अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-July
साधना मार्ग पर आकर्षित एवं प्रोत्साहित कर सकें। साधारण कठिनाइयों को हल करने में हम अब तक सामने आये। व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ सहयोग करते रहे हैं, आगे थोड़े लोगों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे ताकि वे स्थायी रूप से अपनी समस्याओं का समाधान करके इस स्थिति में पहुँच सकें कि दूसरों की समस्याऐं हल करने में उसी प्रकार सहयोग दे सकने की क्षमता प्राप्त कर लें, जैसी कि अब तक हमारी गतिविधि रही है। अपना काम समाप्त करते हुए आखिर कुछ लोग तो पीछे छोड़ने ही हैं जो इस महान परम्परा को आगे भी गर्व और गौरव के साथ जारी रख सकें। इनका निर्माण अब भी न किया गया तो आखिर फिर वह समय आवेगा भी कब?
साधना पद्धति की भिन्नता है, तथापि ब्रह्मविद्या के इन अनेक रूपों के अन्तस्तल में स्वरूपगत एकता बनी हुई है। ब्रह्म की शक्ति और उसके जीवन को भव्य बनाने के संबंध में उनमें कहीं भी मतभेद नहीं है। परमात्मा की उपासना चरित्र निर्माण का अत्यन्त आवश्यक अंग है, यह बात यह सब स्वीकार करते हैं।
साधना से उत्तरोत्तर सफल होता हुआ आगे बढ़ता रहता है।
साधना जन्म जन्मान्तरों तक की अवधि ले सकती है। सेवा मार्ग से जिस मनःशाँति के लिये मनुष्य को एक जीवन ही काफी है उसके लिये हठ पूर्वक जन्म जन्मान्तरों का मूल्य चुकाना महंगा ही कहा जायेगा। वैसे जो सामर्थ्यवान हैं वे चुकाते भी हैं और एक लम्बी यात्रा का श्रम करके अपना लक्ष्य प्राप्त भी कर लेते हैं। किन्तु जनसामान्य के लिये यह व्यवहार-सम्मत कहा जाना उपयुक्त नहीं जान पड़ता। मन बड़ा दुराग्रही, चंचल तथा बलवान है।
साधना में लगाता है फलस्वरूप उसकी आत्मिक प्रगति होती है और वह अपने सूक्ष्म आध्यात्मिक स्वरूप को भी समझने लगता है।
साधना का प्रतिफल क्या है —आत्म-बोध। आत्म-बोध, आत्मतोष, आत्म प्रसाद अथवा आत्म सुख। सेवा के सत्कर्म करने पर इस सुफल की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। आज ही कोई छोटा-सा सेवा कार्य की याद कर देखिये—आप पायेंगे कि उक्त छोटे सेवा कार्य में जितनी आत्म प्रसन्नता, आत्म संतोष प्राप्त हुआ है उतना सप्ताह भर की पूजा उपासना अथवा तपश्चर्या में भी नहीं प्राप्त हुआ। यह यथार्थ तथा व्यक्तिगत अनुभव कोई भी बड़ा-छोटा व्यक्ति स्वयं ही करके निर्णय कर सकता है कि परोपकार तथा सेवा सत्कार्य सद्य फल-दाता होते हैं।
साधना भंग हो गई और वे पत्नी के भरण पोषण की चिन्ता करने लगे। घर की परिस्थिति ऐसी न थी कि रामानुजम् के साथ उनकी पत्नी का भी भरण पोषण किया जा सकता। फिर रामानुजम् की गैरत ही यह कब गवारा करती कि वे अपनी पत्नी के भरण-पोषण का भार अपने कम आय वाले पिता के सिर पर डालकर अपने गणित-सिद्धान्तों की खोज में लगे रहते। अब जब उन्होंने गृहस्थ जीवन अपना ही लिया था तो उसके संवाहन-कर्तव्य से विमुख किस प्रकार हो सकते थे। निदान इन्टर से पढ़ाई छोड़कर वे उपार्जन की चिन्ता में घूमने लगे।
साधना क्षण मात्र में भंग हो जाती है। वर्षों के साधे हुये संकल्प चारित्रिक विकल्प से नष्ट हो जाते हैं और तब बहुधा साधक को पुनः ‘अ’ ‘आ’ से यात्रा प्रारम्भ करनी पड़ती है। इस प्रकार के संकल्प-विकल्पों का क्रम न जाने कब तक चलता रहता है। यह मनः मार्गीय अध्यात्म साधना जन्म जन्मान्तरों तक की अवधि ले सकती है। सेवा मार्ग से जिस मनःशाँति के लिये मनुष्य को एक जीवन ही काफी है उसके लिये हठ पूर्वक जन्म जन्मान्तरों का मूल्य चुकाना महंगा ही कहा जायेगा।
साधना अथवा पूजा अर्चना की जरूरत नहीं पड़ती। शिष्ट व्यवहार स्वयं ही अपने में एक पूजा है, एक उपासना है। एक उपासक तो केवल एक ईश्वर की कल्पना करके उसकी पूजा किया करता है, उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न किया करता है, किन्तु एक नम्र एवं शिष्ट व्यक्ति न जाने कितने मनुष्यों की आत्मा प्रसन्न किया करता है जो कि ईश्वर का ही अंश होती है। उपासक एक देव की पूजा करता है और शिष्ट व्यक्ति अपने शालीन व्यवहार से सार्वजनिक विराट भगवान की पूजा किया करता है शिष्ट व्यवहार को केवल व्यवहार नहीं पूजा के भाव से ही देखना चाहिये।
साधना क्रम का सामान्य प्रशिक्षण हो चुका। अब जिनने उसे सीख लिया है वे दूसरों को सिखावें। हमें आस्थावान लोगों की उपासना को इतना परिपक्व एवं प्रखर बनाने में अपना ध्यान केन्द्रित करना है, जिससे वे स्वयं एक अनुकरणीय उदाहरण बनकर दूसरों को साधना मार्ग पर आकर्षित एवं प्रोत्साहित कर सकें। साधारण कठिनाइयों को हल करने में हम अब तक सामने आये। व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ सहयोग करते रहे हैं, आगे थोड़े लोगों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे ताकि वे स्थायी रूप से अपनी समस्याओं का समाधान करके इस स्थिति में पहुँच सकें कि दूसरों की समस्याऐं हल करने में उसी प्रकार सहयोग दे सकने की क्षमता प्राप्त कर लें, जैसी कि अब तक हमारी गतिविधि रही है।
साधना अथवा आराधना की अपेक्षा आत्मिक सुख के मार्ग परमार्थ की ओर बढ़ने के लिये—’सेवा’ सबसे सरल साधन एवं उपाय है।
साधनाओं के गूढ़ रहस्य जानने के लिए,कई अन्यान्य प्रयोजनों से आते हैं। इनकी सामयिक सेवा कर देने से हमारा कर्तव्य पूरा हो जाता है। उनके बारे में न हम अधिक सोचते हैं और न उनकी कोई शिकायत या चिन्ता करते हैं।
साधना तपस्या बन नहीं पड़ती, जिससे अभीष्ट सहायता पहुँचाई जा सके। पाँच वर्ष बाद हमें इस दृष्टि से अधिक अवसर मिलेगा, तदनुरूप समर्थता भी बढ़ेगी। हमें न स्वयं की कामना है न मुक्ति की। इस जन्म में जो हमारा आध्यात्मिक उपार्जन हो उसे इस ऋण को चुकाने में ही लगा देंगे जो भावनाशील परिजनों द्वारा आत्मीयता एवं श्रद्धा के रूप में हमें उपलब्ध हुआ है। जिसने हमें जितना दिया है उसे ब्याज समेत लौटा देने की हमारी कामना आज रह-रह कर उठ रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-September
साधना यह है कि वे अपने शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं पुष्ट बनायें। जो असमर्थ व्यक्ति साधारण तम दैनिक श्रम नहीं कर सकता—अपने जीवन संकट को ठीक से नहीं खींच सकता वह साधन समर में आवश्यक संयमों का निर्वाह कर सकेगा—काम, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या, डाह आदि शत्रुओं से डटकर मुकाबला कर सकेगा ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती। साधन समर के लिये स्वस्थ एवं पुष्ट शरीर की अनिवार्य आवश्यकता है जिसे पूरा किये बिना कोई भी व्यक्ति अध्यात्म पथ पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा रहती है” यह तथ्य किसी भी आध्यात्मिक जिज्ञासु को नहीं भूलना चाहिए।
साधना की प्रमुख एवं प्रथम आवश्यकता है। शरीर को स्वस्थ, सबल एवं सक्षम बनाने सात्विक आहार, इन्द्रिय संयम मानसिक संतुलन, व्यवस्थित दिनचर्या के अतिरिक्त उचित मात्रा में शारीरिक श्रम करना भी है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए व्यायाम आवश्यक है। श्रम करने को तो यों सभी लोग कुछ न कुछ शारीरिक श्रम करते रहते हैं। किसान तथा मजदूर तो केवल शारीरिक श्रम के आधार पर ही अपनी जीविका कमाते हैं।
साधनाओं में स्वाध्याय के लिये महत्वपूर्ण सद्ग्रन्थ पढ़ने से हृदय में निर्मलता और मन में एकाग्रता की वृद्धि होती है। विवेक उज्ज्वल और बुद्धि प्रखर होती है। मन को संयमित एवं सुशील बनाने में पुस्तकों का अध्ययन बड़ी सीमा तक सहायक होता है। निरन्तर प्रेरणाप्रद, जीवनोंपवागी पुस्तकें पढ़कर तन्मयता का गुण सहज रूप से बढ़ाया जा सकता है। सदाचार, सद्विचार तथा सद्वृत्तियाँ बढ़ाने में तो पुस्तकों का योगदान सबसे अधिक रहता है।
साधना आनन्दमय, मधुमय एवं प्रेममय रूप में ही की है।
साधना-क्रम में प्रवेश करने वाले को आरम्भ में ही भय और प्रलोभन-भरी कितनी ही विभीषिकाओं का सामना करना पड़ता है। जो उनमें असफल हुआ उसे तन्त्र-शक्ति के अवतरण से वंचित रहना पड़ा।
साधना द्वारा अपना आन्तरिक स्तर कितना परिष्कृत किया है, इसी आधार पर वह ब्राह्मी-शक्ति अवतरित होती है। मनोभूमि में अधिकाधिक पात्रता उत्पन्न करने के प्रयोजन से ही उपासना की जाती है महाशक्ति ने अपनी जिन विभूतियों का वर्णन उपरोक्त श्लोकों में आत्म-परिचय देते हुए किया है, वे सभी उसमें प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं। आवश्यकता केवल उतनी भर रह जाती है कि व्यक्ति अपने में पात्रता उत्पन्न करे और उन लाभों से लाभान्वित हो, उन विभूतियों को धारण करके दैवी-जीवन जी सकने की स्थिति तक पहुँचे।
साधना की वह कसौटी है जिसमें तपकर जीव विशुद्ध बनता है और ब्रह्म में मिलन की स्थिति प्राप्त करता है। जीव और परमात्मा के बीच जो तादात्म्य है वह अपने शुद्ध रूप में प्रेम द्वारा ही प्रकट होता है। प्रेम न होता तो इस पृथ्वी पर लोगों को आध्यात्मिक तत्वों की अनुभूति भी न होती। यह स्थिति प्रारम्भ में आत्मस्वरूप की प्राप्ति के लिये विकलता, विरह के रूप में प्रकट होती है पर जिन्हें स्वाभाविक रूप में वह स्थिति प्राप्त न हो और वे ईश्वर को प्राप्त करना अपने जीवन का उद्देश्य मान गये हों तो उन्हें भी प्रेम का अभ्यास करना पड़ता है। तप, त्याग और सुख की इच्छाओं का दमन कर अन्तःकरण की प्रेम-प्रवृत्ति को जागृत करना पड़ता है।
साधना लगा करती है। एक-एक वस्तु तैयार होने और उपयोग की दशा में लाने तक प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से लाखों-करोड़ों लोगों का सहयोग रहा करता है।
साधना का लक्ष्य है। जिसे शत्रु-भय, अस्वास्थ्य भय, मृत्यु भय, अयश भय, हानि भय, विछोह भय आदि सताते रहते हैं वह एक प्रकार से जीते जी नरक में पड़ा रहता है। भय, चिन्ताओं को जन्म देने वाला विष बीज है। जिसके हृदय में चिन्ता की ज्वाला जल रही है जिसकी बुद्धि विविध प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष भयों से भ्रमित हो रही है, वह आध्यात्मिक पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। इन्हीं भवभयों पर विजय पाना ही आध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है।
साधना के साथ विद्या-लाभ कर सकें और न पूर्वकाल जैसे वनस्थली ही रह गये हैं जहाँ सन्यासावस्था में सुरक्षा पूर्वक रहा जा सके और आत्म-कल्याण की साधना की जा सके। इसीलिये ब्रह्मचर्य-आश्रम को गृहस्थ आश्रम एवं संन्यास आश्रम को वानप्रस्थ आश्रम में ही जोड़कर वास्तविक प्रयोजन को चरितार्थ किया जाये यही उचित है। जिस प्रकार आज बालक घर रहकर ही माता-पिता के अवधान में विद्याध्ययन करता है, वहीं रहकर अपनी शक्तियों एवं योग्यताओं का विकास करता है उसी प्रकार संन्यास स्थिति का पालन समाज-सेवा द्वारा, वानप्रस्थ में ही किया जाये।
साधना की जा सके। इसीलिये ब्रह्मचर्य-आश्रम को गृहस्थ आश्रम एवं संन्यास आश्रम को वानप्रस्थ आश्रम में ही जोड़कर वास्तविक प्रयोजन को चरितार्थ किया जाये यही उचित है। जिस प्रकार आज बालक घर रहकर ही माता-पिता के अवधान में विद्याध्ययन करता है, वहीं रहकर अपनी शक्तियों एवं योग्यताओं का विकास करता है उसी प्रकार संन्यास स्थिति का पालन समाज-सेवा द्वारा, वानप्रस्थ में ही किया जाये।
साधना का लक्ष्य है। भयों से मुक्त हो जाने पर मनुष्य की आत्मा एक अनिवर्चनीय सुख शाँति की अनुभूति पाती है—एक ऐसी निःशंक सुख शाँति की अनुभूति जो ब्रह्मानन्द के समकक्ष ही होती है।
साधना-
साधना सभी देशों के भक्तों एवं साधकों में देखी जाती है। उपनिषद् में भगवान को “मधु ब्रह्म” कहा है यह उसका विशुद्ध प्रेममय स्वरूप ही है। परमात्मा प्रेम द्वारा ही मधुर होता है—’मधुक्षरन्तितद्ब्रह्म’ जिससे मधु अर्थात् प्रेम प्रकीर्ण होता है वही ब्रह्म है। अपने इसी रूप में वे भक्त के लिये, आराधक के लिये पुत्र, धन आत्मीय स्वजन—इन सबसे बढ़कर प्रियतम हो जाते हैं। महापुरुष ईसा का कथन है—’प्रेम परमेश्वर है’।
साधना एवं उपासना है। इस पुण्य प्रक्रिया द्वारा पुरुषार्थी साधक अपनी आन्तरिक स्थिति इतनी विकसित कर लेते हैं कि इस निखिल महदाकाश में संव्याप्त उस ब्राह्मी-महाशक्ति—गायत्री—से अपना संबन्ध स्थापित कर सकें। यह सम्बन्ध जितना स्पष्ट और जितना प्रौढ़ होता है, उतनी ही उच्चस्तरीय विभूतियाँ मनन-क्षेत्र में अवतरित होती है। यह अवतरण ही मनुष्य को महापुरुष, सिद्ध-पुरुष एवं अतिमानव के रूप में विकसित करता है।
साधनाओं एवं साधनों की आवश्यकता है उनमें शरीर रूपी साधन को सक्षम, समर्थ एवं सुयोग्य बनाने के लिए स्वास्थ्य-साधना की प्रमुख एवं प्रथम आवश्यकता है। शरीर को स्वस्थ, सबल एवं सक्षम बनाने सात्विक आहार, इन्द्रिय संयम मानसिक संतुलन, व्यवस्थित दिनचर्या के अतिरिक्त उचित मात्रा में शारीरिक श्रम करना भी है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए व्यायाम आवश्यक है। श्रम करने को तो यों सभी लोग कुछ न कुछ शारीरिक श्रम करते रहते हैं। किसान तथा मजदूर तो केवल शारीरिक श्रम के आधार पर ही अपनी जीविका कमाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-April
साधना है। सेवा धर्म को अपनाये बिना किसी आत्मा में से आन्तरिक उल्लास प्रस्फुटित नहीं हो सकता। आज इस धूर्तता के युग में निठल्ले, कामचोर व्यक्ति संसार को मिथ्या बताकर मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाते और आलस में पड़े रहने का नाम त्याग, वैराग्य बताते हैं। यह कलियुगी परिभाषा है। आज लाखों व्यक्ति इस अनाचार से ग्रसित होकर उत्थान की तो बात ही कहाँ उल्टे पतन के गहरे गर्त में गिरते चले जा रहे हैं।
साधना ही मानता हूँ।”
साधना-पद्धति मानना चाहिये। यह आस्था हमारे मनों में इतनी गहरी जमे कि उसे क्रियान्वित किए बिना किसी से रहा ही न जा सके तो अखण्ड-ज्योति अपने प्रयत्नों की सार्थकता माने और हम अपने श्रम को सफल हुआ समझें।
साधना कहलाता है और उसी से सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिक प्रगति होती है। अध्यात्म तत्व-ज्ञान का यही रहस्य एवं मार्ग है। जिनने इसके शार्टकट निकाले हैं उनने भारी भूल की है। जो केवल थोड़े से भजन का, टंट-घंट का सहारा लिये बैठे हैं और वह लाभ पाने की आशा करते हैं—जो त्रिविध समग्र साधना करने पर ही किसी को मिल सकती है—तो इसे एक भूल ही कहना चाहिए। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति का एक पाठक भी इस भूल या भ्रम में न रहे।
साधना ही है। इसमें जिसकी जितनी निष्ठा एवं तत्परता होगी, उसे उतने ही बड़े स्तर का अध्यात्म लाभ होगा, और इस लाभ से वह उतना आनन्द प्राप्त कर रहा होगा।
साधना करने पर ही किसी को मिल सकती है—तो इसे एक भूल ही कहना चाहिए। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति का एक पाठक भी इस भूल या भ्रम में न रहे। यदि उनसे उपासना में निष्ठा प्रदर्शित की है जो फिर दो कदम और भी आगे बढ़ाने चाहियें। जीवन-शोधन और परमार्थ के लिये भी उसे उतना ही मन, उतना ही अपना ध्यान, समय और श्रम संलग्न करना चाहिये। जहाँ वह त्रिविध समन्वय हुआ कि अध्यात्म का आशाजनक, आश्चर्यमय एवं उत्साहवर्धक परिणाम सामने आना आरम्भ हो जायगा।
साधना पर बढ़ रहे होंगे, और उनकी आध्यात्मिक प्रगति का एक तिहाई पथ प्रशस्त हो रहा होगा।
साधना-पथ की कठिनाइयों से पूरी तरह अवगत थे। बालक की दृढ़ता पर वे एकाएक विश्वास न कर सके अतः उन्होंने नचिकेता को सम्बोधित करते हुये कहा—”वत्स! तुम इस आत्म-ज्ञान को प्राप्त कर क्या करोगे, मैं तुम्हें सुख-सामग्रियों से भरपूर राज्य कोष, घोड़े, हाथी, रूपवती स्त्रियाँ और सौ वर्ष जीने वाले बहुत से पुत्र दे सकता हूँ, तुम चाहो तो इन्हें प्राप्त कर बहुत दिनों तक इस धरती का सुखोपभोग करो। यह आत्म-ज्ञान बड़ा कठिन है तुम ऐसी तपश्चर्या क्यों करना चाहते हो? दीर्घ-जीवन व्यापी सामर्थ्य प्राप्त कर इस संसार के सुखोपभोग क्यों नहीं माँग लेते।”
साधना (3) परमार्थ-तीनों ही साधना क्रमों को अपनाया है और उस समग्र साधना का वैसा ही लाभ देखा है, जैसा कि प्राचीनकाल के साधकों को मिलता था, अथवा शास्त्रों में जैसा लिखा है। हमने केवल भजन ही नहीं किया है, वरन् अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में कम श्रम नहीं किया है। इसके लिये लोक-मंगल के लिये सेवा संलग्न रहने की प्रवृत्तियों में तनिक भी कमी नहीं आने दी है। जीवनोत्कर्ष की प्रेरणा भर देने वाले साहित्य का सृजन, संगठन, प्रशिक्षण एवं व्यक्तिगत रूप से भी जो जिसकी जितनी सेवा सहायता बन पड़े उसके लिए अपना तप पूँजी का अनुदान, यह प्रक्रिया सदा से ही हमने चलाई है और यह माना है कि जीवन-शोधन एवं लोक सेवा के यह दोनों कार्य भी उपासना के अविच्छिन्न अंग हैं। इन अंगों को हटा दिया जाय और चौबीस घण्टे केवल भजन करते रहा जाय तो वह भजन ऐसा ही अपूर्ण होगा जैसा सिर और पैर काट देने के उपरान्त पड़ा हुआ बीच वाला धड़।
साधना के तीनों ही अंग समान रूप से उपयोगी हैं। इन तीनों का सम्मिश्रित स्वरूप ही समाज साधना कहलाता है और उसी से सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिक प्रगति होती है। अध्यात्म तत्व-ज्ञान का यही रहस्य एवं मार्ग है। जिनने इसके शार्टकट निकाले हैं उनने भारी भूल की है। जो केवल थोड़े से भजन का, टंट-घंट का सहारा लिये बैठे हैं और वह लाभ पाने की आशा करते हैं—जो त्रिविध समग्र साधना करने पर ही किसी को मिल सकती है—तो इसे एक भूल ही कहना चाहिए।
साधना के पथ पर धैर्यपूर्वक अन्त तक टिके रह पाते हैं।
साधना हम में से हर एक को आरम्भ कर देनी चाहिए। जीवन-शोधन की आधार शिला इस दैनिक आत्म-चिन्तन पर ही अवलम्बित है।
साधना में संलग्न होना ही है। प्राचीनकाल में प्रत्येक संत और ब्राह्मण को इसी मार्ग पर चलना पड़ा है। उनमें से हर एक ने लोक-सेवा का व्रत लिया और उसे आजीवन निवाहा है। परोपकार एक विशुद्ध आध्यात्मिक साधना है। सेवा धर्म को अपनाये बिना किसी आत्मा में से आन्तरिक उल्लास प्रस्फुटित नहीं हो सकता।
साधना के रूप में बदल गया। अभी तक ये अपने विचार से पीड़ितों की सेवा कर अपने मानवीय कर्तव्य का पालन करते थे, किन्तु अब उनका विश्वास हो गया कि मानव-सेवा के माध्यम से साक्षात् परमात्मा की ही भक्ति कर रहे हैं। उन्होंने अपनी इस आध्यात्मिक अनुभूति को व्यक्त करते हुये कहा-
साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम की साधना करने के लिए मथुरा रहना ही चाहिए, पर यदि इतना न बन पड़े तो एक वर्ष तो रहना ही चाहिए। इस एक वर्ष में वे अपने गायत्री पुरश्चरण अधिक उत्तम रीति से कर सकते हैं। साथ ही गीता, रामायण, वेद, शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन आदि का सार-तत्व भी एक नियमित पाठ्यक्रम के रूप में बढ़ाया जायगा। गृहस्थ में प्रवेश करने से पूर्व जिस प्रकार बालकों को हिसाब, भूगोल, भाषा आदि की पढ़ाई पढ़नी पड़ती है उसी प्रकार पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व—ब्रह्मविद्या की शिक्षा भी प्राप्त करनी चाहिए। यह प्रशिक्षण एक वर्ष का तो होना चाहिए।
साधना में उसके दो अंग हैं। (1) दोष दुर्गुणों का निवारण एवं (2) सद्गुणों का अभिवर्धन। गाड़ी दो पहियों से चलती है, उसी प्रकार जीवन-साधना के भी यह दो ही अवलम्बन हैं। जीव रूपी पक्षी इन दो पंखों के सहारे ही आत्म-कल्याण के आकाश में उड़ता है। दोष दुर्गुणों से रहित होने के लिए कई व्यक्ति प्रयत्न करते हैं और उसमें सफल भी हो जाते हैं।
साधना पर दिया जाय और कहीं अधिक माहात्म्य उस आत्म-निर्माण के प्रयास का समझा जाय। अखण्ड-ज्योति इसी दिशा में अपने परिवार का पथ-प्रदर्शन करती है। हम पत्रिका एवं पुस्तकों से विचार-क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न करते हैं। पर साथ ही यह भी सुझाया जा रहा है कि आत्म-निर्माण का अभ्यास तत्परतापूर्वक जारी रखें। इसे न तो गौण समझें और न महत्वहीन वरन् सच तो यह है कि उपासना का प्राण भाग, हृदय संस्थान यह जीवन साधना ही है।
साधना-क्रम चल रहा है वहाँ उत्साहपूर्वक जारी रखा जाय और जिन्होंने अभी भाग नहीं लिया हो वे अब लेना आरम्भ कर दें।
साधना के भी यह दो ही अवलम्बन हैं। जीव रूपी पक्षी इन दो पंखों के सहारे ही आत्म-कल्याण के आकाश में उड़ता है। दोष दुर्गुणों से रहित होने के लिए कई व्यक्ति प्रयत्न करते हैं और उसमें सफल भी हो जाते हैं। चोरी, व्यभिचार, असत्य भाषण, जुआ, चुगली आदि छोड़ देते हैं। यह छोड़ने का प्रयत्न आत्मिक प्रगति की आधी आवश्यकता पूरी करता है।
साधना जीवन को शुद्ध बनाना है। पाप और विकार ही आत्मा के बन्धन माने गये हैं अतः उनसे मुक्ति पाने का प्रयत्न किया जाता है। पीछे जो पाप हो गये हैं उनके प्रक्षालन के लिए प्रायश्चित और तपश्चर्या करनी पड़ती है। इसके बिना आत्म-ज्ञान के लिए जिस एकाग्रता और दृढ़ता की आवश्यकता होती है वह नहीं हो पाती। पापों में रत और चित्तवृत्तियों का शोधन न करने वालों के मन सदैव अशान्त रहते हैं।
साधना-पद्धति है। परिजनों को हम बहुत जोर देकर कहते रहते हैं कि वे प्रातः उठते समय यह योजना बनाया करें कि आज का दिन एक समग्र जीवन है, इसे रात्रि की मृत्यु आने तक कितने अच्छे ढंग से व्यतीत किया जा सकता है, यह सोचे और करे। प्रातः इस आधार पर बनाई गई योजना को रात्रि तक कड़ाई के साथ पालन किया जाय। दिनचर्या पूरी करते हुये बराबर यह ध्यान रखा जाय कि प्रातः निर्धारित कार्य-पद्धति में कहीं भूल तो नहीं हो रही है। चूक को तुरन्त सँभाला जाय।
साधना का वैसा ही लाभ देखा है, जैसा कि प्राचीनकाल के साधकों को मिलता था, अथवा शास्त्रों में जैसा लिखा है। हमने केवल भजन ही नहीं किया है, वरन् अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में कम श्रम नहीं किया है। इसके लिये लोक-मंगल के लिये सेवा संलग्न रहने की प्रवृत्तियों में तनिक भी कमी नहीं आने दी है। जीवनोत्कर्ष की प्रेरणा भर देने वाले साहित्य का सृजन, संगठन, प्रशिक्षण एवं व्यक्तिगत रूप से भी जो जिसकी जितनी सेवा सहायता बन पड़े उसके लिए अपना तप पूँजी का अनुदान, यह प्रक्रिया सदा से ही हमने चलाई है और यह माना है कि जीवन-शोधन एवं लोक सेवा के यह दोनों कार्य भी उपासना के अविच्छिन्न अंग हैं। इन अंगों को हटा दिया जाय और चौबीस घण्टे केवल भजन करते रहा जाय तो वह भजन ऐसा ही अपूर्ण होगा जैसा सिर और पैर काट देने के उपरान्त पड़ा हुआ बीच वाला धड़।
साधना में संलग्न रहते हैं और आत्म-ज्ञान का लाभ प्राप्त करते हैं। यह मार्ग कायरों के लिए कठिन है पर पुरुषार्थियों के लिए कठिन नहीं होता। वे इन कठिनाइयों में भी अपने जीवन का आनन्द ढूँढ़ लेते हैं और अन्त तक तत्परतापूर्वक अभ्यास करते रहते हैं। यह आत्मा अन्त में उन्हीं वीर पुरुषों को प्राप्त होता है। वही स्वर्ग और मुक्ति के अधिकारी होते हैं।
साधना-क्रम भी जुड़ा हुआ हो। जीवन-साधना के बिना उपासना अधूरी है। आज लाखों धर्म-जीवी केवल कुछ थोड़ा-सी उपासना की टंट-घंट करके आत्म-कल्याण की आशा लगाये रहते हैं, फलतः उन्हें सर्वथा निराश एवं असफल ही रहना पड़ता है। हमें जानना चाहिए कि अध्यात्म-लाभ बड़ा लाभ है, अतएव उसकी कीमत भी बड़ी है। आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए प्रयत्न करने से कम मूल्य पर उस लाभ को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
साधना क्रमों को अपनाया है और उस समग्र साधना का वैसा ही लाभ देखा है, जैसा कि प्राचीनकाल के साधकों को मिलता था, अथवा शास्त्रों में जैसा लिखा है। हमने केवल भजन ही नहीं किया है, वरन् अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में कम श्रम नहीं किया है। इसके लिये लोक-मंगल के लिये सेवा संलग्न रहने की प्रवृत्तियों में तनिक भी कमी नहीं आने दी है। जीवनोत्कर्ष की प्रेरणा भर देने वाले साहित्य का सृजन, संगठन, प्रशिक्षण एवं व्यक्तिगत रूप से भी जो जिसकी जितनी सेवा सहायता बन पड़े उसके लिए अपना तप पूँजी का अनुदान, यह प्रक्रिया सदा से ही हमने चलाई है और यह माना है कि जीवन-शोधन एवं लोक सेवा के यह दोनों कार्य भी उपासना के अविच्छिन्न अंग हैं। इन अंगों को हटा दिया जाय और चौबीस घण्टे केवल भजन करते रहा जाय तो वह भजन ऐसा ही अपूर्ण होगा जैसा सिर और पैर काट देने के उपरान्त पड़ा हुआ बीच वाला धड़।
साधना की अविच्छिन्न शर्त के रूप में अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
साधना से विचलित करने का हर संभव प्रयत्न करते हैं। कुचली हुई वासनाओं को जब भी अवकाश मिलता है वे ऐसे-ऐसे प्रलोभनकारी रूपक रचकर मनुष्य को लुभाती हैं कि आत्म-ज्ञान का सारा महत्व उसकी आँखों से ओझल हो जाता है, बात की बात में साधक पथभ्रष्ट होकर रह जाता है।
साधना की पूर्ति परमार्थ के द्वारा ही होगी। आज की सामयिक आवश्यकता जन मानस में प्रेरणाप्रद भावनाओं का बीज बोने की है। हमें उसी को पूरा करना चाहिये। युग निर्माण योजना, इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए है। वैसे ही अपना काम धंधा करते हुए जिनसे भी संपर्क हो उन्हें नव-निर्माण की प्रेरणा देते रहना कुछ कठिन नहीं है, और इसे स्वभाव एवं अभ्यास में सम्मिलित कर लिया जाय तो बहुत काम हो सकता है।
साधना करने के लिए मथुरा रहना ही चाहिए, पर यदि इतना न बन पड़े तो एक वर्ष तो रहना ही चाहिए। इस एक वर्ष में वे अपने गायत्री पुरश्चरण अधिक उत्तम रीति से कर सकते हैं। साथ ही गीता, रामायण, वेद, शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन आदि का सार-तत्व भी एक नियमित पाठ्यक्रम के रूप में बढ़ाया जायगा। गृहस्थ में प्रवेश करने से पूर्व जिस प्रकार बालकों को हिसाब, भूगोल, भाषा आदि की पढ़ाई पढ़नी पड़ती है उसी प्रकार पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व—ब्रह्मविद्या की शिक्षा भी प्राप्त करनी चाहिए। यह प्रशिक्षण एक वर्ष का तो होना चाहिए।
साधना में संलग्न है। अपने पाठकों में वह हर मास ऐसी प्रेरणा एवं ज्योति प्रदीप्त करती है, जिससे आदर्शवादिता के मानवोचित सत्पथ पर चलते हुए जीवन को सार्थक बना सकना सम्भव हो सके। यह प्रेरणा किसने कितनी ग्रहण की? इसकी परख इसी कसौटी पर की जा सकती है कि कौन उस प्रेरणा को अपने व्यावहारिक जीवन में किस सीमा तक कार्यान्वित कर रहा है? विचारों में विलक्षण शक्ति तो अवश्य है, पर वह सजीव तभी होती है, जब कार्य रूप में परिणत होती चले।
साधना के बिना उपासना अधूरी है। आज लाखों धर्म-जीवी केवल कुछ थोड़ा-सी उपासना की टंट-घंट करके आत्म-कल्याण की आशा लगाये रहते हैं, फलतः उन्हें सर्वथा निराश एवं असफल ही रहना पड़ता है। हमें जानना चाहिए कि अध्यात्म-लाभ बड़ा लाभ है, अतएव उसकी कीमत भी बड़ी है। आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए प्रयत्न करने से कम मूल्य पर उस लाभ को प्राप्त नहीं किया जा सकता। सोना सस्ता नहीं बिकता और न हीरा कम दाम में खरीदा जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-November
साधना में लगाया। राजा चित्रकेतु अन्त में आत्म-ज्ञान प्राप्त कर जीवन-मुक्त हो गया।
साधना करने के सत्परिणामों का तो कहना ही क्या है।
साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना के द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त करने से चूकते हैं वे मन्दबुद्धि हैं। जो द्विज गायत्री मन्त्र के होते हुए भी अन्य मन्त्रों की साधना करते हैं वे ऐसे ही हतभागी हैं जैसे कि चिन्तामणि को फेंककर छोटे-छोटे चमकीले पत्थर ढूँढ़ते फिरने वाले।
साधना भी मिल जायेगी पर उसकी पूर्णता और सफलता के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता पड़ेगी, उसकी पूर्ति आज से 5 वर्ष बाद ही सम्भव है। इसलिए अभी जो सीखा है उसे परिपक्व करना, आगे की आवश्यक जानकारी प्राप्त करना तथा मनोभूमि तैयार करना ही पर्याप्त है।
साधनाएं, तपश्चर्याएँ कभी निष्फल नहीं जाती। हमारा यह प्रयोग भी निष्फल जाने वाला नहीं है।
साधना असंदिग्ध रूप से सफल होती है। किन्तु जो केवल कर्मकाँड सीखकर ही सन्तुष्ट हो बैठते हैं उनके हाथ यदि कुछ पड़े भी तो वह बहुत ही स्वल्प होता है।
साधनाओं को सम्पन्न कर मुक्ति का अधिकारी बनता है। यदि इन बातों को अगम्य बुद्धि मानें तो भी इतना तो है ही कि गाय की उपयोगिता सर्वोच्च है कृषि का सम्पूर्ण भार उसी की पीठ पर है। एक ओर बछड़े देकर और दूसरी ओर स्वास्थ्य का साधन प्रस्तुत कर वह किसान का और इस तरह समाज और राष्ट्र का बड़ा कल्याण करती है।
साधना कर सकता है वह अनुपम स्तर का शक्तिवान् बन सकता है। इतिहास पुराणों में ऐसे असंख्यों प्रसंगों का उल्लेख है जिनसे सिद्ध होता है कि गायत्री उपासना का लाभ अद्भुत, आश्चर्यजनक एवं अलौकिक कहे जाने जितना ही होता है।
साधना का जो प्रशिक्षण गत वर्षों में चला है, अब उस मार्ग के साधक कुछ दिन उसी को पक्का करें। उसी अभ्यास-क्रम को जारी रखें। इस लेख-माला के अंतर्गत उन्हें आगे की शेष साधना भी मिल जायेगी पर उसकी पूर्णता और सफलता के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता पड़ेगी, उसकी पूर्ति आज से 5 वर्ष बाद ही सम्भव है। इसलिए अभी जो सीखा है उसे परिपक्व करना, आगे की आवश्यक जानकारी प्राप्त करना तथा मनोभूमि तैयार करना ही पर्याप्त है।
साधना इसी शरीर के आधार पर ही सम्भव होती तभी है। किन्तु यह सम्भव होती है जब मनुष्य सत्कर्मों द्वारा शरीर का सदुपयोग करता है।
साधना की जा सके उतना ही कम है। प्राचीन काल में इस दिशा में बहुत बड़ी प्रगति की थी, पर यह न समझना चाहिये कि उसमें आगे बढ़ने की गुंजाइश न थी। आगे और भी बहुत कुछ हो सकता था और मनुष्य देवताओं की तरह अजर-अमर बन कर इस धरती को स्वर्ग बना सकता था। यदि उसके हाथ में वेदों से सन्निहित समस्त विज्ञान हाथ लग जाता तो। पर संसार चक्र परिवर्तनशील है।
साधना
साधना है और कहना न होगा कि उपासनाओं में सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोपरि एकमात्र गायत्री महामन्त्र की उपासना ही है।
साधना द्वारा इस पंच-तात्विक देवता को प्रसन्न करने, समृद्धिय पाने, पुण्य-परमार्थ करके आत्मा को मुक्त करने के लिए है, वचन-बाध्य है। “मैं नहीं चाहता”—कहकर मनुष्य इस उद्देश्य से मुक्त नहीं हो सकता। उसका जन्म, उसकी नियुक्ति इस कर्तव्य के लिये ही की गई है और उसने जीवन-लाभ के लिए सर्व समर्थ को यह वचन दिया था कि वह उसके दिये जीवन को सुन्दर एवं समृद्ध बनाकर संसार की शोभा बढ़ायेगा और उसके आत्मा रूपी प्रकाश की किरणें आवरण से मुक्त कर उसमें ही मिला देने की लिए किसी परिश्रम, पुरुषार्थ तथा परमार्थ से विमुख न होगा। परमात्मा ने उसके इसी वचन पर विश्वास करके उसे सृष्टि की सर्वश्रेष्ठता प्रदान की। बल, बुद्धि एवं विवेक सब योग्य बना दिया।
साधना करते हैं वे ऐसे ही हतभागी हैं जैसे कि चिन्तामणि को फेंककर छोटे-छोटे चमकीले पत्थर ढूँढ़ते फिरने वाले।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-October
साधना-विधान कोई बड़ी शास्त्रीय परम्परा पर आधारित न था फिर भी उन्हें अपने उद्देश्य की पूर्ति में आशाजनक सफलता मिली। कबीर की शिक्षा स्वल्प थी, उन्हें मार्गदर्शक भी अनुभवी नहीं मिला। सन्त रामानन्द उनके ऐसे ही गुरु थे जैसे एकलव्य के द्रोणाचार्य। वे प्रत्यक्ष में कबीर के गुरु होने की बात से इनकार करते रहे। रैदास की वंश परम्परा ने उन्हें शास्त्रीय साधना पद्धति का लाभ लेने से वंचित रखा।
साधना की सफलता सुनिश्चित रहेगी।
साधना से लग जाइये।
साधना करके अपने लक्ष्य को अवश्य पा लेंगे। इस प्रकार पुण्यात्मा पुरुष को मृत्यु की कल्पना से भय तो क्या एक आनन्द पुलक की ही प्राप्ति होती है।
साधना की जा सकती है, उसकी उपस्थिति में ही शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास का प्रयत्न किया जा सकता है। यदि जीवन नहीं, तो कुछ भी नहीं। जीवन का अर्थ केवल श्वाँसों का आवागमन मात्र ही नहीं है। जीवन का अर्थ है, प्राणों के साथ मनुष्य में स्वाभिमान, स्वास्थ्य, निर्भयता, आत्म-सम्मान, आशा, उत्साह, अखेद एवं अग्लानि आदि गुणों का होना। यदि मनुष्य की श्वाँस चलती है किन्तु उसमें इस प्रकार के गुण नहीं है, तो वह सच्चे अर्थों में जीवन जीना नहीं है, वैसे तो गति रूपी जीवन कीट-पतंगों में भी रहता है।
साधनाएँ—जिनमें गायत्री उपासना प्रमुख है, एक प्रकार की वैज्ञानिक कृषि है। उसके लिये उपयुक्त साधन आवश्यक हैं। इस संदर्भ में सबसे अधिक आवश्यकता साधक के उत्कृष्ट व्यक्तित्व की है। उसकी मनोभूमि बढ़िया किस्म की होनी चाहिए। यह बढ़ियापन जितना बढ़ा-चढ़ा होगा, उतनी ही साधना की सफलता सुनिश्चित रहेगी।
साधना-
साधना भला क्यों न पूरी होगी?
साधना पद्धति उपहासास्पद है। फिर भी उनने काफी ऊँचाई तक आत्मिक प्रगति कर ली। इसका एकमात्र कारण उनके व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ही थी। मानवीय सद्भावों का बाहुल्य ही उनकी यह विशेषता थी, जिसने उच्चस्तरीय सफलता का अधिकारी उन्हें बना दिया।
साधना विधान अपना-अपना विशिष्ट प्रतिफल उत्पन्न करते हैं पर इसके लिए उनकी समुचित जानकारी इस महाविद्या के प्रयोगकर्ताओं को ठीक तरह अनुभव और अभ्यास में लानी चाहिए। इसके लिए अनुभवी मार्गदर्शक और ऋषि परम्परा की शास्त्रीय पद्धति का अवलम्बन ग्रहण करना चाहिए। साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आध्यात्मिक उपासनाओं के पथ पर गतिशील होने के आकाँक्षी साधक को अपने व्यक्तित्व की उत्कृष्टता बढ़ाना तथा स्थिर रखना नितान्त आवश्यक है। आत्मिक प्रगति की यह एक अनिवार्य शर्त है।
साधना के द्वारा अपना ही नहीं दूसरों का भी कल्याण किया जा सकता है इस तथ्य पर हमारा अटूट विश्वास है। जीवन का अधिकाँश भाग हमने इसी प्रयोग परीक्षण में लगाया भी है। इस अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया से भिन्न प्रकार का कार्य—परिवार का निर्माण—हमें हमारे मार्ग दर्शक ने इस उद्देश्य से सौंपा था कि जिन व्यक्तियों से संपर्क बने उनका आन्तरिक स्तर इतना उठाने का प्रयत्न किया जाय कि वे अपने निज के जीवन में सफल समृद्ध और सामाजिक जीवन में नव निर्माण के प्रकाश स्तम्भ सिद्ध हो सकें। अपनी तुच्छ सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार वह कार्य हमने आरम्भ किया और गत 16 वर्षों में उसने असाधारण रूप से विस्तार भी पाया। 24 लाख सदस्यों वाला गायत्री परिवार अपने आप में एक बहुत बड़ी बात थी।
साधना का विधि-विधान शास्त्रों में सार-रूप में लिखा हुआ है, उसमें कोई बड़ी पेचीदगी नहीं है। विधि-विधानों की मामूली जानकारी किन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर की जा सकती है। उन्हें कर सकना भी कुछ विशेष कठिन नहीं है। लोग करते भी हैं, कर भी रहे हैं, पर साधारण कठिनाइयों या मामूली-सी कामनाओं की पूर्ति के अतिरिक्त वस्तुतः कोई इतना बड़ा प्रभाव उन्हें नहीं दीखता, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि गायत्री महामन्त्र के माध्यम से वेदों में वर्णित आत्म-विद्या के असंख्य चमत्कारी लाभों में से—ऋूद्धि-सिद्धियों में से—कुछ की उपलब्धि वे कर सकेंगे।
साधना—
साधना की हुई यह गायत्री विद्या द्विजों के लिए कामधेनु के समान सब सिद्धियों को देने वाली है।
साधना की हुई गायत्री भला कौन सा ऐसा अभीष्ट लाभ है जिसे प्राप्त नहीं करा सकती?
साधना तपश्चरण उनने की वह उनकी आत्मा का, उनके परिवार का सारे समाज का कुछ भी हित साधन न कर सकी। अतएव हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि जिन्हें वस्तुतः अध्यात्मिकता का लाभ लेना हो, इस मार्ग पर चिरस्थायी और आशाजनक प्रगति करनी हो, उन्हें सबसे पूर्व—सबसे अधिक—ध्यान इस बात पर देना चाहिए कि उनका व्यक्तित्व, उत्कृष्ट स्तर का बने। यही ब्राह्मणत्व है। ब्रह्मवर्चस है। ब्रह्मवर्चस की सारी शक्ति, चेतना एवं क्षमता इसी आधार पर उपलब्ध होती और बढ़ती है।
साधना में संलग्न होना चाहिए।
साधना को सर्वथा त्यागकर आगन्तुकों को पूरा समय दे सकें। इस प्रकार साक्षात सत्संग की सम्भावनायें एवं अवसर आज नहीं के बराबर ही रह गये हैं।
साधनाएँ फलित हुआ करती हैं। गन्ने की, गुलाब की या दूसरी कीमती फसलें पैदा करने के लिए वाटिका को जमीन की आवश्यकता पड़ती है। उसमें खाद-पानी का समुचित प्रबंध करना होता है। यदि ऐसा न हो सके, ऊसर, बंजर में बिना जोते-बोए बीज बो दिया जाए, वहाँ खाद-पानी तथा सुरक्षा का प्रबन्ध न हो तो अच्छी फसल की आशा किस प्रकार की जा सकेगी? आध्यात्मिक साधनाएँ—जिनमें गायत्री उपासना प्रमुख है, एक प्रकार की वैज्ञानिक कृषि है।
साधनार्थ दी जाने वाली दान की परम्परा आज भी चली आती है किन्तु इस पर से विवेक का अंकुश हटा लेने से यह दान की पुण्य परम्परा तुच्छ भिक्षावृत्ति में विकृत हो गई है, जो व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक, किसी के लिये भी, किसी प्रकार भी कल्याणकारी नहीं हैं। आज इसमें सुधार किये जाने की बहुत बड़ी आवश्यकता आ पड़ी है।
साधना पद्धति का लाभ लेने से वंचित रखा। मीरा केवल भजन, कीर्तन, नृत्य एवं भावोन्माद तक अपना साधन विधान सीमित रख सकी। शबरी किस प्रकार की उपासना पद्धति अपनाये रही कुछ पता नहीं चलता। बाल्मीकि तो सीधा राम नाम भी न ले सके उन्हें ‘मरा’ ‘मरा’ का उलटा नाम जप कर ही आगे बढ़ना पड़ा। ऐसे उदाहरण साधन इतिहास के पन्ने-पन्ने पर भरे पड़े हैं।
साधना का मुख्य उद्देश्य मानवता का उच्चतम स्तर प्राप्त करना ही है। मानवता की चरमावधि पर पहुँचकर मनुष्य दैवत्व की परिधि में प्रवेश करता है और वहाँ से शनैः-शनैः उठता हुआ ईश्वरीय परिधि की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार ईश्वर प्राप्ति की सोपान परम्परा में मनुष्य का विकास आदि सोपान है। आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिये जिज्ञासु व्यक्ति को सर्वप्रथम अपनी मनुष्यता का ही विकास करने का प्रयत्न चाहिये। जो साधक मनुष्यता का विकास न कर सीधे-सीधे ईश्वर प्राप्ति की कामना से साधना रत रहते हैं, उनको अपने उद्देश्य में सफलता मिल सकना असम्भव ही समझना चाहिये।
साधना रत रहते हैं, उनको अपने उद्देश्य में सफलता मिल सकना असम्भव ही समझना चाहिये।
साधना निष्फल ही चली जायेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-May
साधना संस्थानों की दृष्टि से किया गया था। आज तो सब कुछ उल्टा हो रहा है, तो तीर्थ का स्वरूप भी उल्टा क्यों न होगा?
साधना का कुछ वास्तविक लाभ देखना हो, उन्हें एक वर्ष उधर रहकर अपनी तपश्चर्या पूर्ण करने की बात सोचनी चाहिए।
साधना-काल में वेद का तत्वज्ञान और उसका रहस्योद्घाटन उपनिषदों के द्वारा पढ़ाया जायगा। चारों वेदों और 108 उपनिषदों का भाष्य करने के उपरान्त अब हमारे लिए यही उचित भी था कि ब्रह्म-विद्या के इस तत्वज्ञान को व्यवहारिक रूप से सिखाने पढ़ाने का भी कार्य करें। सो यह प्रशिक्षण प्रक्रिया द्वारा होगा।
साधना, आस्तिकता, अतर्कता,विश्वास और श्रद्धा की भावना से भरे हृदय में सदैव प्रसन्नता का निवास रहता है।
साधना की अन्योन्याश्रय संगति है। ब्रह्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा सत्संग है। सच्चे सत्संग की आवश्यकता ऊट-पटाँग बकवास से नहीं, वरन् क्रमबद्ध शास्त्र अध्ययन से ही पूरी हो सकती है। इस एक वर्षीय वानप्रस्थ साधना में ब्रह्म-विद्या की शिक्षा को भी आधारभूत अंग बना दिया गया है।
साधना, तपश्चर्या, यज्ञाहुति आदि का प्रभाव ऐसा है, जिससे यहाँ निवास करने मात्र से बहुत कुछ कल्याण हो सकता है। यमुना तट पर बसी हुई यह तपोभूमि— साधना एवं तपश्चर्या के लिए, शिक्षा और दीक्षा के लिए कितनी उपयुक्त है, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
साधना में ब्रह्म-विद्या की शिक्षा को भी आधारभूत अंग बना दिया गया है।
साधना के, स्वतन्त्रता, पेड़ के फल की भाँति नहीं टपक सकती और बिना स्वतन्त्रता के जीना वृथा है।
साधना कर सकता है। यह विशेषतायें, यह श्रेष्ठ उपलब्धियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मनुष्य-जीवन प्राप्त हो जाना कोई साधारण बात नहीं है।
साधना का महँगा मूल्य चुका कर ही प्राप्त किये जा सकते हैं। सस्ते दाम में ही वे नहीं खरीदे जा सकते। माला घुमाने की कीमत पर न तो ईश्वर मिल सकता है, न आत्मा। उपासना का तो कर्मकाण्ड-कलेवर है उसका प्राण तो भावनात्मक उत्कर्ष के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
साधना के साथ-साथ ब्रह्म-विद्या का प्रशिक्षण भी अनिवार्य रूप से हम आवश्यक है। ज्ञान और कर्म का जोड़ा है। स्वाध्याय और साधना की अन्योन्याश्रय संगति है। ब्रह्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करना ही सच्चा सत्संग है। सच्चे सत्संग की आवश्यकता ऊट-पटाँग बकवास से नहीं, वरन् क्रमबद्ध शास्त्र अध्ययन से ही पूरी हो सकती है।
साधना एवं शिक्षा का एक वर्षीय कार्यक्रम चला करे। एक वर्ष में सहस्रांशु गायत्री महापुरश्चरण पूरा हो जाता है। यह एक बहुत बड़ी तपश्चर्या है। एक वर्ष तक इस तीर्थ भूमि में रहकर यह पुरश्चरण किया जाय तो घर रहकर किये जाने वाले दस पुरश्चरणों से अधिक इसका प्रभाव होगा। इसी एक वर्ष की अवधि में एक चान्द्रायण व्रत कर लिया जायगा।
साधना का क्रमबद्ध अभियान चल पड़ता है। दूसरे से कुछ कहने वाले को लोक-लाज वश अपने को भी अपेक्षाकृत अधिक सुधरा हुआ बनाना पड़ता है। सेवा धर्म अपनाने वाले के गुण कर्म स्वभाव स्वयमेव उत्कृष्टता की दिशा में विकसित होने लगते हैं। और उसकी पात्रता का कोष बढ़ता चला जाता है जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हे।
साधना की आवश्यक व्यवस्था रहती थी, इसी के लिए वहाँ जाते थे और देर तक वहाँ ठहरते थे। तीर्थों का सृजन ही वानप्रस्थों से लिये, गुरुकुलों एवं साधना संस्थानों की दृष्टि से किया गया था। आज तो सब कुछ उल्टा हो रहा है, तो तीर्थ का स्वरूप भी उल्टा क्यों न होगा?
साधना एवं तपश्चर्या के लिए, शिक्षा और दीक्षा के लिए कितनी उपयुक्त है, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
साधना संलग्न रह सकें। इस तीर्थ-यात्रा के बिना उनके संस्कार परिपक्व न होंगे। जो इच्छा उत्कण्ठा परमार्थ के लिए किसी अवसर पर उठी होगी, वह फिर पानी के बबूले की तरह बैठ जायगी। भावनाओं की परिपक्वता के लिये कुछ ठोस प्रयत्न करना होता है। यह प्रयत्न कुछ समय घर से बाहर रहकर करना होगा, जहाँ जीवन के नये मोड़ में कार्य आने वाली क्षमता उत्पन्न की जा सके।
साधना-शिक्षा का प्रयोजन पूरा हो सके। कहना न होगा कि मथुरा तीर्थ का अपना अनुपम स्थान है। ‘तीन लोक से मथुरा न्यारी’ की उक्ति निरर्थक नहीं, सार-गर्भित है। यहाँ की कुछ विशेषताएं हैं, जो इस भूमि में अनादि-काल से घुली चली आती हैं। यहाँ के निवास का अपना लाभ है।
साधना की सफलता को अधिक सम्भव एवं अधिक सरल बना देती है। एक वर्ष तक नित्य हवन करने का लाभ भी कुछ कम नहीं, उससे शरीर और मन पर चढ़े हुए रोग-शोक एवं कषाय-कल्मषों का शमन होगा ही। साधना में मार्ग-दर्शक का सान्निध्य आवश्यक होता है। गायत्री उपासना में मार्ग पर बढ़ते हुए जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उनका समाधान जितनी अच्छी तरह यहाँ रहने वाले का हो सकता है, उतना और कहीं नहीं। किस साधक के लिए किस प्रकार की साधना उपयुक्त है?
साधना उपयुक्त है? इसका निश्चय यहाँ रहने पर बहुत ही उत्तमता से हो सकता है। जिन्हें गायत्री साधना का कुछ वास्तविक लाभ देखना हो, उन्हें एक वर्ष उधर रहकर अपनी तपश्चर्या पूर्ण करने की बात सोचनी चाहिए।
साधना क्रम में सम्मिलित होना चाहिए।
साधना पूरी करके अपने घरों को वापिस लौट जायेंगे और अपने परिवार की देख-भाल करते हुए अपनी उपासना तथा लोक सेवा की साधना में निरत रहकर अपना तथा दूसरों का कल्याण करेंगे। इस मार्ग पर चलते हुए वे अपना भावी यौवन—मरणोत्तर जीवन तो आनन्दमय बनायेंगे ही, इस लोक में भी यश तथा पुण्य से सम्मिश्रित आत्म संतोष प्राप्त करेंगे।
साधना में मार्ग-दर्शक का सान्निध्य आवश्यक होता है। गायत्री उपासना में मार्ग पर बढ़ते हुए जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उनका समाधान जितनी अच्छी तरह यहाँ रहने वाले का हो सकता है, उतना और कहीं नहीं। किस साधक के लिए किस प्रकार की साधना उपयुक्त है? इसका निश्चय यहाँ रहने पर बहुत ही उत्तमता से हो सकता है। जिन्हें गायत्री साधना का कुछ वास्तविक लाभ देखना हो, उन्हें एक वर्ष उधर रहकर अपनी तपश्चर्या पूर्ण करने की बात सोचनी चाहिए।
साधना काल की ऊँची-नीची, टेढ़ी-तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें वस्तुतः वही उसके पात्र होते हैं।
साधना की दिशा में जगी या नहीं, हमारे अनुरोध का कुछ मूल्य समझा या नहीं—इसकी पहचान इस तरह सहज ही हो सकती है कि उपरोक्त दो छोटे से प्रयोग आरम्भ कर दिये या नहीं।
साधना में निरत रहकर अपना तथा दूसरों का कल्याण करेंगे। इस मार्ग पर चलते हुए वे अपना भावी यौवन—मरणोत्तर जीवन तो आनन्दमय बनायेंगे ही, इस लोक में भी यश तथा पुण्य से सम्मिश्रित आत्म संतोष प्राप्त करेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-December
साधना काल में भावनाओं का होना इसी दृष्टि से बड़ा शुभ और लाभजनक माना जाता है। भावनायें जिसे मिल जायँ उसे अपने आप पर ईश्वरीय विशेष कृपा ही माननी चाहिए।
साधनाओं में उदासीनता हो तो भी प्रगति तो होती ही है किन्तु जब भावनाओं का सम्मिश्रण हो जाता है तो साधना से ही एक अलौकिक आनंद की रसानुभूति होने लगती है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए जो समय की दूरी थी वह कम अखरने लगती है। भावना मनुष्य की साधना में सफलता की आशंका को भी कम कर देती है। “मैं तेरा हूँ अब तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँ। मुझे अज्ञान से निकाल और मानव-जीवन के उपयुक्त आचरण करने की क्षमता प्रदान कर। अब मेरे जीवन का सर्वस्व तू ही है।
साधना में सफलता की आशंका को भी कम कर देती है। “मैं तेरा हूँ अब तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँ। मुझे अज्ञान से निकाल और मानव-जीवन के उपयुक्त आचरण करने की क्षमता प्रदान कर। अब मेरे जीवन का सर्वस्व तू ही है।” इस प्रकार की भावनायें आत्म-कल्याण के पथिक को बड़ा बल प्रदान करती है।
साधना से ही एक अलौकिक आनंद की रसानुभूति होने लगती है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए जो समय की दूरी थी वह कम अखरने लगती है। भावना मनुष्य की साधना में सफलता की आशंका को भी कम कर देती है। “मैं तेरा हूँ अब तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँ। मुझे अज्ञान से निकाल और मानव-जीवन के उपयुक्त आचरण करने की क्षमता प्रदान कर। अब मेरे जीवन का सर्वस्व तू ही है।
साधना-सामग्री की सुविधा है, वे उसी अनुपात में असंतुष्ट एवं अशाँत हैं। आशंका, सन्देह, तनाव, भय तथा युद्धोन्माद उनकी चिन्तन धारा का अंग बन गये हैं। वे जो कुछ सोच पाते हैं विनाश को सामने रख कर और जो कुछ कर पाते हैं स्वार्थ को सामने रखने कर कर पाते हैं। परोपकार के नाम से किया हुआ उनका प्रवर्तन में किसी निहित स्वार्थ से मुक्त नहीं होता। आज जब शाँति तथा निःशस्रीकरण की कल्याणकारी बात उनके सामने आती है तो उनके अस्तित्व सिहर उठता है शाँति अथवा निःशस्री करण की अवस्था में हम कहीं इतने कमजोर न हो जाएं कि कोई दूसरे हमारे भोग-उपभोगों को छीन ले।
साधना-उपासना से भी कठिनता पूर्वक पाई जा सकती है।”
साधना मार्ग पर चलने वालों को गायत्री विद्या का सांगोपांग प्रशिक्षण अगले पाँच वर्ष में पूरा किया जायगा। अखण्ड ज्योति में हर महीने एक अनुपम लेख छपता रहेगा। पाँच वर्ष में इस सम्बन्ध में इतना कुछ कहा समझाया जायगा जो उच्चस्तरीय आध्यात्मिक विकास के लिए पर्याप्त सिद्ध हो सके। इसी प्रकार आत्म-शोध, आत्म-निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के प्रत्येक पहलू पर आधुनिक परिस्थितियों के अनुकूल महत्वपूर्ण मार्गदर्शन इस ब्रह्म-विद्यालय के छात्रों को निरन्तर नियमित रूप से मिलता रहेगा।
साधनायें भावनाओं का रस पाकर शीघ्र फलदायिनी होती हैं यों इन साधनाओं में उदासीनता हो तो भी प्रगति तो होती ही है किन्तु जब भावनाओं का सम्मिश्रण हो जाता है तो साधना से ही एक अलौकिक आनंद की रसानुभूति होने लगती है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए जो समय की दूरी थी वह कम अखरने लगती है। भावना मनुष्य की साधना में सफलता की आशंका को भी कम कर देती है। “मैं तेरा हूँ अब तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँ। मुझे अज्ञान से निकाल और मानव-जीवन के उपयुक्त आचरण करने की क्षमता प्रदान कर। अब मेरे जीवन का सर्वस्व तू ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-March
साधना के लिए उत्साहपूर्वक उठ खड़े हों। पर्वों की प्रेरणाप्रद पद्धति को यदि ठीक तरह अपनाया जा सके तो इससे बढ़कर जन-जागरण एवं युग निर्माण का दूसरा कोई आधार नहीं हो सकता। विचार व्यक्त करने के लिए जन-समूह का उचित मनोभूमि के साथ एकत्रित होना आवश्यक है। धर्म-मंच का यह वह महत्वपूर्ण प्रयोजन पर्व आयोजनों के समय सहज ही पूरा हो सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पर्वों को मनाने एवं उस माध्यम से लोक नेतृत्व करने की क्षमता प्रस्तुत प्रशिक्षण के सभी शिक्षार्थियों में उत्पन्न की जायेगी।
साधना पर प्रकार डालते हुए कहा—
साधना यौगिक क्रियाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सरल है।
साधना से बनीं और फिर उसी की अनाश्रमिक प्रवृत्ति के कारण मिट गई। श्रम के बल पर बनाई गई कोई भी वस्तु बनी रहने के लिये निरन्तर श्रम की आवश्यकता रखती है। यदि आज यह सोच लिया जाये कि संसार में सुख-सुविधा के प्रचुर साधन इकट्ठे हो गये हैं, अब आगे उनके लिए श्रम करने की क्या आवश्यकता है, तो निश्चय ही कल से संसार में दरिद्रता का सूत्रपात हो जाय। श्रम से ही श्रेय प्राप्त होते हैं और श्रम से ही वे सुरक्षित रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-February
साधना क्षेत्र में उपासना के साथ-साथ लोक मंगल की प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप में जोड़ ले।
साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिये अन्त तक लगे रहे। निर्ममता का अर्थ भी दरअसल “मैं और मेरे” का त्याग है। यह जो कुछ है परमात्मा का अंश है। परमात्मा के प्रत्येक अंश को पूजकर ही उसकी पूर्ण कृपा प्राप्त की जा सकती है।
साधना है। —महर्षि रमण
साधना करने लगे। वे जिस सनातन आध्यात्मिकता को भारत के उज्ज्वल भविष्य का कारणभूत आधार मानते थे उसे ही सिद्ध करने में लग गये। श्री अरविन्द 4 मार्च 1910 को आये तो केवल अकेले ही किन्तु शीघ्र ही एक से अनेक होने लगे और उनका छोटा-सा साधना कुटीर एक बड़े आश्रम के रूप में बदलने लगा। शीघ्र ही पांडिचेरी आध्यात्मिक अस्त्रों की एक यन्त्र शाला बन गई।
साधना में स्वार्थ सिद्धि का भी अवसर मिलेगा।
साधना की थी।
साधनाओं के स्वरूप भी बनते बदलते रहते हैं। आज की परिस्थिति में आत्म-कल्याण का मार्ग ईश्वर उपासना के साथ-साथ जन-जागरण के नव-निर्माण के साधना क्रम को जोड़ देना भी आवश्यक हो गया। इसलिए हर अध्यात्म प्रेमी की यही युग-साधना हो सकती है कि वह अपने भौतिक जीवन में जिस तरह आजीविका उपार्जन को अनिवार्य कर्त्तव्य मानता है, उसी प्रकार साधना क्षेत्र में उपासना के साथ-साथ लोक मंगल की प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप में जोड़ ले।
साधना हो सकती है कि वह अपने भौतिक जीवन में जिस तरह आजीविका उपार्जन को अनिवार्य कर्त्तव्य मानता है, उसी प्रकार साधना क्षेत्र में उपासना के साथ-साथ लोक मंगल की प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप में जोड़ ले।
साधना की एक निश्चित सीमा होती है उसके बाद की साधना समाज और विश्व के हित साधन तथा लोक-मंगल में जुटने की होती है। ऋषि गृहस्थ थे, गृहस्थ में रहकर उन्होंने साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिये अन्त तक लगे रहे। निर्ममता का अर्थ भी दरअसल “मैं और मेरे” का त्याग है। यह जो कुछ है परमात्मा का अंश है।
साधना—चाहे वह कितनी भी क्यों न हो, कदापि लक्ष्य प्राप्त करा सकने में समर्थ नहीं हो सकती।
साधना क्रम को जोड़ देना भी आवश्यक हो गया। इसलिए हर अध्यात्म प्रेमी की यही युग-साधना हो सकती है कि वह अपने भौतिक जीवन में जिस तरह आजीविका उपार्जन को अनिवार्य कर्त्तव्य मानता है, उसी प्रकार साधना क्षेत्र में उपासना के साथ-साथ लोक मंगल की प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप में जोड़ ले।
साधना स्थान जिसे देखते ही आत्मा पुलकित, प्रफुल्लित हो जाया करे।
साधना कुटीर एक बड़े आश्रम के रूप में बदलने लगा। शीघ्र ही पांडिचेरी आध्यात्मिक अस्त्रों की एक यन्त्र शाला बन गई।
साधना में ईश्वरीय अनुभूति प्राप्त कर ली और इस सत्य का अन्वेषण कर लिया कि किसी संघर्ष को लड़ने के लिये बाह्य साधन उतने उपयोगी तथा आवश्यक नहीं है जितना कि आन्तरिक बल। कारागार के दण्ड के कल्याणकारी परिणाम को बतलाते हुए उन्होंने स्वयं एक स्थान पर कहा था। “ब्रिटिश सरकार का कोप भाजन बनकर मैं ईश्वर का अनुग्रह पात्र बन गया जिसके फलस्वरूप मैंने अंतस्थ ईश्वर को प्राप्त कर लिया है। उनके कथन के पीछे निश्चय ही यह तथ्य छिपा हुआ है कि मातृभूमि के प्रति उनकी बलिदान भावना की तीव्रता ही उन्हें अपनी आत्मा में ईश्वर रूप होकर अनुभव हुई थी।
साधनाओं का आधार मानते हुए उन्होंने कहा—
साधना करने वाले के लिए व्यक्तिगत रूप से भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होगी। व्यक्तिगत अशांति एवं शत्रु समाधान में भी इस पुरुश्चरण के भागीदारों को विशेष लाभ मिलेगा। परमार्थ के साथ इस साधना में स्वार्थ सिद्धि का भी अवसर मिलेगा।
साधना स्थल में प्रतिमा की आरती आदि की जाय तो वह भी अच्छा है।
साधना समाज और विश्व के हित साधन तथा लोक-मंगल में जुटने की होती है। ऋषि गृहस्थ थे, गृहस्थ में रहकर उन्होंने साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिये अन्त तक लगे रहे। निर्ममता का अर्थ भी दरअसल “मैं और मेरे” का त्याग है। यह जो कुछ है परमात्मा का अंश है।
साधना का बीज मंत्र है। जिन विचारों को युग निर्माण योजना के प्रकाश से ग्रहण किया जा रहा है, उसे कम से कम दस दूसरों तक तो हमें पहुँचाना ही चाहिए। इसमें जो समय लगता हो उसे नवयुग अरुणोदय की पुण्य बेला में नियोजित ज्ञान-यज्ञ में दी जाने वाली आहुतियों की तरह श्रेयस्कर मानना चाहिये। इस संदर्भ में लगने वाले समय की आवश्यकता उपयोगिता एवं महत्ता हमें समझनी चाहिए। साथ ही आलस्य, प्रमाद या संकीर्णता के कारण जो उपेक्षा रहती है उसे साहसपूर्वक हटा देने के लिए तत्पर होना चाहिए।
साधना में लगाकर, संसार के सारे सुख-साधनों को त्यागकर विश्व-मानवता के कल्याण के लिये उत्सर्ग कर दिया।
साधना शक्ति अभिवर्धन करेगी वह शक्ति के लिए, साधना करने वाले के लिए व्यक्तिगत रूप से भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होगी। व्यक्तिगत अशांति एवं शत्रु समाधान में भी इस पुरुश्चरण के भागीदारों को विशेष लाभ मिलेगा। परमार्थ के साथ इस साधना में स्वार्थ सिद्धि का भी अवसर मिलेगा।
साधना स्थल में प्रवेश करे और परमात्मा की उपासना करे। आज का दिन एक परिपूर्ण जीवन है, यह मानकर परमात्मा से सच्चाई, ईमानदारी और नेक निष्ठा की ओर प्रेरित रखने के लिए बल की माँग की जाय। भावना के अनुसार, धूप, दीप, अक्षत, रोली आदि से देव प्रतिमा का अभिषेक किया जाय। प्रातःकाल का नाश्ता सदस्य इसी स्थान के प्रसाद रूप में ग्रहण करें तो वह और भी मंगल दायक हो सकता है।
साधनाकक्ष” भी होना चाहिए। एक छोटी -सी देव प्रतिमा, नहीं तो किसी चित्र को जो भगवान का, गायत्री या किसी देवता का हो एक सुन्दर वेदी पर स्थापित कर लीजिये। सामने चौकी पर धूप-दान दीपक और जप की मालायें रखी हुई होनी चाहिए। एक छोटा-सा हवन कुण्ड भी हो। सम्पूर्ण कक्ष स्वच्छ, सुन्दर लिप-पुता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-January
साधनाओं, अनुष्ठानों और उपासनाओं के बावजूद भी जब वे मन को अनुकूल नहीं कर पाते तो हताश होकर यह विश्वास बना लेते हैं कि मनुष्य का मन बहुत प्रबल होता है उसको वश में कर लेना असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है और कभी-कभी तो मन की प्रतिकूलता को भाग्य का दोष मानकर संतोष कर लेते हैं। यह कहकर बुराइयों एवं असफलताओं के प्रति आत्म-समर्पण कर देते हैं कि अच्छाइयाँ और असफलताएँ उनके भाग्य में ही नहीं हैं।
साधना का अर्थ है-कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए प्रयास जारी रखना। उपासना, जप, यज्ञ आदि भी आध्यात्म की मुख्य प्रक्रियाओं में से हैं, किन्तु यह सर्वांगपूर्ण नहीं हैं, यह भी साधन का ही एक अंग है। साधना एक प्रकार की परीक्षा है। यह साधनाशील जीवन का कठोर किंतु कल्याणकारी प्रसंग है। परीक्षा पर परीक्षा ली जाती है, तब कहीं उत्तीर्ण होने का सौभाग्य मिलता है।
साधना की सफलता का सौभाग्य उन्हीं को मिलता है। इस सीढ़ी को वही पार करते हैं-जो “प्रभो! पग-पग मेरी परीक्षा ले” की भावना रखते हैं। ध्रुवता के साथ साधना-पथ पर आरुढ़ रहने वाले ही संसिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना करते हुए हम स्वयं ही पार नहीं होते वरन् साथ ही असंख्य लोगों को भी अपने साथ ही पार कराते हैं। ऐसा उभय पक्षीय स्वर्ण सुयोग शायद ही किसी अन्य कार्य-पद्धति को अपना कर कोई प्राप्त कर सके।
साधना वह तो पुरुषार्थ का आनन्द देने वाली होती है।
साधना की जाती है। कोई रोजगार तलाश कर पूँजी लगाते हैं, माल मँगाते हैं, दिन भर दुकान पर बैठते हैं, किफायत करते हैं, आवश्यकतायें घटाते हैं, तब कहीं धन इकट्ठा हो पाता है। वायुयान चालक अन्तरिक्ष में जाने से पूर्व पृथ्वी पर ऊपर उड़ने की साधना करते हैं। किसान सालभर खेतों में जुटे रहते है, तब कहीं अन्न की पैदाइश होती है। संसार में हर तरह की उपलब्धि के लिये साधना करने का एक निश्चित विधान है।
साधना के अतिरिक्त और कहाँ रक्खा था। निदान वे अपनी जिज्ञासा शान्त करने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिये आध्यात्मिक चिन्तन की ओर झुक गये।
साधना पूरी श्रद्धा एवं तत्परता के साथ चलानी चाहिए। हमारा जीवन क्रम दूसरों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय ही होना चाहिए।
साधना से ही उपलब्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त ओर कोई मार्ग नहीं है।
साधना है। कहा भी गया है-
साधना है। इसमें जहाँ व्यक्ति जीवन में आत्म-सन्तोष, आन्तरिक आह्लाद, शरीर और मन की स्वस्थता चिरस्थायी यश, परमार्थ का पुण्य, परिवार की उत्कृष्टता, स्वर्ग एवं मुक्ति की आशा और ईश्वर के अपार प्यार का सौभाग्य मिलना निश्चित है वहाँ सामाजिक रूप से देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति की सेवा भी कम नहीं। युग निर्माण की साधना करते हुए हम स्वयं ही पार नहीं होते वरन् साथ ही असंख्य लोगों को भी अपने साथ ही पार कराते हैं। ऐसा उभय पक्षीय स्वर्ण सुयोग शायद ही किसी अन्य कार्य-पद्धति को अपना कर कोई प्राप्त कर सके।
साधना सिद्धि और लक्ष्य सिद्धि के यह शाश्वत नियम हैं। इन्हें कोई साधारण भले ही समझे पर इसकी वास्तविकता में राई-रत्ती गुँजाइश नहीं। लक्ष्य छोटा हो, चाहे बड़ा- स्वर्ग और मुक्ति की यश, धन अथवा कीर्ति की, मनुष्य को संतुलन मन्द-गति से, लगन के साथ धैर्यपूर्वक साधना है। कहा भी गया है-
साधना में श्रद्धा एवं निष्ठापूर्वक लगे हुए हैं। युग निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रम अपने-अपने ढंग से, अपनी-अपनी जगह चला रहे हैं। फिर भी बार-बार प्रोत्साहन एवं उद्बोधन की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि यदि कहीं कुछ शिथिलता आने लगी हो तो वह दूर हो जाय। कुछ सदस्य ऐसे भी हो सकते हैं जिनने परिवार में अभी नया प्रवेश किया हो और यह अनुभव न किया हो कि अखण्ड-ज्योति के पन्ने पढ़ना ही नहीं, वरन् एक प्रबुद्ध परिवार के सम्मान्य सदस्य होने के नाते कुछ विशेष कर्तव्य पालन करने का उत्तरदायित्व भी उन पर है। ऐसे लोगों के लिए भी सामयिक उद्बोधन की अपेक्षा रहती है।
साधना करने का परमार्थ दिया। वे गंगा के किनारे स्यालदा नामक ग्राम में जाकर रहने लगे।
साधना भी है। भजन के साथ ही हमें जीवन शोधन की प्रक्रिया भी अनिवार्य रूप से जोड़ लेनी चाहिये। दोनों पहिये की गाड़ी ही आध्यात्मिक प्रगति का प्रयोजन पूरा करेगी। अस्त-व्यस्त जीवन रखते हुये, केवल भजन के सहारे आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती, इस तथ्य को हमें भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिए और आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त करने के लिए आत्म-निर्माण एवं जीवन-निर्माण की साधना पूरी श्रद्धा एवं तत्परता के साथ चलानी चाहिए। हमारा जीवन क्रम दूसरों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय ही होना चाहिए।
साधना एक प्रकार का आनन्द है, जिसे थोड़ी भोगने से तृप्ति नहीं होती, वरन् चिरकाल तक उस रस को लूटा जाता है। भार की तरह ढोने के लिये साधना वह तो पुरुषार्थ का आनन्द देने वाली होती है।
साधना-पथ पर आरुढ़ रहने वाले ही संसिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना है, जो अनवरत श्रम, अटूट लगन, धैर्य और विश्वास से ही मिल सकती है। विद्यार्थी वर्षों तक विद्याध्ययन की साधना करते हैं, तब उन्हें विद्वान् कहलाने का गौरव प्राप्त होता है। पहलवान बहुत दिन तक व्यायाम करने, पौष्टिक आहार जुटाने आदि की साधना के उपरान्त कसदार शरीर प्राप्त करते हैं। सेनाओं के अभ्यास शान्ति काल में भी बराबर चलते रहते है, तब कहीं वे दुश्मनों से लड़ पाते हैं। वास्तव में सुख प्राप्ति के लिये जो शक्ति चाहिए, वह साधना से ही उपलब्ध हो सकती है।
साधना करने का एक निश्चित विधान है। इस विधान से देव, दनुज, मनुज आदि सभी बँधे हैं, इस नियम का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
साधना के उपरान्त कसदार शरीर प्राप्त करते हैं। सेनाओं के अभ्यास शान्ति काल में भी बराबर चलते रहते है, तब कहीं वे दुश्मनों से लड़ पाते हैं। वास्तव में सुख प्राप्ति के लिये जो शक्ति चाहिए, वह साधना से ही उपलब्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त ओर कोई मार्ग नहीं है।
साधना परमावश्यक है। साधना का अर्थ है-कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए प्रयास जारी रखना। उपासना, जप, यज्ञ आदि भी आध्यात्म की मुख्य प्रक्रियाओं में से हैं, किन्तु यह सर्वांगपूर्ण नहीं हैं, यह भी साधन का ही एक अंग है। साधना एक प्रकार की परीक्षा है। यह साधनाशील जीवन का कठोर किंतु कल्याणकारी प्रसंग है।
साधना करते हैं, तब उन्हें विद्वान् कहलाने का गौरव प्राप्त होता है। पहलवान बहुत दिन तक व्यायाम करने, पौष्टिक आहार जुटाने आदि की साधना के उपरान्त कसदार शरीर प्राप्त करते हैं। सेनाओं के अभ्यास शान्ति काल में भी बराबर चलते रहते है, तब कहीं वे दुश्मनों से लड़ पाते हैं। वास्तव में सुख प्राप्ति के लिये जो शक्ति चाहिए, वह साधना से ही उपलब्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त ओर कोई मार्ग नहीं है।
साधना करते हैं। किसान सालभर खेतों में जुटे रहते है, तब कहीं अन्न की पैदाइश होती है। संसार में हर तरह की उपलब्धि के लिये साधना करने का एक निश्चित विधान है। इस विधान से देव, दनुज, मनुज आदि सभी बँधे हैं, इस नियम का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
साधना— अखण्ड- ज्योति परिवार की ओर से प्रति मास 24 करोड़ गायत्री महापुरश्चरण का एक महान अभियान चल रहा है। देश पर शत्रुओं के आक्रमण को निरस्त करने के लिये जहाँ शस्त्र एवं सुरक्षा साधनों की आवश्यकता है वहाँ इस संदर्भ में किये गये आध्यात्मिक उपचार भी कम महत्वपूर्ण नहीं। ‘क्लीं’ बीज मन्त्र युक्त गायत्री पुरश्चरण जहाँ शत्रुओं की दुष्टता को निरस्त करेगा वहाँ देश में सर्वतोमुखी शक्ति एवं जागृति का भी विकास होगा। हमें एक वर्ष तक इस शक्ति साधना में किसी न किसी प्रकार भाग लेते ही रहना चाहिये। प्रति परिवार पीछे आठ माला प्रतिदिन करने से हर महीने 24 हजार का एक अनुष्ठान हो सकता है।
साधना पथ से विचलित हो जाने वाले इन परीक्षाओं को पार नहीं कर पाते, बीच में ही फेल हो जाते हैं। जो कठिनाइयों, संघर्षों, आपदाओं, मुसीबतों, विपरीत परिस्थितियों से भी नहीं घबड़ाते, अन्ततः साधना की सफलता का सौभाग्य उन्हीं को मिलता है। इस सीढ़ी को वही पार करते हैं-जो “प्रभो! पग-पग मेरी परीक्षा ले” की भावना रखते हैं। ध्रुवता के साथ साधना-पथ पर आरुढ़ रहने वाले ही संसिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना एक प्रकार की परीक्षा है। यह साधनाशील जीवन का कठोर किंतु कल्याणकारी प्रसंग है। परीक्षा पर परीक्षा ली जाती है, तब कहीं उत्तीर्ण होने का सौभाग्य मिलता है। साधना पथ से विचलित हो जाने वाले इन परीक्षाओं को पार नहीं कर पाते, बीच में ही फेल हो जाते हैं। जो कठिनाइयों, संघर्षों, आपदाओं, मुसीबतों, विपरीत परिस्थितियों से भी नहीं घबड़ाते, अन्ततः साधना की सफलता का सौभाग्य उन्हीं को मिलता है।
साधनाशील जीवन का कठोर किंतु कल्याणकारी प्रसंग है। परीक्षा पर परीक्षा ली जाती है, तब कहीं उत्तीर्ण होने का सौभाग्य मिलता है। साधना पथ से विचलित हो जाने वाले इन परीक्षाओं को पार नहीं कर पाते, बीच में ही फेल हो जाते हैं। जो कठिनाइयों, संघर्षों, आपदाओं, मुसीबतों, विपरीत परिस्थितियों से भी नहीं घबड़ाते, अन्ततः साधना की सफलता का सौभाग्य उन्हीं को मिलता है। इस सीढ़ी को वही पार करते हैं-जो “प्रभो! पग-पग मेरी परीक्षा ले” की भावना रखते हैं।
साधनात्मक जीवन ही जिया जा रहा हो। थोड़ी-सी सतर्कता एवं दृढ़ता बरतने लगा जाए तो कुछ ही दिनों में ऐसा ढर्रा बन जाता है। उपासना का ही एक आवश्यक अंग जीवन साधना भी है। भजन के साथ ही हमें जीवन शोधन की प्रक्रिया भी अनिवार्य रूप से जोड़ लेनी चाहिये। दोनों पहिये की गाड़ी ही आध्यात्मिक प्रगति का प्रयोजन पूरा करेगी।
साधना में किसी न किसी प्रकार भाग लेते ही रहना चाहिये। प्रति परिवार पीछे आठ माला प्रतिदिन करने से हर महीने 24 हजार का एक अनुष्ठान हो सकता है। प्रयत्न उसी के लिये किया जाय पर ऐसा न बन पड़े तो भी एक माला तो हम में से हर एक को उपरोक्त प्रयोजन के लिये करनी ही चाहिये। जहाँ अभी वह क्रम न चला हो वहाँ इस अंक के पहुँचते ही आरम्भ कर दिया जाना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-August
साधना के लिए भी शक्तिशाली आत्माएँ एक ऐसा ही एक महान् अनुष्ठान आरम्भ कर रही हैं। सूक्ष्म जगत के वर्तमान स्वरूप को बदल देने के लिये ऐसे ही आयोजन सृष्टि के इतिहास में समय-समय पर होते आये हैं। इस बार भी ऐसी ही व्यवस्था सामर्थ्यवान् प्रकाश-पुञ्जों द्वारा की गई है। उसमें भाग लेने का अवसर हम जैसे अकिंचन व्यक्ति को भी मिल रहा है। हमारी भावी तपश्चर्या इसी निमित्त से है।
साधना का यही मार्ग है। हम अपने प्रिय परिजनों को अब उपासना से आगे बढ़ाकर जीवन-साधना के क्षेत्र में संलग्न करना चाहते हैं ताकि वे आध्यात्मिकता के सच्चे और चिरस्थायी लाभों से लाभान्वित हो सके। अपने प्रियजनों को सुखी बनाने के लिए हर कुलपति प्रयत्न करता है, हम भी इसी दृष्टि से इन दिनों अपना प्रयत्न तीव्र कर रहे हैं। यदि कुछ ठोस लाभ दिये बिना हमें विदा होना पड़ा, तो अपने प्रिय परिवार के प्रति हमारा उत्तरदायित्व पूरा न हो सकेगा और उसकी लज्जा एवं वेदना हमें देर तक कष्ट देती रहेगी। इस व्यथा से छुटकारा पाने के लिए वर्तमान छटनी पर बहुत जोर दे रहे हैं।
साधना के अतिरिक्त सारे कर्तव्य क्रम को इसी जीवन के सीमित समय में ही पूरा करना होगा।
साधना की दृष्टि से नवरात्रि का समय बहुत ही महत्वपूर्ण है।
साधना को विशेष फलवती बना सकते है। इन्हीं दिनों 9 दिन का एक छोटा शिविर भी होगा। जिसमें ज्येष्ठ शिविर में कही गई और सिखाई गई सभी महत्वपूर्ण बातें सिखा समझा दी जायेंगी। जिनका ज्येष्ठ शिविर में आना न हो सका वे इस अवसर पर आ सकते हैं। आने वालों को पहले से स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए।
साधना का कठोर व्रत लेकर धार्मिक जीवन की सिद्धि करते थे और तब ही अपने को उस समय के उन्नत समाज का सदस्य होने योग्य समझते थे।
साधना तक कामों की एक लम्बी शृंखला चली गई है। कर्तव्यों की इस अनिवार्य परम्परा को पूरा किये बिना मनुष्य का कल्याण नहीं। इस कर्म-क्रम को इसी एक जीवन के सीमित समय में ही पूरा कर डालना है क्योंकि आत्मा की मुक्ति मानव जीवन के अतिरिक्त अन्य किसी जीवन में नहीं हो सकती और मुक्ति का प्रयास तभी सफल हो सकता है जब वह उसके सहायक पूर्व प्रयासों को पूरा करता है। अस्तु जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति को पाने के लिये उसकी साधना के अतिरिक्त सारे कर्तव्य क्रम को इसी जीवन के सीमित समय में ही पूरा करना होगा।
साधनावलम्बी व्यक्ति कभी-कभी अविकल वैभव रहने पर भी लोगों द्वारा उपेक्षित कर दिये जाते हैं। उनकी अपेक्षा अधिक दाता, अधिकारी अथवा वैभव वान व्यक्ति मिल जाने पर उसे छोड़कर लोग उस आधिक्य वाले व्यक्ति की ओर उन्मुख हो जाते हैं। सवा सौ देने के मुकाबले में लोग सौ देने वाले को बात की बात में भुला देते हैं। पहले वाले की ओर से अपनी सारी प्रियता पसन्दगी तथा चाटुकारी हटाकर दूसरों की ओर बढ़ा देते हैं। कभी-कभी तो प्रियता क्या परिचय तक छीनकर नये उपयोगी व्यक्ति को दे दिया जाता है।
साधना शिविर-
साधना के क्षेत्र में संलग्न करना चाहते हैं ताकि वे आध्यात्मिकता के सच्चे और चिरस्थायी लाभों से लाभान्वित हो सके। अपने प्रियजनों को सुखी बनाने के लिए हर कुलपति प्रयत्न करता है, हम भी इसी दृष्टि से इन दिनों अपना प्रयत्न तीव्र कर रहे हैं। यदि कुछ ठोस लाभ दिये बिना हमें विदा होना पड़ा, तो अपने प्रिय परिवार के प्रति हमारा उत्तरदायित्व पूरा न हो सकेगा और उसकी लज्जा एवं वेदना हमें देर तक कष्ट देती रहेगी। इस व्यथा से छुटकारा पाने के लिए वर्तमान छटनी पर बहुत जोर दे रहे हैं। जो हमारी बात तो सुन सकते हैं पर बताये मार्ग पर चलने के लिए तनिक भी तैयार नहीं,उनके साथ उलझे रहने की अपेक्षा अब हमें ऐसे लोगों को साथ रखना है जो कुछ काम कर सकने लायक श्रद्धा और आत्मीयता हमारे प्रति उत्पन्न कर चुके हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1966-June
साधना से सच्चा ज्ञान प्राप्त कर संसार की सेवा ही करेंगे।
साधना की शिक्षा दे दी।
साधना की हो और सन्मार्ग पर चलने की उसकी अपनी भावना इतनी मजबूत हो जो कैसी भी विकट परिस्थिति आने पर भी झुक न सके। ब्राह्मण मर जाते हैं पर अपने आदर्शों से नहीं गिरते। जीवन भर कठिनाइयों से लड़ते रहते हैं पर समाज के प्रति सेवाओं का कोई लौकिक मूल्य माँगने वाला जल्द उनकी जबान पर नहीं आता।
साधना करने का अवसर जिन्हें मिलेगा वे अपना आत्मिक बल आशातीत मात्रा में बढ़ा सकेंगे यह निश्चय है। धर्म-मंच के माध्यम से वे लोक-मंगल का—जन-जागरण का—नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान का महान परमार्थ किस प्रकार कर सकेंगे इसका प्रशिक्षण भी इसी वर्ष में हो जायगा। प्राकृतिक चिकित्सा का सामान्य ज्ञान, आसन, प्राणायाम, सूर्य-नमस्कार एवं योग-साधन की वे शिक्षाएं भी मिल जायेंगी जो इन दिनों के अस्त-व्यस्त शरीरों द्वारा आसानी से पूरी की जा सकती हैं। ऐसे आयोजन का लाभ हर ढलती आयु के व्यक्ति को उठाना ही चाहिए। बहुत दिन से ऐसी शिक्षा व्यवस्था करने की बात हम सोच रहे थे।
साधना करने से तीर्थयात्रा का सच्चा पुण्य मिल जाना असंदिग्ध है। जो स्वयं तीर्थ करने के इच्छुक हैं या जिनके बच्चे अपने बड़े-बूढ़ों को तीर्थ-यात्रा के साधन उपलब्ध कराना चाहते हैं। अच्छा हो वे इस एक वर्षीय तीर्थ साधना का लाभ उठावें।
साधना को छोड़ा तो व्यक्तिगत प्रगति के नाम पर अन्धकार ही अन्धकार दीख रहा है। लोग भले ही अमीर या डिग्री धारी बने पड़े हों पर उनमें महापुरुषों जैसे एक भी चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं होते। रईसों के कुत्ते भी मोटरों में बैठकर घूमते दूध, जलेबी खाते और रेशमी झूल ओढ़ते हैं। इन सुविधाओं से क्या वे कुत्ते कोई सम्माननीय महापुरुष बन जायेंगे? बचपन में महानता के बीज नहीं बोये गये तो शेष जीवन में महानता के अंकुर फूटेंगे कैसे?
साधना भी साथ ही करेंगे। मंत्र चाहे कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो उसका फल केवल परिष्कृत व्यक्तित्व वालों को ही मिलता है। औषधि सेवन के साथ-साथ आहार-विहार का पथ्य भी ठीक रखें तभी रोगी अच्छा होगा। दवा कीमती खायें किन्तु परहेज बिगाड़े तो बीमारी कैसे जायगी? कारतूस बढ़िया हों पर बन्दूक बाँस की बनी हुई नकली हो तो उससे निशाना कहाँ सधेगा?
साधना का कार्यक्रम पुनः रुक गया। तन्त्र-मन्त्र का पाखण्ड दूर करने के लिये उनको वहाँ भी चार माह तक रुकना पड़ा।
साधना का निष्कर्ष मिला हुआ है।
साधना में सिद्ध होकर महावीर राजगिरि, मुँगेर, बसाढ़, बनारस, अयोध्या आदि प्रदेशों का भ्रमण करते हुए राढ़ पहुँचे, जहाँ उन्हें सबसे अधिक कष्ट उठाने पड़े।
साधना में संलग्न होने का निर्देश किया है। हिन्दू धर्म—वर्णाश्रम धर्म के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें चार आश्रमों की जो अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यवस्था थी उसी के कारण हमारा देश, हमारा समाज चिरकाल तक उन्नति के उच्च शिखर पर खड़ा रहा। अब जब कि आश्रम धर्म की मर्यादाएं टूट गई तो राष्ट्र की महानता का महल भी ध्वस्त होकर चूर-चूर हो गया। लड़कों ने शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को विकसित करने वाली ब्रह्मचर्य साधना को छोड़ा तो व्यक्तिगत प्रगति के नाम पर अन्धकार ही अन्धकार दीख रहा है।
साधना का लाभ उठावें।
साधना को भी गाड़ी के दो पहियों की तरह अन्योन्याश्रित माना है। कोई भी धर्मात्मा व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ-कोई भी ईश्वर भक्त ऐसा नहीं रहा-जिसने मानव सेवा का व्रत न लिया हो। जिसने इस ओर उपेक्षा बरती वह भले ही कितनी ही माला घुमाता रहा हो, कितना ही व्रत उपवास करता रहा हो, आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्ति में सर्वथा असफल ही रहेगा।
साधना, व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के कल्याण की अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं आवश्यक परिपाटी है। जो स्थान व्यक्तिगत जीवन में बालक को सुसंस्कृत रुप से बिताकर भौतिक प्रगति प्राप्त करने का है, ठीक वही सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन में ढलती आयु के सदुपयोग का है। हमारा व्यापक प्रयत्न यह होना चाहिए कि ढलती आयु के लोग वासना और तृष्णा की कीचड़ में से निकल कर शानदार जिन्दगी जियें। वानप्रस्थ की परम्परा को अपनायें। आत्म-निर्माण और समाज निर्माण की उभयपक्षीय गतिविधियाँ अपनाकर मनुष्य जीवन की अपने विवेक की सार्थकता सिद्ध करें।
साधना न करे, किसी तप में अपने को न जलाये, तब भी एक अकेली परिव्याप्त विश्व भावना से उसकी वाणी तथा व्यक्तित्व में इतना तेज आ जाता है कि संपर्क में आया हुआ कोई भी बड़े से बड़ा व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रहता!
साधना का लाभ प्रसन्नतापूर्वक उठा सकते हैं।
साधना है। जिसका उद्देश्य समाज का नवनिर्माण ही नहीं उस कार्यक्रम में संलग्न व्यक्तियों का अध्यात्म लक्ष्य पूरा करना भी है। हमने स्वयं भी यही रीति-नीति अपनाई है, और अपने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को भी अपने जीवन का वैसा ही अंग बनावें जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्य कर्म करने में प्रयत्नशील रहते हैं।
साधना करनी पड़ती थी। ऋग्वेद में कहा है- “आपव्रिता विसृजन्तो अधिक्षमि” अर्थात् वे प्रत्यक्ष देवता हैं, जो धर्म-प्रेरणा को सजीव रखने के लिये मर मिटते हैं।
साधना में बाधक ही बनेगा, इसलिए हर वानप्रस्थ को एक वर्ष के लिए भोजन वस्त्र का प्रबन्ध घर से ही करके लाना चाहिए। दो-दो, तीन-तीन व्यक्ति मिलकर भोजन बना लिया करेंगे तो इसमें समय और पैसे की और भी अधिक किफायत रहेगी, जिनको भोजन बनाना नहीं आता है, उनमें एक बड़ी कमी है। जो खाना जानता है उसे बनाना भी जानना चाहिए। जिन्हें न आता होगा उन्हें हम ब्रह्म-विद्या की तरह यह भी सिखा देंगे। जो पूरी तरह घर से निवृत्त नहीं हुए हैं पर एक वर्ष का समय किसी प्रकार निकाल सकते हैं, वे भी इस शिक्षा साधना का लाभ प्रसन्नतापूर्वक उठा सकते हैं।
साधना सुविधा उपलब्ध कराने में सहायता करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-December
साधना के जल-साबुन से ही मनःक्षेत्र पर छाई हुई मलिनताएँ धोई जाती हैं। यह समस्त प्रयोजन समाज-सेवा का व्रत धारण किये बिना सम्भव नहीं हो सकते। सेवा-धर्म को अंगीकार किये बिना कोई व्यक्ति मात्र पूजा-पाठ की टण्टघण्ट अपनाये रहकर सच्चा अध्यात्मवादी नहीं बन सकता और न उसे आत्मिक प्रगति का लाभ मिल सकता है।
साधना प्रकारान्तर से नाद-ब्रह्म की वैसी ही आराधना है, जैसी ब्रह्म-विद्या के अन्तर्गत अद्वैत-ब्रह्म चिन्तन की।
साधना हो। दूर-दर्शिता इसमें है कि उच्च आदर्शों की समाज में विजयी बनाने के लिए व्यक्तिगत आदर्शवादिता की उपेक्षा भी कर दी जाय। साधन और साध्य दोनों उत्तम हों तो उसे स्वर्ण सुयोग कहा जा सकता है, पर जब आपत्ति-धर्म सामने आ खड़ा हो तो साध्य की गरिमा को विजयी बनाने के लिए साधनों की आदर्शवादिता को घटाया या गिराया भी जा सकता है।
साधना इस अव्यक्त गुँजन को व्यक्त बनाती है-मुखर करती है। गान यदि उच्च स्तर का हो तो अन्तरात्मा की भावसत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानंद की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।
साधनारत महामानव या तो कविताएँ रचते रहे हैं, या फिर छन्द-स्वरों में भगवान के गुणानुवाद गाते रहे हैं। महर्षि नारद से लेकर सूर, तुलसी, मीरा, कबीर तक वही परम्परा क्रमबद्ध शृंखला के रूप में चली आई है।
साधना की जाय तो अपने भीतर ही वह सब कुछ मिल सकता है, जिसकी हमें खोज है।
साधना, वेश, वस्त्र आदि का उपयोग हो सकता है, पर वस्तुतः उसका प्रयोजन उससे बहुत आगे का है। देवता या परमेश्वर के रूप में जिसकी आराधना की जाती है, वह वस्तुतः अपने आपे का परिष्कृत रूप ही है। इष्टदेव और सद्गुरु के रूप में इसी को विभिन्न नाम व रूपों से प्रस्तुत किया गया है। अपने आप में गहरी दिलचस्पी उत्पन्न करके आत्म-शोधन और आत्म विकास का क्रिया कलाप ही वस्तुतः भक्ति-भावना अथवा योग-साधना का प्रयोजन है। परमात्मा के जो गुणानुवाद गाये जाते हैं, वे वस्तुतः अपने ही परिष्कृत रूप में अभ्यर्थना है।
साधना में निरत हैं।
साधना के रूप में सीखी थी। प्राणायाम के उच्च-स्तरीय अभ्यास ने उन्हें शब्द-ब्रह्म का वेत्ता बनाया था। आहत-नाद और अनाहत-नाद की अत्यन्त सूक्ष्म प्रवाह शृंखला को नादयोग के आधार पर ही अनुभव में लाया जाता है। योग के आधार पर ही अनुभव में लाया जाता है। स्वर-साधना प्रकारान्तर से नाद-ब्रह्म की वैसी ही आराधना है, जैसी ब्रह्म-विद्या के अन्तर्गत अद्वैत-ब्रह्म चिन्तन की।
साधना से निरत रहकर जीवनोद्देश्य की पूर्ति कर सकने में निश्चय पूर्वक सफल हो सकते हैं।
साधना का अवलम्बन लेकर जिस प्रकार उच्चकोटि की सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती है, उसी प्रकार स्वर-योग की साधना से भी उच्च आध्यात्म की भूमिका में प्रवेश करके दिव्य विभूतियों को करतलगत किया जा सकता है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के अन्तराल में नाद-ब्रह्म का गुँजन संव्याप्त है, उसकी प्रतिध्वनि से पिण्ड की अन्तःस्थिति भी गूँजती रहती है। संगीत की स्वर साधना इस अव्यक्त गुँजन को व्यक्त बनाती है-मुखर करती है। गान यदि उच्च स्तर का हो तो अन्तरात्मा की भावसत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानंद की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।
साधना से भी उच्च आध्यात्म की भूमिका में प्रवेश करके दिव्य विभूतियों को करतलगत किया जा सकता है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के अन्तराल में नाद-ब्रह्म का गुँजन संव्याप्त है, उसकी प्रतिध्वनि से पिण्ड की अन्तःस्थिति भी गूँजती रहती है। संगीत की स्वर साधना इस अव्यक्त गुँजन को व्यक्त बनाती है-मुखर करती है। गान यदि उच्च स्तर का हो तो अन्तरात्मा की भावसत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानंद की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।
साधना के रूप में की जाती थी।
साधना का प्रयोजन है। परमात्मा के जो गुणानुवाद गाये जाते हैं, वे वस्तुतः अपने ही परिष्कृत रूप में अभ्यर्थना है। ईश्वरीय अनुकम्पा से जो कुछ वरदान अनुदान मिलने का विश्वास किया जाता है-वह कहीं अन्यत्र से नहीं, अपने ही अन्तरंग से प्रस्फुटित होता है। देवता हमारे मानस-पुत्र हैं और मन्त्र विधानों का प्राण-साधक के प्रचण्ड संकल्पों के साथ गुँथा पड़ा है। मानवी-निष्ठा की श्रद्धा और विश्वास की परिणति ही सिद्धियों और विभूतियों के रूप में होती है।
साधनाएँ मानवी-व्यक्तित्व के साथ जुड़े रहने वाले अनेक उतार-चढ़ावों को सन्तुलित करने में तथा प्रगति के अवरुद्ध पथ को प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण सहायता कर सकती है। षट्चक्रों के विकास परिष्कार के साथ अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का सन्तुलन और नियन्त्रण भी किस प्रकार सम्भव हो सकता है? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए योग-साधना के अंतर्गत चक्र-विज्ञान में गहराई तक उतरने की आवश्यकता है।
साधना से कम न था।
साधना और आत्म-कल्याण की कम-साधना से निरत रहकर जीवनोद्देश्य की पूर्ति कर सकने में निश्चय पूर्वक सफल हो सकते हैं।
साधना में ही सन्निहित दीखता है। दान के पीछे यदि अन्धविश्वासों की मूढ़ मान्यता, विवशता और कुटिलता छिपी न पड़ी हो तो निश्चित रूप से उसके सहारे मनुष्य अपनी महानता विकसित कर सकता है और आत्म-शान्ति पा सकता है।
साधना-विधानों के द्वारा आत्म-सत्ता की गरिमा के प्रति श्रद्धालु होने के लिए किया जाता है।
साधना, उपासना, तपश्चर्या, योग-परायणता वैराग्य, संन्यास, दान-पुण्य स्वाध्याय सत्संग एवं विविध-विधि धर्म-कृत्यों का एक मात्र प्रयोजन यही है कि आत्मा पर चढ़े हुए संकीर्ण-स्वार्थपरता के वे कषाय कल्मष हट जाएँ तो वासना-तृष्णा के-लोभ-मोह के भव-बन्धनों में जकड़े रहते हैं। नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है। उदारता एवं सेवा-साधना के जल-साबुन से ही मनःक्षेत्र पर छाई हुई मलिनताएँ धोई जाती हैं। यह समस्त प्रयोजन समाज-सेवा का व्रत धारण किये बिना सम्भव नहीं हो सकते। सेवा-धर्म को अंगीकार किये बिना कोई व्यक्ति मात्र पूजा-पाठ की टण्टघण्ट अपनाये रहकर सच्चा अध्यात्मवादी नहीं बन सकता और न उसे आत्मिक प्रगति का लाभ मिल सकता है।
साधना के लिए किसी मात्रा में लगा रहना हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है। विचार पूर्वक आत्मनिरीक्षण किया जाय तो अपने पास समय का बहुत सा अंश ऐसा होता है, जो आलस्य, प्रमाद, गपशप अथवा दूसरे ऐसे निरर्थक कामों में खर्च होता रहता है, जिसे यदि चाहें तो आसानी से बचाया जा सकता है। समय के अपव्यय को तीखी दृष्टि से देखा-परखा जाय तो प्रतीत होगा कि अपना ढेरों समय ऐसी बरबादी में नष्ट होता है, जिसका न अपने लिए कोई प्रयोजन है और न दूसरे अन्य किसी के लिए। समय काटने के लिए हमारे कितने ही निरर्थक काम होते रहते हैं और जो करते हैं उनमें इतनी अन्य मनस्कता एवं शिथिलता बरतते हैं, जिनके कारण कम समय में हो सकने वाला काम दूना-चौगुना समय खा जाता है। यदि इस अस्त-व्यस्तता को हटाकर मुस्तैदी की आदत डाली जाय तो सहज ही ढेरों समय ऐसा बच सकता है, जो पहले फालतू नष्ट होता रहता था।
साधना का तत्त्वज्ञान। इंजेक्शन की पिचकारी के सहारे द्रव औषधियाँ रक्त में मिलाई जाती हैं, सीधा प्रवेश कठिन पड़ता है। ठीक यही प्रयोग देव-मन्त्रों कर्मकाण्डों और साधना-विधानों के द्वारा आत्म-सत्ता की गरिमा के प्रति श्रद्धालु होने के लिए किया जाता है।
साधना है। इस आधार पर हम अपनी अन्तः चेतना को इस योग्य विकसित परिष्कृत करते हैं कि ब्रह्माण्ड -व्यापी सूक्ष्म धारा प्रवाहों की अनुकूलता प्रतिकूलता के साथ हम उपयोगी सम्बन्ध सूत्र स्थापित कर सकें।
साधना के अंतर्गत चक्र-विज्ञान में गहराई तक उतरने की आवश्यकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-June
साधनाक्रम का आश्रय लेकर द्रुतगति से आगे बढ़ सकेंगे और पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे।
साधना ने जीवनलक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।
साधना कही जाती है। देवालयों में, कर्मकांड उपचारों में यही प्रक्रिया काम आती है। कथा, कीर्तन, परिक्रमा, यात्रा, स्नान, तर्पण, प्रभृति विविध-विधि क्रियाकलाप इसी स्तर के हैं। यह बालकक्षा है।
साधना की, अंधकार का निराकरण करके दिव्य प्रकाश से रोम-रोम भर देने वाले बिंदुयोग की दिव्य संकेतों पर थिरकने की, भावभरी मनःस्थिति उत्पन्न करने वाले नादयोग की, आत्मबोध और तत्त्वबोध के आधार पर अपनी मान्यताओं में क्रांतिकारी परिवर्तन करने की प्रेरणाऐं भरी पड़ी हैं।
साधना के बिना हो ही नहीं सकते। बहीखाते में लंबे मीजान सही-सही लगाते रहने वाले मुनीमों की कुशलता उनकी एकाग्रता पर ही निर्भर है। कवि, लेखक, चित्रकार एवं वैज्ञानिक आदि की सफलता भी एकाग्रता पर ही निर्भर है। इतने पर भी उन्हें योगी या आत्मिक-प्रगति में सफल व्यक्ति नहीं कह सकते हैं। मन का केंद्रीकरण उपयोगी तो हर क्षेत्र में है, पर वह अध्यात्म लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अनिवार्य नहीं है।
साधना-माध्यमों के आधार पर अपने को परमेश्वर के साथ जोड़कर अभीष्ट आदान-प्रदान का लाभ प्राप्त करते हैं।
साधना का प्रथम चरण है। इसे पंद्रह मिनट करते और शेष आधा घंटा अपनी समग्र सत्ता को दिव्य प्रकाश से ओत-प्रोत स्थिति की अनुभूति में लगाया जाता है।
साधनापद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्रत्यावर्तन सत्र में साधकों को दी जाती है। क्रम प्रातः आँख खुलते ही आरंभ हो जाता है और जब तक नींद नहीं आ जाती तब तक चालू रहता है। इस साधन-प्रक्रिया में सूत्ररूप से वे सभी साधनाएँ समाहित कर दी गई हैं, जिन्हें प्रत्यावर्तन के दिनों में कराया-सिखाया जाता है।
साधनाएँ इनमें से किसी एक अथवा तीनों के संमिश्रण से पूर्ण करते हैं। सामान्य आहार में भी इनको आधार मानकर चला जाए तो उससे शरीर और मन में सात्विकता का अंश और बढ़ेगा, साधना-तपस्या में आशाजनक प्रगति होगी।
साधना) (3) आधा घंटा गायत्री जप— सूर्यार्घदान।
साधनाक्रम चल रहे हैं, फिर भी जो थोड़ी बहुत जगह किसी प्रकार काट छाँटकर निकाली जा सकी है, उससे कुछ ही दिन में ऐसा प्रबंध हो जाएगा कि एक सौ वानप्रस्थों की ज्ञान-संपदा एवं तप-साधना बढ़ाने के लिए समग्र प्रशिक्षण किया जा सके। यह बहुमूल्य अवसर ही है कि इन दिनों उपयुक्त शिक्षा मिलने की सुविधा भी मौजूद है। 'प्रत्यावर्तन सत्र' संभवतः पाँच वर्ष चलेंगे, तब तक साथ ही वानप्रस्थों की स्थिर शिक्षा-व्यवस्था का क्रम भी चलता रहेगा।
साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछूता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रियाकलाप अथवा वस्तुओं का हेर-फेर भर जुड़ा रहता है, वे प्राय: बालक्रीड़ा बनकर ही रह जाती हैं। उनसे कोई महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
साधना के समय चलता रहे तो आगे चलकर साधना-स्थल से बाहर निकलने पर भी, गंध का कोई उपकरण न होने पर भी, दिव्य गंध आती रहेगी। यह नासिका की सूक्ष्म तन्मात्रा के जागरण का, एकाग्रता की अभिवृद्धि का चिह्न है। इससे सफलता से प्रसन्नता का बढ़ना स्वाभाविक है।
साधना में इसके लिए पैंतालीस मिनट रखे गए हैं। महत्त्व को देखते हुए यह समय अधिक नहीं, कम ही है। कारण कि मृत्यु को एक प्रकार से भुला ही दिया गया है, यदि वह याद रहती तो निश्चित रूप से यह भी स्मरण ही रहता कि हमें परमेश्वर ने असाधारण विभूतियाँ देकर क्यों यह सुरदुर्लभ शरीर दिया है और उसके साथ क्या-क्या जिम्मेदारियाँ सौंपी हैं। उन्हें पूरा करने के लिए कुछ किया जा रहा है या नहीं। अपने मन में यह भाव कभी उठते ही नहीं।
साधना के साथ-साथ उपरोक्त भावचित्रों को मन:क्षेत्र पर अतिसघन चित्रित किया जाना चाहिए। इससे वह चिंतन कुछ ही समय में जीवन का एक प्रवाह बन जाता है और साधक का आंतरिक कायाकल्प होने से बाह्य जीवन अनासक्त कर्मयोगी जैसा उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से कृषक, पशुपालक, श्रमिक, व्यवसायी जैसे सामान्य आजीविका में निरत होने के कारण छोटा भले ही समझा जाए, पर वस्तुतः आंतरिक उत्कृष्टता के कारण वह होता अत्यंत महान ही है। अध्यात्म मूल्यांकनों की कसौटी पर कसने से उसे महामानव एवं ऋषिकाय ही ठहराया जा सकता है। राजा जनक यों सांसारिक दृष्टि से क्रियाव्यस्त व्यक्ति थे, पर अपने उदात्त दृष्टिकोण के कारण वे सदा ब्रह्मवेत्ता ही माने गए।
साधना-उपक्रमों में यथासमय ऐसी स्थिति स्वयमेव आती है, जिसमें योग-निद्रा जैसी अनुभूति होती है। सारे क्रियाकलाप ठप्प हो जाते हैं। जप में माला फेरना और मंत्रोच्चार बंद हो जाता है। जब स्थिति सुधरती है तो ऐसा प्रतीत होता है, झपकी लग गई थी, सो गए थे; पर वस्तुतः ऐसा होता ही नहीं, यह साधनाएँ ऊर्जा और ऊष्मायुक्त हैं। उसमें आवेश संभव नहीं, निद्रा की कोई संभावना नहीं।
साधना स्तर की मान्यताएँ गहराई तक अंत:करण में जड़ जमा लें और वे कार्यरूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठें तो समझना चाहिए इस एक ही साधना ने जीवनलक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।
साधनाक्रम चलाया जाना चाहिए, इसकी एक क्रमबद्ध विधि-व्यवस्था बनाकर साधकों को दी जाती है और आशा की जाती है कि वे भविष्य में आजीवन निष्ठापूर्वक पालन करते रहेंगे।
साधनाएँ समाहित कर दी गई हैं, जिन्हें प्रत्यावर्तन के दिनों में कराया-सिखाया जाता है।
साधना के राजमार्ग पर ही चलना पड़ता है। किसी पंथ, मंत्र, देवता या गुरु का सहारा लेकर बिना कठोर प्रयास के आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य तक पहुँच सकना सर्वथा असंभव ही है। यह तथ्य जिनकी समझ में आ जाता है, वे ही कुछ ठोस प्रयास कर पाते हैं, तदनुसार उन्हीं के हाथ कुछ काम की चीज लग भी पाती हैं। शेष तो ऐसे ही कल्पना-जल्पना की, बेपर की उड़ानें उड़ते रहने में ही समय गँवाते हैं।
साधनाऐं इसी समर्पणयोग की पृष्ठभूमि विनिर्मित करती हैं, इसलिए उसे उच्चतम स्तर की वेदांतोक्त अद्वैत साधना कह सकते हैं। जिन्हें इन सत्रों में बुलाया गया है, उनकी पूर्वजन्मों की संचित तप संपदा इसी स्तर की समझी गई है और आशा की गई है कि पूर्वजन्मों की उपलब्धियों से आगे वे सामान्य साधनाक्रम का आश्रय लेकर द्रुतगति से आगे बढ़ सकेंगे और पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे।
साधना ही लोक-मानस का मर्मस्पर्श करने और उसका स्तर ऊँचा उठा सकने में समर्थ हो सकती है। लोकसेवा का, जननेतृत्व का उद्देश्य इससे घटिया स्तर के लोग पूरा कर ही नहीं सकते। इस आवश्यकता की पूर्ति वानप्रस्थ आश्रम ही कर सकता है। आज की गई गुजरी स्थिति में जनजागरण के लिए, लोक-निर्माण के लिए, वानप्रस्थ संस्था को पुनर्जीवित किया ही जाना चाहिए।
साधना के साथ जुड़ी हुई विचारणा एवं भावना को सुविस्तृत करने वाला व्यापक चिंतन करने के लिए कहा जाता है। साधना और निर्दिष्टि दिशा में चलने की उन प्रेरणाओं को हृदयंगम करने की विधि क्या हो सकती है? इसी की विस्तृत योजनाएँ साधनाकाल में बनाते रहने के लिए कहा जाता है। भाव-प्रवाह को निर्दिष्ट दिशा में लगाए रहा जाए और भावी जीवन में उन प्रेरणाओं का समावेश कैसे किया जाए, इसी की योजनाएँ बनाते रहने के लिए कहा जाता है। इन साधना सत्रों में साधक को विशेष दिशाओं में चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है।
साधना के दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक-प्रगति यात्रा कह सकते हैं। जिस प्रकार इंद्रियजन्य वासनाओं और मनोवांछाओं की, तृष्णाओं की पूर्ति भौतिक साधन-सामग्री के आधार पर होती है, इसी प्रकार आंतरिक समाधान, संतोष, आनंद-उल्लास की असीम शांति भरी स्थिति अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उपार्जित संपदाओं से होती है। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है। अगणित ऋद्धि-सिद्धियों की राह यही है।
साधनात्मक योग-प्रक्रिया है। इसी को ब्रह्मविद्या कहते हैं। दिव्य चेतना के अभीष्ट अवतरण का विज्ञान ही साधना उपक्रम है। इसके लिए यों अन्य विधि-विधान भी प्रचलित हैं; पर सर्वोत्तम सर्वसुलभ और समुचित फलप्रद साधना गायत्री महामंत्र के शक्ति पक्ष की ही है।
साधना है। इसमें पंद्रह मिनट शरीर को ढीला करना, पंद्रह मिनट मन को खाली करना और तदुपरांत एक घंटे जिह्वा को उलटकर तालू से लगाना, धीरे-धीरे सिहलाना और उस आधार पर अमृत बिंदु की मधुरता और ब्रह्मानंद की चरम संवेदना का अनुभव करना— सामान्यतया यही खेचरी मुद्रा है। यों उपरोक्त तीन कार्यक्रम प्रथक-प्रथक प्रतीत होते हैं; किंतु वस्तुतः वे एक ही हैं। शरीर को ढीला और मन को खाली किए बिना कोई ध्यान सही रूप से जम नहीं सकता। इसलिए इन पंद्रह-पंद्रह मिनट के दो उपक्रमों को तो खेचरी-साधना के साथ जुड़े हुए दो चरण ही कहना चाहिए, जिसके बिना गति आगे बढ़ती ही नहीं।
साधना की प्राणयोग-प्रक्रिया है। इन दोनों में कमर को सीधी रखकर, पालथी मारकर सुखासन में बैठना पड़ता है। ध्यान-साधनाओं से शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है, इसलिए उनमें आराम-कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पड़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम्-साधना जपात्मक प्रक्रियाएँ हैं। सोऽहम्-साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं।
साधनाक्रम में पांच योगों का समावेश है— (1) लययोग (2) बिंदुयोग (3) प्राणयोग (4) ऋजुयोग (5) नादयोग। इस एक ही साधनाक्रम में पाँच योग-साधनाएँ जुड़ी-गुथी हुई हैं। इन्हें पंचकोशों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना-सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम्-साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती है।
साधना का स्वरूप, जो पौने नौ बजे से नौ बजे तक किया जाता है। इतने समय यों प्राय: ऐसी स्थिति बन जाती है, जिसके आधार पर देर तक भ्रूमध्य भाग में प्रदीप्त किए गए प्रकाश की आभा को समस्त शरीर में विस्तृत एवं व्यापक हुआ अनुभव किया जा सके।
साधना के तीन स्तर हैं— आरंभिक, माध्यमिक, उच्चस्तरीय। इन्हें प्राइमरी स्कूल, हाईस्कूल और कॉलेज कह सकते हैं। प्राइमरी स्कूल की त्रैत साधना है, जिनमें पंचतत्त्वों से बना प्रतिमास्वरूप भगवान, पूजारत पंचतत्त्वों से बना शरीर। पंचतत्त्वों की पूजा-सामाग्री, इस प्रकार यह पार्थिव पूजा प्रारंभिक साधना कही जाती है। देवालयों में, कर्मकांड उपचारों में यही प्रक्रिया काम आती है।
साधना-पद्धति बहुत ही सुंदर, समुचित एवं संतुलित रूप से संपन्न करती है। साधना-उपक्रम के माध्यम से उस भाव-अभ्यास की यह रूप-रेखा है, जिसके आधार पर प्राण का महाप्राण एवं आत्मा का परमात्मा के रूप में विकसित हो सकना कठिन नहीं रहता, सरल हो जाता है।
साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरंतर उसका बीजरूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदंड को सीधा रखकर ही एवं पालथी मारकर ही बैठना पड़ता है।
साधना कराई जा सके। पेंसठ वर्ष के बाद तो आमतौर से इंद्रियाँ, हाथ-पैर और मस्तिष्क इतने शिथिल हो जाते हैं कि जरा-जीर्ण स्थिति में किसी प्रकार एक स्थान पर बैठकर, सहायक की सहायता से दिन ही काँटे जा सकते हैं। प्राचीनकाल में यह असमर्थ स्थिति ही सन्यास की होती थी। भागदौड़ की, सेवा-साधना तथा पंचकोशों के अनावरण की कष्टसाध्य तपश्चर्या के अयोग्य वयोवृद्ध शरीर छूट-पुट ध्यान-भजन या उपदेश परामर्श के योग्य ही रह जाता है। संन्यास उसी विश्रामकाल के लिए उपयुक्त माना गया है।
साधना अद्वेत की है। इसे कॉलेज कक्षा कह सकते हैं। इससे ब्रह्म और जीव का परस्पर समर्पण होता है। जीव अपनी सत्ता ब्रह्म में होमता है और ब्रह्म अपनी विभूतियाँ जीव पर उड़ेलता है। इस आदान-प्रदान में दोनों की ही तृप्ति होती है, इसे आत्मा और परमात्मा का विवाह-बंधन— ब्रह्म-संबंध कह सकते हैं।
साधना का प्रयोजन इसी स्थिति को प्राप्त कराना है।
साधना में निरत उच्चस्तरीय चिंतन और कर्तृत्व के अभ्यस्त व्यक्ति किसी भी राष्ट्र की बहुमूल्य संपदा सिद्ध हो सकते हैं। चरित्रवान, कर्मठ और आदर्शवादी लोग ही समाज को समुन्नत बनाते हैं। विश्वशांति में उन्हीं की भूमिका प्रमुख होती है। प्रत्यावर्तन-साधना की सफलता का सामाजिक परिणाम अत्यंत सुखद होगा। उनके हाथ में जो भी काम होगा उसे उच्चस्तरीय कर्मयोग भावना से पूरा करेंगे।
साधना का चमत्कारी प्रयोजन भी कम नहीं है। यह प्राणयोग की महती साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण, इस प्रकार चौंसठ प्राणायामों का साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताए गए हैं। इन सब में प्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्-साधना’ में सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मंत्रो में गायत्री सर्वोपरि है, उसमें प्राणयोग के विविध साधना-विधानों में सर्वोच्चत मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है।
साधना। आरंभ के पंद्रह मिनटों में श्वास के साथ-साथ ‘सो’ की तथा श्वास बाहर निकलते समय ‘हम्’ की ध्यान की भावना करना। उसके उपरांत श्वास के रूप में महाप्राण का शरीर के रोम-रोम में प्रवेश और ‘हम्’ के रूप में निकृष्ट स्तर की अहंता का बहिष्कार।
साधना की सफलता को प्रख्यात पाँच देवों के द्वारा प्राप्त हो सकने वाले अनुदान वरदान के रूप में देख सकते हैं।
साधना एवं विधि-विधानों का ही बाह्य कलेवर गठित होता है; पर उनके साथ-साथ भावोत्कर्ष की ध्यान-धारणा अत्यंत सघन रूप में जुड़ी रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि प्रत्येक साधना-विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं— शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं; वरन भावभरी मन:स्थिति में संपन्न किया जाए।
साधना को ही सर्वोत्तम बताते हैं —
साधना में प्रत्येक अवयव को पृथक-पृथक ध्यान-भूमिका में सम्मुख लाया जाता था और उसमें प्राणशक्ति भर जाने का भाव किया जाता था। ठीक उसी प्रकार इस साधना में ह्रदय, फ्फुफुस, आँते, आमाशय, वृक्क, मस्तिष्क आदि अंग-प्रत्यंग में भरी हुई ज्वलंत ज्योति की अनुभूति की जाती है। प्रत्येक कोशिका एवं तंतु को आलोकित देखा जाता है। मष्तिष्क के चार परत माने गए हैं— मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। इन चारों को प्रकाश-पुँज बना हुआ अनुभव किया जाता है।
साधना में सर्वप्रथम डेढ़ घंटे की खेचरी मुद्रा साधना है। इसमें पंद्रह मिनट शरीर को ढीला करना, पंद्रह मिनट मन को खाली करना और तदुपरांत एक घंटे जिह्वा को उलटकर तालू से लगाना, धीरे-धीरे सिहलाना और उस आधार पर अमृत बिंदु की मधुरता और ब्रह्मानंद की चरम संवेदना का अनुभव करना— सामान्यतया यही खेचरी मुद्रा है। यों उपरोक्त तीन कार्यक्रम प्रथक-प्रथक प्रतीत होते हैं; किंतु वस्तुतः वे एक ही हैं। शरीर को ढीला और मन को खाली किए बिना कोई ध्यान सही रूप से जम नहीं सकता। इसलिए इन पंद्रह-पंद्रह मिनट के दो उपक्रमों को तो खेचरी-साधना के साथ जुड़े हुए दो चरण ही कहना चाहिए, जिसके बिना गति आगे बढ़ती ही नहीं।
साधना-स्थल से बाहर निकलने पर भी, गंध का कोई उपकरण न होने पर भी, दिव्य गंध आती रहेगी। यह नासिका की सूक्ष्म तन्मात्रा के जागरण का, एकाग्रता की अभिवृद्धि का चिह्न है। इससे सफलता से प्रसन्नता का बढ़ना स्वाभाविक है।
साधना करने वालों को अपने कलेवर के हर कक्ष में ज्योति अवतरण के साथ दिव्य भावनाओं के समावेश का चिंतन करते हुए प्रसन्नता ही अनुभव करनी चाहिए।
साधना कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है। इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताए गए हैं। इन सब में प्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्-साधना’ में सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मंत्रो में गायत्री सर्वोपरि है, उसमें प्राणयोग के विविध साधना-विधानों में सर्वोच्चत मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायाम का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
साधनाओं के लिए कुल मिलाकर पंद्रह मिनट हैं। प्रतिदिन करना हो तो दोनों साढ़े सात-सात मिनट की जा सकती है। अन्यथा यह तरीका भी अच्छा है कि एक दिन पंद्रह मिनट ज्योति अवतरण और दूसरे दिन सोऽहम्-साधना करते रहा जाए।
साधना-संपर्क बनाना चाहिए।
साधना’ में सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मंत्रो में गायत्री सर्वोपरि है, उसमें प्राणयोग के विविध साधना-विधानों में सर्वोच्चत मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायाम का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
साधनारत साधक उनका श्रवण आनंद लेते हुए नादयोग का क्रम चलाते रहें। स्वयं भी इकतारा, सितार जैसे मृदुल वाद्य यंत्र बजाते हुए उस स्थिति में आत्मविभोर हो सकते हैं। झींगुरों की झंकार, चिड़ियों की चहचहाहट सुनने का प्रकृति सान्निध्य मिल सके तो वह सहज वाद्य भी उपयुक्त रहेगा। इस प्रकार के बाह्य माध्यमों का आश्रय लेकर भी नादयोग की साधना हो सकती है और यदि भावना स्तर प्रखर रहे तो उनसे भी उतना ही लाभ मिल सकता है, जितना कि कान के छेद बंद करके अंतःचेतना द्वारा दिव्य नाद सुनने से उपलब्ध होता है।
साधना, जिसका विस्तृत वर्णन पिछले पृष्ठों में हो चुका है।
साधना के पथ पर समग्र रूप से चलना भी एक साधना है और कितने व्यक्ति बिना योग-साधना के निर्धारित विधि-विधानों को अपनाए बिना भी महामानव देवदूत स्तर की परिष्कृत स्थिति प्राप्त कर लेते हैं; पर जिन्हें साधना विज्ञान पर निष्ठा है, उन्हें योगाभ्यास की प्रक्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण सहायता कर सकने वाली दृष्टिगोचर होती है। अस्तु समुन्नत जीवन के लिए व्यावहारिक कदम उठाने के साथ-साथ वे योग-साधानाओं में भी तत्परता बनाए रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए खेचरी मुद्रा का असाधारण लाभ-प्रभाव और महत्त्व साधारण नहीं, असाधारण ही है।
साधना ध्यान-धारणा सफल नहीं हो सकती। ऐसा अन्न पेट में जाकर ऐसे उपद्रव खड़े करता है, जिनके कारण मन में न शांति रह पाती है और न स्थिरता। इस विग्रह के निवारण करने को साधक सबसे पहले अपने आहार में सात्विक तत्त्वों के समावेश का प्रथम प्रयास करते हैं। इस प्रयोजन के लिए हविष्यान्न से बढ़कर और किसी की उपयोगिता नहीं हो सकी। प्रायश्चित्य-प्रक्रिया के लिए हविष्यान्न एवं पंचगव्य लेने का निर्देश धर्मग्रंथो में पग-पग पर पाया जाता है।
साधना जैसा पुण्य फलदायक बन जाता है। उसकी सुंदरता और सफलता देखते ही बनती है।
साधना एवं सेवा प्रयास वे जारी रखेंगे। सुविधानुसार समय-समय पर आवश्यक शक्ति प्राप्त करने के लिए हरिद्वार आते रहेंगे। जिन्हें पूरे समय का प्रभु समर्पित जीवन जीना है, वे अपना स्थाई घर शान्तिकुञ्ज को मानेंगे। निर्धारित समय तक हर वर्ष शिक्षा तथा साधना के लिए आश्रम में रहेंगे और बताए गए क्षेत्र में सेवा का कार्य करने के लिए चले जाया करेंगे। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन की वे त्रिविधि उपलब्धियों को समग्र विधि- व्यवस्था के साथ पूरा करते हुए, जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए द्रुतगति से अग्रसर हो सकेंगे।
साधना है। एक-एक कोश की, एक-एक ब्रह्मविभूति हैं। ये ब्रह्मविभूतियाँ वे सीढ़ी हैं, जो साधक को अपना सुखास्वादन कराती हुई अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए अग्रसर करती हैं।
साधनाएँ साधक की सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करती हैं। उनमें व्यक्ति और समाज के समग्र उत्कर्ष की संभावना सन्निहित है।
साधना दो घंटे का प्रवचन पंद्रह मिनट का परामर्श विशुद्ध रूप से इस एक ही प्रयोजन के लिए है। यदि यह पूरा हो सके तो नरक से स्वर्ग में पहुँचना, बंधन से मुक्त होना अविलंब संभव हो जाता है। अवांछनीय गतिविधियों में उलझी हुई अंतःचेतना जब अपना चिंतन और कर्तृत्व बदलने के लिए सहमत हो जाती है तो मनुष्य का कायाकल्प महामानव के, भूसुर के रूप में हुमा तत्काल दीख पड़ने लगता है। जीवनलक्ष्य की पूर्ति इसी को कहते हैं। अपना आत्मा जिसे सबमें दीखने लगा, जिसने स्वार्थपरता और संकीर्णता की जंजीरें तोड़कर समस्त विश्व को परमात्मा का रूप माना और उसे समुन्नत बनाने के लिए आत्मसमर्पण का साहस किया, उसके लिए ईश्वरीय अनुकंपा दूर कहाँ रहती है ?
साधना में अग्नि या बिजली के सहारे जलने वाले प्रकाश-दीप का प्रयोग आरंभिक आवश्यकता पूरी करने के लिए ही किया जाता है। ध्यान-धारणा को प्रकाश का भौतिक स्वरूप भली प्रकार अपनाने का अवसर मिल जाए, बस इतनी भर आवश्यकता वह प्रत्यक्ष दीपक पूरी करता है। उससे आगे की मंजिल पूरी करने के लिए अग्नियुक्त प्रकाश को सद्ज्ञान प्रकाश में परिणत करना पड़ता है। आत्मोत्कर्ष प्रयोजन के साथ स्पष्टत: उसी का संबध भी है।
साधना कह सकते हैं। चार दिनों में उसी महायात्रा के संबंध में आवश्यक परिचय एवं अभ्यास करा दिया जाता है, ताकि क्रमशः उस मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए अध्यात्म संपदाओं से संपन्न बना जा सके। चार दिन में साधना की पूरी मंजिल पार करके पूर्णता के लक्ष्य तक जा पहुँचना और सिद्धयोगी बन सकना तो असंभव है, उसके लिए समय और सतत श्रम चाहिए। इन थोड़े से दिनों में शिक्षण और अनुभव की इतनी आवश्यकता पूरी हो जाती है कि प्रगति प्रयाण की शांति सुव्यवस्था एवं सफलता के साथ द्रुतगति से आगे बढ़ाया जा सके।
साधना भी संचित मलीनता के निराकरण में सहायता करती है। शान्तिकुञ्ज का वातावरण भी शोधन और समाधान की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है। इस दृष्टि से कुछ बार तो यहाँ ऐसे ही हलका होता है, शेष के लिए पूण्य-संवर्द्धन के लिए कुछ साहस करने की विशेष विधि-व्यवस्था सोची जाती है।
साधना सत्र में सम्मिलित होने वाले साधकों को मिलता है। अन्न शुद्धियों के लिए जो कुछ संभव है, वह सब कुछ किया जाता है। गंगाजल से ही भोजन बनता है और वही पीया जाता है। बनाने तथा परोसने में जिन व्यक्तियों का संपर्क रहता है, उससे वह सहज ही संस्कारवान हो जाता है। पंचगव्य का सेवन प्रायश्चित की दृष्टि से आवश्यक ही माना गया है।
साधना करने के छोटे से विधान को ही लें, उसमें छायापुरुष सिद्धि की समस्त संभावनाएँ विद्यमान हैं। अपने ही स्तर का एक नया सूक्ष्मव्यक्तित्व उत्पन्न कर लेना छायापुरुष कहलाता है। पाँचकोशों में पाँच छायापुरुष तक सिद्ध कर लेने की गुंजाएश है, वे विश्वस्त एवं समर्थ सेवक का कार्य करने में निरंतर जुटे रह सकते हैं। बिंदुयोग से मैस्मरिज्म, हिप्नोटिज्म जैसी सफलताएँ मिल जाती हैं। प्राणयोग के सहारे प्राण चिकित्सा से कठिन रोगों को सरलतापूर्वक दूर करने में सफलता मिल सकती है।
साधना करना एक विशेष अनुष्ठान है, जिसे सामयिक ही कह सकते हैं। सदा इस रीति को अपनाए रहना असंभव है। घर जाकर किस प्रकार साधनाक्रम चलाया जाना चाहिए, इसकी एक क्रमबद्ध विधि-व्यवस्था बनाकर साधकों को दी जाती है और आशा की जाती है कि वे भविष्य में आजीवन निष्ठापूर्वक पालन करते रहेंगे।
साधनाएँ इसी प्रयोजन को पूरा करती हैं। देखने में उनमे भी तपश्चर्या, योग-साधना एवं विधि-विधानों का ही बाह्य कलेवर गठित होता है; पर उनके साथ-साथ भावोत्कर्ष की ध्यान-धारणा अत्यंत सघन रूप में जुड़ी रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि प्रत्येक साधना-विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं— शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं; वरन भावभरी मन:स्थिति में संपन्न किया जाए।
साधनाओं का क्षेत्र ध्यान-भूमिका है, उसमें प्रवेश करने के लिए मानसिक स्थिरता आवश्यक है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए योगसाधक शरीर को ढीला और मन को खाली करने का अभ्यास करते रहे हैं। इसमें सफलता मिलने पर उनका आगे का क्रियाकलाप सरलतापूर्वक अग्रसर होने लगता है, तब ध्यान जमने की बात कुछ अधिक कठिन नहीं रह जाती।
साधनाचक्र है, जिससे मनोनिग्रह कि समस्या इस स्तर के अन्य सभी साधनों कि अपेक्षा अधिक अच्छी तरह हल हो जाती है।
साधना में गहरे स्वासोच्छ्वास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम का मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी, जितनी मंदगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोककर धीरे-धीरे उस वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए। गहरी और पूरी सांस लेने से स्वभावत: नासिका छिद्रों से टकराकर उत्पन्न होने वाला ध्वनि-प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा सके। कर्णेंद्रियों की सूक्ष्मचेतना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है।
साधनाक्रम यदि सही रीति से संपन्न हो सके, तो तत्काल उसका प्रतिफल देखा जा सकता है। जीवन का जो कुछ भी भला-बुरा स्वरूप है, वह मनुष्य के चिंतन और कर्तृत्व की प्रतिक्रियामात्र है। उत्थान और पतन की अंतःस्थिति का प्रतिबिंबमात्र कहना चाहिए। विक्षोभ और उल्लास का तात्त्विक विवेचन किया जाए तो उन्हें चेतना के श्वासोच्छास भर रख सकते हैं और आंतरिक स्तर में हेर-फेर संभव हो सके तो परिस्थितियों के बदलने में एक क्षण भर की भी देर नहीं लगती। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं कि मनुष्य की अंतःनिष्ठा एवं आकांक्षा-प्रवाह में परिवर्तन हुआ तो बाह्य जीवन का सारा ढाँचा ही उलट गया।
साधना से सिद्धि मिलती है।
साधना से संबधित है। इसके लिए सरल विधि-विधान प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र की साधना-पद्धति में समन्वित किया गया है। चार दिन के सत्र में इसकी भूमिका इस प्रकार अभ्यस्त करा दी जाती है कि उसे भविष्य में नियमित साधना का अंग बना लिया जाए तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की आत्मबलवर्द्धन की दिशा में क्रमिक, किंतु तीव्र प्रगति की जा सकती है। विशिष्ट प्रगति करने वाले इसी मार्ग पर चलते हुए कुंडलिनी जागरण जैसी महान उपलब्धियाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।
साधनाक्रम निर्धारित है, उसे पंचकोश जागरण भूमिका कह सकते हैं और उसी दिशा में चलते रहने से षट्चक्र-प्रस्फुरण, कुंडलिनी जागरण, त्रिविध ग्रंथीवेधन, जीवनमुक्ति, भावसमाधि आदि अनेकानेक योग सिद्धियों की उपलब्धि का अनुदान मिलना संभव मान सकते हैं।
साधनाक्रमों में सफलता नहीं मिल सकती। अस्त-व्यस्त मन:स्तर के लोगों को त्रैतवादी कर्मकांडपरक साधनाएँ बता दी जाती हैं, वे कथा-कीर्तन, यात्रा, परिक्रमा, पूजा-पाठ के उपक्रमों को, प्रधानतया शरीर को और यत्किंचित मन को लगाकर अपनी गाड़ी धकेलते रहते हैं। उच्चस्तरीय साधनाओं का क्षेत्र ध्यान-भूमिका है, उसमें प्रवेश करने के लिए मानसिक स्थिरता आवश्यक है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए योगसाधक शरीर को ढीला और मन को खाली करने का अभ्यास करते रहे हैं। इसमें सफलता मिलने पर उनका आगे का क्रियाकलाप सरलतापूर्वक अग्रसर होने लगता है, तब ध्यान जमने की बात कुछ अधिक कठिन नहीं रह जाती।
साधना विज्ञान पर निष्ठा है, उन्हें योगाभ्यास की प्रक्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण सहायता कर सकने वाली दृष्टिगोचर होती है। अस्तु समुन्नत जीवन के लिए व्यावहारिक कदम उठाने के साथ-साथ वे योग-साधानाओं में भी तत्परता बनाए रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए खेचरी मुद्रा का असाधारण लाभ-प्रभाव और महत्त्व साधारण नहीं, असाधारण ही है।
साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बन गया।
साधनाओं पर यही सिद्धांत लागू होता है। उनमें विचार-विस्तार का, भाव-प्रवाह का क्षेत्र अतिव्यापक है। अंत:भूमिका, परिशोधन, परिमार्जन और परिष्कार इसी समुद्र-मंथन में संभव है, इसलिए यहाँ एकाग्रता में कमी पड़ने की बात नहीं सोचनी चाहिए। साकार उपासना में तो पूजा-पाठ, स्तवन, जप आदि का पूरा उपक्रम ही बहुमुखी चिंतन के साथ जुड़ा हुआ है। जहाँ क्रिया होगी वहाँ भावविस्तार भी रहेगा ही।
साधना की प्रगति में योगदान मिलेगा।
साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
साधना के लिए अगरबत्ती-धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चंदन-कपूर आदि लेपकर, इत्र लगाकर, गुलाबजल छिड़ककर उस स्थान पर सुगंध उत्पन्न की जाती है। साधना के समय अनुभव किया जाता है। प्रस्तुत गंध नासिका में — मस्तिष्क में बस रही है। उसकी अनुभूति सहज ही हो रही है। ऐसा क्रम साधना के समय चलता रहे तो आगे चलकर साधना-स्थल से बाहर निकलने पर भी, गंध का कोई उपकरण न होने पर भी, दिव्य गंध आती रहेगी।
साधना की सफलता का सामाजिक परिणाम अत्यंत सुखद होगा। उनके हाथ में जो भी काम होगा उसे उच्चस्तरीय कर्मयोग भावना से पूरा करेंगे। फलतः व्यक्ति के सदाशयता पूर्ण अनुदान से समाज को, विश्व को, अत्यंत सुखद परिणामों से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
साधनाक्रम को संक्षिप्त में फिर एक बार यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इससे संदर्भ-चर्चा एवं विवेचन-विश्लेषण को समझने में अधिक सुविधा होगी।
साधना का प्रतिफल भी संतोषजनक होता है।
साधना जब परिपक्व होने लगती है तो भावोत्कर्ष क्षेत्र से आगे बढ़कर सुविस्तृत अंतरिक्ष में संव्याप्त हलचलों को समझने का अवसर मिलता है। इस संसार को प्रभावित करने वाली अगणित ब्रह्म-प्रेरणाओं के प्रवाह बहते रहते हैं। उनके स्पंदन हमारी कर्णेंद्रिय से शब्दरूप में टकराते हैं। उन्हें पहचानने और पकड़ने की सफलता, साधक में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्मजगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है। किसी व्यक्तिविशेष क्षेत्र, देश अथवा लोक के संबंध में इस प्रकार की सही स्थिति का पूर्वाभास होने लगता है।
साधना अज्ञानग्रस्त लोगों जैसी भ्रम-धारणाओं पर निर्धारित नहीं होती। वह ईश्वर अनुकंपा, बहुमूल्य उपलब्धियाँ पाने के लिए पूरी कीमत चुकाने पर विश्वास करता है और उसके लिए महामानवों जैसी स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा उपासना-उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है।
साधना-कक्ष से बाहर अकारण न भटकने, अनावश्यक वार्त्तालाप न करने के प्रतिबंध इसीलिए हैं। साधना में छह घंटे लगते हैं और दो घंटे प्रवचन सुनने को मिलते हैं। पंद्रह मिनट व्यक्तिगत परामर्श के हैं। इस प्रकार बाधित सवा आठ घंटे की प्रक्रिया साधक को अनिवार्य रूप से आत्मचिंतन में लगाए रहती है। निद्रा और नित्यकर्म के अतिरिक्त जो शेष समय बच जाता है, उसमें भी मनन और चिंतन की प्रक्रिया में ही संलग्न रहना पड़ता है।
साधनाओं में विरह की व्याकुलता है। गोपी कृष्ण-विरह में उसी रसानुभूति को उच्चस्तरीय लययोग-साधना बताया गया है, यद्यपि एकाग्रता का उसमें सर्वथा अभाव है। अपने स्तर का भाव भरा उद्वेग ही भक्तियोग की परिभाषा में योगाभ्यास का उच्च चरण माना गया है। प्रत्यावर्तन साधकों को अपनी मनोभूमि इसी स्तर की रखने के लिए कहा गया है। वे एकाग्रता को महत्त्व न दें; वरन यह देखें कि जिस साधना के साथ, जिस भाव-प्रभाव को जोड़कर रखा गया है, चिंतन उसी दिशा में बहने लगा या नहीं।
साधना के समय उपरोक्त विचारधारा की सुविस्तृत शृंखला मस्तिष्क में घुमड़ते रहने से एकाग्रता नष्ट हुई। एकाग्रता की लययोग एवं समाधि-प्रक्रिया में ही आवश्यकता पड़ती है। शेष सभी साधनाओं में विचार-प्रवाह की एक दिशा बनाए रहना ही पर्याप्त होता है। गंगा हिमालय से निकलकर समुद्र में मिलने के लिए चलती है। यह दिशा-निर्धारण उसे लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है।
साधनाक्रम में विघ्न बनकर खड़ा होता है, चित्त का उच्चाटन करता है— श्रद्धा नहीं जमने देता। इस प्रकार उपासना की दिशा में उठाए गए कदम प्रायः लँगड़े-लूले, अधूरे-असफल रह जाते हैं। यदि आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया पहले अपना ली जाए तो कपड़े को धोने के बाद रँगने की तरह साधना का प्रतिफल भी संतोषजनक होता है।
साधना के साथ भावना जुड़ी हुई है, उसे आत्मसात करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें। प्रयत्न इतना गहरा होना चाहिए कि क्रिया-प्रक्रिया अनुभूति के रूप में परिणित, प्रतिबिंबित होने लगे। इस प्रकार भावोत्कर्ष का प्रयोजन सरलतापूर्वक संपन्न होता चला जाता है। इस अंतःस्फुरणा को व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकता और पिछले ढर्रे को बदलकर उपलब्ध आलोक के आधार पर किस प्रकार, किस दिशा में, क्या परिवर्तन किया जा सकता है? तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं तो आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट ढाँचा सामने आ खड़ा होता है।
साधना के रूप में कराया जाता है। पीछे इसी का उच्चस्तर विकसित होकर आत्मज्योति एवं ब्रह्मज्योति दर्शन के रूप में परिणत विकसित हो जाता है, तब फिर किसी त्राटक के लिए प्रकाशोत्पादक दीपक आदि भौतिक उपकरणों की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
साधनाओं को सबसे जटिल व्यवधान कह सकते हैं। यह दूर न किया जा सके तो मनोयोग के आधार पर संपन्न होने वाले साधनाक्रमों में सफलता नहीं मिल सकती। अस्त-व्यस्त मन:स्तर के लोगों को त्रैतवादी कर्मकांडपरक साधनाएँ बता दी जाती हैं, वे कथा-कीर्तन, यात्रा, परिक्रमा, पूजा-पाठ के उपक्रमों को, प्रधानतया शरीर को और यत्किंचित मन को लगाकर अपनी गाड़ी धकेलते रहते हैं। उच्चस्तरीय साधनाओं का क्षेत्र ध्यान-भूमिका है, उसमें प्रवेश करने के लिए मानसिक स्थिरता आवश्यक है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए योगसाधक शरीर को ढीला और मन को खाली करने का अभ्यास करते रहे हैं।
साधना-उपक्रम के माध्यम से उस भाव-अभ्यास की यह रूप-रेखा है, जिसके आधार पर प्राण का महाप्राण एवं आत्मा का परमात्मा के रूप में विकसित हो सकना कठिन नहीं रहता, सरल हो जाता है।
साधना बढ़ाने के लिए समग्र प्रशिक्षण किया जा सके। यह बहुमूल्य अवसर ही है कि इन दिनों उपयुक्त शिक्षा मिलने की सुविधा भी मौजूद है। 'प्रत्यावर्तन सत्र' संभवतः पाँच वर्ष चलेंगे, तब तक साथ ही वानप्रस्थों की स्थिर शिक्षा-व्यवस्था का क्रम भी चलता रहेगा।
साधना ब्रह्मविद्या के उस महान प्रयोजन को पूरा करती है, जिसमें भूमा, ऋतंभरा एवं आत्मजागृति के आधार पर भवबंधन कटने और जीवनलक्ष्य प्राप्त होने की प्रेरणा दी गई है। तत्त्वज्ञान में शरीर और मन के प्रथक्करण का धारण है। वैराग्य, संन्यास, परमहंसगति, स्थितिप्रज्ञ अवस्था का उदय होता है। आत्मबोध और तत्त्वबोध की उभयपक्षीय चेतना का उद्भव जिस अंत:करण में होगा, उसे विज्ञानमयकोश का सफल साधक ठहराया जा सकेगा ।
साधना का हाईस्कूल कक्षा, मंत्रदीक्षा और प्राणदीक्षा इन्हीं दो स्तरों का नाम है। इस साधना के साधक अपने को प्राणदीक्षा से दीक्षित अनुभव कर सकते हैं। कॉलेज-कक्षा, अग्निदीक्षा कहलाती है। उसमें साधक ब्रह्मभूत होता है, अपने को स्थितिप्रज्ञ की, जीवनमुक्त की, ब्रह्मसायुज्य की स्थिति में अनुभव करता है। इस स्तर की साधनाएँ प्राण-प्रत्यावर्तन के सफल साधक समयानुसार प्राप्त कर सकते हैं।
साधना को प्रकारांतर से पंचकोशों के जागरण की उच्चस्तरीय गायत्री साधना कह सकते हैं। इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होने वाले समस्त साधन-सूत्र इसमें क्रमबद्ध रूप से भली प्रकार जोड़ दिए गए हैं। उच्चस्तरीय शिक्षा के प्रथम अध्याय के रूप में इसे अपेक्षायुक्त सुगम रखा गया है। क्रमिक उन्नति के साथ अगले दिनों और भी अधिक कठिन, साथ ही अधिक समर्थ साधनाओं का मार्गदर्शन भी अधिकारी साधक यथासमय प्राप्त कर सकते हैं।
साधना में ह्रदय, फ्फुफुस, आँते, आमाशय, वृक्क, मस्तिष्क आदि अंग-प्रत्यंग में भरी हुई ज्वलंत ज्योति की अनुभूति की जाती है। प्रत्येक कोशिका एवं तंतु को आलोकित देखा जाता है। मष्तिष्क के चार परत माने गए हैं— मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार। इन चारों को प्रकाश-पुँज बना हुआ अनुभव किया जाता है। अपनी सत्ता के प्रत्येक पक्ष को भ्रूमध्य केंद्र से निकलने वाले प्रकाश-प्रवाह से आलोकित अनुभव करना लगभग उसी स्तर का, जैसा कि प्रभातकालीन सूर्य निकलने पर अंधकार का हर दिशा से पलायन होने लगता है और समस्त संसार आलस्य-अवसाद छोड़कर आलोक, उल्लास, स्फूर्ति एवं सक्रिय उमंगो के साथ कार्यरत हो जाता है।
साधना हो सकती है और यदि भावना स्तर प्रखर रहे तो उनसे भी उतना ही लाभ मिल सकता है, जितना कि कान के छेद बंद करके अंतःचेतना द्वारा दिव्य नाद सुनने से उपलब्ध होता है।
साधना तो आज विरक्त वर्ग में कहीं दीख ही नहीं पड़ती, जबकि परमार्थ का आधार ही जनमानस को ऊँचा उठा सकने वाले प्रयत्नों में संलग्न होता है। प्राचीनकाल में भारत की समग्र प्रगति का मेरुदंड वानप्रस्थ आश्रम ही था। नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक प्रगति एवं स्थिरता के लिए उसी वर्ग का बहुमूल्य योगदान मिलता था। परिपक्व बुद्धि, परिष्कृत दृष्टिकोण और निस्वार्थ सेवा का त्रिवर्ग जहाँ भी मिलेगा, वहीं वह शक्ति उत्पन्न होगी जो उच्चस्तरीय श्रद्धा को आकर्षित कर सके, अपने प्रभाव से जनमानस को झकझोर सके और लोक-प्रवृत्ति को महत्त्वपूर्ण दिशा दे सके। समाज का समग्र नेतृत्व वानप्रस्थवर्ग ही करता है।
साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इंद्रिय-लिप्साओं का, आलस्य-प्रमाद जैसी दुष्कृतियों का, मन से लोभ-मोह जैसी तृष्णाओं का, अंतस्तल से जीव भावी अहंता का निवारण-निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएँ अत्यंत प्रगाढ़ होनी चाहिए। दुर्भावनाएँ और दुष्कृतियाँ, निष्कृताएँ और दुष्टताएँ, क्षुद्रताएँ और हीनताएँ सभी निरस्त हो रही हैं, सभी पलायन कर रही हैं। यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए।
साधनाओं के उपयुक्त पड़ती है। यदि यह अवधि ऐसे ही निकल जाए तो पेंसठ-सत्तर की आयु तक पहुँचते-पहुँचते शरीर का कचूमर निकल जाता है, तब जरा-जीर्ण शरीर ही एक भार बन जाता है। उसी लाश का वजन ढोना कठिन पड़ता है, तब आत्मकल्याण का पुरुषार्थ कर सकने योग्य कुछ बचा ही नहीं रहता। इसके बाद तो मौत से ही कुछ आशा की जा सकती है कि वह नया शरीर देकर इस योग्य बनाए कि नई क्षमता के सहारे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने योग्य, पुरुषार्थ कर सकना संभव हो सके।
साधना जीवन सत्ता के कण–कण में प्रकाश उद्भव की अनुभूति तो कराती ही है, साथ ही उन अभिनव स्तर की हलचलें भी उभरती दृष्टिगोचर होती हैं।
साधनाएँ हैं। उसी में कुंडलिनी जागरण की समग्र प्रक्रिया जुड़ी रहती है। यह उन लोगों के लिए सुरक्षित है, जो प्रत्यावर्तन के माध्यम से सूक्ष्मशरीर को परिष्कृत करने की दूसरी मंजिल पूरी कर लेंगे। सामान्य गायत्री उपासना को प्राथमिक कक्षा कह सकते हैं। प्रत्यावर्तन-साधना का हाईस्कूल कक्षा, मंत्रदीक्षा और प्राणदीक्षा इन्हीं दो स्तरों का नाम है।
साधना में संलग्न होने का परमार्थ संपादन कर सकने का ठीक यही समय है। इसे गँवा देने के बाद एक प्रकार से कुछ हाथ रहता ही नहीं।
साधना-उपक्रम को अपनाकर पूर्णता की दिशा में क्रमिक यात्रा जारी रखी जा सकती है और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। चार दिन जितनी छोटी अवधि में इतना बड़ा प्रयोजन पूरा हो सकना असंभव है। एम.ए. पास करने में सोलह वर्ष लगते हैं और हर दिन छह-छह घंटे मनोयोगपूर्वक घोर परिश्रम करना पड़ता है। बगीचा लगाकर उसे फला-फूला देखने तक माली को कई वर्षों तक धैर्यपूर्वक कठिन परिश्रम करना पड़ता है। पहलवानी की साधना भी इसी प्रकार समयसाध्य है।
साधना के लिए लगाया जा सकना संभव हो, उतना लगाया जाए। मन-मस्तिष्क पर परमार्थ उत्तरदायित्वों की संवेदना समुचित मात्रा में छाई रहनी चाहिए और चेष्टा यही रहनी चाहिए कि पूरा न सही, अधूरा प्रयास तो होता ही रहना चाहिए।
साधना में कुछ समय, सांस लेते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ की अनुभूति। साँस के साथ महाप्राण का काया के कण-कण और मन के प्रत्येक परत में प्रवेश तथा आधिपत्य की स्थापना। ‘हम्’ के साथ लोभ, मोह भरे अहंकार का पलायन। यही है संक्षेप में सोऽहम्-साधना, जिसका विस्तृत वर्णन पिछले पृष्ठों में हो चुका है।
साधना के साथ जुड़ा हुआ अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व दर्शन।
साधना के समय अनुभव किया जाता है। प्रस्तुत गंध नासिका में — मस्तिष्क में बस रही है। उसकी अनुभूति सहज ही हो रही है। ऐसा क्रम साधना के समय चलता रहे तो आगे चलकर साधना-स्थल से बाहर निकलने पर भी, गंध का कोई उपकरण न होने पर भी, दिव्य गंध आती रहेगी। यह नासिका की सूक्ष्म तन्मात्रा के जागरण का, एकाग्रता की अभिवृद्धि का चिह्न है।
साधना-विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछूता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रियाकलाप अथवा वस्तुओं का हेर-फेर भर जुड़ा रहता है, वे प्राय: बालक्रीड़ा बनकर ही रह जाती हैं। उनसे कोई महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
साधना कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना-सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम्-साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती है। आज्ञाचक्र में ज्योति आवरण बिंदुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्मसंबंध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं।
साधना-विधि तो कहीं कदाचित ही दीख पड़ती है। आमतौर से लोग भजन के लिए नामोच्चार की तोतारट लगाए रहते हैं। भावनाविहीन क्रियाकांड में उलझे रहते हैं। फलस्वरूप अंतःचेतना का विकास होने का प्रयोजन तनिक भी नहीं होता। उलटे आलस्य-प्रमाद जैसी नई विकृतियाँ सिर पर चढ़ बैठती हैं।
साधना ब्रह्म और जीव के बीच संबध-सूत्र को सुसंचालित करती है और उनके बीच आदान-प्रदान में जो अवरोध उत्पन्न हो गया है, उसे समाप्त करके संचार-शृंखला में पुनर्जीवन उत्पन्न करती है।
साधना कह सकते हैं। इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होने वाले समस्त साधन-सूत्र इसमें क्रमबद्ध रूप से भली प्रकार जोड़ दिए गए हैं। उच्चस्तरीय शिक्षा के प्रथम अध्याय के रूप में इसे अपेक्षायुक्त सुगम रखा गया है। क्रमिक उन्नति के साथ अगले दिनों और भी अधिक कठिन, साथ ही अधिक समर्थ साधनाओं का मार्गदर्शन भी अधिकारी साधक यथासमय प्राप्त कर सकते हैं।
साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंत:करण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधना-पद्धति से भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है; पर नादयोग का इसी प्रयोजन के लिए अपना अत्यधिक महत्त्व है।
साधना का प्राण सात्विक आहार है। कहना न होगा कि इस तथ्य का इन सत्रों में पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है। पंचगव्य, हविष्यान्न, आँवला कल्क का त्रिविध संयोग इसी दृष्टि से है। इसके अतिरिक्त चावल, दाल, दलिया आदि के बनाने, शोधने, पकाने में इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है कि यह आहार-प्रक्रिया अन्नमयकोश को परिष्कृत करने में, मनःसंस्थान को उच्चस्तरीय बनाने की भूमिका ठीक तरह संपादित कर सके।
साधना में एकाग्रता का नहीं प्रवाहक्रम की प्रखरता का महत्त्व है। इसी बिंदुयोग की प्रकाश-साधना करने वालों को अपने कलेवर के हर कक्ष में ज्योति अवतरण के साथ दिव्य भावनाओं के समावेश का चिंतन करते हुए प्रसन्नता ही अनुभव करनी चाहिए।
साधना करते हुए किया जाता था। आत्मदेव को सद्गुरु, परमात्मा का प्रतिनिधि, उद्धारकर्त्ता एवं इष्टदेव के रूप में नमन करना चाहिए और आग्रह भरा अनुरोध करना चाहिए कि अपनी गतिविधियों का स्तर ऊँचा उठाए, ताकि लक्ष्य की ओर सुख-शांतिपूर्वक बढ़ चलना संभव हो सके।
साधनात्मक पक्ष कितना प्रखर है; यह कहने की आवश्यकता नहीं। इन चौबीस अक्षरों में जिन तथ्यों और प्रेरणाओं का समावेश है, उस आधार पर इस महामंत्र को संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वदर्शन, सबसे छोटा, किंतु सबसे महान सार्वभौम धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। इन अक्षरों पर जितना विचार किया जाए, उतने ही बहुमूल्य मणि-मुक्तक हस्तगत होते हैं। इसमें भरी शिक्षाएँ देश, काल, धर्म, जाति से ऊपर हैं। इसमें विश्वमानव के लिए आत्मिक एवं भौतिक रीति-नीति अपनाने का उच्चस्तरीय ऐसा मार्गदर्शन किया गया है, जिसे अपनाने पर अभाव और अशांति का कहीं कोई कारण शेष रह ही नहीं सकता।
साधना की पुनरावृत्ति करनी चाहिए। शरीर आत्मा से पृथक हो गया। मरी हुई काया चारपाई पर पड़ी है। चारों पाय चार संबंधी हैं, जो उसे जलाने ले जा रहे हैं। आत्मा दूर खड़ा इस मरण को देख रहा है।
साधना के उपयुक्त है। अपने परिचय क्षेत्र में जो लोग इस उपक्रम के उपयुक्त हों उनमें अभीष्ट साहस उत्पन्न करने के लिए साधना-संपर्क बनाना चाहिए।
साधना की जाती है।
साधना भी इसी प्रकार समयसाध्य है। आध्यात्मिक बचपन को पूरा करके प्रौढ़ता तक पहुँचाने जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति उपरोक्त सफलताओं की तुलना में कम नहीं, अधिक ही महत्त्व की हैं। अस्तु स्वभावतः उसके लिए अधिक श्रम एवं अधिक मनोयोग लगाते हुए परिपूर्ण तत्परता के साथ धैर्यपूर्वक सतत संलग्न रहना पड़ता है। हथेली पर सरसों जमाने जैसी यह बाजीगरी नहीं है। प्रत्यावर्तन इस महान निर्माण का उच्चस्तरीय शिलान्यासमात्र है।
साधनाओं में वे उपक्रम आते हैं, जिन्हें गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में गायत्री योग-साधना संदर्भ में बताया— समझाया गया है।
साधनापद्धति का परिपूर्ण, किंतु संक्षिप्त समावेश है।
साधना-विधानों में सर्वोच्चत मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायाम का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
साधना-संपदाएँ इसी एक कोश की उपलब्धियाँ हैं। शेष चार सूक्ष्मकोश, द्रश्यमान स्थूलकोश की तुलना में असंख्य गुने अधिक बलिष्ठ हैं। उनमें जो अदृश्य क्षमताएँ भरी पड़ी हैं, उनका लेखा-जोखा ले सकना सामान्य बुद्धि के लिए प्राय: असंभव ही है। योगियों, सिद्धपुरुषों, ब्रह्मज्ञानियों, तत्त्ववेत्ताओं, महामानवों की अलौकिक क्षमताओं का यदा-कदा विवरण सुना-देखा जाता है, जो नहीं सुना-देखा गया, वह और भी अधिक विस्तृत एवं रहस्यपूर्ण है। इस समस्त अलौकिकता को अदृश्य कोशों का जागरण- प्रतिफल ही कह सकते हैं।
साधना के लिए परम पुरुषार्थ की अवधि वही है, जो वानप्रस्थ के लिए निर्धारित है। यही ठीक वह समय है, जिसमें मनुष्य की मनःस्थिति वस्तुतः कुछ ठोस वस्तु प्राप्त कर सकने की होती है। जिन्हें भगवान अपनी ओर खीचते हैं, उनके लिए इस ढलती उम्र का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने की मनःस्थिति और परिस्थिति बना देते हैं।
साधना के साधक अपने को प्राणदीक्षा से दीक्षित अनुभव कर सकते हैं। कॉलेज-कक्षा, अग्निदीक्षा कहलाती है। उसमें साधक ब्रह्मभूत होता है, अपने को स्थितिप्रज्ञ की, जीवनमुक्त की, ब्रह्मसायुज्य की स्थिति में अनुभव करता है। इस स्तर की साधनाएँ प्राण-प्रत्यावर्तन के सफल साधक समयानुसार प्राप्त कर सकते हैं। क्रमिक प्रगति के साथ-साथ अग्रगामी उपलब्धियों का पथ स्वयमेव प्रशस्त होता चला जाता है।
साधना के लिए प्रत्यावर्तन सत्र में पौन घंटा निर्धारित है। इसमें से आरंभ के पंद्रह मिनट श्वास-ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की धारणा में लगने चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरंभ में अतिमंद स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमश: प्रखरता आती चली जाए। इसके उपरांत शेष आधा घंटे में चिंतन का स्तर यह होना चाहिए कि सांस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय-कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है; वरन प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है।
साधना-पद्धतियाँ, एक ही प्रयोजन पूरा करती हैं कि अंतःकरण की प्रसुप्त उच्च भावनाओं को जगाएँ, उन्हें दिशा दें और इतना आत्मबल उत्पन्न करें, जिसके सहारे लोभ और मोह के बंधनों को तोड़ते हुए मनुष्य उत्कृष्ट चिंतन को ह्रदयंगम और आदर्श कर्तृत्व को क्रियान्वित करने के लिए आंतरिक और बाह्य अवरोधों को तोड़ता हुआ कटिबद्ध हो सके। उपासना के अनेकों विधि-विधान प्रचलित हैं, पर उनका एकमात्र उदेश्य यही है। कर्मकांडो, साधना उपक्रमों की बालपोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उच्चस्तरीय शिक्षा-व्यवस्था की जाती है। सीढ़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं, केवल मुगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं, पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं। ठीक इसी प्रकार साधना-विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है।
साधना ग्रंथो में बिंदुयोग का उल्लेख विस्तारपूर्वक है। ध्यान के लिए किसी दीप विशेष पर मन को केंद्रित किया जाता है। देवताओं की प्रतिमाएँ उसी प्रयोजन के किए गढ़ी गई हैं। जब ध्यान साकार भूमिका की प्रथम कक्षा से ऊँचा उठकर प्रकाश तत्त्व पर केंद्रित किया जाता है तो उसे बिंदुयोग कहते हैं। बिंदुयोग अर्थात प्रकाश-केंद्र पर ध्यान-धारणा को केंद्रीभूत करके अंतर्जगत में दिव्य आलोक का आविर्भाव करना।
साधनाएँ जुड़ी-गुथी हुई हैं। इन्हें पंचकोशों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना-सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम्-साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती है। आज्ञाचक्र में ज्योति आवरण बिंदुयोग है।
साधनाएँ प्राण-प्रत्यावर्तन के सफल साधक समयानुसार प्राप्त कर सकते हैं। क्रमिक प्रगति के साथ-साथ अग्रगामी उपलब्धियों का पथ स्वयमेव प्रशस्त होता चला जाता है।
साधना उपक्रम है। इसके लिए यों अन्य विधि-विधान भी प्रचलित हैं; पर सर्वोत्तम सर्वसुलभ और समुचित फलप्रद साधना गायत्री महामंत्र के शक्ति पक्ष की ही है।
साधना के यों कई अभ्यास हैं, पर उनमें अधिक सरल और अधिक सफल सोऽहम्-साधना ही रहती है। यह विशुद्ध रूप से प्राणयोग है। उसमें प्राणायाम के, षट्चक्रवेधन, ग्रंथिवेधन, कुंडलिनी जागरण, स्वर-साधन, गंधानुभूति भावोत्कर्ष जैसी योगाभ्यास की अनेक ऐसी धाराएँ समाविष्ट हैं, जिनके माध्यम से साधक को उच्चस्तरीय आत्मविकास का लाभ मिल सकता है।
साधना है, जिनमें पंचतत्त्वों से बना प्रतिमास्वरूप भगवान, पूजारत पंचतत्त्वों से बना शरीर। पंचतत्त्वों की पूजा-सामाग्री, इस प्रकार यह पार्थिव पूजा प्रारंभिक साधना कही जाती है। देवालयों में, कर्मकांड उपचारों में यही प्रक्रिया काम आती है। कथा, कीर्तन, परिक्रमा, यात्रा, स्नान, तर्पण, प्रभृति विविध-विधि क्रियाकलाप इसी स्तर के हैं। यह बालकक्षा है।
साधना के अंतर्गत तीसरे प्रहर तीन से पाँच बजे तक चलने वाले तृतीय सोपान में आत्मबोध और तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय है। तीन से पौने चार, पौन घंटा— आत्मबोध। पौने चार से साढ़े चार, पौन घंटे— तत्त्वबोध। यों इन दोनों साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
साधना में लगा जाए, पर यदि परिस्थितियाँ वैसी छूट न दें तो भी इस अमृत अवधि का तकाजा यही स्वीकार करना चाहिए कि घर रहते हुए ही जितना अधिक समय इस साधना के लिए लगाया जा सकना संभव हो, उतना लगाया जाए। मन-मस्तिष्क पर परमार्थ उत्तरदायित्वों की संवेदना समुचित मात्रा में छाई रहनी चाहिए और चेष्टा यही रहनी चाहिए कि पूरा न सही, अधूरा प्रयास तो होता ही रहना चाहिए।
साधनाक्रम अपनाने पड़ते हैं। इसके लिए बिंदुयोग, त्राटक, प्रकाश-ज्योति का आज्ञाचक्र में अवतरण सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। मन का निवास मस्तिष्क में है और मस्तिष्क का नियंत्रण आज्ञाचक्र से होता है। शिव और दुर्गा के चित्रों में जो तीसरा नेत्र चित्रित है, वह इस महाकेंद्र में अवस्थित शक्तिसत्ता का परिचय देता है। भगवन शिव ने उपद्रवकारी मनजिस, मनोज, कामदेव को इसी दिव्य नेत्र का अनावरण करके भस्म किया था।
साधना ऐसा परमार्थ है, जो हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को सुख, शांति और समृद्धि से भर देता है।
साधना को पंचकोशी साधना कहते हैं। गायत्री माता की कुछ मूर्तियाँ तथा तस्वीरें ऐसी भी मिलती हैं, जिनमें उनके पाँच मुख दिखाए गए हैं। अलंकारिक रूप में उन्हें पंचकोश कह सकते हैं। मानवी सत्ता का एक ही काय-कलेवर इंद्रियगम्य है। इसे अन्नमयकोश कहते हैं।
साधना के आधार पर जाना जा सकता है।
साधना-उपक्रमों के साथ प्रचंड चिंतन जुड़ा हुआ है। साधकों को उसी दिशा में अपने मनोयोग को नियोजित करना पड़ता है और इस प्रयास में लगाना पड़ता है कि किस प्रकार अब तक की मूढ़ताओं, भ्रांतियों और अवांछनीयताओं को चिंतन और कर्तृत्व के क्षेत्र में से बहिष्कृत करके उनकी जगह उच्चस्तरीय परिवर्तन लाया जा सकता है। वस्तुतः चार दिनों इसी उखाड़-पछाड़ में, ध्वंस निर्माण में लगना पड़ता है। सरकारी पंचवर्षीय योजनाओं के संचालक सिंचाई, सड़क, शिक्षा, बिजली, व्यवसाय आदि की बहुमुखी प्रगति के लिए सुविस्तृत योजनाएँ बनाते हैं और उनके लिए क्या किया जाना चाहिए, किस प्रकार किया जाना चाहिए, इसका ढाँचा खड़ा करते हैं। समझना चाहिए कि परिष्कृत जीवनक्रम का भावी निर्धारण करने के लिए इन चार दिनों में सुविस्तृत योजना बनाई जानी है और साधक को योजनाध्यक्ष की भूमिका निभानी है।
साधना के लिए ठीक समय पर अपने को प्रस्तुत कर दें। दूरदर्शी व्यक्ति विवाह होते ही अपनी पलियों को स्वावलंबी बनाने के लिए कई प्रकार के रास्ते खोजते हैं। उन्हें अधिक प्रशिक्षित बनाकर अध्यापन आदि से कुछ आजीविका उपार्जित करने योग्य बना सके यदि गृहस्थ की कुछ जिम्मेदारियाँ बच भी जाए तो स्वावलंबी महिलाएँ उसका निर्वाह कर लेती हैं। जिनके पास खेती-बाड़ी, ब्याज-भाड़ा आदि की इतनी आमदनी है कि घर का खर्च चल सके, छोटे बच्चों का निर्वाह हो सके तो उनके लिए तो ईश्वरप्रदत्त स्वर्ण-सुयोग ही सामने है। परिवार के निर्वाह के योग्य जिनके पास साधन मौजूद हैं, फिर भी जिन्हें उपार्जन की धुन है, अधिक धनी बनने, अधिक संग्रह करने की ललक जिन्हें खाए जा रही है, वे तो ढलती आयु का भी कदाचित ही कुछ महत्त्वपूर्ण उपयोग कर सकें।
साधनापरायण हाथों का ही उपयोग होता है। ब्रह्मचर्य से रहने वाले शरीर ही इस आहार का स्पर्श करते हैं। इससे पूर्व उसे और भी अधिक सुसंस्कारी बनाने के लिए आध्यात्मिक उपचारों से संपन्न किया जाता है। उस पर निरीक्षण दृष्टिपात उन आँखों का रहता है, जिन्होंने प्रत्यावर्तन सत्र शृंखला का आधार खड़ा किया है।
साधना के निर्धारित विधि-विधानों को अपनाए बिना भी महामानव देवदूत स्तर की परिष्कृत स्थिति प्राप्त कर लेते हैं; पर जिन्हें साधना विज्ञान पर निष्ठा है, उन्हें योगाभ्यास की प्रक्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण सहायता कर सकने वाली दृष्टिगोचर होती है। अस्तु समुन्नत जीवन के लिए व्यावहारिक कदम उठाने के साथ-साथ वे योग-साधानाओं में भी तत्परता बनाए रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए खेचरी मुद्रा का असाधारण लाभ-प्रभाव और महत्त्व साधारण नहीं, असाधारण ही है।
साधना-विज्ञान का वह प्राण है। मंत्रयोग की धुरी गायत्री साधना को ही कहा जा सकता है। प्रत्यावर्तन को तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो उसे गायत्री के पाँच मुखों के अलंकार चित्र में चित्रित पाँच कोशों की पंचयोग सम्मिश्रित साधना कह सकते हैं। यह जागृत कोश— (1) भवानी (2) गणेश ( 3) ब्रह्मा (4) विष्णु (5) महेशरूपी। पाँच देवता कहे जा सकते हैं।
साधना में लगे और आधा समय सेवा-धर्म में लगता रहे। पूरा या अधूरा जितना भी समय वानप्रस्थ-व्यवस्था में लगना हो, उसका विभाजन इसी प्रकार किया जाना चाहिए।
साधनाओं में विचार-प्रवाह की एक दिशा बनाए रहना ही पर्याप्त होता है। गंगा हिमालय से निकलकर समुद्र में मिलने के लिए चलती है। यह दिशा-निर्धारण उसे लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त है। प्रवाह में लहरें उत्पन्न हों, टकराव आएँ, भँवर पड़ें, मोड़ बने इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। एकाग्रता मुख्य नहीं, दिशा-प्रवाह का ही महत्त्व है।
साधना के उपरांत इस बिंदुयोग का ही क्रम आता है। त्राटक अभ्यास करना इस साधना का प्रथम चरण है। इसे पंद्रह मिनट करते और शेष आधा घंटा अपनी समग्र सत्ता को दिव्य प्रकाश से ओत-प्रोत स्थिति की अनुभूति में लगाया जाता है।
साधना-तपस्या में आशाजनक प्रगति होगी।
साधना तथा पंचकोशों के अनावरण की कष्टसाध्य तपश्चर्या के अयोग्य वयोवृद्ध शरीर छूट-पुट ध्यान-भजन या उपदेश परामर्श के योग्य ही रह जाता है। संन्यास उसी विश्रामकाल के लिए उपयुक्त माना गया है।
साधना का अंग बना लिया जाए तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की आत्मबलवर्द्धन की दिशा में क्रमिक, किंतु तीव्र प्रगति की जा सकती है। विशिष्ट प्रगति करने वाले इसी मार्ग पर चलते हुए कुंडलिनी जागरण जैसी महान उपलब्धियाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।
साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया।
साधना इसी का पथ प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण योगदान करती है, गहित गतिविधियाँ और भ्रमग्रसित मान्यताएँ अपनाने के कारण अब तक के जीवन का जिस तरह अपव्यय हुआ उस दुर्भाग्य पर दुःखी होने का अवसर इस साधना से मिलता है। बिना समय गँवाए भूल को सुधार लेने, गतिविधियों के उलट देने की प्रचंड प्रेरणा उठती है। इस समुद्र-मंथन से भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारण करने पर अनमोल रत्न निकलते हैं और पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देने तथा कथित शुभ चिंतकों के दबाव को अस्वीकार करने की ऐसी दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है, जिससे परिष्कृत भावी गतिविधियों का नवनिर्माण सरल और संभव हो जाता है।
साधना अहर्निश होनी चाहिए, एक क्षण भी साधना विरत नहीं जाना चाहिए। प्रमाद जहाँ भी, जब भी आएगा शैतान को चढ़ बैठने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय के लिए सो जाए तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतें तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। भावी साधनापद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्रत्यावर्तन सत्र में साधकों को दी जाती है।
साधना-पद्धति में उसके माध्यम-उपकरण में यह हेर-फेर किया जा सकता है कि व्यक्ति की चेतना-स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसे अंतर्मुखी अथवा बहिर्मुखी की साधना-प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा जाए।
साधना, पंचकोशों की साधना है। एक-एक कोश की, एक-एक ब्रह्मविभूति हैं। ये ब्रह्मविभूतियाँ वे सीढ़ी हैं, जो साधक को अपना सुखास्वादन कराती हुई अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए अग्रसर करती हैं।
साधना कह सकते हैं। जिन्हें इन सत्रों में बुलाया गया है, उनकी पूर्वजन्मों की संचित तप संपदा इसी स्तर की समझी गई है और आशा की गई है कि पूर्वजन्मों की उपलब्धियों से आगे वे सामान्य साधनाक्रम का आश्रय लेकर द्रुतगति से आगे बढ़ सकेंगे और पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे।
साधना के सुधार-उपक्रम के लिए ही हैं। रोगी न रहे तो डॉक्टर की क्या उपयोगिता रहेगी। परमार्थपरायण पुरुषार्थ को प्रखर करने का सु-अवसर पाने के लिए ही संभव है। समीपवर्त्ती क्षेत्र में विकृति उत्पन्न हुई हो, ऐसा भी तो सोचा जा सकता है।
साधनाएँ बता दी जाती हैं, वे कथा-कीर्तन, यात्रा, परिक्रमा, पूजा-पाठ के उपक्रमों को, प्रधानतया शरीर को और यत्किंचित मन को लगाकर अपनी गाड़ी धकेलते रहते हैं। उच्चस्तरीय साधनाओं का क्षेत्र ध्यान-भूमिका है, उसमें प्रवेश करने के लिए मानसिक स्थिरता आवश्यक है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए योगसाधक शरीर को ढीला और मन को खाली करने का अभ्यास करते रहे हैं। इसमें सफलता मिलने पर उनका आगे का क्रियाकलाप सरलतापूर्वक अग्रसर होने लगता है, तब ध्यान जमने की बात कुछ अधिक कठिन नहीं रह जाती।
साधना दैवी वरदान बनकर सामने आ गई।
साधना-सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम्-साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती है। आज्ञाचक्र में ज्योति आवरण बिंदुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्मसंबंध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं। तीसरे सोपान में आत्मबोध और तत्त्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष हैं।
साधना कहते हैं। गायत्री माता की कुछ मूर्तियाँ तथा तस्वीरें ऐसी भी मिलती हैं, जिनमें उनके पाँच मुख दिखाए गए हैं। अलंकारिक रूप में उन्हें पंचकोश कह सकते हैं। मानवी सत्ता का एक ही काय-कलेवर इंद्रियगम्य है। इसे अन्नमयकोश कहते हैं।
साधना से मिलता है। बिना समय गँवाए भूल को सुधार लेने, गतिविधियों के उलट देने की प्रचंड प्रेरणा उठती है। इस समुद्र-मंथन से भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारण करने पर अनमोल रत्न निकलते हैं और पूर्वाग्रहों को तिलांजलि देने तथा कथित शुभ चिंतकों के दबाव को अस्वीकार करने की ऐसी दिव्यदृष्टि प्राप्त होती है, जिससे परिष्कृत भावी गतिविधियों का नवनिर्माण सरल और संभव हो जाता है।
साधना संदर्भ में बताया— समझाया गया है।
साधना से परिष्कृत— समुन्नत होते हैं। आज की स्थिति में सर्वसाधारण के शारीरिक-मानसिक स्तर को देखते हुए प्राणयोग का सर्वसुलभ माध्यम सोऽहम् का अजपा जाप ही निर्धारित किया जा सकता है।
साधनाक्रम में अभ्यंतरमयकोश की जागृति के लिए दो साधनाऐं— (1) खेचरी मुद्रा— जिह्वा को तालु से सटाकर ब्रह्मरंध्र में टपकने वाले अमृत बिंदुओ का रसास्वादन। (2) नादयोग और नादानुसंधान— इसके माध्यम से मन मयूर को नृत्य करने का, वेणुनाद पर चलने वाले रास-उल्लास का अनुभव कराते हैं और अंतःकरण को आनंद-उल्लास भरी भूमिका का रसास्वादन होता है।
साधना-प्रक्रियाओं की चर्चा की गई थी। चुँकि इस अंक में उसी संदर्भ में विशेष प्रकाश डाला जा रहा है, अतएव इस साधनाक्रम को संक्षिप्त में फिर एक बार यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इससे संदर्भ-चर्चा एवं विवेचन-विश्लेषण को समझने में अधिक सुविधा होगी।
साधना में, ध्यान-धारणा में तो उसकी उपयोगिता असंदिग्ध रूप से है ही।
साधना गायत्री महामंत्र के शक्ति पक्ष की ही है।
साधना के लिए प्राण प्रत्यावर्तन सत्र में प्रात: आठ बजकर पैतालीस मिनट से लेकर नौ बजकर तीस मिनट तक पौन घंटे का समय निर्धारित है। सोऽहम्-साधना के उपरांत इस बिंदुयोग का ही क्रम आता है। त्राटक अभ्यास करना इस साधना का प्रथम चरण है। इसे पंद्रह मिनट करते और शेष आधा घंटा अपनी समग्र सत्ता को दिव्य प्रकाश से ओत-प्रोत स्थिति की अनुभूति में लगाया जाता है।
साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को जिस-जिस चित्तवृत्तिनिरोध का निर्देश किया है, उसे चित्तनिरोध नहीं, चित्तवृतिनिरोध ही समझना चाहिए। यहाँ वृत्ति शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मन की वृत्तियाँ, दिशाएँ, रुचियाँ अगणित हैं, उनमें बेहिसाब उछल-कूद करने की अपेक्षा मन को एक दिशा में लगाया जाना चाहिए। दिशा-निर्धारण और उस दिशा में मनोयोग को नियोजित करना ही साधना मार्ग की बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर देना है, एकाग्रता तो बहुत बाद की और बहुत छोटी चीज है।
साधना द्वारा समाज का ऋण चुकाने, पुण्य संचय करने एवं ईश्वरीय स्नेह अनुदान पाने में संलग्न होना चाहिए। इन तीनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समय का विभाजन इस प्रकार होना चाहिए कि आधा समय स्वाध्याय, शिक्षण एवं तप-साधना में लगे और आधा समय सेवा-धर्म में लगता रहे। पूरा या अधूरा जितना भी समय वानप्रस्थ-व्यवस्था में लगना हो, उसका विभाजन इसी प्रकार किया जाना चाहिए।
साधना के हिमालय से मिकलने वाली गंगा-यमुना भावोत्कर्ष एवं शक्ति-संवर्द्धन के दोनों प्रयोजन पूरे करती है। इससे भौतिक और आत्मिक प्रगति के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। शक्तिसंपन्न और भावोत्कर्ष की उभयपक्षीय उपलब्धियाँ ही समग्र अध्यात्म है। उसे प्राप्त करने में सोऽहम्-साधना कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है। इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
साधनाएँ हैं। इन्हें पाँच कोशों की, पाँच चक्रों की समग्र साधना कह सकते हैं। चार दिनों में उसी महायात्रा के संबंध में आवश्यक परिचय एवं अभ्यास करा दिया जाता है, ताकि क्रमशः उस मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए अध्यात्म संपदाओं से संपन्न बना जा सके। चार दिन में साधना की पूरी मंजिल पार करके पूर्णता के लक्ष्य तक जा पहुँचना और सिद्धयोगी बन सकना तो असंभव है, उसके लिए समय और सतत श्रम चाहिए। इन थोड़े से दिनों में शिक्षण और अनुभव की इतनी आवश्यकता पूरी हो जाती है कि प्रगति प्रयाण की शांति सुव्यवस्था एवं सफलता के साथ द्रुतगति से आगे बढ़ाया जा सके।
साधना-उपक्रम को माध्यम बनाकर समुद्र-मंथन जैसी मनःस्थिति रखने के लिए हर साधक को कहा जाता है। सोते-जागते उन्हें विचारों में डूबे रहने और परिवर्तन के लिए आवश्यक मार्ग ढूढ़ निकालने के लिए लगा रहा जाए तो समझना चाहिए कि अभीष्ट योग-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया।
साधना में पाँच चक्र भी जागृत होते चले जाते हैं।
साधनाऐं दोनों को एक ही प्रकार की कराई जाएँगी, अंतर यह रहेगा कि घर रहने वाले लोग छै: महीने प्रशिक्षण प्राप्त करके अपने यहाँ वापिस लौट जाएँगे और जिन्हें समग्र साहस करना है, वे यहाँ के स्थाई निवासी माने जाएँगे।
साधना के उपयुक्त है, उन्हीं को हरिद्वार आने की बात सोचनी चाहिए। मरे हुए लोग यहाँ जगह घेरकर बैठ जाएँगें तो जिंदा लोगों को लाभ लेने का रास्ता ही बंद हो जाएगा। गंगातट पर शांति के दिन काटने वालों को नहीं, अपनी प्रखर उपलब्धियों को विश्वात्मा के चरणों में समर्पित करने के लिए जिनकी स्फूर्ति, प्रतिभा और समर्थता फूटी पड़ रही है, आह्वान उन्हीं का किया जा रहा है। स्थान थोड़ा-सा ही तो है उसकी पूर्ति उपयुक्त व्यक्तित्वों से ही होनी चाहिए। उन्हीं से की भी जाएगी।
साधना विरत नहीं जाना चाहिए। प्रमाद जहाँ भी, जब भी आएगा शैतान को चढ़ बैठने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय के लिए सो जाए तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतें तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। भावी साधनापद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर प्रत्यावर्तन सत्र में साधकों को दी जाती है।
साधना के लिए समर्पित कर दिया जाए। यदि पूर्ण छुटकारे की स्थिति न हो, तो भी इतना तो करना ही चाहिए कि अपने समय तथा साधनों का एक बड़ा भाग इन प्रयोजनों में नियमित रूप से नियोजित किया जाए, जिनके लिए इस अमृत अवधि को नियत-निर्धारित किया गया है।
साधना ऋजुयोग के दो पक्ष हैं। लययोग से आनंदमयकोश बिंदुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमयकोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमयकोश की जागृति होती है। इसी साधना में पाँच चक्र भी जागृत होते चले जाते हैं।
साधनाऐं— (1) खेचरी मुद्रा— जिह्वा को तालु से सटाकर ब्रह्मरंध्र में टपकने वाले अमृत बिंदुओ का रसास्वादन। (2) नादयोग और नादानुसंधान— इसके माध्यम से मन मयूर को नृत्य करने का, वेणुनाद पर चलने वाले रास-उल्लास का अनुभव कराते हैं और अंतःकरण को आनंद-उल्लास भरी भूमिका का रसास्वादन होता है।
साधना पर बैठते ही अनुभव होने लगता है। कुछ समय तो यह ज्योति कई रंगों की तथा हिलती हुई दीखती है। पीछे स्वयमेव स्थिर एवं शुभ्रवर्ण की बन जाती है।
साधना के लिए अध्यात्म दर्शन का, साधना विज्ञान का अध्ययन करना नितांत आवश्यक है, चूँकि उन्हें शिक्षा-तपश्चर्या के अतिरिक्त बहुत सा समय सेवा-साधना में भी लगाना है, इसलिए व्यक्ति और समाज की आज की परिस्थितियों का जानना और प्रस्तुत समस्याओं को समझाने का मार्ग जानना भी किसी लोकसेवों के लिए नितांत आवश्यक है। नियमित अध्ययन में इन सभी तत्त्वों का गहरा समावेश रखा जाएगा। प्रत्येक शिक्षार्थी को शान्तिकुञ्ज में इस प्रकार के अध्ययन का अवसर मिलेगा।
साधनाएँ हैं— (1) आत्मबोध और (2) तत्त्वबोध। जीवन तथ्य की गरिमा, गंभीरता तथा यथार्थता को समझना, अनुभव करना ही विज्ञान है। दर्पण के माध्यम से अपने गर्हित और एक महत्तम स्तर का विचार- विष्लेषण किया जाता है और आत्मसत्ता को उच्चस्तरीय स्थिति तक पहुँचाने के लिए उभारा-उगाया जाता है। आत्मदेव को इष्टदेव में परिणत करने की आत्मबोध-साधना ब्रह्मविद्या के उस महान प्रयोजन को पूरा करती है, जिसमें भूमा, ऋतंभरा एवं आत्मजागृति के आधार पर भवबंधन कटने और जीवनलक्ष्य प्राप्त होने की प्रेरणा दी गई है। तत्त्वज्ञान में शरीर और मन के प्रथक्करण का धारण है।
साधना की उच्चस्तरीय, पंचकोशी साधना ही वानप्रस्थ के लिए सर्वोत्तम है। प्रत्यावर्तन सत्र के साधकों को इसी के सूत्ररूप में सिखाया जा रहा है। उसके अभ्यास की आरंभिक झाँकी ही चार दिनों में संभव हो सकती है। वानप्रस्थ साधकों को यह अनियार्य रूप से छः महीने करनी होगी, यों हर साधक की साधना में उसकी स्थिति के अनुरूप कुछ अंतर करना होता है, पर प्रयत्न यही किया जाएगा कि जिन पाँच योगों को प्रत्यावर्तन सत्र में आधार माना गया है, उनमें से एक या कई का अभ्यास कराया जाए। उचित मार्गदर्शन एवं संरक्षण में वैसा ही लाभ मिलता है, जैसा प्राचीनकाल के गुरुकुलों में छात्रों को मिलता था।
साधना है और कितने व्यक्ति बिना योग-साधना के निर्धारित विधि-विधानों को अपनाए बिना भी महामानव देवदूत स्तर की परिष्कृत स्थिति प्राप्त कर लेते हैं; पर जिन्हें साधना विज्ञान पर निष्ठा है, उन्हें योगाभ्यास की प्रक्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण सहायता कर सकने वाली दृष्टिगोचर होती है। अस्तु समुन्नत जीवन के लिए व्यावहारिक कदम उठाने के साथ-साथ वे योग-साधानाओं में भी तत्परता बनाए रखते हैं। ऐसे लोगों के लिए खेचरी मुद्रा का असाधारण लाभ-प्रभाव और महत्त्व साधारण नहीं, असाधारण ही है।
साधना वाला पक्ष आज्ञाचक्र से मुड़कर फेफड़ों की तरह श्वास-प्रश्वास का रूप धारण करता है और वहीं से दूसरी धारा मेरुदंड की ओर मुड़कर शक्ति जागरण का काम करती है। सोऽहम्-साधना के हिमालय से मिकलने वाली गंगा-यमुना भावोत्कर्ष एवं शक्ति-संवर्द्धन के दोनों प्रयोजन पूरे करती है। इससे भौतिक और आत्मिक प्रगति के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। शक्तिसंपन्न और भावोत्कर्ष की उभयपक्षीय उपलब्धियाँ ही समग्र अध्यात्म है। उसे प्राप्त करने में सोऽहम्-साधना कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है।
साधनात्मक सेवा-साधना में समय और शक्ति को पूरी तरह नियोजित करना है।
साधना के लिए आश्रम में रहेंगे और बताए गए क्षेत्र में सेवा का कार्य करने के लिए चले जाया करेंगे। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन की वे त्रिविधि उपलब्धियों को समग्र विधि- व्यवस्था के साथ पूरा करते हुए, जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए द्रुतगति से अग्रसर हो सकेंगे।
साधना को अत्यंत सफल प्रक्रिया कहा जा सकता है। प्रस्तुत मार्गदर्शन को जो जितनी मात्रा में अपना सकेगा, वह उसी अनुपात से अपने में देवत्व की ज्योतिर्मयी आभा जाज्वल्यमान अनुभव करेगा। दूसरों का स्नेह, सहयोग और सद्भाव उसी अनुपात में उस पर बरसेगा। प्रगति की बहुमुखी संभावनाओं का उतना ही द्वार खुला हुआ प्रत्यक्ष दिखाई देगा।
साधनाओं से शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है, इसलिए उनमें आराम-कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पड़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम्-साधना जपात्मक प्रक्रियाएँ हैं। सोऽहम्-साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरंतर उसका बीजरूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदंड को सीधा रखकर ही एवं पालथी मारकर ही बैठना पड़ता है।
साधनात्मक जीवन जीने वालों के लिए स्वर्णक्षरों में लिखे जाने योग्य है। आज के दिन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे हो सकता है, इसका क्रम-विभाजन इन्हीं क्षणों में कर लिया जाना चाहिए। स्थूलशरीर (देह), सूक्ष्मशरीर (मन), कारणशरीर (भाव)। यह तीन कर्मचारी हमें मिले हैं। इन्हें क्रिया विचारणा-भावना भी कह सकते हैं।
साधना है। भौतिक शक्तियाँ विद्युत, भाप, अणुऊर्जा आदि के यंत्र-उपकरणों द्वारा गुप्त की जाती है और उससे विविध-विधि, सुविधा-साधन उपलब्ध किए जाते हैं। आत्मिक शक्तियों के समस्त स्रोत मानवी काय-कलेवर में विद्यमान हैं। चेतन की क्षमता जड़ की तुलना में असंख्यगुनी अधिक है। चेतन्य शक्तियों ने जड़ जगत को बनाया है और वे ही उसका नियंत्रण करती हैं।
साधनाकाल में बनाते रहने के लिए कहा जाता है। भाव-प्रवाह को निर्दिष्ट दिशा में लगाए रहा जाए और भावी जीवन में उन प्रेरणाओं का समावेश कैसे किया जाए, इसी की योजनाएँ बनाते रहने के लिए कहा जाता है। इन साधना सत्रों में साधक को विशेष दिशाओं में चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है। एकाग्रता इस सत्र में आवश्यक नहीं मानी गई है।
साधना में छह घंटे लगते हैं और दो घंटे प्रवचन सुनने को मिलते हैं। पंद्रह मिनट व्यक्तिगत परामर्श के हैं। इस प्रकार बाधित सवा आठ घंटे की प्रक्रिया साधक को अनिवार्य रूप से आत्मचिंतन में लगाए रहती है। निद्रा और नित्यकर्म के अतिरिक्त जो शेष समय बच जाता है, उसमें भी मनन और चिंतन की प्रक्रिया में ही संलग्न रहना पड़ता है। बाहर की बातें न सोचने की मनाही इसीलिए की गई है कि आत्मचिंतन में बाधा न पड़े।
साधना में भी लगाना है, इसलिए व्यक्ति और समाज की आज की परिस्थितियों का जानना और प्रस्तुत समस्याओं को समझाने का मार्ग जानना भी किसी लोकसेवों के लिए नितांत आवश्यक है। नियमित अध्ययन में इन सभी तत्त्वों का गहरा समावेश रखा जाएगा। प्रत्येक शिक्षार्थी को शान्तिकुञ्ज में इस प्रकार के अध्ययन का अवसर मिलेगा।
साधना-विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं— शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं; वरन भावभरी मन:स्थिति में संपन्न किया जाए।
साधना-प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा जाए।
साधना के ध्यानपक्ष के साथ जुड़ा हुआ मूल प्रयोजन पूरी तरह संपन्न हो गया। चित्त की एकाग्रता इन दिनों न अभीष्ट है और न आवश्यक, इसलिए इस संदर्भ में किसी से कुछ कहा, पूछा भी नहीं जाता।
साधनाओं का समन्वय है। तीन से पौने चार, पौन घंटा— आत्मबोध। पौने चार से साढ़े चार, पौन घंटे— तत्त्वबोध। यों इन दोनों साधनाओं का विधि-विधान और उपक्रम पृथक-पृथक है, पर बारीकी से देखा जाए तो यह दोनों एक ही लक्ष्य के दो पक्ष हैं। एकदूसरों पर अन्योन्याश्रित हैं— एकदूसरे के पूरक है।
साधना के पूर्वार्ध में अपने काय-कलेवर पर श्वसन-क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की, परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिंतन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रहकर एक व्यावहारिक यथार्थता के प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।
साधना की दृष्टि से तो यह उपचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ध्यान-धारणा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले इसे प्रथम सोपान गिन सकते हैं। ध्यान न जमने, मन का गहराई में प्रवेश न करने, इधर-उधर के विचार मस्तिष्क पर छाए रहने, चित्त के यहाँ-वहाँ उड़ते फिरने की उच्चस्तरीय साधनाओं को सबसे जटिल व्यवधान कह सकते हैं। यह दूर न किया जा सके तो मनोयोग के आधार पर संपन्न होने वाले साधनाक्रमों में सफलता नहीं मिल सकती। अस्त-व्यस्त मन:स्तर के लोगों को त्रैतवादी कर्मकांडपरक साधनाएँ बता दी जाती हैं, वे कथा-कीर्तन, यात्रा, परिक्रमा, पूजा-पाठ के उपक्रमों को, प्रधानतया शरीर को और यत्किंचित मन को लगाकर अपनी गाड़ी धकेलते रहते हैं।
साधना का क्रियाकलाप शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में चलाया जाए। अपने परिवार के, अनेक भावनाशील परिजन बहुत दिनों से इसकी आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं और उत्सुक हैं; पर कोई व्यवस्थितक्रम सामने न होने से वे घर पर ही जो कुछ उलटा-पुलटा अपनी बुद्धि, मर्जी और स्थिति के अनुरूप हो, करते रहते हैं। उन्हें जब सुव्यवस्थित क्रमबद्धता का अवसर मिलेगा तो उत्साह ही मिलेगा, संतोष ही होगा। आशा की जानी चाहिए, अगले पाँच वर्षों में एक हजार ऐसे वानप्रस्थ प्रशिक्षित किए जा सकेंगे, जो ज्ञान-संपदा तप-साधना से सुसंपन्न होकर आत्मकल्याण के साथ-साथ लोक-मंगल का, विश्व के नवनिर्माण का प्रयोजन भी पूरा कर सकें।
साधनाओं पर ध्यान देने से प्रतीत होगा कि इनका भावपक्ष तत्त्वदर्शन के सारभूत सिद्धांतो का एक संतुलित समन्वय है। उसके ब्रह्मविद्या के चार आधार हैं— (1) आत्मचिंतन (2) आत्मसुधार (3) आत्मनिर्माण (4) आत्मविकास। इन चारों ही प्रयोजनों को यह साधना-पद्धति बहुत ही सुंदर, समुचित एवं संतुलित रूप से संपन्न करती है। साधना-उपक्रम के माध्यम से उस भाव-अभ्यास की यह रूप-रेखा है, जिसके आधार पर प्राण का महाप्राण एवं आत्मा का परमात्मा के रूप में विकसित हो सकना कठिन नहीं रहता, सरल हो जाता है।
साधना में तत्पर होना चाहिए।
साधना जपात्मक प्रक्रियाएँ हैं। सोऽहम्-साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरंतर उसका बीजरूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदंड को सीधा रखकर ही एवं पालथी मारकर ही बैठना पड़ता है।
साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती है। आज्ञाचक्र में ज्योति आवरण बिंदुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्मसंबंध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं। तीसरे सोपान में आत्मबोध और तत्त्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष हैं। लययोग से आनंदमयकोश बिंदुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमयकोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमयकोश की जागृति होती है।
साधना के समय एकाग्रता पर जोर नहीं दिया जाता; वरन प्रत्येक साधना के साथ जुड़ी हुई विचारणा एवं भावना को सुविस्तृत करने वाला व्यापक चिंतन करने के लिए कहा जाता है। साधना और निर्दिष्टि दिशा में चलने की उन प्रेरणाओं को हृदयंगम करने की विधि क्या हो सकती है? इसी की विस्तृत योजनाएँ साधनाकाल में बनाते रहने के लिए कहा जाता है। भाव-प्रवाह को निर्दिष्ट दिशा में लगाए रहा जाए और भावी जीवन में उन प्रेरणाओं का समावेश कैसे किया जाए, इसी की योजनाएँ बनाते रहने के लिए कहा जाता है। इन साधना सत्रों में साधक को विशेष दिशाओं में चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है।
साधना’।
साधना द्वारा आत्मशक्ति का विकास करना चाहिए और (3) लोक-मंगल की सेवा-साधना द्वारा समाज का ऋण चुकाने, पुण्य संचय करने एवं ईश्वरीय स्नेह अनुदान पाने में संलग्न होना चाहिए। इन तीनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए समय का विभाजन इस प्रकार होना चाहिए कि आधा समय स्वाध्याय, शिक्षण एवं तप-साधना में लगे और आधा समय सेवा-धर्म में लगता रहे। पूरा या अधूरा जितना भी समय वानप्रस्थ-व्यवस्था में लगना हो, उसका विभाजन इसी प्रकार किया जाना चाहिए।
साधना में समय और शक्ति को पूरी तरह नियोजित करना है।
साधना सत्रों में साधक को विशेष दिशाओं में चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है। एकाग्रता इस सत्र में आवश्यक नहीं मानी गई है।
साधना नासिका द्वारा ही होती है। सोऽहम्-साधना द्वारा गंध तन्मात्रा का विकास होता है और समय-समय पर अनायास ही दिव्य गंधों की अनुभूति होती है। इन गंधों में मन को प्रसन्न करना या कौतूहल दीखने जैसा साधारण लाभ नहीं; वरन वे विभूतियाँ भी भरी पड़ी हैं, जिनसे दिव्यशक्तियों और दिव्य सिद्धियों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। सोऽहम्-साधना के लिए अगरबत्ती-धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चंदन-कपूर आदि लेपकर, इत्र लगाकर, गुलाबजल छिड़ककर उस स्थान पर सुगंध उत्पन्न की जाती है। साधना के समय अनुभव किया जाता है।
साधना में प्रथम स्थान है। अन्नमयकोश के परिष्कार के लिए सात्विक आहार की व्यवस्था बनाई जाती है। भगवान का भोग, प्रसाद लगाकर गायत्री मंत्र का उच्चारण करने के बाद भोजन आरंभ करने से आहार का स्तर औषधि रूप हो जाता है। नियत समय पर भूख से कुछ कम मात्रा में, प्रसन्नता और संतोष की मनःस्थिति के साथ यदि सामान्य भोजन किया जाए तो उसका प्रभाव शरीर की आरोग्य वृद्धि के लिए ही नहीं, मन की सात्विकता बढ़ाने की दृष्टि से भी यह अत्यंत प्रभावशाली है।
साधना मिश्रित क्रियापद्धति, जिसे प्रत्यावर्तन सत्र में सम्मिलित होने वालों को घर जाकर निरंतरर अपनाए रहने के लिए कहा जाता है, इसमें प्रत्यावर्तन सत्र के दिनों की समस्त साधनापद्धति का परिपूर्ण, किंतु संक्षिप्त समावेश है।
साधना-विधान करने पड़ते हैं; पर उनके साथ-साथ यह तथ्य भली प्रकार ह्रदयंगम करा दिया जाता है कि क्रिया-कृत्य को ही सब कुछ न मान बैठें, उसके भीतर गहराई तक प्रवेशकर और जिस साधना के साथ भावना जुड़ी हुई है, उसे आत्मसात करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें। प्रयत्न इतना गहरा होना चाहिए कि क्रिया-प्रक्रिया अनुभूति के रूप में परिणित, प्रतिबिंबित होने लगे। इस प्रकार भावोत्कर्ष का प्रयोजन सरलतापूर्वक संपन्न होता चला जाता है। इस अंतःस्फुरणा को व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकता और पिछले ढर्रे को बदलकर उपलब्ध आलोक के आधार पर किस प्रकार, किस दिशा में, क्या परिवर्तन किया जा सकता है? तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं तो आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट ढाँचा सामने आ खड़ा होता है।
साधना दर्पण के सहारे की जाती है। इसके लिए प्रत्यावर्तन सत्र में जो पेंतालीस मिनट निर्धारित हैं, उनमें आत्मतत्त्व से संबंधित प्रायः सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है। आस्थाओं में आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए? गतिविधियों में, रीति-नीति एवं कार्यपद्धतियों में क्या उलट-पुलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु-प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है।
साधना में सिद्धि न जाने मिलती हैं या नहीं।
साधना द्वारा किस प्रकार अलौकिक अतींद्रिय क्षमताएँ प्राप्त होती हैं। वर्षाऋतु आने पर जिस प्रकार सुखी हुई घास हरी हो जाती है, उसी प्रकार खेचरी मुद्रा द्वारा अनंत आकाश से चेतनतत्त्व की वर्षा कराई जाती है और उससे सुषुप्त मूर्छा में पड़े हुए महत्त्वपूर्ण शक्ति-संस्थान सहज ही सजीव होते हैं और मनोरम हरितमा के रूप में पुष्पित, सुगंधित, सुरभित दृष्टिगोचर होते हैं। अमृत का गुण मृतक को जीवित करना और जीवित को अमर बनाना है। यह दोनों ही लाभ परिक्षा रूप में खेचरी मुद्रा के साधक को मिलते हैं।
साधना-कक्ष में सुनते हुए उपरोक्त अनुभूतियाँ जगाई जा सकती हैं। रिकार्ड प्लेयर पर कोई भाव-भरे स्वर-प्रवाह सुने जा सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि एक केंद्र स्थान पर वाद्य यंत्र बजते रहें और समीपवर्त्ती कक्षों में साधनारत साधक उनका श्रवण आनंद लेते हुए नादयोग का क्रम चलाते रहें। स्वयं भी इकतारा, सितार जैसे मृदुल वाद्य यंत्र बजाते हुए उस स्थिति में आत्मविभोर हो सकते हैं। झींगुरों की झंकार, चिड़ियों की चहचहाहट सुनने का प्रकृति सान्निध्य मिल सके तो वह सहज वाद्य भी उपयुक्त रहेगा।
साधना को ही कहा जा सकता है। प्रत्यावर्तन को तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो उसे गायत्री के पाँच मुखों के अलंकार चित्र में चित्रित पाँच कोशों की पंचयोग सम्मिश्रित साधना कह सकते हैं। यह जागृत कोश— (1) भवानी (2) गणेश ( 3) ब्रह्मा (4) विष्णु (5) महेशरूपी। पाँच देवता कहे जा सकते हैं। इस साधना की सफलता को प्रख्यात पाँच देवों के द्वारा प्राप्त हो सकने वाले अनुदान वरदान के रूप में देख सकते हैं।
साधना है। भावना की जाती है कि शरीर में से प्राण निकल गया और किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर मृत शरीर को, उसकी मरणोत्तर स्थिति को गंभीरतापूर्वक देख रहा है। मरी हुई निर्जीव काया अकड़ गई। कहीं सुनसान जंगल में पड़ी है और उसे कौए, गिद्ध, सियार और कुत्ते नोंच-नाँचकर खा रहे हैं, बोटियाँ इधर-उधर छितरी पड़ी हैं। कुछ खाया, कुछ अधखाया मांस इधर-उधर छितरा पड़ा है।
साधना की पूरी मंजिल पार करके पूर्णता के लक्ष्य तक जा पहुँचना और सिद्धयोगी बन सकना तो असंभव है, उसके लिए समय और सतत श्रम चाहिए। इन थोड़े से दिनों में शिक्षण और अनुभव की इतनी आवश्यकता पूरी हो जाती है कि प्रगति प्रयाण की शांति सुव्यवस्था एवं सफलता के साथ द्रुतगति से आगे बढ़ाया जा सके।
साधना से ही पूरा होता है।
साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है। यों शब्द, रूप, रस, गंध स्पर्श, की किसी भी प्रक्रिया के आधार पर बनी हुई साधना-पद्धति से भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है; पर नादयोग का इसी प्रयोजन के लिए अपना अत्यधिक महत्त्व है।
साधनाएँ ऊर्जा और ऊष्मायुक्त हैं। उसमें आवेश संभव नहीं, निद्रा की कोई संभावना नहीं। अस्तु उस स्थिति को विशुद्ध रूप में योगनिद्रा, समाधि स्तर की भूमिका ही समझा जाना चाहिए और ऐसी सहज एकाग्रता जब भी प्राप्त होती है, तब उसे सफलता का उत्साहवर्द्धक चिह्न मानते हुए स्थिति को यथावत बनाए रहना चाहिए। साधना उपक्रम भले ही रुका रहे, पर उसे सहज समाधि के दैवी अनुदान को अस्त-व्यस्त न किया जाए, यही उचित है। प्रत्यावर्तन साधना में एकाग्रता का नहीं प्रवाहक्रम की प्रखरता का महत्त्व है।
साधना उपक्रम भले ही रुका रहे, पर उसे सहज समाधि के दैवी अनुदान को अस्त-व्यस्त न किया जाए, यही उचित है। प्रत्यावर्तन साधना में एकाग्रता का नहीं प्रवाहक्रम की प्रखरता का महत्त्व है। इसी बिंदुयोग की प्रकाश-साधना करने वालों को अपने कलेवर के हर कक्ष में ज्योति अवतरण के साथ दिव्य भावनाओं के समावेश का चिंतन करते हुए प्रसन्नता ही अनुभव करनी चाहिए।
साधना और निर्दिष्टि दिशा में चलने की उन प्रेरणाओं को हृदयंगम करने की विधि क्या हो सकती है? इसी की विस्तृत योजनाएँ साधनाकाल में बनाते रहने के लिए कहा जाता है। भाव-प्रवाह को निर्दिष्ट दिशा में लगाए रहा जाए और भावी जीवन में उन प्रेरणाओं का समावेश कैसे किया जाए, इसी की योजनाएँ बनाते रहने के लिए कहा जाता है। इन साधना सत्रों में साधक को विशेष दिशाओं में चिंतन करने का, विचारणाओं को दिशा-विशेष में नियोजित किए रहने का अभ्यास कराया जाता है। एकाग्रता इस सत्र में आवश्यक नहीं मानी गई है।
साधना में लगाने से आधा घंटा हो जाता है, शेष आधा घंटा गायत्री की पाँच मालाएँ पूरी करने के लिए। गायत्री के पाँच मुख माने गए हैं। यह पाँच कोश हैं। हर कोश का जागरण करने के लिए एक माला। इस प्रकार पाँच मालाओं का जप उचित है।
साधना का उद्देश्य। ऐसी साधना-विधि तो कहीं कदाचित ही दीख पड़ती है। आमतौर से लोग भजन के लिए नामोच्चार की तोतारट लगाए रहते हैं। भावनाविहीन क्रियाकांड में उलझे रहते हैं। फलस्वरूप अंतःचेतना का विकास होने का प्रयोजन तनिक भी नहीं होता।
साधना-विज्ञान कहते हैं।
साधनाक्रम आगे बढ़ाया जा सकता है। टेप रिकार्डर पर संगीत ध्वनियाँ भरी रह सकती हैं और उन्हें अपने साधना-कक्ष में सुनते हुए उपरोक्त अनुभूतियाँ जगाई जा सकती हैं। रिकार्ड प्लेयर पर कोई भाव-भरे स्वर-प्रवाह सुने जा सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि एक केंद्र स्थान पर वाद्य यंत्र बजते रहें और समीपवर्त्ती कक्षों में साधनारत साधक उनका श्रवण आनंद लेते हुए नादयोग का क्रम चलाते रहें। स्वयं भी इकतारा, सितार जैसे मृदुल वाद्य यंत्र बजाते हुए उस स्थिति में आत्मविभोर हो सकते हैं।
साधना कह सकते हैं। यह जागृत कोश— (1) भवानी (2) गणेश ( 3) ब्रह्मा (4) विष्णु (5) महेशरूपी। पाँच देवता कहे जा सकते हैं। इस साधना की सफलता को प्रख्यात पाँच देवों के द्वारा प्राप्त हो सकने वाले अनुदान वरदान के रूप में देख सकते हैं।
साधना मार्ग की बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर देना है, एकाग्रता तो बहुत बाद की और बहुत छोटी चीज है।
साधना बताया गया है, यद्यपि एकाग्रता का उसमें सर्वथा अभाव है। अपने स्तर का भाव भरा उद्वेग ही भक्तियोग की परिभाषा में योगाभ्यास का उच्च चरण माना गया है। प्रत्यावर्तन साधकों को अपनी मनोभूमि इसी स्तर की रखने के लिए कहा गया है। वे एकाग्रता को महत्त्व न दें; वरन यह देखें कि जिस साधना के साथ, जिस भाव-प्रभाव को जोड़कर रखा गया है, चिंतन उसी दिशा में बहने लगा या नहीं। यदि प्रवाह की दिशा ठीक हो तो समझना चाहिए कि अभीष्ट प्रगति में आशाजनक सफलता मिल रही है।
साधनाएँ बनाई हैं, पर उन सब में नादनुसंधान सबस सरल और श्रेष्ठ है।
साधना उपक्रमों की बालपोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उच्चस्तरीय शिक्षा-व्यवस्था की जाती है। सीढ़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं, केवल मुगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं, पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं। ठीक इसी प्रकार साधना-विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछूता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रियाकलाप अथवा वस्तुओं का हेर-फेर भर जुड़ा रहता है, वे प्राय: बालक्रीड़ा बनकर ही रह जाती हैं। उनसे कोई महत्त्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
साधना इसी प्रयोजन के लिए है और साधक प्रत्यक्ष अनुभव करता है कि उसका मनःक्षेत्र किसी ऐसे दिव्य प्रकाश से भर गया, जिससे मनोगत कुत्साएँ एवं उच्छृंखलताओं को हतप्रभ ही होना पड़ेगा। मनोजय कि दिशा में बिंदुयोग से— त्राटक द्वारा ज्योति अवतरण की ध्यान-धारणा से कितनी सहायता मिलती है, इसे अनुभव के आधार पर सहज ही जाना जा सकता है।
साधना प्रकाश-दीप के माध्यम से होती है। बार-बार दीपशिखा देखने, आँखें बंद करने और भ्रूमध्य भाग में ध्यान जमाने की आवश्यकता पड़ती है, जब वह भूमिका परिपक्व हो जाती है, तो प्रकाश स्वतः दृष्टिगोचर होता है और दीपक की आवश्यकता नहीं रहती। ठीक इसी प्रकार बाहरी वाद्य यंत्रों का सहारा लेकर नादयोग का साधनाक्रम आगे बढ़ाया जा सकता है। टेप रिकार्डर पर संगीत ध्वनियाँ भरी रह सकती हैं और उन्हें अपने साधना-कक्ष में सुनते हुए उपरोक्त अनुभूतियाँ जगाई जा सकती हैं। रिकार्ड प्लेयर पर कोई भाव-भरे स्वर-प्रवाह सुने जा सकते हैं।
साधना विज्ञान का अध्ययन करना नितांत आवश्यक है, चूँकि उन्हें शिक्षा-तपश्चर्या के अतिरिक्त बहुत सा समय सेवा-साधना में भी लगाना है, इसलिए व्यक्ति और समाज की आज की परिस्थितियों का जानना और प्रस्तुत समस्याओं को समझाने का मार्ग जानना भी किसी लोकसेवों के लिए नितांत आवश्यक है। नियमित अध्ययन में इन सभी तत्त्वों का गहरा समावेश रखा जाएगा। प्रत्येक शिक्षार्थी को शान्तिकुञ्ज में इस प्रकार के अध्ययन का अवसर मिलेगा।
साधनाओं का मार्गदर्शन भी अधिकारी साधक यथासमय प्राप्त कर सकते हैं।
साधना में हर वानप्रस्थ को अपनी उपलब्धियों का आधा भाग नियोजित करना पड़ता है। इसके लिए युगनिर्माण शाखाओं का सुविस्तृत क्षेत्र खाली पड़ा है। सर्वत्र उनकी मांग है। शिक्षा और साधना की पूँजी लेकर वानप्रस्थों को उन्हीं क्षेत्रों में प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक शतसूत्री कार्यक्रमों को अग्रगामी बनाने के लिए भेजा जाएगा। वहाँ वे स्थानीय कार्यकर्त्ताओं की सहायता करेंगे और स्वयं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे।
साधना कह सकते हैं।
साधनारूपी परिचर्या को जीवनक्रम का अविछिन्न अंग बनाया जाए। इसके लिए आरंभिक आयु में ब्रह्मचर्य, विद्याध्ययन, यौवन में उपार्जन, गृहस्थपालन करते हुए भी सरलतापूर्वक ऐसी रीति-नीति अपनाई जा सकती है, जिसके आधार पर लोक और परलोक की भौतिक और आत्मिक क्षेत्र की उभयपक्षीय प्रगति का संतुलित आधार बन सके। सामान्य जीवनक्रम में ऐसे संतुलन की स्थापना संभव तो है ही, सहज भी है।
साधना के साथ, जिस भाव-प्रभाव को जोड़कर रखा गया है, चिंतन उसी दिशा में बहने लगा या नहीं। यदि प्रवाह की दिशा ठीक हो तो समझना चाहिए कि अभीष्ट प्रगति में आशाजनक सफलता मिल रही है।
साधना द्वारा गंध तन्मात्रा का विकास होता है और समय-समय पर अनायास ही दिव्य गंधों की अनुभूति होती है। इन गंधों में मन को प्रसन्न करना या कौतूहल दीखने जैसा साधारण लाभ नहीं; वरन वे विभूतियाँ भी भरी पड़ी हैं, जिनसे दिव्यशक्तियों और दिव्य सिद्धियों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। सोऽहम्-साधना के लिए अगरबत्ती-धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चंदन-कपूर आदि लेपकर, इत्र लगाकर, गुलाबजल छिड़ककर उस स्थान पर सुगंध उत्पन्न की जाती है। साधना के समय अनुभव किया जाता है। प्रस्तुत गंध नासिका में — मस्तिष्क में बस रही है।
साधना सफल हुई। वस्तुतः बालबुद्धि प्रबुद्ध साधकों के लिए नितांत उपेक्षणीय और उपहास्यपद है। ऐसे अजूबे कोई मैस्मरिज्म विज्ञान का ज्ञाता किसी को भी क्षण भर में दिखा सकता है अथवा हिप्नोटिज्म का जानकार संवेदनाओं के आधार पर इस तरह के कौतूक-कौतुहल स्वयं भी देख सकता है। कई योगज्ञाता नौसिखिये साधकों को ऐसे ही कुछ अजूबे दिखाकर उनमें बाल उत्साह पैदा कर देते हैं, पर उनसे बनता कुछ नहीं। मैस्मरिज्म के प्रभाव मे कोई अनुभव करने लगे कि वह सिंह पर सवारी किए घूम रहा है तो इससे वस्तुतः कुछ भी लाभ न होगा; वरन उलटी एक नई भ्रांति बढ़ जाएगी।
साधना सत्र में सम्मिलित होने वाले साधकों को जिस दिनचर्या का पालन करना पड़ता है, उसे भी जीवनक्रम की संतुलित व्यवस्था की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण ही कह सकते हैं। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त्त में 4 बजे उठना, शौच-स्नान से 5 बजे तक निवृत्त हो जाना— एक ऐसा क्रम है, जो अभ्यास में आने पर एक घंटे में शरीर की स्व्च्छता से निवृत्त होकर आवश्यक कार्यों में जुटा जा सकता है और ऐसे ही आलस-प्रमाद में जो समय नष्ट होता रहता है, उसे बचाया जा सकता है। भोजन, विश्राम आदि की नियोजित दिनचर्या बनाई जाए, अपने काम स्वयं किए जाएँ। कपड़े धोने, सफाई संबधी अन्य काम स्वयं निपटाने की आदतें रखें। रात्रि को समय पर सो जाया जाए।
साधना तथा उपासना करके दैवी मार्ग पर अग्रसर हों और जीवन को उच्चतर बनाते हुए अपने महान लक्ष्य को प्राप्त करें। दैवी मार्ग को अपनाने और जीवन को शुद्ध, पवित्र, परोपकारमय बनाने में ऐसी कोई बात नहीं है, जो हमारी प्रगति में बाधास्वरूप सिद्ध हो। गरीब-से-गरीब और सांसारिक साधनों से रहित व्यक्ति भी इसको अपना सकता है और गायत्री उपासना तथा सेवामय जीवन के द्वारा निरंतर ऊपर की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है। इसके लिए मुख्य आवश्यकता श्रद्धा, लगन व दृढ़ आत्मविश्वास की ही है, जिसको मनुष्य अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकता है।
साधना को, यदि इस तृतीय नेत्र को ठीक तरह ज्योतिर्मय किया जा सके तो उसमें उत्पन्न होने वाली अग्निशिखा मनोविकारों को— अवरोधों को जलाकर भस्म कर सकती हैं। उसकी शक्ति व्याख्या है। यदि दार्शनिक व्याख्या करने हो तो उसे विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता का जागरण भी कह सकते हैं, जिसके आधार पर लोभ, मोह, वासना, तृष्णा, अहंता जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न हुए अगणित शोक-संतापों और विग्रह-उपद्रवों को सहज ही शमन या सहन किया जा सकता है।
साधना ही रहती है। यह विशुद्ध रूप से प्राणयोग है। उसमें प्राणायाम के, षट्चक्रवेधन, ग्रंथिवेधन, कुंडलिनी जागरण, स्वर-साधन, गंधानुभूति भावोत्कर्ष जैसी योगाभ्यास की अनेक ऐसी धाराएँ समाविष्ट हैं, जिनके माध्यम से साधक को उच्चस्तरीय आत्मविकास का लाभ मिल सकता है।
साधना में एक स्तर ऐसा भी आता है, जब एकाग्रता की भी आवश्यकता पड़ती है; पर महर्षि पतंजलि ने साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को जिस-जिस चित्तवृत्तिनिरोध का निर्देश किया है, उसे चित्तनिरोध नहीं, चित्तवृतिनिरोध ही समझना चाहिए। यहाँ वृत्ति शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मन की वृत्तियाँ, दिशाएँ, रुचियाँ अगणित हैं, उनमें बेहिसाब उछल-कूद करने की अपेक्षा मन को एक दिशा में लगाया जाना चाहिए। दिशा-निर्धारण और उस दिशा में मनोयोग को नियोजित करना ही साधना मार्ग की बहुत बड़ी मंजिल पूरी कर देना है, एकाग्रता तो बहुत बाद की और बहुत छोटी चीज है।
साधना से सुसंपन्न होकर आत्मकल्याण के साथ-साथ लोक-मंगल का, विश्व के नवनिर्माण का प्रयोजन भी पूरा कर सकें।
साधना में उसकी स्थिति के अनुरूप कुछ अंतर करना होता है, पर प्रयत्न यही किया जाएगा कि जिन पाँच योगों को प्रत्यावर्तन सत्र में आधार माना गया है, उनमें से एक या कई का अभ्यास कराया जाए। उचित मार्गदर्शन एवं संरक्षण में वैसा ही लाभ मिलता है, जैसा प्राचीनकाल के गुरुकुलों में छात्रों को मिलता था। वातावरण का प्रभाव होना स्वाभाविक है। हिमालय का द्वार गंगातट, सप्तऋिषियों की, तपस्थली की पुण्य सुविधाएँ यहाँ उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त शान्तिकुञ्ज की स्थिति का अपना अतिरिक्त महत्त्व है।
साधना का तत्त्वज्ञान। श्वास-प्रश्वास क्रिया के माध्यम से ‘सो’ और ‘हम्’ ध्वनि के सहारे उसी भाव-चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का, वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रांति जैसी यह भाव-भूमिका है, जिसमें अनाधिकारी-अनाचारी शासनसत्ता का तख्ता उलटकर उस स्थान पर सत्य, न्याय और प्रेम संविधान वाली धर्मसत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम्-साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंत:करण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधना करते रहा जाए।
साधना है। आत्मा का स्वरूप समझने के बाद दूसरा कदम यही उठाना पड़ता है कि संसार के साथ अपने संबंधो का पुनर्निर्धारण करें। इसके लिए सुधार का पहला प्रयास आत्मा और काय-कलेवर के संबंधो में उत्पन्न हुई भ्रांति के निवारण के रूप में आरंभ करना पड़ता है।
साधना पर मार्मिक प्रकाश डाला गया है।
साधना अपने दैनिक कार्यों में समग्र मनोयोग लगाने से ही संभव होती है। पूजा में भी यही अभ्यास काम दे जाता है। यदि हर काम आधे मन से करने की आदत होगी तो फिर पूजा ही तन्मयतापूर्वक कैसे संभव हो सकेगी?
साधना-विधानों में एक महत्त्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उगलियों से, शीशी वाले कार्क से, कपड़े की गोली से इस प्रकार बंद किया जाता है कि बाहर की वायु या स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि आधार से विलग किया जाता है और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतींद्रिय जगत से आने वाले शब्द-प्रवाह को अंतःचेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेंद्रिय का, उसकी शब्द तन्मात्रा का योगदान तो रहता है; पर वह श्रवण है, वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनिलहरी सुनने के लिए, कर्णेंद्रिय और अंतःकरण का इसे संयुक्त प्रयास भी कह सकते हैं।
साधना के साथ जुड़े हुए दो चरण ही कहना चाहिए, जिसके बिना गति आगे बढ़ती ही नहीं।
साधना ही वानप्रस्थ के लिए सर्वोत्तम है। प्रत्यावर्तन सत्र के साधकों को इसी के सूत्ररूप में सिखाया जा रहा है। उसके अभ्यास की आरंभिक झाँकी ही चार दिनों में संभव हो सकती है। वानप्रस्थ साधकों को यह अनियार्य रूप से छः महीने करनी होगी, यों हर साधक की साधना में उसकी स्थिति के अनुरूप कुछ अंतर करना होता है, पर प्रयत्न यही किया जाएगा कि जिन पाँच योगों को प्रत्यावर्तन सत्र में आधार माना गया है, उनमें से एक या कई का अभ्यास कराया जाए। उचित मार्गदर्शन एवं संरक्षण में वैसा ही लाभ मिलता है, जैसा प्राचीनकाल के गुरुकुलों में छात्रों को मिलता था।
साधनाक्रम में पाँच योग-साधनाएँ जुड़ी-गुथी हुई हैं। इन्हें पंचकोशों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना-सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम्-साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती है। आज्ञाचक्र में ज्योति आवरण बिंदुयोग है।
साधना-पद्धति में समन्वित किया गया है। चार दिन के सत्र में इसकी भूमिका इस प्रकार अभ्यस्त करा दी जाती है कि उसे भविष्य में नियमित साधना का अंग बना लिया जाए तो क्रमशः आत्मोत्कर्ष की आत्मबलवर्द्धन की दिशा में क्रमिक, किंतु तीव्र प्रगति की जा सकती है। विशिष्ट प्रगति करने वाले इसी मार्ग पर चलते हुए कुंडलिनी जागरण जैसी महान उपलब्धियाँ भी प्राप्त कर सकते हैं।
साधना की पूँजी लेकर वानप्रस्थों को उन्हीं क्षेत्रों में प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक शतसूत्री कार्यक्रमों को अग्रगामी बनाने के लिए भेजा जाएगा। वहाँ वे स्थानीय कार्यकर्त्ताओं की सहायता करेंगे और स्वयं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगे। इस प्रकार जहाँ शिथिलता आने लगी है, वहाँ अभिनव चेतना का विकास-विस्तार तत्काल दीखने लगेगा। मुरझाए हुए शाखा-संगठन युगनिर्माण परिवार देखते-देखते हरे-भरे, फले-फूले दृष्टिगोचर होने लगेंगे। युग परिवर्तन के क्रियाकलाप में आवश्यक स्फूर्ति एवं सक्रियता उत्पन्न करने के लिए प्रशिक्षित, परिष्कृत और तपस्वी वानप्रस्थों का कितना बड़ा योगदान हो सकता है।
साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण, इस प्रकार चौंसठ प्राणायामों का साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताए गए हैं। इन सब में प्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्-साधना’ में सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मंत्रो में गायत्री सर्वोपरि है, उसमें प्राणयोग के विविध साधना-विधानों में सर्वोच्चत मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायाम का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-January
साधना उपासना की सुगम पद्धति यही है कि मन को स्थिर करने के लिये ईश्वर की धारणा किसी मूर्ति रूप में की जाये।’
साधना में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती कुछ दिनों के बाद गुरु, और उनके वियोग में बिल्ली दोनों ही इस संसार से विदा हो गये। अब मार्ग दर्शन के लिए अनेक अनुयायियों ने उनके शिष्य के पास जाना शुरू कर दिया। सुबह-शाम उनके आसन पर बैठकर शिष्य ने साधना प्रारम्भ कर दी, पूर्व का अभ्यास न होने के कारण शिष्य का मन न लगता। 10-15 मिनट की साधना के बाद ही ध्यान टूट जाता।
साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर चलना होगा। मंत्र शक्ति की महत्ता का शास्त्रों ने इस प्रकार वर्णन किया है -
साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।
साधना क्षेत्र में स्वर का अर्थ वाक् शक्ति के माध्यम से किये जाने वाले सशक्त जप अनुष्ठान से ही है।
साधना में राजयोग, हठयोग, प्राणयोग, शक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग का नाम दिया जाता है। शरीर में इसी को षट्चक्र और सप्तम ब्रह्मरंध्र - सहस्र कमल के रूप में गिना जाता है। सप्तऋषि, सप्तलोक, सप्तसागर, सप्तमेरु, सप्तदेव, सप्ततीर्थ, सप्तसाधना के रूप में ब्रह्मविद्या का विस्तार हुआ है। भौतिकी विज्ञान भी सात भागो में ही विभक्त है।
साधना के समस्त प्रयोजन उसी तरह पूर्ण हो सकते हैं जैसे कि शास्त्रों में लिखे है। वरिष्ठ साधकों की तरह आज भी साधना के वैसे ही प्रतिफल मिल सकते हैं। शर्त केवल एक ही है- वाक् साधना का महत्त्व समझा जाय और उस पर समुचित रूप से ध्यान दिया जाय।
साधना का महत्त्व समझा जाय और उस पर समुचित रूप से ध्यान दिया जाय।
साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
साधना प्रयोजनों में सूती वस्त्रों की अपेक्षा ऊनी या रेशमी कपड़ों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। यहाँ एक बात और नोट कर ली जानी चाहिए कि वध करने के उपरांत भेड़ों की उतारी हुई ऊन अथवा कीड़ों को उबाल कर उन्हें मार डालने के उपरांत पाया जाने वाला रेशम आत्मिक प्रयोजनों काम आने लायक नहीं रह जाता। वध के समय निकला हुआ चीत्कार उनकी सूक्ष्म स्थिति को आसुरी प्रकृति का बना देता है। शरीरगत विद्युत के आवागमन में प्रतिरोध उत्पन्न करने की क्षमता तो ऐसे ऊन या रेशम में हो सकती है पर उनसे उच्च आध्यात्मिक प्रयोजन में तो उलटी बाधा ही पड़ेगी। उससे तो धुला हुआ सूती वस्त्र ही अच्छा है।
साधना के लिए बैठते समय पास में बिछे तख्त के एक पाये में उसे बाँध देते। इस तरह बिल्ली गुरु के पास भी बनी रहती और साधना में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती कुछ दिनों के बाद गुरु, और उनके वियोग में बिल्ली दोनों ही इस संसार से विदा हो गये। अब मार्ग दर्शन के लिए अनेक अनुयायियों ने उनके शिष्य के पास जाना शुरू कर दिया। सुबह-शाम उनके आसन पर बैठकर शिष्य ने साधना प्रारम्भ कर दी, पूर्व का अभ्यास न होने के कारण शिष्य का मन न लगता। 10-15 मिनट की साधना के बाद ही ध्यान टूट जाता।
साधना के बाद ही ध्यान टूट जाता।
साधना पद्धति का प्रधान अंग था। इसी आधार पर स्व , पर कल्याण के अनेकों प्रयोजन सिद्ध होते थे। वेद मंत्र में जो शिक्षायें सन्निहित है वे तो साधारण है, उनसे भी अधिक स्पष्ट और प्रभावी शिक्षायें, स्मृतियाँ तथा अन्यान्य धर्मग्रन्थों में मौजूद है। वेद मंत्रों का महत्त्व मात्र उनके अर्थों या निर्देशों तक सीमित नहीं है वरन् उनकी गरिमा उन शक्तियों में अन्तर्निहित है जो इन ऋचाओं के सस्वर उच्चारण से प्रादुर्भाव होती है।
साधना पूरी हो जाती है।
साधना के लिए भजन, मनन और चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका माहात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या पृथक-पृथक सुविधा के समय और शांत एकांत स्थान में, सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान, चिंतन, किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य संपदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए वे सहज ही करतल गत होती चली जायेगी।
साधना को अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रथम चरण मानना चाहिए और समझना चाहिए कि जो इस प्रयोजन को पूरा कर सकेगा वही मंत्रविद्या का - प्रार्थना उपासना का लाभ उठा सकेगा। वाणी के अशुद्ध रहते उपासना की सफलता संदिग्ध ही रहेगी इस तथ्य को ध्यान में रखा जा सके तो जप अनुष्ठान आदि की प्रक्रिया के साथ -साथ वाणी के परिष्कार की बात भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण समझनी होगी और उसको भी साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर चलना होगा। मंत्र शक्ति की महत्ता का शास्त्रों ने इस प्रकार वर्णन किया है -
साधना पद्धतियाँ सामान्य समझी जाने वाली वाणी को असामान्य ‘वाक्’ में परिणत करती है। उसकी अद्भुत शक्ति जड़ जगत को हिला सकने और चेतन जगत से व्यापक भाव प्रवाह उत्पन्न कर सकने में समर्थ होती है। इसलिए वाक् साधना को आत्मविद्या का प्रधान आधार माना गया है।
साधना में लीन थे- एक स्त्री अपने रूप पाश में बाँधने के उद्देश्य से वहाँ आई। संत तुकाराम ने एक अभंग में उसे जो उद्बोधन दिया उसने उस स्त्री का मन ही पलट दिया। वे कहते हैं “ परस्त्री मेरे लिए रुक्मिणी माता के समान है, इसलिए हे माता! तुम जाओ और मेरे लिए कुछ प्रयत्न मत करो, हम तो विष्णु के दास है। मुझसे तुम्हारा यह पतन देखा नहीं जाता। तुम आगे कभी ऐसी अपवित्र बात मुख से मत निकालना।
साधनाओं के लिए संध्या वंदन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बंधन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। वातावरण शांत और स्थान एकांत होना चाहिए। आँखें बंद करे आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा।
साधना उपासना का क्रम निर्धारण उन्होंने सदा बसन्त पंचमी को किया है और ठीक एक वर्श में उस पूर्व निश्चित योजना को पूर्ण कर लिया। उस दिन वे अपने ऊपर दिव्य प्रेरणा की प्रकाश किरणों का अवतरण होना स्वीकार करते हैं और कहा करते हैं कि यह दिन हर वर्श एक नया सन्देश देकर नव प्रभात की तरह उनके अन्तरंग अन्तरिक्ष में आविर्भूत होता है। इसी प्रकाश को वे ईश्वरीय मार्ग-दर्शन के रूप में अंगीकार करते हैं और तदनुसार एक वर्श के लिए उठाये जाने वाले कदमों का निर्धारण करते हैं।
साधना नितान्त आवश्यक है।
साधना के लिए मंत्र विद्या का समस्त आधार वाणी की पृष्ठभूमि पर ही आधारित है। मंत्रविद्या का जो कुछ भी चमत्कार कहा, सुना और देखा जाता है उसका आधार वाणी ही है। सत्य, मौन, अभक्ष्य अवरोध, जप आदि की साधना पद्धतियाँ सामान्य समझी जाने वाली वाणी को असामान्य ‘वाक्’ में परिणत करती है। उसकी अद्भुत शक्ति जड़ जगत को हिला सकने और चेतन जगत से व्यापक भाव प्रवाह उत्पन्न कर सकने में समर्थ होती है। इसलिए वाक् साधना को आत्मविद्या का प्रधान आधार माना गया है।
साधना मार्ग विकसित करना चाहिए। अविवेकी ढंग से किया गया अनुकरण सफलता की ओर अग्रसर नहीं करता।
साधना के आत्मविश्वास का अभिवर्धन और तप तितीक्षा द्वारा तेजोवलय के प्रखरीकरण का प्रयोजन पूरा किया जाता है। यह दोनों ही उपलब्धियों ऐसी है जिनके आधार पर भौतिक और आत्मिक जीवन का आशातीत और आश्चर्यजनक विकास संभव हो सकता है।
साधना विधान किसी के लिए फलप्रद होते हैं। किसी के लिए नहीं, इसका एक मात्र कारण साधक के अतीन्द्रिय मन की परिस्थितियों का ऊँचा नीचा स्तर ही है। अलौकिकताओं का ध्रुव केन्द्र यही मर्म स्थल है। ब्रह्मबिन्दु इसी को कहते हैं।
साधना तपश्चर्या के आधार पर पहुँचते रहें हैं। आत्म विज्ञान और भौतिक विज्ञान की प्रगति यदि यथावत् होती हरे तो वह दिन दूर नहीं जब मनुष्य की शारीरिक , मानसिक विकृतियों को ही दूर नहीं किया जा सकेगा वरन् व्यक्ति को सर्वांग सुंदर और अपूर्णताओं से मुक्त होने का स्वपन् किया जा सकेगा।
साधना के रूप में किया जाय तो वही व्यापार, नौकरी, कृषि, शिल्प, वृद्धि, श्रम आदि एक प्रकार से कर्मयोग का क्रिया-कृत्य ही माना जाएगा शरीर को यदि वासना, प्रदर्शन, अहंकार, अनाचार के लिए अनीति और उच्छृंखलता पूर्वक सजाया पोषा और बलिष्ठ कारक स्वार्थपरता की श्रेणी में गिना जाएगा भोजन यदि भगवान का प्रसाद, शरीर इंजन का ईंधन, क्षुधा रोग की औषधि की तरह किया जा रहा है तो वह परमार्थ है किंतु यदि चटोरेपन की लालसा से अनुपयुक्त आहार किया जा रहा है तो वही सामान्य दीखने वाली प्रक्रिया पाप परिणाम प्रस्तुत करेगी।
साधना में से वाणी को प्रधान माध्यम ही मानना चाहिए। स्कूली अध्यापकों और छात्रों तक की शिक्षा प्रक्रिया वाणी के आधार पर ही चलती है। विद्या का- ब्रह्मविद्या का आधार भी वही हैं। सत्संग, प्रवचन, कथा, कीर्तन, स्तवन, जप आदि के लिए वाणी ही माध्यम है।
साधना के वैसे ही प्रतिफल मिल सकते हैं। शर्त केवल एक ही है- वाक् साधना का महत्त्व समझा जाय और उस पर समुचित रूप से ध्यान दिया जाय।
साधना से एक हद तक छिपाई भी जा सकती है पर तेजोवलय के सूक्ष्म शरीर पर किसी भी प्रकार पर्दा नहीं डाला जा सकता। जिनका अंतःकरण थोड़ा जागृत हो चला है और किसी की भीतरी स्थिति समझने देखने योग्य जिनकी सूक्ष्म दृष्टि जागृत हो गई है वे रंग, रूप की उपेक्षा करके तेजोवलय में संव्याप्त सुंदरता एवं कुरूपता को देख सकते हैं और उसी के अनुरूप किसी के प्रति श्रद्धालु अश्रद्धालु होने की आवश्यकता अनुभव कर सकते हैं। वस्त्र पहनने का कारण शरीर को सर्दी-गर्मी से बचाना या शोभा बढ़ाना भी हो सकता है पर मूल कारण तेजोवलय पर आवरण आच्छादित किये रहना ही है। भीतर की शक्ति बाहर निकल कर बिखरने न पाये इसके लिये वस्त्रों का आवरण चढ़ाया जाता है। नग्न शरीर रहने वाले साधु संन्यासी भी शरीर पर भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाये रहते हैं।
साधना को आत्मविद्या का प्रधान आधार माना गया है।
साधना का प्रथम सोपान समझता हूँ
साधना के लिए बैठते तो वह उनकी गोद में आकर बैठ जाती और उनका ध्यान टूट जाता अतः साधना के लिए बैठते समय पास में बिछे तख्त के एक पाये में उसे बाँध देते। इस तरह बिल्ली गुरु के पास भी बनी रहती और साधना में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती कुछ दिनों के बाद गुरु, और उनके वियोग में बिल्ली दोनों ही इस संसार से विदा हो गये। अब मार्ग दर्शन के लिए अनेक अनुयायियों ने उनके शिष्य के पास जाना शुरू कर दिया। सुबह-शाम उनके आसन पर बैठकर शिष्य ने साधना प्रारम्भ कर दी, पूर्व का अभ्यास न होने के कारण शिष्य का मन न लगता। 10-15 मिनट की साधना के बाद ही ध्यान टूट जाता।
साधना है उससे मनुष्यों का ही नहीं समस्त प्राणियों का श्रेय साधन हो सकता है और सर्वत्र उल्लास, आनन्द का विस्तार हो सकता है।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले व्यक्ति की - दीक्षा की - महत्ता समझनी चाहिए। वाक् साधना को अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रथम चरण मानना चाहिए और समझना चाहिए कि जो इस प्रयोजन को पूरा कर सकेगा वही मंत्रविद्या का - प्रार्थना उपासना का लाभ उठा सकेगा। वाणी के अशुद्ध रहते उपासना की सफलता संदिग्ध ही रहेगी इस तथ्य को ध्यान में रखा जा सके तो जप अनुष्ठान आदि की प्रक्रिया के साथ -साथ वाणी के परिष्कार की बात भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण समझनी होगी और उसको भी साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर चलना होगा। मंत्र शक्ति की महत्ता का शास्त्रों ने इस प्रकार वर्णन किया है -
साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहिन आदि का भरा-पूरा कुटुंब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन, सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गई रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का-अधिक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं।
साधना का तीसरा चरण है- चिंतन। चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जनम-हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की -समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जनम है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय संपदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए-जीवन लाभ देने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए।
साधना विज्ञान में महत्त्वपूर्ण स्थान है। नासिका द्वारा चलने वाले सूर्य चन्द्र स्वरों को माध्यम बनाकर कितने ही साधक प्रकृति के अन्तराल में प्रवेश करते हैं और वहाँ से अभीष्ट मणिमुक्तक उपलब्ध करते हैं।
साधना पर लागू होती है। वातावरण शांत और स्थान एकांत होना चाहिए। आँखें बंद करे आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग-प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना-पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी। इसी प्रकार मस्तिष्क को एक छोटे डिब्बे की तरह खोलकर देखना चाहिए कि उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार आभूषण, उपकरण औजार सुसज्जित रखे थे।
साधना के रूप में ब्रह्मविद्या का विस्तार हुआ है। भौतिकी विज्ञान भी सात भागो में ही विभक्त है।
साधना के भव पक्ष के तीन चरण है। (1) भजन, (2) मनन, (3) चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समय साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी।
साधना का प्रकाश प्राप्त किया और परमार्थ पर कदम बढ़ाया इसी प्रकाश के - इसी प्रवाह के प्रतीक प्रतिनिधि रूप में उनका अवतरण प्रस्तुत हुआ। निर्दिष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्हें कई प्रकार के क्रिया - कलाप अपनाने पड़े पर दिशा एक सीधी रेखा की तरह ही बनी रही। वे अपनी उसी निर्दिष्ट पथ पर बिना क्षण भर भी प्रमाद किये अनवरत रूप से चलते ही चले आ रहे है और निश्चित है कि अन्तिम साँस रहते उसी एक कार्य में निरत रहेंगे यह शुभारम्भ बसन्त पर्व के दिन हुआ इसलिए गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिन भी - युग - निर्माण आन्दोलन के जन्म दिन के साथ अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध है। हम सब अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन जो गुरुदेव के प्रति - युग निर्माण मिशन के प्रति निष्ठा रखते हैं उनके जन्म दिन को उसी श्रद्धा और उमंग के साथ मानते मनाते रहे है।
साधना की प्रथम कक्षा वे मूर्तिपूजा को ही मानते थे परंतु निर्गुणोंपासक और विभिन्न मतवादियों से भी उन्हें कोई विरोध नहीं था। अपने सिद्धांतों का वे प्रतिपादन अवश्य करते थे परन्तु दुराग्रह नहीं।
साधना करने वाले लोग ही जान सकते हैं। चेतन मन के स्वरूप और प्रभाव से सभी लोग परिचित है। उसे सुयोग्य बनाने के लिए अध्ययन, अनुभव, परामर्श, मनन, चिन्तन आदि उपयोग को अपनाया जाना चाहिए। अचेतन मन की गरिमा और सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए मनः शास्त्री जितने गहरे उतरते जाते हैं, उतना ही यह अनुभव करते हैं कि इस रत्नागार में छिपी बहुमूल्य सम्पदा इतनी अपार और असीम है जिनकी कल्पना तक कर सकना कठिन है।
साधना में एकाग्रता बनी रहती है। अनेक शिष्य गुरु की आदतों की इसी प्रकार नकल करते हैं और कार्य-कारण के सम्बन्ध को समझने की कोशिश नहीं करते। इस तरह की नकल व्यर्थ प्रत्येक व्यक्ति को गुरु के मार्ग दर्शन में अपनी प्रकृति तथा क्षमतानुसार साधना मार्ग विकसित करना चाहिए। अविवेकी ढंग से किया गया अनुकरण सफलता की ओर अग्रसर नहीं करता।
साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाय तो परलोक में निश्चित रूप से परम शांति और सद्गति ही मिलेगी।
साधना प्रारम्भ कर दी, पूर्व का अभ्यास न होने के कारण शिष्य का मन न लगता। 10-15 मिनट की साधना के बाद ही ध्यान टूट जाता।
साधना की अग्नि में प्रवेश किया था। हर वर्श एक गायत्री महापुरश्चरण प्रारम्भ करके चौबीस वर्षों में उस साधन शृंखला की चौबीस कड़ियाँ पूरी की गई। जिसके आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ एवं सिद्धियाँ प्राप्त हो सकी। कहना न होगा कि इसी पूँजी के बल पर उन्होंने युग परिवर्तन की प्रचण्ड धाराओं को द्रुतगति से प्रवाहित कर सकने में आशातीत सफलताएँ प्राप्त की।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-February
साधना की अतिकष्टसाध्य-प्रक्रिया अपनाकर अपने को ऐसी प्रचंड अग्नि के रूप में विकसित करता है, जिसके संपर्क में आने वाला सहज ही तत्सम बन जाए। इसके लिए उसे आत्मनिग्रह की, आत्मसंवर्द्धन की अग्निपरीक्षा में होकर जन्म- जन्मांतर तक आत्मशोधन करना पड़ता है। तब कहीं वह इस स्थिति में बनता है कि अपनी बहुमूल्य संचित संपदा परम निस्वार्थ भाव से अधिकारी शिष्य को प्रदान करके उसे अपनी समकक्षता का गौरव उपलब्ध करा सके। परमार्थ का यह चरमबिंदु है।
साधना अधिक तत्परतापूर्वक बढ़ाएँ। इसी अनुदान पर तो अनुदान का उच्चस्तरीय लाभ उठाया जाना संभव हो सकता है।
साधना है। इसी तप-साधना से अंतरात्मा निर्मल और शक्तिशाली होती है। उसी के द्वारा आत्मकल्याण, ब्रह्मसाक्षात्कार एवं जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। शास्त्र कहता है—
साधना है।
साधनाओं का प्रयोजन शरीर को आत्मकल्याण की दिशा में रुचि लेने के लिए सधाना है। स्वाध्याय-सत्संग, मनन-चिंतन, ध्यान-धारणा का फल, मन को जीवन का स्वरूप और लक्ष्य समझाने के लिए, इच्छा-आकांक्षाओं को आत्मकल्याण के लिए, कुछ सोचने-करने के लिए, उत्साहित एवं अभ्यस्त करने का प्रयोजन पूरा करती है। साधनों का अंतिम चरण आस्था को, श्रद्धा को, भावना को, आकांक्षा को देवदृष्टि के साथ जोड़ देता है।
साधना, उपासना, तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केंद्रित न किया जाए; वरन यह भी देखा जाए कि उस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग-उपयोग किस प्रयोजन के लिए किया जा रहा है।
साधनाएँ शरीर का शोधन करती हैं । जप-तप, व्रत-उपवास, प्रायश्चित, हवन, तीर्थयात्रा, नेति-धोति,वस्ति-वज्रोली जैसी साधनाओं का प्रयोजन शरीर को आत्मकल्याण की दिशा में रुचि लेने के लिए सधाना है। स्वाध्याय-सत्संग, मनन-चिंतन, ध्यान-धारणा का फल, मन को जीवन का स्वरूप और लक्ष्य समझाने के लिए, इच्छा-आकांक्षाओं को आत्मकल्याण के लिए, कुछ सोचने-करने के लिए, उत्साहित एवं अभ्यस्त करने का प्रयोजन पूरा करती है। साधनों का अंतिम चरण आस्था को, श्रद्धा को, भावना को, आकांक्षा को देवदृष्टि के साथ जोड़ देता है।
साधना, तपश्चर्या के विविध विधि-विधानों से लेकर धर्मानुष्ठानों के अगणित कर्मकांडों तक के सारे क्रिया-कृत्य इसलिए हैं कि उनके माध्यम से भौतिकतापरायण पशु-प्रवृत्तियों को आत्मवादी आस्थाओं में परिणत किया जा सके। मनीषी और तत्त्वदर्शी इस रहस्य का समय-समय पर उद्घाटन करते रहे हैं। उपनिषदों की ब्रह्मविद्या इसी मर्म चर्चा से भरी पड़ी है। देवाराधन के विधान प्रकारांतर से अपने ही श्रद्धातत्त्व के विकास की भाव विज्ञान समर्थित पद्धति है। देवता वस्तुतः मनुष्य का अपना अस्तित्व ही है।
साधना की कठिनाइयाँ मानकर इन सब शर्तों को स्वीकार करते रहे और अंततः संस्कृत भाषा के विद्वान बनकर अपनी संस्था को महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न कर सकने में समर्थ बना सके।
साधना की उपेक्षा करते रहते हैं, उसी तरह आत्मकल्याण के लिए कटिबद्ध होने की श्रेयसाधक प्रधानता देते हैं और सुख-सुविधाओं की उपेक्षा करते हैं। इसके लिए पुराने ढर्रे को बदलना पड़ता है और नया अपनाना पड़ता है। जंगली जानवरों को पालतू बनाने में बहुत श्रम करना पड़ता है। उनकी पुरानी आदतें भुलानी पड़ती हैं और नए अभ्यास कराने होते हैं। इस प्रशिक्षण के साथ, उनके साथ कठोरता का व्यवहार भी करना पड़ता है।
साधना में तत्पर होने की ही सार्थकता है।
साधना त्याग, बलिदान से आरंभ करते हैं; किंतु पाते इतना अधिक हैं कि स्वयं धन्य बनते हैं और अपने युग के इतिहास को चिरस्मरणीय— अभिनंदनीय बनाते हैं।
साधना के, उपासना-अर्चा के मूल मर्म हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के अमर फल आत्मदेवरूप कल्पवृक्ष को सींचने-संजोने से ही प्राप्त किए जा सकते हैं। जिसने ब्रह्मविद्या के इस मर्म को समझ लिया, उसी के हाथ आत्मिक विभूतियाँ लगने की आशा की जानी चाहिए।
साधना द्वारा उपार्जित आत्मबल-संपदा की प्रचुर पूँजी का, प्रचुर संग्रह आवश्यक है।
साधना के लिए तो ब्रह्ममुहूर्त्त ही सर्वोत्तम है। इस समय उपासना जितनी अच्छी तरह हो सकती है, उतनी अन्य किसी समय नहीं। देर तक सोते रहने वाले मंदबुद्धि, आलसी, रुग्ण और दरिद्र बनते चले जाते हैं। यह तथ्य सर्वथा माननीय है।
साधनारत व्यक्ति मादक द्रव्यों का भी सेवन करते हैं। कापालिक और अघोर संप्रदायों में ऐसे कृत्य भी मनस्वी एवं तेजस्वी बनाने के लिए काम में लाए जाते हैं, जिन्हें अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। कई सिद्धयोगी अपनी सिद्धियों को, अपने को चमत्कारी— सिद्ध— प्रख्यात करने में अथवा स्वर्गमुक्ति के व्यक्तिगत लाभ में ही खरच कर डालते हैं। अर्थशास्त्र की तरह अध्यात्मशास्त्र का भी यही नियम है कि विशिष्ठ उत्पादन की वह पूँजी, जो निर्वाह खरच से बच जाए, ऐसे ही कामों में लगाई जानी चाहिए, जिससे अतिरिक्त उत्पादन बढ़ने में सहायता मिले, भले ही पूँजी धन के रूप में हो अथवा विभूतियों के रूप में।
साधना में जुट जाना और अपनी प्रतिभा, बुद्धि, संपदा आदि को लोक-मंगल के लिए नियोजित करना भी तप-साधना है। इसी तप-साधना से अंतरात्मा निर्मल और शक्तिशाली होती है। उसी के द्वारा आत्मकल्याण, ब्रह्मसाक्षात्कार एवं जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। शास्त्र कहता है—
साधना से अंतरात्मा निर्मल और शक्तिशाली होती है। उसी के द्वारा आत्मकल्याण, ब्रह्मसाक्षात्कार एवं जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। शास्त्र कहता है—
साधना अब अपने प्रभाव में आ रही है। जनमानस को मैं जिस दिशा में ढालना चाहता था, धर्मतंत्र को जो तेजस्वी और प्रभावशाली स्वरूप देना चाहता था, वह परिस्थितियाँ अब उभरकर आईं, जब मुझे अपना शरीर त्याग करना पड़ रहा है। मृत्यु से प्यार करने वाले तुम्हारे वृद्ध आचार्य के मन में कुछ भी दुःख और क्षोभ नहीं, किंतु मानवता का भविष्य मुझे पीड़ित कर रहा है। एक ही आशंका है, धर्मतंत्र कहीं अपने प्रौढ़काल में नष्ट या पथभ्रष्ट तो नहीं हो जाएगा?”
साधनाओं की समग्र-संहिता आत्मबल संपादन के लिए है। आत्मविज्ञान के विद्यार्थी को यह जानना ही चाहिए कि ईश्वरीय विभूतियों और सिद्धियों के लिए किसी अनुनय-विनय से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। उसके लिए पात्रता का विकास ही एकमात्र उपाय है।
साधना की भाँति बिताया। बात उस समय की है जब उपगुप्त स्नातक थे। उनकी संपन्नता से अधिक उनके सौंदर्य की घर-घर चर्चा हुआ करती, राजकुमारियाँ तक उपगुप्त को वरण करने का स्वप्न देखा करती थीं।
साधना, तपश्चर्या, प्रगाढ़ तत्त्व, चिंतन एवं परमार्थपरायणता का आश्रय लेकर किसी भी उर्वर मस्तिष्क को इस योग्य बनाया जा सकता है कि वह अपने प्राण-प्रवाह से समीपवर्त्ती लोगों को सुचिंतन के लिए उत्तेजित कर सके और सद्भावनाओं से ओत-प्रोत गति के लिए बाध्य कर सके। प्राचीनकाल के ऋषि-मुनि यही कार्य करते थे। अब उसे विज्ञानवेत्ता यंत्र-उपकरण के माध्यम से, विद्युत-विकरण द्वारा कार्यांवित करने के लिए प्रयत्नशील हैं।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-August
साधना में सफलता प्राप्त कर सकता है।
साधना थी तो निराशा ही हाथ लगेगी। प्रलोभन के लिए उछल कूद करने वालों की संख्या बढ़ी है पर इससे कला का स्तर तनिक भी ऊँचा नहीं उठा। उसके प्रति विचारशील वर्ग के आकर्षण में बुरी तरह गिरावट आई है। आश्चर्य नहीं कलाकार और कला प्रेमियों को अगले दिनों बाजारू कहा जाने लगे।
साधना। जिसने थोड़ी सफलता पर अहंकार व्यक्त किया, समझ लो, वह मारा गया। प्रगति तो अनन्त है, इसलिये उसकी साधना भी असीम ही होनी चाहिए।
साधना की कुदाली से उन्हें खोद निकाला जाय तो सिद्धि-सम्पदा से सुसम्पन्न बन सकना, किसी के लिए भी सम्भव एवं सरल हो सकता है।
साधनात्।
साधना और उपासना का प्रतिफल आत्म विस्तार के रूप में ही उपलब्ध होता है। संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों को तोड़ फोड़ कर फेंक देने और विराट् के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ लेने का ही नाम मुक्ति है। स्वर्ग के दो पक्ष है उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व। जिसके अन्त करण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई समझना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही देवयोनि प्राप्त कर ली।
साधना प्रयोगों को काम में लाया जाता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन उससे ऊँचा है। अपनी आकांक्षा की भावना को संकीर्ण स्वार्थ परता की परिधि से ऊँचा उठाकर जब उत्कृष्ट दैवी प्रेरणाओं में नियोजित किया जाता है तो वह भाव योग की साधना नर को नारायण ही बना देती है तब उसके चमत्कार बाजीगरी, कौतुक, कौतूहल जैसे न रह कर इस स्तर के होते हैं जिनसे विश्व में सुख-शान्ति का संवर्धन सम्भव हो सके।
साधना है। शारीरिक बल-वर्धन के लिये आसान प्राणायाम के नेति, धोति, वस्ति आदि की प्रक्रिया अपनाई जाती है। मानसिक क्षमता विकास के लिए ध्यान धारण ओर प्रत्याहार की एकाग्रता मूलक साधना प्रयोगों को काम में लाया जाता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन उससे ऊँचा है। अपनी आकांक्षा की भावना को संकीर्ण स्वार्थ परता की परिधि से ऊँचा उठाकर जब उत्कृष्ट दैवी प्रेरणाओं में नियोजित किया जाता है तो वह भाव योग की साधना नर को नारायण ही बना देती है तब उसके चमत्कार बाजीगरी, कौतुक, कौतूहल जैसे न रह कर इस स्तर के होते हैं जिनसे विश्व में सुख-शान्ति का संवर्धन सम्भव हो सके।
साधना की है। जिसमें मन की क्रिया को निर्मल उत्कृष्ट बनाने पर ही सारा जोर दिया जाता रहा है। ऋषि-मुनि इसी स्तर के होते रहे है इसका उल्लेख शास्त्रों में सर्वत्र उपलब्ध है-
साधना करते हुए निस्सन्देह सिद्धि प्राप्त करता है।
साधनात्मक पथ पर अग्रसर होते हुए विचारवान साधकों को साँसारिक और आत्मिक दोनों भूमिकाओं का समन्वयात्मक निर्वाह करना चाहिए। प्राचीन काल में भी ऋषि-मुनियों की जीवनचर्या यही थी। आज की दृष्टि से यही उचित एवं उपयुक्त है।
साधनाओं के पथ पर चलने के लिये साहस करने वाले व्यक्तियों को आज की स्थिति में संन्यासी होने की-कपड़े रंगने की, घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। यदि युवावस्था हो तो गृह आजीविका उपार्जित करते हुए इस मार्ग पर चलने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। यदि आयु ढल गई है और बच्चे कमाने योग्य हो गये है, छोटे बहन-भाइयों को सम्भाल सकते हैं तो फिर वानप्रस्थ की तरह घर में रहते हुए स्वाध्याय, सेवा संयम, साधना का क्रम निर्धारित करना चाहिए। घर से कुछ दूरी भी निवास किया जा सकता है। पत्नी को भी साथ रखा जा सकता है।
साधना के आधार पर जन-साधारण की सहज श्रद्धा अर्जित करने वाले धर्मात्मा आज कहाँ हैं?
साधना भी असीम ही होनी चाहिए।
साधना मार्ग पर चलने वालों को सन्तान की संख्या न्यूनतम रखने का आरम्भ से ही प्रयास रखना चाहिए। ढलती आयु में तो यह सतर्कता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। बुढ़ापे में सन्तान पैदा करना अपने साथ और उस सन्तान के साथ एक प्रकार से अत्याचार करना ही है।
साधना का अपना विज्ञान, रसायनशास्त्र या विद्युत विज्ञान की तरह ही है। रासायनिक कणों के सम्मिश्रण से नये गुण धर्म वाले पदार्थों के विनिर्मित होने की बात रसायनशास्त्री कहते ही रहते हैं और ऋण तथा धन प्रवाहों का मिलन किस प्रकार विद्युत धारा का सृजन संचार करता है यह विद्युत विज्ञानी बताते ही रहते हैं। योग विज्ञान का प्रतिपादन यह है कि आत्मा की असीमता जब परमात्मा की असीमता के साथ घुल-मिल जाती है तो सामान्य समझा जाने वाला मनुष्य अनेक दृष्टियों से असामान्य बन जाता है। योगी, तपस्वी, ऋषि, सिद्ध पुरुष महामानव, देवदूत प्रायः इसी स्तर के होते हैं। सिंह की खाल ओढ़कर कोई गधा वनराज बनने का उपहासास्पद उपक्रम करे यह दूसरी बात है पर यदि वस्तुतः आत्मा को परमात्मा स्तर के अनुरूप बनाने का प्रयत्न किया गया हो तो प्रगति के अनुरूप वैसी क्षमताएँ असंदिग्ध रूप से प्राप्त होती चली जायेगी जो सामान्य स्तर के लोगों में प्रायः नहीं ही पाई जाती।
साधना में संलग्न साधक गृहस्थ रहते हुए भी संयम पूर्वक साधना करने से सिद्धि प्राप्त करता है।
साधना के आधार पर सामान्य स्तर से ऊँचा उठकर असामान्य बना जा सकता है। समय समय पर ऐसे कौतुक कौतूहल देखने को भी मिलते रहते हैं, जिनसे योग साधना के द्वारा प्रत्यक्ष देखे जा सकने वाली असामान्य उपलब्धियों का आभास मिलता है।
साधना उपक्रम का एक मात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है। आत्मा की पवित्रतम और उदारतम स्थिति का नाम ही परमात्मा है। लोभ, मोह के बन्धनों को काटकर आदर्श और कर्तव्य के अपनाने का नाम ही मुक्ति है। स्वर्ग न तो स्थान है और न परिस्थिति। वह विशुद्ध रूप से परिष्कृत दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाला देव संज्ञा में गिना जाने लगता है और अति मानवी आनन्द का रसास्वादन करता है।
साधना छोड़ी नहीं। फेफड़ों की खराबी बेतरह तंग करती थी और लगता था कि वे अब महाप्रयाण करने ही वाले हैं, तो भी उन्होंने अपनी साधना छोड़ी नहीं। अन्तिम दिनों में वे महिला मित्र नामक अत्यन्त कलापूर्ण चित्र बनाने में निमग्न थे और अपने बेटे की मेज़ पर रखने के लिए एक गुलदस्ता चित्रित कर रहे थे।
साधना सिद्ध होती है और न केवल अपने को वरन् परिवार के प्रत्येक सदस्य को उसका समुचित लाभ मिलता है।
साधना के दोनों रूप हो सकते हैं अभिवर्धन भी और उन्मूलन भी। कुशल माली अपने बगीचे को सुरम्य बनाने के लिए उसमें कुछ आरोपण करता है कुछ उखाड़-पछाड़ कुछ काट-छाँट आरोपण की तरह यह उन्मूलन भी महत्त्वपूर्ण विद्या है। सहयोग का सहोदर ही संघर्ष है। आवश्यकतानुसार दीपक और जल कलश की तरह उन दोनों ही शीत-ताप पुण्यों का प्रयोग करना पड़ता है। परिष्कृत दृष्टि से मानव जीवन की सार्थकता लोक मंगल के क्रिया कलाप को व्यक्तिगत लाभ व्यवसाय की तरह ही परम रुचिकर मानने और उसमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त होने में मानी जा सकती है।
साधना में निरत हो।
साधना से समझा और बुझती हुई आँखों को नये सिरे से चमकाते हुए कहा– लूसी मैं समझता हूँ कि चित्रकला के बारे में मैं अब कुछ-कुछ समझ सकने योग्य हो चला। इसके बाद उन्होंने सदा के लिए आँखें बन्द कर ली।
साधना करने से सिद्धि प्राप्त करता है।
साधना छोड़ी नहीं। अन्तिम दिनों में वे महिला मित्र नामक अत्यन्त कलापूर्ण चित्र बनाने में निमग्न थे और अपने बेटे की मेज़ पर रखने के लिए एक गुलदस्ता चित्रित कर रहे थे।
साधना का क्रम निर्धारित करना चाहिए। घर से कुछ दूरी भी निवास किया जा सकता है। पत्नी को भी साथ रखा जा सकता है। पर आजीविका की दृष्टि से स्वावलम्बी ही होना चाहिए।
साधना द्वारा संपर्क बना लिया गया तो उसके सहारे प्रकृति के पदार्थों के हेर-फेर करने की विद्या करतलगत हो सकती है।
साधना के द्वारा प्रत्यक्ष देखे जा सकने वाली असामान्य उपलब्धियों का आभास मिलता है।
साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है। आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निमित्त खड़ा किया गया है। ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष संबन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है। उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण संभव हो सकता है। साधना उपक्रम का एक मात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है।
साधना करने से साधक की बुद्धि भी वैसी ही कुसंस्कारी बनेगी। उसे न एकाग्रता प्राप्त होगी और न शान्ति। भजन का बहाना भले ही करते रहा जाय, न उसमें मन लगेगा और न सफलता मिलेगी। ऐसी दशा में आज की स्थिति में-भिक्षा का अन्न, मुफ्त का निर्वाह एक प्रकार से सर्वथा अवांछनीय ही है। जंगलों में कन्द, मूल, फल की प्राचीन सुविधा रही नहीं।
साधना नर को नारायण ही बना देती है तब उसके चमत्कार बाजीगरी, कौतुक, कौतूहल जैसे न रह कर इस स्तर के होते हैं जिनसे विश्व में सुख-शान्ति का संवर्धन सम्भव हो सके।
साधना-उपक्रम के द्वारा लिंग परिवर्तन में सफलता प्राप्त की हैं। इन दिनों भले ही वे उपचार विस्मृत-विलुप्त हो गये हों– इससे क्या– तथ्य तो जहाँ के तहाँ ही रहेंगे। आत्मा के संकल्प सुदृढ़ और प्रयत्न यदि प्रखर होवे, तो किसी भी आत्मा के लिए अपना वर्तमान लिंग बदल लेने की पूरी-पूरी सम्भावना हो सकती है।
साधना के अंतर्गत नमक का प्रयोग बन्द कर देने की बात भी कही गई है। भारतीय धर्मग्रन्थों में नमक के त्याग को एक व्रत के रूप में निरूपित किया गया है। धार्मिक दृष्टि से नमक त्याग का महत्त्व तो है ही विज्ञान की खोज ने भी इस नियम की पुष्टि की है। यही नहीं नमक को शरीर के लिए हानिकारक भी माना है।
साधनात्मक जीवन जिया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-September
साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते है कि छोटे-छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभाएंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके। जो समर्थ होता है, वही पुरुषार्थ कर दिखाने का दावा कर सकता है। विचार-क्रान्ति शब्द तो अच्छा है किन्तु व्यवहार में इसे प्रयुक्त कर दिखाने के लिये एक समर्थ, दैवी तन्त्र का संरक्षण चाहिए। हमारा दावा है कि असंभव को संभव कर दिखाने का यह पुरुषार्थ आगामी पन्द्रह वर्षों से सम्पन्न होकर रहेगा। विवेक और श्रद्धा के जिस समन्वित ऋतम्भरा रूप का -आद्य शक्ति का अवलम्बन कर लिया है, उसमें लाखों-करोड़ों को अपना सहयोगी बनाया है।
साधना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ध्यान-साधना का रास्ता सुझाया गया था।
साधना को उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
साधना की तो जाती है अन्तराल में, पर उसका प्रतिफल दैवी शक्तियों का सहयोग लेने पर ही मिलता है।
साधना के द्वारा प्राण ऊर्जा का सम्वर्धन भली प्रकार सम्भव है। इसके लिये उचित वातावरण मिल सके तो ठीक, नहीं तो आत्मशोधन एवं साधना प्रक्रिया द्वारा भी मनःस्थिति द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित की जा सकती है। विज्ञान का यह स्थूल पक्ष तो इस दिशा में संकेत भर देता है। इससे आगे की - शरीर की ‘सटलर’ जानकारी एवं उसे उपकरण मानकर विद्यमान ऊर्जा का सदुपयोग सुनियोजन योग शास्त्रों में वर्णित हैं। इस ज्ञान का लाभ उठाया जा सके तो वह सब कुछ अर्जित कर सकना संभव है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में वर्णित किया जाता है।
साधना की, परोक्ष में क्रियाशील रहे। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द से लेकर रामतीर्थ, योगीराज अरविन्द, महर्षि रमण आदि का नाम इसी संदर्भ में लिया जाता है। जिनका नाम इस सूची में नहीं है, वे सदा से उत्तराखण्ड की कंदराओं में तप साधना में निरत है एवं सारे लीला संदोह को देख रहे है जो प्रत्यक्ष में दृश्यमान है, परोक्ष में पड़ने वाला है।
साधना है।
साधना इस यौगिक तृतीय नेत्र-आज्ञाचक्र के सहयोग से संभव है।
साधना से सम्भव है। वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे अपनी मनः शक्ति को माया रूपिणी प्रकृति को समझने में समय नष्ट न करके दिव्यात्मा के अनुभवों की खोज में प्रयुक्त करें, जिससे परम सत्य की जानकारी तथा मानव जीवन के परम उद्देश्य का उद्घाटन हो सके।
साधना में सहभागी बने है कि नवयुग अवश्य आयेगा। वह श्रद्धायुग कहा जाएगा। आस्थाओं के स्तर के मीटर के आधार पर ही किसी की महानता-क्षुद्रता का मूल्यांकन किया जाएगा। महाप्रज्ञा का तत्वदर्शन जन-जन के मन-मन में प्रविष्ट होगा एवं विवेक का सारथी उन मूर्धन्य का संचालन करेगा जिनके हाथी में अर्थ, सुरक्षा, शासन एवं विचार तंत्र है। सूक्ष्मीकरण साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते है कि छोटे-छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभाएंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके।
साधना प्रक्रिया द्वारा भी मनःस्थिति द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित की जा सकती है। विज्ञान का यह स्थूल पक्ष तो इस दिशा में संकेत भर देता है। इससे आगे की - शरीर की ‘सटलर’ जानकारी एवं उसे उपकरण मानकर विद्यमान ऊर्जा का सदुपयोग सुनियोजन योग शास्त्रों में वर्णित हैं। इस ज्ञान का लाभ उठाया जा सके तो वह सब कुछ अर्जित कर सकना संभव है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में वर्णित किया जाता है।
साधना तत्काल प्रतिफल देने वाली है, लेकिन इसका क्रम ज्ञानयोग, कर्मयोग की सिद्धि के बाद आता है। श्रद्धा को श्रेष्ठता से प्यार माना गया है एवं भक्ति को उदार आत्मीयता एवं सेवा सज्जनता। पात्रता प्राप्ति के बाद की गयी निश्छल प्रार्थना निश्चित ही अपने सुपरिणाम दिखाती है साधक को धन्य बना देती है।
साधना का रास्ता सुझाया गया था।
साधना से इस आयाम में पहुँचने की होड़ मचने लगे एवं “एजींग” (वार्धक्य) पर नियंत्रण में वैज्ञानिक-अध्यात्मवादी सफल हो जाये।
साधना में निरत है एवं सारे लीला संदोह को देख रहे है जो प्रत्यक्ष में दृश्यमान है, परोक्ष में पड़ने वाला है।
साधना उपक्रमों की चर्चा करते हुए कहते है कि इनके माध्यम से अपने बहिरंग वातावरण को ऋण आवेशयुक्त बनाना संभव है।
साधना, एकान्त सेवन की प्रक्रिया सम्पन्न करते थे, ताकि वर्ष में एक बार प्रत्यावर्तन होता चले एवं आयुष्य बढ़ती रहे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-November
साधना में जहाँ शब्द शक्ति का विस्फोट होता है। विस्फोट में गुणन शक्ति है। मंत्र में सर्व प्रथम देवस्थापन की सघन निष्ठा उत्पन्न की जाती है। यह भाव चुम्बकत्व है। श्रद्धा शक्ति के उद्भव का प्रथम चरण है।
साधना है। विभिन्न प्रकार के तप-साधन इसी प्रयोजन के लिए किये जाते हैं। प्राणवान व्यक्तियों के समीप रहकर उनके विद्युत प्रवाह का लाभ उसी प्रकार उठाया जा सकता है कि चन्दन वृक्ष के समीप उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी सुगन्धित युक्त होने का लाभ उठाते हैं। मौन, एकांत सेवन और ब्रह्मचर्य जैसी साधनाएँ इसलिए है कि वह विद्युत भण्डार निरर्थक कार्यों में खर्च न होकर संग्रहित रखा जा सके। महान व्यक्तित्वों का सान्निध्य सम्पर्क अपने आप में एक बड़ा लाभ है।
साधना द्वारा साधक के मनः क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण चुम्बकत्व से परिपूर्ण कर लेती है।
साधनाएँ इसलिए है कि वह विद्युत भण्डार निरर्थक कार्यों में खर्च न होकर संग्रहित रखा जा सके। महान व्यक्तित्वों का सान्निध्य सम्पर्क अपने आप में एक बड़ा लाभ है। बिना सत्संग और परामर्श के भी ऐसा सम्पर्क स्वल्प प्राण व्यक्तियों के लिये अमृत वर्षा जैसा अति महत्वपूर्ण अनुदान प्रस्तुत करता है। स्पष्ट है कि आग और बिजली के सम्पर्क में आने वाली वस्तुओं में यदि ग्रहण करने की शक्ति हो तो वे भी उसी स्तर की बन जाती है।
साधना कष्टसाध्य तितीक्षा के द्वारा मंत्र की गुहा शक्ति के करतल गत हो जाने को भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मनः क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण चुम्बकत्व से परिपूर्ण कर लेती है।
साधना की सिद्धियों और देव अनुग्रह से मिलने वाली विभूतियों के रूप में सामने आता है। तपश्चर्या तितीक्षा और कष्टसाध्य साधना पथ पर दूर तक चल सकना, इस आत्मबल के सहारे ही सम्भव होता है। विकसित स्तर का यही आत्मतेज सूक्ष्म जगत में काम करने वाली दिव्य शक्तियों को खींच लाता है और उस व्यक्ति की हथेली पर लाकर रख देता है।
साधना और उपासना का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया है।
साधना से उत्पन्न, शब्द शक्ति का प्रचण्ड प्रवाह जैसी अनेकों रहस्यमयी मंत्राराधन की विशेषताएँ मंत्र को जागृत करती है और निष्ठावान् साधकों को सिद्ध मांत्रिक के स्तर पर ले जाकर पहुँचा देती है।
साधना और परमार्थ प्रयोजनों का मार्ग सुख-सुविधाओं से भरा हुआ नहीं है , उसमें अपेक्षाकृत अधिक श्रम करना पड़ता है और सुख-सुविधाओं में कटौती करनी पड़ती है। यह कटौती उस समय तक बड़ी भयानक प्रतीत होती है जब तक उस क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया जाता। तैरना जिसने नहीं सीखा है उसे पानी में घुसना संकट को निमंत्रण देने जैसा प्रतीत होता है पर जब वह शिक्षार्थी तैरना सीखने के लिए जल में प्रवेश करता है और हाथ पैर चलाना आरम्भ करता है तो लगता है कि न तो पानी में घुसना उतना संकटापन्न था और न तैरने की प्रक्रिया उतनी जटिल थी। अभ्यास हर कठिनाई को सरल बना देता है।
साधनाओं के पीछे कोई दर्शन नहीं है यदि कुछ है तो इतना ही कि तितीक्षा पूर्ण अभ्यास के द्वारा मनुष्य चाहे तो अपने शरीर की सामान्य क्रियाओं को असामान्य बना सकता है।
साधना कर सकने की- अग्नि परीक्षा उत्तीर्ण कर ले।
साधना ठीक प्रकार की जा सके तो उस रहस्यमयी शक्ति का प्रचुर परिमाण में उत्पादन किया जा सकता है जो मनुष्य के भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों को आश्चर्यजनक सफलताओं से भर सकती है। मंत्रशक्ति में चमत्कारों का प्रधान आधार है- शब्द। शब्द शक्ति का स्फोट। इसके साथ ही साधक की शारीरिक मानसिक और भावनात्मक स्थिति की पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। इन सब के समन्वय से ही वह प्रभाव उत्पन्न होता है जिसे मन्त्र शक्ति का चमत्कार कहा जा सके।
साधना पथ पर दूर तक चल सकना, इस आत्मबल के सहारे ही सम्भव होता है। विकसित स्तर का यही आत्मतेज सूक्ष्म जगत में काम करने वाली दिव्य शक्तियों को खींच लाता है और उस व्यक्ति की हथेली पर लाकर रख देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-October
साधना करने पर भी कोई रोक नहीं है, पर प्रयत्न यही किया जाता है कि सामूहिक उपासना का उपक्रम बने और उसे एक उत्साह आयोजन का स्वरूप मिले। ऐसी व्यवस्था बनाने में उत्साही लोगों को स्वयं आगे रहने, थोड़ी दौड़ धूप करने साधन जुटानें एवं जन-संपर्क साधकर उत्साह दिलाने जैसे प्रयत्न करने होते हैं। ऐसा कुछ कर पाने वाले उत्साही जहाँ एक दो भी हों वहाँ नवरात्रि आयोजन की व्यवस्था सहज ही बन जाती हैं। वह न तो महंगी है और न कठिन कष्ट साध्य। जो इसके लिए आगे बढ़कर साहस दिखाते हैं उन्हं अनुभव से इस निष्कर्ष पर पहूँचना होता है कि भारत जैसे धर्म प्रकृति वाले देश में नवरात्रि आयोजनों को साधना सत्रों के रूप में विकसित और व्यापक बना सकने में अनुत्साह के अतिरिक्त और कोई भी कठिनाई नहीं हैं जो हँसते-हँसातें हल न की जा सकं।
साधना ही प्रधान है। पूजा अर्चा तो वे थोड़ी सी ही करते रहे हैं सो भी एकान्तिकनहीं सामूहिक। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी आरम्भिक दिनों में ही तपश्चर्या अपनाई थी उसके उपरान्त वे धर्म चक्र प्रवृत्तियों को विश्वव्रुपी बनाने, उसके लिए परिव्राजक प्रशिक्षित करने तथा साधन जुटाने, में ही निरत रहे। गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ रामदा, चाणक्य, आदि की गणना भी ऐसे ही कर्मयोगियों में की जाती है। जिनने भजन कम और परमार्थ अधिक किया हैं।
साधना के प्रति श्रद्धा निष्ठा में भावना का समावेश कर लोक मंगल के लिए समयदान तथा अंशदान प्रस्तुत करने हेतु प्रत्येक परिजन को उत्साह पूर्वक आगे आना चाहिए।
साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मंगल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।
साधनाक्रम पूरा करने के साथ-साथ एकान्त में शान्त चित्त से अन्तमुर्खी होने का अवसर भी ढूँढ़ना चाहिए और यह भी सोचना चाहिए कि वर्तमान जीवनचर्या में आदर्शवादित्ता का कितना समन्वय किस प्रकार हो सकता है ? सोचने में ईमानदारी और तथ्यान्वेषी दृष्टि का समोवश हो सके तो हर किसी को अपने वर्तमान ढर्रे में यह गुजायंश दिखाई पड़ेगी कि वह प्रस्तुत समय और साधनों में से अपव्यय अंश काटने और उसे पुण्य प्रयाजनों में लगा सकने की इतनी गुजायंश निकाल सकता है जिसे संतोषजनक ही नहीं उत्साहवर्धक भी कहा जा सके। अब तक जो बन नहीं पड़ा हैं उसका कारण कोई भौतिक अवरोध नहीं वरन् चिंतन में कृपणता का समावेश भर रहा है। यदि उस अभ्यस्त ढर्रे में थोड़ा सा परिवर्तन किया जा सके तो सहज ही उस दिशा में कुद कदम उठने लगेंगे जिससे युग-धर्म का निर्वाह होने लगे। नवरात्रि साधना की सफलता का अनुमान ऐस निष्कर्षो से ही निकलता है, जिससे अभ्यस्त ढर्रे में पुण्य प्रयोजनों के समावेश का रास्ता निकले।
साधनाओं की विशेष व्यवस्थ की जाती है ताकि बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं। और 24 हजार वाली संख्या को घआ कर 10 हजार तक हलका कर दिया गा है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तात्पर्य मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है। यह किसी के लिए भी भारी नहीं पड़ना चाहिए।
साधना बनकर उफनती उछलती दृष्टिगोचर होती है।
साधना का खादपानी लागाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मंगल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।
साधना पर्द के नौ दिनों में स्थानीय प्रज्ञा संस्थान बनने का कुछ न कुछ प्रबन्ध अवश्य हो जायेगा। इस आकाँक्षा से अनुप्राणित प्रज्ञापुत्र इस छोटी स्थापना में असफल रहें यह तो हो ही नहीं सकता।
साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता है। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हें वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
साधना, शिक्षा, व्यवसाय आदि किसी में भी सफलता नहीं मिलती फिर उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?
साधना एक अत्यावश्यक पुण्ड परम्परा के रूप में सदा सर्वदा से अपनाई जाती रही हैं।
साधना में अभ्यास करना पड़ता है। भक्तिभावना का परिपोषण पूजा उपचारों के कर्मकाण्ड़ों से ही होता है। जिस प्रकार भावना और उद्देश्य के अभाव में पूजा कृत्य भी लकीर पीटने जैसे रह जाते हैं उसी प्रकार भावनाएं भी निरर्थक निष्फल बनी रहती है और कल्पना की उड़ानें तो उडती है पर क्रिया में परिणत होने का साहस नहीं जुटा पाती। थोथे ब्रह्मज्ञानी और ओछे कर्मकाँडी दोनों ही उपहासास्पद बनते और परिणाम की दृष्टि से निरशअसफल पाये जाते हैं। जब तक ज्ञान और कर्म का समन्वय न हो तब तक किसी महत्वपूण सत्परिणाम की आशा नहीं की जा सकती।
साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधना न रहकर आपत्ति धर्म जैसी युग साधना बन गयी है। जागृतों को दूसरों को जगाने का ठीक यही समय है। इन दिनों नव जागरण के अग्रदूत बनकर बादलों की तरह हर खेत पर बरसने के लिए निकल पड़ने की आवश्यकता है। पवन जन-जन तक पहुँचता और प्रत्येक को प्रचुर परिणाम में जीवन तत्व प्रदान करता है। पवन पुत्र की तरह प्रज्ञापुत्र का भी कर्तव्य है कि ‘राम काज कीन्हे बिना” विश्राम ने लेने का निश्चय करें और देवर्षि नारद की तरह जन-जन से संपर्क साधने और युग प्रयोजन से परिचित सहमत करने के लिए अथक परिश्रम करता रहे।
साधना नहीं है। ऐसे व्यक्ति नित्य नियम तिजनी थोड़ी उपासना कर लेने से भी उच्चस्तरीय परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। विवेकानन्द, गाँधी, विनाबा आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें सेवा साधना ही प्रधान है। पूजा अर्चा तो वे थोड़ी सी ही करते रहे हैं सो भी एकान्तिकनहीं सामूहिक। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी आरम्भिक दिनों में ही तपश्चर्या अपनाई थी उसके उपरान्त वे धर्म चक्र प्रवृत्तियों को विश्वव्रुपी बनाने, उसके लिए परिव्राजक प्रशिक्षित करने तथा साधन जुटाने, में ही निरत रहे।
साधना की मनःस्थिति बनाने में बाधा उत्पन्न होती हैं। मृगचर्म, व्याघ्रचर्म, अपनी मौत मरने वालों से प्राप्त होते थे तब पवित्र रहे होंगे। आज तो कहीं भी वैसा चमड़ा उपलब्ध नहीं होता। अतएव प्राचीन काल में मृगचर्म, व्याघ्रचर्म आदि के आसनों को जो मान्यता मिली थी आज की परिस्थिति में वह पूर्णतया समाप्त हो जाती हैं। चर्म त्याग की चिन्ह पूजा तो ऐसे भी हो सकती हैं कि नौ दिन रबड़ की चप्पल पहन कर काट लिये जाएँ, पर नवरात्रि उपासना तत्वज्ञान में सन्निहित संकेत सभी ऐसे हैं जिन्हें साधना अवधि में प्रयुक्त करने के बहाने अभ्यास में उतारा जाए और उसका निर्वाह भविष्य में भी यथासम्भव करते रहा जाए।
साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधना सत्रों में वे सभी प्रयोजन पूरे होते हैं जो जन मानस के परिष्कार एवं सत्प्रंवृति सम्वर्धन की उभयपक्षीय युग चेतना के अग्रगणी बनाने के लिए नितान्त आवश्यक हैं।
साधना के साध “नैष्टिक” कहलाते हैं। निष्ठा से उत्पन्न ऊर्जा ही आत्मकल्याण और लोकनिर्माण के उीय पक्षीय प्रयोजन पूरी कर पाती है। युग सृजन में यह मानवी निष्ठा ही दिव्य ऊर्जा के रूप में परिणित होगी। व्यष्टि में देवत्व के उदय और समष्टि में स्वर्गीय वातावरण की आशा अपेक्षा इसी आधार पर की गई कि निष्ठावानों का समुदाय सृजन शिल्पियों के रूप में भागीरथ, हनुमान, अर्जुन जैसे पराक्रम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होंगे और समय की आवश्यकता पूरी करेंगे।
साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता। इस सच्व्चाई को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही श्रेयस्कर रहेगा।
साधना का सुयोग बना सकते हैं।
साधना में नियोजित कर सकने का अवसर प्राप्त करते हैं। जागृत आत्माएँ-युग शिल्पी, सृजन-सैनिक, देवमानव, प्रज्ञापुत्र आदि नामों से समय-समय पर इसी समुदाय का उल्लेख होता रहता है। उज्ज्वल श्विष्य की आशाओं के केन्द्र बिंदु दन्ही को माना गया है। शेष तो मोह मदिरा पीकर उन्मादियों अथवा अर्धमृतकों की तरह मनुष्य जीवन को मखौल बनाते हुए दिन गुजारते हैं। प्रतिभाओं की कमी नहीं।
साधना को प्रखर बनाने और साधक की निष्ठा परिपक्व करने के लिए अनुष्ठानों में जो अनुबन्ध रखे गये हैं। उन्हें व्रत कहते हैं। नवरात्रि में उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, चर्मत्याग, स्वयंसेवा जैसे कुछ नियम पालन की परम्परा इसी दृष्टि से शास्त्रकारों ने बनाई है कि उपासना में अधिक प्रखरता का वह समावेश हो सकें जो सुविधा, सरलता के वातावरण में उपलब्ध नहीं होता।
साधना की बात सोंचे। इन अभ्यासो के लिए भी कई प्रकार की सरल साधनाओं की विशेष व्यवस्थ की जाती है ताकि बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं। और 24 हजार वाली संख्या को घआ कर 10 हजार तक हलका कर दिया गा है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तात्पर्य मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है।
साधना सत्रों से बढ़द्यकर अधिक उपयोगी एवं अधिक सरल व्यवस्था अन्य कदाचित ही कोई बन पड़े। महान साँस्कृतिक परम्पराओं का पुनर्जीवन नव सृजन के अभीष्ट आत्म-ऊर्जा का अभिवर्धन तथा जन जीवन में उत्कृष्टता के समावेश का जैसा र्स्वण सुयोग इन साधना सत्रों में मिल सकता है। उसकी तुलना का उपाय उपचार कदाचित ही कोई खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञान यज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता है जो प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना को जन-मानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक हैं। इस अवसर पर ऐसे संगठित प्रयासों के लिए उपयुक्त वातावरण भी रहता है जिससे साधकों को भी व्रतशील जीवन जीने के अतिरिक्त सृजन प्रयोजनों में सहयोग देने के लिए भी तत्पर किया जा सकें।
साधना की सफलता का अनुमान ऐस निष्कर्षो से ही निकलता है, जिससे अभ्यस्त ढर्रे में पुण्य प्रयोजनों के समावेश का रास्ता निकले।
साधना पद्धति के कारण भी महत्व पूर्ण माना गया हैं। नैष्ठिक साधकों के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान साधना एक अत्यावश्यक पुण्ड परम्परा के रूप में सदा सर्वदा से अपनाई जाती रही हैं।
साधना उपक्रमों में पुण्य परमार्थो को जोड़ रखने की बात उपयोगी भी है और आवश्यक भी है अन्यथा लोग साधन दान के लिए तैयार ही न होते। मात्र फालतू समय में थोड़ा सा पूजा पाठ करके निवृत हो जाते। चन्द्रायन व्रत की पूर्णाहुति पर गोदाम का विधान है। उसी प्रकार अन्यान्य सभी साधनात्मक उपक्रमों में वियोजित हुए श्रमदान समय दान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता बताई गई है इससे कृपणता को उदारता में विकसित करने के लिए दबाब पड़ता है। साथ ही लोक मंगल की सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण का सुयोग भी बनता है।
साधना सत्र आयोजन के रूप में नियोजित करने और सफल बनाने पर आरम्भ से ही बहुत जोर दिया जाता रहा हैं। इसमें उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। प्रातः काल सामूहिक जप, हवन-पूजन का औ सायं काल संगीत प्रवचन के ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था रहती हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी।
साधना के साधकों का दूसरा लक्ष्य वातावरण का अनुकूलन ही हैं। यों आत्मकल्याण और लोकमंगल दोनों एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। वे परस्पर पूरक बनकर ही दो पहियों की तरह संयुक्त प्रयास से प्रगति की आकाँक्षा को प्रत्यक्ष उपलब्धि में परिणत करते हैं। फिर भी वर्गीकरण की दृष्टि से समझने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें यों भी कह दिया जाता है। यों एक के बिना दूसरे की पूर्ति हो सकना किसी प्रकार भी संभव नहीं है।
साधना का भी अनुशासन जुड़ा है। इसके अतिरिक्त सामूहिक रूप में मासिक यज्ञ करने की व्यवस्था उन्हें बनाये रखनी होती है। सामान्यतया चलने वाले यही अनुबन्ध है जिनका परिचालन करते हुए युग सन्धि महापुरश्चरण की भागीदारी को गतिशील रखा जाता है।
साधना करनी पड़ती है।
साधना की चमत्कारी परिणिति का लाभ ले सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता।
साधना को अपनाने के लिए प्रज्ञा युग के प्रत्येक व्यक्ति को कहने एवं सहमत करने का प्रयत्न चलते रहना चाहिए। प्रज्ञा पुत्रों का संपर्क जिनसे भी उन्हें आत्मिक पुरुषार्थ और प्रकारान्तर से वातावरण अनुकूलन में योगदान के लिए तथ्य समझाते हुए अनुरोध किया जाय तो कोई कारण नहीं कि इस पाँच मिनट जितने सरलतम पुरुषार्थ को अपनाने पर इनकार ही सहमत होंगे। कितनों से ही कहने पर कुछ तो अवश्य ही सहमत होंगे। जिनके अन्तराल में सुसंस्कारिता अवश्य ही सहमत होंगे। उन्हें इस आधार पर उपलब्ध होने वाली युग चेतना से लाभान्वित होने का सहज ही उत्साह उभरेगा।
साधना को भी सम्मिलित करना और उसके लिए साहस जुटाना आवश्यक समझा जाता है। जो इनमें से एक के लिए अपनाते और दूसरे को छोड़ते हैं वे एक पंख के सहारे उड़ने का प्रयास करने वाले पक्षी की तरह निराश ही रहते हैं। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चल पाती है ? एक पैर के लम्बी यात्रा कर सकने में सफलता कहाँ मिलती है ? लंगड़े व्यक्ति भी लकड़ी का सहारा लेकर ही खड़े होते और आगे चलने में समर्थ हो पाते हैं।
साधना का अधिक माहात्म्य बताया है और इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसरों पर न बन पड़े सही पर नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म इन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाम मार्गी साधक अभीष्ट मन्त्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते रहते हैं।
साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। प्रातः काल सामूहिक जप, हवन-पूजन का औ सायं काल संगीत प्रवचन के ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था रहती हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं।
साधना को अनुष्ठान कहते हैं। उसके साथ तपश्चयाओं का अनुशासन जुड़ जाने से उनकी संज्ञा पुरश्चरण हो जाती है अनुष्ठान पुरश्चरण हलके भारी स्तर के भी होते हैं।
साधना स्वयं करनी है वरन् जन समपर्क साधनों में अभी से लगना हैं तथा पुरानों को प्रोत्साहित और नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद वन सकें इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न कर सकने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता है।
साधना की पूर्ति होने का स्मरण बनायें रखें।
साधनारत हो रहें हैं।
साधना में निरत रहकर सुसंस्कारिता परिपक्व करनी होती है। एकाँगी अभिरुचि रखने वाले पूजा परायणों की असफलता का एक मात्र कारण यही होता है कि वे परमार्थ परायणता में रुचि नहीं लेते और लोकूँगल को अपनी संचित संकीर्णता के कारण स्वार्थ सिद्धि के लिए आवश्यक न मानकर उसमं निरत बने रहते हैं। यदि यह अपूर्णता बाधक न रहे तो काँने, लँगड़े जैसी कुरूपता और अर्धांग पक्षाघात से पीड़ितों जैसी असमर्थताजन्य असफलता का सामना क्यों करना पड़े ? उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता।
साधना समय, स्थान, स्नान आदि के अनुबन्धों से तो मुक्त रखी गई है, पर निष्ठा को जीवन्त बनाये रहने के लिए इतना अनुशासन तो उसमें भी रखा गया हैं कि खाने या सोने से पूव उसे कर ही लिया जाय। इतनी नियमितता बनी रहने से भी उस निष्ठा का परिपोषण होता रहेगा जो उपसनात्मक कर्मकाण्डों में जीवन प्राण मानी जाती है। अस्त-व्यस्त रखने पर तो स्वास्थ्य, साधना, शिक्षा, व्यवसाय आदि किसी में भी सफलता नहीं मिलती फिर उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?
साधना की है उनकी श्रद्धा को जीवन्त रखने के लिए दक्षिण की परम्परा है। यज्ञ ब्रह्मभोज को इसी लिए अनुष्ठान के साथ जोड़ा गया है कि कहीं चतुर लोग माला घुमाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री न करलें। वे सत्प्रयोजनों के लिए उदार अनुदान प्रस्तुत करने पर ही साधना की पूर्ति होने का स्मरण बनायें रखें।
साधना अनुष्ठान का संकल्प सर्वत्र एक ही होगा कि साधकों को महामानवों जैसी मनोभूमि एवं शूरवीरों जैसी उदात्त साहिसिकता का वरदान मिलें। इस अनुष्ठान के फलस्वरूप ऐसा वातावरण बने जिससे युग प्रवार को उलटना संभव हो सकें। अवाध्नयीता को निरस्त और सदाशयता को समर्थ बनाने में देवमानवों का पुरुषार्थ ही निर्णायक होता है। यह उथला-हलका पड़ा तो गाड़ी रुक जाती है किन्तु यदि उसमें आवेश जैसा पराक्रम सम्मिलित हो गया तो समझना चाहिए कि लक्ष्य वेध में अब कहीं कोई अड़चन शेष नहीं रह गई। इस दृष्टि से इस बार नवरात्रि साधना के साधकों का दूसरा लक्ष्य वातावरण का अनुकूलन ही हैं।
साधना की पूर्णाहुति होती है। पूर्णाहुति की विशेष परम्परा में दो बातें अनिवार्य रूप से सम्मिलित हैं-एस यज्ञ दूसरा ब्रह्मभोज। इनके न करने पर मात्र जप भर करने की प्रक्रिया को अनुष्ठान संज्ञा नहीं मिल सकती। अधूरे-उपक्रम का प्रतिफल भी अधूरा ही रहता है। अस्तु जहाँ भी अनुष्ठानों का व्यक्तिगत एवं सामूहित आयोजन होता है वहा इन दोनों की व्यवस्था किसी न किसी रूप में की ही जाती है, चाहे वह संक्षेप में छोटे स्तर की ही क्यों न हो।
साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
साधना में संलग्न रहकर युग धर्म का निर्वाह किया जाये यह कार्य समयदान से ही हो सकता है।
साधना करने लगें और साथ ही अपने परिवारों में धार्मिक वातावरण बनाने के लिए प्रयास आरंभ करें, जो परिवार निर्माण अभियान के अंतर्गत बताया जाता रहा है। इस प्राकर वे वरिष्ठ स्तर के न होते हुए भी अपनी व्यक्तिगत उपासना का शुभारम्भ कर सकेंगे और निजी परिवार में सृजनात्मक वृत्तियों का सूत्र संचालन करते हुए वही प्रक्रिया आरम्भ कर सकेंगे जो बड़े रूप शाखा संगठन एवं प्रज्ञापीठों के माध्यम से किया जाना है।
साधना की ओर साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
साधना का चमत्कार था जो इष्टदेव का ध्यान पूजन करने तक सीमित नहीं रहती वरन् उसकी इच्छा को अपनी इच्छा का समर्पण करके अपने साधनों को उसी की पूर्ति में खपा देती है। राम पंचायतन में अन्य सदस्य वस्त्राभूषण पहने सम्मानित स्थान पर बैठे दृष्टिगोचर होते हैं पर पवन पुत्र के शरीर पर लज्जावस्त्र की तरह लँगोटी मात्र है और उनने अपना स्थान सबसे नीचे चीरणों के समीप बैठने का बनाया है।
साधना सत्रों में मिल सकता है। उसकी तुलना का उपाय उपचार कदाचित ही कोई खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञान यज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता है जो प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना को जन-मानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक हैं। इस अवसर पर ऐसे संगठित प्रयासों के लिए उपयुक्त वातावरण भी रहता है जिससे साधकों को भी व्रतशील जीवन जीने के अतिरिक्त सृजन प्रयोजनों में सहयोग देने के लिए भी तत्पर किया जा सकें।
साधना में सम्मिलित होने वाले तथा प्रज्ञा अभियान में रुचि लेने वालों का समर्थन करने से आगे बढ़ाने की योजना बननी चाहिए। यह कार्य ज्ञान घटों और धर्मघटों की स्थापना से ही हो सकता है। प्रज्ञा संस्थानों में से प्रत्येक को कार्यकर्ता निर्वाह का घर-घर युग आलोक पहुँचानें का प्रबंध करना होगा। जम्न दिवसोत्सव की सुव्यवस्था में भी एक नियमित एवं नियुक्त कार्यकर्ता की आवश्यकता पड़ेगी। भले ही वह प्रज्ञा मन्दिरों की दुर्बल स्थिति में आधे समय का ही क्यों न रखा जाए।
साधना अपने आप में परिपूर्ण योग साधना एवं तपश्चर्या हैं। उस मार्ग पर कदम बढ़ाते ही मील के पत्थरों की तरह वे देवी अनुग्रह मिलते चले जाते हैं। जिनके सहारे विभूतियों एवं समृद्धियों की अपेक्षा की जाती हैं।
साधना में अहिर्निशि निरत है, उसे जीवन्त रखने के लिए शरीर यात्रा के साधन तो देने ही होंगे इस उत्तर दायित्व का निर्वाह ही ‘ब्रह्मभोज है। प्राचीन काल में ऐसे लोक सेवी ब्रह्म परायण सर्वत्र उपलब्ध थे। उनके चरण इन बहाने अपने घर में पड़ें। हाथ से खिलाने का कभी तो सौभाग्य मिले। इस भावना से ओत-प्रोत भावुक साधकों को ब्रह्मपरायणों को अपने घर बुलाने का भी आग्रह रहता था।
साधनात्मक उपक्रमों में वियोजित हुए श्रमदान समय दान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता बताई गई है इससे कृपणता को उदारता में विकसित करने के लिए दबाब पड़ता है। साथ ही लोक मंगल की सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण का सुयोग भी बनता है। इसलिए तत्वदर्शियों ने प्रत्येक धर्मानुष्ठान के साथ दान पुण्य क व्यवस्था रखी है और उसमें उदार साहसिकता अपनाने पर जोर दिया है।
साधना उपासना का भी नियमित उपक्रम बन नहीं पड़ रहा है। इस समुदाय के लिए एक अति सरल पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया है और उसको अपनाने के लिए नवरात्रि पर्व को ही शुभारम्भ के मुहूर्त के रूप में मनाने के लिए अनुरोध किया गया है।
साधना पर्व जैसी सामान्य नहीं वरन् आसाधारण स्तर की हैं। उनमें युगसंधि के बीजारोपण वर्ष की विशेष प्रयोजन भी जुड़ गया है। अमावश्या, पूर्णिमा को यों सदा ही पर्व माना जाता है। और शुभ कर्मों के लिए उनहं विशेष अवसर या उपयुक्त मुहूर्त माना जाता है। किन्तु जब उनके साथ कुछ विशिष्टता जुड़ जाती है तो स्थिति और भी उच्चस्तरीय हो जाती हैं।
साधना के लिए सरलता पूर्वक निकाले जा सकते हैं। तीस दिन के उपर्जन में से एक दिन की आजीविका इस कार्य के लिए लगाई जा सके, तो इससे किसी पर भी अर्थ संकट नहीं आने वाला है। थोड़ी सी बचत कर लेने पर उस एक दिन की कमाई की पूति हो सकती है। जो समय नहीं दे सकते, व उतने साधन देकर दूसरों का समय खरीद सकते हैं। इस संदर्भ में प्रत्येक युग साधक को गम्भीरता पूर्वक सोचना चाहिए और समय की माँग को देखते हुए अधिकतम उदारता का परिचय देना चाहिए।
साधना में संलग्न साधकों के लिए इन दिनों हिमालय के धुवकेंद्र में विशिष्ठ अनुदान उपहार उतर रहे हैं। वे उस लाभ को अनायास ही उपलब्ध कर रहे हैं जिन्हं प्रातः और साँयकला ग्रहण करने का स्वर्णित सुअवसर निष्ठावानों को मिल रहा हैं। नवसृजन अभियान का जन समाज को मिल रहा है। नवसृजन अभियान का जन समाज को, भावपीढ़ी को जो लाभ मिलेगा उससे कहीं अधिक लाभान्वित प्रज्ञापुत्रों का वह समुदाय होगा, जिसमें नैष्ठिक भागीदार प्रमुख है।
साधना क्षेत्र में नये संकल्प लेकर अग्रसर हुआ है। उसमें से प्रत्येक को न केवल नवरात्रि की अनुष्ठान साधना स्वयं करनी है वरन् जन समपर्क साधनों में अभी से लगना हैं तथा पुरानों को प्रोत्साहित और नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद वन सकें इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न कर सकने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता है।
साधना एवं तपश्चर्या हैं। उस मार्ग पर कदम बढ़ाते ही मील के पत्थरों की तरह वे देवी अनुग्रह मिलते चले जाते हैं। जिनके सहारे विभूतियों एवं समृद्धियों की अपेक्षा की जाती हैं।
साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
साधना का अत्यधिक महत्व माना गया है। इसमें पूजा अर्चा की निर्धारित विधि व्यवस्था का अपना महत्व हैं और ऋतु सन्धि के अवसर पर इस बेला की समयपरक विशेषता है। इतने पर भी इस रहस्य को भली प्रकार हृदयंगम किया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी रहने वाली सिद्धियों की दृष्टि से इन अनुष्ठानों का मर्म उस अवसर पर पालन किये जाने वाले अनुबन्ध, अनुशासनों के साथ जुड़ा हुआ है। वे नियम सामान्य व्यवहार में कुछ कठिन तो पड़ते हैं, पर ऐसे नहीं है जिन्हें सच्ची इच्छा के रहते व्यस्त समझे जाने वाले व्यक्ति भी पालन न कर सकें। समझे जाने योग्य तयि यह है कि इन अनुशासनों का इन दिनों अभ्यास करने के उपरान्त जीवन दर्शन में स्थायी रूप से सम्मिलित करने की जो प्रेरणा है उसी को अपनाने पर प्रगति एवं सिऋि का समस्त आधार केन्द्रीभूत हैं।
साधना पर्व पर विश्ष रूप से प्रयुक्त करने और अनुबन्ध से अपनी जीवनचर्या को जोड़े रहने का वास्तविक उद्देश्य यह है कि थोड़े दिन बन्धन में बँधकर की गई साधना पीछे सामान्य दिनचर्या में उतरे और स्वभाव व्यवहार का अंग बनकर रहें। पूजा अर्चा की उपासना और उसके साथ सम्मिलित रहने वाले आदर्शवादी अनुबन्धों को साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म इन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाम मार्गी साधक अभीष्ट मन्त्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते रहते हैं।
साधना की सिद्धि इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि उसे कितनी गहन निष्ठा के साथ अपनाया गया। यों जब तब, ज्यों-त्यों करके कुछ न कुछ भजन-पूजन करते रहने में भी हर्ज नहीं, उतने से भी रुचि बदलती है और प्रवाह बनता है, पर इस तथ्य को भुलाया नहीं जाना चाहिए कि वाण की बेधक शक्ति इस बातपर निर्भर रहती हैं कि धनुष्य की प्रत्यंचा को कितना खींचा जा सका और लक्ष्य बेध में कितने एकाग्र मनोयोग का उपयोग किया गया। आत्मिक सफलताओं का रहस्य एक ही है कि ‘निष्ठा’ का महत्व कितना समझा गया और उसे कितनी गम्भीरतापूर्वक अपनाया गया। कर्मकाण्ड तो उपचार भर है। चमत्कार तो निष्ठा की प्रखरता एवंपरिपक्वता ही दिखाती है।
साधना में निरत प्रज्ञापुत्रों में से प्रत्येक को जन संपर्क के लिए समयदान करने के निमित्त अनुरोध आग्रह किया गया है। यह जन संपर्क युगान्तरीय चेतना से जन जन को परिचित एवं प्रभावित करने के लिए हैं
साधना प्रखरता बनाने के लिए अनिवार्य समझा जाना चाहिए। निष्ठा का जितना ही समावेश हो सकेगा, नैष्ठिक उपासकों द्वारा चलायें जाने वाले युग सन्धि महापुरश्चरण के सत्परिणाम उसी अनुपात में फलित होंगे।
साधना अवधि में प्रयुक्त करने के बहाने अभ्यास में उतारा जाए और उसका निर्वाह भविष्य में भी यथासम्भव करते रहा जाए। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की अध्यात्म मान्यता का प्राणि वध से उपलब्ध साधनों का उपयोग करने से बढ़ती नहीं वरन् घटती और बुझती ही चली जाती हैं। अस्तु नवरात्रि में चर्मत्याग की लकीर पीट लेने से ही नहीं प्राणियों के प्रति करुणा बरतने, यहाँ तक कि अत्यधिक भार से लदे घायल पशुओं के श्रम का उपयोग करते समय भी उसी करुणा को अपना कर कुछ निर्णय करना होगा। प्रकारान्तर से नवरात्रि में चर्मत्या के पीछे अहिसाँ वृत्ति के विकास का तत्वज्ञान जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए।
साधना करने के रूप में चलता रह सकता है।
साधना का व्रत लेते ही इसी जीवन में देवत्व का सहज प्रकटीकरण होने लगता है। अलग-अलग सद्गुणों के लिए अलग-अलग उपाय अपनाने की आवश्यकता नहीं। सत्प्रवृत्ति संवर्धन की सेवा साधना अपने आप में परिपूर्ण योग साधना एवं तपश्चर्या हैं। उस मार्ग पर कदम बढ़ाते ही मील के पत्थरों की तरह वे देवी अनुग्रह मिलते चले जाते हैं। जिनके सहारे विभूतियों एवं समृद्धियों की अपेक्षा की जाती हैं।
साधना मेकं अधिक और पूजा अर्चा में कम लगता रहा होगा।
साधना के रूप में वर्ष की दोनों नवरात्रियों में उन्हें 24 हजार के गायत्री अनुष्ठान भी करने होते हैं। उस समय वे नहीं कर सकते तो आगे पीछे हटकर भी उसकी पूर्ति करनी होती हैं। यह अनिवार्यता इस लिए रखी गई है कि इन नौ दिनों के साधना सत्रों में वे सभी प्रयोजन पूरे होते हैं जो जन मानस के परिष्कार एवं सत्प्रंवृति सम्वर्धन की उभयपक्षीय युग चेतना के अग्रगणी बनाने के लिए नितान्त आवश्यक हैं।
साधना का सज्जनता और उदारता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। उपासनात्मक उपचारों में दान-पुण्य की प्रक्रिया इसीलिए सम्मिलित रखी गई है कि दोनों के मिलने से ज्ञान और कर्म का-भावना और तत्परता का समावेश रहने से अभीष्ट परिणाम उपलब्ध हो सकें।
साधना प्रयोजनों के लिए यह समय विशेष रूप से उपयुक्त माना गया है। जिस प्रकार प्रभात काल की उपासना अधिक फलवती होती और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों सन्ध्याओं के समतुल्य माना गया है।
साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीमा को जन्म देने और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने में आधारभूत कारण बना था।
साधना के अतिरिक्त सामान्य जनों को गायत्री उपासना में प्रवृत्त कने का उत्तरदायित्व भी युग साधकों को सौंपा गया है। सामान्य उपासक एकदम तो युग पुरश्चरण जैसी निष्ठ प्रधान साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता है। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हें वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
साधना प्रक्रिया तक सीमित रहने की बात है। बीजारोपण वर्ष के उपयुक्त युग साधकों जैसी मनःस्थिति जिन साधकों की बन रही है वे इस पर्व बेला को ऐतिहासिक बनाने की अपनी योजना बना रहे हैं। आत्म सत्ता में देवत्व का आवेश भर देने ओर संपर्क क्षेत्र को आलोकमय बनाने की उमंग जिस प्रकार समुद्री तूफान की तरह उभर रही हैं उसे देखते हुए लगता है महाकाल का प्रेरणा प्रवाह युग परिवर्तन की परिस्थितियं उत्पन्न करके ही रहेगा।
साधना पीछे सामान्य दिनचर्या में उतरे और स्वभाव व्यवहार का अंग बनकर रहें। पूजा अर्चा की उपासना और उसके साथ सम्मिलित रहने वाले आदर्शवादी अनुबन्धों को साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधना बन गयी है। जागृतों को दूसरों को जगाने का ठीक यही समय है। इन दिनों नव जागरण के अग्रदूत बनकर बादलों की तरह हर खेत पर बरसने के लिए निकल पड़ने की आवश्यकता है। पवन जन-जन तक पहुँचता और प्रत्येक को प्रचुर परिणाम में जीवन तत्व प्रदान करता है। पवन पुत्र की तरह प्रज्ञापुत्र का भी कर्तव्य है कि ‘राम काज कीन्हे बिना” विश्राम ने लेने का निश्चय करें और देवर्षि नारद की तरह जन-जन से संपर्क साधने और युग प्रयोजन से परिचित सहमत करने के लिए अथक परिश्रम करता रहे।
साधनाएं करने के लिए आरण्यकों का आश्रय लेना पड़ता है। किन्तु साथ ही वानप्रस्थों के लिए आवश्यक परिवाज्रक प्रक्रिया अपना कर लोकमंगल में भी निरत रहना पड़ता है। जो मात्र जप आदि के उपचारों को ही पर्याप्त मानकर पूजा-पाठ भर में अपने को केन्द्रित कर लेते हैं, जन कल्याण में श्रम, समय लगाने की आवश्यकता नहीं समझते वे न तो भक्ति का तत्वज्ञान समझते हैं और न भगवान की प्रकृति प्रसन्नता को। ऋषि परम्परा में भजन का जितना स्थान है उससे कहीं अधिक लोकव्यवस्था को सुनियोजित रखने के लिए अधिक परिश्रम करने का। व्यास जैसे साहित्यकार, नागार्जुन जैसे रसायन शास्त्री चरक सुश्रुत जैसे चिकित्सक, वशिष्ठ और चाणक्य जैसे राज निर्देशक लोक मंगल में निरत देखे जा सकते हैं।
साधना सत्रों के रूप में विकसित और व्यापक बना सकने में अनुत्साह के अतिरिक्त और कोई भी कठिनाई नहीं हैं जो हँसते-हँसातें हल न की जा सकं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-March
साधना के उपयुक्त मनोभूमि का निर्माण होता है कहना न होगा कि ऐसी स्थिति का अभ्यास कर लेने का प्रथम चरण पूरा कर लिया उनके ध्यान की सफलता एक प्रकार से सुनिश्चित ही हो जाती है।
साधना का प्राण बताते रहें है। देव सत्ता के अनुग्रह में-प्रत्यक्षीकरण में-श्रद्धा तत्त्व को ही आधार कहा जाता रहा है। यह प्रतिपादन अक्षरशः सत्य है। कष्ट साध्य कर्मकाण्डों में उलझे रहने पर भी अश्रद्धालु व्यक्ति प्रायः खाली हाथ ही रहते हैं। दैवी शक्ति तो अन्तः करण में अवतरित होती है और वहीं से सिद्धि सफलताओं के रूप में बहिरंग जीवन में प्रस्फुटित होती है।
साधना विधानों के लिए किया गया भारी प्रयास पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए प्रयत्नशील पथिकों को सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनाव रहित और मस्तिष्क को उत्तेजना रहित रखा जाय। ताकि उस पर दिव्य चेतना का अवतरण निर्बाध गति से होता रह सकें।
साधनाएँ की जाती है।
साधना के लिये-ब्रह्म सम्बन्ध के लिये सर्वथा अनुपयुक्त है।
साधनाएँ करने, कापालिक के मृतकों की खोपड़ी को साफ करने, उससे जल पीने जैसी अघोर क्रियाओं के पीछे मृतकों की अवशिष्ट वलय ऊर्जा का उपयोग करने का सिद्धान्त ही कार्यान्वित होता है। उपयोग करते हैं वरन् किन्हीं अन्यों के शरीरों में ऊर्जा का दोहन भी करते हैं। पशुबलि जैसे घृणित कर्म इसी स्तर का लाभ उठाने के लिए किये जाते हैं।
साधना उपचार के द्वारा किस प्रकार उपलब्ध किया जाय और उससे किस प्रकार देवोपम विभूतियों से लाभान्वित हुआ जाय।
साधना-शब्दब्रह्म का अभ्यास वस्तुतः एक साधना है जिसका अवलम्ब लेकर मनुष्य अपने भीतर के ‘सुन्दर’ को ही नहीं ‘शिव’ और ‘सत्य’ को भी उल्लसित कर सकता है और उस आन्तरिक तृष्णा की तृप्ति कर सकता है जिसकी लालसा उसे विविध विविध कामनाएँ और प्रवृत्तियाँ अपनानी पड़ती है। ‘संगीत’ के योगसूत्र में यही स्पष्ट किया गाय है। कि योग साधना के अनेक प्रकारों में नादयोग की स्वर साधना का भी महत्त्व पूर्ण स्थान है।
साधना का भी महत्त्व पूर्ण स्थान है।
साधना एवं परमार्थ प्रयोजन की गति-विधियों में इस तथ्य को गतिशील रहता देख जा सकता है। भावनाशील व्यक्ति स्वार्थ भरी संकीर्णता की सड़न में कृमिकीटों की तरह संतुष्ट रह ही नहीं सकता। उस उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले पक्षी की तरह अपना हर क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत दीखता है। विश्व मानव की समस्याएँ होती है। विश्व कल्याण में उसे अपना निज का स्वार्थ दिखाई पड़ता है।
साधना द्वारा भीतर भरे शक्ति स्रोत को उभारा जाता है और निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अनन्त सामर्थ्य को अपने भीतर धारण किया जाता है। यह धारणा ही वह पात्रता है जिसके आधार पर दिव्य शक्तियों का साधक में अवतरण होता है। जब अपने अणु अस्तित्व को विराट् के विभु में समर्पित कर दिया जाय। यह समर्पण जितना यथार्थ और जितना प्रगाढ़ होता है। उसी अनु-पात से सफलता का पथ प्रशस्त होता चला जाता है।
साधना को आधार बताया जाता रहा है। कृष्ण और रुक्मिणी द्वारा बद्रीनाथ धाम में बारह वर्ष तक तक तप करने की तपश्चर्या इसी उद्देश्य से की गई थी और उन्हें मनोवाँछित सन्तान प्रद्युम्न के रूप में प्राप्त हुई।
साधनाओं में अत्यन्त बाधक होती है। उनके कारण महत्त्वपूर्ण साधना विधानों के लिए किया गया भारी प्रयास पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए प्रयत्नशील पथिकों को सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनाव रहित और मस्तिष्क को उत्तेजना रहित रखा जाय। ताकि उस पर दिव्य चेतना का अवतरण निर्बाध गति से होता रह सकें।
साधना का तात्पर्य ही अहंता का विसर्जन है। पारमार्थिक दृष्टिकोण अपनाये बिना न जीवन लक्ष्य पूरा होता है और न कुण्डलिनी जागरण जैसी योग साधनाओं में सफलता मिलती है।
साधना की सफलता के लिए गंगा तट का निवास-गंगाजल पान, गंगाजल स्नान अमोघ आधार है। जिनके लिए जितने समय तक इस प्रकार का लाभ उठा सकना संभव हो उन्हें उसके लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
साधना जब आरम्भ होती है तो काय कलेवर के रोम-रोम में विद्यमान् परमेश्वर पुलकित हो उठता है और आरोग्य का उपहार तत्काल देना आरम्भ कर देता है।
साधना क्षेत्र में पृथ्वी और सूर्य का संयोग कहते हैं। कुण्डलिनी साधना इसी केन्द्र बिन्दु पर पहुँचने की चेष्टा को कह सकते हैं।
साधना कुण्डलिनी योग द्वारा करते तो है पर यह भूल जाते हैं कि अपनी सत्ता में दिव्य चेतना भी उसी मार्ग पर चलते हुए प्रखर बनानी होगी जिस पर चलते हुए एक तुच्छ सा अग्नि पिण्ड सविता के रूप में विकसित हुआ है।
साधना का जो उपयोगी एवं आकर्षक सतोगुणी कलेवर खड़ा किया गया है उसकी कुछ आवश्यकता ही न रहती। सब कुछ, नीरस हो जाता है, यहाँ जो कौतुक दीख रहा है, बहुरंगी, कटु मधुर अभिव्यंजनाएँ सामने आ रहीं है उनमें कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर न होता। इन परिस्थितियों में से और कुछ लाभ भले ही होता मनुष्य की वह चेतनात्मक प्रतिभा कुण्ठित ही रह जाती जिसके कारण प्रगति पथ पर इतना आगे तक चल सकना सम्भव हो सका है।
साधना विज्ञान का प्रयोजन यही है कि मनुष्य की उस विशेषता को बलिष्ठ बनाया जाय तो प्रकृति गत प्रतिकूलताओं में उपयोगी एवं अनुकूल तत्त्वों को खींचकर अपनी आन्तरिक क्षमता बढ़ा सके और उसके आधार पर जीवन के हर क्षेत्र में सुसम्पन्न रह सके।
साधना का उद्देश्य आत्म क्षेत्र में अदृश्य लोकों से अवतरित होते रहने वाले शक्ति प्रवाह की अभीष्ट मात्रा को आकर्षित एवं धारण करना है। यह दिव्य अवतरण ऊर्जा के अतिरिक्त ध्वनि रूप में भी होता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में ऊर्जा को ध्यानयोग द्वारा और ध्वनि को नादयोग द्वारा आकर्षित नियन्त्रित किया जाता है। ध्रुवीय मेरुप्रभा का भौतिक विज्ञानों ने केवल स्वरूप और प्रभाव ही जाना है वे अभी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके उन प्रचण्ड शक्ति धाराओं के प्रवाह भी आवश्यक हेर फेर कैसे किया जा सकता हैं, पर योग विज्ञानी जानते हैं, कि मानवी काया से धरती पर दिव्य लोकों से , दिव्य शक्तियों से जो प्राप्त हो सकता है और उस साधना उपचार के द्वारा किस प्रकार उपलब्ध किया जाय और उससे किस प्रकार देवोपम विभूतियों से लाभान्वित हुआ जाय।
साधना यह है कि मस्तिष्कीय गति विधियों पर-विचार धाराओं पर विवेक का आधिपत्य स्थापित किया जाय। चाहे जो कुछ सोचने की छूट न हो। चाहे जिस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया अपनाने न दी जाय। औचित्य-केवल औचित्य-मात्र औचित्य-ही चिन्तन का आधार हो सकता है, यह निर्देश मस्तिष्क को लाख बार समझाया जाय और उसे सहमत अथवा बाध्य किया जाय कि इसके अतिरिक्त उसे और किसी अनुपयुक्त प्रवाह में बह चलने की छूट न मिल सकेगी।
साधनाओं के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, पर यदि कोई चाहे कि इस स्थिति में प्रत्याहार , धारणा, ध्यान समाधि जैसे लययोग परक, अभ्यास कर सके तो उसे असफलता ही मिलेगी। इस सन्दर्भ में बहुधा खेचरी मुद्रा, नासिका पर दृष्टि जमाना, उड्डयन बन्ध जालन्धर बन्ध, यहाँ तक कि मन्त्रोच्चारण के साथ किया गया माला जप भी व्यतिरेक उत्पन्न करता है। इस विधि विधानों के साथ ध्यान नहीं हो सकता, क्योंकि चित्त वृत्तियाँ इन शरीरगत हलचलों में लगी रहती हैं- एकाग्रता हो तो कैसे हो।
साधनाओं में सफलता मिलती है।
साधना पूँजी से सुसम्पन्न व्यक्ति यदि ब्रह्मचर्य पालन की तरह ही सुसन्तति उत्पादन का प्रयोजन सामने रखें तो निस्सन्देह ऋषि परम्परा की पीढ़ियों का सृजन हो सकता है और आनुवांशिकी विज्ञान जिस महामानव के आदि पूर्वज को विनिर्मित करने में संलग्न है उसका प्रयोजन पूरा किया जा सकता है। अध्यात्म और विज्ञान के सहयोग समन्वय से यह युगान्तर-कारी प्रयोग और भी अधिक सफलता एवं शीघ्रता से सम्पन्न हो सकता है।
साधना के अनेक प्रकारों में नादयोग की स्वर साधना का भी महत्त्व पूर्ण स्थान है।
साधना द्वारा उपार्जित आत्मबल का सम्पादन नितान्त आवश्यक है। हम चाहें तो शरीर बुद्धि और धन जैसी सम्पदाओं की तरह आत्म शक्ति की विभूतियों भी सम्पादित कर सकते हैं और इसके आधार पर हमारा मानवी चुम्बकत्व-तेजोवलय-इतना प्रचण्ड हो कसता है कि व्यक्तियों तथा वस्तुओं को अभीष्ट मात्रा में प्रभावित किया जा सके और अपने आपको हर क्षेत्र में समर्थ सफल सिद्ध किया जा सके।
साधना जुड़ जाती है। उन्हें अलग से कुछ बहुत बड़े कर्मकाण्ड नहीं करने पड़ते।
साधनायें की जाती है। कर्मयोग का मूल प्रयोजन यही है कि शरीर को उच्छृंखल क्रिया कृत्य न करने दिये जाये, उसे औचित्य की मर्यादा में रहने के लिए ही अभ्यस्त और विवश किया जाय।
साधना और प्रतीक्षा करनी पड़ती है। गाय के पेट में घास जाकर दूध में बदलती है इसे कौन नहीं जानता पर यह लाभ धैर्य पूर्वक ही उठाया जा सकता है। कोल्हू से तेल निकलने की तरह गाय को एक और घास खिलाने और दूसरी और दूध पाने की आशा की जाय तो सफलता न मिलेगी ठीक इसी प्रकार कर्म को फल के रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया कुछ समय चाहती है।
साधना का तात्त्विक आधार। इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए विविध-विधि योग साधनाएँ की जाती है।
साधना, तपस्या, देव अनुग्रह, वरदान, स्वर्ग मुक्ति आदि आत्मिक उत्पादनों के पीछे जो तथ्य काम करता है उस श्रद्धा का परिपाक ही समझा जाना चाहिए। यदि श्रद्धा न हो तो यह समस्त क्रिया-कलाप मात्र कर्म-काण्ड बनकर ही रह जायेंगे और उनका परिणाम नगण्य जितना ही दिखाई देगा।
साधना का सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी। पृथ्वी अर्थात् भौतिक सम्पदा-अहंता-सूर्य अर्थात् आत्मिक सत्ता-ब्रह्म चेतना इन दोनों को जो जितना जोड़ सकता है उसे कुण्डलिनी जागरण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ मिलती है। स्वार्थ को परमार्थ में जोड़ने का शारीरिक वासनाओं को आत्मिक उल्लासों में घुला देने का नाम ही आत्म समर्पण है।
साधनायें इसी स्तर की होती हैं, उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी महत्त्व करना होता है। तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निश्चेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है। माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान को जितना अधिक तनाव रहित शान्त रखा जा सके उतना ही लाभ मिलता है।
साधना से अपने को हीरे की तरह बहुमूल्य बनाया जहाँ रहे वहाँ का यश गौरव बढ़ाया। अपनी पसंदगी की ऐसी ही कोई स्थिति लोग जान अनजान में स्वयं ही चुनते हैं। तद्नुरूप वैसे ही उठते गिरते हैं।
साधना तो दूर कला भी न रही और कुत्साओं के हाथ का खिलौना बनकर व्यसनी और व्यभिचारियों की तुष्टि-पुष्टि के काम आने वाली एक नशा भर बनकर रह गया। सामंतों और अमीरों की पशु प्रवृत्ति को अधिकाधिक उत्तेजित करने और उनके ‘पशु’ को अधिकाधिक उग्र बनाने भर के लिए जब उसने अपनी आत्मा को बेच दिया तो उस तत्त्वदर्शी की आत्मा बिलख-बिलख कर रोई होगी जिसने स्वर विज्ञान द्वारा नर को नारायण बनाने के सपने देखे होगे
साधना अब कला भी नहीं रही, वह नटनी, नर्तकी, गायकी वेश्या हरजाई है। उसका तन अब हर कोठे पर किसी भी कोढ़ी के आगे प्रमाणित होने के लिए सजा बैठा है। सन्त परम्परा-सामंतों के आश्रय में विकृत हुई तो अब हर कुत्साएं भड़काने वाली विडम्बना मात्र रह गई हैं। धन, वैभव तो वेश्याएँ भी कमाती हैं, तालियाँ बजने और वाहवाही सुनने का लाभ तो नग्निकाओं और विष कन्याओं को भी मिल जाता है ऐसी ही प्रशंसा यदि आधुनिक गीत वाद्य की कला को मिले तो उसे नियति का क्रूर व्यंग ही समझा जाना चाहिए। संगीत में सम्मोहन है।
साधना क्रम व्यावहारिक जीवन में उतारने से ही जीवन लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हुआ जा सकता है।
साधना है जिसका अवलम्ब लेकर मनुष्य अपने भीतर के ‘सुन्दर’ को ही नहीं ‘शिव’ और ‘सत्य’ को भी उल्लसित कर सकता है और उस आन्तरिक तृष्णा की तृप्ति कर सकता है जिसकी लालसा उसे विविध विविध कामनाएँ और प्रवृत्तियाँ अपनानी पड़ती है। ‘संगीत’ के योगसूत्र में यही स्पष्ट किया गाय है। कि योग साधना के अनेक प्रकारों में नादयोग की स्वर साधना का भी महत्त्व पूर्ण स्थान है।
साधना के अंतर्गत आता है लोग इसी के लिए कथा, प्रवचन सुनते हैं। ग्रन्थ पाठ भी उसी पुण्य प्रयोजन के लिए किये जाते हैं पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब निर्देश संकेत मात्र हैं- आधार नहीं। मस्तिष्क पर नियन्त्रण प्राप्त करने के लिए किस स्तर की चिन्तन प्रक्रिया हो इसके लिए अवतारों के, ऋषियों के-महामानवों के चरित्रों, एवं निर्देशों का श्रवण स्वाध्याय करके हम अपनी मनः स्थिति सही करें-विचारणाओं में परिष्कृत तत्त्वों का समावेश करें इतना भर उद्देश्य इस सारे ज्ञानयोग कलेवर का है। उसका सार-तत्त्व व्यवहार में आया कि नहीं इसकी परख इस कसौटी पर होती है कि सूक्ष्म दृष्टि से अपनी मानसिक हलचलों का बारीकी से अध्ययन-उनके औचित्य का वर्गीकरण-अवांछनीय प्रवाह का दमन और दिव्य चिन्तन को प्रोत्साहन कितनी गहराई के साथ किया जा रहा है।
साधना प्रयास में केवल आदत डालने नियमितता अपनाने एवं रुचि उत्पन्न करने जितना ही लक्ष्य रहता है इसलिए उपासना में मनोरंजक-चित्त को एक नियत विधि व्यवस्था में लगाये रहने वाली विधियाँ उपयुक्त रहती है। शंकर जी पर बेलपत्र चढ़ाना परि-क्रम करना, धूप, दीप आदि से देव प्रतिमा का पंचोपचार पूजन’ स्तवन, पाठ, जप आदि शारीरिक हलचलों के साथ की जाने वाली साधनायें इसी स्तर की होती हैं, उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी महत्त्व करना होता है। तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निश्चेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है। माँस पेशियों और नाड़ी संस्थान को जितना अधिक तनाव रहित शान्त रखा जा सके उतना ही लाभ मिलता है।
साधना का निर्धारण किया उसे अपना इस कर्मयोग का प्रतिफल सुदृढ़ आरोग्य और दीर्घ जीवन के रूप में मिलता ही रहेगा। शरीर के अनैतिक, अवांछनीय, असामाजिक, गर्हित कर्म न करने दिये जायें कुसंस्कार और गर्हित अभ्यास तथा दुष्ट दृष्टिकोण यदि कुकर्म करने के लिए प्रेरित करें तो उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया जाय। इसके लिए उपयुक्त साहस उत्पन्न करने के लिए व्रत, उपवास, अस्वाद, भूमि शयन, रात्रि जागरण, तप, तितीक्षा, पदयात्रा, मौन धारण, ब्रह्मचर्य, शीतोष्ण सहन जैसी धार्मिक साधनायें की जाती है। कर्मयोग का मूल प्रयोजन यही है कि शरीर को उच्छृंखल क्रिया कृत्य न करने दिये जाये, उसे औचित्य की मर्यादा में रहने के लिए ही अभ्यस्त और विवश किया जाय।
साधनायें सफल हो सकें।
साधनात्मक कर्म-काण्ड के आधार पर अभ्यासी लोग इन दोनों को जोड़ने के लिए प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा, ध्यान समाधि का षट्चक्र वेधन का हठयोग का मन्त्र साधना का सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी। पृथ्वी अर्थात् भौतिक सम्पदा-अहंता-सूर्य अर्थात् आत्मिक सत्ता-ब्रह्म चेतना इन दोनों को जो जितना जोड़ सकता है उसे कुण्डलिनी जागरण के साथ जुड़ी हुई विभूतियाँ मिलती है। स्वार्थ को परमार्थ में जोड़ने का शारीरिक वासनाओं को आत्मिक उल्लासों में घुला देने का नाम ही आत्म समर्पण है।
साधना माना जाता है। पृथ्वी मूलाधार स्थित शरीरगत शक्ति-सूर्य ब्रह्म रंध्र स्थित सहस्र दल कमल-इन दोनों के परस्पर सुयोग संयोग का नाम ही कुण्डलिनी जागरण है। साधनात्मक कर्म-काण्ड के आधार पर अभ्यासी लोग इन दोनों को जोड़ने के लिए प्राणायाम, प्रत्याहार , धारणा, ध्यान समाधि का षट्चक्र वेधन का हठयोग का मन्त्र साधना का सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी।
साधना इसी केन्द्र बिन्दु पर पहुँचने की चेष्टा को कह सकते हैं।
साधना से पति-पत्नी के शरीरों में विद्यमान् गुण सूत्र परिष्कृत किये जा सकते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही विकृतियों का निराकरण किया जा सकता है और साधना पूँजी से सुसम्पन्न व्यक्ति यदि ब्रह्मचर्य पालन की तरह ही सुसन्तति उत्पादन का प्रयोजन सामने रखें तो निस्सन्देह ऋषि परम्परा की पीढ़ियों का सृजन हो सकता है और आनुवांशिकी विज्ञान जिस महामानव के आदि पूर्वज को विनिर्मित करने में संलग्न है उसका प्रयोजन पूरा किया जा सकता है। अध्यात्म और विज्ञान के सहयोग समन्वय से यह युगान्तर-कारी प्रयोग और भी अधिक सफलता एवं शीघ्रता से सम्पन्न हो सकता है।
साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक-निष्प्राण मूर्छित, निद्रित, निश्चेष्ट स्थिति में किसी आराम कुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानो शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती और तनाव दूर करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-April
साधना मानव कल्याण के विविध पक्षों में अभिनव उपलब्धियों का प्रयोग कर सके। आज संकीर्णता वादी राज सत्ताओं ने विज्ञान को-वैज्ञानिकों को अपने फौलादी पंजों में जकड़ रखा है और उससे करने न करने योग्य कार्य करा रहे है। । कल ऐसा न हो सकेगा। विज्ञान को भी मुक्ति मिलेगी और वह युगान्तर कारी भूमिकाएँ सम्पन्न करेगा।
साधना से प्रसन्न होकर शंकर भगवान प्रकट हुए और वरदान माँगने के लिए कहा।
साधना सर्वदा अभीष्ट फल प्रदान नहीं कर सकती। एक ही देवता ऐसा है जिसकी साधना का सत्परिणाम असंदिग्ध रूप से प्राप्त होता है ऐसा शक्तिशाली महादेव है-आत्मदेव अब तक किसी को भी यह परिवाद नहीं करना पड़ा कि आत्मदेव की पूजा अर्चना से किया गया श्रम निरर्थक चला गया अथवा उसके दरबार से खाली हाथ लौटना पड़ा।
साधना का निर्देश दिया था। तदनुसार एशिया भर में बौद्ध धर्म तेजी से फला और प्रगति के विविध विधि प्रयास वहाँ पाये। यह प्रवासी भारतीय और उनके वंशज एवं अनुयायी एशिया में बहुलता पूर्वक और संसार भर में न्यूनाधिक रूप में फैले हुए हैं। दुर्भाग्य इतना ही हुआ कि भारत के और उनके बीच का संबंध एक प्रकार से टूटता चला गया और एक महत्त्वपूर्ण कड़ी नष्ट हो गई। अन्यथा हिन्दू धर्म उस संस्कृति की पताका विश्व भर में फहरा रही होती आज तो बौद्ध धर्म अपने आपको हिन्दू धर्म का अविच्छिन्न अंग मानने तक को तैयार नहीं।
साधना का सत्परिणाम असंदिग्ध रूप से प्राप्त होता है ऐसा शक्तिशाली महादेव है-आत्मदेव अब तक किसी को भी यह परिवाद नहीं करना पड़ा कि आत्मदेव की पूजा अर्चना से किया गया श्रम निरर्थक चला गया अथवा उसके दरबार से खाली हाथ लौटना पड़ा।
साधना करने वाले ही अभीप्सित मनोरथ पूर्ण कर सकने का वरदान प्राप्त करते हैं इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही श्रेयस्कर है।
साधना का प्रधान क्रिया कृत्य है।
साधना तथा सिद्धि की प्रखरता के आधार पर तानसेन को परास्त कर प्रतिशोध लेने का विचार किया। वीणा और वाद्य यन्त्र लेकर देवी सरस्वती के सम्मुख बैठा बैजू अहर्निश संगीत साधना में लगा रहने लगा।
साधना में लगा रहने लगा।
साधना का निश्चय किया और अपनी साधना तथा सिद्धि की प्रखरता के आधार पर तानसेन को परास्त कर प्रतिशोध लेने का विचार किया। वीणा और वाद्य यन्त्र लेकर देवी सरस्वती के सम्मुख बैठा बैजू अहर्निश संगीत साधना में लगा रहने लगा।
साधना को भी चिकित्सा एवं मानसोपचार की तरह ही सर्वोपयोगी मान कर उन्हें विधिवत् उपयोग में लाने की आवश्यकता स्वीकार की जायेगी।
साधना का लाभ असंख्यों को पहुँचाने में सफल हो ही सकता है।
साधना में कुण्डलिनी जागरण विद्या की सर्प सर्पिणी संयोग के रूप में चर्चा की जाती है। इस प्रकार के वर्णन यह बताते हैं कि सर्प की अपनी कुछ भली बुरी विशेषताएँ उच्च स्तर की हैं और ऐसी हैं जिन पर गम्भीरता पूर्वक चिन्तन करके जीवनोपयोगी तथ्य हस्तगत किये जाने चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-May
साधना में अनन्त के साथ सम्बन्ध जोड़ा और और अदृश्य अनुदानों को लक्ष्य बनाया जाता है। प्रत्यक्ष अनुदानों की तुलना में परोक्ष वरदान कितने अधिक समर्थ होते हैं इसे सभी जानते है।
साधना भी। दोनों की सचाई और गहराई उनके प्रखर जीवनदर्शन में प्रकट परिलक्षित होती थी, वे निर्वाह भी करते थे, कुटुम्ब भी सम्भालते थे साथ ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए इतना कुछ करते थे, जिसके सहारे उन का व्यक्तित्व देवोपम स्तर की भूमिकाएँ निभाने में सफल रह सके।
साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासक होने पर देश भर में एक लाख नैष्ठिक उपासक होते हैं। इनके द्वारा हर प्रान्त में 24 करोड़ जप होने का उपक्रम चलेगा और कुछ मिलाकर 240 करोड़ जप नित्य पूरा होता रहेगा। यह संकल्प प्रस्तुत गायत्री जयन्ती 13 जून 90 से आरम्भ होकर आगामी बोस वर्ष तक चलेगा। युग सन्धि की यही मध्य बेला है।
साधना का पथ प्रशस्त करती है। अर्थात् व्यक्तित्व सम्पन्न बनने का मनोविज्ञान और क्रियापरक आधार खड़ा करती है। यह प्रगति जिस स्तर की होती है। उसी अनुपात से परिष्कृत पुरुषार्थ निखरता है। यही है साधना से सिद्धि की सीधी सादी, सरल एवं सुनिश्चित प्रक्रिया साधक की यथार्थता और सफलता उसकी व्यक्तित्व सम्पन्नता के आधार पर ही आँकी जाती है।
साधना की सिद्धि आदि नामों से अतंकारिक वर्णन किया जाता है।
साधनायें उसी एक प्रयोजन की पूर्ति के लिए की जाती थी। व्रत, संयम, तप, दान आदि के धर्मानुष्ठानों से संचित संस्कारों का निराकरण और उत्कृष्ठानो से संचित संस्कारों का निराकरण और उत्कृष्टता का उच्चस्तरीय अवधारण ही लक्ष्य था। सत्संगों में यही कहा और स्वाध्याय में यही पढ़ा जाता था। कि अभ्यस्त पशु-वृत्तियों को निरस्त करने के लिए अनवरत अभ्यास किया जाय साथ ही ऐसा क्रिया कलाप अपनाया जाय, जिससे आदर्शवादिता समझने समझाने तक सीमित न हरे, वरन व्यक्तित्व का अविच्छिन्न अंग बन सके। ईश्वर भक्ति से लेकर योगाभ्यास और तप-साधना के पीछे इसी एक लक्ष्य की पूर्ति का उद्देश्य सन्निहित है।
साधना से सिद्धि की सीधी सादी, सरल एवं सुनिश्चित प्रक्रिया साधक की यथार्थता और सफलता उसकी व्यक्तित्व सम्पन्नता के आधार पर ही आँकी जाती है।
साधना के पीछे इसी एक लक्ष्य की पूर्ति का उद्देश्य सन्निहित है। चिंतन और मनन का महात्म्य इसीलिए बनाया गया है कि उससे आत्म सुधार और आत्म निर्माण के दोनों पक्ष पूरे होते है स्वाध्याय ओर सत्संग की महिमा भी इसी आधार पर इतने विस्तार से बखानी गई है।
साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।
साधना के क्षेत्र में गहरा उतरता जाता है उसे एक से एक रहस्यमय गुत्थियों का पता लगता है और अनुभव होता है कि प्रत्यक्षतः जगत जैसा प्रतीत होता है, वैसा तो वास्तव में कुछ भी नहीं है बल्कि सब कुछ रहस्यपूर्ण है। यह बात और है कि भीड़ की सम्भावनाओं के समान पदार्थ के स्थूल नियमों का पता लगाकर विज्ञान उससे रुत्किचिंत लाभ उठाने की स्थिति में पहुँच गया है। परन्तु सचाई कुछ और ही है इन स्थूल नियमों से लाभ उठाने के कारण यह भ्रम हो सकता है कि विज्ञान ने शायद सत्य को जान लिया हो। पर वैसा है नहीं। मोटी बातें जो दिखाई देती है उनका थोड़ा-सा परिचय भी पर्याप्त लाभ दे सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी वास्तविकता जान ली गई।
साधना की आस्था एवं प्रेरणा उभारने के निमित्त हुआ है। भगवान खुशामद और रिश्वत की पकड़ से बहुत ऊँचा है। उपासना तो उत्कृष्टता के रूप में विद्यमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रम ग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित्त जीवन साधना करने की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्मकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। इसी स्तर के नैष्ठिक साधकों की युग साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।
साधना के चमत्कारों की आधारशिला तो उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श चरित्र पर ही रखी गई है। ब्राह्मणत्व में उज्ज्वल चरित्र और साधुता में परमार्थ परायणता की अवधारणा है। जो व्यक्तित्व को जितना परिष्कृत करता जायेगा उसके नगण्य से पूजा उपचार, भी आर्श्चयजनक चमत्कारों का आधार बनते जायेंगे। उत्कृष्ट जीवन ही ईश्वरीय अनुदानों का ऋद्धि-सिद्धियों का आधारभूत कारण है, उसे जितना ज्यादा समझा जा सके उतना ही उत्तम है।
साधना रत बनाये रहना। इन नियमों का पालन करने वाले ही नैष्ठिक माने जायेंगे ऐसी साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। इसी स्तर के नैष्ठिक साधकों की युग साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है।
साधना में प्रवृत्त किया जायेगा जिसमें भूत कालीन प्रचलनों को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न प्रमुख है स्पष्ट है कि साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा का चतुर्विध उपचार ही व्यक्तित्व निर्माण का, आत्मविकास का, ईश्वर प्राप्ति का सुनिश्चित आधार है, इससे कम से वास्तविक आत्मोत्कर्ष सम्भव नहीं, इस प्रक्रिया को अपनाने के उपरान्त और कुछ अधिक खोजने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
साधना तक उपचार तो शरीर और साधनों के सहारे ही किये जाते है किन्तु साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाता है कि जो मिलना है वह अन्तरिक्ष से बरसेगा और धरती पर उगेगा। दैवी अनुग्रह, साधना की सिद्धि, ईश्वरीय अनुकम्पा आदि के समस्त प्रतिपादन तथ्यतः अन्तरिक्ष के ही अनुदान हैं।
साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासकों द्वारा सम्पन्न होता रहेगा। देश को दस साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासक होने पर देश भर में एक लाख नैष्ठिक उपासक होते हैं। इनके द्वारा हर प्रान्त में 24 करोड़ जप होने का उपक्रम चलेगा और कुछ मिलाकर 240 करोड़ जप नित्य पूरा होता रहेगा।
साधना की सिद्धि, ईश्वरीय अनुकम्पा आदि के समस्त प्रतिपादन तथ्यतः अन्तरिक्ष के ही अनुदान हैं।
साधनात्मक उपचार ही वह तीव्र गति से चलने वाले राकेट हैं जो वस्तुओं के प्रचण्ड आकर्षण शक्ति से साधक को परे ले जाते तथा चेतना की गहराइयों में प्रविष्ट कराते हैं।
साधना में श्रद्धा रखने वालों के सर्वप्रथम दरवाजा खटखटायें नैष्ठिक उपासना की आवश्यक जानकारी देने वाली 20 पैसे वाली पुस्तिका अधिक संख्या में गायत्री तपोभूमि से मँगा लें और उसे पढ़ाने सुनाने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न से नैष्ठिक उपासकों की संख्या बढ़ने में प्रयत्न की तुलना में सफलता ही अधिक मिलेगी। अन्तरिक्ष में प्रवाहित युगान्तरीय चेतना इस सफलता में विशेष रूप से सहायक सिद्ध होगी। साथ ही छोटे प्रज्ञामन्डलों की स्थापना के लिये भी श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयास को प्रोत्साहित किया जाये, तो हर क्षेत्र में इन्हीं दिनों अनेकों प्रज्ञामन्डल बन सकेंगे और उनका अनुकरण अन्य गाँवों में भी चल पड़ेगा सभी जागृत आत्माओं से गायत्री जयन्ती तक की अवधि इस प्रयोजन के लिए समयदान करने के लिए इन पंक्तियों द्वारा विशेष अनुरोध किया जा रहा हैं।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा का चतुर्विध उपचार ही व्यक्तित्व निर्माण का, आत्मविकास का, ईश्वर प्राप्ति का सुनिश्चित आधार है, इससे कम से वास्तविक आत्मोत्कर्ष सम्भव नहीं, इस प्रक्रिया को अपनाने के उपरान्त और कुछ अधिक खोजने की आवश्यकता नहीं रह जाती।
साधना करने की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्मकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
साधना सहित। (2) गुरुवार को अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य एवं दो घण्टे का मौन। (3) महीने में एक बार अग्नि-होत्र (4) आश्विन, चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान (5) दस अन्य व्यक्तियों को साधना रत बनाये रहना। इन नियमों का पालन करने वाले ही नैष्ठिक माने जायेंगे ऐसी साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। इसी स्तर के नैष्ठिक साधकों की युग साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा।
साधना सत्र स्थगित रहेंगे उसके उपरान्त ही उन्हें आरम्भ किया जा सकेगा। अस्तु इन तीन महीनों के लिए अन्य वर्ग के शिक्षार्थी आवेदन पत्र न भेजे।
साधना की उर्वर भूमि पर ही उगता और फैलता है। इस तथ्य को जिनने भी जाना है उनने लिप्साओं पर अंकुश लगाया आर परमार्थ पथ पर चल पड़ने का साहस दिखाया है। कल्पना-जल्पना करते रहने में तो आत्म प्रवंचना ही बन पड़ती है। मन मोदक खाते रहने से पेट भरता है ?
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चार कार्यक्रमों में अपनी दिनचर्या ढ़ालनी है। विश्राम, भोजन, व्यायाम आदि नित्य कर्मों में बँटा हुआ समय इन्हीं चार कार्यक्रमों में साधक की स्थिति देखते हुए तदनुरूप विभाजित किया जायेगा। यह निर्धारण हर व्यक्ति की स्थिति का पर्यवेक्षण कराने के उपरान्त ही किया जायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1973-July
साधनाएं हर साधक के लिए उसके स्तर के अनुरूप थोड़ी हर-फेर जैसी होनी स्वाभाविक है। उनकी आरंभिक शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् परिव्राजक साधक उस विधान को स्वयमेव अग्रगामी बनाते रह सकते हैं।
साधना निरत रहते हुए- बिना ऊबे-उकताये जिन्दगी गुजार देते है। उच्च भावना और सहृदय सेवा साधना की इस कसौटी पर हमारे साधु बाबा खरे नहीं उतरते। एक लाख ईसाई मिशनरी आज समस्त विश्व में अपने धर्म की अभिवृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं। हिन्दू धर्म जितना खर्च अपने धर्म आडंबरों पर करता है उससे कही कम ईसाई मिशनों का खर्च है। हमारे साधु 56 लाख से बढ़ कर 80 लाख हो गये।
साधना तथा तपश्चर्या के आधार पर विकसित प्रतिभा-नव-निर्माण के उपयुक्त सेवा साधना का उपयोगी प्रशिक्षण-इन सब विभूतियों से सज्जित वानप्रस्थ लोक-निर्माण की महती आवश्यकता पूर्ण कर सकने में सर्व समर्थ सिद्ध हो सकते हैं।
साधना के संदर्भ में परिव्राजक क्रम-व्यवस्था अपनानी है। आज यहाँ ता कल वहाँ, हर जगह अधिकारी मार्ग दर्शक कहाँ हैं? ऐसी दशा में सद्ग्रन्थों का , स्वाध्याय ही सत्संग की- तत्वदर्शी प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी कर सकता है। एकान्त अवकाश के समय मनन चिन्तन भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। जो पढ़ा समझा गया हे उस पर गंभीरता पूर्वक विचार करना-मान्य आदर्शों का जीवन में उतारने की विधि-व्यवस्था सोचना, यही है मनन चिन्तन का स्वरूप।
साधना के लिए जिन पाँच योगों, की तपश्चर्या करनी पड़ती है उन्हें लययोग, प्राणयोग, बिन्दुयोग, ऋजुयोग और नादयोग कह सकते हैं। इन पाँच योगों की भौतिक और आध्यात्मिक प्रतिक्रियाओं को पाँच देवसत्ताओं के नाम से जाना जाता है। भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पौराणिक अलंकार वर्णन में जिन महिमा महात्म्यों का वर्णन किया गया है उन्हें प्रकारान्तर से इन पाँच कोशों की पाँच चक्रों की, पाँच योगों की प्रखरता ही समझनी चाहिए। पंचमुखी गायत्री साधना का उच्चस्तरीय उपक्रम यही है। इसका प्रारम्भिक आभास-अभ्यास प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों में भी कराया जाता है, किन्तु बार दिनों में तो मात्र झाँकी ही मिल सकती है-परिचय ही हो सकता है।
साधना से बढ़ कर ईश्वर की भक्ति पूजा और नर जन्म की सार्थकता का और कोई मार्ग है भी नहीं। सच पूछा जाय तो ज्ञान साधना और योग साधना की उपयोगिता भी इसी दृष्टि से है कि इन उपायों से परिष्कृत किये गये व्यक्तित्व द्वारा अधिक उच्चकोटि का आत्मिक आनन्द प्राप्त किया जा सके।
साधनाओं में तीन ही प्रधान हैं। देव समुदाय में ब्रह्मा-विष्णु, महेश की जिस प्रकार प्रधानता है उसी प्रकार भावयोगों में तीन ही प्रमुख है। (1) ज्ञानयोग (2) भक्तियोग (3) कर्मयोग। वानप्रस्थ साधना में इन तीनों का समुचित समावेश होना चाहिये। ब्रह्मविद्या परायण होकर स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के माध्यम से अपनी विचारणा को उत्कृष्टतम स्तर कर उठाना ज्ञानयोग है।
साधना, उपासना तथा स्वाध्याय रुचि का अब तक का प्रयास एवं परिणाम (14) गायन एवं भाषण की वर्तमान क्षमता (15) वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करने के उपरान्त भी क्या कुछ समय घर-परिवार को सम्भालना पड़ेगा, यदि हो तो किसे समय तक और किस कारण? (16) अब तक के उल्लेखनीय ऐसे कार्यों का विवरण जिन्हें प्रशंसनीय अथवा निन्दनीय कहा जा सके (17) किसी राजनैतिक या धर्म-सम्प्रदाय के प्रति अपना विशेष रुझान-लगाव (18) किस भाषा पर किस स्तर का अधिकार है। (19) आपकी पत्नी का इस कदम में क्या रोल होगा? आप के परिवार वालों का इस कदम के सम्बन्ध में क्या रुख रहेगा। (20) आप किस सत्र में कितने समय शिक्षण प्राप्त करेंगे।
साधना की उपयोगिता भी इसी दृष्टि से है कि इन उपायों से परिष्कृत किये गये व्यक्तित्व द्वारा अधिक उच्चकोटि का आत्मिक आनन्द प्राप्त किया जा सके।
साधना क्षेत्र में प्रचलित किसी भी क्रिया कलाप से हलके स्तर का नहीं गिना जा सकता। वरन् सच तो यह है कि युग धर्म के अनुरूप यही सर्वोत्तम तपश्चर्या है। जप तप से तो अकेले अपना ही कल्याण होता है किन्तु लोकमंगल में निरत ब्रह्मपरायण महामानव तो अपनी यह पुण्य साधना भी पद दलित मानवता के उत्कर्ष में समर्पित कर देते हैं। उदारता को देखते हुए लोकसेवकों को किसी ज्ञानसाधक, योगी तपस्वी, भगवद् भक्त से कम नहीं वरन् बहुत अधिक ऊँचा ठहराया जायगा जो अपने प्रयास का लाभ स्वयं न उठा कर विश्व कल्याण के लिए समर्पित करता है उसकी आन्तरिक महानता निश्चित रूप से अधिक और अति प्रशंसनीय कही जायगी।
साधना भी दैनिक और सामयिक-क्रम पद्धति के अनुसार करते-कराते रहे हैं। अब अगली कक्षा में प्रवेश करना होगा ओर भाव-भूमिका’ यथा शक्ति भूमिका के उच्चतर और उच्चतम साधना-विधानों का अवगाहन करना होगा।
साधना में जुट जायें। दिनचर्या का ऐसा निर्धारण होना चाहिए जिसमें स्वाध्याय और योग साधना तपश्चर्या के लिए भी समुचित स्थान रहे और शेष समय सेवा-कार्यों में लगा रह। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की महानतम आवश्यकता और विश्व-मानव की सेवा साधना एक ही है, जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की की विचार-क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए।
साधना में जन संपर्क बढ़ाना जीवन्त एवं भावनाशील व्यक्तित्वों को ढूँढ़ना-उन्हें दिशा देना, साथ लेना और नव-निर्माण में संलग्न कर देना यही है समग्र क्रिया पद्धति जिसमें लोकमंगल के समस्त आधारों को सन्निहित समझा जा सकता है।
साधना। भौतिक सेवा-साधना तो धनी मानी लोग कर सकते हैं पर जन-मानस में उत्कृष्टता को बोना, उगाना और बढ़ाना केवल ब्रह्म परायण लोगों के लिए ही संभव होता है। उसे बकवादी वक्ता पूरा नहीं कर सकते। धर्मशाला, मन्दिर, प्याऊ, सदावर्त, विद्यालय, चिकित्सालय, उद्योगशाला, व्यायामशाला जैसे अर्थसंभव परमार्थ प्रयोजन धनीमानी लोग ही करते हैं। उनके धन का सदुपयोग भी ऐसे ही कार्यों का जन-मानस में आरोपण, अभिवर्धन केवल उच्च कोटि के परमार्थ-परायण व्यक्ति ही कर सकते हैं।
साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
साधना और ज्ञान-साधना तक सीमित होकर कोई भावनाशील जीवन्त आत्मा बैठ ही नहीं सकती। अग्निकाण्ड की ज्वालायें बुझाने में समस्त आवश्यक कार्य छोड़कर जुटना पड़ता है, इसी प्रकार समय की विभीषिकाओं और विकृतियों से निपटे बिना भी काम नहीं चल सकता। हर वानप्रस्थ को धर्मक्षेत्र में-कुरुक्षेत्र’-में उतरना ही पड़ेगा। गाँडीव शर-सन्धान से इस आपत्तिकाल में किसी परमार्थ प्रेमी को छुट्टी मिल ही नहीं सकती। आत्म-कल्याण के साधन जुटाने में थोड़ी प्रतीक्षा भी की जा सकती है पर आपत्तिधर्म का सामयिक कर्तव्य तो हर हालत में पालन करना ही पड़ेगा।
साधना के चरित्र और परमार्थ के पुण्य प्रयोजनों का समन्वय करते हुए लोक-निर्माण में प्रवृत्त होने की पुण्य परम्परा इन दिनों युग-निमार्ण परिवार ने ही आरम्भ अथवा पुनर्जीवित की है सृजन सेना में संलग्न हजारों लाखों कर्मयोगी सके प्रत्यक्ष प्रमाण है। अब तो कदम और भी आगे बढ़ाया जाना आवश्यक हो गया है। तो उसकी पूर्ति भी हमें ही करनी पड़ेगी। अधिकाधिक समय लोक-मंगल के लिए समर्पण करने वाले सुयोग्य एवं अवैतनिक परमार्थ परायण व्यक्तियों की न दिनों जो महती आवश्यकता अनुभव की जा रही हैं उसकी पूर्ति भी हमें करनी होगी। महानता का पथ अपनाया है तो एक के बाद एक बड़ी और कड़ी कसौटी पर अपने को सही सिद्ध करने के लिए हमें ही आगे आना होगा।
साधना का महत्व है। प्राचीनकाल के ग्रन्थों को पढ़ते रहने का जाल-जंजाल इतना बड़ा है कि उसे अनेक जन्मों में भी पार नहीं किया जा सकता। शिक्षा सोद्देश्य होनी चाहिए- वानप्रस्थों की भी।
साधना पाठ्यक्रम छह महीने के है जो माघ सुदी पूर्णिमा ओर श्रावण सुदी पूर्णिमा से तदनुसार 6 फरवरी 74 से और 6 अगस्त 74 से आरम्भ होंगे। किन्तु जो लोग अभी बहुत अधिक व्यस्त उतने समय की छुट्टी नहीं पा सकते। प्रथम श्रेणी का परिव्राजक वानप्रस्थ भी जिन्हें लेना नहीं उनके लिए काम-चलाऊ विशेष शिक्षण सत्र छह सप्ताह का लाभ करेगा। उसकी व्यवस्था 15 मई से 30 जून तक और 25 नवम्बर से 30 दिसम्बर तक ही हुआ करेगी। पर चूँकि वानप्रस्थ विद्यालय का प्रबन्ध फरवरी 74 से होने जा रहा है अस्तु विशेष शिक्षण रात्र की व्यवस्था 25 मई 74 से ही आरम्भ हो सकेगी।
साधना, योगाभ्यास। आत्मा पर चढ़े हुए कषाय कल्मष और मल, आवरण एवं विक्षेपों का निवारण निराकरण इसी अग्नि संस्कार द्वारा संभव होता है। दबी हुई आन्तरिक प्रखरता इसी मार्ग पर चलने से निखरती है। आत्मबल के सम्पादन का प्रधान मार्ग तप ही तो है तपस्वी ही प्रकारान्तर से तेजस्वी होता है- अन्तः क्षेत्र में- पंचकोशों में-षटचक्रों में-तीन शरीरों में जो एक से एक अद्भुत विभूतियाँ दबी पड़ी हैं, उन्हें सुषुप्त मूर्छना से उवार कर प्रखर एवं प्रचण्ड बनाने का मार्ग तप ही है। योग के बिना आत्मा को परमात्मा से जोड़ो नहीं जा सकता और जब तक ईश्वरीय समर्थन-सहयोग प्राप्त न हो तब तक महामानवों की--ऋषि भूमिका में प्रवेश करना कठिन पड़ता है।
साधना का बहुत छोटा अंग हैं। उतने भर को पूर्णता मानकर बैठे रहना घातक है। भजन करना हो तो उसके साथ स्वाध्याय का- जीवन-शोधन का और सेवा-साधना का अनिवार्य समावेश उसी प्रकार होना चाहिए जिस तरह कि पूजा में अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, जल आदि के उपकरणों को एकत्रित करना आवश्यक माना जाता है। भजन एक जीवन नीति है- कुछ क्षणों में पूरी हो जाने वाली हलचल नहीं। इस सत्य को अध्यात्मिक जगत में जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।
साधना की आन्तरिक पीड़ा किसी-किसी में ही कसकती दिखाई देती है स्पष्ट है कि जब तक मिशनरियों की आवश्यकता पूरी न की जायगी तब तक सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में केवल निर्माण ओर उत्थान की निर्जीव हल-चले भर होती रहेगी उनके पीछे प्राण प्रेरणा का अभाव बना रहा तो कोई ठोस परिणाम सामने न आ सकेगा। पिछड़ापन दूर करने का स्वप्न साकार न हो सकेगा। प्रगति की स्वर्णिम कल्पनाएं कभी भी मूर्तिमान न बन सकेंगी।
साधना में सर्वतोभावेन तत्पर होकर अनुकरणीय आदर्श उपस्थिति किया जाता है। यज्ञोपवीत धारण के समय ली गई परमार्थ परायणता की, इस जन्म में दूसरा जन्म लेने की- द्विजत्व प्रतिज्ञा बहुत समय तक छोटे पौधे के रूप में रहने के पश्चात् वानप्रस्थ स्थिति में ही फल−फूलों से लदती है। व्यावहारिक क्रियान्वित एवं प्रत्यक्ष मूर्तिमान हुई परिलक्षित होती है। असम में द्विजत्व के योग्य क्षमता ढलती आयु में ही उत्पन्न होती है।
साधना से ही ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रकट होती है और जीवात्मा का ‘भूमा’ स्थिति प्रज्ञता में प्रविष्ट होना संभव होता है। आत्मा की यह भूख बुझाने के लिए नये सिरे से विद्याध्ययन करना पड़ता है-यह ब्रह्मचारी की लौकिक शिक्षा से सर्वथा भिन्न होता है, वानप्रस्थ लेने का प्रथम सोपान है-ब्रह्मविद्या का पारायण करना, उसमें पारंगत होना- ज्ञानमृत से परिपूर्ण व्यक्ति ही ब्रह्मनिर्वाण प्राप्त करते हैं और लोक निर्माण जैसे महान प्रयोजन के लिए अधिकारी बनते हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं।
साधना की दिशा धर्म-कलेवर को पृष्ठभूमि बनाकर ज्ञान-यज्ञ की- विचार-क्रान्ति की ज्योतिर्मय प्रखरता उत्पन्न करना ही हो सकता है। उन्हें इसी परिधि में रहकर विभिन्न सेवा साधनों में संलग्न होने की तैयारी करनी पड़ती हैं।
साधना के लिए उपासना के अतिरिक्त स्वाध्याय और आत्म-चिन्तन का अवसर रहना ही चाहिए।
साधना में उच्चतम भावनाओं और प्रबल पराक्रम भरी चेष्टाओं के साथ संलग्न होना पड़ता है। इस राजमार्ग को छोड़ कर और किसी पगडंडी से जीवनोद्देश्य की पूर्ति हो नहीं सकती।
साधना में निरत साहित्यकारों की आवश्यकता पड़ेगी यह साहित्य-तन्त्र इतना बड़ा है जिसके लिए सुयोग्य कष्ट और भावनाशील स्तर के हजारों लाखों कार्यकर्ताओं का के सहज ही खपाया जा सकता है। इसमें करोड़ों की पूँजी लगनी है। तथा व्यावसायिक विक्रय क्षेत्र को सम्भालने वाले कितने ही छोटे -बड़े संस्थान खड़े किये जाने है। उन्हें गाँव गाँव फैलाया जाना है कथा साहित्य का भारत की चौदह भाषाओं में ही नहीं संसार की समस्त भाषाओं में भी अनुवाद प्रकाश किया जाना है। इसके लिए केंद्रीय कार्यालय मार्ग दर्शन भले ही करे पर उसे सहस्रों स्थानों में-सहस्रों शाखा प्रशाखाओं में विभक्त करके बनाया बढ़ाया जा सकता है।
साधना करे, इसका निर्णय इस साधनाक्रम में से कौन किस प्रकार किस प्रक्रिया का आरम्भ, अभिवर्धन करे इसका निर्णय करने के पूर्व साधक का आन्तरिक स्तर देखना पड़ता है। हर रोगी के लिए एक ही दवा फिट नहीं पड़ती, प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा क्रम में परिवर्तन करना पड़ता है इसी प्रकार उपासना पद्धति निर्धारण करते समय व्यक्ति विशेष की प्रकृति और स्थिति का ध्यान रखना होता है।
साधना की दृष्टि से भी अभीष्ट सुविधायें यहाँ सहज ही उपलब्ध है वानप्रस्थी साधना के लिए उपयुक्त स्थान चुनने के संदर्भ में शास्त्रकारों का अभिमत इस प्रकार है-
साधनाक्रम में से कौन किस प्रकार किस प्रक्रिया का आरम्भ, अभिवर्धन करे इसका निर्णय करने के पूर्व साधक का आन्तरिक स्तर देखना पड़ता है। हर रोगी के लिए एक ही दवा फिट नहीं पड़ती, प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा क्रम में परिवर्तन करना पड़ता है इसी प्रकार उपासना पद्धति निर्धारण करते समय व्यक्ति विशेष की प्रकृति और स्थिति का ध्यान रखना होता है।
साधना का शुभारम्भ अपने आप से आरम्भ होता है। वह सर्वसाधारण के सामने अपना आदर्श उपस्थित करते हुए यह सिद्ध करता है कि त्याग और सेवा की बात मात्र बकझक नहीं है वह ऐसी व्यावहारिकता भी है जिसे प्रत्यक्ष करके दिखाया जा सकता है दैनिक जीवन में घोला और घुलाया जा सकता है।
साधना विज्ञान के अत्यन्त महत्वपूर्ण रहस्यों का समावेश है सिद्धियों और विभूतियों की आशाजनक सम्भावना उस क्षेत्र में समाविष्ट है। कौन साधक क्या साधना करे, इसका निर्णय इस साधनाक्रम में से कौन किस प्रकार किस प्रक्रिया का आरम्भ, अभिवर्धन करे इसका निर्णय करने के पूर्व साधक का आन्तरिक स्तर देखना पड़ता है। हर रोगी के लिए एक ही दवा फिट नहीं पड़ती, प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा क्रम में परिवर्तन करना पड़ता है इसी प्रकार उपासना पद्धति निर्धारण करते समय व्यक्ति विशेष की प्रकृति और स्थिति का ध्यान रखना होता है।
साधना का परम पुरुषार्थ भी करना पड़ता है। श्रेयार्थी के लिए तपस्वी जीवन की रीति-नीति अपनानी ही पड़ती है। ब्रह्म-तेजस उसी से निखरता है। इसी बलिष्ठता के--समर्थता के आधार पर व्यक्ति अपनी जीवन-नौका को खेता हुआ लक्ष्य तक ले पहुँचता है और साथ ही उसमें बिठा कर अनेकों को पार कर सकता है।
साधना ही है जिसे पौराणिक भाषा में पंचमुखी वेदमाता की पंचदेव साधना कहते हैं। भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पाँच देव माना है तात्विक दृष्टि से उन्हें सर्वसमर्थता, प्रज्ञा प्रतिष्ठा, सृजन, अभिवर्धन और विवर्तन का प्रचण्ड क्षमता-सम्पन्न आत्मबल भी कह सकते हैं।
साधना के शिक्षा संदर्भ में प्रवचन प्रक्रिया को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उसे न केवल सिद्धान्त रूप में वरन् व्यावहारिक अभ्यास में भी इस प्रकार समाविष्ट किया जाता है कि सेवा-साधना में निरत वानप्रस्थ को प्रवचन का अवसर आने पर झेंप झिझक का सामना न करना पड़े।
साधना उपासना आदि में संलग्न होवे। लोक सो में तत्पर होता हुआ अपनी इंद्रियों का नियन्त्रण करे।
साधना का अनिवार्य समावेश उसी प्रकार होना चाहिए जिस तरह कि पूजा में अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, जल आदि के उपकरणों को एकत्रित करना आवश्यक माना जाता है। भजन एक जीवन नीति है- कुछ क्षणों में पूरी हो जाने वाली हलचल नहीं। इस सत्य को अध्यात्मिक जगत में जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।
साधना द्वारा आत्मबल सम्पादन करना है वहाँ लोक मंगल के लिए अपनी विभूतियों को समर्पित करते हुए विश्व मानव को अधिकाधिक श्रेष्ठ समुन्नत बनाने में निरत निमग्न भी रहना है। जिन्हें सेवा धर्म पर आस्था न हो मात्र जप तप और निवृत्ति परक एकान्त सेवन अथवा सुख चैन के, बिना झंझट भरे दिन काटने हो, उन्हें इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए। वह स्थिति मरण काल आदि के निकट आ जाने पर थके हारे और अशक्त असमर्थ लोगों के लिए ही उपयुक्त हो सकती है। इसे वैराग्य निवृत्ति संन्यास आदि अन्य किसी नाम से भले ही पुकारा जाय-परम तेजस्वी वानप्रस्थ के साथ तो नहीं ही जोड़ा जा सकता।
साधना का दृश्य रूप सामने न आने के कारण लोकेषणा से वंचित रहने का त्याग ही क्यों न करना पड़ता हो। जब घन और कामुकता की वित्तैषणा और पुत्रेषणा छोड़ दी तो वानप्रस्थों की लोकेषणा के लिए दृश्यमान भौतिक सुविधा संवर्धक कार्यों से ललचाकर ज्ञानयज्ञ से विमुख होने का उथलापन क्यों अपनाना चाहिए।
साधना-विधानों का अवगाहन करना होगा।
साधनाक्रम भी बनाया जा सकता है जो क्रमिक रूप से चक्रबेधन, कोशों के अनावरण की दिव्य सम्भावनाओं का मूर्तिमान करता रहें यह गायत्री महाशक्ति की उच्चस्तरीय साधना ही है जिसे पौराणिक भाषा में पंचमुखी वेदमाता की पंचदेव साधना कहते हैं। भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पाँच देव माना है तात्विक दृष्टि से उन्हें सर्वसमर्थता, प्रज्ञा प्रतिष्ठा, सृजन, अभिवर्धन और विवर्तन का प्रचण्ड क्षमता-सम्पन्न आत्मबल भी कह सकते हैं।
साधना एक ही है, जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की की विचार-क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस चरण को पूरा करने के बाद ही, शिल्प, चिकित्सालय,मन्दिर, धर्मशाला, प्याऊ, सदावर्त आदि कितने ही लोकोपयोगी कार्य हो सकते हैं पर वानप्रस्थ को ही लक्ष्य सामने रखना चाहिए- विचार-क्रान्ति, बौद्धिक परिष्कार भावनात्मक नवनिर्माण। इसी से संबद्ध सेवा कार्य हाथ में लिए जाएं।
साधना और योग साधना की उपयोगिता भी इसी दृष्टि से है कि इन उपायों से परिष्कृत किये गये व्यक्तित्व द्वारा अधिक उच्चकोटि का आत्मिक आनन्द प्राप्त किया जा सके।
साधना परायण जीवन क्षेत्र में प्रवेश करने वाले स्वयमेव भी अपने में तो साधना की आवश्यकता पूरी करते रह सकते है।
साधना तपश्चर्या एवं ज्ञान सम्पदा का अभिवर्धन किया करे। इस प्रकार हर वर्ष कुछ समय आत्मशोधन एवं आत्म-विकास का विशेष क्रम अपनाते हुए कार्य क्षेत्र में नई स्फूर्ति एवं नई शक्ति के साथ प्रवेश किया करे। उतने समय उनके निवास, विश्राम, भोजन आदि की अभी सुविधाएं आश्रम में उपलब्ध रहें।
साधना क्रम चलाने वाले द्वितीय श्रेणी के वानप्रस्थ का विशेष शिक्षा पत्र 3 सप्ताह का होगा जो 25 मई से 30 जून 74 तक चलेगा। इसमें 50 शिक्षार्थी लिये जायेंगे। इसी प्रकार इनका दूसरा सत्र 25 नवम्बर से 30 नवम्बर तक चलेगा, उसमें भी 50 छात्र ही लिए जायेंगे। इस प्रकार 100 प्रथम श्रेणी के और 100 द्वितीय श्रेणी के शिक्षार्थियों की शिक्षा व्यवस्था प्रथम वर्ष की गई है। आगामी वर्षों में यह संख्या स्वभावतः कई गुनी होकर रहेगी।
साधना में इन तीनों का समुचित समावेश होना चाहिये। ब्रह्मविद्या परायण होकर स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के माध्यम से अपनी विचारणा को उत्कृष्टतम स्तर कर उठाना ज्ञानयोग है। योगाभ्यास और तपश्चर्या को गायत्री शक्ति स्रोतों पर अवलम्बित साधना क्रम को भक्तियोग करना चाहिए। लोकमंगल में सहृदय किन्तु साहसी शूर-वीरों की तरह प्राणपण से जुट पड़ने वाली कर्मनिष्ठा को श्रेष्ठतम कर्म योग कहा जा सकता है। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन में तीनों प्रधान योगों में निरन्तर संलग्न रहने की विधि व्यवस्था है।
साधना की ओर मोड़े ही जा सकते हैं।
साधना को ज्ञानवृद्ध-तपस्वी एवं सेवा परायण वानप्रस्थ ही पूरा कर सकते हैं। उन्हें ही करनी भी होगी।
साधना के बारे में भी यही बात है। किसी व्यक्ति का पूर्व ज्ञान किस स्तर का है उसे देखते हुए आगे की शिक्षा-प्रक्रिया निर्धारित की जाती है। इतने पर भी यह स्पष्ट हे कि आत्म-परिष्कार और लोकसेवा के मार्ग में आने वाली समस्याओं का समाधान करने की रीति-नीति जानना ही इस प्रशिक्षण का उद्देश्य होता है। उसी परिधि में की जाने वाली ज्ञान-साधना का महत्व है। प्राचीनकाल के ग्रन्थों को पढ़ते रहने का जाल-जंजाल इतना बड़ा है कि उसे अनेक जन्मों में भी पार नहीं किया जा सकता।
साधना भी पद दलित मानवता के उत्कर्ष में समर्पित कर देते हैं। उदारता को देखते हुए लोकसेवकों को किसी ज्ञानसाधक, योगी तपस्वी, भगवद् भक्त से कम नहीं वरन् बहुत अधिक ऊँचा ठहराया जायगा जो अपने प्रयास का लाभ स्वयं न उठा कर विश्व कल्याण के लिए समर्पित करता है उसकी आन्तरिक महानता निश्चित रूप से अधिक और अति प्रशंसनीय कही जायगी।
साधना क्रम को भक्तियोग करना चाहिए। लोकमंगल में सहृदय किन्तु साहसी शूर-वीरों की तरह प्राणपण से जुट पड़ने वाली कर्मनिष्ठा को श्रेष्ठतम कर्म योग कहा जा सकता है। इस प्रकार वानप्रस्थ जीवन में तीनों प्रधान योगों में निरन्तर संलग्न रहने की विधि व्यवस्था है। आहार, निद्रा, स्नान जैसे अनिवार्य शरीर धर्म का पालन करने के उपरान्त जो समय बचता है उसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाने वाला साधन अनवरत रूप से भगवद्भक्ति में निरत कहा जा सकता है। उसे सच्चा वैरागी, योगी, तपस्वी, भक्त अथवा ऋषिकल्प जो भी कहा जाय, सार्थक कथन ही होगा।
साधना में संलग्न उच्चकोटि के सुशिक्षित एवं अनुभवी व्यक्ति जिस कार्य को भी हाथ में लेते हैं वह जनता का अजस्र सहयोग उपलब्ध करते हैं और निश्चित रूप से सफल होते हैं। नवनिर्माण की बहुमुखी प्रवृत्तियों में संलग्न होकर ऐसे लोग देश को कितनी जल्दी आगे बढ़ा सकते हैं- ऊँचा उठा सकते हैं- इसकी कल्पना मात्र करने से आंखें चमकने लगती हैं।
साधना है। लययोग-प्राणयोग- विन्दुयोग-नादयोग-ऋजुयोग के आधार पर ऐसा अतिरिक्त साधनाक्रम भी बनाया जा सकता है जो क्रमिक रूप से चक्रबेधन, कोशों के अनावरण की दिव्य सम्भावनाओं का मूर्तिमान करता रहें यह गायत्री महाशक्ति की उच्चस्तरीय साधना ही है जिसे पौराणिक भाषा में पंचमुखी वेदमाता की पंचदेव साधना कहते हैं। भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पाँच देव माना है तात्विक दृष्टि से उन्हें सर्वसमर्थता, प्रज्ञा प्रतिष्ठा, सृजन, अभिवर्धन और विवर्तन का प्रचण्ड क्षमता-सम्पन्न आत्मबल भी कह सकते हैं।
साधना करने में सुविधा हो तो उन्हें वैसा करने देना चाहिए।
साधना में प्रवृत्त रहना हो तो ही भिक्षा अन्न की सार्थकता है ऐसी स्थिति में रह कर थोड़ा भजन करना हो अधिक ईश्वर अनुग्रह प्रदान कर सकना है आशा तो कम ही है पर कई बार पत्थरों पर भी पेड़ उगते देखे गये है। प्रयत्न करने पर सन्त वर्ग में भी कुछ तो सेवा साधना की ओर मोड़े ही जा सकते हैं।
साधना कहते हैं। भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश को पाँच देव माना है तात्विक दृष्टि से उन्हें सर्वसमर्थता, प्रज्ञा प्रतिष्ठा, सृजन, अभिवर्धन और विवर्तन का प्रचण्ड क्षमता-सम्पन्न आत्मबल भी कह सकते हैं।
साधना के लिए उपयुक्त स्थान चुनने के संदर्भ में शास्त्रकारों का अभिमत इस प्रकार है-
साधना के लिए अधिक और अनवरत श्रम समय चाहिए। इस प्रकार के अभ्यास इस छह महीने की तपश्चर्या अवधि में ही सम्भव हैं। गं-तट, हिमालय का क्षेत्र, सात ऋषियों की तपोभूमि के अतिरिक्त उपयुक्त मार्गदर्शन संरक्षण का सुयोग उन दिनों मिलाता रहने से प्रयास की सफलता असंदिग्ध ही रहेगी।
साधना ही है। सद्विचारों में सत्प्रवृत्तियों में निमग्न रहना किसी उच्चस्तरीय तप के कम महत्वपूर्ण नहीं। दूसरों के आन्तरिक स्तर को ऊँचा उठाना उनके जीवनक्रम को मुख-शान्ति में ओतप्रोत करने के लिए दिया गया श्रेष्ठतम अनुदान ही है। इसे उच्चस्तरीय पुण्य परोपकार ही कहा जायेगा। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के सृजन, सिंचन में बहाये गये स्वेद-बिन्दुओं को परब्रह्म को अमृतजल से स्नान कराना है।
साधना करे। फल, मूल, पुष्प, जल की सुविधा वाले नदी तट, तीर्थ आदि पवित्र स्थान में निवास करे। स्थान ग्राम नगर से अति दूर न हो। प्राकृतिक उपयुक्त हो।
साधना यह तीनों अमृतमयी देव सरिताएं मिलकर गंगा-यमुना-सरस्वती के मिलन,संगम का प्रयोजन पूरा करती हैं और तीर्थराज प्रयाग जैसी त्रिवेणी इस जीवन में प्रादुर्भूत होती हैं। यह अभिनव आनन्द अपने ढंग का अनोखा है और ऐसा है जिससे बालकपन किशोरावस्था और यौवन में जो अर्जित किया गया था उससे कम नहीं वरन् अधिक ही आनन्दमयी विभूतियाँ उपलब्ध हो सकती हैं- होती हैं। सम्पदाओं से विभूतियों का स्तर हलका नहीं भारी ही है। इसलिये पूर्वार्ध में जो उपार्जित किया गया था उसकी तुलना में उत्तरार्ध की कमाई का मूल्य भी अधिक ही आता है। ऐसी दशा में परमार्थ परायण उत्तरार्ध में प्रवेश करने वाले को बाल्यकाल और यौवन के चले जाने का पश्चाताप नहीं करना पड़ता वरन् यही अनुभव होता है कि वह अल्हड़पन चला गया सो अच्छा ही हुआ, यह ढलती आयु ऐसे अनुदान-वरदान लेकर आई हे जिनका इस गघापचीपी के दिनों में मिल सकना कठिन है।
साधना के लिए इन दिनों हमें एक ही केन्द्र पर केन्द्रित होना है- ज्ञान यज्ञ, ज्ञान-यज्ञ, ज्ञान-यज्ञ। विचार-क्रान्ति- विचार-क्रान्ति। चूँकि अपना कार्य भावनाओं के परिष्कार से सम्बन्ध रखता है इसलिए उसके साथ अध्यात्म की पृष्ठभूमि ही रह सकती है। धर्म का तत्व दर्शन ही इस प्रयोजन की पूर्ति कर सकता है। भावनाओं का स्पर्श करने और उन्हें मोड़ने उभारने के लिए धर्म-चिन्तन और धर्म कलेवर को ही आधार बनाना होगा।
साधना कहते हैं। वानप्रस्थ मनोबल आत्मबल सम्पादन करने के लिए योगाभ्यास, तपश्चर्या तितिक्षा, मनो-निग्रह की रीति नीति य अपना कर अपनी आन्तरिक प्रखरता प्रदीप्त करता है। ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ दोनों ही अपने-अपने स्तर का अध्ययन और स्वास्थ्य संवर्धन करते हैं। अन्तर इतना ही रहता है कि पूर्वार्ध की चेष्टाएँ होती हैं भौतिक प्रयोजनों के लिये उत्तरार्ध की मनोबल आत्मबल बढ़ाने के लिये।
साधना में निरत वानप्रस्थ को प्रवचन का अवसर आने पर झेंप झिझक का सामना न करना पड़े।
साधना में प्रयुक्त होता है। उसे लोकशिक्षण के लिए परिव्राजक की तरह भ्रमण करना होता है। उन दिनों शरीर में उतनी समर्थता भी रहती है कि दौड़-धूप के प्रयोजन पूरे कर सके सुदूर क्षेत्रों में आवागमन कर सके और कष्टसाध्य सेवाकार्यों को अपने बलबूते क्रियान्वित कर सके। सत्प्रवृत्तियों में जनसाधारण के साथ कन्धे से कन्धा लगाकर कदम मिलाकर कार्य कर सके। इसलिए वानप्रस्थी को ज्ञान सम्पादन और योगाभ्यास में आधे से कम समय लगाकर आधे से अधिक समय प्रत्यक्ष लोकसेवा कार्यों में समर्पण करना होता है।
साधना भी तो करनी ही है। युग-वेदना के बिलखते क्रन्दन को भी तो अनसुना नहीं किया जा सकता। जलती हुई मान्यता को दम तोड़ते हुए भी तो नहीं देखा जा सकता इन दिनों लम्बी योग-साधना और ज्ञान-साधना तक सीमित होकर कोई भावनाशील जीवन्त आत्मा बैठ ही नहीं सकती। अग्निकाण्ड की ज्वालायें बुझाने में समस्त आवश्यक कार्य छोड़कर जुटना पड़ता है, इसी प्रकार समय की विभीषिकाओं और विकृतियों से निपटे बिना भी काम नहीं चल सकता। हर वानप्रस्थ को धर्मक्षेत्र में-कुरुक्षेत्र’-में उतरना ही पड़ेगा।
साधना करने के लिए निर्देश किया है। सुयोग्य विद्वान तपस्वियों से अभीष्ट मार्ग-दर्शन, प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। इस शास्त्र निर्देश के अनुरूप एवं उपयुक्त स्थान पर ही शांतिकुंज बना है। हिमालय की गोद, गंगा तट, सप्त ऋषियों की तपोभूमि प्रमुख तीर्थ होने के साथ-साथ एकान्त एवं प्राकृतिक वातावरण भी वहाँ तपश्चर्या एवं ज्ञान साधना की दृष्टि से भी अभीष्ट सुविधायें यहाँ सहज ही उपलब्ध है वानप्रस्थी साधना के लिए उपयुक्त स्थान चुनने के संदर्भ में शास्त्रकारों का अभिमत इस प्रकार है-
साधना की दौड़-धूप। जब शरीर अशक्त-असमर्थ हो जाय तो एक स्थान पर बैठ कर अध्यापन, प्रवचन,सत्संग जैसे सेवा साधनों को तथा ध्यान−धारणा परक उपासना की पूर्ति। वस्तुतः दोनों का लक्ष्य एक ही है-शरीर की स्थिति के अनुरूप कष्ट साध्य एवं सरलतम कार्यों का विभाजन किया गया है।
साधना का प्रत्येक कदम इसी दिशा में उठना चाहिए।
साधना में अनवरत रूप से तत्पर रह जाय। यही है वानप्रस्थी जीवन दर्शन। उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनी शक्तियों को अधिकाधिक मात्रा में लगाना आवश्यक हो जाता है, अतः एवं यह आवश्यक है कि पारिवारिक उत्तरदायित्वों का भार या तो बिल्कुल ही न हो- यदि हो तो यह इतना कम हो कि परमार्थ प्रयोजन की विधि व्यवस्था के लिए अवकाश और मनोयोग की कहने लायक मात्रा हाथ में रह सके।
साधना और शिक्षा के समुचित साधन यहाँ उपलब्ध रहेंगे। शिक्षा का अभाव एवं स्तर यहाँ ऐसा नहीं होगा जिससे किसी को असन्तोष हो। स्नेह और सौजन्य भरा वातावरण भी ऐसा है जिसके कारण घर छोड़कर वहाँ पहुँचने वालों को उदासीनता प्रायः नहीं ही होती। अधिक न सही पर कम आत्मीयता का वातावरण भी यहाँ नहीं है। ऐसी दशा में ब्रह्म-विद्या की तत्वदर्शी ज्ञान सम्पादन, योगाभ्यास एवं तप साधना की अभीष्ट मात्रा में उपलब्धि यहाँ सहज ही हो सकती है।
साधना भी विशुद्ध रूप में एक योग-साधना ही है। सद्विचारों में सत्प्रवृत्तियों में निमग्न रहना किसी उच्चस्तरीय तप के कम महत्वपूर्ण नहीं। दूसरों के आन्तरिक स्तर को ऊँचा उठाना उनके जीवनक्रम को मुख-शान्ति में ओतप्रोत करने के लिए दिया गया श्रेष्ठतम अनुदान ही है। इसे उच्चस्तरीय पुण्य परोपकार ही कहा जायेगा। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के सृजन, सिंचन में बहाये गये स्वेद-बिन्दुओं को परब्रह्म को अमृतजल से स्नान कराना है।
साधना का उच्चस्तरीय उपक्रम यही है। इसका प्रारम्भिक आभास-अभ्यास प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों में भी कराया जाता है, किन्तु बार दिनों में तो मात्र झाँकी ही मिल सकती है-परिचय ही हो सकता है। उस साधना के लिए अधिक और अनवरत श्रम समय चाहिए। इस प्रकार के अभ्यास इस छह महीने की तपश्चर्या अवधि में ही सम्भव हैं। गं-तट, हिमालय का क्षेत्र, सात ऋषियों की तपोभूमि के अतिरिक्त उपयुक्त मार्गदर्शन संरक्षण का सुयोग उन दिनों मिलाता रहने से प्रयास की सफलता असंदिग्ध ही रहेगी।
साधना और योग साधना द्वारा आत्मबल सम्पादन करना है वहाँ लोक मंगल के लिए अपनी विभूतियों को समर्पित करते हुए विश्व मानव को अधिकाधिक श्रेष्ठ समुन्नत बनाने में निरत निमग्न भी रहना है। जिन्हें सेवा धर्म पर आस्था न हो मात्र जप तप और निवृत्ति परक एकान्त सेवन अथवा सुख चैन के, बिना झंझट भरे दिन काटने हो, उन्हें इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए। वह स्थिति मरण काल आदि के निकट आ जाने पर थके हारे और अशक्त असमर्थ लोगों के लिए ही उपयुक्त हो सकती है। इसे वैराग्य निवृत्ति संन्यास आदि अन्य किसी नाम से भले ही पुकारा जाय-परम तेजस्वी वानप्रस्थ के साथ तो नहीं ही जोड़ा जा सकता।
साधना की बात सोचता अवश्य है भले ही परिस्थितियाँ उसे वैसा अवसर ही न होने दें। जिनमें थोड़ा उत्साह है वे साधु-बाबाओं के आश्रय में दिन काटते-रामनाम जपते और तथा कथित सत्संग में उलझे देखे जा सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों की संख्या गिनी जाय तो वह लाखों तक अभी भी पहुँचेगी। यदि इन्हें सही मार्ग दर्शन मिला होता तो वे आत्म-कल्याण के साथ लोकमंगल क्षेत्र में प्रवेश कर सकते थे और निर्माण के महान प्रयोजन की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सकते थे।
साधना में भी संलग्न किया जाना अनिवार्य है। ज्ञान-यज्ञ को ज्योतिर्मय बनाने के लिए-विचार क्रान्ति की चिनगारी को दावानल स्तर तक ले जाने की जिम्मेदारी उन्हीं की है।
साधना की यों असंख्य धारा दिशाएं हो सकती हैं। जनता की आर्थिक समृद्धि, स्वास्थ्य संवर्धन जल व्यवस्था, धर्मशाला, मन्दिर, तालाब, प्याऊ, अस्पताल जैसे कितने ही उपयोगी कार्य भी लोककल्याण कारक ही कहे जायेंगे पर आज की आपत्तिकालीन स्थिति में हमारा पूरा ध्यान उन्हीं प्रयासों पर केन्द्रित होना चाहिए जो विचारों के झकझोरने-भ्रान्त-धारणाओं और विकृत मान्यताओं एवं निकृष्ट अभिरुचियों से जनमानस को विरत कर सकने में समर्थ हो सकें।
साधना का-विशाल काय-कलेवर मनुष्य की आन्तरिक महानता में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि का लक्ष्य रखकर ही खड़ा किया गया है। नीति-निष्ठ, कर्तव्य परायण और समाजसेवी व्यक्तित्वों का विकास ही धर्म धारणा का- अध्यात्म-दर्शन का एकमात्र प्रयोजन है। ईश्वर की समीपता और प्रसन्नता प्राप्त करने का आधार लेकर चलने वाले मनुष्य को आत्म-परिष्कार और उदार ममता विस्तार का अवलम्बन स्वीकार करना पड़ता है। इस तरह प्रकारान्तर से आस्तिकता और ईश्वर भक्ति-धर्म धारणा और तपश्चर्या का चरम प्रयोजन मनुष्य में देवत्व का अवतरण ही बनता है। ब्राह्मण वर्ग इसी प्रयोजन की पूर्ति में अपने को खपाता था।
साधना की इस कसौटी पर हमारे साधु बाबा खरे नहीं उतरते। एक लाख ईसाई मिशनरी आज समस्त विश्व में अपने धर्म की अभिवृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं। हिन्दू धर्म जितना खर्च अपने धर्म आडंबरों पर करता है उससे कही कम ईसाई मिशनों का खर्च है। हमारे साधु 56 लाख से बढ़ कर 80 लाख हो गये। कहाँ एक लाख पादरी कहाँ अस्सी लाख साधु।
साधना एवं तपश्चर्या के स्तर की श्रेय साधना माने। ऐसे लोग ही अपनी उच्च मनोभूमि एवं प्रचण्ड कर्मठता के आधार पर विश्व मानव की ठोस एवं गम्भीर सेवा कर सकेंगे। कहना न होगा कि वानप्रस्थ परम्परा इसी महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुई थी। उसका पुनः प्रचलन कर सकना यदि सम्भव हो सके तो निश्चित रूप से मिशनरी वर्ग की अभाव पूर्ति हो सकेगी और हमारा श्मशान जैसा सार्वजनिक क्षेत्र हरे भरे उद्यान का रूप धारण कर सकेगा।
साधना की अभीष्ट मात्रा में उपलब्धि यहाँ सहज ही हो सकती है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति और समाज की वर्तमान समस्याओं का स्वरूप एवं समाधान इस तरह सीखा, समझा जा सकेगा कि उस आधार पर लोकसेवा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को अभीष्ट सफलता प्राप्त करने में विशेष कठिनाई का अनुभव न करना पड़।
साधना तक कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में सबसे बड़ी सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता एक ही सामने उपस्थित होती है- सुयोग्य, भावनाशील अवैतनिक और सेवा की उत्कट लगता के साथ राष्ट्र-निर्माण में जुट पड़ने वाले कर्मठ कार्यकर्ताओं की इस अभाव को पूरा किये बिना कोई गति नहीं-कोई राह नहीं-कोई आशा नहीं। इस प्रयोजन को वानप्रस्थ परम्परा का पुनर्जागरण करके ही पूरा किया जा सकता है। यदि इस दिशा में एक प्रबल और सुव्यवस्थित आन्दोलन खड़ा किया जा सके तो इस धर्म प्राण देश में-प्राचीन संस्कृति की रक्षा की भाव-प्रेरणा से प्रेरित अगणित व्यक्ति आगे आ सकते हैं। और उस सृजन सेना से देखते-देखते द्वापर में उँगली पर गोवर्धन उठाये जाने के तरह-त्रेता में सेतुबन्ध बाँधे जाने की तरह वह चमत्कार सम्भव हो सकता है जिसके आधार पर राष्ट्र का पिछड़ापन-प्रचण्ड प्रगतिशीलता में परिणत हुआ देखा जा सके।
साधना की उद्देश्य पूर्ति नहीं होती। नित्य मन पर चढ़ने वाले दूषित वातावरण के बुरे प्रभाव की गन्दगी बोने के लिए स्वाध्याय का- मनन-चिन्तन का प्रयोग नित्य, नियमित रूप से करना चाहिए। जीवन को परिष्कृत और उदार बनाने की प्रेरणा भरने वाला साहित्य स्वाध्याय के लिए चुन लेना चाहिए और उसे मनोयोगपूर्वक पढ़ने के लिए कोई न कोई समय निश्चित निर्धारित कर ही लेना चाहिए। फुरसत के समय यहाँ तक कि रास्ता चलने भी पढ़ना पड़े तो भी चलेगा आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास की चतुर्विध आवश्यकताओं को कैसे पूरा किया जा सकता है? वर्तमान ढर्रे में क्या सुधार परिवर्तन किस क्रम में होना चाहिए इसी प्रकार की योजनाएं मनन-चिन्तन में बनाई जाती है।
साधना परायण लोग धारण करते हैं और आत्मा में परमात्मा का अवतरण सम्भव एवं प्रत्यक्ष बनाते हैं। यह साधनाएं हर साधक के लिए उसके स्तर के अनुरूप थोड़ी हर-फेर जैसी होनी स्वाभाविक है। उनकी आरंभिक शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् परिव्राजक साधक उस विधान को स्वयमेव अग्रगामी बनाते रह सकते हैं।
साधना तो धनी मानी लोग कर सकते हैं पर जन-मानस में उत्कृष्टता को बोना, उगाना और बढ़ाना केवल ब्रह्म परायण लोगों के लिए ही संभव होता है। उसे बकवादी वक्ता पूरा नहीं कर सकते। धर्मशाला, मन्दिर, प्याऊ, सदावर्त, विद्यालय, चिकित्सालय, उद्योगशाला, व्यायामशाला जैसे अर्थसंभव परमार्थ प्रयोजन धनीमानी लोग ही करते हैं। उनके धन का सदुपयोग भी ऐसे ही कार्यों का जन-मानस में आरोपण, अभिवर्धन केवल उच्च कोटि के परमार्थ-परायण व्यक्ति ही कर सकते हैं। धन-लोलुप प्रचारक तो लोकरंजन भर कर सकते हैं।
साधना तपश्चर्या एवं लोकमंगल की परिव्राजक प्रक्रिया में लगते हुए आत्मकल्याण एवं विश्वकल्याण का प्रयोजन पूरा कर ले। परिवार के बचे हुए उत्तरदायित्व बड़े ओर स्वावलम्बी लड़कों को सौंपे जा सकें इसके लिये उन्हें पहले से ही प्रशिक्षित करना चाहिए। तभी वे इस भार को उचित रीति से वहन कर सकने की मनःस्थिति में हो सकेंगे।
साधना। कहना न होगा कि इस युग में सबसे अधिक आवश्यकता और सबसे अधिक महत्वपूर्ण परमार्थ जन-मानस का भावनात्मक परिष्कार ही है। समस्त उलझने, निकृष्ट विचारणा ने ही उत्पन्न की हैं और अब, या हजार वर्ष बाद जब भी विश्व-शान्ति की आधारशिला रखी जायगी तब विचारणा का स्तर ऊँचा उठाने वाले क्रिया-कलापों को ही प्राथमिकता दी जायेगी। हमारी सेवा-साधना का लक्ष्य ज्ञान यज्ञ का विस्तार ही होना चाहिए। विचार क्रान्ति वह प्रधान आवश्यकता है जिसकी शाखा-प्रशाखाएं अवाँछनीयताओं के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के रूप में फूटती दिखाई पड़ेंगी।
साधना का उपयोगी प्रशिक्षण-इन सब विभूतियों से सज्जित वानप्रस्थ लोक-निर्माण की महती आवश्यकता पूर्ण कर सकने में सर्व समर्थ सिद्ध हो सकते हैं।
साधना-पद्धति व्यस्त और गृहस्थ लोगों के लिए हैं। जिनकी भावनाएँ जितनी प्रखर हो चली हैं उन्हें उसी स्थिति के अनुरूप उपरोक्त तीनों कार्यों में बढ़ा-चढ़ा श्रम, साहस करना चाहिए। वानप्रस्थ जीवन में इन तीनों चरणों की पूर्ति के लिए अधिकाधिक समय लगाना और अधिकाधिक अभिरुचि के साथ-प्रगाढ़ निष्ठा के साथ मनोयोग केन्द्रित करना पड़ता है। उपासना परक योगाभ्यास और तप साधना की दृष्टि से पंचकोशों का अनावरण और षटचक्रों का वेधन बहुत ही उपयुक्त प्रयोग, इसमें मनोविज्ञान और साधना विज्ञान के अत्यन्त महत्वपूर्ण रहस्यों का समावेश है सिद्धियों और विभूतियों की आशाजनक सम्भावना उस क्षेत्र में समाविष्ट है। कौन साधक क्या साधना करे, इसका निर्णय इस साधनाक्रम में से कौन किस प्रकार किस प्रक्रिया का आरम्भ, अभिवर्धन करे इसका निर्णय करने के पूर्व साधक का आन्तरिक स्तर देखना पड़ता है।
साधना तपश्चर्या के लिए भी समुचित स्थान रहे और शेष समय सेवा-कार्यों में लगा रह। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की महानतम आवश्यकता और विश्व-मानव की सेवा साधना एक ही है, जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की की विचार-क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस चरण को पूरा करने के बाद ही, शिल्प, चिकित्सालय,मन्दिर, धर्मशाला, प्याऊ, सदावर्त आदि कितने ही लोकोपयोगी कार्य हो सकते हैं पर वानप्रस्थ को ही लक्ष्य सामने रखना चाहिए- विचार-क्रान्ति, बौद्धिक परिष्कार भावनात्मक नवनिर्माण।
साधना तक सीमित होकर कोई भावनाशील जीवन्त आत्मा बैठ ही नहीं सकती। अग्निकाण्ड की ज्वालायें बुझाने में समस्त आवश्यक कार्य छोड़कर जुटना पड़ता है, इसी प्रकार समय की विभीषिकाओं और विकृतियों से निपटे बिना भी काम नहीं चल सकता। हर वानप्रस्थ को धर्मक्षेत्र में-कुरुक्षेत्र’-में उतरना ही पड़ेगा। गाँडीव शर-सन्धान से इस आपत्तिकाल में किसी परमार्थ प्रेमी को छुट्टी मिल ही नहीं सकती। आत्म-कल्याण के साधन जुटाने में थोड़ी प्रतीक्षा भी की जा सकती है पर आपत्तिधर्म का सामयिक कर्तव्य तो हर हालत में पालन करना ही पड़ेगा।
साधना माने। ऐसे लोग ही अपनी उच्च मनोभूमि एवं प्रचण्ड कर्मठता के आधार पर विश्व मानव की ठोस एवं गम्भीर सेवा कर सकेंगे। कहना न होगा कि वानप्रस्थ परम्परा इसी महती आवश्यकता की पूर्ति के लिए विनिर्मित हुई थी। उसका पुनः प्रचलन कर सकना यदि सम्भव हो सके तो निश्चित रूप से मिशनरी वर्ग की अभाव पूर्ति हो सकेगी और हमारा श्मशान जैसा सार्वजनिक क्षेत्र हरे भरे उद्यान का रूप धारण कर सकेगा।
साधना में लगाना चाहिए। विश्वमानव का भावनात्मक स्तर ऊँचा उठाने के लिये किये गये प्रयासों को विशुद्ध रूप से पूजा आराधना में ही सम्मिलित किया जाना चाहिये। संसार में उत्कृष्टता का अभिवर्धन ऐसा कर्मयोग है जिसे साधना क्षेत्र में प्रचलित किसी भी क्रिया कलाप से हलके स्तर का नहीं गिना जा सकता। वरन् सच तो यह है कि युग धर्म के अनुरूप यही सर्वोत्तम तपश्चर्या है। जप तप से तो अकेले अपना ही कल्याण होता है किन्तु लोकमंगल में निरत ब्रह्मपरायण महामानव तो अपनी यह पुण्य साधना भी पद दलित मानवता के उत्कर्ष में समर्पित कर देते हैं।
साधना के लिए उन्मुक्त आकाश में छितराते। यज्ञ में जो उद्देश्य वसोधरा का है वही दैनिक जप में सूर्यार्घ का है। व्यष्टि का समष्टि में समर्पण-स्वार्थ का परमार्थ में समापन- यही हे आत्मा की परमात्मा में परिणति, ईश्वर प्राप्ति या ब्रह्मा-निर्वाण अथवा भव बन्धनों से मुक्ति इसी का नाम है। उपासना के समय पूजन, जप, ध्यान, सूर्यार्घ आदि भजन कृत्यों को इसी उद्देश्य से किया जाना चाहिए। संक्षिप्त योगाभ्यास की पूर्ति यह दैनिक पूजा-प्रक्रिया किसी हद तक कर देती है।
साधना का आश्रय लिया जाय। इसके अतिरिक्त जन-मानस में युगान्तरकारी परिवर्तन लाने के लिये ज्ञान-यज्ञ की ज्वालायें प्रचण्ड बनाने की सेवा साधना में अनवरत रूप से तत्पर रह जाय। यही है वानप्रस्थी जीवन दर्शन। उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपनी शक्तियों को अधिकाधिक मात्रा में लगाना आवश्यक हो जाता है, अतः एवं यह आवश्यक है कि पारिवारिक उत्तरदायित्वों का भार या तो बिल्कुल ही न हो- यदि हो तो यह इतना कम हो कि परमार्थ प्रयोजन की विधि व्यवस्था के लिए अवकाश और मनोयोग की कहने लायक मात्रा हाथ में रह सके।
साधना का लक्ष्य ज्ञान यज्ञ का विस्तार ही होना चाहिए। विचार क्रान्ति वह प्रधान आवश्यकता है जिसकी शाखा-प्रशाखाएं अवाँछनीयताओं के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के रूप में फूटती दिखाई पड़ेंगी। हर धर्म प्रेमी को ईश्वर भक्त को-उपासना परायण और ज्ञान-यज्ञ के विस्तार में अपना योगदान देना चाहिए और सेवा धर्म का पालन करते हुए आत्म-विस्तार के चरम-लक्ष्य तक पहुँचना चाहिए।
साधना और योग-तपश्चर्या का स्वर्ण सुयोग यों जितनी लम्बी अवधि तक मिलता रह सके उतना ही मनुष्य का सौभाग्य है पर इस आपत्तिकाल में आपत्ति धर्म का पालन करते हुए सेवा-साधना भी तो करनी ही है। युग-वेदना के बिलखते क्रन्दन को भी तो अनसुना नहीं किया जा सकता। जलती हुई मान्यता को दम तोड़ते हुए भी तो नहीं देखा जा सकता इन दिनों लम्बी योग-साधना और ज्ञान-साधना तक सीमित होकर कोई भावनाशील जीवन्त आत्मा बैठ ही नहीं सकती। अग्निकाण्ड की ज्वालायें बुझाने में समस्त आवश्यक कार्य छोड़कर जुटना पड़ता है, इसी प्रकार समय की विभीषिकाओं और विकृतियों से निपटे बिना भी काम नहीं चल सकता। हर वानप्रस्थ को धर्मक्षेत्र में-कुरुक्षेत्र’-में उतरना ही पड़ेगा।
साधना के दिनों में भी खर्च अपना ही करना चाहिए ताकि पुण्य परमार्थ का समुचित संचय हो सके। वैसा प्रबन्ध न हो तो अधिक से अधिक भोजन, वस्त्र जैसी निर्धन देश के स्तर का निर्वाह सामग्री ही उपलब्ध की जा सकती है। इससे अधिक कमाने पर संचय करने की बुद्धि लेकर तो इस पवित्र क्षेत्र में किसी को प्रवेश ही नहीं करना चाहिए। धर्म को व्यवसाय बनाकर चलने वालों की तो घोर भर्त्सना ही की जा सकती है। वेतन, पारिश्रमिक या दान-दक्षिणा लेने की जिन्हें आवश्यकता प्रतीत हो उन्हें वानप्रस्थ क्षेत्र में प्रवेश नहीं ही करना चाहिए।
साधना पवित्रतम कार्यक्षेत्र ईश्वरी वरदान की ही तरह मंगलमय माना जा सकता है। सन्तान न होने का लाँछन लगाकर जिनके पति दूसरा विवाह करने के लिए आतुर है, उनके दुष्कर्म को खुल खेलने देने के लिए विचारशील महिलाएँ रास्ता खाली कर सकती है और रोज के ताने सुनती हुई अपने को बिना आग के जलते रहने से बचा सकती है। ऐसी महिलायें समझ सकती है। मानो प्रस्तुत असुविधाजनक स्थिति ईश्वर ने उन्हें इसी विशेष प्रयोजन के लिए वरदान रूप में प्रदान की है। यदि भौतिक लालसाओं से होकर वे इस प्रकार की भावनात्मक उत्कृष्टता अपनाने वाला साहस एकत्रित कर सके तो समझना चाहिये उनका दुर्भाग्य सच्चे अर्थों में सौभाग्य बन गया।
साधना द्वारा ही संभव है। इसलिए तप-साधना का परम पुरुषार्थ भी करना पड़ता है। श्रेयार्थी के लिए तपस्वी जीवन की रीति-नीति अपनानी ही पड़ती है। ब्रह्म-तेजस उसी से निखरता है। इसी बलिष्ठता के--समर्थता के आधार पर व्यक्ति अपनी जीवन-नौका को खेता हुआ लक्ष्य तक ले पहुँचता है और साथ ही उसमें बिठा कर अनेकों को पार कर सकता है।
साधना-योगाभ्यास की तप साधना- लोक-मंगल की सेवा साधना यह तीनों अमृतमयी देव सरिताएं मिलकर गंगा-यमुना-सरस्वती के मिलन,संगम का प्रयोजन पूरा करती हैं और तीर्थराज प्रयाग जैसी त्रिवेणी इस जीवन में प्रादुर्भूत होती हैं। यह अभिनव आनन्द अपने ढंग का अनोखा है और ऐसा है जिससे बालकपन किशोरावस्था और यौवन में जो अर्जित किया गया था उससे कम नहीं वरन् अधिक ही आनन्दमयी विभूतियाँ उपलब्ध हो सकती हैं- होती हैं। सम्पदाओं से विभूतियों का स्तर हलका नहीं भारी ही है। इसलिये पूर्वार्ध में जो उपार्जित किया गया था उसकी तुलना में उत्तरार्ध की कमाई का मूल्य भी अधिक ही आता है। ऐसी दशा में परमार्थ परायण उत्तरार्ध में प्रवेश करने वाले को बाल्यकाल और यौवन के चले जाने का पश्चाताप नहीं करना पड़ता वरन् यही अनुभव होता है कि वह अल्हड़पन चला गया सो अच्छा ही हुआ, यह ढलती आयु ऐसे अनुदान-वरदान लेकर आई हे जिनका इस गघापचीपी के दिनों में मिल सकना कठिन है।
साधना सर्वोत्तम है। इन चौबीस अक्षरों के शब्द गुँथन में एक से एक बढ़ कर उच्चस्तरीय शक्ति केन्द्रों का समावेश है। भावना और विचारणा के परिशोधन का उद्देश्य यह महामन्त्र आश्चर्यजनक रीति से सम्पन्न करता है। यों साधारण उपासना में इस महामंत्र का जप और परम तेजस्वी सविता-देवता का ध्यान-रोम-रोम में ज्योति किरणों का अवतरण, समावेश की अनुभूति के साथ किया जाता रहे तो उससे भी आत्मिक प्रगति में बड़ी सहायता मिलती है।
साधना की दृष्टि से पंचकोशों का अनावरण और षटचक्रों का वेधन बहुत ही उपयुक्त प्रयोग, इसमें मनोविज्ञान और साधना विज्ञान के अत्यन्त महत्वपूर्ण रहस्यों का समावेश है सिद्धियों और विभूतियों की आशाजनक सम्भावना उस क्षेत्र में समाविष्ट है। कौन साधक क्या साधना करे, इसका निर्णय इस साधनाक्रम में से कौन किस प्रकार किस प्रक्रिया का आरम्भ, अभिवर्धन करे इसका निर्णय करने के पूर्व साधक का आन्तरिक स्तर देखना पड़ता है। हर रोगी के लिए एक ही दवा फिट नहीं पड़ती, प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा क्रम में परिवर्तन करना पड़ता है इसी प्रकार उपासना पद्धति निर्धारण करते समय व्यक्ति विशेष की प्रकृति और स्थिति का ध्यान रखना होता है।
साधना में ही प्रवृत्त रहते हैं। उसे किसी भजन या तप से कम महत्व का नहीं माना जा सकता। अतएव वानप्रस्थ साधकों को सेवा साधना में भी संलग्न किया जाना अनिवार्य है। ज्ञान-यज्ञ को ज्योतिर्मय बनाने के लिए-विचार क्रान्ति की चिनगारी को दावानल स्तर तक ले जाने की जिम्मेदारी उन्हीं की है।
साधना- लोक-मंगल की सेवा साधना यह तीनों अमृतमयी देव सरिताएं मिलकर गंगा-यमुना-सरस्वती के मिलन,संगम का प्रयोजन पूरा करती हैं और तीर्थराज प्रयाग जैसी त्रिवेणी इस जीवन में प्रादुर्भूत होती हैं। यह अभिनव आनन्द अपने ढंग का अनोखा है और ऐसा है जिससे बालकपन किशोरावस्था और यौवन में जो अर्जित किया गया था उससे कम नहीं वरन् अधिक ही आनन्दमयी विभूतियाँ उपलब्ध हो सकती हैं- होती हैं। सम्पदाओं से विभूतियों का स्तर हलका नहीं भारी ही है। इसलिये पूर्वार्ध में जो उपार्जित किया गया था उसकी तुलना में उत्तरार्ध की कमाई का मूल्य भी अधिक ही आता है। ऐसी दशा में परमार्थ परायण उत्तरार्ध में प्रवेश करने वाले को बाल्यकाल और यौवन के चले जाने का पश्चाताप नहीं करना पड़ता वरन् यही अनुभव होता है कि वह अल्हड़पन चला गया सो अच्छा ही हुआ, यह ढलती आयु ऐसे अनुदान-वरदान लेकर आई हे जिनका इस गघापचीपी के दिनों में मिल सकना कठिन है।
साधना ही यम द्वारा नचिकेता को बताई गई रहस्य पूर्ण पँचाग्निविद्या है। पाँच अग्नियाँ अनन्य शक्ति के ऊर्ध्व लोकों तक फैली हुई ज्योतिर्मयी ऊर्जा ही है। उन्हें ब्रह्मतेजस् के रूप में साधना परायण लोग धारण करते हैं और आत्मा में परमात्मा का अवतरण सम्भव एवं प्रत्यक्ष बनाते हैं। यह साधनाएं हर साधक के लिए उसके स्तर के अनुरूप थोड़ी हर-फेर जैसी होनी स्वाभाविक है। उनकी आरंभिक शिक्षा प्राप्त कर लेने के पश्चात् परिव्राजक साधक उस विधान को स्वयमेव अग्रगामी बनाते रह सकते हैं।
साधना के पाये जाते हैं। ऐसा अंकुर जहाँ भी हो उसे सींचा जाना चाहिए और कहा जाना चाहिए कि भिक्षा अन्न खाकर तो किया हुआ भजन भी उस अन्नदाता के हाथों बिक जायगा ऐसी विडम्बना से क्या लाभ? सेवा साधना में प्रवृत्त रहना हो तो ही भिक्षा अन्न की सार्थकता है ऐसी स्थिति में रह कर थोड़ा भजन करना हो अधिक ईश्वर अनुग्रह प्रदान कर सकना है आशा तो कम ही है पर कई बार पत्थरों पर भी पेड़ उगते देखे गये है। प्रयत्न करने पर सन्त वर्ग में भी कुछ तो सेवा साधना की ओर मोड़े ही जा सकते हैं।
साधना की दिशा, मात्र एक ही दिशा में चलनी चाहिए-विचार शोधन, भाव परिष्कार-विवेक संवर्धन, विचार क्रान्ति एवं ज्ञानयज्ञ का यही लक्ष्य हैं। उन्हें इसके अतिरिक्त इधर नहीं देखना चाहिए और इमारतों रूप में दीख पड़ने वाली विज्ञापन बाजी के आकर्षण बनते हुए मानवता की ठोस सेवा में प्रवृत्ति होना चाहिए। भले ही उस सेवा साधना का दृश्य रूप सामने न आने के कारण लोकेषणा से वंचित रहने का त्याग ही क्यों न करना पड़ता हो। जब घन और कामुकता की वित्तैषणा और पुत्रेषणा छोड़ दी तो वानप्रस्थों की लोकेषणा के लिए दृश्यमान भौतिक सुविधा संवर्धक कार्यों से ललचाकर ज्ञानयज्ञ से विमुख होने का उथलापन क्यों अपनाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-September
साधनापरक उद्देश्य पूरा करने के लिए कोई प्रतिमा बनानी पड़ती है। मनुष्य की कल्पना मनुष्य देहधारी भगवान ही रच सकता है। इसलिए अपनी मान्यता एवं श्रद्धा के अनुरूप अवतारों के रूप में देवताओं की छवि जैसी आकृतियों को मान्यता के अनुरूप ही सृजा गया है। इसीलिए “एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” के अनुरूप एक को ही बहुत रूपों में दृष्टिगोचर होने वाला कहा गया है।
साधना सही ढंग से की है व आपने गलत ढंग से की है। इसीलिए आप शिकायत करते पाए जाते हैं। गलत यह कि मात्र बीज बोना ही काफी नहीं, उसमें खाद-पानी देना भी उतना ही जरूरी है। खाद आप देंगे नहीं, पानी आप लगाएँगे नहीं तो आपकी उम्मीद लगाना कि फसल पैदा होगी, पेड़ में फल लगेंगे गलत है। साधना का बीज बोया हमने पर खाद पानी भी साथ लगाया।
साधना की प्रचण्डता से ही प्रतिपल अगणित व्यक्ति अनुदानों से लाभांवित हो रहे हैं।
साधना से सिद्धि का सिद्धाँत उपासना, साधना, आराधना इन तीन सूत्रों पर चला है। ये तीनों क्या है? ये है जमीन, खाद और पानी। भगवान के चरणों में हमने अपने आपको समर्पित किया है व भगवान जितने शक्तिशाली है, उतने ही हम हो गए। ईंधन को आग में डाल देते हैं, वह भी उतना ही गरम और आग जैसा हो जाता है।
साधना की है ‘व’ इसे सिद्धियाँ मिली हैं कि नहीं? आप जिरह कीजिए व प्रमाण मिलने पर ही इसे सच मानिए।
साधना वर्ष में अनुदान पाने हेतु अपनी पात्रता को निखारने का प्रयास पुरुषार्थ। इसके लिए युगसाधना के उद्गम स्रोत शाँतिकुँज युगतीर्थ से निरंतर संपर्क बनाए रहना व वहाँ सम्पन्न होने वाले शक्ति साधना सत्रों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य है। परम पूज्य गुरुदेव की शक्ति का संवहन माता भगवती देवी कर रही है। उनकी साधना की प्रचण्डता से ही प्रतिपल अगणित व्यक्ति अनुदानों से लाभांवित हो रहे हैं।
साधना व उपासना की है तथा उसका परिणाम हमारे सामने है। यही आप अपने जीवन में देखना चाहे तो आप भी प्रयोग कर सकते हैं। फिर आप हमें बताइए कि आपकी साधना सिद्धि की दिशा में फैली कि नहीं। हमारी बात समाप्त। ॐ शाँतिः।
साधना से सिद्धि” विषय पर परिजनों के लिए दिया गया टेप संदेश प्रस्तुत है। उद्बोधन को यथावत् दिए जाने का पूरा प्रयास किया गया है।
साधना करते रहे हैं। औसत नागरिक की तरह-सादगी भरा जीवन निर्वाह करते तथा उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श चरित्र की गौरव गरिमा बनाये रहे हैं। पवित्रता एवं प्रखरता पर आधारित व्यक्तिवादी संकीर्ण चिन्तन सर्वथा एकाँगी है। नीति मर्यादा का पालन करने वाला आदर्शवादी व्यक्ति आत्मकल्याण की साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है। वह समाज के लोगों से सहानुभूति रखता है और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहार से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करता है।
साधनाओं के द्वारा सचेतन बुद्धि संस्थान की चिंतन और संकल्प
साधना निष्ठ हो, कर्तव्यपरायण हो। ऐसा शिष्य ही अविनाशी सत्स्वरूपा आत्मा को जान और गुरुकृपा का लाभ उठा सकता है। जिसमें यह गुण नहीं, उस ऊसर भूमि में किसी भी गुरु के एक पक्षीय प्रयत्न से भी काम नहीं चल सकता। दोनों ही पक्षों की श्रेष्ठता से गुरु शिष्य संयोग का सच्चा लाभ मिलता है।
साधनारत भी रहे। जो अन्तः प्रकाश मिला उसके आधार पर जातिगत भेदभाव मिटाने का कार्य हाथ में लेकर पूरी तरह उसमें जूट गये।
साधना क्षेत्र में इसी को जीवनी शक्ति, प्राण ऊर्जा, कुण्डलिनी शक्ति आदि नामों से पुकारते हैं। ब्राह्मी ऊर्जा उपार्जित कर लेने वाले तेजस्वी ही सच्चे अर्थों में ब्राह्मण कहलाते हैं। ब्राह्मणत्व का आधार गायत्री महाशक्ति ही है। ओजस, तेजस् एवं वर्चस् की उपलब्धि गायत्री साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने पर ही हस्तगत होती है।
साधना से सिद्धि का जुड़ा हुआ संबंध है। ऐसा जैसे कि बोने व काटने के बीच होता है। बोयेंगे तो आप काटेंगे भी। इसी तरह आप साधना करेंगे तो सिद्धियाँ भी आपको मिलेंगी। हमने साधना सही ढंग से की है व आपने गलत ढंग से की है।
साधना का बीज बोया हमने पर खाद पानी भी साथ लगाया। इसीलिए फला। कैसे लगाया जाता है खाद-पानी। चलिए मैं आपको दो घटनाएँ अपने जीवन की सुना देता हूँ। सारी तो बहुत अधिक हैं, मुश्किल पड़ेंगी।
साधना की शुरुआत ध्यान से करना चाहते हैं। ऐसा करने में उनको कहीं अधिक श्रेष्ठता और गौरव की अनुभूति होती है। पर सवाल यह है कि यदि पिछले छः अंगों की जरूरत न होती तो सूत्रकार इसे क्यों बताते। सही कहा जाय तो ऐसे लोगों का लक्ष्य जीवन को संवारना नहीं बल्कि मानसिक शक्तियों पर अधिकार पाना है। यही कारण है कि वे देर-सवेर अध्यात्म मार्ग से भटक जाते हैं।
साधना विद्या विलास या बौद्धिक विकास पर प्रतिबन्ध लगाती है। उसमें मानसिक उत्कर्ष, विद्याध्ययन कला-कौशल और ज्ञानार्जन की पूरी छूट है। प्रतिबन्ध है तो केवल इस बात पर कि मनःक्षेत्र को उत्तेजित, विक्षुब्ध एवं अशान्त न होने दिया जाय।
साधना से सिद्धि नहीं मिली। हमने इतना जप किया, इतना पूजा पाठ किया, इतना भजन किया लेकिन हमको तो कोई चमत्कार दिखाई नहीं पड़ा। मेरे ख्याल से अधिकाँश आदमी आप में ऐसे हैं जो ऐसी शिकायत करते पाए जाते हैं। तो क्या यह ऋषियों की धोखेबाजी है, ऐसा ही एक बौद्धिक मायाजाल है? न, ऐसी बात नहीं।
साधना से कोई लाभ नहीं होता तो आप मन से अपने इन विचारों को निकाल दीजिए। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि “साधना से सिद्धि-’ अवश्य मिलती है।
साधनानातु हे प्रिये,
साधना का आलोक लगाने देश के कोने कोने जाएंगे। इस प्रकार अखण्ड दीपक की ऊर्जा का आलोक सारे देश भर व विदेश में बैठे प्रवासी परिजनों तक सतत् पहुँचता रहेगा। इन आयोजनों से जो ऊर्जा विस्तार प्रक्रिया सम्पन्न होगी उसका चमत्कार शीघ्र ही परिजन विराट रूप में देखेंगे। इन आयोजनों के अतिरिक्त उनके लिए जो उपासना पराक्रम महाकाल की सत्ता ने निर्धारित किया है, तत्संबंधी मार्गदर्शन देने हेतु आगामी मास की अखण्ड-ज्योति पत्रिका का अंक “उपासना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित होगा। इसमें अपनी स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीर की सत्ता को निखारने व इस विशिष्ट संक्रातिकाल में विशिष्ट साधना
साधनाओं को आत्मसात किया। इस संबंध में उसकी साधना को गुरजिएफ व रमण से कम नहीं कहा जा सकता। पर अन्तःकरण की शुद्धि के अभाव के कारण उसने सारे काम गलत किए। जार तथा उसकी पत्नी को भी प्रभावित किया। किन्तु गलत कामों के कारण उसे जहर दिया गया, गोलियाँ मारी गई।
साधनाएँ कीं। ठेठ तिब्बत एक खोज बीन की। पूर्व में प्रचलित एकाग्रता की अधिकाँश साधनाओं को आत्मसात किया। इस संबंध में उसकी साधना को गुरजिएफ व रमण से कम नहीं कहा जा सकता। पर अन्तःकरण की शुद्धि के अभाव के कारण उसने सारे काम गलत किए।
साधनाओं में भी साधना मार्ग के अवरोधों, विक्षोभों एवं कुसंस्कारों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान होता है। वह शिष्य को अन्तः शक्तियों से परिचित ही नहीं कराते, वरन् उसे जाग्रत एवं विकसित करने, व्यक्तित्ववान बनाने के हर संभव उपाय भी करते हैं। वह अपनी प्रचण्ड प्राण ऊर्जा तपश्चर्या एवं पुण्य सम्पदा का एक अंश देकर शिष्य की पात्रता एवं क्षमता बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। गुरु द्वारा अपनी शक्ति को हस्ताँतरित करने की यह प्रक्रिया ‘शक्तिपात’ कहलाती है। शास्त्रों में उल्लेख है- ”तत्पातः शिष्येषु” अर्थात् उस शक्ति का पात शिष्यों में होता है।
साधना पथ में गुरुवरण अनिवार्य है। गुरु-कृपा के बिना इस दिशा में प्रगति संभव नहीं। शिवपुराण वायवीय संहिता में कहा गया है।
साधना है। तीसरी आराधना वह जिसके लिए हमने आपको अभी कहा। यह है समाज के लिए देश के लिए, संस्कृति के लिए, भगवान के लिए जीवन जीना। भगवान का विराट रूप यही है। जन मानस को ऊँचा उठाने के लिए लगे रहने को आराधना कहते हैं।
साधना का तत्वदर्शन-बौद्धिक चेतना पर नियंत्रण स्थापित करके अचेतन को दबाने से रोकना और उसे जाग्रत करना। इन प्रयोगों को यदि व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके तो निःसंदेह मनुष्य साधारण न रह कर असाधारण बन सकता है और वे विभूतियाँ अर्जित कर सकता है, जो उसे अतीन्द्रिय ज्ञान संपन्न बना सकती हैं।
साधना सिद्धि की दिशा में फैली कि नहीं। हमारी बात समाप्त। ॐ शाँतिः।
साधना क्रम में आगे बढ़ना चाहिए। स्थान ऐसा चुनना चाहिए जो कोलाहल रहित हो और जहाँ स्वच्छ वायु का आवागमन होता रहे।
गायत्री उपासना प्रज्ञायोग के रूप में करनी चाहिए। इसके पाँच अंग हैं (1) आत्म शोधन (2) देव पूजन (3) जप (4) ध्यान (5) विसर्जन।
साधना कर ली है, गुण कर्म, स्वभाव एवं चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से अपने को उत्कृष्ट आदर्शवादिता के साथ जोड़ने की प्रारंभिक जीवन साधना सम्पन्न कर ली है, वे सच्चे अर्थों में ब्राह्मण है। ऐसे व्यक्तियों को ही ब्रह्मतेज उपलब्ध करने, सिद्धियों को हस्तगत करने में सफलता मिलती है। उन्हें ही साधारण उपासना तक सीमित न रह कर गुप्त और रहस्यमयी गायत्री साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने का अधिकार मिलता है। ऐसे लोग योग और तप में संलग्न होकर उसका तत्वज्ञान हृदयंगम कर जीवन शोधन कर उसे ऊँचा उठा पाने में सफल होते हैं।
साधना पद्धति है जिसके अवलम्बन से शिष्य अपनी दुष्प्रवृत्तियों, कषाय-कल्मषों एवं कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाता तथा आत्मिक प्रगति करता है।
साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने का अधिकार मिलता है। ऐसे लोग योग और तप में संलग्न होकर उसका तत्वज्ञान हृदयंगम कर जीवन शोधन कर उसे ऊँचा उठा पाने में सफल होते हैं।
साधना का समुचित सत्परिणाम उत्पन्न होकर रहेगा।
साधना द्वारा साधक गुरु से प्राप्त करता है। यह कोई आकस्मिक क्रिया नहीं है जिसके द्वारा तत्काल चमत्कारी शक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं, वरन् एक लम्बे समय तक चलने वाली साधना पद्धति है जिसके अवलम्बन से शिष्य अपनी दुष्प्रवृत्तियों, कषाय-कल्मषों एवं कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाता तथा आत्मिक प्रगति करता है।
साधना पद्धति में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। विभिन्न प्रतीकों के अपनाए जाने के पीछे कुछ मनोविज्ञान के सूत्र सिद्धाँत सन्निहित रहे हैं। शिक्षण की व्यवहारिक विधियाँ रही हैं। इस तत्व को भली-भाँति न समझ पाने के कारण ही तथाकथित उपासक खाली रहते देखे जाते हैं। चिन्तन, चरित्र, व्यवहार एवं गुण, कर्म, स्वभाव में कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता।
साधना द्वारा प्रत्यक्ष करते रहे है और उन्हें प्रत्यक्ष तथा प्रमाणित करने की अब भी पूरी गुँजाइश है क्योंकि वह एक विज्ञान है जो प्रकृति के रहस्यों को अपने ढंग से सुलझाने में सुनिश्चित निष्कर्ष तक काफी समय पहले पहुँच चुका है। इन नियमों के अनुसार कोई व्यक्ति यदि अभी भी प्रयत्न करे तो उन नियमों और सिद्धाँतों के आधार पर अभी भी इन संभावनाओं को साकार किया जा सकता है।
साधना के दौरान 21 अप्रैल 1984 को “साधना से सिद्धि” विषय पर परिजनों के लिए दिया गया टेप संदेश प्रस्तुत है। उद्बोधन को यथावत् दिए जाने का पूरा प्रयास किया गया है।
साधना ग्रंथों एवं इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। अर्जुन, हनुमान, शिवाजी, विवेकानन्द, दयानन्द आदि के उदाहरण यह बताते हैं कि समर्थ सत्ता से, गुरु सत्ता से जुड़ने-समर्पित होने के पश्चात् उन्होंने जन प्रवाह के बहते हुए ढर्रे के जीवन से मुख मोड़ कर वह मार्ग अपनाया जो कठिनाइयों से भरा था। उनने संघर्षों का आह्वान किया तथा उनसे व्यक्तित्व को इतना परिष्कृत किया जिससे सभी लोग प्रकाश एवं प्रेरणा ले सकें। विवेकानंद में रामकृष्ण का, श्री माँ में अरविंद का व्यक्तित्व झाँकता दिखाई देता था। इनके जीवन में महत्ता अनुभूतियों की नहीं, फलश्रुतियों की-सौंपे गये उत्तरदायित्वों को पूरा करने की स्पष्ट देखी जाती है।
साधनात्मक पुरुषार्थ कर लिया जाय तो उससे प्राप्त दिव्य अनुदान युगों-युगों के लिए धन्य ही नहीं बनाएंगे अपितु साधक का नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में भी लिखवा देंगे। ऐसी विशिष्ट घड़ियाँ कभी हजारों लाखों वर्ष बाद आती हैं। स्वयं महाकाल इस वेला में सुपात्रों में अनुदान बाँटने के लिए तत्पर हुआ है। यों योगाभ्यास, तपश्चर्या, व्रतशीलता, ब्रह्मविद्या आदि के क्षेत्र में गहराई तक उतरने वाले ही कुछ ऋद्धि-सिद्धियों के अनुदान उपलब्ध कर पाते हैं पर कभी कभी ही ऐसा समय आता है जब पर ब्रह्म की सत्ता स्वयं अनुग्रह लुटा कर बहुमूल्य अनुदान उपहार के रूप में नगण्य से पुरुषार्थ के बदले देने की प्रक्रिया पूरी करती है। सन् 2009 तक चलने वाला समय कुछ ऐसा ही विशिष्ट है।
साधना से सिद्धि-’ अवश्य मिलती है।
साधना सत्रों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य है। परम पूज्य गुरुदेव की शक्ति का संवहन माता भगवती देवी कर रही है। उनकी साधना की प्रचण्डता से ही प्रतिपल अगणित व्यक्ति अनुदानों से लाभांवित हो रहे हैं।
साधना में प्रवृत्त होता है। पर भ्रान्तियों के कारण ऐसे साधकों में से कोई इना-गिना व्यक्ति ही परम तत्व को जान पाता है।
साधना और आत्म विकास की तपश्चर्या अपनी जगह अनिवार्य है किन्तु श्रुति यह भी संकेत करती है कि महानता से संपर्क साधने और लाभान्वित होने का अवसर भी न चूका जाय। यों ऐसे अवसर बिरले ही होते हैं व कभी- कभी ही किसी भाग्यशाली को मिलते हैं किन्तु कदाचित वैसा सुयोग बैठ जाय तो ऐसा अप्रत्याशित लाभ मिलता है जिसे लाटरी खुलने और देखते-देखते मालदार बन जाने के समतुल्य कहा जा सकता है।
साधना मार्ग के अवरोधों, विक्षोभों एवं कुसंस्कारों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान होता है। वह शिष्य को अन्तः शक्तियों से परिचित ही नहीं कराते, वरन् उसे जाग्रत एवं विकसित करने, व्यक्तित्ववान बनाने के हर संभव उपाय भी करते हैं। वह अपनी प्रचण्ड प्राण ऊर्जा तपश्चर्या एवं पुण्य सम्पदा का एक अंश देकर शिष्य की पात्रता एवं क्षमता बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। गुरु द्वारा अपनी शक्ति को हस्ताँतरित करने की यह प्रक्रिया ‘शक्तिपात’ कहलाती है। शास्त्रों में उल्लेख है- ”तत्पातः शिष्येषु” अर्थात् उस शक्ति का पात शिष्यों में होता है।
साधनाओं का मूलभूत आधार गायत्री है।
साधना करने से पहले ब्राह्मण बनना पड़ता है। कपड़े को रँगने से पहले धोना पड़ता है। मैले कपड़े पर कभी भी रंग नहीं चढ़ता। अपने आपको शुद्ध व पवित्र बनाने के लिए, जीवन का शोधन करने के लिए सेवा करनी पड़ती है। परोपकार और पुण्य इन दोनों के बिना कोई साधना सफल नहीं हो सकती।
साधनाओं को ऐसी किसी जादू की छड़ी के पाने का साधन मानते हैं, जिसे घुमाकर कुछ अद्भुत, अलौकिक आश्चर्यजनक पाया जा सके। दूसरों पर रौब गाँठा जा सके। जब मन आया तो अगत्स्य की तरह शाप देकर समुद्र सुखा दिया। जब मनमर्जी हुई तो विश्वामित्र की तरह इन्द्र को धमकाकर बरसात करवा दी।
साधना
साधना हमने जीवन भर की है। साधना अर्थात् माला जपना नहीं, साधक का जीवन जीना। हमने अपनी
साधना सम्पन्न कर ली है, वे सच्चे अर्थों में ब्राह्मण है। ऐसे व्यक्तियों को ही ब्रह्मतेज उपलब्ध करने, सिद्धियों को हस्तगत करने में सफलता मिलती है। उन्हें ही साधारण उपासना तक सीमित न रह कर गुप्त और रहस्यमयी गायत्री साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने का अधिकार मिलता है। ऐसे लोग योग और तप में संलग्न होकर उसका तत्वज्ञान हृदयंगम कर जीवन शोधन कर उसे ऊँचा उठा पाने में सफल होते हैं।
साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने पर ही हस्तगत होती है।
साधना मार्ग के पथिक हो। इस मार्ग पर किसकी उपलब्धियाँ क्या है? यह तो ज्ञात नहीं। पर ध्यान रखो इन दोनों के खरेपन की कसौटी है दुःखी जनों की निष्काम सेवा। साधना और लोकसेवा दोनों ही मानसिक कुशलता और बौद्धिक प्रखरता से नहीं उपजा करतीं।
साधना और लोकसेवा दोनों ही मानसिक कुशलता और बौद्धिक प्रखरता से नहीं उपजा करतीं। वाणी की प्रगल्भता भी इनके विकास के लिए यथेष्ट नहीं। हृदय की वृत्ति के विकास का एकमेव साधन है भावपूर्ण निष्काम सेवा।” हृदय कुहर से निकली तथागत की भावपूर्ण वाणी उपस्थिति प्रत्येक जन को आत्म परीक्षण के लिए विवश करने लगी।
साधना ठीक चल रही है। पर मन में वासनाएँ, तृष्णाएँ, सदा उमड़ती घुमड़ती रहती है मात्र लोक लाज से ही उन्हें आप कार्यान्वित नहीं कर पाते। मन की वह घुटन ही आपको असमंजस में डाले रहती है और बीमार करती है।
साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है। वह समाज के लोगों से सहानुभूति रखता है और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहार से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करता है।
साधना व तप को तो तिजोरी में बन्द करके रखा है। उसको हम सारे संसार के एक बड़े काम में खर्च करेंगे। यह जो कह देते है तो उससे किसी का भला हो जाता है। यह मात्र ब्राह्मण की विशेषता है।
साधना सफल नहीं हो सकती।
साधना की सफलता मन की एकाग्रता पर कम, यम-नियम के प्रति दृढ़ निष्ठ पर पूरी तरह निर्भर करती है। इसी को बताते हुए भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं, हजारों में से कोई बिरला साधना में प्रवृत्त होता है। पर भ्रान्तियों के कारण ऐसे साधकों में से कोई इना-गिना व्यक्ति ही परम तत्व को जान पाता है।
साधना की सिद्धि जितनी मिलनी चाहिए थी, हमें मिलती चली गयी। अभी और आपका बचा हुआ समय है, उसके बारे में बताइए? जब तक हमारा शरीर है, तब तक व्यक्ति के ही नहीं समाज के निमित्त हमारा रोम-रोम लगेगा, यह हमारा संकल्प है।
साधनाक्रम को आरंभ कर दिया जाना चाहिए। ऐसे अवसर बार-बार नहीं आते। यदि इस का लाभ उठा लिया गया तो यह निश्चित मान लिया जाना चाहिए कि अत्यधिक श्रेय उठा लेने वाले दूरदर्शियों में अपनी गणना हो गयी।
साधना, आराधना इन तीन सूत्रों पर चला है। ये तीनों क्या है? ये है जमीन, खाद और पानी। भगवान के चरणों में हमने अपने आपको समर्पित किया है व भगवान जितने शक्तिशाली है, उतने ही हम हो गए। ईंधन को आग में डाल देते हैं, वह भी उतना ही गरम और आग जैसा हो जाता है।
साधना के उद्गम स्रोत शाँतिकुँज युगतीर्थ से निरंतर संपर्क बनाए रहना व वहाँ सम्पन्न होने वाले शक्ति साधना सत्रों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य है। परम पूज्य गुरुदेव की शक्ति का संवहन माता भगवती देवी कर रही है। उनकी साधना की प्रचण्डता से ही प्रतिपल अगणित व्यक्ति अनुदानों से लाभांवित हो रहे हैं।
साधना करेंगे तो सिद्धियाँ भी आपको मिलेंगी। हमने साधना सही ढंग से की है व आपने गलत ढंग से की है। इसीलिए आप शिकायत करते पाए जाते हैं। गलत यह कि मात्र बीज बोना ही काफी नहीं, उसमें खाद-पानी देना भी उतना ही जरूरी है। खाद आप देंगे नहीं, पानी आप लगाएँगे नहीं तो आपकी उम्मीद लगाना कि फसल पैदा होगी, पेड़ में फल लगेंगे गलत है।
साधना को गुरजिएफ व रमण से कम नहीं कहा जा सकता। पर अन्तःकरण की शुद्धि के अभाव के कारण उसने सारे काम गलत किए। जार तथा उसकी पत्नी को भी प्रभावित किया। किन्तु गलत कामों के कारण उसे जहर दिया गया, गोलियाँ मारी गई। गले में पत्थर बाँध कर बोल्गा में फेंका गया।
साधना अर्थात् माला जपना नहीं, साधक का जीवन जीना। हमने अपनी
साधना पर भी यही तथ्य लागू होता है। साधक का अपना पुरुषार्थ प्रमुख है, उपासनात्मक उपचार उसे ही अपने भाव-जगत में करना है किन्तु वातावरण तथा परिस्थितियों की भी इन उपचारों में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, यह तथ्य नहीं बिसराया जाना चाहिए।
साधना की वैज्ञानिक प्रणाली बताने वाले महर्षि पातंजलि ने भी स्वीकारा है। उनके सूत्र “यथामिमत्ध्यानाद्धा” अर्थात्- अभीष्ट ध्यान चित्त की एकाग्रता को पूर्ण कर देता है। इससे स्पष्ट है कि उपासना की साकार विधि बाहर मूर्ति के रूप में होती है। कारण कि अनुराग के लिए बाहरी प्रतीक की जरूरत है। विभिन्न देशों के झण्डे महापुरुषों के चित्र इसी मानवीय स्वभाव के द्योतक हैं।
साधनात्मक पराक्रम ही अपरिमित फल देने वाला सिद्ध होता है। ऐसा ही कुछ समय युग संधि की इस वेला में हम सबके समक्ष उपस्थिति है। नौ वर्ष का एक अति विशिष्ट समय अब हमारे सामने है जिसका एक एक दिन नवरात्रि के एक दिन, एक पल के समान है। इस समय विशेष को यदि समझते हुए इसका लाभ उठाने का प्रयास किया जाय, आलस्य प्रमोद की दीर्घसूत्रता में न गँवाकर इसका विशिष्ट प्रयोजन हेतु उपभोग किया जाय तो न केवल अपना वरन् अपने साथ-साथ सारे जगत का कल्याण निश्चित है। तीर्थ स्नान तो कभी भी किया जा सकता है पर विशिष्ट पर्वों पर किये गए स्नान का विशिष्ट पुण्य है।
साधना का उपक्रम। जप संख्या कितनी हो यह अपनी सुविधा और संकल्प पर निर्भर है। न्यूनतम तीन माला तो होनी ही चाहिए।
साधनाओं में निरत होने वाले अधिकाँश लोग यह चीज भुला बैठे हैं। उनमें से ज्यादातर तरह-तरह की मानसिक कल्पनाओं को हथिया लेने के दिवा स्वप्न देखा करते हैं। कोई आकाशगमन की सिद्धि पाकर किसी अनजाने लोक की सैर करना चाहता है। किसी की इच्छा घर बैठे दूर की बात सुनने देखने की रहती है। प्रायः सभी व्यक्ति आध्यात्मिक साधनाओं को ऐसी किसी जादू की छड़ी के पाने का साधन मानते हैं, जिसे घुमाकर कुछ अद्भुत, अलौकिक आश्चर्यजनक पाया जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-August
साधना का समावेश मनुष्य का इतना बड़ा सौभाग्य है, जिस पर सृष्टि का सारा वैभव न्यौछावर किया जा सकता है। उससे न केवल व्यक्ति को सुख-शान्ति मिलती है अपितु सारे समाज की प्रगति और प्रसन्नता का मार्ग प्रशस्त होता है। परम पूज्य गुरुदेव ने साधना को ही युग परिवर्तन का आधार माना था। इसीलिए शान्तिकुँज की स्थापना हुई थी। साधनाओं को विज्ञान सम्मत प्रतिपादित करने के लिए ब्रह्मवर्चस की स्थापना का उद्देश्य भी यही था कि न केवल उन लोगों को, जिनमें से पहले से श्रद्धा के संस्कार हैं अपितु बुद्धिजीवी वर्ग को भी साधना की कक्षाओं में प्रवेश दिलाया जाये इसके बिना न तो मानवीय सुख-शान्ति की कल्पना की जा सकती है और न मनुष्य के पतन-पराभव की ओर बढ़ते हुए कदम रोके जा सकते हैं।
साधना वर्ष घोषित किया और पूरे वर्ष न केवल समूचे देश भर में अपितु विदेशों में भी इसी तरह के तीन-तीन दिवसीय साधना प्रधान गायत्री महामंत्र के 24 अखण्ड जप आयोजन सम्पन्न करने की घोषणा की। देवशक्तियों की अनुदान वर्षा ऐसे महापुरश्चरणों से ही संभव होती है। इतनी बड़ी संख्या में यह आयोजन सम्पन्न करने के लिए इस वर्ष 24 टोलियाँ निकालने और सभी 24 प्रान्तों में शक्तिसाधना का आलोक जगाने की तैयारी की गई है। प्राचीनकाल में ऋषि आश्रमों में स्थापित अखण्ड अग्नियों से गार्हपत्याग्नियाँ सारे देश में जाती थीं। जिस वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को बोध हुआ था, उस बोधि (वट) वृक्ष की शाखाएँ सारे विश्व में गई थी।
साधना स्थल की स्टेज पर देव साक्षी स्वरूप परम पूज्य गुरुदेव वंदनीय माता जी के चित्र एवं अखण्ड दीप की विधिवत वेदमंत्रों के साथ स्थापना की जायेगी। पूजा अर्चना के पश्चात् तीन दिवसीय साधना के अनुबंध बताये और संकल्प कराये जाएंगे और परम पूज्य गुरुदेव के स्थूल शरीर की सिद्धियों, शक्तियों की कार्यक्रमों पर प्रकाश डालने वाला प्रथम प्रवचन सम्पन्न होगा। जल यात्रा, कलश स्थापना कार्यक्रम टोली पहुँचने से पूर्व स्थानीय स्तर पर सम्पन्न किए जायँ। पहले दिन मात्र इतना ही कृत्य सम्पन्न होगा।
साधना का आलोक जगाने की तैयारी की गई है। प्राचीनकाल में ऋषि आश्रमों में स्थापित अखण्ड अग्नियों से गार्हपत्याग्नियाँ सारे देश में जाती थीं। जिस वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को बोध हुआ था, उस बोधि (वट) वृक्ष की शाखाएँ सारे विश्व में गई थी। उसी तरह प्रथम पुण्य तिथि पर सम्पन्न अखण्ड जप की ऊर्जा को सारे देश भर में इसी वर्ष पहुँचा देने का बड़ा निश्चय किया गया है।
साधना स्थल यथासंभव जन कोलाहल से अलग किन्तु महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान पर रखा जाये। उसे यथा संभव प्राकृतिक बनाने के लिए तोरण, बंदनवार और केले के पत्तों से आच्छादित किया जाये,
साधनाओं से मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का एक बड़ा लक्ष्य पूर्ण होगा।
साधना, आराधना का अवलम्बन ही है।
साधना की समग्रता, दार्शनिकता का विवरण अपने संपर्क क्षेत्र में बताते रहना चाहिए। उससे जो सन्तोष एवं आँतरिक आनन्द मिला है, उसका परिचय देते रहना चाहिए। ताकि जिन्हें इस मार्ग में ज्ञान नहीं है, उनकी भी जिज्ञासा जागे और अधिक विवरण जानने पर उस मार्ग पर चलने का उत्साह भी उभरे। स्वयं ही धर्मप्रचारक बनने और अपने परिवार, पड़ोस एवं परिचय क्षेत्र में प्रकाश वितरण की भूमिका निभानी चाहिए। आवश्यक नहीं कि यह पुण्य प्रचार मात्र प्रज्ञायोग तक ही सीमित हो।
साधना में भागीदारी का अक्षय पुण्य मान कर दें ताकि साधना सम्मेलनों की भारी माँग को पूरा किया जा सके। ईंधन खर्च तथा आयोजन की अवधि में टूट-फूट मरम्मत की जिम्मेदारी शान्तिकुँज की होगी।
साधनाओं को विज्ञान सम्मत प्रतिपादित करने के लिए ब्रह्मवर्चस की स्थापना का उद्देश्य भी यही था कि न केवल उन लोगों को, जिनमें से पहले से श्रद्धा के संस्कार हैं अपितु बुद्धिजीवी वर्ग को भी साधना की कक्षाओं में प्रवेश दिलाया जाये इसके बिना न तो मानवीय सुख-शान्ति की कल्पना की जा सकती है और न मनुष्य के पतन-पराभव की ओर बढ़ते हुए कदम रोके जा सकते हैं। समग्र परिवर्तन का एक मात्र आधार-उपासना-साधना, आराधना का अवलम्बन ही है।
साधना नियमित रूप से की जाती रहे तो अल्प समय में ही सद्गुणों के विकास, कार्यक्षमता की वृद्धि, तनाव, शैथिल्य, आभामण्डल में वृद्धि प्रभावोत्पादकता तथा लोक सम्मान-जनसहयोग के रूप में इसकी परिणतियाँ देखी जा सकती हैं। अष्टाँग योग के उच्चतम सोपानों पर कदम रखने वाले इस प्रारम्भिक अभ्यास को पहले कर लें तो बड़ी उपलब्धियाँ तो सहज ही मिल जाती हैं।
साधनात्मक प्रयत्न करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी यह भी है कि मन को सही दिशा दें। इच्छाओं-आकांक्षाओं का सही स्वरूप समझें ताकि उनमें से उचित का ही वरण कर सकें। श्रेयस के पथिक को लक्ष्य ही नहीं अपने चिंतन का स्वरूप भी निर्धारित करना पड़ता है। कारण कि उत्कृष्ट जीवन की ओर चलने में सर्वाधिक सहायक अथवा बाधक अपना चिन्तन एवं दृष्टिकोण ही होता है।
साधना के भाव नहीं पाये जाते तो इस नकली संतान से उस प्रकार की आशाएँ बाँधना तो और भी अधिक उपहासास्पद है। बुढ़ापे में सेवा लेने और पिण्डदान पाकर उद्धार कराने की बात सोचना तो और भी अधिक विडम्बना वाली है। बेटी-बेटे का अन्तर बरतने की संकीर्णता तो और भी अधिक हेय है। बुढ़ापे में सेवा लेने की बात किसी को सोचनी पड़े तो उस सम्बन्ध में भी बेटों की तुलना में बेटी से तो भी कुछ आशा की जा सकती है। समय बदल रहा है जिसमें बेटी-बेटे का अंतर अनायास ही समाप्त हो जायेगा।
साधना को भी एक पक्ष माना जाना चाहिए। इसे आराधना की संज्ञा देनी चाहिए। तभी आत्मिक प्रगति का त्रिवेणी संगम बन पड़ता है।
साधना कार्यक्रम रखने हो वे अविलम्ब पत्र लिखकर अथवा तार से आवेदन करें। स्मरण रखें यह एकाकी कार्यक्रम नहीं, अतएव आवेदन पत्र प्रायः 5 से लेकर 11 व्यक्तियों के हस्ताक्षरों सहित आने चाहिए। किसी को भी व्यक्तिगत सम्मान के लिए यह कार्यक्रम दिए नहीं जाएंगे। संघ शक्ति के अवतरण के लिए आयोजन की सभी व्यवस्थाएँ भी संघीय रहेंगी व्यक्तिवादी नहीं। सो यह परिपत्र जिन हाथों में पहुँचे, वे इसे अपने स्नेह संपर्क के सभी कर्मठ और मिशन में निष्ठा रखने वाले परिजनों को पढ़ा दें और सारी संभावनाओं पर परस्पर परामर्श के पश्चात् आयोजन के लिए आवेदन करें।
साधना करती है। इन दोनों का तात्पर्य प्रकारान्तर से प्रतिभा और सेवा साधना में सरसता अनुभव होने की प्रकृति ही समझी जा सकती है।
साधना से ही आती है। पवित्र हृदय में ही प्रभु का अवतरण होता है। महात्मा बुद्ध, ईसा, महावीर आदि का जीवन भी इसी तथ्य की साक्षी है।
साधना के अनुबंध बताये और संकल्प कराये जाएंगे और परम पूज्य गुरुदेव के स्थूल शरीर की सिद्धियों, शक्तियों की कार्यक्रमों पर प्रकाश डालने वाला प्रथम प्रवचन सम्पन्न होगा। जल यात्रा, कलश स्थापना कार्यक्रम टोली पहुँचने से पूर्व स्थानीय स्तर पर सम्पन्न किए जायँ। पहले दिन मात्र इतना ही कृत्य सम्पन्न होगा।
साधना आदि का भी समावेश रखा गया।
साधना कठोर और कष्टपूर्ण लगती है तो यह दोष भगवान का नहीं, जीवन नीति का है। वस्तुतः कठिन कर्तव्य और कठिनाईयों से भरे जीवन में भी मस्ती का आनन्द लिया जा सकता है। यही नहीं व्यक्तित्व के निर्माण और पूर्णता का लाभ भी इसी तरह हँसते-थिरकते प्राप्त किया जा सकता है, अपने जीवन में इस सत्य की गहन अनुभूति के बाद। तभी तो प्रसिद्ध वैज्ञानिक जूलियन हक्सले ने लिखा है व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए जीवन में प्रेम का आरोपण बहुत जरूरी है।
साधना स्थल पर किसी तरह की कोई भी शाब्दिक हलचल नहीं होगी। उस स्थान पर कठोरतापूर्वक मौन व्रत का पालन किया जायेगा। व्यवस्थापकों को कोई बात करनी अनिवार्य होगी, तो वे संकेतों में करेंगे अथवा इतनी कम आवाज में, जिसे दो के अतिरिक्त तीसरा न सुन सके।
साधना उसकी धुलाई-सफाई कर समग्र स्वास्थ्य का आधार ही नहीं खड़ी करती, वरन् उसे समुन्नत,-सुसंस्कृत बनाने एवं प्रतिभा प्रखरता से सुसज्जित करने का काम भी बहुत हद तक पूरा करती है।
साधना सम्मेलनों की भारी माँग को पूरा किया जा सके। ईंधन खर्च तथा आयोजन की अवधि में टूट-फूट मरम्मत की जिम्मेदारी शान्तिकुँज की होगी।
साधना का निर्धारण तो स्पष्ट ही है पर उसकी साधना, सुसंस्कारिता की जीवन साधना और लोकमंगल की परमार्थ साधना को भी एक पक्ष माना जाना चाहिए। इसे आराधना की संज्ञा देनी चाहिए। तभी आत्मिक प्रगति का त्रिवेणी संगम बन पड़ता है।
साधना स्थल आकार में बड़ा हो, तो समापन दीप यज्ञ वहीं सम्पन्न कराया जा सकता है। तीसरे दिन ही दीपयज्ञ के पश्चात् अन्तिम परम पूज्य गुरुदेव की कारण सत्ता और मिशन की भावी संभावनाओं पर प्रवचन सम्पन्न हो सकेगा।
साधनाओं की विपुलता वाले भी चैन से कहाँ बैठ पाते हैं? जो मिलता है वह कम प्रतीत होता? इससे बहुत अधिक पाने की उत्कंठा कुछ हस्तगत होने के साथ-साथ ही भड़कती चली जाती है। ऐसा कदाचित ही कभी कहीं हुआ हो कि आज जो चाहा जा रहा है वह उपलब्ध हो जाय तो उतने भर से ही संतोष करते बन पड़े। आवश्यकताएँ सीमित हैं, उन्हें तो हर कोई थोड़े प्रयत्नों से पूरी कर सकता है।
साधना मार्ग के पथिक के लिए इस बात का निर्देश दिया गया है कि शाकाहारी सात्विक आहार ही अपनाया जाय और उसकी
साधना काल की पवित्रता और मर्यादाओं का अनुपालन सभी को एक समान करना अनिवार्य होगा।
साधना प्रक्रिया युग मनीषी द्वारा प्रस्तुत की गयी है, जिसे हर मान्यता और हर पंथ का व्यक्ति अपना सकता है। साथ ही उन असमंजसों का वैकल्पिक समाधान भी पा सकता है। जो अनेक विधानों पर दृष्टिपात करने पर कौन सही कौन गलत के रूप में सामने आते रहते हैं।
साधना में मनोयोग और भाव संवेदन का समुचित समावेश सहज ही चाहिए। प्रज्ञायोग में भी।
साधना करोगे तो पहले ब्राह्मण बनो। साधु अपने आप बन जाओगे। पीले कपड़े पहनते हो कि नहीं, पर मन को पीला कर लो। सेवा बुद्धि का, दूसरों के प्रति पीड़ा का, भावसंवेदना का विकास करना ही साधुता को जगाना है। आज इस वर्ष श्रावणी
साधना, पदयात्रा, शीत ताप सहन जैसे मन मारने वाले अनुशासन इसीलिए अपनाये जाते हैं कि अभावग्रस्त अथवा कठिनाइयों से भरी हुई परिस्थितियों में बिना खिन्न हुए समत्व बुद्धि के साथ किस प्रकार रहा जा सकता है। पानी के प्रवाह को रोकने से जो प्रतिरोधी शक्ति उत्पन्न होती है उससे शक्तिशाली बिजली घर बनते है। लालसाओं और लिप्साओं पर नियंत्रण लगाने से खिन्नता होनी स्वाभाविक है, पर मन को निग्रहीत करके जब प्रस्तुत विपन्नता को मनोबल वृद्धि की दृष्टि से स्वेच्छापूर्वक अपनाया जाता है तो वह तपस्या बन जाती है। तप−साधना से संकल्प बल, मनोबल, साहस, धैर्य जैसे अनेक सद्गुणों का विकास होता है और आत्मनिष्ठा का परिपाक होता है।
साधना से पूर्व दीक्षा संस्कार सम्पन्न होंगे। उसके तुरन्त बाद अखण्ड जप का क्रम यथा पूर्व प्रारम्भ हो जायेगा। अन्य कोई संस्कार होने होंगे, तो वह अलग प्रवचन पंडाल में होंगे। दिन में शक्ति साधना स्थल पर किसी तरह की कोई भी शाब्दिक हलचल नहीं होगी। उस स्थान पर कठोरतापूर्वक मौन व्रत का पालन किया जायेगा।
साधनायें प्रायः निष्फल ही सिद्ध होती है। हर साधना में मनोयोग और भाव संवेदन का समुचित समावेश सहज ही चाहिए। प्रज्ञायोग में भी।
साधना या युग साधना का नाम भी दिया जा सकता है। यह विशुद्ध मंडन है। इसमें किसी प्रक्रिया के खण्डन का कोई प्रतिपादन नहीं, मतभेदों के उभरने के स्थान पर एक ऐसी सार्वभौम साधना प्रक्रिया युग मनीषी द्वारा प्रस्तुत की गयी है, जिसे हर मान्यता और हर पंथ का व्यक्ति अपना सकता है। साथ ही उन असमंजसों का वैकल्पिक समाधान भी पा सकता है। जो अनेक विधानों पर दृष्टिपात करने पर कौन सही कौन गलत के रूप में सामने आते रहते हैं।
साधनायें समुचित फल प्रदान करती हैं। अनियमित, अस्त−व्यस्त, उपेक्षापूर्ण, अन्यमनस्क भार से किसी प्रकार चिन्ह पूजा की तरह निपटाई हुई साधनायें प्रायः निष्फल ही सिद्ध होती है। हर साधना में मनोयोग और भाव संवेदन का समुचित समावेश सहज ही चाहिए। प्रज्ञायोग में भी।
साधना व तुम्हारा निष्काम समर्पण चाहिए।
साधना, सुसंस्कारिता की जीवन साधना और लोकमंगल की परमार्थ साधना को भी एक पक्ष माना जाना चाहिए। इसे आराधना की संज्ञा देनी चाहिए। तभी आत्मिक प्रगति का त्रिवेणी संगम बन पड़ता है।
साधना की कक्षाओं में प्रवेश दिलाया जाये इसके बिना न तो मानवीय सुख-शान्ति की कल्पना की जा सकती है और न मनुष्य के पतन-पराभव की ओर बढ़ते हुए कदम रोके जा सकते हैं। समग्र परिवर्तन का एक मात्र आधार-उपासना-साधना, आराधना का अवलम्बन ही है।
साधना बना दिया गया। इतने पर भी इसकी प्रभावोत्पादक क्षमता कम नहीं हुई। मधुर स्वर लहरियों का प्रत्यक्ष प्रभाव आज भी देखा और अनुभव किया जा सकता है।
साधनाओं में आहार की कारण शक्ति को विकसित करके उसके उपयोग का विधान है। मनुस्मृति में साधकों के लिए भक्ष्य-अभक्ष्य आहार की लम्बी सूची बताई गई है और कहा गया है कि आत्मोन्नति के इच्छुकों को अभक्ष्य आहार अनजाने में भी नहीं करना चाहिए। यदि ऐसा हो भी जाय तो चांद्रायण स्तर का व्रत करना चाहिए। योगशास्त्रों और साधना ग्रन्थों ने तो अंतःकरण को पवित्र एवं परिष्कृत करने तथा मनः संस्थान को प्रखर प्रतिभाशाली बनाने के लिए सात्विक आहार ही अपनाने को कहा है। गीता में भगवान कृष्ण ने शरीर, मन और भावनाओं पर आहार के संभावित प्रभावों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है।
साधना, प्रार्थना-अभ्यर्थना के साथ ही आराधना का भी उनके दैनिक कृत्यों में अनिवार्य रूप से समावेश था।
साधनाओं का क्रियान्वयन। हर दिन यज्ञ सप्ताह में एक दिन की कमाई परमार्थ प्रयोजनों को निमित्त सुनियोजन। न्यूनतम यह राशि प्रतिदिन बीस पैसे तो होनी ही चाहिए।
साधना से मिलेगी। आज मिशन का सारा गतिचक्र इसी परिधि में घूम रहा है।
साधना के उपचार प्रयोगों से मनोमयकोष को अधिक परिष्कृत और सबल संपन्न न बनाया जा सके।
साधना प्रधान गायत्री महामंत्र के 24 अखण्ड जप आयोजन सम्पन्न करने की घोषणा की। देवशक्तियों की अनुदान वर्षा ऐसे महापुरश्चरणों से ही संभव होती है। इतनी बड़ी संख्या में यह आयोजन सम्पन्न करने के लिए इस वर्ष 24 टोलियाँ निकालने और सभी 24 प्रान्तों में शक्तिसाधना का आलोक जगाने की तैयारी की गई है। प्राचीनकाल में ऋषि आश्रमों में स्थापित अखण्ड अग्नियों से गार्हपत्याग्नियाँ सारे देश में जाती थीं। जिस वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को बोध हुआ था, उस बोधि (वट) वृक्ष की शाखाएँ सारे विश्व में गई थी।
साधना स्थल पर पूर्णाहुति मंत्र से विसर्जन कर दिया जाए और दीप यज्ञ प्रवचन पंडाल में सम्पन्न किया जाये, पर यदि संख्या सीमित ही रहे या साधना स्थल आकार में बड़ा हो, तो समापन दीप यज्ञ वहीं सम्पन्न कराया जा सकता है। तीसरे दिन ही दीपयज्ञ के पश्चात् अन्तिम परम पूज्य गुरुदेव की कारण सत्ता और मिशन की भावी संभावनाओं पर प्रवचन सम्पन्न हो सकेगा।
साधना से संकल्प बल, मनोबल, साहस, धैर्य जैसे अनेक सद्गुणों का विकास होता है और आत्मनिष्ठा का परिपाक होता है।
साधना और लोकमंगल की परमार्थ साधना को भी एक पक्ष माना जाना चाहिए। इसे आराधना की संज्ञा देनी चाहिए। तभी आत्मिक प्रगति का त्रिवेणी संगम बन पड़ता है।
साधना में सर्वप्रथम यम-नियम की गणना की गई है। यह अन्तरंग और बहिरंग सुव्यवस्था के ही दो रूप हैं। जिसने इस दिशा में जितनी प्रगति की, समझना चाहिए कि उसे उतनी ही आत्मिक प्रगति हस्तगत हुई और उसकी क्षमता उस स्तर की निखरी, जिसका वर्णन महामानवों में पाई जाने वाली ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में किया जाता है। उपासनात्मक समस्त कर्मकाण्डों की संरचना इसी एक प्रयोजन के लिए हुई है, कि व्यक्ति की पशु-प्रवृत्तियों के घटने और दैवी सम्पदाओं के बढ़ने का सिलसिला क्रमबद्ध रूप से चलता रहे। यदि उद्देश्य का विस्मरण कर दिया जाय और मात्रा पूजा परक क्रिया-कृत्यों को ही सब कुछ मान लिया जाय, तो यह चिन्ह-पूजा का निर्जीव उपक्रम ही माना जायगा और उतने से बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियों की आशा करने वालों को निराश ही रहना पड़ेगा।
साधना ही भक्तियोग कहलाती है। अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति करने एवं महान उपलब्धियों से लाभान्वित होने के लिए तीनों का ही अवलम्बन लेना होगा। ईश्वरीय दिव्य अनुदानों का वास्तविक आनन्द तभी उठाया जा सकता है।
साधना पथ की महान उपलब्धियाँ इन दोनों के समन्वय पर ही अवलम्बित है। कर्मयोग इन्हें चिरस्थायित्व प्रदान करता है।
साधना का विषय रहा, तब तक न केवल उसका प्रभाव मनुष्य पर देखा गया, वरन् पशुओं को मुग्ध करने, साँपों का शमन करने, पागल, जंगली हाथियों को वश में करने से लेकर फूल खिला देने, वर्षा कराने, पत्थर पिघला देने जैसे असंभव कार्य तक सम्पन्न कर सकना संभव था। पर कालान्तर में इसे मात्र मनोरंजन का साधना बना दिया गया। इतने पर भी इसकी प्रभावोत्पादक क्षमता कम नहीं हुई। मधुर स्वर लहरियों का प्रत्यक्ष प्रभाव आज भी देखा और अनुभव किया जा सकता है।
साधना में प्रवेश का प्रथम पड़ाव था, जिसमें 24 हजार परिजनों ने भावनापूर्वक भाग लिया। एक बार में 2400 परिजन अखण्ड जप में बैठते थे। 24 घंटे में प्रायः पाँच करोड़ अर्थात् 5 दिन में 24 करोड़ गायत्री मंत्र जप का एक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान शक्ति स्वरूपा वंदनीया माता जी के संरक्षण में सम्पन्न हुआ। उन्होंने तभी इस वर्ष को शक्ति साधना वर्ष घोषित किया और पूरे वर्ष न केवल समूचे देश भर में अपितु विदेशों में भी इसी तरह के तीन-तीन दिवसीय साधना प्रधान गायत्री महामंत्र के 24 अखण्ड जप आयोजन सम्पन्न करने की घोषणा की। देवशक्तियों की अनुदान वर्षा ऐसे महापुरश्चरणों से ही संभव होती है।
साधना है। साधु तुम अभी बने नहीं हो। मन से ब्राह्मणत्व की साधना करोगे तो पहले ब्राह्मण बनो। साधु अपने आप बन जाओगे। पीले कपड़े पहनते हो कि नहीं, पर मन को पीला कर लो।
साधना थी-उथल मनोरंजन का माध्यम नहीं। जब तक यह साधना का विषय रहा, तब तक न केवल उसका प्रभाव मनुष्य पर देखा गया, वरन् पशुओं को मुग्ध करने, साँपों का शमन करने, पागल, जंगली हाथियों को वश में करने से लेकर फूल खिला देने, वर्षा कराने, पत्थर पिघला देने जैसे असंभव कार्य तक सम्पन्न कर सकना संभव था। पर कालान्तर में इसे मात्र मनोरंजन का साधना बना दिया गया। इतने पर भी इसकी प्रभावोत्पादक क्षमता कम नहीं हुई। मधुर स्वर लहरियों का प्रत्यक्ष प्रभाव आज भी देखा और अनुभव किया जा सकता है।
साधनाओं के अतिरिक्त “प्रज्ञायोग“ को एक विशेष बलवर्धक रसायन सेवन करने की तरह अपनाया जा सकता है।
साधना को ही युग परिवर्तन का आधार माना था। इसीलिए शान्तिकुँज की स्थापना हुई थी। साधनाओं को विज्ञान सम्मत प्रतिपादित करने के लिए ब्रह्मवर्चस की स्थापना का उद्देश्य भी यही था कि न केवल उन लोगों को, जिनमें से पहले से श्रद्धा के संस्कार हैं अपितु बुद्धिजीवी वर्ग को भी साधना की कक्षाओं में प्रवेश दिलाया जाये इसके बिना न तो मानवीय सुख-शान्ति की कल्पना की जा सकती है और न मनुष्य के पतन-पराभव की ओर बढ़ते हुए कदम रोके जा सकते हैं। समग्र परिवर्तन का एक मात्र आधार-उपासना-साधना, आराधना का अवलम्बन ही है।
साधना में सरसता अनुभव होने की प्रकृति ही समझी जा सकती है।
साधना ग्रन्थों ने तो अंतःकरण को पवित्र एवं परिष्कृत करने तथा मनः संस्थान को प्रखर प्रतिभाशाली बनाने के लिए सात्विक आहार ही अपनाने को कहा है। गीता में भगवान कृष्ण ने शरीर, मन और भावनाओं पर आहार के संभावित प्रभावों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। आध्यात्मिक प्रगति के आकाँक्षी और साधना मार्ग के पथिक के लिए इस बात का निर्देश दिया गया है कि शाकाहारी सात्विक आहार ही अपनाया जाय और उसकी
साधना का नाम भी दिया जा सकता है। यह विशुद्ध मंडन है। इसमें किसी प्रक्रिया के खण्डन का कोई प्रतिपादन नहीं, मतभेदों के उभरने के स्थान पर एक ऐसी सार्वभौम साधना प्रक्रिया युग मनीषी द्वारा प्रस्तुत की गयी है, जिसे हर मान्यता और हर पंथ का व्यक्ति अपना सकता है। साथ ही उन असमंजसों का वैकल्पिक समाधान भी पा सकता है। जो अनेक विधानों पर दृष्टिपात करने पर कौन सही कौन गलत के रूप में सामने आते रहते हैं।
साधना में आनन्द क्यों नहीं? उनके मन में एक तर्क उठा। इस तर्क ने उनका मन ढीला कर दिया।
साधना और अमृत वचन, उसके तुरन्त पश्चात शंख ध्वनि के साथ अखंड जप प्रारम्भ होगा। यह जप सूर्योदय से प्रारम्भ होगा और सूर्यास्त तक चलता रहेगा। अखण्ड जप के समय अखण्ड दीपक प्रज्वलित रखना अनिवार्य रहेगा। अखंड जप करने वाले परिजन एक-एक घंटे की पारियों में बदलते रहेंगे। नये बैठने वाले पाटों पर रखी तश्तरी और पंचपात्र आचमनी से पवित्रीकरण करने के पश्चात् जप प्रारम्भ करते रहेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-March
साधनाओं की आवश्यकता नहीं।”
साधना बन जाते हैं। इसका प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है। यह विहार क्रम जिसे सात्विक मिला है, उसका मन न कुमार्गगामी होगा न उच्छृंखल, वह उद्धत आचरण नहीं करता। जानता है कि मेरा अस्तित्व सेवा करना है, मुझे सेवक के रूप में बनाया गया है,मेरा कर्तव्य आत्मा की सहायता करना है। मुझे कोई ऐसा काम न करना चाहिए, जिससे जीवात्मा के जीवन लक्ष्य में बाधा-व्यवधान उत्पन्न होता है।
साधना के बलबूते अर्जित करते हैं। इसी के अनुपात से कोई देवात्मा, महामानव, सिद्ध पुरुष आदि बन सकता है। जिस प्रकार पतंग के पतले धागे में भी कभी-कभी कारणवश विद्युत प्रवाह आ जाता है, या उसे प्रयत्नपूर्वक आकर्षित - अर्जित कर लिया जाता है, उसी प्रकार मनुष्य में दैवी शक्तियों का समावेश भी हो जाता है। यह बड़ी मात्रा में होती है, तो उसे व्यक्तित्व की असाधारण मात्रा में देखा पाया जाता है। दिव्य व्यक्तित्व इसी के सहारे उपलब्ध या विकसित होता है, किन्तु अतिरिक्त प्रयत्न करने पर दोनों के बीच घनिष्ठता भी उत्पन्न हो जाती है और परस्पर का आश्चर्यजनक आदान-प्रदान भी आरंभ हो जाता है।
साधना की सफलता के लिए सबसे पहला एवं अनिवार्य कदम “इन्द्रिय निग्रह” है। यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं, पर उनमें से दो ही प्रधान हैं पहली- स्वादेन्द्रिय और दूसरी कामेन्द्रिय। इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान है। उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती है। रसना को जिसने जीता, वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा।
साधना, स्वाद को, जिव्हा को वश में करके आरंभ की जाती है। चटोरेपन की वेदी पर न केवल आरोग्य और दीर्घ जीवन बलि चढ़ जाता है, वरन् आत्मसंयम की साधना भी मात्र मखौल बनकर रह जाती है।
साधना का भी अधिकाधिक आश्रय लिया जा रहा है।
साधनाओं की विवेचना करके विभिन्न पक्षों को देखते हुए विस्तार-रहस्य को भली प्रकार समझा जा सकता है।
साधना भी मात्र मखौल बनकर रह जाती है।
साधना करने वाले को सर्वप्रथम अपनी रसना को वश में रखना अनिवार्य है। इसके लिए स्वाद नियंत्रण परमावश्यक है। उनके अनुसार जो रसना अर्थात् जीभ के स्वाद पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता, वह विषयों वासनाओं पर भी विजय नहीं प्राप्त कर सकेगा। इसलिए ब्रह्मचर्य पर जिनकी आस्था है, उन्हें अस्वादव्रत लेना चाहिए और सात्विक आहार भूख से कम खाना चाहिए।
साधना की है। यही मेरी ऊर्जास्विता और शक्ति का स्त्रोत बना है।” इन शब्दों ने प्रयाग के पण्डितों को चौंका दिया-यही तो वे ढूँढ़ने आए थे क्या है महापण्डित कल्लट का शक्ति स्त्रोत? उन्हें स्वयं पर शर्म लगने लगी थी। इधर वह कह रहे थे-”मेरा कर्तृत्व भूर्जपत्रों पर कुछ अक्षरों को जोड़ने तक सीमित नहीं रहा।
साधना यदि सच्चे अर्थों में की गयी हो, तो उसकी दोनों आत्मिक ऋद्धि-सिद्धियों, स्वर्ग और मुक्ति के रूप में निरन्तर अनुभव में उभरती रहती हैं और उनके रसास्वादन से हर घड़ी कृत-कृत्य हो चलने का अनुभव होता है।
साधना। आत्म शोधन कर इन दोनों के लिए यदि स्थिर मति और प्रगाढ़ निष्ठ के साथ प्रयास किया जाय तो निःसन्देह आत्मिक प्रगति भी उसी तरह मिल सकती है, जैसी कि भौतिक प्रगति।
साधना के कारण वे शान्ति के नोबुल पुरस्कार के अधिकारी व हजारों लोगों के प्रेरणा स्त्रोत बने।
साधना के प्रतिफलों की चमत्कार भरी झलक मिलती है।
साधना की जाय, तो उसके फल-स्वरूप किस प्रकार उनमें सन्निहित दिव्य शक्तियों कि उपलब्धि होती रहे। अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों को इसी प्रकार के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिक्रिया समझा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के रूप में परामनोविज्ञानी मानवी सत्ता में सन्निहित जिन विभूतियों का वर्णन निरूपण करते हैं, उन सबकी संगीत गायत्री मंत्र के खण्ड-उपखण्डों के साथ पूरी तरह बैठ जाती है। दैवी भागवत सुविस्तृत उपपुराण है। उसमें महाशक्ति के अनेक रूपों की विवेचना तथा शृंखला है।
साधना इसी प्रयत्नशीलता को कहते हैं।
साधना में लगाना चाहिए।
साधना करनी चाहिए।
साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही चाहिए। इस दिशा में एक कदम उठना ही चाहिए, भले ही वह आरंभ में अस्वाद व्रत के रूप में ही क्यों न हो। वस्तुतः अस्वादव्रत अपने आप में एक महाव्रत है। महात्मा गाँधी ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है और अपने सप्तमहाव्रतों में इसे प्रमुख स्थान दिया है। यह एक ऐसा महाव्रत है, जिसे उन्होंने स्वयं एवं विनोबा जैसे अनेकों महामानवों ने अपनाया और उस आधार पर अपने आहार विहार को उत्तरोत्तर शुद्ध-सात्विक बनाते हुए साधना पथ पर आगे बढ़े और अभिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए।
साधना प्रयत्नों द्वारा अर्जित की हुई होती हैं। तपस्वी इसी प्रयत्न में लगे रहते हैं। योगियों का पुरुषार्थ इसी उपार्जन-अर्जन के लिए होता है। ऋषि, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, देवर्षि इसी स्तर की क्षमता अपने भीतर अत्यन्त कष्टसाध्य प्रयत्नों द्वारा अर्जित करते हैं। जो जितनी, जिस स्तर की सफलता प्राप्त कर लेता है, वह उतने ही बढ़े-चढ़े स्तर का सिद्ध पुरुष बन जाता है।
साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही होती है।
साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।
साधना जरूरी समझी होगी।
साधना-शास्त्रों में वर्णित है। गायत्री को नौ शब्दों की व्याख्या में निरूपित किया गया है कि इनसे किस पक्ष की, किस प्रकार साधना की जाय, तो उसके फल-स्वरूप किस प्रकार उनमें सन्निहित दिव्य शक्तियों कि उपलब्धि होती रहे। अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों को इसी प्रकार के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिक्रिया समझा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के रूप में परामनोविज्ञानी मानवी सत्ता में सन्निहित जिन विभूतियों का वर्णन निरूपण करते हैं, उन सबकी संगीत गायत्री मंत्र के खण्ड-उपखण्डों के साथ पूरी तरह बैठ जाती है। दैवी भागवत सुविस्तृत उपपुराण है।
साधना पथ पर आगे बढ़े और अभिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए। सप्ताह में एक दिन भी इसे पालन किया जाय, तो मन की संयम शक्ति और दृढ़ता बढ़ती है। यह बढ़ोत्तरी धीरे-धीरे मनुष्य में उन गुणों का भी विकास कर देती है, जो महापुरुषों-महामानवों में होने ही चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-November
साधना है आश्वलायन।
साधना और संघर्ष का समन्वय है। इसी आधार पर उनने अपने साधनों से सारे विश्व में नवयुग का शंख बजाया और नए जागरण का वातावरण बनाया। उनके न रहने पर अनुयायियों ने अहिंसा की, पूजा-पाठ की सस्ती लकीरें पीटते रहना तो जारी रखा किन्तु अनीति से लड़ने की कष्ट साध्य प्रक्रिया की ओर से मुँह मोड़ लिया। फलतः बौद्ध धर्म मध्य एशिया से चढ़-दौड़ने वाले डाकुओं द्वारा देखते-देखते पद दलित कर दिया गया। शौर्य-साहस की तेजस्विता को खो बैठने वालों की जो दुर्गति होती है वही अपने देश की भी हुई।
साधना सर्वोत्तम एवं सर्वाधिक सहज कुण्डलिनी-साधना विधान है।
साधना से हैं और उसको सफल करने के लिए बहुत बड़े संयम, त्याग, समय, एवं मार्ग निर्देशक की जरूरत है। हमारी प्रवृत्ति भी उसके अनुकूल है। किन्तु परिस्थिति इस योग्य नहीं कि सब कुछ त्याग साधना में जुटा जाए, तो वह विचार ग्राह्य होते हुए भी अग्रहणीय है। इसको क्रियान्वित करने के लिए समय की प्रतीक्षा करनी होगी और तब तक करनी होगी जब तक परिस्थिति अनुकूल न हो जाय। विचार ग्रहण करके उसे अपने अन्तराल में सँजो लेना होगा और धीरे-धीरे अन्दर मन में चिन्तन करते हुए उसे दृढ़ से दृढ़तर बनाते रहना होगा।
साधना के तीन सोपान-दीक्षा के तीन चरण। पहला ‘भू’, मंत्र दीक्षा, दूसरा ‘भुवः’ प्राण दीक्षा और तीसरा ‘स्वः’ ब्रह्म दीक्षा। प्राणदीक्षा को ही अग्निदीक्षा कहा गया है। ब्रह्म दीक्षा उससे आगे की बात है।
साधना की यह आरंभिक कक्षा साकार उपासना से शुरू होती है और धीरे-धीरे विकसित होकर वह निराकार तक जा पहुँचती है। मन किसी रूप पर ही जमता है। निराकार का ध्यान पूर्ण परिपक्व मन ही कर सकता है, आरंभिक अभ्यास के लिए वह सर्वथा कठिन है। इसलिए साधना का आरम्भ साकार उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनायें दो कक्षाओं की भाँति हैं जिसमें आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है और बाद में वही कागज स्याही और पेन से लिखने लगता है।
साधना का आरम्भ साकार उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनायें दो कक्षाओं की भाँति हैं जिसमें आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है और बाद में वही कागज स्याही और पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर है, पर इसमें कोई विरोध नहीं है। साकार का अवलम्बन लेकर ही निराकार में प्रवेश किया जाता है।
साधना में उच्चस्तरीय विकास के लिए साधक के चित्त में सम्प्रसादवृत्ति अर्थात् सहज प्रसन्नता का होना अनिवार्य बताया गया है। किन्तु सामाजिक पारिवारिक और भावनात्मक समस्याएं जन साधारण से प्रायः यह प्रसन्नता छीन लेती हैं। उपासना के क्षणों में भी वह तनावग्रस्त बना रहता है और उसमें वह तल्लीनता नहीं आ पाती जो साधना की सफलता के लिए अनिवार्य है। मानसिक प्रतिक्रियाओं की यह परस्पर विरोधी खींचातानी तनाव को और बढ़ा देती है। उपासना में बैठने के लिए आसन की स्थिरता भी आवश्यक है व उसके लिए शैथिल्य का अभ्यास आवश्यक है।
साधना ग्रंथों में, अध्यात्म शास्त्रों में जप के साथ ध्यान को अनिवार्य बताया गया है। गायत्री उपासना के बारे में कहा गया है-
साधना में तीव्र गति से प्रगति होना सुनिश्चित है। जप में मन तभी लगता है जब आराध्य के प्रति-माता के प्रति प्रेम का, आत्मीयता का, उफान उमगने लगे। इससे व्यावहारिक जीवन में भी निर्मलता बढ़ती जाती है और चहुँ ओर से साधक पर परमात्मा का अनुदान-वरदान बरसता दिखाई देता है।
साधना के उच्च सोपानों पर आगे बढ़ने के लिए मन को एकाग्र करने की परिधि को आत्मिक विकास के
साधनाओं में ध्यान की विभिन्न साधनायें, आसन, प्राणायाम आदि विभिन्न प्रकार के अभ्यास इस दृष्टि से बनाये गये है जिससे शरीर के उन अवयवों तक की मालिश हो जाती है साधारण व्यायाम जिन पर प्रभाव नहीं डाल पाते। मर्मस्थलों में छिपी शक्तियों को उन्नयन करना,उभारना और उनका लाभ लेना इन क्रियाओं का उद्देश्य है। इनके द्वारा बुरी आदतों एवं कुसंस्कारों को,जो नाना प्रकार की व्यथाओं-वेदनाओं की जड़ है उनको बदल कर उनके स्थान पर स्वस्थ आदतों एवं सुसंस्कारों की स्थापना की जा सकती है।, इससे न केवल मन की कमजोरियाँ दूर होती है,वरन् प्रसुप्त पड़ी अंतःशक्तियाँ धीरे-धीरे जाग्रत एवं विकसित होकर ऐसे सत्परिणाम प्रस्तुत करती है जिन्हें चमत्कारी कहा जा सके।
साधना से उल्टा दूसरा मार्ग है ‘वाममार्ग।’ वाम अर्थात् टेढ़ा-उलटा। यह दैत्य पथ है। इसी को तंत्र कहते है। रावण, मारीच, कुँभकरण, भस्मासुर आदि तंत्र मार्ग के साधक थे।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं (1) मद्यं (2) मास (3) मीनं (4) मुद्रा (5) मैथुन एवं च। यह पाँच मकार ही तंत्रमार्ग के आराध्य हैं। वे माँस खाते हैं और देवी देवताओं के नाम पर पशुओं का ही नहीं मनुष्यों तक का वध करते हैं, ताकि उनकी निष्ठुरता बधिकों की तरह अभ्यास में आ सके और स्वभाव का अंग बन सके। नशे की स्थिति में भी मनुष्य अर्धविक्षिप्त हो जाता है और वैसी स्थिति में क्रूर कर्म करते हुए संकोच नहीं होता। मछलियों को पकड़ना, तड़पाना, मारना भी उसी स्तर का क्रूर कर्म है।
साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल अष्टवक्र रूपी विभूति के रूप में ऋषि-दम्पत्ति को मिल चुका था। यही उनकी अदम्य इच्छा भी थी।
साधना में जुटा जाए, तो वह विचार ग्राह्य होते हुए भी अग्रहणीय है। इसको क्रियान्वित करने के लिए समय की प्रतीक्षा करनी होगी और तब तक करनी होगी जब तक परिस्थिति अनुकूल न हो जाय। विचार ग्रहण करके उसे अपने अन्तराल में सँजो लेना होगा और धीरे-धीरे अन्दर मन में चिन्तन करते हुए उसे दृढ़ से दृढ़तर बनाते रहना होगा। साधना पथ पर धीरे-धीरे परिस्थिति से सामंजस्य करते हुए चलना होगा। सहसा कोई बड़ा कदम उठा लेना उचित न होगा।
साधना उपक्रमों से जब अपने प्राण के प्रवाह को उनके कम्पन गति के समतुल्य बना लेते हैं, तो फिर उनसे संपर्क साधना उनके लिए तनिक भी कठिन नहीं होता। फिर वे स्थूल मनुष्य की तरह उनसे साक्षात्कार कर विचार विनिमय, बातचीत सब कुछ सामान्य ढंग से सम्पन्न कर सकते हैं।
साधना का सच्चा रूप समझाती है व विराट ब्रह्म की आराधना करने की प्रेरणा देती है।
साधना की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इड़ा-पिंगला के प्राण प्रवाह में एकरूपता लायी जाय। जब यह संभव होगा तभी सुषुम्ना क्रियाशील बनेगी।
साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।
साधना का अन्तिम चरण पार कर लोगे, तो तुम भी उसके अधिकारी बन जाओगे, जिसका आरुणि बना, पर शायद तब तक मेरा यह स्थूल शरीर न रहे।” देखो न, कभी की यह सुदृढ़ देहयष्टि अब कैसी जीर्ण-शीर्ण और कमजोर हो चली है, किन्तु तुम लोग अपने सौंपे दायित्व में तनिक भी कोताही नहीं बरतना और सिद्धाँतों के प्रति निष्ठ बनाये रखना। इस पंच भौतिक ढकोसले के न रहने पर भी मैं तुम लोगों की काया के साथ छाया की भाँति मौजूद रहूँगा एवं हर प्रकार की सहायता करने के लिए सदा तत्पर बना रहूँगा। फिर जब तुम्हारी जीवन-साधनापूर्ण हो जाये और खरे सुवर्ण की भाँति चमकने लगो तो ऋद्धियों की यह थाती हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारे सुपुर्द कर दी जायेगी, जिसे मैं वर्षों से तुम लोगों के लिए यत्नपूर्वक सँजोये आ रहा हूँ।
साधनायें, आसन, प्राणायाम आदि विभिन्न प्रकार के अभ्यास इस दृष्टि से बनाये गये है जिससे शरीर के उन अवयवों तक की मालिश हो जाती है साधारण व्यायाम जिन पर प्रभाव नहीं डाल पाते। मर्मस्थलों में छिपी शक्तियों को उन्नयन करना,उभारना और उनका लाभ लेना इन क्रियाओं का उद्देश्य है। इनके द्वारा बुरी आदतों एवं कुसंस्कारों को,जो नाना प्रकार की व्यथाओं-वेदनाओं की जड़ है उनको बदल कर उनके स्थान पर स्वस्थ आदतों एवं सुसंस्कारों की स्थापना की जा सकती है।, इससे न केवल मन की कमजोरियाँ दूर होती है,वरन् प्रसुप्त पड़ी अंतःशक्तियाँ धीरे-धीरे जाग्रत एवं विकसित होकर ऐसे सत्परिणाम प्रस्तुत करती है जिन्हें चमत्कारी कहा जा सके।
साधना के तीन चरण बतायें गये है, एक ‘भू’ इस चरण में साधक गुरु से मंत्र दीक्षा प्राप्त करता है। मंत्र दीक्षा लेते समय साधक प्रतिज्ञा करता है कि मैं गुरु का आदेश अनुशासन पूर्ण श्रद्धा के साथ मानूँगा। समय-समय पर उनके परामर्श और मार्गदर्शन से अपनी जीवन नीति निर्धारित करूंगा तथा अपनी सब भूलों को उनके सामने स्पष्ट रूप से प्रकट कर दिया करूंगा।
साधना की कठिन तपश्चर्या करनी पड़ेगी, तभी ऐसा संभव है। बोलो तैयार हो? अपना व्यक्तित्व गंगा जैसा निर्मल और समुद्र जैसा शाँत बना सकोगी? अन्तस् की महानता हिमालय जैसा विशाल बनाने की दृढ़ता है? स्वयं के लिए कठोर और दूसरों के लिए उदार बनने की सामर्थ्य रखती हो?
साधना आरंभ कर दो।”
साधना हैं जिसमें वज्रोली मुद्रा का उद्देश्य वीर्यपात को रोकना भर है। कामोत्तेजना तो उसके लिए चाहिए ही। मुद्रा का अर्थ येन-येन प्रकारेण धन कमाना भी है। भले ही वह किराये के हत्यारों की तरह ही क्यों न करना पड़े। ऐसे अनुचित तरीकों से ही विपुल धन कमाने में चोर डाकू हत्यारे सफल होते हैं और उस धन को दुर्व्यसनों की पूर्ति में उड़ाते रहते हैं।
साधना नियमित रूप से लम्बे समय तक करने पर साधक के भीतर की उत्कृष्टतायें उभरती चली जाती हैं और वह गीतोक्त संजय की तरह दिव्य दर्शन की शक्ति-दिव्य दृष्टि भी प्राप्त कर लेता है। भूगर्भ में या सृष्टि के अन्तराल में छिपी दूरवर्ती वस्तुओं का ज्ञान आज्ञाचक्र से निकलने वाली अद्भुत सूक्ष्म किरणों द्वारा सहज ही हो जाता है। अविज्ञात के गर्भ में पक रही संभावनायें, भविष्य में घटित होने वाली घटनायें भी उसे दिख जाती हैं। आज्ञाचक्र के जागरण से ही साधक आत्म ज्योति के अनावरण में सफल होता और आप्तकाम बनता है। आज्ञाचक्र के जागरण की यह सविता साधना सरल भी है और बिना जोखिम की सर्वोपयोगी भी।
साधना का अभ्यास किया जाता है, वहीं शिथिलीकरण भी एक अति उपयोगी प्रक्रिया है। शिथिलीकरण का प्रगाढ़ अभ्यास इड़ा-पिंगला के प्राण प्रवाह में संतुलन स्थापित करता है। कुछ काल तक नियमित रूप से शिथिलीकरण का अभ्यास करने से सुषुम्ना प्रवाह चलने लगता है। यह उपासना के सर्वथा उपयुक्त मनोभूमि है। यदि मस्तिष्क में तनाव हो तो उस स्थिति में उपासना के लिए बैठने के पूर्व शिथिलीकरण की प्रक्रिया द्वारा तनाव मुक्त हो लेना चाहिए, तदुपरान्त उपासना करनी चाहिए।
साधनाओं का लक्ष्य इसी दूरी और समय को समाप्त करना है।
साधना सरल भी है और बिना जोखिम की सर्वोपयोगी भी। इसे हर कोई सरलतापूर्वक सम्पन्न कर सकता है।
साधनापथ आलोकित हो जाता है और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है। उस साधना-पथ पर चलते हुए साधक सुगमता से लक्ष्य को पा लेता है। इस आज्ञाचक्र को जाग्रत करने के लिए सविता के ज्योति पुँज के अवतरण की साधना करनी होती है।
साधना-पथ पर चलते हुए साधक सुगमता से लक्ष्य को पा लेता है। इस आज्ञाचक्र को जाग्रत करने के लिए सविता के ज्योति पुँज के अवतरण की साधना करनी होती है।
साधना पथ पर धीरे-धीरे परिस्थिति से सामंजस्य करते हुए चलना होगा। सहसा कोई बड़ा कदम उठा लेना उचित न होगा।
साधना की जाती है और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है। पूजा उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अंतर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की ही की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
साधना की सफलता के लिए अनिवार्य है। मानसिक प्रतिक्रियाओं की यह परस्पर विरोधी खींचातानी तनाव को और बढ़ा देती है। उपासना में बैठने के लिए आसन की स्थिरता भी आवश्यक है व उसके लिए शैथिल्य का अभ्यास आवश्यक है।
साधनारत होने का समाचार पाकर वे स्वयं भी जन सभा में उपस्थित हुए। गायत्री उपासना से विकसित संत की तेजस्विता देखकर वे पराभूत हो उठे और उनने स्वीकार किया कि लोगों का हृदय परिवर्तन राजतंत्र से नहीं आध्यात्मिक धरातल पर ही संभव है। सो उनने भी विधिवत् गायत्री उपासना की दीक्षा ग्रहण की और मांसाहार जैसी दुष्प्रवृत्ति का परित्याग किया।
साधनाओं एवं ध्यान के लिए यह मनः स्थिति आवश्यक है। इससे उपासना में भी प्रगति होती है और दैनन्दिन जीवन में भी सहज प्रसन्नता समाई रहती है। प्रारंभ में शिथिलीकरण का अभ्यास 10-15 मिनट तक करना चाहिए, बाद में इसे आधे घंटे तक बढ़ा सकते हैं। आध्यात्मिक विकास के इच्छुक प्रत्येक साधक को यह अभ्यास बहुत सहायक सिद्ध होता है। अन्यथा तनावग्रस्तता एवं चित्त विक्षेप की स्थिति में मन कभी भी एकाग्र नहीं हो पाता और चित्त की तन्मयता-प्रसन्नता के बिना जप और उपासना-साधना से समुचित लाभ नहीं मिल सकता, पर्याप्त प्रगति नहीं हो पाती।
साधनाकाल में बालक के समान शुद्ध एवं निश्छल रहने लगे तो समझना चाहिए कि साधना में तीव्र गति से प्रगति होना सुनिश्चित है। जप में मन तभी लगता है जब आराध्य के प्रति-माता के प्रति प्रेम का, आत्मीयता का, उफान उमगने लगे। इससे व्यावहारिक जीवन में भी निर्मलता बढ़ती जाती है और चहुँ ओर से साधक पर परमात्मा का अनुदान-वरदान बरसता दिखाई देता है।
साधना उनके लिए तनिक भी कठिन नहीं होता। फिर वे स्थूल मनुष्य की तरह उनसे साक्षात्कार कर विचार विनिमय, बातचीत सब कुछ सामान्य ढंग से सम्पन्न कर सकते हैं।
साधना प्रणालियों द्वारा भूतकाल की घटनाओं को दृश्यमान करते हैं। आराध्य के रूप में राम, कृष्ण, हनुमान मुहम्मद साहब, रामकृष्ण, बुद्ध आदि के दर्शनों के पीछे यही तथ्य निहित है कि वे भूतकाल के इन महापुरुषों के माध्यम से चैतन्य प्रक्रिया द्वारा अदृश्य जगत में पहुँच कर वहाँ विद्यमान देवमानवों का साक्षात्कार करते और आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। इस संबंध में विवेकानन्द अपनी पुस्तक “राजयोग“ में लिखते हैं कि यहाँ भी गति की भूमिका महत्वपूर्ण है। हमारे इर्द-गिर्द अनेकों अशरीरधारी आत्माएँ घूमती-फिरती रहती हैं, किन्तु हम उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं देख पाते हैं कि उनके प्राण का कम्पन हमारे प्राण कम्पन से कई गुना अधिक है। इसी असमानता के कारण हम उन्हें देखने की बात तो दूर अनुभव भी नहीं कर पाते हैं, योगीजन विशेष साधना उपक्रमों से जब अपने प्राण के प्रवाह को उनके कम्पन गति के समतुल्य बना लेते हैं, तो फिर उनसे संपर्क साधना उनके लिए तनिक भी कठिन नहीं होता।
साधना से समुचित लाभ नहीं मिल सकता, पर्याप्त प्रगति नहीं हो पाती।
साधना विज्ञान में ‘चक्र’ या ‘प्लेक्सस’ कहा जाता है। मूलाधार तथा सहस्रार के बीच मेरुदण्ड में ऐसे पाँच प्रमुख चक्र संस्थित हैं। ये हैं -स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञाचक्र। मूलाधार और सहस्रार को मिलाकर ये सप्त चक्र हो जाते हैं। इन्हें ही सप्त लोक, सप्तऋषि, सप्तद्वीप, सप्तसागर आदि कहा जाता है।
साधना गायत्री साधना है। गायत्री उपासक को सविता आराधना से जो शक्ति प्राप्त होती है वह उसकी भावनात्मक उत्कृष्टता के अनुपात में ही उपलब्ध होती है।
साधना एक समर है जिसे प्राण शक्ति की प्रचुरता के बिना जीता नहीं जा सकता। इस शक्ति को अर्जित करना और उससे अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत एवं सुसंस्कार सम्पन्न बनाना ही अग्निविद्या है। प्राण को अग्नि भी कहा गया है। अग्नि अर्थात् कषाय-कल्मषों, दोष-दुर्गुणों व्यक्तित्व में विद्यमान विकारों मलिनताओं को जला-गलाकर कुँदन सदृश तपाये हुए व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली ऊर्जा। प्राण ही वह अग्नि है जिसके अभिवर्धन का रहस्य ज्ञात हो जाने पर साधना मार्ग में आगे वाले अवरोधों को दूर किया और व्यक्तित्व बना जाता है।
साधना के साथ संघर्ष का भी प्रशिक्षण दिया था। समर्थ गुरु रामदास ने अपने प्रौढ़ शिष्य शिवाजी को तलवार थमाई थी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को अनाचार के विरोध में जीवन खपा डालने का निर्देश दिया था। गाँधी ने अपने सत्याग्रहियों को प्रत्यक्ष मृत्यु से लड़ने का निर्देश दिया और “टूट जाना पर अनीति से लड़ने की हट छोड़ना मत।”
साधना की जायेगी, आज्ञाचक्र के जागरण का उद्देश्य उतना ही मात्रा में पूरा होता जायेगा।
साधना के उपरान्त भी कदाचित ही कर पाते हैं।”
साधना विधान है।
साधना करनी होती है।
साधना की सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी। यही कारण है कि साधना ग्रंथों में, अध्यात्म शास्त्रों में जप के साथ ध्यान को अनिवार्य बताया गया है। गायत्री उपासना के बारे में कहा गया है-
साधना है। गायत्री उपासक को सविता आराधना से जो शक्ति प्राप्त होती है वह उसकी भावनात्मक उत्कृष्टता के अनुपात में ही उपलब्ध होती है।
साधना में मन नहीं लगता। यह एक तथ्य भी है कि मन प्रेम का गुलाम है। जहाँ भी जिस वस्तु में भी प्रेम मिलेगा वहीं मन उसी प्रकार दौड़ जायगा जैसे खिल-खिलाते पुष्प पर भौंरा जा पहुँचता है। यदि जप के साथ इष्ट के प्रति-आराध्य के प्रति भावना का समावेश कर लिया जाय तो निश्चित रूप से मन उसमें उसी प्रकार लगा रहेगा जैसा संसारी मनुष्यों का अपने स्त्री-पुत्र, धन आदि में लग रहता है। साधक और आराध्य के मध्य प्रेम और आत्मीयता का संबंध सूत्र ध्यान द्वारा ही सधता है।
साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। जप के समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही संभव है। मात्र जप करते रहा जाय और ध्यान धारणा की उपेक्षा अवहेलना होती रहे तो साधना की सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
साधना की सफलता भी उतनी ही तीव्रगति से अपना सत्परिणाम प्रस्तुत करती और साधक को धन्य बनाती है।
साधनायें ही करने के लिए परामर्श दिया है और तंत्र से दूर रहने के लिए कहा है। जिन्हें तंत्र विज्ञान की दृष्टि से ज्ञान भी हो उनके लिए भी आदेश है कि कुपात्र को न बतायें, अन्यथा वह दूसरों का अनर्थ करने के प्रलोभन से अपने को बचा न सकेगा। इसी दृष्टि से गायत्री तंत्र के प्रथम श्लोक में ही इसे कुपात्र को न बताने का निषेध कर दिया गया है।
साधना, ब्रह्मवर्चस और निर्लोभ निरहंकारिता।’ आश्वलायन के स्वर में पर्याप्त गम्भीरता थी।
साधना की दूसरी भूमिका तब आरंभ होती है जब मन की भागदौड़ बन्द हो जाती है और चित्त जप के साथ ध्यान में संलग्न रहने लगता है। इस स्थिति को प्राप्त कर लेने पर चित्त को एक सीमित केन्द्र पर एकाग्र करने की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है, उपरोक्त ध्यान के स्थान पर दूसरी भूमिका में साधक सूर्य मण्डल के स्वर्णिम प्रकाश तेज में गायत्री माता के सुन्दर मुख की झाँकी करता है। उसे समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड में केवल मात्र एक पीतवर्ण सूर्य ही दीखता है और उसके मध्य में गायत्री माता का मुख हँसता-मुसकराता दृष्टिगोचर होता है। साधक भावनापूर्वक उस मुख मण्डल को ध्यानावस्था में देखता है और उसे माता के अधरों से, नेत्रों से, कपोलों की रेखाओं से एक अत्यन्त मधुर स्नेह, वात्सल्य, आश्वासन, साँत्वना एवं आत्मीयता की झाँकी होती है, वह उस झाँकी को आनंदविभोर होकर देखता रहता है और सुधि-बुद्धि भुलाकर चन्द्र चकोर की भाँति उसी में तन्मय हो जाता है।
साधना की सफलता का आधार भी यही श्रद्धासिक्त भावना है। इसके अभाव में देवाराधन निष्प्राण मात्र चिन्ह पूजा भर रह जाता है।
साधनापूर्ण हो जाये और खरे सुवर्ण की भाँति चमकने लगो तो ऋद्धियों की यह थाती हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारे सुपुर्द कर दी जायेगी, जिसे मैं वर्षों से तुम लोगों के लिए यत्नपूर्वक सँजोये आ रहा हूँ।
साधना मार्ग में आगे वाले अवरोधों को दूर किया और व्यक्तित्व बना जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-January
साधना और आराधना के लिए अपने स्वभाव को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाला जाय।
साधना और आराधना की समन्वित क्रिया पद्धति अपनाने से वह अध्यात्म उपक्रम बन पड़ता है जिसके असफल होने की कोई आशंका नहीं रहती। लक्ष्य तक पहुँचने का सत्परिणाम सुरक्षित रहता है।
साधना अधूरी एवं एकाँगी रह जाएगी। इसलिए मानसिक संयम के साथ-साथ वाणी का संयम भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। मौन साधना इसी की पूर्ति करती है।
साधना की है?” एक पत्रकार ब्रिटेन की विलक्षण शक्ति सम्पन्न महिला एनी ओवन्स से ताबड़तोड़ प्रश्न किये जा रहा था। ओवन्स ने बड़े धैर्यपूर्वक उसके सवालों को सुना और संक्षेप में उत्तर दिया “जहाँ तक मुझे स्मरण है, मैंने ऐसी कोई साधना नहीं की है, जो ऐसे दिव्य सामर्थ्य के उद्भव के लिए जिम्मेदार होती है। हाँ, पर एक काम मैंने अपने जीवन में अवश्य किया हैं, वह है सच्चे अर्थों में अध्यात्म को समझने और उसे जीवन में चरितार्थ करने का प्रयास-अभ्यास। मैंने महत्वाकांक्षा रहित जीवन जिया और अपनी योग्यता, क्षमता और सम्पदा से अभावग्रस्तों की सहायता करने में कोई कोर कसर उठा न रखी।
साधना के लिए नियत रखना चाहिए। कम से कम सप्ताह में एक दिन या कुछ घण्टे ही सही मौन अवश्य रखा जाय। आत्मबल संवर्धन की यह सर्वश्रेष्ठ साधना जो है।
साधनाओं में भी अपने को खपाना पड़ेगा, किन्तु यह नहीं समझा जाना चाहिए कि इतना बड़ा काम मात्र मानवी भागदौड़ से पूरा हो जाएगा। जब अपने छोटे से कुटुम्ब के थोड़े से दायरे में वाद-विवाद, मनोमालिन्य, लोकव्यवहार के झगड़े काबू में नहीं आ पाते तो 600 करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक के पीछे लगी हुई ढेरों दुष्प्रवृत्तियों का कुप्रचलन कुछ थोड़े से व्यक्ति थोड़ी सी योजनाएं बनाकर हलके-फुलके व्यक्तियों के सहारे उसे पूरा कर सकेंगे, यह आशा कैसे की जा सकती है। इतने प्रबल पुरुषार्थ और समाधान के पीछे दैवी शक्ति का समावेश भी होना चाहिए अन्यथा मानवी पुरुषार्थ अपनी भूलों, कमजोरियों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण ही सफलता के स्थान पर असफल होते देखे गये हैं।
साधना हो, उन्हें नियमित रूप से कुछ समय के लिए मौन रहना चाहिए। एकाग्रता सम्पादन के लिए इससे बढ़कर कोई अन्य सरल उपाय है नहीं।
साधना कहा जाता है इसका प्रतिफल भी हाथों हाथ मिलता है। आत्म संतोष, लोक सम्मान और परिस्थितियों का अनुकूलन जिसे देवी अनुग्रह भी कहते हैं, इन तीनों का ही लाभ हर साधक अपने प्रयत्नों के अनुरूप प्राप्त करता चाहता है। यही है साधना से सिद्धि का सिद्धान्त।
साधना वाले पूर्वकाल में जिन ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करते रहे हैं, उनसे आज वंचित लक्ष्य तक कहीं पहुँच पाता है?
साधना द्वारा अर्जित दिव्य सामर्थ्य ही था। हर किसी में ये संभावनाएँ विद्यमान हैं।
साधना बल के सहारे कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कीं, पर वे न तो अधिक समय टिकीं और न अन्ततः सुखद परिणाम ही प्रस्तुत कर सकीं। भस्मासुर, महिषासुर, वृत्रासुर, रावण आदि की सिद्धियाँ अन्ततः उनके और उनके संबंधियों के लिए विनाश और विपत्ति का कारण ही बनीं। इसके विपरीत उस दिशा में उद्देश्यपूर्ण कदम बढ़ाने वाले स्वल्प साधना में भी उच्चस्तरीय एवं प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर सके। बुद्ध, गाँधी, अरविंद, रमण, रामकृष्ण, चाणक्य, रामदास, विवेकानन्द, दयानन्द, आदि की साधनाएँ जहाँ उन्हें मनस्वी बना सकीं वहीं उनके कर्तृत्व ने समाज का असाधारण हित-साधन किया। ऋषियों की समस्त शृंखला उसी प्रकार की है।
साधना (3) आराधना। उपासना में उत्कृष्टता को भगवान मान कर उस पर अनन्य निष्ठ जमाई जाती है। साधना में जीवनचर्या को परिष्कृत एवं सुसंस्कारों से ओतप्रोत बनाया जाता है। आराधना का तात्पर्य है सत्प्रवृत्ति संवर्धन परमार्थ परायणता। इन तीनों को ही मिला देने से एक समूची बात बनती है।
साधना के सत्यपरिणाम प्राप्त नहीं होते। शब्दों का उच्चारण भले ही न किया जाता हो, पर बोलने की वृत्ति दूसरी तरह से व्यक्त होती रहे, तो जो शक्ति बोलने में खर्च होती थी, वह उस विषय में खर्च होने लगती है। ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर किया गया मौन ही असाधारण प्रतिफल प्रदान करता है। मौन का अर्थ आन्तरिक है। बाह्य क्रियाओं का अपने ऊपर प्रभाव न होने देना, स्वयं को उनसे निरपेक्ष रखने का नाम मौन है।
साधना से उपरोक्त चरण निभते रहें तो समझना चाहिए कि चित्त वृत्ति निरोध की योग साधना और व्रत संयम की तप। साधना का छोटा, किन्तु महत्वपूर्ण प्रयास चल पड़ा।
साधना से उत्कृष्टता अपनाने से और प्रचण्ड पुरुषार्थ से कोई भी व्यक्ति आत्मशोधन कर सकता है और महामानव स्तर तक पहुंच सकता है। आत्मा भी परमात्मा का ही अति समीपवर्ती प्रतीक प्रतिनिधि है। अंतर केवल इतनी ही पड़ गया है कि कुसंस्कारों की कालिमा से ढक जाने के कारण उसका प्रकाश धूमिल पड़ गया है। यदि उस पर जमी परत हटा दी जाय तो उसकी प्रखरता का प्रत्यक्ष दर्शन किया जा सकता है।
साधना है। सर्व सुगम एवं सब धर्मों के लिए प्रयुक्त की जा सकने वाले इस अध्यात्म उपचार को महाकाल की साधना हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है एवं प्राप्त प्रेरणाओं को जीवन में उतारकर निज का कायाकल्प किया जा सकता है। नवयुग की अगवानी के लिए सविता देवता की ही उपासना अगले दिनों की जाएगी।
साधना का छोटा, किन्तु महत्वपूर्ण प्रयास चल पड़ा।
साधना में भी उच्चस्तरीय एवं प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर सके। बुद्ध, गाँधी, अरविंद, रमण, रामकृष्ण, चाणक्य, रामदास, विवेकानन्द, दयानन्द, आदि की साधनाएँ जहाँ उन्हें मनस्वी बना सकीं वहीं उनके कर्तृत्व ने समाज का असाधारण हित-साधन किया। ऋषियों की समस्त शृंखला उसी प्रकार की है। वे स्वयं तो आकाश में नक्षत्रों की तरह अभी भी चमकते हैं, साथ ही उनके समय में उनके साथ जो भी रहे वे सत्संग जन्य लाभों से निहाल होकर रहे और उच्चकोटि के अनुदान-वरदान प्राप्त करके कृतकृत्य हो सके।
साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इसे अध्यात्मवादी जीवन का प्रारंभिक पाठ समझा जाना चाहिए।
साधना के मार्ग पर चलने वालों को चटोरेपन पर नियंत्रण करना चाहिए। नित्य के भोजन में सात्विक पदार्थों की सीमित मात्रा लेते रहने का क्रम चलाना चाहिये। अधिक दृढ़ता न अपनाई जा सके, तो सप्ताह में एक दिन अस्वाद-व्रत का तो पालन करना ही चाहिए। इसके लिए रविवार या गुरुवार के दिन उत्तम हैं। इस अनुपालन से दिव्य स्तर की अनुकूलताएँ निभती हैं।
साधना आत्म-सत्ता के बहिरंग एवं अन्तरंग पक्ष को विकसित करने में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होती है। सामान्य सी लगने वाली यह साधना असामान्य प्रभाव उपलब्ध कराती है।
साधना में संलग्न रहना ही प्रिय विषय बन जाता है। इसी मनः स्थिति और ऐसी ही गतिविधि से अपने को ओत प्रोत करने के लिए वे सभी उपचार किये जाते हैं जिन्हें पूजा अर्चा कृत्य कहा जाता है।
साधना जो है।
साधना सार्वभौम साधना है। सर्व सुगम एवं सब धर्मों के लिए प्रयुक्त की जा सकने वाले इस अध्यात्म उपचार को महाकाल की साधना हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है एवं प्राप्त प्रेरणाओं को जीवन में उतारकर निज का कायाकल्प किया जा सकता है। नवयुग की अगवानी के लिए सविता देवता की ही उपासना अगले दिनों की जाएगी।
साधनाएँ जहाँ उन्हें मनस्वी बना सकीं वहीं उनके कर्तृत्व ने समाज का असाधारण हित-साधन किया। ऋषियों की समस्त शृंखला उसी प्रकार की है। वे स्वयं तो आकाश में नक्षत्रों की तरह अभी भी चमकते हैं, साथ ही उनके समय में उनके साथ जो भी रहे वे सत्संग जन्य लाभों से निहाल होकर रहे और उच्चकोटि के अनुदान-वरदान प्राप्त करके कृतकृत्य हो सके।
साधना है कि सप्ताह में एक दिन का उपवास किसी न किसी रूप में करते ही रहा जाय। जो तीसों दिन पेट को बंदूक की नली की तरह भरे रहते हैं, उनके लिए व्रतशीलता के आधार पर मनोबल को बढ़ा सकना कठिन है, आत्मिक प्रगति का अवरोध तो बना ही रहेगा।
साधना के साथ उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वर भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी का प्रतिपादन गायत्री और द्विजत्व का समन्वय करने की संगति बिठाकर किया गया है और उससे लाभान्वित होने का तथ्य शास्त्रों में समझाया गया है।
साधना हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है एवं प्राप्त प्रेरणाओं को जीवन में उतारकर निज का कायाकल्प किया जा सकता है। नवयुग की अगवानी के लिए सविता देवता की ही उपासना अगले दिनों की जाएगी।
साधना की प्रखरता और व्यक्तित्व की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती है।
साधना में संलग्न होने, उदारता अपनाने से लोक मंगल के कृत्य तथा समय बन पड़ते रहा करते हैं। तीनों का सम्मिश्रण गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम जैसा आधार बन पड़ता है। इसी स्थिति को मनुष्य में देवत्व का अवतरण कह सकते हैं। ऐसी मनःस्थिति वालों को विशाल विश्व को व विराट ब्रह्म को समुन्नत बनाने के लिए निरन्तर सेवा साधना में संलग्न रहना ही प्रिय विषय बन जाता है। इसी मनः स्थिति और ऐसी ही गतिविधि से अपने को ओत प्रोत करने के लिए वे सभी उपचार किये जाते हैं जिन्हें पूजा अर्चा कृत्य कहा जाता है।
साधनाओं में इसीलिए वाणी के संयम को मानसिक संयम के साथ सम्बद्ध रखा गया है और कहा गया है कि विचारणा, भावना और आकाँक्षा पक्ष से मानसिक शक्तियों का क्षरण रोका जाय, पर अभिव्यक्ति पक्ष से वाक् संचय न किया जाय, तो शक्ति संचय की साधना अधूरी एवं एकाँगी रह जाएगी। इसलिए मानसिक संयम के साथ-साथ वाणी का संयम भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। मौन साधना इसी की पूर्ति करती है।
साधना असामान्य प्रभाव उपलब्ध कराती है।
साधना का कुछ न कुछ क्रम बनाकर रखना ही चाहिए। मौन का अर्थ यह नहीं है कि मुँह से कुछ न बोलते हुए हाथ चलाने या लिखकर बातें करने का क्रम अपनाया जाय। उससे मौन साधना के सत्यपरिणाम प्राप्त नहीं होते। शब्दों का उच्चारण भले ही न किया जाता हो, पर बोलने की वृत्ति दूसरी तरह से व्यक्त होती रहे, तो जो शक्ति बोलने में खर्च होती थी, वह उस विषय में खर्च होने लगती है। ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर किया गया मौन ही असाधारण प्रतिफल प्रदान करता है।
साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मिलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र कुछ पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है, पर पूरा सत्यपरिणाम देखना हो तो पवित्र एवं प्रखरता भरा जीवनक्रम अपनाने की साधना के साथ उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वर भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए।
साधना में जीवनचर्या को परिष्कृत एवं सुसंस्कारों से ओतप्रोत बनाया जाता है। आराधना का तात्पर्य है सत्प्रवृत्ति संवर्धन परमार्थ परायणता। इन तीनों को ही मिला देने से एक समूची बात बनती है। सर्वतोमुखी प्रगति की पृष्ठभूमि बनती है।
साधना में अमर शक्ति प्राप्त करता है।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त।
साधना नहीं की है, जो ऐसे दिव्य सामर्थ्य के उद्भव के लिए जिम्मेदार होती है। हाँ, पर एक काम मैंने अपने जीवन में अवश्य किया हैं, वह है सच्चे अर्थों में अध्यात्म को समझने और उसे जीवन में चरितार्थ करने का प्रयास-अभ्यास। मैंने महत्वाकांक्षा रहित जीवन जिया और अपनी योग्यता, क्षमता और सम्पदा से अभावग्रस्तों की सहायता करने में कोई कोर कसर उठा न रखी। मैं इसे ही अपनी अद्भुत क्षमता के विकास के लिए उत्तरदायी मानती हूँ। मैंने भौतिक अनुदान सत्पात्रों को बाँटे और बदले में भगवान का दिव्य प्रतिदान हाथोंहाथ इसी जन्म में प्राप्त किया।
साधना और व्रत संयम की तप। साधना का छोटा, किन्तु महत्वपूर्ण प्रयास चल पड़ा।
साधना युक्त तपे स्वर ॥
साधना इसी की पूर्ति करती है।
साधना में शालीनता और सुसंस्कारिता की अवधारणा है। चरित्र निष्ठा भी इसी को कहते हैं। आराधना में परमार्थ परायणता अपनाने, सेवा साधना में संलग्न होने, उदारता अपनाने से लोक मंगल के कृत्य तथा समय बन पड़ते रहा करते हैं। तीनों का सम्मिश्रण गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम जैसा आधार बन पड़ता है। इसी स्थिति को मनुष्य में देवत्व का अवतरण कह सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-February
साधना और मौत की मनहूसियत से मरते जा रहे विश्व वसुधा में जीवन चेतना का प्रसार विस्तार इसकी आराधना है।”
साधना से जाग्रत होती है। कर्मों की सफलता इसी के जागने से प्राप्त होती है। अतएव उस महाशक्ति को जगाने के लिए प्रबल प्रयत्न करना चाहिए।”
साधना का यही उद्देश्य है कि उसको बेतुकी हरकतों-हलचलों में निरत रहने से रोका जाय और क्रमबद्ध रूप से कार्य करने के लिए अभ्यस्त किया जाय यह अध्यात्म प्रयोजनों के लिए तो अनिवार्य है ही, साँसारिक क्रियाकलापों को भी ठीक तरह से सम्पन्न करने के लिए भी आवश्यक है। अन्यथा जो भी काम हाथ में लिया जायगा वह अस्त व्यस्त बनेगा और उसकी सफलता सन्दिग्ध रहेगी। गेहूँ एक टोकरी में रखे रहें तो उनका मनचाहा उपयोग किया जा सकता है। पर यदि दानों को रेत में बिखेर दिया जाय तो समझना चाहिए कि वह बरबाद हो गया। उसका एक दाना बीनने में जितना श्रम समय लगेगा उतनी ही कीमत उस गेहूँ की बैठेगी जिसे रेत में बिखेर दिया गया था ।
साधना है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसीलिए जिस तरह इन्द्रिय संयम के लिए ब्रह्मचर्य आदि का विधान है, उसी तरह वाणी के संयम के लिए मौन की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।
साधना करते हैं। प्राणवायु के द्वारा जाग्रत हुई यह कुण्डलिनी साधक के लिए सिद्धियों का आधार बनती है और उसे परमज्ञान प्रदान करती है। ऋग्वेद की ऋचा 10/125/5 में इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा गया है-
साधनाओं का आधार भी कुण्डलिनी ही है। जब गुरु की कृपा से सोयी हुई कुण्डलिनी जागती है, तब सम्पूर्ण पद्म-षट्चक्र और ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं। इसी ग्रंथ के अगले श्लोकों 3/15 से 17 में कहा गया है कि जाग्रत होने पर ही यह कुण्डलिनी योगियों के मोक्ष का साधन बनती है और सोती रहने पर मूढ़ों के बन्धन का कारण बनी रहती है। इस रहस्य को जानने वाला साधक ही योगी होता है। जिस प्रकार कुँजी से किवाड़ खोले जाते हैं वैसे ही साधक कुण्डलिनी द्वारा मोक्ष द्वार को खोलते हैं।
साधना है। इन्हें ही इच्छा शक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का विकास कहा गया है। देवी भागवत् में उल्लेख है “इच्छाशक्तिश्च भूःकारः क्रियाशक्तिर्भुवः तथा। स्वः कारः ज्ञानशक्तिश्च भूर्भुवः स्वः स्वरूपकम।” अर्थात् भूर्भुवः और स्वः ये तीन व्याहृतियाँ क्रमशः इच्छा, क्रिया और ज्ञानशक्तियों का स्वरूप है।
साधना के साथ यज्ञ प्रक्रिया का समन्वय हो जाने से वे चमत्कार उत्पन्न होते हैं जिन्हें ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ, स्वर्ग, मुक्ति, शान्ति, समृद्धि आदि के नाम से जाना जाता है।
साधना करनी पड़ी है? सफलता प्राप्ति के पूर्व उन ने कितनी ठोकरें खाई व कितनी असफलताएँ गले उतारीं? वस्तुतः पल्लवित वृक्ष का इतिहास वहां से आरंभ होता है जहाँ एक बीज ने अपने अस्तित्व की बाजी लगाई थी।
साधना में किया गया। वह क्रम अभी भी दूसरे रूप में चल रहा है।
साधना करने का निर्देश है। इन परम वैभवों की उपलब्धि जिस साधना उपक्रम को अपनाने से होती है, उसे ही कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण कहते हैं। अध्यात्म क्षेत्र का परम पुरुषार्थ भी यही है।
साधना के लायक मेरा मन नहीं। तब ऐसे में.......।”
साधना उपक्रम को अपनाने से होती है, उसे ही कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण कहते हैं। अध्यात्म क्षेत्र का परम पुरुषार्थ भी यही है।
साधना में सबसे बड़ी बाधा हमारी वाचालता ही है, जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसके आदेशों को नहीं सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी ही उत्तम भाषा, बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”
साधना उपक्रमों का आश्रय लेना पड़ता है आदि रहस्यों का उपनिषदों तथा योगशास्त्रों में विस्तारपूर्वक वर्णन है। इसके स्वरूप का उल्लेख करते हुए महायोग-विज्ञान में कहा गया है “आत्मशक्ति कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में साढ़े तीन कुण्डलिनी लगाये हुए सर्पिणी की तरह शयन करती है। जब तक वह सोती है, तब तक मनुष्य पशुवत बना रहता है। बहुत प्रयत्न करने पर भी तब तक उसे ज्ञान नहीं हो पाता। जिसकी यह आधार शक्ति सो रही है उसका सारा संसार ही सो रहा है,पर जब वह जागती है तो उसका भाग्य और संसार ही जाग पड़ता है।
साधना पुरुषार्थ किया जा सके तो उद्देश्यपूर्ण प्रयोजनों के लिए भी अतीन्द्रिय सामर्थ्यों को जगाना संभव है।
साधना से अधिक और भौतिक सिद्धियों का पथ प्रशस्त होता है और ऐसा अजस्र भण्डार जो अपने ही भीतर छिपा है, प्रकट हो जाता है क
साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो। फ्रैंकलिन के शब्दों में “चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती है। “कारलाइल ने कहा है “मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति होती है।
साधना है और इस साधना में सबसे बड़ी बाधा हमारी वाचालता ही है, जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसके आदेशों को नहीं सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी ही उत्तम भाषा, बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”
साधना ही सच्ची ईश्वर उपासना है। पूजाकृत्य ऐसी ही मनोभावना विकसित करने के लिए अपनाये जाते हैं।
साधना प्रयास आरंभ करता है और उस परम पुरुषार्थ का समुचित लाभ प्राप्त करता है जिसका उल्लेख शक्ति तंत्र में किया गया है। उसके अनुसार “कुण्डलिनी महाशक्ति के प्रयत्न से ही यह सारा संसार व्यापार चल रहा है, जो इस तथ्य को जान लेता है, वह शोक संतप्त भव बंधनों से बँधा नहीं रहता।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-May
साधना को अध्यात्मवेत्ताओं ने शीघ्र परिणाम प्रस्तुत करने वाला पाया है। बृहद्योगी याज्ञवलक्य ने सविता की ज्योति साधना को सर्वश्रेष्ठ माना है और कहा है कि गायत्री मंत्र का जप करते हुए सूर्य के दिव्य तेज को अपने में धारण करना चाहिए। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ में वस्तुतः सविता ही ध्येय है। सूर्योपनिषद् चाक्षुषोपनिषद, अक्ष्युपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों में इसी तेजपुँज की उपासना करने को कहा गया है। बृहत्पराशर स्मृति में सूर्य मंडल में स्थित भगवान विष्णु का ध्यान करने का विधान है।
साधना के बाद भी समाधि नहीं सिद्ध हो पायी। उमड़े पश्चाताप के ज्वर ने भेद-बुद्धि को धो दिया। इसी समय बादलों के समूह ने उन पर जल कणों की वृष्टि की। भेदभाव भी घुल गया व वे परम लोक को चल दिए।
साधना द्वारा जाग्रत कर लिया जाय तो अपने भीतर ही वह सब कुछ मिल सकता है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है और जिसकी तलाश हम बाहर करते और भटकते हैं।
साधना क्षेत्र में भी यह बात है। योगाभ्यास से सम्बन्धित क्रिया-कलापों के, विधि-विधानों के बहुत महत्व बताये गये हैं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक के मन ने उस उत्सव को कितनी गहराई से अपनाया। यदि वह उन्हें मखौल मानता रहे और गरिमा स्वीकार न करे, तो कितनी ही देर तक किसी क्रिया-कलाप को करता रहा जाय, कोई असाधारण बात दिख न पड़ेगी। योगाभ्यासों में गुरु की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया है।
साधनारत थे उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया- ऋषि की क्रान्तदर्शी आँखों ने नर देह धारी नारायण को पहचान लिया। विचार विनिमय के बीच कौरव-पाण्डव विग्रह की चर्चा चल पड़ी। हुए महासंहार की विस्तृत शृंखला की प्रत्येक कड़ी से कृष्ण ने उन्हें अवगत कराया।
साधना एवं तपश्चर्याओं में सविता शक्ति का ही आश्रय लिया जाता है। कुण्डलिनी जागरण में सविता शक्ति का ही अवगाहन अवधारण किया जाता है। दिव्य दृष्टि प्रदान करने एवं दिव्य क्षमताओं के उन्नयन में, रवि में रवि-रश्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पराशर कल्प सूत्र में इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहा गया है कि मूलाधार में सविता देवता का ध्यान करने पर दिव्यदृष्टि की प्राप्ति होती है। इसी तरह अक्ष्युपनिषद एवं कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद् में चाक्षुषी विद्या का वर्णन करते हुए कहा गया है कि इसी विद्या का आश्रय लेकर मनुष्य न केवल सभी प्रकार के नेत्र रोगों से मुक्ति पा सकता है, वरन् दिव्य दृष्टि भी जागृत कर सकता है।
साधना से प्राप्त होने का उल्लेख है। इसके 36 वें सूत्र में 6 सिद्धियों का वर्णन करते हुए कहा गया है- ततः प्रातिभ श्रावण वेदनदर्शस्वाद वार्ता जायते, अर्थात् उससे प्रातिम, श्रवण, वेदन, आदर्श, अस्वाद और वार्ता-छह सिद्धियों प्रकट होती हैं। योगसूत्र भोजवृति भाष्य में इन सिद्धियोँ का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है।
साधना करने वाले साधकों पर भी कुछ प्रयोग परीक्षण हुए हैं। पाया गया है कि इसके अन्दर बैठने पर तनाव से सहज ही छुटकारा मिल जाता है और शरीर में एक नयी स्फूर्ति के संचार का अभाव होता है।
साधनाशास्त्रों में पवित्र जीवन अग्नि के रूप में कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन किया गया है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को उष्ण एवं प्रकाशवान बना देती है, वैसा ही प्रकाश कुण्डलिनी जागरण का होता है। योगकुंडल्योपनिषद् में कहा गया है- “अग्नि और प्राणवायु दोनों के आघात से प्रसुप्त कुण्डलिनी जाग पड़ती है और ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि, रुद्रग्रन्थि तथा षट्चक्र का भेदन करती हुई सहस्रार कमल में जा पहुँचती है। वहाँ यह शक्ति शिव के साथ मिलकर आनन्द की स्थिति में निवास करती है। वही श्रेष्ठ परा स्थिति है।
साधना की। गुरुगृह में रहकर सेवा और श्रद्धा का अभ्यास किया। इसी कारण वे पाँच होते हुए भी सौ की तुलना में अधिक भारी पड़े।
साधना से समतल की गई मनोभूमि को अपने तुमुल- ताण्डव से ऊबड़-खाबड़ करने लगे। वह सामने खड़ा कह रहा था “आप प्यास से विकल है महाराज! मेरे पास पर्याप्त जल है, कृपया ग्रहण करें।” “दूर हट।” अपनी रही बची सामर्थ्य को समेट- बटोर कर मुश्किल से वे दो शब्द कह सके। वह सिर नवा कर चला गया।
साधना और योग उपासना भूल कर रोगियों की सेवा करने में जुट गये। उन्होंने अपने सारे शिष्य और साथियों को सेवा कार्य में लगा दिया। एक साधारण व्यक्ति की भाँति व्यग्र और व्याकुल देख कर अनेक लोगों ने कहा “आप तो एक वीतराग योगी हैं। फिर इस तरह साधारण मनुष्यों की तरह व्याकुल क्यों हैं?”
साधनाओं में हल्के-फुल्के प्रयोग हैं। न उनमें पहलवानों जैसी कड़ी कसरत करनी पड़ती है और न सरकस में काम करने वाले नटों जैसा कठिन अभ्यास करना पड़ता है। प्राणायाम में साँस लेने का स्वाभाविक क्रम यत्किंचित् ही बदलना पड़ता है। त्राटक में दृष्टि को उतना केन्द्रित करना पड़ा है, जितना अस्त्रों का निशाना लगाने वाले लोगों को करना पड़ता है। आसनों में हाथ पैरों को यत्किंचित् मोड़ना-मरोड़ना ही पड़ता है।
साधना प्रचंडता तभी धारण करेगी जब सभी धर्म, पंथ, जाति के अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से, एकनिष्ठ होकर समष्टिगत चेतना को जगाने की दृष्टि से उसे सम्पन्न करेंगे। अब की बार मानवता का भविष्य ही दाँव पर लगा है और महाविनाश की आशंका बढ़ी है। अतः हमारे सुरक्षा उपाय- प्रयास भी बढ़े चढ़े हुए होने चाहिए।
साधना और निष्ठ सदा−सर्वदा अविस्मरणीय रहेगी।
साधना कर रहे थे, तो उस दौरान उनके हाव-भाव और आचरण बन्दरों की भाँति ही हो गये थे। वैसे ही उछल कर पेड़ों पर चढ़ जाते जैसे कोई बन्दर। बाद में जब वे राधा भाव में रहने लगे, तो उनके विचार-व्यवहार तो प्रत्यक्षतः महिलाओं जैसे हो ही गये थे, शारीरिक-संरचना में भी अनेक स्त्रैण लक्षण उभर आये थे।
साधना-उपासना में सविता की प्रमुखता रही है। उससे प्राप्त ज्ञान के आधार पर उनने अनेकानेक भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुसंधान किये। प्रकृति पर विजय पाई। एडिंगटन, जीन्स फाउलर, एडवर्ड आर्थर, मिलेन, रसेल आदि प्रख्यात वैज्ञानिक मनीषियों ने सूर्य-शक्ति के सम्बन्ध में गहन खोजें की हैं और वैदिक ऋषियों से प्रतिपादित सविता की सत्ता, महत्ता, गति आदि के सिद्धान्तों की पुष्टि की है।
साधना को सर्वश्रेष्ठ माना है और कहा है कि गायत्री मंत्र का जप करते हुए सूर्य के दिव्य तेज को अपने में धारण करना चाहिए। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ में वस्तुतः सविता ही ध्येय है। सूर्योपनिषद् चाक्षुषोपनिषद, अक्ष्युपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों में इसी तेजपुँज की उपासना करने को कहा गया है। बृहत्पराशर स्मृति में सूर्य मंडल में स्थित भगवान विष्णु का ध्यान करने का विधान है। यथा- “ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्ती नारायण”।
साधना में भागीदारी। इसमें नित्य नियमित रूप से गायत्री महामंत्र का न्यूनतम पन्द्रह मिनट का जप और साथ में प्रातः कालीन उगते स्वर्णिम सविता-सूर्य का ध्यान करने का विधान है। इसे अनिवार्य रूप से हर परिजन को अपनाने के लिए कहा गया है। इस ध्यान−धारणा के माध्यम से सविता की शक्ति को अपने में आकर्षित एवं अवधारित किया जाता है। साथ ही अनुदान में अपनी प्राण चेतना का योगदान मिला कर अनन्त अन्तरिक्ष में नियति को अनुकूल बनाने के उद्देश्य से बिखेर दिया जाता है।
साधना का आश्रय लिया जाता है। चिन्तन, चरित्र, व्यवहार एवं गुण, कर्म, स्वभाव में तदनुरूप श्रेष्ठता का, शालीनता का समावेश किया जाता है। इस प्रकार से जिन सिद्धियों तथा दिव्यशक्तियों की उपलब्धि होती है, उनका सुविस्तृत वर्णन पतंजलि योग सूत्र विभूतिपाद में सूत्र 16 से 44 तक किया गया है। भूत और भविष्य का ज्ञान, सभी प्राणियों की भाषा समझने, पूर्व जन्म के बारे में जानने, दूसरों के मन की बात समझने की क्षमता, अन्तर्ध्यान, आत्मबल, दूरदर्शन, दूर श्रवण, सर्वज्ञान भूख-प्यास की निवृत्ति सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य शक्तियों से संपर्क आदि अनेकों प्रकार की शक्तियाँ योग साधना से प्राप्त होने का उल्लेख है। इसके 36 वें सूत्र में 6 सिद्धियों का वर्णन करते हुए कहा गया है- ततः प्रातिभ श्रावण वेदनदर्शस्वाद वार्ता जायते, अर्थात् उससे प्रातिम, श्रवण, वेदन, आदर्श, अस्वाद और वार्ता-छह सिद्धियों प्रकट होती हैं।
साधना पद्धति में सन्निहित है, वरन् इस आधार पर उसको अपने अनुकूल भी बनाया जा सकता है। प्राण चेतना के माध्यम से सौर सक्रियता को अपने अनुकूल बनाया जा सकता तो निश्चित ही आसन्न विभीषिकाओं को निरस्त किया जा सकता है। विश्व-शान्ति की- नियति अनुकूलन की यह सामूहिक साधना प्रचंडता तभी धारण करेगी जब सभी धर्म, पंथ, जाति के अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से, एकनिष्ठ होकर समष्टिगत चेतना को जगाने की दृष्टि से उसे सम्पन्न करेंगे। अब की बार मानवता का भविष्य ही दाँव पर लगा है और महाविनाश की आशंका बढ़ी है। अतः हमारे सुरक्षा उपाय- प्रयास भी बढ़े चढ़े हुए होने चाहिए।
साधना की उद्देश्यपूर्ण रीति-नीति अपनाने वाले, इन सभी को या अधिकाँश को उपलब्ध कर सकते हैं।
साधनाओं से ही संभव है, जिन्हें कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।
साधना कर सकते हैं।
साधना भी इसी को कहा जाता है। पुरातन काल के तत्वदर्शी अपनी काया में सन्निहित उन सूक्ष्म केन्द्रों को समझते थे, साथ ही उन्हें प्रखर बनाने की विद्या का प्रयोग करके न केवल अपने को असामान्य बनाते थे वरन् अन्यान्यों को भी इस कौशल से लाभान्वित करते थे। यह गुह्य विद्या है तो भी है यह यथार्थ और प्रचण्ड। जिनमें श्रद्धा हो वे अनुभवी, प्रवीण पारंगतों के मार्गदर्शन में यह प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं और अभ्यास की परिणितियों से लाभान्वित हो सकते हैं। पिण्ड में ब्रह्माण्ड का समग्र ढाँचा विद्यमान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-October
साधना इसी दिव्य चेतन को समुन्नत बनाने की प्रक्रिया का नाम है।
साधना वर्ष घोषित कर भारत व विश्व में स्थान-स्थान पर अखण्ड गायत्री जप की शृंखला चलाने का निश्चय इसी उद्देश्य से किया है। 1976-77 में साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के दौरान एक विराट व्यापक अभियान चला व चौबीस लाख व्यक्तियों ने उसमें भाग लिया था। गायत्री महापुरश्चरण अभियान जो उसके बाद आरंभ हुआ, सतत् चलता रहा। नए परिजन उसमें जुड़े एवं परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि में एक समर्थ ब्रह्मास्त्र का रूप उसने ले लिया। सुनियोजित ढंग से एक करोड़ से अधिक साधकों की भागीदारी उस युग संधि महापुरश्चरण में हो रही है जो 1988 की नवरात्रि से आरंभ हुआ।
साधना से भौतिक किंवा आध्यात्मिक सिद्धि के क्षेत्र में गायत्री मंत्र की गरिमा सर्वोपरि है। किसी भी भारतीय संस्कृति के अनुयायी को इस महामंत्र की उत्कृष्टता के संबंध में किसी प्रकार का संदेह न रख भावनापूर्वक दैनन्दिन उपासना कृत्यों में इसे स्थान देना चाहिए।
साधना सफल नहीं होती। ऐसा उल्लेख किसी आर्षग्रन्थ में कहीं भी नहीं है। मध्यकालीन छुट-पुट पुस्तकों में ही एकाध जगह ऐसा प्रसंग आया है। इनमें कहा गया है कि गायत्री को ब्रह्मा, वशिष्ठ और विश्वामित्र ने शाप दिया है कि उसकी साधना निष्फल रहेगी, जब तक उसका शाप मोचन नहीं हो जाता। किन्तु यह प्रसंग बहुत विचित्र एवं असमंजस पैदा करने वाला है।
साधना से हस्तगत की जा सकती हैं। हे परम पतिव्रता पार्वती। इस गुप्त रहस्य को जो जानेंगे और गायत्री साधना में प्रवृत्त होंगे, वे परम सिद्धि को प्राप्त करेंगे।”
साधना प्राणवान बनती है- इस रहस्य को यदि समझा और अपनाया जा सके तो किसी को भी इस क्षेत्र में निराश न रहना पड़े।
साधना करने लगे। एक दिन भैरव उनकी सफल साधना से प्रसन्न होकर वर देने आए व बोले कि गायत्री उपासना के कारण उनमें इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता को न सहन पाने के कारण वे स्वयं सामने नहीं आ सकते। उनकी शंका का समाधान करने के लिए भैरव ने उन्हें पूर्व के चौदह जन्मों के एक भयंकर दृश्य दिखाए व कहा कि “आपकी तेरह वर्ष की साधना पिछले 13 जन्मों के पापों का शमन करने में लग गयी। दुष्कर्मों से उत्पन्न कुसंस्कार मिटने पर अब आप जो गायत्री साधना करेंगे वह फलदायी होगी। “ प्रसन्न मन लौटे माधवाचार्य ने वृन्दावन में जो उपासना की उसका आश्चर्यजनक प्रतिफल उन्हें मिला।
साधना संपन्न करने वाला चेतना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयाम है।
साधना ध्वनि प्रधान होने के बावजूद उसके फलीभूत होने में और तीन प्रधान तथ्य काम करते हैं-(1) संयम (2) उपकरण (3) विश्वास शब्द संरचना और उच्चारण की शुद्धतायुक्त ध्वनि ही सार्थक होती है- यह तो सर्वविदित तथ्य है, किन्तु साधक के शरीर के शारीरिक-मानसिक संयम की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उपासना के दौरान माला, स्थान, उपकरण, उपचार आदि में प्रयुक्त हुए पदार्थों की शुद्धता का भी ध्यान रखना पड़ता है। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है मंत्र के प्रति अटूट विश्वास। यह सभी बातें जहाँ भली-भाँति प्रयुक्त होती हैं, वहाँ मंत्रोपासना का प्रतिफल भी निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होता है।
साधना इससे ऊँचे स्तर की है। यह विचार क्षेत्र से गहरे स्तर पर भाव-प्रवाह से संबंधित है। इस कोश का केन्द्र विशुद्धिचक्र माना गया है। कहीं-कहीं अनाहत चक्र को भी इसका केन्द्र बताया गया है। इस कोश की संतुलित साधना मनुष्य को उदार, सज्जन, सहृदय, संयमी एवं शालीन बनाती है।
साधना के दौरान साधकों को स्पष्ट अनुभव होता है। घर में की गई साधना की अपेक्षा यहाँ की साधना जल्दी फलीभूत होती है। परोक्ष प्रभाव वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा, सप्तऋषियों का प्रतीक पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की तपश्चर्या विशेष प्रभाव उत्पन्न करती है।
साधना की थी। प्रज्ञाचक्षु श्री विरजानन्द जी का गायत्री उपासना पर दृढ़ विश्वास था एवं इसी कारण वे पढ़ न पा सकने के बावजूद अध्यात्म ग्रन्थों के मर्म को गहराई तक जानते थे। उनने ही प्रेरणा देकर भटक रहे दयानन्द को पास बुलाकर शक्तिपात किया था। महर्षि दयानन्द अपने गुरु से गायत्री का ब्रह्मवर्चस् प्राप्त कर ही सारे भारत वर्ष में एक धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक क्राँति का वातावरण बनाने में सक्षम हुए। स्वयं स्वामी जी अपने अनुभव के आधार पर लिखते हैं कि इस महामंत्र द्वारा परमात्मा के तेज का ध्यान करने से बुद्धि की मलिनता दूर हो जाती है।
साधना कोई और नहीं।
साधना कार्यक्रमों द्वारा जन-जन तक गायत्री महाविद्या के विस्तार का संकल्प जो परम पूज्य गुरुदेव के निर्देश पर यहाँ से उठाया गया है वह भी यही संकेत देता है कि अगले दिनों वातावरण गायत्रीमय होने जा रहा है। प्रज्ञावतार का निष्कलंक निराकार रूप में अवतरण हो चुका है, दुर्बुद्धि का साम्राज्य मिटने वाला है व सद्बुद्धि का विस्तार
साधना इसी सुखद दुर्भाग्य को मिटाने के लिए की जाती है। इसके आधार पर उस ताले को खोला जा सकता है, जिसमें उल्लास का अजस्र भाण्डागार भरा पड़ा है।
साधना का मार्ग हर गायत्री साधक के लिए हर समय खुला हुआ है। यदि किसी को अलौकिक-परोक्ष स्तर की सिद्धि की कामना न हो तो भी व्यक्तित्व के सर्वांगपूर्ण परिष्कार से लेकर मनोकामना सिद्धि तथा प्रतिभा संवर्धन से लेकर प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि जैसे अगणित ऐसे लाभ इससे जुड़े हुए हैं जो मानव मात्र को अभीष्ट है। यदि चक्रों को जगाकर सूक्ष्म शरीर की गहन परतों में स्थित इन कोशों को अनावृत्त किया जा सके तो व्यक्ति असाधारण श्रेय का अधिकारी बन सकता है। आध्यात्मिक लाभ जो सद्गुणों की बढ़ोत्तरी के रूप में मिलते हैं, तो स्वतः मिलने ही हैं।
साधनाएँ निष्फल हैं।
साधना का महत्वपूर्ण स्थान है। पाँचकोश वस्तुतः तिजोरी के भीतर पाँच तालों में बंद बहुमूल्य रत्न भण्डार के समान हैं।
साधना में स्थूल-सूक्ष्म कारण शरीर को विकसित करने की साधना की जाती है। स्थूल शरीर की साधना में यों अन्नमय व प्राणमयकोश दोनों ही आते हैं। सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत मनोमय कोश तथा विज्ञानमय कोश की साधना का पूर्वार्ध आता है तथा कारण शरीर के अंतर्गत विज्ञानमय कोश का उत्तरार्ध एवं आनन्दमय कोश की अंतिम स्थिति आती है। यह दोनों विभाजन यों सूक्ष्म एनाटॉमी की दृष्टि से पृथक-पृथक हैं अतः मोटे रूप में ही दोनों में कुछ साम्यता बिठाई जा सकती है। पाँचकोशों की साधना हो चाहे तीन शरीरों की, है यह गायत्री की उच्चस्तरीय साधना व इसके प्रतिफल बड़े महत्वपूर्ण हैं।
साधना से अर्जित शक्ति जब दुर्वासा ऋषि के पीछे मृत्यु चक्र बनकर दौड़ी तो अन्त में दुर्वासा को अम्बरीष की शरण लेकर ही प्राण बचाने पड़े थे। इस प्रकार की अगणित कथायें ऐसी हैं जिनसे प्रकट है कि गायत्री तप के द्वारा दिव्य, विलक्षण शक्तियाँ तपस्वी में उत्पन्न होती हैं।
साधना द्वारा हुई है, कृपया बताएँ?”
साधना का एक अंश पूर्वजन्मों के पाप निवारण में लग जाने से ही यह विलम्ब होता है, अतः किसी को अधीर नहीं होना चाहिए।
साधनाओं वाली बताया गया है। सावित्री के पाँच मस्तक शरीर के पाँच शक्ति कोशों के प्रतीक प्रतिनिधि हैं।
साधना व्यक्ति की अनादिकालीन आकाँक्षा तृप्ति,तुष्टि,शाँति-उद्विग्नता से मुक्ति जैसे अनुदान सुलभ कराती है। वस्तुतः परमात्मा आनन्द स्वरूप है। जीवसत्ता के कण-कण में आनन्द भरा पड़ा है। आनन्दमय कोश के माध्यम से असीम मात्रा में, सहज रूप से प्रसन्नता-प्रफुल्लता का भाण्डागार मनुष्य को मिला हुआ है यह एक विडम्बना ही कि आनन्द अंदर भरा पड़ा है व व्यक्ति स्वयं निरानन्द स्थिति में, तेजाब के तालाब में रोती कलपती स्थिति में विक्षुब्ध-बेचैन पड़ा हुआ है। कोई व्यक्ति अपने घर का ताला कहीं बन्द करके चला जाय।
साधना निष्फल रहेगी, जब तक उसका शाप मोचन नहीं हो जाता। किन्तु यह प्रसंग बहुत विचित्र एवं असमंजस पैदा करने वाला है। पौराणिक उल्लेखों के अनुसार गायत्री ब्रह्माजी की अविच्छिन्न शक्ति है। कही-कहीं तो उन्हें ब्रह्मा की पत्नी भी कहा गया है। वशिष्ठ वे हैं, जिनने गायत्री के तत्वज्ञान को देवसत्ता से हस्तगत करके मानवोपयोगी बनाया।
साधना-3
साधना को युग परिवर्तन हेतु अनिवार्य परिशोधन तथा युगशक्ति के प्रचण्ड उत्पादन हेतु प्रेरित एक विशिष्ट धर्मानुष्ठान मानकर सविता देवता के उदय के साथ उद्भूत प्राण ऊर्जा में अपनी आत्मशक्ति जोड़ते हुए सभी निष्ठावान परिजनों द्वारा अनिवार्य रूप से करना चाहिए। भागीदार व्यक्तियों को इससे मिलने वाले प्रतिफलों के संबंध में बताया जाना चाहिए ताकि अधिक से अधिक भावनाशील इस ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान से जुड़ सकें। विभीषिका निवारण, अनीति उन्मूलन तथा परिस्थिति के अनुकूलन हेतु महाकाल द्वारा निर्देशित यह विशिष्ट साधना अनुष्ठान है, जिससे किसी भी आस्थावान गायत्री साधक को वंचित नहीं रहना चाहिए।
साधना में रुचि लेने वाले पढ़ते हैं। मुकुटराम का जन्म बड़ौदा में एक ब्राह्मण घर में हुआ,उन दिनों गायत्री के संबंध में शाप लगने उपासना करने पर उन्हें गायत्री मंत्र के लिए निषिद्ध कर देते थे।
साधनायें करते हैं और उनसे यथा संभव लाभ भी उठाते हैं, परन्तु अध्यात्म विज्ञान के सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने अपने योगबल से यह देख लिया था कि गायत्री महाशक्ति की सहायता के बिना कोई भी तप अधिक फलदायी नहीं हो सकता। इसीलिए उपासना पद्धति में इस महामंत्र को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि यहाँ इसी महाविज्ञान के आधार पर आत्मकल्याण के महान अभियान किये जाते रहे हैं। प्रायः सभी ऋषि-महर्षियों में जो विशेषतायें थीं, उनमें उनकी तपस्या ही एक मात्र कारण थी। विश्वामित्र, वसिष्ठ, याज्ञवलक्य, अत्रि, भारद्वाज, गौतम, कपिल, कणाद, पतंजलि, व्यास, वाल्मीकि, च्यवन, शुकदेव, नारद, दुर्वासा आदि ऋषियों के जीवन वृत्तांत पर विहंगावलोकन किया जाय, तो सहज ही पता चल जाता है कि उनकी महानता का, उनके अद्भुत एवं महान कार्यों का कारण उनका गायत्री तप ही था।
साधना पुरश्चरण कर माँ का साक्षात्कार किया। सैंकड़ों विधर्मियों को बाबा रामभरोसे ने गायत्री उपासना की प्रेरणा दी।
साधना ‘रज’ के इन निविड़ बन्धनों से शरीर चेतना को मुक्त करने के लिए करनी होती है, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार के समुच्चय से बनी जड़ चेतन मिश्रित जीवचेतना हर घड़ी अशान्त बनी रहती है। इसी के परिमार्जन परिशोधन हेतु योगसाधना व तपश्चर्या की जाती है, जिसके लिए नवरात्रि की संधिबेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधना मनुष्य को उदार, सज्जन, सहृदय, संयमी एवं शालीन बनाती है। परमार्थ भावना का “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की भावना का विकास इस कोश की सिद्धि द्वारा होता है।
साधना के फलस्वरूप नीरोग, दीर्घ जीवन अनुदान रूप में मिला व सद्ज्ञान मिलते चलने से जीवन के भावी स्वरूप के प्रति दृष्टि मिली। ये प्रत्यक्ष अनुग्रह जिन्हें मिले उन्हें उनने उच्चस्तरीय कक्षाओं में चढ़ाया व उनके माध्यम से नये व्यक्तियों तक प्रेरणा पहुँचाई। देखते-देखते लाखों व्यक्ति जुड़ गए। गायत्री महाविज्ञान नामक एक विश्व कोश जिसमें गायत्री साधना संबंधी सब कुछ जो पाठक चाहते थे, वर्णित था इन्हीं दिनों पहले पाँच खण्डों में,फिर तीन खण्डों में प्रकाशित हुआ। यह स्वयं में एक अभूतपूर्व रचना थी क्योंकि अब तक गायत्री महाशक्ति पर कही भी संकलित रूप में कोई ग्रन्थ नहीं था।
साधना को शापमुक्त हुआ मान लेना चाहिए।
साधना तो घर गाँव में रहते हुए सामान्य क्रियाकलापों के साथ भी चलती रहती है किन्तु उच्चस्तरीय साधनाओं में प्रयास ही सब कुछ नहीं होता। इसके लिए वातावरण भी चाहिए। अस्तु दोनों को सुसम्पन्न नगरियों में उपलब्ध अपने प्रस्तुत साधन छोड़ने पड़े और अभीष्ट प्राप्ति के लिए उपयुक्त स्थान उत्तराखण्ड के हिमाच्छादित क्षेत्र में ढूँढ़ना पड़ा। वहाँ उन लोगों ने बारह वर्ष तक मात्र जंगली बेर खाकर तप किया। तदुपरांत ही उनके स्तर की सुसंतति के रूप में प्रद्युम्न का जन्म हो सका।
साधना के बाद त्रिकालज्ञ की, भूत-भविष्य ज्ञाता की, सिद्धि उन्हें मिल गयी थी। उनकी वाणी ऐसी सिद्ध हो गयी थी, कि वे जो भी कहते वह होकर रहता था।
साधना में यों अन्नमय व प्राणमयकोश दोनों ही आते हैं। सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत मनोमय कोश तथा विज्ञानमय कोश की साधना का पूर्वार्ध आता है तथा कारण शरीर के अंतर्गत विज्ञानमय कोश का उत्तरार्ध एवं आनन्दमय कोश की अंतिम स्थिति आती है। यह दोनों विभाजन यों सूक्ष्म एनाटॉमी की दृष्टि से पृथक-पृथक हैं अतः मोटे रूप में ही दोनों में कुछ साम्यता बिठाई जा सकती है। पाँचकोशों की साधना हो चाहे तीन शरीरों की, है यह गायत्री की उच्चस्तरीय साधना व इसके प्रतिफल बड़े महत्वपूर्ण हैं। अन्नमयकोश की सिद्धि से नीरोगता, दीर्घजीवन व चिरयौवन का लाभ मिलता है।
साधना कार्यक्रम हैं। इन कार्यक्रमों में अखण्ड जप सूर्योदय से सूर्यास्त तक एक साथ दो सौ चालीस स्थानों पर चौबीस हजार व्यक्तियों द्वारा प्रतिदिन संपन्न किया जाएगा। यह क्रम प्रस्तुत नवरात्रि से आने वाले आठ माहों तक अनवरत चलता रहेगा। गायत्री जप प्रक्रिया के साथ ध्यान यह किया जाएगा कि प्रचण्ड आत्म ऊर्जा एक लक्ष्य की पूर्ति के लिए एक साथ एक बारगी उत्पन्न की जा रही है। वह संकल्प शक्ति परम पूज्य गुरुदेव की तप ऊर्जा से जुड़कर ऊपर उठती है व अंतरिक्ष की ऊँची परतों पर छतरी की तरह छा जाती है।
साधना की अवधि में एक समर्थ ब्रह्मास्त्र का रूप उसने ले लिया। सुनियोजित ढंग से एक करोड़ से अधिक साधकों की भागीदारी उस युग संधि महापुरश्चरण में हो रही है जो 1988 की नवरात्रि से आरंभ हुआ। उसी शृंखला में इस वर्ष के शक्ति साधना कार्यक्रम हैं। इन कार्यक्रमों में अखण्ड जप सूर्योदय से सूर्यास्त तक एक साथ दो सौ चालीस स्थानों पर चौबीस हजार व्यक्तियों द्वारा प्रतिदिन संपन्न किया जाएगा। यह क्रम प्रस्तुत नवरात्रि से आने वाले आठ माहों तक अनवरत चलता रहेगा।
साधना में एकाग्रता की शक्ति का सम्पादन एवं अभिवर्धन किया जाता है। मनःशक्ति बिखरी होने पर मस्तिष्क के पूर्ण समर्थ होते हुए भी व्यक्ति को पिछड़ेपन से ही ग्रस्त तथा बौद्धिक दृष्टि से दुर्बल बनाती है। इस बिखराव को गायत्री की ध्यानयोग प्रक्रिया द्वारा मनःसंस्थान के विभिन्न क्षमता केन्द्रों पर संचित-केन्द्रित कर लिया जाता है तो प्रसुप्त पड़े संस्थान जाग्रत होने लगते हैं। वे विशेषताएँ जो भीतर पहले नहीं थीं, जाग्रत होने लगती हैं। स्मरण शक्ति-प्रतिभा-बुद्धिलब्धि जैसी कितनी ही क्षमताएँ इस आधार पर विकसित की जा सकती हैं।
साधना पिछले 13 जन्मों के पापों का शमन करने में लग गयी। दुष्कर्मों से उत्पन्न कुसंस्कार मिटने पर अब आप जो गायत्री साधना करेंगे वह फलदायी होगी। “ प्रसन्न मन लौटे माधवाचार्य ने वृन्दावन में जो उपासना की उसका आश्चर्यजनक प्रतिफल उन्हें मिला।
साधना वस्तुतः गायत्री साधक को वह सब देने में समर्थ है, जिसके लिए व्यक्ति भौतिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में आकाँक्षा रखता है। भक्ति व शक्ति दोनों का ही इसमें समन्वय है।
साधना में प्रयुक्त किया जाता है। प्रकारान्तर से सूर्य उपासना का तात्पर्य ब्रह्मतेज की अवतरण प्रक्रिया आत्मचेतना की पृष्ठभूमि पर सम्पन्न कराना है। आत्मा को पृथ्वी और ब्रह्मतेज को सूर्य की उपमा दी जा सकती है। पृथ्वी पर जो जीवन दृष्टिगोचर होता है, वह सूर्य का ही अनुदान है। सूर्य को जगत की आत्मा बताया गया है।
साधना संकल्पित साधना है। “अनुष्ठान” शब्द का अर्थ है “अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिए संकल्पपूर्वक निर्धारित प्रतिबन्धों और तपश्चर्या के साथ विशिष्ट उपासना संपन्न करना।” चौबीस हजार जप की संकल्पित गायत्री साधना ही नवरात्रि के लिए सर्वश्रेष्ठ है। लम्बे समय तक व्रत पालन करने, कड़ी पुरश्चरण साधनाएँ करने के लिए तो सुदृढ़ मनोबल चाहिए। संकल्प किसी बहाने टूटे या मात्र चिह्न−पूजा ही हो इससे अच्छा तो यह है कि छोटा ही सही पर संकल्प नियमपूर्वक निभाया जाय।
साधना की प्रत्यक्ष सिद्धि का प्रमाण है कि आज उसी पत्रिका की पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ आधुनिकतम मशीनों द्वारा छपती हैं व दस गुने पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं। गायत्री परिवार को जन्म वस्तुतः “अखण्ड-ज्योति” ने दिया है व इसे पूज्य गुरुदेव “नवयुग के मत्स्यावतार” की उक्ति दिया करते थे,जोकि नितान्त सटीक है।
साधना का सूक्ष्म प्रभाव साधना के दौरान साधकों को स्पष्ट अनुभव होता है। घर में की गई साधना की अपेक्षा यहाँ की साधना जल्दी फलीभूत होती है। परोक्ष प्रभाव वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा, सप्तऋषियों का प्रतीक पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की तपश्चर्या विशेष प्रभाव उत्पन्न करती है।
साधना एवं अनुष्ठान उपक्रम में अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक मंत्रों का उपयोग लिखा गया है। गायत्री महाविज्ञान के तीनों भाग तथा गायत्री साधना विधि-विधान संबंधी छोटी-छोटी चौबीस पुस्तकों में इन्हें विस्तार से दिया गया है। शुद्ध रूप से इन मंत्रों को याद कर सकना सर्वसाधारण के लिए संभव नहीं है। अतः समय को देखते हुए यह उचित है कि एक गायत्री मंत्र के उच्चारण द्वारा ही विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति कर ली जाय। जिनकी स्मरण शक्ति मंत्रों को शुद्ध रूप से याद कर सकने की है, वे उनका उच्चारण करते हुए सभी विधि-विधानों को पूरा करते रह सकते हैं।
साधना व तपश्चर्या की जाती है, जिसके लिए नवरात्रि की संधिबेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधना संबंधी सब कुछ जो पाठक चाहते थे, वर्णित था इन्हीं दिनों पहले पाँच खण्डों में,फिर तीन खण्डों में प्रकाशित हुआ। यह स्वयं में एक अभूतपूर्व रचना थी क्योंकि अब तक गायत्री महाशक्ति पर कही भी संकलित रूप में कोई ग्रन्थ नहीं था। संस्कृत में संहिताएँ सब कोई तो पढ़ नहीं सकते थे अतः सारे ग्रन्थों से सार निकाल कर अपना एक महत्वपूर्ण शोध प्रबन्ध उनने जन-जन को समर्पित कर दिया। 1948 में प्रकाशित इस ग्रन्थ के अट्ठाइस संस्करण अब तक प्रकाशित हो चुके हैं व न्यूनतम पच्चीस लाख लोगों तक यह सद्ज्ञान पहुँच चुका है। अगणित व्यक्तियों की शंकाएँ मिटीं व गायत्री मंत्र जन-जन के लिए बिना किसी धर्म, जाति, मत, पंथ व लिंग के अब सुलभ हो गया है।
साधनाएँ विशेष रूप से इन्हीं दिनों संपन्न की जाती हैं। देवी उपासकों द्वारा दुर्गा सप्तशती का पाठ इन्हीं दिनों विशिष्ट उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
साधना की जाय तो साधक के रोम-रोम में सिद्धियाँ फूट पड़ती हैं।
साधना के आधार पर यमराज को भी उसकी विनती सुनने पर विवश कर दिया। पति निष्ठा से प्रसन्न यमराज ने सावित्री को पति की प्रिय पत्नी बनने तथा पुत्रवान् बनने का आशीर्वाद दिया। इन सब वरदानों के बाद यमराज को उस सत्यवान को पुनर्जीवित करना पड़ा जिसकी आयु पूरी हो चुकी थी।
साधना जैसे मातृशक्ति में विशिष्ट रूप से पाये जाने वाले गुणों का साधक को अनुदान मिलता है। इस प्रतीक पूजा से नारी तत्व के प्रति पूज्य भाव की सहज श्रद्धा उत्पन्न होती है। अस्तु इस चिन्तन के इस दिव्य प्रवाह को यदि अलंकारिक रूप से नारी के रूप में चित्रित किया गया है, तो उसे उचित ही कहा जा सकता है। इस प्राथमिक प्रतिपादन के रूप में प्रस्तुत किये गये नारी-विग्रह से भी गायत्री महाशक्ति के उच्चस्तरीय स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आता।
साधना ही नवरात्रि के लिए सर्वश्रेष्ठ है। लम्बे समय तक व्रत पालन करने, कड़ी पुरश्चरण साधनाएँ करने के लिए तो सुदृढ़ मनोबल चाहिए। संकल्प किसी बहाने टूटे या मात्र चिह्न−पूजा ही हो इससे अच्छा तो यह है कि छोटा ही सही पर संकल्प नियमपूर्वक निभाया जाय। इस दृष्टि से नौ दिन की चौबीस हजार जप की साधना सुगम भी है व तप की न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा करती है। नियत दिनों में नियत जप संख्या, ब्रह्मचर्य व्रतपालन, भोजन में उपवास का समावेश, दूसरों से शरीर सेवा न करवाना, भूमिशयन, कम वस्त्रों में रहना, चमड़े का परित्याग जैसी तप तितिक्षाएँ, अंत में हवन की पूर्णाहुति ये अनुष्ठान की सामान्य मर्यादाएँ हैं।
साधना की महिमा प्रतिपादित करते हैं।
साधनाकाल में विस्थापित स्थिति में भटक रह दो राजकुमार उनके पास आए। स्वामी जी का आशीर्वाद प्राप्त कर उनने अपना खोया राज्य फिर से प्राप्त कर लिया। जीवन भर वे आदर्श राज्य की तरह विजय नगर का संचालन करते रहे। कभी विजय नगर उतना ही समृद्ध राष्ट्र था, जितना उत्तर में पाटलिपुत्र या हस्तिनापुर।
साधना की। सफलता न मिलने पर वे काशी के मणिकर्णिका घाट चले गए व वहाँ श्मशान में रहकर साधना करने लगे। एक दिन भैरव उनकी सफल साधना से प्रसन्न होकर वर देने आए व बोले कि गायत्री उपासना के कारण उनमें इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता को न सहन पाने के कारण वे स्वयं सामने नहीं आ सकते। उनकी शंका का समाधान करने के लिए भैरव ने उन्हें पूर्व के चौदह जन्मों के एक भयंकर दृश्य दिखाए व कहा कि “आपकी तेरह वर्ष की साधना पिछले 13 जन्मों के पापों का शमन करने में लग गयी। दुष्कर्मों से उत्पन्न कुसंस्कार मिटने पर अब आप जो गायत्री साधना करेंगे वह फलदायी होगी।
साधनाओं का आधार गायत्री को ही माना गया है। हर प्रकार की सफलता या सिद्धि गायत्री साधना से हस्तगत की जा सकती हैं। हे परम पतिव्रता पार्वती। इस गुप्त रहस्य को जो जानेंगे और गायत्री साधना में प्रवृत्त होंगे, वे परम सिद्धि को प्राप्त करेंगे।”
साधना से अतीन्द्रिय सामर्थ्य का विकास होता है व परोक्ष के गर्भ में झाँक कर अविज्ञात को देखा जा सकता है। ऐसे ही क्षमता संपन्न साधकों में जीवराम व्यास का नाम प्रख्यात है, जिन्हें पानी वाले महाराज के नाम से जाना जाता है। महाराष्ट्र के जलगाँव में जन्मे श्री जीवराम बाल्यकाल से ही गायत्री के अनन्य उपासक थे। साधनाकाल में उन्हें अपने हृदय में दिव्य प्रकाश का दर्शन हुआ व प्रेरणा मिली कि परोक्ष दर्शन की क्षमता जो उन्हें प्राप्त है, उसका परमार्थ प्रयोजन के निमित्त उपयोग हो।
साधना का अधिक माहात्म्य बताया है और इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसरों पर न बन पड़े तो इन नवरात्रियों में तो आध्यात्मिक तप साधनाओं का सुयोग बिठा ही लेना चाहिए।
साधना की अनेकों प्रथाओं पद्धतियों के रूप में बिखरा पड़ा है। मोटे रूप से तो यह ऐसा लगता है मानों किसी देवी-देवता की अभ्यर्थना कर मनोकामना की मनुहार इसमें की जा रही हैं। किन्तु वास्तविकता ऐसी है नहीं। मानवी सत्ता के अन्तराल में इतनी महान संभावनाएँ और क्षमताएँ प्रसुप्त भरी पड़ी हैं कि उन्हें प्रकारान्तर से ब्रह्म चेतना की “ट्रू कॉपी” कहा जा सकता है। अंतराल का सोया पड़ा रहना ही दरिद्रता है और उसकी जाग्रति में सम्पन्नता का महासागर लहलहाता देखा जा सकता है।
साधना से सम्पन्नता की सिद्धि या सफलता प्राप्ति के शाश्वत सिद्धाँत पर ये सभी बातें लागू होती हैं। छुट-पुट कर्मकाँडों की लकीर पीट लेने पर अभीष्ट सफलता कहाँ मिलती है? उसके लिए श्रम-साधना, मनोयोग, साधनों का सदुपयोग आदि सभी आवश्यक है। इतना सब होने पर अभीष्ट की प्राप्ति होती है।
साधना को सिद्धि स्तर तक पहुँचाया जाता है।
साधना से प्रसन्न होकर वर देने आए व बोले कि गायत्री उपासना के कारण उनमें इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता को न सहन पाने के कारण वे स्वयं सामने नहीं आ सकते। उनकी शंका का समाधान करने के लिए भैरव ने उन्हें पूर्व के चौदह जन्मों के एक भयंकर दृश्य दिखाए व कहा कि “आपकी तेरह वर्ष की साधना पिछले 13 जन्मों के पापों का शमन करने में लग गयी। दुष्कर्मों से उत्पन्न कुसंस्कार मिटने पर अब आप जो गायत्री साधना करेंगे वह फलदायी होगी। “ प्रसन्न मन लौटे माधवाचार्य ने वृन्दावन में जो उपासना की उसका आश्चर्यजनक प्रतिफल उन्हें मिला।
साधना वर्ष घोषित किया गया है। जिस महामंत्र का आश्रय लेकर ब्रह्मर्षि विश्वमित्र ने कभी नूतन सृष्टि की रचना की थी, उसी का अवलम्बन लेकर सतयुग की वापसी अब संभव होगी। आज के युग के विश्वामित्र
साधना-2
साधना की प्रेरणा उन्हें महर्षि पाराशर ने दी। पूर्ण विधि-विधान से दोनों पति-पत्नी ने अनुष्ठान किया तो रानी की इच्छानुसार उन्हें सावित्री के रूप में कन्या की प्राप्ति हुई। सर्वांग सुन्दर युवती सावित्री का विवाह राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुआ। जंगल में यज्ञ हेतु ईंधन लेने गए सत्यवान की जब अकाल मृत्यु हो गयी तो सावित्री ने अपनी गायत्री साधना के आधार पर यमराज को भी उसकी विनती सुनने पर विवश कर दिया। पति निष्ठा से प्रसन्न यमराज ने सावित्री को पति की प्रिय पत्नी बनने तथा पुत्रवान् बनने का आशीर्वाद दिया।
साधनाकाल में उन्हें अपने हृदय में दिव्य प्रकाश का दर्शन हुआ व प्रेरणा मिली कि परोक्ष दर्शन की क्षमता जो उन्हें प्राप्त है, उसका परमार्थ प्रयोजन के निमित्त उपयोग हो।
साधना में संपन्न की जाती है। नादयोग से लेकर लययोग तथा त्राटक तक किसी को भी साधना का माध्यम बनाया जा सकता है। अंतिम लक्ष्य सब का एक ही है जीवन ब्रह्म सम्मिलन की रसानुभूति, अद्वैत का भाव तथा अंतर्चेतना का जागरण-उन्नयन।
साधना के लिए इष्ट रूप में गायत्री का ही वरण होना चाहिए। सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी ने कमल पुष्प पर बैठ कर आकाशवाणी द्वारा निर्देशित गायत्री उपासना की थी और सृष्टि सृजन का सामर्थ्य प्राप्त किया था। त्रिदेवों की उपास्य गायत्री ही रही है।
साधना प्रक्रिया को किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
साधना गायत्री महाशक्ति की उच्चस्तरीय साधनाक्रम में श्रेष्ठतम साधना मानी गयी है। ईश्वर मिलन की, शिव और शक्ति के मिलन की कुण्डलिनी जागरण की साधना इसे कहते हैं। भावनात्मक क्षेत्र में इस दिव्य मिलन की प्रतिक्रिया आनन्द और उल्लास के रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह भक्ति की पराकाष्ठा वाला स्वरूप है। संसार के श्रेष्ठ देवपक्ष को देखते हुए प्रसन्न होना आनन्द है और निकृष्ट दैत्य पक्ष को निरस्त करने के लिए उमगते शौर्य साहस को दिखाना उल्लास है।
साधना की है, उनने गायत्री को ही आधार रखा है। प्राचीन इतिहास पुराणों के पन्ने पलटे जायें तो यह तथ्य स्पष्ट हो जायगा कि सभी प्रमुख ऋषि-महर्षि गायत्री के आधार पर ही परम् सिद्धि प्राप्त करते थे। वसिष्ठ, याज्ञवलक्य, गौतम अत्रि, विश्वामित्र, भारद्वाज आदि सप्तर्षियों सहित समस्त ऋषि-मनीषियों ने वेदमाता की उपासना करके किस प्रकार दिव्य शक्तियाँ अर्जित की थी और उसके द्वारा वे कितनी महान सफलतायें उपलब्ध कर सके थे, इतिहासवेत्ताओं से इनके चरित्र छिपे नहीं है।
साधना बड़ी मात्रा में करते हैं, जो प्रतिदिन कितने ही लक्ष मंत्र जप के समकक्ष हो जाती है। दोनों नवरात्रियों में तो यहाँ इतने अधिक साधक हर वर्ष आते हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि अभी भी साधना तपश्चर्या के प्रति लोक-निष्ठ समाप्त नहीं हुई। स्थापना से लेकर अब तक जितना जप यहाँ संपन्न हुआ है, उसे देखते हुए इसे गायत्री तीर्थ नाम दिया जाना उचित ही है। दिव्य साधना का सूक्ष्म प्रभाव साधना के दौरान साधकों को स्पष्ट अनुभव होता है। घर में की गई साधना की अपेक्षा यहाँ की साधना जल्दी फलीभूत होती है।
साधना की अवधि में प्रकट हुए व उनके सिर पर स्पर्श कर उन्हें उनके पूर्व जन्मों की उनने जानकारी करायी। पूर्व जन्म में गुरु के द्वारा दिया नाम उद्धड़ साधना, उपासना, उस जन्म की अनुभूतियाँ अब उन्हें याद आती चली गयी। यह भी याद आया कि कैसे एक सुन्दरी, रूपवती युवती के रूप जाल में उलझ कर वे साधना मार्ग से विरत हो गए थे व उन्हें विष देकर मार दिया गया था।
साधना की उपलब्धियाँ है। वैज्ञानिक कहते हैं कि मस्तिष्कीय कोशों को सतत् उत्तेजना देकर प्रसुप्त केन्द्रों को उद्दीप्त किया जा सकता है। गायत्री महाविद्या के जप द्वारा मूलतः यही प्रक्रिया संपन्न होती है व व्यक्ति विलक्षण मानसिक क्षमताओं से संपन्न बन जाता है। विकसित कला-कौशल, बढ़ी हुई स्मरण शक्ति, आविष्कर्ता स्तर की सूझबूझ, मौलिक स्तर का चिन्तन करने जैसी बुद्धि इसी प्रकार की सिद्धियाँ है। इससे न केवल व्यक्ति की स्वयं की क्षमताएँ परिष्कृत होती हैं, वह दूसरों को प्रभावित कर सकने की प्रतिभा का भी धनी बन जाता है।
साधना करने वाले महापुरुषों ने गायत्री महाशक्ति के इस चौथे कोश विज्ञानमय कोश का ही अनावरण कर वह सिद्धि अर्जित की जिसका छोटा सा नमूना भक्तों द्वारा समय-समय पर देखा गया। परोक्ष की जानकारी, विचार संचार व देवात्म संपर्क आदि कितनी ही अलौकिक ऋद्धियाँ इसी केन्द्र की जाग्रति का परिणाम है। विशुद्धि या अनाहत चक्र पर ध्यान करते हुए देवात्म शक्ति के प्रवेश व सारे क्षेत्र के अग्निमय-ज्योतिर्मय होने की भावना ध्यानयोग की उच्चस्तरीय प्रक्रिया द्वारा विज्ञानमय कोश की साधना में संपन्न की जाती है। नादयोग से लेकर लययोग तथा त्राटक तक किसी को भी साधना का माध्यम बनाया जा सकता है। अंतिम लक्ष्य सब का एक ही है जीवन ब्रह्म सम्मिलन की रसानुभूति, अद्वैत का भाव तथा अंतर्चेतना का जागरण-उन्नयन।
साधना का उत्कीलन हो गया और उनकी सफलता सुनिश्चित हो गई।
साधना आवश्यक प्रतीत हुई। गुरु वशिष्ठ ने भी इस आकाँक्षा का समर्थन किया। अयोध्या में साधनों की कमी नहीं थी, उसके लिए सभी सुविधाएँ जुट सकती थी, पर मूल प्रश्न एक ही था कि अभीष्ट वातावरण वहाँ कहाँ से आये? जन्म भूमि और कर्म भूमि के साथ मनुष्य के अनेकानेक संस्कार जुड़े होते हैं। अपना-पराया, राग-द्वेष, स्मृति-अभ्यास, संपर्क-स्वभाव के कुछ ऐसे प्रवाह मनुष्य के साथ जुड़े होते हैं कि बहुत रोकथाम करने पर भी मनुष्य की चिन्तन पद्धति अभिरुचि और आदतें उसी अभ्यस्त ढर्रे में अनायास ही घूमती रहती है।
साधना है, यह हर कोई नहीं समझ सकता। किन्तु परम पूज्य गुरुदेव का जीवन जिनने देखा है, वे जानते है कि उनका एक-एक पल औरों को ऊँचा उठाने के निमित्त नियोजित था। निज के लिए उनने कभी कुछ माँगा नहीं। अपना सब कुछ पैतृक सम्पत्ति से लेकर आर्षग्रन्थों के भाष्य व तीन हजार पुस्तकों से मिल सकने वाली रायल्टी समाज को दान में दे दी। जो भी दिया वह बादल बनकर उनके पास लौटा, उन पर जीवन भर अनुग्रह बरसता रहा।
साधना का प्रमुख लाभ प्राणशक्ति जीवनी शक्ति के रूप में ही साधक को मिलता है।
साधना के बलबूते चारों वेदों के ज्ञाता महर्षि याज्ञवलक्य बने। यज्ञ प्रक्रिया या वैज्ञानिक अनुसंधान इन्हीं के द्वारा संपन्न हुआ।
साधना के अधिक सफल होने की आशा है, इसके अतिरिक्त इस कथन में और कोई तथ्य नहीं हो सकता। किन्तु कहीं यह असमंजस आड़े आता हो तो बिना किसी उलझन में पड़े “शापुमुक्ताभव” मंत्र को दुहरा कर साधना को शापमुक्त हुआ मान लेना चाहिए।
साधना करते।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा प्रक्रिया को शिक्षार्थियों के अन्तराल की गहराई तक उतारने की व्यवस्था यहाँ के नौ दिवसीय सत्रों में है। मनोबल और आत्मबल बढ़ाने वाले आहार के साथ दिव्य औषधियों का सेवन भी आवश्यकतानुसार जुड़ा रहता है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में बहुमूल्य यंत्रों द्वारा मूर्धन्य वैज्ञानिक हर शिविरार्थियों की चिकित्सकीय जाँच पड़ताल करते हैं। इन विशेषताओं से स्पष्ट है कि पुरातन तीर्थ स्थानों में जो उच्चस्तरीय विशेषताएँ आदि से अंत तक भरी रहती थी, लगभग
साधना ही हमारा जीवन लक्ष्य हो सकता है, होना चाहिए।
साधना है। “अनुष्ठान” शब्द का अर्थ है “अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिए संकल्पपूर्वक निर्धारित प्रतिबन्धों और तपश्चर्या के साथ विशिष्ट उपासना संपन्न करना।” चौबीस हजार जप की संकल्पित गायत्री साधना ही नवरात्रि के लिए सर्वश्रेष्ठ है। लम्बे समय तक व्रत पालन करने, कड़ी पुरश्चरण साधनाएँ करने के लिए तो सुदृढ़ मनोबल चाहिए। संकल्प किसी बहाने टूटे या मात्र चिह्न−पूजा ही हो इससे अच्छा तो यह है कि छोटा ही सही पर संकल्प नियमपूर्वक निभाया जाय।
साधना कर रहे थे, तो उनकी मान्यताओं एवं भावनाओं के आधार पर स्त्रियोचित गुण ही नहीं शारीरिक लक्षणों का भी प्रकटीकरण होने लगा था। झाड़ी का भूत और रस्सी का साँप मान्यताओं पर ही आधारित है। जिस चिकित्सक पर विश्वास होता है उसकी झाड़फूँक और राख भभूत भी संजीवनी बूटी का काम करती हैं, जिस पर सन्देह हो उस सुयोग्य चिकित्सक की उपयोगी दवा भी काम नहीं करती हैं।
साधना छूटी थी, उससे आगे की मंजिल उनने पार की। गायत्री साधना के बाद त्रिकालज्ञ की, भूत-भविष्य ज्ञाता की, सिद्धि उन्हें मिल गयी थी। उनकी वाणी ऐसी सिद्ध हो गयी थी, कि वे जो भी कहते वह होकर रहता था।
साधना के कारण ही नित्य सौ मन स्वर्ण प्राप्त होने का वरदान था, जिसे वह दान कर देते थे। परशुराम अकेले होते हुए भी पृथ्वी के समस्त राजाओं को सेना समेत संहार करने में सफल हुए थे। धौम्य ऋषि के आशीर्वाद मात्र से आरुणि को समस्त विद्यायें प्राप्त हो गयी थीं। दधीचि ऋषि की हड्डियों में इतना प्रचण्ड तेज आ गया था कि उन्हीं के द्वारा बना हुआ वज्र वृत्रासुर को मारने में सफल हुआ।
साधना करने हेतु सहर्ष आमंत्रण है। वर्ष भर चलने वाले नौ दिवसीय अथवा एक माह के युगशिल्पी सत्रों में शाँतिकुँज हरिद्वार 249411 (उ.प्र.) के पते पर पत्र व्यवहार कर भागीदारी हेतु अनुमति प्राप्त की जा सकती है।
साधना प्रसिद्ध है। सीता का वनवास में अशोक वाटिका और अन्त में वाल्मीकि आश्रम में तप करना सर्वविदित है। भरत ने चौदह वर्ष तक जो तप किया था उसी का प्रताप था कि वे बाण पर बिठाकर हनुमान को लंका पहुँचा सके।
साधनाओं का प्रकरण है। वैदिक-पक्ष में इस प्रकार के कड़े प्रतिबन्ध नहीं है, क्योंकि वे सौम्य है। उनमें मात्र आत्मबल बढ़ाने और दिव्य क्षमताओं को विकसित करने की शक्ति है। अनिष्ट करने के लिए उनका प्रयोग नहीं होता। इसलिए दुरुपयोग का अंश न रहने के कारण सौम्य मंत्रों का कीलन नहीं हुआ है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के दौरान एक विराट व्यापक अभियान चला व चौबीस लाख व्यक्तियों ने उसमें भाग लिया था। गायत्री महापुरश्चरण अभियान जो उसके बाद आरंभ हुआ, सतत् चलता रहा। नए परिजन उसमें जुड़े एवं परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि में एक समर्थ ब्रह्मास्त्र का रूप उसने ले लिया। सुनियोजित ढंग से एक करोड़ से अधिक साधकों की भागीदारी उस युग संधि महापुरश्चरण में हो रही है जो 1988 की नवरात्रि से आरंभ हुआ। उसी शृंखला में इस वर्ष के शक्ति साधना कार्यक्रम हैं।
साधना जल्दी फलीभूत होती है। परोक्ष प्रभाव वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा, सप्तऋषियों का प्रतीक पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की तपश्चर्या विशेष प्रभाव उत्पन्न करती है।
साधनाक्रम में श्रेष्ठतम साधना मानी गयी है। ईश्वर मिलन की, शिव और शक्ति के मिलन की कुण्डलिनी जागरण की साधना इसे कहते हैं। भावनात्मक क्षेत्र में इस दिव्य मिलन की प्रतिक्रिया आनन्द और उल्लास के रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह भक्ति की पराकाष्ठा वाला स्वरूप है। संसार के श्रेष्ठ देवपक्ष को देखते हुए प्रसन्न होना आनन्द है और निकृष्ट दैत्य पक्ष को निरस्त करने के लिए उमगते शौर्य साहस को दिखाना उल्लास है।
साधना की जाती है। स्थूल शरीर की साधना में यों अन्नमय व प्राणमयकोश दोनों ही आते हैं। सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत मनोमय कोश तथा विज्ञानमय कोश की साधना का पूर्वार्ध आता है तथा कारण शरीर के अंतर्गत विज्ञानमय कोश का उत्तरार्ध एवं आनन्दमय कोश की अंतिम स्थिति आती है। यह दोनों विभाजन यों सूक्ष्म एनाटॉमी की दृष्टि से पृथक-पृथक हैं अतः मोटे रूप में ही दोनों में कुछ साम्यता बिठाई जा सकती है। पाँचकोशों की साधना हो चाहे तीन शरीरों की, है यह गायत्री की उच्चस्तरीय साधना व इसके प्रतिफल बड़े महत्वपूर्ण हैं।
साधना करने की उतनी जरूरत नहीं है। इस छोटी सी गायत्री मंत्र का जप करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है।”
साधना से सबसे अधिक प्रभावित साधक का व्यक्तित्व ही होता है।
साधना का पूर्वार्ध आता है तथा कारण शरीर के अंतर्गत विज्ञानमय कोश का उत्तरार्ध एवं आनन्दमय कोश की अंतिम स्थिति आती है। यह दोनों विभाजन यों सूक्ष्म एनाटॉमी की दृष्टि से पृथक-पृथक हैं अतः मोटे रूप में ही दोनों में कुछ साम्यता बिठाई जा सकती है। पाँचकोशों की साधना हो चाहे तीन शरीरों की, है यह गायत्री की उच्चस्तरीय साधना व इसके प्रतिफल बड़े महत्वपूर्ण हैं। अन्नमयकोश की सिद्धि से नीरोगता, दीर्घजीवन व चिरयौवन का लाभ मिलता है। प्राणमयकोश से साहस, शौर्य, पराक्रम, प्रभाव, प्रतिभा जैसी विशेषताएँ उभरती हैं।
साधना का क्रम इस प्रकार है-सबसे पहले आत्मशोधन-की संघ्या का विधान है। इसके पाँच अंग है (1) पवित्री करण (2) आचमन (3) शिखा बन्धन (4) प्राणायाम (5) न्यास इनका विधान बहुत सरल है।
साधना है। चढ़ाया हुआ जल भूमि पर गिरकर सूर्य की गर्मी से भाप बनकर अनन्त आकाश में बिखर जाता है। पीछे वह ओस, बादल आदि बनकर भूमि के वनस्पतियों की आवश्यकता पूरी करते हुए अपने को धन्य बनाता है। सविता देवता से यही अनुदान-वरदान माँगा जाता है कि हमारा व्यक्तित्व अर्घ्य रूप में स्वीकार कर वे हमें बादल बनकर अनंत में बिखरने की शक्ति एवं सिद्धि सामर्थ्य हमें प्रदान करें।
साधना मानी गयी है। ईश्वर मिलन की, शिव और शक्ति के मिलन की कुण्डलिनी जागरण की साधना इसे कहते हैं। भावनात्मक क्षेत्र में इस दिव्य मिलन की प्रतिक्रिया आनन्द और उल्लास के रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह भक्ति की पराकाष्ठा वाला स्वरूप है। संसार के श्रेष्ठ देवपक्ष को देखते हुए प्रसन्न होना आनन्द है और निकृष्ट दैत्य पक्ष को निरस्त करने के लिए उमगते शौर्य साहस को दिखाना उल्लास है।
साधना के बदले गुरु माध्यम बनकर आरुणि के लिए महर्षि धौम्य, जाबालि के लिए गौतम, अर्जुन के लिए इन्द्र, नचिकेता के लिये यम तथा कच के लिए शुक्राचार्य रूप में एवं विवेकानंद के लिए रामकृष्ण परमहंस रूप लेकर प्राणशक्ति में शिष्यों को ओतप्रोत कर देते हैं।
साधना इसे कहते हैं। भावनात्मक क्षेत्र में इस दिव्य मिलन की प्रतिक्रिया आनन्द और उल्लास के रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह भक्ति की पराकाष्ठा वाला स्वरूप है। संसार के श्रेष्ठ देवपक्ष को देखते हुए प्रसन्न होना आनन्द है और निकृष्ट दैत्य पक्ष को निरस्त करने के लिए उमगते शौर्य साहस को दिखाना उल्लास है। भक्ति से हटकर कुण्डलिनी जागरण वाला रूप शक्ति पक्ष है जो समृद्धि व सामर्थ्य का भण्डार है।
साधना का महत्व जन-जन को समझ में आ सके। अनुष्ठान की अवधि में मात्र जौ की रोटी व छाछ पर रहना था। जौ भी
साधनाओं के लिए आवश्यक है कि उन्हें अनुभवी संरक्षण में सम्पन्न किया जाए, स्वेच्छाचार न बरता जाय। जो इस प्रयोजन को पूरा कर सकें समझना चाहिए कि उनकी गायत्री साधना का उत्कीलन हो गया और उनकी सफलता सुनिश्चित हो गई।
साधना मार्ग से विरत हो गए थे व उन्हें विष देकर मार दिया गया था।
साधनाओं का सुयोग बिठा ही लेना चाहिए।
साधना के लिए दो मार्ग गायत्री साधना में बताए जाते हैं एक ब्रह्मरंध्र में प्रकाश ज्योति का ध्यान, दूसरा खेचरी मुद्रा द्वारा तालु देश से जिह्वा मूल को लगाकर इस अमृतरस का पान करना।
साधना का माध्यम बनाया जा सकता है। अंतिम लक्ष्य सब का एक ही है जीवन ब्रह्म सम्मिलन की रसानुभूति, अद्वैत का भाव तथा अंतर्चेतना का जागरण-उन्नयन।
साधना को उतारा उसका जीवन ही बदल गया। कोई अभाव था, वह दूर होता चला गया, घर में साधन समृद्धि आ गयी व प्रतिकूलताएं मिटती चली गयीं। जीवन साधना के फलस्वरूप नीरोग, दीर्घ जीवन अनुदान रूप में मिला व सद्ज्ञान मिलते चलने से जीवन के भावी स्वरूप के प्रति दृष्टि मिली। ये प्रत्यक्ष अनुग्रह जिन्हें मिले उन्हें उनने उच्चस्तरीय कक्षाओं में चढ़ाया व उनके माध्यम से नये व्यक्तियों तक प्रेरणा पहुँचाई। देखते-देखते लाखों व्यक्ति जुड़ गए।
साधनात्मक विधानों की ओर न करने पर परिणाम हानिकारक भी होता है। अपराधवृत्तियों का बाहुल्य इन्हीं दिनों देखा जाता है। देव संस्कृति में नवरात्रि पर्व के दौरान किये जानें वाले विभिन्न क्रिया कृत्यों का विधान अंतः की शक्ति को सुनियोजन देने के लिए ही है, उदाहरण के लिए गुजरात में दोनों नवरात्रियों में गरबा नृत्य संपन्न किया जाता है। भक्ति भावना की पराकाष्ठा व अंदर के उल्लास की क्रिया रूप में परिणति इस माध्यम से संपन्न होती है। महालय, दुर्गाष्टमी, पोंगल आदि पर्व ऐसी विशिष्टताओं से भरे हुए हैं।
साधना ने उनके ब्रह्मवर्चस् की रक्षा की व अन्त में मुनि वशिष्ठ ने भी कर्म के अनुसार जाति का अस्तित्व स्वीकार करके उन्हें ब्रह्मर्षि कहकर संबोधित किया था।
साधना कैसे जीवन को प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष बना देती है व अगणित सिद्धियाँ जिनका वर्णन विभिन्न ग्रन्थों में देखने को मिलता है, वास्तव में मिलती हैं कि नहीं यह उत्सुकता हर किसी को हो सकती है। कोई जीता-जागता उदाहरण मिल जाए, मॉडल दिख जाए तो मानने को मन भी करता है। पौराणिक नियम व भूतकाल के उदाहरणों से संभवतः आज का बुद्धि जीवी मानस प्रभावित न हो, पर यदि वस्तुतः ऐसा कोई नमूना सामने हो तो बरबस विश्वास हो उठता है कि हाँ गायत्री उपासना के माहात्म्य के विषय में जो कुछ कहा गया है, वह सच हो सकता है क्योंकि प्रमाण सामने है। यह नमूना यह मॉडल है स्वयं परम पूज्य गुरुदेव का जीवन। अस्सी वर्षों तक उनने जो जीवन जिया, वह एक खुली किताब की तरह है।
साधना-1
साधना के द्वारा योगीजन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं। नाम रूप सुविधानुसार कुछ भी माना जाए, पर वस्तुतः वह सविता देवता ही सब का उपास्य है, उसी के तेज को-ब्रह्मतेज को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है।
साधना, उपासना, उस जन्म की अनुभूतियाँ अब उन्हें याद आती चली गयी। यह भी याद आया कि कैसे एक सुन्दरी, रूपवती युवती के रूप जाल में उलझ कर वे साधना मार्ग से विरत हो गए थे व उन्हें विष देकर मार दिया गया था।
साधना में अग्निपिंड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है। उसकी मूल सत्ता दिव्य ज्ञान कही गई है। निराकार प्रज्ञा तत्व का साकार रूप सविता है अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म। सूर्य की उपासना करते हुए यह अनुभूति विकसित की जाती है कि वह आलोक साधक के शरीर मन और अन्तरात्मा में स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों में सक्रियता सद्ज्ञान एवं सद्भाव बनकर प्रकाशवान हो रहा है। इस प्रकार सूर्य को न केवल आलोक दर्शन की दिव्य प्रक्रिया मात्र मानकर बात समाप्त कर दी जाती है।
साधना करेंगे वह फलदायी होगी। “ प्रसन्न मन लौटे माधवाचार्य ने वृन्दावन में जो उपासना की उसका आश्चर्यजनक प्रतिफल उन्हें मिला।
साधना है।
साधना की अपेक्षा यहाँ की साधना जल्दी फलीभूत होती है। परोक्ष प्रभाव वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा, सप्तऋषियों का प्रतीक पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की तपश्चर्या विशेष प्रभाव उत्पन्न करती है।
साधनाएँ करने के लिए तो सुदृढ़ मनोबल चाहिए। संकल्प किसी बहाने टूटे या मात्र चिह्न−पूजा ही हो इससे अच्छा तो यह है कि छोटा ही सही पर संकल्प नियमपूर्वक निभाया जाय। इस दृष्टि से नौ दिन की चौबीस हजार जप की साधना सुगम भी है व तप की न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा करती है। नियत दिनों में नियत जप संख्या, ब्रह्मचर्य व्रतपालन, भोजन में उपवास का समावेश, दूसरों से शरीर सेवा न करवाना, भूमिशयन, कम वस्त्रों में रहना, चमड़े का परित्याग जैसी तप तितिक्षाएँ, अंत में हवन की पूर्णाहुति ये अनुष्ठान की सामान्य मर्यादाएँ हैं।
साधना में प्रवृत्त होंगे, वे परम सिद्धि को प्राप्त करेंगे।”
साधना तभी सार्थक व फलवती होती है, जब मानव मात्र के लिए उसका उपयोग हो।
साधना सुगम भी है व तप की न्यूनतम आवश्यकताओं को भी पूरा करती है। नियत दिनों में नियत जप संख्या, ब्रह्मचर्य व्रतपालन, भोजन में उपवास का समावेश, दूसरों से शरीर सेवा न करवाना, भूमिशयन, कम वस्त्रों में रहना, चमड़े का परित्याग जैसी तप तितिक्षाएँ, अंत में हवन की पूर्णाहुति ये अनुष्ठान की सामान्य मर्यादाएँ हैं।
साधना उपचारों द्वारा वातावरण में गर्मी उत्पन्न की जाती है, जिसकी व्यापक प्रखरता के दबाव से सब कुछ सहज ही बदलता चला जाता है। शाँतिकुँज की स्थापना इन दोनों कसौटियों पर कसने के उपरान्त परम पूज्य गुरुदेव द्वारा 1971 में की गई। इस स्थान पर कभी गायत्री मंत्र के प्रथम द्रष्ट विश्वामित्र से लेकर भारद्वाज, कश्यप, अत्रि, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ ऋषि आदि ने ज्ञान-विज्ञान संबंधी महत्वपूर्ण प्रयोग किये थे। उनकी सूक्ष्म एवं दिव्य प्राण ऊर्जा को यहाँ सतत् अनुभव किया जा सकता है।
साधना अनुष्ठान है, जिससे किसी भी आस्थावान गायत्री साधक को वंचित नहीं रहना चाहिए।
साधना संपन्न की व विश्व भर में गायत्री महाशक्ति के विस्तार के रूप में उसे अगले दिनों ही साकार होता देखा जा सकेगा। उसका शुभारंभ इसी वर्ष पश्चिम के देशों की यात्रा व हजारों घरों में देव स्थापना से हो चुका है।
साधना है। गायत्री ब्रह्मवर्चस् रूपा है, इससे बढ़कर सिद्धिदायक साधना कोई और नहीं।
साधना में बताए जाते हैं एक ब्रह्मरंध्र में प्रकाश ज्योति का ध्यान, दूसरा खेचरी मुद्रा द्वारा तालु देश से जिह्वा मूल को लगाकर इस अमृतरस का पान करना।
साधना हेतु इस वर्ष को शक्ति साधना वर्ष घोषित किया गया है। जिस महामंत्र का आश्रय लेकर ब्रह्मर्षि विश्वमित्र ने कभी नूतन सृष्टि की रचना की थी, उसी का अवलम्बन लेकर सतयुग की वापसी अब संभव होगी। आज के युग के विश्वामित्र
साधना से सिद्धि के सिद्धाँत में फिर कहीं भी किसी सन्देह की गुँजाइश नहीं रह जाती।
साधनाकाल में उन्हें विचित्र अनुभूतियाँ होती थीं। कभी एक विशेष प्रकार की सुगन्ध आने लगती तो कभी विचित्र दृश्य दिखाई देने लगते। जब जप के लिए बैठते तो मन ध्यान में ऐसा लगता था कि पता ही नहीं चलता कब समय बीत गया। कई बार उन्हें ध्यान करते समय ही गायत्री की छवि भी दिखाई देने लगती। ध्यान में मन इतना एकाग्र हो जाता था कि अपने शरीर की कोई सुध-बुध ही नहीं रहती थी।
साधना द्वारा सिद्धि की यह सामर्थ्य हस्तगत की है। जानना चाहें तो मनोमयकोश से मस्तिष्कीय विकास, उत्कृष्ट चिन्तन-प्रतिभा परिष्कार चमत्कारी प्रज्ञा रूप में इन्हें समझ सकते है, दूसरी और विज्ञानमय कोश को असामान्य स्तर की बुद्धि के विकास, परोक्ष से संपर्क जोड़ने की क्षमता तथा आदर्शवादी उमंगों के उभार के रूप में जान सकते हैं।
साधना से न केवल सन्तानहीन को इष्ट की प्राप्ति होती है, वरन् अकाल मृत्यु हो भी जाय तो उससे भी लौटाया जा सकता है। जरा, व्याधि, मृत्यु फिर किसी का भी भय गायत्री साधक को नहीं रहता। निष्ठ अश्वपति व मालती तथा पुत्री सावित्री के स्तर की चाहिए।
साधना तपश्चर्या के प्रति लोक-निष्ठ समाप्त नहीं हुई। स्थापना से लेकर अब तक जितना जप यहाँ संपन्न हुआ है, उसे देखते हुए इसे गायत्री तीर्थ नाम दिया जाना उचित ही है। दिव्य साधना का सूक्ष्म प्रभाव साधना के दौरान साधकों को स्पष्ट अनुभव होता है। घर में की गई साधना की अपेक्षा यहाँ की साधना जल्दी फलीभूत होती है। परोक्ष प्रभाव वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा, सप्तऋषियों का प्रतीक पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है।
साधना के निष्फल चले जाने का शाप देकर अपने पैरों कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे? स्वयं हतवीर्य क्यों बनेंगे और समस्त संसार को इस कल्पवृक्ष का लाभ उठाने से वंचित क्यों करेंगे? यह ऐसी अनबूझ पहेली है, जिसका समाधान कहीं से भी नहीं सूझता।
साधना में कुमारी पूजन, शव साधन तथा गायत्री की कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र वेधन, आदि की साधनाएँ विशेष रूप से इन्हीं दिनों संपन्न की जाती हैं। देवी उपासकों द्वारा दुर्गा सप्तशती का पाठ इन्हीं दिनों विशिष्ट उद्देश्यों के लिए किया जाता है।
साधना से सिद्धि संबंधी मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है। अपनी जीवन यात्रा को परम पूज्य गुरुदेव एक ब्रह्म कमल की जीवन यात्रा की उपमा देते थे। विगत वर्ष बसन्तपर्व पर “महाकाल का बसंतपर्व पर संदेश” में उनने लिखा था कि “इस जीवन रूपी दुर्लभ ब्रह्मकमल के अस्सी फूल पूरी तरह खिल चुके। एक से एक शोभायमान पुष्पों के खिलते रहने का एक महत्वपूर्ण अध्याय पूरा हो चला ----- सूत्र संचालक सत्ता के इस जीवन का प्रथम अध्याय पूरा हुआ। स्वयं वे बसन्तपर्व से प्रायः साढ़े चार माह बाद माँ गायत्री के अवतरण के पावन पुण्य दिवस गायत्री जयन्ती(2 जून 1990)को अपनी आध्यात्मिक माता की गोद में विश्राम हेतु चले गए।
साधना करने का निर्देश दिया। देवप्रयाग, मुनि की रेती, लक्ष्मण झूला जैसे स्थानों पर उन लोगों की तपःस्थली थी, ऐसा मनीषियों का मत है।
साधना का बीजारोपण करने वाले कार्यक्रमों का शुभारंभ हो रहा है। जहाँ भी व्यवस्था बन सकें, वैयक्तिक व सामूहिक स्तर पर क्रमबद्ध अनुष्ठान की व्यवस्था की जाए ताकि परोक्ष जगत से बरसने वाले देवी अनुदानों से सब लाभ उठा सकें।
साधना हो चाहे तीन शरीरों की, है यह गायत्री की उच्चस्तरीय साधना व इसके प्रतिफल बड़े महत्वपूर्ण हैं। अन्नमयकोश की सिद्धि से नीरोगता, दीर्घजीवन व चिरयौवन का लाभ मिलता है। प्राणमयकोश से साहस, शौर्य, पराक्रम, प्रभाव, प्रतिभा जैसी विशेषताएँ उभरती हैं। मनोमयकोश की जाग्रति से विवेकशीलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमत्ता, धैर्य-संतुलन, तनाव मुक्ति जैसे गुण उपलब्ध होते हैं, अतीन्द्रिय ज्ञान, अपरोक्षानुभूति, दिव्यदृष्टि जैसी उपलब्धियाँ विज्ञानमयकोश के जागरण की हैं। आनन्दमयकोश के विकास से ईश्वर दर्शन, आत्म साक्षात्कार, स्वर्ग-मुक्ति हर घड़ी आनन्द स्थिति जैसी महान उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं।
साधना, मनोयोग, साधनों का सदुपयोग आदि सभी आवश्यक है। इतना सब होने पर अभीष्ट की प्राप्ति होती है।
साधना के महत्वपूर्ण शिक्षण सत्र चलाए। यही पर उनकी एकाकी सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या संपन्न हुई। यहीं पर अध्यात्म व विज्ञान के समन्वय का उनका संकल्प ब्रह्मवर्चस् के रूप में साकार होकर सामने आया।यहीं पर उनने भारत भर में प्रज्ञा संस्थान बनाने व जन-जन तक ब्राह्मणत्व के विस्तार का संकल्प लिया व देखते-देखते तीन हजार से अधिक शक्ति पीठें पूरे भारत वर्ष भर में बन गई। यहीं पर उनने देवात्म शक्ति के कुण्डलिनी जागरण की साधना संपन्न की व विश्व भर में गायत्री महाशक्ति के विस्तार के रूप में उसे अगले दिनों ही साकार होता देखा जा सकेगा।
साधना उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं। इस प्रकार की भेद-भाव भरी मान्यता मध्यकाल के अन्धकार युग की देन है, जिसमें स्त्रियों को हेय,नीच कह कर उनके अधिकार उनसे छीन लिये गये। आज की विवेकशीलता की माँग है कि उन्हें उनके अधिकार वापस दिलाये जाएँ, मंत्र जप, गायत्री यज्ञ करना-कराने का उन्हें नर के समान ही अधिकार है व यह प्रयत्नपूर्वक दिलवाने का प्रयास पुरुषार्थ शाँतिकुँज ने किया है।
साधना करते हुए, पाण्डवों ने स्वर्ग प्रस्थान किया था यह सभी को विदित है। यह विशिष्ट कार्य वे इन्द्रप्रस्थ अथवा हस्तिनापुर रहते हुए राजकाज चलाते हुए नहीं कर सकते थे। वातावरण व्यक्ति का तीन चौथाई मन अपने साथ अनायास ही जकड़े रहता है। अभ्यस्त ढर्रे में स्थान के साथ-स्वजन संबंधियों के साथ जुड़े हुए सम्बन्ध इतने सघन होते हैं, जिनका उल्लंघन करते हुए पार जा सकना दुष्कर समझकर यही उपाय अपनाया जाता है कि उपयुक्त वातावरण की दृष्टि से पुराने संबंधों से जकड़ा हुआ स्थान बदल दिया जाय। पाण्डवों ने भी राम बंधुओं की तरह वही किया।
साधनाओं में प्रयास ही सब कुछ नहीं होता। इसके लिए वातावरण भी चाहिए। अस्तु दोनों को सुसम्पन्न नगरियों में उपलब्ध अपने प्रस्तुत साधन छोड़ने पड़े और अभीष्ट प्राप्ति के लिए उपयुक्त स्थान उत्तराखण्ड के हिमाच्छादित क्षेत्र में ढूँढ़ना पड़ा। वहाँ उन लोगों ने बारह वर्ष तक मात्र जंगली बेर खाकर तप किया। तदुपरांत ही उनके स्तर की सुसंतति के रूप में प्रद्युम्न का जन्म हो सका।
साधना विधि-विधान संबंधी छोटी-छोटी चौबीस पुस्तकों में इन्हें विस्तार से दिया गया है। शुद्ध रूप से इन मंत्रों को याद कर सकना सर्वसाधारण के लिए संभव नहीं है। अतः समय को देखते हुए यह उचित है कि एक गायत्री मंत्र के उच्चारण द्वारा ही विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति कर ली जाय। जिनकी स्मरण शक्ति मंत्रों को शुद्ध रूप से याद कर सकने की है, वे उनका उच्चारण करते हुए सभी विधि-विधानों को पूरा करते रह सकते हैं।
साधना के संबंध में भी है। किस साधक को किस मंत्र का उपयोग किस कार्य के लिए किस प्रकार करना चाहिए, इसका निर्धारण ही उत्कीलन है।
साधना में योगी शिरश्चंद्र से झरने वाले उस दिव्य रस को पीता है, जो सर्वव्याधियों का नाश करने वाला है।
साधना में शिव-शक्ति का संगम जिसे कुण्डलिनी जागरण की चरमतम स्थिति माना जाता है,यहीं पर होता है। यह भक्ति और भक्ति की समन्वित साधना संपन्न करने वाला चेतना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयाम है।
साधना से इतनी सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। सभी आपकी सर्वज्ञता को तथा महेश्वर कहकर आपकी प्रभुता को स्वीकार करते हैं। इन विशिष्टताओं की उपलब्धि किस योग साधना द्वारा हुई है, कृपया बताएँ?”
साधना से अर्जित बल द्वारा उनने उच्चकोटि की अध्यात्म तत्वज्ञान पर अगणित पुस्तकें लिखीं।
साधना, स्वाध्याय, शुचिता, सेवा के एक से एक मार्मिक प्रसंग उनके जीवनक्रम में देखें जा सकते हैं। उनके अधिक विस्तार में न जाकर जब “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का शुभारंभ हम देखते हैं तो पाते हैं कि यह छोटा सा बीजारोपण गायत्री के तत्वज्ञान के विस्तार का था। इस बीज से जो वटवृक्ष बनने वाला था, उसी की छाया में अगले दिनों गायत्री परिवार तथा युगनिर्माण योजना नामक विशाल संगठन बनना था। “एकोहं बहुस्यामि” का मूल मंत्र उनने “अखण्ड-ज्योति” के प्रकाशन से कार्य रूप में उतारना आरंभ किया व चिट्ठी की तरह निकली प्रारंभिक पत्रिका की सौ प्रतियाँ देखते-देखते हजार व लाखों में छपने लगीं। यह वस्तुतः उनकी साधना की प्रत्यक्ष सिद्धि का प्रमाण है कि आज उसी पत्रिका की पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ आधुनिकतम मशीनों द्वारा छपती हैं व दस गुने पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
साधना से मनोमय एवं विज्ञानमयकोश की सिद्धि द्वारा विलक्षण प्रतिभा, अद्भुत संकल्प शक्ति से लेकर पूर्वाभास, दूरदर्शन, परोक्ष जगत की जानकारी से लेकर पदार्थ हस्तांतरण तक की उच्च चेतन स्तर की क्षमताएँ अर्जित की जा सकती हैं। ये सब विभूतियाँ मात्र पौराणिक मिथक नहीं हैं, इस सदी में भी अगणित ऐसे साधक हमारे देश व बाहर हुए हैं, जिनने साधना द्वारा सिद्धि की यह सामर्थ्य हस्तगत की है। जानना चाहें तो मनोमयकोश से मस्तिष्कीय विकास, उत्कृष्ट चिन्तन-प्रतिभा परिष्कार चमत्कारी प्रज्ञा रूप में इन्हें समझ सकते है, दूसरी और विज्ञानमय कोश को असामान्य स्तर की बुद्धि के विकास, परोक्ष से संपर्क जोड़ने की क्षमता तथा आदर्शवादी उमंगों के उभार के रूप में जान सकते हैं।
साधना पर भी लागू होती है। उसके लिए ऐसे वातावरण का चयन अनिवार्य है, जहाँ प्राणतत्व पहले से विद्यमान हो, लम्बे समय तक विशिष्ट तपश्चर्या सम्पन्न होती रही हो एवं छोटे प्रयास करने पर जहाँ भारी सफलता मिलने की संभावना हो।
साधना व इसके प्रतिफल बड़े महत्वपूर्ण हैं। अन्नमयकोश की सिद्धि से नीरोगता, दीर्घजीवन व चिरयौवन का लाभ मिलता है। प्राणमयकोश से साहस, शौर्य, पराक्रम, प्रभाव, प्रतिभा जैसी विशेषताएँ उभरती हैं। मनोमयकोश की जाग्रति से विवेकशीलता, दूरदर्शिता, बुद्धिमत्ता, धैर्य-संतुलन, तनाव मुक्ति जैसे गुण उपलब्ध होते हैं, अतीन्द्रिय ज्ञान, अपरोक्षानुभूति, दिव्यदृष्टि जैसी उपलब्धियाँ विज्ञानमयकोश के जागरण की हैं। आनन्दमयकोश के विकास से ईश्वर दर्शन, आत्म साक्षात्कार, स्वर्ग-मुक्ति हर घड़ी आनन्द स्थिति जैसी महान उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं।
साधना के व संजीवनी साधना के महत्वपूर्ण शिक्षण सत्र चलाए। यही पर उनकी एकाकी सूक्ष्मीकरण तपश्चर्या संपन्न हुई। यहीं पर अध्यात्म व विज्ञान के समन्वय का उनका संकल्प ब्रह्मवर्चस् के रूप में साकार होकर सामने आया।यहीं पर उनने भारत भर में प्रज्ञा संस्थान बनाने व जन-जन तक ब्राह्मणत्व के विस्तार का संकल्प लिया व देखते-देखते तीन हजार से अधिक शक्ति पीठें पूरे भारत वर्ष भर में बन गई। यहीं पर उनने देवात्म शक्ति के कुण्डलिनी जागरण की साधना संपन्न की व विश्व भर में गायत्री महाशक्ति के विस्तार के रूप में उसे अगले दिनों ही साकार होता देखा जा सकेगा।
साधना करें। मंत्र, लेखन, गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उनके लिए ही हैं। अच्छा हो, जहाँ व्यवस्था हो वहाँ सामूहिक उपासना का क्रम चले। इससे विशिष्ट ऊर्जा का उद्भव होता है।
साधना ठीक प्रकार से चल रही है। बालक रामदास प्रातः चार बजे ही उठकर और नित्यकर्म से निवृत्त होने के बाद शान्त निर्जन में स्थित उस वटवृक्ष के नीचे जा बैठते, जहाँ प्रायः कोई आना जाना न था। वहीं एकान्त में तीन-चार घण्टे तक वे साधना करते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-June
साधना सत्र मथुरा गायत्री तपोभूमि में करवाया गया और ठीक डेढ़ वर्ष बाद एक संस्कारवान जीवसत्ता उनके घर आयी। समय-समय पर उसका व्यवहार देखकर लगता था कि यह वही बालक है जो कुछ वर्ष पूर्व दिवंगत हुआ था। परोक्ष जगत में हस्तक्षेप कर अपनी प्रचण्ड शक्ति के सुपात्र शिष्य को ऐसी गुरुसत्ता क्या कुछ नहीं दिला सकती?
साधना अर्थात् “अपने आपको साधना” अपना नियंत्रण अपने हाथ में रखना व श्रेष्ठता-उत्कृष्टता की ओर निरन्तर बढ़ते चले जाना। संक्षेप में यही अध्यात्म का मर्म है।
साधना में मग्न रहने वाला यह चीवरधारी भिक्षु इस तरह स्वयं को उत्सर्ग कर देगा-किसने सोचा था? किन्तु संवेदना स्वयं में रत्नाकर है-प्रत्यक्ष में भले यह जल लहरों का समूह नृत्य भर लगे। पर समय का मन्दराचल-इसमें से अनेकों गुणों विभूतियों को प्रकट कर सिद्ध करता रहता है। सब कुछ इसमें है-इसी में हैं।
साधना द्वारा तुम्हें पकाना उद्देश्य था, वह हो चुका। तुम्हें पुत्र प्राप्ति होगी व तुम्हारी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।” ठीक एक वर्ष बाद उन्हें पुत्र हुआ। उसके माध्यम से पति-पत्नी के जीवन में प्रसन्नता आयी। कुछ शंकाएँ गुरुसत्ता को लेकर मन में थीं तो वे दूर हो गयीं।
साधना की दृष्टि से भी यह योग सर्वश्रेष्ठतम है।
साधना से सर्वथा वंचित नहीं रहना चाहिए। ‘न कुछ से कुछ अच्छा’ की नीति के अनुरूप सामान्य साधकों को साँसारिक जनों को इन पंचमुखों का योगाभ्यास और तपश्चर्या के रूप में न सही, नीति और व्यवहार के रूप में तो अभ्यास करना ही चाहिए। इतना बन पड़े तो भी उससे साँसारिक और आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में विशेष सहायता मिलेगी।
साधना में निरत रहना, किन्तु असहायों की मदद हेतु तुरंत पहुँच जाना पूज्यवर के जीवन की एक ऐसी विशेषता है जो बिरलों में पायी जाती हैं।
साधना में उनकी अनुभूति सहज ही होने लगेगी।
साधना में दुष्प्रवृत्तियाँ तपाई-जलाई जा रही हों ऐसा कोई भी कृत्य तप है।
साधना से सिद्धि का सही स्वरूप जो वे स्वयं देख चुके थे।
साधना की चरमावस्था कहा जाता है या साधना से सिद्धि का अंतिम सोपान माना जाता है। यही सब कुछ परम पूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्षों के जीवन का नवनीत भी है। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय करने वाले इस ब्रह्मर्षि ने अपने जीवन माध्यम से मनोविज्ञान, अतिचेतन व उससे जुड़ी उच्चस्तरीय शक्तियों का जो परिचय अपने निकटस्थ परिजनों को दिया उससे बड़ी साक्षी परामनोविज्ञान व गुह्य विज्ञान जैसी विधाओं में मिल नहीं सकती।
साधना में निरत रहना, किन्तु असहायों में बैठकर घण्टों साधना में निरत रहना, किन्तु असहायों की मदद हेतु तुरंत पहुँच जाना पूज्यवर के जीवन की एक ऐसी विशेषता है जो बिरलों में पायी जाती हैं।
साधना सत्रों में आए थे। उनसे व्यक्तिगत मेल-मुलाकात के दौरान पूज्यवर ने पूछा कि “अभी तक तुमने संस्था की ही बात की। अपने लिए व्यक्तिगत कुछ नहीं माँगा। माँ की कृपा से तुम्हें सब मिलेगा।” निःसंतान वे सज्जन कहना नहीं चाहते थे कि 48 वर्ष की उम्र हो गयी व मिशन कार्य करते हुए प्रायः बीस वर्ष।
साधना की थी, अभी भी जाकर उस आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति की जा सकती है। बहुत चंचल मन भी वहाँ एकाग्र हो जाता है। उत्तराखण्ड में-हिमालय के हृदय में ऐसे अनेक स्थान विद्यमान हैं जहाँ बैठकर ध्यान करने मात्र से ही मन सहज ही ऊंचाइयों को स्पर्श करने लगता है। थियोसॉफी की जन्मदात्री मैडम ब्लावट्स्की ने इसे सिद्धपुरुषों की उच्चतम समिति का स्थान बताया है, जो परोक्ष जगत से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। स्वयं पूज्य गुरुदेव ने चार बार दुर्गम हिमालय के इसी स्थान पर पहुँच कर तप किया।
साधना शक्ति के बलबूते करोड़ों-अरबों की योजनाएँ चलाते हैं व सफल होते हैं। उनके इशारे पर सैकड़ों व्यक्ति दौलत का ढेर लगा देते हैं। युग निर्माण योजना संगठन का आज का विराट रूप देखकर क्या यह सही नहीं लगता?
साधना विज्ञान के पथिक साधना के उच्च सोपानों में चढ़ कर इस नाद को पकड़ते, सुनते एवं विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ अर्जित करते हैं, पर कई बार इस प्रकार की भौतिक ध्वनियाँ न जाने कहाँ से उत्पन्न होतीं, लोगों को सुनाई पड़ती और थोड़ी देर पश्चात् स्वतः विलीन हो जाती हैं, जब कि सब कुछ आश्चर्यजनक घटती ही रहती हैं।
साधना करने की दैवी प्रेरणा मिलती है, वहाँ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी को पहले महर्षि दुर्वासा की तपःस्थली में मथुरा में। जहाँ गायत्री तपोभूमि विद्यमान है तथा बाद में नवीन सृष्टि के सृजेता महर्षि विश्वामित्र की तपःस्थली सप्त सरोवर शाँतिकुँज में जाकर तप करने व ऋषि संस्कृति के गायत्री के तत्वज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने की परोक्ष सत्ता की प्रेरणा मिलती है।
साधना करने की प्रेरणा मिलती। वे अपने मन की बात कई बार चाह कर भी नहीं कह पाते थे। उनकी पत्नी को एक विचित्र व्याधि थी कि दो पुत्रियों की अकाल मृत्यु के बाद उन्हें जब भी गर्भ ठहरता बालक की भ्रूण में मृत्यु हो जाती। तीन गर्भपात हो चुके थे। वे उस ओर से निराश हो चुके थे।
साधना का सुयोग्य मार्गदर्शन एक सिद्ध पुरुष द्वारा सतत मिलता रहा ताकि अनुदानों के लिए पात्रता अर्जित हो सके। एक परिजन जो छिन्दवाड़ा, म.प्र. के हैं, जब भी पूज्यवर के पास आते, तो गायत्री साधना करने की प्रेरणा मिलती। वे अपने मन की बात कई बार चाह कर भी नहीं कह पाते थे। उनकी पत्नी को एक विचित्र व्याधि थी कि दो पुत्रियों की अकाल मृत्यु के बाद उन्हें जब भी गर्भ ठहरता बालक की भ्रूण में मृत्यु हो जाती। तीन गर्भपात हो चुके थे।
साधना से सिद्धि का अंतिम सोपान माना जाता है। यही सब कुछ परम पूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्षों के जीवन का नवनीत भी है। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय करने वाले इस ब्रह्मर्षि ने अपने जीवन माध्यम से मनोविज्ञान, अतिचेतन व उससे जुड़ी उच्चस्तरीय शक्तियों का जो परिचय अपने निकटस्थ परिजनों को दिया उससे बड़ी साक्षी परामनोविज्ञान व गुह्य विज्ञान जैसी विधाओं में मिल नहीं सकती।
साधना में मग्न रहने वाला था।
साधना हमारी भारतीय संस्कृति का एक अनिवार्य अंग रही है। तीर्थ, देवालय, आरण्यक, गुरुकुल, आश्रम आदि सबसे जुड़े इतिहास यही बताते हैं कि इस स्थान की प्रसुप्त संस्कारिता को किसी महापुरुष ने तप द्वारा उभारा व वातावरण सशक्त ऊर्जा सम्पन्न बनाया। शांतिकुंज जिसे युग तीर्थ की उपमा प्राप्त है, की चर्चा जब परम पूज्य गुरुदेव के जीवन दर्शन के संदर्भ में की जाती है तो सहज कही इस संबंध में अनेकानेक रहस्यों पर से पर्दा उठने लगता है।
साधना जो वर्षों चली, यहीं संपन्न हुई। इस प्रकार से यह संस्कारित शक्ति केन्द्र है जहाँ आने वाले का भावनात्मक कायाकल्प हो जाता है एक अनिर्वचनीय अलौकिक शाँति की अनुभूति होती है तथा उसकी मन की इच्छाएँ सहज ही पूरी हो जाती है। पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद उनकी परोक्ष सत्ता को गायत्री तीर्थ के सूक्ष्म स्पन्दनों में अनुभव किया जा सकता है।
साधना के उच्च सोपानों में चढ़ कर इस नाद को पकड़ते, सुनते एवं विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ अर्जित करते हैं, पर कई बार इस प्रकार की भौतिक ध्वनियाँ न जाने कहाँ से उत्पन्न होतीं, लोगों को सुनाई पड़ती और थोड़ी देर पश्चात् स्वतः विलीन हो जाती हैं, जब कि सब कुछ आश्चर्यजनक घटती ही रहती हैं।
साधनाएँ की हैं। दक्षिणेश्वर में जहाँ स्वयं श्रीरामकृष्ण ने जिस कक्ष में अपनी तप साधना की थी, अभी भी जाकर उस आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति की जा सकती है। बहुत चंचल मन भी वहाँ एकाग्र हो जाता है। उत्तराखण्ड में-हिमालय के हृदय में ऐसे अनेक स्थान विद्यमान हैं जहाँ बैठकर ध्यान करने मात्र से ही मन सहज ही ऊंचाइयों को स्पर्श करने लगता है। थियोसॉफी की जन्मदात्री मैडम ब्लावट्स्की ने इसे सिद्धपुरुषों की उच्चतम समिति का स्थान बताया है, जो परोक्ष जगत से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेती है।
साधना अत्यन्त कठिन है जिसमें ऋषिकल्प तपश्चर्या की भट्ठी में साधक को तपना पड़ता है। इतने पर भी सर्व साधारण को उस पंचमुखी साधना से सर्वथा वंचित नहीं रहना चाहिए। ‘न कुछ से कुछ अच्छा’ की नीति के अनुरूप सामान्य साधकों को साँसारिक जनों को इन पंचमुखों का योगाभ्यास और तपश्चर्या के रूप में न सही, नीति और व्यवहार के रूप में तो अभ्यास करना ही चाहिए। इतना बन पड़े तो भी उससे साँसारिक और आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में विशेष सहायता मिलेगी।
साधना” अपना नियंत्रण अपने हाथ में रखना व श्रेष्ठता-उत्कृष्टता की ओर निरन्तर बढ़ते चले जाना। संक्षेप में यही अध्यात्म का मर्म है।
साधना का निर्वाह करना चाहिए।
साधना हेतु चयन किया, प्राणशक्ति को घनीभूत कर इन स्थानों को प्रचण्ड ऊर्जा संपन्न बना दिया, परमपूज्य गुरुदेव भी अपने लिए व अपने पद चिन्हों पर चलने वाले अनुयायियों के लिए भारतीय संस्कृति का एक समग्र शिक्षण करने वाले आरण्यक के रूप में शाँतिकुँज की भूमि, वातावरण का चयन कर चुके थे। जिनने इस आश्रम के निर्माण को प्रारंभ से देखा हैं, वे जानते हैं कि यहाँ खड़े भवन वस्तुतः जलधारा में तैर रहे हैं। न जाने कितनी मिट्टी डालकर इस स्थान को दुर्गम से रहने योग्य बनाया गया है। अभी भी थोड़ी सी भूमि को खोदते ही जलधारा स्पष्ट दिखाई देती है व गंगा नदी की तलहटी में पाए जाने वाले शालिग्राम पाए जाते हैं किन्तु यह आश्रम जो स्वयं में अनूठा है, व दिव्य संरक्षण प्रदान कर रहा है। यह वातावरण में छाए दैवी संस्कारों की प्रचुरता व सशक्तता ही है कि जो यहाँ आता है, उसकी मनोकामना हर इच्छा कल्प वृक्ष के नीचे बैठने की तरह यहाँ पूर्ण होती देखी जाती है।
साधना द्वारा अपने प्रसुप्त को जगाकर इन सभी ने वह उच्चस्तरीय स्थिति प्राप्त की थी, जिसे साधना की चरमावस्था कहा जाता है या साधना से सिद्धि का अंतिम सोपान माना जाता है। यही सब कुछ परम पूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्षों के जीवन का नवनीत भी है। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय करने वाले इस ब्रह्मर्षि ने अपने जीवन माध्यम से मनोविज्ञान, अतिचेतन व उससे जुड़ी उच्चस्तरीय शक्तियों का जो परिचय अपने निकटस्थ परिजनों को दिया उससे बड़ी साक्षी परामनोविज्ञान व गुह्य विज्ञान जैसी विधाओं में मिल नहीं सकती।
साधना पुरुषार्थ में उन्हें जुटा दिया तथा सारा श्रेय माँ गायत्री को दिया। राजनाँदगाँव (म.प्र.) के एक सज्जन लिखते हैं कि उनका ज्येष्ठ पुत्र उन्माद जनित मनोविकार से ग्रसित होकर घर से निकल गया। चार साल तक घर नहीं लौटा। अपनी परेशानी जान बूझकर पूज्यवर को नहीं लिखी क्योंकि कभी लौकिक दृष्टि से कुछ नहीं माँगा था। बच्चे की माँ एक माह के सत्र में शाँतिकुँज आई थी।
साधना पुरुषार्थ में जुटाकर संभावित विपत्ति को टाल दिया या हल्का बना दिया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-December
साधना-उपासना की एकाग्रता तभी सध सकती है जब विचारतंत्र को- मानसिक हलचलों के बिखराव से बचाकर एक सीमित परिधि में सीमाबद्ध किया जाय। मन को एक सीमित परिधि में ही चिंतन करते रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाय। इसके लिए सर्वोत्तम उपाय उपचार ध्यान साधना है, इसका स्वरूप यह है कि विचारों को केन्द्रीभूत करके किसी एक लक्ष्य पर नियोजित किया जाय। इसमें सफलता तभी मिलती है जब चेतना का मस्तिष्कीय हलचलों पर नियंत्रण सध जाय। गायत्री माता-के इष्टदेव के अथवा स्वर्णिम सविता के प्रकाश मण्डल के या अन्य किसी केन्द्र पर मन मस्तिष्क को सीमाबद्ध किये रहा जाय।
साधना मानसिक परिष्कार के लिए और आसन-प्राणायाम का अभ्यास शारीरिक सुव्यवस्था के लिए है। यदि इन आरंभिक चरणों को पूरा न किया जाये तो फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्चस्तरीय साधना में प्रवेश पा सकना संभव नहीं।
साधना के साधक को आत्मबोध एवं तत्वबोध की इन्हीं दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों का लक्ष्य एक ही है। दोनों अन्योन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। इसके लिए ध्यान मुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यान पूर्वक देखा जाना ही आत्म बोध की प्रत्यक्ष विद्या है। अधिक बड़े साइज का दर्पण उपलब्ध हो तो पूरे शरीर को भी देखा जा सकता है।
साधना की भी पाँच शर्तें और पाँच तत्व हैं। जो इन साधनों को जुटाकर साधना में प्रवृत्त हो उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति निश्चित है।
साधना उपक्रम अपनाने पर भी लागू हो सकता है। पर वस्तुतः वैसा नहीं होता। अपने को शरीर मात्र समझने और उसी सेवा शुश्रूषा में निरन्तर लगे रहने के कारण आत्मा की स्थिति भी अन्य अंग अवयवों की भ्राँति एक सामान्य घटक जैसी रह जाती है। उसका उपयोग इतना ही रहता है कि उसके बने रहने पर शरीर भी जीवित बना रहता है। मनमर्जी की कर सकने के लिए जिस शक्ति सामर्थ्य की आवश्यकता है उसे उपलब्ध कराता रहे।
साधना में लगा था। उसी आधार पर सतयुग का स्वर्णिम काल विनिर्मित हुआ था। उन दिनों यह भारत भूमि देव मानवों की जन्मदात्री और “ स्वर्गादपि गरीयसी” कहलाती थी। यहाँ के निवासियों ने असाधारण स्तर की सेवा साधना करके जनसंपर्क और जनसहयोग अर्जित किया था। जगद्गुरु और चक्रवर्ती के ऊँचे पदों पर उन्हें इसी सेवा साधना के बदले बिठाया गया था।
साधना एक दैवी वरदान बनकर सामने आई है। आत्मोत्कर्ष के महान प्रायोजन की आवश्यकता पूरी हुई और अणु से विभु, नर से नारायण बनने का लक्ष्य हस्तगत हुआ।
साधना का वास्तविक स्वरूप एक ही है-अंतरंग में विद्यमान देव शक्तियों को जाग्रत, प्रखर और समर्थ बनाने की आकुलता भरी चेष्टा। यही है अध्यात्म का मर्म यथार्थ स्वरूप।
साधना पथ पर बढ़ना होता है।
साधनायें, परम पू. गुरुदेव के आद्योपाँत साहित्य, मिशन के विश्वव्यापी स्वरूप का परिचय और भावी कार्यक्रमों के क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण की रूपरेखा बनायी गयी हैं ताकि लोग अनुभव कर सकें- देवसंस्कृति कितनी विज्ञान सम्मत, बुद्धिसंगत और मानवीय प्रगति और प्रसन्नता का आधार रही है। अखण्ड ज्योति का कलेवर तो उतना ही रहेगा, पर इस वसंत पर्व से अंक विशेषाँक जैसे संग्रहणीय होंगे। इसे देवसंस्कृति का समग्र परिचय-प्रशिक्षण समझा जाना चाहिए।
साधना करके जनसंपर्क और जनसहयोग अर्जित किया था। जगद्गुरु और चक्रवर्ती के ऊँचे पदों पर उन्हें इसी सेवा साधना के बदले बिठाया गया था।
साधना संपन्न रहते हुए भी व्यक्तित्त्व को, प्रतिभाओं को ऊँचा उठाने के स्थान पर पतनोन्मुख बनाती और और उसकी दुखद प्रक्रिया से समूचा वातावरण विकृत दुर्गन्धित करती है। इसे आत्मिक दुर्बलता भी कह सकते हैं, जबकि आदर्शों को अपनाने की, दृष्टिकोण उत्कृष्टता भरने की, कार्यपद्धति को दूरदर्शी विवेकशीलता के अनुरूप बनाने की महती आवश्यकताओं को यही पूरा कर सकती है। सत्प्रवृत्तियां आत्मिक क्षेत्र से ही उभरती हैं। सन्मार्ग पर ले चलने वाला प्रकाश उसी केन्द्र से उपलब्ध होता है। यदि समुद्र के बीच में खड़ा हुआ यह प्रकाण्ड स्तम्भ बुझ जाय तो फिर उस क्षेत्र में चलने वाले जलयान चट्टानों से टकराकर दुर्दशाग्रस्त होंगे ही।
साधना क्रम चलाते रहें।
साधनायें भी निष्फल चली जाती हैं। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनायी जाती है एवं पिछले पापों एवं कुसंस्कारों के कारण आत्मिक प्रगति के पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का निवारण परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। प्रायश्चित का अर्थ गिड़गिड़ाना या सस्ते मोल में विधि-विधान से बच निकलना नहीं, वरन् क्षतिपूर्ति करना है। दुष्कर्मों से अपने अंतःकरण को विचार संस्थान को तथा कार्यक्रमों को जिस प्रकार दुष्प्रवृत्तियों से भर दिया गया था, उसी साहस और प्रयास के साथ इन तीनों संस्थानों के परिमार्जन, परिशोधन एवं परिष्कार की प्रक्रिया को प्रायश्चित कहा गया है। इससे सदाशयता और साहसिकता तो बढ़ती ही है, साथ-साथ सफलता की प्राप्ति भी सुनिश्चित हो जाती है।
साधना करते हैं और प्रतियोगिता में बाजी मारकर ऊँचे अफसर का पद पाते हैं। किसान एक वर्ष तक खेत की मिट्टी को पसीने से सींच कर कोठे भरी फसल काटता है और साथियों में सिर ऊँचा उठाकर चलता है। व्यवसायी, शिल्पी, कलाकार लम्बे समय तक साधनारत रहते हैं और उपर्युक्त समय पर श्रेयाधिकारी बनते हैं। लम्बे समय तक अखाड़े की साधना करने पर ही पहलवानों को मिलने वाले पुरस्कार को हस्तगत करने का अवसर मिल पाता है। इसे प्रकाराँतर की साधना कह सकते हैं।
साधना में प्रवेश पा सकना संभव नहीं।
साधनारत व्यक्ति मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं। कापालिक और अघोर सम्प्रदायों में ऐसे कृत्य मनस्वी व तपस्वी बनने के लिए काम में लाये जाते हैं जिसे जिस-तिस प्रकार साधन एवं धन बटोरने वाले उपायों की तरह अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। कई सिद्ध योगी अपनी सिद्धियों को, अपने को चमत्कारी सिद्ध विख्यात करने में अथवा स्वर्ग मुक्ति के व्यक्तिगत लाभ में ही खर्च कर डालते हैं। इसी तरह अर्थ क्षेत्र में चन्द लोगों के हाथ में इतने साधन आ जाते हैं कि अगणित लोगों द्वारा कमाई जाने वाली आजीविका स्वयँ ही हड़पकर जाते है। अर्थशास्त्र की तरह अध्यात्मशास्त्र का भी यही नियम है कि विशिष्ट उत्पादन की वह पूँजी जो निर्वाह खर्च से बच जाये, ऐसे ही कामों में लगाई जानी चाहिए जिससे अतिरिक्त उत्पादन बढ़ने में सहायता मिले, भले ही वह पूँजी धन के रूप में हो अथवा विभूतियों के रूप में।
साधना है। इसे दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक प्रगति की आत्म कल्याण की यात्रा कह सकते हैं। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान-आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। नर पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है। अगणित ऋद्धि-सिद्धियों का राज मार्ग यही है।
साधनाकाल में ही विद्यारण्य की अंतर्निहित शक्तियाँ जाग्रत हो गयी थीं और वे अलौकिक क्षमताओं के स्वामी बन गये थे। छिपाये रखने पर भी उनका परिचय जब तब संपर्क में आने वालों को मिल ही जाता था। इसी अवधि में दो राजकुमार हरिहर राय व बुक्काराय उनकी शरण में पहुँचे। उनका राज्य छिन गया था और वे मारे मारे फिर रहे थे। स्वामी जी का आशीर्वाद प्राप्त करके उन्होंने अपना खोया हुआ राज्य फिर से प्राप्त कर लिया और जीवन भर उनकी शिक्षाओं एवं आदर्शों पर ही राज्य चलाते रहे।
साधना के बदले बिठाया गया था।
साधना का है ही नहीं। ऐसी भी साधनायें हैं जो अनीश्वरवादी उपासना में अरुचि रखने वाले अध्यात्म सिद्धाँतों से असहमत लोगों के लिए भी उपयोगी रहेगी। आस्तिक प्रवृत्ति के लोग भी उनसे समुचित लाभ उठा सकते हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है। -
साधना, चिंतन, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण हैं। सतोगुणी, माया एवं चित्त के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है, क्योंकि यह खुला रहस्य है कि शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती आदि के रूप में गायत्री की पूजा की जाती है।
साधना आरण्यक में निवास करते हैं। इन सब प्रयोगों के बारे में विस्तार से जाने से पूर्व ऊपर वर्णित अध्यात्म उपचारों के संबंध में अगली बार पढ़ें।
साधना, उपासना, तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केन्द्रित न किया जाय, वरन् यह भी देखा जाय कि उस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग उपयोग लोक मंगल के लिए अथवा किस प्रयोजन के लिए किया जा रहा है।
साधना दर्पण के सहारे की जाती है। इस साधना के द्वारा प्रायः संबंधित सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्म निरक्षण, आत्म सुधार और आत्म विकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं में आकाँक्षाओं में क्या हेर फेर होना चाहिए? गतिविधियों में रीति नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है।
साधना वर्ष घोषित करते हुए सामूहिक गायत्री साधना की आवश्यकता पर बल दिया गया है। प्रस्तुत संकट का समाधान इससे कम में संभव भी नहीं।
साधना का प्रथम सोपान है।
साधना के कर्म पक्ष हैं। लेकिन कर्म की पूर्णता तभी है जब वह ज्ञान के साथ जुड़ा हो। इस ज्ञान पक्ष में पाँच तत्वों का आकलन किया गया है। ये पाँच तत्व हैं (1)ऋषि (2)छन्द (3)देवता (4)बीज (5)तत्व। इन्हीं से मंत्र शक्ति सर्वांगपूर्ण बनती है।
साधना है, इसका स्वरूप यह है कि विचारों को केन्द्रीभूत करके किसी एक लक्ष्य पर नियोजित किया जाय। इसमें सफलता तभी मिलती है जब चेतना का मस्तिष्कीय हलचलों पर नियंत्रण सध जाय। गायत्री माता-के इष्टदेव के अथवा स्वर्णिम सविता के प्रकाश मण्डल के या अन्य किसी केन्द्र पर मन मस्तिष्क को सीमाबद्ध किये रहा जाय। इस उपक्रम में यदि सफलता मिल गयी तो समझना चाहिए कि विचार प्रवाह को स्वेच्छाचार बरतने से छोड़ने के लिए अनुशासन में रहने के लिए सहमत कर लिया गया।
साधना, अष्टगयोग की प्रक्रियाएँ, मंत्र शक्ति आदि शरीर मन व अंतःकरण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? तथा तनाव जैसी महाव्याधि से भरे इस समाज को क्या एक निरापद किन्तु सर्वांगपूर्ण चिकित्सा पद्धति अध्यात्म तंत्र दे सकता है, यह प्रतिपाद्य विषय लेकर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान ने विगत बारह वर्षों में कार्य किया है। सीमित साधनों किन्तु समर्पित व्यक्तियों व सहज ही उपलब्ध होते रहने वाले “सब्जेक्ट्स” जिन पर प्रयोग परीक्षण का क्रम चला, के कारण यह कार्य सही गति से चल रहा है। शोध प्रक्रिया का उद्देश्य यह नहीं था कि रोग निवारण के लिए अध्यात्म उपचार कितने सक्षम हैं, यह पता लगाया जाय। यदि उद्देश्य यह रहा होता तो एक सैनीटोरियम बनाना जरूरी होता।
साधना की सफलता के लिए जरूरी है कि साधक की प्रकृति और प्रवृत्ति श्रद्धासिक्त बनें।
साधनामय जीवन के भविष्य और विकास समूचे को तहस-नहस कर देता है। इष्ट और गुरुमूर्तियों को स्वीकारने के पीछे पूर्णता और पवित्रता का भाव ही रहा है। सूर्य को भी सुन्दर, पवित्र, प्रेरणादायक होने के कारण स्वीकारा गया है। सामान्य कर्म दोषों से भरा रहता है। दोष जहाँ भरे रहते हैं वहाँ स्वरूप नहीं, उसके पीछे रहने वाला भाव है।
साधना प्रारम्भ करें। भ्रमर गुहा होकर बिन्दु बेध करते सहस्रार में पहुँचकर शून्य शिखर से ऊपर सत्स्वरूप में अवस्थित होने में तुझे अधिक समय अपेक्षित हो ऐसी संभावना नहीं है।’
साधना को समझा हो।
साधना में प्रवृत्त हो उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति निश्चित है।
साधना में सिद्ध हुए हो। तुम्हारी धार्मिकता के कारण उस महाअज्ञात की प्रेरणा मुझे तुम्हारे पास ले गई और आज तुम यहाँ सिद्धों की मण्डली के सदस्य हो।
साधना के द्वारा प्रायः संबंधित सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्म निरक्षण, आत्म सुधार और आत्म विकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं में आकाँक्षाओं में क्या हेर फेर होना चाहिए? गतिविधियों में रीति नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है।
साधना एवं संवर्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गयी है, प्राचीन समय में राजतंत्र द्वारा राजसूय यज्ञ व धर्मतंत्र द्वारा वाजपेय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के व्यापक निराकरण के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह, सम्मेलन, आयोजन, संवर्धन सह प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वान मण्डली या दो चार तपस्वी एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से संपन्न नहीं कर सकते थे, उन्हें मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त शक्ति से संपन्न कर लिया जाता था।
साधना की भावात्मक आकाँक्षा भले पूरी कर ले पर उससे वैज्ञानिक लाभों का प्रयोजन पूरा न होगा।
साधना तथा उच्चस्तरीय साधना का नियोजन किये रहना पड़ता है। इस आधार पर खड़ी हुई साधना तपश्चर्या के सफल होने में फिर कोई अड़चन शेष न रह जाती।
साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में प्रवीण हो, गुरु का यह आवश्यक कर्तव्य भी है कि शिष्य का न केवल पथ प्रदर्शन करें बल्कि उसे अपनी शक्ति का एक अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भी बनावे। अतएव ऋषि का आश्रय साधना का प्रथम सोपान है।
साधनाएँ भी हैं। पर उनका लक्ष्य प्रयोजन एवं सामर्थ्य सीमित होने के कारण साधक तक ही उसका लाभ परिमित होकर रह जाता है। सर्वजनीन साधना एवं संवर्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गयी है, प्राचीन समय में राजतंत्र द्वारा राजसूय यज्ञ व धर्मतंत्र द्वारा वाजपेय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के व्यापक निराकरण के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह, सम्मेलन, आयोजन, संवर्धन सह प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वान मण्डली या दो चार तपस्वी एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से संपन्न नहीं कर सकते थे, उन्हें मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त शक्ति से संपन्न कर लिया जाता था।
साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों का लक्ष्य एक ही है। दोनों अन्योन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। इसके लिए ध्यान मुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यान पूर्वक देखा जाना ही आत्म बोध की प्रत्यक्ष विद्या है। अधिक बड़े साइज का दर्पण उपलब्ध हो तो पूरे शरीर को भी देखा जा सकता है।
साधना है दूसरों की शाँति के लिए अशाँत होना, अपने आप को दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़ कर महाअज्ञात के चरणों में उड़ेल देना। तुम इस साधना में सिद्ध हुए हो। तुम्हारी धार्मिकता के कारण उस महाअज्ञात की प्रेरणा मुझे तुम्हारे पास ले गई और आज तुम यहाँ सिद्धों की मण्डली के सदस्य हो।
साधना के गूढ़ तत्व उसे प्रत्यक्ष हो रहे थे। तभी हिमालय के स्वेत धुँधलके से कुछ छायाएँ उभरीं जो पास आकर प्रत्यक्ष हो गयी, सभी दिव्य ऋषि सत्ताएँ थी जिनका सान्निध्य उसे प्राप्त हो रहा था। सामने योजनों तक रुई की तरह बर्फ का साम्राज्य था।
साधना की प्रगाढ़ता में अलगाव की रेखाएँ मिट जाती हैं। साधक साकार से निराकार भाव में प्रवेश करता है। चित्त के परिपूर्ण समाधान की यही दशा समाधि की है।
साधना करते रहें तो चिरकाल व्यतीत हो जाने और लम्बा कष्ट साध्य अनुष्ठान कर लेने पर भी अभीष्ट लाभ की गुँजाइश नहीं है। श्रद्धा आत्मिक उपलब्धियों का प्राण है। प्राण रहित शरीर की कितनी भी सार-सँभाल की जाय उससे कुछ काम न बनेगा। साधना की सफलता के लिए जरूरी है कि साधक की प्रकृति और प्रवृत्ति श्रद्धासिक्त बनें।
साधना को पूजा उपासना के साथ जोड़कर रखा गया है। देवाराधना एवं योगाभ्यास का प्रयोग ही उसमें सम्मिलित रहता है। यह उचित भी है क्योंकि इसका दोहरा लाभ है- जीवन सम्पदा के सदुपयोग के लिए मनोविग्रह जैसी महान उपलब्धि के साथ ही उपासनात्मक लाभ। किन्तु ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि देवाराधना या योगाभ्यास के अतिरिक्त और कोई उपाय ध्यान साधना का है ही नहीं। ऐसी भी साधनायें हैं जो अनीश्वरवादी उपासना में अरुचि रखने वाले अध्यात्म सिद्धाँतों से असहमत लोगों के लिए भी उपयोगी रहेगी।
साधना धार्मिकता की और बढ़ चलने के प्रचण्ड पुरुषार्थ का नाम है पुत्र। महा सिद्ध एक क्षण के लिए रुके दूसरे ही क्षण उनकी वाणी का प्रवाह हिमसरिता के समान बह चला और धार्मिकता है संवेदनशीलता का चरमोत्कर्ष। इसकी प्राप्ति के लिए एक ही साधना है दूसरों की शाँति के लिए अशाँत होना, अपने आप को दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़ कर महाअज्ञात के चरणों में उड़ेल देना। तुम इस साधना में सिद्ध हुए हो। तुम्हारी धार्मिकता के कारण उस महाअज्ञात की प्रेरणा मुझे तुम्हारे पास ले गई और आज तुम यहाँ सिद्धों की मण्डली के सदस्य हो।
साधना शक्ति की खोज में तन्मयता उच्चस्तरीय तत्वों का चिंतन आदि कार्यों में इसकी अनुभूति होती है। परन्तु ये तीनों प्रकार किसी न किसी गुण के आधीन होने के कारण विशुद्ध नहीं हैं।
साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने उपर्युक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना करें तो उसे आहार, वस्त्र, रहन-सहन, माला, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि में किस प्रकार का चयन करना चाहिए। तत्व निर्धारण में इन्हीं बातों का ध्यान रखा जाता है।
साधनारत रहते हैं और उपर्युक्त समय पर श्रेयाधिकारी बनते हैं। लम्बे समय तक अखाड़े की साधना करने पर ही पहलवानों को मिलने वाले पुरस्कार को हस्तगत करने का अवसर मिल पाता है। इसे प्रकाराँतर की साधना कह सकते हैं। योगी जब इसी मार्ग पर अवलम्बन करते हैं तो सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिकता अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं।
साधना करने पर ही पहलवानों को मिलने वाले पुरस्कार को हस्तगत करने का अवसर मिल पाता है। इसे प्रकाराँतर की साधना कह सकते हैं। योगी जब इसी मार्ग पर अवलम्बन करते हैं तो सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिकता अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं। उनने भविष्य पर दृष्टि दौड़ाई है।
साधनायें हैं जो अनीश्वरवादी उपासना में अरुचि रखने वाले अध्यात्म सिद्धाँतों से असहमत लोगों के लिए भी उपयोगी रहेगी। आस्तिक प्रवृत्ति के लोग भी उनसे समुचित लाभ उठा सकते हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है। -
साधना विज्ञान में यति कहा गया है। मंत्रों की एक यति सब के लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का लय का निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने उपर्युक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना कह सकते हैं। योगी जब इसी मार्ग पर अवलम्बन करते हैं तो सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिकता अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं। उनने भविष्य पर दृष्टि दौड़ाई है। तदनुरूप योजना बनाई है और एक निष्ठ भाव से अनवरत यात्रा करते हुए ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचने में सफलता पाई है।
साधना के पाँचों तत्वों में इसी का पथ प्रदर्शन है।
साधना क्षेत्र यों होती तो व्यक्तिगत और एकान्तिक साधनाएँ भी हैं। पर उनका लक्ष्य प्रयोजन एवं सामर्थ्य सीमित होने के कारण साधक तक ही उसका लाभ परिमित होकर रह जाता है। सर्वजनीन साधना एवं संवर्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गयी है, प्राचीन समय में राजतंत्र द्वारा राजसूय यज्ञ व धर्मतंत्र द्वारा वाजपेय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के व्यापक निराकरण के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह, सम्मेलन, आयोजन, संवर्धन सह प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वान मण्डली या दो चार तपस्वी एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से संपन्न नहीं कर सकते थे, उन्हें मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त शक्ति से संपन्न कर लिया जाता था।
साधना का तीसरा तत्व हैं देवता। देवता का अर्थ है चेतना सागर में से अपने अभीष्ट शक्ति प्रवाह का चयन। आकाश में एक ही समय में अनेक रेडियो स्टेशन बोलते रहते हैं पर हर एक की फ्रीक्वेंसी अलग होती है। ऐसा न होता तो ब्रॉडकास्ट किये गये सभी शब्द मिलकर एक हो जाते। शब्द धाराओं की पृथकता और उनसे संबंध स्थापित करने के पृथक माध्यमों का उपयोग करके ही किसी रेडियो सेट के लिए संभव है कि अपनी पसंद का रेडियो प्रोग्राम सुने और अन्यत्र चल रहे प्रोग्रामों को बोलने से रोक दे।
साधना की जाती है। इस आधार पर यह भी निर्माण निर्धारण किया जाता है कि किस मंत्र की, किस उद्देश्य के लिए, किस स्थिति की व्यक्ति साधना करें तो उसे आहार, वस्त्र, रहन-सहन, माला, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि में किस प्रकार का चयन करना चाहिए। तत्व निर्धारण में इन्हीं बातों का ध्यान रखा जाता है।
साधना परम उपयोगी है। विश्व माता के रूप में भगवान की मातृभाव से परम पुण्य भावनाओं के साथ आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दिशा में जितनी अधिक सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात में अन्य इन्द्रियों का निग्रह, मन का निरोध एवं अनेक मनोविकारों का शमन अपने आप होता जाता है। मातृभक्त के हृदय में दुर्वासनाएँ अधिक देर तक नहीं ठहर सकती। इसी कारण श्री रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविंद घोष, छत्रपति शिवाजी, महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द आदि कितने ही महापुरुष शक्ति के उपासक थे।
साधना की उक्त प्रक्रिया को अपने नियमित अभ्यास में सम्मिलित करके हर कोई उस स्थिति को प्राप्त कर सकता है।
साधना प्रक्रिया द्वारा इस प्रयोजन की पूर्ति होती है उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम अर्थात् प्राण का आयाम जोड़ने की, प्राणतत्व संवर्धन की एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीवात्मा का क्षुद्र प्राण-विराट चेतना के महाप्राण से जुड़कर उसी के समतुल्य बन जाय। विराट चेतना से जुड़ने और पूर्णता प्राप्त करने का यही राजमार्ग है।
साधना तपश्चर्या के सफल होने में फिर कोई अड़चन शेष न रह जाती।
साधनाएँ, मंत्र विज्ञान एवं यज्ञ विज्ञान।
साधना का नियोजन किये रहना पड़ता है। इस आधार पर खड़ी हुई साधना तपश्चर्या के सफल होने में फिर कोई अड़चन शेष न रह जाती।
साधना इन शिथिल संबंधों को पुनः प्रतिष्ठापित करने की सुनिश्चित पद्धति है। विश्व चेतना के साथ व्यक्ति को जोड़ने वाला राज मार्ग है।
साधना की आवश्यकता पर बल दिया गया है। प्रस्तुत संकट का समाधान इससे कम में संभव भी नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-July
साधना का भाव तो पशु-पक्षियों तक में पाया जाता है। परन्तु अन्य जीवधारियों की तुलना में मनुष्य जीवन में दिव्यता की, दिव्य विकास की सारी संभावनाएँ विद्यमान हैं। अतः इसमें कोई बुद्धिमानी नहीं हो सकती कि मनुष्य सम्पूर्ण जीवन केवल अपनी ही स्वार्थपूर्ण प्रबंधनाओं में बिता दे। इससे अन्त तक मानवी दिव्य शक्तियाँ प्रसुप्त बनी रहती हैं। प्रेम और आत्मीयता की भावनाओं का विकास नहीं हो पाता।
साधना के समय पृथ्वी से दस फुट ऊपर उठ जाते थे। उस समय उनके शरीर एवं वस्त्रों से सुनहरी चमकीली ज्योति निकलती दिखाई देती थी। उनका शरीर वायु में विचरण करता रहता था। टियाना निवासी योगी एपोलोनियस में भी आकाशगमन की शक्ति थी।
साधना पड़ता है, उसे व्यंग, उपहास तिरस्कार की आदत छोड़ ही देनी चाहिए। इसके लिए शिष्टाचार की किसी पाठशाला में पढ़ने जाने की आवश्यकता नहीं है। मस्तिष्क को शान्त संतुलित बनाये रखने की विधा से यह सहज स्वभाव बन जाता है। जो अपने सेवक, स्वामी, मित्र, कुटुम्बी, पड़ौसी आदि के प्रति अपनी ओर से शिष्टाचार बरतता रहता है, उसके प्रति अन्यान्यों की अपेक्षा, अवमानना टिक नहीं सकती। फलतः वह अन्ततः नफे में ही रहता है।
साधना तो प्रधान थी ही दिव्य जड़ी-बूटियों का उपयोग भी सम्मिलित था।
साधना है। इस पुण्य प्रक्रिया द्वारा पुरुषार्थी साधक अपनी आन्तरिक स्थिति इतनी विकसित कर लेते हैं कि इस निखिल महदाकाश में संव्याप्त उस ब्राह्मी महाशक्ति-गायत्री से अपना सम्बन्ध स्थापित कर सकें। यह सम्बन्ध जितना गहन और जितना प्रौढ़ परिपक्व होता है, उतनी ही उच्चस्तरीय विभूतियाँ मानस क्षेत्र में अवतरित होती हैं। यह अवतरण ही मनुष्य को महामानव, सिद्ध-पुरुष एवं अतिमानव के रूप में विकसित करता है।
साधना द्वारा वस्तुतः सूर्य चक्र का ही जागरण किया जाता है जिससे आत्मा अपना, सम्बन्ध सीधे सूर्य से जोड़कर प्राणाग्नि का विकास करती रहती है। इस केन्द्र को जाग्रत कर लेने का अर्थ है शक्तिपुँज बन जाना, महाप्राण बन जाना।
साधनाएँ मात्र क्रिया हैं यदि उनमें
श्रद्धा का समन्वय नहीं है। आदमी की जो भी कुछ आध्यात्मिक उपलब्धियाँ हैं,
वे श्रद्धा पर टिकी हैं। आपकी अपने प्रति यदि श्रेष्ठ मान्यता है, आपकी
श्रद्धा वैसी है तो असल में वही हैं आप। यदि इससे उलटा है तो वैसे ही बन
जाएँगे आप। गुरुपूर्णिमा श्रद्धा के विकास का त्यौहार है।
साधना हेतु श्री अरविन्द ने दो चरण बताए हैं। प्रथम शुद्ध अभीप्सा अर्थात् वही व्यक्ति जीवन में परम शान्ति आनन्द एवं प्रकाश पा सकता है जो इसके लिए आवश्यक गुण दया, करुणा, ममता, सेवा-सहकार जैसे सद्गुणों को चाहे।
साधना को गुणों के विकास की साधना का नाम देते हैं। बात भी सही है न्यूनाधिक रूप से दोनों एक दूसरे के पर्याय ही हैं। इस साधना हेतु श्री अरविन्द ने दो चरण बताए हैं। प्रथम शुद्ध अभीप्सा अर्थात् वही व्यक्ति जीवन में परम शान्ति आनन्द एवं प्रकाश पा सकता है जो इसके लिए आवश्यक गुण दया, करुणा, ममता, सेवा-सहकार जैसे सद्गुणों को चाहे।
साधना और सुनियोजित दिनचर्या अपनाने भर से अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। जबकि दूसरों का रक्त अपने शरीर में प्रवेश करा लेने पर भी उन उपलब्धियों का अन्त थोड़े ही समय में हो जाता है। काम तो अपने निजी रक्त उत्पादन के सुव्यवस्थित हो जाने पर ही चलता है।
साधना द्वारा संभव हो सकेगा। सामाजिक उन्नति और प्रगति का लक्ष्य इन्हीं माध्यमों से प्राप्त होगा। इसी से स्वर्गीय वातावरण का सृजन हो सकेगा।
साधना, स्वाध्याय, तप की शक्तियाँ चाहता है। उन्होंने इसकी व्यवस्थाएँ जुटाई थी। नागरिक ऊर्ध्वमुखी जीवन-यापन करें, सतत जागरुक थे इसके लिए वह चिन्तन के तरंग वलय-भावों के उतार चढ़ाव के रूप में मुख मण्डल पर प्रकट हो रहे थे।
साधना का नाम देते हैं। बात भी सही है न्यूनाधिक रूप से दोनों एक दूसरे के पर्याय ही हैं। इस साधना हेतु श्री अरविन्द ने दो चरण बताए हैं। प्रथम शुद्ध अभीप्सा अर्थात् वही व्यक्ति जीवन में परम शान्ति आनन्द एवं प्रकाश पा सकता है जो इसके लिए आवश्यक गुण दया, करुणा, ममता, सेवा-सहकार जैसे सद्गुणों को चाहे।
साधना में अपने आप को संलग्न किया जाय- भगवान के अगणित गुणानुवादों में से अपने लिए इतना ही पक्ष हृदयंगम करना पर्याप्त है कि वह मनुष्य स्तर के लिए ‘सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय’ है। उसके प्रति आत्म समर्पण की भावनाओं से अन्तराल को भरने का तात्पर्य है ईश्वर की उच्चस्तरीय विशेषताओं को अपने कण-कण में समाविष्ट करना। जिस प्रकार ईंधन अपने आपको अग्नि के निमित्त समर्पित करता है तो वह समिधा सामान्य लकड़ी की होते हुए भी अग्नि रूप हो जाती है। अग्नि की समूची ऊर्जा और आभा अपने में धारण कर लेती है। उसी प्रकार समझा जाना चाहिए कि अपनी आत्मा भी उसी प्रकार जाज्वल्यमान हो गयी और हेय स्तर के कषाय-कल्मष जल गलकर भस्म हो गये।
साधना नाम दिया। जिन्हें भय था कि उनके परिवारीजन गायत्री परिवार से जुड़कर बैरागी, बाबाजी, पलायनवादी बन जाएँगे, उन्हें उससे मुक्ति मिली व लगा कि उनके लिए भी जीवन को नया मोड़ देने वाला यह मार्ग खुला पड़ा है।
साधना है पर प्रत्यक्ष फल देने वाली चमत्कारी विधा है। यह तथ्य स्मरण रहा तो सिद्धियों की खोज में इधर उधर न भटक कर हम जीवन देवता रूपी जिन्न को ही साधने का प्रयास करेंगे, यही तो नियन्ता को भी प्रिय है।
साधना, उपासना एवं तप-तितिक्षा के विविध सोपानों का सृजन प्राचीन ऋषि-मनीषियों ने किया था और स्वयं अपनी कायिक प्रयोगशाला में अनेकानेक शक्तियों, क्षमताओं, दिव्य विभूतियों को उद्भूत किया था। पंच भौतिक काया तो माध्यम मात्र है। उसकी समस्त हलचलों के पीछे प्राणचेतना सक्रिय रहती है। निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त समष्टिगत प्राण चेतना के लहलहाते महासागर में से आकर्षित अवधारित करके साधक अपनी प्राण ऊर्जा को विकसित करता हुआ क्रमशः प्रगति पथ पर बढ़ता जाता है। दूरदर्शन, दिव्य दर्शन, दूर श्रवण, आकाश गमन, परकाया प्रवेश जैसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ पराशक्तियाँ प्राणोत्थान की देन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1991-April
साधना मानकर सम्पादित किया।
साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना के अतीन्द्रिय क्षमताएँ विकसित हो गई। इसका प्रथम आभास उन्हें 5 अप्रैल, 1968 को हुआ जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति के भाई राबर्ट केनेडी की हत्या कर दिये जाने के स्पष्ट दृश्य मानस पटल पर दिखाई देने लगे। इसकी सूचना उन्होंने उन तक पहुँचाई भी, पर तब लोगों ने उन पर सहज विश्वास नहीं किया और बात आई गई हो गई। पर घटना के उक्त तिथि पर घट जाने से सभी को उन पर आश्चर्य भी हुआ और विश्वास भी।
साधना के अंतर्गत आते हैं। खुले नेत्रों से प्रकाश को देखने की अवधि न्यूनतम होनी चाहिए। एक पल की झाँकी भर। इसके बाद पलक बंद कर लेनी चाहिए और उस प्रकाशपुँज की मानसिक अवधारणा करनी चाहिए। कुछ दिन के अभ्यास से सूर्य को या दीपक को खुले नेत्रों से देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
साधना भूख तक सीमित नहीं है। व्रत, उपवास, विशेष आहार या अमुक मात्रा में निर्भरता के कारण समूचे शरीर का ढाँचा बनता है और जैसा अन्न होता है, वैसी ही प्रकृति एवं प्रवृत्ति का सारा शरीर बनता है। काया का कण-कण अन्न से विनिर्मित है। ऐसी दशा में यह नहीं कहा जा सकता कि मुख ही अन्न का आधार क्षेत्र है।
साधना की यथार्थता और उपलब्धि में जितनी अधिक गहराई के साथ तन्मयता के साथ नियोजित किया गया होगा, मंत्र उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा। याँत्रिक की चमत्कारी शक्ति उसी अनुपात से प्रचण्ड होगी। इन तीनों चेतनात्मक आधारों को महत्व देते हुए जिसने मंत्रानुष्ठान किया होगा, निश्चित रूप से वह अपने प्रयोजन में पूर्णतया सफल होकर रहेगा।
साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना बना लिया जाय। फिर भगवान का उपकरण बन कर लोकहित के लिए दिव्य कर्म किया जाय। यहाँ दो बातें हैं, जिन्हें समझना अनिवार्य है प्रथम है सत्ता के केन्द्र को ऊर्ध्वगामी बनाने का मार्ग और दूसरी कर्म के बाह्य रूप का महत्व नहीं, उसे बदलना आवश्यक नहीं, यद्यपि उसके हेतु व परिधि परिवर्तित हो जायेंगे। ये दोनों बातें तत्वतः एक ही हैं, क्योंकि एक को समझने से दूसरी समझ में आ जाती है। हमारे कर्म के भाव का उदय हमारी सत्ता के स्वभाव से होता है, किन्तु स्वयं यह स्वभाव भी कर्म से अप्रभावित नहीं रह पाता।
साधनाएँ कर लेने में भी कोई हर्ज नहीं, किन्तु जहाँ सुगमता और रोचकता की बात आती है, वहाँ कर्मयोग को ही प्रमुखता देनी पड़ेगी। इसके द्वारा भी हम उस लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं, जो अन्य मार्गों द्वारा सुनिश्चित बतायी गई है। वंचित प्रायः वही रहते हैं, जो अपने कर्तव्य धर्म को भूल जाते हैं। इसी बात को समझाने के लिए रामकृष्ण परमहंस एक उदाहरण दिया करते थे। वे कहते थे तालाब में बहुतेरी मछलियाँ हुआ करती हैं।
साधना उपक्रम द्वारा उल्लेखनीय आत्मविकास किया जा सकता है। अन्तः प्रेरणा के माध्यम से सूझबूझ को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया जा सकता है। इसके अभ्यासियों का वैज्ञानिक परीक्षण जे. बी. राइन द्वारा आविष्कृत अतीन्द्रिय क्षमता टेस्ट द्वारा करने पर पाया गया कि अपने आपे का विस्तार करने वाले अन्यों के दुःख दर्दों को बिना किसी के बताये ही जान जाते हैं। उनके कष्ट-कठिनाईयों को अपने शुभ संकल्पों के माध्यम से दूर करने में भी उनने महत्वपूर्ण सफलता पाई। ऐसे व्यक्ति की अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी बढ़ी चढ़ी देखी गई।
साधना में रत रहकर पुण्य अर्जित किया जा सकता है। इन आचारों को जो जितनी दृढ़ता और तत्परता के साथ अपनाता है, वह अपनी पात्रता बढ़ाते हुए परमेश्वर का प्राणप्रिय बनता और जीवन को धन्य बनाता है।
साधना की दृष्टि से उसे आदर्श एवं अनुकरणीय माना जा सकता है। तेजस्विता उसकी विशिष्टता है। इन्हीं सब विभूतियों को ध्यान-धारणा द्वारा आकर्षित और अन्तराल में प्रतिष्ठित किया जा सके तो समझना चाहिए कि साधक की सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल गया। जिस उद्देश्य के लिए ध्यान किया जाता है उस गन्तव्य तक पहुँचने का राजमार्ग मिल गया।
साधनाओं के करने से प्राप्त होती हैं। इस मंत्र की साधना को सफल बनाने में चार तथ्यों का समावेश है। 1-शब्द शक्ति 2-मानसिक एकाग्रता 3-चारित्रिक श्रेष्ठता और 4-अटूट श्रद्धा।
साधना की यौगिक क्रिया “जो साकू” में त्याग के माध्यम से ‘स्व’ का विकास कराया जाता है। इसी प्रकार से विश्व के विभिन्न धर्मों में आत्मत्याग की तपश्चर्यायें निर्धारित हैं। मानव जीवन में उच्च समस्वरता लाने के लिए जेन पद्धति में सेल्फ निगेशन की तपश्चर्या को अनिवार्य माना गया है। डॉ. मोटोयामा ने अपनी कृति “हिप्नोटिज्म एण्ड रिलीजियस सुपर कान्शसनेस” में इसका सविस्तार वर्णन करते हुए बताया है कि इस साधना उपक्रम द्वारा उल्लेखनीय आत्मविकास किया जा सकता है। अन्तः प्रेरणा के माध्यम से सूझबूझ को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया जा सकता है।
साधना चाहिए, उसकी पूर्ति दिशाहीनता की स्थिति में नहीं बन पड़ती है, जबकि होना यह चाहिए था कि समय की माँग के अनुरूप लिखा या वक्तृत्व कला को नियोजित किया जाय। यही महाकाल की पुकार है-न सिर्फ वक्ताओं, लेखकों से, वरन् उन विधाओं के निष्णातों से भी जो अपनी प्रखर प्रतिभा द्वारा समय और समाज के प्रवाह को मोड़ने-मरोड़ने में समर्थ हैं।
साधना को सफल बनाने में चार तथ्यों का समावेश है। 1-शब्द शक्ति 2-मानसिक एकाग्रता 3-चारित्रिक श्रेष्ठता और 4-अटूट श्रद्धा।
साधना कही जाती है। साहस, संकल्प, पराक्रम अनुसंधान को कड़ाई से अपनाने पर प्राणमय कोश सधता रहता है। श्रेष्ठ ही देखने, खोजने ओर सोचने विचारने से मनोमय कोश सध जाता है। इसी तरह संकीर्णता छोड़कर विशालता के साथ जुड़ जाने पर विज्ञानमय कोश सधता है और सादा जीवन उच्च विचार की, बालकों जैसी निश्छलता की आदत डालने पर, हार-जीत में हँसते रहने वाले प्रज्ञावानों की तरह हर किसी अवसर में आनन्दित रहने पर आनन्दमय कोश सध जाता है। यह सर्वसाधारण की अतिशय सुगम पंचकोशी साधना हुई, पर उच्चस्तरीय पंचकोश साधना के लिए एकान्त, मौन, स्वल्पाहार, संयम, लक्ष्य के प्रति तन्मयता जैसे अनुबंध अपनाने पड़ते हैं।
साधना-उपासना से जहाँ आत्मशोधन और आत्म परिष्कार का प्रयोजन सधता है, वहीं सेवा-साधना में रत रहकर पुण्य अर्जित किया जा सकता है। इन आचारों को जो जितनी दृढ़ता और तत्परता के साथ अपनाता है, वह अपनी पात्रता बढ़ाते हुए परमेश्वर का प्राणप्रिय बनता और जीवन को धन्य बनाता है।
साधना हुई, पर उच्चस्तरीय पंचकोश साधना के लिए एकान्त, मौन, स्वल्पाहार, संयम, लक्ष्य के प्रति तन्मयता जैसे अनुबंध अपनाने पड़ते हैं। तप-तितीक्षा का स्तर ऊँचा करना पड़ता है। और ‘स्व’ को ‘पर’ में पुरी तरह समर्पित करना पड़ता है। इस संदर्भ में ऐसी कष्ट साध्य तपश्चर्यायें करनी पड़ती है जिसके संबंध में अनुभवी मार्गदर्शकों की सहायता से ही योजनाबद्ध कार्यपद्धति निर्धारित की जाती है। इसमें पग-पग पर परामर्श और मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है, जिसकी पूर्ति अनुभवी सिद्ध पुरुष ही कर सकते हैं।
साधना पर सवार होती है और श्रेष्ठताओं के साथ-साथ दोष भी साधक पर हावी होते चले जाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सूर्य को सर्वथा दोष रहित माना गया है। उसमें गुण ही गुण हैं। साथ ही शक्ति का भण्डार एवं आकर्षक सुन्दरता से भरापूरा भी उसे समझा जा सकता है। वह उभय पक्षीय शक्ति का भण्डार एवं आकर्षक सुन्दरता से भरापूरा भी उसे समझा जा सकता है।
साधनाओं में फिर भी अन्यान्य कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं, पर गायत्री मंत्र की साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना कभी निष्फल नहीं होती।
साधना विज्ञान में योग तो अनेकानेक गिनाये गये हैं, यथा-ध्यानयोग, लययोग, हठयोग आदि पर सर्वसाधारण के लिए आज के व्यस्त समय में न तो यह उतने उपयुक्त हैं, न उपयोगी। इसके दो कारण बताये जाते हैं- प्रथम तो यह कि इनमें नितान्त एकान्त की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है, द्वितीय मनुष्य का शरीर आज इतना खोखला और अशक्त हो चुका है कि कठिन तपश्चर्याएँ वह कदाचित ही बर्दाश्त कर सके। ऐसी स्थिति में किसी ऐसे साधन-मार्ग की आवश्यकता अनुभव होती है, जो पद्धति की दृष्टि से सरल-सुगम भी हो और वर्तमान जन-संकुल वातावरण के अनुकूल भी, साथ ही उपलब्धि भी संतोषजनक।
साधना आजीवन चली।
साधना में श्वास-प्रश्वास के साथ निरन्तर चलते रहने की आदत स्वभाव का अंग बन जाती है।
साधना के बाद ही विकसित हो पाती है, फिर आप अपने जीवन की इस अद्भुत क्षमता के लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं? उनका सीधा और सपाट उत्तर था- अपनी विशिष्ट सेवा और सादगी युक्त जीवनक्रम को।
साधना की गई। मंत्र का जितना महत्व है, साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि साधक अपनी श्रद्धा तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मंत्र प्रयोग सही निशान साधने वाली बहुमूल्य बंदूक का काम कर सके।
साधना करने से तो उसके सत्परिणाम से वंचित ही रहना पड़ता है। शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता, लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा, यह चार आधार ले कर की जाने वाली मंत्र साधना कभी निष्फल नहीं होती।
साधना क्यों नहीं बन सकती है? निश्चय ही वह बन सकती है, पर कठिनाई आड़े वहाँ आ जाती हैं, जहाँ हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में ईमानदार बने नहीं रह पाते, जबकि होना यह चाहिए था कि ऐसे कार्यों में भी हम उसी कर्मनिष्ठ और ईमानदारी का परिचय देते, जो अन्य मार्गों के लिए भी अभीष्ट आवश्यक होता है किन्तु अंतस् की उत्कृष्टता के अभाव में ऐसा बन नहीं पड़ता और लक्ष्य प्राप्ति में यह रास्ता विघ्न प्रतीत होने लगता है, जबकि बात ऐसी है नहीं। सच्चाई तो यह है कि अन्य मार्गों में सफलता के लिए साधक को जो आत्मिक स्तर अभीष्ट है, उसी स्तर के त्याग, सेवा, संयम और सहिष्णुता जैसे उपक्रम इस मार्ग में भी अपनाने पड़ते हैं, तभी वह कार्य योग स्तर का बन पड़ता और सही अर्थों में कर्मयोग कहलाता है। इससे कम में सफलता यहाँ भी संदिग्ध ही बनी रहती है।
साधना के लिए एकान्त, मौन, स्वल्पाहार, संयम, लक्ष्य के प्रति तन्मयता जैसे अनुबंध अपनाने पड़ते हैं। तप-तितीक्षा का स्तर ऊँचा करना पड़ता है। और ‘स्व’ को ‘पर’ में पुरी तरह समर्पित करना पड़ता है। इस संदर्भ में ऐसी कष्ट साध्य तपश्चर्यायें करनी पड़ती है जिसके संबंध में अनुभवी मार्गदर्शकों की सहायता से ही योजनाबद्ध कार्यपद्धति निर्धारित की जाती है। इसमें पग-पग पर परामर्श और मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है, जिसकी पूर्ति अनुभवी सिद्ध पुरुष ही कर सकते हैं।
साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि साधक अपनी श्रद्धा तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मंत्र प्रयोग सही निशान साधने वाली बहुमूल्य बंदूक का काम कर सके।
साधना में निरत रहा जाय। इस दूरदर्शी विवेकशीलता को व्यावहारिक जीवन में उतारने पर ही कोई सच्चे अर्थों में भक्त या साधक बन सकता है। पात्रता का विकास भी यही है। इसी आधार पर किसी को दैवी अनुग्रह का अनुदान मिलता है। विभूतियाँ, ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ हस्तगत होने का यह सुनिश्चित राज मार्ग है।
साधना का सम्पुट मिलकर जीवन में चमत्कारी परिवर्तन लाता व ब्राह्मणत्व को सार्थक बना देता है।
साधना में निरत होने वाले प्रत्येक मनस्वी के लिए नितान्त आवश्यक है।
साधनाएँ हैं, प्रायः उन सब में मंत्र जप का समावेश किसी न किसी रूप में अवश्य होता है। क्योंकि मंत्र विद्या मनुष्य के अंतरंग में सोई उन शक्तियों और क्षमताओं को जाग्रत करती है जो उसे उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँचाती हैं। अन्य मंत्र साधनाओं में फिर भी अन्यान्य कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं, पर गायत्री मंत्र की साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना अविस्मरणीय रहेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-September
साधनाक्रम अमेरिका में भी उन दिनों पाया गया था। बुलियन नगर के मनःशक्ति संस्थान के अधिष्ठाता सी. क्रिल्हन ने अपने प्रायः एक लाख अनुयायियों सहित ऐसी ही सुरक्षा साधना सम्पन्न की थी।
साधना कर मनीषियों ने ब्रह्मा प्राप्ति ईश्वर साक्षात्कार का मार्ग भी सुझाया है। योगविद्या के ग्रन्थों में उल्लेख आता है। कि जिन मन्त्रों का प्रयोग कर साधक साधना की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ लक्ष्य तक पहुँचता हैं उनमें मन्त्रों का उच्चारण तो गौण है। मुख्य तो इस उच्चारण में लय को साधना है। मन्त्रों के प्रत्येक अक्षर का एक लक्ष्य नियत किया गया है।
साधना की बात सोचता है तो उसे अपनी काया गलानी पड़ती है। उसकी यह करुण सम्वेदना गंगोत्री से फूटती है। उसका प्रयाण प्यासी भूमि को सींचने और प्राणियों की प्यास बुझाने का होता है। इसी का गंगावतरण कहते है। उसके सभी सहायकों को श्रेय प्राप्त होता है।
साधना का अपना एक स्वतन्त्र विज्ञान तो है ही पर उसमें लय और गति का तालमेल बहुत कुछ संगीत की इस जीवन दात्री क्षमता के प्रयोग का उदाहरण है। कोई आश्चर्य नहीं कि संगीत का स्वास्थ्य प्रयोजन के लिए उपयोग करते-करते विज्ञान इस तथ्य को भी बहुत जल्दी स्वीकार करने की स्थिति में आ जाय।
साधनाओं द्वारा यह विकास सहज रूप में हो जाता है और तब व्यक्ति को अपनी उस अनन्त विस्तृत आत्म-चेतना का बोध होता है, जिसे वह विस्मृत किये रहता है।
साधना-समर’ कहा गया है।
साधना के माध्यम से विकसित करते है वह कई बार बिजली की चमक के समान अनायास ही सामने आ प्रस्तुत होती है। इस सत्ता का विकास करके मनुष्य सीमित परिधि के बन्धन काट कर असीम के साथ अपने सम्बन्ध मिला सकता है और अपनी ज्ञान परिधि को उतना ही विस्तृत कर सकता है।
साधना में सम्मिलित है। विशिष्ट साधनाओं के लिए शीत ऋतु सर्वोत्तम मानी गई है।
साधना करने का विधान भी इसी उद्देश्य से किया गया है। गुरुमुख से मन्त्र लेने का अर्थ है उसकी लय को अधिकारी सिद्ध पुरुष से सुनना व समझना ताकि उसे लक्ष्य बना कर अपना साधन अभ्यास आरम्भ किया जाय। बेद मन्त्रों का प्रभाव तभी दृष्टिगोचर होता है; जब उन्हें निर्धारित क्रम से-लयबद्ध रूप में गाया जाय। वस्तुतः मन्त्र साधनाओं में संगीत की सूक्ष्म शक्ति का महत् प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। इस तथ्य को अन्यान्य रहस्यों की भाँति भले ही हम लोगों ने भुला दिया हो परन्तु विज्ञान पुनः इस दिशा में बढ़ रहा है।
साधनाएं भी बताई जायेंगी। पंचकोशों के अनावरण एवं कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया इसी साधना में सम्मिलित है। विशिष्ट साधनाओं के लिए शीत ऋतु सर्वोत्तम मानी गई है।
साधना की उसे सूक्ष्म संरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त शक्तिशाली एवं अत्यन्त महत्वपूर्ण ही माना जायगा। इसी से मिलता-जुलता एक साधनाक्रम अमेरिका में भी उन दिनों पाया गया था। बुलियन नगर के मनःशक्ति संस्थान के अधिष्ठाता सी. क्रिल्हन ने अपने प्रायः एक लाख अनुयायियों सहित ऐसी ही सुरक्षा साधना सम्पन्न की थी।
साधना कृत्य नहीं दुस्साहस है। उसमें बन्धनों को तोड़ने और महान से मिलने की ललक ही महान भूमिका सम्पादित करती है, सिद्धि के लक्ष्य, तक पहुँचाती है।
साधना के रूप में परिणित हो। कल्पना जल्पना के मन मोदक खाते रहने से न तो साँसारिक सफलताएँ मिलती है और न आध्यात्मिक प्रगति सम्भव होती है।
साधना है। मन्त्रों के प्रत्येक अक्षर का एक लक्ष्य नियत किया गया है। उसका सफल अभ्यास करने के बाद ही मन्त्र सिद्धि की कक्षा उत्तीर्ण की जाती है।
साधना की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ लक्ष्य तक पहुँचता हैं उनमें मन्त्रों का उच्चारण तो गौण है। मुख्य तो इस उच्चारण में लय को साधना है। मन्त्रों के प्रत्येक अक्षर का एक लक्ष्य नियत किया गया है। उसका सफल अभ्यास करने के बाद ही मन्त्र सिद्धि की कक्षा उत्तीर्ण की जाती है।
साधनाओं के लिए शीत ऋतु सर्वोत्तम मानी गई है।
साधना करनी होती है। जो जिस स्तर तक उस समष्टि चित्त से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उसकी भूत-भविष्य की दर्शन-क्षमता उतनी ही बढ़ती जाती है। इसी तथ्य को महर्षि पातंजलि ने योगदर्शन में इस प्रकार प्रतिपादित किया है-
साधना है। साधना कृत्य नहीं दुस्साहस है। उसमें बन्धनों को तोड़ने और महान से मिलने की ललक ही महान भूमिका सम्पादित करती है, सिद्धि के लक्ष्य, तक पहुँचाती है।
साधना सम्पन्न की थी।
साधना-सत्र
साधनाओं का ही अवलम्बन लेना होगा। चेतना अपने उद्गम स्थल पर पहुँचकर ही शान्ति एवं आनन्द की शाश्वत अनुभूति कर सकती है। जीवनपर्यन्त मनुष्य जिसकी प्राप्ति के लिए साँसारिक आकर्षणों में भटकता रहता है, आत्म-दर्शन से ही सम्भव है।
साधनाओं में संगीत की सूक्ष्म शक्ति का महत् प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाता है। इस तथ्य को अन्यान्य रहस्यों की भाँति भले ही हम लोगों ने भुला दिया हो परन्तु विज्ञान पुनः इस दिशा में बढ़ रहा है। अब यह तो सिद्ध हो ही गया है कि संगीत का मनुष्य के मन मस्तिष्क पर अद्भुत प्रभाव पड़ता है। यह भी सिद्ध हो गय है कि न केवल मन मस्तिष्क पर वरन् मनुष्य के स्वास्थ्य पर संगी का अद्भुत प्रभाव पड़ता है।
साधना, उपासना का विशालकाय कलेवर खड़ा है। हम इस तथ्य को समझें। अपने को ईश्वर का बनावें ताकि यह हमारा बन सके। प्रगति का-सुख-शांति का-सच्चा मार्ग यही है।
साधना के पथ पर बढ़ने की हिम्मत जग पड़े तो फिर दूसरा चरण जीवन को सुव्यवस्थित बनाने का होना चाहिये उसके लिये सतर्क सिपाही की तरह प्रतिदिन मन को भक्त बनाने का, संकल्प शील बनाने का अभ्यास प्रारम्भ करना पड़ेगा।
साधना के अधिकाँशतः साधक इन बाधकों द्वारा विचलित कर दिये जाते हैं। काम-क्रोध की लिप्सा में फंसकर अपनी साधन-सम्पत्ति को गवाँ बैठते हैं। इस स्थिति को संभालना बहुत आवश्यक होता है। आत्म-लाभ की फसल की रखवाली, काम क्रोधादि पक्षियों से इन्हीं दिनों करनी पड़ती है। इन बाधक तत्वों से बच निकलता बड़े पुरुषार्थ की बात होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-April
साधना को अपनाना होगा। उसकी दयालुता के साथ ही रुद्र रूप को भी याद रखें तथा सत्पथ शुद्ध एवं सात्विक भावना से चलकर उसे अप्रसन्न होने का अवसर न दे, मनुष्य का कल्याण इसी में है। यही परमात्मा के अंश मनुष्य के लिए योग्य एवं शोभनीय है।
साधना के उपकरण व्यक्ति और वस्तुएँ हो सकते हैं, पर वे ही प्रेम का स्रोत नहीं हैं। कुँआ खोदने के लिये गैंती, फावड़ा की जरूरत पड़ती है। पर जल-स्त्रोत कुँए के भीतर से ही फूटता है, उन उपकरणों से नहीं।
साधना है। साधना के उपकरण व्यक्ति और वस्तुएँ हो सकते हैं, पर वे ही प्रेम का स्रोत नहीं हैं। कुँआ खोदने के लिये गैंती, फावड़ा की जरूरत पड़ती है। पर जल-स्त्रोत कुँए के भीतर से ही फूटता है, उन उपकरणों से नहीं।
साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
साधना बदले और पहुँचाये जाते रहते है। इतने पर भी वह निस्तब्धता और तमिस्रा इतनी खलती है कि प्रायः एक दिन में ही बन्दी घबरा जाता है और आत्म-समर्पण की घंटी बजा देता है। दस दिन से अधिक तो कोई भी उस स्थिति को सहन नहीं कर सका हैं।
साधनामय बनाकर कितने परम प्रभु को पाकर तद्रूप हो चुके हैं और आगे भी उस पर चलकर होते रहेंगे।
साधना के सहारे अभ्यास आरम्भ होना है तो आगे चलकर अन्धता युक्त एकान्त भी कठिन नहीं रहता।
साधना का सहारा लेकर चाहे तो इतना ही ऊँचा उठ सकता है जहाँ पहुँचने पर उसे सिद्ध पुरुष एवं देवात्मा कहा जा सकता हैं।
साधना, जगह-जगह पर यही कहानी!!
साधना सम्भव है। अन्तरंग से निकलने वाले प्रेम-रस का उभार ही साध्य है। यह ध्यान रखकर प्रेम-साधना करने पर ही आत्म-तृप्ति मिलती है। उस प्रेम में कभी भी विफलता नहीं प्राप्त होती। आन्तरिक उल्लास और सच्ची शाँति प्रेम, के विकास के अनिवार्य परिणाम हैं।
साधनाओं के अभ्यास द्वारा इस प्रकार करतब कोई भी कर सकता है।
साधना तपस्या से कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की असाधारण शक्ति प्राप्त कर सकता है। परन्तु इस बात के कोई कारण नहीं मिल सकें हैं कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में ये विशेषतायें अनायास ही क्यों उत्पन्न हो जाती हैं?
साधना करने पर ही आत्म-तृप्ति मिलती है। उस प्रेम में कभी भी विफलता नहीं प्राप्त होती। आन्तरिक उल्लास और सच्ची शाँति प्रेम, के विकास के अनिवार्य परिणाम हैं।
साधना, नव उपासना, महाशक्ति की अब करनी है,
नई शक्ति, अभिव्यक्ति, प्रेरणा, जगती के मरु में भरनी है!!
साधना के समय प्रायः एकाकीपन रहता है। अंतर्मुखी होने की चेष्टा चलती है। अपने आपे से अपरिचित मन इस स्थिति में रहने से डरता है। और भीड़ की तरफ दौड़ पड़ता है। उपासना में मन न लगने की, तरह-तरह के विचार उठने की,अजनबी कल्पनाएँ आने की, स्थिरता न होने की-शिकायत इसी आत्म-विस्मृति का चिन्ह है।
साधना में बहुत प्रशंसा है। जब वह सहन हो जाय तो गुफा गमन जैसे अन्धकार, अभ्यास को भी उसी में सम्मिलित कर लिया जाता है। योगी प्रायः इसी प्रक्रिया को अपनाते देखे गये हैं।
साधना योगाभ्यासियों के लिए पुरानी है। मोटे तौर से वह कोई कौतुक-कौतूहल जैसी जादुई क्रिया-प्रक्रिया मालूम पड़ती है, पर तथ्यतः उसमें शरीर को उस स्थिति में रखने का अभ्यास है जिसे अन्तरिक्ष संव्याप्त भार-हीनता के समतुल्य माना जा सकता हैं आयुर्वेद शास्त्र में काया-कल्प चिकित्सा का विधान है। उसमें शरीर के पुनर्गठन नवीनीकरण की विधा सम्पन्न की जाती है। कहा जाता है कि इससे वृद्धता दूर होती है और यौवन लौट आता है। इस विधान में भी लम्बे समय तक एकान्त और अँधेरे में रहना पड़ता है।
साधनाओं के द्वारा इन सामर्थ्यों को विकसित करने के उदाहरण भारतीय योगी ऋषियों में सामान्य रूप से देखने को मिलते हैं। परन्तु चेतना और मानवीय सत्ता की शक्ति सामर्थ्य किसी देश-प्रदेश तक सीमित नहीं हैं सृष्टि के नियम जिस प्रकार सर्वत्र लागू होते हे उसी प्रकार चेतना भी अपना प्रभाव व सामर्थ्य हर कहीं दिखाती है। आवश्यकता उसे विधिवत् विकसित करने भर की है।
साधना करते हैं। भीतर की प्रमुख शक्तियों को जगाने के लिए भी उनका प्रयोग प्रयास चलता है। इस प्रयोजन के लिए उन्हें ऐसे स्थान में अपना निवास निर्धारित करना पड़ता है जहाँ अनावश्यक कोलाहल की पहुँच न हो और जहाँ रात्रि के समय कृत्रिम प्रकाश उत्पन्न न करना पड़े। दिन में सूर्य का और रात्रि में चाँद-तारों का प्रकाश ही सामान्य और स्वाभाविक निर्वाह के लिए पर्याप्त होना चाहिए।
साधना-भवन और स्नातकों के निवास आदि सभी स्वच्छ, सजे हुये एवं सुव्यवस्थित देख कर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। बड़ी देर तक वसुगण ऋषियों के तप, ज्ञान, दर्शन और उनकी जीवन व्यवस्था पर चर्चा करते और प्रसन्न होते रहें।
साधना अब है मेरी
उठो सभी परिजन अब जागो बजती महाकाल की भेरी!!
साधनात्मक विधियों का मूल गन्तव्य एक ही है- वह है जीवन की रीति-नीति ऐसी बनाना जो परमात्मा के अंश मनुष्य के अनुरूप हो। परिष्कृत जीवन ही परमात्मा का कृपा पात्र बनता है एवं ईश्वरीय अनुग्रह की अजस्र धारा विभिन्न प्रकार की सफलताओं के रूप में बरसती रहती है। ईश्वर परम सन्तोष एवं आनन्द रूप उपासक को अपना मंगलमय सान्निध्य का अनुग्रह करता है। परमात्मा के सच्चे भक्तों को संसार में किसी भी प्रकार की सुख−शांति की कमी नहीं रहती।
साधना द्वारा इस प्रकार की सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाने के उल्लेख भी मिलते है। निस्सन्देह साधना तपस्या से कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की असाधारण शक्ति प्राप्त कर सकता है। परन्तु इस बात के कोई कारण नहीं मिल सकें हैं कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में ये विशेषतायें अनायास ही क्यों उत्पन्न हो जाती हैं?
साधना अनुकूल नहीं पड़ती। उन्हें कथा, कीर्तन, यज्ञ, तीर्थयात्रा, आरती, प्रार्थना जैसे सामूहिक धर्मानुष्ठान ठीक पड़ते है। बहिर्मुखी गतिविधियों का समावेश रहने से इस स्तर के लोगों का मन लग जाता है। ऐसे लोग दैनिक जीवन में भी भीड़ के साथ ही काम कर सकते है। यहाँ तक कि सोने के समय भी अन्य लोगों को साथ रखे बिना काम नहीं चलता।
साधना और ब्रह्म-वर्चस् के लिए विश्व विख्यात था। वहाँ अलौकिक शान्ति विहर रही थी।
साधना के विधि-विधानों तक अनेक धर्म-कृत्य किये जाते है। भजन, कीर्तन, जप, ध्यान, पूजा-पाठ का उद्देश्य इतना ही है कि ब्राह्मी चेतना का अन्तःकरण में उदय उद्भव हो सकें, संक्षेप में इस सारी विधा को आत्म परिवर्तन या आत्म-परिष्कार कह सकते हैं। इसी के लिए धर्म कलेवर का विभिन्न उपचारों के साथ प्रयोग होता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-January
साधना सत्र (क्र. 3, 4 एवं 7) इस वर्ष गायत्री महा पुरश्चरण शृंखला के अंतर्गत लाखों नये साधक मिशन में सम्मिलित हुए है। स्वभावतः उनकी आकांक्षा शान्ति कुँज के वातावरण और उपयोगी सान्निध्य में कुछ दिन रहने ओर साधना करने की होगी। इन्हें दस दिवसीय सत्रों में सम्मिलित होने का अवसर मिल सके इसके लिए अगली दिवाली तक 9 सत्र रखे गये हैं। एक अभी चैत्र की नवरात्रि (क्र. 3) में तीन मई और तीन जून (क्र. 4) में और दो आश्विन (क्र. 7) में इस प्रकार कुल 9 सत्रों में ही साधकों को स्थान मिल सकेगा जो इस वर्ष नये साधकों के रूप में मिशन में सम्मिलित हुए।
साधना के शरीर पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन करते हुए निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले- ‘‘जब कोई व्यक्ति ध्यान करता है तो उसकी हृदयगति, रक्तचाप, नाड़ी की चाल और श्वसन गति में एक स्वस्थ संतुलन बनता है। जैसे हृदयगति सामान्य हो जाती है, रक्त चाप भी सन्तुलन बिन्दु पर आ जाता है। श्वाँस धीमी और गहरी चलने लगती है।” उन्होंने ध्यान के कारण शरीर में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों की भी जाँच की ओर एक पूरा शोध निबंध तैयार किया। यह निबन्ध ‘साइण्टिफिक अमेरिकन’ जैसी विख्यात विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ।
साधनाओं द्वारा परिष्कृत अन्तःकरण और निर्मल चित्त हुए व्यक्ति उन तरंगों को पकड़ने में समर्थ हो जाते हैं। अनायास होने वाली परोक्ष अनुभूतियाँ चेतना की इसी सामर्थ्य का परिचय देती है और व्यक्ति को जड़ में ही उलझे न रहकर उससे भी सामर्थ्यवान चेतन को विकसित करने की प्रेरणायें देती हैं।
साधनाओं का 11 वर्ष तक अभ्यास किया। इस का परिणाम वर्तमान सफलता के रूप में प्रस्तुत है।
साधना कहते हैं। इस उपासना से अन्तरंग गतिवान होता है, उसमें छायी मलीनता, अन्धकार, अविवेक दूर भागते है। सृष्टि का यथार्थ अभिव्यक्त होने से मनुष्य करने योग्य करता है और सोचने योग्य सोचता है। भावनाओं में देवत्व का विकास और कर्तृत्व में शुचिता व पवित्रता का, दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। जहाँ लोगों की भावनायें शुद्ध और पवित्र होगी वहाँ के समाज में सर्वत्र शान्ति, सुव्यवस्था, प्रसन्नता और सन्तोष भरे जीवन की निर्झरिणी प्रवाहित हो रही होगी।
साधनाओं की प्रतिक्रिया का प्रमाण निष्कर्ष प्रस्तुत कर सके। इन प्रयोगों के कार्य संचालन के लिए उपयुक्त शिक्षा संपन्न सुयोग्य प्रतिभाएं आ चुकी हैं और आ रही हैं आशा की जानी चाहिए विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का अद्भुत आविष्कार अगले दिनों संपन्न हो सकेगा। यदि अभीष्ट प्रयोजन में सफलता मिलती है तो इसे अपने समय की अनुपम एवं युगांतकारी उपलब्धियां कहा जा सकेगा।
साधना की उपलब्धि, आत्मा का वरदान ही कहा है। इन्हीं बातों को देख कर वैज्ञानिक शरीर में आत्मा जैसी किसी सर्व व्यापक शक्ति के अस्तित्व की बात स्वीकार करने लगे हैं। भले ही अभी उसका विस्तृत अध्ययन कर पाना सम्भव न हो पाया था। अमेरिका के प्रसिद्ध जीव शास्त्री और चिकित्सा विज्ञान के माने हुए पण्डित डाक्टर एम. डी. कुले ने वर्जीनिया के मेडिकल कॉलेज में व्याख्यान देते हुए बताया था कि - मनुष्य के जीवन का आधार केन्द्र हृदय नहीं वरन् मस्तिष्क है। यद्यपि मस्तिष्क का सम्पूर्ण विश्लेषण अभी नहीं किया जा सका है, पर यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि मनुष्य की जीवन चेतना विज्ञान के स्थूल उपकरणों से नहीं समझी जा सकती।
साधना के फलस्वरूप आपको कल्पवृक्ष जैसी प्रतिभा मिलेगी और उसके द्वारा आपकी सब प्रकार की इच्छा, आकाँक्षाएँ आसानी से पूरी हो जाया करेगी।
साधना का अभ्यास किया था जिसमें उन विशिष्ट शब्दों पर, जिन पर उनकी आस्था थी ध्यान को केन्द्रित किया जाता है। इन शब्दों को भारतीय दर्शन की भाषा में मंत्र भी कहा जा सकता है। अपने चित्त को पूर्णतया एकाग्र कर, चिन्तन को एक दिशा में मोड़कर की जाने वाली ध्यान साधना के चमत्कारी परिणाम सामने आ रहे है।
साधना सत्रों का कई स्वरूप में प्रयोग चलता रहा है। बड़ी संख्या में परिजन उसमें समय-समय पर सम्मिलित होते रहे हैं। इसका प्रभाव परिणाम क्या हुआ इसका संक्षेप में एक ही उत्तर है कि प्रयत्न का सत्यपरिणाम आशातीत निकला है। “पिछले दिनों इस प्रयास की सफलता ने जो उत्साह एवं साहस प्रदान किया है कि उसके आधार पर इस प्रक्रिया को और भी अधिक व्यवस्थित एवं तीव्र कर देने का निश्चय किया गया है। इस निश्चय को कार्यान्वित भी जल्दी ही किया जा रहा है।
साधना द्वारा वह साधक को लाभान्वित करती है तो सामूहिक अनुष्ठानों द्वारा उससे सारा समाज, राष्ट्र और युग प्रभावित होता है इस अकाट्य सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता।
साधना भर चलती है। इस बार महापुरश्चरण योजना के अंतर्गत सर्वत्र गायत्री यज्ञों की धूम है। बसन्त पर्व पर हर शाखा को अपने यहाँ तथा अपने समीपवर्ती क्षेत्रों में पाँच कुण्डी आयोजन करने के लिए कहा गया है। उस उत्तरदायित्व का निर्वाह करने को प्राथमिकता दी गई है। इसलिए इस क्रम से ही लोगों को आ सकने का अवसर मिलेगा।
साधनाओं में जप ध्यान और एकाग्रता द्वारा मन को ही नियंत्रित संयमित किया जाता है। महर्षि वशिष्ठ ने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ‘योगवाशिष्ठ में कहा है--’मन सब प्रकार की शक्तियाँ हैं। वह अपने भीतर जैसी भाव करता है क्षण भर में वैसा ही हो जाता है।
साधना आरम्भ करने के बाद कई व्यक्ति मादक द्रव्यों, मद्यपान और धूम्रपान के दुर्व्यसनों से छुटकारा पाने में से मिलने वाली सफलता की तुलना में अधिक थी। कई व्यक्ति जो चिन्ता और तनाव के कारण बिना ‘ट्रैक्वलाइजर’ सोने के अभ्यस्त नहीं थे, नींद की गोली लिए बिना चैन की गाड़ी नींद सोने लगे। डा. पीटर फेन्विक का कहना है कि -’अभी तक ध्यान के प्रभावों के जो विपुल प्रमाण मिले हैं उनसे सिद्ध होता है। कि मनः चिकित्सा में ध्यान साधना बहुत सहायक और कारगर सिद्ध होती है।
साधनायें करने के बाद भी जब चित्त को सच्ची शान्ति नहीं मिली तो शिखिध्वज निराश से रहने लगे। परन्तु जिस मार्ग का उन्होंने अपनाया था उससे वे वापस लौट भी नहीं सकते थे। लौटने का कोई अर्थ भी नहीं था, क्योंकि जिस जीवन को छोड़कर उन्होंने यह मार्ग अपनाया था, वह जीवन भी तो क्लान्ति, अतृप्ति और अशान्ति के सन्ताप से भरा हुआ था।
साधनाओं द्वारा मन की इस शक्ति को विकसित किया जा सकता है तथा विलक्षण शक्तियों का स्वामी बना जा सकता है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी विद्वान लुई जकालियान ने जो बहुत दिनों तक भारत में रहकर योगविद्या का अध्ययन अन्वेषण करते रहे इस तरह कई उदाहरणों का उल्लेख किया है जिनमें उन्होंने योग के द्वारा मानसिक शक्तियों के अद्भुत विकास की घटना प्रत्यक्ष देखी। लुई जकालियान ने गोविन्द स्वामी नाम दक्षिण के एक योगी के सम्बन्ध में लिख है पानी भरे हुए घड़े को वह दूर बैठकर अपनी मानसिक या शक्ति से आगे पीछे कर देता था और हवा में उड़ा सकता था। उसके आदेश पर जल से भरा हुआ घड़ा भी अधेर में लटक जाता हुआ मैंने देखा हैं। भारती योगियों के इन करतबों को कई लोग मनोरंजन व दृष्टि से देखते है, पर मुझे उस कौतूहल के पीछे किसी व रहस्य की अनुभूति होती है।
साधनायें सम्पन्न की। उन संस्कारों का ही प्रतिफल है कि आज भी इस प्रदेश में पहुँचने वालों में श्रद्धा और भक्ति भावनायें उमड़ पड़ती हैं। इस प्रान्त के निवासी मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा अब भी बड़े ईमानदार पाये जाते हैं। वातावरण का प्रभाव न केवल शरीर, स्वास्थ्य, खानपान और वेशभूषा को प्रभावित करता है अपितु उसके सूक्ष्म संस्कारों में मनुष्यों के विचार और भावनायें बदल डालने की भी जबर्दस्त शक्ति है। डा. आस्कर ब्रोलर ने 1948 में प्रकाशित अपने एक लेख “ब्रेन रेडिएशन” में इस तथ्य पर विस्तृत प्रकाश डालते हुये लिखा है कि किसी क्षेत्र के लोगों में एक ही तरह के विचारों में अटूट निष्ठा हो तो उनके मस्तिष्कों से होने वाले “मस्तिष्कीय विकिरण” की सघन तरंगें वहाँ छा जाती हैं और चिरकाल तक बनी रहती हैं।
साधनाओं में ध्यान का प्रमुख स्थान है। प्रायः सभी धर्मो ने अपनी उपासना पद्धतियों में ध्यान को किसी न किसी रूप में अपनाया है। भारतीय धर्म में ‘ध्यान’ ईसाई धर्म में ‘होर्सचाज्म’ यहूदी धर्म में ‘कब्बालह’ इस्लाम मत में ‘तसब्बुफ’ जापान के जैन धर्म में, जो भारतीय धर्म की ही एक प्रशाखा है ‘जानने’ आदि उपासना विधानों का एक ही अर्थ है। ध्यान की परिभाषा करते हुए गीताकार ने कहा है -’योगी को चाहिए कि वह एकान्त स्थान पर बैठकर, सब इच्छाओं, आकाँक्षाओं को त्याग कर किसी भी परिग्रह की कामना न करते हुए अपने मन को परमात्मा में एकाग्र करें।’
साधना करने की होगी। इन्हें दस दिवसीय सत्रों में सम्मिलित होने का अवसर मिल सके इसके लिए अगली दिवाली तक 9 सत्र रखे गये हैं। एक अभी चैत्र की नवरात्रि (क्र. 3) में तीन मई और तीन जून (क्र. 4) में और दो आश्विन (क्र. 7) में इस प्रकार कुल 9 सत्रों में ही साधकों को स्थान मिल सकेगा जो इस वर्ष नये साधकों के रूप में मिशन में सम्मिलित हुए।
साधनायें है; जिनसे परमात्मा प्रसन्न होता है और इच्छित वरदान प्रदान करता है।
साधनाओं द्वारा मनुष्य वह सामर्थ्य भी विकसित कर लेता है जिसमें एक स्थान पर बैठे-बैठे ही दूरवर्ती स्थानों पर क्या हो रहा है? यह जान लेता है। उस स्थिति में व्यक्ति की चेतना शरीर तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि विराट चेतना से एकाकार हो जाती है। जिस प्रकार अँगूठे में आयी चोट की सूचना मस्तिष्क को और वहाँ से रोम-रोम तक पहुँच जाती है, उसी प्रकार विश्व ब्रह्माण्ड के किसी भी क्षेत्र में घटने वाली घटना का प्रभाव वहीं तक सीमित नहीं रह जाता। पानी में फेंके गये ढेले के कारण उठने वाली लहरों की तरह उसकी तरंगें सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं।
साधना के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की थी-रूस भेजने के लिए भी आग्रह किया था। न केवल वरन् अन्य पश्चिमी देशों में भी इस प्रकार के प्रयोग सफलतापूर्वक किये गये है। तथा इस देश में बहुत आगे पहुँच गये व्यक्तियों से कई महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोग लिया गया है।
साधना सत्र 1 एक गर्मी के दो महीनों में न केवल पढ़ने पढ़ाने वालों को वरन् अन्याय वर्ग के लोगों को भी घर से बाहर जाने की सुविधा रहती है। अस्तु इनमें दस दस दिन के छः सत्रों की व्यवस्था की गई है। इनमें सभी को 24 हजार जप का अनुष्ठान इस पुनीत वातावरण में रह कर करना होगा। अध्यात्म को व्यवहार में उतारने और चमत्कारी प्रतिफल प्राप्त करने का सामान्य मार्ग दर्शन को सभी को मिलेगा साथ ही व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुरूप उसके अवरोधों से जूझने तथा प्रगति पथ पर चलने का विशिष्ट परामर्श एवं सहयोग भी उपलब्ध होगा। इन सत्रों में से कोई अपनी सुविधानुसार चुना जा सकता है।
साधना बहुत सहायक और कारगर सिद्ध होती है।
साधना चाहिए। सुख और शान्ति और आशाप्रद भविष्य की सम्भावनायें इसी सन्तुलन में निहित है।
साधना ऐसी हो नहीं सकती दृष्टिकोण और आचरण में संकीर्णता एवं निकृष्टता भरे रहने पर भी वैसा कुछ परिणाम उत्पन्न कर सके जैसा कि अध्यात्म प्रयोगों के फलस्वरूप अपेक्षा की जाती है।
साधना भी एक विज्ञान है और उसके अपने सुनिश्चित सिद्धाँत है। विज्ञान का यह सिद्धाँत जिस प्रकार अपने आप में अकाट्य है कि हाइड्रोजन के दो अणु और ऑक्सीजन का एक अणु मिलकर पानी बनता है उसी प्रकार योगविज्ञान के भी अकाट्य, अनुभूत और परीक्षित सिद्धाँत है, जिन्हें अपना कर अभीष्ट दिशा में असाधारण सामर्थ्य अर्जित कर लेता है।
साधना सत्र सर्व साधारण के लिए।
साधना उपासना से इस भ्रम जाल, माया मय संसार के सत्य को पहचाना था। विज्ञान भी अब उसी बिन्दु की ओर प्राप्त करने के लिए सच्ची लगन और जिज्ञासा से किसी भी क्षेत्र में प्रयास किया जाय अन्ततः पहुँचना एक ही बिन्दु पर होता है।
साधना तपश्चर्या के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
साधनाओं के अनवरत अभ्यास से प्राप्त होती है किन्तु यदा कदा सामान्य स्थिति में भी इसकी अनुभूति हो जाती है।
साधनाओं से प्राप्त होने की बात करते है। मैले दर्पण को साफ कर लेने पर जिस प्रकार उसमें स्पष्ट छवि देखी जा सकती है उसी प्रकार अपनी अन्तरंग चेतना पर चढ़े मलीनता आवरणों को हटाकर उसमें संसार की दृष्ट-अदृष्ट सभी वस्तुओं, घटनाओं को देखा जा सकता है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
साधना के चमत्कारी परिणाम सामने आ रहे है।
साधना सत्र। नवरात्रि सत्र 22 सितम्बर से 30 सितम्बर 79 तक और दशहरा दिवाली की छुट्टियों का सत्र ता 2 अक्टूबर से 11 अक्टूबर तक का रहेगा।
साधना से सिद्ध की जा सकती है। परन्तु परोक्ष (क्लेयरवायन्स) के सम्बन्ध में वैज्ञानिक अभी भी मौन है।
साधना करने परामर्श पाने की इच्छा अनेकों को रहती है। सीमित स्थान और सीमित समय में सभी को स्थान नहीं मिल पाता। ठीक समय पर आवेदन पत्र भेजने वाले को स्थान पर जाने के कारण प्रायः निराश हो रहना पड़ता है। इसलिए इस सूचना के साथ आमंत्रण भेजा जा रहा है कि अगले आठ महीनों के उपरोक्त सत्रों में से किसी में जिन्हें सम्मिलित होना हो वह समय से पहले ही अपने विस्तृत परिचय सहित आवेदन पत्र भेज कर स्वीकृति प्राप्त करलें।
साधना सत्र। गायत्री लघु अनुष्ठान, उपयुक्त वातावरण एवं मार्ग दर्शन में करने वालों के लिए।
साधना सत्र (1) 1 से 10 मई तक (2) 11 से 20 मई तक (3) 21 से 30 मई तक। (4) 1 जून से 10 जून तक (5) 11 से 20 जून तक (6) 21 से 30 जून तक।
साधना एवं तपश्चर्या के विभिन्न उपचार इसी क्षेत्र में विभूतियां उत्पन्न करने के लिए किये जाते हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का चमत्कारी और विभूतियों का स्वर्ग एवं मुक्ति का- आत्म साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार का यही क्षेत्र है।
साधना हो सकेगी। प्राचीन काल में ऋषियों ने अपनी अंतर्दृष्टि से, साधना उपासना से इस भ्रम जाल, माया मय संसार के सत्य को पहचाना था। विज्ञान भी अब उसी बिन्दु की ओर प्राप्त करने के लिए सच्ची लगन और जिज्ञासा से किसी भी क्षेत्र में प्रयास किया जाय अन्ततः पहुँचना एक ही बिन्दु पर होता है।
साधना परख योगाभ्यासों में किन्हीं अवयवों को प्रमुखता देकर कई प्रकार की हलचलों से उन्हें प्रभावित किया जाता है। यह प्रयोगात्मक पद्धति है। व्यायामशालाओं में भी ऐसा ही होता रहता है। कई प्रकार के व्यायामों में ऐसा लगता है कि उनका प्रभाव अमुख अवयवों पर ही पड़ रहा है। फलतः समस्त शरीर को बलिष्ठ बनाने की कुँजी वही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-October
साधना और एकाग्रता पूर्वक संचित किया जाये तथा दूसरी ओर उसे इन्द्रिय छिद्रों से निर्बाध बहने दिया जाता रहे तो स्वप्न ही सिद्ध होगा। प्रयत्न और परिश्रम का, साधना और एकाग्रता का सत्परिणाम संयम से ही मिलता है। जो अपने आवेगों, भावों और इच्छाओं को वश में रखता है, आत्म-विजय की सफलता का श्रेय उसे ही मिलता है। आवेगों का निरन्तर नियन्त्रण में रखने की शक्ति का नाम ही संयम है।
साधनाओं या योग विद्या के चमत्कार और कुछ नहीं मनुष्य की अन्तःशक्ति के ही परिणाम है। यदि वह बढ़ाई या विकसित की जा सके तो मनुष्य शरीर चलते फिरते बिजलीघर के रूप में परिणत हो सकता है। इस शक्ति का प्रयोग योगीजन भले कार्या में ओर दुष्ट प्रकृति के लोग बुरे प्रयोजनों में करते है। आग से भोजन भी बनाया जा सकता है और घर भी जलाया जा सकता है। यही बात साधना द्वारा उत्पन्न अन्तःशक्ति के बारे में भी लागू होती है।
साधना शिविर
साधना सत्र चलेंगे इसलिए उन दो महीनों तक संगीत सत्र बन्द रहेंगे। इसके उपरान्त तीसरा सत्र जुलाई, अगस्त, सितम्बर का और चौथा अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर का चलेगा। इन चारों में से जिन्हें जिसमें प्रवेश पाना हो, वे अपना स्थान सुरक्षित करा लें।
साधनाकाल में साधक इन्द्रियों के विषयों से सम्बद्ध नहीं होता और चित्त को अपने विषय में लगाता है, उस समय इन्द्रियों का अपने विषयों की ओर न जाकर चित्त में विलीन सा हो जाना ही प्रत्याहार सिद्धि है।”
साधना इसी संस्थान को सुविकसित करने से संभव होता है। इसी की साधना से मनुष्य देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करते चले जाते है। मनुष्यों के बीच निकृष्टता और वरिष्ठता का जो अन्तर दिखाई पड़ता है उसमें इसी संस्थान का विकसित स्तर, चिंतन का क्रम एवं मनुष्य का दृष्टिकोण प्रमुख भूमिका प्रस्तुत करते है। यहीं से वस्तुतः प्रारम्भ होता है-समस्त अध्यात्म साधनों का आद्याक्षर।
साधना सत्र
साधना से मनुष्य देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करते चले जाते है। मनुष्यों के बीच निकृष्टता और वरिष्ठता का जो अन्तर दिखाई पड़ता है उसमें इसी संस्थान का विकसित स्तर, चिंतन का क्रम एवं मनुष्य का दृष्टिकोण प्रमुख भूमिका प्रस्तुत करते है। यहीं से वस्तुतः प्रारम्भ होता है-समस्त अध्यात्म साधनों का आद्याक्षर।
साधना द्वारा उत्पन्न अन्तःशक्ति के बारे में भी लागू होती है। इसलिए योग विद्या के आचार्यों ने यम-नियमों द्वारा अपने स्वभाव, प्रकृति और आदतों को परिमार्जित करने के बाद अगली सीढ़ियों पर कदम रखने का निर्देश दिया है।
साधना और कुछ नहीं- ऋतंभरा प्रज्ञा, दूरदर्शिता, विवेकशीलता का ही जागरण है। महामानवों का इतिहास यही बताता है कि उन्होंने अपनी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाकर उसे एक सुनियोजित ढंग से लक्ष्य की ओर अभिमुख कर दिया। परिणामतः उन्हें इसी जीवन में वे सभी भौतिक तथा आत्मिक वरदान मिले, जिनका शास्त्रकारों ने स्थान-स्थान पर वर्णन किया है।
साधना करते हुए यह सिद्धियाँ उन्हीं लोगों को हस्तगत होती है जो उनका सदुपयोग करना जानते है।
साधना किये जाने पर महत् उद्देश्य व्यक्तित्व का परिष्कार करना तथा चिंतन को उच्चस्तरीय बनाना है। शारीरिक बलवृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में शेष अनुदान स्वतः मिलते चले जाते हैं। हमारा शरीर सृष्टा की अनुपम देन है। इसमें जीवकोष से लेकर जीन्स तक तथा न्यूरान्स से लेकर हारमोन्स तक सभी अनन्त क्षमताओं से संपन्न हैं। केवल इनकी संभावनाओं को पहचानना एवं उनका सदुपयोग करना मनुष्य को आना चाहिए।
साधना सत्र भारतीय महीनों के हिसाब से चलेंगे। चान्द्रायण व्रत का क्रम इसी प्रकार बनता है। प्रथम सत्र मार्गशीर्ष मास में 4 नवम्बर से 3 दिसम्बर तक का, दूसरा पोष का 3 दिसम्बर से 2 जनवरी तक का, तीसरा माघ शिविर 2 जनवरी से 1 फरवरी तक का चौथा फाल्गुन का 1 फरवरी से 3 मार्च तक का तथा पांचवां 3 मार्च से 2 अप्रैल तक का होगा। अभी इन पाँच शिविरों में ही स्थान सुरक्षित कराये जायेंगे।
साधना में तभी चूक हो जाती है जब मनुष्य विषय भोगों में रस लेता है। विषय भोग एक सीमा तक आवश्यक है, शरीर निर्वाह की दृष्टि से उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन जब मनुष्य उनमें रस लेने लगता है तो वहीं से दुख और शक्ति क्षय का सूत्रपात हो जाता है। मनुष्य जब सुख की खोज में इन्द्रियों और विषय को साधन बनाकर प्रयत्न आरम्भ करता है, मन बुद्धि को भी इसी ओर लगाता है तो इसी पर्यंत में अनेक दुखों का सूत्रपात हो जाता है। उदाहरण के लिए शरीर यात्रा के लिए भोजन करना नितान्त अनिवार्य है, लेकिन जब रसना के माध्यम से अनेक स्वादों का आनन्द प्राप्त करने के लिए भोजन किया जाने लगता है तो भोजन की मात्रा और उसके स्वरूप का निर्णय पेट न करके जिह्वा करने लगती है। जीभ की तृप्ति के लिए मनुष्य तरह-तरह के सुस्वादु भोजन करता है और परिणाम रोग, शारीरिक कष्टों के रूप में प्राप्त होते है, इस रूप में दुष्परिणाम न भोगना पड़े, शरीर की सामर्थ्य उन्हें पचा जाने की हो तब भी जो शक्ति आत्मिक विकास के लिए लगनी चाहिए थी, वह इन दुष्पाच्य पथ्यों को हजम कर जाने में लग जाती है।
साधना की जाय तो निश्चित रूप से सिद्धियाँ प्राप्त होती है। आत्मिक कल्याण के लिए किये जाने वाले योगाभ्यासों में भी अपने आप भी कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ जागृत होती है। महर्षि पतंजलि ने उन सिद्धियों का उल्लेख योगदर्शन के विभूतिपाद में सविस्तार किया है। अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्, ईश्वित्व, काय सम्पत्, मनोजवित्व, विकिरण, प्रधान-जय, भूत-जय, आकाशगमन, प्रतिभा, श्रावण वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता आदि अनेक सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, पर साधक को इनमें ही न उलझ जाने के लिए सतर्क भी किया है। क्योंकि ये सिद्धियाँ अन्तिम लक्ष्य ‘आत्म-कल्याण’ में बाधक ही बताई गई है।
साधनाएँ भी बताई और चलाई जायेगी। पंचकोशों का अनावरण और कुण्डलिनी जागरण का उतना शिक्षण हर साधक को मिलेगा जितना उसकी स्थिति को देखते हुए पचने की सम्भावना प्रतीत होती है। जो कर सकेंगे उन्हें उनसे कायाकल्प जैसी तपश्चर्या चान्द्रायण साधना भी कराई जायगी पूर्ण चान्द्रायण करना है अथवा सौम्य यह निर्णय साधक की सहन शक्ति के अनुसार किया जायगा ये सभी साधनाएँ गंगा तट पर बने ब्रह्मवर्चस आरण्यक में सम्पन्न कराई जायेगी। साथ ही साधनात्मक मार्गदर्शन की कक्षाएं भी चलेंगी।
साधना द्वारा मनोमय कोश की साधना आज्ञाचक्र के जागरण की साधना किये जाने पर महत् उद्देश्य व्यक्तित्व का परिष्कार करना तथा चिंतन को उच्चस्तरीय बनाना है। शारीरिक बलवृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में शेष अनुदान स्वतः मिलते चले जाते हैं। हमारा शरीर सृष्टा की अनुपम देन है। इसमें जीवकोष से लेकर जीन्स तक तथा न्यूरान्स से लेकर हारमोन्स तक सभी अनन्त क्षमताओं से संपन्न हैं। केवल इनकी संभावनाओं को पहचानना एवं उनका सदुपयोग करना मनुष्य को आना चाहिए।
साधनात्मक मार्गदर्शन की कक्षाएं भी चलेंगी।
साधना का मार्ग अपनाते है। उसमें यदाकदा सफलता मिल भी जाती है और ठीक ढंग से यदि साधना की जाय तो निश्चित रूप से सिद्धियाँ प्राप्त होती है। आत्मिक कल्याण के लिए किये जाने वाले योगाभ्यासों में भी अपने आप भी कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ जागृत होती है। महर्षि पतंजलि ने उन सिद्धियों का उल्लेख योगदर्शन के विभूतिपाद में सविस्तार किया है। अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्, ईश्वित्व, काय सम्पत्, मनोजवित्व, विकिरण, प्रधान-जय, भूत-जय, आकाशगमन, प्रतिभा, श्रावण वेदना, आदर्श, आस्वाद और वार्ता आदि अनेक सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, पर साधक को इनमें ही न उलझ जाने के लिए सतर्क भी किया है।
साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं। गायत्री महापुरश्चरण की वर्तमान श्रृंखला में इन दिनों प्रायः दस लाख साधक एक समय, एक मन, एक विधान और एक उद्देश्य को लेकर जो धर्मानुष्ठान कर रहे हैं उसका प्रतिफल अदृश्य वातावरण के संशोधन में अपना असाधारण योगदान देगा और इसे आज दूरदर्शिता के सहारे जाना जा सकता है। कल उसके प्रत्यक्ष परिणाम भी सुखद परिस्थितियों के रूप में सामने होंगे।
साधना उपासना आत्मिक आध्यात्मिक प्रयास हैं मनोकामनाओं की पूर्ति में इस तरह के प्रयास शायद ही पूरे होते हों। कुछ लोगों के हो भी जाते होंगे पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा अनिवार्य रूप से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है।
साधना ही चेतना का स्तर उठाने में समर्थ है। विकसित चेतना नदी, प्रतिमा आदि से भी प्रेरणा पा सकती है और दैनंदिन जीवन क्रम से भी। अविकसित चेतना स्तर पर तीर्थाटन का भी प्रभाव नहीं होगा, जबकि विकसित चेतना के लिए घर में ही तीर्थ यात्रा के सुफल प्राप्त होना सम्भव हैं। अतः अपनी भूलों को स्वीकार कर उनका प्रायश्चित्त करते हुए निरन्तर आत्म परिष्कार के लिये प्रयासरत रहना ही सच्ची तीर्थ यात्रा है।
साधनाएँ गंगा तट पर बने ब्रह्मवर्चस आरण्यक में सम्पन्न कराई जायेगी। साथ ही साधनात्मक मार्गदर्शन की कक्षाएं भी चलेंगी।
साधना और एकाग्रता का सत्परिणाम संयम से ही मिलता है। जो अपने आवेगों, भावों और इच्छाओं को वश में रखता है, आत्म-विजय की सफलता का श्रेय उसे ही मिलता है। आवेगों का निरन्तर नियन्त्रण में रखने की शक्ति का नाम ही संयम है।
साधना के उद्देश्य से आने वाले ऐसे रिटायर व्यक्तियों का शान्ति कुँज में विशेष स्वागत किया जायगा जो तकनीकों होने के स्थान पर बुद्धिजीवी स्तर के कार्य करते रहे हैं, उच्च कक्षाओं के अध्यापक, वकील, न्यायाधीश स्तर के लोग प्रशिक्षण में जितने फिट बैठते हैं उतने इंजीनियर आदि नहीं। यों उनमें भी कितने ही स्वाध्यायशील और विचारशील होते हैं तथा शान्ति कुँज में अध्यापक स्तर की योगदान दे सकते हैं। ऐसे व्यक्ति सदा सर्वदा के लिए आएँ यह आवश्यक नहीं है। कम से कम एकाध महीने के लिए तो आना ही चाहिए, इससे कम में कम नहीं चलेगा, पर आने के लिए कम से कम चार महीने की तैयारी की जा सके तो उस समय का कुछ कारगर उपयोग हो सकता है। महीने पन्द्रह दिन का समय तो समझने और समझाने में ही लग जाता है।
साधना में वह बहुमूल्य समय कट सकता है जो घर पड़े रहने पर ऐसे ही निरर्थक बीतता है। विद्या और अनुभव की सार्थकता इसी में है कि वह उच्च उद्देश्यों के काम में प्रयुक्त हो, ऐसे ही नष्ट न हो जाए।
साधना भी कराई जायगी पूर्ण चान्द्रायण करना है अथवा सौम्य यह निर्णय साधक की सहन शक्ति के अनुसार किया जायगा ये सभी साधनाएँ गंगा तट पर बने ब्रह्मवर्चस आरण्यक में सम्पन्न कराई जायेगी। साथ ही साधनात्मक मार्गदर्शन की कक्षाएं भी चलेंगी।
साधना उपासना से किसी का यह उद्देश्य पूरा होता है अथवा नहीं, क्योंकि यह उद्देश्य विशुद्ध रूप से लौकिक और भौतिक है और साधना उपासना आत्मिक आध्यात्मिक प्रयास हैं मनोकामनाओं की पूर्ति में इस तरह के प्रयास शायद ही पूरे होते हों। कुछ लोगों के हो भी जाते होंगे पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा अनिवार्य रूप से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है।
साधना का आधार भूत अंग है। शिवजी द्वारा तीसरे नेत्र को खोल कर कामदेव का दहन मात्र पौराणिक आरष्यान नहीं अपितु इसी ग्रन्थि द्वारा पीटुचरी का संचालन एवं जननेन्द्रियों के स्रावों पर नियंत्रण है। मन के महादैत्य की साधना इसी संस्थान को सुविकसित करने से संभव होता है। इसी की साधना से मनुष्य देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करते चले जाते है। मनुष्यों के बीच निकृष्टता और वरिष्ठता का जो अन्तर दिखाई पड़ता है उसमें इसी संस्थान का विकसित स्तर, चिंतन का क्रम एवं मनुष्य का दृष्टिकोण प्रमुख भूमिका प्रस्तुत करते है।
साधना उपासना प्रायः तीन प्रयोजनों के लिए की जाती है। पहली लौकिक सफलताओं के लिए, जिनमें कोई मनोकामना की पूर्ति, अवरोध हटने-मिटने और अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने का उद्देश्य रहता है। पता नहीं साधना उपासना से किसी का यह उद्देश्य पूरा होता है अथवा नहीं, क्योंकि यह उद्देश्य विशुद्ध रूप से लौकिक और भौतिक है और साधना उपासना आत्मिक आध्यात्मिक प्रयास हैं मनोकामनाओं की पूर्ति में इस तरह के प्रयास शायद ही पूरे होते हों। कुछ लोगों के हो भी जाते होंगे पर निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि आध्यात्मिक प्रयोगों द्वारा अनिवार्य रूप से भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है।
साधनाओं का उद्देश्य मनुष्य की अन्तःशक्ति को अनगढ़ स्थिति से उबारकर उसे शुद्ध एवं प्रखर बनाना ही है। इस शक्ति को अर्जित और परिष्कृत कर कई प्रकार की अलौकिक क्षमताएँ उत्पन्न की जा सकती है और उसका उपयोग सत्प्रयोजनों में करके अपना व समाज का इतना बड़ा हित साधन किया जा सकता है, जितना सामान्य भौतिक क्षेत्र में सम्पन्न किये जाने वाले पुरुषार्थ द्वारा सम्भव नहीं है।
साधना सत्र शान्ति-कुंज में चलेंगे। इसके बाद छह महीने तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
साधना में सर्वप्रथम मन की इस निरर्थक भागदौड़ को रोका बाँधा जाता है।
साधना के आधार पर संपन्न किया जाता है। वायु मण्डल की परिशुद्धि के लिए यज्ञोपचार से बढ़कर और कोई अधिक शक्तिशाली माध्यम अब तक नहीं ढूँढ़ा जा सका। थोड़े से पदार्थों को जलाने की हानि को ही देखा जाय और उसके द्वारा होने वाले लाभों को दृष्टि से ओझल कर दिया जाय तो यह बुद्धिमत्ता की बात न होगी। स्वर्ण भस्म, मोती भस्म आदि में उन पदार्थों को जला देने से मोटी दृष्टि से हानि और मूर्खता का ही निष्कर्ष निकलता है, पर जो उन रसायनों का महत्व समझते हैं उन्हें उसमें लाभ और समझदारी ही का परिचय मिलता है।
साधना द्वारा सम्भव हो सकेगा। सामाजिक उन्नति और प्रगति का लक्ष्य इन्हीं माध्यमों से प्राप्त हो सकेगा। इसी स्वर्गीय वातावरण का सृजन हो सकेगा।
साधनाओं से प्राप्त होती है। उसके लिए प्रयास किया जाय यह अच्छा ही है, पर यह स्थिति एक दिन में नहीं बनती। जब भीतर वैसी उत्कृष्ट मनःस्थिति न हो तब ऊपर से भावोद्वेगों को दबाकर शान्ति बनाये रखना हानिकर ही सिद्ध होगा। इसीलिए कहा गया है कि मुक्त कण्ठ से हँसना और जी भरकर रोना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही है।
साधना आज्ञाचक्र के जागरण की साधना किये जाने पर महत् उद्देश्य व्यक्तित्व का परिष्कार करना तथा चिंतन को उच्चस्तरीय बनाना है। शारीरिक बलवृद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य के रूप में शेष अनुदान स्वतः मिलते चले जाते हैं। हमारा शरीर सृष्टा की अनुपम देन है। इसमें जीवकोष से लेकर जीन्स तक तथा न्यूरान्स से लेकर हारमोन्स तक सभी अनन्त क्षमताओं से संपन्न हैं। केवल इनकी संभावनाओं को पहचानना एवं उनका सदुपयोग करना मनुष्य को आना चाहिए।
साधना स्तर पर बिताने का प्रशिक्षण भी इन शिविरों में मिलेगा। साथ ही ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला, हरिद्वार, कनखल क्षेत्र तीर्थ स्थानों दर्शनीय स्थलों को दिखाने की भी सम्मिलित व्यवस्था बस द्वारा की जा रही है।
साधना और योगाभ्यास आदि का समुचित अवसर आदि ऐसी सुविधाएँ हैं जो लाख प्रयत्न करने पर भी उचित ढंग से जुटाई नहीं जा सकतीं। सबसे बड़ा और अतिरिक्त लाभ यह है कि उपरोक्त नौ सत्रों में प्रशिक्षण की सेवा साधना में वह बहुमूल्य समय कट सकता है जो घर पड़े रहने पर ऐसे ही निरर्थक बीतता है। विद्या और अनुभव की सार्थकता इसी में है कि वह उच्च उद्देश्यों के काम में प्रयुक्त हो, ऐसे ही नष्ट न हो जाए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-June
साधना एवं उपलब्धि की पंचमुखी गायत्री का क्षेत्र माना जाता है। पाँच कोशों का जागरण ही प्रख्यात पाँच देवताओं का प्रत्यक्ष अनुग्रह-अनुदान प्राप्त करना है। यह सब कैसे सम्भव है इसका सुविस्तृत विवेचन इस पुस्तक में देखें।
साधनाओं के माध्यम से संपर्क साधा जा सकता हैं, उन्हें अधिक सहयोग देने के लिए सहमत किया जा सकता है।
साधना से साधक अपनी सामर्थ्य बढ़ाते हैं, दैवी शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त करते हैं तथा अन्यान्य व्यक्तियों एवं वस्तुओं को प्रभावित करते हैं। यह न तो कपोल कल्पना है और न अंध विश्वास। इसे शब्द शक्ति का विज्ञान सम्मत प्रयोग कह सकते हैं। मन्त्र की शब्द संरचना उसकी उच्चारण प्रक्रिया, निर्धारित साधना पद्धति- साधक का मनोबल एवं व्यक्तित्व आदि के सम्मिलित स्वरूप से वह शक्ति निखरती है जिसके आधार पर वे चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होते हैं जिनकी मन्त्र योग की साधना से अपेक्षा की जाती हैं।
साधना से अपेक्षा की जाती हैं।
साधना में पंच कोशों का अनावरण कुण्डलिनी जागरण षट्चक्र वेधन एवं सुसंकल्पों की ध्यान धारणा का समावेश है। इस समग्र साधना पद्धति को ब्रह्मविद्या तपश्चर्या का समन्वय समझा जा सकता है। भौतिक वर्चस और आत्मिक तेजस् की प्राप्ति के लिए क्या धारणा अपनानी और क्या योग साधना करनी होती है इसका क्रमबद्ध शिक्षण इस पुस्तक में है।
साधना को तपसाधना बना देती है।
साधना पद्धति- साधक का मनोबल एवं व्यक्तित्व आदि के सम्मिलित स्वरूप से वह शक्ति निखरती है जिसके आधार पर वे चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होते हैं जिनकी मन्त्र योग की साधना से अपेक्षा की जाती हैं।
साधना विधान विश्व के नव-निर्माण में किस प्रकार अपने प्रभाव से विश्वमानव को प्रभावित परिष्कृत करने जा रहे हैं, इसकी तथ्यपूर्ण झाँकी प्रस्तुत पुस्तक में है।
साधना है। उससे परोक्ष अध्यात्म उद्देश्य ही नहीं- प्रत्यक्षतः शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के उपयोगी लाभ भी मिल सकते हैं। वैज्ञानिक क्षेत्रों में ऐसे प्रयोगों को चिकित्सा उपचार का महत्वपूर्ण अंग माना जाने लगा है।
साधना कारण रूप से उपस्थित है उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यही व्यावहारिक उपाय रह जाता हैं कि उसी अनुपात में थोड़ा समाज के लिए भी करते रहें।
साधना विधान के निष्णातों तक के लिए यह पुस्तक समान रूप से उपयोगी है। गायत्री की ब्रह्मविद्या का स्वरूप एवं तत्वज्ञान इसमें सुबोध ढंग से समझाया गया है।
साधना का प्रारम्भिक सोपान है’ - वर्द्धमान के इन वचनों को सुनकर मातृ हृदय के सशंक सन्देह तिरोहित हो गये और वर्द्धमान ने जब तक माता-पिता रहे घर छोड़कर बन जाने एकान्त तप त्याग का अनुष्ठान करने की बात भी नहीं सोची।
साधना वस्तुतः मन को साधने की ही विद्या है। उसमें अपनी अन्त भूमिका से ही जूझना पड़ता है। इसे गीता का आन्तरिक महाभारत कह सकते हैं। हर साधक को अर्जुन की तरह अपना मनोबल-गाण्डीव संभालना पड़ता है। जो इस महा-समर में तत्पर होते है; भगवान उनका रथ हाँकते हैं और सफलता के लक्ष्य तक पहुँचाते हैं।
साधना करनी होती है इसका क्रमबद्ध शिक्षण इस पुस्तक में है।
साधना
साधना पद्धति को ब्रह्मविद्या तपश्चर्या का समन्वय समझा जा सकता है। भौतिक वर्चस और आत्मिक तेजस् की प्राप्ति के लिए क्या धारणा अपनानी और क्या योग साधना करनी होती है इसका क्रमबद्ध शिक्षण इस पुस्तक में है।
साधनाओं द्वारा उस चेतना से सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते हैं अध्यात्म विज्ञान में जड़ को गौण और चेतना को प्रमुख स्थान इसीलिए मिला है कि वह स्थूल प्रकृति की मर्यादाओं से बंधी हुई नहीं है और अपना स्वतन्त्र विकास करने में सक्षम है।
साधना बना देती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-November
साधनाएं
(16) गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति
(17) गायत्री की असंख्य शक्तियां
(18) गायत्री की सिद्धियां
(19) गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप
(20) गायत्री स्त्रियों का अधिकार
(21) गायत्री और यज्ञोपवीत
(22) गायत्री और यज्ञ का संबंध
(23) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि
(24) गायत्री की दैनिक साधना
(25) गायत्री चालीसा
(26) युग-निर्माण सत्संकल्प
साधना का एक अंग कहा जाता है। एक अंग ही नहीं आत्म निर्माण का प्रथम और अनिवार्य चरण भी। साधारण से साधारण और अनपढ़ से अनपढ़ व्यक्ति से भी धर्म का अर्थ पूछा जाय तो वह सर्व प्रथम सत्य बोलने की ही शिक्षा देते हैं। स्कूल के अध्यापक भी अपने छात्रों को ‘सत्यं वद’ का उपदेश देते हैं। कोई भी संत महात्मा अपने धार्मिक प्रवचनों में सत्य भाषण की महिमा सर्व प्रथम गाते हैं।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रंथों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना, (42) गायत्री के पांच मुख-पांच दिव्य कोश।
साधना समान मात्रा में विद्यमान है इसीलिए वे सड़ी-गली मान्यताओं को निर्मम भाव से तोड़ते चलते समय निर्माण का राम राज्यीय सपना भी देते चलते हैं। इस दृष्टि से महात्मा गाँधी का अधूरा काम आचार्य जी का युग साधना से पूर्ण होने जा रहा है।
साधना सत्र (3) जन जागरण का उद्देश्य पूरा कराने में समर्थ बनाने वाले लोक नायकों के परिव्राजक सत्र (4) नारी जागरण एवं परिवार निर्माण की मुहीम संभालने वाली प्रतिभाओं को खरीदने वाले महिला सत्र (5) व्यक्तित्व में प्रखरता उत्पन्न करने वाले साधना सत्र (6) परिवार निर्माण सत्र (7) संगीत सत्र किस प्रकार चलेंगे और उनकी रूपरेखा क्या होगी, इसका विस्तृत विवरण छापा जा चुका है। उनमें शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या, अब तक के सभी सत्रों की तुलना में कई गुनी अधिक होगी। यह स्वाभाविक भी है, पिछले दो वर्षों में परिवार की सदस्य संख्या दूनी ढाई गुनी हो गई। पुरानों का उत्साह तो कुछ ठण्डा भी पड़ा है, पर नये रक्त का उभार तो तूफानी गति उभरता और मचलता है। इस प्रवेश पर हर्ष मनाने और संतोष व्यक्त करने के साथ ही यह पहाड़ जैसा उत्तरदायित्व सामने आ खड़ा होता है, कि इन भावनाशीलों को प्रवीण पारंगत बनाने के लिए तत्काल आवश्यक व्यवस्था बनाई जाय और साधन जुटाये जायें।
साधना सत्र (6) परिवार निर्माण सत्र (7) संगीत सत्र किस प्रकार चलेंगे और उनकी रूपरेखा क्या होगी, इसका विस्तृत विवरण छापा जा चुका है। उनमें शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या, अब तक के सभी सत्रों की तुलना में कई गुनी अधिक होगी। यह स्वाभाविक भी है, पिछले दो वर्षों में परिवार की सदस्य संख्या दूनी ढाई गुनी हो गई। पुरानों का उत्साह तो कुछ ठण्डा भी पड़ा है, पर नये रक्त का उभार तो तूफानी गति उभरता और मचलता है। इस प्रवेश पर हर्ष मनाने और संतोष व्यक्त करने के साथ ही यह पहाड़ जैसा उत्तरदायित्व सामने आ खड़ा होता है, कि इन भावनाशीलों को प्रवीण पारंगत बनाने के लिए तत्काल आवश्यक व्यवस्था बनाई जाय और साधन जुटाये जायें।
साधना
(11) गायत्री का शक्ति स्रोत- सविता देवता
(12) गायत्री और उसकी प्राण-प्रक्रिया
(13) गायत्री पंचमुखी और एक मुखी
(14) गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना
(15) गायत्री की विशेष साधनाएं
(16) गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति
(17) गायत्री की असंख्य शक्तियां
(18) गायत्री की सिद्धियां
(19) गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप
(20) गायत्री स्त्रियों का अधिकार
(21) गायत्री और यज्ञोपवीत
(22) गायत्री और यज्ञ का संबंध
(23) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि
(24) गायत्री की दैनिक साधना
(25) गायत्री चालीसा
(26) युग-निर्माण सत्संकल्प
साधना से पूर्ण होने जा रहा है।
साधना का मार्ग आचार्य जी के द्वारा प्रशस्त किया जा रहा है ‘साधों सहज समाधि भली।’
साधना के क्षेत्र में सर्वाधिक समर्थ माने जाते हैं किन्तु जीवन प्रवाह सहस्र क्षेत्रों में प्रवाहित हुआ है। लोक सेवक, समाज सुधारक, पुरोहित साहित्यकार, सद्गृहस्थ, कथाकार, प्रभावशाली वक्ता, प्रखर विचारक दार्शनिक, वैज्ञानिक, राजनीतिवेत्ता, व्यावहारिक अर्थशास्त्री आदि अनेक-अनेक विधाओं में उनका व्यक्तित्व गुँथा हुआ है। स्पष्ट है कि उनसे सम्बन्धित परिजनों ने उन्हें अपनी-अपनी तरह से देखा होगा।
साधना
(25) गायत्री चालीसा
(26) युग-निर्माण सत्संकल्प
साधना द्वारा इस विश्व उपवन को सुसज्जित सुरभित किया है। उसी के परिणामस्वरूप हम सामर्थ्य से अधिक उपार्जन कर पाते हैं। हम इस उपार्जन को अपने आप तथा अपने परिवार तक ही सीमित करें तो न हम स्वयं सुखी हो सकेंगे न दूसरों को सुखी बना सकेंगे तथा कृतघ्नता के दोषी बनेंगे।
साधना
(15) गायत्री की विशेष साधनाएं
(16) गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति
(17) गायत्री की असंख्य शक्तियां
(18) गायत्री की सिद्धियां
(19) गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप
(20) गायत्री स्त्रियों का अधिकार
(21) गायत्री और यज्ञोपवीत
(22) गायत्री और यज्ञ का संबंध
(23) संक्षिप्त गायत्री हवन विधि
(24) गायत्री की दैनिक साधना
(25) गायत्री चालीसा
(26) युग-निर्माण सत्संकल्प
साधना में ही मिलता है। इससे बढ़कर कोई ऐसा कर्म नहीं जो मानव को अपनी गरिमा का भान कराता हो।
साधनाओं द्वारा इसी एकमेव द्वितीय चेतन सत्ता और उसके लिए क्रियाकलापों की जानकारी में समर्थ होते रहे हैं। तभी वे सूक्ष्म जगत में उभरने वाली हलचलों की जानकारी प्राप्त करने में समर्थ होते थे। सृष्टि के रहस्यों को समझ सकने के लिए सर्व व्याप्त चेतना से तादात्म्य स्थापित करने के अतिरिक्त और कोई उपाय भी नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-July
साधना कहा जाता हैं। अन्तःकरण ही मानवी सत्ता का केन्द्र बिन्दु है। उसकी स्थिति का सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर प्रभाव नहीं पड़ता। जा आज सिर्फ धोती- कुर्ता पसन्द करने लगे, तो इससे उसकी स्वयं की स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन न होगा। न ही उसके आस-पास इस परिवर्तन से कोई उल्लेखनीय उथल पुथल होगी।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में एक लाख साधकों ने मिल कर प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जाप का अभियान चलाया। यह इस युग का अद्वितीय और अपने आप में अकेला प्रयास था। इस अभियान का वातावरण पर, जन मानस पर जो सूक्ष्म प्रभाव पड़ा तो वह स्पष्टतः दिखाई पड़ सकता है। गायत्री यज्ञों के रूप में सामूहिक आयोजनों की जो अभियान श्रृंखला चल पड़ी है वातावरण के निर्माण और सूक्ष्म जगत के परिवर्तन में उनका भी अपना विशिष्ट स्थान है।
साधना में सम्मिलित सभी साधकों और शाखाओं को होना चाहिये। साधना विधि इस प्रकार है-
साधना, प्रचार, जनसंपर्क और व्यवहार कुशलता के बल पर ख्याति अर्जित कर लेते हैं। दुर्बल से ‘बलवान, अख्यात से विख्यात, मंदबुद्धि से बुद्धिमान, निर्धन से धनवान आदि सफलतायें बहिरंग सत्ता की ही उपलब्धियाँ कही जा सकती हैं।
साधना-समर में विजय तभी प्राप्त होती है। बुरे विचारों को अच्छे विचारों से काटना पड़ता है। गलत आदतों को दूर कर नई आदतों का अभ्यास करना होता है। निकृष्टता की ओर आकर्षित करने वाले वातावरण के स्थान पर चारों ओर उत्कृष्ट वातावरण बनाना होता है।
साधना की सामूहिक व्यवस्था बना लेंगे। इसके बाद बन सके तो भी हर्ज नहीं। पूरा महीना न बन पड़े तो कम से भी कम चल सकता है पर साधना में सम्मिलित सभी साधकों और शाखाओं को होना चाहिये। साधना विधि इस प्रकार है-
साधना इसी प्रकार आभा निखारती, परिपक्वता-सुदृढ़ता बढ़ाती और सात्विकता मधुरता पैदा करती है। मनुष्य के भीतर जो दिव्य, अलौकिक और अद्भुत है, उसे साधना द्वारा ही उभारा-निखारा जा सकता है।
साधना विधि इस प्रकार है-
साधना में सम्मिलित हों।
साधना है।
साधना करके उन स्व निर्मित असन्तुलनों से बचा जा सकता है जो जीवन की संकटग्रस्त बनाने के बहुत बड़े कारण बने रहते हैं।
साधना द्वारा ही अपनी स्वाभाविक सुन्दरता-उज्ज्वलता से समृद्ध बनती है।
साधना का अर्थ है चिन्तन और मनन। आत्म-चिन्तन द्वारा अपनी समीक्षा आप ही करनी चाहिए। जैसे प्रयोगशाला में पदार्थों का वर्गीकरण कर उनकी संरचना के तत्वों को देखा-परखा जाता है, उसी प्रकार अन्तःकरण की प्रयोगशाला में चिन्तन-प्रक्रिया द्वारा अपनी भीतरी स्थिति का वर्गीकरण कर उसे देखा -परखा जाता है। गुण-कर्म-स्वभाव की स्थिति और प्रकृति समझी जाती है। उनका आदर्श स्वरूप क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है, यह विचारपूर्वक निर्धारित किया जाता है।
साधना याचना नहीं है। क्रिया-कृत्यों की विलक्षणता एवं काय कष्टों में उसकी पूर्णता समझना व्यर्थ है। शरीरगत हलचलें और मनोगत मनुहारें साधना के आवरण को तो पूरा करती है पर लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पर्याप्त नहीं। भक्ति का उद्गम अन्तःकरण है। उस मर्मस्थली से जब महानता के प्रति अगाध आस्था और पाने की आतुरता उत्पन्न होती है तो दिशा में कदम बढ़ते हैं जो क्षुद्रों द्वारा मूर्खतापूर्ण कहे जाते हैं।
साधना और यही तपश्चर्या है।
साधना कहते है। प्रचंड मनोबल और जागृत संकल्प शक्ति द्वारा ही यह सम्भव होता है, इस प्रक्रिया में एक प्रकार से अन्तःयुद्ध जैसी ही स्थिति उत्पन्न होती है। इसीलिये साधना को समर कहा गया है। कचरे के विशाल ढेर को हटाने के लिये सफाई-कर्मचारियों को उससे जूझना ही पड़ता है। बाढ़ या तूफान के समय जब प्रकृति के उत्पात से मलबों और लाशों का अम्बार लग जाता है, तब उसे हटाने के लिये सेना की मदद लेनी पड़ती है।
साधना प्रारम्भ कर दी जाये। आशा की गई है कि पहली जुलाई से न सही 6 जुलाई से अधिकांश परिजन इस साधना की सामूहिक व्यवस्था बना लेंगे। इसके बाद बन सके तो भी हर्ज नहीं। पूरा महीना न बन पड़े तो कम से भी कम चल सकता है पर साधना में सम्मिलित सभी साधकों और शाखाओं को होना चाहिये। साधना विधि इस प्रकार है-
साधना का प्रभाव कहीं अधिक होता है। सामूहिक प्रयास, सत्संग, कथा, कीर्तन, यज्ञानुष्ठान, परिक्रमा, तीर्थ यात्रा आदि की क्षमता सामान्य गणना की तुलना में कहीं अधिक होती है।
साधना कही जा सकती है। व्यक्तित्व की साधना इसी प्रकार आभा निखारती, परिपक्वता-सुदृढ़ता बढ़ाती और सात्विकता मधुरता पैदा करती है। मनुष्य के भीतर जो दिव्य, अलौकिक और अद्भुत है, उसे साधना द्वारा ही उभारा-निखारा जा सकता है।
साधना है और उसी का अभ्यास कर सामान्य, स्थिति में रहते हुए भी देवोपम जीवन व्यतीत किया जा सकता है। उसके आलोक से असंख्य व्यक्तियों का भला किया जा सकता है। सही अर्थों में यही अध्यात्म का चमत्कार है। और जिन व्यक्तियों ने भी अध्यात्म के मर्म को समझा है उन्होंने सिद्धियों और चमत्कारों को व्यर्थ बताया है।
साधना द्वारा ही उभारा-निखारा जा सकता है।
साधना के आवरण को तो पूरा करती है पर लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पर्याप्त नहीं। भक्ति का उद्गम अन्तःकरण है। उस मर्मस्थली से जब महानता के प्रति अगाध आस्था और पाने की आतुरता उत्पन्न होती है तो दिशा में कदम बढ़ते हैं जो क्षुद्रों द्वारा मूर्खतापूर्ण कहे जाते हैं। तुच्छता और महानता की दिशा, परिभाषा और उपलब्धि भिन्न-भिन्न है। परमात्मा का स्वरूप महानता है।
साधना में लगे रहे और अन्ततः अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए।
साधना-स्वाध्याय कर या संयम-उपासना-सेवा क पथ अपनाकर भी क्या होगा, अब तो थोड़े दिनों का खेल है, चाहे जैसे दिन काटने हैं, यह भावना पुनर्जन्म पर सच्ची आस्था रखने वाले में नहीं आ सकती। उसके लिये तो जीवन का प्रत्येक क्षण और प्रत्येक कार्य महत्वपूर्ण है। क्योंकि उसका परिणाम अवश्यम्भावी है।
साधना का महत्व है। बँगला देश के उपद्रवों, आपात्काल स्थिति के निवारण और रजत जयंती वर्ष के महापुरश्चरण इसी श्रेणी में आते हैं जो अप्रत्याशित रूप से सफल रहे। स्काई लैब का संकट सामयिक स्थानीय और छोटा मालूम पड़ता है पर गम्भीरतापूर्वक विचारने पर इसे उस श्रृंखला का सूत्र पात समझा जा सकता है जिसकी ओर भविष्य वक्ता क्रूम हेलर ने संकेत किया था। घटना बड़ी भी है दूरगामी भी। इसलिये उपाय उपचारों की दृष्टि ले अध्यात्म वादियों को भी अपने कर्तव्य पालन करने सुरक्षात्मक प्रयास करने में पीछे नहीं रहना चाहिये।
साधना कहते हैं।
साधना है। चेतना के समुद्र में अनन्त ऐश्वर्य-दायक रत्न-भंडार भरे पड़े है। उन्हें पाने के पुरुषार्थ को ही साधना कहते है। वह भीतर की स्वच्छता और श्रृंगार-सज्जा है।
साधना में निरत हो गया।
साधना कहा जा सकता है। उसके अनगढ़ होने का प्रतिफल ही हमें इस अत्यन्त उपयोगी उपकरण के अनुदानों से वंचित किये रहता है। इस दिशा में थोड़ा ध्यान दिया जाय मस्तिष्क को अशुभ चिन्तन से विरत करके विधेयात्मक दिशा अपनाने के लिए सहमत अभ्यस्त किया जा सके तो यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि ही कही जायेगी। संसार के सफलता सम्पन्न महामानवों को सबसे प्रथम अपने चिन्तन को परिष्कृत किया है। इसी आधार पर उनकी गतिविधियाँ सुधरी।
साधना नकद धर्म है। उसका प्रत्यक्ष परिणाम है हथेली पर सरसों जमाने की तरह तत्काल सत्परिणाम प्रस्तुत करते हुए देखा जा सकता है।
साधना कहलाता है। शरीर की सुन्दरता की रक्षा के लिये उसे व्याधियों से मुक्त रखना होता है और पोषक तत्व जुटाना होता है। अन्तःकरण को कुसंस्कारों - कषाय कल्मषों की भयानक व्याधियों से साधना की औषधि ही मुक्त करती है। अन्तःकरण की गहराई तक उत्कृष्टताओं को पहुँचाने वाले भाव-संवेदनों के इन्जेक्शनों का नाम ही साधना है।
साधना मार्ग में विघ्न कहा है तथा उनसे अप्रभावित अनाकर्षित रहते हुए निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए कहा है। वह प्रगति सदाचार, नीति, सद्भाव और सत्कर्मों द्वारा ही होती है न कि चमत्कारी सिद्धियों द्वारा।
साधना 1 जुलाई से ही आरम्भ की जा रही है इन दिनों मथुरा प्रेस हड़ताल चल रही है अतएव पत्रिकाओं द्वारा समय पर सूचना भेजनी कठिन जान पड़ी अतएव इस अनुष्ठान की सूचना आकस्मिक रूप से दी जा रही है। जहाँ जहाँ यह संदेश पहुँचे उसके बाद यथा संभव जल्दी ही यह, सामूहिक साधना प्रारम्भ कर दी जाये। आशा की गई है कि पहली जुलाई से न सही 6 जुलाई से अधिकांश परिजन इस साधना की सामूहिक व्यवस्था बना लेंगे। इसके बाद बन सके तो भी हर्ज नहीं। पूरा महीना न बन पड़े तो कम से भी कम चल सकता है पर साधना में सम्मिलित सभी साधकों और शाखाओं को होना चाहिये।
साधना है जब कि आत्मकल्याण के इच्छुकों को अपनी ही ओर अवर्मुखी होना चाहिए तथा समस्त इच्छाओं वासनाओं को परम चेतना में विलीन कर परमप्राप्तव्य को प्राप्त करना चाहिए।
साधना का अगला चरण है। यह कठिन कार्य यों ही नहीं हो जाता। एक तो आत्म- समीक्षा ही कठिन है। अपने दोष देखने की सामान्यतः व्यक्ति में प्रवृत्ति नहीं होती। वैसी प्रवृत्ति अपनाना सरल नहीं है।
साधना की औषधि ही मुक्त करती है। अन्तःकरण की गहराई तक उत्कृष्टताओं को पहुँचाने वाले भाव-संवेदनों के इन्जेक्शनों का नाम ही साधना है।
साधना को समर कहा गया है। कचरे के विशाल ढेर को हटाने के लिये सफाई-कर्मचारियों को उससे जूझना ही पड़ता है। बाढ़ या तूफान के समय जब प्रकृति के उत्पात से मलबों और लाशों का अम्बार लग जाता है, तब उसे हटाने के लिये सेना की मदद लेनी पड़ती है। फौज जैसी चुस्ती और तत्परता के बिना अपेक्षित सफाई सम्भव नहीं होती।
साधना कहते है। वह भीतर की स्वच्छता और श्रृंगार-सज्जा है।
साधना से ही व्यक्तित्व विकसित - परिवर्तित होता और महिमा-मंडित, गरिमापूर्ण बनता है। मानवीय चेतना साधना द्वारा ही अपनी स्वाभाविक सुन्दरता-उज्ज्वलता से समृद्ध बनती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-August
साधना के रूप में सम्मानित होता है। तत्वदर्शी इन्हीं अदृश्य हलचलों को जागृत आत्माओं के अन्तःकरणों में उछलती देखते हैं तो कहते हैं अवतार का आवेश असन्तुलन को सन्तुलन में बदलकर ही रहेगा।
साधना क्रम नियमित रूप से चल पड़ने चाहिएँ। ऐसे ‘यूनिट’ अपनी मण्डली को शान्ति कुँज से पंजीकृत करा लें ताकि उन्हें इस प्रयोग से काम आने वाली अभीष्ट सामर्थ्य अनुदान के रूप में नियमित रूप से मिलती रहे।
साधना सत्र एक-एक महीने के ब्रह्मवर्चस आरण्यक की सिद्धि पीठ में चला करेंगे। परिव्राजकों के न्यूनतम एक महीने के सत्र शान्ति कुंज में चला करेंगे। गायत्री नगर में कार्यकर्त्ताओं के परिवारों का निवास निर्वाह एवं प्रशिक्षण क्रम तो पूर्ण योजना के अनुरूप चलेगा ही, इसके अतिरिक्त खाली जगह में ‘तीर्थ सेवन’ के लिए उपयुक्त व्यवस्था बनाने का निश्चय किया गया है। इसके लिए न केवल निवास के लिए धर्मशाला जैसा स्थान बनाया जा रहा है वरन् सस्ते भोजन, नाई, धोबी दूध, आवश्यक सामान, वाहन आदि के आवश्यक साधन वहीं उपलब्ध रहें, ऐसा प्रबन्ध किया जा रहा है। पाँच सौ व्यक्तियों के एक साथ बैठ कर सत्संग करने तथा नौ कुण्डी यज्ञशाला बनाना, फुहारा तथा उद्यान भी इसी निर्माण योजना में सम्मिलित है।
साधना, यज्ञ, प्रशिक्षण भोजन आदि से निवृत्त करा दिया जायगा। दस से छः तक आठ घंटे में हरिद्वार क्षेत्र के दूर-दूर तक फैले हुए ज्ञात एवं अविज्ञात तीर्थों के दर्शन बस द्वारा करा दिये जायेंगे। न केवल दर्शन वरन् उनकी पूर्ण गाथा तथा प्रेरणा से भी यात्रियों को लाभान्वित कराया जाता रहेगा।
साधना एवं भाव भरी परमार्थ परायणता।
साधना को नया जीवन और नया प्रकाश मिलना अपेक्षित है। .... अभियान का आरम्भ तो शक्ति पीठों की प्रक्रिया तथा महापुरश्चरण आयोजनों की व्यवस्था के लिए नियोजित किया, गया पर अन्ततः उसका मूल उद्देश्य धर्म-प्रचार को संपर्क यात्रा के रूप में ही होना है। यही प्रयास तीर्थयात्रा है। तीर्थयात्रा की प्रव्रज्या प्रकारान्तर से अन्योन्याश्रित है।
साधना आवश्यक है। प्रभावशाली श्रेष्ठ सज्जन इस पुनीत कार्य में श्रद्धा पूर्वक जुट पड़ें तो यह वातावरण उत्पन्न करना तीर्थ यात्रा की पुण्य परम्परा में उत्साह भरने से सम्भव हो सकता हैं। यह सारे कार्य ऐसे हैं जो शासकीय अथवा दूसरे मंचों से किये जाने वाले समाज कल्याण जैसे कार्यों द्वारा किये जाने वाले रचनात्मक प्रयासों की तुलना में कहीं अधिक गहरा एवं चिरस्थायी सत्परिणाम उत्पन्न करेंगे।
साधना का प्रवाह जन-मानस को अनुकरण के लिए अनायास ही आकर्षित और प्रेरित करेगा। पिछले दिनों जहाँ आदर्शवादिता के दोनों आधार धर्म और अध्यात्म चर्चा एवं उपचार की विडम्बनाओं में उलझकर रहते रहे है। इन दिनों उन्हें अपनी प्रखरता प्रकट करने का-प्रत्यक्ष कार्यरत होने का अवसर मिलेगा। इंजन चलता रहता है तो डिब्बे अनायास ही पीछे लुढ़कने लगते है। तूफान उठता है तो पत्ते और तिनके साथ ही उड़ने लगते है।
साधना सत्र हर भारतीय महीनों की पूर्णिमा से पूर्णिमा तक लगा करेंगे। तारीखों की संगति बदलती रहती है। इसलिए जिन्हें जिस महीने आना हो वे तारीखों की जानकारी प्राप्त कर ले। इसमें सौम्य चांद्रायण व्रत, पंचकोशीय साधना, कुण्डलिनी जागरण सहित गायत्री उपासना का विधान रहेगा। व्यक्ति, विशेष की स्थिति के अनुरूप साधनाक्रम बनाया जाया करेगा।
साधना की भाव सम्वेदनाऐं मचलती रहती हैं उन्हीं पर कुटुम्ब का आनन्द और उत्थान टिका हुआ है श्रद्धा तत्व हटा देने के बाद कुटुम्बियों के बीच आपाधापी, खींचतान, उठक-पटक, रोष प्रतिशोध, घृणा ईर्ष्या के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। ऐसे कुटुम्बों को प्रतिदिन अनुभव में आने वाला तरक ही माना जायेगा। परिवार संस्था की गरिमा श्रद्धा सद्भावना के अतिरिक्त किसी प्रकार न तो स्थिर रह सकती है और न बढ़ सकती है।
साधना क्षेत्र के वरिष्ठ लोगों का ध्यान इस स्तर का पुरुषार्थ करने के लिए प्रथम बार आह्वान किया गया है। आत्म-बल के बलिष्ठों का सामूहिक शक्ति का अर्जन करने और उसे विश्व संकट के निमित्त झोंक देने का यह प्रथम प्रयोग और उसके परिणाम दोनों ही दृष्टि से सफल रहा है। संकट की जैसी आशंका थी वैसी सामने नहीं आई। स्वल्प कालीन सूचना पर इतनी तत्परता से कार्य संलग्न होने से जिस कठिनाई की आशंका थी वह निर्मूल सिद्ध हुई। गायत्री परिवार के चौबीस लाख साधकों में से अधिकाँश ने उसमें परिपूर्ण श्रद्धा के साथ भाग लिया।
साधना से संचित मानवों का अंत चुटकी बजाने जितने समय में कर सकता है। तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या ने यह संकट सामने खड़ा कर दिया है कि एक शताब्दी में ही जीवन यापन करने के लिए आवश्यक अन्न, जल, वस्त्र, निवास जैसे साधन मिलना कठिन हो जायेगा। जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उस अभिवृद्धि का भार उठा सकने की क्षमता अपनी धरती शताब्दी पूरी होते-होते गंवा बैठेगी। कारखाने जिस अनुपात से प्रदूषण और विकिरण उत्पन्न करते हैं उसका प्रभाव मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक संतुलन स्थिर नहीं रख सकता। शरीर और मन की बढ़ती हुई दुर्बलता, प्रकृति का दबाव और विकृति प्रचलनों दबाव कहां तक सहन कर सकेगी इसमें भारी संदेह है।
साधना एवं तपश्चर्या का प्रतिफल प्रस्तुत करते हैं किन्तु यदि भीतर नीरसता छाई हो-भाव सम्वेदनाएँ प्रसुप्त पड़ी हों-तो कितना ही काय कष्ट सहने तथा जप तप करने से भी कुछ बनता नहीं है। क्षेत्र चाहे भौतिक सफलताओं का हो चाहे आत्मिक विभूतियों का-हर हालत में श्रद्धा की सघनता अपेक्षित होती है। उसके बिना लौकिक पुरुषार्थ भी उस स्तर के नहीं बन पड़ते जो बढ़ी-चढ़ी सफलताओं के लिए आवश्यक है। धुन के धनी, लगनशील, तन्मयता और तत्परता बरतने वाले स्वल्प साधनों और नगण्य सामर्थ्यों के रहते अनवरत प्रयत्नरत रहकर पर्वतों के शिखर पर जा पहुँचते हैं इसके विपरीत चंचल चित्त, अस्थिर मति, आस्था रहित मनःस्थिति के व्यक्ति प्रचुर साधनों के रहते, अपनी बढ़ी-चढ़ी क्षमता का भी कुछ लाभ नहीं उठा पाते।
साधना नियोजित की जा सकती। समृद्धि सम्वर्धन के लिए जिस प्रकार सोचा जाता रहा है, जिस प्रकार उसमें साधन, श्रम तथा मनोयोग का नियोजन होता रहा है। उसी तन्मयता तथा तत्परता से यह भावनात्मक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए सक्रियता अपनाई जाएगी तो कोई कारण नहीं कि प्रयत्न असफल चले जायें। असफलता का एक ही प्रमुख कारण है - उपयुक्त तन्मयता तथा अभिरुचि एवं प्रयत्नशीलता का अभाव। इसे यदि दूरी किया जा सके तो प्रगति किसी भी क्षेत्र में हो सकती है।
साधनाक्रम बनाया जाया करेगा। यह नया क्रम कार्तिकी पूर्णिमा ता. 4 नवम्बर से प्रारम्भ होगा। तब तक के सभी स्थान पूर्ण हो चुके हैं।
साधना का समय 1 अक्टूबर से फरवरी अन्त तक 8 से पौने नौ तक रहेगा। ध्यान प्रक्रिया इतनी ही है कि “गायत्री परिवार के लाखों सदस्य अपनी प्रचण्ड आत्म ऊर्जा एक साथ एक वारगी एक लक्ष्य की पूर्ति के लिए उत्पन्न कर रहे हैं। वह संकल्प-शक्ति ऊपर उठती है और अन्तरिक्ष की ऊँची परतों पर छतरी की तरह छा जाती है। इससे वातावरण एवं वायुमण्डल में भरे हुए दुरित धरातल पर गिरने से पूर्व ही रुक जाते हैं। संयुक्त आत्म-शक्ति का छाता उन्हें ऊपर ही रोक देता है।
साधना का निर्धारण तथा प्रस्तुत समस्याओं के समाधान के निमित्त परिजन इनमें आते रहेंगे। व्यस्त लोगों को भी थोड़े दिन अपने प्रिय परिजनों के साथ आने की इस सुविधा का लाभ सभी परिजनों को मिलेगा। स्वभावतः इस निमित्त हजारों परिजन शान्ति कुंज आना और बहु सुविधा सम्पन्न आनन्द उठाना चाहेंगे।
साधना द्वारा अति मानवी क्षमताओं का उन्नयन षोड्श संस्कारों के साथ सम्पन्न होने वाली ज्ञान गोष्ठियाँ द्वारा पारिवारिक वातावरण शालीनता का संवर्धन पर्व त्यौहारों में सन्निहित सामाजिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण जैसे अनेकानेक उच्चस्तरीय उद्देश्य धार्मिक किया-कृत्यों के सहारे भाव भरे वातावरण में सरलता पूर्वक सम्पन्न होते रह सकते हैं। कथा पुराणों में रोचक संस्मरणों के सहारे संस्कृति की महान् परम्पराओं को बाल वृद्ध, नर-नारी जिस प्रकार सुनते, समझते और अपनाते हैं उसे देखते हुए प्रतीत होता हैं। प्रत्यक्ष निर्देशन की अपेक्षा यह देव इतिहासों का कथन श्रवण अन्तरंग की गहराई तक अधिक अच्छी तरह प्रविष्ट हो सकता हैं। आदर्शवादी अनुकरण प्रत्यक्ष न मिल सकें तो उस अभाव की पूर्ति ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा अपनाई गई देव परम्पराओं के दृश्य मनःक्षेत्र में विचरते रहने पर भी एक बड़ा काम हो सकता है। अनुकरण का उत्साह उठ सकता है।
साधना में अग्रणी होना चाहिए। साथी दूसरों को भी बना सकते हैं, सहयोग दूसरों से भी ले सकते हैं। किन्तु अग्रणी वरिष्ठों को ही करना चाहिए। ठीक नौ से सवा नौ बजे तक सस्वर गायत्री पाठ। सवा नौ से पौने दस तक आधा घण्टा ध्यान।
साधना के, रूप यौवन के अथवा व्यवस्था उपचार के सहारे उपलब्ध होने को आशा की जाती है, किन्तु देखा यह गया है कि जहाँ इन सबकी प्रचुरता है वहाँ भी मनोमालिन्य कम नहीं है। तथ्य ढूंढ़ने पर भावनाओं को दरिद्रता ही कुटुम्बों को विश्रृंखलित एवं विपन्न बनाती है। इसका निराकरण हो सके तो अभावग्रस्त घरौंदे में भी लोग देवोपम स्नेह सौजन्य का आनंद लेते हुए दिन बिता सकते है।
साधना से ही इस परिमाण में सम्भव होगा कि व्यापक वातावरण को प्रभावित करने में कहने लायक योगदान द सकें।
साधना, कुण्डलिनी जागरण सहित गायत्री उपासना का विधान रहेगा। व्यक्ति, विशेष की स्थिति के अनुरूप साधनाक्रम बनाया जाया करेगा। यह नया क्रम कार्तिकी पूर्णिमा ता. 4 नवम्बर से प्रारम्भ होगा। तब तक के सभी स्थान पूर्ण हो चुके हैं।
साधना और योग को ब्रह्मविद्या कहते हैं। आस्तिकता- आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी मिलने से वह त्रिवेणी बनती है, जिसमें स्नान करने पर रामायण में प्रतिपादित “काक होंहि पिक-बक्हु मराला” का भावनात्मक कायाकल्प संभव होता है।
साधनाएं पिछले समय से निष्ठापूर्वक चलती रही है; ‘जो कई अनुष्ठान कर चुके और दूसरों को प्रेरणा देने में जिनकी प्रतिभा कारगर सिद्ध होती रही है; उन्हें ‘सुरक्षा साधना में अग्रणी होना चाहिए। साथी दूसरों को भी बना सकते हैं, सहयोग दूसरों से भी ले सकते हैं। किन्तु अग्रणी वरिष्ठों को ही करना चाहिए। ठीक नौ से सवा नौ बजे तक सस्वर गायत्री पाठ। सवा नौ से पौने दस तक आधा घण्टा ध्यान।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-March
साधना तपश्चर्या की शक्ति निर्झरणी गायत्री का कहीं एक भी समर्थ तीर्थ न दिखे और अन्यान्य चित्र विचित्र देवी-देवताओं के देवालयों की भरमार होती चले। इस लज्जाजनक स्थिति को हमें अविलम्ब धो डालना है। गायत्री तीर्थों की श्रृंखला का व्यापक विस्तार नवयुग के अवतरण का वातावरण बनाने के लिए भी आवश्यक है। यह सभी कार्य इन शक्ति पीठों से किस प्रकार सम्भव हो सकते हैं इसे समय से पूर्व कहना व्यर्थ है। यह तीर्थ मात्र देवालय नहीं रहेंगे, उनके द्वारा जो सृजनात्मक प्रवाह बहेंगे उन्हें हिमालय से निकलने वाली अनेकानेक सरिताओं के समतुल्य ही समझा जा सकता है।
साधनाएँ करके वह आलोक प्राप्त करने का अवसर मिलता रहेगा, जो तीर्थ के नाम से जाने जाने वाले साँस्कृतिक मेरुदण्ड का मूलभूत उद्देश्य है। गायत्री नगर में रहकर इस दिन साधना करने वाले यह अनुभव कर सकेंगे कि तीर्थों का जो महात्म्य शास्त्रकारों ने बताया है वह अकारण एवं निरर्थक नहीं है।
साधना का अलंकारिक प्रतिपादन नहीं है। ईश्वरीय सत्ता का तन्मयतापूर्वक भाव भरा चिन्तन व्यक्ति चेतना को क्रमशः विकसित करता चलता है और आत्मा से परमात्मा की मँजिल तक पहुँचा जा सकता है। यह यात्रा किस प्रकार सम्पन्न होती है यह तो अनुभव गम्य ही है परन्तु इस साधना के पीछे छुपे तत्व दर्शन का विश्लेषण तो किया ही जा सकता है। सर्वविदित है कि बिखरी हुई शक्तियाँ और वस्तुएँ बहुत दुर्बल होती हैं। बिखरी हुई बुहारी की सीकों से धूल का एक कण भी साफ नहीं किया जा सकता, परन्तु वे जुड़ कर सूत्र में बंध कर एक दिशा में कार्य करने लगती हैं तो सारी गन्दगी देखते ही देखते साफ हो जाती है बिखरी हुई सूर्य किरणों से साधारण गर्मी तथा प्रकाश ही मिलता है।
साधना में व्यक्ति की मनः शक्ति का बिखराव एक स्थान पर सिमटता जाता है। शक्ति का वह केन्द्रियकरण ऐसा चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न करता है कि व्यक्ति सिद्ध सन्तों और योगी पुरुषों की श्रेणी में जा बैठता है।
साधना तो उसका सुनिश्चित मार्ग है ही। कई बार इसे जीवन में बिना किसी योग-साधना के भी कुछ व्यक्तियों में यह सामर्थ्य विकसित देखी-पाई जाती है। जिससे जहाँ उनके पूर्व जन्म में सम्पन्न विकास का पता चलता हैं, वही मनुष्य के भीतर सन्निहित दिव्यचेतना का भी प्रमाण मिलता है।
साधनाओं में, चाहे वह भक्तिपरक हों या ज्ञानपरक, कर्मपरक हों अथवा तन्त्र मार्गी-ध्यान का महत्व पूर्ण स्थान है। क्योंकि यही वह सेतु है जिससे चढ़ कर आत्मा परमात्मा तक पहुँचता है, यही वह डोर है जिससे जीव ब्रह्म से बँधता है।
साधना, दैनिक-यज्ञ प्रक्रिया एवं शरीर यात्रा के लिए भोजन, शयन, शौच, स्नान आदि का प्रबन्ध रहेगा। अभी आरंभिक निर्माण के लिए इतनी ही व्यवस्था सोची गई है। अच्छा तो यह होता कि दूर-दूर से आने वाले आगंतुकों के लिए एक धर्म शाला भी साथ ही रहती, पर लागत की अधिकता और समय की जल्दी का ध्यान रखते हुए तुरन्त निर्माण के लिए उपरोक्त तीन मंजिलें तीर्थों का ही काम हाथ में लिया गया है। दूसरे चरण में जहाँ
भी तीर्थ होंगे उसीसे सटी हुई या थोड़ी हटकर धर्मशालाएँ भी बनेंगी। जहाँ तीर्थयात्री और अनुष्ठानकर्ता शान्तिपूर्वक निवास करने एवं तीर्थों जैसा वातावरण प्राप्त करने का लाभ उठा सकें।
साधना के पथ पर चलकर आत्मसाक्षात्कार द्वारा सत्य को जानते-देखते -समझते थे वहीं तर्क क्षेत्र में भी सत्य के प्रत्येक पहलू के परीक्षण-विश्लेषण में वे सदा सोत्साह अग्रसर रहें और उससे उन्होंने कभी मुँह नहीं चुराया।
साधना पथ पर चल कर ईश्वर-साक्षात्कार के साथ ही उसके अस्तित्व का तर्कों,-युक्तियों द्वारा विचार-विवेचन भी यहाँ सदा हो होता रहा हैं।
साधना का खाद पानी भर देने की। फिर तो ब्रह्म के समान समर्थ बनने का अवसर मिल सकता है। तपस्वी; ज्ञानी, तत्वज्ञ इन्हीं शक्ति स्त्रोतों को प्रचंड बनाने और उनका आत्मकल्याण तथा लोक कल्याण के प्रयोजन में उपयोग करने का प्रयत्न करते रहते हैं।
साधना के पीछे छुपे तत्व दर्शन का विश्लेषण तो किया ही जा सकता है। सर्वविदित है कि बिखरी हुई शक्तियाँ और वस्तुएँ बहुत दुर्बल होती हैं। बिखरी हुई बुहारी की सीकों से धूल का एक कण भी साफ नहीं किया जा सकता, परन्तु वे जुड़ कर सूत्र में बंध कर एक दिशा में कार्य करने लगती हैं तो सारी गन्दगी देखते ही देखते साफ हो जाती है बिखरी हुई सूर्य किरणों से साधारण गर्मी तथा प्रकाश ही मिलता है। परन्तु उन्हें केन्द्रित कर लिया जाय तो विराट् ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। आज-कल सौर ऊर्जा के माध्यम से कारखाने चलाने और बिजली पैदा करने की बात सोची जाती है, उसका उत्पादन भी सूर्य किरणों को केन्द्रित करके ही किया जाना सम्भव है।
साधना के भी कुछ व्यक्तियों में यह सामर्थ्य विकसित देखी-पाई जाती है। जिससे जहाँ उनके पूर्व जन्म में सम्पन्न विकास का पता चलता हैं, वही मनुष्य के भीतर सन्निहित दिव्यचेतना का भी प्रमाण मिलता है।
साधनाओं का सहारा लिया जाता है। उन सभी योग साधनाओं में, चाहे वह भक्तिपरक हों या ज्ञानपरक, कर्मपरक हों अथवा तन्त्र मार्गी-ध्यान का महत्व पूर्ण स्थान है। क्योंकि यही वह सेतु है जिससे चढ़ कर आत्मा परमात्मा तक पहुँचता है, यही वह डोर है जिससे जीव ब्रह्म से बँधता है।
साधनाश्रम के रूप में बनाया गया था। अब उस गंगा ने त्रिवेणी का रूप धारण कर लिया है। युग शक्ति की 24 धाराएँ 24 देवियों के रूप में प्रतिष्ठापित की गई है। कलेवर की दृष्टि से छोटा होते हुए भी इसे अन्तर्राष्ट्रीय गायत्री तीर्थ बनाया जा रहा है। यह दर्शनार्थियों की श्रद्धा का परिपोषण ही नहीं करेगा वरन् बुद्धिवाद एवं प्रत्यक्षवाद का उपयुक्त समाधान कर सकने के लिए आवश्यक अनुसंधान भी प्रस्तुत करेगा।
साधना द्वारा जिसने अपने मल विकारों को नष्ट कर लिया है तथा अन्तःकरण को पवित्र निष्कलुष बना दिया है वह व्यक्ति अपने चारों ओर विस्तीर्ण प्रकृति देखकर ही धर्म और अध्यात्म का तत्व ज्ञान सीख सकता है।”
साधना करने वाले यह अनुभव कर सकेंगे कि तीर्थों का जो महात्म्य शास्त्रकारों ने बताया है वह अकारण एवं निरर्थक नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-December
साधनाओं द्वारा अपने लक्ष्य की प्राप्ति संभव बताई गई है, वहीं यह भी बताया गया है कि ये साधनाएँ करते-करते मनुष्य अनेक दिव्यशक्तियों का स्वामी बन जाता है और उसके भीतर ऐसी-ऐसी विलक्षणताओं के उद्भव की बात भी कही गई है, जिन्हें चमत्कारी सिद्धियाँ कहा जाता है। योग दर्शन के चार पादों में से एक पाद-एक अध्याय में तो केवल उसी बात का विवेचन किया गया है कि योगसाधक को कौन-कोन सी सिद्धियाँ प्राप्त होती है। दिव्यदर्शन, दिव्यश्रवण, दूरदर्शन, भूत-भविष्य का ज्ञान, प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श आस्वाद, बार्ता छह पुरुष ज्ञान सिद्धियाँ तथा अणिमा, महिमा लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, काय सपत और अनभिघात आदि सिद्धियों का उल्लेख आता है। अन्याय शास्त्रों में इन सिद्धियों का इतना सविस्तार उल्लेख मिलता है कि उन्हें पढ़कर सहज ही विश्वास करते नहीं बनता। कई लोग इसी कारण योगशास्त्र और उसकी सिद्धियों को कपोल-कल्पित मानते थे।
साधना-विधान के रूप में अपनाना होता है। साधना में शिक्षा और
प्रेरणा का समावेश होता है, फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में
प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
साधना में शिक्षा और
प्रेरणा का समावेश होता है, फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में
प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
साधनाएँ करते-करते मनुष्य अनेक दिव्यशक्तियों का स्वामी बन जाता है और उसके भीतर ऐसी-ऐसी विलक्षणताओं के उद्भव की बात भी कही गई है, जिन्हें चमत्कारी सिद्धियाँ कहा जाता है। योग दर्शन के चार पादों में से एक पाद-एक अध्याय में तो केवल उसी बात का विवेचन किया गया है कि योगसाधक को कौन-कोन सी सिद्धियाँ प्राप्त होती है। दिव्यदर्शन, दिव्यश्रवण, दूरदर्शन, भूत-भविष्य का ज्ञान, प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श आस्वाद, बार्ता छह पुरुष ज्ञान सिद्धियाँ तथा अणिमा, महिमा लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, काय सपत और अनभिघात आदि सिद्धियों का उल्लेख आता है। अन्याय शास्त्रों में इन सिद्धियों का इतना सविस्तार उल्लेख मिलता है कि उन्हें पढ़कर सहज ही विश्वास करते नहीं बनता। कई लोग इसी कारण योगशास्त्र और उसकी सिद्धियों को कपोल-कल्पित मानते थे।
साधना करते हैं। उसके अंतरंग और बहिरंग दोनों पक्ष को समुन्नत बनाते हैं। सामान्य स्थिति में यहाँ सब कुछ अनगढ़ रहता हैं। उत्कृष्टता का दृष्टिकोण एवं पुरुषार्थ उसे सुंदर और सुव्यवस्थित बनाता है। झाड़ियों के स्थान पर उद्यान उगाना,वन्य पशुओं को पालतू बनाना और अनगढ़ को सुगढ़ में परिवर्तित करना संस्कृति है।
साधना के आरंभिक अभ्यासी बहुत बढ़-बढ़कर अध्यात्म चर्चा करते है, किंतु इसके पीछे प्रायः उसकी स्वयं को आध्यात्मिक दिखाने की अहंभावना रहती है। जिसे सचमुच वह आध्यात्मिक अनुभूति होनी शुरू हो जाती है, वह उसे गोपनीय धन की तरह रखता है। चाहे जब उसकी चर्चा कदापि नहीं करता। बाद में, यदि ज्ञानी उस विषय में बोलता भी है तो लोक-मंगल की उदात्तभावना से न कि पहले जैसे अहं से भरे आवेश में।
साधना है।
साधना-क्षेत्र का प्रथम चरण
‘इष्टनिर्धारण’ है। प्रगति के किस बिंदु तक पहुँचना है, इसका सुदृढ़
निश्चय होना आवश्यक है, भव्य भवन बनाने वाले सर्वप्रथम अभीष्ट निर्माण के
नक्शे का मॉडल बनाते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए किस मार्ग से जाता है? किस
स्तर का साधन जुटाना है, उसके लिए कितने ही प्रकार के निर्धारण अपनाए जाते
रहे हैं। इन्हें इष्टदेव या देव कहते हैं।
साधना आरंभ करें। विचारक श्रेष्ठ विचारों के रूप में,
कलाकार सौंदर्य के रूप में, साधक श्रद्धाभावना के रूप में तथा कर्मयोगी
श्रेष्ठ कर्मों के रूप में अपनी साधना आरंभ करके उस परमात्मा की अनुभूति कर
सकता है। सृष्टि की सुव्यवस्था एवं महापुरुषों के
उदात्त चरित्र में भी उस महती चेतना का दर्शन किया जा सकता हैं। गणित के
नियमों के समान नियम व्यवस्था एवं अनुशासन में बंधी सृष्टि प्रत्येक
विचारशील को यह सोचने को बाध्य करती है कि क्या यह सब बिना किसी विचारशील
नियामक सत्ता के संभव है।”
साधना से सिद्धि का सिद्धांत सत्य है। भौतिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थी अनेकानेक सफलताएँ अर्जित
करते देखे जाते हैं। जीवन एक ऐसा क्षेत्र हैं जिसे जड़ जगत के किसी भी घटक
एवं वर्ग में अत्याधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। जड़ सीमित है, चेतन
असीम। जड़ से साधनमात्र मिलते हैं।
साधना के लिए इष्टरूप में गायत्री का ही वरण होना चाहिए।
यों गायत्री का स्थूलरूप चौबीस अक्षरों के एक
शब्दगुच्छक के रूप में है और उसकी प्रतिमा हंसारूढ़ देवी के रूप में बनती
है। यह नाम और रूप का निर्धारण है। उसके बिना मस्तिष्कीय-संरचना किसी तथ्य
को पकड़ने, समझने में ही समर्थ नहीं होती। इसलिए चिंतन को किसी दिशा में
आगे बढ़ाने के लिए नाम, रूप का अवलंबन अनिवार्य होता है।
साधना एवं
धर्मानुष्ठानों के रूप में प्रचलित हैं। इष्ट का, लक्ष्य का, उपास्य का
निर्धारण दिव्यदर्शियों ने गायत्री के रूप में गहन अध्यवसाय और अनवरत
अनुभव, अभ्यास के आधार पर किया है। वह प्राचीनकाल की तरह आज भी अपनी
उपयोगिता यथावत् अक्षुण्ण रखे हुए है। विज्ञ-साधकों के लिए उसी का अवलंबन ग्रहण करना हर दृष्टि से उपयोगी है।
साधना का एक सुविस्तृत विज्ञान है। अध्यात्मतत्त्वज्ञान के
अंतर्गत उसकी व्यापक विवेचना की गई है।
साधना से सिद्धि का सिद्धांत सुनिश्चित है। भौतिक क्षेत्र में अपने प्रसंग में साधनारत पुरुषार्थी अभीष्ट मनोरथ पूरे करते देखे जाते हैं। आत्मोत्कर्ष भी चेतनात्मक विभूतियाँ उपार्जन करने की ही एक विशिष्ट प्रक्रिया हैं। उसमें सफलता प्राप्त करने का सिद्धान्त भी वहीं है जो भौतिक सफलताओं पर लागू होता हैं। साधक जीवन देवता की साधना करते हैं।
साधना-संदर्भ में एक ही निश्चय पर पहुँची है कि आत्मिक-प्रगति की
साधना के लिए इष्टरूप में गायत्री का ही वरण होना चाहिए।
यों गायत्री का स्थूलरूप चौबीस अक्षरों के एक
शब्दगुच्छक के रूप में है और उसकी प्रतिमा हंसारूढ़ देवी के रूप में बनती
है। यह नाम और रूप का निर्धारण है। उसके बिना मस्तिष्कीय-संरचना किसी तथ्य
को पकड़ने, समझने में ही समर्थ नहीं होती। इसलिए चिंतन को किसी दिशा में
आगे बढ़ाने के लिए नाम, रूप का अवलंबन अनिवार्य होता है।
साधना-मार्ग पर चलने के लिए प्रथम चरण
‘इष्टनिर्धारण’ का उठाना पड़ता है। प्रगति की आंतरिक महत्त्वाकांक्षा
स्वाभाविक है, पर उसका स्वरूप भी तो निश्चित होना चाहिए। उमंगे असीम हैं और
उनकी दिशाधारा भी अनेकों। पानी से उठने वाली लहरों की तरह महत्त्वाकांक्षाओं
की कोई सीमा नहीं। एक के बाद दूसरी लहर उठती है और हवा के झोंकों के साथ
अपनी दिशा बदलती है।
साधना-विधान की आधारशिला इसी पृष्ठभूमि पर रखी जानी
चाहिए।
साधना कर लेता है, वह उतना ही कृतकृत्य बनता है। जीवन का मूल्य महत्त्व और उपयोग न समझना ही वह अभिशाप है।
जिसके कारण गई-बीती परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़ते हैं। यदि स्थिति
को बदल दिया जाए, जीवन देवता की अनंत सामर्थ्य तथा उसके वरदानों की असीम
शृंखला को समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि सृष्टि ने बीजरूप में वैभव का
भांडागार इसी मानवीकाय-कलेवर के भीतर संजोया हुआ था। भूल इतनी ही होती रही
कि न उसे खोजा गया और न काम में लाया गया।
साधना का स्वरूप और उद्देश्य समझने भर की है। यदि उसे पात्रता का,समर्थता का और व्यक्तित्व का परिष्कार माना जाए, उसी दृष्टि से उस महाप्रयास में निरत हुआ जाए तो ऐतिहासिक एवं विद्यमान अध्यात्मवादियों की तरह हर कोई अपने स्तर को क्रमशः अधिकाधिक ऊँचा उठा सकता है। इतना ऊँचा जिसकी गरिमा को हिमालय से कम नहीं, वरन अधिक ही उत्तुंग, समुन्नत एवं समृद्ध कहा जा सके। साधना-क्षेत्र में निराश उन्हें रहना पड़ता है जो आत्मपरिष्कार के लिए कुछ नहीं करते, वरन देवताओं को फुसलाने वाले सस्ते तरीके ढूँढ़ने और उतने भर से ही लंबी-चौड़ी आशाएँ लगाए रहते हैं।
साधना के यही दो क्षेत्र
हैं। बहिरंग को सभ्यता की मर्यादा में करना होता हैं और अंतरंग को संस्कृत
बनाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। साधना का तत्त्वदर्शन यहीं
है। सरकस का पशुप्रशिक्षक अनगढ़ जानवरों को प्रशिक्षित करता हैं और उन्हें
आश्चर्यजनक करतब दिखाने में अभ्यस्त कर लेता है। प्रकारांतर से यही
प्रक्रिया जीवन-संपदा के अनगढ़ और अव्यवस्थितस्वरूप को सुव्यवस्थित और
समुन्नत बनाने के लिए पड़ती हैं।
साधना के व्यवसाय की महत्ता समझते, उसे
प्रमुखता देते और समुचित लाभ उठाते रहें हैं। प्रगतिशीलता में रुचि लेने
वाले प्रत्येक जागरूक को लाभदायक व्यवसायों में से चुनाव करते समय साधना को
प्रमुखता देने में ही बुद्धिमानी प्रतीत हुई है। आज भी उसी राजमार्ग का
अनुसरण सबसे अधिक दूरदर्शितापूर्ण है।
साधना के अभ्यासों को देखते हुए यह भ्रम होता
है कि कहीं बाहर से कुछ माँगने-पाने का वह उपक्रम है, पर वस्तुतः बात ऐसी
है नहीं। उपयोगी उपार्जन के लिए अपने खेत में ही फसल बोनी और काटनी पड़ती
है। अपने पुरुषार्थी से ही निर्वाह होता है। बाहरी सहायता के बल पर किसका
काम चला है? फिर याचना पर मिलता भी किसे कितना है।
साधना के समय यहीं दृष्टि केंद्रित करने का निर्देश भी विभिन्न शास्त्रों में मिलता है। इस केंद्र को संसार की स्थूल और सूक्ष्म परिस्थितियाँ जानने-समझने की ही नहीं, वस्तुओं और व्यक्तियों को प्रभावित करने की भी क्षमता है। इतना ही नहीं वातावरण में व्यापक परिवर्तन भी इस केंद्र के उपयोग द्वारा संभव बताया गया है। दूरदर्शन, परोक्ष दर्शन, तो उसकी आरंभिक कला है। एक्स-किरण जिस प्रकार ठोस पदार्थों से पार हो जाती है, वे पदार्थ उसमें कोई बाधा नहीं पहुँचते और वह आँखों से न दिखाई देने वाली भीतरी स्थिति का भी चित्र खींचकर रख देती है, उसी प्रकार आज्ञाचक्र की संकल्प- किरणें दूर अदृश्य को भी तमाम अवरोधों—बाधाओं के बाद भी जान लेती हैं।
साधना का स्वरूप और उद्देश्य
साधना का विधि-विधान उसी के अनुरूप चलता है। यों उपास्य केवल एक ही है—’दिव्य
जीवन’, किंतु उसके लिए पुरुषार्थ करने की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि
उपासनात्मक उपचारों के सहारे ही बनती है। दिव्य जीवन की कल्पना करते रहने
भर से तो कोई काम नहीं बनता, पहलवान बनने के लिए व्यायाम की, विद्वान् बनने
के लिए स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। इसी
प्रकार आत्मिक प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार
अपनाने पड़ते है। दिव्य जीवन की चरम परिणिति ही पूर्णता है।
साधना है। इस मार्ग पर चलने वाले को अतिरिक्त याचना नहीं करनी पड़ती, जो उपयुक्त है वह अनायास ही मिलता है। उपयुक्त का तात्पर्य है— अपने स्तर को बढ़ाए बिना न तो विभूतियाँ मिलती हैं और न मिलने पर ठहरती ही हैं। अतः पात्रता की पाचन की समर्थता का अभिवर्द्धन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। साधनों में यही करना पड़ता है।
साधना-प्रयोजन में इसी के विभिन्न उपचार योगाभ्यासों, तप-साधना एवं
धर्मानुष्ठानों के रूप में प्रचलित हैं। इष्ट का, लक्ष्य का, उपास्य का
निर्धारण दिव्यदर्शियों ने गायत्री के रूप में गहन अध्यवसाय और अनवरत
अनुभव, अभ्यास के आधार पर किया है। वह प्राचीनकाल की तरह आज भी अपनी
उपयोगिता यथावत् अक्षुण्ण रखे हुए है। विज्ञ-साधकों के लिए उसी का अवलंबन ग्रहण करना हर दृष्टि से उपयोगी है।
साधना को
प्रमुखता देने में ही बुद्धिमानी प्रतीत हुई है। आज भी उसी राजमार्ग का
अनुसरण सबसे अधिक दूरदर्शितापूर्ण है।
साधना का तत्त्वदर्शन यहीं
है। सरकस का पशुप्रशिक्षक अनगढ़ जानवरों को प्रशिक्षित करता हैं और उन्हें
आश्चर्यजनक करतब दिखाने में अभ्यस्त कर लेता है। प्रकारांतर से यही
प्रक्रिया जीवन-संपदा के अनगढ़ और अव्यवस्थितस्वरूप को सुव्यवस्थित और
समुन्नत बनाने के लिए पड़ती हैं। साधना के समस्त उपचार इसी प्रयोजन के लिए
सृजे गए हैं।
साधना का उद्देश्य इसी पात्रता का अभिवर्द्धन है।
साधना आरंभ करके उस परमात्मा की अनुभूति कर
सकता है। सृष्टि की सुव्यवस्था एवं महापुरुषों के
उदात्त चरित्र में भी उस महती चेतना का दर्शन किया जा सकता हैं। गणित के
नियमों के समान नियम व्यवस्था एवं अनुशासन में बंधी सृष्टि प्रत्येक
विचारशील को यह सोचने को बाध्य करती है कि क्या यह सब बिना किसी विचारशील
नियामक सत्ता के संभव है।”
साधना का उद्देश्य है।
साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित
की थी। आदिमानव देवों से सप्तऋषियों का नाम आता है। वे सभी गायत्री की सप्त
व्याहृतियों के प्रतीक माने जाते हैं। राम-कृष्ण आदि अवतारों की इष्ट
गायत्री रही है। इसी महामंत्र की व्याख्या में चारों वेद तथा अन्यान्य
धर्मशास्त्र रचे गए हैं।
साधनाओं के पीछे कोई विशेष सिद्धांत नहीं है। है भी, तो इतना मात्र ही कि तितिक्षा के अभ्यास द्वारा अपनी इच्छाशक्ति को प्रखर बनाया जाए।
साधना के समस्त उपचार इसी प्रयोजन के लिए
सृजे गए हैं।
साधना-विधान का विस्तार है। गायत्री गुरुमंत्र है। दीक्षा
में उसी को माध्यम बनाया जाता है। हिंदू धर्म के दो प्रतीक है—शिखा और
सूत्र। दोनों ही गायत्री के प्रतीक है।
साधना दूरदर्शिता। समग्र विवेकशीलता को गायत्री कह सकते है। इसी
बीजमंत्र का विशाल वृक्ष ब्रह्मविद्या है। अध्यात्म का यह दार्शनिक पक्ष
है। साधना-प्रयोजन में इसी के विभिन्न उपचार योगाभ्यासों, तप-साधना एवं
धर्मानुष्ठानों के रूप में प्रचलित हैं।
साधनारत पुरुषार्थी अनेकानेक सफलताएँ अर्जित
करते देखे जाते हैं। जीवन एक ऐसा क्षेत्र हैं जिसे जड़ जगत के किसी भी घटक
एवं वर्ग में अत्याधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। जड़ सीमित है, चेतन
असीम। जड़ से साधनमात्र मिलते हैं। चेतन में आनंद और उल्लास के भी भंडार
भरे पड़े हैं।
साधनारत पुरुषार्थी अभीष्ट मनोरथ पूरे करते देखे जाते हैं। आत्मोत्कर्ष भी चेतनात्मक विभूतियाँ उपार्जन करने की ही एक विशिष्ट प्रक्रिया हैं। उसमें सफलता प्राप्त करने का सिद्धान्त भी वहीं है जो भौतिक सफलताओं पर लागू होता हैं। साधक जीवन देवता की साधना करते हैं। उसके अंतरंग और बहिरंग दोनों पक्ष को समुन्नत बनाते हैं।
साधना से सिद्धि के सिद्धांत में कहीं संदेह की गुंजाइश नहीं रह
जाती।
साधना कहते हैं।
साधना
है।
साधना कहते हैं। साधना किसकी? इसका
उत्तर है— जीवन की। जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है जो उसकी जितनी सदुपयोग साधना कर लेता है, वह उतना ही कृतकृत्य बनता है। जीवन का मूल्य महत्त्व और उपयोग न समझना ही वह अभिशाप है।
साधना द्वारा उनका विकास एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया से होता है। उसके द्वारा विश्व-ब्रह्मांड में व्याप्त परम चेतना से तादात्म्य स्थापित कर जीवचेतना उसकी सामर्थ्य को अर्जित करने लगती है।
साधना का व्यवसाय इन सबसे सरल और फलप्रद है। उसमें न
बाहर की सहायता अपेक्षित होती है, न साधन जुटाने पड़ते हैं और न
परिस्थितियों के अनुकूलन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। अपने आप को समझा लेने
और सुधार लेने भर से वह प्रयोजन पूरा हो जाता है, जिसमें लाभ ही लाभ है।
वह भी इतना असाधारण जिसकी तुलना में अन्य सभी व्यवसायों का लाभांश हलका
पड़ता हैं। दूरदर्शी सदा से साधना के व्यवसाय की महत्ता समझते, उसे
प्रमुखता देते और समुचित लाभ उठाते रहें हैं।
साधना-क्षेत्र में निराश उन्हें रहना पड़ता है जो आत्मपरिष्कार के लिए कुछ नहीं करते, वरन देवताओं को फुसलाने वाले सस्ते तरीके ढूँढ़ने और उतने भर से ही लंबी-चौड़ी आशाएँ लगाए रहते हैं।
साधना उसी की मनुहार है। यह मान्यता आंशिक रूप से ही सत्य है। दुकानदार माँगने से ही कोई वस्तु निकालकर दिखाता और देता है। न माँगने पर तो वह देना तो दूर, कुछ बताएगा तक नहीं। प्रार्थना को अपनी आवश्यकता की अभिव्यक्ति कह सकते हैं।
साधना से सिद्धि का सिद्धांत शाश्वत सत्य की तरह स्पष्ट है। न उसमें संदेह की गुंजाइश है, न विवाद की। अड़चन साधना का स्वरूप और उद्देश्य समझने भर की है। यदि उसे पात्रता का,समर्थता का और व्यक्तित्व का परिष्कार माना जाए, उसी दृष्टि से उस महाप्रयास में निरत हुआ जाए तो ऐतिहासिक एवं विद्यमान अध्यात्मवादियों की तरह हर कोई अपने स्तर को क्रमशः अधिकाधिक ऊँचा उठा सकता है। इतना ऊँचा जिसकी गरिमा को हिमालय से कम नहीं, वरन अधिक ही उत्तुंग, समुन्नत एवं समृद्ध कहा जा सके।
साधनाओं या भौतिक उपायों और उपचारों क्षरा जागृत किया जा सकता है। ऐसी अनेक घटनाएँ आए दिन सामने आती रहती हैं जिनके आधार पर चेतन की स्वतंत्र सत्ता, ब्रह्माण्डव्यापी, चेतन जगत और अतींद्रिय सामर्थ्य प्रमाणित होती है।
साधना से सिद्धि मिलने का माहात्म्य बताया जाता है, वह
जीवन देवता की अभ्यर्थना ही है। परब्रह्म की प्रसन्नता के लिए उसकी
मर्यादाओं का पालन करने भर से काम चल जाता है, किंतु अंतरात्मा में
विद्यमान दिव्य ज्योति को प्रखर बनाने के लिए विशेष रूप से पुरुषार्थ करने
होते हैं और वही साधना कहलाती है।
साधना चेतना-क्षेत्र का ऐसा व्यवसाय है,
जिसमें पुरुषार्थ की तुलना में लाभ की मात्रा अत्यधिक है। पूँजी, परिश्रम
और अनुभव के आधार पर संसार के सभी व्यवसाय चलते हैं और परिस्थिति के अनुरूप
उनसे लाभ भी मिलता है। साधना का व्यवसाय इन सबसे सरल और फलप्रद है। उसमें न
बाहर की सहायता अपेक्षित होती है, न साधन जुटाने पड़ते हैं और न
परिस्थितियों के अनुकूलन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। अपने आप को समझा लेने
और सुधार लेने भर से वह प्रयोजन पूरा हो जाता है, जिसमें लाभ ही लाभ है।
साधना किसकी? इसका
उत्तर है— जीवन की। जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है जो उसकी जितनी सदुपयोग साधना कर लेता है, वह उतना ही कृतकृत्य बनता है। जीवन का मूल्य महत्त्व और उपयोग न समझना ही वह अभिशाप है।
जिसके कारण गई-बीती परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़ते हैं।
साधना में अदृश्य शक्तियों की सिद्धियों की उपलब्धि का प्रतिपादन गलत नहीं है। ईश्वर का अनुग्रह सृष्टि के हर घटक पर अनादिकाल से बरसता रहा है और अनंतकाल तक बरसता रहेगा। उसे न्यून या अधिक मात्रा में प्राप्त कर सकना अपने स्तर के अनुरूप ही हो सकता हैं। संसार में आहार के विपुल भंडार भरे पड़े हैं। उन्हें प्राप्त करने की सभी को सुविधा है, किंतु चींटी अपने स्तर की अपनी मात्रा में सामग्री प्राप्त करती है और हाथी को अपने काम के पदार्थ अपनी आवश्यकतानुसार मिलते रहते हैं।
साधना है। इसके लिए
जीवन के बहिरंग को व्यवस्थित और अंतरंग को परिष्कृत करना होता है।
परिष्कृति को योग और व्यवस्थिति को तप कहते हैं। साधना के यही दो क्षेत्र
हैं। बहिरंग को सभ्यता की मर्यादा में करना होता हैं और अंतरंग को संस्कृत
बनाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है।
साधना कहलाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-May
साधना का विज्ञान हैं। कुंडलिनी को ताँत्रिकी वाममार्गी-भौतिकी कहा जाता है। एक ज्ञान की देवी हैं दूसरी विज्ञान की आद्यशक्ति गायत्री इन दोनों की अधिष्ठात्री है।
साधना के अविच्छिन्न अंग बलिवैश्व में की पाँच आहुतियाँ नित्य देने की विधि परम्परा में इन्हीं पंचशीलों को धारण करने और उन्हें निष्ठापूर्वक अपनाये रहने का संकल्प दुहराया जाता है।
साधना और युग चेतना से अवगत कराना अपेक्षाकृत अधिक सरल रहेगा। नये स्थानों पर इस रुचि के व्यक्तियों को खोजने में नये स्थानों पर इस रुचि के व्यक्तियों को खोजने में नये सिरे से प्रयत्न करने पड़ेंगे।
साधना एवं शिक्षण की समुचित व्यवस्था। इस क्रमबद्ध साधना सत्र प्रक्रिया भी कह सकते है।
साधना के रूप में विकसित किया जिसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों का समान समन्वय है।
साधना भी नहीं है कि मेघमाला को आमंत्रित करने एवं बुला सकने में सफल हो सके। बादल ही अपनी सहज करुणा से अपने पैरों चलकर-अपने कन्धों पर जल राशि लाद कर खेतों तक पहुँचते है और आवश्यकता से अधिक जल देकर उन्हें तृप्त करते है। संसार में छाये हुए शीत को निवारण करने के लिए धरती सूर्य के समीप नहीं पहुँच सकती। सूर्य ही उसकी आवश्यकता समझकर स्वयं उस पर अपना तेजस बखेरते है। रात्रि के अन्धकार की व्यापकता कैसे मिटे?
साधना ही आगंतुकों को पुण्य फल प्रदान करती थी जिसकी संगति तीर्थ माहात्म्य के साथ पूरी तरह बैठ जाती है।
साधना करें। इसे महन्त मैनेजर जैसा पद न समझा जाय। यश, मान, वैभव, सुविधा एवं अहंता की तृप्ति का इसे सरल माध्यम समझ कर कोई इस स्थान को न अपनाये। तीर्थ सेवन एक विशुद्ध तप है। इसी तप साधना का आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण से भरा पूरा यह अति महत्वपूर्ण स्वरूप है।
साधना सूत्रों का प्रबन्ध करना चाहिए जिससे आगंतुकों को एक साथ उपरोक्त सभी लाभ मिल सकें। संयुक्त प्रयत्नों से ही तीर्थों का महत्व बढ़ सकता है। इस अभिवृद्धि को हर दृष्टि से श्रेयस्कर ही माना जायगा।
साधना करनी हो तो भी उसमें दो सौ साधक एक साथ बैठ सकें। इतनी जनता का छोटी ज्ञान-गोष्ठियों का-कथा प्रवचनों का उद्देश्य इस देवालय भाग से पूरा हो सकेगा।
साधना का एक अंश इन अन्नदाताओं को भी मिलेगा। इन प्रचलित मान्यताओं में यदि कुछ सत्य और तथ्य हो तो तीर्थ निर्माण का पुण्य इस सबसे अधिक ही माना जायगा। इन धर्म संस्थानों से जो धर्म चेतना उत्पन्न होगी उस उत्पादन में इन पुण्यात्माओं का एक बड़ा भाग होगा जिनने इस सृजन में सहयोग दिया है।
साधनाओं में ही रुचि सनकों को भी रहती है। व्यक्तिगत संपर्क की ललक ही कुछ ऊँचे क्षेत्र में चलकर निजी सिद्धियों के रूप में अपना मुखौटा बदल लेती है। स्वर्ग और मुक्ति को स्वार्थपरता का थोड़ा ऊँचा स्तर कह सकते है। सेठ और सन्त की प्रवृत्ति प्रायः एक ही दिशा में बहती देखी जा सकती है। आत्म साधन का यह स्वरूप न तो वास्तविक है और न उच्चस्तरीय।
साधना उन्हें भी करनी होगी जो तीर्थ संचालक की साधना करें। इसे महन्त मैनेजर जैसा पद न समझा जाय। यश, मान, वैभव, सुविधा एवं अहंता की तृप्ति का इसे सरल माध्यम समझ कर कोई इस स्थान को न अपनाये। तीर्थ सेवन एक विशुद्ध तप है। इसी तप साधना का आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण से भरा पूरा यह अति महत्वपूर्ण स्वरूप है।
साधना के साथ जुड़ा हुआ गंगावतरण कह सकते है। अभी वह कल्पना के गर्भ में है। इन दिनों उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली सम्भावना और प्रतिक्रिया का सुखद अनुमान ही लगाया जा सकता है, पर जब भी वह मूर्ति रूप में सामने होगी तो प्रतीत होगा कि मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के संदर्भ में जो सोचा-कहा और किया जा रहा था वह अनर्गल नहीं था।
साधना सम्पन्नों का दरवाजा खटखटाते हुए पहुँचने की स्थिति में नहीं होते। उदार, व्यक्तियों को ही अपनी सहज करुणा से प्रेरित होकर उन पीड़ितों की सहायता करने पहुँचना पड़ता है और अपने श्रम, सौहार्द्र एवं साधनों की सहायता से उन्हें ही आगे बढ़कर पीड़ितों का कष्ट हलका करना पड़ता है। तीर्थ यात्रा को ठीक इसी स्तर की परम्परा कहा जा सकता है जिसमें जन-जन तक घर-घर तक पहुँचने का प्रयत्न सद्भावना सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा जब तब नहीं वरन् सुनियोजित रीति से किया जाता है।
साधना का तो सर्वोत्तम सुअवसर है ही; गृह निवृत्त लोगों के लिए यह उपयुक्त अवसर है अभी एकाकी व्यक्ति ही लिए जायेंगे पर जिनकी गृहणी शारीरिक दृष्टि से समर्थ होंगी और तीर्थ प्रयोजन में कुछ हाथ बटा सकेंगी उन्हें पत्नी समेत भी रहने की स्वीकृति मिल जायगी। बच्चे किसी भी स्थिति में साथ नहीं रह सकेंगे।
साधनाओं की सफलता से जो पाँच विभूतियाँ उपलब्ध होती है, उन्हीं को देव संज्ञा दी गई है। पाँच देवता प्रसिद्ध हैं। उन्हीं की शक्तियों को देवियाँ कहते है। देव और देवियों में पाँच-पाँच ही प्रधान हैं। इन्हें सावित्री के पाँच मुख कह सकते हैं।
साधना सत्र प्रक्रिया भी कह सकते है।
साधना कह सकते है। लोभ और मोह से जिन्हें निवृत्ति मिल चुकी हो-परिवार के उत्तरदायित्वों से जो निश्चिंत हो चुके हो उनके लिए इस परमार्थ द्वार में प्रवेश करने का खुला अवसर है।
साधना व्रत लेते हैं और उस तपश्चर्या को ‘कल्प वास’ कहते है। प्राचीन काल में तीर्थ ऐसे आध्यात्मिक सेनेटोरियम थे जहाँ आत्मिक विश्रान्ति पाने एवं उद्विग्नताओं का समाधान करने में सहायता मिलती थी। वहाँ ऋषियों के आरण्यक रहते थे तीर्थ सेवन के लिए आने वाले वहाँ कुछ समय ठहर कर जीवन क्रम पर नये सिरे से विचार करते और आरण्यक संचालक ऋषियों से अपनी समस्याओं के समाधान तथा उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में आवश्यक परामर्श-प्रकाश प्राप्त करते थे। दूर हटकर देखने पर विस्तृत क्षेत्र दीखता है। जीवन की उलझनों की समीक्षा करने के लिए भी कुछ दूर पहुँचने पर निष्पक्ष समीक्षा कर सकना अधिक सरल पड़ता है।
साधना का प्रतिफल प्राप्त करते है।
साधनाओं में, तपश्चर्याओं में, धर्मानुष्ठानों में महत्वपूर्ण स्थान तीर्थयात्रा का भी है। यह इसलिए कि विचाराधीन धर्मज्ञ जन-जन धर्म धारणा जागृत रखने के लिए गाँव-गाँव पहुँचते घर-घर जाते और अलख जगाते वर्ग के लोग अपनी निर्वाह समस्याओं में ही उलझें रहते है उन्हें धर्म, दर्शन अध्यात्म जैसी उच्चस्तरीय अनुभूतियों के साथ संपर्क मिलाने की इच्छा ही नहीं होती। इच्छा हो तो अवसर नहीं मिलता। नगरों से दूर छोटे देहातों में प्रायः हर तरह के साधनों का अभाव रहता है। ऐसी दशा में उनकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति इस योग्य नहीं रहती कि वे जीवन लक्ष्य को समझने और उसे उपलब्ध करने के लिए उपयुक्त प्रकाश प्राप्त कर सकें।
साधना विज्ञान है। ब्रह्म विद्या इसी को कहते है। इस प्रयोजन के लिए बनाये गये अनेकानेक उपाय-उपचारों को धर्म कुकृत्यों के रूप में विनिर्मित किया गया है।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा के द्वारा सर्वतोमुखी आत्म-विकास के लिए प्रोत्साहन तथा मार्गदर्शन देना। (4) दो परिव्राजकों के एक जत्थे का प्रतिदिन दो गाँवों में जाना। विचारशील लोगों से संपर्क बनाना। नवयुग के संदेशों से अवगत करना और तदनुरूप ढलने की प्रेरणा देना। (5) जन्म-दिन मनाने का उत्साह उत्पन्न करके व्यक्ति निर्माण की-संस्कार प्रचलन से परिवार निर्माण की-पर्व त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाकर समाज निर्माण की चेतना उत्पन्न करना।
साधना में तपस्वी योगी की तरह एक निष्ठा भाव से लगे रहने के लिए कहा गया है। वह उसी उत्तरदायित्व को शपथपूर्वक निभायेंगे भी।
साधना सत्रों के लिए जो आश्रम बनेंगे, वे कोलाहल से दूर एकान्त शान्त प्रकृति सान्निध्य वाले स्थानों में होंगे। वहाँ उसी प्रकार के साधना सत्र चला करेंगे जैसे कि ब्रह्म-वर्चस शांतिकुंज में चलते हैं। उस क्षेत्र के साधकों, जिज्ञासुओं-सृजन शिल्पियों के लिए उपयुक्त वातावरण में रह कर साधना करने और जीवन निर्माण तथा लोक-कल्याण की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता रहे। जहाँ सम्भव होगा इनमें तो यात्रियों के ठहरने की सुविधा भी रखी जायगी। यह आश्रम कहे जायेंगे और एक मंजिलें ही होंगे।
साधना (6) रात्रि को किसी गाँव में रुक कर वहीं रामायण, गीता आदि की कथा कहना और धर्म चेतना उत्पन्न करना (7) पन्द्रह दिन का गति चक्र बना कर हर दिन दो गाँवों में जाने के क्रम से तीस गाँवों का एक मण्डल बनाना और उसे अपनी मण्डलीय कार्य क्षेत्र मानकर विचार-क्रान्ति के लिए पथ प्रशस्त करना (8) अपने क्षेत्र में चलपुस्तकालयों की व्यवस्था बढ़ाना (9) प्रौढ़ शिक्षा, नशा निवारण, वृक्षारोपण, श्रमदान, व्यायामशाला, स्वच्छता सहकारिता, कुप्रथाओं, अन्धमान्यताओं का और अनैतिकताओं का उन्मूलन, जैसे रचनात्मक प्रयत्नों में स्वयं लगना दूसरों को लगाना। (10) कर्मक्षेत्र में चल रही सरकारी गैर सरकारी सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने के लिए जन सहयोग जुटाना।
साधना सत्र। प्रथम चरण में जन-संपर्क वाले देवालय बन रहे हैं। इन्हें ऐसे जन-संकुल वाले संकुल वाले साधन स्थानों में बनाया जा रहा है। जहाँ यात्रियों का सहज स्वभाव आवागमन होता हो। इमारतें विस्तार में छोटी होते हुए भी तीन मंजिली बनाई जा रही हैं उनके मुख कलेवर-ऐलीवेशन-ऐसे रखे जा रहे हैं, जो उधर से निकलने वाले को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर सकें और उसकी भव्यता को देख कर हर किसी का उसे देखने-भीतर प्रवेश करने का मन हो।
साधना प्रक्रिया थी जहाँ वे रुकते थे उनके लिए सौभाग्य सुअवसर जैसी दैवी अनुकम्पा। इसी भावनात्मक तालमेल के कारण तीर्थयात्रा प्रक्रिया का धर्म प्रवाह सर्वत्र बहता था और उससे नदी सरोवरों से भी अधिक मात्रा में जन-जन को लाभान्वित होने क अवसर मिलता था।
साधना का विशालकाय ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है कि उसके आलोक में मनुष्य प्रगति पथ पर अग्रसर हो सके। अपनी चेतना को-व्यक्तित्व की सत्ता को उच्चस्तरीय बना सके। कहना न होगा कि वैयक्तिक सुख−शांति और सामाजिक सुविधा सुरक्षा के समस्त आधार इसी केन्द्र बिन्दु पर निर्भर है।
साधना सत्र चला करेंगे जैसे कि ब्रह्म-वर्चस शांतिकुंज में चलते हैं। उस क्षेत्र के साधकों, जिज्ञासुओं-सृजन शिल्पियों के लिए उपयुक्त वातावरण में रह कर साधना करने और जीवन निर्माण तथा लोक-कल्याण की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता रहे। जहाँ सम्भव होगा इनमें तो यात्रियों के ठहरने की सुविधा भी रखी जायगी। यह आश्रम कहे जायेंगे और एक मंजिलें ही होंगे। उनमें भव्यता आवश्यक नहीं।
साधना के लिए नियत करेंगे। दो परिव्राजक इस क्षेत्र में नव-जागरण की सचेतनता उत्पन्न करने के लिए परिभ्रमण करते रहेंगे। तीन स्थानीय गतिविधियों को सुनियोजित रखते में संलग्न रहेंगे। कहना न होगा कि प्रशिक्षित परिव्राजकों की सेवा साधना से उससे समूचे क्षेत्र में धर्म चेतना की कृषि कुछ ही दिनों में लहलहाती हुई दिखाई देगी।
साधना, आत्म-संयम, चरित्र-निष्ठा; आदर्शवादिता, तप-तितीक्षा जैसे व्यक्ति का गौरव बढ़ाने वाले और समाज को समुन्नत बनाने वाले समस्त प्रयोजन वस्तुतः धर्म श्रद्धा के ही रूपांतरण हैं। यह चेतना जिस भी क्षेत्र में प्रयुक्त होती है वहीं मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले महान कार्य रच कर खड़ा कर देती है। यह तत्व जहाँ भी है उसे रत्न राशि से स्वर्ण खदान से बढ़कर बहूमूल्य माना जय। उसे अन्ध श्रद्धा से टकराकर चूर-च्र होने और उसके टुकड़े से बचाया ही जाना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब उसे दूसरी उपयोगी दिशा मिले।
साधना हीन परिस्थितियों में भी किस प्रकार उगते-बढ़ते और फलते-फूलते है, इसके अनेक उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर अंकित है। उस श्रृंखला में नवयुग के अवतरण के लक्ष्य रख कर किये गये प्रयास को अपने समय का दुस्साहस ही कहा जायगा। इसकी उपमा खोजनी हो तो समुद्र पाटने के लिए प्राणपण से सन्निद्ध टिटहरी से अथवा सागर को पाटने में प्रवृत्त गिलहरी से ही दी जा सकती है। सेतुबन्ध बाँध जाने जैसे सहज बुद्धि द्वारा असंभव घोषित किये जाने वाले कार्य को संभव बनाने के लिए रीछ बानरों ने प्राणों की बाजी लगाई थी। साधन हीन क्या कर सकते है इसके लिए उनके लिए इतना ही संभव था कि लकड़ी पत्थर जमा करने में श्रम लगायें।
साधनात्मक अवलम्बन, ग्रहण करने के लिए उपयुक्त मार्ग क्या हो सकता है। बिखराव का केंद्रीकरण करने की दिशा में यह एक अति महत्वपूर्ण शुभारम्भ है। उपासना से आगे चलकर जीवन क्षेत्र की अन्यान्य मान्यताओं एवं गतिविधियों का भी सार्वभौम स्वरूप बन सकेगा, इस पर विश्वास करने के लिए पर्याप्त कारण एवं तथ्य मौजूद है।
साधना करने का स्थान-अतिथि कक्ष-पाँच परिव्राजकों के रहने की निवास व्यवस्था-साहित्य स्टाल, पुस्तकालय जैसी प्रवृत्तियों को देखते हुए इससे कम में काम चलना कठिन था। सो न्यूनतम आवश्यकता और सस्तेपन की हरमद को पूरी तरह ध्यान में रखने हुए योजना बनाई गई है।
साधना में निरत रहते थे।
साधना का आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण से भरा पूरा यह अति महत्वपूर्ण स्वरूप है। इसमें आत्मसंतोष और ईश्वरीय आग्रह के दोनों तत्व समान मात्रा में भरे पड़े है। अपने युग की इसे सर्वोत्तम साधना कह सकते है। लोभ और मोह से जिन्हें निवृत्ति मिल चुकी हो-परिवार के उत्तरदायित्वों से जो निश्चिंत हो चुके हो उनके लिए इस परमार्थ द्वार में प्रवेश करने का खुला अवसर है।
साधना से उससे समूचे क्षेत्र में धर्म चेतना की कृषि कुछ ही दिनों में लहलहाती हुई दिखाई देगी।
साधना और उस आलोक से लोक श्रद्धा को प्रभावित करना रहा है। यह प्रयोजन जहाँ से, जिस प्रकार, जिस सीमा तक पूरा होता है, उसी अनुपात से उसे जीवन्त कह सकते है। अन्यथा मात्र देव प्रतिमाओं को अलग-अलग स्थापित करते फिरने और वहाँ पूजा पत्री भर की चिन्ह पूजा होते रहने से उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती, जिसके लिए इस महान स्थापना के लिए ऋषियों ने अपनी दूरदर्शिता एवं प्रखर प्रयत्नशीलता का प्रयोग किया था।
साधनाएँ है। बृहस्पति ने देव समुदाय के पाँच कोशों का अनावरण कराया था। यह वैदिक पक्ष है। इन साधनाओं की सफलता से जो पाँच विभूतियाँ उपलब्ध होती है, उन्हीं को देव संज्ञा दी गई है। पाँच देवता प्रसिद्ध हैं।
साधना करने और जीवन निर्माण तथा लोक-कल्याण की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता रहे। जहाँ सम्भव होगा इनमें तो यात्रियों के ठहरने की सुविधा भी रखी जायगी। यह आश्रम कहे जायेंगे और एक मंजिलें ही होंगे। उनमें भव्यता आवश्यक नहीं। कुटिया बनाने में भी काम चल सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1979-February
साधना। जन मानस में श्रम रूपी देवता के प्रति निष्ठा की प्रतिष्ठा से ही सामाजिक उन्नति एवं भौतिक समृद्धि सम्भव है।
साधना का प्रचार करे, संयोग की बात कि एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आ कर इस कार्य को संगठन बद्ध प्रचार करने का प्रस्ताव रखा। इसके बाद चार्ल्स फिल्मोर कसाँस शहर चले गये। वहाँ के लोगों ने जिस स्थान पर कार्यालय खोलने की बात कही वह स्थान यो तो चार्ल्स के लिए अपरिचित था परन्तु उन्होंने पाया कि स्वप्न में जिस स्थान को उन्होंने देखा था यह वही स्थान है उसी स्थान पर सोसायटी ऑफ सायलेण्ट यूनिटि नामक संस्था की स्थापना की। संस्था की ओर से जो समाचार पत्र निकाला गया उसका प्रथम अक्षर ‘यू’ ही था और अखबार का नाम ‘यूनिटि’ रखा गया। बाद में और भी पत्र पत्रिकायें वहाँ से छपी।
साधना-उपासक द्वारा अपनी आन्तरिक क्षमताएँ विकसित-परिष्कृत करली जाती है, तो ईश्वरीय सत्ता की प्रतिपल अनुभूति स्वाभाविक हो जाती है। जैसे दूरदर्शन यंत्र से दिन में तारे देखे जा सकते हैं उसी प्रकार तब साँसारिक भागदौड़ के बीच भी आत्म सत्ता का दर्शन-स्मरण होता रह सकता है।
साधना का सही और नया मार्ग प्रकाशित किया।
साधना को भी प्रखरतम बनाती है तथा व्यक्ति का स्तर दिनों-दिन उच्च से उच्चतर और उच्चतम की और बढ़ता है।
साधना - उपासना द्वारा अपनी मलीनताओं तथा विकृतियां का शोधन करके भी इस प्रकार की आत्मिक प्रखरता उत्पन्न करते है और स्वप्नों के माध्यम से, ऐसे संकेत प्राप्त करते है जो आत्मतत्व की खोज में सहायक होते है अथवा आत्मसत्ता के अस्तित्व की पुष्टि करते है।
साधना का आनन्द तो मात्र उन्हें ही मिलता है जो साधु ब्राह्मण की पुण्य परम्परा के अनुरूप अपना जीवन क्रम उदार परमार्थ परायणता के रंग में रंगे रहते हैं।
साधना करते हो उसमें अहं की भावना होती है, जबकि राजमहिषी समर्पण के भाव से अर्चना करती है। जिसने अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दिया उसके पास अहं कहां बचा? और जहां अहं मिट जाता है वहां ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं रह जाता।’’
साधना अथवा उपासना उस विभेद को दूर करने के लिए ही की जाती है। चित्त की एकाग्रता के महत्व को समझाते हुए आचार्य बिनोवा भावे ने लिखा है कि-”उपासना ही क्यों जीवन व्यवहार के किसी भी क्षेत्र में चित्त की एकाग्रता अत्यन्त आवश्यक है। व्यवहार ही .... परमार्थ चित्त की एकाग्रता के बिना उसमें सफलता मिलना कठिन ही है।
साधना संपन्न करते रहते है। व्यवहार शोधन और सद्विचारों के बाद अभ्यास से जब चित्त स्थिर हो जाता है तो व्यक्ति सभी प्रकार की मानसिक दुश्चिंताओं पीड़ाओं आदि पर नियंत्रण रखने में सफल हो जाता है।
साधना क्षेत्र में हमारी प्रगति किस गति से हो रही है। स्वप्नों के संकेत यदि समझना सम्भव हो सके तो न केवल आत्मिक स्थिति का स्तर मालूम किया जा सकता है वरन् उसके माध्यम से सूक्ष्म को समझ पाना तथा उसके साथ ताल मेल बिठाना भी सम्भव हो सकता है। प्रश्नोपनिषद् में महर्षि ने निद्रा को इसीलिए यज्ञ कहा है कि उस अवस्था में चेतना के अन्तर्मुख होने की सम्भावना भी रहती है। अन्यथा निद्रा आलस्य प्रमाद की तामसिक वृत्ति भी हो सकती है।
साधना जैसे उच्चस्तरीय कार्यों में मस्तिष्क के रहने से उन चिन्ताओं का दबाव सहज ही घट जाता है जो बुढ़ापे को आवश्यकता से अधिक कष्टकारण बना देती हैं।
साधना, ध्यान- अभ्यास और आत्मिक व्यायामों द्वारा हो अथवा पूर्व जन्मों के संस्कारों के परिणाम स्वरूप जब व्यक्ति का आत्मिक स्तर इतना ऊंचा उठ जाता हे कि उसका मन आत्मा की सन्निधि में पहुँच जाय तो वह इस स्तर की अनुभूतियाँ स्वप्नों के माध्यम से प्राप्त करता है। उपचेतन मन ऐसे स्वप्न संकेत ही पकड़ता है जिनसे किसी का भला होता हो अथवा अपना पवित्र साध्य भी पवित्र साधनों से सधता हो। स्वप्नों के माध्यम से आज तक न तो किसी को अनीति अपनाने अथवा अवाँछनीय लाभ उठाने के संकेत मिले है अथवा न किसी को पहुँचाने की ही प्रेरणा मिली है। ऐसे उदाहरण अवश्य मिलते है जिनमें व्यक्ति के अपने सौभाग्य उदय में आर हे अवरोधों को हटाने की प्रेरणा मिली हो।
साधना क्षेत्र में आत्मिक प्रगति की कितनी मंजिल पार कर ली गयी है इसका पता भी स्वप्नों से लगाया जा सकता है पुराणों और आर्ष-ग्रन्थों में इस प्रकार के कई स्वप्नों का उल्लेख आता है जिनसे यह पता चलता है कि साधना क्षेत्र में हमारी प्रगति किस गति से हो रही है। स्वप्नों के संकेत यदि समझना सम्भव हो सके तो न केवल आत्मिक स्थिति का स्तर मालूम किया जा सकता है वरन् उसके माध्यम से सूक्ष्म को समझ पाना तथा उसके साथ ताल मेल बिठाना भी सम्भव हो सकता है। प्रश्नोपनिषद् में महर्षि ने निद्रा को इसीलिए यज्ञ कहा है कि उस अवस्था में चेतना के अन्तर्मुख होने की सम्भावना भी रहती है। अन्यथा निद्रा आलस्य प्रमाद की तामसिक वृत्ति भी हो सकती है।
साधना उपासना द्वारा अपनी चेतना का परिष्कार, मलीनताओं का निवारण तथा आत्मशोधन के द्वारा अपने व्यक्तित्व का परिपाक करना पड़ता है जिस समय चेतना पूर्णतः निर्मल, शुद्ध हो जाती है उस समय आत्मसत्ता-परमात्मसत्ता का उसी प्रकार अनुभव किया जा सकता है, जिस प्रकार कि सामने बैठे हुए व्यक्ति या रखी हुई वस्तु का।
साधना की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए कहा है कि ‘‘सात्विक श्रद्धा धेनु सहाई।’’ सात्विक श्रद्धा ही सुंदर गाय है। यह गाय ‘जप, तप, व्रत जम नियम अपारा’ यानी यम-नियम, जप-तप आदि चारा ही खाती है। यह चारा हरा हो, उसमें जीवन हो, प्राण हो, जीवंत संवेदनायें उन्हें प्राणवान बने रहे हैं।
साधना का अभ्यास करते और लोगों से भी कराते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि एक अपरिचित व्यक्ति उन्हें अपने पीछे - पीछे आने का संकेत कर रहा है। वे उसके पीछे -पीछे चल पड़े और कसाँस नगर पहुँच गये। फिर वह व्यक्ति उन्हें ऐसे स्थान पर ले गया जो उनके लिए अपरिचित था। वहाँ उसने चार्ल्स के हाथ में एक समाचार पत्र दिया जिसका पहला अक्षर ‘यू’ ही वे पढ़ पाये थे कि एक के बाद एक अनेक समाचार पत्र उनके हाथों में आते गये।
साधना में लगा हुआ हूं। मुझे तो यह सिद्धि मिली नहीं। उदयानी किस प्रकार इतनी जल्दी इस अवस्था में पहुंच गयी? यह विचार अंबरीष को और भी खिन्न और उदास करने लगा। धर्म-कर्म में उनकी रुचि भी कम होने लगी।
साधना में जीवन बिताने लगे।
साधना के श्रद्धा बांझ ही रही आती है।
साधना मार्ग में अधिक प्रगति कर चुकी है। उसके मुखमंडल पर अभूतपूर्व दीप्ति, दिव्य-शांति और दैवीय आभा दिखाई देने लगी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उदयानी भाव समाधि की स्थिति में जा पहुंची हैं।
साधना आवश्यक है। बिना साधना के श्रद्धा बांझ ही रही आती है।
साधना नहीं की थी, अतः यह अनुभूति पूर्वजन्म की साधना का ही फल थी यह बात उन्होंने स्वयं कहीं है।
साधना का ही फल थी यह बात उन्होंने स्वयं कहीं है।
साधना एवं सद्ज्ञान द्वारा ही देखा-समझा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-June
साधना का उद्देश्य है। ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि का वर्णन हठयोग की विवेचना में किया जाता है। ब्रह्मवर्चस् की बन्ध साधना में इन्हीं तीनों को खोलने का विधान है। मूलबन्ध, जालन्धर बन्ध और उड्डियन बन्धों की साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती हैं। इसीलिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।
साधना से अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त करने वालों का इतिहास आदि से अन्त तक एक ही तथ्य प्रमाणित करता है कि उन्होंने आवश्यक तपश्चर्या करके अपनी पात्रता विकसित की, फलतः उन्हें विभूतियों, सिद्धियों से लाभान्वित होने का अवसर मिला। महामानवों से लेकर ऋषि-महर्षियों तक की सफलताएँ पूर्णतया उनकी तप-साधना पर निर्भर रही हैं। मंत्राराधन जादूगरी नहीं है। उसके पीछे प्रचण्ड तपश्चर्या की शक्ति ही चमत्कार प्रस्तुत करती है। साधक की पात्रता का विकास जिस अनुपात से होता है, उसी क्रम में उसका वर्चस्व बढ़ता जाता है और दैवी अनुदान-वरदानों से वह निहाल होता जाता है।
साधनाओं में लगाने की बात करता रहता था। उसकी यही बातें प्रोफेसर वाँन श्लेगल की पत्नी को नागवार गुजरती थीं। वह सोचती कहीं ऐसा न हो कि श्वेरिन के साथ बँधकर उसकी इकलौती संतान कार्सिका की जिन्दगी भी जीवन के सारे सुखों से मरहूम हो जाए।
साधना पंचमुखी है। उसके प्राण रूपी प्रकरण पाँच-पाँच सोपानों बँटे हुए हैं। तप−साधना वाला प्रकरण भी पाँच भागों में विभक्त है। पाँच तत्वों से बना हुआ काय-कलेवर, पाँच प्राणों से बने हुए चेतना-संस्थान पाँच प्राणों से बने हुए चेतना-संस्थान भी पाँच प्रकार की तपश्चर्याओं से परिष्कृत, परिमार्जित होते हैं। गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएँ-(1) उपवास, (2) ब्रह्मचर्य, (3) मौन, (4) तितीक्षा और (5) अनुदान-इन पाँच नामों से प्रसिद्ध हैं।
साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती हैं। इसीलिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।
साधना में शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा तथा उनमनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण मुद्रा तथा उन्मनी मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक, निष्प्राण, मूर्छित, निद्रित, निःचेष्ट स्थिति में किसी आरामकुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका दिया जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानी शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत या हलचल नहीं हो रही है।
साधना पर निर्भर रही हैं। मंत्राराधन जादूगरी नहीं है। उसके पीछे प्रचण्ड तपश्चर्या की शक्ति ही चमत्कार प्रस्तुत करती है। साधक की पात्रता का विकास जिस अनुपात से होता है, उसी क्रम में उसका वर्चस्व बढ़ता जाता है और दैवी अनुदान-वरदानों से वह निहाल होता जाता है।
साधना के ऐसे विषय पर दिये जा रहे हैं जो प्रायः उपेक्षित रहता है।
साधना एवं भावभरी परमार्थ-परायणता।
साधना द्वारा किया जाता है।
साधना का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा ही यह प्रेरणा देता है कि प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न की जाय। ऊपर उठने के लिए, आगे बढ़ने के लिए सर्वत्र ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। वायुयान को या राकेट को आकाश में फेंकना हो या पानी को नीचे से ऊपर की ओर खींचना हो तो साधन और सामर्थ्य दोनों को ही जुटाना पड़ता है। जीवन को ऊँचा उठाना हो, आगे बढ़ाना हो तो भी समर्थता उत्पन्न करनी होगी और यह ऊर्जा तपश्चर्या के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती। तपश्चर्या के बिना उत्पन्न नहीं हो सकती।
साधना में (1) बिन्दुयोग-त्राटक (2) प्राणयोग-सूर्यवेधन प्राणायाम (3) कुण्डलिनी योग-शक्ति चालिनी मुद्रा व साधना (4) लययोग-खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग, सोऽहम् साधना का विस्तार से विवेचन परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन में किया है। इस समन्वय को उनने यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गयी कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या नाम भी दिया है। इस लेख में प्रारम्भिक दो साधनाओं का वर्णन हैं।
साधना, उपासना, तपश्चर्या एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्वतोभावेन संलग्न होंगी। साथ ही सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जाग्रत होगा कि वे अन्धकार और प्रकाश का अन्तर समझ सकें। अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़कर इन आंदोलनों द्वारा प्रतिपादित न्याय और विवेक के उचित पक्ष को स्वीकार कर सके। इस प्रकार उभयपक्षीय सुयोग-संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाता चला जाएगा, जो युगपरिवर्तन का मूलभूत आधार है।
साधना में इसी का अभ्यास कराया जाता है। साधक अपने भीतर प्राणतत्व की अभिवृद्धि का अनुभव करता है। इस प्रक्रिया के द्वारा उपार्जित प्राणसम्पदा साधक की बहुमूल्य सम्पत्ति होती है। इस पूँजी को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। इसे बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्र का सामर्थ्य उत्पादक प्रयोग कह सकते हैं।
साधना-प्रयास में केवल आदत डालने, नियमितता अपनाने एवं रुचि उत्पन्न करने जितना ही लक्ष्य रहता है। इसलिए उपासना में चंचल-चित्त को एक नियत विधि-व्यवस्था में लगाए रहने वाली मनोरंजन विधियाँ उपयुक्त रहती हैं। शंकरजी पर विल्वपत्र चढ़ाना, अभिषेक करना, परिक्रमा करना, धूप-दीप से गायत्री माता की मूर्ति अथवा चित्र का पंचोपचार, षोडशोपचार पूजन करना आदि क्रियाएँ इसी स्तर की हैं। विभिन्न धर्मग्रन्थों-बाइबिल, रामायण, गीता का पाठ, देवी-देवताओं के स्तवन, मंत्रजप आदि शारीरिक हलचलों के साथ की जाने वाली साधनाएँ इसी स्तर की होती है। उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है।
साधना भी टूटते दाम्पत्य को जोड़ सकती हैं। यह साधना दोनोँ ही पक्षों को करनी चाहिए।
साधना का विस्तार से विवेचन परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन में किया है। इस समन्वय को उनने यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गयी कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या नाम भी दिया है। इस लेख में प्रारम्भिक दो साधनाओं का वर्णन हैं।
साधना में घृत-दीप जलाकर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँख खोलकर देखते हैं। फिर आँखें बन्द कर लेते हैं। भ्रू-मध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाश ज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योर्तिमय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है। इस ध्यान में दीप ज्योति से सहायता मिलती है।
साधनाओं का वर्णन हैं।
साधना दोनोँ ही पक्षों को करनी चाहिए।
साधनाओं में बाधक होती हैं। उनके कारण महत्वपूर्ण साधना-विधानों के लिए किया गया भारी पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है इसीलिए तत्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए अभ्यासरत साधकों को यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनावरहित और मस्तिष्क को उत्तेजनारहित रखा जाय, ताकि उस दिव्यचेतना का अवतरण निर्बाध गति से होता हर सके।
साधनाक्रम हठयोग एवं तान्त्रिक साधनाओं के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, पर यदि कोई चाहे कि इस स्थिति में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसे लययोगपरक अभ्यास कर सके तो उसे असफलता ही मिलेगी। इस संदर्भ में बहुधा खेचरी मुद्रा, नासिकाग्र पर दृष्टि जमाना, उड्डयन बन्ध, जालन्धर बन्ध, यहाँ तक कि मंत्रोच्चारण के साथ किया गया माला जप भी व्यतिरेक उत्पन्न करता है। इन विधि-विधानों के साथ ध्यान नहीं हो सकता। क्योंकि चित्तवृत्तियों इन शरीरगत हलचलों में ही लगी रहती हैं। ऐसी दशा में एकाग्रता, स्थिरता हो तो कैसे हो?
साधना जिसमें शिशु स्तर का चान्द्रायण भी कराया जाता है, सवालक्ष गायत्री महापुरश्चरण (जप के साथ तल्लीनतापूर्वक ध्यान) के अतिरिक्त पाँच योगों के समावेश से पूरी होती है। ये साधनाएँ सरल भी हैं एवं हर परिजन इन्हें सम्पन्न कर सकता है। इनमें कोई भूल होने पर हानि की भी कोई सम्भावना नहीं है। गायत्री को पंचमुखी कहा गया है। पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी आवरण साधना में (1) बिन्दुयोग-त्राटक (2) प्राणयोग-सूर्यवेधन प्राणायाम (3) कुण्डलिनी योग-शक्ति चालिनी मुद्रा व साधना (4) लययोग-खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग, सोऽहम् साधना का विस्तार से विवेचन परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन में किया है।
साधना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। इसका अभ्यास देव प्रतिमाओं सहारे किया जा सकता है। सामान्य जीवन-क्रम में इस सम्बन्ध में अधिक अनुशासन बरतने की मर्यादाएँ बनानी और पालन करनी चाहिए।
साधना के उपयुक्त मनोभूमि का निर्माण होता है। कहना न होगा कि शिथिलीकरण एवं उन्मनी मुद्रा यह प्रयोजन बड़ी आसानी से पूरी करती है। इनके द्वारा जिस पृष्ठभूमि का निर्माण होता है, उसमें ध्यानयोग के उच्चस्तरीय स्वरूप को आसानी से अपनाया जा सकता है।
साधनाएँ इसी स्तर की होती है। उनमें रुचि उत्पन्न करने, स्वभाव का रुझान ढालने का लक्ष्य जुड़ा रहता है। आरम्भ में इस लाभ का भी अपना महत्व है, किन्तु जब ध्यानयोग की उच्च भूमिका में प्रवेश करना होता है, तो शरीरगत हलचलें बन्द करके निःचेष्ट होने की आवश्यकता पड़ती है। माँसपेशियों और नाड़ी संस्थान को जितना अधिक तनाव-रहित, शान्त रखा जा सके उतना ही लाभ मिलना है।
साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन में किया है। इस समन्वय को उनने यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गयी कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या नाम भी दिया है। इस लेख में प्रारम्भिक दो साधनाओं का वर्णन हैं।
साधना (4) लययोग-खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग, सोऽहम् साधना का विस्तार से विवेचन परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन में किया है। इस समन्वय को उनने यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गयी कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या नाम भी दिया है। इस लेख में प्रारम्भिक दो साधनाओं का वर्णन हैं।
साधना के साथ-साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा, उसी अनुपात से उसकी कार्य-क्षमता बढ़ती चली जाएगी।
साधनाओं के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, पर यदि कोई चाहे कि इस स्थिति में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसे लययोगपरक अभ्यास कर सके तो उसे असफलता ही मिलेगी। इस संदर्भ में बहुधा खेचरी मुद्रा, नासिकाग्र पर दृष्टि जमाना, उड्डयन बन्ध, जालन्धर बन्ध, यहाँ तक कि मंत्रोच्चारण के साथ किया गया माला जप भी व्यतिरेक उत्पन्न करता है। इन विधि-विधानों के साथ ध्यान नहीं हो सकता। क्योंकि चित्तवृत्तियों इन शरीरगत हलचलों में ही लगी रहती हैं। ऐसी दशा में एकाग्रता, स्थिरता हो तो कैसे हो?
साधना का नाम त्राटक है। इसके लिए प्रकाश का अवलम्बन लेना पड़ता है।
साधना वाला प्रकरण भी पाँच भागों में विभक्त है। पाँच तत्वों से बना हुआ काय-कलेवर, पाँच प्राणों से बने हुए चेतना-संस्थान पाँच प्राणों से बने हुए चेतना-संस्थान भी पाँच प्रकार की तपश्चर्याओं से परिष्कृत, परिमार्जित होते हैं। गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएँ-(1) उपवास, (2) ब्रह्मचर्य, (3) मौन, (4) तितीक्षा और (5) अनुदान-इन पाँच नामों से प्रसिद्ध हैं। साधना के साथ-साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा, उसी अनुपात से उसकी कार्य-क्षमता बढ़ती चली जाएगी।
साधना से जो दूरदर्शी, तत्वदर्शी विवेक जाग्रत होता है उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। गायत्री मन्त्र का धियः तत्व वही है। इस जागरण को आत्मजागरण की संज्ञा दी जाती है। इसे भौतिक और आत्मिक जीवन की महान उपलब्धि ही कह सकते हैं।
साधना को प्राणयोग कहते हैं। सामान्यतः इसे प्राणायाम कहते हैं। ‘लय’ और ‘ताल’ की महान शक्ति का ज्ञान सर्वसाधारण को तो नहीं होता, पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सर्वविदित होने पर भी यह सामर्थ्य कितनी प्रचण्ड है।
साधना नीति, सदाचार एवं ईश्वर भक्ति के लिए समर्पित थीं। कई सभासद उनसे ईर्ष्या करते थे, लेकिन उनके सादे, सच्चरित्र एवं सहज सन्तुष्ट जीवन में ऐसा कुछ न था जिसके आधार पर उन्हें नीचा दिखाया जा सके। आज भी जब दरबार में चापलूसों का बड़बोलापन गूँज रहा था, तब भी वे मौन बने रहे।
साधनाएँ सरल भी हैं एवं हर परिजन इन्हें सम्पन्न कर सकता है। इनमें कोई भूल होने पर हानि की भी कोई सम्भावना नहीं है। गायत्री को पंचमुखी कहा गया है। पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी आवरण साधना में (1) बिन्दुयोग-त्राटक (2) प्राणयोग-सूर्यवेधन प्राणायाम (3) कुण्डलिनी योग-शक्ति चालिनी मुद्रा व साधना (4) लययोग-खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग, सोऽहम् साधना का विस्तार से विवेचन परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन में किया है। इस समन्वय को उनने यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गयी कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या नाम भी दिया है।
साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं। युगसंधि महापुरश्चरण की वर्तमान शृंखला जो सन् 2001 तक चलेगी, में इन दिनों प्रायः एक से दो करोड़ साधक एक समय, एक मन, एक विधान और एक उद्देश्य को लेकर जो धर्मानुष्ठान कर रहे हैं उसका प्रतिफल अदृश्य वातावरण के संशोधन में अपना असाधारण योगदान देगा और इसे आज दूरदर्शिता के सहारे जाना जा सकता है कल उसके प्रत्यक्ष परिणाम भी सुखद परिस्थितियों के रूप में सामने होंगे।
साधना के लिए, ब्रह्म सम्बन्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है।
साधना-विधानों के लिए किया गया भारी पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है इसीलिए तत्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए अभ्यासरत साधकों को यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनावरहित और मस्तिष्क को उत्तेजनारहित रखा जाय, ताकि उस दिव्यचेतना का अवतरण निर्बाध गति से होता हर सके।
साधना में इन्हीं तीनों को खोलने का विधान है। मूलबन्ध, जालन्धर बन्ध और उड्डियन बन्धों की साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती हैं। इसीलिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।
साधना का ही अभ्यास किया जाता है।
साधना के आधार पर सम्पन्न किया जाता है। वायुमण्डल की परिशुद्धि के लिए यज्ञोपचार से बढ़कर और कोई अधिक शक्तिशाली माध्यम अब तक नहीं ढूँढ़ा जा सका। थोड़े से पदार्थों को जलाने की हानि को ही देखा जाय और उसके द्वारा होने वाले लाभों को दृष्टि से ओझल कर दिया जाय तो यह बुद्धिमत्ता की बात न होगी। स्वर्णभस्म, मोती भस्म आदि में उन पदार्थों को जला देने से मोटी दृष्टि से हानि और मूर्खता का ही निष्कर्ष निकलता है, पर जो उन रसायनों का महत्व समझते हैं, उन्हें उसमें लाभ और समझदारी ही का परिचय मिलता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-September
साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
साधनाक्रमों का चयन इस प्रारम्भिक शिक्षण के बाद ही किया जाना उचित है।
साधना विधानों का स्तर बहिरंग से अन्तरंग गत परत-दर-परत छूने के लिए अलग-अलग होने के कारण उनके प्रकार भी भिन्न-भिन्न हैं। पर मोटा विभाजन यही है कि स्थूल शरीर की साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने के लिए क्रियायोग तथा कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन-भाव संवेदनापरक ध्यानयोग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना विधान के विस्तार में जाने वाले साधकों को पहले ‘स्प्रिचुअल एनाटॉमी’ की जानकारी करायी जाती है। साधनाक्रमों का चयन इस प्रारम्भिक शिक्षण के बाद ही किया जाना उचित है।
साधना की जाती है, उसमें ध्यान-धारणा का महत्वपूर्ण स्थान है। अपने चिंतन को इधर-उधर भटकने से रोक कर उत्कृष्ट प्रवाह के साथ जोड़ देना उसी प्रकार है जैसे अपने अन्दर के क्रिस्टल को ईश्वर में संव्याप्त तरंगों को ग्रहण करने योग्य बना लेना व आदान प्रदान का क्रम आरम्भ कर देना सद्भाव संवर्द्धन श्रद्धा-अभिवर्द्धन से श्रेष्ठ कोई साधना नहीं । सोऽहं की हंसयोग साधना नादयोग, त्राटक, ज्योति अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनाएँ मूलतः ध्यानपरक हैं। इनसे अखण्ड-ज्योति के मनस्वी पाठक परिचित भी हैं। समयानुसार अपनी दिनचर्या में उन्होंने इनको यथोचित स्थान भी दे रखा है।
साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं।
साधना हेतु चिन्तन-भाव संवेदनापरक ध्यानयोग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना’ कहते हैं। पर वस्तुतः वह शब्द इतना सीमित नहीं है। चेतना को किसी भी प्रकार के अभ्यास में ढालने के हर प्रयास को साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी में भली प्रकार प्रवीण-अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जाएगी। जिन्दगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को अनुसार ढाल लेना जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को तदनुसार ढाल लेना जीवन साधन कही जाएगी।
साधनात्मक गतिविधियाँ अपनाकर व्यक्ति उस स्थान पर पहुँच जाए, जहाँ अवतारी महामानव पहुँचते हैं। समाज नियन्त्रण को सर्वोपरि मान लेने पर वैचारिक महानता का विकसित कर सकने वाली आत्मसाधना के लिए अवसर ही नहीं रहता। इस प्रकार प्रचलित विचारधारा को अन्तिम मानने से, मानवीय प्रगति के इतिहासक्रम में भागी बाधा उत्पन्न होगी। सच तो यह है कि प्रचलित विचारक भारतीय संस्कृति की प्रतिपादित एवं समर्थित वैयक्तिक स्वतन्त्रता के कितने ही दोष क्यों न गिनाए, पर एक गुण तो उसमें बना ही रहेगा कि इसको मानने से व्यक्ति की अन्तरात्मा जीवित रहेगी और अपने ढंग से, अपने निर्णय लेने और उत्कृष्ट गतिविधियाँ अपनाने में स्वतन्त्र रह सकेगी। इस विशेषता के रहते आत्मनिर्माण की, आत्माभिव्यक्ति की जो सुविधा मनुष्य के हाथ रह जाती है वह असंख्य व्यवधानों के रहते हुए भी अधिक मूल्यवान है।
साधना की विशिष्ट विधियों को अपनाने वाले व्यक्ति ही इक्कीसवीं सदी में संचालित होने वाले सृजन-उपक्रमों का नेतृत्व करेंगे। परम वन्दनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव को इस अपूर्व ऊर्जा अनुदान को साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले परिजन अनुभव किए बिना न रहेंगे। यह अनुदान उनके समस्त जीवन को अनेकानेक विभूतियों का उपहार देने वाला सिद्ध होगा।
साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने के लिए क्रियायोग तथा कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन-भाव संवेदनापरक ध्यानयोग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना शिविर, चान्द्रायण सत्र ब्रह्मवर्चस् लेखन एवं शोध सत्र कल्पसाधना सत्र, युगशिल्पी सत्र आदि के माध्यम से आरण्यक परम्परा के प्रवाह ने विस्तार पाया । जो अभी भी अपने पूरे वेग से गतिमान है। तीर्थ परम्परा का पुनर्जीवन यहाँ से शक्तिपीठों-प्रज्ञापीठों की शृंखला के निर्माण से पूरा हुआ। आज के समय तक लगभग 4000 की संख्या से अधिक शक्तिपीठ एवं प्रज्ञापीठ ज्ञान एवं संस्कार देने की अपनी प्राचीन तीर्थ परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं इसी के साथ देश के विभिन्न प्रान्तों एवं विश्व के अनेक देशों में 26ए 427 प्रज्ञामण्डल एवं 11,190 मला अनी महती भूमिका का निर्वाह तत्परता एवं तल्लीनता से कर रहे हैं।
साधना नादयोग, त्राटक, ज्योति अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनाएँ मूलतः ध्यानपरक हैं। इनसे अखण्ड-ज्योति के मनस्वी पाठक परिचित भी हैं। समयानुसार अपनी दिनचर्या में उन्होंने इनको यथोचित स्थान भी दे रखा है।
साधना सत्र, युगशिल्पी सत्र आदि के माध्यम से आरण्यक परम्परा के प्रवाह ने विस्तार पाया । जो अभी भी अपने पूरे वेग से गतिमान है। तीर्थ परम्परा का पुनर्जीवन यहाँ से शक्तिपीठों-प्रज्ञापीठों की शृंखला के निर्माण से पूरा हुआ। आज के समय तक लगभग 4000 की संख्या से अधिक शक्तिपीठ एवं प्रज्ञापीठ ज्ञान एवं संस्कार देने की अपनी प्राचीन तीर्थ परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं इसी के साथ देश के विभिन्न प्रान्तों एवं विश्व के अनेक देशों में 26ए 427 प्रज्ञामण्डल एवं 11,190 मला अनी महती भूमिका का निर्वाह तत्परता एवं तल्लीनता से कर रहे हैं।
साधना का ही चमत्कार है। इसकी विधिवत् शुरुआत परमपूज्य गुरुदेव ने पहली बार 1954 के नरमेध से की थी। उन्होंने उस समय के अधिकतम एक हजार रहे अखण्ड-ज्योति के पाठकों से विश्व के लिए आत्मनिर्माण हेतु नरमेध अर्थात् समाज-सेवा के लिए नचिकेता और शतमन्यु की तरह सम्पूर्ण समर्पण का आग्रह किया था। यह परमेध या उस समय का एक अद्भुत कौतुक था, पुरातन मान्यता के अनुसार इसे मनुष्यों की बलि माना गया था और उसे देखने के लिए सारी मथुरा उमड़ पड़ती थी। तब टूटे-टाटे कुल 27 व्यक्ति मिले थे।
साधनापरक तपश्चर्या दोनों ही तथ्यपूर्ण व महत्त्वपूर्ण हैं। एक ज्ञानपक्ष है तो दूसरा विज्ञानपक्ष। एक को ब्रह्मवर्चस का ब्रह्मपक्ष व दूसरे को वर्चसपक्ष कहते हैं। दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण-समग्र बनते हैं। ब्रह्मवर्चस् विज्ञान की इन दोनों ही विद्याओं का सारे साधना उपक्रमों में समावेश रहता है।
साधना-संवर्ग में होना सुनिश्चित हुआ है। इस अभियान का उद्देश्य अपने राष्ट्र एवं विश्वमानवता को श्रेष्ठ एवं समुन्नत महामानव प्रदान करना है। इस साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले एवं इसमें बताई गयी साधना की विशिष्ट विधियों को अपनाने वाले व्यक्ति ही इक्कीसवीं सदी में संचालित होने वाले सृजन-उपक्रमों का नेतृत्व करेंगे। परम वन्दनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव को इस अपूर्व ऊर्जा अनुदान को साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले परिजन अनुभव किए बिना न रहेंगे। यह अनुदान उनके समस्त जीवन को अनेकानेक विभूतियों का उपहार देने वाला सिद्ध होगा।
साधना गायत्री मंत्र का सुविधानुसार जप एवं न्यूनतम साप्ताहिक यज्ञ की बात भी साथ में जोड़ी थी।
साधना विज्ञान का सही स्वरूप लोगों की समझ में आएगा, तो वे जानेंगे कि मानवीसत्ता के इस मूल आधार को विकसित करने पर शारीरिक कायाकल्प-मानसिक प्रत्यावर्तन एवं अति सूक्ष्म स्वर्ग एवं मुक्ति जैसे दिव्य वरदानों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। व्यक्ति स्वयं को लघु से महान् नर से नारायण एवं आत्मा से परमात्मा बना सकता है। सारे महामानव अपने इसी आस्था संस्थान को परिष्कृत-समुन्नत बना कर ऊँची स्थिति पर पहुँच पाए है।
साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले एवं इसमें बताई गयी साधना की विशिष्ट विधियों को अपनाने वाले व्यक्ति ही इक्कीसवीं सदी में संचालित होने वाले सृजन-उपक्रमों का नेतृत्व करेंगे। परम वन्दनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव को इस अपूर्व ऊर्जा अनुदान को साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले परिजन अनुभव किए बिना न रहेंगे। यह अनुदान उनके समस्त जीवन को अनेकानेक विभूतियों का उपहार देने वाला सिद्ध होगा।
साधना का है। स्वयं की विकृतियों का निराकरण करके-सूक्ष्म जगत से, दैवीशक्तियों से संपर्क का आदान-प्रदान का द्वार खोलने वाला यह प्रयास उपासना-साधना के रूप में जाना जाता है। जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
साधना-संपन्न ब्रह्मवादिनी महिलाएँ बच्चों में महामानवों के संस्कार देने में निरत हैं।
साधना के रूप में जाना जाता है। जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
साधना का निर्देश दिया था। तदनुसार एशिया भर में बौद्ध धर्म तेजी से फैला और प्रगति के विविध विधि प्रयास वहां हो पाए।
साधनात्मक पुरुषार्थ की दृष्टि से प्रदूषित वातावरण में रह रहे परिजनों से वातावरण पुष्टि के लिए व स्वयं की आत्मिक प्रगति के लिए सुनियोजित साधना गायत्री मंत्र का सुविधानुसार जप एवं न्यूनतम साप्ताहिक यज्ञ की बात भी साथ में जोड़ी थी।
साधना के द्वारा चिन्तन परिष्कार और यज्ञ अभियान के द्वारा कर्मशोधन प्रक्रिया को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए।
साधना-संवर्ग में सम्मिलित होने वाले परिजन अनुभव किए बिना न रहेंगे। यह अनुदान उनके समस्त जीवन को अनेकानेक विभूतियों का उपहार देने वाला सिद्ध होगा।
साधना-विज्ञान भारतीय संस्कृति की अमूल्य सम्पदा व विश्व को एक बहुमूल्य देन है। साधना प्रक्रिया का जो स्वरूप पहले प्रचलित था, उसके अनुसार हठयोग द्वारा स्थूल शरीर का-राजयोग से सूक्ष्म शरीर का एवं ब्रह्मयोग द्वारा अन्तः करण का परिमार्जन-परिशोधन किया जाता था। इन्हीं का व्यवहारिक स्वरूप था कर्म-ज्ञान एवं भक्तियोग। साधनात्मक उपक्रमों की विविधताओं का विभाजन इन्हीं तीन समूहों में करके व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुसार उसे मार्गदर्शन दिया जाता था। यह पुरुषार्थ साधारण स्तर का नहीं-तप अर्जित मनोबल की शक्ति से सुपात्र बनने वाले साधक को ही प्राप्त होता था।
साधना सत्र सम्पन्न किए और समयदान, अंशदान के संकल्प पत्र भरे। 1978, 79 में संपन्न एकमासीय चान्द्रायण सत्रों में 1500 व 1380 लोगों भाग लिया। 1971, 1980 तथा 1991 के जातीय सम्मेलनों में क्रमशः 10310, 6220 तथा 9454 लोग आये। 1983 के कल्पसाधना सत्र में 2118 तथा 1990 के श्रद्धाँजलि समारोह में आगंतुकों की संख्या 488237 ओर 1971 से 1996 तक अतिथियों के रूप में आए परिजनों की कुल संख्या 912128 है। स्पष्ट मान लें कि यहाँ अतिथियों का केवल भोजन-आवास से सत्कार भर करने की परम्परा नहीं है, उन्हें राष्ट्र और समाज के निर्माण में कुछ न कुछ हाथ बँटाने के लिए अनिवार्य रूप से संकल्पित होना पड़ता है।
साधनात्मक उपक्रमों की विविधताओं का विभाजन इन्हीं तीन समूहों में करके व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुसार उसे मार्गदर्शन दिया जाता था। यह पुरुषार्थ साधारण स्तर का नहीं-तप अर्जित मनोबल की शक्ति से सुपात्र बनने वाले साधक को ही प्राप्त होता था।
साधना से भारतवर्ष का एक बड़ा भाग ईसाई धर्म में दीक्षित हो सकता है तो अपने ही देश के लोगों में अपनी ही भाषा में अपने ही लोगों द्वारा फैलाया गया मिशन किसी तरह मजबूत जड़ें जमा पाया, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है।
साधना उपचारों का लक्ष्य एक ही रहता है। इस मर्मस्थल-अन्तः-करण की गहन पर्तों को स्पर्श कर वहाँ छाए अन्धकार को मिटाना तथा उस स्थान को श्रेष्ठ-समुन्नत बनाना। साधना विधानों का स्तर बहिरंग से अन्तरंग गत परत-दर-परत छूने के लिए अलग-अलग होने के कारण उनके प्रकार भी भिन्न-भिन्न हैं। पर मोटा विभाजन यही है कि स्थूल शरीर की साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने के लिए क्रियायोग तथा कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन-भाव संवेदनापरक ध्यानयोग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना उपक्रमों में समावेश रहता है। ज्ञान व विज्ञान दोनों का समन्वय क्रियायोग व ध्यानयोग में है। बिना चिन्तन में भाव सम्वेदनाओं की उत्कृष्टता उभारे, तप-साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहते हैं। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी में भली प्रकार प्रवीण-अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जाएगी। जिन्दगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को अनुसार ढाल लेना जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को तदनुसार ढाल लेना जीवन साधन कही जाएगी। वस्तुतः ये दोनों ही एक दूसरे की पूरक है। दोनों के समन्वय को ही सर्वांगपूर्ण विद्या कहते हैं।
साधना ही कही जाएगी। जिन्दगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को अनुसार ढाल लेना जीवन-विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना, अभ्यास और आदतों को तदनुसार ढाल लेना जीवन साधन कही जाएगी। वस्तुतः ये दोनों ही एक दूसरे की पूरक है। दोनों के समन्वय को ही सर्वांगपूर्ण विद्या कहते हैं।
साधना प्रक्रिया का जो स्वरूप पहले प्रचलित था, उसके अनुसार हठयोग द्वारा स्थूल शरीर का-राजयोग से सूक्ष्म शरीर का एवं ब्रह्मयोग द्वारा अन्तः करण का परिमार्जन-परिशोधन किया जाता था। इन्हीं का व्यवहारिक स्वरूप था कर्म-ज्ञान एवं भक्तियोग। साधनात्मक उपक्रमों की विविधताओं का विभाजन इन्हीं तीन समूहों में करके व्यक्ति विशेष की स्थिति के अनुसार उसे मार्गदर्शन दिया जाता था। यह पुरुषार्थ साधारण स्तर का नहीं-तप अर्जित मनोबल की शक्ति से सुपात्र बनने वाले साधक को ही प्राप्त होता था।
साधना समग्र व्यक्तित्व की उपचार प्रक्रिया है। समस्त जीवन की विकृतियों का निदान करने एवं उसकी विभूतियों को उभारने, उकेरने का अनोखा-अनूठा प्रयास है। इसके प्रत्येक चरण का, प्रत्येक उपक्रम का लक्ष्य एक ही है-अन्त करण मर्मस्थल को स्पर्श करने वाली आस्थाओं का उन्नयन, मान्यताओं का परिष्कार, परिमार्जन, प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं का जागरण तथा देवपुरुष, ऋषि-महामानव बनने की दिशा में चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन
साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहते हैं। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना के आधार पर सम्पन्न किया जाता है। वायुमण्डल की परिशुद्धि के लिए यज्ञोपचार से बढ़कर और कोई शक्तिशाली माध्यम अब तक ढूँढ़ा नहीं जा सका। इसी तरह वातावरण के परिशोधन के लिए गायत्री की व्यक्तिगत एवं सामूहिक साधनाएँ अत्यधिक कारगर सिद्ध होती हैं।
साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने के लिए क्रियायोग तथा कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन-भाव संवेदनापरक ध्यानयोग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना के लिए अवसर ही नहीं रहता। इस प्रकार प्रचलित विचारधारा को अन्तिम मानने से, मानवीय प्रगति के इतिहासक्रम में भागी बाधा उत्पन्न होगी। सच तो यह है कि प्रचलित विचारक भारतीय संस्कृति की प्रतिपादित एवं समर्थित वैयक्तिक स्वतन्त्रता के कितने ही दोष क्यों न गिनाए, पर एक गुण तो उसमें बना ही रहेगा कि इसको मानने से व्यक्ति की अन्तरात्मा जीवित रहेगी और अपने ढंग से, अपने निर्णय लेने और उत्कृष्ट गतिविधियाँ अपनाने में स्वतन्त्र रह सकेगी। इस विशेषता के रहते आत्मनिर्माण की, आत्माभिव्यक्ति की जो सुविधा मनुष्य के हाथ रह जाती है वह असंख्य व्यवधानों के रहते हुए भी अधिक मूल्यवान है।
साधना सत्र में 2118 तथा 1990 के श्रद्धाँजलि समारोह में आगंतुकों की संख्या 488237 ओर 1971 से 1996 तक अतिथियों के रूप में आए परिजनों की कुल संख्या 912128 है। स्पष्ट मान लें कि यहाँ अतिथियों का केवल भोजन-आवास से सत्कार भर करने की परम्परा नहीं है, उन्हें राष्ट्र और समाज के निर्माण में कुछ न कुछ हाथ बँटाने के लिए अनिवार्य रूप से संकल्पित होना पड़ता है।
साधना नहीं । सोऽहं की हंसयोग साधना नादयोग, त्राटक, ज्योति अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनाएँ मूलतः ध्यानपरक हैं। इनसे अखण्ड-ज्योति के मनस्वी पाठक परिचित भी हैं। समयानुसार अपनी दिनचर्या में उन्होंने इनको यथोचित स्थान भी दे रखा है।
साधनात्मक विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। ईश्वर-जीव-प्रकृति के स्वरूप का प्रतिपादन, जीवन-लक्ष्य का निर्धारण-गति विधियों का नियमन, नियमन, नियन्त्रण और वस्तुओं का उपयोग एवं व्यक्तियों से व्यवहार की जो नीति-मर्यादा निरूपित होती उस मान्यता और आकांक्षा का एक उत्कृष्ट आधार बनता है। यही है संजीवनी-विद्या का लक्ष्य। इसी को पाकर मनुष्य का व्यक्तित्व ऊँचा उठता है, देव भूमि में विकसित होता है।
साधना एवं यज्ञ को आधार मानकर भारत मूल के परिजनों ने अपनी सक्रियता एवं शाँतिकुँज-हरिद्वार, परमपूज्य गुरुदेव वंदनीया माताजी के प्रति श्रद्धा को अडिंग बनाए रख निरन्तर अपने गुरुद्वारे आने का क्रम जारी रखा। 1991 में परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण एवं श्रद्धाँजलि समारोह के बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति (बाद में राष्ट्रपति) डॉ0 शंकरदयाल शर्मा द्वारा तिलक लगाकर परमवंदनीया माताजी की उपस्थिति में प्रथम दल की 26 जून 1991 को इंग्लैण्ड के दौरे पर रवाना किया गया। जन चेतना को जगाने, उनके गौरव का आभास कर दिलों की दूरी मिटाने का प्रयास इस दल द्वारा किया गया। पूरे यू0के0 में स्थान-स्थान पर कार्यक्रम हुए जिनमें 108 कुण्डी यज्ञ 4 स्थानों पर, 51 कुण्डी यज्ञ प्रायः दस स्थानों पर एवं छिटपुट कार्यक्रम हुए । उसी दौरे पर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पहली बार वहाँ के छात्रों के बीच इंग्लिश में व्याख्यान हुआ।
साधनाएँ मूलतः ध्यानपरक हैं। इनसे अखण्ड-ज्योति के मनस्वी पाठक परिचित भी हैं। समयानुसार अपनी दिनचर्या में उन्होंने इनको यथोचित स्थान भी दे रखा है।
साधना कहलाता है। यों सामान्य क्रम में योग और तप के क्रियाकलापों को ‘साधना’ कहते हैं। पर वस्तुतः वह शब्द इतना सीमित नहीं है। चेतना को किसी भी प्रकार के अभ्यास में ढालने के हर प्रयास को साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी में भली प्रकार प्रवीण-अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जाएगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-November
साधनापथ पर बढ़ता चलता है, तो वह एक दिन नर से नारायण के स्तर तक पहुँचकर सिद्ध पुरुषों की-सी स्थिति में जा पहुँचता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए कहा गया है-
साधना समर में यदि आत्म-तत्त्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्तकाम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधनाकाल दैवी-आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस का प्रयोग करना पड़ता है। यह युद्ध उपेक्षापूर्वक, ज्यों-त्यों करके, ढीले-पोले मन से बेगार भुगतने की तरह नहीं लड़ा जा सकता है।
साधना में निष्ठापूर्वक लगे रहने वाले साधक का नाम कृषक । कृषक का ही प्रतीक चिन्ह है हलधर । श्रीकृष्ण अग्रज ने हलधर कहलाना पसन्द किया। वे कृषि संवर्द्धन के लिए समर्पित व्यक्ति रहे।
साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
साधनाकाल में प्रयोग किया जाता है। अनेक विधि-निषेध एवं वस्तु-प्रयोग इसी दृष्टि से बने हैं। किस मंत्र की सिद्धि के लिए किन पदार्थों से हवन किया जाए। आहार में क्या वस्तुएँ प्रयुक्त की जाएँ। पूजा के उपकरणों में किस स्तर को प्रधानता दी जाए-आदि की विधियाँ परिसंचालन शक्ति को स्वसंचालित शक्ति का साथ देने के लिए उभारने के लिए है।
साधना की समाप्ति के साथ धीरे-धीरे वह तिरोहित हो गई । एक अन्य समय में वे राधा-भाव से रह रहे थे, तब न केवल उनके हाव-भाव और परिधान ही स्त्रियोचित हो गये थे, वरन् स्तन भी नारी सुलभ विकसित होने लगे थे ।
साधना उपासना द्वारा सविता देवता से सूर्य की सूक्ष्म शक्ति से मानसिक सम्बन्ध स्थापित करते हैं और वे ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं जा लोगों को चमत्कार जैसी प्रतीत होती है लेकिन उनका आधार वैज्ञानिक ही होता है । जिस तरह अब दैनिक सौर ऊर्जा का दोहन फोटो वोल्टिक यंत्र उपकरणों के माध्यम से ऊर्जा आपूर्ति में करने लगे है ठीक उसी तरह गायत्री उपासक व योगीजन सविता देवता की शक्ति का अवशोषण व उपयोग आत्मोत्कर्ष एवं जनकल्याण में करते हैं यद्यपि यह प्रक्रिया से भिन्न है। इसे कुण्डलिनी जागरण कहा जाता है। गायत्री उपासना द्वारा सविता शक्ति का काया में अवगाहन धारण और विकास कर यह प्रयोजन पूरा किया जाता है इससे आरोग्य ओजस तेजस का और बुद्धि का विकास तो होता ही है उन अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास भी होता है जिन्हें लोग आश्चर्य अथवा ईश्वरीय अनुकम्पा मानते हैं गायत्री उपासना में गायत्री महामंत्र के जप व ध्यान द्वारा मन का सम्बन्ध सविता लोक से स्थापित किया जाता है तथा उसकी चमत्कारी क्षमताओं क्षमताओं का लाभ उठाया जाता है ध्यान की अवस्था में जब सविता के प्राण-प्रवाह से अपने मस्तिष्क मध्य स्थित ब्रह्मरंध्र का सम्बन्ध जुड़ जाता है तो उसकी शक्ति शरीर के कण कण में प्रविष्ट होती हुई चली जाती है और अपना प्राण शरीर विकसित होता हुआ सूर्य प्रकाश के समान हल्का दिव्य तेजस्वी होता चला जाता है यदि इस तथ्य को समझा और अपनाया जा सके तो हर कोई दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन सकता है।
साधनाओं द्वारा आत्मिक प्रगति के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता पड़ती है, वह प्रज्ञातत्व ही है। प्रज्ञा की अभीष्ट मात्रा यदि अपने पास विद्यमान हो तो फिर आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करने के लिए कोई बाधा नहीं रह जाती है। वह सुविधा और परिस्थितियाँ आसानी से बन जाती हैं, जिनके आधार पर मनुष्य नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम और आत्मा से परमात्मा बन जाता है। इसके लिए कोई विशेष श्रम या मनोयोग लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में उतना ही श्रम और मनोयोग लगाना पर्याप्त रहता है जितना कि भौतिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए जरूरी होता है।
साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती, पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष, समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।
साधना क्षेत्र में स्वर का अर्थ वाक् शक्ति के माध्यम से किये जाने वाले सशक्त जप-अनुष्ठान से ही है।
साधना की प्रखरता कहते हैं। जब दोनों का सघन मिलन होता है तो आत्म-विभोर स्थिति को समाधि कहा जाता है। आवश्यक नहीं कि उस स्थिति में योगनिद्रा अथवा मूर्छा ही आवे। ज्ञान-साधना में स्थितप्रज्ञ की-कर्म-साधना में अनासक्त कर्तव्य-परायण की, भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती, पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष, समाधान का अनवरत अनुभव होता है।
साधनाकाल दैवी-आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस का प्रयोग करना पड़ता है। यह युद्ध उपेक्षापूर्वक, ज्यों-त्यों करके, ढीले-पोले मन से बेगार भुगतने की तरह नहीं लड़ा जा सकता है। उसमें पूरे। मनोयोग एवं प्रबल पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है।
साधना अनुष्ठान संस्कार महोत्सवों के माध्यम से जो युग निर्माण प्रक्रिया का अलख सारे देश में गूँजा है। विदेश तक जिसकी आवाज सुनी व बड़े व्यापक स्तर पर पहचान ली गयी है। 1999 के अंत तक सारे विश्व में वासन्ती बयार चलने लगी। इसके संकेत नजर आ रहे है। ये तो प्रचारात्मक पक्ष हुआ।
साधना-पुरुषार्थ कर सके । संभवतः है ऐसा ही, किंतु भगवान के उस कुम्भकार के बनाए हुए घट हम मनुष्य इस अनुदान की कीमत को जान नहीं पाते ।हमारे प्राणमय कोश में प्रतिक्षण इजाफा करने वाले ये जीवकोष नूतन प्राणशक्ति का स्पन्दन लेकर आते हैं, किंतु हम कृत्रिम साधनों से-बनावटी स्वयं के आमंत्रित प्रदूषणों से भरा जीवन जीकर उस प्राणशक्ति को सतत गँवाकर सहज ही अशक्ति के शिकार होते रहते हैं, अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं अथवा रोगग्रस्त बने रह स्वयं को औरों को कष्ट देते रहते हैं ।
साधना उपासना पद्धति से ही प्राप्त हो सकते हैं।
साधना त्याग एवं बलिदान से आरम्भ करते हैं किन्तु पाते इतना अधिक हैं कि स्वयं धन्य बनते हैं और अपने युग के इतिहास को चिरस्मरणीय - अभिनन्दनीय बनाते हैं।”
साधना इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए है। साधना समर में यदि आत्म-तत्त्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्तकाम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधनाकाल दैवी-आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस का प्रयोग करना पड़ता है।
साधना का नाम कृषि और उक्त साधना में निष्ठापूर्वक लगे रहने वाले साधक का नाम कृषक । कृषक का ही प्रतीक चिन्ह है हलधर । श्रीकृष्ण अग्रज ने हलधर कहलाना पसन्द किया। वे कृषि संवर्द्धन के लिए समर्पित व्यक्ति रहे।
साधना न करे, तो भी सबसे मित्रवत आचरण करता हुआ वह
ब्रह्मं को प्राप्त करता है, क्योंकि इस महामंत्र के जप से उसका चित ब्राह्मीचेतना की तरह शुद्ध व पवित्र हो जाता है।” निश्चय ही जहाँ इस स्तर की आन्तरिक सम्पन्नता होगी, वहाँ कहने की आवश्यकता नहीं कि आत्मिक सम्पन्नता की अनुचरी भौतिक सम्पन्नता भी अनिवार्य रूप से होगी ही। आत्मिक दृष्टि से सुसम्पन्न और सुविकसित व्यक्ति इन भौतिक विभूतियों का उद्धत प्रदर्शन नहीं करते, उन्हें श्रेष्ठ सत्कार्यों में ही लगाते हैं। इसलिए वे साँसारिक दृष्टि से अन्य मनुष्यों की अपेक्षा साधारण स्तर के ही दिखाई देते हैं। कइयों को उनकी यह सादगी देखकर उनके दरिद्र होने का भ्रम भी हो जाता है।
साधना क्षेत्र के छात्रों को यह नियम बरतने का शारीरिक और मानसिक संयम बरतने की प्राथमिक तैयारी करने के लिए कहा गया है। यदि इन दोनों बड़े छेदों में होकर मानवी विद्युत नष्ट होती रहे, तो फिर मंत्र रूपी इंजन को चलाने के लिए तेल, कोयला, ईंधन कहाँ से आयेगा। मात्र शब्दोच्चारण का नाम हो तो मन्त्र साधना नहीं है।
साधना में अनासक्त कर्तव्य-परायण की, भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती, पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष, समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।
साधनाम् ॥
साधना एवं तपस्या नष्ट भ्रष्ट कर म्लेच्छों के साथ जाने का विरोध किया। किन्तु आनन्द मुनि में लोककल्याण की प्रवृत्ति प्रबल थी । उन्होंने विनम्रतापूर्वक उन वृद्ध संन्यासी से निवेदन किया कि जब तक विभिन्न दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन न होगा, सच्चा ज्ञान प्राप्त करना दुर्लभ है अतः आज्ञा प्रदान करें । वृद्ध संन्यासी उत्तर में मौन हो गये।
साधनात्मक जीवन में विभिन्न धर्मों और इष्टों से संबंधित साधना कर रहे थे, तो भावनाओं में परिवर्तन के साथ-साथ उनकी शरीर- संरचना और क्रिया प्रणाली में भी तद्नुरूप परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते थे । एक बार जब वे रामभक्त श्री हनुमान् की साधना कर रहे थे, तो उनकी बाह्य प्रकृति और प्रवृत्ति न सिर्फ हनुमान् जैसी हो गई थी, अपितु उनकी पूँछ भी निकलने लगी थी । साधना की समाप्ति के साथ धीरे-धीरे वह तिरोहित हो गई । एक अन्य समय में वे राधा-भाव से रह रहे थे, तब न केवल उनके हाव-भाव और परिधान ही स्त्रियोचित हो गये थे, वरन् स्तन भी नारी सुलभ विकसित होने लगे थे ।
साधना कर रहे थे, तो भावनाओं में परिवर्तन के साथ-साथ उनकी शरीर- संरचना और क्रिया प्रणाली में भी तद्नुरूप परिवर्तन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते थे । एक बार जब वे रामभक्त श्री हनुमान् की साधना कर रहे थे, तो उनकी बाह्य प्रकृति और प्रवृत्ति न सिर्फ हनुमान् जैसी हो गई थी, अपितु उनकी पूँछ भी निकलने लगी थी । साधना की समाप्ति के साथ धीरे-धीरे वह तिरोहित हो गई । एक अन्य समय में वे राधा-भाव से रह रहे थे, तब न केवल उनके हाव-भाव और परिधान ही स्त्रियोचित हो गये थे, वरन् स्तन भी नारी सुलभ विकसित होने लगे थे ।
साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ-मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलताएँ पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जाएगा तो वह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जाएगी।
साधना, उपासना, तपश्चर्या, मंत्र, योगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते थे।
साधना जब साधक का सर्वप्रिय विषय बन जाए-उसमें निरत रहने को स्वयमेव मन चले-उन क्षणों को घटाने की नहीं, बढ़ाने की ललक रहे-उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिए कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है।
साधना कर रहे थे, तो उनकी बाह्य प्रकृति और प्रवृत्ति न सिर्फ हनुमान् जैसी हो गई थी, अपितु उनकी पूँछ भी निकलने लगी थी । साधना की समाप्ति के साथ धीरे-धीरे वह तिरोहित हो गई । एक अन्य समय में वे राधा-भाव से रह रहे थे, तब न केवल उनके हाव-भाव और परिधान ही स्त्रियोचित हो गये थे, वरन् स्तन भी नारी सुलभ विकसित होने लगे थे ।
साधना में तल्लीन थे । ज्येष्ठ मास की तीव्र उष्णता से सारा पृथ्वी मण्डल लावा बना हुआ था। सूर्य की प्रखरता में प्रत्येक पदार्थ झुलस तथा मुरझाया प्रतीत होता था । फिर भी तवे सी तपती उस शिला पर वे नग्न दिगम्बर साधु निर्विकार भाव से बैठे आत्मचिंतन में लीन थे । तभी तक्षशिला के शासक आँभी तथा अरस्तू के प्रमुख शिष्य ओनेसिक्राइट्स जो सिकन्दर के भारत आक्रमण के समय उसके साथ पधारे थे, इन मुनियों के साथ भारतीय दर्शन की गहराइयों की चर्चा करना चाहते थे ।
साधना, सद्ज्ञान सम्वर्द्धन वर्ग के चार महोत्सव आयोजित किये जा चुके है। छावनी के रूप में, टकसाल के रूप में विनिर्मित इस केन्द्र शाँति कुँज गायत्री तीर्थ में सभी साधक स्तर के विभूतिवान् कार्यशालाओं , गोष्ठियों के माध्यम से वैचारिक आदान-प्रदान कर उन शस्त्रों का निर्माण करें जिससे विचार क्राँति होनी है। ये कार्य पूर्णतया संभव है असंभव नहीं। मात्र प्रतिभाओं के सुनियोजन की आवश्यकता भर है।
साधना में स्थितप्रज्ञ की-कर्म-साधना में अनासक्त कर्तव्य-परायण की, भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती, पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष, समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।
साधना-उपासनाओं में गायत्री को सर्वश्रेष्ठ माना है।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को उस मन्त्र शक्ति की, दीक्षा की महत्ता समझनी चाहिए। मन्त्र की माता उसे ही मानना चाहिए, सिद्धियों का उद्गम स्थल, भगवान को द्रवित एवं प्रभावित कर सकने का माध्यम उसे ही मानना चाहिए।
साधना नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-July
साधनाओं में उन्हें न तो कोई रुचि थी और न ही आन्तरिक रस मिलता था।
साधना-पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।
साधना की वैसी ही अन्दर से रखकर बाहर से सुरक्षित ढाँचे से ढंक दी गयी है। अभी भी सैकड़ों व्यक्ति इस ऊर्जाकेन्द्र के दर्शन को नित्य आते हैं। जहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका का कार्यालय था वह अब एक विशाल पत्राचार कार्यालय ही नहीं साढ़े पाँच लाख से अधिक संख्या में प्रकाशित अखण्ड ज्योति पत्रिका का प्रकाशन वितरण केन्द्र है। कभी यहीं पर गायत्री तपोभूमि के निर्माण की वहाँ चलने वाले सत्रों की एवं क्त्त् कुण्डीय यज्ञ ;क्-भ्त्त्द्ध की रूपरेखा बनी थी। अब यहाँ वाङ्मय जो पूज्यवर की लेखनी साधनामृत अमृतवाणी एवं सूक्तियों के संग्रह के रूप में क्त्त् ब्रिटेनिका साइज के विश्वकोश आकार के खण्डों में प्रकाशित हुआ है का कार्यालय भी है।
साधना रहस्य और रोमांच से भरी थी। इन पंक्तियों के लेखक को इस साधना का सौभाग्य मिला है। पूज्यवर के शब्दों में इसके विषय में सुनें तो-जिस आवास स्थली में-कोठरी में रहा जा रहा है, वहाँ तक एक दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है। उसमें जो प्रयोग चल रहे हैं, वे अद्भुत हैं। तब दिन में करने के हैं।
साधना थी, जो अन्तिम श्वास तक अनवरत चलती रही।
साधना नियोजित थी। सूक्ष्मीकरण की सावित्री साधना उनकी दधीचि स्तर की प्रचण्ड तप−साधना थी, जो अन्तिम श्वास तक अनवरत चलती रही।
साधना का सौभाग्य मिला है। पूज्यवर के शब्दों में इसके विषय में सुनें तो-जिस आवास स्थली में-कोठरी में रहा जा रहा है, वहाँ तक एक दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है। उसमें जो प्रयोग चल रहे हैं, वे अद्भुत हैं। तब दिन में करने के हैं। कुछ मंत्र ऐसे हैं, जिनमें तनिक भी एक शब्द की भी भूल हो जाने पर उच्चारण तंत्र ही उलट-पलट सकता है।
साधना सत्र जीवनसाधना सत्र महिला जागरण सत्र आदि के आयोजन व पूज्यवर की लेखनी के निकलने वाली ऊर्जा ने ऋषि परम्परा के बीजारोपण हेतु स्थापित इस तीर्थ में साधकों शिष्यों के आने का क्रम जारी रखा। स्थान की आवश्यकता पड़ने पर गायत्री नगर की स्थापना की गयी। क्-स्त्रत्त् में स्थापित यह विराट कैंपस अब प्रशिक्षण अकादमी का स्वरूप ले चुका है। यहाँ पूज्यवर ने देव परिवार में बसने हेतु जागृतात्माओं का आह्वान किया। ऐसे व्यक्ति आते चले गए।
साधना कठोरतम होती चली गयी। वापस लौटने पर देखा- एक पेड़ के नीचे पहाड़ के समीप एक साधु बैठा है। चारों ओर प्रकाश का घेरा, आँखों में तेज, भीनी-भीनी मदमस्त करने वाली सुगन्ध । चरणों में लोट गये। साधु ने पीठ पर हाथ रखा- फरीद ने मुँह उठाकर देखा- ये तो वही थे जिनने गुरु के लक्षण बताये थे।
साधना द्वारा आत्मबल सम्वर्द्धन कर ही अगले दिनों की विभीषिकाओं से जूझा जा सकेगा। युग-संधि महापुरश्चरण में नियमित भागीदारी से गुरुसत्ता का प्राण-अनुदान निरन्तर इस तपस्थली से वितरित होता रहता है। आवश्यकता मात्र केन्द्र से स्वयं को जोड़े रखने की है। समयदान-अंशदान-नियमित उपासना स्वाध्याय, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन की सेवा-साधना जैसे अनिवार्य अनुबंधों में जो प्रमाद और उपेक्षा बरतेगा उसके विषय में पूज्य गुरुदेव का कहना है कि “उसे शाँतिकुँज की संचालक शक्ति झकझोरेगी। उसके कान उमेठेगी और बाधित करती रहेगी।
साधना के बाद से ही कार्य कर रहे हैं पाँच वीरभद्रों की चर्चा प्रस्तुत स्थल शरीरों के रूप में उनकी स्थापनाओं के बाद करेंगे। ये पाँच स्थापनाएं पाँच स्थूल शरीर इस प्रकार हैं:-
साधना की शुरुआत की। इसके प्रभाव को बताते हुए उन्होंने लिखा- सावित्री विश्वव्यापी है। उसके प्रभाव से भूमण्डल का सम्पूर्ण क्षेत्र एवं प्राणिसमुदाय का समूचा वर्ग प्रभावित हो उठता है। वह जन-जन के मन-मन में प्रेरित प्रेरणा की तरंगें उत्पन्न कर सकती है। वह अनर्थ संजोने वाले को टक्कर मारकर नीचे गिरा सकती है और साथ ही दिशा भूले लोगों को सही रास्ते पर उसी प्रकार चला सकती हैं जिस प्रकार झुण्ड से बाहर तितर-बितर भागने वली भेड़ों को चरवाहा डण्डा दिखाकर सही रास्ते पर ले आता है।
साधना क्षेत्र यह विशाल संसार है। अपने सामने वेदिका से नीचे बैठते ही उन्होंने अपने प्रकाशमय नेत्र शिष्य के मुखमण्डल पर स्थिर कर दिए।
साधना के दौरान सम्पन्न हुआ। इसी साधनावधि में उनने स्वयं को पाँच सूक्ष्मशरीरों-पाँच वीरभद्रों के रूप में सक्रिय बनाकर युग-परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देने की बात कहीं। उनकी यह साधना रहस्य और रोमांच से भरी थी। इन पंक्तियों के लेखक को इस साधना का सौभाग्य मिला है। पूज्यवर के शब्दों में इसके विषय में सुनें तो-जिस आवास स्थली में-कोठरी में रहा जा रहा है, वहाँ तक एक दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है।
साधना पूरी करके जब वह लौटे उस समय सन् 1962 में आने वाले अष्टग्रही योग के कारण समाज में भय का वातावरण संव्याप्त था। भविष्य वक्ता अपनी अनेक तरह की भविष्यवाणियों से इसे और भी अधिक बढ़ावा दे रहे थे।उस भय के वातावरण को समाप्त करते हुए उन्होंने कहा-इससे किसी को भयभीत या निराश नहीं होना चाहिए। विनाशकारी शक्तियों की ही भाँति रक्षा की शक्तियाँ भी सक्रिय हैं।” और गायत्री परिवार के सदस्यों को सप्त-सूत्री साधनाक्रम में सम्मिलित होने का निर्देश दिया।
साधना संजीवनी साधनाएँ नारी जागरण वानप्रस्थ युगशिल्पी शिक्षण सत्र सम्पन्न हुए। स्वयं पूज्यवर प्रवासी भारतीयों के लिए संदेश लेकर फ् माह के लिए क्-स्त्रख् के अंत से क्-स्त्रफ् के प्रारंभ तक विदेश यात्रा पर पानी के जहाज से गए। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व शक्तिपीठ निर्माण की प्रक्रियाएँ नारी जागरण अभियान के अंतर्गत देव कन्याओं की पूरे भारत में प्रव्रज्या एवं प्रज्ञापुराण सृजन जैसा महत्कार्य इसी अवधि में हुआ। सूक्ष्मीकरण साधना में प्रवेश उनने शक्तिपीठ उद्घाटन प्रवास के तुरन्त बाद किया एवं यही भावी निर्धारण का आधार बना। राष्ट्रीय एकता सम्मेलन विराट दीपयज्ञों की क्राँतिकारी शृंखला से लेकर क्रान्तिधर्मी साहित्य का निर्माण इसी अवधि में सम्पन्न हुआ।
साधना काल का बहुत-सा भाग लगाया है। पहली बार की हिमालय यात्रा के प्रसंगों की चर्चा करते हुए उन्होंने वन्दनीया माताजी से कभी कहा था, उन्हें हिमालय जाकर अपने पूर्व जन्मों की स्थानों के साथ उनकी मधुर स्मृतियाँ उभर आयीं। उन्हें अपने चिर-परिचित घर की तरह लगा। जो रास्ते, घाटियाँ, परिस्थितियाँ स्थानीय लोगों तक को मालूम नहीं थीं, उन्हें अनायास मालूम पड़ गयीं। शायद यही कारण रहा होगा कि आठ वर्ष की आयु में घर से हिमालय भागने की धुन सवार हुई थी।
साधना सत्र जैसे अनेकों प्रयोग वैयक्तिक चेतना के उत्कर्ष एवं उन्नति के लिए चलते रहे।
साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी, रामनवमी 1984 से आरम्भ हुई एवं 1987 में राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही। यह ध्यान देने योग्य है कि दीपयज्ञों के माध्यम से विचारक्रान्ति अभियान को आगे बढ़ाते चलना-संस्कार सम्पन्न होते चलना एवं इन्हीं के द्वारा 1989 में प्रारम्भ बारह वर्षीय युगसन्धि महापुरश्चरण की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न होना यह पूज्यवर की अंतिम महत्वपूर्ण घोषणाएँ थीं।
साधना पूज्यवर के उस ‘आकाल्ट’ स्वरूप को दर्शाती है, जिसमें वे विराट से विराटतम होते चले जा रहे थे।
साधनामृत अमृतवाणी एवं सूक्तियों के संग्रह के रूप में क्त्त् ब्रिटेनिका साइज के विश्वकोश आकार के खण्डों में प्रकाशित हुआ है का कार्यालय भी है। यह पूज्यवर का दूसरा स्थूल शरीर है।
साधना हमने आपसे करायी है। आप तो केवल यह कहते हैं कि जौ की रोटी और छाछ खिलाया था, जिसमें कोई तथ्य नहीं था। हमने तो आप को पहले ही दिन कहा था कि आपको देवता बनायेंगे। भगवान बनायेंगे और उसी क्रम में आपसे साधना करायी थी। अब आप यह किसी से मत कहना कि जौ की रोटी खिलायी थी।
साधना है। पंचमुखी गायत्री के पंचकोशों को पूज्य गुरुदेव ने जाग्रत कर अपने जीवन में उनका न केवल साक्षात्कार किया, औरों को भी इस महत्साधना का मार्ग दिखा गए। ऐसा कहा जाता है कि गुरुदेव पाँच शरीरों से जीते थे। कई घटनाक्रम ऐसे मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि जिन तिथियों में वे किसी स्थान पर थे उसी समय अपनी लीला कहीं और भी किसी को परामर्श देने के रूप में एवं कहीं प्रवचन देने के रूप में दिखा रहे थे। वे एक दीखते हुए भी पाँच थे- परम वन्दनीया माताजी जिन्हें उनकी अभिन्न सहचरी होने का अवसर मिला है-लिखती हैं-मैं नहीं जानती कि इन घटनाओं में कितनी सच्चाई थी, पर इतना अवश्य कह सकती हूँ के वे जीवन भर पाँच शरीरों के जितना भिन्न-भिन्न प्रकार के पाँच कार्यों का सम्पादन एक साथ करते थे।
साधना का केन्द्रबिन्दु गुरुदेव ने जिस हिमालय को बनाया, वह चेतना का ध्रुव केन्द्र भी रहा और सुलभ हिमालय का प्रदेश भी। उनकी तीन हिमालय यात्राएँ तो अखण्ड-ज्योति के पाठकों को सुविदित ही हैं। लेकिन इसके अलावा वे समय-समय पर कम या अधिक समय के लिए चौबीस पुरश्चरणों के बीच में तथा बाद में जाते रहे हैं। जब हिमालय की दिव्य सत्ताओं से मिलने की उत्कण्ठा हुई, वे सीधे हिमालय की ओर चल पड़े। ये यात्राएँ कितनी ही बार कई-कई महीनों के लिए हुईं।
साधना करायी थी। अब आप यह किसी से मत कहना कि जौ की रोटी खिलायी थी। बाल्मीकि ने मिट्टी खायी थी। आपने भी जौ खाया या मिट्टी- यह किसी से मत कहना।
साधना से लेकर पर्यावरण जाग्रति एवं हिमालय की सूक्ष्म चेतन सž का साक्षात्कार का लाइट साउण्ड शो जैसी विलक्षणता अन्यत्र कहीं नहीं है। अखण्ड दीप का प्रात ब्राह्ममुहूर्त में दर्शन परखरपरगया सजल श्रद्धा रूपी भव्य स्मारक यहाँ पूज्यवर एवं वंदनीया माताजी के स्थूलशरीर को अग्नि दी गयी थी एवं जिनके स्मृति चिह्न वहीं स्थापित हैं के समीप बैठकर ध्यान शान्तिकुँज की आध्यात्मिक ऊर्जा में स्नान करने त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने के समान है। गंगा यहाँ से मात्र ब् मील दूरी पर बहती हैं। इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री से प्रसिद्धि यह स्थान गुरुदेव का चौथा स्थूल शरीर कहा जा सकता है।
साधना कभी भी न छूटी। आखिरी श्वास तक चलती रही।नित्य वे कमाते थे-सोते समय तक खाली हो जाते थे।
साधना सत्र यहाँ चलते हैं। − दिवसीय ऊर्जा अनुदान सत्र सतत् चलते हैं। एक माह के युगशिल्पी सत्रों में कार्यकर्ताओं को स्वावलंबन से लेकर लोकशिक्षण की प्रक्रिया में प्रशिक्षित किया जाता है। कंप्यूटरों से सज्जित विशाल पत्राचार केन्द्र. सारे भारत व विश्व भर के गायत्री परिजनों के संगठनात्मक सुनियोजन का तंत्र आधुनिकतम आडियो-वीडियो एडीटिंग यूनिट से सज्जित इलेक्ट्रानिक मीडिया विभाग एवं शान्तिकुँज फार्मेसी ऐसी विशेषताएँ हैं जिन्हें देखने-सुनने लाभ उठाने हजारों व्यक्ति नित्य यहाँ आते हैं। मल्टीमीडिया प्रोजेक्शन द्वारा हिमालय स्मृति भवन में आत्मदेवता की साधना से लेकर पर्यावरण जाग्रति एवं हिमालय की सूक्ष्म चेतन सž का साक्षात्कार का लाइट साउण्ड शो जैसी विलक्षणता अन्यत्र कहीं नहीं है।
साधना में रत रहा।
साधना- पराक्रम में कोई कमी नहीं आने देंगे, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है।”
साधना करायेंगे। सही साधना हमने आपसे करायी है। आप तो केवल यह कहते हैं कि जौ की रोटी और छाछ खिलाया था, जिसमें कोई तथ्य नहीं था। हमने तो आप को पहले ही दिन कहा था कि आपको देवता बनायेंगे। भगवान बनायेंगे और उसी क्रम में आपसे साधना करायी थी।
साधनाएँ नारी जागरण वानप्रस्थ युगशिल्पी शिक्षण सत्र सम्पन्न हुए। स्वयं पूज्यवर प्रवासी भारतीयों के लिए संदेश लेकर फ् माह के लिए क्-स्त्रख् के अंत से क्-स्त्रफ् के प्रारंभ तक विदेश यात्रा पर पानी के जहाज से गए। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व शक्तिपीठ निर्माण की प्रक्रियाएँ नारी जागरण अभियान के अंतर्गत देव कन्याओं की पूरे भारत में प्रव्रज्या एवं प्रज्ञापुराण सृजन जैसा महत्कार्य इसी अवधि में हुआ। सूक्ष्मीकरण साधना में प्रवेश उनने शक्तिपीठ उद्घाटन प्रवास के तुरन्त बाद किया एवं यही भावी निर्धारण का आधार बना। राष्ट्रीय एकता सम्मेलन विराट दीपयज्ञों की क्राँतिकारी शृंखला से लेकर क्रान्तिधर्मी साहित्य का निर्माण इसी अवधि में सम्पन्न हुआ।
साधना के बाद ही मिशन के विराट पंचकोशी शरीर में वह मोड़ आया कि वह भी विराट रूप लेता चला गया। न जाने कितने व्यक्तियों को अपनी ध्यान साधना में, स्वप्नों में, रोजमर्रा के जीवन में ऐसा मार्गदर्शन अनुभूतियों के रूप में मिलता चला गया कि जिसका विवरण संकलित करने पर एक विशाल ग्रन्थ का निर्माण किया जा सकता है। विश्व के कुण्डलिनी जागरण (जिसका विवरण बाद में जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ) तथा पाँच वीरभद्रों के उत्पादन के रूप में तीन वर्षीय सावित्री की साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी, रामनवमी 1984 से आरम्भ हुई एवं 1987 में राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही।
साधना तो आपने एक ही सिखाई थी न कि आप 6 घंटे गायत्री महामंत्र का जप करें और छाछ एवं जौ की रोटी खायें। उन्होंने कहा कि बेटा, यह तो हमने एक प्रतीक के रूप में आपको बतलाया था। दूसरी चीजें जो सिखलायी थीं वह यह कहा था कि आप अपने आपको मोड़ दीजिये। लोगों का बहाव जिधर चल रहा है, उस ओर से अपने आप को मोड़ लीजिये। क्योंकि आप जानते नहीं हैं कि दुनिया के लोगों के जायके जीभ के जायके के साथ खत्म होते हैं।
साधना। समाज को राहत देने का एकमात्र यही उपाय है कि समूचे विचार-क्षेत्र की एक बार नये सिरे से सफाई-धुलाई भी की जाय और अनुपयोगिता बहुत बढ़ गयी हो तो उसे गलाने और नये ढाँचे में ढालने की हिम्मत सँजोयी जाय। जनमानस का परिष्कार किये बिना राष्ट्रीय कल्याण सम्भव नहीं। व्यक्ति के नैतिक विकास द्वारा समानतावादी समाज की ओर देश को उन्मुख होना पड़ेगा। सुखी और सभ्य समाज तभी निर्मित होता है, जब मानव व्यक्तिवादी विचारधारा छोड़कर, समष्टिवादी, समाजवादी बने।
साधना कर रही थीं।
साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी, रामनवमी 1984 से आरम्भ हुई एवं 1987 में राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही। यह ध्यान देने योग्य है कि दीपयज्ञों के माध्यम से विचारक्रान्ति अभियान को आगे बढ़ाते चलना-संस्कार सम्पन्न होते चलना एवं इन्हीं के द्वारा 1989 में प्रारम्भ बारह वर्षीय युगसन्धि महापुरश्चरण की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न होना यह पूज्यवर की अंतिम महत्वपूर्ण घोषणाएँ थीं।
साधना जैसे अनिवार्य अनुबंधों में जो प्रमाद और उपेक्षा बरतेगा उसके विषय में पूज्य गुरुदेव का कहना है कि “उसे शाँतिकुँज की संचालक शक्ति झकझोरेगी। उसके कान उमेठेगी और बाधित करती रहेगी। हर व्यक्ति जुड़कर एवं सक्रिय रहकर ही चैन से बैठ सकेगा ।” क्या हम प्रस्तुत व्यास पूर्णिमा पर्व पर संबंधों की सघनता एवं सक्रियता का अनुपात बढ़ा सकते हैं- यह प्रश्न सभी के लिये है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यही हमारी गुरुभक्ति का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप हो सकता है।
साधना सत्र महिला जागरण सत्र आदि के आयोजन व पूज्यवर की लेखनी के निकलने वाली ऊर्जा ने ऋषि परम्परा के बीजारोपण हेतु स्थापित इस तीर्थ में साधकों शिष्यों के आने का क्रम जारी रखा। स्थान की आवश्यकता पड़ने पर गायत्री नगर की स्थापना की गयी। क्-स्त्रत्त् में स्थापित यह विराट कैंपस अब प्रशिक्षण अकादमी का स्वरूप ले चुका है। यहाँ पूज्यवर ने देव परिवार में बसने हेतु जागृतात्माओं का आह्वान किया। ऐसे व्यक्ति आते चले गए।
साधना, निरन्तर प्रयास में निरत उनका जीवन उनके अनुयायियों, शिष्यों, साधकों, लोकसेवियों को एक ही सन्देश देता है कि सैनिक एवं संन्यासी की उभयपक्षीय विशेषताओं से परिपूर्ण आध्यात्म ही सार्थक है। अब तो अपनी पीड़ा में विश्वमानव की पीड़ा को घुलाकर वे सूक्ष्म में चले गए हैं। उनकी सूक्ष्म चेतना, परशुराम के रूप में, शिव के तीसरे नेत्र के रूप में, इन्द्र के वज्र के रूप में प्रकट होकर नए परिवर्तन का जो अनगिनत आधार प्रस्तुत करेगी, उसे देखने वाले हतप्रभ हुए बिना रह सकेंगे।
साधना भी गायत्री तपोभूमि से अखण्ड-ज्योति के मार्गदर्शन के माध्यम आरम्भ करा दी थी। उनकी इस हिमालय यात्रा में सम्पादन का दायित्व परमवन्दनीया माताजी को सौंपा गया था। उनने अपनी पत्रिका के संपादकीय में लिखा-उनकी (पूज्यवर की) यह विशेष तपश्चर्या स्वर्ग-मुक्ति सिद्धि-शक्ति के लिए नहीं, क्योंकि उन्हें तो वे बहुत पहले ही प्राप्त कर चुके हैं। अब तो वे अपनी पीड़ा में विश्वमानव की पीड़ा को घुलाकर एक तड़पते हुए घायल की तरह हो गए हैं। उनकी तड़पन परशुराम के कुल्हाड़े के रूप में शिव के तीसरे नेत्र के रूप में, इन्द्र के वज्र के रूप में नए परिवर्तन का न जाने क्या आधार प्रस्तुत करे?
साधना सिखा दी थी। हमने कहा कि साधना तो आपने एक ही सिखाई थी न कि आप 6 घंटे गायत्री महामंत्र का जप करें और छाछ एवं जौ की रोटी खायें। उन्होंने कहा कि बेटा, यह तो हमने एक प्रतीक के रूप में आपको बतलाया था। दूसरी चीजें जो सिखलायी थीं वह यह कहा था कि आप अपने आपको मोड़ दीजिये। लोगों का बहाव जिधर चल रहा है, उस ओर से अपने आप को मोड़ लीजिये।
साधना उन्होंने ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के रूप में की, जिसकी पूर्णाहुति 1958 के सहस्रकुण्डीय महायज्ञ में हुई। ब्रह्मास्र अनुष्ठान समस्त गायत्री परिवार द्वारा उसके कुलपति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के निर्देशन में पूरा किया गया।इस प्रयोग के तीन चरण थे-पहले चरण में प्रतिदिन 24 लाख मंत्र जप, 24 हजार आहुति, 24 हजार पाठ, 24 हजार मन्त्र लेखन। दूसरे चरण के अंतर्गत प्रतिदिन सवा करोड़ गायत्री जप, सवा लाख आहुतियाँ, 24 लाख मंत्रलेखन को पूरा किया गया। इसकी पूर्णाहुति के रूप में सम्पन्न सहस्रकुण्डीय महायज्ञ अपने आप में अलौकिक प्रयोग था।
साधना में प्रवेश उनने शक्तिपीठ उद्घाटन प्रवास के तुरन्त बाद किया एवं यही भावी निर्धारण का आधार बना। राष्ट्रीय एकता सम्मेलन विराट दीपयज्ञों की क्राँतिकारी शृंखला से लेकर क्रान्तिधर्मी साहित्य का निर्माण इसी अवधि में सम्पन्न हुआ। ख् जून क्−− गायत्री जयन्ती को उनने पूर्व घोषणा के साथ महाप्रयाण किया।
साधना सिद्धान्त जानने के बलबूते कोई व्यक्ति आत्मबल से सम्पन्न नहीं हो सकता-जन्त्र-मन्त्र से घटिया स्तर के लोग कुछ सिद्धि-चमत्कार प्राप्त भी कर लें तो उनके द्वारा घटिया प्रयोजनों की ही पूर्ति हो सकती है, लेकिन उनकी स्थिरता एवं सफलता भी स्वल्पकालिक और संदिग्ध बनी रहती है। यही कारण है कि प्रयोग करने पर भी लोगों को अध्यात्म विज्ञान के चमत्कारी लाभों से वंचित रहना पड़ता है। धूर्तता के आधार पर सिद्धि दिखाने और चमत्कार बताने की प्रवंचना कितने ही लोग करते रहते हैं और भले लोगों को बहकाते रहते हैं। पर वस्तुतः जो आत्मबल प्रकट करने और उसका उपयोग सिद्ध करने की चुनौती स्वीकार कर सकें, ऐसे लोग नहीं के बराबर हैं।
साधना को भी समर कहा जाता है। दुर्गा सप्तशती में महिषासुर, मधुकैटभ और शुम्भ-निशुम्भ के रूप में स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर में घुसे बैठे असुरों को आत्मशक्ति के द्वारा निरस्त करने की शिक्षा है। इस तरह संघर्ष आत्मिक प्रगति का मुख्य आधार है। भौतिक जीवन का तो कहना ही क्या? यहाँ प्रगति तो दूर अपने अस्तित्व को बनाए रखना भी बिना संघर्ष के सम्भव नहीं।
साधनावर्ष मनाया गया।इसका उद्देश्य एक लाख साधकों की चेतना में विशेष बल भरना था। इसी क्रम में सन 1976 में रजत जयन्ती पुरश्चरण सम्पन्न हुआ।
साधना सत्रों का क्रम अनवरत चलता रहा।सूक्ष्मीकरण साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के रूप में की गयी। आध्यात्मिक प्रयोगों का यह क्रम उन्होंने अन्तिम श्वास तक जारी रखा और अन्त में सूक्ष्म जगत में ‘इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य’ के अपने उद्घोष को साकार करने वह चल पड़े। इस तरह उनके जीवन का पल-पल आध्यात्मविद्या के बहुमूल्य प्रयोगों में व्यतीत हुआ।उनका आध्यात्म दार्शनिक सिद्धान्तों, प्रवचनों, तर्कों तक सीमित नहीं रहा।
साधना व मन दोनों ही दृष्टि से अबोध शिशु।” महर्षि अभी और कुछ सोचते कि इतने में जैसे सम्पूर्ण परिसर संगीत आह्लाद की क्रीड़ा में उल्लसित हो गया। “ओह कौशल्य” का स्वर कुछ इस तरह गूँजा मानो एक साथ अनेकों सुमधुर घण्टियाँ बज गयी हों। महर्षि को अभिवादन करने से पूर्व उन गोलोक धाम के अधीश्वर की दृष्टि अपने गुरुदेव के पीछे आते ऋषिकुमार पर पड़ी-अच्छे आये। हम सब आज तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे थे।
साधनाक्रम में सम्मिलित होने का निर्देश दिया। इसके परिणाम आश्चर्यजनक रूप से सामने आये। अष्टग्रही योग बिना किसी प्रकार का विशेष उपद्रव मचाते शान्त हो गया।
साधनाएँ आहार प्रार्थना यज्ञ प्राणायाम आदि के पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण अध्ययन करने का एक व्यापक तंत्र यहाँ आधुनिकतम उपकरणों के माध्यम से बनाया गया है। शान्तिकुँज में साधक ठहरते हैं व उनका माह में दो बार परीक्षण होता है। नित्य साधकों पर विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक प्रयोग भी यहाँ संपन्न होते रहते हैं। तीसरी मंजिल पर ब्भ् से अधिक ग्रन्थों वाली एक विशाल लाइब्रेरी है। विश्व भर में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर हुए कार्य शोध प्रबन्ध प्रकाशित पत्रिकाओं का यहाँ संकलन है।
साधनावधि में उनने स्वयं को पाँच सूक्ष्मशरीरों-पाँच वीरभद्रों के रूप में सक्रिय बनाकर युग-परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देने की बात कहीं। उनकी यह साधना रहस्य और रोमांच से भरी थी। इन पंक्तियों के लेखक को इस साधना का सौभाग्य मिला है। पूज्यवर के शब्दों में इसके विषय में सुनें तो-जिस आवास स्थली में-कोठरी में रहा जा रहा है, वहाँ तक एक दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है। उसमें जो प्रयोग चल रहे हैं, वे अद्भुत हैं।
साधना में, स्वप्नों में, रोजमर्रा के जीवन में ऐसा मार्गदर्शन अनुभूतियों के रूप में मिलता चला गया कि जिसका विवरण संकलित करने पर एक विशाल ग्रन्थ का निर्माण किया जा सकता है। विश्व के कुण्डलिनी जागरण (जिसका विवरण बाद में जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में प्रकाशित हुआ) तथा पाँच वीरभद्रों के उत्पादन के रूप में तीन वर्षीय सावित्री की साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना जो 1984 से 1987 तक चली, की अंतिम परिणति हुई। उनकी यह सावित्री साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी, रामनवमी 1984 से आरम्भ हुई एवं 1987 में राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही। यह ध्यान देने योग्य है कि दीपयज्ञों के माध्यम से विचारक्रान्ति अभियान को आगे बढ़ाते चलना-संस्कार सम्पन्न होते चलना एवं इन्हीं के द्वारा 1989 में प्रारम्भ बारह वर्षीय युगसन्धि महापुरश्चरण की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न होना यह पूज्यवर की अंतिम महत्वपूर्ण घोषणाएँ थीं।
साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के रूप में की गयी। आध्यात्मिक प्रयोगों का यह क्रम उन्होंने अन्तिम श्वास तक जारी रखा और अन्त में सूक्ष्म जगत में ‘इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य’ के अपने उद्घोष को साकार करने वह चल पड़े। इस तरह उनके जीवन का पल-पल आध्यात्मविद्या के बहुमूल्य प्रयोगों में व्यतीत हुआ।उनका आध्यात्म दार्शनिक सिद्धान्तों, प्रवचनों, तर्कों तक सीमित नहीं रहा। बल्कि अपने जीवन में उन्होंने विश्वामित्र, दधीचि, अगस्त्य, आदि प्राचीन ऋषियों की भाँति इसके लुप्त विज्ञान को प्रकट किया और विश्वहित के लिए इसके अनगिनत प्रयोग सम्पन्न किए।
साधना हेतु विदाई दी गयी। वंदनीया माताजी के लिए शाँतिकुँज हरिद्वार निर्धारित हो चुका था। पूज्यवर दुर्गम हिमालय चले गए जहाँ से वे हरिद्वार वापस क् वर्ष बाद लौटे। पुनः मथुरा लौटकर न जाने का संकल्प उनने अंत तक निभाया। जिनके कंधों पर गायत्री तपोभूमि संभालने का दायित्व सौंपा गया था उनके माध्यम से एक भव्य निर्माण अब वहाँ हो चुका है।
साधना कहते हैं। अपने मार्गदर्शक के आदेशानुसार उन्होंने सूक्ष्मीकरण-सावित्री साधना का शुभारम्भ 1984 की रामनवमी से कर दिया।
साधना-सत्रों का प्रारम्भ हुआ, साथ ही गायत्री महाअभियान का आयोजन और गायत्री उपासना के सामूहिक आयोजन किये जाने लगे। यज्ञ विद्या पर सर्वांगीण शोध के उद्देश्य से सन् 1955 की वसन्त पंचमी से 15 महीनों तक चलने वाले विशद् गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत (1) चारों वेदों का परायण, (2) महामृत्युँजय यज्ञ (3) रुद्र यज्ञ (4) विष्णु यज्ञ (5) शत चण्डी यज्ञ (6) नवग्रह यज्ञ (7) गणपति यज्ञ (8) सरस्वती यज्ञ (9) ज्योतिष्टोम (10) अग्निष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रतिक्रियाएं सम्मिलित थीं। यह विश्वहित के लिए सम्पन्न हुआ आध्यात्मिक प्रयोग था। गुरुदेव के शब्दों “इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्णफल प्राप्तकर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं है।
साधना आत्मिक चेतना और सविता चेतना के बीच तारतम्य स्थापित करने का मूलभूत आधार बनी, रामनवमी 1984 से आरम्भ हुई एवं 1987 में राष्ट्रव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के साथ राष्ट्रीय एकता सम्मेलन तथा फिर विराट दीपयज्ञ योजनों का सम्पन्न करने के रूप में समष्टि में ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के गगनभेदी उद्घोषों के रूप में चलती रही। यह ध्यान देने योग्य है कि दीपयज्ञों के माध्यम से विचारक्रान्ति अभियान को आगे बढ़ाते चलना-संस्कार सम्पन्न होते चलना एवं इन्हीं के द्वारा 1989 में प्रारम्भ बारह वर्षीय युगसन्धि महापुरश्चरण की प्रथम व द्वितीय पूर्णाहुतियाँ सम्पन्न होना यह पूज्यवर की अंतिम महत्वपूर्ण घोषणाएँ थीं।
साधना की फलश्रुति के रूप में उन्हें सदैव सही मार्गदर्शन मिलता रहा है। उन्हें अनपेक्षित सहयोग भी मिला है एवं आत्मबल संवर्द्धन के रूप में ऐसी पूँजी मिली है जिसने मानो एक सुरक्षा कवच चारों ओर प्रदान कर दिया हो। बहुत से प्राणवान परिजन पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण अवधि में ही उनके सूक्ष्मशरीर से प्रेरणा पाकर उनके दर्शन कर सतत् यही कहती रही कि युगधर्म की पुकार अनसुनी नहीं करनी है। अब शेष समय यदि भगवान के कार्य में लगाना है तो अभी ही छलाँग लगानी होगी। बहुत से परिजन इन्हीं दिनों शाँतिकुँज से बाहर गए भी-व्यक्तिगत कारणों से अथवा युग-चेतना के प्रवाह से तालमेल न बिठा पाने के कारण।
साधना में कुतर्कों के समूह-सजल श्रद्धा में एवं संशयाकुल चित्तवृत्तियाँ अटल-अडिग विश्वास में अपने-आप बदल जाते हैं। भगवत्कथा का अमृत-सिंचन तड़पते-कलपते छटपटाते जीवन को मधुर शान्ति एवं अपरिमित आनन्द से लबालब भर देता है।”
साधना की, उसे सूक्ष्म संरक्षण की दृष्टि से अत्यन्त शक्तिशाली एवं महत्वपूर्ण माना जायेगा।इस प्रयोग के अलावा शांतिकुंज में चान्द्रायण सत्र, कल्पसाधना सत्र एवं ब्रह्मवर्चस-साधना सत्र जैसे अनेकों प्रयोग वैयक्तिक चेतना के उत्कर्ष एवं उन्नति के लिए चलते रहे।
साधना-जब परमपूज्य गुरुदेव पाँच शरीरों के रूप में सूक्ष्मजगत में सक्रिय हो रहे थे की अवधि में दो तरह के प्रभाव देखे जा सकते हैं-एक समष्टिगत, दूसरा परिजनों की अनुभूतियों के रूप में, जिसे हम सूक्ष्मतम रूप में के स्तर पर मान लें। यहाँ उनका ही थोड़ा विस्तृत विवेचन करेंगे। यह विवेचन 1984 से 1997 की अंत तक की तेरह वर्षीय अवधि के एक समीक्षात्मक अध्ययन रूप में, विवरण रूप में प्रस्तुत किया जा रहा हैं।
साधना का शुभारम्भ 1984 की रामनवमी से कर दिया।
साधना सत्र एवं ब्रह्मवर्चस-साधना सत्र जैसे अनेकों प्रयोग वैयक्तिक चेतना के उत्कर्ष एवं उन्नति के लिए चलते रहे।
साधना के समय और उसके बाद शांतिकुंज में एकमासीय और नौदिवसीय साधना सत्रों का क्रम अनवरत चलता रहा।सूक्ष्मीकरण साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय यज्ञों के रूप में की गयी। आध्यात्मिक प्रयोगों का यह क्रम उन्होंने अन्तिम श्वास तक जारी रखा और अन्त में सूक्ष्म जगत में ‘इक्कीसवीं सदी का उज्ज्वल भविष्य’ के अपने उद्घोष को साकार करने वह चल पड़े। इस तरह उनके जीवन का पल-पल आध्यात्मविद्या के बहुमूल्य प्रयोगों में व्यतीत हुआ।उनका आध्यात्म दार्शनिक सिद्धान्तों, प्रवचनों, तर्कों तक सीमित नहीं रहा।
साधना मार्ग जानने आया था।” महर्षि का गदगद कण्ठ स्पष्ट नहीं था।”और वह आपका परम सामीप्य पा गया। मेरे सभी शिष्यों से अधिक सौभाग्यशाली।”
साधना द्वारा उत्कृष्ट बनाते थे, तब उसको भली प्रकार से जोती हुई भूमि में चमत्कारी, आध्यात्मिक विद्याओं की कृषि उगायी जाती थी। मात्र दार्शनिक ज्ञान एवं साधना सिद्धान्त जानने के बलबूते कोई व्यक्ति आत्मबल से सम्पन्न नहीं हो सकता-जन्त्र-मन्त्र से घटिया स्तर के लोग कुछ सिद्धि-चमत्कार प्राप्त भी कर लें तो उनके द्वारा घटिया प्रयोजनों की ही पूर्ति हो सकती है, लेकिन उनकी स्थिरता एवं सफलता भी स्वल्पकालिक और संदिग्ध बनी रहती है। यही कारण है कि प्रयोग करने पर भी लोगों को अध्यात्म विज्ञान के चमत्कारी लाभों से वंचित रहना पड़ता है। धूर्तता के आधार पर सिद्धि दिखाने और चमत्कार बताने की प्रवंचना कितने ही लोग करते रहते हैं और भले लोगों को बहकाते रहते हैं। पर वस्तुतः जो आत्मबल प्रकट करने और उसका उपयोग सिद्ध करने की चुनौती स्वीकार कर सकें, ऐसे लोग नहीं के बराबर हैं।
साधना के दौरान हुईं जिन्हें 1984-85 की अखण्ड-ज्योति के विभिन्न अंकों में प्रकाशित किया गया था। यहाँ कुछ संस्मरण उस समय उस के बाद की अवधि के हम दे रहे हैं, जो मात्र एक झलक देते हैं प्रज्ञावतार की उस दिव्यसत्ता की, जो सतत् हम सभी परिजनों के आस-पास है हमारे योगक्षेमं का वहन करने को तत्पर है।
साधना की अवधि में ही परमवन्दनीया माताजी के साथ चौबीस कुमारी कन्याओं द्वारा अखण्ड दीपक के समक्ष ख्ब् करोड़ गायत्री मंत्र जप का अनुष्ठान आरंभ कर दिया गया। इसी के साथ नारी जागरण अभियान की आधारशिला रखी गयी। पूज्यवर के एक वर्ष बाद हिमालय से लौट कर आने पर प्राण−प्रत्यावर्तन सत्रों की शृंखला चली। साधकों में प्राणऊर्जा का संचार कर गुरुदेव ने उन्हें भविष्य में महती भूमिका निभाने की प्रेरणा दी। धीरे−धीरे शान्तिकुँज विराट रूप लेने लगा।
साधना करने वाला महान साधक भी हो सकता है, सहसा विश्वास नहीं होता। भगवद् आराधना करने वाले किसी भी साधक में, संन्यासी में, मृत्यु से अठखेलियाँ करने का इतना प्रचण्ड दुस्साहस हो सकता है यह एक अनोखी बात लगती हैं, पर है सत्य। इन घटनाओं के संदर्भ में परमपूज्य गुरुदेव इतना ही कहा करते थे कि आत्मा की अमरता और मृत्यु को वस्त्र बदलने जैसी सामान्य घटना मानने की गीता की शिक्षा सदुद्देश्य के लिए बड़े से बड़ा दुस्साहस कर गुजरने की ही तो शिक्षा देती है।
साधना उनकी दधीचि स्तर की प्रचण्ड तप−साधना थी, जो अन्तिम श्वास तक अनवरत चलती रही।
साधना-पद्धतियाँ इसी कारण गुरु के माध्यम से ही सम्पन्न किये जाने पर सफल होती है। आत्मिक प्रगति का क्षेत्र वस्तुतः एक जीवन-समर महाभारत के सदृश है। यह उपक्रम प्रवाह के विरुद्ध है। ऊंचा उठना-गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध चलना एक बहुत बड़ा काम है- इसके लिये एक बड़ी ताकत की जरूरत पड़ती है। समर्थ गुरु की प्रथम प्रक्रिया या दीक्षा इसीलिये अनिवार्य बतायी गयी है।
साधना करने दलित वर्ग के पिछड़े वर्ग के समुदाय में जाकर उनकी सेवा करने के रूप में दिखाने लगा। हिमालय की तीव्र पुकार एक दिन घर से भगाकर काठगोदाम तक ले गए जहाँ से संबन्धी वापस ले आए। क्ख् वर्ष की आयु में मदनमोहन मालवीय जी से दीक्षा लेकर गायत्री ब्राह्मण को कामधेनु है का शिक्षण प्राप्त कर बालक श्रीराम ने क्भ् वर्ष की आयु में अपनी मार्गदर्शक सž से साक्षात्कार किया एवं जीवन की राह गन्तव्य अपना वास्तविक स्वरूप सभी का बोध हो गया।
साधना करते हैं। आहार नहीं लेंगे तो कमजोरी आ सकती है, यह कहने पर गुरुदेव ने कहा था कि आकाश तत्त्व से जो भी ग्रहण करना होता है वे ग्रहण कर लेते हैं, क्योंकि सूक्ष्मीकरण प्रयोग हेतु स्थूल आहार उनके लिए महत्त्वहीन है। किसी भी चिकित्सक या वैज्ञानिक के लिए यह आश्चर्यजनक तथ्य हो सकता है कि कोई बिना आहार के अपनी वृद्ध-काया के साथ कैसे कब तक जीवित रह सकता है। किन्तु जैसा पूर्व में कहा गया कि 1961 में हिमालय से लौटने के बाद से ही भविष्यत् की तैयारी के निमित्त उनकी सारी साधना नियोजित थी। सूक्ष्मीकरण की सावित्री साधना उनकी दधीचि स्तर की प्रचण्ड तप−साधना थी, जो अन्तिम श्वास तक अनवरत चलती रही।
साधना रूपी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग यह शब्दावली परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी से सतत् इस अवधि के बाद काफी जोर देकर एक चेतावनी-एक मार्गदर्शन के रूप में सभी परिजनों को मिलने लगी थी। अपने तृतीय हिमालय प्रवास व हमेशा के लिए गायत्री तपोभूमि छोड़ने की बात वे 1962 से ही कहते आ रहे थे यह 1971 के बाद भी जारी रहा, साथ ही उनकी साधकों के निर्माण की प्रक्रिया भी जारी रही। उनका एक ही उद्देश्य था-समष्टि का हितसाधन, सृष्टि की विकासात्मक भवितव्यता को गति देना। उसी दिशा में एक विशेष प्रयोग उनके द्वारा सिद्ध स्थली शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ में 1984 से 1987 के दौरान चली सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान सम्पन्न हुआ। इसी साधनावधि में उनने स्वयं को पाँच सूक्ष्मशरीरों-पाँच वीरभद्रों के रूप में सक्रिय बनाकर युग-परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देने की बात कहीं।
साधना का मार्ग दिखा गए। ऐसा कहा जाता है कि गुरुदेव पाँच शरीरों से जीते थे। कई घटनाक्रम ऐसे मिले हैं जिनसे ज्ञात होता है कि जिन तिथियों में वे किसी स्थान पर थे उसी समय अपनी लीला कहीं और भी किसी को परामर्श देने के रूप में एवं कहीं प्रवचन देने के रूप में दिखा रहे थे। वे एक दीखते हुए भी पाँच थे- परम वन्दनीया माताजी जिन्हें उनकी अभिन्न सहचरी होने का अवसर मिला है-लिखती हैं-मैं नहीं जानती कि इन घटनाओं में कितनी सच्चाई थी, पर इतना अवश्य कह सकती हूँ के वे जीवन भर पाँच शरीरों के जितना भिन्न-भिन्न प्रकार के पाँच कार्यों का सम्पादन एक साथ करते थे।” वे लिखती हैं कि उनके स्थूल शरीर की उपलब्धि देखकर नहीं लगता कि एक व्यक्ति एक शरीर से इतना काम कभी कर सकता है।
साधनामय कहा जा सकता है। योगी सिद्धपुरुष दिव्यदृष्टि सम्पन्न होते हैं। उन्हें आने वाले हर परिवर्तन, काल की चाल का अहसास सतत् होता रहता है। अपने द्वितीय हिमालय प्रवास (1959-1961) से लौटकर आने के बाद से ही, जब उन्होंने ‘युगनिर्माण योजना’ के शुभारम्भ की घोषणा की-पंचकोशी साधना भी गायत्री तपोभूमि से अखण्ड-ज्योति के मार्गदर्शन के माध्यम आरम्भ करा दी थी। उनकी इस हिमालय यात्रा में सम्पादन का दायित्व परमवन्दनीया माताजी को सौंपा गया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-January
साधना की सफलता और भी सत्त्वर हो उठती है।
साधनाएँ जुड़ी है।
साधना एवं समाज सेवा में पूरी तरह समर्पित कर दिया और अनेकों की प्रेरणा स्त्रोत बनी। अतः देखा जाय जात तो जीवन में पूर्ण असफलता नाम की कोई चीज नहीं है। जब हम स्वयं को एक असफल व्यक्ति मान बैठते हैं तो हम अपनी उन्नति की समस्त सम्भावनाओं के द्वारा बन्द कर देते हैं।
साधना के बाद वसन्त पर्व पर वे सबसे मिलने लगे थे। कुछ कारणों वश इसका प्रकाशन तब रोक दिया गया था। निर्देश दिए गए थे कि यह लेख सुरक्षित रखा जाए। जब ऐसी मनोवृत्ति बढ़ती दिखाई दे, तब इसे प्रकाशित करें। आज जब गायत्री परिवार प्रसिद्धि के शिखर पर है, ऐसी मनोवृत्ति वाले व्यक्ति भी बढ़ते दिखाई देते हैं जो भिन्न-भिन्न मायावी रूपों में स्वार्थ सिद्धि ही अपना लक्ष्य मानकर कुछ भी कर गुजरने से बाज नहीं आ रहे।
साधना विधान नहीं है।
साधना पद्धति का मूल आधार वाक् की ही अवधारणा है। इस संदर्भ में ऋग्वेद का देवी सूक्त या वागाम्भूण्ी सूक्त (मण्डल 10 सूक्त, सूक्त 125) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वैदिक इतिहास के अनुसार महर्षि अम्भूण की पुत्री वाक् इसकी मंत्रदृष्टा ऋषि थी। यह सूक्त पराशक्ति के विश्व रूप का दर्शन कराता है। सूक्त के कतिपय मंत्र दृष्टव्य हैं-
साधना इसी मायावी वरदान को प्राप्त करने में लगी थी। कालनेमि ने ही सूर्पणखा को रूपवती बनाकर राम की उपपत्नी बन जाने की पट्टी पढ़ायी थी। इसके बाद इसी की चतुराई थी कि रावण को सीता हरण के लिए तैयार किया। मारीचि स्वर्ग जाने का वरदान चाहता था। उसे स्वर्ण-मृग बनने का वरदान माँगने के लिए सहमत कर लिया।
साधना भी साथ-साथ चलती थी। बीच-बीच में सामूहिक धर्मानुष्ठान भी होते थे इससे वहाँ का स्थापत्व पुरुष जाग्रत हो उठता और भूमि में आकर तीर्थ सेवी शुद्ध अन्तः करण से कोई सात्विक कामना करें, तो वह पूरी हुए बिना नहीं रहती। इसीलिए उन दिनों प्रायश्चित प्रक्रिया ऐसे ही तीर्थों में आकर करने का विधान था, ताकि वहाँ के जीवन्त तीर्थदेव के सम्मुख दोष प्रकटीकरण और दण्ड स्वरूप स्वेच्छया तितीक्षा ग्रहण कर क्षमा याचना की जा के। तीर्थ चेतना से काफी माँगना प्रकारान्तर से भगवद् चेतना से ही क्षमा माँगने के समान है। निष्कपट अन्तरात्मा से जब अपने किये पर वास्तविक पश्चाताप उभरता है, तो वह उसे सुनती स्वीकारती और उसमें रियायत भी करती है।
साधना विज्ञान एवं व्यावहारिक अध्यात्म की परिधि में आने वाले सभी विषयों को अपनी परिधि में आने वाले सभी विषयों को अपनी परिधि में हुए एक व्यापक परिभाषा वाली विधा है। इन सभी की विज्ञान की कसौटी पर कसते हुए कैसे प्रस्तुत किया जाय, जबकि संस्कृति स्वयं में एक विज्ञान है? दृश्य-श्रव्य साधनों द्वारा यदि संस्कृति के विभिन्न घटकों का विज्ञानसम्मत विवेचन प्रत्यक्ष कर दिखा दिया जाये तो इस दुनिया का हल निकल आता है। यही तथ्य ध्यान में रख युग ऋषि परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य जो कि आज के युग के सर्वोत्कृष्ट वैज्ञानिक भी माने जा सकते है-के शाश्वत चिन्तन की संस्कार महोत्सवों में ज्ञानयज्ञ के माध्यम से विराट प्रदर्शनी के रूप में एक अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया गया है।
साधना कर रहे है। एक दिन करते-करते साल जब पूरा हो गया, तब भैरव जी ने दर्शन दिए, उन्होंने कहा-”जिसका तू जप कर रहा है, वह मैं ही हूँ। हमारा नाम भैरव है और हम आ गए। अब तू हमसे वरदान माँग।” उन्होंने कहा कि “पहली माँग तो यह है कि आप मुझे यह यकीन करा दीजिए कि आप भैरव ही है।
साधना से राजनीति का प्रधान समन्वय करके यह प्रस्तुत करते रहे है कि धर्म और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक है। लोकमान्य तिलक, महामना मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द जैसे धर्मवेत्ता मनीषियों को भी अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखा। इसमें उनकी धार्मिकता घटी नहीं वरन् प्रखर एवं समुज्ज्वल ही होती चली गई।
साधना को श्रेय देते हैं। अनेकों को जी व्यक्तिगत लाभ मिले है और वातावरण बदलने वाले जो प्रयास चले है, उनके पीछे इसी युग्म की भावभरी चर्चा करते हैं। पर वस्तुतः बात वैसी है नहीं। यह सदा समझा जाता है कि कठपुतली के खेल में लकड़ी के खिलौने उचकते-मचकते भर है, उनके पीछे किसी बाजीगर की सधी हुई अदृश्य उँगलियाँ काम कर रही है। नियन्ता की युग परिवर्तन आकांशा ही योजना का एकमात्र कारण है।
साधनाएँ करने का जो विधान है, वह सूर्य की इस आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक शक्ति का खोज का ही फल है एवं पूर्णतया विज्ञानसम्मत है।
साधना करने वाले एक व्यक्ति है और तेरह वर्ष तक गायत्री की उपासना करते रहे। लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला, हम बहुत खिन्न है और यह सोचते हैं कि उपासना से कोई लाभ नहीं हैं खासतौर से गायत्री का कोई फल नहीं हो सकता, ऐसे हमारे विचार है। महात्माजी हँसने लगे। उन्होंने कहा-अच्छा एक काम कीजिए, गायत्री के बारे में तो हमारी कोई जानकारी नहीं है, हम तो ताँत्रिक और कापालिक विद्याओं को जानते हैं, तू ताँत्रिक और कापालिक विद्या को सीख ले, एक साल के अन्दर तुझे कुछ चमत्कार दीखने लगेंगे, अनुभव हो जाएगा तथा चमत्कार दीखने पर तेरा विश्वास बढ़ जाएगा। इसलिए चमत्कार दिखाने की की दृष्टि से तुझे हम एक साल की ताँत्रिक उपासना करने की सलाह देते हैं।
साधना एवं ईश्वर के प्रति आत्म-समर्पण की तरह ही अपना सर्वस्व राजनीति की सदाशयता की ओर मोड़ने के प्रयास में उत्सर्ग कर दिया।
साधना को ही सब कुछ मानकर चलना चाहिए। वैसी ही हुआ माधवाचार्य अपने गुरु के कहने के मुताबिक सब कुछ करते रहे। जो कोई आते रहे, सबको फटकारते रहे-आप लोग चले जाएँ हम तो साधना कर रहे है। एक दिन करते-करते साल जब पूरा हो गया, तब भैरव जी ने दर्शन दिए, उन्होंने कहा-”जिसका तू जप कर रहा है, वह मैं ही हूँ। हमारा नाम भैरव है और हम आ गए।
साधना को फिर करने लगे। गायत्री उपासना चौदहवाँ वर्ष जो उन्होंने किया, उसका परिणाम मिला, गायत्री का साक्षात्कार हुआ। गायत्री महाशक्ति ने पूछा क्या वरदान चाहते हो? तो माधवाचार्य ने कहा-मैं कोई अजर-अमर ऐसा काम करके दिखा दूँ, जिससे दुनिया मुझे याद करती रहे। उन्होंने फिर ‘माधवनिदान’ नाम का प्रख्यात ग्रन्थ लिखा।
साधनाओं के माध्यम से विषाक्त वायुमण्डल-वातावरण को बदलने के लिए प्रज्ञा पुरश्चरण की प्रक्रिया इन दिनों चल रही है। उसमें 24 लाख व्यक्ति भागीदार हैं और प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जप सम्पन्न करते हैं। हरीतिमा संवर्द्धन का जन-आन्दोलन भी साथ-साथ चल रहा है सामूहिक धर्मानुष्ठानों के इतिहास में इसे अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है।
साधनात्मक ऊर्जा से सम्पन्न व्यक्तित्व सहज की अपने मन में प्रतिबिम्बित कर लेता है। ऐसे प्रयास हमेशा से होते रहे हैं, भले ही उनका यन्त्रीकरण न किया जा सका हो। विख्यात खगोलशास्त्री डेविडसन ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट पिरामिड इट्स डिवाइन मैसेज’ में मिश्र के कतिपय उन भविष्यवेत्ताओं के भविष्य-कथनों को संकलित किया है, जो उन्होंने पिरामिडों में अंकित किए। ये अंकन प्रतीकों के रूप में हैं। डेविडसन का अपनी पुस्तक में मानना है कि इन पिरामिडों पर पृथ्वी के जन्मकाल से लेकर प्रलय तक की घटनाएँ अंकित हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-August
साधना के सभी सरंजाम भी जुटाते रहे और इस तरह एक सुबह वे शान्तिकुञ्ज छोड़कर कब चले गए, सम्भवतः यह वंदनीया माताजी के अतिरिक्त किसी को भी पता नहीं चल पाया। शान्तिकुञ्ज भी मथुरा की तरह उसी तरह शोक-सागर में डूब गया, जिस तरह किसी दिन भगवान् श्रीराम के तमसा तट पर अयोध्यावासियों को सोते छोड़कर चले जाने के बाद अयोध्या शोक में डूब गई थी।
साधना में तीसरा अनिवार्य अभ्यास लययोग का है। इसमें शरीर अभ्यास को आत्मसत्ता के साथ समर्पित-विसर्जित करना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य अपने आपको शरीर भर मानता है और उसी की इच्छा, आवश्यकता पूरी करने में जुटा रहता है। आत्मा को, उसके स्वरूप, लक्ष्य एवं उत्तरदायित्व को तो एक प्रकार से विस्मृत ही किए रहता है। यह वह भटकाव है जिसे मायापाश, भवबन्धन आदि नामों से पुकारते हैं।
साधना द्वारा इस ग्रन्थि को नियमित कर मनुष्य अपने स्थूल, सूक्ष्म एवं आत्मिक आवरणों का परिमार्जन कर सकता है, पूर्ण मानव बन सकता है।
साधनाओं के आधार पर इन तीनों क्षेत्रों को अधिक परिष्कृत, आधिक प्रखर एवं अधिक समर्थ बनाया जा सकता है।
साधना बड़ी मात्रा में करते हैं, जो प्रतिदिन कितने ही लक्षमंत्र जप के समकक्ष हो जाती है।
साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था।
साधना में प्रवृत्त हुए और आज से ठीक अर्द्धशताब्दी पूर्व उन्हें अपनी साधना का सुफल राश्ट्र की स्वतन्त्रता के रूप में मिला। कृतज्ञ राश्ट्र ने उनसे इस अवसर पर विशेष सन्देश देने का अनुरोध किया।
साधना को बिन्दुयोग कहते हैं। इसी का एक नाम त्राटकसाधना भी है।
साधनाओं का प्रयोजन अपने भीतर की महानता को विकसित करना है। बाहर व्यापक क्षेत्र में भी यों तो देवशक्तियाँ विद्यमान है, पर उनके लिए समष्टि विश्व की देखभाल का विस्तृत कार्यक्षेत्र नियत रहता है। मनुष्य की भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करने, सफलता और वरदान देने का कार्य उनके वे अंश ही पूरा करते हैं, जो बीज रूप में हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान है। इन्हें जाग्रत कर समष्टिगत विश्वव्यापी देवतत्वों के साथ सम्बन्ध जोड़ना, आकर्षित करना और उनका सहयोग-अनुग्रह प्राप्त करना जिस साधना-पद्धति के सहारे बन पड़ता है, योगशास्त्रों में उसे कुँडलिनी जागरण के नाम से सम्बोधित किया गया है।
साधना के कारण प्रख्यात हुए। तपस्वी ही वहाँ ऐसा वातावरण बनाते थे, जिसमें कुछ समय निवास करने वाले अपने में उत्साहवर्द्धक परिवर्तन का अनुभव करते कर सकें। सेनेटोरियम स्वास्थ्य सुधारते हैं। पर तीर्थों में आन्तरिक परिशोधन- परिष्कार की कायाकल्प जैसी जैसी सुविधा हर श्रद्धालु को मिलती थी। शान्तिकुञ्ज-गायत्री तीर्थ को उसी पूर्व परम्परा की अनुकृति बनाने का सूत्र-संचालक सत्ता द्वारा प्रयत्न किया गया है।
साधना है। उस आधार पर दिव्य ध्वनियों को सुनने का अभ्यास किया जाता है और ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अदृश्य रहस्यों को जाना जाता है। अपनी आन्तरिक स्थिति का विश्लेषण-पर्यवेक्षण करने एवं प्रकृति की सामयिक हलचलों का कारण समझकर अपनी ज्ञानपरिधि को अत्यधिक व्यापक बनाया जा सकता है। इसी आधार पर भूतकाल के स्मृतिकम्पन एवं भविष्य में घटित होने वाले प्रकरणों का पूर्वाभास सम्भव हो जाता है। नादयोग की शब्द साधना को “कालजयी” कहा जाता है।
साधना अपने अन्तरंग क्षेत्र में ही करनी पड़ती है और उसकी सफलता जब मेघमालाओं की तरह बरसती है तो अगणित दिव्य-विभूतियाँ-सिद्धियाँ स्वयमेव प्रस्फुटित और पल्लवित होती हैं।
साधना और तदनंतर गायत्री जयंती २ जून, १९९० को परमपूज्य गुरुदेव ने अपनी स्थूल गतिविधियों को विराम दिया तो एक बार फिर लोगों को लगा, अब इस मिशन का क्या होगा ? महाप्रयाण से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि वे अभी अपना स्थूल शरीर भर छोड़ रहे हैं, लम्बे समय तक वे अपने सूक्ष्मशरीर से शान्तिकुञ्ज में बने रहेंगे और सत्र-संचालन अपने हाथ में बनाये रखेंगे। डाक्टर्स भी इस बात की पुष्टि करते हैं, जब तक मस्तिष्क गर्म रहे तब तक ‘क्लिनिकल डेथ’ घोषित नहीं की जाती सो शान्तिकुञ्ज स्थित उनकी सक्रियता एक प्रश्न रहित यथार्थ है। इस सच को लाखों लोगों ने १९९१ के श्रद्धाञ्जलि समारोह में देखा। रोते हुए अर्जुन को अपना विराट् स्वरूप दिखाकर भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध के लिए जिस तरह सहमत किया, उसी तरह देवसंस्कृति संग्राम के लिए परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म सत्ता न गायत्री परिवार रजामंद किया।
साधनाओं में इनका प्रतिफल मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष के रूप में मिलता है। बंध कुल तीन हैं। मूल बंध, जालंधर बंध, उड्डियान बंध। सुषुम्ना नाड़ी में प्राण के स्वतन्त्र प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करने वाली ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा रुद्रग्रन्थि इन अभ्यासों से शीघ्र खुल जाती है। बंध मुख्यतः प्राण-प्रवाह के नियंत्रण हेतु किए जाते हैं, जिनका सुनियोजन ध्यान प्रक्रिया द्वारा किया जाता है।
साधनाओं के संदर्भ
साधना भी कहा जाता है। नादयोग को अनाहतध्वनि भी कहते हैं। लययोग का आत्मदेव-साधना कहते हैं। छाया-पुरुष जैसे अभ्यास इसी के अंतर्गत आते हैं। स्थूलशरीर के साथ लययोग, सूक्ष्म के साथ बिन्दुयोग और कारण-शरीर के साथ नादयोग का सीधा सम्बन्ध है।
साधना की आशाजनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अन्तरंग में अवस्थित देवअंश पोषण के अभाव में भूखा-नंगा रोगी-दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधिपूर्वक मंत्र, जप आदि करते हुए भी समुचित लाभ न उठा सकेगा।
साधना के बारे में कुछ व्यावहारिक सवाल पूछे, जिनका उत्तर उस शास्त्रज्ञ शिष्य से देते न बन पड़ा। किन्तु आत्मसाधना एवं लोकसेवा में समान भाव लगे शिष्यों ने व्यवहारिक अनुभव के आधार पर सटीक उत्तर दिए, जिन्हें सुनकर अहंकारी विशय का सारा ज्ञानाभिमान गल गया। तभी महात्मा बुद्ध ने उसे समझाते हुए कहा-ज्ञान का वास्तविक स्त्रोत शास्त्र नहीं वरन् आत्मसाधना एवं लोकसेवा से पवित्र हुआ अन्तःकरण है। पवित्र अन्तःकरण में समस्त ज्ञान स्वतः स्फूर्त होता रहता है।”
साधना-आरण्यक है, जहाँ शासक भी गायें चराते और गोबर साफ करते हैं। ऐसे स्वयंसेवक बनाकर किसी को भी लाया जा सकता है अन्यथा ऐसे व्यक्ति इन सत्रों में नहीं ही लेकर आएँ।
साधना और समर्पण की प्रबलता है एवं जो ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानते हैं, उनकी मति-गति इस दूसरी अवस्था की ओर होगी ।
साधना की उद्देश्य पूर्ति होती है।
साधना का व्यावहारिक सत्र शिक्षण, जड़ी-बूटी उद्यान, अन्तर्ग्रही सूत्र-सम्बन्ध जोड़ने वाली वेधशाला जैसी अनेकों गतिविधियाँ यहाँ चलती हैं जिनके प्रभाव से गायत्री तीर्थ के वातावरण में प्राचीनकाल के तीर्थों जैसी विभूतिवान् विशेषताएँ विद्यमान हैं-वह प्रत्यक्ष है। परोक्ष वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा सप्तऋषियों का प्रतीक-पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की सूक्ष्म सत्ता की तपश्चर्या अपना विशेष संरक्षण व प्रभाव उत्पन्न करती है। यही कारण है कि यहाँ के सत्रों में सम्मिलित होने वाले वापस लौटने पर अपने में असाधारण परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं। चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में ऐसी उथल-पुथल हुई देखते हैं, जिसे कायाकल्प के समतुल्य कहा जा सके।
साधना कर ली है।
साधना एवं लोकसेवा में समान भाव लगे शिष्यों ने व्यवहारिक अनुभव के आधार पर सटीक उत्तर दिए, जिन्हें सुनकर अहंकारी विशय का सारा ज्ञानाभिमान गल गया। तभी महात्मा बुद्ध ने उसे समझाते हुए कहा-ज्ञान का वास्तविक स्त्रोत शास्त्र नहीं वरन् आत्मसाधना एवं लोकसेवा से पवित्र हुआ अन्तःकरण है। पवित्र अन्तःकरण में समस्त ज्ञान स्वतः स्फूर्त होता रहता है।”
साधनाओं का आधार भी कुण्डलिनी ही है। जब गुरु की कृपा से सोई हुई कुण्डलिनी जागती है, तब सम्पूर्ण षट्चक्र और ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं और उसी समय प्राण की शून्य पदवी सुषुम्ना, राजपथ के समान हो जाती है, चित्त विषयों से रहित हो जाता है और मृत्यु का भय मिट जाता है।”
साधना काल में इन निष्कर्षों पर पहुँच जाना चाहिए। (१) सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन को अलभ्य सौभाग्य माना जाए और उसकी सार्थकता के लिए उस अवधि को आत्मकल्याण और लोकमंगल के लिए निरत रखा जाए। (२) शरीर को ही सब कुछ न माना जाए। आत्मा का भी हित सोचा जाए। अपनी क्षमताओं तथा सम्पदाओं का उपयोग आत्मकल्याण के निमित्त आवश्यक पुण्य-परमार्थ में भी उपयुक्त मात्रा में नियोजित रखा जाए।
साधना एवं लोकसेवा से पवित्र हुआ अन्तःकरण है। पवित्र अन्तःकरण में समस्त ज्ञान स्वतः स्फूर्त होता रहता है।”
साधना में लगी रहेगी। वर-वधू की सहमति देखकर उनके अभिभावकों ने भी स्वीकृति दे दी। सावित्री भी अपने पति सत्यवान के साथ उसी वनप्रदेश में रहने लगी और उन्हीं के क्रियाकलाप में पूरी तरह सहयोग करने लगी ।वह भी पितृसेवा में निमग्न होकर लोककल्याण के कार्यों में निरत रहने लगीं।
साधना से भी उस छाया साधना की उद्देश्य पूर्ति होती है।
साधना यहीं की, एवं प्रख्यात प्रस्थानत्रयी यहीं लिखा था। गौतम बुद्ध, महावीर, ज्ञानानन्द, अशोक, कालीदास, गुरुनानक, कबीर, आदि महापुरुषों ने कभी हिमालय में ज्ञान साधना की थी। सम्राट चन्द्रगुप्त ने राष्ट्रोद्धार का चिन्तन यहाँ के एकान्त एवं शान्त वातावरण में आकर किया था। समर्थ गुरु रामदास को राष्ट्र को संगठित करने एवं एकता के सूत्र में बाँधने की प्रेरणा-शक्ति इसी आद्य स्थान में रामदूत हनुमान से मिली थी। स्वामी विवेकानन्द एवं स्वामी रामतीर्थ ने सनातन धर्म को विश्व व्यापी बनाने की विचारणा तपोभूमि हिमालय की गोद में बैठ कर की थी।
साधना वर्ग समारोह
साधना की थी। सम्राट चन्द्रगुप्त ने राष्ट्रोद्धार का चिन्तन यहाँ के एकान्त एवं शान्त वातावरण में आकर किया था। समर्थ गुरु रामदास को राष्ट्र को संगठित करने एवं एकता के सूत्र में बाँधने की प्रेरणा-शक्ति इसी आद्य स्थान में रामदूत हनुमान से मिली थी। स्वामी विवेकानन्द एवं स्वामी रामतीर्थ ने सनातन धर्म को विश्व व्यापी बनाने की विचारणा तपोभूमि हिमालय की गोद में बैठ कर की थी।
साधना को “कालजयी” कहा जाता है। ऋषियों को दृष्टा, त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ आदि की सिद्धियाँ इसी आधार पर उपलब्ध होती थीं।
साधना कहते हैं। छाया-पुरुष जैसे अभ्यास इसी के अंतर्गत आते हैं। स्थूलशरीर के साथ लययोग, सूक्ष्म के साथ बिन्दुयोग और कारण-शरीर के साथ नादयोग का सीधा सम्बन्ध है। इन साधनाओं के आधार पर इन तीनों क्षेत्रों को अधिक परिष्कृत, आधिक प्रखर एवं अधिक समर्थ बनाया जा सकता है।
साधनाओं व उपयुक्त प्राणायामों के सम्मिश्रण के साथ किया जाता है तो साधक अपने में अप्रत्याशित परिवर्तन पाते हैं।
साधनाओं के लिए मात्र या-कृत्य या कर्मकाण्ड ही सबकुछ नहीं होते। उसके लिए उपयुक्त वातावरण भी चाहिए। बीज कितना ही उत्तम क्यों न हो, पर उसे विकसित- पल्लवित करने का अवसर तभी मिलता है जब भूमि उपजाऊ हो। खाद-पानी की व्यवस्था हो और देख-रेख करने वाले व्यक्ति का संरक्षण मिले। विशेष क्षेत्र में विशेष प्रकार के फल, शाक, अन्न, पुष्प, वृक्ष-वनस्पति जीव-जन्तु आदि जन्मते हैं।
साधना-पद्धति के सहारे बन पड़ता है, योगशास्त्रों में उसे कुँडलिनी जागरण के नाम से सम्बोधित किया गया है।
साधना आरम्भ करने के बाद और भी अधिक गई-गुजरी स्थिति में चले गये। न तो उनमें कोई प्रत्यक्ष विशेषता देखी गयी, न आत्मिक महत्ता, न उन्हें सुख प्राप्त था, न शान्ति। स्वास्थ्य से लेकर सम्मान तक कोई भी सम्पदा उनके पास नहीं थी और न विवेक से लेकर आत्मबल तक कोई प्रतिभा-विशेषता उपलब्ध हुई, वरन् जिस स्थिति में उन्होंने वह उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई, पीछे उनकी स्थिति हर प्रकार बिगड़ती ही चली गयी। भौतिक सुख-सम्पत्ति ना सही, आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता, तो भी संतोष किया जा सकता था, पर वैसा भी वे कुछ ना प्राप्त कर सके।
साधना तपस्या, श्रम व शक्ति ही हमारे स्वतन्त्र भारत को महान् बनाएगी। अपने नवनिर्माण के अवसर पर भारतमाता तपस्वियों, संन्यासियों को ही नहीं बल्कि समस्त शक्तिसम्पन्न लोगों की आत्माओं का आह्वान कर रही है।
साधना द्वारा अतीन्द्रिय क्षमताएँ जाग्रत करने एवं सिद्धि सम्पन्न बनने के जो सर्वमान्य नियम दिये गये है, उनके सिवाय अध्यात्म-विद्या-विशारदों ने इस मार्ग में शीघ्र प्रगति करके कुछ महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त कर लेने की जो विधियाँ निकाली हैं, उनमें “कुण्डलिनी योग” का विशेष स्थान है। कुण्डलिनी जागरण से शरीर में एक शक्ति का आविर्भाव होता है, जिससे मनुष्य की चैतन्यता बहुत अधिक बढ़ जाती है और वह जब चाहे तब स्थूल संसार की अपेक्षा सूक्ष्म जगत की स्थिति का अनुभव कर सकता है और सीमित क्षेत्र में आबद्ध रहने के बजाये विराट विश्व की गतिविधियों को देखने लगता है। जाग्रत कुण्डलिनी मनुष्य को सब प्रकार की शक्तियाँ , विद्या और अन्त में मुक्ति प्राप्त कराने का साधन होती हैं।
साधना को आज्ञाचक्र का जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन कहा जाता है। दोनों नेत्रों के बीच मस्तक के भृकुटी भाग में सूक्ष्मतम स्तर का तृतीय नेत्र है। भगवान शंकर की, देवी दुर्गा की तीन आँखें चित्रित की जाती हैं। दो आँखें सामान्य-एक भृकुटी स्थान पर दिव्य। इसे ज्ञानचक्षु भी कहते हैं।
साधनाओं के साथ ही चक्रों पर सूक्ष्म प्रभाव डालने वाले बंध अभ्यासों की चर्चा भी अभीष्ट हैं। ध्यानयुक्त साधनाओं में इनका प्रतिफल मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष के रूप में मिलता है। बंध कुल तीन हैं। मूल बंध, जालंधर बंध, उड्डियान बंध। सुषुम्ना नाड़ी में प्राण के स्वतन्त्र प्रवाह में अवरोध उत्पन्न करने वाली ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा रुद्रग्रन्थि इन अभ्यासों से शीघ्र खुल जाती है।
साधना के समय अपने स्वरूप के भीतर ही परमात्मा की सत्ता का अनुभव-अभ्यास किया जाता है। अपने चेहरे पर सज्जा-सौन्दर्य की नहीं, एक विशेष दृष्टि डाली जाती है कि इस माँस-पिण्ड के भीतर स्रष्टा का प्रतिनिधित्व करने वाली आत्मसत्ता विद्यमान है। वही इस काया की अधिष्ठात्री है। उसी का उत्कर्ष परम लक्ष्य है। काया उसी प्रयोजन की पूर्ति का वाहन, साधन, उपकरण मात्र है।
साधना और जनसेवा में लगे रहते थे, उन्हें वह अपनी तुलना में कम पढ़ा-लिखा और तुच्छ समझता और यदा-कदा उन सबको निरक्षर भट्टाचार्य कहकर चिढ़ता रहता। एक दिन तथागत ने उसे बुलाकर शील, संयम, तप और साधना के बारे में कुछ व्यावहारिक सवाल पूछे, जिनका उत्तर उस शास्त्रज्ञ शिष्य से देते न बन पड़ा। किन्तु आत्मसाधना एवं लोकसेवा में समान भाव लगे शिष्यों ने व्यवहारिक अनुभव के आधार पर सटीक उत्तर दिए, जिन्हें सुनकर अहंकारी विशय का सारा ज्ञानाभिमान गल गया। तभी महात्मा बुद्ध ने उसे समझाते हुए कहा-ज्ञान का वास्तविक स्त्रोत शास्त्र नहीं वरन् आत्मसाधना एवं लोकसेवा से पवित्र हुआ अन्तःकरण है। पवित्र अन्तःकरण में समस्त ज्ञान स्वतः स्फूर्त होता रहता है।
साधना करके अपने गणेश को परिपुष्ट बना लेगा, वह विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जड़ में पानी नहीं देगा उसके विनायक भगवान सूखे, मूर्छित एक कोने में पड़े रहेंगे। लड्डू-खीर खिलाने, स्तोत्र-पाठ करने पर भी वे कुछ सहायता नहीं कर सकेंगे। बुद्धिमान और विद्वान बनना सम्भव न होगा। यही बात अन्य देवशक्तियों के बारे में भी है।
साधना तपश्चर्या सफल नहीं हो सकती।
साधना सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों द्वारा सम्पन्न की जाती है। खुले कान तो एक सीमा तक की समीपवर्ती प्रत्यक्ष ध्वनि ही सुन पाते हैं, किन्तु सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों में ज्ञानातीत दिव्य ध्वनियाँ सुनने की भी क्षमता है। प्रकृति का मूल “शब्द” है। शब्द को ब्रह्म भी कहा गया है। नादयोग में इसी शब्दब्रह्म की साधना है।
साधनाओं की पहुँच है, उनमें (९) बिन्दुयोग (२) नादयोग (३) लययोग को प्रमुख माना गया है । इनमें मान्यता, भावना एवं आकांक्षा क्षेत्रों में सुधार-परिवर्तन कर सकने की विशिष्ट क्षमता है।
साधना का सुफल राश्ट्र की स्वतन्त्रता के रूप में मिला। कृतज्ञ राश्ट्र ने उनसे इस अवसर पर विशेष सन्देश देने का अनुरोध किया।
साधना भी है।
साधना को भी जारी रखता। सावित्री ने उसी जंगल में डेरा डाला। युवक से संपर्क बढ़ाया और उसके व्यक्तित्व को परखा। उसने उसी से विवाह करने का निश्चय कर लिया। पति के साथ रहकर वह भी श्रम करेगी और सेवा - साधना में लगी रहेगी।
साधना से अपने समतुल्य एक और व्यक्तित्व का निर्माण कर लिया जाता है और वह एक अभिन्न मित्र एवं समर्थ सेवक की तरह निरन्तर साथ देता तथा सहायता करता है। दर्पण साधना से भी उस छाया साधना की उद्देश्य पूर्ति होती है।
साधना का एक अंश देकर वरदान-आशीर्वाद से लाभान्वित कर सकें। भारत ही नहीं संसार भर का पुराण-साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएँ देवप्रदत्त थीं। ऋषियों, तपस्वियों, संतों के जीवन चरित्रों में अधिकाँश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएँ थीं और उन्हें उन्होंने तप-साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था।
साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाये, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा। आसुरी भूमिका पर कहीं कोई सिद्धि मिल भी पायी तो अन्ततः उसी के लिए घातक सिद्ध होगी। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतना ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़ों पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा-उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही पा लेते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-December
साधनाओं द्वारा प्राणशक्ति का प्रचुर संग्रह करते हैं। इसी के एक अंश का संप्रेषण वे रोगी व्यक्ति के बेजान हो रहे शरीर का किसी अंग विशेष में करते हैं। प्राणशक्ति की इस प्रचण्ड बौछार से विरोधी शक्तियाँ, रोग पैदा करने वाले जीवाणु-विषाणु निस्तेज हो जाते हैं और व्यक्ति को सर्वथा नयी चेतना का अनुदान मिलता है। मुरझाया जीवन कुसुम फिर से खिलने, खिलखिलाने लगता है।
साधना- उपासना द्वारा इन केन्द्रों में छिपी बीजशक्ति को उभारना और उच्चस्तरीय बनाना सम्भव हो सके, तो सामान्य-सा दिखने वाला मनुष्य असामान्य बन सकता है।
साधनाएँ विधि-विधान के साथ माह व वर्ष के उल्लेख के साथ प्रति माह इसमें पाठकगण पढ़ते रहेंगे। इसके अतिरिक्त हरिद्वार के कुम्भ महापर्व के सम्बन्ध में प्रथम चार माह विशेष सामग्री प्रकाशित होती रहेगी। कथा-साहित्य चुभने वाले संस्मरण, सद्वाक्यों की संख्या भी अब अधिक होगी। बीच-बीच में श्वेत-श्याम रंगीन चित्र भी विशेषांक के साथ देखने को मिलते रहेंगे। निश्चित ही ऐसी संस्कृति सम्पदा से भरी सामग्री को कोई भी छोड़ना नहीं चाहेगा।
साधनात्मक उपाय-उपचारों के माध्यम से करके वह रत्न-राशि अर्जित करें, जिन्हें ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। मूर्च्छा को जाग्रति में बदलना और नर से नारायण रूप में विकसित होना, यही कुण्डलिनी जागरण का मूल प्रयोजन है।
साधनापथ पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए जिस निर्मलता, निर्विकारता एवं निर्भयता की आवश्यकता है, वह शरीर को सबल, स्वस्थ-संवर्द्धन की दृष्टि से सबसे उपयुक्त बताया गया है। अश्विन नवरात्र के बाद शरद ऋतु आरम्भ हो जाती है। इसका काल सामान्यतः 15 नवम्बर तक माना जाता है। तत्पश्चात शिशिर और हेमन्त ऋतुएं आती हैं, जो जनवरी तक चलती हैं।
साधना-समर में आवश्यक नियमों, संयमों का निर्वाह कर सकेगा- काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, डाह आदिक शत्रुओं से डटकर मुकाबला कर सकेगा, ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर उच्चस्तरीय साधना-तपश्चर्या के लिए स्वस्थ एवं पुष्ट शरीर की तो अनिवार्य आवश्यकता होती है, जिसे पुरा किये बिना कोई भी व्यक्ति साधनापथ पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए जिस निर्मलता, निर्विकारता एवं निर्भयता की आवश्यकता है, वह शरीर को सबल, स्वस्थ-संवर्द्धन की दृष्टि से सबसे उपयुक्त बताया गया है। अश्विन नवरात्र के बाद शरद ऋतु आरम्भ हो जाती है। इसका काल सामान्यतः 15 नवम्बर तक माना जाता है।
साधना सिखा दीजिये। बेटे यह मत कह, बल्कि यह कह कि हमें बाजीगरी सिखा दीजिये। मित्रों, बाजीगरी में व्यक्तित्व-निर्माण की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल बाहरी क्रियाकलापों से, आडम्बरों से वह पूरी हो जाती है। किसान को मेहनत करनी पड़ती है, पसीना बहाना पड़ता है, न फसल मिलती है, लेकिन बाजीगर बिना किसी मेहनत के केवल जमीन पर से मिट्टी उठाना है तथा हाथों की हेरा-फेरी करके पैसा कमा लेता है।
साधना क्रम इसके बाद ही सफल होते देखे जा सकते हैं। (अगले अंक में जारी)
साधना समर में लागू होती है। स्वास्थ्य सुख से वंचित असमर्थ शरीर वाला व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में कौन-सी और कितनी उन्नति कर सकता है, कितना आगे बढ़ सकता है, इसका उत्तर भी केवल नकारात्मक ही हो सकता है।
साधना से क्या मकसद है। यह मैं सब अच्छी तरह जानता हूँ। तू जो देखना चाहता है, वह तो मैं इसी तरह दिखा सकता हूँ। आपको पाने की लालसा कम है, सो दिखाने से काम चल सकता है। आप लोग सिद्ध
साधनाओं एवं आध्यात्मिक प्रक्रियाओं से प्रायः अपरिचित रहने के कारण उनके द्वारा यह सम्भव नहीं बन पड़ता है कि वे सीधे ही बिना किसी सूक्ष्म शरीरधारी की सहायता से अपने में भरी प्राण क्षमता का संग्रह करें, परन्तु इन सभी का यह मानना अवश्य रहा है कि बिना किसी माध्यम विशेष के सहयोग के भी सामान्य व्यक्ति स्वयं में फेथ पैदा करके यह गहरी भावना कर सकता है कि ईश्वर की महाशक्ति जिसे वैश्वप्राण भी कह सकते हैं, हमारे रोगी शरीर को पूर्णतया रोग मुक्त कर रही है और हम स्वस्थ-सबल हो रहे हैं। यह भावना जितनी गहरी होती जाती है ख् प्रभाव भी उतने ही स्पष्ट होने लगते हैं। धीरे-धीरे आधुनिक मनोविज्ञानी भी इस सत्य को स्वीकार करने लगे हैं, मनोभावनाएँ ही अपने अनुरूप मनुष्य को स्वस्थ या रोगी बनाती हैं। सब कुछ अपनी आस्था या फेथ पर निर्भर है। आने वाला समय ‘फेथ हीलिंग’ या आस्था-चिकित्सा को चिकित्सा जगत में विशेष स्थान दिला दे, तो कोई असम्भव घटना नहीं मानी जानी चाहिए।
साधना विशेषांक तथा गुरुपूर्णिमा की पावन बेला में ‘समर्पण विशेषांक प्रकाशित करने की योजना है, जिसमें अगणित संस्करण एवं भविष्य की योजनाएँ होंगी, इसके अलावा एक विशेष तौर पर अगले ही माह से साधना-प्रक्रिया पर एक लेखमाला आरम्भ की जा रही है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अखण्ड-ज्योति में दी जाती रही विभिन्न साधनाएँ विधि-विधान के साथ माह व वर्ष के उल्लेख के साथ प्रति माह इसमें पाठकगण पढ़ते रहेंगे। इसके अतिरिक्त हरिद्वार के कुम्भ महापर्व के सम्बन्ध में प्रथम चार माह विशेष सामग्री प्रकाशित होती रहेगी। कथा-साहित्य चुभने वाले संस्मरण, सद्वाक्यों की संख्या भी अब अधिक होगी। बीच-बीच में श्वेत-श्याम रंगीन चित्र भी विशेषांक के साथ देखने को मिलते रहेंगे।
साधना करूँगी । अपने इसी निश्चय के साथ राजकुमारी भी लोककल्याण की साधना में लग गयी।
साधना यह है कि वे अपने शरीर को पूर्ण रूप से स्वस्थ एवं पुष्ट बनायें। संयमी और समर्थ बनें। जो असमर्थ व्यक्ति साधारण दैनिक श्रम नहीं कर सकता, अपने जीवन-शकट तो ठीक से खींच नहीं सकता, वह साधना-समर में आवश्यक नियमों, संयमों का निर्वाह कर सकेगा- काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, डाह आदिक शत्रुओं से डटकर मुकाबला कर सकेगा, ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर उच्चस्तरीय साधना-तपश्चर्या के लिए स्वस्थ एवं पुष्ट शरीर की तो अनिवार्य आवश्यकता होती है, जिसे पुरा किये बिना कोई भी व्यक्ति साधनापथ पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए जिस निर्मलता, निर्विकारता एवं निर्भयता की आवश्यकता है, वह शरीर को सबल, स्वस्थ-संवर्द्धन की दृष्टि से सबसे उपयुक्त बताया गया है।
साधना मनुष्य का सर्वप्रथम पुरुषार्थ होना चाहिये। आध्यात्मिक साधना क्रम इसके बाद ही सफल होते देखे जा सकते हैं। (अगले अंक में जारी)
साधना-प्रक्रिया पर एक लेखमाला आरम्भ की जा रही है। परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अखण्ड-ज्योति में दी जाती रही विभिन्न साधनाएँ विधि-विधान के साथ माह व वर्ष के उल्लेख के साथ प्रति माह इसमें पाठकगण पढ़ते रहेंगे। इसके अतिरिक्त हरिद्वार के कुम्भ महापर्व के सम्बन्ध में प्रथम चार माह विशेष सामग्री प्रकाशित होती रहेगी। कथा-साहित्य चुभने वाले संस्मरण, सद्वाक्यों की संख्या भी अब अधिक होगी। बीच-बीच में श्वेत-श्याम रंगीन चित्र भी विशेषांक के साथ देखने को मिलते रहेंगे।
साधना में लग गयी।
साधना की गहराई में जाकर उसी काया को एक प्रयोगशाला बनाकर भाँति-भाँति के प्रयोग करना चाहते हैं, जिनका शास्त्रों में वर्णन है। इस ‘शरीरक्षेत्र’ के बारे में मानवीत्वचा, अस्थिकवच, रक्तवाही वे हृदय-संस्थान तथा श्वाँस-संस्थानों की चर्चा विगत अंक में की जा चुकी है। जिस शरीर को मनुष्य इतने प्रेम से पालता, पोसता, सींचता है, उसके बहिरंग की मल-मल कर धुलाई-सफाई करता है, उसके बारे में वस्तुतः वह कितना जानता है- यह रहस्योद्घाटन उपरोक्त संस्थानों के परिप्रेक्ष्य में विगत अंक में किया जा चुका है। अब कुछ और अंगों-संस्थानों की चर्चा करें।
साधना-तपश्चर्या के लिए स्वस्थ एवं पुष्ट शरीर की तो अनिवार्य आवश्यकता होती है, जिसे पुरा किये बिना कोई भी व्यक्ति साधनापथ पर एक कदम भी नहीं बढ़ सकता। आध्यात्मिक उन्नति करने के लिए जिस निर्मलता, निर्विकारता एवं निर्भयता की आवश्यकता है, वह शरीर को सबल, स्वस्थ-संवर्द्धन की दृष्टि से सबसे उपयुक्त बताया गया है। अश्विन नवरात्र के बाद शरद ऋतु आरम्भ हो जाती है। इसका काल सामान्यतः 15 नवम्बर तक माना जाता है। तत्पश्चात शिशिर और हेमन्त ऋतुएं आती हैं, जो जनवरी तक चलती हैं।
साधना में प्राणविद्युत के दोनों सिरों को आपस में मिला देना होता है। इस मिलन का चमत्कार वैसा ही होता है, जिस प्रकार नर-नारी के मिलन से एक नये परिवार का आरम्भ होता है। कुण्डलिनी जागरण में मूर्च्छना की समाप्ति और चेतना की अभिवृद्धि ही नहीं, दो शक्तिध्रुवों की मिलन प्रक्रिया भी सम्मिलित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-October
साधना से सिद्धि-1
साधना से आत्मनिर्माण और लोककल्याण के व्रतों को फलित करने योग्य, अग्रदूतों की भूमिका निभाने योग्य ऊर्जा प्राप्त होगी। अशुभ को निरस्त करने और सृजन बनाने के लिए आत्मशक्ति की इन दिनों विशेष आवश्यकता है। उसे उपलब्ध करने के लिए ध्यान का यह अभिनव उपक्रम आरम्भ किया गया हैं, जिसे प्रज्ञा परिवार के समस्त परिजनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। उनके संपर्क में जो भी श्रद्धा सम्पन्न व्यक्ति आयें, उन्हें भी अपनाने के लिए कहा जाना चाहिए।
साधना एवं उपलब्धियाँ
साधना से सिद्धि-2
साधना का गुह्य विवेचन
साधना स्थली। कई बार पुनर्जन्म के स्थानों से गहरा लगाव होने के कारण इस प्रकार की घटनाएँ घट जाती हैं और अनेक बार इसके पीछे ईश्वरीय लीला होती है। तुम्हारे संदर्भ में कारण आकर्षण ही है। समाधान से किरणचन्द्र संतुष्ट हो गये और गुरु को प्रणाम कर चले गए।
साधना विधियाँ सरल हैं, कठिन तो वह प्रक्रिया है जिसमें क्रिया, विचारणा और भावना को परिष्कृत-परिमार्जित करने के लिए निरन्तर आत्म-संघर्ष करना पड़ता है। शब्द विद्या का लाभ उठाने के लिए उसके लिए उपयुक्त यंत्र - उपकरण अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही होता है। शब्द को शब्द - ब्रह्म बना सकना ऐसे ही व्यक्तित्वसम्पन्न साधकों के लिए संभव होता है।
साधना कर रहे थे। एक दिन जब वे गंभीर ध्यान की स्थिति में थे तो अचानक उन्हें कुछ असुविधा महसूस होने लगी। आँखें खोली, तो सामने एक तेजस्वी बालक दिखायी पड़ा। गंभीर नाथ ने पूछा-तुम कौन हो और क्या चाहते हो? बालक ने कहा-मैं कपिलधारा हूँ।
साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
साधनाओं एवं तपश्चर्या के आधार पर जाग्रत् होते हैं।
साधनाएँ आत्म-साक्षात्कार के लिए भी थीं और सूक्ष्म जगत में प्रवेश एवं अधिकार पाने के लिए भी। योग - साधना के साथ स्वर्ग - मुक्ति की भावनात्मक और ऋद्धि - सिद्धि की शक्तिपरक सफलताएँ जुड़ी हुई हैं।
साधना द्वारा विकास होता है उतना ही अधिक प्राणशक्ति का अभिवर्द्धन और उसी अनुपात से कुण्डलिनी का जागरण होता है। यह प्रकाश धीरे - धीरे नेत्र , वाणी, मुख और ललाट आदि सम्पूर्ण शरीर में ओजस्-तेजस् के रूप में चमकने लगता है। त्वचा में यही कोमलता और बुद्धि में सात्विकता एवं पवित्रता की अभिवृद्धि करता है यह क्रिया धीरे - धीरे होती है, इसलिए हानि की भी आशंका नहीं रहती। उपासक अपने आत्म-कल्याण भर के संकेत प्राप्त करता हुआ जो वास्तविक लक्ष्य है, वह जीवन - मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है। अणिमादिक अष्ट सिद्धियों, अतीन्द्रिय क्षमताओं के प्रलोभन उसे अपने गन्तव्य मार्ग से विचलित नहीं कर पाते।
साधना द्वारा उपार्जित की गई उत्कृष्ट अन्तः स्थिति से ही संभव होता है। मस्तिष्क में दुर्बुद्धि, अचिन्त्य, विकृत विचार - प्रवाह का निराकरण करने से उत्पन्न हुई चित्त स्थिरता से नादानुसंधान में सफलता मिलती है। व्यावहारिक जीवन से सत्कर्म परायणता, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एवं आदर्शवादी चरित्रनिष्ठा से उस वाक् शक्ति का उदय होता है जो मंत्रों को लक्ष्यवेधी बाण की तरह सामर्थ्यवान बनाती है। साधना विधियाँ सरल हैं, कठिन तो वह प्रक्रिया है जिसमें क्रिया, विचारणा और भावना को परिष्कृत-परिमार्जित करने के लिए निरन्तर आत्म-संघर्ष करना पड़ता है। शब्द विद्या का लाभ उठाने के लिए उसके लिए उपयुक्त यंत्र - उपकरण अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही होता है।
साधना से उत्पन्न अनुभूतियों, विभूतियों का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। पर इन भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक ऋद्धियों को प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी शक्ति जगाने का अर्थ है - अपने सूक्ष्म शरीर स्थित षट्चक्रों, पंचकोशों एवं उपत्यिकाओं को सक्रिय करना। गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार की पवित्रता के बिना, इन्हें उच्चस्तरीय बनाये बिना यह कार्य सम्पन्न नहीं हो सकता। इसलिए कुण्डलिनी जागरण की विद्या को बहुत गुप्त रखा गया है। कुण्डलिनी के दो उत्पत्ति स्थान माने गये हैं।
साधना-आराधना
साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
साधना द्वारा रोजमर्रा की जीवन चर्या में उतारने हेतु संजीवनी साधना सत्रों की शृंखला शान्तिकुञ्ज में चलाई। आज संस्कार महोत्सव जो स्थान-स्थान पर सम्पन्न हो रहे हैं, एक ही विशेष लक्ष्य के साथ हो रहे हैं कि यह वैज्ञानिक अध्यात्मवाद उन सभी तक पहुँचे, जो कर्मकाण्ड प्रधान धर्म को परम्परागत मानते हुए उसे नकारते हैं, ताल ठोंककर स्वयं को नास्तिक कहते हैं, जबकि व्यक्तिगत जीवन में हर क्षण हर कष्ट में भगवान को याद करते हैं। अखण्ड ज्योति के विज्ञानसम्मत प्रतिपादन भी इसी उद्देश्य के साथ प्रतिमास निरन्तर 58 वर्षों से प्रकाशित हो रहे हैं एवं यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित ही रहेगी।
साधना द्वारा उसकी जाग्रत अवस्था सूर्य जैसी हो जाती है। अर्थात् उसमें मनुष्य की शक्ति सूर्य जैसी प्रचण्ड शक्ति वाली, सर्वव्यापी एवं सर्वसमर्थ हो जाती है। फिर उस शक्ति का नियंत्रण करना कठिन हो जाता है। कमजोर मन और शरीर वाले उस शक्ति को धारण नहीं कर सकते।
साधना को केवल ब्राह्मणो तक ही सीमित रखना चाहते थे, परन्तु विश्वामित्र ने जो कि समस्त विश्व के मित्र, स्नेही और हितैषी थे और प्राणी मात्र में परमात्म-तत्व का अनुभव करते थे, इस सीमित अधिकार की दीवारों को तोड़−फोड़ दिया था और महर्षि वशिष्ठ के विचारों के विरुद्ध एक आंदोलन खड़ा कर दिया था। परम पूज्य आचार्यजी ने भी एक नयी सृष्टि की रचना की है, एक नये समाज का निर्माण किया है। समाज को एक नयी मोड़ दी है उसके लिए वह सदैव स्मरणीय रहेंगे। सैकड़ों वर्षा से जिस जाति का इतना पतन हो चुका हो कि उसने उन्हें भजन-पूजन के अधिकारों से वंचित कर रखा हो। ऐसी-ऐसी कपोल कल्पित घोषणाएँ कर दी हों कि कोई स्त्री यदि वेदमंत्र सुन या पढ़ लेगी या गायत्री जाप कर लेगी तो उसके परिवार में महान अनिष्ट होगा ।
साधना-प्रयोग ऋषिसत्ता की अनुकम्पा से उपलब्ध कराया जा सकता है। साधकों का इस अनुदान-साधना से आत्मनिर्माण और लोककल्याण के व्रतों को फलित करने योग्य, अग्रदूतों की भूमिका निभाने योग्य ऊर्जा प्राप्त होगी। अशुभ को निरस्त करने और सृजन बनाने के लिए आत्मशक्ति की इन दिनों विशेष आवश्यकता है। उसे उपलब्ध करने के लिए ध्यान का यह अभिनव उपक्रम आरम्भ किया गया हैं, जिसे प्रज्ञा परिवार के समस्त परिजनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। उनके संपर्क में जो भी श्रद्धा सम्पन्न व्यक्ति आयें, उन्हें भी अपनाने के लिए कहा जाना चाहिए।
साधना पुरुषार्थ के साथ युगशक्ति के दिव्य-अनुदान प्राप्त करने के लिए यह साधना-प्रयोग ऋषिसत्ता की अनुकम्पा से उपलब्ध कराया जा सकता है। साधकों का इस अनुदान-साधना से आत्मनिर्माण और लोककल्याण के व्रतों को फलित करने योग्य, अग्रदूतों की भूमिका निभाने योग्य ऊर्जा प्राप्त होगी। अशुभ को निरस्त करने और सृजन बनाने के लिए आत्मशक्ति की इन दिनों विशेष आवश्यकता है। उसे उपलब्ध करने के लिए ध्यान का यह अभिनव उपक्रम आरम्भ किया गया हैं, जिसे प्रज्ञा परिवार के समस्त परिजनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। उनके संपर्क में जो भी श्रद्धा सम्पन्न व्यक्ति आयें, उन्हें भी अपनाने के लिए कहा जाना चाहिए।
साधना कर रहे थे। छह महीने बीत चुके थे। अचानक एक दिन समाचार मिला कि उनकी माँ गम्भीर रूप से बीमार है। आते समय उन्होंने माँ को वचन दिया कि वे कहीं भी रहें उनके पास पहुँच जाएँगे। इसलिए वचनबद्ध थे।
साधना क्षेत्र में उन्हें कहना ही क्या कि कितना आगे बढ़ चुके हैं। चौबीस-चौबीस लक्ष्य के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण उन्होंने किये हैं। पूर्वकाल में सवा करोड़ गायत्री जप करने वाले को वशिष्ठ की पदवी प्रदान की जाती थी। उनका इतना सम्मान किया जाता था कि वशिष्ठ ही अयोध्यापुरी के राजाओं के राजगुरु हुआ करते थे जिनकी आज्ञा के बिना राज्य में पत्ता भी नहीं हिलता था, उनके पथ-प्रदर्शन में ही सब कार्य हुआ करते थे। इसका अर्थ यह है कि सवा करोड़ गायत्री जाप के तप के द्वारा आत्मा इतनी महान बन जाती है कि वह व्यक्ति राष्ट्र के नेतृत्व के योग्य बन जाता है।
साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द साधक को सहज ही मिलने लगता है। योगिनी तंत्र में कहा गया है -
साधना द्वारा विशेष शक्ति उत्पन्न करके शब्दों के साथ संपुटित करना होता है। अभिमंत्रित किया गया पदार्थ ही ‘ भविष्य कहलाता है। उसके यज्ञाग्नि में यजन करके सशक्त ऊर्जा के रूप में परिणत किया जाता है। इस ऊर्जा का व्यक्ति पर, वातावरण पर, लक्ष्य पर प्रहार किया जाता है। यज्ञाग्नि भी चूल्हे में जलने वाली अग्नि से भिन्न होती है।
साधना के लिए एक पृथक् कोठरी की व्यवस्था कर दी थी। उसी में वे प्रतिदिन प्रायः चार घण्टे साधना किया करते। उन दिनों ‘लता साधना’ नामक उनकी एक विशिष्ट साधना चल रही थी। तंत्र शास्त्र में इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि इस प्रक्रिया द्वारा काम-शक्ति पर विजय प्राप्त कर सकना सम्भव है।
साधना’ नामक उनकी एक विशिष्ट साधना चल रही थी। तंत्र शास्त्र में इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि इस प्रक्रिया द्वारा काम-शक्ति पर विजय प्राप्त कर सकना सम्भव है।
साधना का निर्देश किया। किरणचन्द्र भी काम की प्रबलता से परेशान थे और इससे मुक्ति का उपाय खोज रहे थे। जब उन्हें उपचार बता दिया, तो उसे वे निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करने लगे।
साधना और तप करने वाला भी कोई दिखाई नहीं देता। अध्यात्म ज्ञान सम्बन्धी अगणित पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं। 1956 में दस हजार साधकों से 24-24 गायत्री जाप के अनुष्ठान करवा कर 108 कुण्डीय यज्ञ करवाया था। पाँच वर्ष के थोड़े से समय में देश के कोने कोने में गायत्री यज्ञ भारतीय संस्कृति का प्रसार किया है। 4000 गायत्री परिवार की शाखाएँ स्थापित कराकर उन क्षेत्रों में धार्मिक जागृति की गंगा बहा दी।
साधना, समर्पण एवं पारस्परिक आत्मीयता के सूत्रों का जीवन में उतारे कोई आध्यात्मिक संगठन नहीं चला सकता। यही अन्यान्य संगठनों से कुछ अलग हमारा गायत्री परिवार दिखाई देता है, जहाँ औरों के हित जीने की तमन्ना लिए हर धर्म-सम्प्रदाय वर्ग के व्यक्ति सूक्ष्म चैतन्य प्रवाह से जुड़ते ही चले जा रहे हैं। आस्तिकवाद जीवनचर्या में व्यावहारिक रूप में कैसे उतरना चाहिए, सभी समस्याओं का हम अध्यात्म कैसे हो सकता है, उज्ज्वल भविष्य एक भवितव्यता है, कैसे समूह मन के विकास से-एक साथ सम्पन्न की गयी साधना से आ सकता है, अध्यात्म के ध्यान-प्रयोगों से मानसोपचार कैसे सम्भव है, ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं जिन्हें गायत्री परिवार ने आज बड़ी सरलता से जन-जन के मन में बिठा दिया है। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद के प्रवक्ता इसे ठोस तर्क, तथ्य व प्रमाणों के माध्यम से प्रमाणित कर जन-जन तक पहुँचाने वाले परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य की यही विलक्षणता है कि व्यक्ति जो स्वयं को बुद्धिजीवी मानता है, सहज ही इस विराट विचार सागर में डुबकी लगाकर आस्तिकता को सही मायने में उतारता देखा जाता है। गाँव में रहने वाले सीधे साधे किसान वर्ग के, श्रमिक वर्ग के व्यक्ति ने तो परम्परा के रूप में वे संस्कार पाए हैं कि वह अध्यात्म उसके रोम-रोम में समाया हुआ है।
साधना में भी विक्षेप नहीं आयेगा। इतना कहकर वे आगे बढ़ गये। हरनाथ ठाकुर जैसे सोते से जागे। देखा सचमुच वे एक पगडंडी के मध्य आसन जमाए हुए हैं। उन्हें स्मरण आया कि वे तो कमरे में बैठे हुए थे, फिर यहाँ कैसे आ गए ?
साधनात्मक जीवन के सम्बन्ध में है। किरणचन्द्र तब वृन्दावन में अपने गुरु विजयकृष्ण के साथ ‘तीर्थमणि कुँज’ में निवास कर रहे थे। गुरु ने उनकी साधना के लिए एक पृथक् कोठरी की व्यवस्था कर दी थी। उसी में वे प्रतिदिन प्रायः चार घण्टे साधना किया करते। उन दिनों ‘लता साधना’ नामक उनकी एक विशिष्ट साधना चल रही थी।
साधना - विज्ञानियों ने , प्रामाणिक शास्त्र साक्षियों ने मंत्र की गरिमा समान रूप से प्रतिपादित की है। इससे उच्चस्तरीय शब्द विज्ञान द्वारा उत्पन्न ध्वनि की महत्ता पर प्रकाश पड़ता है -
साधना की न्यूनतम अवधि 15 मिनट रखी गयी है। दुर्बल व्यक्ति 10 मिनट ही करें। जो आत्मिक दृष्टि से प्रौढ़ और परिपक्व हैं, वे प्रति सप्ताह एक-एक मिनट बढ़ाते हुए आधा घण्टा तक पहुँचा सकते हैं। अधिक भोजन से उत्पन्न होने वाली हानियों की तरह इस प्राण-संचार-साधना को उपयुक्त सीमा तक सीमित रखने को ही कहा गया है।
साधना में व्यवधान न पहुँचे, पर प्रस्थान करते वक्त एक पड़ोसी मित्र को सारी बात समझा दी थी और यह भी बता दिया था कि वे कहाँ जा रहे हैं। आज वही मित्र सूचना लेकर आए थे।
साधना तो दूर उसका जीवन एक ऐसी नैया की तरह दिखाई देता है, जो गतिशील तो है पर गंतव्यहीन होकर बेचैनी से बढ़ती चली जा रही है। कब लहरों के थपेड़े, तनाव के झोंके उसे उलट दें, पता नहीं। इसी वर्ग के लिए परमपूज्य गुरुदेव ने प्रतिपादन दिये, प्रत्यक्षीकरण हेतु ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना की एवं जीवन साधना द्वारा रोजमर्रा की जीवन चर्या में उतारने हेतु संजीवनी साधना सत्रों की शृंखला शान्तिकुञ्ज में चलाई। आज संस्कार महोत्सव जो स्थान-स्थान पर सम्पन्न हो रहे हैं, एक ही विशेष लक्ष्य के साथ हो रहे हैं कि यह वैज्ञानिक अध्यात्मवाद उन सभी तक पहुँचे, जो कर्मकाण्ड प्रधान धर्म को परम्परागत मानते हुए उसे नकारते हैं, ताल ठोंककर स्वयं को नास्तिक कहते हैं, जबकि व्यक्तिगत जीवन में हर क्षण हर कष्ट में भगवान को याद करते हैं। अखण्ड ज्योति के विज्ञानसम्मत प्रतिपादन भी इसी उद्देश्य के साथ प्रतिमास निरन्तर 58 वर्षों से प्रकाशित हो रहे हैं एवं यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित ही रहेगी।
साधना। इसमें अवधि 10 से 15 मिनट रखी गयी है। नये साधकों के लिए एक सरल उपक्रम बनाया गया है एवं पुराने शान्तिकुञ्ज आ चुके व्यक्तियों-परिजनों के लिए शान्तिकुञ्ज का ध्यान निर्धारित किया गया है। विस्तार से इस ध्यान-साधना का विवरण आगामी पृष्ठ में पढ़ लें।
साधनाओं से सूक्ष्म ध्वनि क्षेत्र से संपर्क बनाने और लाभ उठाने के दो प्रयोग होते रहे हैं। शब्द विद्या की दो धाराएँ मानी गई हैं, एक तो पकड़ने समझने और उनके सहारे अविज्ञात सम्भावनाओं से परिचित रहने की है, जिसे नादयोग कहा गया है। नादानुसंधान की महिमा योगशास्त्र में विस्तारपूर्वक बताई गई है। उनके सहारे सूक्ष्म जगत की हलचलों की जानकारी प्राप्त करने का लाभ बताया गया है। यह कहने - सुनने में छोटी किन्तु व्यवहार में बहुत बड़ी बात है।
साधना वर्ग के अंतर्गत परमवंदनीय माताजी की पुण्यतिथि पर जो आयोजन सम्पन्न हुआ, वह स्वयं में अति महत्वपूर्ण रहा है, अनेकानेक संकल्पों के साथ उसका समापन हुआ एवं ऐसा लगा कि साधना पक्ष का प्राधान्य इस मिशन की जड़ों में रहा है, उसके माहात्म्य व क्रियापक्ष को लोगों ने भली−भाँति समझा है, आत्मसात् किया है।
साधना उपक्रम मौन साधना-’ भविष्य उज्ज्वल बने विभीषिकाएँ मिटे' ऐसी प्रार्थना तथा दीपयज्ञ संक्षिप्त उपक्रम करेंगे तो इससे एक समष्टिगत मन-कास्मिक माइण्ड’ का निर्माण होगा, जिसका प्रभाव निश्चित ही चारों ओर वातावरण पर, सूक्ष्म जगत पर पड़ेगा। आशा की जानी चाहिए कि उत्साहपूर्वक यह उपक्रम सभी स्थानों पर चल पड़ेगा व सन् 2000 के आने तक गति पकड़ लेगा। अब यही तो एक मात्र आशा की केन्द्र रह गया है।
साधना वर्ग की एक विशिष्ट उपलब्धि के रूप में दो कार्यक्रम विशेष रूप से दिये जा रहे हैं।
साधना का है। इसे हिमालय पर अवस्थित अध्यात्म ध्रुव केन्द्र का, महाकाल का अनुदान समझा जाए। (सन् 2000 तक यह विशिष्ट प्राण-प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर चलता रहेगा
साधना में लीन व्यक्तियों को कभी - कभी रात में ऐसे कुछ स्वप्न भी आते हैं जिसमें उन्हें किसी भविष्य की घटना का पूर्वाभास मिल जाता है या किसी गोपनीय रहस्य का पता चल जाता है। वह कुण्डलिनी की ही शक्ति होती है।
साधना के साथ स्वर्ग - मुक्ति की भावनात्मक और ऋद्धि - सिद्धि की शक्तिपरक सफलताएँ जुड़ी हुई हैं।
साधना चल रही थी। तंत्र शास्त्र में इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि इस प्रक्रिया द्वारा काम-शक्ति पर विजय प्राप्त कर सकना सम्भव है।
साधना उग्र चल रही थी, उन दिनों उनके साथ कई विचित्र घटनाक्रम होने लगे थे। इनका उल्लेख सुरेशचन्द्र चक्रवर्ती ने अपनी पुस्तक ‘पागल की कथा’ में विस्तारपूर्वक किया है। एक प्रसंग की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है कि एक दिन मध्य रात्रि को जब वे ध्यान कर रहे थे तो अचानक एक अस्फुट सी आवाज सुनाई पड़ी। उन्होंने ध्यान नहीं दिया, किन्तु जब बार-बार सुनाई पड़ने लगी तो आँखें खोली। देखा सामने एक दिव्य पुरुष खड़े हैं।
साधना के इस पक्ष को ऋषियुग्म की सत्ता ने बड़ी सहजता ने निरक्षर अथवा कम शिक्षित जनता के दिलों को पहुँचाकर संस्कारों के समावेश की जीवन में अनिवार्यता बताकर उन्हें भी आत्मनिर्माण से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में जोड़ दिया है। युगशक्ति का जागरण इतने बड़े समुदाय को जोड़े बिना हो भी कैसे सकता था। अब शिक्षित समुदाय की, तथा कथित प्रबुद्ध वर्ग की समस्या सामने है, जिसने बुद्धि विलास के साधन तो अनेकानेक जुटाएँ हैं, किन्तु उस मृगमरीचिका में वह स्वयं को ऐसा उलझा चुका है कि साधना तो दूर उसका जीवन एक ऐसी नैया की तरह दिखाई देता है, जो गतिशील तो है पर गंतव्यहीन होकर बेचैनी से बढ़ती चली जा रही है। कब लहरों के थपेड़े, तनाव के झोंके उसे उलट दें, पता नहीं। इसी वर्ग के लिए परमपूज्य गुरुदेव ने प्रतिपादन दिये, प्रत्यक्षीकरण हेतु ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना की एवं जीवन साधना द्वारा रोजमर्रा की जीवन चर्या में उतारने हेतु संजीवनी साधना सत्रों की शृंखला शान्तिकुञ्ज में चलाई।
साधना को उपयुक्त सीमा तक सीमित रखने को ही कहा गया है।
साधना :- साधकों के अपने साधना पुरुषार्थ के साथ युगशक्ति के दिव्य-अनुदान प्राप्त करने के लिए यह साधना-प्रयोग ऋषिसत्ता की अनुकम्पा से उपलब्ध कराया जा सकता है। साधकों का इस अनुदान-साधना से आत्मनिर्माण और लोककल्याण के व्रतों को फलित करने योग्य, अग्रदूतों की भूमिका निभाने योग्य ऊर्जा प्राप्त होगी। अशुभ को निरस्त करने और सृजन बनाने के लिए आत्मशक्ति की इन दिनों विशेष आवश्यकता है। उसे उपलब्ध करने के लिए ध्यान का यह अभिनव उपक्रम आरम्भ किया गया हैं, जिसे प्रज्ञा परिवार के समस्त परिजनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए। उनके संपर्क में जो भी श्रद्धा सम्पन्न व्यक्ति आयें, उन्हें भी अपनाने के लिए कहा जाना चाहिए।
साधना सत्रों की शृंखला शान्तिकुञ्ज में चलाई। आज संस्कार महोत्सव जो स्थान-स्थान पर सम्पन्न हो रहे हैं, एक ही विशेष लक्ष्य के साथ हो रहे हैं कि यह वैज्ञानिक अध्यात्मवाद उन सभी तक पहुँचे, जो कर्मकाण्ड प्रधान धर्म को परम्परागत मानते हुए उसे नकारते हैं, ताल ठोंककर स्वयं को नास्तिक कहते हैं, जबकि व्यक्तिगत जीवन में हर क्षण हर कष्ट में भगवान को याद करते हैं। अखण्ड ज्योति के विज्ञानसम्मत प्रतिपादन भी इसी उद्देश्य के साथ प्रतिमास निरन्तर 58 वर्षों से प्रकाशित हो रहे हैं एवं यह ज्योति निरंतर प्रज्वलित ही रहेगी।
साधना से जोड़कर क्रमशः उन्हें आगे बढ़ाते रहें। यदि कभी चूक हो जाये, तो उसकी पूर्ति अगले दिन कर लें।
साधनाओं का फल प्राप्त कर मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है।
साधना - ग्रंथों में इसे ब्रह्म - मैथुन कहा गया है। कुण्डलिनी साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द साधक को सहज ही मिलने लगता है। योगिनी तंत्र में कहा गया है -
साधना की। उसके उपरान्त आधे घण्टे का ध्यान का नियम था। उन्होंने आँखें बन्द की और ध्यान करने लगे। अभी वे ध्यान की गहराई में उतर ही रहे थे कि कुछ घुटन अनुभव हुई। तनिक सजग हुए, तो ज्ञात हुआ कि कमरे में जलने वाली धूपबत्ती की सुगन्ध भी गायब है।
साधनाएँ
साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
साधना असम्भव नहीं । जीवन में पवित्रता रखकर उसे हँसते-खेलते पूरा किया जा सकता है।
साधना से आ सकता है, अध्यात्म के ध्यान-प्रयोगों से मानसोपचार कैसे सम्भव है, ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं जिन्हें गायत्री परिवार ने आज बड़ी सरलता से जन-जन के मन में बिठा दिया है। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद के प्रवक्ता इसे ठोस तर्क, तथ्य व प्रमाणों के माध्यम से प्रमाणित कर जन-जन तक पहुँचाने वाले परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य की यही विलक्षणता है कि व्यक्ति जो स्वयं को बुद्धिजीवी मानता है, सहज ही इस विराट विचार सागर में डुबकी लगाकर आस्तिकता को सही मायने में उतारता देखा जाता है। गाँव में रहने वाले सीधे साधे किसान वर्ग के, श्रमिक वर्ग के व्यक्ति ने तो परम्परा के रूप में वे संस्कार पाए हैं कि वह अध्यात्म उसके रोम-रोम में समाया हुआ है। उसे मात्र स्वावलम्बन-आर्थिक उपार्जन-पारमार्थिक सुनियोजन-स्वच्छता सभ्यता के प्रारम्भिक पाठ की आवश्यकता थी, वह भी गुरुसत्ता ने पूरी कर दी। जीवन साधना के इस पक्ष को ऋषियुग्म की सत्ता ने बड़ी सहजता ने निरक्षर अथवा कम शिक्षित जनता के दिलों को पहुँचाकर संस्कारों के समावेश की जीवन में अनिवार्यता बताकर उन्हें भी आत्मनिर्माण से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में जोड़ दिया है।
साधना पक्ष का प्राधान्य इस मिशन की जड़ों में रहा है, उसके माहात्म्य व क्रियापक्ष को लोगों ने भली−भाँति समझा है, आत्मसात् किया है।
साधना का विवरण आगामी पृष्ठ में पढ़ लें।
साधना देखने में सामान्य किन्तु परिणाम में असामान्य है। इसमें विशेष महत्व शक्ति-संचार-साधना का है। इसे हिमालय पर अवस्थित अध्यात्म ध्रुव केन्द्र का, महाकाल का अनुदान समझा जाए। (सन् 2000 तक यह विशिष्ट प्राण-प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर चलता रहेगा
साधना किया करते। उन दिनों ‘लता साधना’ नामक उनकी एक विशिष्ट साधना चल रही थी। तंत्र शास्त्र में इसका विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि इस प्रक्रिया द्वारा काम-शक्ति पर विजय प्राप्त कर सकना सम्भव है।
साधना से प्राण प्रयोग द्वारा प्रज्वलित अग्नि के समान इस कुण्डलिनी महाशक्ति को जाग्रत किया जाता है। वह हृदयाकाश में सर्प की गति से बिजली जैसी चमकती है।
साधना है। यह सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में किसी भी समय 15 मिनट तक की जा सकती है। प्रक्रिया इस प्रकार है :-
साधना वर्षा पहले से छह करोड़ के लगभग हो चुकी है। उनकी महानता की नाप वशिष्ठ के आत्म विकास से हो सकती है। इस महान तप के कारण ही उन्हें इस युग का विश्वामित्र कहा जाता है। विश्वामित्र के द्वारा नवीन सृष्टि की रचना हुई मानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने अपने क्रान्तिकारी विचारों द्वारा एक नये समाज का निर्माण किया था।
साधना एवं तपश्चर्या को आत्म-कल्याण और सूक्ष्म विज्ञान के अधिकरण का दुहरा प्रयास कहा जा सकता है। हमारे ऋषि ज्ञानी भी थे और विज्ञानी भी। उनकी साधनाएँ आत्म-साक्षात्कार के लिए भी थीं और सूक्ष्म जगत में प्रवेश एवं अधिकार पाने के लिए भी। योग - साधना के साथ स्वर्ग - मुक्ति की भावनात्मक और ऋद्धि - सिद्धि की शक्तिपरक सफलताएँ जुड़ी हुई हैं।
साधना ठीक से की जा सके। अगले अंकों में क्रमशः इसी तरह से ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान-शान्तिकुञ्ज में चल रहे वनौषधि अनुसंधानों से परिजनों को परिचित कराते रहने का प्रयत्न जारी रहेगा।
साधना-’ भविष्य उज्ज्वल बने विभीषिकाएँ मिटे' ऐसी प्रार्थना तथा दीपयज्ञ संक्षिप्त उपक्रम करेंगे तो इससे एक समष्टिगत मन-कास्मिक माइण्ड’ का निर्माण होगा, जिसका प्रभाव निश्चित ही चारों ओर वातावरण पर, सूक्ष्म जगत पर पड़ेगा। आशा की जानी चाहिए कि उत्साहपूर्वक यह उपक्रम सभी स्थानों पर चल पड़ेगा व सन् 2000 के आने तक गति पकड़ लेगा। अब यही तो एक मात्र आशा की केन्द्र रह गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-April
साधना का रूप इस प्रकार है-
साधना का पल्ला पकड़ते ही संस्कृत के उद्भट विद्वान बन गए, उनकी कृतियाँ आज भी अनुपम, अतुलनीय तथा अमर बनी हुई हैं। विद्वान वोपदेव भी बचपन में मन्दबुद्धि है, पर अपने लगन एवं प्रयासों द्वारा उच्च कोटि के विचारक बने। उल्लेख मिलता है कि विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन बाल्यावस्था में मन्दबुद्धि थे। पर उनमें लगन, अध्ययन के प्रति अपूर्व रुचि थी। फलतः वे असाधारण प्रतिभा के धनी बने तथा भौतिक विज्ञान के आविष्कारों के क्षेत्र में वह कर गए, जिसका लोहा विश्व के मूर्धन्य भौतिकविद् भी मानते हैं।
साधना की दूसरी अवस्था है। सबसे उच्च अवस्था वह है, जब परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाय।
साधना सतत् चलती रही और जब त्रिवेन्द्रम में आयोजित एक ललित कला प्रदर्शनी में उसके चित्रों का प्रदर्शन किया गया, तो देखने वाले स्वयं चित्रवत् रह गए। दरबारी चित्रकारों की द्वेषवृत्ति अपनी ही शर्म में डूबने लगी।
साधना है। यह सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में किसी भी समय 15 मिनट तक की जा सकती है। प्रक्रिया इस प्रकार है। उपासना-कक्ष या कोलाहल रहित स्थान में ध्यानमुद्रा में बैठें। ध्यानमुद्रा अर्थात् स्थिर शरीर, शान्तचित्त-सुखासन (पालथी मारकर), कमर सीधी-हाथ गोदी में-आँखें बन्द।
साधना में उनकी तन्मयता रुकावटों व अवरोधों के बावजूद बढ़ती गयी। 1876 में त्रावनकोर के अँग्रेज रेजीडेण्टा ने उनकी मद्रास में लगी ललित कला प्रदर्शनी को देखा। इसमें उनके द्वारा बनाया एक चित्र ‘शृंगार करती नायर जाति की एक नारी’ का था। नारी के कोमल एवं संवेदनशील भावों का इतना मार्मिक कचत्राँकन ने उस गवर्नर का मन मोह लिया। इस चित्र पर उन्हें गवर्नर की ओर से स्वर्ण पदक का प्रथम पुरस्कार मिला।
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा, आत्मजाग्रति के चारों आधार इनमें सम्यक् रूप से प्रतिष्ठित हुए थे। गुरुदेव ने इन्हें जनमानस के परिष्कार के लिए प्रेरित करते हुए कहा, यही सबसे श्रेष्ठ लोकसेवा है। यदि चिन्तन परिष्कृत होगा, तो कर्म भी सात्त्विक ही होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत होंगे। गुरुकृपा से इनमें कवित्व शक्ति जाग्रत हुई थी।
साधना के फलस्वरूप सन् 1963 में वहाँ का सर्वश्रेष्ठ गायकी का पुरस्कार भी उसे मिला।
साधना सभी नैष्ठिक परिजन तो कर ही रहे हैं, किन्तु आवश्यक यह भी है कि इस नवरात्रि से इस साधना उपक्रम से अधिक से अधिक नये व्यक्तियों को अवगत करायें और मिशन से जोड़ें, ताकि आत्मकल्याण एवं विश्वकल्याण का उभयपक्षीय प्रयोजन पूरा कर सकना सम्भव हो सके।
साधना की यही तो खासियत है और तुम उससे भूषित हो।
साधना की पुलकन एवं पूर्ण सन्तुष्टि का प्रखर आलोक था। उसकी आँखों में श्रम की मर्यादा एवं गरिमा के दीप जल रहे थे। क्योंकि आज वह इसी के कारण सम्राट द्वारा सम्मानित हुआ था। उसने निश्चय कर लिया था-वह अपने घर को ही नहीं, पूरे गाँव, समूचे समाज को श्रम की मर्यादा सिखाएगा। इस सोच ने उसके पैरों की गति तेज कर दी।
साधना के किसी ने इन क्षेत्रों में विशिष्टता हासिल कर ली हो, ऐसा न देखा गया और न ही सुना गया।
साधना-मार्गदर्शन के साथ, कैसे इन पृष्ठों का आवंटन किया जाय, यह चिंतन चल रहा है। संभव हुआ तो अगले अंक से ही यह स्तंभ आरम्भ करेंगे। इसमें महापूर्णाहुति की तैयारी के विभिन्न चरण भी होंगे।
साधना का है। इसे हिमालय पर अवस्थित अध्यात्म ध्रुव केन्द्र का-महाकाल का अनुदान समझा जाए। सन् 2000 तक यह विशिष्ट प्राण प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर प्राण प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर चलता रहेगा। प्रज्ञा परिजनों को यह अतिरिक्त अनुदान है। इसका स्वरूप प्राण प्रवाह है, जिसे संकल्पपूर्वक खींचने पर साँस के साथ भीतर प्रवेश करने का अवसर मिलता है।
साधना की न्यूनतम अवधि पन्द्रह मिनट रखी गयी है। अधिक समय बढ़ाना हो तो उसे हर सप्ताह एक मिनट के क्रम से बढ़ाया और अधिकतम आधा घण्टा तक पहुँचाया जा सकता है। इससे अधिक न किया जाए। बालक एवं दुर्बल व्यक्ति दस मिनट ही करें। जो आत्मिक दृष्टि से प्रौढ़ एवं परिपक्व हैं वे एक-एक मिनट बढ़ाते हुए आधा घण्टे तक पहुँचा सकते हैं।
साधना, तपस्या, उपासना की अनूठी विधि भी है। ईसा, सन्त पाल, सन्त आइन्स्टाइन सभी प्रार्थना के बल पर ही सिद्ध महापुरुष बने थे। दादू, रज्जब, नानक, कबीर, रैदास जैसे सन्तों का तो जैसे यह जीवन का आधार ही था। वे इसी प्राण वायु के बल पर ही जीते थे। ध्यान रहे प्रार्थना किसी जीते थे।
साधना के सभी सम्प्रदायों में किसी न किसी रूप में प्रेत साधना प्रचलित है, किन्तु प्रत्येक सम्प्रदाय के अलग-अलग साधना, नियम, पद्धति और विधियाँ हैं और किस पद्धति ए0 किस विधि से किस प्रकार की प्रेतात्माएँ अधिकार में आती हैं और उनसे कौन-सा काम लिया जा सकता है-इन सब बातों का भी ताँत्रिक साहित्य में उल्लेख मिलता है।
साधना, नियम, पद्धति और विधियाँ हैं और किस पद्धति ए0 किस विधि से किस प्रकार की प्रेतात्माएँ अधिकार में आती हैं और उनसे कौन-सा काम लिया जा सकता है-इन सब बातों का भी ताँत्रिक साहित्य में उल्लेख मिलता है।
साधना सत्रों में भागीदार साधकों के माध्यम से किया जाता है। इसी के साथ युगनिर्माण आन्दोलन के विविध क्रियाकलापों की मनोवैज्ञानिकता को परखने का सिलसिला भी जारी है।
साधनाओं से मानव प्रकृति की सूक्ष्मता को भली प्रकार जाना और उसकी विभिन्न क्षमताओं को जगाने में सफल रहे। अपनी मनोवैज्ञानिक सर्वांगता में उन्होंने कुछ पहलू रचे जो बाद में ब्रह्मवर्चस् की शोध का आधार बने। इस शोध की आधार-भूत मान्यताएँ इस प्रकार हैं-
साधना प्रचलित है, किन्तु प्रत्येक सम्प्रदाय के अलग-अलग साधना, नियम, पद्धति और विधियाँ हैं और किस पद्धति ए0 किस विधि से किस प्रकार की प्रेतात्माएँ अधिकार में आती हैं और उनसे कौन-सा काम लिया जा सकता है-इन सब बातों का भी ताँत्रिक साहित्य में उल्लेख मिलता है।
साधना के साथ न जोड़े और यह आकाँक्षा सँजोये रखे कि आदर्शों के परिपालन में अपने को हर किसी से आगे रखना है। सामूहिक उन्नति को ही अपनी उन्नति मानना है। यही मनोवृत्ति और रीति-नीति अपनाना सच्चे अर्थों में धार्मिकता या आध्यात्मिकता है। लोक-व्यवहार की भाषा में इसी को समतावाद, समाजवाद आदि नामों से पुकारा और सराहा जाता है। इस नैतिक अनुशासन में बँधने पर हर किसी को समाजनिष्ठ बनना पड़ता है।
साधना देखने में सामान्य किन्तु परिणाम में असामान्य है। इसमें विशेष महत्व शक्ति-संचार साधना का है। इसे हिमालय पर अवस्थित अध्यात्म ध्रुव केन्द्र का-महाकाल का अनुदान समझा जाए। सन् 2000 तक यह विशिष्ट प्राण प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर प्राण प्रवाह सूर्योदय तक निरन्तर चलता रहेगा। प्रज्ञा परिजनों को यह अतिरिक्त अनुदान है।
साधना से अमृत योग में बदले हैं। युगदेवता ने असहाय एवं दीन-हीनों को अपने जहाज में आ बैठने के लिए आवाज लगायी है। उन्होंने हम सभी को आश्वासन दिया है कि उनके समर्थ आश्रय में अब कोई अपने को निराश्रय न समझे। युग चेतना के महावट की शीतल छाया ने हर अशान्त-क्लान्त, पीड़ित को आमंत्रण दिया है।
साधना उपक्रम से अधिक से अधिक नये व्यक्तियों को अवगत करायें और मिशन से जोड़ें, ताकि आत्मकल्याण एवं विश्वकल्याण का उभयपक्षीय प्रयोजन पूरा कर सकना सम्भव हो सके।
साधना करने का नियम बनाया जाना चाहिए और उसे निष्ठापूर्वक निभाया जाना चाहिए। कारणवश कभी व्यतिरेक उत्पन्न हो जाए तो उसकी पूर्ति अगले दिनों कर ली जाए।
साधना को भी उपयुक्त सीमा तक सीमित रखने को ही कहा गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-February
साधना में मन की गति को समझने की इतनी महत्ता, उपयोगिता नहीं, जितनी कि वृत्तियों की समझी जाती है। महर्षि पातंजलि ने योगदर्शन-सूत्र-5 में मन की पाँच वृत्तियों का प्रमुख रूप से उल्लेख किया है- (1) सम्यक् ज्ञान, (2) असम्यक् ज्ञान, (3) कल्पना-शक्ति, (4) निद्रा, (5) स्मृति। उनने मन और शरीर की अभिन्नता को दर्शाते हुए ‘साइकास्मा’ अर्थात् मनःशारीरिक शब्द की व्युत्पत्ति की है। शरीर के पास क्रिया के पाँच उपकरण पाँच इन्द्रियों के रूप में विद्यमान हैं, तो मन की वृत्तियाँ भी क्रिया के पाँच रूप हैं। मन के पास सम्यक् ज्ञान की अकूत-असीम सामर्थ्य है जो अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर-अमृतत्व की ओर ले जा सकती हैं।
साधना विज्ञान की गूढ़तम गहराइयों में जाने वाला व्यक्ति भी इसके माध्यम से व्यक्तित्व के परिष्कार, परिवारों में सुसंस्कारिता -सम्वर्धन एवं समाज के नवनिर्माण का व्यावहारिक मार्गदर्शन प्राप्त करता है।
साधना उत्तरकाशी में ही सम्पन्न हुई थी।
साधना का समावेश अत्यंत जयरी है यदि यह क्रम चलता रहे तो हमारे आस-पास परमपूज्य गुरुदेव गुरुदेव के श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की एक टीम खड़ी होगी, न कि कुछ कच्ची बुद्धि के खुशामदी पसंद समर्थकगण , जो हमें अपना माध्यम बनाकर कुछ स्वार्थ पूर्ति करते हैं। विराट से विराटतम होते जा रहे संगठन के लिए यह समझना अत्यन्त जरूरी है।
साधना पूरी नहीं होती। आत्माहुति जितनी सम्पूर्ण होगी, परमार्थ की ज्वाला उतनी ऊँची उठेगी। दीप जितना अधिक अपने को जलाता है, ज्योति उतनी ही अधिक प्रखर होती है। जड़े अपने को जितनी अधिक गहराई में दबाई रखती हैं, वृक्ष उतने ही अधिक मजबूत होते और ऊँचे उठते हैं। जीवन को आधार और ऊर्जा प्रदान करने वाला प्रत्येक घटक इसी पुण्य-परम्परा में संलग्न है।
साधना की थी। मैं भी वहीं रहूँगा, बिना कुछ खाए-पिए और सुख-सुविधा की चिन्ता किए। मुझे पूरी तरह से यकीन है कि भगवान मेरे सवालों का जवाब जरूर देगा।”
साधनाओं एवं सामाजिक नीति-मर्यादाओं का मूल्य आँका जा सकता है। क्योंकि ये प्रवृत्तियों का नियन्त्रण करने वाले जीन्स में उत्परिवर्तन को सम्भव बना सकती है। तभी तो एस. फ्रोजा का अपने ग्रन्थ में कहना है कि जादुई जीन के मूल रहस्य को उद्घाटित किया जा सके तो जीवन के विकास की अनन्त संभावनाओं को साकार किया जा सकता है।
साधनात्मक दिनचर्या भी जरूरी हैं बाल्टीमोर विश्वविद्यालय के अपराध विज्ञान विभाग की प्राध्यापक डायना फिशाविन के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को लगातार प्रताड़ित किया जाय, तो इस तिरस्कार से उनके अन्दर गहरी मनोग्रन्थियाँ बन जाती है यही मनोग्रन्थियाँ बाद में आनुवंशिक अपराध को जन्म देती है। ऐसे व्यक्तियों को यदि प्रेमपूर्ण वातावरण में रखा जाए और उनमें ईश्वरीय आस्था एवं विश्वास का पनपाया जा सके, तो आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम पा जा सकते हैं अब वैज्ञानिक भी मानते हैं। कि प्राचीन ऋषियों द्वारा अन्वेषित अध्यात्म विज्ञान की तकनीकें सिर्फ प्राची परम्पराएँ भर नहीं है । आज उनका उपयोग विज्ञानसम्मत ऐसे प्रयोगों के रूप में किया जा सकता है जो मानव की जेनेटिक प्रणाली को दोष मुक्त बना सके। स्वयं आप भी चाहें तो स्वयं को और अपनी भावी पीढ़ियों को इन्हीं आध्यात्मिक प्रयोगों का आश्रय लेकर गुणवान बना सकते हैं।
साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीनकाल से लेकर अभी तक बना हुआ हैं। उन्हीं दिव्य सत्ताओं के प्रत्यक्ष आदेश से हिमालय की छाया और गंगा की गोद में शान्तिकुँज बनाया-बसाया गया था, ताकि जन-साधारण यहाँ साधना करके हिमालय के दिव्य अनुदानों का पा सकें और वहाँ के ऋषिगणों देवशक्तियों के सूक्ष्म संपर्क में आकर स्वयं को धन्य अनुभव कर सकें।
साधना का यही स्थान है। शिव ताण्डव भी यहीं हुआ था। उसी अवसर पर उपयोग में लाया गया त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप-साधना उत्तरकाशी में ही सम्पन्न हुई थी।
साधना अनवरत रूप से चल रही है। हमने हर बसंत पर्व पर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है तथा उसे पूरा किया है। इस बसंत पर भी हमने तीन कार्यों के लिए कदम बढ़ाया है। पहला प्रज्ञा-मंडल का गठन, दूसरा साप्ताहिक दीप यज्ञ-सत्संग की शृंखला प्रारम्भ करना। तीसरा है- बुराइयों का, दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करना।
साधनाओं का सृजन किया था। विज्ञानवेत्ता एबीगेल भी मानते हैं यदि किसी तरह मन की गहराइयों को प्रभावित किया जा सके तो tcq जीन के प्रभावित होने की सम्भावना बढ़ जाती है ओर यह निर्विवाद है कि ध्यान मन की गहराइयों को प्रभावित करता है इससे tcq का प्रभावित होना लगभग सुनिश्चित है। यह tcq ही वह जीन है जो म्यूटेशन में आश्चर्यजनक ढंग से भाग लेता है। इस म्यूटेशन में ही नए गुण पैदा होते हैं।
साधना करते हुए ऋद्धि सिद्धियों का भाण्डागार हस्तगत किया जा सकता है। हाँ, यह पत्रिका अपने लेखों द्वारा यही मार्गदर्शन देती है।
साधनात्मक पराक्रम अपने स्थान पर जरूरी है एवं वही एक मात्र संबल है जो साधक को पथभ्रष्ट, अहंकारी, उन्मादी नहीं बनने देता न्यूनतम ही सही किसी न किसी रूप में दैनिक जीवन में साधना का समावेश अत्यंत जयरी है यदि यह क्रम चलता रहे तो हमारे आस-पास परमपूज्य गुरुदेव गुरुदेव के श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की एक टीम खड़ी होगी, न कि कुछ कच्ची बुद्धि के खुशामदी पसंद समर्थकगण , जो हमें अपना माध्यम बनाकर कुछ स्वार्थ पूर्ति करते हैं। विराट से विराटतम होते जा रहे संगठन के लिए यह समझना अत्यन्त जरूरी है।
साधनात्मक स्तर पर इसीलिए यह परिपाटी बनायी गयी है, कि सामूहिक अखण्ड जप का क्रम हर स्थान पर चले, चाहे उसमें सक्रिय परिजन एक घण्टा ही भागीदारी कर सकें, अवश्य करें।
साधना करके हिमालय के दिव्य अनुदानों का पा सकें और वहाँ के ऋषिगणों देवशक्तियों के सूक्ष्म संपर्क में आकर स्वयं को धन्य अनुभव कर सकें।
साधनात्मक दिनचर्या या जीवन को गौण मान लेना साधनात्मक पराक्रम अपने स्थान पर जरूरी है एवं वही एक मात्र संबल है जो साधक को पथभ्रष्ट, अहंकारी, उन्मादी नहीं बनने देता न्यूनतम ही सही किसी न किसी रूप में दैनिक जीवन में साधना का समावेश अत्यंत जयरी है यदि यह क्रम चलता रहे तो हमारे आस-पास परमपूज्य गुरुदेव गुरुदेव के श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की एक टीम खड़ी होगी, न कि कुछ कच्ची बुद्धि के खुशामदी पसंद समर्थकगण , जो हमें अपना माध्यम बनाकर कुछ स्वार्थ पूर्ति करते हैं। विराट से विराटतम होते जा रहे संगठन के लिए यह समझना अत्यन्त जरूरी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-March
साधनारत व्यक्ति को बोध कराती है, ‘योऽसौसूर्यो सोऽह्मस्मि।’ यानि कि वही मैं हूँ। ध्यान की इसी गम्भीरता में रुद्र, विष्णु, ब्रह्मग्रंथियाँ भी खुलती हैं। यही विज्ञानमय कोश की विभूतियों का जागरण है। इसके बाद आनन्दमय कोश की विभूतियाँ बता सकना भले ही वाणी और शब्द से परे हों फिर भी उन्हें संकेत तो दिये जा सकते हैं जो यथार्थ में जिज्ञासु हैं।
साधना उपक्रम में पाँच कोशों का अनावरण किया जाता है । सूक्ष्म शरीर में पाँच ऐसे रत्नकोश हैं जिसमें विभूतियों और सम्पत्तियों के विपुल भाण्डागार भरे पड़े हैं । इन पाँचों को अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश कहते हैं । यह पाँचों कोश सामान्यतया प्रसुप्त स्थिति में पड़े
साधना का दूसरा प्रमुख लाभ पंचकोशों का परिशोधन एवं जागरण है। इस लाभ को प्रमुख एवं महत्वपूर्ण इसलिए बताया जा रहा है क्योंकि सच्चे साधक अपनी तप ऊर्जा को प्रारब्ध को नष्ट करने में नहीं लगाते हैं। वे तो समाधि में परमात्मा का सान्निध्य पाने के लिए अपने पंचकोशों को परिशोधित एवं जाग्रत करते रहते हैं। साधना की तनिक गहराई में प्रवेश पाने के बाद साधक बुरे प्रारब्ध को भी तप से रूपान्तरित कर लेते हैं। फिर तो असाध्य कष्ट ही तप की विभूतियाँ लुटा जाता है।
साधना को किया जाये तो आनन्दमय कोश की विभूतियाँ भी उपलब्ध की जा सकती हैं।
साधना भी कुछ खास कठिन नहीं रह जाती । पर होता है कि वैसी एकाग्रता के कुछ
साधना चलती रहती। हालाँकि इस समय तक उसके बारे में लोगों को कुछ खास जानकारी नहीं थी।
साधना का ही एक विशिष्ट पक्ष है । इसमें भी पाँच साधना तपश्चर्याएँ की जाती हैं । कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसी साधना विज्ञान का पंचाग्नि विद्या का नाम से वर्णन है । इस प्रयोग को किस प्रकार क्रियान्वित किया जाता है इसकी चर्चा यहाँ न करके इन पंक्तियों में केवल सर्वजनीन सर्वसुलभ एक मुखी गायत्री साधना उपासना की चर्चा ही अभीष्ट है ।
साधना करके ही उपलब्धियाँ, विभूतियाँ अर्जित की हैं, परमानन्द ब्रह्मानन्द पाया है।
साधना तपश्चर्याएँ की जाती हैं । कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसी साधना विज्ञान का पंचाग्नि विद्या का नाम से वर्णन है । इस प्रयोग को किस प्रकार क्रियान्वित किया जाता है इसकी चर्चा यहाँ न करके इन पंक्तियों में केवल सर्वजनीन सर्वसुलभ एक मुखी गायत्री साधना उपासना की चर्चा ही अभीष्ट है ।
साधना के द्वारा लोग ऋषि, तपस्वी बन जाते हैं। उनके जीवन का कायाकल्प हो जाता है। इसीलिए हम आप लोगों को गायत्री तपोभूमि मथुरा बुलाते हैं जो गायत्री की एक सिद्ध पीठ है। जहाँ अखण्ड अग्नि एवं 400 तीर्थों के जल रज की स्थापना है। यहाँ हम गायत्री अनुष्ठान कराते हैं ताकि आपके पूर्वजन्म के संस्कार कम हों तथा इस जन्म में आप महानता की ओर बढ़ सकें।
साधना की पृष्ठभूमि कह सकते हैं । इसके उपरान्त मंत्र ध्यान आरंभ होता है । मंत्र साधना के दो भाग है - (1) जप (2) ध्यान । इन दोनों के साथ-साथ समन्वय करके चलना पड़ता है ।
साधना है जिसके लिए संयमी ही नहीं मनस्वी भी बनना पड़ता है । दो वस्तुएँ बनने से तीसरी मिलने की प्रक्रिया रसायन कहलाती है । केमिस्ट्री इस विज्ञान का नाम है । रज और वीर्य मिलने से भ्रूण की उत्पत्ति होती है
साधना के बाद अपना विद्याध्ययन पूरा कर लिया। तत्वदर्शी विद्वान के रूप में उसकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी थी। जीवन के अनगिनत रहस्यों का उसने अनुभव कर लिया था।
साधना काल में निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्य एवं वाणी का दृढ़तापूर्वक संयम प्राणमय कोश की शक्तियों को विकसित एवं अभिवर्धित करने के कारगर उपाय हैं। अनुष्ठान काल में मानव प्रकृति के रहस्यों को खोजने वाली पुस्तक का स्वाध्याय, जप के समय मंत्रार्थ चिंतन, आज्ञाचक्र पर अंतःत्राटक, मनोयोग कोश की विभूतियों को तीव्र गति से जाग्रत करने में समर्थ है। जप काल में स्वर्णिम सविता का ध्यान आवश्यक है। ध्यान में साधक का सविता में समर्पण, विसर्जन, विलय की गहरी अनुभूति साधनारत व्यक्ति को बोध कराती है, ‘योऽसौसूर्यो सोऽह्मस्मि।’ यानि कि वही मैं हूँ।
साधना के साथ चांद्रायण महाव्रत के प्रभावों का स्थान-स्थान पर वर्णन किया है। गायत्री महामंत्र की महिमा से भी अब कोई अपरिचित नहीं रहा। किन्तु इस दोनों के संयुक्त प्रयोग से अभी भी कम ही लोग परिचित हैं।
साधना की चारों उपलब्धियों को यथासम्भव अधिकाधिक मात्रा में ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित करना ।
साधनारत योगी भी इससे कम हैरान नहीं होते । तभी तो गीतोपदेश के समय योगचर्चा के दौरान अर्जुन ने घबराकर भगवान श्रीकृष्ण से पूछ लिया, आखिर यह सब होगा कैसे प्रभु? क्योंकि - चन्चलहि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदद्वम । यानि कि हे कृष्ण! यह मन तो बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला और बड़ा मजबूत है। सभी का यही मानना है कि इसे एक ही दिशा में देर तक बनाए रखना ही एकाग्रता है।
साधना का अति विशिष्ट उपक्रम है। इससे होने वाले लाभ तो इतने हैं कि जिन्हें गिनाने के लिए एक लेख का कलेवर पर्याप्त न होगा। हर लाभ को स्पष्ट करने के लिए एक-एक लेख लिखना पड़ेगा। फिर भी इसके प्रभावों का अनुभव जिस रूप में स्पष्ट किया जा सकता है वे हैं, (1) बुरे प्रारब्ध या दुष्कर्मों के चक्रव्यूह का वेधन (2) पंचकोशों का शोधन एवं जागरण (3) व्यक्तित्व में सूर्य और चन्द्र या प्राण एवं रवि अथवा सोम एवं अग्नि की धाराओं का समुचित सामंजस्य। ये तीनों ही लाभ ऐसे है जो अल्प समय में मिलने वाले हैं, जिन्हें अध्यात्मवेत्ता चमत्कार से कम नहीं मानते।
साधना करते रहने वाले व्यक्ति भी कई तरह की शिकायतें करते देखे गये हैं, उदाहरण के लिए जी मिचलाना, चक्कर आना, सिरदर्द होना। मूलतः ये और ऐसी अनेकों तकलीफें गायत्री मंत्र की अधिकता के कारण शरीर में अचानक बढ़ जाने वाले अग्नि तत्व के कारण होती हैं। हालाँकि गायत्री मंत्र सर्वथा निरापद मंत्र है। मंत्र विज्ञान के मर्मज्ञ इस बात को जानते भी हैं। इसमें सूर्य और गुरु दोनों शक्तियों का संतुलित सामंजस्य है।
साधना से उपलब्ध होने वाला तीसरा तत्व जो भले ही उपलब्धि की श्रेणी में न गिना जा सके किन्तु इस प्रक्रिया का सारा विज्ञान इसी में निहित है, यह है सोम तथ्यों का ठीक-ठाक संतुलन सामंजस्य। गायत्री साधना के शुरुआती दौर से गुजरने वाले साधक और कभी-कभी तो लम्बे-लम्बे समय समय तक साधना करते रहने वाले व्यक्ति भी कई तरह की शिकायतें करते देखे गये हैं, उदाहरण के लिए जी मिचलाना, चक्कर आना, सिरदर्द होना। मूलतः ये और ऐसी अनेकों तकलीफें गायत्री मंत्र की अधिकता के कारण शरीर में अचानक बढ़ जाने वाले अग्नि तत्व के कारण होती हैं। हालाँकि गायत्री मंत्र सर्वथा निरापद मंत्र है। मंत्र विज्ञान के मर्मज्ञ इस बात को जानते भी हैं।
साधना करके यह विद्या सीख ली थी जिसके द्वारा वह सामान्य भौतिक शरीर के साथ एक अन्य संकल्प शरीर में भी प्रकट हो सकता था। ये दोनों शरीर दो अलग-अलग स्थानों पर दो अलग-अलग ढंग से सक्रिय रह सकते थे। देखने में दोनों में कोई भेद मालूम नहीं पड़ता। दोनों ही शरीरों में उसकी सूक्ष्म चेतना सक्रिय रहती और परस्पर आँतरिक संवाद बनाये रखती।
साधना विधान है, जो अति उच्चस्तरीय होने के कारण सर्वसाधारण की पहुँच से बाहर हैं। फिर भी इतना तो है ही कि गायत्री मंत्र ज्यादा जपने से उष्णता पैदा होती है, स्नायु भी चंचल और ऊष्ण हो जाते हैं। यह उष्णता कुछ यद्यपि हवन से भी कम होती है फिर भी इसका वैज्ञानिक उपाय यही है कि जब अग्नि तत्व की बढ़ोत्तरी हो तो सोम को आकर्षित किया जाये। चांद्रायण व्रत से वातावरण से सोम तत्व का आकर्षण तीव्रता से होता है, इससे उत्तेजित स्नायु शान्त होते हैं। स्वाभाविकता ही प्रसन्नता और उल्लास भर जाता है।
साधना की शुरुआत का क्रम उसी तरह का है जिस तरह अपने परिजन नौ दिवसीय या चालीस दिवसीय अनुष्ठानों में करते थे। बस इतना ध्यान रखें कि इस क्रम में 42 माला का जप अनिवार्य है इसमें किसी भी छूट की कोई गुँजाइश नहीं है। षट्कर्म, गुरुदेव एवं गायत्री माता के चित्र का पंचोपचार पूजन के पश्चात् जप प्रारम्भ कर देना चाहिए। प्राणाकर्षण-प्राणायाम का अभ्यास षट्कर्म के समय भी किया जा सकता है और बाद में भी। 42 माला का पूरा जप करने में प्रायः चार घण्टे लगते हैं, प्रातः ढाई-तीन घंटे एवं सायंकाल डेढ़ घंटे लगाने से उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।
साधना प्रयोग विधानों में अध्यात्म का सार निहित है। उत्कृष्ट चिंतन की पृष्ठभूमि बनाने वाली गायत्री महाविद्या एक प्रकार से अमृत है। पारस भी और कल्पवृक्ष भी। साथ ही उनने यज्ञ का तत्वदर्शन एवं विज्ञान के रूप में धर्म की सारी शिक्षाएँ समुदाय के समक्ष रख दीं। परमार्थ के लिए किये गये सत्कर्म के रूप में यज्ञ विद्या को हमारी गुरुसत्ता ने ‘जाग्रत जीवान्त पुरोहितो’ के रूप में सक्रिय कार्यकर्ताओं के माध्यम से जन जन के लिए सुलभ बना दिया।
साधना कर सका, यानि समय की शाश्वत धारा से स्वयं को एक कर सका व उसे अपना शाश्वत स्वरूप प्रदान करता है, वह जगत के घटना क्रमों में अपनी उचित एवं उपयुक्त भूमिका का निर्वाह करता हुआ शाश्वत आनन्द में निमग्न हो जाता है। संसार में जितने भी श्रेष्ठतम व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने निष्ठा पूर्वक समय की साधना करके ही उपलब्धियाँ, विभूतियाँ अर्जित की हैं, परमानन्द ब्रह्मानन्द पाया है।
साधना उपासना की चर्चा ही अभीष्ट है ।
साधना के दो भाग है - (1) जप (2) ध्यान । इन दोनों के साथ-साथ समन्वय करके चलना पड़ता है ।
साधना के यह दोनों ही आरंभिक चरण हैं । इसे साधना की पृष्ठभूमि कह सकते हैं । इसके उपरान्त मंत्र ध्यान आरंभ होता है । मंत्र साधना के दो भाग है - (1) जप (2) ध्यान । इन दोनों के साथ-साथ समन्वय करके चलना पड़ता है ।
साधना जितनी प्रभावकारी एवं सुगम है उतनी कोई और विधि नहीं। इसमें वे सभी तत्व हैं जो पंचकोशों को विकसित करने के लिए आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए अन्नमय कोश की शक्तियों के विकास के लिए चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार घटते बढ़ते क्रम में मिर्च मसाले रहित एक समय के अस्वाद भोजन से उत्तम और कोई उपाय नहीं। यही बात प्राणमय कोश के संदर्भ में है। सहज सरल प्राणाकर्षण प्राणायाम मंत्र जाप के समय श्वास की क्रिया, लयबद्धता, साधना काल में निष्ठापूर्वक ब्रह्मचर्य एवं वाणी का दृढ़तापूर्वक संयम प्राणमय कोश की शक्तियों को विकसित एवं अभिवर्धित करने के कारगर उपाय हैं।
साधना सम्पन्न की थी । अलीपुर जेल में जहाँ श्री अरविन्द स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय में कैद किए गए थे, उनके छूट जाने के बाद जब भी वहाँ किसी को ले जाया जाता तो उसका मन किन्हीं विशेष विद्युत तरंगों से झनझना उठता । आखिर हार-थक कर जेल अधिकारियों ने वहाँ किसी को ले जाना बन्द कर दिया और उस कोठरी में ताला लगा दिया । हालाँकि बाद में उस स्थान को स्मारक में तब्दील कर दिया गया ।
साधना को भी पाँच चरणों में विभाजित किया गया है । इस साधना उपक्रम में पाँच कोशों का अनावरण किया जाता है । सूक्ष्म शरीर में पाँच ऐसे रत्नकोश हैं जिसमें विभूतियों और सम्पत्तियों के विपुल भाण्डागार भरे पड़े हैं । इन पाँचों को अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश कहते हैं । यह पाँचों कोश सामान्यतया प्रसुप्त स्थिति में पड़े
साधना द्वारा आत्मशोधन, आत्मपरिमार्जन किया है। योग तप के माध्यम से अपने को गलाया है बीज जब गलता है तभी पेड़ का रूप लेता है। हम यह बताना चाहते हैं कि आपके अन्दर अभी जितनी कमियाँ हैं इसे निकाले बिना आपको हम कुछ नहीं दे सकते हैं। इसके परिमार्जन एवं परिशोधन के लिए हम आपको गायत्री तपोभूमि समय-समय पर बुलाते रहते हैं। आप जानते हैं कि ऊसर भूमि में कोई बीज न तो उगता है और कोई उपज होती है।
साधना और अध्ययन पूरा कर लेने के बाद वह अपने मित्र से मिलने गाँव की ओर चल पड़ा। गाँव पहुँचकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वैभव अभी भी उसी टूटी फूटी कुटी में दिन बिता रहा था। “ यह क्या वैभव तुम ओर इस हालत में ?”
साधना सम्पदा का भी है। और परिस्थितियाँ भी मनुष्य को प्रभावित करती है। इतने पर भी यह मानकर चलना होगा कि उनका महत्व सीमित है। साधनों के सहारे की गयी प्रगति उनके हटते ही सादा के लिए समाप्त हो जाता है। परिस्थितियाँ बदलती, उलटती रहती हैं, आज अनुकूलता कल प्रतिकूलता।
साधना करनी पड़ सकती है और प्राण को परिपुष्ट करने वाली सत्प्रवृत्तियों से भरा पूरा व्यक्तित्व बनाना पड़ता है । वस्तुतः सुयोग्य संतानोत्पादन भी एक साधना है जिसके लिए संयमी ही नहीं मनस्वी भी बनना पड़ता है । दो वस्तुएँ बनने से तीसरी मिलने की प्रक्रिया रसायन कहलाती है । केमिस्ट्री इस विज्ञान का नाम है । रज और वीर्य मिलने से भ्रूण की उत्पत्ति होती है
साधना के दौरान उसे अपने अस्तित्व में कुछ विशेष होने का आभास होने लगा था। उसे लगने लगा था कि वह स्वयं को दो रूपों में प्रकट कर सकता है। सूक्ष्म आत्माओं को बताये गये निर्देश के अनुसार उसने साधना करके यह विद्या सीख ली थी जिसके द्वारा वह सामान्य भौतिक शरीर के साथ एक अन्य संकल्प शरीर में भी प्रकट हो सकता था। ये दोनों शरीर दो अलग-अलग स्थानों पर दो अलग-अलग ढंग से सक्रिय रह सकते थे। देखने में दोनों में कोई भेद मालूम नहीं पड़ता।
साधना को समुचित रूप से करेंगे। किसी भी महीने में एक चांद्रायण महाव्रत के साथ गायत्री साधना को समन्वित रूप से अपनाकर इससे होने वाली उपलब्धियों से परिचय पाया जा सकता है। विशिष्ट साधक अपनी स्थिति के मुताबिक़ इस क्रम को आगे भी बढ़ा सकते हैं। उचित परामर्श और मार्गदर्शन इस पत्रिका के माध्यम से गुरुकृपा से सभी को समयानुसार मिलता रहेगा।
साधनाओं में ही वैसी एकाग्रता अपेक्षित होती है । यदि प्राथमिक अभ्यास कर लिया जाये तो वैसी एकाग्र साधना भी कुछ खास कठिन नहीं रह जाती । पर होता है कि वैसी एकाग्रता के कुछ
साधना अभी पक्की नहीं हो पाई है दूसरे शरीर को सक्रिय, सतेज एवं प्रखर बनाये रखने के लिए जितनी प्राण ऊर्जा चाहिए अभी वह उतनी नहीं जुटा पाया है। यदि तप प्रखर हो सका तो आगे ऐसी परेशानी नहीं होगी।
साधनात्मक प्रयासों से इन्हें प्रकट करो। ईश्वर के राजकुमार होने की सार्थक अनुभूति करो।
साधना क्रम में आने वाले विक्षेप, व्यतिरेक स्वतः शान्त हो जाते हैं।
साधना । आयु से क्या होता है, मुख्य तो है सीखने-नया जानने की जिज्ञासा-आयु के अन्तिम क्षण तक ।
साधनात्मक प्रयासों से अपने मन सहित समूची चेतना को नियंत्रित कर सके, तो वह स्वयं कई रूप प्रकट कर सकता है।
साधना क्षेत्र में गायत्री एकमुखी है । एकमुखी का तात्पर्य है अंतःकरण का परिष्करण के लक्ष्य पर अर्जुन के मत्स्यवेध जैसी गुरुवरण की अखण्ड निष्ठा । लक्ष्य प्राप्ति का एकमात्र यही उपाय है । इसके अवलम्बन की प्रेरणा देन वाली एकमुखी गायत्री है । इसमें जीवन लक्ष्य और उसके धारा प्रवाह की दिशा निर्धारित है ।
साधना विज्ञान का पंचाग्नि विद्या का नाम से वर्णन है । इस प्रयोग को किस प्रकार क्रियान्वित किया जाता है इसकी चर्चा यहाँ न करके इन पंक्तियों में केवल सर्वजनीन सर्वसुलभ एक मुखी गायत्री साधना उपासना की चर्चा ही अभीष्ट है ।
साधना की तनिक गहराई में प्रवेश पाने के बाद साधक बुरे प्रारब्ध को भी तप से रूपान्तरित कर लेते हैं। फिर तो असाध्य कष्ट ही तप की विभूतियाँ लुटा जाता है। पिछले दिनों विगत डेढ़ मास में मेरी अनुभूतियाँ शीर्षक के अंतर्गत इसी तत्व की चर्चा की गयी है।
साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा बढ़ाई जाती है, किन्तु पूर्व जर्मनी में दो सौ वर्ष पूर्व जन्में हानिरस हान्केन नामक तीन वर्षीय बालक के बारे में क्या कहा जाये, जिसने इतनी कम उम्र में हजारों लैटिन मुहावरे कंठस्थ कर रखे थे । कठिन से कठिन जोड़, बाकी, गुणा, भाग वह बड़ी आसानी से कर लेता था । इसी उम्र में उसने फ्रेंच एवं अन्य कई भाषाएँ सीखनी आरम्भ कर दी थीं । प्रख्यात कवि गैटे 9 वर्ष की आयु में कविता लिखने लगे थे । विकासवाद के जन्मदाता डार्विन भी ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे ।
साधना की शुरुआत कैसे करें ? पाठकों की इस जिज्ञासा के उत्तर में कहना इतना ही है कि इसे किसी भी मास की पूर्णिमा से शुरू किया जा सकता है। पूर्णिमा को पूरा आहार लिया जाये। ध्यान रहे यहाँ पूरे अहार का मतलब दोनों समय भोजन नहीं है, किसी भी एक ही समय आहार ग्रहण करना है। सुविधा सहूलियत के हिसाब से सुबह या दोपहर का समय अधिक उपयुक्त है।
साधनाकाल में क्रोध, क्षोभ, ईर्ष्या, घृणा आदि मनोविकारों का कोई स्थान नहीं है। ऐसा कुछ भी सोचा जाये तो चित्त की शाँति और समरसता को नष्ट करे। इन दिनों अपना दैनिक जीवन विशेष रूप से लोकहित के कार्यों में संलग्न रहना चाहिए। प्रत्येक दिन शुभ कर्मों के उपार्जन का माध्यम बने। इस साधना के प्रभाव विलक्षण एवं अद्भुत हैं।
साधना के प्रभाव विलक्षण एवं अद्भुत हैं। व्रत के दिनों में जल खूब लें। जल में नीबू, शहद, ग्लूकोस जैसी वस्तुएँ भी लेते रहना चाहिए। स्थिति के अनुसार पेट की सफाई के लिए एनीमा जरूर लेते रहना चाहिए ताकि उपवास के दिनों में पेट में गर्मी बढ़ने से मल सूखकर गाँठ न बन जाये। इस प्रक्रिया में अकेला शरीर ही नहीं समूचा अस्तित्व तप की आँच में पकता है।
साधना के रूप में उसकी इतनी कोई खास उपादेयता नहीं। इसके लिए मृदु चांद्रायण का महत्व कुछ विशेष है।
साधना शिविर में दिया गया व्याख्यान )
साधना में न तो रस मिलेगा और न सफलता का सुयोग बनेगा। सामान्यता मन का चिंतन बहुमुखी है और भौतिकता का ही तान बान बुनता रहता है। अंतःक्षेत्र की दिव्य विभूतियों को समझना और उन्हें प्राप्त करने का उपाय खोजना ध्यान साधना से ही संभव हो सकता है।
साधना होती है। मंत्र बड़े सार्थक और सामर्थ्यवान है। इसके द्वारा बड़े बड़े काम हो सकते हैं। साधारण मंत्र जो सपेरा जानता है, साँपों के जहर को मंत्र पढ़कर उतार देता है। भौतिक जगत में मंत्रों का बड़ा महत्व है।
साधनात्मक मनोभूमि विकसित कर आहार विहार का नियमन कर कैसे स्वस्थ, सुसंस्कृत संतति को जन्म दिया जाये, इसकी पूरी व्यवस्था उस संस्कार में है। गायत्री परिवार के द्वारा सुव्यवस्थित पौरोहित्य व्यवस्था के माध्यम से यह कर्मकाण्ड अब बड़े व्यापक रूप से सम्पन्न किया जाता है। 21वीं सदी में यदि मातृसत्ता को स्वस्थ देखना चाहते हैं, उसकी संख्या में तेजी से आ रही कमी को रोकना चाहते हैं एवं उनका उनके गर्भकाल में होने वाली आनुवंशिक व्याधियों में शिशुओं को रोगी होने से बचाना चाहते हैं तो यह संस्कार ही इस प्रक्रिया के लिए सम्पन्न कराया जाना अनिवार्य माना जाना चाहिए। भविष्य की -------------रोगमुक्त, संस्कार वान श्रेष्ठ महामानवों को ही,---------------- इसके लिए यह संस्कार जरूरी है।
साधना में 10-15 दिन गुजरते ही अनुभव करने में आता है कि हर किसी के विगत जन्मों में जाने-अनजाने कुछ ऐसे कर्म बन पड़े होते हैं, जो वर्तमान जन्म में दुर्भाग्य बनकर सामने आते हैं। जब सच्चाई और ईमानदारी पूर्वक लाख प्रयत्न करने पर भी सफलता नहीं मिले तो यही समझना चाहिए कि कुछ दुर्योग आ गया। इस दुर्योग के समाधान के लिए समाज में ऐसे न जाने कितने टोने-टोटके जादू-मन्त्र प्रचलित हैं कि जिनसे प्रायः लाभ की जगह हानि देखी जाती है। इन तमाशों और चुटकुलों में समय गँवाने के साथ भारी धन भी गँवाना पड़ता है और मुश्किलें हैं कि जहाँ कि तहाँ खड़ी रहती हैं। चांद्रायण महाव्रत के साथ गायत्री अनुष्ठान करने वाले इस कर्म चक्र को अपने तप एवं मंत्र शक्ति से सूक्ष्म जगत में छिन्न-भिन्न कर देते हैं।
साधना का चमत्कार अवर्णनीय है। एक समय अकबर ने महामंत्री मानसिंह को बुलाया और कहा कि हमारा प्रयाग का किला अठारह बार ढह गया है उसका कोई उपाय करो ताकि वह सुरक्षित रह सके। अकबर का आदेश पाकर मानसिंह निकले और गंगा तट पर भ्रमण करने लगे। उसने देखा इस वीरान स्थान पर एक महात्मा तप कर रहे है। वे उनके पास पहुँचे ।
साधना में गायत्री पंचमुखी है । कुक्षा के अनुरूप इस साधना को भी पाँच चरणों में विभाजित किया गया है । इस साधना उपक्रम में पाँच कोशों का अनावरण किया जाता है । सूक्ष्म शरीर में पाँच ऐसे रत्नकोश हैं जिसमें विभूतियों और सम्पत्तियों के विपुल भाण्डागार भरे पड़े हैं । इन पाँचों को अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश कहते हैं ।
साधनाकाल में अपनी सेवा कराने की अपेक्षा सेवा करने की बात सोची जानी चाहिए। चमड़े का उपयोग भी इन दिनों वर्जित है क्योंकि आजकल 19 प्रतिशत चमड़ा हत्या करके ही उपलब्ध किया जाता है और उसका प्रयोग करने वाले के सिर पर भी आसुरी हत्या का प्रभाव पड़ता है। लकड़ी, रबड़ या कपड़े के जूते हों तो व्रत काल में प्रयोग करना चाहिए। अच्छा तो यह हो कि उन दिनों घर के वातावरण को अपनी आध्यात्मिक भावनाओं के अनुरूप बनाने की कोशिश की जाये। इतना न हो सके तो अपनी दिनचर्या में अधिक से अधिक मौन एवं स्वाध्याय को स्थान एवं महत्व देने की कोशिश करनी चाहिए।
साधना एवं लोक सेवा में लगाना चाहिए। मोह निशा के समाप्त होते ही त्याग और वैराग्य का भाव तरंगित होने लगा। उन्हें ऐसा लग रहा था कि जैसे इसी क्षण उनकी जिन्दगी का नवप्रभात हुआ है। उनके भावजगत में काव्य का नया छन्द आकार लेने लगा था -
साधना के शुरुआती दौर से गुजरने वाले साधक और कभी-कभी तो लम्बे-लम्बे समय समय तक साधना करते रहने वाले व्यक्ति भी कई तरह की शिकायतें करते देखे गये हैं, उदाहरण के लिए जी मिचलाना, चक्कर आना, सिरदर्द होना। मूलतः ये और ऐसी अनेकों तकलीफें गायत्री मंत्र की अधिकता के कारण शरीर में अचानक बढ़ जाने वाले अग्नि तत्व के कारण होती हैं। हालाँकि गायत्री मंत्र सर्वथा निरापद मंत्र है। मंत्र विज्ञान के मर्मज्ञ इस बात को जानते भी हैं। इसमें सूर्य और गुरु दोनों शक्तियों का संतुलित सामंजस्य है।
साधना के रूप में काम सेवन करते भी हैं तो इसका प्रयोजन एक अद्भुत प्रतिभा को जन्म देना होगा जो आवश्यकता अनुसार एक या दो शरीरों में पैदा की जा सकती है । यह उच्च स्तरीय शिशु जन्म है । एक काम सेवन अभिशाप या वरदान हो सकता है । विष को भी यदि संशोधन करके भेषज बना लिया जाये तो वितायक न रह कर संजीवनी मूरि बन सकता है । काम प्रक्रिया को विष बनाकर अपने मरण का साज न सँजोयें, बल्कि उसे अमृत बनाकर दो व्यक्तियों के असाधारण उत्कर्ष एवं विश्व कल्याण में कर सकने में समर्थ एवं प्राण प्रयोजन सिद्ध करें ।
साधना काल में व्यक्ति की चेतना कुछ अधिक ही संवेदनशील हो जाती है, इसलिए जहाँ अच्छे प्रभाव शीघ्र असर करते हैं वहाँ बुरे प्रभावों का भी बहुत जल्दी असर होता है, इसीलिए इन बुरे प्रभावों से जितना ज्यादा दूर रहा जा सके उतना ही अच्छा।
साधना के लिए छोड़ दें।
साधना बन पाती है ।
साधना से ही संभव हो सकता है।
साधना को समन्वित रूप से अपनाकर इससे होने वाली उपलब्धियों से परिचय पाया जा सकता है। विशिष्ट साधक अपनी स्थिति के मुताबिक़ इस क्रम को आगे भी बढ़ा सकते हैं। उचित परामर्श और मार्गदर्शन इस पत्रिका के माध्यम से गुरुकृपा से सभी को समयानुसार मिलता रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1997-May
साधना का उच्चस्तरीय आयाम है। इस साधना के अनुभवी ही जानते हैं कि भानुमती के पिटारे के अजूबे एवं अलादीन के चिराग के चमत्कार और कहीं नहीं अपने मन में ही है।
साधना महापूर्णाहुति से सम्बन्धित होंगी इससे भेजी जाती रहेंगी, वेदमंत्रों से लेकर उपनिषद् तथा भारतीय संस्कृति सम्बन्धी सारी जानकारियाँ सारे विश्व के करोड़ों व्यक्तियों को यदि इस माध्यम से आकर्षित कर इस अभियान से जो युग-निर्माण के निमित्त ऋषिचेतना ने खड़ा किया है, जोड़ दें तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यही विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय की इक्कीसवीं सदी कही वैचारिक क्रान्ति का आधार बनेगा, इसमें कोई सन्देह किसी को नहीं होना चाहिए।
साधनाएँ समूह मन के जागरण हेतु किये जा रहे पुरुषार्थों में एवं सविता-देवता बृहस्पति की उपासना में तन्मय बने रह, अपने लौकिक पुरुषार्थ में कोई कमी नहीं आने देते । यह समस्त विक्रमी संवत्सर हमें प्रेरित करने आया है कि यदि हम अशुभ से बचना चाहते हैं, तो गायत्री उपासना करने वालों की संख्या में न केवल वृद्धि करें, युगसंधि महापुरश्चरण में भागीदारी कर देवत्व को संगठित करने का भी प्रयास करें। श्रुति कहती है कि दैव-दैव कहना मात्र आलसी-प्रमादियों को शोभा देता है जो ब्रह्ममुहूर्त में जागकर औरों को भी सारे राष्ट्र को विश्व समुदाय को जाग्रत बनाए रखने का पुरुषार्थ करते हैं, इनके लिए ‘विकृति संवत्सर‘ के प्रतिफल शुभ भी बन सकते हैं।
साधना से सिद्धि-1
साधना करनी है, तो आपको सीमित ब्रह्मचर्य का पालन कर संयमशील बनना चाहिए, तभी मन की चंचलता थमेगी और आपका मन उपवास में लगेगा।
साधना का गुह्य विवेचन
साधना हो सके और उपलब्धियों का लाभ असंख्यों को वितरण करके कृत-कृत्य हो सकें।
साधना एवं उपलब्धियां गायत्री साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
साधनाएँ एवं कड़ी तपश्चर्याएँ करते रहे है। अब इस क्रम में विज्ञानवेत्ता भी प्रयत्नशील है काल का रहस्यबोध पाने के लिए वे सतत् शोध-अनुसंधान कर रहे है। इस क्रम में प्राप्त उनके निष्कर्ष हमें अचरज में डाल देते हैं।
साधना के द्वारा चेतना की गहराइयों में मंत्र बीज के स्फोट द्वारा ‘टाइम कोड’ को विखण्डित करके अनन्त ऊर्जा को प्राप्त करते हैं। इस रहस्यमय विज्ञान को अब आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी स्वीकार करने लगे है।
साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
साधना का सिर्फ पहला चरण है, जिसे इन अमर विभूतियों ने अनुभव किया। परस्पर हित के लिए उत्सर्ग, स्वार्थ नहीं बलिदान इनका मूलमंत्र था, जिसे अपनाकर वे मानवीय प्रेम के चरम बिन्दु तक पहुँच सके।
साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
साधना-आराधना
साधना ने उन्हें न केवल सुनने-समझने की ताकत दी वरन् उन्हें संगीत साम्राज्य का सिरमौर बना दिया। इससे स्पष्ट होता है कि संगीत का जादू भाषा से ऊपर उठकर बोलता है। ऐसे अनगिनत लोग है, जो शिक्षा के क्षेत्र में नौसिखिया होते हुए भी सुप्रसिद्ध संगीतकार सिद्ध हुए है ईशावेल पेरेट्रज के अनुसार संगीत एक ही समय में सृजनात्मक, संवेदनात्मक एवं विचारात्मक कार्यों को सम्पादित करता है। इस विधा की समुचित जानकारी रोगोपचार से लेकर भावना के उच्चस्तरीय आयामों तक पहुँचा सकती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की पद्धति में वह सारा गुण परिलक्षित होता है।
साधनाएँ बतलायी है, जो मनुष्य को करनी चाहिए। वे है-’सादा जीवन उच्च विचार’ आत्मवत् सर्वभूतेषु’, लोष्ठवत् परद्रव्येषु’ एवं ‘मातृवत् परदारेषु’। इन सूत्रों को अपनाकर ही हम अध्यात्मवादी बन बल-’आत्मबल’ आ सकता है।
साधना निरन्तर गहराती गयी। दैवी प्रेम से की गयी शुरुआत ईश्वरीय प्रेम के सर्वोच्च बिन्दु तक जा पहुँची। उन्होंने अपनी भावनाओं में यो माँ पश्यति सर्वत्र , सर्व च मयि पश्यति में निहित सत्य का अनुभव किया। चिरवियोग-चिरमिलन में बदल गया।
साधना में भावमय गुरुमूर्ति एवं भावमय परमेश्वर की अनन्तता में जब स्वयं को विलीन होते हुए अनुभव करता है, तब कबीर के स्वरों में गा उठता है, मन मगन भया फिर क्यों बोले।
साधना निर्विघ्न रूप से चल रही है ? विद्या अभ्यासी ब्रह्मचारीगणों के अध्ययनादि में कोई व्याघात तो नहीं पड़ रहा ?”
साधनाएँ
साधना का सर्वोच्च प्रकार था। उनके प्रियतम प्रभु श्री कृष्ण का उनके समय कोई स्थूल अस्तित्व न था। चर्मचक्षुओं से उन्हें न देख पाने पर भी भाव-साधना निरन्तर गहराती गयी। दैवी प्रेम से की गयी शुरुआत ईश्वरीय प्रेम के सर्वोच्च बिन्दु तक जा पहुँची। उन्होंने अपनी भावनाओं में यो माँ पश्यति सर्वत्र , सर्व च मयि पश्यति में निहित सत्य का अनुभव किया।
साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
साधना से सिद्धि -2
साधना-उपासना का महत्व, जो दो-दो कौड़ी के आदमी को महान बना देता है।
साधना होगा और पाँचवाँ-स्वाध्यायशील बनना होगा। आप इस प्रकार कर सकेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपका जीवन महान बन जायगा।
साधना के अनुभवी ही जानते हैं कि भानुमती के पिटारे के अजूबे एवं अलादीन के चिराग के चमत्कार और कहीं नहीं अपने मन में ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-July
साधना की विधि में कोई दोष है।
साधना के प्रसंग में कही गयी चौपाई गायत्री साधकों के लिए भी प्रासंगिक है। साधना के इस अभ्यास की पूर्णता के लिए वैराग्य की भी आवश्यकता है। इसकी व्याख्या महर्षि के अगले सूत्र में है, जिसे साधक अगले महीने पढ़ सकेंगे।
साधना की, बाद में सब कुछ छूट गया। फिर एकाएक मन में उत्साह उमड़ा और दुबारा शुरू हो गए। पर इस बार दो-तीन महीने में थक कर रुक गए। यही सिलसिला जीवन पर्यन्त चलता रहता है। रुक-रुक कर चलना, थक-थक कर रुकना, इस तरह से साधना अभ्यास कभी भी सफल नहीं होता है।
साधना से बहुत प्रसन्न हुए। इंद्र उसके सम्मुख प्रकट हुए और वर माँगने के लिए कहा।
साधना आरंभ करने के बाद श्रीराम सामाजिक गतिविधियों में भी पहले की तरह ही रुचि लेते थे। मालवीय जी के बारे में उन्हें जब भी कोई सूचना मिलती तो ध्यान से सुनते। पूरी जानकारी जुटाते और सोचने लगते कि उनके समाज अनुष्ठान में किस तरह सहयोग किया जा सकता है। सन् 1926 के वसंत पर्व के बाद उन्होंने अपनी दीक्षा की पिछली गतिविधियों का अवलोकन किया। समाज संस्कार के क्षेत्र में पिछले तीन वर्ष में उनके आस-पास जो कुछ भी घटा था, उसके प्रकाश में अपने लिए कुछ दायित्व चुना।
साधना कहाँ से और कैसे प्रारम्भ करें? यह सवाल प्रत्येक गुरु अनुरागी के मन में रह-रहकर स्पन्दित होता है। पिछले कई महीनों से अखण्ड-ज्योति के पाठक गुरु-गीता को श्रद्धा के साथ पढ़ रहे हैं। गुरु तत्त्व की व्यापकता, समर्थता और रहस्यमय आध्यात्मिकता ने उनकी श्रद्धा को और अधिक प्रगाढ़ किया है। उनके हृदय में उफनती-उमड़ती भक्ति और भी अधिक बलवती हो गयी है।
साधना का गीत रचा। भविष्य ने उसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार अर्नेस्ट हेर्माग्वे के नाम से पहचाना। उसके साहित्य सृजन को नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
साधना अभ्यास में यदि ये चार तत्त्व जुड़े हों तो अभ्यास चमत्कारी परिणाम उत्पन्न किए बिना नहीं रहता। जिन्हें अपने अभ्यास के परिणाम से शिकायत है, उन्हें महर्षि के इस कथन के प्रकाश में आत्मावलोकन व आत्मसमीक्षा करनी चाहिए। वे अवश्य ही यह पाएँगे कि उनके जीवन में कहीं न कहीं किसी तत्त्व की कमी है।
साधना-सहचरी बने, इसलिए नहीं कि गृहस्थी बसाना या सामान्य लोगों की तरह वंश चलाना है। (क्रमशः)
साधना करने से होता है। गंगा तट पर तपस्या-साधना की गति तीव्रगामी हो जाती है।
साधना विद्यमान है, वही उपनिषद् का मुख्य विषय है।
साधना का यही स्वरूप वरेण्य है। यही क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते चलते व्यक्ति को महामानव बना देता है।
साधना में विलीन हो गए। साधना काल में ध्यान के पलों में एक दिन उन्हें अंतर्दर्शन हुआ कि सुषुम्ना नाड़ी में अपनी चेतना के एक अंश को प्रविष्ट कर गुरुदेव उनकी चेतना को ऊपर उठा रहे हैं। गुरु कृपा से उसी क्षण उनकी अन्तर्चेतना काम विकार से मुक्त हो गई। वह लिखते हैं कि फिर कभी उन्हें काम का प्रकोप नहीं हुआ।
साधना के निष्कर्ष हैं- ये सूत्र और उनकी क्रमिक व्याख्या। शिष्यों के लिए संजीवनी औषधि की भाँति होने के कारण- इस धारावाहिक कथा का नाम भी ‘शिष्य संजीवनी’ है।
साधना में उतरने के लिए कुछ विशेष बातें माननी जरूरी हैं। गुरु भक्त शिष्यों की महान् परम्परा उनसे कहती है- इससे पहले तुम्हारे नेत्र देख सकें, उन्हें आँसू बहाने की क्षमता से मुक्त हो जाना चाहिए। इसके पहले तुम्हारे कान सुन सकें, उन्हें बहरे हो जाना चाहिए। और इसके पहले तुम सद्गुरुओं की उपस्थिति में बोल सको, तुम्हारी वाणी को चोट पहुँचाने की वृत्ति से मुक्त हो जाना चाहिए। इसके पहले तुम्हारी आत्मा सद्गुरुओं के समक्ष खड़ी हो सके, उसके पाँवों को हृदय के रक्त से धो लेना चाहिए।
साधना की यह प्रक्रिया सहज-सुलभ होते हुए भी परम-दुर्लभ है। इसमें दुर्लभता उस गुरु तत्त्व के बोध की है, जो गहन-श्रद्धा से ही मिल पाता है। श्रद्धा परिपूर्ण और परिपक्व न हो तो सद्गुरु को सामान्य मानव समझने की भूल होती रहती है। श्रद्धा और समर्पण की सघनता में ही यह रहस्य समझ में आता है कि गुरुदेव मूर्त महेश्वर हैं। गुरु चेतना को नमन ही ब्राह्मी चेतना को नमन है।
साधनामय जीवन का सार यह कथन बड़ा ही रहस्यमय एवं अतिशय प्रभावी है। इसमें पहली बात बड़ी स्पष्ट है कि कोरी भावुकता, बात-बात में आँसू बहाना गुरु भक्ति का परिचय नहीं है। शिष्यत्व की साधना के लिए पहली जरूरत समर्पित दृढ़ता की है। दृढ़ता से भरी अश्रुविहीन आँखें ही गुरुचेतना को निहार सकती हैं। जहाँ तक कानों की बात है- सो वे गुरु निन्दा और विषय चर्चा के लिए बहरे हों ताकि वे सद्गुरु की परावाणी सुन सकें।
साधना के पथ पर आरुढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आँतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्द्धन कर सकते है। इसी कारण शोपेनहॉर ने अपनी भावभरी अभिव्यक्ति में स्पष्ट किया है कि उपनिषद् पवित्र एवं उच्च विचारों से आप्लावित है, सत्य की जिज्ञासा से ओत-प्रोत हैं। सारे विश्व में उपनिषदों के समान कल्याणकारी एवं श्रेयस्कर कोई भी अन्य विद्या नहीं है। इसे अपनाकर मानव ब्रह्म से साक्षात्कार कर सकता है।
साधना के लिए बढ़ने वाला हमारा प्रत्येक कदम हमारे अपने हृदय के रक्त से यानि की प्रगाढ़ भावनाओं से धुला हुआ-परम पवित्र हो। यदि हम यह कर सकते हैं तो ही हम शिष्यत्व की साधना के अधिकारी हैं। और ये शिष्य संजीवनी के परम गोपनीय सूत्र हमारे लिए हैं। इन योग्यताओं के साथ ही हम इस राह पर आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि यह राह हठी, उन्मादियों एवं अहंकारियों के लिए नहीं है।
साधना, स्वाध्याय के क्षेत्र में भी छा गए ऊँच-नीच ने हिंदू समाज को बुरी तरह खोखला किया था। कलकत्ता (कोलकाता) अधिवेशन में उपजी कटुता को शाँत करने के बाद वे राष्ट्रीय भावनाओं का प्रचार करते हुए जगह-जगह घूमे। राष्ट्रीय आँदोलन को गति देते हुए वे समाज-सुधार संबंधी कार्यक्रमों को भी गति देते रहे। व्याख्यानों में अछूतोद्धार, स्त्रियों की दशा सुधारने और सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने की प्रेरणा रहती। शूद्रों के शास्त्र-अधिकार का मुद्दा भी इन व्याख्यानों का विषय होता।
साधना सही है भी या नहीं। पता नहीं साधना का पथ दिखाने वाले गुरु ठीक भी हैं या नहीं। पता नहीं मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं। इस तरह से डगमगाती श्रद्धा और चंचल निष्ठ, साधक और उसकी साधना को कहीं भी नहीं पहुँचने देती। वह प्रत्यक्ष में क्रिया तो करता रहता है पर भाव और विचारों की कमजोरी के कारण उसकी साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।
साधना का क्रम अपने ढंग से चल रहा था। उसके लिए चार-पाँच घंटे का अतिरिक्त समय चाहिए था। नींद में कटौती कर समय की पूर्ति की। गोघृत, मठा और जौ की रोटी आदि का प्रबंध माँ कर देती थी। दीपक में घी भरा रहने के लिए भी वही ध्यान देती थी ।
साधना करने के लिए यह पूर्णतया वर्जित है। उनका अन्तःकरण तो गुरु-प्रेम से इस कदर परिपूर्ण होना चाहिए कि उसमें तनिक से भी द्वेष और तनिक सी भी कड़वाहट की कोई गुँजाइश ही न रहे। हमारी भक्ति इतनी अधिक प्रगाढ़ हो कि शिष्यत्व की साधना के लिए बढ़ने वाला हमारा प्रत्येक कदम हमारे अपने हृदय के रक्त से यानि की प्रगाढ़ भावनाओं से धुला हुआ-परम पवित्र हो। यदि हम यह कर सकते हैं तो ही हम शिष्यत्व की साधना के अधिकारी हैं। और ये शिष्य संजीवनी के परम गोपनीय सूत्र हमारे लिए हैं।
साधना करते रहें।
साधना संघर्ष से गुजर रहे थे। काम वासना का प्रबल वेग उनके अन्तःकरण में रह-रहकर उद्वेग करता था। समझ में नहीं आता क्या करें? कैसे निबटे इस काम रूपी महाअसुर से। हारकर उन्होंने अपनी विकलता गुरुदेव से निवेदित की।
साधना में विघ्न डालेगा। छाया किस पर पड़ी, कौन कितना लाभान्वित हुआ, इसका पता न चलना ही मेरे जैसे विनम्रों के लिए श्रेयस्कर है।”
साधना विज्ञान एक समग्र दृष्टि एवं उपचार प्रस्तुत करता है। क्योंकि प्रो. एडगर एस ब्राइटमैन के शब्दों में, यह एक समस्वर, समग्र एवं संगठित जीवन का प्रतिपादन करता है। स्वामी अखिलानन्द ने अपने ग्रंथ ‘मेन्टल हेल्थ एण्ड हिन्दु साइकोलॉजी’ में इस संदर्भ में कुछ सूत्र प्रतिपादित किए हैं जो व्यक्तित्व गठन पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।
साधना का पुण्य पर्व है। शिष्यत्व की यह महासाधना अति कठिन है। लेकिन इसकी पूर्णता पर गुरु कृपा- अजस्र अनुदान बनकर बरसती है। जन सामान्य की सर्वमान्य सोच यही है कि यदि किसी तरह सद्गुरु कृपा हो जाय तो फिर जीवन में कुछ और करना शेष नहीं रह जाता है। यह सोच अपने सारभूत अंशों में सही भी है।
साधना का। जिसने शिष्यत्व की महाकठिन साधना की है। जो अपने गुरु की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरा है- वही उनकी कृपा का अधिकारी है। शिष्यत्व का चुम्बकत्व ही सद्गुरु के अनुदानों को अपनी ओर आकर्षित करता है। जिसका शिष्यत्व खरा नहीं है- उसके लिए सद्गुरु के वरदान भी नहीं हैं।
साधना करेंगे उन पर देश-काल के सभी बन्धनों से परे सद्गुरु की परम चेतना अजस्र अनुदान बरसाती रहेगी। यह बात केवल वैचारिक उक्ति भर नहीं है। यह महासत्य है, जो युग-युग के, भारतभूमि एवं अन्यान्य देशों के समर्पित शिष्यों की शिष्यत्व साधना का सार है। ध्यान रहे कि ये सूत्र उन्हीं के हैं और जो व्याख्या है वह परम पूज्य गुरुदेव की अन्तःप्रेरणा से प्रकट हुई है। इस सब में यदि किसी का सच्चा स्वत्व है, तो वह गुरु-शिष्य की महान परम्परा का है।
साधना के अधिकारी हैं। और ये शिष्य संजीवनी के परम गोपनीय सूत्र हमारे लिए हैं। इन योग्यताओं के साथ ही हम इस राह पर आगे बढ़ सकते हैं। क्योंकि यह राह हठी, उन्मादियों एवं अहंकारियों के लिए नहीं है। साधना का परम रहस्य मार्ग केवल शिष्यों के लिए है।
साधना की शक्ति बनती है। देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा-छाँह में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है। शिष्य काय-कलेवर में सद्गुरु ही साधक के रूप में अवतार लेते हैं।
साधना पथ आपके लिए है। यह साधना केवल उनके लिए है जिन्हें अपने प्यारे गुरुवर के बिना रहा नहीं जाता। जो अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की चेतना में समर्पित-विसर्जित और विलीन कर देना चाहते हैं। शिष्य संजीवनी की यह महाऔषधि उनके लिए है- जो श्रेष्ठ शिष्यों की अग्रिम कतार में खड़ा होना चाहते हैं। जो बार-बार अनेक बार, अनगिनत बार अपने गुरुवर द्वारा ली जाने वाली कठोरतम परीक्षा में खरे उतरना चाहते हैं।
साधना के परिणाम में गायत्री महामंत्र तुम्हें सब कुछ दे देगा। इस साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-
साधना करते समय उनके कमरे की छत गिर पड़ी। जिस ढंग से छत गिरी उस तरह उन्हें दबकर मर जाना चाहिए था। परन्तु आश्चर्यजनक ढंग से जिस स्थान पर बैठे थे, उस स्थान पर छत का मलबा अधर में ही लटका रह गया। गुरु कृपा को अनुभव करते हुए पहले वह उठे, फिर गुरुदेव के चित्र को उठाया, और बाहर आ गए। इसी के साथ पूरी छत भी गिर गयी।
साधना का प्रभाव है और फिर आप तो उनसे जुड़े हुए हैं, बँधे हुए हैं। यदि आपको अनुदान मिलता है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है, मिलना ही चाहिए आपको और मिलेगा भी। इसके साथ-साथ जब बिना माँगे ही हमको मिल रहा है, बिना माँगे ही अनुदानों से हमारी झोली भरी जा रही है, फिर उसकी थोड़ी-सी कीमत हम चुका दें तो क्या हर्ज है! उसकी कीमत आप तो क्या, बेटे, कभी चुकाई ही नहीं जा सकती। और उन अनुदानों की, जो जाने और अनजाने हमको प्राप्त होते रह हैं और हो रहे हैं, उनकी कीमत चुकाइए? नहीं बेटे, हजार जन्म में भी नहीं चुकाई जा सकती।
साधना के अभ्यास का। बिना थके, बिना रुके, समर्पित भावनाओं के साथ साधना का अभ्यास करते जाना चाहिए।
साधना का परम रहस्य मार्ग केवल शिष्यों के लिए है। जिनमें समर्पित संकल्प और संकल्पित समर्पण कूट-कूटकर भरा है।
साधना जारी भी रखते हैं, उनमें प्रायः निरन्तरता का अभाव होता है। होता यह है कि एक महीने मन लगाकर साधना की, बाद में सब कुछ छूट गया। फिर एकाएक मन में उत्साह उमड़ा और दुबारा शुरू हो गए। पर इस बार दो-तीन महीने में थक कर रुक गए। यही सिलसिला जीवन पर्यन्त चलता रहता है।
साधना से न केवल स्वयं को बल्कि अनेकों के जीवन को प्रकाशित किया।
साधना सूत्र सद्गुरु प्रेमियों को प्रतिमाह मिलते रहेंगे। जो इनकी साधना करेंगे उन पर देश-काल के सभी बन्धनों से परे सद्गुरु की परम चेतना अजस्र अनुदान बरसाती रहेगी। यह बात केवल वैचारिक उक्ति भर नहीं है। यह महासत्य है, जो युग-युग के, भारतभूमि एवं अन्यान्य देशों के समर्पित शिष्यों की शिष्यत्व साधना का सार है। ध्यान रहे कि ये सूत्र उन्हीं के हैं और जो व्याख्या है वह परम पूज्य गुरुदेव की अन्तःप्रेरणा से प्रकट हुई है।
साधना का सिद्धान्त यही है। उसमें प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए आदर्शवादी त्याग बलिदान की माँग पूरी करनी पड़ती है। जीवनचर्या को सिद्धान्तों आदर्शों के सहारे अधिकाधिक पवित्र, प्रखर, परिष्कृत करने का न केवल संकल्प करना पड़ता है, वरन् उसे निष्ठापूर्वक निभाना भी पड़ता है।
साधना के सम्बन्ध में गुरुदेव की एक बात और मनन योग्य है। वह कहते थे- गायत्री साधना के चमत्कार अनुभव करने हैं- तो मन को इधर-उधर मत भटकावों, अधिक नहीं तो अनुष्ठान के नियमों का पालन करते हुए 24-24 हजार के अनुष्ठान करते रहो। समर्पित भाव श्रद्धा के साथ की गई निरन्तर, निष्ठापूर्वक और लम्बे समय की साधना के परिणाम में गायत्री महामंत्र तुम्हें सब कुछ दे देगा। इस साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-
साधना प्रसंग की चर्चा की है। ऐसी एक चर्चा उनके जीवन के उस कालखण्ड की है, जब वह गहरे साधना संघर्ष से गुजर रहे थे। काम वासना का प्रबल वेग उनके अन्तःकरण में रह-रहकर उद्वेग करता था। समझ में नहीं आता क्या करें? कैसे निबटे इस काम रूपी महाअसुर से।
साधना की अविराम गति में लय का संगीत होना चाहिए।
साधना के इस अभ्यास की पूर्णता के लिए वैराग्य की भी आवश्यकता है। इसकी व्याख्या महर्षि के अगले सूत्र में है, जिसे साधक अगले महीने पढ़ सकेंगे।
साधना से जीवन के सभी तत्त्व, सभी सत्य अनायास ही सहज सुलभ हो जाते हैं। नमन-साधना की यह प्रक्रिया सहज-सुलभ होते हुए भी परम-दुर्लभ है। इसमें दुर्लभता उस गुरु तत्त्व के बोध की है, जो गहन-श्रद्धा से ही मिल पाता है। श्रद्धा परिपूर्ण और परिपक्व न हो तो सद्गुरु को सामान्य मानव समझने की भूल होती रहती है। श्रद्धा और समर्पण की सघनता में ही यह रहस्य समझ में आता है कि गुरुदेव मूर्त महेश्वर हैं।
साधना में लीन हो जाए। उसे संकल्पपूर्वक अपनी समस्त दुर्बलताओं को त्यागकर संयम द्वारा साधना के पथ पर आरुढ़ होना चाहिए। यही उपनिषद् की पावन व दिव्य शिक्षा है, जिसे अपनाकर हम अपने आँतरिक विकास के साथ-साथ नैतिकता तथा उच्च मानवीय मूल्यों का भी संवर्द्धन कर सकते है। इसी कारण शोपेनहॉर ने अपनी भावभरी अभिव्यक्ति में स्पष्ट किया है कि उपनिषद् पवित्र एवं उच्च विचारों से आप्लावित है, सत्य की जिज्ञासा से ओत-प्रोत हैं। सारे विश्व में उपनिषदों के समान कल्याणकारी एवं श्रेयस्कर कोई भी अन्य विद्या नहीं है।
साधना इसी तरह का जीवन जीते संपन्न हुई । सही अर्थों में ब्राह्मणत्व को जीवन में उतारते हुए सबके कल्याण के लिए सभी कर्म किए। सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त ‘ज्यौं की त्यौं धरि दीनी चदरिया’ की तरह जीवन जीने वाले ऐसे महापुरुष ही ऋषि की पदवी पर शोभित होते हैं। अखिल विश्व गायत्री परिवार जो उनने विनिर्मित किया, एक नमूना है, जो एक ऋषि के परम पुरुषार्थ का प्रतीक है। हम उनके जीवन से गीता के इस पाँचवें अध्याय के बहुत-से पक्षों को सीख सकते है।
साधना के लिए तैयार करें।
साधना अति कठिन है। लेकिन इसकी पूर्णता पर गुरु कृपा- अजस्र अनुदान बनकर बरसती है। जन सामान्य की सर्वमान्य सोच यही है कि यदि किसी तरह सद्गुरु कृपा हो जाय तो फिर जीवन में कुछ और करना शेष नहीं रह जाता है। यह सोच अपने सारभूत अंशों में सही भी है। सद्गुरु कृपा है ही कुछ ऐसी- इसकी महिमा अनन्त-अपार और अपरिमित है।
साधना है और अंत में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं। सद्गुरु की कृपाशक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा-छाँह में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है। शिष्य काय-कलेवर में सद्गुरु ही साधक के रूप में अवतार लेते हैं।
साधना का अभ्यास करते जाना चाहिए।
साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।
साधना का सार समाहित है। भगवान् सदाशिव की वाणी शिष्यों को बोध कराती है- कि ब्राह्मी चेतना से एकरूप गुरुदेव इस जगत् का परम कारण होने के साथ ही कारण रूप यह जगत् भी हैं। वे ही महाबीज हैं और वे ही महावट हैं। ऐसे कार्य-कारण रूपी सद्गुरु को नमन है॥41॥ इस संसार में यद्यपि ऊपरी तौर पर सब जगह भेद व भिन्नता दिखाई देती है। परन्तु तात्त्विक दृष्टि से ऐसा नहीं है।
साधना का सार है। ध्यान रहे कि ये सूत्र उन्हीं के हैं और जो व्याख्या है वह परम पूज्य गुरुदेव की अन्तःप्रेरणा से प्रकट हुई है। इस सब में यदि किसी का सच्चा स्वत्व है, तो वह गुरु-शिष्य की महान परम्परा का है। महान् गुरुओं की करुणा और समर्पित शिष्यों की साधना के निष्कर्ष हैं- ये सूत्र और उनकी क्रमिक व्याख्या। शिष्यों के लिए संजीवनी औषधि की भाँति होने के कारण- इस धारावाहिक कथा का नाम भी ‘शिष्य संजीवनी’ है।
साधना अभ्यास कभी भी सफल नहीं होता है। साधना की अविराम गति में लय का संगीत होना चाहिए।
साधना की समस्त उपलब्धियाँ-सिद्धियाँ सहज रूप में प्राप्त होती जाती हैं। गुरुकृपा से तत्त्वज्ञान, आत्मबोध, ईश्वर कृपा सभी कुछ सुलभ-सहज हो जाती हैं। गुरु पूर्णिमा सद्गुरु की इसी महा कृपा की अनुभूति का महापर्व है।
साधना के अभ्यास में बल और प्राण कैसे आएँ? इसका उत्तर स्वयं परम पूज्य गुरुदेव का अपना जीवन है। चौबीस वर्षों का दीर्घकाल, उसमें सदा बनी रहने वाली तप की निरन्तरता, सद्गुरु और गायत्री मंत्र पर गहन भाव श्रद्धा एवं अविचल अडिग निष्ठ ने ही उन्हें महासाधक और महायोगी होने का गौरव दिलाया। गुरुदेव अपनी चर्चा में कहते थे कि मेरे लिए गायत्री महामंत्र, गायत्री माता और अपनी मार्गदर्शक सत्ता में कभी कोई अन्तर नहीं रहा। गायत्री महामंत्र के 24 अक्षर ही मेरे जीवन सर्वस्व थे और हैं।
साधना-विधान का उल्लेख मिलता है।
साधना केवल उनके लिए है जिन्हें अपने प्यारे गुरुवर के बिना रहा नहीं जाता। जो अपने अस्तित्त्व को सद्गुरु की चेतना में समर्पित-विसर्जित और विलीन कर देना चाहते हैं। शिष्य संजीवनी की यह महाऔषधि उनके लिए है- जो श्रेष्ठ शिष्यों की अग्रिम कतार में खड़ा होना चाहते हैं। जो बार-बार अनेक बार, अनगिनत बार अपने गुरुवर द्वारा ली जाने वाली कठोरतम परीक्षा में खरे उतरना चाहते हैं। जिनकी एक मात्र चाहत है कि जिएँगे तो गुरुदेव के लिए और मरेंगे तो गुरुदेव के लिए।
साधना जीवन में आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ अर्जित की, अपितु कइयों ने राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी निभायी। इन शिष्यों में कुलदानन्द ब्रह्मचारी उनके ऐसे शिष्य थे, जिन्होंने अपने तप और योग साधना से न केवल स्वयं को बल्कि अनेकों के जीवन को प्रकाशित किया।
साधना के चमत्कार अनुभव करने हैं- तो मन को इधर-उधर मत भटकावों, अधिक नहीं तो अनुष्ठान के नियमों का पालन करते हुए 24-24 हजार के अनुष्ठान करते रहो। समर्पित भाव श्रद्धा के साथ की गई निरन्तर, निष्ठापूर्वक और लम्बे समय की साधना के परिणाम में गायत्री महामंत्र तुम्हें सब कुछ दे देगा। इस साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-
साधना काल में ध्यान के पलों में एक दिन उन्हें अंतर्दर्शन हुआ कि सुषुम्ना नाड़ी में अपनी चेतना के एक अंश को प्रविष्ट कर गुरुदेव उनकी चेतना को ऊपर उठा रहे हैं। गुरु कृपा से उसी क्षण उनकी अन्तर्चेतना काम विकार से मुक्त हो गई। वह लिखते हैं कि फिर कभी उन्हें काम का प्रकोप नहीं हुआ।
साधना की कठिन राह पर आपको चला सके? यदि हाँ- तो शिष्य संजीवनी के सूत्रों की शृंखला प्रतिमाह आपको-हमको, हम सभी के साधना पथ पर अपना उजाला बिखेरती रहेगी। प्रथम सूत्र के प्रकट होने पर हम सभी स्वयं को इस महासाधना के लिए तैयार करें।
साधना के गूढ़ तत्त्वों, गहन सत्यों एवं अतिरहस्यमयी प्रक्रियाओं को ले जाना चाहे-ले जाये। जितना ले जाना चाहे उतना ले जाए। उसका मन चाहे तो सबका सब ले जाए। परन्तु ये महर्षिगण इन बेशकीमती खजाने के सदुपयोग के बारे में पूर्ण आश्वस्त हैं। उनका विश्वास है कि इस आध्यात्मिक खजाने की गति और रुचि उन्हीं की होगी- जो साधक हैं।
साधना का पथ दिखाने वाले गुरु ठीक भी हैं या नहीं। पता नहीं मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं। इस तरह से डगमगाती श्रद्धा और चंचल निष्ठ, साधक और उसकी साधना को कहीं भी नहीं पहुँचने देती। वह प्रत्यक्ष में क्रिया तो करता रहता है पर भाव और विचारों की कमजोरी के कारण उसकी साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।
साधना का प्रारम्भ करते हैं। बाद में महीने-दो-महीने, साल दो साल या ज्यादा से ज्यादा पाँच-छः साल में इसे छोड़ बैठते हैं। जो लोग दीर्घकाल तक साधना जारी भी रखते हैं, उनमें प्रायः निरन्तरता का अभाव होता है। होता यह है कि एक महीने मन लगाकर साधना की, बाद में सब कुछ छूट गया। फिर एकाएक मन में उत्साह उमड़ा और दुबारा शुरू हो गए।
साधना या कोई योग विधि में कोई दोष है। बात सिर्फ इतनी सी है कि अभ्यास ठीक तरह से किया नहीं गया। अभ्यास किस तरह से किया जाय इसकी चर्चा महर्षि अपने अगले सूत्र में करते हैं-
साधना में पल-पल इनमें मैंने अपने प्राण अर्पित किए हैं। यही है आदर्श मानदण्ड साधना के अभ्यास का। बिना थके, बिना रुके, समर्पित भावनाओं के साथ साधना का अभ्यास करते जाना चाहिए।
साधना के द्वारा स्वयं को उचित एवं उपयुक्त सत्पात्र के रूप में सिद्ध किया हो।
साधना करके गुरु प्रेम के सर्वोत्तम अधिकारी कैसे बनें? ऐसी चाहत रखने वाले अनेक परिजनों ने अखण्ड ज्योति के सम्पादक से व्यक्तिगत रूप से मिलकर, उन्हें पत्र लिखकर अपनी भावनाओं से अवगत कराया है।
साधना के लिए पहली जरूरत समर्पित दृढ़ता की है। दृढ़ता से भरी अश्रुविहीन आँखें ही गुरुचेतना को निहार सकती हैं। जहाँ तक कानों की बात है- सो वे गुरु निन्दा और विषय चर्चा के लिए बहरे हों ताकि वे सद्गुरु की परावाणी सुन सकें। और यदि हम यह चाहते हैं कि हमारे स्वर सद्गुरु को स्पर्श करें- तो हमारी वाणी का किसी और को चोट पहुँचाने की प्रवृत्ति से मुक्त होना आवश्यक है। ऊपर कही गयी इन तीनों बातों का मेल बड़ा दुर्लभ है।
साधना में दीर्घकाल और निरन्तरता को बनाए रखते हैं, उनमें भावभरी श्रद्धा एवं अडिग निष्ठ की कमी रह जाती है। बार-बार मन में सन्देह एवं चित्त में व्यग्रता पनपती रहती है। पता नहीं यह साधना सही है भी या नहीं। पता नहीं साधना का पथ दिखाने वाले गुरु ठीक भी हैं या नहीं। पता नहीं मुझे मंजिल मिलेगी भी या नहीं।
साधना के परम रहस्यमय एवं सदा से गोपनीय रखे गए कुछ विशेष सूत्रों को साधकों के सामने प्रकट किया जाय। अब से शिष्यत्व के साधना सूत्र सद्गुरु प्रेमियों को प्रतिमाह मिलते रहेंगे। जो इनकी साधना करेंगे उन पर देश-काल के सभी बन्धनों से परे सद्गुरु की परम चेतना अजस्र अनुदान बरसाती रहेगी। यह बात केवल वैचारिक उक्ति भर नहीं है। यह महासत्य है, जो युग-युग के, भारतभूमि एवं अन्यान्य देशों के समर्पित शिष्यों की शिष्यत्व साधना का सार है।
साधना की गति तीव्रगामी हो जाती है।
साधना की है। जो अपने गुरु की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरा है- वही उनकी कृपा का अधिकारी है। शिष्यत्व का चुम्बकत्व ही सद्गुरु के अनुदानों को अपनी ओर आकर्षित करता है। जिसका शिष्यत्व खरा नहीं है- उसके लिए सद्गुरु के वरदान भी नहीं हैं।
साधना की तड़प है, त्वरा है, तृषा है यह योग कथा केवल उन्हीं के लिए है। महर्षि पतंजलि एवं परम पूज्य गुरुदेव का संवाद सिर्फ उन्हीं से है। जो इस संवाद में अपनी भागीदारी चाहते हैं। उन्हें साधक बनना ही होगा। अन्यथा गोस्वामी तुलसी बाबा के शब्दों में उनकी स्थिति कुछ ऐसी होगी-
साधना में भाव श्रद्धा कैसी हो इस बारे में गोस्वामी जी महाराज के वचन है-
साधना पथ पर अपना उजाला बिखेरती रहेगी। प्रथम सूत्र के प्रकट होने पर हम सभी स्वयं को इस महासाधना के लिए तैयार करें।
साधना को कहीं भी नहीं पहुँचने देती। वह प्रत्यक्ष में क्रिया तो करता रहता है पर भाव और विचारों की कमजोरी के कारण उसकी साधना सदा प्राणहीन और बलहीन बनी रहती है।
साधना करने के बावजूद, सालों तक गायत्री जपने के बावजूद जिन्दगी में कोई चमत्कारी परिवर्तन नहीं हुए। तब क्या अभ्यास की महिमा गलत है अथवा फिर साधना की विधि में कोई दोष है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-November
साधना उपासना से लोग विवेकशीलता प्राप्त करते रहे, तब तक वे जीवन के हर क्षेत्र में सफल रहे, देवमानव की कोटि में गिने जाते रहें।
साधना मार्ग के पथिकों को वैसा ही निस्संग होना चाहिए। श्रीराम भी अपने साधन भजन में तत्पर हो गए। उस आकृति से विरत होने या क्षणभर पहले हुई भेंट को भुला देने के लिए उन्हें कुछ नहीं करना पड़ा था। पानी में खींची लकीर की तरह वह स्मृति अपने आप तिरोहित हो गई। झील के तट पर कुछ देर और बैठकर श्रीराम जोशीमठ के लिए वापस मुड़ गए।
साधना की दिशा में ही।उसे मोड़ना इसी पक्ष में संभव है। घाटे का सौदा वह नहीं करना चाहती। इसीलिए ऐसे उच्च आदर्शों के परिपालन में उसे कटिबद्ध नहीं किया जा सकता, जिससे प्रत्यक्ष घाटा पड़ता हो कारण कि बुद्धिवादी धर्मोपदेशक आदर्शों की बड़ी बड़ी बातें तो कहते है उनके भाषण बड़े लच्छेदार होते है पर जब उस कथन को निजी जीवन में कार्यान्वित करने के अवसर आते है तो पीछे हट जाते है। इसका कारण एक ही है कि उन्होंने धर्मचर्चा को बुद्धिक्षेत्र में अपनाया है पर अंतःकरण में, भावना क्षेत्र में स्थान नहीं दिया।
साधना से यह निरीक्षण अतिसहज और सुगम हो जाता है। इस सहज व सरल साधना से प्रत्येक दिन अपने नये जीवन एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना होता है। इससे हमें प्रतिदिन अपने कार्यों के मूल्याँकन के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व की गहराई में झाँकने का अवसर मिलता है। हर दिन एक नये संकल्प के साथ नया कार्य प्रारम्भ होता है जो सफल व्यक्तित्व की सम्मोहक विशेषता है।
साधना उपासना द्वारा सहज ही प्राप्त हो जाती है इसमें संदेह नहीं।
साधना परमार्थ हेतु इसका नियोजन व नियमित गायत्री उपासना किसी भी व्यक्ति को सिद्धि संपन्न बना सकती है।
साधना में पारंगत सिद्ध जनों की अनुभूति संजोयी है। इन सूत्रों में जो कुछ भी कहा जा रहा है, उसके प्रत्येक अक्षर में एक गहरी सार्थकता है। सार्थक निर्देश के यही स्वर चौथे सूत्र में भी ध्वनित हैं। इसमें कहा गया है- उत्तेजना की इच्छा को दूर करो। इसके लिए इन्द्रियजन्य अनुभवों से शिक्षा लो और उसका निरीक्षण करो, क्योंकि आत्मविद्या का पाठ इसी तरह शुरू किया जाता है और इसी तरह तुम इस पथ की पहली सीढ़ी पर अपना पाँच जमा सकते हो।
साधना के लिए नहीं जगा पा रहा।
साधना का तो अर्थ ही सूक्ष्मतम एवं शुद्धतम का अनुभव है और यह अनुभव स्वयं को सूक्ष्म एवं शुद्ध बनाकर ही पाया जा सकता है।
साधनाओं द्वारा ही समुलब्ध होता है।
साधना ने भगवान् की देह को हर तरह से दिव्य बना दिया था। प्रभु जहाँ भी रहते, वही स्थान सुगन्ध से सुवासित हो जाता। प्रकाश की प्रभा उस स्थान को सदा घेरे रहती। इस अनूठे प्रकाश में भगवान् के तप एवं ज्ञान की आभा छलकती रहती थी। इसके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति सदा-सदा के लिए अपना हो जाता।
साधना से प्रत्येक दिन अपने नये जीवन एवं प्रत्येक रात्रि अपनी मृत्यु का अनुभव करना होता है। इससे हमें प्रतिदिन अपने कार्यों के मूल्याँकन के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व की गहराई में झाँकने का अवसर मिलता है। हर दिन एक नये संकल्प के साथ नया कार्य प्रारम्भ होता है जो सफल व्यक्तित्व की सम्मोहक विशेषता है।
साधना से उन्हें सब कुछ अनायास ही मिल जाता है।
साधनाओं से संभव है पर कई बार आकस्मिक घटना भी आत्मचेतना के पृथक अस्तित्व का बोध करा देती है। जम्मू में शिक्षा विभाग के एक मध्यम श्रेणी कर्मचारी श्री गोपीकृष्ण थे। उनके किसी पुस्तक में पढ़ रखा था कि मस्तिष्क मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करने से परमात्मा की अनुभूति होती है। एक दिन वे इसी तरह ध्यान कर रहे थे। जिज्ञासा की प्रखरता में बड़ी प्रबल शक्ति ही मन की चंचलता के कारण ध्यान का जो लाभ कुछ लोग वर्षों अभ्यास के बाद भी नहीं ले पाते, वह उनकी तीव्र जिज्ञासा के क्षणभर में प्रदान कर दिया।
साधना के जगत् में प्रवेश नहीं पा सकता। क्योंकि साधना का तो अर्थ ही सूक्ष्मतम एवं शुद्धतम का अनुभव है और यह अनुभव स्वयं को सूक्ष्म एवं शुद्ध बनाकर ही पाया जा सकता है।
साधना में प्रवृत्त होता है।
साधनावधि में भी यह प्रकाश बना रहता था। पर आज उसकी सघनता कुछ ज्यादा ही थी। उसका आश्चर्य और भी ज्यादा तो तब हुआ जब उसने देखा कि गोल आकार के श्वेत प्रकाश में एक हलका सा विस्फोट सा हो गया है। और उसमें श्वेत कमल की दो पंखुड़ियाँ खुल रही हैं।
साधना से परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठ होते जाते है। -परमपूज्य गुरुदेव
साधनाएँ अनेक हैं। मत और पथ भी अनगिनत हैं। पर गुरुभक्तों के लिए यही एक मंत्र है अपने गुरुदेव का नाम। उनका एक ही कर्म है, अपने गुरुवर की सेवा। उनमें सदा एक ही भाव विद्यमान रहता है, गुरुदेव के प्रति समर्पण का भाव।
साधना की सफलता का आधार है।
साधना क्यों कर भुलाई जा रही है॥
साधना महिमा के अगले क्रम को स्पष्ट करते हुए भगवान् सदाशिव जगन्माता पार्वती से कहते हैं-
साधना, यज्ञ की ऊर्जा एवं उसकी पदार्थ जगत की कारण शक्ति में उभार लाने की वृत्ति पर वैज्ञानिक शोध निरंतर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में हो रहा है। 1971 में स्थापित यह संस्थान अगले वर्ष (24-25) अपनी रजत जयंती मना रहा है। शोध संस्थान एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के महत्वपूर्ण ज्ञान विज्ञान संबंधी निष्कर्ष ‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से सबके पास पहुँचते है। आज की परिस्थितियों में हमारा राष्ट्रधर्म क्या हो, हम कैसे एक श्रेष्ठ नागरिक बनें यह समग्र मार्गदर्शन इस पत्रिका में 66 पृष्ठों में पाया जा सकता है। टूटते परिवार, कलह द्वेष की बढ़ती महाव्याधि हेतु इसने परिवार निर्माण, सुसंस्कारिता संवर्द्धन जैसे प्रयोगों को प्रमाण सहित प्रस्तुत किया है।
साधना कड़ी बन चुकी है। इस योग कथा की पिछली कड़ी में सम्प्रज्ञात समाधि की चर्चा की गयी थी। महर्षि के अनुसार यह वैराग्य का सहज परिणाम है। निर्मल चित्त की सहज अवस्था है। महर्षि कहते हैं कि सम्प्रज्ञात समाधि वह समाधि है, जो वितर्क विचार, आनन्द और अस्मिता के भाव से संयुक्त होती है।
साधनाओं द्वारा प्रमाण प्रत्यक्ष प्रदर्शनों द्वारा प्रस्तुत किए है, जिनसे पता चलता है कि आत्मा अज्ञानवश शरीर के व्यापार में आसक्त पड़ी रहे यह अलग बात है, पर वह है स्वशासी, अपनी नियंत्रक आप। अनेक वर्ष पूर्व सुप्रसिद्ध योगी देशबंधु की इस मान्यता को कुछ डाक्टरों ने अमान्य कर दिया, फलस्वरूप मुँबई मेडिकल यूनियन की ओर से श्री देशबंधु का प्रदर्शन कराया गया। उसे देखने के लिए मुँबई मेडिकल कॉलेज के छात्र, स्टाफ और अन्य विशिष्ट नागरिक भी एकत्र हुए। डॉ. बसंत रैले ने उनके शरीर परीक्षण के लिए नियुक्त किए गए। श्री देशबंधु से कहा गया कि यदि आप जानते है कि चेतना को शरीर से भिन्न किया जा सकता है तो आप दाहिने हाथ की शरीर क्रिया को शून्य करके दिखाइए।
साधना का महत्व कितना है यह इन छह अध्यायों में में एक पूरा अध्याय इसी के लिए सुनियोजित किये जाने पर समझा जा सकता है। इस अध्याय का शुभारम्भ प्रथम श्लोक की व्याख्या के साथ किया गया था। उसमें योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को सच्चे संन्यासी का स्वरूप बताते है। जो निष्काम भाव से कर्म करते है। वे भले ही संन्यासी का वेश न धरें, सही अर्थों में संन्यासी है।
साधना में जिस एकाग्रता की बात कही जाती है, वह सहज ही साधन को माँ की छवियुक्त आकृति के ध्यान से प्राप्त हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-August
साधना में संवेग तब तक नहीं आ पायेगा, जब तक साधक वैराग्य से वंचित है। वैराग्य विहीन साधना में पहले तो गति और संवेग उत्पन्न ही नहीं होता, यदि किसी कारण संकल्प की दृढ़ता पर ऐसा हो भी गया तो भी इससे मात्र भौतिक प्रयोजन ही पूरे हो पाते हैं। वैराग्य के बिना कैसी भी और कितनी भी साधना क्यों न की जाय इसे आध्यात्मिक परिणाम नहीं होते। ऐसों को कभी भी आत्म जागृति की अनुभूति नहीं हो पाती। आत्म जागृति एवं आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति का एक ही उपाय है-वैराग्य।
साधना की सफलता के लिए उचित एवं आवश्यक है।
साधना (सूक्ष्मीकरण साधना) तंत्र का उत्कृष्टतम प्रयोग कहा जा सकता है, जिसकी परिणति विश्व राष्ट्र की कुण्डलिनी जागरण के रूप में हुई।
साधना, जीवन जीने की कला के विषयों में दिया जाता है। एक दिन पूर्व आकर संध्या को संकल्प लिया जाता है एवं 9वें दिन विदाई हो जाती है। प्रस्तावित सत्र की तिथि से न्यूनतम दो माह पूर्व आवेदन करना होता है।
साधना विज्ञान में आवश्यक अनुबंध के रूप में स्वीकारा गया है। संसारी व्यक्तियों के लिए यह दुनिया ही साधना-भूमि है। इससे बढ़कर अनुकूल स्थान साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता।
साधना का महाविनाश ही है।
साधना में पहले तो गति और संवेग उत्पन्न ही नहीं होता, यदि किसी कारण संकल्प की दृढ़ता पर ऐसा हो भी गया तो भी इससे मात्र भौतिक प्रयोजन ही पूरे हो पाते हैं। वैराग्य के बिना कैसी भी और कितनी भी साधना क्यों न की जाय इसे आध्यात्मिक परिणाम नहीं होते। ऐसों को कभी भी आत्म जागृति की अनुभूति नहीं हो पाती। आत्म जागृति एवं आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति का एक ही उपाय है-वैराग्य। महर्षि के स्वरों में इस वैराग्य का सूत्र है-
साधना की गहनता में उतरना ही पड़ेगा। ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठि’। कबीर बाबा का यह वचन इस योग कथा के बारे में सम्पूर्ण सार्थक है। इस सार्थकता की अनुभूति साधकों ने पिछली कड़ी में भी की थी। इस कड़ी में यह बताया गया था कि अभ्यास की सही विधि क्या है?
साधना जीवन की अनेकों समस्याओं का समाधान होता है। साधना पथ पर बिखरे हुए अनगिन कंटक अपने आप ही दूर हो जाते हैं। नये-नये साधना रहस्यों का मर्म अंतर्दृष्टि में उजागर होता है। अन्तर्यात्रा की दुरुहता-जटिलता स्वयं ही सुगम हो जाती है। यह अनुभव किसी अकेले एक का नहीं, बल्कि उन अनगिनत साधकों का है, जो दृढ़ निष्ठ होकर संकल्पित एवं समर्पित भाव से साधनारत हैं।
साधनाओं का एक ही उद्देश्य है-मन को वृत्ति रहित बनाना तथा सभी प्रवृत्तियों तथा उपप्रवृत्तियों को ठीक तरीके से, सही प्रकाश में समझने का प्रयास करना और उनका निदान करना। जब तक इन वृत्तियों, उपवृत्तियों या प्रवृत्तियों का निदान नहीं होता, चेतना का क्रमिक विकास और सभी प्रकार की आन्तरिक या आध्यात्मिक उपलब्धियाँ असम्भव हैं।
साधनाएँ अनवरत चलती रहती हैं। ऐसे शिष्य के विचार और व्यवहार, ज्ञान और कर्म में ज्यादा अन्तर नहीं रहता।
साधना का उद्देश्य है।
साधना पथ पर बिखरे हुए अनगिन कंटक अपने आप ही दूर हो जाते हैं। नये-नये साधना रहस्यों का मर्म अंतर्दृष्टि में उजागर होता है। अन्तर्यात्रा की दुरुहता-जटिलता स्वयं ही सुगम हो जाती है। यह अनुभव किसी अकेले एक का नहीं, बल्कि उन अनगिनत साधकों का है, जो दृढ़ निष्ठ होकर संकल्पित एवं समर्पित भाव से साधनारत हैं।
साधनाओं द्वारा व्यक्तित्व की चार प्रबल अवस्थाओं को नियंत्रित करने का प्रयत्न किया जाता है। चार विकारों के कारण ही साधक या मनुष्य अपने व्यक्तित्व का संतुलन खो बैठता है। ये विकार हैं- आहार, निद्रा, भय और मैथुन। तंत्र की मान्यता है कि मनुष्य कितनी ही साधना या कितना ही प्रयास क्यों न करें, यदि ये चार प्रवृत्तियाँ उसके अन्दर विद्यमान रहती हैं और उनका निराकरण यदि नहीं किया जाये तो उसका पतन कभी भी हो सकता है। तंत्र शास्त्र में इन प्रवृत्तियों को अनुशासित करने के लिए प्रयत्न किया जाता है।
साधना का अभ्यास आवश्यक हो जाता है।
साधना ही मूल में है। स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र) के साथ के सोलह व्यक्तियों (उन्हें मिलाकर) में पाँच ग्रेजुएट थे, दस ने मात्र औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी एवं एक पूर्णतः अशिक्षित थे। फिर भी सोलह का यह समूह एकजुट हो अपने उस गुरु का, जिनका सान्निध्य उन्हें मिला था, स्वप्न पूरा करने के लिए कठोर तपस्वी जीवन जीने हेतु तत्पर रहा एवं आज के विराट श्रीरामकृष्ण मिशन की नींव का पत्थर बना।
साधना में संवेग नहीं उत्पन्न हो पाता।
साधना करें। अगला अंक गुरु चेतना के अन्य तीन आयामों को उनके सम्मुख प्रकट करेगा।
साधना की सफलता के संकेत होते हैं, किंतु आत्मसाक्षात्कार की भूमिका वह होती है, जिसमें सालोक्य, सारूप्य तथा सायुज्य की अनुभूति होती है। यह स्थिति भगवती गायत्री के तेजपुंज में अपने आपको घुलाने, मेल-मिलाप कराने के अभ्यास से प्रारंभ होती है और उस तेज पुँज में समाधिस्थ हो जाने की प्रगाढ़ अवस्था में उसकी परिणति। उस स्तर का साधक अपने आप को सविता के तेजपुँज की स्थिति में अनुभव करता और विराट आत्मा की अनुभूति करता है। इस दृष्टि से तेजपुँज ज्योति अवतरण की साधना का अभ्यास आवश्यक हो जाता है।
साधना थी। भक्त समुदाय में बहुप्रचलित श्रीरामकृष्ण देव की समाधि लीन फोटो जब बनकर आयी तो श्री ठाकुर ने स्वयं उसे प्रणाम किया। लाटू महाराज बोले-ठाकुर यह क्या, अपनी ही फोटो को प्रणाम। इस पर ठाकुर हँसे और बोले- नहीं रे! मेरा यह प्रणाम इस हाड़-माँस की देह वाले चित्र को नहीं है, यह तो उस परम वन्दनीय गुरुचेतना को प्रणाम है जो इस फोटो की भावमुद्रा से छलक रही है।
साधनाओं के विधि-विधान का मार्गदर्शन ही इनका मुख्य कार्य है।
साधना संदेश का मर्म केवल साधक ही समझ पाते हैं। जो साधक नहीं हैं उनके लिए यह बौद्धिक आयोजन भर है। ऐसे लोगों को इसका शब्द परिचय तो मिलता है, पर इसमें अन्तर्निहित अकूत आध्यात्मिक सम्पदा से वे वंचित रह जाते हैं। इसलिए जो इसके तत्त्व को सत्य को जानना चाहते हैं, उन्हें योग साधना की गहनता में उतरना ही पड़ेगा। ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठि’।
साधना सत्र- ये सत्र प्रतिमाह 1 से 9, 11 से 19 एवं 21 से 29 तारीखों में अनवरत चलते हैं। चौबीस हजार गायत्री मंत्र का अनुष्ठान इस अवधि में संपन्न हो जाता है। प्रातः ब्राह्ममुहूर्त (ठंड के दिनों में 4 बजे एवं गरमी में 3.30 बजे) में यहाँ की दिनचर्या आरंभ हो जाती है। प्रातः सायं प्रार्थना-आरती, योग साधना, ध्यान-त्रिकाल संध्या के अलावा दिन में तीन बार प्रवचन-उद्बोधनों से मार्गदर्शन-जीवनसाधना, जीवन जीने की कला के विषयों में दिया जाता है। एक दिन पूर्व आकर संध्या को संकल्प लिया जाता है एवं 9वें दिन विदाई हो जाती है।
साधना का क्रम बना रहे।
साधनाओं का प्रारम्भ होता है। कुपात्र के लिए इनका सर्वथा निषेध ही रहता है। क्योंकि इनके गुप्त रहस्यों को जन साधारण के लिए प्रकाशित कर देने का अर्थ बालकों के क्रीड़ा-स्थल में बारूद बिखेर देना होगा। जिनमें वे क्रीड़ा, कौतुक करने के उपलक्ष में सर्वनाश का उपहार प्राप्त करेंगे। अतः यह परम्परा अधिकार और अधिकारी के आधार पर एक-दूसरे को सिखाने की रही है।
साधनापथ की यह पहली शर्त है। यों तो संभोग से समाधि से लेकर तरह तरह के आधुनिक ‘योगा’ के शॉर्टकट निकल आए हैं, पर उनसे कुछ उपलब्धि नहीं होने वाली। होगी कब? जब अपना मन संयत (यतचेतमसाम्) होगा। चित्त नियंत्रित हो तो कोई भी बहिरंग की उत्तेजना अंदर प्रवेश कर शाँति भंग नहीं कर सकती।
साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धान्तों का गम्भीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्ण अनुगमन आवश्यक है।
साधना है, अक्षरों की नकल करने से नहीं हो सकता।
साधना के लिए तैयार हैं, उनके लिए शिष्य संजीवनी का प्रथम सूत्र है- महत्त्वाकांक्षा को दूर करो। क्योंकि शिष्यों के लिए महत्त्वाकांक्षा पहला अभिशाप है। जो कोई अपने साधना पथ पर आगे बढ़ रहा है, उसे यह मोहित करके पथ से विचलित कर देती है। सत्कर्मों एवं पुण्यों को समाप्त करने का यह सबसे सरल साधन है। बुद्धिमान, परम समर्थ एवं महातपस्वी लोग भी इसके जाल में फंस कर बराबर अपनी उच्चतम सम्भावनाओं से स्खलित होते रहते हैं।
साधना, ज्ञान आदि श्रेष्ठकर्मों, सद्कर्मों में सदैव निमग्न रहते थे। ऋषियों की इस तप-साधना में ही स्वर्ग का गुप्त रहस्य ढँपा-ढँका है। अनुभवी ही इसके रहस्य को अनावृत्त कर अनुभव कर सकते हैं। मनुष्य जहाँ व्यष्टि है, वहीं विराट भी है। उसकी स्थिति- अवस्था के अनुरूप उसकी चेतना का स्तर होता है और चेतना के उन्हीं स्तरों की, शक्तियों की अनुभूति उसे होती रहती है।
साधना से मनुष्य इस सर्वव्यापी आत्मतत्त्व की वास्तविकता का बहुत कुछ अनुभव कर सकता है। यह अनुभूति जितनी प्रगाढ़ होगी, आत्मानुभूति, आत्मसाक्षात्कार और अपनी परमात्मामय होने की भावना उतनी ही सघन होती चली जाएगी।
साधना सत्र है, इनमें उन्हीं को स्वीकृति दी जाती है जो पहले − दिवसीय, एकमासीय सत्र कर चुके हों एवं गायत्री परिवार की महत्त्वपूर्ण योजना में भागीदारी कर रहे हों। फार्म भरकर व पासपोर्ट साइज का चित्र भेजने पर ही मात्र साठ व्यक्तियों को एक सत्र में अनुमति दी जाती है।
साधना एवं आत्मीयता का विस्तार।
साधना पथ पर आगे बढ़ रहा है, उसे यह मोहित करके पथ से विचलित कर देती है। सत्कर्मों एवं पुण्यों को समाप्त करने का यह सबसे सरल साधन है। बुद्धिमान, परम समर्थ एवं महातपस्वी लोग भी इसके जाल में फंस कर बराबर अपनी उच्चतम सम्भावनाओं से स्खलित होते रहते हैं। महत्त्वाकांक्षा कितनी भी सम्मोहक व आकर्षक क्यों न हो, पर इसके फल चखते समय मुँह में राख और धूल बन जाते हैं। मृत्यु और विछोह की ही भाँति इससे भी यही सीख मिलती है कि स्वार्थ के लिए अहं के विस्तार के लिए कार्य करने से परिणाम में केवल निराशा ही मिलती है।
साधना की है। महत्त्वाकांक्षा एवं शिष्यत्व का कोई मेल नहीं है। शिष्य बनने के लिए अपने को गलाना, जलाना और मिटाना पड़ता है, ताकि खाली हुआ जा सके। पात्र बना जा सके और इस पात्रता को सद्गुरु के अनुदानों से परिपूर्ण किया जा सके। महत्त्वाकांक्षा इस प्रक्रिया की एकदम विरोधी है।
साधना में प्रगति का पुरुषार्थ तो स्वयं ही करना है, यह सामान्य ज्ञान तो सभी को है। पूज्यवर कहते रहे कि यह दैवी संकल्पना है, भगवान का मिशन है, स्रष्टा का निर्धारण है। कोई भी युगपरिवर्तन रोक नहीं सकता। तुम लोग काम न भी करो तो असंख्यों उच्चस्तरीय आत्माओं से मैं यह कार्य करा लूँगा, जो प्रतीक्षा सूची में पड़ी हैं, बुलावे का इंतजार कर रही हैं।
साधनावस्था में एक दिन उन्होंने देखा श्री ठाकुर किसी दिव्यलोक में है। बड़ी ही प्रकाश और प्रभापूर्ण उपस्थिति है उनकी। स्वर्ग के देवगण विभिन्न ग्रहों स्वामी रवि, शनि, मंगल आदि उनको स्तुति कर रहे हैं। ध्यान के इन्हीं क्षणों में महाराज ने देखा श्री श्री ठाकुर की पराचेतना ही विष्णु-ब्रह्म एवं शिव में समायी। माँ महाकाली भी उनसे एकाकार है।
साधना होती रही है। हर युग एवं प्रत्येक काल खण्ड में दर्शन के मूल्य और महत्त्व को स्वीकारा गया है। हाँ इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी की चकाचौंध से चुँधियाई आँखों ने दर्शन के मूल्य और महत्त्व की अवमानना की है। वैज्ञानिक क्रियात्मकता के प्रसार में दार्शनिक चिन्तन की गति काफी मन्द हुई है। परिष्कृत चिन्तन विहीन मानवीय क्रिया ने जीवन की दशा और दिशा को संकटों व कंटकों से भर दिया है।
साधना या कितना ही प्रयास क्यों न करें, यदि ये चार प्रवृत्तियाँ उसके अन्दर विद्यमान रहती हैं और उनका निराकरण यदि नहीं किया जाये तो उसका पतन कभी भी हो सकता है। तंत्र शास्त्र में इन प्रवृत्तियों को अनुशासित करने के लिए प्रयत्न किया जाता है। तंत्र की समस्त साधनाओं का एक ही उद्देश्य है-मन को वृत्ति रहित बनाना तथा सभी प्रवृत्तियों तथा उपप्रवृत्तियों को ठीक तरीके से, सही प्रकाश में समझने का प्रयास करना और उनका निदान करना। जब तक इन वृत्तियों, उपवृत्तियों या प्रवृत्तियों का निदान नहीं होता, चेतना का क्रमिक विकास और सभी प्रकार की आन्तरिक या आध्यात्मिक उपलब्धियाँ असम्भव हैं।
साधना तपश्चर्या जैसी ही फलवती हुई। एक बार उन्होंने नेत्र उघारकर दुर्योधन को देखा तो उसका शरीर लौहवत् हो गया। अंत में उन्होंने श्रीकृष्ण को भी शाप दिया था कि “तुम चाहते तो महाभारत टल सकता था। तुम्हारी उपेक्षा से जिस प्रकार मेरा वंश नाश हुआ, उसी प्रकार तुम्हारा वंश भी परस्पर लड़-भिड़कर समाप्त होगा।” कालसत्य है कि यदुवंशी गाँधारी के शाप से लड़-भिड़कर समाप्त हुए थे।
साधना में जुट गये।
साधना अपना चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत किए बिना नहीं रहती। परन्तु व्यावहारिक जीवन में देखा यह जाता है कि अनेकों प्रयत्नों के बावजूद साधक इन चार तत्त्वों का संग्रह नहीं कर पाते। इन चार में से कभी कोई छूटता है तो कभी कोई रह जाता है। चाहत होने पर भी साधना में संवेग नहीं उत्पन्न हो पाता।
साधना क्यों न की जाय इसे आध्यात्मिक परिणाम नहीं होते। ऐसों को कभी भी आत्म जागृति की अनुभूति नहीं हो पाती। आत्म जागृति एवं आध्यात्मिक सम्पदा की प्राप्ति का एक ही उपाय है-वैराग्य। महर्षि के स्वरों में इस वैराग्य का सूत्र है-
साधना की दीक्षा गुरु अपने शिष्य को, शिष्य की अवस्था और उपलब्धि के स्तर को देखकर प्रदान करता है। जब साधक मन की चार मूल प्रवृत्तियों का सामना करते हुए मनःस्थिति की एक विकसित सीमा तक पहुँच जाता है तब अन्य गुप्त साधनाओं का प्रारम्भ होता है। कुपात्र के लिए इनका सर्वथा निषेध ही रहता है। क्योंकि इनके गुप्त रहस्यों को जन साधारण के लिए प्रकाशित कर देने का अर्थ बालकों के क्रीड़ा-स्थल में बारूद बिखेर देना होगा। जिनमें वे क्रीड़ा, कौतुक करने के उपलक्ष में सर्वनाश का उपहार प्राप्त करेंगे।
साधना में संलग्न साधकों के लिए दो-दो घंटे के दो ऐसे समय भी नियुक्त है, जिनमें किन्हीं महान दिव्य शक्तियों द्वारा अपना शक्तिप्रवाह भी जोड़ा जाता है। उस समय ध्यान करने में विशेष आनंद आता है और विशेष प्रभाव पड़ता है। श्रेष्ठतम समय रात्रि को 6 से 8 बजे और प्रातः 3 से 6 बजे का है। शांतिकुंज में यह साधना अभी 1.45 से 2 की अवधि में कराई जाती है।
साधना भगवान् बुद्ध को थी, जिन्होंने सारे राजसी सुखों के बीच रहकर भी यही निष्कर्ष निकाला ‘सब्बं दुक्ख्म्’ - यह सब दुःख ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- वैराग्य साधना है तो भगवान् को पुकारो। उनके शब्दों में काशी की ओर जितना बढ़ो, कलकत्ता उतना ही पीछे छूटता है। यानि कि भगवान् की ओर जितना बढ़ोगे-संसार की आसक्ति उतना ही घटेगी। यह साधन वैराग्य जितना सघन होगा, उतना ही हम डडडडड स द्धवैराग्य की ओर आगे बढ़ेंगे।
साधना की गहनता में प्रवेश करना है।
साधना-जगत का गुह्य रहस्य है, जिसे कोई भी सुपात्र अनुभव कर सकता है।
साधना के लिए सब कुछ खोने के लिए तैयार हूँ। मैं अपने आप को भी देने के लिए तैयार हूँ। शिष्यत्व का अर्थ है- एक गहन विनम्रता। शिष्य वही है- जो अपने को झुकाकर, स्वयं के हृदय को पात्र बना लेता है।
साधना अभ्यास के लिए हमें वैराग्यवान् एवं ईश्वर परायण होना ही पड़ेगा और इसके लिए जरूरी है, साँसारिक दुःखों का बार-बार चिंतन। वैराग्य की सच्ची साधना भगवान् बुद्ध को थी, जिन्होंने सारे राजसी सुखों के बीच रहकर भी यही निष्कर्ष निकाला ‘सब्बं दुक्ख्म्’ - यह सब दुःख ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे- वैराग्य साधना है तो भगवान् को पुकारो। उनके शब्दों में काशी की ओर जितना बढ़ो, कलकत्ता उतना ही पीछे छूटता है। यानि कि भगवान् की ओर जितना बढ़ोगे-संसार की आसक्ति उतना ही घटेगी।
साधनापरक रुटीन रहेगा, फिर उसके बाद रात्रि 1 बजे तक उनका सघन रिफ्रेशर प्रशिक्षण चलेगा। आठ दिन में इतनी काम की बातें हो जाएंगी, वे निश्चित ही स्पष्ट कार्ययोजना बनाकर जा सकेंगे। प्रवक्तागण-चिकित्सक-रचनात्मक कार्यों में रुचि रखने वाले अपने-अपने समूह बनाकर आ सकते हैं। यहाँ से जाने के बाद वे कार्यक्षेत्र में जाकर प्रशिक्षण दे सकेंगे। एक सहयोगी हम उन्हें देंगे।
साधना समझाने वाला ही सच्चे अर्थों में मुनि है, सच्चा संन्यासी है। परमपूज्य गुरुदेव ने हमें युगप्रवर्त्तन के कार्य में इसी कारण लगाया। स्वयं उनने कठोर साधना की, चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री अनुष्ठान (लगभग साठ करोड़ गायत्री मंत्र जप) संपन्न किए एवं हम सभी को भी न्यूनतम गायत्री साधना से जोड़कर आराधना में, कर्मयोग में प्रवृत्त कर दिया। गीता में भगवान अर्जुन को पहचानते हैं कि उसका धर्म संन्यास नहीं है। कुसमय का कच्चेपन का वैराग्य गड़बड़ी पैदा करता है।
साधना की तीसरी अवस्था आती है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक प्रकार पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योगसिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में योग-साधना की वह समस्त विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, जिसका अधिकारी एक यती ही है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधाहीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी?
साधना अभ्यास के समय कुछ अलग सपने देखते हैं तो किशोर व युवाओं के ख्वाब कुछ और होते हैं। इन सभी में यदि किसी एक तत्त्व की समानता होती है तो वह है सभी में भटकाव। जप करते समय ध्यान करते समय मन यूँ ही भटकता रहता है। रह-रह कर वह इन्द्रिय विषयों, भोग आसक्तियों की कल्पनाओं से घिर जाता है। हममें से किसी के साथ ऐसा होने का मतलब वैराग्य का अभाव है।
साधना : एक समग्र उपचार
साधना प्रधान, प्रशिक्षण प्रधान। साधना प्रधान सत्रों में दो प्रकार के सत्र चल रहे है।
साधना का निर्धारण शिष्य या साधक की प्रकृति एवं पात्रता के अनुरूप ही होता है। यहाँ साधकों के तीन स्तर हैं-1. पशु शिष्य, 2. वीर शिष्य, 3.दिव्य शिष्य। पशु शिष्य निम्नतम कोटि का साधक होता है। ऐसा शिष्य स्वयं को तथा स्वयं की वासना, इच्छा और आकाँक्षा को जान नहीं पाता, समझ नहीं पाता और अपने आपको समर्पित नहीं कर पाता है। ऐसे शिष्यों के लिए तंत्र मार्ग में भक्ति मार्ग, कर्म मार्ग और उपासना मार्ग बतलाये गये हैं।
साधना सम्पन्न की थी। उनका ‘सौंदर्य लहरी’ नामक ग्रंथ तंत्र ग्रंथों में अद्वितीय स्थान रखता है। शंकर की ही भाँति नागार्जुन, गोरखनाथ, महेन्द्रनाथ, कीनाराम, वामार वेपा, कमलाकान्त, रामप्रसाद, रामकृष्ण परमहंस तंत्र की गुह्य प्रक्रियाओं में निष्णात थे। परम पूज्य गुरुदेव को श्रेष्ठतम तंत्र साधक माना जा सकता है। उनके द्वारा 1984-86 के दौरान सम्पन्न की गई सावित्री साधना (सूक्ष्मीकरण साधना) तंत्र का उत्कृष्टतम प्रयोग कहा जा सकता है, जिसकी परिणति विश्व राष्ट्र की कुण्डलिनी जागरण के रूप में हुई।
साधनाओं के जंजाल में न उलझाकर परमपूज्य गुरुदेव ने हम सभी को ज्ञानयज्ञ रूपी युगधर्म संपन्न करने को कहा।
साधना जिनके जीवन की साध्य है, उन्हें इस अभिशाप को किसी भी तरह अपने पास नहीं फटकने देना चाहिए।
साधना निरन्तर अविराम-तीव्र से तीव्रता एवं तीव्रतम होती गयी। इस साधनावस्था में एक दिन उन्होंने देखा श्री ठाकुर किसी दिव्यलोक में है। बड़ी ही प्रकाश और प्रभापूर्ण उपस्थिति है उनकी। स्वर्ग के देवगण विभिन्न ग्रहों स्वामी रवि, शनि, मंगल आदि उनको स्तुति कर रहे हैं। ध्यान के इन्हीं क्षणों में महाराज ने देखा श्री श्री ठाकुर की पराचेतना ही विष्णु-ब्रह्म एवं शिव में समायी।
साधना अभ्यास को ऊर्जा मिलती है। प्रकारान्तर से वैराग्य को अभ्यास का ऊर्जा स्रोत भी कहा जा सकता है।
साधना संदेश है। इसमें परम पूज्य गुरुदेव एवं महर्षि पतंजलि के अनुभव घुले-मिले हैं। इन महायोगियों के अनुभव का स्पर्श सदा ही साधकों को नवस्फूर्ति देता है। जो साधक हैं उन्हें प्रति माह बड़ी आतुरता से इस दैवी संदेश की प्रतीक्षा रहती है, क्योंकि इसे पढ़ने से इन पर मनन-चिंतन करने वे साधना जीवन की अनेकों समस्याओं का समाधान होता है। साधना पथ पर बिखरे हुए अनगिन कंटक अपने आप ही दूर हो जाते हैं।
साधना, ध्यान-त्रिकाल संध्या के अलावा दिन में तीन बार प्रवचन-उद्बोधनों से मार्गदर्शन-जीवनसाधना, जीवन जीने की कला के विषयों में दिया जाता है। एक दिन पूर्व आकर संध्या को संकल्प लिया जाता है एवं 9वें दिन विदाई हो जाती है। प्रस्तावित सत्र की तिथि से न्यूनतम दो माह पूर्व आवेदन करना होता है।
साधना अभ्यास में ये चार तत्त्व बने रहे तो साधना अपना चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत किए बिना नहीं रहती। परन्तु व्यावहारिक जीवन में देखा यह जाता है कि अनेकों प्रयत्नों के बावजूद साधक इन चार तत्त्वों का संग्रह नहीं कर पाते। इन चार में से कभी कोई छूटता है तो कभी कोई रह जाता है। चाहत होने पर भी साधना में संवेग नहीं उत्पन्न हो पाता।
साधना सत्र- ये पाँच दिवसीय मौन साधना सत्र आश्विन नवरात्रि के समापन से चैत्र नवरात्रि के पूर्व तक प्रतिमाह 1 से 5, 6 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25 एवं 26 से 30 की तारीखों में चलते हैं। इस वर्ष से सत्र छह अक्टूबर, 23 से आरंभ होकर 2 मार्च, 24 तक चलेंगे। वसंत पंचमी (26 जनवरी, 24) की अवधि वाला सत्र प्रभावित होता है, अतः एक या दो सत्र स्थापित करने होते है। इन सत्रों में भागीदारी हेतु छह माह पूर्व लिखना होता है। इन सत्रों में भागीदारी हेतु छह माह पूर्व लिखना होता है।
साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता।
साधना चाहते है, उनके लिए समाज से बढ़कर कोई दूसरी उपयुक्त योगस्थली नहीं है।
साधना द्वारा शक्ति का संवर्द्धन कर जनसेवा में स्वयं को लगा दें। परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं लिखा है (अखण्ड ज्योति अगस्त, 1969), “युगनिर्माण योजना एक शंखनाद है, जो संस्कारी व्यक्तियों को जगाने और उन्हें प्रभातकालीन कर्त्तव्यों में जुटने का उद्बोधन कर रहा है।” हम और कुछ नहीं तो उनके शब्दों पर विश्वास कर उनकी जन्म शताब्दी वर्ष ; डडडडड-डडडडड तक ही मात्र 8-9 वर्षों के लिए स्वयं को तपस्वी बना लें, वैसे ही जैसा जीवन हम सभी ने पूर्वजन्म में सौ वर्ष जिया था। इतिहास की पुनरावृत्ति सुनिश्चित ही होगी।
साधना प्रधान सत्रों में दो प्रकार के सत्र चल रहे है।
साधना उपर्युक्त साधन है। दर्पण साधना अर्थात् शीशे के माध्यम से अपने अस्तित्व की गहराई में डूबना व उतरना। इससे हमारे स्व का स्वरूप बोध होने लगता है।
साधना, समय-समय पर व्याधियों द्वारा ली जाने वाली शरीर की परीक्षा के बीच ऐसे तपस्वी जन्म लेते चले गए, जिनने श्रीरामकृष्ण संघ एवं स्थान-स्थान पर स्थापित हुए मठों, देश-विदेश में प्रचार की पृष्ठभूमि बनाई। शिकागो की धर्मसभा में स्वामी जी की विख्यात वक्तृता (सितंबर 1893) से लेकर ढेरों विदेशी-भारतीय शिष्यों के उनसे जुड़ने तक भी संघ का हम जो आधारभूत ढाँचा देखते हैं, उसमें साधन कम, द डडडडडडडड साधना ही मूल में है। स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र) के साथ के सोलह व्यक्तियों (उन्हें मिलाकर) में पाँच ग्रेजुएट थे, दस ने मात्र औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी एवं एक पूर्णतः अशिक्षित थे। फिर भी सोलह का यह समूह एकजुट हो अपने उस गुरु का, जिनका सान्निध्य उन्हें मिला था, स्वप्न पूरा करने के लिए कठोर तपस्वी जीवन जीने हेतु तत्पर रहा एवं आज के विराट श्रीरामकृष्ण मिशन की नींव का पत्थर बना।
साधना) तंत्र का उत्कृष्टतम प्रयोग कहा जा सकता है, जिसकी परिणति विश्व राष्ट्र की कुण्डलिनी जागरण के रूप में हुई।
साधना स्थल में उसे उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था आती है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक प्रकार पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योगसिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में योग-साधना की वह समस्त विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, जिसका अधिकारी एक यती ही है।
साधना मार्ग का निष्ठापूर्ण अनुगमन आवश्यक है।
साधना द्वारा जब इसका जागरण होता है तथा यह क्रमशः विभिन्न चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञाचक्र) का भेदन करती हुई सहस्रार स्थित शिव तत्त्व से मिलती है शिव शक्ति का यह दिव्य मिलन ही जीवन को पूर्णता प्रदान करता है और जीव शिव तुल्य हो जाता है।
साधना एवं व्रताभ्यास के साथ व्यतीत किया है, तो उसमें इस वर्ष कतिपय नये आयाम विकसित करें। श्रेष्ठता की कक्षा को उत्तीर्ण कर श्रेष्ठतर व श्रेष्ठतम की ओर बढ़ें। यदि संयोग से अभी तक हम ऐसा कुछ भी नहीं कर सके हैं, तो इस वर्ष श्रेष्ठता के लिए संकल्पित हों। अटल विश्वास एवं प्रगाढ़ निष्ठ के साथ ऋषि जीवन की राह पर बढ़ें।
साधना भी सफल होती है। अगर हमारी भावना से वे दूर रहते है, भावना को छू नहीं पाते, केवल भौतिक क्रियाकलाप से भौतिक चीजों की कामना में हम डूबे रहते हैं तो यह खाली भौतिकवाद है। भौतिकवाद के लिए हम अलग हैं और अध्यात्मवाद के लिए अलग। भौतिकवाद कीमत के बदले में कीमत चुकाना चाहता है। आप आठ घंटे काम कीजिए, हम आपको छह रुपये चुका सकते है, आप चार घंटे काम कीजिए, हम आपको तीन रुपये दे सकते है।
साधना करना चाहिए। समय कितना लगाना है, यह अपनी सुविधा एवं परिस्थिति पर निर्भर है, पर जितना भी समय लगाना हो उसे तीन भागो में विभक्त कर लेना चाहिए। एक तिहाई में स्थूलशरीर में ज्योति का अवतरण करना चाहिए। अनुमान से या घड़ी की सहायता से यह समय निर्धारित करना चाहिए।
साधना अभी 1.45 से 2 की अवधि में कराई जाती है।
साधना है तो भगवान् को पुकारो। उनके शब्दों में काशी की ओर जितना बढ़ो, कलकत्ता उतना ही पीछे छूटता है। यानि कि भगवान् की ओर जितना बढ़ोगे-संसार की आसक्ति उतना ही घटेगी। यह साधन वैराग्य जितना सघन होगा, उतना ही हम डडडडड स द्धवैराग्य की ओर आगे बढ़ेंगे। सिद्ध वैराग्य की व्याख्या महर्षि के अगले सूत्र में है, इसे साधक अगले अंक में पढ़ेंगे।
साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था आती है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक प्रकार पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योगसिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में योग-साधना की वह समस्त विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, जिसका अधिकारी एक यती ही है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है।
साधनारत हैं।
साधना अर्थात् शीशे के माध्यम से अपने अस्तित्व की गहराई में डूबना व उतरना। इससे हमारे स्व का स्वरूप बोध होने लगता है।
साधना करने वालों के लिए महान् गुरु भक्तों का यही निर्देश है कि छोड़े महत्त्वाकाँक्षा। छोड़े तुलना की प्रवृत्ति। बस एक ही बात की फिक्र करें कि अपने आपको किस विधि से सम्पूर्णतया सद्गुरु को सौंपें? यदि हमारा जीवन महत्त्वाकाँक्षा से रहित है तो कृपालु सद्गुरु इसमें से भगवत् सत्ता को प्रकट कर देंगे। आत्मतत्त्व दिव्यता से जीवन अपने आप ही महक उठेगा।
साधना के संदर्भ में भ्राँतियाँ का सघन कुहासा जन मानस के बीच छाया रहा है। जो तत्त्व अलंकारिक विवरण में किसी गुह्य उद्देश्य और रहस्य को छुपाये थे, उनके शब्दशः अर्थ लिए जाने लगे। सबसे अधिक भ्रम पंचमकारों के संदर्भ में हुआ। मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन के रहस्य को न जानकर, इनके यथावत उपयोग में ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ ली गई। जबकि तंत्र शास्त्रों के अनुसार जिस मद्य के प्रयोग का आदेश है वह नशा उत्पन्न करने वाला पदार्थ नहीं है, बल्कि वह दिव्य ज्ञान है, जिससे साधक बाहरी जगत् से नाता तोड़कर आन्तरिक क्षेत्र में प्रवेश करता है।
साधना में, आत्मप्रशिक्षण में, कार्यकर्त्ता के रूप में तैयारी में कोई कमी तो नहीं रह गई। यदि है तो पहुँचें गायत्रीतीर्थ एवं पुनः उस कषाय-कल्मष को बुहारकर सक्रियता के साथ गति पकड़ लें। समय बहुत कम रह गया है। अब मात्र 8 से 9 वर्ष का समय बाकी है। नवरात्रि के नौ दिनों की तरह पूज्यवर की जन्मशताब्दी ; डडडडड-डडडडड से पूर्व की अवधि का यह पहला दिन ; पहला वर्ष चल रहा है।
साधना-विधान को अपनाता है, उसी के अनुरूप उसे पार्थिव चेतना से एकत्व का आभास होता रहता है। यहीं ‘भू ‘तत्व की अनुभूति होती है। ‘भुवः’तत्व की अनुभूति इसके निम्न और उच्च स्तरों के अनुसार प्रेत, पिशाचों की भयंकरता-विकरालता और यक्ष आदि प्राणिक शक्तियों की सौम्यता के दर्शन के रूप में हो सकती है। दैनंदिन जीवनक्रम में स्वप्न के माध्यम से इसे कुछ-कुछ अनुभव किया जाता है। जागरुकता के अभाव के कारण यह स्पष्ट एवं साफ नहीं हो पता ।
साधना से जोड़कर आराधना में, कर्मयोग में प्रवृत्त कर दिया। गीता में भगवान अर्जुन को पहचानते हैं कि उसका धर्म संन्यास नहीं है। कुसमय का कच्चेपन का वैराग्य गड़बड़ी पैदा करता है। कभी वह कहता है कि युद्ध नहीं करूंगा, संन्यास ले लूँगा। श्रीकृष्ण अर्जुन के मन से वैराग्य का भूत भगाने की कोशिश कर रहे है।
साधना की जा सकती है। तब दो बार में कुल मिलाकर एक घंटे तक का यह समय हो सकता है। 24 घंटे में 2 घंटे इसके लिए अधिकतम समय हो सकता है। अधिक तेज के ग्रहण करने में कठिनाई पड़ती है, इसलिए ग्रहण उतना ही करना चाहिए, जितना पचाया जा सके, कम से आरंभ कर धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है। कौन किस समय इस साधना को करे, कितनी देर, किस प्रकार बैठकर करे, यह निर्धारण करना साधक का काम है।
साधना इस प्रकार करनी चाहिए-
साधना सहचरी का आगमन
साधना की वह समस्त विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, जिसका अधिकारी एक यती ही है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधाहीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी? यदि कोई ऐसी अभावग्रस्त स्थिति में रह भी रहा हो तो इसे उसकी मजबूरी कहनी चाहिए, वैराग्य नहीं। जो जीवनभर सरोवर में कभी उतरा नहीं, वह बढ़-चढ़कर जल में नहीं डूबने का दंभ करे तो इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है?
साधना सत्र आश्विन नवरात्रि के समापन से चैत्र नवरात्रि के पूर्व तक प्रतिमाह 1 से 5, 6 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25 एवं 26 से 30 की तारीखों में चलते हैं। इस वर्ष से सत्र छह अक्टूबर, 23 से आरंभ होकर 2 मार्च, 24 तक चलेंगे। वसंत पंचमी (26 जनवरी, 24) की अवधि वाला सत्र प्रभावित होता है, अतः एक या दो सत्र स्थापित करने होते है। इन सत्रों में भागीदारी हेतु छह माह पूर्व लिखना होता है। इन सत्रों में भागीदारी हेतु छह माह पूर्व लिखना होता है।
साधना रहस्यों का मर्म अंतर्दृष्टि में उजागर होता है। अन्तर्यात्रा की दुरुहता-जटिलता स्वयं ही सुगम हो जाती है। यह अनुभव किसी अकेले एक का नहीं, बल्कि उन अनगिनत साधकों का है, जो दृढ़ निष्ठ होकर संकल्पित एवं समर्पित भाव से साधनारत हैं।
साधना में ही स्वर्ग का गुप्त रहस्य ढँपा-ढँका है। अनुभवी ही इसके रहस्य को अनावृत्त कर अनुभव कर सकते हैं। मनुष्य जहाँ व्यष्टि है, वहीं विराट भी है। उसकी स्थिति- अवस्था के अनुरूप उसकी चेतना का स्तर होता है और चेतना के उन्हीं स्तरों की, शक्तियों की अनुभूति उसे होती रहती है। शरीर के स्तर पर वह जो साधना-विधान को अपनाता है, उसी के अनुरूप उसे पार्थिव चेतना से एकत्व का आभास होता रहता है।
साधना की, चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री अनुष्ठान (लगभग साठ करोड़ गायत्री मंत्र जप) संपन्न किए एवं हम सभी को भी न्यूनतम गायत्री साधना से जोड़कर आराधना में, कर्मयोग में प्रवृत्त कर दिया। गीता में भगवान अर्जुन को पहचानते हैं कि उसका धर्म संन्यास नहीं है। कुसमय का कच्चेपन का वैराग्य गड़बड़ी पैदा करता है। कभी वह कहता है कि युद्ध नहीं करूंगा, संन्यास ले लूँगा। श्रीकृष्ण अर्जुन के मन से वैराग्य का भूत भगाने की कोशिश कर रहे है।
साधना-भूमि है। इससे बढ़कर अनुकूल स्थान साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता।
साधना को करे, कितनी देर, किस प्रकार बैठकर करे, यह निर्धारण करना साधक का काम है। अपनी परिस्थितियोँ के अनुसार उसे अपनी व्यवस्था किया जाए, उसे उसी क्रम चलाना चाहिए। समय और स्थिति का एक ही क्रम चलाना किसी भी साधना की सफलता के लिए उचित एवं आवश्यक है।
साधना की है, जिसे ठीक प्रकार पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योगसिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में योग-साधना की वह समस्त विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, जिसका अधिकारी एक यती ही है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधाहीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी? यदि कोई ऐसी अभावग्रस्त स्थिति में रह भी रहा हो तो इसे उसकी मजबूरी कहनी चाहिए, वैराग्य नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-December
साधना महिमा के अगले क्रम को प्रकट करते हुए देवाधिदेव भगवान् महादेव जगन्माता भवानी से कहते हैं-
साधना क्या है? कैसे हम इस जीवनरूपी प्रत्यक्ष देवता को साधें, इस नकद धर्म को कैसे भुनाएँ, जीवनशैली किस तरह व्यवस्थित करें, उस पर विशेषज्ञ लेखनी से पूज्यवर का चिंतन जनवरी 24 की ‘अखण्ड ज्योति’ में पढ़ें। अधिक-से-अधिक नए व्यक्ति पढ़ सकें, इसलिए अभी से इन्हें जोड़ें।
साधना की कई बार परीक्षाएँ लेकर उन्हें सहस्रदल कमल में ध्यान करने की यह विधि सुझाई थी। ध्यान का यह दुर्लभ प्रयोग बताते समय श्री रामकृष्ण ने अपनी ओर इशारा करते हुए पूछा था-तुम इसे क्या समझते हो? नाग महाशय ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया-यह मुझसे मत कहलाइये ठाकुर। आपकी कृपा से मैं समझ गया हूँ कि आप वही हैं। इस पर परमहंस देव ने कहा-तब ठीक है।
साधना विशेषाँक’ होगा। अन्य नियमित स्तंभ इसमें नहीं होंगे। ‘आर्ट ऑफ लिविंग‘ जिसकी परिभाषा पूज्यवर ने सबसे पहले की, आज विविध रूपों में कमाई का साधन बनी दिखाई पड़ती है। वस्तुतः जीवन साधना क्या है? कैसे हम इस जीवनरूपी प्रत्यक्ष देवता को साधें, इस नकद धर्म को कैसे भुनाएँ, जीवनशैली किस तरह व्यवस्थित करें, उस पर विशेषज्ञ लेखनी से पूज्यवर का चिंतन जनवरी 24 की ‘अखण्ड ज्योति’ में पढ़ें।
साधना है, वही परम सिद्धि है और उन्हीं की कृपा से उनके ही मार्गदर्शन में साधकगण अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है-’साधना-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
साधना विस्तार (देवालय प्रबंधन) से लेकर पर्यावरण के प्रति जागरुकता का संवर्द्धन, नशा-निवारण, कुरीति-उन्मूलन जैसे ढेरों कार्य हमारे सामने हैं। इनमें भागीदारी करने हेतु हमारे क्षेत्र के संगठित समूहों, समन्वय समितियों, प्रज्ञामंडलों, ट्रस्टों से जुड़ी समितियाँ, सभी को प्रतिभाओं से भावभरा आह्वान करना चाहिए। ऐसे सदुद्देश्य व सुनिश्चित कार्यप्रणाली सामने होते हुए ढेरों व्यक्ति सामने आएँगे और विभिन्न आँदोलनों को अपने हाथ में ले लेंगे। अपने परिवार, अखण्ड ज्योति पाठकों के समुदाय में भी ढेरों ऐसे हो सकते हैं, जो अभी उस भूमिका में न उतर पाए हों। उनके लिए भी, प्रशिक्षित हो इस नवनिर्माण के महायज्ञ में भागीदारी हेतु भावभरा आमंत्रण है।
साधना इतनी उग्र एवं कठोर थी कि सामान्य निद्रा की उन्हें कोई विशेष जरूरत नहीं रह गयी थी। अमावस के दिन उपवास रखकर गंगा के किनारे जप करते-करते वह भाव समाधि में लीन हो जाते थे। कभी-कभी तो यह समाधि दशा इतनी प्रगाढ़ होती कि नदी का ज्वार उन्हें बहा ले जाता। बाद में इन्हें तैरकर वापस आना पड़ता।
साधना के अलावा प्रयत्नपूर्वक भी इस जीवन में पायी जा सकती है। इसी की व्याख्या में महर्षि पतञ्जलि का अगला सूत्र है। जिसकी चर्चा सभी योग साधक ‘अखण्ड ज्योति’ के अगले अंक में पढ़ेंगे।
साधना का पूर्वार्द्ध अंगुलिमाल पहले ही पूरा कर चुका था। देवता पर प्रतिदिन पाँच उँगलियाँ काटकर न चढ़ा सकने की प्रतिज्ञा टूटते देखकर उसने एक दिन अपने बाएँ हाथ की पाँच उँगलियाँ काटकर चढ़ाई थीं। क्या यह घटना आप सबको मालूम नहीं?
साधना आरंभ से ही क्यों न चलाई गई? चर्चा तथागत के कानों तक पहुँची। शिष्यों का समाधान करते हुए वे बोले-संकल्पपूर्ति के लिए दृढ़ता अपनाए रहने की साधना का पूर्वार्द्ध अंगुलिमाल पहले ही पूरा कर चुका था। देवता पर प्रतिदिन पाँच उँगलियाँ काटकर न चढ़ा सकने की प्रतिज्ञा टूटते देखकर उसने एक दिन अपने बाएँ हाथ की पाँच उँगलियाँ काटकर चढ़ाई थीं। क्या यह घटना आप सबको मालूम नहीं?
साधना में प्रवेश पाने का आज संस्कार समारोह था।
साधना मार्ग में नित्य प्रति प्रगति कर रहे हैं। इनमें से कुछ भावप्रवण साधक ऐसे भी हैं, जो महर्षि पतञ्जलि एवं ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव का सूक्ष्म सहचर्य भी अनुभव कर रहे हैं। सच में श्रद्धा सेतु है। हृदय में श्रद्धा प्रगाढ़ हो तो देश एवं काल की दूरियाँ भी सिमट जाती हैं। लोक-लोकान्तर के सत्य पलक झपकते ही भाव चक्षुओं के सामने आ विराजते हैं।
साधना और तत्वज्ञान प्रसार का काम होता रहा। वे मात्र उनतालीस वर्ष जिए, पर इतने स्वल्प काल में अपनी लगन और तत्परता के कारण विश्व धर्म-मानव धर्म की इतनी सेवा कर सके, जितनी कि तीन सौ साठ वर्षों में भी संभव नहीं।
साधना के गहरे रहस्य संजोये हैं। इन रहस्यों को गुरुभक्त साधकों के अन्तःकरण में संप्रेषित करते हुए भगवान् भोले नाथ के वचन हैं- गुरुदेव के चरण कमल संसार के सभी दावानलों का विनाश करने वाले हैं। गुरुभक्त साधकों को उन सद्गुरु का ध्यान ब्रह्मरन्ध्र में करना चाहिए॥ 57॥ यह ध्यान चन्द्रमण्डल के अन्दर श्वेत कमल के बीच में सहस्रदलमण्डल पर अकथ आदि तीन रेखाओं से बने हंस वर्ण युक्त त्रिकोण में करना चाहिए॥ 58॥
साधना द्वारा जागरण, प्रतिभा का समाज के उन्नयन में नियोजन तथा युवाशक्ति द्वारा रचनात्मक अभियानों को गति दिया जाना। इन सभी कार्यों को अगले वर्ष वरीयता दी जाएगी और इस अभियान को भारतव्यापी बनाना होगा। युग निर्माण सत्संकल्प के अठारह सूत्र सतयुगी समाज के आधार पर बनेंगे। विभूतिवान-प्रतिभाशाली स्वयं इनका जन-जन तक प्रचार करते देखे जाएँगे। इन्हीं में चिंतन को क्रिया में बदलने की शक्ति होती है।
साधना करने में अनुरक्त हुआ है। क्योंकि ऐसे अपूर्व साधकों को सहज ही सद्गुरु प्रेम की उपलब्धि होगी। और यह सद्गुरु प्रेम अध्यात्म जगत् का परम दुर्लभ तत्त्व है। जिसके हृदय में निष्कपट सद्गुरु प्रेम है, उसे सब कुछ अपने आप ही सुलभ हो जाता है। उसे किसी भी अन्य साधन एवं साधना की जरूरत नहीं रहती।
साधना से उठे और यह कुतूहल देखकर अवाक् रह गए। आगंतुकों को विदा करने का निश्चय हुआ। ऋषि बोले, “मूर्द्धन्यजनों की ईर्ष्या अन्यान्यों की अपेक्षा अधिक घातक और व्यापक परिणाम उत्पन्न करती है। आप लोग जहाँ रहते थे, वहाँ चले जाएँ। अपनी ईर्ष्या से जिस क्षेत्र को कलुषित किया था, उसे स्नेह-सौजन्य के सहारे सुधारने का नए सिरे से प्रयत्न करें।
साधनाओं के सुफल स्वयं ही उसकी अन्तर्चेतना में आ विराजते हैं। सद्गुरु ही आध्यात्मिक जीवन का सार निष्कर्ष है। सही साधना है, वही परम सिद्धि है और उन्हीं की कृपा से उनके ही मार्गदर्शन में साधकगण अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है-’साधना-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
साधना पथ प्रकाशित होगा। यदि तुम इसे अपने भीतर नहीं देख सकते, तो कहीं और उसे ढूंढ़ना बेकार है। जो तुमसे परे है, केवल उसी की इच्छा करो। वह तुमसे परे है, इसलिए जब तुम उसे प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारा अहंकार नष्ट चुका होता है। जो अप्राप्य है, केवल उसी की इच्छा करो।
साधना-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
साधनारत हैं उन सभी का यही कहना और मानना है कि अन्तर्यात्रा के विज्ञान की प्रत्येक कड़ी जीवन साधना में एक नया अनुभव बनकर प्रकट होती है। अनुभूतियों एवं साक्षात्कार के नये झरोखे अन्तर्चेतना में खुलते हैं। पिछली कड़ी में असम्प्रज्ञात समाधि पर चिंतन किया गया है। महर्षि के अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधि का अगला कदम है। सम्प्रज्ञात समाधि में जहाँ चेतन मन अपनी शुद्धतम भावदशा में होता है।
साधना में भी सिद्धि का प्रारंभ ऐसी ही अवस्था है, जबकि साधक अपने अंदर एक नवीन आत्मिक चेतना अनुभव करता है और उत्साहित होकर प्रदर्शन द्वारा दूसरों पर अपनी महत्ता की छाप बिठाना चाहता है। यह क्रम यदि चल पड़े तो वह कच्चा वीर्य - प्रारंभिक सिद्धि तत्त्व स्वल्प काल में ही अपव्यय होकर समाप्त हो जाता है और साधक को सदा के लिए छूँछ एवं निकम्मा हो जाना पड़ता है।
साधना उचित बतायी गयी है। सहस्रदल कमल पर गुरुगीता के इन महामंत्रों के अनुरूप ध्यान की परमहंस अवस्था को सिद्धों का ध्यान कहा गया है। यही कारण है कि यहाँ उसका सम्पूर्ण रहस्य नहीं बताया जा रहा। नाग महाशय की उच्च अवस्था देखकर ही श्री श्री रामकृष्ण ने उन्हें यह दुर्लभ प्रयोग बताया था।
साधना की आँच से भी वैसा ही विचारमंथन और आत्मिक जगत में हल-चल प्रारंभ होती है। यह स्थिति तब तक चलती रहती है, जब तक पिछले संस्कारों का परिमार्जन नहीं हो जाता। उसके बाद शनैः-शनैः ऐसे लक्षण प्रकट होने प्रारंभ हो जाते हैं, जिन्हें साधना की सफलता और सिद्धि प्राप्ति के लक्षण कह सकते हैं। यह उपलब्धि चर्चित नहीं होनी चाहिए, अन्यथा साधक का अहंकार बढ़ेगा और वह पथभ्रष्ट होगा, किंतु उन्हें अनुभव कर सफलता के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है। सफलता के लक्षण इस प्रकार हैं-
साधना व पात्रता भी चाहिए तथा एक समर्थ गुरु का अवलंबन भी। गायत्री का सिद्ध महापुरुष भी हर किसी को यह नहीं दे देता, न ही सृष्टि के विधान में वह कोई हस्तक्षेप करना चाहता है, परन्तु जहाँ शिष्य का हित हो, शिष्य स्वयं पूरा समर्पण भाव रख वह सब कुछ करने को तैयार हो, जो गुरु कह रहे हैं, तब समर्थ गुरु अपने अनन्य प्रेम के कारण उसके लिए ऐसा भी कर देते हैं। लिखा भी है पूज्यवर ने-”माता ने आपकी श्रद्धा-भक्ति के अनुरूप ही आपको लौटाया है।” यही समझना जरूरी है। परमपूज्य गुरुदेव ने स्वयं श्रेय न लेकर सारा श्रेय माता गायत्री को एवं अपने शिष्य की श्रद्धा-भक्ति को दिया है।
साधना की सफलता और सिद्धि प्राप्ति के लक्षण कह सकते हैं। यह उपलब्धि चर्चित नहीं होनी चाहिए, अन्यथा साधक का अहंकार बढ़ेगा और वह पथभ्रष्ट होगा, किंतु उन्हें अनुभव कर सफलता के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है। सफलता के लक्षण इस प्रकार हैं-
साधना के उच्च शिखरों पर आरुढ़ नाग महाशय की पात्रता-पवित्रता एवं साधना की कई बार परीक्षाएँ लेकर उन्हें सहस्रदल कमल में ध्यान करने की यह विधि सुझाई थी। ध्यान का यह दुर्लभ प्रयोग बताते समय श्री रामकृष्ण ने अपनी ओर इशारा करते हुए पूछा था-तुम इसे क्या समझते हो? नाग महाशय ने बिना किसी हिचकिचाहट के जवाब दिया-यह मुझसे मत कहलाइये ठाकुर। आपकी कृपा से मैं समझ गया हूँ कि आप वही हैं। इस पर परमहंस देव ने कहा-तब ठीक है।
साधना की है, उन सभी का यही अनुभव है कि दुर्गा सप्तशती की ही भाँति इस आध्यात्मिक सप्तशती के सविधि प्रयोग से मनोवाँछित फल प्राप्त होता है।
साधना का पथ प्रकाशित होता है। भीतर की यह खोज ही जीवन में सार्थकता देती है। इच्छा के सम्बन्ध में सूत्रकार एक दूसरा बिन्दु उठाते हैं- कि जो तुमसे परे हैं, केवल उसकी इच्छा करो। जबकि साधारण तौर पर उसकी इच्छा करते हैं, जिसे हम पा सकते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आप कभी भी अपने आप से बड़े न हो सकेंगे।
साधना में एक नया अनुभव बनकर प्रकट होती है। अनुभूतियों एवं साक्षात्कार के नये झरोखे अन्तर्चेतना में खुलते हैं। पिछली कड़ी में असम्प्रज्ञात समाधि पर चिंतन किया गया है। महर्षि के अनुसार यह सम्प्रज्ञात समाधि का अगला कदम है। सम्प्रज्ञात समाधि में जहाँ चेतन मन अपनी शुद्धतम भावदशा में होता है।
साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है-’साधना-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
साधना की जरूरत नहीं रहती। समस्त साधनाओं के सुफल स्वयं ही उसकी अन्तर्चेतना में आ विराजते हैं। सद्गुरु ही आध्यात्मिक जीवन का सार निष्कर्ष है। सही साधना है, वही परम सिद्धि है और उन्हीं की कृपा से उनके ही मार्गदर्शन में साधकगण अपनी साधना को निर्विघ्न पूर्ण कर पाते हैं। तभी तो कहा गया है-’साधना-सिद्धि गुरुवर पद नेहू’।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-January
साधना के प्रगाढ़ होते ही इस तरह की अनुभूति होने लगती है, लेकिन यहीं नहीं ठहरना है। साधना निरंतर जारी रहनी चाहिए।
साधनात्मक अनुशासन का उल्लंघन करने वाले मनुष्य के कर्म उसे दुर्गति को पहुँचाते हैं।
साधनाओं का विशेषज्ञ देश कहे जाने वाले भारत में इसकी विविधता पर विशेष विचार किया गया है। लिंगपुराण (85/109-111) में प्राप्त विवरण के अनुसार अंगुलियों पर मंत्र जप से एक गुना, पर्व पर जपने से आठ गुना, पुत्रजीव (इंगुदीवृक्ष की तरह का एक वृक्ष) की माला से जपने पर दस गुना, शंख की माला से जपने पर सौगुना फल मिलता है। इसी तरह मूँगे की माला से जप करने पर हजार गुना, मणियों की तथा रत्नों की माला से जप करने पर दस हजार गुना, मोती की माला से जप करने पर लाख गुना जप का सुफल होता है। पद्माक्ष की माला से किया गया जप दस लाख गुना, सुवर्ण की माला से किया गया जप करोड़ गुना, कुश ग्रन्थि से किया गया जप अरब गुना तथा रुद्राक्ष की माला से किया गया जप अनन्त गुना फल देता है।
साधना कराएँगे। इसे कराने से पहले हम आपको प्रारंभिक प्रशिक्षण देते हैं। यह पी॰ एम॰ टी॰ का कोर्स है। कौन−सा? यह जो अभी हम कराते हैं।
साधना परक साहित्य का चुनाव करें।
साधना की शुरुआत नहीं की है, वे करें और जल्दी करें। हम सभी ईश्वर प्राप्ति के दिव्य जीवन पथ पर आ जाएँ और इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर सावधानी के साथ आगे बढ़ते रहें, इसी उद्देश्य से यह साधक दैनन्दिनी की योजना तैयार की गयी है। इसके अंतर्गत 24 प्रारम्भिक नियम बनाए गए हैं। ये चौबीस नियम गायत्री महामंत्र के चौबीस मंत्राक्षरों की भाँति हैं। अतएव इन नियमों का पालन स्वयं विश्वासपूर्वक करना चाहिए तथा अपने परिचित व प्रियजनों से कराना चाहिए।
साधना कराके शिक्षार्थी को इस योग्य बनाया जाए कि उसे मनस्वी एवं श्रेष्ठ पुरुषों की श्रेणी में गिना जा सके। (पृष्ठ 60, मार्च, 1964) परमपूज्य गुरुदेव द्रष्टा थे, महामनीषी थे एवं युगप्रवर्तक भी। उन्हें अनुमान था कि संस्कार घटिया बने रहे, मात्र जानकारी प्राप्त करने का तंत्र बना रहा एवं चिन्हपूजा के नाम पर सरस्वती के मंदिर खड़े कर दिए गए, तो राष्ट्र समर्थ और सशक्त नागरिक नहीं खड़े कर सकेगा। जीवन विद्या पर इसी कारण उनका ध्यान विशेष था। इसे वे स्वावलंबन प्रधान एवं अनौपचारिक स्तर की बनाना चाहते थे।
साधना के लिए बाधा ही समझा जाता है। पर यदि साधक समझदार हो तो इसे भी अपनी साधना बना सकता है। भ्रम में समझदारी पैदा हो जाय। भ्रमित करने वाली वस्तु, विषय या विचार के प्रति जागृति हो जाय, तो भ्रम अपने आप ही टूट जाते हैं।
साधनामय जीवन का चरमोत्कर्ष है।’
साधना की उच्चतम स्थिति है। अब आगे दसवें श्लोक से इस माह का स्वाध्याय आरंभ करते हैं।
साधना अनन्त गुना फलवती हो जाती है। यहाँ थोड़े से भी शुभकर्म अपरिमित एवं असीम फलदायी होते हैं। ऐसे कृपालु गुरुदेव के चरणों में साधक-शिष्यों का बार-बार नमन कल्याणकारी है।
साधना करनी होती थी। वर्षा-वास के बाद भिक्षु जब अपनी प्रव्रज्या हेतु पुनः निकलते तो लोग उन्हें भेंट देते। भेंट भी क्या? थोड़ी सी भेंट लेने की ही उन्हें आज्ञा थी।
साधनामय जीवन का एक मात्र सत्य है।
साधना का सार है।
साधना पथ की प्रधान बाधा चतुराई है। यह चतुराई कोई न कोई तरीका निकाल ही लेती है। तिष्य ने भी अपनी चतुराई से चालाकी भरा मार्ग खोज निकाला। उसी गाँव में उसकी बहन सुवर्णा रहती थी। तिष्य को जब यह चादर भेंट की गयी थी, तो पास में वह भी खड़ी थी।
साधना चलती। माताजी के हाथ की बनी रोटी हम खाते। कैसे आनंद भरे क्षण थे वे सोच−सोचकर रोमाँच हो जाता है। (समापन किश्त अगले अंक में)
साधना जीवन की कसौटी है।
साधनाविधि विपर्यय के प्रति सचेत होना, जागरुक होना। उसे परत-दर-परत उद्घाटित करना मैं क्या हूँ? इस गहन जिज्ञासा के साथ ही विपर्यय की परतें उघड़ने लगती हैं। इस क्रम में पहले अपने को देह मानने का असत् ज्ञान टूटता है। फिर टूटता है अपने को प्राण मानने का परिचय।
साधना के लिए रक्तचन्दन अथवा रुद्राक्ष को श्रेष्ठ कहा गया है। कालिका पुराण में अलग-अलग कामनाओं के लिए अलग-अलग तरह की माला की बात कही गयी है। इसके अनुसार कुशग्रन्थि की माला सर्वपाप नाशक, पुत्रजीव की माला पुत्रदायक, मणिमाला सर्वाभिष्टदायक तथा मूँगे की माला विपुल धनदायक है। सनत्कुमार संहिता में माला के सूत्रों से भी फल की विशेषता बतायी गयी है। इस विवरण के अनुसार कपास के सूत से गूँथी गयी माला धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष दायक मानी गयी है।
साधनाएँ, दुनिया भर के प्रपंच रचकर भी जो नहीं मिल सकता, वह अपने मन, बुद्धि, ज्ञानेंद्रियों, कर्मेंद्रियों से प्रभु अर्पित होकर कर्म करने से मिल जाता है। संसाररूपी परमात्मा के इस बगीचे को समुन्नत, सुँदर, व्यवस्थित बनाना ही हमारा कर्त्तव्य है। हम निज की तो सोचें, पर उसमें आसक्ति न हों, उसके लिए परेशान न हों। जो प्रभु की सेवा करता है, दरिद्रनारायण की सेवा करता है, प्रभु उसका ध्यान रखते हैं। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे, ‘परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ है।
साधना की सफलता के लिए आपका मार्ग प्रशस्त करेंगे।
साधना- गायत्री की दैनिक साधना विधि के अनुसार नियमित गायत्री साधना करते हुए नित्य प्रति कम से कम एक माला गायत्री मंत्र का जप करना। गायत्री साधकों को रविवार या गुरुवार कम से कम एक समय का उपवास अवश्य करना चाहिए।
साधना पथ पर बढ़ चलने के लिए संकल्पित साधकों के लिए भावभरा मार्गदर्शन संदेश है। उनके उन्नत साधनामय जीवन की सफलता के लिए सच्ची कल्याण कामना है। नववर्ष प्रायः नई दैनन्दिनी की शुरुआत करने के लिए जाना जाता है। बहुसंख्यक जन दैनन्दिनी का उपयोग अपनी जीवनचर्या के कुछ खास बिन्दुओं का स्मरण रखने के लिए कर सकते हैं। कुछ लोग इसका प्रयोग रुपये, पैसे एवं चीज-सामान का हिसाब रखने के लिए करते हैं।
साधना होना चाहिए। उन्हें बस अपने जीवन शैली और जीवन तत्त्व दोनों ही आयामों में छाई हुई विपर्यय घटाओं के प्रति जागरुक होना पड़ेगा। तो आज और अभी से प्रारम्भ करने अपनी यह जागरुकता की ध्यान साधना। इसके बाद आपके सामने योग कथा की अगली कड़ी का प्रस्तुतीकरण होगा। जिसमें महर्षि पतंजलि विकल्पवृत्ति के बारे में बताएँगे।
साधनाओं) द्वारा अंतर्मन को मजबूत बनाया जाये। अध्यात्म दर्शन के समर्थ सम्बल द्वारा जीवन के दृष्टिकोण एवं कार्यपद्धति में हेर-फेर कर जीवन को अधिक रोमाँचकारी व तनावरहित बनाया जा सकता है।
साधना कर रहें हैं, आरती हो रही है, यज्ञ−हवन हो रहा है। लोग आ रहे हैं। जा रहे हैं। यह प्रतीति कुछ देर बनी रही, फिर तिरोहित हो गई (बाद में इसी स्थान पर 1953 में गायत्री तपोभूमि की स्थापना हुई।) संध्या संपन्न कर अगली सुबह द्वारिकाधीश के दर्शन करते हुए आगरा के लिए रवाना हो गए।
साधना का परम रहस्य है। इसे जानने वाला जीवन की सारी भटकन से क्षण में ही उबर जाता है। जब समर्थ सद्गुरु के चरणों का आश्रय सुलभ हो, तब भला और कहीं भटकने से क्या फायदा? दयामय गुरुदेव के चरणों की महिमा की कथा पिछली कड़ी में कहीं गयी थी। इस पिछली कड़ी में भगवान् महादेव ने माता पार्वती को बताया कि सद्गुरु के चरणों का जल से किस तरह से साधक को यौगिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
साधनामय जीवन की सफलता के लिए सच्ची कल्याण कामना है। नववर्ष प्रायः नई दैनन्दिनी की शुरुआत करने के लिए जाना जाता है। बहुसंख्यक जन दैनन्दिनी का उपयोग अपनी जीवनचर्या के कुछ खास बिन्दुओं का स्मरण रखने के लिए कर सकते हैं। कुछ लोग इसका प्रयोग रुपये, पैसे एवं चीज-सामान का हिसाब रखने के लिए करते हैं। पर ये सब सामान्य लोगों की सामान्य बातें हैं।
साधना को हम अपनी समष्टि की आराधना द्वारा पकाएँ। अपनी उपासना स्वार्थप्रधान न हो। परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ मान सारे समाज−राष्ट्र के उत्थान की, मूल्यों के उत्थान की, गायत्री चेतना के विस्तार की बात हम सोचें। तब ही युगनिर्माण योजना अपने लक्ष्य पर पहुँच सकेगी।
साधना की स्थली थी। यह कक्ष अपने आप में असंख्य गुह्य एवं गहन आध्यात्मिक प्रयोगों की इतिहास कथा समेटे है। इसे आज भी पढ़ा जा सकता है, पर केवल तपोन्मीलित दृष्टि से। अनुभूतियों के अक्षर केवल अनुभूतियों में ही बाँचे जा सकते हैं। अनुभूतियों की इन असंख्य कड़ियों में एक कड़ी अनायास ही उस दिन भी जुड़ी।
साधना में हम आपको शक्ति देने के लिए बुलाते हैं, पर आपके लिए शर्त यही है कि आप अपने वर्तमान जीवन का स्वयं ही संशोधन कर लें, क्योंकि तभी जो शक्ति आएगी, वह आप के जीवन के लिए लाभदायक हो सकती है। आपका भला कर सकती है अन्यथा यदि शक्ति आई, तो आपका पेट फट जाएगा। आप उस शक्ति को सहन नहीं कर सकेंगे।
साधना बना सकता है। भ्रम में समझदारी पैदा हो जाय। भ्रमित करने वाली वस्तु, विषय या विचार के प्रति जागृति हो जाय, तो भ्रम अपने आप ही टूट जाते हैं।
साधना विधि बनाने की तकनीक है। और वह साधनाविधि विपर्यय के प्रति सचेत होना, जागरुक होना। उसे परत-दर-परत उद्घाटित करना मैं क्या हूँ? इस गहन जिज्ञासा के साथ ही विपर्यय की परतें उघड़ने लगती हैं। इस क्रम में पहले अपने को देह मानने का असत् ज्ञान टूटता है।
साधना। इसके बाद आपके सामने योग कथा की अगली कड़ी का प्रस्तुतीकरण होगा। जिसमें महर्षि पतंजलि विकल्पवृत्ति के बारे में बताएँगे। इसका स्वरूप और महत्त्व जानने के लिए अखण्ड ज्योति के अगले अंक की प्रतीक्षा करें। परन्तु यह प्रतीक्षा भी साधकों के अनुरूप साधनामय होनी चाहिए।
साधनामय होनी चाहिए।
साधना महान् फलदायी होगी, ऐसा बार-बार अनुभव किया गया है।
साधना को भी प्रमाणित करेगी और उसे प्रमाणिक बना देगी। महर्षि ने इस सूत्र में प्रमाणवृत्ति के स्रोत भी बताए। उनके अनुसार प्रमाणवृत्ति के तीन स्रोत हैं- पहली प्रत्यक्ष बोध, दूसरा है- अनुमान और तीसरा स्रोत है- योगसिद्ध आप्त पुरुषों के वचन। इनसे कैसे और किस तरह ठीक-ठीक ज्ञान होता है, यह कथा पिछली कड़ी में बतायी गयी थी।’
साधना का सार इतना ही है कि वह गुरु चरणों के जल (चरणामृत) को पिए। गुरु को पहले भोज्य पदार्थों को समर्पित कर बाद में स्वयं उन्हें प्रसाद रूप में ग्रहण करे॥15॥ गुरु का निवास ही मुक्तिदायिनी काशी है। उनका चरणोदक ही इस काशीधाम को आध्यात्मिक ऊर्जा से भरने वाला गंगाजल है। गुरुदेव ही भगवान् विश्वनाथ है। वही साक्षात् तारक ब्रह्म है॥16॥ गुरुदेव का चरणोदक गया तीर्थ है।
साधना में संलग्न रहें।
साधना
साधना अति सुगम और महाफलदायी है। जब सर्वदेव देवीमय कृपालु सद्गुरु का सान्निध्य हमें सुलभ है, तब अन्यत्र क्यों भटका जाय? गुरुदेव का चरणोदक महाप्रभावशाली है। यह सामान्य जल नहीं है। इसमें तो उनकी तप चेतना घुली रहती है।
साधनात्मक समीक्षा सुनाना चाहिए। किसी दिन किसी नियम के टूट जाने पर आवश्यक दण्ड विधान को आग्रहपूर्वक स्वीकार करना चाहिए। शान्तिकुञ्ज आकर-पत्र लिखकर अथवा इस पत्रिका के सम्पादक से भेंट
साधना श्रेष्ठ है।
साधना पथ ही श्रेष्ठतम जीवन पथ है। परम पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन का सार निष्कर्ष इसी एक वाक्य में कहा है। फिर भला हम सब इस श्रेष्ठतम जीवन मार्ग से क्यों चूकें। हम विचारशील हैं, विवेकवान हैं, इसके परख की कसौटी एक ही है कि हम साधक दैनन्दिनी की इस योजना में कितने उत्साह, निष्ठ एवं श्रद्धा से भागीदार बनते हैं। इस योजना में ही अखण्ड ज्योति एवं शान्तिकुञ्ज की ओर से साधकों के लिए नववर्ष की मंगलकामनाएँ निहित हैं।
साधना−अभ्यास से जैसे−जैसे अज्ञान का यह अंधकार छँटता है, उसका स्थान ज्ञान का प्रकाश लेता जाता है। जब अंधकार का पूर्ण विलय हो जाता है तो संपूर्ण आत्मप्रकाश खिल उठता है, हृदयाकाश आलोकमय हो जाता है। यही चित्ताकाश है। चित्ताकाश का आलोकमय परदा जब कभी हट जाता है, तब जिस प्रकार चिदाकाश दिखाई देता है, ठीक उसी प्रकार भूताकाश का अंधकारमय परदा बीच−बीच में हट जाने पर उक्त रंध्रमार्ग में आलोकित चित्ताकाश का दर्शन होता है। चिदाकाश का दर्शन ऊर्ध्व नेत्रों से, चित्ताकाश का दर्शन मध्य नेत्रों से एवं भूताकाश का दर्शन अधोनेत्रों से होता है।
साधना को प्रखर करते रहने से निश्चित ही पूरा हो सकता है। हमें करना मात्र इतना ही है कि हमारे इष्ट की उपासना एवं जीवनदेवता की साधना को हम अपनी समष्टि की आराधना द्वारा पकाएँ। अपनी उपासना स्वार्थप्रधान न हो। परमार्थ में ही सच्चा स्वार्थ मान सारे समाज−राष्ट्र के उत्थान की, मूल्यों के उत्थान की, गायत्री चेतना के विस्तार की बात हम सोचें। तब ही युगनिर्माण योजना अपने लक्ष्य पर पहुँच सकेगी।
साधना पथ के जोखिम हैं। इनसे दूर रहने पर ही साधक का कल्याण है। ऐसा आत्म चिन्तन करते हुए भिक्षुओं ने तथागत को प्रणाम किया और ध्यान के लिए चले गए।
साधनात्मक कर्त्तव्य के पालन में जुट जाना चाहिए। तनिक सोचें तो सही, हम सभी भगवान् महाकाल के अंश हैं, महातपस्वी युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ परम पूज्य गुरुदेव की संतानें हैं, क्या क्षुद्रताओं से घिरे रहना हममें से किसी को शोभा देता है।
साधना निरंतर जारी रहनी चाहिए।
साधना है। जिससे जीवन में सभी सुफल अनायास ही मिल जाते हैं। इस कथा की अगली कड़ी अखण्ड ज्योति के अगले अंक की विषयवस्तु होगी। तब तक साधकगण गुरुदेव के स्वरूप का ध्यान करते हुए गुरुमंत्र की साधना में संलग्न रहें।
साधना कर रहे हैं, वे आगे बढ़ें, जिन्होंने अभी साधना की शुरुआत नहीं की है, वे करें और जल्दी करें। हम सभी ईश्वर प्राप्ति के दिव्य जीवन पथ पर आ जाएँ और इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर सावधानी के साथ आगे बढ़ते रहें, इसी उद्देश्य से यह साधक दैनन्दिनी की योजना तैयार की गयी है। इसके अंतर्गत 24 प्रारम्भिक नियम बनाए गए हैं। ये चौबीस नियम गायत्री महामंत्र के चौबीस मंत्राक्षरों की भाँति हैं। अतएव इन नियमों का पालन स्वयं विश्वासपूर्वक करना चाहिए तथा अपने परिचित व प्रियजनों से कराना चाहिए।
साधना में हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते हैं, त्यों-त्यों मन में शान्ति भरती जाती है। जबकि भोगों को पाने की कोशिश में मन अशान्त और विक्षिप्त होता चला जाता है।
साधना विधि के अनुसार नियमित गायत्री साधना करते हुए नित्य प्रति कम से कम एक माला गायत्री मंत्र का जप करना। गायत्री साधकों को रविवार या गुरुवार कम से कम एक समय का उपवास अवश्य करना चाहिए।
साधना सत्य को ध्यान में रखते हुए अपने गायत्री परिजनों के लिए साधक दैनन्दिनी की योजना बनायी गयी है। वर्षों से परम पूज्य गुरुदेव द्वारा रचित युग साहित्य से परिचित, प्रेरित एवं प्रभावित हममें से प्रायः सभी मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य की ओर गतिशील हैं। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य सर्व समर्थ भगवान् की अपने जीवन से अभिन्नता को अनुभव करना है। उनके अनन्य प्रेम को प्राप्त करते हुए भागवत् चेतना को अपनी अन्तर्चेतना में अवतरित कर लेना है। वस्तुतः ज्ञान, भक्ति, मुक्ति, मोक्ष सब इसी के अलग-अलग नाम हैं।
साधना की है कमी।
साधना करते हुए नित्य प्रति कम से कम एक माला गायत्री मंत्र का जप करना। गायत्री साधकों को रविवार या गुरुवार कम से कम एक समय का उपवास अवश्य करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-February
साधना बहुत ही दृढ़ता से करनी चाहिए।
साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, कुरीति उन्मूलन, व्यसन मुक्ति तथा नारी जागरण अभियान रूपी सप्त आँदोलनों की दिशा में क्या कुछ गति पकड़ पाए? यदि नहीं, तो हमें किन्हीं भी दो आँदोलनों को इस वर्ष प्रमुखता देकर साधना की धुरी पर गतिशील कर देना है। 2004 के वसंत पर्व पर जब हम आत्मावलोकन करें तो अमुक दो आँदोलनों में स्वयं की गति परिपूर्ण, संतोषदायी मानें। फिर इसी तरह 2004 के पूरे वर्ष व 2005 के पूरे वर्ष में हम दो−दो आँदोलन हाथ में लेकर सप्ताँदोलनों को पूर्णता तक पहुँचा सकते हैं।
साधना का अंग बने। इस दृष्टि से बुद्ध स्वयं ताँत्रिक थे। बुद्ध की घुँघराले बालों वाली प्रतिमा विशुद्ध रूप से उनके ताँत्रिक स्वरूप की परिकल्पना है। उनके बालों का गुँजलक सहस्रार के अगणित दलों का प्रतीक है। यों बुद्ध के वचनों और बौद्ध शास्त्रों में ब्रह्मचर्य का पूरा महत्त्व है।
साधना का हो रहा है। यह अनुष्ठान जिस तर का हो, उसी तरह की तिथि, नक्षत्र, वार और लग्न का विचार किया जात है, उदाहरणार्थ, अनुष्ठान के लिए मेष लग्न—धन—धान्य का देने वाला, वृष—साधक का विनाश करने वाला, कर्क—सर्वसिद्धिदाता, कन्या—लक्ष्मीप्रदाता, मकर—पुण्यप्रद, कुँभ—समृद्धिकारक, ऐसा समझना चाहिए।
साधना में अपना कोई बड़प्पन आड़े न आए। अपना कोई क्षुद्र स्वार्थ इसमें बाधा न बने। श्री रामकृष्णदेव कभी-कभी हँसते हुए अपने भक्तों से कहते थे- कुछ ऐसे हैं, जिनके मन में तो भगवान् के प्रति और गुरु के प्रति भक्ति है, परन्तु उन्हें लाज लगती है, शर्म आती है कि लोग क्या कहेंगे? आश्रम एवं कुल की झूठी मर्यादा, अपनी जाति का अभिमान, यश-प्रतिष्ठ का लोभ उन्हें गुरु की सेवा करने में बाधा बनता है। परमहंस देव जब यह कह रहे थे तो उनके एक भक्त शिष्य मास्टर महाशय ने पूछा, तो फिर मार्ग क्या है?
साधना के खरे होने की कसौटी इसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें साँसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है। यह सब कैसे और किस तरह होगा इसका विवरण अगली कड़ी की विषय वस्तु बनेगी। इसमें चौथी वृत्ति ‘स्मृति’ में समायी शक्ति का उद्घाटन किया जायेगा। योग साधक इस अगली कड़ी की प्रतीक्षा साधनारत रहते हुए करें।
साधना की धुरी पर गतिशील कर देना है। 2004 के वसंत पर्व पर जब हम आत्मावलोकन करें तो अमुक दो आँदोलनों में स्वयं की गति परिपूर्ण, संतोषदायी मानें। फिर इसी तरह 2004 के पूरे वर्ष व 2005 के पूरे वर्ष में हम दो−दो आँदोलन हाथ में लेकर सप्ताँदोलनों को पूर्णता तक पहुँचा सकते हैं।
साधना की सफलता को प्रभावित करती है। स्फटिक सूर्य का प्रतीक है। मोक्षकामी साधनाओं के लिए यह प्रयुक्त होती है। रक्त चंदन और मूँगे की मालाएं आकर्षण, वशीकरण और श्री−प्राप्ति आदि कामों के लिए उपयोगी मानी गई हैं। रुद्राक्ष की माला पापनाशक भी है और सर्वसिद्धि प्रदाता भी।
साधना का साधक तत्त्व बनाते हैं या फिर उसे बाधक बने रहने देते हैं। हमारी योग साधना के खरे होने की कसौटी इसे अपनी साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें साँसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है। यह सब कैसे और किस तरह होगा इसका विवरण अगली कड़ी की विषय वस्तु बनेगी। इसमें चौथी वृत्ति ‘स्मृति’ में समायी शक्ति का उद्घाटन किया जायेगा।
साधना पद्धति का नाम है। जैन योग अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रहरूपी पाँच व्रतों का वर्णन किया गया है, जिनका पालन करना महाव्रत कहलाता है। इस प्रकार बौद्ध−जैन साहित्य में योग की परंपरा समान रूप से विकसित होती है। शुँग, शक, कुषाण, गुप्त एवं पूर्व मध्ययुग में योग−परंपरा उन्नति के शिखर पर पहुँच गई। अष्टाँगहृदय, अष्टाँगसंग्रह तथा चरम संहिता में योग−सूत्रों की व्याख्या की गई है।
साधना, कर्म यज्ञ बनता जाए,
हम पदार्थ की आहुति से, सुख की आहुति देना सीखें,
हम समाज के अगणित मनकों में हीरे जैसे दीखें,
साधना जब सामूहिक स्तर पर होती है एवं विराट् ब्राह्मीसत्ता की सेवा−साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
साधना के क्रमिक विकास का प्राण तत्त्व भी रही है। सरस्वती साधना का यही स्वरूप वाल्मीकि का मूल स्वर बना तथा तमिल के कवि कम्ब के रामायण में निखर उठा। महाभारत में व्यासजी ने आराध्य सरस्वती को इस तरह स्मरण किया है-
साधना का साधक तत्त्व बनाने में है। इस विकल्प वृत्ति की साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें साँसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है। यह सब कैसे और किस तरह होगा इसका विवरण अगली कड़ी की विषय वस्तु बनेगी। इसमें चौथी वृत्ति ‘स्मृति’ में समायी शक्ति का उद्घाटन किया जायेगा। योग साधक इस अगली कड़ी की प्रतीक्षा साधनारत रहते हुए करें।
साधना का नया आयाम उद्घाटित करती है। यही कारण है कि अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रति साधकों की अभिरुचि-अभीप्सा का रूप ले चुकी है। इसके पठन-चिंतन, मनन व निदिध्यासन को भी उन्होंने अपनी साधना का एक अनिवार्य व अविभाज्य अंग मान लिया है। इस अपूर्व साधना ने उनके जीवन में कई अलौकिक अनुभूतियों व उपलब्धियों के द्वार भी खोले हैं। साधना पथ के इन प्रगति द्वारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
साधना से कण्ठ से सोलह धारा वाले विशुद्ध शाम्भवी चक्र का उदय होता है वह चन्द्र बिन्दु से विभूषित रहता है। इसका तात्पर्य है सोलह स्वरों की आत्मा चन्द्रामृत से दीप्त रहती है। इसी को शिवसंहिता में देदीप्यमान स्वर्ण वर्ष कमल की सोलह पंखुड़ियों के रूप में प्रदर्शित किया गया है। इस चन्द्र पर ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है।
साधना में आने की तैयारी करें। जिस शक्ति की आप तलाश करते हैं, उसको कोई ऐसा देने वाला तो हो, जो आपको दे सके। बेटे, हम गारंटी देते हैं कि वह शक्ति हम आपको दिलाएँगे। महाराज जी! रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु हो और हम उसके पैर पड़ जाएँ, तो जिस तरह से विवेकानंद में उनकी सारी शक्ति आ गई थी, ऐसा ही गुरु हमको मिल जाए और हमको विवेकानंद बना दे, तो बहुत अच्छा हो। अच्छा बेटे, तेरे लिए तो हम कहीं से भी ऐसा गुरु ढूँढ़कर ला देंगे और वह तुझे शक्ति दे देगा, लेकिन पहले तुझे एक काम करना पड़ेगा, तुझे विवेकानंद बनना पड़ेगा।
साधना है, उसे विस्मरण मत करो। विद्वत्ता की विजय के पीछे शिष्य की विजयशीलता का विस्मरण नहीं होना चाहिए।”
साधना को और अधिक निखारने एवं संगठन को सशक्त बनाने हेतु नियोजित होना चाहिए। गंगा निरंतर बहती रहती है। सृष्टि के सारे क्रियाकलाप चलते रहते हैं। रुटीन तो स्वतः ही निभता चला जाता है। नौकरी करने वाले, व्यवसाय करने वाले पहले की तरह इस वर्ष भी उसी कार्य को करेंगे व पदोन्नति, अधिक धनराशि या व्यवसाय में सफलता की कामना करेंगे।
साधना कक्ष में अकेले मौन रहकर निर्धारित साधना करनी होती है। अतः जिन्हें साधना का अनुभव हो व शरीर मन से स्वस्थ हों, वे ही आवेदन करें। नियमावली पत्र भेजकर या किन्हीं के हाथों मँगवा लें। एक बार सत्र संपन्न कर चुके परिजन दोबारा आवेदन न करें।
साधना पथ के इन प्रगति द्वारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। योग कथा की विगत कड़ी में आगत कड़ी कुछ यूँ जुड़ती रहेगी जैसे भक्त व भगवान् की भावनाएँ जुड़ती हैं, शिष्य और गुरु के हृदय जुड़ते हैं।
साधना को भी जोड़कर रखा है इसमें कुँडलिनी−जागरण भी शामिल है, पंचकोशों का अनावरण भी शामिल है। इसमें भगवान का साक्षात्कार भी शामिल है। इसमें मनुष्य के भी विद्यमान आत्मतत्व का ज्ञान होना भी शामिल है। इसके द्वारा आपके समीपवर्ती वातावरण में स्वर्गीय परिस्थितियों का पैदा होना भी शामिल है। ये सारी−की−सारी विभूतियाँ, विशेषताएँ जो बताई गई थीं, वे सारी−की−सारी सिद्धियाँ आपका स्वागत करती हैं और आपको बुलाती हैं और आपसे प्रार्थना करती हैं कि आप चाहें तो हमें स्वीकार कर सकते हैं।
साधना में विशेष महत्त्व रखती है। वह किस द्रव्य की है, यह बात भी साधना की सफलता को प्रभावित करती है। स्फटिक सूर्य का प्रतीक है। मोक्षकामी साधनाओं के लिए यह प्रयुक्त होती है। रक्त चंदन और मूँगे की मालाएं आकर्षण, वशीकरण और श्री−प्राप्ति आदि कामों के लिए उपयोगी मानी गई हैं।
साधना की ओर प्रेरित करती है, तो यह प्रश्न उठता है कि क्या इस उच्च स्तर पर सभी प्राणी पहुँच सकते हैं। जब स्रष्टा ने ‘एकोऽहं बहुस्यामि’ का व्रत लिया, तो उनकी भी कल्पना रही होगी कि जीव अपना सहज कर्म करता रहे एवं सृष्टि को बढ़ाता रहे। किसी के भी मन में परस्पर विरोधाभास की बात आ सकती है। कहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस सृष्टि का संवर्द्धन करो, कहीं संन्यास (तथाकथित आज का प्रपंच भरा) की आलोचना करते हैं एवं बार−बार आसक्ति को त्यागने, सभी कामनाओं को छोड़कर मात्र सेवाधर्म में नियोजित करते हैं। तो फिर क्या मानव को अपना संतानोत्पादन से लेकर महत्त्वाकांक्षाओं द्वारा आगे बढ़ने की कामना का लक्ष्य छोड़ देना चाहिए?
साधना में बदली एवं यदि बदली तो क्या हमने व औरों ने उसकी अनुभूति की? यही जीवनसाधना जब सामूहिक स्तर पर होती है एवं विराट् ब्राह्मीसत्ता की सेवा−साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
साधना की जा सके, तो कल्पतरु की उपमा शत-प्रतिशत चरितार्थ हो सकती है। इससे वह सभी कुछ प्राप्त किया जा सकना सम्भव है, जिनकी अपेक्षा उससे की जाती है।
साधना भी इसी स्तर की थी। उनके एक से डेढ़ वर्ष चार हिमालय प्रवास जिन घड़ियों में हुए, वे संकट भरी थीं, पर उनके सोद्देश्य तप एवं नवद्वारों वाली उनकी देह परमात्मा की अनंत शक्तियों के झरने का माध्यम बन गई। प्रतिकूलताएँ अनुकूलताओं में बदलती चली गई।
साधना विधि की सारी सामग्री लेकर उन्हें अपने आवंटित कक्ष में संध्या से पूर्व ही पहुँचना होता है। वे ही आवेदक आएँ, जिन्हें स्वीकृति यहाँ से मिल चुकी हो। साधना काल के नियम बहुत कड़े हैं। प्रत्येक साधक को पाँच दिन तक एक ही साधना कक्ष में अकेले मौन रहकर निर्धारित साधना करनी होती है। अतः जिन्हें साधना का अनुभव हो व शरीर मन से स्वस्थ हों, वे ही आवेदन करें।
साधना करने वाला जीवन के परम लक्ष्य को पाए बिना नहीं रहता। पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और कर्म की सम्पूर्ण निष्ठ को नियोजित करके गुरुदेव भगवान् का ध्यान करना चाहिए। भावना हो या चिन्तन अथवा फिर क्रिया सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।
साधना के रूप में स्वीकार करते हैं।
साधना’ अपनी विगत एक वर्ष में जीवन में निखर पाई। हमारी उपासना जो वैयक्तिक हुआ करती थी, क्या जीवनसाधना में बदली एवं यदि बदली तो क्या हमने व औरों ने उसकी अनुभूति की? यही जीवनसाधना जब सामूहिक स्तर पर होती है एवं विराट् ब्राह्मीसत्ता की सेवा−साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
साधना की अग्नि में प्रवेश किया। प्रायः सत्ताईस वर्ष में यह कठोर साधना, जिसमें चौबीस−चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण किए गए, संपन्न हुई। तीन वर्ष अतिरिक्त इसलिए लगे कि बीच में उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लेना पड़ा। जप−तप तो वहाँ भी चलता रहा, पर नियमानुसार एक आसन पर बैठे जप को पूर्ण मानकर उनने तीन वर्ष अतिरिक्त साधना की। यह प्रयास सोने को अग्नि में तपाकर निर्मल और तेजस्वी बनाने जैसा ही था।
साधना−संगठन−सशक्तीकरण का यह उत्तरार्द्ध वाला वर्ष तो है ही, विद्या−विस्तार का भी वर्ष है यह। इस पावन दिन हम सभी आत्मचिंतन करें कि कितनी कुछ ‘साधना’ अपनी विगत एक वर्ष में जीवन में निखर पाई। हमारी उपासना जो वैयक्तिक हुआ करती थी, क्या जीवनसाधना में बदली एवं यदि बदली तो क्या हमने व औरों ने उसकी अनुभूति की? यही जीवनसाधना जब सामूहिक स्तर पर होती है एवं विराट् ब्राह्मीसत्ता की सेवा−साधना में नियोजित होती है तो आराधना बन जाती है। संगठन इसी आधार पर सशक्त एवं परिणाम देने वाले बनते चले जाते हैं।
साधना काल के नियम बहुत कड़े हैं। प्रत्येक साधक को पाँच दिन तक एक ही साधना कक्ष में अकेले मौन रहकर निर्धारित साधना करनी होती है। अतः जिन्हें साधना का अनुभव हो व शरीर मन से स्वस्थ हों, वे ही आवेदन करें। नियमावली पत्र भेजकर या किन्हीं के हाथों मँगवा लें। एक बार सत्र संपन्न कर चुके परिजन दोबारा आवेदन न करें।
साधना का यही स्वरूप वाल्मीकि का मूल स्वर बना तथा तमिल के कवि कम्ब के रामायण में निखर उठा। महाभारत में व्यासजी ने आराध्य सरस्वती को इस तरह स्मरण किया है-
साधनारत रहते हुए करें।
साधना भारतीय साहित्य साधना के क्रमिक विकास का प्राण तत्त्व भी रही है। सरस्वती साधना का यही स्वरूप वाल्मीकि का मूल स्वर बना तथा तमिल के कवि कम्ब के रामायण में निखर उठा। महाभारत में व्यासजी ने आराध्य सरस्वती को इस तरह स्मरण किया है-
साधना ने उनके जीवन में कई अलौकिक अनुभूतियों व उपलब्धियों के द्वार भी खोले हैं। साधना पथ के इन प्रगति द्वारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। योग कथा की विगत कड़ी में आगत कड़ी कुछ यूँ जुड़ती रहेगी जैसे भक्त व भगवान् की भावनाएँ जुड़ती हैं, शिष्य और गुरु के हृदय जुड़ते हैं।
साधना से जुड़ते हैं, गूँथते हैं। एक कड़ी के बाद एक नयी कड़ी उनमें योग साधना का नया आयाम उद्घाटित करती है। यही कारण है कि अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रति साधकों की अभिरुचि-अभीप्सा का रूप ले चुकी है। इसके पठन-चिंतन, मनन व निदिध्यासन को भी उन्होंने अपनी साधना का एक अनिवार्य व अविभाज्य अंग मान लिया है। इस अपूर्व साधना ने उनके जीवन में कई अलौकिक अनुभूतियों व उपलब्धियों के द्वार भी खोले हैं।
साधना का अनुभव हो व शरीर मन से स्वस्थ हों, वे ही आवेदन करें। नियमावली पत्र भेजकर या किन्हीं के हाथों मँगवा लें। एक बार सत्र संपन्न कर चुके परिजन दोबारा आवेदन न करें।
साधनाओं के लिए यह प्रयुक्त होती है। रक्त चंदन और मूँगे की मालाएं आकर्षण, वशीकरण और श्री−प्राप्ति आदि कामों के लिए उपयोगी मानी गई हैं। रुद्राक्ष की माला पापनाशक भी है और सर्वसिद्धि प्रदाता भी। यही एक ऐसी माला है, जो हर क्षेत्र में हर प्रकृति के कार्य के लिए प्रयोग में आती है। वैष्णवों के लिए भी यह उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी शैवों, मोक्षकामियों और साँसारिक कामना वाले व्यक्तियों के लिए।
साधना का विस्तृत वर्णन किया गया।
साधना वैसी ही सफल होकर रहेगी, आपका ध्यान निश्चित ही लगेगा, जैसा कि हमारे साथ हुआ। आज की बात समाप्त। ॥ ॐ शाँतिः॥
साधना की। यह प्रयास सोने को अग्नि में तपाकर निर्मल और तेजस्वी बनाने जैसा ही था। इसी के आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ एवं ऋद्धि−सिद्धियां प्राप्त हो सकीं। युगपरिवर्तन की प्रचंड धाराएँ इसी आधार पर द्रुतगति से प्रवाहित हो सकीं।
साधना एवं उपासना वसन्त के उल्लास के साथ त्याग तप और आनन्द का परिचायक है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार वसन्त के अग्रदूत श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम सरस्वती पूजन कर विधान किया था। इसके अनुसार-
साधना, जिसमें चौबीस−चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण किए गए, संपन्न हुई। तीन वर्ष अतिरिक्त इसलिए लगे कि बीच में उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लेना पड़ा। जप−तप तो वहाँ भी चलता रहा, पर नियमानुसार एक आसन पर बैठे जप को पूर्ण मानकर उनने तीन वर्ष अतिरिक्त साधना की। यह प्रयास सोने को अग्नि में तपाकर निर्मल और तेजस्वी बनाने जैसा ही था। इसी के आधार पर उन्हें महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ, प्रतिभाएँ, विभूतियाँ एवं ऋद्धि−सिद्धियां प्राप्त हो सकीं।
साधना−अनुष्ठान कर सकता है। व्याधि उसमें विक्षेप पैदा करती है। अतएव तंत्रशास्त्र रुद्राक्ष माला को धारण करने का निर्देश करता है।
साधना का यह पथ बड़ा ही सरल, सुगम और निरापद है। श्री रामकृष्ण परमहंस देव के अनेक शिष्य थे। उनमें से कई बहुत पढ़े-लिखे, विद्वान और तपस्वी थे। स्वामी विवेकानन्द जी महाराज की अलौकिक प्रतिभा से तो समूची दुनिया चमत्कृत रह गयी। इन शिष्यों में एक लाटू महाराज भी थे।
साधना से जोड़ रही हैं। इन कड़ियों के द्वारा साधक अपनी साधना से जुड़ते हैं, गूँथते हैं। एक कड़ी के बाद एक नयी कड़ी उनमें योग साधना का नया आयाम उद्घाटित करती है। यही कारण है कि अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रति साधकों की अभिरुचि-अभीप्सा का रूप ले चुकी है। इसके पठन-चिंतन, मनन व निदिध्यासन को भी उन्होंने अपनी साधना का एक अनिवार्य व अविभाज्य अंग मान लिया है।
साधना करनी होती है। अतः जिन्हें साधना का अनुभव हो व शरीर मन से स्वस्थ हों, वे ही आवेदन करें। नियमावली पत्र भेजकर या किन्हीं के हाथों मँगवा लें। एक बार सत्र संपन्न कर चुके परिजन दोबारा आवेदन न करें।
साधना थी, यह तो तुम भूल ही गए। शास्त्रार्थ के दसों दिन उन्होंने जल लेकर सफलता के लिए उपवास किया और इससे पूर्व पढ़ाने में कितना श्रम किया, इसका तो तुम्हें स्मरण ही नहीं रहा। विजय की अहंता तुम्हारे चेहरे पर झलकती है और अभिवादन में चिह्न−पूजा भर का शिष्टाचार था।” उनने कहा, “वत्स, तुम्हारी विजय के पीछे पिता की साधना है, उसे विस्मरण मत करो। विद्वत्ता की विजय के पीछे शिष्य की विजयशीलता का विस्मरण नहीं होना चाहिए।
साधना ही सर्वश्रेष्ठ है।
साधना से जोड़कर और भी अमूर्त व अवर्णनीय कर दिया है। प्राचीन काल से ज्ञान रूपी यही विचारधारा समस्त जगत् को अपने भावधारा से सिंचित करती रही है परन्तु रचनाकार की स्थूल दृष्टि एवं विकृत भाव के काया को ही सर्वोपरि मान लेने से विसंगतियाँ उत्पन्न हो गई हैं। काया का शृंगार संकीर्ण मन एवं संकुचित भाव में सिमटकर विकृति एवं सड़ांध उत्पन्न करता है। इसे जन-मन के परिष्कार के लिए ज्ञान एवं कला धारा के रूप में सतत प्रवाहमान होते रहना चाहिए। तभी जीवन में चिरन्तन सहजता एवं प्रफुल्लता आ सकती है।
साधना को धन्य किया। उनके अद्भुत आध्यात्मिक जीवन और योग शक्तियों के अद्भुत विकास को देखकर स्वामी विवेकानन्द ने उन्हें अद्भुतानन्द नाम दिया। श्री रामकृष्ण संघ में वह इसी नाम से विख्यात हुए। स्वामी विवेकानन्द उनके बारे में कहा करते थे- लाटू ठाकुर का चमत्कार है। वह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गुरु स्मरण, गुरुसेवा और गुरु की आज्ञापालन से सब कुछ सम्भव हो सकता है।
साधना का एक अनिवार्य व अविभाज्य अंग मान लिया है। इस अपूर्व साधना ने उनके जीवन में कई अलौकिक अनुभूतियों व उपलब्धियों के द्वार भी खोले हैं। साधना पथ के इन प्रगति द्वारों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। योग कथा की विगत कड़ी में आगत कड़ी कुछ यूँ जुड़ती रहेगी जैसे भक्त व भगवान् की भावनाएँ जुड़ती हैं, शिष्य और गुरु के हृदय जुड़ते हैं।
साधना यदि बहिर्मुखी हो तो हमें साँसारिक उपलब्धियों के वरदान देती है और यदि इसे अन्तर्मुखी करलें, कल्पना हमारी धारणा का स्वरूप ले ले तो हमें यौगिक विभूतियों के वरदान देती है। यह सब कैसे और किस तरह होगा इसका विवरण अगली कड़ी की विषय वस्तु बनेगी। इसमें चौथी वृत्ति ‘स्मृति’ में समायी शक्ति का उद्घाटन किया जायेगा। योग साधक इस अगली कड़ी की प्रतीक्षा साधनारत रहते हुए करें।
साधना−विधि में सम्मिलित कर चुके थे। ताँत्रिकों की चक्रपूजा में माँ, बेटी, बहू की नारी प्रतीक के रूप में उपस्थितिमात्र की मान्यता भर है, शिव−संयोग (उनके साथ संभोग) का आदेश नहीं, पर वज्र यानी बौद्ध इसे भी स्वीकृति प्रदान करते हैं। कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि उन दिनों तंत्र का इतना व्यापक प्रचार हुआ कि प्रभाव से सात्विक बौद्ध साधक भी अछूते न रह सके।
साधना के लिए क्यों अपने को समर्पित करते हैं। ऋषियों की परंपरा इतनी कम नहीं थी कि वे विलासियों की तरह साधन−सामग्री उपार्जित नहीं कर सकते थे। फिर क्यों उनने गरीबों जैसा बाना पहना? इसका उत्तर भी उसी समाधान के साथ जुड़ा है, जिसमें खाने की तुलना में खिलाने के जायके को अत्यधिक स्वादिष्ट पाया जाता है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर, भामाशाह, माँधाता, अशोक, हर्षवर्धन आदि से पूछा जाना चाहिए कि उनने अपनी संपदा विलास के लिए उत्तराधिकारियों के लिए जकड़कर क्यों नहीं रखी।
साधना−विधान की पवित्रता पर उतना जोर नहीं दिया जाता, जितना इस बात पर कि माध्यम कितना सशक्त है। निर्भीकता इसकी सफलता की आवश्यक शर्त है। जो निडर नहीं होते, उन्हें तंत्रशास्त्र के अयोग्य माना जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-September
साधना प्रयोगों द्वारा सहज ही उपलब्ध होने लगते है। त्रिपदा गायत्री का दूसरा चरण विष्णुग्रंथि खुलने से संबंधित है।
साधना में कहाँ तक खरे उतर रहे हैं। दृढ़ निष्ठ एवं श्रद्धा सिक्त समर्पण ही इस महासाधना का सम्बल है।
साधना-उपचार करते चलना। कभी फल की कामना में जल्दबाजी न करना। यह गीता के योग की पराकाष्ठा है, जिसमें प्रभु इस महावाक्य के माध्यम से परमशाँति की मानों कुँजी अर्जुन के माध्यम से हमें सौंप देते है।
साधना मार्ग है- उन पर चलकर इस सिद्ध वैराग्य के दर्शन हो तो सकते हैं पर बड़ी कठिनाई से। यह भी सम्भव है कि इन राहों पर साधकों को कई बार अटकना या रुकना पड़े। और हो सकता है सब कुछ करके भी सिद्ध वैराग्य तक न भी पहुँचा जा सके।
साधना अनुभव से इस बात को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। सिद्धों के, सन्तों के बीच बाबा कीनाराम का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। बाबा कीनाराम का ज्यादातर समय काशी में बीता। वह अघोर तंत्र के महान् सिद्ध थे। उनके चमत्कारों, अति प्राकृतिक रहस्यों के बारे में ढेरों किंवदंतियाँ कही-सुनी जाती हैं।
साधना के कारण उन्हें जनसहयोग भरपूर मिलता रहा और देव अनुग्रह से असंभव लगने वाले कार्यों में भी रास्ता बनता चला गया। उन्होँने हरिजनों के लिए अलग से मंदिर बनवाया। शुवर्ण उसे तोड़ने पर तुले रहे, पर विरोध से उनका समर्थन सशक्त था। वे बढ़ते रहे। हरिजन शिक्षा के लिए और भी अधिक उत्साह के साथ लग पड़े।
साधना की धुरी पर हमारे शेष छहों आँदोलन चल पड़े है। जिसने भी साधनात्मक अवलंबन छोड़ा है, वह भटका है। आँदोलन समूह अपने स्तर पर अपना प्रभाव दिखा भी रहे है। सातों जोन्स के माध्यम से उनका सुनियोजन हो सके, यह प्रयास भी केन्द्र द्वारा सतत किया जा रहा है। अभी प्रशिक्षण की आवश्यकता सभी ओर अनुभव की जा रही है, जिसकी पूर्ति नवरात्रि के पूर्व वर्षा ऋतु के विशेष क्षेत्रीय सत्रों द्वारा करने का प्रयास किया जा रहा है।
साधना करने वाले अपने स्वजनों से यही कहना है- कि प्रथम बार शिष्य संजीवनी की कथा को उसी भाँति पढ़ें, जैसे इस पत्रिका के अन्य लेखों को पढ़ते हैं। दूसरी बार इसमें बताए गए सूत्र पर गहरा चिन्तन करें और उसे अपने जीवन में आत्मसात करने के लिए संकल्पित हों। इसके बीच-बीच में शिष्य संजीवनी के प्रकाश में अपने को परखते रहें कि हम अपनी शिष्यत्व साधना में कहाँ तक खरे उतर रहे हैं। दृढ़ निष्ठ एवं श्रद्धा सिक्त समर्पण ही इस महासाधना का सम्बल है।
साधना का तेज ऐसा बढ़ा की देव शक्तियाँ परेशान हो गयी। देवलोक वासियों ने उन्हें डिगाने के लिए भाँति-भाँति के मायाजाल रचे। एक के बाद एक नए तरीके अपनाए, पर कोई कामयाबी न मिली। अन्तिम अस्त्र के रूप में उन्होंने कामदेव को सम्पूर्ण सेना के साथ भेजा। काम की सारी कलाएँ, अप्सराओं की सारी नृत्य लीलाएँ देवर्षि नारद के वैराग्य के सामने पराजित हो गयी।
साधना का सत्यानाश करा बैठे। महर्षि वाल्मीकि रामायण के आदिकाण्ड में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की कथा कुछ ऐसी ही है। त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भेजने वाले विश्वामित्र को अपनी साधना में कई बार स्खलित होना पड़ा। ऐसा केवल इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने ऊपर सजग दृष्टि नहीं रखी। शिष्य का पहला और अनिवार्य कर्त्तव्य है कि वह अपने गुरुदेव के आदर्श को सदा अपने सम्मुख रखे।
साधना है- जिसका एक ही अर्थ है- अहंकार का अपने सद्गुरु के चरणों में विसर्जन। हालाँकि इस समर्पण-विसर्जन के साथ भी कई तरह के भ्रम जनमानस में व्याप्त हैं। कई लोगों का सोचना है कि जब हमने समर्पण कर दिया- तब हम फिर कुछ काम क्योँ करें? जब तृष्णा नहीं सुख की लालसा नहीं तब फिर मेहनत किसलिए? ये सवाल दरअसल भ्रमित मन की उपज है।
साधना की धुरी पर ही हमारा व्यक्तित्व परखा गया था एवं में एक विराट अभियान का अंग बनाया गया था। गायत्री उपासना एवं जीवन साधना जिसकी जितनी गहरी होगी, उतना ही वह गुरुसत्ता के उच्चस्तरीय अनुदानों का भागीदार बनेगा। व्यक्तित्व में जब जीवन-साधना फलीभूत होने लगेगी तब हम आराधना प्रधान विभिन्न आँदोलनों को गति दे सकेंगे।
साधना का एक परम दुर्लभ एवं अति रहस्यमय अनुष्ठान किया जाना था। इस अनुष्ठान के लिए कई तरह की सामग्री आवश्यक थी। जिन्हें साधना का थोड़ा सा भी ज्ञान है- वे जानते हैं कि तंत्र साधना में उपयोग की जाने वाली सामग्री कितनी दुर्लभ हुआ करती है। प्रश्न था- कहाँ से और कैसे लायी जाय। तंत्र अनुष्ठान की इस शृंखला में अनेक देवों, योगिनियों को संतुष्ट करना था।
साधना से प्रभावित होकर, गाँधी जी उनसे मिलने स्वयं पहुँचे थे। केरल में उनकी स्थापित कितनी ही हरिजन संस्थाएं है, जिनमें एक कॉलेज भी है। सतत परमार्थ का क्रम अपनाकर श्री नारायण झा आँतरिक और लौकिक दोनोँ ही स्तरों पर महान बने।
साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। इन साधनाओं में फलता प्राप्त करने के लिए भले ही थोड़ा-बहुत अधिक समय व श्रम लगाना पड़े पर अन्य कष्टपूर्ण साधनाओं की अपेक्षा उन साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगीजनों का कष्टसाध्य लंबा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।
साधना समर’ को हमने पढ़ा, बड़े गजब की किताब है। मेरे ख्याल से हिंदी में इसका अनुवाद शायद नहीं हुआ है। उन्होंने इसमें दुर्गा का, चंडी का और गीता का मुकाबला किया है। दुर्गा सप्तशती में सात सौ श्लोक हैं और गीता में भी सात सौ श्लोक हैं। दुर्गा सप्तशती में अठारह अध्याय हैं, गीता के भी अठारह अध्याय हैं।
साधना है। शब्द से सत्ता नहीं आती है। इसका द्वार तो शून्य है। शब्द से निःशब्द में छलाँग लगाने का साहस ही साधना है।
साधना अति प्रखर थी। विवेक उनमें पूर्णतया प्रज्वलित था। अपनी साधना की प्रचण्ड अविरामता में उन्होंने हिमालय में समाधि लगा ली। उनकी योग साधना का तेज ऐसा बढ़ा की देव शक्तियाँ परेशान हो गयी। देवलोक वासियों ने उन्हें डिगाने के लिए भाँति-भाँति के मायाजाल रचे।
साधना का सत्यानाश कर लेते हैं।
साधनाओं की अपेक्षा उन साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगीजनों का कष्टसाध्य लंबा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।
साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
साधना की डगर पर काफी दूर तक चल चुके हैं। ऐसे साधना परायण जनों के लिए ही यह गुरुदेव की महिमा नित्य अनुभव की वस्तु बन जाती है। महान् अघोर संत बाबा कीनाराम के साधना अनुभव से इस बात को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। सिद्धों के, सन्तों के बीच बाबा कीनाराम का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। बाबा कीनाराम का ज्यादातर समय काशी में बीता।
साधनादि कठोर संयम से पाले गए व्रतों का भोक्ता प्रभु को मानना, स्वयं को नहीं। ईश्वर को स्वार्थरहित, पक्षपात रहित एवं दयालु मानकर उसके प्रति पूरे निष्ठाभाव से समर्पण। वह सुहृदय है, दयालु है, प्रेमी है, यह मानकर निष्काम भाव से अपने सभी कर्म एवं आत्मिक प्रगति के लिए किए गए साधना-उपचार करते चलना। कभी फल की कामना में जल्दबाजी न करना। यह गीता के योग की पराकाष्ठा है, जिसमें प्रभु इस महावाक्य के माध्यम से परमशाँति की मानों कुँजी अर्जुन के माध्यम से हमें सौंप देते है।
साधना का पर्व है। वैसे तो माता का प्रेम अपनी संतान पर सदा ही बरसता रहता है, पर कभी-कभी यह प्रेम छलक पड़ता है, तब वह अपनी संतान को सीने से लगाकर अपने प्यार का अहसास कराती है। संरक्षण का आश्वासन देती है। नवरात्रि की समयावधि भी आद्यशक्ति की स्नेहाभिव्यक्ति का ऐसा ही विशिष्ट काल है। यही शक्ति विश्व के कण-कण में विद्यमान है।
साधना परायण जनों के लिए ही यह गुरुदेव की महिमा नित्य अनुभव की वस्तु बन जाती है। महान् अघोर संत बाबा कीनाराम के साधना अनुभव से इस बात को बहुत ही स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। सिद्धों के, सन्तों के बीच बाबा कीनाराम का नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। बाबा कीनाराम का ज्यादातर समय काशी में बीता। वह अघोर तंत्र के महान् सिद्ध थे।
साधना माना गया है। इसी समूचे सत्ता क्षेत्र को त्रिपदा गायत्री की परिधि कहा गया है।
साधना जिसकी जितनी गहरी होगी, उतना ही वह गुरुसत्ता के उच्चस्तरीय अनुदानों का भागीदार बनेगा। व्यक्तित्व में जब जीवन-साधना फलीभूत होने लगेगी तब हम आराधना प्रधान विभिन्न आँदोलनों को गति दे सकेंगे।
साधना ज्यों-ज्यों प्रगाढ़ होती है, त्यों-त्यों अध्यात्म लोक के द्वार खुलते जाते हैं। ज्ञान और प्रकाश का एक नया लोक उसे मिल जाता है। फिर उसकी रुचि बेवजह की बातों में अपने आप ही समाप्त हो जाती है। इस क्रम में एक बड़ी रहस्यपूर्ण स्थिति भी आती है, जिसे केवल ध्यान साधक ही समझ सकते हैं कि ध्यान की प्रगाढ़ता में वाणी की अपेक्षा अन्तश्चेतना कहीं अधिक सक्रिय एवं प्रभावी होती है।
साधना संस्कार थे। विवेकसार ग्रन्थ में उनकी जीवनकथा विस्तार से वर्णित है। इसमें लिखा है कि जब वह जूनागढ़ के परम सिद्धपीठ गिरनार गए तो उन्हें स्वयं भगवान् दत्तात्रेय ने दर्शन दिए। और उन्होंने कीनाराम को एक कुबड़ी देते हुए कहा- जहाँ यह कुबड़ी तुमसे कोई ले ले, वहीं तुम स्थायी रूप से रहना तथा उन्हीं को अपना अघोर गुरु बनाना। इसी के साथ भगवान् दत्तात्रेय ने उन्हें गुरुगीता में वर्णित उपरोक्त महामंत्रों के रहस्य को समझाते हुए उनको गुरु महिमा के बारे में बताया।
साधना संदेश एवं महर्षि पतंजलि के दिव्य संकेत मिलते हैं।
साधना सुबह छह बजे पहले और शाम को सूर्यास्त होने तक पूरी कर लेते थे। जप का अभ्यास होने के बाद में पाँच घंटे समय ही पर्याप्त होता। साधना में ज्यादा समय लगने के दिनों राष्ट्रीय और सामाजिक मोरचों पर सक्रियता बढ़ी। तिथिक्रम निश्चित नहीं है, लेकिन घटनाएं उस समय की है, जब श्रीराम अठारह-उन्नीस वर्ष के थे। लूली-लंगड़ी गायों को बेच देने और दूध नहीं देने वाली गायों को यों ही सड़क पर छोड़ देने की प्रवृत्ति तब भी थी।
साधना करनी होती है। सत्य की साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।
साधना भस्म हो सकती है। इसलिए शिष्यों के लिए महान् साधकों का यही निर्देश है कि जीवन की तृष्णा एवं सुख की चाहत से सदा दूर रहें। इस सूत्र को अपनाने पर ही शिष्य संजीवनी का अगला सूत्र इसी कथा में अगली बार प्रकट होगा। जिसके द्वारा शिष्यत्व की साधना के नए वातायन खुलेंगे, नए आयाम विकसित होंगे।
साधना कितनी परिपक्व और प्रगाढ़ हो रही है।
साधनात्मक उपाय को विष्णुग्रंथि को खोलना कहते है। यह द्वार खुल जाने पर अनंत आकाश में बिखरी पड़ी बहुमूल्य ज्ञानसंपदा को बटोर लेना भी सहज संभव हो सकता है। सामान्य शिक्षा से जितना जिस क्षेत्र का ज्ञान संपादन किया जाता है, उसकी तुलना में कहीं ऊँचा और कहीं अधिक सुविस्तृत, परिष्कृत ज्ञान जाग्रत मनःसंस्थान से अनायास ही उपलब्ध किया जा सकता है। विष्णुग्रंथि के जागरण से मिलने वाली सफलता के अनुपात से इस प्रकार के अनेकों दिव्यज्ञान साधना प्रयोगों द्वारा सहज ही उपलब्ध होने लगते है। त्रिपदा गायत्री का दूसरा चरण विष्णुग्रंथि खुलने से संबंधित है।
साधना कक्ष में उन्हें युग ऋषि गुरुदेव के साधना संदेश एवं महर्षि पतंजलि के दिव्य संकेत मिलते हैं।
साधना से कोई मेल नहीं है।
साधना रहस्य को भलीप्रकार जान लें। अगले अंक में सद्गुरु चेतना के नए आध्यात्मिक रहस्य प्रकट होंगे।
साधना करने वाले व्यक्ति के मन में इच्छाओं की बाढ़ नहीं आया करती है। उसके अन्तःकरण में निरन्तर जलने वाली ज्योति उसके सामने इस सत्य को प्रकाशित करती रहती है कि यहाँ अथवा किसी अन्य लोक में कुछ भी पाने योग्य नहीं है। इसके अलावा उसे इस महासत्य का हमेशा बोध होता है कि सृष्टि में सब कुछ भगवान् महाकाल की इच्छानुसार हो रहा है, फिर भला दोष किसका? जब दोष ही नहीं तब द्वेष क्यों? ये भावनाएँ उसे हमेशा दौर्मनस्य से बचाए रखती है।
साधना के सिद्ध होने की कसौटियाँ? ये सवाल इन पंक्तियों को पढ़ रहे प्रत्येक साधक के मन में कभी न कभी पनपते रहते हैं। शायद इन क्षणों में भी कहीं मानस उर्मियों में तरंगित हो रहे हैं। इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की चर्चा तो बहुत होती है। पर प्रायः सही समाधान नहीं जुट पाता।
साधना के नए वातायन खुलेंगे, नए आयाम विकसित होंगे।
साधना की प्रचण्ड अविरामता में उन्होंने हिमालय में समाधि लगा ली। उनकी योग साधना का तेज ऐसा बढ़ा की देव शक्तियाँ परेशान हो गयी। देवलोक वासियों ने उन्हें डिगाने के लिए भाँति-भाँति के मायाजाल रचे। एक के बाद एक नए तरीके अपनाए, पर कोई कामयाबी न मिली। अन्तिम अस्त्र के रूप में उन्होंने कामदेव को सम्पूर्ण सेना के साथ भेजा।
साधना द्वारा मानसिक परिष्कार, व्यक्तित्व के विकास, दुःखों के निवारण और आत्मिक विकास के दिव्य लाभों के अतिरिक्त कई सिद्धियाँ, विशेष शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इन शक्तियों को क्रमशः अर्जित करते हुए व्यक्ति अनुपम और अद्वितीय, असाधारण व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है।
साधना में उपयोग की जाने वाली सामग्री कितनी दुर्लभ हुआ करती है। प्रश्न था- कहाँ से और कैसे लायी जाय। तंत्र अनुष्ठान की इस शृंखला में अनेक देवों, योगिनियों को संतुष्ट करना था। एक साथ यह सब कैसे हो?
साधना से जो मनुष्य एक समय राजसी भोजनों और ‘रेशमी’ गद्दे-तकियों से भी संतुष्ट नहीं होता, वह किसी संत के उपदेश से त्याग और संन्यासी व्रत ग्रहण कर लेने पर जंगल की भूमि को ही सबसे उत्तम शय्या, वन के कंद-मूल-फलों को ही सर्वोत्तम आहार समझने लगता हैं। यह सब अंतर मनोभाव और विचारों के बदल जाने से ही उत्पन्न होता है।
साधनाएँ इन महामंत्रों के आश्रय में अति सुगम हो जाती हैं। ऐसा होते हुए भी सभी लोग इस सत्य को समझ नहीं पाते हैं। जिनके पास गुरुभक्ति से मिली दिव्य दृष्टि है, उन्हीं की अन्तश्चेतना में यह तत्त्व उजागर होता है। गुरुदेव भगवान् के प्रति श्रद्धा अति गहन हो तो फिर साधक को इस बात की प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है कि विश्व-ब्रह्मांड में यदि कहीं कुछ भी है तो वह अपने गुरुदेव में है। इन्हीं के आश्रय में सभी तरह की साधनाएँ सिद्धिदायी होती हैं।
साधना, साध्य एवं सिद्धि के सारे मर्म समाए हैं। गुरुदेव सृष्टि में चल रहे उत्पत्ति एवं प्रलय रूप नाटक के नित्य साक्षी हैं। वे ही सम्पूर्ण सृष्टि के चक्रवर्ती स्वामी हैं। ऐसे गुरुदेव भगवान् जिस दिशा में भी विराज रहे हों, उसी दिशा में विद्वान् शिष्य को मन्त्रोच्चार पूर्वक सुगन्धित पुष्पों की अञ्जलि समर्पित करनी चाहिए॥ 51॥
साधना में कई बार स्खलित होना पड़ा। ऐसा केवल इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने ऊपर सजग दृष्टि नहीं रखी। शिष्य का पहला और अनिवार्य कर्त्तव्य है कि वह अपने गुरुदेव के आदर्श को सदा अपने सम्मुख रखे।
साधना की छठी कसौटी है। इस सत्य को हम सभी ने कई बार अनुभव किया होगा कि आवेग-आवेश में श्वास की संख्या बढ़ जाती है। इसी तरह शारीरिक असामान्यता में भी श्वास की गति बढ़ जाती है। ध्यान साधक की न केवल अन्तश्चेतना में स्थिरता और आवेग शून्यता आती है, बल्कि उसके शरीर में धातु साम्यता बनी रहती है। ऐसी स्थिति में स्वभावतः श्वास की गति कम हो जाती है।
साधना सिद्धि के किस सोपान तक पहुँच सकी है। जाँच का यह क्रम एक नियमित अन्तराल में हमेशा बना रहे- इसकी सावधानी हममें से हर एक ध्यान साधक को रखनी चाहिए।
साधना विज्ञान में इन तीन बंधनों के खुलने पर तीन दिव्य शक्तियों के दर्शन एवं अनुग्रह का लाभ मिलने की बात कही गई है।
साधना
साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।
साधना टेप द्वारा संपन्न कराई जाएगी। 6.3 से 7.3 का समय योग-व्यायाम एवं योग प्रधान परामर्श हेतु रखा गया है। 7.3 से 12.3 यज्ञ का समय रहेगा।
साधना के बिना अर्थहीन हैं। शास्त्रों और शब्दों से सत्य के बारे में तो जाना जा सकता है, पर इसे पाया नहीं जा सकता। सत्य की अनुभूति का मार्ग तो केवल साधना है। शब्द से सत्ता नहीं आती है। इसका द्वार तो शून्य है।
साधना करनी पड़ती थी। देवपक्ष के आचार्य वृहस्पति थे। दैत्य पक्ष का प्रशिक्षण शुक्राचार्य करते थे। तप-साधना दोनों को ही करनी पड़ती थी, ऋषि और देवताओं का सात्विक तप होता था, दैत्यों का तामसिक। कुँभकरण, मेघनाद, मारीच, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, भस्मासुर, वृत्रासुर, सहस्रबाहु, महिषासुर आदि अनेक दुर्दांत दैत्यों के वैभव और पराक्रमों का वर्णन पुराणों में मिलता हैं।
साधना का सम्बल है।
साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें गायत्री महामंत्र के जप को प्रथम स्थान दिया गया है।
साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगीजनों का कष्टसाध्य लंबा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।
साधनाओं में फलता प्राप्त करने के लिए भले ही थोड़ा-बहुत अधिक समय व श्रम लगाना पड़े पर अन्य कष्टपूर्ण साधनाओं की अपेक्षा उन साधनाओं में जल्दी ही सफलता मिलती है। योगीजनों का कष्टसाध्य लंबा मार्ग गायत्री द्वारा बहुत सरल हो जाता है और घर में रहते हुए गृहस्थ व्यक्ति भी वनवासी तपस्वियों जैसी सफलता प्राप्त कर लेता है।
साधनाएँ सिद्धिदायी होती हैं।
साधना बाह्य जड़ता को दूर करने तक ही सीमित न हो। हम अपनी आँतरिक जड़ता को मिटाने का प्रयास करें। व्यर्थ के ईर्ष्या, द्वेष, प्रपंच में निमग्न मन की गतिविधियों को ‘स्व’ की ओर उन्मुख करें। क्योंकि जो जड़ पदार्थों से अधिक प्रेम करेगा, उसे उनका स्वामित्व, संग्रह, उपभोग भी उतना ही उच्चतर लगेगा। मोह और अहंकार के पाश में वे उतनी ही दृढ़ता से बंधेंगे।
साधना विज्ञान के तत्वदर्शी वैज्ञानिकों ने तीन ग्रंथियों का विस्तृत विवेचन एवं निरूपण किया है। उन्हें खोलने के साधन एवं विधि-विधान बताए हैं। उनके नाम है ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि, रुद्र ग्रंथि। रुद्र ग्रंथि का स्थान नाभि स्थान माना गया है, इसे अग्निचक्र भी कहते हैं। माता के शरीर से बालक के शरीर में जो रसरक्त प्रवेश करता है।
साधना है।
साधना में ज्यादा समय लगने के दिनों राष्ट्रीय और सामाजिक मोरचों पर सक्रियता बढ़ी। तिथिक्रम निश्चित नहीं है, लेकिन घटनाएं उस समय की है, जब श्रीराम अठारह-उन्नीस वर्ष के थे। लूली-लंगड़ी गायों को बेच देने और दूध नहीं देने वाली गायों को यों ही सड़क पर छोड़ देने की प्रवृत्ति तब भी थी। गाँव में किसी ने दो गायें काई को बेच दी। उनके पाँव खराब थे।
साधना समर’। ‘साधना समर’ को हमने पढ़ा, बड़े गजब की किताब है। मेरे ख्याल से हिंदी में इसका अनुवाद शायद नहीं हुआ है। उन्होंने इसमें दुर्गा का, चंडी का और गीता का मुकाबला किया है। दुर्गा सप्तशती में सात सौ श्लोक हैं और गीता में भी सात सौ श्लोक हैं।
साधना को रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा की साधना माना गया है। इसी समूचे सत्ता क्षेत्र को त्रिपदा गायत्री की परिधि कहा गया है।
साधना की जाती रही है। यहाँ के महर्षियों ने विश्व जीवन की एकात्मता और समरसता को सदा से अनुभव किया है। यहाँ के दिव्यदर्शियों ने विश्वमाता के वैभव के रूप में पूरे विश्व जीवन को देखा और जाना है। विश्वमाता की संतानों के रूप में समूचे विश्व को अपनाया जाना है। विश्व जननी की भक्ति करने वाले भारत देश का यह वैश्वीकरण न तो स्वार्थ प्रेरित है और न ही विनाशकारी, अपितु इसमें तो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के महान भाव भरे है।
साधना दोनों को ही करनी पड़ती थी, ऋषि और देवताओं का सात्विक तप होता था, दैत्यों का तामसिक। कुँभकरण, मेघनाद, मारीच, हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, भस्मासुर, वृत्रासुर, सहस्रबाहु, महिषासुर आदि अनेक दुर्दांत दैत्यों के वैभव और पराक्रमों का वर्णन पुराणों में मिलता हैं। यह सावित्री पक्ष की उपासना का परिणाम है। एकाँकी दुष्टता को निरस्त करने के लिए आक्रमण अस्त्र के रूप में त्रिपदा के सावित्री पक्ष का प्रयोग होता है। इस प्रकार के प्रयोग-उपचार को ब्रह्मास्त्र कहते है।
साधना के समस्त तत्त्व दिखाई दे रहे थे। शिष्यवत्सल बाबा कालूराम की यह अद्भुत कृपा देखकर कीनाराम भक्ति विह्वल हो गए। और ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ कहते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। अपने सद्गुरु के पूजन से ही उन्हें तंत्र की समस्त शक्तियाँ, सारी सिद्धियाँ मिल गयीं। गुरु कृपा ने उन्हें अघोरतंत्र का महासिद्ध बना दिया।
साधनाओं का फल है, जो सिद्ध योगियों को सहज सुलभ रहता है। अन्तर्चेतना प्रभु में विलीन होने के कारण विषयों के प्रति, भोगों के प्रति न गति होती है, न रुचि और न ही रुझान। यह प्रभुलीन भावदशा की सहज अभिव्यक्ति है। प्रभु प्रीति की सहज रीति है यह।
साधना करने का साहस करते हैं, उनके लिए साधना के सत्य के रूप में चेतना का तीसरा रूप प्रकट होता है। यह तीसरा रूप अमूर्छा - पूर्ण चेतना का है। यह पूर्ण चैतन्य है, विचारों से परे है।
साधना वास्तव में समर है। समर मतलब लड़ाई, महाभारत। यह महाभारत हैं, यह लंकाकाँड है। इसमें क्या करना पड़ता है? अपने आप से लड़ाई करनी पड़ती है, अपने आपकी पिटाई करनी पड़ती है, अपने आप की धुलाई करनी पड़ती है और अपने आपकी सफाई करनी पड़ती है।
साधना फलीभूत होने लगेगी तब हम आराधना प्रधान विभिन्न आँदोलनों को गति दे सकेंगे।
साधनात्मक अवलंबन छोड़ा है, वह भटका है। आँदोलन समूह अपने स्तर पर अपना प्रभाव दिखा भी रहे है। सातों जोन्स के माध्यम से उनका सुनियोजन हो सके, यह प्रयास भी केन्द्र द्वारा सतत किया जा रहा है। अभी प्रशिक्षण की आवश्यकता सभी ओर अनुभव की जा रही है, जिसकी पूर्ति नवरात्रि के पूर्व वर्षा ऋतु के विशेष क्षेत्रीय सत्रों द्वारा करने का प्रयास किया जा रहा है।
साधनाओं का सार इनमें है। महाकठिन साधनाएँ इन महामंत्रों के आश्रय में अति सुगम हो जाती हैं। ऐसा होते हुए भी सभी लोग इस सत्य को समझ नहीं पाते हैं। जिनके पास गुरुभक्ति से मिली दिव्य दृष्टि है, उन्हीं की अन्तश्चेतना में यह तत्त्व उजागर होता है। गुरुदेव भगवान् के प्रति श्रद्धा अति गहन हो तो फिर साधक को इस बात की प्रत्यक्ष अनुभूति हो जाती है कि विश्व-ब्रह्मांड में यदि कहीं कुछ भी है तो वह अपने गुरुदेव में है।
साधना का थोड़ा सा भी ज्ञान है- वे जानते हैं कि तंत्र साधना में उपयोग की जाने वाली सामग्री कितनी दुर्लभ हुआ करती है। प्रश्न था- कहाँ से और कैसे लायी जाय। तंत्र अनुष्ठान की इस शृंखला में अनेक देवों, योगिनियों को संतुष्ट करना था। एक साथ यह सब कैसे हो?
साधना से ही साधना का सत्य प्रकट होता है। यह स्थिति ही समाधि है।
साधना का सूर्य तामसिक अंधकार के परदे को हटा देता है और आत्मा का सहज ईश्वरीय रूप प्रकट हो जाता है। आत्मा का यह निर्मल रूप सभी ऋद्धि-सिद्धियों से परिपूर्ण होता है।
साधना भी चल रही थी। महापुरश्चरण के लिए छह घंटे प्रतिदिन लगते थे। श्रीराम यह साधना सुबह छह बजे पहले और शाम को सूर्यास्त होने तक पूरी कर लेते थे। जप का अभ्यास होने के बाद में पाँच घंटे समय ही पर्याप्त होता। साधना में ज्यादा समय लगने के दिनों राष्ट्रीय और सामाजिक मोरचों पर सक्रियता बढ़ी।
साधना के माध्यम से दर्द रूपी इस विकार से मुक्ति का उपाय तलाशना चाहिए। भगवद् देन समझकर दर्द को सहकर ही दर्दमुक्त हुआ जा सकता है। अतः हमें असीम धैर्य और दृढ़ मनोबल से इसका सामना करना चाहिए। यही आत्म चेतना को विकसित करने का उपयुक्त माध्यम है।
साधना तपस्या द्वारा हम स्वयं ही अपने बाह्य एवं अंतर को साफ-सुथरा कर लें। अन्यथा जगन्माता को यह कार्य बलपूर्वक करना पड़ेगा। हम चाहें या न चाहें परिवर्तन तो होना ही है, सृष्टि की संचालिनी शक्ति इस विश्व-वसुन्धरा के कल्याण के लिए कटिबद्ध है। आत्मसुधार कर हम भी उसके उद्देश्य में सहयोगी बनें, यही इस नवरात्रि का संदेश है।
साधनाओं की सिद्धि का मर्म भी कह जाते है। वह मर्म है-ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को पहचानकर संपूर्ण समर्पण। भगवान को तत्व से जानना। अपने भी यज्ञीय कर्मों एवं तप साधनादि कठोर संयम से पाले गए व्रतों का भोक्ता प्रभु को मानना, स्वयं को नहीं। ईश्वर को स्वार्थरहित, पक्षपात रहित एवं दयालु मानकर उसके प्रति पूरे निष्ठाभाव से समर्पण।
साधना का उद्देश्य एक है कि हमारी भीतर वाली मनः स्थिति की सफाई होनी चाहिए, जो हमारी शरीर की विकृतियों और मानसिक विकृतियों के लिए जिम्मेदार है। हमारी मानसिक और शारीरिक विकृतियाँ ही है, जिन्होंने हमारे और भगवान के बीच में एक दीवार खड़ी की हैं। अगर हम इस दीवार को नहीं हटा सकते, तो हमारे पड़ोस में बैठा हुआ भगवान हमें साक्षात्कार नहीं दे सकता। बेटे, भगवान ओर हम में दीवार का फर्क है, जिससे भगवान हमसे कितनी दरी पर है? गुरुजी! भगवान तो लाखों-करोड़ों कि.मी. दूर रहता है?
साधनाओं के रहस्यों का गूढ़ संकेतों में वर्णन है। भगवान् भोलेनाथ की वाणी शिष्यों के समक्ष इस रहस्य को प्रकट करती है, कि गुरुदेव भगवान् में साधना, साध्य एवं सिद्धि के सारे मर्म समाए हैं। गुरुदेव सृष्टि में चल रहे उत्पत्ति एवं प्रलय रूप नाटक के नित्य साक्षी हैं। वे ही सम्पूर्ण सृष्टि के चक्रवर्ती स्वामी हैं। ऐसे गुरुदेव भगवान् जिस दिशा में भी विराज रहे हों, उसी दिशा में विद्वान् शिष्य को मन्त्रोच्चार पूर्वक सुगन्धित पुष्पों की अञ्जलि समर्पित करनी चाहिए॥ 51॥
साधना की सभी अधिष्ठात्री देव शक्तियाँ महासिद्ध कालूराम में विद्यमान थीं। सभी तंत्रपीठ उनमें समाहित थे। सद्गुरु चेतना में तंत्र साधना के समस्त तत्त्व दिखाई दे रहे थे। शिष्यवत्सल बाबा कालूराम की यह अद्भुत कृपा देखकर कीनाराम भक्ति विह्वल हो गए। और ‘गुरुकृपा ही केवलम्’ कहते हुए उनके चरणों में गिर पड़े।
साधना के तीनों रहस्य मयपीठ-कामरूप, पूर्णागिरि एवं जालंधर पीठ स्थित हैं। मन्मथ आदि अष्ट भैरव, सभी महासिद्धों के समूह, तंत्र साधना में सर्वोच्च कहा जाने वाला विरंचि चक्र उन्हीं में है। स्कन्दादि बटुकत्रय, योन्याम्बादि दूतीमण्डल, अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल, सोममण्डल आदि मण्डल, प्रकाश व विमर्श के युगल पद के रहस्य उन्हीं में हैं। दशवीर, चौसठ योगिनियाँ, नवमुद्राएँ, पंचवीर तथा अ से क्ष तक सभी मातृकाएँ एवं मालिनीयंत्र गुरुदेव के चेतनामण्डल में ही स्थित हैं। सभी तत्त्वों से युक्त गुरु मण्डल को मेरा बारम्बार प्रणाम है।
साधनात्मक स्तर पर यदि हमारी अच्छी तैयारी नहीं होगी तो हम उस कार्य को कर पाने में समर्थ नहीं हो पाएंगे, जो हमें गुरुदेव की सत्ता सौंप गई है। प्रस्तुत नवरात्रि की पावन मेला (26 सितंबर-4 अक्टूबर 23) में भी हमें अपने आपको बार-बार यह याद दिलाना चाहिए कि साधना की धुरी पर ही हमारा व्यक्तित्व परखा गया था एवं में एक विराट अभियान का अंग बनाया गया था। गायत्री उपासना एवं जीवन साधना जिसकी जितनी गहरी होगी, उतना ही वह गुरुसत्ता के उच्चस्तरीय अनुदानों का भागीदार बनेगा। व्यक्तित्व में जब जीवन-साधना फलीभूत होने लगेगी तब हम आराधना प्रधान विभिन्न आँदोलनों को गति दे सकेंगे।
साधना की सातवीं और श्रेष्ठतम कसौटी है- संवेदनशीलता यानि कि भाव संवेदना का जागरण।जिसका ध्यान जितना प्रगाढ़ होगा उसमें भाव संवेदना भी उतनी ही सघन होगी। उसकी करुणा भी उतनी ही तीव्र होगी। करुणा जागी है तो जानना चाहिए कि ध्यान सध रहा है। यदि अपनी संवेदनशीलता में पहले की तुलना में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई तो समझना चाहिए कि अभी अपनी ध्यान की प्रगति भी शून्य है।
साधना के बावजूद एक दिन अचानक अपना और अपनी साधना का सत्यानाश करा बैठे। महर्षि वाल्मीकि रामायण के आदिकाण्ड में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की कथा कुछ ऐसी ही है। त्रिशंकु को सदेह स्वर्ग भेजने वाले विश्वामित्र को अपनी साधना में कई बार स्खलित होना पड़ा। ऐसा केवल इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने अपने ऊपर सजग दृष्टि नहीं रखी। शिष्य का पहला और अनिवार्य कर्त्तव्य है कि वह अपने गुरुदेव के आदर्श को सदा अपने सम्मुख रखे।
साधना में सर्वोच्च कहा जाने वाला विरंचि चक्र उन्हीं में है। स्कन्दादि बटुकत्रय, योन्याम्बादि दूतीमण्डल, अग्निमण्डल, सूर्यमण्डल, सोममण्डल आदि मण्डल, प्रकाश व विमर्श के युगल पद के रहस्य उन्हीं में हैं। दशवीर, चौसठ योगिनियाँ, नवमुद्राएँ, पंचवीर तथा अ से क्ष तक सभी मातृकाएँ एवं मालिनीयंत्र गुरुदेव के चेतनामण्डल में ही स्थित हैं। सभी तत्त्वों से युक्त गुरु मण्डल को मेरा बारम्बार प्रणाम है।
साधना-संगठन आँदोलन प्रधान गोष्ठियाँ होगी। भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा और उसके अनुयाज, रचनात्मक आंदोलन की रूपरेखा संबंधी चर्चाएँ भी इसी समय कर ली जाएँगी। सायंकाल प्रज्ञोपनिषद् प्रधान ऋषि संदेश मंच से प्रतिनिधियों द्वारा प्रसारित होगा। यह इस वर्ष की विशिष्टता होगी। परमपूज्य गुरुदेव के विराट वाङ्मय में प्रज्ञोपनिषद का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है।
साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें गायत्री महामंत्र के जप को प्रथम स्थान दिया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-May
साधना की थी। यह आत्मवत् सर्वभूतेषु ही समत्व दृष्टि है। इसके बिना तो सभ्य जीवन संभव नहीं है। सुसंस्कृत देवोपम जीवन जीनार हो तो यही समत्व का दृष्टिकोण जीवन में उतारना होगा, ऐसा परमपूज्य गुरुदेव का भी मत है।
साधना करने लगे। सखीरुप धारण करने के लिए उन्होंने केश रखवाए। वेणी गूँथने लगे। नाक में बेसर, आँखों में अंजन, माथे पर सिंदूर, बिंदी और होठों पर लाली लगाने लगे। साधना की प्रगाढ़ अवस्था में वे पुकारने लगते, कहाँ है ललिता, कहाँ है विशाखा?
साधना के बाद ही भाव बदल गए। उनके अंतः करण से हिंदू का भाव विलुप्त हो गया। उन्होंने मंदिर में जाना बंद कर काली का प्रसाद नहीं खाया। साधना के दिनों में किसी ने कहा कि इस्लाम के अनुसार जो काफिरों का वध करेगा, वही स्वर्ग में सुख से रहेगा। तुम भी क्या काफिरों का वध करोगे?
साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान् मुझसे इतना रूठे क्यों हैं? महायोगी हँसे और कहने लगे-पुत्र! कल मैं एक बगीचे में गया था। वहाँ कुछ दूसरे युवक भी थे। उनमें से एक को प्यास लगी थी।
साधना की पूर्ति हेतु।
साधना−परंपराओं का मर्म जान−समझ लेने के बाद वे अपने स्वभाव में स्थिर हो गए। मुक्त और सिद्ध आत्माओं को वैसे अपना कोई स्वतंत्र स्वभाव नहीं होता। वे परमात्मचेतना से इस तरह ओत−प्रोत हो जाते हैं कि उनकी अपनी स्वतंत्र सत्ता कहीं दिखाई ही नहीं देती। जिस स्थिति और स्तर का साधक आता है, उसी के अनुरूप वे दिखाई देने लगते हैं। दर्पण की तरह, स्फटिक से बने विग्रह की भाँति हो जाते हैं, जो सामने उपस्थित दृश्य या वर्ण को ही अपने स्वरूप में प्रतिबिंबित करने लगता है।
साधना करोगे?”
साधना की प्राकृतिक ताजगी आ सकती है और न ही योग की अलौकिक सुरभि। ये दोनों तत्त्व क्या है? किस तरह करें अभ्यास को? कैसे साधें वैराग्य को? इन प्रश्नों का उत्तर महर्षि ने अपने अगले सूत्रों में दिया है।
साधना करते हुए रामकृष्णदेव के शरीर में स्त्रियोचित परिवर्तन होने लगे थे। उनकी आवाज मधुर और कोमल होने लगी। आवाज सुनकर उन्हें कोई भी पहचान नहीं सकता था। कुछ दिन बाद उनकी चाल भी बदल गई। वक्ष पर स्त्री जैसे उभार दिखाई देने लगे और पाँव किसी तन्वंगी नारी की तरह सँभल−सँभलकर उठते थे।
साधना−परंपराओं का अभ्यास और उनके शिखर तक पहुँचना रामकृष्णदेव का अनूठा प्रयोग था। राम की उपासना शुरू की तो हनुमान की तरह व्यवहार करने लगे। राम−रघुवीर कहते हुए वे वृक्षों पर चढ़ जाते, फल तोड़ते, दाँत से काटते और चखकर फेंक देते। प्राणिमात्र में और कण−कण में राम के दर्शन की अवस्था में पहुँच जाने के बाद साधना को विराम दिया। एक बार सखीभाव से श्रीकृष्ण की आराधना करने लगे।
साधना जीवन की सभी समस्याओं का एक साथ समाधान हो जाता है। प्रायः-प्रायः सभी साधकों की साधनागत समस्यायें एवं परेशानियाँ एक ही बिन्दु के इर्द-गिर्द घूमती रहती है - मन नहीं लगता, मन एक जगह में टिकता नहीं है। धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने विश्वम्भर कृष्ण से भी यही समस्या कही थी- ‘चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमथि बलवद्दृढ़भ’ - हे कृष्ण! यह मन बड़ा की चंचल है, बड़े ही प्रमथन स्वभाव वाला और बहुत ही बलवान है। अर्थात् मन की चंचलता ही इतनी बढ़ी-चढ़ी है कि किसी भी तरह काबू में ही नहीं आती। महारथी अर्जुन के इस सवाल को सुनकर भगवान् कृष्ण ने कहा-
साधना−उपासना का मार्ग भी अपनाया। सब धर्मों और साधना−परंपराओं का मर्म जान−समझ लेने के बाद वे अपने स्वभाव में स्थिर हो गए। मुक्त और सिद्ध आत्माओं को वैसे अपना कोई स्वतंत्र स्वभाव नहीं होता। वे परमात्मचेतना से इस तरह ओत−प्रोत हो जाते हैं कि उनकी अपनी स्वतंत्र सत्ता कहीं दिखाई ही नहीं देती। जिस स्थिति और स्तर का साधक आता है, उसी के अनुरूप वे दिखाई देने लगते हैं।
साधना?”
साधना की प्रगाढ़ अवस्था में वे पुकारने लगते, कहाँ है ललिता, कहाँ है विशाखा? मुझ पर दया करो। मैं अति दीन−हीन हूँ। तुम्हारी दया के बिना मैं राधिका जी का दर्शन नहीं कर सकूँगी और राधिका जी के बिना श्रीकृष्ण तक नहीं पहुँच पाऊंगी।
साधना करो।”
साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष, दुर्गुणों को दूर करो।
साधना की यह स्थिति प्रमाण है कि तन्मय होकर आराधना करने पर व्यक्ति त्व में आमूलचूल परिवर्तन आने लगता है। यहाँ तक कि शरीर भी उसी के अनुसार ढलने और बदलने लगता है। सखीभाव की साधना को विराम देने के महीनों बाद ठाकुर सहज स्थिति में पहुँचे।
साधना दोनों ही झूठे हैं। कागज के फूलों की तरह उसके जीवन में न साधना की प्राकृतिक ताजगी आ सकती है और न ही योग की अलौकिक सुरभि। ये दोनों तत्त्व क्या है? किस तरह करें अभ्यास को? कैसे साधें वैराग्य को?
साधना की विधि सीखी। तीन दिन साधना के बाद ही भाव बदल गए। उनके अंतः करण से हिंदू का भाव विलुप्त हो गया। उन्होंने मंदिर में जाना बंद कर काली का प्रसाद नहीं खाया। साधना के दिनों में किसी ने कहा कि इस्लाम के अनुसार जो काफिरों का वध करेगा, वही स्वर्ग में सुख से रहेगा।
साधना करके भी मैं जो स्थिति प्राप्त नहीं कर सका, एक ही दिन में तुमने उसे उपलब्ध कर लिया। तुम धन्य हो।” तोतापुरी वेदाँती थे। वे मूर्तिपूजा को नहीं मानते थे। अपने शिष्य की सिद्ध अवस्था से चमत्कृत होकर उन्होंने दक्षिणेश्वर मंदिर में स्थित माँ काली की प्रतिमा को प्रणाम किया।
साधना के दिनों में किसी ने कहा कि इस्लाम के अनुसार जो काफिरों का वध करेगा, वही स्वर्ग में सुख से रहेगा। तुम भी क्या काफिरों का वध करोगे? रामकृष्ण परमहंस ने कहा, “काफिर बाहर नहीं रहते, वे हमारे भीतर ही हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि ही हमारे भीतर रहने वाले विजातीय तत्त्व हैं। उनका विनाश करने से ही अल्लाह की मेहरबानी होती है।
साधना का वातावरण था, तपश्चर्या का वातावरण था, जहाँ ज्ञान का वातावरण था, जहाँ भक्ति का वातावरण था। उस सुसंस्कारित वातावरण में रहकर न केवल सीता का दुःख और शोक समाप्त हो गया, वरन् जो पेट में रहने वाले बालक थे, उनका भी न जाने क्या−से−क्या हो गया।
साधना का विज्ञान मिथ्या है? क्या इसकी तकनीकों में कोई त्रुटि है? ऐसे अनेकों प्रश्न कंटक उनके अन्तःकरण में हर पल चुभते रहते हैं। निरन्तर की चुभन से उनकी अन्तरात्मा में घाव हो जाता है। जिससे वेदना रिसती रहती है।
साधना करने वाले साधक अपने आपको श्रीकृष्ण की सहेलियाँ, गोपियाँ मानते हैं और स्त्रियों की तरह ही रहते हैं। रामकृष्ण भी उसी तरह साधना करने लगे। सखीरुप धारण करने के लिए उन्होंने केश रखवाए। वेणी गूँथने लगे। नाक में बेसर, आँखों में अंजन, माथे पर सिंदूर, बिंदी और होठों पर लाली लगाने लगे।
साधना भी सिखाएगा।” स्वामी रामकृष्ण ने महंत तोतापुरी से सारा संवाद ज्यों−का त्यों कह सुनाया। वे हँसे, फिर कहा, “हमसे उपदेश ग्रहण करना है तो संन्यासी बनना पड़ेगा।”
साधना की जाती है, जो भी योग-ऊर्जा अवतरित होती है, वह सबकी सब विभिन्न इच्छाओं और आसक्तियों के छिद्रों से बह जाती है। साधक सदा खाली का खाली बना रहता है। इसी तरह केवल वैराग्य है, अभ्यास में दृढ़ता नहीं है तो केवल आलस्य का अँधेरा ही जिन्दगी में घिरा रहता है। ऊर्जा, शक्ति, चैतन्यता की किरणें कहीं भी दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि महर्षि दोनों की समन्वित आवश्यकता बताते हैं।
साधना के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्वरूप से मार्ग भले ही अलग हों, तात्त्विक दृष्टि से किसी में कोई अंतर नहीं है। खालास पंथ की दीक्षा लेकर उसका मर्म समझा। एक दिन विचार आया कि हिंदू−मूसलमान में क्या भेद है, यह भी मालूम किया जाए। अपनी इष्ट−आराध्य भवानी से अनुमति माँगी, माँ ने अनुमति दे दी। टमटमा गाँव में एक सूफी साधक रहता था, उससे दीक्षा ली और साधना की विधि सीखी।
साधना
साधनात्मक अभ्यास और वैराग्य होगा ही। इन दोनों के अभाव में साधक और उसकी साधना दोनों ही झूठे हैं। कागज के फूलों की तरह उसके जीवन में न साधना की प्राकृतिक ताजगी आ सकती है और न ही योग की अलौकिक सुरभि। ये दोनों तत्त्व क्या है? किस तरह करें अभ्यास को?
साधना धाराओं को ही परख रहे थे। पूजा की कोठरी में बैठे श्रीराम को ये दृश्य जीवंत घटनाओं की तरह दिखाई देते हैं। दक्षिणेश्वर मंदिर में भिन्न−
साधना को पूर्ण करके सारे देश में अलख जगा रहे थे।
साधना शुरू की। उस क्षेत्र में ‘सोऽहम्’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ रूप की सिद्धि तक पहुँचे। ताँत्रिक, बंगला, बाउल, वैष्णव और शाक्त आदि संप्रदायों का मार्ग भी अपनाया। विभिन्न संप्रदयों, पंथों की साधना के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि स्वरूप से मार्ग भले ही अलग हों, तात्त्विक दृष्टि से किसी में कोई अंतर नहीं है। खालास पंथ की दीक्षा लेकर उसका मर्म समझा।
साधना -फिर सिद्धि। यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते।
साधना करने के लिए परोपकाररत रहना ही सर्वश्रेष्ठ है, चाहे व्यक्ति किसी भी आश्रम में हो।”
साधना को विराम देने के महीनों बाद ठाकुर सहज स्थिति में पहुँचे।
साधना को विराम दिया। एक बार सखीभाव से श्रीकृष्ण की आराधना करने लगे। इस भाव से साधना करने वाले साधक अपने आपको श्रीकृष्ण की सहेलियाँ, गोपियाँ मानते हैं और स्त्रियों की तरह ही रहते हैं। रामकृष्ण भी उसी तरह साधना करने लगे। सखीरुप धारण करने के लिए उन्होंने केश रखवाए।
साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए।
साधना की गयी पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया, पर तृप्ति नहीं मिली। अनेकों साधकों की विकलता यही है। लगातार सालों-साल साधना करने के बाद वे सोचने लगते हैं, क्या साधना का विज्ञान मिथ्या है? क्या इसकी तकनीकों में कोई त्रुटि है?
साधना पूरी होती रह सकती है। त्याग करना ही है तो अंतः के विकारों एवं भ्रम−जंजालों को कर।” व्यक्ति ने वास्तविकता समझी एवं लौट पड़ा अपने घर को, अपनी व्यावहारिक साधना की पूर्ति हेतु।
साधनागत समस्यायें एवं परेशानियाँ एक ही बिन्दु के इर्द-गिर्द घूमती रहती है - मन नहीं लगता, मन एक जगह में टिकता नहीं है। धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने विश्वम्भर कृष्ण से भी यही समस्या कही थी- ‘चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमथि बलवद्दृढ़भ’ - हे कृष्ण! यह मन बड़ा की चंचल है, बड़े ही प्रमथन स्वभाव वाला और बहुत ही बलवान है। अर्थात् मन की चंचलता ही इतनी बढ़ी-चढ़ी है कि किसी भी तरह काबू में ही नहीं आती। महारथी अर्जुन के इस सवाल को सुनकर भगवान् कृष्ण ने कहा-
साधना करने के बाद वे सोचने लगते हैं, क्या साधना का विज्ञान मिथ्या है? क्या इसकी तकनीकों में कोई त्रुटि है? ऐसे अनेकों प्रश्न कंटक उनके अन्तःकरण में हर पल चुभते रहते हैं। निरन्तर की चुभन से उनकी अन्तरात्मा में घाव हो जाता है। जिससे वेदना रिसती रहती है।
साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-March
साधना का यही सार है।
साधना के कठोर प्रतिमानों से होकर गुजरता है। कई बार ये अभ्यास चित्र-विचित्र रूप तक ले लेते हैं। यूनान के प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता डायोजिनीज का जीवन एक ऐसा ही उदाहरण है। वह अपना जीवन एक नाद में ही बिता लेता था, वह रहने के लिए घर बाँधना आवश्यक नहीं समझता था। एक बार किसी युवक ने उसे काफी देर तक एक पत्थर की मूर्ति से भीख माँगते देखा।
साधना के लिए प्रातः का समय श्रेष्ठ माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर साधना करनी चाहिए। साधना नियत स्थान व समय पर नियमित रूप से होनी चाहिए। दिशा को विचार भी अभीष्ट है। सामान्यतः प्रातः पूर्व की ओर तथा सायंकाल पश्चिम ओर मुँह करके साधना में बैठना चाहिए।
साधना तो हर श्वास में जी जानी चाहिए। साधना का अर्थ है−अपने आप पर अपना स्वयं का नियंत्रण, अपने आपे को खुद साधना, क्षरित हो रही वृत्तियों पर कठोरता से अंकुश लगाना। इसी को संयम कहा गया है एवं संयम−साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है। समय, अर्थ, इंद्रिय एवं विचारों का−चार संयम किए जाते हैं, तब जीवन देवता प्रसन्न होते हैं एवं कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करते हैं। अपने पर कड़ी दृष्टि, स्वयं को जिम्मेदार नागरिक मानकर हर त्रुटि की (अपनी स्वयं की) समीक्षा, अवलोकन, सुधार एवं नई आदतों का, अच्छी आदतों का निर्माण−यह हम सबका, जिन्हें युग−नेतृत्व सँभालना है, अब अनिवार्य दायित्व है।
साधना निष्फल नहीं जाती।
साधना की सम्भावना है। साहस से स्वतंत्रता आती है और स्वतंत्रता से सत्य का साक्षात्कार होता है।
साधना की धुरी पर इस विश्वविद्यालय ने लिए हैं।
साधना का अभ्यास करें।
साधना ग्रन्थ योगतारावली में इसकी समूची साधना विधि को बड़े ही संक्षेप में वर्णित करते हैं-
साधना की सिद्धि के लिए शरीर की शुद्धि अभीष्ट है। यह प्रयोजन स्नान द्वारा पूरा होता है। अधिक सर्दी, रोग या किसी विवशता वश हाथ मुँह धोकर या गीले कपड़े से बदन पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। शरीर पर कम से कम वस्त्र रहने चाहिए। ठण्ड में कम्बल का प्रयोग किया जा सकता है।
साधना है’ - इस वाक्य का भाव यह है कि साधना का परम दुर्गम पथ पार करना सद्गुरु की कृपा शक्ति के बिना सम्भव नहीं है। सद्गुरु की कृपा शक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सद्गुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है और तब उसे इस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है क्योंकि सद्गुरु और ईष्ट दो नहीं बल्कि एक हैं। अपने गुरु ही गोविन्द है।
साधना को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। योग दर्शन महर्षि पतञ्जलि ने लिखा है कि ‘जल, औषधि, मंत्र जप और समाधि से सिद्धि प्राप्त होती है’ अर्थात् मंत्र जप को सिद्धि के साधन के रूप में स्वीकारा गया है। इसी तरह मंत्र शास्त्रियों ने बारम्बार कहा है कि ‘जपात् सिद्धि, जपात् सिद्धि, जपात् सिद्धि न संशया।’ अर्थात् मंत्र जप से प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता और सिद्धि प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं होना चाहिए तथा अनेकों भौतिक एवं आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त होती हैं। ‘आनि पुराण’ में मंत्र जप की आत्यंतिक व्याख्या सुन्दर रीति से करते हुए कहा गया है-
साधना के अनुरूप क्रमशः मन ब्रह्म भाव को प्राप्त होता है, अद्वैत स्थिति की ओर अग्रसर होता है, व स्वतः अपनी निम्न इच्छा, वासनाओं एवं कामनाओं से मुक्त होने लगता है और उसी अनुपात में स्थायी सुख-शान्ति और आनन्द को प्राप्त होने लगता है।
साधना ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है।
साधनामय जीवन की सर्वोच्च कक्षा की व्याख्या प्रस्तुत करनी हो तो उसका सार यही होगा; साधक का सद्गुरु में समर्पण-विसर्जन-विलय। अनन्य चिंतन की निरन्तरता साधक के सद्गुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। और तब आती है। विलीनता की अवस्था, इस भावदशा में शिष्य साधक का काय-कलेवर तो यथावत् बना रहता है, पर उसमें उसकी चेतना अनुपस्थित होती है।
साधना करनी चाहिए। साधना नियत स्थान व समय पर नियमित रूप से होनी चाहिए। दिशा को विचार भी अभीष्ट है। सामान्यतः प्रातः पूर्व की ओर तथा सायंकाल पश्चिम ओर मुँह करके साधना में बैठना चाहिए। सात्त्विकता की दृष्टि से माला तुलसी की ही श्रेष्ठ है।
साधना मन की इसी प्रशान्त स्थिति को प्राप्त करने का अभ्यास है। गीताकार ने यह स्पष्ट किया है कि मन का निग्रह बहुत कठिन है, क्योंकि इसका वेग वायु के समान है, किन्तु नियंत्रण सम्भव है और इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अभ्यास और वैराग्य का उपदेश देते हैं।यह भी वस्तुतः साँसारिक आसक्ति, आशा एवं तृष्णा को शून्य की ओर ले चलने का ही प्रतिपादन है।
साधना में सहायक सिद्ध होगा। इसके अभाव में अभक्ष्य आहार, बहुभक्षण भूख से अधिक भोजन आदि के रूप में असंयम मन को चंचल एवं भारी बनाएगा, जो कि मंत्र साधना में एक बड़ा अवरोध है। विहार के संदर्भ में वाणी का संयम प्रमुख है। इसका मोटा सूत्र है-वाणी मित, मधुर व कल्याणकारी ही रहे। परचर्चा और परनिंदा से सर्वथा दूर ही रहें।
साधना उनने जन−जन के लिए इसी अज्ञान के आवरण से मुक्त होने के लिए प्रतिबंधों से मुक्त कराई। स्वयं कठोर तप कर उस स्वरूप में पहुँच गए, जहाँ उत्कीलन−शाप विमोचन स्वयं गुरुसत्तारूपी अवतारी चेतना करती है। गायत्री त्रिपदा है। अज्ञान, अभाव, अशक्ति, इन तीनों को मिटाने की सामर्थ्य रखती हैं। चेतनातत्त्व की इकाई यही परमतत्त्व है।
साधना है और अन्त में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं। यह कथन पहली बार में कबीर वचनों की उलटबाँसी जैसा भले ही लगे, पर थोड़ा सा ही चिंतन करने पर सब कुछ ठीक-ठीक समझ में आ जाता है। इस तत्त्व का सत्य बोध कुछ यूँ है-सद्गुरु ही साधक है, इस वाक्य का अर्थ यह है कि सामान्य देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा छाँव में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है। इस तरह अपने शिष्य के काय-कलेवर में दरअसल सद्गुरु ही साधक के रूप में अवतार लेते हैं।
साधना करने भेजा था था! चल, उठ, समाज में व्याप्त अनीति−अंधविश्वास मिटा। धर्म की चादर को मैला करने वाले पाखंडियों का खंडन कर। लगा, स्वयं गुरुदेव अंदर से कह रहे हों। वे उठ खड़े हुए और उन्होंने धर्मांधों के बीच आकर अपना अड्डा जमाया, ज्ञान−विस्तार कर जनमानस में व्याप्त भ्रांतियों का खंडन किया और यही उनकी जीवनसाधना बन गई।
साधना बनाने के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ाते हैं। वे जड़ता पूर्ण तमस और वासनाओं के रजस् को शुद्ध सत्व में रूपांतरित करते हैं। और निद्रा को आलस्य और विलास की शक्ति के रूप में नहीं जगन्माता भगवती आदि शक्ति के रूप में अपना प्रणाम निवेदित करते हुए कहते हैं-
साधना बन गई।
साधना का निखार एवं दूसरा विद्याविस्तार। जीवनसाधना हर पल की होती है। उपासना−अजान−प्रेयर−अरदास थोड़ी देर की, कुछ पल से कुछ घंटों की हो सकती है, पर साधना तो हर श्वास में जी जानी चाहिए। साधना का अर्थ है−अपने आप पर अपना स्वयं का नियंत्रण, अपने आपे को खुद साधना, क्षरित हो रही वृत्तियों पर कठोरता से अंकुश लगाना। इसी को संयम कहा गया है एवं संयम−साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है।
साधनात्मक प्रक्रियाएं ठोस मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं, जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है।
साधना से संतुष्ट हो, तुम्हीं इन्हें प्रदान करते हो। अतएव यह जानने की इच्छा होती है कि किस कर्म, किस व्रत या किस प्रकार की तपस्या से तुम प्रसन्न होते हो?
साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है। समय, अर्थ, इंद्रिय एवं विचारों का−चार संयम किए जाते हैं, तब जीवन देवता प्रसन्न होते हैं एवं कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करते हैं। अपने पर कड़ी दृष्टि, स्वयं को जिम्मेदार नागरिक मानकर हर त्रुटि की (अपनी स्वयं की) समीक्षा, अवलोकन, सुधार एवं नई आदतों का, अच्छी आदतों का निर्माण−यह हम सबका, जिन्हें युग−नेतृत्व सँभालना है, अब अनिवार्य दायित्व है। जितना यह निखरेगी, उतना ही आत्मसंतोष एवं लोक−सम्मान मिलेगा। दैवी अनुग्रह तो बरसेगा ही।
साधना के अभ्यास द्वारा ही जो व्यक्ति मन को दुःखों को सहने के लिए पहले से ही तैयार कर लेता है, वह दुःखों के आने पर विचलित नहीं होता। जीवन में परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव सदा होते ही रहते हैं, जो इन परिवर्तनों के लिए मन को पहले ही साधना द्वारा अभ्यस्त कर लेता है, वह इन परिवर्तनों के आने पर डरता नहीं, ना ही किसी प्रकार के उद्वेग को प्राप्त होता है। ऐसा ही साधक एकरस आनन्द और शान्ति को प्राप्त कर पाता है। ऐसा ही व्यक्ति अध्यात्म तत्त्व का वास्तविक चिंतन कर सकता है। सत्यान्वेषण के लिए मन का अनुद्विग्न होना आवश्यक है; बिना मन को वश में किये सत्य का चिंतन सम्भव नहीं।
साधना के विषय में प्रथम तथ्य है आचरण की शुद्धता। इसके अपने वैज्ञानिक कारण हैं। मंत्र शब्द शक्ति का सूक्ष्म विज्ञान है। किसी भी मंत्र की रचना शब्द विज्ञान के गम्भीर तथ्यों पर आधारित है। इनका सही उच्चारण हमारे शरीर में अवस्थित सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों, चक्रों, उपत्यिकाओं को उनकी सुषुप्तावस्था से जागृत करता है और अभीष्ट शक्ति के प्रवाह को संचालित करता है।
साधना के संदर्भ में दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य है-मंत्र की शक्ति, प्रभाव एवं प्रमाणिकता पर अटूट विश्वास। विश्वास को साधना का प्राण कहा गया है। इसके अभाव में साधना आधे-अधूरे मन से ही होती है और ऐसे में अभीष्ट सफलता संदिग्ध ही रह जाती है। वस्तुतः विश्वास स्वयं में ही एक बहुत बड़ी शक्ति है, विश्वास से उद्भूत ऊर्जा तमाम अवरोधों के बीच भी साधक को प्रगति पथ पर बढ़ाती रहती है। मानसकार ने तो ‘श्रद्धा विश्वास’ की महिमा ‘भवानी-शंकर’ से उपमा करते हुए प्रतिपादित की है।
साधना सफल होती है। साधनामय जीवन की सर्वोच्च कक्षा की व्याख्या प्रस्तुत करनी हो तो उसका सार यही होगा; साधक का सद्गुरु में समर्पण-विसर्जन-विलय। अनन्य चिंतन की निरन्तरता साधक के सद्गुरु में समर्पण को सुगम बनाती है। समर्पण की परमावस्था में साधक का समूचा अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। और तब आती है।
साधना का परम दुर्गम पथ पार करना सद्गुरु की कृपा शक्ति के बिना सम्भव नहीं है। सद्गुरु की कृपा शक्ति ही साधक में साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सद्गुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है और तब उसे इस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है क्योंकि सद्गुरु और ईष्ट दो नहीं बल्कि एक हैं। अपने गुरु ही गोविन्द है।
साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सद्गुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है और तब उसे इस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है क्योंकि सद्गुरु और ईष्ट दो नहीं बल्कि एक हैं। अपने गुरु ही गोविन्द है। वही सदाशिव और परमशक्ति हैं। ये सभी साधना के सत्य निरन्तर और लगातार सद्गुरु के अनन्य चिंतन से प्राप्त होते हैं।
साधना से उत्पन्न हो रही शक्ति को बूँद-बूँद करके अपने शक्ति घर में इकट्ठा करना पड़ता है। मंत्र सिद्धि में सहायक संयम साधना का यही सार है।
साधना से हमीं ने जिन्दगी को ऐसा गढ़ा था कि देवता भी हमारे घर-आँगन में आकर हम सबसे होली खेलते थे। देवत्व हमारी निजी जिन्दगी की परिभाषा थी। स्वर्ग हमारी सामाजिक जिन्दगी का सच था। ऐसा नहीं था कि इस क्रम में व्यतिक्रम के अवसर नहीं आए। असुरता ने अपनी हुँकार भरी, हिरण्यकश्यपु और होलिका के सहोदर षड़यंत्रों ने हमारे देवत्व और स्वर्ग को मटियामेट करने का कुचक्र रचा।
साधना में जुट जाना चाहिए।
साधना (ज्ञान) का मार्ग हो, गुरु के प्रति भक्ति व समर्पण हो, दिव्यकर्मी रूप में कर्मयोग का मार्ग हो, सभी उसके लिए खुले पड़े हैं। त्रिगुणातीत होते ही अज्ञान मिट जाता है, ज्ञान बादल हटने पर जाज्वल्यमान सूर्य की तरह प्रकाशित हो उठता है व जीव कह उठता है, सोऽहम्। मैं भी वहीं हूँ, जो यह परमात्मा है।
साधना में लगाकर आत्मज्ञान प्राप्त किया व जीवनमुक्त हो गया।
साधना नियत स्थान व समय पर नियमित रूप से होनी चाहिए। दिशा को विचार भी अभीष्ट है। सामान्यतः प्रातः पूर्व की ओर तथा सायंकाल पश्चिम ओर मुँह करके साधना में बैठना चाहिए। सात्त्विकता की दृष्टि से माला तुलसी की ही श्रेष्ठ है। मंत्र जप इस तरह हो कि कण्ठ से ध्वनि तो होती रहे और होंठ भी हिलता रहे किन्तु पास बैठा दूसरा व्यक्ति सुन न सके।
साधना सत्यों का साक्षात्कार होता है। वे जानते हैं कि सद्गुरु ही साधक हैं, वही साधना है और अन्त में वही साध्य के रूप में प्राप्त होते हैं। यह कथन पहली बार में कबीर वचनों की उलटबाँसी जैसा भले ही लगे, पर थोड़ा सा ही चिंतन करने पर सब कुछ ठीक-ठीक समझ में आ जाता है। इस तत्त्व का सत्य बोध कुछ यूँ है-सद्गुरु ही साधक है, इस वाक्य का अर्थ यह है कि सामान्य देहधारी मनुष्य जब सद्गुरु की कृपा छाँव में आता है, तब वह शिष्य बनता है। उस शिष्य में गुरु जब अपने एक अंश को प्रतिष्ठित करते हैं, तब साधक के रूप में उसका नवसृजन होता है।
साधनाएँ होती हैं, उससे कहीं अधिक गहरी और प्रभावोत्पादक साधनाएँ रात्रि की नींद में हो सकती है। वैदिक संहिताओं में, अनेकों प्रकरण ऐसे हैं, जिनसे गुरुदेव के वचनों का महत्त्व प्रकट होता है।
साधना के अंतर्गत मन को उपरोक्त सूत्र के अनुरूप कठोर अभ्यास द्वारा उपयुक्त साँचे में ढाला जाता है। यही साधना का मर्म है। इसी आधार पर गीता मानव को यह शाश्वत संदेश देती है कि जो व्यक्ति (साधक) मन को साधना द्वारा शान्ति, अशान्ति, मान-अपमान, सुख-दुःख में निर्लिप्त बना लेता है वही निर्विघ्न शान्ति का अधिकारी है। जो व्यक्ति काम-क्रोध के वेगों को सह सकता है, वही वास्तविक सुखी है।
साधना का लाभ न उठा सकेंगे। और यह दुर्लभ सुयोग व्यर्थ चला जायेगा। भगवान् महाकाल के वरदान हम पा न सकेंगे।
साधना (ज्ञानयोग) एवं आराधना (कर्मयोग) द्वारा हमारी गुरुसत्ता ने जन−जन को अपनी ऋतंभरा−प्रज्ञा विकसित करने को प्रेरित किया। सभी की जीवनसाधना निखरी, दृष्टिकोण बदले, मुग्धता की स्थिति से निकलकर वे जंतु से दिव्यकर्मी बने एवं सद्बुद्धि का आश्रय ले वे आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे। अपने आप का ज्ञान उन्हें स्वाध्याय से होने लगा। श्रेष्ठ विचारों में स्नान उनके स्वभाव को उच्चस्तरीय भाव में प्रतिष्ठित करता चला गया। जीवनोद्देश्य की जानकारी उस ध्यान से हुई, जिसमें उनने जाना कि वे कौन हैं−एक सामान्य जीव नहीं−विशिष्ट प्रयोजन के लिए जन्मे प्रज्ञा परिजन, जिन्हें उलटे को उलटकर सीधा करना हैं, विचार−क्राँति करनी है।
साधना ही स्थिर सुख एवं शान्ति का द्वार खोलता है। प्रख्यात मनोविद विलियम जेम्स ने इस तथ्य को गणितीय सूत्र के द्वारा स्पष्ट किया है- संतोष या आनन्द, आशा या तृष्णा। इस तरह यदि हमारी आशा या तृष्णा बढ़ी-चढ़ी है तो कितनी भी उपलब्धि या लाभ के बावजूद आनन्द की मात्रा न्यून ही रहेगी और यदि आशा न्यून है तो हल्की-फुल्की उपलब्धियाँ भी बड़े संतोष का कारण बनेंगी और यदि आशा शून्य है तो आनन्द अनन्त गुना हो जायेगा। अर्थात् जिसे ब्रह्मानंद कहा गया है उसकी प्राप्ति इस सूत्रानुसार तृष्णा का आशा के शून्य होते ही सिद्ध होती है।
साधना कर। राजा आश्वस्त हुआ और शेष जीवन उसने आत्मकल्याण की साधना में लगाकर आत्मज्ञान प्राप्त किया व जीवनमुक्त हो गया।
साधना का परम दुर्लभ योग है। जिसमें उपवास और उपासना करने वाले पर देवाधिदेव महाकाल की कृपा बरसती है। भगवान् भूतभावन उस पर प्रसन्न होते हैं। सदाशिव-महामृत्युञ्जय उसका कल्याण करते हैं। इस महापर्व के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि एक बार कैलास शिखर पर माता पार्वती ने भोलेनाथ से पूछा-
साधना जीवन के स्थायी सुख एवं आनन्द को प्राप्त करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत मन की इच्छा-कामनाओं का निग्रह करते हुए कठोर व्रत एवं अनुष्ठान का दीर्घकाल तक अभ्यास किया जाता है। जीवन में सुख और आनन्द को पाने की ये साधनात्मक प्रक्रियाएं ठोस मनोवैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं, जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है।
साधना नियमित रूप से निश्चित मात्रा में होनी चाहिए। यदि किसी कारणवश विघ्न-बाधा आ जाय तो अगले दिन एक माला प्रायश्चित स्वरूप जपनी चाहिए। जन्म या मृत्यु के सूतक होने पर विधि-विधान पूर्वक साधना करना मना है। ऐसे में मानसिक जप द्वारा काम चलाया जाना चाहिए। यात्रा या रोग की स्थिति में भी जब विधि विधान से जप करना सम्भव न हो तो चलते-फिरते या बिस्तर पर मानसिक जप किया जा सकता है।
साधना के अंतर्गत अभ्यास का अपना गहरा मनोवैज्ञानिक आधार है, जिसे जीवन के सामान्य क्रम में ही देखा एवं समझा जा सकता है। शेर वर्षों तक पिंजड़े में ही रहता है, वह पिंजड़े का दरवाजा खुलने पर भी पिंजड़े से बाहर नहीं भागता। यदि उसे बाहर निकाल भी दिया जाय तो वह पुनः पिंजड़े में ही घुसता है। जिन कैदियों की सारी उमर कैद में ही बीतती है, वे कैद से मुक्त होने पर कैद में जाने के लिए तरसते हैं। इस तरह मन अभ्यास का अनुवर्ती है।
साधना का एक अंग था, चाहे वे मथुरा हों या बाहर। पहले के पत्र में हम पढ़ चुके हैं कि दस हजार पत्रिकाएँ उस समय छपती थीं। अब छपती हैं साढ़े छह लाख, लगभग पैंसठ गुना अधिक। इतनी ही विभिन्न भाषाओं में भी छपती हैं। यही वह धरोहर है, जिसने मिशन को इतनी ऊँचाइयाँ दी हैं।
साधना को निखारता है स्वाध्याय। स्व का पर्यवेक्षण−अध्ययन एवं श्रेष्ठ विचारों में सतत् स्नान। व्यक्तित्व अच्छे विचारों से स्नात रहेगा तो विचार स्वतः ही विधेयात्मक−सुगढ़ होते चले जाएँगे। स्वाध्याय का एक अच्छा तरीका है विद्याविस्तार योजना का स्वयं को एक अंग बना लेना। जो भी पुस्तक या पत्रिका या ऑडियो बुक या कैसेट औरों को देना, पढ़ाना, सुनाना है, उसे पहले स्वयं पढ़ना, अच्छी तरह से उसे गुनना।
साधना आधे-अधूरे मन से ही होती है और ऐसे में अभीष्ट सफलता संदिग्ध ही रह जाती है। वस्तुतः विश्वास स्वयं में ही एक बहुत बड़ी शक्ति है, विश्वास से उद्भूत ऊर्जा तमाम अवरोधों के बीच भी साधक को प्रगति पथ पर बढ़ाती रहती है। मानसकार ने तो ‘श्रद्धा विश्वास’ की महिमा ‘भवानी-शंकर’ से उपमा करते हुए प्रतिपादित की है। वस्तुतः बिना श्रद्धा भाव के मंत्र साधना में वह निष्ठ ही नहीं बन पड़ती जो साधना से सिद्धि तक की दूरी को अध्यवसाय पूर्वक पूर्ण कर सके।
साधना की शक्ति बनती है। उसी के सहारे वह अपने साधनामय जीवन की डगर पर आगे बढ़ता है। सद्गुरु की कृपा से ही उसे साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है और तब उसे इस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है क्योंकि सद्गुरु और ईष्ट दो नहीं बल्कि एक हैं। अपने गुरु ही गोविन्द है। वही सदाशिव और परमशक्ति हैं।
साधना की विभूतियाँ एवं उपलब्धियाँ मिलती हैं और अन्त में साध्य से उसका साक्षात्कार होता है और तब उसे इस सत्य का बोध होता है कि सद्गुरु ही साध्य है क्योंकि सद्गुरु और ईष्ट दो नहीं बल्कि एक हैं। अपने गुरु ही गोविन्द है। वही सदाशिव और परमशक्ति हैं। ये सभी साधना के सत्य निरन्तर और लगातार सद्गुरु के अनन्य चिंतन से प्राप्त होते हैं।
साधना हर पल की होती है। उपासना−अजान−प्रेयर−अरदास थोड़ी देर की, कुछ पल से कुछ घंटों की हो सकती है, पर साधना तो हर श्वास में जी जानी चाहिए। साधना का अर्थ है−अपने आप पर अपना स्वयं का नियंत्रण, अपने आपे को खुद साधना, क्षरित हो रही वृत्तियों पर कठोरता से अंकुश लगाना। इसी को संयम कहा गया है एवं संयम−साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है। समय, अर्थ, इंद्रिय एवं विचारों का−चार संयम किए जाते हैं, तब जीवन देवता प्रसन्न होते हैं एवं कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करते हैं।
साधना नहीं करनी चाहिए। आसन ऐसा हो जिस पर लम्बे समय तक बिना कष्ट के बैठ सकें। पाल्थी मारकर सीधे बैठना सबसे सरल है। मेरुदण्ड सदा सीधा रहना चाहिए, जिससे कि सुषुम्ना का प्राण-प्रवाह बिना अवरोध के चलता रहे।
साधना जीवन का परम सत्य निहित है। इनमें वह परम रहस्य संजोया है, जिसके आचरण का स्पर्श पारसमणि की भाँति है। जो छूने भर से साधक के अनगढ़ जीवन और कुसंस्कारों को आमूल-चूल बदल देता है। गुरु कृपा से मानवीय कमियाँ-कमजोरियाँ ईश्वरीय विभूतियों व उपलब्धियों में बदल जाती है। गुरु निष्ठ से क्या नहीं हो सकता?
साधना−संगठन−सशक्तीकरण वर्ष के उत्तरार्द्ध में यदि झोला पुस्तकालय, ज्ञानरथ, वीडियो रथ पुनः गति पकड़ लें तो आनंद ही आ जाए। पतन−निवारण की सर्वश्रेष्ठ सेवा इससे होगी।
साधना का एकमेव मार्ग है। जीवन भर जीव को इसी पुरुषार्थ में लगे रहना होता है। जो अज्ञानरूपी आवरण से जल्दी मुक्त हो मोह से मुक्त हो जाता है, वह मोक्ष में प्रतिष्ठित हो आनंदमय जीवन जीता है। कुँठाओं रहित जीवन, संत्रास−तनाव−विक्षुब्धता रहित जीवन जीने का एक ही मार्ग है कि अज्ञानरूपी आवरण जो ज्ञान पर ढका है, जिसमें मुग्ध हो जीव गलत कामों में लगा है, किसी तरह हटे। चाहे वह साधना (ज्ञान) का मार्ग हो, गुरु के प्रति भक्ति व समर्पण हो, दिव्यकर्मी रूप में कर्मयोग का मार्ग हो, सभी उसके लिए खुले पड़े हैं।
साधना में एक बड़ा अवरोध है। विहार के संदर्भ में वाणी का संयम प्रमुख है। इसका मोटा सूत्र है-वाणी मित, मधुर व कल्याणकारी ही रहे। परचर्चा और परनिंदा से सर्वथा दूर ही रहें। आचरण के संदर्भ में विपरीत लिंग के प्रति पवित्र एवं शुद्ध भावों को रखना, नितान्त अनिवार्य है।
साधना न बन सके न समाधान सिद्ध हो सके। उन्हें बड़ी दया आयी। झपकियों में झूमते सम्राट को उन्होंने पुकारा, महाराज? क्या ऐसे ही जीवन गँवा देना है। जागना नहीं है?
साधना बनाने वाले साधकों के लिए नित्य मननीय है। इनमें से छठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं-‘यावयावृक्यं वृकं यवय स्तेनभूर्म्ये। अथा नः सुतरा भव’॥ 6॥ ‘हे रात्रिमयी चित्शक्ति! तुम कृपा करके वासनामयी वृकी तथा पापमय वृक को अलग करो। काम आदि तस्कर समुदाय को भी दूर हटाओ। तदन्तर हमारे लिए सुख पूर्वक तरने योग्य बन जाओ।
साधना द्वारा शान्ति, अशान्ति, मान-अपमान, सुख-दुःख में निर्लिप्त बना लेता है वही निर्विघ्न शान्ति का अधिकारी है। जो व्यक्ति काम-क्रोध के वेगों को सह सकता है, वही वास्तविक सुखी है।
साधना के प्रति मोह ने रोका, और भी ऊँचे आयाम पार कर मुक्त हो जाओ। ऐसे में अंदर से धमकी भरा आदेश आया, मैंने इसीलिए तुझे साधना करने भेजा था था! चल, उठ, समाज में व्याप्त अनीति−अंधविश्वास मिटा। धर्म की चादर को मैला करने वाले पाखंडियों का खंडन कर। लगा, स्वयं गुरुदेव अंदर से कह रहे हों। वे उठ खड़े हुए और उन्होंने धर्मांधों के बीच आकर अपना अड्डा जमाया, ज्ञान−विस्तार कर जनमानस में व्याप्त भ्रांतियों का खंडन किया और यही उनकी जीवनसाधना बन गई।
साधना में थे।)
साधना का मर्म है। इसी आधार पर गीता मानव को यह शाश्वत संदेश देती है कि जो व्यक्ति (साधक) मन को साधना द्वारा शान्ति, अशान्ति, मान-अपमान, सुख-दुःख में निर्लिप्त बना लेता है वही निर्विघ्न शान्ति का अधिकारी है। जो व्यक्ति काम-क्रोध के वेगों को सह सकता है, वही वास्तविक सुखी है।
साधना का प्राण कहा गया है। इसके अभाव में साधना आधे-अधूरे मन से ही होती है और ऐसे में अभीष्ट सफलता संदिग्ध ही रह जाती है। वस्तुतः विश्वास स्वयं में ही एक बहुत बड़ी शक्ति है, विश्वास से उद्भूत ऊर्जा तमाम अवरोधों के बीच भी साधक को प्रगति पथ पर बढ़ाती रहती है। मानसकार ने तो ‘श्रद्धा विश्वास’ की महिमा ‘भवानी-शंकर’ से उपमा करते हुए प्रतिपादित की है। वस्तुतः बिना श्रद्धा भाव के मंत्र साधना में वह निष्ठ ही नहीं बन पड़ती जो साधना से सिद्धि तक की दूरी को अध्यवसाय पूर्वक पूर्ण कर सके।
साधनामय जीवन के लिए कल्याण कारी ही हैं। परम रहस्य सद्गुरु की कृपा भी बड़ी ही रहस्यमय होती है। इसका बौद्धिक विवेचन किसी भी तरह सम्भव नहीं। इसे तो बस सजल भावनाओं में ग्रहण किया जा सकता है।
साधना की भट्ठी में, हमको सतत गलाया।
क्या लोहा ‘सोना’ बन पाया? इतना तो अनुमानो॥
साधना, प्रचण्ड तप करने का वह पुरुषार्थ, जिस पर रीझकर भगवान नृसिंह हमारे-हम सबके अन्तःकरण में अवतरित हो सके। ध्यान रहे- भगवान केवल भक्तों और तपस्वियों को वरदान देते हैं। भावसंवेदना की सघनता और पुरुषार्थ की प्रचण्डता ही प्रभु के वरदान की अधिकारी बनती है। निष्ठुर और कायर तो सदा ही दुःख भोगते आये हैं।
साधना करना मना है। ऐसे में मानसिक जप द्वारा काम चलाया जाना चाहिए। यात्रा या रोग की स्थिति में भी जब विधि विधान से जप करना सम्भव न हो तो चलते-फिरते या बिस्तर पर मानसिक जप किया जा सकता है।
साधना को फलदायी बनाने के लिए कुछ आधारभूत तथ्यों का ध्यान रखना अनिवार्य है।
साधना में स्थान का भी महत्त्व है। यह शान्त, एकाँत व सात्त्विक होना भी श्रेयस्कर है। नदीतट, मन्दिर, बाग एवं घर का एकाँत कोना आदि इसके लिए उपयुक्त स्थल है, यथासंभव दिनभर पहने हुए कपड़ों को पहन कर साधना नहीं करनी चाहिए। आसन ऐसा हो जिस पर लम्बे समय तक बिना कष्ट के बैठ सकें। पाल्थी मारकर सीधे बैठना सबसे सरल है।
साधना निखरी, दृष्टिकोण बदले, मुग्धता की स्थिति से निकलकर वे जंतु से दिव्यकर्मी बने एवं सद्बुद्धि का आश्रय ले वे आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते रहे। अपने आप का ज्ञान उन्हें स्वाध्याय से होने लगा। श्रेष्ठ विचारों में स्नान उनके स्वभाव को उच्चस्तरीय भाव में प्रतिष्ठित करता चला गया। जीवनोद्देश्य की जानकारी उस ध्यान से हुई, जिसमें उनने जाना कि वे कौन हैं−एक सामान्य जीव नहीं−विशिष्ट प्रयोजन के लिए जन्मे प्रज्ञा परिजन, जिन्हें उलटे को उलटकर सीधा करना हैं, विचार−क्राँति करनी है। अपने साथ औरों के चिंतन पर छाए कुहासे को भी मिटाना है।
साधना का अभिन्न अंग है जो क्रमशः साधक को स्थिर सुख-आनन्द एवं शान्ति की ओर ले जाता है।
साधना के स्वर्णिम सूत्र हैं। जिसे बदलना है- वह राष्ट्र की जीवन व्यवस्था है। राजनीतिक व्यवस्था को बदल देने भर से कुछ होने वाला नहीं है। हर पाँच साल में सरकारों के बदल जाने का अनुभव सभी को है। पर इससे समस्याएँ घटती नहीं, बल्कि पचास गुना बढ़ जाती हैं।
साधना का एक अहम् पक्ष है, जिसकी प्रायः उपेक्षा की जाती है। अतः सफलता से साधक को वंचित ही रहना पड़ता है। दुराचारी, अनाचारी, व्याभिचारी और कुकर्मी की मंत्र साधना से उत्पन्न शक्ति का वही हश्र होता है जो जलते तवे पर पड़ने वाली पानी की बूँदों का। साधना से उत्पन्न हो रही शक्ति को बूँद-बूँद करके अपने शक्ति घर में इकट्ठा करना पड़ता है। मंत्र सिद्धि में सहायक संयम साधना का यही सार है।
साधना में तरह-तरह के विघ्न आते हैं। उनसे धैर्यपूर्वक निपटना चाहिए। समय पर अभीष्ट सफलता न मिलने पर निराशा एवं संशयग्रसित नहीं होना चाहिए। इसकी जगह गहराई से अपनी कमियों का निरीक्षण करना चाहिए और दुगुने उत्साह के साथ साधना में जुट जाना चाहिए।
साधना निश्चित रूप से साधक को मंत्र में निहित शक्ति एवं सामर्थ्य का परिचय करवाने में सफल सिद्ध होती है।
साधना में जुट जाना चाहिए, घर का मोह त्यागकर समाज को अपने अनुभवों का लाभ और लोकश्रद्धा का आनंद लेना चाहिए।” लेकिन बुड्ढे के मन में नाती−पोतों का मोह समाया था, बोला, “महात्मन्, मेरे बिना बच्चे कैसे रहेंगे?” वृद्ध घर लौटा। वृद्धावस्था का शरीर, रात नींद जल्दी टूट गई। उसे लगा बगल के कमरे में कोई बात कर रहा है।
साधना में बैठना चाहिए। सात्त्विकता की दृष्टि से माला तुलसी की ही श्रेष्ठ है। मंत्र जप इस तरह हो कि कण्ठ से ध्वनि तो होती रहे और होंठ भी हिलता रहे किन्तु पास बैठा दूसरा व्यक्ति सुन न सके। एक माला पूरी होने पर सुमेरु का उल्लंघन नहीं किया जाता, बल्कि उसके मस्तिष्क तथा नेत्रों से स्पर्श करके वापस पीछे की ओर उलटकर जप शुरू किया जाता है।
साधना से उत्पन्न शक्ति का वही हश्र होता है जो जलते तवे पर पड़ने वाली पानी की बूँदों का। साधना से उत्पन्न हो रही शक्ति को बूँद-बूँद करके अपने शक्ति घर में इकट्ठा करना पड़ता है। मंत्र सिद्धि में सहायक संयम साधना का यही सार है।
साधनाएँ रात्रि की नींद में हो सकती है। वैदिक संहिताओं में, अनेकों प्रकरण ऐसे हैं, जिनसे गुरुदेव के वचनों का महत्त्व प्रकट होता है।
साधना मन की इस आशा या तृष्णा को शून्य की ओर ले जाने की प्रक्रिया है। आशा या तृष्णा मन की तरंगें हैं। विचलित मन आशा और तृष्णामय होता है। प्रशान्त मन आशा और तृष्णा रहित होता है। नित्य की साधना मन की इसी प्रशान्त स्थिति को प्राप्त करने का अभ्यास है।
साधना करेंगे, वहाँ ध्यान लगेगा। आज सायंकाल ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे।
साधना इस मिशन की नस−नस में संव्याप्त है एवं यह परिवार निरंतर बढ़ता, प्रगति ही करता चला जा रहा है। विनोबा कहते थे, कार्यकर्त्ता को ‘यश’ का दान कर देना चाहिए, निर्लिप्त भाव से बिना श्रेय लिए जीना चाहिए। आज के लिए भी यही मार्गदर्शन हम सबके लिए है।
साधना में वह निष्ठ ही नहीं बन पड़ती जो साधना से सिद्धि तक की दूरी को अध्यवसाय पूर्वक पूर्ण कर सके।
साधना, क्षरित हो रही वृत्तियों पर कठोरता से अंकुश लगाना। इसी को संयम कहा गया है एवं संयम−साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है। समय, अर्थ, इंद्रिय एवं विचारों का−चार संयम किए जाते हैं, तब जीवन देवता प्रसन्न होते हैं एवं कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करते हैं। अपने पर कड़ी दृष्टि, स्वयं को जिम्मेदार नागरिक मानकर हर त्रुटि की (अपनी स्वयं की) समीक्षा, अवलोकन, सुधार एवं नई आदतों का, अच्छी आदतों का निर्माण−यह हम सबका, जिन्हें युग−नेतृत्व सँभालना है, अब अनिवार्य दायित्व है। जितना यह निखरेगी, उतना ही आत्मसंतोष एवं लोक−सम्मान मिलेगा।
साधना का अर्थ है−अपने आप पर अपना स्वयं का नियंत्रण, अपने आपे को खुद साधना, क्षरित हो रही वृत्तियों पर कठोरता से अंकुश लगाना। इसी को संयम कहा गया है एवं संयम−साधना शब्द एक साथ प्रयुक्त होता है। समय, अर्थ, इंद्रिय एवं विचारों का−चार संयम किए जाते हैं, तब जीवन देवता प्रसन्न होते हैं एवं कल्पवृक्ष की तरह मनोकामना पूर्ण करते हैं। अपने पर कड़ी दृष्टि, स्वयं को जिम्मेदार नागरिक मानकर हर त्रुटि की (अपनी स्वयं की) समीक्षा, अवलोकन, सुधार एवं नई आदतों का, अच्छी आदतों का निर्माण−यह हम सबका, जिन्हें युग−नेतृत्व सँभालना है, अब अनिवार्य दायित्व है। जितना यह निखरेगी, उतना ही आत्मसंतोष एवं लोक−सम्मान मिलेगा।
साधना द्वारा अभ्यस्त कर लेता है, वह इन परिवर्तनों के आने पर डरता नहीं, ना ही किसी प्रकार के उद्वेग को प्राप्त होता है। ऐसा ही साधक एकरस आनन्द और शान्ति को प्राप्त कर पाता है। ऐसा ही व्यक्ति अध्यात्म तत्त्व का वास्तविक चिंतन कर सकता है। सत्यान्वेषण के लिए मन का अनुद्विग्न होना आवश्यक है; बिना मन को वश में किये सत्य का चिंतन सम्भव नहीं। अतः मन को वश में करने की साधना ही सत्य की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है।
साधना से सिद्धि तक की दूरी को अध्यवसाय पूर्वक पूर्ण कर सके।
साधना के सत्य निरन्तर और लगातार सद्गुरु के अनन्य चिंतन से प्राप्त होते हैं।
साधना की परिणति और परिणाम यही है। यही राष्ट्र के समस्त प्रश्नों का सार्थक हल और राष्ट्रीय उज्ज्वल भविष्य को निर्माण करने वाला ऊर्जा प्रवाह है।
साधना के द्वारा इसके सतत मनन के द्वारा यह शक्ति जागृत होने लगती है और साधक को अपनी प्रकृति के अनुरूप अभीष्ट कर देती है। अपने सूक्ष्म भौतिक स्वरूप के अनुरूप यह अभीष्ट लौकिक मनोकामना को पूर्ण करते हैं और आध्यात्मिक प्रकृति के अनुरूप यह साधक के अन्तःकरण में वाँछित हेर-फेर कर मनोभूमि को इतना परिष्कृत करती है कि अभीष्ट ईश्वरीय चेतनधारा अवतरित हो सके और साधक के माध्यम से प्रवाहित हो सके। इस तरह मंत्र विश्व-ब्रह्मांडव्यापी सूक्ष्म एवं अलौकिक शक्तिधाराओं को स्फूरित कर अपने अनुकूल बनाने वाली विद्या है। यह एक ऐसी विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है जिससे शक्ति का उद्भव होता है। यह ज्ञान एवं प्रकाश का एक ऐसा पुञ्ज है जो जागृत होने पर अज्ञान, तमस एवं अंधकार का हरण करता है।
साधना विधि को बड़े ही संक्षेप में वर्णित करते हैं-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-June
साधना में टिकने ही नहीं देती। वैसे भले ही मन थोड़ा शाँत बना रहे, परन्तु साधना के आसन पर बैठते ही उसकी भाग-दौड़, बंदर-कूद शुरू हो जाती है। न जाने कहाँ-कहाँ के विचार मन को परेशान करते हैं। कभी-कभी तो बुरे विचारों, बुरी भावनाओं की असंख्य प्रेतछायाएं घेरकर खड़ी हो जाती है। ये इतनी हठीली होती है कि किसी भी तरह हटती ही नहीं।
साधना, सेवा, श्रम और पुरुषार्थ के आधार पर मिलती है, वह इतनी सस्ती और आसानी से मिल सकती है, तब क्या किसी ने भाँग खाई है कि वह प्रतिष्ठापूर्ण जीवन जीने के लिए संयम तथा साधना करता फिरे, सेवा और त्याग का प्रमाण देता घूमेँ क्यों न किसी प्रकार से धन बटोरकर उसे प्राप्त किया जाए? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अंध आर्थिकता में डुबो दिया है।
साधना करने के लिए कहा है। पाँच-छह घंटे रोज प्रतिदिन जप-ध्यान करूंगा। गुरुदेव ने कहा है कि चौबीस साल तक साधना करनी है। गाय के दूध से बनी छाछ और जौ की रोटी का आहार लेना है। पूजा की कोठरी में वह जो दीपक जल रहा है न, उसे अखंड ही रखना है।
साधना, हों सशक्त, ठहरें न कहीं बाधाओं में,
दृष्टि स्वच्छ हो, जिससे पलभर भ्रमित न हो भटकावों में,
सर्वप्रथम व्यक्तित्व स्वयं का पावन प्रखर बनाएं हम,
भागीरथ-तप के यूँ भागीदार स्वयं बन जाएं हम।
साधना की जिस चरम अवस्था तक वे पहुँचे थे, आज तक विश्व का कोई भी दार्शनिक वहाँ तक नहीं पहुँच पाया है। दर्शन के इतने महान एवं मूर्द्धन्य ज्ञाता होते हुए भी उनका हृदय उदात्त भव-संवेदनाओं से लबालब भरा था। उसमें से भक्ति की तरंगें उद्वेलित होती थीं। ‘सौंदर्यलहरी’ ग्रंथ का सृजन इस भक्तिभाव के प्रस्फुटन का ही परिचायक है। एक ओर जहाँ उन्होंने शुष्क, नीरस परन्तु ज्ञान के अविरल स्रोत वेदाँत का प्रचार किया, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय से भक्ति की अविच्छिन्न धारा भी प्रवाहित हुई।
साधना के सहारे अर्जित करना पड़ता है। इसके लिए किसी से कोई अपेक्षा नहीं की जाती, वरन् यह स्वयं के प्रचण्ड पुरुषार्थ एवं भागीरथी प्रयास के द्वारा प्राप्त की जाती है। यह न तो उत्तराधिकार में मिलती है और न किसी से वरदान-उपहार में उपलब्ध होती है। व्यक्तित्व का निर्माण स्वयं को ही करना पड़ता है। निजी तन्मयता एवं तत्परता का सघन समावेश करके ही इसे हस्तगत किया जा सकता है।
साधना में बैठे श्रीराम ने अपनी मार्गदर्शक सत्ता से पूछा, ‘हम तो आपको खोजते हुए नहीं आए थे। आपने हमें क्यों ढूँढ़ा और अचानक साधना का आदेश क्यों दिया? किस तरह की साधना?’ कहते-कहते श्रीराम के अधरों पर एक मुसकान खिल उठी।
साधना है। यह साधना अंतरंग जीवन में सुसंस्कारिता का सुवास फैलाती है और बहिरंग जीवन में सभ्यता रूपी शालीन व्यवहार में निखरती है। यूँ तो इस उपलब्धि को प्राप्त करने में वातावरण एवं संपर्क-सान्निध्य भी सहायक होते हैं तो भी मुख्यतया योगदान अपने दृष्टिकोण एवं प्रयास का रहता है। यही सच्ची पात्रता है। ऐसे ही सत्पात्रों को स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, तुष्टि, शाँति जैसी दिव्य विभूतियाँ मिलती हैं और कृतार्थ करती हैं।
साधना मानकर व्यवहार में उतारने लगता है। शिष्टता, सज्जनता, शालीनता, सहृदयता, उदारता जैसी प्रवृत्तियाँ जीवन के आवश्यक अंग बन जाते हैं। शरीर को भगवान् का मंदिर मानकर उसे सदा स्वच्छ रखा जाता है और लोभ, मोह और वासना-तृष्णा से सदा इसकी रक्षा की जाती है। जीवन में लोकमंगल के लिए बढ़-चढ़कर अनुदान देने की ललक उठती है।
साधना के अन्य सूत्र हैं पारिवारिकता एवं सामाजिकता का भाव। इसे आत्मविस्तार की प्रक्रिया कह सकते हैं। समाज का विशाल कलेवर परिवार की छोटी-छोटी इकाइयों में बसता है। परिवार लघु समाज एवं छोटा राष्ट्र है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को वैयक्तिक कर्त्तव्यों एवं सामाजिक उत्तरदायित्व से परिचित कराया जाना चाहिए।
साधना ‘भगीरथ’ के रूप में अवतरित हुई। और महातपस्वी भगीरथ की महासाधना ने माता गंगा के अवतरण को सम्भव-साकार किया। गंगा की लहरों ने भारत देश की चेतना में नवप्राण भरे।
साधना करते रहे।
साधना की कोई आवश्यकता नहीं है। हाँ अन्य साधनाएँ जरूर गायत्री साधना के बिना अपूर्ण रहती हैं। इसलिए गायत्री साधना में हम सभी को अपने मन-प्राण-भावनाएँ परिपूर्ण रूप से अर्पित करना चाहिए। गायत्री अवतरण दिवस के पावन क्षण गायत्री साधना के संकल्प दिवस के रूप में मूर्त हो, तभी इस पुण्य तिथि की सार्थकता है। इसी में हमारी सही पहचान है।
साधना में नियोजित किया, उस दिन वसंत पंचमी थी। निर्धारित उपासना संपन्न हो चुकी थी। जप निवेदन के बाद विसर्जन और समर्पण का विधान ही शेष रह गया था। श्रीराम ने उस उपचार को स्थगित किया और निर्दिष्ट क्रम के अनुसार आगे का जप आरंभ किया। एक वर्ष में 24 लाख जप का अनुष्ठान संपन्न करने के लिए छियासठ मालाओं का जप (लगभग सात हजार बार गायत्री मंत्र का उच्चारण) आवश्यक है।
साधना करने वाला साधक इन चौबीस ऋषियों के महातप का भागीदार बनता है।
साधना के लिए हिम्मत और हौसला बढ़ता है। इस योग-कथा की पिछली कड़ियाँ तमाम योग साधकों को यही अनूठी सौगात सौंपती रही है। अब तक अनेक साधकों ने अपने अनुभव लिखे हैं। इन अनुभवों से पता चलता है कि यह केवल एक लेखमाला नहीं है, बल्कि साधकों एवं महान गुरुओं के बीच निरंतर चलने वाला रहस्यमय वार्त्तालाप है। महर्षि पतंजलि एवं परमपूज्य गुरुदेव स्वयं इस योग कथा के माध्यम से अगणित साधकों की भावनाओं को सुनते हैं और उन्हें अपनी योग अनुभूतियों के अमृतरस का भागीदार बनाते हैं।
साधना के सूत्रों से ही हैं। साधना का यह बीज सतत अंकुरित-पल्लवित होता रहे, यह भाव मन में रख इस महामंत्र का अर्थ मन में धारण कर उन्हीं सद्गुणों का ध्यान करना चाहिए, जो उदीयमान सविता देवता के विषय में बताए गए हैं। वे सुखस्वरूप हैं, प्राणस्वरूप हैं, दुःखनाशक है, श्रेष्ठ हैं, तेजस्वी-पापनाशक तेज के रूप में है। उनके देवस्वरूप इस तेज को हम सोखते चले जा रहे हैं, अपने जीवन में इन्हीं सभी श्रेष्ठ वृत्तियों को धारण करते चले जा रहे हैं। इससे हमारी बुद्धि सद्पथ पर स्वतः ही जा रही है।
साधना का अपना महत्त्व है। यदि वह न बन पड़े तो अपनी गुरुसत्ता को सूर्य के मध्य स्थित मानकर उनका ध्यान करते हुए कम-से-कम एक घंटा जप अपने-अपने घरों में अवश्य करना चाहिए।
साधना करने का तात्पर्य है, व्यक्तित्व को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत करना। यह अनमोल सम्पदा है जो स्व उपार्जित है। इसे स्वयं ही श्रद्धा, व्रतशीलता एवं संयम साधना के सहारे अर्जित करना पड़ता है। इसके लिए किसी से कोई अपेक्षा नहीं की जाती, वरन् यह स्वयं के प्रचण्ड पुरुषार्थ एवं भागीरथी प्रयास के द्वारा प्राप्त की जाती है। यह न तो उत्तराधिकार में मिलती है और न किसी से वरदान-उपहार में उपलब्ध होती है।
साधना की सफलता नहीं मिल सकेगी।
साधना में नियुक्त किए जाने के दिन दो काम और सौंपे गए। वे थे तो महानुष्ठान के ही क्रम में, लेकिन उनका स्वरूप लौकिक ज्यादा था। प्रकाशपुँज से प्रेरणा आ रही थी, गाँव-समाज में जो भी गलत होता दिखाई दे, उसका विरोध करना है। उसे नहीं होने देना है और ऐसी तैयारी जुटाना है कि आगे भी नहीं हो सके। इसके लिए लोगों को समझा-सिखाकर तैयार करना है।
साधना एवं सेवा की वृत्ति को जन्म देता है। जिसे अपनाकर वह अपने कषाय-कल्मषों को नित्य स्वच्छ करता है। और दिव्य अनुदान-वरदान का अधिकारी बनता है। आज परिवार में गायत्री माता का चित्र या अन्य महापुरुषों को ईश्वरीय सत्ता का, मानवीय आदर्शवादिता का प्रतीक मानकर रखना चाहिए जिससे आस्तिकता का वातावरण बना रहे।
साधना का फल एक साथ मिलता है।
साधना ही आत्मा को परमात्मा का पद प्रदान करती है।
साधना करता फिरे, सेवा और त्याग का प्रमाण देता घूमेँ क्यों न किसी प्रकार से धन बटोरकर उसे प्राप्त किया जाए? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अंध आर्थिकता में डुबो दिया है।
साधना का आदेश क्यों दिया? किस तरह की साधना?’ कहते-कहते श्रीराम के अधरों पर एक मुसकान खिल उठी।
साधना की डगर कब किस ओर मुड़ती है, प्रस्तुत स्तंभ के माध्यम से साफ-साफ समझा जा सकता है साधकों की राह में आने वाले प्रश्न-कंटकों को हटाने-बीनने की पूरी व्यवस्था इसके उजाले में संभव है। इसकी किरणें साधकों के अंतर्मन के अंधियारे की घुटन और घबराहट को हटाती है। इससे साधकों में अपनी साधना के लिए हिम्मत और हौसला बढ़ता है। इस योग-कथा की पिछली कड़ियाँ तमाम योग साधकों को यही अनूठी सौगात सौंपती रही है। अब तक अनेक साधकों ने अपने अनुभव लिखे हैं।
साधना है। व्यक्तित्व को पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर बनाने की प्रक्रिया जीवन साधना है। यह साधना अंतरंग जीवन में सुसंस्कारिता का सुवास फैलाती है और बहिरंग जीवन में सभ्यता रूपी शालीन व्यवहार में निखरती है। यूँ तो इस उपलब्धि को प्राप्त करने में वातावरण एवं संपर्क-सान्निध्य भी सहायक होते हैं तो भी मुख्यतया योगदान अपने दृष्टिकोण एवं प्रयास का रहता है। यही सच्ची पात्रता है।
साधना वरदायिनी सिद्ध होगी।
साधनाजन्य यह उपलब्धि ऐसी है, जिस पर गहन शोध जरूरी है। संत चाहे पढ़े हों, अनपढ़ हों, वे अंतर में इस ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, जो वर्षों तक पढ़ने वाला नहीं प्राप्त कर पाता।
साधना विधियों के होते हुए गायत्री साधना ही क्यों?
साधना के संकल्प दिवस के रूप में मूर्त हो, तभी इस पुण्य तिथि की सार्थकता है। इसी में हमारी सही पहचान है।
साधना से ही संभव है।
साधना करनी है। गाय के दूध से बनी छाछ और जौ की रोटी का आहार लेना है। पूजा की कोठरी में वह जो दीपक जल रहा है न, उसे अखंड ही रखना है। दीपक में घी हमेशा भरा रहे।’
साधना का प्रथम सूत्र है ईश्वर विश्वास। ईश्वर पर आस्था मानवी नैतिकता का मेरुदण्ड है। यही आस्तिकता के रूप में आर्ष साहित्य के पन्नों-पन्नों में बिखरा मिलता है। कर्मफल के विज्ञान विधान का सम्बन्ध भी इसी से है। कर्मफल तत्काल मिलते न देखकर मनुष्य कुमार्गगामी बनता है।
साधना के आसन पर बैठते ही उसकी भाग-दौड़, बंदर-कूद शुरू हो जाती है। न जाने कहाँ-कहाँ के विचार मन को परेशान करते हैं। कभी-कभी तो बुरे विचारों, बुरी भावनाओं की असंख्य प्रेतछायाएं घेरकर खड़ी हो जाती है। ये इतनी हठीली होती है कि किसी भी तरह हटती ही नहीं। समझ में नहीं आता कि इनसे बचकर कहाँ भागें, कहाँ जाएं?
साधना के सरल, सहज परन्तु स्वर्णिम सूत्रों को स्वयं में उतारे एवं औरों को अपनाने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करे।
साधना का एक चरण चौबीस वर्ष तक महापुरश्चरण की शृंखला चलाने के रूप में है। एक वर्ष में गायत्री महामंत्र के चौबीस लाख जप का एक महापुरश्चरण संपन्न करना है। आहार-विहार में संयम ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए तपश्चर्या का अनुशासन भी अपनाया जाना चाहिए। वह अनुशासन नियत कर दिया गया है।
साधना कहा जाता है। जीवन वैभव का श्रेष्ठतम एवं सर्वोत्तम सदुपयोग करना ही जीवन साधना है। व्यक्तित्व को पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर बनाने की प्रक्रिया जीवन साधना है। यह साधना अंतरंग जीवन में सुसंस्कारिता का सुवास फैलाती है और बहिरंग जीवन में सभ्यता रूपी शालीन व्यवहार में निखरती है। यूँ तो इस उपलब्धि को प्राप्त करने में वातावरण एवं संपर्क-सान्निध्य भी सहायक होते हैं तो भी मुख्यतया योगदान अपने दृष्टिकोण एवं प्रयास का रहता है।
साधना का यह बीज सतत अंकुरित-पल्लवित होता रहे, यह भाव मन में रख इस महामंत्र का अर्थ मन में धारण कर उन्हीं सद्गुणों का ध्यान करना चाहिए, जो उदीयमान सविता देवता के विषय में बताए गए हैं। वे सुखस्वरूप हैं, प्राणस्वरूप हैं, दुःखनाशक है, श्रेष्ठ हैं, तेजस्वी-पापनाशक तेज के रूप में है। उनके देवस्वरूप इस तेज को हम सोखते चले जा रहे हैं, अपने जीवन में इन्हीं सभी श्रेष्ठ वृत्तियों को धारण करते चले जा रहे हैं। इससे हमारी बुद्धि सद्पथ पर स्वतः ही जा रही है। हम भूलकर भी गलत चिंतन नहीं कर सकते।
साधनामय बने, नए संकल्प हम लें
साधनामार्ग का, सत्य प्राप्ति का अवरोध मानने के कारण वह उनका अवलंबन नहीं चाहता। परिणामस्वरूप तत्त्वदर्शन की बौद्धिक गवेषणाओं में वह अपना समय और श्रम नहीं गंवाता। उसकी समस्त चेष्टाएं भाव-समुद्र में इष्ट से भावनात्मक तादात्म्य स्थापित करने और उसी भाव-समुद्र में डूबने रहने में नियोजित रहती हैं।
साधना से दुर्भाग्य का सौभाग्य में रूपांतरण सहज सम्भव है।
साधना से उन्हें शाँति न मिली। महत्त्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था।
साधना करता रहा। मुझे क्या फर्क पड़ता है? मैं तो सिर्फ इतना चाहती हूँ कि तुम मेरे पास बने रहो। मुझसे दूर कभी न जाना।’ ताई जी ने आश्वस्त करते हुए कहा।
साधना करने वाले को अन्य किसी भी साधना की कोई आवश्यकता नहीं है। हाँ अन्य साधनाएँ जरूर गायत्री साधना के बिना अपूर्ण रहती हैं। इसलिए गायत्री साधना में हम सभी को अपने मन-प्राण-भावनाएँ परिपूर्ण रूप से अर्पित करना चाहिए। गायत्री अवतरण दिवस के पावन क्षण गायत्री साधना के संकल्प दिवस के रूप में मूर्त हो, तभी इस पुण्य तिथि की सार्थकता है। इसी में हमारी सही पहचान है।
साधना सूत्रों को अपनाना चाहिए ताकि अपने मानव जन्म की गौरव गरिमा बनी रहे।
साधना में सन्नद्ध करो। साधना का एक चरण चौबीस वर्ष तक महापुरश्चरण की शृंखला चलाने के रूप में है। एक वर्ष में गायत्री महामंत्र के चौबीस लाख जप का एक महापुरश्चरण संपन्न करना है। आहार-विहार में संयम ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए तपश्चर्या का अनुशासन भी अपनाया जाना चाहिए।
साधनाक्रम को आरंभ करते हुए श्रीराम अपनी मार्गदर्शक सत्ता को सामने ही अनुभव कर रहे थे। उनकी उपस्थिति मन, प्राण और चेतना में रमती जा रही थी।
साधना-पथ की महान उपलब्धियाँ इन दोनों के समन्वय पर ही अवलंबित हैं।’
साधना अंतरंग जीवन में सुसंस्कारिता का सुवास फैलाती है और बहिरंग जीवन में सभ्यता रूपी शालीन व्यवहार में निखरती है। यूँ तो इस उपलब्धि को प्राप्त करने में वातावरण एवं संपर्क-सान्निध्य भी सहायक होते हैं तो भी मुख्यतया योगदान अपने दृष्टिकोण एवं प्रयास का रहता है। यही सच्ची पात्रता है। ऐसे ही सत्पात्रों को स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, तुष्टि, शाँति जैसी दिव्य विभूतियाँ मिलती हैं और कृतार्थ करती हैं। इनमें सद्भावना, शालीनता, सहृदयता के समस्त लक्षण प्रकट होते हैं जो स्वयं प्रसन्न एवं आनन्दित होते हैं तथा दूसरों की सद्प्रेरणा के केन्द्र बनते हैं।
साधना का व्रत लेने की बात ने कोई हस्तक्षेप करने से रोक दिया। जानती थीं कि श्रीराम के हाथ से लेकर पूजाकक्ष को संभालने की कोशिश करेंगी तो वह पुत्र राजी नहीं होगा। दो तीन बार रुककर देखा, किसी तरह के सहयोग की माँग उठने की आस में ठिठकी भी रहीं। लेकिन श्रीराम पूजाकक्ष की व्यवस्था में इस तन्मयता से जुटे रहे, जैसे समाधि लग गई हो। कौन आ रहा है और कौन जा रहा है, क्या कर रहा है?
साधना वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, अपने कष्टों का निवारण करने के लिए आरंभ की जा सकती है। प्रतिदिन न लिख सकें तो रविवार को न्यूनतम चौबीस गायत्री मंत्र भी लिखने का अभ्यास करें। विस्तार हेतु गायत्री महाविज्ञान (संयुक्त) का पृष्ठ 271 देख लें। हमारा अनुरोध है कि जितने अधिक साधक आरंभ कर सकें, वे करें व इसकी सूचना शाँतिकुँज, हरिद्वार को भी दे दें।
साधना के लिए संकल्पित हो जाओ। महातप से ही माँ गंगा की जलधारा निर्मल होगी। महातप से ही माँ गायत्री की साधना वरदायिनी सिद्ध होगी।
साधना की चाहत तो बहुत है, पर मन नहीं लगता। मन की चंचलता साधना में टिकने ही नहीं देती। वैसे भले ही मन थोड़ा शाँत बना रहे, परन्तु साधना के आसन पर बैठते ही उसकी भाग-दौड़, बंदर-कूद शुरू हो जाती है। न जाने कहाँ-कहाँ के विचार मन को परेशान करते हैं। कभी-कभी तो बुरे विचारों, बुरी भावनाओं की असंख्य प्रेतछायाएं घेरकर खड़ी हो जाती है।
साधना की सर्वोपरी आवश्यकता है। इन दिनों ऐसे व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति एवं सुदृढ़ चरित्रवानों की आवश्यकता है। जो जीवन के शाश्वत सिद्धान्तों को जन सामान्य में सरल और व्यावहारिक रूप में समझा सके, उपयोगी कर सके। इन्हें अपने प्रयास-पुरुषार्थ की आधारभिति अब ऐसे सशक्त एवं सुबोध आधार पर खड़ी करनी होगी जिसे उपभोक्तावादी, उच्छृंखलतावादी अपसंस्कृति तूफान गिरा न सके, वरन् टकराकर वापस लौटने की अवशता-विवशता अनुभव करे, जो जीवन साधना के सरल, सहज परन्तु स्वर्णिम सूत्रों को स्वयं में उतारे एवं औरों को अपनाने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करे।
साधना है, यही सत्य है, जिसे हर इंसान को निरपवाद रूप से अपनाकर श्रेष्ठता के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। इसी में जीवन की सार्थकता है और यही सार्थक जीवन है।
साधनाओं से विचलित न होता तो आज वह भी बूँदों के समान वंशलोचन, कपूर और मोती बन गया होता।
साधना का चमत्कार ही है कि इतना विशाल गायत्री परिवार खड़ा होता चला गया। हम सब जुड़े साधना के सूत्रों से ही हैं। साधना का यह बीज सतत अंकुरित-पल्लवित होता रहे, यह भाव मन में रख इस महामंत्र का अर्थ मन में धारण कर उन्हीं सद्गुणों का ध्यान करना चाहिए, जो उदीयमान सविता देवता के विषय में बताए गए हैं। वे सुखस्वरूप हैं, प्राणस्वरूप हैं, दुःखनाशक है, श्रेष्ठ हैं, तेजस्वी-पापनाशक तेज के रूप में है। उनके देवस्वरूप इस तेज को हम सोखते चले जा रहे हैं, अपने जीवन में इन्हीं सभी श्रेष्ठ वृत्तियों को धारण करते चले जा रहे हैं।
साधना चलाते रहेंगे। नियम टूटने नहीं देंगे। यह न्यूनतम व्रत है। यदि यह क्रम 2208 तक चला सकें तो और भी श्रेष्ठ है।
साधना है। जीवन को सार्थक एवं समर्थ बनाने वाली क्षमता अर्जित करने का ही दूसरा नाम व्यक्तित्व निर्माण है। संयमशील, अनुशासित और सुव्यवस्थित क्रिया-कलाप अपनाना जीवन साधना कहा जाता है। जीवन वैभव का श्रेष्ठतम एवं सर्वोत्तम सदुपयोग करना ही जीवन साधना है। व्यक्तित्व को पवित्र, प्रामाणिक, प्रखर बनाने की प्रक्रिया जीवन साधना है।
साधना के साथ अखण्ड ज्योति का भी अवतरण उसी दिन वसंत पंचमी पर संपन्न हुआ। तभी से यह अखण्ड दीपक प्रज्वलित है। क्रमशः आगरा, मथुरा होकर 75 वर्ष की यात्रा कर चुका है। सन 1971 से यह शाँतिकुँज, हरिद्वार में स्थापित है।
साधना के संबंध में तरह-तरह की जिज्ञासाएं उठी। उन्हें पूछने के लिए शब्द नहीं तलाशने पड़े। बिना पूछे ही प्रश्न संप्रेषित हो गए और उस दिव्य आत्मा के सान्निध्य में समाधान भी अपने आप होते गए। एक जिज्ञासा थी गुरुदेव कहाँ रहते हैं? उत्तर आया, हिमालय के हृदय देश में।
साधना करने वाले को इन सभी की साधना का फल एक साथ मिलता है।
साधना का पुरुषार्थ करना ही पड़ता है।’
साधना के स्वर्णिम सूत्र हैं जिनसे जीवन सधता है एवं व्यक्ति का परिष्कार परिमार्जन होता है। हम सबको अपने जीवन में इन साधना सूत्रों को अपनाना चाहिए ताकि अपने मानव जन्म की गौरव गरिमा बनी रहे।
साधनाक्रम ठीक से चलने के बाद तुम्हें वहाँ बुलाया जाएगा। चार दिन की अवधि के लिए वहाँ रहना होगा। हम ‘मार्गदर्शक सत्ता’ के रूप में साथ रहेंगे। सूक्ष्मशरीर धारण करने और उससे कहीं भी गति करने, प्रवेश पाने में कोई कठिनाई नहीं होगी। वैसी सुविधा-व्यवस्था बना दी जाएगी।
साधना ही क्यों?
साधना।’
साधना नकद धर्म है। यह नकद सौदा व व्यापार है इसके परिणाम-प्रतिफल के लिए लम्बे समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। इसका उपहार हाथो-हाथ मिलता है। इसकी साधना से अन्तर में संचित पशु-प्रवृत्तियों का आवरण कटता-मिटता है तथा व्यक्तित्व निरन्तर उच्चस्तरीय बनता जाता है। उत्कृष्टता और आदर्शवाद की दिव्य उपलब्धियाँ सतत मिलने लगती हैं।
साधना की। और भगवती गायत्री की सभी दिव्य शक्तियों को पुनः प्रकट किया। जन सामान्य को जगन्माता की कृपा, करुणा का ज्ञान कराया। माता के अमित प्रभावों से अपरिचित जन-मन में यह सवाल उठ सकता है कि अगणित मंत्रों, अनेकानेक साधना विधियों के होते हुए गायत्री साधना ही क्यों?
साधना के संकल्प लेने से पावन बेला भी है। अगले दिन एकादशी से प्रतिदिन दस माला, प्रति रविवार पंद्रह माला एवं प्रत्येक एकादशी को चौबीस माला करते चलने, तीनों नवरात्रियों वासंतेय (चैत्री), ज्येष्ठीय, आश्विन में 24,000 का जप करने से वर्षभर में पाँच लाख का जप हो जाता है। यह एक जमापूँजी के रूप में होता है। यदि पाँच वर्ष भी नियम चल गया तो 24 लक्ष न्यूनतम का एक महापुरश्चरण संपन्न हो जाता है। नियम भी सामान्य ही हैं।
साधना?’ कहते-कहते श्रीराम के अधरों पर एक मुसकान खिल उठी।
साधना को दो वर्ष पूर्व युगसंधि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के बाद आरंभ किया गया था। इसमें एक वर्ष में पाँच लक्ष्य का गायत्री जप पूरा किया जाता है। किसी भी मास की शुक्लपक्ष की एकादशी से आरंभ कर इसे एक वर्ष तक नियमों के साथ संपन्न किया जाता है। नियम बड़े सरल हैं। माह की दोनोँ एकादशियों में उपवास एवं प्रत्येक एकादशी में दिन में 24 गायत्री मालाएं की जाती हैं।
साधनाएँ जरूर गायत्री साधना के बिना अपूर्ण रहती हैं। इसलिए गायत्री साधना में हम सभी को अपने मन-प्राण-भावनाएँ परिपूर्ण रूप से अर्पित करना चाहिए। गायत्री अवतरण दिवस के पावन क्षण गायत्री साधना के संकल्प दिवस के रूप में मूर्त हो, तभी इस पुण्य तिथि की सार्थकता है। इसी में हमारी सही पहचान है।
साधना-शिक्षण स्थली मात्र है। संपादक को इस संबंध में लिखे पत्रों के उत्तर न दिए जा सकेंगे। वैसे यज्ञोपचार पूर्णतः निरापद है।
साधना से अन्तर में संचित पशु-प्रवृत्तियों का आवरण कटता-मिटता है तथा व्यक्तित्व निरन्तर उच्चस्तरीय बनता जाता है। उत्कृष्टता और आदर्शवाद की दिव्य उपलब्धियाँ सतत मिलने लगती हैं। नर-पशु के अन्दर नर-देव की झलक-झाँकियाँ झलकने लगती हैं। और इसी के आधार पर उच्चतर कर्म, स्वभाव, चिन्तन और चरित्र विनिर्मित होता है। यही वास्तविक उपार्जन-उपलब्धि है, जिसे परिष्कृत व्यक्तित्व के रूप में जाना-समझा जाता है।
साधना में हम सभी को अपने मन-प्राण-भावनाएँ परिपूर्ण रूप से अर्पित करना चाहिए। गायत्री अवतरण दिवस के पावन क्षण गायत्री साधना के संकल्प दिवस के रूप में मूर्त हो, तभी इस पुण्य तिथि की सार्थकता है। इसी में हमारी सही पहचान है।
साधना के बिना अपूर्ण रहती हैं। इसलिए गायत्री साधना में हम सभी को अपने मन-प्राण-भावनाएँ परिपूर्ण रूप से अर्पित करना चाहिए। गायत्री अवतरण दिवस के पावन क्षण गायत्री साधना के संकल्प दिवस के रूप में मूर्त हो, तभी इस पुण्य तिथि की सार्थकता है। इसी में हमारी सही पहचान है।
साधना में जितने अधिक व्यक्तियों को जोड़ा जा सके, जोड़ना चाहिए। स्वयं भी चौबीस मंत्र न्यूनतम रोज लिखने का संकल्प लेना चाहिए। मंत्र लेखन से बड़ा तप कोई नहीं। इसका महत्त्व जप से भी अधिक बताया गया है। थोड़े से मंत्रों का लेखन दस गुना पुण्य देता है।
साधना ने माता गंगा के अवतरण को सम्भव-साकार किया। गंगा की लहरों ने भारत देश की चेतना में नवप्राण भरे।
साधना का सर्वस्व मानकर अभ्यास करें। मन-ही-मन प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण, साथ ही यह प्रगाढ़ भाव कि इन चौबीस अक्षरों में स्वयं आदिशक्ति जगन्माता अपनी चौबीस शक्यों के साथ समाई है। यह मंत्र स्वयं ही परमशक्ति है। साथ ही साधक को सब कुछ देने में समर्थ है। जप करते समय ही नहीं, जप करने के बाद रह-रहकर साधक के मन में माता का स्मरण होते रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-October
साधना वाला प्रकरण भी पाँच भागों में विभक्त है। पाँच तत्वों से बना हुआ काय कलेवर, पाँच प्राणों से बने हुए चेतना संस्थान भी पाँच प्रकार की तपश्चर्याओं से प्रभावित परिष्कृत होते है। गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएं (1)उपवास (2)मौन (3)ब्रह्मचर्य (4)तितिक्षा (5)अनुदान इन पांचों नामों से प्रसिद्ध है। साधना के साथ साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा उसी अनुपात से उसकी कार्यक्षमता बढ़ती चली जाएगी।
साधना सत्र है जो पाँच दिन के होते है। इनमें भागीदारी के लिए अनिवार्य है कि न्यूनतम नौ दिन का एक सत्र पहले संपन्न कर लिया हो। इस वर्ष ये सत्र 11 अक्टूबर से आरंभ होकर 25 दिसंबर तक चलेंगे (1 से 5, 6 से 10..... इस क्रम से) फिर 6 जनवरी से 12 जनवरी तक एवं 31 जनवरी से 21 फरवरी एवं 1 मार्च से 2 मार्च 24 तक चलेंगे। कुल 28 सत्र इस वर्ष के लिए निर्धारित है। इस वर्ष प्रति सत्र मात्र 32 साधक ही लिए जा रहे है।
साधना परम्पराओं में अनेकों विधियाँ भी सुझाई गई हैं। साधकों की समस्या यह है कि इन अनगिनत विधियों में किसका चुनाव करें?
साधना को प्रगाढ़ करें कि मस्तिष्क के भीतर मक्खन जैसे कोमल एवं बालू के जैसे बिखरे हुए कणों में अगणित प्रकार की मानसिक शक्तियों एवं विचारणाओं के केन्द्र छिपे हुए हैं। उन तक आदि शक्ति माता गायत्री के प्रकाश की धाराएँ पहुँच रही हैं और वे सभी कण उसके द्वारा रक्तकणों की तरह ज्योतिर्मय होकर जगमगाने लगे हैं।
साधना में निरत व्यक्तियों को कितने ही प्रकार के कष्ट सहने पड़ते है। परिव्राजक जीवन की कठिनाइयाँ तो सर्वविदित ही है। वानप्रस्थ संन्यास में भी कष्टसाध्य जीवनयापन ही करना पड़ता है। तितिक्षा इसी का पूर्वाभ्यास है, ताकि समय आने पर अभ्यास प्रक्रिया अपनाने में कठिनाई अनुभव न हो।
साधना पथ पर अभी पहला पग रखा है। ध्यान साधना के इस महाप्रयोग का नाम है-’ज्योति अवतरण की ध्यान साधना’। यह साधना इतनी अधिक प्रभावी है कि साधकों को पंद्रह दिन के अभ्यास के बाद अपने अस्तित्व एवं अन्तःकरण में स्पष्ट परिवर्तन नजर आने लगते हैं। ध्यान के इस महाप्रयोग की प्रक्रिया निम्न बिन्दुओं में स्पष्ट है।
साधना’ के अपने राष्ट्रीय मिशन के प्रति जीवन्त एवं जाग्रत् होने की निताँत आवश्यकता है।
साधनाक्रम समुचित मार्गदर्शन के साथ पूरा करने को कहा जाता है।
साधना में खोता ही खोता है, पाता कुछ नहीं। हम स्वप्न खोते है, तब सत्य पाते है।
साधना में सहायक तत्व,आने वाले अवरोध, पुनर्जन्म एवं मोक्ष, आध्यात्मिक जीवनशैली क्या है, यह बताया जाएगा। स्थूल, सूक्ष्म व कारणशरीर का आध्यात्मिक परिचय,विभूतियां, इनके जागरण की विधि,कर्मयोग ज्ञानयोग, भक्तियोग एवं इनके लिए आराधना, साधना, उपासना का शिक्षण भी इसी में आता है। श्रद्धा प्रज्ञा निष्ठा का तत्वदर्शन भी इसी में है। पंचकोशों का आध्यात्मिक परिचय, इनमें निहित दिव्य संभावनाएं, इनके जागरण की विधियाँ, षटचक्रों एवं कुंडलिनी का परिचय, जागरण का विज्ञान तथा आध्यात्मिक जीवन के लक्षण एवं मापन इसमें सिखाए जाएंगे।
साधना साधक में इन चार तत्वों का संवर्द्धन करती है, जिससे उसकी रक्षा भी होती चलती है एवं वह विपत्ति के समुद्र से अपनी नाव खेता निकल जाता है।
साधनाक्रम चल रहा था, वही अद्भुत और अलौकिक था। इन नौ दिनों में फिर भी उन्होंने पूरी तरह निराहार रहने का व्रत लिया। सिर्फ जल और दूध पर ही निर्भर रहे। संभवतः पंचमी का दिन था। सुबह ढाई तीन बजे उठे और नित्य के उपासना अनुष्ठान में प्रवृत्त हुए।
साधना में आरम्भ और अन्त दोनों में विरोध नहीं। भिन्नता विरोधिता नहीं है। हमारे शरीर में हाथ, पैर, आँख, नाक, नाक आदि सब पृथक-पृथक तत्त्व हैं लेकिन सब के बीच समन्वय है। समन्वय के बिना शरीर का संचालन असम्भव है। भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई आदि के गुण अलग हैं, लेकिन उनके समन्वय में हमारी समृद्धि बढ़ती हैं।
साधनाएं इन्हीं दिनों की जाती है। दिन छोटे होते है, रात्रि बड़ी। वैसे भी आदमी अति शीत के कारण स्वयं को अंतर्मुखी बना लेता है। ऐसे में साधना फलदायी होती है।
साधना भी हमारी साँस्कृतिक विरासत है। यहाँ नास्तिक और आस्तिक, सभी सनातन धर्म में स्थान पाते हैं। चाहे वे वेद को मानते हों या नहीं, किसी को बहिष्कृत करने की परम्परा नहीं है। इसी प्रकार शैव, शाक्त, वैष्णव, उदासी आदि सभी का वैदिक धर्म में समावेश है। इसमें कम से कम 300-400 विभिन्न पंथ हैं।
साधना के लिए शान्त, एकान्त, खुले एवं हवादार स्थान का चुनाव करे। इस क्रम में अपनी पूजा स्थली का भी चुनाव किया जा सकता है। सामूहिक ध्यान साधना के योग्य स्थान का चुनाव आचार्य एवं साधक मिल कर करें। उपयुक्त स्थान पर स्थिर चित्त हो, सुखासन पर बैठें। ध्यान साधना के लिए बैठते समय यथासम्भव शरीर पर कसे हुए कपड़े न रहे।
साधना के योग्य स्थान का चुनाव आचार्य एवं साधक मिल कर करें। उपयुक्त स्थान पर स्थिर चित्त हो, सुखासन पर बैठें। ध्यान साधना के लिए बैठते समय यथासम्भव शरीर पर कसे हुए कपड़े न रहे। ढीले वस्त्र पहनें। सुखासन पर स्थिरता पूर्वक बैठकर रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए भावना करें कि अपना मन, शरीर एवं आत्म चेतना पूर्ण शान्त निश्चिन्त एवं प्रसन्न स्थिति में अवस्थित है।
साधना की प्रेरणा देते हुए अगणित लोगों की रक्षा की। इस संबंध में उनके कुछ पत्र इस अंक में प्रस्तुत है, जो प्रत्यक्ष प्रमाण देते है।
साधना का संकल्प लेकर आते हैं, उन्हें एक जीवन साधना सत्र व शेष समय साधनाक्रम समुचित मार्गदर्शन के साथ पूरा करने को कहा जाता है।
साधना है। इस साधनक्रम को अपनाने वाले अपने जीवनक्रम में कायाकल्प जैसा परिवर्तन होते हुए अनुभव करेंगे और उन्हें अपनी आन्तरिक प्रगति पर उत्साहवर्धक संतोष अनुभव होगा।
साधना में लगे हुए साधकों को सर्वदा ही श्रेष्ठ चिंतन, श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा उनका अर्चन करते रहना चाहिए।
साधना अपने ढंग से चल रही थी। उन्होंने चैत्र नवरात्र में विशेष कुछ नहीं किया। जो साधनाक्रम चल रहा था, वही अद्भुत और अलौकिक था। इन नौ दिनों में फिर भी उन्होंने पूरी तरह निराहार रहने का व्रत लिया। सिर्फ जल और दूध पर ही निर्भर रहे।
साधना की यह समर्थ प्रक्रिया पूरा करने में लगभग पैंतीस मिनट लग जाते हैं। पैंतीस मिनट के इस क्रम में पाँच मिनट आसन पर बैठने एवं मनोभूमि के निर्माण में एवं शेष दस मिनट स्थूल शरीर ज्योति धारण करने में, दस मिनट सूक्ष्म शरीर में ज्योति अवतरण की भावना करने में, दस मिनट अंगुष्ठ प्रमाण जीवात्मा की ज्योति के साथ आकाश में स्थित भगवती आदिशक्ति के मिलन की अनुभूति में लग जाता है। समय कम हो तो इसी अनुपात में थोड़ा-थोड़ा समय चारों धारणाओं में कम किया जा सकता है। यह अति समर्थ एवं परम गोपनीय साधना है। इस साधनक्रम को अपनाने वाले अपने जीवनक्रम में कायाकल्प जैसा परिवर्तन होते हुए अनुभव करेंगे और उन्हें अपनी आन्तरिक प्रगति पर उत्साहवर्धक संतोष अनुभव होगा।
साधना से मनःस्थिति इतनी सक्षम-समर्थ हो जाती है कि वह किसी भी परिस्थिति से तालमेल कर अपने अभीष्ट लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकती है। यही तनाव का एकमात्र निदान है और उच्चस्तरीय जीवन का पाथेय पथ भी है।
साधना में प्रतिपादित मणिपूरक चक्र को ‘सूर्यचक्र’ भी कहते हैं। हमारा नाभिकेन्द्र (सूर्यचक्र) प्राण का उद्गम स्थल ही नहीं बल्कि अचेतन मन के संस्कारों तथा चेतना का संप्रेषण केन्द्र भी है। सूर्यदेव इस चराचर जगत् में प्राणों का प्रबल संचार करते हैं- ‘प्राणः प्रजानामुदयत्येषं सूर्यः’। सूर्य भगवान् को मार्तण्ड भी कहते हैं क्योंकि ये जगत् को अपनी ऊष्मा तथा प्रकाश से ओतप्रोत कर जीवनदान देते हैं। सूर्यदेव कल्याण के उद्गम स्थान होने के कारण शम्भु कहलाते हैं।
साधना इतनी अधिक प्रभावी है कि साधकों को पंद्रह दिन के अभ्यास के बाद अपने अस्तित्व एवं अन्तःकरण में स्पष्ट परिवर्तन नजर आने लगते हैं। ध्यान के इस महाप्रयोग की प्रक्रिया निम्न बिन्दुओं में स्पष्ट है।
साधना के साथ साथ इनका समन्वय जितना हो सकेगा उसी अनुपात से उसकी कार्यक्षमता बढ़ती चली जाएगी।
साधना में न केवल वीर्यरक्षा का वरन् कामुक दृष्टि को निरस्त करने का भी अनुशासन है।
साधना अनेकता में एकता, विविधता के बीच समता, यही भारतीय संस्कृति की चिरंतन विशेषता रही है। चाहे दर्शन हो या साहित्य, स्थापत्य हो या कला सब जगह वैविध्य है, लेकिन इन विविधताओं में एकता देखना भारतीय मनीषा की अभीप्सा रही है। आज भी भारतीय राष्ट्र इसी का एक प्रतिदर्श है। राष्ट्र के निर्माण में भाषा, धर्म, प्रजाति आदि प्रमुख तत्त्व माने जाते हैं। किन्तु यूरोप में एक ही ईसाई धर्म है, लेकिन दर्जनों राष्ट्र हैं।
साधनाक्रम में शामिल हो, चाहे हवन में, चाहे अनुष्ठान में, पाँच कृत्य आपको अवश्य करने पड़ते है- यह आत्मशोधन की प्रक्रिया पाँच है-(1) पवित्रीकरण करना (2) आचमन करना (3)शिखाबंधन (4)प्राणायाम और (5) न्यास। इन चीजों के माध्यम से मैंने आपको एक दिशा दी है, एक संकेत दिया है। हमने यह नियम बनाया है कि आपको स्नान करना चाहिए, प्राणायाम करना चाहिए न्यास करना चाहिए। इन माध्यमों से आपको अपनी प्रत्येक इंद्रिय का परिशोधन करना चाहिए।
साधना बन गयी। जब-जब उसे उदासी होती, वृक्ष के पास जाता, अपने हल को देखता और फिर से वापस लौट आता। संघ के अन्य भिक्षुओं ने उसे बार-बार अपने हल-नंगल को देखते और बार-बार नंगल के पास जाते देखकर उसका नाम ही नंगलकुल रख दिया।
साधना सत्र व शेष समय साधनाक्रम समुचित मार्गदर्शन के साथ पूरा करने को कहा जाता है।
साधना के इस महाप्रयोग का नाम है-’ज्योति अवतरण की ध्यान साधना’। यह साधना इतनी अधिक प्रभावी है कि साधकों को पंद्रह दिन के अभ्यास के बाद अपने अस्तित्व एवं अन्तःकरण में स्पष्ट परिवर्तन नजर आने लगते हैं। ध्यान के इस महाप्रयोग की प्रक्रिया निम्न बिन्दुओं में स्पष्ट है।
साधना किसी को अपनी ओर से आक्रमण करना तो नहीं सिखाती, पर आए हुए हमलों को निष्फल अवश्य कर देती है। यह जो रक्षाकवच है, वह सबसे बड़ी विभूति है। गायत्री ब्रह्मास्त्र तो है, पर साधक के चारों ओर एक घेरा बनाकर रखती है एवं आज के इस लौकिक जगत में जहाँ षड़यंत्रों की भरमार है, पूरी तरह से संरक्षण की व्यवस्था बनाती है। समर्थ गुरु का, गायत्री के सिद्ध साधक का आश्रय मिल जाने के बाद तो वह सुरक्षाकवच अभेद्य हो जाता है।
साधना एवं नादयोग इसमें है।
साधना में एक ओर तप की प्रखरता थी, तो दूसरी ओर संवेदना की सजलता। इस पूर्णता का ही प्रभाव था कि जब उन्होंने धर्म युद्ध के लिए अपने पग बढ़ाये तो काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, माँतगी तथा कमला ये सभी दस महाविद्याएँ उनकी सहयोगिनी बनी और ‘यतो धर्मस्ततोजयः’ के महा सत्य को प्रमाणित करते हुए विजय दशमी धर्म विजय का महापर्व बन गयी।
साधना सत्रों में भागीदारी करना जीवन का एक बहुत बड़ा सौभाग्य माना जाना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव इसे महाकाल का घोंसला कहते रहे है, जहाँ से इक्कीसवीं सदी की ज्ञान गंगोत्री प्रवाहित हुई है। शीतऋतु, जो आश्विन नवरात्रि से आरंभ हो जाती है, तो अति विशिष्ट होती है। सभी महत्वपूर्ण साधनाएं इन्हीं दिनों की जाती है। दिन छोटे होते है, रात्रि बड़ी।
साधना से आपने क्या पाया?” उन्होंने उत्तर दिया,”खोया बहुत, पाया कुछ नहीं।”जिज्ञासु ने आश्चर्य से पूछा,”ऐसा क्यों?” ज्ञानी ने कहा,”जो पाने लायक था, वह तो पहले से ही प्राप्त था। जो खोने लायक विषय विकार और अज्ञान अंधकार के अनात्म के अनात्म तत्व भीतर घुस पड़े थे, उन्हें साधना ने निकाला भर है।
साधना की एक सत्यकथा साधकों के समक्ष प्रस्तुत है। यह कथा आदि गुरु शंकराचार्य एवं उनके शिष्य तोटकाचार्य से सम्बन्धित है। आचार्य शंकर उन दिनों बद्रीनाथ धाम में वेदान्त दर्शन पर अपने प्रसिद्ध शारीरिक भाष्य को लिख रहे थे। वेदान्त दर्शन यानि कि ब्रह्मसूत्र पर यह सुप्रसिद्ध भाष्य है। इसकी एक-एक पंक्ति में वेदान्त साधना एवं ब्रह्मज्ञान के अद्भुत रहस्य संजोये हैं।
साधना हमारी दुर्बलता तो नहीं है या इससे सचमुच हमारा नुकसान तो नहीं हुआ है। इतिहास साक्षी है कि समन्वय की साधना के विपरीत मानसिकता वाली संस्कृतियों के नामों-निशान मिट गये। जो जुलियस सीजर या सिकन्दर विश्व विजयी बनने की इच्छा रखते थे वे आज इतिहास के कूड़ेदान में चले गये हैं। जो धर्म या सम्प्रदाय आग और तलवार लेकर फैलना चाहता था, उसका वेग थम गया, उसकी प्रतिष्ठ गिर गई है। ईसाइयत जो विश्व विस्तारक धर्म बनना चाहता था, उसके धर्म गुरु को रोम में ‘धर्म समन्वयक’ का सचिवालय बनाना पड़ा।
साधना करना एक ऐसा अवसर है, जिसे किसी भी आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक को नहीं छोड़ना चाहिए। अब तो यहाँ देवसंस्कृति विश्वविद्यालय भी है, जहाँ लगभग दस हजार से अधिक ग्रंथ है, पढ़ाने वाले समयदानी विद्वान है तथा बहुत कुछ सीखने योग्य है। इतनी अधिक ठंड भी नहीं पड़ती कि भारतीय हुआ जाए।
साधना को सुगम बना दिया। समय समय पर उन्होंने इस साधना की प्रेरणा देते हुए अगणित लोगों की रक्षा की। इस संबंध में उनके कुछ पत्र इस अंक में प्रस्तुत है, जो प्रत्यक्ष प्रमाण देते है।
साधना ने निकाला भर है। अपने आपको खाली कर लिया।” इस तरह साधक साधना में खोता ही खोता है, पाता कुछ नहीं। हम स्वप्न खोते है, तब सत्य पाते है।
साधना के सिद्ध जनों में इस मार्ग पर चलने वाले पथिकों को चेतावनी भरे स्वरों में शिष्य संजीवनी के तीसरे सूत्र का उपदेश दिया है। उन्होंने कहा है- “द्वैत भाव को समग्र रूप से दूर करो। यह न सोचो कि तुम बुरे मनुष्य से या मूर्ख मनुष्य से दूर रह सकते हो। अरे! वे तो तुम्हारे ही रूप हैं। भले ही तुम्हारे भिन्न अथवा गुरुदेव से कुछ कम तुम्हारे रूप हों, फिर भी हैं वे तुम्हारे ही रूप।
साधना के लिए बैठते समय यथासम्भव शरीर पर कसे हुए कपड़े न रहे। ढीले वस्त्र पहनें। सुखासन पर स्थिरता पूर्वक बैठकर रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए भावना करें कि अपना मन, शरीर एवं आत्म चेतना पूर्ण शान्त निश्चिन्त एवं प्रसन्न स्थिति में अवस्थित है। यह भावना प्रगाढ़ता पूर्वक पाँच मिनट करने से अन्तःकरण में ध्यान के लिए उपयुक्त शान्ति उत्पन्न होने लगती है।
साधना, उपासना का शिक्षण भी इसी में आता है। श्रद्धा प्रज्ञा निष्ठा का तत्वदर्शन भी इसी में है। पंचकोशों का आध्यात्मिक परिचय, इनमें निहित दिव्य संभावनाएं, इनके जागरण की विधियाँ, षटचक्रों एवं कुंडलिनी का परिचय, जागरण का विज्ञान तथा आध्यात्मिक जीवन के लक्षण एवं मापन इसमें सिखाए जाएंगे।
साधना’। यह साधना इतनी अधिक प्रभावी है कि साधकों को पंद्रह दिन के अभ्यास के बाद अपने अस्तित्व एवं अन्तःकरण में स्पष्ट परिवर्तन नजर आने लगते हैं। ध्यान के इस महाप्रयोग की प्रक्रिया निम्न बिन्दुओं में स्पष्ट है।
साधना से लेकर आत्मप्रबंधन के सूत्र सिखाए जाएंगे। निश्चित ही इस विद्या कि प्रशिक्षण से छात्रों में आज की शिक्षणपद्धति में पाई जाने वाली एक बहुत बड़ी कमी दूर होगी, शिक्षा सर्वांगपूर्ण बनेगी।
साधना के जिज्ञासुओं के सवालों के सटीक समाधान के लिए इन पंक्तियों के माध्यम से ध्यान की अतिसुगम किन्तु अति समर्थ विधि प्रस्तुत है। इसका प्रयोग सभी आयु वर्ग के साधक सरलता से कर सकते हैं। इसका प्रयोग उनके लिए भी लाभकारी है जो वर्षों से नियमित साधना कर रहे हैं। इनके साथ वे साधक भी इस प्रयोग को अपना सकते हैं, जिन्होंने साधना पथ पर अभी पहला पग रखा है। ध्यान साधना के इस महाप्रयोग का नाम है-’ज्योति अवतरण की ध्यान साधना’।
साधना ईश्वर उपासना का अविच्छिन्न अंग है। विराट ब्रह्म की, विशाल विश्व की सेवा आराधना से विरत रहकर पूजा अर्चा मात्र से कोई भी जीवनलक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता। सेवा साधना में निरत व्यक्तियों को कितने ही प्रकार के कष्ट सहने पड़ते है। परिव्राजक जीवन की कठिनाइयाँ तो सर्वविदित ही है। वानप्रस्थ संन्यास में भी कष्टसाध्य जीवनयापन ही करना पड़ता है।
साधना एवं ब्रह्मज्ञान के अद्भुत रहस्य संजोये हैं। हिमालय के शुभ्र धवल शिखरों की छाँव में भगवान् नारायण की पावन तपस्थली में उन दिनों आचार्य की लेखन पयस्विनी प्रवाहित हो रही थी। आचार्य का प्रायः सम्पूर्ण दिन अपने एकान्त चिन्तन एवं लेखन में बीतता था। दिन के अन्तिम प्रहर में सन्ध्या से पूर्व आचार्य अपने भाष्य के लिखित अंशों को शिष्यों को पढ़ाते थे।
साधना सत्र प्रभावित होते है। इसलिए शीतऋतु में शांतिकुंज आकर साधना करना एक ऐसा अवसर है, जिसे किसी भी आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक को नहीं छोड़ना चाहिए। अब तो यहाँ देवसंस्कृति विश्वविद्यालय भी है, जहाँ लगभग दस हजार से अधिक ग्रंथ है, पढ़ाने वाले समयदानी विद्वान है तथा बहुत कुछ सीखने योग्य है। इतनी अधिक ठंड भी नहीं पड़ती कि भारतीय हुआ जाए।
साधना कर रहे हैं, उनकी अन्तर्चेतना में दिन-प्रतिदिन अपने गुरुदेव की छवि उजली होती जाती है। बाह्य जगत् में भी सभी रूपों और आकारों में सद्गुरु की चेतना ही बसती है। गुरु प्रेम में डूबने वालों के अस्तित्व से द्वैत का आभास मिट जाता है। दो विरोधी भाव, दो विरोधी अस्तित्व एक ही स्थान पर, एक ही समय प्रगाढ़ रूप से नहीं रह सकते। प्रेम से छलकते हुए हृदय में घृणा कभी नहीं पनप सकती।
साधना फलदायी होती है।
साधना पंचमुखी है। उसके प्राणरूपी प्रकरण पाँच पाँच अध्याय सोपानों में बंटे हुए है। तप साधना वाला प्रकरण भी पाँच भागों में विभक्त है। पाँच तत्वों से बना हुआ काय कलेवर, पाँच प्राणों से बने हुए चेतना संस्थान भी पाँच प्रकार की तपश्चर्याओं से प्रभावित परिष्कृत होते है। गायत्री उपासना को सफल बनाने वाली पाँच तपश्चर्याएं (1)उपवास (2)मौन (3)ब्रह्मचर्य (4)तितिक्षा (5)अनुदान इन पांचों नामों से प्रसिद्ध है।
साधना की जितनी भी प्रक्रियाएँ हैं, उन सभी का कोई भी महत्त्वपूर्ण तत्त्व उनसे अलग नहीं है। सभी कुछ उन्हीं शिष्यवत्सल प्रभु में समर्पित है।
साधना का विस्तृत माहात्म्य है। रमजान में रोजे तो मुसलमान भी रखते है। जन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि, गंगा दशहरा, नवरात्र आदि पर्वों पर उपवास की परंपरा हैं। आहार न करने से पेट को विश्राम मिलना और उसका नई शक्ति, नई स्फूर्ति अर्जित करना स्वास्थ्य की दृष्टि से तो हितकर है ही, उसका प्रभाव मन पर भी पड़ता है। शारीरिक आवश्यकता भूख के रूप में प्रकट होती और आहार मांगती है।
साधना के विपरीत मानसिकता वाली संस्कृतियों के नामों-निशान मिट गये। जो जुलियस सीजर या सिकन्दर विश्व विजयी बनने की इच्छा रखते थे वे आज इतिहास के कूड़ेदान में चले गये हैं। जो धर्म या सम्प्रदाय आग और तलवार लेकर फैलना चाहता था, उसका वेग थम गया, उसकी प्रतिष्ठ गिर गई है। ईसाइयत जो विश्व विस्तारक धर्म बनना चाहता था, उसके धर्म गुरु को रोम में ‘धर्म समन्वयक’ का सचिवालय बनाना पड़ा। आज धर्म के क्षेत्र में यदि हम सह-अस्तित्व की संस्कृति धारण नहीं कर सकते हैं तो धर्म का अस्तित्व ही संकट में हो जायेगा।
साधना कर रहे हैं। इनके साथ वे साधक भी इस प्रयोग को अपना सकते हैं, जिन्होंने साधना पथ पर अभी पहला पग रखा है। ध्यान साधना के इस महाप्रयोग का नाम है-’ज्योति अवतरण की ध्यान साधना’। यह साधना इतनी अधिक प्रभावी है कि साधकों को पंद्रह दिन के अभ्यास के बाद अपने अस्तित्व एवं अन्तःकरण में स्पष्ट परिवर्तन नजर आने लगते हैं। ध्यान के इस महाप्रयोग की प्रक्रिया निम्न बिन्दुओं में स्पष्ट है।
साधना साधक को बल देती है, जीवन पथ पर चलते हुए हर मोड़ को सुगम बना देती है।
साधना सत्र- ये सत्र प्रतिमाह 1 से 1,11 से 11,21 से 21 तारीखों में चलते हैं। नौ दिन की अवधि में चौबीस हजार गायत्री मंत्र का एक अनुष्ठान, आठ प्रेरक उद्बोधन, इतनी ही प्रेरणादायी गोष्ठियां तथा वीडियो संदेश दिनभर की दिनचर्या साधक को व्यस्त रखते हैं। प्रातः 4 बजे (26 सितंबर 23 से 2 मार्च 24 तक) उठाना होता है। हिमालय समीप होने पर भी ठंड इतनी नहीं होती कि कोई परेशानी हो। फिर तप तितिक्षा का विशेषकर तीर्थों में तो विशेष महत्व है ही।
साधना के तीनों रहस्यमय पीठ उन्हीं में है। अष्ट भैरव, विरंचि चक्र, सभी मण्डल, पंचवीर, नव मुद्राएँ, चौसठ योगिनियाँ, सभी मातृकाएँ उन गुरुदेव के ही चेतना मण्डल में अवस्थित हैं। साधना की जितनी भी प्रक्रियाएँ हैं, उन सभी का कोई भी महत्त्वपूर्ण तत्त्व उनसे अलग नहीं है। सभी कुछ उन्हीं शिष्यवत्सल प्रभु में समर्पित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2003-April
साधनात्मक पुरुषार्थ ठिठका न रहे।
साधना के प्रभाव परिणाम अत्यन्त व्यापक और अद्भुत होते हैं। ऐसी साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है। यह साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है। यह शास्त्र सम्मत भी है, जिसके प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना के अनुशासनों एवं नियमों का उचित ढंग से पालन किया गया हो।
साधना प्रखर एवं प्रचण्ड होगी, जब उसमें सम्यक् उपासना के साथ साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़े हों। उपासना-साधना के इस क्रम का भक्तिभाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्वाह करना होता है। मंत्र तभी फलित होते हैं। इसके प्रभाव एवं परिणाम नियम-अनुशासन के अनुपालन में सन्निहित होते हैं। अतः चैत्र नवरात्रि के इस असाधारण समय में इन अनुशासनों का पालन करना चाहिए जिनसे मंत्र की सिद्धि होती है।
साधना का प्रभाव परिलक्षित हो। इस संदर्भ में निम्न तथ्य ध्यान देने योग्य हैं-
साधना और तप के ये सभी सूत्र मिलकर साधक को उच्चस्तरीय चेतना की ओर आरोहित करते हैं।
साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़े हों। उपासना-साधना के इस क्रम का भक्तिभाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्वाह करना होता है। मंत्र तभी फलित होते हैं। इसके प्रभाव एवं परिणाम नियम-अनुशासन के अनुपालन में सन्निहित होते हैं। अतः चैत्र नवरात्रि के इस असाधारण समय में इन अनुशासनों का पालन करना चाहिए जिनसे मंत्र की सिद्धि होती है।
साधनाकाल में इन्हें अपनाने धारण करने वालों को साधनात्मक उपलब्धियाँ है। साधना के अन्तिम दिन साधक को भावपूर्ण पूर्णाहुति के रूप में हवन की पुण्य प्रक्रिया को पूर्ण करना चाहिए। इसके साथ यह भाव भी सन्निहित होना चाहिए कि गायत्री परिवार के सभी तपस्वी परिजनों की सम्मिलित तपऊर्जा से वैयक्तिक एवं वैश्विक आपदा-विपदाएँ विनष्ट हो रही हैं और माँ गायत्री की कृपा से उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ मूर्त रूप ले रही हैं। चैत्र नवरात्रि के इस विशेष साधना और तप के सुविकसित तप प्रयोग से दिव्य व पावन परिणाम अवश्य ही उत्पन्न होंगे और इनकी परिणति सुखद व आश्चर्यकारी होगी।
साधना सत्र या प्रशिक्षण−सत्र में आना चाहें, वे इस आवेदन फार्म की नकल करके सादे कागज पर भेजें। वाँछित सत्र के लिए दो माह पूर्व ही आवेदन करें।
साधना के गहरे रहस्यों को समेटे हैं। इनके पल-पल में प्रेरणा भरी पुकार है। जो साधक हैं वे इसे सुने बिना नहीं रह सकते। रणभूमि में रणभेरी बजती रहे और शूरवीर मुँह छुपाये किसी कोने में दुबके बैठे रहें, यह किसी भी तरह से सम्भव नहीं। नव सम्वत्सर के नौ दिन भी साधकों के लिए ऐसी ही चुनौती भरी साधना की रणभेरी बजा रहे हैं।
साधना पथ छुरे की धार की भाँति अति दुष्कर है। यह पथ अति दुर्गम है, ऐसा अनुभवी कवियों (ऋषियों) का कहना है। गुरुकृपा ही इस दुर्गम पथ को सुगम बनाती है। गुरु करुणा का सम्बल पाकर ही शिष्य इस पर चलने में सफल होता है। सद्गुरु के स्नेह सिंचन से ही साधक की साधना पूर्ण होती है।
साधना में तप संजीवनी औषधि के समान है। तप के महावज्र से ही जीवन के दुर्बोध रहस्य को जाना समझा जा सकता है। महातप की दुर्धर्ष एवं प्रचण्ड ऊर्जा से हम वैयक्तिक एवं वैश्विक दुर्योग को तहस-नहस कर सकते हैं। तप की इस सूर्य के सदृश्य सतेज सच्चाई को महातपस्वी अगस्त्य ने पहचाना था। नई सृष्टि के सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के जीवन का हर पल-हर क्षण महातप से तपा था।
साधना से संकल्पित होने जा रहे हैं। अपने जीवन में साधना की सुदीर्घ प्रक्रिया और परम्परा को प्रारम्भ करने जा रहे हैं। और इन पुण्य पावन दिनों में प्रयुक्त साधना के स्वरूप से भी हम सभी भलीभाँति परिचित हैं। परन्तु इस संकल्प साधना का प्रभाव हमारे जीवन में दिखता क्यों नहीं है? क्यों इसका दिव्य प्रभाव हमारे चिंतन, चरित्र और व्यवहार के लिए अनभिज्ञ और अनजान सा बनकर रह जाता है?
साधनाएँ इसी गहराई में उतर कर आत्मप्रेरणा से प्रेरित होती हैं। श्रीअरविन्द, महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस अपने दिव्य पुरुषार्थ-साधना से इस आत्म प्रेरणा से अनुप्राणित हो सके थे। उनका प्रेरणा स्रोत उनके अपने अन्दर में विद्यमान था। वही आत्म प्रेरणा ही उनका सद्गुरु थी।
साधना और तप के सुविकसित तप प्रयोग से दिव्य व पावन परिणाम अवश्य ही उत्पन्न होंगे और इनकी परिणति सुखद व आश्चर्यकारी होगी।
साधना पथ का प्रदीप है। इससे निकलने वाली प्रत्येक किरण के प्रकाश में साधक का साधनामय जीवन उज्ज्वल होता है। गुरु तत्त्व जितना श्रेष्ठ है, उतना ही श्रेष्ठ गुरु का कार्य है। तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी शिवानन्द जी महाराज कहते थे- ‘डिवोशन टू संघ इज़ डिवोशन टू ठाकुर’ यानि कि मिशन-मठ के संगठन के प्रति भक्ति ठाकुर के प्रति भक्ति है।
साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है। यह शास्त्र सम्मत भी है, जिसके प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना के अनुशासनों एवं नियमों का उचित ढंग से पालन किया गया हो।
साधनावधि में नमक, खार, खटाई, प्याज आदि निषिद्ध भोजन, पान, दो बार का भोजन तथा कुसंग और प्रमाद आदि त्याग देना चाहिए।
साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है। यह साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है। यह शास्त्र सम्मत भी है, जिसके प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना के अनुशासनों एवं नियमों का उचित ढंग से पालन किया गया हो।
साधना प्रखर थी, उनके लिए तो भगवान् का स्पर्श निर्वाण के महाद्वार खोलने वाला था।
साधना का प्रभाव हमारे जीवन में दिखता क्यों नहीं है? क्यों इसका दिव्य प्रभाव हमारे चिंतन, चरित्र और व्यवहार के लिए अनभिज्ञ और अनजान सा बनकर रह जाता है? क्यों यह हमारे मन में सृजनशील विचार और हृदय में भाव प्रवण-पुलकन नहीं प्रदान कर पाता? इन अनगिन और ज्वलन्त प्रश्नों का जवाब एक ही है कि हमने साधना के कलेवर को अपनाया परन्तु इसकी प्राण चेतना तपस्या को भुला दिया और प्राणहीन कलेवर में आकर्षण कितना ही क्यों न हो परन्तु प्रभाव कुछ भी नहीं होगा।
साधना के कलेवर को अपनाया परन्तु इसकी प्राण चेतना तपस्या को भुला दिया और प्राणहीन कलेवर में आकर्षण कितना ही क्यों न हो परन्तु प्रभाव कुछ भी नहीं होगा।
साधनापथ के प्रदीप हैं। इनसे निःसृत होने वाली ज्योति किरणें साधकों को भटकन और उलझन से बचाती है। वैदिक ऋषिगण, अनुभवी महासाधक सभी एक स्वर से कहते हैं कि साधनापथ महादुर्गम है। इस पर निरन्तर चलते रहना महाकठिन है। फिर चलते रहकर लक्ष्य को पा लेना गुरु कृपा के बिना नितान्त असम्भव है।
साधना हेतु यह समय असामान्य और असाधारण है। यूँ तो साधना कभी भी और किसी भी समय की जा सकती है परन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में विशेष विधि-विधान तथा उचित रीति-नीति से सम्पन्न की जाने वाली साधना के प्रभाव परिणाम अत्यन्त व्यापक और अद्भुत होते हैं। ऐसी साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है। यह साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है। यह शास्त्र सम्मत भी है, जिसके प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं।
साधना नियमित और सघन नहीं है, वे इस अन्तर्यात्रा विज्ञान के शब्दों को तो हथिया सकते हैं, पर इनका सत्य उनसे सदा दूर रहेगा। एक महान् वैज्ञानिक की भाँति महर्षि पतंजलि ने अपने अन्तर्यात्रा विज्ञान में ऐसी व्यवस्था कर रखी है। जो अनाधिकारी हैं, वे सदा वंचित रहेंगे। अन्तर्यात्रा विज्ञान का सत्य एक ही है, अधिकारी बनें और प्राप्त करें।
साधना सूत्र बड़े ही प्रभावकारी हैं। स्मृति के रहस्य के जिज्ञासु साधकों के लिए यह पुस्तक नित्य पठनीय है। ध्यान रहे- हमारे दैनिक जीवन के सारे दुःखों के मूल में एक मात्र सत्य यही है कि हमने अपनी स्मृति को कष्टकारक बना लिया है। स्थिति को उलटने के लिए हमें इसे ही सुखकारक बनाना होगा। मन की समस्त वृत्तियाँ मन की शक्तियाँ कैसे बनेंगी, चंचल मन किस तरह से सधेगा, इसकी चर्चा महर्षि के अगले सूत्र का सत्य है, जिसे योग साधक अगले क्रम में पढ़ेंगे।
साधना का रूप ले लेता है। वृत्तियों के शोधन के साथ क्रमशः आत्मा में निहित शक्तियों का जागरण शुरू हो जाता है। इस क्रम में संयम, सहिष्णुता, नैतिकता व अन्य नीति-नियम, मार्ग के अनिवार्य सोपान बनते जाते हैं। अब युवाओं को अपने अनुत्तरित प्रश्नों के समाधान सहज ही मिलने लगते हैं। क्षणिक सुख का थोड़ा सा संयम आन्तरिक सशक्तता एवं आनन्द की एक गहरी अनुभूति देता है।
साधना काल में सदा मंत्र के अर्थ का चिंतन करते रहें। साधना और तप के ये सभी सूत्र मिलकर साधक को उच्चस्तरीय चेतना की ओर आरोहित करते हैं।
साधना अनुष्ठान के लिए संकल्पित न हुआ हो। चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र के चौबीस हजार के अनुष्ठान में ही माता की कृपा झलकती है। उनकी कृपा से सब कुछ सम्भव है। महा असम्भव को अति शीघ्र सम्भव करने वाली वरदायिनी माता गायत्री की सन्तानों में से किसी को नौ दिनों में वंचित नहीं रहना चाहिए। स्वास्थ्य, सफलता, समृद्धि-सिद्धि सभी कुछ नव सम्वत्सर के इन नौ दिनों में समाया है।
साधना के बीच में अपने स्वरूप की हल्की झलकियाँ मिलती हैं। लेकिन सम्मोह का जाल अभी भी बना रहता है। यह तब टूटता है, जब क्लिष्ट स्मृति यानि जीवन के ईर्ष्या, द्वेष, बैरभाव या विषयानुभूति की यादों को अपने पास न फटकने दें। इनके स्थान पर याद करें सत्पुरुषों के संग को, अपने सद्गुरु के संग और उनके वचनों को। इससे न केवल सम्मोह नष्ट होता है, बल्कि क्रोध भी नष्ट होता है।
साधनात्मक उपलब्धियाँ है। साधना के अन्तिम दिन साधक को भावपूर्ण पूर्णाहुति के रूप में हवन की पुण्य प्रक्रिया को पूर्ण करना चाहिए। इसके साथ यह भाव भी सन्निहित होना चाहिए कि गायत्री परिवार के सभी तपस्वी परिजनों की सम्मिलित तपऊर्जा से वैयक्तिक एवं वैश्विक आपदा-विपदाएँ विनष्ट हो रही हैं और माँ गायत्री की कृपा से उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ मूर्त रूप ले रही हैं। चैत्र नवरात्रि के इस विशेष साधना और तप के सुविकसित तप प्रयोग से दिव्य व पावन परिणाम अवश्य ही उत्पन्न होंगे और इनकी परिणति सुखद व आश्चर्यकारी होगी।
साधना पूर्ण होती है।
साधना के इस क्रम का भक्तिभाव और पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्वाह करना होता है। मंत्र तभी फलित होते हैं। इसके प्रभाव एवं परिणाम नियम-अनुशासन के अनुपालन में सन्निहित होते हैं। अतः चैत्र नवरात्रि के इस असाधारण समय में इन अनुशासनों का पालन करना चाहिए जिनसे मंत्र की सिद्धि होती है।
साधना का सार यही है कि हम ईर्ष्या, बैरभाव, विषयभोगों से जुड़ी हुई यादों को हटाकर-भगाकर बार-बार अपनी आत्मचेतना को पवित्र करने वाली यादों को दुहराएँ।
साधनापथ महादुर्गम है। इस पर निरन्तर चलते रहना महाकठिन है। फिर चलते रहकर लक्ष्य को पा लेना गुरु कृपा के बिना नितान्त असम्भव है। उपनिषद् की श्रुतियों में साधकों के लिए ऐसे ही चेतावनी भरे वचन हैं। कठोपनिषद् की श्रुति कहती है- ‘क्षुरस्य धारा निशिता दुरव्यया दुर्गमं पथस्तत कवयोः वदन्ति’ अर्थात्- यह साधना पथ छुरे की धार की भाँति अति दुष्कर है।
साधना का महापुरुषार्थ किए बिना नहीं रह पायेंगे।
साधना करने वाले ऋषि-मुनि जन्मों-जन्मों में नहीं पाते। अमिट और अपार है प्रभु राम के नाम का प्रभाव। इसी के प्रभाव से तो वनवासी बाल्मीकि महर्षि हो गये। अपने गोसाँई बाबा तुलसीदास को भी कौन पहचान पाता राम के नाम बिना। रामनाम की कथा ने ही तो उन्हें महाकवि के साथ जन कवि बना दिया।
साधना के स्वरूप से भी हम सभी भलीभाँति परिचित हैं। परन्तु इस संकल्प साधना का प्रभाव हमारे जीवन में दिखता क्यों नहीं है? क्यों इसका दिव्य प्रभाव हमारे चिंतन, चरित्र और व्यवहार के लिए अनभिज्ञ और अनजान सा बनकर रह जाता है? क्यों यह हमारे मन में सृजनशील विचार और हृदय में भाव प्रवण-पुलकन नहीं प्रदान कर पाता? इन अनगिन और ज्वलन्त प्रश्नों का जवाब एक ही है कि हमने साधना के कलेवर को अपनाया परन्तु इसकी प्राण चेतना तपस्या को भुला दिया और प्राणहीन कलेवर में आकर्षण कितना ही क्यों न हो परन्तु प्रभाव कुछ भी नहीं होगा।
साधना का श्रेष्ठ व सर्वोत्तम मुहूर्त है। यह साधना का महापर्व है, संकल्पित साधना के लिए दिव्य पुकार है। साधना हेतु यह समय असामान्य और असाधारण है। यूँ तो साधना कभी भी और किसी भी समय की जा सकती है परन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में विशेष विधि-विधान तथा उचित रीति-नीति से सम्पन्न की जाने वाली साधना के प्रभाव परिणाम अत्यन्त व्यापक और अद्भुत होते हैं। ऐसी साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है।
साधना की सुदीर्घ प्रक्रिया और परम्परा को प्रारम्भ करने जा रहे हैं। और इन पुण्य पावन दिनों में प्रयुक्त साधना के स्वरूप से भी हम सभी भलीभाँति परिचित हैं। परन्तु इस संकल्प साधना का प्रभाव हमारे जीवन में दिखता क्यों नहीं है? क्यों इसका दिव्य प्रभाव हमारे चिंतन, चरित्र और व्यवहार के लिए अनभिज्ञ और अनजान सा बनकर रह जाता है? क्यों यह हमारे मन में सृजनशील विचार और हृदय में भाव प्रवण-पुलकन नहीं प्रदान कर पाता?
साधनामय जीवन उज्ज्वल होता है। गुरु तत्त्व जितना श्रेष्ठ है, उतना ही श्रेष्ठ गुरु का कार्य है। तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक ही है। श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी शिवानन्द जी महाराज कहते थे- ‘डिवोशन टू संघ इज़ डिवोशन टू ठाकुर’ यानि कि मिशन-मठ के संगठन के प्रति भक्ति ठाकुर के प्रति भक्ति है। सद्गुरु का कार्य सद्गुरु की चेतना का ही विस्तार है।
साधना की रणभेरी बजा रहे हैं। जो साधक हैं, वे इसे सुनकर साधना का महापुरुषार्थ किए बिना नहीं रह पायेंगे।
साधना से इस आत्म प्रेरणा से अनुप्राणित हो सके थे। उनका प्रेरणा स्रोत उनके अपने अन्दर में विद्यमान था। वही आत्म प्रेरणा ही उनका सद्गुरु थी।
साधना के अन्तिम दिन साधक को भावपूर्ण पूर्णाहुति के रूप में हवन की पुण्य प्रक्रिया को पूर्ण करना चाहिए। इसके साथ यह भाव भी सन्निहित होना चाहिए कि गायत्री परिवार के सभी तपस्वी परिजनों की सम्मिलित तपऊर्जा से वैयक्तिक एवं वैश्विक आपदा-विपदाएँ विनष्ट हो रही हैं और माँ गायत्री की कृपा से उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ मूर्त रूप ले रही हैं। चैत्र नवरात्रि के इस विशेष साधना और तप के सुविकसित तप प्रयोग से दिव्य व पावन परिणाम अवश्य ही उत्पन्न होंगे और इनकी परिणति सुखद व आश्चर्यकारी होगी।
साधना के अनुशासनों एवं नियमों का उचित ढंग से पालन किया गया हो।
साधना कभी भी और किसी भी समय की जा सकती है परन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में विशेष विधि-विधान तथा उचित रीति-नीति से सम्पन्न की जाने वाली साधना के प्रभाव परिणाम अत्यन्त व्यापक और अद्भुत होते हैं। ऐसी साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है। यह साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है। यह शास्त्र सम्मत भी है, जिसके प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना के अनुशासनों एवं नियमों का उचित ढंग से पालन किया गया हो।
साधना का महापर्व है, संकल्पित साधना के लिए दिव्य पुकार है। साधना हेतु यह समय असामान्य और असाधारण है। यूँ तो साधना कभी भी और किसी भी समय की जा सकती है परन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में विशेष विधि-विधान तथा उचित रीति-नीति से सम्पन्न की जाने वाली साधना के प्रभाव परिणाम अत्यन्त व्यापक और अद्भुत होते हैं। ऐसी साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है। यह साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है।
साधना के लिए दिव्य पुकार है। साधना हेतु यह समय असामान्य और असाधारण है। यूँ तो साधना कभी भी और किसी भी समय की जा सकती है परन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में विशेष विधि-विधान तथा उचित रीति-नीति से सम्पन्न की जाने वाली साधना के प्रभाव परिणाम अत्यन्त व्यापक और अद्भुत होते हैं। ऐसी साधना से हठीली वृत्तियों एवं चट्टानी प्रारब्ध के असह्य ताप घटते-मिटते हैं और जीवन में पवित्रता-दिव्यता का नवोदय होता है, उत्साह और उमंग का अवतरण होता है। यह साधना विज्ञान के तत्त्वज्ञ महान साधकों-महर्षियों का अनुभूत सत्य है।
साधना के लिए तीव्र लगन और गहरा समर्पण है, वही इस योगकथा के सत्य को समझने के लिए सुपात्र हैं। महर्षि पतंजलि केवल सुपात्रों और सत्पात्रों को ही जिन्दगी के रहस्य एवं विभूतियाँ सौंपने के इच्छुक हैं। जो सत्पात्र नहीं हैं, जिनकी साधना नियमित और सघन नहीं है, वे इस अन्तर्यात्रा विज्ञान के शब्दों को तो हथिया सकते हैं, पर इनका सत्य उनसे सदा दूर रहेगा। एक महान् वैज्ञानिक की भाँति महर्षि पतंजलि ने अपने अन्तर्यात्रा विज्ञान में ऐसी व्यवस्था कर रखी है। जो अनाधिकारी हैं, वे सदा वंचित रहेंगे।
साधना विज्ञान के मर्मज्ञ महर्षियों-ऋषियों ने नवरात्रि के इस मुहूर्त को दिव्यता एवं देवत्व के अभिवर्धन के लिए अनुकूल माना है। वे कालचक्र की अनवरत गतिशीलता से भलीभाँति परिचित थे। उन्होंने ग्रहों, नक्षत्रों आदि के संयोग-वियोग से उत्पन्न होने वाले प्रभावों का गम्भीर व गहन अध्ययन-अनुसंधान किया था। और वे इस तथ्य को अच्छी तरह से जानते थे कि इनके अधिकतम शुभ प्रभावों से मानवीय अन्तर्चेतना को कैसे प्रेरित-रूपांतरित किया जा सकता है। इसी सूक्ष्म व गम्भीर विज्ञान को जानने वाले हमारे प्राचीन वैज्ञानिक ऋषियों ने वर्ष में चार बार नवरात्रि पर्वों की विधि-व्यवस्था बनाई थी।
साधना सत्र)
साधना के वे बीज बोये जा सकते हैं। जिनकी लहलहाती फसलें साधकों के आन्तरिक एवं बाह्य जीवन को समूचे वर्ष समृद्ध बनाये रखें। इन नौ दिनों को नकारने का अर्थ है, नव सम्वत्सर की सम्पूर्ण सम्भावनाओं को नकार देना।
साधना के प्रारम्भिक दिन से लेकर अन्तिम दिन तक एक सा, एक ही संख्या में जप करें, न कम करें न अधिक। निरन्तर ऐसा करते ही रहें, क्रम एवं व्यवस्था बनाये रखे, अपनी वृत्तियों के फेर में लिप्त न हो जायँ। प्रातः से लेकर मध्याह्न तक विधिवत् जप करते रहें। मन से पवित्र रहें और साधना काल में सदा मंत्र के अर्थ का चिंतन करते रहें। साधना और तप के ये सभी सूत्र मिलकर साधक को उच्चस्तरीय चेतना की ओर आरोहित करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-November
साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय-कोष, आनन्दमय कोष कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन।
साधना का एक महान् अवसर मानना चाहिए और यहाँ अनेक प्रकार के अभाव तथा असुविधाएं सहन करने के लिए तैयार होकर आना चाहिए।
साधना एवं विज्ञान संबन्धी और 26 में गायत्री मंत्र के एक एक अक्षर में सन्निहित, नैतिकता, मानवता एवं दिव्य सद्गुणों, सद्भावों, सद्विचारों, सत्य प्रवृत्तियों का प्रतिपादन करने वाली अत्यन्त ही महत्वपूर्ण धर्म शिक्षाओं का दिग्दर्शन कराया गया है।
साधना निष्फल हो जाती है। आसुरी आक्रमणों के अन्य सब मोर्चों की अपेक्षा यह मोर्चा सबसे कठिन है। इसकी ओर से सभी को सावधान होकर आना है। कोई व्यक्ति कितनी ही निन्दा, कटुता, द्वेष, आक्षेप भरी बातें कह कर क्रोध उत्पन्न कराने का प्रयत्न क्यों न करे, हम सभी को पूर्ण शान्त रहना है। न तो मन में, न वाणी में न व्यवहार में किसी भी प्रकार का आवेश आने दिया जाय।
साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय-कोष, आनन्दमय कोष कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन।
साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है।
साधना के प्रतीक पीले रंगे हुए कपड़े हर याज्ञिक को अपने साथ लाने चाहिएं। नेकर, पेंट, पजामा यज्ञ करते समय पहन कर न बैठा जा सकेगा। इसलिए आवश्यक वस्त्रों समेत ही सबको आना चाहिए। यों रास्ते में आते समय तथा यज्ञ के दिनों पूरे समय ही पीले वस्त्र पहने रहना उचित है, पर यदि इसमें किसी को संकोच हो तो कंधे पर पीला दुपट्टा तो यज्ञीय पोशाक की तरह सबको पहनना ही चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-May
साधना, पूजा उपासना के उद्देश्य थे वहाँ यह बात भी पूरी गहराई तक जमी हुई थी कि सारे राष्ट्र को, सारे समाज को धर्म प्रेरणा देते रहने के लिए कुछ ऐसे धर्म-सेवियों की आवश्यकता है जो अपनी आजीविका की ओर से निश्चित रहकर सारा मस्तिष्क और सारा समय निर्धारित लक्ष के लिए ही लगाते रह सकें। भगवान को उत्तम पौष्टिक भोजन का नित्य भोग लगने के पीछे यही प्रवृत्ति काम करती है, ताकि पूजा करने वाले धर्म-सेवी लोग अपनी सहज त्याग बुद्धि के कारण रूखा-सूखा खाकर अपने कीमती शरीर को ही क्षीण न करने लगें। यों भगवान तो विदुर के साग, शबरी के बेर, सुदामा के तंदुल एवं तुलसी-पत्र का भोग लगने से भी पूर्ण तृप्त हो सकते हैं, पर भगवान के बहाने इन धर्म-सेवियों के आहार का समुचित ध्यान रखना था। इसलिए दूध, घी, शक्कर, उत्तम अन्न, शाक आदि की व्यवस्था भोग में रखनी आवश्यक समझी गई। भगवान की प्रतिमा स्थापित करने के लिए हर मन्दिर में एक छोटी कोठरी ही रखी जाती है।
साधना को इस मास से कम से कम एक चौथाई और बढ़ा दें। अब की अपेक्षा सवाई साधना करने लगें।
साधना क्रम से अतिरिक्त अपना धर्म प्रचार करने एवं धर्मप्रवृत्तियों के सञ्चालन की जिम्मेदारी का अनुभव करें और उसकी पूर्ति के लिए प्राण पण से जुटे रहें तो हमें उस संख्या से भी तिगुनी संख्या में धर्म सेवक मिल सकते हैं, जितने के बल पर ईसाइयों ने गत डेढ़ सौ वर्षों से समस्त संसार की लगभग आधी जनसंख्या को ईसाई बना लिया। मंदिरों की प्रथा का प्रारम्भ करने वालों के मस्तिष्क में जहाँ आस्तिकता, ईश्वर विश्वास, भगवद्भक्ति, आत्म-कल्याण की साधना, पूजा उपासना के उद्देश्य थे वहाँ यह बात भी पूरी गहराई तक जमी हुई थी कि सारे राष्ट्र को, सारे समाज को धर्म प्रेरणा देते रहने के लिए कुछ ऐसे धर्म-सेवियों की आवश्यकता है जो अपनी आजीविका की ओर से निश्चित रहकर सारा मस्तिष्क और सारा समय निर्धारित लक्ष के लिए ही लगाते रह सकें। भगवान को उत्तम पौष्टिक भोजन का नित्य भोग लगने के पीछे यही प्रवृत्ति काम करती है, ताकि पूजा करने वाले धर्म-सेवी लोग अपनी सहज त्याग बुद्धि के कारण रूखा-सूखा खाकर अपने कीमती शरीर को ही क्षीण न करने लगें। यों भगवान तो विदुर के साग, शबरी के बेर, सुदामा के तंदुल एवं तुलसी-पत्र का भोग लगने से भी पूर्ण तृप्त हो सकते हैं, पर भगवान के बहाने इन धर्म-सेवियों के आहार का समुचित ध्यान रखना था। इसलिए दूध, घी, शक्कर, उत्तम अन्न, शाक आदि की व्यवस्था भोग में रखनी आवश्यक समझी गई।
साधना से रिक्त न जाने दो। अपनी जीवन-चक्रिका को सफल बनाओ और ईश्वरत्व को अभी, इसी क्षण प्राप्त करो। यही हमारी एकमात्र प्रार्थना है। प्रभु तुम्हें ऐश्वर्य और आनन्द से पूर्ण बनावें। अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में शान्ति का लाभ करो।
साधनामय ही होता है। लक्ष्य को स्थिर करके निरन्तर उस ओर अग्रसर होते रहना साधु जीवन में अधिक सम्भव है।
साधना के शत्रु
साधना का सर्वश्रेष्ठ मार्ग प्रकट किया है।
साधना के बल पर ही हम जो चाहें प्राप्त कर सकेंगे।
साधना बलवती एवं इच्छित फलदात्री नहीं हो सकती। इसीलिये त्यागमय साधु जीवन को साधना के लिये उपयुक्त माना गया है। गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियां होती है, अपने परिवार के भरण-पोषण और लोक-व्यवहार एवं सामाजिक नियमों को सुव्यवस्थित संचालित करने के लिये विविध प्रवृत्तियों में व्यस्त रहना पड़ता है। साधु-जीवन में आवश्यकताएँ और बाहरी जिम्मेदारियां बहुत कम हो जाती हैं। इसलिये साधना में पूरा समय, शक्ति लगाई जा सकती है।
साधना ही सिद्धि का सोपान है। बिना साधना सिद्धि नहीं मिलती। साधना के लिये बहुत बड़े त्याग की आवश्यकता होती है। निवृत्ति-जीवन में वह अधिक सुलभ होती है, क्योंकि अनेक प्रवृत्तियों में जहाँ तक मन, वचन, काया लगी रहती है वहाँ तक साधना के उपयुक्त एकाग्रता प्राप्त नहीं हो सकती और बिना एकाग्रता के साधना बलवती एवं इच्छित फलदात्री नहीं हो सकती। इसीलिये त्यागमय साधु जीवन को साधना के लिये उपयुक्त माना गया है।
साधना करने लगें।
साधना की प्राथमिक अवस्था का शत्रु है- ‘आलस्य’ और परिणतावस्था का शत्रु है- ‘अहंकार। आलस्य से साधना में प्रवृत्ति ही नहीं होती और अहंकार आगे बढ़ने में रुकावट डालता है। अभिमान के द्वारा उच्च स्थिति से पतन हो जाता है। वह कहाँ जाकर गिरेगा इसका कोई ठिकाना नहीं रहता।
साधना के लिये उपयुक्त माना गया है। गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियां होती है, अपने परिवार के भरण-पोषण और लोक-व्यवहार एवं सामाजिक नियमों को सुव्यवस्थित संचालित करने के लिये विविध प्रवृत्तियों में व्यस्त रहना पड़ता है। साधु-जीवन में आवश्यकताएँ और बाहरी जिम्मेदारियां बहुत कम हो जाती हैं। इसलिये साधना में पूरा समय, शक्ति लगाई जा सकती है। एक तरह से साधु जीवन साधनामय ही होता है।
साधना में प्रवृत्ति ही नहीं होती और अहंकार आगे बढ़ने में रुकावट डालता है। अभिमान के द्वारा उच्च स्थिति से पतन हो जाता है। वह कहाँ जाकर गिरेगा इसका कोई ठिकाना नहीं रहता।
साधना की सामग्रियाँ उपलब्ध होती हैं।
साधना के उपयुक्त एकाग्रता प्राप्त नहीं हो सकती और बिना एकाग्रता के साधना बलवती एवं इच्छित फलदात्री नहीं हो सकती। इसीलिये त्यागमय साधु जीवन को साधना के लिये उपयुक्त माना गया है। गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियां होती है, अपने परिवार के भरण-पोषण और लोक-व्यवहार एवं सामाजिक नियमों को सुव्यवस्थित संचालित करने के लिये विविध प्रवृत्तियों में व्यस्त रहना पड़ता है। साधु-जीवन में आवश्यकताएँ और बाहरी जिम्मेदारियां बहुत कम हो जाती हैं। इसलिये साधना में पूरा समय, शक्ति लगाई जा सकती है।
साधना में पूरा समय, शक्ति लगाई जा सकती है। एक तरह से साधु जीवन साधनामय ही होता है। लक्ष्य को स्थिर करके निरन्तर उस ओर अग्रसर होते रहना साधु जीवन में अधिक सम्भव है।
साधनायें भी आसानी से हो सकती हैं।
साधना के लिये बहुत बड़े त्याग की आवश्यकता होती है। निवृत्ति-जीवन में वह अधिक सुलभ होती है, क्योंकि अनेक प्रवृत्तियों में जहाँ तक मन, वचन, काया लगी रहती है वहाँ तक साधना के उपयुक्त एकाग्रता प्राप्त नहीं हो सकती और बिना एकाग्रता के साधना बलवती एवं इच्छित फलदात्री नहीं हो सकती। इसीलिये त्यागमय साधु जीवन को साधना के लिये उपयुक्त माना गया है। गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियां होती है, अपने परिवार के भरण-पोषण और लोक-व्यवहार एवं सामाजिक नियमों को सुव्यवस्थित संचालित करने के लिये विविध प्रवृत्तियों में व्यस्त रहना पड़ता है। साधु-जीवन में आवश्यकताएँ और बाहरी जिम्मेदारियां बहुत कम हो जाती हैं।
साधना करने लगता है। उस मूर्ति को देखकर हमारी अन्तः चेतना ऐसा अनुभव करती है मानो साक्षात् भगवान से हमारा मिलन हो रहा है।
साधना के पक्ष में आगे बढ़ते-बढ़ते विश्वामित्र अपना व्यक्ति-भाव भूल गये थे। विश्व की समस्त विभूतियाँ उनकी अपनी बन चुकी थीं। वे जो कुछ प्रयत्न कर रहे थे वे अपने लिये नहीं, वरन् अन्य अनेकों के लिये-समाज के लिये कर रहे थे। पहले उनको अपने अन्तःकरण से प्रेरणा मिलती थी। पर अब उनको प्रेरणा मिल रही थी।
साधना सिद्धि नहीं मिलती। साधना के लिये बहुत बड़े त्याग की आवश्यकता होती है। निवृत्ति-जीवन में वह अधिक सुलभ होती है, क्योंकि अनेक प्रवृत्तियों में जहाँ तक मन, वचन, काया लगी रहती है वहाँ तक साधना के उपयुक्त एकाग्रता प्राप्त नहीं हो सकती और बिना एकाग्रता के साधना बलवती एवं इच्छित फलदात्री नहीं हो सकती। इसीलिये त्यागमय साधु जीवन को साधना के लिये उपयुक्त माना गया है। गृहस्थ जीवन में अनेकों जिम्मेदारियां होती है, अपने परिवार के भरण-पोषण और लोक-व्यवहार एवं सामाजिक नियमों को सुव्यवस्थित संचालित करने के लिये विविध प्रवृत्तियों में व्यस्त रहना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-August
साधनाएं नियमित रूप में चलती रहती हैं। अखण्ड अग्नि पर नित्य गायत्री यज्ञ होता रहता है। प्रधान यज्ञशाला अब नये सिरे से बहुत ही सुन्दर बनाई है। उसके फर्श पर संगमरमर जड़ा लाना शेष है। जब तक यह प्रधान यज्ञशाला बनकर पूर्ण न हो जायगी तब तक छोटी दाहिनी यज्ञशाला में दैनिक हवन चलता रहेगा।
साधना तथा साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के विभिन्न कार्यक्रमों में बड़ी तत्परतापूर्वक संलग्न है। इस उत्साह को देखकर यह निश्चय दिन-दिन दृढ़ होता चला जा रहा है कि नैतिक, चारित्रिक, आत्मिक, धार्मिक, साँस्कृतिक एवं सामाजिक पुनरुत्थान के युग परिवर्तनकारी संकल्प को पूरा करने में यह संगठन महत्वपूर्ण योग दे सकेगा।
साधना में लगे। अधिकाँश ब्राह्मण भी अपने शास्त्र विहित कर्तव्य कर्मों को परित्याग करके विद्या पढ़ना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, इन छह कर्मों को त्याग कर, दान देने के लिये दान लेने की बात को भूलकर केवल अपने निज के उपयोग के लिये ही निमन्त्रण तथा दक्षिणा लेने तक सीमित हो गये।
साधना करें। 24 हजार का एक लघु अनुष्ठान तो बहुत आसानी से किया जा सकता है। इस मास छोटे-छोटे सामूहिक यज्ञ हर जगह किए जाने चाहिए।
साधना के अतिरिक्त कुछ अधिक साधना करें। 24 हजार का एक लघु अनुष्ठान तो बहुत आसानी से किया जा सकता है। इस मास छोटे-छोटे सामूहिक यज्ञ हर जगह किए जाने चाहिए।
साधनाओं में कवच, कीलक, अर्गल का उपयोग करना पड़ता है। जब गायत्री की ताँत्रिक उपासना की जाती है तब कवच, न्यास, शाप, मोचन, कीलक, अर्गल- 24 मुद्राएं करनी होती हैं। यह एक प्रक्रिया विशेष का संकेत है। चारों वेदों की जननी को, ज्ञान विज्ञान की आदि गंगोत्री को कोई ऋषि शाप देगा और वह भी गायत्री के मन्त्र दृष्टा विश्वामित्र द्वारा शाप दिया जायगा यह बातें समझ से बाहर की हैं। संस्कृत की किसी पुस्तक में कोई बात कहीं लिखी मिले तो उसे वेद-वाक्य ही नहीं मान लेना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-February
साधना ही सरल सुलभ है, प्रत्यक्ष फलदायिनी है। इसका आश्रय लेने वाला कभी निराश व हताश नहीं हुआ। किन्तु लगन की आवश्यकता है। इससे अपनी बुराइयाँ अपने आप विलीन होकर उत्साहवर्धक एवं जनहित कल्याणकारी मार्ग में प्रगति होती है। हमारी भारतीय संस्कृति का एक मात्र आधार हैं?
साधना को बढ़ाते जाइये। नियमितता, दृढ़ता एवं तत्परता से इनका पालन करना आवश्यक है। साधना का समय, परिमाण आदि प्रतिदिन आध्यात्मिक डायरी में लिखिए। प्रतिमास उसकी समालोचना करके अपनी त्रुटियों को सुधारते रहिए।
साधना में एक विलक्षण बात यह है कि साधक का सारा प्रयत्न सहज सिद्ध अवस्था को प्राप्त करने के लिए होता है। अन्त में वह जान जाता है कि समस्त साधनाओं का एकमात्र लक्ष्य अपने स्वरूप का ज्ञान ही है। ऐसा ज्ञान प्राप्त होने पर वह अपने सीमित व्यष्टि-भाव को त्यागकर यह अनुभव करता है कि वह वास्तव में परमात्मा से अभिन्न है और परमात्मा सभी पदार्थों में विद्यमान है।
साधना, जप, तप, योग, समाधि करने वाले अन्य महात्माओं की अपेक्षा भगवान को अधिक प्यारी लगी और वे भगवान के पास बे रोक-टोक चाहे जब आने-जाने का अधिकार प्राप्त कर सके। पुराणों को पढ़ने से प्रतीत होता है कि यह अधिकार अपनी व्यक्तिगत साधना में लगे हुए अन्य किसी ऋषि को नहीं मिल सका था। नारद जी ही वीणा बजाते हुए चाहे जब विष्णु लोक में जा धमकते थे और भगवान को अपनी शंकाओं का उत्तर देने को विवश कर लेते थे। इतनी बड़ी सफलता का कारण नारद की सर्वश्रेष्ठ धर्म-प्रचार साधना ही थी। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य, भगवान बुद्ध, मीरा, दयानन्द, गाँधी आदि प्रमुख सन्तों का जीवन इसी मार्ग में लगा है।
साधना के विभिन्न स्तर आध्यात्मिक पूर्णता की स्थिति के निकट पहुँचने की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। साधना उतने ही अंश में पूर्ण होती है जितने अंश में वह इस आध्यात्मिक आदर्श को व्यक्त करती है अर्थात् जितने अंश में वह पूर्ण जीवन के सदृश्य होती है। इस प्रकार साधन और साध्य में जितना ही कम अन्तर होता है, साधना उतनी ही पूर्ण होती है। और जब साधना पूर्ण हो जाती है तब साधना आध्यात्मिक साध्य में जाकर मिल जाती है और इस प्रकार साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
साधना प्रारम्भ कर दी है। परिवार के सभी साधकों में बड़ा उत्साह है।
साधना आध्यात्मिक साध्य में जाकर मिल जाती है और इस प्रकार साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
साधना व स्वाध्याय में बिताइए। गुरु या कोई सन्त महात्मा के सत्संग में रह कर साधना करिए।
साधना में लगे रहे। इसके प्रभाव से गर्भ का मृत बालक बिना आपरेशन के बाहर निकल आया और मेरा दूसरा जन्म हुआ। ऐसी माता और गुरुजी को हम जन्म-जन्मान्तर तक न भूलेंगे।”
साधनायें करते रहना चाहिए। मन में किसी प्रकार के विकार के आते ही सावधान हो जाना चाहिए। श्री दुर्गाशंकर नागर ने एक स्थान पर लिखा है-
साधना में संलग्न रहकर सुखी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। प्रारब्धवश पिछले वर्ष मुझे मृत गर्भ की विपत्ति का सामना करना पड़ा। नागपुर और सतना के श्रेष्ठ डॉक्टर और डॉक्टरनी उसका ठीक निदान न कर पाये और मेरी जान पूरे 9 स्वयं मास संकट में रही। तो भी हम माता पर पूर्ण विश्वास रख कर साधना में लगे रहे। इसके प्रभाव से गर्भ का मृत बालक बिना आपरेशन के बाहर निकल आया और मेरा दूसरा जन्म हुआ।
साधना करने पर भी उपलब्ध करना कठिन है। शारीरिक विकारों से अस्त, मानसिक अपूर्णता एवं उद्वेगों से ग्रस्त, सुसन्तति के लिए तरसने वाले, चिन्ता और भय से परेशान, आपत्तिग्रस्त व्यक्ति इस अवसर पर भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अन्तःकरण पर चढ़े हुए कुसंस्कारों को जलाने के लिए यह अवसर सोने को तपाकर शुद्ध करने जैसा ही है। भीतर के तमोगुण को हटाकर आत्मा में दिव्य सतोगुण की स्थापना ऐसे अवसरों पर ही होती है। विश्व शाँति, साँस्कृतिक पुनरुत्थान एवं देवत्व की अभिवृद्धि के सार्वभौम लाभ तो होंगे ही, साथ ही, जो लोग इस यज्ञ में शामिल रहेंगे, वे व्यक्तिगत सत्परिणाम भी आशाजनक मात्रा में प्राप्त कर सकेंगे।
साधना के अनेक भेद हो सकते हैं। प्रत्येक साधक के लिए उसके संस्कारों और मनोवृत्ति के अनुकूल साधना प्रणाली में कुछ अन्तर किया जा सकता है। इस प्रकार सबका साधना-ध्येय एक होने पर भी विशेष साधक का साधन भिन्न हो सकता है।
साधना-ध्येय एक होने पर भी विशेष साधक का साधन भिन्न हो सकता है।
साधना तभी सफल समझी जा सकती है जब वह साधक के जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य के अनुकूल बनाने में समर्थ होती है और वह उद्देश्य होता है जीव मात्र को ब्रह्म भाव की आनन्दमय अनुभूति कराना। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने साधन को इस ध्येय के स्वरूप के सर्वथा अनुकूल बनावें।
साधना में लगे हुए अन्य किसी ऋषि को नहीं मिल सका था। नारद जी ही वीणा बजाते हुए चाहे जब विष्णु लोक में जा धमकते थे और भगवान को अपनी शंकाओं का उत्तर देने को विवश कर लेते थे। इतनी बड़ी सफलता का कारण नारद की सर्वश्रेष्ठ धर्म-प्रचार साधना ही थी। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य, भगवान बुद्ध, मीरा, दयानन्द, गाँधी आदि प्रमुख सन्तों का जीवन इसी मार्ग में लगा है। आज भी संत बिनोवा सर्वोदय एवं भूदान के लिए पैदल यात्रा करके सच्ची तीर्थ-यात्रा का उदाहरण उपस्थित कर रहे हैं।
साधना का अर्थ यह नहीं हैं कि मनुष्य कठोर नियमों के बन्धन में बंधा रहे। कोई एक अटल नियम ऐसा नहीं हो सकता जिसको अनिवार्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति पर लागू किया जाय। आध्यात्मिक क्षेत्र में साधना के अनेक भेद हो सकते हैं। प्रत्येक साधक के लिए उसके संस्कारों और मनोवृत्ति के अनुकूल साधना प्रणाली में कुछ अन्तर किया जा सकता है। इस प्रकार सबका साधना-ध्येय एक होने पर भी विशेष साधक का साधन भिन्न हो सकता है।
साधना से भिन्न प्रकार की होती है, क्योंकि आध्यात्मिक क्षेत्र का ध्येय भी भौतिक क्षेत्र के ध्येय से भिन्न प्रकार का होता है। भौतिक क्षेत्र का ध्येय एक ऐसा पदार्थ है जिसका काल की दृष्टि से आदि और अन्त होता है और जिसका उद्देश्य किसी अन्य वस्तु का प्राप्त करना होता है। किन्तु आध्यात्मिक साधना का ध्येय ऐसी वस्तु की प्राप्ति होता है जो सदा रही है, सदा रहेगी और इस समय भी हमारे ही अन्तर में मौजूद है।
साधना के प्रत्येक अंग का ध्येय जीवन के सभी स्तरों में ईश्वरत्व की प्राप्ति होना चाहिए। इस दृष्टि से आध्यात्मिक साधना के विभिन्न स्तर आध्यात्मिक पूर्णता की स्थिति के निकट पहुँचने की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। साधना उतने ही अंश में पूर्ण होती है जितने अंश में वह इस आध्यात्मिक आदर्श को व्यक्त करती है अर्थात् जितने अंश में वह पूर्ण जीवन के सदृश्य होती है। इस प्रकार साधन और साध्य में जितना ही कम अन्तर होता है, साधना उतनी ही पूर्ण होती है। और जब साधना पूर्ण हो जाती है तब साधना आध्यात्मिक साध्य में जाकर मिल जाती है और इस प्रकार साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
साधना करिए।
साधना ऐसी होनी चाहिए कि वह हमारे जीवन को उस जीवन के अधिकाधिक निकट ले जाय जिसे हम आध्यात्मिक समझते हैं। आध्यात्मिक साधना का ध्येय किसी सीमित अभीष्ट की प्राप्ति करना नहीं होता जो कुछ दिन स्थिर रहकर फिर मिट जाय। वरन् उसका उद्देश्य जीवन का ऐसा आमूल परिवर्तन होता है जिससे कि वह सदा के लिए चिरस्थायी महान सत्य को प्राप्त कर सके। कोई साधना तभी सफल समझी जा सकती है जब वह साधक के जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य के अनुकूल बनाने में समर्थ होती है और वह उद्देश्य होता है जीव मात्र को ब्रह्म भाव की आनन्दमय अनुभूति कराना। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने साधन को इस ध्येय के स्वरूप के सर्वथा अनुकूल बनावें।
साधना का समय, परिमाण आदि प्रतिदिन आध्यात्मिक डायरी में लिखिए। प्रतिमास उसकी समालोचना करके अपनी त्रुटियों को सुधारते रहिए।
साधना के अतिरिक्त उनका शेष सारा समय इसी धर्म सेवा में लगता है। यही प्राचीन परम्परा है। संसार की इस अत्यन्त महत्वपूर्ण सुख शान्ति स्थापित करने की सच्ची प्रक्रिया को चलाने के कारण ही सन्त महात्माओं का इतना मान होता है। इसी से उनके चरणों में मस्तक झुकाया जाता है। उनके अमूल्य कार्यक्रम में किसी अभाव के कारण बाधा न पहुँचे, इसी दृष्टि से जनता उन्हें समय-समय पर दान-दक्षिणा देकर अपने को पुण्य फल का अधिकारी मानती है।
साधना प्रणाली में कुछ अन्तर किया जा सकता है। इस प्रकार सबका साधना-ध्येय एक होने पर भी विशेष साधक का साधन भिन्न हो सकता है।
साधना को सर्वांग पूर्ण बनाते थे। महर्षि अश्विनीकुमार, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट, शार्गंधर, माधव प्रभृति असंख्य ऋषियों ने अपना सम्पूर्ण जीवन ही मानव जाति की आरोग्य सेवा में लगाया था।
साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती।”
साधना ही थी। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य, भगवान बुद्ध, मीरा, दयानन्द, गाँधी आदि प्रमुख सन्तों का जीवन इसी मार्ग में लगा है। आज भी संत बिनोवा सर्वोदय एवं भूदान के लिए पैदल यात्रा करके सच्ची तीर्थ-यात्रा का उदाहरण उपस्थित कर रहे हैं। तीर्थ यात्रा का पुण्य ऐसी ही उद्देश्य पूर्ण, विवेक पूर्ण धर्म-फेरी से होना संभव हैं। अब वह समय आ गया है जब सच्ची परिक्रमा, सच्ची धर्म-फेरी और सच्ची तीर्थ यात्रा का मर्म समझ लिया जाय और उसी के लिए कटिबद्ध हुआ जाय।
साधना का उद्देश्य होता है। इस दृष्टि से मोक्ष के साधनों में साँसारिक विषयों के बाहरी त्याग की गणना की जाती है। तथापि वह सर्वथा आवश्यक नहीं है। वास्तव में आवश्यकता है साँसारिक विषयों की स्पृहा या आकाँक्षा के भीतरी त्याग की। जब इस स्पृहा का त्याग हो जाता है, तब इस संसार के पदार्थों का त्याग गौण हो जाता है।
साधना तथा बच्चे की तपस्या दोनों ही सफल है। बड़ा होने पर उसे अवश्य ही कोई अच्छी नौकरी मिल जायेगी। अच्छी नौकरी पाना ही जब सब प्रकार से जीवन का उद्देश्य हो जाय तो मानसिक विकास का प्रश्न ही कहाँ रहा? आजकल तो विद्या और नौकरी पर्यायवाची शब्द बन गये हैं। ऐसी हालत में प्रत्येक मनुष्य स्वार्थ-साधन में तल्लीन रहेगा, इसके सिवाय उससे और किस बात की आशा की जा सकती है?
साधना के गम्भीर स्तरों में साधना का अर्थ होता है- (1) ज्ञान-मार्ग, (2) कर्म-मार्ग, (3) भक्ति-मार्ग का अनुसरण। ज्ञान के साधन का स्वरूप होता है। (क) यथार्थ बोध से उत्पन्न होने वाले वैराग्य का अभ्यास और (ख) ध्यान की भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं और अन्तःप्रज्ञा का निरन्तर उपयोग।
साधना का ध्येय ऐसी वस्तु की प्राप्ति होता है जो सदा रही है, सदा रहेगी और इस समय भी हमारे ही अन्तर में मौजूद है।
साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
साधना
साधना उतने ही अंश में पूर्ण होती है जितने अंश में वह इस आध्यात्मिक आदर्श को व्यक्त करती है अर्थात् जितने अंश में वह पूर्ण जीवन के सदृश्य होती है। इस प्रकार साधन और साध्य में जितना ही कम अन्तर होता है, साधना उतनी ही पूर्ण होती है। और जब साधना पूर्ण हो जाती है तब साधना आध्यात्मिक साध्य में जाकर मिल जाती है और इस प्रकार साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
साधना का अर्थ होता है- (1) ज्ञान-मार्ग, (2) कर्म-मार्ग, (3) भक्ति-मार्ग का अनुसरण। ज्ञान के साधन का स्वरूप होता है। (क) यथार्थ बोध से उत्पन्न होने वाले वैराग्य का अभ्यास और (ख) ध्यान की भिन्न-भिन्न प्रक्रियाएं और अन्तःप्रज्ञा का निरन्तर उपयोग।
साधना उतनी ही पूर्ण होती है। और जब साधना पूर्ण हो जाती है तब साधना आध्यात्मिक साध्य में जाकर मिल जाती है और इस प्रकार साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
साधना उपासना के लिए गोरेगाँव (बम्बई) से श्री आचार्य जी के पास तपोभूमि मथुरा में आ गये हैं। इसलिए जो सज्जन उनसे पत्र व्यवहार करे वे अब “गायत्री तपोभूमि, मथुरा” के पतेदार पत्र भेजें।
साधना पूर्ण हो जाती है तब साधना आध्यात्मिक साध्य में जाकर मिल जाती है और इस प्रकार साधना और साध्य का भेद अखण्ड सत्ता की अविकल पूर्णता में लीन हो जाता है।
साधना के गम्भीर स्तरों में प्रवेश करना पड़ता है। जब साधक इस भूमिका में पहुँच जाता है तब धर्म का बाह्य रूप उसके लिए गौण हो जाता है और उसकी रुचि धर्म के उन मूल तत्वों की ओर हो जाती है जो सभी बड़े-बड़े मजहबों में व्यक्त हुए हैं। सच्ची आध्यात्मिकता उस जीवन को कहते हैं जिसके मूल में आध्यात्मिक बोध और उसका व्यवहार रहता है।
साधना का स्वरूप अपने-अपने धर्मों द्वारा निर्दिष्ट क्रिया-कलाप का बाह्य अनुष्ठान ही होता है। प्रारम्भिक अवस्थाओं में इस अनुष्ठान का भी एक महत्व होता है, क्योंकि इससे आत्मशुद्धि और मनोनिग्रह में सहायता मिलती है। पर बाद में साधक को ऊपरी नियमों के पालन की अवस्था से ऊंचा उठकर आध्यात्मिक साधना के गम्भीर स्तरों में प्रवेश करना पड़ता है। जब साधक इस भूमिका में पहुँच जाता है तब धर्म का बाह्य रूप उसके लिए गौण हो जाता है और उसकी रुचि धर्म के उन मूल तत्वों की ओर हो जाती है जो सभी बड़े-बड़े मजहबों में व्यक्त हुए हैं। सच्ची आध्यात्मिकता उस जीवन को कहते हैं जिसके मूल में आध्यात्मिक बोध और उसका व्यवहार रहता है।
साधना का ध्येय किसी सीमित अभीष्ट की प्राप्ति करना नहीं होता जो कुछ दिन स्थिर रहकर फिर मिट जाय। वरन् उसका उद्देश्य जीवन का ऐसा आमूल परिवर्तन होता है जिससे कि वह सदा के लिए चिरस्थायी महान सत्य को प्राप्त कर सके। कोई साधना तभी सफल समझी जा सकती है जब वह साधक के जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य के अनुकूल बनाने में समर्थ होती है और वह उद्देश्य होता है जीव मात्र को ब्रह्म भाव की आनन्दमय अनुभूति कराना। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने साधन को इस ध्येय के स्वरूप के सर्वथा अनुकूल बनावें।
साधना करने का निश्चय, व्रत या संकल्प कीजिए और प्रतिवर्ष नया संकल्प करके साधना को बढ़ाते जाइये। नियमितता, दृढ़ता एवं तत्परता से इनका पालन करना आवश्यक है। साधना का समय, परिमाण आदि प्रतिदिन आध्यात्मिक डायरी में लिखिए। प्रतिमास उसकी समालोचना करके अपनी त्रुटियों को सुधारते रहिए।
साधना में प्रयत्न रहता ही है और कभी-कभी तो घोर प्रयत्न करना पड़ता है- उदाहरणतः उस साधक को जो प्रलोभनों के रहते वैराग्य के लिए चेष्टा करता है। परन्तु प्रेम के प्रयत्नों का भाव नहीं रहता, क्योंकि प्रेम करना नहीं पड़ता, अपने आप होता हैं। स्वाभाविकपन ही सच्ची ईश्वर प्राप्ति का स्वरूप है। ज्ञान की सबसे ऊंची अवस्था को, जिसमें चित्त सर्वथा तत्त्वाकार हो जाता है, सहजावस्था कहते हैं-जिसमें स्वरूप का ज्ञान अबाधित रहता है। आध्यात्मिक साधना में एक विलक्षण बात यह है कि साधक का सारा प्रयत्न सहज सिद्ध अवस्था को प्राप्त करने के लिए होता है।
साधना अवश्य ही भौतिक क्षेत्र की साधना से भिन्न प्रकार की होती है, क्योंकि आध्यात्मिक क्षेत्र का ध्येय भी भौतिक क्षेत्र के ध्येय से भिन्न प्रकार का होता है। भौतिक क्षेत्र का ध्येय एक ऐसा पदार्थ है जिसका काल की दृष्टि से आदि और अन्त होता है और जिसका उद्देश्य किसी अन्य वस्तु का प्राप्त करना होता है। किन्तु आध्यात्मिक साधना का ध्येय ऐसी वस्तु की प्राप्ति होता है जो सदा रही है, सदा रहेगी और इस समय भी हमारे ही अन्तर में मौजूद है।
साधनाओं का एकमात्र लक्ष्य अपने स्वरूप का ज्ञान ही है। ऐसा ज्ञान प्राप्त होने पर वह अपने सीमित व्यष्टि-भाव को त्यागकर यह अनुभव करता है कि वह वास्तव में परमात्मा से अभिन्न है और परमात्मा सभी पदार्थों में विद्यमान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-January
साधना नाम नेकता।
उपास्या नाम नियमः एतर्द्धमस्य लक्षणम्॥
साधनाओं की अनेकता और उपास्य-देवों का अनियम, यह धर्म के लक्षण हैं।”
साधना में लगे रहने को कहा। माता की कृपा से इसी 14 अगस्त को इनके घर में 18 वर्ष के बाद पुत्र का जन्म हुआ, जिससे सबको बड़ा आश्चर्य और प्रसन्नता हुई।
साधनाओं की अनेकता और किसी एक उपास्य का अभाव भी यही बतलाता है कि सारे हिन्दुओं का हिन्दु-धर्म कोई विशिष्ट सर्व-साधारण धर्म नहीं है। हिन्दुओं के धर्म अनेक हैं और उनमें एकसूत्रता नहीं पाई जाती।
साधना का स्वरूप है और यही जादू है। (आ) प्राकृतिक वस्तु पूजा भी हिन्दु-धर्म में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। गंडकी नदी के काले शालिग्राम, नर्मदा के ताम्र वर्ण गोल पत्थर, गंगा, जमुना, कृष्णा, गोदावरी आदि नदियाँ, पीपल, बड़, बेल, तुलसी, आँवला आदि वनस्पतियाँ, गाय, बन्दर, महिष, मछली, हाथी, नाग, गरुड़, मयूर, हंस आदि पशु-पक्षी, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल आदि का आकाशस्थ पिण्ड, अग्नि, वायु, वर्षा आदि प्राकृतिक घटनायें आदि सभी का पूजा करने का विधान हिन्दु-धर्म में मौजूद है। नाग और गाय तो स्वतंत्र देव बने हुये हैं। सूर्य, चन्द्र आदि नवग्रहों की आराधना वर्तमान हिन्दु-धर्म में बड़े महत्व की बात मानी गई है।
साधना करने पर भी उपलब्ध करना कठिन है। शारीरिक विकारों से त्रस्त, मानसिक अपूर्णता एवं उद्वेगों से ग्रस्त, सुसन्तति के लिए तरसने वाले, चिन्ता और भय से परेशान, आपत्तिग्रस्त व्यक्ति इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अन्तःकरण पर चढ़े हुए कुसंस्कारों को जलाने के लिए यह अवसर सोने को तपाकर शुद्ध करने जैसा ही है। भीतर के तमोगुण को हटाकर आत्मा में दिव्य सतोगुण की स्थापना ऐसे अवसरों पर ही होती है। विश्व-शान्ति, साँस्कृतिक पुनरुत्थान एवं देवत्व की अभिवृद्धि के सार्वभौम लाभ तो होंगे ही, साथ ही इस यज्ञ में सम्मिलित रहने वाले व्यक्तिगत सत्परिणामों को भी आशाजनक मात्रा में प्राप्त कर सकेंगे।
साधना। अपने किसी खास मनोरथ की पूर्ति के लिये अथवा आने वाली आपत्तियों के निवारण के लिये किसी खास पदार्थ, खास क्रिया या खास मन्त्रों का प्रयोग इस विश्वास से करना कि उनमें कोई खास प्रभाव समाया है, यही साधना का स्वरूप है और यही जादू है। (आ) प्राकृतिक वस्तु पूजा भी हिन्दु-धर्म में पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। गंडकी नदी के काले शालिग्राम, नर्मदा के ताम्र वर्ण गोल पत्थर, गंगा, जमुना, कृष्णा, गोदावरी आदि नदियाँ, पीपल, बड़, बेल, तुलसी, आँवला आदि वनस्पतियाँ, गाय, बन्दर, महिष, मछली, हाथी, नाग, गरुड़, मयूर, हंस आदि पशु-पक्षी, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल आदि का आकाशस्थ पिण्ड, अग्नि, वायु, वर्षा आदि प्राकृतिक घटनायें आदि सभी का पूजा करने का विधान हिन्दु-धर्म में मौजूद है। नाग और गाय तो स्वतंत्र देव बने हुये हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-June
साधनाओं (योगासन, प्राणायाम, ध्यान, यम-नियम) में तल्लीन होते हैं, क्योंकि भौतिक सुख की अपेक्षा आत्मिक सुख को ही वे प्रधानता देते हैं। योगियों ने विश्वात्मा से मिलन के अपने अनुभव लेखबद्ध किए हैं। अतः योग का चमत्कार जानने और अनुभव करने के लिए यह आवश्यक है कि जिज्ञासु स्वाध्याय या आत्मवादियों, योगियों एवं विद्वानों के सत्संग द्वारा योग विद्या को भली प्रकार समझें। आजकल तो केवल आसन और प्राणायाम मात्र ही करना योग हो गया है। ये तो शरीर के स्वास्थ्य के लिए गौण योगिक साधन हैं, प्रधान तो मनोयोग और आत्मयोग हैं।
साधना का ही है। उस समय योगी मृगछाला इसलिए पहनते थे कि वह आसानी से मरे पड़े हुए मृगों से मिल जाती थी। आजकल बन्दूक की गोली से मरे हुए जानवर की खाल होती है, वह निन्दनीय है। अब चिमटे की आवश्यकता नहीं रह गई है। योगिराज अरविन्द, महात्मा गाँधी जी, स्वामी दयानन्दजी, स्वामी शिवानन्दजी आदि की तरह का सीधा साधा जीवन ही उपयुक्त है।
साधना क्या है? मानव अन्तस्थल में जो शुद्ध-बुद्ध चैतन्य अमर सत्ता है,वही परमात्मा है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चतुष्टय को जीव कहते हैं। यह जीव आत्मा से भिन्न भी है और अभिन्न भी है। इसे द्वैत भी कह सकते हैं, अद्वैत भी।
साधना।
साधना प्रतिफलित करने के लिए संत कबीर ने अपने ब्रह्म के लिए प्रतीकों का आश्रय ग्रहण किया। उन्होंने अपने ब्रह्म से मानसिक सम्बन्ध जोड़ा और ब्रह्म को अनेक प्रकार से अपने समीप समीप लाने की विधि सोची। उन्होंने ब्रह्म को गुरु, राजा, पिता, माता, स्वामी, मित्र और पति के रूप में मानने की शैली अपनाई। ब्रह्म का गुरु रूप देखिए।
साधना कहते हैं। यह योग-साधना प्रत्येक उच्च प्रवृत्तियों वाले साधक के जीवन का नित्य कर्म होना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अनुसार सच्ची सुख-शाँति का आधार योग-साधना ही है। योग द्वारा साँसारिक संघर्षों से व्यथित मनुष्य अन्तर्मुखी होकर आत्मा के निकट बैठता है, तो उसे अमित शान्ति का अनुभव होता है।
साधना द्वारा आत्मा का जब परमात्मा से मिलन होता है, तो बिछुड़ी हुई माता और छोटी स्तनपान करने वाली कन्या के मिलने से मन की जो दशा होती है, वही आनंददायक अनुभूति हमें प्राप्त होती है।
साधना के चमत्कार।
साधनाएं बनाई हैं उनमें पंचयज्ञ का विशिष्ट स्थान है। इन पाँच यज्ञों के नाम हैं-ब्रह्म-यज्ञ, देव-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, भूत-यज्ञ तथा नृयज्ञ अतिथि-यज्ञ। ये पाँचों प्रकार के यज्ञ सदा से भारतीय संस्कृति के गौरव की वस्तु रहे हैं। प्राचीन समय में प्रायः प्रत्येक हिन्दू-परिवार में प्रतिदिन ये यज्ञ किये जाते थे। इनमें भी अतिथि-यज्ञ पर विशेष जोर दिया जाता था और अनेक लोगों का यह नियम रहता था कि वे बिना किसी अतिथि को खिलाये स्वयं भोजन नहीं करते थे।
साधना सर्वाधिक फलदायिनी है। गायत्री की साधना करने वाले को किसी प्रकार का भय नहीं हो सकता। शास्त्र में कहा गया है-
साधना के क्षेत्र में योग और प्रेम को जो महत्व दिया है, यह क्रमशः नाथ सम्प्रदाय और सूफी मत का प्रभाव ही माना जा सकता है। यद्यपि प्रेम का महत्व वैष्णव भक्ति से भी समर्थित होता है, परन्तु प्रेम की मादकता जो अनेक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत की गयी है, वह निश्चय ही सूफी मत से प्राप्त की हुई ज्ञात होती है।
साधना से प्रत्येक साधक की मनोकामना अवश्य सिद्ध हो सकती है। भगवान मनु ने कहा है कि सब प्रकार के यज्ञों और जपों से गायत्री की साधना सर्वाधिक फलदायिनी है। गायत्री की साधना करने वाले को किसी प्रकार का भय नहीं हो सकता। शास्त्र में कहा गया है-
साधना के जप, हवन कृत्यों के साथ ही सद्ज्ञान प्रसार साहित्य द्वारा ब्रह्मभोज करना ही आवश्यक धर्म कृत्य मानते हैं। जहाँ भी ब्रह्मभोज की आवश्यकता हो वहाँ सद् साहित्य प्रसार का कार्य किया जाना चाहिये। लोगों के भावना स्तर को ऊँचा उठाने के लिये यह एक आवश्यक प्रक्रिया है।
साधना पूर्ण न मानी जायगी।
साधना विधान, अर्थ तथा सन्देश इन पुस्तकों में बड़े प्रभावशाली एवं सुबोध रूप से लिखा गया है। यह सस्ता सैट प्रत्येक धर्म-प्रेमी को अपने घर पर रखना चाहिए। स्वयं पढ़ना तथा दूसरों को पढ़ाना चाहिए। यह 52 पुस्तकें घर में गायत्री पुस्तकालय स्थापना का उद्देश्य पूर्ण करती हैं। मूल्य प्रत्येक का चार आना।
साधना करने वाले को किसी प्रकार का भय नहीं हो सकता। शास्त्र में कहा गया है-
साधना ही है। योग द्वारा साँसारिक संघर्षों से व्यथित मनुष्य अन्तर्मुखी होकर आत्मा के निकट बैठता है, तो उसे अमित शान्ति का अनुभव होता है।
साधना के लिए जरूरी हैं।
साधना अधिकाँश धर्म प्रेमी करते रहे हैं। गायत्री से होने वाले सब लाभों का वर्णन कर सकना असंभव है। सृष्टि के आदि से असंख्यों व्यक्ति इस मंत्र को जपते आये हैं, इसके फलस्वरूप इसकी शक्ति और प्रभाव में अत्यन्त वृद्धि हो गई है और इसकी साधना से प्रत्येक साधक की मनोकामना अवश्य सिद्ध हो सकती है। भगवान मनु ने कहा है कि सब प्रकार के यज्ञों और जपों से गायत्री की साधना सर्वाधिक फलदायिनी है। गायत्री की साधना करने वाले को किसी प्रकार का भय नहीं हो सकता।
साधना का प्रथम लाभ तो यह होता है कि मन शान्त हो जाता है। अशाँत मन में योग का आधार नहीं हो जाता है। विचारों का तूफान आने पर भी योगी का मन स्थिर और अविचल बना रहता है। दूसरा लाभ एकाग्रता है। निरन्तर ध्यान और चिन्तन करने से एकाग्रता की वृद्धि होती है।
साधना प्रत्येक उच्च प्रवृत्तियों वाले साधक के जीवन का नित्य कर्म होना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अनुसार सच्ची सुख-शाँति का आधार योग-साधना ही है। योग द्वारा साँसारिक संघर्षों से व्यथित मनुष्य अन्तर्मुखी होकर आत्मा के निकट बैठता है, तो उसे अमित शान्ति का अनुभव होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-March
साधना, उपासना, आस्तिकता, ईश्वर भक्ति, धर्म भावना, आध्यात्मिकता का वातावरण उत्पन्न करना इस यज्ञ का प्रधान उद्देश्य है। जप, तप, व्रत, उपवास करके आने वाले नैष्ठिक याज्ञिकों के द्वारा इतने विशाल परिमाण में गायत्री महामंत्र की आहुतियाँ दी जायेंगी। उनका प्रचण्ड आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न होगा। यज्ञ में सम्मिलित होने वाले याज्ञिकों भागीदारों को तो उसका विशेष लाभ मिलेगा ही साथ ही विश्वव्यापी धर्म प्रवाह की शक्ति तरंगें भी इसके द्वारा प्रचुर परिमाण में उत्पन्न होंगी। यज्ञ लौकिक और पारलौकिक सुख शान्ति की श्रेष्ठ साधना है।
साधना में रही त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
साधना करते-करते स्वर्गलोक सिधार गये। परिवार के सब सदस्यों ने एकत्रित होकर उनकी आत्मा की शाँति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
साधना करते हैं। इसके परिणाम स्वरूप शीघ्र ही इनकी नौकरी में तरक्की हो गई और सहकारी कर्मचारी भी विशेष सम्मान करने लगे। माता की कृपा से इनकी बतलाई बातें प्रायः ठीक ही निकल जाती हैं इससे दफ्तर के कर्मचारी इनको बाबाजी कहने लग गये हैं।
साधना की सूचना हमें दे देंगे उनकी साधना में रही त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
साधना है। देव तत्वों की तृप्ति और पुष्टि यज्ञ द्वारा होती है। आरोग्यवर्धक वातावरण तैयार करना, सूक्ष्म जगत में सदप्राण की मात्रा बढ़ाना और मानव जाति के मन क्षेत्र में सतोगुणी प्रेरणाएं उत्पन्न करना इस यज्ञ का उद्देश्य है। आध्यात्मिक विज्ञान के महान साधनों का कर्मकाण्डों का उपयोग इस यज्ञ में होगा और उन्हें सम्पन्न करने के लिए अनेकों उच्च कोटि के तपस्वी एवं सिद्ध पुरुष इस साधन को सुसम्पन्न करने के लिए कृपा-पूर्वक पधारने का अनुग्रह करेंगे।
साधना और श्रद्धा की कड़ी परीक्षा देकर आने वाले नैष्ठिक एवं संस्कृति पुनरुत्थान में सजीव दिलचस्पी रखने वालों एवं उस दिशा में कुछ ठोस काम करने के इच्छुक लोगों का यह एक ऐसा सजीव धार्मिक सम्मेलन है जैसा हजारों वर्षों से नहीं हुआ। यों अन्ध श्रद्धा वाली जनता की भीड़ तो हर सोमवती अमावस्या पर गंगा के किनारे इससे भी बड़ी संख्या में देखी जा सकती है। सावन के झूले तमाशे देखने मथुरा वृन्दावन में तथा गोवर्द्धन की परिक्रमा लगाने में इससे भी कहीं अधिक नरमुण्ड देखे जा सकते हैं। पर ऐसे लोग जो गायत्री और यज्ञ के तत्व ज्ञान को गहराई तक समझ चुके हैं और भारत भूमि में धार्मिक भावनाओं की प्रतिष्ठापना करने के लिए दिल में कुछ आग रखते हों कुछ कर मिटने और मर मिटने की चाह रखते हों ऐसे बीन-बीन कर संग्रह किये हुए लोग इतनी बड़ी संख्या में हजारों वर्षों से एक स्थान पर एकत्रित नहीं हुए। ऐसा महत्वपूर्ण एवं सारगर्भित सम्मेलन केवल एक अनुष्ठान पूजा-पाठ का कार्य ही होकर नहीं रह जाना है वरन् इस अवसर पर राष्ट्र को प्रकाश देने वाली ज्योति भी जलानी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-July
साधना की जो कठिन शर्त थी वह सरल हो जाने से जिनको इतनी अधिक साधना इतने कम समय में न कर सकने का भय था वह दूर हो रहा है।
साधना इतने कम समय में न कर सकने का भय था वह दूर हो रहा है।
साधना करेंगे तथा अपने-अपने क्षेत्रों में अगले वर्ष धर्म प्रचार का कर्म करने की, यज्ञानुष्ठान आयोजनों की तथा समाज सेवा की शिक्षा दी जाएगी। महायज्ञ की पूर्णाहुति के लिए यही शिक्षार्थी स्वयं-सेवकों का कार्य करेंगे। गायत्री-परिवार की प्रत्येक शाखा को अपने यहाँ से कुछ शिक्षार्थी स्वयं-सेवक भेजने का प्रयत्न करना चाहिए।
साधना की, ज्ञान पाया,
साधना उधार देदी जायगी जो अगले वर्ष वे पूरा कर सकेंगे। इस प्रकार साधना की जो कठिन शर्त थी वह सरल हो जाने से जिनको इतनी अधिक साधना इतने कम समय में न कर सकने का भय था वह दूर हो रहा है।
साधना करने तक ही सीमित न रह कर जो परिजन धर्म प्रचार का भी महत्व स्वीकार करते हैं और उसके लिए सक्रिय सहयोग एवं समय भी देते हैं, ऐसे ही धर्मनिष्ठ, कर्त्तव्य परायण लोक सेवी सज्जनों को गायत्री परिवार का आधार स्तम्भ माना जायगा। इन्हीं के कन्धों पर राष्ट्र में धर्म बुद्धि पैदा करने की जिम्मेदारी रहेगी। ऐसे लोगों को लेकर ही देश भर में गायत्री परिवार के मंडल बनाये जाएंगे और उन्हीं के द्वारा अ.भा. गायत्री परिवार का केन्द्रीय मन्त्रि-मण्डल बनेगा।
साधना अधिक बढ़ा देनी चाहिए। अगली आश्विन की नवरात्रि में परिवार के कार्यकर्त्ताओं पर महायज्ञ का बहुत भार आ जायगा। प्रतिदिन फुरसत मिलनी कठिन होगी। इसलिए नौ दिन का अनुष्ठान तथा जहाँ सम्भव है वहाँ छोटे-छोटे सामूहिक यज्ञ आयोजनों का कार्यक्रम भी इस अधिक श्रावण मास में ही बना देना चाहिए। ज्ञान मन्दिरों की स्थापना तथा दस व्यक्तियों को गायत्री साहित्य पढ़ा देने का ‘उपाध्याय’ कार्य इस अधिक श्रावण मास में पूरा कर लेना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-September
साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप ही ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेदमाता कहते हैं। चारों वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं।” गायत्री को जानने वाला वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।
साधना एक बहुमूल्य दिव्य सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को इकट्ठी करके साधन उसके बदले में साँसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है।
साधनाएँ गायत्री के आधार पर ही होती थीं। गायत्री महा विद्या से ही 84 प्रकार की महान योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना, कार्य पद्धति, तपस्या ही बना लें। महायज्ञ के दिनों में यह कार्य सौंपा गया है कि पूर्णाहुति की सूचना देने के लिए कम से कम 240 व्यक्तियों के पास जाया जाय। उन्हें एक-एक परिपत्र पुस्तिका दें और गायत्री तथा यज्ञ की महत्ता बताते हुए महायज्ञ में भाग लेने के लिए जनता को आमंत्रण देने के लिए धर्मफेरी लगावें, लोगों के घरों पर जावें। यह कार्य हर किसी के लिए सुगम है। इससे धर्म प्रचार का अभ्यास बढ़ेगा।
साधना से साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है। विवेक दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और ऋतम्भरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञानजन्य दुखों का निवारण हो जाता है। प्रारब्धवश, अनिवार्य कर्म फल के कारण कष्टसाध्य परिस्थितियाँ हर एक के जीवन में आती रहती हैं। हानि शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण विरोध, आघात आदि की विभिन्न परिस्थितियों से जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग, मृत्यु-तुल्य कष्ट पाते हैं वहाँ आत्मबल सम्पन्न गायत्री साधक अपने विवेक, ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा, धैर्य, सन्तोष संयम और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते हँसते आसानी से काट लेता है। बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी वह अपने आनन्द का मार्ग ढूंढ़ निकालता है और मस्ती, प्रसन्नता एवं निराकुलता का जीवन बिताता है।
साधना और 52 उपवासों का कठिन व्रत किसी साधक की धर्मनिष्ठा की कड़ी कसौटी है। जो व्यक्ति इतनी गहरी निष्ठा अपनी अन्तरात्मा में धारण किये हुए है उसकी श्रद्धा में सच्चे ब्राह्मणत्व की झाँकी जा सकती है। ऐसे परम निस्वार्थ लोग अत्यन्त विशाल संख्या में जिस पूर्णाहुति में बिना किसी अर्थ लोभ के यज्ञ करेंगे निश्चय ही वह अपने ढंग का अनोखा एवं असाधारण सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला महायज्ञ होगा।
साधनाएँ हैं। सभी का अपना-अपना महत्व है और परिणाम भी अलग अलग है। ‘स्वाध्याय’ से सन्मार्ग की जानकारी होती है। सत्संग से स्वभाव और संस्कार बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएँ जागृत होती हैं।
साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सबसे बड़ा लाभ आत्म कल्याण है। जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।
साधना इतनी बड़ी है, जिसके विस्तार की कल्पना करने से मनुष्य का मन कौतूहल से भर जाता है। लगभग एक लाख व्यक्ति इस साधन में संलग्न हैं। इतने बड़े जन-समूह द्वारा प्रतिदिन कई-कई घंटे साधना करना और 52 उपवास पूर्ण करना साधारण बात नहीं है। यह असाधारण आयोजन किसी व्यक्ति विशेष का कार्य नहीं वरन् उस महाशक्ति का ही क्रीड़ा कौतुक है जो युग निर्माण के लिए आवश्यक साधन तैयार करने में संलग्न है। उसी की प्रेरणा से इतना बड़ा आयोजन संभव हो सका।
साधना के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करनी पड़ेगी। तप शक्ति से परिपूर्ण मनुष्यों की आत्मशक्ति से ही ऐसे महान कार्य सम्पन्न हो सकते हैं जो भारत भूमि में ही नहीं सारे भूमंडल में सुख शान्ति की स्थापना करें।
साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते हैं। जिनके दाम्पत्य जीवन बड़े कर्कश थे, पति- पत्नी में कुत्ता बिल्ली का सा बैर रहता था, वहाँ प्रेम की निर्झरणी बहती देखी गई। भाई-भाई जो एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे उनमें भरत मिलाप हुआ। जो कुटुम्ब,परिवार क्लेश और कलह की अग्नि में झुलस रहे थे वहाँ शाँति की वर्षा हुई। फौजदारी ,मुकदमेबाजी ,कत्ल,चोरी, डकैती की आशंका से जहाँ हर घड़ी भय रहता था वहाँ निर्भयता का एकछत्र राज हुआ।
साधना करना और 52 उपवास पूर्ण करना साधारण बात नहीं है। यह असाधारण आयोजन किसी व्यक्ति विशेष का कार्य नहीं वरन् उस महाशक्ति का ही क्रीड़ा कौतुक है जो युग निर्माण के लिए आवश्यक साधन तैयार करने में संलग्न है। उसी की प्रेरणा से इतना बड़ा आयोजन संभव हो सका। अन्यथा इस युग में जब कि धर्म और साधना के नाम से लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं, इस मार्ग पर चलने वालों का उपहास करते हैं, स्वेच्छापूर्वक इतनी बड़ी साधना करने के लिए इतना बड़ा जन-समूह कैसे तैयार हो जाता? जब कि दक्षिणा देने पर भी यजमान द्वारा कराये जाने वाले जप अनुष्ठान को लोग पूरा नहीं करते तो फिर इतना बड़ा धर्मानुष्ठान बिना रत्ती भर भी स्वार्थ सिद्ध हुए इतने लोग इतनी बड़ी साधना करने को क्यों तैयार हो जाते ?
साधना ही काम करती है। भारत को स्वाधीनता दिलाने वाला स्वाधीनता आन्दोलन महात्मा गाँधी की तपस्या का प्रतीक है। विश्व में अहिंसा की महत्ता की ध्वजा फहराने वाला महान आन्दोलन भगवान बुद्ध के तप को मूर्त रूप कहा जा सकता है।
साधना में लगे रहना मात्र बन गया है। समाज का मानसिक स्तर स्थिर रखने की जिम्मेदारी को छोड़ कर अन्य साधारण व्यवसायियों जैसी स्वार्थ बुद्धि जब से अपनाई तब से हमारा सामूहिक अधःपतन आरम्भ हो गया और आज हम इस हीन दशा को पहुँच गये।
साधनाएं ही छिपी होती हैं। अनेक बार यह कार्य अमैथुनी प्रक्रिया द्वारा पूर्ण होते हैं जैसे सीता जन्म, गंगावतरण इन्द्र वज्र निर्माण, दुर्गा अवतार आदि। कई बार ऐसी आत्माओं को जन्म देने के लिए माता का पिता का तप साधारण मानवी प्रक्रिया द्वारा नर तन में जन्म धारण करता है। भगवान राम और कृष्ण का जन्म उनके माता पिता की तपस्याओं का ही सत्परिणाम है। इस प्रकार के असंख्य उदाहरण इतिहास पुराणों में उपलब्ध हैं कि साधुता के परित्राण और दुष्कृतों के विनाश के लिए जन्म लेने वाले महापुरुषों या महान् आन्दोलनों के पीछे किन्हीं तपस्वी आत्माओं की तप साधना ही काम करती है।
साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, स्वल्प—श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है।
साधना धन्य है, वो ही लोक-परलोक में सच्ची सुख-शान्ति की स्थापना करेंगे।
साधना एवं तपस्या नहीं के बराबर होती है। वे स्वयं प्रतिदिन निजी रूप से कोई कहने लायक तपस्या नहीं करते, उनमें वह तपोबल नहीं होता, जो यज्ञों की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक है। मिष्ठान्न खाने की लालसा और अधिक दक्षिणा मिलने की तृष्णा में ही उनका चित्त पड़ा रहता है। ऐसे लोगों द्वारा सम्पन्न हुए धर्मानुष्ठान कभी उचित सत्परिणाम नहीं दे सकते। राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ राज्यान्नभोजी पूर्ण विद्वान वशिष्ठ जी पूरा नहीं करा सकते थे, इसलिए वह यज्ञ परम तपस्वी शृंगी ऋषि द्वारा सम्पन्न कराया गया था।
साधनात्मक आयोजन इस युग में आज तक नहीं हुआ। जिस साधना में लगभग 125000 नैष्ठिक साधक संकल्पपूर्वक संलग्न हों और प्रतिदिन 24000000 गायत्री जप 2400000 आहुतियों का हवन, सवा लाख पाठ, सवा लाख मंत्र लेखन हो, वह अभूतपूर्व ही है। 2400000 व्यक्तियों तक गायत्री माता का संदेश पहुँचाने का ब्रह्मभोज उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस साधना के फलस्वरूप विश्व शान्ति के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होना निश्चित है।
साधना का आश्रय लेना सब प्रकार दूरदर्शितापूर्ण है।
साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं होता।
साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष पान करके स्वर्ग सिधारे। गान्धी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह जानना हो तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिखों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये। शिष्य भी तब ऐसे ही होते थे।
साधना बताने वाली हैं तथा शेष 26 में गायत्री के 24 अक्षरों एवं व्याहृतियों का एक-एक करके उद्देश्य एवं संदेश बताया गया है। यह 52 पुस्तकें मानव जीवन की प्रायः सभी समस्याओं पर स्वस्थ प्रकाश डालती हैं। इन 52 पुस्तकों को जो याज्ञिक अपने 10 मित्रों को आद्योपान्त पढ़ा देंगे उन्हें संस्था विधिवत् अपना धर्मप्रचारक स्वीकार करेंगी और महायज्ञ के अवसर पर ‘उपाध्याय’ पद से विशेष सम्मान के साथ विभूषित करेंगी।
साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं, तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि सिद्धियाँ परिलक्षित होने लगती हैं। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है उसी प्रकार गायत्री साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशमान होकर ईश्वरीय शक्तियों गुणों, सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।
साधना में संलग्न नर नारी ऐसे महापुरुषों को जन्म देंगे जो युगान्तर उत्पन्न करने वाले अवतारों की भूमिका पूरी कर सकें। शिव पार्वती के तप से उत्पन्न गणेश जी असुरों का विनाश कर सके, इस युग की असुरता को मिटाने के लिए जिन उच्चकोटि की आत्माओं की आवश्यकता है वे इस महान साधना में संलग्न नर नारियों के शरीरों के माध्यम से जन्म लेने के लिये प्रसन्नतापूर्वक तत्पर होंगी। उत्तम बाग लगाने के लिये बढ़िया खेत और बढ़िया माली तैयार करने की आवश्यकता इस महायज्ञ द्वारा पूरी की जा रही है।
साधना, भक्ति , ज्ञान, दीक्षा, आदि के द्वारा अनीति निवारण और धर्म विस्तार कार्य करते रहे हैं।
साधना करने वाले ही यज्ञ कुंडों पर बैठ सकेंगे। ऐसे पवित्र यज्ञ में खर्च होने वाली एक-एक पाई परम पवित्र एवं श्रद्धासिक्त होनी चाहिए। ऐसा ही धन इस कार्य में लगे, इसलिए यह नियम रखा गया है कि किसी से कुछ माँग न जाय। जो व्यक्ति गायत्री की, इस महायज्ञ की महत्ता को भली प्रकार समझते होंगे, वे बिना किसी वाह्य प्रेरणा या दबाव के जो कुछ स्वेच्छापूर्वक देंगे वह निस्संदेह श्रद्धासिक्त ऐसे ही पुनीत धन से संयोजित होने पर इतनी पवित्र पूर्णाहुति सफल हो सकती है। साधकों की श्रद्धा की परीक्षा की कसौटी के रूप में भी यह अयाचना व्रत लिया गया है।
साधना में संलग्न नर नारियों के शरीरों के माध्यम से जन्म लेने के लिये प्रसन्नतापूर्वक तत्पर होंगी। उत्तम बाग लगाने के लिये बढ़िया खेत और बढ़िया माली तैयार करने की आवश्यकता इस महायज्ञ द्वारा पूरी की जा रही है।
साधना होती है वहाँ कल्याण की निरन्तर वर्षा होती रहती है।
साधना पन्थ बना लिए फिर भी ऐसी साधना जो पूर्ण सिद्धावस्था तक साधक को पहुँचा सके गायत्री के अतिरिक्त और कोई सिद्ध न हो सकी। जिसने भी पूर्णता एवं परम सिद्धावस्था पाई है, उसने गायत्री माता का आश्रय अवश्य लिया है। मध्यकाल में महाभारत से लेकर अब तक के सभी सिद्ध पुरुष प्रायः इसी राजमार्ग से चले हैं। उनका मत प्रन्थ तथा विशेष साधन चाहे पृथक भले ही रहे हैं पर मूल आश्रय को किसी ने भी नहीं छोड़ा है। वर्तमान काल में भी जिसने आत्मिक दृष्टि से कुछ विकास किया है, उन्हें वेदमाता का पय पान करने का सौभाग्य अवश्य मिला है।
साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशमान होकर ईश्वरीय शक्तियों गुणों, सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।
साधना करने पर भी उपलब्ध करना कठिन है। शारीरिक विकारों से ग्रस्त; मानसिक अपूर्णता एवं उद्वेगों में ग्रसित, सुसंतति के लिए तरसने वाले, चिन्ता और भय से परेशान, आपत्तिग्रस्त व्यक्ति इस अवसर का भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अन्तःकरण पर चढ़े हुए कुसंस्कारों को जलाने के लिये यह अवसर सोने को तपा कर शुद्ध करने जैसा ही है। भीतर के तमोगुण को हटा कर दिव्य सतोगुण की स्थापना ऐसे समय में ही हो सकती है। विश्व शाँति एवं देवत्व की अभिवृद्धि के सार्वभौम लाभ तो होंगे ही साथ ही जो लोग इस यज्ञ में शामिल रहेंगे वे व्यक्तिगत लाभ भी आशाजनक मात्रा में प्राप्त कर सकेंगे।
साधना में लगभग 125000 नैष्ठिक साधक संकल्पपूर्वक संलग्न हों और प्रतिदिन 24000000 गायत्री जप 2400000 आहुतियों का हवन, सवा लाख पाठ, सवा लाख मंत्र लेखन हो, वह अभूतपूर्व ही है। 2400000 व्यक्तियों तक गायत्री माता का संदेश पहुँचाने का ब्रह्मभोज उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस साधना के फलस्वरूप विश्व शान्ति के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होना निश्चित है।
साधना और तपस्या की कसौटी पर खरे प्रमाणित हो चुके हैं,सवालक्ष जप की साधना और 52 उपवासों का कठिन व्रत किसी साधक की धर्मनिष्ठा की कड़ी कसौटी है। जो व्यक्ति इतनी गहरी निष्ठा अपनी अन्तरात्मा में धारण किये हुए है उसकी श्रद्धा में सच्चे ब्राह्मणत्व की झाँकी जा सकती है। ऐसे परम निस्वार्थ लोग अत्यन्त विशाल संख्या में जिस पूर्णाहुति में बिना किसी अर्थ लोभ के यज्ञ करेंगे निश्चय ही वह अपने ढंग का अनोखा एवं असाधारण सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला महायज्ञ होगा।
साधना जो पूर्ण सिद्धावस्था तक साधक को पहुँचा सके गायत्री के अतिरिक्त और कोई सिद्ध न हो सकी। जिसने भी पूर्णता एवं परम सिद्धावस्था पाई है, उसने गायत्री माता का आश्रय अवश्य लिया है। मध्यकाल में महाभारत से लेकर अब तक के सभी सिद्ध पुरुष प्रायः इसी राजमार्ग से चले हैं। उनका मत प्रन्थ तथा विशेष साधन चाहे पृथक भले ही रहे हैं पर मूल आश्रय को किसी ने भी नहीं छोड़ा है। वर्तमान काल में भी जिसने आत्मिक दृष्टि से कुछ विकास किया है, उन्हें वेदमाता का पय पान करने का सौभाग्य अवश्य मिला है।
साधना है। इतना बड़ा साधनात्मक आयोजन इस युग में आज तक नहीं हुआ। जिस साधना में लगभग 125000 नैष्ठिक साधक संकल्पपूर्वक संलग्न हों और प्रतिदिन 24000000 गायत्री जप 2400000 आहुतियों का हवन, सवा लाख पाठ, सवा लाख मंत्र लेखन हो, वह अभूतपूर्व ही है। 2400000 व्यक्तियों तक गायत्री माता का संदेश पहुँचाने का ब्रह्मभोज उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। इस साधना के फलस्वरूप विश्व शान्ति के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होना निश्चित है।
साधना करने हिमालय में गये थे, पर उन्हें वहाँ ईश्वरीय प्रेरणा हुई कि “लोक सेवा ही सर्वोत्तम योग साधना है।” स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञानग्रस्त जनता में ज्ञान प्रसार करने को हो अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष पान करके स्वर्ग सिधारे। गान्धी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह जानना हो तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिखों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये।
साधना दूसरी नहीं है।
साधना उनको अच्छे घर वर तथा अनन्त सौभाग्य प्राप्त करने में सहायक होती है। सधवाएं गायत्री साधना द्वारा दाम्पत्य जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशलक्षेम प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान, दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।
साधना के नाम से लोग नाक-भौं सिकोड़ते हैं, इस मार्ग पर चलने वालों का उपहास करते हैं, स्वेच्छापूर्वक इतनी बड़ी साधना करने के लिए इतना बड़ा जन-समूह कैसे तैयार हो जाता? जब कि दक्षिणा देने पर भी यजमान द्वारा कराये जाने वाले जप अनुष्ठान को लोग पूरा नहीं करते तो फिर इतना बड़ा धर्मानुष्ठान बिना रत्ती भर भी स्वार्थ सिद्ध हुए इतने लोग इतनी बड़ी साधना करने को क्यों तैयार हो जाते ? निस्संदेह यह मनुष्य कृत नहीं, दिव्य शक्ति का प्रेरित संकल्प है जिसे साधारण प्रचार मात्र से प्रभावित होकर धर्मप्रेमी आत्माओं ने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य किया है।
साधना करने की परम्परा का अवसर है। चार दिन यहाँ असुविधा उठाने तथा तप करने जो जा आ सकें उन्हें ही यहाँ आना चाहिए।
साधना से अभीष्ट परिणाम प्राप्त न भी हों तो भी उसका शुभ परिणाम अन्य मार्ग से अवश्य प्राप्त हो जाता है। कोई बड़ी कुश्ती पछाड़ने के लिए कोई व्यक्ति अखाड़े में आया करे तो उसका शरीर दिनोंदिन अवश्य मजबूत होगा। वह मनोवाँछित कुश्ती पछाड़ने में सफल न भी हो तो यह नहीं सोचना चाहिए कि उसका व्यायाम तथा पौष्टिक आहार व्यर्थ चला गया। कुश्ती वह भले ही हार जाय पर निरोगिता, स्फूर्ति, जीवनशक्ति, दीर्घजीवन, कमाने की क्षमता, बलवान सन्तान, शत्रुओं से निबट लेने की सामर्थ्य आदि अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं, जिन्हें पछाड़ने से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इसी प्रकार गायत्री उपासना कभी भी असफल नहीं होती अटल प्रारब्ध का कोई सुनिश्चय न टल सके तो भी अन्य अनेकों रीतियों से उपासना साधक के लिए शुभ परिणामों का आयोजन करती है।
साधना द्वारा दाम्पत्य जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशलक्षेम प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान, दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।
साधनाओं की अपेक्षा अधिक प्रिय है।
साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना से भी सम्पन्न नहीं हो पाता वह इस एक बारगी प्रचण्ड योगाग्नि की समीपता से कुछ ही दिनों में प्राप्त होना सम्भव होगा।
साधना करने के लिए इतना बड़ा जन-समूह कैसे तैयार हो जाता? जब कि दक्षिणा देने पर भी यजमान द्वारा कराये जाने वाले जप अनुष्ठान को लोग पूरा नहीं करते तो फिर इतना बड़ा धर्मानुष्ठान बिना रत्ती भर भी स्वार्थ सिद्ध हुए इतने लोग इतनी बड़ी साधना करने को क्यों तैयार हो जाते ? निस्संदेह यह मनुष्य कृत नहीं, दिव्य शक्ति का प्रेरित संकल्प है जिसे साधारण प्रचार मात्र से प्रभावित होकर धर्मप्रेमी आत्माओं ने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य किया है।
साधनाएँ करके अणिमा, महिमा आदि चरम-सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनके शाप और वरदान सफल होते थे। तथा वे कितनी अद्भुत एवं चमत्कारी सामर्थ्यों से भरे पूरे थे, इसका वर्णन इतिहास पुराणों में भरा पड़ा है। वह तपस्याएँ और योग साधनाएँ गायत्री के आधार पर ही होती थीं। गायत्री महा विद्या से ही 84 प्रकार की महान योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना बनाया था, और यह परम निस्वार्थ उपासना भगवान को अन्य सब साधनाओं की अपेक्षा अधिक प्रिय है।
साधनाओं का एकीकरण पिण्ड ही गणेश हैं।
साधना है।” स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञानग्रस्त जनता में ज्ञान प्रसार करने को हो अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष पान करके स्वर्ग सिधारे। गान्धी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह जानना हो तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिखों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये।
साधना के फलस्वरूप विश्व शान्ति के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण होना निश्चित है।
साधना में संलग्न होना एक ऐतिहासिक घटना है। इस सामूहिक तप की शक्ति किरणें आकाश में वह सूक्ष्म तरंगें पैदा करेंगी जिनसे आकर्षित होकर ब्रह्मलोक से दिव्य आत्माएं भूलोक पर आवें और अवतारों की जिम्मेदारी धर्म स्थापना और अधर्म शमन के कार्य को पूरा करें। जब पुष्प खिलते हैं और उनकी सुगंध चारों ओर फैलती है तो मधु मक्खियाँ तथा भौंरे दूर-दूर से खिंच कर चले आते हैं। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान से प्रादुर्भूत तपश्चर्या की दिव्य गंध में अपने मनोवाँछित तत्व देखकर दैवी शक्तियों के अवतरित होने की परिस्थितियाँ बनेंगी। पूर्व काल में भी अवतारों के आह्वान करने के लिये तप आयोजन करने पड़े हैं।
साधना करने को क्यों तैयार हो जाते ? निस्संदेह यह मनुष्य कृत नहीं, दिव्य शक्ति का प्रेरित संकल्प है जिसे साधारण प्रचार मात्र से प्रभावित होकर धर्मप्रेमी आत्माओं ने श्रद्धापूर्वक शिरोधार्य किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-October
साधना में लगभग 3 घण्टे लगते हैं। इतना समय 9 दिन तक, इतनी अधिक सत्परिणाम दायिनी साधना में लगा देना कुछ बहुत बड़ी बात नहीं है।
साधनायें निकाली हैं जिनसे मनुष्य मनोमय कोश से ऊपर उठकर विज्ञान मय और उससे ऊपर के कोशों तक पहुँच जाता है। पर इन विधियों और साधनाओं को थोड़े ही समय के भीतर बन्धन युक्त, जड़ता की पोषक और रूढ़िवादी बना दिया जाता है, वे प्राणहीन और शुष्क बन जाती हैं। तब केवल थोड़े से संसार से विरागी जन ही उनका अवलम्बन कर पाते हैं और समस्त मानव समाज के लिये वे निरर्थक ही बनी रहती हैं। आवश्यकता है कि यह सत्य सर्वदेशीय और सर्व कालीन हो। यह आवश्यक है कि जो सिद्धान्त एक बार केवल भारतीय चीज समझे जाते थे और जो भारतीय धर्मों द्वारा प्रसारित हुये थे, वे समस्त मानव जाति की वस्तु बन जायें।
साधना प्रेमियों के लिए नवरात्रि का पुनीत पर्व सदा से ही महत्वपूर्ण रहा है। नैष्ठिक साधक इन दिनों अपनी साधना को तीव्र कर देते हैं। साधारण लोग जो साल के अन्य समयों में उपासना के लिए समय नहीं निकाल पाते, वे इन दिनों साँसारिक कामों से अवकाश लेकर साधना रत होते हैं, अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस पर्व पर अपनी सुविधा के अनुरूप कुछ न कुछ समय नवरात्रि में विशेष गायत्री साधना के लिए निकालते हैं। इस बार भी सभी परिजनों को वैसा करना चाहिए।
साधना का अंग कहकर उनका प्रचार करते है। यहाँ तक कि देवाधिदेव महादेव के हाथों में भी उन्होंने संकोच छोड़कर अब सिद्धियों के बदले भाँग का लोटा और गाँजे की चिलम दे दी है!
साधना को तीव्र कर देते हैं। साधारण लोग जो साल के अन्य समयों में उपासना के लिए समय नहीं निकाल पाते, वे इन दिनों साँसारिक कामों से अवकाश लेकर साधना रत होते हैं, अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस पर्व पर अपनी सुविधा के अनुरूप कुछ न कुछ समय नवरात्रि में विशेष गायत्री साधना के लिए निकालते हैं। इस बार भी सभी परिजनों को वैसा करना चाहिए।
साधना द्वारा जितना विकास साधा जा सकता है, उसे आज मानव पूरा कर चुका है। अतः अब उसके आगे कोल्हू के बैल की तरह गोल-गोल चक्कर लगाने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जायगा। पर ऐसी बात प्राकृतिक नियमों के विपरित है।
साधना के लिए निकालते हैं। इस बार भी सभी परिजनों को वैसा करना चाहिए।
साधना में मनोमय चेतना से परे की चेतना के कार्य को सम्भव बनाने के लिये विज्ञानमय करण को विकसित करना ही मुख्य है। पर यह भी स्पष्ट है कि इस मानसातीत कारण के मानव में व्यवस्थित होने और नियमित रूप से कार्य करने के लिये यह आवश्यक है कि वर्तमान मानस और चित्तंत्र में मौलिक परिवर्तन किये जायें। उदाहरण के लिये जैसे अभी मानव द्वैत भाव प्रधान है, वहाँ द्वैत भाव हटाकर उसे सदैव अद्वैत की अनुभूति होती रहेगी, अभी वह बहिर्मुख है, नवीन करण के होने पर वह अन्तर्मुख होगा और अन्तर के केन्द्र में बैठ कर वहाँ से अपने सामान्य बाह्य जीवन का संचालन करेगा, आज प्राण की कामनाएं और भावनाएं, द्वन्द्वात्मक अनुभूतियाँ, बुद्धि और तर्क के मानसिक आदर्श मानव-जीवन का नियमन कर रहे हैं, परन्तु नवीन करण होने पर ऐसा न होगा, मनुष्य इन चीजों के अधीन न होगा। बुद्धि की तर्कणा उसकी नियामक न रहेगी, वरन् स्वयं बुद्धि उसके वश में आज्ञाकारी करण के रूप में रहेगी। चेतना की इस पुनर्घटना के पश्चात् मानव के कर्म करने का हेतु कामनाओं को संतुष्ट करना न रहेगा।
साधना बहुत दिन करने पर भी सफल नहीं होती वह इन नवरात्रियों के 9 दिनों में पूर्ण हो जाती है।
साधना प्रणालियों को जन्म दिया गया है। परंतु अभी तक सामान्य रूप में मनुष्य बाहरी क्रियाओं द्वारा आन्तरिक प्रगति की चेष्टा करता है। बहुत से देशों में तो धर्म या समाज की ओर से आन्तरिक जीवन के विकास की चेष्टाओं को अवैध ठहराया गया है। परंतु बाह्य जीवन को अनेक प्रकार से जकड़ने वाले भारतवर्ष में इस सम्बन्ध में सदा स्वतंत्रता रही है। इसके फलस्वरूप भारत ने इस राह में असाधारण उन्नति की है।
साधना में रही हुई त्रुटियों का संरक्षण दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
साधना के लिए अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वर्ष के अन्य महीनों में जो साधना बहुत दिन करने पर भी सफल नहीं होती वह इन नवरात्रियों के 9 दिनों में पूर्ण हो जाती है।
साधना में लगा देना कुछ बहुत बड़ी बात नहीं है।
साधना का महत्व कई गुना अधिक होता है।
साधना
साधना रत होते हैं, अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस पर्व पर अपनी सुविधा के अनुरूप कुछ न कुछ समय नवरात्रि में विशेष गायत्री साधना के लिए निकालते हैं। इस बार भी सभी परिजनों को वैसा करना चाहिए।
साधना भी विशेष फलदायक होती है। सूर्य उदय और सूर्य अस्त के समय जिस प्रकार दिन और रात का मिलन काल ‘संध्या समय’ माना जाता है, उस समय की हुई उपासना, दिन रात में अन्य किसी भी समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। इसी प्रकार ग्रीष्म और शीत ऋतुओं की मिलन बेला 9-9 दिन के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रि में आती हैं। यह समय साधना के लिए अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वर्ष के अन्य महीनों में जो साधना बहुत दिन करने पर भी सफल नहीं होती वह इन नवरात्रियों के 9 दिनों में पूर्ण हो जाती है।
साधना के भौतिक तत्वों का सर्व सामान्य मानस-शास्त्र अथवा चेतन शास्त्र की दृष्टि से निरूपण किया जाय।
साधनाओं को थोड़े ही समय के भीतर बन्धन युक्त, जड़ता की पोषक और रूढ़िवादी बना दिया जाता है, वे प्राणहीन और शुष्क बन जाती हैं। तब केवल थोड़े से संसार से विरागी जन ही उनका अवलम्बन कर पाते हैं और समस्त मानव समाज के लिये वे निरर्थक ही बनी रहती हैं। आवश्यकता है कि यह सत्य सर्वदेशीय और सर्व कालीन हो। यह आवश्यक है कि जो सिद्धान्त एक बार केवल भारतीय चीज समझे जाते थे और जो भारतीय धर्मों द्वारा प्रसारित हुये थे, वे समस्त मानव जाति की वस्तु बन जायें। ऐसा होने पर ही वह मानव संस्कृति के लिये मार्गदर्शक ज्योति का काम दे सकते हैं।
साधना द्वारा दिव्य शक्ति का अवतरण (3) महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद- इन तीन लेखों में यह बताया गया है कि गायत्री-परिवार का आगामी सार्वजनिक कार्यक्रम उद्देश्य लक्ष, विचार तथा अरमान क्या हैं? यह कोरी आकाँक्षाएं तथा अभिलाषाएं ही नहीं है-इन्हें शेखचिल्ली के सपने ही नहीं समझना चाहिए। एक लाख व्रतधारी धर्म सेवकों की अन्तरात्माओं में जो हिलोरें उठ रहीं हैं उन्हें देखते हुए इस लक्ष तक पहुँच सकना कुछ भी कठिन नहीं है। इतना विशाल लक्ष और इतना नया-केवल दो वर्ष का बाल-संगठन-इन दोनों की तुलना करने पर यह सब ऐसा लगता है मानों छोटे मुँह बड़ी बातें की जा रही हों। समय ही बतावेगा कि वस्तुस्थिति ऐसी ही बन चुकी है जिस पर आज नहीं तो कल सुसंस्कृत भारत के भावी नागरिक गर्व अनुभव कर सकेंगे।
साधना में प्रकृति को स्वीकार किया गया है। आज ऐसी बहुत सी प्रणालियाँ प्रचलित हैं जिनमें प्रकृति को स्वीकार तो किया गया है पर अंतिम उद्देश्य उसका त्याग ही बतलाया गया है। परन्तु श्री अरविन्द की प्रणाली में प्रगति के परिणाम स्वरूप जीवन को स्वीकार करना होगा, हाँ, यह जीवन आज के जीवन से भिन्न होगा, वह आज की अविद्या पर आधारित प्रकृति के बजाय विद्या पर आधारित प्रकृति के अनुकूल जीवन होगा। यह रूपांतर भगवती महाशक्ति की ही कृपा से साधा जा सकता है।
साधना की सूचना समय पर दे देंगे उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का संरक्षण दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
साधना की अपेक्षा सामूहिक साधना का महत्व कई गुना अधिक होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-April
साधना आरम्भ की उसके 15 दिन पश्चात् से खड़ा होकर चलने लगा। अब मुझे दृढ़ विश्वास हो गया है और मैं जन्म भर माता की शरण में रहूँगा।
साधना करने का अवसर मिलेगा और वह मन्त्र कापी जहाँ भी रहेगी वहाँ पवित्रता एवं धार्मिकता के तत्वों को बढ़ाती रहेगी। उत्साही व्यक्ति प्रयत्न करें तो अपने क्षेत्र से 21-21 लक्ष, 24-24 लक्ष मन्त्र संग्रह का कार्य आरम्भ कर सकते हैं। यह कार्य यज्ञ के लिए धन देने से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। कौन शाखा कितने अधिक मन्त्र संग्रह करे- इसके लिए एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता, होड़, घुड़-दौड़ आपस में चल पड़नी चाहिए। अधिक साधक बनाने, अधिक गायत्री उपासक उत्पन्न करने, अधिक व्यापक क्षेत्र में गायत्री माता का सन्देश पहुँचाने का यह एक श्रेष्ठ तरीका है।
साधना है।
साधना उसी प्रकार करता रह सकता है जिस प्रकार एक विद्यार्थी अनेक विषयों को पढ़ने के लिये पृथक-पृथक अध्यापकों की सहायता लेता है और उन सभी अध्यापकों को अपना गुरु मानता है।
साधना बताते हैं। पर वस्तुतः सच्चा गुरु-मंत्र यह गायत्री-महामन्त्र ही है। अन्य मंत्रों की गुरुदीक्षा लेने पर भी गायत्री-मंत्र की विधिवत् दुबारा भी गुरुदीक्षा ली जा सकती है। दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाये थे, इसी प्रकार एक व्यक्ति कई मंत्र प्राप्त करने के लिये कई बार गुरुदीक्षा ले सकता है और उन सब मंत्रों की साधना उसी प्रकार करता रह सकता है जिस प्रकार एक विद्यार्थी अनेक विषयों को पढ़ने के लिये पृथक-पृथक अध्यापकों की सहायता लेता है और उन सभी अध्यापकों को अपना गुरु मानता है।
साधना तपोभूमि से उधार ले ली जाय और उसकी पूर्ति अगले वर्ष कर दी जाय। ऐसा भी हो सकता है कि कोई व्यक्ति अपना जप, मन्त्र लेखन या उपवास तपोभूमि में रहने वाले ब्रह्मचारियों को पारिश्रमिक देकर पूरा करालें। इन विकल्पों के कारण वह कठिनाई हल हो जानी चाहिए जो साधना सम्बन्धी प्रतिबन्धों के कारण लोगों को निराश करती है। 1250 गायत्री चालीसा पाठ भी सवा लक्ष जप के स्थान पर लिया गया है। 3 पाठ प्रतिदिन से वह पूर्णाहुति तक पूरा हो सकता है।
साधना की लौ जगी हैं,
साधनायास्तु सिद्धये।
साधना विधि है। इसमें स्त्री, पुरुष, बाल, वृद्ध सभी प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकते हैं। इसमें कोई विशेष प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी समय मिले, मंत्र लेखन किया जा सकता है। जप की अपेक्षा मंत्र लेखन का पुण्य दश गुना अधिक माना गया है।
साधना आसानी से पूरी हो सकती है। मंत्र लेखन में समय का या स्नान आदि का भी प्रतिबन्ध नहीं है। अपने अन्य काम काज करते हुए 10 मिनट फुरसत कभी भी निकाली जा सकती है। इस प्रकार जिनके जी में महायज्ञ में सम्मिलित होने की इच्छा तो है पर साधना की कठिनाई से डरते हैं उनके लिए यह सबसे सरल साधना है।
साधना सम्बन्धी प्रतिबन्धों के कारण लोगों को निराश करती है। 1250 गायत्री चालीसा पाठ भी सवा लक्ष जप के स्थान पर लिया गया है। 3 पाठ प्रतिदिन से वह पूर्णाहुति तक पूरा हो सकता है। अशिक्षित लोग जिन्हें पूरा मन्त्र शुद्ध रूप से नहीं आता ॐ भूर्भुवः स्वः की पंचाक्षरी गायत्री सवा लक्ष जप कर सकते हैं।
साधना मन्त्र लेखन में भली प्रकार बन पड़ती है। इसलिये उसका महत्व भी बहुत माना गया है। शास्त्रों में गायत्री मन्त्र लेखन के सम्बन्ध में ऐसे वचन मिलते हैं :-
साधना है वह वस्तुतः उतनी कठिन नहीं है जितनी नये साधकों को दीखती है। कई धर्म-प्रेमी व्यक्ति इन साधना सम्बन्धी कठिनाइयों से डरते हैं और महायज्ञ में सम्मिलित होने से हतोत्साह हो जाते हैं।
साधना की सिद्धि के लिए अनेक मार्ग हैं। उनमें मन्त्रों का लेखन विशेष श्रेष्ठ है।
साधनाओं में उंगलियों से जप और जिह्वा से उच्चारण होता है। मन को इधर-उधर भागने की काफी गुंजाइश रहती है। पर गायत्री मन्त्र लेखन में लिखते समय हाथ, आँखें, मस्तिष्क तथा समस्त चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं क्योंकि लिखने का कार्य एकाग्रता चाहता है। मन को वश में करके एकाग्र भाव की साधना मन्त्र लेखन में भली प्रकार बन पड़ती है। इसलिये उसका महत्व भी बहुत माना गया है।
साधना की पूर्ति करने की है। इनमें से सच्ची श्रद्धा रखने वालों के लिये पहली कठिनाई अवश्य हल होकर रहेगी।
साधना बहुत ही सरल है। सवा लक्ष जप के स्थान पर 2400 गायत्री मन्त्र लेखन रखा गया है। अभी 8 महीने या 240 दिन पूर्णाहुति के शेष हैं। 10 मिनट प्रतिदिन लगाकर 10 मन्त्र प्रतिदिन लिखने से तब तक यह साधना आसानी से पूरी हो सकती है। मंत्र लेखन में समय का या स्नान आदि का भी प्रतिबन्ध नहीं है।
साधना-तपस्या संग्रह का महत्व है। मोटे तौर पर यह माना जाना चाहिए कि जिसने जितने मन्त्र लिखकर भेजे उसने उतने रुपये यज्ञ के लिए दिये। 2400 मन्त्रों की श्रद्धाँजलि यहाँ 2400 रुपये दान के बराबर मानी जायगी। यहाँ यज्ञ में मथुरा पधारने वाले लोग अपने साथ मन्त्र लेखन के बड़े-बड़े बस्ते- नोटों के बण्डलों के रूप में साथ लाने का प्रयत्न करें।
साधना सम्बन्धी है। साधना के नियम कुछ कठोर रखे गये हैं। सवा लक्ष जप और 52 उपवास करने वाले यजमान, 2। लक्ष जप करने वाले होता, 1 माला रोज जपने वाले संरक्षक बनने की जो साधना है वह वस्तुतः उतनी कठिन नहीं है जितनी नये साधकों को दीखती है। कई धर्म-प्रेमी व्यक्ति इन साधना सम्बन्धी कठिनाइयों से डरते हैं और महायज्ञ में सम्मिलित होने से हतोत्साह हो जाते हैं।
साधना सफल होने में कोई सन्देह नहीं रहता। प्राचीन काल में यज्ञोपवीत संस्कार कराने और गुरुदीक्षा देने के लिए अधिकारी आचार्य बड़ी खोज के साथ ढूँढ़े जाते थे। आज तो कोई भी अधिकारी-अनाधिकारी, योग्य-अयोग्य पंडित यज्ञोपवीत संस्कार जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य को कराने का दुस्साहस कर बैठते हैं, और इस जीवन परिवर्तन करने जैसी महान प्रक्रिया को एक खिलवाड़ जैसा बना देते हैं। देखा जाता है कि यज्ञोपवीत संस्कार या गुरु दीक्षा करने वाले पंडितों को दान-दक्षिणा खूब मिल जाती है और उधर जिनके बच्चे का संस्कार हुआ हैं उनका खर्च भी बहुत पड़ जाता है। इतना होने पर भी जिसने यज्ञोपवीत धारण किया उसके जीवन में कोई परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता।
साधना सम्बन्धी कठिनाइयों से डरते हैं और महायज्ञ में सम्मिलित होने से हतोत्साह हो जाते हैं।
साधना के नियम कुछ कठोर रखे गये हैं। सवा लक्ष जप और 52 उपवास करने वाले यजमान, 2। लक्ष जप करने वाले होता, 1 माला रोज जपने वाले संरक्षक बनने की जो साधना है वह वस्तुतः उतनी कठिन नहीं है जितनी नये साधकों को दीखती है। कई धर्म-प्रेमी व्यक्ति इन साधना सम्बन्धी कठिनाइयों से डरते हैं और महायज्ञ में सम्मिलित होने से हतोत्साह हो जाते हैं।
साधना की कठिनाई से डरते हैं उनके लिए यह सबसे सरल साधना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1958-December
साधना पूरी तरह से सफल नहीं हो रही है। निःस्वार्थ भाव से सेवा करना उच्चकोटि के साधकों का मुख्य चिन्ह है, यही सच्चा यज्ञ है।
साधना करलें तो उनकी भावनायें स्वयमेव शुद्ध हो जा सकती हैं।
साधना में ही निरन्तर लगा रहता है और धर्म सेवा को आवश्यक नहीं समझता।
साधना की पूर्णाहुति के लिए उनके क्षेत्रों में ही सामूहिक गायत्री यज्ञों की व्यवस्था होनी चाहिए। मथुरा से जाने के बाद प्रत्येक शाखा के संचालकों को अपने क्षेत्र में एक गायत्री यज्ञ का आयोजन करने में लगना है। उसका संकल्प प्रत्येक शाखा को यहाँ पूर्णाहुति के समय ही करके जाना चाहिए।
साधना के लिए सवा लाख आहुतियों के हवन पर्याप्त है। 24 हजार आहुतियों के लिए 5 कुण्डों का, सवा लाख आहुतियों के लिए 9 कुण्डों का यज्ञ पर्याप्त है। तीन दिन का कार्यक्रम रखा जाय नित्य-प्रातः हवन तथा तीसरे पहर एवं रात के प्रवचनों की व्यवस्था रहे। पूर्णाहुति में नारियल, सुपाड़ी अन्य धर्मप्रेमी भी चढ़ा सकें।
साधना को कम करके भी परोपकार व सेवा के कार्यों में अधिक समय लगाता है,उसकी आत्मिक उन्नति उस साधक से बहुत ही शीघ्र होती है जो केवल अपनी साधना में ही निरन्तर लगा रहता है और धर्म सेवा को आवश्यक नहीं समझता।
साधना पूरी हो जाय तो उन उपासकों या उनके परिवार वालों के द्वारा ही हवन कार्य सम्पन्न किया जाय। 24 लक्ष जप के लिए 24 हजार आहुतियों का और सवा करोड़ साधना के लिए सवा लाख आहुतियों के हवन पर्याप्त है। 24 हजार आहुतियों के लिए 5 कुण्डों का, सवा लाख आहुतियों के लिए 9 कुण्डों का यज्ञ पर्याप्त है। तीन दिन का कार्यक्रम रखा जाय नित्य-प्रातः हवन तथा तीसरे पहर एवं रात के प्रवचनों की व्यवस्था रहे। पूर्णाहुति में नारियल, सुपाड़ी अन्य धर्मप्रेमी भी चढ़ा सकें।
साधना पूर्ण की। इस महायज्ञ के ‘होता’एवं यजमान का गौरवपद प्राप्त करने के हेतु सवालाख जप और 52 उपवास करने की मूक-तपस्या कितने ही महान आत्माओं ने की। अकेले गायत्री-तपोभूमि पर ही हजारों व्यक्ति समय निकाल कर आते रहे और अपनी तपस्या पूरी की। यह सभी प्रयत्न वर्तमान महायज्ञ की आधार शिला थे। इसी पावन आधार पर महायज्ञ की सफलता अवलम्बित थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-July
साधना और आराधना के साथ जुड़ा हुआ है। संचित पशु-प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिए अपने दोष-दुर्गुणों की बारीकी से परीक्षा करनी पड़ती है और जहाँ जो जितनी मात्रा में खोट दिखाई दे उसे बुहार फेंकने के लिए उसी प्रकार उद्यत रहना पड़ता है जैसा कि शरीर की, कपड़ों की, घर के वस्तुओं की सफाई पर निरंतर ध्यान देते रहने और तत्पर रहने के संबंध में सतर्कता बरती जाती है। सुसंस्कारिता का अभिवर्धन दूसरा पक्ष है। इसके लिए चिंतन, चरित्र और व्यवहार को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाना पड़ता है। सेवा-साधना को भी नित्यकर्म में सम्मिलित करना पड़ता है।
साधना-तप द्वारा शक्ति संचय करोड़ों व्यक्तियों में मनोबल आत्मबल के संचार के निमित्त लगाने का निश्चय किया है। दूर से हमें भले ही उनके दर्शन होते रहें निकट से परामर्श उनके समीपवर्ती वरिष्ठ परिजनों के माध्यम से मिलते रहें, हमें अपनी गुरु पूर्णिमा की श्रद्धांजलि इसी रूप में देनी चाहिए कि हमारे पुरुषार्थ में कोई कभी किसी रूप में न आने पाये। निषेधात्मक चिंतन हम पर हावी न हों। आगामी यज्ञायोजन, विगत अश्वमेधों के अनुयाज यथावत तीव्र वेग से चलते रहें तथा हर व्यक्ति एक से अनेक गुना बनता हुआ इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल बनाने वाले इस मिशन की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता चले, यही हमसे उनकी अपेक्षा है।
साधना सीखे और अपना मंगल साथ ले। परन्तु अपने परिवार के अथवा राज्य के किसी भी व्यक्ति पर उसने कभी कोई दबाव नहीं डालना चाहता था। अंततः उसने एक उपाय सोचा।
साधना पुरुषार्थ द्वारा।
साधना अत्यंत विस्मयकारी सिद्ध होती है। इस अभ्यास के फलस्वरूप अनेक सिद्ध महात्माओं, अवतारों तथा देवताओं की शक्तियाँ साधक पर अपना असर डालती और अंतराल को श्रेष्ठता से भरती रहती है। सद्विचारों से ही शरीर-मन स्वस्थ रहता है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना का ऐसा प्राणायाम है जिनमें हानि की कतई संभावना नहीं।
साधना को भी नित्यकर्म में सम्मिलित करना पड़ता है। सुविस्तृत सामाजिक सहयोग के बलबूते ही मनुष्य आदिमकाल की अनगढ़ परिस्थितियों को पार करते हुए वर्तमान प्रगतिशीलता के उच्च शिखर पर पहुँचा है। सृष्टि का मुकुटमणि बनने का अवसर उसके एकाकी प्रयत्नों ने ही संभव नहीं किया है। इसके लिए मानवजाति की चिर-संचित उपलब्धियों का लाभ हस्तगत करने का अवसर उसे मिलता रहा है। यदि वह सब न मिल सका होता तो अभी भी कबीलों में रहने वाली जन-जातियों से अधिक अच्छी स्थिति उसकी न बन पाई होती।
साधना के नाम से निरूपित किया गया है। उसे आवश्यक बताया गया है और अनिवार्य भी। मिल-जुल कर प्रगति करने और कठिनाइयों तथा अवरोधों से उबरने का अवसर इसी आधार पर मिलता है। दैनिक कर्तव्यों को जीवनचर्या के क्रिया-कलापों में सेवा-साधना का महत्वपूर्ण स्थान रहना ही चाहिए। इसके बिना किसी को भी आत्म-संतोष , जन सम्मान और प्रगति के विशिष्ट अवसरों के रूप में मिलने वाला दैवी अनुग्रह किसी को भी हस्तगत नहीं हो सकता।
साधना में कभी किसी ने घाटा उठाना भी नहीं पड़ा। कृपण ही निष्ठुरता अपनाकर लालच के वशीभूत रहता है और अपने को हर किसी की आँख में हेय सिद्ध करते हुए अपनी भूल के लिए सिर धुनते हुए विदा होते हैं। संग्रह सड़ता है इस तथ्य को कोई भी समझदार न भूले और न भूलने दे, तो ही अच्छा है। जिस बीज को गलने, अंकुरित होने और वृक्ष बनने में घाटा दीखता है, वह उस साहस को अपनाये बिना भी कुछ समय छिपते-बचते काट तो सकता है, पर उस प्रकृतिक्रम को कोई क्या करे, जो कृपण को रौंद कर खाद बनाने और कीड़े-मकोड़ों का आहार बनाने के लिए अपनी निर्धारित प्रक्रिया को आदिकाल से विनिर्मित-निर्धारित किये हुए है।
साधना के लिए प्रयत्नरत रहने के उत्साह को सर्वत्र साहा जाता है।
साधना पुरुषार्थ के भी रखते हैं। वह या तो दैवी अंतः स्फुरणा के आधार पर, स्वप्नों के माध्यम से अथवा व्यष्टि चेतना के समष्टि चेतना के सीधे संपर्क में होने के आधार पर अर्जित संपदा के रूप में भी प्रस्फुटित हो जाती है, पर यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि अभ्यास करने पर हर कोई इस क्षमता को जाग्रत और विकसित कर सकता है और एक अच्छा भविष्यवक्ता बन सकता है।
साधनात्मक पराक्रम द्वारा लाखों-करोड़ों आत्मबल संपन्न महामानवों के सृजन के निमित्त अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। विगत चौबीस वर्षों में गायत्री परिवार के प्रत्येक पुराने-नये सदस्य ने शक्ति के स्त्रोत के रूप के में स्नेह सलिला माताजी की ओर से न केवल अजस्रं प्रवाह बहता अनुभूत किया है, वरन् अनेकानेक रूपों में उनके अनुदानों से स्वयं को लाभान्वित होता पाया है।
साधना का महत्वपूर्ण स्थान रहना ही चाहिए। इसके बिना किसी को भी आत्म-संतोष , जन सम्मान और प्रगति के विशिष्ट अवसरों के रूप में मिलने वाला दैवी अनुग्रह किसी को भी हस्तगत नहीं हो सकता। इसलिए अनिवार्य आवश्यकताओं में सेवा-साधना के लिए प्रयत्नरत रहने के उत्साह को सर्वत्र साहा जाता है।
साधना के अतिरिक्त और किसी प्रकार संभव नहीं हो सकती। संतोष, आह्लाद और उल्लास का रसास्वादन करने का अवसर उसी आत्मा को मिल पाता है जो उदार , परमार्थ , परायणता को भी अन्न जल की तरह नित्य प्रयोग में लाये जाने की आवश्यकता अनुभव करती है।
साधना उपलब्ध नहीं होगी। गिरे हुओं और पिछड़े हुओं को यथावत् विपत्ति के दलदल में फँसे हुए दम तोड़ना पड़े। गर्भधारण करने , स्तनपान कराने और बालकों के परिपोषण से भी महिलाएँ इनकार कर दें, क्योंकि इस प्रसंग में उन्हें मात्र कष्ट सहने और शरीर निचोड़ने की हानि ही हानि दृष्टिगोचर होगी। तब शायद कोई युवती पितृगृह का स्वच्छन्द जीवन छोड़कर ससुराल में दूसरे परिवार की सेवा करने के लिए समर्पित होने का प्रस्ताव भी स्वीकार न करे। ऐसी दशा में समाज व्यवस्था का परंपरा क्रम चल भी सकेगा या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-September
साधना से एक हद छिपाई भी जा सकती है, पर तेजोवलय के सूक्ष्म शरीर पर किसी भी प्रकार पर्दा नहीं डाला जा सकता। जिनका अंतःकरण थोड़ जाग्रत हो चला है और किसी की भीतरी स्थिति समझने देखने योग्य जिनकी सूक्ष्म दृष्टि जाग्रत हो गई है, वे रंग रूप की उपेक्षा करके तेजोवलय में संव्याप्त सुन्दरता एवं कुरूपता को देख सकते है और उसी के अनुरूप किसी के प्रति श्रद्धालु अश्रद्धालु होने की आवश्यकता अनुभव कर सकते हैं। वस्त्र पहनने का कारण शरीर को सर्दी गर्मी से बचाना या शोभा बढ़ाना भी हो सकता है पर मूल कारण तेजोवलय पर आवरण आच्छादित किये रहना ही है। भीतर की शक्ति बाहर निकल कर बिखरने न पाये इसके लिये वस्त्रों का आवरण चढ़ाया जाता है। नग्न शरीर रहने वाले साधु संन्यासी शरीर पर भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाये रहते हैं।
साधना करना सिखाया, निकट बैठाकर हमें।
प्राण पुलकित सा लगा, वह ऊष्मा पाकर हमें॥
साधना का नियन्त्रण मिल रहा है। वत्स! अगले सुसंस्कारों के कारण अंतःकरण के संकेत आप अनुभव कर सके है। अब इनको समझकर आचरण में लाने में विलंब न करना ही श्रेयस्कर है।
साधना के पूर्वार्द्ध में श्वास लेते समय सो ध्वनि के साथ व्यष्टिगत आत्मसत्ता पर समष्टिगत परमात्मा चेतना का आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है तो उत्तरार्द्ध में हम को अर्थात् अपनी अहंता को विसर्जित करने का भाव है। यह अहंता ही लोभ मोह की जननी है। शरीराध्यास में जीव उसकी प्रबलता के कारण भवसागर में डूबता है। माया अज्ञान अंधकार बंधन आदि की भ्रान्तियाँ एवं विपत्तियों इस अहंता के कारण ही उत्पन्न होती है। इसे विसर्जित कर देन पर ही भगवान का अंतः क्षेत्र में प्रवेश करना निवास करना संभव होता है।
साधना का महत्वपूर्ण अंग बताते हुये कहा गया है विभर्ति कुण्डल षकिरात्मानं हंसयाश्रिता अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति आत्मक्षेत्र में हंसारूढ़ होकर विचरती हैं।
साधना का यही है भावना प्रधान व्यावहारिक स्वरूप। ईश्वर जीव को मनुष्य को ऊंचा उठाना श्रेष्ठ बनाना चाहता है मनुष्य कि अपने तथा कथित पूजा पाठ के आधार पर ईश्वर को अपने इशारे पर नचाने एवं उससे उचित अनुचित मनोकामनायें पूरी कराने की पात्रता कुपात्रता परखने की न्याय निष्ठा को छोड़ देने का आग्रह करता रहता है। दोनों की दिशायें एक दूसरे के अनुकूल कैसे बने? एकत्व की सामीप्य की आशा कैसे पूर्ण हो? इस कठिनाई का समाधान सोऽहम् साधना के साथ जुड़े हुये तत्वज्ञान सन्निहित है।
साधना के साथ जुड़े हुये तत्वज्ञान सन्निहित है। दोनों एक दूसरे से गुँथ जाय, परस्पर एक दूसरे में विलीन हो जाये दोनों में तादात्म्य स्थापित हो जाय तथा अंतःकरण आकाँक्षा एवं अस्तित्व को पूरी तरह समर्पित कर दे उसी के दिव्य संकेतों पर अपनी दिशा धाराओं का निर्धारण करे। इस स्थिति की प्रतिक्रिया द्वैत की समाप्ति और अद्वैत की प्राप्ति के रूप में होती है। साधक ने इष्टदेव को भक्त ने भगवान को जीव ने ब्रह्मा को समर्पण किया है। सो ब्रह्मा की सत्ता स्वभावतः समर्पणकर्ता में अवतरित हुई दृष्टिगोचर होने लगेगी।
साधना उसके सहयोग का सुयोग पा लेना भी कई बार अप्रत्याशित सौभाग्य बनकर सामने आता है। चंदन के समीप झाड़-झंखाड़ों के सुगंधित बन जाने और उसी मूल्य में बिकने की किंवदंती प्रख्यात है। पानी के दूध में मिलकर उसी भाव बिकने की उक्ति आये दिन दुहराई जाती रहती है। पारस को छूकर काले कुरूप और सस्ते मोल वाले लोहे का सोने जैसे बहुमूल्य धातु में बदल जाना प्रख्यात है। पेड़ से लिपट कर चलने वाली बेल उसी के बराबर ऊँची जा पहुँचती और अपनी प्रगति पर गर्व करती है जब कि वह अपने बलबूते मात्र जमीन पर ही थोड़ी दूर रेंग सकती है।
साधना से आपको जो यहाँ अर्थ लेना चाहिये वह यह लेना चाहिये कि यहाँ जो आपसे कराया जाने वाला है जो आपसे कराने के लिये दबाव डालेंगे कि आपका भीतर वाला हिस्सा जिसका अर्थ होता है मन बुद्धि और चित्त जिसका अर्थ होता है जीवात्मा जिसका अर्थ होता है आपका दृष्टिकोण चिंतन और चरित्र बदल जाय। अगर इसे हम बदल दे तो आप विश्वास रखिये कि आपका जीवन पिछले दिनों जैसा भी कुछ रहा है भविष्य में वैसा रह ही नहीं सकता। आपने इतिहास पढ़ा होगा और आपको उन भक्तों के नाम याद होंगे जो पहले सामान्य स्थिति में गये बीते थे लेकिन जब उन्होंने अपना मन स्तर और दृष्टिकोण बदल दिया तो कितना कमाल हो गया। उनकी जिंदगी कैसी शानदार हो गयी। अगर उन्होंने भीतर वाले हिस्से को अर्थात् दृष्टिकोण को बदला न होता तो बाहर वाली परिस्थितियाँ बिलकुल मामूली आदमी के तरीके की रही होती।
साधना को छोड़कर जाने की इच्छा भी नहीं थी। किंतु कोई प्रेम से बुलाए तो तिरस्कार भी उचित नहीं। वह शांत भाव से साथ हो लिए।
साधना संकल्प से ही संभव होती है। संकल्प को ही व्रत कहते हैं। व्रतधारी ही तपस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। लक्ष्य की ओर शब्दबेधी बाण की तरह मन मानते हुए चल पड़ने की क्षमता उन्हीं में होती है। जागरुक पुरुषार्थ का प्रथम चरण संकल्प ही है।
साधना से करनी चाहिए।
साधना का उत्तरार्द्ध कषाय कल्मषों मलीनताओं शरीर में से अवाँछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का आलस्य प्रमाद जैसी दुष्कृत्यों का मन से लोभ मोह जैसी तृष्णाओं का अंतःकरण से जीवभावी अहंता का निवारण निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएं अत्यन्त प्रगाढ़ होनी चाहिये। दुर्भावनाएं और दुश्चिंतन निकृष्टताएं और दुष्टताएं क्षुद्रताएं और हीनताएं सभी निरस्त से रही है सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिये। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपराँत जो हलकापन जो संतोश उल्लास स्वभावतः होता हे और निरंतर बना रहता उसकी का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिये। तभी कहा जा सकता है कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्द्ध भी एक तथ्य बन गया।
साधना के लिए आप सभी यहाँ शांतिकुंज आये है। कल्प आखिर है क्या जिसके लिए हमने आपको यहाँ बुलाया है। कल्प का अर्थ होता है परिवर्तन। आपको बदलने का हमारा मन है। आप यदि अभी तक दुखी जीवन जीते रहे है तो सुखी जीवन जियें।
साधना का तत्वज्ञान। श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से सो और हम ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जाग्रत किया जाता हे कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ मोह का वासना तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में
साधना ही अजपा गायत्री कही जाती है। अजपा गायत्री का महत्व बताते हुये अग्निपुराण में उल्लेख है अजपा नाम गायत्री ब्रह्म विष्णु महेश्वरी। अजपा जपते यस्ताँ पुनर्जन्म न विद्यते॥
साधना में चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना होता है और भावना को इस स्तर तक प्रगाढ़ करना पड़ता है कि उससे श्वास लेते समय सो शब्द के ध्वनि प्रवाह की मंद अनुभूति होने लगें उसी प्रकार श्वास छोड़ी जाती है तो यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि हम ध्वनि प्रवाह विनिसृत हो रहा हैं आरंभ में कुछ समय यह अनुभूति इतनी स्पष्ट नहीं होती किन्तु क्रम और प्रयास संयमित रूप से जारी रखने पर कुछ की समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है और उसे सुनने में न केवल चित्त एकाग्र होमता है वरन् आनंद का अनुभव भी होता हे यह प्रक्रिया सामान्य डीप ब्रींदिग प्रक्रिया से बहुत ऊंचे सोपान की है। मात्र फेफड़ों का व्यायाम नहीं है इतना स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिये। सो का तात्पर्य परमात्मा और हम का जीव चेतना समझा जाना चाहिये। निखिल। निखिल विश्व ब्रह्माँड में संव्याप्त महा प्राणचेतना नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करती है और अंग शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतारी जाती है और हम शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस कायकलेवर पर से अपना कब्जा छोड़कर चले जाने ईश्वर अर्पित हो जो की मान्यता प्रगाढ़ की जाती है।
साधना प्रयोजनों में सूती वस्त्रों की अपेक्षा ऊनी या रेशमी कपड़ों को अधिक महत्व दिया जाता है। यहाँ एक बात नोट कर ली जानी चाहिये कि वध करने के उपराँत भेड़ों की उतारी हुई उन अथवा कीड़ों को उबाल कर उन्हें मार डालने के उपराँत पाया जाने वाला रेशम आत्मिक उद्देश्यों में काम आने लायक नहीं रह जाता। वध के समय निकला चीत्कार उनकी सूक्ष्म स्थिति को आसुरी प्रकृति का बना देता शरीरगत विद्युत के आवागमन प्रतिरोध उत्पन्न करने की क्षमता तो ऐसे उन या रेशम में हो सकती है पर उनसे आध्यात्मिक प्रयोजनों में तो उलटी बाधा ही पड़ेंगीं उससे तो धुला हुआ सूती वस्त्र ही अच्छा है जो तेजोवलय को अपने सात्विक संपर्क में रख कर कम से कम निर्मल बनाये तो रहता है।
साधना से साधक को इस लक्ष्य की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।
साधनाओं द्वारा इसे विकसित करके नर से नारायण स्तर तक पहुँचकर आरोह की स्थिति में आती है और दैवी चेतना से संबद्ध हो जाने पर प्राणि मात्र के लिए कल्याणकारी अनुदानों को बखेरती है।
साधना को करते रहेंगे जिसके ऊपर वातावरण के परिमार्जन, देवसंस्कृति के उन्नयन एवं विश्वमानव के उज्ज्वल भविष्य का बहुत कुछ आधार अवलंबित है।
साधना आदि से लेकर अधेड़ अवस्था के पारिवारिक एवं राजनैतिक उत्तरदायित्वों एवं राजनैतिक उत्तरदायित्व के निर्वाह में उन्होंने पूरे मनोयोग से कार्य किया था। किंतु न जाने क्यों उन्हें अनुभव होने लगी थी। कर्तव्य पालन के संतोश की शीतलता के अतिरिक्त कुछ आकुलता की अनुभूति भी उन्हें होने लगी। वह कारण न समझ सके और उन्होंने अपने कुलगुरु के सम्मुख अपनी समस्या रखी।
साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल तभी दिखाई देता हे जब श्वास ग्रहण करते समय सो और निकालते समय हम की प्रबल धारण की जाय। इसके लिये प्रयत्न यह होना चाहिये कि इन शब्दों प्रारंभ में अति मंद स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। चिंतन का स्वरूप यह होना चाहिये कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ कायकलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे है। यह प्रवेश मात्र वायु का अंगों में आवागमन नहीं वरन् प्रत्येक अंग अवयव पर प्राण सत्ता का आधिपत्य बन रहा है एक एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना करनी चाहिये और अनुभव करना चाहिये कि उसमें भगवान की सत्त चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय फेफड़े पाचन तंत्र आदि में परमात्मा चेतना का प्रवेश हो गया।
साधना के पूर्वार्द्ध में अपने कायकलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुये महाप्राण की परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन भाव प्रवण चिंतन करना पड़ता हे कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगे।
साधना
साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी जितनी मंदगति से ली जा सके लेनी चाहिये और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे धीरे उस वा को पूरी तरह खली कर देना चाहिये गहरी और पूरी साँस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकराकर उत्पन्न होने वाला धवि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा के। कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेताना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है।
साधना और आत्म विकास की तपश्चर्या को आवश्यक बताया गया है वहाँ इस ओर भी संकेत किया गया है कि उसकी -प्रखरता सके संपर्क साधने-सान्निध्य में रहने और लाभान्वित होने का अवसर भी न चूका जाय। यो ऐसे अवसर कभी -कभी ही आते और किसी भाग्यशाली को ही मिलते हैं। किंतु कदाचित वैसा सुयोग बैठ जाय तो ऐसा अप्रत्याशित लाभ मिलता है। जिस ईश्वर के दिव्य अनुदान वरदान के समतुल्य कहा जा सके।
साधना चलाते रहने की बात निजी जीवन की है। इतनी उपासना कम पड़ती होगी तो उसकी पूर्ति शाँतिकुँज हरिद्वार से उसी प्रकार होती रहेगी जैसा कि गुरुदेव के सूक्ष्म-कारण सत्ता में चले जाने के उपराँत होती रही है।
साधना के विधानों द्वारा इस क्षेत्र में संकेन्द्रित वलय ऊर्जा से अन्नमय और प्राणमय कोषों की सुप्त शक्तियां जगायी भी जा सकती है।
साधनाओं में प्राणायाम कहा गया है। उसका एक छोटा प्रयोजन डीप ब्रीदिंग अर्थात् गहरी साँस लेने से भी पूरा होता है।
साधना का निर्देश माना जाना ही उचित है प्रपंच तंत्र में कहा भी गया है देह देवालय है इसमें जीव रूप में शिव विराजमान है। इसकी पूजा वस्तुओं से नहीं सोऽहम् साधना से करनी चाहिए।
साधना का उत्तरार्द्ध भी एक तथ्य बन गया।
साधना सत्र चलते रहे है। उन दिनों पूज्यवर स्वयं साधकों को संबोधित कर कल्प प्रक्रिया की जटिलताओं एवं कैसे अपने अंदर परिवर्तन लाया जाय, इस विशय पर उद्बोधन देते थे। इसी विशय पर दो अंकों में प्रकाशित दो प्रवचनों की पहली कई यहाँ प्रस्तुत है। 1983-84 के इन प्रवचनों को जिनने सुना है- हृदयंगम किया है, उनके जीवन को एक नयी दिशा मिली, न केवल स्वास्थ्य सुधरा, चिंतन परिष्कृत हुआ एवं आत्मिक प्रगति का पथ भी प्रशस्त हुआ। पढ़े अमृतवाणी-
साधना की शीतलता से आत्मा तृप्त होती है।
साधना के बारे में यह भ्रम फैला हुआ है कि कल्प माने बूढ़े से जवान हो जाना, पर यह एक भ्राँति है। बूढ़े का जवान होना संभव नहीं है क्योंकि वह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। प्रकृति के नियमों को कोई बदल नहीं सकता। सूर्य पूर्व से निकलता है और पश्चिम में डूबता है। ऐसा हो सकता कि सूर्य पश्चिम से निकले और पूर्व में डूबा करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-June
साधना द्वारा यदि इन्हें नियमित, सुव्यवस्थित एवं लयबद्ध बना लिया जाय तो न केवल शारीरिक और मानसिक जगत की सूक्ष्म शक्तियों को जगाया और उनसे लाभ उठाया जा सकता है, वरन् आत्मिक जगत की विभूतियों से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है ।
साधना के सत्र चले। प्रायः दस लाख से बढ़कर ऋषि युग्म की गोदी में पला यह परिवार अब प्रायः साढ़े पाँच करोड़ की संख्या पार कर चुका है।
साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शूद्र ऐतरेय भी ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल ओर धुँधकारी शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ। ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेकों को सुपथ पर चलना सिखाये।
साधना प्रणालियों का विकास यहाँ देखने को मिलता है। विकासमान व्यक्तित्व तमाम सारी अतीन्द्रिय क्षमताओं की चर्चा यहाँ सुनने को मिलती है। कुल मिलाकर इनकी मदद व्यक्तित्व विकास की पूर्णता पाने के लिए है।
साधना द्वारा ही जाना समझा जा सकता है ।
साधना का, धर्म-धारणा का उपक्रम अपनाना किन्हीं शूर साहसियों से ही बन पड़ता है पर जो ऐसा आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं वे कृतकृत्य भी हो जाते हैं। अनुकरण करने वालों के लिए ऐसी परंपरा विनिर्मित करते हैं जिसका अवलंबन लेकर वे भी साधारण न रहकर असाधारण बन सकें । ऐसों को ही देवमानव या युग-पुरुष की संज्ञा मिलती है ।
साधना-पंच कोशों के अनावरण की साधना है उससे ब्रह्म सान्निध्य ब्रह्म साक्षात्कार का लाभ मिलता है । उसके कितने ही आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे प्रतिफल हैं जिनसे क्रमशः आत्मा का परमात्मा के रूप में विकास होते हुए अपूर्णता की पूर्णता में परिणति होती है ।
साधना के ये सभी लाभ जीवन में तभी मिलते हैं जब लक्ष्य ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हो अन्यथा यह समर्थ महामंत्र भी सामान्य कर्मकाण्ड बन कर रह जाता है। एक बार पारस्परिक चर्चा में पूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मणत्व को स्पष्ट करते हुए कहा था “ब्राह्मण की सही माने में पूँजी तो विद्या और तप है-जो उसे गायत्री मंत्र की साधना से मिलती है। भौतिक सुविधाओं के मामले में तो उसे सर्वथा अपरिग्रही होना चाहिए।” फिर कुछ रुक कर थोथा रोप व्यक्त करते हुए बोले-”खेद है आज अपरिग्रह को दरिद्रता समझ लिया गया जबकि अपरिग्रह का मतलब है स्वयं पर विश्वास और ब्राह्मण का जीवन इसका उच्चादर्श है। जब मनुष्य का स्वयं पर, समाज पर और भगवान पर पूरी तरह विश्वास उठ जाता है तभी वह लालची होकर सुविधाएँ बटोरने लगता है।
साधना की। निष्कर्ष में उन्होंने कहा-”गायत्री की तुलना अमृत, पारस और कल्पवृक्ष से की गई है। इसके तत्वज्ञान के संपर्क में आकर मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को-बल और महत्व को, पक्ष और प्रयोजन को ठीक तरह समझ लेता है। इस आस्था के आधार पर विनिर्मित कार्य-पद्धति अपनाने रहने पर वह ब्राह्मण बन जाता है भले ही लौकिक रूप में उसे सामान्य परिस्थितियों का जीवन जीना पड़े। ब्राह्मण की आस्थाएँ एवं विचारताएँ इतने ऊँचे स्तर की होती हैं उनके निवास स्थान अंतःकरण में अमृत का निर्झर झरने जैसा आनन्द हर घड़ी उपलब्ध होता रहता है।
साधना से बना करते हैं। इस तथ्य को न समझने वाले छुटपुट पूजा पत्री करने और उलटी-पलटी माला खिसकाने के सहारे लंबे चौड़े स्वप्न देखते और विफल-मनोरथ, निराश, असफल बने रहते हैं।”
साधना और ये सुख इतने निर्बल होते हैं कि उनसे व्यक्ति की आँतरिक पिपासा शाँत नहीं होती । क्षणिक सुख का-सा जो आभास होता है वह भी अंततः अग्नि में घी डालने का ही काम करता है । इससे सुख प्राप्ति की कामना प्रबल होती है और उनके प्रति राग या आसक्ति बन जाती है ।
साधना करते और समाधि स्थिति तक जा पहुँचते हैं।
साधना की उन चमत्कारी विभूतियों को अपने जीवन में पायें- जिन्हें हमने पाया और धन्य हुए। “
साधना से शक्ति के उपार्जन की दैवी अनुकूलताओं को आमंत्रित कर अप्रत्याशित विपत्तियों से जूझने व इन्हें निरस्त करने की प्रमुख भूमिका इसी माध्यम से सम्पन्न हुई।
साधनारत रह निरंतर अधिकाधिक सीखने की वृत्ति बनाए रखना एक उच्चस्तरीय योग है । यही ज्ञानयोग कहलाता है ।
साधना में जिनकी अभिरुचि है उनके लिए क्रिया पक्ष की साधनाएँ करने के साथ ही इन अनुबंधों का पालन करना आवश्यक निर्धारित किया गया है ।
साधना संजीवनी साधना के सत्र चले। प्रायः दस लाख से बढ़कर ऋषि युग्म की गोदी में पला यह परिवार अब प्रायः साढ़े पाँच करोड़ की संख्या पार कर चुका है।
साधना पुरुषार्थ में संलग्न कर सूक्ष्मीकरण में प्रवेश किया था। कार्य महाकाल की सत्ता करा रही है। निश्चित रूप से वह जो भी निर्धारण करेगी, वह विश्व मात्र के हित में होगा। अगले अश्वमेधों या संस्कार महोत्सवों या छोटे स्तर के यज्ञों-देवस्थापना कार्यक्रमों में कौन जाता है, यह महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि शक्ति सतत् अपने अजस्र स्त्रोत से निरंतर बहती रहेगी, निमित्त किसी भी अर्जुन, हनुमान, निषाद, गिलहरी या शबरी को बना सकती है। निश्चित ही दुंदुभि इसी प्रकार बजती रहे सारे विश्व ब्रह्मांड को निनादित करती रहेगी व सन् 2000 के आने की अवधि तक अपने लक्ष्य को समीप लाकर रहेगी।
साधना से सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों की शक्ति को जगाया जा सके, तो अनंत ब्रह्मांड के सूक्ष्म रहस्यों को आसानी से जाना-समझा जा सकता है । नादयोग सूक्ष्म ध्वनि प्रवाह को सुनने समझने की क्षमता का विकास करने की विधा है । इसके नित्य नियमित अभ्यास से स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर का विकास होता और जीवन की सफलता का रहस्य खुलता जाता है ।
साधना का था, पंचवीर भद्रों के शक्ति जागरण का था, विश्व मात्र की देवात्म शक्ति कुँडलिनी के जागरण का था, एक नया रूप लेकर आया व पूज्यवर ने पंचवर्षीय ‘एक्सटेंशन’ के साथ नई-नई योजनाओं के साथ सार्वजनिक रूप से सबसे मिलने का क्रम आरंभ किया एवं 2 जून 1990 को गायत्री जयंती के दिन अपनी सभी शक्ति परम वंदनीय माताजी को देकर वे महाप्रयाण कर गये।
साधना को इस विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने वाले परमार्थ में ही खपाना पड़ता है । ऐसे लोग औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में संतुष्ट रहने और धनाध्यक्ष बनने के सपने नहीं देखते । ऐसे लोगों को आत्म संतोष, लोक सम्मान का लाभ तो प्रचुर मात्रा में मिलता है, पर उस स्तर की संपदा संग्रह करना बन नहीं पड़ता जिसके सहारे मनमर्जी गुलछर्रे उड़ाए जा सकें और उत्तराधिकारियों के लिए सात पीढ़ी तक बैठ कर खाते रहने के लिए दौलत के भरे हुए भंडार छोड़कर विदा हुआ जाय ।
साधनाओं में शब्द शक्ति का उपयोग जहाँ आत्मोत्थान एवं जनकल्याण के लिए किया जाता है, वहीं वाममार्गी साधनाओं में इस पराशक्ति का दुरुपयोग प्रायः दूसरों को क्षति पहुँचाने में भी होता रहा है । विज्ञान-वेत्तओं ने भी ध्वनि तरंगों में सन्निहित इन क्षमताओं को अब ढूँढ़ निकाला है और पाया है कि मनुष्यों सहित प्राणियों एवं जड़ इमारतों पर इनका प्रभाव बुरा होता है । पिछले दिनों चैकोस्लोवाकिया के एक इंजीनियर प्रो. गावराड ने पराध्वनि उत्पादक एक ऐसा यंत्र विकसित किया जो प्रयोग के दौरान अपनी शक्ति शाली तरंगों के कारण प्राणघातक सिद्ध हुआ । जब उसकी तरंगें एक बैल पर डाली गयीं तो वह तड़प कर तुरंत वहीं मर गया । मृत्यु का करण जानने के लिए जब उसकी चीर-फाड़ की गयी तो देखा गया कि आँतरिक अवयव बिलकुल विकृत हो गये थे ।
साधना के नाम से सम्मिलित है ।
साधना के चरम शिखर पर पहुँचने वाला कैसा होगा ? यहीं पर उसकी एक झलक देखने को मिलती है।
साधना-आराधना के रूप में जाना जा सकता है ।
साधना है उससे ब्रह्म सान्निध्य ब्रह्म साक्षात्कार का लाभ मिलता है । उसके कितने ही आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे प्रतिफल हैं जिनसे क्रमशः आत्मा का परमात्मा के रूप में विकास होते हुए अपूर्णता की पूर्णता में परिणति होती है ।
साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल ओर धुँधकारी शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ। ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेकों को सुपथ पर चलना सिखाये।”
साधना पूरी हुई, इसे कैसे पहचाने? इस पहेली को गीता ने अपने अठारहवें अध्याय के बयालीसवें श्लोक में सुलझाया है। इसके अनुसार अंतःकरण का निग्रह, आचरण एवं व्यवहार की परिष्कृत स्थिति सरल आस्तिक बुद्धि अपरिग्रह आदि ऐसे लक्षण हैं जिनसे इन्हें पहचाना जा सकता है। प्राचीन समय में ब्राह्मणों ने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया भी। स्मृतियों की विविधता इसका प्रमाण है।
साधना से मिलती है। भौतिक सुविधाओं के मामले में तो उसे सर्वथा अपरिग्रही होना चाहिए।” फिर कुछ रुक कर थोथा रोप व्यक्त करते हुए बोले-”खेद है आज अपरिग्रह को दरिद्रता समझ लिया गया जबकि अपरिग्रह का मतलब है स्वयं पर विश्वास और ब्राह्मण का जीवन इसका उच्चादर्श है। जब मनुष्य का स्वयं पर, समाज पर और भगवान पर पूरी तरह विश्वास उठ जाता है तभी वह लालची होकर सुविधाएँ बटोरने लगता है।
साधनाएँ करने के साथ ही इन अनुबंधों का पालन करना आवश्यक निर्धारित किया गया है ।
साधना की। इसके लिए पल-पल तपे, इंच-इंच बढ़े। जिंदगी में यज्ञोपवीत संस्कार का वह क्षण कभी नहीं भूला जब महामना मदनमोहन मालवीय ने गायत्री महामंत्र सुनाने के साथ ही कहा था-”गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है”। “ब्राह्मण जन्म से नहीं जीवन साधना से बना करते हैं। इस तथ्य को न समझने वाले छुटपुट पूजा पत्री करने और उलटी-पलटी माला खिसकाने के सहारे लंबे चौड़े स्वप्न देखते और विफल-मनोरथ, निराश, असफल बने रहते हैं।
साधनाओं में इस पराशक्ति का दुरुपयोग प्रायः दूसरों को क्षति पहुँचाने में भी होता रहा है । विज्ञान-वेत्तओं ने भी ध्वनि तरंगों में सन्निहित इन क्षमताओं को अब ढूँढ़ निकाला है और पाया है कि मनुष्यों सहित प्राणियों एवं जड़ इमारतों पर इनका प्रभाव बुरा होता है । पिछले दिनों चैकोस्लोवाकिया के एक इंजीनियर प्रो. गावराड ने पराध्वनि उत्पादक एक ऐसा यंत्र विकसित किया जो प्रयोग के दौरान अपनी शक्ति शाली तरंगों के कारण प्राणघातक सिद्ध हुआ । जब उसकी तरंगें एक बैल पर डाली गयीं तो वह तड़प कर तुरंत वहीं मर गया । मृत्यु का करण जानने के लिए जब उसकी चीर-फाड़ की गयी तो देखा गया कि आँतरिक अवयव बिलकुल विकृत हो गये थे ।
साधना द्वारा ब्राह्मणत्व उपलब्ध किया। विदेशों में यह नाम भले न प्रचलित हो पर इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ ब्राह्मण नहीं हुए। सुकरात, योरो, इमर्सन, आइन्स्टीन सौ टंच खरे ब्राह्मण थे।
साधना है ।
साधना कर सकता है ? उनके परामर्श भी ऐसे ही अधोगामी होते हैं । तथाकथित स्वजन संबंधी भी ऐसे ही सुझाव देते और आग्रह करते देखे जाते हैं । इनका बुलावा अपने जैसी काक मंडली में आ बैठने के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता । अपने संचित कुसंस्कार भी उसी कीचड़ में लौट चलने के लिए प्रेरित करते हैं , जिनमें मुद्दतों रहना पड़ा ।
साधना है। मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान है। इस साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शूद्र ऐतरेय भी ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल ओर धुँधकारी शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ।
साधनात्मक उपाय उपचारों को सृजन किया है । विज्ञानवेत्ता भी अब इसी तथ्य को पुष्टि कर रहे हैं । ब्रिटेन के विख्यात भौतिक विज्ञानी एवं रसायन शास्त्री विलियम हाइडे वोलेस्टन ने भी अपने अनुसंधान निष्कर्षों में बताया है कि शरीर की समस्त हलचलों और गतिविधियों का संचालन प्राण चेतना द्वारा ही होता है । यदि उसकी लयबद्धता को अभ्यास द्वारा नियमित बना लिया जाय तो जीवन की रहस्यमय विलक्षणताओं को, जिन्हें अतींद्रिय क्षमतायें भी कहा जाता है, साक्षात्कार किया जा सकता है । उनके अनुसार अंदर की सूक्ष्म ध्वनियों को सुनने के लिए सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय को विकसित करने की आवश्यकता है ।
साधनात्मक प्रयोगों से मिलती है। इसी लिए उसे कल्पवृक्ष कहते हैं।
साधना से अपने आँतरिक तारों को झंकृत कर षट्चक्रों को जगाने और उनकी प्रवृत्तियों को रूपाँतरित कर उनमें सन्निहित क्षमताओं को विकसित करके ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी बनते हैं । अपने इसी शरीर में सप्त देव, सप्त ऋषि, सप्त लोक, सप्त सागर, सप्तमेरु, सप्त तीर्थ, सप्त साधना के रूप में-सप्त स्वरों के-सप्त झंकृतियों के रूप में प्रतिक्षण तरंगित होते रहते हैं जिससे सारा अंतर्जगत संगीतमय बना रहता है । इन तरंगों में असाधारण शक्ति भरी पड़ी है । नाद ब्रह्म की साधना द्वारा यदि इन्हें नियमित, सुव्यवस्थित एवं लयबद्ध बना लिया जाय तो न केवल शारीरिक और मानसिक जगत की सूक्ष्म शक्तियों को जगाया और उनसे लाभ उठाया जा सकता है, वरन् आत्मिक जगत की विभूतियों से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है ।
साधना में मनःस्थिति को ब्राह्मी भूत बनाना पड़ता है । अपने को शरीर और मन से ऊपर की स्थिति में अनुभव कराने वाली ब्रह्मचेतना जगानी पड़ती है । इसकी भूमिका बन पड़ने पर श्वास प्रक्रिया में इतना दिव्य आकर्षण उत्पन्न हो जाता है कि उसके सहारे अनन्त अंतरिक्ष से दिव्य प्राण को अपने लिये आकर्षित करना और उपलब्ध अंश को धारण कर सकना संभव होता है । इसी का नाम सोऽहम् साधना है ।
साधना से जो अमृत-कण हाथ लगते हैं, उनसे सारी वसुधा को हम धन्य बना सकते हैं ।
साधना के रूप में-सप्त स्वरों के-सप्त झंकृतियों के रूप में प्रतिक्षण तरंगित होते रहते हैं जिससे सारा अंतर्जगत संगीतमय बना रहता है । इन तरंगों में असाधारण शक्ति भरी पड़ी है । नाद ब्रह्म की साधना द्वारा यदि इन्हें नियमित, सुव्यवस्थित एवं लयबद्ध बना लिया जाय तो न केवल शारीरिक और मानसिक जगत की सूक्ष्म शक्तियों को जगाया और उनसे लाभ उठाया जा सकता है, वरन् आत्मिक जगत की विभूतियों से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है ।
साधनाओं की कष्ट साध्य प्रक्रिया का अवलंबन लेना पड़ता है । मूर्द्धन्य भौतिक विज्ञानी चार्ल्स जी. वान राइपर ने अपनी पुस्तक “ऐन इन्ट्रोडक्सन टू जनरल अमेरिकन फोनेटिक्स” में जीवनोपयोगी ध्वनि विज्ञान की इस क्षमता पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि शरीर में समाविष्ट स्वर लहरियों के अविरल प्रवाह को समझे बिना मनुष्य चेतना की रहस्यमय परतों से अनभिज्ञ ही बना रहेगा और उसकी विलक्षण क्षमताओं से कोई लाभ नहीं उठा सकेगा । अब तो कानों से सुनी जा सकने वाली तथा न सुनी जा सकने वाली ध्वनियों के अध्ययन-अनुसंधान के लिए “श्रोत ध्वनि विज्ञान” नाम से एक पृथक शाखा ही बन चुकी है जिसमें श्रवण और श्रवणातीत दोनों ही प्रकार की ध्वनि तरंगों का वैज्ञानिक ढंग से विवेचन-विश्लेषण किया जाता है । राइपर का कहना है कि ध्वनि एक निश्चित भौतिक प्रक्रिया एवं सृष्टि की एक महत्त्वपूर्ण शक्ति है । जिस प्रकार प्रकृति और प्राणि जगत में प्रकाश, गर्मी, चुँबकत्व एवं गुरुत्वाकर्षण शक्तियों का प्रभाव होता है और उससे उनके शरीर बढ़ते पुष्ट और स्वस्थ बनते हैं, उसी प्रकार ध्वनि में भी तापीय और प्रकाशीय ऊर्जा होती है और वह प्राणियों के विकास में उतना ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है जितना वायु, अन्न और जल ।
साधनाओं में आसन-प्राणायाम से लेकर ध्यान-धारणा तक की समस्त प्रक्रियायें व्यष्टि चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से ऐक्य स्थापित करने के लिए विनिर्मित हुई हैं । स्फूर्ति उत्पन्न करने वाली अपने अंदर की ध्वनि कंपनों स्वर लहरियों को जिन्हें विज्ञानवेत्ता ‘फिजियोलॉजिकल टैमर’ के नाम से संबोधित करते हैं, उन्हें हर व्यक्ति सुन और क्रमबद्ध कर सकता है । इससे न केवल जीवनी शक्ति की अभिवृद्धि की जा सकती है, वरन् चेतना के उच्च सोपानों पर आरुढ़ हुआ जा सकना संभव है । मंत्र-जप में इन्हीं स्वर लहरियों का तादात्म्य सूक्ष्म जगत की ध्वनियों से बिठाया जाता है, फलस्वरूप सूक्ष्म जगत की हलचलों को आसानी से सुना जा सकता हे ।
साधना सुविधाओं में अभिवृद्धि की है । इन तरंगों का वैज्ञानिकों ने उपयोग कर अब एक ऐसी सुरक्षा घंटी विकसित की है कि यदि इन तरंगों को रात के वक्त घर में फैला दिया जाय तो चोर अथवा अन्य किसी भी प्रकार की हलचल इनकी तीक्ष्ण आँखों की पकड़ से बच नहीं सकती और तुरंत घंटी बजा कर इस की सूचना मालिक को दे देती हैं । इसी तरह शल्यचिकित्सा, कीटाणु-नाश, ऋतु परिवर्तन, मोटे धातु खंडों का विलगन आदि क्षेत्रों में इसे विद्युत एवं अणु शक्ति के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है । इन कार्यों को देखते हुए इसकी विलक्षण सामर्थ्य का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है ।
साधना की प्रक्रिया भारत भू के चप्पे-चप्पे में सोये संस्कारों को जगाने की निमित्त संपन्न होना आरंभ हुई तथा विराट् संस्कार महोत्सवों के माध्यम से पूरे उत्तरी मध्य, पूर्वी, पश्चिमी भारत के साथ विश्वभर के सत्ताईस देशों में ये आयोजन सफलता पूर्वक हुए। पंजाब व आसाम समस्या का समाधान प्रत्यक्षतः तो किन्हीं औरों से बन पड़ा होगा, किंतु परोक्ष स्तर पर साधना से शक्ति के उपार्जन की दैवी अनुकूलताओं को आमंत्रित कर अप्रत्याशित विपत्तियों से जूझने व इन्हें निरस्त करने की प्रमुख भूमिका इसी माध्यम से सम्पन्न हुई।
साधना में प्राण साधना के नाम से सम्मिलित है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-August
साधना से सिद्धि न मिल जाय, तब तक उसे निष्ठापूर्वक करते रहना चाहिए। (2) नैरन्तर्येण या नित्य-नैमित्तिकत्ता। इसके अंतर्गत उस प्रमाद से बचने को सलाह दी गई है, जिसमें उपासक दस दिन उपासना करके चार दिन आराम करने की बात सोचते हैं। इसके उपासना निष्फल जाती है। उसे नित्य-नैमित्तिक क्रिया की तरह प्रतिदिन आस्था पूर्वक किया जाना चाहिए।
साधना को भी नर द्वारा अपना अधिकार समझा जाता है। अमेरिका में जब दास प्रथा का बाहुल्य था तब खरीदे हुए गुलामों से मन चाहा काम लेना और कमी देखने पर प्रताड़ना देना प्रचलन जैसा बन गया था। भले ही पीछे उसे अमानवीय माना गया हो और कानूनन उस प्रथा को समाप्त किया गया हो। पराये घर से आई महिलाओं से मन माना लाभ उठाते रहने पर भी अपने समुदाय पर न जाने क्या प्रेत-पिशाच चढ़ा रहता है कि वधू वर्ग की महिलाओं के हिस्से में पक्षपात ही आता है। उन्हें पराई समझा जाता रहा ।
साधना के पकने और फलदायी होने में समय लगता है।
साधनाओं का अधिकारी होता। एक बार उनके किसी पुराने शिष्य ने पूछा-आपका व्यक्तित्व इतना प्रेममय है फिर आप इतना कठोर कैसे हो जाते हैं। गुरजिएफ का जवाब था कठोर कहाँ होता हूँ-मैं तो पत्थरों में हीरे छाँटता हूँ। हीरे छाँटकर उन्हें तराशने लगता हूँ, पत्थरों को फेंक देता हूँ रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानंद के सामने उस समय अपनी समस्त सिद्धियाँ देने का प्रस्ताव रखा, जिस समय वे और उनका परिवार एक-एक अन्न कण के लिए तरस रहे थे। ऐसे में भी विवेकानंद ने उपेक्षा के स्वरों में कहा था, उन्हें ईश्वरीय प्रेम चाहिए तुच्छ सिद्धियाँ नहीं।
साधना की पूर्णता के पूर्व अपने क्रियाकलापों को गुप्त रखा, प्रशंसा प्रसिद्धि से अपने को अछूता रखा और अहंकार के शिकंजे से कोसोँ दूर रहे।
साधना गुरु भक्ति से आरंभ होकर ईश्वर भक्ति तक जा पहुँची। हमें इस प्रसंग में इतने अधिक आनंद उल्लास का अनुभव होता रहा है कि उसके आगे संसार का बड़े से बड़ा सुख भी तुच्छ लग सके। अपने गुरु के प्रति बढ़ती हुई हमारी प्रेम भावना आत्म प्रेम और विश्व प्रेम में विकसित होती चली गयी और देखने वालों को उस अंतः भूमिका की प्रतिध्वनि एक दिव्य जीवन के रूप में मिल सकी।”
साधना का महत्व समझने वाले और उसे चरितार्थ करते रहने वाले कभी घाटे में नहीं रहते। यदि आर्थिक दृष्टि से कुछ हानि उठाना पड़े तो उसकी भरपाई उस प्रतिक्रिया में हो जाती है, जो उसकी सहायता के बदले बहुतों की सद्भावना साथ लेकर वापस लौटती है।
साधनाओं द्वारा अपनी बुद्धि को सूक्ष्म और निर्मल बनाते हैं। चित्त को विषय-वासनाओं से मुक्त करके उसे किसी भी सूक्ष्म स्थिति में प्रवेश और चिंतन के योग्य बनाते हैं, तब कहीं उन भाव तरंगों की प्राप्ति और अनुभूति हो पाती है, जो अपने अंदर और बाहर सब तरफ तिल में तेल जल में विद्युत और शब्द में अर्थ की भाँति छिपे पड़े हैं। प्रेम भावनाओं के उद्रेक से अंतःकरण में अतिरिक्त कुछ और दिखाई ही नहीं देता इसलिए प्रेम जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है। उसके लिए कठिन साधनाओं की आवश्यकता नहीं । आत्मारस है उसकी अनुभूति कराने की शक्ति केवल प्रेम को है।
साधना की फलोत्पादकता के संबंध में भी यही बात समझी जानी चाहिए। वह भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की मनोभूमि पर निर्भर करती है। जिस व्यक्ति की मनोभूमि जितनी उर्वर और झाड़-झंखाड़ों, कषाय-कल्मषों से रहित होती है, उसकी उपासना उतनी ही जल्दी फलवती होती है, किंतु जिसका अंतः कारण कषाय-कल्मषों से भरा, अनुर्वर, ऊबड़-खाबड़ पथरीला होता है, उसकी उपासना आरंभ में होती है। बाद में जब वह धवल और निरभ्र आकाश की तरह साफ हो जाता है, तो उपासना का परिमाण भी सामने आने लगता है। अस्तु अध्यात्म मार्ग के पथिकों की उपासना में फल-प्राप्ति की उतावली न करने का शास्त्रकारों ने परामर्श दिया है।
साधनात्मक जीवन के संबंध में भी घटित हुआ था।
साधना को यदि साँसारिक रिश्तों से तौला जाय तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अनन्य पति प्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है। उनकी इच्छा अपनी इच्छा। अपने व्यक्तित्व के लिए कभी कुछ चाहने-माँगने की कल्पना तक नहीं उठी। केवल इतना ही सोचते रहे, अपने पास जो कुछ है।
साधना के पश्चात् भी फल न प्राप्त होने के कारण साधक उपासना छोड़ बैठने की अधीरता बरतते हैं कि ऐसा क्यों व किस कारण हुआ। ऐसा ही एक प्रसंग महान गायत्री उपासक विद्यारण्य स्वामी का है। उन्होंने लंबे समय तक निष्ठापूर्वक गायत्री के 23 पुरश्चरण किये, किंतु लाभ नगण्य जितना दिखाई पड़ा। इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने गायत्री-उपासना छोड़ दी। उपासना का सत्परिणाम बस इतना ही दिखाई पड़ा कि उनके मन में तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया।
साधना की।
अगले जन्म के हित भी-अमृत, यही पिया है॥
साधनाओं की आवश्यकता नहीं । आत्मारस है उसकी अनुभूति कराने की शक्ति केवल प्रेम को है। इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट जानने के लिए हमें जीवन के उन क्षणों का स्मरण करना होगा जब हम किसी के प्रेम में भाव विभोर रहे हों। प्रेम में अद्वितीय रस, अनुपम सौंदर्य और रहस्यमय संगीत छिपा हुआ है। प्रेमी तो वीरान भी महल और राजप्रासादों में रहने वालों की अपेक्षा स्वयं को असीम तृप्त और परमानंद की स्थिति में पाता है।
साधना प्रकाराँतर से चमत्कारी वरदान बनकर ही वापस लौटी है।
साधना को करने के लिए हृदय की विशालता चाहिए। जो दूसरों के दुःख से दुखी और दूसरों के सुख से सुखी हो सकता है, उसी के लिए यह संभव है कि उदारता बरते, दूसरे की सहायता करे। इसके लिए अपनी सुविधाओं में कटौती करके ही वह बचत की जा सकती है जो परमार्थ के काम आए। अपनी सुविधाओं में कटौती कर सकना किसी आदर्शवादी के लिए ही संभव है। हर किसी के लिए नहीं जिसमें आत्मसंयम अपनाने का साहस है, वही यह भी कर सकता है कि अपना समय, श्रम, ज्ञान, साधन दूसरों को देने के लिए कदम बढ़ा सके।
साधनाओं का सृजन हुआ है। अंतःकरण ही मनुष्य का भाग्य विधाता है। इस क्षेत्र को उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं-आस्थाओं आकाँक्षाओं से अनुप्राणित करने पर ही व्यक्ति और समाज को वर्तमान से उबारा और उज्ज्वल भविष्य के निकट पहुँचाया जा सकता है।
साधनात्मक जीवन में यह विडंबना संभव नहीं। इसकी शुरुआत ही सद्गुरु में अपनी समस्त इच्छाएँ विसर्जित करने से होती हैं। मेरे गुरु ने मुझे धोबी की तरह पीट-पीट कर धुला है, धुनिए की तरह धुना है।
साधना की जाती है। अंतःकरण को ब्रह्म, मनः संस्थान को विष्णु और कायकलेवर को रुद्र की उपमा दी गयी है। यही तीनों व्यक्तिगत त्रिदेव हैं जिनके वरदान-अभिशाप पर उत्थान पतन की सारी संभावनायें अवलंबित हैं।
साधना करनी चाहिए कि संसार भर में जो कुछ है ईश्वर का है।
मैं तो वस्तुओं या प्राणियों का उपयोग उनकी इच्छानुसार किया करूंगा।
साधना में उसी मनोयोग से लगे रहे, जिस भाव से भारत जी लगे थे। उस पृष्ठभूमि पर ही राम राज्य का भवन खड़ा किया गया था।
साधना की महत्ता को वह भूल जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर सपफली लेखक, कवि, वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक एवं महापुरुषों ने अपनी साधना की पूर्णता के पूर्व अपने क्रियाकलापों को गुप्त रखा, प्रशंसा प्रसिद्धि से अपने को अछूता रखा और अहंकार के शिकंजे से कोसोँ दूर रहे।
साधनाओं और तपश्चर्या का आविष्कार किया और परामर्श दिया है कि अंतःकरण की भाव संवेदना को-उत्कृष्टता को जगाया-बढ़ाया जाय, कारण कि व्यक्तित्व के समग्र विकास की जड़ें अंतःकरण की गहराई में ही विद्यमान हैं। नर से नारायण बनने का उद्गम स्थल यही है। ऋद्धि-सिद्धियों के भंडार इसी की तिजोरी में बंद हैं। इसे ही विकसित करने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।
साधना उपचारों का सहारा लिया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-May
साधना तपश्चर्या है। जिसे साधारण मनुष्य भी जागरुकता अपनाकर अपने अभ्यास में उतार सकता है और अभीष्ट दिशा में उत्साह वर्धक सफलता प्राप्त कर सकता है। मन की एकाग्रता उन्हीं से सधती हैं जो अपने समय को साध लेते हैं। अर्थात् दिनचर्या बनाकर समय के श्रेष्ठतम विभाजन की योजना बनाते हैं। समय का एक क्षण भी बर्बाद नहीं होने देते।
साधना करने के लिए जितना प्रयास किया, उतनी सफलता पायी। साधना से सिद्धि की बात प्रख्यात है। जीवन की साधना की सिद्धि में ही किसी प्रकार के संदेह की गुँजाइश नहीं है। अन्य किसी बात में तो संदेह की गुँजाइश भी है, देवी-देवताओं की उपासना करने पर हमको फल मिले न मिले कह नहीं सकते, लेकिन जीवन की साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता है। यह साधना के बारे में निवेदन किया गया है।
साधना की गतिविधियाँ अपनाते हैं। यह उत्कर्ष, अभ्युदय प्राप्त कर सकना हर किसी के अपने वश की बात है। चौराहे पर खड़ा मनुष्य इच्छानुसार किसी भी मार्ग को अपना सकता है। नरक अथवा स्वर्ग की ओर चलने वाली किसी भी दिशा को वह अपना सकता है। इस चयन की छूट उसे पूरी तरह मिली हुई है।
साधना ने जिन्हें सिद्धि समुदाय का स्वामी बना दिया है, ऐसे महापुरुष की सेवा का सौभाग्य मिला मुझे आज।’ नरपति का हर्ष अनुचित नहीं था।
साधना अनिवार्य थी। इसके कई गुह्य व परोक्ष पहलू हमें किसी को भी ज्ञात नहीं है। परम वंदनीया माताजी के अतिरिक्त उन्हें कोई जानता भी नहीं है। किन्तु उनने जन-जन को देखा था। यह भी देखा व पाया था कि आत्मबल, अध्यात्म शक्ति के अभाव-वश व्यक्ति दीन−हीन जीवन जीता देखा जाता है।
साधना से भरापूरा जीवन जीने वाले धरती के देवता जैसी स्थिति प्राप्त करते और अपने चारों ओर स्वर्ग बिखरा देखते हैं। यही जीवन का लक्ष्य और आनंद है। यह सब विभूति-वैभव उन्हीं को उपलब्ध होता है, जो आदर्शों के लिए समर्पित रहकर धर्मधारणा और लोक साधना की गतिविधियाँ अपनाते हैं। यह उत्कर्ष, अभ्युदय प्राप्त कर सकना हर किसी के अपने वश की बात है। चौराहे पर खड़ा मनुष्य इच्छानुसार किसी भी मार्ग को अपना सकता है।
साधना के साथ आहार संयम का सरल सुगम रूप पूज्यवर ने दो चीजों का प्रयोग- एक खाने की एक लगाने की या मात्र तरल प्रवाही द्रव्योँ का प्रयोग, यह बताया। नवरात्रि की अनुष्ठान साधना तो ढेरों व्यक्ति करते हैं तो कितने सही अर्थों में मन लगा पाते हैं। यदि वे जल उपवास जैसी या निर्जला जैसी कड़ी तथा फलाहार की अति वाली दो विपरीत धुरियों के बीच एक सामान्य कड़ी के ही प्रयोग चालू करें तो बहुत सफल साधना उनकी होती रह सकती है, यह पूज्यवर ने समय समय पर बताया।
साधना, आध्यात्मिक भावकल्प साधना आदि के रूप में शांति कुँज में समय-समय पर सत्र तो होते रहे हैं किंतु पूज्यवर ने मुख्य ध्यान जन-जन के लिए साधना सूत्रों को सुगम बनाने पर विशेषतः दिया व जीवन साधना सत्र इसी प्रयोजन के निमित्त आयोजित भी होते रहें। इन्हें बाद में संजीवनी साधना नाम दिया गया जिनमें जीवन जीने की कला के शिक्षण के सारे सूत्र गूँथ दिये गए। यह अपने आप में एक विलक्षण संश्लेषित प्रक्रिया बन गयी। दैनिक जप, जप के साथ ध्यान तथा प्रज्ञायोग को नियमित संपादित किया जाना, स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
साधनाओं को कर रहे हैं एवं लाभान्वित हो रहे हैं।
साधना उनकी होती रह सकती है, यह पूज्यवर ने समय समय पर बताया।
साधना के लिए हमको वही क्रिया-कलाप अपनाने पड़ते हैं जो कि एक कुसंस्कारी घोड़े या बैल को सुधारने के लिए उसके मालिकों को करने पड़ते हैं-हल में चलने के लिए और गाड़ी में चलने के लिए। कुसंस्कारों को दूर करने के लिए हमको लगभग उसी तरह के प्रयत्न करने पड़ते हैं जैसे कि सरकस के पशुओं को पालते हुए उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे सरकस में तमाशा दिखा सकें। इसी तरह के प्रयत्न हमको अपने गुण, कर्म, स्वभाव के विकास के परिष्कार के लिए करने पड़ते हैं। कच्ची धातुओं को जिस तरीके से आग में तपा करके उनको शुद्ध-परिष्कृत बनाया जाता है, जेवर आभूषण बनाये जाते हैं, उसी तरीके से हमारा कच्चा जीवन-कुसंस्कारी जीवन को ढाल करके ऐसा सभ्य और ऐसा सुसंस्कृत बनाया जाय कि हम ढली हुई धातु के आभूषण के तरीके से अथवा औजार-हथियार के तरीके से दिखायी पड़े। जंगली झाड़ियों को काटकर के माली लोग अच्छे-अच्छे झाड़ और खूबसूरत पार्क बना देते हैं।
साधना सूत्रों को सुगम बनाने पर विशेषतः दिया व जीवन साधना सत्र इसी प्रयोजन के निमित्त आयोजित भी होते रहें। इन्हें बाद में संजीवनी साधना नाम दिया गया जिनमें जीवन जीने की कला के शिक्षण के सारे सूत्र गूँथ दिये गए। यह अपने आप में एक विलक्षण संश्लेषित प्रक्रिया बन गयी। दैनिक जप, जप के साथ ध्यान तथा प्रज्ञायोग को नियमित संपादित किया जाना, स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
साधना मानव को महामानव के गौरवपूर्ण पद पर पहुँचा देती है। जीन प्लनडिन की कला-साधना और उसके प्रति समर्पण प्रगति के इच्छुक हर किसी के लिए एक सर्वोत्तम उदाहरण है।
साधनाएँ देर तक करते रहने के लिए उपयुक्त रहा होगा। पर अब तो परिस्थितियाँ भिन्न हैं। आत्मपरिष्कार के आधार भी आवश्यक हो गये हैं जो पहले हस्तगत रहते थे।
साधना अद्वितीय है उसकी सफलता कोई रोक नहीं सकता। धन्य है आपका ब्राह्मणत्व एवं यह देश जिसने आप जैसे नर रत्नों को जन्म दिया।”
साधना की सिद्धि में ही किसी प्रकार के संदेह की गुँजाइश नहीं है। अन्य किसी बात में तो संदेह की गुँजाइश भी है, देवी-देवताओं की उपासना करने पर हमको फल मिले न मिले कह नहीं सकते, लेकिन जीवन की साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता है। यह साधना के बारे में निवेदन किया गया है।
साधना विज्ञान की पुस्तकों को देखकर आज के युग के किसी भी व्यक्ति को लग सकता है कि ये सब उसके लिए नहीं है। कोई देवलोक से विशिष्ट क्षमताएँ लेकर आया व्यक्ति ही यह कार्य कर सकता है, एक सामान्य व्यक्ति के लिए तो मात्र पेट-प्रजनन की जिंदगी जीकर जीवन किसी तरह काट देना भर हैं, यही तथ्य, सबको समझ में आता है व लोक-व्यवहार में दृष्टिगोचर भी होता है। लेकिन पूज्यवर गुरुदेव, पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने अपने जीवन के अनुभवों से हर व्यक्ति के समक्ष एक खुली किताब रखते हुए कहा कि साधनहीन व्यक्ति भले ही जीवन जीले किंतु साधना विहीन जीवन न जिये एवं उसके लिए सरलतम योग साधनात्मक पद्धतियों का आहार से लेकर दैनंदिन जीवन व्यवहार का एक ऐसा पहलू प्रस्तुत किया जो हर किसी के लिए सुगम है।
साधना प्रक्रिया पूज्यवर के द्वारा ही निर्धारित है। उपासना में आत्मसत्ता को परमतत्व से एकाकार करने की भावना कषाय कल्मषों का परिशोधन, साधना में विचार, अर्थ, समय व इंद्रिय-संयम व उसके लिए सत्त स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा। ये चारों ऐसे हैं जिनमें से एक को भी आत्मोत्कर्ष के लिए छोड़ा नहीं जा सकता। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसके बिना हमारे जीवन का उत्थान हो सके। चारों में आपस में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, जिस तरीके से कई तरह की चौकड़ियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं-मसलन बीज एक, जमीन-दो, खाद-तीन, पानी-चार। चारों जब तक नहीं मिलेंगे कृषि नहीं हो सकती।
साधना से समष्टि मन का निर्माण कर सके ताकि समूह चेतना के जागरण से व्यक्ति-परिवार ही नहीं समाज की अभिनव संरचना का भी सरंजाम जुट सके। इतने विराट स्तर पर मानव मात्र के कल्याण की बात युगऋषि स्तर की सत्ता ही सोच सकती है।
साधना मानते हैं। जहाँ-जहाँ से गीता के ही श्लोक चुनकर अपने मत को प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं। पर यदि निष्पक्ष होकर विचार करने का प्रयास किया जाय तो इस मत का आग्रह नहीं ठहरता। कारण कि ग्रन्थ में बार-बार कहा जा रहा है, कि अकर्म से कर्म उत्तम है। कर्म की श्रेष्ठता इस बात में है कि कामना का आंतरिक त्याग करके कर्म परम-पुरुष को अर्पण करना होता हैं।
साधना और उसके प्रति समर्पण प्रगति के इच्छुक हर किसी के लिए एक सर्वोत्तम उदाहरण है।
साधना सत्र इसी प्रयोजन के निमित्त आयोजित भी होते रहें। इन्हें बाद में संजीवनी साधना नाम दिया गया जिनमें जीवन जीने की कला के शिक्षण के सारे सूत्र गूँथ दिये गए। यह अपने आप में एक विलक्षण संश्लेषित प्रक्रिया बन गयी। दैनिक जप, जप के साथ ध्यान तथा प्रज्ञायोग को नियमित संपादित किया जाना, स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
साधना में अनिवार्य है, किंतु तंत्र के साधक में लोकोत्तर साहस भी चाहिए। संपूर्ण ब्रह्मांड विस्फुरित हो जाए तो भी साधक का आसन अविचल रहे-कर सकेगा ?
साधना भूमि की ओर मुड़ गए और एक दिन पुनः देवर्षि नारद संयमनी पधारें।
साधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।
साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है। युगसाधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।
साधना का ही प्रताप था।
साधना की। मात्र जौ व छाछ पर रहकर उस अवधि को पूरा किया। यों वह अवधि 24 वर्ष की थी किन्तु बीच में अदृश्य गुरु सत्ता का आदेश आने पर वह प्रायः 27 वर्षों में पूरी हुई एवं 1953 में उनकी पूर्णाहुति संपन्न हुई। उनके निज के जीवन के लिए यह साधना अनिवार्य थी। इसके कई गुह्य व परोक्ष पहलू हमें किसी को भी ज्ञात नहीं है।
साधना के प्रयत्नों में लगे रहकर अपनी आयुष्य बिता देता है। उसके कोई जिन के उद्देश्य नहीं होते फलतः कुछ क्रम बढ़ रूप में करते धरते भी नहीं बन पड़ता है। इस स्थिति को एक प्रकार से निष्फल जीवन ही कह सकते हैं। जितनी महत्वपूर्ण क्षमताएँ उसे उपलब्ध हुई है। उसकी तुलना में शताँश भी वैसा कुछ नहीं होता जिस पर कि संतोष किया जा सके।
साधना और भजन के बराबर ही मूल्य और महत्व समझा जाना चाहिए। तीसरी बात जो आत्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है, उसका नाम है संयम। संयम का अर्थ है- रोकथाम। अगर हम रोकथाम करें तो जो हमारी शक्तियों का घोर अपव्यय होता रहता है, उसको बचा सकते है। हम अपनी अधिकाँश शारीरिक और मानसिक शक्तियों को अपव्यय में नष्ट कर देते है, कुमार्ग पर नष्ट कर देते है।
साधना, स्वाध्याय के सतत् अभ्यास और उसके अनुसार कार्यक्षेत्र में उतरने पर सफल और स्निग्ध जीवन की सुवास मिलने लगती हैं।
साधना अपनाने के लिए तत्पर होना चाहिए। उस पर संकल्प-पूर्वक निष्ठ भी जमी चाहिए।
साधना में तत्पर शाँति कामियों का गीता विरोध करती है। और सामाजिक कर्तव्यों के निस्वार्थ भाव से करने के आदर्श का प्रतिपादन करती है। वस्तुतः इसमें स्पष्ट ही और उपरोक्त अर्थ ग्रहण करते हुए भी ऐसी कोई बात नहीं है। यह एक प्राचीन ग्रन्थ को अर्वाचीन बुद्धि से समझने का परिणाम है।
साधना, प्राण प्रत्यावर्तन साधना, आध्यात्मिक भावकल्प साधना आदि के रूप में शांति कुँज में समय-समय पर सत्र तो होते रहे हैं किंतु पूज्यवर ने मुख्य ध्यान जन-जन के लिए साधना सूत्रों को सुगम बनाने पर विशेषतः दिया व जीवन साधना सत्र इसी प्रयोजन के निमित्त आयोजित भी होते रहें। इन्हें बाद में संजीवनी साधना नाम दिया गया जिनमें जीवन जीने की कला के शिक्षण के सारे सूत्र गूँथ दिये गए। यह अपने आप में एक विलक्षण संश्लेषित प्रक्रिया बन गयी। दैनिक जप, जप के साथ ध्यान तथा प्रज्ञायोग को नियमित संपादित किया जाना, स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
साधनात्मक पद्धतियों का आहार से लेकर दैनंदिन जीवन व्यवहार का एक ऐसा पहलू प्रस्तुत किया जो हर किसी के लिए सुगम है।
साधना- शाक कल्प, दुग्ध कल्प, फलों के कल्प के प्रयोग किए, कइयों से कराए तथा शाँतिकुँज में कृच्छा चाँद्रायण प्रक्रिया में अमृताशन के रूप में उबले नाम मात्र के मसाले के आहार, हविष्यान्न के प्रयोग तथा पूर्णिमा से अमावस्या व फिर पूर्णिमा तक क्रमशः आहार घटाने व बढ़ाने का प्रयोग कर अन्नमय कोश को साधना व इससे प्राणमय कोश परिष्कार की प्रक्रिया में आगे बढ़ने का सरलतम प्रयोग सबको सिखाया। युग के अनुरूप जो व्यक्ति के शरीर- मन आज ढल गये हैं, उनमें सरलतम पद्धति हो सकती है, इससे लेकर कठिनतम का सत्त विकास पूज्यवर की साधना प्रणालियों में पाये जाते हैं। व्रतों को भी उनने उतना ही महत्व दिया पर उस रूप में नहीं, जैसे वे आज प्रचलित है। आज तो फलाहार के नाम पर अनापशनाप खाकर मनुष्य पेट में और अधिक ठूँसता चला जाता है जबकि व्रत का मोटा अर्थ है- शरीर को थोड़ी छुट्टी -अवकाश दे देना तथा सूक्ष्म अर्थ है मन को निभ्रांत कर श्रेष्ठ चिंतन का सत्त अभ्यास करने की प्रक्रिया सीखना। नवरात्रि साधना के साथ आहार संयम का सरल सुगम रूप पूज्यवर ने दो चीजों का प्रयोग- एक खाने की एक लगाने की या मात्र तरल प्रवाही द्रव्योँ का प्रयोग, यह बताया।
साधना से सिद्धि की बात प्रख्यात है। जीवन की साधना की सिद्धि में ही किसी प्रकार के संदेह की गुँजाइश नहीं है। अन्य किसी बात में तो संदेह की गुँजाइश भी है, देवी-देवताओं की उपासना करने पर हमको फल मिले न मिले कह नहीं सकते, लेकिन जीवन की साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता है। यह साधना के बारे में निवेदन किया गया है।
साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है। युगसाधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।
साधना में जुटे पड़े थे जैसे शेष संसार उनके लिए किसी श्मशान की तरह हो-जहाँ न तो कुछ दर्शनीय होता है न ग्रहणीय। संसार में कोई भौतिक सुख भी होता है, यह उन्होंने जाना ही नहीं।
साधना के लाभों से लाभान्वित होना है, उन्हें सर्वतोमुखी संयम साधना अपनाने के लिए तत्पर होना चाहिए। उस पर संकल्प-पूर्वक निष्ठ भी जमी चाहिए।
साधना के बारे में निवेदन किया गया है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा दैनिक जीवन में न्यूनतम मात्रा में भले ही हों, पर सम्मिलित अवश्य और अनिवार्य रूप से रहने चाहिए।
साधना करने वाला हर मनुष्य अपने में इससे भी विलक्षण शक्तियों का विकास कर सकता है।
साधना अपने आपकी तथा आराधना विराट विश्व ब्रह्मांड की , इस समाज की यह एक निराली त्रिधा साधना प्रक्रिया पूज्यवर के द्वारा ही निर्धारित है। उपासना में आत्मसत्ता को परमतत्व से एकाकार करने की भावना कषाय कल्मषों का परिशोधन, साधना में विचार, अर्थ, समय व इंद्रिय-संयम व उसके लिए सत्त स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है।
साधना करने का परिणाम निश्चित रूप से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों में लाभ के रूप में देखा जा सकता है। यह साधना के बारे में निवेदन किया गया है।
साधना प्रणालियों में पाये जाते हैं। व्रतों को भी उनने उतना ही महत्व दिया पर उस रूप में नहीं, जैसे वे आज प्रचलित है। आज तो फलाहार के नाम पर अनापशनाप खाकर मनुष्य पेट में और अधिक ठूँसता चला जाता है जबकि व्रत का मोटा अर्थ है- शरीर को थोड़ी छुट्टी -अवकाश दे देना तथा सूक्ष्म अर्थ है मन को निभ्रांत कर श्रेष्ठ चिंतन का सत्त अभ्यास करने की प्रक्रिया सीखना। नवरात्रि साधना के साथ आहार संयम का सरल सुगम रूप पूज्यवर ने दो चीजों का प्रयोग- एक खाने की एक लगाने की या मात्र तरल प्रवाही द्रव्योँ का प्रयोग, यह बताया। नवरात्रि की अनुष्ठान साधना तो ढेरों व्यक्ति करते हैं तो कितने सही अर्थों में मन लगा पाते हैं।
साधना व इससे प्राणमय कोश परिष्कार की प्रक्रिया में आगे बढ़ने का सरलतम प्रयोग सबको सिखाया। युग के अनुरूप जो व्यक्ति के शरीर- मन आज ढल गये हैं, उनमें सरलतम पद्धति हो सकती है, इससे लेकर कठिनतम का सत्त विकास पूज्यवर की साधना प्रणालियों में पाये जाते हैं। व्रतों को भी उनने उतना ही महत्व दिया पर उस रूप में नहीं, जैसे वे आज प्रचलित है। आज तो फलाहार के नाम पर अनापशनाप खाकर मनुष्य पेट में और अधिक ठूँसता चला जाता है जबकि व्रत का मोटा अर्थ है- शरीर को थोड़ी छुट्टी -अवकाश दे देना तथा सूक्ष्म अर्थ है मन को निभ्रांत कर श्रेष्ठ चिंतन का सत्त अभ्यास करने की प्रक्रिया सीखना। नवरात्रि साधना के साथ आहार संयम का सरल सुगम रूप पूज्यवर ने दो चीजों का प्रयोग- एक खाने की एक लगाने की या मात्र तरल प्रवाही द्रव्योँ का प्रयोग, यह बताया।
साधना का तत्वदर्शन और प्रयोजन। यदि वह बन पड़े तो तृप्ति-तृष्टि और शाँति की तीनों दिव्य विभूतियाँ हस्तगत होती हैं।
साधना पद्धतियों में युगानुकूल हेर फेर कर अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में उसका भली भाँति प्रयोग कर उन्हें सहज-सुगम बना देते हैं। पूज्यवर का सारा जीवन इसकी साक्षी देता है। उनने स्वयं 24-24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण किए। बड़ी कठोर साधना की। मात्र जौ व छाछ पर रहकर उस अवधि को पूरा किया।
साधना की सफलता की नहीं, उसके बाधित हो जाने की परिचायिका है।’ आचार्य उपदेश करने लग जाते- लोक नायक को उससे सावधान रहना चाहिए, क्योंकि वह सामान्य नियमों का उल्लंघन करके भी न्यायालय की परिधि में नहीं आया करता। शारीरिक आसक्ति या यश-इच्छा ने ही उसे सिद्धि के स्वीकार करने को विवश किया है। कामना वहाँ निर्बीज नहीं हुई। अत्यंत उर्वर खाद है सिद्धि इस बीज के लिए।
साधना विहीन जीवन न जिये एवं उसके लिए सरलतम योग साधनात्मक पद्धतियों का आहार से लेकर दैनंदिन जीवन व्यवहार का एक ऐसा पहलू प्रस्तुत किया जो हर किसी के लिए सुगम है।
साधना आदि के रूप में शांति कुँज में समय-समय पर सत्र तो होते रहे हैं किंतु पूज्यवर ने मुख्य ध्यान जन-जन के लिए साधना सूत्रों को सुगम बनाने पर विशेषतः दिया व जीवन साधना सत्र इसी प्रयोजन के निमित्त आयोजित भी होते रहें। इन्हें बाद में संजीवनी साधना नाम दिया गया जिनमें जीवन जीने की कला के शिक्षण के सारे सूत्र गूँथ दिये गए। यह अपने आप में एक विलक्षण संश्लेषित प्रक्रिया बन गयी। दैनिक जप, जप के साथ ध्यान तथा प्रज्ञायोग को नियमित संपादित किया जाना, स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
साधना है। साधना के लिए हमको वही क्रिया-कलाप अपनाने पड़ते हैं जो कि एक कुसंस्कारी घोड़े या बैल को सुधारने के लिए उसके मालिकों को करने पड़ते हैं-हल में चलने के लिए और गाड़ी में चलने के लिए। कुसंस्कारों को दूर करने के लिए हमको लगभग उसी तरह के प्रयत्न करने पड़ते हैं जैसे कि सरकस के पशुओं को पालते हुए उन्हें इस लायक बनाते हैं कि वे सरकस में तमाशा दिखा सकें। इसी तरह के प्रयत्न हमको अपने गुण, कर्म, स्वभाव के विकास के परिष्कार के लिए करने पड़ते हैं। कच्ची धातुओं को जिस तरीके से आग में तपा करके उनको शुद्ध-परिष्कृत बनाया जाता है, जेवर आभूषण बनाये जाते हैं, उसी तरीके से हमारा कच्चा जीवन-कुसंस्कारी जीवन को ढाल करके ऐसा सभ्य और ऐसा सुसंस्कृत बनाया जाय कि हम ढली हुई धातु के आभूषण के तरीके से अथवा औजार-हथियार के तरीके से दिखायी पड़े।
साधना तो ढेरों व्यक्ति करते हैं तो कितने सही अर्थों में मन लगा पाते हैं। यदि वे जल उपवास जैसी या निर्जला जैसी कड़ी तथा फलाहार की अति वाली दो विपरीत धुरियों के बीच एक सामान्य कड़ी के ही प्रयोग चालू करें तो बहुत सफल साधना उनकी होती रह सकती है, यह पूज्यवर ने समय समय पर बताया।
साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
साधना नाम दिया गया जिनमें जीवन जीने की कला के शिक्षण के सारे सूत्र गूँथ दिये गए। यह अपने आप में एक विलक्षण संश्लेषित प्रक्रिया बन गयी। दैनिक जप, जप के साथ ध्यान तथा प्रज्ञायोग को नियमित संपादित किया जाना, स्वाध्याय एवं ध्यान योग लययोग-नादयोग के रूप में योग त्रयी का दिनचर्या में समावेश अपने आप में एक साधना शैली बन गयी जिसे अब लाखों व्यक्ति जीवन में उतारते देखे जाते हैं।
साधना-साधन का अर्थ है कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव को साथ लेना। वस्तुतः मनुष्य चौरासी लाख योनियों में घूमते-घूमते उन सारे के सारे प्राणियों के कुसंस्कार अपने भीतर जमा करके ले आया है, जो मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक नहीं है, बल्कि हानिकारक है। तो भी स्वभाव के अंग बन गये है, और हम मनुष्य होते हुए भी पशु संस्कारों से प्रेरित रहते हैं और पशु-प्रवृत्तियों को बहुधा अपने जीवन में कार्यान्वित करते रहते हैं। इस अनगढ़पन को ठीक कर लेना, सुगढ़पन का अपने भीतर से विकास कर लेना, कुसंस्कारों को जो पिछली योनियों के कारण हमारे भीतर जमे हुए है, उनको निरस्त कर देना और अपना स्वभाव इस तरह का बना लेना जिसको हम मानवोचित कह सकें-साधना है। साधना के लिए हमको वही क्रिया-कलाप अपनाने पड़ते हैं जो कि एक कुसंस्कारी घोड़े या बैल को सुधारने के लिए उसके मालिकों को करने पड़ते हैं-हल में चलने के लिए और गाड़ी में चलने के लिए।
साधना को जनम दिया। वह अपने आप में विलक्षण किंतु सरल हैं। उनने कहा कि नित्यप्रति के अपने आहार पर ध्यान दो कि तुम क्या खा रहे हो पर कड़ा तप करने की कोई जरूरत किसी को भी नहीं है। हम शाकाहारी बनें, सात्विक आहार लें एवं अन्नों वै मनः के तथ्य को ध्यान में रखें कि जैसा हम खाते हैं, वैसा ही हमारा चिंतन बन जाता है। आँवलखेड़ा से आगरा, मथुरा से हिमालय-उत्तरकाशी-सप्तसरोवर व फिर हरिद्वार के शाँतिकुँज में उनके प्रयोग सतत् चलते उनने ‘अस्वाद व्रत जन जन से कराके सबको सिखाया।
साधना। उपासना और साधना-इन दोनों को मिलाकर एक पूरी चीज बनती है। उपासना का अर्थ है-भगवान पर विश्वास, भगवान की समीपता। उपासना माने भगवान के पास बैठना-नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें-जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है।
साधना निरंतर चलती रही। स्वार्थी तत्वों द्वारा मिलाये, मिथ्या, विचारों, श्लोकों को अपने साहित्य में से वे ऐसे निकाल-निकाल कर फेंकते गए जैसे किसान खेत के झाड़ - झंखाड़ को। नागेश भट्ट प्रकाँड पंडित गिने जाने लगे। उनकी योग्यता के आगे कोई भी प्रतिक्रियावादी व्यक्ति टिक नहीं पाता था।
साधना में विचार, अर्थ, समय व इंद्रिय-संयम व उसके लिए सत्त स्वाध्याय तथा आराधना में सारे समाज का अपने को एक अंग मानते हुए समाज सेवा के निमित्त समय व अंशदान नियमित रूप से देते रहने का विधान जो उनने बनाया, वह प्रज्ञापरिजनों के लिए योगत्रयी बनाया। यह त्रिवेणी जिसमें करोड़ों व्यक्ति स्नान कर अपने आप को महाकाल की धारा के साथ जोड़ चुके हैं, आज अपने सरल-सुगम रूप में योग साधना में प्रवेश का, मानव मात्र को कुँडलिनी के जागरण का एक द्वारा हो नहीं खोलती है वरन् जन जन की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है। यही वह विशेषता है जिससे गायत्री परिवार अपने अधिष्ठाता के मार्गदर्शन में साधना प्रणाली को जन-जन तक पहुँचा सका है। दीपयज्ञों, संस्कारों के द्वारा अब हर व्यक्ति अध्यात्म को उल्लासमय महोत्सव बनाकर अपने जीवन से झरता देख सकता है। युगसाधना का कायाकल्प कर प्रत्येक के लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त करने वाले उस युगऋषि को महाकाल की सत्ता को बारंबार प्रणाम है।
साधना-इन दोनों को मिलाकर एक पूरी चीज बनती है। उपासना का अर्थ है-भगवान पर विश्वास, भगवान की समीपता। उपासना माने भगवान के पास बैठना-नजदीक बैठना। इसका मतलब यह हुआ कि उसकी विशेषताएँ हम अपने जीवन में धारण करें-जैसे आग के पास हम बैठते हैं, तो आग की गर्मी से हमारे कपड़े गरम हो जाते हैं, हाथ गरम हो जाते हैं, शरीर गरम हो जाता है। पास बैठने का यही लाभ होना चाहिए।
साधना, आराधना की आवश्यकता है। इतने पर भी आत्म परिष्कार और लोक मंगल में संलग्न रहने की आवश्यकता बनी ही रहती है। इसकी पूर्ति के लिए अधिकाधिक समय दान और अंशदान नियोजित करते रहना चाहिए। इस निर्धारण को कार्यान्वित करने का नाम वानप्रस्थ है। उसी मनः स्थिति में ऐसा कुछ बन पड़ना संभव है जिसमें आत्म संतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह के विविध लाभों से लाभान्वित हो सकना बन पड़ा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-March
साधना करके देखें। गायत्री की उपासना से बड़ी से बड़ी सिद्धियां मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है किंतु इसकी शक्ति भारी है।
साधना-उपासना कर रहे है। हमें सूक्ष्मीकरण के लिए कहा गया था उस साधना में हम मुस्तैदी से लगे हुए हैं इस बारे में इतना की कहना काफी है कि हमारे बारे में आपको कोई चिंता करने की बात नहीं है। चिंता तो आपकी हमको करनी है आप क्यों करेंगे? बच्चे माँ बाप की चिंता क्यों नहीं करेंगे कि पिता जी का यह काम कैसे होगा? वह काम कैसे होगा?
साधना करने के पश्चात् वह उस व्यक्ति का तुल्या बनाने में सफल हो गई। कई महीने बाद फ्रांसीसी महिला ने तिब्बत के दूसरे भागो को देखने का कार्यक्रम बनाया और अपने नौकर के साथ एक दिन चल पड़ी। उन्हें यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि उनका तुल्या भी यात्रा में साथ-साथ चल रहा है। वे लिखती है कि यद्यपि यह संरचना पूर्णरूप से दृश्य सूक्ष्माकृति थी किंतु यदा कदा उसके स्पर्श की स्पष्ट प्रतीति भी होती थी। एलेक्जेण्ड्रा ने इससे कई आवश्यक पर असंभव जैसे लगने वाले कार्य लिए, ऐसा वे लिखती है अंततः फ्राँस लौटने से पूर्व उतने इसे विगलित कर दिया।
साधना के परिणामों को दर्शाते हुए कहते हैं”जिस प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री हैं।” गायत्री काम धेनु के समान है। गंगा शरीर के पाप कामों निर्मल करती है , गायत्री 3पों ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है जो साधक गायत्री महामंत्र को छोड़कर अन्य उपासनाएं करता है। वह पकवान् छोड़कर भिक्षा माँगने वाले के समान हैं राम कृष्ण, हनुमान, भगवान शंकर, गणेश, कार्तिकेय , जैसी अवतारी सत्ताओं ने स्वयं गायत्री महाशक्ति की उपासना की और उपार्जित शक्ति का उपयोग असुरता से लड़ने के लिए किया । अपने भक्तों को भी गायत्री की ही शरण में आने का संदेश उन्होंने दिया।
साधना की जरूरत नहीं। इस छोटी सी गायत्री की साधना करके देखें। गायत्री की उपासना से बड़ी से बड़ी सिद्धियां मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है किंतु इसकी शक्ति भारी है।
साधना होती है। उपरोक्त अभिमतों से मिलते जुलते विचार प्रायः सभी ऋषियों के है। ऋषि प्रचर भारद्वाज , चरक, नारद, वशिष्ठ, गौतम , उद्दोलक, देवगुरु बृहस्पति, शृंगी ऋषि , वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, दत्तात्रेय, अगस्त अनत्कुमार, कण्व शैतिक जैसे ऋषियों के जीवन वृत्तांतों से स्पष्ट है कि उनकी महान सफलताओं का मूल हेतु गायत्री उपासना ही था कोई भी ऋषि अन्य विषयों में चाहे परस्पर विचारों की भिन्नता रखते रहे हों पर गायत्री के बारे में उन सबमें समान श्रद्धा भी और सभी ने उपासना क्रम में उसे प्रमुख स्थान दिया। गायत्री मंत्र का निरंतर जप रोगियों को अच्छा करने में और आत्मा की उन्नति के लिए उपयोगी । गायत्री महामंत्र का स्थिर चित्त और शाँत हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है यह कहते हुए महात्मा गांधी ने स्वीकार किया है।
साधना सफल हुई। साक्षात शिव स्वरूप गुरु गोरखनाथ ने दर्शन देकर कृतार्थ किया मुझे।” अघोरनाथ का देह भले निष्कम्प हो, उनका चित विह्वल हो रहा था। अनंत भावनाओं को उद्वेग अंतः करण में एक साथ उठ रहा था। “ भगवान महाकाल की गति अवरुद्ध नहीं हुआ करती।
साधनास्थल चुनने में इस सुने हुए विवरण ने उनकी सहायता की।” भगवान नीलकण्ठ के विशद वक्ष में भगवती का प्रतिबिंब अर्थात् शक्ति समन्वित पुरुष अर्धनारीश्वर की सौम्य क्रीड़ास्थली अधोगति ने व्यास, पार्वती सरिताओं की मध्यभूमि त्रिकोण सिद्ध क्षेत्र कुलाँत में भी सुदूर हिमक्षेत्र में पार्वती के उद्गम स्थान को उपयुक्त माना। चारों ओर हिश्वेत शिखर, सत्वगुण मानो सर्वत्र साकार हो रहा था। पार्वती के उद्गम का अल्प प्रवाह और उसे अंकभाल देता ऊष्णेदक निर्झर- भगवान उमा महेश्वर का व्यक्त विग्रह प्रकृति में वह जल रूप हैं योग सिद्ध तपस्वी अघोरनाथ को आहार की अल्पतम अपेक्षा ही थी। जब जरूरत हो, वे कुछ नीचे आकर वन्य कंद मूल सहज प्राप्त कर लेते थे।
साधना और ईश्वर-उपासना से लिया जाता है, पर जानने योग्य तथ्य यह है कि अध्यात्म क्षेत्र में जितनी इसकी महत्ता उपयोगिता है उससे कोई कम भौतिक क्षेत्र में नहीं है। भौतिक जीवन की समृद्ध बनाने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है, कारण कि किसी व्यक्ति की सफलता-विफलता का मुख्य हेतु अस्थिर और अव्यवस्थित चित वृत्तियाँ होती है। जो इन्हें संयमित कर लेता अथवा शुभ अशुभ भाव संकल्पों के आधार पर अच्छों को सुरक्षित रख बुरी को निकाल बाहर करता है जीवन में वही सफल ही पाता है। सामान्य जीवन में उपयोग यही कार्य संपन्न करता है। वह अनावश्यक संकल्पों को शमित और शुभ संकल्पों को पोषण देकर सुदृढ़ बनाता और अंततः उसकी सिद्धि में सहयोग करता है।
साधना की आत्म प्रवंचना में न डूबे रहकर सेवा-साधना को सर्वोपरि मानते हैं।
साधना द्वारा आत्मोन्नति होती है। यह सुनिश्चित तथ्य है। कतुष्य के अंतः क्षेत्र के संशोधन, परिमार्जन संतुलन एवं विकास के लिए गायत्री मंत्र से बढ़कर और कोई उसका साधन नहीं है। जो अतीतकाल से असंख्यों व्यक्तियों के अनुभवों में सदा खरा उतरता आया हो। मन , बुद्धि, चित्त, अहंकार का अंतःकरण चतुष्टय गायत्री महामंत्र की उपासना के द्वारा शुद्ध कर लेने वाले व्यक्ति के लिए साँसारिक जीवन में सब आरे से सब प्रकार की सफलताओं का द्वार खुल जाता है उत्तम स्वभाव अच्छी आदतें, स्वस्थ मस्तिष्क, दर दृष्टि , प्रफुल्ल मन, उच्च चरित्र , कर्तव्य निष्ठा की प्रकृति को प्राप्त करने के पश्चात् गायत्री साधक के लिए संसार में कोई दुःख कष्टकर नहीं रह जाता, उसके लिए सामान्य परिस्थितियों में भी सुख ही सुख उपस्थित रहता है इन रहस्यों को गायत्री उपासना में निमग्न साधकों ने अनुभव किया है।
साधना में हम मुस्तैदी से लगे हुए हैं इस बारे में इतना की कहना काफी है कि हमारे बारे में आपको कोई चिंता करने की बात नहीं है। चिंता तो आपकी हमको करनी है आप क्यों करेंगे? बच्चे माँ बाप की चिंता क्यों नहीं करेंगे कि पिता जी का यह काम कैसे होगा? वह काम कैसे होगा? पिताजी का कर्ज कैसे चुकेगा?
साधना को सर्वोपरि मानते हैं।
साधना को संपन्न करके इसकी सच्चाई को जानने का निश्चय किया। इस निर्मित जिस व्यक्ति का उनने चयन किया, वह एक सीधा-सादा ठिगने कद का संन्यासी था। कई महीनों तक एकाँत साधना करने के पश्चात् वह उस व्यक्ति का तुल्या बनाने में सफल हो गई। कई महीने बाद फ्रांसीसी महिला ने तिब्बत के दूसरे भागो को देखने का कार्यक्रम बनाया और अपने नौकर के साथ एक दिन चल पड़ी। उन्हें यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि उनका तुल्या भी यात्रा में साथ-साथ चल रहा है।
साधना, तप तथा एकाग्रता परक ध्यान की प्रक्रियाओं से मानव की मस्तिष्कीय क्षमताओं-मानसिक शक्तियों में असीम वृद्धि हो जाती है। इससे मस्तिष्क में लगता है जिससे मानसिक क्षमताओं का विकास स्वतः बढ़ जाता है। आज विज्ञान भी एक ऐसे कगार पर आ खड़ा हुआ है जहाँ पर मस्तिष्कीय विकास के विभिन्न पक्षों पर व्यापक शोध अद्भुत मानसिक आवश्यकता मात्र सी और विधेयात्मक दिशा देने की है।
साधना एवं लोक निरपेक्षता की देखते ही सबके मस्तक उनके सामने झुक जाते हैं। सच्चे योग साधक के सम्मुख सिद्धियाँ आती है। अघोरनाथ के सम्मुख अनेक रूप में वे आयी और बार बार आयी किंतु उन्होंने तत्काल झिड़क दिया उन्हें जैसे कोई घाव भरे खजुलाहे कुत्ते को झिड़क देता है। “शिव स्वरूप गुरु गोरखनाथ अमर हैं । उन्होंने काल के पद अवरुद्ध कर दिये है।
साधना शक्ति भावना से भी अधिक श्रम किया था। वे शस्त्र संचालन का सत्पात्रों को शिक्षण देने के लिए भी एक साधन संपन्न विद्यालय चलाते थे। एक दिन धौम्य ऋषि द्रोणाचार्य के आश्रम में जा पहुंचें। आचार्य को स्वयं शस्त्र धारण किये और दूसरों को शस्त्र संचालन पढ़ाते देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ और बोले ‘सत्तें को तो दया धर्म अपनाना और भक्ति का प्रचार करना ही उचित है। उन रक्तपात की व्यवस्था क्यों बना रहे हैं।
साधना का परिणाम कहा जा सकता है। विशुद्ध विप्र वर्गीय पारद- कृष्णा, पीत एवं अरुणिमा से सर्वथा शून्य शुघ्र चन्द्रोज्वल रस धरा में अपने आप उपलब्ध नहीं होता। अनेक अनुष्ठानों के उपराँत मत्रपूत साधक मरुस्थल के मानव वर्जित प्रदेश के प्राणप्रद स्पर्श हीन सिकता कणों से उसे तब कण-कण के रूप में प्राप्त कर सकता है जब ग्रीष्म के मध्याह्न में धरा गर्भ से रमेश्वर के कण ऊपर उठते हैं। अपने को अग्नि में आहुति देने के समान अनुष्ठान है यह मरुस्थल की प्रचंड ऊष्मा जल विहीन धरा और उसमें से अनेक योजन लक्ष्यहीन भटकती यात्रा में राशि-राशि उड़ती बालुका में अल्पतप कणों का अन्वेषण, किंतु अघोरनाथ को यह दुष्कर नहीं लगा। उन्होंने शुद्ध विप्र वर्गीय पारद प्राप्त किया।
साधना में अपने शक्ति को इस हिसाब से विकसित किया है कि पचास परसेंट शक्ति से हमारे पास जो अभी थोड़े से 24 लाख व्यक्ति है, उनकी हम सुरक्षा कर लेंगे। पचास फीसदी शक्ति हम सुरक्षा में लगायेंगे। आपकी हारी-बीमारी में घाटे में दुख में, मुसीबत में , हैरानी में हमारी आधी शक्ति बराबर काम करती रहेगी। इसमें भी आप कमी नहीं पायेंगे,चाहे आप कैसी ही मुसीबत में क्यों न फँसे हो और लोगों से अप हर हालत में नफे में रहेंगे- यह हमारा वायदा है और यह हमारा आप से कहना है। एक और बात हमने यह कही थी कि अब आपको बार-बार हरिद्वार आने और बार-बार हमसे मिलने की आवश्यकता नहीं है।
साधना के बलबूते पर उपलब्ध हुई थी।
साधनात्मक पराक्रम द्वारा, मुक्ति, सिद्धि की लक्ष्य सिद्धि को गौण एवं औरों के कष्टों में सहभागिता को वरीयता देकर स्वल्प साधनों में भी एक ऐसी संस्था के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ कर दी, जिसका आदि से अंत तक का इतिहास त्याग आदि से अंत तक का इतिहास त्याग व बलिदान, संवेदना व समर्पण का इतिहास है।
साधना में व्याघात उपस्थित करती है। इस विचार ने अघोरनाथ को जालंधर पीठ पर भी स्थिर नहीं होने दिया। त्रिपुर भैरवी प्रसन्न न हों तो कोई सफलता किसी को मिला नहीं करती। उनको गोद का आश्रय अपेक्षित है रस साधक को। “ भगवती त्रिपुर सुंदरी की छाया जो स्फटिक शुम्र विग्रह वृषभ ध्वज के श्री विग्रह में पड़ती है, भस्म भूषिताड़ शिव के वक्ष में वह किंचित् श्याम प्रतीत होने वाला प्रतिबिंब ही भगवती त्रिपुर भैरवी की है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-April
साधना के माध्यम से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो सकता है। साँसारिक संकटों में भी गायत्री उपासना वरदान की तरह सिद्ध होती है। आद्य शक्ति गायत्री माता का आँचल पकड़ने वाला कभी निराश नहीं हुआ।
साधनाओं की कार्यपद्धति का आधार ही यह है कि दूसरे प्राणियों के शरीरों में निवास करने वाली शक्ति को हस्ताँतरित करके एक जगह इकट्ठा कर लिया जाये और फिर उस संचित शक्ति का मनमाना उपयोग किया जाये। तंत्र में बलि प्रथा का यही प्रयोजन है। उसमें किन्हीं पशुओं का वध करके उनके पाँच प्राणों का उपयोगी भाग खींच लिया जाता है। जैसे शिकारी लोग वराह के शरीर में से चर्बी को अलग से निकाल लेते हैं वैसे ही तंत्र साधक उस वध होते हुए पशु के दस प्राणों में से उपयोगी पाँच प्राणों को चूस जाते हैं और उससे अपनी शक्ति बढ़ लेते हैं। बकरे, भैंसे, मुर्गे आदि के बलिदानों का आधार यही है।
साधना समर है, जिसमें प्रत्येक हनुमान और अर्जुन को-साधक का अपना पराक्रम दिखाना पड़ता है।
साधना होती है। शृंगी ऋषि की उक्ति है कि ज्ञान-विज्ञान का आदि स्रोत गायत्री ही है। उससे अधिक संसार में और कुछ नहीं है। देव गुरु बृहस्पतिजी कहते हैं कि देवत्व और अमरत्व की आदि जननी गायत्री है। इसे प्राप्त करने के पश्चात और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।
साधना का रक्षा−कवच धारण कर हममें से हर कोई आने वाली प्रतिकूलताओं व आसन्न संकट से स्वयं का बचाव व विश्व वसुधा का गौरव बढ़ाने वाला कार्य सम्पन्न करता है।
साधनाओं हेतु श्मशान-कब्रिस्तान को साधना स्थली के रूप में चुनने का विधान है।ताकि बचे रहे अवशिष्ट प्राण से अपनी क्षमता में अभिवृद्धि हो सके। साथ ही उस वातावरण के सूत्र स्पंदनों की ओर सहज आकर्षित होने वाली शक्तियों से तादात्म्य बिठाया, सहयोग प्राप्त किया जा सके। पंचमुँडी, नवमुँडी आसनों की सृष्टि भी इसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए थी।
साधना में विविध उपायों के सहारे इसी का अभ्यास करना पड़ता है। वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक एवं प्रगतिशील व्यक्ति इसी दक्षता में प्रवीणता प्राप्त करते और अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल होकर रहते हैं। दूरदर्शिता का मार्ग यही है, जिसमें आरंभ में थोड़ा घाटा उठा कर कुछ ही समय उपराँत असीम लाभ उठाया जा सकता है। किसान, माली, विद्यार्थी, व्यवसायी, पहलवान अपने आरंभ काल में समय और धन गंवाते दिखते हैं। पर कुछ ही समय का धैर्य और श्रम उन्हें पूँजी की तुलना में असंख्य गुनी उपलब्धियों से मालामाल करके रख देता है।
साधना भी बचकाने लोगों को निरर्थक सिर खपाई दिखती है। पर जब समयानुसार छोटा पौधा विशाल वृक्ष बन कर अपनी गरिमा का परिचय देता है तब यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि दूरदर्शिता अपनाना ही सबसे अच्छा व्यवसाय है। इसी को अपनाकर सामान्य परिस्थिति के व्यक्ति महामानव बने, सौभाग्यशाली हुए और अपने कर्तव्य के आधार पर लोक श्रद्धा के भाजन होकर इतिहास में प्रसिद्ध हुए हैं। हम भी संयम बरतें व समर्थ संपन्न बनें।
साधना स्थली के रूप में चुनने का विधान है।ताकि बचे रहे अवशिष्ट प्राण से अपनी क्षमता में अभिवृद्धि हो सके। साथ ही उस वातावरण के सूत्र स्पंदनों की ओर सहज आकर्षित होने वाली शक्तियों से तादात्म्य बिठाया, सहयोग प्राप्त किया जा सके। पंचमुँडी, नवमुँडी आसनों की सृष्टि भी इसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए थी।
साधना ऐसे वातावरण में तो निश्चित ही विशिष्ट लाभ प्रदान करती है। यह अनुभूति अनेकों की है।
साधनाओं की अपेक्षा गायत्री का वाममार्गी प्रयोग अधिक शक्तिशाली है यह सच है और यह भी सत्य है कि अन्य सभी विधियों की अपेक्षा इस विधि से मार्ग ही निरापद और ग्रहण योग्य है, उसी का अवलंबन लिया जाना चाहिए।
साधना करने वाले अघोरी उन मृतकों से भी शक्ति चूसते हैं। देखा जाता है कि कई अघोरी मृत बालकों की लाशों को जमीन में से खोद ले जाते हैं, मृतकों की खोपड़ी (महापात्र) लिए फिरते हैं चिताओं पर भोजन पकाते हैं। यह सब किन्हीं निहित उद्देश्यों के लिए किया जाता है। कुछ ताँत्रिक कोमल प्रकृति के वयस्क स्त्री-पुरुषों या छोटे बालकों के प्राण चूस जाते हैं। ऐसे अघोरी, कापालिक, रक्तबीज, वैतालिक, ब्रह्मराक्षस, प्रेत, पितर, वताँक पुरुष तथा डाकिनी, शाकिनी, हाकिनी, कपाल-कुँडला, सर्पसूत्रा, धूमावती आदि स्त्रियाँ अब भी गुप्त प्रकट रूप से जहाँ-तहाँ देखी जाती हैं।
साधना करें या न करे केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता, वह निन्दा का पात्र है।
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में सम्मिलित करके जिस ध्यान की बाबत बताया है उसको आपने जान लिया और उसका व्यवहारिक स्वरूप समझ लिया। अगर आप उसका व्यावहारिक रूप नहीं जान पाये और कल्पना लोक में ही उड़ते रहे तो फिर ख्वाब ही देखते रहेंगे- सपने ही देखते रहेंगे। आध्यात्म सपना नहीं व्यावहारिक है। यह हमारे इसी जीवन से ताल्लुक रखता है और आज से ताल्लुक रखता है। ख्वाबों का अध्यात्म नहीं है, सपनों का अध्यात्म नहीं है।
साधना भी होती है और तंत्र का वाममार्गी अनुष्ठान भी हो सकता है। संसार के अन्य किसी मंत्र से जो कार्य होते हैं, वे सब गायत्री से भी हो सकते हैं। तंत्र साधना भी हो सकती है, पर जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है तंत्र मार्ग कंटकाकीर्ण है। उसमें पग-पग पर हानि की संभावना रहती है। कई बार तो चूक होने पर जान के भी लाले पड़ जाते है।
साधना और तपश्चर्या की शक्तिधाराएं गायत्री रूपी उद्गम से ही निस्सृत हुई हैं। उसकी साधना के सत्परिणाम, अमृत, पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और ब्रह्मानंद के रूप में बताए गये हैं। यही पाँच प्रमुख वरदान हैं। इसी रहस्य के कारण उसका एक स्वरूप पाँच मुख वाला भी चित्रित किया जाता है। भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों के अनंत भंडार इस महाशक्ति के अंतराल में छिपे पड़े हैं।
साधना बंद रखी गई, त्रुटि बरती गई या छोड़ दी गयी तो, उस शक्ति का घट जाना एवं स्वयं का अहित हो जाना अवश्यंभावी है।
साधनात्मक दिशाधाराओं में किया गया है। यज्ञाग्नि और प्राणाग्नि में परस्पर संबंध में प्रश्नोपनिषद् में सुविस्तृत प्रकाश डाला गया।
साधना को निरर्थक करने वाले कदम उठाने को तत्पर हो जाता है। कवि दंडी भी उसी प्रवाह में बह उठे। उन्होंने निर्णय कर लिया अपनी राह के काँटे को उखाड़कर फेंकने का। पिता- मार्गदर्शक गुरु की हत्या......। अविवेक पूर्ण भयंकर कुकृत्य।
साधना से सिद्धि “ का सिद्धाँत विधिवत गायत्री साधना के माध्यम से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो सकता है। साँसारिक संकटों में भी गायत्री उपासना वरदान की तरह सिद्ध होती है। आद्य शक्ति गायत्री माता का आँचल पकड़ने वाला कभी निराश नहीं हुआ।
साधना है। प्रकाश चमकना चाहिए हमारे ज्ञान को और विचारों को संतुलित और सुव्यवस्थित करने के लिए। अगर आपको ऐसा ज्ञान आए तो मैं समझूंगा कि हमने आपको अनुष्ठान में और साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में सम्मिलित करके जिस ध्यान की बाबत बताया है उसको आपने जान लिया और उसका व्यवहारिक स्वरूप समझ लिया। अगर आप उसका व्यावहारिक रूप नहीं जान पाये और कल्पना लोक में ही उड़ते रहे तो फिर ख्वाब ही देखते रहेंगे- सपने ही देखते रहेंगे। आध्यात्म सपना नहीं व्यावहारिक है।
साधना हमारे लिए सर्वोपरि श्रेय साधन है। उसमें अपनी प्रवृत्तियों को तत्परता पूर्वक लगाया जा सके, उसी में कल्याण है।
साधनाओं के लिए नदी का किनारा पर्वतीय सान्निध्य जैसे मन को विश्राँति देने वाले स्थल सुझाए हैं। वहीं प्राण प्रधान ताँत्रिक साधनाओं हेतु श्मशान-कब्रिस्तान को साधना स्थली के रूप में चुनने का विधान है।ताकि बचे रहे अवशिष्ट प्राण से अपनी क्षमता में अभिवृद्धि हो सके। साथ ही उस वातावरण के सूत्र स्पंदनों की ओर सहज आकर्षित होने वाली शक्तियों से तादात्म्य बिठाया, सहयोग प्राप्त किया जा सके। पंचमुँडी, नवमुँडी आसनों की सृष्टि भी इसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए थी।
साधनायें इसी परिधि में आती हैं। आत्म यज्ञ में बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं पड़ती। कायसत्ता में विद्यमान साधन सामग्री से ही योगाग्नि उत्पन्न कर ली जाती है और वह प्रतिफल हस्तगत किया जाता है जिसका महात्म्य-विस्तार अध्यात्म विज्ञान को अनेकों साधनात्मक दिशाधाराओं में किया गया है। यज्ञाग्नि और प्राणाग्नि में परस्पर संबंध में प्रश्नोपनिषद् में सुविस्तृत प्रकाश डाला गया।
साधना भी हो सकती है, पर जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है तंत्र मार्ग कंटकाकीर्ण है। उसमें पग-पग पर हानि की संभावना रहती है। कई बार तो चूक होने पर जान के भी लाले पड़ जाते है। इसलिए उसका अनुष्ठान चाहे जब, जहाँ, जिस किसी के लिए निषिद्ध माना गया है।
साधना के सत्परिणाम, अमृत, पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और ब्रह्मानंद के रूप में बताए गये हैं। यही पाँच प्रमुख वरदान हैं। इसी रहस्य के कारण उसका एक स्वरूप पाँच मुख वाला भी चित्रित किया जाता है। भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों के अनंत भंडार इस महाशक्ति के अंतराल में छिपे पड़े हैं। “ साधना से सिद्धि “ का सिद्धाँत विधिवत गायत्री साधना के माध्यम से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो सकता है।
साधनायें की हैं।
साधना का मध्यकाल आता है, तब कितने रोमाँचकारी भय सामने आ उपस्थित होते हैं, इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं। उनसे न तो डरना, न विचलित होना साधारण काम नहीं है। साहस के अभाव में यदि इस प्रतिरोधी प्रतिक्रिया के साधक भयभीत हो जायें, तो वह पागल, बीमार, गूँगा-बहरा, अंधा हो सकता है। साहसी और निर्भीक प्रकृति के मनुष्य इस मार्ग में सफलता प्राप्त करते देखे जाते हैं।
साधनाएं कठिन और विशिष्ट भी हैं, पर साथ ही सरल भी इतनी हैं कि उन्हें हर कोई हर स्थिति में बड़ी सरलता और सुविधा के साथ सम्पन्न कर सकता है। इसी से उसे सार्वजनीन और सार्वभौम माना गया। नर-नारी, बाल-वृद्ध बिना किसी जाति व सम्प्रदाय भेद के उसकी आराधना प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं और श्रद्धा-भक्ति के अनुरूप लाभ उठा सकते हैं।
साधना में अपने मार्गदर्शक को प्रधानता देकर चलते हैं। मार्गदर्शक का संतोष ही उनकी प्रगति का मानदंड बनता है। एक बार लक्ष्य निर्धारित करके फिर कितनी सीढ़ियां किस प्रकार चढ़ना है, यह मार्ग दर्शक के ऊपर छोड़ कर साधक के लग जाते हैं अपनी समूची शक्ति के साथ निर्देश को पूरा करने में। इस स्थिति में हर कदम पर उन्हें निर्देशक के संतोष का ही ध्यान रहता है। मानो वही मूल लक्ष्य हो।
साधना वर्ष में हमने आपको तीन जगह ध्यान करने को कहा है। एक आप मस्तिष्क में ध्यान किया कीजिए। दूसरा अंतरात्मा में हृदय स्थान पर और तीसरा नाभि स्थान पर ध्यान किया कीजिए। हमारे तीन शरीर हैं और तीनों शरीरों के ये तीन केन्द्र हैं। इन तीनों के भीतर प्रकाश चमकना चाहिए।
साधना प्रणाली युक्त है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत जो साधना की जाती है, उससे प्रकृति के अंतराल में बड़े प्रबल कंपन उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण ताप और विक्षोभ की मात्रा बढ़ती है।
साधना की जाती है, उससे प्रकृति के अंतराल में बड़े प्रबल कंपन उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण ताप और विक्षोभ की मात्रा बढ़ती है।
साधना का भौतिक रूप, तंत्र कहलाता है। इसे वाम मार्ग भी कहते हैं। इसका उद्देश्य साँसारिक कामनाओं की पूर्ति कर सुखोपभोग करना है। इससे नाश भी संभव है और निर्माण भी, पर आत्मोपलब्धि का वह प्रयोजन अधूरा रह जाता है, जो मानव जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य है। संक्षेप में कहे, तो गायत्री का वह पक्ष, जो अपरा प्रकृति पर नियंत्रण करता है, गायत्री तंत्र है।
साधना में योगाभ्यास और तपश्चर्या के वे समस्त आधार, संकेत और विधान मौजूद हैं जिनके सहारे साधक को ऋद्धि-सिद्धियों का समुचित लाभ मिल सकता है। आत्मिक प्रगति की दोनों उच्च भूमिकाएं-स्वर्ग और मुक्ति पाने के लिए तत्वज्ञान का अवलम्बन अनुपम है।
साधना के माध्यम से प्राप्त हुई थीं। स्वयं विश्वामित्र ब्रह्मर्षि इसी के प्रभाव से बने थे। उनका कथन है- “गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है। सम्पूर्ण शास्त्र, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मंत्र की एक कला के समान भी नहीं है।”
साधनाओं का भी अवलंबन अपनाना पड़ता है। गीता में “प्राण-अपान में और अपान को प्राण में यजन करने” का संकेत है। यह अंतःक्षेत्र की प्राणाग्नि का यज्ञाग्नि का प्रज्ज्वलन है। कुँडलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, ग्रंथि वियोजन, ध्यान, धारणा समेत समाधि प्रकरण जैसी अनेक साधनायें इसी परिधि में आती हैं। आत्म यज्ञ में बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं पड़ती।
साधना में तन्मय थे। उनकी प्रतिभा निखरने लगी। हर प्रयास पर उन्हें प्रशंसा भी मिलती और आलोचना भी। प्रशंसा से उत्साह बढ़ कर आलोचना से आत्मशोधन करते हुए वह बढ़ रहे थे। परिचितों की दृष्टि में उनका स्तर बहुत उच्चकोटि का माना जाने लगा था।
साधना के योग्य नहीं हैं, ऐसा मेरा हृदय स्वीकार नहीं करता। यदि वह सह सका तो अवश्य पा लेगा। अन्यथा मेरा तिरस्कार करेगा तो भी उसका जो स्तर है, वह तो बना ही रहेगा। मैं क्यों उसके अंदर में हीन कल्पना लाकर अपना कर्तव्य छोड़ू ?”
साधना मंत्र, सम्प्रदाय मंत्र आदि तो कहा जा सकता है, पर अनादि, “गुरुमंत्र” गायत्री को ही कहा गया है। भगवान राम को गुरु वशिष्ठ ने एवं भगवान कृष्ण को संदीपन ऋषि ने यही गुरुमंत्र दिया था। महर्षि विश्वामित्र द्वारा राम को बला और अतिबला शक्तियाँ इसी साधना के माध्यम से प्राप्त हुई थीं। स्वयं विश्वामित्र ब्रह्मर्षि इसी के प्रभाव से बने थे। उनका कथन है- “गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मंत्र नहीं है।
साधना चल रही थी। मार्ग-दर्शन उन्हीं के पिता कर रहे थे। किसी भी दिशा में आगे बढ़ने के लिए विशेष प्रयास, विशेष पुरुषार्थ करना ही पड़ता है। पहलवानी करना चाहे या खिलाड़ी बनना हो, वाणी का उपयोग हो या लेखनी का, ज्ञानमार्गी बने या कठोर कर्म के पथ में उतरे-सभी के लिए यही एक तत्व ज्ञान है। जितना तपेगा उतना ही निखरेगा।
साधना विशेष के लिए स्थान विशेष की अनिवार्यता बताई है। जहाँ मन प्रधान-योग साधनाओं के लिए नदी का किनारा पर्वतीय सान्निध्य जैसे मन को विश्राँति देने वाले स्थल सुझाए हैं। वहीं प्राण प्रधान ताँत्रिक साधनाओं हेतु श्मशान-कब्रिस्तान को साधना स्थली के रूप में चुनने का विधान है।ताकि बचे रहे अवशिष्ट प्राण से अपनी क्षमता में अभिवृद्धि हो सके। साथ ही उस वातावरण के सूत्र स्पंदनों की ओर सहज आकर्षित होने वाली शक्तियों से तादात्म्य बिठाया, सहयोग प्राप्त किया जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-November
साधना में बदलने को विवश होना पड़ेगा। मनुष्य में देवत्व के द्रुत विकास का यह दीपमालिका पर्व जो देखेगा वह अपने आप को धन्य अनुभव करेगा जो सुनेगा वह सन् दो हजार के लिए तिल तिल प्रतीक्षा में समय गुजारेगा।
साधना भी की थी। संसार के अन्य वे महापुरुष जितने लोगों को उच्च भूमिका की ओर बढ़ाया निश्चित रूप से तपस्वी थे। महात्मा ईसा के जीवन में 27 वर्ष तपश्चर्या में लगे। मुहम्मद साहब ने 25 वर्ष की आयु में साधना की ओर कदम बढ़ाया। 40 साल तक वे उसी में संलग्न रहे।
साधनायें, फल रही है,
अज्ञता, असमानता, अविनय, अविद्य,
अनय-नाशक सत्व के, मृदुहास हो तुम।
साधना की ओर कदम बढ़ाया। 40 साल तक वे उसी में संलग्न रहे। 65 वर्ष की आयु में उनने धर्मोपदेश और और इस्लाम की स्थापना का कार्य आरंभ किया। यहूदी धर्म के संस्थापक यहोवा और पारसी धर्म के देवदूत जरथुस्त्र की दीर्घ कालीन कोर तपश्चर्याएं प्रसिद्ध हैं।
साधनात्मक जीवन एकांगी बना हुआ है और जो मात्र जप तक स्वयं को सीमाबद्ध रखते हैं, संभव उन्हें गायत्री के वास्तविक फलितार्थ और महापुरुषों के अपूर्व सहयोग से वंचित रहना पड़े, पर जा उपासना साधना और आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।
साधना है, जिससे आत्मबल प्राप्त होता है। निर्भीकता, दृढ़ता साहस, पवित्रता त्याग, सत्यनिष्ठा और कर्तव्य-भावना का आधार शुद्ध और पवित्र प्रेम है। इसे अपने जीवन में धारण करने वाला पुरुष मानव न रहकर महामानव और देवता बन जाता है। व्यक्ति का जीवन खिल उठता है। ऐसे कर्तव्य-निष्ठ नागरिकों के बाहुल्य से ही राष्ट्रों के हित फलते-फूलते रहते हैं।
साधना का सर्वोपरि चमत्कार और संयम का दिव्य उपहार कहा गया है। तुम्हें उसी को लक्ष्य बनाना चाहिए।
साधनात्मक जीवन में उनकी समर्थ साधनात्मक जीवन में उनकी समर्थ सहायता एवं मार्गदर्शन मिलते रहते हैं। जिनका साधनात्मक जीवन एकांगी बना हुआ है और जो मात्र जप तक स्वयं को सीमाबद्ध रखते हैं, संभव उन्हें गायत्री के वास्तविक फलितार्थ और महापुरुषों के अपूर्व सहयोग से वंचित रहना पड़े, पर जा उपासना साधना और आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।
साधनात्मक उपाय उपाय उपचार भी है जिन्हें यदि नियमित रूप से करता रहा जाय , तो इन नाडी गुच्छकों का शोधन एवं संभव हो जाता है। बाह्योपचार जहाँ इन्हें परिमार्जित करने में एक प्रकार से निष्फल बने रहने हैं, वही आध्यात्मिक अवलंबन रामबाण सिद्ध होता है।
साधनात्मक जीवन में उनकी समर्थ सहायता एवं मार्गदर्शन मिलते रहते हैं। जिनका साधनात्मक जीवन एकांगी बना हुआ है और जो मात्र जप तक स्वयं को सीमाबद्ध रखते हैं, संभव उन्हें गायत्री के वास्तविक फलितार्थ और महापुरुषों के अपूर्व सहयोग से वंचित रहना पड़े, पर जा उपासना साधना और आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।
साधना विज्ञान के मूर्धन्य आचार्य सघोजात लिखते हैं कि जिसे अन्न से हम अपना पेट भरते हैं और शरीर रक्त माँस का निर्माण करता है वास्तव में वही अन्न हमारे अन्नमय कोश और उपत्यिकाओं को बनाता-बिगाड़ता रहता है। उनके अनुसार अन्न के स्थूल सूक्ष्म कारण तीन भाग है। स्थूल से रस रक्त का सृजन होता है। सूक्ष्म वाला हिस्सा मानवी प्रवृत्तियों को जन्म देता है, जबकि उसका कारण भाग संकल्प और संस्कार के लिए जिम्मेदार है। भोजन का यह अंश अच्छा बुरा जैसा होता है, वैसे ही संस्कार हमारे अन्न से संबंधित इस कोश में जमने लगते हैं।
साधना है, जिसमें निराकार को साकार में परिणत किया जाता है और साकार को सुविकसित-सुसज्जित बनाया जाता है। जड़ता की स्थिति को प्रगति में बदलने की सामर्थ्य केवल श्रम में है। श्रम से ही व्यक्ति का अहंकार गलत तथा सेवा साधना की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। जिसने श्रम की अवज्ञा की वस्तुतः उसने अपनी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध कर लिया।
साधना से ही पाया जा सकता है। समस्त सिद्धियाँ श्रम देवता के अनुग्रह से ही पायी जाती रही है और भविष्य में भी पायी जाती रहेंगी।
साधना विज्ञानियों का कहना है कि नाडी जाल देह में नाडी गुच्छक के रूप में फैला होता है इन्हें अध्यात्म की भाषा में उपत्यिका कहते हैं। इनकी कई जातियाँ है। कई स्थानों पर ज्ञान तंतुओं जैसी बहुत पतली नाड़ियां परस्पर चिपकी रहती है। कई बार यह रस्सी की तरह आपस में लिपटी और बटी होती है। कई स्थानों पर गुच्छक गाँठ की तरह ठोस गोली जैसे बन जाते हैं।
साधना में संलग्न रहें। 41 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने अंदर परिपक्वता अनुभव की तो दूसरों को शिक्षा देने के कार्य में हाथ लगाया। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग तप में और एक चौथाई भाग धर्मोपदेश में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेश उतने दिये जितने आज के मामूली उपदेशक दे देते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई जनता उनकी शिक्षाओं पर आस्था रखती है।
साधना की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है। जिसने श्रम की अवज्ञा की वस्तुतः उसने अपनी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध कर लिया।
साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाने के लिये कहा गया है। यह वातावरण बनाने की योजना है। इसे भूमि जोतना कह सकते हैं। बीज बोने खाद पानी का प्रबंध करने और गिराने मोड़ने रखवाली का प्रबंध करने से लेकर फसल काट कर घर लाने की सुविस्तृत क्रिया प्रक्रिया इसके बाद आरंभ होती है।
साधना संचय पर आधारित अन्य अनेकों कार्य करने होते हैं। व्यक्तित्व जीवन संघर्ष में जिन्हें जूझना पड़ा है वे ही यह अनुभव कर सकते हैं कि युग की समस्याएँ कितनी विस्तृत एवं भारी होती है। उन्हें हल करने के लिये कितने भारी भरकम व्यक्तियोँ की आवश्यकता पड़ती है।
साधना करने का सुयोग मिलता और उसके आधार पर हर दृष्टि से धन्य बनने का अवसर मिलता है।
साधनारत रहे। एक दिन उन्हें लगा कि उनके शिष्य होने वाले है एक वर्ष तक वे शिष्यों की प्रतीक्षा करते रहे फिर ब्रह्मानंद शिवानंद विवेकानंद जैसे थोड़े से प्रतिभा संपन्न शिष्य घर बैठे प्राप्त हुए और उन्हीं के सहारे उनकी आत्मा ने संसार को इसी प्रकार संसार में आदि काल से लेकर अब तक एक ही तथ्य समय समय पर स्पष्ट होता रहा है कि तपश्चर्या द्वारा आत्मबल संपादित करने वाली आत्माएँ ही संसार का सच्चा मार्ग दर्शन करने और जन मानस को शुद्ध करने में समर्थ हो सकती हैं।
साधना और आराधना रूपी त्रिपदा के त्रिविध आधार को अपनाये हुए है, वे कृतकृत्य होकर रहते हैं, इसमें दो मत नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-December
साधनायें सीखीं 30 वर्ष तक वह यहीं रहे, तत्पश्चात् वापस इजराइल लौट गये और वहाँ अपनी शिक्षाओं का प्रचार शुरू किया। जिसे बाद में उनके शिष्यों-मैथ्यू, मार्क, ल्यूक और जॉन ने लिपिबद्ध किया जो ‘न्यू टेस्टामेण्ट’ में वर्णित है।
साधना द्वारा प्रसुप्त को जगा लेता है। यही हम सबका अभीष्ट लक्ष्य भी होना चाहिए।
साधना के प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाय, उतनी ही कम है। अनुदान का प्रदान दे सकना तो कदाचित् संभव ही नहीं है। उसके ऋणों से उऋण भी नहीं हुआ जा सकता। इतने पर भी यह तो आशा की जानी ही चाहिए कि इस करुणामयी के आड़े समय में काम आया जाय। अपेक्षित प्रत्युपकार की तनिक सी याचना जब की जाय, तो इससे इनकार न किया जाय।
साधना का महत्व इसलिये है कि इससे दोष-दुर्गुणों का निवारण होता है। लेकिन इसमें दंभ बढ़ने की भी आशंका है और दंभ बढ़ने पर यह आडंबर को नियंत्रित करता है।
साधना ज्योति बोध शक्ति संचय का प्रतीक है वही पराशक्ति है वही गायत्री है।
साधना की दृष्टि से विशेष महत्व है। दिव्य वनौषधियों से युक्त नंदनवन, हरकीदून तथा प्रायः सोलह से अधिक फूलों की घाटियाँ इस स्थान को वस्तुतः स्वर्ग की उपमा प्रदान करती हैं। यही देवताओं, ऋषियों, तपस्वियों का क्रीड़ा प्राँगण रहा है। आर्ष साहित्य में जो भी कुछ लिखा है वह एक प्रकार से हिमालय की ही आत्मा को अभिव्यक्ति है। इस क्षेत्र विशेष की महत्ता के कारण ही अध्यात्म वेत्ताओं ने इसे सर्वोपरि महत्व सदा से ही दिया है।
साधना चाहिये इसके लिए गायत्री यज्ञों, दीप यज्ञों और साथ ही युग निर्माण सम्मेलनों का संयुक्त कार्यक्रम बनाया गया है। इस हेतु प्रचारकों की टोलियाँ आवश्यक उपकरणों के साथ योजनाबद्ध रूप से देश व विदेश के प्रवास पर निकलती हैं।
साधना सीखने, एवं हिमालय में तपस्या करने का उल्लेख है। ईसा की “सरमन आद दी माउण्ट” नामक धर्मनीति भी इस बात का परिचायक है कि उन्होंने हिन्दू और बौद्ध धर्मों का गहन अध्ययन किया था।
साधना कर रहे हैं। आपको विश्वास होगा कि गायत्री माता अनुग्रह करेंगी। जरूर अनुग्रह करेंगी गायत्री माता का स्वभाव ही है कि वह जरूर सहायता करती हैं यह भी आपको विश्वास होगा कि गुरुदेव आशीर्वाद देंगे, अपने पुण्य का एक अंश देंगे। बिलकुल यकीन रखिये, हमने जिंदगी भर अपने पुण्य के अंश बाँटे हैं। हमें बाँटने में बड़ी खुशी होती है, पर हमको खिलाने में खुशी होती है।
साधना स्थल में उसे उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात् राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था में अवस्थान करना होता है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक-ठीक ढंग से पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योग-सिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में वह योग साधना की वह सारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है, जिसका अधिकारी एक यती है।
साधना द्वारा इस क्षेत्र को संस्कारित कर इसे गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित भी किया गया है। इस कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर उपासना करने वाले के प्रसुप्त संस्कार स्वयं जाग उठते हैं, दैवीसत्ता का मार्गदर्शन उसे मिलता है तथा लौकिक एवं अन्यान्य समस्याएँ स्वतः सुलझ जाती हैं। यदि शांतिकुंज को दिव्यशक्ति धारा का गोमुख कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। इक्कीसवीं सदी का गंगावतरण भी यहीं हुआ है एवं उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष भी महाकाल द्वारा यहीं से किया गया है।
साधना। सच्चा साधना द्वारा प्रसुप्त को जगा लेता है। यही हम सबका अभीष्ट लक्ष्य भी होना चाहिए।
साधना, इक्कीसवीं सदी रूपी सतयुग के अवतरण हेतु युगसंधि महापुरश्चरण यहाँ पर न्यूनतम वर्ष में बार तो आकर संपन्न किया ही जाना चाहिए ताकि संस्कारित वातावरण का लाभ परिजनों में विद्यमान देवत्व के बीज को मिल सके, वे सुपात्र बन सकें। यह वह त्रिवेणी संगम है ‘जहाँ काक होहिं पिक बकऊँ मराला’ की उक्ति सार्थक होती है।
साधना और आत्मशोधन और लोककल्याण की बात पर ध्यान कौन दे?
साधना, जो महाकाल व हिमालय की ऋषि सत्ता द्वारा प्रेरित थी, को ही वह श्रेय दिया जाता रहा है कि स्वतंत्रता संग्राम के लिए समुचित वातावरण इसी कारण बना व एक साथ अनेकों महामानव इस समय विशेष में जन्मे। शैव साधकों की उस तपस्थली के दिव्य संस्कार ही थे कि महर्षि मौन रहते थे फिर भी किसी आगन्तुक को ऐसा आभास न होता था कि उसके मन की बात को पढ़कर उसे समाधान, भावी जीवन संबंधी परामर्श उनकी चेहरे की मुसकान व नेत्रों की भावभंगिमा से न मिला हो। कोई साधक किसी भूमि विशेष में पड़े प्रसुप्त बीजाँकुरों को अपनी प्रखरता से जगाकर किस प्रकार उस स्थान को एक सिद्धपीठ बना सकता है, अरुणाचलम् इसका जीता जागता उदाहरण है।
साधना की तीसरी अवस्था में अवस्थान करना होता है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक-ठीक ढंग से पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योग-सिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में वह योग साधना की वह सारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है, जिसका अधिकारी एक यती है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, तो उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधा हीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी?
साधना की थी। पाण्डवों ने-
साधना सत्र मार्च 83 )
साधना शिविर लगाये हैं और जिनकी इच्छा से आपको यहाँ बुलाया गया है। वह आपको खाली हाथ जाने देंगे क्या? नहीं। यह तीनों शक्तियां ऐसी हैं जो बराबर आपकी सहायता करने के लिए अमादा हैं और सच्चे मन से चाहती हैं कि आपको कुछ दें। गाय सच्चे मन से चाहती है कि हम अपने बच्चे को अपना सारा का सारा दूध पिला दें।
साधना करने का निर्णय लिया तो अगस्त्य मुनि की तपस्थली वेदपुरी का ही चयन किया। यह स्थान वही हैं जहाँ आज पांडिचेरी अवस्थित है जिस स्थान पर श्री अरविंद ने अपने जीवन के उत्तरार्ध में व बाद में श्री माँ ने साधना की। वहीं पर अगस्त्य ऋषि की कभी कुटिया थी, ऐसा अध्यात्मवेत्ताओं का मत है इस स्थान का प्रभामंडल इतना अद्भुत दैवी एवं चमत्कारी था कि स्वयं राक्षस राज रावण उस स्थान पर आने की आजीवन हिम्मत न कर सका। उसके स्पष्ट निर्देश अपने अनुचरों के लिए थे कि उस आश्रम से दूर ही रहें नहीं तो वे उसके प्रभाव से अपना अस्तित्व तक खो बैठेंगे। इसी स्थान पर मुनि अगस्त्य ने श्री राम को माँ सीता की खोज के लिए जाते हुये दिव्यास्त्र प्रदान किये थे।
साधना की सिद्धि में मिलती है।
साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात् राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था में अवस्थान करना होता है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक-ठीक ढंग से पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योग-सिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में वह योग साधना की वह सारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है, जिसका अधिकारी एक यती है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, तो उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है।
साधना द्वारा शिप्रा नदी के तट पर स्थित इसी स्थान पर योगीराज बने। सूत-शैनक परंपरा में कुँभ के मेलों के लिए चुने गए चार दिव्य संस्कारित स्थानों में एक नाम उज्जैन का भी है जहाँ हर बारह वर्ष में एक बार सिंहस्थ का आयोजन आदिकाल से होता आ रहा है। इसमें सारे भारत वर्ष की हस्तियाँ एकत्र होकर अध्यात्म जगत से विभिन्न लौकिक एवं आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान निकाला करती थीं। हरिद्वार, प्रयाग, नासिक के साथ उज्जयिनी का नाम पवित्र स्थानों के रूप में इसी कारण लिया जाता है। संभवतः इस भूमि के संस्कार ही थे कि महर्षि साँदीपनि ने श्रीकृष्ण, बलराम, सुदामा, आदि को विद्या विस्तार का शिक्षण देने के लिए इसे ही चुना।
साधना यहाँ होती हैं। वर्ष भर में तो वह जप संख्या अरबों-खरबों की गणना तक जा पहुँचती हैं। नौ कुण्डों की विनिर्मित यज्ञशाला में नित्य नियमित रूप से यज्ञ होता है और वर्ष में आहुतियों की संख्या करोड़ों तक जा पहुँचती हैं। जिस अखण्ड-ज्योति की स्थापना इस महा मिशन के साथ साक्षी रूप में हुई थी। उस दीपक का प्रज्ज्वलन पिछले उनहत्तर वर्षों से अनवरत रूप से ज्योतिर्मय है।
साधना की। वहीं पर अगस्त्य ऋषि की कभी कुटिया थी, ऐसा अध्यात्मवेत्ताओं का मत है इस स्थान का प्रभामंडल इतना अद्भुत दैवी एवं चमत्कारी था कि स्वयं राक्षस राज रावण उस स्थान पर आने की आजीवन हिम्मत न कर सका। उसके स्पष्ट निर्देश अपने अनुचरों के लिए थे कि उस आश्रम से दूर ही रहें नहीं तो वे उसके प्रभाव से अपना अस्तित्व तक खो बैठेंगे। इसी स्थान पर मुनि अगस्त्य ने श्री राम को माँ सीता की खोज के लिए जाते हुये दिव्यास्त्र प्रदान किये थे।
साधना हेतु मरघटों को चुनते हैं। वहाँ की भूमि में, वातावरण में ऐसी विशिष्टता होती है कि उन्हें आसुरी शक्तियों की पूरी मदद अपनी साधना की सिद्धि में मिलती है।
साधना से आत्मा एवं शरीर की प्रथक सत्तायें दृष्टिगोचर होने लगती हैं ज्यों-ज्यों जीवात्मा एवं शरीर के संयोग का विकास एवं परिमार्जन होता है, आत्मिक शक्तियों की अनुभूति होती है और अब तक से भिन्न विलक्षण आनन्द एवं संतोश की स्थिति बनती है।
साधना चाहते हैं, , उनके लिए समाज से बढ़कर कोई दूसरी उपयुक्त योगस्थली नहीं।
साधना की वह सारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है, जिसका अधिकारी एक यती है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, तो उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधा हीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी? यदि कोई ऐसी अभावग्रस्त स्थिति में रह भी रहा हो, तो इसे उसकी मजबूरी कहना चाहिए, वैराग्य नहीं। जो जीवन भर सरोवर में कभी उतरा नहीं, वह बढ़-चढ़ जल में नहीं डूबने का दम्भ करें तो इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है?
साधनायें की थीं। इस समय उत्तरी भारत में राजा शालिवाहन का राज्य था। फिलिस्तीन (इजराइल) की दुखद घटनाओं के कारण दुबारा जब वे भारत आये तब यहीं कश्मीर में बस गये और मृत्युपर्यंत यहीं रहे। अपनी उक्त कृति में हुसैन ने ईसा के कश्मीर में बस गये और मृत्युपर्यंत यहीं रहे। अपनी उक्त कृति में हुसैन ने ईसा के कश्मीर आने, नाम बदल कर मृत्युपर्यंत ठहरने तथा उनके मकबरे आदि के बारे में विस्तारपूर्वक लिखा है।
साधना में प्रखर तत्परता 5- आत्मियता चरम विस्तार
साधना करने का स्पष्ट उल्लेख है।
साधना की है, जिसे ठीक-ठीक ढंग से पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योग-सिद्ध योगी स्तर की हो जाती है। इस दशा में वह योग साधना की वह सारी विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है, जिसका अधिकारी एक यती है। जो संसार छोड़ने और वैरागी बनने की बात करते हैं, तो उनका वैराग्य भी समाज के बिना अधूरा है। भला साधन-सुविधा हीन वन में वैराग्य की परीक्षा किस भाँति हो सकेगी? यदि कोई ऐसी अभावग्रस्त स्थिति में रह भी रहा हो, तो इसे उसकी मजबूरी कहना चाहिए, वैराग्य नहीं।
साधना कर सिद्धि को प्राप्त हुए। राजा भर्तृहरि अपनी तप−साधना द्वारा शिप्रा नदी के तट पर स्थित इसी स्थान पर योगीराज बने। सूत-शैनक परंपरा में कुँभ के मेलों के लिए चुने गए चार दिव्य संस्कारित स्थानों में एक नाम उज्जैन का भी है जहाँ हर बारह वर्ष में एक बार सिंहस्थ का आयोजन आदिकाल से होता आ रहा है। इसमें सारे भारत वर्ष की हस्तियाँ एकत्र होकर अध्यात्म जगत से विभिन्न लौकिक एवं आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान निकाला करती थीं। हरिद्वार, प्रयाग, नासिक के साथ उज्जयिनी का नाम पवित्र स्थानों के रूप में इसी कारण लिया जाता है।
साधनाओं, के,
अभिनव मंत्र जगाकर, ममता बाँटी जाति-वर्ग के,
सारे भेद भुलाकर, भला भुला पायेंगे कैसे, तेरा यह उपकार,
तरने चला सकल संसार॥
साधना है। यही मनुष्य के विकास का उत्तम मार्ग है और उसी से जीवन लक्ष्य की पूर्ति होती हैं। दूसरी ओर असत् विचार भीतर के दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त करते हैं, जो हमारे दुःख, अकर्मण्यता एवं आलस्य के परिणाम के रूप में सामने आते हैं। वह पतित हो जाता है एवं इन्द्रियों के क्षणिक भोग में आनंद लेने लगता है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के अनेकों दुष्परिणाम इनके कारण आते हैं।
साधना के पश्चात् 70 प्रति मिनट तक हृदयगति को कम करने में सफल हुए। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुर ऑटोनामिकनर्वस सिस्टम एवं मन-मस्तिष्क का सीध संबंध मंत्र के साथ जुड़ जाने के कारण ही इस प्रकार के अप्रत्याशित परिवर्तन होते हैं।
साधना विज्ञान में स्वीकारा गया है। संसारी व्यक्तियों के लिए यह दुनिया ही साधना-भूमि है। इससे बढ़कर अनुकूल स्थान साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता। इस साधना स्थल में उसे उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है।
साधना भी अगणित पुण्य फलदायी होती है। सारी ऋषि सत्ताओं की संग्रहित-शक्ति जहाँ हो, वहाँ किया गया तप सिद्धिदायक ही होता है गायत्री महाशक्ति की साधना, इक्कीसवीं सदी रूपी सतयुग के अवतरण हेतु युगसंधि महापुरश्चरण यहाँ पर न्यूनतम वर्ष में बार तो आकर संपन्न किया ही जाना चाहिए ताकि संस्कारित वातावरण का लाभ परिजनों में विद्यमान देवत्व के बीज को मिल सके, वे सुपात्र बन सकें। यह वह त्रिवेणी संगम है ‘जहाँ काक होहिं पिक बकऊँ मराला’ की उक्ति सार्थक होती है।
साधना के लिए चुना व प्राण-शक्ति को घनीभूत कर इतना प्रचंड ऊर्जा संपन्न बना दिया कि वहाँ जाने वाला हर व्यक्ति स्वयं में परिवर्तन अनुभव करता था। कहा जाता है कि ऋषि आश्रमों में प्राचीनकाल में सिंह व गाय एक ही घाट पर पानी पीते थे। यह उक्ति और कहीं सत्य हो न हों, पर महर्षि रमण के आश्रम में हिंसक जीव भी पालतू पशुओं की तरह महर्षि व उनके पास अपने वाले दर्शनार्थियों के पास घूमते रहते थे। किसी को भी किसी ने कोई क्षति पहुँचाई हो, इसका एक भी उदाहरण देखने को नहीं मिला। 19 वीं सदी में जन्मे महर्षि रमण एवं श्री अरविंद सहित श्रीरामकृष्ण की तप−साधना, जो महाकाल व हिमालय की ऋषि सत्ता द्वारा प्रेरित थी, को ही वह श्रेय दिया जाता रहा है कि स्वतंत्रता संग्राम के लिए समुचित वातावरण इसी कारण बना व एक साथ अनेकों महामानव इस समय विशेष में जन्मे।
साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता। इस साधना स्थल में उसे उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात् राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था में अवस्थान करना होता है। अंतिम भूमिका विश्व-साधना की है, जिसे ठीक-ठीक ढंग से पूरा कर लेने के बाद व्यक्ति की अवस्था योग-सिद्ध योगी स्तर की हो जाती है।
साधना की थी। गुरुनानक, कबीर, समर्थ गुरु रामदास, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ आदि महामानवों ने सनातन धर्म को विश्वव्यापी बनाने की विचारणा तपोभूमि हिमालय की गोद में बैठकर ही बनाई थी। अशोक, चन्द्रगुप्त, कालीदास, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गाँधी, दयानंद, राजाराम-मोहनराय, , देशबंधु चितरंजन दास आदि महापुरुषों ने भी इस तुषार मंडित हिमक्षेत्र में यहीं न कहीं अपना आसन जमाया था। राम, कृष्ण बुद्ध, महावीर, ईसा जैसे अवतारी महापुरुषों ने देवात्मा हिमालय में ही कभी तपस्या की थी और समस्त संसार का मार्गदर्शन किया था।
साधना कहते हैं। वह जीवनोत्कर्ष की प्राप्ति के लिये अनिवार्य है। इसमें मनुष्य एक पतली पगडंडी पकड़ कर चलता है जिसके दोनों ओर सुख एवं दुख, जीवन एवं मुक्ति, स्वर्ग एवं नरक के छोर हैं। इनमें मनुष्य को सबसे अधिक जागरुक एवं सतर्क रहना पड़ता है। इसे विचार विचार परिमार्जन या विचारों की तपश्चर्या भी कह सकते हैं।
साधनायें सीखीं। एक अन्य पाश्चात्य विद्वान ब्रायन एलबर्न ने अनेकों प्रमाण प्रस्तुत करते हुए बताया है कि ईसा ने कश्मीर में रहकर आयुर्वेद का उदाहरण देते हुए उनने लिखा है कि उस पुस्तक में ईसा के भारत आने, एवं हिमालय में तप साधना करने का स्पष्ट उल्लेख है।
साधना-भूमि है। इससे बढ़कर अनुकूल स्थान साधना के लिए कोई दूसरा हो नहीं सकता। इस साधना स्थल में उसे उपासना के प्रथम चरण के रूप में पहले परिवार की प्रारंभिक भूमिका से होकर गुजरना पड़ता है। इसके पूरा होने के उपराँत उसे दूसरी भूमिका-समाज-साधना में प्रवेश करना पड़ता है। इसके पश्चात् राष्ट्र-साधना की तीसरी अवस्था में अवस्थान करना होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-October
साधना द्वारा जैसे-जैसे आत्मिक शक्ति बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे ही व्यक्ति में कलाओं का विस्तार हो जाता है। इस विस्तार क्रम में आगे बढ़ते हुए साधक कला कि किस भूमिका में पहुँच गया, इसे कोई दिव्यदृष्टि संपन्न महापुरुष ही जान सकता है। आमतौर से सामान्य व्यक्ति में शक्ति का दुरुपयोग भौतिक आकाँक्षाओं की पूर्ति में होता रहता है। किंतु साधना मार्ग का पथिक जब इसे संचित करते हुए आगे बढ़ता है, तो अंततः एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है, जिसे कला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कहा जा सके। इसी के आधार पर उसकी क्षमता का अनुमान लगाया जाता है।
साधना के, वानप्रस्थों आदि के महत्वपूर्ण शिक्षण सत्र ऋषि परंपरा के बीजारोपण प्रक्रिया के अंतर्गत चलने थे। 1975 तक यही क्रम चला। इस बीच पूज्यवर पहले विदेश प्रवास पर तेजनिद्या व केन्या की यात्रा पर पानी के जहाज से गये तथा डेढ़ माह बाद फरवरी 1973 में लौट आये। प्रवासी भारतीयों को भी लगा कि कोई हमारा अपना भी है, जो मीलों दूर से हमारी संस्कार परंपरा को पुनर्जीवित करने आया है। देव संस्कृति का विश्वसंस्कृति में विस्तार का यह प्रारंभिक चरण था, जो बाद में 1991 से 1994 में विराट् रूप लेकर सारे विश्व भर में फैल गया “समस्त विश्व को भारत के अस्त्र अनुदान” नाम का ग्रंथ इसी के बाद लिखा गया, जिन्हें संस्कृति-इतिहास का मील का पत्थर माना गया।
साधना” की चर्चा की गई हैं, वह और कुछ नहीं, वरन् वह परम ज्योति है, जो इस विश्व में चेतना का आलोक बन कर जगमगा रही है। गायत्री का सविता देवता इसी परम तेज को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण-कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर देख सकता है। इस ‘कला’ अथवा ‘ज्योति’ की जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो, समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।
साधना उपक्रम हेतु हिमालय प्रस्थान किया। दोनों ने जिसे कर्मभूमि बनाया था व अखण्ड-ज्योति संस्थान (घीया मंडी मथुरा) तथा गायत्री तपोभूमि (वृन्दावन रोड मथुरा) से क्रमशः साधना-लेखन एवं सत्र संचालन-प्रचार-संगठन का कार्य बखूबी 30 वर्षों तक संपन्न किया था उसे सदा के लिए छोड़कर पूज्यवर 20 जून को चले गए। परम वंदनीया माताजी को शाँतिकुँज सप्त सरोवर हरिद्वार में अखण्ड दीपक चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने वाली छः कुमारी कन्याएँ व तीन वरिष्ठ कार्यकर्ता गणों के साथ नीरव एकाँत में रहने का निर्देश दे गए। कैसा निष्ठुर सा लगता है यह कदम एक बैरागी संत का, जिसने जीवन भर औरों के हित स्वयं को तिल-तिल कर जलाया था, अगाध स्नेह लुटाकर एक विराट् परिवार का अभिभावक कहलवाया था, किंतु ऐसा लगता भर है। यह एक सुनियोजित कार्य स्थानाँतरण की प्रक्रिया भर थी।
साधना का वास्तविक उद्देश्य शरीर के भीतर स्थित विभिन्न कला-केन्द्रों को परिमार्जित, परिष्कृत कर ब्रह्माँडव्यापी उन हलचलों और सूक्ष्म जानकारियों को अर्जित करना है, जो परमज्योति की लौटती धारा द्वारा उसके मूल उद्गम में संगृहीत होती रहती है।
साधना के शिविर लगाये गये हैं, ऐसी परमसत्ता आपको गुरु के तरीके से मार्गदर्शन करने के लिए तैयार है और सहर्ष यहाँ विद्यमान है। आप लोग उसका फायदा उठाइये, वे आपकी सहायता करेंगे। हमको चाहें तो आप वही मान सकते हैं, अभिभावक मान सकते हैं। हमारे पास जो कुछ तप होगा, पुण्य होगा, ज्ञात होगा, चरित्र होगा, दबाव होगा, तो आप यकीन रखिये कि हम न केवल आप पर दबाव डालेंगे, सिखाएंगे, वरन् उसका एक हिस्सा भी देंगे, बाप भी तो अपने बच्चे को शिक्षा, ही थोड़े देता है, सहायता भी देता है। हमारी शिक्षा भी आपको मिलने वाली है और सहायता भी मिलने वाली है।
साधनाएँ और आचार प्रतिबंधित हो चुके थे। लोगों ने आमतौर से धारणा बना ली थी, कि ऐसी क्रियाओं में प्रवृत्त लोग राक्षस होते हैं।
साधना के संबंध में कल थोड़ी सी जानकारी दी थी कि यह कल्प आखिर है क्या? यह भी बताया था कि कल्प माने है-परिवर्तन। पर यह परिवर्तन क्या होगा? कौन करेगा? कैसे संभव होगा?
साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान, किंतु मथुरा में आते-जाते रहने वाले आगन्तुक दर्शनार्थी यहाँ थे, पूज्यवर भी साथ नहीं थे। अतः यह और भी कड़ी परीक्षा की घड़ी थी।
साधना ग्रंथों में यत्र-तत्र पंचतत्वों को नियंत्रित कर व्याप्ति को व्यवस्थित करने का विधान समझाया गया है। जो इसे जिस अनुपात में संपन्न कर लेता है, उतने ही अंशों में व्याप्ति पर उसका नियमन हो जाता है।
साधना यही है कि सतत् अपने को श्रेष्ठ विचारों में लीन रखा जाय, पतनोन्मुखी विचार प्रवाह से स्वयं को बहने से रोका जाय तथा विभिन्न व्यावहारिक अध्यात्म के उपचारों से आत्मोत्थान के प्रयास किये जाते रहें।
साधना पथ पर प्रशस्त करना था तथा श्री बलराम सिंह परिहार सहित मात्र तीन कार्यकर्ता। शाँत-साधना के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान, किंतु मथुरा में आते-जाते रहने वाले आगन्तुक दर्शनार्थी यहाँ थे, पूज्यवर भी साथ नहीं थे। अतः यह और भी कड़ी परीक्षा की घड़ी थी।
साधना में उनने वह सारी जिम्मेदारी निभाई, जिसकी चर्चा हम पहले के लेख में कर चुके हैं। कड़ी परीक्षा की घड़ी तब आयी, जब साढ़े सात वर्ष पूर्व ही पूज्य आचार्य जी ने अपने हिमालय जाने व कर्मभूमि को स्थायी रूप से छोड़ने का संकल्प ले लिया। बाहर से रुद्र व योद्धा-अंदर से कोमल व यति का रूप लिये पूज्यवर ने वह सब हस्ताँतरण माताजी के कंधों पर करना आरंभ कर दिया, जो उन्हें 1971 के बाद उनके हिमालय प्रवास पर जाने पर सप्तर्षियों की भूमि सप्त सरोवर में शक्ति का स्रोत बनकर प्राप्त होने वाला था।
साधना के नाम से संबोधित किया गया है। इसमें पंचतत्वों के पाँच प्रमुख स्थानों गुदा, पेडू, नाभि, हृदय एवं कंठ प्रदेशों में निवास करने वाले पृथ्वी तत्वों का संतुलन-समीकरण बिठाते हुए, दोष-परिमार्जन करते हुए मूल प्रकाश को इतना निर्मल और प्रखर बना लिया जाता है कि सामान्य स्थिति में जो अनगढ़ बन कर रोग-शोक का कारण बना हुआ था, वही अपने उच्चस्तरीय आयाम में ऋद्धि-सिद्ध का भाँडागार बन जाता है। जो इस साधना मार्ग में प्रवृत्त होकर अपनी कला को जिस अनुपात में बढ़ाते हैं, वे उतने ही ऐश्वर्यवान बनते चलते हैं-ऐसा तत्वज्ञों का मत है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” में इसी की याचना है। गायत्री का भर्ग इसे ही कहा गया है।
साधना, जिसके रंगीन सपने हमने दिखाये हैं और यह बताया है कि आपका जीवन दैवी जीवन होकर रहेगा और आप अच्छे शानदार आदमी होकर रहेंगे, पूरा हो सकना संभव नहीं है। यह एक काम तो आपको करना ही चाहिए। अगर आप यह नहीं करेंगे और पुराने घिनौने जीवन के ढर्रे पर ही चलते रहेंगे तो फिर हम क्या कर पायेंगे। फिर आपकी पूजा-उपासना क्या कर लेगी आपको जप और अनुष्ठान चमत्कार कैसे दिखा पायेंगे? जादू-चमत्कार जैसा अध्यात्म नहीं है।
साधनात्मक मार्गदर्शन अब चलेगा।”
साधना का तीव्र गति से संपादन, राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों व 108 कुँडीय महायज्ञों का भारत भर में सम्पन्न होने के साथ दीप महायज्ञों का प्रचलन घर-घर होना उत्तरार्ध की चौथी व अति महत्वपूर्ण योजना का अंग था। अंतिम 6 माह में पूज्यवर ने महाकाल की प्रेरणा के क्राँतिधर्मी साहित्य विरवित कर इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य के रूप में परिष्कृत प्रतिभा द्वारा लाये जाने की घोषणा की। उनने 2 जून 1990 (गायत्री जयंती) को महाप्रयाण के साथ ही सारी शक्ति परम वंदनीया माताजी को सौंप कर सूक्ष्म में स्वयं को विलीन कर मिशन को प्रचंड शक्ति संपन्न बना दिया।
साधना समारोहों, संस्कार महोत्सवों, रजवंदन समारोहों, विराट शपथ समारोह तथा देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के निमित्त संपन्न 15 भारत में तथा 3 विदेश के अश्वमेध महायज्ञों द्वारा मिशन की गति सौ गुनी बढ़कर मिशन के पक्षधरों की संख्या साढ़े पाँच करोड़ से अधिक जा पहुँची। इन 18 आयोजनों तक की जिम्मेदारी प्रत्यक्ष रूप से परम वंदनीया माताजी ने ली थी। बुलावा आते ही उनने अपनी चेतना को समेटा व सूक्ष्मीकृत हो अपने इष्ट के साथ जा मिलीं। समय भी चुनकर महालय श्राद्धारंभ का निर्धारित किया, जो भाद्रपद पूर्णिमा 19 सितंबर का था व 11:50 घड़ी में बजे थे।
साधना में लगाये रखना है, चिंतन-मनन करना है। इस बीच में आपको जप और अनुष्ठान करना है, योगाभ्यास करना है, और अपने आपका परिशोधन करना है। तो क्या हम अकेले कर लेंगे? नहीं आप अकेले कहाँ हैं। पीठ पीछे हम जो हैं।
साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं।”-”अखण्ड-ज्योति का यह संपादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है।”
साधनाओं के प्रति भय से ही सही, इतनी विरति व्याप गई थी कि कोई उनका नाम तक नहीं लेता था। लेकिन यह साधक तो उन प्रतिबंधों के स्रष्टा-अधिष्ठाता के ठीक सामने खड़ा होकर किस कदर निःशंक भाव से याचना कर रहा था। सम्राट ने दृढ़ता पूर्वक उत्तर दिया-”किसी भी दशा में नर बलि की अनुमति नहीं दी जाएगी।”
साधना में जो आप आये हैं तो यह कार्य पद्धति आपको समझनी होगी। आपके ऊपर दबाव डाला जायगा और आप में उत्साह पैदा किया जायगा कि आपके अंदर पिछले स्वभाव पिछली गंदी आदतें और पिछली क्रिया पद्धति जो जम गयी है, उसको आप हटा दीजिए। उसको निकालिए, उसको छोड़िये। बुरी आदतें यदि छोड़ने से छूटती हों तो उनसे लड़ना शुरू कीजिए। उनके विरुद्ध बगावत कीजिए।
साधना क्षेत्र में लौटना है। अखण्ड-ज्योति का यह संपादन परिवर्तन भी इसी योजना का एक अंग है।” “पूरी बात तो उनने अभी स्पष्ट नहीं की है, पर मालूम होता है कि किन्हीं विशेष स्थानों पर किन्हीं विशेष आत्माओं के सान्निध्य में मथुरा से बहुत दूर रहने की उनकी योजना है। वे राष्ट्र के लिए एक विशेष शक्ति का आविर्भाव करने के लिए कुछ विशेष साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं।”-”अखण्ड-ज्योति का यह संपादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है।
साधना के लिए नर बलि की आवश्यकता है। मैं इसके लिए आपकी अनुमति प्राप्त करने आया हूँ।” उसके बोलने से ऐसा लगा कि आकाश पर छायी घनघोर घटाएँ एक बारगी गहरा उठीं। अथवा किसी पर्वतीय गुहा से सिंह परिकर ने गर्जना की हो।
साधना और मनोनिग्रह का नाम ही संन्यास है, तो उसे घर पर रह कर सुविधापूर्वक क्यों न पालूँ?
साधना-लेखन एवं सत्र संचालन-प्रचार-संगठन का कार्य बखूबी 30 वर्षों तक संपन्न किया था उसे सदा के लिए छोड़कर पूज्यवर 20 जून को चले गए। परम वंदनीया माताजी को शाँतिकुँज सप्त सरोवर हरिद्वार में अखण्ड दीपक चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण करने वाली छः कुमारी कन्याएँ व तीन वरिष्ठ कार्यकर्ता गणों के साथ नीरव एकाँत में रहने का निर्देश दे गए। कैसा निष्ठुर सा लगता है यह कदम एक बैरागी संत का, जिसने जीवन भर औरों के हित स्वयं को तिल-तिल कर जलाया था, अगाध स्नेह लुटाकर एक विराट् परिवार का अभिभावक कहलवाया था, किंतु ऐसा लगता भर है। यह एक सुनियोजित कार्य स्थानाँतरण की प्रक्रिया भर थी।
साधना के लिए भी ढेरों समय निकल आता। संत विनोबा भावे ने व्यस्त जीवन के बीच ही संसार की प्रमुख 23 भाषाओं का अध्ययन कर लिया था। अनेक सद्गृहस्थों ने समय का वर्गीकरण और सदुपयोग करके इतने महत्वपूर्ण कार्य कर डाले जिनकी यशगाथा सुनकर हर सुनने वाले को पुलकित होना पड़ता है। पर हम में से कितने हैं जो समय सारिणी सही तरह निर्धारित करते हैं, और अपने समय का ऐसा सदुपयोग करते हैं जिसकी प्रतिक्रिया से न केवल स्वयं लाभान्वित हों वरन् अन्य अनेकों के लिए भी अनुकरणीय बनें। वस्तुतः “टाइम मैनेजमेंट” से बढ़कर व्यवस्था बुद्धि का सही रूप कोई और है नहीं।
साधना का आदेश दिया है।
साधना का उद्देश्य पूरा हो गया और जिस लक्ष्य पर पहुँचने की आप इच्छा करते थे, अथवा जिस लक्ष्य पर हम आपको पहुँचाना चाहते थे, वह निश्चित रूप से सफल हो जायेगा। एक काम और कीजिये कि जिस तरह से मालवीय जी से तीसरा जो काम टॉनिक सेवन कराया गया था, आपको भी टॉनिक सेवन करना चाहिए। टॉनिक सेवन से क्या मतलब है? टॉनिक सेवन से मतलब है कि जिन विचारों का आप में अभाव रहा है, उन विचारों को फिर से सेवन करना शुरू कीजिए। टॉनिक तो आपको मिला ही नहीं।
साधना से लेकर उनके द्वारा आराधना उपक्रम के अंतर्गत युग निर्माण योजना एवं सत्संकल्प रूपी घोषणा पत्र द्वारा मिशन को एक नया मोड़ दिया।
साधना मार्ग का पथिक जब इसे संचित करते हुए आगे बढ़ता है, तो अंततः एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है, जिसे कला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण कहा जा सके। इसी के आधार पर उसकी क्षमता का अनुमान लगाया जाता है। जिस प्रकार मोटरों की सामर्थ्य उसकी “हार्स पावर” पर निर्भर करती है और जितनी अधिक हार्स पावर की मोटर होती है उतना ही बड़ा काम ले पाना उससे संभव होता है, वही बात कला शक्ति के साथ भी है। साधक में यह शक्ति जितनी बढ़ी-चढ़ी होगी, उतना ही बढ़ा-चढ़ा पुरुषार्थ कर सकने में वह समर्थ होगा।
साधना में, जनहित के लिए तिल-तिल कर गलने में तथा स्नेह व ममत्व को लुटाने में ही नियोजित हुए।
साधना मार्ग में प्रवृत्त होकर अपनी कला को जिस अनुपात में बढ़ाते हैं, वे उतने ही ऐश्वर्यवान बनते चलते हैं-ऐसा तत्वज्ञों का मत है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय” में इसी की याचना है। गायत्री का भर्ग इसे ही कहा गया है। यही सबका जीवन प्राण है।
साधना सम्यक् पूर्ण कहाँ हुई।
साधना सत्र कितना शानदार और कितना आपके भविष्य को उज्ज्वल करने में सहायक सिद्ध होता है। ॐ शाँतिः शाँतिः
साधना संबंधी प्रवचन का उत्तरार्ध)
साधना करा रहे हैं। ये क्रियायें हैं। इन क्रियाओं का मतलब सिर्फ इतना है कि आप अपने भीतर वाले दृष्टिकोण, चिंतन, चरित्र, स्वभाव, रुचि और आकाँक्षाओं को बदल दें। अगर आपने यह अनुमान लगा लिया हो कि केवल क्रिया करने से जादूगरी के तरीके से आपको कहीं आसमान से कोई सिद्धियाँ आ टपकेंगी, तो आप इस ख्याल को निकाल दीजिए। करना आपको ही पड़ेगा।
साधना से हुआ। तत्पश्चात् वसंत 1986 से भारत भर में युग संधि महापुरश्चरण साधना का तीव्र गति से संपादन, राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों व 108 कुँडीय महायज्ञों का भारत भर में सम्पन्न होने के साथ दीप महायज्ञों का प्रचलन घर-घर होना उत्तरार्ध की चौथी व अति महत्वपूर्ण योजना का अंग था। अंतिम 6 माह में पूज्यवर ने महाकाल की प्रेरणा के क्राँतिधर्मी साहित्य विरवित कर इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य के रूप में परिष्कृत प्रतिभा द्वारा लाये जाने की घोषणा की। उनने 2 जून 1990 (गायत्री जयंती) को महाप्रयाण के साथ ही सारी शक्ति परम वंदनीया माताजी को सौंप कर सूक्ष्म में स्वयं को विलीन कर मिशन को प्रचंड शक्ति संपन्न बना दिया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1994-January
साधना आपस में इस कदर घुल-मिल गये थे कि एक के बिना दूसरे के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है। उनके ही शब्दों में स्पष्ट किया गया तथ्य है-”लेखन हमारे लिए कभी व्यवसाय नहीं रहा। इसे मैंने अपनी उपासना की तरह अपनाया है। तप ने मेरे चिंतन में प्राण भरे हैं।” एक अन्य स्थान पर उनके शब्द हैं, अपनी रचनाओं में मैंने अपना प्राण सँजोया है।
साधनाओं का लक्ष्य उसी तक पहुँचाने का है। साधना मार्ग पर चलते हुए सील के पत्थरों की तरह अनेकों छोटी-बड़ी सिद्धियाँ भी बीच-बीच में आती रहती हैं। इनसे लौकिक ऐश्वर्य और पारलौकिक सुख-शाँति का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना में कितनी प्रगति हुई। सिद्धियाँ और चमत्कारी क्षमतायें, देवी अनुग्रह केवल इसलिए उपलब्ध होते हैं कि उनका उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जा सके। यही साधना का मूल लक्ष्य है एवं इसी राजमार्ग पर चलते हुए वह सब कुछ पाने का प्रयास किया जाना चाहिए जो कि साधक को अभीष्ट है।
साधना से सिद्धि मिलने और सिद्धि के चमत्कारी होने की मान्यता का यही सुनिश्चित और ठोस आधार है।
साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है? गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति संपन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है। ऐसे अनेकानेक पक्षों की शोध हमने अथर्ववेदीय ऋषि परंपरा के अंतर्गत है सम्पन्न की है। जो आगामी समय में आत्मिकी के अनुसंधान में निरत होने वाले वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाश में आयेगी।
साधना एवं तपश्चर्या का खाद-पानी लगाना पड़ता है, साथ ही साथ उच्चस्तरीय चरित्र निष्ठ एवं उदार सेवा सहायता का अवलंबन अपनाना पड़ता है। इस नीति को अपना कर कोई भी साधक बुद्धिमान माली की तरह अपने अंतः क्षेत्र में विद्यमान ऋद्धि-सिद्धियों को उभार कर उनसे भरा-पूरा उद्यान खड़ा कर सकता है। इसके लिए बाहर से कुछ ढूँढ़ने, लाने या पाने की आवश्यकता नहीं है। मात्र कषाय−कल्मषों की परतों को हटा देने भर का साहस सँजो लेना पर्याप्त है। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार ही विभिन्न साधनाओं, तपश्चर्याओं का वास्तविक उद्देश्य है।
साधना करता हूँ। उसके प्रभाव से ही इस कुँड का पानी अलौकिक गंध से सुरभित और मधु से भी अधिक मीठा है। लो पानी का थोड़ा आचमन भी करो।”
साधना के ऊपर टिकी हुई है। कठिन तपश्चर्या एवं उच्चस्तरीय व्यक्तित्व द्वारा ही उसे उपार्जित रूप में वह किसी को नहीं मिलती।
साधना का एक अंश देकर उन्हें कष्टमुक्त कर देते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अपना पुण्य-तप कष्ट पीड़ित को दान रूप में देना पड़ता है और उसके कठिन प्रारब्ध भोग को भुगतने को स्वयं तत्पर होना पड़ता है। संसार में हर वस्तु एक नियत नियम के आधार पर चल रही है। केवल कोरे आशीर्वाद देने से किसी का कोई भला नहीं हो सकता। सच्चा आशीर्वाद जो फलित हो, वही व्यक्ति दे सकता है जिसके पास तप की पूँजी संग्रहित हो और उसके एक भाग को आशीर्वाद के साथ देते हुए दूसरे का कठिन प्रारब्ध भोगने के लिए स्वयं तैयार हो।
साधना उपक्रमों के साथ जुड़े हुए इस दिशा निर्धारण को जो समझते हैं और बिना हारे अनवरत प्रयास करते हैं, उन्हें सिद्ध पुरुष होने का अवसर निश्चित रूप से मिलता है। साधना से सिद्धि का सिद्धाँत अकाट्य है। प्रयास के साथ जुड़ी हुई उपलब्धि का प्रमाण, परिचय हर साधक कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है। साधक को सिद्धियाँ मिलती हैं जिसको देखते हुए यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। सिद्धियाँ और चमत्कारी क्षमतायें, देवी अनुग्रह केवल इसलिए उपलब्ध होते हैं कि उनका उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जा सके।
साधना में निरंतर तपाया।
साधना करो। तुम सबकी समवेत साधना धरती में मधुवाता ऋ तायते....मधुछरंति सिंधपः बनकर मुखरित होगी।”
साधना में निरत नहीं, वैसा ही प्रयास वे मरने के उपराँत भी करती रहती हैं।
साधना करते हैं पर सर्व साधारण के लिए उसका सरल उपाय एक ही है कि उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संयम साधना एवं परमार्थ प्रयोजनों के लिए कष्ट सहने, पुरुषार्थ करने के लिए समग्र साहसिकता के साथ प्रयत्नशील रहें। अनीति के साथ संघर्ष में आपत्ति सहने के लिए भी। तभी कुछ उच्चस्तरीय उपलब्धि किसी को मिल सकती है। श्रेयार्थी बनने के लिए कुछ कीमत चुकानी पड़ती है एवं वह है ही तप-साधना के माध्यम से, अतः इस राजमार्ग पर चलकर ही सिद्धि-लब्धि का प्रमाद किया जाना चाहिए।
साधना एवं परमार्थ प्रयोजनों के लिए कष्ट सहने, पुरुषार्थ करने के लिए समग्र साहसिकता के साथ प्रयत्नशील रहें। अनीति के साथ संघर्ष में आपत्ति सहने के लिए भी। तभी कुछ उच्चस्तरीय उपलब्धि किसी को मिल सकती है। श्रेयार्थी बनने के लिए कुछ कीमत चुकानी पड़ती है एवं वह है ही तप-साधना के माध्यम से, अतः इस राजमार्ग पर चलकर ही सिद्धि-लब्धि का प्रमाद किया जाना चाहिए।
साधना एवं तपश्चर्या द्वारा जाग्रत एवं विकसित किया जाता है। इस दिशा में अपने गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार में साधक जितनी अधिक पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश करता जाता है, उसी क्रम से एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय विभूतियाँ-सिद्धियाँ हस्तगत होती चली जाती हैं। मनुष्य का मौलिक स्वरूप देवत्व प्रधान है। अतः शारीरिक, मानसिक और आत्मिक क्षेत्र की सिद्धियाँ भी अगणित प्रकार की हैं, उन्हें आठ या किसी अन्य संख्या में विभाजित नहीं किया जा सकता। आत्मबल की जिस दिशा में लगा दिया जाय, उसी में चमत्कार पैदा हो जायेगा और वह एक स्वतंत्र सिद्धि दिखाई देने लगेगी।
साधना के माध्यम से, अतः इस राजमार्ग पर चलकर ही सिद्धि-लब्धि का प्रमाद किया जाना चाहिए।
साधना में उसका सतत् मार्ग दर्शन करती रहीं। परिणाम यह हुआ कि सन् 1967 में बी. बी. सी. ने ब्राउन के संगीत पर आधारित एक वृत्त चित्र प्रसारित किया। विश्व के तत्कालीन संगीत विशारदों ने उसे देखने सुनने के बाद एक ही निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि यह सब ब्राउन की ही रचनायें हैं, तथापि यह निस्संदेह एक अविश्वनीय घटना है कि विश्व के विगत प्रसिद्ध संगीतकारों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त कृतियाँ हैं।
साधना मार्ग पर चलते हुए सील के पत्थरों की तरह अनेकों छोटी-बड़ी सिद्धियाँ भी बीच-बीच में आती रहती हैं। इनसे लौकिक ऐश्वर्य और पारलौकिक सुख-शाँति का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना की सफलता के रूप में उपरोक्त सिद्धियाँ समयानुसार सामने आती हैं, पर उनकी ओर आकर्षित होना, उन्हें अधिक महत्व देना, उनका प्रदर्शन करना अथवा उनसे कोई भौतिक लाभ उठाना, गर्व करना और चमत्कारी बनकर लोगों को अपने पीछे लगाना एक भारी भूल है।
साधना धरती में मधुवाता ऋ तायते....मधुछरंति सिंधपः बनकर मुखरित होगी।”
साधनारत हों, तभी बड़े यज्ञों का विधान ठीक तरह संपन्न हो सकता है, जो वर्तमान परिस्थितियों में अत्यधिक कठिन है।
साधना विज्ञान का सारा ऊहापोह इसी के चहुँ ओर है।
साधना से अपना आत्मबल बढ़ाए और उपलब्धियों को अभावग्रस्तों की प्यास बुझाने के लिए उन्हें सुलभ कराए। आत्मबल के अभाव में साहस नहीं उभरता। साहस के बिना परमार्थ कैसा? परमार्थ में प्रयुक्त न होने पर ज्ञान वैभव-वर्चस्व आदि की सार्थकता कहाँ? अस्तु जिस अंतःप्रेरणा से मनीषा उभरती है, उसी का दूसरा अनुदान तपस्वी, जीवनचर्या के रूप में भी मिलता है।
साधना है। शारीरिक दृष्टि से इसका प्रभाव हारमोन ग्रंथियों पर तो पड़ता ही है, साथ ही मानसिक स्तर को भी उत्कृष्ट चिंतन की दिशाधारा मिलती है। विधेयात्मक दृष्टिकोण इसी की परिणति है। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण के समतुल्य ही प्रार्थना भी ईश्वरीय सहायता को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है। भौतिक-वेत्ताओं एवं चिकित्सा विज्ञानियों ने भी अब प्रार्थना को समर्थ अध्यात्मोपचार के रूप में मान्यता प्रदान की है।
साधना कराई जाती है। इसी के बल-बूते वे प्रचंड पराक्रम करने में समर्थ नर रत्न बनते हैं।
साधना-उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है? गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति संपन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है। ऐसे अनेकानेक पक्षों की शोध हमने अथर्ववेदीय ऋषि परंपरा के अंतर्गत है सम्पन्न की है।
साधनाएँ तपश्चर्याएँ मूर्खता है। आज आप अनुभव करें कि योग में साधारण मनुष्यों को ही नहीं पर्वतों और नदियों को भी इच्छावर्ती बना लेने की शक्ति है। हमारा अहंकार न बढ़े इसलिए सामान्य मनुष्य की तरह हम भीख माँग कर खाना खाते और जीते हैं।”
साधना विज्ञान बनाये गये और सारे के सारा अध्यात्म का इतना बड़ा कलेवर बनाया गया। आपको इसके उद्देश्यों को पूजा-उपासना के उद्देश्यों को समझना चाहिए।
साधनाओं, तपश्चर्याओं का वास्तविक उद्देश्य है। अंगारे पर चढ़ी राख की परत ही उसे धूमिल और निस्तेज बना देती है। यह परत हअते ही अंगारा फिर अपनी गर्मी और प्रकाश का परिचय देने लगता है। चिंतन, चरित्र कर्तृत्व को यदि उत्कृष्ट एवं उच्चस्तरीय बना लिया जाय तो फिर आत्मिक प्रखरता के कारण उपलब्ध होने वाली असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों के मार्ग में और कोई बड़ा व्यवधान शेष नहीं रह जाता।
साधना का लक्ष्य उसे प्राप्त करना है। योगशास्त्रों एवं उपनिषदों में वर्णित चौरासी प्रकार के योग एवं विविध विधि तप-साधनाओं का लक्ष्य उसी तक पहुँचाने का है। साधना मार्ग पर चलते हुए सील के पत्थरों की तरह अनेकों छोटी-बड़ी सिद्धियाँ भी बीच-बीच में आती रहती हैं। इनसे लौकिक ऐश्वर्य और पारलौकिक सुख-शाँति का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना के लिए गुरु चरणों में वापस लौट गया।
साधना है। इसे परम पुरुषार्थ माना गया है। अपने कुसंस्कारों से निरंतर लड़ते रहना, जीवन क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों की फसल उगाना, पशुता को देवत्व में परिणत कर देना-यही है साधना को स्वरूप। साधना उपक्रमों के साथ जुड़े हुए इस दिशा निर्धारण को जो समझते हैं और बिना हारे अनवरत प्रयास करते हैं, उन्हें सिद्ध पुरुष होने का अवसर निश्चित रूप से मिलता है। साधना से सिद्धि का सिद्धाँत अकाट्य है।
साधनाओं में बीता, रणविद्या के हुँकारो अथवा राजनीतिक पहेलियों को सुलझाने में। योगी की गुह्यताओं से सुपरिचित नहीं हूँ देव! क्या मन में विकसित कामना अथवा भावना इतनी बलवती हो सकती है कि वह इस भौतिक प्रकृति को ही बदल दे? क्या अगोचर अव्यक्त का प्रभाव इतना गोचर प्रत्यक्ष भी हो सकता है कि असंभव भी संभव प्रतीत होने लगे।”
साधना मार्ग में अग्रसर साधकों को समयानुसार जो सिद्धियाँ मिलती है, उनका वर्णन योगशास्त्रों एवं उपनिषदों में मिलता है। उनकी संख्या आठ हैं, जिन्हें अष्ट सिद्धियाँ भी कहते हैं। उनका वर्णन इस प्रकार है-
साधना में विश्वास था, सो वे एक दिन चुपचाप रात्रि में उठ कर वन चले गये। रानी ने योगबल से जान लिया, सो राजकाज स्वयं चलाने लगीं। राजा के कुछ काल के लिए प्रवास जाने की बात कह दी।
साधना करनी पड़ती है। वत्स ! जिस दिन तू इस तत्वज्ञान को समझ लेगा, उस दिन तेरी अवरुद्ध आत्म-प्रगति के द्वार अपने आप खुल जाएँगे ।”
साधना एवं उपासना के समस्त क्रिया-कलाप, विधि-विधान इस उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं कि उनमें निर्दिष्ट संकेतों का अनुसरण करते हुए मनुष्य अपने व्यक्तित्व को अधिकाधिक परिष्कृत एवं उदात्त तथा स्वयं को पवित्र बनाता चले। आत्म परिष्कार की इस प्रक्रिया में जिसने जितनी सफलता पायी वह उसी स्तर का संत, ऋषि, महामानव, देवता एवं अवतारी कहा गया। सामान्य मनुष्यों की तुलना में इन महामानवों को ब्रह्मलोक के निवासी कहा और उन्हें चमत्कारी माना जाता है। लौकिक सफलताओं को समृद्धि कहते हैं, किंतु आत्मोत्कर्ष की अलौकिक उपलब्धियाँ ‘विभूतियाँ’ एवं ‘सिद्धियाँ’ कहलाती हैं। सिद्धपुरुषों के चमत्कारी कर्तृत्व ही संसार भर के महामानवों को ऐतिहासिक श्रेय-सम्मान प्रदान करते हैं।
साधना का परिणाम था। चिंतन और साधना आपस में इस कदर घुल-मिल गये थे कि एक के बिना दूसरे के बारे में सोच पाना भी मुश्किल है। उनके ही शब्दों में स्पष्ट किया गया तथ्य है-”लेखन हमारे लिए कभी व्यवसाय नहीं रहा। इसे मैंने अपनी उपासना की तरह अपनाया है। तप ने मेरे चिंतन में प्राण भरे हैं।
साधना करनी पड़ती है। अंडे सेने के लिए आवश्यक ताप तथा मादा की सुरक्षा के लिए वह जिस कोटर में रहती है, नर उसका मुख बंद कर देता है, वह उतना ही खुला रहता है, जिससे चोंच भर बाहर निकल सके। बस इसी से नर अपनी मादा को खिलाता-पिलाता रहता है।
साधना के बल पर सत्य की गंगोत्री उनका आवास बनी थी। उन्होंने सवालों, समस्याओं, उलझनों के शिकंजे में विकल बेबस मानव जीवन के दर्द को पहचाना और अपना समूचा जीवन इस व्यथा के निवारण के लिए उत्सर्ग कर दिया। उन्हीं के शब्दों में कहें तो हमारा यह जीवन भगवान की उस इच्छा के लिए समर्पित है, जिसके अनुसार वे प्रश्नचिह्नों के चक्रव्यूह में फँसी अपनी प्रिय मानवता का उद्धार करना चाहते हैं। हमारा अब तक का क्रिया-कलाप इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। जितने दिन और जीना पड़ेगा।
साधना करें। इसी में मानव मात्र के समूचे समाज व राष्ट्र का हित है।
साधना से सिद्धि का सिद्धाँत अकाट्य है। प्रयास के साथ जुड़ी हुई उपलब्धि का प्रमाण, परिचय हर साधक कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है। साधक को सिद्धियाँ मिलती हैं जिसको देखते हुए यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। सिद्धियाँ और चमत्कारी क्षमतायें, देवी अनुग्रह केवल इसलिए उपलब्ध होते हैं कि उनका उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जा सके। यही साधना का मूल लक्ष्य है एवं इसी राजमार्ग पर चलते हुए वह सब कुछ पाने का प्रयास किया जाना चाहिए जो कि साधक को अभीष्ट है।
साधना का मूल लक्ष्य है एवं इसी राजमार्ग पर चलते हुए वह सब कुछ पाने का प्रयास किया जाना चाहिए जो कि साधक को अभीष्ट है।
साधना को स्वरूप। साधना उपक्रमों के साथ जुड़े हुए इस दिशा निर्धारण को जो समझते हैं और बिना हारे अनवरत प्रयास करते हैं, उन्हें सिद्ध पुरुष होने का अवसर निश्चित रूप से मिलता है। साधना से सिद्धि का सिद्धाँत अकाट्य है। प्रयास के साथ जुड़ी हुई उपलब्धि का प्रमाण, परिचय हर साधक कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है। साधक को सिद्धियाँ मिलती हैं जिसको देखते हुए यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-January
साधनाओं द्वारा मन चाहा स्वास्थ्य और इच्छित सुन्दरता प्राप्त की जा सकती है। इस पुस्तक में इन आध्यात्मिक तथ्यों को समझाया गया है, जिनसे स्वास्थ्य और सौंदर्य को हर मनुष्य प्राप्त कर सकता है। मू॰)
साधना करने से एक मनुष्य का प्राण दूसरे शरीर में प्रवेश कर आता है मैस्मरेजम के ढंग पर अपनी आत्म शक्ति से दूसरों में प्रभावित करने, उन्हें अपना इच्छानुसार चलाने, बेहोश कर देने, विचार बदल देने की विद्या इस पुस्तक बताई गई हैस्त्र जो रहस्य जन्म भर योगियों की सेवा करने पर भी प्राप्त नहीं होते उन्हें इस पुस्तक में दर्पण की तरह खोलकर रख दिया गया है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-May
साधना करके अपार लाभ प्राप्त करना चाहिये।
साधना की जाय तो न जाने कितना लाभ होगा, बुद्धिमानों ने कहा है कि—”बड़े लाभ के लिए छोटे लाभ का त्याग करना चाहिए।” इसलिए मुझे सच्चे योग की साधना करके अपार लाभ प्राप्त करना चाहिये।
साधना। मूल्य 1 रुपया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-July
साधना द्वारा उसके समीप तक पहुँच जावें तो निस्सन्देह आप अपनी समस्त आकांक्षाएं पूर्ण कर सकेंगे, इस कल्पवृक्ष के पास पहुँचने का जो मार्ग है उसे ही आध्यात्मवाद, ब्रह्म विद्या या योग साधन कहते हैं। प्रफुल्ल, आनन्दमय और सन्तुष्ट जीवन बिताने के लिए हरएक व्यक्ति को इसी मार्ग से चलना पड़ता है।
साधनाओं के सम्बन्ध में अनेक अनुष्ठानों की मर्म उपासनाओं में पारंगत हो चुका था, राजा ने उसे प्रसन्न करके इस बात के लिए रजामन्द कर लिया कि अनुष्ठान द्वारा उसे सौ पुत्र प्राप्त करा देगा। उस अनुष्ठान में वर्तमान पुत्र को बलिदान करने की शर्त थी, राजा खुशी-खुशी इसके लिए तैयार हो गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-September
साधना को जारी रखिए उस महान पथ को पूरा करने की योग्यता बनाये रखने के लिए साँसारिक उन्नतियों को एकत्रित कीजिए या प्रतिष्ठित, शक्ति शास्त्रों और वैभव वान बनने की दिशा में सदैव प्रगति करते रहिए।
साधना के अनुसार न्यूनाधिक मात्रा में प्राप्त करते हैं, जिस सुख की तलाश में बहिर्मुखी व्यक्ति घोर प्रयत्न करते हुए मारे-मारे फिरते हैं फिर भी निराश रहते हैं उससे कई गुना सुख आध्यात्म साधक अनायास ही पा जाते हैं। अष्ट सिद्धि के प्रभाव से उनका जीवन हर घड़ी आनन्द से परिपूर्ण रहता है, दुख की छाया भी पास में नहीं फटकने पाती।
साधना)
साधना है उसे उसी मात्रा में ऋद्धि सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इनका दुरुपयोग करना बुरा है, सदुपयोग करने से आत्मिक बल वृद्धि होती है। जहाँ ऋद्धि सिद्धियों से बचने के लिए कहा गया है वहाँ उसका तात्पर्य इनका दुरुपयोग न करने से है अथवा कौतूहलपूर्ण बाजीगरी के निरर्थक खेलों में रुचि न लेने से है। योगी को स्वभावतः ऋद्धि सिद्धियाँ मिलती हैं यह प्राकृतिक काम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-April
साधना एक कल्पना का विषय ही हो सकता है। कई असंयमी मनुष्य योग क्रियाओं में उलझे तो उन्हें तपैदिक, पागलपन या अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-November
साधना की गई है तो भी वह लाभदायक ही सिद्ध होगी। शुभ कर्मों में ऐसा आकर्षण है कि उन्हें एक बार थोड़ा सा करने पर फिर उनका चस्का लग जाता है और बार-बार श्रेष्ठ कर्म करने की इच्छा होती है। उनका ऐसा बीज रूप संस्कार जम जाता है जो अवसर पाते ही फिर उग आता है। ग्रीष्मऋतु में घास सूख जाती है, उसका दर्शन होना भी कठिन हो जाता है, परन्तु वर्षा होते ही उसकी सूखी हुई जड़ें जमीन के अंदर फिर हरी हो जाती हैं और घास का भूमि पर बड़ा भारी विस्तार दिखाई पड़ने लगता है। इसी प्रकार शुभ कर्म का बीज जम जाने पर उस आरंभ का फिर कभी नाश नहीं होता, अनायास छूट जाने और बुरी परिस्थिति में पड़ जाने से भले ही दुर्बुद्धियों का आधिपत्य हो जाए पर जब कभी भी अनुकूल अवसर मिलेगा, उस थोड़े से धर्म-संस्कार का बीज हरा हो जाएगा और फिर धर्म में प्रवृत्ति बढ़ जाएगी।
साधना से जो नई चीज पैदा होगी, वह संसार भर की एक अपूर्व सम्पत्ति होगी।
साधना आरंभ करते हुए लोग अक्सर ऐसा संदेह किया करते हैं कि यदि इस मार्ग पर पूरी तरह न चल सके, यदि साधन बीच में ही टूट गया तो देवता रुष्ट हो जायेंगे और उनके कोप से कहीं उलटा फल न उपस्थित हो जाए। यदि धर्म का कार्यक्रम आगे न चल सका तो कहीं उपहास का भाजन न बनना पड़े हानि या निन्दा सहन न करनी पड़े।
साधना में चित्त लगाकर काम करते जाओ, बाहरी उत्तेजना में न फसो, अन्तर में भगवान की दिव्य मूर्ति प्रकट होने दो। स्मरण कर लो, तुम्हारी साधना से जो नई चीज पैदा होगी, वह संसार भर की एक अपूर्व सम्पत्ति होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-October
साधना कीजिए, परमार्थ में प्रवृत्त हूजिए।
साधना से उसे प्राप्त किया जा सकता है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि विषयों में रमणीयता नहीं वरन् आत्मा में है। जो वस्तु जहाँ है वह वहीं से प्राप्त हो सकती है।
साधना
साधना में प्रारम्भ भी हो गया है, योगियों के लिए सब कुछ सम्भव है। शिक्षा, समाज, राजनीति, शिल्प, वाणिज्य आदि सभी क्षेत्रों में योगियों की अपूर्व प्रतिभा एक विचित्र संसार तैयार कर सकती है यह निश्चय है।
साधना में प्रविष्ट होने वाले साधक के लिए घातक ही सिद्ध होगा। यह साधना पुष्टि मार्ग की है और तदनुसार यही कहना चाहिए कि यह ‘स्टेज’ परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। इस दर्जे को प्राप्त करने के लिए प्रथम कथित दो साधन ही उपयुक्त सिद्ध होंगे।
साधना की बागडोर आत्मबल, मनन, विचारशीलता और चिन्तन के हाथ में है। यहाँ हमें हर कदम पर सावधान रहना चाहिए, कहीं अपनी पगडंडी से फिसल न जायें।
साधना पुष्टि मार्ग की है और तदनुसार यही कहना चाहिए कि यह ‘स्टेज’ परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। इस दर्जे को प्राप्त करने के लिए प्रथम कथित दो साधन ही उपयुक्त सिद्ध होंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-February
साधना करने से एक मनुष्य का प्राण दूसरे शरीर में प्रवेश कर जाता है। मैस्मरेजम के ढंग पर अपनी आत्म शक्ति से दूसरों में प्रभावित करने, उन्हें अपना इच्छानुसार चलाने, बेहोश कर देने, विचार बदल देने की विद्या इस पुस्तक में बताई गई है। जो रहस्य जन्म भर योगियों की सेवा करने पर भी प्राप्त नहीं होते उन्हें इस पुस्तक में दर्पण की तरह खोलकर रख दिया गया है। मूल्य 1 रु.
साधनाओं द्वारा मन चाहा स्वास्थ्य और इच्छित सुन्दरता प्राप्त की जा सकती है। इस पुस्तक में इन आध्यात्मिक तथ्यों को समझाया गया है, जिनसे स्वास्थ्य और सौंदर्य को हर मनुष्य प्राप्त कर सकता है। मूल्य 1 रु.
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-March
साधना के लिये दुःख में सहिष्णुता और संयम को नहीं खोया, उन्होंने अपने देश का मस्तक उठाने के साथ साथ समग्र पृथ्वी तक को गौरवान्वित किया है। दुःख की तपस्या किसी अवस्था विशेष के लिये ही प्रयोजनीय नहीं है अपितु आयु के हर भाग में दुःख हमें चुनौती देता हुआ आता है। उसे इसकी चिन्ता नहीं होती कि हमारी शक्तियाँ बराबर काम कर रही हैं या उनमें कोई घाटा भी आ गया है? प्रसिद्ध कवि इमर्सन का कथन है कि—”उच्च अवस्था में आचरण व स्वभाव की शुद्धि तथा उन्नति के लिये दुःख का होना आवश्यक है।” जगत् के बड़े-बड़े प्रसिद्ध पुरुष ऐसे हुए हैं, जिन्होंने पहिले अत्यन्त दुःख व कष्ट सहे और फिर जग द्विख्यात गुरु , महात्मा और सुप्रसिद्ध महापुरुष हुए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-June
साधनामय जीवन की,
साधना विधि बताई है। वे कहते हैं कि आराम करने के लिये एक मुलायम बिस्तर पर चले जायो और शरीर ढीला करके चित्त लेट जाओ। कुछ देर अपने को तन्द्रा की दशा में चले जाने की भावना करो और तदुपरान्त शरीर से मन को अलग करने का अभ्यास करो। ऐसा अनुभव करो कि तुम अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके अलग हटा रहे हो। पहले यह कल्पना करो कि तुम्हारा एक हाथ दूसरे कमरे में चला गया है, फिर दूसरा भी।
साधना के मार्ग में अग्रसर होंगे।
साधना से उठते शरीर में एक नवीन स्फूर्ति और उत्साह भर गया है। जब तुम्हें आराम करना हो तो इस क्रिया को अपनाओ तुम देखोगे कि इस विधि से थोड़ी देर में बहुत आराम मिल जाता है और दिमाग दूने उत्साह के साथ करने में समर्थ हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1943-August
साधना में सिद्ध होकर सैंकड़ों और हजारों प्राणियों के बीच, ज्ञान व शक्ति की ज्योति फैलाकर उनमें से अविद्या को दूर करेगा और उनका उद्धार करेगा। एक साधक की शक्ति के प्रकाश से सहस्रों जन धर्म में दीक्षित होंगे और सच्चिदानन्द के अगाध सागर में निमग्न होंगे।
साधना का उद्देश्य है।
साधना और आत्मोपलब्धि। इसलिये हमें पुनः उसी मार्ग का अनुसरण करना होगा, उसी पथ पर लौटना होगा, जहाँ से हमें ईसा की पवित्रता व पूर्णता, मुहम्मद का आत्मविश्वास और आत्मसमर्पण श्री चैतन्य देव का प्रेम व आनन्द, परमहंस राम कृष्ण का संसार के सभी धर्मों का समन्वय तथा एकीकरण व सूक्ष्म मानवता की प्राप्ति होगी।
साधना में विक्षेप पढ़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-October
साधना के लिए ही है। जो हिंसा है वह हिंसा ही है। आप कहेंगे कि वध करने से उस पशु को कोई दुःख नहीं होता। अगर ऐसा है तो वह क्यों रोता चिल्लाता है, क्यों तड़फड़ाता है और इससे बचने की कोशिश करता है? जैसे प्राण हमारे हैं वैसे उसके भी है अगर हमको जरा-सा काँटा लगने पर दुःख होता है तो क्या उसे छुरी से काटने पर भी दुःख नहीं होता?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-July
साधना सर्वोत्तम मार्ग। जो व्यक्ति निगूढ़ भाव से ज्ञान तत्व को जानने में समर्थ होता है, उसकी समस्त कामनाएँ परिपूर्ण हो जाती हैं।
साधना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-November
साधना में लगे हुए हैं उन्हें दूसरों से भिक्षा माँगने या दूसरों पर अपना किसी प्रकार का कोई भार डालने का अधिकार नहीं है। प्राचीन काल में ऋषि गण इस प्रत्यक्ष सत्य को भली भाँति जानते थे और वे अपने जीवन को लोकोपयोगी कार्यों में लगाये रहते थे। जब अपना सारा जीवन जनता जनार्दन के चरणों में अर्पण कर दिया तो प्रसाद स्वरूप दान या भिक्षा के रूप में निर्वाह साधन लेने का भी उन्हें अधिकार था। आज तो वैरागी कहे जाने वाले लोग लोक सेवा से कोसों दूर भागते हैं और दूध मलाई उड़ाने के लिए तैयार रहते हैं।
साधना द्वारा कितनी आत्मोन्नति कर ली है, प्रत्युत साम्प्रदायिकता की दूरबीन चढ़ा कर वे अपने अपने मजहबी ट्रेड मार्क ही सर्वोपरि कहने में बद्धपरिकर रहते हैं। कभी-कभी उसका वीभत्स रूप देख कर सहसा हृदय से यह उद्गार निकल पड़ता है कि यदि यही धर्म है तो अधर्म की परिभाषा क्या होगी।
साधना में दिन-रात रहता है रत,
साधना का यही सार मालूम होगा। यही भगवत्प्राप्ति का मार्ग है। भगवत्प्राप्ति ही तुम्हारा मुख्य-कर्त्तव्य है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-September
साधना के समय साधक को पूर्ण साहस और धैर्य रखना चाहिये, सिद्धि लाभ करने में कितना ही समय क्यों न लगे साधक को आकुल नहीं होना चाहिए। साधक को असाधारण धैर्य करना चाहिए और यदि इस बीच में कोई अनर्थकारी घटना उपस्थित हो जाय तो भी साधक को घबरा कर साहस नहीं छोड़ देना चाहिये। सच्चिदानन्द परमेश्वर सर्व शक्तिमान हैं, चाहे वे कितने ही भीषण गड्ढे में हमें क्यों न फेंक दें, किसी न किसी दिन वहाँ से उवार कर वे हमें अपनी गोद में अवश्य ले लेंगे, यह ध्रुव जानिये।
साधना में धैर्य की आवश्यकता
साधना अत्यन्त कठिन काम है, पर जो लोग आरंभ में ही इसमें दृढ़ विश्वास करके इस पर निर्भर हो जाते हैं उनके लिए इससे सरल कोई और मार्ग नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-March
साधना के लिए शरीर की बाह्य तथा आन्तरिक शुद्धि के साथ-साथ निरन्तर आत्मनिरीक्षण और सद्विचार की नितान्त आवश्यकता है।
साधना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-May
साधना के लिए निर्दोष व्यक्तियों को दुख देना हिंसा है। किन्तु निस्वार्थ भाव से लोक कल्याण के लिए तथा उसी प्राणी के उपकार के लिए यदि उसे कष्ट दिया जाय तो वह हिंसा नहीं वरन् अहिंसा हो होगी। डॉक्टर निस्वार्थ भाव से रोगी की वास्तविक सेवा के लिए फोड़े को चीरता है एक न्याय मूर्ति जज समाज की व्यवस्था कायम रखने के लिए डाकू को फाँसी की सजा का हुक्म देता है, एक धर्म प्रचारक अपने जिज्ञासु साधक को आत्म कल्याण के लिए तपस्या के कष्टकर मार्ग में प्रवृत्त करता है। मोटी दृष्टि में देखा जाय तो यह सब हिंसा जैसा प्रतीत होता है पर असल में यह सच्ची अहिंसा है। गुण्डे बदमाशों को क्षमा कर देने वाला, हरामखोरों को दान देने वाला, दुष्टता को सहन करने वाला देखने में अहिंसक सा प्रतीत होता है पर असल में वह घोर पातकी, हिंसक हत्यारा है क्योंकि बुज़दिली और हीनता को अहिंसा की टट्टी में छिपाता हुआ, अप्रत्यक्ष रुप से पाजीपन की मदद करता है, एक प्रकार से अनजाने में दुष्टता की जहरीली बेल को सींचकर दुनिया के लिए प्राण घातक फल उत्पन्न करने में सहायक बनता है, ऐसी अहिंसा को जड़ बुद्धि अज्ञानी ही अहिंसा कह सकते हैं।
साधना से उस योगी के निकट- मन में-बैर भाव निकल जाता है। बैर भाव, द्वेष, प्रतिशोध की दृष्टि से किसी के चित्त को दुखाना, या शरीर को कष्ट देना सर्वथा अनुचित है, इस हिंसा से सावधानी के साथ बचना चाहिए। अहिंसक का अर्थ है प्रेम का पुजारी, दुर्भावना से रहित। सद्भावना और विवेक बुद्धि से यदि किसी को कष्ट देना आवश्यक जान पड़े तो अहिंसा की मर्यादा के अंतर्गत उसकी गुंजाइश है। अहिंसक को बैर भाव छोड़ना होता है, क्रोध पर काबू करना होता है, निजी हानि लाभ की अपेक्षा कुछ ऊँचा उठना पड़ता है, उदार निष्पक्ष, और न्याय मूर्ति बनना पड़ता है, तब उस दृष्टिकोण से जो भी निर्णय किया जाय वह अहिंसा ही होगी।
साधना है। शरीर की नश्वरता को समझते हुए उसके न रहने का अवसर आने पर विचलित न होना अहिंसा है। अहिंसक की दृष्टि दूसरों को सुख देने की होती है, अधर्म और अज्ञान को हटाने से ही दुख की निवृत्ति और सुख की प्राप्ति हो सकती है। अहिंसा का पुजारी अपने और दूसरे के अधर्म और अज्ञान को हटाने का अविचल भाव से प्रबलतम प्रयत्न करता है जिससे सच्चा और स्थायी सुख प्राप्त हो, इस महान कार्य के लिए यदि अपने को या दूसरे को कुछ कष्ट सहना पड़े तो उसे उचित समझकर अहिंसक उसके लिए सदा तैयार ही रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-December
साधनाएं पाठकों के सामने उपस्थित की जायगी, जिनका अभ्यास करके अपरिमित लाभ उठाया जा सकता है। कार्यव्यस्त लोग भी उन साधनों पर ऊंची आध्यात्म भूमिकाओं में पहुँच सकते हैं और लोक तथा परलोक के महत्तम लाभों को प्राप्त कर सकते हैं।
साधना है और सच्चे कर्म-योग का यही एक मात्र अपना सन्देश है।
साधनाओं का उद्देश्य, (5) शक्ति से सिद्धि, (6) सम्पन्नता के चार आधार (7) आत्मबल की अकूत शक्ति, (8) योग शक्तियों का उद्गम, (9) प्रत्यक्ष अष्ट सिद्धियाँ, (10) निरर्थक मृगतृष्णा।
साधना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-January
साधना करने वालों को सर्वप्रथम उक्त दो शत्रुओं के अतिरिक्त विलास, प्रमाद, निंदा, विषयभोग तथा व्यर्थ वार्त्तादि में अपने अमूल्य समय का नाश नहीं करना चाहिए। संसार के सम्पूर्ण पदार्थों में और कर्मों में ममता और आसक्ति का सर्वथा त्याग करने का अभ्यास करना चाहिए। चोरी, व्यभिचार, झूठ, कपट इत्यादि निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग, काम्य कर्मों का त्याग, तृष्णा का सर्वथा निराकरण करना चाहिए। मन की विजय अपने ही प्रयत्न से प्राप्त होती है। अतः अपने पदार्थों में दृढ़ इच्छा से प्रेरित होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-April
साधनाओं में से एक है। इसकी विशेषता यह है कि साधारण रीति से साँसारिक कार्य करते हुए भी साधना क्रम चलता रहता है। इसी बात को यों भी कहना चाहिए कि दैनिक जीवन के समान साँसारिक काम ही साधना भय बन जाते हैं। सहज योगी अपने दिन भर के कार्यों को कर्त्तव्य, यज्ञ, धर्म, ईश्वरीय आज्ञा पालन की दृष्टि से करता है। भोजन करने में उसकी भावना रहती है कि प्रभु की एक पवित्र धरोहर शरीर को यथावत रखने के लिए भोजन किया जा रहा है।
साधना रूप, बन जाते हैं। जैसे खाँड़ से बना हुआ खिलौना आकृति में कैसे ही क्यों न हो, होंगे मीठे ही। इसी प्रकार सद्भावना और उद्देश्य परायणता के साथ किये हुए काम बाह्य आकृति में कैसे ही क्यों न दिखाई देते हों, होंगे वे यज्ञ रूप ही, पुण्यमय ही, सत्य परायण व्यक्तियों के सम्पूर्ण कार्य-छोटे से छोटे कार्य-यहाँ तक कि चलना, सोना, खाना देखना तक ईश्वर आराधना बन जाते हैं।
साधना है। काम, क्रोध लोभ, मोह के तूफान के कारण मनः क्षेत्र में भारी उथल-पुथल मची रहती है। इस अशान्त वातावरण में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित नहीं हो पाती। हर घड़ी एक लालसा, चिन्ता, आशंका एवं उद्विग्नता और मानसिक शक्तियों का क्षरण होता रहता है। ऐसे व्यक्तियों का आत्म विकास पूरी तरह नहीं हो पाता।
साधना भय बन जाते हैं। सहज योगी अपने दिन भर के कार्यों को कर्त्तव्य, यज्ञ, धर्म, ईश्वरीय आज्ञा पालन की दृष्टि से करता है। भोजन करने में उसकी भावना रहती है कि प्रभु की एक पवित्र धरोहर शरीर को यथावत रखने के लिए भोजन किया जा रहा है। खाद्य पदार्थों का चुनाव करते समय शरीर की स्वस्थता उसका ध्येय रहता है, स्वादों के चटोरेपन के बारे में वह सोचता तक नहीं। कुटुम्ब का पालन पोषण करते समय वह परमात्मा की एक सुरम्य वाटिका का माली की भाँति सिंचन, संवर्धन का ध्यान रखता है, कुटुम्बियों को अपनी सम्पत्ति नहीं मानता।
साधना शक्ति के भीतर है, इसीलिए उसे ‘सहज-समाधि’ का नाम दिया गया है। हठ योग, राज योग, लय योग, नाद योग, बिन्दु योग, आदि की साधना से कठिन है, उनका अभ्यास करते हुए समाधि की स्थिति तक पहुँचना असाधारण कष्ट साध्य है। चिरकालीन तपश्चर्या, षट्कर्मों के श्रम साध्य साधन सब किसी के लिए सुलभ नहीं हैं। अनुभवी गुरु के सम्मुख रहकर विशेष सावधानी के साथ वे क्रियाएं साधनी पड़ती हैं फिर यदि उनका साधन खंडित हो जाय तो वे संकट भी सामने आ सकते हैं जो योग भ्रष्ट लोगों के सामने कभी-कभी भयंकर रूप से आ खड़े होते हैं।
साधना से कठिन है, उनका अभ्यास करते हुए समाधि की स्थिति तक पहुँचना असाधारण कष्ट साध्य है। चिरकालीन तपश्चर्या, षट्कर्मों के श्रम साध्य साधन सब किसी के लिए सुलभ नहीं हैं। अनुभवी गुरु के सम्मुख रहकर विशेष सावधानी के साथ वे क्रियाएं साधनी पड़ती हैं फिर यदि उनका साधन खंडित हो जाय तो वे संकट भी सामने आ सकते हैं जो योग भ्रष्ट लोगों के सामने कभी-कभी भयंकर रूप से आ खड़े होते हैं।
साधना में व्यतीत करो। इस सिद्धि के बिना जीवन वास्तव में मृत्यु है। अपने विचारों को शोधों (उनका सार निकालो)। अपने प्रयोजनों को परखो (या उनकी परीक्षा करो) स्वार्थभाव का त्याग करो। इन्द्रिय विकारों को शाँत करो।
साधनाओं के अंतर्गत एक ही है।
साधना क्रम चलता रहता है। इसी बात को यों भी कहना चाहिए कि दैनिक जीवन के समान साँसारिक काम ही साधना भय बन जाते हैं। सहज योगी अपने दिन भर के कार्यों को कर्त्तव्य, यज्ञ, धर्म, ईश्वरीय आज्ञा पालन की दृष्टि से करता है। भोजन करने में उसकी भावना रहती है कि प्रभु की एक पवित्र धरोहर शरीर को यथावत रखने के लिए भोजन किया जा रहा है। खाद्य पदार्थों का चुनाव करते समय शरीर की स्वस्थता उसका ध्येय रहता है, स्वादों के चटोरेपन के बारे में वह सोचता तक नहीं।
साधना नहीं करता। मैं तो आँखें खोले रहता हूँ और हँस-हँस कर परमात्मा की पुनीत कृति का सुन्दर रूप देखता हूँ। जो कहता हूँ सो नाम जप है। जो सुनता हूँ सो सुमिरन है, जो खाता-पीता हूँ सो पूजा है। घर और जंगल एक सा देखता हूँ, और द्वैत का भाव मिटाता हूँ।
साधनाएं ऐसी हैं जिनसे पेट का बड़ा हित होता है। उन दोनों की विधि नीचे बताई जाती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1946-June
साधना है। अन्य ईश्वर भक्त भी अन्तःकरण में परमात्मा की झाँकी करते हैं, असंख्यों कविताएं एवं श्रुतिवचन ऐसे उपलब्ध होते हैं जिनमें यह प्रतिपादन किया गया है कि “बाहर ढूँढ़ने से नहीं अन्दर ढूँढ़ने से परमात्मा मिलता है” संत कबीर ने कहा है कि परमात्मा हम से चौबीस अँगुल दूर है। मन का स्थान मस्तिष्क और आत्मा का स्थान हृदय है। मस्तिष्क से हृदय की दूरी 24 अँगुल है। इस प्रतिपादन में भी ईश्वर को अन्तःकरण में स्थित बताया है।
साधना सर्वथा सराहनीय है।
साधना के बाद हमारा लड़का बहुत ही सुयोग्य बनकर निकलेगा। उसकी शिखा अपने शुभ परिणामों से आनन्दमय, वातावरण की सृष्टि करेगी।
साधना करते हैं, इस साधना का कार्यक्रम यह होता है कि आत्मा की प्रेरणा के अनुसार मन की सारी इच्छा और कार्य प्रणाली हो। भौतिक पदार्थों के नाशवान अस्थिर और हानिकर आकर्षणों की ओर से मुँह मोड़कर जब आत्मा की प्रेरणा के अनुसार जीवन चक्र चलने लगता है तो मनुष्य साधारण मनुष्य न रहकर महान मनुष्य बन जाता है। ऐसे महापुरुषों के विचार और कार्य सात्विकता, चैतन्यता और आनन्ददायक स्थिति से परिपूर्ण होते हैं। उन्हें, संत, महात्मा, योगी, तपस्वी, परमहंस, सिद्ध आत्मदर्शी या ब्रह्म परायण करते हैं। जिनका ब्रह्म भाव, आत्म विकास पूर्ण सात्विकता तक विकसित हो गया है समझना चाहिए कि उनने ब्रह्म को प्राप्त कर लिया उन्हें आत्म दर्शन हो गया।
साधना एवं लोक सेवा के लिए भी प्रतिदिन कुछ समय नियत रखना आवश्यक है। “परमार्थिक कार्यों के लिये समय नहीं मिलता।” यह कथन बहाने बाजी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मनुष्य की इच्छा जिस ओर होती है, उस दिशा में कार्य करने के लिये समय निकल ही आता है। यदि दिन भर में 20 काम करने में हों और उनमें से यदि पाँच-पाँच मिनट बचा लिये-उन कामों को थोड़ा जल्दी कर लिया जाय तो काफी समय बच सकता है और उसका उपयोग परमार्थ के कार्यों में किया जा सकता है।
साधना की भावना से सात्व की श्रद्धा का जन्म होता है। जित्तस्य विषय को अपने अध्यवसाय की क्षमता के अनुभव का विषय बना सकना ही श्रद्धा का लक्षण है। भारतीय विचारकों ने अपने वांग्मय के उषाकाल से ही इस महत्वपूर्ण तत्व को समझकर उसका प्रचार किया है। ज्ञानसिद्धि, ऋषि महर्षियों का जो साक्षात्कार था, उसको उन्होंने ‘श्रुति” कहा है। श्रुति का जन्म प्रज्ञा से होता है।
साधना का कार्यक्रम यह होता है कि आत्मा की प्रेरणा के अनुसार मन की सारी इच्छा और कार्य प्रणाली हो। भौतिक पदार्थों के नाशवान अस्थिर और हानिकर आकर्षणों की ओर से मुँह मोड़कर जब आत्मा की प्रेरणा के अनुसार जीवन चक्र चलने लगता है तो मनुष्य साधारण मनुष्य न रहकर महान मनुष्य बन जाता है। ऐसे महापुरुषों के विचार और कार्य सात्विकता, चैतन्यता और आनन्ददायक स्थिति से परिपूर्ण होते हैं। उन्हें, संत, महात्मा, योगी, तपस्वी, परमहंस, सिद्ध आत्मदर्शी या ब्रह्म परायण करते हैं। जिनका ब्रह्म भाव, आत्म विकास पूर्ण सात्विकता तक विकसित हो गया है समझना चाहिए कि उनने ब्रह्म को प्राप्त कर लिया उन्हें आत्म दर्शन हो गया।
साधना तथा भगवान की प्रसन्नता के लिये किए जाने वाले स्वधर्माचरण से बुद्धि शुद्ध होती है और बुद्धि के शुद्ध होने पर बुरे कर्मों से मन स्वतः ही हट जाता है। भगवान पर विश्वास न रहने से और धर्म पर श्रद्धा न होने से ही, और पापों से परिणाम रूप दुःख-दुर्गति, दुर्भाग्य की अनिवार्यता पर विश्वास न रहने के कारण ही आज लोग केवल इहलौकिक व्यक्तिगत सुख और इन्द्रिय चरितार्थता के लिए कामोपभोग परायण होकर मनुष्य असुर बन गए हैं। जब तक पापों के लिये मन में घोर पश्चाताप उत्पन्न नहीं होता तब तक वर्तमान संकट से बचा भी नहीं जाता।
साधनायें हैं बाम।
साधना की ओर संकेत करती हैं। जीवन में दर्शन का फल है, मनः सभ्यता का उदय। साधना की भावना से सात्व की श्रद्धा का जन्म होता है। जित्तस्य विषय को अपने अध्यवसाय की क्षमता के अनुभव का विषय बना सकना ही श्रद्धा का लक्षण है। भारतीय विचारकों ने अपने वांग्मय के उषाकाल से ही इस महत्वपूर्ण तत्व को समझकर उसका प्रचार किया है।
साधना करने से उन्हें कितना लाभ होता है। निस्सन्देह वायु का स्वास्थ्य से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है और वायु के प्रयोग द्वारा मनुष्य अपनी बिगड़ी हुई तन्दुरुस्ती को ठीक कर सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-December
साधना को समर्थ बनाने में काम आ सकते हैं। आवश्यक नहीं कि वे वैसे ही हों जैसा कि उन्हें होना चाहिए। इस अभाव की पूर्ति अपनी सघन श्रद्धा को आरोपित करके भी की जा सकती है। एकलव्य ने मिट्टी के द्रोणाचार्य और मीरा ने पत्थर के कृष्ण बनाये और सर्व समर्थ बने थे। स्वतः समर्थ सहायक मिल कसे तो प्राथमिकता उन्हें ही देनी चाहिए यदि न मिलें तो अपनी श्रद्धा का आरोपण करके भी उन्हें प्रभावोत्पादक बनाया जा सकता है, विश्वास के आधार पर झाड़ी से भूत बन सकता है तो कोई कारण नहीं कि सामान्य साधन उपकरणों एवं व्यक्तियों को भी इस योग्य बनाया जा सकता है कि वे अपने वास्तविक मूल्य की तुलना में विशिष्ट साधक के लिए विशिष्ट चमत्कार प्रस्तुत कर सके।
साधना करनी पड़ी और उन्होंने वह सब कुछ पा लिया, जिसे मानव के लक्ष्य की चिरन्तन व्यास एवं समय की तत्कालीन आवश्यकता कह सकते हैं।
साधना को अपेक्षाकृत अधिक सरलता से सफल बनाया जा सके।
साधना को विधिवत् किया जा सके तो उसके प्रतिफल वैसे ही हो सकते हैं जैसे कि सप्त ऋषियों को प्राप्त हुए थे। गायत्री के ऋषि विश्वामित्र ने नई दुनिया बसाने- नया जमाना लाने की हरिश्चन्द्र के सहयोग से एक विश्व योजना बनाई थी। यह बल एवं साधन उन्हें आद्य शक्ति की आराधना से ही प्राप्त हुआ था। विश्वामित्र ने अपनी तप सम्पदा राम लक्ष्मण को बला अतिबला विद्या के नाम से प्रदान की थी। यह गायत्री और सावित्री के ही दो उपनाम हैं।
साधना उपचार इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। अलग-अलग मनःस्थिति के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग ध्यान उपचार बताए जाते हैं। इस प्रक्रिया को अपनाकर कोई भी अपने मन को इतना समर्थ और सशक्त बना सकता है ताकि उससे सामान्य से लेकर असामान्य प्रयोजन पूरा कर सके।
साधना के लिए ऐसे ही स्थान चुने जा सके तो सामान्य स्थानों की तुलना में अधिक सफलता मिलने की सम्भावना रहती है।
साधना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यों अनगढ़ लोग भी अपनी कुसंस्कारिता बनाये रहकर, अनैतिक तारकों से कुछ न कुछ कमा ही लेते हैं किन्तु स्मरणीय यह है कि वे बड़े आदमी कहलाने पर भी आत्म-संतोष, लोक-सम्मान एवं दैवी अनुग्रह की तीनों ही विभूतियों से वंचित रहते हैं। अनीति उपार्जन एवं उद्धत उपभोग उनके लिए आत्म-प्रताड़ना से लेकर आधि-व्याधि लेकर भर्त्सना और ईश्वरीय दण्डों से आयेदिन पीड़ित ही होते रहते हैं। इस प्रकार दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने वाला होते हुए भी वह वैभव अन्ततः बहुत महंगा पड़ता है और सिकन्दर, रावण, हिरण्यकश्यप आदि की तरह उस पर पश्चाताप ही करना पड़ता है।
साधना के पीछे यही सिद्धान्त काम करता है। उच्चस्तरीय दैवी शक्तियों का किसी व्यक्ति विशेष की ओर अकर्षित करना- अनुग्रह बरसाना, सहयोग देना, अनुकूल होना केवल एक बात पर निर्भर है कि उनके स्तर की अनुकूलता उत्पन्न हुई या नहीं।
साधना की जाती है। सहस्रार से सम्बन्धित खेचरी मुद्रा का यही स्वरूप है। शाम्भवी मुद्रा मूलाधार को प्रभावित करती है। हृदयचक्र में ज्योति मुद्रा का- अमृत कलश का ध्यान किया जाता है। यह सभी प्रयोग गायत्री उपासना के अंतर्गत आते हैं और साधक को सतोगुण प्रधान, रजोगुण प्रधान, तमोगुण प्रधान प्रकृति का पता चलने के उपरान्त निर्धारित किये जाते हैं।
साधना के अतिरिक्त दूसरी परिलक्षित नहीं होती।
साधना में मन को भी काम देना होता है। उसे एकाग्र होने के लिए साधना पड़ता है। यह कार्य ध्यान धारणा को जप के साथ लेकर चलने से ही सम्पन्न होता है। इससे एकाग्रता का सहज अभ्यास होता है और मन भागने की जो आम शिकायत रहती है उसका समाधान होने लगता है। एकाग्रता की शक्ति का अध्यात्म शास्त्र में अत्यधिक महत्व बताया गया है।
साधना से सिद्धि की पृष्ठभूमि।
साधना मार्ग पर अग्रसर होना होता है। यह मंजिल अपने ही पैरों चलकर पूरी करनी पड़ती है। मार्ग में सहायक सहयोगी भी मिलते हैं और लक्ष्य तक पहुँचने पर अभीष्ट उपहार उपलब्ध होते हैं किन्तु ऐसा नहीं होता कि अपने पैरों को कष्ट देने से बचा लिया जाय और किसी दूसरे के कन्धे पर बैठकर यह यात्रा पूरी करली जाय। दैवी शक्तियों के वरदान अनुदान प्राप्त होने की परम्परा तो है, पर वह लाभ विजेताओं को मिलता है। छात्रवृत्ति या उपाधि उत्तीर्ण छात्रों को मिलती है।
साधना पड़ता है। यह कार्य ध्यान धारणा को जप के साथ लेकर चलने से ही सम्पन्न होता है। इससे एकाग्रता का सहज अभ्यास होता है और मन भागने की जो आम शिकायत रहती है उसका समाधान होने लगता है। एकाग्रता की शक्ति का अध्यात्म शास्त्र में अत्यधिक महत्व बताया गया है। यह उपलब्धि ध्यान धारणा की है।
साधना अथवा कई योग प्रयोजनों का सम्मिश्रण करके ऐसा निर्धारण करते हैं जो अभावों की पूर्ति एवं उलझनों से निवृत्ति करा सकने में समर्थ हो सके। मेरुदण्ड में प्रवाहित त्रिविध शक्ति धाराओं- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना में से किसे किस शरीर को प्रधानता देनी है, किसे किस क्षेत्र में प्रवेश करना है, वे इन्हीं तीनों के साथ अपना तादात्म्य बिठाते हैं। इन्हीं तीनों को तीन लोकों में प्रवेश पाने के तन राजमार्ग कहते हैं। भूलोक इड़ा से, भुवः लोक पिंगला से और स्व लोक सुषुम्ना से सम्बन्धित माना गया है। इन तीनों का समग्र स्वरूप त्रिपदा गायत्री के रूप में बनता है।
साधनाएँ विभूतियों को करतलगत कराती है।
साधना एवं प्रायश्चित्त प्रक्रिया के लिए इसी क्षेत्र में डेरा डालते हैं। गंगाजल, गंगा तट साधना की अवधि में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है। प्रसिद्ध है कि जब गंगा लेकर भागीरथ आगे-आगे चल रहे थे तो मांग में हरिद्वार के निकट सप्त ऋषि अपनी सात कुँजों में तप करते पाये गये। गंगा ने उन्हें हटाया नहीं वरन् स्वयं ही सात भागों में विभक्त होकर उनके साधना स्थलों को यथावत् रहने दिया। यह स्थान अभी सप्ती सरोवर के नाम से प्रख्यात है।
साधना करते हुए- अपना-अपना कर्त्तव्य पालन करते एवं श्रेय सम्पादित करने में सफल होते हैं। उच्चस्तरीय व्यक्तित्व वाले गुरु के माध्यम से श्रद्धा को अधिक पैनी बना लेने वाले साधक उस चुम्बकत्व को परब्रह्म के निमित्त नियोजित करते हैं तो उसमें भी वैसी ही उपलब्धियाँ अर्जित कर सकते हैं जैसी कि शरीरधारी गुरु की अनुकम्पा प्राप्त की जा सकी।
साधना कहते हैं। उसके दो प्रयोजन हैं एक अन्तराल की प्रसुप्त विभूतियों का जागरण दूसरी अनन्त ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ब्राह्मी चेतना का अनुग्रह-अवतरण। यह दोनों प्रयोजन देखने में भिन्न प्रतीत होते हैं किन्तु वस्तुतः हैं अविच्छिन्न एक दूसरे के पूरक।
साधना’ कहते हैं जो पदार्थ के सदुपयोग से आरम्भ होते हुये- चेतना के परिष्कार एवं व्यष्टि तथा समष्टि चेतन शक्ति में परस्पर आदान-प्रदान के क्रम के बनने तक सतत् क्रियाशील रहती है। यही है वह मूलभूत तत्व-दर्शन जिसकी जानकारी के अभाव में आत्म विस्मृति बनी रहती है एवं सामान्य अथवा निम्न स्तर का जीवन जीते हुए अधिकांश व्यक्तियों द्वारा जैसे-जैसे जीवन यात्रा, पूरी कर ली जाती है।
साधना करनी और करानी पड़ रही है। वही सब कुछ मनुष्य को अपने आपे की साधना में भी करना पड़ता है। चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते हुए- विकास क्रम को एक के बाद दूसरी सीढ़ी पार करते हुए- मनुष्य आगे उठता ऊँचा चढ़ता तो आया है किन्तु अभी उस स्तर तक नहीं पहुँचा है कि सभ्य संसार का सुसंस्कृत नागरिक कहला सके। ऐसी दशा में उसे बौना, कुबड़ा, पिछड़ा, उथला बनकर रहना पड़ रहा है। मानवी गरिमा के उपयुक्त उसका व्यक्तित्व ढले इसके लिए वैसा ही प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ेगी जैसी कि कुशल माली, मदारी अपने-अपने यजमानों से निपटते हैं और उन्हें बलपूर्वक इच्छित स्थिति में बदलने के लिए साधते हैं।
साधना है। आरोग्य क्षीण होने पर आयुर्विज्ञान के निष्णात उन्हें दूध-कल्प, छाछ-कल्प, आम्र-कल्प आदि आहार विशेष पर रखकर शरीर शोधन कृत्य करते हैं। इसी प्रकार खाद्य पदार्थों के अन्तराल में रहने वाली चेतना शक्ति को ध्यान में रखते हुए साधकों को आहार में कुछ विशिष्ट वस्तुओं का समावेश करके उन्हें पकाने का विशेष उपक्रम बनाकर ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं जिसमें वह आहार ही एक प्रकार के आध्यात्मिक काय-कल्प का आधार बन सके। यज्ञीय धान्यों में तिल, जौ, चावल की प्रमुखता है। इन्हें हविष्यान्न भी कहते हैं।
साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त का रहस्य उतना ही है कि साधक अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को इस प्रकार की बनाता है जिससे उसका व्यक्तित्व शक्तिशाली चुम्बक की तरह अभीष्ट सफलता को अपनी ओर खींच घसीट लाने में समर्थ हो सके। इस संसार में हर पदार्थ या हर जीव अपने लिए जहाँ भी अनुकूलता, सुविधा देखता है उसी ओर खिंचता दौड़ता चला जाता है। फूलों के उद्यान में ये तितलियाँ, भौंरे, मधुमक्खियाँ न जाने कहाँ से पता लगाते, रास्ता नापते, बिना बुलाये दौड़ते चले आते हैं। मरी लाश को पड़ी देखकर आसमान से चील, कौए उतरते ओर जमघट लगाते देखे गये हैं। कुत्ते और सियार भी न जाने कहाँ से आकर उसी लाश पर चढ़ दौड़ते हैं।
साधना की यदि आत्मिकी क्षेत्र को कायाकल्प चिकित्सा माना जाय तो उसके लिए अस्पताल में-सेनेटोरियमों में भर्ती होने जैसा सुयोग्य वहाँ मिल सकता है जहाँ के वातावरण में आध्यात्मिकता का सहज समावेश विद्यमान है। जिनके पास समय या सुविधा नहीं है वे घर में थोड़ा हटकर उपयुक्त वातावरण ढूंढ़े कम से कम इतना तो करें ही एकान्त कक्ष न होने की दशा में खुली छत पर जा बैठने या पास-पड़ोस में ही कोई पार्क, उद्यान, मन्दिर, जलाशय तट जैसा स्थान खोजने का प्रयत्न करें। न मिल सके तो ‘न कुछ से कुछ अच्छा’ की नीति अपनाकर घर में भी यथा सम्भव अधिक स्वच्छता एवं निस्तब्धता बनाये रखने की चेष्टा करें। यह बात भुलाये जाने योग्य नहीं है कि साधना के लिए उपयुक्त वातावरण का सुनिश्चित महत्व रहता है।
साधना पड़ता है। मानसिक परिष्कार के लिए ‘योग’ और शारीरिक प्रखरता उभारने के लिए ‘तप’ का आश्रय लेना पड़ता है। योग और तप की परिधि में अनेकों प्रकार के अभ्यासों और अनुशासनों का विधि-विधान है। इसमें से कौन किसे अपनाये यह व्यक्ति विशेष की स्थिति का अतिरिक्त विश्लेषण करके ही यह तालमेल बैठता है कि किस मनःस्थिति में किस साधना को परिस्थिति को हृदयंगम करना और व्यवहार में उतारना बन पड़ेगा। सबके लिए एक जैसे निर्धारण नहीं हो सकते।
साधना के दिनों इसलिए आते हैं कि यदि इस मार्ग में सफलता मिलने लगी तो फिर दण्ड भुगतने का अवसर कैसे मिलेगा? साधना से जो नये सुसंस्कारों की हरियाली उगाई जाती है, उन्हें कुसंस्कारों के वन्य पशु झुण्ड बना कर आते और देखते-देखते चर जाते हैं। सभी जानते हैं मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता, पथरीली जमीन में उद्यान नहीं लगता। दुष्कर्मों के घटा टोप विकृत हुई मनोभूमि ऐसी हठीली होती है कि उस साधना के माध्यम से सुसंस्कारों का रंग चढ़ाना या उपवन लगाना बन ही नहीं पड़ता। सारे प्रयास निष्फल जाते रहते हैं।
साधना विधान का अविच्छिन्न अंग मानते हैं। इसे भूमि शोधन कहा जाता है। कायाकल्प चिकित्सा में सर्वप्रथम नाड़ी शोधन कराया जाता है। आत्मिक प्रगति के मार्ग पर चलने वालों को सर्वप्रथम यही करना होता है। ईश्वरीय दण्ड या समाज दण्ड पाने से पूर्व अपने दुष्कृत्यों का स्वयं ही दण्ड भुगत लेना- अपनी कुसंस्कारी मनोभूमि को अपने ही हाथों खुदाई, गुड़ाई करके उर्वर बनाने का कार्य प्रायश्चित कहा जाता है।
साधना के लिए उपयुक्त वातावरण का सुनिश्चित महत्व रहता है।
साधना का महत्वपूर्ण पक्ष है- तपश्चर्या। तप का अर्थ है तपाना। भूमि से निकले मिट्टी मिले लोहे को भट्टी में पकाकर शुद्ध किया जाता है। तब उसकी स्थिति औजार, उपकरण बनाने जैसी बनती है। अन्य धातुओं का शोधन भी अग्नि संस्कार से ही होता है।
साधना का लाभ उठाया जा सकता है। अस्वाद व्रत, शाकाहार, फलाहार, एक समय का भोजन, दो वस्तुओं पर निर्भर रहना जैसे कितने ही उपवास तप के छोटे-बड़े प्रयोजन हैं, उनमें से साधक की स्थिति के अनुरूप निर्धारण किये जाते हैं। किस ईंधन से पकाया जाय, पकाने और परोसने वाले के संस्कार कैसे होंगे यह सब बातें भी साधक की आत्म-सत्ता को प्रभावित करती हैं।
साधनाएँ प्रायः इसी क्षेत्र में सम्पन्न होती रही हैं। भगवान राम और उनके तीनों भाई, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त होते ही आत्म-साधना के लिए अयोध्या छोड़कर हिमालय पहुंचे थे। वशिष्ठ गुफा के थोड़े-थोड़े फासले पर चारों ने अपनी-अपनी एकान्त कुटियाएँ बनाई थीं। राम देव प्रयाग में, लक्ष्मण लक्ष्मण झूला में, भरत ऋषिकेश में और शत्रुघ्न मुनि की रेती में जा बसे थे। अयोध्या में उन्हें स्थान की कमी नहीं थी, पर स्थान एवं व्यक्ति परिवार के साथ जो सूक्ष्म सम्बन्ध जुड़े होते हैं वे चित्त शोधन की प्रक्रिया में अन्त तक बाधक ही बने रहते हैं।
साधना में अपने आपे को ईश्वर के रंग में रंगना होता है। तभी दानों का वर्ण एक जैसा बनता है। इसके लिए सर्वप्रथम धुलाई करनी पड़ती है। कपड़े को बिना धोये रंगा जाय तो काम न चलेगा। वह तेल, कीचड़ में डूबा हो तो रंगने के लिए किया गया परिश्रम भी व्यर्थ चला जाएगा।
साधना अर्थात् जीवन साधना। जीवन साधना अर्थात् आदतों, मान्यताओं एवं आकाँक्षाओं को साध लेना। वैसा जैसा कि घोड़े बैल आदि को सधाकर अनगढ़ आदतों से विरत किया और उपयोगी कार्यों में लगने के लिए अभ्यस्त किया जाता है। शेर, हाथी, रीछ, बन्दर, साँप भी प्रकृतितः मनुष्य के सहयोगी कहाँ होते हैं। उन्हें नरम-नरम करके सरकस तमाशों में ऐसे कौतूहल दिखाने में प्रवीण कर लिया जाता है जो आश्चर्यचकित करते और उनकी मूल प्रकृति के सर्वथा विपरीत होते हैं।
साधना विशेष का चयन करना होता है वरन् उस निर्धारण के लिए अनुभवी मार्ग-दर्शन का परामर्श अनुशासन भी उपलब्ध करना होता है। साधना क्षेत्र में ‘गुरु’ वरण की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया गया है। इसका प्रयोजन अपने उपचार के लिए अनुभवी चिकित्सक का सहयोग जुटाने जैसा है। छात्रों को अध्यापक की भी जरूरत पड़ती है। बाजार से पुस्तकें खरीद कर बिना किसी से पूछताछ किये अपने आप उत्तीर्ण होते रहना कठिन है।
साधना को सिद्ध होने देता है और न उस निमित्त श्रद्धा जमने, मन लगने तथा गम्भीर प्रयत्न करने देता है। उथले प्रयत्नों का गहरा प्रतिफल कैसे मिले? कुसंस्कार ही हैं जो यमदूतों की तरह पग-पग पर त्रास देते हैं। व्यक्तित्व को हेय बनाते हैं। रुग्णता एवं उद्विग्नता के अभिशाप थोपते हैं।
साधना विशेष उद्देश्य से की जाती है और उच्चस्तरीय भी होती है। इसलिए उसका अन्तिम स्वरूप निर्धारित करने के लिए साधक के साथ विचार-विनिमय आवश्यक होता है।
साधना इसके अतिरिक्त है। आत्मोन्नति के लिए उसी की अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ती है।
साधना। जीवन साधना अर्थात् आदतों, मान्यताओं एवं आकाँक्षाओं को साध लेना। वैसा जैसा कि घोड़े बैल आदि को सधाकर अनगढ़ आदतों से विरत किया और उपयोगी कार्यों में लगने के लिए अभ्यस्त किया जाता है। शेर, हाथी, रीछ, बन्दर, साँप भी प्रकृतितः मनुष्य के सहयोगी कहाँ होते हैं। उन्हें नरम-नरम करके सरकस तमाशों में ऐसे कौतूहल दिखाने में प्रवीण कर लिया जाता है जो आश्चर्यचकित करते और उनकी मूल प्रकृति के सर्वथा विपरीत होते हैं।
साधना क्षेत्र में ‘गुरु’ वरण की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया गया है। इसका प्रयोजन अपने उपचार के लिए अनुभवी चिकित्सक का सहयोग जुटाने जैसा है। छात्रों को अध्यापक की भी जरूरत पड़ती है। बाजार से पुस्तकें खरीद कर बिना किसी से पूछताछ किये अपने आप उत्तीर्ण होते रहना कठिन है। बच्चा अपने आप वर्णमाला और गिनती को पढ़ना-लिखना, बिना किसी सहयोग के किस प्रकार आरम्भ करे?
साधनाएँ, प्रायश्चित्त, उपासना इसी उद्देश्य को पूरा करती हैं, जिसमें जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों का निराकरण किया जाता है एवं देव शक्तियों के अभिवर्धन का पथ-प्रशस्त होता है। इस सब दिव्य सामर्थ्यों से युक्त परमसत्ता बीज रूप में मनुष्य में विद्यमान है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति रूपी व्यामोह ही उन्हें मूर्छित बनाये हुये हैं। वे हट जायें तो मनुष्य में अनायास ही ईश्वर की झाँकी हो सकती है। वह अपने आपको लघु से महान, आत्मा से परमात्मा, नर से नारायण के रूप में विकसित हुआ प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।
साधना के मोटे नियम तो हर साधक के लिए एक जैसे हो सकते हैं, पर व्यक्ति विशेष की आवश्यकता के अनुरूप विशेष परामर्श की- विशेष मार्गदर्शन की- विशेष देखभाल की जरूरत पड़ती है।
साधना के माध्यम से सुसंस्कारों का रंग चढ़ाना या उपवन लगाना बन ही नहीं पड़ता। सारे प्रयास निष्फल जाते रहते हैं।
साधना पड़ता है। इस तैयारी के साथ-साथ ही यह प्रयास करना पड़ता है कि निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त परब्रह्म चेतना के साथ अपने सूत्र सम्बन्धों को किस प्रकार घनिष्ठ किया जाय। घर में लगे बल्ब और पंखे तभी चलते हैं जब तारों की सही फिटिंग होने पर बिजली घर के जेनरेटरों से उनका सम्बन्ध सही रूप में जुड़ जाय। जलते तो बल्ब ही हैं, घूमते तो पंखे ही हैं पर जो मात्र दृश्य को ही सब कुछ नहीं समझते, आधारभूत कारण को भी तलाश करते हैं, उन्हें समझना होता है कि तारों में चलने वाला विद्युत प्रवाह ही इन उपकरणों को गतिशील रख रहा है। ब्रह्माण्डीय चेतना- ब्रह्म सत्ता के साथ हर साधक का आत्म तन्त्र जुड़ना चाहिए।
साधनात्मक उपचार ही एकमात्र अवलंबन बनकर रह जाते हैं। योग भावना को उत्कृष्टता के साथ जोड़ता है और तप कुसंस्कारिता को गलाकर सुसंस्कारिता में ढालने वाली भट्टी का प्रयोजन पूर्ण करता है।
साधनाओं में निष्णात और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र, गुरु पत्नी से बदला लेने वाले हैं। ‘विपुल’ ने सूक्ष्म शरीर से गुरु पत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचाया।
साधना से अपनी प्रसुप्त गरिमा को प्रकट करते हैं तो लोक-लोकान्तरों से दिव्य वरदान भी बादलों की तरह बरसने लगते हैं। सत्प्रवृत्तियों से प्रसन्न होकर देवता आकाश से फूल बरसाते हैं। इस मान्यता में इसी रहस्य का उद्घाटन है कि साधना के फलस्वरूप भीतर के उभार और ऊपर के अनुग्रह का दुहरा लाभ मिलता है।
साधना द्वारा उसे जगाया एवं स्वयं को ऊंचा उठाया। ऋषि, देवदूत, महामानव स्तर तक पहुँचने में उन्हें आत्म-परिष्कार-व्यक्तित्व निर्माण की जीवन साधना से लेकर अपने सुपरचेतन को जगाने की साधना करनी पड़ी और उन्होंने वह सब कुछ पा लिया, जिसे मानव के लक्ष्य की चिरन्तन व्यास एवं समय की तत्कालीन आवश्यकता कह सकते हैं।
साधना की जाती है। उनकी प्रखरता मनुष्य को तेजस्वी, मनस्वी एवं ओजस्वी बनाती है। अध्यात्म क्षेत्र की साधनाएँ विभूतियों को करतलगत कराती है।
साधना स्थलों को यथावत् रहने दिया। यह स्थान अभी सप्ती सरोवर के नाम से प्रख्यात है। शान्तिकुँज, ब्रह्मवर्चस् और गायत्री तीर्थ उसी दृष्टि से इस क्षेत्र में बनाये गये हैं कि पूर्ण संचित संस्कारों को इस भूमि से विशेष प्रभाव जुड़ा रहने के कारण साधकों की सफलता सरल होती रहे।
साधना करनी होती है। उनके अनेकों उपभेद और सम्मिश्रक है। औषधि विज्ञान की तरह साधना विज्ञान का भी एक स्वतंत्र शास्त्र है। चिकित्सा उपचार में रोगियों की स्थिति का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, उसी प्रकार श्रेयार्थियों के लिए भी अनुभवी मार्गदर्शक अमुक साधना अथवा कई योग प्रयोजनों का सम्मिश्रण करके ऐसा निर्धारण करते हैं जो अभावों की पूर्ति एवं उलझनों से निवृत्ति करा सकने में समर्थ हो सके। मेरुदण्ड में प्रवाहित होने वाली त्रिविध शक्तिधाराएं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के नाम से जानी जाती हैं।
साधना ही कही जायगी। आदिकाल की ऊबड़-खाबड़ धरती और आज की समतल उपजाऊ स्थिति के बीच आश्चर्यजनक अन्तर देखकर यही कहा जायेगा कि धरती को मनुष्य के लिए अधिक उपयोगी बनने के लिए प्रयत्न पूर्वक सधाया गया है। अन्न, फल, शाक, जूट, कपास आदि खाद्य स्वभावतः इस प्रकार नहीं उगते थे और वैसे नहीं होते थे जैसे कि आज हैं। वनस्पतियों को सुव्यवस्थित बनाने में मनुष्य को लम्बी अवधि से साधना करनी और करानी पड़ रही है। वही सब कुछ मनुष्य को अपने आपे की साधना में भी करना पड़ता है।
साधना से सिद्धि प्राप्त करने में जो जिन विभूतियों का सहयोग मिलता है वे निश्चय ही सामान्य स्तर की होती हैं।
साधना में अरुचि, अस्वस्थता, परिस्थितियों की प्रतिकूलता जैसे कितने ही व्यवधान साधना के दिनों इसलिए आते हैं कि यदि इस मार्ग में सफलता मिलने लगी तो फिर दण्ड भुगतने का अवसर कैसे मिलेगा? साधना से जो नये सुसंस्कारों की हरियाली उगाई जाती है, उन्हें कुसंस्कारों के वन्य पशु झुण्ड बना कर आते और देखते-देखते चर जाते हैं। सभी जानते हैं मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता, पथरीली जमीन में उद्यान नहीं लगता। दुष्कर्मों के घटा टोप विकृत हुई मनोभूमि ऐसी हठीली होती है कि उस साधना के माध्यम से सुसंस्कारों का रंग चढ़ाना या उपवन लगाना बन ही नहीं पड़ता। सारे प्रयास निष्फल जाते रहते हैं।
साधनाएँ तो कितनी ही प्रचलित हैं पर जिनमें परिशोधन ओर प्रगति परिष्कार के दोनों प्रयोजन सिद्ध होते हैं, जो एक होते हुए भी अनेक प्रयोजन सिद्ध कर सके, ऐसी अध्यात्म चिकित्सा चान्द्रायण साधना के अतिरिक्त दूसरी परिलक्षित नहीं होती।
साधना द्वारा सुसंस्कृत बनाई गई वाणी ही सम्पन्न करती है। ऐसी जिह्वा सरस्वती कहलाती है और उसके कथन अमोघ सिद्ध होते हैं। शब्द बेधी बाण की तरह उसका प्रभाव होता है।
साधना से जो नये सुसंस्कारों की हरियाली उगाई जाती है, उन्हें कुसंस्कारों के वन्य पशु झुण्ड बना कर आते और देखते-देखते चर जाते हैं। सभी जानते हैं मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता, पथरीली जमीन में उद्यान नहीं लगता। दुष्कर्मों के घटा टोप विकृत हुई मनोभूमि ऐसी हठीली होती है कि उस साधना के माध्यम से सुसंस्कारों का रंग चढ़ाना या उपवन लगाना बन ही नहीं पड़ता। सारे प्रयास निष्फल जाते रहते हैं।
साधना-पुरुषार्थ का ही प्रतिफल होती है। दिव्य दृष्टि सम्पन्न ऐसे कितने ही व्यक्तियों का परिचय समय-समय पर मिलता रहता है।
साधना सम्बन्धी गूढ़ दर्शन व क्रियापरक मार्गदर्शन तब आगामी चार अंकों के अतिरिक्त भी विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया जाता रहेगा।
साधना के माध्यम से यही करना होता है। राजयोग की अष्टांग साधना में पाँच यम और पाँच नियम प्रथम चरण माने गये हैं। वे न बन पड़ें तो प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि प्रयोगों का कोई तुक नहीं रह जाता। वर्णमाला, गिनती का आरम्भिक अक्षर ज्ञान न होने पर भी जो गणित और विज्ञान में एम.ए. करने की बात सोचता है वह भूल करता है। एक-एक सीढ़ी पार करते हुए ही तो क्रमशः छत पर चढ़ सकना सम्भव होता है।
साधना से ही जा सकती है।
साधना अर्थात् आदतों, मान्यताओं एवं आकाँक्षाओं को साध लेना। वैसा जैसा कि घोड़े बैल आदि को सधाकर अनगढ़ आदतों से विरत किया और उपयोगी कार्यों में लगने के लिए अभ्यस्त किया जाता है। शेर, हाथी, रीछ, बन्दर, साँप भी प्रकृतितः मनुष्य के सहयोगी कहाँ होते हैं। उन्हें नरम-नरम करके सरकस तमाशों में ऐसे कौतूहल दिखाने में प्रवीण कर लिया जाता है जो आश्चर्यचकित करते और उनकी मूल प्रकृति के सर्वथा विपरीत होते हैं। पेड़-पौधों में कलम लगना, उन्हें काट छाँटकर नयनाभिराम बनाना एक प्रकार से माली की साधना ही कही जायगी।
साधना परक पुरुषार्थ किया जा सके तो अविज्ञात, प्रसुप्त को प्रत्यक्ष होने का अवसर मिल सकता है।
साधना चान्द्रायण व्रत की है। उसे आध्यात्मिक कायाकल्प कहा जाता है। कायाकल्प चिकित्सा से शरीर में भरे हुए मल विकारों की पूरी तरह सफाई की जाती है। तथा ऐसे उपचार अपनाये जाते हैं जिससे नये रक्त का नाडियों में संचार होने लगे। पाचन तंत्र नई स्फूर्ति के साथ काम करने लगे।
साधना भी कष्टसाध्य, श्रम साध्य एवं समय साध्य है। उसमें विलम्ब लगता हो, सफलताक्रम धीमा हो तो भी हताश होने की आवश्यकता नहीं। धैर्य पूर्वक प्रयास जारी रखने से आज नहीं तो कल सफलता मिलकर ही रहती है। उपरोक्त तीनों अंतर्मुखी ध्यानों में से कोई किया जाय या दो बहिर्मुखी ध्यानों में से अपनाया जाय। इसका निर्धारण मनोभूमि की गम्भीर पर्यवेक्षण से ही निश्चित किया जा सकता है।
साधना के लिए जिस प्रकार आहार-विहार में अधिकाधिक सात्विकता का समावेश रखने की आवश्यकता है उसी प्रकार उसके लिए अनुकूल वातावरण भी उपलब्ध किया जाना चाहिए। वातावरण से तात्पर्य है उद्देश्य के अनुरूप स्थान एवं संपर्क सान्निध्य। इन दोनों का सुयोग न बन पड़ने पर विक्षेपों के घटाटोप जमते रहते हैं और प्रयत्न को अग्रगामी न होने देने वाले अवरोध पग-पग पर आ खड़े होते हैं। इसलिए शान्तिदायक स्थान और उसी तरह के लोगों का सामीप्य भी आवश्यक हो जाता है।
साधना का नाम अध्यात्म है। चेतना को किस प्रकार मल आवरण, विक्षोभों से बचाया जाय? किस प्रकार उसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने का अवसर दिया जाय? किस प्रकार उसे बलिष्ठ प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय? इसी विद्या का नाम ‘अध्यात्म’ है।
साधना क्षेत्र में भी यही नीति अपनानी होती है। न केवल स्थिति के अनुरूप साधना विशेष का चयन करना होता है वरन् उस निर्धारण के लिए अनुभवी मार्ग-दर्शन का परामर्श अनुशासन भी उपलब्ध करना होता है। साधना क्षेत्र में ‘गुरु’ वरण की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया गया है। इसका प्रयोजन अपने उपचार के लिए अनुभवी चिकित्सक का सहयोग जुटाने जैसा है। छात्रों को अध्यापक की भी जरूरत पड़ती है।
साधना में सम्मिलित है।
साधना के लिए मन और शरीर दोनों को साधना पड़ता है। मानसिक परिष्कार के लिए ‘योग’ और शारीरिक प्रखरता उभारने के लिए ‘तप’ का आश्रय लेना पड़ता है। योग और तप की परिधि में अनेकों प्रकार के अभ्यासों और अनुशासनों का विधि-विधान है। इसमें से कौन किसे अपनाये यह व्यक्ति विशेष की स्थिति का अतिरिक्त विश्लेषण करके ही यह तालमेल बैठता है कि किस मनःस्थिति में किस साधना को परिस्थिति को हृदयंगम करना और व्यवहार में उतारना बन पड़ेगा। सबके लिए एक जैसे निर्धारण नहीं हो सकते।
साधना’ है। साधना का प्रयोजन है मनुष्य को उसकी गरिमा का बोध कराना एवं कुत्साओं और कुण्ठाओं की उन जंजीरों को काट डालना जो जीव और ईश्वर के मिलन में बाधा बनकर खड़ी हैं। तपश्चर्याएँ, तितिक्षाएँ, योग-साधनाएँ, प्रायश्चित्त, उपासना इसी उद्देश्य को पूरा करती हैं, जिसमें जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों का निराकरण किया जाता है एवं देव शक्तियों के अभिवर्धन का पथ-प्रशस्त होता है। इस सब दिव्य सामर्थ्यों से युक्त परमसत्ता बीज रूप में मनुष्य में विद्यमान है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति रूपी व्यामोह ही उन्हें मूर्छित बनाये हुये हैं।
साधना करने से-मनुष्य को इसी हाड़-माँस की काया में रहते हुए देव स्तर का बन सकने का सुयोग मिलता है। परीक्षा अच्छे नम्बर लाने के अतिरिक्त प्रामाणिकता सिद्ध करना और तद्नुरूप पद पाना कठिन है। महामानवों, सिद्ध पुरुषों, ऋषियों, देवदूतों की बिरादरी का हर सदस्य उसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के उपरान्त गौरव भरी विशिष्टता उपलब्ध करता रहा है।
साधना में मात्र स्वाद जीतना ही नहीं- आहार को औषधि बुद्धि से सेवन करना ही नहीं, अभक्ष्य-भक्षण से बचना भी एक प्रक्रिया है। अभक्ष्य मात्र मद्य, माँस, मसाले उत्तेजना को ही नहीं कहते वह सब भी अभक्ष्य हैं जो अनीति से अथवा बिना परिश्रम किये पाया गया है। अन्न से मन बनता है। मन क्षेत्र का परिष्कार ही आत्मिक प्रगति का मूल आधार है। अस्तु मन की शुद्धि के लिए अन्न की शुद्धि पर विशेष रूप से ध्यान देना पड़ता है।
साधना और धुलाई को प्रायश्चित्त तप कहते हैं।
साधना और आदान-प्रदान का सिलसिला चलाना किस प्रकार सम्भव हो सकता है। प्रयत्न में सफलता न मिलने पर कई प्रेतात्माएँ अनगढ़ उपाय करती हैं मूलतः मनुष्य इस अनुभूति से भयभीत एवं आतंकित होते हैं। जब कि उनमें से कितने ही प्रियजनों के साथ स्नेह, सौजन्य एवं सहयोग का सिलसिला चल सकता है। एक देश दूसरे देश की- एक समाज दूसरे समाज की- एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के स्नेह सहयोग में बँध जाने पर उपयोगी परिणाम उपलब्ध करते हैं फिर कोई कारण नहीं कि कुछ समय पूर्व के अपने ही जैसे मनुष्यों की इसलिए उपेक्षा करे कि शरीर खो बैठे और सूक्ष्म शरीर में- अन्तरिक्ष में निवास कर रहे हैं। आत्मिकी में वह सामर्थ्य है कि वह इन दोनों लोगों के बीच भावनात्मक एवं क्रियात्मक सहयोग का द्वार खोल सके।
साधना को परिस्थिति को हृदयंगम करना और व्यवहार में उतारना बन पड़ेगा। सबके लिए एक जैसे निर्धारण नहीं हो सकते। एक कक्षा के बच्चों को तो एक पाठ्यक्रम का अभ्यास कराया जा सकता है, पर एक रोग के हर रोगी को एक जैसी चिकित्सा एवं परिचर्या नहीं बताई जा सकती है। उसमें रोग इतिहास, रोग का कारण एवं रोगी की वर्तमान स्थिति का निदान विश्लेषण करना होता है। इसके उपरान्त ही कुशल चिकित्सक उपचार का निर्धारण करते हैं।
साधना में बैठ गये। उनके शरीर पर दीमक ने घर बना लिया। ब्रह्मा जी ने आकर दीमक छुड़ाई और पाप मुक्ति का वरदान दिया। इसी घटना के आधार पर उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। वाल्मीकि संस्कृत में दीमक को कहते हैं।
साधना-पुरुषार्थ किया जा सके तो त्रिकालदर्शी बन सकना हर किसी के लिए सम्भव है।
साधना इन्द्रिय संयम में प्रधान है। अन्य इन्द्रियों का भी इसी प्रकार संयम बरता और तपश्चर्या का एक चरण पूरा किया जाता है।
साधना सधती है। अस्वाद, उपवास, मौन एवं ब्रह्मचर्य की साधना इन्द्रिय संयम में प्रधान है। अन्य इन्द्रियों का भी इसी प्रकार संयम बरता और तपश्चर्या का एक चरण पूरा किया जाता है।
साधना यहीं से आरंभ होती है। साधक को अन्तराल के धर्म क्षेत्र में और व्यवहार के कर्म क्षेत्र में उच्च उद्देश्यों के लिए अग्रगामी होना पड़ता है। गाण्डीव उठाने और “करिष्ये वचनं तव” का संकल्प करने के उपरान्त ही सामान्य-सा पाण्डु पुत्र भगवान का अनन्य सहचर महान अर्जुन बनता है। यही है साधना से सिद्धि की पृष्ठभूमि।
साधना को मध्यवर्ती सूत्र माना जा सकता है। भ्रूण की नाभि से जुड़ा हुआ नाल तन्तु उसे माता के साथ जोड़ता है। बिजली घर और बल्ब के बीच तारों की फिटिंग संबंध जोड़ती है। दो पहियों के मध्य धुरी की भूमिका रहती है। जनता और सरकार का मध्य सूत्र अफसरों से जुड़ता है।
साधना के फलस्वरूप भीतर के उभार और ऊपर के अनुग्रह का दुहरा लाभ मिलता है।
साधना का कदम इससे आगे का है। राजयोग में यम, नियम पालने की मनोभूमि बनने पर ध्यान धारणा के अगले कदम उठते हैं।
साधना विधि के साथ सघन श्रद्धा का भी समावेश होता है। इसलिए अध्यात्मिक क्षेत्र के सर्वोपरि-सर्वसमर्थ-श्रद्धा शास्त्र को अधिकाधिक सक्षम बनाने की आवश्यकता पड़ती है। इसका प्रारम्भिक अभ्यास कैसे हो? इसलिए गुरुतत्त्व को एकलव्य की तरह अपने निजी प्रयत्न से समर्थ बनाना पड़ता है। यही है ‘गुरु दीक्षा’ और ‘गुरु दक्षिणा’ की परस्पर संबद्ध प्रक्रिया।
साधना के लिए अयोध्या छोड़कर हिमालय पहुंचे थे। वशिष्ठ गुफा के थोड़े-थोड़े फासले पर चारों ने अपनी-अपनी एकान्त कुटियाएँ बनाई थीं। राम देव प्रयाग में, लक्ष्मण लक्ष्मण झूला में, भरत ऋषिकेश में और शत्रुघ्न मुनि की रेती में जा बसे थे। अयोध्या में उन्हें स्थान की कमी नहीं थी, पर स्थान एवं व्यक्ति परिवार के साथ जो सूक्ष्म सम्बन्ध जुड़े होते हैं वे चित्त शोधन की प्रक्रिया में अन्त तक बाधक ही बने रहते हैं। इसलिए स्थान परिवर्तन की उपयोगिता ऐसे दिव्य प्रयोजन की कितनी अधिक होती है उसे सहज ही समझा जा सकता है।
साधना एक पराक्रम है, जिसके लिए प्राथमिक तैयारी योग्यता वृद्धि के रूप में करनी पड़ती है। पीछे साधनों के माध्यम से पुरुषार्थ प्रकट करने की बात बनती है। आत्म विज्ञान के अभिनव प्रयोगों में साधनारत व्यक्तियों को आत्म-सत्ता की प्रयोगशाला के सभी यन्त्र उपकरण सही स्थिति में रखने होंगे। शरीरगत इन्द्रिय शक्ति और मनोगत भाव शक्ति को संयम तथा श्रद्धा स्वीकार करने के लिए साधना पड़ता है। इस तैयारी के साथ-साथ ही यह प्रयास करना पड़ता है कि निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त परब्रह्म चेतना के साथ अपने सूत्र सम्बन्धों को किस प्रकार घनिष्ठ किया जाय।
साधना। तप की गर्मी से कुसंस्कार जलते हैं और प्रसुप्त जगते उभरते हैं। योग से परब्रह्म के साथ एकात्म स्थापित करने का अवसर मिलता है। बल्ब तब प्रकाशवान होता है जब तारों के माध्यम से वह बिजली के उत्पादन केन्द्र के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। परमात्मा बिजली घर है और आत्मा बल्ब।
साधना को आवश्यक समझा। वर्णन है कि वे अविचल साधना में बैठ गये। उनके शरीर पर दीमक ने घर बना लिया। ब्रह्मा जी ने आकर दीमक छुड़ाई और पाप मुक्ति का वरदान दिया। इसी घटना के आधार पर उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।
साधना से सिद्धि’ के समस्त उदाहरण इसी एक तथ्य की साक्षी हैं कि साधकों ने इसी चेतन घटक को सामर्थ्यवान बनाया और बदले में ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ पायीं। यह सिद्धान्त सदा से ही शाश्वत रहा है और आगे भी जब भी किसी को इस मार्ग पर चलना होगा- इसी को अपना आधार बनाना होगा।
साधना विज्ञान का भी एक स्वतन्त्र शास्त्र है। चिकित्सा उपचार में रोगियों की स्थिति का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, उसी प्रकार श्रेयार्थियों के लिये भी अनुभवी मार्गदर्शन अमुक साधना अथवा कई योग प्रयोजनों का सम्मिश्रण करके ऐसा निर्धारण करते हैं जो अभावों की पूर्ति एवं उलझनों से निवृत्ति करा सकने में समर्थ हो सके। मेरुदण्ड में प्रवाहित त्रिविध शक्ति धाराओं- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना में से किसे किस शरीर को प्रधानता देनी है, किसे किस क्षेत्र में प्रवेश करना है, वे इन्हीं तीनों के साथ अपना तादात्म्य बिठाते हैं। इन्हीं तीनों को तीन लोकों में प्रवेश पाने के तन राजमार्ग कहते हैं। भूलोक इड़ा से, भुवः लोक पिंगला से और स्व लोक सुषुम्ना से सम्बन्धित माना गया है।
साधना का साहस करने से पूर्व सिद्ध पुरुषों के अनुदान, आशीर्वाद अथवा देव सत्ताओं को सिद्धि वरदान मिलने लगें, ऐसी अपेक्षा करना व्यर्थ है।
साधना की फसल भली प्रकार उगती और अपने निर्धारित प्रतिफल उत्पन्न करती है।
साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त को हृदयंगम करने के पूर्व यह यह समझना होगा कि आत्म-सत्ता का जीवन का, प्रयोजन क्या है। दूरदर्शिता का तकाजा है कि हम शरीर और मन रूपी उपकरणों का प्रयोग जानें और उन्हीं प्रयोजनों में तत्पर रहें, जिनके लिये प्राणिजगत का यह सर्वश्रेष्ठ शरीर- सुरदुर्लभ मानव जीवन उपलब्ध हुआ है। आत्मा वस्तुतः परमात्मा का पवित्र अंश है। वह श्रेष्ठतम उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण है। आत्मा को उसी स्तर का होना चाहिये, जिसका कि परमात्मा है।
साधना नित पुण्य-पथ में,
साधनाएँ करते रहे हैं। समस्त ऋषियों की गुफा, कन्दराएँ इसी क्षेत्र में पाई गई हैं। पाण्डवों की तरह अन्यान्य महत्वपूर्ण व्यक्ति अपनी साधना एवं प्रायश्चित्त प्रक्रिया के लिए इसी क्षेत्र में डेरा डालते हैं। गंगाजल, गंगा तट साधना की अवधि में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है। प्रसिद्ध है कि जब गंगा लेकर भागीरथ आगे-आगे चल रहे थे तो मांग में हरिद्वार के निकट सप्त ऋषि अपनी सात कुँजों में तप करते पाये गये।
साधना अथवा कई योग प्रयोजनों का सम्मिश्रण करके ऐसा निर्धारण करते हैं जो अभावों की पूर्ति एवं उलझनों से निवृत्ति करा सकने में समर्थ हो सके। मेरुदण्ड में प्रवाहित होने वाली त्रिविध शक्तिधाराएं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के नाम से जानी जाती हैं। किसे किस शरीर को प्रधानता देनी है, किसे किस क्षेत्र में प्रवेश करना है वे इन्हीं तीनों के साथ अपना तादात्म्य बिठाते हैं। इन्हीं तीनों को तीन लोकों में प्रवेश पाने के तीन राजमार्ग कहते हैं। भूलोक इड़ा से भुवः लोक पिंगला से और स्वःलोक सुषुम्ना से सम्बन्धित माना गया है।
साधना की दृष्टि से हिमालय की छाया और गंगा की गोद का असाधारण महत्व माना गया है। सप्त ऋषियों से लेकर मध्यवर्ती योगी तपस्वियों की सफल साधनाएँ प्रायः इसी क्षेत्र में सम्पन्न होती रही हैं। भगवान राम और उनके तीनों भाई, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त होते ही आत्म-साधना के लिए अयोध्या छोड़कर हिमालय पहुंचे थे। वशिष्ठ गुफा के थोड़े-थोड़े फासले पर चारों ने अपनी-अपनी एकान्त कुटियाएँ बनाई थीं। राम देव प्रयाग में, लक्ष्मण लक्ष्मण झूला में, भरत ऋषिकेश में और शत्रुघ्न मुनि की रेती में जा बसे थे।
साधनाओं का समान रूप से नियोजन आवश्यक है। इन्हें चार वेदों का सार निर्देश कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति न होगी।
साधना विज्ञान का भी एक स्वतंत्र शास्त्र है। चिकित्सा उपचार में रोगियों की स्थिति का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, उसी प्रकार श्रेयार्थियों के लिए भी अनुभवी मार्गदर्शक अमुक साधना अथवा कई योग प्रयोजनों का सम्मिश्रण करके ऐसा निर्धारण करते हैं जो अभावों की पूर्ति एवं उलझनों से निवृत्ति करा सकने में समर्थ हो सके। मेरुदण्ड में प्रवाहित होने वाली त्रिविध शक्तिधाराएं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना के नाम से जानी जाती हैं। किसे किस शरीर को प्रधानता देनी है, किसे किस क्षेत्र में प्रवेश करना है वे इन्हीं तीनों के साथ अपना तादात्म्य बिठाते हैं। इन्हीं तीनों को तीन लोकों में प्रवेश पाने के तीन राजमार्ग कहते हैं।
साधना विज्ञान में भी शारीरिक, मानसिक मलीनताओं के निष्कासन पर जोर दिया गया है। आयुर्वेद में विकार-ग्रस्त शरीरों के मलशोधन की प्रक्रिया के उपरान्त चिकित्सा का समुचित प्रतिफल मिलने की बात कही गई है। हठयोग नेति, धोति, वस्ति, न्योलि, बज्रोली, कपाल, भाति आदि क्रियाओं द्वारा मलशोधन करते हैं। आयुर्वेद में वमन, विरेचन, स्वेदन, नस्य आदि शोधन कर्म करके संचित मलों का निष्कासन किया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में यही कार्य उपवास एवं ऐनिमा के द्वारा किया जाता है।
साधना के लिए परामर्श दिया जाता है।
साधना का एकमात्र प्रयोजन है।
साधना ही जीवन देवता की उपासना है।
साधना में भी करना पड़ता है। चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करते हुए- विकास क्रम को एक के बाद दूसरी सीढ़ी पार करते हुए- मनुष्य आगे उठता ऊँचा चढ़ता तो आया है किन्तु अभी उस स्तर तक नहीं पहुँचा है कि सभ्य संसार का सुसंस्कृत नागरिक कहला सके। ऐसी दशा में उसे बौना, कुबड़ा, पिछड़ा, उथला बनकर रहना पड़ रहा है। मानवी गरिमा के उपयुक्त उसका व्यक्तित्व ढले इसके लिए वैसा ही प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ेगी जैसी कि कुशल माली, मदारी अपने-अपने यजमानों से निपटते हैं और उन्हें बलपूर्वक इच्छित स्थिति में बदलने के लिए साधते हैं।
साधनारत व्यक्तियों को आत्म-सत्ता की प्रयोगशाला के सभी यन्त्र उपकरण सही स्थिति में रखने होंगे। शरीरगत इन्द्रिय शक्ति और मनोगत भाव शक्ति को संयम तथा श्रद्धा स्वीकार करने के लिए साधना पड़ता है। इस तैयारी के साथ-साथ ही यह प्रयास करना पड़ता है कि निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त परब्रह्म चेतना के साथ अपने सूत्र सम्बन्धों को किस प्रकार घनिष्ठ किया जाय। घर में लगे बल्ब और पंखे तभी चलते हैं जब तारों की सही फिटिंग होने पर बिजली घर के जेनरेटरों से उनका सम्बन्ध सही रूप में जुड़ जाय। जलते तो बल्ब ही हैं, घूमते तो पंखे ही हैं पर जो मात्र दृश्य को ही सब कुछ नहीं समझते, आधारभूत कारण को भी तलाश करते हैं, उन्हें समझना होता है कि तारों में चलने वाला विद्युत प्रवाह ही इन उपकरणों को गतिशील रख रहा है।
साधना का चौथा सोपान है- विचार संयम। मस्तिष्क का स्वभाव खाली रहने का नहीं। उसमें स्वभावतः हर घड़ी कल्पनाएँ उठतीं उभरती रहती हैं। निर्धारित दिशाधारा न होने पर वे जिधर-तिधर आवारा जानवरों की तरह भटकती रहती हैं। चंचल मन इस उस डाली पर व्यर्थ ही उचकने-मचकने वाले बन्दर की तरह बेसिर पैर की उड़ाने उड़ता रहा है।
साधना उपचारों से सकती है उनमें चान्द्रायण सर्वोपरि है। उसकी निर्धारित कार्य पद्धति का प्रभाव आरोग्य रक्षा, मनोरोग चिकित्सा के रूप में ही नहीं एक कदम आगे बढ़कर अन्तराल की गहरी परतों में जमी हुई कुसंस्कारिता को उखाड़ फेंकने की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। एकांगी साधनाएँ तो कितनी ही प्रचलित हैं पर जिनमें परिशोधन ओर प्रगति परिष्कार के दोनों प्रयोजन सिद्ध होते हैं, जो एक होते हुए भी अनेक प्रयोजन सिद्ध कर सके, ऐसी अध्यात्म चिकित्सा चान्द्रायण साधना के अतिरिक्त दूसरी परिलक्षित नहीं होती।
साधना तो थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ सभी के लिए एक जैसी है, किन्तु विशेष साधनाएं उसी प्रकार की है जैसा की पहलवानी को अखाड़े का आश्रम लेकर उस्तादी के देख-रेख में विशेष प्रकार की कसरतों के माध्यम से करनी पड़ती है। दंगल में कुश्ती पछाड़ने के लिए यही प्रक्रिया अपनाना पड़ती है। इस स्तर तक पहुँचने के लिए मात्र टहलने जैसी हलकी-फुलकी कसरतों से काम नहीं चलता।
साधना के क्रमिक विस्तार अगले साधकों में प्रकाशित होते रहेंगे।
साधना का नित्य कर्म, हर दिन आक्रमण करने वाले कुसंस्कारों का-वातावरण के प्रभाव का निरस्त करने के लिए किया जाता है। नित्य का स्नान, कपड़े धोना, मंजन करना, कमरे में झाड़ू लगाना, बर्तन मलना आदि जिस तरह हर दिन का सफाई कृत्य माना जाता है इसी तरह मनःक्षेत्र पर मलीनता की परतें न जमने देने के लिए उपासनात्मक नित्य कर्म भी करने होते हैं। विशिष्ट साधना इसके अतिरिक्त है। आत्मोन्नति के लिए उसी की अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ती है।
साधना को संग्राम कहा गया है। यही अर्जुन का महाभारत है। उसे लड़े बिना कोई चारा नहीं। कृष्ण का आग्रह इसी निमित्त था। जब तैयार हो गया तो वह उसका रथ चलाने, घोड़े हाँकने, रास्ता बताने और विजय दिलाने के लिए वचनबद्ध हो गये।
साधना की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य इसी जीवन में देवताओं जैसा अन्तराल प्राप्त न कर सके। कोई कारण नहीं कि वह सामान्य परिस्थितियाँ और सीमित साधनों के सहारे भी स्वर्गीय वातावरण में रहने का आनन्द न ले सके।
साधना बद्रीनाथ में की थी और वृद्धावस्था में वे समुद्र तट पर द्वारिका चले गये थे। जन्म स्थान एवं क्रीड़ा क्षेत्र मथुरा वृन्दावन इसके लिए उन्हें रुचा नहीं था। पढ़ने के लिए भी वे उज्जैन संदीपन ऋषि के आश्रम में ही रहे थे। घर में ट्यूशन लगाने या पड़ोस के स्कूल में पढ़ने से उन्हें यह बात बनती दिखाई नहीं पड़ी जो उच्चस्तरीय संस्कार सम्पादन के लिए गुरुकुलों का आश्रम लेने से ही सम्भव होती है। राम और लक्ष्मण की शिक्षा भी माता-पिता के लाड़-प्यार और सुविधा भरे राजमहल में रहकर सम्पन्न नहीं हुई थी उन्हें विश्वामित्र के आश्रम में आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रवेश पाना और निवास करना पड़ा था।
साधना से सिद्धि। जिनने कुछ महत्वपूर्ण पाया है उनने इसी तथ्य को हृदयंगम किया है और पात्रता विकसित करने वाले साधनात्मक पुरुषार्थ के सहारे अपनी यथार्थता को बढ़ाया है।
साधना का प्रयोजन है मनुष्य को उसकी गरिमा का बोध कराना एवं कुत्साओं और कुण्ठाओं की उन जंजीरों को काट डालना जो जीव और ईश्वर के मिलन में बाधा बनकर खड़ी हैं। तपश्चर्याएँ, तितिक्षाएँ, योग-साधनाएँ, प्रायश्चित्त, उपासना इसी उद्देश्य को पूरा करती हैं, जिसमें जन्म-जन्मान्तरों से संचित कुसंस्कारों का निराकरण किया जाता है एवं देव शक्तियों के अभिवर्धन का पथ-प्रशस्त होता है। इस सब दिव्य सामर्थ्यों से युक्त परमसत्ता बीज रूप में मनुष्य में विद्यमान है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति रूपी व्यामोह ही उन्हें मूर्छित बनाये हुये हैं। वे हट जायें तो मनुष्य में अनायास ही ईश्वर की झाँकी हो सकती है।
साधना के सम्बन्ध में भी आत्म-शोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
साधना द्वारा निजी जीवन के भौतिक एवं आत्मिक पक्षों में असाधारण प्रगति सम्भव हो सकती है। इतना ही नहीं, दूसरों का भी उस माध्यम से हित साधन हो सकता है। नियति के रहस्यों को भी उस आधार पर जाना जा सकता है और आवश्यकतानुसार विश्व-प्रवाह का अदृश्य वातावरण में हेर-फेर कर सकना भी सम्भव हो सकता है।
साधना की अवधि में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होता है। प्रसिद्ध है कि जब गंगा लेकर भागीरथ आगे-आगे चल रहे थे तो मांग में हरिद्वार के निकट सप्त ऋषि अपनी सात कुँजों में तप करते पाये गये। गंगा ने उन्हें हटाया नहीं वरन् स्वयं ही सात भागों में विभक्त होकर उनके साधना स्थलों को यथावत् रहने दिया। यह स्थान अभी सप्ती सरोवर के नाम से प्रख्यात है। शान्तिकुँज, ब्रह्मवर्चस् और गायत्री तीर्थ उसी दृष्टि से इस क्षेत्र में बनाये गये हैं कि पूर्ण संचित संस्कारों को इस भूमि से विशेष प्रभाव जुड़ा रहने के कारण साधकों की सफलता सरल होती रहे।
साधना का अर्थ है- व्यक्ति चेतना के स्तर को इतना परिष्कृत करना कि उस पर ब्रह्म चेतना के अनुग्रह का अवतरण सहज सम्भव हो सके। आत्म-सत्ता का चुम्बकत्व इस अनुदान को सहज आकर्षित कर सकता है, पहले इसकी महत्ता को जानें तो सही। सूक्ष्म जगत की विभूतियों को पकड़ने हेतु जिस सामर्थ्य की आवश्यकता होती है, वह अपने आपको जाने बिना सम्भव नहीं। बिजली घर की बिजली, हमारे घर के बल्बों में उछल कर नहीं चली आती। इसके लिए सम्बन्ध जोड़ने वाले मध्यवर्ती तार बिछाने पड़ते हैं।
साधनात्मक प्रयोग, उपचार, क्रिया-कृत्य आरम्भ करने के साथ-साथ सर्वप्रथम एक समस्या का समाधान करना होता है कि प्रगति पथ के अवरोधों को कैसे हटाया जाय? अवरुद्ध द्वार कैसे खोला जाय? आत्मिक प्रगति में- सिद्धियों की उपलब्धि से सबमें प्रमुख बाधक अपने कुसंस्कार ही होते हैं। दृश्यमान दुष्कर्म अपना विस्तार समेट कर अदृश्य संस्कारों का रूप बनकर अचेतन की गहरी परतों में जा घूमते हैं और वहीं से अनेक प्रकार के संकटों का सृजन करते रहते हैं। आग जहाँ रखी जाती है, वहीं जलाना आरम्भ कर देती है।
साधना बन पड़े। यों नित्य कर्म की तरह ही भगवान का नाम कहीं भी, किसी भी स्थिति में लिख जा सकता है। पर ध्यान में तो यह बात रहनी ही चाहिए कि मनोभूमि में सन्तुलन रखने एवं विक्षोभ उत्पन्न करने के वातावरण का असाधारण योगदान रहता है। उसकी अनुकूलता प्रतिकूलता अपना भला-बूरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती।
साधना का अवलम्बन लेना आवश्यक है।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त अध्यात्म क्षेत्र में सर्वमान्य है। शास्त्रकारों, आप्त पुरुषों, महा-मनीषियों, तपस्वी, साधकों ने एक स्वर से इस तथ्य को मान्यता दी है कि मानवी सत्ता में दैवी विभूतियों का अजस्र भाण्डागार भरा पड़ा है। उसे जगाने के लिए साधना परक पुरुषार्थ किया जा सके तो अविज्ञात, प्रसुप्त को प्रत्यक्ष होने का अवसर मिल सकता है।
साधना की प्रगति में सर्वप्रथम इसी मोर्चे पर जूझना पड़ता है। साधना को संग्राम कहा गया है। यही अर्जुन का महाभारत है। उसे लड़े बिना कोई चारा नहीं। कृष्ण का आग्रह इसी निमित्त था।
साधना अपने आपे की करनी पड़ती है। जिस स्तर की सफलता पानी है उसी प्रकार का सरंजाम जुटाना पड़ता है। वातावरण ढूंढ़ना पड़ता है और मन का रुझान तथा दिनचर्या का निर्धारण तद्नुरूप करना पड़ता है। पहलवान, कलाकार, वैज्ञानिक, फौजी स्तर से विशिष्ट उद्देश्य वाले व्यक्ति अपने ही गोरख धन्धे में उलझे रहते हैं। मन और शरीर को उन्हीं कार्यों में जोते रहते हैं।
साधना अभीष्ट हो तो उसके लिए अनुकूल वातावरण की तलाश भी करनी चाहिए। घर रहकर पुराने ढर्रे के- सामान्य घटिया मनोभूमि वाले लोगों के बीच निर्वाह करते हुए यह कठिन है कि दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली महत्वपूर्ण साधना बन पड़े। यों नित्य कर्म की तरह ही भगवान का नाम कहीं भी, किसी भी स्थिति में लिख जा सकता है। पर ध्यान में तो यह बात रहनी ही चाहिए कि मनोभूमि में सन्तुलन रखने एवं विक्षोभ उत्पन्न करने के वातावरण का असाधारण योगदान रहता है। उसकी अनुकूलता प्रतिकूलता अपना भला-बूरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती।
साधनाएं उसी प्रकार की है जैसा की पहलवानी को अखाड़े का आश्रम लेकर उस्तादी के देख-रेख में विशेष प्रकार की कसरतों के माध्यम से करनी पड़ती है। दंगल में कुश्ती पछाड़ने के लिए यही प्रक्रिया अपनाना पड़ती है। इस स्तर तक पहुँचने के लिए मात्र टहलने जैसी हलकी-फुलकी कसरतों से काम नहीं चलता।
साधना पुरुषार्थ किया जा सके- अन्तरंग को जगाने- सामर्थ्य को कुरेदने, उभारने, उछालने का साहस संजोया जा सके तो मनुष्य दिव्य दृष्टि सम्पन्न बन सकता है। किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में यह क्षमता अनायास प्रकट होती दिखाई पड़ती है। अपनी दिव्य दृष्टि के बलबूते वे भविष्य के विषय में कितने ही उद्घोष करते देखे जाते हैं। अपने समय पर जब वे शत-प्रतिशत सही उतरती हैं तो हर व्यक्ति को आश्चर्य होता है। अनायास प्रकट होने वाले भविष्य दर्शन की सामर्थ्य भी पूर्व जन्मों की साधना-पुरुषार्थ का ही प्रतिफल होती है।
साधना में मन्त्र विद्या के साथ जुड़े हुए अन्यान्य उपक्रमों को जोड़े देने से वह ब्राह्मी शक्ति के रूप में प्रकट होती है। अग्नि की सामर्थ्य तो सर्वविदित है, पर उसे प्रज्वलित देखने में सूखे ईंधन की आवश्यकता तो रहेगी ही। साधक की तत्परता, तन्मयता ईंधन का काम देती है। शरीर से तप करना होता है और मन को इष्ट में समर्पित किये रहना होता है। यही ध्यान धारणा है।
साधनात्मक पुरुषार्थ के सहारे अपनी यथार्थता को बढ़ाया है।
साधनात्मक प्रयोजनों में शब्द शक्ति का ही प्रयोग करना पड़ता है। जप, स्तवन कथा, मन्त्रोपचार, पाठ-कीर्तन, प्रवचन, आशीर्वाद, अभिचार आदि में शब्द का ही किसी न किसी रूप में प्रयोग होता है। नादयोग के माध्यम से ईश्वरीय सन्देश सुनने एवं अदृश्य जगत में चल रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने की बात बनती है। विज्ञान ने प्रकृति के अन्तराल से ऐसी ध्वनि तरंगें ढूंढ़ निकाली हैं जो अब तक के समस्त आविष्कारों की तुलना में अधिक सामर्थ्यवान शक्ति स्त्रोत उपलब्ध हुआ है। चेतना जगत तथा पदार्थ जगत के दोनों ही क्षेत्रों में उच्चस्तरीय अनुकूलताएं उत्पन्न करने तथा अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए शब्द शक्ति का जो विशेष विनियोग उपचार किया जाता है, उसी को मन कहते हैं।
साधना इसी को कहते हैं कि बीज अंकुरित हो, जड़ पकड़े जमीन से खुराक खाने और पत्तों के द्वारा हवा में साँस खींचने लगे।
साधना में पाँच यम और पाँच नियम प्रथम चरण माने गये हैं। वे न बन पड़ें तो प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि प्रयोगों का कोई तुक नहीं रह जाता। वर्णमाला, गिनती का आरम्भिक अक्षर ज्ञान न होने पर भी जो गणित और विज्ञान में एम.ए. करने की बात सोचता है वह भूल करता है। एक-एक सीढ़ी पार करते हुए ही तो क्रमशः छत पर चढ़ सकना सम्भव होता है।
साधना कर सकना भी अब सम्भव नहीं रहा। माचिस के प्रचलन ने लौह चुम्बक की रगड़ से आग उत्पन्न करने की प्रथा को अब एक प्रकार से निरस्त ही कर दिया है।
साधना प्रयोजनों में अर्थ संयम की व्रतशील तपश्चर्या में सम्मिलित रखा गया है।
साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है। मनोनिग्रह एवं एकाग्रता का दुहरा अभ्यास इच्छा शक्ति- संकल्प शक्ति को दृढ़ बनाने के लिए करना पड़ता है। ध्यान के विभिन्न साधना उपचार इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए किए जाते हैं। अलग-अलग मनःस्थिति के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग ध्यान उपचार बताए जाते हैं। इस प्रक्रिया को अपनाकर कोई भी अपने मन को इतना समर्थ और सशक्त बना सकता है ताकि उससे सामान्य से लेकर असामान्य प्रयोजन पूरा कर सके।
साधना समर में ही समग्र रूप से प्रयुक्त होती है। गीता रहस्य का असली महाभारत यही है जो अन्तराल के धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में लड़ा जाता है। भगवान इसी संग्राम के लिए अर्जुन को प्रोत्साहित करते हैं और युद्ध तथा योग की परस्पर संगति बिठाते हैं।
साधनात्मक प्रयोजनों में शब्द शक्ति का ही प्रयोग करना पड़ता है। जप, स्तवन, कथा, मंत्रोच्चार, पाठ, कीर्तन, प्रवचन, आशीर्वाद, अभिचार आदि में शब्द का ही किसी न किसी रूप में प्रयोग होता है। नादयोग के माध्यम से ईश्वरीय सन्देश सुनने एवं अदृश्य जगत में चल रही हलचलों की जानकारी प्राप्त करने की बात बनती है। विज्ञान ने प्रकृति के अन्तराल से ऐसी ध्वनी तरंगें-ढूँढ़ निकाली हैं जो अब तक के समस्त आविष्कारों की तुलना में अधिक सामर्थ्यवान शक्ति स्त्रोत उपलब्ध हुआ है। चेतना जगत तथा पदार्थ जगत के दोनों ही क्षेत्रों में उच्चस्तरीय अनुकूलताएं उत्पन्न करने तथा अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए शब्द शक्ति का जो विशेष विनियोग उपचार किया जाता है उसी को मन्त्र कहते हैं।
साधना से लेकर अपने सुपरचेतन को जगाने की साधना करनी पड़ी और उन्होंने वह सब कुछ पा लिया, जिसे मानव के लक्ष्य की चिरन्तन व्यास एवं समय की तत्कालीन आवश्यकता कह सकते हैं।
साधना मार्ग पर चलने वालों को चान्द्रायण साधना के लिए परामर्श दिया जाता है।
साधनाएँ ऐसी हैं जिनमें से एक को भी छोड़ा नहीं जा सकता। साथ ही यह भी है कि इनमें से किसी एक के सहारे लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव भी नहीं हो सकता। कमरे की चार दीवारों की तरह पलंग के चार पायों की तरह साधक स्तर की आत्म सत्ता विनिर्मित करने के लिए आत्मिक प्रगति के लिए उपरोक्त चार तप साधनाओं का समान रूप से नियोजन आवश्यक है। इन्हें चार वेदों का सार निर्देश कहा जाय तो भी अतिशयोक्ति न होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-November
साधना कर लेता है, वह उतना ही समर्थ-सफल एवं ऊँचे स्तर का बनता चला जाता है। इसकी गरिमा न समझ पाना, ‘स्व’ का बोध न होने से परावलम्बी स्वभाव का होना ही वस्तुतः वह अभिशाप है जो कई व्यक्तियों को गई-बीती, नर-पशु जैसी, स्थिति में रहने को विवश कर देता है। सृष्टा ने बीज रूप में वैभव का भाण्डागार अपनी इसी मानवी काया में सँजोकर रखा है। भूल इतनी ही होती है कि न इसे खोजा जाता है, न काम में लाने का बात ही बनती है। जब इस भूल के परिमार्जन के प्रयास चल पड़ते हैं तो इसे ‘आत्म ज्ञान’ कहते हैं।
साधना में आधा पक्ष परिशोधन का, आधा परिवर्धन का है, अतः उससे अस्पताल का ही नहीं अखाड़े का भी लाभ मिलता है।
साधनारत बनाने और अपनी प्रखरता उभारने के लिए इन दिनों कुछ विशेष प्रेरणायें दी जा रही हैं। शांतिकुंज को गायत्री तीर्थ के रूप में इसीलिए परिवर्तित किया गया है कि भविष्य में यहाँ साधना का कार्यक्रम एवं वातावरण ही बना रहे। आत्मशक्ति का उद्भव अपने युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसी के सहारे व्यक्ति तथा विश्व के भाग्य निर्माण का उपचार बन पड़ेगा।
साधनाओं कुण्डलिनी जागरण जैसी प्रक्रियाओं में इन चक्रों का वेधन-छेदन किया जाता है। सामान्यतया ये सुषुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। उनकी असीम सामर्थ्य का लाभ मनुष्य को नहीं मिल पाता। अशक्त एवं अभावग्रस्त बने रहने का यही कारण है। घर में सम्पत्ति गढ़ी पड़ी है।
साधना क्रम चला करेगा। इसी का छोटा संस्करण कम समय निकल सकने वालों के लिए दस-दस दिन की साधनाओं का बनाया गया है। वह अँग्रेजी महीनों की तारीखों से चला करेगा। हर महीने 1 से 10 तक, 11 से 20 तक, 21 से 30 तक दस दिवसीय लघु चान्द्रायण एवं लघु अनुष्ठान 24 हजार जप के चला करेंगे। एक महीने का, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक सवा लक्ष जप वाला पूर्ण चान्द्रायण माना जायेगा।
साधना किसकी? इसका उत्तर है उस देवता की जो मानव जीवन के रूप में हर व्यक्ति को सहज रूप में मिला है। इस कल्पवृक्ष की जो जितनी साधना कर लेता है, वह उतना ही समर्थ-सफल एवं ऊँचे स्तर का बनता चला जाता है। इसकी गरिमा न समझ पाना, ‘स्व’ का बोध न होने से परावलम्बी स्वभाव का होना ही वस्तुतः वह अभिशाप है जो कई व्यक्तियों को गई-बीती, नर-पशु जैसी, स्थिति में रहने को विवश कर देता है। सृष्टा ने बीज रूप में वैभव का भाण्डागार अपनी इसी मानवी काया में सँजोकर रखा है।
साधना का कार्यक्रम एवं वातावरण ही बना रहे। आत्मशक्ति का उद्भव अपने युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसी के सहारे व्यक्ति तथा विश्व के भाग्य निर्माण का उपचार बन पड़ेगा।
साधना मनोयोग पूर्वक श्रम से अर्जित उपलब्धियों के कारण। इसके लिये उन्हें दैवी मनुहार नहीं करनी पड़ी। अपने अन्दर उन्होंने स्वयं को टटोला- एक विपुल रत्नराशि का भण्डार पाया तथा स्वयं को उसके सदुपयोग की ओर नियोजित कर दिया। हंफ्री, डेवी, एलेग्जेंडर फ्लेमिंग, मैडम क्यूरी, एडीसन, आइन्स्टीन, कार्ल मार्क्स, सी.वी. रमन, जगदीश चन्द्र वसु, बाबा साहब आमरे, बाबा राघवदास जैसे कुछ उदाहरण ऐसे व्यक्तियों के हैं जिन्होंने वास्तविक अर्थों में जीवन देवता की साधना की।
साधनामय तप भरा जीवन॥
अनूठी शक्तियाँ उपहार में मिलती कहाँ से फिर।
अमर आनन्द-अमृतबेल तब फलती कहाँ से फिर॥
निरन्तर साधना से ही मिली है सम्पदा-अनुपम॥
साधना में निरत होना चाहिए।
साधना आरम्भ करे। हर दृष्टि से फलितार्थ इसी तथ्य के रूप में निकल कर आता है कि जिसने व्यक्तित्व के विकास की- अन्तः की सामर्थ्यों को जगाने- विकसित करने की- साधना कर ली, वही ‘सिद्ध पुरुष’ बन गया।
साधनायें सफल होती हैं। इस रहस्य को जितनी जल्दी समझा जा सके उत्तम है।
साधना का उद्देश्य है। यही वह तत्त्वदर्शन है जो एक नितान्त सामान्य जीवन जीने वाले को मात्र एक ही मोड़ मिलते ही असामान्य बना देता है।
साधनायें भी चलती रहती हैं जो साधक की स्थिति को देखते हुए सामयिक संकटों के निवारण एवं भविष्य के अनुकूलन को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती हैं।
साधना के लिए वातावरण, आहार एवं संपर्क में उच्चस्तरीय साधना के लिए वातावरण, साधना विधान तथा मार्गदर्शन भी उच्चस्तरीय ही होना चाहिए। यदि घर के कुसंस्कारी वातावरण, आहार एवं संपर्क में उच्चस्तरीय साधना बन पड़ती तो किसी को भी घर की सुविधा छोड़कर उपयुक्त स्थान की तलाश करने की आवश्यकता न पड़ती। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न अयोध्या छोड़कर हिमालय नहीं ही जाते। विश्वामित्र राज पाट छोड़कर हिमाच्छादित प्रदेश में क्यों जाते? पूजा पाठ तो घर पर भी चलता रह सकता था।
साधना से बच निकलने का कोई “शॉटकट” नहीं है।
साधना विज्ञान में खोज-बीन, अध्ययन, अन्वेषण की आवश्यकता होगी। नवीन जानकारियों के साथ-साथ इस प्रयास में असन्तुलनों को दूर करने, प्रकृति विक्षोभों से रोकथाम और सन्तुलन बनाये रखने के महत्वपूर्ण सूत्र हाथ लगने की पूरी-पूरी सम्भावना विद्यमान है।
साधना विधान में दो प्रकार की समाधियों का वर्णन आता है। मूर्च्छित एवं जागृत। प्रथम तो मनोवैज्ञानिक प्रयोग है व किसी-किसी के लिये ही सम्भव है। पर जागृत समाधि सर्वसुलभ है। इस समाधि का अर्थ है- बौद्धिक और भावनात्मक प्रवाहों का सन्तुलित ओर विवेकयुक्त बना लेना।
साधनायें निष्फल होती रहें।
साधना का साहस सँजोना पड़ता है। इसके फलस्वरूप ही भौतिक सिद्धियाँ, आत्मिक ऋद्धियाँ एवं दैवी विभूतियों से लाभान्वित होने की आशा की जानी चाहिए।
साधना से सिद्धि स्तर तक पहुँचने की आशा की जा सके। भोजन आधा कर देना ही पर्याप्त नहीं, आहार औषधि तुल्य सुसंस्कारी भी होना चाहिए। अब साधकों को प्रातः प्रायश्चित्त पंचगव्य औषधियों का क्वाथ (चाय), मध्याह्न, गौमूत्र परिशोधित हविष्यान्न की रोटी, दिव्य जड़ी बूटियों की चटनी तथा पकाने परोसने में सुसंस्कारों का समन्वय करने का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। इसे अध्यात्म उपचार की आहार चिकित्सा कहा जा सकता है।
साधना सम्पन्न होती है।”
साधना की है व प्रत्युत्तर में अनगिनत बहुमूल्य मणिमुक्तक पाये हैं। इससे वे स्वयं लाभान्वित हुये व अनेकों को लाभ पहुँचाया है।
साधना से अपना नया संसार बनाने वाले- ऐसे नर पुंगव इतिहास में अनेकों हुये हैं। महात्मा गाँधी शरीर की दृष्टि में तो क्षीण-दुर्बल थे। मात्र 16 पौंड की काया, पर प्रचण्ड मनोबल के धनी इस महामानव ने अपनी जीवन साधना से भारत का नव-निर्माण कर दिखाया। अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर एवं जार्ज वाशिंगटन भी ऐसे ही सामान्य व्यक्तियों में से थे। जीवनोद्देश्य को पहचान कर जब उन्होंने अपनी दिशा को मोड़ा तो ऐसे चले कि फिर पलटकर नहीं देखा।
साधना से भारत का नव-निर्माण कर दिखाया। अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर एवं जार्ज वाशिंगटन भी ऐसे ही सामान्य व्यक्तियों में से थे। जीवनोद्देश्य को पहचान कर जब उन्होंने अपनी दिशा को मोड़ा तो ऐसे चले कि फिर पलटकर नहीं देखा। सारी प्रतिकूलताओं से अकेले ही मोर्चा लेने की यह सामर्थ्य उनके भीतर से ही तो उपजी।
साधना करते समय अर्जुन की तरह ही अग्नि परीक्षा में से गुजरना होता है। विवेक भूमिका में जागृत आत्मा यदि अपने कषाय-कल्मषों को ही न मिटा सकी तो उसके जागरण का आखिर प्रयोजन ही क्या रहा? जिसके पास आत्म भूमिका में जागृत हुआ जीवन युक्त नर-नारायण है। उसके लिये संसार में कुछ भी असम्भव नहीं है। अध्यात्म के उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ने व ऋद्धि-सिद्धियाँ हस्तगत करने के लिये आत्म-जागृति ही प्रथम शर्त है।
साधना के लिए वातावरण, साधना विधान तथा मार्गदर्शन भी उच्चस्तरीय ही होना चाहिए। यदि घर के कुसंस्कारी वातावरण, आहार एवं संपर्क में उच्चस्तरीय साधना बन पड़ती तो किसी को भी घर की सुविधा छोड़कर उपयुक्त स्थान की तलाश करने की आवश्यकता न पड़ती। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न अयोध्या छोड़कर हिमालय नहीं ही जाते। विश्वामित्र राज पाट छोड़कर हिमाच्छादित प्रदेश में क्यों जाते? पूजा पाठ तो घर पर भी चलता रह सकता था।
साधना बन पड़ती तो किसी को भी घर की सुविधा छोड़कर उपयुक्त स्थान की तलाश करने की आवश्यकता न पड़ती। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न अयोध्या छोड़कर हिमालय नहीं ही जाते। विश्वामित्र राज पाट छोड़कर हिमाच्छादित प्रदेश में क्यों जाते? पूजा पाठ तो घर पर भी चलता रह सकता था।
साधना कहा जाता है।
साधना हम साध्य के प्रति कर नहीं पाये॥
बिठाना जिस हृदय में था परमप्रिय साध्य को अपने।
वहाँ पर कामनाओं के संजोते ही रहे सपने॥
परमप्रिय किस तरह आते न टूटा साधना का क्रम॥
साधना विधान को उसके वास्तविक स्वरूप में पू. गुरुदेव ने समझाने और अपनाने का प्रयत्न किया है। फलतः उन्होंने उसका समुचित प्रतिफल भी प्राप्त किया है। ‘साधना से सिद्धि’ का सिद्धान्त अक्षरशः सही है, इस तथ्य की प्रामाणिकता पू. गुरुदेव की उपलब्धियों को जांचने-परखने पर किसी को भी सहज विश्वास हो सकता है।
साधना क्रम में अविच्छिन्न समावेश है। इन अभ्यासों को योग साधना की संज्ञा दी गई है और मन क्षेत्र के परिष्कार, परिवर्तन, उन्नयन का लाभ दे सकने वाली व्यवस्था की गई है।
साधना समर में अपने ही अज्ञान असुर से ही तो लड़ना पड़ता है। कर्त्तव्य, धर्म व संघर्ष साथ-साथ जुड़े हैं। अतएव हे अर्जुन! चिरपरिचितों का- चिर सहचरों का मोह छोड़ और वह कर जिससे श्रेयस् की साधना सम्पन्न होती है।”
साधना की जाय।” इतना समझा, स्वीकार जा सके तो समझना चाहिये कि आत्म-विज्ञान की वर्णमाला याद हो गयी। अन्यथा बिना अक्षर ज्ञान सीखे स्नातक बनने का दिवास्वप्न देखने वालों को रोक कौन सकता है?
साधना की संज्ञा दी गई है और मन क्षेत्र के परिष्कार, परिवर्तन, उन्नयन का लाभ दे सकने वाली व्यवस्था की गई है।
साधना चान्द्रायण व्रत की है। यह पूर्णिमा से से पूर्णिमा तक एक महीने में पूरी होती है। इसमें आधा भोजन घटा देने का अर्ध उपवास तो अपनाना ही पड़ता है, साथ ही सवा लक्ष गायत्री पुरश्चरण भी करना होता है। इसके अतिरिक्त, साथ-साथ ऐसी अन्यान्य साधनायें भी चलती रहती हैं जो साधक की स्थिति को देखते हुए सामयिक संकटों के निवारण एवं भविष्य के अनुकूलन को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती हैं।
साधना की जाती है। अन्तःकरण को ब्रह्मा- मनःसंस्थान को विष्णु और काय कलेवर को रुद्र की उपमा दी गई है। यही तीनों व्यक्तिगत त्रिदेव हैं जिनके वरदान अभिशाप पर उत्थान-पतन की सारी सम्भावनाएँ अवलम्बित हैं।
साधना विधान तथा मार्गदर्शन भी उच्चस्तरीय ही होना चाहिए। यदि घर के कुसंस्कारी वातावरण, आहार एवं संपर्क में उच्चस्तरीय साधना बन पड़ती तो किसी को भी घर की सुविधा छोड़कर उपयुक्त स्थान की तलाश करने की आवश्यकता न पड़ती। राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न अयोध्या छोड़कर हिमालय नहीं ही जाते। विश्वामित्र राज पाट छोड़कर हिमाच्छादित प्रदेश में क्यों जाते? पूजा पाठ तो घर पर भी चलता रह सकता था।
साधना से सिद्धि’ का सिद्धान्त अक्षरशः सही है, इस तथ्य की प्रामाणिकता पू. गुरुदेव की उपलब्धियों को जांचने-परखने पर किसी को भी सहज विश्वास हो सकता है।
साधना उपचारों का दिग्दर्शन रहेगा जिसके सहारे आत्मा को परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठता जोड़ने ओर महत्वपूर्ण आदान-प्रदान करने में सफलता मिल सकती है। तीनों अंकों को मिलाकर अध्यात्म शिक्षा का एक समूचा पाठ्यक्रम बन जाता है। यदि इनमें भी समूचा प्रतिपादन आ सका तो मार्च अंक की बात भी सोची जा सकती है। कहना न होगा कि इस प्रस्तुतीकरण की विशिष्टता और उस आधार पर परिजनों को कुछ विशेष लाभ ले सकने की सम्भावना का ध्यान रखते हुए ही पत्राचार विद्यालय का नया झंझट सिर पर उठाया गया था। अब उस रहस्यमयी जानकारी को अखण्ड-ज्योति के अंकों में छाप कर सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाया जा रहा है।
साधना का यह अवलम्बन लिया जा सके- चक्रों को जगाया जा सके तो वायु में उठने वाले साइक्लोन और नदियों में पड़ने वाले भँवर से भी अधिक सामर्थ्यवान सिद्ध हो सकते हैं। जागृत सात चक्र सात देवों के रूप में मनुष्य को इतना अनुदान दे सकने में सक्षम हैं जिनको प्राप्तकर असामान्य शक्ति सम्पन्न बना जा सकता है। मनुष्य भौतिक एवं आत्मिक दोनों ही दृष्टियों से सम्पन्न बन जाता है।
साधना की एक पाठशाला है। पत्नी द्वारा बच्चों के लिए अपने सुखों की बलि दी जाती है। उनकी प्रसन्नता और विकास की बात सोची जाती है। उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति में जो कष्ट उठाया जाता है उसमें सन्तोष की अनुभूति होती है। यह आरम्भिक प्रशिक्षण है किन्तु जब अपने सगे सम्बन्धियों की प्रसन्नता के लिए उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रहता और आदर्शों की बलि दे दी जाती है तो वह प्रेम नहीं रहता, मोह बन जाता है।
साधनाओं का बनाया गया है। वह अँग्रेजी महीनों की तारीखों से चला करेगा। हर महीने 1 से 10 तक, 11 से 20 तक, 21 से 30 तक दस दिवसीय लघु चान्द्रायण एवं लघु अनुष्ठान 24 हजार जप के चला करेंगे। एक महीने का, पूर्णिमा से पूर्णिमा तक सवा लक्ष जप वाला पूर्ण चान्द्रायण माना जायेगा। इतने पर भी दोनों में अनुशासन, आधार एवं कार्यक्रम एक जैसे ही चला करेंगे।
साधना अन्तरंग और बहिरंग दोनों पक्षों को स्वस्थ समुन्नत बनाती है। झाड़ियों के स्थान पर उद्यान लगाना- वन्य पशुओं को पालतू बनाना- अनगढ़ को सुगढ़ में बदल डालना- ही संस्कृति है। इसी का चमत्कार इस दृश्य जगत में सर्वत्र बिखरा पड़ा है। अपने आपे को सद्गुणी की संपदा से लदा कल्पवृक्ष बना लेना- यही साधना का उद्देश्य है। यही वह तत्त्वदर्शन है जो एक नितान्त सामान्य जीवन जीने वाले को मात्र एक ही मोड़ मिलते ही असामान्य बना देता है।
साधनामय, सात्विक जीवन बिताते थे।
तभी तप-त्याग के बल पर “जगत गुरु” हम कहाते थे॥
उसी सामर्थ्य को हमने स्वयं बदनाम कर डाला॥
क्रियाओं मात्र को अध्यात्म का उपनाम कर डाला॥
न चल पाया हमारी आत्म-शोधन-साधना का क्रम॥
साधनाओं के सफल होने में विधि-विधान की कमी से देवता को अप्रसन्नता नहीं वरन् एकमात्र बाधा साधक के संचित कषाय-कल्मषों की भरमार है। इस जन्म के तथा पूर्व जन्म के संचित पाप कर्म अपना दण्ड प्रकट करना चाहते हैं। साधना से उस कर्मफल व्यवस्था का परिमार्जन हो सकता है। इसलिए संचित दुष्कर्म ही चित्त की चंचलता, अश्रद्धा, अन्यमनस्कता व्यतिरेक, आदि अनेक तरह की अड़चनें उत्पन्न करके ऐसी स्थिति बना देते हैं जिससे साधनायें निष्फल होती रहें।
साधना से शक्ति जागरण की प्रक्रिया जिस मार्ग से सम्पन्न होती है उसे सुषुम्ना कहते हैं। चक्र इसी पर अवस्थित होते हैं। आत्मोत्कर्ष की प्रक्रिया इसी मार्ग से सम्पन्न होती है। शास्त्रों में इसीलिए इसे देवयान मार्ग कहा गया है।
साधना’ कहते हैं। साधना किसकी? इसका उत्तर है उस देवता की जो मानव जीवन के रूप में हर व्यक्ति को सहज रूप में मिला है। इस कल्पवृक्ष की जो जितनी साधना कर लेता है, वह उतना ही समर्थ-सफल एवं ऊँचे स्तर का बनता चला जाता है। इसकी गरिमा न समझ पाना, ‘स्व’ का बोध न होने से परावलम्बी स्वभाव का होना ही वस्तुतः वह अभिशाप है जो कई व्यक्तियों को गई-बीती, नर-पशु जैसी, स्थिति में रहने को विवश कर देता है।
साधना से ही मिली है सम्पदा-अनुपम॥
साधना कर ली, वही ‘सिद्ध पुरुष’ बन गया।
साधना कर सकने वाले सुनिश्चित रूप से भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ उपलब्ध करते हैं। दूसरे भ्रमग्रस्त तो कल्पित देवी देवताओं के सामने नाक रगड़ते, मनुहार करते, दाँत निपोरते और अन्ततः निराश होकर खीजते अनास्था व्यक्ति करते देखे जाते हैं। विवेकवानों को वास्तविकता ही वरण करनी चाहिये भले ही वह कठोर या कष्टसाध्य ही क्यों न हो। नियति की व्यवस्था एक सुसंचालित सत्ता के हाथ में है। उसे किसी आतुर लालची की इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता।
साधना की।
साधना से उस कर्मफल व्यवस्था का परिमार्जन हो सकता है। इसलिए संचित दुष्कर्म ही चित्त की चंचलता, अश्रद्धा, अन्यमनस्कता व्यतिरेक, आदि अनेक तरह की अड़चनें उत्पन्न करके ऐसी स्थिति बना देते हैं जिससे साधनायें निष्फल होती रहें।
साधना के रंग में रंगा हुआ आश्रम तथा वातावरण इस योग्य बन गया है कि वहाँ रह कर की गई साधना से सिद्धि स्तर तक पहुँचने की आशा की जा सके। भोजन आधा कर देना ही पर्याप्त नहीं, आहार औषधि तुल्य सुसंस्कारी भी होना चाहिए। अब साधकों को प्रातः प्रायश्चित्त पंचगव्य औषधियों का क्वाथ (चाय), मध्याह्न, गौमूत्र परिशोधित हविष्यान्न की रोटी, दिव्य जड़ी बूटियों की चटनी तथा पकाने परोसने में सुसंस्कारों का समन्वय करने का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। इसे अध्यात्म उपचार की आहार चिकित्सा कहा जा सकता है।
साधना है। इस तथ्य की अपनाने वाला ही तत्त्वदर्शी- यथार्थवादी है। दूसरे तो भटकने-भटकाने वाले भर हैं। ‘सत्य’ को ही नारायण कहा गया है। सत्य की प्रथम किरण का दर्शन इसी रूप में होता है कि सफलता, सम्पदा एवं प्रसन्नता के आधार जहाँ-तहाँ ढूंढ़ने के लिये कस्तूरी हिरन जैसी थकाने वाली भ्रान्ति भगदड़ बन्द की जाय।
साधना विज्ञान और उसके प्रयोग उपचार पर सही अर्थों में विश्वास होता है। इन दिनों अध्यात्म विद्या के प्रति सन्देह और अविश्वास बढ़ता जा रहा है, निराशा का वातावरण बन रहा है, उसका कारण वह असफलता ही है जो आरम्भ तो बहुत उत्साहपूर्वक की गई किन्तु अंत में पूरी न हो सकी। इस असमंजस को दूर करने के लिए अखण्ड-ज्योति में लगातार अध्यात्म का सैद्धांतिक एवं प्रयोगात्मक “रहस्योद्घाटन” प्रतिपादन प्रकाशित होने जा रहे हैं। यह लेख माला दिसंबर 81 अंक से आरम्भ हो रही है और प्रायः एक साल तक चलेगी। इस प्रतिपादन को उनके अध्यात्म क्षेत्र के निजी अनुभवों का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है।
साधना का क्रम॥
साधना का अत्यधिक महत्व माना गया है। शान्तिकुंज के नव निर्मित गायत्री तीर्थ में यह सत्र इसी कार्तिक पूर्णिमा-11 नवम्बर से प्रारम्भ होंगे और भविष्य में निरन्तर चलते रहेंगे। यह दो प्रकार के होंगे (1) एक महीने के जो पूर्णिमा से पूर्णिमा तक सवा लक्ष गायत्री अनुष्ठान सहित (2) दस-दस दिन के लघुचान्द्रायण 24 हजार अनुष्ठान सहित। हर महीने 1 से 10, 11 से 20 और 21 से 30 तक। सभी परिजनों को परामर्श है कि जिन्हें जब आना हो शीघ्र आवेदन पत्र भेजकर अपना स्थान सुरक्षित करालें।
साधना के माध्यम से जीव की प्रसुप्ति को जागृति में बदला जाता है। उन्नयन, उत्कर्ष का अर्थ है- जीव को मूर्छा-वासना, तृष्णा एवं अहंता के अन्धकार से निकालकर स्वर्ग एवं मुक्ति के पथ पर बढ़ाना। देवयान मार्ग सुषुम्ना से उत्कर्ष का लक्ष्य पूरा किया जाता है। कुण्डलिनी जागरण का लक्ष्य है अधोगति में पड़ी जीवसत्ता को ऊर्ध्वगति प्रदान करना।
साधना” का पत्राचार पाठ्यक्रम माना जा सकता है। सभी पाठकों से प्रत्येक अंक दो बार पढ़ने और आवश्यक तथ्यों को डायरी में नोट करते रहने के लिये कहा गया है। जब पाठ्य सामग्री की पूर्णाहुति होगी तो पाठकों से कुछ प्रश्न पूछे जायेंगे। उत्तरों के आधार पर उन्हें चित परामर्श दिये जायेंगे। साथ ही जिनकी जानकारी परिपक्व मानी जायेगी उन्हें अंतरंग साधकों में पंजीकृत कर लिया जायेगा।
साधना सत्र लगाये जाया करेंगे। इन्हें दस वर्ष पूर्व के प्राण प्रत्यावर्तन सत्रों के समतुल्य समझा करेगा। प्रशिक्षण बहुत कुछ हो चुका है। जो शेष है उसे पत्रिकाओं के माध्यम से तथा पत्राचार से करने की बात सोची गई। समय कम-स्थान कम-और इच्छुक अधिक और आवश्यकता तात्कालिक एवं महान।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-April
साधना की आरम्भिक क्रिया द्विविध है- बाह्य और अंतरंग। बैठना दोनों में एक ही तरह से होता है। अन्तर मात्र ग्रहण व प्रेषण का होता हैं बाह्य-नाद को भी ब्रह्मनाद का श्रवण कहा जाता है।
साधना के सभी अभ्यासों का लक्ष्य उसी एक परम तत्व की अनुभूति है, जिसे भारतीय मनीषियों ने प्रणव ध्वनि, उद्गीथ, अनाहत ब्रह्मनाद आदि कहकर पुकारा है।
साधना का भी है। हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए। जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और सुसंतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है।
साधना के दोनों पैरों के सहारे चलना पड़ता है।
साधना है।
साधना-विधानों में एक महत्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उँगलियों से या शीशी वाली कार्क से इस प्रकार बन्द किया जाता है कि बाहर की वायु या स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि-आधार से विलग किया जाता है, और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतीन्द्रिय जगत से आने वाले शब्द प्रवाह को अंतःचेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेंद्रिय का, उसकी शब्द तन्मात्रा का योगदान तो रहता ही है। पर वह श्रवण वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनि लहरी सुनने के लिये है।
साधना के सहारे ब्रह्मांडीय चेतना से संपर्क स्थापित कर उससे चेतनात्मक आदान-प्रदान किया जाता है। साधना की आरम्भिक क्रिया द्विविध है- बाह्य और अंतरंग। बैठना दोनों में एक ही तरह से होता है। अन्तर मात्र ग्रहण व प्रेषण का होता हैं बाह्य-नाद को भी ब्रह्मनाद का श्रवण कहा जाता है।
साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया कि तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है।
साधना विज्ञान की समन्वयात्मक साधना विधा में इसी तथ्य का पूरी तरह समावेश हुआ है। इसलिए उसकी सरलता, यथार्थता और सफलता भी असंदिग्ध होती है। कुंडलिनी साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता दोनों के ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों क्षेत्रों में उसमें असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।
साधना ग्रन्थों में इसकी चर्चा इस प्रकार मिलती है।
साधना से शरीर की स्वस्थता और मन की एकाग्रता भले ही कुछ सीमा तक बढ़ सके, आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा, इसके लिए भावनाएं तरंगित करनी पड़ेंगी।
साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता दोनों के ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों क्षेत्रों में उसमें असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।
साधना का अलग अस्तित्व है, यह सोचना गलत है। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना भी अनुचित है। अस्तु, गायत्री की भावात्मक, क्रियाकाण्ड परक पूजा की जानी चाहिए। हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें तथा उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें। व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित रखते हुए ही हम आत्मिक प्रगति के मार्ग पर बढ़ सकते हैं तथा उसमें पूर्णता प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।
साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं, एक दूसरे के पूरक हैं तथा एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस प्रकार अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरा अकेला, असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर आरूढ़ होना ही उचित है।
साधना विज्ञान सम्मत प्रक्रिया का ही दिग्दर्शन है। दस देवियों के चित्रों में विपरीत रति उल्लेख हैं। उस समागम में शिव को नीचे और शक्ति को ऊपर बताया जाता है। जागृत अवस्था में कुँडलिनी की समर्थता और प्रमुखता का जीवन के हर क्षेत्र में छा जाना- यह इस चित्रण का संकेत है। वृहज्जावालोपनिषद् में इसकी चर्चा इस प्रकार है-
साधना की भिन्न-भिन्न प्रक्रियाओं में इस चेतना-ऊर्जा की किसी धारा विशेष को लेकर विस्तृत ढांचा खड़ा किया गया है।
साधना, अर्चना को ही अग्नि पूजा, यज्ञ-प्रक्रिया का आध्यात्मिक स्वरूप कहते हैं।
साधनाओं में, ज्योति अवतरण में प्राणाकर्षण प्राणायाम में सूर्य के समान तेजस्वी प्रकाश का ध्यान किया जाता है। सूर्य हमारे जीव जगत का केन्द्र है। सौर परिवार अपने इसी अभिभावक के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते हैं। अणु की संरचना भी इसी प्रकार की है कि उसकी तुलना सौर परिवार से की जा सकती है। अणु का नाभिक एक छोटा सूर्य है।
साधना मनोरंजक भटकाव ही कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक क्रियाकृत्यों को योगाभ्यास के आधार साधन मानना ही पर्याप्त है। उन कृत्यों को ही जादुई मान बैठना और उनकी प्रवीणता मिल जाने मात्र से लक्ष्य पूरा हो जाना मान लिया जाएगा तो यह विशुद्ध भ्रान्ति ही सिद्ध होगी। एक व्यक्ति दूसरे तक अपने मनोभाव पहुँचाने के लिए कागज कलम का प्रयोग करता है। यह उपकरण निश्चय ही बड़े महत्वपूर्ण हैं।
साधना से प्राण प्रयोग द्वारा, प्रज्वलित अग्नि के समान इस कुण्डलिनी शक्ति को जागृत किया जाता है। वह हृदयाकाश में सर्प की गति से बिजली जैसी चमकती है।
तथेति स होवाच-
साधना होनी चाहिए। आद्य शंकराचार्य ने वेदान्त परक ज्ञानयोग का ही मुख्य रूप से प्रतिपादन किया है, लेकिन उनके स्वयं के जीवन में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ी, सो उसके लिए कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया उन्हें भी अपनानी पड़ी। शंकराचार्य ने अपने कुण्डलिनी अनुभव ‘सौंदर्य लहरी’ नाम ग्रन्थ में किये हैं, जो अपने विषय का अनूठा धर्म ग्रन्थ है।
साधना है। अग्निहोत्र प्रक्रिया के पीछे इसी सूक्ष्म दर्शन का संकेत मिलता है। मनुष्य की महत्ता के विस्तार के सारे आयाम यज्ञ दर्शन में सन्निहित हैं।
साधनाओं के परिणाम स्वरूप मनुष्य में ऐसी अनेक विशिष्ट क्षमताएं उत्पन्न हो जाती हैं, जिन्हें चमत्कार ही कहा जा सकता है। योगदर्शन सहित अन्याय योग ग्रन्थों में इस प्रकार की कई सिद्धियों और चमत्कारी क्षमताओं का उल्लेख आता है जो साधारण मनुष्य को महामानव और अति मानव बना देती है।
साधना में आज्ञाचक्र के स्थान पर भृकुटि मध्य केन्द्र में सूर्य सदृश तेजस्वी प्रकाश का ध्यान किया जाता है। उच्चस्तरीय आध्यात्म साधनाओं में, ज्योति अवतरण में प्राणाकर्षण प्राणायाम में सूर्य के समान तेजस्वी प्रकाश का ध्यान किया जाता है। सूर्य हमारे जीव जगत का केन्द्र है। सौर परिवार अपने इसी अभिभावक के इर्द-गिर्द परिक्रमा करते हैं। अणु की संरचना भी इसी प्रकार की है कि उसकी तुलना सौर परिवार से की जा सकती है।
साधना एकांगी नहीं समग्र, समन्वित और उभयपक्षीय होनी चाहिए तथा सफलता का योग बनता है। इसके लिए ज्ञान और शक्ति की समन्वित साधना होनी चाहिए। आद्य शंकराचार्य ने वेदान्त परक ज्ञानयोग का ही मुख्य रूप से प्रतिपादन किया है, लेकिन उनके स्वयं के जीवन में भी शक्ति की आवश्यकता पड़ी, सो उसके लिए कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया उन्हें भी अपनानी पड़ी। शंकराचार्य ने अपने कुण्डलिनी अनुभव ‘सौंदर्य लहरी’ नाम ग्रन्थ में किये हैं, जो अपने विषय का अनूठा धर्म ग्रन्थ है।
साधना के क्रमिक अभ्यास पर प्रकाश डालते हुये कहा गया है-
साधना के समन्वित उपक्रम को योग भी कहा जा सकता है। योग का सामान्य अर्थ होता है जोड़ना। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देने की प्रक्रिया योग कहलाती है। इसमें उपासना और साधना दोनों का समान महत्व है। योग साधना में कई प्रकार के उपासनात्मक क्रियाकृत्य अपनाने पड़ते हैं।
साधनाएं सिखाईं। भिक्षुणी का संपर्क पाकर जूना के संस्कार जाग उठे और वह अपना काम मुस्तैदी से करते हुए भी बताई गईं साधना के लिए समय निकालने लगी। धीरे-धीरे उसकी साधना के सत्परिणाम सामने आने लगे और उसने अपने में यह अद्भुत क्षमता जागृत होती हुई अनुभव की। कुछ लोगों पर उसने प्रयोग भी किये जिसके आशाजनक परिणाम निकले। बस, उसने आध्यात्मिक चिकित्सा को ही अपने जीवन का मिशन बना लिया और प्राण-प्रण से इसी काम में जुट गई।
साधना का उपक्रम भी अनिवार्य रूप से जोड़े रखना चाहिए अर्थात् उसमें आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिए। उपासना और साधना का अलग अस्तित्व है, यह सोचना गलत है। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना भी अनुचित है। अस्तु, गायत्री की भावात्मक, क्रियाकाण्ड परक पूजा की जानी चाहिए। हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने कर्म एवं स्वभाव में सद्गुणों का समुचित समावेश करके दिव्य जीवन बनावें तथा उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें।
साधना के सत्परिणाम सामने आने लगे और उसने अपने में यह अद्भुत क्षमता जागृत होती हुई अनुभव की। कुछ लोगों पर उसने प्रयोग भी किये जिसके आशाजनक परिणाम निकले। बस, उसने आध्यात्मिक चिकित्सा को ही अपने जीवन का मिशन बना लिया और प्राण-प्रण से इसी काम में जुट गई। उसी का परिणाम है कि जूना पहले जिस रेस्तरा में काम करती थी, उसी शहर में एक विशेष क्लिनिक खोलने की व्यवस्था की जा रही है ताकि वह अपना काम अधिक व्यवस्थित ढंग से कर सके और उसकी इस चमत्कारी क्षमता अधिकाधिक लोग लाभ उठा सकें। जहाँ तक उसकी प्रामाणिकता का प्रश्न है, रूस के वे मूर्धन्य नेता भी जूना की इस असाधारण प्रतिभा का लोहा मानने लगे हैं, जो इस तरह की बातों का मखौल उड़ाया करते थे।
साधना में वास्तविक प्रगति संभव है।
साधना भी अन्योन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरा अकेला, असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर आरूढ़ होना ही उचित है।
साधना इस ऐतिहासिक अवसर पर उपलब्ध होने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यह अग्रणी समुदाय अपने साथी सहचरों की सहायता से 360 किश्तों तक नियमित रूप से हर दिन युग साहित्य पहुँचाने का प्रबन्ध कर सके तो पाठकों की संख्या आठ करोड़ चार लाख होती है। यह संख्या देश के अधिकांश शिक्षितों तक अपना आलोक पहुँचा सकेगी। इतने लोग नियमित रूप से इस प्रेरणा प्रवाह के साथ जुड़ सकें तो ऊर्जा उतने तक ही सीमित न रहेगी वरन् सूर्य किरणों की तरह क्रमशः व्यापक बनेगी। एक से दूसरे ते उछलती हुई समुद्र की लहरों की तरह विशाल क्षेत्रों में अपने अस्तित्व का परिचय देगी।
साधना के लिए समय निकालने लगी। धीरे-धीरे उसकी साधना के सत्परिणाम सामने आने लगे और उसने अपने में यह अद्भुत क्षमता जागृत होती हुई अनुभव की। कुछ लोगों पर उसने प्रयोग भी किये जिसके आशाजनक परिणाम निकले। बस, उसने आध्यात्मिक चिकित्सा को ही अपने जीवन का मिशन बना लिया और प्राण-प्रण से इसी काम में जुट गई। उसी का परिणाम है कि जूना पहले जिस रेस्तरा में काम करती थी, उसी शहर में एक विशेष क्लिनिक खोलने की व्यवस्था की जा रही है ताकि वह अपना काम अधिक व्यवस्थित ढंग से कर सके और उसकी इस चमत्कारी क्षमता अधिकाधिक लोग लाभ उठा सकें।
साधना में कई प्रकार के उपासनात्मक क्रियाकृत्य अपनाने पड़ते हैं। इनका उद्देश्य आत्म चेतना को परमात्म चेतना से जोड़ने वाली मनःस्थिति उत्पन्न करना है। इस तथ्य को ध्यान में रख कर चला जाय तभी लक्ष्य की पूर्ति होनी संभव है। यदि चेतना के परिष्कार का प्रयत्न न किया जाय और मात्र उन क्रियाकृत्यों को ही योगाभ्यास मान लिया जाय तो उस भ्रान्ति के कारण घोर परिश्रम करते रहने पर भी कोल्हू के बैल की तरह जहाँ के तहाँ बने रहना पड़ेगा। उपासनात्मक क्रियाकृत्यों में जप, ध्यान, नाद, एकाग्रता, तन्मयता, स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।
साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए। जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और सुसंतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है।
साधना विज्ञान के अनुभवी मनीषियों के कुंडलिनी जागरण की चर्चा करते हुए लिखा है-
साधना है। जिस प्रकार सीमारक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और बातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर करने की आवश्यकता पड़ती है। यही तत्परता साधना है।
साधना करें। तर्जनी उँगलियों से कानों के छेद बन्द रखें और अग्नि तत्व प्रेरित सूक्ष्म शब्दों को श्रवण करें। जब तक शब्द सुनाई न पड़े तब तक अभ्यास जारी रखें। प्रायः अभ्यास सातवें दिन से शब्द सुनाई पड़ता है।
साधना कई दृष्टियों से बड़ी महत्वपूर्ण है। प्रथम तो दिव्य संगीत के सुनने में इतना आनंद आता है, जितना किसी मधुर वाद्य या गायन को सुनने में नहीं आता। दूसरे इस नाद श्रवण से मानसिक तंतुओं का प्रस्फुटन होता है। सर्प जब संगीत सुनता है, तो उसकी नाड़ियों में एक विद्युत-लहर प्रवाहित हो उठता है। मृग का मस्तिष्क मधुर संगीत सुनकर इतना उत्साहित हो जाता है कि उसे तन बदन का होश नहीं रहता।
साधना विधि का उल्लेख शिवपुराण में इस प्रकार है-
साधना ये दोनों माध्यम अपनाने पड़ते हैं। इससे बच निकलने और सरल पगडंडियाँ ढूंढ़ निकालने के प्रयासों में सिवा आत्म-प्रवंचना के और कुछ हाथ नहीं लगता। सस्ते मोल से ईश्वर की प्राप्ति करा देने से लेकर कुण्डलिनी जगा देने तक के प्रलोभन देने वालों की कमी नहीं है। किन्तु स्पष्ट है कि उस प्रवंचना में भ्रम जंजाल के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। हमें अपनी रोटी आप खानी और पचानी पड़ती है।
साधना की इन क्रमिक प्रक्रियाओं के अभ्यास की चरम सार्थकता उस मूल ॐकार ध्वनि से पूर्ण तादात्म्य में है, जो सृष्टि मात्र के क्रिया-व्यापार का हेतु है। जो सृष्टि की समस्त शक्तिधाराओं का, ऊर्जा-प्रवाहों का केन्द्र एवं स्रोत है। व्यष्टि-सत्ता को समष्टि-केन्द्र से जोड़ने में समर्थ नाद-साधना के सभी अभ्यासों का लक्ष्य उसी एक परम तत्व की अनुभूति है, जिसे भारतीय मनीषियों ने प्रणव ध्वनि, उद्गीथ, अनाहत ब्रह्मनाद आदि कहकर पुकारा है।
साधना का प्रयोजन अपनी आत्मिक चेतना का विकास करने के साथ-साथ भौतिक जीवन को सुदृढ़ और सुविकसित बनाना भी है। इससे दानों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। योग्य साधन के क्षेत्र में जितनी ही सफलता मिलती जाती है मनुष्य उतनी ही मात्रा में उस वैभव को हस्तगत करता और उस पर आधिपत्य जमाता चलता है, जिसके प्रभाव को हम जड़ चेतन में अपने चारों ओर बिखरा हुआ अनुभव करते हैं। भौतिक जीवन तक ही अपने आपको सीमाबद्ध रखने के कारण मनुष्य दलील और दरिद्र होता जाता है, पर आत्मिक चेतना को यदि विकसित किया जा सके तो विराट् चेतना के साथ जुड़कर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती।
साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया कि तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है। जिस प्रकार सीमारक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और बातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर करने की आवश्यकता पड़ती है।
साधना में जितनी कुछ जैसी कुछ अनुभूति दे सकती हैं, उसे देकर समाप्त हो जायेंगी। भाव-विहीन साधना से शरीर की स्वस्थता और मन की एकाग्रता भले ही कुछ सीमा तक बढ़ सके, आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा, इसके लिए भावनाएं तरंगित करनी पड़ेंगी।
साधना से उसे आश्चर्यजनक सफलता मिली। उसे प्रेतात्माओं का प्रामाणिक संदेशवाहक माना जाने लगा। इस संदर्भ में ब्रिटेन के कई उच्चकोटि के वैज्ञानिक उससे अपना समाधान करने के लिए मिलने आने लगे और संतुष्ट होकर लौटे। इन ख्यातिनामा लोगों में ईवनिंग पोस्ट के सम्पादक विलियम कुलेन ब्रामेट, प्रसिद्ध उपन्यासकार विलियम थेकर, विख्यात रसायन विज्ञानी सर क्रुम्स जैसे मूर्धन्य लोगों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
साधना दोनों का समान महत्व है। योग साधना में कई प्रकार के उपासनात्मक क्रियाकृत्य अपनाने पड़ते हैं। इनका उद्देश्य आत्म चेतना को परमात्म चेतना से जोड़ने वाली मनःस्थिति उत्पन्न करना है। इस तथ्य को ध्यान में रख कर चला जाय तभी लक्ष्य की पूर्ति होनी संभव है। यदि चेतना के परिष्कार का प्रयत्न न किया जाय और मात्र उन क्रियाकृत्यों को ही योगाभ्यास मान लिया जाय तो उस भ्रान्ति के कारण घोर परिश्रम करते रहने पर भी कोल्हू के बैल की तरह जहाँ के तहाँ बने रहना पड़ेगा।
साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा तो निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया कि तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है।
साधना द्वारा एक अंश जब व्यक्तिगत जीवन में उपलब्ध कर लिया जाता है तो प्रगति की अनेक सम्भावना अप्रत्याशित रूप से सामने आ उपस्थित होती है- इसी अनुभव के आधार पर साधना विज्ञान के अनुभवी मनीषियों के कुंडलिनी जागरण की चर्चा करते हुए लिखा है-
साधना विधा में इसी तथ्य का पूरी तरह समावेश हुआ है। इसलिए उसकी सरलता, यथार्थता और सफलता भी असंदिग्ध होती है। कुंडलिनी साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता दोनों के ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों क्षेत्रों में उसमें असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-February
साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ होता है। अन्तरिक्षीय ब्रह्मांड की आध्यात्मिक एवं वैचारिक शक्तियाँ पृथ्वी के निवासियों को इस समय विशिष्ट अनुदान देती हैं। हिमालय के योगी अपनी श्रेष्ठ एवं सशक्त विचार और प्राणशक्ति को जन-कल्याण के लिये सम्प्रेषित करते हैं। ब्रह्ममुहूर्त के समय को सात्विक भाव विचार एवं कर्मों में एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। यदि आलस्य प्रमाद वश प्रातः जल्दी न उठा गया तो फिर बाद में तो और भी सुस्ती-उदासी आती है।
साधना और अभ्यास द्वारा इन क्षमताओं को जागृत कर अपूर्व शक्ति का स्वामी बना सकता है। किन्तु अधिकाँश मनुष्य शिश्नोदर परायण जीवन तक ही अपनी गतिविधियाँ सीमित रखते हैं और पेट तथा प्रजनन का सामान जुटाते-जुटाते ही इस संसार से कूचकर जाते हैं। अधिकाँश लोगों की कल्पना में यह बात आती ही नहीं है कि जिन्हें वे सिद्धियाँ और चमत्कार कहते हैं वे किसी व्यक्ति विशेष को दिये गये उपहार नहीं हैं, अपितु उनके बीज उनमें स्वयं ही निहित हैं। आवश्यकता केवल उन्हें सींचने और खाद पानी देकर अंकुरित भर करने की है।
साधना और अभ्यास द्वारा अपनी किन्हीं विशेष शक्तियों को जागृत कर लेते हैं। परमात्मा ने ऐसी शक्तियाँ किसी भी मनुष्य को पक्षपात से प्रेरित होकर नहीं दी हैं वरन् उसने अपने सभी पुत्रों को बिना किसी भेदभाव के इन सम्भावनाओं से पूरित बनाया है।
साधना सर्वोत्तम मानी गयी है।
साधना के लिए आवश्यक माने गये हैं। घुटन, सीलन, सड़न जहाँ रहती है वहाँ के अनुपयुक्त वातावरण में साधना का वह लाभ नहीं मिल पाता जो अभीष्ट है। खाली पेट यह साधना अधिक सफल होती है। यदि भोजन कर लिया हो तो एक दो घण्टे ठहर कर ही यह प्रयोग करना चाहिए।
साधनाओं का एक मात्र लक्ष्य है- हृदय को पवित्र बनाना। धर्म-ग्रन्थों का एकमात्र उद्बोधन है- जीवन को उत्कृष्ट करना। यह महानता हृदय की विशालता द्वारा ही सम्भव है। “बाइबिल’ में वर्णन है धन्य हैं वे लोग जिनके हृदय पवित्र हैं क्योंकि परमात्मा को पाने के सच्चे अधिकारी वही हैं।’’
साधना का विशाल कलेवर अन्तरंग को ही परिष्कृत करने तथा सम्वेदनाओं को विकसित करने के लिए खड़ा किया गया है।
साधना मानकर किया जाय, प्रतिफल की आशा किये बिना मनोयोगपूर्वक कर्म करने से कार्य-क्षमता, कुशलता आदि में अभिवृद्धि होती है। कार्य करते समय अंतर्मौन, श्वास के प्रति जागरूकता द्वारा ध्यान की अवस्था का विकास हो जाने पर अपने अनुभवों के प्रति सचेत रखकर स्फूर्ति को निरन्तर रखा जा सकता है।
साधना द्वारा उस क्षमता का विकास करना होता है। किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए पात्रता और शक्ति के विकास का यही नियम लागू होता है। इसीलिए निर्बलता को एक अपराध, एक पाप कहा गया है, जो पथभ्रष्ट करता और विपत्तियों के गर्त में धकेल देता है। प्रकृति के विधान में निर्बलता का कठोर दण्ड लिखा गया है। यदि उसे दूर नहीं किया गया तो दण्ड भाजन बनना ही पड़ेगा।
साधना में इन श्रवणातीत ध्वनियों का उत्पादन अतिरिक्त रूप से होता है और वे अपने क्षेत्र में असाधारण प्रभाव डालती हैं।
साधना विधान की उपयोगिता स्वीकार करता है। योग शब्द इन दिनों डरावना इसलिए बन गया है कि उसके प्रयोक्ता असामान्य और असामाजिक जीवन-क्रम अपना कर चलते दिखते हैं। सामान्य बुद्धि सोचती है इस पद्धति को अपनाने पर तो लोकप्रवाह से कट कर अलग-थलग रहना पड़ेगा और सहज जीवनचर्या से विरत होना पड़ेगा। इस शर्त पर ‘योगी’ बनना किसी को स्वीकार नहीं। यही कारण है योग की चर्चा तो आकर्षक लगती है, पर उस मार्ग पर चलने की हिम्मत पड़ना तो दूर इच्छा तक नहीं होती।
साधना द्वारा ही किया जा सकता है। संसार में ज्ञान का अभाव नहीं है, अभाव है उस बौद्धिक सामर्थ्य का जिसके कारण हम उसे प्राप्त करने में अक्षम हैं। शिक्षा साधना द्वारा उस क्षमता का विकास करना होता है। किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए पात्रता और शक्ति के विकास का यही नियम लागू होता है। इसीलिए निर्बलता को एक अपराध, एक पाप कहा गया है, जो पथभ्रष्ट करता और विपत्तियों के गर्त में धकेल देता है।
साधना का वह लाभ नहीं मिल पाता जो अभीष्ट है। खाली पेट यह साधना अधिक सफल होती है। यदि भोजन कर लिया हो तो एक दो घण्टे ठहर कर ही यह प्रयोग करना चाहिए।
साधना अधिक सफल होती है। यदि भोजन कर लिया हो तो एक दो घण्टे ठहर कर ही यह प्रयोग करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-March
साधना एक बिजली है, जिससे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के बल्ब दिव्य-ज्योति से जगमगाने लगते हैं। इस प्रकाश का सीधा प्रभाव अन्तरात्मा पर पड़ता है, जिससे उसकी सूक्ष्म चेतना जागृत हो जाती है और दिव्य संदेशों को, ईश्वरीय आदेशों को, प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझने की योग्यता उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार साधक का अन्तःकरण रेडियो का उदाहरण बन जाता है और उसके द्वारा सूक्ष्म जगत की बड़ी-बड़ी रहस्यमय बातों का प्रकटीकरण होने लगता है।
साधना से प्राप्त हुई अपनी शक्ति को संचित रखे। बुद्धिमान मनुष्य कभी उन शक्तियों को छोटे कार्यों में खर्च नहीं करते।
साधनात्मक प्रक्रिया में आहार शुद्धि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कई पदार्थों के संबंध में जो साधकों के लिए वर्जित हैं, कुछ समय पहले तक सीमित जानकारी थी। समझा जाता था कि नशीले पदार्थों का गुण खुमारी मस्ती तक ही सीमित है। इसलिए लोग थकान मिटाने गम गलत करने के लिए उनका सेवन करते थे। भांग, गांजा, चरस, अफीम, शराब जैसे नशीले पदार्थ इसी प्रयोजन के लिए पिए जाते थे, पर अब उनमें अन्य अनेक विशेषताएं नवीनताएं पाई गई हैं और देखा गया है कि वे ऐसी अनुभूतियाँ कराते हैं जो सामान्य चिन्तन से अलग बिल्कुल भिन्न प्रकार की होती है।
साधना करते-करते जब साधक का हृदय दिव्य पवित्रता से परिपूर्ण हो जाता है तो सूक्ष्म दैवी शक्ति जो व्यष्टि अन्तरात्मा और समष्टि परमात्मा में समान रूप से व्याप्त है, उस पवित्र हृदय पटल पर अपना कार्य आरम्भ कर देती है और साधक में कई दिव्य शक्तियों का जागरण होने लगता है।
साधना करते हुए भी कुछ विशेष क्षमताएं जागृत हो जाती हैं। मनीषियों ने उन क्षमताओं को कौतूहल वश प्रयोग में लाने के लिए कड़ाई के साथ मना किया है। भगवान बुद्ध के संबंध में प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपने एक शिष्य का स्वर्ण कमंडल तुड़वाकर नदी में फिंकवा दिया था, जो उसने अपनी अतीन्द्रिय क्षमता से लोगों को चमत्कृत करने के लिए प्राप्त किया था। इस से भगवान बुद्ध ने बड़ा रोष व्यक्त किया था और अपने सभी शिष्यों को एकत्रित करके यह प्रतिबंध लगा दिया था कि उनमें से कभी कोई आलौलिक चमत्कार न दिखाए। तान्त्रिक साधनाएं कर जल पर चलने की सिद्धि प्राप्त करने वाले एक अन्य योगी को उन्होंने यह कह कर निरुत्साहित किया था कि यह छोटी सी सफलता प्राप्त करने के लिए बारह वर्ष तक व्यर्थ श्रम किया।
साधनाओं से साधक की आत्म चेतना परिष्कृत होती है और उसमें कई विलक्षणताएं उत्पन्न हो जाती हैं परन्तु ऋषि मुनियों ने इन विलक्षणताओं पर गर्व करने से तो मना किया ही है, इनकी उपेक्षा का भी निर्देश किया है। योग साधना के परिणाम स्वरूप प्राप्त होने वाली सिद्धियों का उल्लेख करते हुए महर्षि पतंजलि ने कहा “ते समधाबुपसर्गा ....” (योग दर्शन 3।37) अर्थात् ये सिद्धियाँ यदि प्राप्त हों तो साधन को इनका त्याग कर देना चाहिए क्योंकि इससे साधना में विघ्न उत्पन्न होता है। सिद्धियों के आकर्षण में उलझ कर व्यक्ति अपने लक्ष्य को भूल जाता है तथा आत्मोद्धार के लिए प्रयत्न करना छोड़ देता है।
साधना-प्राकृतिक जीवन से संभव है।
साधना द्वारा जन सहयोग अर्जित करने के लिए जुटा दिया गया है। आशा की गई है जो बन गये हैं- जो बन रहे हैं- जो बनने वाले हैं वे प्रतिमा पूजन भर तक सीमित रहने वाले वर्तमान देवालयों से सर्वथा भिन्न होंगे और सिद्ध करेंगे कि धर्म तंत्र को पुनर्जीवित करने से जन-मानस को किस प्रकार सत्प्रवृत्तियों में नियोजित किया जा सकता है। उस निर्धारण में नव-निर्मित प्रज्ञा संस्थान कितनी बड़ी भूमिका सम्पन्न कर सकते हैं।
साधना व्यक्तिक चेतना को ब्रह्मांड चेतना से जोड़ने की प्रक्रिया है। उसी के संसर्ग संपर्क से उस दिव्य अग्नि का अभिवर्धन होता है जिसे साधना की सफलता और सिद्धि कहा जाता है।
साधना में यह कार्य ध्यान धारणा द्वारा एकाग्रता उत्पन्न करके भी किया जा सकता है। समाधि इस विज्ञान की चरम परिणित है। उसमें जो दिव्य-दर्शन होता है उसे सत्य का साक्षात्कार एवं ईश्वर सान्निध्य स्तर का समझा जा सकता है। उस स्थिति में विराट् ब्रह्मांड के सभी रहस्य अपने आप प्रकट होने लगते हैं। चेतना जगत की ब्रह्म सत्ता अपना अन्तराल उस स्थिति में साधक के सामने खोलकर रख देती है।
साधना की सफलता और सिद्धि कहा जाता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के प्रतिफल ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के के रूप में परिणित होते हैं। यह योगाभ्यास एवं तप साधन का ही एक छोटा रूप है जिसे हर शिक्षार्थी के लिए एक प्रकार से अनिवार्य ही कर दिया गया है।
साधना का नाम योग-साधना है। उचित उपाय करने से ही परम सत्य का साक्षात्कार संभव होता है।
साधना में विघ्न उत्पन्न होता है। सिद्धियों के आकर्षण में उलझ कर व्यक्ति अपने लक्ष्य को भूल जाता है तथा आत्मोद्धार के लिए प्रयत्न करना छोड़ देता है।
साधनाओं में आहार शुद्धि का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। यदि उस ओर ध्यान न दिया जाए और प्राणायाम, प्रत्याहार, नेति, धोति आदि आगे के क्रिया-कलाप में उलझा जाए तो वह समय पूर्व की बात की है। अक्षर ज्ञान सीखे बिना किसी बच्चे से कोई पुस्तक पढ़ने के लिए कहा जाना जितना नासमझी का काम है उतनी ही नासमझी आहार शुद्धि के बिना आत्मिक प्रगति की अपेक्षा रखने में है। आहार में मस्तिष्क और हृदय को, बुद्धि और भावनाओं को सात्विकता तथा शुद्धि की दिशा में अग्रगामी बनाने वाले तत्त्वों का समावेश न किया जा सके तो वह भूखे पेट फुटबाल खेलने जैसा ही उपहासास्पद होगा। आज आत्मिक प्रगति के लिए आहार शुद्धि पर पूरा-पूरा ध्यान देना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
साधना है। उचित उपाय करने से ही परम सत्य का साक्षात्कार संभव होता है।
साधना की दिव्य-ज्योति अधिकाधिक प्रकाशित होती चलती है और अन्तरात्मा की ग्राह्य शक्ति बढ़ती चलती है। रेडियो यंत्र के भीतर बल्ब लगे होते हैं, बिजली का संचार होने से वे जलने लगते हैं। प्रकाश होते ही यंत्र की ध्वनि पकड़ने वाला भाग जागृत हो जाता है और ईथर तत्व में भ्रमण करती हुई सूक्ष्म शब्द तरंगों को पकड़ने लगता है, इसी क्रिया को ‘रेडियो बजाना’ कहते हैं। साधना एक बिजली है, जिससे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के बल्ब दिव्य-ज्योति से जगमगाने लगते हैं। इस प्रकाश का सीधा प्रभाव अन्तरात्मा पर पड़ता है, जिससे उसकी सूक्ष्म चेतना जागृत हो जाती है और दिव्य संदेशों को, ईश्वरीय आदेशों को, प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझने की योग्यता उत्पन्न हो जाती है।
साधनान्यपि॥17॥
साधना का अभ्यास कर सके। प्राणवान वातावरण की प्रेरणा से अनुप्राणित हो सके।
साधना द्वारा उसे क्षमता को बढ़ाया जाय और ऐसे उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए उसका उपयोग किया जाये जिससे न केवल रुग्णता का निवारण संभव हो वरन् उत्कृष्टता का समग्र संवर्धन भी इस माध्यम से संभव हो सके।
साधना कर परमहंस स्थिति में पहुँचे जाने वाले महापुरुषों ने इस तरह की क्षमताओं का परिचय देने से सदैव इन्कार ही किया है। इस युग के महान संत और परम सिद्ध संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस के संबंध में विख्यात है, कि किसी व्यक्ति ने उनके पास जा कर पूछा था, ‘‘यदि आपने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है और ईश्वर का सिद्ध होना मानते हैं तो ऐसा कोई प्रमाण दीजिये जिससे उसके अस्तित्व का पता लगे।’’ प्रश्नकर्ता ने सहज जिज्ञासा के भाव से यह पूछा था। इसलिए रामकृष्ण ने उसका समाधान करते हुए कहा था कि इससे बड़ा चमत्कार क्या हो सकता है कि ‘‘इतना विराट् और विशाल जगत सुव्यवस्थित रीति से चल रहा है। चाँद है, सूरज है, तारे हैं, मैं हूँ, तुम हो, पशु पक्षी हैं, कीड़े-मकोड़े हैं यह कोई कम बड़ा चमत्कार है?
साधना के परिणाम स्वरूप प्राप्त होने वाली सिद्धियों का उल्लेख करते हुए महर्षि पतंजलि ने कहा “ते समधाबुपसर्गा ....” (योग दर्शन 3।37) अर्थात् ये सिद्धियाँ यदि प्राप्त हों तो साधन को इनका त्याग कर देना चाहिए क्योंकि इससे साधना में विघ्न उत्पन्न होता है। सिद्धियों के आकर्षण में उलझ कर व्यक्ति अपने लक्ष्य को भूल जाता है तथा आत्मोद्धार के लिए प्रयत्न करना छोड़ देता है।
साधना अर्चना कहा जा सकता है।
साधना कहा जा सकता है। विचारों की ज्योति की सीमा आपे नहीं है।
डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड
डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड पेज छूटा हुआ है। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड
डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड
साधनाएं कर जल पर चलने की सिद्धि प्राप्त करने वाले एक अन्य योगी को उन्होंने यह कह कर निरुत्साहित किया था कि यह छोटी सी सफलता प्राप्त करने के लिए बारह वर्ष तक व्यर्थ श्रम किया। नदी पार करने के लिए तो मल्लाह को कुछ पैसे दे कर नाव में बैठना ही पर्याप्त है।
साधनाएं भी कराई जाती रहेंगी जो आत्मबल के अभिवर्धन में, आतिथेय क्षमताएं उभारने में, कुसंस्कारों के निराकरण में, प्रखरता प्रतिभा संवर्धन में विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के प्रतिफल ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के के रूप में परिणित होते हैं। यह योगाभ्यास एवं तप साधन का ही एक छोटा रूप है जिसे हर शिक्षार्थी के लिए एक प्रकार से अनिवार्य ही कर दिया गया है।
साधना को इसीलिए शिव शक्ति की संयोग प्रक्रिया कहा गया है।
साधना करनी होती है। उसी साधना का नाम योग-साधना है। उचित उपाय करने से ही परम सत्य का साक्षात्कार संभव होता है।
साधना में क्रमबद्धता और पूर्णता आने लगती है वैसे-वैसे साधना की दिव्य-ज्योति अधिकाधिक प्रकाशित होती चलती है और अन्तरात्मा की ग्राह्य शक्ति बढ़ती चलती है। रेडियो यंत्र के भीतर बल्ब लगे होते हैं, बिजली का संचार होने से वे जलने लगते हैं। प्रकाश होते ही यंत्र की ध्वनि पकड़ने वाला भाग जागृत हो जाता है और ईथर तत्व में भ्रमण करती हुई सूक्ष्म शब्द तरंगों को पकड़ने लगता है, इसी क्रिया को ‘रेडियो बजाना’ कहते हैं। साधना एक बिजली है, जिससे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के बल्ब दिव्य-ज्योति से जगमगाने लगते हैं। इस प्रकाश का सीधा प्रभाव अन्तरात्मा पर पड़ता है, जिससे उसकी सूक्ष्म चेतना जागृत हो जाती है और दिव्य संदेशों को, ईश्वरीय आदेशों को, प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझने की योग्यता उत्पन्न हो जाती है।
साधना जैसे अध्यात्म योगाभ्यासों का अवलम्बन किया जाता रहा है, पर उसे उतना महत्व नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था। व्यक्तित्व में प्राण ऊर्जा का चुम्बकत्व इतनी मात्रा में भरा जा सकता है जिसे मनुष्य अपने को हर दृष्टि से अधिक प्रभावशाली बना सके, अधिक पुरुषार्थ कर सके, एवं अधिक सहयोग संपादित कर सके, अधिक सफलता सम्पादित करने में समर्थ हो सके।
साधनात्मक उपचारों का प्रतिपादन किया। उपासना को सर्वश्रेष्ठ अवलम्बन माना। जो एकाग्रता का एकाकी लक्ष्य ही नहीं सही दिशा में नियोजन का उद्देश्य भी पूरा करता है। मन उस परम सत्ता से जुड़कर ही टिका रह सकता तथा दृढ बन सकता है। एकाग्रता प्राप्ति के अन्यान्य माध्यम भी हो सकते हैं।
साधना प्रक्रिया चलाने लगता है, उसकी साधना में क्रमबद्धता और पूर्णता आने लगती है वैसे-वैसे साधना की दिव्य-ज्योति अधिकाधिक प्रकाशित होती चलती है और अन्तरात्मा की ग्राह्य शक्ति बढ़ती चलती है। रेडियो यंत्र के भीतर बल्ब लगे होते हैं, बिजली का संचार होने से वे जलने लगते हैं। प्रकाश होते ही यंत्र की ध्वनि पकड़ने वाला भाग जागृत हो जाता है और ईथर तत्व में भ्रमण करती हुई सूक्ष्म शब्द तरंगों को पकड़ने लगता है, इसी क्रिया को ‘रेडियो बजाना’ कहते हैं। साधना एक बिजली है, जिससे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के बल्ब दिव्य-ज्योति से जगमगाने लगते हैं। इस प्रकाश का सीधा प्रभाव अन्तरात्मा पर पड़ता है, जिससे उसकी सूक्ष्म चेतना जागृत हो जाती है और दिव्य संदेशों को, ईश्वरीय आदेशों को, प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझने की योग्यता उत्पन्न हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-June
साधना होगा जो विचारशील एवं भावनाशील प्रकृति का भी हो। इन लोगों को युग साहित्य एवं उसके पठन-पाठन से उत्पन्न सत्परिणामों से परिचित कराना होगा। साथ ही ऐसा प्रबन्ध भी करना होगा कि उनके पास बिना बुलाये प्रतिदिन एक नई पुस्तिका देने एवं पिछले दिन वाली को वापिस लाने का सिलसिला नियमित रूप से चलता रहे। इसके अतिरिक्त ‘प्रज्ञा अभियान मासिक पत्रिका’ भी बारी-बारी इन सबको पढ़ने के लिए मिलती रहनी चाहिए। इस प्रकार उन्हें नियमित रूप से उच्चस्तरीय प्राण प्रेरणा से अनुप्राणित युगान्तरीय चेतना के आलोक का लाभ नियमित रूप से बिना कुछ खर्च किये-घर बैठे मिलने लगेगा।
साधना, भक्त का ईष्ट मिलन इसी तरफ की साधना है।
साधना की प्रत्येक छोटी-बड़ी प्रक्रिया में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यों योग की मूल धारा मनःशास्त्र से संबंधित है और उस क्षेत्र की विकृतियों का निराकरण करने के उद्देश्य से ही विकसित हुई है, तो भी उसमें शारीरिक व्याधियों से छुटकारा दिलाने वाले कतिपय प्रयोग उपचार भी सम्मिलित हैं। इस प्रकार योग को एक समग्र चिकित्सा शास्त्र भी कहा जा सकता है।
साधना है। वही तपस्या भी है। तप का कष्ट यों दुःख जैसा प्रतीत होता है किन्तु उसमें असमर्थ की आंखों से टपकने वाली कातरता नहीं है। यह तो रुद्र तेज से उदीप्त आलोक है, ताप है, गति है, प्राण है, जिसने अनादिकाल से मानव के जीवन प्रवाह को गतिमान रखा है। यह दुःख मानव की दुर्बलता या असफलता का परिचायक नहीं है वरन् विकास का आधार है।
साधना की जा सके तो तुच्छ-सा दिखने वाला मनुष्य असीम सामर्थ्य का भाण्डागार बन सकता है।
साधना तो एक दो घण्टे बाहर निकलने से ही सम्भव हो सकता है। सभ्य परिवारों में प्रायः चार पाँच व्यक्ति ऐसे अवश्य होते हैं जिनकी आयु और बुद्धि इस सरल साहित्य को पढ़ने समझने योग्य हो। ऐसे-ऐसे 20 परिवारों से संपर्क साधने पर सौ का लक्ष्य पूरा हो जाता है। कई व्यक्ति पैसा दे सकते हैं समय नहीं। वे अर्थ व्यवस्था स्वयं जुटाते हैं और काम दूसरों से कराते रहें तो भी परस्पर सहयोग से वह गाड़ी चलती रह सकती है और वर्तमान एक लाख प्रज्ञा परिजन एक करोड़ की युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित करने का आलोक वितरण का कार्य भली प्रकार करते रह सकते हैं।
साधनाएं इस प्रयोजन के लिए निकली हैं। काया-कल्प जैसे नामों से कई प्रकार के ऐसे दावे प्रस्तुत किये गये हैं जिसमें दुर्बल काया को बलिष्ठ कर दिखाने की बात कही गई है। कसौटी पर इन दावों में से अधिकाँश खोटे निकले हैं। मात्र व्याधि निवारण के क्षेत्र में शल्य क्रिया विष दमन, प्रसुप्तीकरण के कुछ प्रयोग ही तात्कालिक राहत दिला सकने में प्रभावी सिद्ध हुए हैं। शेष उपचार तो अन्धे के हाथों बटेर पड़ने की तरह तीर-तुक्का भर हैं।
साधना का स्वर बनूँ मैं।
नींव का पत्थर बनूँ मैं॥
साधना है।
साधना विज्ञान का आश्रय लिया जा सके तो रोगोपचार ही नहीं कितनी ही सूक्ष्म शक्तियों को करतलगत किया जा सकता है और असाधारण क्षमता सम्पन्न बना जा सकता है।
साधना उन्हें व्यक्तिगत परामर्श अनुरोध से आगे बढ़ाना और अन्ततः ऐसे लोग ढूंढ़ निकालना जो अनेकानेक सृजन प्रयोजनों में हाथ बंटा सकें। यह है प्रज्ञा पुत्र योजना का आरम्भ, मध्य और अन्त। इसमें अपना रोल तो होना ही चाहिए, पर ध्यान यह भी रखा जाना है कि सुविस्तृत प्रयोजन के लिए असंख्यों का समर्थन एवं सहयोग उपलब्ध करना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसी लक्ष्य को सामने रखकर प्रज्ञापुत्रों के कदम आरम्भ में छोटे उठेंगे और क्रमशः अधिकाधिक भारी भरकम बनते चले जायेंगे।
साधना रूपी अध्यात्म उपचारों का आश्रय लिया जाता है, शास्त्रों में वर्णित वैज्ञानिक पद्धति से अपने जीवन को परिष्कृत समुन्नत बनाकर प्रतीति या प्रपंच जगत से ऊपर पहुँचने की स्थिति बनायी जाती है, तो जिस लीला जगत का दर्शन होता है, उसकी शब्दों में अभिव्यक्ति संभव नहीं। यह सब अपने ही अंदर है, इस वास्तविकता को भूलकर व्यक्ति सामान्यतया अपने को त्रिआयामीय जगत एवं इन्द्रिय सम्वेदनों तक ही स्वयं को सीमित कर लेता है। वस्तुस्थिति तक पहुँचे बिना ही सन्तुष्टि सामान्य जीवन क्रम वालों के लिए है। देवपुरुष महामानव इससे ऊँचा उठते हैं व स्वयं तो धन्य बनते ही हैं, दूसरों को भी कृतकृत्य करते हैं।
साधना पड़ा। वे दोनों काम ऐसे थे ही नहीं कि घर बैठे निजी पराक्रम के सहारे सम्पन्न हो जाते। दोनों कार्यों के लिए जिनमें से पूछा गया हो उन्होंने अनुकूल उत्तर दिया हो ऐसी बात नहीं थी। कुछेक ही काम के सिद्ध हुए शेष तो ऐसे ही अंगूठा दिखाते, मुँह पिचकाते और उपेक्षा व्यक्त करते रहे। अटूट श्रद्धा और प्रबल पुरुषार्थ संजोये रखकर पवन पुत्र ने लम्बी और कष्टसाध्य खोज का अपना उत्तरदायित्व पूरा कर लिया।
साधनात्मक निर्देश दिए थे। श्री अरविन्द जिन दिनों बड़ौदा में रह रहे थे, उन दिनों का एक अनुभव बताते हुए उन्होंने लिखा है कि एक बार जब वे अपनी गाड़ी में कैंप रोड से शहर की ओर जा रहे थे तब आमबाग के पास उन्हें लगा कि जैसे कोई दुर्घटना होने को हो। उस समय उन्होंने स्पष्ट देखा कि दुर्घटना को बचाने की बात मन में आते ही एक ज्योति पुरुष ऐसे प्रकट हुआ, मानो वह वहाँ पहले से विद्यमान था और उसने एक क्षण में ही स्थिति को अपने हाथ में लेकर सम्हाल लिया।
साधना विधान एवं तप उपचार भी कहते हैं। ब्रह्म विद्या भोजन है तो योगाभ्यास व्यायाम। स्वास्थ्य संवर्धन की प्रक्रिया अनुशासनपरक है। चिकित्सा उपचार में घुसी हुई विषाक्तता से निपटने की विधि व्यवस्था है। एक-दूसरे के पूरक होते हुए भी दोनों आत्म-निर्भर है।
साधना, उनके साथ स्नेह सूत्र जोड़ना और इस आधार पर उत्पन्न हुई घनिष्ठता की शालीनता एवं प्रगतिशीलता की दिशा में प्रेरणा देने हेतु प्रयुक्त करना। साहित्य और सत्संग का यह दुहरा सुयोग परोक्ष प्रभाव डालता है और पाठक को आत्म निर्माण एवं समाज निर्माण के लिए कुछ करने के लिए उमंगें उकसाता है। नियमित रूप से सींचने से पौधों की वृद्धि होती है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को ऐसा ही सुयोग मिले तो वे भी समुन्नत हुए बिना न रहेंगे।
साधनात्मक घनिष्टता अपनाकर परमात्मा बनती और वैसी ही अभिप्रेत होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-July
साधना उपचारों का यही लक्ष्य होता है- आन्तरिक परिष्कार एवं प्रवृत्तियों पर नियंत्रण। जप-तप, अनुष्ठान की कठोर साधनाएं इसीलिए की जाती हैं। साधन के विशाल उपक्रम इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए ही बनाये गये हैं। सबका एकमात्र लक्ष्य है- अन्तःप्रकृति पर नियंत्रण।
साधना के समन्वित केन्द्र चलाते थे। किशोर, गृहस्थ एवं अधेड़ व्यक्ति अपने-अपने परिस्थितियों का नये सिरे से पर्यवेक्षण करने तथा प्रगति के लिए सार्थक समाधान ढूंढ़ने के लिए पहुँचते थे। इन पहुँचने वालों को तीर्थयात्री कहा तो जाता था पर वस्तुतः वे पहुँचते तीर्थ सेवन के लिए थे। यह ‘सेवन’ -कायाकल्प जैसी रसायन का सेवन करने से भी अधिक फलप्रद सिद्ध होता था। यही है वह प्रक्रिया जिससे जन-जन को लाभ पहुँचाने के लिए महा मनीषियों ने ‘तीर्थ’ निर्धारण में अपनी तत्वदर्शिता का प्रयोग किया था।
साधनाओं से भी समन्वित रहते थे जो जीवन की दिशाधारा में- अन्तः करण की आस्था, अभिरुचि एवं आदतों में महत्वपूर्ण परिवर्तन कर सके।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चतुर्विध तीर्थ सेवन के रूप में उपलब्ध की जानी है। उसकी विस्तृत चर्चा तो अगले अंक में पढ़ी जा सकेगी। पर संक्षेप में इतना जाना जा सकता है कि एक महीने का सत्र तीर्थ सेवन सत्र होगा एवं पांच दिन का सत्र तीर्थ यात्रा सत्र, यह बात स्मरण रखने योग्य है कि जो भी आवें, लिखित स्वीकृति के बिना न आवें। न ही अपना कोई परिजन ऐसा पत्र लेकर बिना पूर्व अनुमति के किसी को भेजें।
साधना में ही बुद्धिमता है। तथ्य इसके विपरीत है। दूरवर्ती एवं चिरस्थायी, उज्ज्वल भविष्य का महत्व समझने की यदि टैलिस्कोप जैसी दूरदर्शिता हस्तगत हो सके तो प्रतीत होगा कि श्रेय साधन ही महत्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर है। चन्द्रमा की विशालता और आकाश गंगा की लघुता मध्यान्तर के कारण उत्पन्न हुई भ्रांतियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसी प्रकार वर्तमान में उलझे रहकर संकीर्ण स्वार्थों को ही सब कुछ मान बैठना और परम लक्ष्य की ओर ध्यान न देना अपने ढंग ही अदूरदर्शिता ही है।
साधना प्रयासों द्वारा ही सम्भव होती है। उसी प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी देव शक्तियों के साथ सम्बन्ध जोड़ना और उन्हें अनुग्रह बरसाने के लिए सहायता करना इन साधन प्रयत्नों के सहारे सुलभ बनता है।
साधना द्वारा उभारा, उछाला जा सके तो मनुष्य सिद्ध पुरुष चमत्कारी अलौकिक बन सकता है।
साधना का अवलम्बन लेना होगा। साधन के द्वारा जैसे-जैसे साधक ईश्वरीय प्रकाश के निकट पहुँचता है, वैसे-वैसे उसके मन के विकास दूर होते जाते हैं। लोभ-मोह की अन्ध-तमिस्रा परमात्मा सत्ता के प्रकाश के आलोक से तिरोहित हो जाती है। उस स्थिति में साँसारिक आकर्षण साधक को प्रभावित नहीं कर पाते। ‘मुक्त पुरुष’ जो अन्तरात्मा में विद्यमान है, ईश्वरीय प्रकाश के अवतरित होते ही अपने स्वतंत्र स्वरूप में प्रकाशित होता है।
साधना और एक से दस तक, ग्यारह से बीस तक और इक्कीस से तीस तक दस-दस दिवसीय साधना का समय निर्धारित रहेगा।
साधना का समय निर्धारित रहेगा।
साधनाएं प्रक्रियाएं नये सिरे से जोड़ी जा रही हैं जो तीर्थ के प्राचीन स्वरूप के जीवन्त दर्शन करा सकने में समर्थ हो सके। इस स्थापना को अगले दिनों युगान्तरकारी महाप्रयत्नों में प्रज्ञा पीठ निर्माणों की तरह ही मूर्धन्य एव ऐतिहासिक माना जायेगा।
साधनाएं करनी पड़ती हैं जो दुष्कर्मों की खाई को उसी स्तर के तप पुण्य से पूरी कर सकने में समर्थ हो सके। पापों के प्रतिफल इससे कम में नहीं छूटते। प्राचीनकाल में इस तथ्य को भली प्रकार समझा जाता था और क्रियामाण का निराकरण करने के लिए तीर्थों के उपयुक्त वातावरण में रोग के अनुरूप उपचार की नीति अपना कर प्रायश्चित्त तप का निर्धारण किया जाता था।
साधनाएँ, तपश्चर्याएं करने का भी सुयोग बैठता है जो प्रायश्चित्त का तीर्थ उद्देश्य पूरा कर सके और आत्म-विकास की दृष्टि से फलप्रद सिद्ध हो सके। ऐसे-ऐसे और भी अनेकों प्रत्यक्ष परोक्ष लाभ हैं जो तीर्थ यात्री के लिए उस प्रकरण में लगाये गये श्रम, समय एवं धन की तुलना में असंख्य गुने लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। यह तथ्य प्राचीन काल में सर्वविदित थे। फलस्वरूप तीर्थयात्रा पर जाने वालों को, लौटकर आने वालों का भावभरा स्वागत होता था उस प्रयास को दूरदर्शितापूर्ण समझा और भूरि-भूरि सराहा जाता था।
साधना मार्ग को अवरुद्ध करने वाले तरह-तरह के विघ्न उपस्थित करते रहते हैं।
साधनापरक भी बन सके। इस प्रकार की सुविधाएं विनिर्मित की जा रही हैं जो अब तक नहीं थीं। इस परिवर्तन एवं नवीन संस्थान में कई प्रकार के महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गये हैं। जो कार्य एक वर्ष में निपटना चाहिए था, उसे तीन महीने में निपटाने के लिए जो कुछ सम्भव था वह पूरी तत्परता के साथ करने के लिए समूची कार्य क्षमता एवं मुट्ठी की साधन-सामग्री को झोंक दिया गया है। आश्विन नवरात्रि से निर्धारित कार्य पद्धति विधिवत् चल पड़ेगी।
साधनाओं के लिए इस कारण से ही हिमालय में जाते हैं। इस वातावरण में शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का अपव्यय रुक जाता है। मानसिक समाधि का प्रयोजन भी यही है। ऐसी अवस्था में भोजन आदि की आवश्यकता भी कम पड़ती है। आज भी हिमालय पर ऐसे संत महात्मा हैं जो बिना भोजन किये रहते हैं अथवा बहुत कम खाद्य-सामग्री पर अपना काम चलाते हैं।
साधनाएं इसीलिए की जाती हैं। साधन के विशाल उपक्रम इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए ही बनाये गये हैं। सबका एकमात्र लक्ष्य है- अन्तःप्रकृति पर नियंत्रण।
साधना’ द्वारा जगाया जा सके तो वह इतना समर्थ है कि बिना किसी बाह्य साधनों के भी कार्य कर सकता है।
साधनारत रहते हैं। उस क्षेत्र में निकलकर कहीं बहार न जाने की मर्यादा को पालते और तपस्वी जीवन व्यतीत करते हैं। इसमें यदि क्रमबद्ध मार्गदर्शन भी जुड़ गया होता कार्यक्रम एक छत्र-छात्रा में नियंत्रण पूर्वक चलता तो प्राचीन काल के तीर्थ सेवन की एक झाँकी देखने का अवसर अभी भी मिल सकता था। मथुरा में वृज चौरासी कोस की यात्रा निकलती है। उसमें प्रायः ढाई महीने लगते हैं।
साधनाओं में प्राथमिकता ‘प्रायश्चित्त तप’ की दी गई है। पूजा उपचार पर प्रारब्ध कर्मों का निराकरण नहीं होता, मात्र उनका नया निर्माण रुकता है। क्रियामाण कर्मों की लम्बी दण्ड श्रृंखला से बचने का एक मात्र उपाय उपचार है- ‘प्रायश्चित’। प्राचीन काल में लोग पापों का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थों में जाते थे। आज तो इतना भर समझा जाता है कि देव-दर्शन, जल-स्नान भर से पाप छूट जाते हैं, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं।
साधना उपक्रमों का एकमात्र लक्ष्य यही है। जीवन के सभी व्यापार जाने-अनजाने इसी लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। पराधीनता मानवी प्रकृति के विरुद्ध है। उसे तोड़ने के लिए मनुष्य हर संभव प्रयास करता है। बड़ी-बड़ी राजनैतिक क्रांतियां परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ने के हुई हैं।
साधना जिसने कर ली, उसने जीवन में सतत् उत्साह, उमंग, उल्लास, सक्रियता, सेवा और आनंद भर लिया है। पवित्र प्रेम में सराबोर अन्तःकरण ही सच्ची आस्तिकता का परिचायक है।
साधना का प्रतिफल तुरन्त मिलता है और परमार्थ की परिणति कालांतर में होती है। इसी भ्राँति में मनुष्य यह सोचने लगता है कि तात्कालिक स्वार्थ साधना में ही बुद्धिमता है। तथ्य इसके विपरीत है। दूरवर्ती एवं चिरस्थायी, उज्ज्वल भविष्य का महत्व समझने की यदि टैलिस्कोप जैसी दूरदर्शिता हस्तगत हो सके तो प्रतीत होगा कि श्रेय साधन ही महत्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर है। चन्द्रमा की विशालता और आकाश गंगा की लघुता मध्यान्तर के कारण उत्पन्न हुई भ्रांतियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
साधना की दृष्टि से भी ठण्डा वातावरण अनुकूल पड़ा है। हिमालय के वातावरण की श्रेष्ठता का प्रतिपादन शास्त्रों में अनेकों स्थान पर मिलता है। स्वास्थ्य सम्वर्धन एवं साधनों में सफलता का दोहरा प्रयोजन इस दिव्य वातावरण में मिलता है। अनेक लोग, विशिष्ट साधनाओं के लिए इस कारण से ही हिमालय में जाते हैं। इस वातावरण में शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का अपव्यय रुक जाता है।
साधना द्वारा मनुष्य भीतरी और बाहरी जगत में विद्यमान सूक्ष्म शक्तियों के साथ संपर्क स्थापित करता है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ सभी में विद्यमान रहती हैं, पर उनकी सूक्ष्म सत्ता को अनुभव में लगाने था अभीष्ट प्रयोजन में प्रयुक्त करने की स्थिति साधना प्रयासों द्वारा ही सम्भव होती है। उसी प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी देव शक्तियों के साथ सम्बन्ध जोड़ना और उन्हें अनुग्रह बरसाने के लिए सहायता करना इन साधन प्रयत्नों के सहारे सुलभ बनता है।
साधना प्रयासों पर बल दिया गया है।
साधना कक्ष बनाया जा रहा है, जिसमें चौबीस साधक एक साथ बैठकर अखण्ड जप की वह संयुक्त साधना चलाते रह सकेंगे जिससे इस गायत्री तीर्थ का समूचा वातावरण उच्चस्तरीय प्राण प्रेरणा से निरन्तर अनुप्राणित बना रह सके।
साधना चलाते रह सकेंगे जिससे इस गायत्री तीर्थ का समूचा वातावरण उच्चस्तरीय प्राण प्रेरणा से निरन्तर अनुप्राणित बना रह सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-October
साधना या तपश्चर्या इसी को कहते हैं। साधना का बाह्य स्वरूप देखने पर ऐसा भ्रम होता है कि किसी बाहरी शक्ति से कुछ याचना की जा रही है और अभीष्ट वस्तु देने के लिए किसी बाहरी सत्ता के लिए नाक रगड़ने, गिड़गिड़ाने, लुभाने जैसी कुछ उथली बचकानी रीति-नीति अपनाई जा रही है। किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं। आत्म-सत्ता इतनी समर्थ है कि उसे थोड़ा-सा कुरेदने और थोड़ा-सा ईंधन डालने भर से चिनगारी को ज्वाला बनने में कोई कठिनाई पड़ने वाली नहीं है।
साधनाएँ अचेतन को किसी बड़ी छलाँग लगाने के लिए तत्पर करती हैं। यह व्यक्तित्व विकसित करने की प्रक्रिया है। जिसकी परिणति प्रतिभाओं, विशिष्टताओं, सफलताओं, सम्पन्नताओं के रूप में हस्तगत होती है। इसे लौकिक जीवन को ऋद्धि-सिद्धियों से भरा-पूरा बनाने वाला क्षेत्र कह सकते हैं।
साधना में निरत रहीं वैसा ही प्रयास वे मरने के उपरान्त भी करती रहती हैं। शरीर न रहने पर भी आत्मा का स्तर एवं रुझान मरणोत्तर जीवन में भी प्रायः वैसा ही बना रहता है।
साधना है आज मेरी।
साधना का प्राण जन-जन की अकथ पीड़ा घनेरी॥
साधना का अंग बन जाती है तो उसमें होने वाली रसानुभूति की तुलना में काम सेवन तुच्छ और हेय जान पड़ता है।
साधनाओं के संबंध में भी यही बात है।
साधना का प्राण जन-जन की अकथ पीड़ा घनेरी॥
साधना का बाह्य स्वरूप देखने पर ऐसा भ्रम होता है कि किसी बाहरी शक्ति से कुछ याचना की जा रही है और अभीष्ट वस्तु देने के लिए किसी बाहरी सत्ता के लिए नाक रगड़ने, गिड़गिड़ाने, लुभाने जैसी कुछ उथली बचकानी रीति-नीति अपनाई जा रही है। किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं। आत्म-सत्ता इतनी समर्थ है कि उसे थोड़ा-सा कुरेदने और थोड़ा-सा ईंधन डालने भर से चिनगारी को ज्वाला बनने में कोई कठिनाई पड़ने वाली नहीं है।
साधनाओं का अन्तर है। वैदिकी देव साधनाओं में मूल व्यतिरेक का दुष्परिणाम अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि जितने सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए उससे कम मिले या विलम्ब लगे। उलटकर हानि होने की तो किसी भी प्रकार आशंका नहीं की जा सकती।
साधना में आजीवन निरत पं. विष्णु दिगम्बर अपने पीछे सुयोग्य संगीत साधक छोड़ जाने के लिए प्रयत्नशील रहे। इस प्रयत्न की सफलता सन्तोषजनक नहीं दिख रही थी। इस पर उनके एक मित्र ने व्यंगपूर्वक पूछा- ‘इतनी मेहनत करके आखिर आपने कितने ‘तानसेन’ पैदा कर लिये?’
साधनाओं में मूल व्यतिरेक का दुष्परिणाम अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि जितने सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए उससे कम मिले या विलम्ब लगे। उलटकर हानि होने की तो किसी भी प्रकार आशंका नहीं की जा सकती।
साधना है आज मेरी॥
साधना विज्ञान में मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान और उनकी विलक्षणताओं के प्रकटीकरण की अनुभूत विधि-व्यवस्था का परिपूर्ण समावेश है।
साधना में प्राण-विद्युत के दोनों सिरों को मिला दिया जाता है। इस मिलन का चमत्कार वैसा ही होता है, जिस प्रकार नर-नारी के मिलन से एक नये उत्साह का, नये उत्तरदायित्व का और नये परिवार का आरम्भ होता है। कुण्डलिनी जागरण में मूर्छना की समाप्ति और चेतना की अभिवृद्धि ही नहीं, दो शक्ति ध्रुवों की मिलन प्रक्रिया भी सम्मिलित है।
साधना द्वारा ‘काम’ का रूपांतरण होता है। रूपांतरण का अर्थ है सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उल्लास का समावेश हो जाना।
साधना उपासना के क्षेत्र पर आक्रमण बोल दिया। इतना ही नहीं उसे भी बेतरह अपने चंगुल में फँसा लिया। दैनिक उपासना जैसे नित्य कर्मों के सम्बन्ध में भी यह शंका की जाने लगी कि कहीं भूल होने पर अनर्थ न होने लगे और इष्टदेव उस भूल से रुष्ट होकर उलटे आक्रमण पर न उतर आयें।
साधना उपासना की भक्ति माता भी ऐसी ही हैं। उसका आश्रय लेने पर कष्ट घटते हैं, बढ़ते नहीं।
साधना के प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन के लिये ‘प्रज्ञा अभियान’ पत्रिका का एक विशेषाँक इस आश्विन नवरात्रि पर प्रकाशित किया गया है। इसका साइज ‘अखण्ड-ज्योति’ के समान ही है एवं पृष्ठ संख्या 2 अंकों के बराबर। इसमें छपे लेखों पर प्रश्न पूछे जायेंगे व सही उत्तर भेजने वालों को ‘वरिष्ठ प्रज्ञापुत्रों’ की मान्यता मिलेगी। मान्यता प्राप्त ये वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र परिवार के अंतरंगों में गिने जायेंगे व आगामी विषम बेला में उनकी भूमिका मुख्य होगी। यह विशेषाँक संयुक्ताँक के रूप में ‘गायत्री तपोभूमि मथुरा’ से प्रकाशित किया गया है।
साधनाओं में शरीरगत, मनोगत विशिष्ट शक्तियों को उभारने वाली उत्तेजनाएँ उत्पन्न की जाती हैं और उस उफान का बिना नैतिक अनैतिक विचार किये मनचाहे उपचारों में प्रयोग किया जाता है। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि तंत्र प्रयोग के सभी प्रहार लक्ष्य आसुरी अनैतिक हैं। उस स्तर की शक्तियों का उपार्जन सृष्टा के कठिन एवं दुरूह कारण हैं, साथ ही उस क्षेत्र में प्रवेश करना भी खतरे से खाली नहीं रखा है।
साधना के आधार पर अर्जित की जाती है।
साधना मार्ग के संबंध में फैली हुई यह भ्रान्ति निरर्थक है कि यह प्रक्रिया देवी-देवताओं को चंगुल में फँसाकर उनसे चमत्कारी सिद्धि-वरदान झटक लेने के लिए प्रयुक्त की जाती है। वस्तुतः उस माध्यम से अचेतन और उच्च चेतन की रहस्यमय परतों को परिष्कृत समुन्नत किया जाता है। इसी क्षेत्र में अगणित अतीन्द्रिय क्षमताएँ और व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बना देने वाली विभूतियाँ छिपी पड़ी हैं। उनका जागरण उन्नयन होने से मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक समुन्नत सुसंस्कृत बनता है और देवोपम बनने की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होता है। साधना विज्ञान में मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान और उनकी विलक्षणताओं के प्रकटीकरण की अनुभूत विधि-व्यवस्था का परिपूर्ण समावेश है।
साधनाओं में भावनाओं का नहीं क्रियाओं का महत्व माना जाता है। उनमें चरित्र को नहीं दुस्साहस के रूप में विकसित किये जाने वाले मनोबल मात्र का चमत्कार है। मशीनों में भावना नहीं क्रिया होती है। इस क्रिया शक्ति को ही जड़ पदार्थों में सन्निहित कार्यरत पाया जाता है। ताँत्रिक साधनाओं में शरीरगत, मनोगत विशिष्ट शक्तियों को उभारने वाली उत्तेजनाएँ उत्पन्न की जाती हैं और उस उफान का बिना नैतिक अनैतिक विचार किये मनचाहे उपचारों में प्रयोग किया जाता है।
साधना विधान का प्राथमिक ढाँचा इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सृजा गया है कि उस उपचार से अन्तःचेतना के अभ्यासों को बदलने, सुधारने एवं ढालने की प्रक्रिया चल पड़े। वस्तुतः यही परम पुरुषार्थ है। उपेक्षा के गर्त में गिराये हुए अचेतन का यदि सही मूल्याँकन किया जा सके और उसे मानवी गरिमा के अनुरूप आदतें अपनाने के लिए सहमत किया जा सके तो समझना चाहिए कि सर्वतोमुखी प्रगति के द्वार खुल गये। एक ऐसा समर्थ साथी मिल गया जिसकी सहायता से आसमान तक ऊँचा उठ सकना सम्भव हो सके। परिष्कृत अचेतन को यदि अंगद-हनुमान की, नल-नील की, भीम-अर्जुन की उपमा दी जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
साधना द्वारा उस दिव्य चेतना को विकसित करने में एक बड़ी सीमा तक सफल हुए थे। इन दिनों चूँकि क्षमताओं को जागृत करने की वह विद्या लुप्त हो गई है इसलिए इन्हें बाजीगरी, हाथ की सफाई, जादुई करतब और मनोरंजन चमत्कार के समतुल्य माना जाने लगा। कुछ धूर्त लोगों ने मूर्खों को भ्रमग्रस्त करने और उन्हें ठगने के लिए, स्वार्थ साधन के लिए तथाकथित चमत्कार प्रस्तुत किए और लोगों में योग विज्ञान के प्रति अश्रद्धा बढ़ने लगी। इसे अवैज्ञानिक और ‘सूडोसाइन्स’ का फतवा देने वालों की आज सर्वत्र भरमार है। परन्तु इस संबंध में अब जो तथ्य सामने आते जा रहे हैं उनके कारण अतीन्द्रिय चेतना वैज्ञानिक आधार पर भी प्रामाणित होने लगी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-August
साधना बता देना अवैज्ञानिक एवं अनुपयुक्त होता है। दूसरे लोग ऐसी भूल करें या करायें पर गम्भीर पर्यवेक्षण करने वाले “सब धान बाईस पसेरी” नहीं कर सकते। सबको एक लाठी से नहीं हाँक सकते। इस सम्बन्ध में होम्योपैथी निदान प्रक्रिया की सराहना करनी पड़ती है। जिसमें एक ही नाम से प्रख्यात रोगों का लक्षण भेद से वर्गीकरण करना और तदुपरान्त औषधि निर्धारण के निश्चय पर पहुँचना पड़ता है।
साधना के लिए अभीष्ट वातावरण एवं कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले प्राणवान केन्द्रों की भूमिका निभाते थे।
साधना स्वाध्याय, संयम, सेवा की चतुर्विधि प्रक्रिया उसकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति जान लेने के उपरान्त पृथक-पृथक स्तर की बनाई और बताई जायेगी। रोगियों की स्थिति देखकर पृथक-पृथक प्रकार के उपचार किये जाते हैं। इसी प्रकार इन साधना उपचारों के सम्बन्ध में भी समझा जाना चाहिए। सभी साधकों को एक जैसी साधना बता देना अवैज्ञानिक एवं अनुपयुक्त होता है। दूसरे लोग ऐसी भूल करें या करायें पर गम्भीर पर्यवेक्षण करने वाले “सब धान बाईस पसेरी” नहीं कर सकते।
साधना उपचार के अनेकानेक उपचार उसी प्रयोजन को पूरा करने के लिये किये जाते हैं।
साधना का अलख जगाते रहना शक्य होता रहे। उनमें कार्यकर्ता भर रहते हैं। कभी कोई परिव्राजक प्रचारक आ पहुँचे तो उसके लिए निवास, भोजन का प्रबन्ध भी मिल सके।
साधना समर में प्रवेश करने का साहस न करना ही श्रेयस्कर है।
साधना क्षेत्र का प्रारम्भिक उपचार है। इस प्राइमरी स्कूल को पास करने के बाद ही माध्यमिक, उच्चस्तरीय एवं स्नातकीय कक्षाओं में प्रवेश पाने का अवसर मिलता है। अन्नमय कोष का ही परिशोधन न हो सका तो फिर प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों के उच्चस्तरीय देव लोकों में प्रवेश पाने का अवसर कैसे मिलेगा?
साधना उपचारों के सम्बन्ध में भी समझा जाना चाहिए। सभी साधकों को एक जैसी साधना बता देना अवैज्ञानिक एवं अनुपयुक्त होता है। दूसरे लोग ऐसी भूल करें या करायें पर गम्भीर पर्यवेक्षण करने वाले “सब धान बाईस पसेरी” नहीं कर सकते। सबको एक लाठी से नहीं हाँक सकते। इस सम्बन्ध में होम्योपैथी निदान प्रक्रिया की सराहना करनी पड़ती है।
साधना का महत्व शिक्षण की तुलना में कहीं अधिक है। शिक्षण मात्र मस्तिष्क भर को प्रभावित करता है। उसे इतना सोचने भर का अवसर प्रदत्त करता है कि किस तर्क के आधार पर क्या सोचना उचित हो सकता है। इससे पूर्व मान्यताओं में अन्तर आने जितना प्रयोजन सध सकता है, किन्तु इतने भर से उन रुझानों, अभ्यासों एवं आदतों पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता जो अनुपयुक्त होते हुए भी स्वभाव का अंग बनकर रह रही हैं और तर्क की दृष्टि से मात खाते हुए भी टस से मस होने का नाम नहीं लेतीं।
साधना के संदर्भ में भी लागू होता है। उसमें व्यक्ति विशेष के संग्रहित संस्कार, स्वभाव अभ्यास, रुझान का पता लगाना होता है। आज की परिस्थितियों का पर्यवेक्षण किया जाता है।
साधना पद्धति भी जुड़ी हुई है। साधना का महत्व शिक्षण की तुलना में कहीं अधिक है। शिक्षण मात्र मस्तिष्क भर को प्रभावित करता है। उसे इतना सोचने भर का अवसर प्रदत्त करता है कि किस तर्क के आधार पर क्या सोचना उचित हो सकता है। इससे पूर्व मान्यताओं में अन्तर आने जितना प्रयोजन सध सकता है, किन्तु इतने भर से उन रुझानों, अभ्यासों एवं आदतों पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता जो अनुपयुक्त होते हुए भी स्वभाव का अंग बनकर रह रही हैं और तर्क की दृष्टि से मात खाते हुए भी टस से मस होने का नाम नहीं लेतीं।
साधना काल को प्रकारान्तर से काया-कल्प जैसा उपचार कह सकते हैं। आयुर्विज्ञानी जानते हैं कि इस उपचार में रोगी को उपचार के पूरे चालीस दिन का इससे भी लम्बी अवधि में एक पर्णकुटी में रहना पड़ता है। उसे बाहर निकलने का अवसर नहीं मिलता। उसी छोटी दुनिया में कैदी की तरह अपनी दिनचर्या गुजारनी पड़ती है। जेल को भी सुधार गृह कहते हैं।
साधना के इच्छुकों को इसी प्रयोजन के लिये बने हुए आवेदन पत्र मंगाकर उसको भरना और स्वीकृति प्राप्त होने पर पहुँचना होगा। इन कक्षाओं में मनोकामनापूर्ण करने, चुटकी बजाते-जादू चमत्कार देखने, शारीरिक, मानसिक रोगों का इलाज करा लेने, आपत्ति से बचकर कुछ समय दिन काटने जैसी उथली मनःस्थिति के एक भी व्यक्ति को प्रवेश नहीं मिलेगा। क्योंकि उनकी आतुरता प्रकारान्तर से अर्ध-विक्षिप्तता उत्पन्न किये रहेगी और वे साधना का महत्व न समझकर किसी प्रकार अपना लौकिक मनोरथ पूरा करने का ताना-बाना बुनते रहने में निरत रहेंगे। फलतः मूल प्रयोजन की दिशा में एक कदम भी बढ़ सकना उनके लिये सम्भव न हो सकेगा। ऐसी दशा में साधकों को ही नहीं, साधना विज्ञान को भी इसके आयोजकों को भी अपयश का भागी बनना पड़ेगा।
साधना के निमित्त अभी भी किया करते हैं। जहां साधना में सच्चाई है वहाँ अभी भी इस प्रकार के अनुबन्ध लगाते देखे जा सकते हैं। गुजरात में मोटा महाराज के सूरत और नडियाड आश्रमों में इसी प्रकार साधना काल में नियत कोठरी में ही कहने का नियम है।
साधना काल का तीसरा प्रयोग है- आहार। वह न केवल सात्विक, सीमित होना चाहिए वरन् संस्कारवान् भी रहना चाहिए। अन्न का मन पर प्रभाव पड़ने की बात को सभी जानते हैं। कुसंस्कारी आहार करते रहने पर किसी की भी उच्चस्तरीय साधना सफल नहीं हो सकती। इसलिये भोजन न केवल अपने हाथ बनाना होगा, वरन् उसके सम्बन्ध में जुड़ी हुई मान्यताओं, आदतों और स्वादों को भी बदलना होगा।
साधना में रत साधकों को भी प्रकृति के भण्डार से जीवित रहने के लिए कुछ न कुछ भोज्य पदार्थ के रूप में ग्रहण करना पड़ता है। अस्तु, यह निर्विवाद सिद्ध होता है, हर व्यक्ति को निर्वाह के लिए न्यूनतम साधन चाहिए।
साधना प्रयासों द्वारा अनुभव किया जाता था। फलतः भटकाव की भ्रान्ति की सम्भावना नहीं रहती थी।
साधना स्वल्पकालीन ही हो सकती है। इन व्यस्तता के दिनों में तो उसकी अवधि एक महीने मानी जाय तो उतना ही अवकाश कठिनाई से ही निकल सकेगा। सामान्यता यह दस दिन का भी हो सकता है। प्राचीनकाल में वह समय अपेक्षाकृत अधिक ही रहता होगा क्योंकि उन दिनों न तो आवश्यकताएं इतनी बढ़ी-चढ़ी थीं और न उनकी पूर्ति में आज जैसी दिन-रात मारामारी करनी पड़ती थी। कृषि, पशु-पालन से आजीविका, उपार्जन संयुक्त कुटुम्ब के नर-नारी, जवान बाल-वृद्ध किसी प्रकार मिलजुल कर चला लेते थे, पर आज के गृहस्थ के सूत्र-संचालकों को निरंतर खटना खपना पड़ता है।
साधना के संबंध में भी है। उसमें दुहरी तैयारी करनी होती है। निजी व्यक्तित्व उभारने वाली आत्मोत्कर्ष की साधना तथा अगले दिनों जिस स्तर की सेवा साधना अपनानी है उसके लिए परिस्थितियों के अनुरूप कौशल तथा अनुभव प्राप्त करना। आरण्यक इसी दुहरी क्षमता को अर्जित करने की साहसिक साधना के लिए अभीष्ट वातावरण एवं कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले प्राणवान केन्द्रों की भूमिका निभाते थे।
साधना में सच्चाई है वहाँ अभी भी इस प्रकार के अनुबन्ध लगाते देखे जा सकते हैं। गुजरात में मोटा महाराज के सूरत और नडियाड आश्रमों में इसी प्रकार साधना काल में नियत कोठरी में ही कहने का नियम है।
साधना की जमीन पर सफलता के बीज नहीं बोये जा सकते। खेती करते समय किसान जमीन की कठोरता अथवा कोमलता नहीं देखता, वह हल जोतता है और जमीन फाड़ता है। यदि एक बार में जमीन की मिट्टी भुरभुरी नहीं होती तो दुबारा वैसा ही प्रयत्न करता है। लेकिन सफलता के लिए अभीष्ट प्रयत्न करने में मनुष्य यह सोचकर क्या हार जाता है कि उसके ग्रह खराब हैं।
साधना केंद्रों के रूप में स्थापित एवं विकसित किए गये थे जिनसे अन्तराल की गहरी परतों का उपचार, परिष्कार एवं उत्कर्ष संभव हो सके। इस प्रक्रिया को एक प्रकार से उपयोगी वातावरण में बने हुए साधन-सम्पन्न तथा मूर्धन्य चिकित्सकों से भरे-पूरे ‘सेनेटोरियमों’ की उपमा दी जा सकती है। अन्तर इतना ही है कि वे उपचार केन्द्र मात्र स्वास्थ्य लाभ भर दे सकते हैं। जबकि तीर्थों से न केवल चिन्तन को मोड़ने-मरोड़ने वाली स्वाध्याय, सत्संग जैसी परिचर्या चलती है वरन् मेजर आपरेशनों जैसी, प्लास्टिक सर्जरी जैसी सुविधा भी रहती है। अन्तराल को, अचेतन मन के रहस्यमय क्षेत्रों को सुधारने संभालने का कार्य तीर्थों में होता रहा है।
साधनाओं के माध्यम से ही सरल, सम्भव है।
साधना शिक्षा एवं मनीषियों के परामर्श से समस्याओं का समाधान एवं उत्कर्ष का निर्धारण प्रमुख करण रहा है। गुरुकुलों, आरण्यकों और निर्धारण सत्रों के रूप में व्यक्तित्वों के परिष्कार की प्रक्रिया इतनी महत्वपूर्ण है कि उसके लाभों को देखते हुए प्रयुक्त होने वाले श्रम, समय, धन की सार्थकता बिना, किसी ननुनच के स्वीकार किया जा सकता है। किन्तु बात इतने भर से ही समाप्त नहीं होती। वहाँ समय-समय पर होते रहने वाले पूर्व आयोजन एक प्रकार से बिना नियंत्रण के विशिष्ट स्तर के व्यक्तियों के लिए भाव भरे सम्मेलनों की तरह व्यवहृत होते थे। आज की तरह उन दिनों डुबकी मार, दर्शन झाँक, पैसा फेंक वाले भगदड़ के रूप में पर्व मनाये जाते थे वरन् उन दिनों अमुक स्तर की प्रतिभाएं अपने-अपने समय पर एकत्रित होकर प्रस्तुत समस्याओं के समाधान एवं निर्धारण खोजती थीं।
साधना से काम चलायेंगे। जिज्ञासाएं न्यूनतम उभारेंगे, श्रद्धा की स्थापना में विशेष प्रकार का पराक्रम अपनायेंगे। समय-समय पर तीर्थ के सूत्र संचालक युग-ऋषि से विचार विनिमय का वही सामयिक समाधान का अवसर प्राप्त होता रहेगा। पर मानकर यहीं चलना चाहिए कि यहाँ सीखने सुनने के लिए नहीं धारणाओं को परिष्कृत परिपक्व करने के लिए जाया रहा है। इसमें सुनने-पूछने की कम और अन्तरंग को उभारने उछालने की आवश्यकता अधिक पड़ती है।
साधना विज्ञान को भी इसके आयोजकों को भी अपयश का भागी बनना पड़ेगा। इस कटु तथ्य को आरंभ से ही ध्यान में रखकर गायत्री तीर्थ के साधना उपक्रम की रूपरेखा बनाई गई है।
साधना करने का अवसर नहीं मिल सकता। फिर भी इतना तो मानना ही होगा कि पूर्वकाल की भांति ही गृहस्थ वर्ग को अपने असन्तुलनों से जूझने और निर्धारणों को क्रियान्वित करने वाली सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए इस उपाय का अवलम्बन करके स्थिरता, प्रसन्नता एवं प्रखरता प्राप्त करने के लिए आवश्यकता तो है ही। सच तो यह है कि चक्रव्यूह में फंसे आज के जन समाज को इस प्रकार को अवलम्बन पूर्व काल की तुलना में और भी अधिक आवश्यक है।
साधना का निर्धारण करे। दूसरे योग शिक्षकों की तरह सामूहिक कक्षाएं लगाना गायत्री-तीर्थ के साधनों के लिए सम्भव नहीं। उन्हें अलग-अलग कमरों में रखने की अपने निवास को एक विशेष वातावरण में युक्त करने की एक विशेष प्रकार का संसार बनाने के लिए प्रयत्न किया जाना है ताकि अपनी विशिष्ट साधना में हर साधना अपनी राह पर आप चलता रहे। न दूसरे साथियों से प्रभाव ग्रहण करे और न उस पर छोड़े।
साधना को विशुद्ध तपश्चर्या के रूप में समझा और समझाया जाना चाहिए और उस अवधि में स्थिर रहने की आवश्यकता, उपयोगिता हृदयंगम कराई जानी चाहिए। वैसा ही अनुबन्ध, अनुशासन गायत्री तीर्थ के साधकों को भी अपनाना होगा।
साधना’ ही है जिसके अनेकानेक भेद उपचार अन्तराल की गहराई तक पहुँचने और उपयोगी फेर-बदल करने में समर्थ होते हैं। अतएव जहाँ तक व्यक्तित्व वाली आदतों को उच्चस्तरीय बनाने का सम्बन्ध है वहाँ साधना परक अभ्यास की अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है। साधना की शक्ति को सुर और असुर दोनों ही अपने-अपने विरुद्ध प्रयोजनों के लिए समान रूप से आवश्यक मानते और संकल्पपूर्वक अपनाते रहे हैं।
साधना मार्ग पर एक कदम भी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं। पूर्णता- ईश्वर प्राप्ति की बात तो बहुत दूर की है। कर्मवाद का समर्थन हमारे धर्म ग्रन्थों में पग-पग पर मिलता है। “ईशावास्योपनिषद्” का सन्देश है-
साधना का महत्व न समझकर किसी प्रकार अपना लौकिक मनोरथ पूरा करने का ताना-बाना बुनते रहने में निरत रहेंगे। फलतः मूल प्रयोजन की दिशा में एक कदम भी बढ़ सकना उनके लिये सम्भव न हो सकेगा। ऐसी दशा में साधकों को ही नहीं, साधना विज्ञान को भी इसके आयोजकों को भी अपयश का भागी बनना पड़ेगा। इस कटु तथ्य को आरंभ से ही ध्यान में रखकर गायत्री तीर्थ के साधना उपक्रम की रूपरेखा बनाई गई है।
साधना अनुष्ठानों का विधान है। उन्हें निष्ठापूर्वक सम्पन्न करते हुए वह अन्तर्ज्योति विकसित की जा सकती है जिसके माध्यम से लोक-लोकान्तरों की, भू-गर्भ की पंच भौतिक परिस्थितियों को देखा और समझा जा सके।
साधना अपनी राह पर आप चलता रहे। न दूसरे साथियों से प्रभाव ग्रहण करे और न उस पर छोड़े।
साधना सफल नहीं हो सकती। इसलिये भोजन न केवल अपने हाथ बनाना होगा, वरन् उसके सम्बन्ध में जुड़ी हुई मान्यताओं, आदतों और स्वादों को भी बदलना होगा। स्वादेन्द्रिय का नियमन साधना क्षेत्र का प्रारम्भिक उपचार है। इस प्राइमरी स्कूल को पास करने के बाद ही माध्यमिक, उच्चस्तरीय एवं स्नातकीय कक्षाओं में प्रवेश पाने का अवसर मिलता है। अन्नमय कोष का ही परिशोधन न हो सका तो फिर प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों के उच्चस्तरीय देव लोकों में प्रवेश पाने का अवसर कैसे मिलेगा?
साधना का सर्वप्रथम सोपान है। अन्यत्र उसे झुठलाया उपेक्षित किया जाता है किंतु गायत्री तीर्थ के साधना विधानों के हर साधन के लिए उसके अनुरूप प्रायश्चित तप का भी प्रावधान रहा गया है। इस प्रकार सुसंस्कारिता के सम्पादन में जो एक भारी व्यवधान अड़ा रहता है उसे भी यहाँ दूर कराने पर पूरा ध्यान रखा जाता है।
साधना से कायाकल्प और परिवर्तन से लाभान्वित होकर वापिस लौटते थे। तीसरा वर्ग वह रह जाता है जिसे गृहस्थ एवं भौतिक प्रयोजनों में संलग्न कह सकते हैं। बहुसंख्यक जन-समुदाय इसी वर्ग का होता है। बहुमुखी क्रिया-कलापों में संलग्न होने के कारण समस्याऐं भी उन्हीं के सामने रहती हैं और चित्र-विचित्र व्यवधानों से लोहा भी उन्हीं को लेना पड़ता है। आकर्षक भी उन्हीं को लुभाते और विग्रह भी उन्हीं को सताते हैं।
साधना का आधार बनती है। अपनी श्रद्धा को आरोपित करते हुए उस मूर्ति में ही भगवान का दर्शन कर लेता है। दूसरा व्यक्ति उसे तराशने वाले कलाकार की कला के रूप में देखता है। दार्शनिक उसे भावों की अभिव्यक्ति के एक साधन के रूप में देखता है। मनोवैज्ञानिक उसे एकाग्रता का साधन मानता है।
साधना का मजाक बनाना हो तो उस अवधि में बन्दर की तरह यहाँ-वहाँ, उचकते-मचकते फिरने जहाँ-तहाँ दर्शन झाँकी और सैर सपाटा करने से कोई क्यों टोकेगा और कोई क्यों रुकेगा। किन्तु तब बात की गम्भीरता के स्तर तक चला जाय तो साधना को विशुद्ध तपश्चर्या के रूप में समझा और समझाया जाना चाहिए और उस अवधि में स्थिर रहने की आवश्यकता, उपयोगिता हृदयंगम कराई जानी चाहिए। वैसा ही अनुबन्ध, अनुशासन गायत्री तीर्थ के साधकों को भी अपनाना होगा।
साधना काल तीर्थ के सीमित क्षेत्र में गुजारने की शर्त पहली है।
साधना परक अभ्यास की अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है। साधना की शक्ति को सुर और असुर दोनों ही अपने-अपने विरुद्ध प्रयोजनों के लिए समान रूप से आवश्यक मानते और संकल्पपूर्वक अपनाते रहे हैं।
साधना भी इसी समुदाय की श्रेष्ठता, समर्थता बनाये रहने के लिए, वापिस लौटने पर सेवा रत होने के लिए संलग्न दिखती है। इसका अर्थ यह हुआ कि गृहस्थ की वह धड़ है जहाँ पाचन होता है रक्त बनता है। मस्तिष्क से लेकर अन्यान्य सभी अवयव वहाँ से अपनी खुराक पाते और तरह-तरह के पुरुषार्थ चमत्कार दिखाते हैं।
साधना तथा अगले दिनों जिस स्तर की सेवा साधना अपनानी है उसके लिए परिस्थितियों के अनुरूप कौशल तथा अनुभव प्राप्त करना। आरण्यक इसी दुहरी क्षमता को अर्जित करने की साहसिक साधना के लिए अभीष्ट वातावरण एवं कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले प्राणवान केन्द्रों की भूमिका निभाते थे।
साधना, उपचार, जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि का क्या-क्या करने होंगे और क्या-क्या चमत्कार दिखेंगे इस प्रसंग पर समय से पहले सोचने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। प्रगति किस क्रम से, किस दिशा में हो रही है- इसके लिए ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की बहुमूल्य मशीनों द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्थिति का पर्यवेक्षण किया जाना रहेगा। प्रगति होने, न होने की कसौटी किसी साधक के पास नहीं होती उसे तो जौहरी ही अपने विशिष्ट उपकरणों से जाँचते परखते हैं। साधकों को अपना काम बन्द करना होता है और उसमें उतावली न मचाकर चिकित्सक को अपना काम अपने ढंग से करने का अवसर प्रदान करना होता है। गायत्री तीर्थ के साधक भी इसी प्रकार का साधकोचित धैर्य साथ में लेकर आवेंगे ऐसी अपेक्षा की गई है।
साधना अपनानी है उसके लिए परिस्थितियों के अनुरूप कौशल तथा अनुभव प्राप्त करना। आरण्यक इसी दुहरी क्षमता को अर्जित करने की साहसिक साधना के लिए अभीष्ट वातावरण एवं कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले प्राणवान केन्द्रों की भूमिका निभाते थे।
साधना का रूखा समय पूरा होने के उपरांत शिक्षण का उपयोगी मनोरंजन भी साथ-साथ मिलता रहे। वस्तुतः स्वाध्याय, सत्संग जैसे प्रयोजन महत्वपूर्ण होते हुए भी बुद्धि संस्थान तक ही अपनी उछल-कूद करने के उपरान्त शान्त हो जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो आये दिन कथा-सत्संगों के वक्ता श्रोता अवश्य ही अपने व्यक्तित्वों को प्रखर बनाने में समर्थ हो गये होते, जब कि उन क्षेत्रों का प्रभाव, परिणाम दिखने पर एक प्रकार से निराशा ही हाथ लगती है।
साधना विधानों के हर साधन के लिए उसके अनुरूप प्रायश्चित तप का भी प्रावधान रहा गया है। इस प्रकार सुसंस्कारिता के सम्पादन में जो एक भारी व्यवधान अड़ा रहता है उसे भी यहाँ दूर कराने पर पूरा ध्यान रखा जाता है।
साधना प्रधान होते हैं। उनमें शिक्षण का भी पुट रहता है ताकि साधना का रूखा समय पूरा होने के उपरांत शिक्षण का उपयोगी मनोरंजन भी साथ-साथ मिलता रहे। वस्तुतः स्वाध्याय, सत्संग जैसे प्रयोजन महत्वपूर्ण होते हुए भी बुद्धि संस्थान तक ही अपनी उछल-कूद करने के उपरान्त शान्त हो जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो आये दिन कथा-सत्संगों के वक्ता श्रोता अवश्य ही अपने व्यक्तित्वों को प्रखर बनाने में समर्थ हो गये होते, जब कि उन क्षेत्रों का प्रभाव, परिणाम दिखने पर एक प्रकार से निराशा ही हाथ लगती है।
साधना, स्वाध्याय, सत्संग की दृष्टि से वर्तमान समय में मूर्धन्य माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। कर्मकाण्ड की दृष्टि से शास्त्रीय विधि-व्यवस्था की समग्र जानकारी और विधि व्यवस्था का यहाँ समुचित प्रबन्ध है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात है गुरुदेव माताजी की उपस्थिति में उनके हाथों किये गये यह संस्कार कितने फलप्रद हो सकते हैं, इसका अनुमान लगाने में किसी को संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। ऐसे संस्कार करने में बालकों को परिवार के बड़े-बूढ़ों के हाथ में थमाया, गोद में बिठाया जाता है। अपने विशाल परिवार के कुलपिता एवं कुलमाता की उपस्थिति में जिन्हें अपने बालकों के संस्कार कराने का अवसर मिलेगा, वे बड़भागी ही माने जायेंगे।
साधना में हर साधना अपनी राह पर आप चलता रहे। न दूसरे साथियों से प्रभाव ग्रहण करे और न उस पर छोड़े।
साधना काल में नियत कोठरी में ही कहने का नियम है।
साधना-सीता को चुरा कर ले जा सकता है। ताँत्रिक श्मशान-साधना करते हैं और योगी को गुफा में सेवन करना पड़ता है, प्रज्ञा परिजनों को आत्म-परिष्कार के लिए जो करना है वह वजनदार होने के कारण उसके निमित्त तपश्चर्या भी उच्चस्तरीय ही करनी होगी। इसमें साधना काल तीर्थ के सीमित क्षेत्र में गुजारने की शर्त पहली है।
साधना की शक्ति को सुर और असुर दोनों ही अपने-अपने विरुद्ध प्रयोजनों के लिए समान रूप से आवश्यक मानते और संकल्पपूर्वक अपनाते रहे हैं।
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा की चतुर्विधि तपश्चर्या के लिए दो प्रकार के कार्यक्रम रखे गये हैं। एक-एक महीने के दस-दस दिन के। इन दोनों का समय सदा एक जैसा ही निर्धारित रहेगा। एक महीने वाले पहली तारीख से तीस तक और दस दिन वाले 1 से 10 तक, 11 से 20 तक और 21 से 30 तक। यह समय भविष्य के लिए नियमित रूप से चलेगा।
साधना करते हैं और योगी को गुफा में सेवन करना पड़ता है, प्रज्ञा परिजनों को आत्म-परिष्कार के लिए जो करना है वह वजनदार होने के कारण उसके निमित्त तपश्चर्या भी उच्चस्तरीय ही करनी होगी। इसमें साधना काल तीर्थ के सीमित क्षेत्र में गुजारने की शर्त पहली है।
साधना उपक्रम की रूपरेखा बनाई गई है।
साधना द्वारा अन्तः की परतों को उत्तेजित किया जा सके तो आँतरिक प्रगति का पथ-प्रशस्त किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-May
साधना योग द्वारा जागृत किया जा सके तो अपनी प्रखर आकर्षक क्षमता के सहारे वह इतना कुछ अदृश्य अनुदान प्राप्त कर सकने में सफल हो सकती है जो स्थूल पदार्थों की अपेक्षा कई गुना अधिक उपयोगी है।
साधनाएँ की जाती हैं, आत्मिक विकास के लिये, जितने भी उपक्रम करने पड़ते हैं वे शरीर के द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। अस्वस्थ शरीर से साधना के लिये बैठना तक सम्भव नहीं रह जाता। इसीलिये शास्त्रकारों ने कहा है, ‘शरीर माघ खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् वास्तव में शरीर ही सबसे पहला धर्म साधन का आधार है। यौगिक क्रियाओं से लेकर परमार्थ उपकार और लोक मंगल के कार्यों तक में शरीर का ही उपयोग करना पड़ता है।
साधनाओं के बल पर जगत को कुछ दे पाने में सफलता प्राप्त की।
साधना कर ली, उसकी इन्द्रियाँ काबू में रहती हैं एवं नियत निर्धारित क्रम में अपनी सुव्यवस्था, कौशल का परिचय देती है। ऐसे व्यक्ति सामान्य मनुष्य की तुलना में कई गुने परिणाम में उत्कृष्ट कार्य कर सकने में सफल होते हैं।
साधना के लिये बैठना तक सम्भव नहीं रह जाता। इसीलिये शास्त्रकारों ने कहा है, ‘शरीर माघ खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् वास्तव में शरीर ही सबसे पहला धर्म साधन का आधार है। यौगिक क्रियाओं से लेकर परमार्थ उपकार और लोक मंगल के कार्यों तक में शरीर का ही उपयोग करना पड़ता है।
साधना किया करता था और साधना करते हुए ही उसकी मृत्यु हुई। उसने गुफा तक पहुँचने का मार्ग तथा उसमें रखे अपने चिमटे और खड़ाऊ के बारे में भी बताया। लोगों ने उस स्थान पर जाकर देखा तो सब कुछ सही पाया गया।
साधना
साधना में प्रवृत्त हुये उन्होंने न केवल सृष्टि की आदि कारण सत्ता को जाना वरन् उसके सान्निध्य का लाभ भी उठाया। दिव्य आलिंगन का अनुभव किया। उस आनन्द की मस्ती में कह उठे.............. “भौतिक जगत के सारे सुख उस आनन्द के समक्ष कुछ भी नहीं है।’’
साधना करते हुए ही उसकी मृत्यु हुई। उसने गुफा तक पहुँचने का मार्ग तथा उसमें रखे अपने चिमटे और खड़ाऊ के बारे में भी बताया। लोगों ने उस स्थान पर जाकर देखा तो सब कुछ सही पाया गया।
साधना के क्षेत्र में उसकी गति की सभी चर्चा करते हैं किन्तु उसे न जाने क्या मोह है जो वह दिन ढलने की प्रक्रिया प्रारम्भ होते ही आश्रम का परित्याग कर देता है, दूर तक चला जाता है। अश्वत्थ वृक्ष तक पहुँचना, वहाँ घण्टों ध्यान मग्न बैठे रहना उसका दैनन्दिन क्रम हो गया है। सांध्य आरती में उसने कभी भाग लिया हो यह देखने में नहीं आया। सहपाठी अनेक बार महर्षि कौटिल्य को इस तथ्य से अवगत करा चुके हैं। महर्षि की तीक्ष्ण दृष्टि विदूरथ पर रही है पर आज तक उन्होंने कुछ कहा नहीं।
साधना करते हुये इस प्राण-शक्ति को निग्रहित और दिशा नियोजित किया जाता है। फलतः उसके सत्परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं।
साधना एवं अन्य आध्यात्मिक उपचारों के पीछे भी इसी उद्देश्य की पूर्ति ही निहित होती है।
साधना के लिए अपनाया गया अनुशासन भी सम्मिलित हो। इस तथ्य को इन दिनों गम्भीरतापूर्वक समझने और समझाये जाने की आवश्यकता है।
साधना है। ‘यतोऽभ्युत्थानः निःश्रेयस् कशवुमैन’ के अनुसार जिससे इहलोक में उन्नति और परलोक में भी कल्याण सधे वह धर्म है। इस व्याख्या या परिभाषा के अनुसार धर्म प्रथा परम्पराओं में नहीं है, वह उन गुणों के धारण करने में है जो आत्मिक और पारलौकिक जीवन में कल्याणकर सिद्ध हों। इस स्तर का धर्म जीवन-जीने की एक कला कहा जा सकता है और उसे मनुष्य के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक समझा जा सकता है। जितना सम्मानास्पद और आवश्यक यह वास्तविक धर्म है उतना ही घृणित और हेय है- धार्मिक अन्धविश्वास।
साधना उपक्रम के योग-तप भी आज की तरह विभाजित नहीं थे। इस विभाजन में विग्रह ढूंढ़ना व्यर्थ है। वस्तुतः क्षेत्र विस्तार होने पर खेत में क्यारियाँ बनाने की तरह व्यवस्था बनाये रखने की दृष्टि से इस प्रकार के विकेंद्रीकरण की आवश्यकता अनिवार्य होकर सामने आ खड़ी होती है। नये परिवार का आरम्भ करते समय पति-पत्नि दो ही होते हैं और छोटे बच्चे भी साथ-साथ लिपटे रहते हैं। पर जब कुटुम्ब बढ़ता है, बेटे-पोते वयस्क होते हैं, बन्धुओं और जामाताओं की अच्छी खासी भीड़ जमने लगती है, तो विशालकाय परिवारों का संयुक्त रहना सुविधा का नहीं, अव्यवस्था का कारण बनता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-September
साधनायें सिखायेंगे अपितु उनकी पूर्वजन्मों की गाठों को खोलने, अपना प्राण देने और साधना द्वारा अर्जित शक्ति को जीवन में विकसित होने देने के लिये आवश्यक खाद पानी और संरक्षण भी देंगे। इसे अब तक के साधन-क्रम का सर्वश्रेष्ठ अध्याय मानना चाहिये। अच्छी तरह निर्वाह कर लेने पर इस पत्राचार साधना विधान के द्वारा ही लोग घर बैठे हिमालय में साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
साधनाओं के सुमन दो॥
साधना के सहारे अभीष्ट आत्मबल अर्जित करने और प्रशिक्षण द्वारा सामयिक प्रेरणा एवं प्रज्ञा उभारने की आवश्यकता को इसलिये रोके नहीं रखा जा सकता है कि शाँतिकुँज में स्थान सीमित है। युग की माँग तो यथा समय पूरी होनी ही चाहिये। कठिनाई आती है तो दूसरा मार्ग खोजा जाय।
साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
साधना विधान के द्वारा ही लोग घर बैठे हिमालय में साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
साधना सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। भले ही वे इससे पूर्व दस वर्षों में कई सत्रों में सम्मिलित हो चुके हों।
साधनात्मक निर्धारण उसी प्रकार किये जायेंगे जैसे कि मूर्धन्य चिकित्सक रोगी की पिछली और अब की प्रत्येक परिस्थितियों का गंभीरतापूर्वक निदान करने के उपरांत चिकित्सा का निर्धारण करते हैं।
साधनाओं द्वारा इन शक्तियों को प्राप्त कर सकने का मार्ग हर किसी के लिए खुला पड़ा है।
साधना करने वालों और सूत्र संचालकों के मध्य चलता है।
साधना के दो मार्ग हैं एक दक्षिण दूसरा वाम। दक्षिण मार्ग में पंचकोशों का अनावरण करना होता है और वाम मार्ग में षट्चक्रों का जागरण। षट्चक्र वेधन में प्रयुक्त होने वाली प्राण प्रक्रिया को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। इस शक्ति उन्नयन सरल भी है और कठिन भी। सरल उनके लिए जो उस मार्ग पर चलने का साहस जुटाते हैं।
साधना पुरुषार्थ का ही प्रतिफल होती हैं। जिन्हें करतलगत कर असम्भव काम भी पूरे किए जा सकते हैं।
साधनाक्रम एवं परामर्श निर्देशन का सिलसिला चल पड़ेगा। इस संदर्भ में अन्य किसी प्रकार की फीस या खर्च तो नहीं देना पड़ेगा, किन्तु हर पत्र के साथ पचास पैसे के टिकट या उतने ही टिकट वाला लिफाफा भेजते रहना आवश्यक है। पाठ्यक्रम, परामर्श, उत्तर स्टेशनरी आदि का सारा खर्च तो संस्था वहन करेगी। डाक खर्च प्रवेशार्थियों को स्वयं ही वहन करना होगा। पाठ्यक्रम एवं उत्तर भारी हो जाने के कारण उन पर पैंतीस पैसे न लगकर पचास पैसे लग जाते हैं।
साधना किस प्रकार चलाये इसके निर्धारण सभी के लिये एक जैसे नहीं होंगे वरन् हर व्यक्ति की मनःस्थिति, परिस्थिति, परम्परा एवं पूर्व प्रगति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग होंगे। किसे, किस प्रयोजन के लिये किस स्तर की आत्मशक्ति चाहिए, कौन कितना कर सकने में समर्थ है, इन सब बातों का तालमेल बिठाकर ही साधना विधि का पृथक-पृथक निर्धारण किया जायेगा।
साधना पुरुषार्थ द्वारा उनका जागरण सम्भव है। स्थूल काया तो खाने, पीने, सोने, श्रम करने एवं मस्तिष्क सोचने-विचारने लौकिक गुत्थियों को सुलझाने जितना सामान्य प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। शरीर के भीतर विद्यमान सूक्ष्म एवं कारण शरीर की क्षमताएँ स्थूल शरीर एवं मस्तिष्क की तुलना में कई गुनी अधिक हैं। उसमें एक से बढ़कर एक आश्चर्यजनक सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। उनका जागरण यदि सम्भव हो सके तो स्थूल उपचार द्वारा दूसरों को राहत पहुँचाना ही नहीं, अदृश्य की जानकारियाँ भूत एवं भविष्य का ज्ञान जैसी कितनी ही चमत्कारी शक्तियाँ करतलगत की जा सकती हैं।
साधना सम्बन्धी रहा करेगा। इस प्रकार दस बार में दोनों प्रकार के मिलाकर 20 पाठ्यक्रम पत्रक पहुँच जायेंगे।
साधना विधि का पृथक-पृथक निर्धारण किया जायेगा।
साधना भी कहा जा सकता है। जिस भी काम को हाथ में लिया जाय उसे मेहनतपूर्वक, पूरा मनोयोग लगाकर काम में रस लेते हुए जब सम्पादित किया जाने लगेगा तो जो परिणाम निकलेंगे उन्हें चमत्कारों की सत्ता दी जा सकती है।
साधनाएं कराई जानी हैं। सभी को परामर्श किये जाने हैं। फिर स्थान, समय और माँग का तालमेल कैसे बैठे? 400 एक बार में करने से दस-दस दिन वाले सत्रों में हर महीने मात्र 1200 साधन शाँतिकुँज पहुंच सकेंगे- एक वर्ष में प्रायः पन्द्रह हजार। एक लाख वरिष्ठ परिजन अभी शेष हैं, उनके लिए प्रायः सात वर्ष चाहिए।
साधना की कठिन प्रक्रिया अपनाने का सुदृढ़ निश्चय और अविचल संकल्प नहीं करते।
साधना धन्य है, मेरे पास आने की प्रथम कसौटी तो आप ही हैं। इसलिये जब लोग मेरी उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ।
साधनाओं से हरा मन,
साधना सत्रों की नई श्रृंखला चलाई गई है और महापुरश्चरण के नैष्ठिक भागीदारों- प्राण दीक्षा ले चुके भावनाशीलों- प्रज्ञापुत्रों- समयदानियों एवं वरिष्ठ परिजनों को कहा गया है कि वे इन नये निर्धारण के साधना सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। भले ही वे इससे पूर्व दस वर्षों में कई सत्रों में सम्मिलित हो चुके हों।
साधना में उन विशिष्ट तत्वों का समावेश करें जो इन्हीं दिनों नितान्त आवश्यक है। इन पंक्तियों द्वारा इस स्तर के सभी वरिष्ठ परिजनों से इसी का अनुरोध किया जा रहा है।
साधना और शिक्षा की प्रकारान्तर से वैसी ही व्यवस्था बना लेनी चाहिए जैसी कि शाँतिकुँज में पहुंचने पर संभव थी।
साधनाओं के सुमन दो।
रात से मत तिलमिलाओ, प्रात की हंसती किरण दो॥
साधना सत्रों में स्थान न मिले, वे न तो निराश हों और न प्रतीक्षा करें। उन्हें पत्राचार विद्यालय के माध्यम से घर बैठे अपनी साधना और शिक्षा की प्रकारान्तर से वैसी ही व्यवस्था बना लेनी चाहिए जैसी कि शाँतिकुँज में पहुंचने पर संभव थी।
साधना द्वारा अर्जित शक्ति को जीवन में विकसित होने देने के लिये आवश्यक खाद पानी और संरक्षण भी देंगे। इसे अब तक के साधन-क्रम का सर्वश्रेष्ठ अध्याय मानना चाहिये। अच्छी तरह निर्वाह कर लेने पर इस पत्राचार साधना विधान के द्वारा ही लोग घर बैठे हिमालय में साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1981-January
साधना के मार्ग में प्रगति मिलती है। मन का स्तर योगी के आहार पर निर्भर है। यह जितना सात्विक होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जाएगा। अन्नमय कोष भी साधना के लिये अन्न की महिमा को प्रधानता देते हुए ही साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहारशास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है।
साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहारशास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है। भूख से आरम्भ होने वाली यह प्रक्रिया आहार ग्रहण करने तथा उसे आत्मसात कर उसका निष्कासन होने तक व्यक्ति को प्रभावित करती है।
साधना प्रकरणों में विस्तारपूर्वक हुआ है।
साधना के लिये अन्न की महिमा को प्रधानता देते हुए ही साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहारशास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है। भूख से आरम्भ होने वाली यह प्रक्रिया आहार ग्रहण करने तथा उसे आत्मसात कर उसका निष्कासन होने तक व्यक्ति को प्रभावित करती है।
साधनाएँ चाहे वह यम नियम प्राणायाम हों या मन्त्र जाप सोऽहम् खेचरी और मुद्रा बन्ध साधनाएँ, सबका उद्देश्य प्राणशक्ति को प्रखर बनाना है। प्रज्ज्वलित प्राण ऊर्जा ही मस्तिष्कीय न्यूरान के लिए विद्युत का काम करते हैं, उसी के सहारे सिद्ध योगी टेलीविजन की तरह चाहे कहीं देखते, कहीं भी सुन लेते हैं। भूत और भविष्य उनके लिए वर्तमान में निवास करते हैं।
साधना आत्मिक क्षेत्र को और तालबद्ध लयबद्ध संगीत लहरों से भौतिक क्षेत्र को प्रभावित करने और उससे लाभान्वित होने के लिए विशाल कार्य क्षेत्र विद्यमान है। साधना के साहसी लोगों को इसमें प्रवेश करने लिए पदार्थ विज्ञानियों की तरह ही निष्ठापूर्वक प्रवेश करना चाहिए।
साधनायें सिद्ध कर ली न जाने क्यों तथागत उन्हीं को दोहराने की बात करते हैं इससे मेरा समय नष्ट होगा या नहीं?
साधनाएँ, सबका उद्देश्य प्राणशक्ति को प्रखर बनाना है। प्रज्ज्वलित प्राण ऊर्जा ही मस्तिष्कीय न्यूरान के लिए विद्युत का काम करते हैं, उसी के सहारे सिद्ध योगी टेलीविजन की तरह चाहे कहीं देखते, कहीं भी सुन लेते हैं। भूत और भविष्य उनके लिए वर्तमान में निवास करते हैं।
साधना में साधक को इन्हीं बातों का ध्यान रखना होता है। समग्र स्वास्थ्य का आधार सात्विक आहार है, इसी मूल-दर्शन को योगविज्ञान में केन्द्र बिन्दु माना गया है। साधक का आहार अनेक स्वादों का नहीं होना चाहिए। एक ही पदार्थ व एक ही स्वाद उत्तम है। गाँधी जी ने सप्त महाव्रत लेखमाला में प्रथम व्रत अस्वाद को माना है।
साधना है। साधना के सोपान पर चढ़ते हुए ही जीवन-मृत्यु के संघात के पीछे चल रहे सृष्टि प्रवाह के सत्य को जाना एवं अनुभव किया जा सकता है।
साधना की प्रवृत्ति और उपलब्धि का पर्यवेक्षण मात्र अतिनिकटवर्ती लोगों के लिए ही सम्भव है। जो इस स्थिति में हैं वे जानते हैं कि विगत 43 वर्षों में धर्मतन्त्र को पुनर्जीवित करने और जन मानस को उलटने की दिशा में कितनी उत्साहवर्धक सफलता मिलती चली गई है। यों, जो करने में पड़ा है उसकी तुलना में उपलब्धियों को नगण्य भी कहा जा सकता है।
साधना द्वारा उपार्जित प्राण पक न जायें तब तक साधक के दिन जोखिम भरे कसौटी के होते हैं उनके न पकने तक विषय, वासना और तृष्णा, अहंता के वनचरों द्वारा उदरस्थ कर लिये जाने की आशंका तो रहती ही है, कहीं कोई अनुभूति हो तो बाल बुद्धि उसे चमकाकर अपना अहंकार जताने की भूल करके उसे गवाँ सकती है। कदाचित साधना काल में ही किसी की मृत्यु हो जाये तो लोकोत्तर जीवन में प्राण परिपाक क्रिया चलती रहती है वहीं इतर जन्मों की प्रतिभा के रूप में दिखाई देती है।
साधना के साहसी लोगों को इसमें प्रवेश करने लिए पदार्थ विज्ञानियों की तरह ही निष्ठापूर्वक प्रवेश करना चाहिए।
साधना को अखण्ड क्रम से जारी रखना।
साधना के स्वरूप को बोधगम्य बनाने के लिए आहार के सभी आयामों को शरीर मन की संरचना के साथ सम्बन्धित कर प्रस्तुत किया।
साधना के क्षेत्र में भी कार्य करती है। साधनाएँ चाहे वह यम नियम प्राणायाम हों या मन्त्र जाप सोऽहम् खेचरी और मुद्रा बन्ध साधनाएँ, सबका उद्देश्य प्राणशक्ति को प्रखर बनाना है। प्रज्ज्वलित प्राण ऊर्जा ही मस्तिष्कीय न्यूरान के लिए विद्युत का काम करते हैं, उसी के सहारे सिद्ध योगी टेलीविजन की तरह चाहे कहीं देखते, कहीं भी सुन लेते हैं। भूत और भविष्य उनके लिए वर्तमान में निवास करते हैं।
साधना में प्रयुक्त होने वाले मुख्य बन्ध तीनों हैं- (1) मूलबन्ध (2) उड्डियान बन्ध (3) जालन्धर बन्ध।
साधना के लिए उत्साह उत्पन्न किया जा सकता है। स्वयं पीछे रहा जाय और दूसरों से लंबी-चौड़ी आशा लगाई जाय तो उसमें सफलता कदाचित ही कभी- छोटी-सी मात्रा में मिल पाती है। आदर्शवादी उत्साह उत्पन्न करने कि लिए तो श्रेय साधकों को स्वयं ही आगे बढ़ना होता है और अपना उदाहरण प्रस्तुत करके उन्हें भी सहयोग देने के लिए सहमत किया जाता है।
साधना का उल्लेख योग शास्त्र के साधना प्रकरणों में विस्तारपूर्वक हुआ है।
साधना आहार सम्बन्धी अपने दृष्टिकोण के परिष्कार की साधना है। साँसारिक जीवन में सफलता की बात हो या आत्मिक उत्कर्ष की, सुखी स्वस्थ जीवन दोनों के लिये जरूरी है। जो अपनी वृत्तियों का परिशोधन कर अपने जीवनक्रम में परिवर्तन कर लेता है वह अन्नमयकोश जागरण की साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है। शुद्ध सात्विक भोजन, मिताहार, प्रसन्न मन से भगवान से प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया भोजन, स्वाद विशेष में रुचि न रख बीच-बीच में अस्वाद व्रत का पालन, परिश्रम की कमाई का ही भोजन निश्चिततः साधक की इस प्राथमिक भूमिका को सशक्त बनाते हैं।
साधना की। अनुभूतियों के आधार पर उद्घोष किया कि “सम्पूर्ण सृष्टि में एवं सर्व समर्थ चैतन्य सत्ता कार्य कर रही है। वही सृष्टि का आदि कारण है।
साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है। शुद्ध सात्विक भोजन, मिताहार, प्रसन्न मन से भगवान से प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया भोजन, स्वाद विशेष में रुचि न रख बीच-बीच में अस्वाद व्रत का पालन, परिश्रम की कमाई का ही भोजन निश्चिततः साधक की इस प्राथमिक भूमिका को सशक्त बनाते हैं।
साधना के सोपान पर चढ़ते हुए ही जीवन-मृत्यु के संघात के पीछे चल रहे सृष्टि प्रवाह के सत्य को जाना एवं अनुभव किया जा सकता है।
साधना बताइये? पीवक ने भगवान बुद्ध ने संगर्व पूछा।
साधना से आटोनामिक नर्वस सिस्टम को चैतन्य नियन्त्रण में रखने तथा भाव-सम्वेदनाओं की अतिरेकता के प्रभावों से बचाये रखने में सहायता मिलती है।
साधना काल में ही किसी की मृत्यु हो जाये तो लोकोत्तर जीवन में प्राण परिपाक क्रिया चलती रहती है वहीं इतर जन्मों की प्रतिभा के रूप में दिखाई देती है।
साधना बता दी जायेगी।
साधना में इतने सिद्ध हस्त हो गये कि प्रकृति के कण-2 और अणु-2 से वे प्यार करने लगे और प्यार बाँटने लगे। उसकी आत्मीयता से प्रभावित होकर वनस्पति को भी गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन लाने को मजबूर होना पड़ा।
साधना के प्रयोग-परीक्षणों से होकर ही गुजरना होगा। वास्तविक सत्य की अनुभूति तभी सम्भव है। यह दिव्य दृष्टि एवं सम्वेदन क्षमता आत्म परिष्कार के फलस्वरूप भीतर से उभरती और ऊपर से बरसती है। इसी के माध्यम से उस यथार्थ को जान सकना सम्भव होता है जो इस विश्व का तात्विक स्वरूप एवं आधारभूत कारण है।
साधना में वर्णित ‘बन्ध’ विधि में किसी प्रकार का बन्धन नहीं है जैसा कि शब्दार्थ से प्रतीत होता है। अपितु चक्रों के आयनोप्लाज्मिक क्षेत्रों को सक्रिय व विस्तृत करने की विधि है। बन्ध तीन होते हैं इनके अलग अभ्यास से विभिन्न चक्रों के आयनिक क्षेत्रों को जागृत करने में सहायता मिलती है किन्तु तीनों बन्धों का एक साथ अभ्यास करने से चौथा महाबन्ध हो जाता है जो सबसे ज्यादा प्रभावी व कारगर सिद्ध होता है।
साधना में पुंजीभूत कर उपयोगी बनाई जाती है। हिप्नोटिज्म में इसी विद्युत शक्ति को प्रखर और वशीभूत बनाना होता है।
साधना का अभ्यास करो। नियम समय पर अगली साधना बता दी जायेगी।
साधना है। साँसारिक जीवन में सफलता की बात हो या आत्मिक उत्कर्ष की, सुखी स्वस्थ जीवन दोनों के लिये जरूरी है। जो अपनी वृत्तियों का परिशोधन कर अपने जीवनक्रम में परिवर्तन कर लेता है वह अन्नमयकोश जागरण की साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है। शुद्ध सात्विक भोजन, मिताहार, प्रसन्न मन से भगवान से प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया भोजन, स्वाद विशेष में रुचि न रख बीच-बीच में अस्वाद व्रत का पालन, परिश्रम की कमाई का ही भोजन निश्चिततः साधक की इस प्राथमिक भूमिका को सशक्त बनाते हैं।
साधना में आवश्यक बताया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-August
साधना कहिए-विवेकशीलों का संगठन कहिए-जन जागृति का बीजारोपण अपना कहिए-नव निर्माण की पृष्ठभूमि कहिए-नाम जो कुछ भी दिया जाय हम जीवन भर एक ही काम करते रहे हैं कि नरपशु जैसा संकीर्ण और स्वार्थी जीवन जीने से आदमी लजाये और कुछ ऐसा करने की उमंग उत्पन्न कर-अनुदान देने की बात सोचे जिससे अपने समाज का पिछड़ापन दूर होने में मदद मिले। आज का सबसे बड़ा धर्म पुण्य यही है कि एक हजार वर्ष की गुलामी ने जिन संकीर्णताओं, स्वार्थपरताओं, क्षुद्रताओं मूढ़ताओं, कुत्साओं और कुण्ठाओं ने आज का भारतीय जीवन तमसाच्छन्न कर दिया है उसे उन्हें उखाड़ने के लिए कुछ शौर्य साहस प्रदर्शित करे और पिछड़ेपन को प्रगतिशीलता में बदलने के लिये यथा संभव त्याग और बलिदान की’ सहयोग पुरुषार्थ की बात सोचे। कह नहीं सकते कि हमारे इस प्रयत्न का कितना परिणाम निकला। कितनों ने उसे हृदयंगम किया और कितनों ने इस कान सुनकर उस कान निकाल दिया। इसका लेखा-जोखा समय लेगा।
साधना और तपश्चर्या के बल पर देवताओं के समकक्ष होना तो क्या परमात्मा के समकक्ष हो जाते हैं। जीवन की समग्र उन्नतियाँ और सारी सफलतायें इच्छा शक्ति के ही अधीन होती हैं।
साधनाओं का प्राण है, पर उसके तत्वज्ञान को कोई प्रेमी अन्तःकरण ही समझ सकता है। जो प्रेम तत्व को समझता है, वही सच्चा भक्त है, वही सच्चा ईश्वर-परायण है। यह तथ्य समझने ही योग्य है।
साधना के लिये आपको छोड़ना पड़ेगा। भगवतीचरण ने यह शर्त स्वीकार करली।
साधनाएं निर्भर रहती हैं। यही वह दिव्य सम्बल है जिसे पाकर संसार में खाली हाथ आया मनुष्य वैभव और ऐश्वर्यवान बनकर संसार को चकित कर देता है। यही वह मोहन ओर वशीकरण मन्त्र है जिसके बल पर एक अकेला पुरुष कोटि-कोटि जन-गण को अपना अनुयायी बना लेता है। जीवन में उन्नति और सफलता की आकाँक्षा करने से पहले अपनी इच्छा शक्ति को प्रबल तथा प्रखर बना लेने वालों को न कभी असफल होना पड़ता है और न निराश। वे अपनी मनोवाँछित विजयमाल पहन कर ही मानते हैं।
साधना के लिए भौतिक वैभव आवश्यक लगता है?’ विद्रूप ने स्वीकार की अपनी भूल। महात्मा ने आशीर्वाद दिया-’तुम्हारी साधना आगे बढ़ेगी। उसके लिए भौतिक वैभव का अभाव नहीं। उसका भार ही गतिरोध उत्पन्न करता है।
साधना तथा व्यक्तिगत परामर्श संबंधी डाक ‘अखण्ड-ज्योति संस्थान’ के पते पर ही भेजनी चाहिये, क्योंकि इन दिनों इस प्रकार की डाक माताजी ही खोलती हैं। जब हम रहते हैं, तो हम स्वयं उत्तर लिखते या लिखाते हैं-हमारे न रहने पर माताजी उत्तर देती हैं। चूँकि माता जी अखण्ड-ज्योति संस्थान में ही रहती हैं और वहीं की व्यवस्था संभालती हैं, इसलिये व्यक्तिगत पत्र वहीं भेजे जाने उचित हैं।
साधना में रत थे। अपनी साधना में गतिरोध सा उन्हें अनुभव होता था। अवसर का लाभ उठाने वह भी पहुँचे।
साधना, तपश्चर्या से लेकर-साहित्य सृजन और प्रचार संगठन से लेकर विविधविध रचनात्मक कार्यों तक इसी प्रयोजन के लिये होते चले आये हैं कि मनुष्य में मनुष्यता की और समाज में देवत्व की मात्रा जो अति न्यून मात्रा में शेष रह गई है उसका अधिकाधिक संवर्धन कर सकने के लिए हर संभव पुरुषार्थ किया जाय।
साधना की सार्थकता क्या रह जायेगी।
साधनायें उन्होंने आत्मा के विकास के लिए निकालीं, वह सब योग कहलाईं, योग का अर्थ है, अपने आपको परमात्मा में घुलाना, लघु से विभु, अणु से महत् और जीव से परम ऐश्वर्यशाली परमात्मा बनना।
साधनाएं छोड़ सकते हैं।
साधना में भौतिक वैभव बाधक बनता है। किन्तु उनको छोड़ा भी नहीं जा सकता और बिना छोड़े गति भी नहीं। कृपया कोई मार्ग बतलावें।’
साधना मानकर करने की शिक्षा लेकर लौटे। यही तो बन्धन-मुक्ति का राज-मार्ग था, सो उन्हें बुद्ध के क्रिया-योग का दर्शन कर स्वयमेव मिल गया।
साधना में गतिरोध सा उन्हें अनुभव होता था। अवसर का लाभ उठाने वह भी पहुँचे।
साधनाओं से विचलित न होता तो आज वह बूँदों के समान, वंशलोचन कपूर और मोती बन गया होता।
साधना में श्रेष्ठ गति प्राप्त की।
साधना काल में यह स्थिति बड़ी ही कष्टदायक प्रतीत होती है। इसलिए दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को योग की दीक्षा नहीं दी जाती। यदि मस्तिष्क की इन विकल्पनाओं पर विजय न प्राप्त की जा सके, तो उच्च भूमिका में पहुँचे हुए साधक भी स्त्री और बालकों के समान भयग्रस्त होकर साधनाएं छोड़ सकते हैं।
साधना में इतने तन्मय हो गये कि उन्हें राज-दरबार में उपस्थित होने की भी सुधि न रही। इस पर स्वातितिरुनालु बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने वडिवेलु को राज्याश्रय से बाहर निकाल दिया। मन्त्रियों तथा सभासदों ने कहा-महाराज! संगीत तो भगवान् का स्वरूप है। यदि कोई संगीत-आराधना में इतना निमग्न हो गया कि उसे राज दरबार में आने का ध्यान न रहा, तो उसे ईश्वर-भक्ति मानकर क्षमा ही नहीं करना चाहिये, वरन् श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिये। यदि संगीत न रहेगा महाराज, तो जीवन नीरस हो जायेगा।
साधना करते-करते पदार्थों की विविधता में ही उलझ कर रह गये। पशु-पक्षी, वन्य जन्तु, मछलियाँ, साँप, कीड़े-मकोड़ों में शरीरों और प्रवृत्तियों की भिन्नता होने पर भी शुद्ध अहंकार और चेतनता की एकता तो समझ में आ गई पर विस्तृत पहाड़, टीले, जंगल, नदी, नाले, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकाश, आकाश और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध खनिज, धातुएं, गैसें, ठोस आदि क्या हैं, क्यों हैं और उनमें यह विविधता कहाँ से आई है-यह उनकी समझ में नहीं आया। इससे उनकी आत्म-दर्शन की आकाँक्षा और बेचैन हो उठी।
साधना आगे बढ़ेगी। उसके लिए भौतिक वैभव का अभाव नहीं। उसका भार ही गतिरोध उत्पन्न करता है। लोक मर्यादा के लिए भी आवश्यक पड़े, तो तुम उसका प्रत्यक्ष समाधान देख ही चुके हो।’
साधना में लौकिक दृष्टि से आवश्यक समझे जाने वाले वैभव आदि को भारी क्यों बनने दिया जाये। जब हर हालत में दौड़ना अपने ही पैरों से है, तो क्यों न बालिका जैसा हलकापन स्वीकार कर लिया जाए?
साधना नहीं करता तो यह जो हजारों औषधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ, वह कहाँ से प्राप्त हो जाता?”
साधनाओं में लगाकर अतींद्रिय शक्तियों का विकास और परमानन्द की प्राप्ति करेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-June
साधना से भी अधिक पवित्र है। अब तुम आश्रम में रहकर शिक्षण कार्य करो, तुम्हारी गाथा चिरकाल तक भारतीय नारी को चरित्र का उपदेश करती रहेगी।
साधना, उपासना, व्यवहार-व्यापार, धर्म और दर्शन, भाषा और शासन व्यवस्था आदि की दृष्टि से भारतीय संविधान से जुड़ी रहीं। ईसा से 1500 वर्ष पूर्व मध्य एशिया में “मिटानी” और “हिटाइट” नामक दो पड़ौसी राज्य थे। मिटानी का शासक “मलिउजाजा” था और हिटाइट में “शिविलुलिउमा” राज्य करता था। प्राचीन काल में जब दो राजाओं के मध्य सन्धि या किसी प्रस्ताव पर बातचीत होती थी तो अदालतों में जिस प्रकार भगवान की शपथ ली जाती है, उसी प्रकार देवताओं को साक्षी बनाया जाता था। इन दो राजाओं के मध्य हुई सन्धि का एक शिलालेख मिला है।
साधना का दूसरा चरण मन की अस्त-व्यस्तता दूर करना है। देखा गया है कि कितने लोगों का मन बड़ा चंचल रहता है। अनर्गल और अनावश्यक विचार मस्तिष्क में घुमड़ते रहते हैं। जिन बातों का अपने से सीधा सम्बन्ध नहीं उन निरर्थक और अनर्गल बातों को सोचते रहते हैं और चिन्तन की एक बहुत बड़ी शक्ति का महत्वपूर्ण अंश यों ही निरर्थक खर्च हो जाता है। अपने स्वभाव में जिन अनावश्यक आदतों की घुसपैठ है उन्हें हटाने के लिए क्या किया जाए?
साधनायें कठिन बताई जाती हैं पर सिद्धि का संरक्षण उससे भी कठिन बात है। कोसा जिस दिन मगध राजनर्तकी घोषित हुई, उस दिन उसे प्राप्त करने के लिये श्रीसामन्तों, राजकुमारों तक में होड़ लग गई। स्वयं मगध नरेश की दृष्टि भी निष्कलुष न रह सकी, पर कोसा के मस्तिष्क में आचार्य देव के वह शब्द अभी भी सुप्त नहीं पड़े थे- भद्र! राजनर्तकी का गौरव प्राप्त हुआ तो तुम भारतीय नारी हो, भारतीय नारी सदैव एक पुरुष का वरण करती है और उसके आदर्शों के लिये अपने को न्यौछावर करती रही है, उस परम्परा को भूलना मत।”
साधना में अवरोध आया हो। किन्तु आज कोई भी तप परीक्षा के बिना जरा सिद्ध हो गया हो ऐसा कभी हुआ नहीं। एक दिन अनमीषि के जीवन में भी ऐसा आया कि उस दिन कोई भी सेवा का अधिकारी द्वार तक आना तो क्या किसी की छाया भी नहीं झाँकी।
साधना निरन्तर चलती रही। स्वार्थी तत्त्वों द्वारा मिलाऐ मिथ्या विचारों, श्लोकों को अपने साहित्य में से वे ऐसे निकाल-निकालकर फेंकते गये, जैसे किसान खेत के झाड़-झंखाड़ को। नागेश भट्ट प्रकाण्ड पण्डित गिने जाने लगे। उनकी योग्यता के आगे कोई भी प्रतिक्रियावादी व्यक्ति टिक नहीं पाता था।
साधनायें हैं। उन्हें वही प्राप्त कर सकता है, जिसमें असीम श्रद्धा, निष्ठा और चारित्रिक पवित्रता भी हो। यह संस्कार आत्मा से सम्बन्ध रखते हैं-समृद्धि सवर्णना और कुल श्रेष्ठता से नहीं। जब उनने कोसा को उस रूप में पाया तो उनकी वर्षों की निराशा दूर हो गई। कोसा को पाकर उनका आचार्यत्व और वात्सल्य दोनों एक साथ उमड़ पड़े।
साधना में प्रवृत्त व्यक्तियों के ऊपर ऋद्धि-सिद्धि छाया किये खड़ी रहती और उस पर चंवर डुलाती देखी गई है।
साधनारूपी त्रिवेणी में स्नान करती हुई सिद्धि प्राप्त करती हैं।
साधना में ध्यान का ऐसा ही प्रमुख स्थान है जैसे शरीर में मस्तिष्क तथा वृक्ष में उसकी जड़ का।
साधना-गुरुओं द्वारा सताया ही गया है। आरुणि ब्रह्मविद्या सीखने धौम्यपाद के आश्रम में गये थे, तब उन्हें गाय रखने का कष्टकर कार्य दिया गया। दिलीप राजा थे, चाहते तो वह महर्षि वशिष्ठ की गाय चराने के लिये कई भृत्य रख सकते थे, पर वह समझते थे कि आत्मिक आवश्यकताएँ अपना सबसे बड़ा स्वार्थ हैं और उसकी पूर्ति सांसारिक ढर्रे से उल्टा चलकर ही हो सकती है; इसीलिये उन्होंने पद-प्रतिष्ठा का मोह छोड़कर महारानी सुलक्षणा के साथ वशिष्ठ की गाय चराना स्वीकार किया। इससे उन्हें जीवन के वह आध्यात्मिक और भावनात्मक सूत्र पकड़ में आएँ जो मनुष्य को जन्म-जन्मान्तरों से बाँधे हुए हैं। दिलीप को अपनी इस तपश्चर्या से असन्तोष नहीं हुआ।
साधना शारीरिक श्रम से प्रसन्नता अनुभव करने के साथ आरंभ करनी होती है। आलस्य हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। दरिद्रता और अस्वस्थता उसी के अभिशाप हैं। शरीर को आराम तलब बना लेना, बैठे ठाले रहने में सन्तोष करना, मेहनत से जी चुराना, समय रहने के लिए मटरगश्ती करना, तथाकथित यार-दोस्तों में गप-शप लड़ाते रहना, ऐसे दुर्गुण हैं जो जहाँ भी रहेंगे वहाँ दरिद्रता आकर रहेगी। पूर्व उपार्जित पूँजी धीरे-धीरे समाप्त हो जायगी।
साधनाओं का भी वर्णन है जिनसे इन प्रकाश-अणुओं द्वारा स्थूल अणुओं को न केवल जराजीर्ण होने से रोका जा सके वरन् उनको आमूल-चूल परिवर्तित भी किया जा सके।
साधना में अपने को समर्पित कर दें। उन्हें सच्चे अर्थों में सन्त तपस्वी और साहसी कहा जायगा।
साधनाओं के द्वारा शारीरिक लाभ तो अभी भी सैकड़ों लोग ले रहे हैं पर इस दिशा में प्रगति और अगली शोधें चलती रहें तो विज्ञान एक दिन वृद्ध शरीर को पुनः छोटे से बच्चे के शरीर में बदलने की सम्भावना को सत्य कर दिखा सकता है पर इसके लिये भारतीय योग साधना विज्ञान का आश्रय और सहयोग लेना नितान्त आवश्यक होगा।
साधनाओं में लगे रहते थे इसलिए उन्हें उदर पोषण के लिए थोड़े धान्य की ही समस्या रहती थी इसीलिए अन्नदान और किसी को भोजन करा देना उन दिनों सबसे बड़ा पुण्य माना जाता था। आज की स्थिति उल्टी है इसलिए परम्परा को भी उलट देना चाहिये। अब अधिकाँशतः सारे संसार की चिन्ता कैसे भी कमाई की है। आत्म-कल्याण या लोक सेवा की बात तो कभी किसी के मस्तिष्क में ही नहीं आती इसलिये पुरुषार्थी का कर्तव्य है कि वह किसी को अन्न या खाना न खिलावें पर सद्प्रवृत्ति का कहीं अंकुर उगता दिखाई दे तो अपने साधनों का अंजलि जल डालकर उसके पनपने में सहायक अवश्य हो।
साधना-उपनिषदों में इन प्रकाश के नियन्त्रण और लाभ लेने की उन योग-साधनाओं का भी वर्णन है जिनसे इन प्रकाश-अणुओं द्वारा स्थूल अणुओं को न केवल जराजीर्ण होने से रोका जा सके वरन् उनको आमूल-चूल परिवर्तित भी किया जा सके।
साधना पास रहकर कर चुके किन्तु उनके मन में एक क्षण के लिये भी काम-विकार और साँसारिक आकर्षण जागृत न हुआ तो कोसा की रही-सही आशायें भी टूट गई।
साधना विज्ञान का आश्रय और सहयोग लेना नितान्त आवश्यक होगा।
साधना की ओर जो जितने कदम बढ़ा सका, समझना चाहिए कि उसने उतने ही बड़े शौर्य का परिचय दे दिया। शारीरिक और मानसिक वीरतायें कई लोग बड़ी आसानी से दिखा सकते हैं पर आध्यात्मिक वीरता जिसका अर्थ है- स्वार्थपरता की संकीर्ण परिधि से बाहर निकल कर परमार्थ के लिए, लोक मंगल के लिए आवश्यक त्याग बलिदान का परिचय देना- निस्सन्देह बहुत ही कठिन है। उसे केवल उदात्त और वसुदेव कुटुम्बकम् की प्रवृत्ति वाले लोग ही कार्यान्वित कर सकते हैं। आदर्शवाद की लम्बी चौड़ी बातें बखानना किसी के लिए भी सरल है पर जो उसे अपने जीवन क्रम में उतार सके सच्चाई और हिम्मत का धनी उसी को कहा जायगा। ऐसे व्यक्ति कम ही होते हैं।
साधना अद्वितीय है, उसकी सफलता कोई रोक नहीं सकता।"
साधना में जुटे पड़े थे, जैसे शेष संसार उनके लिये किसी श्मशान की तरह हो, जहाँ न तो कुछ दर्शनीय होता है, न ग्रहणीय। संसार में कोई भौतिक सुख भी होता है, यह उन्होंने जाना ही नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-March
साधना क्रम में अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है।
साधना का एक अंश अपने प्रिय परिजनों की व्यक्तिगत सहायता के लिए भी सुरक्षित रखा है।
साधना के लिए एक उद्यान बनाया है। उसमें हर ऋतु में फलने वाले वृक्ष तथा दूसरे कन्द-मूल, शाक आदि लगाये गये हैं। माता जी यहीं रहकर अपनी भावी साधना करेंगी।
साधना में रत हो गये। साधना और लोक-सेवा में तत्पर श्रमण उद्रायण बहुत समय तक देश का भ्रमण और तीर्थाटन कर अपनी आत्मिक क्षमतायें बढ़ाने में लगे रहे। धर्म साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार में फैल गया।
साधनाओं की व्याख्या कर दी गई है, जिनके अभ्यास से जीवात्मा अपनी क्षमताओं का विकास करते हुए परमात्मा को प्राप्त कर सकती है। यही योग का उद्देश्य है।
साधना वाला यह प्रदेश जहाँ गंगा सात धारायें बनाकर बही हैं, उपासना की दृष्टि से अतीव उपयुक्त स्थान है। यहाँ कुछ समय के लिए यदाकदा हम भी आते रहेंगे और जो प्रकाश संग्रह करेंगे उसको जनसाधारण में फैलाने के उपयुक्त जितना अंश होगा माता जी के पास छोड़ जाया करेंगे। वे इस प्रकाश को जनसाधारण तक बखेरती रहेंगी। इस उद्यान का नाम शाँति कुण्ड रखा है। इसे वेदमाता गायत्री ट्रस्ट के अंतर्गत देवोत्तर सम्पत्ति बना दिया गया है।
साधना और लोक-सेवा में तत्पर श्रमण उद्रायण बहुत समय तक देश का भ्रमण और तीर्थाटन कर अपनी आत्मिक क्षमतायें बढ़ाने में लगे रहे। धर्म साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार में फैल गया।
साधना प्रेम ही है। आध्यात्मवादी प्रेमी हुए बिना ईश्वर की ओर गमन नहीं कर सकता।
साधनाओं का अभ्यास करते हुए उन्होंने मन को भ्रूमध्य में वशवर्ती बना लिया था।
साधना में दिन-रात एक कर दिये। भगवान् को और क्या चाहिये, उन्हें तो निष्ठा भर की परख होती है, अन्यथा अपने भक्त की सहायता के लिये तो वे अहर्निशि तत्पर रहते हैं।
साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार में फैल गया।
साधनाओं द्वारा इस अद्भुत शक्ति को ही प्राप्त करने में लगे रहे हैं तभी उस महान् शक्ति की प्राप्ति और उद्घाटन सम्भव हुआ। “या निशा सर्वभूतायाँ तस्यामि जागर्तिसंयमी” योगी की व्याख्या एक ही वाक्य में कर दी गई, उसका अर्थ ही होता है जब सबके लिये अन्धकार होता है, तब भी योगी और आत्म-संयमी के लिये सर्वत्र प्रकाश ही रहता है। इस तरह का विलक्षण ज्ञान तो आत्मा की सिद्धि-सामर्थ्यों के एक कण के समान है।
साधना करेंगे, वहाँ ध्यान लगेगा। आज सायंकाल ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे।
साधनाओं द्वारा अपने शरीर के मर्मों में सुरक्षित सूक्ष्म यन्त्र, चक्र, उपत्यिकाओं, नाड़ी-गुच्छकों और कुण्डलिनी शक्ति को जागृत कर लेते हैं, और उनसे ऐसी सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं, जो साधारण व्यक्तियों के लिये चमत्कार जैसी लगती हैं। यह साधनायें कुछ कष्ट साध्य, समय साध्य और जीवन-प्रवाह से विपरीत दिशाओं पर चलकर साहसपूर्वक सिद्ध होती हैं, कुछ उनका सम्बन्ध आध्यात्मिक श्रद्धा और विश्वास से भी होता है, इसलिये बहुत कम लोग उन पर विश्वास कर पाते हैं, जो विश्वास कर भी लेते हैं, वे इतनी मूल्यवान् वस्तु के लिये उतना ही परिश्रम और परित्याग नहीं करना चाहते, इसीलिये भारतीय तत्व दर्शन का यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अध्याय उपेक्षित ही होता चला जा रहा है। पर इस एक आकस्मिक घटना ने एक बार फिर से सारे भारतवर्ष वरन् समूचे विश्व को यह सोचने के लिये विवश किया कि शरीर में कोई एक अतीन्द्रिय सत्ता अवश्य है, जो सर्वदर्शन, दूरदर्शन, दूरानुभूति आदि सूक्ष्म गुणों से सम्पन्न है। यह शक्ति सूक्ष्म होकर भी वैज्ञानिक है और उसे विभिन्न योगिक क्रियाओं के द्वारा जागृत भी किया जा सकता है। इस शक्ति का एक साधारण यन्त्र दोनों भौंहों के बीच जहाँ देखने वाली नाड़ियाँ (आप्टिक नर्ब्स) आप्टिक कैजमा बनाती हैं, वहाँ है और उसका नाम ‘आज्ञा चक्र’ रखा गया है।
साधना में तल्लीन हो गई।
साधना रत जो मनस्वी,
साधना विधि का प्रतिदिन थोड़ी देर तक अभ्यास करने से अपना वैराग्य और ईश्वर प्राप्ति का भाव दृढ़ होता है,यह अभ्यास कोई भी अपनी सुविधानुसार कर सकता है जानकारी के लिए दो अभ्यास नीचे दे रहे हैं।
साधना करेंगी।
साधना में तत्पर रहता है वह शरीर तथा वस्तुओं के संपर्क से तपपूर्ण कर्मों की योजना करता है और उनके फल को अक्षय परिपाक के लिये बिना भोगे, छोड़ता चलता है। वह संसार के विषय से लेकर उपासना तक के सारे कर्तव्य अभोगी वृति से करता हुआ भविष्य के स्वर्ग का निर्माण करता चलता है। वह न तो इतना लोलुप होता है ओर न अधैर्यवान् कि तुरन्त के छोटे-छोटे लाभों तथा सुखों का भोग लिये बिना चैन से न रह सके।
साधनायें कुछ कष्ट साध्य, समय साध्य और जीवन-प्रवाह से विपरीत दिशाओं पर चलकर साहसपूर्वक सिद्ध होती हैं, कुछ उनका सम्बन्ध आध्यात्मिक श्रद्धा और विश्वास से भी होता है, इसलिये बहुत कम लोग उन पर विश्वास कर पाते हैं, जो विश्वास कर भी लेते हैं, वे इतनी मूल्यवान् वस्तु के लिये उतना ही परिश्रम और परित्याग नहीं करना चाहते, इसीलिये भारतीय तत्व दर्शन का यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अध्याय उपेक्षित ही होता चला जा रहा है। पर इस एक आकस्मिक घटना ने एक बार फिर से सारे भारतवर्ष वरन् समूचे विश्व को यह सोचने के लिये विवश किया कि शरीर में कोई एक अतीन्द्रिय सत्ता अवश्य है, जो सर्वदर्शन, दूरदर्शन, दूरानुभूति आदि सूक्ष्म गुणों से सम्पन्न है। यह शक्ति सूक्ष्म होकर भी वैज्ञानिक है और उसे विभिन्न योगिक क्रियाओं के द्वारा जागृत भी किया जा सकता है। इस शक्ति का एक साधारण यन्त्र दोनों भौंहों के बीच जहाँ देखने वाली नाड़ियाँ (आप्टिक नर्ब्स) आप्टिक कैजमा बनाती हैं, वहाँ है और उसका नाम ‘आज्ञा चक्र’ रखा गया है। साधारण मनुष्यों में कभी गर्म नाड़ी (इड़ा), कभी ठंडी नाड़ी (पिंगला) चलती रहती है, इसीलिये उस सूक्ष्म संस्थान का बोध नहीं होता पर कुछ प्राणायाम और योग क्रियाओं से दोनों नाड़ियों को ‘समवात’ कर लिया जाता है तो एक तीसरी विद्युत-चुम्बकीय शक्ति ‘भ्रूमध्य में दिव्य प्रकाश के रूप में चमक उठती है, यह चैतन्य विद्युत ही उन तमाम जानकारियों का आधार है, जो दूसरों के लिये रहस्य जैसी होती है पर उस योगी के लिये वह नितान्त साधारण बात होती है।
साधनाओं का अभ्यास कर सकता है।
साधनाओं के माध्यम से सिद्ध होने वाला संकल्प तो इतना सूक्ष्म और शक्तिशाली है कि आत्मा उससे अपनी घोर से घोर शत्रुओं से रक्षा, प्रहार, दूर-दर्शन, दूर श्रवण आदि अलौकिक प्रयोजन सम्पन्न कर सकती है। यह आत्मा अपना वैभव संकल्प शक्ति द्वारा ही प्रकट करता है। इस अनुभव के आधार पर ही वेद में कहा गया है-
साधनायें जो ईश्वर को प्राप्त करा सकती हैं, देश, काल, स्व-स्थिति के अनुसार अदल-बदल सकती हैं, लाभदायक भी हो सकती हैं। और हानिकारक भी, किन्तु शुद्ध प्रेम की साधना में कहीं भी, किसी भी समय कोई भी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं।
साधना में कहीं भी, किसी भी समय कोई भी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-January
साधना है, उसके लिये आवश्यक तैयारियाँ न की जायें तो लोगों के वैयक्तिक जीवन ही नहीं पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्थायें भी लड़खड़ा सकती हैं। जीवन के प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्यपूर्वक रहकर विद्याध्ययन करने और पाठ्य−क्रम में धार्मिक, आध्यात्मिक नैतिक, साँस्कृतिक विषयों के समावेश के पीछे एक मात्र उद्देश्य और रहस्य यही था कि आने वाले जीवन और जिम्मेदारियों को वहन करने के लिये शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक त्रुटि न रह जाये। पूर्ण तैयारी कर लेने के फलस्वरूप ही उन दिनों के दाम्पत्य जीवन, पारिवारिक और सामाजिक संगठन, प्रेम−मैत्री, करुणा, दया, क्षमा, उदारता आदि सुख−संतोष और स्वर्गीय परिस्थितियों से भरे−पूरे रहते थे। आनंद छलकता था उन दिनों, पर आज जबकि शिक्षा के ढंग−ढाँचे में, हमारी रीति−नीति और जीवन पद्धति में उस तैयारी के लिये कोई स्थान नहीं रहा, तब हमारे पारिवारिक जीवन में कोई उल्लास नहीं रह गया। दाम्पत्य जीवन असन्तोष और अस्तव्यस्तता के पर्याय बन गये हैं।
साधना में कोई अन्तर नहीं पड़ा। एक शरद गई दूसरी ने प्रवेश किया। कार्तिक के सुहावने दिन प्रकृति की हरीतिमा और नव्य-कुसुमों की शोभा वन-श्री को नई आभा प्रदान कर रही थी। नन्दिनी चरते-चरते कैलाश शिखर तक जा पहुँची। दिलीप प्रकृति के अजस्र सौन्दर्य का पान करते उसके पीछे-पीछे चलते चले गये।
साधना का प्रयोजन अन्तःकरण पर चढ़े हुए उन मल आवरण विक्षेपों को हटाना है, जो हमें देवत्व से वंचित कर नर-पशु की स्थिति में डाले हुए हैं। तपश्चर्या इसी मलीनता को स्वच्छ करती और प्रस्तुत ऋद्धि-सिद्धियों का जागृत करके दैवी वरदान की तरह लघु को महान् बना देती है।
साधनायें करने वाले स्नातक और वानप्रस्थ वर्ण−कुटीरों में रहते थे, उन्हें भी एक पर्ण कुटीर रहने के लिये दे दिया गया। बिलकुल सामान्य, राज−वंश की शान के अनुकूल विशेषता का एक भी अंश उसमें नहीं था।
साधना और तपश्चर्या करने के कारण निषाद कुल में जन्मे बटुक काँदीवर को उन्होंने क्षत्रियत्व प्रदान कर राज्य की सेना में प्रवेश का अधिकार दे दिया, जबकि राजकुमार युयुत्स को उन्होंने असंयमी ठहराकर एक वर्ष के लिये क्षत्रियत्व का अधिकार छीन लिया। उन्होंने बताया—“राजकुमार ने अनेक महिलाओं का शील भंग कर उन्हें व्यभिचारिणी बनाया है, उन्हें 1 वर्ष तक नंगे पाँव, उघारे बदन राज्य की गौयें चरानी चाहियें और दुग्ध कल्प करके शरीर शुद्ध करना चाहिये। जब तक वे वह प्रायश्चित नहीं कर लेते, उन्हें राजकुमार के सम्मानित संबोधन से भी वंचित रखा जायेगा। उन्हें केवल युयुत्स कहकर पुकारा जायेगा।
साधना का एक महान् माध्यम है। इसी की सहायता से आत्मा का ज्ञान और परमात्मा का साक्षात्कार होता है। इसे संसार के अपवित्र भोगों में लिप्त कर डालना अकल्याणकारी प्रमाद है, जिसे कभी भी न करना चाहिये। शरीर को भगवान का मन्दिर समझ कर आत्म−संयम तथा अध्यात्म साधना द्वारा श्रेय−पथ पर बढ़ना चाहिये। अनात्म भाव के कारण ही शरीर, शरीर बना हुआ है।
साधना की सर्वथा उपेक्षा करने से ही आज मनुष्य जाति इतनी उन्नति और प्रगति के बाद भी दुःखी और दीन बनी हुई है।
साधना द्वारा श्रेय−पथ पर बढ़ना चाहिये। अनात्म भाव के कारण ही शरीर, शरीर बना हुआ है। अन्यथा यह एक चमत्कारी साधन है, जिसका सदुपयोग करके इसी जीवन में आत्मा को पाया और परमात्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। शरीर को अपनी सम्पत्ति मानकर भोग−विलासों में लगाये रहना अहंकार है। वस्तुतः शरीर आत्मा की संपत्ति है, उसका ही उपादान है, अस्तु इसे ऐसे साधनों में ही लगाया जाना चाहिए, जिससे भवबन्धन में आबद्ध आत्मा मुक्त हो और जीव को शाश्वत सुख का लाभ प्राप्त हो।
साधनायें और तपश्चर्यायें मूर्खता हैं, आज आप अनुभव करें कि योग में साधारण मनुष्यों को ही नहीं, पर्वत और नदियों को भी इच्छानुवर्ती बना लेने की शक्ति है हमारा अहंकार न बढ़े इसलिये सामान्य मनुष्य की तरह हम भीख माँग कर खाना खाते और जीते हैं पर आप न भूलें योग की शक्ति वह सब कर सकती है, जो आपकी मशीनें, आपका विज्ञान भी नहीं कर सकता?”
साधना की जाती रहे तो निश्चित ही भव रोगों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। आध्यात्मिक औषधि का महत्व जानने वाले प्राचीन ऋषि मुनियों ने भौतिक विभूतियों को त्याग कर भी सुखी और उपयोगी जीवन−यापन कर इसकी अमोघता को सिद्ध कर दिखलाया है। आज भी इसमें वही विशेषता मौजूद है, पर खेद है आज हमारे प्रमाद, भ्रम, अज्ञान, आलस्य एवं अनास्था आदि दोषों ने हमारी दृष्टि और अध्यात्म के महत्त्व के बीच परदा डाल दिया है। हम अध्यात्म के सारे महत्त्व को भूले चले जा रहे हैं। भौतिक उपलब्धियों में संलग्न रहने और अध्यात्म साधना की सर्वथा उपेक्षा करने से ही आज मनुष्य जाति इतनी उन्नति और प्रगति के बाद भी दुःखी और दीन बनी हुई है।
साधना में भी लगा जाय।
साधना तपश्चर्या द्वारा अपने ही भीतर की भावनात्मक चेतना को जागृत कर लिया जाये तो मनुष्य सूर्य चेतना की तरह सर्वसमर्थ और शक्तिशाली हो सकता है। सामान्य और सुषुप्त अवस्था की चेतना शक्ति सूर्य की चेतना के समान ही दृष्टिगोचर नहीं होती पर वह शक्ति है असंदिग्ध।
साधना की कठिनाइयों को झेल सकने की क्षमता न होने पर भी वैराग्य का ढोंग करने वाले पलायनवादी श्रेणी के लोगों ने घुसकर साधुओं की संख्या न बढ़ाई होती, भीख माँगना, नशेबाजी करना आलस्य और प्रमोद में पड़े रहने जैसी अनेक तरह की धूर्ततायें ने की होतीं तो यों उपेक्षा और अपमान के दिन देखने को न मिलते। इस तरह तो उन्होंने अपनी कम, अपने धर्म और संस्कृति की मिट्टी कहीं अधिक कुटाई।
साधना के प्रताप से दिलीप और सुलक्षणा ने रघु को जन्म दिया। जिनके नाम पर दिलीप के वंश का नाम ‘रघुवंश’ पड़ा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-April
साधना के लिये अन्तेवासी हो गया था।
साधना और अभ्यास से छोटे व्यक्ति सम्पन्न व्यक्तियों के समकक्ष योग्य और श्रद्धास्पद हो जाते हैं। चरवाहे की पत्नी को इस कला निपुणता के कारण राजदरबार तक में आमंत्रित किया जाता था।
साधना के लिए चले जायेंगे। अस्तु मई सन् 70 से लेकर मई 71 तक का एक वर्ष-विदाई वर्ष के रूप में मनाया जाय। इसी अवधि में आचार्य जी के शरीर का साठवाँ वर्ष पूरा होता है। 60 और 75 वें वर्ष में “हीरक जयन्ती” मनाये जाने की प्रथा है। इस वर्ष को ‘गुरुदेव का हीरक जयन्ती वर्ष’ भी कह सकते हैं।
साधना आदि कि दृष्टि से अत्यन्त अविकसित स्थिति में पड़े हैं, प्रकृति का यह सहयोग हमें सिखाता और पाठ पढ़ाता है कि हमें उन सबके प्रति भी श्रद्धा रखनी चाहिए उनके उत्थान, भरण-पोषण और संरक्षण के लिये जो भी सम्भव सहयोग कर सकते हैं, वह करना चाहिये। सहयोग के सिद्धान्त से समाज के नकारा लोग भी पल जाते हैं और समर्थ लोगों के विकास और सफलता की सम्भावनायें बदलती हैं।
साधना में सुख शाँति के मनोवाँछित फल लगेंगे। किन्तु उनकी यह धारणा कभी सत्य सिद्ध नहीं हो सकती। अध्यात्म में सफल होने, पूजा-पाठ का उचित फल पाने और परमात्मा से सच्चा सम्बन्ध स्थापित करने के लिए विकारों का त्याग और गुणों का ग्रहण करना आवश्यक है।
साधना से बड़ा और कोई शस्त्र नहीं है।
साधना की सफलता में देर नहीं लगती। आग्नीध्र थोड़े दिनों में ही समाधि-सुख की अनुभूति करने लगे। जब वे तप के लिये बैठते तो साँसारिकता की ओर उनका चित तक न डोलता। आत्मा मुक्त आकाश में विचरण करने और देव-शक्तियों के दर्शन का आनन्द लेने में निमग्न होने लगी।
साधनायें सिखायेंगे।”
साधना। 4. गायत्री शक्ति का स्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसका प्राण-प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एक मुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना।
साधना। 8. गायत्री की साधनायें। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ।
साधना तब तक अधूरी है एकाँगी है, जब तक आत्म विकास और आत्म सुधार की प्रक्रिया भी इसमें नहीं जोड़ दी जाती। उपासक का कर्त्तव्य है कि वह भजन-पूजन तो करे ही साथ ही मानसिक मलों और शारीरिक दुष्टताओं का भी परिशोधन करता चले। उसकी उपासना तभी पूर्ण होगी, तभी फलवती होगी और तभी आनन्द-दायिनी।
साधना। (124)कर्मयोग की नीति-रीति।(125) भक्ति-योग का वास्तविक रूप। (126) प्रेम ही परमेश्वर है। (127) उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता।
साधना की सफलता के लिए हममें से प्रत्येक एक माला गायत्री मन्त्र की अतिरिक्त जप प्रारम्भ करें और उसे एक वर्ष तक चालू रखें। गायत्री जयन्ती और बसन्त पन्चमी को दो सामूहिक यज्ञ भी छोटे या बड़े जैसे भी बन पड़ें कर लें।
साधना व्यक्ति की शक्ति और महत्व को हजार गुना बढ़ा देती है। जबकि स्वार्थ से सने व्यक्ति भी कालान्तर में छूछे हाथ खोखली झोली रह जाती है। पीटर हरकौस के इस चमत्कार ने एक बार तो सारे संसार को चमत्कृत कर दिया, धीरे-धीरे वह उसका व्यवसाय बन गया। वह इस शक्ति को मनुष्य जीवन में बढ़ते हुये पाप और दुर्भाव को रोकने में लगाकर ईश्वरीय प्रयोजन भी पूरा कर सकता था पर स्वार्थवश ऐसा कुछ न हुआ, चमत्कार तो चमत्कार ही होता है, थोड़ी नामवरी भले ही मिल ले पर उससे आत्म-शान्ति, आत्म-कल्याण का महान उद्देश्य कहाँ से पूरा हो पाता है।
साधना।(130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें। (132) सफलता आत्मविश्वासी को मिलती है। (133) जो करें मन लगाकर करें।
साधनायें। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप।
साधना ने उसे इस जीवन में सुखद परिस्थितियाँ दी, वहाँ पूर्व जन्म का प्रतिशोध पाप की प्रेरणा बनकर फूटा। यक्षिणी जिसका नाम हारीति था, नगर के बच्चे चुरा-चुराकर मारने और उनका भक्षण करने लगी। पुण्य की आड़ में पल रहे इस पाप को लोगों ने बहुत दिन बाद जाना। जब राजगृह नरेश को उसका पता चला तो उन्होंने हारीति को बन्दी बनाकर कारागृह में डाल दिया।
साधना, तपस्या सब कुछ इसी केन्द्र बिन्दु के इर्द-गिर्द घूमी है। परिजनों को इस अभियान में सम्मिलित होने की आशा अनिवार्य स्तर पर रखी गई है। यों युग-निर्माण के शत सूत्री कार्यक्रम भी उन्होंने प्रस्तुत किये हैं और अपनी रुचि, सुविधा एवं योग्यता के अनुरूप उन्हें भी कार्यान्वित करने की प्रेरणा दी है। पर प्रथम और अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में उन्होंने ज्ञान-यज्ञ की सदस्यता को ही आगे रखा है। नाम जो भी हो हम लोगों के लिए यह इतना आवश्यक है कि आचार्य जी के प्रति अपने संपर्क की सार्थकता सिद्ध करने के लिए इस वर्ष को कुछ निर्दिष्ट कार्यक्रमों के साथ मनाने के लिए आलस्य और प्रमाद छोड़कर तत्परतापूर्वक कदम बढ़ायें।
साधना क्रम को ठीक तरह चला ले तो उसका सूक्ष्म जगत की परिशुद्धि पर भारी प्रभाव पड़ेगा।
साधनाओं द्वारा जब किसी को कोई सन्देश देना होता है तो उसके शरीर के पसीने से लगा कोई कपड़ा इसलिये आवश्यक होता है कि ठीक उस व्यक्ति के स्वभाव से मिलते जुलते तत्वों वाली ऊर्जा उसके पास भेजी जाये और उसके मस्तिष्क में सन्देश भरकर अपनी ओर से उसे इतना प्रभावित कर दिया जाये कि वह वैसा ही करने को विवश हो जाये यह सब शरीर में प्राप्त विद्युत के उन सूक्ष्म विकिरणों के फलस्वरूप ही सम्भव होता है, जिसकी चर्चा ऊपर कर चुके हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-November
साधना की अवधि में पूरा करेंगे। जनमानस में जागृति उत्पन्न करना और उसे शक्ति सज्जा से सुसज्जित करना यह दोनों कार्य एक ही है, इन्हें एक भी कहा जा सकता है, दो भी। जो भी कहा जाय हम अपने जीवन का तीसरा अध्याय इसी प्रयोजन के लिए पूरा करेंगे। हमारी कार्य पद्धति अपने द्वारा निर्धारित नहीं होती न अपनी व्यक्तिगत इच्छा और समझ का उपयोग उसमें होता है। तीसरे अध्याय का कार्यक्रम भी ऊपर से आया है तो उसमें ननुनच कैसे करें?
साधना, योगाभ्यास, स्वाध्याय और दीर्घकालीन मनन चिन्तन के बाद आत्मतत्व की स्पष्ट अनुभूति नहीं कर ली, इस विषय में दुविधा पूर्ण स्थिति में रहता आया है। आत्मा का कोई अस्तित्व है भी अथवा नहीं। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसे सुलझा न पाने वाले जीवन भर उलटी और अंधकार पूर्ण दिशाओं में भटकते रहते हैं पर जो इस स्थिति के बारे में निश्चिन्त होकर आत्मानुभूति कर लेते हैं, वे अपना जीवन धन्य मानते हैं।
साधना में लग जायेंगी। वहाँ से वे अखण्ड-ज्योति का सम्पादन करेंगी तथा परिजनों को मार्गदर्शन एवं स्नेह प्रदान करती रहेंगी। बाप मर जाता है तो माँ बच्चों को पाल लेती है। माँ न रहे तो बाप के लिये कठिन पड़ता है। सो परिजनों को हमारे स्नेह सहयोग की आवश्यकता की पूर्ति माता जी द्वारा होती रहेगी वे अपने को एकाकी अनुभव न करेंगे।
साधनायें भी कीं और उसके अनेक गूढ़ रहस्यों का पता लगाया।
साधना आदि की धार्मिक अथवा आध्यात्मिक स्वभाव की क्रियाओं को शुभ और मुक्ति प्रदायिका माना जाता है। निश्चय ही यह है भी। किन्तु कब? जब इनको इन्हीं की स्थिति में रखा जाए। इनको निःस्वार्थ, निष्काम तथा निर्लोभ भाव से किया जाय।
साधनायें उससे भी कठिन है, तुम उन्हें पूरा नहीं कर सकोगे। चाहिये तो कोई शारीरिक सुख का वरदान माँग लो। मैं तुम्हें वृद्ध से युवा बना देने में भी समर्थ हूँ। सुखों की इच्छा त्यागकर कठिनाइयों भरा जीवन से मत जियो?
साधना पद्धति द्वारा आत्मा के ऊपर चढ़े हुये मलावरण को परिमार्जित करना पड़ता है। आप आत्म-वेत्ता महामुनि शाकायन्य के पास जायें वे ही आपको आत्म-ज्ञान की दीक्षा देने में समर्थ हैं।
साधना तक ही मनुष्य की सारी क्रियायें प्रतिक्रियायें एकमात्र बंधन अथवा मुक्ति का प्रयत्न ही है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। यह मानना है कि मनुष्य के बंधन अथवा मुक्ति की विधायिका क्रियायें, प्रतिक्रियायें भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं भूल ही होगी। मानव जीवन की सम्पूर्ण गतिविधि इन्हीं दो में से एक गति की सम्पादिका होती है। बंधन अथवा मुक्ति दायिनी गतिविधियों का अलग-अलग कोई बंटवारा नहीं है।
साधना तो सबके अपने वश की बात है। हम ज्ञान के केन्द्रबिन्दु मन और मस्तिष्क को जीत पायें तो क्या विज्ञान क्या ग्रह-गणित सबसे विजय पाकर अपने आप में ही भूत और भविष्य के न केवल ज्ञान वरन् नियंत्रण की क्षमता भी प्राप्त कर सकते हैं।
साधना भी वस्तुतः इस सूक्ष्म आकाँक्षा के लिये ही रही कि ये लाभान्वित दीन-दुःखी नव निर्माण मिशन की ओर भी उन्मुख होंगे। वे न हुए बात दूसरी है। आज की दुनिया कुछ है ही इस ढंग की कि अपने मतलब से मतलब रखना बुद्धिमानी मानी जाती है। प्रणाम, दर्शन करने की कीमत पर आशीर्वाद अनुदान प्राप्त करना लोगों को सस्ता लगता है। सेवा साधना के झंझट में कोई क्यों पड़े?
साधना कक्ष की ओर चल पड़ेंगी। यह उनका निजी कमरा है जहाँ वे भगवान के भजन से लेकर मानव जाति के सेवा के काम-काज किया करती हैं।
साधना है, मैं तुम्हारी दुष्टता के आगे झुकूँगी नहीं चाहे मेरे प्राण ही क्यों न ले लो।’
साधनात्मक एवं व्यक्तिगत कार्यवाहियों के संबंध में परामर्श का कार्य माता भगवती देवी करेगी। अखण्ड-ज्योति का सम्पादन संचालन भी उन्हीं के जिम्मे छोड़ा गया है।
साधना के झंझट में कोई क्यों पड़े? उसमें तो समय, पैसा, मन सभी बिना स्वार्थ के काम में खर्च करने पड़ते हैं। इस झंझट को कौन मोल ले। लोगों का यही दृष्टिकोण रहा और उस वर्ग में से चन्द लोग ही अपने जीवन लक्ष्य में सहायक हो सके। जो हो हमारा प्रयोजन वही था।
साधना किये बिना कोई उन्हें पा नहीं सकता।
साधना आदि की आध्यात्मिक गतिविधि बंधन की हेतु नहीं बनती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-September
साधना निष्ठ साधु ही हैं। जो शरीर से 80-90 पौण्ड होकर भी शक्ति और सामर्थ्य में हजारों बमों की क्षमता से भी शक्तिशाली और ज्ञान-विज्ञान के भंडार होते हैं।”
साधना अधूरी रह गई थी, उसी का यह फल है। अब फिर से शक्ति की साधना प्रारम्भ करो, पर देखना इस बार अहंकार भूलकर भी न करना।
साधना प्रारम्भ करो, पर देखना इस बार अहंकार भूलकर भी न करना।
साधना के हाथों में, कंगन पहिनाना,
साधना, तपश्चर्या से लेकर लोगों के साथ सद्भावना जोड़ने तक के सारे प्रयास इसी दृष्टि से किये हैं कि लोक-निर्माण के लिये अपने तथा दूसरों के साधनों को अधिक मात्रा में, अधिक अच्छाई के साथ, अधिक भावपूर्ण रीति से नियोजित कर सकें। व्यक्ति का भावनात्मक परिवर्तन और समाज-क्रम की दशा सुधार आज की सबसे महती आवश्यकता है। उसे ईश्वरीय इच्छा भी कहा जा सकता है। इसके लिए हमें जन्म लेना पड़ा और आदि से अन्त तक अपनी समस्त गतिविधियों को इसी प्रयोजन के लिए संलग्न समर्पित करना पड़ा। संस्कारवान आत्माओं को ढूंढ़-ढूँढ़ कर अपना परिवार बनाया।
साधनाएं और योगाभ्यास आदि करने से इस स्थिति का स्पष्ट आभास शरीर रहते हुए भी हो जाता है। इस अवस्था में साधक के अधिकाँश स्वप्न सच्चे भी होने लगते हैं।
साधना और कठिन तपश्चर्या के लिये पुनः तैयार हूँ आप मुझे रास्ता दिखाइये ताकि मैं उस छोड़े हुये अधूरे कार्य को पूरा कर सकूँ।”
साधनाओं के द्वारा इन अवस्थाओं का विकास बीज जागृत अवस्था में न कर लें।
साधना में प्रवेश दिया जाये?
साधनायें की हैं। उल्लेखनीय सिद्धियाँ प्राप्त कीं और कथनीय कार्यों को कर दिखाया। फिर वही तपस्वी तथा तेजस्वी व्यक्ति वासनाओं के दलदल में फंसे और शोचनीय अन्त को प्राप्त हुए। इसके विपरीत कुछ ऐसे लोग हुए जिनका प्रारम्भिक जीवन वासनापूर्ण रहा। पर जब उन्होंने उसकी निःसारता को समझा और उसका त्याग किया तो उनका वही निकृष्ट जीवन उत्कृष्ट हो गया।
साधना के लिये बुलाया गया। बाद में वह कौन हुआ, किस नाम से विख्यात हुआ क्या काम किया पर उन्होंने जो कुछ देखा उसको लेकर वे हिन्दुस्तान से इंग्लैंड तक भारतीय धर्म और अध्यात्म के गीत गाते रहे। इस घटना की पुष्टि अपने एक लेख में स्वयं श्री फैरेल ने 17 मई 1959 के साप्ताहिक हिन्दुस्तान में भी की थी।
साधना और तप कराना चाहता हूँ पर उसकी पूर्व जन्मों की स्मृतियों सो गई हैं इस जनम के संस्कार और परिस्थितियाँ उसे खींचती हैं इसलिये वह साधना में आरुढ़ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ वह न हो पायेगा इसलिये आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।
साधना अधूरी रह गई है अब मैं फिर उसे लोक-मंगल के लिये साधना और तप कराना चाहता हूँ पर उसकी पूर्व जन्मों की स्मृतियों सो गई हैं इस जनम के संस्कार और परिस्थितियाँ उसे खींचती हैं इसलिये वह साधना में आरुढ़ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ वह न हो पायेगा इसलिये आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।
साधना और योगाभ्यास करना पड़ता है, जीवन के सुख और इन्द्रियों के आकर्षण त्याग कर लम्बे समय तक तप करना पड़ता है वह न आपके लिये सम्भव है न आप जान सकते हैं आपको तो जिस काम के लिये बुलाया है उसी के लिये यहाँ आ जाइये।
साधना द्वारा ऐतरेय ने अपनी माँ का ही मुख उज्ज्वल नहीं कर दिया वरन् इस बात का प्रमाण भी दे दिया कि शूद्र हो तो क्या संस्कारों से ही मनुष्य ब्राह्मण हुआ करते हैं।
साधनाओं का अधिकार प्रदान किया जाय अथवा नहीं। उनकी करुणा, उनका सहज स्नेह उमड़ता और कहता सौभरि ने तुम्हारी बड़ी सेवायें की हैं, उसे यह अधिकार मिलना ही चाहिये। किन्तु शास्त्र-अनुभव आड़े आ खड़े होते और पूछते-क्रौष्टक! सिद्धि पान के बाद भी क्या तुझे विचलित करने वाली परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा? क्या तुझे इन्द्रिय लालसाओं के दमन में अत्यधिक कठोरता बरतनी नहीं पड़ी? क्या यह संभव है कि सिद्धि पाने के बाद सौभरि को ऐसे सामाजिक जीवन के अनिवार्य सन्दर्भों का सामना नहीं करना पड़ेगा?
साधना पद्धतियाँ विकसित हुई हैं। प्राण की अनुभूति के लिये ही अनेक प्रकार के योगों का आविर्भाव हुआ। प्राचीन काल में इस देश के निवासियों ने प्राण तत्व पर एक प्रकार से अधिकार ही कर लिया था। इसलिये हम भारतीय विश्व की सर्वसमर्थ जाति बन सके थे। ज्ञान-विज्ञान हमारी मुट्ठी में था-वह इस शक्ति का ही चमत्कार था।
साधना अधूरी रह गई लगती है। संयमी और पराक्रमी होने के साथ उसे निरहंकारी भी होना चाहिये था। संयम से स्वर्ग जीत जाते हैं, सो अब तुम अविलम्ब स्वामी कार्तिकेय के पास जाओ और उन्हें सैन्य संचालन के लिये राजी कर लो।’
साधनाशील और धार्मिक व्यक्तियों को होती है। घर वालों ने भी उसे निकाल दिया। युवक का एक हाथ खराब हो चुका था, तो भी प्रत्येक आध्यात्मिक-धार्मिक पुरुष में श्रम और स्वाभिमान के जो लक्षण होने चाहिये, वह उसमें पर्याप्त मात्रा में थे। उसने अपनी आजीविका आप कमाने का निश्चय कर लिया।
साधना करते थे। महीनों गुफा के अन्दर बन्द रहते थे। कई बार तो लोगों को सन्देह होता था कि वे मर गये। पर जब वे निकाले जाते थे, तो उनके शरीर-स्वास्थ्य में कोई अन्तर नहीं आता था। अमेरिकी डाक्टरों के एक दल ने एक बार उनकी जाँच करके बताया था- ‘आहार द्वारा जो तत्त्व शरीर ग्रहण करता है वह सब तत्त्व उनके शरीर में हैं।
साधना की कसौटी पर कस-कस कर और भगवती प्रकृति के व्यवहार को देख-देख कर उसने ज्ञान का अद्वितीय भाण्डागार अर्जित कर लिया। इतरा के पुत्र का यश संसार में चन्द्रमा की कला के समान विकसित होने लगा।
साधना में आरुढ़ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ वह न हो पायेगा इसलिये आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-February
साधना, सारी तपस्या और सारा धर्माचरण यहाँ तक कि सारा जीवन ही व्यर्थ चला जाता है। बाद में वे सोचते और पछताते हैं कि ऐसी क्या कमी रह गई कि साधना का कोई लाभ नहीं हुआ। इस निराशा में वास्तविकता यह होती है कि वे इस आप्त वचन को नहीं जानते-
साधना की ही उपलब्धियाँ हैं। योग शास्त्र के अध्येता भली प्रकार जानते हैं कि उक्त शास्त्र की दक्षिण-मार्गी और वाम-मार्गी जिन अलौकिक विभूतियों और सिद्धियों का विस्तार से वर्णन किया गया है, उसके विधि-विधाता के अन्तर्गत अध्यात्म साधना का सार ही सन्निहित है। अध्यात्म साधना में जो व्यक्ति जितनी सीमा तक अग्रसर हो जाता है, वह उस सीमा तक चमत्कारी व्यक्ति बन जाता है। वे ऐसी समर्थ सूक्ष्म-शक्तियों का उपार्जन कर लेते हैं, जिनके द्वारा अभाग्य ग्रस्त लोगों का भी कल्याण सम्पादन किया जा सकता है। अध्यात्म की शक्तियाँ अपार एवं अपरिमेय हैं।
साधना से किसी लाभ के होने की आशा संदिग्ध ही रहती है।
साधना सिद्धि के रूप में परिपक्व हो जाती है और यह व्यक्ति चमत्कारी शक्तियों का विधान बन जाता है। सामान्य स्थिति से चमत्कारी स्थिति पर पहुँचने की यही सुन्दर, सरल और असंदिग्ध निधि है। साहसिक साधना से किसी लाभ के होने की आशा संदिग्ध ही रहती है।
साधना भी करता चलता है। धीरे-धीरे उनका विकास होता और संस्कार संचय होते जाते हैं। कालान्तर में जब संस्कारों की निधि संचय हो जाती है, तब किसी एक जन्म में सारी संचित साधना सिद्धि के रूप में परिपक्व हो जाती है और यह व्यक्ति चमत्कारी शक्तियों का विधान बन जाता है। सामान्य स्थिति से चमत्कारी स्थिति पर पहुँचने की यही सुन्दर, सरल और असंदिग्ध निधि है। साहसिक साधना से किसी लाभ के होने की आशा संदिग्ध ही रहती है।
साधना शास्त्र में निरर्थक ही नहीं, हानिकारक भी बताया गया है। और कहा गया है कि सनातन उपासना गायत्री ही है। जब देवता उसी की उपासना करके शक्ति प्राप्त करते हैं तो मूल का तिरस्कार कर पत्तों पर भटकने की भूल क्यों की जाय? ऐसी भूल करने वालों की भर्त्सना भी की गई है।
साधना से अपने जीवन में सुख-शाँति का समावेश कर सके। ऋषि-मुनियों की अखण्ड आत्म-साधना की हिसु करना उचित नहीं। क्योंकि वह सर्वसाधारण के वश की बात नहीं होती और जो लोग लोभ, स्पर्धा अथवा अहंकार के वशीभूत होकर अपने सामान्य जीवन की साधना से हटकर असाधारण साधना में चले जाते हैं, वे न तो इधर के रहते हैं और न उधर के। यद्यपि अध्यात्म की असाधारण साधना किसी के लिए वर्जित नहीं है तथा यह तब तक उचित नहीं, जब तक मनुष्य उस साधना के योग्य मानसिक स्तर में न पहुँच जाए। ऋषि-मुनियों की तरह चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के लोभ से जो लोग हठपूर्वक साँसारिक कर्तव्य त्याग कर योग साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
साधना से आत्मा में आप्त तेज का विकास होता है। साधक का व्यक्तित्व सुखद और प्रभावशाली बनता है। संसार में जितने भी आत्मज्ञानी और तत्वदर्शी हुए हैं, उन सबने अपने अनुभवों और साँसारिक निष्कर्षों के आधार पर एक स्वर में सत्य की महत्ता घोषित की है। और अभिवचनों, धर्म-ग्रन्थों, शास्त्रों तथा आत ग्रन्थों द्वारा मानव-समाज को सत्य को धारण और उसी का आचरण करने का निर्देश किया है। जो धर्म जन महापुरुष के इन वचनों का आदर करते हुए सत्य पथ का आलम्बन करते हैं, वे क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी जीवन क्षेत्र में सफल नहीं होते।
साधना का फल नहीं होता। वह तो जन्म जन्मान्तरों की निर्बाध साधना का ही संचित सत्फल होता है। साधना की सिद्धि साहसिक घटना नहीं है। यह तो जन्म-जन्म की साधन परम्परा का एक सुनिश्चित परिणाम ही होता है। कोई साधक अपने पूर्वजन्मों की परंपरा में अपने आवश्यक कर्त्तव्यों के साथ थोड़ी-थोड़ी अध्यात्म साधना भी करता चलता है।
साधना की सिद्धि साहसिक घटना नहीं है। यह तो जन्म-जन्म की साधन परम्परा का एक सुनिश्चित परिणाम ही होता है। कोई साधक अपने पूर्वजन्मों की परंपरा में अपने आवश्यक कर्त्तव्यों के साथ थोड़ी-थोड़ी अध्यात्म साधना भी करता चलता है। धीरे-धीरे उनका विकास होता और संस्कार संचय होते जाते हैं। कालान्तर में जब संस्कारों की निधि संचय हो जाती है, तब किसी एक जन्म में सारी संचित साधना सिद्धि के रूप में परिपक्व हो जाती है और यह व्यक्ति चमत्कारी शक्तियों का विधान बन जाता है।
साधना की जाएगी, उसका निष्फल हो जाना स्वाभाविक ही है। सारे श्रेयों का मूल सत्य ही है। जब उसका परित्याग कर साधना में निरत हुआ जाएगा तो वह एक विडम्बना के सिवाय और क्या सिद्ध हो सकती है। सामान्य जीवन में ही नहीं, सत्य का महत्व तो आध्यात्मिक जीवन में और भी अधिक है। जो आध्यात्मिक जीवन में उतरता है, वह मानों एक प्रकार से सत्याचरण करने की प्रतिज्ञा करता है।
साधना में चले जाते हैं, वे न तो इधर के रहते हैं और न उधर के। यद्यपि अध्यात्म की असाधारण साधना किसी के लिए वर्जित नहीं है तथा यह तब तक उचित नहीं, जब तक मनुष्य उस साधना के योग्य मानसिक स्तर में न पहुँच जाए। ऋषि-मुनियों की तरह चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के लोभ से जो लोग हठपूर्वक साँसारिक कर्तव्य त्याग कर योग साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
साधना किसी के लिए वर्जित नहीं है तथा यह तब तक उचित नहीं, जब तक मनुष्य उस साधना के योग्य मानसिक स्तर में न पहुँच जाए। ऋषि-मुनियों की तरह चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के लोभ से जो लोग हठपूर्वक साँसारिक कर्तव्य त्याग कर योग साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
साधना के योग्य मानसिक स्तर में न पहुँच जाए। ऋषि-मुनियों की तरह चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के लोभ से जो लोग हठपूर्वक साँसारिक कर्तव्य त्याग कर योग साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
साधना, उपासना के साथ स्वावलम्बी जीवन का अभ्यास भी प्रारंभ कर दिया।
साधना का सार ही सन्निहित है। अध्यात्म साधना में जो व्यक्ति जितनी सीमा तक अग्रसर हो जाता है, वह उस सीमा तक चमत्कारी व्यक्ति बन जाता है। वे ऐसी समर्थ सूक्ष्म-शक्तियों का उपार्जन कर लेते हैं, जिनके द्वारा अभाग्य ग्रस्त लोगों का भी कल्याण सम्पादन किया जा सकता है। अध्यात्म की शक्तियाँ अपार एवं अपरिमेय हैं। इस शक्ति के आधार पर संसार के ऐसे कार्य भी सरलतापूर्वक किए जा सकते हैं, जिन्हें संसार असंभव कह सकता है।
साधना का कोई लाभ नहीं हुआ। इस निराशा में वास्तविकता यह होती है कि वे इस आप्त वचन को नहीं जानते-
साधना में निरत हुआ जाएगा तो वह एक विडम्बना के सिवाय और क्या सिद्ध हो सकती है। सामान्य जीवन में ही नहीं, सत्य का महत्व तो आध्यात्मिक जीवन में और भी अधिक है। जो आध्यात्मिक जीवन में उतरता है, वह मानों एक प्रकार से सत्याचरण करने की प्रतिज्ञा करता है। अध्यात्मवाद और सत्य समानार्थी शब्द हैं। अध्यात्मवादी बनकर भी जो असत्य को अपनाता है।
साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
साधना में जो व्यक्ति जितनी सीमा तक अग्रसर हो जाता है, वह उस सीमा तक चमत्कारी व्यक्ति बन जाता है। वे ऐसी समर्थ सूक्ष्म-शक्तियों का उपार्जन कर लेते हैं, जिनके द्वारा अभाग्य ग्रस्त लोगों का भी कल्याण सम्पादन किया जा सकता है। अध्यात्म की शक्तियाँ अपार एवं अपरिमेय हैं। इस शक्ति के आधार पर संसार के ऐसे कार्य भी सरलतापूर्वक किए जा सकते हैं, जिन्हें संसार असंभव कह सकता है। अध्यात्म एक सर्वांगीण संपूर्ण विज्ञान है।
साधना में संलग्न रहकर प्रभु का अनुग्रह प्राप्त करें। हृदय कमल पर भाव भगवान की उच्च-स्तरीय स्थापना करें। अपनी मनोभूमि ऐसी बनायें जिससे सद्भावना सम्पन्न सद्भक्त कहला सकें। अपने को शरीर नहीं आत्मा समझें और शरीरगत वासना-तृष्णा से ऊँचे उठकर आत्म-कल्याण की गतिविधियाँ अपनायें। काम-क्रोध, मोह-मद मत्सर रूपी षटरिपुओं से सावधान रहें।
साधनाओं द्वारा स्पष्ट बनाया जाता है। मनुष्य अपने को शरीर मानने की भूल को छोड़ता हुआ चला जाये और शुद्ध आत्म-चेतना की अनुभूति तक पहुँच जाये तो वह चींटी ही नहीं, जीवाणु की उस सूक्ष्म सत्ता तक भी पहुँचकर सब कुछ यन्त्रवत देख सकता है, जिसका व्यास 1/30000 इंच तक होता है। वैज्ञानिक यन्त्र इस बात के प्रमाण हैं कि आत्म-चेतना के लिए असंभव कुछ है नहीं।
साधना की हिसु करना उचित नहीं। क्योंकि वह सर्वसाधारण के वश की बात नहीं होती और जो लोग लोभ, स्पर्धा अथवा अहंकार के वशीभूत होकर अपने सामान्य जीवन की साधना से हटकर असाधारण साधना में चले जाते हैं, वे न तो इधर के रहते हैं और न उधर के। यद्यपि अध्यात्म की असाधारण साधना किसी के लिए वर्जित नहीं है तथा यह तब तक उचित नहीं, जब तक मनुष्य उस साधना के योग्य मानसिक स्तर में न पहुँच जाए। ऋषि-मुनियों की तरह चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के लोभ से जो लोग हठपूर्वक साँसारिक कर्तव्य त्याग कर योग साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
साधना से हटकर असाधारण साधना में चले जाते हैं, वे न तो इधर के रहते हैं और न उधर के। यद्यपि अध्यात्म की असाधारण साधना किसी के लिए वर्जित नहीं है तथा यह तब तक उचित नहीं, जब तक मनुष्य उस साधना के योग्य मानसिक स्तर में न पहुँच जाए। ऋषि-मुनियों की तरह चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त कर लेने के लोभ से जो लोग हठपूर्वक साँसारिक कर्तव्य त्याग कर योग साधनाओं में लग जाते हैं, वे भूल करते हैं और उस ओर का कोई विशेष लाभ तो नहीं ही उठा पाते, इस ओर वे संसार से भी वंचित हो जाते हैं।
साधना, जप, अनुष्ठान आदि में लगे रहते हैं। पर उनके हाथ कुछ भी नहीं आता। उनकी सारी साधना, सारी तपस्या और सारा धर्माचरण यहाँ तक कि सारा जीवन ही व्यर्थ चला जाता है। बाद में वे सोचते और पछताते हैं कि ऐसी क्या कमी रह गई कि साधना का कोई लाभ नहीं हुआ। इस निराशा में वास्तविकता यह होती है कि वे इस आप्त वचन को नहीं जानते-
साधना, स्वाध्याय और प्रातः तथा सायंकालीन संध्या-वंदन का नियम अनिवार्य बना दिया था। जो लोग प्रमादवश इस अनिवार्य नियम का पालन नहीं करते थे, उन्हें या तो समाज-बाहर माना जाता था अथवा पतित तथा पापी।
साधनाओं द्वारा उसका साक्षात्कार करते हैं तो ज्ञानी जन उसे तत्व रूप में चिंतन करके प्राप्त करते हैं, दोनों ही अवस्थाओं में उसकी सूक्ष्मता तक पहुँचना अनिवार्य है। शास्त्रकार ने श्वेताश्वेतरोपनिषद् में बताया है-
साधना, तितीक्षा, संयम एवं तपश्चर्या का अभ्यास करें। फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटाने का पुरुषार्थ कर अपने आत्म बल को विकसित करें। आदर्श जीवन जीकर दूसरों के लिए प्रकाश प्रदान करने वाले उज्ज्वल नक्षत्र सिद्ध हों। उन विचारों से ओत-प्रोत रहें, जिनसे शाँति मिले। उन कार्यों को अपनायें जिनसे यशस्वी जीवन जीने का अवसर मिले और परलोक में सद्गति को प्राप्त हों।
साधना, ध्यान, जप, स्वाध्याय, मनन, चिन्तन आदि के द्वारा मस्तिष्क में यह संकल्प सुदृढ़ कर लेता है कि साँसारिक आवश्यकतायें यथा इन्द्रियसुख, पद-यश, वित्त, पुत्र यह सब चेतना के ऊपर चढ़ी झिल्ली की खुजलाहट, क्रियाशीलता अथवा माँग उसकी निज की नहीं, तब उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। आसक्ति नष्ट होकर वह शुद्ध चैतन्य की प्राप्ति का प्रयत्न करने लगता है। तब वह बार-बार अनेक तरह के शरीर धारण करने की चिंता से भी मुक्त हो जाता है।
साधना का ही संचित सत्फल होता है। साधना की सिद्धि साहसिक घटना नहीं है। यह तो जन्म-जन्म की साधन परम्परा का एक सुनिश्चित परिणाम ही होता है। कोई साधक अपने पूर्वजन्मों की परंपरा में अपने आवश्यक कर्त्तव्यों के साथ थोड़ी-थोड़ी अध्यात्म साधना भी करता चलता है। धीरे-धीरे उनका विकास होता और संस्कार संचय होते जाते हैं।
साधना शास्त्रों में निष्ठावान भारतीय धर्मानुयायियों को- द्विजों को- एकमात्र गायत्री उपासना का ही निर्देश किया गया है। उसमें वे अपना ब्रह्मवर्चस आशाजनक मात्रा में बढ़ा सकते हैं और उस आधार पर विपन्नता एवं आपत्तियों से बचते हुए, सुख-शाँति के मार्ग पर सुनिश्चित गति से बढ़ते रह सकते हैं। द्विजत्व का व्रत-बंध स्वीकार करते समय हर व्यक्ति को गायत्री मंत्र की दीक्षा लेनी पड़ती है, इसलिए उसे ही गुरुमंत्र कहा जाता रहा है। पीछे से अंधकार युग में चले सम्प्रदायवाद ने अनेक देवी-देवता, मन्त्र और उनके उपासना विधान गढ़ डाले और लोगों को निर्दिष्ट मार्ग से भटकाकर भ्रम-जंजालों में उलझा दिया। फलतः अनादि काल से प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी की निर्दिष्ट उपासना पद्धति हाथ से छूट गई और आधार रहित पतंग की तरह हम इधर-उधर टकराते हुए अधःपतित स्थिति में जा पहुँचे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-May
साधना-शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिये वे अविराम तप करने लगे।
साधनायें चलाते हैं उन्हें अधिक गहरी निष्ठा का समावेश करने और घरेलू ज्ञान मन्दिर और चल पुस्तकालयों की स्थापना के लिये व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रयत्नों को इस वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य माना जाना चाहिए। एक घंटा समय और दस पैसा रोज देने वाली प्रक्रिया अपने परिवार की सदस्यता की एक अनिवार्य शर्त बना दी गई है। जिनके द्वारा युग-निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य में भूमिका सम्पादन करने की आशा की जाय उनका कर्तव्य न्यूनतम इतना तो होना ही चाहिए, जो भावी कार्यक्रम की रूप-रेखा नियोजित करेंगे।
साधना को निरर्थक करने वाले कदम उठाने को तत्पर हो जाता है। कवि दण्डी भी उसी प्रवाह में बह उठे। उन्होंने निर्णय कर लिया अपनी राह के काँटे को उखाड़ फेंकने का। पिता मार्ग-दर्शक गुरु की हत्या...। भयंकर अविवेकपूर्ण कुकृत्य।
साधना में अपने मार्गदर्शक को प्रधानता देकर चलते हैं। मार्ग-दर्शक सन्तोष को ही अपनी प्रगति का चिन्ह मानते हैं। एक बार लक्ष्य निर्धारण करके फिर कितनी सीढ़ियाँ किस प्रकार चढ़ना है, यह मार्ग-दर्शक के ऊपर छोड़कर साधक लग जाते हैं, अपनी पूरी शक्ति के साथ निर्देश पूरा करने में। इस स्थिति में हर कदम पर उन्हें निर्देशक के सन्तोष का ही ध्यान रहता है। मानो वही मूल लक्ष्य हो।
साधना चल रही थी। मार्गदर्शक थे उन्हीं के पिता। किसी भी दिशा में बढ़ना हो, श्रेष्ठ स्तर तक पहुँचने के लिए विशेष प्रयास, विशेष श्रम करना ही पड़ता है। खिलाड़ी बनना चाहें या पहलवान, वाणी का उपयोग हो या लेखनी का, ज्ञान-मार्गी बने या कर्ममार्गी-सभी के लिए एक ही सिद्धान्त है। जितना तपेगा उतना ही निखरेगा।
साधना के योग्य नहीं है, ऐसा मेरा पित्र हृदय स्वीकार नहीं करता। यदि वह सह सका, तो लक्ष्य पा लेगा। अन्यथा मेरा तिरस्कार करेगा तो भी उसका जो स्तर है, वह तो बना ही रहेगा। मैं क्यों उसके बारे में हीन कल्पना लाकर अपना कर्त्तव्य छोड़ूँ?”
साधना-साधना-शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिये वे अविराम तप करने लगे।
साधना में लगा तो गुरु की कठोरता गलकर बह गई। और दण्डी वह समर्थ कवि ‘दण्डी’ बन सके कि स्वयं माँ सरस्वती ने उनकी श्रेष्ठता स्वीकार की। हर उत्कृष्टता की प्राप्ति के पीछे कठोर साधना का इतिहास छिपा रहता है।
साधना का इतिहास छिपा रहता है।
साधनायें करना चाहेंगे उनके लिये साधना-विधान की एक व्यवस्थित संहिता भी हम तैयार कर रहे हैं ताकि हमारे यहाँ न होने पर भी उसका लाभ साहसी साधकों को मिलता रहे और साधना सुचारु रूप से चलती रहे।
साधना की प्रणालियाँ बहुत कष्ट साध्य हैं भगवन् ! नारद ने एक बार विष्णु भगवान से प्रश्न किया- ऐसा कोई सरल उपाय बताइये, जिससे भक्तगण सहज ही में आपकी अनुभूति कर लिया करें?
साधना है उससे ध्वनि-कम्पन नाभि-प्रदेश से निकालकर ब्रह्म-रन्ध्र में लाये जाते हैं। यहाँ तालु से उन्हें पकड़कर मनोमय विद्युत का संयोग दिया जाता है, तब वह मुख द्वारा बाहर निकलता है। इस तरह नियन्त्रित स्वर पानी में भ्रमर अथवा गोलाकार चक्र रूप में निकलता है, फिर उसका प्रयोग इच्छानुसार किसी भी प्रयोजन में हो सकता है। हर प्रयोजन के लिये अलग-अलग राग खोजे गये हैं, जो मंत्रवत् काम करते हैं। तंत्र में तो एक बुराई यह होती है कि यदि उसकी प्रतिक्रिया जो एक तेज झटके की तरह होती हैं, सहन न हो तो प्रयोगकर्त्ता का अनिष्ट भी कर सकती है, पर इन प्रयोगों में गायत्री उपासना, गीता के पाठ, गाय के दूध और गायत्री मंत्र के जप के समान किसी भी अवस्था में हानि की कोई भी आशंका नहीं रहती।
साधना-विधान की एक व्यवस्थित संहिता भी हम तैयार कर रहे हैं ताकि हमारे यहाँ न होने पर भी उसका लाभ साहसी साधकों को मिलता रहे और साधना सुचारु रूप से चलती रहे।
साधना सुचारु रूप से चलती रहे।
साधना बनकर उतर चुकी थी। और वह उसका मूल्य भी चुकाना अच्छी तरह जानते थे।
साधना-साधना-साधना-शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिये वे अविराम तप करने लगे।
साधनायें हैं, वैसे ही लोक-कल्याण के लिए भी अनेक परम्परायें मान्यतायें और आचार-विचार प्रतिस्थापित किये गये हैं, उन सबका उद्देश्य जीवन को सशक्त और संस्कारवान बनाना रहा है अब जो परम्परायें विकृत हो चुकी हैं उनमें वेष-भूषा भी कम चिन्ताजनक नहीं हमें अनुभव करके ही नहीं इस मनोवैज्ञानिक खोज से भी सीखना चाहिये कि अपनी वेष-भूषा ओछापन नहीं बड़प्पन का ही प्रतीक है। हाँ काले अँगरेज और काली मेम बनना हो तब तो कुछ भी पहना और ओढ़ा जा सकता है।
साधनाओं के अभ्यास और तपश्चर्या से कोई भी प्राप्त कर सकता है ऐसा विधान दुनिया के किसी और देश में नहीं किन्तु ईश्वरीय देन के रूप में ऐसी आत्मायें सर्वत्र जन्म लेती रहती हैं जिनके भविष्य कथन बहुत अंशों में सच निकलते रहते हैं। इस शताब्दी में हालैण्ड में ही नहीं सम्भवतः सारे योरोप में गेरार्ड क्राइसे सबसे अधिक प्रभावशाली भविष्य दृष्टा हुआ है उसकी बताई हुई बातें असत्य निकली हों ऐसा बहुत ही कम हुआ है। गेरार्ड क्राइसे हालैण्ड में एक यहूदी परिवार से सम्बन्ध रखते हैं।
साधना के समकक्ष संसार की और कोई दूसरी शक्ति नहीं। उसके चमत्कारिक प्रयोग भी सैकड़ों बार हुये हैं।
साधनायें, जप और ध्यान की प्रणालियाँ समय का अपव्यय नहीं वरन् विश्व के यथार्थ को जानने की एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक प्रणाली है।
साधनाओं से पूरी होने वाली योजनायें थी, उसके लिये श्री फैरेल के पास न तो पर्याप्त साहस ही था और न ही समय। पर उन्होंने यह अवश्य स्वीकार कर लिया कि सूक्ष्म अन्तर्चेतना से सम्बन्धित भारतीय तत्व-दर्शन कोई गल्प या कल्पना मात्र नहीं, वह वैज्ञानिक तथ्य है, जिनकी ओर आज यूरोपीय वैज्ञानिक बढ़ रहे हैं।
साधनात्मक अनुक्रम को नियमितता पूर्वक चलाया जाने लगे तो यह बहुत बड़ी बात होगी और अपने परिजनों का व्यक्तित्व बहुत निखरेगा। जो उच्च स्तर की साधनायें करना चाहेंगे उनके लिये साधना-विधान की एक व्यवस्थित संहिता भी हम तैयार कर रहे हैं ताकि हमारे यहाँ न होने पर भी उसका लाभ साहसी साधकों को मिलता रहे और साधना सुचारु रूप से चलती रहे।
साधना में। उनकी प्रतिभा निखरने लगी। हर प्रयास पर उन्हें प्रशंसा भी मिलती और आलोचना भी। प्रशंसा से उत्साह बढ़ाकर आलोचना से आत्म-शोधन करते हुए वह बढ़ रहे थे। परिचितों की दृष्टि में उनका स्तर बहुत उच्चकोटि का हो गया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-December
साधना कठोर और कष्टपूर्ण लगती है तो यह दोष भगवान का नहीं, अपनी जीवन नीति का है। वस्तुतः लौकिक हो तो क्या यदि प्रेम निश्छल वासना रहित और पवित्र बना रहता है तो कठिन कर्त्तव्य और कठिनाइयों से भरे जीवन में भी मस्ती का आनन्द लिया जा सकता है। यही नहीं व्यक्तित्व के निर्माण और पूर्णता का लाभ भी इसी तरह हँसते थिरकते प्राप्त किया जा सकता है। अपने जीवन में इस सत्य की गहन अनुभूति के बाद तभी तो प्रसिद्ध वैज्ञानिक जूलियन हक्सले ने लिखा है- “व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिये सौंदर्य पर प्रेम, सुन्दर व आश्चर्यजनक वस्तुओं के प्रति प्रेम भी आवश्यक है क्योंकि उससे भावी जीवन में आगे बढ़ने की भावना जागृत होती है।”
साधनाओं के अतिरिक्त उपयुक्त
वातावरण पर भी निर्भर है। अनेक वैज्ञानिकों ने उसके लिये ऐसे तापमान की
आवश्यकता बताई है जो शून्य से भी कम हो। ‘स्पेश ओडिसी’ में श्री क्लार्क ने
भी लिखा है कि 200-200, 400-400 वर्षों में पूरी होने वाली अन्तरिक्ष
यात्राओं में मनुष्य को सुषुप्त रखकर उन्हें लम्बी आयु प्रदान करने में
शून्य तापमान से कम तापमान आवश्यक होगा। इन सब उदाहरणों से स्पष्ट है कि
यदि हिमालय में ऐसी कोई अमर आत्मायें हों तो उसे आश्चर्य न मानकर सत्य माना
जाये यदि यह आत्मायें इस देश को जागृत करने और अध्यात्म ज्ञान की एक नई
दिशा देने का प्रयत्न कर रही हों तो इसे भी आश्चर्य न मानकर तथ्य और सत्य
ही माना जाना चाहिये।
साधना के लिये हरिद्वार और ऋषिकेश के बीच सप्तधारा गंगा संगम पर-सप्त ऋषि आश्रम के समीप जो उपवन आश्रम बनाया गया है उसका आरम्भ भी वसन्त पंचमी के दिन कराया गया है। यों हम जून में हिमालय चले जायेंगे फिर भी तपश्चर्या का आरम्भ वसन्त पंचमी से ही करेंगे। कौन जानता है हमारे जीवन का अन्त कब हो-पर यदि वसन्त पञ्चमी को हो तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि वह हमें स्वभावतः बहुत प्रिय जन्म है। न जाने किस-किस जन्म में हम उस दिन क्या-क्या करते रहे हैं। और न जाने उनमें से किस-किस संस्कार का हमारे ऊपर क्या प्रभाव है जिससे हमें वसन्त पञ्चमी बहुत प्रिय लगती है और वह जब आती है तो न जाने किस-किस लोक से क्या-क्या लेकर आती है और उस दिन न जाने कितना क्या दे जाती है जो साल भर तक चुकाये नहीं चुकता।
साधना या उपासना की एक भिन्न विधि निकालकर एक पृथक सम्प्रदाय
स्थापित कर देते हैं, उनका एक नवीन मन्दिर बन जाता है। इस प्रकार के हजारों
नये-नये मत और धार्मिक फिर्के जंगली कहे जाने वाले प्रदेशों में ही नहीं
वरन् योरोप, अमरीका, एशिया के साक और सुसंस्कृत देशों में भी पाये जाते
हैं। ऐसी कोई पूजा-पद्धति नहीं है जिसका आविष्कार और प्रचलन संसार में कहीं
न कहीं न हो चुका हो। आप कैसी भी विचित्र अथवा असंगत उपासना पद्धति की
कल्पना क्यों न करें, वह इस विस्तृत पृथ्वी पर किसी जगह अवश्य ही क्रिया
रूप में होती मिल जायगी।
साधनाओं के लिये अभीष्ट मनोबल हो भी, तुम तन्त्र की कठिनाइयों को झेल लो और अनेक सिद्धियों के स्वामी बन जाओ तो भी उसमें तुम्हारा कोई हित नहीं है। आत्म-कल्याण का प्रयोजन तो किसी और ही तरह से पूरा होता है, उसके लिये व्यक्ति को अपने अन्तःकरण को शुद्ध बनाना पड़ता है। सद्गुण और सन्मार्गगामी साधनायें करनी पड़ती हैं, तुम्हारे लिये भी वही उचित है।” महर्षि वर्ष ने नवागत शिष्य व्याडि और इन्द्रदत्त को बहुतेरा समझाया पर वे तन्त्र और पदार्थ विद्या सीखने का ही हठ करते रहे। महर्षि ने सोचा यह विद्या लुप्त न हो, लोग आध्यात्मिक शक्तियों को भौतिक शक्ति से बढ़कर स्वीकार करते रहें और आवश्यक हो तो विश्व-कल्याण में तन्त्र का उपयोग भी होता रहे, इस दृष्टि से उन्होंने शिष्यों की बात मान ली।
साधना करनी पड़ेगी। तुम्हें उन साधनाओं की जानकारी के लिये ही यहाँ बुलाया है।
साधनाओं की जानकारी के लिये ही यहाँ बुलाया है।
साधना के बल पर अब तक परिजनों को कठिनाइयों से बचाने और उत्कर्ष में सहयोग देने में समर्थ रहे हैं वह उत्तरदायित्व माताजी उठावेंगी। वे हरिद्वार, ऋषिकेश के बीच सप्त सरोवर के निकट “शान्तिकुँज” नामक साधना कक्ष में हमारी ही तरह अखण्ड दीपक पर 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरणों का क्रम चलावेंगी और उसी उपलब्धि के आधार पर परिवार की सेवा सहायता करने का क्रम पूर्ववत् जारी रखेंगी। बाप मर जाता है तो बच्चों को माता किसी प्रकार पाल लेती है। माँ मर जाय तो बाप के लिए छोटे बच्चे पालना कठिन पड़ता है। हम जा रहे हैं पर सारे परिवार की आत्मिक जिम्मेदारी माताजी के कन्धों पर छोड़े जा रहे हैं।
साधना द्वारा मनुष्य लौकिक जीवन का पूर्ण रसास्वादन करता हुआ पारमार्थिक लक्ष्य पूर्ण करता है। इसलिये प्रेम से बड़ी मनुष्य-जीवन में और कोई उपलब्धि नहीं।
साधनायें समाप्त कर घर चलने का समय हुआ तो व्याडि बोला-गुरुदेव! कहिये आपको गुरुदक्षिणा क्या दें? इन्द्रदत्त ने भी वही, आग्रह किया तो वर्ष बोले-तात! भौतिक सम्पत्तियाँ क्षण भंगुर सुख देती हैं, हमें वह चाहिये नहीं, कोई भी अध्यात्मवादी जो चाहता है, मेरी भी वही इच्छा है कि तुम यहाँ से जाओ, धर्म और ज्ञान का प्रकाश फैलाओ ताकि अपने देश जाति और संस्कृति के जीवन में उच्च आदर्शों, उद्दात्त भावनाओं, सुख और समृद्धि की कमी न रहे और हमें कुछ नहीं चाहिये।
साधनायें करनी पड़ती हैं, तुम्हारे लिये भी वही उचित है।” महर्षि वर्ष ने नवागत शिष्य व्याडि और इन्द्रदत्त को बहुतेरा समझाया पर वे तन्त्र और पदार्थ विद्या सीखने का ही हठ करते रहे। महर्षि ने सोचा यह विद्या लुप्त न हो, लोग आध्यात्मिक शक्तियों को भौतिक शक्ति से बढ़कर स्वीकार करते रहें और आवश्यक हो तो विश्व-कल्याण में तन्त्र का उपयोग भी होता रहे, इस दृष्टि से उन्होंने शिष्यों की बात मान ली। उन्हें अनेक ऐसे आसन, प्राणायाम, हठ-योग की क्रियायें आदि बताईं जिससे उनमें सैकड़ों सिद्धियों का प्रादुर्भाव होता चला गया। परकाया प्रवेश से लेकर सूक्ष्म लोकों में अभिगमन तक, दूरदर्शन, श्रवण से लेकर औरों के मन की बता जान लेने तक की सारी विद्यायें उन्होंने दोनों शिष्यों को सिखाकर उनको निष्णात योगी बना दिया।
साधना की वेद उपनिषद् से लेकर ब्राह्मण आरण्यक तक एक भी ग्रन्थ नहीं छोड़ा। हम ज्ञानी हैं, ब्राह्मण हैं अतएव स्वर्ग के अधिकार से हमें वंचित नहीं किया जा सकता।
साधना समझते हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि जिस प्रकार स्त्री अपने पति से प्रेम करके उसमें तन्मय जो जाती है उसी प्रकार ईश्वर में भी तन्मयता प्राप्त कर ली जाय।
साधनायें ही सिखाईं।
साधना में आनन्द क्यों नहीं उनके मन में एक तर्क उठा-एक तर्क ने उनका मन ढीला कर दिया।
साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारिक शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्रबल से पृथ्वी, देव-लोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तान्तरण, शक्ति को पदार्थ और पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना, एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक-एक जोड़ की जानकारी तक मंत्र की ही अलौकिक शक्ति थी।
साधना कक्ष में हमारी ही तरह अखण्ड दीपक पर 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरणों का क्रम चलावेंगी और उसी उपलब्धि के आधार पर परिवार की सेवा सहायता करने का क्रम पूर्ववत् जारी रखेंगी। बाप मर जाता है तो बच्चों को माता किसी प्रकार पाल लेती है। माँ मर जाय तो बाप के लिए छोटे बच्चे पालना कठिन पड़ता है। हम जा रहे हैं पर सारे परिवार की आत्मिक जिम्मेदारी माताजी के कन्धों पर छोड़े जा रहे हैं। हमें पूरा और पक्का विश्वास है कि वे हमसे कम नहीं कुछ अधिक ही प्रिय परिजनों को अपनी सन्तान से अधिक दुलार करने और भरपूर सहायता देने में समर्थ रहेंगी।
साधना में जुट गई।
साधना का सम्मिलित रूप है उससे सृष्टि के विराट से विराट और अणु से अणु कण का भेदन भी संभव हो जाता है। इसलिये मंत्र की शक्ति को अकूत माना जाता है और अनुमान किया जाता है कि इस शक्ति की उल्लंघन विधि (ब्रह्मा) विष्णु महेश तथा कोई अन्य देवता भी नहीं कर सकता।
साधना करें तो न केवल बालक के पूर्व जन्मों का इतिहास जाना जा सकता है, वरन् भविष्य के एक-एक दिन का इतिहास भी सिनेमा के पर्दे की तरह देखा जा सकता है। उन्होंने नकली प्रचलिन फलित ज्योतिष का बहुत खण्डन किया था।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-July
साधना के लिये वहाँ से चल पड़े। उधर भगवान् सूर्य पश्चिम क्षितिज पर ढलते जा रहे थे। इधर दत्तात्रेय अपने पाँव बढ़ाते हुये आगे बढ़ रहे थे, मानों उनके और भगवान सूर्य के लक्ष्य में कोई अन्तर न हो।
साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य स्थान बचा है। वहाँ चित्ताकर्षक शाँति हैं, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है। उसमें जो एक बार इस पुष्प घाटी को ही देख आता है, उसे हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं। वह वहाँ बार-बार जाता है। पुष्प घाटी तक पहुँचने के लिये जोशी मठ पहुँचना पड़ता है।
साधना याद आ रही हो। तत्पश्चात् प्रकाश-पुरुष ने प्रकाश-घेरे को बढ़ाया और गिरिबाला को उसी घेरे में ले लिया।
साधना में लगे रहे तो आवश्यकताओं की पीड़ा से उसका चित्त अस्थिर रहेगा और शरीर जवाब देगा जिसका फल अनानुभूति के सिवाय और कुछ भी नहीं हो सकता। इस प्रकार की आध्यात्मिक साधना उसके लिये मृत्यु की तरह कष्टदायक बन जायेगी। इसी प्रकार यदि आध्यात्मिक साधना से विरत होकर केवल भौतिक भोगों की ही उपासना की जाती रहे तो भी मानवीय लक्ष्य दूर से दूरतर होता चला जायेगा। दोनों का समुचित समन्वय ही उद्देश्य-पूर्ति का कारण बन सकता है, जिसका अनुपात कम-से-कम पच्चीस और पचहत्तर का ही होना चाहिए। इससे कम अनुपात में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए अनेक जन्म-जन्मान्तरों तक प्रयत्न एवं प्रतीक्षा करनी होगी।
साधना उसके लिये मृत्यु की तरह कष्टदायक बन जायेगी। इसी प्रकार यदि आध्यात्मिक साधना से विरत होकर केवल भौतिक भोगों की ही उपासना की जाती रहे तो भी मानवीय लक्ष्य दूर से दूरतर होता चला जायेगा। दोनों का समुचित समन्वय ही उद्देश्य-पूर्ति का कारण बन सकता है, जिसका अनुपात कम-से-कम पच्चीस और पचहत्तर का ही होना चाहिए। इससे कम अनुपात में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए अनेक जन्म-जन्मान्तरों तक प्रयत्न एवं प्रतीक्षा करनी होगी।
साधना से विरत होकर केवल भौतिक भोगों की ही उपासना की जाती रहे तो भी मानवीय लक्ष्य दूर से दूरतर होता चला जायेगा। दोनों का समुचित समन्वय ही उद्देश्य-पूर्ति का कारण बन सकता है, जिसका अनुपात कम-से-कम पच्चीस और पचहत्तर का ही होना चाहिए। इससे कम अनुपात में लक्ष्य-प्राप्ति के लिए अनेक जन्म-जन्मान्तरों तक प्रयत्न एवं प्रतीक्षा करनी होगी।
साधना में विघ्न के कारण सम्भवतः ऐसी स्थिति और यह संस्कार बन गये होंगे। पर साधना और कठिन तपश्चर्या के संस्कार तथापि आत्म-निष्ठा के संस्कार उसमें अब भी अत्यधिक प्रबल थे। उन संस्कारों का ही प्रभाव इस आत्म-विश्वास पूर्ण संकल्प में उभरा था।
साधना-सामग्री का उत्कृष्ट उपयोग करके दिखा सकना-यही तो कौशल कसौटी है। अधिक साधना के अभाव और प्रस्तुत अवरोधी की चर्चा में जो प्रस्तुत उपलब्धियों की महत्ता कम करना चाहता है और यह कहता है कि यदि अमुक साधन मिल सके होते, तो अमुक कर्तृत्व प्रस्तुत करता-उसे आत्म-वञ्चना में निरत ही कहना चाहिए। जीवन-कला से अवगत कलाकार अपने स्वल्प साधनों से ही महान् अभिव्यंजना प्रस्तुत करते रहे हैं। जिसे जीना आ गया उसे सब कुछ आ गया और वह सच्चा शिल्पी है- यह मानना चाहिए।
साधना-भूमि होने के कारण हमारा भी विश्वास है कि हिमालय में अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृश्य तरंगें, वह ज्ञान अब भी विद्यमान है जिसे प्राप्त कर इस भौतिक युग की सम्पूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धाँतों को बालू की दीवार की तरह बदला जा सकता है। ‘पुष्प घाटी’ ऐसे-ऐसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक प्रमाण है।
साधना से विरत रहकर न केवल यही एक अलभ्य अवसर खो दिया वरन् आगे कि लिए भी अपनी पात्रता असिद्ध कर दी और पुनः लाखों करोड़ों वर्षों के लिये चौरासी लाख योनियों के कारावास की भूमिका तैयार कर ली।
साधना-उनके हित।
साधना में ढालने का एकमात्र उद्देश्य यही था भरत साहसी बने, भरत प्राणवान्, प्रज्ञावान् और यशस्वी बने। सो वह सब राजसूय लक्षण उसमें अभी से परिलक्षित होने लगे थे।
साधनाओं में लगा था। उन्होंने प्रकाश के एक परमाणु में अपनी चेतना स्थिर कर संसार के रहस्यों को उसी तरह करतल गत किया था, जिस प्रकार मज्जा (पित्त) में ध्यान जमाने से वृक्ष की भूत-भविष्य की कल्पनायें साकार हो उठती हैं।
साधना के अभाव और प्रस्तुत अवरोधी की चर्चा में जो प्रस्तुत उपलब्धियों की महत्ता कम करना चाहता है और यह कहता है कि यदि अमुक साधन मिल सके होते, तो अमुक कर्तृत्व प्रस्तुत करता-उसे आत्म-वञ्चना में निरत ही कहना चाहिए। जीवन-कला से अवगत कलाकार अपने स्वल्प साधनों से ही महान् अभिव्यंजना प्रस्तुत करते रहे हैं। जिसे जीना आ गया उसे सब कुछ आ गया और वह सच्चा शिल्पी है- यह मानना चाहिए।
साधना और कठिन तपश्चर्या के संस्कार तथापि आत्म-निष्ठा के संस्कार उसमें अब भी अत्यधिक प्रबल थे। उन संस्कारों का ही प्रभाव इस आत्म-विश्वास पूर्ण संकल्प में उभरा था।
साधना की अपेक्षा से निरपेक्ष ही रहे। किन्तु ध्वनि स्पष्टतर होती हुई तल्लीनता को अनस्थिर बना रही थी। आखिर जागकर ऊपर आना ही पड़ा। पहचानते देर न लगी कि यह क्रन्दन किसी अत्याचार त्रस्त अबला का है, जो सहायता के लिये आह्वान कर रहा है। परोपकारी जटायु ने हस्तगत होता हुआ मोक्ष का छोर छोड़ दिया और उठ पड़े।
साधना अधूरी न रहने पाये।
साधना में संलग्न हो गया।
साधना, धैर्य और सक्रियता की प्रेरणा मिली तो एक गुरु चील को बना लिया। समुद्र को देखकर उन्होंने जाना कि संसार की विभिन्न परिस्थितियों, घात-प्रतिघातों को भी जो अपने में अविचल भाव से भरता चला जाता है वह समुद्र के समान अक्षय, विशाल, धीर और गम्भीर बन जाता है। इसी तरह कुमार सर्प, स्त्री, बैल आदि विभिन्न जीव-जन्तुओं को अपना गुरु वरण करते हुये भगवान् दत्तात्रेय ने ज्ञान, कर्मकुशलता, गुण और भावनाओं का दीर्घ-प्रकाश अपने में धारण कर लिया। उनके इस महान् अर्जन-तप की सर्वत्र चर्चा होने लगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1970-October
साधना या अभ्यास से पराये का हित नष्ट नहीं होना चाहिये, भले ही उससे आत्म-कल्याण की आवश्यकता पूरी न हो। तंत्र भाग में ऐसी क्रियाएं हैं। इसीलिये भारतीय आचार्यों ने उसे गोपनीय रखा। उनका उद्देश्य प्रत्येक कर्म को चाहे वह उपासना रही हो अथवा वणिक-विपणन उसमें ब्राह्मी भाव, परमार्थ शुद्धता और पवित्रता बनाये रखना रहा है। इसीलिये भारतीय संस्कृति सदैव ही निरालोच्य रही है।
साधना उपासना, इष्ट-ध्यान, बोली-भाषा, उपरोक्त दोनों आवश्यकताओं को पूर्ण करें वही सच्ची संस्कृति का निर्माण करते हैं, जब इस परिभाषा में रखकर देखते हैं तो हम पाते हैं कि भारतीय संस्कृति ने इस संतुलन को बनाये रखने में सफलता प्राप्त की है। उसमें जाति-आयु लिंग और वर्ण का कोई भेद-भाव नहीं है। सब देशों के लिये संपूर्ण प्राणियों के लिये हितकारक होने के कारण ही वह विश्व-संस्कृति कही जाती है। भारत में जन्म लेने के कारण उसे भारतीय संस्कृति या हिन्दू-संस्कृति भी कहते हैं। पर उसमें किसी एक समुदाय, सम्प्रदाय या देशवासियों के ही कल्याण की सीमा संकीर्णता नहीं है।
साधनायें कठिन हो सकती हैं, पर स्वरों की कोमलता और लयबद्धता में कुछ ऐसी शक्ति है कि वह सहज ही में आत्मा को ऊर्ध्वमुखी बना देती है। उससे शारीरिक, मानसिक लाभ भी है, पर आत्मोत्थान का लाभ सबसे बड़ा है। संगीत कला का उपयोग उसी में किया भी जाना चाहिये।
साधना करते थे।
साधनायें करने का निश्चय कर लिया।’
साधना एवं ईश्वर के प्रति आत्म-समर्पण की तरह ही अपना सर्वस्व राजनीति को सदाशयता की ओर मोड़ने के प्रयास में उत्सर्ग कर दिया।
साधना के साथ राजनीति को भी अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखा। इससे उनकी धार्मिकता घटी नहीं वरन् प्रखर एवं समुज्ज्वल ही होती चली गई।
साधना में संलग्न हो गया।
साधना से राजनीति का प्रधान समन्वय करके यह आदर्श प्रस्तुत करते रहे हैं कि धर्म और राजनीति एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक हैं। लोकमान्य तिलक, महामना मालवीय, स्वामी श्रद्धानन्द जैसे धर्मवेत्ता मनीषियों ने अपनी धर्म साधना के साथ राजनीति को भी अविच्छिन्न रूप से जोड़े रखा। इससे उनकी धार्मिकता घटी नहीं वरन् प्रखर एवं समुज्ज्वल ही होती चली गई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-August
साधना और उनकी सिद्धियां यदि इतनी सरल और सस्ती होती तो प्राचीन ऋषि मुनि आत्म परिष्कार, चिंतन मनन, स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते?
साधना की दिशा में बढ़ने की योजना भी बनती रहनी चाहिए। शक्तियों को बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं, उनके संचय का उपाय भी करना चाहिए ताकि सदुपयोग के लिए कुछ अतिरिक्त बचत हाथ में बनी रहे। घड़े में छेद हो तो भरा हुआ पानी उसमें होकर बिखर जाता है। असंयमी अपनी संचित क्षमताओं का लाभ उठाने के स्थान पर उन्हें अपव्यय में गँवा बैठता है और छूंछ रहने वाले की तरह खोखली स्थिति में पड़कर कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने के योग्य नहीं रहता। इसलिए संयम को तप की संज्ञा दी गई है।
साधना में आत्मपरिष्कार और संयम साधना के दो पक्ष ऐसे हैं। जिन्हें कार्यान्वित करने की योजना बनाते रहना चाहिए। इस प्रकार प्रज्ञायोग की यह सरल साधना हर किसी को आत्मिक प्रगति का पथ भी दर्शाती है व सभी के लिए संभव भी है।
साधना के ईद गिर्द ही धर्म की धुरी पर घूमते हैं। उसके अविच्छिन्न अंग हैं आत्म संयम और परमार्थ के निमित्त बढ़े चढ़े संकल्प साहस का प्रदर्शन।
साधनाओं के लिए दबाव डालना व्यर्थ है। न कुछ करने से कुछ करना अच्छा, की नीति अपनाई जानी चाहिए। इसलिए समय को देखते हुए सर्वसाधारण के लिए सुलभ और सर्वोपयोगी साधना विधि ‘प्रज्ञायोग‘ है मन लगने लगे तो इस साधना को क्रमशः आगे बढ़ाया जा सकता है। और उसे बड़ा, भारी और विस्तृत रूप दिया जा सकता है।
साधना का एक अनिवार्य अंग था।
साधना प्रणाली का प्रचलन तो किया जा सकता है किन्तु उसके अपनाये जाने का आग्रह नहीं होता है। आग्रह यदि होता भी है तो धर्म के मूलभूत सिद्धांतों को अपनाये जाने का।
साधना का सम्मिलित रूप है। उससे सृष्टि के विराट् से विराट् और सूक्ष्म कण का भेदन भी संभव हो जाता है। इसलिए मंत्र की शक्ति को अकूत माना जाता है और अनुमान किया जाता है कि इस शक्ति का उल्लंघन ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा कोई अन्य देवता भी नहीं कर सकते। तभी तो मानसकार ने कहा है-मंत्र परम् लघु जासुवश, विधि, हरिहर, सुर सर्व। “
साधना प्रणाली में किस प्रकार की कमी नहीं है।
साधना के दो पक्ष ऐसे हैं। जिन्हें कार्यान्वित करने की योजना बनाते रहना चाहिए। इस प्रकार प्रज्ञायोग की यह सरल साधना हर किसी को आत्मिक प्रगति का पथ भी दर्शाती है व सभी के लिए संभव भी है।
साधना में तो योगाभ्यास को एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इस प्रक्रिया में श्वास प्रश्वास को क्रमबद्ध, तालबद्ध लयबद्ध किया जाता है और सांस लेने की अनवरत प्रक्रिया की अव्यवस्था को दूर कर व्यवस्था बंधनों को बाँधा जाता है। तदुपराँत ही निखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त प्राणसत्ता की अभीष्ट मात्रा खींचने और धारण करने का सुयोग बनता है। प्राणायाम की सुयोग विधि को समझने से पूर्व श्वास प्रश्वास प्रक्रिया और उससे जुड़े तंत्र की बारीकियों को जटिलता से समझना और उससे सही लाभ उठाना संभव नहीं हो पाता।
साधना यह उनकी दिन चर्या का एक अनिवार्य अंग थी चाहें वे क्षेत्र के दौरे पर हो, राह में, ट्रेन में या सक्रिय कार्यक्रमों के केन्द्र में संलग्न, लेखनी कभी उनकी रुकी नहीं नियमित स्तर पर यह लेखन था जिसके माध्यम से चिंतन को उछालने वाले श्रेष्ठ स्तर के साहित्य का सृजन संभव हो सका। यही प्रेरणा उनने अपने पास कार्य करने वाले - सीखने वाले साधकों को भी दी। जिनने उस दिनचर्या को अपनाया, उनका निज का व्यक्तित्व तो परिष्कृत हुआ ही, उनके माध्यम से मार्ग दर्शन का एक तंत्र विकसित होता चला गया।
साधना प्रयोजनों में अज्ञान होने के कारण व्यस्तता जैसे बहाने गढ़ने पड़ते हैं। मन बार बार उचटता है। अज्ञान के रहते उस प्रसंग से बच निकलने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लिया जाता है और यथार्थता की कितनी ही प्रबल माँग होते हुए भी टालमटोल का मन बना रहता है। ऐसी दशा में समय-साध्य, कष्ट साध्य, साधन साध्य साधनाओं के लिए दबाव डालना व्यर्थ है। न कुछ करने से कुछ करना अच्छा, की नीति अपनाई जानी चाहिए।
साधनाएँ निकाली हैं। धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति भाँति के उपायों का सहारा लेते हैं, जिससे उनकी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है। पर आध्यात्मिक शाँति प्राप्त करने, साँसारिक तापों से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही है कि मनुष्य भिन्न भिन्न कामनाओं का मोह त्यागकर सच्चे हृदय से परमात्मा का आश्रय ले और शुद्ध भाव से उसकी स्तुति और प्रार्थना करें। हमें स्मरण रखना चाहिए कि सब प्रकार की कामनाओं को वास्तव में पूरा करने वाला भगवान ही हैं। इसलिए अगर हम उसकी पूजा करके आत्मिक शाँति प्राप्त कर लेंगे तो हमारी अन्य उचित कामनायें और आवश्यकतायें अपने आप पूरी हो जायेंगी।
साधना प्रणालियों को नहीं आदर्शों एवं सिद्धांतों को महत्व देने लगता है। समाज में उसकी प्रतिष्ठापना ही उसका लक्ष्य होता है।
साधना, यह उपासना, यह ही सच्ची पूजा है।
उसके गुण धारण करने से, हटकर मार्ग न दजा है॥
उसकी कला ओर लीला में, भी रखें पूरा विश्वास॥
साधनापथ कहलाता है
साधना और परमार्थ परायणता की दिशा में अग्रसर होना पड़ता है। आस्तिकता कोरी भावुकता नहीं है। किसी प्रतिमा की पूजा अर्चना करते भर रहने से वक प्रयोजन पूरा नहीं होता। भक्ति भावना भक्त जन के चिंतन चरित्र और व्यवहार में उच्चस्तरीय परिवर्तन प्रस्तुत करती है। यह मनुष्य को देवस्तर में बदलने वाला कायाकल्प ही भगवद्भक्ति का यथार्थ रूप है।
साधना उपचारों द्वारा जब तक इसे सशक्त किया जाता रहेगा, मनुष्य का आँतरिक वैभव सतत् बढ़ता ही रहेगा। (3-6-83)
साधना को अपना कर ही उत्कृष्टता के उच्च शिखर तक पहुँचते हैं।
साधना ही जाना और माना जाता रहा है कि इन दिनों इन प्रयत्नों को युग शक्ति के उदय उद्भव का उद्देश्य पूरा करने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है।
साधना हर किसी को आत्मिक प्रगति का पथ भी दर्शाती है व सभी के लिए संभव भी है।
साधना, सेवा, श्रम और पुरुषार्थ के आधार पर इतनी सस्ती और आसानी से मिल सकती है तब क्या किसी ने भाँग खाई है कि वह प्रतिष्ठा पूर्ण जीवन जीने के लिए संयम और साधना करता फिरे। सेवा और त्याग का परिमाण देता घूमें। क्यों न किसी प्रकार से धन बटोर कर उसे प्राप्त किया जाये? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अंध आर्थिकता में डुबो दिया है।
साधना विधि ‘प्रज्ञायोग‘ है मन लगने लगे तो इस साधना को क्रमशः आगे बढ़ाया जा सकता है। और उसे बड़ा, भारी और विस्तृत रूप दिया जा सकता है।
साधना करता फिरे। सेवा और त्याग का परिमाण देता घूमें। क्यों न किसी प्रकार से धन बटोर कर उसे प्राप्त किया जाये? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अंध आर्थिकता में डुबो दिया है।
साधना, योगाभ्यास, अनुष्ठान, जप, ध्यान आदि। यह विज्ञान वाला पक्ष हैं। इससे शक्ति पैदा होती है। गायत्री मंत्र के जप करने से, उपासना और ध्यान करने से उसके जो महत्व बताये गये है कि इससे बह लाभ होता है, अमुक लाभ होते हैं, अमुक कामनायें पूरी होती है। अब यह देखा जाय कि कैसे पूरी होती है और कैसे पूरी नहीं होती।
साधना को क्रमशः आगे बढ़ाया जा सकता है। और उसे बड़ा, भारी और विस्तृत रूप दिया जा सकता है।
साधना कराना मेरा उद्देश्य है। यह समझ लोगे तो तुम लोग कभी लक्ष्य से भटकोगे नहीं। परमपूज्य गुरुदेव ने उपरोक्त भाव तब व्यक्त किये थे, जब हम सब उनके समक्ष गोष्ठी में बैठे उनका मार्गदर्शन ले रहे थे। इन दिनों कागज काले करने वाले ढेरों समाचार पत्र निकलते हैं। लाखों पत्रिकायें रोज प्रकाशित होती हैं किन्तु रचनात्मक लेखन, युग परिवर्तन साहित्य सर्जन कैसे किया, यह समझना हो तो हमें परम पूज्य गुरु देव की लेखन प्रक्रिया से जुड़े प्रसंगों व उन अंतरंग क्षणों की आपको झाँकी करनी होगी जिसे देखने समझने के बाद अखण्ड ज्योति का जाज्वल्यमान विराट रूप हमारे समक्ष होता चला जाता है।
साधना कर असाधारण पुरुषार्थ संपन्न किया। जब साहित्य जगत इस विराट साहित्य संजीवनी का मूल्याँकन कर पाने में सक्षम होगा, तब वह भी युग के यास को समय पर न पहचान पाने की विडम्बना पर स्वयँ अपना सिर धुन रहा होगा
साधना की शक्ति से, अपनी सशक्त लेखनी व ओजस्वी वाणी से वह सब कुछ कर दिखाने की सामर्थ्य रखते हैं जिसे युग असंभव मानता रहा हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उनके द्वारा किये गये कुछ व्यवहारिक निर्देश दृष्टि पटल पर आ जाते हैं, जिन्हें समय समय पर डायरी में नोट किया जाता रहा। (1) अब हमें भारती य दर्शन में समग्रता लाती है इसे नया स्वरूप विज्ञान का पुट देकर देना है। तत्त्व दर्शन ही किसी समाज की संस्कृति बनाता है। हमारी संस्कृति के अनिवार्य अंग हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-December
साधना ही रहा है। वे अपने अंतराल को उत्कृष्ट न बना सके और भौतिक स्तर की महत्वाकांक्षाएं सँजोये रहे। उनके तद्नुरूप ही वरदान पाये और अपने पुरुषार्थों के निमित्त अभीष्ट वरदान पाये। इस वर्ग के रावण, कुँभकरण, हिरण्यकशिपु, वृत्रासुर, महिषासुर आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। शक्तियाँ उनमें भी अकूत थीं, पर चूक दिशा निर्धारण में हुई।
साधना द्वारा जगाया जा सके तो जीवात्मा को देवात्मा और परमात्मा बनने का अवसर मिल सकता है।
साधना।
साधना करते हैं और प्रतियोगिता में बाजी मार कर ऊँचे अफसर का पद पाते हैं। किसान एक वर्ष तक खेत की मिट्टी को पसीने से सींच कर कोठे भर फसल काटता है और साथियों में सिर ऊँचा उठाकर चलता है। व्यवसायी शिल्पी, कलाकार लंबे समय तक साधनारत रहते हैं और उपयुक्त समय पर श्रेयाधिकारी बनते हैं। लंबे समय तक अखाड़े की साधना करने पर ही पहलवान को मिलने वाले पुरस्कार पाने का अवसर हाथ आता है। से प्रकाराँतर से साधना कह सकते हैं।
साधनाओं के द्वारा सचेतन मस्तिष्क की चिंतन शक्ति एवं संकल्प शक्ति को शिथिल करते हुए वहाँ लगे तेजस् को अचेतन में नियोजित किया जाता है, तभी अनुपम दिव्यताएं प्रकट होना शुरू होती हैं। योग और लय का आश्रय लेकर अचेतन को कुसंस्कारों से मुक्त कराने की दिशा में जो जितनी अधिक प्रगति करता है, वह उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है। यही योग का उद्देश्य है।
साधना भी कहते हैं। यद्यपि आज परामनोविज्ञान एवं मनोविज्ञान के अंतर्गत भी अचेतन की क्षमता को समझने और उसमें अभीष्ट परिवर्तन करने के उपाय खोजे तथा सोचे जा रहे हैं, किंतु तत्वदर्शियों की अनुभूति पद्धति योग साधना के अतिरिक्त और कोई कारगर मार्ग अभी तक करतलगत हुआ नहीं है।
साधना द्वारा ही संभव है। व्यक्तिवादी अहंता और स्वार्थवादी महत्वाकाँक्षा में परिधिबद्ध मन को सार्वभौम चेतना से जोड़कर अपने चिंतन और कर्तृत्व को उत्कृष्ट बनाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। इससे कम कुछ भी नहीं। सही दिशा में चलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय की प्रक्रिया का प्रारंभ अनिवार्य है। योग वस्तुतः एक भाव विज्ञान है, जो जीव को ब्रह्म से चिर मिलन की भाव-भूमिका की ओर ले जाता है।
साधना उपक्रम में नित्य सवेरे आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े-पड़े यह चिंतन करना चाहिए कि आज हमारा नया जन्म हुआ है। यह एक दिन के लिए ही है। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना चाहिए। इसके लिए सोते समय तक की ऐसी दिनचर्या बना लेनी चाहिए कि आवश्यक विश्राम को छोड़ कर सारा दिन व्यस्तता में बीते और उसमें शरीर यात्रा के साँसारिक कार्य ही नहीं आत्मोत्कर्ष के निमित्त परमार्थ प्रयोजनों के लिए भी स्थान रहे।
साधना के प्रभाव से मुखमंडल पर स्वर्गीय ज्योति आ विराजी। वह पहला शरीर ही बदल गया। सिद्धि के लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होने लगे। जब-जब निराशा अपना प्रभाव दिखाती गुरु की शक्ति उसे भगाकर मन को तत्काल ईश्वराभिमुख कर देती। यहाँ तक कि शरीर का भान भी जाने लगा।
साधना कराइए, तप कराइए जिससे मेरा अंतःकरण पवित्र बने।”
साधना अगर आधी-या एकाँगी न रही, तो वही साधना हमें आँतरिक जगत की खोज में ले जाएगी। फिर तो दोनों साधनाएँ एक साथ चलेंगी, एक दूसरे की मदद करेंगी । “पश्चिम जड़वादी है, हम अध्यात्मवादी हैं। ऐसी डींग हाँकना छोड़कर हम कबूल करें कि दोनों एकाँगी हैं और जीवन रहस्य तभी प्राप्त होगा, जब हम एकाँगिता छोड़कर सर्वांगी बनेंगे।
साधना बदलनी पड़ती है। “बाह्य प्रवृत्ति कम करना, अंतर्मुखी होकर चिंतन को बढ़ाना, जीवन साधना के द्वारा आत्मतत्व का जो परिचय अथवा साक्षात्कार हुआ हो, उसी को परिपक्व और दृढ़ करते जाना।” यह है जीवन के संध्याकाल की साधना।
साधना के अतिरिक्त और कोई कारगर मार्ग अभी तक करतलगत हुआ नहीं है।
साधना करने पर ही पहलवान को मिलने वाले पुरस्कार पाने का अवसर हाथ आता है। से प्रकाराँतर से साधना कह सकते हैं। योगीजन इसी मार्ग का अवलंबन करते और सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिक अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं, उनने भविष्य पर दृष्टि दौड़ाई है, तद्नुरूप योजना बनाई है और एकनिष्ठ भाव से अनवरत यात्रा करते हुए ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचने की सफलता पाई है। जिन्हें सिर्फ आज ही सूझा, कल पर दृष्टि ही नहीं गई, वे घाटे में रहे हैं और उपहासास्पद बने हैं।
साधना के द्वारा आत्मतत्व का जो परिचय अथवा साक्षात्कार हुआ हो, उसी को परिपक्व और दृढ़ करते जाना।” यह है जीवन के संध्याकाल की साधना।
साधना का प्रयोजन भी अपनी समीपता को असीमता के साथ जोड़ देना है। इस प्रयोजन में जितनी ही सफलता मिलती जाती है, उतनी ही मात्रा में मनुष्य उस वैभव पर आधिपत्य जमाता जाता है जिसके प्रभाव को हम जड़-चेतन जगत में अपने चारों ओर फैला हुआ देखते हैं। सीमाबद्ध स्थिति में हम तुच्छ और दरिद्र होते हैं, पर असीम के साथ जुड़ जाने पर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती है। सिद्ध पुरुषों में देखी गयी विशिष्ट क्षमतायें और कुछ नहीं, विराट के साथ उनकी घनिष्ठता का आरंभिक उपहार भर हैं। बढ़ी-चढ़ी स्थिति तो ऐसी बन जाती है जिसमें आत्मा और परमात्मा के बीच कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं रह जाता, दोनों समतुल्य ही दीखते हैं।
साधना कह सकते हैं। योगीजन इसी मार्ग का अवलंबन करते और सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिक अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं, उनने भविष्य पर दृष्टि दौड़ाई है, तद्नुरूप योजना बनाई है और एकनिष्ठ भाव से अनवरत यात्रा करते हुए ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचने की सफलता पाई है। जिन्हें सिर्फ आज ही सूझा, कल पर दृष्टि ही नहीं गई, वे घाटे में रहे हैं और उपहासास्पद बने हैं।
साधना की महत्ता के भरे पड़े हैं। ऐतिहासिक महामानवों, ऋषियों, तत्वदर्शियों, देवदूतों की प्रसिद्धि और सिद्धि का आधार तप का प्रकाश ही रहा है। तप द्वारा ही आध्यात्मिक शक्तियाँ और सिद्धियाँ आज तक उपलब्ध होती आई हैं और भविष्य में भी वही एकमेव मार्ग रहने वाला है।
साधना उपचार निश्चित ही मनुष्य को महानता के पथ पर ले जाने वाला है।
साधना की प्रक्रिया समझाते हुए वह बोले सावधान ध्रुव ! माया के अनेकों प्रलोभन तुम्हारे सामने आवेंगे। स्वीकार न कर बैठना उन्हें। तुम्हारा महान संकल्प के आगे ब्रह्मा का पद भी तुच्छ है। मैं सब समय साथ रहूँगा। हृदय से आशीर्वाद देता हूँ तुम्हारा संकल्प पूर्ण हो।
साधनाओं द्वारा चेतन मन-मस्तिष्क को शिथिल, निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाया जाता है। तब ही दूरदर्शन दूर-दृष्टि, विचार-प्रेषण, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का, परोक्ष का दर्शन, आदि अनेक अतीन्द्रिय क्षमतायें प्राप्त की जा सकती हैं। सचेतन बौद्धिक मस्तिष्क को शिथिल करके इच्छाशक्ति, प्राणशक्ति को अचेतन के विकास में प्रयुक्त करने पर शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन संभव है। अति दीर्घजीवी होना, अति शक्तिशाली होना, अदृश्य जगत का ज्ञान प्राप्त करना आदि उसी स्थिति में संभव है।
साधना करने वाले में यही विशेषतायें अवतरित होती हैं। अपने भाई-बहिनों के प्रति-प्राणिमात्र के प्रति अनंत करुणा और आत्मीयता की भावनायें उपासक के अंतःकरण में उद्भूत होती हैं। संपूर्ण विश्व ही उसे अपने आत्म स्वरूप में दिखाई देने लगता है। उनको चरितार्थ करके वह अपने जीवन को यशस्वी बनाता है और अपने अंतःकरण में धारण किये रहकर अनंत शाँति का अनुभव करता है। ऋद्धि-सिद्धियाँ भी उसकी अनुगामिनी बन कर रहती हैं।
साधना की यह एकाग्रता संपादन प्रक्रिया मस्तिष्क को साधने की दिशा में एक अत्यंत छोटा सा प्रयास मात्र है। समग्र आध्यात्मिक प्रगति तभी संभव हैं जब अपनी चेतना को विश्व चेतना का घटक मानकर स्वार्थ को परमार्थ में विकसित किया जाय।
साधना का उद्देश्य। दूसरे लोगों की, किसी के भीतर की-अविज्ञात कर्मों की-मनःस्थिति की जानकारी नहीं रहती, पर अपने आप से तो अपनी कोई बात छिपी नहीं होती। इसलिए वहाँ के अपने असली-नंगे स्वरूप में ही प्रकट होना चाहिए।
साधना अपनानी पड़ती है, जिसके उपराँत ही अनुभूतियों के निमित्त कारण को भलीभाँति जाना और समझा जा सकता है।
साधनारत रहते हैं और उपयुक्त समय पर श्रेयाधिकारी बनते हैं। लंबे समय तक अखाड़े की साधना करने पर ही पहलवान को मिलने वाले पुरस्कार पाने का अवसर हाथ आता है। से प्रकाराँतर से साधना कह सकते हैं। योगीजन इसी मार्ग का अवलंबन करते और सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिक अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं, उनने भविष्य पर दृष्टि दौड़ाई है, तद्नुरूप योजना बनाई है और एकनिष्ठ भाव से अनवरत यात्रा करते हुए ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचने की सफलता पाई है।
साधनाएँ एक साथ चलेंगी, एक दूसरे की मदद करेंगी । “पश्चिम जड़वादी है, हम अध्यात्मवादी हैं। ऐसी डींग हाँकना छोड़कर हम कबूल करें कि दोनों एकाँगी हैं और जीवन रहस्य तभी प्राप्त होगा, जब हम एकाँगिता छोड़कर सर्वांगी बनेंगे।
साधना का स्वरूप क्या होगा ?
साधना में तल्लीन हो गये और वातावरण को इतना गरम कर दिया कि उन्हीं दिनों एक से बढ़कर एक महामानव प्रचंड चक्रवातों की तरह उत्पन्न हुए और उन्होंने वह कर दिखाया जो अद्भुत और अनुपम था। प्रसिद्ध नेताओं में अनेकों नाम हैं, पर वैसे न तो इसके पहले उत्पन्न हुए थे और न पीछे ही विनिर्मित खड़े हो पाये हैं। अरविंद की तरह ही महर्षि रमण की तपश्चर्या भी थी जिसने सारे देश के जन समुदाय को और विदेशी मूर्धन्यों को भी प्रभावित किया। चाणक्य, समर्थ गुरु रामदास, कबीर जैसे महामानवों के शिष्यों की कृतियाँ या उनके जीवन की घटनायें ही लोगों को मालूम हैं। यह बात विरलों को ही ज्ञात है कि देश का कायाकल्प करने के लिए निजी जीवन में उनने क्या-क्या कठिन तपस्यायें की थीं।
साधना की बहिरंग और दृश्यमान तपश्चर्या हुई। इससे गहरी और अगली दूसरी है। इसमें अंतरंग के शक्ति स्रोतों को अंतर्मुखी होकर खोजना पड़ता है और उस क्षेत्र में दबे हुए देव वैभव को उसी प्रकार ढूँढ़ निकाला जाता है जैसे कोयला खदानों से हीरे, गहरे समुद्र से मोती एवं गहरी बोरिंग करके खनिज तेलों को ऊपर खींच निकाला जाता है। यह अपनी अनोखी वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आत्म विज्ञान के इन स्रोतों को कोई बिरले ही जानते हैं कि अपने भीतर कितनी प्रचंड चेतन क्षमता भरी पड़ी है।
साधना में बाहरी दुनिया का परिचय बढ़ाने की आवश्यकता कम होती है, जो अनुभव हो चुका है, उसकी जुगाली करना महत्वपूर्ण होता है। इसलिए प्रकृति माता की रचना है कि इस अवस्था में इंद्रियों की धारणा-शक्ति क्रमशः क्षीण होती जाती है और बुद्धि शक्ति और अनुभव का सार निकालने की दोहन शक्ति बढ़ती जाती है, जो कि स्वाभाविक है।
साधना हमें आँतरिक जगत की खोज में ले जाएगी। फिर तो दोनों साधनाएँ एक साथ चलेंगी, एक दूसरे की मदद करेंगी । “पश्चिम जड़वादी है, हम अध्यात्मवादी हैं। ऐसी डींग हाँकना छोड़कर हम कबूल करें कि दोनों एकाँगी हैं और जीवन रहस्य तभी प्राप्त होगा, जब हम एकाँगिता छोड़कर सर्वांगी बनेंगे।
साधना उच्च से उच्चतर सोपानों को पार करने लगी। क्रमशः वह उस अवस्था में जा पहुँचे जिसमें ईश्वर का नाम उनके रोम-रोम में व्याप्त हो गया।
साधना करता था। आसक्ति वश ही मुझे मृगयोनि में जन्म लेना पड़ा।”
साधना में दिव्य-शक्तियों के उन्नयन के लिए विविध विधि तपश्चर्या को प्रमुखता दी गयी है। लौकिक जीवन हो या आध्यात्मिक-पुरुषार्थ, श्रम, साहस, मनोयोग ही प्रगतिशील बनाते हैं। तप ही संपूर्ण प्रगति का आधार है। देवताओं के वरदान तपस्वियों को ही सुलभ होते हैं। मनुष्य की अंतर्निहित शक्तियाँ तपस्या द्वारा ही प्रकाशित होती हैं।
साधना संभव होती है। दीर्घकाल से संग्रहित कुसंस्कारों-पशु प्रवृत्तियों को परिवर्तित कर उच्चस्तरीय दिव्य आस्थाओं का स्वरूप दे देने की प्रक्रिया योग है। इसके लिए प्रचंड पुरुषार्थ अपेक्षित है।
साधना नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-April
साधना का उद्देश्य आत्मसत्ता को परिष्कृत करना है। जीव अपने आप में पूर्ण है। पूर्ण से उत्पन्न हुआ पूर्ण ही होना चाहिए। इसके लिये उपयुक्त बोध, साहस और कौशल प्राप्त करने के लिए विभिन्न अध्यात्म साधनाएँ की जाती हैं। प्रसुप्त को जाग्रत में परिणत करने के लिये आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जाता है।
साधनाएँ की जाती हैं। प्रसुप्त को जाग्रत में परिणत करने के लिये आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जाता है। इस मार्ग पर चलते हुए जो सफलताएँ मिलती हैं, उन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। उन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी कहा जाता है। उन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी कहा जाता है।
साधना की पराकाष्ठा-अतः की संवेदना का मूल मर्म छिपा पड़ा है। अगले अंक में पढ़ेंगे उस करुणामयी सत्ता के जीवन से जुड़े कुछ व्यावहारिक प्रसंग जो हम सबके लिए प्रेरणा के स्रोत बन सकते हैं।”
साधना, हंसयोग। इस समन्वय को यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गई कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या भी कह सकते हैं। इनमें से प्रथम तीन का सामान्य परिचय इस प्रकार है-
साधना के मर्म, गुह्यतम पक्षों का विवेचन सरल सुगम भाषा में देने का प्रयास किया जायेगा। अधिक से अधिक व्यक्ति इस का लाभ लें, इसका पाठकगण प्रयास करें।
साधना में धृत दीप जलाकर सामने रखते हैं। त्राटक साधना में धृत दीप जलाकर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँख खोलकर देखते हैं, फिर आँखें बंद कर लेते हैं। भूमध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाशज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योतिर्मय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है। संकल्प बल द्वारा आज्ञा चक्र में उसकी प्रतिष्ठापना होती है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है कि चर्मचक्षुओं की तरह से इसे विश्वव्यापी दिव्यता का भान होने लगे।
साधना का सही और नया मार्ग प्रकाशित किया।
साधना में लगा हुआ हूँ। मुझे तो यह सिद्धि मिली नहीं। यह जिसे मैंने अपने से पहले पूजा भी नहीं करने दी किस तरह इतनी जल्दी इस अवस्था में पहुंच गयी? यह विचार उन्हें और भी खिन्न व उदास करने लगा। धर्म-कर्म में उनकी रुचि कम होने लगी।
साधना के लिए इसीलिए रखना चाहिए। आम तौर से रविवार या गुरुवार का दिन इसके लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है रविवार प्रखरता पाप नाशक वृत्ति के संवर्धन की दृष्टि से तथा गुरुवार पवित्रता संवर्धन, गुरुभक्ति के अभिवर्धन की दृष्टि से पर यदि असुविधा हो, तो कोई अन्य दिन भी नियत किया जा सकता है। गाँधी जी के मौन का दिवस मंगलवार था। कभी अनिवार्य व्यवधान आ जाता था, तो वे मंगल से पहले या बाद का दिन इस के लिए रख लेते थे। अनिवार्य कारण होने पर दूसरे और भी दिन नियत कर सकते हैं और उस दिन विशेष कठिनाई आ जाने पर उसकी पूर्ति जल्दी ही अगले दिन कर सकते हैं।
साधना में धृत दीप जलाकर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँख खोलकर देखते हैं, फिर आँखें बंद कर लेते हैं। भूमध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाशज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योतिर्मय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है। संकल्प बल द्वारा आज्ञा चक्र में उसकी प्रतिष्ठापना होती है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है कि चर्मचक्षुओं की तरह से इसे विश्वव्यापी दिव्यता का भान होने लगे। जड़ के आवरण में छिपी हुई आत्मा की झाँकी होने लगे।
साधना से उनके जीवन में आयी? भगवान के खेत में बोना व कई गुना काटना जैसे लाभदायक व्यवसाय को अपने जीवन के प्रसंगों से जोड़कर वे हमें समझाते हैं कि हम सबके लिए भी वही मार्ग खुला पड़ा है।
साधना बन गई। भावुकता का हर आवेग जीवात्मा के बंधनों को तोड़ता-फेंकता चला गया। भाव बीज का अंकुरण बचपन से ही उन्हें असहाय बूढ़ी, कुष्ठ रोग पीड़ित मेहतरानी की सेवा करने, कमाई के हाथ पड़ी गाय की जीवन रक्षा करने के लिए विवश करने लगा। धीरे-धीरे जीवन की हर चेष्टा, संवेदना की कसक बन गई। संवेदना-भावुकता की विकसित अवस्था है।
साधना में इसी का अभ्यास कराया जाता है। साधक अपने भीतर प्राणतत्व की अभिवृद्धि का अनुभव करता है। इस प्रक्रिया के द्वारा उपार्जित प्राण सम्पदा साधक की बहुमूल्य संपत्ति होती है। इस पूँजी को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है। इसे बहिरंग और अंतरंग क्षेत्र का सामर्थ्य उत्पादक प्रयोग कह सकते हैं।
साधना में मूलाधार शक्ति को जगाने-उठाने और पूर्णता के केन्द्र से जोड़ देने का प्रयत्न किया जाता है। मूलाधार की प्रसुप्त कुण्डलिनी को जगाने तथा ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रथम प्रयास शक्ति चालिनी मुद्रा के रूप में संपन्न किया जाता है। ऊर्ध्वमुखी कुण्डलिनी अग्नि शिखा की तरह मेरुदण्ड मार्ग से ब्रह्मलोक तक पहुँचती है तथा अपने अधिष्ठाता सहस्रार से मिलकर पूर्णता प्राप्त करती है।
साधना द्वारा किया जाता है।
साधना के साथ संपन्न किया जाता है। इस प्रक्रिया का समूचे कुण्डलिनी क्षेत्र पर प्रभाव पड़ता है जिससे उस शक्ति स्रोत के जागरण और उर्ध्व गमन के दोनों उद्देश्य पूरे हो सकें। इस प्रयास से उत्पन्न हुई उत्तेजना का सदुपयोग करने वाले अनेक असाधारण काम संपन्न कर सकते हैं। इस प्रकार पंचकोशी साधना के तीन प्रमुख साधना उपचार ये हैं, जिन्हें विधिविधान से करने पर निश्चित ही फल मिलता है।
साधना और साँसारिक वैभव से न मिल सकी, वह निष्काम कर्मयोग के प्रयोग से सहज मिलने लगी।
साधनाएँ उन्होंने संपन्न की। यम-नियम ध्यान, धारणा प्रत्याहार के द्वारा उनने इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना भी सीख लिया। कई तरह की सिद्धियों का अर्जन भी किया। किन्तु न जाने क्यों उन्हें अपने अन्तःकरण में कुछ सूना-सूना सा लगता था। शान्ति के स्थान पर गहरा द्वन्द्व था।
साधना प्रकारांतर से चमत्कारी वरदान बनकर लौटी है।” इस चमत्कारी वरदान को पाने के अवसर हमारे आपके सामने भी हैं। बस करुणा व प्रेम से लबालब भरा अंतःकरण चाहिए तथा गुरु के प्रति अनन्य भक्ति।
साधना में मुझ सागर से भी बढ़कर गहराई है। निश्चय ही उनके पास जाकर तुम पूर्णता की प्राप्ति कर सकोगे।”
साधनाएँ प्रमुख मानी गई हैं। उपवास जिस स्तर का सध सके, उतना सधना चाहिए। अच्छा तो यह है कि पूरे दिन जल पीकर रहा जाय। आवश्यकतानुसार उसमें नीबू शहद जैसा कुछ मिला लिया जाय। इतना न बन पड़ने पर दूध छाछ, रस, रसा आदि प्रवाह पदार्थ लेकर काम लिया जा सकता है।
साधना को प्राणयोग कहते हैं। इसे करने वाले को प्राणवान कहते हैं। “लय” और “ताल” की महान् शक्ति का ज्ञान सर्वसाधारण को तो नहीं होता, पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सर्वविदित न होने पर भी यह सामर्थ्य कितनी प्रचण्ड है।
साधना का पांचवां व एक प्रमुख पक्ष माना जाता है। यह शारीरिक मानसिक के अतिरिक्त साधन क्षेत्र की पांचवीं तपश्चर्या है। इन सभी को समान महत्व मिलना चाहिए, तभी व्यक्ति की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
साधना मार्ग में अधिक प्रगति कर चुकी है। उसके मुखमण्डल पर अभूतपूर्व दीप्ति, दिव्य शान्ति और दैवीय आभा दिखाई देने लगी। पूछने पर मालूम हुआ कि वह भाव-समाधि की स्थिति में जा पहुँची है।
साधना का अंतिम परिणाम है। सामान्य व्यक्तियों की बात तो बहुत दूर महामानवों में से भी बहुत कम ही इस अंतिम सीढ़ी पर चढ़ सकने में सफल होते हैं। अन्यथा बहुतों को बीच में ही कहीं न कहीं रुक जाना पड़ता है। सूक्ष्म व गहरी दृष्टि के अभाव में महामानवों के जीवन इतिहास के विद्यार्थी इस रहस्य को जानने से वंचित रह जाते हैं। प्रेम तत्व का बीच किस तरह से अंकुरित होता, फूलता-फलता और महावट का रूप धारण करता है इसे गुरुदेव के जीवनक्रम में अनुभव किया जा सकता है।
साधना के नाम से जाना जाता है। इसी समग्र मार्ग को अपना सकने पर व्यक्तित्व निखरता और प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम इसलिए नियमित किया गया है।
साधना द्वारा किया जाता है। इस क्षमता के चमत्कारी क्रिया−कलाप भौतिक क्षेत्र में संपदाएँ, सफलताएँ और आत्मिक क्षेत्र का उत्पादन है। जाग्रत आत्माओं का पुरुषार्थ इसी दिशा में नियोजित होता है। ब्रह्मतेज या आत्मबल के उत्पादन उपार्जन में जिस साधना का अभ्यास किया जाता है उसमें पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी अनावरण प्रक्रिया प्रमुख मानी जाती है।
साधना भी भली प्रकार बन सके और स्वाध्याय का वास्तविक प्रयोजन पूरा हो सके।
साधना उपचार ये हैं, जिन्हें विधिविधान से करने पर निश्चित ही फल मिलता है।
साधना क्या हो सकती है? परिध को यह जान लेने के बाद कुछ जनना शेष नहीं रह गया।
साधना प्रसंग में अनेक तप तितिक्षाओं का वर्णन है। तपाने से धातुएँ शुद्ध होती हैं। कच्ची मिट्टी पक्की बनती है। तपाने से धातुओं की गलाई-ढलाई होती रहती है। गरम करने से ही भोजन पकता है।
साधना से जो दूरदर्शी तत्वदर्शी विवेक जाग्रत होता है, उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। वही गायत्री मंत्र का धियः तत्व है। इस जागरण को आत्म जागरण की संज्ञा दी जाती है तथा इसे भौतिक और आत्मिक जीवन की महान उपलब्धि भी कहा जा सकता है।
साधना का पुरुषार्थ किया जाता है। इस मार्ग पर चलते हुए जो सफलताएँ मिलती हैं, उन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। उन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी कहा जाता है। उन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी कहा जाता है। इन सामर्थ्य अथवा क्षमताओं का मूल आत्मबल एवं ब्रह्म तेज है, जिसका उपार्जन गायत्री मन्त्रों की साधना द्वारा किया जाता है।
साधना का मार्ग अपनाने का साहस दिखा सके।
साधना करते हो उसमें अहं की भावना होती है। जबकि महारानी समर्पण के भाव से अर्चना करती है। जिसने अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दिया, उसके पास अहं कहाँ बचा? और जहाँ अहं मिट जाता है, वहाँ ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं रह जाता।”
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चारों को आध्यात्मिक जीवन का अविच्छिन्न अंग माना गया है। इनमें अधिक सरल और अधिक आवश्यक है-स्वाध्याय इसे बीजारोपण की संज्ञा दी गई है। जीवन को महामानव स्तर का कल्पवृक्ष बनाने में सफलता इसी आधार पर बनती है। इसलिए प्रयत्न तो यह चाहिए कि स्वाध्याय को भी योगाभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हुए उसे दिनचर्या का एक अंग माना जाय। कम से कम इतना तो अनिवार्य ही होना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन इस प्रयोजन के लिए सुनिश्चित रखा जाय।
साधना का अभ्यास किया जाता है उसमें पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी अनावरण प्रक्रिया प्रमुख मानी जाती है।
साधना त्राटक है। त्राटक साधना में धृत दीप जलाकर सामने रखते हैं। त्राटक साधना में धृत दीप जलाकर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँख खोलकर देखते हैं, फिर आँखें बंद कर लेते हैं। भूमध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाशज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योतिर्मय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है।
साधना का उद्देश्य है। पातंजलि योग दर्शन का एक सूत्र बताता है कि मंत्र जप के साथ मन की बिखरी हुई शक्तियों को समेटना आवश्यक है। इसी से जप ‘शक्तिशाली बनता हैं। यह शक्ति विद्युत चुम्बकीय क्षमता की तरह है और प्रारंभिक है। अन्तिम अवस्था तो मंत्र के साथ-साथ भाव संवेदना का ही जुड़ना है।
साधना के तीन प्रमुख साधना उपचार ये हैं, जिन्हें विधिविधान से करने पर निश्चित ही फल मिलता है।
साधना का उद्देश्य भी यही है कि हम उस अजस्र शक्ति के भांडागार से अनुदान लेकर उन अभावों को पूरा करें, जिनके माध्यम से प्रगतिशील, संपन्न, प्रतिभाशाली बना जा सकता है।
साधना में पाँच योगों का समावेश है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-November
साधना, तपश्चर्या, स्वाधीनता संग्राम, पत्रकारिता, हिमालय प्रवास, विशिष्ट यात्रायें, हिमालय दर्शन, पत्राचार, पत्रिकाओं का संपादन, साहित्य सृजन, गायत्री तपोभूमि, शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस् और गायत्री शक्तिपीठों, प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना, देशव्यापी प्रव्रज्या, बड़ों से भेंट, विशिष्ट सम्मान, विदेश प्रवास, पारिवारिक परिचय, विलक्षण कार्य, अतीन्द्रिय क्षमतायें, अभूतपूर्व उल्लेखनीय घटनायें, संस्मरण, साहस-संघर्ष, संगठन, सम्पन्न कार्यक्रमों का विवरण, महाप्रयाण उसके पश्चात् के निर्धारण तथा पूर्ति प्रबंध आदि सभी सुविस्तृत क्रमबद्ध, प्रामाणिक दस्तावेजों सहित प्रकाशित हों, अभी तक यह प्रश्न था, इसे लिखे कौन?कैसे लिखा जाये?अतएव यह कार्य उनके संपूर्ण वाङ्मय के साथ-साथ जिनके चालीस भाग (वाल्यूम्स) सम्पादन का कार्य प्रारंभ हो गया। यह जीवन चरित भी चिर-प्रतीक्षित था। उनके लिए भी उचित व्यवस्था हो गई है।
साधना, योग, तप जैसे अध्यात्म उपचारों को सफलता में देव अनुग्रह को माध्यम माना जाता था।
साधना के संबंध में सार्वभौम स्तर पर नहीं मिलती। योगवशिष्ठ, तेज बिन्दूपनिषद्, योग चूड़ामणि, ज्ञान संकलिनी तंत्र, शिवपुराण, देवी-भागवत्, शाण्डिल्योपनिषद्, मुक्तिकोपनिषद्, हठयोग -प्रदीपिका, कुलावर्ण -तंत्र, योगिनी-तंत्र, घेरंड-संहिता, कंठश्रुति, ध्यान बिंदूपनिषद्, रुद्रयामलतंत्र, योगकुण्ड-लिन्योपनिषद्, शारदा तिलक आदि ग्रन्थों में इस विद्या के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। उसके विधानों और विवरणों में तो थोड़ा बहुत अंतर है, पर यह मान्यता सर्वविदित है कि आँतरिक आत्मिक शक्तियों को प्रसुप्ति से जाग्रति में बदलने, जाग्रति को प्रचंड बनाने में कुँडलिनी जागरण प्रक्रिया से असाधारण सहायता मिलती है।
साधना में वाक् शक्ति को विकसित करने के लिए मन, वचन और कर्म में ऐसी उत्कृष्टता उत्पन्न करनी पड़ती है कि जीभ को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जायें। इतना कर लेने के उपरान्त जपा हुआ मंत्र सहज ही सिद्ध होता है। और उच्चारण किया हुआ शब्द असंदिग्ध रूप से सफल होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा उच्चारित मंत्र भी जल जायेंगे। तब बहुत संख्या में बहुत समय तक जप, स्तवन, पूजा पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेगा।
साधना करते शिक्षण शोध प्रक्रिया चलाते थे।
साधनाओं पर अनुसंधान करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार मनोविकारों एवं अंतर्द्वंद्वों से न केवल शारीरिक मानसिक रोग होते हैं। अपितु इस कुचक्र में फँस जानें पर आर्थिक पारिवारिक सामाजिक जीवन के भी नष्ट भ्रष्ट हो जानें की बात भी पूर्णतया स्पष्ट है। पुरातन काल में यही तथ्य पाप-पुण्य के प्रत्ययों से समझाया जाता था।
साधना के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है अंतरात्मा की वाणी सुनना। आत्मा हमें निरन्तर अपना परामर्श देती रहती है। यदि इसे सुनने का प्रयत्न किया जाय, तो वैदिक ऋषियों के सदृश अपनी समस्याओं का समाधान निज के अंतराल में प्राप्त कर सकते हैं।
साधना पूरी करनी पड़ती है। सत्प्रवृत्तियों, उच्च आदर्शों को समर्पित जीवन। ऐसे साधक के लिए ही भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है। “तू अपना मन और बुद्धि मेरे ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में लगा। इस तरह तू मेरे में ही निवास करेगा।
साधनाजन्य अनुभूतियाँ।
साधनाओं में वर्णित प्रक्रियाओं से दिशा ग्रहण कर तत्संबंध शोध प्रयास करना होगा। इस तरह किया गया प्रयास नूतन मनोविज्ञान को जन्म देने वाला सिद्ध होगा। जिससे मानवी व्यक्तित्व को प्रखर बनाना संभव हो सकेगा।
साधना है। यह सौभाग्य जिन प्रयोजनों के लिए मिल जाते हैं। चाहे वह साँसारिक हों या आध्यात्मिक उनकी सफलता की आधी मंजिल तत्काल पूर्ण हो जाती है। साथ ही उस समर्पित आत्मा को ईश्वर सान्निध्य का एक ऐसा दिव्य लाभ इसी साधना से मिल जाता है जिसके लिए योगाभ्यास और जन्म जन्माँतरों की कठिन और लंबी साधना पूरी करनी पड़ती है। सत्प्रवृत्तियों, उच्च आदर्शों को समर्पित जीवन।
साधना ‘तथा भारत के अश्वमेधों की वीडियो फिल्में दिखाया जाना 9 जुलाई को प्रातः से ही आरंभ हो गया था। प्रदर्शनी सभी के आकर्षण की मूल बिंदु थी। लंबी-लंबी लाइनें लगी थीं ताकि सभी क्रम से अंदर जाकर अनुशासित ढंग से अध्यात्म के विज्ञान सम्मत प्रतिपादन को देख समझ सकें प्रायः सौ परिजनों ने भोपाल’भारत’से आए श्रीदत्तात्रेय एम. जोशी के सहायक के रूप में पिछले चार-पाँच दिन से रात-दिन लग कर यह विशाल प्रदर्शनी खड़ी की थी कैप्शन्स लिखे थे एवं लगभग एक हजार चित्रों, ट्राँसपेरेसी तथा वैज्ञानिक उपकरणों-माडल्स के सहारे देवसंस्कृति का आमूलचूल एक नया ढाँचा खड़ा कर दिया था। वैज्ञानिक चार्ट्स के द्वारा सभी यह देख-समझ रहे थे कि ब्रह्मवर्चस् की शोध में किस किस क्षेत्र में साधकों को क्या-क्या लाभ मिले हैं। ब्रिटिश लोगों के लिए ये आँकड़े तो आँख खोल देने वाले थे।
साधनात्मक उपचारों द्वारा खोजा और जगाया जा सके तो जीवात्मा को देवात्मा एवं परमात्मा बनने का अवसर मिल सकता है। इस अन्वेषण प्रयास को ”ब्रह्म विद्या” और जागरण प्रक्रिया को ‘ब्रह्मतेज - सम्पादन’कहते हैं। इस संदर्भ में शरीर स्थित सूक्ष्म चैतन्य केन्द्रों को जाग्रत एवं जीवंत करने और उनके ब्रह्मबल से उच्चकोटि का लाभ उठाने की प्रक्रिया कुँडलिनी जागरण के नाम से जानी जाती है।
साधना-उपासना जो बहुत सरल है, आन पहली जनवरी से चाहे तो कर सकते हैं। इसके लिए आपको नित्य प्रातःकाल साढ़े चार बजे साँस के रूप में उस प्राण को खींचना है। हम भी प्रातःकाल उस प्राण रूपी माँ के दूध को पीते हैं, शक्तियाँ आ जाती है। दिन भर हम उछलते रहते हैं, फुदकते रहते हैं। आप लोगों को जाग्रत आत्माओं को दूध को जो प्रातःकाल प्राणाधार के रूप में आता है, ग्रहण करना चाहिए और रात्रि को सोते समय वातावरण में उसे तीर कमान की तरह इस तरीके से छोड़ना चाहिए कि इस वातावरण को संशोधित करने में मदद कर सके।
साधना है, जिसकी ध्यान एक क्रिया है।
साधना करने पर जाग्रत होती है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह साधक की अपनी उपार्जित पूँजी है। यह एक प्रचंड विश्वव्यापी दिव्य शक्ति है जिसे उपयुक्त सत्पात्र अपनी आत्मिक संपदा और सशक्तता बढ़ाते हैं। उस उपार्जित संपदा के आधार पर साँसारिक वैभव और आत्मिक वर्चस्व का दुहरा लाभ मिलता है।
साधना के रूप में लिया जाना चाहिए।
साधना का प्राण कह सकते हैं। उसे साधक की कामधेनु एवं तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी परिमार्जित जिव्हा को सरस्वती कहते हैं। मंत्र की आत्मा वही है। सिद्धियों का उद्गम स्थल उसी को मानना चाहिए।
साधना में किसी तरह बाधक है। प्राचीनकाल में बहुसंख्यक ऋषि सपत्नीक रहकर गुरुकुल में वास कर साधना करते शिक्षण शोध प्रक्रिया चलाते थे।
साधनाओं में या आत्मोपलब्धि, मोक्ष के लिए समर्पित होने के लिए संपूर्ण कामनाएँ नष्ट करनी पड़ती हैं। मार्ग दर्शक या ध्येय की प्रामाणिकता सिद्ध हो जाये तो फिर कर्तव्य में अवाँछनीयता की गुँजाइश रहती ही नहीं।
साधनायें करनी पड़ती हैं।
साधना में पहली जनवरी से दो चीजें मिला दें। पहली यह कि नया युग लाने के लिए एक धारा एक प्रवाह कहीं से चला है, हम उसी से प्रभावित होते हैं, हम उसी से प्रभावित होते हैं और आपको भी प्रभावित करने के लिए उसी ताकत का इस्तेमाल करते हैं। जो महान शक्ति इतना बड़ा कार्य कर रही है नये युग को ला रही है उसके साथ संपर्क बनाने वाली साधना-उपासना जो बहुत सरल है, आन पहली जनवरी से चाहे तो कर सकते हैं। इसके लिए आपको नित्य प्रातःकाल साढ़े चार बजे साँस के रूप में उस प्राण को खींचना है। हम भी प्रातःकाल उस प्राण रूपी माँ के दूध को पीते हैं, शक्तियाँ आ जाती है।
साधना निग्रह, आहार-विहार, साधना, योग, तप जैसे अध्यात्म उपचारों को सफलता में देव अनुग्रह को माध्यम माना जाता था।
साधना में यही होता है। उच्चारित होने के उपरान्त स्थूल शब्द अन्तःकरण के मर्मस्थल की गहराई में उतरता है और उस शक्ति स्रोत की ऊर्जा से सम्पन्न होकर ऊपर आता है। जब वह ऊपर आता है तो बैखरी में पश्यंती का वैसा ही प्रभाव होता है जैसा कि बिजली के संपर्क से धातु के तार में। वह मंत्रवत् शब्द समस्त सृष्टि में हलचल उत्पन्न करता है। सूक्ष्म जगत को स्पंदित करता है और व्यक्ति को सामान्य न रहने देकर उसे दैवी शक्ति से सम्पन्न बना देता है।
साधना द्वारा इसे जगाया जा सकता है। ”
साधनाएँ या पारमार्थिक सेवाएँ तो समर्पण के अभाव में पनप ही नहीं सकती।
साधना प्रक्रियाओं, तप के उपक्रमों, आप्त वचनों, आर्ष साहित्य के कथनों को श्रद्धा के सहारे अपनाया जाता था और उनके परिणाम स्पष्ट गोचर होते थे। किन्तु आज मानव की बुद्धिवादी प्रकृति ने श्रद्धा के गूढ़ तत्व में प्रवेश न कर पाने के कारण इनसे सर्वथा इन्कार कर दिया है। इस प्रयोजन की पूर्ति प्रखर तथ्यों से ही कर संभव है। विज्ञान साक्षी की आज प्रामाणिकता का परिचायक बन गई है। वरिष्ठता का चोला आज कल वैज्ञानिकता ने पहन रखा है।
साधना से मिल जाता है जिसके लिए योगाभ्यास और जन्म जन्माँतरों की कठिन और लंबी साधना पूरी करनी पड़ती है। सत्प्रवृत्तियों, उच्च आदर्शों को समर्पित जीवन। ऐसे साधक के लिए ही भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है। “तू अपना मन और बुद्धि मेरे ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में लगा। इस तरह तू मेरे में ही निवास करेगा।
साधना है। सहयोग से भौतिक प्रगति के लक्ष्य प्राप्त किये जा सकते हैं। परमार्थिक प्रयोजनों की भी एक सीमा तक शक्ति सहायता मिल सकती है। किन्तु महान कार्य, बड़े उद्देश्य समर्पित सेवाओं के बिना संभव नहीं हो पाते। श्रेष्ठता के प्रति समर्पण आत्मा की क्षमताओं और भावनाओं को प्रकट करके व्यक्ति, समुदाय और संसार को प्रगति का मार्ग, नई ज्योति और सदाशयी लक्ष्यों की सफलता प्रदान कर सकती हैं।
साधना व उससे जुड़ी शंकाएं-समाधान, ध्यान का साकार एवं निराकार स्वरूप कैसा हो व्यवहारिक स्तर पर कैसे उसे करें, युवा वर्ग की समस्याएं व उनका समाधान, नारी शक्ति की नवनिर्माण में भूमिका जैसे विषयों पर वर्कशाप एवं सेमीना आयोजित हुई। डॉ.रमण गोकल, प्रमोद भटनागर, श्रीकालीचरण शर्मा, सूरज प्रसाद शुक्ला एवं डा. प्रणव पण्ड्या द्वारा अंग्रेजी में प्रस्तुत इन संगोष्ठियों में प्रायः चार हजार से अधिक ने भागीदारी की।
साधना, और आराधना का उपक्रम भी बिठाती चली गयी। फलतः आरोग्य लाभ भी हस्तगत हुआ।
साधनाओं में सिद्धि के गुणोँ में यह स्थिति अनिवार्य मानी गयी है। अतएव समर्पण को आत्म कल्याण की सर्वोपरि साधना के रूप में लिया जाना चाहिए।
साधना द्वारा -नादयोग के माध्यम से, दिव्य ध्वनियों के श्रवण द्वारा अथवा सौर चेतना पर केन्द्रित आत्मचेतना द्वारा लक्ष्य सभी का एक है आँतरिक सुव्यवस्था व बहिरंग के साथ सामंजस्य।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-May
साधनाओं में प्रवेश कर सिद्धियाँ प्राप्त करूं। पंचकोशों का अनावरण करते हुए आनन्दमय भूमिका में पहुंचूं।
साधना की समाप्ति के साथ कुछ ही दिनों में वे अस्वाभाविक लक्षण स्वतः तिरोहित हो गये। ऐसे ही एक अवसर पर जब वे राधा भाव की साधना कर रहे थे, तो उनके विचार व्यवहार, चाल-ढाल न सिर्फ स्त्रियों जैसे हो गये थे वरन् शरीर में स्त्रैण गुण भी उभर आये थे। महिलाओं की तरह उरोज और मासिक स्राव भी शुरू हो गया था, किन्तु ज्योंही साधना पूरी हुई धीरे-धीरे सभी असामान्यताएँ अदृश्य हो गई।
साधना और शरीर से आराधना की है।
साधना में सिद्धि मिलना कोई रहस्य है। उन लोगों ने भी बिल्ली पाली और उसी प्रकार बाँधना आरंभ कर दिया। कुछ दिन पश्चात् साधु तो न रहे पर उनके अनुयायियों ने बिल्ली की समीपता में साधना करने की एक परम्परा ही बना ली।
साधना। साधना अपने आपको करने को कहते है। हमने अपने आपको कितना कसा है, शरीर को, इन्द्रियों को कितना कसा है। अपने व्यवहार को कितना कसा है। अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं और महत्वाकाँक्षाओं को चूरा करके फेंक दिया है।
साधना अपने आपको करने को कहते है। हमने अपने आपको कितना कसा है, शरीर को, इन्द्रियों को कितना कसा है। अपने व्यवहार को कितना कसा है। अपनी इच्छा-आकाँक्षाओं और महत्वाकाँक्षाओं को चूरा करके फेंक दिया है। अपने आप को धोने के लिए परिष्कृत करने के लिए हमने धोबी के तरीके से बेरहमी के साथ पीट-पीट कर धोया है और धुनिये के तरके से अपने आपको धुना है।
साधना एवं तपश्चर्या की एक-एक करके सभी सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। स्थूल से आगे सूक्ष्म और सूक्ष्म से आगे बढ़ कर कारण शरीर में प्रवेश करना पड़ता हैं,तब कहीं योगशास्त्रों में वर्णित ऋद्धि-सिद्धियों के दर्शन होते है। प्राचीनकाल का समूचा इतिहास इन्हीं आध्यात्मिक उपलब्धियों से भरा पड़ा है जिसे ऋषियों, तत्वदर्शियों योगियों और सन्तों का इतिहास कहा जा सकता है, वे अपने संकल्पबद्ध से या सूक्ष्म शरीर से परकाया प्रवेश से लेकर सुदूर ग्रह- नक्षत्रों तक कि यात्रा पलक झपकते ही कर लेते थे।
साधना ‘प्राणायाम’ की प्रक्रिया द्वारा सधती है। विज्ञात प्राणायामों की संख्या चौरासी है। अविज्ञात इससे भी अधिक हो सकते हैं। अध्यात्मिक क्षेत्र में प्रगति करने, साधकों को प्राणवान बनाने के उद्देश्य से कुछ ऐसे निर्धारण चुने गये हैं जो सर्वसुलभ हैं और जिनके प्रयोग से लाभ तो बहुत हैं, किंतु कोई भूल रहने पर भी हानि होने की तनिक भी आशंका नहीं है।
साधनाओं में जिस धैर्य की आवश्यकता होती है, वह श्रद्धावान व्यक्तियों में ही संभव है। ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानं’ ‘श्रद्धया सत्य माप्यते’ श्रद्धावान ही ज्ञानार्जन करते हैं, श्रद्धावान ही सत्य को प्राप्त करते हैं। शिखिध्वज की श्रद्धा भावना के ही कारण महर्षि ने मंत्रदीक्षा दी थी। सामान्यतः हर किसी को वे दीक्षा नहीं दिया करते थे।
साधनाओं की नहीं की जा रही है। कहने का आशय मात्र इतना भर है कि अध्यात्म श्रद्धा-विश्वास की जिस धुरी पर टिका है, उसे यदि प्रगाढ़ और प्रबल किया जा सके, तो आज जिस प्रकार इस सूक्ष्म विज्ञान की विश्वसनीयता पर उँगली उठायी जा रही है, उसकी गुंजाइश न सिर्फ सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जायेगी, अपितु अनेक ऐसी उपलब्धियाँ भी हस्तगत हो सकेंगी, जिसे अब तक पढ़ी-सुनी भर, कपोल-कल्पना भर मानी जाती रही थीं।
साधना के लिए अमादा हो जाइये साधक बनिये। साधना भगवान की नहीं अपनी होती है। भगवान पर क्या चंदन चढ़ायेंगे, चावल चढ़ायेंगे, स्नान करायेंगे? भगवान पर रहम कीजिए। पहले अपनी गंदगी धोइये, अपने को स्नान कराइये।
साधना एवं तपश्चर्या से ब्रह्मांडीय चेतन ऊर्जा सूक्ष्म शरीर में जैसे-जैसे साधन होती जाती है वह सशक्त एवं परिपुष्ट बनता जाता है उसकी क्षमता भौतिक काया से कई गुनी बढ़ी चढ़ी होती है जिसके लिए समय, स्थान दूरी आदि जैसे कारक काई अर्थ नहीं रखते उनके अनुसार सूक्ष्म शरीर से यात्रा करने के पश्चात् जितनी ताजगी और स्फूर्ति की अनुभूति होती है। उतना स्थूल शरीर से कभी भी संभव नहीं हो पाती। इसे उन्होंने मन की यात्रा कहा है जो प्रबल संकल्प बल के सहारे संपन्न होती है।
साधना में उसने रात-दिन एक कर दिए। भगवान को और क्या चाहिए, उन्हें तो निष्ठा की परख होती है, अन्यथा अपने भक्त की सहायता के लिए वे अहिर्निशि तत्पर रहते हैं।
साधना करने की एक परम्परा ही बना ली।
साधना के कई रहस्यों का उद्घाटन करने वाला होगा। इसका मूल्य अन्य अंकों के समान ही होगा। अधिक से अधिक व्यक्तियों को इससे लाभान्वित कराने का परिजन प्रयास करें।
साधना के द्वारा निर्माण किया गया मन एक ही क्षण में लोभ की कीचड़ में डूब गया। मुद्राध्यायी महर्षि मुस्कुराए इतनी कमजोर निष्ठा वाले शिष्य कहीं अग्नि-दीक्षा के अधिकारी हो सकते हैं। यह तो धन की बात रही अभी तो सौंदर्य, यश, प्रतिष्ठा के कितने ही आकर्षण हैं शिखिध्वज वित्तेषणा से ही मुक्त न हो सका तो यह ब्रह्मदीक्षा तक पहुँचने की कठिनाई कैसे झेल सकेगा? स्वल्प शक्ति, योग्यता और प्रतिभा का मनुष्य जो अपने कल के भविष्य के लिए भी निश्चित नहीं होता, उसे राज सम्मान के पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने में ही कितनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। सर्वशक्ति ब्रह्म और उसका अनन्त ऐश्वर्य प्राप्त करने की कठिनाइयों का तो अनुमान ही कौन कर सकता है।
साधना कर रहे थे, तो उनके विचार व्यवहार, चाल-ढाल न सिर्फ स्त्रियों जैसे हो गये थे वरन् शरीर में स्त्रैण गुण भी उभर आये थे। महिलाओं की तरह उरोज और मासिक स्राव भी शुरू हो गया था, किन्तु ज्योंही साधना पूरी हुई धीरे-धीरे सभी असामान्यताएँ अदृश्य हो गई।
साधना सिर्फ अपने आपे की करनी पड़ती है। अपने आपे की साधना कर लेने और पात्रता विकसित कर लेने के बाद में दैवी शक्तियों का अनुदान अनायास ही बिना माँगे मिलता हुआ चला जाता है।’ मेरे गुरु ने जिस दिन दीक्षा दी उसी दिन मुझे वास्तविकता समझा दी और कहा-कि सारे का सारा ध्यान अपने ऊपर केन्द्रित कर लीजिये मैंने अपने ऊपर केन्द्रित रखा और यही कहता रहा-आदर्शों को, सिद्धान्तों को भगवान कहते हैं, उत्कृष्टता को भगवान कहते हैं और उसी की आराधना के लिए, उसी की उपासना के लिए अपने हर एक साँस को, हर एक चप्पे को, योग्यता के हर एक कण को मैंने नियोजित कर दिया। हमने भगवान की महत्ता को समझने की कोशिश की और उसने हमको गायत्री के नजदीक ला दिया। आप तो लाखों मील दूर हैं इसलिए कि आपने केवल सुना है और कृत्यों को किया है, अतः निराश नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे।
साधना की प्रारंभिक आवश्यकताएँ हैं, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मंत्र दीक्षा संपन्न हुई। पूजन की सामग्री उपयुक्त पात्र, कुश आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करते हुए शुभ ज्योति स्वरूप निराकार गायत्री का ध्यान करना। जब तुम इस प्रारंभिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे, तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
साधना पूरी हुई धीरे-धीरे सभी असामान्यताएँ अदृश्य हो गई।
साधना कैसे कर सकता है? साधना सिर्फ अपने आपे की करनी पड़ती है। अपने आपे की साधना कर लेने और पात्रता विकसित कर लेने के बाद में दैवी शक्तियों का अनुदान अनायास ही बिना माँगे मिलता हुआ चला जाता है।’ मेरे गुरु ने जिस दिन दीक्षा दी उसी दिन मुझे वास्तविकता समझा दी और कहा-कि सारे का सारा ध्यान अपने ऊपर केन्द्रित कर लीजिये मैंने अपने ऊपर केन्द्रित रखा और यही कहता रहा-आदर्शों को, सिद्धान्तों को भगवान कहते हैं, उत्कृष्टता को भगवान कहते हैं और उसी की आराधना के लिए, उसी की उपासना के लिए अपने हर एक साँस को, हर एक चप्पे को, योग्यता के हर एक कण को मैंने नियोजित कर दिया। हमने भगवान की महत्ता को समझने की कोशिश की और उसने हमको गायत्री के नजदीक ला दिया।
साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे, तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए। शिखिध्वज ने गुरुचरणों में प्रणिपात किया, महर्षि ने आशीर्वाद दिया और दोनों अपने-अपने पर्णकुटीरों की ओर चले गये।
साधना कर लेने और पात्रता विकसित कर लेने के बाद में दैवी शक्तियों का अनुदान अनायास ही बिना माँगे मिलता हुआ चला जाता है।’ मेरे गुरु ने जिस दिन दीक्षा दी उसी दिन मुझे वास्तविकता समझा दी और कहा-कि सारे का सारा ध्यान अपने ऊपर केन्द्रित कर लीजिये मैंने अपने ऊपर केन्द्रित रखा और यही कहता रहा-आदर्शों को, सिद्धान्तों को भगवान कहते हैं, उत्कृष्टता को भगवान कहते हैं और उसी की आराधना के लिए, उसी की उपासना के लिए अपने हर एक साँस को, हर एक चप्पे को, योग्यता के हर एक कण को मैंने नियोजित कर दिया। हमने भगवान की महत्ता को समझने की कोशिश की और उसने हमको गायत्री के नजदीक ला दिया। आप तो लाखों मील दूर हैं इसलिए कि आपने केवल सुना है और कृत्यों को किया है, अतः निराश नहीं रहेंगे तो क्या करेंगे। लेकिन हमको-पूरी तरीके से सच्चे मन से हजार बार कहने की हिम्मत पड़ती है कि गायत्री शक्तिवान है, सामर्थ्यवान है और चमत्कारी है।
साधना का यह द्वितीय द्वार सिद्धान्ततः जितना सरल है, व्यवहार में उतना ही कठिन। जन्म−जन्मांतरों का अभ्यासी मन लौकिक सुखों को सहज ही त्यागने के लिए नहीं तैयार होता है। बड़ी भारी संग्राम करना पड़ता है, तब कहीं मन की मलीनताएं दूर होती हैं। इस अवस्था में पहुँचे हुए साधकों को थोड़ी सी-भी चूक उन्हें पथ-भ्रष्ट कर सकती है। उन्हें पहाड़ जैसी उपलब्धियों से पल भर में नीचे गिरा सकती है।
साधना-विधानों में जड़ दिनमान के आश्रय का क्या तुक है? ऐसे लोगों के समाधान के लिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि मानवी मन इतना चलायमान है कि उसे स्थिर व एकाग्र करने के लिए दृश्य माध्यमों का सहारा लेना पड़ता है। जिसने निराकार ईश्वर को देखा नहीं, उसे साकार साधनों से काम चलाना पड़ता है, उन्हें ब्रह्म का मूर्तिमान प्रकाश मान कर चलना पड़ता है। इतने पर भी अंतिम लक्ष्य वह सर्वव्यापी तेजोमय ब्रह्म की उपलब्धि ही होती है। बालक जब छोटा होता है, तो उसे लकड़ी की तिपहिये गाड़ी से चलना सिखाया जाता है।
साधना विशेषाँक” के रूप में प्रकाशित हो रहा है। परम पूज्य गुरुदेव की तृतीय पुण्यतिथि गायत्री जयंती 30 मई 1993 पर प्रकाशित जून का यह अंक सूर्य-सविता-सावित्री के विभिन्न नवयुग की गायत्री-सावित्री साधना के कई रहस्यों का उद्घाटन करने वाला होगा। इसका मूल्य अन्य अंकों के समान ही होगा। अधिक से अधिक व्यक्तियों को इससे लाभान्वित कराने का परिजन प्रयास करें।
साधना में तल्लीन हो गई।
साधना-गायत्री आराधना उसी अनुपात में सफल मानी जाती है।
साधना के लिए आश्रम में आए थे,एक-एक कर महर्षि के चरणों में शीश झुकाते जा रहे थे और शिखिध्वज देख रहा था, इस अनुशासन में शाँति-संतोष आनन्द का भाव छलक रहा है। आज उसे अपनी दीनता पर बड़ा पश्चाताप हो रहा था।
साधना कर रहे थे। कुछ ही दिनों में उनकी प्रकृति में विलक्षण परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे। बंदरों की तरह उछलना-कूदना, पेड़ पर चढ़ना-सब कुछ में कपिवृत्ति का विचित्र समावेश था। इतना ही नहीं, बंदरों की भाँति उनके पूँछ भी निकलने लगी। सभी हैरान थे, पर साधना की समाप्ति के साथ कुछ ही दिनों में वे अस्वाभाविक लक्षण स्वतः तिरोहित हो गये।
साधना का पुनः अभ्यास करूं, फिर से अग्नि दीक्षा की पात्रता उपलब्ध करूं।’
साधना करनी चाहिए।
साधना में और अन्तःकरण उपासना में लगा दिया है। यह है चमत्कारों के स्रोत। आप इसको सुनना, नोट करके रखना और जहाँ तक संभव हो सके वहाँ तक चलना। भागना नहीं आता दौड़ना नहीं आता तो छोटे बच्चे की तरीके से दीवाल पकड़ कर गाड़ी के सहारे चलना सीखिये-एक कदम आगे बढ़िये। लोभ, मोह की हथकड़ी और बेड़ी को-जिसने आपको मजबूती से जकड़ रखा है-छोड़िये-थोड़ा ढीला करिये फिर देखिये आपको आगे बढ़ने का मौका मिलता है कि नहीं श्रेष्ठता की दिशा में, शालीनता की दृष्टि में, महानता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाइये।
साधना इसी को कहते हैं।
साधना भगवान की नहीं अपनी होती है। भगवान पर क्या चंदन चढ़ायेंगे, चावल चढ़ायेंगे, स्नान करायेंगे? भगवान पर रहम कीजिए। पहले अपनी गंदगी धोइये, अपने को स्नान कराइये। अपना तो कराते नहीं हैं स्नान-भगवान को और करायेंगे।
साधना विज्ञान में इसी बात को ध्यान में रख कर जड़ के सहारे चेतन की ओर, व्यक्त के सहारे अव्यक्त की ओर निरन्तर बढ़ते चलने का प्रावधान है। हम दृश्य जगत में उगने वाले सूर्य का ध्यान तो करें, पर उसके पीछे उसकी चेतना को-ब्रह्मवर्चस को सविता को ग्रहण-धारण करने का ही प्रयास लक्ष्य मानें। स्थूल में न अटकें वरन् उसकी सूक्ष्म सत्ता तक पहुँचने का प्रयास करें-सूर्योपासना का यही तत्वदर्शन है। जो इसे समझ कर सविता के भर्ग को जितने अंशों में आत्मसात् करता हैं, उसकी सूर्योपासना-सविता साधना-गायत्री आराधना उसी अनुपात में सफल मानी जाती है।
साधना के लिए तुम्हें अग्नि दीक्षा भी देंगे।’ यह कहते हुए महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए। शिखिध्वज ने गुरुचरणों में प्रणिपात किया, महर्षि ने आशीर्वाद दिया और दोनों अपने-अपने पर्णकुटीरों की ओर चले गये।
साधना बेकार गई, इसका मुझे हार्दिक दुःख है। अब आशीर्वाद दें कि इसी साधना का पुनः अभ्यास करूं, फिर से अग्नि दीक्षा की पात्रता उपलब्ध करूं।’
साधना-क्षेत्र के साधकों को वर्षों नहीं, जन्मों तक इंतजार करना पड़ता है।
साधना नहीं होती। कोई भगवान की साधना कैसे कर सकता है? साधना सिर्फ अपने आपे की करनी पड़ती है। अपने आपे की साधना कर लेने और पात्रता विकसित कर लेने के बाद में दैवी शक्तियों का अनुदान अनायास ही बिना माँगे मिलता हुआ चला जाता है।’ मेरे गुरु ने जिस दिन दीक्षा दी उसी दिन मुझे वास्तविकता समझा दी और कहा-कि सारे का सारा ध्यान अपने ऊपर केन्द्रित कर लीजिये मैंने अपने ऊपर केन्द्रित रखा और यही कहता रहा-आदर्शों को, सिद्धान्तों को भगवान कहते हैं, उत्कृष्टता को भगवान कहते हैं और उसी की आराधना के लिए, उसी की उपासना के लिए अपने हर एक साँस को, हर एक चप्पे को, योग्यता के हर एक कण को मैंने नियोजित कर दिया।
साधनारत थे, तो माधव लाल नामक एक व्यक्ति अपनी व्यथा-कथा लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुआ और असाध्य लम्बी बीमारी का उल्लेख कर फूट-फूट कर रो पड़ा। योगिराज का मन करुणा से विगलित हो गया। उन्होंने कुछ क्षण रुक कर बगल के पौधे से एक पत्ती तोड़ी। हाथ हवा में लहराया और उसे खा लेने के लिए माधव लाल को दे दिया। माधव लाल यही समझ रहा था, कि वह पत्ती ही होगी, पर जब हाथ में लिया, तो उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ।
साधना का अंतिम चरण आज से पूरा हो रहा है। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि अब मैं उच्चस्तरीय साधनाओं में प्रवेश कर सिद्धियाँ प्राप्त करूं। पंचकोशों का अनावरण करते हुए आनन्दमय भूमिका में पहुंचूं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-July
साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
साधना शुरू की थी तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गये थे। तप ओर पूजा-उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था। तब वे बहुत मेधावी थे लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गये। भस्मासुर का क्या हो गया? मारीचि का क्या हो गया?
साधनाएँ भी की थीं। यही कारण था कि जब सन् 30 में 30 वर्ष की आयु में वे वापस यरुशलेम पहुँचे तो भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों से संपन्न महामान बनकर पहुँचे। उनकी इस क्षमता से प्रभावित होकर लोगों की भारी भीड़ सदैव उन्हें घेरे रहती थी। अपने मिशन का प्रचार करते हुए तीन वर्ष से कुछ अधिक ही दिन बीते थे कि विरोधियों ने उन पर ईश निन्दा का अभियोग लगाकर सूली पर चढ़ा दिया और घोषणा कर दी गयी कि ईसा की मृत्यु हो गयी।
साधना कर सकता है। यह विशेषतायें, यह श्रेष्ठ उपलब्धियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मनुष्य-जीवन प्राप्त हो जाना कोई साधारण बात नहीं है।
साधना में बिताये थे, वरन् सूली पर चढ़ाये जाने के बाद पुनर्जीवित होकर दूसरी बार भारत आ गये थे और कश्मीर में रहने लगे थे। वृद्धावस्था में यहीं पर उनका स्वर्गवास हुआ था उनके अनुसार स्वयं मूसा भी कभी काश्मीर आयें थे।
साधनाएँ संपन्न करते थे।
साधना के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, अध्यात्म के क्षेत्र में कदम बढ़ाया, उस दिन से लेकर आज तक हमारी निष्ठा ज्यों की त्यों बनी हुई है। इसमें कही एक राई-रत्ती, सुई के नोंक के बराबर फर्क नहीं आयेगा। जिस दिन तक हमारी लाश उठेगी उस दिन तक आप कभी यह नहीं सुनेंगे कि इन्होंने अपनी श्रद्धा डगमगा दी। इन्होंने अपने विश्वास में कमी कर दी।
साधना में विश्वास था, सो वे एक विम चुपचाप रात्रि में उठ कर वन चले गये। रानी ने योगबल से जान लिया, सो राजकाज स्वयं चलाने लगी। राजा को कुछ काल के लिए प्रवास जाने की बात कह दी।
साधनाओं द्वारा जाग्रत किया। फलस्वरूप उनकी पकड़ने की शक्ति इतनी बलवान हो गई कि जिस प्रकार (खाली) अपनी लम्बी गर्दन पानी में डुबोकर चाहे जहाँ से मछली पकड़ लेती है, उसी प्रकार वे आकाश क्षेत्र में से नाना प्रकार की वस्तुएँ सामर्थ्य तथा शक्तियां पकड़ लेते थे।
साधना के बीज अंकुरित हो उठे हैं। यदि उसे तप करने का अवसर मिले तो वह बीज बढ़कर वृक्ष का रूप ले सकते हैं। यह दंड-जान-बूझकर इसी उद्देश्य आत्म प्रतिभा का विकास कराना ही होता था।
साधना-उपासना का अभ्यास किया था, अष्टाँग योग की गम्भीरताओं में निमग्न हुए थे। पर लोकोपकार और आत्मतत्व की शोध में निरंतर व्यस्त रहने के कारण लौकिक संपत्ति न जुटा पाए थे। इसी कारण लोपामुद्रा की आकाँक्षा को पूरा करना उनके लिए चिन्ता का ही विषय था।
साधना में निरत होते थे। जो पत्रियाँ साथ रहना चाहतीं थी वे पति के साथ उसी प्रयोजन में निरत होती थी। जो अपने को असमर्थ पाती थीं वे परिवार को सँभालने और पड़ोस को यथा संभव अपनी उपस्थिति का लाभ देती थी।
साधना करने का साहस व्यक्त कर सकता है, सन्त और ऋषि बनने का अधिकारी भी वहीं बन सकता है। उत्तराधिकार में पाया हुआ धन और बिना परिश्रम हुआ सम्मान व्यक्ति के अहंकार को बढ़ाकर उसके पतन का ही कारण बनता है। इसलिए दूरदर्शी ऋषि भला ऐसी झूठी सिद्धि और सम्मान को क्यों महत्व देते? कवष ने नेकी का मार्ग अपनाया था। उसके लिए सराहा जाना अपनाया था।
साधना काल की ऊँची-नीची, टेड़ी-तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें, वस्तुतः वही उसके पात्र होते हैं। ऐसे आत्मबल संपन्न व्यक्तियों पर ही समाज का भविष्य निर्भर है आत्मतत्व के खोजी वर्चस् संपन्न व्यक्तियों पर ही समाज का भविष्य निर्भर है आत्मतत्व के खोजी वर्चस् संपन्न व्यक्ति अगले दिनों और अधिक संख्या में पैदा हों, ऐसी नियति की इच्छा है कोई कारण नहीं कि महाकाल की यह इच्छा पूरी न हो।
साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि नवनिधि सरीखी लोकोत्तर शक्तियाँ उपलब्ध रहती थी। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।
साधना कर पाता था जितनी कि शासन तंत्र से भी नहीं बन पड़ती। शासन प्रायः अवाँछनीयताओं से निपटता रहता था, प्रगति के लिए आवश्यक साधन-सुविधाएँ भी जुटाता है किन्तु उस सब से भी अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है व्यक्ति की शालीनता और दक्षता का। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में सुसंस्कारिता के समावेश का। इसके बिना समुचित साधन उपलब्ध कर लेने पर भी सार्वजनिक शान्ति और प्रगति का सुयोग बन नहीं पड़ता। धर्मतंत्र इसी महती आवश्यकताओं की पूर्ति करता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-January
साधना में अग्नि की समीपता और सहायता से अनेकों उपासनात्मक उपचार होते है। अग्निपूजा ही यज्ञ का प्रधान विषय है। न्यायदर्शन 4/1/62, मनुस्मृति-1-22, सिद्धाँत शिरोमणि (गणिताध्याय), गोपथ ब्राह्मण (1/4/24), गीता (4/22), ऋग्वेद (1/1/1), अनेकानेक आप्त वचनों में उपासनात्मक एवं अध्यात्म प्रयोजनों में अग्नि को प्रमुख माध्यम माना गया हैं। उसके प्रकटीकरण एवं क्रियान्वयन की पद्धति को अग्निहोत्र कहते हैं। भौतिक अग्नि में जब तक मनुष्य का परिचय नहीं था, तब की पिछड़ेपन और आज उस महाशक्ति के सहारे संभव हुई प्रगति वाली स्थिति की तुलना करते हैं तो दोनों के मध्य जमीन-आसमान जैसा अंतर दिखायी पड़ता है।
साधना के अतिरिक्त श्रम, मनोयोग, नियमितता एवं अविचल धैर्य आदि की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही अनुभवी मार्गदर्शक के बिना भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ती।
साधना क्षेत्र में प्रगति की ओर अग्रसर होने लगता है।
साधना।
साधना में बिताया।
साधना कर सकते हैं। यों तो स्नान और वस्त्र शुद्धि की प्रशंसा ही की जायगी। पर हाथ-पैर और मुँह धोकर, पसीने वाले वस्त्र बदलकर भी उपासना हो सकती है। यहाँ तक कि रास्ता चलते, शारीरिक श्रम करते समय भी मंत्र जप चलता रह सकता है। ऐसी स्थिति में मुँह बन्द कर, मन ही मन मानसिक जप करने का विधान है।
साधना है। बिखराव को, चंचलता को, उद्दण्डता को केन्द्रीभूत करना और मर्यादा के बंधनों में अपने को बाँध लेना ही साधना है।
साधना है।
साधनाओं में तो कभी रणभूमि में। अवन्तिका की सेना उनके बिना सूनी थी। सम्राट विक्रमादित्य उनके बिना स्वयं को विवश महसूस करने लगे। प्रश्न कूटनीतिक चक्रव्यूह का हो, या सेना की व्यूह रचना का-उनकी बुद्धि चुटकी बजाते ढेरों समाधान प्रस्तुत कर देती। उनकी कोप-चण्डी शत्रु शिविरों को ऐसे सूना कर देती थी, जैसे तेज तूफान में कटी हुई फसलें उड़ जाती हैं।
साधना कहते है। तप का अर्थ है तपाना-गरम करना। संचित कुसंस्कारों और आदतों से लड़ पड़ना और उन्हें अनगढ़ धातु को गलाकर उपयोगी उपकरण के रूप में ढाल लेना। सुसंस्कृत कोयला ही हीरा बनता है। तपाने से कच्ची मिट्टी के बर्तन बनते हैं और पानी को उबालने की शक्तिशाली, भाप बनती है।
साधना का आधा व्यवधान दूर हो जाता है। शेष आधा त दूर होता जब उनमें रस आने लगता है।
साधना क्रम में भी सूर्य पर त्राटक करने या स्वर्णिम सविता का ध्यान करने से साधक को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, जिसके द्वारा वह किसी को भी देखकर उसका प्राकृत स्वरूप और समस्त घटनाओं को जान लेता है। दूरस्थ वस्तुओं, घटनाक्रमों एवं प्रकृति के गर्भ में चल रही सूक्ष्म हलचलों की जानकारी वह प्राप्त कर सकता है। सविता देवता की उपासना से अभीष्ट की पूर्ति होती है। शास्त्रों में इसके अनेकों प्रमाण मिलते हैं। भगवान राम द्वारा रावण पर विजय एवं साम्ब का कुष्ठ रोग से मुक्त होना सूर्योपासना की इतिहास प्रसिद्ध घटनायें हैं।
साधना अपनी और आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृतकृत्य बनता है।
साधना करने के बाद उनकी स्थिति इतनी उच्च हो गई थी कि आसन पर बैठे-बैठे ही वे एक सर्वथा पृथक दिव्य लोक में पहुँच जाते। ज्ञातव्य है कि इस मध्य वे पूर्णतः चैतन्य रहते। उन्हें आसन के स्पर्श की प्रतीत भी सदा बनी रहती, किन्तु फिर भी न तो वह उनका अपना कमरा होता, न भौतिक जगत। आँखों से जो कुछ दिखाई पड़ता, वह इतना दिव्य और अलौकिक होता, कि उसकी कल्पना पंचभौतिक जगत में की ही नहीं जा सकती। कई बार वे वहाँ पूर्ण चेतना की स्थिति में चलते-फिरते भी और उसकी अलौकिकता के बारे में साथ-साथ सोचते भी।
साधना करने वाले और रात-दिन एक करके वहाँ की व्यवस्थाएँ संभालने वाले कर्मवीर अश्वमेध के अविस्मरणीय अध्याय हैं। वे भुलाये नहीं भूलते। जब भी चर्चा होती है, वंदनीया माता जी गदगद अन्तःकरण से नींव के उन सुदृढ़ आधार स्तम्भों को ही याद करती है, जिन्होंने ज्ञान यज्ञ के अग्रिम मोर्चे संभाले और अज्ञानान्धकार से जूझते जनमानस के लिए सच्चे अर्थों में प्रकाश स्तम्भ बने।
साधना के ढाँचे में ढाल सकें।
साधना के अनेक प्रयोग सूर्य से संबंधित हैं। उनकी मान्यता है कि सूर्य सान्निध्य से उनकी आतापना लेने से शरीर में बल और कान्ति की ओजस और तेजस की अभिवृद्धि होती है। प्राण-प्रखरता बढ़ती है। ‘तेजस् लब्धि’ के लिए जैन शास्त्रों में 6 महीने तक सूर्य की ओर मुख करके तप करने-आतप लेने का विधान है। कर्मक्षय एवं आभामंडल के विकास के लिए भी सूर्य मंडल या उसकी प्रकाश रश्मियों का ध्यान किया जाता है।
साधना अथवा वैचारिक साधना के अभ्यासी होते हैं, विकृत एवं विघटनकारी चिंतन के दुष्परिणामों को भलीभाँति समझने और उत्कृष्ट चिंतन की रीति-नीति अपनाकर कष्ट कठिनाइयों से छुटकारा पाने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः मनुष्य की संरचना समन्वयवादी एवं मानवतावादी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर परमात्मा ने की है। इस तरह की विचारणा को मनीषियों ने कल्पवृक्ष की उपमा दी है जो व्यक्ति की हर आवश्यकता को पूरी करने की क्षमता रखती और उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए अभिप्रेरित करती है।
साधना करनी चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनानी चाहिए। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करना चाहिए तथा जो समय, धन, श्रम, चिंतन आदि की बचत हो सके, उस कटौती को विश्व के कल्याण के - लोक मंगल के कार्यों में निमित्त लगाना चाहिए। इसी को पुण्य, इसी को परमार्थ, इसी को आराधना कहते हैं। पात्रता विकसित करने का यह तीसरा व अंतिम अवलम्बन है।
साधना रही है, जिसके लिए वह स्वयं को तिल-तिल तपाते-गलाते रहे, जिसके लिए उन्होंने अपनी समस्त साधना-क्षमताओं की आहुति दी और जिसके लिए वह आज भी सूक्ष्म जगत में सतत् सक्रिय हैं-उसकी आधार भूमि समता ही है। ऊँच-नीच की खाइयाँ-खड्ड जब तक है दुनिया में अशाँति ही रहेगी। अज्ञान और अन्याय का सम्मिश्रित स्वरूप असमानता के रूप में प्रकट होता है। इस दो जीभ वाली विश्व विभीषिका को आस्तीन में छिपी सर्पिणी की तरह साथ रखकर हम चैन से नहीं बैठ सकते।
साधना में सफल होकर रहने वाला समझना चाहिए।
साधना-क्षमताओं की आहुति दी और जिसके लिए वह आज भी सूक्ष्म जगत में सतत् सक्रिय हैं-उसकी आधार भूमि समता ही है। ऊँच-नीच की खाइयाँ-खड्ड जब तक है दुनिया में अशाँति ही रहेगी। अज्ञान और अन्याय का सम्मिश्रित स्वरूप असमानता के रूप में प्रकट होता है। इस दो जीभ वाली विश्व विभीषिका को आस्तीन में छिपी सर्पिणी की तरह साथ रखकर हम चैन से नहीं बैठ सकते।
साधनारत एवं तपस्वी कहा जा सकता है। इसमें अपने धन, समय, विचार, और लपकते मन पर नियंत्रण प्राप्त करना पड़ता है। जो यह कर सका उसे आत्मकल्याण की साधना में सफल होकर रहने वाला समझना चाहिए।
साधना अर्थात् अपने अंतरंग और बहिरंग जीवन को पवित्र, प्रखर एवं प्रमाणित बना लेना। मनुष्य वस्तुतः एक प्रकार का पशु है। जन्म जन्माँतरों से उसके संचित संस्कार इस जन्म में भी चिपके रहते है और हमारे अधिकाँश आचरण नर पशुओं जैसे होते है। अनगढ़ उच्छृंखल, असभ्य और मानवीय गरिमा की दृष्टि से गये बीते। इन्हें सुधारना और सुसंस्कृत बनाने का संकल्प-पूर्वक कठोर प्रयास करना, यही अपने को साधना है।
साधना में प्रवृत्त करते हैं, ज्ञान-रथ, झोला-पुस्तकालय चलाते हैं, पत्रिकाओं के सदस्य बनाते हैं। देवासुर संग्राम में देवत्व के लिए लड़ने वाले, उसे विजयी बनाने वाले कर्मवीर योद्धा वस्तुतः यही लोग हैं जिनको भुला देना इतिहास की सबसे बड़ी भूल होगी।
साधना में भी यही किया जाता है। संचित कुसंस्कारों से पिण्ड छुड़ाये बिना अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति संभव नहीं।
साधनाएँ, तपश्चर्यायें, विशिष्ट- प्रयोग सम्पन्न होते रहे हैं-सम्पन्न हो रहे हैं। जहाँ तक भूमि का प्रश्न है, इन स्थानों पर तुम और तुम्हारे अनेक साथी आते-जाते रहते हैं, किंतु उसके निवासी जब तक स्वयं न चाहे, उन्हें तुम देख नहीं सकते।”
साधना के अभ्यासी होते हैं, विकृत एवं विघटनकारी चिंतन के दुष्परिणामों को भलीभाँति समझने और उत्कृष्ट चिंतन की रीति-नीति अपनाकर कष्ट कठिनाइयों से छुटकारा पाने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः मनुष्य की संरचना समन्वयवादी एवं मानवतावादी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर परमात्मा ने की है। इस तरह की विचारणा को मनीषियों ने कल्पवृक्ष की उपमा दी है जो व्यक्ति की हर आवश्यकता को पूरी करने की क्षमता रखती और उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए अभिप्रेरित करती है।
साधना, स्वाध्याय,संयम,सेवा के उपाय-उपचारों द्वारा सद्विचारों का आरोपण सहज संभव हो जाता है। प्रखर, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण इसी आधार पर संभव हो सकेगा।
साधना और आराधना कहते हैं। उपासना ईश्वर की, साधना अपनी और आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृतकृत्य बनता है।
साधना किसे कहते हैं? आदतें एक, मान्यताएँ दो और आकाँक्षाएँ तीन -इन तीनों को उच्चस्तरीय बनाना पड़ेगा। यही साधना है। जरा ऊंचे स्तर पर उठ के तो देखिए। जिस जमीन पर आए रहते हैं, वहाँ पर चलना बहुत मुश्किल है।
साधना क्षेत्र की प्राण ऊर्जा कहा जा सकता है। तीसरी शुचि है जिसकी समर्थता और व्यापकता अत्यधिक है। उसके सहारे अदृश्य जगत के प्रवाह को निकृष्टता की विभीषिका उत्पन्न करने से रोका जा सकता है और सुखद संभावनाओं से भरा-पूरा सतयुग की स्थापना में योगदान लिया जा सकता है। इस प्रकार संक्षेप में अग्नि के तीन क्षेत्र ऊर्जा, प्रखरता एवं विश्व नियामक शक्तियों के रूप में जाना जा सकता है। यज्ञाग्नि का स्वरूप ऐसा बनाया जाता है कि उसके द्वारा पवमान और शुचि की भूमिका सम्पन्न की जा सके।
साधनायें कर सकते है, पर होना चाहिए उन सब में समर्पण भाव की प्रधानता। भिक्षुक या दरिद्र बनकर हम परमात्मा के दरबार में सम्मान नहीं प्राप्त कर सकते। कुछ छुट-पुट अनुग्रह पाकर खाली हाथ न आने का मिथ्या संतोष भर भले ही प्राप्त कर सकें।उपासना भले ही थोड़ी हो पर नियत, समय पूर्वक, नियम पूर्वक और भाव भरी होनी चाहिए। वह हमारी आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने में बहुत हद तक सफल रहेगी।
साधनाओं का अवलम्बन इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है, शिक्षा का अर्थ भौतिक जानकारी देने वाली स्कूली पढ़ाई तक सीमित हो गया है। उसके द्वारा बहुज्ञता,कुशलता एवं अधिक उपार्जन क्षमता के लाभ तो मिल सकते हैं किंतु उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का निर्माण विचार परिष्कार से ही संभव है। चिंतन की उत्कृष्टता जहाँ होगी वहाँ जीवन में स्नेह-सौजन्य का सौमनस्य का बाहुल्य मिलेगा। इसी प्रकार संपर्क क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग-सद्भाव उमड़ रहा होगा।
साधना ग्रन्थ में भी ऐसी कुछ योगियों का जिक्र किया गया है, जिनमें शून्य में उठने और भ्रमण करने की सामर्थ्य थी। इनमें भास्कर राय, राम ठाकुर, समुज्ज्वल आचार्य, शिशिर प्रभृति संत विशेष उल्लेखनीय है।
साधना करते हैं औरों को साधना में प्रवृत्त करते हैं, ज्ञान-रथ, झोला-पुस्तकालय चलाते हैं, पत्रिकाओं के सदस्य बनाते हैं। देवासुर संग्राम में देवत्व के लिए लड़ने वाले, उसे विजयी बनाने वाले कर्मवीर योद्धा वस्तुतः यही लोग हैं जिनको भुला देना इतिहास की सबसे बड़ी भूल होगी।
साधनात्मक अनुभूतियों का रसामृत। इसका श्रद्धाभाव से अवगाहन उपासकों की समस्त शंकाओं को निर्मूल करता रहेगा। इसके अतिरिक्त अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में प्रकाशित उनकी विचार चेतना की रश्मियाँ-हृदयगत संशय,अन्धकार को दूर भागने के लिए सर्व-समर्थ हैं। फिर भी जिनके मन में शंका उठे, वह शान्ति-कुंज से निःसंकोच पत्र-व्यवहार करके मार्गदर्शन प्राप्त करते रह सकते हैं।
साधना” के शब्दों में कहें तो=“जब तक मनुष्य लेने की लिप्सा में डूबा रहता है-उसे अपने चारों ओर अभाव और दारिद्रय ही घिरा दीखता है। पर जब वह अपनी मनोदशा देने में रस लेने वाली बना लेता है तो धन न रहते हुए भी शारीरिक, मानसिक सम्पदाएँ इतनी बहुमूल्य दीखने लगती हैं, जिनके आधार पर लोक मंगल के लिए बहुत कुछ किया जा सकना सम्भव हो सके। “
साधना है। जरा ऊंचे स्तर पर उठ के तो देखिए। जिस जमीन पर आए रहते हैं, वहाँ पर चलना बहुत मुश्किल है। एक घंटे में आप तीन मील चलेंगे; लेकिन जरा ऊँचे तो उठिए, फिर आप देखिए एक घंटे में छः मील की रफ्तार से जाते हैं। बोइंग जहाज छः सौ मील की रफ्तार से चलते हैं, जरा उठिए।
साधना किसे कहते हो? अपने घटियापन को दूर कराने के लिए जद्दोजहद करना, लड़ाई करना। तपश्चर्या इसी का नाम है। उपासना इसी का नाम है। अनुष्ठन इसी का नाम है।
साधना से कुछ ही समय में शुभ विचारों से एकात्मक अनुभूति जुड़ जाएगी। उनके चिन्तन-मनन की निरन्तरता के फलस्वरूप वे माँगलिक विचार संस्कार बन-बन कर संचित होने लगेंगे जिनका प्रकाश चरित्र की असंख्य रश्मियाँ बनकर फूट निकलेगा। इनके प्रकाश में हमारा अपना भविष्य उज्ज्वल, उदीयमान, उत्कृष्ट बन सकेगा।
साधना” में किया है। इसमें वे अपने एक गुरु भाई की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि कई वर्षों तक साधना करने के बाद उनकी स्थिति इतनी उच्च हो गई थी कि आसन पर बैठे-बैठे ही वे एक सर्वथा पृथक दिव्य लोक में पहुँच जाते। ज्ञातव्य है कि इस मध्य वे पूर्णतः चैतन्य रहते। उन्हें आसन के स्पर्श की प्रतीत भी सदा बनी रहती, किन्तु फिर भी न तो वह उनका अपना कमरा होता, न भौतिक जगत। आँखों से जो कुछ दिखाई पड़ता, वह इतना दिव्य और अलौकिक होता, कि उसकी कल्पना पंचभौतिक जगत में की ही नहीं जा सकती।
साधना स्वयं के लिए और भगवान को प्रभावित करने के लिए अंतिम चरण रह जाता है-आराधना। आराधना का अर्थ है- लोक सेवा, जनहित, जनकल्याण, समाजसेवा। अपने समय में से, अपने श्रम में से, अपनी मेहनत में से और पैसों में से भगवान का काम कीजिए। भगवान का क्या काम है? भगवान का एक काम है-उसकी दुनिया को सुसंस्कृत और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति को बढ़ाना।
साधना का है। साधना अर्थात् अपने अंतरंग और बहिरंग जीवन को पवित्र, प्रखर एवं प्रमाणित बना लेना। मनुष्य वस्तुतः एक प्रकार का पशु है। जन्म जन्माँतरों से उसके संचित संस्कार इस जन्म में भी चिपके रहते है और हमारे अधिकाँश आचरण नर पशुओं जैसे होते है। अनगढ़ उच्छृंखल, असभ्य और मानवीय गरिमा की दृष्टि से गये बीते।
साधना और तपश्चर्या करने के कारण निषाद कुल में जन्में बटुक काँदीवर को महर्षि अंगिरस ने क्षत्रियत्व प्रदान कर राज्य की सेना में प्रवेश का अधिकार दे दिया जबकि राजकुमार युयुत्स को उन्होंने असंयमी ठहराकर एक वर्ष के लिए क्षत्रियत्व का अधिकार छीन लिया। उन्होंने बताया -”राजकुमार ने अनेक महिलाओं का शीलभंग का उन्हें व्यभिचारिणी बनाया है। उन्हें एक वर्ष तक नंगे पाँव, उघारे बदन, राज्य की गौयें चरानी चाहिए और दुग्ध कल्प करके स्वयं को शुद्ध करना चाहिए। जब तक वे यह प्रायश्चित नहीं सम्पन्न करने कर लेते, उन्हें राजकुमार के सम्मानित सम्बोधन से भी वंचित रखा जायेगा। राज्य के सभी नागरिक उन्हें सिर्फ युयुत्स का सम्बोधन देंगे।
साधना, आराधना के उपरोक्त तीन माध्यमों को अपनाकर हम अपनी पात्रता को इस स्तर तक विस्तृत कर सकते हैं जिसमें देवताओं के अनुग्रह आकाश से होने वाली पुष्प-वर्षा की तरह हम पर बरसें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-June
साधना प्रक्रिया को अपनाकर उसे मधुमक्खी की तरह संचित करके अपना श्रेय और दूसरों का सुख बढ़ाया जा सकता है। आत्म विद्या के अनुसार सूर्य चक्र प्राण सत्ता का साहसिक पराक्रमशीलता का एवं प्रतिभा का केन्द्र बिंदु माना गया है। इस स्थान की ध्यान साधना करते हुए इस प्राण शक्ति को निग्रहित और दिशा को सुनियोजित किया जाता है। फलतः उसके सत्परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं।
साधना से इस विज्ञान को प्रत्यक्ष किया जाता है। गायत्री महामंत्र सूर्य की रहस्यमयी प्राण विद्या ही है। जिसके द्वारा प्राण को जगाया और उसके रहस्यों को अनुभव किया जाता है। जिसने अपने प्राण को जगा लिया उसके लिए चारों ओर जाग्रति ही जाग्रति है। सब दिशाओं में प्रकाश ही प्रकाश है।
साधना की उच्चतम स्थिति में समाधि की अवस्था में जहाँ परमतत्व में एकात्म होता है, उस समय इन ग्रंथों से प्रत्यक्ष प्रयोजन नहीं रहता। यद्यपि चेतना के उत्कर्ष का आधार उनके स्वाध्याय से ही विनिर्मित होता है। साधना की प्रक्रिया के निर्देशक ग्रंथों का एवं मार्गदर्शक सद्गुरु की आवश्यकता तो पग-पग पर पड़ती है। किंतु सविता संपर्क की प्रत्यानुभूति के क्षणों में आत्मसत्ता ही वेद और गुरु बन जाती है।
साधना में क्रिया -कृत्यों की तुलना में भावना एवं संकल्प का महत्व अधिक है। साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचे हुए को मेरुदंड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़तापूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अंतरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त प्राणाग्नि कुण्डलिनी ज्वाला को अपने प्रचंड आघातों से जगा रहा है। प्रहार के उपराँत प्राण को सूर्यनाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने के उपराँत प्राण को सूर्यनाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता द्वारा प्रकाशित, आलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
साधना अनेकों रहस्य प्रकट करने लगी। आखिर एक दिन परम रहस्य प्रकट हुआ। चारों दिशाओं में खबर फैल गयी-विश्वरथ ने गायत्री महाविद्या की खोज की है। वह दस्युओं को भी आर्य बनायेंगे। स्वरों ने सक्रियता धारण की, दस्युनेता शम्बर की कन्या उमा के साथ अनगिनत दस्यु आर्य बनने लगे।
साधना की प्रगाढ़ता में स्वयं होने लगता है। उसे अनुभव होने लगता है कि सविता का अन्तःक्षेत्र में अवतरण अपना प्रभाव चमत्कार दिखा रहा है। तीनों शरीरों और उनमें सन्निहित अनेक घटकों में सूर्य शक्ति का अभिनय संचार हो रहा है। सौर चेतना साधक को सर्वतोमुखी अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त कर रही है।
साधना विज्ञान का इतना एवं समग्र दर्शन नहीं मिलता। भाव संवेदनाओं की पराकाष्ठा का दर्शन यदि कहीं करना हो तो गायत्री महामंत्र में किया जा सकता है। इसके गंभीर प्रयोग न केवल साधक और सूर्य के भावनात्मक आदान-प्रदान के सिलसिले को आरंभ करते हैं बल्कि ऐसी सामर्थ्य प्रदान करते हैं जिससे समूचे विश्व में भाव-प्रवाह को आन्दोलित किया जा सके। गायत्री मंत्र सविता देव से स्वयं को एकात्म करने की गुह्य तकनीक है। सविता शब्द “षड् प्राणिगर्भ विमोचनेयाष प्रेरणो” धातुओं से बना है।
साधना निश्चित रूप से भगवान भुवन-भास्कर की अनुकम्पाओं की निमित्त कारण बनेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
साधना से सूर्यचक्र एवं अनाहत चक्र में एक सुनियोजित सीधा संबंध स्थापित होकर साधक की सर्वतोमुखी उन्नति में जो स्वैच्छिक सहयोग मिलता है वह शीघ्र ही लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त कर देता है। साधना के प्रति उपेक्षा नाभि स्थित सूर्य के अमृत तत्व को पतनोन्मुख कर देती है। इसे फुलझड़ी की तरह जलाकर तनिक-सा विनोद भी खरीदा जा सकता है। जबकि साधना प्रक्रिया को अपनाकर उसे मधुमक्खी की तरह संचित करके अपना श्रेय और दूसरों का सुख बढ़ाया जा सकता है। आत्म विद्या के अनुसार सूर्य चक्र प्राण सत्ता का साहसिक पराक्रमशीलता का एवं प्रतिभा का केन्द्र बिंदु माना गया है।
साधना प्रणालियों से जगाया जा सके तो अपनी प्रखर आकर्षक क्षमता के सहारे वह इतना कुछ अनुदान उपहार दे सकने में समर्थ हो सकता है जो स्थूल पदार्थों की तुलना में हजारों गुना अधिक उपयोगी है।
साधना द्वारा दृढ़ संकल्पपूर्वक चेतना का प्राण के साथ संयोग हो जाने पर साधक के मन व मस्तिष्क में चुम्बकीय विद्युत तरंगों का निर्बाध प्रवाह जारी हो जाता है। जो साधक के आस-पास एवं उससे संबंधित वातावरण को प्रभावोत्पादक बनाने में समर्थ होता है।
साधना का प्रयोग उनने बाह्य प्रकृति के परिशोधन के निमित्त किया व अभी भी सूक्ष्म कारण सत्ता से वही कर रहे हैं। सूर्य सम बन की कोई अवतारी स्तर की सत्ता युग परिवर्तन जैसा भागीरथी कार्य संपन्न कर सकती है। इससे कम में तो बात बन ही नहीं सकती। गायत्री व सूर्य हमारी संस्कृति के प्राण है। जब तक भारतवर्ष के देवमानव भगवान भास्कर की गायत्री मंत्र के माध्यम से उपासना करते रहें, तब तक भारत ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी, स्वस्थ-प्रसन्न एवं सर्वांगपूर्ण प्रगति के पथ पर अग्रगामी रहा।
साधना द्वारा सिद्धि तो इतनी प्राप्त करली थी कि जिसे जो देते बाँटते-वह तुरंत फल जाता। जब उन्हीं सज्जन ने हम से इच्छा व्यक्त की कि अब हमें गुरुदेव से दीक्षा दिलवा दो नहीं तो हम जन्म-जन्मान्तरों तक भटकते रहेंगे, बड़ा आश्चर्य हुआ।
साधना विज्ञान के मर्मज्ञ जानते हैं कि यह उपत्यिकाएँ शरीर में अन्नमयकोश की बंधन ग्रन्थियाँ हैं। मृत्यु होते ही सब बंधन खुल जाते है। और फिर एक भी गुच्छक दिखाई नहीं देता। यह उपत्यिकाएं अन्नमय कोष के गुण-दोषों की प्रतीत हैं। “इन्धिका” जाति की उपत्काएँ चंचलता, अस्थिर, उद्विग्नता की प्रतीक है।
साधना विज्ञान के आचार्य करते है।
साधनात्मक दृष्टि से भी गंभीर महत्व है। अगस्त्य संहिता में का है-
साधना व्यक्तित्व के अलौकिक क्षमताओं, सामर्थ्यों को विकसित करने वाली होती है।
साधना कक्ष में पद्मासन में कमर सीधी स्थिति में बैठकर दस से बीस बार गहरी-गहरी श्वास लें अथवा तीन से पाँच मिनट तक नाड़ी शोधन प्राणायाम करें। इससे प्राण का सुषुम्ना नाड़ी में संचार प्रारंभ हो जाता है। इसके पश्चात रीढ़ की हड्डी को बिलकुल सीधा रखते हुए अजपा गायत्री (सोऽहम्) का श्वास के साथ पाँच मिनट तक मौन जप करना चाहिए। बाद में अपनी नाभि के पीछे मेरुदण्ड स्थित सूर्य चक्र में पीले चमकीले रंग वाले चमकीले कमल के मानसिक ध्यान में स्वयं को तन्मय कर देना चाहिए।
साधना विज्ञान के आधार पर जाग्रत किया जा सके तो सामान्य में से असामान्य का प्रकटीकरण हो सकता है।
साधनाओं विचारों आदि के मूर्तिमान शक्ति पुँज चलते फिरते बिजली घर बन जाते हैं और उससे वह सैकड़ों लोगों का भला कर सकते है। मात्र
साधना के समय सुषुम्ना प्रवाह में जब प्राण ऊर्जा प्रविष्ट होकर ऊर्ध्वारोहण करती है, तब अति चेतन में जो प्रकाश संव्याप्त हो जाता है। सूक्ष्मदर्शियों ने उसका ध्वनिमय प्रतीक ॐ को ही बतलाया है। उन्हें गुह्य आदेश कहा गया है। ये आदेश प्रणव रूपी पुष्प से ही प्राप्त होते है। आनंद और उल्लास से भरी जो प्रखर सक्रियता उस समय उत्पन्न होती है, वही केन्द्रवर्ती मधु है।
साधना भी है। गीता में-विष्या विनिवर्तन्तें निराहारस्य देहिनः” कहर इसी तत्व की ओर संकेत किया है। इसी तथ्य को भली प्रकार समझ कर ऋषियों ने हर महीने कई उपवासों का धार्मिक महत्व स्थापित किया था।
साधना के क्रम में विभिन्न दार्शनिक मतों का गम्भीर अनुशीलन, वेदों का अध्ययन, स्वाध्याय आवश्यक होता है। साधना की उच्चतम स्थिति में समाधि की अवस्था में जहाँ परमतत्व में एकात्म होता है, उस समय इन ग्रंथों से प्रत्यक्ष प्रयोजन नहीं रहता। यद्यपि चेतना के उत्कर्ष का आधार उनके स्वाध्याय से ही विनिर्मित होता है। साधना की प्रक्रिया के निर्देशक ग्रंथों का एवं मार्गदर्शक सद्गुरु की आवश्यकता तो पग-पग पर पड़ती है। किंतु सविता संपर्क की प्रत्यानुभूति के क्षणों में आत्मसत्ता ही वेद और गुरु बन जाती है।
साधना ग्रंथों में अनेकों स्थान पर हुआ हैं। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि प्राणऊर्जा, जीवनी शक्ति अथवा कुण्डलिनी कहते हैं। अग्नि में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है जिसमें अग्नि तत्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में होते है। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है। उसमें सजातीय तत्वों का ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है।
साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचंड संकल्प शक्ति का प्रयोग करते हैं।
साधना विज्ञान निर्मित किया था। अब भौतिक विज्ञानी भी हर दिशा से निराश होकर सूर्य देवता की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसे सही दिशा में उठाया गया सही कदम ही कहना चाहिए। इसके परिणाम स्वरूप-सुनिश्चित रूप से नवयुग की मानवी सभ्यता सविता देवता के अनुदानों को ऊर्जा संसाधन और शक्ति स्रोत के रूप में उपलब्ध कर सकेगी।
साधना में बदल गये। निरंतर गहरी होती जा रही सविता देव की साधना अनेकों रहस्य प्रकट करने लगी। आखिर एक दिन परम रहस्य प्रकट हुआ। चारों दिशाओं में खबर फैल गयी-विश्वरथ ने गायत्री महाविद्या की खोज की है। वह दस्युओं को भी आर्य बनायेंगे।
साधनात्मक मर्म बताया गया है।
साधना, तथा पाँचों पहर के उपवासों के सूक्ष्म तत्व जिसमें समाहित है, वह रविवार का सूर्य व्रत है। उस दिन सातों ग्रहों की सम्मिलित शक्ति पृथ्वी पर आती है जो विविध आयोजनों के लिए उपयोगी होती है। रविवार को प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्रों से उदय कालीन सूर्य के सम्मुख बैठना चाहिए। एक बार खुले नेत्रों से सूर्य नारायण को देखकर फिर नेत्र बन्द करके सविता के तेज पुँज का ध्यान करते हुए एक हजार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। जप करते हुए ध्यान में यह भाव करें “इस सूर्य के तेजपुँज रूपी समुद्र में हम स्नान कर रहे है, वह हमारे चारों और ओत-प्रोत हो रहा है।
साधना के संदर्भ में हंस उनको ही स्मरण कर रहे है। वे एक सिद्ध ताँत्रिक थे। जिसे आशीर्वाद देते, फल जाता। कभी-कभी शाँतिकुँज आते, यहाँ 5-6 दिन रहते, फिर कानपुर चले जाते। सशरीर किसी तीर्थ नहीं गए थे, किन्तु जब मित्र मंडली के साथ बैठते तो सभी का ऐसा जीवन्त चित्रण करते कि सभी ये समझते कि ये होकर अवश्य आए है।
साधना में इसी प्राण योग की आवश्यकता पड़ती है। सूर्यवेधन प्राणायाम करते हुए ध्यान−धारणा अधिकाधिक गहरी होनी चाहिए और प्रचण्ड संकल्प शक्ति का पूरा समावेश होना चाहिए। श्वाँस खीचते हुए महाप्राण को विश्व प्राण को पकड़ने और घसीटकर आत्मसत्ता के समीप लाने का प्रयत्न किया जाता है। श्वाँस के साथ प्राण तत्व की अधिकाधिक मात्रा रहने की भाव भरी मान्यता रहनी चाहिए। साँस में आक्सीजन की जितनी अधिक मात्रा होती है, उतना ही उसे आरोग्यवर्धक माना जाता है।
साधना की सर्वोच्च उपलब्धि चरम परिणति यही है। वशिष्ठ पद पाने पर यह संभव होता है।
साधना की गायत्री अनुष्ठान व योग साधना के क्षेत्र में गहरे प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते थे। कभी भी उनका प्रदर्शन ख्याति के निमित्त अथवा सिद्धि चमत्कार दिखाने के लिए नहीं रहा। यही कारण था कि वह एकाकी गहन शोध कर सूर्य विज्ञान विधा को तिब्बत की दुर्गम गुफाओं से लाकर पवित्र नगरी वाराणसी में प्रतिष्ठित कर सके। हीरा, सोना, मोती, मूँगा आदि सूर्य किरणों से विनिर्मित कर वापस उसे ब्रह्मांड में लौटा देने की क्रिया अनेकों व्यक्तियों ने अपनी आँखों से देखी है। यही नहीं सभी की नाभि में कमल होता है, यह उनने अपनी नाभि से नाल सहित कमल उत्पन्न कर अपने शिष्यों को दिखाया था ।
साधना विज्ञान में अन्नमय कोष की शुद्धि के लिए उपवास की विशेष आवश्यकता को स्वीकारा गया है। शरीर में कई जाति की उपत्यिकाएँ देखी जाती हैं जिन्हें शरीर विज्ञानी नाड़ी गुच्छक कहते हैं। देखा गया है कि कई स्थानों पर ज्ञान तन्तुओं जैसी बहुत पतली नाड़ियाँ आपस में चिपकी होती है। यह गुच्छक कई बार रस्सी की तरह आपस में लिपटे और बटे हुए होते हैं कई जगह ये गुच्छक गाँठ की तरह ठोस गोली जैसे बन जाते हैं।
साधना रम पूज्य गुरुदेव ने गहन स्तर की संपन्न की तथा उससे मानव मात्र की अंतःप्रकृति के परिशोधन की प्रक्रिया पूरी की। साथ ही सावित्री साधना का प्रयोग उनने बाह्य प्रकृति के परिशोधन के निमित्त किया व अभी भी सूक्ष्म कारण सत्ता से वही कर रहे हैं। सूर्य सम बन की कोई अवतारी स्तर की सत्ता युग परिवर्तन जैसा भागीरथी कार्य संपन्न कर सकती है। इससे कम में तो बात बन ही नहीं सकती। गायत्री व सूर्य हमारी संस्कृति के प्राण है।
साधना करने का विधान है। किसी पवित्र एवं एकाँत स्थान में अथवा अपने दैनिक साधना कक्ष में पद्मासन में कमर सीधी स्थिति में बैठकर दस से बीस बार गहरी-गहरी श्वास लें अथवा तीन से पाँच मिनट तक नाड़ी शोधन प्राणायाम करें। इससे प्राण का सुषुम्ना नाड़ी में संचार प्रारंभ हो जाता है। इसके पश्चात रीढ़ की हड्डी को बिलकुल सीधा रखते हुए अजपा गायत्री (सोऽहम्) का श्वास के साथ पाँच मिनट तक मौन जप करना चाहिए। बाद में अपनी नाभि के पीछे मेरुदण्ड स्थित सूर्य चक्र में पीले चमकीले रंग वाले चमकीले कमल के मानसिक ध्यान में स्वयं को तन्मय कर देना चाहिए।
साधना को मनोरम ढंग से समझाया गया है। इसके अनुसार आदित्य देवताओं का मधु है-
साधना करनी चाहिए। “
साधना की दृष्टि से इस तत्व को यों समझना होगा कि अन्न आदि रस की उत्पत्ति का मतलब है अन्नमय कोश की पुष्टि। जिससे प्रखरता उत्पन्न होती है। प्राणशक्ति बढ़ती है तथा प्राणमय कोश की इस प्रकार हुई सक्रियता से यश वृद्धि होती है। इंद्रियों का अधिपति मन है। अतः उनकी उत्पत्ति का अर्थ है मनोमयकोश की सिद्धि।
साधना की प्रक्रिया के निर्देशक ग्रंथों का एवं मार्गदर्शक सद्गुरु की आवश्यकता तो पग-पग पर पड़ती है। किंतु सविता संपर्क की प्रत्यानुभूति के क्षणों में आत्मसत्ता ही वेद और गुरु बन जाती है।
साधना है। बारह रविवार तक बिना नागा इस को करते रहने से साधक स्वयं में अपेक्षित परिवर्तन अनुभव कर सकता है। बारह रविवार लगातार सूर्य व्रत करने में द्वादश आदित्यों की उपासना का अलौकिक विज्ञान छुपा है।
साधना पद्धति का आधार स्तम्भ मानी जाती रही है। श्री अरविंद ने कहा है कि आर्यों का इष्ट एक ही रहा हैं-स्वयं प्रकाशित एकमेव(तद् एकं, तत् सत्यं)-सूर्य। सविता, सृजेता, स्रष्टा सूर्य ही सत्य का अधिपति, आलोक प्रदाता एवं रचयिता है, पुष्टिदायक पूषा है जो उसका ध्यान करने वाले साधक में केवेलेशन (स्वतः प्रकाशित ज्ञान) इंस्पीरेशन (अंतःप्रेरणा), इंट्यूशन (अंतर्ज्ञान) तथा ल्युमीनस डिसर्नमेण्ट द्वारा विवेक दृष्टि प्रदान करता है, मन की त्रिविध लोकों वाली सृष्टि को प्रकाश प्रेरणा से अनुप्राणित कर देता है। भौतिक चेतना वाला, “भूलोक” क्रियाशील-प्राणमय चेतना वाला “भूषः लोक” तथा प्रकाशमान मन (विशुद्ध मानसिक चेतना वाला) लिए “स्वःलोक” उसी सविता से प्रेरित है जिसकी रश्मियों ने इस सृष्टि का सृजन किया है। इनके माध्यम से सृष्टि के किसी भी जड़ चेतन घटक की संरचना में परिवर्तन संश्लेषण-विश्लेषण सभी कुछ कर पाना योगी के लिए संभव है।
साधना के पश्चात शरीर, मन, मस्तिष्क में परिवर्तन समझ पड़ते है। इन परिवर्तनों में यह स्पष्ट अनुभूति होती है कि भावनाओं के अनुरूप ही मन व बुद्धि विकसित हो रहे हैं। इसकी दीर्घकालीन साधना द्वारा दृढ़ संकल्पपूर्वक चेतना का प्राण के साथ संयोग हो जाने पर साधक के मन व मस्तिष्क में चुम्बकीय विद्युत तरंगों का निर्बाध प्रवाह जारी हो जाता है। जो साधक के आस-पास एवं उससे संबंधित वातावरण को प्रभावोत्पादक बनाने में समर्थ होता है।
साधना के प्रति उपेक्षा नाभि स्थित सूर्य के अमृत तत्व को पतनोन्मुख कर देती है। इसे फुलझड़ी की तरह जलाकर तनिक-सा विनोद भी खरीदा जा सकता है। जबकि साधना प्रक्रिया को अपनाकर उसे मधुमक्खी की तरह संचित करके अपना श्रेय और दूसरों का सुख बढ़ाया जा सकता है। आत्म विद्या के अनुसार सूर्य चक्र प्राण सत्ता का साहसिक पराक्रमशीलता का एवं प्रतिभा का केन्द्र बिंदु माना गया है। इस स्थान की ध्यान साधना करते हुए इस प्राण शक्ति को निग्रहित और दिशा को सुनियोजित किया जाता है।
साधना के द्वारा योगी जन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते है। नाम-रूप सुविधानुसार कोई माना जाय-वस्तुतः यह सविता देवता ही सबका उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है।
साधना के क्षेत्र में गहरे प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते थे। कभी भी उनका प्रदर्शन ख्याति के निमित्त अथवा सिद्धि चमत्कार दिखाने के लिए नहीं रहा। यही कारण था कि वह एकाकी गहन शोध कर सूर्य विज्ञान विधा को तिब्बत की दुर्गम गुफाओं से लाकर पवित्र नगरी वाराणसी में प्रतिष्ठित कर सके। हीरा, सोना, मोती, मूँगा आदि सूर्य किरणों से विनिर्मित कर वापस उसे ब्रह्मांड में लौटा देने की क्रिया अनेकों व्यक्तियों ने अपनी आँखों से देखी है। यही नहीं सभी की नाभि में कमल होता है, यह उनने अपनी नाभि से नाल सहित कमल उत्पन्न कर अपने शिष्यों को दिखाया था ।
साधना करते हुए इस प्राण शक्ति को निग्रहित और दिशा को सुनियोजित किया जाता है। फलतः उसके सत्परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं।
साधनात्मक कर्मकाण्डों का फल परिपूर्ण मिलना न मिलना अथवा स्वल्प मिलना कर्मकाण्डों के विधि विधानों पर नहीं साधक की श्रद्धा पर निर्भर रहता है। श्रद्धा की न्यूनता ही साधनाओं के निष्फल जाने का प्रधान कारण होता है। जो इस सुनिश्चित तथ्य को जानते हैं वे सभी साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचंड संकल्प शक्ति का प्रयोग करते हैं।
साधना में उपवास का एक सुविस्तृत विज्ञान है। अमुक प्रकार से उपवास करने का अमुक फल देता है। ऐसे आदेश शास्त्रों में जगह-जगह पर मिलते है। ऋतुओं के अनुसार शरीर की छः अग्नियाँ न्यूनाधिक होती रहती है। ऊष्मा बहुवृच, हृवादी, रोहिता, आत्पता, व्याति यह छः शरीरगत अग्नियाँ ग्रीष्म से लेकर बसन्त तक छः ऋतुओं में क्रियाशील रहती है।
साधना करने वाला व्यक्ति भी इन्हीं उदात्त भावनाओं से सम्पन्न होता चला जाता है।
साधनाओं के निष्फल जाने का प्रधान कारण होता है। जो इस सुनिश्चित तथ्य को जानते हैं वे सभी साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचंड संकल्प शक्ति का प्रयोग करते हैं।
साधना पूरी कर लेते है। यदि ब्रह्मबेला में यह आराधना करनी हो तथा बादल छाए रहने पर प्रत्यक्ष दर्शन न हो पा रहा हो तो उस ओर मुखकर के भी ध्यान किया जा सकता है। यह अनेकानेक प्रचलनों में कुछ एक की चर्चा है।
साधना सर्वांगपूर्ण बन जाती है, ऐसा परम पूज्य गुरुदेव ने युग-परिस्थिति को देखते हुए हम सभी को बताया। पूज्यवर करते हैं कि “यह सुनिश्चित है कि युग परिवर्तन होने वाला है व उसकी मूल धुरी अब भारतवर्ष है। सारी धरती का अध्यात्म अब सिमटकर यहाँ आ गया है व नवयुग का सूर्योदय स्वर्णिम आभा लिए यहीं से होगा।” इस उक्ति को सार्थक करने के लिए संभवतः विगत ढाई सौ वर्षों में पुनः सतयुग की वापसी करने व दो सहस्र वर्षों के अंधकार को मिटाने सर्वाधिक महामानव भारतवर्ष में ही जन्मे। जो कार्य इन ढाई सौ वर्षों में विगत सौ वर्ष में हुआ है वह विश्व के इतिहास में इतनी तीव्रता से पहले कभी नहीं हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-September
साधना में बीता। नचिकेता को अब यमाचार्य ने मन के हर संकल्प को पूरा करने का अभ्यास कराया। वह सोता तब अचेतन मन की पूर्व जन्मों की क्रियायें स्वप्न पटल पर उभरती, उसमें कई ऐसे पापों की क्रियाएँ भी होती जिन्हें प्रकट करने पर आत्मग्लानि होती। उसको वह सारी बातें बतानी पड़ती। गुरु माता ने उससे भी उसे बचाने का यत्न किया, पर यमाचार्य ने कहा-”आत्मग्लानि और कुछ नहीं पूर्व जन्मों के पापों के संस्कार मात्र हैं, जब तक मन निताँत शुद्ध नहीं हो जाता तब तक आत्मबोधन का मनोबल कहाँ से आएगा।
साधना तपश्चर्या करने का मन हो वे अपनी उपयुक्त दिशा पाने के लिए शाँतिकुँज हरिद्वार से संपर्क स्थापित कर सकते हैं।
साधना इसी पुण्यवेला में युग ऋषि के संरक्षण में की जानी है। इसके लिए पूर्वकाल का स्वस्थ संस्कृति परंपराओं एवं वर्तमान के विवेक पूर्ण विचारों का सामंजस्य बैठाकर समाज को प्रशिक्षित करना होगा। भारतीय आध्यात्मिक धरातल पर मातृ शक्ति की पुनः प्रतिष्ठापना करनी होगी। तभी समाज एवं विश्व का उज्ज्वल भविष्य संभव है। तथा नारी धारती एवं निर्मात्री की महत्वपूर्ण भूमिका संपादित करने में सक्षम होगी।
साधना है संकल्प सच्चा है या झूठा इसका प्रमाण ही है लक्ष्य के प्रति अडिग निष्ठा। आदर्शवादियों को अनादि काल से इसी मार्ग पर चलना पड़ा है और अनन्त काल तक इसी पर चलना पड़ेगा।
साधना और शाँतिमय जीवन को देखकर विनोबा ने उनका नामकरण किया था, शाँतिदास। पश्चिमी जगत में भौतिकता की विपुलता, और विलासिता के दिमाग बिगाड़ने वाले वातावरण में शाँतिदास अपना अपमान समझते हैं। इस प्रकार बरते जाने वाले उपेक्षा-भाव के कारण ही अभाव व्यस्तता और गरीबी को पोषण मिलता है क्योंकि मेहनत ही उपार्जन का आधार है। जिस समाज में इसके प्रति दिलचस्पी न होगी वहाँ उपार्जन असम्भव प्रायः है। इसके अभाव में स्वाभाविक संतोष मानसिक शाँति से वंचित रहना पड़ता है, क्योंकि श्रम जीवन का धर्म है।
साधनाओं की हर कठिनाई झेलने में समर्थ है, इसीलिए हम उसे पंचाग्नि विद्या सिखा रहे हैं। आर्यावर्त की पीढ़ियाँ कायर और कमजोर न हो पायें और यह आत्म विद्या लुप्त न हो जाये इस दृष्टि से भी नचिकेता को यह साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है। पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान है, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है।
साधना और सक्रिय हुए थे विचारात्मक एवं क्रियात्मक प्रयास। उनके इन प्रयासों का अंतिम भाग इन्हीं दिनों पूरा होने को है। जो संवेदनशील अंतःकरण
साधना को ‘समर’ कहते हैं। युद्ध में तो अपना प्राण भी संकट में पड़ सकता है फिर भी कोई आवश्यक नहीं कि विजय ही उपलब्ध हो। अभी तो नचिकेता का अन्य संस्कार ही कराया गया है। परमात्म चेतना अत्यन्त पवित्र है, अग्नि रूप है। शरीर सामर्थ्य न होगा तो नचिकेता उसे धारण कैसे करेगा।
साधना सतत् प्रेरणास्रोत रहेगी। टी. इलियट,किशोरी लाल, मश्रूवाला, प्रतिभा बनर्जी, उर्मिला शास्त्री आदि ने श्रम को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाकर अनुकरणीय जीवन जिया।
साधनाओं में घुलाकर सिद्धि पाई है। सबमें ही अद्वैत आत्मा का दर्शन करते हैं आप, फिर क्या मैं आत्मा नहीं हूँ जो आप मेरी आकाँक्षाओं की उपेक्षा करते हैं?” एक मनमोहन दृष्टि इतना कहते-कहते एक बार ऊपर उठी और महायोगी, विरुपाक्ष के तपःतेज से दमकते आनन पर टिक कर एक क्षण में ही झुक गई।
साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है। पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान है, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है। इसी से उसे हर पौष्टिक आहर मिलते हैं।
साधना के संबंध में भी है। दुरुपयोग से पतन और सदुपयोग से उत्थान का सिलसिला चलता रहे तो अंतर में द्रुतगति से फर्क पड़ता चला जाएगा।
साधना की कठोरता को देखकर गुरु माता का हृदय करुणा से सिसक उठता। पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने जितना समर कितना कष्ट-साध्य है। अतएव नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित नहीं हुए।
साधना में प्रत्यक्ष ही घटा है। अपना समय, धन लगाने पर ही दूसरों की सहायता बन पड़ती है। इस आधार पर दूसरे लाभ उठा सकते हैं पर अपना तो खर्च ही खर्च हुआ ऐसी दशा में जिन्हें अपने स्वार्थों को प्रमुखता देनी है उन्हें सेवा कार्यों से बचना ही चाहिए। अपने घाटे से होने वाली हानि का बचाव ही करना चाहिए।
साधनाएँ करनी पड़ती। उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरु माता का हृदय करुणा से सिसक उठता। पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने जितना समर कितना कष्ट-साध्य है। अतएव नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित नहीं हुए।
साधना को, कभी देवता को, कभी अपने भाग्य को दोष देते हुए भविष्य के लिए एक प्रकार से अनास्थावान ही बन जाते हैं। इस विडंबना से हमें मुक्त होना होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-March
साधना के आरंभ काल में वासनाएँ विलीन हो गई थीं। मन एकाग्र हो जाता था अब यह स्थिति है मन एक क्षण को भी टिकता नहीं लक्ष्य पर। जिन वासनाओं को वह अत्यन्त हेय समझते रहे है, वे भी अब विक्षिप्त किए रहती हैं। पाठ और जप के समय भी मन विषयों-वासनाओं की उधेड़-बुन में लगा रहता है। पता नहीं कहाँ थे, भोग लिप्साएँ एवं भौतिक महत्वाकांक्षाएं उभर-उभर कर आ जाती हैं।
साधना में मंत्र शक्ति की प्रमुखता है। इसलिए उसे “माँत्रिकी” कहते है। याँत्रिकी और माँत्रिकी का उद्देश्य एक ही है−गुहा रहस्यों का उद्घाटन और अनुपलब्ध पर आधिपत्य।
साधना कैसे की जाय। उसका स्वरूप क्या हो? इसका स्पष्टीकरण वे समय-समय पर करते रहते थे। गुरु को समर्पित एक शिष्य उनके बताए निर्देशों पर चलता रहे तो उसके व्यक्तित्व गठन की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है तथा यह प्रक्रिया उसके आध्यात्मिक विकास हेतु एक प्लेटफार्म तैयार करती है। कभी-कभी शिष्य अतिवादिता के व्यूह जाल में फँसकर अनेक प्रकार के उपक्रम करने का प्रयास करता है किन्तु उससे हाथ कुछ लगता नहीं, उलटे जो एक विशिष्ट अवसर सामीप्य के नाते मिला था, हाथ से चला जाता है।
साधनात्मक उपचारों में मिलता है। साधना में मंत्र शक्ति की प्रमुखता है। इसलिए उसे “माँत्रिकी” कहते है। याँत्रिकी और माँत्रिकी का उद्देश्य एक ही है−गुहा रहस्यों का उद्घाटन और अनुपलब्ध पर आधिपत्य।
साधना एवं तपश्चर्या का युग कहा जा सकता है। इस युग की महान उपलब्धियाँ आत्मिकी के विशिष्ट प्रयोगों का ही प्रतिफल है। आत्मिकी का प्रत्यक्ष परिचय साधनात्मक उपचारों में मिलता है। साधना में मंत्र शक्ति की प्रमुखता है। इसलिए उसे “माँत्रिकी” कहते है।
साधना में करेंगे आज से ही करेंगे अभी से करेंगे। हमें कोई बाह्य साधन तो चाहिए नहीं जिनके लिए प्रतीक्षा करें। सब कुछ अन्तःकरण की गहराइयों से ही तो निकलना है। फिर देर क्यों? चिंतन की लय को क्रिया को स्वर में भरने दें।
साधनायें शारीरिक−मानसिक व्यायाम भर कर रह जाती है। चेतना के गहन अन्तराल तक पहुँचने और कुरेदने−उभारने में मंत्रोपचार का आश्रय लिए बिना काम नहीं चलता। मंत्र मात्र शब्द गुच्छक की रटन−पुनरावृत्ति तक सीमित नहीं है। यह कृत्य करना तो पड़ता है, पर उसके साथ और भी बहुत कुछ रहता है। साधक को आहार-विहार में विशेषतायें संपन्न करके शरीर को उन उपचारों के उपयुक्त बनाना पड़ता है और मनःशक्ति को प्रखर करने के लिए उस पर लदी हुई दुर्बुद्धि का निराकरण करना होता है।
साधना का परिणाम एक कन्या के रूप में छोड़कर। विश्वामित्र ने बिलखती आत्मजा के पास भी मेनका को नहीं देखा तो उनकी देह क्रोध से जलने लगी, पर अब हो ही क्या सकता था? मेनका तो इन्द्रपुरी पहुँच चुकी थी।
साधना कीजिए।” राजकुमार को जीवन की नयी दिशा मिल चुकी थी।
साधना ही महत्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर है। चन्द्रमा की विशालता एवं आकाश गंगा की लघुता सध्यान्तर के कारण उत्पन्न हुई, भ्रान्तियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसी प्रकार स्वयं को बड़प्पन में विशालता का दीख पड़ना और क्षुद्रता जैसी लगने वाली महानता को लात मार कर निरन्तर उसी ओर बढ़ते चलना, ऐसी अदूरदर्शिता है, जिसे इन दिनों बुद्धिमान समझे जाने वाले दृष्टिधारी भी करते प्रायः देखे जाते हैं। इससे बच निकलने वाले ही सत्य तक पहुंचते और श्रेय साधने में सफल होते हैं।
साधना, समयदान, अंशदान, साप्ताहिक सत्संग, झोला पुस्तकालय आदि। इन्हें हलके दर्जे के स्काउट व्यायाम स्तर का समझा जाय जिससे अभिरुचि और आस्था की परिस्थिति बढ़ चले।
साधना थी, वहाँ देखते-देखते मादकता, वैभव विलास खेलने लगा।
साधना के रूप में बने हुए अनेक उपचार काम दे सकते है। आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा, नेति, धौती, वस्ति, उपवास, तप−तितिक्षा आदि साधनों का उपयोग इसी क्षेत्र को निरोग, समर्थ एवं विशिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। माँत्रिकी का यह एक पक्ष है।
साधना है-शक्ति प्राप्ति का स्रोत है। क्यों सोच-विचार में समय बितायें? ऐसे प्रखर व्यक्तित्व के विकास में तथा ऐसी आनन्द निर्झरणी में साधना में करेंगे आज से ही करेंगे अभी से करेंगे। हमें कोई बाह्य साधन तो चाहिए नहीं जिनके लिए प्रतीक्षा करें। सब कुछ अन्तःकरण की गहराइयों से ही तो निकलना है।
साधना आरंभ कर दी गयी, साथ में अनुष्ठान भी। निश्चित ही प्रातःकाल जल्दी उठकर साधना पहले करनी पड़ती थी, फिर अध्ययन-लेखन व अन्य क्रम आते थे, जिनका मिशन से प्रत्यक्ष संबंध था। चार-पाँच दिन यह क्रम ठीक से चलता हरा। छठे दिन पुनः गुरुसत्ता ने प्रातःकाल निर्देश नोट करने को बुलाया। बैठ तो गए उनके समक्ष पर ध्यान इसी में लगा था कि इतनी माला हो गयी, इतनी बची है।
साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।
साधना सफल होती चली जाती है। फिर व्यक्ति सिद्धियों की तलाश में नहीं जाता। वे उसके पीछे भागती रहती है व वह उनसे दूर भागता रहता है।
साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।
साधना कर रहे हैं, हम यहाँ रहकर भी नहीं कर पा रहे। पूज्यवर से पूछा कि यदि वे आज्ञा दें तो एक सत्र कर लें। प्रत्यक्ष मना तो नहीं किया, हाँ भी नहीं की। बोले “यहाँ रहकर तुम जो भी कुछ कार्य हमारा मिशन के हित में कर रहे हो, वही तुम्हारी साधना है। हाँ साधना की दृष्टि से -न्यूनतम तीन व अधिकतम ग्यारह माला के लिए एक घण्टे का समय तुम चौबीस घंटे में तय कर लो तथा एक या दो खण्डों में इसे पूरा कर लो।
साधना निश्चित ही फल देती है। चाहे वह अत्यल्प ही क्यों न हो, पर वह ईश्वरीय कार्य के निमित्त, उनकी योजना के अंतर्गत तो निश्चित ही सफलता मिलती है। “हमारी वसीयत और विरासत” पुस्तक, जो पूज्यवर की आत्म कथा आधिकारिक जीवनी है, से हम सबसे बड़ा शिक्षण साधना विज्ञान का जो पाते है, वह है सघन श्रद्धा व पूर्ण समर्पण- आराध्य से-इष्ट से। यही यदि भलीभाँति निभ जाय तो जीवन साधना सफल होती चली जाती है। फिर व्यक्ति सिद्धियों की तलाश में नहीं जाता।
साधना में ही निमग्न रहते थे।
साधना उफनती है। संस्कृति की गरिमा इन्हीं में प्रतिष्ठित है। अतः आपको इस प्रपंच से परित्राण पाना चाहिए। दृढ़ होना चाहिए। उसी (महत्संग) की साधना कीजिए।
साधना में जरूरी है। अतिवादी तप-तितिक्षा नहीं।” हमने कहा कि “हमें गायत्री महासत्ता के दर्शन करने हैं-माता के रूप में या प्रकाश के रूप में। इसीलिये हम अनुष्ठान श्रृंखला करना चाहते थे, पर आपने पूरे नहीं होने दिए। कोई न कोई प्रारब्ध हमारा रहा होगा।
साधना, तपस्या, देव−अनुग्रह, वरदान, स्वर्ग−मुक्ति आदि आत्मिक उत्पादनों के पीछे जो तथ्य काम करता है उसे श्रद्धा का ही परिपाक समझा जाना चाहिए। यदि श्रद्धा न हो तो यह समस्त क्रिया−कलाप मात्र कर्मकाण्ड बनकर ही रह जायेगा और उनका परिणाम नगण्य जितना ही दिखायी देगा।
साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।
साधना पुरुषार्थ व्यक्तित्व की सबसे बड़ी क्राँति है। जैसे समाज परिकर में संव्याप्त सारी गड़बड़ियाँ एक व्यापक स्तर पर हुई क्राँति से ठीक हो जाती है, वैसे ही व्यक्तित्व की अनगढ़ता- आत्मक्षेत्र की गड़बड़ियाँ साधना द्वारा ठीक हो जाती हैं।
साधना सत्र शाँतिकुँज में चल रहे थे। बड़ी जिद थी कि बाहर से तो लोग आकर साधना कर रहे हैं, हम यहाँ रहकर भी नहीं कर पा रहे। पूज्यवर से पूछा कि यदि वे आज्ञा दें तो एक सत्र कर लें। प्रत्यक्ष मना तो नहीं किया, हाँ भी नहीं की। बोले “यहाँ रहकर तुम जो भी कुछ कार्य हमारा मिशन के हित में कर रहे हो, वही तुम्हारी साधना है।
साधना से पैदा कर सकते हैं तो हम ब्राह्मणत्व की सेवा कर सकते हैं और उस चमत्कार को देख सकते हैं जो गायत्री मंत्र के साथ जुड़ा हुआ है। जो यज्ञ के माध्यम से जुड़ा हुआ है।
साधना की दृष्टि से -न्यूनतम तीन व अधिकतम ग्यारह माला के लिए एक घण्टे का समय तुम चौबीस घंटे में तय कर लो तथा एक या दो खण्डों में इसे पूरा कर लो। बस इतना भर तुम्हारा करना पर्याप्त है, शेष हम सँभाल लेंगे।” होना तो यही चाहिए था कि जो भी कुछ उनने कहा उस पर विश्वास करते हुए अपनी कर्मठता का स्तर और बढ़ा देना चाहिए था। किन्तु कहा गया कि “आपकी आज्ञा हो तो सवा-सवालक्ष के पाँच अनुष्ठान पाँच चान्द्रायण के साथ करने की बड़ी तीव्र इच्छा है। यदि आज्ञा मिल जाय तो कृपा होगी।
साधना देखकर मुग्ध हो जाते थे।
साधना को किसी उपयोगी कार्य में ही नियोजित कार्य में ही नियोजित किया जाय। यदि कमाई अत्यधिक मात्रा में संग्रह हो रही है तो उसके सदुपयोग का विवेक फिर रह नहीं जाता। कमाई में प्रयुक्त हुआ अतिवाद व्यय करने की घड़ी में फिजूलखर्ची बनकर उभरता है। बढ़े हुए धन का पिछड़ों को उठाने और उठों को उछालने जैसे महान प्रयोजनों में लगा सकने की उदार दूरदर्शिता आतुर लोगों के पास रह नहीं जाती, वे विलास, संग्रह और प्रदर्शन के अतिरिक्त और कोई राह ऐसी खोज नहीं पाते, जिसमें आवश्यकता से अधिक धन का नियोजन बन पड़े। परमार्थ उनके लिए पर्वत उठाने की तरह भारी पड़ता है।
साधनाएँ की व करायी। दुर्गम हिमालय से लेकर उत्तरकाशी एवं ऋषिकेश की छोटी-सी कुटिया से लेकर सप्तऋषि आश्रम परिसर में बनी विश्वामित्र कुटीर तथा अखण्ड-ज्योति संस्थान का साधना कक्ष, उनके कठोर तप−साधना के क्षेत्र रहे हैं। गायत्री चर्चा स्तंभ 40 वे दश्याक में प्रारंभ कराने बाद क्रमशः पंचकोशी साधना, कल्प साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है।
साधना सार्थक सिद्धिदात्री हो जाएगी।
साधना के अवलम्बन को ही प्रमुख माना जा सकता है। हर किसी के द्वारा ऐसा अध्यात्म उपचारों का प्रयोग करना शक्य है, इसे एक सुनिश्चित तथ्य मानना चाहिए।
साधनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।”
साधना के बिना उसका व्यक्तित्व उस स्तर का बन ही नहीं सकता जो सेवा कार्य के मानव-जीवन प्राप्त हर जीव के लिए अनिवार्य है क्योंकि “परमसत्ता यह चाहती है कि भगवत् चेतना उसके माध्यम से इसी साधना पुरुषार्थ द्वारा झरे, परमात्मा मानवी व्यक्तित्व के माध्यम से पूरे ऐश्वर्य के साथ प्रकट हो सके।” वे अध्यात्म को जिन्दगी का शीर्षासन बताते हुए समय-समय पर कहते रहते थे कि “साधना पुरुषार्थ व्यक्तित्व की सबसे बड़ी क्राँति है। जैसे समाज परिकर में संव्याप्त सारी गड़बड़ियाँ एक व्यापक स्तर पर हुई क्राँति से ठीक हो जाती है, वैसे ही व्यक्तित्व की अनगढ़ता- आत्मक्षेत्र की गड़बड़ियाँ साधना द्वारा ठीक हो जाती हैं।
साधना पुरुषार्थ द्वारा झरे, परमात्मा मानवी व्यक्तित्व के माध्यम से पूरे ऐश्वर्य के साथ प्रकट हो सके।” वे अध्यात्म को जिन्दगी का शीर्षासन बताते हुए समय-समय पर कहते रहते थे कि “साधना पुरुषार्थ व्यक्तित्व की सबसे बड़ी क्राँति है। जैसे समाज परिकर में संव्याप्त सारी गड़बड़ियाँ एक व्यापक स्तर पर हुई क्राँति से ठीक हो जाती है, वैसे ही व्यक्तित्व की अनगढ़ता- आत्मक्षेत्र की गड़बड़ियाँ साधना द्वारा ठीक हो जाती हैं।
साधना है। हाँ साधना की दृष्टि से -न्यूनतम तीन व अधिकतम ग्यारह माला के लिए एक घण्टे का समय तुम चौबीस घंटे में तय कर लो तथा एक या दो खण्डों में इसे पूरा कर लो। बस इतना भर तुम्हारा करना पर्याप्त है, शेष हम सँभाल लेंगे।” होना तो यही चाहिए था कि जो भी कुछ उनने कहा उस पर विश्वास करते हुए अपनी कर्मठता का स्तर और बढ़ा देना चाहिए था। किन्तु कहा गया कि “आपकी आज्ञा हो तो सवा-सवालक्ष के पाँच अनुष्ठान पाँच चान्द्रायण के साथ करने की बड़ी तीव्र इच्छा है।
साधना के अभाव में वह उड़ान थकान और निराशा देने के अतिरिक्त और कुछ भी उपलब्ध नहीं करा पाती।
साधना द्वारा ठीक हो जाती हैं।
साधना करना चाहते हैं, वे जबरदस्ती हमें कर्मयोगी बनाने पर तुले हुए हैं। स्वयं तो उनने चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण संपन्न किए, हमें क्यों टोकते है। ऐसा ही मंथन चल रहा था कि ऊपर से बुलावा आया। बिठाकर बोले “क्यों इतना पीछे पड़े हो जप-तप करने के। जो हमने कहा, उस पर विश्वास नहीं .या?
साधना
साधना कक्ष, उनके कठोर तप−साधना के क्षेत्र रहे हैं। गायत्री चर्चा स्तंभ 40 वे दश्याक में प्रारंभ कराने बाद क्रमशः पंचकोशी साधना, कल्प साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है।
साधना के क्षेत्र रहे हैं। गायत्री चर्चा स्तंभ 40 वे दश्याक में प्रारंभ कराने बाद क्रमशः पंचकोशी साधना, कल्प साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है।
साधना पहले करनी पड़ती थी, फिर अध्ययन-लेखन व अन्य क्रम आते थे, जिनका मिशन से प्रत्यक्ष संबंध था। चार-पाँच दिन यह क्रम ठीक से चलता हरा। छठे दिन पुनः गुरुसत्ता ने प्रातःकाल निर्देश नोट करने को बुलाया। बैठ तो गए उनके समक्ष पर ध्यान इसी में लगा था कि इतनी माला हो गयी, इतनी बची है। बात-बात में गुरुदेव ने उपस्थित सभी कार्यकर्ता बनना चाहिए।
साधना’ कहते हैं जिसमें काय−कलेवर में सन्निहित प्रसुप्ति को जाग्रत एवं निष्क्रिय को सक्रिय किया जाता है।
साधना, कल्प साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।
साधना में जीवन बिताने लगे।
साधना विज्ञान का जो पाते है, वह है सघन श्रद्धा व पूर्ण समर्पण- आराध्य से-इष्ट से। यही यदि भलीभाँति निभ जाय तो जीवन साधना सफल होती चली जाती है। फिर व्यक्ति सिद्धियों की तलाश में नहीं जाता। वे उसके पीछे भागती रहती है व वह उनसे दूर भागता रहता है।
साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।
साधना आश्रमों में भी बड़ी संख्या में ऐसी प्रतिभाएं विनिर्मित होती थी, जो मनुष्य समाज से सम्बन्धित अगणित पक्षों में से किन्हीं थोड़े से को अपनाकर अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व की बढ़ी−चढ़ी महानता का परिचय दे सकें। उस महान परम्परा को फिर से पुनर्जीवित करना कठिन तो अवश्य दीख सकता है; पर निश्चय ही वह असंभव इन परिस्थितियों में भी नहीं है। विश्वास को प्रत्यक्ष में परिणित करने के लिए इन दिनों ऐसे प्रचण्ड प्रयत्न चल पड़े है, जिन के साथ प्राण−पण की बाजी लगी हुई समझी जा सकती है।
साधना-संरक्षण तथा मात्र आदर्शों मर्यादाओं का सम्मान हमारा महत्वपूर्ण कर्तव्य है। दूसरों की सेवा हम अपना धर्म समझें। सेवा हम किसी को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मीय भाव से प्रेरित होकर करें। सत्कार्य किसी की नकल के रूप में प्रेरित होकर करें। सत्कार्य किसी की नकल के रूप में नहीं वरन् अन्तःकरण की स्वाभाविक भूख, न दब सकने कोई हमारे पास आने से कतरायेगा?
साधनाएँ करने के बाद भी जब चित्त को सच्ची शान्ति नहीं मिली तो वे निराश से रहने लगें। परन्तु जिस मार्ग को उन्होंने अपनाया था उससे वे वापस लौट भी नहीं सकते थे। लौटने का कोई अर्थ भी नहीं था, क्योंकि जिस जीवन को छोड़कर उन्होंने यह मार्ग अपनाया था वह जीवन भी तो क्लान्ति, अतृप्ति और अशान्ति के संताप से भरा हुआ था।
साधना का प्रतिफल तुरन्त मिलता है, और परमार्थ की परिणति कालांतर में होती है। इसी भ्रान्ति में मनुष्य यह सोचने लगता है कि तात्कालिक स्वार्थ-साधना में ही बुद्धिमत्ता है। तथ्य इसके विपरीत है। दूरवर्ती एवं चिरस्थायी उज्ज्वल भविष्य की महत्ता समझने की यदि टेलिस्कोप जैसी दूरदर्शिता हस्तगत हो सके, तो प्रतीत होगा कि श्रेय साधना ही महत्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर है। चन्द्रमा की विशालता एवं आकाश गंगा की लघुता सध्यान्तर के कारण उत्पन्न हुई, भ्रान्तियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
साधना क्षेत्र की परमपूज्य गुरुदेव की समस्त उपलब्धियाँ, जिनने उन्हें साक्षात् सूर्यमय बना दिया, इसी समर्पण की तो देन थी। अपनी सूक्ष्मशरीरधारी गुरुसत्ता को उनने वसंत पंचमी 1926 को स्वयं को सौंपा तो योगक्षेम के वहन की चिंता उन पर छोड़कर स्वयं एक निमित्त मात्र बन कर वे गायत्री जयन्ती 1990 तक उन्हीं का कार्य करते हुए माँ गायत्री की गोद में ही समा गए। समर्पण इस स्तर का हो तो साधना निश्चित ही फल देती है। चाहे वह अत्यल्प ही क्यों न हो, पर वह ईश्वरीय कार्य के निमित्त, उनकी योजना के अंतर्गत तो निश्चित ही सफलता मिलती है। “हमारी वसीयत और विरासत” पुस्तक, जो पूज्यवर की आत्म कथा आधिकारिक जीवनी है, से हम सबसे बड़ा शिक्षण साधना विज्ञान का जो पाते है, वह है सघन श्रद्धा व पूर्ण समर्पण- आराध्य से-इष्ट से।
साधना क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है। गीताकार की तरह उनने आश्वासन भी दिया−
साधना विफल हुई।”गुर्जर राजकुमार ने एक लम्बी श्वास ली। वे अपने विश्राम कक्ष में एक चन्दन की चौकी पर धवलवस्त्र डाले विराजमान थे। ग्रन्थ पाठ समाप्त हो गया और जप भी पूर्ण कर लिया था उन्होंने। ध्यान की चेष्टा व्यर्थ रही और वे पूजा स्थान से उठ आए।
साधना, प्राण−प्रत्यावर्तन साधना, कुण्डलिनी साधना, जीवन साधना व कुटीप्रवेश आदि सभी के मूल में एक ही बात रही-साधक का समूचा व्यक्तित्व साधनामय बन जाय व इसकी प्रारंभिक शर्त है-”आत्मशोधन” जून 1973 में प्राण प्रत्यावर्तन प्रक्रिया समझाने के लिए लिखे गए अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में वे स्पष्ट लिखते है-”यह मान्यता सर्वथा मिथ्या है कि छुटपुट पूजा पत्री या कर्मकाण्डी टण्ट घण्ट आत्मकल्याण अथवा ईश्वर अनुग्रह का लक्ष्य प्राप्त करा सकते है। उपासनात्मक उपचार तो रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल, सड़क पर लगे संकेतपट मात्र है, जो दिशा–निर्देश भर देते है। काम तो सत्प्रवृत्ति भी उसी स्तर का घटनाक्रम-क्रिया−कलाप अपनाने से पूरा हो सकता है। कर्म की काट कर्म से ही हो सकती है। इसलिए प्रायश्चित्त द्वारा आत्मशोधन का आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करना पड़ता है वैसा ही सत्साहस दिखाने की जरूरत पड़ती है, जैसा कि दुष्कर्म करते समय किसी भी न सुनने का दुस्साहस किया गया था।
साधनायें सफल हो सकें। ध्यानयोग के लिए जिस शरीरगत− अंतःशांति की नितान्त आवश्यकता होती है, वह श्रद्धा, समन्वित मनःस्थिति से ही संभव हो पाती है।
साधना में ही बुद्धिमत्ता है। तथ्य इसके विपरीत है। दूरवर्ती एवं चिरस्थायी उज्ज्वल भविष्य की महत्ता समझने की यदि टेलिस्कोप जैसी दूरदर्शिता हस्तगत हो सके, तो प्रतीत होगा कि श्रेय साधना ही महत्वपूर्ण एवं श्रेयस्कर है। चन्द्रमा की विशालता एवं आकाश गंगा की लघुता सध्यान्तर के कारण उत्पन्न हुई, भ्रान्तियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसी प्रकार स्वयं को बड़प्पन में विशालता का दीख पड़ना और क्षुद्रता जैसी लगने वाली महानता को लात मार कर निरन्तर उसी ओर बढ़ते चलना, ऐसी अदूरदर्शिता है, जिसे इन दिनों बुद्धिमान समझे जाने वाले दृष्टिधारी भी करते प्रायः देखे जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1993-February
साधना करने और गृह परित्याग से पहले यह जरूरी है कि जिन लोगों के प्रति अपने कर्तव्य हैं, उनकी पूर्ण स्वीकृति और सहमति प्राप्त की जाये। जब तक आप महाराज बिबिसार से आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेतीं, दीक्षा का अधिकार आपको नहीं है।”
साधना में निमग्न साधक एवं मनीषी गोपीनाथ-कविराज अपने सम्पादित ग्रन्थ श्री श्री सद्गुरु प्रसंग में स्पष्ट करते है कि मन की स्थिरता एवं एकाग्रता का सार तत्व तन्मयता में आ जाता है। तन्मयता का अथ है इष्ट के साथ भाव संवेदनाओं को केंद्रीभूत कर देना। यह स्थिति तभी आ सकती है जब इष्ट के प्रति असीम श्रद्धा हो। श्रद्धा तब उत्पन्न होती है जब किसी की गरिमा पर परिपूर्ण विश्वास हो। साधक को अपनी मनोभूमि ऐसी बनानी चाहिए जिसमें इष्ट और मार्गदर्शक सद्गुरु की चरम उत्कृष्टता पर, असीम शक्ति सामर्थ्य पर संपर्क में आने वाले के उत्कर्ष होने पर गहरा विश्वास जमता चला जाय।
साधना का महत्व बताते हुए प्रपंच तन्त्र में कहा गया है कि “देह देवालय है। इससे जीव रूप में शिव विराजमान है। इसकी पूजा वस्तुओं ने सही ‘सोऽहम्’ साधना से करनी चाहिए।” अंतःकरण में हंस-वृत्ति की स्थापना की यह साधना ही अजपा गायत्री कही जाती है। अग्नि-पुराण, शिव-स्वरोदय, गोरक्ष-संहिता, तंत्र-सार आदि में इसे समस्त पापों से छुटकारा दिलाने वाली एवं मोक्ष प्रदाता कहा गया है।
साधना का तत्वज्ञान। श्वास-प्रश्वास क्रिया के माध्यम से ‘सो’ और ‘हम’ ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जाग्रत किया जाता है कि अपना स्वरूप बदल रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का, वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी, राज्यक्रांति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी-अनाचारी शासन सत्ता का तख्ता पलट कर उस स्थान पर सत्य, न्याय और प्रेम-संविधान वाली धर्मसत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। ‘सोऽहम्’ साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंतःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधना विज्ञान के छाया-पुरुष वाली मान्यता उक्त भ्रान्ति को निर्मूल साबित कर देती है, जिसमें कहा गया है कि साधना-विज्ञान में अपना ही प्रतिरूप तैयार कर लेने और उससे तरह-तरह के कार्य करवा लेने में आश्चर्य अथवा अचम्भा जैसा कुछ भी नहीं है। यदि व्यक्ति थोड़ा-सा प्रयास करे, तो नियमित अभ्यास द्वारा वह अपना न सिर्फ छाया-पुरुष तैयार कर सकता है, अपितु उससे अनेक ऐसे भी कार्य करवा सकता है, जो स्वयं उसके लिए संभव नहीं।
साधनाओं का प्रयोग किया जा सकता है और उनका चमत्कारी प्रतिफल देखा जा सकता है।
साधना।
साधना की जाती है। ध्यानमुद्रा में शान्तचित्त से बैठकर जिह्वाग्र भाग को तालु मूर्धा से लगाया जाता है। सहलाने जैसे मन्द-मन्द स्पंदन किये जाते है। इस उत्तेजना से सहस्र दल कमल की प्रसुप्त स्थिति जाग्रति में बदलती है। बन्द छिद्र खुलते है और आत्मिक अनुदान जैसा रसास्वादन जिह्वाग्र भाग के माध्यम से अन्तःचेतना को अनुभव होता है यही खेचरी मुद्रा है।
साधना स्वयं की इन क्षमताओं के विकास का ही दूसरा नाम है।
साधना है जिसे अपना कर हर कोई लाभान्वित हो सकता है।
साधना “छाया-पुरुष” की बताई गई है। इसमें अपनी ही प्रतिकृति को दर्पण में देख-देख कर श्रद्धा और विश्वास के माध्यम से उसे इतना सशक्त और सबल बना लिया जाता है कि वह एक स्वतंत्र सत्ता की तरह काम करने लगती है। आरंभ में यह सत्ता निर्बल होती है और मात्र दर्शन-झाँकी जैसे कार्य ही सम्पन्न कर पाती है; किन्तु जैसे-जैसे व्यक्ति की संकल्प शक्ति बढ़ती जाती है, वैसे ही वैसे “छाया-पुरुष” की समर्थता भी बढ़ने लगती है। फिर स्वामिभक्त सेवक की तरह ऐसे कार्य करवाने में साधक उससे सफल हो जाता है, जो सामान्य स्तर के साधक के लिए संभव नहीं होता और सामान्य स्तर का व्यक्ति उसे सिद्ध योगी मानने लगता है, जबकि उसकी अपनी योग्यता मात्र इतनी भर होती है, कि उसने अपनी गहन आस्था का आरोपण कर उसमें स्वयं को अनुप्राणित कर लिया। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विभूति उसके अन्दर होती नहीं।
साधना विज्ञान प्राचीन काल से ही परिचित था, अब उसे “जेनेटिक्स” भी स्वीकारने लगा है। उसका “लाँ ऑफ डोमिनेन्स” इसी की स्वीकारोक्ति है। इसमें इसी बात को तथ्य रूप में अंगीकार किया गया है कि जन्तु अथवा व्यक्ति में शारीरिक या व्यावहारिक रूप में जो लक्षण दिखाई पड़ते है, सच्चाई मात्र इतनी ही नहीं होती, अपितु इसके विपरीत गुण भी उसमें अगोचर रूप में सदा बने रहते हैं-यह कथन भी उतना ही सत्य है, जितना दिन-रात का होना।
साधना में स्थिरता की नहीं एक दिशाधारा में मन को नियोजित किए रहने की आवश्यकता है। पर ब्रह्म में आत्म-समर्पण और उस पराशक्ति का आत्म सत्ता में अवतरण की ध्यान का मुख्य प्रयोजन है। उसके लिए कितने ही प्रकार की साकार-निराकार ध्यान-धारणाएँ विद्यमान है। उनमें से जो उपयोगी एवं रुचिकर लगे उसे अपनाया जा सकता है।
साधना के आरम्भिक चरण में श्वास खींचते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम’ की धारणा की जाती है। प्रयत्न यह किया जाता है कि इन शब्दों के प्रारंभ में अति मंद स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। चिन्तन का स्वरूप यह बनाना पड़ता है कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय-कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे है। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है, वरन् प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। इस तरह एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना की जाती है और अनुभव करना पड़ता है कि उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप में समाविष्ट हो गयी।
साधना कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना प्रकोष्ठ की तीन सीढ़ियाँ उनसे चढ़ी न जा सकी। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गए। उनकी कृश देह माँ गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरी। ऋषि अचेत हो गए।
साधना विधान जो आत्मतत्व का परिशोधन-परिष्कार करने की, आदर्शों को कर्तृत्व में समाहित करने की शिक्षा देता है, देव संस्कृति के दो मूल आधार रहे है। उसमें भी यदि अश्वमेधी स्तर का गायत्री महायज्ञ समाज में समय पर संपन्न हो रहा है, आत्मबल संपन्न ऋषिगण-राष्ट्र को तेजस्वी-पराक्रम बनाने के उद्देश्य से क्षात्रबल अपनाने वाले राष्ट्राधिपति उसे संपन्न करा रहे तो निश्चित ही यह मानकर चलना चाहिए कि असुरता से मोर्चा ले, मानसिक दुर्बलताओं से जूझते हुए जन-जन को ऊर्जस्विनी ओजस्वी, प्राणशक्ति संपन्न बनाने की प्रक्रिया संपन्न हो रही है। यदि कहीं इस पुरुषार्थ में व्यक्तिक्रम आ रहा है तो यह समझ लेना चाहिए कि धर्म के नाम पर कर्मकाण्ड की चिह्न-पूजा तो संपन्न हो रही है किन्तु इसमें वह अध्यात्म तत्व नहीं है जिसका मूल प्रयोजन हो देवशक्तियों और उनके अधिष्ठाता परमात्मा में सामंजस्य स्थापित करना है। अध्यात्म घनीभूत संवेदनाओं को जीवन में देने की प्रक्रिया का नाम है तथा वह सबसे पहले व्यक्ति को शूरवीर, प्राणवान तथा शक्ति संपन्न बनाने का कार्य संपन्न करता है। ऋषियुग में यहीं सब होने से प्राणवान व्यक्तियों का मनीषियों का-शूरवीरों का कभी अकाल नहीं था।
साधना ही अजपा गायत्री कही जाती है। अग्नि-पुराण, शिव-स्वरोदय, गोरक्ष-संहिता, तंत्र-सार आदि में इसे समस्त पापों से छुटकारा दिलाने वाली एवं मोक्ष प्रदाता कहा गया है।
साधना, आपका तत्व ज्ञान, आपका ब्रह्मवर्चस् विश्व के कल्याण के लिए है भगवान! पर यह काँ सम्भव है कि आप सुदूर प्रान्तों का निरंतर परिव्राजक करते रहे और लोगों की ज्ञान-पिपासा को तृप्त करें। गुरुकुल की स्थापना करनी ही होगी देव! उसके बिना भावी पीढ़ी का आध्यात्मिक प्रशिक्षण किस प्रकार बन पड़ेगा? आप ही तो कहते है, कि धर्म तत्व का प्रशिक्षण और प्रसार किए बिना लोक जीवन का चारित्रिक, बौद्धिक, सामाजिक और आत्मिक विकास नहीं हो पाता।”
साधना प्रणाली एवं मान्यताओं में भारी अन्तर दिखाई पड़ता है। क्रिश्चियन धर्म की अपनी विशेषता है, मुस्लिम धर्म की अपनी, पारसी, बौद्ध, ताओ, हिन्दू धर्म जिस परिवेश एवं भौगोलिक वातावरण में विकसित हुए हैं, उनकी छाप इन धर्मों में विद्यमान है। प्रवर्तकों ने इस बात का पूरा-पूरा
साधना शब्द जोड़कर सेवा साधना उसे इसीलिए कहा गया है कि सेवा में कहीं आत्मा श्लाघा की प्रवंचना न जुड़ जाए, उदार आत्मीयता का विस्तार होने पर जो करुणा उमंगती है और दूसरों को ऊँचा उठाने आगे बढ़ाने के लिए जो साहस प्रखर होता है, उसकी तृप्ति अपनी क्षमताएँ सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित किये बिना नहीं होती। इस परमार्थ परायणता को ही सेवा साधना कहते हैं।
साधना के पूर्व भाग में साँस लेते समय ‘सो’ ध्वनि के साथ जीवन सत्ता पर उस “परब्रह्म” परमात्मा का शासन -आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है उत्तरार्द्ध में ‘हम’ को-अहंता को विसर्जित करने का भाव है। श्वास निकली साथ-साथ अहम् भाव का भी निष्कासन हुआ। अहंता ही लोभ और मोह की जननी है। शरीराध्यास में जीव उसी की प्रबलता के कारण डूबता हैं इसे विसर्जित कर देने पर ही भगवान का अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करना-निवास करना संभव होता है। आत्म-समर्पण की इस स्थिति को प्राप्त होते ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है और तब ईश्वरीय अनुभूतियाँ चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती है।
साधना ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक बताये गये है। उन सबका सार संक्षेप इतना ही है कि मस्तिष्क, हृदय और प्रजनन तंत्र में वरिष्ठता एवं पवित्रता, प्रखरता उत्पन्न करने के लिए उपरोक्त तीन मुद्राओं की साधनाओं का प्रयोग किया जा सकता है और उनका चमत्कारी प्रतिफल देखा जा सकता है।
साधना की गहराइयों में प्रवेश करने पर मन की बनावट एक प्रचण्ड विद्युत भंडार जैसी अनुभव की जा सकती है। उसके भीतरी और बाहरी क्षेत्र में विचार तरंगों के आँधी तूफान निरन्तर उठते रहते हैं। यह तरंग-तूफान जितने तीव्र-गति सम्पन्न होते हैं उसकी मानसिकता उतनी ही उर्वर और कुशाग्र बुद्धि मानी जाती है। जहाँ उतनी ही जड़ता, दीर्घसूत्रता, मूर्खता छाई रहेगी। हरे-थके मस्तिष्क को निद्रा घेर लेती है अर्थात् उसकी गतिशीलता शिथिल हो जाती है।
साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते है।
साधना का उत्तरार्द्ध पाप निष्कासन का है शरीर में से अवाँछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का, आलस्य-प्रभाव जैसी दुष्प्रवृत्तियों का, मन से लोभ, मोह जैसी तृष्णाओं का, अन्तस्तल से जीव का भावी अहंता का निवारण-निराकरण हो रहा है-ऐसी भावनायें अत्यन्त प्रगाढ़ होनी चाहिए। दुर्भावनायें और दृष्कृत्तियाँ, निकृष्टतायें और दुष्टतायें-क्षुद्रतायें एवं हीनतायें सभी निरस्त हो रही है, सभी पलायन कर रही है, यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त जो हलकापन-जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरन्तर बना रहता है, उसी का स्वभावतः होता है और निरन्तर बना रहता है, उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए। तभी कहा जा सकेगा कि ‘सोऽहम्’ साधना का उत्तरार्द्ध भी एक तथ्य बन गया।
साधना प्रणाली में भी साँस्कृतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों की छाप रही है। एक धर्म के क्रिया कृत्यों, मान्यताओं में परस्पर भिन्नता होते हुए मूल लक्ष्य एक ही है-व्यक्ति एवं समाज का सर्वांगीण विकास करना।
साधना-विज्ञान में अपना ही प्रतिरूप तैयार कर लेने और उससे तरह-तरह के कार्य करवा लेने में आश्चर्य अथवा अचम्भा जैसा कुछ भी नहीं है। यदि व्यक्ति थोड़ा-सा प्रयास करे, तो नियमित अभ्यास द्वारा वह अपना न सिर्फ छाया-पुरुष तैयार कर सकता है, अपितु उससे अनेक ऐसे भी कार्य करवा सकता है, जो स्वयं उसके लिए संभव नहीं।
साधना का क्रम फिर चल उठे। श्रीमाल के पीड़ितों का दर्द मुझे अब भी असह्य हो रहा है, जब तक मेरे कानों में जनता के दुःख के समाचार पहुँचते रहेंगे, तब तक मुझे शांति न मिलेगी।”
साधना और सद्भाव मिला होता है। इसी ऋण को चुकाना ऐसा बड़ा काम है जिसमें आधी जिन्दगी लग सकती है। जन्म के समय जिन सम्बन्धियों के साथ संयोग मिला था, उनमें माता-पिता, बड़े भाई-बहन, नाना-नानी इतने होते हैं कि उन्हीं को समुन्नत बनाना एक बहुत बड़ा काम है उसी को पूरा कर लिया जाय तो क्या कम है?
साधना-स्थलियाँ अपने प्राकृतिक रूप में यहाँ बने तथा इससे सुपात्र व्यक्ति लाभ उठायें। स्वयं को गलाकर भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनन्दा को जन्म देने वाले इस हिमालय में कृत्रिम बाँध बनाकर देवी प्रकोपों को आमंत्रित न करें। यदि हम हिमालय को सुरक्षित रख सके तो हमारा साँस्कृतिक गौरव भी अक्षुण्ण बना रहेगा तथा हम इक्कीसवीं सदी के लिए प्राणवान पीढ़ी भी समाज के लिए छोड़कर जा सकेंगे।
साधना, संस्कृति, शिक्षा कभी कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमाबद्ध थी, उसका द्वार अब उसके लिए खोल दिया गया है। प्रत्यक्ष एवं परोक्ष-जगत में इसकी व्यापकता को विवेकवान सहज ही अनुभव करते हैं। अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न दिव्यदर्शियों से लेकर मूर्धन्य चिन्तक, मनीषी, वैज्ञानिक तक सारी मानवजाति का भविष्य उज्ज्वल होने की बात पर जोर देते हुए अब चिन्तन चेतना में आमूल-चूल परिवर्तन की बात करते हैं।
साधना से करनी चाहिए।” अंतःकरण में हंस-वृत्ति की स्थापना की यह साधना ही अजपा गायत्री कही जाती है। अग्नि-पुराण, शिव-स्वरोदय, गोरक्ष-संहिता, तंत्र-सार आदि में इसे समस्त पापों से छुटकारा दिलाने वाली एवं मोक्ष प्रदाता कहा गया है।
साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंतःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधना के पूर्वार्द्ध में अपने काय-कलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की-परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के, प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।
साधना का समापन ही हिमालय की छाया व भागीरथी की गोद में कर प्राणों का विसर्जन किया। स्वामी विवेकानन्द ने अल्मोड़ा में हिमालय के दर्शन कर स्वयं को कृतार्थ किया व बाद में विश्व की एक निराली स्थापना मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना करके की। अल्मोड़ा में वे अपने अल्पकालीन जीवनावधि में तीन-तीन बार आए तथा यहीं से पर्वत श्रृंखलाओं में भ्रमण करते हुए वे पूरे उत्तराखण्ड में विचरण कर गए। निश्चित ही कोई विशेष कारण रहा होगा जो इन महापुरुषों ने
साधना प्रकोष्ठ की तीन सीढ़ियाँ उनसे चढ़ी न जा सकी। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गए। उनकी कृश देह माँ गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरी। ऋषि अचेत हो गए।
साधनात्मक उपचारों से सहज ही पूरा किया जा सकता है। विश्व विख्यात दार्शनिक-प्लेटो इस तथ्य की पुष्टि बहुत पहले ही कर चुके हैं कि मानव सभ्यता की शक्ति इतनी प्रचण्ड है कि सैन्य बल तक को उसके समक्ष पराजित होना पड़ता है। आज लोगों की सांस्कृतिक चेतना जगी है और सभ्यता का विकास हुआ है।
साधना कहते हैं।
साधना में प्रखर तत्परता (5) आत्मीयता का चरम विस्तार।
साधना उसे इसीलिए कहा गया है कि सेवा में कहीं आत्मा श्लाघा की प्रवंचना न जुड़ जाए, उदार आत्मीयता का विस्तार होने पर जो करुणा उमंगती है और दूसरों को ऊँचा उठाने आगे बढ़ाने के लिए जो साहस प्रखर होता है, उसकी तृप्ति अपनी क्षमताएँ सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित किये बिना नहीं होती। इस परमार्थ परायणता को ही सेवा साधना कहते हैं।
साधना के विद्यार्थी ललचाते रहते हैं और जिसके न मिलने पर अपने अभ्यास की असफलता अनुभव करके खिन्न होते हैं।
साधना मानकर करने की शिक्षा लेकर लौटे। यही तो बन्धन मुक्ति का राजमार्ग है, जो उन्हें बुद्ध के कर्मयोग का दर्शन कर स्वतः मिल गया।
साधना करनी पड़ेगी। जब तुम यह दूसरा चरण भी पूरा कर लेगी, तब दीक्षा की पात्र बनोगी।”
साधना द्वारा ही संभव हो पाता है। इससे कम में इतना हो शक्य है, जितना “छाया-पुरुष” स्तर के साधक कर पाते हैं। यदा-कदा यही छाया-पुरुष वैसे लोगों के सम्मुख प्रकट हो जाते हैं, जो तप जैसे कोई क्रिया-कृत्य तो नहीं करते; पर जिनका अन्तराल तनिक शुद्ध और संकल्प सात्विक हो। ऐसे में अनेक बार ये महत्वपूर्ण सूचनाएँ दे जाते हैं, जो बाद में सही साबित होती हैं। ऐसी ही कुछ घटनाएँ पिछले दिनों घटित हुईं और सत्य भी सिद्ध हुईं।
साधनाएं करने वाले व्यक्ति यहाँ आते व अपना साधना पुरुषार्थ संपन्न करते हैं। तिब्बत जिसे रुफ ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता है में कभी संपन्न होने वाले विशिष्ट स्तर के मंत्रशक्ति व तंत्रशक्ति के प्रयोग इसी क्षेत्र में अभी भी कई साधक संपन्न करते देखे जाते हैं। कैलाश-मानसरोवर का क्षेत्र इसी से जुड़ा हुआ है तथा परमपूज्य गुरुदेव ने तो शिवलिंग-भगीरथ पर्वत-गोमुख -गंगोत्री ग्लेशियर जैसे क्षेत्र को ही वास्तविक कैलाश मानसरोवर कहा है। बर्फ की श्वेत चादर से ढके इन पर्वतों को सूक्ष्म दृष्टि से देखने वाले साधक वास्तव में जाग्रत जीवन्त पाते हैं। हिमवान् पर्वतराज हिमालय की पुत्री जो प्रलयंकर शंकर के परिणय बंधन में बंधी ने भी यहीं तपकर अपनी पात्रता का संवर्धन किया।
साधना का उत्तरार्द्ध भी एक तथ्य बन गया।
साधना का तो एक अंग ही माना गया हैं ईश्वर सामीप्य-सान्निध्य का इससे बढ़कर सरल साधन और कोई नहीं है।
साधना विज्ञान में एक साधना “छाया-पुरुष” की बताई गई है। इसमें अपनी ही प्रतिकृति को दर्पण में देख-देख कर श्रद्धा और विश्वास के माध्यम से उसे इतना सशक्त और सबल बना लिया जाता है कि वह एक स्वतंत्र सत्ता की तरह काम करने लगती है। आरंभ में यह सत्ता निर्बल होती है और मात्र दर्शन-झाँकी जैसे कार्य ही सम्पन्न कर पाती है; किन्तु जैसे-जैसे व्यक्ति की संकल्प शक्ति बढ़ती जाती है, वैसे ही वैसे “छाया-पुरुष” की समर्थता भी बढ़ने लगती है। फिर स्वामिभक्त सेवक की तरह ऐसे कार्य करवाने में साधक उससे सफल हो जाता है, जो सामान्य स्तर के साधक के लिए संभव नहीं होता और सामान्य स्तर का व्यक्ति उसे सिद्ध योगी मानने लगता है, जबकि उसकी अपनी योग्यता मात्र इतनी भर होती है, कि उसने अपनी गहन आस्था का आरोपण कर उसमें स्वयं को अनुप्राणित कर लिया। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विभूति उसके अन्दर होती नहीं।
साधना का एकमात्र व सच्चा स्वरूप है। सेवा के साथ साधना शब्द जोड़कर सेवा साधना उसे इसीलिए कहा गया है कि सेवा में कहीं आत्मा श्लाघा की प्रवंचना न जुड़ जाए, उदार आत्मीयता का विस्तार होने पर जो करुणा उमंगती है और दूसरों को ऊँचा उठाने आगे बढ़ाने के लिए जो साहस प्रखर होता है, उसकी तृप्ति अपनी क्षमताएँ सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित किये बिना नहीं होती। इस परमार्थ परायणता को ही सेवा साधना कहते हैं।
साधना”, (खण्ड-2) के “सूर्य विज्ञान रहस्य “ अध्याय में लिखते है कि सूर्य विज्ञान के माध्यम से गुलाब के फूल को गुड़हल में अथवा जवा पुष्प को कमल में बदल देना प्रकट रूप से रूपांतरण जैसा लग सकता है; पर सच्चाई यह है कि गुलाब का गुड़हल कभी नहीं बनता, वरन् उसमें जो गुड़हल का प्रच्छन्न अंश है, वह सक्रिय हो जाता है और आकाश में अपने सजातीय अणुओं को खींच कर अपनी अभिव्यक्ति करता है। इसका यह मतलब कदापि नहीं कि गुड़हल से गुलाब की सत्ता बिल्कुल ही समाप्त हो गई, अपितु यथार्थता यह है कि वह अप्रकट रूप में अब भी उसमें मौजूद है। सूर्य विज्ञान द्वारा सिर्फ इतना किया जाता है कि जो प्रकट है, उसे अप्रकट बना दे और जो अप्रकट-अगोचर है, उसे गोचर कर दे।
साधना, उपासना, व्यापार, धर्म और दर्शन, भाषा और शासन व्यवस्था आदि की दृष्टि से भारतीय संविधान से जुड़ी रहीं। ईसा से 1500 वर्ष पूर्व मध्य एशिया में ‘मिटानी’ और हिटाइट’ नामक दो पड़ोसी राज्य थे। मिटानी का शासक ‘मालिउजाला’ था। और हिटज्ञइट में ‘शाविलुउिमा’ राज्य करता था। प्राचीनकाल में जब दो राजाओं के मध्य सन्धि या किसी प्रस्ताव पर बातचीत होती थी तो अदालतों में जिस प्रकार भगवान की शपथ ली जाती है, उसी प्रकार देवताओं को साक्षी बनाया जाता था।
साधना में प्रवेश कराया।
साधना पुरुषार्थ संपन्न करते हैं। तिब्बत जिसे रुफ ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता है में कभी संपन्न होने वाले विशिष्ट स्तर के मंत्रशक्ति व तंत्रशक्ति के प्रयोग इसी क्षेत्र में अभी भी कई साधक संपन्न करते देखे जाते हैं। कैलाश-मानसरोवर का क्षेत्र इसी से जुड़ा हुआ है तथा परमपूज्य गुरुदेव ने तो शिवलिंग-भगीरथ पर्वत-गोमुख -गंगोत्री ग्लेशियर जैसे क्षेत्र को ही वास्तविक कैलाश मानसरोवर कहा है। बर्फ की श्वेत चादर से ढके इन पर्वतों को सूक्ष्म दृष्टि से देखने वाले साधक वास्तव में जाग्रत जीवन्त पाते हैं। हिमवान् पर्वतराज हिमालय की पुत्री जो प्रलयंकर शंकर के परिणय बंधन में बंधी ने भी यहीं तपकर अपनी पात्रता का संवर्धन किया।
साधना का यही है भावनात्मक एवं व्यवहारिक स्वरूप। ईश्वर साक्षात्कार की यह सबसे सरल, सहज एवं सर्वोपयोगी साधना है जिसे अपना कर हर कोई लाभान्वित हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-March
साधना का अपना महत्त्व है। दैनिक कृत्यों में उसे ऐसे ही रेचक, कुम्भक, पूरक के नित्य कर्म में संयुक्त रखा जाता है। फेफड़ों के व्यायाम के लिए -डीप ब्रीदिंग- लम्बी साँस लेने की कई पद्धतियाँ देश-विदेश में इन दिनों बहुत लोकप्रिय और लाभप्रद सिद्ध हो रही है। शिथिलासन के साथ किया जाने वाला प्राणाकर्षण प्राणायाम अपनी उपयोगिता के लिए प्रख्यात है। चौरासी सामान्य और उनमें से चुने हुए आठ विशिष्टों की चर्चा साधना ग्रन्थों में मिलती है।
साधना का आश्रय लेकर सब प्रकार धन्य बनता है इसे कल्प-वृक्ष कामधेनु, अमृत, पारस आदि नामों से सम्बोधन किया गया है। परा विद्या यही है। कूर्म पुराण में उसका गुणानुवाद गाते हुए कहा गया है-
साधना में सभी को एक लाठी से नहीं हाँका जा सकता ।
साधना का लाभ उठाने का अवसर दिया जाना है। स्थान और संख्या का सन्तुलन मिलाते हुए यह व्यवस्था बनाई गई है कि व्यस्त व्यक्तियों के लिए दस-दस दिन के और थोड़ी अधिक सुविधा वालों के लिए एक-एक महीने के सत्र चलें। इसके लिए सन् 77 के शेष 6 महीनों का कार्यक्रम अभी घोषित किया जा रहा है। सन् 78 के लिए स्थिति के अनुरूप कार्यक्रम निर्धारित किया जायेगा।
साधनाओं को परम पुरुषार्थ कहा गया है। सामान्य पुरुषार्थों से धन, बल थोड़ी सी भौतिक उपलब्धियाँ स्वल्प मात्रा में उपार्जित की जा सकती है। वे भी अस्थिर होती है और मिलने के बाद उलटी अतृप्ति, भड़काती चलती हैं। किन्तु आत्मिक विभूतियों को उपार्जित करने की दिशा में बढ़ने पर प्रत्येक चरण क्रमशः अधिक उच्चस्तरीय प्रस्तुत करता चलता है। वे स्थायी भी होते हैं और तृप्ति कारक भी ।
साधना की प्रक्रिया को ‘ब्रह्मवर्चस्’ नाम दिया गया है।
साधना विज्ञान का मन्तव्य इस प्रकार है-
साधना का प्रतिफल उस आत्म-ज्ञान की-ब्रह्मबोध की उपलब्धि बताया है जिसे प्राप्त करने के उपरान्त समस्त साँसारिक क्लेशों से छुटकारा मिलता है और अंतःक्षेत्र के भव-बन्धनों से मुक्ति मिलती है। मोक्ष की प्राप्ति, ब्रह्म प्राप्ति, दिव्य समाधि, जीवन-मुक्ति जैसी परम सिद्धि इस सहस्रार महाकेन्द्र से ही उपलब्ध होती है । यथा -
साधना के लिए उपयुक्त वातावरण एवं साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक नाम से जो नया आश्रम इन दिनों बन रहा है उसमें इसी प्रकार की व्यवस्था की गई हैं। यह स्थान बिलकुल गंगा तट पर है। कुछ ही गज दूरी पर भगवती जाह्नवी की पुनीत धारा बहती है। उसी में स्नान, उसी का जल-पान सातों ऋषियों ने जिस भूमि पर बैठकर तप किया था, गंगा ने उनके व्यक्तित्व और प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए स्वयं ही मार्ग छोड़ दिया था और सात धाराओं में बहने लगी थीं।
साधना का मूल आधार है। मन अन्न से बनता है। अस्तु ब्रह्म वर्चस् साधना काल में साधकों के आहार का विशेष निर्धारण रहेगा। वह उपवास स्तर का होगा। हमें भी जो की रोटी और छाछ पर अपनी लम्बी उपासना अवधि पूरी करनी पड़ी है।
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष का पिछला वर्श जपात्मक था। उसे पूर्वार्ध कहना चाहिए। पुरश्चरणों का उत्तरार्ध होमात्मक होता है। वर्तमान वर्ष में इस पक्ष को पूरा किया जा रहा है। हमारे 24 वर्श के 24 गायत्री महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति गायत्री तपोभूमि के सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ में संपन्न हुई थीं।
साधना उसी के सहारे बन पड़ती है। लोक-सम्मान से लेकर आत्म-सन्तोष तक के अनेकानेक वरदान उसी सहारे उपलब्ध होते हैं, भविष्य निर्माण का एकमात्र उपाय आत्म-निर्माण ही माना गया है। संचित कुसंस्कारों से जूझना- उन्हें उखाड़ फेंकना प्रबल पुरुषार्थ कहा जाता है। दूसरों से लड़ने की अपेक्षा अपने से लड़ना-आन्तरिक शत्रुओं को परास्त करना अधिक कठिन है। आत्म-शोधन के मोर्चे पर लड़ना और विजय प्राप्त करना-बाह्य जगत की किसी भी सफलता की तुलना में अधिक श्रेयस्कर है।
साधना। इसे भौतिक मनोवैज्ञानिक भाषा में स्व संकेत -स्व शिक्षण-आत्म निर्देश आदि कह सकते हैं। आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दृष्टि से यह सूक्ष्म जगत से ब्रह्म चेतना से सम्पर्क स्थापित करके उपयुक्त आदान-प्रदान का द्वार खोलना है। इस प्रयार को उपासना साधना के नाम से जाना जात है। भक्ति-भावना के साथ अध्यात्म साधनाओं में निरत रहने की प्रक्रिया अभिनव और उपयोगी आस्थाओं की प्रतिष्ठापना अन्तःकरण के मर्मस्थल में कर सकना सम्भव हो जाता है।
साधना की आधारशिला यही है। अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा का केन्द्र संस्थान भी यही माना गया है। आत्म परिचय देते हुए प्रायः लोग छाती ठोक कर अपने वर्चस्व का परिचय देते हैं और वे क्या करने जा रहे हैं इस संकल्प का परिचय देते हैं।
साधनात्मक क्रिया-कलापों से श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा विकसित करने के साथ-साथ निकृष्टता के उन्मूलन का प्रयोजन भी साथ-साथ सिद्ध होता चलता है।
साधना करते हुए इस प्राण-शक्ति को निग्रहित और दिशा नियोजित किया जाता है। फलतः उसके सत्परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं।
साधना की सिद्धि के रूप में जाना जाता है।
साधना की सफलता से साधक में अनेकों दिव्य क्षमताएँ विकसित होने काक विश्वास किया जाता है। समझा जाता है कि ऐसा व्यक्ति सामान्य स्थिति से ऊँचा उठकर विशिष्ट सिद्ध पुरुषों की स्थिति में जा पहुँचता है। शरीरबल और मनोबल से भी ऊँची शक्ति आत्मबल की है। इसके आधार पर स्व पर कल्याण की अति महत्वपूर्ण दिव्य उपलब्धियाँ करतलगत होती है। इस विशेषता से दैवी शक्तियाँ आकर्षित होती है और साधक की पात्रता के अनुरूप अपनी अनुकम्पा बरसती है।
साधना के सम्बन्ध में सार्वभौम स्तर पर नहीं मिलती। उसके विधानों और विवरणों में तो थोड़ा बहुत अन्तर है, पर यह मान्यता सर्वविदित है किन्तु आन्तरिक आत्मिक शक्तियों को प्रसुप्ति से जागृति में बदलने -जागृत को प्रचण्ड बनाने में कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया से असाधारण सहायता मिलती है।
साधना आरम्भ करते हुए पंच कोशों के परिष्कार एवं कुण्डलिनी जागरण की महान् साहसिकता का परिचय देते हुए-सर्व प्रथम पाप परिमार्जन की प्रायश्चित प्रक्रिया सम्पन्न की जानी चाहिए।
साधना शास्त्र में कही कमल पुष्प तुल्य और कहीं अंगुष्ठ आकार की प्रकाश ज्योति के सूक्ष्म दर्शन का उल्लेख है। कहा गया है-
साधना सम्पन्न मनुष्य सदा पवित्र रहता है॥ मनस्वी बनता है। उसे परम पद मिलता है। पुनर्जन्म नहीं होता।
साधना की जा सकती है। प्राणायाम दीखने में ही सामान्य लगता है, पर यदि उच्चस्तरीय विधान के आधार पर साधा जाय तो शारीरिक , मानसिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए उससे महत्त्वपूर्ण लाभ उठाया जा सकता है।
साधना का महत्त्व स्पष्ट होता चला जाता है।
साधना में ही सम्मिलित रखा गया है। यह करने पर आत्मिक प्रगति द्रुत गति से होने लगती है।
साधना का अविच्छिन्न अंग हैं। धुलाई के बिना रँगाई कहाँ हो पाती है ? साधना रँगाई है और प्रायश्चित प्रक्रिया धुलाई। यह सब व्यक्तिगत परामर्श के उपरान्त ही निर्धारित होगा। साधनाएँ भी सब की एक जैसी नहीं हो सकती।
साधना स्वर्ण जयंती वर्श में सर्व साधारण को समझाने का प्रयत्न किया गया और उसमें समुचित सफलता भी मिली। बसन्त पर्व 76 से बसंत 77 तक के एक वर्श में प्रायः एक लाख साधकों का नियमित रूप से साधना क्रम संकल्पपूर्वक संपन्न हुआ । इसमें 2400 करोड़ सामूहिक गायत्री जप अनुष्ठान संपन्न हुआ।
साधनाएँ भी प्राण विद्या के अंतर्गत ही आती है। इनमें से पंचकोशी साधना के अंतर्गत प्राणमय कोश के परिष्कार के लिए किसे कौन-सा प्राणायाम करना चाहिए, उसका विधान साधकों की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्थिति को परख करके ही बताया जा सकता है। कोश साधना में सभी को एक लाठी से नहीं हाँका जा सकता ।
साधना प्रक्रिया निर्धारित होती है। साधकों को शान्तिकुञ्ज बुलाने की आवश्यकता का एक कारण यह व्यक्तिगत पर्यवेक्षण भी है। वातावरण एवं संरक्षण की विशेषता वाली बात तो पहले ही कही जा चुकी है।
साधना करनी चाहिए।
साधना काल में अनुशासन पालन करने का आश्वासन इन सभी बातों का विस्तृत विवरण लिखकर भेजा जाना चाहिए।
साधना करने से स्थूल और सूक्ष्म जगत पर समान रूप से अधिकार मिलता है। भौतिक और आत्मिक सिद्धियों का दिव्य संस्थान इस विज्ञानमय कोश को ही माना गया है।
साधना में व्यावहारिक जीवन में काम आने वाली दूरदर्शिता और सूक्ष्म जगत के अंतर्गत हो रही हलचलों को समझ सकना उसी उपलब्धि के सहारे सम्भव होता है। इतना ही नहीं उस जागृत दिव्य क्षमता से व्यक्तियों को-पदार्थों को-परिस्थितियों को प्रभावित कर सकना भी सम्भव होता है। आज्ञा चक्र को जागृत कर सकना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
साधना योग द्वारा जाग्रत किया जा सके तो उसकी आकर्षण क्षमता सहज हो बढ़ जाएगी और उसकी प्रखरता के आधार पर इतना कुछ अदृश्य अनुदान प्राप्त किया जा सकेगा जो रक्त माँस आदि स्थूल सम्बन्धों की अपेक्षा कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही उपयोगी है।
साधना परक तपश्चर्या-दोनों ही हर दृष्टि से तथ्यपूर्ण है। वे आस्था की दृष्टि से ही उपयोगी नहीं है वरन् तर्क, तथ्य और प्रमाणों की दृष्टि से भी स्वीकार करने योग्य है। उनके समर्थन में इतना कुछ कहा जा सकता है कि अनास्था के लिए कम ही गुँजाइश रह जाएगी। अनुभवों की कसौटी पर कस कर इसके प्रभाव की स्वयं परीक्षा की जा सकती है। दूसरों से प्रमाण पूछने की अपेक्षा यह आत्म-साक्षी और भी अधिक समाधान कारक हो सकती है।
साधना में योगी शिरश्चन्द्र से झरने वाले उस दिव्य रस को पीता है जो सब व्याधियों का नाश करने वाला है।
साधना एक ही तथ्य के दो नाम रूप हैं। साधना से सिद्धि मिलने की मान्यता के पीछे शक्ति सम्पादन का रहस्य ही काम करता है। सशक्तता ही प्रगति, समृद्धि और विभूति के त्रिविध सत्परिणाम उत्पन्न करती रहती है।
साधना’ का उपाय अपनाना पड़ता है। इस जागरण प्रयास में लगने के लिए जो साहस करते हैं वे भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में समुन्नत स्थिति प्राप्त करते चले जाते हैं। इस महान् जागरण के लिए प्रोत्साहित करते हुए शास्त्रकार कहते हैं-
साधनात्मक अवलम्बन ग्रहण करने से उपलब्ध हो सकती है। उपासना को व्यायाम और साधना को आहार-विहार की सुव्यवस्था के समतुल्य माना गया है। अन्तःशक्ति के सहारे व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाता है और उस आधार पर अनेकानेक सिद्धियाँ, सरलताएँ प्राप्त करने का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है।
साधनाओं में निरत रहने की प्रक्रिया अभिनव और उपयोगी आस्थाओं की प्रतिष्ठापना अन्तःकरण के मर्मस्थल में कर सकना सम्भव हो जाता है। स्पष्ट है यह स्थापना पुरानी अनुपयुक्तता का उन्मूलन भी करती है। सुसंस्कारों की अभिवृद्धि से कुसंस्कारों का निरस्त होते जाना स्वाभाविक है। मात्र अवांछनीयता के उन्मूलन का प्रयास सफल नहीं हो सकता उस स्थान पर परिष्कृत स्थापना की नितान्त आवश्यकता रहती है। साधनात्मक क्रिया-कलापों से श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा विकसित करने के साथ-साथ निकृष्टता के उन्मूलन का प्रयोजन भी साथ-साथ सिद्ध होता चलता है।
साधना प्रयास आरम्भ करता है और उस परम पुरुषार्थ का समुचित लाभ प्राप्त करता है कहा गया है कि -
साधना से अधिक है। परन्तु वह प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर मन स्थिर हो जाता है, यह कौन स्वीकार नहीं करेगा।
साधना की जाय। वस्तुतः इन्हीं अन्तः क्षमताओं को अलंकार रूप से दिव्य लोक में निवास करने वाली सत्ता कहा गया है। यह दिव्य लोक अपना ही अन्तः प्रदेश समझा जाना चाहिए और देवी देवताओं के रूप में अंतः क्षमताओं को मान्यता देनी चाहिए।
साधनात्मक है। उनके माध्यम से मनःशक्ति विकसित और परिष्कृत की जाती है । मनः क्षेत्र में प्रवेश का द्वार आज्ञा चक्र माना गया है। इस संस्थान को जागृत करने से चेतना की उन गहरी परतों से सक्रियता उत्पन्न होती है, जो व्यक्तित्व के समग्र विकास की भूमिका बनती है। आज्ञा चक्र का जागरण प्रकारान्तर से मस्तिष्कीय संस्थान की चेतन और अचेतन दोनों ही परतों को प्रभावित करता है।
साधनाओं का परिचय (9) साधना काल में अनुशासन पालन करने का आश्वासन इन सभी बातों का विस्तृत विवरण लिखकर भेजा जाना चाहिए।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्श के साधक एक लाख है। इसके अतिरिक्त भी अन्य अधिकारी सत्पात्र है जिन्हें इस साधना का लाभ उठाने का अवसर दिया जाना है। स्थान और संख्या का सन्तुलन मिलाते हुए यह व्यवस्था बनाई गई है कि व्यस्त व्यक्तियों के लिए दस-दस दिन के और थोड़ी अधिक सुविधा वालों के लिए एक-एक महीने के सत्र चलें। इसके लिए सन् 77 के शेष 6 महीनों का कार्यक्रम अभी घोषित किया जा रहा है। सन् 78 के लिए स्थिति के अनुरूप कार्यक्रम निर्धारित किया जायेगा।
साधना शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है-
साधना शास्त्रों ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि अपने ही भीतर विद्यमान् इस महती क्षमता का ज्ञान प्राप्त किया जाय और उससे सम्पर्क साधने का प्रयत्न किया जाय। कुण्डलिनी परिचय के कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं -
साधना को सफलता भी उसी स्तर की मनोभूमि में सम्भव होती है। ऋतम्भरा भाव-भूमिका को अध्यात्म विज्ञान में ‘गायत्री’ कहा गया है। अस्तु गायत्री महाविद्या की पृष्ठभूमि पर हो ब्रह्म वर्चस् विज्ञान का भवन खड़ा किया गया है।
साधना से इसी मस्तिष्कीय क्षमता की मनोविज्ञान और परा मनोविज्ञान क्षमताओं की चर्चा-विवेचना होती है। आनंदमयकोश की स्थिति भिन्न है उसमें जीव और ब्रह्म के मिलने का संपर्क साधने वाले अति उच्चस्तरीय सूत्र हैं। शरीर क्षेत्र में ईश्वर का निवास कहाँ है ? इसका उत्तर साधारणतया समूची सत्ता में सव्याँस कहा जा सकता है, पर यदि उसका अन्य कोशों जैसा प्रवेश द्वार या केंद्र संस्थान पूछना हो तो उसे ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्रारचक्र कहना पड़ेगा।
साधना की प्रगति में दृष्टिगोचर होकर रहता है। जिस दिव्य संरक्षण, मार्ग-दर्शन प्रकाश और अनुदान की इसमें व्यवस्था रहेगी उससे इस साधना स्थल का महत्त्व और भी बढ़ा है।
साधना जैसे मातृ शक्ति में विशिष्ट रूप से पाये जाने वाले गुणों का साधक को अनुदान मिलता है। इस प्रतीक पूजा से नारी तत्त्व के प्रति पूज्य भाव की सहज श्रद्धा उत्पन्न होती है। सद्बुद्धि, ऋतम्भरा, प्रज्ञा, विवेकशीलता, दूरदर्शिता जैसी सत्प्रवृत्तियों को साहित्य में स्त्री लिंग माना गया है। अस्तु इस चिन्तन के इस दिव्य प्रवाह को यदि अलंकारिक रूप से नारी प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है तो उसे उचित ही कहा जा सकता है।
साधना का पूर्वार्ध आत्मिक है। उसमें वाचिक, मानसिक, उपाँशु पद्धति के अनुष्ठान पुरश्चरण करने पड़ते हैं। उनकी पूर्णाहुति होमात्मक होती है। ब्रह्मभोज; कन्याभोज जैसे दान-पुण्य भी साथ में जुड़ते हैं। इन साधनाओं में उपवास ब्रह्मचर्य आदि की तितीक्षाएँ भी करनी पड़ती है।
साधना शास्त्र में स्थान-स्थान पर हुआ है। यथा-
साधना से उन सब का निराकरण होता है। मानसिक स्थिरता आने पर चित्त परब्रह्म परमात्मा में लग जाता है।
साधनात्मक बनाये रहने की दृष्टि से परिजनों की नाराजगी की जोखिम उठाते हुए भी इस बार यह कठोर व्यवस्था बना दी गई है और भविष्य में भी वह बनी ही रहेगी।
साधना काल में नहीं बनेगी। इससे आगे या पीछे ही वह सब करना होगा। बाज़ार में कुछ भी चाटते पीते रहने की छूट किसी को भी न मिलेगी। इसलिए चटोरे, अनुशासन हीन व्यक्तियों को या तो नहीं ही आना चाहिए अन्यथा साधना काल में अपने ऊपर अंकुश रखे रहने की बात सोचनी चाहिए। तपश्चर्या का महत्त्व और गौरव जो समझ सके उसमें समुचित श्रद्धा बनाये रह सके उन्हीं के लिए इस साधना की सार्थकता है।
साधना विभिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने ढंग से की भी जाती है। साधन बल भी एक बल है। प्रगति और सुख-सुविधा के लिए साधनों का संचय भी प्रकारान्तर से शक्ति साधना का ही एक रूप है। पर अभाव एक ही बात का रह जाता है उसमें क्रिया और बुद्धि का ही समन्वय रहता है। यदि इसमें उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं का भी समावेश रहा होता तो निश्चित रूप से यही प्रयत्न आकाश में टँगे रवि-राशि और तारक मण्डल की तरह चमचमाते-जगमगाते दृष्टिगोचर होते।
साधना कहते हैं
साधना रँगाई है और प्रायश्चित प्रक्रिया धुलाई। यह सब व्यक्तिगत परामर्श के उपरान्त ही निर्धारित होगा। साधनाएँ भी सब की एक जैसी नहीं हो सकती। सभी मरीजों को एक दवा नहीं दी जा सकती उनकी स्थिति के अनुरूप ही साधना प्रक्रिया निर्धारित होती है। साधकों को शान्तिकुञ्ज बुलाने की आवश्यकता का एक कारण यह व्यक्तिगत पर्यवेक्षण भी है।
साधना है। कोशों के जागृत होने पर व्यक्तित्व का स्तर कैसा होता है इसकी जानकारी शिव गीता में इस प्रकार दी गई है।
साधना इसी स्तर की होगी। उससे खतरा असुरता के अतिरिक्त और किसी को नहीं है।
साधना में प्रयुक्त किया जाता है। प्रकारान्तर से सूर्य उपासना का तात्पर्य ब्रह्म तेज का अवतरण आत्म चेतना की पृष्ठ भूमि पर सम्पन्न कराना है। आत्मा को पृथ्वी और ब्रह्म तेज को सूर्य की उपमा दी जा सकती है। पृथ्वी पर जो जीवन दृष्टिगोचर होता है वह सूर्य का ही अनुदान है। सूर्य आत्मा जगतस्थुश्च’ सूर्य को जगत् की आत्मा बताया गया है।
साधना की हुई गायत्री से भला कौन-सा लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता ।
साधना के नाम से जाना जाता है। इसे ‘ब्रह्म विद्या’ पक्ष कहना चाहिए। ऋतम्भरा प्रज्ञा तत्त्व दृष्टि विकसित करने के लिए इस आधार का अवलम्बन करना होता है।
साधनाओं के लिए गुफा में प्रवेश करके सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं उसी प्रकार इस हृदय गुफा में प्रवेश करके दिव्य उपलब्धियाँ प्राप्त की जाती है। बोलचाल की भाषा में हृदय शब्द का उपयोग संवेदनाओं के लिए किया जाता है। सहृदय का अर्थ कोमल भावनाओं वाला। हृदयहीन अर्थ निष्ठुर। यह रक्त फेंकने वाली थैली के गुण नहीं वरन् उस सचेतन हृदय तत्त्व के गुण हैं जिसे अध्यात्म की भाषा में हृदय चक्र , ब्रह्म चक्र कहा जाता है।
साधना करने का निर्देश साधना शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है-
साधना के शिक्षार्थियों को इस संदर्भ में हमारा परामर्श, मार्ग दर्शन प्राप्त हो सकता है। प्रायश्चित्त का प्रथम चरण जी खोल कर बिना लाग लपेट और दुराव के दुष्कर्मों के समय की मनः स्थिति एवं परिस्थिति का विवरण बताना चाहिए। यह विवरण थोड़ा बड़ा हो जाय तो हर्ज नहीं। संक्षेप में घटना तो बताई जा सकती है पर पाप के वजन का मूल्यांकन करने के लिए इसकी पृष्ठ भूमि समझाई जानी आवश्यक है। जी खोल कर अपने दुष्कर्म को किसी ऐसे व्यक्ति के सम्मुख कहा जा सकता है, जिससे उसके प्रकटीकरण की -प्रतिष्ठा नष्ट किये जाने या किसी प्रकार की हानि पहुँचाये जाने की आशंका न हो ।
साधना की सार्थकता है। अव्यवस्था फैलाने में तो साधक, शिक्षक तब सभी निंदित होते हैं।
साधना के बिना कार्य सिद्धि कैसे हो ?
साधना वर्श की पूर्णाहुति उत्तरार्र्द्ध की तैयारी कर रहे हैं। यह हर्श और सन्तोश की बात है। इन प्रयत्नों का इन पंक्तियों द्वारा अभिवादन और प्रोत्साहन किया जा रहा है। इस दिशा में प्रस्तुत किये गये अनुदान बीज के रूप में गलेंगे तो सही पर उनके प्रतिफल सुविकसित अक्षय वट के रूप में पल्लवित होंगे यह भी निश्चित है। इन आयोजनों की तिथियाँ निर्धारित करने एवं प्रचारक भेजने के संबंध में गायत्री तपोभूमि मथुरा से ही संपर्क स्थापित करें।
साधनारत रहे । स्वर्ण जयन्ती वर्श में सम्मिलित हुए हैं उन्हें ब्रह्म वर्चस् सत्रों में प्राथमिकता दी जाएगी। यों प्रतिबन्ध किन्हीं भी सत्पात्रों पर नहीं है। हर हालत में -किस सत्र में आना है इसका आवेदन पत्र भेजते हुए पूर्व स्वीकृति के कोई न आवे। आवेदन पत्र में (1) प्रवेशार्थी का पूरा नाम पता (2) आयु (3) जन्मजाति (4) शिक्षा (5) व्यवसाय (6) मिशन से परिचय एवं सम्बन्ध का विवरण (7) अब तक की साधनाओं का परिचय (9) साधना काल में अनुशासन पालन करने का आश्वासन इन सभी बातों का विस्तृत विवरण लिखकर भेजा जाना चाहिए।
साधनाओं को आवश्यक मानता है। उसके जागरण का अर्थ केवल उसकी तीक्ष्णता तथा सक्रियता को बढ़ा देना नहीं है, उसे व्यवस्थित, सुनियंत्रित तथा सुनियोजित भी करना आवश्यक है। वर्तमान वैज्ञानिक उसके विधेयात्मक पक्ष को भले ही न समझ सके हो किन्तु निषेधात्मक पक्ष का अध्ययन रोगों के अंतर्गत अवश्य कर सके हैं। हिस्टीरिया तथा इपीलिप्सी जैसे विभिन्न प्रकार के रोगों की तह में मस्तिष्कीय विद्युत का ही खेल पाया जाता है। जब कोई भाग अस्वाभाविक अथवा अवांछनीय रूप से विद्युत स्पन्दन छोड़ने लगता है तो वह किन्हीं केन्द्रों की स्वाभाविक संचार व्यवस्था में व्यतिक्रम ला देते हैं।
साधना का विज्ञान भाग जाना जा सकता है। उच्चस्तरीय आस्थाओं को स्वीकार कर सकने की कोमलता जिसमें हो सके उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। साधना को सफलता भी उसी स्तर की मनोभूमि में सम्भव होती है। ऋतम्भरा भाव-भूमिका को अध्यात्म विज्ञान में ‘गायत्री’ कहा गया है। अस्तु गायत्री महाविद्या की पृष्ठभूमि पर हो ब्रह्म वर्चस् विज्ञान का भवन खड़ा किया गया है।
साधना के उपयुक्त वातावरण भी और किसी प्रकार यहाँ बन नहीं सकेगा। व्यक्तिगत मैत्री के आधार पर अव्यवस्था फैलाने की छूट नहीं ही माँगी जानी चाहिए।
साधनाओं का सुअवसर मिल रहा हो- हर हालत में व्यावहारिक जीवन का परिष्कार-परिशोधन तो अनिवार्य रहेगा ही।
साधना सम्भव होती है।
साधना विधान की संरचना इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गई है।
साधना का विधान आत्म विज्ञान के मनीषियों ने बताया है।
साधना का महत्त्व घटता है। इन प्रतिबन्धों से परिजनों को थोड़ी असुविधा तो रहेगी पर साधना के उपयुक्त वातावरण भी और किसी प्रकार यहाँ बन नहीं सकेगा। व्यक्तिगत मैत्री के आधार पर अव्यवस्था फैलाने की छूट नहीं ही माँगी जानी चाहिए।
साधना की दृष्टि से आना चाहें वे ही पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न करें। अन्य लोग अन्यत्र ठहरें और दोपहर बाद जैसा कि सामान्यतः मिलने-जुलने का समय निर्धारित हो, मिलकर चले जाय। धर्मशाला और होटल की सुविधा पाने की दृष्टि से इन सत्रों में घुस-पैठ करने वालों को इस बार निश्चित रूप से रोक दिया जाएगा। भले ही नाराजी या वापिस लौटाने का कटु प्रसंग ही क्यों न आ जाय। वातावरण को विशुद्ध साधनात्मक बनाये रहने की दृष्टि से परिजनों की नाराजगी की जोखिम उठाते हुए भी इस बार यह कठोर व्यवस्था बना दी गई है और भविष्य में भी वह बनी ही रहेगी।
साधना प्रक्रिया द्वारा आकर्षित करके अपनी आत्मिक सम्पदा सशक्तता बढ़ाते हैं । इस उपार्जित सम्पदा के आधा पर साँसारिक वैभव और आत्मिक वर्चस्व का दुहरा लाभ मिलता है।
साधना के लिए दो मार्ग है-एक ब्रह्मरंध्र में प्रकाश-ज्योति का ध्यान, दूसरा खेचरी मुद्रा द्वारा तालु दंश से जिह्वा मूल को लगाकर इस अमृत रस का पान करना । खेचरी मुद्रा के स्वरूप, सन्दर्भ एवं प्रतिफल के सम्बन्ध में मिलने वाले उल्लेखों में से कुछ इस प्रकार है-
साधना-क्रम चल पड़ने के बाद पहुँचना अनुपयुक्त हैं। इससे अनुशासन बिगड़ता है और साधना का महत्त्व घटता है। इन प्रतिबन्धों से परिजनों को थोड़ी असुविधा तो रहेगी पर साधना के उपयुक्त वातावरण भी और किसी प्रकार यहाँ बन नहीं सकेगा। व्यक्तिगत मैत्री के आधार पर अव्यवस्था फैलाने की छूट नहीं ही माँगी जानी चाहिए।
साधना काल में अपने ऊपर अंकुश रखे रहने की बात सोचनी चाहिए। तपश्चर्या का महत्त्व और गौरव जो समझ सके उसमें समुचित श्रद्धा बनाये रह सके उन्हीं के लिए इस साधना की सार्थकता है। अव्यवस्था फैलाने में तो साधक, शिक्षक तब सभी निंदित होते हैं।
साधनाओं को जनरेटर चलाने की क्रिया विधि कहा जाना युक्ति संगत है। इनका सम्यक् प्रयोग मूलाधार क्षेत्र में सन्निहित शक्ति बीज को प्रचण्ड कुण्डलिनी ऊर्जा के रूप में विकसित कर सकता है।
साधना को आहार-विहार की सुव्यवस्था के समतुल्य माना गया है। अन्तःशक्ति के सहारे व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाता है और उस आधार पर अनेकानेक सिद्धियाँ, सरलताएँ प्राप्त करने का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है।
साधना उभय-पक्षीय है उसमें आत्मिक और भौतिक प्रगति के लिए समग्र साधन-पद्धति को प्रश्रय दिया गया है। भक्ति की अपनी महत्ता है, पर शक्ति की भी तो उपेक्षा नहीं की जा सकती। शक्ति शिवपत्नी है। कहा गया है कि शक्ति के बिना शिव ‘शव’ मात्र रह जाते हैं, प्रकृति के बिना पुरुष के अस्तित्व का प्रकटीकरण ही नहीं हो सकता ।
साधना में लगा सकता है। जो स्वयं ही आकांक्षाओं की आग में जल रहा है उसे तो दूसरों को ईंधन की तरह उपलब्ध करने का ही मन रहेगा। जो अपने को बादल की तरह निचोड़ सके, वहीं किसी के कुम्हलाये पौधे को नव-जीवन दे सकने में समर्थ हो सकता है। स्वार्थों पर अंकुश लगा सकना-साधु ब्राह्मण जैसा मितव्ययी जीवन-क्रम अपना सकना इस अहंलिप्सा के युग में कितना कठिन है यह किसी से छिपा नहीं। नदी प्रवाह से ठीक उलटी दिशा में केवल साहसी मछली ही छरछराती हुई चल सकती है।
साधना में तथा अन्यान्य उल्लास वर्धक सत्प्रयोजनों में लगाया जा सकता है।
साधना से सिद्धि मिलने की मान्यता के पीछे शक्ति सम्पादन का रहस्य ही काम करता है। सशक्तता ही प्रगति, समृद्धि और विभूति के त्रिविध सत्परिणाम उत्पन्न करती रहती है।
साधना से उपलब्ध होती है।
साधना स्थल का महत्त्व और भी बढ़ा है।
साधना महत्त्व से अपरिचित लोग यहाँ धर्मशाला की तरह आ ठहरते हैं और वे थोड़े से व्यक्ति ही यहाँ के अनुशासन एवं वातावरण का सर्वनाश कर देते हैं। पिछले दिनों हर सत्र में दो-चार व्यक्ति ऐसी गड़बड़ी उत्पन्न करते रहे हैं। अब की बार अत्यन्त कठोरतापूर्वक इस प्रकार की घुस-पैठ को रोक दिया गया है। स्पष्ट कर दिया गया है कि जो मात्र कठोर साधना की दृष्टि से आना चाहें वे ही पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न करें। अन्य लोग अन्यत्र ठहरें और दोपहर बाद जैसा कि सामान्यतः मिलने-जुलने का समय निर्धारित हो, मिलकर चले जाय।
साधना में उपासनात्मक इष्ट देव सविता रखा गया है। कलेवर की प्रतीक पूजा नारी रूप में करने के साथ ही उच्च स्तरीय ध्यान में स्थापना भी प्राण की करनी पड़ेगी। गायत्री का प्राण सविता है। शरीर को देख लेने के बाद किसी भी वस्तु स्थिति उसके आन्तरिक स्तर को समझने में ही विदित होती है। सविता सम्पर्क के लिये अग्रिम कदम बढ़ाने के पीछे भी यही कारण है।
साधना का तात्पर्य है-व्यक्ति चेतना के स्तर को इतना परिष्कृत करना कि उस पर ब्रह्म चेतना के अनुग्रह का अवतरण सहज सम्भव हो सके। यह मान्यता सही नहीं है कि देवता का मनुहार करने पर वे प्रसन्न होते हैं और भक्त को याचक को कृपापूर्वक मनोवाँछित वरदानों से लाद देते हैं। सच्चाई यह है कि आत्म-साधक अपनी पात्रता विकसित करता है और तद्नुरूप पद वृद्धि के साथ जुड़े रहने वाले अनेकों लाभ प्राप्त करता है। नहर जितनी चौड़ी गहरी होती है उसी अनुपान से नदी का जल उसे उपलब्ध होता है। आत्मिक वरिष्ठता बढ़ाने के प्रयास में जितनी सफलता मिलती है उसी आधार पर दैवी अनुदान बरसने आरम्भ हो जाते हैं।
साधना के बीज अंकुर निर्मल चरित्र और उदार व्यवहार का पोषण प्राप्त कर सकें तो ही वे समुन्नत और फलित होते हैं। निकृष्ट चिन्तन और घृणित कर्तृत्व बना रहे तो किसी भी पूजा पाठ से दैवी अनुग्रह प्राप्त नहीं हो सकता। उपासना कपड़े को रंगने के समान है। इससे पूर्व धुलाई होनी चाहिए। मैले कपड़े पर रंग कहाँ चढ़ता है।
साधना क्षेत्र में इसी को जीवनी-शक्ति प्राण-ऊर्जा कुण्डलिनी शक्ति आदि नामों से पुकारते हैं ब्रह्म तेज इसी ब्रह्माग्नि की प्रतिक्रिया है। ओजस्, तेजस् एवं वर्चस् इसी को कहते हैं। ब्रह्माग्नि और ब्रह्म वर्चस् शब्दों में लेखन उच्चारण का ही अन्तर है। तथ्यों की दृष्टि से दोनों को एक ही कहा जा सकता है। ब्राह्मी ऊर्जा उपार्जित कर लेने वाले तपस्वी अपने ढंग के अनोखे शक्तिवान होते हैं।
साधना में प्राणायाम की योगाभ्यास का महत्त्वपूर्ण अंग माना गया है। उससे मात्र मनोनिग्रह का लाभ ही नहीं मिलता अन्य सूक्ष्म संस्थानों का भी परिशोधन होता है। शारीरिक आरोग्य का लाभ सर्वविदित है। फेफड़े सुदृढ़ होने अधिक मात्रा में प्राण वायु के शरीर में प्रवेश करने से जीवन तत्त्व भी अधिक मिलते हैं और परिशोधन की गति भी तीव्र होती है। स्थूल और सूक्ष्म शरीरों पर -स्वास्थ्य संवर्द्धन और मानसिक परिष्कार का प्राणायाम का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है।
साधना काल में साधकों के आहार का विशेष निर्धारण रहेगा। वह उपवास स्तर का होगा। हमें भी जो की रोटी और छाछ पर अपनी लम्बी उपासना अवधि पूरी करनी पड़ी है। ब्रह्म वर्चस् साधकों को भी इस प्रकार की तपश्चर्या के लिए तैयार होकर आना चाहिए। एक दिन दाल-चावल शाक-दूसरे दिन दलिया, दाल-चावल आँवला, शंख-पुष्पी ब्राह्मी, गोरखमुण्डी, तच, शतावरी की चटनी दोनों समय।
साधना से प्राण शक्ति की अभिवृद्धि होती है। अस्तु उसके प्रभाव परिणाम को ब्रह्म वर्चस् कहा जाता है। गायत्री के वरदान ब्रह्म वर्चस् को प्राप्त कर सकने वाला हर क्षेत्र में विभूतिवान् बनता है। इस तथ्य का प्रतिपादन छान्दोग्य उपनिषद् में इस प्रकार मिलता है-
साधना चलती रह सके ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है। गत साधना स्वर्ण जयन्ती वर्श के साधक एक लाख है। इसके अतिरिक्त भी अन्य अधिकारी सत्पात्र है जिन्हें इस साधना का लाभ उठाने का अवसर दिया जाना है। स्थान और संख्या का सन्तुलन मिलाते हुए यह व्यवस्था बनाई गई है कि व्यस्त व्यक्तियों के लिए दस-दस दिन के और थोड़ी अधिक सुविधा वालों के लिए एक-एक महीने के सत्र चलें। इसके लिए सन् 77 के शेष 6 महीनों का कार्यक्रम अभी घोषित किया जा रहा है।
साधना की उपयुक्त प्रतिक्रिया होती है। आत्मिक पवित्रता बढ़ती है। अन्तःकरण में श्रेष्ठ संस्कारों का उभार होने लगता है। ऐसी स्थिति बनती चले तो आत्मिक प्रगति में किसी प्रकार का सन्देह न रह जाएगा। कहा भी है -
साधनाएँ करने का अवसर मिले। इसके लिए एक नाव का प्रबन्ध भी किया जाएगा जो साधकों को उनमें पहुँचाने और लाने के काम आती रहे। सप्त ऋषियों से लेकर अन्यान्य अध्यात्म साधक चिरकाल से इसी दिव्य वातावरण का लाभ लेते और लक्ष्य में सफल होते रहे हैं । देवताओं , ऋषियों और महामानवों ने इस भूमि से महत्त्वपूर्ण अनुदान पाये हैं। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक का निर्माण भी ऐसे ही श्रेष्ठतम स्थान पर किया गया है।
साधना प्रशिक्षण और अनुदान की विविध धाराएँ बहेंगी। हर साधक को निर्धारित साधना करनी पड़ेगी। मार्ग-दर्शन प्रशिक्षण की कक्षाएँ चलेंगी। साथ ही अतिरिक्त सहयोग के रूप में आध्यात्मिक अनुदानों का भी समन्वय रहेगा। इस प्रकार ब्रह्म वर्चस् प्रक्रिया को तीन धाराओं के संगम की त्रिवेणी ही कहना चाहिए।
साधनाएँ कराई जाती है। कहा गया है-
साधना कहते हैं।
साधनात्मक कर्मकाण्डों को दिया जाता है उतनी ही जीवन क्रम के सर्वांगीण परिष्कार की क्रमबद्ध योजना बनानी चाहिए। और निश्चयात्मक बुद्धि से उसी सन्मार्ग पर अनवरत गति से बढ़ना चाहिए।
साधना के सहारे ही सम्भव होती है।
साधना के फलित होने का उतना ही सुनिश्चित आधार उपलब्ध हो गया। उपासना के विधि-विधान भले ही गायत्री की उच्चस्तरीय साधना जैसे ही क्यों न हो। भले ही पंच कोशों को ज्योतिर्मय बनाने की- कुण्डलिनी जागरण की -महान् साधनाओं का सुअवसर मिल रहा हो- हर हालत में व्यावहारिक जीवन का परिष्कार-परिशोधन तो अनिवार्य रहेगा ही।
साधनाओं के अन्तर्गत कुण्डलिनी जागरण की फल श्रुतियों के सम्बन्ध में -समस्त संसार में लगभग एक जैसी ही मान्यताएँ प्रचलित है। इस साधना की सफलता से साधक में अनेकों दिव्य क्षमताएँ विकसित होने काक विश्वास किया जाता है। समझा जाता है कि ऐसा व्यक्ति सामान्य स्थिति से ऊँचा उठकर विशिष्ट सिद्ध पुरुषों की स्थिति में जा पहुँचता है। शरीरबल और मनोबल से भी ऊँची शक्ति आत्मबल की है। इसके आधार पर स्व पर कल्याण की अति महत्वपूर्ण दिव्य उपलब्धियाँ करतलगत होती है।
साधना का ही एक रूप है। पर अभाव एक ही बात का रह जाता है उसमें क्रिया और बुद्धि का ही समन्वय रहता है। यदि इसमें उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं का भी समावेश रहा होता तो निश्चित रूप से यही प्रयत्न आकाश में टँगे रवि-राशि और तारक मण्डल की तरह चमचमाते-जगमगाते दृष्टिगोचर होते।
साधना काल में परिलक्षित होता रहे।
साधना फलवती नहीं होती। साधक को जितना श्रम उपासनात्मक उपचारों में करना पड़ता है उससे अधिक प्रयत्न आत्म परिष्कार के लिए आत्मशोधन के लिए करना पड़ता है।
साधना के लिए उसका अलंकारिक स्वरूप पाँच मुख वाला बनाया गया है। इस चित्रण में सूक्ष्म शरीर के पाँच कोशों की प्रसुप्त क्षमता को जागृत करने और इस महाविज्ञान का समुचित लाभ उठाने का संकेत है। ब्रह्म विद्या पंचमुखी है। जीवात्मा का काय कलेवर पाँच भागों में विभक्त माना गया है (1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञानमय कोश (5) आनंदमय कोश । कोश का अर्थ है भण्डार-खजाना इन कोशों के माध्यम से व्यक्तित्व को समृद्धियों और विभूतियों से सुसज्जित कर सकने वाली दिव्य सम्पदायें उपलब्ध की जा सकती हैं और चेतना क्षेत्र में कुबेर जैसा सुसम्पन्न बना जा सकता है।
साधना का सही स्वरूप समझा जा सके और उसे सही ढंग से सही व्यक्तियों द्वारा अपनाया जा सके तो उसके सत्परिणाम सुनिश्चित हैं । यह तथ्य साधना स्वर्ण जयंती वर्श में सर्व साधारण को समझाने का प्रयत्न किया गया और उसमें समुचित सफलता भी मिली। बसन्त पर्व 76 से बसंत 77 तक के एक वर्श में प्रायः एक लाख साधकों का नियमित रूप से साधना क्रम संकल्पपूर्वक संपन्न हुआ । इसमें 2400 करोड़ सामूहिक गायत्री जप अनुष्ठान संपन्न हुआ।
साधनाओं का उद्देश्य आत्म-परिष्कार ही है।
साधना का समावेश कैसे संभव है इस जटिलता को सरलता के रूप में प्रस्तुत कर सकने की शिक्षण शैली ब्रह्म वर्चस् द्वारा अपनाई जाएगी। उसे भौतिक अध्यात्मवाद अथवा आध्यात्मिक भौतिकवाद कहा जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। सन्त विनोबा के मतानुसार भविष्य में अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय ही जीवित रहेगा। गुरु गोविंदसिंह ने अपने शिष्यों को एक हाथ में माला और दूसरे में भाला लेकर रहने की शिक्षा दी थी। सिख धर्मानुयायियों ने उस परम्परा को अपनाकर युग धर्म का ही निर्वाह किया है।
साधना इसी को कहते हैं। आत्मिक सिद्धियों की उपलब्धि साधना के सहारे ही सम्भव होती है।
साधना में ही होता रहता है, पर यदि उसके प्रसुप्त पक्ष को जागृत किया जा सके और उस जागरण को महत्त्वपूर्ण आत्मिक उद्देश्यों में लगाया जा सके तो चेतना क्षेत्र की चमत्कारी शक्तियाँ हस्तगत हो सकती है।
साधना समझा जाना चाहिए।
साधना पर बहुत बल दिया है । दोनों की परस्पर घनिष्ठता बताते हुए कहा गया है कि यदि प्राण पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सके तो मनोनिग्रह जैसा कठिन कार्य सरल बन जायेगा।
साधना स्वर्ण जयंती वर्श में भूतकाल की समीक्षा और भविष्य की रूपरेखा निर्धारित करने का अवसर मिला है। इससे हमारा उत्साह और प्रयास बढ़ना ही चाहिए। परिजनों का जो सहचरत्व सहगमन पिछले दिनों मिलता रहा है, भूतकाल की अपेक्षा भविष्य में उसकी अभिवृद्धि ही होगी ऐसी आशा और अपेक्षा की गई है।
साधना विज्ञान के दो पक्ष हैं- एक योग, दूसरा तप। योग कहते हैं जोड़ने-मिलाने को। जीव जब अपनी भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का परित्याग करके ईश्वरीय निर्देशों को-आत्म-संकेतों को स्वीकार करता है तब उसे समर्पित, शरणागत, भक्त अथवा योगी कहा जाता है। योग से आत्मा को देवात्मा-परमात्मा स्तर तक विकसित होने का अवसर मिलता है। तप से शक्ति उभरती है।
साधना को परम पुरुषार्थ कहा गया है।
साधना युक्त कर दिया गया है। सभी शिक्षार्थियों को सचेत कर दिया गया है कि अपने साथ दर्शनार्थियों , पर्यटकों, सैलानियों, आशीर्वाद-इच्छुकों बाल-बच्चों को लेकर न चलें। इस प्रकार के साधना महत्त्व से अपरिचित लोग यहाँ धर्मशाला की तरह आ ठहरते हैं और वे थोड़े से व्यक्ति ही यहाँ के अनुशासन एवं वातावरण का सर्वनाश कर देते हैं। पिछले दिनों हर सत्र में दो-चार व्यक्ति ऐसी गड़बड़ी उत्पन्न करते रहे हैं। अब की बार अत्यन्त कठोरतापूर्वक इस प्रकार की घुस-पैठ को रोक दिया गया है।
साधनाओं में उपवास ब्रह्मचर्य आदि की तितीक्षाएँ भी करनी पड़ती है। जो इतना सब नहीं कर सकते उनके लिए भी द्वार बन्द नहीं है। वे किसी भी स्थिति में -रास्ता चलते -चारपाई पर पड़े -बिना स्नान किये भी गायत्री का मानसिक जप कर सकते हैं। गायत्री के 24 अक्षरों में सन्निहित शिक्षाओं का अवगाहन करते हुए धर्म-शास्त्र और अध्यात्म विज्ञान के सारतत्त्व को हृदयंगम कर सकते हैं। यह सुलभ मार्ग सदा ही आरम्भिक साधकों के लिए खुला रहेगा।
साधना के नाम से जाना जात है। भक्ति-भावना के साथ अध्यात्म साधनाओं में निरत रहने की प्रक्रिया अभिनव और उपयोगी आस्थाओं की प्रतिष्ठापना अन्तःकरण के मर्मस्थल में कर सकना सम्भव हो जाता है। स्पष्ट है यह स्थापना पुरानी अनुपयुक्तता का उन्मूलन भी करती है। सुसंस्कारों की अभिवृद्धि से कुसंस्कारों का निरस्त होते जाना स्वाभाविक है। मात्र अवांछनीयता के उन्मूलन का प्रयास सफल नहीं हो सकता उस स्थान पर परिष्कृत स्थापना की नितान्त आवश्यकता रहती है।
साधना है। ऐसा करने पर ही उपासनाकाल में भी अभीष्ट भावभूमि बनी रह सकती है। जीवन-साधना के अभाव में उपासना भी सार्थक बन पड़ेगी।
साधना करनी शेष रह जाती है। इस आवरण के हटते की आत्मा को परमात्मा रूप में परिष्कृत होने का अवसर मिल जाता है। तब उसकी स्थिति वैसी हो जाती है जैसी कि वेदांत में ‘अयमात्मा ब्रह्म’ तत्त्वमसि, सोहमस्मि, सच्चिदानन्दोऽहम्, शिवोऽहम् आदि उद्घोषों के अंतर्गत प्रतिपादित की गई है।
साधना जैसे ही क्यों न हो। भले ही पंच कोशों को ज्योतिर्मय बनाने की- कुण्डलिनी जागरण की -महान् साधनाओं का सुअवसर मिल रहा हो- हर हालत में व्यावहारिक जीवन का परिष्कार-परिशोधन तो अनिवार्य रहेगा ही।
साधनाओं का आधार भी कुण्डली ही है, जब गुस् की कृपा से सोयी हुई कुण्डली जागती है, तब सम्पूर्ण पद्य (षट्चक्र) और ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं।
साधना के साधकों को प्रायः ऐसी ही तीर्थ यात्राओं के रूप में प्रायश्चित कराये जाते हैं। इसमें पाप निवारण और पुण्य सम्पादन के दोनों ही तत्त्व प्रचुर परिमाण में सन्निहित रहते हैं। इसे भी साधना में ही सम्मिलित रखा गया है। यह करने पर आत्मिक प्रगति द्रुत गति से होने लगती है।
साधना से काया की भीतरी स्थिति की सूक्ष्म जानकारी मिलने का वर्णन हैं।
साधना करते हुए इस प्रचण्ड शक्ति को निग्रहित किया जा सकता है और उसे भक्ति भावना में कला सम्वेदना में, लोक साधना में तथा अन्यान्य उल्लास वर्धक सत्प्रयोजनों में लगाया जा सकता है।
साधना ग्रन्थों में मिलती है। नाड़ी शोधन, लोम विलोम, सूर्यभेदन साधनाएँ भी प्राण विद्या के अंतर्गत ही आती है। इनमें से पंचकोशी साधना के अंतर्गत प्राणमय कोश के परिष्कार के लिए किसे कौन-सा प्राणायाम करना चाहिए, उसका विधान साधकों की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्थिति को परख करके ही बताया जा सकता है। कोश साधना में सभी को एक लाठी से नहीं हाँका जा सकता ।
साधना प्रकृति की जा रही है सो ठीक है, पर चेतन पुरुष को भी परिष्कृत प्रगतिशील बनाने की उपयोगिता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य का निर्माण हो नहीं सकेगा। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।
साधना के अभाव में उपासना भी सार्थक बन पड़ेगी।
साधनाएँ भी सब की एक जैसी नहीं हो सकती। सभी मरीजों को एक दवा नहीं दी जा सकती उनकी स्थिति के अनुरूप ही साधना प्रक्रिया निर्धारित होती है। साधकों को शान्तिकुञ्ज बुलाने की आवश्यकता का एक कारण यह व्यक्तिगत पर्यवेक्षण भी है। वातावरण एवं संरक्षण की विशेषता वाली बात तो पहले ही कही जा चुकी है।
साधना गायत्री पुरश्चरणों के साथ जुड़ी रहेगी। दस-दस दिन वालों को 24 हजार का एक पुरश्चरण करना होगा और एक-एक महीने वालों को 24-24 हजार के तीन अनुष्ठान करने होंगे। सोऽहम् उपासना जप, ध्यान, खेचरी मुद्रा की चतुर्विधि उपासना की जो पद्धति गत वर्श काम में लाई जाती रही है। वह तो यथावत् रहेगी ही। साथ ही त्राटक और प्राणायाम के दो प्रयोग अतिरिक्त रूप से सम्मिलित रहेंगे।
साधना विज्ञान बहिरंग परिस्थितियों को समुन्नत बनाने की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। दोनों ही दृष्टियों से उसकी गरिमा एवं उपयोगिता को देखते हुए अध्यात्म वेत्ताओं ने उसे ‘परम’ सर्वोपरि-सर्वोत्कृष्ट ऐसा आधार बताया है जिसके सहारे सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकना सम्भव बनता है। यों अपने-अपने स्थान पर सभी तत्त्व-ज्ञान एवं उपासनात्मक विधि-विधान महत्त्वपूर्ण है, पर तुलनात्मक अध्ययन करने के उपरान्त जिन ब्रह्म-वेत्ताओं ने वरिष्ठता के निष्कर्ष निकाले है, उन्होंने गायत्री को ‘परम’ कहा है और बताया है कि इसकी सार्थकता एवं समर्थता पर सन्देह करने की आवश्यकता नहीं है। शास्त्रकार कहते हैं -
साधना करते हैं। प्राण वायु के द्वारा जागृत हुई यह कुण्डलिनी साधक के लिए सिद्धियों का आधार बनती है और उसे परम ज्ञान प्रदान करती है।
साधना करनी पड़ेगी। मार्ग-दर्शन प्रशिक्षण की कक्षाएँ चलेंगी। साथ ही अतिरिक्त सहयोग के रूप में आध्यात्मिक अनुदानों का भी समन्वय रहेगा। इस प्रकार ब्रह्म वर्चस् प्रक्रिया को तीन धाराओं के संगम की त्रिवेणी ही कहना चाहिए। यह अपने ढंग का अनोखा अवसर है।
साधना सिद्धि, स्वर्गानुभूति आदि नामों से कहा जाता रहा है।
साधना के अंतर्गत प्राणमय कोश के परिष्कार के लिए किसे कौन-सा प्राणायाम करना चाहिए, उसका विधान साधकों की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्थिति को परख करके ही बताया जा सकता है। कोश साधना में सभी को एक लाठी से नहीं हाँका जा सकता ।
साधना वस्तुतः तेजस्विता की -प्राण शक्ति की ब्रह्मबल की उपासना । इसी से उसकी उच्च स्तरीय साधन प्रक्रिया को ‘ब्रह्म वर्चस्’ विद्या कहा जाता है। इस उपार्जन में संलग्न व्यक्ति को सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का अवसर मिलता है। श्रुति कहती है -
साधना उन्हीं के लिए अभीष्ट है जो पहले से ही गायत्री उपासना करते रहे हैं अथवा अन्य प्रकार से अपनी आत्मिक स्थिति को ऊँची उठा चुके है। गायत्री विद्या का योग पक्ष और ब्रह्म तेज का तपश्चर्या पक्ष दोनों ही समन्वित है। सविता का भर्ग तत्त्व ब्रह्म तेज है और धियः तत्त्व की प्रेरणा ब्रह्म विद्या कहलाती है। इन दोनों का समन्वय ब्रह्म वर्चस् है।
साधना विधानों में अन्तर रहने की बात इस सन्दर्भ में कोई बड़ा व्यवधान प्रस्तुत नहीं करती । कहा भी है-
साधना के मार्ग पर चलने का साहस करने वालों को चरित्र-निष्ठ और समाज-निष्ठ बनना पड़ता है। उर्वर भूमि में ही बीज उगते हैं। खाद पानी के सहारे ही पौधे बढ़ते और फलते-फूलते हैं। साधना के बीज अंकुर निर्मल चरित्र और उदार व्यवहार का पोषण प्राप्त कर सकें तो ही वे समुन्नत और फलित होते हैं। निकृष्ट चिन्तन और घृणित कर्तृत्व बना रहे तो किसी भी पूजा पाठ से दैवी अनुग्रह प्राप्त नहीं हो सकता।
साधना सत्र चले। उनमें प्रायः 10 हजार शिक्षार्थी सम्मिलित और लाभान्वित हुए। अब द्वितीय पंच वर्षीय प्रशिक्षण योजना आरम्भ होती है। इसे गायत्री की उच्चस्तरीय साधना समझा जाना चाहिए।
साधना क्रम संकल्पपूर्वक संपन्न हुआ । इसमें 2400 करोड़ सामूहिक गायत्री जप अनुष्ठान संपन्न हुआ।
साधनात्मक पराक्रम करके अधिक तीव्र कर सकता है और उत्कर्ष के अन्तिम लक्ष्य तक इसी जीवन में पहुँच सकता है। यही पंचकोशी साधना है। कोशों के जागृत होने पर व्यक्तित्व का स्तर कैसा होता है इसकी जानकारी शिव गीता में इस प्रकार दी गई है।
साधना से कोई संबंध हो सकता है भला। किंतु गुरु-आज्ञा थी।
साधना का अविच्छिन्न अंग माना जाना चाहिए और जितना महत्त्व विधि विधानों को, साधनात्मक कर्मकाण्डों को दिया जाता है उतनी ही जीवन क्रम के सर्वांगीण परिष्कार की क्रमबद्ध योजना बनानी चाहिए। और निश्चयात्मक बुद्धि से उसी सन्मार्ग पर अनवरत गति से बढ़ना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-August
साधना से सिद्धि मिलने और सिद्धि के चमत्कारी होने की मान्यता का यही सुनिश्चित और ठोस आधार है।
साधना द्वारा जिसने प्रसन्न किया है उन्होंने संसार में एक से एक बढ़ी चढ़ी सफलताएं प्राप्त की हैं।
साधना के अति महत्वपूर्ण अंग बन जाते हैं। जीवन की सार्थकता का प्रथम सूत्र यह कर्मयोग ही है।
साधना है जिसके सहारे आत्म परिष्कार का उद्देश्य पूरा हो सकता है। इस सामर्थ्य को उपार्जित करने के लिए जो साधन काम
में लाने पड़ते हैं उन्हें तप कहते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए तप तितीक्षा की साधना करनी अनिवार्य रूप से आवश्यक होती है।
साधना में-तप तितीक्षा का प्रमुख स्थान हैं। पूजा उपासना के विधि विधान एवं कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान बैठना पर्याप्त नहीं। जप, ध्यान आदि के क्रिया कलाप अति सरल है। उनमें न शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं और न मनोनिग्रह की आवश्यकता पड़ती है। मुख से कुछ शब्दों का उच्चारण और कर्मकाण्ड में प्रयुक्त होने वाले सस्ते उपकरणों के साथ साथ हाथों की थोड़ी सी हेरा फेरा इतनी महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली नहीं हो सकती कि उतने भर से दिव्य शक्तियों का अनुदान वरदान प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके।
साधना के आधार पर विनिर्मित एवं अवतरित होता है।
साधना की सफलता के रूप में होती रहती है। मूर्छित समाधि एक मनोवैज्ञानिक प्रयास है वह किसी-किसी के लिए ही सम्भव है। जागृत समाधि सर्व सुलभ हैं। समाधि का अर्थ है,, बौद्धिक और भावनात्मक प्रवाहों को सन्तुलित एवं विवेक युक्त बना लेना। सुसंस्कृत चिन्तन पद्धति हाथ लगने पर समस्याओं का स्वरूप और समाधान उपलब्ध हो जाता है।
साधना विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है। इसे तितीक्षा कहते हैं। तपश्चर्या के तत्व दर्शन को तितीक्षा द्वारा ही कार्य रूप में परिणित किया जाता है।
साधना उत्तरकाशी में संपन्न हुई थी।
साधना अनुष्ठान की प्रखरता एवं सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक ने उस अवधि में अपने को कितना तपाया-कितना गरम किया। साधना औजार है और तपस्या उसे चलाने वाली शक्ति ऊर्जा। तपश्चर्या से कतराने वाले-विलासिता अपनाये रहकर ज्यों ज्यों भजन पूजन करते रहने वाले-कुछ तो पाते भी है, पर वह होता अत्यन्त स्वल्प है।
साधना हो सकने की अपेक्षा है।
साधनाओं का चरम प्रतिफल बताया गया हैं। भव-बन्धनों से मुक्ति का तात्पर्य है-बहिरंग कल्मष और अन्तरंग कषायों से छुटकारा पाना। दूसरे शब्दों में इसे संकीर्ण स्वार्थपरता एवं निर्मम निष्ठुरता की लाभ-मोह की, हथकड़ी-बेड़ियों को काट डालना, कुत्साओं और कुँठाओं की, दुष्प्रवृत्तियों की जड़े उखाड़ फेंकना इसी को मुक्ति पुरुषार्थ की साधना कहते हैं। समाधि की चर्चा साधना की सफलता के रूप में होती रहती है। मूर्छित समाधि एक मनोवैज्ञानिक प्रयास है वह किसी-किसी के लिए ही सम्भव है।
साधना का अत्यधिक महत्व है। इस गर्मी को उत्पन्न किये बिना व्यक्ति मूर्छित स्थिति में पड़ा रहता है। उसकी ईश्वर प्रदत्त क्षमता निरर्थक, निर्जीव एवं अविज्ञात रूप में पड़ी रहती है। किसी भी क्षेत्र में प्रगति की जाय उसके लिए गतिशीलता की अनिवार्य आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए ऊर्जा जुटानी ही पड़ेगी।
साधना के फलस्वरूप मिलने वाली बलिष्ठता एवं दीर्घजीवन का वरदान भी पाया जा सकता है। इस प्रकार के नियमों में सात प्रमुख माने गये है। इन्हें आरोग्य सूर्य की सप्त वर्ण, सप्त किरणें भी कहा जा सकता है।
साधना से आत्मिक प्रखरता उभरती है जब कि विलासिता अपनाने पर वह दिन दिन क्षीण और कुण्ठित होती चली जाती है। साधना अनुष्ठान की प्रखरता एवं सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक ने उस अवधि में अपने को कितना तपाया-कितना गरम किया। साधना औजार है और तपस्या उसे चलाने वाली शक्ति ऊर्जा। तपश्चर्या से कतराने वाले-विलासिता अपनाये रहकर ज्यों ज्यों भजन पूजन करते रहने वाले-कुछ तो पाते भी है, पर वह होता अत्यन्त स्वल्प है।
साधना करने वाला भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों से भरता ही चला जाता है। उसे स्वर्ग खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती उसके इर्द-गिर्द ही स्वर्गीय वातावरण बनता है। विश्व की सुख शान्ति और मानवी भविष्य के उज्ज्वल होने की सम्भावना ऐसे ही दिव्य वातावरण के साथ जुड़ी हुई हैं जो जीवन साधना के आधार पर विनिर्मित एवं अवतरित होता है।
साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीन कालं की तरह अभी भी बना हुआ है। और सम्भवत सदा ही बना रहेगा। ब्रह्मवर्चस आरण्यक की स्थापना हिमालय की छाया में उपयुक्त वातावरण को ध्यान में रख कर ही की गई है।
साधना औजार है और तपस्या उसे चलाने वाली शक्ति ऊर्जा। तपश्चर्या से कतराने वाले-विलासिता अपनाये रहकर ज्यों ज्यों भजन पूजन करते रहने वाले-कुछ तो पाते भी है, पर वह होता अत्यन्त स्वल्प है।
साधना कहते हैं। समाधि की चर्चा साधना की सफलता के रूप में होती रहती है। मूर्छित समाधि एक मनोवैज्ञानिक प्रयास है वह किसी-किसी के लिए ही सम्भव है। जागृत समाधि सर्व सुलभ हैं। समाधि का अर्थ है,, बौद्धिक और भावनात्मक प्रवाहों को सन्तुलित एवं विवेक युक्त बना लेना।
साधना का यही साधन है। शिव ताण्डव भी यही हुआ था। उस अवसर पर प्रयुक्त हुआ त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप साधना उत्तरकाशी में संपन्न हुई थी।
साधना के प्रतिफल के बारे में सन्देह भी किया जा सकता है पर जीवन देवता की आराधना, साधना करने वाला भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों से भरता ही चला जाता है। उसे स्वर्ग खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती उसके इर्द-गिर्द ही स्वर्गीय वातावरण बनता है। विश्व की सुख शान्ति और मानवी भविष्य के उज्ज्वल होने की सम्भावना ऐसे ही दिव्य वातावरण के साथ जुड़ी हुई हैं जो जीवन साधना के आधार पर विनिर्मित एवं अवतरित होता है।
साधना करनी अनिवार्य रूप से आवश्यक होती है।
साधना उसी सीमा तक सार्थक हो गई।
साधना का मनोयोग जुड़ा रहता है इसलिए उससे दुहरा लाभ है। शरीर की स्थिति के अनुरूप हलके भारी थोड़े बहुत व्यायाम का क्रम भी दिनचर्या में जोड़ कर रखा जाय। घर के कामकाज में हाथ बंटाना, टूट फूट की मरम्मत, सफाई, घरेलू शाक वाटिका, गृह उद्योग, चक्की पीसना जैसे कामों में परिवार के सभी लोग भाग लेते रहे तो शारीरिक श्रम के अतिरिक्त सुव्यवस्था, आर्थिक लाभ भी मिलेगा और सुरुचि, सुसज्जा का वातावरण दृष्टिगोचर होगा। रुग्ण दुर्बल व्यक्ति भी चारपाई पर पड़े पड़े अंग संचालन व्यायाम करते रह सकते हैं। मालिश से भी इस प्रयोजन की पूर्ति होतीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-October
साधना से प्राणियों की अविज्ञात अन्तः स्थिति का परिचय प्राप्त करने की सिद्धि मिलने का उल्लेख है। कहा गया है-
साधना करता है वह है परोपकार, दूसरों की सेवा, सत्य, संयम और कर्तव्य-पालन आदि। ‘धर्मचर’ का अभिप्राय भी तो यही है कि सदाचरण, धर्माचरण, सत्याचरण आदि मानव जीवन में व्यावहारिक रूप पा सकें।
साधना सफल बनती है। ऐसी ही वाणी अभिनन्दनीय और शक्तिशाली होती है।
साधना है।
साधनाएँ किये ही अपनी अलौकिक क्षमताओं का परिचय देते हैं।
साधना, मात्र श्रम एवं आहार बिहार की सुव्यवस्था तक ही सीमित नहीं है उसके साथ वह कुशलता, स्फूर्ति एवं प्रसन्नता भी जुड़ी रहनी चाहिए जिसे ओजस्विता के नाम से पुकारा जाता है। जिन शरीरों में ओजस् का समावेश करने की साधना की गई है वे बराबर की दृष्टि से सामान्य होते हुए भी असामान्य कार्य करते और विशिष्ट गौरवान्वित होते हैं।
साधना ध्यान है। निर्धारित परिधि के अंतर्गत ही ध्यान-चेष्टाएँ केन्द्रित रहना साधना क्रम की सही दिशा का संकेत है। मन की चंचलता से यदा-कदा उल्लंघन तो होगा, पर सतत् प्रयत्न से यह उल्लंघन घटता जायेगा ओर मन सधता जायेगा।
साधना द्वारा उपार्जित की गई उत्कृष्ट अन्तः स्थिति से ही सम्भव होती है। मस्तिष्क में दुर्बुद्धि-अचिन्त्य चिन्तन-विकृत विचार प्रवाह का निराकरण करने से उत्पन्न हुई चित्त स्थिरता से नादानुसंधान में सफलता मिलती है। व्यावहारिक जीवन में सत्कर्म परायणता-सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एवं आदर्श वादी चरित्रनिष्ठा से उस वाक् शक्ति का उदय होता है जो मन्त्रों को लक्ष्य बेधी बाण की तरह सामर्थ्यवान बनाती है। साधना विधियाँ सरल हैं, कठिन तो वह प्रक्रिया है जिसमें क्रिया, विचारणा और भावना को परिष्कृत परिमार्जित करने के लिए निरन्तर आत्म संघर्ष करना पड़ता है। शब्द विद्या का लाभ उठाने के लिए उसके लिए उपयुक्त यन्त्र उपकरण अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही होता है।
साधना में अपने अस्तित्व को भगवान की सत्ता में समर्पित होने का ध्यान करना होगा। परमेश्वर के विराट् रूप का चिन्तन-विवेचन इसमें सहायक होगा। विराट् ब्रह्म को इस चराचर जगत का शरीर मानते हुए कल्पनाएँ की जाए। इस विराट ब्रह्म का एक क्षुद्रतम घटक है अपना ‘अहम्’। इसका स्वतन्त्र क्या अस्तित्व?
साधना रही है। संकीर्ण स्वार्थपरता की छोड़कर अपने को विश्व परिवार का सदस्य मानना-वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रीत रहकर लोकहित के क्रिया-कलापों में निरत रहना भी आत्म-समर्पण का ही एक अति महत्त्वपूर्ण योग साधना है।
साधना से बढ़कर और कोई दूसरा सरल एवं सफल उपाय नहीं है।
साधना देवी-देवताओं और मंत्र-तंत्रों के आधार पर ही की जाय। यह सार्वभौमिक एवं सर्वजनीन प्रक्रिया है। आस्तिक-नास्तिक सभी इसे अपनाकर समान रूप से अपना मनोबल बढ़ा सकते हैं। चित्त की चंचलता का समाधान, एकाग्रता का अभिवर्धन जिस उपाय से बन पड़े उसे ध्यान कहा जा सकता है अंतःक्षेत्र में घुसी हुई पशु-प्रवृत्तियों के स्थान पर दैवी तत्त्वों की स्थापना के लिए जो प्रयत्न किया जाय उन्हें धारणा वर्ग का कहा जाएगा। इसके लिए किसी पुरुष को भी माध्यम बनाया जा सकता है।
साधना से असंख्य पिछड़े क्षेत्रों की समुन्नत न बनाया हो।
साधना ‘लय-योग कहलाती है। भक्ति मार्ग में इसी दिशा में बढ़ा जाता है। द्वैत को मिटाकर अद्वैत बन जाने की आकांक्षा को आत्म-समर्पण, ईश्वर प्राप्ति कहा जाता है। दीपक पतंगों का उदाहरण इसी प्रयोजन को समझाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
साधना की गई है वे बराबर की दृष्टि से सामान्य होते हुए भी असामान्य कार्य करते और विशिष्ट गौरवान्वित होते हैं।
साधना में ईश्वर भक्ति का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘परिपूर्ण व्यक्तित्व’ के रूप में ईश्वर की अन्तःकरण में प्रतिष्ठापना की जाती है और फिर उसमें आत्म-सात होने का भावभरा उपक्रम चलता है। इष्टदेव का अर्थ हे-अपने विकास का अन्तिम लक्ष्य। हम राम, कृष्ण, हनुमान, सूर्य, आदि नर रूपकों में अथवा गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी आदि नारी कलेवरों में इष्टदेव का निर्धारण करते हैं और आत्मोत्कर्ष की उस शिखर तक पहुँचने का संकल्प करते हैं। इष्टदेव के साथ तन्मय अविच्छिन्न-एकाकार हो जाने की साधना ‘लय-योग कहलाती है।
साधना में सर्वोपरि महत्त्व दिया गया था। विहारों में परिव्राजकों को प्रशिक्षित करने की ही व्यवस्था थी। नालन्दा, तक्षशिला आदि के विश्व विद्यालयों में अर्थ उपार्जनी शिक्षा का नहीं लोक शिक्षण के लिए प्रतिभाएँ विनिर्मित करने वाली उच्चस्तरीय ब्रह्म विद्या पढ़ाने का ही प्रबन्ध था। तपस्वी और तेजस्वी बनाने के लिए योगाभ्यास और तपश्चर्या को भी उसी प्रशिक्षण को अंग बनाकर रखा गया था। जैन धर्म के चैत्य भी उसी पृष्ठ भूमि पर बने और चले।
साधना के साथ स्वर्ग मुक्ति की भावनात्मक और ऋद्धि-सिद्धि की शक्ति परक सफलताएँ जुड़ी हुई हैं।
साधनाओं में सूक्ष्म ध्वनि क्षेत्र से संपर्क बनाने और लाभ उठाने के दो प्रयोग रहे हैं। शब्द विद्या की दो धाराएँ मानी गई हैं, एक तो पकड़ने , समझने और उनके सहारे अविज्ञात सम्भावनाओं से परिचित रहने की हैं जिसे नादयोग कहा गया है। नादानुसंधान की महिमा योग शास्त्र में विस्तार पूर्वक बताई गई हैं। उनके सहारे सूक्ष्म जगत की हलचलों की जानकारी प्राप्त करने का लाभ बताया गया है। यह कहने सुनने में छोटी किन्तु व्यवहार में बहुत बड़ी बात हैं।
साधना प्रयासों द्वारा अथवा पूर्व संचित जागरण प्रयत्नों का प्रतिफल होता है। जीवात्मा क्रमशः महात्मा, देवात्मा परमात्मा स्तर पर विकसित होती है और लघु से महान बनती है। यह सफलताएँ किसी दूसरे का दिया हुआ अनुग्रह उपकार नहीं होता वरन् आत्म-सत्ता के क्रमिक विकास की प्रतिक्रिया ही होती है। जिस उपकरण के माध्यम से यह प्रगति क्रम अग्रसर होता है उसे मनोबल ही कह सकते हैं इस पेट्रोल के बिना कोई मोटर किसी भी सड़क पर दौड़ लगाने में असमर्थ रहती है।
साधनाओं की सफलता के साथ तो यह तथ्य अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है कि साधक पवित्र जीवन जिये। इसके लिए परिमार्जन-परिष्कार की दिशा में साहसिक कदम बढ़ाये जाने चाहिए। भूतकाल का परिमार्जन और भावी पवित्र निर्धारण की प्रक्रिया प्रायश्चित द्वारा ही सम्भव होती है। अस्तु आत्मिक प्रगति के लिए प्रायश्चित रूपी धुलाई आवश्यक है ताकि जीवन सत्ता पर साधना द्वारा उपयुक्त रंगाई ठीक तरह हो सके।
साधना कहते हैं। योग साधना की प्रधान क्षमता मनोबल है। संकल्प बल के प्रहार से शक्ति संस्थानों का समुद्र मन्थन होता है और उसी में से सिद्धियों की रत्न राशि निकल कर ऊपर आती है।
साधना व्यर्थ हो जायेंगे और अन्य कोई कारण न होने पर शरीर के भीतरी अवयव अपना काम ठीक तरह पूरा न कर सकेंगे। फलतः दुर्बलता ओर रुग्णता अकारण ही बढ़ती चली जायगी।
साधना विज्ञान में भी शारीरिक, मानसिक मलीनताओं के निष्कासन पर जोर दिया गया है। आयुर्वेद में विकार-ग्रस्त शरीरों के मल-शोधन की प्रक्रिया के उपरान्त चिकित्सा का समुचित प्रतिफल मिलने की बात कही गई है। हठयोगी नेति, धोति, वस्ति, नौलि, ड़ड़ड़ड़, कपालभाति, आदि क्रियाओं द्वारा मल-शोधन करते हैं। आयुर्वेद में वमन, विरेचन, स्वेदन, नस्व, आदि शोधन कर्म करके संचित मलों का निष्कासन किया जाता है प्राकृतिक चिकित्सा में यही कार्य उपवास एवं एनीमा के द्वारा किया जाता है। राजयोग में यम, नियमों का विधान है।
साधना का यही सबसे बड़ा लाभ है।
साधना द्वारा उपयुक्त रंगाई ठीक तरह हो सके।
साधना का-वैराग्य का-धर्म सेवा का उद्देश्य भी पीछे छूट जाता है। प्राचीन काल में तीर्थ यात्रा भी सामान्य सन्तों की क्रिया-पद्धति थी। उनके सूत्र संचालन, मार्गदर्शन, आधार निर्धारण के शोध कार्य, ग्रन्थ लेखन के लिए उँगलियों पर गिनने लायक ही संस्थान बनते थे। व्यास, चरक, सुश्रुत नागार्जुन, पापिनी, पातंजलि, जैसे कुछ ही दार्शनिक तत्त्वदर्शी अपने शोध संस्थान स्थिर रूप से चलाते थे। तीर्थ यात्रा ही हर सन्त की क्रिया-पद्धति थी।
साधना की जा सके तो रुग्ण और दुर्बलकाय व्यक्ति चन्दगीराम, सेण्डो जैसे विश्व विख्यात पहलवान बन सकते हैं। पौहारी बाबा की तरह आवश्यक पोषण आहार आकाश से ही आकर्षित करते रह सकते हैं। गंगोत्री के स्वामी कृष्णाश्रम जी की तरह दो सो वर्ष की आयु पा सकते हैं।
साधना क्रम की सही दिशा का संकेत है। मन की चंचलता से यदा-कदा उल्लंघन तो होगा, पर सतत् प्रयत्न से यह उल्लंघन घटता जायेगा ओर मन सधता जायेगा।
साधना कहा गया है।
साधना विधियाँ सरल हैं, कठिन तो वह प्रक्रिया है जिसमें क्रिया, विचारणा और भावना को परिष्कृत परिमार्जित करने के लिए निरन्तर आत्म संघर्ष करना पड़ता है। शब्द विद्या का लाभ उठाने के लिए उसके लिए उपयुक्त यन्त्र उपकरण अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही होता है। शब्द को शब्द-ब्रह्म बना सकना ऐसे ही व्यक्तित्व सम्पन्न साधकों के लिए सम्भव होता है।
साधना में ही सम्मिलित किया गया है। ब्रह्मचर्य तप है। अस्वाद व्रत उपवास को तप माना गया है। सर्दी, गर्मी सहन करने के लिए कम वस्त्र, धारण करने, जूते न पहनने, ठंडे पानी से नहाने; जैसी तितीक्षाएँ की जाती है। कोमल शैया का त्याग, भूमि शयन अथवा तख्त पर सोना इसी प्रकार की साधना है।
साधना विज्ञानियों ने प्रामाणिक शास्त्र साक्षियों ने मन्त्र की गरिमा समान रूप से प्रतिपादित की है। इससे उच्चस्तरीय शब्द विज्ञान द्वारा उत्पन्न ध्वनि की महत्ता पर प्रकाश पड़ता है-
साधना में प्रयोग किया है वह परम पवित्र ‘वाक्’ शक्ति ही है। वह अन्तःकरण के गहन अन्तराल से निकलती है। जिह्वा तो उसका संचार भर करती है। मुख का उपयोग तो उसके परिप्रेषण यंत्र की तरह ही अकिंचन होता है। संकल्प बल द्वारा ही सम्भव होता है।
साधना का परिचय देने वाले स्थानों या खण्डहरों के कोई अवशेष कहीं नहीं है। ऋषियों की गरिमा उनकी शिक्षा की प्रखरता-प्रशिक्षण की व्यापकता से इनकार नहीं किया जा सकता। वही तो अपनी संस्कृति की रीढ़ रही है। फिर उसका स्थान परिचय क्यों नहीं मिलता? इस असमंजस का उत्तर एक ही है कि उन दिनों सन्तों और ऋषियों को क्रिया पद्धति में ‘परिव्रज्या’ अनिवार्य अंग थी।
साधना द्वारा सधा हुआ शब्द साक्षात् ब्रह्म ही है। उसके सहारे ब्रह्म संपर्क सरलतापूर्वक सम्भव होता है। शत पथ ब्राह्मण की श्रुति है-
साधना की उपयोगिता भी अत्यधिक हैं। न्यूनतम निर्वाह में वे अधिक व्यापक अधिक महत्त्वपूर्ण सेवाएँ कर सकते हैं जो कि सीमा क्षेत्र में बँधे हुए के ब्राह्मण के लिए सम्भव नहीं हैं।
साधना में अहर्निश जुटे हैं।
साधना जिह्वा संचालन द्वारा कुछ शब्दों की पुनरावृत्ति करते रहने भर से सम्भव नहीं हो सकती। उनके लिए परिष्कृत वाणी चाहिए; जिसे ‘वाक्” कहते हैं। वाक् से शब्दोच्चार के कलेवर का उत्कृष्ट व्यक्तित्व और प्रचण्ड मनोबल जुड़ा रहता है। गहन श्रद्धा और पवित्र अन्तरात्मा के समन्वय की शक्ति ही मन्त्र की शब्द शृंखला में प्राण भरती हैं और उसकी के सहारे मंत्र का प्रहार शब्द बेध की-लक्ष्य बेध की भूमिका सम्पन्न करता है। इसी समन्वय से साधा हुआ शब्द ‘ब्रह्म’ शक्ति से सुसम्पन्न बनाता है।
साधनाएँ आत्म-साक्षात्कार के लिए भी थीं और सूक्ष्म जगत में प्रवेश एवं अधिकार पाने के लिए भी। योग साधना के साथ स्वर्ग मुक्ति की भावनात्मक और ऋद्धि-सिद्धि की शक्ति परक सफलताएँ जुड़ी हुई हैं।
साधना के फलस्वरूप बलिष्ठता बढ़ती है और पहलवान बन जाता है।
साधना की प्रधान क्षमता मनोबल है। संकल्प बल के प्रहार से शक्ति संस्थानों का समुद्र मन्थन होता है और उसी में से सिद्धियों की रत्न राशि निकल कर ऊपर आती है।
साधना है। सुविधा का लाभ लेते रहने पर प्रतिरक्षा की शक्ति नष्ट होती है। जो लोग एयरकण्डीशंड कमरों में रहते हैं, उनकी ऋतु प्रभाव सहने की क्षमता चली जाती है। जरा-सी सर्दी-गर्मी लगने पर वे तुरन्त बीमार पड़ते हैं। सहन शक्ति बढ़ाने से बलिष्ठता बढ़ती है।
साधना पड़ता है। चित्त वृत्तियों की स्थिति भी लगभग वैसी ही है। साधने की सफलता में उन पशुओं को भी यश मिलता है और शिक्षक की कुशलता भी सराही जाती है। इन साधकों और सिद्धों की उपयोगिता बढ़ती है और उनका बढ़ा-चढ़ा मूल्यांकन होता है। यह ध्यान का ही चमत्कार है कि प्रत्याहार और धारणा की दण्ड-बैठक करते हुए साधक को मनोबल सम्पन्न बनने का अवसर मिलता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-November
साधना अहमन्यता की पूर्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने की उच्छृंखलता अपनाता है तो उसे आस्तिकता की भावना ही डराती हैं वह कहती है यहाँ स्वेच्छाचार की किसी को भी छूट नहीं है। सबक ऊपर एक नियामक शक्ति मौजूद है और कर्मफल की दण्ड व्यवस्था भी मौजूद है जो इतनी कठोर है कि मर्यादा तोड़ने वाले को भली प्रकार सबक सिखा सकती है। भगवान की भयानकता से डर कर उच्छृंखलता पर बहुत कुछ नियन्त्रण होता रहता है आस्तिकता में ईश्वर के गुणानुवादों का कथन, श्रवण, मनन, चिन्तन जुड़ा हुआ है। ईश्वर सद्गुणों का पुँज है। पवित्रता, करुणा, ममता, उदारता जैसी सद्भावनाएँ ईश्वरीय अनुकम्पा के फलस्वरूप उपलब्ध होने वाली विभूतियाँ है।
साधना को सत्य की खोज कह सकते हैं। इस प्रकार विज्ञान को अपने ढंग का ‘आस्तिक’ और उसकी शोध साधना को ईश्वर उपासना कहा जा सकता।’
साधना में इन पाँचों को समान रूप से विकसित होने का अवसर मिलता है। तदनुसार इस ब्रह्मलोक में, देवलोक में निवास करने वाला जीवात्मा स्वर्गीय परिस्थितियों के बीच रहता हुआ अनुभव करता है।
साधना के केन्द्र (4) मोक्ष तीर्थ-विद्या ज्ञान और अध्यात्म के केन्द्र।
साधना के लिए जितने समय जहाँ रुकना आवश्यक समझा वहाँ रुके और इसके पश्चात् परिभ्रमण के लिए निकल पड़े । सिखाना और सीखना यही उनकी प्रधान प्रवृत्ति रही है।
साधना है सहयोग से भौतिक प्रगति के लक्ष्य पूरे किये जा सकते हैं, पारमार्थिक प्रयोजनों को भी एक सीमा तक शक्ति सहायता मिल सकती है। किन्तु महान कार्य, बड़ उद्देश्य समर्पित सेवाओं के बिना सम्भव नहीं हो पाते। श्रेष्ठता के प्रति समर्पण आत्मा की क्षमताओं और सम्भावनाओं को उजागर करके व्यक्ति समुदाय और संसार को प्रगति का मार्ग, नई ज्योति और दाशयी लक्ष्यों की सफलता प्रदान कर सकती है। आध्यात्मिक साधनायें या पारमार्थिक सेवायें तो समर्पण के अभाव में पनप ही नहीं सकती।
साधनाओं के विधि-विधान तक सीमित न रह कर जीवन-प्रक्रिया को उच्चस्तरीय बनाने की सुविस्तृत रूपरेखा तैयार करते हैं। उस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसके जप तप उसी अनुपात में सफल होते देखे जा सकेंगे । शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार इसी मार्ग पर चलने से सम्भव होता है। समूची आत्मसत्ता को परिष्कृत बनाने से वाणी की परिणित ‘वाक्’ शक्ति में होती है। वाक् शक्ति का प्रभाव असीम है।
साधनाओं का केन्द्र है। सामान्य भारतीय की तरह उनमें भी आध्यात्मिक अभिरुचि स्वाभाविक है। एक घटना के माध्यम से जापानी वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकालने का भी प्रयास किया है कि शरीर में विद्युत की उपस्थिति का कारण तो ज्ञात नहीं किन्तु जिनमें भी यह असामान्य स्थिति पाई गई उनके मनोविश्लेषण से पता चलता है कि ऐसे व्यक्ति या तो जन्म-जात आध्यात्मिक प्रकृति के थे या कालान्तर में उनमें विलक्षण अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास भी हो जाता है। इस संदर्भ में जेनेवा की एक युवती जेनेट डरनी का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जेनेट 1948 में जब वह 16-17 वर्षीय युवती थी किसी रोग से पीड़ित हुई।
साधना की दृष्टि से सामान्य व्यवहार में उसके रसना प्रयोजन एवं वार्ताक्रम में साधकों जैसी रीति नीति का समावेश किया जाय। अति की, हराम की कमाई न खाई जाय। परिश्रम और न्याय के सहारे जितना कुछ कमाया जा सके उतने में ही मितव्ययितापूर्वक गुजारा किया जाय। चटोरेपन की बुरी आदत से लड़ा जाय और सात्विक सुपाच्य पदार्थों को औषधि भाव से उतनी ही मात्रा में लिया जाय जितनी कि पेट की आवश्यकता एवं क्षमता है। इस दृष्टिकोण को अपनाने वाले के लिए मद्य, माँस जैसे अभक्ष्य को ग्रहण करने की तो बात ही क्या-उत्तेजक मसाले और नशीले पदार्थों-मिष्ठान्न पकवानों तक से परहेज करने की जरूरत स्पष्ट है।
साधना करने वाले व्यायाम प्रेमी उसे सुन्दर बलिष्ठ और आकर्षक बना लेते । ऐसे शरीर पहलवान के नाम से प्रख्यात होते और पुरस्कृत होते हैं। विद्वान बनने के लिए मस्तिष्क की साधना करनी पड़ती है। प्रशिक्षण और वातावरण के दबाव से ही मनुष्य सुसंस्कृत बनता और गौरवास्पद होता है। यह सब संस्कार साधना का ही प्रतिफल है।
साधना से योगी चित्त को स्थिर कर आत्मभाव में लीन हो जाता है। भवबन्धन से छुट जाता है। समग्र शक्तियों से सम्पन्न होता है। स्वच्छन्द विचरता है और उसकी वाणी विमल हो जाती है।
साधना करनी पड़ेगी। वे न तो हमसे तुच्छ हैं न दया के भिखारी। इस धरती की शोभा और शान में वे हमारे समान सहचर और सहभागी हैं मनुष्य चाहें तो उनसे स्वयं भी बहुत सीख सकता है।
साधना की तीन सही प्रमुख धाराएँ हैं-कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग इन्हीं के सहारे जीवन लक्ष्य प्राप्त होने की स्थिति बनती हैं। इसी त्रिवेणी में स्नान करने से परम पद की प्राप्ति का लाभ मिलता है।
साधना तो सफल हो ही कैसे सकती है ?
साधना के अनेक स्वरूप, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के प्रयोग अभ्यासों के रूप में प्रस्तुत किये गये है। उनकी सफलताओं के फलस्वरूप मिलने वाले सत्परिणामों का आकर्षक वर्णन हुआ है। उस क्षेत्र की सफलताओं का भौतिक और आत्मिक ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में महात्म्य बताया गया है।
साधना के रूप में लिया जाना चाहिये।
साधना पूजा-पाठ के अर्थों में होता है। इसे आत्म साधना कहना चाहिए। प्रसुप्त अन्तः शक्तियों को जगाने, उच्चस्तरीय दृष्टिकोण विकसित करने एवं क्षमताओं को सुनियोजित करने के लिए ही तत्त्वदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घ कालीन अनुभवों के सहारे आत्म-विज्ञान का आविर्भाव किया है। इस विद्या को संसार की सर्वोपरि विद्या कहा गया है। यह सर्वथा सत्य है।
साधना करनी पड़ती है। प्रशिक्षण और वातावरण के दबाव से ही मनुष्य सुसंस्कृत बनता और गौरवास्पद होता है। यह सब संस्कार साधना का ही प्रतिफल है।
साधना करनी पड़ती है। इससे कष्टों और कठिनाइयों को जानबूझकर आमन्त्रित किया जाता है। प्रायः सभी प्रकार की तपश्चर्याएँ शरीर को कष्ट देने वाली और मन को अखरने वाली होती है। उन्हें आमन्त्रित करने का उद्देश्य प्रतिकूलताओं से टकराने पर उत्पन्न होने वाली शक्ति का लाभ उठाना हैं जल प्रपातों की धारा से घूमने वाले पहिये जोड़ दिये जाते हैं। और उतने भर से बिजली घर, पनचक्की तथा दूसरे कल कारखाने चलने लगते हैं।
साधना में जहाँ श्रद्धा विश्वास भरी संकल्प शक्ति का समावेश करना है वहाँ उसकी तालबद्धता का अभ्यास करना भी आवश्यक होता है।
साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त की ही पग पग पर पुष्टि करते हैं। विज्ञान की साधना करते करते मनुष्य ने प्रकृति के चमत्कारी वरदान प्राप्त किये है। जब तक वे प्रयास बन नहीं पड़े थे, तब तक प्रस्तुत वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक भी हस्तगत नहीं हुई थी।
साधना के क्षेत्र में होने वाला प्रयोग है। इसके लिए समूचे व्यक्तित्व को मन, वचन, कर्म को, गुण कर्म स्वभाव को, चिन्तन एवं चरित्र को, उच्चस्तरीय बनाने के भागीरथ प्रयत्न में जुटना होता है। मन्त्रोच्चारण की विधि-व्यवस्था कुछ घण्टों में सीखी जा सकती है। उसका परिपूर्ण अभ्यास कुछ दिनों में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व की मूल सत्ता का स्तर ऊँचा उठाना काफी कठिन है।
साधना के लिए जो किया और सोचा जाता है उसकी किसी को आवश्यकता ही न पड़ेगी। फिर आरोग्य स्वाभाविक रहने से उसका महत्त्व भी प्रतीत न होगा तब किसी को स्वास्थ्य का महत्त्व ही प्रतीत न होगा और उसके लिए प्रयत्नशील रहना तो दूर कोई उस संदर्भ में चर्चा तक करना पसन्द न करेगा। ऐसी दशा में मानव जीवन में सुदृढ़ स्वास्थ्य के कारण जो गर्व गौरव एवं आनन्द प्राप्त होता है उसका भी अन्त हो जाएगा । मरण संसार में से उठ जाय तो फिर जिन्दगी को प्यार करने का कोई प्रश्न ही न रहेगा। कुरूपता कहीं रहे ही नहीं तो सौंदर्य के लिए आँखें आज जिस तरह तरसती हैं और देख कर प्रसन्न होती हैं फिर वैसी स्थिति नहीं रहेंगी ।
साधनाएँ ही उपयुक्त हो सकती है जिन्हें कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया के अंतर्गत प्रायः काम में लाया जाता है।
साधनाओं से ही सम्भव हो सकती है। प्राणों का स्वरूप स्थिति और विज्ञान जान लेने के बाद, आत्मा-परमात्मा और प्रकृति में से जानने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
साधना के आधार पर आत्म चेतना की गहरी परतों को उभारने की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया सम्पन्न होती है और उसके सहारे जो असाधारण स्तर के सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं उन्हें सिद्धि कहा जाता है।
साधना से मिल जाता है जिसके लिये योगाभ्यास और जन्म-जन्मान्तरों के दोष परिमार्जन की एक कठिन और लम्बी साधना पूरी करनी पड़ती, सत्प्रवृत्तियों को, उच्चादर्शों को समर्पित जीवन का अर्थ परमात्मा को समर्पित जीवन। ऐसे साधक के लिये ही भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:-
साधना में लगा रहना पड़ा है और पशु-पालन शास्त्र विकसित करना पड़ा है। हिंस्र पशुओं को सरकस में कौतूहलवर्धक काम करते देखते हैं तो आश्चर्य होता है। अपनी मूल-स्थिति में जो सिंह बाघ मनुष्य का प्राण हरण ही कर सकते हैं, प्रशिक्षित होने पर वे ही भारी कमाई करते हैं। इसे साधना का चमत्कार ही कहा जा सकता है।
साधना है। यह सौभाग्य जिन प्रयोजनों को मिल जाते हैं। चाहे वह साँसारिक हों या आध्यात्मिक उनको सफलता की आधी मंजिल तत्काल पूर्ण हो जाती है। साथ उस समर्पित आत्मा को ईश्वरीय सान्निध्य का एक ऐसा दिव्य लाभ इसी साधना से मिल जाता है जिसके लिये योगाभ्यास और जन्म-जन्मान्तरों के दोष परिमार्जन की एक कठिन और लम्बी साधना पूरी करनी पड़ती, सत्प्रवृत्तियों को, उच्चादर्शों को समर्पित जीवन का अर्थ परमात्मा को समर्पित जीवन। ऐसे साधक के लिये ही भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:-
साधना अपनाई जाय ओर पीछे के लिए प्रति के लिए नितान्त आवश्यक प्रखरता का उपार्जन किया जाय। बालकों को आरम्भ में थोड़ी असुविधा भले ही रहे पर दूरगामी ओर चिरस्थायी लाभ तो तपस्वी जीवन के फलस्वरूप ही मिलता है। यह तथ्य जब तक छात्रों, अध्यापकों और अभिभावकों को स्वीकार रहा तब तक गुरुकुलों के छात्र ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी बन कर निकलते रहे और अपनी प्रतिभा का हर क्षेत्र में परिचय देते रहे।
साधना नहीं वरन् जीवन साधना के क्षेत्र में होने वाला प्रयोग है। इसके लिए समूचे व्यक्तित्व को मन, वचन, कर्म को, गुण कर्म स्वभाव को, चिन्तन एवं चरित्र को, उच्चस्तरीय बनाने के भागीरथ प्रयत्न में जुटना होता है। मन्त्रोच्चारण की विधि-व्यवस्था कुछ घण्टों में सीखी जा सकती है। उसका परिपूर्ण अभ्यास कुछ दिनों में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व की मूल सत्ता का स्तर ऊँचा उठाना काफी कठिन है।
साधनायें या पारमार्थिक सेवायें तो समर्पण के अभाव में पनप ही नहीं सकती।
साधना से अभीष्ट साधनों का, सफलताओं का मिलना तो एक गौण लाभ है। असली लाभ है साधक के व्यक्तित्व का-गुण कर्म, स्वभाव का सुविकसित होना। इस उपार्जन के सहारे प्रतिभा निखरती है और उस सामर्थ्य के सहारे किसी भी दिशा में प्रगति की जा सकती है।
साधना पूरी करनी पड़ती, सत्प्रवृत्तियों को, उच्चादर्शों को समर्पित जीवन का अर्थ परमात्मा को समर्पित जीवन। ऐसे साधक के लिये ही भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:-
साधना का प्रतिफल है। समाज का गठन, शासन तन्त्र, तत्त्व-दर्शन धर्म, सभ्यता, संस्कृति आदि का प्रस्तुत ढाँचा यदि खड़ा न किया जा सका होता तो मनुष्य अपने मूल स्वरूप में वनमानुषों से अधिक कुछ हो नहीं सकता था। अब भी जहाँ सभ्यता का प्रकाश स्वल्प मात्रा में पहुँचा है, वहाँ के मनुष्यों का पिछड़ापन कितना दयनीय प्रतीत होता है।
साधना का चमत्कार ही कहा जा सकता है।
साधनाओं में या आत्मोपलब्धि, परमात्मा के दर्शन परमगति या मोक्ष की कामना उनमें से किसी भी ध्येय के लिये समर्पित हों, कामनायें सर्वप्रथम नष्ट करनी पड़ती है। मार्गदर्शक या ध्येय की प्रामाणिकता प्रारम्भ में सिद्ध हो जाये तो फिर कर्तृत्व में अवाँछनीयता की गुँजाइश प्रायः रहती ही नहीं।
साधना से सिद्धि की उक्ति अक्षरशः सत्य है। इस संसार में ने तो कुछ अनायास होता है और न अप्रत्याशित। प्रकृति की विलक्षण घटनाओं से लेकर मानवी उत्थान-पतन तक की समस्त हलचलें किसी क्रमबद्ध प्रतिक्रिया के सुनिश्चित परिणाम है। भले ही हम उस प्रक्रिया से परिचित न होने के कारण भाग्य, दैव आदि का कुछ भी नाम देते रहें। तथ्य ‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त की ही पग पग पर पुष्टि करते हैं।
साधना को ही श्रेय जाता है। तब उसमें से किसी में भी न तो कोई महत्त्वाकाँक्षा थी न पूर्वाग्रह सेवा के फल की कामना थी न यश की। सरफरोशी की तमन्ना अर्थात् सच्चे समर्पण की भावना का जहाँ भी उदय होगा वहाँ उद्देश्य सार्थक होते चले जायेंगे।
साधनाओं का स्वरूप सद्भाव सम्पन्नता के साथ जोड़कर बनाया गया है, अस्तु उनमें श्रेष्ठताओं के दैवी अनुदान ही मिलते हैं।
साधना को ईश्वर उपासना कहा जा सकता।’
साधनाओं में सिद्धि के गुणों में यह स्थिति अनिवार्य मानी गई है। अतएव समर्पण को आत्म कल्याण की सर्वोपरि साधना के रूप में लिया जाना चाहिये।
साधना का ही प्रतिफल है।
साधना के,अनुकरणीय आदर्शवादिता के अनेकों उदाहरण इसी भक्ति भावना की प्रेरणा से बन पड़ते हैं।
साधना’ शब्द का प्रयोग योगाभ्यास, तप-साधना पूजा-पाठ के अर्थों में होता है। इसे आत्म साधना कहना चाहिए। प्रसुप्त अन्तः शक्तियों को जगाने, उच्चस्तरीय दृष्टिकोण विकसित करने एवं क्षमताओं को सुनियोजित करने के लिए ही तत्त्वदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घ कालीन अनुभवों के सहारे आत्म-विज्ञान का आविर्भाव किया है। इस विद्या को संसार की सर्वोपरि विद्या कहा गया है। यह सर्वथा सत्य है।
साधना करते करते मनुष्य ने प्रकृति के चमत्कारी वरदान प्राप्त किये है। जब तक वे प्रयास बन नहीं पड़े थे, तब तक प्रस्तुत वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक भी हस्तगत नहीं हुई थी।
साधना कहना चाहिए। प्रसुप्त अन्तः शक्तियों को जगाने, उच्चस्तरीय दृष्टिकोण विकसित करने एवं क्षमताओं को सुनियोजित करने के लिए ही तत्त्वदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घ कालीन अनुभवों के सहारे आत्म-विज्ञान का आविर्भाव किया है। इस विद्या को संसार की सर्वोपरि विद्या कहा गया है। यह सर्वथा सत्य है। जड़ की तुलना में चेतन की क्षमता असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी है।
साधना यह है कि उसके लिए जिव्हा समेत समस्त उपकरणों का परिशोधन करना पड़ता है। जो तथ्य को समझते हैं वे साधनाओं के विधि-विधान तक सीमित न रह कर जीवन-प्रक्रिया को उच्चस्तरीय बनाने की सुविस्तृत रूपरेखा तैयार करते हैं। उस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसके जप तप उसी अनुपात में सफल होते देखे जा सकेंगे । शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार इसी मार्ग पर चलने से सम्भव होता है। समूची आत्मसत्ता को परिष्कृत बनाने से वाणी की परिणित ‘वाक्’ शक्ति में होती है।
साधनाओं का फल चमत्कार समझा जाता है और उसे सिद्धि नाम दिया जाता है। वस्तुतः आत्म साधना के आधार पर आत्म चेतना की गहरी परतों को उभारने की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया सम्पन्न होती है और उसके सहारे जो असाधारण स्तर के सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं उन्हें सिद्धि कहा जाता है।
साधना सम्पन्न होकर ‘वाक्’ बनती है तो उसका विस्तार श्रवण क्षेत्र तक सीमित न रह कर तीनों लोकों की परिधि तक व्यापक होता है। वाणी में ध्वनि है ध्वनि में अर्थ। किन्तु वाक् शक्ति रूपा है। उसकी क्षमता का उपयोग करने पर वह सब जीता जा सकता है। जो जीतने योग्य है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-February
साधना में-देव पूजन में प्रयुक्त होने वाले पंचोपचार के, धूप, दीप, नैवेध, अक्षत, पुष्प के समतुल्य माना जा सकता है। अगले दिनों हममें से प्रत्येक की यह प्रयत्न करना चाहिए कि इनका पालन अपने व्यक्तिगत जीवन व्यवहार में अधिकाधिक मात्रा में होता रहे। हमने आजीवन इन्हें निबाहने का प्रयत्न किया है। चाहते यह है कि परिजनों में से प्रत्येक को इन्हें अपनाने के लिए उत्साह उमड़े और वे इसके लिए इसी बसन्त पर्व से साधना स्तर का प्रयत्न आरम्भ कर दें।
साधना जैसी दुरूह और गुह्ममानी जाने वाली प्रक्रिया को वर्तमान परिस्थितियों में भी अपनाया जाने योग्य व्यावहारिक, सुगम रूप दिया जा सका, उसी प्रकार इन साधनाओं को भी सर्वसुलभ बनाया जा रहा है। उनका प्रभाव यथावत् बनाये रखकर भी उनकी साधना विधि का जन-साधारण द्वारा अपनाये जाने योग्य बनाया गया है। सीमित साधनों एवं सीमित समय में भी इन साधनाओं को उत्साही साधक कर सकते हैं तथा पर्याप्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
साधना के पाँच प्रमुख अंग समझे जाएँ और इन्हें जीवन-क्रम में उतारने के लिए सतत् प्रयत्न करते रहा जाय तो कुछ ही समय में सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए भी आत्मिक दृष्टि से असामान्य एवं असाधारण बनना सम्भव होगा। हमारी जीवन-यात्रा सड़क पर चलते हुए लक्ष्य, पूर्ति के निकट स्थल तक जा पहुँची है। हम चाहते हैं कि अपने परिवार का प्रत्येक सदस्य इन्हें हृदयंगम करें। जीवन व्यवहार में उतारे। पंचकोशों के अनावरण का- पंचमुखी गायत्री साधना का- इसे उच्चस्तरीय प्रयास कहा जा सकेगा।
साधना में शिथिलता, शून्यावस्था, समाधि, शवासन आदि को बहुत महत्त्व दिया जाता है यह अर्धतन्द्रा की स्थितियाँ है। इन्हें योगनिद्रा कहा जाता है। स्नायु संस्थान पर से तनाव, दबाव, हटाकर यदि उसे शान्त, विश्रान्त, सौम्य, मनःस्थिति को एक प्रकार से जागृत निद्रा के समतुल्य माना जा सकता है। धारणा और ध्यान के चरण पूरे करते हुए समाधि स्थिति पर पहुँचना साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है। स्वप्नावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और स्वसंकेत देना एवं अपने बलबूते अपने को इच्छित दिशा में मोड़ सकना संभव नहीं।
साधना सत्रों के तीन आधार है- (1) स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर में छाई, तन्द्रा का निवारण और जागृति का प्रखरता का अभिवर्धन (2) अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोशों का अनावरण करने वाली गायत्री की उच्चस्तरीय पंचमुखी-पंचकोशी साधना (3) कुण्डलिनी जागरण की अन्त ऊर्जा का उभार। ओजस् तेजस् एवं आत्मबल का प्रचण्ड उन्नयन। साधना में इन्हीं तीन तत्त्वों का सन्तुलन समावेश रखा गया है।
साधनाओं के साथ जोड़ा गया आसनों का दर्शन पक्ष साधक को उपयुक्त आधार की दिशा और प्रेरणा देता है। उसे तो अनिवार्य रूप से तुरन्त हृदयंगम करना ही चाहिए। क्रिया पक्ष का भी अभ्यास चालू रखना चाहिए। प्रारम्भ में आसन थोड़े समय ही करें। साधना में केवल मुद्रा-अथवा मुद्रा एवं प्राणायाम उसके लिए नियुक्त विशेष आसन में की जाय।
साधना कि सिद्धि मिलने का उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण हो गया।
साधना स्वर्ण-जयन्ती की पूर्णाहुति बसन्त पर्व-24 जनवरी को सम्पन्न हुई। उसी दिन यह ‘पंक्तियाँ लिखी जा रही है। जीवन को साधनामय बनाने के- आदर्श के प्रति निष्ठा व्यक्त करने के- लिए यह योजना बनाई गई थी कि जनसाधारण का विशेषतया अपने घनिष्ठ परिजनों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाय कि जीवन को साधनामय बनाना कितना सार्थक और कितना बुद्धिमत्ता पूर्ण है? एक वर्ष तक 45 मिनट की साधना का कार्यक्रम देकर यह चेतना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया था कि मनुष्य जीवन का मूल्य महत्त्व स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग समझा जाय। ईश्वर के इस सर्व श्रेष्ठ उपहार को सार्थक बनाया जाय।
साधना के अंतर्गत तीनों साधनों का आरम्भ में उपस्थित साधकों को निर्देश दिया जाता है कि वे कमर सीधी-हाथ को गोदी में-बाँया हाथ नीचे दाहिना ऊपर-शान्तचित्त-नेत्र बन्द की ध्यान मुद्रा में बैठें। मन को एकाग्र रखें। निर्धारित निर्देशों के अनुरूप कल्पना क्षेत्र में भाव चित्र बनायें। उन चित्रों से मन स्पष्ट और प्रखर करने का प्रयत्न करें। अनुभूतियाँ जो बताई गई हैं, उन्हें उभारने के लिए तन्मयता एवं श्रद्धा का परिपूर्ण समावेश करें।
साधना से आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाने वाली प्रबल प्रेरणा मिलती है। यदि इस उद्भव को चिरस्थायी बनाया जा सके और सदुपयोग हो सके तो समझना चाहिए कि साधना कि सिद्धि मिलने का उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण हो गया।
साधना विधि का जन-साधारण द्वारा अपनाये जाने योग्य बनाया गया है। सीमित साधनों एवं सीमित समय में भी इन साधनाओं को उत्साही साधक कर सकते हैं तथा पर्याप्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
साधना में ‘स्व’ पर कल्याण समान रूप से सन्निहित है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शरीर यात्रा की भाँति ही परमार्थ प्रयोजनों को भी नितान्त आवश्यक मानना चाहिए। उपलब्ध साधनों का विभाजन इन दानों के लिए समान मात्रा में करना चाहिए। उत्तमता तो इसमें है कि शरीर को कम और आत्मा को अधिक भाग दिया जाय। शारीरिक आवश्यकताएं स्वल्प रखी जाएँ, परिवार बढ़ाया न जाय, जो है उसी को स्वावलम्बी बनाने की अपनी सामर्थ्य जीवनोद्देश्य की पूर्ति में लगाने की तैयारी की जाय।
साधनाओं को भी सर्वसुलभ बनाया जा रहा है। उनका प्रभाव यथावत् बनाये रखकर भी उनकी साधना विधि का जन-साधारण द्वारा अपनाये जाने योग्य बनाया गया है। सीमित साधनों एवं सीमित समय में भी इन साधनाओं को उत्साही साधक कर सकते हैं तथा पर्याप्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
साधना एवं प्रशिक्षण सत्रों में जोड़ दिया गया है। क्षेत्रों में भी परिजन इसे प्रारम्भ कर सकते हैं। शांतिकुंज में जप, तप, उपासना, हवन आदि के क्रम में साथ-साथ प्रतिदिन दो बार इन साधनाओं का अभ्यास कराया जाता है। दस दिवसीय शिविरों में तीन-तीन दिन तक एक-एक साधना का क्रम चलता है। प्रातः 45 मि0 ध्यान साधना एवं सायंकाल क्रियायोग सहित साधना का प्रशिक्षणात्मक अभ्यास कराया जाता है।
साधना के सत्परिणामों पर हमारा पक्का विश्वास रहा होता तो अन्य लाभदायक उद्योगों में जितनी तत्परता रहती है उससे भी अधिक इस दिशा में रही होती। उपेक्षा और अन्य मनस्कता के कारण ही हम उखड़ी-उखड़ी साधना करते रहते हैं और विश्वास की परिपक्वता के अभाव में सत्परिणामों से वंचित रहते हैं। विश्वास के फलस्वरूप झाड़ी का भूत, रस्सी का साँप ओर आशंका का आतंक रोमांचकारी भय संचार कर सकता है। तो उसकी उच्चस्तरीय प्रतिष्ठापना से पत्थर में से देवता भी प्रकट हो सकता है। मीरा के गिरधर गोपाल ,रामकृष्ण परमहंस की काली ,एकलव्य के द्रोणाचार्य मात्र उनके गहन विश्वास द्वारा किये गये चमत्कारी उत्पादन भर कहे जा सकते हैं।
साधना का समावेश रहा करेगा। साथ ही एक महीने के महिला सत्रों के ध्यान प्रवचन के अतिरिक्त वे भी महिला समस्याओं के संबंधित अतिरिक्त कक्षाओं में शिक्षा प्राप्त करेंगी।
साधनाएँ संयम का ही प्रयोजन पूरा करती है। योग साधना में कितना ही चमत्कारी सिद्धियों का वर्णन है उन सबको प्रकारान्तर से चित्त-वृत्तियों के संयम से उत्पन्न उपलब्धियाँ ही कहा जा सकता है।
साधना का पूर्वार्ध कह सकते हैं। कारण यह कि इनका सीधा सम्बन्ध और प्रभाव भौतिक गतिविधियों के साथ जुड़ा रहता है। अस्तु इन दोनों को स्थूल वर्ग में गिना गया है। और इनके सत्परिणामों को उन सिद्धियों के रूपं में देखा जाता है जिनके आधार जिनका प्रभाव लौकिक होता है। और जिन्हें चमत्कारी कहा जाता है।
साधनामय बनाने के- आदर्श के प्रति निष्ठा व्यक्त करने के- लिए यह योजना बनाई गई थी कि जनसाधारण का विशेषतया अपने घनिष्ठ परिजनों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाय कि जीवन को साधनामय बनाना कितना सार्थक और कितना बुद्धिमत्ता पूर्ण है? एक वर्ष तक 45 मिनट की साधना का कार्यक्रम देकर यह चेतना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया था कि मनुष्य जीवन का मूल्य महत्त्व स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग समझा जाय। ईश्वर के इस सर्व श्रेष्ठ उपहार को सार्थक बनाया जाय।
साधना के लिए सही आधार आसन के साथ-साथ साधक की दिशा, रुख भी ठीक हो तभी लाभ होता है। मुद्रा के अभ्यास से वृत्तियाँ एक दिशा विशेष की ओर मोड़ी जाती है। हर मुद्रा के साथ उसके दर्शन को इसीलिए हृदयंगम करना होता है।
साधना वर्ष के ध्यान, आकर्षण प्रयास की सफलता को देखते हुए यह विश्वास होता है कि परिवार के भावनाशील परिजनों में से अधिकांश को जीवन साधना में संलग्न होने की प्रेरणा मिलेगी। ठोस कदम यही होगा।
साधना में इसी की स्थिति में उत्पन्न करने के लिए निर्देश दिये जाते हैं। साधक अनुभव करता है कि वह वस्तुतः शरीर शिथिल और मन में समाहित होकर गम्भीर शान्ति अनुभव कर रहा है। यह योग निद्रा प्रकरण हुआ।
साधना की गहराइयों में उतरते और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं।
साधनाओं का इतिहास इसी भूखण्ड के साथ जुड़ा हुआ है। राम लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न चारों भाई वृद्धावस्था में अयोध्या छोड़कर इसी भूमि में तप करने के लिए आये थे। भगवान कृष्ण ने रुक्मिणी सहित इसी भूमि में तप किया था। पाण्डव स्वर्गारोहण की साधना करने यहीं आये थे। सप्त ऋषियों का तप यहीं सम्पन्न हुआ था।
साधनाओं के लिए तीन-तीन दिन की- आधा-आधा घण्टे की- ध्यान धारणा निर्धारित है। उस अवधि में तीन दिन तीनों शरीरों सम्बन्धी, तीन दिन पाँच कोशों सम्बन्धी तथा तीन दिन कुण्डलिनी जागरण सम्बन्धी ध्यान विशेष निर्देशों के साथ कराया जाता है।
साधना का उद्देश्य इसी चुम्बकत्व का- ब्रह्मवर्चस् का अभिवर्धन है। इसी से सामान्य मनुष्य को राजर्षि ब्रह्मर्षि और देवर्षि स्तर तक पहुँचने का अवसर मिलता है। जीवात्मा को क्रमशः महात्मा देवात्मा और परमात्मा स्तर तक ऊँचा उठा ले जाने वाले प्रचण्ड ईंधन के रूप में इसी आत्म-विद्युत का- प्राण चुम्बक का प्रयोग करना पड़ता है। संयम ब्रह्मचर्य से, मनोनिग्रह से, मौन-व्रत उपवासों से, ध्यान धारणा से तथा अनेक सरल कठोर विधि विधानों से इस या उस प्रकार से साधना मार्ग के पथिकों को इसी प्राण ऊर्जा के अभिवर्धन, नियन्त्रण एवं उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न करने की विधि व्यवस्था से अवगत कराया जाता है। वैज्ञानिक क्षेत्र में कुछ हलके स्तर पर इसी प्राण विद्युत की खोज बीन सम्भव हुई है।
साधना का- इसे उच्चस्तरीय प्रयास कहा जा सकेगा। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में अगले दिन विभिन्न स्तर की योग तप उपासनाओं का अभ्यास कराने के साथ-साथ इन पंचशीलों को अपनाने पर भी जोर दिया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा कि इस मार्ग में किसे क्या कठिनाई आ सकती है और उसका निराकरण किस प्रकार सम्भव हो सकता है?
साधनाओं का अभ्यास कराया जाता है। दस दिवसीय शिविरों में तीन-तीन दिन तक एक-एक साधना का क्रम चलता है। प्रातः 45 मि0 ध्यान साधना एवं सायंकाल क्रियायोग सहित साधना का प्रशिक्षणात्मक अभ्यास कराया जाता है। साधक दिये जाने वाले निर्देशों का अनुसरण करते हुए साधना की गहराइयों में उतरते और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं।
साधना (3) कुण्डलिनी जागरण की अन्त ऊर्जा का उभार। ओजस् तेजस् एवं आत्मबल का प्रचण्ड उन्नयन। साधना में इन्हीं तीन तत्त्वों का सन्तुलन समावेश रखा गया है।
साधना का ‘प्रकाश’ प्रशिक्षण दिया जाता रहा है। शान्ति-कुंज के पिछले सत्र इसी प्रयोजन के लिए चलते रहे हैं।
साधनाएं अधिक समय चलाना चाहते हैं। उनकी इच्छा एवं सुविधा के अनुरूप वैसा प्रबन्ध विशेष रूप से कर दिया जाया करेगा। महिलाओं के दस-दस दिवसीय सत्र साथ ही चला करेंगे। वे प्रातः काल के ध्यान और मध्याह्न प्रवचन में तो सम्मिलित हो सकेंगी, पर शेष समय उनकी अतिरिक्त कक्षाएँ गृह-लक्ष्मी एवं नारी जागरण के लिए सेवा-साधना करने की योग्यता बढ़ाने की दृष्टि से चला करेंगी। एक-एक महीने के वानप्रस्थ सत्रों में भी अब ‘ब्रह्म वर्चस्’ साधना का समावेश रहा करेगा।
साधना आगे या पीछे भी की जा सकती है। हाँ शक्ति संचार का विशेष लाभ सूर्योदय से 45 मिनट पूर्व से लेकर ठीक सूर्योदय की अवधि तक ही मिल सकेगा। उपासना की कर्मकाण्ड परक-प्रक्रिया को ‘जादुई’ मानकर चलने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उपासना में मात्र जीवन-क्रम के निर्धारण के संकेत सूत्र सन्निहित रहते हैं। वास्तविक साधना तो जीवन की दिशा धारा को आदर्शवादी प्रयोजनों के साथ जोड़ने से सम्बन्ध रखती है।
साधना का कार्यक्रम देकर यह चेतना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया था कि मनुष्य जीवन का मूल्य महत्त्व स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग समझा जाय। ईश्वर के इस सर्व श्रेष्ठ उपहार को सार्थक बनाया जाय।
साधनाक्रम आज समाप्त हो जायेगा। जो लोग उसे आगे भी जारी रखना चाहें, रखे रहे। वह साधन प्रक्रिया अपने आप में बहुत ही सारगर्भित है और इस योग्य है कि उसे आजीवन अपनाये रहा जाय। सूर्योदय से पूर्व 45 मिनट का समय बन्धन इसलिए था कि उस समय शक्ति संचार का विशेष लाभ मिल सके वैसी व्यवस्था की गई थी। प्रसन्नता की बात है कि वह शक्ति संसार क्रम ठीक उसी समय साधना करने न करने का कोई आग्रह प्रतिबंध नहीं हैं सुविधानुसार वह साधना आगे या पीछे भी की जा सकती है।
साधना एवं प्रशिक्षण सत्रों में जोड़ दिया गया हूँ। क्षेत्रों साधना एवं प्रशिक्षण सत्रों में जोड़ दिया गया है। क्षेत्रों में भी परिजन इसे प्रारम्भ कर सकते हैं। शांतिकुंज में जप, तप, उपासना, हवन आदि के क्रम में साथ-साथ प्रतिदिन दो बार इन साधनाओं का अभ्यास कराया जाता है। दस दिवसीय शिविरों में तीन-तीन दिन तक एक-एक साधना का क्रम चलता है।
साधना में अटूट धैर्य और मनोबल के साथ लगा रहना पड़ता है। इसी मार्ग पर चलते हुए आत्मोत्कर्ष का जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर सकना सम्भव होता है। साधक की प्रथम परीक्षा इसी कसौटी पर होती है।
साधना एवं सायंकाल क्रियायोग सहित साधना का प्रशिक्षणात्मक अभ्यास कराया जाता है। साधक दिये जाने वाले निर्देशों का अनुसरण करते हुए साधना की गहराइयों में उतरते और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं।
साधना के लिए आवश्यक हलचल एवं ऊष्मा शरीर एवं अन्तःकरण में पैदा की जाती हैं योग साधना का प्राणायामक वल श्वास-प्रश्वास नहीं होता, उसके साथ संकल्प युक्त प्राण प्रयोग होता है। संकल्प एवं चिन्तन की प्रखरता के अनुरूप ही प्राण संचरण में सबलता आती है।
साधना के पथ पर चलने वाला साधक का सर्व प्रथम आधार है इसके उपार्जन-अभ्यास के लिए उपासना का कर्मकाण्डों में पूरी तरह समावेश किया गया है। प्रातः काल जल्दी उठना, तत्परतापूर्वक नित्यकर्म से निवृत्त होना-नियम स्थान पर-नियत मर्यादाओं का पालन करते हुए-उपासना पर बैठना-सुखासन लगाना मेरु दण्ड का सीधा होना जैसा शारीरिक अनुशासन नियत स्थान ,नियत समय, नियत मात्रा में नियम विधान से उपासना-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-बल के अभिवर्धन की प्रक्रिया जुड़ी हुई है। अस्त व्यस्तता और अव्यवस्था को इसी कठोरता के आधार पर निरस्त किया जाता है। बाल चंचलता को हटाकर दृढ़ निशित प्रौढ़ता उत्पन्नं करने में प्रचण्ड मनोबल की ही प्रधान भूमिका रहती है। व्रत, उपवास, तप, तितीक्षा, मौन, ब्रह्मचर्य आदि के अनेकों विधि निषेध अनुशासन साधना में पालन करते हैं साधना विधि में ढील-पोल नहीं चलने दी जाती, वरन् निर्धारित क्रिया-कृत्यों को राई−रत्ती पूरा करना पड़ता है।
साधना स्थल एवं वातावरण के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय भावनाएँ लेकर चलना पड़ता है। तप की परम्परा में हिमालय पिता की गोद तथा गंगा माता के आँचल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं का इतिहास इसी भूखण्ड के साथ जुड़ा हुआ है। राम लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न चारों भाई वृद्धावस्था में अयोध्या छोड़कर इसी भूमि में तप करने के लिए आये थे। भगवान कृष्ण ने रुक्मिणी सहित इसी भूमि में तप किया था।
साधना में ढलने के उपयुक्त बन गई। उससे सत्कर्ष ही बन पड़ेंगे। क्रिया क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियाँ उस दिव्य ऊर्जा के अवतरण से सहज ही जल-भुनकर नष्ट होंगी। पुरुषार्थ और वर्चस्व निखरेगा।
साधना के पंचशील
साधना करने की योग्यता बढ़ाने की दृष्टि से चला करेंगी। एक-एक महीने के वानप्रस्थ सत्रों में भी अब ‘ब्रह्म वर्चस्’ साधना का समावेश रहा करेगा। साथ ही एक महीने के महिला सत्रों के ध्यान प्रवचन के अतिरिक्त वे भी महिला समस्याओं के संबंधित अतिरिक्त कक्षाओं में शिक्षा प्राप्त करेंगी।
साधना के पंचशीलों का पालन (3) दिसम्बर अखण्ड ज्योति के आह्वान आमन्त्रण एवं अपनों से अपनी बात को अपने लिए व्यक्तिगत सब मानकर कुछ करने का साहस (4) अपने संपर्क क्षेत्र में इस प्रेरणा का विस्तार। उपेक्षा को उत्साह में परिवर्तन करने के लिए जन-संपर्क का कार्य क्रम (5) महिला जागरण शाखा संगठन का आरम्भ और उसे अग्रगामी बनना। यह पाँचों कार्य करने के लिए इस बसन्त पर्व पर हमारा विशेष आग्रह हैं इस दिशा में जो जितना कर सकें उसकी सूचना शान्ति-कुँज पहुँचा दें।
साधना में संलग्न होने की प्रेरणा मिलेगी। ठोस कदम यही होगा।
साधना में कितना ही चमत्कारी सिद्धियों का वर्णन है उन सबको प्रकारान्तर से चित्त-वृत्तियों के संयम से उत्पन्न उपलब्धियाँ ही कहा जा सकता है।
साधना में पालन करते हैं साधना विधि में ढील-पोल नहीं चलने दी जाती, वरन् निर्धारित क्रिया-कृत्यों को राई−रत्ती पूरा करना पड़ता है। इस फौजी अनुशासन को ठीक तरह निभाते चलने पर मनोनिग्रह की सफलता मिलती है और उस आत्म-विजय पर गर्व गौरव अनुभव करता हुआ साधक जीवन -संग्राम में बढ़े-बढ़े आदर्शवादी पुरुषार्थ, पराक्रम, कर सकने में समर्थ होता है।
साधनाओं में प्रमुख भूमिका ध्यान की ही है, अन्य क्रियाएं उसी की सहयोगी क्रियायें है। ध्यान को प्रधान मानने का अर्थ अन्य को निरर्थक मान लेना नहीं है। सभी क्रियाएं अपना-अपना महत्त्व रखती है, और प्रकारान्तर से ध्यान को प्रखर तथा सुनियोजित बनाती है। इनके सहारे साधक का ध्यान भटकता नहीं है तथा साधना प्रवाह अबाध चलता रह सकता है।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष के अन्त में अपने प्रत्येक प्रबुद्ध परिजन से हमें इस प्रकार उद्बोधन सम्पर्क के लिए एकाकी या टाली बाँधकर निकलने की अपेक्षा करेंगे।
साधना करते रहते हैं और विश्वास की परिपक्वता के अभाव में सत्परिणामों से वंचित रहते हैं। विश्वास के फलस्वरूप झाड़ी का भूत, रस्सी का साँप ओर आशंका का आतंक रोमांचकारी भय संचार कर सकता है। तो उसकी उच्चस्तरीय प्रतिष्ठापना से पत्थर में से देवता भी प्रकट हो सकता है। मीरा के गिरधर गोपाल ,रामकृष्ण परमहंस की काली ,एकलव्य के द्रोणाचार्य मात्र उनके गहन विश्वास द्वारा किये गये चमत्कारी उत्पादन भर कहे जा सकते हैं।
साधना माना जाय और इसी क्रिया-कलाप में उत्कृष्ट आदर्शवादिता को सँजोये रखने का अभ्यास किया जाय। आरम्भ में यह अभ्यास कुछ कठिन, जटिल और असुविधा उत्पन्न करने वाला लगता है पर जब उसकी आदत पड़ ताजी है तो प्रतीत होता है कि आदर्शवादी जीवन कितना सरल और कितना सुखद है।
साधना में केवल मुद्रा-अथवा मुद्रा एवं प्राणायाम उसके लिए नियुक्त विशेष आसन में की जाय। अभ्यास से जब वह सहज हो जाय तभी से जप एवं ध्यान के समय उसका उपयोग किया जाय, अन्यथा सामान्य सुखासन में ही जप ध्यान करना उचित है।
साधना का उद्देश्य इन्हीं साधनों को एकत्रित करना हैं ईश्वर अनुग्रह को घसीट बुलाना इसी चुम्बकत्व के सहारे सम्भव होता है। इसी कुदाली से अन्तः क्षेत्र को खोदने, कुरेदते हुए विभूतियों के मणि− माणिक्य उपलब्ध किये जाते हैं।
साधनाओं को उत्साही साधक कर सकते हैं तथा पर्याप्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
साधना क्रम में (1) स्वतिस्तकासन (2) खेचरी मुद्रा (3) सोऽहं प्राणायाम (4) तीन प्रणवयुक्त गायत्री मंत्र का जप एवं (5) सविता देवता के प्रकाश का ध्यान, यह पाँच क्रियाएं सम्मिलित है।
साधना स्तर का प्रयत्न आरम्भ कर दें।
साधना के साथ, उसके विज्ञान के अनुरूप इन क्रियाओं के भिन्न-भिन्न रूप रखे गये है। तीनों ही साधनाओं में प्रमुख भूमिका ध्यान की ही है, अन्य क्रियाएं उसी की सहयोगी क्रियायें है। ध्यान को प्रधान मानने का अर्थ अन्य को निरर्थक मान लेना नहीं है। सभी क्रियाएं अपना-अपना महत्त्व रखती है, और प्रकारान्तर से ध्यान को प्रखर तथा सुनियोजित बनाती है। इनके सहारे साधक का ध्यान भटकता नहीं है तथा साधना प्रवाह अबाध चलता रह सकता है।
साधना करने यहीं आये थे। सप्त ऋषियों का तप यहीं सम्पन्न हुआ था। भागीरथ ने गंगावतरण की और परशुराम ने शक्ति पुँज दिव्य परशु प्राप्त करने तथा सफलता प्राप्त करने की दिव्य साधनाएँ इसी भूमि पर तप करते हुए सम्पन्न की थी। इस वातावरण में तपश्चर्या के उपयुक्त ऐसे दिव्य आधार मौजूद है, जिनके कारण अन्यत्र जन्म भर तप साधना करने की अपेक्षा यह प्रयोजन स्वल्प-काल में ही अधिक सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न हो जाता है।
साधना का प्राणायामक वल श्वास-प्रश्वास नहीं होता, उसके साथ संकल्प युक्त प्राण प्रयोग होता है। संकल्प एवं चिन्तन की प्रखरता के अनुरूप ही प्राण संचरण में सबलता आती है।
साधना, तपश्चर्या के देवता है, तो दूसरी और अनूठे दाम्पत्य प्रेम के,, अनुपम प्रणय के, प्रेम, सद्भाव और समाज-कल्याण के। वे नृत्य-उल्लास और लालित्य के, भाषा, शास्त्रों, कलाओं के प्रवर्तक हैं, तो विनाशकारी रुद्र भी है, प्रलयंकर शंकर है।
साधना है, सम्मोहन वैज्ञानिक प्रयोग। मानसिक चिकित्सा जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को अर्ध-मूर्च्छित करने की प्रक्रिया द्वारा ही सम्पन्न होता है। इस प्रकार उत्पन्न हुई योगनिद्रा इतनी गहरी होती है कि उसमें छोटे बड़े आपरेशन भी आसानी से हो सकते हैं। पाश्चात्य देशों में यह विज्ञान अब बहुत आगे तक बढ़ गया है और दन्त चिकित्सक तो आमतौर से इस प्रक्रिया का उपयोग करके बिना सुन्न किये ही दाँत उखड़ते रहते हैं, और रोगी को किसी प्रकार ही दाँत उखड़ते रहते हैं, और रोगी को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता।
साधना
साधना को पाँच सूत्रों में विभक्त किया जा सकता है। आध्यात्मिक जीवन के इन्हें पंचशील कहा जाय तो भी अत्युक्ति न होगी। पंच-रत्न पंच-गंव्य पंच-देव पंचाँग, पंच कोश आदि प्रसिद्ध है। गायत्री माता की प्रतिमा भी पंच मुखी बनाई जाती है। व्यावहारिक जीवन को साधना में-देव पूजन में प्रयुक्त होने वाले पंचोपचार के, धूप, दीप, नैवेध, अक्षत, पुष्प के समतुल्य माना जा सकता है।
साधनाएँ इसी भूमि पर तप करते हुए सम्पन्न की थी। इस वातावरण में तपश्चर्या के उपयुक्त ऐसे दिव्य आधार मौजूद है, जिनके कारण अन्यत्र जन्म भर तप साधना करने की अपेक्षा यह प्रयोजन स्वल्प-काल में ही अधिक सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न हो जाता है।
साधना पंचक, अथवा साधना पंचापचार कह सकते हैं।
साधना के लिए अत्यन्त उपयोगी स्थान है। यहाँ अखण्ड दीपक, नित्य जप, नित्य हवन एवं साधनाओं का दिव्य वातावरण बना रहता है। यह केन्द्र वस्तुतः किसी महान अध्यात्म शक्ति के संरक्षण में चल रहा है। आचार्य दम्पत्ति जो उसका प्रबन्ध कार्यवाहक के रूप में करते हैं। इसलिए इस क्षेत्र में ‘दिव्यता’ अनायास ही छाई रहती है।
साधना पंचापचार कह सकते हैं।
साधना सत्र चले थे। उसके बहिरंग जीवन के परिशोधन को प्रधानता दी गई थी। भूमि को जोत कर खाद पानी देकर उपजाऊ बनाने का प्रयत्न किया जाता है। बीज बोने और फसल उगाने का अध्याय इसके बाद ही आरम्भ होता है। बहिरंग में-व्यवहार में-अध्यात्म तत्त्व का प्रवेश सरल भी है और आवश्यक भी।
साधना संयुक्त मन से सर्वजनीन लोकमंगल के लिए हो रही है। यह ध्यान आरम्भ से पूर्व की प्रथम भूमिका है जिसे कुछ समय शान्त चित्त से करना होता है। इससे अनेकता में एकता की अनुभूति होने लगती है।
साधना वर्ष पूर्ण हुआ। 45 मिनट की उपासना का जो क्रम अपनाया गया था उसकी पूर्णाहुति आज हो जायेगी। अग्निहोत्र तथा मिलन सम्मेलन कार्यक्रमों के साथ वह साधनाक्रम आज समाप्त हो जायेगा। जो लोग उसे आगे भी जारी रखना चाहें, रखे रहे। वह साधन प्रक्रिया अपने आप में बहुत ही सारगर्भित है और इस योग्य है कि उसे आजीवन अपनाये रहा जाय।
साधना के लिए निर्धारित 45 मिनट से पहले 15 मिनट इस लिए सुरक्षित है। शेष आधा घंटा ध्यान करना होता है। तीन साधनाओं के लिए तीन-तीन दिन की- आधा-आधा घण्टे की- ध्यान धारणा निर्धारित है। उस अवधि में तीन दिन तीनों शरीरों सम्बन्धी, तीन दिन पाँच कोशों सम्बन्धी तथा तीन दिन कुण्डलिनी जागरण सम्बन्धी ध्यान विशेष निर्देशों के साथ कराया जाता है।
साधना पंचांग, साधना पंचक, अथवा साधना पंचापचार कह सकते हैं।
साधना के अनुकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही आसन का अर्थ आधार स्थिति नींव भी होता है। आधार गलत हो तो अगली रचना ही बिगड़ जाती हैं साधनाओं के साथ जोड़ा गया आसनों का दर्शन पक्ष साधक को उपयुक्त आधार की दिशा और प्रेरणा देता है। उसे तो अनिवार्य रूप से तुरन्त हृदयंगम करना ही चाहिए। क्रिया पक्ष का भी अभ्यास चालू रखना चाहिए।
साधना सत्रों की प्रक्रिया में यह प्रातः कालीन ध्यान धारणा मुख्य हैं परन्तु इन तीनों ही साधनाओं में से हर एक के साथ ध्यान सहित कुल पाँच-पाँच क्रियाएं रखी गई है। (1) आसन, (2) मुद्रा, (3) प्राणायाम, (4) जप, (5) ध्यान।
साधना क्रम में उन दोनों का ही उल्लेख है, ताकि उनका सही प्रयोग-उपयोग किया जा सके।
साधना द्वारा प्रेरक शक्ति प्राप्त कर लेने वाले दूसरों को उपयोगी व सार्थक प्रेरणा देकर उन्हें लाभान्वित कर सकते हैं।
साधना स्वर्ण जयन्ती का आयोजन परक स्वरूप उत्साहवर्धक रीति से सम्पन्न हो गया। अब उसके प्रकाश एवं प्रभाव को रचनात्मक दिशा में लगाने में प्रबल प्रयत्न किया जाना चाहिए। (1)उपासना में सघन श्रद्धा, उसके लिए नित्य समय लगाने का निश्चय (2) जीवन साधना के पंचशीलों का पालन (3) दिसम्बर अखण्ड ज्योति के आह्वान आमन्त्रण एवं अपनों से अपनी बात को अपने लिए व्यक्तिगत सब मानकर कुछ करने का साहस (4) अपने संपर्क क्षेत्र में इस प्रेरणा का विस्तार। उपेक्षा को उत्साह में परिवर्तन करने के लिए जन-संपर्क का कार्य क्रम (5) महिला जागरण शाखा संगठन का आरम्भ और उसे अग्रगामी बनना। यह पाँचों कार्य करने के लिए इस बसन्त पर्व पर हमारा विशेष आग्रह हैं इस दिशा में जो जितना कर सकें उसकी सूचना शान्ति-कुँज पहुँचा दें।
साधना तो जीवन की दिशा धारा को आदर्शवादी प्रयोजनों के साथ जोड़ने से सम्बन्ध रखती है। चमत्कार उसी से मिलते हैं। सिद्धियों का स्रोत इसी केन्द्र के साथ जुड़ा हुआ है। संसार भर के महामानवों को अपनी जीवन प्रक्रिया को ऐसी बनाकर चलना पड़ा हैं जिसमें उनके व्यक्तित्व में उत्कृष्टता भरी रहे साथ ही लोक-मंगल के लिए किये जाने वाले प्रयासों का उत्साहवर्धक बाहुल्य जुड़ा रहे। इससे कम में नैतिक एवं आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं, और न वे लाभ किसी को मिल सकते हैं जो ‘साधना की सिद्धि’ के रूप में शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक वर्णन किये है।
साधना का क्रम चलता है। प्रातः 45 मि0 ध्यान साधना एवं सायंकाल क्रियायोग सहित साधना का प्रशिक्षणात्मक अभ्यास कराया जाता है। साधक दिये जाने वाले निर्देशों का अनुसरण करते हुए साधना की गहराइयों में उतरते और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं।
साधना स्वतन्त्र रखी गई है। शेष पाँच चक्रों को पाँच कोशों का केन्द्र कहा जाता है इन कोशों का ध्यान पद्धति से ‘अनावरण’ ही हठयोग ग्रन्थ से हठयोग पद्धति में “चक्र वेधन” बताया गया है। अन्नमय कोश को केन्द्र ‘स्वाधिष्ठान’ चक्र-प्राणमय कोश का मणिपुर-मनोमय कोश का अनाहत-विज्ञानमय कोश का विशुद्धि और आनंदमय कोश का केन्द्र सहस्रार चक्र हैं इनका अनावरण वेधन या जागरण होने पर वे दिव्य क्षमताएँ जागृत होती है। वह होती तो प्रत्येक मनुष्य में हैं, पर प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहने के कारण वह अपने को दीन-दरिद्र अनुभव करता रहता है। इस कोश अनावरण को ही ‘आत्म जागृति’ नाम दिया गया है।
साधनाक्रम
साधनामय बनाना कितना सार्थक और कितना बुद्धिमत्ता पूर्ण है? एक वर्ष तक 45 मिनट की साधना का कार्यक्रम देकर यह चेतना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया था कि मनुष्य जीवन का मूल्य महत्त्व स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग समझा जाय। ईश्वर के इस सर्व श्रेष्ठ उपहार को सार्थक बनाया जाय।
साधनाओं का दिव्य वातावरण बना रहता है। यह केन्द्र वस्तुतः किसी महान अध्यात्म शक्ति के संरक्षण में चल रहा है। आचार्य दम्पत्ति जो उसका प्रबन्ध कार्यवाहक के रूप में करते हैं। इसलिए इस क्षेत्र में ‘दिव्यता’ अनायास ही छाई रहती है। फिर प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन और स्पष्ट अनुदान देने के लिए-तथा स्नेह दुलार की दिव्य संवेदनाएँ उभारने के लिए दो प्रत्यक्ष प्रतिमाएँ भी यहाँ मौजूद है।
साधना में इन्हीं तीन तत्त्वों का सन्तुलन समावेश रखा गया है।
साधना का प्रशिक्षणात्मक अभ्यास कराया जाता है। साधक दिये जाने वाले निर्देशों का अनुसरण करते हुए साधना की गहराइयों में उतरते और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं।
साधना प्रवाह अबाध चलता रह सकता है।
साधना एवं तप विधान में विनियमित किये गये है। इन्हीं चारों का तत्त्व दर्शन समझाने के ब्रह्मा जी ने चार मुखों से चार वेदों की सुविस्तृत ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया है। इसी अवलम्बन को ग्रहण करते हुए साधकों को जीवन लक्ष्य में हिमालय शिखर पर पहुँच सकने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है। स्वप्नावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और स्वसंकेत देना एवं अपने बलबूते अपने को इच्छित दिशा में मोड़ सकना संभव नहीं। इसलिए आवश्यक समझा गया कि कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास किया जाय इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तंद्राग्रस्त हो जाते हैं। पर चित्त में संकल्प ज्वलन्त रखे जा सकते हैं। इन संकल्पों से अचेतन मन को प्रभावित एवं प्रशिक्षित किया जाता है।
साधना करने न करने का कोई आग्रह प्रतिबंध नहीं हैं सुविधानुसार वह साधना आगे या पीछे भी की जा सकती है। हाँ शक्ति संचार का विशेष लाभ सूर्योदय से 45 मिनट पूर्व से लेकर ठीक सूर्योदय की अवधि तक ही मिल सकेगा। उपासना की कर्मकाण्ड परक-प्रक्रिया को ‘जादुई’ मानकर चलने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उपासना में मात्र जीवन-क्रम के निर्धारण के संकेत सूत्र सन्निहित रहते हैं। वास्तविक साधना तो जीवन की दिशा धारा को आदर्शवादी प्रयोजनों के साथ जोड़ने से सम्बन्ध रखती है।
साधनाओं में से हर एक के साथ ध्यान सहित कुल पाँच-पाँच क्रियाएं रखी गई है। (1) आसन, (2) मुद्रा, (3) प्राणायाम, (4) जप, (5) ध्यान।
साधना की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। साधना के लिए निर्धारित 45 मिनट से पहले 15 मिनट इस लिए सुरक्षित है। शेष आधा घंटा ध्यान करना होता है। तीन साधनाओं के लिए तीन-तीन दिन की- आधा-आधा घण्टे की- ध्यान धारणा निर्धारित है। उस अवधि में तीन दिन तीनों शरीरों सम्बन्धी, तीन दिन पाँच कोशों सम्बन्धी तथा तीन दिन कुण्डलिनी जागरण सम्बन्धी ध्यान विशेष निर्देशों के साथ कराया जाता है।
साधना करने की अपेक्षा यह प्रयोजन स्वल्प-काल में ही अधिक सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न हो जाता है।
साधना मार्ग के पथिकों को इसी प्राण ऊर्जा के अभिवर्धन, नियन्त्रण एवं उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न करने की विधि व्यवस्था से अवगत कराया जाता है। वैज्ञानिक क्षेत्र में कुछ हलके स्तर पर इसी प्राण विद्युत की खोज बीन सम्भव हुई है। क्रमशः इस संदर्भ में उपयोगी निष्कर्ष भी निकल रहे हैं।
साधनाएँ
साधना विधि में ढील-पोल नहीं चलने दी जाती, वरन् निर्धारित क्रिया-कृत्यों को राई−रत्ती पूरा करना पड़ता है। इस फौजी अनुशासन को ठीक तरह निभाते चलने पर मनोनिग्रह की सफलता मिलती है और उस आत्म-विजय पर गर्व गौरव अनुभव करता हुआ साधक जीवन -संग्राम में बढ़े-बढ़े आदर्शवादी पुरुषार्थ, पराक्रम, कर सकने में समर्थ होता है।
साधना-स्थल दिव्य-लोक के रूप में है। दिव्य वातावरण और दिव्य संरक्षण की अद्भुत सुविधा यहाँ मौजूद है।
साधना प्रधान है। पिछले पाँच वर्षों में जीवन-साधना सत्र चले थे। उसके बहिरंग जीवन के परिशोधन को प्रधानता दी गई थी। भूमि को जोत कर खाद पानी देकर उपजाऊ बनाने का प्रयत्न किया जाता है। बीज बोने और फसल उगाने का अध्याय इसके बाद ही आरम्भ होता है।
साधना की सिद्धि’ के रूप में शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक वर्णन किये है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-September
साधना पद्धति की ही प्रधानता रहेगी, पर साथ-साथ बीस हजार टोली नायकों को भी नवयुग के अग्रदूत बनने के लिए आवश्यक चेतना और क्षमता देने के लिए दस दस दिवसीय शिक्षण सूत्रों को भी क्रम चलता रहेगा। पुनर्गठन के समुद्र मन्थन से जो रत्न उभर कर आवेंगे उन्हें साधना सत्रों में बनाकर युग निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सकने योग्य बनाना भी तो एक काम है। आगामी सत्र योजना में इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जाना है।
साधना का प्राण कह सकते हैं। उसे साधक की कामधेनु एवं तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी को परिमार्जित जिह्वा को ‘सरस्वती’ कहते हैं। मन्त्र का आत्मा वही है। सिद्धियों की उद्गम स्थली उसी को मानना चाहिए।
साधना का तत्त्वदर्शन इन कथनों के माध्यम से अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है।
साधना ही कही जायगी। उसका प्रतिफल प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
साधना विज्ञान में बढ़ी चढ़ी महिमा बताई गई है।
साधना को ही दिया जा सकता है। ज्ञान साधना के आधार पर ही हम नर पशु से ऊँचे उठकर सृष्टि के मुकुट मणि बने हैं।
साधना करता है। शरीर को, मिट्टी में मिलाये रहता है। फलतः फसल आने पर धान से कोठे भरता है। लकड़ी की साधना बढ़ई-लोहे की लुहार-
स्वर्ण की सुनार, पत्थर की मूर्ति कार करता है। अपने श्रम, मनोयोग एवं कौशल से वे उन अनगढ़ वस्तुओं को बहुमूल्य बना देते हैं।
साधना का प्रयोजन अपने अविवेक और अनाचार का निराकरण करना है। अपनी कामनाओं का परिशोधन एवं दृष्टिकोण भी साधना का उद्देश्य कहा जा सकता है। कर्तृत्व में देवत्व का समावेश करना तथा चिन्तन में घुसी कुत्साओं के उन्मूलन में जुटा देना साधनात्मक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके आधार पर आत्मबल बढ़ाया जाता है और देव वर्ग की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्म परिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रत्न भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है। साधना अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है, जिससे अपने लक्ष्य और कर्तव्य को समझा जा सके।
साधना और उसके सिद्धान्त (8) सेवा, धर्म और उसका स्वरूप (9) धर्म तन्त्र की शक्ति और सामर्थ्य (10) युग परिवर्तन की पृष्ठ भूमि और रूपरेखा ।
साधना उपचार में ‘एकान्त’ की चर्चा बहुत होती है उसे आवश्यक माना जाता है। यहाँ एकान्त से मतलब किसी गुफा, कुटी आदि में अकेले रहने से नहीं वरन् संसारी प्रभावों से मुक्त होकर विशुद्ध अध्यात्म लोक में जा पहुँचना है।
साधना और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न बाधा का-कष्ट कठिनाई का-धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके। साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं। तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता-ईश्वर भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है-इतना अधिक कि उसके आधार पर अपने को-संसार को-और परमेश्वर को सन्तुष्ट किया जा सके।
साधना बताये गये हैं। उनमें से फेफड़े को मजबूत बनाने के लिए गहरी साँस लेने (डीप ब्रीदिंग) का विधान भी है और इसकी शरीर शास्त्रियों ने कई विधियाँ बताई हैं। साधारणतया लोग हल्की साँस लेते हैं और उससे फेफड़ों का मध्य भाग ही प्रभावित होता है। उनके ऊपर नीचे के भागों में थोड़ी सी ही हवा पहुँचती है, अस्तु वहाँ एक प्रकार से निष्क्रियता ही छाई रहती है। जहाँ निष्क्रियता होगी वहाँ स्वभावतः दुर्बलता रहेगी।
साधना से मुक्त हस्त से धन और समय लगाते हैं। मस्तिष्क के अन्तराल में उसका नाभिक-न्यूक्लियस-ब्रह्मरंध्र है। जिसके सहारे न केवल मस्तिष्क का स्तर प्रभावित होता है, वरन् सूक्ष्म जगत के साथ वैसे ही आदान प्रदान का द्वार खुलता है जैसा कि पृथ्वी का सूर्य एवं अन्यान्य गृह नक्षत्रों के साथ चलता है।
साधनाएँ यहीं से फलित और विकसित होती हैं। ओजस्, तेजस् और ब्रह्मवर्चस् के रूप में पराक्रम, विवेक एवं आत्मबल की उपलब्धियों का अभिवर्धन यहीं से उभरता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों चरणों को किसी न किसी प्रकार न्यूनाधिक मात्रा में समाविष्ट किये ही रहे। थोड़ा शुभारम्भ ही भविष्य में सुविस्तृत हो सकता है। बीजारोपण इन चारों का ही किया जाय। कौन, कितना, किस, प्रकार, क्या कर सकता है? यह व्यक्तिगत सुविधा, और श्रद्धा का प्रश्न है।
साधना के फलस्वरूप सिद्धि मिलने का सिद्धान्त अकाट्य है। देवी-देवताओं को माध्यम बनाकर वस्तुतः हम अपने ही व्यक्तित्व की साधना करते हैं। अनगढ़ आदतों की बेतुकी इच्छाओं और अस्त-व्यस्त विचारणाओं को सभ्यता एवं संस्कृति के शिकंजे में कस कर ही मनुष्य ने प्रगतिशीलता का वरदान पाया है। इसी परम्परा को जो अपने व्यक्तिगत जीवन में जितना क्रियान्वित कर लेता है वह उतना ही श्रेयाधिकारी बनता है।
साधना वही हैं जिसमें देवता की मनुहार करने के माध्यम से आत्म निर्माण की दूरगामी योजना तैयार की जाती और सुव्यवस्था बनाई जाती है।
साधनात्मक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके आधार पर आत्मबल बढ़ाया जाता है और देव वर्ग की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्म परिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रत्न भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है। साधना अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है, जिससे अपने लक्ष्य और कर्तव्य को समझा जा सके। साधना वह शक्ति प्रदान करती है, जिससे आत्मबल विकसित हो सके और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न बाधा का-कष्ट कठिनाई का-धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके।
साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं। तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता-ईश्वर भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है-इतना अधिक कि उसके आधार पर अपने को-संसार को-और परमेश्वर को सन्तुष्ट किया जा सके।
साधना की योजना बना कर अपने इर्द-गिर्द ऐसा दिव्य वातावरण बनाना है जिसके संपर्क में जीवात्मा को दिव्य विभूतियों का रस मिलने लगे। होता यह है कि संसार की अवांछनीय गतिविधियाँ ही अपने चारों ओर बिखरी दीखती हैं। जन समूह, वासना, विलासिता, तृष्णा, अहंता को जीवन में सर्वोपरि स्थान देता है। इन्हीं प्रयोजनों के लिए दौड़ धूप करता है। साहित्य और परामर्श भी आमतौर से इसी दिशा में प्रोत्साहन देने वाले मिलते हैं।
साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल अतिमानव स्तर का उपलब्ध होता है। साधक महात्मा और देवात्मा बनता है और अन्ततः परमात्मा की भूमिका तक जा पहुँचता है यही आत्मोत्कर्ष का सुनिश्चित पथ है। ऐसा कभी हुआ ही नहीं व्यक्ति गुण, कर्म स्वभाव की दृष्टि से तो हेय स्तर का बना रहे पर पूजा पाठ की किन्हीं क्रिया प्रक्रियाओं को अपनाकर अपने में दिव्य विभूतियाँ एवं चमत्कारी सिद्धियाँ उत्पन्न कर ले। बीज बोने से पौधा पौधे को विकसित होने पर फल। यह सनातन नियम है।
साधना अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है, जिससे अपने लक्ष्य और कर्तव्य को समझा जा सके। साधना वह शक्ति प्रदान करती है, जिससे आत्मबल विकसित हो सके और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न बाधा का-कष्ट कठिनाई का-धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके। साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं।
साधना है। स्पष्ट है कि अपने आप को सुविकसित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बना लेना ही- देवाराधना का एक मात्र उद्देश्य है। अपनी ही सत्प्रवृत्तियों को अलंकारिक भाषा में देव शक्तियाँ कहा गया है और उनकी विशेषताओं के अनुरूप उनके स्वरूप, वाहन, आयुध, अलंकार आदि का निर्धारण किया गया है।
साधना करनी पड़ती है। फौजी सैनिक अपनी युद्ध कला का निरन्तर अभ्यास करते रहते हैं। मोर्चे पर वे जो कौशल दिखाते हैं वह कोई चमत्कार नहीं होता वरन् वर्षों तक किये गये अभ्यास का ही वह प्रतिफल होता है।
साधना का उद्देश्य पूरा होने लगा। भारी चीजों को उठा कर ऊपर पहुँचाने का कार्य ‘क्रेन’ करती है। पशु प्रवृत्तियों की जकड़न से-लोभ मोह की विषमता से- ऊँचा उठ सकना माया ग्रस्त प्राणी के लिए अति कठिन है। इस कठिनाई को, समानान्तर सन्तुलन बनाने से ही हल किया जा सकता है। ध्यान लोक का सृजन इसी उद्देश्य के लिए किया जाता है कि वह दृश्य जगत में निरन्तर उठने वाली विकृतियों के दुष्प्रभाव से टक्कर ले सके।
साधना से उसकी प्रगति सद्गति का अच्छा−खासा चित्रण है। कूर्म अर्थात् भगवान्-पैर समेटे गई ’गुजरी स्थिति में सबसे नीचे। मंथन के लिए लाया गया मंदराचल पर्वत उनकी पीठ पर। मथने के कार्य में प्रयुक्त होने वाली वासुकी सर्प की रज्जु। देवता और असुरों द्वारा उसका मंथन।
साधना द्वारा ही आत्म बल बढ़ता है और यही वह दिव्य वरदान है जिसके सहारे मनुष्य तनाव मुक्त जीवन जी सकता है और जिन्दगी का सच्चा आनन्द ले सकता है।
साधना प्रयोग और सिद्धियाँ (5) आत्मोत्कर्ष का सम्बल स्वाध्याय (6) शक्ति संचय का स्त्रोत संयम (7) सेवा साधना और उसके सिद्धान्त (8) सेवा, धर्म और उसका स्वरूप (9) धर्म तन्त्र की शक्ति और सामर्थ्य (10) युग परिवर्तन की पृष्ठ भूमि और रूपरेखा ।
साधना का उद्देश्य कहा जा सकता है। कर्तृत्व में देवत्व का समावेश करना तथा चिन्तन में घुसी कुत्साओं के उन्मूलन में जुटा देना साधनात्मक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके आधार पर आत्मबल बढ़ाया जाता है और देव वर्ग की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्म परिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रत्न भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है। साधना अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है, जिससे अपने लक्ष्य और कर्तव्य को समझा जा सके। साधना वह शक्ति प्रदान करती है, जिससे आत्मबल विकसित हो सके और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके।
साधना वह शक्ति प्रदान करती है, जिससे आत्मबल विकसित हो सके और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न बाधा का-कष्ट कठिनाई का-धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके। साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं। तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता-ईश्वर भी नहीं।
साधना का, सधने की प्रक्रिया का ही चमत्कारी प्रतिफल दृष्टिगोचर होता है।
साधना की गई वाक् शक्ति की क्षमता असीम है। मंत्राराधन उसी के बलबूते सफल होता है।
साधना का उद्देश्य है।
साधना की विलक्षणता से जादुई सिद्धि मिलती है। इसमें से एक मध्यवर्ती आधार बिन्दु भुला या हटा दिया जाता है कि सच्ची साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल अतिमानव स्तर का उपलब्ध होता है। साधक महात्मा और देवात्मा बनता है और अन्ततः परमात्मा की भूमिका तक जा पहुँचता है यही आत्मोत्कर्ष का सुनिश्चित पथ है। ऐसा कभी हुआ ही नहीं व्यक्ति गुण, कर्म स्वभाव की दृष्टि से तो हेय स्तर का बना रहे पर पूजा पाठ की किन्हीं क्रिया प्रक्रियाओं को अपनाकर अपने में दिव्य विभूतियाँ एवं चमत्कारी सिद्धियाँ उत्पन्न कर ले। बीज बोने से पौधा पौधे को विकसित होने पर फल।
साधना का प्रतिफल है जिसे विज्ञान के रूप में विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ देखा जा सकता है। द्रुतगामी वाहन-तार रेडियो, पनडुब्बी, वायुयान एवं अन्तर्गत ही उड़ानों का श्रेय मनुष्य की विज्ञान साधना को ही दिया जा सकता है। ज्ञान साधना के आधार पर ही हम नर पशु से ऊँचे उठकर सृष्टि के मुकुट मणि बने हैं।
साधना में वर्षों लगे रहते हैं, वाद्य यन्त्र उनके हाथों में ही लगे रहते हैं। संगीतकार की सफलता उसकी जन्मजात विशेषता पर नहीं, उसके अनवरत अभ्यास पर निर्भर रहती है। जादूगर, नर्तक, अभिनेता, चित्रकार, साहित्यकार, कलाकार बन सकना अनायास ही सम्भव नहीं हो जाता वरन् उसके लिए चिरकाल तक दत्त चित्त से साधना करनी पड़ती है। फौजी सैनिक अपनी युद्ध कला का निरन्तर अभ्यास करते रहते हैं। मोर्चे पर वे जो कौशल दिखाते हैं वह कोई चमत्कार नहीं होता वरन् वर्षों तक किये गये अभ्यास का ही वह प्रतिफल होता है।
साधना करते हैं। अनगढ़ आदतों की बेतुकी इच्छाओं और अस्त-व्यस्त विचारणाओं को सभ्यता एवं संस्कृति के शिकंजे में कस कर ही मनुष्य ने प्रगतिशीलता का वरदान पाया है। इसी परम्परा को जो अपने व्यक्तिगत जीवन में जितना क्रियान्वित कर लेता है वह उतना ही श्रेयाधिकारी बनता है।
साधना सत्रों में बनाकर युग निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सकने योग्य बनाना भी तो एक काम है। आगामी सत्र योजना में इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जाना है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा चार अंग हैं। यह सभी एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें से एक की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भवन निर्माण में ईंट चूना लकड़ी लोहा चारों ही चाहिये। जीवन निर्वाह में भोजन, शयन, मल, विसर्जन और उपार्जन में से एक भी छोड़ने से कठिनाई उत्पन्न होगी।
साधना में लगाता है और यौवन आने तक उसी में तत्परतापूर्वक संलग्न रहता है, इसका प्रतिफल उसे विद्वान होने के रूप में मिलता है। उस साधना का लाभ धन, पद एवं सम्मान बनकर उपलब्ध होता है।
साधना शास्त्र में मूलाधार चक्र कहा गया है। इसकी उपयोगिता और गरिमा अपने स्तर की है। मस्तिष्क ज्ञान की और काम बीज सामर्थ्य का उद्गम है। आत्मिक बल ऊपर है और भौतिक बल नीचे। भावनाएँ, विचारणाएँ, आस्थाएँ ऊपर से उतरती है।
साधना का एक स्वरूप माना जा सकता है। ऐसे ही अनेक प्रसंगों में एक वैज्ञानिक परिपाटी कुण्डलिनी जागरण की भी है। इसमें शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान दोनों के महत्वपूर्ण आधार जुड़े हुए हैं। भौतिकी और ब्रह्म विद्या के दोनों तत्वों का इसमें समान रूप से समावेश है।
साधना में ‘वाक्’ शक्ति को विकसित करने के लिए मन, वचन और कर्म में ऐसी उत्कृष्टता उत्पन्न करनी पड़ती है कि जिह्वा को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जाय। इतना कर लेने के उपरान्त जपा हुआ मन्त्र सहज ही सिद्ध होता है और उच्चारण किया हुआ शब्द असंदिग्ध रूप से सफल होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र भी जल जायेंगे । तब बहुत संख्या में बहुत समय तक जप, स्तवन, पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेगा। परिष्कृत जिह्वा में ही वह शक्ति रहती है जिसके बल पर किसी भी भाषा का-किसी भी धर्म सम्प्रदाय का-कोई भी मन्त्र प्रचण्ड और प्रभावशाली हो उठता है।
साधना अपनाकर अपना पात्रता को विकसित करना और ऊर्ध्वगामी बनकर परमात्मा में समन्वित हो जाने का विकास क्रम है। कुण्डलिनी जागरण साधना का तत्त्वदर्शन इन कथनों के माध्यम से अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है।
साधना। जिन देवी देवताओं की साधना की जाती है वे वस्तुतः अपनी ही विभूतियाँ एवं सत्प्रवृत्तियाँ हैं। इन विशेषताओं के प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहने के कारण हम दीन दरिद्र बने रहते हैं किन्तु जब वे जागृत, प्रखर एवं सक्रिय बन जाती हैं तो अनुभव होता है कि हम ऋद्धि सिद्धियों से भरे पूरे हैं। मनुष्य की मूल सता एक जीवन्त कल्पवृक्ष की तरह है। ईश्वर ने उसे बहुत कुछ-सब कुछ-देकर इस संसार में भेजा है।
साधना के आधार पर ही हम नर पशु से ऊँचे उठकर सृष्टि के मुकुट मणि बने हैं।
साधना प्रयोजनों में इन अवयवों से भी कुछ न कुछ काम लिया जाता है। प्रगति पथ प्रशस्त होने में इससे सहायता भी मिलती है।
साधना विज्ञान का नाम दिया है।
साधना की जाती है वे वस्तुतः अपनी ही विभूतियाँ एवं सत्प्रवृत्तियाँ हैं। इन विशेषताओं के प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहने के कारण हम दीन दरिद्र बने रहते हैं किन्तु जब वे जागृत, प्रखर एवं सक्रिय बन जाती हैं तो अनुभव होता है कि हम ऋद्धि सिद्धियों से भरे पूरे हैं। मनुष्य की मूल सता एक जीवन्त कल्पवृक्ष की तरह है। ईश्वर ने उसे बहुत कुछ-सब कुछ-देकर इस संसार में भेजा है। समुद्र तल में भरे मणि मुक्तकों की तरह-भूतल में दबी रत्न राशि की तरह मानवी सता में भी असंख्य सम्पदाओं के भण्डार भरे पड़े हैं।
साधना। सद्भाव और सत्कर्म को जब तक धन ऋण विद्युत के समान सम्बद्ध नहीं करेंगे, तब तक प्रकाश सम्भव नहीं। ज्ञान, कर्म, के अभाव में अपूर्ण है और कर्म ज्ञान के अभाव में अधूरा। एतदर्थ इन दोनों में समन्वय से ही धर्माचरण में पूर्णता आती है। किसी व्यक्ति की दीन हीन, असहाय स्थिति को देखकर यदि हमारे मन में सहानुभूति एवं सम्वेदना के भाव को उत्पन्न होते हैं किन्तु उसकी सेवा एवं सहायता के पर्याप्त उपक्रम एवं उपचार नहीं किये गये तो धर्म का अपूर्ण आचरण माना जाएगा।
साधना उपासना के क्रिया कृत्य में यही रहस्यमय संकेत सन्देश सन्निहित है कि हम अपने व्यक्तित्व को किस प्रकार समुन्नत करें और जो प्रसुप्त पड़ा है, उसे जागृत करने के लिए क्या कदम उठाये । सच्ची साधना वही हैं जिसमें देवता की मनुहार करने के माध्यम से आत्म निर्माण की दूरगामी योजना तैयार की जाती और सुव्यवस्था बनाई जाती है।
साधना न की गई होती तो दोनों ही पक्ष घाटे में रहते। घोड़े, हाथी, कुत्ते आदि का मनुष्यों के साथ सहयोग लाभदायक ही रहा; पर यदि सिखाने साधने के प्रयत्न करने पर ही सम्भव हुआ है। सरकस में हिंस्र पशु भी कैसे अद्भुत करतब दिखाते हैं कि आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। सिंह, व्याघ्र आदि अपने असली रूप में मनुष्य के लिए प्राण घातक ही होते हैं, पर सधा लेने पर वे सरकस मालिक के लिए सम्पत्ति कमाने का साधन बनते हैं। स्वयं प्रशंसा के पात्र बनते हैं और साधने वाले का गौरव बढ़ाते हैं।
साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं। तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता-ईश्वर भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है-इतना अधिक कि उसके आधार पर अपने को-संसार को-और परमेश्वर को सन्तुष्ट किया जा सके।
साधना का लाभ धन, पद एवं सम्मान बनकर उपलब्ध होता है।
साधना बीज है। परिष्कृत व्यक्तित्व उसका पौधा । इसी के परिपुष्ट होने पर आत्मोत्कर्ष की वे उपलब्धियाँ मिलती हैं, जिनके आधार पर जीवन सच्चे अर्थों में धन्य बनता है।
साधना का अर्थ है-अपने आप को साधना। जिन देवी देवताओं की साधना की जाती है वे वस्तुतः अपनी ही विभूतियाँ एवं सत्प्रवृत्तियाँ हैं। इन विशेषताओं के प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहने के कारण हम दीन दरिद्र बने रहते हैं किन्तु जब वे जागृत, प्रखर एवं सक्रिय बन जाती हैं तो अनुभव होता है कि हम ऋद्धि सिद्धियों से भरे पूरे हैं। मनुष्य की मूल सता एक जीवन्त कल्पवृक्ष की तरह है। ईश्वर ने उसे बहुत कुछ-सब कुछ-देकर इस संसार में भेजा है।
साधना करके अपने को बलिष्ठ बनाता है। विद्यार्थी बचपन से लेकर पूरी किशोरावस्था शिक्षा साधना में लगाता है और यौवन आने तक उसी में तत्परतापूर्वक संलग्न रहता है, इसका प्रतिफल उसे विद्वान होने के रूप में मिलता है। उस साधना का लाभ धन, पद एवं सम्मान बनकर उपलब्ध होता है।
साधना बढ़ई-लोहे की लुहार-
स्वर्ण की सुनार, पत्थर की मूर्ति कार करता है। अपने श्रम, मनोयोग एवं कौशल से वे उन अनगढ़ वस्तुओं को बहुमूल्य बना देते हैं। स्वयं गौरवान्वित होते हैं और उन वस्तुओं को उपयोगी एवं दर्शनीय बनाकर रख देते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-December
साधना विज्ञान में सात चक्र कहा गया है, प्रत्येक चक्र प्रत्येक ऋषि का एक एक वरदान एक एक सद्गुण के रूप में प्राप्त होता है। वे ही ऋद्धि-सिद्धियों साथ में जीवन को देवमय बनाते हैं और स्वर्गीय उपलब्धियों से सुसम्पन्न करते हैं।
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों चरणों में से किसी को भी छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य पूरा हो सके। इस सन्दर्भ में अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर चिरकाल से विभिन्न रूपों में कहा जाता रहा है।
साधनाओं की सफलता के रूप में वर्णन किया गया है।
साधना में प्रायः सभी परिजन संकल्पपूर्वक निरत हो गये हैं। मात्रा में न्यूनाधिकता भले ही रही हो, पर वे संकल्प और निष्ठा के साथ अपनाया सर्वत्र गया है। झोला पुस्तकालय में नया उत्साह आया है और जहाँ भी शाखा संगठन जीवित है वहाँ चल पुस्तकालय आरम्भ हो गये या होने जा रहे हैं। इस प्रयोजन के लिए प्रायः सभी समर्थ शाखाओं ने एक एक स्थायी कार्यकर्ता की नियुक्ति कर ली है और क्रियाकलाप इस तरह चलाया है जिससे भविष्य में कभी भी शिथिलता आने की आशंका न रहे। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण-नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की- लक्ष्य पूरा करने के लिए जिस भावना और कर्मनिष्ठा की आवश्यकता है वह अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में इन दिनों पहले की अपेक्षा अनेक गुनी अधिक दृष्टिगोचर हो रही है।
साधना के फलस्वरूप अन्तरंग में उत्कृष्टता उभरती है और सज्जनोचित सद्भावों का विस्तार होता है। बहिरंग के सत्प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती हैं और क्रिया-कलापों में महामानवों जैसी प्रतिभा व्यवस्था एवं शालीनता की मात्रा बढ़ती है। जहाँ आत्मविकास का यह स्वरूप दृष्टिगोचर हो समझना चाहिए कि यहाँ सच्ची साधना की गई और उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व निखरने के स्वरूप ही भौतिक और आत्मिक सफलताओं के-ऋद्धि-सिद्धि के रूप में वे प्रतिफल प्राप्त होते हैं जिनका माहात्म्य साधनाओं की सफलता के रूप में वर्णन किया गया है।
साधना की गई और उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व निखरने के स्वरूप ही भौतिक और आत्मिक सफलताओं के-ऋद्धि-सिद्धि के रूप में वे प्रतिफल प्राप्त होते हैं जिनका माहात्म्य साधनाओं की सफलता के रूप में वर्णन किया गया है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों चरणों को समान महत्व मिलना चाहिए। इन चारों के लिए जिससे जितना बन पड़े उसे उतना प्रयत्न अवश्य ही करना चाहिए। हममें से एक भी ऐसा न रहे जो आत्मिक प्रगति को कम महत्व दे और उसके लिए इन ठोस आधारों की अपेक्षा करता रहे। स्मरण रखने योग्य बात यह है कि मात्र मन्त्र जपने भर से आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए आत्मशोधन और आत्म-परिष्कार के लिए तत्पर होना होगा।
साधना-ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष जीवन-लक्ष्य सर्वतोमुखी विकास उल्लास के समस्त तत्वों का समावेश है। कहा गया है-
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चार सूत्री आत्मोत्कर्ष साधना में प्रायः सभी परिजन संकल्पपूर्वक निरत हो गये हैं। मात्रा में न्यूनाधिकता भले ही रही हो, पर वे संकल्प और निष्ठा के साथ अपनाया सर्वत्र गया है। झोला पुस्तकालय में नया उत्साह आया है और जहाँ भी शाखा संगठन जीवित है वहाँ चल पुस्तकालय आरम्भ हो गये या होने जा रहे हैं। इस प्रयोजन के लिए प्रायः सभी समर्थ शाखाओं ने एक एक स्थायी कार्यकर्ता की नियुक्ति कर ली है और क्रियाकलाप इस तरह चलाया है जिससे भविष्य में कभी भी शिथिलता आने की आशंका न रहे। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण-नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की- लक्ष्य पूरा करने के लिए जिस भावना और कर्मनिष्ठा की आवश्यकता है वह अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में इन दिनों पहले की अपेक्षा अनेक गुनी अधिक दृष्टिगोचर हो रही है।
साधना और उसकी सिद्धि का विषय ऐसा है जिसे कुछेक अधिकारी व्यक्तियों तक के लिए सुरक्षित रखा जाय तो ठीक है। उसके चमत्कारी सत्परिणामों का लाभ उतने ही छोटे परिकर तक सीमित रहने में ही लोकहित है। अनाधिकारी उसे तुर्त-फुर्त प्राप्त करने और मन चाहे उपयोग के लिए भारी उछल-कूद मचाते हैं। इन अपरिपक्व हाथों में कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु लग जाये तो वे अपना और समग्र का अनर्थ ही करते हैं। गोपनीयता का उच्चस्तरीय प्रयोजन यही है।
साधनापूर्वक इसे बनाया था और सोचा था मंदिर में बजाकर दर्शकों को रस पिलाया करूँगा। पर स्थापना के दिन से लेकर आज तक वैसा अवसर ही न मिला। दूसरे ही दिन उस पर भौंड़े राग गाते रहे।
साधना एक साथ ही सम्पन्न होती है। इसी में देव-साधना-ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष जीवन-लक्ष्य सर्वतोमुखी विकास उल्लास के समस्त तत्वों का समावेश है। कहा गया है-
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चतुर्विध प्रयोजनों में संलग्न करने के लिए भरपूर प्रयत्न करेंगे और आशा रखेंगे कि इन सिद्धान्तों को-गतिविधियों को अपनाने के लिए जिससे जितना बन पड़ेगा वह उसके लिए प्रयत्न करेगा। जो अब तक इस दिशा में प्रयास नहीं कर सके हैं वे शुभारम्भ करेंगे और जो कुछ करते रहे है वे इसमें अभिवृद्धि का साहस जुटाएँगे। सर्वथा विरत अपने परिवार का एक भी व्यक्ति न रहने पावे। इस वर्ष का यही बसंती लक्ष्य हम लोगों के सामने रहना चाहिए और बसन्त पर्व के दिन इसी के संकल्प सामूहिक रूप से किये जाने चाहिए। इस वर्ष बसन्त पर्व 12 फरवरी रविवार का है।
साधना, रात्रि का गायत्री साहित्य के कथा प्रवचन-अन्तिम दिन गायत्री यज्ञ और अन्त में विसर्जन जुलूस का कार्यक्रम पूरे उत्साह के साथ सम्पन्न हुए हैं। इतने कम खर्च में इतने प्रभावोत्पादक आयोजन हो सकने का यह पहला अनुभव है। चैत्र की नवरात्र और भी अधिक उत्साह में मनाये जाने की सम्भावना है। इन उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यह अनुमान लगाने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है कि बसन्त पर्व भी अखण्ड-ज्योति परिजनों द्वारा पहले की अपेक्षा अधिक उत्साहपूर्वक मनाया जाएगा । मिशन के प्रति निष्ठावानों की सघन श्रद्धा उसके जन्म दिन पर उभरेगी ही।
साधना कहते हैं।
साधना में सप्त चक्रों का जागरण प्रमुख है। यह सप्त चक्र और पंचकोश परस्पर सम्बद्ध हैं। दोनों की साधना एक साथ ही सम्पन्न होती है। इसी में देव-साधना-ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष जीवन-लक्ष्य सर्वतोमुखी विकास उल्लास के समस्त तत्वों का समावेश है। कहा गया है-
साधना द्वारा इन बीजों को अंकुरित और पल्लवित किया जाता है। ब्रह्माण्ड और पिण्ड की सत्ता एक जैसी बताते हुए कहा गया है।
साधना प्रकरण के कुछ विशिष्ट रहस्यों और प्रसंगों को अधिकारी व्यक्तित्वों तक के लिए सुरक्षित रख कर शेष को सर्वविदित होने दिया है। इस विज्ञात विवरण से भी यह पता चल सकता है कि बसन्त पर्व की विशिष्ट अमृत वर्षा का जल आदि जीवन-कलश में एकत्रित कर लिया जाय तो उससे कितना बड़ा हित साधन हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-May
साधनाएँ सरल एवं सफल होने लगती है। अस्त त्राटक को - ध्यानयोग को प्रथम प्रक्रिया माना गया हैं।
साधना का क्रम ब्रह्म वर्चस् शिक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत आरम्भ किया गया है। अन्य महत्त्वपूर्ण शिक्षा विधानों की तरह इस प्रक्रिया के भी सिद्धान्त , शिक्षण एवं व्यवहार अनुभव दो पक्ष है। शिल्प, कला , विज्ञान, इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि महत्त्वपूर्ण विषयों की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इन दोनों ही पक्षों को महत्त्व देना पड़ता है। ज्ञान और अभ्यास के दोनों ही चरणों के सहारे प्रगति पथ पर चला जाता है।
साधना में योगाभ्यास एवं तपश्चर्या की क्रिया-प्रक्रिया भी सम्मिलित है। कहा जा चुका है कि ब्रह्म विद्या के तथ्यों को हृदयंगम करने के लिए पंच कोशों के अनावरण की साधना है। ब्रह्म तेज उपार्जन के लिए कुण्डलिनी जागरण के अभ्यास करने होंगे। इन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है-
साधना किस प्रकार करनी है उसका प्रत्यक्ष अनुभव और भावी क्रम निर्धारण करने के लिए इन सत्रों में सम्मिलित होना आवश्यक है।
साधना की प्रगति में प्रमुख बाधा है। नादानुसन्धान से यह बाधा सरलतापूर्वक हल हो जाती है।
साधना ही मानी गई हैं।
साधना विज्ञान में इसी अन्तरात्मा को विज्ञानमय कोश कहा है। उसके परिष्कृत प्रयासों को योगाभ्यास में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। आस्थाओं का परिमार्जन होने से जीवन के बहिरंग स्वरूप में कायाकल्प होते देर नहीं लगती। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अम्बपाली, अजामिल, सूर , तुलसी आदि के जीवन परिवर्तन को एक प्रकार से आध्यात्मिक कायाकल्प ही कह सकते हैं। सामान्य स्थिति के मनुष्य असामान्य स्तर के महामानव बने है।
साधना का पूरा काम आत्म साधना है। देव साधना का तात्पर्य किसी बाहरी सत्ता को रिझाना नहीं, अपनी ही दिव्य विशेषताओं को जागृत एवं परिष्कृत करना है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त कर सका, उसे विश्व विभूतियों में से उतने ही अनुपात से दिव्य उपलब्धियाँ सिद्धियाँ- मिलती चली जाती है।
साधना से इसी सुयोग संयोग की व्यवस्था बनाई जाती है।
साधना के लिए कमर सीधी, हाथ गोदी में, पालथी सही-रखकर बैठना चाहिए। वातावरण में घुटन दुर्गन्ध, मक्खी, मच्छर जैसे चित्त में विक्षोभ उत्पन्न करने वाली बाधाएँ नहीं हो। यह अभ्यास दस मिनट में आरम्भ करके उसे एक-एक मिनट बढ़ाते हुए एक दो महीने में अधिक से अधिक आधे घण्टे तक पहुँचाया जा सकता है। इससे अधिक नहीं किया जाना चाहिए ।
साधना विज्ञान का प्राण है। आस्तिकता को कर्म फल के प्रति अटूट विश्वास ही कह सकते हैं। धार्मिक कर्मकाण्डों और पूजा विधानों का महत्व इसी दृष्टि से है कि मनुष्य ईश्वर के प्रति- उसकी कर्म व्यवस्था के प्रति गहरी आस्था बनाये रखे। चिन्तन का स्तर उत्कृष्ट रखे और क्रिया कलाप में आदर्शवादिता के समावेश का अधिकाधिक प्रयत्न करे। धर्म और अध्यात्म का ढाँचा इसी लिए खड़ा किया गया है।
साधना का उद्देश्य है।
साधना की ज्योति के प्रति तन्मयता का भाव रखते हुए उसमें एकाकार हो जाने की भाव भूमिका बनानी चाहिए।
साधना (3) खेचरी मुद्रा (4) नादानुसंधान (5) ध्यान में सविता शक्ति का संचरण।
साधना अपने आपे को साधने से-व्यवस्थित एवं परिष्कृत होने के साथ आरम्भ होती है। इसके लिए प्रस्तुत दोष दुर्गुणों का-पिछले दिनों की अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों का विवरण प्रस्तुत करना और उनके निराकरण के लिए जीवन प्रक्रिया में किस प्रकार परिवर्तन किया जाय यह निर्धारण आवश्यक है। वन पड़े पापों का लेखा जोखा सामने हो तो उसके प्रायश्चित परिमार्जन का रास्ता निकलेगा। प्रगति के लिए किन सत्प्रवृत्तियों का गुण, कर्म, स्वभाव में समावेश किया जाना है यह जानना और उसे व्यवहार में परिणत करने के लिए भावी जीवन का सुव्यवस्थित क्रम निर्धारित किया जाना आवश्यक हैं इस आधार भूमि पर ही आत्मिक प्रगति का विशाल भवन खड़ा होता है।
साधना जब परिपक्व होने लगती है तो भावोत्कर्ष क्षेत्र से आगे बढ़ कर सुविस्तृत अन्तरिक्ष में संव्याप्त हलचलों को समझने का अवसर मिलता है। इस संसार को प्रभावित करने वाली अगणित ब्रह्म प्रेरणाओं के प्रवाह बहते रहते हैं । उनके स्पन्दन हमारी कर्णेन्द्रिय से शब्दरूप में टकराते हैं। उन्हें पहचानने और पकड़ने की सफलता, साधना में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है? किसी व्यक्ति विशेष क्षेत्र, देश अथवा लोक के सम्बन्ध में इस प्रकार की सही स्थिति का पूर्वाभास होने लगता है।
साधना के यह तीनों ही उपाय एकाग्रता और भाव कल्पना को प्रखर परिपक्व बनाने के उद्देश्य से की जाती है। साकार उपासना का भी यही उद्देश्य है।
साधना करनी चाहिए।
साधना पथ कहलाता है।
साधना में लगना चाहिए। यह योग साधनाओं का सम्राट है।
साधना को, यदि इस तृतीय नेत्र को ठीक तरह ज्योतिर्मय किया जा सके तो उसमें उत्पन्न होने वाली अग्नि शिखा मनोविकारों को- अवरोधों की जलाकर भस्म कर सकती है। उसकी शक्ति व्याख्या है। यदि दार्शनिक व्याख्या करनी हो तो उसे विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता का जागरण भी कह सकते हैं। जिसके आधार पर लोभ , मोह, वासना तृष्णा अहंता जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न हुए अगणित शोक, संतापों और निग्रह उपद्रवों को सहज ही शमन या सहन किया जा सकता है।
साधना को बाजीगरों जैसी हाथ की सफाई वाली क्रिया करके तरह-तरह के अजूबे दिखाने, बनाने वाली कौतुक करतूत नहीं मानना चाहिए । आमतौर से लोग साधना के नाम पर प्रयुक्त होने वाले विधि-विधानों को ही सब कुछ समझते हैं और असफलता मिलने पर इन्हीं विधानों में कोई खोट रह जाने की बात सोचते हैं। यह तथ्य भुला दिया जाता है कि वाणी के उच्चारण, अंगों के संचालन एवं पूजा वस्तुओं के उपयोग भर से आध्यात्मिक क्षमताएँ विकसित होने तथा उनके सत्परिणाम सामने आने का लाभ नहीं मिल सकता है। क्रिया-कृत्यों का महत्त्व तो है, पर उनका उद्देश्य व्यक्तित्व के स्तर को उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रेरणात्मक आधार खड़े करना है। यदि निष्कृष्ट चिन्तन और घृणित चरित्र की स्थिति में सुधार, परिवर्तन न हो तो फिर समझना चाहिए कि पूजा-पाठ के उपचार मात्र कौतुक कौतूहल ही बनकर रह गये।
साधना से यह सम्भव हो सकता है।
साधना से शरीर में उत्तम कान्ति उत्पन्न होती है। जठराग्नि बढ़ती है, शरीर निरोग होता है, पटुता और सर्वज्ञता प्राप्त होती है तथा सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त होता है।
साधना कह सकते हैं। त्राटक का उद्देश्य यही है। त्राटक में बाह्य नेत्रों एवं दीपक जैसे साधनों का उपभोग किया जाता है। इसलिए उसकी गणना स्थूल उपचारों में है। बिन्दुयोग में ध्यान धारणा के सहारे किसी इष्ट आकृति पर अथवा प्रकाश ज्योति पर एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है ।
साधना के अनुसार प्रकाशवान बनाया जाता है।
साधनानां तु हे प्रिये!
साधनाओं का मूलाधार गायत्री ही है।
साधना विधानों में एक महत्त्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उँगलियों से, शीशी वाले कार्क से, कपड़े की गोली से इस प्रकार बन्द किया जाता है कि बाहर की वायु या स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि आधार से विलग किया जाता है और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतीन्द्रिय जगत से आने वाले शब्द प्रवाह को अन्तः चेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेन्द्रिय का उसकी छनद तन्मात्रा का योगदान तो रहता है पर वह श्रवण है, वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनि लहरी सुनने के लिए, कर्णेन्द्रिय और अन्तःकरण का इसे संयुक्त प्रयास भी कह सकते हैं ।
साधना के अंतर्गत हृदयचक्र में प्रज्वलित अग्नि ज्योति को उसी महाशक्ति का स्वरूप माना गया है। हृदयचक्र में ज्योति रूप बनकर कुण्डलिनी ही परिभाषित होती है।
साधना विज्ञान का आश्रय लिया जाता है। दैवी अनुदान अभीष्ट मात्रा में सहज ही प्राप्त किये जा सकते हैं। उस भण्डार में कोई घाटा नहीं, जहाँ से कि प्राप्त किया जाना है। उपलब्धियों के उपयोग का क्षेत्र भी सुविस्तृत पड़ा है। ऊँचा उठने और आगे बढ़ने के लिए भौतिक और आत्मिक क्षेत्र में अनेकों आधार खाली पड़े है।
साधना का तात्पर्य किसी बाहरी सत्ता को रिझाना नहीं, अपनी ही दिव्य विशेषताओं को जागृत एवं परिष्कृत करना है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त कर सका, उसे विश्व विभूतियों में से उतने ही अनुपात से दिव्य उपलब्धियाँ सिद्धियाँ- मिलती चली जाती है।
साधना का प्रभाव मात्र ईश्वर उपासना का आनन्द देने भर के लिए नहीं, वरन् मनः स्थिति परिस्थिति एवं अस्तित्व स्थिति में इस विकास परिवर्तन का आश्चर्यजनक परिणाम दृष्टिगोचर हो सकता है। उससे कुसंस्कारों की वे कीलें उखड़ सकती है, जो साधारणतया बहुत गहरी और मजबूत मालूम पड़ती है।
साधना द्वारा उत्तरी ध्रुव जैसी शान्ति मस्तिष्कीय क्षेत्र में उत्पन्न करनी पड़ती है। सहस्रार साधना से यह सम्भव हो सकता है।
साधना आगे बढ़ने पर अन्त में मधु, द्राक्ष रस जैसा अमृत सरीखा यह रसास्वादन होता है। साथ ही आज्ञाचक्र में आत्म दर्शन भी होता है।
साधनाओं में उतनी सरलता नहीं है। उन्हें विशेष व्यायामों एवं चिकित्सा उपचारों के समान समझना चाहिए। जिन्हें विशेष मार्ग-दर्शन एवं प्रत्यक्ष प्रशिक्षण के साथ किया जाना चाहिए। एक ही रोग की सभी रोगियों की चिकित्सा एक ही प्रकार की नहीं होती। चिकित्सक उन सबकी स्थिति का परीक्षण करते हैं और उनकी स्थिति के अनुरूप भिन्न-भिन्न औषधियों, तथ्यों एवं परिचर्याओं का निर्धारण करते हैं।
साधना की समस्त साधनाएँ आ जाती है॥ पंचमुखी गायत्री साधना का इन पाँचों समावेश हो जाता है।
साधना तथा उच्चस्तरीय साधना का नियोजन करना चाहिए। उज्ज्वल चरित्र ह वह भूमि है जिस पर साधना के बीज उगते और पल्लवित होते हैं। अच्छी बन्दूक ही कारतूसों का लक्ष्य पूरा करती है। घटिया व्यक्तित्व घटिया बन्दूक की तरह है, जिनमें बढ़िया उपासना के बढ़िया कारतूस भी समुचित प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकते।
साधना विधान है। कानों के बाहरी छेद बन्द कर देने पर उनमें स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब ईथर से चल रहे ध्वनि कम्पनों को उस नीरवता में सुन समझ सकना सरल हो जाता है। नाद योग के अभ्यासी आरम्भ में कई प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ कानों के छेद बन्द करके मानसिक एकाग्रता के आधार पर सुनते हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग, वीणा, नफीरी, नूपुर जैसी आवाजें आती हैं और बादल गरजने, झरना झरने, आग जलने, झींगुर बोलने जैसी क्रमबद्ध ध्वनियाँ भी सुनाई पड़ती हैं।
साधना निष्फल चली जायेगी। साथ ही अन्तरात्मा भी पाप भार से लदता, बोझिल होता चला जायेगा।
साधना से उसी उद्देश्य की पूर्ति होती है।
साधना में इसी स्तर के प्राणयोग की आवश्यकता रहती हैं सूर्य-वेधन इसी स्तर का है। उसमें ध्यान धारणा अधिकाधिक गहरी होनी चाहिए ओर प्रचण्ड संकल्प शक्ति का पूरा समावेश रहना चाहिए। श्वास खीचते समय महाप्राण को विश्वप्राण को-पकड़ने और घसीट कर आत्मसत्ता के समीप लाने का प्रयत्न किया जाता है। श्वास के साथ प्राण तत्त्व की अधिकाधिक मात्रा रहने की भाव-भरी मान्यता रहनी चाहिए। साँस में आक्सीजन की जितनी अधिक मात्रा होती है उतनी ही उसे आरोग्यवर्धक माना जाता है।
साधना कहा जा सकता है।
साधना में- एकाग्र तन्मयता से सम्भव होने वाले शोध प्रयत्नों में प्रचंड पराक्रम के रूप में प्रकट होने वाले शौर्य साहस में गहन आध्यात्मिक क्षेत्र से उद्भूत श्रद्धा भक्ति से उसे नियोजित किया जा सकता है।
साधना ठीक तरह नहीं बन पड़ती हैं । यदि दिन में ही करनी हो तो अँधेरे कमरे का प्रबन्ध करना होता है।
साधना को सिद्धि में परिणत होते देखा जा सकता है। जो इस परम पुरुषार्थ के लिए साहस जुटा सके, उसने मनुष्य जन्म का सच्चा लाभ पा लिया ऐसा समझा जा सकता है।
साधना ब्रह्म वर्चस् के नाम से आरम्भ की गई है । इसकी सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि से परिचित होना उन सबके लिए आवश्यक है जो इस विषय में रुचि रखते हैं। आवश्यक जानकारी के उपरान्त ही यह निर्णय ठीक तरह हो सकता है कि इस दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है भी या नहीं। यदि है तो उसके लिए क्या करना पड़ेगा? इसी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए अखण्ड-ज्योति के प्रस्तुत मार्च, अप्रैल, मई के अंकों में आवश्यक जानकारी प्रस्तुत की गई है।
साधनाओं का सम्राट है।
साधना प्रयोजनों में सम्मिलित किया गया है। यह दो मूल सत्ताओं के संभोग नहीं जोड़ा गया है। यों यह सूक्ष्म अध्यात्म सिद्धान्त रति कर्म पर भी प्रयुक्त होते, दाम्पत्य स्थिति पर भी लागू होते हैं। दोनों के मध्य समता की, आदान-प्रदान की स्थिति जितनी ही संतुलित होगी उतना ही युग्म को अधिक सुखी, सन्तुष्ट समुन्नत पाया जायेगा।
साधना में लगाया जा सकता है। दोनों की प्रसुप्त स्थिति को समाप्त कर साहसिक संवेदना उभारना कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया अपनाने से सहज सम्भव हो सकता है।
साधना की सुव्यवस्थित प्रक्रिया हैं प्रारम्भ आत्म-शोधन एवं आत्म-परिष्कार से होना चाहिए। साथ ही गायत्री की सामान्य साधना तथा उच्चस्तरीय साधना का नियोजन करना चाहिए। उज्ज्वल चरित्र ह वह भूमि है जिस पर साधना के बीज उगते और पल्लवित होते हैं। अच्छी बन्दूक ही कारतूसों का लक्ष्य पूरा करती है। घटिया व्यक्तित्व घटिया बन्दूक की तरह है, जिनमें बढ़िया उपासना के बढ़िया कारतूस भी समुचित प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकते।
साधना के प्रथम चरण में समाधि परक प्रयोग किये जाते हैं। यह जागृत समाधि है। इसमें मूर्च्छित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती, वरन् प्रलोभन एवं भय की उत्तेजनाओं को शान्त करना पड़ता है। ऐषणाओं के आवेश ठण्डे पड़ने पर मनुष्य अपना लक्ष्य देख पाता है। निर्धारित दिशा में चल पड़ने की बात इससे पूर्व बन ही नहीं पड़ती ।
साधना के अंतर्गत (1) मूर्धा त्राटक (2) सोहंसाधना (3) खेचरी मुद्रा (4) नादानुसंधान (5) ध्यान में सविता शक्ति का संचरण।
साधनाओं में अत्यन्त ऊँचा स्थान दिया है। निम्न श्लोक उसी पृष्ठों के लिए गये है-
साधना से इस असीमता की दिशा में बढ़ चलना- प्रचुर सशक्तता प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है।
साधना’ के आधार पर आत्म-परिष्कार के प्रबल प्रयत्न सम्पन्न किये जाते हैं। ईश्वर की प्रसन्नता इसी उपाय से सम्भव हो सकती है। उन्हें अभीष्ट वरदान देने के लिए एकमात्र इसी शर्त पर सहमत किया जा सकता है। साधना का स्वरूप- विधि-विधान-क्रिया कृत्य समझने से पहले हमें उसके उद्देश्य को समझना चाहिए। तथ्य से विपरीत स्तर की मान्यता बना लेने से नये-नये किस्म की भ्रान्तियाँ उत्पन्न होगी और सफलता न मिलने पर तरह-तरह के संशयों और अविश्वासों के जंगलों में भटकना पड़ेगा।
साधना की तरह हम स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म जगत का भी ज्ञान वृद्धि एवं सुविधा सम्पदा के लिए उपयोग कर सकते हैं। दृश्य प्राणियों की तरह अदृश्य जगत में विद्यमान् अशरीरी समर्थ आत्माओं के साथ सम्पर्क साध सकते हैं। जमीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई की तुलना में वायु सेना द्वारा लड़े जाने वाले युद्ध के परिणाम अधिक दूरगामी होते हैं श्रम से ज्ञान का
साधनाओं में मेरुदण्ड सीधा रखने का विधान है। साधक को सुविधा का समय दिन में हो तो तारे कहाँ मिलेंगे? फिर तारे कितने ही होते हैं। त्राटक के लिए एक ही प्रकाश बिन्दु चाहिए कई बिन्दु होने पर दृष्टि भटकती है। इन सब कारणों को देखते हुए सिद्धांतत भले ही सूर्यः चन्द्र तारकों की बात कही जा सके
साधना है। ब्रह्म तेज उपार्जन के लिए कुण्डलिनी जागरण के अभ्यास करने होंगे। इन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है-
साधना करने में भी कई कठिनाइयाँ है। तारे मात्र रात्रि को निकलते हैं। बदली , कुहरा, धुन्ध, धुँआ छा जाने पर वे रात्रि में भी नहीं दीखते । जिन्हें खुला आसमान उपलब्ध है वे ही तारों को देखने का लाभ ले सकते हैं । उन्हें लेटकर या तिरछे होकर ही देखा जा सकता है जब कि साधनाओं में मेरुदण्ड सीधा रखने का विधान है।
साधना के प्रतिफल आदि ऐसे अनेकों तथ्य है जिन्हें अन्ध-विश्वास कह कर टाला नहीं जा सकता। मिस्र के पिरामिडों की खोज बीन करने वाले शोधकर्ताओं पर विपत्तियों के पहाड़ टूटते रहे हैं, उन्हें संयोग मात्र कहने से काम नहीं चल सकता। योगियों में पाई जाने वाली कई तरह की विचित्रताएँ अकारण नहीं हो सकती। ईश्वर भक्तों को जो विशिष्टताएँ उपलब्ध होती रही है, वे मूढ मान्यताएँ भर नहीं है, दन्त कथाएँ उनसे जुड़ी तो हो सकती हैं पर वह पूरे का पूरा अन्ध-विश्वास भर है यह कह देना तथ्यों से आंखें मीच लेने जैसा होगा। बुद्धि की समझ में जो न आये वही अप्रामाणिक, वही अविश्वस्त यह दुराग्रह कुछ समय पहले तक तो प्रबल था, पर अब विचारशीलता ने सन्तुलन साधा है और यह गम्भीरता-पूर्वक सूक्ष्म जगत के अस्तित्व की शोध की जा रही है।
साधना जैसी अनेक कठिन मंजिलें पार करनी पड़ती है। वह विशेष लोगों का विशेष कृत्य है। सर्वसाधारण की समाधि वह है जिसमें जीवन की दिशा-धारा अस्त-व्यस्त न रहने देकर एक सुनिश्चित मार्ग पर प्रवाहित की जाती है। वर्षा का पानी मारा-मारा फिरे तो उससे हानि ही होगी। नदी-नाले के माध्यम से उसके बहने में ही लाभ है।
साधना है। देव साधना का तात्पर्य किसी बाहरी सत्ता को रिझाना नहीं, अपनी ही दिव्य विशेषताओं को जागृत एवं परिष्कृत करना है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त कर सका, उसे विश्व विभूतियों में से उतने ही अनुपात से दिव्य उपलब्धियाँ सिद्धियाँ- मिलती चली जाती है।
साधना की सिद्धि कहा गया है। इस स्थिति को दिव्य मैथुन की संज्ञा भी दी गई है। इस स्थिति को दिव्य मैथुन की संज्ञा भी दी गई है।
साधना से मिलती है, उसे महत्त्वहीन नहीं कहा जा सकता।
साधना की स्थिति आ जाने पर बाह्य त्राटक की आवश्यकता नहीं रहती।
साधना से बढ़कर और कोई उपाय हो नहीं सकता। इसकी चर्चा शास्त्रकारों ने इस प्रकार की है-
साधना के क्रमिक मार्ग पर चलते हुए प्रथम आज्ञाचक्र के पश्चात् हृदयचक्र को त्राटक साधना के अनुसार प्रकाशवान बनाया जाता है।
साधनाओं में से किसे क्या साधना किस प्रकार करनी है उसका प्रत्यक्ष अनुभव और भावी क्रम निर्धारण करने के लिए इन सत्रों में सम्मिलित होना आवश्यक है।
साधनाओं के निष्फल जाने का प्रधान कारण होता है। जो इसे सुनिश्चित तथ्य को जानते हैं वे सभी साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति का उपयोग करते हैं।
साधना जीवन सत्ता के कण-कण में प्रकाश उद्भव की अनुभूति तो कराती ही है। साथ ही उन अभिनव स्तर की हलचल भी उभरती दृष्टिगोचर होती है।
साधना क्रम किसके लिए क्या उपयुक्त पड़ेगा? इसका निर्धारण साधक की शारीरिक, मानसिक, आत्मिक एवं साँसारिक परिस्थितियों का अध्ययन, विश्लेषण करके ही किया जा सकता हैं
साधना की सहस्रार चक्र पर असाधारण प्रतिक्रिया होती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के दिव्य संस्थान अपनी मूर्छना छोड़ कर सक्रिय बनते हैं और वह देखने सुनने, जानने लगते हैं जो साधारण स्थिति में असम्भव ही लगता है। दूरदर्शन, दूर श्रवण, अविज्ञात का परिचय, भविष्य का आभास, प्रभाव परिवेषण, जैसी सिद्धियाँ उनके लिए सरल है जिनमें अपनी मन स्थिति ध्रुव प्रदेश की तरह शान्त और शीतल बना ली ह। अन्तरिक्ष की असंख्यों हलचलों को-ध्वनियों एवं प्रकाश किरणों को हमारी भौंड़ी इन्द्रिय क्षमता देख समझ नहीं पाती। काम चलाऊ मोटी जानकारियाँ दे सकने के स्तर पर ही उनका निर्माण हुआ है।
साधना करके उसे आज्ञानुवर्ती बनाया जा सकता है। स्थूल शरीर- स्थूल कार्य करता है और सूक्ष्म शरीर-सूक्ष्म स्तर के काम कर सकता है। छाया पुरुष की सिद्धि में अपना ही एक और शरीर अपने हाथ आ जाता है और इन दोनों शरीरों से दो प्रकार के काम एक साथ करना सम्भव हो जाता है। इस प्रतिपादन में एक ‘प्रति मनुष्य का- छाया पुरुष का अस्तित्व और क्रिया-कलाप बताया गया है। देखा जाता है कि प्रकाश में अपनी ही एक और छाया उत्पन्न हो जाती है और वह साथ-साथ रहती है।
साधना से यही प्रयोजन पूरा होता है। गायत्री की प्राण शक्ति मूलाधार चक्र से सम्बन्धित होने का उल्लेख गायत्री मंजरी में मिलता है-
साधना ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करती है।
साधना किये बिना क्लेशों और दुःखों की निवृत्ति नहीं हो सकती। मन को जीत लेना ही सबसे बड़ी विजय है।
साधना से सिद्धि की प्रचलित उक्ति को विज्ञानमय कोश की सफलता कहा जाय तो कुछ अनुचित न होगा।
साधनाएँ आ जाती है॥ पंचमुखी गायत्री साधना का इन पाँचों समावेश हो जाता है।
साधना के नाम पर प्रयुक्त होने वाले विधि-विधानों को ही सब कुछ समझते हैं और असफलता मिलने पर इन्हीं विधानों में कोई खोट रह जाने की बात सोचते हैं। यह तथ्य भुला दिया जाता है कि वाणी के उच्चारण, अंगों के संचालन एवं पूजा वस्तुओं के उपयोग भर से आध्यात्मिक क्षमताएँ विकसित होने तथा उनके सत्परिणाम सामने आने का लाभ नहीं मिल सकता है। क्रिया-कृत्यों का महत्त्व तो है, पर उनका उद्देश्य व्यक्तित्व के स्तर को उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रेरणात्मक आधार खड़े करना है। यदि निष्कृष्ट चिन्तन और घृणित चरित्र की स्थिति में सुधार, परिवर्तन न हो तो फिर समझना चाहिए कि पूजा-पाठ के उपचार मात्र कौतुक कौतूहल ही बनकर रह गये। घिनौने व्यक्तित्व किसी दैवी शक्ति के प्रिय पात्र नहीं बन सकते ।
साधना एवं आदान-प्रदान करना सम्भव हो जाता है। वे ध्वनियाँ किस प्रकार की होती है इसका उल्लेख इस प्रकार है-
साधना रंगाई हैं बिना धुले कपड़े पर ठीक तरह रंग कहाँ चढ़ता है? आत्म -शोधन के बिना उच्चकोटि की साधनाएँ भी निष्फल चली जाती है। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनानी चाहिए और पिछले पापों के कारण आत्मिक प्रगति पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा करना चाहिए।
साधना की परम्परा न रह सकेगी ओर उससे समुचित लाभ प्राप्त न हो सकेगा।
साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति का उपयोग करते हैं।
साधना के अंतर्गत (1) सिद्धासन युक्त मूल वेध (2) शक्ति चालनी मुद्रा (3) सूर्य वेधन प्राणायाम (4) हृदि त्राटक (5) अग्नि मन्थन -ऊर्जा उन्नयन ध्यान।
साधना के सिद्धान्तों की जानकारी देने वाली पाठ्य सामग्री पिछले पृष्ठों पर तथा गत दो अंकों में प्रस्तुत की गई है। अब यह जानना, समझना शेष है कि प्रस्तुत साधना क्रम में क्या करना होगा। इस दिशा में प्रथम चरण आत्म-शोधन का है? साधक को शारीरिक , मानसिक और आत्मिक क्षेत्रों का आचार परक , चिन्तन परक और भाव परक परिष्कार करने के लिए साधकों -चित जीवन प्रक्रिया का निर्धारण करना चाहिए। भूमि की उर्वरता पर बीज का उगना और फलित होना निर्भर रहता है।
साधना में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है? किसी व्यक्ति विशेष क्षेत्र, देश अथवा लोक के सम्बन्ध में इस प्रकार की सही स्थिति का पूर्वाभास होने लगता है। अविज्ञात को ज्ञात स्तर पर उतारने में नादयोग की साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है।
साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थानों को विकसित करना -अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही नादयोग साधना का उद्देश्य है।
साधनाओं में से किसका किस प्रकार का क्रम बनाया जाना है। इसका निर्धारण पारस्परिक विचार विनियम के साथ किया जाना चाहिए। जिन्हें (1) पंचकोशों का अनावरण एवं (2) कुण्डलिनी जागरण की क्रिया-प्रक्रियाओं में रुचि है, उन्हें वह शुभारम्भ हरिद्वार आकर ही निर्धारण कराना चाहिए। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक का निर्माण इसी उद्देश्य के लिए किया गया है। दस दिवसीय सत्र अति व्यस्त व्यक्तियों के लिए और एक मासीय सत्र थोड़ी फुरसत वालों के लिए चलाये जा रहे हैं।
साधना क्रम चल पड़ेगा यों उसका सामान्य परिचय तो वर्तमान सत्रों में भी कराया जा रहा है। जुलाई और अक्टूबर में 1 से 10-11 से 20 और 21 से 30 तक के दस-दस दिवसीय सत्र चलेंगे और अगस्त, सितम्बर तथा नवम्बर , दिसम्बर में एक-एक महीने के सत्र हैं। इन उच्चस्तरीय साधनाओं में से किसे क्या साधना किस प्रकार करनी है उसका प्रत्यक्ष अनुभव और भावी क्रम निर्धारण करने के लिए इन सत्रों में सम्मिलित होना आवश्यक है।
साधना से जीव और ब्रह्म की एकता हो जाती है।
साधना द्वारा सधा लिया जाय तो ऐसे लाभ मिल सकते हैं जिन्हें देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करना कहने में अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती। मानसिक साधना ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करती है।
साधना। काम-काजी मस्तिष्क समेत मन-क्षेत्रीय की स्तरीय परतें मनोमय कोश की परिधि में आती है। जिस प्रकार वन्य पशुओं को साधकर पालतू बनाया जाता है। उनसे अनेक प्रकार के लाभ लिये जाते हैं, उसी प्रकार मन के महादैत्य की यदि साधना द्वारा सधा लिया जाय तो ऐसे लाभ मिल सकते हैं जिन्हें देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करना कहने में अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती। मानसिक साधना ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करती है।
साधना उपचार से बनती है। आवरण के छिद्रों की संख्या बढ़ाना और चौड़ी करना ही वह कार्य है जिसके आधार पर साधना को सिद्धि में परिणत होते देखा जा सकता है। जो इस परम पुरुषार्थ के लिए साहस जुटा सके, उसने मनुष्य जन्म का सच्चा लाभ पा लिया ऐसा समझा जा सकता है।
साधना कहते हैं। यों परामनोविज्ञान एवं मनोविज्ञान के अंतर्गत भी अचेतन की क्षमता को समझने और उसमें अभीष्ट परिवर्तन करने के उपाय खोजे तथा सोचे जा रहे है किन्तु तत्त्वदर्शियों की अनुभूत पद्धति मनः साधना के अतिरिक्त और कोई कारगर मार्ग अभी तक करतल गत हुआ नहीं है।
साधनाओं की सफलता निर्भर है। सभी जानते हैं कि बिखरी भाप, बारूद, धूप आदि से सामान्य प्रयोजन ही सधते हैं, पर जब उनमें केन्द्रीकरण होता है तो चमत्कार देखे जा सकते हैं। लक्ष्य बेध जैसी एकाग्रता उत्पन्न ही जा सके तो भौतिक एवं आत्मिक सभी प्रयोजनों में सफलता मिलती है।, त्राटक से इसी उपलब्धि का अभ्यास होता है।
साधना में लगा हुआ चित्त विषयों की आकांक्षा नहीं करता।
साधना करनी पड़ती है। इसी आधार पर कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य भी पूरा होता है।
साधना में लययोग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। लय का अर्थ-विलीन है। आत्मसत्ता का परमात्म सत्ता में विलीनीकरण ही परम लक्ष्य है। इसे प्राप्त करने पर आत्मा को -परमात्मा स्तर का बन सकना सम्भव हो जाता है। ‘लय’ के लिए नादयोग की साधना करनी पड़ती है।
साधना का स्वरूप- विधि-विधान-क्रिया कृत्य समझने से पहले हमें उसके उद्देश्य को समझना चाहिए। तथ्य से विपरीत स्तर की मान्यता बना लेने से नये-नये किस्म की भ्रान्तियाँ उत्पन्न होगी और सफलता न मिलने पर तरह-तरह के संशयों और अविश्वासों के जंगलों में भटकना पड़ेगा।
साधना से इसी चरम उपलब्धि की दिशा में बढ़ चलना सम्भव होता है।
साधना को त्राटक कहते हैं।
साधना का नियोजन करना चाहिए। उज्ज्वल चरित्र ह वह भूमि है जिस पर साधना के बीज उगते और पल्लवित होते हैं। अच्छी बन्दूक ही कारतूसों का लक्ष्य पूरा करती है। घटिया व्यक्तित्व घटिया बन्दूक की तरह है, जिनमें बढ़िया उपासना के बढ़िया कारतूस भी समुचित प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकते।
साधना ग्रन्थों में जगह-जगह पर हुआ है। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि, प्राण ऊर्जा, जीवनी शक्ति या कुण्डलिनी कहते हैं । आग में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है जिसमें अग्नि तत्त्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में होते हैं। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है उसमें सजातीय तत्त्व का ईंधन डालने से उद्दीपन होता है। प्राणायाम द्वारा इड़ा-पिंगला के माध्यम से अन्तरिक्ष से खींचकर लाया गया प्राण-तत्त्व मूलाधार में अवस्थित चिनगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता है तो वह भभकती है और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी जीवन सत्ता को अग्निमय बनाती है।
साधना विज्ञान के आचार्य करते रहे है।
साधना तपश्चर्या के सफल होने में कोई अड़चन शेष नहीं रह जाती।
साधना के अतिरिक्त और कोई कारगर मार्ग अभी तक करतल गत हुआ नहीं है।
साधना का उल्लेख है कहा गया है कि मनुष्य की सूक्ष्म सत्ता का प्रतिनिधित्व करने वाला इक जीवित प्रेत होता है। और वह साथ ही रहता है- इसकी देवता या भूत प्रेत जैसी साधना करके उसे आज्ञानुवर्ती बनाया जा सकता है। स्थूल शरीर- स्थूल कार्य करता है और सूक्ष्म शरीर-सूक्ष्म स्तर के काम कर सकता है। छाया पुरुष की सिद्धि में अपना ही एक और शरीर अपने हाथ आ जाता है और इन दोनों शरीरों से दो प्रकार के काम एक साथ करना सम्भव हो जाता है। इस प्रतिपादन में एक ‘प्रति मनुष्य का- छाया पुरुष का अस्तित्व और क्रिया-कलाप बताया गया है।
साधना एवं सूर्यभेदन प्राणायाम को-प्राणयोग (3) खेचरी मुद्रा एवं शक्ति चालनी को लय योग(4) नादानुसंधान को-नादयोग (5) सविता संचरण एवं ऊर्जा उन्नयन धारणा को ध्यानयोग कहा जा सकता है। इन्हीं पाँचों के अंतर्गत पंचकोशी और कुण्डलिनी साधना की समस्त साधनाएँ आ जाती है॥ पंचमुखी गायत्री साधना का इन पाँचों समावेश हो जाता है।
साधना का सत्परिणाम मनोजय है। इसे प्राप्त कर लेने वाला आत्म विजय को विश्व विजय के लाभ से भी बढ़ कर आनन्ददायक अनुभव करता है।
साधना का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा। आत्म-परिष्कार कपड़े की धुलाई और साधना रंगाई हैं बिना धुले कपड़े पर ठीक तरह रंग कहाँ चढ़ता है? आत्म -शोधन के बिना उच्चकोटि की साधनाएँ भी निष्फल चली जाती है। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनानी चाहिए और पिछले पापों के कारण आत्मिक प्रगति पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा करना चाहिए।
साधना काल में ध्यान भूमिका को लगातार प्रकाश ज्योति की झाँकी होती रहे। धुँधलेपन का हटाने के उद्देश्य से ही नेत्रों को खोलने, बन्द करने की प्रक्रिया अपनाई जाय।
साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है।
साधना में सम्पन्न होती है।
साधना में एकाग्रता का अत्यधिक महत्त्व है। मनःशक्तियों का बिखराव ही उस मनोबल के उत्पन्न होने में सबसे बड़ी बाधा है जिस पर साधनाओं की सफलता निर्भर है। सभी जानते हैं कि बिखरी भाप, बारूद, धूप आदि से सामान्य प्रयोजन ही सधते हैं, पर जब उनमें केन्द्रीकरण होता है तो चमत्कार देखे जा सकते हैं। लक्ष्य बेध जैसी एकाग्रता उत्पन्न ही जा सके तो भौतिक एवं आत्मिक सभी प्रयोजनों में सफलता मिलती है।, त्राटक से इसी उपलब्धि का अभ्यास होता है।
साधनाओं में ‘त्राटक’ प्रमुख है। इसे बिन्दुयोग भी कहते हैं । अस्त-व्यस्त इधर-उधर भटकने वाली बाह्य और अन्तः दृष्टि को किसी बिन्दु विशेष पर- लक्ष्य विशेष पर एकाग्र करने को बिन्दु साधना कह सकते हैं। त्राटक का उद्देश्य यही है। त्राटक में बाह्य नेत्रों एवं दीपक जैसे साधनों का उपभोग किया जाता है।
साधना शास्त्र में स्थान-स्थान पर मिल जाता है। इस प्रकार की सफलता प्राप्त करने के लिए विज्ञानमय कोश के जागरण का प्रयत्न करना पड़ता है। इस संदर्भ में कुछ संकेत इस प्रकार मिलते हैं-
साधना, दैवी संकेतों के समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप और भावनात्मक आदान प्रदान करने में समर्थ हो सकती है। साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थानों को विकसित करना -अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही नादयोग साधना का उद्देश्य है।
साधना विज्ञान के आधार पर जागृत किया जा सके तो सामान्य में से असामान्य का प्रकटीकरण हो सकता है। प्राण की क्षमता की असीम है। प्राण साधना से इस असीमता की दिशा में बढ़ चलना- प्रचुर सशक्तता प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है।
साधनावस्था भवेदिव्यं व पुस्तदा॥
साधना क्रम में क्या करना होगा। इस दिशा में प्रथम चरण आत्म-शोधन का है? साधक को शारीरिक , मानसिक और आत्मिक क्षेत्रों का आचार परक , चिन्तन परक और भाव परक परिष्कार करने के लिए साधकों -चित जीवन प्रक्रिया का निर्धारण करना चाहिए। भूमि की उर्वरता पर बीज का उगना और फलित होना निर्भर रहता है। साधना अपने आपे को साधने से-व्यवस्थित एवं परिष्कृत होने के साथ आरम्भ होती है।
साधनात्मक कर्मकाण्डों का फल परिपूर्ण मिलना न मिलना अथवा स्वल्प मिलना कर्मकाण्डों के विधि-विधानों पर नहीं साधक की श्रद्धा पर निर्भर रहता है। श्रद्धा की न्यूनता ही साधनाओं के निष्फल जाने का प्रधान कारण होता है। जो इसे सुनिश्चित तथ्य को जानते हैं वे सभी साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति का उपयोग करते हैं।
साधना के आधार पर चुम्बक ज्योति से साधक का व्यक्तित्व भी ज्योतिर्मय एवं विशिष्ट आकर्षण युक्त बन सकता है।
साधनाएँ भी निष्फल चली जाती है। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनानी चाहिए और पिछले पापों के कारण आत्मिक प्रगति पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा करना चाहिए।
साधना के रूप में प्रयुक्त होती है।
साधना के बीज उगते और पल्लवित होते हैं। अच्छी बन्दूक ही कारतूसों का लक्ष्य पूरा करती है। घटिया व्यक्तित्व घटिया बन्दूक की तरह है, जिनमें बढ़िया उपासना के बढ़िया कारतूस भी समुचित प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकते।
साधना सरलतापूर्वक चलने लगती है।
साधना का इन पाँचों समावेश हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-June
साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमा आदि सिद्धियों का अधिकारी बनता है।
साधना के ही आधारों को अपनाना पड़ेगा। मान्यताओं के गहन मर्मस्थल का स्पर्श इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। ब्रह्मवर्चस् आरण्यक से इस स्तर की शोधें करने का विचार है। यदि उसमें कुछ कहने लायक सफलता मिली तो समझना चाहिए कि पदार्थ विज्ञान व्यवसाय विज्ञान, शिल्प विज्ञान, शिक्षा विज्ञान-आरोग्य विज्ञान की ही तरह यह अध्यात्म अवलंबी मनोविज्ञान भी विश्व मानव की सर्वोपरि आवश्यकता को पूर्ण कर सकने में समर्थ होगा। इस सफलता के पीछे हम समग्र मानव जाति की एक असाधारण अनुदान दे सकने की आशा अपेक्षा कर सकते हैं।
साधना में अपना सहयोग सम्मिलित रह सके। इसलिए सोचा यह गया है कि इस अभिनव
साधना के विभिन्न प्रयोग विभिन्न समय में होते रहे है। व्यक्तिगत त्याग तितीक्षा-धार्मिक जीवन से आत्म-शोधन का उद्देश्य पूरा होता है। साथ ही यह प्रक्रिया परमार्थ प्रयोजन के साथ जुड़ी रहे तो दूना लाभ है। परमार्थ में सद्ज्ञान संवर्द्धन-धर्म प्रचार सर्वोपरि है। इसके प्रभाव से सामान्य मनुष्य भी ऋषि कल्प बन सकते हैं।
साधना के अंतर्गत रखा गया है, इस एक ही प्रक्रिया की पाँच महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ है-पापों का प्रायश्चित (2) सद्ज्ञान प्रसार-ब्रह्मदान का पुण्य संपादन (3) धर्म धारणा से ओत-प्रोत जीवनयापन की तपश्चर्या (4) जनमानस परिष्कार के युग परिवर्तन आधार की पूर्ति (5) तीर्थयात्रा परम्परा के वास्तविक स्वरूप का पुनरुद्धार इन पुण्य प्रयोजनों का संयुक्त स्वरूप सम्मिलित करते हुए हमें धर्म प्रचार मंडलियों के रूप में चिर प्राचीन एवं चिर जीवन-साँस्कृतिक अभियान का सूत्र-पात्र करना चाहिए। ब्रह्म वर्चस साधना तपश्चर्या का यह एक अति महत्त्वपूर्ण अंग रहना चाहिए।
साधना तथा मूलबन्ध का समन्वय, यह कर लेने पर निश्चित रूप से योग की सिद्धि होती है।
साधना सम्पन्न की जाती हैं।
साधना में-प्रणव तत्त्व का अविच्छिन्न समावेश है। कहा गया है-
साधना ब्रह्मलोक से-ब्रह्मरंध्र से- सामीप्य साधती है और उस केन्द्र के अनुदानों को उसी प्रकार चूसती है जैसे छोटे बालक का मुख माता का स्तन चूसता है। यह भावना एवं कल्पना सूक्ष्म शरीर में एक विशेष प्रकार की सुखद एवं उत्साहवर्धक गुदगुदी उत्पन्न करती है। उसका रसास्वादन देर तक करते रहने को जी करता है। यह तो हुआ भावनात्मक पथ जिससे अन्तःचेतना के अमृत से सम्पर्क बनता है और अन्तर्मुखी होकर अंतर्जगत में एक से एक बढ़ी चढ़ी दिव्य सम्वेदनाओं की अनुभूति का द्वारा खुलता है। पर बात इतने तक ही सीमित नहीं है।
साधना में सम्मिलित रहने का व्रत निबाहा इससे कई गुने वे लोग है जो प्रतिज्ञा बद्ध रूप से तो नहीं पर साधना के नियमित रूप से साधना करते हैं। विचार यह है कि इन्हें भी ब्रह्म वर्चस साधना का आभास कराया जाय। अन्यथा वे पीछे कभी हरिद्वार आते तो रहेंगे, पर वैसा स्वच्छ मार्ग दर्शन शायद कठिन पड़े। इधर हमारी भी इच्छा है कि जिस प्रकार गायत्री साधना की दिशा में प्रोत्साहित करने से लेकर सफल बनाने तक में व्यक्तिगत सहयोग करने में साधकों की सहायता की उसी प्रकार ब्रह्म वर्चस की उच्चस्तरीय साधना में अपना सहयोग सम्मिलित रह सके। इसलिए सोचा यह गया है कि इस अभिनव
साधना को करते हुए एक व्यक्ति चमत्कारी फल प्राप्त करता है। पर दूसरे को असफल रहना पड़ता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा में न्यूनाधिकता होना ही प्रधान कारण होता है।
साधना के दो रूप है। एक तो अन्तरिक्ष से सूक्ष्म जगत से आने वाली दिव्य ध्वनियों का श्रवण, दूसरा अपने अन्तरंग के शब्द ब्रह्म का जागरण और उसका अभीष्ट क्षेत्र में अभीष्ट उद्देश्य के लिए परिप्रेषण। यह शब्द उत्थान एवं परिप्रेषण ॐ कार साधना के माध्यम से ही बन पड़ता है।
साधना के उपयुक्त सभी विशेषताएँ और अनुकूलताएँ जुटाने का यहीं वे सभी आधार एकत्रित किये गये हैं, जिनके कारण किन्हीं स्थानों को तीर्थ कहलाने का सौभाग्य मिलता है। गंगा की गोद और हिमालय की छाया होने से सप्त ऋषियों की तपोभूमि होने से स्थान की सनातन गरिमा तो है ही । अब भी यहाँ अखण्ड दीप, नित्य यज्ञ, नियमित जप, ब्रह्म सन्दोह, आरण्यक वातावरण की परम्परा का नवीन संस्करण प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। पारिवारिक स्नेह-सौजन्य से अधिक गहरा और भाव भरा वात्सल्य, दुलार देने का मातृत्व यहाँ जीवन्त है। व्यक्ति विशेष के लिए उपयुक्त परामर्श दे सकने वाले तपश्चर्या, ज्ञान-सम्पदा और अनुभवों के धनी मार्गदर्शक भी यहाँ अभी तो मौजूद हैं ही, उसका संरक्षण एक ऐसा तथ्य हैं जिससे साधना की सफलता सम्भव होनी ही चाहिए।
साधना अतीव उपयोगी सिद्ध होती है।
साधना में नाद श्रवण में ॐ कार की ध्वनि पकड़ने तक पहुँचना पड़ता है। अन्य शब्द तो मार्ग के मील पत्थर मात्र है। अनाहत ध्वनि को ‘सुरति’ तुरीयावस्था, समाधि आदि पूर्णता बोधक आस्थाओं के समतुल्य माना गया है और अनाहत ध्वनि ‘ऊँ’ कार की श्रवण अनुभूति ही है। ॐ कार ध्वनि का नादयोग में इसीलिए उच्च स्थान है।
साधना से करनी चाहिए।
साधनाओं के साथ सम्मिलित नहीं किया जा सकता । चित्र-विचित्र ढंग से शरीर के अवयवों को मोड़ने मरोड़ने से शरीरगत लाभ तो हो सकते हैं, पर मन की एकाग्रता पर तो उनके कारण उत्पन्न हुए तनाव से बाधा ही पड़ेगी।
साधना से अभीष्ट उद्देश्य सरलतापूर्वक सिद्ध होता है-
साधना में मन न लगने, जी ऊबने , चित्त के चंचल रहने की शिकायत साधकों को प्रायः बनी ही रहती है। इसका कारण मन का अनगढ़ होना और निग्रह में संकल्प-शक्ति का प्रयोग न किया जाना भी होता है। किन्तु बहुत करके वातावरण का प्रभाव भी छाया रहता है। उसके कारण भी मन उचटता रहता है। साधना जिस श्रद्धा, अभिरुचि एवं विश्वासपूर्वक की जानी चाहिए, हो नहीं पाती।
साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देव सत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधना के नियमित रूप से साधना करते हैं। विचार यह है कि इन्हें भी ब्रह्म वर्चस साधना का आभास कराया जाय। अन्यथा वे पीछे कभी हरिद्वार आते तो रहेंगे, पर वैसा स्वच्छ मार्ग दर्शन शायद कठिन पड़े। इधर हमारी भी इच्छा है कि जिस प्रकार गायत्री साधना की दिशा में प्रोत्साहित करने से लेकर सफल बनाने तक में व्यक्तिगत सहयोग करने में साधकों की सहायता की उसी प्रकार ब्रह्म वर्चस की उच्चस्तरीय साधना में अपना सहयोग सम्मिलित रह सके। इसलिए सोचा यह गया है कि इस अभिनव
साधना क्रम में सम्मिलित रखना चाहिए। कुण्डलिनी जागरण साधना में नाद श्रवण में ॐ कार की ध्वनि पकड़ने तक पहुँचना पड़ता है। अन्य शब्द तो मार्ग के मील पत्थर मात्र है। अनाहत ध्वनि को ‘सुरति’ तुरीयावस्था, समाधि आदि पूर्णता बोधक आस्थाओं के समतुल्य माना गया है और अनाहत ध्वनि ‘ऊँ’ कार की श्रवण अनुभूति ही है। ॐ कार ध्वनि का नादयोग में इसीलिए उच्च स्थान है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष अनुपम सामूहिक गायत्री महा पुरश्चरण के सत्परिणाम भी अनोखे ही होंगे। राजनीति के क्षेत्र में जो काली घटाएँ छा गई थीं उन्हें टालने और लोकतन्त्र का सदुपयोग होने की प्रकाश किरणें सामने आई हैं। इसके अतिरिक्त जन-जीवन तथा सामूहिक वातावरण में उत्साह भरे सुख परिवर्तनों की आशा बँध रही हैं। उज्ज्वल भविष्य का अरुणोदय प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। इन सम्भावनाओं के अनेक कारणों का एक कारण ऐसी सामूहिक परिचर्याओं को भी समझा जा सकता है जैसी कि साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के अवसर पर सम्पन्न की गई।
साधना करता है वह त्रिदेव रूप है। वह सर्वव्यापी भगवान को जान ही लेता है।
साधना की सफलता का चिह्न माना जा सकता है।
साधना यों प्रकृतिः सौम्य सतोगुणी हैं, पर आवश्यकतानुसार उसका उपयोग अवांछनीयताओं के उन्मूलन में प्रतिरोध शक्ति की तरह सुरक्षात्मक प्रयोजनों के लिए भी किया जा सकता है।
साधना की सफलता सम्भव होनी ही चाहिए।
साधना के अंतर्गत गायत्री की उच्चस्तरीय साधना करने वालों को आत्म-शोधन और परमार्थ संचय के उभय पक्षीय उद्देश्य से कुछ समय के लिए तीर्थयात्रा पर निकलने का कार्य-क्रम बनाना चाहिए। प्रायश्चित की यह सर्वोत्तम प्रक्रिया है। इस साँस्कृतिक महान् परम्परा का वास्तविक स्वरूप प्रस्तुत करने और उसे अभिनव प्रचलन का रूप देने में यह यात्राएँ धर्म को एक अभिनव मार्ग दर्शन कर सकती है।
साधना का निर्देश माना जाना ही उचित है।
साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी के साथ योगसाधना में निरत है, वही चिरकाल तक आनन्द पाता है।
साधना ही शक्ति और सिद्धि का माध्यम एवं स्रोत है। ईश्वर द्वारा तप के ये वितरण स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के लिए अभीष्ट उपलब्धियों का यही एकमात्र मार्ग है।
साधना का महात्म्य भी बताया है और उसके स्वरूप एवं तत्त्व दर्शन को समझाने का प्रयत्न करते हुये कहा है-
साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम का मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी जितनी मन्दगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे धीरे उस वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए। गहरी और पूरी साँस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकरा कर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे अनुभव किया जा सकता है।
साधना है। आरम्भिक अभ्यासी की प्रकृति प्रवाह से उत्पन्न विविध स्तर की आहत-परिचित ध्वनियाँ सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से सुनाई पड़ती है। इनके सहारे मन को वशवर्ती बनाने तथा प्रकृति क्षेत्र में चल रही हलचलों को जानने तथा उन्हें मोड़ने मरोड़ने की सामर्थ्य मिलता है। आगे चलकर ‘अनाहत’ क्षेत्र आ जाता है। ड़ड़ड़ड़ भू-ध्वनि प्रवाह-जिसे परब्रह्म का अनुभव में आ सकने वाला स्वरूप कह सकते हैं यदि किसी के सघन संपर्क में आ सके तो उसे अध्यात्म क्षेत्र का सिद्ध पुरुष भी कह सकते हैं।
साधना के लिए सिद्धासन (विधि आगे लिखी जायेगी) श्रेष्ठ होने पर भी जिस आसन से सुखपूर्वक निरन्तर ब्रह्म का चिन्तन हो सके वही आसन योगी को उपादेय है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष की इसे महानतम स्मृति एवं उपलब्धि कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
साधना का महत्त्व समझा जा सकता है। स्मरणीय इतना ही है कि इस मुद्रा के साथ साथ भाव सम्वेदनाओं की अनुभूति अधिकतम गहरी एवं श्रद्धा सिक्त होनी चाहिए।
साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान में जाने की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि पुराने निवास स्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति बन नहीं पाती जैसी महत्त्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है। कुटुम्बियों के परिचित लोगों के साथ जुड़े हुए भले-बुरे सम्बन्धों की पकड़ बनी रहती है। कामों का दबाव बना रहता है। राग द्वेष उभरते रहते हैं। दिनचर्या बदलने पर कुटुम्बी तथा साथी विचित्रता अनुभव करते और उसमें विरोध खड़ा करते हैं।
साधनाओं में विशिष्ट स्थान है। राई-रत्ती वासना का क्रमशः इतना विस्तार होता जाता है कि मनुष्य की सम्पूर्ण शक्ति उसी में व्यय होती जाती है, फिर भी तनिक भी सन्तोष प्राप्त नहीं हो पाता। कामुकता की प्रेरणा, पत्नी ढूँढ़ने की प्रेरणा बन जाती है। पत्नी, बच्चे और परिवार का आधार बनती है। बच्चों के उत्तरदायित्व गर्दन तोड़ कर रख देते हैं।
साधना से धर्म शास्त्र विकसित होकर ब्रह्म विद्या का तत्त्वदर्शन बन जाता है। वैदिक दक्षिण मार्ग यही हैं। इसके सामान्य और असामान्य दो पक्ष हैं। एक कामकाजी लोगों का गृहस्थोपयोगी चरित्र निष्ठा एवं समाजनिष्ठा का नैतिक सामाजिक प्रशिक्षण । विरक्त स्तर अपनाने वाले साधु ब्राह्मण स्तर के महामानवों के लिए उदात्त विश्व हित के अनुरूप आत्म-विस्तार एवं लोककल्याण का तत्त्वदर्शन ।
साधना का तत्त्वज्ञान श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से- सो और हम ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा ह अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त ही रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारी शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान पर सत्य न्याय और प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देव सत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधनाओं की न तो व्यवस्था बनने देती है और न मनःस्थिति ही वैसी रह पाती हैं। दैनिक नित्य कर्म के रूप में सामान्य उपासना तो घर पर भी चलती रह सकती है, पर यदि कुछ विशेष करना हो तो उसके लिए विशेष स्थान, वातावरण, सान्निध्य एवं मार्ग दर्शन भी चाहिए। यह सब प्राप्त करने के लिए उसके लिए उपयुक्त स्थान का प्रबंध करना वह आधार है जिस पर सफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है।
साधना से निखरा व्यक्ति अनिवार्य निर्वाह के अतिरिक्त अपनी समस्त सम्पत्तियाँ और विभूतियाँ लोककल्याण के लिए समर्पित कर देता है। यही प्रभु समर्पित जीवन है। ऐसा जीवन जीने वाला ही तपस्वी तथा देवोपम सिद्ध पुरुष कहलाने का अधिकारी है।
साधनाएँ इसी उद्देश्य की पूर्ति करती है।
साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का- आलस्य प्रमाद जैसी
दुष्प्रवृत्तियों का-मन से लोभ, मोह जैसी तृष्णाओं का-अन्तस्तल से जीव भावी अहन्ता का-निवारण निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएँ अत्यन्त प्रगाढ़ होनी चाहिए। दुर्भावनाएँ और दुष्कृतियां- निष्कृष्टतायें और दुष्टताएँ-क्षुद्रताएँ और हीनताएँ सभी निरस्त हो रही है-सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। उपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त जो हलकापन-जो सन्तोष-जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरन्तर बना रहता है उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए।
साधना के माध्यम से ही बन पड़ता है।
साधना की जाती है, उसी प्रकार मानवी विद्युत प्रवाह को दिशा विशेष में प्रयुक्त करने के लिए नेत्रों की ईक्षण शक्ति को सधाया जाता है। इस प्रक्रिया को त्राटक का नाम दिया गया है।
साधना को प्रणव विद्या भी कहा गया है। उसके जागरण में जहाँ अन्यान्य विधि-विधानों का प्रयोग होता है वहाँ उस सन्दर्भ में प्रणव तत्त्व की प्रायः प्रमुखता ही दी जाती है।
साधना अथवा परतन्त्र विज्ञान’ कहा गया हैं। ड़ड़ड़ड़ उपासना से चेतना पंचक और पदार्थ पंचक के दोनों ही क्षेत्रों को समर्थ परिष्कृत बनाने का अवसर मिलता है। सावित्री साधना यही है। इसका देवता सविता है। सावित्री और सविता का युग्म है।
साधना करने से उन्मनी कला स्वयमेव सिद्ध होती है और तीनों ड़ड़ड़ड़ भी इस अभ्यास से स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं।
साधना करने वाला इच्छानुसार मृत्यु को जीत लेता है। उसकी सूक्ष्मता बढ़ जाती है और भव सागर के बन्धन कट जाते हैं। जागरूक योगी शब्द ब्रह्म की साधना करे। यह परम कल्याणकारी योग है।’
साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बन गया।
साधना करे। यह परम कल्याणकारी योग है।’
साधना का उद्देश्य अपनी दृष्टि क्षमता में इतनी तीक्ष्णता उत्पन्न करना है कि वह दृश्य की गहराई में उतर सके और उसके अन्तराल में अति महत्त्वपूर्ण घटित हो रहा है उसे पकड़ने और ग्रहण करने में समर्थ हो सके। वैज्ञानिकों, कलाकारों, तत्त्वदर्शियों में यही विशेषता होती है कि सामान्य समझी जाने वाली घटनाओं को अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से देखते हैं और उसी में से ऐसे तथ्य ढूँढ़ निकालते हैं जो अद्भुत एवं असाधारण सिद्ध होते हैं।
साधना उसी की स्थिति के अनुरूप होगी और प्रतिक्रिया को गम्भीरतापूर्वक देखते हुए आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जाते रहेंगे यह सब नये आरण्यक आश्रम में ही सम्भव है। शान्ति कुँज में चल रहें ब्रह्म वर्चस सत्र तो उसकी पूर्वभूमा मात्र है। आरण्यक बन तो रहा है पर आर्थिक कारणों से निर्माण की गति धीमी है। जब भी उसमें निवास की स्थिति बन जाएगी तभी उपरोक्त साधना क्रम आरम्भ कर दिया जाएगा तब तक साधकों के नाम नोट किये जाते रहेंगे और आरम्भ होते ही उन्हें बुलाने में प्राथमिकता रखने के आश्वासन भेजे जाते रहेंगे। बन रहे आरण्यक का निर्माण कार्य जिस दिन में साधकों के रहने योग्य बन जाएगा उसी दिन से निर्धारित प्रशिक्षण चलने लगेगा आशा की जानी चाहिए कि उसमें भी अनावश्यक विलम्ब नहीं लगेगा।
साधना करते हैं। विचार यह है कि इन्हें भी ब्रह्म वर्चस साधना का आभास कराया जाय। अन्यथा वे पीछे कभी हरिद्वार आते तो रहेंगे, पर वैसा स्वच्छ मार्ग दर्शन शायद कठिन पड़े। इधर हमारी भी इच्छा है कि जिस प्रकार गायत्री साधना की दिशा में प्रोत्साहित करने से लेकर सफल बनाने तक में व्यक्तिगत सहयोग करने में साधकों की सहायता की उसी प्रकार ब्रह्म वर्चस की उच्चस्तरीय साधना में अपना सहयोग सम्मिलित रह सके। इसलिए सोचा यह गया है कि इस अभिनव
साधना के आधार पर जितनी सरलतापूर्वक बन सकती है, उतनी अन्य किसी प्रकार नहीं। तत्त्व-बोध की यह-साधना भी ऐसी है। जिसके लिए समय न मिलने, न साधन होने, मन न लगने जैसी शिकायत करने का कोई अवसर नहीं है।
साधना की खेचरी मुद्रा प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में शिव संहिता में इस प्रकार उल्लेख मिलता है-
साधना के लिए सुरक्षित रखे जाने का विधान है। इसी विधान की, निद्रा को रात्रि और जागृति को दिन मानते हुए उनकी सन्धि बेला को संध्याकाल कहा जा सकता है। इस प्रकार उठते समय का आत्म-बोध और सोते समय को तत्त्व बोध’ साधना की व्यावहारिक जीवन को प्रभावित करने वाली उच्चस्तरीय साधना कहा जा सकता है। सरलता और प्रभावोत्पादक क्षमता की दृष्टि से उसे अद्वितीय माना जा सकता है ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ का जीवन सूत्र जो जितनी गहराई के साथ हृदयंगम और कार्यान्वित कर सकेगा वह उतनी ही तीव्रतापूर्वक आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा, यह निश्चित है।
साधना कह सकते हैं। योग और तप स्तर के साधकों को क्रियान्वित होते हैं। योग में जीव चेतना को ब्रह्म चेतना से जोड़ने के लिए स्वाध्याय, मनन से लेकर ध्यान धारणा तक के अवलम्बन अपनी मनःस्थिति के अनुरूप अपनाने पड़ते हैं। विचारणा, भावना एवं आस्था की प्रगाढ़ प्रतिष्ठापना इसी आधार पर सम्भव होती है। तपश्चर्या के औजारों से जमे हुए कुसंस्कारों को उखाड़ना पड़ता है।
साधना कहा जाता है।
साधना से सम्भव होता है। कुण्डलिनी अग्नि के प्रज्ज्वलन में ॐ कार को ईंधन की तरह प्रयुक्त किया जाता है-
साधना तपश्चर्या का यह एक अति महत्त्वपूर्ण अंग रहना चाहिए।
साधना के सम्बन्ध में भी आत्म शोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
साधना करके सफलता प्राप्त कर सके। पात्रता युक्त अधिकारी साधक और अनुभवी सुयोग्य मार्गदर्शक की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही ग्रन्थों में इस गूढ़ विद्या पर प्रायः संकेत ही किये गये हैं।
साधना आरम्भ करने के दिनों दस-दस सेकेण्ड के तीन गुँजार बीच-बीच में पाँच-पाँच सेकेण्ड रुकते हुए करने चाहिए। इस प्रकार 40 सेकेण्ड का एक शब्द उत्थान हो जाएगा इतना करके उच्चार बन्द और उसकी प्रतिध्वनि सुनने का प्रयत्न करना चाहिए। जिस प्रकार गुम्बजों में, पक्के कुओं में, विशाल भवनों में, पहाड़ों की घाटियों में जोर से शब्द करने पर उसकी प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है, उसी प्रकार अपने अंतःक्षेत्र में ॐ कार गुँजार के छोड़े हुए शब्द प्रवाह की प्रतिध्वनि उत्पन्न हुई अनुभव करनी चाहिए और पूरी ध्यान एकाग्र करके इस सूक्ष्म प्रतिध्वनि का आभास होता है। आरम्भ में बहुत प्रयत्न से, बहुत थोड़ी-सी अतीव मन्द-रुक रुककर सुनाई पड़ती है, किन्तु धीरे धीरे उसका उभार बढ़ता चलता है और ॐ कार की प्रतिध्वनि अपने ही अन्तराल में अधिक स्पष्ट एवं अधिक समय तक सुनाई पड़ने लगती है। स्पष्टता एवं देरी को इस साधना की सफलता का चिह्न माना जा सकता है।
साधनाओं में ही करना चाहिए। सामान्य गायत्री जप ध्यान आदि में तो सामान्य पालथी मार कर बैठना ही पर्याप्त होता है। तनाव उत्पन्न करने वाले साधनों से सामान्य साधन में ध्यान बँटता है।
साधना में निरत है, वही चिरकाल तक आनन्द पाता है।
साधना पद्धति ही उपचारात्मक मन शास्त्र कह सकते हैं। विश्व के मूर्धन्य मनोविज्ञानवेत्ता मात्र विवेचनाएँ और व्याख्याएँ कर सके है उसके एक कदम आगे बढ़ कर हमें विकृतियों के निराकरण का कारगर उपाय भी खोजना है। निस्संदेह यह कार्य अब कभी भी सम्पन्न होगा तब उसमें योग साधना के ही आधारों को अपनाना पड़ेगा। मान्यताओं के गहन मर्मस्थल का स्पर्श इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। ब्रह्मवर्चस् आरण्यक से इस स्तर की शोधें करने का विचार है।
साधना के पूर्वार्ध में अपने कार्य कलेवर पर श्वासन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की- परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के-प्रत्यक्ष तथ्य के-रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगें।
साधना ग्रन्थों में गिनाये गये है। कहीं-कहीं इन्हें लोक भी कहा गया है। एक ॐ कार ध्वनि और शेष नौ शब्द इन्हें मिलाकर दस शब्द बनते हैं। इन्हीं की श्रवण साधना शब्द ब्रह्म की नाद साधना कहलाती है।
साधना नादयोग की उच्चस्तरीय साधना है। आरम्भिक अभ्यासी की प्रकृति प्रवाह से उत्पन्न विविध स्तर की आहत-परिचित ध्वनियाँ सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से सुनाई पड़ती है। इनके सहारे मन को वशवर्ती बनाने तथा प्रकृति क्षेत्र में चल रही हलचलों को जानने तथा उन्हें मोड़ने मरोड़ने की सामर्थ्य मिलता है। आगे चलकर ‘अनाहत’ क्षेत्र आ जाता है। ड़ड़ड़ड़ भू-ध्वनि प्रवाह-जिसे परब्रह्म का अनुभव में आ सकने वाला स्वरूप कह सकते हैं यदि किसी के सघन संपर्क में आ सके तो उसे अध्यात्म क्षेत्र का सिद्ध पुरुष भी कह सकते हैं।
साधनाक्रम का शुभारम्भ, ब्रह्मवर्चस आरण्यक का निर्माण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हैं साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष की इसे महानतम स्मृति एवं उपलब्धि कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
साधना भी ऐसी है। जिसके लिए समय न मिलने, न साधन होने, मन न लगने जैसी शिकायत करने का कोई अवसर नहीं है।
साधना से ही योग को जानना चाहिए। साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी के साथ योगसाधना में निरत है, वही चिरकाल तक आनन्द पाता है।
साधना में ‘यम’ नियम के उपरान्त आसन को स्थान दिया गया है। यहाँ आसन का तात्पर्य मात्र बैठने की विधि से नहीं वरन् उस स्थान एवं वातावरण से है। जहाँ उपासना की जाय। आसन के नाम पर सिद्धासन, सर्वांगासन, पद्मासन आदि पंरो को मोड़ने-तोड़ने के विधि विशेष को शोभित नहीं किया जाना चाहिए, वरन् उस समूचे वातावरण का संकेत सन्निहित समझा जाना चाहिए। जहाँ कि उपासना की जा रहीं है या की जानी है।
साधना का एक अंग ही माना गया है।
साधना का उद्देश्य पूरा हो गया।
साधना का सुअवसर एवं साधक का सौभाग्य ही माना जाना चाहिए। ऐसे ही वातावरण में निवास करने का स्वर्गीय दिव्य आनन्द प्राप्त करने के लिए भर्तृहरि बेचैन थे। इसके लिए उन्होंने राजपाट का सारा जंजाल त्याग और योगी का देव जीवन अपना कर उच्चस्तरीय मनोरथ पूरा करने में सफल हुए। जब तक यह स्थिति न आई तब तक वे उसी के मनोरम सपने देखते रहे। भर्तृहरि शतक में उनकी अभिव्यक्ति इस प्रकार है-
साधना करने का प्रयत्न किया जा सकता है। इस क्षेत्र में अपने ही जैसे साथी संगी तपस्वी बने रहने से एक दूसरों को प्रेरणा भी मिलती है। कन्याओं का निवास प्रत्यक्ष कुमारिका देवियों की चलती-फिरती प्रतिमाओं का दर्शन कराता है। अपने समीप में भी यथा सम्भव कुछ ऐसी ही उपयुक्तता तलाश की जा सकती है।
साधना के लिए निर्जन द्वीपों में चले जाया करें जिनमें कभी सप्त ऋषि तप करते थे और वे स्थान अभी जन प्रवेश से वंचित रहने के कारण अपनी मौलिक विशेषता अभी भी बनाये हुए हैं गंगा तट के शहरों का गन्दा, पानी गंगा में ही बहायी जाता है पर ब्रह्मवर्चस तक वैसा कहीं नहीं हुआ है। इससे पूर्व ऋषिकेश, देवप्रयाग, उत्तर काशी आदि जो कस्बे है उनका गन्दा पानी भी गंगा में नहीं गिरा है। इस विशेषता के कारण यहाँ की जल धारा अभी भी अपनी मौलिक विशेषता पूर्ववत् बनाये हुए है।
साधना कहलाती है।
साधना का महत्त्व और प्रतिफल बताते हुए योगविद्या के आचार्यों ने कहा है-
साधना से बड़ी सहायता मिलती है। उत्साह जगता है और स्फूर्ति बढ़ती हैं। क्रिया के साथ मनोयोग जुड़ा रहने से सफलता के समस्त आधार बनते हैं। इसके लिए मन को प्रशिक्षित करना पड़ता है। यह भी सरकस के लिए हिंस्र जानवर साधने की तरह कठिन कार्य है।
साधना की सफलता में सरलता उत्पन्न होती है। यहाँ इतना और स्मरण रखने योग्य है कि उत्तानपाद शीर्षासन, मत्स्यासन , मयुरासन आदि चौरासी या न्यूनाधिक संख्या में गिनाये जाने वाले आसन एक प्रकार के शारीरिक व्यायाम हैं। आरोग्य रक्षा की दृष्टि से विशेष व्यायामों जैसा ही उनका महत्त्व है। उन्हें आध्यात्मिक साधनाओं के साथ सम्मिलित नहीं किया जा सकता । चित्र-विचित्र ढंग से शरीर के अवयवों को मोड़ने मरोड़ने से शरीरगत लाभ तो हो सकते हैं, पर मन की एकाग्रता पर तो उनके कारण उत्पन्न हुए तनाव से बाधा ही पड़ेगी।
साधना की सफलता में स्थान, क्षेत्र व वातावरण की असाधारण महत्त्व हैं विशिष्ट साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान में जाने की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि पुराने निवास स्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति बन नहीं पाती जैसी महत्त्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है। कुटुम्बियों के परिचित लोगों के साथ जुड़े हुए भले-बुरे सम्बन्धों की पकड़ बनी रहती है। कामों का दबाव बना रहता है। राग द्वेष उभरते रहते हैं। दिनचर्या बदलने पर कुटुम्बी तथा साथी विचित्रता अनुभव करते और उसमें विरोध खड़ा करते हैं।
साधना से कोई वास्ता नहीं माना जाना चाहिए, जो अपने पहाड़ जैसे परिग्रह में से राई रत्ती दान करते रहने का प्रदर्शन करते रहते हैं अथवा अपनी निरंकुश विलासिता की निष्ठुर पशु-चेष्टाओं को अनदेखा बनाने के लिए छोटे छोटे अनुष्ठानों में शारीरिक कष्ट सहने का प्रदर्शन करते रहते हैं। वस्तुतः वे आत्म-प्रवंचक और ठग है। तपस्वी होने का तो प्रश्न ही नहीं।
साधना धर्मानुष्ठानों के इतिहास में अभूत पूर्व ही समझा जाना चाहिए। एक लाख नैष्ठिक साधकों द्वारा पूरे एक वर्ष तक नियमित एवं अनुशासित रूप से जो सामूहिक गायत्री जप हुआ। इस वर्ष उसका उत्तरार्ध सम्पन्न किया जा रहा हैं। छोटे-छोटे हजारों गायत्री यज्ञों के साथ बड़े-बड़े युग निर्माण सम्मेलनों को जोड़कर नवयुग का सन्देह सुनाने तथा उपयुक्त वातावरण बनाने की दृष्टि से इसे अपने ढंग की अनोखी प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए।
साधना की दिशा में प्रोत्साहित करने से लेकर सफल बनाने तक में व्यक्तिगत सहयोग करने में साधकों की सहायता की उसी प्रकार ब्रह्म वर्चस की उच्चस्तरीय साधना में अपना सहयोग सम्मिलित रह सके। इसलिए सोचा यह गया है कि इस अभिनव
साधना के पूर्व भाग में श्वास लेते समय सो ध्वनि के साथ जीवन सत्ता पर उस परब्रह्म परमात्मा का शासन-आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है। उत्तरार्ध में हम को-अहंता को-विसर्जित करने का भाव है। साँस निकली साथ-साथ अहम् भाव का भी निष्कासन हुआ। अहंता ही लोभ और मोह की जननी है। शरीराध्यास में जीव उसी की प्रबलता के कारण डूबता है।
साधनाओं का प्रयोजन पूरा करता है। प्रातःकाल नींद खुलते ही हर रोज यह भावना जागृत करनी चाहिए कि आज हमारा नवीनतम जन्म हुआ है और वह सोते समय तक एक रोज के लिए ही है। इसे हर दृष्टि से श्रेष्ठतम और आदर्श रीति-नीति अपनाते हुए जिया जाय। इसके लिए शैया त्याग से लेकर रात को सोते समय तक का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दिनचर्या ऐसी हो जिसमें आलस्य के लिए तनिक भी गुँजाइश न हो।
साधना शब्द ब्रह्म की नाद साधना कहलाती है।
साधना ग्रंथ का उद्धरण प्रस्तुत किया है। कहा गया है कि-
साधना में हृदय आकाश से ॐ कार ध्वनि का उद्भव करना होता है। जिव्हा से मुख ॐ कार उच्चारण का आरम्भिक अभ्यास किया जाता है। पीछे उस उद्भव में परा और पश्यन्ति वाणियाँ ही प्रयुक्त होती है और उस ध्वनि से हृदयाकाश को गुंजित किया जाता है।
साधना के लिए उपयुक्त वातावरण की ही व्यवस्था हुई है। इसे दैवी अनुग्रह एवं सहयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। आत्मनिर्माण के लिए परम सात्विक धन भी भाव भरी श्रद्धा के लिए अपने को सार्थक बनाने के लिए मचलता चला आ रहा है भले ही उसकी मात्रा कितनी ही स्वल्प क्यों न हो। साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्त्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है-
साधना उपचारों में तपश्चर्या को श्रेष्ठतम आधार कहा जा सकता है। उनमें बाल, वृद्ध रोगी, नर-नारी शिक्षित अशिक्षित सभी के लिए छोटे-बड़े प्रयोग मौजूद हैं सरल से सरल और कठिन से कठिन ऐसे विधानों का उल्लेख हैं। जिन्हें हर स्थिति का व्यक्ति अपनी-अपनी स्थिति एवं पात्रता के अनुरूप अपना सकता है।
साधनाओं के लिए आसनों का भी प्रयोग हो सकता है। पर ऐसे आसनों की संख्या अधिक नहीं है। उन्हें 2-4 की सीमा के अंतर्गत ही रखा गया है।-
साधना गायत्री महाविद्या के अंतर्गत एक आत्मशक्ति संवर्धक प्रयोग है। अस्तु उसे गायत्री विज्ञान के अंतर्गत एक विशेष विधान के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
साधना की । कभी क्षण भर को भी गाँधी जी इस आस्था से विचलित नहीं हुए कि एक सार्वभौम सत्ता है और वही चमत्कार को जन्म दिया। जिसके सामने शास्त्रों अणुबमों की शक्ति भी तुच्छ है।
साधना का नाम सावित्री विद्या है। सावित्री ही कुण्डलिनी है। गायत्री मन्त्र में-गायत्री साधना में-प्रणव तत्त्व का अविच्छिन्न समावेश है। कहा गया है-
साधना को ‘सुरति’ शब्दयोग कहा है। कबीर, रैदास, नानक, पलटू और राधास्वामी एवं नाथ सम्प्रदाय में इसका विशेष रूप से प्रचलन है। सुरति का एक अर्थ प्रकृति पुरुष के बीच अनवरत क्रम से चलने वाली दिव्य मिलन-बिछुड़न क्रिया की ओर संकेत करता है। दूसरा अर्थ स्रोत शब्द के अपभ्रंश रूप में भी ‘सुरत’ को ले सकते हैं। शास्त्रों में अध्यात्म स्रोत अनवरत शब्द प्रवाह को माना गया है।
साधना के लिए शान्तिकुञ्ज का ब्रह्मवर्चस् इसी दृष्टि से बनाया गया है। यह वही स्थान है जहाँ सातों ऋषि तप करते थे और गंगा ने पृथ्वी पर अवतरित होते समय उनकी तपश्चर्या में विघ्न डालने की अपेक्षा अपने को ही सात धाराओं में विभक्त कर लेना उचित समझा था। हरिद्वार को हिमालय का प्रवेश द्वारा कहा गया है। इसे शिव लोक की संज्ञा भी दी गई थी दक्ष प्रजापति के घर में सती यहीं जन्मीं और यज्ञ कुण्ड में दग्ध हुई थीं। पार्वती ने तप करके शिव वरण जैसे कठिन संकल्प को यहीं पूरा किया था।
साधना शास्त्र में विभिन्न प्रकार से बताई गई है।
साधना में बैठ गये। उनके शरीर पर दीमक ने धर बना लिया। ब्रह्म जी ने आकर दीमक छुड़ाई और पाप मुक्ति का वरदान दिया। इसी घटना के आधार पर उनका नाम बाल्मीकि पड़ा बाल्मीकि संस्कृत में दीमक को कहते हैं। ऐसी ही कथा सुकन्या की है।
साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है। कुटुम्बियों के परिचित लोगों के साथ जुड़े हुए भले-बुरे सम्बन्धों की पकड़ बनी रहती है। कामों का दबाव बना रहता है। राग द्वेष उभरते रहते हैं। दिनचर्या बदलने पर कुटुम्बी तथा साथी विचित्रता अनुभव करते और उसमें विरोध खड़ा करते हैं।
साधनाओं के अभ्यास में भी हो जाती है। किसी साधना प्रक्रिया मात्र को चमत्कारी मान बैठने से लाभ तो सम्भव नहीं, समय शक्ति और बुद्धि विवेक का अपव्यय तथा क्षरण अवश्य होता है।
साधना करने वालों को आत्म-शोधन और परमार्थ संचय के उभय पक्षीय उद्देश्य से कुछ समय के लिए तीर्थयात्रा पर निकलने का कार्य-क्रम बनाना चाहिए। प्रायश्चित की यह सर्वोत्तम प्रक्रिया है। इस साँस्कृतिक महान् परम्परा का वास्तविक स्वरूप प्रस्तुत करने और उसे अभिनव प्रचलन का रूप देने में यह यात्राएँ धर्म को एक अभिनव मार्ग दर्शन कर सकती है।
साधना का एक नाम हंसयोग भी रखा गया हैं।
साधना पंचाग्नि विद्या कही जाती है। यही गायत्री के पाँच मुख है। गायत्री का प्राण साधना का नाम सावित्री विद्या है। सावित्री ही कुण्डलिनी है। गायत्री मन्त्र में-गायत्री साधना में-प्रणव तत्त्व का अविच्छिन्न समावेश है।
साधना में जिव्हा का संयम होने पर कामेन्द्रिय का संयम सहज ही सध जाने की बात नितान्त तथ्यपूर्ण है। इसमें दोनों के बीच की घनिष्ठता प्रत्यक्ष है। काम क्रीडा में भी यह दोनों ही गह्वर अपने अपने ढंग से उत्तेजित रहते और अपना अपना पक्ष पूरा करते हैं।
साधना हिमालय में ही सम्पन्न हुई थी।
साधना से उपलब्ध होने वाला दूसरा दिव्य अनुदान उल्लास माना गया है। यह उभरता उल्लास इस प्रकार की अवांछनीय मन स्थिति बनने की गुँजाइश नहीं छोड़ता। भगवान निरन्तर आनन्द के साथ-साथ उल्लास भी प्रदान करते हैं और उच्चस्तरीय प्रयत्नों एवं उमंग उत्पन्न करते हैं। उल्लास जब अपनी प्रौढ़ावस्था में होता है तो वह इतना प्रखर होता है कि प्रस्तुत कठिनाइयों, अभावों, अवरोधों की चिन्ता न करते हुए ईश्वरीय सन्देश के अनुरूप अपनी रीति नीति निर्धारण करने के लिए मचल उठता है। किसी के रोके नहीं रुकता।
साधना के लिए हठयोगी जीभ को लम्बी करके ‘काकं चंचु’ तक पहुँचाने के लिए जिव्हा पर कालीमिर्च, शहद, धृत का लेपन करके उसे थन की तरह दुहते, खीचते हैं और लम्बी करने का प्रयत्न करते हैं। जीभ के नीचे वाली पतली त्वचा को काट कर भी अधिक पीछे तक मुड़ सकने योग्य उसे बनाया जाता है। यह दोनों ही क्रियाएँ सर्व साधारण के उपयुक्त नहीं है। इनमें तनिक भी भूल होने से जिव्हा तन्त्र ही नष्ट हो सकता है अथवा दूसरी विपत्तियाँ आ सकती है। अस्तु यदि सर्व जमीन एवं जोखिम रहित
उपासनाएँ अभीष्ट हों तो शारीरिक अवयवों पर अनावश्यक दबाव न डालकर सारी प्रक्रिया को ध्यान परक-भावना मूलक ही रखना होगा।
साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्त्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है-
साधना प्रशिक्षण सम्भवतः 1 जुलाई से चलाने की बात सोची गई थी पर इमारत बनने में विलम्ब होने के कारण सम्भवतः वह तिथि कुछ और आगे टलेगी एक कमरे में एक साधक एकान्त चिन्तन मौन आहार तप प्रत्याहार धारणा ध्यान निदिध्यासन, सहित जप हवन वस्तु, मुद्रा, प्राणायाम जल के नाम पर मात्र गंगाजल का उपयोग त्राटक आदि की साधनाएँ साधक की व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए पृथक् पृथक् बताई जायेंगी। हर साधक का एक जैसा क्रम न रहने से उन्हें सामूहिक कराया न जाएगा वरन् हर साधक की साधना उसी की स्थिति के अनुरूप होगी और प्रतिक्रिया को गम्भीरतापूर्वक देखते हुए आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जाते रहेंगे यह सब नये आरण्यक आश्रम में ही सम्भव है। शान्ति कुँज में चल रहें ब्रह्म वर्चस सत्र तो उसकी पूर्वभूमा मात्र है। आरण्यक बन तो रहा है पर आर्थिक कारणों से निर्माण की गति धीमी है। जब भी उसमें निवास की स्थिति बन जाएगी तभी उपरोक्त साधना क्रम आरम्भ कर दिया जाएगा तब तक साधकों के नाम नोट किये जाते रहेंगे और आरम्भ होते ही उन्हें बुलाने में प्राथमिकता रखने के आश्वासन भेजे जाते रहेंगे।
साधना का मूल उद्देश्य इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के साथ प्रचण्ड संघर्ष खड़ा कर देना है। जिस महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ने सम्मिलित भूमिका निबाही थी वह आत्म परिष्कार में योग साधना के साथ पूरी तरह संबंधित है। कौरव दल इन्हीं कुसंस्कारों का नाम है जो निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे हैं और वातावरण में घुसी अवांछनीयता के कारण भड़कते हैं। कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापिस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा।
साधना हैं इसके लिए उपयुक्त स्थान एवं वातावरण की आवश्यकता थी। इसका ध्यान प्रारम्भ से ही रखा गया हैं यह आश्रम गंगा की धारा से 200 गज से भी कम दूरी पर है। सात ऋषियों की तपोभूमि के
तप में यह पौराणिक साक्षी के साथ प्रख्यात हैं गंगा के मध्य सात द्वीप है जिन्हें छोटे-छोटे उपवन कहा जा सकता है उनमें ऐसे सघन वृक्ष उगे हुए हैं प्रयत्न यह रहेगा कि साधक ब्रह्मवर्चस आश्रम में निवास तो करे पर साधना के लिए निर्जन द्वीपों में चले जाया करें जिनमें कभी सप्त ऋषि तप करते थे और वे स्थान अभी जन प्रवेश से वंचित रहने के कारण अपनी मौलिक विशेषता अभी भी बनाये हुए हैं गंगा तट के शहरों का गन्दा, पानी गंगा में ही बहायी जाता है पर ब्रह्मवर्चस तक वैसा कहीं नहीं हुआ है। इससे पूर्व ऋषिकेश, देवप्रयाग, उत्तर काशी आदि जो कस्बे है उनका गन्दा पानी भी गंगा में नहीं गिरा है। इस विशेषता के कारण यहाँ की जल धारा अभी भी अपनी मौलिक विशेषता पूर्ववत् बनाये हुए है।
साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग-पग पर कठिनाई उत्पन्न करते हैं। दीवार बीच में हो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।
साधना के लिए बैठने में शरीर को सुविधा की स्थिति में रखे रहने वाली मुद्रा होनी चाहिए। इसके लिए सुखासन सर्व-सुलभ है। साधारण रीति से पालथी मार बैठने का नाम- उसकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए -सुखासन उपयुक्त ही रखा गया है। इसे किसी भी साधना में किसी संकोच के प्रयुक्त किया जा सकता है। शास्त्रकार आसन का उद्देश्य और स्वरूप समझाते हुए कहते हैं।
साधना-अजपा गायत्री के विज्ञान एवं विधान के समन्वय को
हंसयोग कहते हैं। हंसयोग साधना का महत्त्व और प्रतिफल बताते हुए योगविद्या के आचार्यों ने कहा है-
साधना का यही है भावनात्मक एवं व्यावहारिक स्वरूप
साधना का ही अपना महत्त्व है फिर चारों ओर गंगा घिरी होने के बीचों बीच जन शून्य द्वीपों में बैठ कर साधना करने का तो प्रतिफल और भी अधिक विलक्षण होगा। नित्य गंगा स्नान-मात्र गंगा जल पान टहलना-बैठना गंगा माता की ही गोद में-इन विशेषताओं के कारण ब्रह्म वर्चस साधना के लिए उपयुक्त वातावरण की ही व्यवस्था हुई है। इसे दैवी अनुग्रह एवं सहयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। आत्मनिर्माण के लिए परम सात्विक धन भी भाव भरी श्रद्धा के लिए अपने को सार्थक बनाने के लिए मचलता चला आ रहा है भले ही उसकी मात्रा कितनी ही स्वल्प क्यों न हो। साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्त्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है-
साधना कहा जा सकता है। सरलता और प्रभावोत्पादक क्षमता की दृष्टि से उसे अद्वितीय माना जा सकता है ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ का जीवन सूत्र जो जितनी गहराई के साथ हृदयंगम और कार्यान्वित कर सकेगा वह उतनी ही तीव्रतापूर्वक आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा, यह निश्चित है।
साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ हो जाता है। पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है। इस साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमा आदि सिद्धियों का अधिकारी बनता है।
साधना की महिमा बताते हुए कहा गया है-
साधना मार्ग पर जिस लक्ष्य बेध के लिए चला जाता है उसमें ॐ कार का धनुष की तरह और आत्मा का बाण की तरह प्रयोग किया जाता है। आत्मा का अग्रगम्य प्रणव धनुष की सहायता से ही होता है। कहा गया है-
साधना प्रक्रिया मात्र को चमत्कारी मान बैठने से लाभ तो सम्भव नहीं, समय शक्ति और बुद्धि विवेक का अपव्यय तथा क्षरण अवश्य होता है।
साधनाओं का बहिरंग अभ्यास मात्र विशेष उपयोगी नहीं। अपनी सम्पदाओं और विभूतियों का विस्तार करके उन्हें लोक मंगल के लिए समर्पित करते हुए सृष्टि उद्यान को अधिक सुरम्य समुन्नत बनाना ही मानवीय जीवन की सार्थकता है। कठोरताओं को सहन करने का अभ्यास मात्र पर्याप्त नहीं। इस अभ्यास के आधार पर लोक जीवन में मनुष्य की सुख लिप्सा तथा उन लोगों का तो तप-साधना से कोई वास्ता नहीं माना जाना चाहिए, जो अपने पहाड़ जैसे परिग्रह में से राई रत्ती दान करते रहने का प्रदर्शन करते रहते हैं अथवा अपनी निरंकुश विलासिता की निष्ठुर पशु-चेष्टाओं को अनदेखा बनाने के लिए छोटे छोटे अनुष्ठानों में शारीरिक कष्ट सहने का प्रदर्शन करते रहते हैं। वस्तुतः वे आत्म-प्रवंचक और ठग है।
साधना।
साधनाएँ साधक की व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए पृथक् पृथक् बताई जायेंगी। हर साधक का एक जैसा क्रम न रहने से उन्हें सामूहिक कराया न जाएगा वरन् हर साधक की साधना उसी की स्थिति के अनुरूप होगी और प्रतिक्रिया को गम्भीरतापूर्वक देखते हुए आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जाते रहेंगे यह सब नये आरण्यक आश्रम में ही सम्भव है। शान्ति कुँज में चल रहें ब्रह्म वर्चस सत्र तो उसकी पूर्वभूमा मात्र है। आरण्यक बन तो रहा है पर आर्थिक कारणों से निर्माण की गति धीमी है। जब भी उसमें निवास की स्थिति बन जाएगी तभी उपरोक्त साधना क्रम आरम्भ कर दिया जाएगा तब तक साधकों के नाम नोट किये जाते रहेंगे और आरम्भ होते ही उन्हें बुलाने में प्राथमिकता रखने के आश्वासन भेजे जाते रहेंगे।
साधना के कुछ चरण एकाग्रता, ध्यान के सहारे प्रयोग में आने लगे है और उनसे तनाव, रक्त चाप, अनिद्रा जैसे मानसिक रोगों पर अनुकूल प्रभाव देखा जाता है। आवश्यकता इस मानसोपचार को आध्यात्मिक साधनाओं के सहारे इस सीमा तक विकसित करने की है कि उन्मादों एवं सनकों को ही नहीं विकृत चिन्तन प्रवाह एवं अभ्यस्त कुसंस्कारों का परिशोधन भी सम्भव हो सके। चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बना सकने में समर्थ साधना पद्धति ही उपचारात्मक मन शास्त्र कह सकते हैं। विश्व के मूर्धन्य मनोविज्ञानवेत्ता मात्र विवेचनाएँ और व्याख्याएँ कर सके है उसके एक कदम आगे बढ़ कर हमें विकृतियों के निराकरण का कारगर उपाय भी खोजना है। निस्संदेह यह कार्य अब कभी भी सम्पन्न होगा तब उसमें योग साधना के ही आधारों को अपनाना पड़ेगा।
साधना में महत्त्व है। इस बैठक का भी शरीर पर और मन पर प्रभाव पड़ता है। और उसके सहारे साधना की सफलता में सरलता उत्पन्न होती है। यहाँ इतना और स्मरण रखने योग्य है कि उत्तानपाद शीर्षासन, मत्स्यासन , मयुरासन आदि चौरासी या न्यूनाधिक संख्या में गिनाये जाने वाले आसन एक प्रकार के शारीरिक व्यायाम हैं। आरोग्य रक्षा की दृष्टि से विशेष व्यायामों जैसा ही उनका महत्त्व है।
साधना में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है। यदि विश्वास न हो तो उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उतना ही फल मिलेगा जितना कि उतने समय तक किये गये हलके फुलके शारीरिक परिश्रम का। उसी साधना को करते हुए एक व्यक्ति चमत्कारी फल प्राप्त करता है। पर दूसरे को असफल रहना पड़ता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा में न्यूनाधिकता होना ही प्रधान कारण होता है।
साधना में प्रगति पथ पर दोनों ही चरण उठने चाहिए। यहाँ नाद श्रवण के साथ साथ नाद उत्थान को भी साधना क्रम में सम्मिलित रखना चाहिए। कुण्डलिनी जागरण साधना में नाद श्रवण में ॐ कार की ध्वनि पकड़ने तक पहुँचना पड़ता है। अन्य शब्द तो मार्ग के मील पत्थर मात्र है। अनाहत ध्वनि को ‘सुरति’ तुरीयावस्था, समाधि आदि पूर्णता बोधक आस्थाओं के समतुल्य माना गया है और अनाहत ध्वनि ‘ऊँ’ कार की श्रवण अनुभूति ही है।
साधना में किसी संकोच के प्रयुक्त किया जा सकता है। शास्त्रकार आसन का उद्देश्य और स्वरूप समझाते हुए कहते हैं। -
साधना ही कहा जाएगा दिन भर जिस परिवार की सेवा की गई वह ईश्वर का उद्यान था। उसे सुविकसित बनाने के लिए अपना उत्तरदायित्व निबाहा गया, अब मालिक को सौंपकर छुट्टी पर जाया जा रहा है। धन वैभव जो कुछ भी अपने सुपुर्द था वह ईश्वर की सम्पत्ति थी उसे उसी के हवाले करके स्वयं खाली हाथों विदाई ली जा रही है। शरीर और मन यह औजार-वाहन भी ईश्वर के कारखाने से किराये पर मिले थे, उन्हें भी यथा स्थान जमा करके एकाकी अपने घर लौटा जा रहा है। यह भावनाएँ सोते समय की हैं।
साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। ठण्डे गरम तार मिलने से विद्युत धारा प्रवाहित होती है। दोनों तारों में रहती तो वह पहले से ही है पर परिचय तभी मिलता है जब दोनों का मिलन हो। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है।
साधनाओं के सहारे इस सीमा तक विकसित करने की है कि उन्मादों एवं सनकों को ही नहीं विकृत चिन्तन प्रवाह एवं अभ्यस्त कुसंस्कारों का परिशोधन भी सम्भव हो सके। चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बना सकने में समर्थ साधना पद्धति ही उपचारात्मक मन शास्त्र कह सकते हैं। विश्व के मूर्धन्य मनोविज्ञानवेत्ता मात्र विवेचनाएँ और व्याख्याएँ कर सके है उसके एक कदम आगे बढ़ कर हमें विकृतियों के निराकरण का कारगर उपाय भी खोजना है। निस्संदेह यह कार्य अब कभी भी सम्पन्न होगा तब उसमें योग साधना के ही आधारों को अपनाना पड़ेगा। मान्यताओं के गहन मर्मस्थल का स्पर्श इसी आधार पर सम्भव हो सकता है।
साधना के बहिरंग उपचारों, व्यायामों का लक्ष्य है आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया को सहज रीति से अपना सकने का अभ्यस्त बन जाना। नीति, न्याय से उपार्जित धन की मात्रा सीमित ही रहती है। आजीविका के निर्वाह के साथ ही उसी में से सत्प्रयोजनों हेतु भी एक अंश निकालना होता है। सीमित आजीविका और ऊपर से परमार्थ प्रयोजनों का अतिरिक्त भार ये दो कारण आदर्शवादी को प्रायः औरों की तुलना में आर्थिक दृष्टि से तंगी में ही रखते हैं। विलासिता का व्यसन तो अत्यधिक धन साध्य है।
साधना यदि सही रीति से सही उद्देश्य के लिए की जा सके तो उससे साधक को अन्त चेतना के विकसित होने का असाधारण लाभ मिलता है साथ ही जिस प्राणी या पदार्थ पर इस दिव्य दृष्टि का प्रभाव डाला जाय उसे भी विकासोन्मुख करके लाभान्वित किया जा सकता है।
साधना अजपा गायत्री भी कहीं जाती है।
साधना करती हो उन्हें यहाँ आकर उसे सम्पन्न करने का प्रयत्न करना चाहिए। यों भूमि तो सर्वत्र ही भगवान की है। और सभी जगह भगवान की उपस्थिति है। फिर भी यदि आसन का-वातावरण का महत्त्व सोचा जाय तो अमुक समय तक यहाँ रहने का और साधना करने का प्रयत्न किया जा सकता है। इस क्षेत्र में अपने ही जैसे साथी संगी तपस्वी बने रहने से एक दूसरों को प्रेरणा भी मिलती है।
साधनाओं में मिलता है। ड़ड़ड़ड़ और निगम दक्षिण ओर वाम मार्ग दोनों ही अपने-अपने ढंग से अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। ब्रह्मास्त्र, ब्रह्म दण्ड, ब्रह्मास्त्र एवं ब्रह्म तेज का उल्लेख उपयोग प्रायः ऐसे ही प्रयोजनों के लिए होता रहा हैं। गायत्री साधना यों प्रकृतिः सौम्य सतोगुणी हैं, पर आवश्यकतानुसार उसका उपयोग अवांछनीयताओं के उन्मूलन में प्रतिरोध शक्ति की तरह सुरक्षात्मक प्रयोजनों के लिए भी किया जा सकता है।
साधनाएँ सर्वसुलभ नहीं है। उन्हें विशेष मार्ग दर्शन से विशेष व्यक्ति ही कर सकते हैं। उन अभ्यासों में समय भी बहुत लगता है और भूल होने पर संकट उत्पन्न होने का खतरा भी रहता है। अस्तु सर्वजनीन सरलीकरण का ध्यान रखते हुए ‘शक्तिचालनी मुद्रा’ को उपयुक्त समझा गया है।
साधना का आभास कराया जाय। अन्यथा वे पीछे कभी हरिद्वार आते तो रहेंगे, पर वैसा स्वच्छ मार्ग दर्शन शायद कठिन पड़े। इधर हमारी भी इच्छा है कि जिस प्रकार गायत्री साधना की दिशा में प्रोत्साहित करने से लेकर सफल बनाने तक में व्यक्तिगत सहयोग करने में साधकों की सहायता की उसी प्रकार ब्रह्म वर्चस की उच्चस्तरीय साधना में अपना सहयोग सम्मिलित रह सके। इसलिए सोचा यह गया है कि इस अभिनव
साधना में सफलता मिलने पर समूची जीवन सत्ता वशवर्ती हो जाती है। सृष्टि का उद्गम केन्द्र शब्द ब्रह्म ॐ कार यदि सिद्ध किया जा सके तो समूचे सृष्टि प्रवाह के साथ तारतम्य मिलना सम्भव हो जाता है। तब इस विश्व वैभव का अभीष्ट सत्प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकने में कठिनाई नहीं रहती। विशेषतया आत्म विश्वास पर तो पूरी तरह अधिकार हो ही जाता है। विश्व नियन्ता परमात्मा के लिए विश्व व्यवस्था की बात जितनी महत्त्वपूर्ण है, आत्म नियन्ता-आत्मा के लिए उतनी ही गरिमा मय आत्म सत्ता के क्षेत्र में सुव्यवस्था बना सकना है।
साधना को आवश्यक समझा। वर्णन है कि वे अविचल साधना को आवश्यक समझ। वर्णन है कि वे अविचल साधना में बैठ गये। उनके शरीर पर दीमक ने धर बना लिया। ब्रह्म जी ने आकर दीमक छुड़ाई और पाप मुक्ति का वरदान दिया।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के अवसर पर सम्पन्न की गई। ठीक ऐसा ही एक सामूहिक अनुष्ठान हम लोगों ने बंगाल देश की क्रान्ति के अवसर पर भी किया था। उन दिनों भी ड़ड़ड़ड़ सूक्ष्मदर्शियों ने उस सफलता को आध्यात्मिक शक्तियों के चमत्कार रूप में देखा था। आज दृष्टिगोचर हो रहे परिवर्तनों और भावी सम्भावनाओं के पीछे दैवी शक्तियों का अनुग्रह देखा जा सके तो उसे अमृत वर्षा के लिए पृष्ठभूमि बनाने वाले आधारों में एक अपने स्वर्ण जयन्ती वर्ष के अभूतपूर्व महापुरश्चरण को भी एक गिना जा सकता।
साधना के साथ पूरी तरह संबंधित है। कौरव दल इन्हीं कुसंस्कारों का नाम है जो निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे हैं और वातावरण में घुसी अवांछनीयता के कारण भड़कते हैं। कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापिस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा। आत्मिक गरिमा पर असुरता आच्छादित हो रही है।
साधना का प्रयोजन पूरा नहीं होता। आत्मिक प्रगति के लिए मात्र चित्त की नहीं-गहराई में उतर कर चित्त वृत्तियों के निरोध की बात सोची जानी चाहिए। चित्त निरोध और चित्त वृत्तियों के बची का अन्तर प्रत्येक विचारशील के मन मस्तिष्क में स्पष्ट रहना चाहिए।
साधना क्रम आरम्भ कर दिया जाएगा तब तक साधकों के नाम नोट किये जाते रहेंगे और आरम्भ होते ही उन्हें बुलाने में प्राथमिकता रखने के आश्वासन भेजे जाते रहेंगे। बन रहे आरण्यक का निर्माण कार्य जिस दिन में साधकों के रहने योग्य बन जाएगा उसी दिन से निर्धारित प्रशिक्षण चलने लगेगा आशा की जानी चाहिए कि उसमें भी अनावश्यक विलम्ब नहीं लगेगा।
साधना की व्यावहारिक जीवन को प्रभावित करने वाली उच्चस्तरीय साधना कहा जा सकता है। सरलता और प्रभावोत्पादक क्षमता की दृष्टि से उसे अद्वितीय माना जा सकता है ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ का जीवन सूत्र जो जितनी गहराई के साथ हृदयंगम और कार्यान्वित कर सकेगा वह उतनी ही तीव्रतापूर्वक आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा, यह निश्चित है।
साधना यही है। इसका देवता सविता है। सावित्री और सविता का युग्म है। इस उपासना में सूर्य को प्रतीक और तेजस्वी परब्रह्म को ड़ड़ड़ड़ सर्वोपरि शक्ति है।
साधनात्मक प्रयोग और भी एक बड़ा प्रयास सामूहिक रूप से करने की दृष्टि से ही गत वर्ष साधना धर्मानुष्ठानों के इतिहास में अभूत पूर्व ही समझा जाना चाहिए। एक लाख नैष्ठिक साधकों द्वारा पूरे एक वर्ष तक नियमित एवं अनुशासित रूप से जो सामूहिक गायत्री जप हुआ। इस वर्ष उसका उत्तरार्ध सम्पन्न किया जा रहा हैं। छोटे-छोटे हजारों गायत्री यज्ञों के साथ बड़े-बड़े युग निर्माण सम्मेलनों को जोड़कर नवयुग का सन्देह सुनाने तथा उपयुक्त वातावरण बनाने की दृष्टि से इसे अपने ढंग की अनोखी प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए।
साधना की समस्त गतिविधियाँ प्रायः इसी ड़ड़ड़ड़ को परिष्कृत एवं सरल बनाने के लिए है। इड़ा ड़ड़ड़ड़ के प्राण प्रवाह इसी क्षेत्र को दुहराने के लिए आयोजित किये जाते हैं। साबुन पानी में कपड़े धोये जाते हैं। झाडू झाड़न से कमरे की सफाई होती है। इड़ा पिंगला के माध्यम से किये जाने वाले नाड़ी शोधन प्राणायाम मेरुदण्ड का संशोधन करने के लिए हैं इन दोनों ऋणात्मक और धनात्मक शक्तियों का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य से भी होता है।
साधना। नित्य कर्म को अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। आये दिन अन्तःचेतना पूरे वातावरण के प्रभाव से चढ़ते रहने वाले ड़ड़ड़ड़ अंकुश लगता है।
साधना के लिए जप, पाठ, मौन जैसे कितने ही अभ्यास है। जननेन्द्रिय में सम्बन्धित काम शक्ति को ब्रह्मचर्य से संयमित किया जाता है और कुण्डलिनी जागरण के रूप में उभारा जाता है। इनका उल्लेख यहाँ अभीष्ट नहीं। त्राटक द्वारा नेत्र गोलकों से प्रवाहित होने वाली विद्युत शक्ति को किस प्रकार केन्द्रीभूत एवं तीक्ष्ण बनाया जाता है। यहाँ तो इसी प्रसंग पर चर्चा की जानी है।
साधना के साथ जुड़े हुए तत्त्वज्ञान में सन्निहित है। दोनों एक-दूसरे से गुँथ जाय-परस्पर विलीनीकरण हो जाय। भक्त अपने आपको अन्तःकरण आकांक्षा एवं अस्तित्व को पूरी तरह समर्पित कर दे और उसी के दिव्य संकेतों पर अपनी दिशा धाराओं का निर्धारण करे। इस स्थिति की प्रतिक्रिया द्वैत की समाप्ति और अद्वैत की प्राप्ति के रूप में होती है। जीव ने ब्रह्म को समर्पण किया है ब्रह्मा की सत्ता स्वभावतः जीवधारी में अवतरित हुई दृष्टिगोचर होने लगेगी।
साधना में चित्त वृत्तियों का निरोध और प्राणशक्ति की प्रखरता यह दो ही तत्त्व प्रधान है। इन दोनों ही प्रयोजनों के लिए ॐ कार की शब्द साधना से अभीष्ट उद्देश्य सरलतापूर्वक सिद्ध होता है-
साधना जिस श्रद्धा, अभिरुचि एवं विश्वासपूर्वक की जानी चाहिए, हो नहीं पाती। स्पष्ट है कि जिसमें गहरी श्रद्धा का मनोबल युक्त संकल्प का समावेश न होगा वह आत्मोत्कर्ष के लिए किया जाने वाला साधन मात्र छुट-पुट कर्मकाण्डों के सहारे सम्पन्न न हो सकेगा। अस्तु आसन की वातावरण की उपयोगिता समझी जानी चाहिए और उसके लिए अच्छे स्थान की अच्छे वातावरण की -ही नहीं अच्छे मार्गदर्शन एवं समुचित संरक्षण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
साधना को आवश्यक समझ। वर्णन है कि वे अविचल साधना में बैठ गये। उनके शरीर पर दीमक ने धर बना लिया। ब्रह्म जी ने आकर दीमक छुड़ाई और पाप मुक्ति का वरदान दिया। इसी घटना के आधार पर उनका नाम बाल्मीकि पड़ा बाल्मीकि संस्कृत में दीमक को कहते हैं।
साधना को त्राटक कहते हैं। इसका योगाभ्यास में अति महत्त्वपूर्ण स्थान है।
साधना करने का तो प्रतिफल और भी अधिक विलक्षण होगा। नित्य गंगा स्नान-मात्र गंगा जल पान टहलना-बैठना गंगा माता की ही गोद में-इन विशेषताओं के कारण ब्रह्म वर्चस साधना के लिए उपयुक्त वातावरण की ही व्यवस्था हुई है। इसे दैवी अनुग्रह एवं सहयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। आत्मनिर्माण के लिए परम सात्विक धन भी भाव भरी श्रद्धा के लिए अपने को सार्थक बनाने के लिए मचलता चला आ रहा है भले ही उसकी मात्रा कितनी ही स्वल्प क्यों न हो। साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्त्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-January
साधना में निष्णात महाभिक्षु फुना कोशी से दीक्षा ली और उनका अन्तेवासी बन योगाभ्यास करता रहा। पर्वतों की निर्जन गुफाएँ, बर्फ से ढकी कन्दराएँ उसका साधना स्थल थीं और वनस्पतियाँ उसका आहार। कई बाद वह जेन साधना में सिद्ध पुरुष बन कर लौटा।
साधना विज्ञान का आश्रय लेकर अधिक समर्थ एवं सुविकसित बना जा सकता है।
साधना में भाग लिया है, वे अनिवार्यतः और शेष साधन प्रिय लोग सामान्यतः इस प्रातः काल के जप, हवन, कार्यक्रम में सम्मिलित रहें। परिवार के प्रत्येक सदस्य के यहाँ ज्ञान-घट स्थापित हो। इसके लिए इस दिन को विशेष दिन माना जाय। एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य देने की शर्त का पालन सभी परिजन अनिवार्य रूप से पालक करें, नये सदस्य बढ़ाये। सदस्यता के संकल्प प्रातः काल यज्ञ की पूर्णाहुति के समय ही कराये जाएँ।
साधना क्षेत्र में दूरदर्शी संकल्प लेकर उतरने वाला इतना कुछ प्राप्त करता है जितना अन्य किसी क्षेत्र में किये जाने वाले पुरुषार्थों से सम्भव नहीं हो सकता।
साधना वर्ष की उत्साहवर्धक पूर्णाहुति के स्तर का माना जा सके।
साधना में उच्चस्तरीय सिद्धियाँ पाई जाती है। साथ ही उसके कई अभ्यासी शारीरिक दृष्टि से भी प्रख्यात पहलवानों को भी अवाक् कर देने वाले कार्य कर दिखाते हैं।
साधना की सफलता किस प्रकार होती होगी, इसका प्रत्यक्ष अनुभव मैंने इस सत्र में सम्मिलित होकर किया।
साधनाएँ वे है जिनकी विज्ञान और विधान का परिचय करने के लिए तन्त्र विज्ञान की रचना की है। इसमें विघातक तत्त्व उभरते हैं। कहना न होगा हक संसाधनों की अभिवर्धन की तरह ही अवांछनीयताओं का उन्मूलन भी आवश्यक है। वाममार्गी तन्त्र साधनाओं द्वारा जो उन्मूलन परम कार्य होते थे उनके मूल में प्रकृति का वह खोया पदार्थ की संज्ञा दी गई है। कार्य कुछ भी क्यों न हो-कदम किसी भी दिशा में क्यों न बढ़े, पर उसमें औचित्य और उपयोगिता का समुचित ध्यान रखा ही जाना चाहिए।
साधना के साथ-साथ कई प्रकार के व्रत नियमों का पालन करना पड़ता है। साधक को आहार विहार का संयम बरतना पड़ता है। ब्रह्मचर्य से रहना पड़ता है तथा ऐसी मर्यादाओं का पालन करना होता है जो साधक को चरित्रवान, सज्जन, सद्गुणी बनाने के लिए प्रेरणा प्रदान करती है। क्रोध, द्वेष आदि दुर्गुणों का निषेध इसीलिए किया जाता है कि मन्त्र शक्ति उत्पन्न करने वाले शरीर तथा मन को कषाय-कल्मषों से रहित होना चाहिए। मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता।
साधनाएँ की जाती हैं।
साधना विज्ञान की भी अपनी उपलब्धियाँ हैं और उनके सहारे दिव्य क्षमताओं के अभिवर्धन की दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।
साधना मार्ग अपनाना पड़ता है।
साधना द्वारा उत्पन्न हुई आत्म शक्ति के सम्बन्ध में भी हैं।
साधना की पूर्णाहुति कर लेनी चाहिए। वसन्त पर्व अपने परिवार का सबसे बड़ा त्यौहार है। अपनी समस्त महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ उसी शुभ मुहूर्त से आरम्भ हुई हैं। इस मिशन का जन्म दिन इसी दिन पड़ता है। उसके सूत्र संचालक का जन्म दिन भी वही है।
साधना का पर्याय बताना अनुचित है। आध्यात्मिक साधना का क्षेत्र इतना संकीर्ण नहीं है। मस्तिष्कीय व्यायाम का महत्त्व तो बताया जाना चाहिए, पर उसे ही रहस्यमयी शैली में योग व अध्यात्म-साधना का समानार्थक नहीं प्रचारित कर दिया जाना चाहिए। मस्तिष्क को साधने की कला का एक अत्यन्त छोटा-सा हिस्सा एकाग्रता है। निस्सन्देह उसका महत्त्व है।
साधना के रूप में मौजूद है।
साधना का एक मात्र उद्देश्य है। आरम्भिक कष्ट वस्तुतः उज्ज्वल सम्भावनाओं का द्वार है। वे तप की गरिमा से उत्पन्न कष्ट है, जिनकी अन्तिम परिणति श्रेयस्कर ही होने वाली है। तपाने से वस्तुएँ गरम होती है और उनमें संशोधन होता है, दृढ़ता आती है तथा स्तर बढ़ता है। व्यक्ति के साथ भी यही होता है।
साधना में प्रायः एक लाख नर-नारियाँ ने अतीव निष्ठापूर्वक भाग लिया। सूर्योदय के 42 मिनट पूर्व निष्ठा के साथ चलती रही है। साधना का विधान उसका उद्देश्य, स्वरूप एवं विवेचन समझाने के लिए गतवर्ष जनवरी के अंक में सब कुछ विस्तारपूर्वक समझा दिया गया था। दोनों नव-नवरात्रियों में इन सभी साधकों को 24 सहस्र गायत्री जप के विशेष अनुष्ठानों के लिए निर्देश था सो थोड़े-से अत्यन्त व्यस्त एवं रुग्ण व्यक्तियों को छोड़ कर सभी ने वह साधना भी सम्पन्न की। प्राप्त सूचनाओं से विदित होता रहा है कि इन एक लाख साधकों में से अधिकांश को चमत्कारी अनुभूतियाँ हुई और अनुभव किया कि वे स्वल्प श्रम में अधिक लाभ देने वाली महत्त्वपूर्ण साधना का सत्परिणाम प्राप्त करने में सफल रहें है।
साधना में प्रचलित है। साधक पालथी मार कर बैठता है। तीन फुट दूर छाती की ऊँचाई से किसी चौकी आदि पर दीपक रखता है। उसे हलकी दृष्टि से दस सेकेण्ड देखता है, फिर आँखें बन्द कर लेता है और मस्तिष्क के मध्य त्रिकुटी स्थान पर उसी दीपक की लौ के जलने की कल्पना करता है। आँखें खोलकर दीपक की लौ देखने और फिर आँख बन्द करके मस्तिष्क के मध्य में जलती लौ की कल्पना करने की प्रक्रिया चलती रहती है।
साधना का उद्देश्य है। जो हमारे लिए आवश्यक एवं उपयोगी है। वह सब कुछ हम अपने ही भीतर से अपने ही पुरुष से आत्म नियन्त्रण की प्रक्रिया अपना कर सहज ही प्राप्त कर सकते हैं। इसी तथ्य को प्रत्यक्ष करना योग साधना का उद्देश्य है।
साधना, तप तथा जागरण का अनूठा उदाहरण विश्व के सम्मुख उपस्थित किया और चले गए। गुरु गोविन्दसिंह के बच्चों ने अति छोटी आयु में ही धैर्य, दृढ़ता और श्रद्धा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करके मुगलों का सिर झुका दिया था। आयु का छोटा या बड़ा होना कोई महत्त्व नहीं रखता यदि हमारी जीवन पद्धति में उत्कृष्टता नहीं है। सौ वर्षों के जीवन की कामना श्रेष्ठ जीवन के लिए है, कीड़ों-मकोड़ों की तरह साधारण मूल्य-रहित जीवन के लिए नहीं।
साधना में होता है, अश्रद्धा, उपेक्षा और अन्य आमनस्क भाव से बेगार टालने की तरह किसी प्रकार अमुक अक्षरों को रटते रहा जाय तो उससे न तो जिव्हा की शक्ति का उपयोग हुआ माना जाएगा और न हृदय शक्ति का समावेश हुआ कहा जाएगा
साधना सत्रों एवं वानप्रस्थ सत्रों में आने की स्वीकृति मिलें वे अपने साथ महिला प्रशिक्षण के लिए ऐसी महिलाओं को लाने की भी चेष्टा करें जो शिक्षण के लिए तथा प्रतिभावान हो। स्मरण रहे अशिक्षित, वयोवृद्ध, झगड़ालू, रोगी तथा बाल-बच्चे लेकर आने वाली महिलाओं को इन सत्रों में प्रवेश न मिल सकेगा। उन्हें लाकर यहाँ की व्यवस्था में गड़बड़ी उत्पन्न नहीं करनी चाहिये
साधना की दिशा हैं।
साधनाओं के द्वारा सचेतन मस्तिष्क की चिन्तन-शक्ति एवं संकल्प शक्ति को शिथिल करते हुए वहाँ लगे तेजस् को अचेतन में नियोजित किया जाता है, तभी अनुपम दिव्यताएँ प्रकट होना शुरू होती हैं। इस दिशा में जो जितनी अधिक प्रगति करता है वह उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है। बौद्धिक चेतना नियन्त्रित रहे और वह अचेतन को दबाने की बजाय उसकी सहायता करे, यही योगसाधना की दिशा हैं।
साधना परक साधनों को ही सब कुछ मान लिया गया है। साध्य आत्मा है। आत्मा को निर्मल एवं प्रखर बनाया जाय। उसकी भावनात्मक, विचारात्मक एवं क्रियात्मक दिशा धाराओं को उत्कृष्टता के साथ नियोजित करके देवत्व स्तर पहुँचाया जाय, इसकी ओर उपेक्षा बरती जाती है। फलतः वह लक्ष्य प्राप्त नहीं होता जिसके लिए अध्यात्म साधनाएँ की जाती हैं।
साधना स्थल थीं और वनस्पतियाँ उसका आहार। कई बाद वह जेन साधना में सिद्ध पुरुष बन कर लौटा।
साधनात्मक प्रेरणा की प्रमुखता रखी गई है। यह सत्र बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं
साधनाएँ वे है जो प्रस्तुत प्राणियों, पदार्थों एवं परिस्थितियों को परिष्कृत करते हुए उन्हें जीवन विकास के लिए प्रयोग करने का पथ प्रशस्त करती हैं वाममार्गी साधनाएँ वे है जिनकी विज्ञान और विधान का परिचय करने के लिए तन्त्र विज्ञान की रचना की है। इसमें विघातक तत्त्व उभरते हैं। कहना न होगा हक संसाधनों की अभिवर्धन की तरह ही अवांछनीयताओं का उन्मूलन भी आवश्यक है। वाममार्गी तन्त्र साधनाओं द्वारा जो उन्मूलन परम कार्य होते थे उनके मूल में प्रकृति का वह खोया पदार्थ की संज्ञा दी गई है। कार्य कुछ भी क्यों न हो-कदम किसी भी दिशा में क्यों न बढ़े, पर उसमें औचित्य और उपयोगिता का समुचित ध्यान रखा ही जाना चाहिए।
साधना को बताता था। उसने जेन साधना में निष्णात महाभिक्षु फुना कोशी से दीक्षा ली और उनका अन्तेवासी बन योगाभ्यास करता रहा। पर्वतों की निर्जन गुफाएँ, बर्फ से ढकी कन्दराएँ उसका साधना स्थल थीं और वनस्पतियाँ उसका आहार। कई बाद वह जेन साधना में सिद्ध पुरुष बन कर लौटा।
साधना में सिद्ध पुरुष बन कर लौटा।
साधना का समानार्थक नहीं प्रचारित कर दिया जाना चाहिए। मस्तिष्क को साधने की कला का एक अत्यन्त छोटा-सा हिस्सा एकाग्रता है। निस्सन्देह उसका महत्त्व है। पर उस एकाग्रता का उद्देश्य क्या है? अध्यात्म की दृष्टि से यह प्रश्न अधिक महत्त्वपूर्ण है।
साधना सीखी। इसी के अभ्यास से वह चमत्कारी योद्धा बन गया।
साधना के नाम से प्रख्यात है। इसके अभ्यासियों में कई प्रकार की अलौकिकताएँ पाई जाती है। मानसिक और आत्मिक दृष्टि से तो इस साधना में उच्चस्तरीय सिद्धियाँ पाई जाती है। साथ ही उसके कई अभ्यासी शारीरिक दृष्टि से भी प्रख्यात पहलवानों को भी अवाक् कर देने वाले कार्य कर दिखाते हैं।
साधना के गुणगान से भरे पड़े हैं। विशिष्ट मनस्वियों को तप-साधना द्वारा ही विभूतियाँ अर्जित करनी होती थीं। पार्वती का शिव से विवाह, ध्रुव का ब्रह्माण्ड का केन्द्र बन जाना, भागीरथ द्वारा गड़ को पृथ्वी पर लाना, दधीचि द्वारा अपना अस्थि दान तथा उनसे असुर-संहारक वज्र का निर्माण, अगस्त ऋषि द्वारा समुद्र शोषण, विश्वामित्र द्वारा नूतन सृष्टि का सृजन, सात साधारण व्यक्तियों का सप्तर्षि बनना आदि अनेक असामान्य घटनाएँ तप द्वारा ही सम्भव हुई है। ऐसी आख्यायिकाएँ, कथाएँ हमारे प्राचीन वांग्मय में भरी पड़ी हैं। जो तप की ही शक्ति को अभिव्यक्त करती है।
साधना प्रयोजनों का आवश्यक अंग माना गया है। इतने पर भी मन्त्र शक्ति को प्रखर बनाने में जहाँ हृदय के उपयोग की चर्चा है, वहाँ उसका प्रयोजन भावना शक्ति से है। शरीर विज्ञान में ‘हृदय ’रक्त संचार में संलग्न बाई पसलियों के मध्य अवस्थित मुट्ठी जितने आकार की थैली को कहा जाता है, पर आध्यात्मिक विवेचना में ‘उसे’ भाव संस्थान समझा जाना चाहिए। भावना का- श्रद्धा सम्वेदना का जितना उच्चस्तरीय समावेश मन्त्र साधना में होता है, अश्रद्धा, उपेक्षा और अन्य आमनस्क भाव से बेगार टालने की तरह किसी प्रकार अमुक अक्षरों को रटते रहा जाय तो उससे न तो जिव्हा की शक्ति का उपयोग हुआ माना जाएगा और न हृदय शक्ति का समावेश हुआ कहा जाएगा
साधना बनाओ। जो नीचा छोटा बनता है वही तो ऊँचा पद पाता है।
साधना में नियोजित किया जा सके तो उतने भर से मनुष्य अपनी रुचि की संगीत, साहित्य आदि किसी भी कलाकारिता में प्रवीण एवं पारंगत बन सकता है। यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में है। वे अपनी ललक लिप्साओं के रसास्वादन में भटकती रहती है। यह स्मरण ही नहीं रहता कि उपभोग की समर्थता बनाये रहने के लिए इन्द्रिय शक्ति के संयम और सुनियोजन की कितनी अधिक आवश्यकता है। विलासी अतिवाद इन्द्रिय शक्ति को क्रमशः क्षीण करता चला जाता है और एक समय ऐसा आता है कि स्वाद की अनुभूति ह कुण्ठित हो जाती है।
साधना का सत्परिणाम प्राप्त करने में सफल रहें है।
साधना में भाग लिया है, उन सभी को सामूहिक गायत्री यज्ञ के रूप में सभा-सम्मेलन की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। अधिक लोगों को इसमें सम्मिलित रहने के लिए अभी से आमन्त्रित करना आरम्भ किया जाय, ताकि उस दिन अवकाश निकाल कर आयोजन में योगदान देने के लिए वे पहले से ही तैयार रह सके। प्रभात-फेरी सामूहिक जप, गायत्री यज्ञ यह कार्यक्रम प्रातःकाल के हैं। जिनमें स्वर्ण-जयन्ती वर्ष की साधना में भाग लिया है, वे अनिवार्यतः और शेष साधन प्रिय लोग सामान्यतः इस प्रातः काल के जप, हवन, कार्यक्रम में सम्मिलित रहें। परिवार के प्रत्येक सदस्य के यहाँ ज्ञान-घट स्थापित हो।
साधना का अविच्छिन्न अंग माना गया है। प्रातः काल उठते समय अथवा अन्य किसी निश्चिंत, शान्त, एकान्त स्थिति में न्यूनतम आधा घण्टे का समय इस प्रयोजन के लिए निकाला जाना चाहिए। मनन को प्रथम और चिंतन को द्वितीय चरण माना जाना चाहिए। दर्जी पहले कपड़ा काटता है, पीछे उसे सीता है। डाक्टर पहले नश्तर लगाता है।
साधना के साथ सन्निहित है। प्रकाश दर्शन के साथ साथ अन्त क्षेत्र में दिव्य प्रेरणाओं के अवतरण की बात जितनी गहरी श्रद्धा के साथ हृदयंगम की जाएगी, ध्यान का उद्देश्य उतनी ही मात्रा में उपलब्ध होता चला जाएगा
साधना का उद्देश्य है।
साधना द्वारा कई प्रकार की अलौकिक क्षमताएँ उत्पन्न की जा सकती है और उसका उपयोग सत्प्रयोजनों में करने से उतना हित साधन हो सकता है जितना सामान्य भौतिक क्षेत्र में सम्पन्न किये जाने वाले पुरुषार्थ द्वारा सम्भव नहीं है।
साधना विधि की कोई कमी ही सोचता था, जिसके कारण माता का अनुग्रह प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म वर्चस् सत्र से लौटने के बाद स्थिति बदल गई। अन्तःकरण की धुलाई और मंजाई का जो विशेष कार्य हुआ है उससे सरसता के द्वार खुल गये हैं। अब उपासना के समय ऐसा अनुभव होता है, मानो भगवान की प्रत्यक्ष समीपता से मिलने कला आनन्द और माता का पय-पान करने जैसा सन्तोष मिल रहा है। अब यह विश्वास दृढ़ हो गया है कि जीवन का परम लक्ष्य पाने का सही आधार मिल गया और अभीष्ट सफलता मिल कर रहेगी।
साधना का विज्ञान, स्वरूप, लक्ष्य एवं समझाने के लिए मार्च 77 की अखण्ड ज्योति का अंग एक विशेषांक के रूप में होगा। उस अति महत्त्वपूर्ण संग्रहणीय एवं अभिनव पाठ्य-सामग्री को विज्ञान ओर अध्यात्म का समन्वय प्रयास समझा जा सकता है। पाठक उसकी प्रतीक्षा करें।
साधनाओं द्वारा चेतन मस्तिष्क को शिथिल, निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाया जाता है। तब ही दूर-दर्शन दूर दृष्टि विचार-प्रेरणा भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्ष आदि अनेक विशेषताएँ प्राप्त की जा सकती हैं। बौद्धिक मस्तिष्क को शिथिल करके इच्छा-शक्ति प्राण-शक्ति को अचेतन के विकास में प्रयुक्त करने पर शरीर में आँखें-जनक परिवर्तन सम्भव है। अति दीर्घजीवी होना, अति शक्तिशाली होना, अदृश्य जगत का ज्ञान प्राप्त करना आदि उसी स्थिति में सम्भव है।
साधनाओं द्वारा जो उन्मूलन परम कार्य होते थे उनके मूल में प्रकृति का वह खोया पदार्थ की संज्ञा दी गई है। कार्य कुछ भी क्यों न हो-कदम किसी भी दिशा में क्यों न बढ़े, पर उसमें औचित्य और उपयोगिता का समुचित ध्यान रखा ही जाना चाहिए।
साधना में संलग्न सभी साधकों को इस विशिष्ट साधना की पूर्णाहुति कर लेनी चाहिए। वसन्त पर्व अपने परिवार का सबसे बड़ा त्यौहार है। अपनी समस्त महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ उसी शुभ मुहूर्त से आरम्भ हुई हैं। इस मिशन का जन्म दिन इसी दिन पड़ता है। उसके सूत्र संचालक का जन्म दिन भी वही है।
साधना होता है। शुद्ध आहार से व्यक्ति-मन की शुद्धि एवं आत्मबल की वृद्धि के कारण जहाँ वातावरण में सात्विकता आती है वहीं सप्ताह में एक दिन के उपवास का क्रम चल पड़े, तो देश की जटिल खाद्य समस्या का भी समाधान-सम्भव है और अपच ही प्रायः सब रोगों की लड़ होने के कारण स्वास्थ्य-संकट में भी बहुत अधिक कमी आ जाए। ‘ अस्वाद व्रत भी आहार-शुद्धि का ही अंग हैं। गाँधी जी ने “सप्त महाव्रत“ प्रतिभा में अस्वाद को प्रथम व्रत माना है। नमक, मसाले, शकर आदि वस्तुओं को अलग से मात्र स्वाद के लिए ही खाया जाता है।
साधना करनी पड़ी।
साधना में उत्तीर्ण होना पड़ता था।
साधना भारतीय योगविद्या का ही एक अंग है। पाँचवीं में बौद्ध भिक्षुओं के जत्थे भारत से जापान पहुँचे थे। उन्होंने धर्म प्रचार के साथ जिस योगविद्या का वहाँ विस्तार किया था उसकी विशेषता उस देश में अभी जेन साधना के रूप में मौजूद है।
साधना, एवं गुरुदेव के प्रवचनों में तो दोनों ही वर्ग समान रूप से सम्मिलित रहेंगे किन्तु शोध शिक्षा में पृथकता रहा करेगी।
साधना का क्षेत्र इतना संकीर्ण नहीं है। मस्तिष्कीय व्यायाम का महत्त्व तो बताया जाना चाहिए, पर उसे ही रहस्यमयी शैली में योग व अध्यात्म-साधना का समानार्थक नहीं प्रचारित कर दिया जाना चाहिए। मस्तिष्क को साधने की कला का एक अत्यन्त छोटा-सा हिस्सा एकाग्रता है। निस्सन्देह उसका महत्त्व है। पर उस एकाग्रता का उद्देश्य क्या है?
साधना द्वारा ही सम्भव हैं। व्यक्तिवादी, अहंता और स्वार्थवादी महत्त्वाकाँक्षा में परिधिबद्ध मन को सार्वभौम चेतना से जोड़कर अपने चिन्तन और कर्तृत्व को उत्कृष्ट बनाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। इससे कम कुछ भी नहीं। सही दिशा में चलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय की प्रक्रिया का प्रारम्भ अनिवार्य है। योग वस्तुतः एक भाव विज्ञान है, जो जीव को ब्रह्म से चिरमिलन की भाव भूमिका की और ले जाता है।
साधना पड़ता है। कहने सुनने की, समझने समझाने की सामर्थ्य अत्यन्त स्वल्प है। किसी को ऊँचा चढ़ाने और आगे बढ़ाने की शिक्षा अपना अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करके ही दी जा सकती है। अपना निज का व्यक्तित्व इस प्रकार ढाला जाना चाहिए जिसमें ठप्पे में ढलने वाले खिलौनों की तरह सम्पर्क क्षेत्र के लोग विशेषतया अपने परिवार के सदस्य अनायास ही ढलते चले जाएँ यह सब संभव तभी हो सकता है जब परिवार संस्था के सदस्यों को आत्माएँ माना जाय और उनके उज्ज्वल भविष्य की झाँकी सुविधा संवर्द्धन में नहीं, वरन् व्यक्तित्व की उत्कृष्टता के साथ सम्बद्ध समझी जाय।
साधना सत्रों के साथ उतने ही समय के महिला सत्र चला करेंगे वानप्रस्थों के एक मास की शिक्षा के साथ साथ भी उतने ही समय का महिला सत्र चलेगा। दोनों की शिक्षण प्रक्रिया अलग-अलग रहेगी। जप, हवन, साधना, एवं गुरुदेव के प्रवचनों में तो दोनों ही वर्ग समान रूप से सम्मिलित रहेंगे किन्तु शोध शिक्षा में पृथकता रहा करेगी।
साधना के नाम पर चल रही ठगी भी कम नहीं है। उस आड़ में धूर्तों का काला बाज़ार भी खूब पनपता है, इतने पर भी यह नहीं मान बैठना चाहिए कि इस क्षेत्र में तथ्य कुछ नहीं है। यदि गहराई उतरा जाय तो प्रतीत होगा कि साधना विज्ञान की भी अपनी उपलब्धियाँ हैं और उनके सहारे दिव्य क्षमताओं के अभिवर्धन की दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।
साधना का समय साध्य है और उसका प्रतिफल देर में मिलता है, यही सुनता रहा हूँ। किन्तु इस बार भिन्न प्रकार का अनुभव हुआ। उपयोगी सहायता मिल जाने से देर का काम जल्दी भी हो सकता है। सत्र में जो सीखा, जो किया, वह तो उपयोगी था ही, पर जो अनुदान पाया, उसे तो परम सौभाग्य ही मानता हूँ। चिन्तन की दिशा धारा ही बदल गई है।
साधना के लिए स्थानीय भाषा की जानकारी प्राप्त करनी होती है, उसी प्रकार जिनका वन्य प्रदेशों और उनमें रहने वाले प्राणियों से वास्ता पड़ता है उन्हें “जंगल की भाषा’ जानना भी आवश्यक होता है।
साधना द्वारा ही विभूतियाँ अर्जित करनी होती थीं। पार्वती का शिव से विवाह, ध्रुव का ब्रह्माण्ड का केन्द्र बन जाना, भागीरथ द्वारा गड़ को पृथ्वी पर लाना, दधीचि द्वारा अपना अस्थि दान तथा उनसे असुर-संहारक वज्र का निर्माण, अगस्त ऋषि द्वारा समुद्र शोषण, विश्वामित्र द्वारा नूतन सृष्टि का सृजन, सात साधारण व्यक्तियों का सप्तर्षि बनना आदि अनेक असामान्य घटनाएँ तप द्वारा ही सम्भव हुई है। ऐसी आख्यायिकाएँ, कथाएँ हमारे प्राचीन वांग्मय में भरी पड़ी हैं। जो तप की ही शक्ति को अभिव्यक्त करती है।
साधना का विधान उसका उद्देश्य, स्वरूप एवं विवेचन समझाने के लिए गतवर्ष जनवरी के अंक में सब कुछ विस्तारपूर्वक समझा दिया गया था। दोनों नव-नवरात्रियों में इन सभी साधकों को 24 सहस्र गायत्री जप के विशेष अनुष्ठानों के लिए निर्देश था सो थोड़े-से अत्यन्त व्यस्त एवं रुग्ण व्यक्तियों को छोड़ कर सभी ने वह साधना भी सम्पन्न की। प्राप्त सूचनाओं से विदित होता रहा है कि इन एक लाख साधकों में से अधिकांश को चमत्कारी अनुभूतियाँ हुई और अनुभव किया कि वे स्वल्प श्रम में अधिक लाभ देने वाली महत्त्वपूर्ण साधना का सत्परिणाम प्राप्त करने में सफल रहें है।
साधना में तप को ही प्रमुखता दी सुदृढ़ बनाता है।
साधना की इच्छाएँ जगती हैं और योजनाएँ बनती है। ऐसी स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति ससीम न रह कर असीम बन जाता है और उसका कार्यक्षेत्र व्यापक परिधि में सत्प्रवृत्तियों को संवर्धन बन जाता है। ऐसे व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं को पैरों तले कुचल कर फेंक देते हैं। अपनी आवश्यकताओं को घटाते हैं ओर निर्वाह को न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी करने के उपरान्त अपनी सत्प्रयोजनों में लगाये रहते हैं। देश, धर्म, समाज, संस्कृति के उत्कर्ष के लिए किये गये प्रयत्नों में उन्हें इतना आनन्द आता है जितना स्वार्थ परायण व्यक्तियों को विपुल धन प्राप्त करने पर भी नहीं मिल सकता।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष गतवर्ष बसन्त पर्व से आरम्भ हुआ और अब उसकी पूर्णाहुति आगामी बसन्त पर्व ता॰ 24 जनवरी 77 सोमवार की होगी। घोषित सामूहिक साधना में प्रायः एक लाख नर-नारियाँ ने अतीव निष्ठापूर्वक भाग लिया। सूर्योदय के 42 मिनट पूर्व निष्ठा के साथ चलती रही है। साधना का विधान उसका उद्देश्य, स्वरूप एवं विवेचन समझाने के लिए गतवर्ष जनवरी के अंक में सब कुछ विस्तारपूर्वक समझा दिया गया था। दोनों नव-नवरात्रियों में इन सभी साधकों को 24 सहस्र गायत्री जप के विशेष अनुष्ठानों के लिए निर्देश था सो थोड़े-से अत्यन्त व्यस्त एवं रुग्ण व्यक्तियों को छोड़ कर सभी ने वह साधना भी सम्पन्न की।
साधना भी सम्पन्न की। प्राप्त सूचनाओं से विदित होता रहा है कि इन एक लाख साधकों में से अधिकांश को चमत्कारी अनुभूतियाँ हुई और अनुभव किया कि वे स्वल्प श्रम में अधिक लाभ देने वाली महत्त्वपूर्ण साधना का सत्परिणाम प्राप्त करने में सफल रहें है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-July
साधना है। साधना का अर्थ है स्तरोन्नयन। धन की साधना का अर्थ आज जितने धनी है, कल उससे भी अधिक धन सम्पन्न होना। स्वास्थ्य साधना तथा अन्य सभी साधनाओं की भी यही स्थिति है। प्रेम की साधना का भी अर्थ है- प्रेम के क्षेत्र का निरन्तर विस्तार।
साधना है।
साधना मार्ग पर चलते हुए जिस प्रखरता को प्राप्त करता है उससे पक्षीय लाभ मिल सकते हैं।
साधना का अर्थ आज जितने धनी है, कल उससे भी अधिक धन सम्पन्न होना। स्वास्थ्य साधना तथा अन्य सभी साधनाओं की भी यही स्थिति है। प्रेम की साधना का भी अर्थ है- प्रेम के क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। जिसने अपनी प्रेमभावनाओं का विकास कर लिया, उसके जीवन में उल्लास, उत्साह, उमंग, सक्रियता, सहयोग सेवा ओर आनन्द भरा रहता है। अहिर्निशि प्रेम भावनाओं में डूबी अंतर्दशा ही सच्ची आस्तिकता है।
साधना अपना चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। साधक की सत्ता को प्रभावित करती हुई यह ध्वनि धारा रेडियो तरंगों की तरह अन्तरिक्ष में दौड़ना आरम्भ करती है। शब्दबेधी बाण की तरह उसका प्रवाह सूक्ष्म जगत के उन संस्थानों से टकराता है जिन्हें प्रभावित करना साधना का उद्देश्य रखा गया था।
साधना में अद्भुत योगदान रहता है। इस संयुक्त प्रभाव से मन्त्र साधना अपना चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। साधक की सत्ता को प्रभावित करती हुई यह ध्वनि धारा रेडियो तरंगों की तरह अन्तरिक्ष में दौड़ना आरम्भ करती है। शब्दबेधी बाण की तरह उसका प्रवाह सूक्ष्म जगत के उन संस्थानों से टकराता है जिन्हें प्रभावित करना साधना का उद्देश्य रखा गया था।
साधना में इन श्रवणातीत ध्वनियों का उत्पादन अतिरिक्त रूप से होता है और वे अपने क्षेत्र में असाधारण प्रभाव डालती हैं।
साधना से सबसे अधिक प्रभावित साधक का व्यक्तित्व ही होता है।
साधना का अर्थ है स्तरोन्नयन। धन की साधना का अर्थ आज जितने धनी है, कल उससे भी अधिक धन सम्पन्न होना। स्वास्थ्य साधना तथा अन्य सभी साधनाओं की भी यही स्थिति है। प्रेम की साधना का भी अर्थ है- प्रेम के क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। जिसने अपनी प्रेमभावनाओं का विकास कर लिया, उसके जीवन में उल्लास, उत्साह, उमंग, सक्रियता, सहयोग सेवा ओर आनन्द भरा रहता है।
साधना सूत्र सरलतापूर्वक उपलब्ध होते चलेंगे।
साधना का भी अर्थ है- प्रेम के क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। जिसने अपनी प्रेमभावनाओं का विकास कर लिया, उसके जीवन में उल्लास, उत्साह, उमंग, सक्रियता, सहयोग सेवा ओर आनन्द भरा रहता है। अहिर्निशि प्रेम भावनाओं में डूबी अंतर्दशा ही सच्ची आस्तिकता है।
साधना तथा अन्य सभी साधनाओं की भी यही स्थिति है। प्रेम की साधना का भी अर्थ है- प्रेम के क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। जिसने अपनी प्रेमभावनाओं का विकास कर लिया, उसके जीवन में उल्लास, उत्साह, उमंग, सक्रियता, सहयोग सेवा ओर आनन्द भरा रहता है। अहिर्निशि प्रेम भावनाओं में डूबी अंतर्दशा ही सच्ची आस्तिकता है।
साधना को आत्म विद्या का प्रधान आधार माना गया है। इसके लिए मन, वचन और कर्म से ऐसी उत्कृष्टता का समन्वय करना पड़ता है कि वाणी को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जाय। इतना करने के उपरान्त ही जपा हुआ-बोला हुआ-कोई भी मन्त्र असंदिग्ध रूप से सिद्ध होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा जप किये गये जप, स्तवन, पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट फल न मिल सकेगा। परिष्कृत वाणी वाक् को अध्यात्म का प्राण कह सकते हैं उसे साधक की कामधेनु और तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।
साधनाओं की भी यही स्थिति है। प्रेम की साधना का भी अर्थ है- प्रेम के क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। जिसने अपनी प्रेमभावनाओं का विकास कर लिया, उसके जीवन में उल्लास, उत्साह, उमंग, सक्रियता, सहयोग सेवा ओर आनन्द भरा रहता है। अहिर्निशि प्रेम भावनाओं में डूबी अंतर्दशा ही सच्ची आस्तिकता है।
साधनाओं में वैसी एकाग्रता अपेक्षित हो सकती है, उस स्तर तक पहुँच जाने पर वैसी एकाग्र साधना कुछ कठिन भी नहीं होती। पर वैसी एकाग्रता में कुछ ऊल-जलूल चमत्कार पढ़
साधना में यही होता है। उच्चारित होने के उपरान्त स्थूल शब्द अन्तःकरण के मर्मस्थल की गहराई में उतरता है और उस शक्ति स्रोत की ऊर्जा से सम्पन्न होकर ऊपर आता है। जब वह ऊपर आता है तो वैखरी में पश्यन्ति का वैसा ही प्रभाव होता है जैसा कि बिजली के संपर्क से धातु के तार में। वह मन्त्रवत् शब्द समस्त सृष्टि में हलचल उत्पन्न करता है। सूक्ष्म जगत को स्पन्दित करता है और व्यक्ति को सामान्य न रहने देकर उसे दैवी शक्ति से सम्पन्न बना देता है।
साधना का उद्देश्य रखा गया था।
साधना कुछ कठिन भी नहीं होती। पर वैसी एकाग्रता में कुछ ऊल-जलूल चमत्कार पढ़
साधना में अन्य विविध उपचारों का विधान रहता है। प्रयुक्त पदार्थों एवं हलचलों का, विधि विधानों का, कर्मकाण्डों के क्रियाकलापों का अपना महत्व है। उनकी सम्मिलित प्रतिक्रिया का मन्त्र साधना में अद्भुत योगदान रहता है। इस संयुक्त प्रभाव से मन्त्र साधना अपना चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। साधक की सत्ता को प्रभावित करती हुई यह ध्वनि धारा रेडियो तरंगों की तरह अन्तरिक्ष में दौड़ना आरम्भ करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1977-April
साधना समाधि तक के अगणित प्रगति प्रयास इसी आधार पर होते हैं। व्यक्तित्व और वर्चस्व की-प्रखरता की समस्त सम्भावनायें इसी क्षेत्र के साथ जुड़ी हुई है। परा प्रकृति की साधना एवं गायत्री उपासना के सहारे ही अन्तःचेतना का विकास होता है।
साधना भी है। इसे अन्य किसी योगाभ्यास से कम न माना जाय। व्यायामों के कला-कौशल सीख कर दंगल पछाड़ने वाले पहलवान बनते हैं, सरकस में भी उनकी प्रशंसा होती है। किन्तु ऐसे भी अनेक व्यक्ति हुए है जिनने व्यायामशाला में प्रवेश नहीं किया और उन विशिष्ट कला-कौशलों को नहीं सीखा जिन्हें वहाँ बताया और अभ्यास कराया जाता है फिर भी उन्होंने आहार-बिहार के संयम-नियम दिनचर्या, प्रकृति अनुसरण प्रसन्न सन्तुष्ट स्वभाव, उच्च-दृष्टिकोण जैसे आधार अपना कर निरोग, बलिष्ठ दीर्घ जीवन प्राप्त किया। व्यायामशाला में लगने वाला समय और श्रम उन्होंने अन्य अधिक महत्वपूर्ण कामों में लगाया।
साधना से सम्पन्न किया जाता है। पंचकोशी साधना इसी को कहते हैं।
साधना से उस विद्युत प्रवाह के द्वारा संभव होती है। जो जीवन तत्त्व बनकर रोम रोम में संव्याप्त है। इसी को मानवीय विद्युत कहते हैं। ओजस्वी, मनस्वी और तेजस्वी उसी विशेषता से सुसम्पन्न लोगों को कहते हैं। प्रतिभाशाली प्रगतिशील लोगों ओर शूरवीर साहसी लोगों में इसी क्षमता की बहुलता पाई जाती है।
साधना की सफलता सिद्धि से आँकी जानी चाहिए। कितने ही महामानव लौकिक सफलता की दृष्टि से नितान्त असफल रहे है। फिर भी उनकी सिद्ध स्थिति पर उँगली उठाये जाने का कोई कारण नहीं बना।
साधना में इसी को ‘पंजीकरण’ कहा गया है।
साधना का पानी लगाना पड़ता है। इस नीति को अपना क्रूर कोई भी साधक बुद्धिमान माली की तरह अपने अन्तः क्षेत्र में ऋद्धि-सिद्धियों से भरा पूरा उद्यान खड़ा कर सकता है। इसके लिए बाहर से कुछ ढूँढ़ने, लाने या पाने का आवश्यकता नहीं है। मात्र कषाय-कल्मषों की परतों को हटा देने भर का साहस सँजो लेना पर्याप्त है। आत्म-शोधन और आत्म परिष्कार ही विभिन्न साधनाओं का वास्तविक उद्देश्य है।
साधना की समय आवश्यकता पूरी होती है। गायत्री साधना का सन्तुलित लाभ उठाने के लिए सावित्री शक्ति को भी साथ लेकर चलना पड़ता है।
साधना अपनाकर क्रमशः इसी क्षेत्र में पदार्पण करना सम्भव होता है।
साधनाएँ अपनाई जाती। एक अनुष्ठान दूसरा पुरश्चरण।
साधना के सत्परिणाम है। घ्राण-शक्ति का विकास भी ऐसे ही चमत्कारी सुफल सामने ला सकता है। कुत्तों जैसे जानवरों की विकसित घ्राण शक्ति का सदुपयोग कर आज अपराधों के अचेष्टा में उनसे सहायता ली ही जा रही है। स्वाद-शक्ति (रसना) और वाक् शक्ति (वाणी) का विकास तृप्ति एवं वाग्वल का वचन-सिद्धि का आधार बनता है। त्वचा की संवेदनशीलता का विकास कर उससे परिवेश के सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्पन्दनों को ग्रहण एवं विश्लेषित किया जा सकता है।
साधना में एकाग्रता की शक्ति का सम्पादन एवं अभिवर्धन प्रमुख है। सर्वविदित है कि बिखराव से समर्थता भी छिन्न-भिन्न हो जाती है। असंगठित होने पर समर्थ लोग भी कुछ कर नहीं पाते, जब कि थोड़े से छोटे लोग मिलकर भी बड़े-बड़े कार्य पूरे कर लेते हैं। यही बात मनःशक्ति के सम्बन्ध में भी है वह बिखरी रहे तो मस्तिष्क यन्त्र के पूर्ण समर्थ होते हुए भी उसकी क्षमता गये-गुजरे स्तर पर पड़ी रहेगी और वह बौद्धिक दुर्बलता के साथ-साथ प्रगति के हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ ही बना रहेगा।
साधना को पूरी करते हुए हम पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचते हैं। इन्हें परीक्षा के पाँच वर्ग एवं स्तर कह सकते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में इन्हीं की पाँच आयामों के रूप में व्याख्या की जाती है। आत्मिक प्रगति के पथ पर हम जितने-जितने आगे बढ़ते हैं, उतने ही उतने दिव्य-विभूतियों से सुसम्पन्न बनते चले जाते हैं। ब्रह्म वर्चस् साधना प्रक्रिया द्वारा इसी मार्ग पर आज की स्थिति के अनुरूप साधन, विधान बताकर प्रगति पथ पर अग्रसर करने का प्रयत्न किया जा रहा है।
साधना करने की स्थित में नहीं हैं उनके लिए भी यह ज्ञान उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि किसी श्रेष्ठतम ज्ञातव्य का संचय करना।
साधना पर निर्भर करती है।
साधना मार्ग पर बढ़ने के लिए भी उपयोगी सिद्ध होती है। ओर साँसारिक जीवनक्रम में भी इनका प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। यह उपलब्धियाँ बड़ी आकर्षक भी लगती है। किन्तु योग मार्ग की यह बहुत प्रारम्भिक सीढ़ियाँ मात्र है। यह इसलिए आवश्यक है कि योग साधना के लिए आवश्यक साधना क्रम में यह शरीर अपनी असमर्थता प्रकट करके साथ देने से कतराने न लगे।
साधना में सहयोगी बन जाता है। श्रेष्ठ चित्रकार जब किसी चित्र की कल्पना करता है तो उसके शरीर की हर इकाई उसके स्पन्दनों से प्रभावित होती है। शरीर की हलचल में उस कल्पना के स्पन्दन समाविष्ट हो जाते हैं तथा निर्जीव तूलिका सामान्य रंगों से जीवन्त चित्र का निर्माण कर देती हैं। वाणी के साधक गायक के मन में जो भाव उभरते हैं वह उसके हाव-भाव तथा स्वर लहरी में न जाने वहाँ से-कैसे गुँथ जाते हैं और उसमें अद्भुत प्रभाव पैदा कर देते हैं। अपने कार्य के प्रति निष्ठावान् चिकित्सक के चर्मचक्षुओं और माँसपेशियों में न जाने क्या विशेषता आ जाती है कि वह रोग के सूक्ष्म से सूक्ष्म चिह्न तथा गम्भीर से गम्भीर स्तर को पकड़ लेता है।
साधना के सम्बन्ध में भी यह बात है। यदि वह तथ्यों पर आधारित हो ओर विधिवत् संपन्न की जाय तो उसके लाभ मिला भी सुनिश्चित ह।
साधना का परिपूर्ण लाभ मिलता रहा है।
साधना ही है। अपने स्वार्थ को परमार्थ में जोड़ देना- व्यष्टि को समष्टि में विलय कर देना- इसे योग ही कहा जायेगा। कितने ही महामानव अपनी जीवन प्रक्रिया को उत्कृष्ट आदर्शवादिता में ढाल कर एक प्रकार से सन्त ही बने रहे है, भले ही उनने वैसी वेशभूषा धारण न की हो ऐसे लोगों को भी विज्ञानमय कोश की साधना का परिपूर्ण लाभ मिलता रहा है।
साधना के उच्चस्तर पर पहुँच कर इसी ताली को ढूँढ़ना पड़ता है और ताले को खोलने की व्यवस्था बनानी पड़ती है। जो उसे कर सका उसे फिर यह नहीं कहना पड़ा कि हम निरानन्द नीरस जीवन जीते हैं। दुःख ओर दुर्भाग्य से ग्रसित है।
साधना में पुरुषार्थ से असाधारण सहायता मिलती है। ब्रह्म वर्चस्’ की उच्चस्तरीय साधना में इसी पंचकोशी तपश्चर्या को प्रमुखता दी गई है।
साधना में जो उच्चस्तरीय उल्लास उपलब्ध होता है। उसे ‘काम’ तत्व की परिष्कृत भाव भूमिका कह सकते हैं। चिन्तन की दिशा धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी लाले के माध्यम से बाँध बनाकर संग्रह किया जाय ओर नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुँचाया जाय तो इससे हर प्रकार लाभ ही लाभ है अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है उसे हठ पूर्वक नष्ट कर देने की बात न सोची जाय, वरन् ऐसे प्रयोजन में लगा दिया जाय जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।
साधना के लिए विज्ञान से लेकर उपासना तक के किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय स्तर पाने के लिए अपने अन्नमय कोश को ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य, सक्षम स्थिति में लाना आवश्यक होता है। उसके लिए उसकी मूल इकाइयों को विशेष रूप से गढ़ना-ढालना पड़ता है इसे ही अन्नमय कोश के परिष्कार विकास की साधना कहा जाता है।
साधना के रूप में दिया है। इसका कर्मकाण्ड और विधिविधान जितना चमत्कारी है उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसका तत्व दर्शन। कुण्डलिनी विधान जानने से पहले उसका दर्शन जानना आवश्यक है। प्रतिपादन यह है कि काम-कला को ब्रह्म विद्या के रूप में परिवर्तित किया जाय। इसे विज्ञान की भाषा में - ट्रान्सफार्मेशन-रूपान्तरण कहते हैं काम को कला में परिणत, परिष्कृत किया जा सकता है भक्ति भावना उसी प्रयास का उत्कृष्ट रूप है, ललित कलाओं में, उद्देश्य पूर्ण शौर्य, साहस में, पारमार्थिक सेवा साधना में जो उच्चस्तरीय उल्लास उपलब्ध होता है।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त पूरी तरह प्रमाणित कर दिया। जीवन साधना का योगाभ्यास ऐसा है जिसकी सिद्धि बाजीगरी कौतुक जैसी चमक दिखा कर समाप्त नहीं होती, वरन् अद्भुत सफलताओं के रूप में-लोक-श्रद्धा के रूप में -इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित अमिट अक्षरों के रूप में- सदा सर्वदा जीवन्त बनी रहती है। ऐसे महामानवों की नामावली, जीवन चरित्रों का पर्व तो जितना साहित्य उलट कर हम जीवन भर तैयार करते रह सकते हैं।
साधना प्रक्रिया द्वारा इसी मार्ग पर आज की स्थिति के अनुरूप साधन, विधान बताकर प्रगति पथ पर अग्रसर करने का प्रयत्न किया जा रहा है।
साधना का अनिवार्य अंग है। ‘संध्या’ का कृत्य गायत्री उपासना के बिना नहीं हो सकता। इसके उपरान्त आगे की विशेष साधनाएँ अपनाई जाती। एक अनुष्ठान दूसरा पुरश्चरण।
साधना क्रम में यह शरीर अपनी असमर्थता प्रकट करके साथ देने से कतराने न लगे। अन्नमय कोश शुद्ध ओर पुष्ट होने पर ही व्यक्ति साँसारिक उतार-चढ़ाव के बीच अपनी शरीर यात्रा सन्तुलित क्रम से चलाता हुआ, अपने आत्मिक लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से बढ़ सकता है।
साधना है। इसी आधार पर नर को नारायण-पुरुष को पुरुषोत्तम-जीव को ब्रह्म-आत्मा को परमात्मा बनने का अवसर मिलता है।
साधना इस प्रकार से की गई या उस तरह, इसका कोई विशेष महत्व नहीं है। बात कर्मकाण्डों के विधि-विधानों की नहीं, अन्तराल में आदर्शवादी उत्कृष्टता को प्रतिष्ठापित करने की है। उसे जिस भी प्रकार वो लिया जाय, अंकुर उगेगा और समयानुसार विशाल वृक्ष बनकर पल्लवित और फलित होगा।
साधना की यही सच्ची सिद्धि है कि उन कठिनाइयों की अग्नि परीक्षा में साधक खरा उतरे। प्रलोभन और भय उसे विचलित न कर सकें। दूसरों के लिए ऐसी परम्परा छोड़े जिसका अनुकरण करने वाले मनुष्य जन्म को सार्थक बना सकें। राजा हरिश्चन्द्र का नाटक बचपन में गाँधी जी ने देखा। और वे उससे इतने प्रभावित हुए कि दूसरे हरिश्चन्द्र ही बनकर रहे।
साधनाएँ है उनके माध्यम से प्रयत्नपूर्वक उस केन्द्र में सन्निहित क्षमताओं का अभिवर्धन किया जा सकता है। साधना के अनेक प्रकार है। उनमें से कुछ योगाभ्यास एवं तपश्चर्या स्तर के है। कुछ ऐसे है जिनमें चरित्र निष्ठा एवं समाज निष्ठा में संलग्न रह कर चेतना के अन्तराल को परिष्कृत किया जाता है। आत्म-निर्माण एवं लोक-निर्माण में आदर्शवादी श्रद्धा सद्भावना को अपनाते हुए तत्पर रहा जाय तो वे क्रिया-कलाप भी उच्चस्तरीय साधना का प्रयोजन पूरा करते हैं।
साधना में-कुण्डलिनी जागरण की विधि-व्यवस्था बनी है भावनात्मक क्षेत्र में इस दिव्य मिलन की प्रतिक्रिया आनन्द और उल्लास के रूप में दृष्टिगोचर होती है। संसार के श्रेष्ठ-देव पक्ष को देखते हुए प्रसन्न होना आनन्द है और निकृष्ट-दैत्य पक्ष को निरस्त करने के लिए उमगते हुए शौर्य, साहस का नाम है-उल्लास धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए ईश्वर का अवतार होने की प्रतिज्ञा को साधक अपने ही भीतर पूरी होते देखता है। उसे लगता है कि भगवान का अवतार आनन्द और उल्लास के-श्रद्धा ओर भक्ति के-कुण्डलिनी जागरण के रूप में अपने ही भीतर हो रहा है। आनन्दमय कोश का यह भाव पक्ष है।
साधना में भक्ति और शक्ति दोनों का समन्वय है।
साधना ज्ञान एवं विज्ञान-सिद्धान्त ऊहापोह के साथ आगे भी चलती रहेगी। पिछले दिनों प्रकाश-मार्ग दर्शन पर, ज्ञातव्य एवं विवेचन पर जोर दिया जाता रहा हैं। अगले दिनों उसकी प्रेरणा, साधना एवं क्रिया-पद्धति से जिज्ञासुओं को लाभान्वित किया जाता रहेगा। यही है अपनी ब्रह्म वर्चस् प्रशिक्षण की भावी रूप-रेखा
साधना मस्तिष्कीय क्षेत्र की धुलाई-सफाई ही नहीं करती, वरन् उसे समुन्नत सुसज्जित एवं सुसंस्कृत बनाने का काम भी बहुत हद तक पूरा कर सकती है।
साधना कहा जाता है।
साधना का प्रयोजन पूरा करते हैं। चरित्र को स्वर्ण की तरह तपा लेना संयम की अग्नि में अपने कषाय-कल्मषों को जला डालना विशुद्ध तप साधना ही है। अपने स्वार्थ को परमार्थ में जोड़ देना- व्यष्टि को समष्टि में विलय कर देना- इसे योग ही कहा जायेगा। कितने ही महामानव अपनी जीवन प्रक्रिया को उत्कृष्ट आदर्शवादिता में ढाल कर एक प्रकार से सन्त ही बने रहे है, भले ही उनने वैसी वेशभूषा धारण न की हो ऐसे लोगों को भी विज्ञानमय कोश की साधना का परिपूर्ण लाभ मिलता रहा है।
साधना-प्राणायाम प्रक्रिया इसी प्रयोजन की पूर्ति का एक सुनिश्चित-विज्ञान सम्मत आधार है।
साधना का योगाभ्यास उसी प्रकार की सिद्धियों से भरा पूरा होता है।
साधना इसी दिव्य चेतना का समुन्नत बनाने की प्रक्रिया का नाम है।
साधनाओं संचय करने की आवश्यकता इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बताई गयी है।
साधना में इसी पंचकोशी तपश्चर्या को प्रमुखता दी गई है।
साधनात्मक प्रयत्नों के द्वारा योजनाबद्ध रूप से बढ़ाया भी जा सकता है। मनोमय कोश के परिष्कार की साधना अपनाकर क्रमशः इसी क्षेत्र में पदार्पण करना सम्भव होता है।
साधनात्मक प्रयोग का परिणाम और भी अधिक उत्साहवर्धक हो सकता है।
साधना, खेचरी मुद्रा जैसी उपासना भाव पक्ष को समुन्नत करती है। कुण्डलिनी जागरण से शक्ति पक्ष उभरता है। उससे मानवी अस्तित्व में ईश्वरीय वर्चस्व की प्रचण्डता प्रकट होती है। आनन्दमय कोश की कुण्डलिनी साधना में भक्ति और शक्ति दोनों का समन्वय है।
साधना में समुद्र मंथन जैसे प्रयत्न करने पड़ते हैं। फलतः प्रसुप्ति जागृति में बदलती है। तप की उष्णता पाकर अन्तः ऊर्जा उभरती है और ऊपर की ओर चलने का प्रयत्न करती है। गर्मी से वायु, जल आदि सभी का विस्तार होता है। वे ऊपर की ओर उठते हैं।
साधना किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण और कम फलप्रद नहीं है। उत्कृष्ट चिन्तन आदर्श कर्तव्य एवं परमार्थ प्रयोजनों में सघन तत्परता रखने वाले उदात्त महा मानव भी अपने ढंग के सिद्ध पुरुष ही बनते हैं। उनका यश एवं वर्चस्व योगी, तपस्वियों से किसी भी प्रकार कम नहीं रहता, आत्म-कल्याण और विश्व कल्याण में उनकी भूमिका आत्मिक प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचे हुए लोगों के समतुल्य ही होती है।
साधना स्वयं की इन क्षमताओं के विकास का ही नाम है।
साधना का योगाभ्यास ऐसा है जिसकी सिद्धि बाजीगरी कौतुक जैसी चमक दिखा कर समाप्त नहीं होती, वरन् अद्भुत सफलताओं के रूप में-लोक-श्रद्धा के रूप में -इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित अमिट अक्षरों के रूप में- सदा सर्वदा जीवन्त बनी रहती है। ऐसे महामानवों की नामावली, जीवन चरित्रों का पर्व तो जितना साहित्य उलट कर हम जीवन भर तैयार करते रह सकते हैं।
साधना को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। और उसके अनेक लाभों एवं सिद्धियों का भी उल्लेख मिलता है। इसके द्वारा ही योगी आरोग्य तथा शरीर संस्थान पर अद्भुत अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। इच्छानुसार शरीर को गर्म या ठण्डा रखना, ऋतुओं के प्रभाव से अप्रभावित रहना, शरीर की ऊर्जा पूर्ति के लिए आहार पर आश्रित न रहकर उसे सीधे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त कर लेना, दीर्घ-जीवन शरीर में वृद्धावस्था के चिह्न न उभरना आदि सभी उपलब्धियाँ अन्नमय कोश की साधना पर निर्भर करती है।
साधना की सिद्धि का सिद्धान्त हर क्षेत्र में काम करता है। श्रम का पुरस्कार मिलने की बात सर्वविदित है। पुरुषार्थ का प्रतिफल प्राप्त होने के विविध क्रिया-कलाप चल रहे है। अध्यात्म साधना के सम्बन्ध में भी यह बात है। यदि वह तथ्यों पर आधारित हो ओर विधिवत् संपन्न की जाय तो उसके लाभ मिला भी सुनिश्चित ह।
साधना का स्वरूप ईश्वर और नाम भर से परिचित है, उसका नाम जब-तक लेते भी है और भजन-पूजन का उपक्रम भी चलाते हैं, पर यह प्रयत्न होता ही नहीं कि ईश्वर को अपने में-और अपने को ईश्वर में-समाहित करने का प्रयत्न करें। इस समन्वय का कितना सुखद परिणाम हो सकता है इसकी कभी कल्पना भी तो नहीं आती। आमतौर से ईश्वर एक ऐसा व्यक्ति माना जाता है जो थोड़े से स्तवन पूजन से प्रसन्न किया जा सकता है और जिससे तुर्त-फुर्त मनोवाँछित वरदान मिल सकते हैं। इसी प्रलोभन में पूजा उपचार की सारी विडम्बनाएँ चलती है। ऐसे भगवत् भक्त कहाँ है, जो अपने ऊपर ईश्वरीय अनुशासन की स्थापना करते हैं।
साधना का उपयोग करना पड़ता है। आत्मा को संसारी वर्चस्व बनाने के लिए शरीर धारण करना पड़ता ह। गायत्री रूपी आत्मा को संसारी कर्तव्यों की पूर्ति के लिए जिस सामर्थ्य की आवश्यकता पड़ती है, उसे सावित्री साधना से सम्पन्न किया जाता है। पंचकोशी साधना इसी को कहते हैं।
साधना एवं गायत्री उपासना के सहारे ही अन्तःचेतना का विकास होता है।
साधना करे।
साधना यही है। इसी में अध्यात्म तत्व ज्ञान के समस्त सूत्र संजोये हुए है। इस ट्रान्सफार्मेशन का-रूपान्तर का सत्परिणाम, महान् जागरण, महान परिवर्तन दिव्य जीवन के पक्ष में सामने आता है। काम बीज का यह ब्रह्म समर्पण कितना श्रेयस्कर होता है इसे कुण्डलिनी महाविज्ञान की जागरण साधना एवं तत्व भावना को अपना कर ही जाना जा सकता है।
साधना का सन्तुलित लाभ उठाने के लिए सावित्री शक्ति को भी साथ लेकर चलना पड़ता है।
साधना को चेतना पर चढ़े कषाय-कल्मषों के निवारण की पुण्य प्रक्रिया कह सकते हैं इससे आत्मसत्ता के दिव्य स्वरूप का निखार होता है। भौतिक क्षेत्र में आत्म-चेतना का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए सावित्री साधना का उपयोग करना पड़ता है। आत्मा को संसारी वर्चस्व बनाने के लिए शरीर धारण करना पड़ता ह। गायत्री रूपी आत्मा को संसारी कर्तव्यों की पूर्ति के लिए जिस सामर्थ्य की आवश्यकता पड़ती है, उसे सावित्री साधना से सम्पन्न किया जाता है। पंचकोशी साधना इसी को कहते हैं।
साधना प्रयत्नों के अन्नमय कोश की अन्तः प्रक्रिया में परिवर्तन लाया जा सकता है। उससे जीन्स की स्थिति बदलने और पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य की आशा की जाती है। इतना ही नहीं पैतृक प्रभाव के कारण वयस्क व्यक्ति का जो ढाँचा बन गया है। उसमें भी सुधार परिष्कार सम्भव हो सकता है शारीरिक कायाकल्प-मानसिक ब्रेन वाशिंग की चर्चा होती रहती है। व्यक्तित्वों के परिवर्तन में साधनात्मक प्रयोग का परिणाम और भी अधिक उत्साहवर्धक हो सकता है।
साधनाएँ ही एकमात्र वह उपाय है जिनके सहारे वंशानुक्रम एवं संगृहीत संस्कारों में अभीष्ट परिवर्तन सम्भव हो सकता है। इस दृष्टि से शरीर विज्ञान एवं आरोग्य शास्त्र की अपेक्षा अध्यात्म उपचारों की सामर्थ्य बहुत बढ़ी-चढ़ी है उनके सहारे शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का ही नहीं स्वभाव, दृष्टिकोण एवं समूचे व्यक्तित्व का ही कायाकल्प हो सकता है।
साधना कितनी ही शास्त्र सम्मत एवं अनुभूत क्यों न हो अन्तः करण का स्तर निकृष्ट बने रहने पर विकसित न हो सकेगी। मरुस्थल में लगाये हुए बहुमूल्य पौधे भी उद्यान कब बन पाते है? ताप तापोँ की जलन साधना को भी उसी तरह जला देती है। जैसे कि तप्त बालू में लगाये गये पौधे मुरझाते और नष्ट होते हैं।
साधना मस्तिष्कीय क्षेत्र में घुसे मनोविकारों को-दुष्प्रवृत्तियों को-निरस्त करने के लिए लड़ा जाने वाला महाभारत हो, साथ ही इसमें धर्म राज्य की-राम राज्य की-स्थापना लक्ष्य संकल्प भी जुड़ा हुआ हों।
साधना हमारी, बुद्धि, कल्पना स्मरण शक्ति आकद के क्षेत्रों को सुविकसित करती है। कालिदास, वरदराज जैसे मन्द मति प्रयत्न पुरुषार्थ से विद्वान, बुद्धिमान बने थे। यह अनपढ़ को सुगढ़ बनाने की प्रक्रिया है इसे प्रशिक्षण द्वारा विकसित करने का उपाय सर्वविदित है। अध्यात्मिक प्रयत्नों द्वारा इस प्रयोजन को किस प्रकार पूरा किया जाय, उसी के प्रयोग में मनोमय कोश की साधना सहायता करती है।
साधना से सिद्धि का तात्पर्य यदि चमत्कारी कौतुक कुतूहलों का प्रदर्शन और उस आधार पर कीर्ति सम्पादन हो तो उस उपलब्धि का ओछे स्तर की विडम्बना मात्र ही कहा जायेगा। इसीलिए लोक प्रचलन की यह मान्यता गलत ही कही जायगी कि साधना की सफलता सिद्धि से आँकी जानी चाहिए। कितने ही महामानव लौकिक सफलता की दृष्टि से नितान्त असफल रहे है। फिर भी उनकी सिद्ध स्थिति पर उँगली उठाये जाने का कोई कारण नहीं बना।
साधना की गहराई में उतरना होगा।
साधना द्वारा यदि इन विभूतियों का जागृत एवं उपलब्ध किया जा सकें तो इन विभूतियों को जागृत एवं उपलब्ध किया जा सकें तो उस दिशा में किया गया प्रयत्न सामान्य कार्यों की दौड़-धूप से कम नहीं अधिक ही लाभदायक और बुद्धिमत्तापूर्ण सिद्ध होगा।
साधना उपक्रम का उल्लेख होगा। इन दो अंगों को ब्रह्म वर्चस् साधना ज्ञान एवं विज्ञान-सिद्धान्त ऊहापोह के साथ आगे भी चलती रहेगी। पिछले दिनों प्रकाश-मार्ग दर्शन पर, ज्ञातव्य एवं विवेचन पर जोर दिया जाता रहा हैं। अगले दिनों उसकी प्रेरणा, साधना एवं क्रिया-पद्धति से जिज्ञासुओं को लाभान्वित किया जाता रहेगा। यही है अपनी ब्रह्म वर्चस् प्रशिक्षण की भावी रूप-रेखा
साधना एवं क्रिया-पद्धति से जिज्ञासुओं को लाभान्वित किया जाता रहेगा। यही है अपनी ब्रह्म वर्चस् प्रशिक्षण की भावी रूप-रेखा
साधना पंचकोशी हैं गायत्री के पाँच मुख्य चित्रित किये जाते हैं आत्मसत्ता पर चढ़े पाँच कोश-आवरण का इसे अलंकारिक चित्रण कह सकते हैं। पंच तत्त्वों से पदार्थ जगत बना हैं पंच कोशों से चेतना के स्थूल, सूक्ष्म, और कारण कलेवरों का निर्माण हुआ हैं विकसित स्थिति में यही पाँच प्रमुख देवताओं की तरह अनुग्रह बरसाते और वरदान देते देखे जाते हैं।
साधना कर चेतना के विविध आयामों का बोध प्राप्त किया था। पंच कोश इन्हीं पाँच चेतना आयामों के ही नाम है। शरीरस्थ इन पाँच आणविक विद्युत भण्डारों को अन्तरिक्ष के संव्याप्त असंख्य शक्तिधाराओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाले शक्तिशाली इलेक्ट्रानिक संयन्त्र के रूप में प्रयुक्त कर ज्ञान और शक्ति का अनन्त विस्तार किया जा सकता है। मनुष्य में समस्त देवशक्तियों का अंश विद्यमान् है, अतः वह अपने भीतर निहित इनमें से किसी भी शक्ति का अथवा सभी ताकि अनेक शक्तियों के समन्वित स्वरूप का विकास कर सकता है। पदार्थवाद अभी तक इस मार्ग में बाधा बनने का प्रयास कर रहा था।
साधना का विधान था, जो कि मनुष्य में अन्तर्निहित चुम्बकत्व शक्ति का विकास-अभिवर्धन करता था। कृष्ण और रुक्मिणी ने बद्रीनाथ धाम में बारह वर्ष तक पर अपनी चुम्बकत्व-शक्ति को अत्यधिक उत्कृष्ट बना लिया था। तभी उन्हें प्रद्युम्न के रूप में मनोवाँछित सन्तान प्राप्त हो सकी थीं
साधना पंचकोशों की अनावरण प्रक्रिया कही जाती हैं। स्थूल जगत में संध्या पंच तत्त्वों पर और सूक्ष्म जगत में सन्निहित पंच प्राणों की प्रस्तुत क्षमता को इसी आधार पर जागृत किया जाता है समग्र प्रगति की इस साधना में पुरुषार्थ से असाधारण सहायता मिलती है। ब्रह्म वर्चस्’ की उच्चस्तरीय साधना में इसी पंचकोशी तपश्चर्या को प्रमुखता दी गई है।
साधना के अनेक प्रकार है। उनमें से कुछ योगाभ्यास एवं तपश्चर्या स्तर के है। कुछ ऐसे है जिनमें चरित्र निष्ठा एवं समाज निष्ठा में संलग्न रह कर चेतना के अन्तराल को परिष्कृत किया जाता है। आत्म-निर्माण एवं लोक-निर्माण में आदर्शवादी श्रद्धा सद्भावना को अपनाते हुए तत्पर रहा जाय तो वे क्रिया-कलाप भी उच्चस्तरीय साधना का प्रयोजन पूरा करते हैं। चरित्र को स्वर्ण की तरह तपा लेना संयम की अग्नि में अपने कषाय-कल्मषों को जला डालना विशुद्ध तप साधना ही है।
साधना विज्ञान के अनुसार उन्हें पाँच कोश कहा जाता है। यदि वे जागृत हों तो सामान्य काया भी देवोपम विशिष्टताओं का परिचय देगी किन्तु यदि सुषुप्ति छाई हुई हो तो फिर निर्जीव निस्तब्धता के अतिरिक्त और कुछ भी दृष्टिगोचर न होगा।
साधना का स्वरूप बनता है।
साधना के उपचार तो उससे अधिक ही सशक्त समर्थ होते हैं। उनका प्रभाव तो और भी अधिक होना चाहिए।
साधना से वह पथ-प्रशस्त होता है। जिससे मानवी काया में सन्निहित विशेषताओं को उभारना और उपयोग में लाना सम्भव हो सकें। कहना न होगा कि यदि निष्ठापूर्वक इसके लिए प्रयास किया जाए तो कोई भी व्यक्ति उतनी प्रगति कर सकता है। जितनी कि भूतकाल में किसी ने की है। इतना ही नहीं भविष्य की संभावनाएँ तो भूतकाल की सफलताएँ की अपेक्षा और भी अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती है।
साधना सहायता करती है।
साधनाओं में अन्नमय कोश की साधना को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। और उसके अनेक लाभों एवं सिद्धियों का भी उल्लेख मिलता है। इसके द्वारा ही योगी आरोग्य तथा शरीर संस्थान पर अद्भुत अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। इच्छानुसार शरीर को गर्म या ठण्डा रखना, ऋतुओं के प्रभाव से अप्रभावित रहना, शरीर की ऊर्जा पूर्ति के लिए आहार पर आश्रित न रहकर उसे सीधे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त कर लेना, दीर्घ-जीवन शरीर में वृद्धावस्था के चिह्न न उभरना आदि सभी उपलब्धियाँ अन्नमय कोश की साधना पर निर्भर करती है।
साधना इसी दुःखद दुर्भाग्य का अन्त करने के लिए है। उसके आधार पर उस ताले को खोला जा सकता है जिसमें उल्लास का जय भाण्डागार भरा पड़ा है। यह कार्य आत्मा और परमात्मा के मिलन की विधि-व्यवस्था बनाकर-रीति-नीति अपनाकर ही सम्भव हो सकता है। पंचकोशों की साधना के उच्चस्तर पर पहुँच कर इसी ताली को ढूँढ़ना पड़ता है और ताले को खोलने की व्यवस्था बनानी पड़ती है। जो उसे कर सका उसे फिर यह नहीं कहना पड़ा कि हम निरानन्द नीरस जीवन जीते हैं।
साधना से सिद्धि का तात्पर्य यदि लौकिक, सफलता, चमत्कार या ख्याति के रूप में देखा जायेगा तो उस परख प्रक्रिया को खोटी कहना पड़ेगा। हाँ आदर्शों की स्थापना में सफलता की बात कही जाय तो उसे तथ्यपूर्ण माना जायेगा। कितने ही महामानव ऐसे हुए है, जो जीवन भर कष्ट सहते रहे, घाटे में रहे, ठगे गये, पग-पग पर असफल हुए, तिरस्कृत एवं उपहासास्पद बने, फिर भी उन्होंने ऐसे आदर्शों की स्थापना की, जिनके पद चिह्नों पर चलकर असंख्यों ने प्रकाश पाया अपना जीवन धन्य बनाया। उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधना की यही सच्ची सिद्धि है कि उन कठिनाइयों की अग्नि परीक्षा में साधक खरा उतरे। प्रलोभन और भय उसे विचलित न कर सकें।
साधनाओं पर ही अवलम्बित है। वे उपाय, उपचार अन्तय प्रकार भी हो सकते हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उसे मनोमय कोश से साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
साधना द्वारा शरीरस्थ जैविक विद्युत को प्रखर बनाकर विकिरण का उपयोग इस दिशा में सफलतापूर्वक किया जाता रहा है। इन्द्र को जीतने में समर्थ वृत्रासुर की उत्पत्ति तथा राजा दशरथ के यहाँ राम भरत जैसी सुसन्तति की प्राप्ति ऐसे ही प्रयोगों द्वारा सम्भव हुई थी।
साधना प्रयोजन में इसी को कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं।
साधना प्रयत्नों द्वारा अपनी अलौकिक सिद्धियाँ-लौकिक जीवन में प्रकट कर सकने योग्य बन सकते हैं।
साधनाओं का वास्तविक उद्देश्य है। अँगारे पर चढ़ी राख की परत ही उसे धूमिल और निस्तेज बना देती है। यह परत हटते ही अंगारा फिर अपनी गर्मी और चमक का परिचय देने लगता है। निकृष्ट चिन्तन और घृणित कर्तृत्व से यदि हाथ खींच लिया जाय तो फिर आत्मिक प्रखरता के कारण उपलब्ध होने वाली असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों के मार्ग में और कोई बड़ा व्यवधान शेष नहीं रह जाता।
साधना का दूसरा क्षेत्र है। साहसिकता का संकल्प-शक्ति का-अभिवर्धन चिन्तन में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का मनोवेश करने वाली वे सद्विचारणाएं भी क्षेत्र में विकसित होती है जो चरित्रनिष्ठा विकसित करने के लिए उत्तरदायी है।
साधना इसी को कहते हैं।
साधना का ध्यान प्रमुख रहा है। फिर भी उन्हें दैवी अनुग्रह का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। यहाँ तक कि जटायु जैसे पक्षी और सेतुबन्ध के समय पुरुषार्थ करने वाली गिलहरी तक ने भगवान का प्यार प्राप्त हुआ था।
साधना एवं तत्व भावना को अपना कर ही जाना जा सकता है।
साधना नित्य-कर्म में सम्मिलित की गई है। संध्या वन्दन अध्यात्म साधना का अनिवार्य अंग है। ‘संध्या’ का कृत्य गायत्री उपासना के बिना नहीं हो सकता। इसके उपरान्त आगे की विशेष साधनाएँ अपनाई जाती। एक अनुष्ठान दूसरा पुरश्चरण।
साधना के लिए आवश्यक साधना क्रम में यह शरीर अपनी असमर्थता प्रकट करके साथ देने से कतराने न लगे। अन्नमय कोश शुद्ध ओर पुष्ट होने पर ही व्यक्ति साँसारिक उतार-चढ़ाव के बीच अपनी शरीर यात्रा सन्तुलित क्रम से चलाता हुआ, अपने आत्मिक लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से बढ़ सकता है।
साधना विज्ञान का केन्द्र बिन्दु गायत्री मन्त्र है। उसके सहारे ज्ञान की अध्यात्मिक विभूतियाँ और विज्ञान की भौतिक सिद्धियाँ उपलब्ध होती है। धर्म-शास्त्र का विकास विस्तार गायत्री के बीज मन्त्र से उद्भूत वट-वृक्ष ही माना जाता है जो कुछ जानने और पाने योग्य है उसे गायत्री के अंतराल में प्रवेश करके प्राप्त किया जा सकता है।
साधना का महत्त्व इसी दृष्टि से है कि हम जड़ के भीतर हर क्षेत्र में काम कर रहे चेतन के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ सके। पदार्थ का स्थूल उपयोग कर सकना ही पर्याप्त नहीं, उसकी मूल-सत्ता को हस्तगत किया जा सकें तो ही वास्तविक लाभ है। पाँच कोशों में प्रथम विशुद्ध पदार्थ परक है। दूसरे को पदार्थ का ऊर्जा क्षेत्र कह सकते हैं। प्रथम अन्नमय और दूसरा प्राणमय कोश है।
साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
साधना को भी उसी तरह जला देती है। जैसे कि तप्त बालू में लगाये गये पौधे मुरझाते और नष्ट होते हैं।
साधना की सिद्धि यही है। जीवन साधना का योगाभ्यास उसी प्रकार की सिद्धियों से भरा पूरा होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-December
साधना नहीं की थी, फिर उसे ऐसी सूक्ष्म अनुभूतियाँ क्यों होती थी, ऐसा प्रायः सबके साथ क्यों नहीं होता। एक ही उत्तर है- आत्मिक पवित्रता और पूर्वजन्मों के संस्कार। यह आवश्यक नहीं कि सूक्ष्म शक्तियाँ इस जीवन की साधना का ही परिणाम हों, वह पूर्वजन्मों की भी हो सकती हैं। इसकी पुष्टि स्वयं सैम के जीवन से होती हैं। उसके परिवार में और किसी भी व्यक्ति में ऐसा गुण नहीं था पर सैम वेन्जोन लिखते हैं कि- मेरे पुत्र में सम्भवतः वंशानुक्रम से यह गुण आ गये थे।
साधना मार्ग पर उत्तरोत्तर अग्रसर होते हुए इक्ष्वाकु के मन की बात जानने वाले मनु ने शिष्य के शीश पर हाथ फेरा और कहा- ‘विलापिनी’ अर्थात्- “वासनाओं का परित्याग कर।” इक्ष्वाकु ने अब अपनी इन्द्रियों पर कठोर प्रतिबन्ध लगाकर उन्हें वशवर्ती बनाना प्रारम्भ कर दिया। अस्वाद व्रत से जिह्वा पर विजय प्राप्त ही, उससे कामेन्द्रिय पर सहज ही नियन्त्रण हो गया। यह दो हो इन्द्रियाँ सशक्त थीं, उनके नियन्त्रण में आते ही इक्ष्वाकु का मन ईश्वरीयभूत होने लगा। वे घण्टों तन्मयतापूर्वक ब्राह्मी स्थिति में बैठे विचार-समाधि’ में विचरण करने लगे।
साधना का प्रयोजन और स्वरूप संक्षेप में बता दिया गया। वो हम सदा ही अपने मार्ग-दर्शक की कठपुतली रहे हैं और उन्हीं के इशारे पर नाचते रहे हैं, सो शेष, जीवन की रूपरेखा बनाने तथा निभाने में भी हमारा कोई वश नहीं है जो उनसे अब तक कहा और कराया सो हम करते रहे और बिना अपनी व्यक्तिगत इच्छा का समावेश किये, आगे भी करते रहेंगे। अभी जो संकेत प्राप्त हुए हैं और जो निश्चय किया गया हैं, उसकी रूप-रेखा उपरोक्त पंक्तियों में व्यक्त कर दी गई।
साधनाओं में ‘भैरवी-चक्र’ की साधना असामाजिक एवं अश्लील होने के कारण उसकी चर्चा नहीं की जाती और उसे अति युग रखा जाता हैं। रामकृष्ण परमहंस में अद्भुत शक्तियों का जागरण करने के लिए उनकी ताँत्रिक गुरु महायोगिनी ने ‘कुमारी पूजा’ की साधना कराई थी। उसके अश्लील क्रिया-कलापों में सहयोग देने के लिए परमहंस जी की धर्मपत्नी शारदामणि जी बड़ी कठिनाई से ही जनन सहज संकोचशीलता छोड़कर तैयार हुई थीं। आध्यात्मिकता का एक काम शास्त्र भी है। जिसके अनुसार कुन्ती द्वारा सर्वथा कुमारी होते हुए भी देव शक्यों का आह्वान कर सूर्य का प्रसाद करण, इन्द्र का प्रसाद अर्जुन, धर्मराज का प्रसाद युधिष्ठिर भौर वरुण का प्रसाद भीम उत्पन्न किया था।
साधना करते हुए भी मैं इच्छाओं के प्रवाह में बहता रहता। कभी भावनायें निष्काम हो जातीं तो भक्ति का आनन्द मिलता पर दूसरे ही क्षण धूप-छाँह की तरह परिस्थिति बदलती और कोई इच्छा आ खड़ी होती। एक दिन की बात है, दो अमेरिकन यात्री उस पहाड़ी पर चढ़ते हुए मेरी कुटी के पास एक आ गये, पूछने पर उन्होंने अमेरिका को रंगीनी के बढ़-चढ़कर समाचार बताये। मैं बड़ा प्रभावित हुआ। मुझे लगा वहाँ जीवित स्वर्ग हैं।
साधना किया करता था।”
साधना उपासना, यम-नियम, प्राणायाम, उपवास आदि के द्वारा शुद्ध होकर दिव्य-शक्तियों के संपर्क में आने लगता है, यह अनुभूतियाँ भी स्पष्ट होने लगती हैं।”
साधना का श्रीगणेश भी बसन्त-पंचमी से ही होगा। इस प्रकार हमारी व्यक्तिगत एवं मिशन की समस्त महत्वपूर्ण गतिविधियों का बसन्त-पंचमी ही हैं।
साधना कर-पड़ेगी। जब तुम यह दूसरा चरण भी पूरा कर लोगों, तब दीक्षा की पात्र बनोगी।
साधना पंच-कोशों के अनावरण की हैं, जिसकी ‘घोड़ी’ चर्चा गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में हैं और थोड़ा-सा मिश्रण अखण्ड-ज्योति के माध्यम से तीन वर्ष तक कर चुके हैं। अभी इस विद्या को सांक्तोपांक्त बताया जाना शेष हैं। उसी प्रकार तन्त्र मार्ग की गायत्री कुण्डलिनी कहलाती हैं। इसकी छुट-पुट चर्चा इन दिनों हम कर रहें हैं। अगले दिनों नैतिक साधकों को योग मार्ग की पंचकोश अनावरण साधना और तन्त्र मार्ग को कुण्डलिनी जागरण की समग्र शिक्षा भी अखण्ड-ज्योति के पूजा पर ही मिलेगी।
साधना के चरण
साधना का प्रकाश भी उसी गन्दगी में घुलकर नष्ट होता चला जाता है, जो बाहर तो निकलती नहीं, भीतर ही घुटती रहती हैं।
साधनाओं द्वारा अपने संकुचित प्राणों को विश्व प्राण में दिया जाये तो मनुष्य शरीर से वह सभी चमत्कार सम्बन्ध हो संसार की किसी भी अच्छी से अच्छी बार मशीन द्वारा भी सम्भव नहीं हैं।”
साधना पर निर्भर रही हैं, आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी कर आत्म-बल सम्पादित करने के पथ पर चल पड़ने का क्रम बन गया। और वह यथावत् 24 वर्ष तक चलता रहा।
साधना करने और गृह-परित्याग से पूर्व यह आवश्यक हैं कि जिन लोगों के प्रति अपने कर्त्तव्य है, उनकी पूर्ण स्वीकृति और सहमति प्राप्त की जाये। जब तक आप महाराज विस्विसार से आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेती, आप दीक्षा की अधिकारिणी नहीं।”
साधना थी। उन्होंने नृत्य की परमात्मा का वरदान मानकर शिरोधार्य किया था, सदैव हँसती-खेलती रहने के कारण उसके स्वास्थ्य में कभी कोई गड़बड़ी नहीं आई। 1767 में फ्राँस में एक ऐसी अभिनेत्री का निधन हुआ, जिसने 111 वर्ष की आयु पार कर ली थी। इस अभिनेत्री का जीवन सारमम्व अभिनेत्रियों से भिन्न था, साधन और सम्पत्ति की प्रचुरता होने पर भी अपने प्राकृतिक जीवन के आनन्द को नहीं छेड़ा, वह अधिकाँश नदियों या झरनों में स्नान करती, जंगलों में चूमने जाती, बाहर के कार्यक्रम न रहने पर भी घर में नृत्य इतना अभ्यास करती, जिससे शरीर का सारा मंज के रूप में निकल जाता। डेमोक्रिट्स 109 वर्ष का जीवन जीकर मरे, उन्होंने अपने जीवन में खराब मसाले और माँस का कभी उपयोग नहीं किया।
साधना और तन्त्र मार्ग को कुण्डलिनी जागरण की समग्र शिक्षा भी अखण्ड-ज्योति के पूजा पर ही मिलेगी। अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया जा वह शिक्षण सर्वथा सार्थक होगा और उससे अनेक प्रतिष्ठान भारी लाभ उठा सकेंगे।
साधना का समन्वय करना पड़ता हैं। तपश्चर्या हर प्रगतिशील और महत्वाकाँक्षी के लिए अनिवार्यतः आवश्यक हैं। इससे बचकर सरलतापूर्वक किसी के वरदान, आदर्शवाद स्वयं से कुछ महत्वपूर्ण कहीं जा सकने वाली उपलब्धि मिल सकना असम्भव हैं। यह तथ्य हमें किशोरावस्था के आरम्भ में ही समझा दिया गया था और बिना भटके- बिना समय गँवायें- अपने पथ प्रदर्शक के संरक्षण में गायत्री महामन्त्र के साथ अभीष्ट तपश्चर्या को सम्मिलित परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। कार्यों की गणना और उनकी व्यापकता एवं सफलता का उल्लेख करना यहाँ निरर्थक हैं।
साधना हैं, जो उसे कर सकें, उन दुस्साहसियों को इस संसार का अति सौभाग्यशाली व्यक्ति बनने का अवसर मिलता हैं।
साधना को-तत्व ज्ञान को-विडम्बना मात्र नहीं कहा जा सकता। अविश्वासियों को विश्वास करने के लिए हमारा प्रमाण प्रस्तुत किया जा सकता हैं। साहित्य सृजन, जन-जागृति, संगठन, परिवर्तन की प्रक्रिया, व्यक्तित्व की प्रखरता एवं दूसरों की अद्भुत सहायतायें कर सकने की अद्भुत गतिविधियाँ हमारे द्वारा सम्भव हो सकीं तो उसका एक मात्र कारण आध्यात्मिकता एवं तपश्चर्या की शक्ति ही हैं। इस शक्ति को उपलब्ध करने के लिए अविश्वासियों में भी विश्वास और उत्साह का संचार हो सकता हैं। यदि ध्यान पूर्वक, गम्भीरता के साथ हमारे छोटे से जीवन की उपलब्धियों को आँका जा सकें।
साधना की पूँजी भी उतनी मात्रा में शेष नहीं बची थी। अस्तु हर एक के हिस्से में थोड़ा-थोड़ा ही आया। इससे न उन्हें सन्तोष हो सका न हमें।
साधना जन्य उपलब्धियों के लिये न उनके पास समय था, न रुचि।
साधना में संलग्न हुए तो उसे सफल बनाने में प्रजापति ब्रह्म ने कूर्म बनकर उसका बोझ अपने ऊपर उठा लिया। प्रयत्न असफल न हो जाय-सुमेरु भी ने न धंसक जाय- इस आशंका को निरस्त करने के लिए कूर्म भगवान ने अवतार लिया और अपनी पीठ पर पर्वत जैसा भार उठा लिया साधन पथ के पथिकों का उत्तरदायित्व भगवान बहन करते हैं और सफलता का पथ पुरुषार्थ एवं निष्ठा क अनुरूप निरन्तर प्रशस्त होता चला जाता हैं। प्रथम चरण में ही चौदह रत्न नहीं निकल आये वरन् उसके लिए देर तक निष्ठापूर्वक मन्थन की प्रक्रिया जारी रखनी पड़ी। आध्यात्मिक साधनाओं में उतावली करने वाले अधीर व्यक्ति सफल नहीं होते, उसका लाभ तो धैर्यवान और श्रद्धा को मजबूती के साथ पकड़े रहकर विश्वासपूर्वक निर्दिष्ट मार्ग पर अग्रसर होते रहने वाले साधन नैष्ठिक साधक ही उठा पाते हैं।
साधना को मिलाकर 60 वर्ष का वर्तमान कार्यकाल पूरा हो चला। यह अवधि ऐसी बीती, जिस पर गर्व नहीं तो संतोष अवश्य किया जा सकता हैं। आध्यात्मिकता निरर्थक नहीं है, इसे जो कसौटी पर कसना चाहतें हों और प्रत्यक्ष प्रमाण देखना चाहते हों, वे हमारी उपलब्धियों को गम्भीरतापूर्वक खोजें, समझें और परखें। भौतिक साधनों से जो सम्भव न था, वह आत्म-बल से सम्भव हो सका। इस तथ्य को समझकर यह विश्वास किया ही जाना चाहिए कि साधना को-तत्व ज्ञान को-विडम्बना मात्र नहीं कहा जा सकता।
साधना असामाजिक एवं अश्लील होने के कारण उसकी चर्चा नहीं की जाती और उसे अति युग रखा जाता हैं। रामकृष्ण परमहंस में अद्भुत शक्तियों का जागरण करने के लिए उनकी ताँत्रिक गुरु महायोगिनी ने ‘कुमारी पूजा’ की साधना कराई थी। उसके अश्लील क्रिया-कलापों में सहयोग देने के लिए परमहंस जी की धर्मपत्नी शारदामणि जी बड़ी कठिनाई से ही जनन सहज संकोचशीलता छोड़कर तैयार हुई थीं। आध्यात्मिकता का एक काम शास्त्र भी है। जिसके अनुसार कुन्ती द्वारा सर्वथा कुमारी होते हुए भी देव शक्यों का आह्वान कर सूर्य का प्रसाद करण, इन्द्र का प्रसाद अर्जुन, धर्मराज का प्रसाद युधिष्ठिर भौर वरुण का प्रसाद भीम उत्पन्न किया था।
साधना और अगाध स्वाध्याय बोल रहा था। कात्यायनी ऐसी भाव-विभोर थी, जैसे कीट भृंग की मधुर गुञ्जार से विमोहित होकर अपना अस्तित्व भूल जाता हैं। वेणुनाद सुनकर सर्प लहराने लगता है। आत्मा का रस प्रवाह है ही ऐसा, जहाँ बहता हैं, वहाँ अमृत पेय का सा रसास्वादन कराता हैं। कात्यायती आत्म-विस्मृत बैठी शोण की वाणी का रस से रही थी।
साधना रत मनुष्यों के शरीरों का करण होता है, तब अन्न के सूक्ष्म संस्कार तक उन्हें प्रं करते है, इसलिये ईश्वर भक्त और उपासकों को सदैव ईमानदारी और परिश्रम से उपार्जित कमाई ही ग्रहण करने को कहा जाता है, यदि तुमने जिस खेत से फलियाँ तोड़ी थीं, उसके स्वामी से आज्ञा ले लेते तो यह दोष न सकता। अनजान में किसी भी वस्तु उठा सेना चोरी नहीं तो क्या हैं?”
साधना द्वारा उत्कृष्ट बनाते थे, तब उस भली प्रकार जीती हुई भूमि में चमत्कारी अध्यात्म विद्याओं की कृषि उगाई जाती थी। लोग धीरे-धीरे आलसी, असंयमी, स्वार्थी और संकीर्ण होते हैं। मात्र साधना सिद्धांत के आधार पर कोई व्यक्ति आत्म-बल से सम्पन्न नहीं हो सकता। जन्त्र–मन्त्र में घटिया स्तर के लोग कुछ सिद्धि, चमत्कार प्राप्त भी कर लें तो उनके द्वारा घटिया प्रयोजनों की ही पूर्ति हो सकती हैं और उनकी स्थिरता एवं सफलता भी स्वल्प कालीन एवं संदिग्ध बनी रहती हैं। यही कारण है कि प्रयोग करने पर भी लोगों को अध्यात्म विज्ञान के चमत्कारी लाभों से वंचित रहना पड़ता हैं।
साधना के फलस्वरूप चौदह रत्न उपलब्ध हुए थे- (1) लक्ष्मी, (2) कौस्तुभ मणि, (3) पारिजात पुष्प, (4) वारुणी, (5) धन्वन्तरि, (6) चन्द्रमा, (7) कामधेनु, (8) ऐरावत हाथी, (9) रम्भा-नर्तकी, (10) उच्चेश्रवा अश्व, (11) अमृत, (12) धनुष, (13) शंख, (14) विष। पौराणिक उपाख्यान के अनुसार उनमें से अधिकाँश रत्न देवताओं को उपलब्ध हुए। दैवी प्रकृति के व्यक्ति ही अपनी सत्पात्रता के आधार पर दिव्य विभूतियों का सदुपयोग करके लाभान्वित हो पाते हैं। दुष्प्रवृत्तियों वाले व्यक्ति उपलब्धियों को गँवा ही देते हैं और उन्हें प्रकृति के नियमानुसार खाली हाथ ही रहना पड़ता हैं।
साधना के दो पक्ष हैं-(1) योग, (2) तन्त्र योग-मार्ग में उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पंच-कोशों के अनावरण की हैं, जिसकी ‘घोड़ी’ चर्चा गायत्री महाविज्ञान के तृतीय खंड में हैं और थोड़ा-सा मिश्रण अखण्ड-ज्योति के माध्यम से तीन वर्ष तक कर चुके हैं। अभी इस विद्या को सांक्तोपांक्त बताया जाना शेष हैं। उसी प्रकार तन्त्र मार्ग की गायत्री कुण्डलिनी कहलाती हैं। इसकी छुट-पुट चर्चा इन दिनों हम कर रहें हैं। अगले दिनों नैतिक साधकों को योग मार्ग की पंचकोश अनावरण साधना और तन्त्र मार्ग को कुण्डलिनी जागरण की समग्र शिक्षा भी अखण्ड-ज्योति के पूजा पर ही मिलेगी।
साधना में प्रवेश भी कराया।
साधनाओं में तो कभी रणभूमि में। अवन्तिका (उज्जैन) की सेना बैताल भट्ट के बिना सूनी थी। बैताल की कोप-चण्डी शत्रुशिविरों को ऐसे सूना कर देती थी, जैसे तीव्र तूफान में कटी हुई फसलें उड़ जाती हैं और खेत सूने हो जाते हैं। आज तक उसकी शक्ति के सामने कोई भी राज्य टिका नहीं था। अवन्तिका यदि अजेय थी तो उसका सारा श्रेय एक मात्र बैताल भट्ट और उसकी सहायिका विषकन्या बसन्तिका को ही था।
साधना इसीलिये सफल नहीं होती कि उससे साधना का प्रकाश भी उसी गन्दगी में घुलकर नष्ट होता चला जाता है, जो बाहर तो निकलती नहीं, भीतर ही घुटती रहती हैं।
साधना शास्त्रों में इस प्रकार वर्णन किया गया है कि सब देवता गायत्री की उपासना एवं स्तुति करते हैं और उसी महाभण्डार से जो उपलब्ध करते हैं, उसका अनुदान अपने क्षेत्र में वितरित करते रहते हैं। इस संदर्भ में उपलब्ध अनेक विवरणों में से कुछ नीचे प्रस्तुत किये जाते हैं-
साधना करते हैं।
साधना के बीच अंकुरित हो उठे हैं, यदि उसे तप करने का अवसर मिले तो वह बीज बढ़कर वृक्ष का रूप ले सकते हैं। यह दंड जान-बूझ कर इसी उद्देश्य से दिया गया था। तप कराने के पीछे ऋषियों का उद्देश्य आत्म-प्रतिभा का विकास कराना ही होता था।
साधना के साधकों को यही करना चाहिए। इस मार्ग पर चलते हुए विभूतियों की जो अमृत मयी उपलब्धि होती हैं, वह विषाक्त न होने वाले इसका ध्यान रखना चाहिए।
साधनाओं द्वारा अपनी उस आन्तरिक शक्ति के विकास का भी उन्होंने निश्चय किया। स्वामी जी ने भी बताया कि जिसकी आत्मा जितनी शुद्ध व पवित्र होगी, वह उतनी ही दूर व भविष्य की बातें जानने लगता हैं। यह बात उपासना के प्रारम्भिक दिन से ही प्रारम्भ हो जाती है, सिद्धावस्था में तो जानने के लिये कुछ शेष रहता ही नहीं। साध दृष्टा-सर्वदर्शी बन जाता हैं।
साधनाओं में उतावली करने वाले अधीर व्यक्ति सफल नहीं होते, उसका लाभ तो धैर्यवान और श्रद्धा को मजबूती के साथ पकड़े रहकर विश्वासपूर्वक निर्दिष्ट मार्ग पर अग्रसर होते रहने वाले साधन नैष्ठिक साधक ही उठा पाते हैं।
साधना कराई थी। उसके अश्लील क्रिया-कलापों में सहयोग देने के लिए परमहंस जी की धर्मपत्नी शारदामणि जी बड़ी कठिनाई से ही जनन सहज संकोचशीलता छोड़कर तैयार हुई थीं। आध्यात्मिकता का एक काम शास्त्र भी है। जिसके अनुसार कुन्ती द्वारा सर्वथा कुमारी होते हुए भी देव शक्यों का आह्वान कर सूर्य का प्रसाद करण, इन्द्र का प्रसाद अर्जुन, धर्मराज का प्रसाद युधिष्ठिर भौर वरुण का प्रसाद भीम उत्पन्न किया था। अंजनि पुत्र पवनसुत हनुमान के पिता महत थे, इसलिए उन्हें मारुत भी कहा जाता हैं।
साधनात्मक जीवन का एक तीसरा प्रयोजन यह भी है कि जिन्हें पिछले दिनों से सुख-शान्ति, अगति और उज्ज्वल भविष्य के आश्वासन देते रहें हैं, उन अभिवचनों को पूरा कर सकने योग्य सामर्थ्य इकट्ठे करते। निश्चित रूप में हमें अपने लिए किसी उपलब्धि की अपेक्षा नहीं हैं। यहाँ तक कि स्वर्ग मुक्ति भी हमें नहीं चाहिए। जो अन्तःभूमि उपलब्ध हैं, वह अपने आप भी अमृत जैसी मधुर और प्रकाश जैसी निर्मल हैं, उसे पाकर और कुछ पाने को इस पंच-तत्वों से बने संसार में पानी शेष भी क्या रह जाता हैं? कल्पना के नाप पर यदि कुछ शेष हैं तो उसमें देश, धर्म समाज, संस्कृति के उत्कर्ष के अतिरिक्त व्यक्तिगत आकाँक्षा एक ही हो कि अपने प्रिय परिजनों के लिए कुछ ऐसे उपहार दे सकने में समर्थ हों, जो उनके आँसू पोंछने और मुसकान बढ़ाने के लिए कारगर सिद्ध हों।
साधना का ही परिणाम हों, वह पूर्वजन्मों की भी हो सकती हैं। इसकी पुष्टि स्वयं सैम के जीवन से होती हैं। उसके परिवार में और किसी भी व्यक्ति में ऐसा गुण नहीं था पर सैम वेन्जोन लिखते हैं कि- मेरे पुत्र में सम्भवतः वंशानुक्रम से यह गुण आ गये थे। उसका नाम टेड था। टेड मेरो आत्मा की आवाज को अच्छी तरह पकड़ लेता था।
साधना समुद्र-मन्थन की तरह हैं। उससे उपरोक्त चौदह रत्न हर साधक को मिल सकते हैं। अध और ऊर्ध्व ध्रुव केन्द्रों में वह सब कुछ भरा पड़ा हैं, जो संसार में कहीं भी विद्यमान हैं। सहस्रार और मूलाधार के रत्न भण्डारों की तिजोरी खोल सकने की चाबी का नाम ही कुण्डलिनी साधना हैं, जो उसे कर सकें, उन दुस्साहसियों को इस संसार का अति सौभाग्यशाली व्यक्ति बनने का अवसर मिलता हैं।
साधना को हैं, जिसे हमने अति निष्ठापूर्वक सम्पन्न किया और अपने मार्ग-दर्शक की पूँजी का अनुदान मिलाकर उसे एक महतम सामर्थ्य के रूप में उपलब्ध एवं प्रयुक्त किया। तप की महता बहुत हैं। इस संसार में जो कुछ महत्वपूर्ण हो रहा हैं, वस्तुतः उसके पीछे तपश्चर्या की शक्ति ही उन्नति रहती हैं। हमारे-हमारे मिशन के साफल्य का किसी को मूल्याँकन करना हो तो इस तथ्य को स्मरण रखना चाहिये कि हमारे व्यक्तिगत प्रयास और जनसहयोग के पीछे एक मात्र श्रेय उस तपश्चर्या को है, जो एक महती शक्ति के रूप में प्रस्फुटित एवं परिलक्षित होती रही।
साधना सिद्धांत के आधार पर कोई व्यक्ति आत्म-बल से सम्पन्न नहीं हो सकता। जन्त्र–मन्त्र में घटिया स्तर के लोग कुछ सिद्धि, चमत्कार प्राप्त भी कर लें तो उनके द्वारा घटिया प्रयोजनों की ही पूर्ति हो सकती हैं और उनकी स्थिरता एवं सफलता भी स्वल्प कालीन एवं संदिग्ध बनी रहती हैं। यही कारण है कि प्रयोग करने पर भी लोगों को अध्यात्म विज्ञान के चमत्कारी लाभों से वंचित रहना पड़ता हैं। धूर्तता के आधार पर सिद्धि दिखावे और चमत्कार बताने की प्रवंचना कितने ही लोग करते रहते हैं और भोले लोगों को बहकाते रहते हैं पर वस्तुतः जा आत्म बल प्रकट करने और उसका उपयोग सिद्ध करने की चुनौती स्वीकार कर सकें, ऐसे लोग नहीं के बराबर हैं। भारत में समाधि लगाने और गडे में बैठने की बाजीगरी बहुत से लोग दिखाते हैं पर सचाई परखने की चुनौती जब वैज्ञानिकों ने दी ता कोई भी परख की आग पर खड़ा होने की तैयारी न हुआ।
साधना करने का साहस व्यक्ति कर सकता हैं, सन्त और ऋषि बनने का अधिकारी भी वही बन सकता हैं। उत्तराधिकार में पाया हुआ धन और बिना परिश्रम पाया हुआ सम्मान व्यक्ति के अहंकार को बढ़ाकर उसके पतन का ही कारण बनता हैं, इसलिये दूरदर्शी ऋषि भला ऐसी झूठी सिद्धि और सम्मान का क्यों महत्व देते? कवष ने नेको का मार्ग अपनाया था, उसके लिये सराहा जाना उचित ही नहीं अनिवार्य भी था, सामाजिक जीवन में अच्छाइयों की बेल सम्मान और सराहना के जल से ही बढ़ती और फलती फूलती है, सो उसे सम्मान दिया जाना ठीक ही था पर इतना नहीं कि वह आत्म-कल्याण और लोक-हित सम्पादन के लिये अपनी अब तक की योग्यता को पर्याप्त मानकर पाँडित्य का झूठा प्रदर्शन करने लगता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-September
साधना-कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना-प्रकोष्ठ के तीन सोपान भी उनसे चढ़े न जा सके। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गये। उनका कृश-मात भगवती गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरा। ऋषि अचेत हो गये स्त्र धौम्य।
साधना है।
साधना का यही उद्देश्य है। यह वनवास की तरह घर में रहकर भी की जा सकती। वानप्रस्थ इसी प्रयोजन के लिए है। लोक-मंगल में सेवा संदर्भ में संलग्न रहने से आत्म-विकास होता है। जिस स्वार्थपरता के साथ हम अपने निजी प्रयोजनों में अब तक लगे रहे, उसी तत्परता के साथ लोक-मंगल और परमार्थ प्रयोजन में रस लेने लगें तो समझना चाहिये कि आत्म-विकास की प्रक्रिया चल पड़ी।
साधना का यही क्रम है और भारतीय परम्परा के अनुरूप हमारा ढलता जीवन-पचास से पचहत्तर तक की आयु इसी में नियोजित होनी चाहिये।
साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
साधनायें अपेक्षित है क्योंकि उनकी अनुभूति में समय लगाना आवश्यक है। ब्रह्माण्ड की तुलना की तरह चेतन परमाणु इतना छोटा है कि यदि उसके नाभिक का व्यास 1/10 मिलीमीटर मानें तो पूरा परमाणु एक भव्य इमारत जैसा लगेगा और बैक्टीरिया जिसका व्यास ऊपर दिया है इतना बड़ा लगेगा जितनी लंदन से बर्लिन की दूरी। अमीबा जो सबसे छोटा एक कोशिकीय जीव है इतना बड़ा होगा कि उसे पृथ्वी की गोलाई में दो बार आसानी से लपेटा जा सकेगा। उस तुलना में मनुष्य इतना बड़ा होगा कि पृथ्वी में खड़ा होकर बड़े आराम से सूर्य को पकड़ ले तब पृथ्वी इतनी बड़ी होगी कि दोनों ध्रुवों के बीच की दूरी प्रकाश की गति से चलकर पूरी की जाये तो पूरे दो वर्ष लग जायें। एक ओर ब्रह्माण्ड की यह विशालता एक ओर जीवन की यह लघुता दोनों पर विचार करते हैं तो ऋषियों की ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ वह अणु से भी छोटा और ब्रह्माण्ड के समान विशाल है, की उक्ति को ही शिरोधार्य करना पड़ता है।
साधना के लिए तथा अन्तिम 25 वर्ष घर परिवार को मोह, ममता से छुटकारा पाकर परि भ्रमण करते हुए विश्व-मानव के लिए-परमात्मा के लिए अपना पूर्णतया समर्पण करने के लिए है। इन चार अवधि विभाजन को चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास कहते हैं। यह ऐसा संतुलित विभाजन है कि जब तक उसे क्रियान्वित किया जाता रहा, यह देश संसार वासियों की दृष्टि में स्वर्ग और इस देश का नागरिक देवता की तरह आदर्श एवं अभिनन्दनीय माना जाता रहा। जीवन का यह विभाजन क्रम प्राचीनकाल की तरह आज भी आवश्यक एवं उपयोगी है।
साधना का अभाव हो तो देखना, उसे पूरा करना। अब यह शरीर बहुत थक गया है।” यह कहते-कहते उनकी आंखें भर आई धौम्य
साधना थी वहाँ देखते-देखते मादकता, वैभव और विलास खेलने लगा।
साधना द्वारा मिलने वाली प्रारम्भिक सिद्धियों को बाधक माना गया है। जिस प्रकार धन-वैभव ऐश्वर्य और सौंदर्यवान युवती पत्नियों का सुख पाकर मनुष्य संसार को ही सब कुछ समझ लेता है उसी प्रकार कुण्डलिनी का साधक भी बीच के ही छः चक्रों में दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूसरों के मन की बात जानना, भविष्य दर्शन आदि अनेक सिद्धियाँ पाकर उनमें ही आनन्द का अनुभव करने लगता है और परम-पद का लक्ष्य अधूरा ही रह जाता है।
साधना, आपका ज्ञान, आपका ब्रह्म-वर्चस्व विश्व के कल्याण के लिये है भगवन्। पर यह कहाँ सम्भव है कि आप सुदूर प्रान्तों का निरन्तर परिव्राजन करें और लोभों की ज्ञान-पिपासा को तृप्त करें। गुरुकुल को स्थापना करनी ही होगी देव। उसके बिना भावी पीढ़ी का आध्यात्मिक प्रशिक्षण किस प्रकार सम्भव होगा? आप ही तो कहते हैं कि धर्म-तत्त्व का प्रशिक्षण और प्रसार किये बिना प्रजा का नैतिक, चारित्रिक, सैद्धान्तिक और आत्मिक विकास नहीं हो पाता।
साधना में नियमित रूप से कम-से-कम चार घण्टा समय देना चाहिए प्रातः और सायंकाल का समय व्यक्तिगत साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
साधना देख मुग्ध हो जाते थे।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा में लगाना चाहिये। यहीं पूर्णता के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है। ब्रह्मचारी अवधि में लौकिक जीवन की प्रगति एवं स्थिरता के लिए तैयारी की गई थी। वानप्रस्थ में आध्यात्मिक जीवन की-परमात्मा-विश्व-मानव की सेवा-साधना करने के लिए अग्रसर होते हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण समय है।
साधना करने के लिए अग्रसर होते हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण समय है। इसमें बच्चे भी सुयोग्य बनते हैं, अपनी आन्तरिक प्रगति का भी अवसर मिलता है और उसी अवधि में लोक-मंगल के वे महत्त्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं, जिनके ऊपर किसी समाज या राष्ट्र की वास्तविक प्रगति निर्भर रहती है।
साधना-प्रकोष्ठ के तीन सोपान भी उनसे चढ़े न जा सके। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गये। उनका कृश-मात भगवती गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरा। ऋषि अचेत हो गये स्त्र धौम्य। भागते हुये आये।
साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है इसलिये इसे “दशम द्वार” या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं। ध्यान बिन्दु उपनिषद् में कहा है-
साधना के स्वरूप पर निर्भर है कि वह सहस्रार में कितने समय तक रहता है उसके बाद वह फिर निम्नतम लोकों के सुखों में जा भटकता है पर जो अपने सहस्रार को पका लेते हैं वह पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त कर अनन्त काल तक ऐश्वर्य सुखोपभोग करते हैं।
साधना करनी होती है।
साधना का परिणाम एक कन्या के रूप में छोड़ कर। विश्वामित्र ने बिलखती आत्मजा के पास भी मेनका को नहीं देखा तो उनकी देह क्रोध से जलने लगी पर अब हो ही क्या सकता? मेनका इन्द्रपुर जा चुकी थी।
साधना को करते हुए आत्म-कल्याण पूर्णता की प्राप्ति और ईश्वरीय प्रकाश की उपलब्धि का पूरा लाभ एवं आनन्द उठा सकता है। सत्कर्मों से हो शुभ संस्कार बनते हैं और वे ही हमारी प्रधान आध्यात्मिक पूँजी है। सद्भावना अभिवर्द्धन की लोक-सेवा उसी प्रयोजन की पूर्ति करती है। वानप्रस्थ में साधु ब्राह्मणों जैसी लोक-मानस को परिष्कृत करने की सेवा, साधना करनी होती है।
साधना का अविच्छिन्न अंग है। इस साधना को करते हुए आत्म-कल्याण पूर्णता की प्राप्ति और ईश्वरीय प्रकाश की उपलब्धि का पूरा लाभ एवं आनन्द उठा सकता है। सत्कर्मों से हो शुभ संस्कार बनते हैं और वे ही हमारी प्रधान आध्यात्मिक पूँजी है। सद्भावना अभिवर्द्धन की लोक-सेवा उसी प्रयोजन की पूर्ति करती है। वानप्रस्थ में साधु ब्राह्मणों जैसी लोक-मानस को परिष्कृत करने की सेवा, साधना करनी होती है।
साधनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।
साधना आरम्भ की। उसने 40 हजार पुस्तकें पढ़ीं। कुछ ग्रन्थ तो उसे केवल एक बार ही सुनाये गये थे। उसके मस्तिष्क में ज्ञान का अनन्त भण्डार जमा हो गया। वह ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर देता था जो कभी औरों की कल्पना में भी न आते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-January
साधना का स्थान अविमुक्त क्षेत्र आधिभौतिक स्थान है और भौहों तथा नासिका का संधि-स्थान (यहीं मन का ध्यान किया जाता है) आध्यात्मिक काशी है, वहीं ज्ञानी यथार्थ ज्ञानोपदेश में समर्थ हो सकता है। यही सबसे बड़ा तीर्थ और देवताओं के लिये भी पवित्र हैं, यही परमात्मा प्राप्ति का स्थल है। यहाँ से जब प्राणी के प्राण निकलते हैं तो अमृतत्व की प्राप्ति होती है।” मनोमय शक्ति की यही साधना सही अर्थों में अभीष्ट भी हे, चमत्कारों से कुछ भला नहीं होता।
साधनायें कभी निष्फल नहीं जाती।
साधना शीघ्र पूरी नहीं की जा सकती। स्तर के अनुरूप ही पर्याप्त समय, धैर्य, पुरुषार्थ एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति धीरे धीरे अपने बाह्य जीवन के परिष्कार से प्रारम्भ होती है। बाह्य की उपेक्षा कर सहसा है, जिसमें सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
साधना से कारूसो ने संगीत साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाई और यह प्रमाणित कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।
साधना पथ पर कदम बढ़ा। शरीर किसी भी दिन पैदा हुआ हो हमारा आध्यात्मिक जन्मदिन यही है। जैसे संन्यासी होने के बाद पिता का नाम विसर्जित और गुरु नाम अपने नाम के आगे जोड़ा जाना आरम्भ हो जाता है। उसी प्रकार हमारा जन्म-दिन बसन्त पंचमी है। उसी दिन जहाँ कहीं हर्षोत्सव मनाये जाते वाले होते हैं, मनाये जाते हैं।
साधना कर पाते है और अलौकिक सिद्धियों को प्राप्त करते है। यह साधना न सामान्य है और न सर्वसाधारण के वश की।
साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि वह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गई है। अब भी यदाकदा, यत्र-तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सुने जाते है। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है। वैसे योग का स्वांग दिखा कर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रगें सियार तो बहुत देखे जाते है।
साधना’ इसे ही कहते हैं, उसके लाभ अनन्त हैं पर पूर्व में मनोविग्रह और उस शक्ति को आत्मा में नियोजित करना अत्यावश्यक है।
साधनाओं का उद्देश्य इसीलिये अन्तःकरण की शुद्धि रखा गया हैं। कामनायें, वासनायें, अहंभाव समाप्त हो जाते हैं तो जीव अपने-आप परमगति को प्राप्त कर लेता है, इस साधना में यदि कहीं पूर्ण सफलता न मिले तो भी उपरोक्त कथन यह बताते हैं कि आत्मा लोकों में रहकर पुनर्जन्म के रूप में प्रकट होती हैं, वहाँ उसे अगले विकास की परिस्थितियाँ अनायास ही मिल जाती है।
साधना करने लगे थे।
साधना करता है और ज्ञान संचय कर लेता है, वह पुनर्जन्म में उन संस्कारों को अनायास ही प्राप्त कर लेता है। यह संस्कार उसे ईश्वर प्राप्ति में सहयोग देते है।
साधना का पथ प्रशस्त होता है। हम सबको इसी सरल एवं साध्य अध्यात्म को लेकर क्रम क्रम से आगे बढ़ना चाहिये। सहसा आदि से अन्त पर कूद जाने का प्रयत्न करना एक ऐसी असफलता को आमन्त्रित करना है, जिससे न तो ठीक से जीवन जिया जा सकता है और न उच्च स्तरीय साधना को सामान्य बनाया जा सकता है।
साधना अथवा थोड़े से कर्मकाण्ड द्वारा पूरी कर लेने की आशा करने वाले बाल-बुद्धि के व्यक्ति ही माने जायेंगे। यह उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधना शीघ्र पूरी नहीं की जा सकती। स्तर के अनुरूप ही पर्याप्त समय, धैर्य, पुरुषार्थ एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति धीरे धीरे अपने बाह्य जीवन के परिष्कार से प्रारम्भ होती है। बाह्य की उपेक्षा कर सहसा है, जिसमें सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि वह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गई है। अब भी यदाकदा, यत्र-तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सुने जाते है। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है। वैसे योग का स्वांग दिखा कर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रगें सियार तो बहुत देखे जाते है। किन्तु उच्च स्तरीय अध्यात्म विद्या की पूर्वोक्त वैज्ञानिक पद्धति से सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने वाले सच्चे योगी नहीं के बराबर ही है।
साधना न सामान्य है और न सर्वसाधारण के वश की।
साधना सतत जारी रखी और एक दिन उसकी बौद्धिक प्रतिभा इस योग्य हुई कि ब्रिटिश सरकार ने उसे मद्रास हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया। वह बालक- सर टी. एस. मुत्तुस्वामी अय्यर पहले भारतीय थे, जिनको इस तरह का कोई महत्त्वपूर्ण पद प्रदान किया गया।
साधना सही अर्थों में अभीष्ट भी हे, चमत्कारों से कुछ भला नहीं होता।
साधना समय साध्य तो है पर जोखिम नहीं है।
साधना में तीन व्यक्तियों को कभी कभी रात में ऐसे कुछ स्वप्न हो जाते हैं जिसमें उन्हें किसी भविष्य की घटना का पूर्वाभास मिल जाता है या किसी गोपनीय रहस्य का पता चल जाता है। वह कुण्डलिनी की ही शक्ति होती है।
साधना और यज्ञादि पुण्य कर्मों को नष्ट करने वाले ‘येष्टिह’ नामक मुहूर्ताभिमानी देवता निवास करते है, उनसे छुटकारा मिलने पर विरजा नाम की नदी मिलती है, जिसके दर्शन मात्र से वृद्धावस्था नष्ट हो जाती है। इससे आगे इला नाम की पृथिवी का स्वरूप इह्म नामक वृक्ष है, उससे आगे एक नगर है, जिसमें अनेकों देवता निवास करते है। उसमें बाग बगीचे, नदी-सरोवर बावड़ी, कुएँ आदि सब कुछ है.......।
साधना में यदि कहीं पूर्ण सफलता न मिले तो भी उपरोक्त कथन यह बताते हैं कि आत्मा लोकों में रहकर पुनर्जन्म के रूप में प्रकट होती हैं, वहाँ उसे अगले विकास की परिस्थितियाँ अनायास ही मिल जाती है।
साधना है। उन शक्तियों के प्रबोधन की प्रक्रिया है, जो मनुष्य के अन्तःकरण में बीज रूप में सन्निहित रहती है। आत्मिक अध्यात्म के उस क्षेत्र में एक से एक बढ़कर सिद्धियाँ एवं समृद्धियाँ भरी पड़ी है। किन्तु उनकी प्राप्ति तभी सम्भव है, जब मन, बुद्धि, चित, अहंकार से निर्मित अन्तःकरण पंचकोशों, छहों चक्रों, मस्तिष्कीय ब्रह्म-रन्ध्र में अवस्थित कमल, हृदय स्थित सूर्यचक्र, नाभि की ब्रह्म-ग्रन्थि और मूलाधार वासिनी कुण्डलिनी आदि के शक्ति संस्थानों और कोश-केन्द्रों को प्रबुद्ध, प्रयुक्त और अनुकूलता पूर्वक निर्धारित दिशा में सक्रिय बनाया जा सके। यह बड़ी गहन, सूक्ष्म और योग साध्य तपस्या है।
साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती है। वह सर्व सामान्य लोगों के लिये सम्भव नहीं। उन्हें इस तपसाध्य अध्यात्म में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिये। उनके साधारण पूजा-पाठ का जो कि जीवन का एक अनिवार्य अंग होना चाहिये, अपनी तरह से लाभ मिलता रहेगा।
साधना ही सम्भव है। इस स्तर से शुरू किए बिना काम भी तो नहीं चल सकता। बाह्य जीवन को यथास्थिति में छोड़कर आत्मिक स्तर पर पहुँच सकना भी तो सम्भव नहीं है। अस्तु हमें उस अध्यात्म को लेकर ही चलना होगा, जिसे जीवन जीने की कला कहा गया है।
साधना के सिद्ध पुरुष देखे सुने जाते है। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है। वैसे योग का स्वांग दिखा कर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रगें सियार तो बहुत देखे जाते है। किन्तु उच्च स्तरीय अध्यात्म विद्या की पूर्वोक्त वैज्ञानिक पद्धति से सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने वाले सच्चे योगी नहीं के बराबर ही है। जिन्होंने साहसिक तपस्या के बल पर आत्मा की सूक्ष्म शक्तियों को जागृत कर प्रयोग योग्य बना लिया होता है, वे संसार के मोह जाल से दूर प्रायः अप्रत्यक्ष ही रहा करते है।
साधना के लिये पहुँचे थे। इस नियम का-कि पहले बाह्य जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म का समावेश करके उसे सुख शान्तिमय बनाया जाय। इस प्रसंग में जो भी पुण्य परमार्थ अथवा पूजा उपासना अपेक्षित हो उसे करते रहा जाये। लौकिक जीवन को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बना लेने के बाद ही आत्मिक अथवा अलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय-उल्लंघन करने वाले कभी सफलता के अधिकारी नहीं बन सकते। लौकिक जीवन की निकृष्टता आत्मिक जीवन के मार्ग में पर्वत के समान अवरोध सिद्ध होती है।
साधना को सामान्य बनाया जा सकता है।
साधनायें प्रारंभ कर दीं, उसे उन संस्कारों का लाभ अब नहीं तो कालांतर में मिलेगा अवश्य। साधनायें कभी निष्फल नहीं जाती।
साधना का फल है। कुछ दिनों पूजा-पाठ करने अथवा जीवन भर यों ही कार्यक्रम के अंतर्गत पूजा करते रहने पर भी ऋषियों वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। उस स्तर की साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती है। वह सर्व सामान्य लोगों के लिये सम्भव नहीं। उन्हें इस तपसाध्य अध्यात्म में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिये।
साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाई और यह प्रमाणित कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।
साधना की। जब एक बार एक शिक्षक ने यहाँ तक कह दिया कि तुम्हारा स्वर संगीत के योग्य है ही नहीं। तुम्हारा स्वर लड़खड़ाता है। पर निरन्तर अभ्यास और साधना से कारूसो ने संगीत साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाई और यह प्रमाणित कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।
साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा। देश का ऋषि वर्ग उसी समय की देन है। जो-जो पुरुषार्थी इस सूक्ष्म साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि वह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गई है। अब भी यदाकदा, यत्र-तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सुने जाते है।
साधना करते है। जो साधक इस प्रकार जानने वाला है कि अव्यक्त ब्रह्म की साधना का स्थान अविमुक्त क्षेत्र आधिभौतिक स्थान है और भौहों तथा नासिका का संधि-स्थान (यहीं मन का ध्यान किया जाता है) आध्यात्मिक काशी है, वहीं ज्ञानी यथार्थ ज्ञानोपदेश में समर्थ हो सकता है। यही सबसे बड़ा तीर्थ और देवताओं के लिये भी पवित्र हैं, यही परमात्मा प्राप्ति का स्थल है। यहाँ से जब प्राणी के प्राण निकलते हैं तो अमृतत्व की प्राप्ति होती है।” मनोमय शक्ति की यही साधना सही अर्थों में अभीष्ट भी हे, चमत्कारों से कुछ भला नहीं होता।
साधना करने से दैवी वरदान भी मिलते है और ऋद्धि-सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। किन्तु वह उच्च स्तरीय सूक्ष्म-साधना का फल है। कुछ दिनों पूजा-पाठ करने अथवा जीवन भर यों ही कार्यक्रम के अंतर्गत पूजा करते रहने पर भी ऋषियों वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। उस स्तर की साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती है। वह सर्व सामान्य लोगों के लिये सम्भव नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-June
साधना के लिए हमें अविज्ञात आवरण में जाना है, उसका उद्देश्य नवनिर्माण के अनुरूप व्यक्तियों एवं परिस्थितियों का सृजन करना ही है। तप प्रचण्ड शक्ति उत्पन्न होती है, जो जन मानस की किया भीड़ सकें। अज्ञानांधकार की तमिस्रा में डूबी हुई दिग्भ्रान्त लोक चेतना को प्रगति के राजमार्ग पर अग्रसर करने हेतु जिस प्रकाश ओर जिस बल की आवश्यकता होती है उस तप साधना से ही उत्पन्न किया जाता रहा है। हम अपनी विशेष तपश्चर्या आरम्भ करने जा रहे है। दोनों ही पक्ष मिलकर एक ऐसा अभिनव सूक्ष्म वातावरण उत्पन्न करेंगे, जिससे युग परिवर्तन के उपयुक्त परिस्थितियाँ विश्व चेतना के अन्तराल में उद्भूत हों सकें।
साधना में संलग्न कर सकें।
साधना से बढ़कर और कोई साधना नहीं, उसमें आदि से लेकर अन्त तक मधुरता ही मधुरता, सौंदर्य ही सौंदर्य हैं, किन्तु वह सौंदर्य और माधुर्य संसार के किसी एक पदार्थ या परिस्थिति में उपलब्ध नहीं हो सकती। जीव स्वयं लघु है, उसकी तरह ही हर कण छोटा और अभाव की स्थिति में है, सबका सम्मिलित भाव परमात्मा हैं, प्रेम उसका निर्विवाद और निर्भय स्वरूप है इसीलिये हम प्रेम को पवित्र बनाकर ही अपनी लघुता को विभुतायें बदल सकते है। परमात्मा के प्रेम में ही वह शक्ति हैं, जो जीव को सामान्य अवस्था में भी असामान्य रस माधुर्य और आनन्द प्रदान करती है।
साधना चल रही हैं, वही प्राचीनकाल में चिरकाल तक यहाँ विद्यमान रहा है और एकता समता और ममता की गंगा यमुना, सरस्वती यहाँ बहती रही है। अस्तु भारतीयता में विश्व धर्म एवं विश्व संस्कृति के बीज विद्यमान परिलक्षित हैं तो इसमें आश्चर्य की कुछ बात नहीं है।
साधना और योग विद्या के सुनिश्चित सिद्धान्त है, जो मूलरूप से आत्मा के सूक्ष्म ‘तत्वदर्शन’ पर आधारित है। पातंजलि योग में बहुत-सी सिद्धियों का वर्णन है, जो केवल मन की स्वच्छता से प्राप्त की जाती है, उनमें से पूर्वजन्म का ज्ञान, दूरस्थ व्यक्ति का ज्ञान, अदृश्य और दूसरे चित्त का ज्ञान आदि भी है। उसके कारण पर योगवाशिष्ठ में इस प्रकार प्रकाश डाला है-
साधनाओं का इतना बाहुल्य नहीं था वहाँ तब इस संसार में इतने दुखों, दोषों, द्वंद्वों तथा द्वेषों के साथ रोग-शोक तथा सन्तापों का भी बाहुल्य नहीं था। आज जैसे अभाव असन्तोष, अल्पता, असहनीयता, अहंकार, अबोधता, असत्य अथवा शोषण छल-कपट, छीना-झपटी, स्वार्थ एवं संकीर्णता का बोल बाला पूर्वकाल में रहा है-इसके भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होते। जीवन साधनों की प्रचुरता के बीच भी मनुष्य का जीवन आज जितना अशान्त एवं अभाव ग्रस्त है, उतना पहले कभी नहीं रहा। साधनों की न्यूनता एवं अल्पता में भी अपेक्षा नहीं अधिक प्रसन्न, पुष्ट तथा सुखी थे।
साधना में 20 वर्ष लोक मंगल के आन्दोलनात्मक अभियान में बीते अब एकांत तपश्चर्या में उस शक्ति का उद्भव सन्निहित है, जो सजग संस्कारवान आत्माओं में से व्यामोह भरे कषाय कल्मषों को हटाकर उन्हें ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में नव निर्माण की साधना में संलग्न कर सकें।
साधना नहीं, उसमें आदि से लेकर अन्त तक मधुरता ही मधुरता, सौंदर्य ही सौंदर्य हैं, किन्तु वह सौंदर्य और माधुर्य संसार के किसी एक पदार्थ या परिस्थिति में उपलब्ध नहीं हो सकती। जीव स्वयं लघु है, उसकी तरह ही हर कण छोटा और अभाव की स्थिति में है, सबका सम्मिलित भाव परमात्मा हैं, प्रेम उसका निर्विवाद और निर्भय स्वरूप है इसीलिये हम प्रेम को पवित्र बनाकर ही अपनी लघुता को विभुतायें बदल सकते है। परमात्मा के प्रेम में ही वह शक्ति हैं, जो जीव को सामान्य अवस्था में भी असामान्य रस माधुर्य और आनन्द प्रदान करती है।
साधना से ही उत्पन्न किया जाता रहा है। हम अपनी विशेष तपश्चर्या आरम्भ करने जा रहे है। दोनों ही पक्ष मिलकर एक ऐसा अभिनव सूक्ष्म वातावरण उत्पन्न करेंगे, जिससे युग परिवर्तन के उपयुक्त परिस्थितियाँ विश्व चेतना के अन्तराल में उद्भूत हों सकें। जन आन्दोलन की स्थूल प्रक्रिया का सूत्र संचालन मथुरा से हो रहा है और शतसूत्री कार्यक्रमों के आधार पर हजारों शाखाओं में संगठित एवं संबद्धता 50 लाख व्यक्ति उस प्रयोजन की पूर्ति में अपने अपने ढंग से संलग्न है। नवनिर्माण का महान प्रयोजन ईश्वरीय निर्देशोँ और संकेतों के आधार पर चल रहा है।
साधना में लग गई, अब जो दिन शेष है उनकी गतिविधियाँ भले ही भिन्न प्रकार की दीखें पर उनकी दिशा यही है। जीवन के प्रथम चरण 24 पुरश्चरणों की साधना में 20 वर्ष लोक मंगल के आन्दोलनात्मक अभियान में बीते अब एकांत तपश्चर्या में उस शक्ति का उद्भव सन्निहित है, जो सजग संस्कारवान आत्माओं में से व्यामोह भरे कषाय कल्मषों को हटाकर उन्हें ईश्वरीय प्रयोजन की पूर्ति में नव निर्माण की साधना में संलग्न कर सकें।
साधनाओं के बाद यह देखा था कि मनोमय जगत् की सूक्ष्म वासनाओं का प्राण-शरीर और प्राण-शरीर का अन्नमय शरीर से कितना गहरा संबंध हैं, अन्नमय शरीर का दोष मनोमय जगत को दूषित करता है तो मनोमय जगत अन्नमय शरीर को। स्थूल शरीर जब नहीं रहता हैं, जीव चेतना शरीर को छोड़ देती है तब भी विकृत-संस्कार मस्तिष्क में छाये रहते हैं और वह जब किसी नये शरीर में पदार्पण करते हैं तो दुर्भावनाओं की तीव्र प्रक्रिया उसे अनजान में ही दूषित और अशक्त कर डालती है। हम उस रोग का कारण समझ नहीं पाते, भगवान् को दोष देते हैं पर प्रकृति इतनी कठोर और अनुशासित है कि बुरी भावनाओं का प्रभाव जब तक स्थूल रूप से समाप्त नहीं हो लेता, तब तक वह मनुष्य चाहे कितना ही अपना स्वभाव बदल कर सतोगुणी कर ले, तब तक व्याधियों से छुटकारा नहीं मिलता। सद्गुणों के धारण और मन को रचनात्मक विचारों में डालने के फल से वंचित रहना पड़ता हो ऐसी बात भी नहीं हैं, उसका भी परिपाक एक दिन जीवन में सुख, स्वास्थ्य और प्रसन्नता बनकर आता है, उस अवधि में उससे धैर्य और सन्तोष भी मिलता है पर तुरन्त सतोगुणी या भगवान् का आश्रय लेकर भी कोई उन कुसंस्कारों के प्रभाव से बच नहीं सकता। भोग तो भोगना ही पड़ता है।
साधना सम्भव हो स्वयं पूरी की जाये, यदि और कोई इच्छानुकूल साथ न दे तो उसे दोषी क्यों ठहराया जायें?”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-May
साधना अच्छी तरह चल रही थी, उन्हें आत्म ज्ञानी गुरु मिल जाने पर बड़ा संतोष था। लेकिन एक बात उन्हें बराबर परेशान किये थी कि उनके गुरु रात्रि में अदृश्य क्यों रहते है।
साधना और तपस्या से ही उन्हें आत्मानुभूति हुई। उनका मुख मण्डल सौंदर्य और आत्मानन्द से खिल उठा। अब उन्हें संसार के अणु-अणु में आनन्द प्राप्त करती हुई, अपनी ही आत्मा दिखाई देने लगी। सब दुःख द्वन्द्व छूट गये। प्रसन्नता ही प्रसन्नता, उल्लास ही उल्लास, शांति और आनन्द उनके जीवन में भर गया।
साधना आदि कर्मकाण्डों का-मनः क्षेत्र में ध्यान, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग आदि का और अन्तःकरण क्षेत्र में भाव तन्मयता, दृष्टि परिष्कार, समक्ष, समाधि तय, वैराग्य आदि निष्ठाओं का अपना महत्व है। इन प्रकरण को भी वाधि विषानपूर्वक अनुभव मार्ग-दर्शन में अग्रसर किया जाना चाहिये। आस्मिक प्रगति के लिये इनकी भी आवश्यकता है और उनके लिये समुचित प्रयत्न परिश्रम होना चाहिये, किन्तु यह नहीं मान बैठना चाहिये किम उपासना पद्धतियों का डडडड ही आत्मा कल्याण एवं देव अनुग्रह प्राप्त कर लेने के लिये पर्याप्त है। तथ्य यह है कि उपासना के साथ साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त।
साधना की उपेक्षा की गई और पूजा-पद्धति के सहारे लम्बे-चौड़े सपने देखे गये तो अन्य असंख्य जाल-जंजालों में भटकने वालों की तरह हमें भी खाली हाथ रहना पड़ेगा “हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया और जिस दिन से उस क्षेत्र में प्रवेश किया, दोनों ही प्रक्रियाओं पर समान रूप से ध्यान दिया। चिकित्सा और पथ्य रोगी के लिए-खाद और पानी पौधे के लिए-पढ़ना और लिखना छात्र के लिए-पूँजी और बुद्धि व्यापार के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिए उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुँजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। सस्ते बेचने वाले कुँजड़े केवल ग्राहकों को भ्रम में डाल सकते है पर आवश्यकता किसी की पूरी नहीं करा सकते।
साधना गुरु भक्ति से आरम्भ होकर ईश्वर भक्ति तक जा पहुँची। हमें इस प्रसङ्ग में उतने अधिक आनन्द-उल्लास का अनुभव होता रहा है कि उसके आगे संसार का बड़े-से बड़ा सुख भी तुच्छ लग सके। यह बढ़ती हुई प्रेम भावना, आत्मा-प्रेम, परिवार -प्रेम ओर विश्व-प्रेम में विकसित होती चली जा रही हैं और देखने वालों को उस अन्तः भूमिका की प्रतिध्वनि एक दिव्य जीवन के रूप में प्रतीत परिलक्षित हो रही हैं।
साधना में जुड़े रहने चाहिये। इससे भाव -विभोरता की स्थिति प्राप्त होती हैं। और उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता।
साधना काल के विक्षेप और कठिनाइयों को सम्भालने के लिये उसमें भी बड़े साहस और कठोर तप की आवश्यकता होती है। कुण्डलिनी शक्ति मूलतः नाड़ियों से सम्बन्धित है। और नाड़ी जाल के द्वारा ही वह सारे शरीर में फैलती है। इसलिये उसे जाग्रत करने का सम्पूर्ण विश्राम नाड़ियों के उत्तेजन से ही सम्भव होता है। साधना काल में साधक को अपनी मन स्थिति को वशवर्ती और स्थिर बनाये रखने के लिये यधति यम, नियम, ध्यान, धारण, प्रत्याहार आदि का भी अभ्यास करना आवश्यक होता है किन्तु कुण्डलिनी प्राण-शक्ति है, इसलिये उनका जागरण मूलतः प्राणायाम की क्रियाओं से होता है।
साधना का तात्पर्य उन बीच तत्त्वों को प्रस्तुत स्थिति से जागृत कर सक्रिय एक समर्थ बनाना है। श्रम और जागृत कर सक्रिय एवं समर्थ बनाना है। श्रम और समय से शरीर, स्वाध्याय और विवेक से मन तथा प्रेम और सेवा से अन्तःकरण का विकास होता है। जीवन साधन के यह छः आधार ही व्यक्तित्व के उत्कर्ष में सहायक होते है। जिस प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह छः शुभ माने गये हैं, उसी प्रकार अन्तरंग में अवस्थित यह छः मित्र भी ऐसे है कि यदि मनुष्य इनका समर्थन प्राप्त कर सके तो अपनी समस्त तुच्छताओं पर विजय प्राप्त कर जीवन लक्ष्य की प्राप्ति में निश्चित रूप से सफलता प्राप्त कर सकता है।
साधना और प्रचंड साहस की आवश्यकता पड़ती है। यह सौर-मण्डल अपने परिवार को लेकर किसी अभिजित नक्षत्र की ओर जा रहा है, ऐसा भारतीय ज्योतिविदों का मत है, और ऐसी-ऐसी आकाश गंगायें, हजारों निहारिकायें और अगणित सूर्य अभी इस अन्तरिक्ष में है। ऋग्वेद में भी सृष्टि के विस्तार का वर्णन में ‘बहवो सूर्या’ अनन्त आकाश गंगा में है ऐसा कहा है। उस विस्तार को समझने से पूर्व हमें दूरी का दूसरा माप जान लेना चाहिये। बहुत दूरी के ग्रह-नक्षत्रों को प्रकाश वर्ष से नापा जाता है।
साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अन्तर प्रत्यन्तरों को हम इतना अधिक जानते है, जितना बुद्धिमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकांकी पढ़ा सीखा होता है- हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और अति गहराई के साथ ढूँढ़ा, समझा है। इस जानकारी का भी महत्व हम मानते है और जहाँ उपयोगिता आवश्यक होती है, उसका प्रयोग भी करते-कराते रहते है पर हमारी अपनी क्रिया-पद्धति अति सरल और सीधी-सादी है, यही सीधा सा एक ॐ, तीन ग्याहृति और 24 अक्षरों वाला वेदोक्त गायत्री मंत्र हमें मिला है और इसमें बिना अधिक ॐ, अधिक बीज सम्पुट आदि की लाग लपेट जोड़े जप-साधना में लग जाते है।
साधना की जिस तरह की छट–पटाहट और पीड़ा होती है, इसी प्रकार परिष का अंतर्द्वन्द्व समाप्त न होता था। व्याकुलता उसे सदैव घेरे रहती थी।
साधना में लग जाते है।
साधना को परिपुष्ट नहीं वरन दुर्गम बनाते है। अभ्यास के लिये ऐसे व्यक्ति चुनने चाहिये जो प्रेम-तत्व का मार्ग, रहस्य, मूल्य, उत्तरदायित्व जानते हों और अपने प्रिय पात्र को निराश नहीं, अधिक उत्साह उल्लास उत्पन्न करने की परिस्थिति बनाते होंगे।
साधनाओं से लोग विमुख होने लगे तो वह बातें भी मिथ्या प्रतीत होने लगीं। यह अज्ञान सारी मानव जाति के लिये दुर्भाग्य का विषय है।
साधनायें सम्पन्न की उसने। दम, नियम, ध्यान, धारण प्रत्याहार के द्वारा उसके इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना भी सीख लिया। कई तरह की सिद्धियाँ भी उसने अर्जित की, किन्तु न जाने क्यों उसके अन्तःकरण में कुछ सूना-सूना-सा लगता था। पति क अभाव में भूषण-भूषित साधना की जिस तरह की छट–पटाहट और पीड़ा होती है, इसी प्रकार परिष का अंतर्द्वन्द्व समाप्त न होता था। व्याकुलता उसे सदैव घेरे रहती थी।
साधनाओं की पृष्ठ-भूमि पर न उतरें, न सही पर संसार में होने वाली अनेक घटनाओं से वस्तुस्थिति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी घटनायें हर मनुष्य के जीवन में देखने-सुनने में आया करती है, उनसे आत्म-तत्व की विवशता की अनुभूति की जा सकती है और उसकी जागृति की चेष्टाएँ भी उभारी जा सकती हैं।
साधना प्राप्त। दोनों एक दूसरे के पूरक है। बिजली के दो तारों के मिलने पर किया उत्पन्न होती है, दोनों पहिये ठीक होने पर ही गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिये जीवन के तीनों स्तर पर स्थूल, सूक्ष्म, और कारण-देह-मन और आत्मा-तब विकसित होती है जब उपासना और साधना, की द्वितीय डडडड पर समुचित ध्यान दिया जाय।
साधना क्रम पसन्द है, उनके लिए प्रातःकाल उगते हुए अरुण वर्ण सूर्य का ध्यान करना उत्तम है।
साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुँजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। सस्ते बेचने वाले कुँजड़े केवल ग्राहकों को भ्रम में डाल सकते है पर आवश्यकता किसी की पूरी नहीं करा सकते। धन्यवाद है भगवान् का जिसने हमें एक घंटे में ईश्वर दर्शन कराने वाले और चेला मूड़ने वाले, जादुई मन्त्र बताने वाले करामाती जंजालियों के चंगुल में फँसने से बचा लिया।
साधना की दिशा से ही मार्ग दर्शन किया- न केवल अपना तन और बल ही हमें दिया वरन उतना वात्सल्य, स्नेह और अपना मन दिया जितना इस संसार में किसी भी प्रसिद्ध के ड़ड़ड़ड़ रिश्ते के प्रिय पात्र एक दूसरे को दे सकते है। हमने भी प्रयत्न किया कि समर्पण कि जितनी सर्वांगपूर्ण भावना और क्रिया चरितार्थ हो सकती हो, उसमें ड़ड़ड़ड़ की जाय। उनका हर आदर्श और हर संकेत ड़डड़ड़ की तरह शिरोधार्य रहा है। माँगना कुछ नहीं, देना सब कुछ’ प्रेम के इस अविच्छिन्न सिद्धान्त को दोनों ने ही चरम सीमा तक निबाहा है। दूसरी ओर से क्या किया गया, इसकी चर्चा हमारी वर्णन शक्ति से बाहर है।
साधना और तपस्या के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
साधना करते थे और प्रतिदिन सायंकाल ग्रामवासियों को एकत्रित कर उन्हें ज्ञान दान भी दिया करते थे। साधु का ही प्रभाव था कि गाँव में न कोई चोरी करता था और न छल-कपट ईर्ष्या-द्वेष और बेईमानी। सब लोग प्रेमपूर्वक रहते थे।
साधना की अवधि में संयम पर इसीलिये अधिक जोर दिया जाता है, जिससे कुण्डलिनी शक्ति का फैलाव ऊर्ध्वगामी हो जाये उसी से ओज की वृद्धि होती है।
साधनाओं से भी अधिक होने लगती है और पारलौकिक साधना में आस्था बढ़ने लगती है इस विधि से मार्ग में पड़ने वाली कठिनाइयों के प्रति उसी तरह साहस बढ़ता जाता है जिस तरह किसी को यदि यह मालूम हो जाये कि यहाँ से इतनी दूरी पर रत्नों का भण्डार छिपा हुआ है तो वह मनुष्य रत्नों के लोभ में मार्ग में आने वाली व्यक्तियों को भी ड़ड़ड़ड़ ठहराकर उन्हें प्राप्त करने के लिये चल पड़ता है।
साधनायें लोग स्वरूप समय में ही छोड़ बैठते है, किन्तु प्राणायाम के शारीरिक और मानसिक लाभ तुरन्त मिलते है, जिससे मनोबल बढ़ता है और आगे का मार्ग साफ होता चला जाता है। बुद्धि के सूक्ष्म ड़ड़ड़ड़ का विकास होने से स्थूल भागो और दुर्बल साधनाओं से भी अधिक होने लगती है और पारलौकिक साधना में आस्था बढ़ने लगती है इस विधि से मार्ग में पड़ने वाली कठिनाइयों के प्रति उसी तरह साहस बढ़ता जाता है जिस तरह किसी को यदि यह मालूम हो जाये कि यहाँ से इतनी दूरी पर रत्नों का भण्डार छिपा हुआ है तो वह मनुष्य रत्नों के लोभ में मार्ग में आने वाली व्यक्तियों को भी ड़ड़ड़ड़ ठहराकर उन्हें प्राप्त करने के लिये चल पड़ता है।
साधना और साँसारिक वैभव न मिल सकी थी, वह निष्काम करम योग के प्रयोग से सहज ही मिल गई।
साधना पाठको को सिखानी आरम्भ की थी अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में उसका क्रम तीन वर्ष तक चला भी था पर अनुभव यह हुआ कि वह सर्वसाधारण का है। समस्त सत्प्रवृत्तियाँ उसी की सहचरी हैं। कृष्ण-चरित्र में जिस रास और महारास का- असंकारिक रूप से सुविस्तृत और आकर्षक वर्णन हुआ है, उसमें प्रेम-प्रसंग को कृष्ण के रूप में और सत्प्रवृत्तियों को गोपियों के रूप में चित्रित किया गया है। एक प्रेमी और अनेक प्रेमिकायें यह आश्रय अध्यात्म जगत में सम्भव है। प्रेम से भरी आत्मा को अगणित सत्प्रवृत्तियाँ असीम प्यार करती है और ये सभी दौड़ी-दौड़ी प्रियतम से मिलने और उसके साथ तादात्म्य होने चली आती है।
साधना की प्रारम्भिक अवस्था में यही क्रिया धीरे-धीरे होती है। किन्तु साक्षात्कार या सिद्धि की अवस्था में यह सीधी हो जाती है और सुषुम्ना का द्वार खुल जाने से शक्ति का स्फुरण वेग से फूट कर सारे शरीर में-विशेष रूप से मुख्यकृति में-फूट पड़ता है। कुण्डलिनी जागरण दिव्य-ज्ञान दिव्य अनुभूति और अलौकिक सुख का सरोवर इसी शरीर में मिल जाता है।
साधनाओं के लिये नियत कर ले, पूजा, उपासना, स्वाध्याय और मार्ग दर्शन के जितने अच्छे साधन यहाँ है, उतने अच्छे साधन बन में कहाँ मिल सकते हैं?
साधना प्राण तत्व की उत्खनन एवं अभिवर्धन प्रक्रिया है। पंच-कोशों का जागरण उसी पर निर्भर है। कई वर्ष पूर्व हमने अत्र भय कोश,मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश,ओर आनन्दमय कोश,के जागरण की पंच-कोसी उच्च-स्तरीय गायत्री साधना पाठको को सिखानी आरम्भ की थी अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में उसका क्रम तीन वर्ष तक चला भी था पर अनुभव यह हुआ कि वह सर्वसाधारण का है। समस्त सत्प्रवृत्तियाँ उसी की सहचरी हैं। कृष्ण-चरित्र में जिस रास और महारास का- असंकारिक रूप से सुविस्तृत और आकर्षक वर्णन हुआ है, उसमें प्रेम-प्रसंग को कृष्ण के रूप में और सत्प्रवृत्तियों को गोपियों के रूप में चित्रित किया गया है।
साधना काम करना पड़ा तो उल्टा-सीधा कर फेंका। जो कुछ उल्टा-सीधा खाने को मिला पेट में डाला और बस पड़ रहे असहायों जैसे समय और जीवन की हत्या करने के लिये।
साधना की सफलता, असफलता का कारण मानते है और इस ढूँढ़ खोज में रहते है कि कोई रहस्यमय ऐसी पद्धति हाथ लग जाय जिससे देखते-देखते जादुई चमत्कार का प्रतिफल सामने आ जाय। हमारी मान्यता वैसी नहीं रही। मंत्र शास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामंत्रिकों से हमारे सम्पर्क है और साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अन्तर प्रत्यन्तरों को हम इतना अधिक जानते है, जितना बुद्धिमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकांकी पढ़ा सीखा होता है- हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और अति गहराई के साथ ढूँढ़ा, समझा है।
साधना अनन्य श्रद्धा और विश्वास के साथ करने की शिक्षा हमें मिली थी, उसमें लम्बे-चौड़े विधि-विधान जुड़े हुए नहीं है। कितने ही व्यक्ति विधि-विधानों के अन्तर और कर्मकाण्डों के जोड़-तोड़ से साधना की सफलता, असफलता का कारण मानते है और इस ढूँढ़ खोज में रहते है कि कोई रहस्यमय ऐसी पद्धति हाथ लग जाय जिससे देखते-देखते जादुई चमत्कार का प्रतिफल सामने आ जाय। हमारी मान्यता वैसी नहीं रही। मंत्र शास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामंत्रिकों से हमारे सम्पर्क है और साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अन्तर प्रत्यन्तरों को हम इतना अधिक जानते है, जितना बुद्धिमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं से शायद ही कोई जानता हो।
साधना मन को इधर -उधर न भागने की समस्या हल कर देती है। यह छवि ध्यान थोड़े अभ्यास से तस्वीर को देखे बिना भी विशुद्ध ध्यान कल्पना के माध्यम से आँखें बन्द करके भी होने लगता है। जिन्हें निराकार साधना क्रम पसन्द है, उनके लिए प्रातःकाल उगते हुए अरुण वर्ण सूर्य का ध्यान करना उत्तम है।
साधना में आस्था बढ़ने लगती है इस विधि से मार्ग में पड़ने वाली कठिनाइयों के प्रति उसी तरह साहस बढ़ता जाता है जिस तरह किसी को यदि यह मालूम हो जाये कि यहाँ से इतनी दूरी पर रत्नों का भण्डार छिपा हुआ है तो वह मनुष्य रत्नों के लोभ में मार्ग में आने वाली व्यक्तियों को भी ड़ड़ड़ड़ ठहराकर उन्हें प्राप्त करने के लिये चल पड़ता है।
साधना में लग गये।
साधना क्या है, ऐसी कल्याणकारक जिज्ञासाओं की पृष्ठ-भूमि न परिपक्व होती, यदि जीव को तड़पाया, पीड़ित ओर, परेशान न किया गया होता। जल-जलकर ही तो उसकी ईश्वर-निष्ठा प्रगाढ़ होती है और तभी तो वह करुणा का उद्गार फूटता है- “ है प्रभु! सब तुम्हारी ही इच्छा की पूर्ति है। मेरे प्रियतम देव! मेरा स्वरूप और मेरा ज्ञान सब तुम्हारी ही तो प्रचेतना है। हे मेरे जीवन प्राण मेरा यश और विस्तार सब तुम्हारे ही सुस्नेह की तो सुगन्ध है। तुम्हीं मेरे प्रेमाधार हो, तुम्हारे बिना अब मैं रह कैसे सकता हूँ।
साधना का अधिकार नहीं है, क्योंकि आत्म-ज्ञान घर में नहीं मिलता। उसके लिए जंगल में एकान्त वास करना पड़ता है पर स्त्रियाँ एकान्त वास कर ही नहीं सकती इसलिये नारी को आत्म ज्ञान का अधिकार प्रदान नहीं किया गया।
साधना के फलस्वरूप वह तेज निपट कर ध्यान के समय ज्योति बनकर देह में कार्य करने लगता है।
साधना, की द्वितीय डडडड पर समुचित ध्यान दिया जाय।
साधना के रूप में चलते चले है। जिनका चक्र वेधन ओर कुण्डलिनी जागरण से सीमा सम्बन्ध है। वे भावनायें सर्वोपयोगी नहीं ओर हमारे सामान्य साधन कम का कण भी नहीं, वे अतिरिक्त प्रयोजन के लिए है, इसलिए उनकी चर्चा यहाँ अनावश्यक समझी गई और उतना ही, उल्लेख किया गया जो सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त था। यह लेख माला लिखी ही इस उद्देश्य से जा रही है कि हमारे अनुभवों के साथ अपने क्रिया-कलाप का ताल -मेल बिठाते हुए परिजन अपनी आत्मिक प्रगति का पथ -प्रशस्त कर सकें और उसी स्तर की सफलता प्राप्त कर सकें,जैसी कि हम कर सके है। इसमें आगे वाली मंजिलों का मार्ग दर्शन इन पंक्तियों में नहीं, अन्य माध्यमों से मिलेगा।
साधना पर ही अवसम्मित है। यदि साधना की उपेक्षा की गई और पूजा-पद्धति के सहारे लम्बे-चौड़े सपने देखे गये तो अन्य असंख्य जाल-जंजालों में भटकने वालों की तरह हमें भी खाली हाथ रहना पड़ेगा “हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया और जिस दिन से उस क्षेत्र में प्रवेश किया, दोनों ही प्रक्रियाओं पर समान रूप से ध्यान दिया। चिकित्सा और पथ्य रोगी के लिए-खाद और पानी पौधे के लिए-पढ़ना और लिखना छात्र के लिए-पूँजी और बुद्धि व्यापार के लिए आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिए उपासना और साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुँजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है।
साधना काल में साधक को अपनी मन स्थिति को वशवर्ती और स्थिर बनाये रखने के लिये यधति यम, नियम, ध्यान, धारण, प्रत्याहार आदि का भी अभ्यास करना आवश्यक होता है किन्तु कुण्डलिनी प्राण-शक्ति है, इसलिये उनका जागरण मूलतः प्राणायाम की क्रियाओं से होता है। कुछ साधन ऐसे भी है जिनमें प्राणायाम के साथ मूलबन्ध और उद्धिमान-ग्रन्ध भी करने पड़ते है। यह क्रियायें हठवादी होने से कई जोखिम भी हो सकते है यद्यपि इनमें कुण्डलिनी शक्ति का जागरण थोड़े समय में ही हो जाता है, किन्तु योनियों में उन कठिनाइयों और बाधाओं को देखकर ऐसे सुगम प्राणायाम में खोज निकाले जो किसी भी स्वरूप, निर्मल, युवक, वृद्ध या नारियों द्वारा किये जा सके और कुण्डलिनी के क्रमिक विकास का लाभ प्राप्त कर सकें।
साधना जुड़ी हुई होनी चाहिये। उपासना शरीर है और साधना प्राप्त। दोनों एक दूसरे के पूरक है। बिजली के दो तारों के मिलने पर किया उत्पन्न होती है, दोनों पहिये ठीक होने पर ही गाड़ी चलती है। इसी प्रकार आत्मिक प्रगति कि लिये जीवन के तीनों स्तर पर स्थूल, सूक्ष्म, और कारण-देह-मन और आत्मा-तब विकसित होती है जब उपासना और साधना, की द्वितीय डडडड पर समुचित ध्यान दिया जाय।
साधना खण्ड के अनेक उपनिषदों में सिद्धियों के अनेक चमत्कारिक वर्णन मिलते हैं। उनमें एक सिद्धि ‘ज्ञान सिद्धि’ है। ‘योग कुण्डल्युपनिपत्’ में आत्म-भेदन की विभिन्न क्रियाओं का वर्णन करते हुए अन्त में कहा है-
साधना में तब तक ही लगता जब तक इन्द्रियाँ शिथिल होती पर न उनसे स्वाद, संयम सधा और न चित्त-वृत्तियों को रोकने के लिए उन्होंने ज्ञानार्जन की वृत्ति अपनाई इसलिये वे पीछे रह गये। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि चुड़ाला के जीवन में आनन्द का स्रोत कहाँ से फूट रहा है। सामान्य काम-काज में हानि-लाभ जीवन-मरण यश-अपयश से भी अप्रभावित और सदैव प्रसन्न कैसे रहती है। पूछने पर रानी ने बताया-महाराज! हम उस स्थिति में हैं जिसकी खोज के लिये हम दोनों साथ-साथ चले थे।”
साधना क्या हो सकती है। परिध को वह जान लेने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह गया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-March
साधना का स्वरूप कुछ भी हो पर वह सफल तभी होती है, जब श्रद्धा, विश्वास, संयम, साहस, धैर्य और नियमितता आदि तत्त्वों का अवलम्बन लेकर चला जायेगा। इन गुणों से विहीन साधक साधना का वह उच्च फल नहीं पा सकते जिसका सम्बन्ध आत्मा और उसकी शक्तियों द्वारा कतिपय सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु यह सिद्धियाँ बहुत ही निम्नकोटि की और अवांछनीय होती हैं। उनको यदि आसुरी सिद्धियाँ भी कह दिया जाय तब भी अनुचित न होगा।
साधना से देह के किन रहस्यमय शक्ति संस्थानों को कितना विकसित किया जा सकता है और इस प्रकार के विकास से मनुष्य जाति क्या लाभ उठा सकती है?
साधनायें करके अलौकिक शक्तियों के स्वामी बन जाते थे। लोक के साथ अपने परलोक तक को कल्याण-कुसुमों से परिपूर्ण कर लिया करते थे। जिस साधना द्वारा मनुष्य की आत्मिक शक्तियाँ प्रबुद्ध होती हैं, वह है अपने शरीर और मन पर नियन्त्रण करना। शरीर पर नियन्त्रण करने का अर्थ है, इन्द्रियों को स्वाधीन करना और मन पर नियन्त्रण करने का आशय है, उसकी चंचलता पर प्रतिबन्ध लगा देना, उसकी वृत्तियों को अपने अनुकूल बना लेना। उसे एकाग्र, एकनिष्ठ और स्थिर बना लेना।
साधनायें करके, बड़े-बड़े कष्ट उठाकर महान् से महान् त्याग करके आत्म-क्षेत्र में प्रवेश किया था। उन्होंने साधना द्वारा कुण्डलिनी जागरण, ब्रह्म-समाधि आदि योगों को सिद्ध किया। शरीर सीमा से उठकर उच्च भूमिका में और स्थूलता से बढ़कर सूक्ष्म दशा में गये और आत्मा से साक्षात्कार कर उसकी शक्तियों को जगाया और सिद्धि की उस स्थिति के स्वामी बने जिसे ईश्वरीय स्थिति कहा जा सकता है। उन्होंने उस दिव्य-शक्ति का आग्रहण किया, जिसके आधार पर वे सूक्ष्म जगत् में होने वाले क्रिया-कलापों को वैसे ही देख लेने में समर्थ होते थे, जैसे हम अपने चक्षुओं द्वारा भौतिक जगत् के सामान्य दृश्यों को देख लेते हैं। यह आत्मिक शक्ति के आकलन का ही फल होता था कि ऋषि केवल एक दृष्टि अथवा वचन मात्र से ही लोगों का भाग्य और भविष्य अदल-बदल देते थे।
साधना करने के न तो योग्य हो सकते है और न उनके पास ऐसा अवसर अथवा अवकाश ही होता है। मिट्टी में बीज की तरह मिलकर तप में समाप्त होकर सिद्धि का वैसा प्रयास सब के लिये सम्भव नहीं जैसा कि महापुरुषों ने किया है। तब भी आत्मा को पाने, उसकी शक्ति का आग्रहण करने के लिये जीवन प्रति-जीवन में थोड़ा-थोड़ा प्रयास करते ही चलना चाहिये। इस जीवन में यदि एक साथ सहसा ही तपश्चर्या कर्तव्यों का पालन करते और भौतिक जीवन गति को अक्षुण्ण रखते हुये भी सामान्य साधना तो की ही जा सकती है। इस सामान्य साधना का रूप भक्ति, पूजा, उपासना अनुष्ठान, जप, ज्ञान, साधना, चिन्तन आदि कुछ भी हो सकता है।
साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
साधना का वह उच्च फल नहीं पा सकते जिसका सम्बन्ध आत्मा और उसकी शक्तियों द्वारा कतिपय सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु यह सिद्धियाँ बहुत ही निम्नकोटि की और अवांछनीय होती हैं। उनको यदि आसुरी सिद्धियाँ भी कह दिया जाय तब भी अनुचित न होगा।
साधना ही होती है, उससे शिव परिणामों की आशा नहीं की जा सकती।
साधना को ग्रहण कर उसमें नियमित रूप से लगे रहें। धीरे-धीरे साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
साधना नव-निर्माण आदि की कई शिक्षायें परिजनों को देते चले आ रहे हैं, अब विचार है अगले दो-ढाई वर्षों में प्रेम को अन्तरंग में उगाने और उसे विकसित करने की अपनी अनुभूतियाँ भी लोगों को बतायें और इस अमृत को उपलब्ध करने की शिक्षा देते चलें। यह साहित्य का नहीं समीपता का विषय है, सो सोचते हैं कि जितने अधिक परिजनों से, जितने अधिक समय तक सान्निध्य और सामीप्य सम्भव हो प्राप्त करें और अपनी छूत दूसरों को भी लगाते चलें। लोग प्यार करना सीखें। हममें, अपने आपमें, अपनी आत्मा और जीवन में, परिवार में, समाज में, कर्तव्य में और ईश्वर में - दसों-दिशाओं में प्रेम बिखेरना और उसकी लौटती हुई प्रतिध्वनि का भाव भरा अमृत पीकर धन्य हो जाना, यही जीवन की सफलता है।
साधना के कारण ही वे महानुभाव आज भी मृत्युञ्जय होकर हमारे बीच अजर रूप से जीवित बने हुए हैं।
साधना का बहुत बड़ा साधन है। जब यह नियन्त्रित होकर एक दिशा में प्रवाहित अथवा सक्रिय होता है तो अस दिशा की सूक्ष्म सम्पदाओं को खोज निकालना है। मन की गति बहुत सूक्ष्म है, वह स्वयं भी सूक्ष्म ही होता है। अतएव जब वह भौतिक चंचलता से मुक्त स्थूल से विमुख होकर सूक्ष्म की ओर जाता है, तब अपना सम्बन्ध उस आत्म-प्रदेश से ही स्थापित करता है, जिसमें वे शक्तियाँ सोई रहती हैं, जो अलौकिक कार्य सम्पन्न करने में सक्षम होती हैं। मन का सूक्ष्म शक्तियों से सम्बन्धित होना ही उनका प्रबोधन कहा गया है।
साधना द्वारा कुण्डलिनी जागरण, ब्रह्म-समाधि आदि योगों को सिद्ध किया। शरीर सीमा से उठकर उच्च भूमिका में और स्थूलता से बढ़कर सूक्ष्म दशा में गये और आत्मा से साक्षात्कार कर उसकी शक्तियों को जगाया और सिद्धि की उस स्थिति के स्वामी बने जिसे ईश्वरीय स्थिति कहा जा सकता है। उन्होंने उस दिव्य-शक्ति का आग्रहण किया, जिसके आधार पर वे सूक्ष्म जगत् में होने वाले क्रिया-कलापों को वैसे ही देख लेने में समर्थ होते थे, जैसे हम अपने चक्षुओं द्वारा भौतिक जगत् के सामान्य दृश्यों को देख लेते हैं। यह आत्मिक शक्ति के आकलन का ही फल होता था कि ऋषि केवल एक दृष्टि अथवा वचन मात्र से ही लोगों का भाग्य और भविष्य अदल-बदल देते थे। धन्य थे वे साधक और उनकी सिद्धियाँ।
साधना के स्वरूप हैं। तथापि इनका उद्देश्य भौतिक लाभ बना लेने से वे भी उसी श्रेणी में पहुँच जाती हैं, जिसमें तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र आदि की साधना होती है। तन्त्र साधना और सकाम उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं। सकाम उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
साधना द्वारा सहज ही प्रबुद्ध की जा सकती है।
साधना द्वारा उपार्जित शक्ति का सत्पात्रों की भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनुदान की व्यवस्था।
साधना के किसी भी स्वरूप का आश्रय लेकर निरन्तर धैर्य और निष्काम-भाव से सुयोग्य पुरुषार्थ में संलग्न रहा जाय।
साधना का सच्चा उद्देश्य आत्म-लाभ ही है। तथापि अनेक लोग भौतिक लाभों की कामना से पूजा, उपासना अथवा अनुष्ठान किया करते हैं। यद्यपि पूजा, उपासना अथवा अनुष्ठान आदि आध्यात्मिक साधना के स्वरूप हैं। तथापि इनका उद्देश्य भौतिक लाभ बना लेने से वे भी उसी श्रेणी में पहुँच जाती हैं, जिसमें तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र आदि की साधना होती है। तन्त्र साधना और सकाम उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं।
साधना, उपासना और तपश्चर्या द्वारा पहले इस मनोराज्य पर ही विजय प्राप्त की थी। मनोजयी, सर्वजयी होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।
साधना तीसरा है, परिजनों की अभीष्ट सहायता। हम जहाँ कहीं भी रहेंगे, वहीं से उपरोक्त तीन कार्य अनवरत रूप से करते रहेंगे।
साधना द्वारा योगी अपने को तल्लीन करते है” और एकाग्र की हुई, मनःशक्ति को विचाराधीन से लेकर किसी भी व्यवसाय में लगाकर चमत्कारिक सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं, इसलिये यह मानना पड़ेगा कि संगीत दो वर्ष के बच्चे से लेकर विद्यार्थी, व्यवसायी किसान मजदूर स्त्री-पुरुष सबको उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। उससे मनुष्य की क्रिया शक्ति बढ़ती और आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है। यह बात ऋषि-मनीषियों ने बहुत पहले अनुभव की थी और कहा था-
साधना का रूप भक्ति, पूजा, उपासना अनुष्ठान, जप, ज्ञान, साधना, चिन्तन आदि कुछ भी हो सकता है। हम सब का परम कर्तव्य है कि अपनी योग्यता, स्थिति और परिस्थिति के अनुसार इनमें से किसी भी साधना को ग्रहण कर उसमें नियमित रूप से लगे रहें। धीरे-धीरे साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
साधना, चिन्तन आदि कुछ भी हो सकता है। हम सब का परम कर्तव्य है कि अपनी योग्यता, स्थिति और परिस्थिति के अनुसार इनमें से किसी भी साधना को ग्रहण कर उसमें नियमित रूप से लगे रहें। धीरे-धीरे साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
साधना द्वारा होता है। जो लोग उस साधना पथ पर जितनी दूर तक चल पाते हैं, उतनी ही उनकी वे सूक्ष्म शक्तियाँ प्रबुद्ध हो जाती हैं, जो आत्म-प्रदेश में सुप्त पड़ी रहती हैं। ऋषि-मुनि अपने सम्पूर्ण जीवन को आध्यात्मिक साँचे में ढाल कर चलते थे और प्रचण्डतम साधनायें करके अलौकिक शक्तियों के स्वामी बन जाते थे। लोक के साथ अपने परलोक तक को कल्याण-कुसुमों से परिपूर्ण कर लिया करते थे। जिस साधना द्वारा मनुष्य की आत्मिक शक्तियाँ प्रबुद्ध होती हैं, वह है अपने शरीर और मन पर नियन्त्रण करना।
साधना द्वारा उनको प्रबुद्ध और प्राप्त किया जा सकता है। आत्मिक शक्तियों का स्वामी मनुष्य क्षुद्र से महान्, अणु से विभु और जीव से ईश्वर बन जाता है। किन्तु यह सम्भव तभी है, जब साधना के किसी भी स्वरूप का आश्रय लेकर निरन्तर धैर्य और निष्काम-भाव से सुयोग्य पुरुषार्थ में संलग्न रहा जाय।
साधना अपने व्यक्तिगत वर्चस्व के लिये नहीं, विशुद्ध रूप से लोक-मण्डल के लिये करने जा रहे हैं और जो कुछ हमें मिलेगा, उसको राई-रत्ती सार्वजनिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करते रहेंगे। जब तक यही करना है। जीवन का अन्त होने से पूर्व शरीर को वैज्ञानिक विश्लेषण के लिये इसलिये वसीयत किया है कि शरीर शास्त्री यह जान सकें कि अध्यात्म साधना से देह के किन रहस्यमय शक्ति संस्थानों को कितना विकसित किया जा सकता है और इस प्रकार के विकास से मनुष्य जाति क्या लाभ उठा सकती है?
साधना द्वारा इस आत्मा को ही जानने का प्रयत्न करते हैं। उसे जान लेते हैं और जानकर सर्वदर्शी, सर्वज्ञ और सर्वशक्ति सम्पन्न बन कर जीवन का पूरा-पूरा क्षेत्र प्राप्त कर लेते हैं।
साधनायें करनी पड़ती हैं पर भारतीय योगियों ने जो उपलब्धि की है, उससे यह पता चलता है कि इन साधनाओं से विराट जगत की हलचलों को वायरलैस से भी अधिक स्पष्ट सुना और टेलीविजन से भी अधिक अच्छी तरह देखा जा सकता है। यह लोक ब्रह्माण्ड स्थित लोकों की फ्रीक्वेंसियाँ है और उन्हें जोड़ने वाली या साधने वाली शक्ति का नाम ‘शेषनाग’ है, पौराणिक कथाओं में यह बताया जाता है कि शेष नाग पर पृथ्वी अवस्थित है या पृथ्वी को शेषनाग ने साध रखा है और शेषनाग की शैया में ही भगवान लेटे हुए हैं, विश्राम कर रहे हैं।
साधनाओं से विराट जगत की हलचलों को वायरलैस से भी अधिक स्पष्ट सुना और टेलीविजन से भी अधिक अच्छी तरह देखा जा सकता है। यह लोक ब्रह्माण्ड स्थित लोकों की फ्रीक्वेंसियाँ है और उन्हें जोड़ने वाली या साधने वाली शक्ति का नाम ‘शेषनाग’ है, पौराणिक कथाओं में यह बताया जाता है कि शेष नाग पर पृथ्वी अवस्थित है या पृथ्वी को शेषनाग ने साध रखा है और शेषनाग की शैया में ही भगवान लेटे हुए हैं, विश्राम कर रहे हैं।
साधना और अपनी चिन्ता का श्रेय मिल जाता है। यही कर्म कुशलता है, कर्म-योग है।
साधना पथ पर जितनी दूर तक चल पाते हैं, उतनी ही उनकी वे सूक्ष्म शक्तियाँ प्रबुद्ध हो जाती हैं, जो आत्म-प्रदेश में सुप्त पड़ी रहती हैं। ऋषि-मुनि अपने सम्पूर्ण जीवन को आध्यात्मिक साँचे में ढाल कर चलते थे और प्रचण्डतम साधनायें करके अलौकिक शक्तियों के स्वामी बन जाते थे। लोक के साथ अपने परलोक तक को कल्याण-कुसुमों से परिपूर्ण कर लिया करते थे। जिस साधना द्वारा मनुष्य की आत्मिक शक्तियाँ प्रबुद्ध होती हैं, वह है अपने शरीर और मन पर नियन्त्रण करना। शरीर पर नियन्त्रण करने का अर्थ है, इन्द्रियों को स्वाधीन करना और मन पर नियन्त्रण करने का आशय है, उसकी चंचलता पर प्रतिबन्ध लगा देना, उसकी वृत्तियों को अपने अनुकूल बना लेना।
साधना और सकाम उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं। सकाम उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
साधना द्वारा उस पर अधिकार हो जाने से मनुष्य अपनी अधिकार रेखा तक उसकी प्रक्रियाओं, नियमों और नियन्त्रण में भी हस्तक्षेप कर सकता है। इस अधिकार के आधार पर ही वह उसके सामान्य नियमों का अतिक्रमण करके ऐसे कार्य सम्पादित कर दिखाता है, जो चमत्कार अथवा सिद्धियों जैसे विदित होते हैं। मनुष्य यह देखने और जानने में समर्थ हो जाता है कि सृष्टि के सूक्ष्म परिवेश में क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है और उसे किस प्रकार किया जा सकता है- तथा क्या होने जा रहा है और उसको किस प्रकार अपनी इच्छा के अनुसार परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार वह विराट् सृष्टि यन्त्र का एक सहायक संचालक सा बनकर सामान्य लोगों को चमत्कारी, सिद्ध अथवा अलौकिक पुरुष विदित होने लगता है अलौकिकता और कुछ नहीं प्रकृति के साथ उसके विधान में भागीदार हो जाना भर ही है।
साधना होती है। तन्त्र साधना और सकाम उपासना में स्वरूप भेद होते हुए भी वे परिणाम रूप में एक जैसी ही होती हैं। सकाम उपासना भी आत्मिक उन्नति अथवा आत्म-जागरण कर सकने में सर्वथा असमर्थ ही होती है।
साधना द्वारा मनुष्य की आत्मिक शक्तियाँ प्रबुद्ध होती हैं, वह है अपने शरीर और मन पर नियन्त्रण करना। शरीर पर नियन्त्रण करने का अर्थ है, इन्द्रियों को स्वाधीन करना और मन पर नियन्त्रण करने का आशय है, उसकी चंचलता पर प्रतिबन्ध लगा देना, उसकी वृत्तियों को अपने अनुकूल बना लेना। उसे एकाग्र, एकनिष्ठ और स्थिर बना लेना। मन अध्यात्म-साधना का बहुत बड़ा साधन है। जब यह नियन्त्रित होकर एक दिशा में प्रवाहित अथवा सक्रिय होता है तो अस दिशा की सूक्ष्म सम्पदाओं को खोज निकालना है।
साधना असफल हो गई और वह अपनी आत्मा में एक ग्लानि, एक क्षोभ, एक लज्जा, एक निराशा और एक असंतोष अनुभव करता है। उसका सुख और संतोष श्रम और श्रेय सभी कुछ नष्ट हो जाता है। यही अकर्म, अकुशलता और अनायोग है।
साधना जिसका मार्ग विशुद्ध आध्यात्मिक नहीं होता अशिव साधना ही होती है, उससे शिव परिणामों की आशा नहीं की जा सकती।
साधनाओं से भी कठिनाई से मिलती है, वह स्वर योग के साधक को अनायास ही मिल जाती है।
साधना तो की ही जा सकती है। इस सामान्य साधना का रूप भक्ति, पूजा, उपासना अनुष्ठान, जप, ज्ञान, साधना, चिन्तन आदि कुछ भी हो सकता है। हम सब का परम कर्तव्य है कि अपनी योग्यता, स्थिति और परिस्थिति के अनुसार इनमें से किसी भी साधना को ग्रहण कर उसमें नियमित रूप से लगे रहें। धीरे-धीरे साधना संचित होती रहेगी और एक दिन किसी न किसी जन्म में पूर्ण होकर अपना सम्पूर्ण फन प्रदान करेगी।
साधना से वंचित रखा उसने मानो अपनी ऐसी हानि कर ली, जिसकी क्षतिपूर्ति किसी प्रकार भी नहीं हो सकती। यह बात सही है कि सभी लोग ऋषि-मुनियों जैसी प्रचण्ड साधना करने के न तो योग्य हो सकते है और न उनके पास ऐसा अवसर अथवा अवकाश ही होता है। मिट्टी में बीज की तरह मिलकर तप में समाप्त होकर सिद्धि का वैसा प्रयास सब के लिये सम्भव नहीं जैसा कि महापुरुषों ने किया है। तब भी आत्मा को पाने, उसकी शक्ति का आग्रहण करने के लिये जीवन प्रति-जीवन में थोड़ा-थोड़ा प्रयास करते ही चलना चाहिये। इस जीवन में यदि एक साथ सहसा ही तपश्चर्या कर्तव्यों का पालन करते और भौतिक जीवन गति को अक्षुण्ण रखते हुये भी सामान्य साधना तो की ही जा सकती है।
साधनायें भारत के भाग्य परिवर्तन के लिए हुई। उनमें सूक्ष्म वातावरण को ऐसा गरम किया कि कितने ही आश्चर्यजनक चक्रवात अनायास ही प्रकट हो गये। पिछले थोड़े ही दिनों में भारत ने उच्चकोटि के नेता दिये जिनकी तुलना अन्यत्र नहीं मिलती। इन महामानवों ने जनता को आश्चर्यजनक उत्साह दिया और असम्भव लगने वाली राजनैतिक स्वतन्त्रता सम्भव करके दिखा दी। अभी भाग्य निर्माण का अधिकार मात्र मिला है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-April
साधना करते ही रहना चाहिए।
साधना का फल आध्यात्मिक होगा, यह तो एक बड़ा ही स्थूल और निर्विवाद सत्य है।
साधना पूरी होगी और सिद्धि स्वयं आ उपस्थित होगी। इस जन्म में नहीं अगले में और अगले में नहीं तो उसके बाद में। साधना की न तो कोई अवधि है और इतनी बड़ी उपलब्धि के लिये कोई भी कालावधि अधिक नहीं है।
साधना का विशाल विस्तार परिलक्षित होगा। मातृत्व की साकार प्रतिमूर्ति को हमने गायत्री माता के रूप में देखा और उसे वैसे ही प्यार किया जैसा एक छोटा बालक अपनी सगी माता को कर सकता हैं लोग सिर फोड़ी करते रहते है कि गायत्री साकार नहीं निराकार है। हम इस बहस में नहीं पड़ते कि वह क्या है? वस्तुतः वह सब कुछ है-- जो सब कुछ है वह क्या नहीं है? वस्तुतः वह सब कुछ है उसे किसी आकृति में देखने से क्या गर्ज?
साधना के अन्तिम दिनों में महर्षि विश्वामित्र ने नदियों से बातचीत की थी। ऋग्वेद में ऐसे सूक्त हैं, जिनके देवता नदी है और दृष्टा ने उनसे बातचीत की है। उस वार्तालाप में और कुछ आधार भले ही न हो पर उसमें समस्त जड़-चेतन जगत के प्रति आत्मार्पण का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।
साधना का, विश्व मानव की, विराट् ब्रह्म की आराधना का व्यवहारिक अवसर ही अधिक व्यापकता के साथ उपलब्ध होने लगेगा।
साधना की जानी चाहिये और यदि आत्म-सुख आत्म-विकास आत्म-संतोष आत्म-विस्तार आत्म-दर्शन आदि आध्यात्मिक सम्पदाओं की कामना है तो आध्यात्मिक उपासना, आध्यात्मिक पुरुषार्थ चाहिये। इन दोनों भिन्न क्षेत्रों को एक दूसरे से मिलाना नहीं चाहिये। हाँ! इन दोनों को एक दूसरे का सहायक अवश्य बनाया जा सकता है।
साधना का क्षेत्र जैसे-जैसे बढ़ेगा हमारी प्रेम साधना का, विश्व मानव की, विराट् ब्रह्म की आराधना का व्यवहारिक अवसर ही अधिक व्यापकता के साथ उपलब्ध होने लगेगा।
साधना और प्राणायाम है जिससे शरीर के भीतरी अवयवों का व्यायाम भी होता है और आक्सीजन की वृद्धि भी, फलस्वरूप पाचन-शक्ति गहरी नींद, चौड़ी छाती और हड्डियों की मजबूती का स्थूल लाभ तो मिलता ही है। दया, प्रेम, करुणा, उदारता, क्षमा, आत्मीयता सेवा और सौजन्यता के भावों का तेजी से विकास होता है यह सद्गुण अपनी प्रसन्नता और आनन्द का कारण आप है, वैसे ऐसे व्यक्ति के लिये साँसारिक प्रेम और सहयोग का भी अभाव नहीं रहता।
साधना का यही स्वरूप है कि हम अपने परम शक्तिशाली स्वरूप की अनुभूति करें और यह समझें कि अपने चारों और जो वातावरण घिरा हुआ है, वह मकड़ी के जाले की तरह अपना ही कर्तव्य है। हमारी भीतरी स्थिति ही बाहरी क्षेत्र में सुख-दुःख अथवा सुविधा-असुविधा का रूप धारण कर घूमती रहती है। हम कारण है परिस्थितियाँ कारण। अपनी मान्यतायें और गतिविधियाँ ही है, जो आरोह अवरोह बनकर हमें हँसाने रुलाने के लिए छाया चित्र की तरह आती जाती रहती है।
साधना का वाद साँसारिक रिश्तों से तौला जाय तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अगण्य पति प्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है, उनकी इच्छा अपनी इच्छा। अपने व्यक्तित्व के लिये भी कुछ चाहने -माँगने की कल्पना तक नहीं उठी। केवल इतना ही सोचते रहे अपने पास जो कुछ है, अपने से जो भी सम्पदायें विभूतियाँ जुड़ी हुई है, वे सभी इस आराध्य के चरणों पर समर्पित हो जाएँ उनके व्यक्तित्व में धुल जाएँ, उनके प्रयोजनों में खप जाय, ऐसे अवसर जब भी, जितने भी आये हमारे संतोष ओर उल्लास की मात्रा उतनी ही बढ़ी यह गुरु-भक्ति हमारे लिये कितने बड़े वरदान ओर उपहार लेकर वापिस लौटती रही है, इसकी चर्चा इस समय अप्रासंगिक ही रहेगी। दूसरे क्षुद्र लोगों की तरह हमने भी गुरु-शिष्य का ढोंग बनाकर अपनी कामना पूर्ति की माँग पर माँग रखी होती और प्रेम की लाभदायक धन्धे के रूप में मछली पकड़ने का जाल बनाया होता तो निराश और शिकायतों भरा मस्तिष्क लेकर ही खाली ही लौटना पड़ता।
साधना लहलहाती फसल की तरह उगती, बढ़ती और फलवती होती है, इसलिये हमें उस ओर पूरी सतर्कता और अभिरुचि के साथ प्रयत्नशील रहना होगा वैसा ही हमने किया भी।
साधना करने वाले हर साधक को अर्जुन का अनुसरण करते हुए अग्नि परीक्षा में होकर गुजरना होता है। उसे सबसे पहला काम आत्म-निरीक्षण द्वारा अपनी दुष्प्रवृत्तियों और मूर्खताओं का निराकरण करना होता है। जो गतिविधियाँ शरीर और मन को प्रसन्नता दे पर आत्मा को भूखा मारे, उन्हें मूर्खता नहीं तो और क्या कहा जाय? जो प्रवृत्तियाँ नश्वर संसार की विनोदात्मक हलचलों में रस लेने के लिये प्रेरित करती रहे- उसके लिए कुकर्म करने तक के लिये फुसलाते रहे आत्मा को नारकीय यातनाएँ सहने को विवश करे, उन्हें मूर्खता नहीं तो और क्या कहें? विवेक भूमिका में जागृत आत्मा यदि अपनी मूर्खताओं को भी न हटा सका तो उसके जागरण का आखिर प्रयोजन ही क्या रहा?
साधना की सफलता का जो आधार है, उनमें यह सर्वप्रथम और सर्वप्रधान है। प्रेम को हम परमेश्वर मानते है और उसकी उपासना साधना में सतत मग्न रहने का प्रयत्न करते है। पूजा तो हमारी कुछ घण्टे की ही होती है पर लगन सोते-जागते यही लगी रहती है कि प्रेम का अमृत चखाने और चलने का कोई अवसर हाथ से जाने न पाये। यह वह उपक्रम है जो क्रमशः हमें प्रगति पथ पर एक सीमा तक बढ़ाते चलने से सफलता प्रदान कर सका।
साधना प्रकारान्तर से चमत्कारी वरदान बनकर ही वापिस लौटी है, लौटती रहेगी।
साधना की आवश्यकता है। थोड़ी-थोड़ी उपासना करते चलिये। एक-एक करके अपनी कामनाओं को गिराते और वासनाओं को छोड़ते चलिये। साधना पूरी होगी और सिद्धि स्वयं आ उपस्थित होगी। इस जन्म में नहीं अगले में और अगले में नहीं तो उसके बाद में।
साधना सम्पन्न होती है।
साधना की तीसरी धारा-प्रवाह ‘परिवार’ की ओर है। यों कहने सुनने में परिवार एक संकीर्णता ही लगता है। परिवार से- गायत्री परिवार या युग-निर्माण परिवार से ही मोह क्यों? सारे संसार से क्यों नहीं? इस सन्देह का समाधान जानने के लिये हमें व्यवहारिकता की भूमिका में उतरना होगा।
साधना की न तो कोई अवधि है और इतनी बड़ी उपलब्धि के लिये कोई भी कालावधि अधिक नहीं है।
साधना ही थी, जो सामान्य की असामान्य में-तुच्छता को महानता में-परिणित करने का चमत्कार दिखा सकी।
साधना का फल भौतिक और आध्यात्मिक साधना का फल आध्यात्मिक होगा, यह तो एक बड़ा ही स्थूल और निर्विवाद सत्य है।
साधना में एकत्रित किये है, यह उचित ही था कि उन्हें साथ ले जाने की अपेक्षा परिजनों के सामने खोलकर रख दिया जाये। हमने अपना भरा हुआ मन खाली करना आरम्भ कर दिया है, ताकि संचय का यह अन्तरंग भार भी हल्का हो जाय। ब्रह्मा जीवन के भार तो समय-समय पर हल्के करते रहे हैं। जो शेष है वे अगले दिनों हल्के कर देंगे हमारी ब्रह्मा उपासना पद्धति में गायत्री पुरश्चरणों
साधनायें हैं, जिनसे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक प्रगति की जा सकी है। नृत्य और अभिनव का संगीत कर उसे और भी सरस बनाया जा सकता है। नाचना गाना और बजाना मनुष्य समाज की सुखद कलायें हैं, यदि यह न हों तो मनुष्य जीवन जैसा नीरस और कुछ न रह जाये।
साधना और उसकी परिणति
साधना के द्वारा यह प्रयोजन सिद्ध किया जाता है। शारीरिक ओर मानसिक तपस्या मनुष्य को इस योग्य बनाती है कि वह आत्मिक विभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश करके वह सामर्थ्य प्राप्त कर सके, जिसके आधार पर कि आत्म-बल एवं अनुग्रह उपलब्ध हो सके।
साधना कहा जाता हो तो उसे कहने, मानने में भी कोई हर्ज नहीं है। इस साधना का यही स्वरूप है कि हम अपने परम शक्तिशाली स्वरूप की अनुभूति करें और यह समझें कि अपने चारों और जो वातावरण घिरा हुआ है, वह मकड़ी के जाले की तरह अपना ही कर्तव्य है। हमारी भीतरी स्थिति ही बाहरी क्षेत्र में सुख-दुःख अथवा सुविधा-असुविधा का रूप धारण कर घूमती रहती है। हम कारण है परिस्थितियाँ कारण। अपनी मान्यतायें और गतिविधियाँ ही है, जो आरोह अवरोह बनकर हमें हँसाने रुलाने के लिए छाया चित्र की तरह आती जाती रहती है।
साधना भी मानव समाज के उस वर्ग में करनी पड़ती हे। जिस तक कि अपनी पहुँच हो।
साधना द्वारा ही हो सकती है। अस्तु आत्म कल्याण और आत्म शांति के चरम ‘लक्ष्य’ की सिद्धि के लिए सद्विचारों की साधना करते ही रहना चाहिए।
साधना में सतत मग्न रहने का प्रयत्न करते है। पूजा तो हमारी कुछ घण्टे की ही होती है पर लगन सोते-जागते यही लगी रहती है कि प्रेम का अमृत चखाने और चलने का कोई अवसर हाथ से जाने न पाये। यह वह उपक्रम है जो क्रमशः हमें प्रगति पथ पर एक सीमा तक बढ़ाते चलने से सफलता प्रदान कर सका।
साधना के लिये यह और भी सरल माध्यम दीखा। सो हमने अपने मार्ग-दर्शक पर उतनी ही निष्ठा आरोपित की जितनी परमेश्वर पर की जा सकती है। एक बार जाँच, परख लेना और सोच समझ लेना भी आवश्यक था, सो यथा मति कर लिया। पूरी परख तो हो भी नहीं सकती, पूर्णता प्राप्त तो कोई शरीरधारी है भी नहीं, फिर सतर्क, चतुर और अविश्वासी भी तो आये दिन धोखा खाते रहते है।
साधना समर में अपने ही अज्ञान असुर से तो लड़ना पड़ता है, यदि इस संघर्ष संग्राम से इनकार किया गया तो वीर क्षत्रियों को मिलने वाले श्रेय और स्वर्ग से वंचित रहना पड़ेगा। कर्तव्य धर्म के साथ संघर्ष जुड़ा हुआ है। यदि संघर्ष से मुख मोड़ना है तो कर्तव्य धर्म भी छोड़ना पड़ेगा। अतएव अर्जुन चिर-परिचितों का चिर-सहचरों का मोह छोड़ और वह कर जिससे श्रेयस् की साधना सम्पन्न होती है।
साधना की सहज परिणित है, जिसे हमने अपने परिवार के लिये कलेजे की गहराई में उगा और बढ़ाया है। प्रेम का उपहार कसक ही है, उससे हमें ही वंचित क्यों रहना पड़ता।
साधना के शुष्क एवं नव-निर्माण के कठिन कष्टकर कार्यों में इतना विशाल जनसमूह लगा हुआ है, उसके पीछे शिक्षा, उपदेश या लेख, प्रवचन ही काम नहीं कर रहें, असली प्रेम सम्बन्धों की है, जिसके दबाव से अनिच्छा और असुविधा के होते हुए, लोगों का उस दिशा में चेतना पड़ता है, जो हमें अभीष्ट है। इस प्रयोग में लोगों का जीवन सुधरे है, समाज का हित हुआ है और हमें सम्मान, सद्भाव मिला है। परिवार को प्रेम देकर-उनके दुःख-दर्द में हिस्सा बंटाकर जितना दिया है, उससे असंख्य गुना पाया है। नये युग का नया निर्माण कर सकने जैसा साहस और विश्वास जिस आधार पर किया जा सका वे केवल लक्ष-लक्ष परिजनों की अनन्य आत्मीयता, श्रद्धा और सद्भावना ही है। इसे हम अपने जीवन की अनमोल उपलब्धि मानते हैं।
साधना और संयम द्वारा अपने श्रेष्ठ कर्तव्य के योग्य क्षमता उत्पादित की। सद्गुण बढ़ाये और उनको अपने व्यावहारिक जीवन में मूर्तिमान् किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-February
साधना से ही होती है।
साधना की ओर उन्मुख होना होगा। सुख शाँति न तो संसार की किसी वस्तु में है और न व्यक्ति में उसका निवास मनुष्य के अन्तःकरण में है। जो कि विचार रूप से उसमें स्थित रहता है। सुख शाँति और कुछ नहीं, वस्तुतः मनुष्य के अपने विचारों की एक स्थिति है। जो व्यक्ति साधना द्वारा विचारों को उस स्थिति में रख सकता है, वही वास्तविक सुख शाँति का अधिकारी बन सकता है।
साधना का ही एक प्रकार है। यज्ञ और जाप यद्यपि मानव जीवन का एक अनिवार्य नियम है, जिसका प्रायः लोग पालन करते है, जो लोग नहीं करते वे अपने एक मानवीय कर्तव्य से विमुख होते है, तथापि संकट और आपत्ति का शमन करने और उसके स्थान पर सुख शाँति की सामान्य स्थिति लाने के लिए लोग विशेष अनुष्ठानों का आयोजन करते है। यज्ञो और जपो के माध्यम से विचारों की साधना करते है।
साधनायें सिद्ध की, तिब्बत में रहकर लामाओं से गुह्यतत्त्व सीखे, श्रीलंका से बौद्धदर्शन में एम॰ ए॰ तथा जब सिद्धि उपलब्ध किया-श्री गजानन माधव मुक्ति-बोध के सम्बन्ध में पहले ही बता दिया था कि-उन पर भूत व्याधि है और सन् 1964 उनके जीवन का अन्तिम वर्ष है।
साधनायें करने वाला नैमित्तिक ज्ञान नहीं होता। वह लाभ केवल मनुष्य को ही प्राप्त है। पर यदि सामान्य जीवों की गतिविधियों का देखकर हम यह मान लें, कि आत्म-चेतनता कर्मानुसार अन्य योनियों में भी जाती हैं ओर यदि मनुष्य में धार्मिकता, सच्चाई, ईमानदारी उत्कृष्टता आदि नहीं है तो उसकी स्थिति पशुओं से भी निम्नतर हैं, तो अवश्य ही आत्मा को पहचानने और जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का भाव जागृत हो सकता है।
साधना से परिपुष्ट होने पर और भी अधिक समर्थ बन सकेगा। तब आज की अपेक्षा अपने लिये और दूसरों के लिये अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकेंगे। यदि ऐसा न होता तो हमारी मार्ग दर्शक शक्ति हमें वर्तमान् उपयोगी कार्य क्रम और सरल जीवन प्रवाह से विरत न करती।
साधना के तेजस्वी कण बिखेरे। उनका लाभ वहाँ पहुँचने वाले को अनायास ही मिल जाता है।
साधना करते है।
साधना का भी रहस्य है।
साधना अथवा वैचारिक साधना के अभ्यासी होते है। उपरोक्त व्यक्ति विशेष अपनी सफलता के लिए जिस साधना में लग होते है, उसके लिए मनःशक्ति और बौद्धिक संतुलन की बहुत आवश्यकता होती है। वैभव और विभव उपार्जित करने की लिप्सा में वे लोग विचार संतुलन का महत्व नहीं भूलते और निर्धनता के मूल्य पर भी मिलने वाले मानसिक संतुलन का त्याग नहीं करते। यही कारण है कि वे लोग अन्य सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक शान्त और संतुष्ट दिखलाई देते है।
साधना से रहित धन दौलत से शिर मारते और मेरा तेरा, इसका उसका करते हुए एक झूठे सुख, मिथ्या शाँति के मायाजाल में लोग यो ही भटकते हुए जीवन बिता रहे है और आगे भी बिताते रहेंगे
साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।
साधना ओर संयत का यह कार्यक्रम केवल शारीरिक-बल के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिये मनोबल की आवश्यकता होती है। जिसका मन शक्तिशाली और अनुकूल होता है, वह किसी भी विकार, वेग अथवा उद्वेग पर आसानी से नियंत्रण ला सकता है। जिसका शरीर शक्तिशाली हो पर मन निर्बल हो तो ऐसे आदमी की आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल रहती है। वह तो अपने आवेशों और विकारों को जरा देर भी नहीं रोक सकता।
साधना तथा चिन्तन मनन कर श्रेय पाया है, निर्विवाद रूप से उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत द्वारा सबसे पहले शक्ति की ही साधना की है। वासना को जीत और इन्द्रियों पर अधिकार कर सकने पर ही वे जीवन में श्रेयस्कर कार्य कर सकने में सफल हो सके है।
साधनाओं का अभ्यास करते रहने पर भी खाली हाथ ही रहना पड़ता है। आत्म-बल बढ़ाने के कई प्रयोग, कई साधन, कई अभ्यास भी है पर वे सब तो हीरे पर खराद चढ़ाने के उपकरण मात्र वाली कीमती मशीनें भी उसे असली हीरे का स्थान नहीं दिला सकतीं।
साधना में निरत रहा जाय।
साधना है। जीवन-क्रम देखने में सामान्य भले ही रहे पर अन्तरंग की उत्कृष्टता की जो समुन्नत कर सके वस्तुतः वही महापुरुष है। पुरुष का महापुरुष के रूप में परिणत हो जाना यही जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति हे।
साधना के अभ्यासी होते है। उपरोक्त व्यक्ति विशेष अपनी सफलता के लिए जिस साधना में लग होते है, उसके लिए मनःशक्ति और बौद्धिक संतुलन की बहुत आवश्यकता होती है। वैभव और विभव उपार्जित करने की लिप्सा में वे लोग विचार संतुलन का महत्व नहीं भूलते और निर्धनता के मूल्य पर भी मिलने वाले मानसिक संतुलन का त्याग नहीं करते। यही कारण है कि वे लोग अन्य सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक शान्त और संतुष्ट दिखलाई देते है।
साधना को प्रथम स्वीकार कर लेता है। मुख्य के लिये गौण की उपेक्षा कर सकने का आदर्श जो अपना लेगा उसी के लिये यह सम्भव होगा कि तृष्णा और वासना को ठुकरा कर उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समर्थन एवं आचरण कर सके। यह साहस कुछ ऐसी घटनाओं के साथ विकसित होता है, जिन्हें साधारण लौकिक दृष्टि में दुस्साहस ही कहा जा सकता है।
साधना दूसरी नहीं है। मनुष्य जो कुछ पाना अथवा बनाना चाहता है, उसके अनुरूप विचार धारण कर उनकी साधना करते रहने से वह मन्तव्य में निश्चय ही सफल हो जाता है। यदि किसी में स्वावलम्बन की कमी है और वह स्वावलम्बी बनकर आत्म निर्भरता की सुखद स्थिति पाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह तदनुरूप विचारों की साधना करने के लिये, इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है। वह तो मनुष्य की एक दुर्बल वृत्ति ही है।
साधना करने के लिये, इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है। वह तो मनुष्य की एक दुर्बल वृत्ति ही है। मैं अपनी इस दुर्बल वृत्ति का त्याग कर दूँगा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा अपने मनोरथ सफल करूँगा परावलम्बी व्यक्ति पराधीन रहता है और पराधीन व्यक्ति संसार में कभी सुख और शाँति नहीं पा सकता, मैं साधना द्वारा अपनी आन्तरिक शक्तियों का उद्घाटन करूँगा, शारीरिक शक्ति का उपयोग करूँगा और इस प्रकार स्वावलम्बी बनकर अपने लिये सुख शाँति की स्थिति स्वयं अर्जित करूँगा निश्चय ही इस प्रकार के अनुकूल विचारों की साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।
साधना स्थली रही है। ऋषि-महर्षियों से लेकर अनेक साधु वानप्रस्थों ने यहाँ आकर तपस्याएं कीं और साधना के तेजस्वी कण बिखेरे। उनका लाभ वहाँ पहुँचने वाले को अनायास ही मिल जाता है।
साधना करते रहने से वह मन्तव्य में निश्चय ही सफल हो जाता है। यदि किसी में स्वावलम्बन की कमी है और वह स्वावलम्बी बनकर आत्म निर्भरता की सुखद स्थिति पाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह तदनुरूप विचारों की साधना करने के लिये, इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है। वह तो मनुष्य की एक दुर्बल वृत्ति ही है। मैं अपनी इस दुर्बल वृत्ति का त्याग कर दूँगा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा और स्वयं अपने परिश्रम तथा उद्योग द्वारा अपने मनोरथ सफल करूँगा परावलम्बी व्यक्ति पराधीन रहता है और पराधीन व्यक्ति संसार में कभी सुख और शाँति नहीं पा सकता, मैं साधना द्वारा अपनी आन्तरिक शक्तियों का उद्घाटन करूँगा, शारीरिक शक्ति का उपयोग करूँगा और इस प्रकार स्वावलम्बी बनकर अपने लिये सुख शाँति की स्थिति स्वयं अर्जित करूँगा निश्चय ही इस प्रकार के अनुकूल विचारों की साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।
साधना करते है। किन्तु क्या पुरुषार्थ करने, धन दौलत कमाने, परिवार बसाने और धर्म कर्म करने मात्र से लोग सुख शाँति के पाने उद्देश्य में सफल हो जाने है। सम्भव है इस प्रकार प्रयत्न करने से कई लोग सुख शांति की उपलब्धि कर लेते है, किन्तु बहुतायत में तो यही दिखता है कि धन सम्पत्ति और परिवार परिजन के होते हुए भी लोग दुःखी और त्रस्त दिखते है। धर्म कर्म करते हुए भी असंतुष्ट और अशाँत है।
साधना। यह विचार साधना का ही फल था कि प्राचीन आप्त पुरुष त्रिकालदर्शी और जनसाधारण सुख शाँति के अधिकारी होते थे। सुख शाँति के अन्य उपायों का निषेध न करते हुए भारतीय ऋषि मुनि अपने समाज को धर्म का अवलम्बन लेने के लिए विशेष निर्देशन किया करते थे। जनता की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने जिन वेदों, पुराणों, शास्त्रों, उपनिषदों आदिक धर्म ग्रन्थों का प्रणयन किया है, उनमें मंत्रों, तर्कों, सूत्रों व शक्तियों द्वारा विचार साधना का ही पथ प्रशस्त किया है।
साधना का ही पथ प्रशस्त किया है।
साधनाओं में उतरना पड़ता हैं साधना ओर संयत का यह कार्यक्रम केवल शारीरिक-बल के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिये मनोबल की आवश्यकता होती है। जिसका मन शक्तिशाली और अनुकूल होता है, वह किसी भी विकार, वेग अथवा उद्वेग पर आसानी से नियंत्रण ला सकता है। जिसका शरीर शक्तिशाली हो पर मन निर्बल हो तो ऐसे आदमी की आसुरी प्रवृत्तियाँ बड़ी प्रबल रहती है। वह तो अपने आवेशों और विकारों को जरा देर भी नहीं रोक सकता।
साधना रहा है। वे वेदों में दिए-प्रववाम शरद शतम्। अदीन स्याम शरदः शतम्। जैसे अनेक मंत्रों का जाप किया करते थे। यह मंत्र जाप आयु सम्बन्धी विचार साधना के सिवाय और क्या होता था, गायत्री मंत्र की साधना का भी रहस्य है।
साधना मार्ग से शोध में प्रवृत्त हुए, जिसके परिणामस्वरूप उस ईश्वर को खोज ही लाये, जो इस निखिल ब्रह्माण्ड का रचयिता, पालन कर्ता और लय कर्ता है। उनकी जिज्ञासा ने ही उन्हें यह श्रेय प्रदान किया कि वे सृष्टि के रहस्यों, उसके आदि स्त्रोत ईश्वर का पता ही नहीं लगा सके, बल्कि उससे सीधा सम्पर्क भी स्थापित कर सकें।
साधना है। इसके समान सरल तथा सच्च फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है। मनुष्य जो कुछ पाना अथवा बनाना चाहता है, उसके अनुरूप विचार धारण कर उनकी साधना करते रहने से वह मन्तव्य में निश्चय ही सफल हो जाता है। यदि किसी में स्वावलम्बन की कमी है और वह स्वावलम्बी बनकर आत्म निर्भरता की सुखद स्थिति पाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह तदनुरूप विचारों की साधना करने के लिये, इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है।
साधना का सफल विशेष लोगों के लिए ही अपवाद नहीं उसका सुफल हर वह जनसाधारण भी पा सकता है, जो उचित रूप से विचार साधना में निरत होता है। भारत में जीवन विकास करने और स्थायी सुख शाँति पाने के लिए मंत्र जाप पर बहुत बल दिया जाता था। आज भी आध्यात्मिक लोग पहले की ही तरह आत्म शाँति के लिए मंत्रों का जाप तथा अनुष्ठान करते रहते है। यज्ञ, अनुष्ठान, जप तथा पूजा पाठ और कुछ नहीं विचार साधना का ही एक प्रकार है। यज्ञ और जाप यद्यपि मानव जीवन का एक अनिवार्य नियम है, जिसका प्रायः लोग पालन करते है, जो लोग नहीं करते वे अपने एक मानवीय कर्तव्य से विमुख होते है, तथापि संकट और आपत्ति का शमन करने और उसके स्थान पर सुख शाँति की सामान्य स्थिति लाने के लिए लोग विशेष अनुष्ठानों का आयोजन करते है।
साधना में लग होते है, उसके लिए मनःशक्ति और बौद्धिक संतुलन की बहुत आवश्यकता होती है। वैभव और विभव उपार्जित करने की लिप्सा में वे लोग विचार संतुलन का महत्व नहीं भूलते और निर्धनता के मूल्य पर भी मिलने वाले मानसिक संतुलन का त्याग नहीं करते। यही कारण है कि वे लोग अन्य सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक शान्त और संतुष्ट दिखलाई देते है।
साधना में उन तत्वों का समावेश करे, जिनका प्रतिपादन गायत्री तत्व ज्ञान के अंतर्गत किया गया है।
साधना करनी होगी। सामान्य लोगों की अपेक्षा दार्शनिक, विचारक, विद्वान्, सन्त और कलाकार लोग अधिक निर्धन और अभाव ग्रस्त होते है तथापि उनकी अपेक्षा कही अधिक संतुष्ट, सुखी और शाँत देखे जाते है। इसका एक मात्र कारण यही है कि सामान्य जन सुख शाँति के लिए जहाँ लौकिक अथवा भौतिक साधना में निरत रहते है, वहाँ वे व्यक्ति विशेष मानसिक साधना अथवा वैचारिक साधना के अभ्यासी होते है। उपरोक्त व्यक्ति विशेष अपनी सफलता के लिए जिस साधना में लग होते है, उसके लिए मनःशक्ति और बौद्धिक संतुलन की बहुत आवश्यकता होती है। वैभव और विभव उपार्जित करने की लिप्सा में वे लोग विचार संतुलन का महत्व नहीं भूलते और निर्धनता के मूल्य पर भी मिलने वाले मानसिक संतुलन का त्याग नहीं करते।
साधना करते है, वे रोगी होने पर भी शीघ्र चंगे हो जाया करते है। जो रोगी इस प्रकार सोचने के अभ्यस्त होते है, वे एक बार उपचार के अभाव में भी स्वास्थ्य लाभ कर लेते है-मेरा रोग साधारण है, रोग उपचार लाभ कर लेते है-रोग साधारण है, मेरा उपचार ठीक-ठीक पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन दिन मेरा रोग घटता जाता है और मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव करता हूँ। मेरे पूरी तरह स्वस्थ हो जाने म अब ज्यादा देर नहीं है। इसी प्रकार जो निरोग व्यक्ति भूल कर भी रोगों की शंका नहीं करता और अपने स्वास्थ्य से प्रसन्न रहता है। जो कुछ खाने को मिलता है, खाता और ईश्वर को धन्यवाद देता है, वह न केवल आजीवन निरोग ही रहता है, बल्कि दिन दिन उसकी शक्ति और सामर्थ्य भी बढ़ती जाती है।
साधना के सिवाय और क्या होता था, गायत्री मंत्र की साधना का भी रहस्य है।
साधना की जाती है। मनुष्य जीवन में जो कुछ पाता या खोता है, उसका हेतु मान भले ही किन्हीं और कारणों को लिया आये, किन्तु उसका वास्तविक कारण मनुष्य के अपने विचार ही होते है, जिन्हें धारण कर वह जान अथवा अनजान दशा में प्रत्यक्ष से लेकर गुप्त मन तक चिन्तन तथा मनन करता रहता है।
साधना की है। वासना को जीत और इन्द्रियों पर अधिकार कर सकने पर ही वे जीवन में श्रेयस्कर कार्य कर सकने में सफल हो सके है।
साधना में निरत रहते है, वहाँ वे व्यक्ति विशेष मानसिक साधना अथवा वैचारिक साधना के अभ्यासी होते है। उपरोक्त व्यक्ति विशेष अपनी सफलता के लिए जिस साधना में लग होते है, उसके लिए मनःशक्ति और बौद्धिक संतुलन की बहुत आवश्यकता होती है। वैभव और विभव उपार्जित करने की लिप्सा में वे लोग विचार संतुलन का महत्व नहीं भूलते और निर्धनता के मूल्य पर भी मिलने वाले मानसिक संतुलन का त्याग नहीं करते। यही कारण है कि वे लोग अन्य सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक शान्त और संतुष्ट दिखलाई देते है।
साधना मानव-जीवन की सर्वश्रेष्ठ साधना है। इसके समान सरल तथा सच्च फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है। मनुष्य जो कुछ पाना अथवा बनाना चाहता है, उसके अनुरूप विचार धारण कर उनकी साधना करते रहने से वह मन्तव्य में निश्चय ही सफल हो जाता है। यदि किसी में स्वावलम्बन की कमी है और वह स्वावलम्बी बनकर आत्म निर्भरता की सुखद स्थिति पाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह तदनुरूप विचारों की साधना करने के लिये, इस प्रकार का चिन्तन तथा मनन करे, मुझे परमात्मा ने अनन्त शक्ति दी है, मुझे किसी दूसरे पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परमुखापेक्षी रहना मानवीय व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं परावलम्बी होना कोई विवशता नहीं है।
साधना चाहते होंगे तो वे निश्चय ही उड़न तश्तरियों में बैठ कर पृथ्वी में आते होंगे। इसलिये उड़न तश्तरियों के इन प्रसंगों को मिथ्या नहीं कहा जा सकता।
साधना काफी सुविधाजनक ओर सरल हो जायेगी।
साधनायें करनी होती है। ध्यान और जप के माध्यम से आत्मा के आलोक तक पहुँचना पड़ता है, तब वह शक्ति प्रदीप्त हो पाती है। एक जीवन भर अभ्यास करते रहने के उपरान्त प्राप्त हुई यह आत्म शक्ति ही किन्हीं पुरुषों को संयोगवश दूसरे जन्म में जन्म से ही मिल जाती है।
साधना में निरत होता है। भारत में जीवन विकास करने और स्थायी सुख शाँति पाने के लिए मंत्र जाप पर बहुत बल दिया जाता था। आज भी आध्यात्मिक लोग पहले की ही तरह आत्म शाँति के लिए मंत्रों का जाप तथा अनुष्ठान करते रहते है। यज्ञ, अनुष्ठान, जप तथा पूजा पाठ और कुछ नहीं विचार साधना का ही एक प्रकार है। यज्ञ और जाप यद्यपि मानव जीवन का एक अनिवार्य नियम है, जिसका प्रायः लोग पालन करते है, जो लोग नहीं करते वे अपने एक मानवीय कर्तव्य से विमुख होते है, तथापि संकट और आपत्ति का शमन करने और उसके स्थान पर सुख शाँति की सामान्य स्थिति लाने के लिए लोग विशेष अनुष्ठानों का आयोजन करते है।
साधना द्वारा अपनी आन्तरिक शक्तियों का उद्घाटन करूँगा, शारीरिक शक्ति का उपयोग करूँगा और इस प्रकार स्वावलम्बी बनकर अपने लिये सुख शाँति की स्थिति स्वयं अर्जित करूँगा निश्चय ही इस प्रकार के अनुकूल विचारों की साधना से मनुष्य की परावलम्बन की दुर्बलता दूर होने लगेगी और उसके स्थान पर स्वावलम्बन का सुखदायी भाव बढ़ने और दृढ़ होने लगेगा।
साधना का ही फल था कि प्राचीन आप्त पुरुष त्रिकालदर्शी और जनसाधारण सुख शाँति के अधिकारी होते थे। सुख शाँति के अन्य उपायों का निषेध न करते हुए भारतीय ऋषि मुनि अपने समाज को धर्म का अवलम्बन लेने के लिए विशेष निर्देशन किया करते थे। जनता की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उन्होंने जिन वेदों, पुराणों, शास्त्रों, उपनिषदों आदिक धर्म ग्रन्थों का प्रणयन किया है, उनमें मंत्रों, तर्कों, सूत्रों व शक्तियों द्वारा विचार साधना का ही पथ प्रशस्त किया है।
साधना द्वारा विचारों को उस स्थिति में रख सकता है, वही वास्तविक सुख शाँति का अधिकारी बन सकता है। अन्यथा, विचार साधना से रहित धन दौलत से शिर मारते और मेरा तेरा, इसका उसका करते हुए एक झूठे सुख, मिथ्या शाँति के मायाजाल में लोग यो ही भटकते हुए जीवन बिता रहे है और आगे भी बिताते रहेंगे
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-August
साधना-कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना-प्रकोष्ठ के तीन सोपान भी उनसे चढ़े न जा सके। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गये। उनका कृश-मात भगवती गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरा। ऋषि अचेत हो गये स्त्र धौम्य।
साधना है।
साधना का यही उद्देश्य है। यह वनवास की तरह घर में रहकर भी की जा सकती। वानप्रस्थ इसी प्रयोजन के लिए है। लोक-मंगल में सेवा संदर्भ में संलग्न रहने से आत्म-विकास होता है। जिस स्वार्थपरता के साथ हम अपने निजी प्रयोजनों में अब तक लगे रहे, उसी तत्परता के साथ लोक-मंगल और परमार्थ प्रयोजन में रस लेने लगें तो समझना चाहिये कि आत्म-विकास की प्रक्रिया चल पड़ी।
साधना का यही क्रम है और भारतीय परम्परा के अनुरूप हमारा ढलता जीवन-पचास से पचहत्तर तक की आयु इसी में नियोजित होनी चाहिये।
साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
साधनायें अपेक्षित है क्योंकि उनकी अनुभूति में समय लगाना आवश्यक है। ब्रह्माण्ड की तुलना की तरह चेतन परमाणु इतना छोटा है कि यदि उसके नाभिक का व्यास 1/10 मिलीमीटर मानें तो पूरा परमाणु एक भव्य इमारत जैसा लगेगा और बैक्टीरिया जिसका व्यास ऊपर दिया है इतना बड़ा लगेगा जितनी लंदन से बर्लिन की दूरी। अमीबा जो सबसे छोटा एक कोशिकीय जीव है इतना बड़ा होगा कि उसे पृथ्वी की गोलाई में दो बार आसानी से लपेटा जा सकेगा। उस तुलना में मनुष्य इतना बड़ा होगा कि पृथ्वी में खड़ा होकर बड़े आराम से सूर्य को पकड़ ले तब पृथ्वी इतनी बड़ी होगी कि दोनों ध्रुवों के बीच की दूरी प्रकाश की गति से चलकर पूरी की जाये तो पूरे दो वर्ष लग जायें। एक ओर ब्रह्माण्ड की यह विशालता एक ओर जीवन की यह लघुता दोनों पर विचार करते हैं तो ऋषियों की ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ वह अणु से भी छोटा और ब्रह्माण्ड के समान विशाल है, की उक्ति को ही शिरोधार्य करना पड़ता है।
साधना के लिए तथा अन्तिम 25 वर्ष घर परिवार को मोह, ममता से छुटकारा पाकर परि भ्रमण करते हुए विश्व-मानव के लिए-परमात्मा के लिए अपना पूर्णतया समर्पण करने के लिए है। इन चार अवधि विभाजन को चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास कहते हैं। यह ऐसा संतुलित विभाजन है कि जब तक उसे क्रियान्वित किया जाता रहा, यह देश संसार वासियों की दृष्टि में स्वर्ग और इस देश का नागरिक देवता की तरह आदर्श एवं अभिनन्दनीय माना जाता रहा। जीवन का यह विभाजन क्रम प्राचीनकाल की तरह आज भी आवश्यक एवं उपयोगी है।
साधना का अभाव हो तो देखना, उसे पूरा करना। अब यह शरीर बहुत थक गया है।” यह कहते-कहते उनकी आंखें भर आई धौम्य
साधना थी वहाँ देखते-देखते मादकता, वैभव और विलास खेलने लगा।
साधना द्वारा मिलने वाली प्रारम्भिक सिद्धियों को बाधक माना गया है। जिस प्रकार धन-वैभव ऐश्वर्य और सौंदर्यवान युवती पत्नियों का सुख पाकर मनुष्य संसार को ही सब कुछ समझ लेता है उसी प्रकार कुण्डलिनी का साधक भी बीच के ही छः चक्रों में दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूसरों के मन की बात जानना, भविष्य दर्शन आदि अनेक सिद्धियाँ पाकर उनमें ही आनन्द का अनुभव करने लगता है और परम-पद का लक्ष्य अधूरा ही रह जाता है।
साधना, आपका ज्ञान, आपका ब्रह्म-वर्चस्व विश्व के कल्याण के लिये है भगवन्। पर यह कहाँ सम्भव है कि आप सुदूर प्रान्तों का निरन्तर परिव्राजन करें और लोभों की ज्ञान-पिपासा को तृप्त करें। गुरुकुल को स्थापना करनी ही होगी देव। उसके बिना भावी पीढ़ी का आध्यात्मिक प्रशिक्षण किस प्रकार सम्भव होगा? आप ही तो कहते हैं कि धर्म-तत्त्व का प्रशिक्षण और प्रसार किये बिना प्रजा का नैतिक, चारित्रिक, सैद्धान्तिक और आत्मिक विकास नहीं हो पाता।
साधना में नियमित रूप से कम-से-कम चार घण्टा समय देना चाहिए प्रातः और सायंकाल का समय व्यक्तिगत साधना के लिए और दिन का बचा समय लोक-मंगल की सेवा प्रक्रिया में लगाने के लिए नियुक्त रहना चाहिये। कहना न होगा कि समय की आवश्यकता को देखते हुए, आज की सबसे बड़ी लोक सेवा विचार परिवर्तन की दृष्टि से किये गये, प्रयत्नों पर ही निर्भर है। आर्थिक, शारीरिक या बौद्धिक सुविधाएँ बढ़ाने वाले कार्य भी यों सेवा क्षेत्र में आते हैं पर उनका भी
साधना देख मुग्ध हो जाते थे।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा में लगाना चाहिये। यहीं पूर्णता के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है। ब्रह्मचारी अवधि में लौकिक जीवन की प्रगति एवं स्थिरता के लिए तैयारी की गई थी। वानप्रस्थ में आध्यात्मिक जीवन की-परमात्मा-विश्व-मानव की सेवा-साधना करने के लिए अग्रसर होते हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण समय है।
साधना करने के लिए अग्रसर होते हैं। यह अति महत्त्वपूर्ण समय है। इसमें बच्चे भी सुयोग्य बनते हैं, अपनी आन्तरिक प्रगति का भी अवसर मिलता है और उसी अवधि में लोक-मंगल के वे महत्त्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं, जिनके ऊपर किसी समाज या राष्ट्र की वास्तविक प्रगति निर्भर रहती है।
साधना-प्रकोष्ठ के तीन सोपान भी उनसे चढ़े न जा सके। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गये। उनका कृश-मात भगवती गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरा। ऋषि अचेत हो गये स्त्र धौम्य। भागते हुये आये।
साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है इसलिये इसे “दशम द्वार” या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं। ध्यान बिन्दु उपनिषद् में कहा है-
साधना के स्वरूप पर निर्भर है कि वह सहस्रार में कितने समय तक रहता है उसके बाद वह फिर निम्नतम लोकों के सुखों में जा भटकता है पर जो अपने सहस्रार को पका लेते हैं वह पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त कर अनन्त काल तक ऐश्वर्य सुखोपभोग करते हैं।
साधना करनी होती है।
साधना का परिणाम एक कन्या के रूप में छोड़ कर। विश्वामित्र ने बिलखती आत्मजा के पास भी मेनका को नहीं देखा तो उनकी देह क्रोध से जलने लगी पर अब हो ही क्या सकता? मेनका इन्द्रपुर जा चुकी थी।
साधना को करते हुए आत्म-कल्याण पूर्णता की प्राप्ति और ईश्वरीय प्रकाश की उपलब्धि का पूरा लाभ एवं आनन्द उठा सकता है। सत्कर्मों से हो शुभ संस्कार बनते हैं और वे ही हमारी प्रधान आध्यात्मिक पूँजी है। सद्भावना अभिवर्द्धन की लोक-सेवा उसी प्रयोजन की पूर्ति करती है। वानप्रस्थ में साधु ब्राह्मणों जैसी लोक-मानस को परिष्कृत करने की सेवा, साधना करनी होती है।
साधना का अविच्छिन्न अंग है। इस साधना को करते हुए आत्म-कल्याण पूर्णता की प्राप्ति और ईश्वरीय प्रकाश की उपलब्धि का पूरा लाभ एवं आनन्द उठा सकता है। सत्कर्मों से हो शुभ संस्कार बनते हैं और वे ही हमारी प्रधान आध्यात्मिक पूँजी है। सद्भावना अभिवर्द्धन की लोक-सेवा उसी प्रयोजन की पूर्ति करती है। वानप्रस्थ में साधु ब्राह्मणों जैसी लोक-मानस को परिष्कृत करने की सेवा, साधना करनी होती है।
साधनात्मक प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।
साधना आरम्भ की। उसने 40 हजार पुस्तकें पढ़ीं। कुछ ग्रन्थ तो उसे केवल एक बार ही सुनाये गये थे। उसके मस्तिष्क में ज्ञान का अनन्त भण्डार जमा हो गया। वह ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर देता था जो कभी औरों की कल्पना में भी न आते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-July
साधना गृहों में आसीन भगवती गायत्री के ध्यान, स्मरण, स्तोत्र और जप में तल्लीन हो चुके थे। ऐसी पुण्य बेला में भी महर्षि व्यास के आश्रम का एक तरुण साधक- साधक ही क्यों उनके ही यशस्वी पुत्र स्वयं शुकदेव ने शैया का परित्याग नहीं किया था। यद्यपि वे जग चुके थे पर उनकी मुखाकृति देखने से पता चलता था उसके अन्तस्तल में अन्तर्द्वन्द्व चल रहा है। मन कुछ खोजने का प्रयत्न कर रहा है किन्तु बुद्धि उचित समाधान कर पाने में असमर्थ है।
साधना को छोड़कर जाने की इच्छा भी नहीं थी। किन्तु कोई प्रेम से बुलाये तो तिरस्कार भी उचित नहीं राजा शान्त भाव से साथ ही लिए।
साधना तथा संयम आदि भी धारणा कर मनुष्य को अध्यात्म अथवा धर्म मार्ग से अपनी आत्मा का उद्धार तो करते ही रहना चाहिये, साथ ही उसे दूसरों का दुःख-दर्द भी समझना और उसे दूर करने में यथायोग्य सहयोग भी देते रहना चाहिये। उसे चाहिये कि वह अपनी उपलब्धियों, उपार्जनों तथा प्राप्तियों का वह सारा अंश परोपकार में लगा ही देना चाहिये, जो उसके अपने-अपने आत्मउद्धार के लिये प्रयुक्त होने के बाद शेष रहे। लोग बड़ी-बड़ी विद्याएँ प्राप्त कर लेते हैं, असंख्य धन पैदा कर लेते हैं। किन्तु उसमें से थोड़ा बहुत अपने स्वार्थ में लगा कर शेष को योंही व्यर्थ में छिपाये रखते हैं और अन्त में धरती अथवा कुपात्रों के हाथ में सौंपकर चले जाते है। यह संकीर्णता, यह स्वार्थ परम्परा मानव-जीवन के उद्देश्य के सर्वथा प्रतिकूल है।
साधना का निमन्त्रण मिल रहा है। वत्स! अपने सुसंस्कारों के कारण अन्तःकरण के संकेत आप अनुभव कर सकें हैं। अब इनको समझकर आचरण में लाने में विलम्ब न करना श्रेयस्कर है।
साधना की शीतलता से आत्मा तृप्त होती है।”
साधना कोई भी किसी भी परिस्थिति में कर सकता है। सेवा के लिये किसी बड़े धन की आवश्यकता नहीं है। संकीर्णता का त्याग कर उत्कट भावना के साथ जन-जीवन में घुल-मिल कर एक रूप हो जाना ही सेवा व्रत का पालन करने के लिए पर्याप्त होता है।
साधनाओं को ही सुमेरु पर्वत पर पूरा करने के पश्चात् शुक ने निर्विकल्प समाधि का सुख प्राप्त किया।
साधना रही है-जिसके लिये हम जलते और तपते रहे हैं-जिसके लिये अपने समस्त साधनों को प्रयुक्त कर रहे हैं और जिसके लिये जीवित हैं उसका दूसरा चरण समता ही हैं। असमानता निस्सन्देह अस्वाभाविक और अवांछनीय हैं। जब तक वह विद्यमान् है संसार में अशान्ति ही रहेगी। अज्ञान और अन्याय का सम्मिश्रित स्वरूप असमानता के रूप में प्रकट होता है। इस दो जीभ वाली विश्व विभीषिका को आस्तीन में छिपी सर्पिणी की तरह साथ रख कर हम चैन से नहीं बैठ सकते।
साधना से लोग भ्रष्ट है। जाते है और फिर गिरते ही चल जाते है। इस अवस्था से बचने का एक ही उपाय है, प्रेम के ईश्वरीय और दिव्य स्वरूप को अन्तःकरण में मजबूती से धारण कर लेना। जब यह विश्वास हो जाये कि अब मेरे मन से क्षुद्र वासनाओं का, स्वार्थ, मोह माया आसक्ति का, अन्त हो गया तो फिर अपनी प्रेम-परिधि को जितना बढ़ाया जायेगा उतना ही आनन्द मिलेगा। ऐसा करना निष्काम कर्मयोगी और तपस्वी के लिये ही सम्भव है।
साधना-समर्पण और सौन्दर्य की साक्षात्कार। मनुष्य जीवन में जो इतना-सा दर्शन जान गया उसे ईश्वरीय की प्राप्ति के लिये और कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं
साधना भवन से बाहर नहीं निकले। शुक ने उन्हें सादर प्रणाम किया। विवर्ण मुख मुद्रा देखते ही भगवान् व्यास ने पूछा- शुक तुमने उपासना कर ली? यज्ञ की समिधाएँ और हविव्पात्र यज्ञ स्थल पर पहुँचा दिया? कहो-कहो आज कुछ बेचैन से दिखाई दे रहे हो कोई बात हुई है क्या?
साधनाएँ सफल नहीं होती। अजातशत्रु ने यह बात मान ली पर अब एक नई समस्या उठ खड़ी हुई कि गुरु किसे बनाया जाये? लोगों ने यह बताया था कि गुरु बनने का अधिकारी वही होता है जो परमार्थी और तत्त्वदर्शी हो। किस कसौटी पर कसकर उक्त गुण संयत गुरु का पता लगाया जाये यह बात उनकी समझ में नहीं आई।
साधनायें है। प्रेम की साधना-समर्पण और सौन्दर्य की साक्षात्कार। मनुष्य जीवन में जो इतना-सा दर्शन जान गया उसे ईश्वरीय की प्राप्ति के लिये और कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं
साधना आदि से लेकर- अधेड़ अवस्था के पारिवारिक एवं राजनैतिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह में उन्होंने पूरे मनोयोग से कार्य किया था। किन्तु न जाने क्यों उन्हें अन्तःकरण में कुछ हलचल-सी अनुभव होने लगी थी। कर्त्तव्य पालन के सन्तोष की शीतलता के अतिरिक्त कुछ आकुलता की अनुभूति भी उन्हें होने लगी। राजा कारण न समझ सके और उन्होंने अपने कुल गुरु के सम्मुख अपनी समस्या रखी।
साधना प्रारम्भ करें एक मार्गदर्शक गुरु वरण करना आवश्यक है। बिना गुरु के साधनाएँ सफल नहीं होती। अजातशत्रु ने यह बात मान ली पर अब एक नई समस्या उठ खड़ी हुई कि गुरु किसे बनाया जाये? लोगों ने यह बताया था कि गुरु बनने का अधिकारी वही होता है जो परमार्थी और तत्त्वदर्शी हो। किस कसौटी पर कसकर उक्त गुण संयत गुरु का पता लगाया जाये यह बात उनकी समझ में नहीं आई।
साधना, ध्यान धारणा की अपेक्षा पूर्ण और पारमार्थिक मनुष्य बनने के लिये सेवा सबसे सरल उपाय माना गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-October
साधना कक्ष में बदल चुका था। इससे पूर्व कि महाशतक कुछ कहे, उसने अपने आपको उसी गोद में समर्पित कर दिया।
साधना में त्राटक गोलकों में विकसित इस प्राण प्रवाह के द्वारा केवल नेत्रों का तेज बढ़ाया जाता है और चक्षु गोलकों में विकसित इस प्राण प्रवाह के द्वारा सम्मोहन के कितने ही खेल चमत्कार दिखाये जाते हैं। इस प्रकार का प्राण प्रवाह अन्य इन्द्रियों में भी होता है। उस विकसित और व्यवस्थित किया जा सके तो शरीरगत प्राण प्रवाह हमारे व्यक्तित्व को प्रखर तेजस्वी एवं प्रभावशाली बना सकता है।
साधना के द्वारा अपने आप में पूर्ण हो गये।
साधनाओं में मारण, मोहन, उच्चाटन, अभिसार आदि अनेक विधानों का वर्णन मिलता है, वह सब विचार-शक्ति के नियन्त्रित प्रयोग से ही होता है।
साधना ग्रन्थों में बहुत कुछ वर्णन है। चेतना जगत् में संव्याप्त ‘महत्तत्व’ की तुलना ईथर से की जा सकती है और प्राण की ऊर्जा से। प्राण किसी भी प्राणी की स्थिति, पुष्टि और प्रगति का प्रधान आधार है। जिसमें प्राण की जितनी मात्रा अधिक होगी, वह उतना ही मनस्वी और तेजस्वी होगा। यह मात्रा जितनी ही न्यून होगी, उसी अनुपात से प्राणी आलसी, दीर्घ सूत्री, मन्द, अज्ञ और अविकसित बना रहेगा।
साधना में मुझ सागर से भी बढ़कर गहराई है। निश्चय ही उनके पास जाकर तुम पूर्णता की प्राप्ति कर सकोगे।”
साधना शक्ति से अपना आत्म-बल बढ़ाकर उससे औरों का हित किया करते है, जीन डिक्सन भी हजारों लोगों का हित किया करती।
साधना से दीप्त मुखमण्डल ने उसे इस ओर आने को आकृष्ट किया। आलोपा अपने आपको रोक नहीं पाई थी।
साधना में विघ्न उपस्थित करेगी। विद्युत की कड़क जिस प्रकार बिना कहे दीवारों से प्रतिध्वनित होकर गूँजती है, महाशतक का क्रोध भी उसी प्रकार वर्तमान परिस्थिति से टकराकर द्विगुणित हो उठा। उसने अपनी पत्नी रेवती को जो भी कह सकता था, दुर्वचन कह और दाँत पीस कर उसे मारने को दौड़ा। महाशतक ने अब तक जितना सहन कर लिया था वही उसके लिए कम नहीं था। महाशतक ने पत्नी रेवती को कड़ककर डाँटा ही था कि-सामने तथागत आ गये।
साधना में व्यतीत करना चाहिये था, वह निकृष्ट और हेय जिन्दगी जीता है, जब कि निकृष्ट कहे जाने वाले पेड़-पौधों के आचरण बड़े प्रेरक और प्रकाश देने वाले होते है। मनुष्य चाहे तो इन तुच्छ जीवों से भी बड़ी महत्त्वपूर्ण शिक्षायें ग्रहण कर सकता है।
साधना के परिपक्व अवस्था तक पहुँचने में साधक के चित्त उसी प्रकार चंचल होते हैं। उनके आहार में से लवण और मधु दोनों निकाल दिए गये थे। सहाद्रि अस्वाद व्रत और निर्झर के शीतल के अतिरिक्त और कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1969-November
साधना योगाभ्यास की अति महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसे आरम्भिक स्तर पर करने से भी भौतिक जीवन प्रखर एवं प्रतिभा सम्पन्न बनाया जा सकता है। ऊँचे स्तर पर तो उस साधना को परिणति कितनी चमत्कारी हो सकती है, उसका उल्लेख कर सकना भी कठिन है।
साधना के लिये आश्रम में आये थे, एक-एक कर महर्षि के चरणों में शीश झुकाते चले जा रहे थे और शिखिध्वज देख रहा था, इस अनुशासन में कितनी शाँति, सन्तोष, आनन्द और भाव छलक रहा है। आज उसे अपनी दीनता पर बड़ा पश्चाताप हो रहा था।
साधना को परिणति कितनी चमत्कारी हो सकती है, उसका उल्लेख कर सकना भी कठिन है।
साधना करनी पड़ती है तात! जिस दिन तू इस तत्व ज्ञान को समझ लेगा, उस दिन तेरी अवरुद्ध आत्म प्रगति के द्वार अपने आप खुल जायेंगे।”
साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए। शिखिध्वज ने गुरु-चरणों में प्रणिपात किया, महर्षि उद्दालक ने आशीर्वाद दिया और दोनों अपने-अपने पर्ण कुटीरों की ओर चले गये।
साधना की प्रारम्भिक आवश्यकतायें है, शिखिध्वज! आज तुम्हारी मन्त्र-दीक्षा सम्पन्न हुई। पूजन की सामग्री, उपयुक्त पात्र, कुश-आसन यह अपने पास रखने होंगे। पंचोपचार पूजन सहित मंत्र जप करना चाहिये और शुभ्र ज्योति स्वरूप निराकार भगवती गायत्री का ध्यान करना चाहिये। जब तुम इस प्रारम्भिक साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए।
साधना व्यर्थ गई, इसका मुझे हार्दिक दुःख है। अब आशीर्वाद दे इसी साधना का पुनः अभ्यास करूँ और फिर से अग्नि दीक्षा की पात्रता उपलब्ध करूँ।
साधना कराई थी। परमहंस जी की धर्मपत्नी शारदामणि बड़े संकोच से ही उस संदर्भ में सहयोग के लिए उद्धत हुई थी। इस प्रकार के और भी साधन विधान है, जिनमें कामोत्तेजना को मनस्विता में परिणत करने का वैसा ही प्रयोग है, जैसा कि गिरते हुए जल प्रवाह कि शक्ति का उपयोग करके बिजलीघर बनाये जाते हैं अथवा बहती हुई तेज हवा की क्षमता से पनचक्की चलाई जाती है।
साधना में आनाकानी करने लगता है, जो आत्मा के उद्धार में आवश्यक होते है। अस्तु देहाभिमान अथवा आशक्ति से सदा सावधान रहकर दूर रहना चाहिये।
साधनाओं की तरह यह भी गुहा प्रकरण में ही चला जाता है आरे केवल अधिकारी ही इस संदर्भ में चर्चा कर सकते है।
साधनाओं में प्रवेश कर सिद्धियाँ प्राप्त करूँ, पाँचों कोशों का अनावरण करते हुए आनन्दमय भूमिका में पहुँचूं।
साधनायें करने का जो विधान है वह सूर्य की इस भौतिक प्रकृति की खोज का ही फल है। वह पूर्णतया विज्ञान सम्मत ही है।
साधना ज्ञानार्जन और संयम में उनकी वृत्ति बढ़ेगी, ऐसे लोग ही आगे चलकर विश्व का मार्ग दर्शन करेंगे।
साधना के छोटे बड़े अनेक स्तर प्रयोग एवं फलितार्थ है। सर्वसुलभ आरम्भिक प्रयोग भी इस विद्या के हैं जो सामान्य जीवन में तेजस्विता, प्रखरता एवं क्रियाशीलता भर सकते हैं। कठिन और उच्च स्तर के प्रयोग भी है। जो व्यक्ति की अन्तरंग सत्ता को इतनी व्यापक बना सकते हैं कि वह ब्रह्माण्ड की महान सत्ताओं के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ सके। इस ब्रह्माण्ड में इतना कुछ भरा पड़ा है कि मनुष्य की कल्पना तक अस सब को जानने समझने में समर्थ नहीं हो सकती।
साधना का प्रतिफल परखने का अब समय आ गया है। परिजनों की मूर्छा विरत हुई या नहीं? हमारी साधना रंग लाई या नहीं? इन दोनों ही तथ्यों की परख उपरोक्त दो कसौटियों पर करने की ठानी है। 19 महीने का यही परीक्षा काल है।
साधना की सफलता और भी सत्वर हो उठती है।
साधना का अन्तिम चरण आज से पूरा हो रहा है। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि अब मैं उच्च-स्तरीय साधनाओं में प्रवेश कर सिद्धियाँ प्राप्त करूँ, पाँचों कोशों का अनावरण करते हुए आनन्दमय भूमिका में पहुँचूं।
साधना शरीर कन और आत्मा के स्थूल सूक्ष्म एवं कारण कलेवरों में न जाने कितनी सामर्थ्य उत्पन्न कर सकती है। कहना न होगा कि कुण्डलिनी साधना योगाभ्यास की अति महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसे आरम्भिक स्तर पर करने से भी भौतिक जीवन प्रखर एवं प्रतिभा सम्पन्न बनाया जा सकता है। ऊँचे स्तर पर तो उस साधना को परिणति कितनी चमत्कारी हो सकती है, उसका उल्लेख कर सकना भी कठिन है।
साधना के द्वारा निर्मल किया मन एक ही क्षण में लोभ की कीचड़ में डूब गया। मुद्राध्यायी महर्षि! मुस्कराये-इतनी कमजोर निष्ठा वाले शिष्य कहीं अग्नि-दीक्षा के अधिकारी हो सकते है। यह तो धन की बात रही अभी तो सौंदर्य, स्वर, यश के कितने आकर्षण है, शिखिध्वज वित्तैषणा से ही मुक्त न हो सका तो यह ब्रह्म-दीक्षा तक पहुँचने की कठिनाई कैसे झेल सकेगा? स्वल्प शक्ति, योग्यता और प्रतिभा का मनुष्य जो अपने कल के भविष्य के लिए भी निश्चित नहीं होता, उसे राज-सम्मान के पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने में ही कितनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है, सर्वशक्तिमान ब्रह्म और उसका अन्यतम ऐश्वर्य प्राप्त करने की कठिनाइयों का तो अनुमान ही कौन कर सकता है। परम पुरुषार्थ कहा है इसीलिये आत्म प्राप्ति को, क्योंकि उसमें सिवाय दमन-दमन के और कुछ नहीं।
साधना के पंच ‘म’ कारो में एक मैथुन भी आता है। यह साधारण रतिक्रिया से सर्वथा भिन्न और अतीव विलक्षण प्रकार का है। चूँकि वह प्रसंग गुहा है। सार्वजनिक उपयोग का भी नहीं। कहने सुनने में अश्लील भी बन जाता है।
साधनाओं की सिद्धि के लिए बड़े उपयोगी होते हैं, मानसिक जप से उन शक्ति कणों और स्पन्दनों को अपने भीतर स्थित कर अनेक शारीरिक, मानसिक और आत्मिक लाभ तीव्रता से प्राप्त किये जाते हैं, इसलिये इन दिनों गायत्री उपासना के प्रसार का एक व्यापक अभियान चलाकर उससे आधिदैविक लाभ प्राप्त करने का अवसर सारे देश को देना आवश्यक है, इस पुण्य में सभी गायत्री ड़ को भग लेना चाहिये।
साधना रंग लाई या नहीं? इन दोनों ही तथ्यों की परख उपरोक्त दो कसौटियों पर करने की ठानी है। 19 महीने का यही परीक्षा काल है। हम बहुत बारीकी से अपने स्वजनों की आस्था और सक्रियता का लेखा-जोखा रखेंगे कि जो कुछ कहा-सुना जाता रहा-जो कुछ लिखा-पढ़ा जाता रहा, उसका कुछ परिणाम भी निकला या योंही वह सब कुछ हवा में उड़ गया। हमें विश्वास है अपने परिवार में अधिकाँश व्यक्ति सत्य ओर तथ्य के प्रति निष्ठावान् है और वे अवसर पड़ने पर अपने आत्मिक एवं सामाजिक कर्तव्यों की उपेक्षा न करेंगे।
साधना का प्रयोग इन अभावों की पूर्ति सहज ही कर सकता है और उसकी उच्चस्तरीय प्रगति की प्रचण्ड शक्तियों और अद्भुत सिद्धियों का भाण्डागार सिद्ध कर सकती है।
साधना का पुनः अभ्यास करूँ और फिर से अग्नि दीक्षा की पात्रता उपलब्ध करूँ।
साधना का वाम मार्ग नेत्र है। उससे उस शक्ति को उत्तेजित करके ऐसी प्रक्रियाओं का वर्णन हे, जिससे उस उत्तेजना में अगणित प्रसुप्त क्षमताएँ जग पड़े। उपयोग, क्षरण या विनोद के लिए नेत्र में काम शक्ति को उत्तेजित करना और उससे लाभ उठाने के अद्भुत प्रयोगों का उल्लेख है। साधना के पंच ‘म’ कारो में एक मैथुन भी आता है। यह साधारण रतिक्रिया से सर्वथा भिन्न और अतीव विलक्षण प्रकार का है।
साधना भी परमावश्यक है। इस असार संसार के माया मोह लेकर जाने वाले उस पार के अपार जीवन में बड़ी सघन यातना के भागीदार बनते है को माया मोह के कारण रो-रोकर प्राण छोड़ते और तड़प तड़प कर संसार से विदा होते है, वे वहाँ भी अपनी अस अन्तिम स्थिति के अनुसार वैसे ही रो रो और तड़प तड़प कर जीवन बितायेगा। मनुष्य की अतिमानसिक स्थिति इस बात का स्पष्ट विज्ञापन है कि उसे उस पारलौकिक जीवन में किस भोग का भागी बनना होगा। यदि वह निर्लिप्तावस्था में हँसता खेलता हुआ गया, तब तो समझना चाहिये कि वहाँ भी हँसता खेलता ही रहेगा और यदि रोता सिसकता हुआ, विदा हुआ तो वहाँ भी रोता सिसकता ही रहेगा। इसमें दो सम्भावनायें नहीं हो सकती।
साधनाओं में जिस धैर्य की आवश्यकता होती है, वह श्रद्धावान व्यक्तियों में ही होती है। ‘श्रद्धावान लभते ज्ञान’ ‘श्रद्धयासत्य माप्यते-श्रद्धावान् ही ज्ञानार्जन करते है, श्रद्धावान ही सत्य को प्राप्त करते है। शिखिध्वज में श्रद्धा भावना का अभाव न होने से ही महर्षि ने मंत्रदीक्षा दी थी। सामान्यतः हर किसी को वे दीक्षा दिया नहीं करते थे।
साधना का उल्लेख है। साधना का वाम मार्ग नेत्र है। उससे उस शक्ति को उत्तेजित करके ऐसी प्रक्रियाओं का वर्णन हे, जिससे उस उत्तेजना में अगणित प्रसुप्त क्षमताएँ जग पड़े। उपयोग, क्षरण या विनोद के लिए नेत्र में काम शक्ति को उत्तेजित करना और उससे लाभ उठाने के अद्भुत प्रयोगों का उल्लेख है। साधना के पंच ‘म’ कारो में एक मैथुन भी आता है।
साधना के दक्षिण मार्ग में ब्रह्मचर्य की सरल सर्वोपयोगी साधना का उल्लेख है। साधना का वाम मार्ग नेत्र है। उससे उस शक्ति को उत्तेजित करके ऐसी प्रक्रियाओं का वर्णन हे, जिससे उस उत्तेजना में अगणित प्रसुप्त क्षमताएँ जग पड़े। उपयोग, क्षरण या विनोद के लिए नेत्र में काम शक्ति को उत्तेजित करना और उससे लाभ उठाने के अद्भुत प्रयोगों का उल्लेख है। साधना के पंच ‘म’ कारो में एक मैथुन भी आता है।
साधना के लिये पुनः गुरु चरणों में वापिस लौट आया।
साधना का यह द्वितीय द्वार सिद्धांत जितना सरल है, व्यवहार में उतना ही कठिन। जन्म-जन्मान्तरों का अभ्यासी मन लौकिक सुखों को सहज ही त्यागने के लिए तैयार नहीं होता। बड़ा भारी संग्राम करना पड़ता है, तब कहीं मन की मलिनता दूर होती है। इस अवस्था में पहुँचे हुए साधकों को थोड़ी सी भी चूक उन्हें पथ-भ्रष्ट कर सकती है, उन्हें पहाड़ जैसी उपलब्धियों से पल भर में नीचे गिरा सकती है, इसलिये योग्य आचार्यों एवं सिद्ध महापुरुषों ने अग्नि-दीक्षा उन्हीं को दी, जिन्हें पात्र समझा। इस किसी को अग्नि-दीक्षा का अधिकारी घोषित करने की भूल उन्होंने की होती तो साधन-तत्व नष्ट ही हो गया होता।
साधना को सफलतापूर्वक पूरा कर लोगे तो आगे उच्चस्तरीय साधना के लिये, तुम्हें अग्नि-दीक्षा भी देंगे।” यह कहकर महर्षि उद्दालक उठ खड़े हुए। शिखिध्वज ने गुरु-चरणों में प्रणिपात किया, महर्षि उद्दालक ने आशीर्वाद दिया और दोनों अपने-अपने पर्ण कुटीरों की ओर चले गये।
साधना, अपने ज्ञान और अपनी तपस्या के आधार पर इसका बहुत पहले पता लगाकर घोषणा कर दी थी और इसीलिए सारा भारतीय जीवन उसको ही लक्ष्य मानकर, उसको ही दृष्टि में रखकर निर्धारित किया गया है। पारलौकिक जीवन को अदृष्टिगोचर रखकर लौकिक जीवन नहीं जिया जा सकता और जो ऐसा करते है, अनियोजित तथा अबूझ जीवन जीते है, वे धोखा खाते है और अपने उस अनन्तकाल जीवन के लिये काँटे बो लेते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-October
साधना करने से निश्चयपूर्वक प्राप्त हो सकता है। ध्यान रखा जाय मन्त्र विद्या की सफलता के चार आधार हैं—शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता एवं लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा। चारों आधारों को साथ लेकर चलने वाली मन्त्र साधना कभी निष्फल नहीं होती।
साधना वस्तुतः मन्त्र विज्ञान का ही एक अंग है।
साधना की। फिर नेपाल होते हुए तिब्बत पहुँचे। इसके बाद वे ईरान होते हुए अपने देश लौट गये।”
साधना का उपाय भी प्रस्तुत किया गया है। वेदान्त अति मानव के सृजन पर पूरा जोर देता है। मनोबल प्रखर करने की अनिवार्यता को स्वीकार करता है। ईश्वरवाद का खण्डन किसी विज्ञ जीव की ईश्वर स्तर तक पहुँचा देने की वेदान्त मान्यता बिना रिक्त ता उत्पन्न किये—बिना अनावश्यक उथल−पुथल किये वह प्रयोजन पूरा कर देती है जिसमें ईश्वरवाद के नाम पर प्रचलित विडम्बनाओं को निराकरण करते हुए अध्यात्म मूल्यों की रक्षा की जा सके।
साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि याँत्रिक अपनी श्रद्धा, तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मन्त्र प्रयोग सही निशाना साधने वाली बहुमूल्य बन्दूक का काम कर सके।
साधना अध्यात्म विज्ञान का एक महत्वपूर्ण विधान है। इस लुप्त प्रायः विद्या का यदि विकास हो सके तो मनुष्य की शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों के समाधान का एक नया मार्ग खुल सकता है।
साधना के चार चरण हैं इन्हीं का ऊपर उल्लेख किया गया है।
साधना द्वारा अनन्त अन्तरिक्ष में निरन्तर बहने वाली ध्वनि तरंगों को सुना जाता है और उनमें से अपने काम की तरंगों के साथ संपर्क बनाकर भूतकाल में जो हो चुका है उसकी—भविष्य के लिए जो सम्भावना बन रही है उसकी—तथा वर्तमान में किस व्यक्ति या किस परिस्थिति द्वारा क्या हलचलें उत्पन्न की जा रही हैं उनका पता लगाया जा सकता है। नादयोग की शब्द साधना वस्तुतः मन्त्र विज्ञान का ही एक अंग है।
साधना भी करती है। यह साधना उसकी आवश्यकता भी पूरी करता है और किसी अन्य की कठिनाई हल करने में भी इसका प्रयोग होता है।
साधना कभी निष्फल नहीं होती।
साधना अभ्यास होने पर सरलतापूर्वक की जा सकती है। पृथ्वी तत्व का रंग पीला—जल का श्वेत−अग्नि का लाल—वायु का हरा और आकाश का नीला है। आंतें बन्द करने पर अपने भीतर एवं बाहर जो रंग अधिक मात्रा में बिखरा दिखाई पड़े तब उसके अनुसार तत्व की प्रबलता आँकी जा सकती है। जिह्वा इन्द्रिय को सधा लेने पर मुँह में स्वाद बदलते रहने की प्रक्रिया को समझकर भी समझकर भी तत्वों की प्रबलता जानी जा सकती है। पृथ्वी तत्व का स्वाद मीठा —जल का कसैला—अग्नि का तीखा—वायु का खट्टा और आकाश का खारी होता है।
साधना द्वारा मनः स्थिति लगा सकती है। हर तत्व की अपनी विशेषता है उसी के अनुरूप व्यक्तित्व से भी उतार−चढ़ाव आते रहते हैं। प्रकृति और सामर्थ्य में हेर−फेर होता रहता है। सूक्ष्म शरीर में कब कौन सा तत्व बढ़ा हुआ है और किस तत्व की प्रबलता के समय क्या करना अधिक फलप्रद होता है? यदि इस रहस्य को जाना जा सके तो किसी महत्वपूर्ण कार्य आरम्भ उपयुक्त समय पर किया जा सकता है और सफलता का पक्ष अधिक सरल एवं प्रशस्त बनाया जा सकता है।
साधनाएँ सीखीं, तीर्थ यात्राएँ कीं, बौद्ध धर्म की दीक्षा ली, 6 वर्ष तक साधना की। फिर नेपाल होते हुए तिब्बत पहुँचे। इसके बाद वे ईरान होते हुए अपने देश लौट गये।”
साधना करते हैं फलतः वे उस सत्परिणाम से वंचित रह जाते हैं जो सर्वांगपूर्ण मन्त्र साधना करने से निश्चयपूर्वक प्राप्त हो सकता है। ध्यान रखा जाय मन्त्र विद्या की सफलता के चार आधार हैं—शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता एवं लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा। चारों आधारों को साथ लेकर चलने वाली मन्त्र साधना कभी निष्फल नहीं होती।
साधना का अपना महत्व एवं स्थान है। पृथ्वी आदि पाँच तत्वों से ही समस्त संसार बना है। विद्युत आदि जितनी भी शक्तियाँ इस विश्व में मौजूद हैं वे सभी इन पञ्च तत्वों की ही अन्तर्हित क्षमता है। आकृति−प्रकृति की भिन्नता युक्त जितने भी पदार्थ इस संसार में दृष्टिगोचर होते हैं वे सब इन्हीं तत्वों के योग−संयोग से बने हैं।
साधना की यथार्थता और उपलब्धि में जितनी अधिक गहराई के साथ—तन्मयता के साथ—नियोजित किया गया होगा, मन्त्र उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा। माँत्रिक को चमत्कारी शक्ति उसी अनुपात से प्रचण्ड होगी। इन तीनों चेतनात्मक आधारों को महत्व देते हुए जिसने मन्त्रानुष्ठान किया होगा निश्चित रूप से वह अपने प्रयोजन में पूर्णतया सफल होकर रहेगा।
साधना उसकी आवश्यकता भी पूरी करता है और किसी अन्य की कठिनाई हल करने में भी इसका प्रयोग होता है।
साधना की गई मन्त्र का जितना महत्व है, साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि याँत्रिक अपनी श्रद्धा, तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मन्त्र प्रयोग सही निशाना साधने वाली बहुमूल्य बन्दूक का काम कर सके।
साधना आवश्यक है। इस साधना के चार चरण हैं इन्हीं का ऊपर उल्लेख किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-November
साधना करने, मार्ग दर्शन परामर्श पाने की सुविधा ले सकें। यह क्रम विशिष्ट व्यक्तियों तक सीमित रहेगा। पर सर्वसाधारण के लिए अभी इन सत्रों की शृंखला स्थगित कर दी गई है। पुनः कब चालू की जायगी यह सुविधा और आवश्यकता के अनुसार यथा समय घोषित किया जायगा। अभी तो जिन पाँच प्रकार के प्रशिक्षणों की तात्कालिक आवश्यकता समझी गई है उन्हें आरम्भ किया गया है।
साधना सत्रों के लिए हैं। यह दो भागों में विभाजित है (1) फरवरी, मार्च, अप्रैल (2) जुलाई, अगस्त, सितम्बर। यह सत्र दस−दस दिन के होंगे। वर्ष में कुल 18 इनमें से प्रत्येक में 100 से अधिक को स्थान न दिया जा सकेगा। थोड़ी कम की ही गुंजाइश है।
साधना से सिद्धि मिलती है। अनवरत पुरुषार्थ—जिसमें उपलब्धियों के लिए श्रम और अपने स्तर का विकास दोनों ही बातें सम्मिलित हैं, यह ठीक प्रकार किया जाय तो समयानुसार उसका प्रतिफल अनुकूल साधन मिलने के रूप में सामने आ सकता है। सो भी सुनिश्चित नहीं क्योंकि हमारी आकाँक्षाएँ अनियन्त्रित होती है, वे न अपने स्तर, प्रयास, साधन, का अनुमान लगाती हैं और न परिस्थितियों की बात सोचती हैं। ऐसे ही आँधी तूफान की तरह उमड़ पड़ती हैं चाहने मात्र से ही यदि सब कुछ मिल जाया करे तो फिर मनुष्य−मनुष्य न कहलाये तब उसका नाम कल्पवृक्ष कहलाये। बुद्धिमान मनुष्य वस्तुस्थिति को देखता समझता है।
साधना।
साधनाओं की साधना।
साधना विधान के माध्यम से किया गया है। प्राचीन काल की यही पद्धति थी। युग के अनुरूप अब उसे सरल सुबोध बनाना पड़ेगा और आज की स्थिति के अनुरूप समझाने और व्यवहार में लाने की शैली का विकास करना होगा।
साधनाओं में निरत रहे। इस अनुशासन को वहाँ के राजा भी मानते हैं। फलतः वहाँ अवैतनिक, सुयोग्य एवं भावनाशील लोकसेवियों की बड़ी संख्या उपलब्ध रहती है और उनके द्वारा समाज कल्याण की विविध प्रवृत्तियाँ पूरे उत्साह के साथ चलती रहती हैं। इसी आधार पर वह छोटा सा देश हर क्षेत्र में असाधारण प्रगति करके बड़े देशों को आश्चर्यचकित करने की उच्च स्थिति में रह रहा है।
साधना कहलाता है। यों साधारणतया योग और तप के क्रिया−कलापों को ‘साधना’ कहते हैं। पर वस्तुतः यह शब्द इतना सीमित नहीं है। चेतना को किसी भी प्रकार के अभ्यास में ढालने के हर प्रयास को साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी भी क्षेत्र में अनन्य तत्परता के साथ लगना और अपने व्यक्तित्व को उस दिशा में भली प्रकार प्रवीण अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जायगी।
साधना 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14. गायत्री और यज्ञोपवीत 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना सत्र वर्ष में सात महीने चलेंगे—फरवरी, मार्च, अप्रैल और जुलाई से अगस्त, सितम्बर, अक्टूबर तक वे दस−दस दिन के होंगे।
साधनाएँ आदतों में घुसी विकृतियों को निरस्त करके परिष्कृत व्यक्तित्व के अनुरूप गुण, कर्म स्वभाव ढालने की मनोविज्ञान सम्मत शैली के अनुरूप विकसित की जायें। इसमें नवीन कुछ नहीं है। लक्ष्य वही है जो उस धर्म कलेवर को खड़ा करने वालों का था, नवीनता केवल समय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसे युग के अनुरूप बना देने भर की है। इस परिवर्तन के बिना यथा स्थिति में खड़ा पड़ा रहने वाला हमारा “घोड़ा अड़ेगा—पान सड़ेगा।” कहावत है− घोड़ा अड़ा क्यों?
साधना सत्र के नाम से प्रस्तुत किया गया। पाँच−पाँच दिन के शिविर लगाये गये और यथा सम्भव अधिकारी व्यक्तियों को ही उसमें प्रवेश दिया गया। यों कौतूहल वश उथले दर्जे के लोग भी उसमें कुछ तो घुस ही पड़े। तीर्थ स्थानों में पर्यटन करने वाले और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद माँगने वाले भी रोके नहीं जा सके। छद्म वेष में वे भी धक्का−मुक्की करके इस वैज्ञानिक प्रयोग प्रयोजन में धँस पड़े।
साधना है। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र में इसी को प्रारम्भिक जानकारी पाँच दिनों के प्रशिक्षण में कराई जाती रही है और जप योग, बिन्दु योग, लय योग, प्राण योग, ब्रह्म योग के पाँच योगाभ्यासों के रूप में इनकी साधना का शुभारम्भ कराया जाता रहा है।
साधना करनी पड़ती है और बच्चों के व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनाने पर हर घड़ी ध्यान रखना पड़ता है उन्हें उपयुक्त मार्ग−दर्शन ही नहीं परिष्कृत वातावरण भी देना पड़ता है। यह सब बहुत झंझट भरा काम है इसमें बच्चों का नहीं अपना निर्माण एक ऐसे अच्छे साँचे के रूप में करना पड़ता है जिसमें सुन्दर खिलौने ढाले जा सकें। इसकी योग्यता और तैयारी जिसकी हो सकती है जिसने जीवन के महत्व और उत्तरदायित्वों की गम्भीरतापूर्वक समझा है और उसके लिए अपने आपको तत्परतापूर्वक प्रशिक्षित किया है। उन्हीं को सन्तानोत्पादन का सच्चा प्रतिफल मिल सकता है वे ही एक सुयोग्य पिता को मिल सकने वाले श्रेय सन्तोष का लाभ ले सकते हैं।
साधना कर सकें और जो आ सकते हैं वे तथ्यों की पूर्व जानकारी प्राप्त करके आवें ताकि यहाँ उन्हें कुछ भी अनजाना न लगे और अभ्यास में सरलता प्रतीत हो।
साधना में उन योगाभ्यासों का गहरा अभ्यास कराया जायगा जो पिछले दिनों प्राण प्रत्यावर्तन में प्रयुक्त होते रहे हैं। इसी प्रकार हर दिन भाषण देने का अभ्यास कराते हुए शिक्षार्थी को इस योग्य बनाया जायगा कि वह अपनी बात खुले दिल से बिना संकोच, झिझक के कहीं भी कह सके। गोष्ठियों और सभा, सम्मेलनों में भली प्रकार अपने विचार व्यक्त कर सकें। इस प्रकार योगसाधना तथा प्रवचन प्रवीणता के दो और भी वर्ग जुड़ जाने से जीवन विद्या की दस दिवसीय शिक्षा और भी अधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण बन गई है।
साधना तथा प्रवचन प्रवीणता के दो और भी वर्ग जुड़ जाने से जीवन विद्या की दस दिवसीय शिक्षा और भी अधिक उपयोगी एवं महत्वपूर्ण बन गई है।
साधनात्मक विशिष्ट तपश्चर्याऐं एवं व्यावहारिक जीवन की परिष्कृत रीति−नीति यही थी योग एवं तप की मूल आधार, जिसे सही रूप में अपनाकर किसी समय भारतीय मनीषियों ने इस देश की धरती पर स्वर्ग का, सतयुग का अवतरण किया था और मनुष्य में देवत्व का उदय सम्भव कर दिखाया था।
साधना सत्र—दो−दो महीने वाले वानप्रस्थ प्रशिक्षण सत्र—तीन−तीन महीने के महिला जागरण सत्र—तीन−तीन महीने के संगीत अभिनय सत्र, पन्द्रह−पन्द्रह दिन के लेखनी सत्र−शिक्षण प्रक्रिया को अध्यात्म और धर्म की सनातन ज्ञान गंगा का युग संस्करण ही कहा जाना चाहिए। इसे चिर प्राचीन और चिर नवीन का संगम समन्वय कहा जा सकता है। इस पद्धति को संजीवनी विद्या का नाम दिया जा सकता है। मृतक को जो जीवित बनादे वह संजीवनी, जीवन के रहस्यों का उद्घाटन करने के साथ−साथ जो उसे विकसित परिष्कृत बनाये वह संजीवनी, संजीवनी विद्या का शुभारम्भ इस युग की एक अत्यन्त महत्व पूर्ण घटना कही जा सकती है। इसका श्री गणेश कितना ही छोटा क्यों न हो आशा की जानी चाहिए कि यह चिनगारी अगले दिनों प्रचण्ड दावानल का रूप धारण करेगी और युग की विकृतियों को भस्मसात करके छोड़ेगी।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना—धर्म और अध्यात्म का प्रयोजन दर्शन और व्यवहार इस प्रकार समझना जिससे मनुष्य का दृष्टिकोण ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की आदर्शवादिता के अनुरूप ढल सके। उसकी अभिरुचि, आकाँक्षा उस स्तर की ढल जाय कि चरित्रवान बनने में ही उसे सफलता, बुद्धिमत्ता और प्रसन्नता अनुभव होने लगे। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणामों को वह भी भली प्रकार अनुभव करे और उनसे आग एवं विष की तरह बचे रहने की जागरूकता बरते। संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचा उठे और सामाजिक कर्त्तव्यों की पूर्ति के लिए अपने समय एवं धन का एक अंश निरन्तर लगाता रहे। लोकमंगल के लिए किये गये प्रयास को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और लाभ की पंक्ति में ही सम्मिलित कर ले।
साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी योग, षट्चक्र −वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
साधना 4. गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5. गायत्री और उसकी प्राण−प्रक्रिया 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना 8. गायत्री की विशेष साधना 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14. गायत्री और यज्ञोपवीत 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना को भी माना जाना चाहिए। उपेक्षित तो उसे भी नहीं रखा जा सकता। यदि साधन रह होते तो किसी को रोकने, किसी को बढ़ाने का ‘वन वे ट्रैफिक’ क्यों करना पड़ता। यदि सड़क चौड़ी होती तो गाड़ियाँ बिना रुके अपनी दिशा में अनवरत गति से दौड़ती रह सकती थीं।
साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मूल्य 40 पैसे।
साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी भी क्षेत्र में अनन्य तत्परता के साथ लगना और अपने व्यक्तित्व को उस दिशा में भली प्रकार प्रवीण अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जायगी। जिंदगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना—अभ्यास और आदतों को तदनुरूप ढाल लेना—जीवन साधना कही जायगी। वस्तुतः यह दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं। दोनों के समन्वय को ही सर्वांगपूर्ण संजीवनी विद्या कहते हैं।
साधना ही करनी पड़ती है। लोगों का यह भ्रम नितान्त मिथ्या है कि अमुक कर्मकाण्डों के विधि−विधानों से जादुई जप−तप करने से चमत्कारी, आत्म−शक्तियाँ प्राप्त होती हैं अथवा कोई देवी−देवता सिद्ध होकर मनोवाँछित वरदान प्रदान करते हैं। वस्तुतः उपासनात्मक कर्मकाण्डों और विधि−विधानों के पीछे छिपी हुई साँकेतिक प्रेरणा यही है कि जीवन का अन्तरंग और बहिरंग स्वरूप निखारा जाय। उस पर चढ़े कषाय कल्मषों का आवरण उतारा जाय। यह प्रक्रिया पूजा−पाठ से या जिस भी उपाय से पूरी हे सकेगी उसी से आत्मोत्कर्ष का—आत्म−साक्षात्कार का—अपूर्णता को पूर्णता में परिवर्तित करने का प्रतिफल प्राप्त होगा।
साधना सत्र—भजनोपदेशक सत्र—वानप्रस्थ सत्र, लोक शिक्षा सत्र भी तो चलते हैं उनमें उलट−पुलट होती रहती है पर सौ का औसत उनका भी बना रहता है। डेढ़ सौ शिक्षार्थी और मिशन के कार्य संचालक कार्यकर्त्ताओं के स्थायी निवास से अधिक स्थान यहाँ बिलकुल भी नहीं है। ऐसी दशा में नारी जागरण के लिए सहस्रों महिलाओं का निरंतर शिक्षण अभीष्ट होने पर भी उसकी व्यवस्था सीमित ही रखनी पड़ रही है।
साधनात्मक प्रक्रिया इसी प्रयोजन के लिए गढ़ी गई थी। पर अब तो उसका स्वरूप भी विकृत हो गया और जो लाभ उस विज्ञान द्वारा कारण शरीर के विकास के लिए मिल सकता था वह अब सम्भव नहीं रहा। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का अपना दर्शन हैं और अपना प्रयोग। कभी उसे ठीक तरह समझा गया था और प्रयोग का सुव्यवस्थित आधार मौजूद था। उस आधार पर अनुभवी तत्वदर्शी अपने छात्र शिक्षार्थियों का मार्गदर्शन करते थे।
साधना ही कही जायगी। जिंदगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना—अभ्यास और आदतों को तदनुरूप ढाल लेना—जीवन साधना कही जायगी। वस्तुतः यह दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं। दोनों के समन्वय को ही सर्वांगपूर्ण संजीवनी विद्या कहते हैं। इसी की दार्शनिक पृष्ठभूमि ‘ब्रह्मविद्या’ के नाम से कही जानी जाती रही है।
साधना है। उसका अभ्यास करने के लिये अवकाश भी चाहिये और सुविधा भी। अपने देश की आज जो स्थिति है उसमें लम्बे समय के उपरान्त कल देने वाले किसी कार्य को हाथ में नहीं लिया जा सकता। वर्तमान स्थिति को आपत्तिकालीन मानकर उसका मुकाबला करने के लिये हमें युद्धस्तरीय तात्कालिक उपाय काम में लाने होंगे।
साधना और प्राण भरी प्रेरणाप्रद शिक्षा व्यवस्था की गंगा यमुना मिल जाने से उसका संवर्धन होना स्वाभाविक ही है। प्रत्यावर्तन सत्रों में आने वाले प्रायः सभी लोग इस विशेषता का लाभ लेकर गये। यहाँ बोये गये उगाये गये बीजाँकुरों को उन्होंने अपने−अपने यहाँ जाकर पोसा, सींचा और बढ़ाया तदनुसार कितने ही शिक्षार्थियों ने अनुभव किया कि हम नव जीवन लेकर आये पुरानी स्थिति में कायाकल्प जैसा परिवर्तन पाया।
साधना पद्धति सिखाई गई थी। अन्नमय कोश—प्राणमय कोश—मनोमय कोश—विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश यह पाँच आवरण आत्मा पर चढ़े हुए हैं इनका अनावरण होने पर आत्मसाक्षात्कार हो सकता है। कोश का एक अर्थ भण्डार या खजाना भी हो सकता है। पाँच शक्ति स्रोत हमारे अन्तःक्षेत्र में अनन्त सम्भावनाओं को छिपायें हुए पड़े हैं। इन्हीं को पंचमुखी गायत्री के रूप में चित्रित किया गया है।
साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
साधना में प्रत्यावर्तन सत्र के छात्रों को सिखाया और कराया जाता रहा है। साथ ही प्रवचनों के माध्यम से चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है। प्रत्यावर्तन सत्रों की अवधि थोड़ी ही रखी गई थी क्योंकि उस समय आवश्यक जानकारियाँ देना ही अभीष्ट था। साधना का शुभारम्भ मात्र इस अवधि में कराया गया। अभ्यास तो अपने−अपने घरों पर ही लम्बे समय तक करना था।
साधना है। अध्यात्म का विवेचनात्मक और साधनात्मक विशाल काय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। ईश्वरीय जीव प्रकृति के स्वरूप का प्रतिपादन—जीवन लक्ष्य का निर्धारण, गति विधियों का निर्धारण और वस्तुओं का उपयोग एवं व्यक्तियों से व्यवहार की जो नीति मर्यादा निरूपित होती है उस मान्यता और आकाँक्षा का एक उत्कृष्ट आधार बनता है। यही है अध्यात्म का लक्ष्य। इसी को पाकर मनुष्य का व्यक्तित्व ऊँचा उठता है—देव भूमिका में विकसित होता है।
साधना में किस प्रकार लगाया जा सकता है इसका व्यावहारिक मार्ग सुझाना और बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति के अभियान में—व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण के महाप्रयास में—जिस तरह लगना है उसका स्वरूप समझाना और उसकी योग्यताएँ उत्पन्न करना इस वानप्रस्थ शिक्षा का स्वरूप है।
साधना को समझना और उसके लिए उसी स्तर पर प्रबल प्रयास करना इस वर्ग के छात्रों को सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से सिखाया जायगा, इस मार्ग पर चलते हुए आने वाली कठिनाइयों की जानकारी एवं उनसे निबटने की कुशलता से इस वर्ग के छात्र भली प्रकार परिचित हो सकेंगे।
साधना’ कहते हैं। पर वस्तुतः यह शब्द इतना सीमित नहीं है। चेतना को किसी भी प्रकार के अभ्यास में ढालने के हर प्रयास को साधना कहा जा सकता है। कला, शिल्प, व्यायाम, अध्ययन, परमार्थ आदि किसी भी क्षेत्र में अनन्य तत्परता के साथ लगना और अपने व्यक्तित्व को उस दिशा में भली प्रकार प्रवीण अभ्यस्त कर लेना साधना ही कही जायगी। जिंदगी को परिष्कृत स्तर के जीने की जानकारी को जीवन विज्ञान और उसे स्वभाव का अंग बना लेना—अभ्यास और आदतों को तदनुरूप ढाल लेना—जीवन साधना कही जायगी।
साधना वास्तविक देव साधना है। अदृश्य, अविज्ञात और अनिश्चित अस्तित्व वाले देवता प्रसन्न होकर वरदान देते हैं या नहीं यह संदिग्ध है पर यह पूर्णतया सुनिश्चित है कि हमारे सद्गुण रूपी देव पग−पग पर आकाश कुसुम बरसाते और ऐसी उपलब्धियाँ प्रदान करते हैं जिन्हें देखकर दूसरे लोग दाँतों तले उँगली दबायें और हम स्वयं अपनी प्रगति पर गहरा सन्तोष अनुभव करें।
साधना है। अदृश्य, अविज्ञात और अनिश्चित अस्तित्व वाले देवता प्रसन्न होकर वरदान देते हैं या नहीं यह संदिग्ध है पर यह पूर्णतया सुनिश्चित है कि हमारे सद्गुण रूपी देव पग−पग पर आकाश कुसुम बरसाते और ऐसी उपलब्धियाँ प्रदान करते हैं जिन्हें देखकर दूसरे लोग दाँतों तले उँगली दबायें और हम स्वयं अपनी प्रगति पर गहरा सन्तोष अनुभव करें।
साधना विज्ञान की धुरी यही थी। हठ योग द्वारा शरीर का—राजयोग से मस्तिष्क का और ब्रह्म योग द्वारा अन्तःकरण का परिशोधन किया जाता था। इन्हीं का सरल एवं व्यावहारिक रूप कर्म योग—ज्ञान योग एवं भक्ति योग था। साधनात्मक विशिष्ट तपश्चर्याऐं एवं व्यावहारिक जीवन की परिष्कृत रीति−नीति यही थी योग एवं तप की मूल आधार, जिसे सही रूप में अपनाकर किसी समय भारतीय मनीषियों ने इस देश की धरती पर स्वर्ग का, सतयुग का अवतरण किया था और मनुष्य में देवत्व का उदय सम्भव कर दिखाया था।
साधना सिनेमा है। उसे विकृत स्तर पर पड़ा रहने दिया जाय तो भी वह अपना प्रभाव तो डालता ही रहेगा और जितना हम पूरे जोर से सुधार करेंगे उससे अधिक वह चुपचाप ही बिगाड़ करता रहेगा। जमा खर्च के हिसाब में छुट्टल उच्छृंखल सिनेमा हमारे प्रयासों को मटियामेट ही करता रहेगा। इस क्षेत्र की उपेक्षा नहीं की जा सकती। साहित्य की तरह ही हमें फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ेगा।
साधना के सर्वांगीण प्रशिक्षण का साहित्य सृजन एवं प्रकाशन करने की है। व्यक्ति परिवार और समाज की विविध दिव्य धाराओं का संगम जब गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलन तीर्थराज प्रयाग की तरह होगा तो उसका पुण्य फल सत्यपरिणाम देखते ही बनेगा। यह साहित्य एक निर्धारित पाठ्य क्रम का अंग होगा, जिसे स्थान−स्थान पर लोक शिक्षण की प्रक्रिया का अंग भी बनाया जा सकेगा।
साधना ही गायत्री की पंचमुखी उच्चस्तरीय साधना है। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र में इसी को प्रारम्भिक जानकारी पाँच दिनों के प्रशिक्षण में कराई जाती रही है और जप योग, बिन्दु योग, लय योग, प्राण योग, ब्रह्म योग के पाँच योगाभ्यासों के रूप में इनकी साधना का शुभारम्भ कराया जाता रहा है।
साधना की प्रेरणायें—उच्चस्तरीय प्रगति के लिए तेजस्वी प्रकाश—शोक−संताप से घिरी परिस्थितियों का समाधान आदि न जाने कितने अनुदान हैं जो शान्ति कुँज में आने वाले अनायास ही प्राप्त करते रहते हैं। वे सब उपलब्धियाँ
साधनात्मक विशाल काय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। ईश्वरीय जीव प्रकृति के स्वरूप का प्रतिपादन—जीवन लक्ष्य का निर्धारण, गति विधियों का निर्धारण और वस्तुओं का उपयोग एवं व्यक्तियों से व्यवहार की जो नीति मर्यादा निरूपित होती है उस मान्यता और आकाँक्षा का एक उत्कृष्ट आधार बनता है। यही है अध्यात्म का लक्ष्य। इसी को पाकर मनुष्य का व्यक्तित्व ऊँचा उठता है—देव भूमिका में विकसित होता है।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना के समकक्ष ही जीवन साधना को समझना और उसके लिए उसी स्तर पर प्रबल प्रयास करना इस वर्ग के छात्रों को सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से सिखाया जायगा, इस मार्ग पर चलते हुए आने वाली कठिनाइयों की जानकारी एवं उनसे निबटने की कुशलता से इस वर्ग के छात्र भली प्रकार परिचित हो सकेंगे।
साधना संलग्न करते थे और अपनी निज की आत्म शक्ति का अनुदान देकर उनकी सफलता सुनिश्चित बनाते थे। भारतीय साधना विज्ञान की धुरी यही थी। हठ योग द्वारा शरीर का—राजयोग से मस्तिष्क का और ब्रह्म योग द्वारा अन्तःकरण का परिशोधन किया जाता था। इन्हीं का सरल एवं व्यावहारिक रूप कर्म योग—ज्ञान योग एवं भक्ति योग था। साधनात्मक विशिष्ट तपश्चर्याऐं एवं व्यावहारिक जीवन की परिष्कृत रीति−नीति यही थी योग एवं तप की मूल आधार, जिसे सही रूप में अपनाकर किसी समय भारतीय मनीषियों ने इस देश की धरती पर स्वर्ग का, सतयुग का अवतरण किया था और मनुष्य में देवत्व का उदय सम्भव कर दिखाया था।
साधना और युग−चेतना की दोनों मोर्चों पर सफल लड़ाई लड़ने के लिये जो गोला बारूद चाहिए उसकी पूर्ति अगले दिनों लिखे जाने वाले युगान्तरीय उद्बोधन के द्वारा ही सम्भव होगी। उसके लिए साहित्य सृजा और छापा जायगा। यह कार्य बिना पूँजी के सम्भव कैसे होगा।
साधना के रूप में ही लिखा जायगा। जिनके पास अन्य कोई आजीविका स्त्रोत न होंगे और पूरे समय इसी काम में जुटेंगे उन्हें ही ब्राह्मण स्तर का निर्वाह लेने का अधिकार है। वस्तुतः उच्चस्तरीय साहित्य सृजन सन्त और ब्राह्मण का ही काम है। हमें उसी स्तर के व्यक्ति ढूंढ़ने हैं—प्रशिक्षित करने हैं और उसी प्रकार के प्रयास आरंभ करने हैं। लेखन सत्र इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए हैं।
साधना का शुभारम्भ कराया जाता रहा है।
साधना 8. गायत्री की विशेष साधना 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14. गायत्री और यज्ञोपवीत 15. गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना का शुभारम्भ मात्र इस अवधि में कराया गया। अभ्यास तो अपने−अपने घरों पर ही लम्बे समय तक करना था। पाँच दिन का स्वल्प समय सर्वसाधारण की व्यस्तता को ध्यान में रख कर निर्धारित किया गया था। उतने से भी अभीष्ट उद्देश्य की भली प्रकार पूर्ति होती रही और शिक्षार्थी बहुत कुछ सीखकर तथा बहुत कुछ अनुदान पाकर गये। मात्र सिखाना ही तो इन सत्रों का प्रयोजन नहीं था।
साधना के सर्वोपरि कार्य−महिला जागरण के लिए समर्पित करना चाहती हैं वे भी देशव्यापी महिला जागरण आन्दोलन के विविध प्रयासों को आगे बढ़ा सकती हैं और उनकी सहायता से शान्ति कुँज जैसे अनेकों ट्रेनिंग सेन्टर हजारों केन्द्रों में चलाये जा सकते हैं। परिवार के उत्तरदायित्वों से मुक्त महिलाओं को इस प्रयोजन के लिए प्रोत्साहित और प्रशिक्षित करना एक बहुत महत्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए ही हमें अपनी खोज−बीन जारी रखनी चाहिए। कम से कम इतना तो हर अखण्ड−ज्योति पाठक का मन होना चाहिए कि उनके घर परिवार में से एक सुयोग्य महिला इस पुण्य प्रवृत्ति में किसी न किसी प्रकार भाग ले सके और युग−परिवर्तन के इस महान चरण में अपना कुछ योगदान किसी न किसी रूप में दे सके।
साधना के रूप में अपने अपने यहाँ ऐसी ही प्रौढ़ महिला पाठशालाएँ चलाया करेंगी।
साधना बनती है। यह सब कैसे किया जाय यह पाँच घण्टे प्रतिदिन की भाव साधना में प्रत्यावर्तन सत्र के छात्रों को सिखाया और कराया जाता रहा है। साथ ही प्रवचनों के माध्यम से चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है। प्रत्यावर्तन सत्रों की अवधि थोड़ी ही रखी गई थी क्योंकि उस समय आवश्यक जानकारियाँ देना ही अभीष्ट था। साधना का शुभारम्भ मात्र इस अवधि में कराया गया।
साधना प्राणयोग में आती है। आत्मबोध और तत्त्वबोध की द्विविधि ध्यान धारणा से ब्रह्मयोग की साधना बनती है। यह सब कैसे किया जाय यह पाँच घण्टे प्रतिदिन की भाव साधना में प्रत्यावर्तन सत्र के छात्रों को सिखाया और कराया जाता रहा है। साथ ही प्रवचनों के माध्यम से चिन्तन एवं कर्तृत्व को अध्यात्म दर्शन के अनुरूप कैसे ढाला जाय—व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद का समन्वय कैसे किया जाय इसकी विशद् एवं सुबोध चर्चा की जाती रही है। प्रत्यावर्तन सत्रों की अवधि थोड़ी ही रखी गई थी क्योंकि उस समय आवश्यक जानकारियाँ देना ही अभीष्ट था।
साधना है। उसका समय साध्य होना स्वाभाविक है।
साधना कही जायगी। वस्तुतः यह दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं। दोनों के समन्वय को ही सर्वांगपूर्ण संजीवनी विद्या कहते हैं। इसी की दार्शनिक पृष्ठभूमि ‘ब्रह्मविद्या’ के नाम से कही जानी जाती रही है।
साधना में−ईश्वर उपासना में संलग्न होते थे तो लोक−मंगल क्षेत्र पर्याप्त मात्रा में समाज के सुयोग्य निर्माताओं से भरा पूरा रहता था। उनके नेतृत्व में अनेकानेक प्रचारात्मक, रचनात्मक, संघर्षात्मक प्रवृत्तियाँ चलती थीं। जिनका लाभ देश और विश्व की जनता को पूरी तरह मिलता था। जहाँ बहुत बड़ी संख्या में सुयोग्य, परिष्कृत और परमार्थ परायण, लोक−सेवी अपना पूरा जीवन अनन्य निष्ठा के साथ खपाये हुए हैं वहाँ सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन में कोई कमी न रहेगी। निश्चित है कि ऐसी स्थिति में ज्ञान−विज्ञान वैभव की−सुख−शांति की−प्रगति और समृद्धि की परिस्थितियाँ ही उमगती रही हैं, रहेंगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-December
साधना इसी मानवी विद्युत शक्ति को बढ़ाने के लिए की जाती है।
साधना हमें चारों ओर से घेरे हुई है। उससे सतर्क रहे बिना कोई गति नहीं। आक्रमण को अवश्य नहीं तो असफल बना सकने वाली सामर्थ्य तो हमें जुटानी ही चाहिए।
साधना पर पहुँचने में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता। बात आगे की सोची जा सकती हैं। जो भूतकाल में नहीं हो सका, वह भी भविष्य में हो सकता है। मनुष्य की सम्भावनाएँ अनन्त हैं। भूत से भी अधिक शानदार भविष्य हो सकता है, इसकी आशा की जा सकती है—की जानी चाहिए।
साधना की पद्धतियाँ जीवन के अंतरंग और बहिरंग दोनों पक्षों के विकास में उपयोगी हैं और सहायक भी।
साधनाएँ विनिर्मित की हैं। इन्हें योगाभ्यास के नाम से पुकारा जाता है। जप और ध्यान इस प्रयोजन की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करते हैं। आसन, प्राणायाम, व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य,मौन, तप आदि क्रिया करके अभ्यासों का दीर्घकालीन सेलव भी अचेतन मन को उत्कृष्ट स्तर का बनाने में सहायक होता है। लोहे को गर्म करके ही अभीष्ट आकृति में ढाला जा सकता है।
साधना के गहनतम स्तर तक उतरती गई। यही है उभयपक्षीय सत्प्रयत्नों का प्रतिफल। यही है इस संस्थान के युगान्तरकारी प्रयत्नों का आधार। जिसका मूल्याँकन करने वाले लोग आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं और समझ नहीं पाते कि इतने व्यापक कार्य कैसे किया जा सकता है।
साधना को युग देवता के चरणों पर अनन्य श्रद्धा के साथ समर्पित किया है। परिजनों ने अपना पक्ष समुचित सद्भावना के साथ निवाहा है, उन्होंने उसे अपनाने और फैलाने में कहीं कोई कोर−कसर नहीं छोड़ी है। उभयमयी तत्परता का ही यह फल है कि उस प्रयास को समस्त संसार में आशा भरी दृष्टि से देखा जा रहा है और समझा जा रहा है कि प्रस्तुत विश्व संकट के समाधान में— मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने में अखण्ड−ज्योति द्वारा ऐतिहासिक भूमिका निबाही जायगी।
साधना श्री गणेश पर्व यही है। यों बसन्त पञ्चमी ज्ञान−विज्ञान की देवी सरस्वती का जन्म दिन है। ज्ञान−विज्ञान के समन्वय की—व्यक्ति और समाज को परिष्कृत करने की जो उपासना ही कह सकते हैं। बसन्त ऋतु इसी पुण्य वेला में अवतरित होकर प्रकृति गत सौंदर्य और मानवी चेतना गत उल्लास को प्रफुल्लित करती है। यों बसन्तोत्सव भारत भर में मनाया जाता है पर अपने लिए तो वह जीवन प्राण है।
साधना क्रम अपनाना पड़ता है। योग और तप का महत्व इसी दृष्टि से है। जिनका अनाड़ी मस्तिष्क प्रगति में बाधक है उसी प्रकार असंस्कृत अचेतन भी व्यक्तित्व को विकसित होने के मार्ग में प्रधान अवरोध है। ज्ञान और कौशल प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार सामान्य प्रशिक्षण प्रयासों की उपयोगिता समझी गई है उससे भी अधिक आवश्यकता अचेतन को परिष्कृत करने के लिए योग एवं तप की समझी जानी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-June
साधना करता। जन्मभूमि तो उसकी कहीं दूर देश थी, पर अब रहता यहीं था। बुित कम लोग उसके बारे में कुछ जानते थे, पर इतना तब जानते थे कि यह आदर्शवादी युवक निर्मल चरित्र का है, ईश्वर भक्ति में लीन रहना और प्रेम का प्रचार करना इसका कार्यक्रम है।
साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना — नित्य के जप, हवन के सामान्य विधान। मू. 30 पैसे।
साधनारत मनुष्य अपने को ज्योतिर्मय तेज पुञ्ज के रूप परिणत कर सकते हैं।
साधना में प्रकारांतर से तेजस्विता की साधना ही कह सकते हैं।
साधना करनी पड़ेगी।
साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 4)
साधना 4− गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5−गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया 6−गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी 7−गायत्री की पञ्चमुखी दैनिक साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना समय में उसके लिए विशेष प्रयास किया जाता उथले साँस लेने की आदत को बदला जाय और उसके स्थान पर गहरी साँस लेने का अभ्यास सदा के लिए डाला जाय। इससे स्वास्थ्य संवर्धन और दीर्घजीवन की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं।
साधना ही कह सकते हैं।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना थी, उसमें इधर−उधर हिलने के लिए कोई गुंजाइश न थी। कोई प्रलोभन उसे डिगा न सका। वेश्या खिन्न होती हुई लौट आई।
साधना प्रक्रिया के साथ उसका श्रीगणेश तीन वर्ष पूर्व ही हो गया था। प्रायः 25 कन्याएँ कई अति महत्वपूर्ण शिक्षाएँ प्राप्त करती रही है।वे अगले दिनों जहाँ भी रहेंगी वहाँ आलोक उत्पन्न करेंगी यह निश्चित है। इस नारी शिक्षा व्यवस्था में एक नई कड़ी और जोड़ती गई है। व्यापक नारियों के लिए तीन−तीन महीने के शिक्षा सत्र।
साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी −योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 4)
साधना के समस्त प्रयोजन इस ऊर्ध्वगामी केन्द्र द्वारा ही सम्पन्न होते है। स्वर्ग और मुक्ति का—ऋद्धियों और सिद्धियों का आधार इसी क्षेत्र की विद्युत के साथ जुड़ा हुआ है। मनुष्य के चेहरे के इर्द−गिर्द छाये हुए तेजोबल को—ओजस् को इस ऊर्ध्वगामी विद्युत का ही प्रतीक समझना चाहिए।
साधना में परिलक्षित होना ही चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-March
साधना का लक्ष्य पूरा हो जायगा। ‘एकाग्रता मन मस्तिष्क को सोचने का एक व्यवस्थित विधि मात्र है जिसके आधार पर हर कोई चिन्तनशील व्यक्ति किसी भी भली−बुरी समस्या पर गहराई से विचार कर सकता है। विचारणीय तथ्य पर मनोयोग पूर्वक यदि विचार किया जायगा तो हर चिन्तनशील व्यक्ति को उपयोगी सफलता मिलेगी। विद्यार्थी, वकील, लेखक, कवि, शिल्पी, कलाकार, सर्जन आदि बुद्धिजीवी वर्ग के लोग जब अपना काम मनोयोग पूर्वक करते हैं, प्रस्तुत विषय में तन्मय हो जाते हैं तो वे गहराई में घुस कर कीमती मोती बीन लाते हैं। शोधकर्ता वैज्ञानिकों को यह अवलम्बन अनिवार्य रूप में उनका मस्तिष्क उलझा रहता है।
साधना कहा जा सकता है। यह विश्व, ब्रह्म की साकार प्रतिमा है। उस चेतना के आदर्शवादी पक्ष के प्रति श्रद्धा और तत्परता का अभिवर्धन यही योग साधना का लक्ष्य हो सकता है। इसके लिए दृष्टिकोण का−भाव भूमिका का−परिष्कार करना होता है और पशु स्तर को हेय चिन्तन एवं कर्तृत्व को उलट कर उसे सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों में परिणत करना पड़ता है। अध्यात्म साधनाओं का लक्ष्य यही है।
साधना विज्ञान का आरम्भ भी आत्मबोध से होता है। अपने आपको जानने के लिए गम्भीर चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म−साधना का—उपासना, तपश्चर्या और योगसाधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—
साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—
साधना बता कर उसे उतनी छोटी परिधि में सीमाबद्ध कर दिया जायगा तो उसे अर्थ का अनर्थ ही कहेंगे। आज योग के व्याख्याता कुछ ऐसा ही करने पर तुल गये हैं। चूँकि हलकी वस्तुएँ लोग आसानी से पकड़ लेते हैं, उनके महात्म्य यदि बढ़ा−चढ़ा कर बता दिये जायँ तो लोग आकर्षित भी आसानी से हो जाते हैं और योग शिक्षा की प्रतिष्ठा बढ़ जाती और उनकी योग पाठशाला चलने लगती है। चरित्र निर्माण भाव परिष्कार और जीवन—लक्ष्य के निर्धारण की बात कठिन पड़ती है सो उसे सस्ते योगाभ्यासी क्यों सुनने लगे, योग शिक्षक भी कठिन आधार प्रस्तुत करके अपनी बाजीगरी को अनाकर्षक नहीं बनाना चाहते। सरल सुविधा का रास्ता अपनाया जाय सो ठीक है पर बात का बतंगड़ न बनाया जाय।
साधना अपनाकर अपना शरीर सक्रिय और समर्थ रख सकता हो तो वह बिना आसन, प्राणायाम का सहारा लिए भी योग−साधना का पूर्णतया अधिकारी माना जा सकता है। ऐसी दशा में आसन, प्राणायाम का उतना महत्व नहीं होता जैसा कि आजकल योग की शिक्षा देने वालों ने तिल को ताड़ बनाकर खड़ा कर दिया है।
साधना करे या न करे अकेले गायत्री मन्त्र का आश्रय लेने से ही मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
साधना के साथ नियोजित करना होगा। आज का वर्तमान ही कल का भविष्य बन कर सामने आने वाला है। इसलिए इस त्रिवर्ग को हमें विवेकपूर्ण मान्यता देनी पड़ेगी और बिना एक पक्षीय पूर्वाग्रह कर अड़े, यही नीति अपनानी होगी कि औचित्य को अंगीकार करें और विवेकपूर्ण दूरदर्शिता की रीति−रिवाज अपनायें। नवीनता और प्राचीनता में से किसी का अत्यधिक समर्थन करके हमें भूत और भविष्य को वर्तमान से काटने का प्रयत्न करते हैं। इसमें लाभ कम और हानि अधिक हैं।
साधना के लिए यह उचित है कि शरीर को सक्रिय और मन को सन्तुलित रखा जाय। कैंची, उस्तरा पर धार ठीक रहे तो नाई हजामत ठीक तरह बना सकता है। लुहार छेनी, हथौड़े के सही होने पर अपनी ढलाई−मढ़ाई ठीक से करता है। यह मानने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है। योग साधक का भी शरीर दूसरे अन्य लोगों की तरह ही स्वस्थ रखने के लिए आसन, प्राणायाम जैसे व्यायामों का उपयोग किया जाना चाहिए।
साधना का—उपासना, तपश्चर्या और योगसाधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश, परामर्श इस प्रकार है—
साधना का लक्ष्य हो सकता है। इसके लिए दृष्टिकोण का−भाव भूमिका का−परिष्कार करना होता है और पशु स्तर को हेय चिन्तन एवं कर्तृत्व को उलट कर उसे सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों में परिणत करना पड़ता है। अध्यात्म साधनाओं का लक्ष्य यही है। इसकी पूर्ति के लिए प्रत्याहार धारण, ध्यान और समाधि की मनः विज्ञान समर्थित योगाभ्यास क्रियाओं को अपनाना पड़ता है। यही है वह लक्ष्य जिसकी ओर योग शिक्षकों की तत्परता और शिक्षार्थियों की दिलचस्पी को आगे बढ़ना बढ़ाया जाना चाहिए।
साधना मान कर बैठे जाते हैं।
साधना का लक्ष्य है। जिसने अपने को जान लिया, उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने के भर्म को हस्तगत कर लिया।
साधना विज्ञान का सबसे शक्ति शाली पक्ष कह सकते हैं 24 अक्षरों का गुँथन इस प्रकार हुआ है कि उनकी पुनरावृत्ति करते रहने से प्रसुप्त गुह्य शक्तियों का जागरण हो सकता है और निष्कृष्टता को उत्कृष्टता में परिणत करने का पथ प्रशस्त हो सकता है। विषवत् की गई गायत्री उपासना साधक में भौतिक सफलतायें सम्भव करने वाली सिद्धियों और आत्मिक प्रगति का द्वार खोलने वाली विभूतियों से परिपूर्ण बना सकती है।
साधना का पूर्णतया अधिकारी माना जा सकता है। ऐसी दशा में आसन, प्राणायाम का उतना महत्व नहीं होता जैसा कि आजकल योग की शिक्षा देने वालों ने तिल को ताड़ बनाकर खड़ा कर दिया है।
साधना में तभी सफल होती हैं जब सर्वप्रथम गायत्री मन्त्र द्वारा अपनी भाव भूमिका को चैतन्य कर लिया जाय। इस संदर्भ में शास्त्र का अभिमत स्पष्ट है।
साधना का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये दौड़ लगाते देखे जाते हैं। कहीं−कहीं मुद्रा, बंध, नेति धोति, वस्ति आदि हठ योग परक अंग संचालकों को योग शिक्षा में सम्मिलित कर लिया गया है। चौथे उस चरण की ओर किसी का ध्यान ही नहीं है जिसकी पूर्ति के लिए योग विज्ञान का सारा ढाँचा ही गढ़ा गया और खड़ा किया गया है। व्यक्ति वादी संकीर्णता और स्वार्थवादी महत्वाकाँक्षाओं में उलझे हुए मन को उच्च आदर्शों को अपनाने की तपश्चर्या में लगा देना ही जीव और ब्रह्म की एकता का आधार हो सकता है उसके लिए परिष्कृत दृष्टिकोण का—आदर्शवादी मनोभूमि का विकास अनिवार्य है। इसी विकास के आधार पर यह परखा जा सकता है कि किसकी योगसाधना किस हद तक सही दिशा में चल रही है और कितनी सफल हो रही है।
साधना की जो धूम देश−विदेश में मची हुई है उसे इसी हलके स्तर की बात क्रीड़ा ही कहा जाना चाहिए।
साधना की दृष्टि से करता है। मानवी महानता को समझने और तद्नुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए हम केवल दिव्य दर्शन के आधार पर ही समर्थ होते हैं। बाइबिल के उपरोक्त मन्त्र में इन्हीं विशिष्ट आँखों को खोलने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की गई है।
साधनाओं का लक्ष्य यही है। इसकी पूर्ति के लिए प्रत्याहार धारण, ध्यान और समाधि की मनः विज्ञान समर्थित योगाभ्यास क्रियाओं को अपनाना पड़ता है। यही है वह लक्ष्य जिसकी ओर योग शिक्षकों की तत्परता और शिक्षार्थियों की दिलचस्पी को आगे बढ़ना बढ़ाया जाना चाहिए।
साधना से हम प्रकृति की चेतन ध्वनियों से परिचित होते हैं तदनुरूप उन रहस्यों को जानने में सफल होते हैं सर्वसाधारण के लिए अविज्ञात हैं। प्रकृति की शक्तियों को करतलगत करना सूक्ष्म ध्वनियों पर नियन्त्रण करने से सम्भव होता है। अमुक ध्वनि, अमुक घटना क्रम का प्रतिनिधित्व करती है। नाद साधक प्रकृति के अन्तराल से अमुक ध्वनि पकड़ने और सुनने का अभ्यास करते है। इसमें कितनी सफलता मिलती है उतना ही अविज्ञात को जानना एवं अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष एवं करतलगत करना सम्भव हो जाता है।
साधना में प्रवेश करें।
साधना के उपरान्त एकत्रित किये है। तब हमें आदिम युग से लेकर अब तक की प्रगति प्रक्रिया को बहिष्कृत करके इतिहास का अर्थ आरम्भ करना पड़ेगा। यह बहुत ही महंगी और कष्टकर प्रक्रिया होगी और एक प्रकार से असम्भव ही मानी जायगी। भूत ने जो कटु और एक प्रकार से असम्भव ही मानी जायगी। उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है और भविष्य निर्धारण को सरल बनाया जा सकता है।
साधना जैसी सत्प्रवृत्तियाँ, सद्भाव, संवर्धन के प्रयत्नों के साथ ही जुड़ी हुई हैं। कहना न होगा कि मानव चेतना भौतिक पदार्थों से नहीं सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का खाद पानी पा कर ही जीवित रह सकती है, विकसित हो सकती है। इसी विकास पर विश्व−मंगल का सारा आधार टिका हुआ है।
साधना में अधिक तत्परता एवं सफलता के साथ संलग्न किया। यही खुला रहस्य है कि इस सब शृंखला से लौटे हुए व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों में जन-जागृति का भावनात्मक पुनरुत्थान का प्रयोजन सफलता के साथ सम्पन्न कर रहे है। यों तो गंगाजल की लहरों पर भी कूड़ा करकट बहता पाया जाता है, ऐसे तो कुछ शिक्षार्थी इन सबों के भी ऐसे हो सकते है जो मुँह बन्द सीप की तरह स्वाँति नक्षत्र की वर्षा का लाभ ले सकने में असमर्थ असफल रह गये हो। उपरोक्त प्रशिक्षण शृंखला क इस वर्ष कुछ और नये चरण बढ़ाये गये है। इनमें प्रथम चरण है वरिष्ठ और कनिष्ठ वानप्रस्थों की शिक्षा।
साधना किस हद तक सही दिशा में चल रही है और कितनी सफल हो रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-February
साधना ही जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता समझी जा सकती है।
साधना पर समुचित ध्यान देते हैं। इसके विपरीत दुर्गति में गिरने वाले लोग अपनी वृत्तियों को निरर्थक और अनर्थ मूलक दुष्प्रवृत्तियों में बखेरते और नष्ट करते रहते हैं। महर्षि सनत्कुमार आगे फिर कहते हैं—
साधना में ध्यान का स्थान प्रमुख है। ध्यान के लिए आकृति चाहिए। निराकार ब्रह्म को इसी प्रयोजन के लिए साकार रूप में प्रस्तुत किया गया है। नामों और रूपों की भिन्नता वाला देव प्रकरण साधकों की सुविधा भर के लिए है उससे एक ब्रह्म की सत्ता को चुनौती नहीं दी जाती और न बहु−देव बाद को उससे प्रतिपादन होता है।
साधनाओं में ध्यान को इसलिए अग्रणी माना गया है कि ईश्वर प्राप्ति और आत्म−कल्याण जैसे महान प्रयोजनों के लिए भी तन्मयता एवं तत्परता की आवश्यकता पड़ती है। स्नेह, ममत्व और श्रद्धा, विश्वास के केन्द्रीकरण का नाम ही भक्ति−भावना है। मस्तिष्क को पूरी तरह समेट कर जीवन रहस्यों का विश्लेषण किया जाय तो ही वह ज्ञान प्राप्त होता है जो सद्ज्ञान एवं ऋतम्भरा प्रज्ञा का जागरण करने के लिए आवश्यक है। अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करने के लिए—आत्मा को परमात्मा में जोड़ देने के लिए योग−साधना की जाती है। यह प्रक्रिया या तभी सम्भव होती है, जब चिन्तन को प्रखर और केन्द्रीभूत बना कर लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकाग्रतापूर्वक प्रयुक्त किया जाय।
साधना सामग्री इस लोक में तृप्ति न दे सकी तो तथाकथित स्वर्ग में बताई गई सुख-सामग्री से आत्मा का क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? इस चिन्तन को बचपन ही कहना चाहिए कि आत्म-शान्ति की आन्तरिक तृप्ति के संदर्भ में भी वासना-तृष्णा के साधन जुटाने वाले तथाकथित स्वर्गीय परिस्थितियों में ही आनन्द और सन्तोष मिलने की बात सोचें।
साधना की जाती है। यह प्रक्रिया या तभी सम्भव होती है, जब चिन्तन को प्रखर और केन्द्रीभूत बना कर लक्ष्य प्राप्ति के लिए एकाग्रतापूर्वक प्रयुक्त किया जाय। ध्यान इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। इसलिए प्रायः सभी साधना मार्गों में ध्यान को प्रधानता दी गई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होना कठिन है।
साधना का उल्लेख हुआ। उसमें ईश्वर का समावेश आवश्यक नहीं। गुलाब आदि किसी भौतिक आधार को भी माध्यम बनाया जा सकता है पर प्रभु समर्पण स्तर की जब साधना करनी हो तो फिर भक्त के अस्तित्व को भगवान की सत्ता में समर्पित में होने का ध्यान ही करना पड़ेगा।
साधना में सविता−देवता का−ज्योति पुञ्ज प्राणी की काया को भी ध्यान केन्द्र नियत किया जा सकता है।
साधना जारी रखी जाय तो सबसे उत्तम परामर्श-दाता सिद्ध हो सकती है। मस्तिष्क में वह क्षमता मौजूद है, जिसे थोड़ा-सा सहारा देकर उच्चकोटि के विद्वान् अथवा बुद्धिमान कहलाने का अवसर मिल जाय। हाथों की संरचना अद्भुत है, यदि उन्हें सही रीति से उपयुक्त काम करने के लिए सधाया जा सके तो वे अपने कर्तृत्व से संसार को चमत्कृत कर सकते हैं। मनुष्य का पसीना इतना बहुमूल्य खाद है, जिसे लगाकर हीरे-मोतियों की फसल उगाई जा सकती है।
साधना कहा जाता है।
साधना के साधक कहा जाता है। वे ही आकाश के तारे तोड़ लाने जैसी बढ़ी−चढ़ी सफलतायें प्राप्त करते हैं।
साधना की दृष्टि से अतीव आवश्यक कार्य माना जाना चाहिए।
साधना प्रयोजन पूरा करने के लिए भगवान के रूप की कल्पना गढ़ी गई।
साधना क र ली जाय तो शक्ति के बिखराव को समेट कर एक प्रयोजन में लगाने से आशाजनक सफलता मिला सकती हैं। बिखरी हुई बारूद में आग लगाने से वह भक् से जल जायगी पर उसे बन्दूक की नली द्वारा केन्द्रित करके एक दिशा विशेष में फेंका जाय तो उसका प्रहार असहनीय बन जाता है। मस्तिष्कीय ऊर्जा को के न्द्र−विशेष पर इकट्ठा करना और उसे दिशा−विशेष में लगा देना यही है ध्यान का प्रमुख उद्देश्य।
साधना करने में तत्पर हो गये। इसे हम आदिम-कालीन वर्ण-व्यवस्था कह सकते हैं। इस सहयोग-व्यवस्था के फलस्वरूप जीवन-विकास में तीव्र गति उत्पन्न हुई और बहुकोशीय मल्टी सेल्यूलर-जन्तुओं का उद्भव सम्भव हुआ।
साधना करनी हो तो फिर भक्त के अस्तित्व को भगवान की सत्ता में समर्पित में होने का ध्यान ही करना पड़ेगा।
साधना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
साधना मार्गों में ध्यान को प्रधानता दी गई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होना कठिन है।
साधना विज्ञान में ध्यानयोग को प्रमुखता दी गई है। बिखरी शक्ति यों का केन्द्रीकरण एकाग्रता से होता है। आतिशी शीशे की सहायता से फैली हुई सूर्य किरणों को जब एक के न्द्र बिन्दु पर इकट्ठी कर देते हैं, तो वहाँ आग जलने लगती है। मस्तिष्कीय ऊर्जा के बिखराव को एक दिशा विशेष में केन्द्रित करने की साधना क र ली जाय तो शक्ति के बिखराव को समेट कर एक प्रयोजन में लगाने से आशाजनक सफलता मिला सकती हैं। बिखरी हुई बारूद में आग लगाने से वह भक् से जल जायगी पर उसे बन्दूक की नली द्वारा केन्द्रित करके एक दिशा विशेष में फेंका जाय तो उसका प्रहार असहनीय बन जाता है।
साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त एवं सिद्ध पुरुष बन सकता है।
साधना ही होती है। शरीर से किये जाने वाले कामों की सुन्दरता और सफलता मात्र श्रम पर आधारित नहीं होती, उसमें भी मनोयोग की संलग्नता आवश्यक होती है। यह मनोयोग और कुछ नहीं ध्यान का के केंद्रीकरण ही है। कोई व्यापारी, अध्यापक, शिल्पी अथवा श्रमिक, इस प्रयोग के बिना अपने काम में न तो कुशल हो सकता है और न सफल।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-September
साधना से उसे आश्चर्यजनक सफलता मिली। उसे प्रेतात्माओं को प्रामाणिक सन्देश वाहक माना जाने लगा। इस संदर्भ में इंग्लैंड के उच्चकोटि के व्यक्ति उससे अपना समाधान कराने के लिए मिलने आये और संतुष्ट होकर लौटे। इन ख्याति नामा लोगों में ईविनिंग पोस्ट के सम्पादक विलियम कुलेन ब्रामेट, प्रख्यात उपन्यासकार विलियम थेकर, प्रसिद्ध रसायन विज्ञानी सर क्रुक्स जैसे मूर्धन्य लोगों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसकी विलक्षण प्रतिभा के सम्बन्ध में पत्र−पत्रिकाओं में कितने ही लेख घटनाक्रम के विवरणों सहित प्रकाशित हुए।
साधना को ‘एकांगी’ भले ही माना जाय, पर उसमें झाँकती है प्रेम की प्रौढ़ता ही।
साधना प्रक्रिया अपनाकर अधिक अच्छी तरह और अधिक सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है। प्रयोग करके इस तथ्य को अपने सामने प्रत्यक्ष खड़ा देख सकते हैं।
साधना की पुनीत प्रक्रियाएँ जीवनचर्या में सम्मिलित की जा सकें तो वह प्रखर विद्युत प्रवाह उत्पन्न होगा, जिसे अध्यात्म की भाषा में ब्रह्मवर्चस् और विज्ञान की भाषा में प्राण−तेजस् कहा जा सकता है।
साधना को सहज ही बढ़ा−चढ़ा स्थान मिलने लगेगा। ऐसा सद्भाव सम्पन्न व्यक्ति सेवा धर्म का अनुयायी हुए बिना रह ही नहीं सकता।
साधना का थोड़ी मात्रा में भी चरितार्थ करने लगे तो प्रतीत होगा कि एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति का द्वार खुल गया। अन्तःकरण को सन्तोष दे सकने योग्य साधन एक ही है—सहानुभूति, स्नेह और सहायता के लिए आतुर मनुष्यों की सहायता करना सम्भव है धन के अभाव में कष्ट पीड़ितों को प्रत्यक्ष रूप से कोई बहुत बड़ी साधन सामग्री प्रस्तुत कर सकना सम्भव न हो पर इससे क्या—सहानुभूति अपने आप में एक बहुत बढ़ी−चढ़ी सुख सम्पदा है। उतने भर से पीड़ा और पिछड़ेपन से छुटकारा पाने के लिये कोई व्यक्ति स्वयं तन कर खड़ा हो सकने में समर्थ हो सकता है।
साधना करनी पड़ती है।
साधना करते रहना अंगीकार किया है। माँस पेशियाँ सिकुड़ती फैलती हैं। नाड़ियाँ रक्त को लाती ले जाती हैं—फेफड़े हवा को खींचते−फेंकते हैं। छोटे−छोटे जीव कण और ज्ञान तन्तु तक अपने क्रिया−कलाप में अहिर्निश दत्त−चित्त रहते हैं। इसी सर्वतोन्मुखी सक्रियता का नाम जीवन है।
साधना। जून सन् 73 की अखण्ड−ज्योति के अंक में इस शिक्षा का उद्देश्य, आधार और विवरण छप चुका है।
साधना के सत्परिणाम निर्विवाद है। परिश्रम से प्यार करने वाला जीवन को प्यार करता है अस्तु उसे सफल मनोरथ और आनन्द युक्त जिन्दगी जी सकने का लाभ भी मिलता है।
साधना का अपना स्थान है और अपना महत्व। इस सीड़ियों को पार करते हुए हमें पहुँचना उसी स्थान तक पड़ेगा जहाँ ईश्वर की समीपता मिलती है—उसी के सदृश उदार अन्तःकरण और पवित्र व्यक्तित्व का आलोक जगमगाता है। हम तब तक ईश्वर से असंख्य योजन दूर रहेंगे जब तक अपनी चेतना को ईश्वरीय चेतना के सदृश उदात्त बनाने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते। समीपता तो इसी तथ्य पर निर्भर है कि हम अपनी सत्ता को ईश्वर के समान ही सहृदय और सचेतन बनाने में तत्परता पूर्वक प्रयत्न रत रह रहे हों।
साधना, तीर्थयात्रा, कथा−कीर्तन, देव−दर्शन, दान−पुण्य, व्रत−अनुष्ठान, षोडश संस्कार, पर्व, आयोजन आदि धर्म कृत्यों के साधन विधान इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखकर विनिर्मित किये गये थे इन क्रिया कृत्यों के साथ जुड़े हुए प्रेरणा प्रकाश से जन−मानस को आलोकित करते हुए उस उच्चस्तरीय चिन्तन एवं कर्तव्य को निरत रखा जा सकेगा। संक्षेप में भारतीय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का आधार मूल उद्देश्य एक ही था कि व्यक्ति को नर−पशु से ऊँचा उठाकर नर−नारायण के रूप में विकसित करने के लिए अगणित स्तर के प्रेरणा प्रयोजन खड़े किये जाँय और सुसंस्कृत जीवन जीने की गरिमा के प्रति आस्थावान बनाया जाय।
साधना में प्रवृत्त होने की चेष्टा करते हैं तो सहज ही उस आनन्द की अनुभूति होने लगती है जिसे पाकर ही मानव जीवन सफल होता है।
साधना की पृष्ठभूमि; जिससे वह स्वयं गौरवान्वित हुआ और समस्त संसार को कृतकृत्य बनाया।
साधना की नियमित व्यवस्था बनाकर ही एक से दस वाला अभियान उत्साह वर्धक एवं प्रभावशाली रीति से चलाया जा सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही युग−निर्माण परिवार की सदस्यता की यह दो अनिवार्य शर्तें रखी गई थीं। जिनने अब तक उस दिशा में समुचित ध्यान न दिया हो, उनके लिए यही समय है कि उस प्रक्रिया का शुभारम्भ तत्काल कर दिया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-January
साधना जुड़ी हुई हो, वहाँ अभीष्ट सफलता मिलनी ही थी, मिली भी। भारत—आदर्शवादी महामानवों का देश था। उत्कृष्ट व्यक्तित्वों का अस्तित्व चमत्कारी होता है। उसकी उपस्थिति पग−पग पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है। भूतकाल में भारत ने अपने देश में और संसार भर में जो भूमिका निबाही उसका आधार उन दिनों के सुविकसित लोक−मानस को बिना संकोच के माना जा सकता है।
साधना करायी जाती है।
साधना कराई जाती है ओर स्पष्ट रूप से समझा दिया जाता है कि इन विधि−विधानों और कर्मकाण्डों को ही जादू की छड़ी न मान बैठें, वरन् यह समझे कि जिस प्रकार सीढ़ी के सहारे ऊपर जीने पर चढ़ा जा सकता है, उसी प्रकार अन्तःकरण में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयास कराया जा रहा है। यदि आन्तरिक मलीनताओं के उन्मूलन का प्रबल प्रयत्न न किया गया, भावना−क्षेत्र में उत्कृष्ट देव−तत्वों को आरोपण न किया तो मात्र विधिविधान करते रहने से बात बनेगी नहीं। तप साधना एवं योगाभ्यास के कर्मकाण्ड शरीर एवं मन से किये वैचारिक दुस्साहस अपनाया जाय। इस समन्वयात्मक पद्धति से की गई संरचनाएं सदा सफल होती रही हैं। उनसे साधकों का आत्मबल निश्चित रूप से बढ़ता है और उस उपलब्धि का मूल्य बड़ी सम्पदा से अधिक होता है।
साधना के उभय−पक्षीय उच्च शिक्षार्थी के सामने प्रस्तुत रहेंगे तो यह आशा की जा सकती है वह अपना व्यक्तित्व इस स्तर तक परिष्कृत करलें कि उसे साँचे की संज्ञा दी जा सके और उसके संपर्क में आने वाले खिलौने सुन्दर एवं सराहनीय बनेंगे, ऐसी आशा की जा सके।
साधना एवं योगाभ्यास के कर्मकाण्ड शरीर एवं मन से किये वैचारिक दुस्साहस अपनाया जाय। इस समन्वयात्मक पद्धति से की गई संरचनाएं सदा सफल होती रही हैं। उनसे साधकों का आत्मबल निश्चित रूप से बढ़ता है और उस उपलब्धि का मूल्य बड़ी सम्पदा से अधिक होता है।
साधना के साथ विनिर्मित किया था।
साधना का यही श्रेष्ठतम आधार पहले भी था, पर आज तो वह युग की अनिवार्य आवश्यकता बनकर सामने आया है। आपत्ति−कालीन विशिष्ट कार्य की तरह हमें उसी की पूर्ति में सर्वतोभावेन जुटना चाहिए। ईश्वर−भक्ति से लेकर आत्म−कल्याण ओर परमार्थ−प्रयोजन डडडड डडडड डडडड डडडड सकते हैं।
साधना−शिक्षा का भी प्रबन्ध किया गया है। पहला सत्र 20 जनवरी से आरम्भ भी हो रहा है। इसी श्रृंखला में दूसरे स्तर के क्लिष्ट वानप्रस्थ वे होंगे —जो अभी शेष जीवन पुरी तरह इस महान लक्ष्य के लिए समर्पित करने की स्थिति में तो नहीं है, पर अधिकाधिक साहस इसके लिए जुटाते रहेंगे। इन कनिष्ठ वानप्रस्थों का प्रशिक्षण 25 अप्रैल से दो महीने के लिए आरम्भ होगा।
साधना में आने को संलग्न कर सकें। यह इसलिए और भी अधिक कठिन है कि उन्हें आरम्भिक प्रेरणा व्यक्तिवादी स्वार्थपरता की पूर्ति से मिली है। उनका मन, मस्तिष्क इसी लाभ ने आकर्षित किया है। लोक में धन, सम्मान,परलोक में स्वर्ग−मुक्ति का लाभ तनिक −सा वेष बदलने भर से मिल सकता है। यही आकर्षण उन्हें इस राह पर खींच कर लाया है।
साधना की बात जँच−रुच। यह इतना कठिन है, जिसे लगभग असम्भव भी कहा जा सकता है। जो लोग संसार को माया कहते हैं, सेवा का शूद्रों का कार्य बताते रहे हैं, जिन्हें” तोहि बिरानी क्या पड़ी, तू अपनी निरबेर “ की बात आदि से अन्त तक सुनने को मिलती रही हैं, वे परम गहन सेवा−धर्म स्वीकार करने का, प्रभू समर्पित जीवन जीने का साहस कर सकेंगे,ऐसी आशा नहीं ही की जानी चाहिए।
साधना की धारा गतिगामिनी होती है। वानप्रस्थ प्रयोजन में इन सभी सन्दर्भों का समावेश है, उसे अपना कर हम अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने का, अन्तःचेतना में उच्चस्तरीय तत्वों के समावेश का उद्देश्य पूराकर सकते हैं।
साधना के लिए समर्पित जीवन−क्रम से वे जन−साधारण का हृदय जीतते थे और उस विजय−श्री का उपयोग लोक−मंगल के लिए जन−सहयोग जुटाने में करते थे। फलतः प्रगति पथ पर अग्रसर करने वाली अनेकानेक सत्प्रवृत्तियाँ सफलता की दिशा में द्रुतगति से बढ़ती रहती थीं।
साधना में अपनी उपयोगिता दिखाई पड़ती थी, वे उनके साथ लोक−मंगल प्रयोजन पूरे करने के लिए भी निकल पड़ती थीं। आगे चलकर यही वानप्रस्थ संन्यासी के रूप में एक कदम और आगे बढ़ाते थे। यही थी—प्राचीनकाल की आश्रम−व्यवस्था।
साधना के यज्ञ में प्रसन्नतापूर्वक लगाते थे। यह थी जीवट जिसने किसी समय सम्पूर्ण एशिया को हिन्दू धर्म एवं बौद्ध धर्म के झंडे के नीचे दीक्षित किया था। इतना ही नहीं उनने पृथ्वी के अन्य महाद्वीपों में भी पदार्पण किया था। और सच्चे अर्थों में जगद्गुरु का उत्तरदायित्व निवाहा था।
साधना के लिए भौतिक प्रगति भी आवश्यक है। स्वास्थ्य, शिक्षा, सम्पत्ति, वंश−वृद्धि, परिवार−व्यवस्था, सुरक्षा आदि कार्यों के लिए जीवन का पूर्वार्ध उपयुक्त रहता है। इसलिए ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के दो आश्रम इन प्रयोजनों को पूरा करने के लिए निर्धारित किये गये। जीवन का उत्तरार्द्ध परमार्थ प्रयोजनों के लिए है। वानप्रस्थ और संन्यास की संरचना इसी उद्देश्य के लिए की गई है।
साधना कराई जाती है। यह साधना कम भी क्लिष्ट वानप्रस्थों की शिक्षा पद्धति में सम्मिलित रखा गया है। उनकी स्थिति एवं प्रकृति के अनुरूप साधना कराई जाती है ओर स्पष्ट रूप से समझा दिया जाता है कि इन विधि−विधानों और कर्मकाण्डों को ही जादू की छड़ी न मान बैठें, वरन् यह समझे कि जिस प्रकार सीढ़ी के सहारे ऊपर जीने पर चढ़ा जा सकता है, उसी प्रकार अन्तःकरण में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयास कराया जा रहा है। यदि आन्तरिक मलीनताओं के उन्मूलन का प्रबल प्रयत्न न किया गया, भावना−क्षेत्र में उत्कृष्ट देव−तत्वों को आरोपण न किया तो मात्र विधिविधान करते रहने से बात बनेगी नहीं। तप साधना एवं योगाभ्यास के कर्मकाण्ड शरीर एवं मन से किये वैचारिक दुस्साहस अपनाया जाय।
साधना प्रयोजन में निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग दिया जाता है।
साधना का और अपनी कमाई का अंश डडडड देकर पुण्य-परमार्थ कर प्रयोजन डडडड किया जा सकता है। हमें कर्मवीर होना चाहिए। हमारे विचार का क्रिया में परिणित होना चाहिए। आदर्शवादिता की त्याग-बलिदान का जमा पहनना चाहिए। उसे नंगी-उघारी रख कर उपहासास्पद नहीं बनाना चाहिए।
साधना तथा अध्ययन में निरत रहता है और संघ द्वारा निर्धारित सेवा−कार्य में सच्चे मन से पूरा परिश्रम करता है। भिक्षु का मोटा अर्थ भिक्षुक या भिखारी जैसा लगता है, पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। बौद्धधर्म में साधु को—धर्म−प्रचारक को—भिक्षु कहते हैं। अवसर पड़ने पर उसे भिक्षा द्वारा क्षुधा शांत करने में भी आपत्ति नहीं हो सकती, पर यह आवश्यक नहीं कि भिक्षु नामधारी को अनिवार्य रूप से भिक्षा ही माँगनी पड़े। भिक्षुक और भिक्षु दो शब्द अलग−अलग अर्थों में प्रयुक्त होते रहे हैं।
साधना करने की।
साधना कम भी क्लिष्ट वानप्रस्थों की शिक्षा पद्धति में सम्मिलित रखा गया है। उनकी स्थिति एवं प्रकृति के अनुरूप साधना कराई जाती है ओर स्पष्ट रूप से समझा दिया जाता है कि इन विधि−विधानों और कर्मकाण्डों को ही जादू की छड़ी न मान बैठें, वरन् यह समझे कि जिस प्रकार सीढ़ी के सहारे ऊपर जीने पर चढ़ा जा सकता है, उसी प्रकार अन्तःकरण में सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयास कराया जा रहा है। यदि आन्तरिक मलीनताओं के उन्मूलन का प्रबल प्रयत्न न किया गया, भावना−क्षेत्र में उत्कृष्ट देव−तत्वों को आरोपण न किया तो मात्र विधिविधान करते रहने से बात बनेगी नहीं। तप साधना एवं योगाभ्यास के कर्मकाण्ड शरीर एवं मन से किये वैचारिक दुस्साहस अपनाया जाय। इस समन्वयात्मक पद्धति से की गई संरचनाएं सदा सफल होती रही हैं।
साधना कारण नहीं होती वरन् अस्त व्यस्तता और गैर जिम्मेदारी ही प्रधान रूप से उस प्रकार की अड़चने खड़ी करती हैं। सतर्क मनुष्य पूरी सावधानी से अपना कारोबार चलाते है और पूरी तत्परता से लोक−सेवा करते हे। दोनों पक्षों में से भी कोई हानि नहीं होने देते। असावधानी से होने वाली हानि को लोग लोक−सेवा के सिर मढ़ते रहते हैं। इस भूल के कारण ही यह भ्रम फैला है कि सेवा क्षेत्र में उतरेगा वह अपनी अर्थ व्यवस्था चौपट करेगा।
साधना आत्मा को परमात्मा स्तर तक—नर को नारायण बनाने तक—पहुँचाने के जीवन−लक्ष्य तक क्रमिक रूप से बढ़ता जायगा और अन्तर पूर्णता का— जीवन−मुक्ति का परम पद प्राप्त करेगा। कहना न होगा कि इस दिशा में जो जितना आगे बढ़ सकेगा, वही साधु संस्था की सदस्यता कास प्रयोजन उतनी ही मात्रा में सम्पन्न कर सकेगा। वानप्रस्थ में प्रवेश किस लक्ष्य को लेकर किया जा रहा है—उसकी पूर्ति के लिए प्रचण्ड आत्मबल ही वास्तविक पूँजी है। प्रशिक्षण−काल में इस संदर्भ में प्रत्येक पक्ष से शिक्षार्थी को अवगत कराया जाता है और साधना प्रयोजन में निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग दिया जाता है।
साधना, तितीक्षा−नियमित उपासना आदि की तपश्चर्या तो अनिवार्य रूप से करनी पड़ती थी। इस प्रकार वह अवधि इन यात्रियों के लिए साधु−संस्था के सदस्यों को मिलने वाला प्रत्येक सुअवसर प्रदान करती रहती थी।
साधना के लिए भी यदि अपने पास कुछ है तो उसी का उपयोग करें। पिछली कमाई बेटे−पोतों के लिए और संन्यास में भिक्षा लोगों से—वाली नीति ही चलती रहे तो पिछले पिछड़े हुए साधुओं की तुलना में अपना त्याग का आदर्श क्या रहेगा?
साधनाएं की जा सकती है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चतुर्विध परमार्थ प्रयोजनों में निरत परमार्थ−परायण व्यक्ति कहना चाहिए। ऐसे लोग जितने अधिक किसी देश में होंगे, वह उतना ही अधिक फूलेगा फलेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-May
साधना। बलवृद्धि का—सामर्थ्य संपादन का उद्देश्य यही हो सकता कि उनके वितरण विस्तार का लाभ सुदूर क्षेत्रों को मिले। जो लोग शरीर या परिवार के भीतर ही अपनी प्रतिभा का लाभ सीमित किये बैठे रहते हैं उन्हें गूदे के भीतर ही पहुँचाने वाले बीज की उपमा दी जाती है।
साधना इसी स्तर की होनी चाहिए। प्रतीक पूजा करने में कुछ हर्ज नहीं—पर उसका लाभ उन्हीं को मिलेगा जो उसमें छिपे तत्वों को भी हृदयंगम कर सकें।
साधना में संलग्न रहकर उसे धर्म प्रेमी बनाओ।
साधना में दत्त−चित्त हो संलग्न रह सके। ईश्वर प्रदत्त उपहार को सार्थक बनाने की राह एक ही है कि मानव जीवन के साथ जुड़े हुए अतिरिक्त उपहारों में से प्रत्येक को पूर्णतया उस प्रयोजन के लिए समर्पित कर दे जिसके लिये उसे यह सौभाग्य पूर्ण स्थिति उपलब्ध हुई है।
साधना के फलस्वरूप उस सबको भी पा सकते हैं। जो ईश्वर की सत्ता के अंतर्गत तो है पर अभी तक हमें मिला नहीं।
साधना रूपी सच्ची भगवत भक्ति करने वाले महा−मानव करते रहे हैं और हर दृष्टि से अपने को धन्य बनाते रहे हैं। पाषाण प्रतिमा पर रोली अक्षत चढ़ाने अथवा जप, पाठ करने जैसे सस्ते उपचार इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करा सकते।
साधना कहा जाता है। विश्व मानव की—विश्वात्मा की आराधना उसे प्रेमाञ्जलि को समर्पण करने से सम्पन्न करने से सम्पन्न होती है। वसुधैव कुटुम्बकम् और विश्व परिवार की अनुभूति की ही पूर्णता प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त करना कहा जा सकता है। इसी को ईश्वर दर्शन अथवा भगवत् प्राप्ति का नाम दिया जा सकता है।
साधना की जाती है और उसी के फलस्वरूप धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चार अनुदान पाये जाते हैं। ब्रह्म−विद्या की—अध्यात्म दर्शन की कथन शैली कुछ भी क्यों न हो उसका सार तत्व इतना ही है कि मनुष्य अपने आपको चिन्तन एवं कर्म की दृष्टि से उत्कृष्ट कोटि का निर्मित करने की दिशा में प्रबल पुरुषार्थ करे। उसी को जीवन का प्रमुख प्रयोजन एवं सर्वोपरि लाभ समझें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-April
साधना के लिये जिनके मन में भावनाएँ उमड़ती हैं उन्हें इस वानप्रस्थ शिक्षा प्रक्रिया में सम्मिलित होने पर एक अत्यन्त उपयोगी प्रकाश प्राप्त होगा, यह निश्चित है।
साधना और योगाभ्यास की वैसी प्रक्रिया बननी थी जो चेतना के समुद्र को मथकर रख दे। पौराणिक समुद्र मंथन में चौदह रत्न निकले थे योगी ने ब्रह्म मंथन करके न जाने कितने रत्न पाने का स्वप्न देखा था। इसका कुछ ठीक से पता नहीं चल सका।
साधना, अपनी आस्थाओं—विचारणाओं और आदतों को उसी स्तर का विनिर्मित करना पढ़ता है। कदाचित वैसा लक्ष्य न हो और भौतिक सफलताएँ ही प्राप्त करने तक बात सीमित रखी जानी है तो भी सफल मनोरथ मनस्वी पुरुषार्थी व्यक्तियों के व्यक्तित्व का गहन पर्यवेक्षण करते हुए हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि जा बनना हो उसके अनुरूप आवश्यक है। सफलताएँ चाहे आत्मिक हों चाहें भौतिक, उनके लिए गुण, कर्म, स्वभाव की अनुकूलता का होना अनिवार्य हैं।
साधना हर किसी के लिए सम्भव है और भारतवर्ष में इसी विद्या के बल पर कभी लोगों ने हजारों वर्ष से अधिक की आयु पाई हो तो इसे अतिशयोक्ति नहीं माना जाना चाहिए। आज वह सम्भावनायें प्रायोगिक तौर पर सत्य हो रही हैं।
साधना एवं आदर्श, निष्ठा में नियोजित किया जा सके तो युवावस्था में भी शरीर और मन से ब्रह्मचारी रहा जा सकता है। इसके विपरीत यदि शारीरिक नियन्त्रण तो निभाया जाय पर मानसिक उत्तेजना उभरती रहे तो ब्रह्मचर्य का वह लाभ न मिल सकेगा जैसा कि साधन ग्रन्थों में उसका महात्म्य बताया गया है। दृष्टि कोण में परिवर्तन ही इन्द्रिय का प्रधान आधार है। आहार−विहार के संयम से तो उसमें थोड़ी सी सहायता भर मिलती है।
साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 4)
साधना है।
साधना की शारीरिक, मानसिक कसरतें भी उस आवश्यकता की पूर्ति नहीं करती। इन समस्त आचरणों का मूल उद्देश्य एक ही है उच्चस्तरीय आस्थाओं, आकाँक्षाओं, आदर्शों की अन्तःकरण में इतनी सघन स्थापना जिसकी प्रेरणा से अपनी गतिविधियाँ केवल श्रेष्ठ सत्कर्मों की दिशा में ही गतिशील रह सकें। इस प्रयोजन को जीवन साधना से ही पूरा किया जा सकता है। निरन्तर सत्-चिन्तन और श्रेष्ठ कर्मों के साथ अपने को बाँधे रहकर ही हम सुसंस्कारों की सम्पत्ति उपार्जित कर सकते है और उस आधार पर अपने उज्ज्वल भविष्य का सुखद निर्माण कर सकने में सफल हो सकते है।
साधना में निरत हैं। यह समझते हुए भी कि वे दो तथ्यों को खोज रहे हैं और दो दिशाओं में जा रहे हैं। वस्तुतः उनका प्रयास एक ही दिशा में हैं।
साधना की समग्र प्रक्रिया पूर्ण होती है और उसका वह लाभ मिलता है जो सच्चे योगियों को प्राप्त होता रहा है। अध्यात्म शास्त्र में वर्णित योग साधना का महत्व ऐसी ही सर्वांगपूर्ण साधना से सम्पन्न होता है।
साधना जुटानी पड़ती है। पेट वही सब तो करता रहता है। उसकी अपनी तपस्या ही अन्न देवता को वरदान देने के रूप में विवश करती है तब कहीं जाकर वह रक्त बनता है।
साधनायें उसी स्तर की हैं।
साधना—क्रम, परामर्श एवं आत्मिक अनुदान ने त्रिविध प्रक्रिया के साथ सम्पन्न प्रशिक्षण के आधार पर आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ चढ़ने के जिज्ञासु समुचित लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना में संलग्न रहेंगे।
साधना से ही योग को जानना चाहिए। साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी के साथ पाता है।
साधना का महत्व ऐसी ही सर्वांगपूर्ण साधना से सम्पन्न होता है।
साधना में संलग्न डाक्टरों, कंपाउंडरों, नर्सों और सेवकों को भी रोगी ही समझा जायगा। अफ्रीका के नरभक्षी आदिवासियों के बीच सुसंस्कृत त योरोपीय पादरी स्थायी रूप से जा बसे और उन्हें सुधारने में बहुत हद तक सफल हुए। उन पादरियों को किसी ने नरभक्षी नहीं कहा। यदि वे ऐसा अपडर, डरा करते तो उनकी इस सज्जनता को दुर्बल और अधूरा ही माना जा सकता था। पिछड़े लोगों को ऊँचा उठाने के लिए उन्हीं के बीच बसना आवश्यक है और अपराधियों के अन्तःकरण को छूकर उनकी कोमल भावनाओं को जगाने के लिए उनके बीच रहना भी आवश्यक है।
साधना समस्त दुख, शोकों का निवारण कर देती है।
साधना का स्तर समान रूप से—समन्वित रूप से—आगे बढ़ाया जाता है तो योग साधना की समग्र प्रक्रिया पूर्ण होती है और उसका वह लाभ मिलता है जो सच्चे योगियों को प्राप्त होता रहा है। अध्यात्म शास्त्र में वर्णित योग साधना का महत्व ऐसी ही सर्वांगपूर्ण साधना से सम्पन्न होता है।
साधना में। दोनों इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि विराट् की उपलब्धि के लिए विराट् पर केन्द्रित होने से काम चल सकता है। दोनों ने कुछ दिन एक और भी तथ्य खोजा कि अन्तः का प्रवेश और बहिः का उन्मेष दोनों अन्ततः एक ही स्थान पर जा पहुँचते हैं।
साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी −योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 4)
साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी के साथ पाता है।
साधना करेंगे वरन् सही बात तो यह है कि जब तक शरीर और मन समर्थ है तब तक युवावस्था में ही इस पुरुषार्थ को कर गुजरना चाहिए। भगवान कृष्ण ने युवा अर्जुन की योग साधना को प्रशंसनीय एवं उचित बताते हुए कहा—
साधनात्मक मार्ग−दर्शन अपेक्षित है। उन्हें पाँच दिन की—पंचाग्नि विद्या का वह प्रशिक्षण मिलेगा जो कठोपनिषद् में वर्णित है और यम के द्वारा नचिकेता को प्राप्त हुआ था। अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोश के अनावरण को ही चक्रवेधन भी कहते हैं। कुण्डलिनी जागरण इसे साधना क्रम की चरम परिणति है। यह साधना डडडड जीवन में रहते हुए—सामान्य कार्य व्यवसाय चलते हुए भली प्रकार होता रह सकता है।
साधना कहते हैं। केवल स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान प्रभृति, ज्ञान पक्ष तक सीमित रहने वाली प्रक्रिया अपूर्ण एवं एकांगी है। इसी प्रकार जिन्होंने चिन्तन परिष्कार को तिलाञ्जलि देकर मात्र जप, तप के, हठ योग के, काय−कष्ट तक सीमित विधि−विधान को ही सब कुछ मान लिया है वे भी एक पहिये की गाड़ी चलाने वालों की तरह असफल रहते हैं।
साधना क्रम की चरम परिणति है। यह साधना डडडड जीवन में रहते हुए—सामान्य कार्य व्यवसाय चलते हुए भली प्रकार होता रह सकता है। इसके लिए पंच दिन का प्रशिक्षण निर्धारित है। जो लोग पहले से ही गायत्री उपासना के अभ्यस्त रहे हैं उन्हीं के लिए यह उपयुक्त रहेगा। सर्वथा प्रारम्भिक उपासना आरम्भ करने वालों को यह सब हजम न होगा इसलिए इस वर्ष में उन्हें को भाग लेना चाहिए जो कम से कम एक वर्ष नियमित रूप से गायत्री उपासना कर चुके हों।
साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मू. 30 पैसे।
साधना॥
—मनु
साधना में किसी प्रकार की बाधा न आयेगी। सुबह होते ही मंजिल की ओर तेजी में कदम बढ़ाकर पहुँचने का प्रयास करूंगा।’
साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।’
साधना में लगाया जा सके तो समझना चाहिए कि आत्मज्ञान और आत्मबल की प्रखरता सिद्ध हो गई।
साधना पथ पर चलते हुए आत्म−बल प्राप्त करने वालों के लिए पाँच−पाँच दिन के प्रत्यावर्तन सत्र, (2) लोक−मंगल के लिए समय दे सकने वाले युग−निर्माण कर्त्ता सैनिकों के लिए दो−दो महीने के वानप्रस्थ सत्र (3) सुशिक्षित एवं स्वाध्यायशील विचारकों के लिए पन्द्रह−पन्द्रह दिन के लेखनी सत्र (4) मधुर कण्ठ एवं संगीत में गति रखने वाले प्रचार प्रयोजन के लिए उपयुक्त स्थिति वाले व्यक्तियों के लिए तीन−तीन महीने के संगीत सत्र (5) महिला जागरण में रुचि लेने वाली—हलके डडडड उत्तरदायित्वों वाली—शिक्षित महिलाओं के लिए तीन−तीन महीने के नारी उत्थान सत्र।
साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना डडडड जीवन में रहते हुए—सामान्य कार्य व्यवसाय चलते हुए भली प्रकार होता रह सकता है। इसके लिए पंच दिन का प्रशिक्षण निर्धारित है। जो लोग पहले से ही गायत्री उपासना के अभ्यस्त रहे हैं उन्हीं के लिए यह उपयुक्त रहेगा। सर्वथा प्रारम्भिक उपासना आरम्भ करने वालों को यह सब हजम न होगा इसलिए इस वर्ष में उन्हें को भाग लेना चाहिए जो कम से कम एक वर्ष नियमित रूप से गायत्री उपासना कर चुके हों। आशा की जानी चाहिए।
साधना द्वारा उपलब्ध किया जा सकता है। आत्मा को परमात्मा के स्तर पर पहुँचाया जा सकता है।
साधना से ही पूरा किया जा सकता है। निरन्तर सत्-चिन्तन और श्रेष्ठ कर्मों के साथ अपने को बाँधे रहकर ही हम सुसंस्कारों की सम्पत्ति उपार्जित कर सकते है और उस आधार पर अपने उज्ज्वल भविष्य का सुखद निर्माण कर सकने में सफल हो सकते है।
साधना 4− गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5−गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया 6−गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी 7−गायत्री की पञ्चमुखी दैनिक साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना में लग गया उसने ब्रह्मोपासना को ध्यान में रखकर बनाई गई विशालकाय योजनाओं का परित्याग कर दिया।
साधना को प्रशंसनीय एवं उचित बताते हुए कहा—
साधना से सम्पन्न होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-August
साधना सम्भव हो ही नहीं सकती। पहाड़ जैसे परिग्रह में से राई रत्ती दान पुण्य करते रहने का कृपण प्रदर्शन लोगों के बहकाने और आत्म प्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है। सच्चे आत्मवादी को तो त्याग, बलिदान के अंतिम चरण तक पहुँचना पड़ता है उसकी निष्ठा एवं श्रद्धा का परिचय तो अपनी सम्पदा का किस सीमा तक विसर्जन किया जा सका इसी कसौटी पर कसने के बाद प्राप्त होता है।
साधना की ऊष्मा से पवित्र और परिष्कृत क्यों नहीं बनाया जा सकता। इन प्रयत्नों में भी हमें वैज्ञानिक उत्साह जैसी ही तैयारी के साथ संलग्न होना चाहिए।
साधना अकारण नहीं है। उनके पीछे जिस उद्देश्य की पूर्ति का समावेश है उसे ध्यान में रखकर चला जाय तो अमुक समय तक ब्रह्मचर्य पालन की लकीर पीटने को ही पर्याप्त न माना जायगा वरन् इस दृष्टिकोण के अनुसार अपना और अपने प्रभाव क्षेत्र का अमुक स्तर बनाने का प्रयत्न किया जायगा।
साधना एवं तपश्चर्या है। सारा साधना विज्ञान और तत्व-दर्शन इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। इस संदर्भ में आप्त वचन इस प्रकार हैं—
साधना विज्ञान और तत्व-दर्शन इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। इस संदर्भ में आप्त वचन इस प्रकार हैं—
साधनारत व्यक्ति अपने आपे से लड़ने को अपनी आन्तरिक अशक्त ता से जूझने की दिशा में ही तो अग्रसर होते हैं।
साधना के इस उद्देश्य को समझा जा सके और इन बहिरंग क्रिया-कलापों को उसी दृष्टि से कार्यान्वित किया जा सके तो समझना चाहिए कि तपश्चर्या सार्थक हुई अन्यथा लकीर पीटने भर को निरुद्देश्य किया जा रहा हो तो उसे समझना चाहिए कि वह आत्म प्रताड़ना की निरर्थक कष्टकर विडम्बना भर है।
साधना के अग्नि संस्कार को सहन एवं स्वीकार करे। तप का अर्थ है—सदुद्देश्य के लिए उस हद तक बढ़ चलना जिसमें भौतिक कष्टों की हँसते-खेलते उपेक्षा की जा सके। इस तथ्य को जीवन प्रक्रिया में उतारने के लिए कुछ प्रयाग अभ्यास भी करने पड़ते हैं। बलिष्ठ बनने के लिए व्यायामशाला में जाने और कई तरह की कसरतें करनी पड़ती हैं। आत्मबल सम्पन्न तपस्वी जीवन की भूमिका में विकसित होने के लिए कई तरह के ऐसे कर्मकाण्ड अपनाने पड़ते हैं जो अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सकें।
साधना में गिना जाता है। जो इन उपचारों का क्रियान्वित करते है वे तपस्वी कहलाते हैं। तप का महात्म्य अध्यात्म शास्त्रों में भरा पड़ा है। तप के प्रताप से देव शक्तियों के द्रवित होने और अभीष्ट वरदान प्रदान करने के कितने ही पौराणिक उपाख्यान, पढ़ने और सुनने के मिलते। तपस्वी का सम्मान करने के लिए हमारी सहज श्रद्धा उमड़ती है।
साधना पर भी उसकी उपेक्षा नहीं की है और उनमें से अधिकाँश ने अपने आत्मिक जीवन को समुन्नत बनाने के लिए यथासम्भव प्रयत्न किया है। अपनी प्रेरणा परक चेष्टा भी निरन्तर चलती रही है और स्वजनों को इस संदर्भ में समय−समय पर आवश्यक उत्साह एवं प्रकाश दिया जाता रहा है।
साधना एवं तपश्चर्या के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मविद्या में इसी ‘चित् शक्ति ‘ के विकास पर जोर दिया गया है और कहा गया हैं कि मनुष्य शरीर में सन्निहित प्रकट और अप्रकट रहस्यमय शक्ति संस्थानों को जागृत करके मनुष्य देवस्तर की विशेषताओं से सम्पन्न हो सकता है। भौतिक जगत के विकास प्रयोजनों में बिजली का जो उपयोग है उससे कहीं अधिक उपयोगिता व्यक्तित्व के समग्र विकास में मानवी विद्युत की है। उसका स्वरूप, आधार और उपयोग जानने के लिए हमें विशेष उत्साहपूर्वक प्रयत्न करने चाहिए।
साधना मार्ग में समुचित अभिरुचि रखने वालों की अलग से सूची बनाई जा रही है। वर्ष में दो बार उनके कार्या का लेखा−जोखा लेने और तदनुरूप भविष्य के लिए आवश्यक परामर्श देते रहने का निश्चय किया गया है।
साधना प्रक्रिया किस प्रकार चल रही है? भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन−क्रम किस स्थिति में रह रहा है? यह पूछा गया है और जुलाई के अंग में ऐसे दस सूखकर निर्देश दिये गये हैं जिनके आधार पर वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों का उच्चस्तरीय निर्वाह कर सकने की दिशा में अधिक तेजी से कदम बढ़ाये जा सकें।
साधना मितव्ययता की—सादगी की—गरीबी की करनी चाहिए। इस अभ्यास से ही उसकी परिस्थितियाँ ऐसी रह सकेंगे जिनमें अध्यात्मवादी जीवन पद्धति का निर्वाह सम्भव हो सके।
साधना हानिकारक है। बुद्ध चरित्र में आता है कि तथागत जब कठोर उपवासों द्वारा डडडड को अत्यन्त दुर्बल बना चुके तो एक देव कन्या ने प्रकट होकर उन्हें मध्यम मार्ग पर जाने और इस दुराग्रही कष्ट प्रयोग को छोड़ देने के लिए सहमत किया। उसने सितार का उदाहरण देकर यह भी कहा था कि तारों को अधिक खींचने से वे टूट जाते हैं और वीणा की उपयोगिता नष्ट हो जाती है। शरीर को सताने का भी यही परिणाम होता है। इस तथ्य पूर्ण परामर्श को भगवान बुद्ध ने अंगीकार किया था और वे मध्यम मार्ग स्वयं अपनाकर दूसरों को भी “मज्झम मग्ग“ (मध्यम मार्ग) पर चलने का उपदेश करने लगे थे।
साधना के प्रकरण में इसीलिए सम्मिलित किया गया है कि समृद्ध एवं विलासी लोगों के अनुकरण के लिए मचलने वाली आन्तरिक दुर्बलता के पिण्ड छुड़ाया जा सके और जन प्रवाह से भिन्न स्तर का अपना स्वतन्त्र निर्णय स्वतन्त्र आचरण कार्यान्वित कर सकने का साहस प्रदर्शित किया जा सके, लोगों के व्यंग उपहास से अप्रभावित रह सकने का मनोबल विकसित किया जा सके। आदर्शवादी परम्परा अपनाने वाले में इस प्रकार का शौर्य, साहस होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
साधना का अवलम्बन किया जाय तो ही वे लाभ मिल सकेंगे जिनका वर्णन तप विज्ञान के महात्म्य प्रकरण में बताया गया है।
साधना से निखरा हुआ व्यक्तित्व अपने आप में एक देवता होता है और उसके अपने ही चमत्कार वरदान इतने अधिक होते हैं कि तपस्वी को देवोपम सिद्ध पुरुष की संज्ञा दी जा सके।
साधना करनी पड़ती है। इसके बिना उनको उपयोगी उत्पादन सम्भव ही न होगा। मशीनों के घूमते हुए चक्के ही कारखाने चलाते हैं और आवश्यक वस्तुएँ विनिर्मित होती हैं।
साधनाओं को तपश्चर्या का बहिरंग कलेवर कह सकते हैं।
साधना में एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। अपनी अमीरी और महत्वाकाँक्षाओं को जनकल्याण के लिए समर्पित किये बिना परमार्थ साधना सम्भव हो ही नहीं सकती। पहाड़ जैसे परिग्रह में से राई रत्ती दान पुण्य करते रहने का कृपण प्रदर्शन लोगों के बहकाने और आत्म प्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है। सच्चे आत्मवादी को तो त्याग, बलिदान के अंतिम चरण तक पहुँचना पड़ता है उसकी निष्ठा एवं श्रद्धा का परिचय तो अपनी सम्पदा का किस सीमा तक विसर्जन किया जा सका इसी कसौटी पर कसने के बाद प्राप्त होता है।
साधना की कष्ट साधना हानिकारक है। बुद्ध चरित्र में आता है कि तथागत जब कठोर उपवासों द्वारा डडडड को अत्यन्त दुर्बल बना चुके तो एक देव कन्या ने प्रकट होकर उन्हें मध्यम मार्ग पर जाने और इस दुराग्रही कष्ट प्रयोग को छोड़ देने के लिए सहमत किया। उसने सितार का उदाहरण देकर यह भी कहा था कि तारों को अधिक खींचने से वे टूट जाते हैं और वीणा की उपयोगिता नष्ट हो जाती है। शरीर को सताने का भी यही परिणाम होता है। इस तथ्य पूर्ण परामर्श को भगवान बुद्ध ने अंगीकार किया था और वे मध्यम मार्ग स्वयं अपनाकर दूसरों को भी “मज्झम मग्ग“ (मध्यम मार्ग) पर चलने का उपदेश करने लगे थे।
साधना में अक्सर ऐसी ही भूल की जाती है। यह भुला दिया जाता है कि इन प्रयोजनों का आविष्कार आविर्भाव किस निमित्त किया गया है और उसका कितना उपयोग—किस दृष्टिकोण से करने पर कितना लाभ हो सकता है? यह समस्त पृष्ठभूमि ध्यान में रखते हुए ही यदि तप साधना का अवलम्बन किया जाय तो ही वे लाभ मिल सकेंगे जिनका वर्णन तप विज्ञान के महात्म्य प्रकरण में बताया गया है।
साधना पूरी होने के पहले मृत्यु को प्राप्त हुआ योगी, स्वर्ग से ब्रह्मलोक तक अपने पुण्य के अनुसार किसी लोक को प्राप्त कर अनेक वर्षों तक वहाँ के भोगों को भोगता हैं। भोग समाप्त होने के बाद फिर भूतल पर श्रीमन्त और पवित्र कुल में जन्म धारण करता है, जिससे वहां वहाँ शेष अपनी—साधना पूरी कर सके।
साधना में सुस्थिर उत्साह है उन्हें क्रमिक विकास के लिए नियमित मार्ग−दर्शन करने की व्यवस्था बनाई गई है। गत दो अंकों में इस संदर्भ में कुछ लिखा जाता रहा है। साधना मार्ग में समुचित अभिरुचि रखने वालों की अलग से सूची बनाई जा रही है। वर्ष में दो बार उनके कार्या का लेखा−जोखा लेने और तदनुरूप भविष्य के लिए आवश्यक परामर्श देते रहने का निश्चय किया गया है।
साधना पूरी कर सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1974-July
साधना योजना निश्चित रूप से अति उपयोगी सिद्ध होंगी।
साधना का वर्ष प्रायः गुरु पूर्णिमा से आरम्भ किया जाता है। शान्तिकुंज में प्रशिक्षण प्राप्त किये हुए सभी लोगों से गठ अंक में अनुरोध किया गया था कि वे तब से लेकर अब तक की अवधि में अपने आध्यात्मिक और भौतिक जीवन में आये हुए उतार−चढ़ावों का चित्र रण भेजें। वे भेज ही रहें होंगे। इस अंक में जीवन−साधना की दस सूत्री प्रक्रिया को अपनाने के लिए सभी परिजनों से कहा जा रहा है। जो इन सूत्रों में से कुछ अपना सकें और उसके लिए संकल्पपूर्वक कदम उठायें वे ही अपने प्रयासों की सूचना ‘शान्ति−कुञ्ज सप्त सरोवर, =विज्ञापन हरिद्वार’के पते पर भेज दें।
साधना में निरत होना।
साधना का जो क्रिया-कलाप अपनाना पड़ता है, उसे भी आकाँक्षाओं की श्रेणी से अलग नहीं रखा जा सकता है, भले ही उनका स्तर कितना ही ऊँचा क्यों न हो।
साधना करके प्राप्त कर लिया, अब दर्शन की बारी है कि वह भी इतनी ही प्रचण्ड साधना करे और अपने महान् गौरव को अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए प्रखर पुरुषार्थ का परिचय दे।
साधना करनी पड़ती है। सन की प्रसन्नता का केन्द्र इस पहली मंजिल पर ही नियोजित करना पड़ता है। अभीष्ट प्रयोजन के लिए साधन जुटाने के लिए अपनी क्षमता, योग्यता का बढ़ाना एवं आवश्यक साधनों का जुटाना अनिवार्य है। इन दोनों उपलब्धियों के लिए किये जाने वाले प्रयास को इतना सुखद मान लिया जाना चाहिए मानो वही सफलता का अन्तिम बिन्दु हो। सुखद सत्परिणाम के उपभोग जितना रस यदि प्रगति पथ पर चलने के साधन जुटाने एवं काँटे बीनने में आने लगे तो ही यह समझना चाहिए कि सफलता का आधार सुनिश्चित बन गया।
साधना−क्रम इस प्रकार हैं—
साधनाओं द्वारा मान्यता प्राप्त है।
साधना करे और अपने महान् गौरव को अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए प्रखर पुरुषार्थ का परिचय दे।
साधना−क्रम अगले वर्ष के लिए निर्धारित करना चाहिए और इनमें से जिस सूत्रों को जिस हृदय तक अपनाया जाना सम्भव हो उसके लिए साहसपूर्वक संकल्प करना चाहिए और तत्काल उस निश्चय को कार्यान्वित करने के लिए कदम बढ़ाना चाहिए। यह सूत्र छोटे दीखने पर भी महान् सम्भावनाएँ अपने भीतर छिपाये बैठे हैं जो इन्हें कार्यान्वित करेंगे वे देखेंगे कि अगले वर्ष में उनने कितनी आशाजनक प्रगति सम्पन्न कर ली। अगले वर्ष के लिए प्रस्तुत दस सूत्री साधना−क्रम इस प्रकार हैं—
साधना की दस सूत्री प्रक्रिया को अपनाने के लिए सभी परिजनों से कहा जा रहा है। जो इन सूत्रों में से कुछ अपना सकें और उसके लिए संकल्पपूर्वक कदम उठायें वे ही अपने प्रयासों की सूचना ‘शान्ति−कुञ्ज सप्त सरोवर, =विज्ञापन हरिद्वार’के पते पर भेज दें। जिन्हें उत्तर की अपेक्षा हो उन्हें जवाबी पत्र भेजना न भूलना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-February
साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामन्त्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिकता, एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
साधना विषयक पुस्तकें गायत्री के एक एक अक्षरों की व्याख्या पर पुस्तकें
साधना (10) सहयोग और सहिष्णुता
साधना विज्ञान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण योग, शब्द योग, नाद योग, हठयोग, कुँडलिनी योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष, को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन। मूल्य 3॥)
साधना। आत्म निर्माण की प्रक्रिया तत्वज्ञान के अंतर्गत आती है। धर्म सदाचार, इन्द्रिय निग्रह, ब्रह्मचर्य परलोक, पुनर्जन्म, व्रत, उपवास, दान पुण्य, स्वाध्याय, सत्संग कथा, कीर्तन, तीर्थ यात्रा, मौन तितीक्षा, यम, नियम आदि का उद्देश्य यह है कि व्यक्ति अपने भीतर निरन्तर काम करने वाली दैवी और आसुरी प्रकृतियों में से आसुरी प्रकृति का दमन करके दैव प्रकृति का विकास करें। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग पर इसलिए विशेष जोर दिया गया है कि मनुष्य अपनी बुराइयाँ और कमजोरियाँ जो साधारणतः समझ में नहीं आती, इन दोनों के आधार पर ढूंढ़े और पहचाने।
साधना सामग्री की जरूरत है उसे जुटा लेना कठिन है, हमारी आकाँक्षाएं बहुधा ऐसी होती हैं जिनका वर्तमान परिस्थितियों से मेल नहीं खाता इसलिए उनका पूरा होना प्रायः बहुत कठिन होता है। ऐसे बुद्धिमान लोग विरले ही होते हैं जो अपनी वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप आकाँक्षाएं करते हैं और उनके पूर्ण होने पर सफलता एवं प्रसन्नता का सुख अनुभव करते हैं। अधिकाँश लोग यह नहीं देखते कि अपनी परिस्थितियों में इन दिनों कितनी उन्नति संभव है। संभावनाओं के अनुरूप इच्छाएं तो आसानी से पूरी हो जाती है पर जिन आकाँक्षाओं का ऐसा तालमेल नहीं बैठता वे असफल ही रह जाती हैं और आकांक्षी को अभाव और असफलता जन्य दुख की आग में जलाती रहती है।
साधनाएँ व उपासनाएं हैं। उनमें एक-व्रत की साधना भी है। व्रत से शारीरिक, मानसिक व आत्मिक सब प्रकार की उन्नति होती है। विश्राम से शारीरिक क्षेत्रों में नवजीवन आ जाता है। पाचन प्रणाली को भी विश्राम लेने की आवश्यकता पड़ती है जिससे पेट में पड़ा हुआ अन्न हजम हो जाता है और पेट आगामी कार्य के लिए तैयार हो जाता है और शक्ति आने से इसके बाद खाया हुआ अन्न स्वाभाविक रूप से पच जाता है।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना से अपने जीवन को परिष्कृत किया था। वह गुणों के भण्डार थे। शक्ति उनके इशारे पर नाचती थी। वह अपने तीसरे नेत्र से बड़ी से बड़ी शक्ति को जला कर राख करने की सामर्थ्य रखते थे। कामदेव को तो उन्होंने भस्म कर दिया था।
साधना (22) स्वाध्याय और सत्संग
साधना से हम प्रेरणा ग्रहण नहीं करते। उनकी उपासना करते हैं, यह कह ही कैसे सकते हैं? आत्मा से भी हम बहुत दूर हैं। उसके दर्शन एवं अनुभव का प्रयत्न नहीं करते। शरीर में ही आत्म बुद्धि की हुई है।
साधना का उनके जीवन में विशेष स्थान था। इनके द्वारा प्राप्त शक्ति के द्वारा ही त्रिशूल अथवा त्रितापों को दूर करने की सामर्थ्य रखते थे। यदि हम भी सुखी रहना चाहते हैं तो हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।
साधना से ही इतनी पवित्र हो गई है कि उस से अनायास ही कितनी ऐसी बाते प्रकट होने लगी हैं जो साधारण लोगों में नहीं होती। पतिव्रता स्त्री ईमानदार वैश्य और कर्तव्य परायण चाण्डाल की उत्तम जीवन यापन साधना का महत्व तब साधु की समझ में आया और जाना कि वह साधारण दिखने वाली बातें भी किसी बड़े योगाभ्यास की भाँति ही शक्तिशाली हैं।
साधना का महत्व तब साधु की समझ में आया और जाना कि वह साधारण दिखने वाली बातें भी किसी बड़े योगाभ्यास की भाँति ही शक्तिशाली हैं।
साधनाएं तथा अन्नमय कोष, मनोमय कोष, प्राणमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष, को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन। मूल्य 3॥)
साधना में लीन रहते हैं। इसी उपाय से उन्होंने अनेक प्रकार की शक्तियों को प्राप्त किया है। गायत्री मंजरी नाम की पुस्तक में वर्णन आता है कि भगवान शिव की साधना का मूलाधार गायत्री उपासना था। इसे उन्होंने पृथ्वी की सबसे बड़ी शक्ति कहा है। वह अखण्ड अग्नि अर्थात् यज्ञ भगवान के समक्ष अपनी साधना का उनके जीवन में विशेष स्थान था।
साधना सरसाओ!!
साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
साधना विधान की जानकारी घर घर में थी और उनके आधार पर शान्ति और समृद्धि की सिद्धियाँ भी सभी को उपलब्ध थी।
साधना का मूलाधार गायत्री उपासना था। इसे उन्होंने पृथ्वी की सबसे बड़ी शक्ति कहा है। वह अखण्ड अग्नि अर्थात् यज्ञ भगवान के समक्ष अपनी साधना का उनके जीवन में विशेष स्थान था। इनके द्वारा प्राप्त शक्ति के द्वारा ही त्रिशूल अथवा त्रितापों को दूर करने की सामर्थ्य रखते थे। यदि हम भी सुखी रहना चाहते हैं तो हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।
साधना हो जाने पर ही (3) आमन, (4) प्राणायाम, (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) समाधि का अष्टांग योग पूर्ण होता है और तभी साधक उन अलौकिक दिव्य शक्ति सामर्थ्यों को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है।
साधना द्वारा शक्ति उद्भव करने के लिए भी वह आवश्यक शर्त है। सूक्ष्म और कारण शरीरों में जिन रहस्य मय ऋद्धि-सिद्धियों का अक्षय भण्डार भरा हुआ है उनका खुलना भी उन्हीं के लिए संभव है जिसने लोभ और काम पर विजय प्राप्त करके आत्म निर्माण किया है। राजयोग में पहले (1) पाँच नियम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) और (2) पाँच नियम (शक्ति, संतोष, तप, स्वास्थ्य, ईश्वर प्रणिधान) आवश्यक बनाये गये हैं। इनकी साधना हो जाने पर ही (3) आमन, (4) प्राणायाम, (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) समाधि का अष्टांग योग पूर्ण होता है और तभी साधक उन अलौकिक दिव्य शक्ति सामर्थ्यों को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है।
साधना के चमत्कार (8) प्रकृति का अनुसरण
साधना में चित्त की एकाग्रता और अन्तर्मुखता की बड़ी आवश्यकता है और विषयासक्ति वाले व्यक्ति की चंचलता मिट नहीं सकती क्योंकि कभी अच्छा खाने की इच्छा होती है, कभी देखने, सुनने आदि की। इच्छाओं का अंत नहीं, एक की पूर्ति हुई नहीं, दूसरी अनेक इच्छाएं तैयार। अतः उपासक को इन्द्रिय निग्रह अवश्य करना चाहिये।
साधना भी है। व्रत से शारीरिक, मानसिक व आत्मिक सब प्रकार की उन्नति होती है। विश्राम से शारीरिक क्षेत्रों में नवजीवन आ जाता है। पाचन प्रणाली को भी विश्राम लेने की आवश्यकता पड़ती है जिससे पेट में पड़ा हुआ अन्न हजम हो जाता है और पेट आगामी कार्य के लिए तैयार हो जाता है और शक्ति आने से इसके बाद खाया हुआ अन्न स्वाभाविक रूप से पच जाता है। व्रत से दोषों व दुर्गुणों का परिमार्जन होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-April
साधना सहज हो जाती है। भोगमय जीवन गान्धी जी की दृष्टि में इसलिये वाँछनीय नहीं है क्योंकि इससे सत्य का आचरण दुर्लभ हो जाता है ।
साधना द्वारा अपने प्रभु का साक्षात् करने के लिए व्यग्र हूँ।
साधना में डुबोना चाहता हूँ। मैं इस साधना द्वारा अपने प्रभु का साक्षात् करने के लिए व्यग्र हूँ।
साधना के प्रारंभ में ही मैंने पहिचान लिया था कि यदि मुझे जीवन का चरम सत्य पाना है, तो मुझे प्रेम की हुकूमत के सन्मुख सर झुका देना होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-May
साधना एवं गहन निष्ठा की आवश्यकता है उसको उपलब्ध करने के गायत्री के तत्वज्ञान को समझना चाहिए।
साधना, आत्म संयम, सद्गुरु संग्रह, परोपकार, सदाचार एवं ईश्वर उपासना को प्रधानता देते हैं। स्वाध्याय और सत्संग के द्वारा अपने ज्ञान नेत्रों को खोलकर अन्धकार से प्रकाश की ओर चलने का प्रयत्न करते हैं।
साधना उपासना के लिए पर्याप्त समय प्राप्त कर लेता है, मन भी उन कार्यों में लगता है और आवश्यक साधन भी उपलब्ध हो जाते हैं संसार में जितने धर्मात्मा, लोकसेवी, परोपकारी, विद्वान, ईश्वर भक्त एवं महापुरुष हुए हैं, उन्हें आरंभ से ही इसके लिए कोई बनी बनाई पृष्ठभूमि नहीं मिली थी। वरन् उनकी अभिरुचि की तीव्रता ने विपरीत परिस्थितियों में भी मार्ग निकाला, साधन जुटाये और सफलता प्राप्त की। मनुष्य अपनी अभिरुचि को भौतिक आकर्षणों से बचाकर अध्यात्मिक दूरदर्शिता के मार्ग पर लगा दे, तो निश्चय ही वह इस सुरदुर्लभ मानव जीवन की प्राप्ति का पूरा लाभ उठा सकता है। भव बन्धनों से मुक्त होकर शाश्वत शक्ति का भागी बन सकता है। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि हम जीवन का क्या उपयोग करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-January
साधना से राष्ट्र में नव प्राण, बल, नवीन उत्साह एवं पुरुषार्थ को फूँकता है। सोये राष्ट्र में नव चेतना का संचार करता है। एक नहीं अनेकों व्यक्ति उस मानवता के पुजारी के सत्प्रयत्नों एवं मार्गदर्शन से वास्तविक सुख एवं कल्याण प्राप्त करते हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं देवदूत होता है, राष्ट्र और जाति का प्राण होता है। उसके जीवन का समस्त क्रियाकलाप इसी महान साधना के लिए होता है।
साधना प्रणाली पर विचार करते हैं तो हमको निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक जान पड़ता है - (1) शुद्ध मन से आत्मोत्सर्ग की भावना, (2) अपनी सत्ता के प्रत्येक अंश का सच्चाई के साथ पूर्ण समर्पण, (3) भगवान के साथ सचेतन एकता, (4) उनके रूपांतरकारी स्पर्श को प्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करना, (5) भगवान ने जो कर्म हमारे लिये निर्दिष्ट किया है उसे दृढ़ विश्वास रखकर अंगीकार करना, (6) भगवान की इच्छा के सामने अपने सब कर्मों और सर्वस्व को उत्सर्ग कर देना, (7) अहंकार, अभिमान, द्वेष, कामना, वासना आदि प्रकृति के समस्त दोषों को त्याग कर भगवन् द्वारा किये जाने वाले रूपांतर को तैयार होना, (8) प्राणों की शुद्धि (9) हृदय का प्रेम और भक्तिभाव (10) मन की प्रकाशमयी एकाग्रता (11) प्राणों का सौंदर्य और सामंजस्य (12) जिस परिस्थिति में भगवत् इच्छा ने रखा है उसके साथ प्रत्येक कार्य में सामंजस्य। योग का अर्थ यही है कि आत्मा को पहिचाना जाय, परिपूर्ण बनाया जाय, आत्मा का विस्तार किया जाय, और विश्वात्मा भगवान की भीतर आत्मा को विकसित बनाया जाय। अपने आप को भगवान की इच्छा के सम्मुख सदा सुख और नमनशील रखो। तुम यह समझ लो भगवान की शक्ति ही तुमसे काम करा रही है, तुम उसका एक यंत्र हो और उसकी इच्छानुसार कार्य करना तुम्हारा कर्तव्य है। कर्म फल की कामना का त्याग करो।
साधना साँसारिक-जीवन का पालन करते हुये ही भली प्रकार से की जा सके और जिससे काफी ऊँचे आध्यात्मिक दर्जे पर भी पहुँचा जा सके। ऐसे योग-प्रचारकों में श्री अरविन्द घोष का नाम बहुत अधिक प्रसिद्ध है, उन्होंने वर्षों के अभ्यास और अध्ययन से अपने शिष्यों को जिस “पूर्ण योग“ का उपदेश दिया उससे उपर्युक्त उद्देश्य भली प्रकार पूरा हो जाता है। इस सम्बन्ध में इस योग का अभ्यास करने वाले एक लेखक का कथन है- “पूर्ण योग वह सर्वांग साधन प्रणाली है जिससे साँसारिक जीवन और आध्यात्मिक जीवन के बीच सर्व विजयी सामंजस्य स्थापित हो सके, अर्थात् जीवन को बिना खोये भगवान को प्राप्त करना, मानव-जीवन के भीतर भगवान और प्रकृति का पुनर्मिलन साधित करना। इसमें “पूर्ण” शब्द ही यह सूचित करता है कि यह योग मनुष्य को पूर्णत्व प्राप्त कराता है। अर्थात् यह आत्मा के भीतर जीवन को पूर्णत्व प्रदान करता है, सार्थक बनाता है।
साधना में षट्कर्म जैसे प्रकृति के साधारण नियमों से भिन्न और कठिन विधियों से काम लेना पड़ता है और आसन-प्राणायाम आदि का विशेष रूप से अभ्यास करना पड़ता है। राजयोग में भी लगातार घण्टों तक ध्यान करते रहना और साँसारिक व्यवहारों से अपने को बहुत कुछ हटा लेना आवश्यक होता है। इन सब बातों का साराँश यही है कि अब तक योग के जो स्वरूप लोगों में प्रचलित हैं उसे साधारण जीवन यापन से बहुत भिन्न समझा जाता है, और जो लोग उस मार्ग को ग्रहण करते हैं वे प्रायः गृहस्थ जीवन का त्याग कर देते हैं। इससे अब कुछ नवीन संत पुरुषों ने योग की ऐसी विधियों का प्रचार आरम्भ किया है जिनकी साधना साँसारिक-जीवन का पालन करते हुये ही भली प्रकार से की जा सके और जिससे काफी ऊँचे आध्यात्मिक दर्जे पर भी पहुँचा जा सके। ऐसे योग-प्रचारकों में श्री अरविन्द घोष का नाम बहुत अधिक प्रसिद्ध है, उन्होंने वर्षों के अभ्यास और अध्ययन से अपने शिष्यों को जिस “पूर्ण योग“ का उपदेश दिया उससे उपर्युक्त उद्देश्य भली प्रकार पूरा हो जाता है।
साधना का सर्वोच्च लक्ष्य है। इसके लिये विभिन्न महात्माओं ने अनेक प्रकार की योग-शक्तियों का आविष्कार किया है, जो आज कल हमारे देश में प्रचलित है। इनमें हठयोग, राजयोग, शक्तियोग, कर्मयोग और ज्ञानयोग का नाम अधिक प्रसिद्ध है। जपयोग और क्षव योग को भी महत्व पूर्ण माना गया है। पर इन समस्त योगों की साधना में मनुष्य को अपने साधारण रहन-सहन में विशेष परिवर्तन करना पड़ता है और जीवन के कुछ अंगों का दमन और कुछ का अधिकाधिक विकास करना पड़ता है।
साधना नहीं करनी पड़ती? उसी प्रकार तुम सब शरीर और मनों के अपने होने का भी अभ्यास कर सकते हो और इससे एक अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्त कर सकते हो। यह तथ्य चाहे तर्क शास्त्र, विज्ञान दर्शन, शास्त्र से सिद्ध न हो सके, पर अनुभव द्वारा यह अवश्य सत्य प्रतीत होता है।
साधना भी काफी कठिन मानी जाती है। उसे वे ही लोग कर सकते हैं जिनमें आध्यात्मिकता का कुछ अंश है और त्याग और तपस्या में जिनको अनुराग है।
साधना के लिए होता है। ऋषि अपने लिए कुछ नहीं करते। उनका जीवन दूसरों के लिए ही होता है यही उनके जीवन का महान आदर्श है।
साधना नहीं होता केवल परमार्थ ही करना होता है। जो कष्ट साध्य अन्तः स्थिति प्राप्त की है उसे कोई जाने ही और उससे लाभ उठाये ही, इसमें उन्हें कुछ आग्रह भी नहीं होता, वरन् उदासीनता ही होती है क्योंकि यदि मार्ग दर्शन के लिए उन्हें कोई नहीं पूछता तो इसमें उनकी हानि कुछ नहीं वरन् अपने समय का आत्म कल्याण में ही लगाते रहने का लाभ ही है। परमार्थ न करें, उन्हें सेवा का अवसर न मिले तो भी उनके आत्म कल्याण का जो कार्यक्रम चल रहा था उसके होते हुए लक्ष पूर्ति की कोई बाधा नहीं आती। निश्चय ही असली चीजों का -नकली चीजों की तरह ढिंढोरा नहीं पीटा जा सकता और न उनकी चमक दमक ही नकली जैसी बनाई जा सकती है।
साधना में मनुष्य को अपने साधारण रहन-सहन में विशेष परिवर्तन करना पड़ता है और जीवन के कुछ अंगों का दमन और कुछ का अधिकाधिक विकास करना पड़ता है। उदाहरण के लिये हठयोग की साधना में षट्कर्म जैसे प्रकृति के साधारण नियमों से भिन्न और कठिन विधियों से काम लेना पड़ता है और आसन-प्राणायाम आदि का विशेष रूप से अभ्यास करना पड़ता है। राजयोग में भी लगातार घण्टों तक ध्यान करते रहना और साँसारिक व्यवहारों से अपने को बहुत कुछ हटा लेना आवश्यक होता है। इन सब बातों का साराँश यही है कि अब तक योग के जो स्वरूप लोगों में प्रचलित हैं उसे साधारण जीवन यापन से बहुत भिन्न समझा जाता है, और जो लोग उस मार्ग को ग्रहण करते हैं वे प्रायः गृहस्थ जीवन का त्याग कर देते हैं। इससे अब कुछ नवीन संत पुरुषों ने योग की ऐसी विधियों का प्रचार आरम्भ किया है जिनकी साधना साँसारिक-जीवन का पालन करते हुये ही भली प्रकार से की जा सके और जिससे काफी ऊँचे आध्यात्मिक दर्जे पर भी पहुँचा जा सके।
साधना, पूजा उपासना, सम्पन्नता कीर्ति चाहना आदि से सुख चाहता है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति सुख प्राप्ति के लिए भिन्न भिन्न मार्गों का अवलम्बन करता है। किन्तु इस विभिन्नता के दलदल में वास्तविक सुख के मार्ग को अपनाकर उस पर चलना ही उक्त उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है।
साधना के पश्चात् राष्ट्रीय भावना, बल और सामर्थ्य प्रकट हुआ। इसलिए विद्वान लोग इसके लिए सिर झुकायें।”
साधना का अनुभव आदि को आत्मसात किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-October
साधना करो, स्वलक्ष्य को बढ़े चलो!!
साधना की हुई गायत्री संकटों को भी पछाड़ती परास्त करती है, स्वयं कभी पराजित या परास्त नहीं होती।
साधनाओं के विभिन्न प्रतिफल बताये गये हैं। वे ऐसे हैं जो साधना और तपश्चर्या से विमुख व्यक्तियों को असत्य मालूम दे सकते हैं पर जिनके अंतर्बल को जाना और अभिवर्द्धन किया है वह भली प्रकार समझते हैं कि यह विभूतियाँ तो तुच्छ हैं साधना के बल पर आत्मा को इतना महान बनाया जा सकता है कि वह परमात्मा के समान बन जाय, परमात्मा सत्ता का साझीदार बनकर वही सब अधिकार प्राप्त कर ले जो स्वयं परमात्मा को प्राप्त हैं।
साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा वह राख की परत हट जाती है तो अंगार अपनी प्रकाशवान उष्णतायुक्त स्थिति को पुनः प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार ईश्वर का अविनाशी अंश आत्मा भी तप अग्नि में अपने को तपाकर निर्मल, निष्पाप एवं निरावरण बनकर ईश्वरीय दिव्य प्रभा से चमकने लगता है। साथ ही उसमें वे सब विशेषताएं भी उत्पन्न हो जाती हैं जो ईश्वरीय प्रकाश से परिपूर्ण आत्मा में होनी चाहिएं।
साधना के बल पर आत्मा को इतना महान बनाया जा सकता है कि वह परमात्मा के समान बन जाय, परमात्मा सत्ता का साझीदार बनकर वही सब अधिकार प्राप्त कर ले जो स्वयं परमात्मा को प्राप्त हैं।
साधनाओं की भाँति गायत्री का भी नाम और रूप व्यक्त करना पड़ा है। उच्चारण की दृष्टि से 24 अक्षरों में उसे स्वरबद्ध किया गया है और ध्यान का एकमात्र आधार रूप भी प्रस्तुत करके गायत्री माता की छवि में अंकित किया गया है पर यह ध्यान करना चाहिए कि यह नाम रूप पर आधारित माता का विग्रह केवल उपासना की अनिवार्य आवश्यकता के लिए ही है। वस्तुतः गायत्री मनुष्यों के समान शरीरधारी नहीं है वरन् वह अव्यक्त व्यापक शक्ति प्रवाह के रूप में उसी प्रकार फैली हुई है जैसे गर्मी, सर्दी विद्युत, ईथर आदि सूक्ष्म एवं अदृश्य रूप से सर्वत्र फैले रहते हैं। इस दृष्टि से उसे निराकार भी कहा जा सकता है।
साधना के लिए कोलाहल और जन विक्षेप से दूर वातावरण की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक और अन्वेषण कार्य ऐसे ही वातावरण में संभव होते हैं। नाना प्रकार के विक्षेपों, चिन्ताओं, समस्याओं और प्रतिक्रियाओं के बीच साधारण राम नाम तो लिया जा सकता है, काम चलाऊ पूजा पाठ भी हो सकता है पर वह एकाग्रता और तन्मयता जिसमें साधक की सारी शक्तियाँ एक ही दिशा में एकाग्र और तन्मय होकर लक्ष्यवेध कर सकें एकान्त में ही सम्भव है। इस दृष्टि से यदि तपस्वी लोग एकान्त स्थान ढूंढ़ लें तो उसमें कुछ अनुचित नहीं है। आध्यात्म की लोक शिक्षण करने की बहुत बड़ी व्यवस्था करने वालों से भी अरविंद को भी अपने लिए व्यक्तिगत रूप से तो एकान्त की ही सुविधा रखनी पड़ती थी।
साधनाओं द्वारा अस्थायी एवं हलकी सी ही सफलता किसी साधक को भले मिली हो पर चिरस्थायी और सर्वांगपूर्ण सिद्धियाँ तो केवल गायत्री के द्वारा ही संभव हुई हैं और हो सकती हैं।
साधना के मार्ग पर चलने वाले योगियों का अनादिकाल में एकमात्र आधार ‘गायत्री’ ही रही है। अन्य साधनाओं द्वारा अस्थायी एवं हलकी सी ही सफलता किसी साधक को भले मिली हो पर चिरस्थायी और सर्वांगपूर्ण सिद्धियाँ तो केवल गायत्री के द्वारा ही संभव हुई हैं और हो सकती हैं।
साधना है। इस वर्णमाला को बालक जब बार-बार पढ़ते हैं तो उनकी इन अक्षरों से सम्बंधित देव शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। इसीलिए इसे देवनागरी लिपि कहते हैं। इस वर्णमाला के 54 अक्षरों के लिए एक बार कण्ठ से नाभि तक आने और दूसरी बार नाभि से कण्ठ तक लौटने में 54+54=108 की संख्या हो जाती है। माला में 108 दाने होने का भी यही रहस्य है।
साधना सामग्री जुटाने में यह मानवीय अन्तःचेतना ही काम कर रही है। इसने प्रकृति पर, प्रकृति गत साधनों और शक्तियों पर विज्ञान के माध्यम से बहुत बड़ी मात्रा में आधिपत्य प्राप्त किया है और आगे इससे भी अधिक आधिपत्य प्राप्त करने की तैयारी है। इस चेतना शक्ति का जितना गुणगान किया जाए उतना ही कम है। उसने प्रयत्न करके वनों के सम्राट सिंह और मंत्री हाथी को ही अपने हाथों का खिलौना नहीं बनाया है वरन् देवताओं को भी अपना वशवर्ती और आज्ञाकारी बना कर छोड़ा है। स्वयं भगवान तक को उसके वश में होने को विवश होना पड़ा है।
साधना और तपश्चर्या से विमुख व्यक्तियों को असत्य मालूम दे सकते हैं पर जिनके अंतर्बल को जाना और अभिवर्द्धन किया है वह भली प्रकार समझते हैं कि यह विभूतियाँ तो तुच्छ हैं साधना के बल पर आत्मा को इतना महान बनाया जा सकता है कि वह परमात्मा के समान बन जाय, परमात्मा सत्ता का साझीदार बनकर वही सब अधिकार प्राप्त कर ले जो स्वयं परमात्मा को प्राप्त हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-November
साधना मार्ग पर चले उपलब्ध नहीं हो सकता। उच्च विचार और उज्ज्वल चरित्र रखते हुए ऋजु मार्ग के पथिक को साधना संलग्न भी होना पड़ता है। यों अनेकों साधनाएं प्रचलित हैं, सन्तों ने अपनी अपनी सूझ-बूझ के अनुसार अनेकों साधन मार्ग तथा सम्प्रदाय चला रखे हैं, वे विभिन्न दिशाओं की ओर खींचते हैं और परस्पर भारी मतभेद से भी भरे हुए हैं। इन औंधे सौंधे मार्गों में से किन्हीं पर भटकते रहने से अनेकों व्यक्ति अपना बहुमूल्य समय भी बर्बाद करते हैं। साधना का सर्वश्रेष्ठ वेदोमत वही मार्ग है जिसको अब तक प्रत्येक ऋषि और तत्वदर्शी ने अपनाया है।
साधना में नहीं है। उसमें कोई भूल या अशुद्धि भी हो जाए तो अधिक से अधिक इतनी हानि हो सकती है कि सत्परिणाम में कमी हो जाए, स्वल्प लाभ हो। पर ऐसी सम्भावना कभी भी नहीं है कि उससे कभी किसी का रंच मात्र भी अनिष्ट हो। वह हर किसी के लिए-बाल, वृद्ध, नर, नारी, गृही, विरक्त के लिए समान रूप से कल्याणकारक है।
साधनाओं के लिये हिमालय का उत्तराखण्ड बहुत ही उपयुक्त है। प्राचीन काल में अधिकाँश ऋषियों ने इसी भूमि में अपनी तपस्याएँ पूर्ण की थीं। इस प्रदेश में भ्रमण करने से पता चलता है कि भारतवर्ष के प्रधान-प्रधान सभी ऋषियों के आश्रम प्रायः इसी क्षेत्र में थे। कुछ ऋषि ऐसे भी थे जो आवश्यक प्रयोजनों के लिए देश के विभिन्न भागों में जाकर वहाँ अभीष्ट कार्य करते थे और कार्य की सुविधा के लिये वहाँ भी आश्रम बनाते थे पर जब भी उन्हें अधिक आत्मबल उपार्जन के लिये तप करने की आवश्यकता पड़ती थी तब फिर इसी हिमालय भूमि में जा पहुँचते थे। सहस्र-धारा होकर गंगा इसी प्रदेश में बहती है।
साधना का मार्ग अधिक प्रशस्त हो सकता है। जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने के लिए कतिपय पहाड़ी प्रदेश अच्छे माने जाते हैं, उसी प्रकार आत्मोन्नति की दृष्टि से भी गंगा तटवर्ती हिमालय सब प्रकार उपयुक्त ही है।
साधनाएं तथा अन्नमय-कोष मनोमय-कोष, विज्ञानमय-कोष, आनंदमय-कोष की सिद्धि करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3॥)
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना के समुचित अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना के स्थान बनाये। साथ ही जनता को भी उन तीर्थों में स्थान एवं दर्शन के अभिप्राय से समय-समय पर आते रहने और वहाँ कुछ दिन निवास करके आत्मिक स्वास्थ्य लाभ करने का निर्देश किया। इन तीर्थों में उन ऋषियों का सान्निध्य, सत्संग एवं मार्ग दर्शन भी आगन्तुक तीर्थ यात्रियों को प्राप्त होता था, जिससे उनके अन्तःकरण की मुरझाई हुई कली फिर हरी हो जाती थी।
साधना के लिए भी जाया करें तो उनकी साधना का मार्ग अधिक प्रशस्त हो सकता है। जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने के लिए कतिपय पहाड़ी प्रदेश अच्छे माने जाते हैं, उसी प्रकार आत्मोन्नति की दृष्टि से भी गंगा तटवर्ती हिमालय सब प्रकार उपयुक्त ही है।
साधना विधान। जप-योग, ऋजुयोग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुँडलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय-कोष मनोमय-कोष, विज्ञानमय-कोष, आनंदमय-कोष की सिद्धि करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3॥)
साधना संलग्न भी होना पड़ता है। यों अनेकों साधनाएं प्रचलित हैं, सन्तों ने अपनी अपनी सूझ-बूझ के अनुसार अनेकों साधन मार्ग तथा सम्प्रदाय चला रखे हैं, वे विभिन्न दिशाओं की ओर खींचते हैं और परस्पर भारी मतभेद से भी भरे हुए हैं। इन औंधे सौंधे मार्गों में से किन्हीं पर भटकते रहने से अनेकों व्यक्ति अपना बहुमूल्य समय भी बर्बाद करते हैं। साधना का सर्वश्रेष्ठ वेदोमत वही मार्ग है जिसको अब तक प्रत्येक ऋषि और तत्वदर्शी ने अपनाया है। अनादि काल से लेकर आज तक के शास्त्रवेत्ता एवं विज्ञ व्यक्तियों के द्वारा गायत्री उपासना का ही अवलम्बन स्वीकार किया जाता रहा है, उसे ही निर्भ्रान्त माना गया है।
साधना के साधकों के लिये अलभ्य सुयोग उपस्थित करता है।
साधना भी उतावली करने से नहीं, आवश्यक समय व्यतीत होने पर ही फल देती है। नियत समय पर साधना के लिये बैठना, उपासना के लिए जितना समय लगाना निश्चित किया हो उतना नियमित रूप से लगाना, जितने समय में वह सफल होती है उतने समय तक धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करना, यह सफलता के लिए आवश्यक शर्त है। काल के, समय के आधार पर गायत्री की सफलता निर्भर रहने के कारण उसे काल-रूपिणी कहा गया है। वह विकराल भी है। साधक के भीतरी दोष दुर्गुणों का ऐसे संहार करती है जैसे असुर निकन्दना दुर्गा ने महिषासुर आदि राक्षसों का किया था।
साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों के लिये विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
साधनाओं के लिए गंगा तटवर्ती हिमालय भाग एक उपयुक्त स्थान है। साधना की महत्ता समझाने वाले केवल तीर्थयात्रा और देव दर्शन के लिए ही नहीं, कुछ समय निकाल कर यदि उधर साधना के लिए भी जाया करें तो उनकी साधना का मार्ग अधिक प्रशस्त हो सकता है। जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने के लिए कतिपय पहाड़ी प्रदेश अच्छे माने जाते हैं, उसी प्रकार आत्मोन्नति की दृष्टि से भी गंगा तटवर्ती हिमालय सब प्रकार उपयुक्त ही है।
साधना की महत्ता समझाने वाले केवल तीर्थयात्रा और देव दर्शन के लिए ही नहीं, कुछ समय निकाल कर यदि उधर साधना के लिए भी जाया करें तो उनकी साधना का मार्ग अधिक प्रशस्त हो सकता है। जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने के लिए कतिपय पहाड़ी प्रदेश अच्छे माने जाते हैं, उसी प्रकार आत्मोन्नति की दृष्टि से भी गंगा तटवर्ती हिमालय सब प्रकार उपयुक्त ही है।
साधना संलग्न रहते हैं।
साधनाएं प्रचलित हैं, सन्तों ने अपनी अपनी सूझ-बूझ के अनुसार अनेकों साधन मार्ग तथा सम्प्रदाय चला रखे हैं, वे विभिन्न दिशाओं की ओर खींचते हैं और परस्पर भारी मतभेद से भी भरे हुए हैं। इन औंधे सौंधे मार्गों में से किन्हीं पर भटकते रहने से अनेकों व्यक्ति अपना बहुमूल्य समय भी बर्बाद करते हैं। साधना का सर्वश्रेष्ठ वेदोमत वही मार्ग है जिसको अब तक प्रत्येक ऋषि और तत्वदर्शी ने अपनाया है। अनादि काल से लेकर आज तक के शास्त्रवेत्ता एवं विज्ञ व्यक्तियों के द्वारा गायत्री उपासना का ही अवलम्बन स्वीकार किया जाता रहा है, उसे ही निर्भ्रान्त माना गया है। ऋजु मार्ग की सीधी सड़क को गायत्री ही कहते हैं।
साधना में नहीं है।
साधना के लिये बैठना, उपासना के लिए जितना समय लगाना निश्चित किया हो उतना नियमित रूप से लगाना, जितने समय में वह सफल होती है उतने समय तक धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करना, यह सफलता के लिए आवश्यक शर्त है। काल के, समय के आधार पर गायत्री की सफलता निर्भर रहने के कारण उसे काल-रूपिणी कहा गया है। वह विकराल भी है। साधक के भीतरी दोष दुर्गुणों का ऐसे संहार करती है जैसे असुर निकन्दना दुर्गा ने महिषासुर आदि राक्षसों का किया था। वह साधक के सम्मुख उपस्थित कष्टों, विघ्नों एवं अनिष्टों को भी काल-रूपिणी बन कर मटियामेट करती है।
साधनाएँ कहीं भी की जा सकती हैं, अपना घर भी उसके लिये बुरा नहीं है। सभी भूमि गोपाल की होने के कारण सर्वत्र परमात्मा ही समाया हुआ है, इसलिए किसी स्थान विशेष में प्रभु का स्मरण करने का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। फिर भी उपयुक्त स्थान की अपनी बहुत कुछ विशेषता होती है। गीता के विभूति योग अध्याय में भगवान् ने बताया है कि विशेषता युक्त प्रत्येक वस्तु में मेरी प्रधानता समझनी चाहिये। यही बात स्थान के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
साधना का सर्वश्रेष्ठ वेदोमत वही मार्ग है जिसको अब तक प्रत्येक ऋषि और तत्वदर्शी ने अपनाया है। अनादि काल से लेकर आज तक के शास्त्रवेत्ता एवं विज्ञ व्यक्तियों के द्वारा गायत्री उपासना का ही अवलम्बन स्वीकार किया जाता रहा है, उसे ही निर्भ्रान्त माना गया है। ऋजु मार्ग की सीधी सड़क को गायत्री ही कहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-June
साधना विषयक पुस्तकें
साधना में बाधक मानते हैं, उनका अनुमान होता है कि ब्रह्मचारी या संन्यासी ही कोई आध्यात्मिक प्रगति कर सकने में सफल हो सकते हैं, गृह जंजालों में फँसे हुए लोगों के लिए तो वह मार्ग कठिन ही है। ऐसे लोगों की निराशा का समाधान यों शास्त्र-प्रमाणों, तर्कों और उदाहरण से भी हो सकता है पर परम पूज्य आचार्य जी ने इसके लिए अपना उदाहरण उपस्थित करना ही सर्वोत्तम उपाय समझा। गृहस्थ रहे और यह प्रमाणित किया कि आत्मोन्नति के लिए गृहस्थ जीवन किसी भी प्रकार बाधक नहीं हो सकता वरन् एक अच्छी परिस्थिति उत्पन्न कर लेने पर तो वह सहायक भी होता है।
साधना-विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुंडलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष, विज्ञानमय-कोष आनन्दमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दर्शना । मूल्य 3॥)
साधना में देते रहे हैं। उन्होंने सर्वसाधारण के सामने अपने जीवन को एक प्रयोग के रूप में उपस्थित किया है कि गृहस्थ रहते हुए, आजीविका उपार्जित करते हुए, लोक सेवा करते हुये कोई मनुष्य आध्यात्मिक साधना भी कर सकता है, और उस मार्ग में आशाजनक प्रगति भी संभव हो सकती है। आमतौर से लोग गृहस्थ जीवन को लोकसेवा एवं परमार्थ साधना में बाधक मानते हैं, उनका अनुमान होता है कि ब्रह्मचारी या संन्यासी ही कोई आध्यात्मिक प्रगति कर सकने में सफल हो सकते हैं, गृह जंजालों में फँसे हुए लोगों के लिए तो वह मार्ग कठिन ही है। ऐसे लोगों की निराशा का समाधान यों शास्त्र-प्रमाणों, तर्कों और उदाहरण से भी हो सकता है पर परम पूज्य आचार्य जी ने इसके लिए अपना उदाहरण उपस्थित करना ही सर्वोत्तम उपाय समझा। गृहस्थ रहे और यह प्रमाणित किया कि आत्मोन्नति के लिए गृहस्थ जीवन किसी भी प्रकार बाधक नहीं हो सकता वरन् एक अच्छी परिस्थिति उत्पन्न कर लेने पर तो वह सहायक भी होता है।
साधना के लिए जाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि जो समस्याएं सामने हैं उन्हें सुलझाने के लिए बड़े परिमाण में आध्यात्मिक शक्ति की आवश्यकता है। गायत्री परिवार ने युग निर्माणकारी जिस नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का आरम्भ किया है उसे विशाल एवं व्यापक पैमाने पर विस्तृत किया जाना है। हमारा राष्ट्र लम्बे अन्धकार युग को पार कर अब स्वाधीनता का प्रभात काल देख रहा है। इस पुनीत पर्व पर राष्ट्र को सुनियमित करने के लिए अनेकों प्रयत्न अनेकों दिशाओं में हो रहे हैं, पर हमारी सबसे बड़ी सनातन सम्पत्ति आध्यात्मिकता के विकास के लिए जो प्रयत्न होना चाहिए था उसकी ओर उदासीनता एवं उपेक्षा ही दृष्टिगोचर होती है। जिन आन्तरिक सद्गुणों के आधार पर कोई जाति महान बन सकती है उन्हें विकसित करने वाला अध्यात्मवाद आज उपेक्षा के गर्त में पड़ा है।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना का मार्ग सरल एवं उपयुक्त भी है। ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग यह तीनों ही योग इस उपासना मार्ग के अंतर्गत आते हैं। तपश्चर्या का मार्ग उससे ऊपर का तथा अधिक शक्तिशाली है। आत्मा के सूक्ष्म अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत अनेकों शक्ति केन्द्र सन्निहित हैं। इनमें कुण्डलिनी योग के अंतर्गत षट्चक्र तो प्रसिद्ध ही है।
साधनात्मक इतिहास इस बात का साक्षी है। देवताओं, मनुष्यों और असुरों ने विभिन्न उद्देश्यों के लिए अब तक अगणित बार तप किये हैं और उसके फलस्वरूप प्रकृति माता एवं परमपिता के सम्मुख अपने उन आध्यात्मिक पुरुषार्थों के बदले में अभीष्ट प्रतिफल-वरदान भी प्राप्त किये हैं पर हुआ यह सब घर से बाहर वन, पर्वत आदि एकान्त स्थानों में ही है। घर रह कर उपासना हो सकती है-तपस्या नहीं।
साधना के लिए, देश एवं जाति के लिए किसी प्रकार अहितकर नहीं वरन् लाभदायक ही है।
साधनाएं तथा अन्नमय कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष, विज्ञानमय-कोष आनन्दमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दर्शना । मूल्य 3॥)
साधना द्वारा ही संचित होने की आशा की जा सकती है। आचार्य जी साधक परिवार के लिए इसी शक्तिकोष की खोज में जा रहे हैं।
साधना के बिना और किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकती ।
साधना की सफलता का उनका प्रयोग यदि व्यर्थ चला जाता है तो इस एक असफलता से उनका कुछ बिगड़ता नहीं शेष सफलताएं भी उनके जीवन को प्रकाशवान बनाये रहने के लिए पर्याप्त हैं। पर मेरा तो सारे जीवन में केवल एक ही प्रयोग रहा है, वह है उनके अनुकूल अपने को ढालना और परिवार का वातावरण भी उनके अनुकूल उत्पन्न करना। यदि यह प्रयत्न व्यर्थ गया तो मेरे लिए यह अत्याधिक दुख और लज्जा की ही बात हो सकती है। ऐसा असफल जीवन जीने में मुझे कोई उत्साह नहीं -यह बात मैंने एक वर्ष पूर्व उन्हीं दिनों आचार्य जी को बता दी थी जब उन्होंने अज्ञातवास का प्रस्ताव सर्वप्रथम मेरे सामने रखा था।
साधना जो सामूहिक जीवन में रह कर की जा सकती है उसके द्वारा अन्नमय कोष और मनोमय कोष को विजय करके अपने व्यक्तिगत जीवन में अनेकों सतोगुणी विशेषताएं उत्पन्न करके जीवन लक्ष को पूर्ण करने के लिए प्रगति की जा सकती है और धीरे-धीरे इस मार्ग पर चलते हुए ईश्वर प्राप्ति भी हो सकती है। सर्व साधारण के लिए सद्गृहस्थों के लिए यही उपासना एवं साधना का मार्ग सरल एवं उपयुक्त भी है। ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग यह तीनों ही योग इस उपासना मार्ग के अंतर्गत आते हैं। तपश्चर्या का मार्ग उससे ऊपर का तथा अधिक शक्तिशाली है। आत्मा के सूक्ष्म अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत अनेकों शक्ति केन्द्र सन्निहित हैं।
साधना भी कर सकता है, और उस मार्ग में आशाजनक प्रगति भी संभव हो सकती है। आमतौर से लोग गृहस्थ जीवन को लोकसेवा एवं परमार्थ साधना में बाधक मानते हैं, उनका अनुमान होता है कि ब्रह्मचारी या संन्यासी ही कोई आध्यात्मिक प्रगति कर सकने में सफल हो सकते हैं, गृह जंजालों में फँसे हुए लोगों के लिए तो वह मार्ग कठिन ही है। ऐसे लोगों की निराशा का समाधान यों शास्त्र-प्रमाणों, तर्कों और उदाहरण से भी हो सकता है पर परम पूज्य आचार्य जी ने इसके लिए अपना उदाहरण उपस्थित करना ही सर्वोत्तम उपाय समझा। गृहस्थ रहे और यह प्रमाणित किया कि आत्मोन्नति के लिए गृहस्थ जीवन किसी भी प्रकार बाधक नहीं हो सकता वरन् एक अच्छी परिस्थिति उत्पन्न कर लेने पर तो वह सहायक भी होता है।
साधना विज्ञान के आकाश में अनेकों साधना विद्याओं के बीच गायत्री उपासना सूर्य के समान सर्व प्रमुख मानी गई है। अनेक छोटे मोटे प्रयोजनों के लिए अनेकों मंत्र साधनों के विधान उपलब्ध हैं, इसी प्रकार किन्हीं विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनेकों देवी देवताओं की। उपासनाओं के विधान भी मौजूद हैं पर सर्वांगीण, लौकिक और पारलौकिक लक्षों को एक ही बाण से लक्ष बेध करने वाली गायत्री ही है। चारों वेदों की जननी होने के कारण सभी वेद विद्यायें इसमें बीज रूप में अवस्थित है। इसलिए सभी सिद्धियों की जननी भी इसे कहा जाता है।
साधनाओं में समय लगाना उपरोक्त शास्त्र वचन में व्यर्थ बताया गया है।
साधनाएं इसी की प्राप्ति के लिए होती हैं। अद्वैत, हेतु और द्वैत का विवेचन इसी भूमिका के स्पष्टीकरण के लिए है । वेदाँत शास्त्र इसी तत्व ज्ञान का परिमार्जन करता है। यह तो हुई उच्च भूमिका की बात। साधारण लौकिक जीवन में स्मरणशक्ति , बुद्धि की तीक्ष्णता, चतुरता, व्यवहार कुशलता, विवेकशीलता दूरदर्शिता, उच्च साहस, धैर्य, प्रसन्नता, निश्चिन्तता एकाग्रता, लगन, निष्ठा, दृढ़ता आदि मानसिक शक्तियाँ इसी श्रेणी में आती हैं।
साधना विद्याओं के बीच गायत्री उपासना सूर्य के समान सर्व प्रमुख मानी गई है। अनेक छोटे मोटे प्रयोजनों के लिए अनेकों मंत्र साधनों के विधान उपलब्ध हैं, इसी प्रकार किन्हीं विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अनेकों देवी देवताओं की। उपासनाओं के विधान भी मौजूद हैं पर सर्वांगीण, लौकिक और पारलौकिक लक्षों को एक ही बाण से लक्ष बेध करने वाली गायत्री ही है। चारों वेदों की जननी होने के कारण सभी वेद विद्यायें इसमें बीज रूप में अवस्थित है। इसलिए सभी सिद्धियों की जननी भी इसे कहा जाता है।
साधना में बाधक है। हृदय द्वारा ही दूसरों के हृदयों पर आधिपत्य किया जा सकता है। बुद्धि की दौड़ तर्क वितर्क, चालाकी, प्रतिभा के प्रदर्शन से मित्र को भी पराया बना देती है। शुद्ध हृदय और निष्कपट व्यवहार से शत्रु को भी मित्र बनाया जा सकता है अतः भूलकर ही चालाकी दुराव छिपाव से काम न लेकर सबसे निष्कपट व्यवहार एवं सहृदयता के सम्बन्ध कायम करने चाहिये।
साधना में संलग्न रहेंगे।
साधना सामूहिक परिस्थितियों में हो सकती है, इससे मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में सन्निहित अन्नमय कोष और मनोमय कोष साधक के गुण, कर्म, स्वभाव में सात्विक परिवर्तन हो सकता है, इस परिवर्तन से उत्पन्न हुई आँतरिक निर्मलता के कारण ईश्वरीय प्रकाश की दिव्य किरणें साधक के अंतःप्रदेश में आती और उसे आलोकित करती हैं। वह आत्म कल्याण के मार्ग पर बढ़ता है और शाँति भी प्राप्त करता है। अन्नमय कोष को साधना द्वारा परिपुष्ट कर लेने पर शरीर निरोग और दीर्घजीवी कष्ट सहिष्णु और तितिक्षाशील बन सकता है। उसकी प्रतिभा निखर सकती है और कठिनाइयों से लड़कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करने योग्य पुरुषार्थ उत्पन्न हो सकता है। मनोमय कोष की साधना से मानसिक विकारों,कुविचारों और दुर्गुणों का शमन होता है, स्मरण शक्ति एवं बुद्धि काल में अभिवृद्धि हो सकती है।
साधना प्रार्थना ही है। - (महात्मा गाँधी)
साधना विज्ञान में अनेकों दक्षिणमार्गी और वाममार्गी आध्यात्मिक विद्याएं भरी हुई हैं और उनके लाभ तथा परिणाम भी एक से बढ़कर चमत्कारपूर्ण हैं। आत्म कल्याण करने वाली साधनाओं की भाँति लौकिक सुख साधन जुटाने वाले अनुष्ठान भी अनेक हैं। मंत्र विद्या में एक से एक बढ़कर रत्न मौजूद हैं। प्राचीनकाल में यह साधना विज्ञान अपने चरम उत्कर्ष पर था और ऋषि मुनि इसी अनुसंधान में अपना अधिकाँश समय लगाते थे, और विश्व कल्याण के लिए अनेक मंगलमय उपहार उपस्थित करते थे। इन्हीं उपहारों के बलबूते पर यह देश किसी समय विश्व का मुकुटमणि बना हुआ था और ज्ञान, विज्ञान, व्रत, पुरुषार्थ, धन संपत्ति का भण्डार माना जाता था।
साधना में मूल आधार है अपने आत्मभाव का विस्तार। इसका नियमित अभ्यास डालना आवश्यक है। इसका प्रारम्भ अपने घर पड़ोस से करना चाहिये। सर्वप्रथम अपने घर के लोगों से ही आत्मीयता के सम्बन्ध कायम करने चाहिए। उससे बढ़ाकर अपने पड़ौस मुहल्ले, प्रान्त, देश, समाज तक अपने आत्मभाव का विस्तार करना चाहिए और एक दिन यही भाव विश्व मानव के साथ स्थापित हो जाता है।
साधना द्वारा परिपुष्ट कर लेने पर शरीर निरोग और दीर्घजीवी कष्ट सहिष्णु और तितिक्षाशील बन सकता है। उसकी प्रतिभा निखर सकती है और कठिनाइयों से लड़कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करने योग्य पुरुषार्थ उत्पन्न हो सकता है। मनोमय कोष की साधना से मानसिक विकारों,कुविचारों और दुर्गुणों का शमन होता है, स्मरण शक्ति एवं बुद्धि काल में अभिवृद्धि हो सकती है। चंचलता नष्ट होती और चित्त की एकाग्रता में सफलता मिलती है। साहस, धैर्य, निर्भयता, श्रद्धा, बढ़ती है और इन्द्रिय-विषयों के लिए उठती रहने वाली लिप्सा एवं वासना पर नियंत्रण स्थापित होता है।
साधना पत्तों पर चन्दन लगाने के समान हैं।
साधना करना सुविधाजनक जँचा हो।
साधना के बाद वे और भी अधिक ठोस सेवा जनता जनार्दन की करेंगे। तप के लिए जितना एकान्त उन्हें चाहिए वह मिलना उचित ही है, उससे वे अब की अपेक्षा और भी अधिक सक्षम बनेंगे और अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों की ही नहीं भारतीय धर्म और संस्कृति की भी विशाल परिमाण में एक महत्वपूर्ण सेवा कर सकने में समर्थ होंगे।
साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्व पूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन । मूल्य 3॥)
साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामन्त्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिक एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
साधनाएं सफल हो सकती हैं। इस प्रकार का सहायता कोष भी तप साधना द्वारा ही संचित होने की आशा की जा सकती है। आचार्य जी साधक परिवार के लिए इसी शक्तिकोष की खोज में जा रहे हैं।
साधना के अतिरिक्त कोई बाह्य शक्ति और सहायता भी उनकी प्रगति को तीव्र बनाने में सक्रिय सहायता प्रदान करे। तभी इनकी साधनाएं सफल हो सकती हैं। इस प्रकार का सहायता कोष भी तप साधना द्वारा ही संचित होने की आशा की जा सकती है। आचार्य जी साधक परिवार के लिए इसी शक्तिकोष की खोज में जा रहे हैं।
साधनाओं की भाँति लौकिक सुख साधन जुटाने वाले अनुष्ठान भी अनेक हैं। मंत्र विद्या में एक से एक बढ़कर रत्न मौजूद हैं। प्राचीनकाल में यह साधना विज्ञान अपने चरम उत्कर्ष पर था और ऋषि मुनि इसी अनुसंधान में अपना अधिकाँश समय लगाते थे, और विश्व कल्याण के लिए अनेक मंगलमय उपहार उपस्थित करते थे। इन्हीं उपहारों के बलबूते पर यह देश किसी समय विश्व का मुकुटमणि बना हुआ था और ज्ञान, विज्ञान, व्रत, पुरुषार्थ, धन संपत्ति का भण्डार माना जाता था।
साधना के चमत्कार
साधना में साधक की शक्तियाँ और भी तीव्र सूक्ष्म एवं स्वच्छ हो जाती हैं इसलिए वह दूर रहते हुए भी दूसरों को अन्तः प्रेरणा देता रह सकता है। अलौकिक कार्यों में तो वाणी तथा वस्तु विनिमय की आवश्यकता पड़ती है पर आध्यात्मिक कार्यों में इसकी विशेष आवश्यकता नहीं पड़ती। वह कार्य सूक्ष्म चेतना के आधार पर दूर रहते हुए भी हो सकते हैं। अज्ञातवास में रहते हुए भी जिन लोगों को प्रेरणा देने की आवश्यकता है वह कार्य निर्बाध गति से चल सकता है।
साधना के पथ पर बढ़ता हुआ मनुष्य जब उन्नति की ओर अग्रसर होता है तो वह अन्त में उस प्रेमस्वरूप के दर्शन करता है जहाँ सर्वत्र प्रेम से शून्य कुछ है ही नहीं। इसे ही विश्व प्रेम भी कहते हैं। इस विश्वप्रेम की प्राप्ति कैसे हो? इसका मर्म बहुत कम लोग जानते हैं और उनमें से भी बहुत कम इसको प्राप्त कर पाते हैं।
साधना ही जीवन का उद्देश्य है। निखिल विश्व में उसे अनन्त, रस स्वरूप, प्रेमस्वरूप की दिव्य अनुभूति प्राप्त करना हृदय में विश्व प्रेम को प्रतिष्ठापित करना ही आत्मा का उद्देश्य है।
साधनामय है। जितना समय साधारण व्यक्ति अपनी आजीविका कमाने में लगाते हैं उतना वे नित्य अपनी साधना में देते रहे हैं। उन्होंने सर्वसाधारण के सामने अपने जीवन को एक प्रयोग के रूप में उपस्थित किया है कि गृहस्थ रहते हुए, आजीविका उपार्जित करते हुए, लोक सेवा करते हुये कोई मनुष्य आध्यात्मिक साधना भी कर सकता है, और उस मार्ग में आशाजनक प्रगति भी संभव हो सकती है। आमतौर से लोग गृहस्थ जीवन को लोकसेवा एवं परमार्थ साधना में बाधक मानते हैं, उनका अनुमान होता है कि ब्रह्मचारी या संन्यासी ही कोई आध्यात्मिक प्रगति कर सकने में सफल हो सकते हैं, गृह जंजालों में फँसे हुए लोगों के लिए तो वह मार्ग कठिन ही है। ऐसे लोगों की निराशा का समाधान यों शास्त्र-प्रमाणों, तर्कों और उदाहरण से भी हो सकता है पर परम पूज्य आचार्य जी ने इसके लिए अपना उदाहरण उपस्थित करना ही सर्वोत्तम उपाय समझा।
साधनामय जीवन
साधना करने की आवश्यकता उन्हें क्यों पड़ी? यह जिज्ञासा ‘अखंड-ज्योति’ परिवार के प्रत्येक प्रेमी सदस्य के मन में उठनी स्वाभाविक है। आज से एक वर्ष पूर्व जब उनने अपना यह विचार मेरे सामने उपस्थित किया तो मुझे भी यही आशंका हुई कि -कहीं गृह व्यवस्था उनके कार्यक्रम में बाधक तो नहीं हो रही हैं? मैं कहीं उनके मार्ग में रोड़ा तो नहीं हूँ? यों जब से मैंने इस घर में प्रवेश किया है तभी से मैंने यहाँ जीवित तीर्थ के दर्शन किये हैं।
साधना के पथ में भारी विघ्न है। अपना दृष्टिकोण बदल जाने पर जो दूषित और बुरे तत्व हैं उनमें भी अच्छाई, उस ईश्वरीय तत्व की झाँकी दृष्टिगत होती है। वहाँ भी उस प्रेमस्वरूप के दर्शन होते हैं क्योंकि विश्वप्रेम की प्राप्ति में कहीं दोष, बुराइयां, कमजोरियाँ रहती ही नहीं है। घृणा, परनिन्दा से प्रेम मर जाता है। अतः यह दृष्टिकोण त्याज्य है।
साधना
साधना को असफल ही सिद्ध करता है। साथ ही उनका वह प्रयत्न भी असफल हो जाता है जिसके अनुसार वे संसार में यह उदाहरण उपस्थित कर रहे थे कि गृहस्थ जीवन आध्यात्मिक प्रगति के पथ में बाधक नहीं वरन् सहायक है। आचार्यजी की अज्ञातवास जाने की घोषणा-अब तक के हम दोनों के प्रयत्न को असफल ही सिद्ध कर सकती है। ऐसी दशा में जब कि छोटे दो बच्चों के उत्तरदायित्व से मुक्त होने से पूर्व ही वे गृह त्याग की बात सोचते हैं तो निश्चय ही वह गृहस्थ जीवन की तुच्छता एवं व्यर्थता को ही सिद्ध करता है।
साधना ही हमारे हृदयों में स्थित उस प्रेम स्वरूप के दर्शन का राजमार्ग है। ज्यों-2 प्रेम विकसित होगा त्यों-त्यों उसका स्वरूप अधिक स्पष्ट होता जायगा और अन्त में एकाकार होकर वह प्रेम अबाधित हो सर्वत्र बिखर जायगा जहाँ आनन्दमय प्रेमस्वरूप के सिवा और कुछ होगा ही नहीं। जिधर दृष्टि पड़ेगी वहाँ वह दिखाई देगा और हमारे अन्तःकरणों में भी वही अपने निर्मल एवं उज्ज्वल प्रकाश से प्रकाशित हो उठेगा।
साधना ही बनायेंगे। उनका आगामी कार्यक्रम तप प्रधान ही होगा।
साधना क्रम ठीक ही चल रहा था और गृहस्थ जीवन उनके मार्ग में कुछ बाधक भी न था तो घर छोड़कर कहीं दूर दिशा में अज्ञातवास करके ही कोई साधना करने की आवश्यकता उन्हें क्यों पड़ी? यह जिज्ञासा ‘अखंड-ज्योति’ परिवार के प्रत्येक प्रेमी सदस्य के मन में उठनी स्वाभाविक है। आज से एक वर्ष पूर्व जब उनने अपना यह विचार मेरे सामने उपस्थित किया तो मुझे भी यही आशंका हुई कि -कहीं गृह व्यवस्था उनके कार्यक्रम में बाधक तो नहीं हो रही हैं? मैं कहीं उनके मार्ग में रोड़ा तो नहीं हूँ? यों जब से मैंने इस घर में प्रवेश किया है तभी से मैंने यहाँ जीवित तीर्थ के दर्शन किये हैं।
साधना विज्ञान अपने चरम उत्कर्ष पर था और ऋषि मुनि इसी अनुसंधान में अपना अधिकाँश समय लगाते थे, और विश्व कल्याण के लिए अनेक मंगलमय उपहार उपस्थित करते थे। इन्हीं उपहारों के बलबूते पर यह देश किसी समय विश्व का मुकुटमणि बना हुआ था और ज्ञान, विज्ञान, व्रत, पुरुषार्थ, धन संपत्ति का भण्डार माना जाता था।
साधना भी किन्हीं छोटे मोटे प्रयोजनों के लिए की जा सकती है और उनका सीमित फल भी प्राप्त किया जा सकता है पर शास्त्रकार का कथन है कि जब एक ही कल्प वृक्ष के नीचे बैठने से सारे मनोरथ पूरे हो सकते हैं तो अलग-अलग वृक्षों को ढूँढ़ते फिरने और उनके नीचे बैठने से क्या लाभ? चिन्तामणि सब मणियों में श्रेष्ठ और बहुमूल्य मानी गई है उसे फेंक कर जैसे छोटे-मोटे रत्नों के लिए परिश्रम करते फिरना मूर्खतापूर्ण है इसी प्रकार गायत्री उपासना की उपेक्षा करके छुटपुट साधनाओं में समय लगाना उपरोक्त शास्त्र वचन में व्यर्थ बताया गया है।
साधना व्यवस्था करते थे। भागीरथ ने गंगा को लाने के लिए प्रचंड तप किया, तप का उद्देश्य पूरा होने पर वे पुनः अपने घर आ गये। रावण, कुम्भकरण, मेघनाद, भस्मासुर, सहस्रार्जुन आदि ने भी प्रचंड तप किये थे। उनने भी अभीष्ट शक्ति प्राप्त की और अपने-अपने साधारण जीवन में लौट आये। पार्वती ने पति प्राप्त करने के लिए, ध्रुव ने ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए, स्वायंभु मनु और सतरूपा रानी ने दिव्य पुत्र प्राप्ति के लिये तप किये और सफलता का वरदान प्राप्त कर अपने घरों को लौट आये।
साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त नहीं करते वे अन्धा बुद्धि वाले हैं। जो द्विज गायत्री मंत्र के होते हुए भी अन्य मंत्रों की उपासना करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को फेंककर छोटे रत्नों को ढूंढ़ने फिरने वाला मूर्ख होता है।
साधना की आवश्यकता बतलाई गई थी, जो सबके लिये सम्भव नहीं मानी जा सकती।
साधना में आचार्यजी से नियमित मार्गदर्शन प्राप्त करते हुए प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं। अज्ञातवास में चले जाने पर क्या उनकी प्रगति, बीच में ही रुकी न पड़ी रहेगी? समय-समय पर साँसारिक पीड़ाओं और परेशानियों से त्रस्त व्यक्तियों को जो ज्योति एवं शान्ति की सामग्री उनसे उपलब्ध होती रहती है-वह क्रम क्या टूट न जायगा? इस प्रकार एक विशाल जन समुदाय अपनी लौकिक और पारलौकिक गुत्थियों को सुलझाने में जिस सम्बल का सहारा लेता है, यदि वह उनके सामने से हट जाय तो क्या उन्हें धक्का न लगेगा, निराशा न होगी? फिर इतने बड़े परिवार के अगणित व्यक्ति उन्हें अपने प्राण प्रिय आत्मीय जन की भाँति प्यार भी करते हैं, उनके सान्निध्य के लिये भ्रमर की भाँति मँडराते रहते हैं, क्या उन सब की कोमल भावनाएँ इस अज्ञातवास के कारण वेदनाग्रस्त न होंगी?
साधना आत्मभावों को जोड़ना और उनके विस्तार में ही है। साधारणतया मनुष्य उन वस्तुओं से प्रेम करता है जिन्हें वह अपनी समझता है। जो उन्हें अच्छी लगती है जिनमें वह प्यार करता है। अच्छी लगने वाली वस्तुओं के मूल में वह आत्मभाव ही है जो उनसे जुड़ा हुआ है। कोई अपने मकान, सम्पत्ति से, कोई अपने बाल बच्चों से, कोई अन्य चीजों से प्रेम करते हैं और दूसरों के बाल बच्चों, धन, चीजों मकान आदि से प्रेम नहीं हैं, वह उन्हें अपनी नहीं समझता।
साधना में एक प्रकार का आध्यात्मिक सहायता कोष एकत्रित करना भी आचार्य जी का उद्देश्य है।
साधना के लिए अज्ञातवास ही चुनना पड़ा तो हमारे लिए भी यही मार्ग उचित है। ऐसा सोचकर हजारों परिवार जो उनका अनुकरण करके अपने-अपने गृहस्थ जीवनों को आदर्श बनाने को प्रयत्नों में भारी सफलता भी मिल रही है-वह सब कुछ व्यर्थ हो जाता है।
साधना एवं गहरे चिन्तन से बन्धन और मोक्ष के कारणों को ढूँढ़ा सुख और दुःख क्या है? और क्या होते हैं? इत्यादि जीवन के अनन्त प्रश्नों का समाधान खोजा और अपनी उदात्त वाणी से अनुभव की अमृतवर्षा कर मानवों को अजर-अमर बना दिया। धर्म मानव के मस्तिष्क की सबसे महत्वपूर्ण उपज है। धर्म के सम्बन्ध में जितना चिन्तन गहराई और अनेक दृष्टि-बिन्दुओं से भारतवर्ष में हुआ है उतना विश्व के अन्य किसी भी देश में नहीं हुआ साथ ही जीवन में भी धर्म की जितनी प्रतिष्ठा भारतीय मानवों में हुई, उतनी अन्यत्र शायद ही कहीं हुई हो।
साधना से प्राप्त न हो सकती हो।
साधना की और उसके फलस्वरूप जो कल्याण पथ उन्हें दिखाई दिया, उसे उन्होंने जगत के समक्ष रखा। एक दीप से अनेक जले। मानव समाज अज्ञान रूपी अन्धकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर बढ़ा। अपने कल्याण के साथ विश्व के कल्याण की उदात्त भावना उदित हुई। समस्त प्राणियों को अपने समान मानते हुए बन्धुत्व या प्राणियों को अपने समान मानते हुए बन्धुत्व या मैत्री भाव का प्रचार होने लगा।
साधना और तपश्चर्या दो भिन्न वस्तुएँ हैं, दोनों की शक्ति और मर्यादाएं भी भिन्न-भिन्न हैं। साधना सामूहिक परिस्थितियों में हो सकती है, इससे मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में सन्निहित अन्नमय कोष और मनोमय कोष साधक के गुण, कर्म, स्वभाव में सात्विक परिवर्तन हो सकता है, इस परिवर्तन से उत्पन्न हुई आँतरिक निर्मलता के कारण ईश्वरीय प्रकाश की दिव्य किरणें साधक के अंतःप्रदेश में आती और उसे आलोकित करती हैं। वह आत्म कल्याण के मार्ग पर बढ़ता है और शाँति भी प्राप्त करता है। अन्नमय कोष को साधना द्वारा परिपुष्ट कर लेने पर शरीर निरोग और दीर्घजीवी कष्ट सहिष्णु और तितिक्षाशील बन सकता है। उसकी प्रतिभा निखर सकती है और कठिनाइयों से लड़कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करने योग्य पुरुषार्थ उत्पन्न हो सकता है।
साधना करके मन जब काबू में आ जाता है तो आत्म निर्माण का कार्य सरल हो जाता है। फिर मनुष्य अपने आपको अभीष्ट परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सकता है, अपने में मनोवाँछित विशेषताएं उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार वह अपने भाग्य का निर्माता आप बन सकता है।
साधना से मानसिक विकारों,कुविचारों और दुर्गुणों का शमन होता है, स्मरण शक्ति एवं बुद्धि काल में अभिवृद्धि हो सकती है। चंचलता नष्ट होती और चित्त की एकाग्रता में सफलता मिलती है। साहस, धैर्य, निर्भयता, श्रद्धा, बढ़ती है और इन्द्रिय-विषयों के लिए उठती रहने वाली लिप्सा एवं वासना पर नियंत्रण स्थापित होता है। मन के प्रवाह को कुमार्ग में से रोककर सन्मार्ग पर अग्रसर करना एवं जन्म जन्मान्तरों तक संग्रहीत कुसंस्कारों का परिशोधन किया जा सकता है। शरीर का सर्वोपरि संचालक , मनोवृत्तियों का प्रधान निर्माणकर्ता मन ही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-July
साधना किया करते थे। लेकिन उनमें परार्थ निष्ठा नहीं थी। परन्तु मैं तो इन कृपण जनों को छोड़ कर मुक्त नहीं होना चाहता। यह कितनी कड़ी आलोचना प्रहलाद ने की कि उन मुनियों के पीछे स्वार्थ लगा हुआ था, परार्थ नहीं। ‘मैं अकेला मुक्त नहीं होना चाहता’-यह संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उद्गार है।
साधना में लगें।
साधना तपश्चर्या का ही प्रताप झाँक रहा है।
साधनाओं द्वारा जो इन अन्तरंग शक्तियों पर अधिकार कर लेता है उसके लिए वे वैसी ही उपयोगी हो जाती हैं जैसी बिजली एटम से भाप आदि की शक्तियों पर अधिकार प्राप्त करके आज के वैज्ञानिकों ने उन्हें मनुष्य की सेवा में प्रयुक्त कर दिया है। भौतिक जाति में जो शक्ति भौतिक क्षमता सम्पन्न दिखाई पड़ती हैं वही अंतर्जगत में आध्यात्मिक क्षमता के रूप में प्रकट होती है। गायत्री की आध्यात्मिक शक्ति साधक के सन्मुख सिद्धियों के रूप में सामने आती है। उसे लगता है कि अदृश्य लोक के कोई देव दानव उसकी सेवा में उपस्थित हो गये हैं और उसकी आज्ञा का पालन करने के लिये हर क्षण तत्पर रहते हैं।
साधना से मल दोष दूर हो जाने पर अणिमा, लघिमा, महिमा, आदि आठ शारीरिक सिद्धियों प्राप्त होती हैं। स्वाध्याय से इष्टदेव का साक्षात्कार होता है। ईश्वर प्रणिधान से समाधि लग जाती है। आसन सध जाने से सर्दी गर्मी आदि के द्वन्द्व दुख नहीं पहुँचाते। प्राणायाम से पाप और अज्ञान का आवरण मिटता है।
साधना से ही उत्पन्न होंगी। मानवता की, धर्म और संस्कृति की यही सबसे बड़ी सेवा है। आज इन प्रयत्नों की तुरन्त आवश्यकता अनुभव की जाती है क्योंकि जैसे जैसे दिन बीतते जाते हैं असुरता का पल्ला अधिक भारी होता जाता है। देरी करने में अहित और अनिष्ट की ही अधिक सम्भावना हो सकती है।
साधना में ही अन्तर्हित थी। एक बार राजा विश्वामित्र जब बन में अपनी सेना को लेकर पहुँचे तो वशिष्ठजी ने कुछ सामान न होने पर भी सारी सेना का समुचित आतिथ्य कर दिखाया तो विश्वामित्र दंग रह गये। किसी प्रसंग को लेकर जब निहत्थे वशिष्ठ और विशाल सेना सम्पन्न विश्वामित्र में युद्ध ठन गया तो तपस्वी वशिष्ठ के सामने राजा विश्वामित्र को परास्त ही होना पड़ा। उन्होंने “धिग् बलं आश्रम बलं ब्रह्म तेजो बलं बलम्।” की घोषणा करते हुए राजपाट छोड़ दिया और सबसे महत्व पूर्ण शक्ति की तपश्चर्या के लिए ही शेष जीवन समर्पित कर दिया।
साधना के क्षेत्र में भारत की महिलाएँ भी पीछे न थीं। पार्वती ने प्रचण्ड तप करके मदन दहन करने वाले समाधिस्थ शंकर को विवाह करने के लिये विवश किया, अनुसूया ने अपनी आत्मशक्ति से ब्रह्मा विष्णु महेश को नन्हे-नन्हे बालकों के रूप में परिणत कर दिया। सुकन्या ने तप करके अपने वृद्ध पति च्यवन को युवा बनाया।
साधना द्वारा महान् ब्रह्मवर्चस् को प्राप्त किया है। उसी गायत्री मंत्र के द्वारा तुम्हारे मन का पूर्ण विषाद और निराशा शीघ्र ही दूर हो जाएगी।’
साधना करने वाले से हिंसक जीव भी वैर त्याग देते हैं। सत्य की आराधना करने वाले के मुख से निकले हुए शाप वरदान सफल होते हैं। अस्तेय वृत्ति धारण करने से बहुमूल्य रत्नों के समान वस्तुएँ उपलब्ध होती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से तेजस्विता मिलती है। अपरिग्रह सध जाने पर जन्म−जन्मांतरों का तथा भूत-भविष्य -वर्तमान का ज्ञान हो जाता है।
साधना ही रहा। शेष जी तप के बल पर ही इस पृथ्वी को अपने शीश पर धारण किये हुए हैं। सप्त ऋषियों ने इसी मार्ग पर दीर्घ काल तक चलते रह कर वह सिद्धि प्राप्त की जिससे सदा उनका नाम अजर अमर रहेगा। देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्राचार्य अपने अपने शिष्यों के कल्याण, मार्ग दर्शन और सफलता की साधना अपनी तप शक्ति के आधार पर ही करते रहे हैं।
साधनाओं के लिये भी उनका दृष्टिकोण व्यक्तिगत लाभ का नहीं रहा। वे जो कुछ भी जप तप करते हैं प्रायः उसी दिन किसी पीड़ित परेशान व्यक्ति के कल्याण के लिये अथवा संसार में धार्मिक वातावरण उत्पन्न करने के लिये उसे दान कर देते हैं। अभी कई जन्म भी लेने का उनका विचार है। संसार में धर्म की स्थापना हुए बिना, मानव प्राणी के अन्तराल में मानवता की समुचित प्रतिष्ठापना किये बिना, किसी स्वर्ग मुक्ति में जाने का उनका विचार बिल्कुल ही नहीं है। इसलिये वे अपने लिये कोई सिद्धि नहीं चाहते।
साधना और हमारा धर्म समाज के लिए होगा, तो हम स्वतः समाज के लिए उपयोगी साबित होने का प्रयत्न करेंगे।
साधना, उपासना आदि इसी केन्द्र पर केन्द्रित हैं।
साधना भी पूर्ण सम्पन्न होनी चाहिए। ‘मन कहीं तन कहीं’ वाली बात से कार्य सिद्धि तो हो नहीं सकती। उससे तो परिश्रम भी व्यर्थ जाता है।
साधना से प्रभावित कर गंगा जी को भूलोक में लाने एवं शिवजी को उन्हें अपनी जटाओं में धारण करने के लिए तैयार कर लिया। यह कार्य साधारण प्रक्रिया से सम्पन्न न होते। तप ने ही उन्हें संभव बनाया।
साधना के विचार से काफी दूर हो गये हैं। धर्म की जड़ता ने ही इस असामाजिकता को बढ़ावा दिया है। शास्त्रों की दुहाई देकर भी इसे सिद्ध किया जाता है, पर वह साधुता, वह धर्म और वे शास्त्र निकम्मे हैं, जो सामाजिक साधना की ओर नहीं ले जाते! यदि हमारी साधना और हमारा धर्म समाज के लिए होगा, तो हम स्वतः समाज के लिए उपयोगी साबित होने का प्रयत्न करेंगे।
साधना हो जाने पर घृणा तथा परसंसर्ग से छुटकारा मिलता है। अन्तःकरण ही पवित्रता से मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रियों पर विजय और आत्म साक्षात्कार करने की क्षमता प्राप्त होती है। सन्तोष धारण करने से सर्वोत्तम सुख मिलता है। तप साधना से मल दोष दूर हो जाने पर अणिमा, लघिमा, महिमा, आदि आठ शारीरिक सिद्धियों प्राप्त होती हैं। स्वाध्याय से इष्टदेव का साक्षात्कार होता है।
साधना करने वाला साधक योग मार्ग के नौ विघ्नों-व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्ति, अलब्ध भूमिका, अनवस्थित पर विजय प्राप्त कर लेता है।
साधना के महान प्रयत्नों द्वारा ही शान्ति शस्त्र तैयार किये गये हैं। पूज्य आचार्यजी तथा उनकी सरीखी और भी कई आत्माएँ इसी प्रयत्न के लिए अग्रसर हुई हैं।
साधना के पिपीलिका मार्ग, दादर मार्ग, बिहंगम मार्ग यह तीन मार्ग हैं। इन पर चलने से परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चारों वाणियाँ प्रस्फुटित होती हैं। अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, आय निवेश यह पाँचों क्लेश दूर होते हैं। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीया यह चारों अवस्थाएँ परिमार्जित होती हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धास्थ, आज्ञाचक्र यह छहों चक्र जागृत होते हैं एवं मस्तिष्क के मध्य भाग में व्यवस्थित सहस्रार कमल में ब्रह्म तेज विकसित होने लगता है।
साधना से वेद-ज्ञान की प्राप्ति
साधना अपनी तप शक्ति के आधार पर ही करते रहे हैं।
साधना द्वारा अंतर्जगत से भी प्राप्त किया जा सकता है। बाहर कोई वस्तु ऐसी नहीं जो भीतर न हो।
साधना भी सम्भव हो जाता है।
साधना की ओर नहीं ले जाते! यदि हमारी साधना और हमारा धर्म समाज के लिए होगा, तो हम स्वतः समाज के लिए उपयोगी साबित होने का प्रयत्न करेंगे।
साधना का मूल्य अत्यधिक है। जौहरी काँच को फेंक कर रत्न की साज संभाल करता है। उन्होंने भी भौतिक सुखों को लात मार कर यदि तप की सम्पत्ति एकत्रित करने का निश्चय किया है तो हम मोह-ग्रस्त परिजन भले ही खिन्न होते रहें, वस्तुतः उस निश्चय में दूर-दर्शिता और बुद्धिमानी ही ओत-प्रोत है।
साधनाएं प्रसिद्ध हैं। (1) महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियान (4) जालन्धर बंध (5) मूलबंध (6) महाबन्ध (7) खेचरी (8) विपरीत करणी (9) योनि मुद्रा (10) वज्रौली (11) शक्ति चालनी (12) तडागी (13) माण्डवी (14) शाँभवी (15) अश्विनी (16) पाशिनी (17) काक्री (18) मातंगी (19) भुजाँगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कयवी (24) आकाशी।
साधनाओं से अन्य प्रकार की भी अनेक सिद्धियाँ मिलती हैं। अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, दूर दर्शन दूर श्रवण, परचित्र विज्ञान, परकाया प्रवेश, आकाशारोहण, मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि का वर्णन योग ग्रन्थों में मौजूद है। वे सभी गायत्री उपासना से संभव हैं। कहा गया है कि :-
साधना की आवश्यकता है। साधना भी पूर्ण सम्पन्न होनी चाहिए। ‘मन कहीं तन कहीं’ वाली बात से कार्य सिद्धि तो हो नहीं सकती। उससे तो परिश्रम भी व्यर्थ जाता है।
साधना आरम्भ की तब सविता देव प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर वर माँगने को कहा। याज्ञवलक्य ने उन्हें बारम्बार प्रणाम किया और बोले-’प्रभो आप अन्तर्यामी हैं। मेरी कामना आपसे छिपी हुई नहीं है। मैं समस्त वेद-शास्त्रों के ज्ञान की याचना करता हूँ।
साधना में ही लगा देने का निश्चय किया है तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। वे तप का महत्व समझ चुके हैं कि संसार के बड़े से बड़े पराक्रम, पुरुषार्थ एवं उपार्जन की तुलना में तप साधना का मूल्य अत्यधिक है। जौहरी काँच को फेंक कर रत्न की साज संभाल करता है। उन्होंने भी भौतिक सुखों को लात मार कर यदि तप की सम्पत्ति एकत्रित करने का निश्चय किया है तो हम मोह-ग्रस्त परिजन भले ही खिन्न होते रहें, वस्तुतः उस निश्चय में दूर-दर्शिता और बुद्धिमानी ही ओत-प्रोत है।
साधना विज्ञान के अनुसार बन्ध और मुद्राओं का विधान शास्त्रों में मौजूद है। गायत्री के 24 अक्षरों से सम्बन्धित इस प्रकार की 24 साधनाएं प्रसिद्ध हैं। (1) महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियान (4) जालन्धर बंध (5) मूलबंध (6) महाबन्ध (7) खेचरी (8) विपरीत करणी (9) योनि मुद्रा (10) वज्रौली (11) शक्ति चालनी (12) तडागी (13) माण्डवी (14) शाँभवी (15) अश्विनी (16) पाशिनी (17) काक्री (18) मातंगी (19) भुजाँगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कयवी (24) आकाशी।
साधना की जाती है।
साधना की सीढ़ियों का वर्णन है। अहिंसा की साधना करने वाले से हिंसक जीव भी वैर त्याग देते हैं। सत्य की आराधना करने वाले के मुख से निकले हुए शाप वरदान सफल होते हैं। अस्तेय वृत्ति धारण करने से बहुमूल्य रत्नों के समान वस्तुएँ उपलब्ध होती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से तेजस्विता मिलती है।
साधना का प्रारंभ सेवा से होता है, आगे चल कर त्यागी बन जाता और अंत में सिद्धि को प्राप्त होकर परमात्मा में मिल जाता है। परन्तु प्रपंची सेवक प्रारम्भ में स्वामी, फिर रागी और अन्त में मोह को प्राप्त होकर संसार सिंधु में डूब जाता हैं।
साधना के मार्ग में आने वाले विघ्न ही कैसे दूर होंगे?
साधना की और शंकर जी को इंगित करके अजेय शक्तियों का भण्डार प्राप्त किया। कुम्भकरण ने तप द्वारा ही छः-छः महीने सोने जागने का अद्भुत वरदान पाया था। मेघनाद, अहिरावण और मारीच की विचित्र माया-शक्ति भी उन्हें तप द्वारा ही मिली थी। भस्मासुर ने सिर पर हाथ रखने से किसी को भी जला देने की शक्ति तप करके ही प्राप्त की थी। हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, सहस्रबाहु, बालि आदि असुरों के पराक्रम का भी मूल आधार तप ही था।
साधना का राज मार्ग
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-September
साधना विधान की उपेक्षा न करे।
साधना से परमात्मा की पूजा का सन्देश झंकृत हो रहा है। अपनी कर्मशीलता और परिश्रम पुरुषार्थ आदि के द्वारा किस प्रकार उस परमपिता परमात्मा की पूजा करके उसकी प्राप्ति की जा सकती है। विराट का साक्षात्कार करके आत्म लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यह विश्व कवि ने अपनी छोटी सी भाव व्यंजना में स्पष्टतया व्यक्त किया है। इससे सर्व प्रथम हमें जीवन में कर्मशीलता अबाधित गतिशीलता पुरुषार्थ का सन्देश मिलता है।
साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।
साधना विधान उपेक्षा करने पर मंत्र का समुचित परिणाम नहीं होता।
साधना को विधि विधान पूर्वक नियमित रूप से सम्पन्न किया जाए।
साधनाओं में लगे हुए हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह लोग केवल अपनी ही भलाई के लिए प्रवृत्त हैं। इन्हें पुण्य परमार्थ से कोई सरोकार नहीं। इस दृष्टि में उन्हें स्वार्थी भी कहा जा सकता है और उन लोगों की अपेक्षा अनुदार एवं संकीर्ण माना जा सकता है जो अपने समय और श्रम का एक बड़ा भाग जनता की भलाई करते हुये पुण्य परमार्थ में लगाते हैं।
साधना है जिससे जीवन के वास्तविक मूल्य की प्राप्ति की जा सकती है। महापुरुषों का जीवन कर्म शीलता का जागृत उदाहरण है। ईसा, बुद्ध, शंकराचार्य, गाँधी की जीवनियों से ज्ञात होता है कि उन्होंने कर्म को ही अपना जीवन साथी चुना और उसके सहारे महानता प्राप्त की। पं. नेहरूजी ने एक जगह लिखा है “काम के भार से मैं अपने शरीर और मस्तिष्क की स्फूर्ति कायम रख पाता हूँ। श्रम ही जीवन है।
साधना करते हैं, अपनी मनमर्जी में चाहे जैसे नियम बना लेते हैं, चाहे जिस विधान को व्यर्थ कहने लगते हैं। ऐसी मनमानी करने वाले, शास्त्र विधि की अवज्ञा करने वाले एक प्रकार के बन्दर हैं, उनकी उछल-कूद का कितना परिणाम होगा, यह कह सकना अनिश्चित है।
साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।
साधना से ही मिल जाते हैं। यदि वह किसी को शाप या वरदान दे तो पूर्ण सफल होता है। किसी ने जो शुभ नहीं किया है उसका सत्परिणाम उपस्थित कर देने की शक्ति उसमें उत्पन्न हो जाती है। यह तो एक प्रत्यक्ष एवं प्रकट सिद्धि है। इसके अतिरिक्त भी सत्यनिष्ठ अनेक आध्यात्मिक सफलताओं से सम्पन्न हो जाता है।
साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।
साधना विधान को व्यर्थ मान कर मनमानी रीति से साधना करते हैं, अपनी मनमर्जी में चाहे जैसे नियम बना लेते हैं, चाहे जिस विधान को व्यर्थ कहने लगते हैं। ऐसी मनमानी करने वाले, शास्त्र विधि की अवज्ञा करने वाले एक प्रकार के बन्दर हैं, उनकी उछल-कूद का कितना परिणाम होगा, यह कह सकना अनिश्चित है।
साधनाएँ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। सत्य पालन की साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।
साधना है। वैसी ही साधना जैसी अन्यान्य कष्ट साध्य योग साधनाएँ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। सत्य पालन की साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।
साधना जैसी अन्यान्य कष्ट साध्य योग साधनाएँ परमात्मा को प्राप्त करने के लिए की जाती हैं। सत्य पालन की साधना से भी जीवात्मा परमात्मा तक इसी प्रकार पहुँच सकती है जैसे अन्यान्य योगों के साधक तपस्वी लोग ब्रह्म सायुज्य की स्थिति तक पहुँचते हैं। जिस प्रकार सभी साधनाओं में कुछ कष्ट उठाने और कुछ त्याग करने के लिए तैयार होना पड़ता है उसी प्रकार सत्य साधना का भी मूल्य चुकाना पड़ता है।
साधना विधानों का कोई बन्धन नहीं है।
साधना अपूर्ण एवं अधूरी ही मानी जाएगी। उसे बहुत श्रम करने पर भी वह लाभ न मिल सकेगा जो सत्य निष्ठ-शुद्ध आचरण और सद्विचारों वाला व्यक्ति थोड़ी सी ही साधना से प्राप्त कर सकता है।
साधना विधान की प्रधानता है। भावना विहीन प्रार्थना निष्फल जाती है उसी प्रकार साधना विधान उपेक्षा करने पर मंत्र का समुचित परिणाम नहीं होता।
साधना ग्रंथों में कहा गया है—
साधना से प्राप्त कर सकता है।
साधना के नियमों पर जोर देते हुए कहा गया है कि :—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-March
साधना कर्मों में जप यज्ञ अधिक फल दायक एवं श्रेष्ठ है।
साधना में अन्य सभी साधनाओं द्वारा हो सकने वाले लाभ प्राप्त हो जाते हैं।
साधनाएं करना चाहे तो कर सकता है, पर इस महामंत्र को त्याग कर यदि उसने अन्य मंत्रों या अन्य देवताओं का सहारा लिया है तो यह उसकी भूल है। इस भूल के फलस्वरूप उसे ब्रह्मतेज का अभाव ही रहेगा।
साधना मैं।
साधना की हुई यह गायत्री विद्या द्विजों के लिए कामधेनु के समान सब सिद्धियों को देने वाली है।
साधना का संतुलित भोजन आवश्यक है। जैसे भोजन के अभाव में शरीर का विकास रुक जाता है और उत्तम विचारों के न मिलने पर मन कुँठित हो जाता है उसी प्रकार भगवान की पूजा उपासना न करने से भी जीवात्मा की शुभ करने की प्रेरक शक्ति कुँठित हो जाती है और अपने पूर्ण विकास की स्थिति परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रह जाती है।
साधनाओं द्वारा हो सकने वाले लाभ प्राप्त हो जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-August
साधना में दीक्षा का आश्रय लेकर ही प्रवेश करना चाहिए।
साधना से सुप्त मानवीय शक्तियाँ जागती हैं। मनुष्य में नई शक्ति और अद्भुत सामर्थ्य का उदय होता है। निष्प्राण जैसे व्यक्ति में नई जान और नई आशा का विकास होता है। कालिदास प्रारम्भ में मूढ़ थे, पर मार्मिक शब्दों ने ही नए ज्ञान का उद्रेक किया था। भारतीय मनीषियों ने इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को आधार मान कर मन्त्र-विज्ञान नामक प्रक्रियाओं को जन्म दिया है।
साधना। मनु॰
साधनामय जीवन रहें। परिवार के साथ व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक उन्नति भी करे। संकुचित कुटुम्ब की ममता से अपने को ऊपर उठाकर विश्व वात्सल्य के भाव को जागृत करें और सबके हित के लिये अपने जीवन को समर्पण कर दें। वास्तव में अवकाश के समय का उपयोग भी हमें अपनी आध्यात्मिक उन्नति एवं जन कल्याण में ही करना उचित है। विद्यार्थी अपने छुट्टियों के दिनों में आस-पास के अशिक्षित लोगों को शिक्षित बनाने का प्रयत्न करें।
साधनाएँ न कर सके, केवल गायत्री माता की साधारण उपासना करता रहे तो भी प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर लेता है।
साधना की सफलता चाहने वाले और शास्त्र की महत्ता को स्वीकार करने वालों के लिए तो वह अनिवार्य ही है। देखिए :-
साधनायें मनुष्य की संयम शीलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके अनुसार अभ्यास करने पर मनुष्य अपने जीवन में संयमशीलता में सफलता प्राप्त करके महान एवं पवित्र जीवन का निर्माण कर सकता है।
साधना है।
साधना पूर्ण होती है और मनुष्य अपने लक्ष्य में सफल हो जाता है। जल्दीबाजी अथवा अधीरता से लक्ष्य तक पहुँचना प्रायः असम्भव ही होता है।
साधना करने के लिए सर्व प्रथम साधक को चरित्रवान बनने की आवश्यकता होती है। अपने अन्दर जो दोष हैं उनको आत्म निरीक्षण के द्वारा पता लगा कर परित्याग करना चाहिये। मन बार बार उनकी ओर फिरे तो प्रायश्चित के दण्ड विधानों द्वारा तथा वैसे अवसर न आने देने की व्यवस्था करके उस पर अंकुश लगाना चाहिए। मन सीधे वश में नहीं आता, वह जन्म−जन्मांतरों से संचित कुसंस्कारों को भी आसानी से नहीं छोड़ता। इसके लिए उससे संग्राम ही करना पड़ता है।
साधना क्रम आगे बढ़ावें।
साधना द्वारा आध्यात्म मार्ग पर बढ़ते हुए सच्चे विज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। ऐसे मन्त्र योग से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
साधना में काफी सहयोग मिलेगा।
साधना क्षेत्र में वह वह बहुत आगे बढ़ चुके हैं। चौबीस चौबीस लक्ष के 24 गायत्री महापुरश्चरण उन्होंने किए हैं। पूर्व काल में सवा करोड़ जप करने वाले को वशिष्ठ की पदवी प्रदान की जाती थी। उनका इतना सम्मान किया जाता था कि वशिष्ठ ही अयोध्यापुरी के राजाओं के राजगुरु हुआ करते थे जिनकी आज्ञा के बिना राज्य में पत्ता भी नहीं हिलता था, उनके पथ प्रदर्शन में ही सब कार्य हुआ करते थे। इसका अर्थ यह है कि सवा करोड़ गायत्री जाप के तप के द्वारा आत्मा इतनी महान बन जाती है कि वह व्यक्ति राष्ट्र के नेतृत्व के योग्य बन जाता है।
साधना का मार्ग जानने के लिए गुरु की सेवा में उपस्थित होवें। शम, दम आदि सद्गुणों से सम्पन्न गुरु एवं आचार्य के पास जाना चाहिए। स्वयं शास्त्रज्ञ हो तो भी ब्रह्म विद्या की मनमानी साधना न करे।
साधना का दीप।
साधना विधि की आवश्यकता पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसी तथ्य को समक्ष रखकर भारतीय ऋषियों ने मनुष्य के लिए भिन्न-2 साधना विधियों का निर्धारण करके उन्हें कर्तव्य घोषित किया। अतः जप, ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, यम, नियम आदि की साधनायें मनुष्य की संयम शीलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके अनुसार अभ्यास करने पर मनुष्य अपने जीवन में संयमशीलता में सफलता प्राप्त करके महान एवं पवित्र जीवन का निर्माण कर सकता है।
साधना वर्षों पहिले से छह करोड़ के लगभग हो चुकी हैं। उनकी महानता की माप वशिष्ठ के आत्म विकास से ही हो सकती है। इस महान तप के कारण ही उन्हें इस युग का विश्वामित्र कहा जाता है। विश्वमित्र के द्वारा नवीन सृष्टि की रचना हुई मानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने अपने क्रान्तिकारी विचारों द्वारा एक नए समाज का निर्माण किया था।
साधना मार्ग में संयम और सदाचार का अत्यधिक महत्व है। जो इस पर दृढ़ता पूर्वक आरुढ़ है, वह अधिक कष्ट साध्य साधनाएँ न कर सके, केवल गायत्री माता की साधारण उपासना करता रहे तो भी प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर लेता है।
साधनाओं में गुरु की आवश्यकता है पर गायत्री उपासना में तो यह आवश्यकता विशेष रूप में है। क्योंकि इस साधना का प्रधान आधार प्राण तत्व है। गायत्री शब्द के अक्षरों में स्पष्ट है कि- गय=प्राण, त्री=त्राण करने वाली अर्थात् प्राणों की रक्षा शक्ति ही गायत्री उपासक को अपने में विशेष प्राण बीज धारण करके आगे बढ़ना होता है और यह प्राण किसी प्राणवान साधना निष्णात गुरु से ही प्राप्त हो सकता है। जिस प्रकार गन्ने के, गुलाब के बीज नहीं होते, उसकी लकड़ी काट कर दूसरी जगह बोई जाती है, उसी प्रकार जिसने कम से कम सवा करोड़ जप किया हो ऐसे परिपक्व साधन वाले अनुभवी गुरु के प्राणों का एक अंश अपनी प्राण भूमिका में बोने से ही नवीन साधक का साधना वृक्ष बढ़ता और फल−फूलों से सुशोभित होता है। दीक्षा गायत्री उपासना का महत्वपूर्ण अंग है।
साधना पथ का मार्ग दर्शन
साधना वृक्ष बढ़ता और फल−फूलों से सुशोभित होता है। दीक्षा गायत्री उपासना का महत्वपूर्ण अंग है। साधना की सफलता चाहने वाले और शास्त्र की महत्ता को स्वीकार करने वालों के लिए तो वह अनिवार्य ही है। देखिए :-
साधना से ही सम्भव है लिखा है-
साधना नहीं करते, उन्हें नवोदित शक्तियाँ लुभाकर विषय भोगों में डाल देती हैं।
साधना हो सकती है। दोनों के सम्मिश्रण से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
साधना के पथ पर अग्रसर होने के लिए बाह्य क्रिया अथवा अन्य साधना विधि की आवश्यकता पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसी तथ्य को समक्ष रखकर भारतीय ऋषियों ने मनुष्य के लिए भिन्न-2 साधना विधियों का निर्धारण करके उन्हें कर्तव्य घोषित किया। अतः जप, ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, यम, नियम आदि की साधनायें मनुष्य की संयम शीलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके अनुसार अभ्यास करने पर मनुष्य अपने जीवन में संयमशीलता में सफलता प्राप्त करके महान एवं पवित्र जीवन का निर्माण कर सकता है।
साधना की मात्रा में भी उसी हिसाब से परिवर्तन करना उचित है। मामूली बुखार दो चार दिन दवा खाने से ही ठीक हो जाता है, यदि जीर्ण ज्वर हो तो बहुत दिनों तक दवा लेनी पड़ती है। इसी प्रकार मन कम अशुद्ध हों तो थोड़ी साधना से ही आत्म शक्ति निखर आती है पर दूषणों की अधिकता होने पर देर तक प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है।
साधना और तप करने वाला भी कोई दिखाई नहीं देता। आध्यात्म ज्ञान संबंधी डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं। 1956 में दस हजार साधकों से 24-24 हजार गायत्री जाप के अनुष्ठान करवा कर 105 कुण्डी यज्ञ करवाया था। पाँच वर्ष के थोड़े से समय में देश के कोने कोने में गायत्री, यज्ञ और भारतीय संस्कृति का प्रसार किया। 3000 गायत्री परिवार की शाखायें स्थापित कराकर उन क्षेत्रों में धार्मिक जागृति की गंगा बहा दी।
साधना के वास्तविक स्वरूप से अपरिचित होने के कारण लोग उसे कष्ट साध्य मानते हैं और ऐसा सोचते हैं कि इस मार्ग पर चलने से उनकी लौकिक उन्नति में बाधा पड़ेगी। पर वास्तविकता यह नहीं है। आध्यात्मिकता के मार्ग को अपना कर साधना पथ पर चलने में केवल परलोक एवं परमार्थ ही नहीं सधता वरन् इस लोक में सुख शान्ति के साधन उपलब्ध होते हैं। योग साधना गृहस्थ में रहते हुए भी सुविधा पूर्वक हो सकती है, उसके लिए घर त्याग कर विरक्त भ्रमण करना आवश्यक नहीं। साधना से लोक और परलोक दोनों की सफलता मिलती है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही पदार्थ प्राप्त होते हैं।
साधना का स्वरूप
साधना काल में सतर्कता और आत्म नियन्त्रण की बड़ी आवश्यकता है।
साधना में विधि व्यवस्था का, शास्त्र मर्यादा का ध्यान नहीं रखते, मनमानी चलाते हैं, उनका योग कुयोग बन जाता है और थोड़ा बहुत उन्हें प्राप्त होता है, वह भी इन्द्रिय प्रलोभनों या साँसारिक तुच्छ प्रयोजनों में खर्च हो जाने का खतरा बना रहता है। बहुधा ऐसे उच्छृंखल, नियंत्रण विहीन साधक पथ भ्रष्ट होकर उस उपलब्ध हुई नवोदित शक्ति का दुरुपयोग करते देखे गये हैं। इसलिए साधना काल में सतर्कता और आत्म नियन्त्रण की बड़ी आवश्यकता है।
साधना पथ पर चलने में केवल परलोक एवं परमार्थ ही नहीं सधता वरन् इस लोक में सुख शान्ति के साधन उपलब्ध होते हैं। योग साधना गृहस्थ में रहते हुए भी सुविधा पूर्वक हो सकती है, उसके लिए घर त्याग कर विरक्त भ्रमण करना आवश्यक नहीं। साधना से लोक और परलोक दोनों की सफलता मिलती है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही पदार्थ प्राप्त होते हैं।
साधनाओं का आधार गायत्री ही मानी गई है।
साधना निष्णात गुरु से ही प्राप्त हो सकता है। जिस प्रकार गन्ने के, गुलाब के बीज नहीं होते, उसकी लकड़ी काट कर दूसरी जगह बोई जाती है, उसी प्रकार जिसने कम से कम सवा करोड़ जप किया हो ऐसे परिपक्व साधन वाले अनुभवी गुरु के प्राणों का एक अंश अपनी प्राण भूमिका में बोने से ही नवीन साधक का साधना वृक्ष बढ़ता और फल−फूलों से सुशोभित होता है। दीक्षा गायत्री उपासना का महत्वपूर्ण अंग है। साधना की सफलता चाहने वाले और शास्त्र की महत्ता को स्वीकार करने वालों के लिए तो वह अनिवार्य ही है। देखिए :-
साधना का केन्द्र बिंदु हैं। योगेश्वर भगवान शंकर की उपासना तपस्या भी गायत्री द्वारा होती थी।
साधना ग्रन्थों में ऐसा उल्लेख है कि सतयुग में जबकि वायु मण्डल शुद्ध था और साधकों के शरीर तथा मन सतोगुण से परिपूर्ण थे उस समय 24 लक्ष का पुरश्चरण पूर्ण माना जाता था। पर अब स्थिति बदल गई है। व्यक्तियों के शरीरों में तथा वातावरण में तमोगुण और रजोगुण व्याप्त हैं। स्थिति की शुद्धता अशुद्धता में सैंकड़ों गुना अन्तर आ गया है इसलिए साधना की मात्रा में भी उसी हिसाब से परिवर्तन करना उचित है। मामूली बुखार दो चार दिन दवा खाने से ही ठीक हो जाता है, यदि जीर्ण ज्वर हो तो बहुत दिनों तक दवा लेनी पड़ती है।
साधना विधियों का निर्धारण करके उन्हें कर्तव्य घोषित किया। अतः जप, ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, यम, नियम आदि की साधनायें मनुष्य की संयम शीलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इनके अनुसार अभ्यास करने पर मनुष्य अपने जीवन में संयमशीलता में सफलता प्राप्त करके महान एवं पवित्र जीवन का निर्माण कर सकता है।
साधना, हवन आदि पर हमारी आस्था कम हो रही हैं। हम उनका उपहास करते हैं। यही कारण है कि आध्यात्मिक दृष्टि से उतने विकसित नहीं हो पाते और दीन हीन बन कर दुःख पाते रहते हैं। यह निश्चय के साथ कहा जा सकता है कि हिन्दू धर्म की प्रत्येक प्रक्रिया में अवश्य कुछ रहस्य छिपा रहता है। वह अन्ध विश्वास पर आधारित नहीं है।
साधना कैसे की जाए जिससे कर्म बन्धन रूप न बनकर मुक्ति बन जाए। इसका समाधान करते हुए ऋषियों ने कहा हैं-
साधना है, ध्यान है, यह ही सिद्धियों की माता मानी गई है। इससे बढ़ कर श्रेष्ठ तत्व इस संसार में और कोई नहीं है। कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। समस्त योग साधनाओं का आधार गायत्री ही है।
साधना की सफलता के लिए निम्न सोलह बातों का ध्यान रखना होता है। यह सभी बातें नियमित रूप से विधि पूर्वक करने से सफलता का मार्ग प्रशस्त होगा। इन सभी बातों पर अगले किसी अंक में विस्तृत प्रकाश डालेंगे। 16 स्मरणीय नियम इस प्रकार हैं-
साधना क्षेत्र में उतारा जाता है तो संयम शीलता का पथ बड़ा कठिन जान पड़ता है। अपनी एक छोटी सी बुरी आदत अथवा मानसिक विकार पर नियन्त्रण कर लेना कितना मुश्किल होता है यह वे लोग अच्छी तरह जानते हैं जो इस पथ पर चलते हैं। जो मानसिक विचार वासनाएँ अथवा बुरी आदतें जितने समय से अपना घर किए होती हैं वे उतनी ही प्रबल और दुर्दमनीय होती हैं। उन्हें पछाड़ देना साहसी एवं शूरवीरों का ही कार्य है। किसी आदत को, वासना अथवा विकार को देख लीजिए, जब वह अपना घर कर लेता है तो उसे निकालना बड़े साहस का काम होता है।
साधना गृहस्थ में रहते हुए भी सुविधा पूर्वक हो सकती है, उसके लिए घर त्याग कर विरक्त भ्रमण करना आवश्यक नहीं। साधना से लोक और परलोक दोनों की सफलता मिलती है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही पदार्थ प्राप्त होते हैं।
साधना पथ पर अग्रसर होना चाहिए। गायत्री परा विद्या है, उसकी उपासना एक बहुत ही सुव्यवस्थित विज्ञान है। विज्ञान की शिक्षा को कोई शिक्षार्थी बिना किसी मार्ग दर्शक के अपने आप पूर्ण नहीं कर सकता। जब डाक्टरी, इंजीनियरिंग, रसायन, साइंस आदि साधारण कार्य बिना शिक्षक के नहीं सीखे जा सकते तो फिर आध्यात्म विद्या जैसे महान विज्ञान को अपने आप किसी सक्रिय मार्ग दर्शन के सफलता पूर्वक प्राप्त कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है?
साधना में संगति एवं स्थान का काफी प्रभाव पड़ता है। दुश्चरित्र एवं दुर्विचारों वाले व्यक्तियों में तथा उन स्थानों में जहाँ असंयम वातावरण व्याप्त होता हैं, संयम साधना में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती, क्योंकि इनसे अपनी बुरी आदतों दुर्विचारों एवं दुष्कृत्यों को और भी प्रोत्साहन मिलता है। जिसके कारण मनुष्य अपने पवित्र लक्ष्य में असफल हो जाता है। कभी कभी संयोग से अपने इष्ट मित्रों के प्रभाव से या स्वच्छ एवं सात्विक वातावरण में रहकर तथा महापुरुषों का संग करके मनुष्य बड़ी बड़ी खराब आदतों एवं दुर्विचारों को त्याग देता है और जीवन में काफी उन्नति कर जाता है। अतः संयम शीलता की ओर अग्रसर होने के लिए विपरीत संगति, स्थान, वातावरण का त्याग करना होगा।
साधना निष्फल नहीं जाती। समस्त योग साधनाओं का आधार गायत्री ही है।
साधना को योग कहते हैं। योग साधन द्वारा मनुष्य अपना वास्तविक स्वरूप तथा जीवन का लक्ष समझ सकता हैं। परम आत्मा को प्राप्त कर सकता है और जो कुछ इस संसार में प्राप्त करने योग्य है उसे प्राप्त कर सकता है। कहा गया है कि-
साधनाओं का आधार गायत्री ही है।
साधनानाँ तु वरानने॥
साधना न करे।
साधना के पथ पर चलना कोई आसान कार्य नहीं है। जब मनुष्य को उसकी बुरी आदतें, दुर्विचार, वासनायें पछाड़ पछाड़ कर पटकती हैं तब अच्छे-2 धैर्यवानों का धैर्य टूट जाता है, निराशा टपकने लगती है और सफलता का भविष्य संदिग्ध दिखाई देता है। असंयम के शैतान से लड़कर उस पर विजय प्राप्त करना कोई आसान कार्य नहीं है। अतः इसके लिए अटूट साहस और धैर्य की आवश्यकता है। धैर्य और साहस के साथ इस ओर निरन्तर प्रयत्न करने पर अवश्य ही संयम साधना पूर्ण होती है और मनुष्य अपने लक्ष्य में सफल हो जाता है।
साधना का प्रधान आधार प्राण तत्व है। गायत्री शब्द के अक्षरों में स्पष्ट है कि- गय=प्राण, त्री=त्राण करने वाली अर्थात् प्राणों की रक्षा शक्ति ही गायत्री उपासक को अपने में विशेष प्राण बीज धारण करके आगे बढ़ना होता है और यह प्राण किसी प्राणवान साधना निष्णात गुरु से ही प्राप्त हो सकता है। जिस प्रकार गन्ने के, गुलाब के बीज नहीं होते, उसकी लकड़ी काट कर दूसरी जगह बोई जाती है, उसी प्रकार जिसने कम से कम सवा करोड़ जप किया हो ऐसे परिपक्व साधन वाले अनुभवी गुरु के प्राणों का एक अंश अपनी प्राण भूमिका में बोने से ही नवीन साधक का साधना वृक्ष बढ़ता और फल−फूलों से सुशोभित होता है। दीक्षा गायत्री उपासना का महत्वपूर्ण अंग है। साधना की सफलता चाहने वाले और शास्त्र की महत्ता को स्वीकार करने वालों के लिए तो वह अनिवार्य ही है।
साधना में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती, क्योंकि इनसे अपनी बुरी आदतों दुर्विचारों एवं दुष्कृत्यों को और भी प्रोत्साहन मिलता है। जिसके कारण मनुष्य अपने पवित्र लक्ष्य में असफल हो जाता है। कभी कभी संयोग से अपने इष्ट मित्रों के प्रभाव से या स्वच्छ एवं सात्विक वातावरण में रहकर तथा महापुरुषों का संग करके मनुष्य बड़ी बड़ी खराब आदतों एवं दुर्विचारों को त्याग देता है और जीवन में काफी उन्नति कर जाता है। अतः संयम शीलता की ओर अग्रसर होने के लिए विपरीत संगति, स्थान, वातावरण का त्याग करना होगा।
साधना से ही ज्ञान, ज्ञान कहा जाता है। न मन्त्र के बिना योग हो सकता है, न बिना योग के मन्त्र साधना हो सकती है। दोनों के सम्मिश्रण से ही सिद्धि प्राप्त होती है।
साधना का दीप
साधना की पूँजी कुछ भी नहीं है, जिनसे अपना प्राण विकसित नहीं हुआ है, वह दूसरों को क्या प्राण दान देगा। उसकी दीक्षा में शिष्य का क्या हित साधन हो सकेगा? इस कृत्रिमता प्रधान युग में नकली से बचने तथा असली ढूँढ़ने की भारी आवश्यकता है।
साधना से लोक और परलोक दोनों की सफलता मिलती है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही पदार्थ प्राप्त होते हैं।
साधना को केवल ब्राह्मणों तक ही सीमित रखना चाहते थे परन्तु विश्वामित्र ने जो कि समस्त विश्व के मित्र, स्नेही और हितैषी थे और प्राणी मात्र में परमात्म तत्व का अनुभव करते थे, इन सीमित अधिकार की दीवारों को तोड़ फोड़ दिया था और महर्षि वशिष्ठ के विचारों के विरुद्ध एक आन्दोलन खड़ा कर दिया था। परम पूज्य आचार्यजी ने भी एक नई सृष्टि की रचना की है, एक नये समाज का निर्माण किया हैं समाज को एक नई मोड़ दी है। उसके लिए वह सदैव स्मरणीय रहेंगे। सैंकड़ों वर्षों से जिस जाति का इतना पतन हो चुका हो कि उसने उन्हें भजन पूजन के अधिकारों से भी वंचित कर रखा हो। ऐसी-ऐसी कपोल कल्पित घोषणाएँ कर दी हों कि कोई स्त्री यदि वेद मन्त्र सुन या पढ़ लेगी या गायत्री जाप कर लेगी तो उसके परिवार में महान अनिष्ट होगा।
साधना से ही आत्म शक्ति निखर आती है पर दूषणों की अधिकता होने पर देर तक प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है।
साधना को एक संग्राम भी कहा गया है। आसुरी और दैवी शक्तियों का जो निरन्तर संग्राम हमारे मनः क्षेत्र में होता रहता है, उसी का दिग्दर्शन गीता में कौरव पाण्डवों के महाभारत युद्ध के रूप में कराया गया है। मन को निर्विषय, शान्त और स्थिर बनाना गायत्री उपासक के लिए आवश्यक है। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिए मार्ग दर्शन इस प्रकार मिलता है :-
साधना लोक न कस्यापि कदापि हि।
साधना जो आत्मा का सच्चा कल्याण कर सके गायत्री ही है। इस उपासना से बढ़कर और कोई तप, योग, साधन, ध्यान नहीं हैं। समस्त प्रकार की योग साधनाओं का आधार गायत्री ही मानी गई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1960-December
साधनाएं किया करते थे। जोशीमठ में जगद्गुरु शंकराचार्य ने तप किया था, उपनिषदों के भाष्य लिखे थे और ज्योतिष पीठ नामक गद्दी स्थापित की थी। यहीं उन्होंने अपना नश्वर शरीर भी त्यागा। जोशीमठ से छः मील आगे तपोवन है। यहाँ व्यास जी का वेद विद्यालय था।
साधना और तप के अभाव से वह उस आवाज के अनुसार भले ही आचरण न कर सके परन्तु यह निश्चित है कि वह अपनी कमी को अनुभव करता है। यह सफलता की पहली सीढ़ी है। प्रायः देखा जाता है कि लोग अपनी कमियों और कमजोरियों का अनुभव ही नहीं करते, उनके मानस क्षेत्र में अंधकार का पर्दा पड़ा रहता है। उनके दोष उन्हें दोष ही दिखाई नहीं देते, दोषों की निवृत्ति कैसे हो? गायत्री का साधक ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता जाता है त्यों-त्यों उसे अपने दोष स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।
साधना करने के लिए इसी प्रदेश में आते रहे हैं। विविध कामनाओं के लिए विभिन्न व्यक्तियों ने भी तपस्याएं इधर ही की हैं। अनेक असुरों ने भी अपने उपासना क्षेत्र इधर ही बनाये थे। कतिपय देवताओं ने भी तप यहीं किया था। करते भी क्यों न?
साधना काल में ही अपना कुछ अनिष्ट कर बैठते हैं, या फिर सफल भी हुए तो दूसरों को आश्चर्य चकित करने का एक खेल बनाने में या साँसारिक कामनाओं में दुरुपयोग करते हैं। ऐसे लोगों के हाथ यह विद्या, विशेषतया गायत्री का ताँत्रिक पक्ष पड़ने न पावे इसका बहुत ध्यान रखा गया है। गायत्री गुह्यातिगुह्य है। उसे अब तक के साधकों ने जितना जाना है प्रयत्न करने पर उससे भी बहुत अधिक जाना जा सकता है।
साधना के लिए अभिमंत्रित की थी। राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ यहीं किया था और सन्तान के लिए सौ वर्ष तक तप आयोजन भी इसी स्थान पर किया था।
साधना का उद्देश्य और यही उसकी अनुभूति है।
साधना की थी।
साधना भगवान को बुलाने का एक प्रकार का निमन्त्रण पत्र है क्योंकि इससे बुद्धि शुद्ध व पवित्र होती है और ऐसे साधक को परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
साधना क्षेत्र चुनने में इनमें से प्रत्येक ने सूक्ष्म दृष्टि से ही काम लिया है। वे जानते थे कि हिमालय के हृदय-धरती के स्वर्ग प्रदेश की दिव्य शक्ति अपनी ऊष्मा को अपने निकटवर्ती क्षेत्र में ही अधिक बिखेरती है इसलिये वहीं पहुँचना उत्तम है। अग्नि का लाभ उठाने के लिये उसके समीप ही जाना पड़ता है। आध्यात्मिक तत्वों की किरणें जहाँ अत्यन्त तीव्र वेग से प्रवाहित होती हैं वह स्थान सुमेरु केन्द्र ही है। केवल पानी वाली गंगा ही वहाँ से नहीं निकली आध्यात्मिक गंगा का उद्गम भी वहीं है।
साधना में संलग्न रहते हैं।
साधना में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मस्तक के मध्य बिन्दु त्रिकुटी में एक आध्यात्मिक अमृत कलश रहता है। जिह्वा को उलट कर तालु मूल में लगाने और अन्य नियमों के साथ उस अमृत कलश का विन्दुपान करने की विधि खेचरी मुद्रा कहलाती है। इसका विस्तृत विधान योग ग्रंथों में मौजूद है तथा अनुभवी गुरुओं से सीखा जा सकता है। 24 मुद्राओं में खेचरी को अधिक फलप्रद माना गया है, वह गायत्री स्वरूप ही है।
साधना की। क्योंकि व्यक्ति का प्रभाव बिना उसमें विशेष गुण प्रकट हुए, दूसरों पर यथेष्ट रूप में नहीं पड़ता। साधक का कान, असाधक के लम्बे व्याख्यानों से भी अधिक प्रभावशाली होता है, क्योंकि उसके पवित्र जीवन से दूसरों के हृदय में उनके लिये आदर एवं भक्ति-भाव स्वयं प्रकट हो जाता है और उस आदर-भाव से प्रकट होने के बाद उस व्यक्ति का एक-एक शब्द जादू-का-सा असर करता है। हम देखते हैं कि ‘अंगुलिमाल’ जैसा भयानक डाकू और महान घातक भी भगवान बुद्ध से संपर्क में आते ही साधु-पुरुष बन जाता है। इसी तरह ‘अंगुलिमाल’, भगवान महावीर का शिष्य बन जाता है, जो कि सात व्यक्तियों की हत्या रोज करता था।
साधना से अंतःकरण में एक दिव्य-ज्योति की उत्पत्ति होती है जो हृदय गत अंधकार को नष्ट करती है, जिस प्रकार से साबुन से कपड़े उजले हो जाते हैं, झाड़ू से कमरे को साफ किया जाता है, उसी प्रकार से गायत्री मंत्र रूपी दिव्य साबुन मन रूपी कपड़ों को साफ करता है। यह ऐसा चमत्कारी दिव्य झाड़ू है कि मन रूपी कमरे में जो दुर्गुण, दोष आसक्ति राग-द्वेष सभी कूड़ा पड़ा हुआ है, उसको धीरे-धीरे निकाल देता है। यह कूड़ा-करकट निकलने के बाद ही मन भगवान के बैठने योग्य पवित्र आसन बनता है। गायत्री मंत्र की साधना भगवान को बुलाने का एक प्रकार का निमन्त्रण पत्र है क्योंकि इससे बुद्धि शुद्ध व पवित्र होती है और ऐसे साधक को परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-February
साधना को उचित समझा था। वे भगवती के तट पर ऐसी ही आध्यात्मिक साधना में संलग्न थे।
साधना नहीं वरन् साधन है। शौच का अर्थ पाप तापों को हटाकर आत्मा के निर्मल स्वरूप का दर्शन करना है। शौच रूपी ध्येय जैसे-जैसे प्राप्त होता जाता है, वैसे ही वैसे परम पद, मुक्ति, मोक्ष निकट आता जाता है। जब पूर्ण शौच प्राप्त हो जाता है, तो आत्मा बिलकुल निर्मल और निष्पाप हो जाता है। यही तो मुक्त अवस्था है।
साधना। मूल्य 1 रुपया
साधना है।
साधना में संलग्न थे।
साधना में कोई स्थान इसलिये नहीं दिया गया है कि साधना नहीं वरन् साधन है। शौच का अर्थ पाप तापों को हटाकर आत्मा के निर्मल स्वरूप का दर्शन करना है। शौच रूपी ध्येय जैसे-जैसे प्राप्त होता जाता है, वैसे ही वैसे परम पद, मुक्ति, मोक्ष निकट आता जाता है। जब पूर्ण शौच प्राप्त हो जाता है, तो आत्मा बिलकुल निर्मल और निष्पाप हो जाता है। यही तो मुक्त अवस्था है।
साधना का कर्मयोग में परिवर्तन करने का यह सत्य योग है। अथवा यों कहिये कि राज योग की आत्मा कर्मयोग के वस्त्र पहनकर सत्य योग के नवीन रूप में संसार में अवतार ले रही है।
साधना के अंतर्गत इस प्रकार आ जावेंगे-
साधना नहीं वरन् साध्य, ध्येय, लक्ष समझकर इस नवधा भक्ति से ऊपर रखा है। यों भी कहा जा सकता है कि शौच के अंतर्गत यह सारी साधना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-May
साधना करता। जन्म भूमि तो उसकी कहीं दूर देश थी, पर अब रहता यहीं था। बहुत कम लोग उसके बारे में कुछ जानते थे, पर इतना सब जानते थे कि यह आदर्शवादी युवक निर्मल चरित्र का है, ईश्वर भक्ति में लीन रहना और प्रेम का प्रचार करना इसका कार्य-क्रम है।
साधना। मेरी साधना के साधकों पर दुनिया की शक्ति ठिठक जाती है लेकिन जब तक तुम पुजारी न बनोगे, लाख यत्न करने पर भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, कहिए ऐसी हाट वाला मैं कौन हूँ?
साधना में प्रवृत्त हो जाइए! त्याग और सेवा को अपना साधन बनाइये, आरम्भ अपने घर से कीजिए। आज से ही अपनी पुरानी दुर्भावनाएं मन के कोने 2 में ढूंढ़ कर निकालिए और उन्हें झाड़ बुहार कर दूर फेंक दीजिए। प्रेम की उदार भावनाओं से अन्तःकरण को परिपूर्ण कर लीजिए और सगे सम्बन्धियों के साथ त्याग एवं सेवा का व्यवहार करना आरम्भ कर दीजिए। कुछ ही क्षणों के उपरान्त आप एक चमत्कार हुआ देखने लगेंगे। आप का यही छोटा सा परिवार जो आज शायद कलह-क्लेशों का घर बना हुआ है, आप को सुख शान्ति का स्वर्ग दीखने लगेगा।
साधना। मूल्य 1 रुपया
साधना है, न त्याग है और न संन्यास है। यह तो एक प्रकार की आत्महत्या ही कही जायगी।
साधना के साधकों पर दुनिया की शक्ति ठिठक जाती है लेकिन जब तक तुम पुजारी न बनोगे, लाख यत्न करने पर भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, कहिए ऐसी हाट वाला मैं कौन हूँ?
साधना आरम्भ कीजिए। शिक्षा और दीक्षा से अपने प्रियजनों के अन्तःकरणों में ज्ञान की ज्योति जलाइये, उन्हें सत् असत् का विवेक प्राप्त करने में सहायता दीजिए, परन्तु सावधान, यह कार्य गुरु की तरह आरम्भ न किया जाय, अहंकार का इसमें एक कण भी न हो, वरन् सेवा का दूध अहंकार की खटाई से फट जायगा। अहंकार पूर्वक उपदेश करेंगे, तो तिरस्कार और उपहास ही हाथ लगेगा। इसलिए जिसमें जो सुधार करना हो वह विनयपूर्वक उसे सलाह देते हुए कहिए या करिए। “धीरे धीरे, बार बार और सद्भावना से” ढाक को चन्दन और कौए को हंस बनाया जा सकता है।
साधना आरंभ करता है और अपने आश्रितों को मानसिक और भौतिक दृष्टि से ऐसा स्वावलम्बी बना देता है कि घर में रहने या घर छोड़ने में कुछ अन्तर नहीं रह जाता। उसे किसी कारणवश परिव्राजक बनना पड़े तो घर वालों को कष्ट नहीं होता। आवेश में आकर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर किसी समस्या को सुलझाने में असमर्थ होने पर, गेरुआ कपड़ा पहनकर भिखारियों की श्रेणी में मिल जाना न तो ईश्वरभक्ति है, न मुक्ति साधना है, न त्याग है और न संन्यास है। यह तो एक प्रकार की आत्महत्या ही कही जायगी।
साधना थी, उसमें इधर-उधर हिलने के लिए कोई गुँजाइश न थी। कोई प्रलोभन उसे डिगा न सका। वेश्या खिन्न होती हुई लौट आई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-December
साधनामय बना हुआ है। तपस्या के कारण देवताओं की कृपा उन्हें प्राप्त हुई है या देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए वे तपस्या कर रहे हैं, बात चाहे जो भी हो परन्तु यह निर्विवाद है कि देवताओं की तपस्या से ही, इन सिद्धियों का अत्यन्त घना सम्बन्ध है इतिहास में भी ऐसे ही आख्यात मिलते हैं जिनमें तपस्या से प्रसन्न होकर किसी देवता का प्रकट होना और मनोवाँछा पूरी करना सविस्तार वर्णित है।
साधना द्वारा वश में किया जाता है। योग दर्शन में जिन ऋद्धि-सिद्धियों का वर्णन किया है वे देवियाँ हर किसी पर अनुग्रह नहीं करती। वरन् तपस्वियों पर ही प्रसन्न होती हैं। योग साधना करने वाले तपस्वी तथा कठोर वाममार्गी, हठ अनुष्ठान करने वाले तान्त्रिक ही ऋद्धि सिद्धियों को धारण किये हुए देखे जाते हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि भूत प्रेत चाहे भले ही किसी पर स्वेच्छा से विग्रह अनुग्रह करें पर ऊँची शक्ति वाले देवी देवता घोर आध्यात्मिक साधन करने वाले साधकों के ऊपर ही कृपा करते हैं सिद्ध लोगों के जीवन क्रम का रहन सहन का, आचार व्यवहार का परीक्षण किया जाए तो वे एक विचित्र ढंग के साँचे में अपने को ढले हुए मिलेंगे, साधारण व्यक्तियों से उनकी स्थिति बहुत ही भिन्न होगी।
साधना करने वाले तपस्वी तथा कठोर वाममार्गी, हठ अनुष्ठान करने वाले तान्त्रिक ही ऋद्धि सिद्धियों को धारण किये हुए देखे जाते हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि भूत प्रेत चाहे भले ही किसी पर स्वेच्छा से विग्रह अनुग्रह करें पर ऊँची शक्ति वाले देवी देवता घोर आध्यात्मिक साधन करने वाले साधकों के ऊपर ही कृपा करते हैं सिद्ध लोगों के जीवन क्रम का रहन सहन का, आचार व्यवहार का परीक्षण किया जाए तो वे एक विचित्र ढंग के साँचे में अपने को ढले हुए मिलेंगे, साधारण व्यक्तियों से उनकी स्थिति बहुत ही भिन्न होगी। यह भिन्नता प्रकट करती है उनका जीवन साधनामय बना हुआ है। तपस्या के कारण देवताओं की कृपा उन्हें प्राप्त हुई है या देवता की कृपा प्राप्त करने के लिए वे तपस्या कर रहे हैं, बात चाहे जो भी हो परन्तु यह निर्विवाद है कि देवताओं की तपस्या से ही, इन सिद्धियों का अत्यन्त घना सम्बन्ध है इतिहास में भी ऐसे ही आख्यात मिलते हैं जिनमें तपस्या से प्रसन्न होकर किसी देवता का प्रकट होना और मनोवाँछा पूरी करना सविस्तार वर्णित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-September
साधना कहते वे प्रतिगामी॥
साधना। मूल्य 1 रुपया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-June
साधना, घर गृहस्थी के बीच रह कर किस प्रकार हो सकती है इसका मर्म जानकर मुझे बहुत ही सन्तोष हुआ। अन्यान्य शंकाओं का समाधान प्राप्त करते हुए भी अतीव शान्ति उपलब्ध हुई। मैं सदैव से सत्संग का प्रेमी रहा हूँ और अनेक महापुरुषों के चरण स्पर्श करके कृताकार्य हुआ हूँ पर इस विलक्षण आत्मा में जो दिव्य विभूति मैंने पाई, वह अन्यत्र बहुत ही कम देखने में आती है। पूर्वीय और पाश्चात्य तत्वज्ञान का धुरन्धर विद्वान वज्र की तरह कठोर कर्मनिष्ठ यन्त्र की तरह निरन्तर कार्य में लगा रहने वाला बालक की तरह निष्कपट एवं सरल पुष्प की तरह पवित्र यह निर्धन धर्म प्रचारक अपने ढंग का एक अनोखा पुरुष है जिसकी सादगी सरलता निराभिमानता और सहृदयता देखते ही बनती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-March
साधनाओं द्वारा दिव्य शक्तियाँ प्राप्त करना चाहते हैं, पर उनमें से अधिकाँश को सफलता नहीं मिलती। कारण यह है कि वे सूक्ष्म कारण और लिंग शरीरों द्वारा उतना काम लेना चाहते हैं, जितना कि वे करने में असमर्थ होते हैं, जिस प्रकार भारी बोझा उठाने के लिये मजबूत शरीर चाहिए, उसी प्रकार गहन आत्मिक क्रियाओं को करने के लिये स्वस्थ शरीर की आवश्यकता है।
साधना। मूल्य 1 रुपया
साधना को पूरा नहीं कर पाता और अपने मान सम्मान एवं निर्दोष बनने के लिये अभ्यास प्रणाली अथवा उस महा विज्ञान में दोष लगाता है।
साधना को कुछ दिन नियमपूर्वक करके देखें तो उन्हें संतोषजनक लाभ प्राप्त हो सकता है।
साधनाओं में स्थूल शरीर को उतना परिश्रम नहीं करना पड़ता, जितना कि भीतरी शरीरों को। जब वे निर्बल-दुर्बल या जीर्ण-शीर्ण होते हैं तो अपने दैनिक कर्तव्यों को भी ठीक तरह पालन नहीं कर पाते, फिर योग साधना जैसे कठिन व्यायामों का करना तो उनके लिये दुरूह होता है। अभ्यासी प्रयत्न तो करता है, लेकिन जैसे एक छोटा बालक भारी पत्थर को नहीं उठा पाता, उसी प्रकार वह भी उस साधना को पूरा नहीं कर पाता और अपने मान सम्मान एवं निर्दोष बनने के लिये अभ्यास प्रणाली अथवा उस महा विज्ञान में दोष लगाता है।
साधना में सफल होना कठिन न रहेगा।
साधनावस्था में सत्संग जितना ही अधिक होता है, उतना ही मंगल होता है।
साधना और इन्द्रिय-लिप्सा के लिये बहुत भोगों की इच्छा करता था, बहुत संग्रह करता था, अब उसकी समाप्ति करता हूँ। अपने लिये दूसरों की वस्तु छीनने की नीति का परित्याग करता हूँ।
साधना जैसे कठिन व्यायामों का करना तो उनके लिये दुरूह होता है। अभ्यासी प्रयत्न तो करता है, लेकिन जैसे एक छोटा बालक भारी पत्थर को नहीं उठा पाता, उसी प्रकार वह भी उस साधना को पूरा नहीं कर पाता और अपने मान सम्मान एवं निर्दोष बनने के लिये अभ्यास प्रणाली अथवा उस महा विज्ञान में दोष लगाता है।
साधना ऐसी है, जिसमें तत्क्षण आनन्द का प्रादुर्भाव होता है। ध्यान से उठने पर शान्ति मिलती है, चिंताएं चली जाती हैं और चेहरे पर प्रसन्नता की किरणें प्रस्फुटित होने लगती हैं।
साधना से पहले आवश्यक है कि अपने शरीर को स्वस्थ और बलवान बनावें।
साधना जैसे महत्वपूर्ण विधान में पारंगत होने से पहले हमें उसके मूल आधार को सुदृढ़ करना होगा। महर्षि पतंजलि ने आरम्भ में यम नियमों का विधान किया है, जिसका तात्पर्य है, सबसे पहले शरीर और मन को स्वस्थ बनाना चाहिए, तदुपरान्त आसन प्राणायाम आदि के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
साधना का सफल होना भी सम्भव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-October
साधना की-आरंभिक तपोभूति इस प्रथा को निस्संकोच कहा जा सकता है। दूसरे देशों में लड़का सयाना होते ही बहू को साथ लेकर पक्षी की तरह अलग घोंसला बना लेता है और माता-पिता से अपना सम्बन्ध त्याग देता है। कहते हैं कि-”न्यारा पूत पड़ौसी जैसा!” माँ-बाप से अलविदा होकर लड़के ने अपनी गृहस्थी अलग बसा ली, फिर उनके बीच एक बहुत ही पतला-लोक दिखावे का सम्बन्ध सूत्र रह जाता है। आज पाश्चात्य देश पृथक कुटुम्ब प्रथा के सुखों और सुविधाओं को भली प्रकार प्रकट करते हैं, वे साबित कर देते हैं, कि जितना ही छोटा कुटुम्ब होगा, उतना ही वह सूखी स्वतन्त्र एवं उन्नतिशील होगा। भौतिक दृष्टि से उनकी बात मानने में हमें कोई आपत्ति नहीं हैं, एक दूसरे पर गुर्राने वाले कबूतरों का भरा दरबार सदा दुख-दारिद्र का ही घर बना रहेगा, जब कि एक-एक जोड़ा तीतर आनन्द की किलकारियाँ मारता फिरता है और अपना गौरव प्रकट करने का अवसर पाता है।
साधना में भी सब लोग प्रवृत्त मिलेंगे, कोई भी व्यक्ति इस कार्यक्रम से पृथक-सच्चिदानन्द की उपासना से विरक्त दिखाई न पड़ेगा। इस तरह जब हम गम्भीर दृष्टि से मनुष्य के स्वभावजन्य मूलभूत धर्म की खोज करते हैं, तो ‘सच्चिदानन्द की उपासना’ इसी तत्व को प्राप्त करते हैं।
साधना अन्वेषण, आविष्कार, खोज, परीक्षण, वादविवाद, यात्रा, समारोहों में सम्मिलित होना, नवीन वस्तुओं का देखना, इस श्रेणी के कार्य गुप्त विषयों की जानकारी के लिए होते हैं। समाज में रहना, मित्र बढ़ाना, संगठन में बंधना, दल बनाना, कम्पनी खोलना, साझा करना आदि कार्यों के द्वारा मनुष्य दूसरों की योग्यताओं की जानकारी प्राप्त करना एवं उनकी सामूहिक अनुभूतियों के आधार पर अपनी ज्ञान चेतना में वृद्धि होने के लाभ उठाना चाहता है। इस प्रकार रहस्यान्वेषण को अपना प्रिय विषय बनाकर हम अल्पज्ञता से सर्वज्ञता की ओर बढ़ना चाहते हैं। अपने संसार के और अदृश्य विषयों के रहस्य से परिचित होने के लिए ज्ञान की तीव्र पिपासा को जीव अपने अन्दर धारणा किये हुए है। शिक्षालय, योग साधनाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकें, समाचार पत्र, रेडियो, मनुष्य की इसी महान मानसिक क्षुधा के निवारणार्थ-ज्ञानवृद्धि के निमित्त प्रयत्न कर रहे हैं।
साधनाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकें, समाचार पत्र, रेडियो, मनुष्य की इसी महान मानसिक क्षुधा के निवारणार्थ-ज्ञानवृद्धि के निमित्त प्रयत्न कर रहे हैं।
साधना करते हुए संन्यास का अमर फल प्राप्त किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-April
साधना पूरी होने पर जो विभूतियाँ प्राप्त होंगी, उनकी कल्पना करता हुआ, तलवार हाथ में लेकर डाकू आगे बढ़ा।
साधना क्यों न हो मैं उसे पूरी करूंगा। गुरु ने उससे कहा- बेटा! तुम्हें एक हजार मनुष्यों का वध करना पड़ेगा। युवक ने यह स्वीकार कर लिया और वह तलवार लेकर जंगल की ओर चल दिया।
साधना में जो कठोर कार्य करने पड़ते हैं उन्हें तुम कैसे कर सकोगे?’
साधना दीक्षितों को बताई जाएगी, जिसकी शक्ति से विपत्तियों से बचा जा सके। इस सम्मिलित अनुष्ठान का फल एक सूत्र में बँधे हुए सभी सदस्य समान रूप से पा सकेंगे। यह सहायता कितनी बहुमूल्य होगी, इसको आगामी समय भली प्रकार सिद्ध कर देगा। उसकी विशेष चर्चा करके अनधिकारी लोगों का ध्यान भर आकर्षित करने का हमारा विचार नहीं है। इसलिए धर्म-प्रिय, सात्विक वृत्ति की आत्माओं को ही संकेत रूप में यह गुप्त निमन्त्रण दिया जा रहा है।
साधना। मूल्य 1 रुपया
साधनाओं का उल्लेख होगा। जो सब प्रकार सरल और किसी भी प्रकार की हानि से रहित होंगी।
साधना के लिए मुझे मद्यपान करना पड़ता है। तुम मेरे सब से प्यारे शिष्य हो। यदि तुम तन्त्र विद्या सीखना चाहो तो मैं तुम्हें सिखा सकता हूँ।
साधना छिपी हुई है। चोर ने उसी दिन से बुरे कर्म करना छोड़ दिया और सत् कर्म करने लगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-August
साधना नहीं कर सका तो भी सद्ग्रन्थों का कई बार स्वाध्याय करने से चित विशुद्धि काफी परिणाम में हुई हैं। मेरी इस उन्नति का मुख्य कारण स्वाध्याय प्रेम है, परन्तु वह प्रेम भी तो साधु समागम के कारण ही उत्पन्न हुआ, अतएव मैं उसी को मुख्य मानता हुआ पाठकों का ध्यान साधु समागम एवं सद्ग्रन्थों के निरंतर स्वाध्याय की और विशेष रूप से आकर्षित करता हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-January
साधना पथ में अपने को उत्तरोत्तर अग्रसर होने दें, यही कामना है। शुभमस्तु।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1942-July
साधनाएँ हैं, जिनसे भगवती शक्ति को प्रसन्न करके उनसे इच्छित वरदान प्राप्त किया जा सकता है। आपने जो भी अपना कार्य बनाया हो जो भी जीवनोद्देश्य बनाया हो, उसे पूरा करने में जी जान से जुट जाइए सोते-जागते उसी के सम्बन्ध में विचार करते रहिए और आगे को रास्ता तलाश करते रहिए। परिश्रम। परिश्रम। घोर परिश्रम!!! आपकी आदत में शामिल होना चाहिये मत सोचिये कि अधिक काम करने से आपको थकान लगेगी।
साधना के लिए निर्दोष व्यक्तियों की दुख देना हिंसा है। किन्तु निस्वार्थ भाव से लोक कल्याण के लिए तथा उसी प्राणी के उपकार के लिए यदि उसे कष्ट दिया जाय, तो वह हिंसा नहीं, वरन्, अहिंसा ही होगी। डॉक्टर निस्वार्थ भाव से रोगी की वास्तविक सेवा करने के लिए फोड़े को चीरता है, एक न्यायमूर्ति जज समाज की व्यवस्था कायम रखने के लिए डाकू को फाँसी की सजा का हुक्म देता है, एक धर्म प्रचारक अपने जिज्ञासु साधक आत्म कल्याण के लिए तपस्या करने के मार्ग पर प्रवृत्त करता है। मोटी दृष्टि से देखा जाय तो डॉक्टर का फोड़ा चीरना जज का फाँसी देना, गुरु का शिष्य को कष्ट में डालना, हिंसा और अधर्म जैसा प्रतीत होता है। पर असल में यह सच्ची अहिंसा है।
साधना। मूल्य 1 रुपया
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-December
साधना, प्रतिभा निखारने के लिए साहसपूर्ण प्रयास और अटूट धैर्य के कारण संभव हो सका। संभावना अभी भी है— सत्परिणाम आने के लिए आतुर है; यदि विचारशील वर्ग तथा भटके हुए किशोर युवक, पादरी और जाइगेर की अनुभूति कर सकें। इसकी शुरुआत जितनी शीघ्र हो उतना ही अच्छा है।
साधना सत्र सम्पन्न करते रहने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि वे न आ सकें तो शाँतिकुँज के प्रतिनिधियों की टोलियाँ ऐसे स्थानों पर भेजते रहने का प्रयत्न किया जायगा, जहाँ अधिक परिजन एक स्थान पर बैठकर एक पारिवारिक गोष्ठी स्तर का छोटा मिलन समारोह कर सकें। यह जीवन-प्राण चेतना का मिलन उपक्रम हुआ। इसकी आवश्यकता इसलिये पड़ती है कि अखण्ड ज्योति के पन्नों पर छपे प्रतिपादन मात्र विचार क्षेत्र को ही एक सीमा तक प्रभावित कर सकते है। वह कमी बनी ही रहती है, जो प्राण चेतना के निकटवर्ती होने पर एक नवीन चेतना का पारस्परिक प्रत्यावर्तन संभव दिखाती है जो दूर संचार की तरह छपे कागजों द्वारा एक सीमा तक ही बन पड़ता है।
साधना प्रयासों द्वारा करता है। दोनों मूल सत्ता के ही दो रूप हैं। विज्ञान— अध्यात्म उन्हें ही अपने-अपने ढंग से ढूँढ़ने का उपक्रम कर रहे हैं। दोनों के साथ रहने में ही समग्रता बनती है। अतः दोनों एकदूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
साधना इस स्तर का अर्पित किया जाएगा कि जिसमें उदासीनता का पुट नहीं, गहरी उमंगों का भावुक समावेश हो। इस प्रयास को परमार्थपरायणता की तैयारी कह सकते हैं। बद्ध जीव संकीर्ण स्वार्थपरता के छोटे दायरे में नाली के कीड़ों की तरह हाथ-पैर पटकता रहता है। गूलर के पेड़ों में उगते रहने वाले भुनगों की तरह अंधी हलचलें करता रहता है; पर जब उसके अंतराल में प्रेमभावना का उदय होता है तो ‘स्व’ को ‘पर’ में समर्पित करने के लिए वह आतुर हो उठता है।
साधना का एक ही उपाय-उपचार है— 'ध्यान'। तत्परता, तन्मयता, प्रतिक्रिया ही एकाग्रता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। महान प्रयोजन के साथ जुड़ते ही चंचलता चली जाती है और उद्देश्य के प्रति ऐसी लगन लगती है कि अन्य कहीं मन दौड़ता ही नहीं। मनोनिग्रह को शक्तियों का, सिद्धियों का, विभूतियों का केंद्र माना गया है। यह मनोयोग साधने के लिए ध्यानयोग का आश्रय लेना पड़ता है।
साधना का केंद्र बना लिया। उन्होंने अनेकों कृतियाँ लिखी, जिसे साहित्य समीक्षकों ने उत्तम कृति के रूप में सराहा।
साधना का पंद्रह मिनट से आरंभकर क्रमशः बढ़ाते हुए आधे घंटे तक पहुँचाने का निर्धारण करना चाहिए। इस प्रक्रिया से जो उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं, वे साधक को निहाल कर देती हैं।
साधनाओं आदमी की प्रीति गाओ,
साधना की आवश्यकता है। सामाजिकता का अभिनव गठन तभी संभव है, जब विज्ञान के प्रति हमारा दृष्टिकोण परिवर्तित हो। इसमें जीवन मूल्यों का समावेश हो। इसके लिए आवश्यक है— विज्ञान, दर्शन व धर्म का समन्वय। रूसो विज्ञान एवं दर्शन के समन्वय पर जोर देते हुए कहते हैं कि, "विज्ञान प्रस्तुत कर सकता है, तो दर्शन इस नई व्याख्या को अच्छी व्यवस्था का रूप दे सकता है।
साधना से सब कुछ शक्य है। जो भी इसमें जुटते हैं, उनके लिए सहायक परिस्थितियाँ अपने आप बनती चलती हैं। कभी एक मुजरिम रहे जाइगेर ने आगे चलकर समूचे विश्व की विचारणीय जनता को अपने साहित्य के द्वारा एक सर्वथा नई जीवन-दिशा दी। यह पादरी की प्रेरणा और उसके मन में जगे कर्त्तव्यबोध का संयुक्त परिणाम था। वह अपनी कर्म-साधना, प्रतिभा निखारने के लिए साहसपूर्ण प्रयास और अटूट धैर्य के कारण संभव हो सका।
साधना निराशा की अंधेरी गलियों में भटके राही के लिए प्रकाशदीप है। जिसके आलोक में हम अपना जीवन संवार-सुधार सकते हैं।
साधना-प्रक्रिया का तत्त्व दर्शन, प्रकृति की विलक्षणताओं की आध्यात्मिक विवेचना जैसे विषय तो रहेंगे ही। इन सब के प्रभाव से यह होने की आशा है कि सामयिक उज्ज्वल भविष्य की संरचना में अपनी आज की भूमिका के संबंध में किसी उपयोगी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके।
साधना में निरत यह कर्मयोगी थे—सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'।जिनके साहित्य में पीड़ित मानवता की वाणी गूँजती थी। जो स्वयं में एक औलिया फकीर की मस्ती में जीते थे। उनकी कर्म-साधना निराशा की अंधेरी गलियों में भटके राही के लिए प्रकाशदीप है। जिसके आलोक में हम अपना जीवन संवार-सुधार सकते हैं।
साधना यही है। अद्वैत चिंतन इसी को कहते हैं। तादात्म्यता में ही ईश्वरदर्शन का ऐसा रसास्वादन मिलता है, जिसकी प्यास में जीव कस्तूरी के हिरन की तरह दिशा-दिशा में तलाशता-भागता फिरता है।
साधना-संदर्भ एवं परामर्श-अनुदान की विशेष व्यवस्था की गई है। यों यहाँ पहले से ही एक-एक मास के युगशिल्पी सत्र और नौ-नौ दिन के साधना-सत्र निरंतर चलते रहे हैं, पर वर्ष 1990 में एक विशेष व्यवस्था बनाई गई है कि इस अवधि में मात्र अखण्ड ज्योति के स्थायी सदस्य ही शान्तिकुञ्ज आएँ और वे पाँच दिन का एक सत्र संपन्न करें। पाँच-पाँच दिन के सत्र इसलिए रखे गए हैं कि लाखों परिजनों को इस एक वर्ष में ही अभीष्ट प्रेरणा देकर लाभान्वित किया जा सके। हर महीने पाँच सत्र होंगे (1) ता. 1 से 5 (2) ता. 7 से 11 (3) ता. 13 से 17 (4) ता. 19 से 23 (5) ता. 25 से 29; बीच का एक-एक दिन आने-जाने वालों की सुविधा के लिए छोड़ा है। इसके लिए शान्तिकुञ्ज में भी अखण्ड ज्योति परिजनों की एक नई सूची रखी जाने की व्यवस्था की गई है, ताकि जब वे आने का आवेदन करें, तो उनके संबंध में आवश्यक जानकारी यहाँ सहज ही तत्काल मिल जाए और मथुरा से सूचनाएँ मँगाने-भेजने में व्यर्थ समय नष्ट न हो।
साधना करने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए गए थे। वसुदेव पुत्र भी संदीपन आश्रम की पढ़ाई के साथ बहुत कुछ साथ लेकर लौटे थे। बुद्ध विहारों ने धर्मचक्र-प्रवर्तन में, देखने में साधारण, किंतु पुरुषार्थ में अत्यंत शक्तिशाली महामानव विनिर्मित करके दिए थे। नालंदा, तक्षशिला की इमारतें भले ही साधारण रहीं हों, पर उन खदानों में ऐसे नररत्न उभरे, जिनने समूचे वातावरण को अपने समय में ऊर्जा और आभा से भर दिया। पुरातन गुरुकुलों का इतिहास भी ऐसा ही है।
साधना हैं, जिसे धर्मधारणा कहा जाता है। इसका स्वरूप है— अव्यवस्था को व्यवस्था में और अनगढ़ता को संस्कारिता में बदलने वाले मार्गदर्शन हेतु कटिबद्ध होना। यही सच्चा नेतृत्व है। इसी पर वैयक्तिक और साहसिक प्रगति का आधार बनता है। लोग अभावों से जितने पीड़ित हैं, उसकी अपेक्षा कहीं अधिक इसलिए दुःखी हैं कि वे प्रगति र्और शांति का मार्ग ढूँढने और अपनाने का सुयोग प्राप्त न कर सके।
साधना-सत्र निरंतर चलते रहे हैं, पर वर्ष 1990 में एक विशेष व्यवस्था बनाई गई है कि इस अवधि में मात्र अखण्ड ज्योति के स्थायी सदस्य ही शान्तिकुञ्ज आएँ और वे पाँच दिन का एक सत्र संपन्न करें। पाँच-पाँच दिन के सत्र इसलिए रखे गए हैं कि लाखों परिजनों को इस एक वर्ष में ही अभीष्ट प्रेरणा देकर लाभान्वित किया जा सके। हर महीने पाँच सत्र होंगे (1) ता. 1 से 5 (2) ता. 7 से 11 (3) ता. 13 से 17 (4) ता. 19 से 23 (5) ता. 25 से 29; बीच का एक-एक दिन आने-जाने वालों की सुविधा के लिए छोड़ा है। इसके लिए शान्तिकुञ्ज में भी अखण्ड ज्योति परिजनों की एक नई सूची रखी जाने की व्यवस्था की गई है, ताकि जब वे आने का आवेदन करें, तो उनके संबंध में आवश्यक जानकारी यहाँ सहज ही तत्काल मिल जाए और मथुरा से सूचनाएँ मँगाने-भेजने में व्यर्थ समय नष्ट न हो।
साधना को सुचारु रूप से किसने गतिमान किया? यह और कोई नहीं, उनकी पत्नी थी— श्रीमती जेनी मार्क्स। इन्हें उतना ही श्रेयभाजन समझा जा सकता है, जितना कि स्वयं मार्क्स, बल्कि कुछ अर्थों में उनसे भी अधिक।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-October
साधना क्रम में इससे मनकी एकाग्रता सधती है और अभ्यास क्रम में बढ़ते हरने पर वह अतंतः समाधि स्थिति तक साधक को पहुँचा देती है।
साधनाओं में लगे लोगों के लिए ही सम्भव है। जन सामान्य के लिए थके मन को राहत दिलाने का काम मनोरंजन के द्वारा ही बन पड़ता है। इसी कारण थक जाने के बाद लोग सिनेमा-टी.वी. देखने, गीत संगीत सुनने, कहानी, चुटकुले पढ़ने में खाली समय लगाकर मन को बहलाते हैं।
साधना का भी अन्तिम लक्ष्य यही है। ऋषि ने देवदूत के प्रश्न का उत्तर देते हुए अपनी आन्तरिक आकाँक्षा इतने भर में व्यक्त कर दी कि उन्हें स्वर्ग नहीं चाहिए, न राज्य चाहिए न मुक्ति। मात्र इतनी इच्छा है कि दुख-दैन्य से घिरे हुए प्राणियों की व्यथा निवारण के कुछ काम आ सकूँ। वस्तुतः ऐसे ही देवात्मा बिना कन्दराओं के खोजे, जनसाधारण के बीच रहते हुए अपनी उदारता का परिचय देते हुए उसी पद को प्राप्त करते हैं जो तपस्वियों के लिए निश्चित है, निर्धारित है।
साधना का क्रम चला अबाध,
तभी पा सका सूर्य, शशि गगन।
बन सकी तभी व्यवस्थित सृष्टि,
साथ-रत रहा सृष्टि करतार॥
साधना करें॥
धरा पर स्वर्ग-अवतरण हेतु
साधना ही सक्षम आधार॥
साधना का महत्व बन जाता है। अग्निकाण्ड, भूकम्प, बाढ़ दुर्भिक्ष, महामारी आदि की विपत्तियों से जन समुदाय को बचाने के लिए जो भावना पूर्वक जुटते और उदार सेवा साधना का परिचय देते हैं, उन्हें आत्म संतोष भी मिलता है और लोक सम्मान भी। साथ ही दैवी अनुग्रह का प्रत्यक्ष रसास्वादन करने का अक्सर भी हाथों हाथ उपलब्ध होता है। तप साधना का भी अन्तिम लक्ष्य यही है। ऋषि ने देवदूत के प्रश्न का उत्तर देते हुए अपनी आन्तरिक आकाँक्षा इतने भर में व्यक्त कर दी कि उन्हें स्वर्ग नहीं चाहिए, न राज्य चाहिए न मुक्ति।
साधना मूलतः भाव, ज्ञान और कर्म के अदृश्य तथ्यों पर निर्धारित हैं पर सर्व साधारण को दृश्यमान परिचय प्राप्त हो सके, इसके लिए बाहर वर्षीय प्रत्यक्ष पुरश्चरण की आवश्यकता पड़ी। उपयुक्त वातावरण बनाने, इसे अपनाने और प्रवाह में बहने की इससे आशा की गई है। सन् 89 के आरंभ से ही युगसंधि पुरश्चरण शान्तिकुँज हरिद्वार में विधिवत् आरंभ हो गया है। प्रज्ञा संस्थानों और प्रज्ञा मण्डलों में उसकी छोटी अनुकृतियाँ साप्ताहिक सत्संगों के रूप में हो रही हैं। दीपयज्ञ के विशालकाय समारोह इसी संदर्भ में हो रहे हैं और भी अनेक गतिविधियों का उद्घाटन, शुभारंभ विस्तृतीकरण अपने ढंग से हो रहा है, जिनका प्रत्यक्ष परिचय परिजनों को समय-समय पर मिलता रहेगा।
साधना का अनुपम उपहार,
सृष्टि का यह सौंदर्य अपार॥
अनवरत चली किसी की साध,
जब कहीं हुआ सृष्टि का सृजन।
साधना अपना कर ही प्रगतिशीलता और वरिष्ठता का लाभ उपलब्ध होता है। शरीर का स्वाभाविक तापमान घटने पर .... आ दबोचती है। और मृत्यु आ धमकती हैं। ताप आवश्यक हैं। विषाणु उसी के प्रभाव से मरते हैं।
साधना साधारणतया त्राटक के आधार पर की जाती है। प्रत्यक्ष प्रकाशमान वस्तु को देखकर उसका स्वरूप नेत्रों में बन्द करके चिन्तन करते रहने की विधा को त्राटक साधना कहा गया है। इससे चर्म चक्षुओं में आत्म तेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है। योगाभ्यास परक साधना क्रम में इससे मनकी एकाग्रता सधती है और अभ्यास क्रम में बढ़ते हरने पर वह अतंतः समाधि स्थिति तक साधक को पहुँचा देती है।
साधना। इसी को सत्प्रवृत्ति संवर्धन या जन मानस का परिष्कार कहते हैं। सेवा धर्म का यही केन्द्र बिन्दु हैं।
साधना कहा गया है। इससे चर्म चक्षुओं में आत्म तेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है। योगाभ्यास परक साधना क्रम में इससे मनकी एकाग्रता सधती है और अभ्यास क्रम में बढ़ते हरने पर वह अतंतः समाधि स्थिति तक साधक को पहुँचा देती है।
साधना विधानों में प्रकाश का महत्वपूर्ण स्थान है। इसको माध्यम बनाकर आन्तरिक प्रकाश को जाग्रत किया जाता है। जिस प्रकार नव ग्रहों और उपग्रहों का केन्द्र सूर्य है। पृथ्वी का केन्द्र ध्रुव प्रदेश हैं। परमाणु का शक्ति केन्द्र ध्रुव प्रदेश है।
साधनाओं में नादयोग के रूप में मंत्रों में सन्निहित पराध्वनियों का उपयोग आत्मिक विकास के लिए प्रयुक्त करने की व्यवस्था है, पर विज्ञान ने इनका उपयोग विभिन्न प्रकार के शारीरिक मानसिक रोगों के उपचार में प्रयुक्त करने की विधा विकसित की है।
साधना द्वारा धरती पर रह कर भी स्वर्ग लोक में निवास काने वाले देवमानवों जैसे बन गये, दिव्य सम्पदाओं, विभूतियों और शक्तियों के अधिष्ठाता बने। कह जाता है कि तप के बल पर ही ब्रह्मा, विष्णु महेश अपने सुविस्तृत दायित्व वहन करते रहने में समर्थ होते हैं। तपस्वी भगीरथ ने गंगा को धरती पर उतार कर दिखाने का श्रेय पाया था। दधीचि की अस्थियाँ इन्द्रवज्र जैसी शक्तिवान तभी सिद्ध हुई जब वे दीर्घकालीन तप-साधना कर चुके। तपस्विनी पार्वती ने शिव को वरण कर सकने जैसे कठिन कार्य में तभी सफलता पायी, जब वे कठोर तप की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकीं।
साधना ही सक्षम आधार॥
साधना सत्रों का यही प्रधान उद्देश्य हैं।
साधना परक तपश्चर्या की साधना में जहाँ व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घंटे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का भी विधान हैं यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार वातावरण में सृजन चेतना के समावेश और नव निर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान के तीनों पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।
साधना में जहाँ व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घंटे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का भी विधान हैं यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार वातावरण में सृजन चेतना के समावेश और नव निर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान के तीनों पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।
साधना अपने आप में सम्पूर्ण व समग्र है। आचार्य शंकर अपनी रचना “अपरोक्षानुभूति” में इसका महत्व बताते हैं कि जिस प्रकार प्रकाश के बिना कभी पदार्थ का भान नहीं होता उसी प्रकार बिना विचार साधन के जीवन जीने की कला का बोध सम्भव नहीं।
साधना से भी बढ़कर सेवा साधना का महत्व बन जाता है। अग्निकाण्ड, भूकम्प, बाढ़ दुर्भिक्ष, महामारी आदि की विपत्तियों से जन समुदाय को बचाने के लिए जो भावना पूर्वक जुटते और उदार सेवा साधना का परिचय देते हैं, उन्हें आत्म संतोष भी मिलता है और लोक सम्मान भी। साथ ही दैवी अनुग्रह का प्रत्यक्ष रसास्वादन करने का अक्सर भी हाथों हाथ उपलब्ध होता है। तप साधना का भी अन्तिम लक्ष्य यही है। ऋषि ने देवदूत के प्रश्न का उत्तर देते हुए अपनी आन्तरिक आकाँक्षा इतने भर में व्यक्त कर दी कि उन्हें स्वर्ग नहीं चाहिए, न राज्य चाहिए न मुक्ति।
साधना इसी परम ज्योति के दर्शन कर जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के लिए की जाती है। साधक और सविता को एक बना देने का लक्ष्य अन्तःत्राटक द्वारा ही पूर्ण होता है। दिव्य दृष्टि इसी से खुलती और ज्योतिर्मय बनती है। प्रतिभा उन्नयन का आधार भी यही हे।
साधना करें।
साधना-सामर्थ्य
साधना माध्यम से ही हो सकता है।
साधना क्षेत्र में उतरना ही एक मात्र उपाय है। अन्तःक्षेत्र का परिशोधन परिमार्जन करना पड़ता है। मलीनताएँ सम्मिश्रित किये रहने पर उसका मूल्याँकन ठीक नहीं हो पाता। जमीन से धातुएँ जब निकलती हैं तो उन सब के साथ मिट्टी मिली होती है। आग की प्रचंड भट्ठी में डालकर उसे तपाना- पिघलाना पड़ता है।
साधना ही है।
साधना ऐसी है, जिस अपना कर काम काजी व्यक्ति भी सामान्य जनों जैसा गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी अपने साथ अनेकानेकों की प्रतिभा परिष्कार कर सकने में सफल, समर्थ हो सकता है। यह युग संधि का आपत्ति काल है। इसमें अवांछनियताओं से जूझना आपत्ति धर्म है। साथ ही वातावरण को सुधार-परिष्कार की ऊर्जा से भर देना भी महत्वपूर्ण कार्य हैं। इन दिनों इस प्रक्रिया को प्रतिभा परिष्कार के लिए अपनाया जाना चाहिए।
साधना से इसका उन्मीलन संभव होता है।
साधना और कष्ट साध्य तितिक्षा का भी है, पर वह हर किसी के लिए अनिवार्य नहीं। सदुद्देश्यों के लिए प्रचंड पुरुषार्थ भी एक प्रकार का सर्वसुलभ तप है। उसे अपनाकर असंख्य लोक सेवी अपना और संसार का भला करने और हर दृष्टि से धन्य बनने में समर्थ हुए हैं। गान्धी विनोबा, विवेकानन्द, दयानन्द जैसों की तपश्चर्या सेवा संदर्भ से ही जुड़ी रही उनने अपने को इतना परिष्कृत किया कि उनका व्यक्तित्व दूसरों पर गहरी छाप छोड़ सके और अपनाये हुए कठिनाइयों से भरे मार्ग पर अनेकों को चला सकने में सफल हो सके। इसके अतिरिक्त उन्होंने लोक मंगल के लिए इतना सृजनात्मक प्रयास पुरुषार्थ किया कि उसका प्रभाव बहुमुखी अभ्युदय के रूप में सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत हुआ।
साधना के अंग रहें। श्रीमती शचीरानी गुर्दू के अनुसार वे सफल कवियित्री पटु राजनीतिज्ञ, कुशलता, सजग कार्य कर्त्री और साथ ही साथ सफल गृहणी भी थीं। सन् 25 में काँग्रेस के कानपुर अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने यह सिंह गर्जना की कि देश व समाज के नवसृजन काल में कायरता सबसे अक्षम्य अपराध और निराशा सबसे बड़ा भयानक पाप हैं।
साधना मात्र उसी के हिस्से में आई है इसी कारण उसे ईश्वर का युवराज कहा जाता है। सृष्टि का मुकुटमणि भी।
साधना की नाव खेते हैं और सत्य के परम लक्ष्य तक जा पहुंचते हैं। युग परिवर्तन यही व्यक्ति कर पाते हैं।
साधना के धीन आदर्शपूर्ण लक्ष्य पर चट्टान की तरह अटल रहते है।
साधना करते हैं। माता का अजस्र वात्सल्य भी सन्तान पर इसी हेतु बरसता है। तत्वज्ञानी जब जीवन और महिमा पर विचार करते हैं तो उन्हें इसी में सार प्रतीत होता है कि द्वैत को अद्वैत में परिणत किया जाय। कामनाओं की भावनाओं में उलट दिया जाय मनुष्यों में उत्कृष्टता जिन्हें अर्पित की जाती है, वे पुरोहित और परिव्राजक अनने के पुण्य प्रयास में लगे होते हैं।
साधना का परिचय देते हैं, उन्हें आत्म संतोष भी मिलता है और लोक सम्मान भी। साथ ही दैवी अनुग्रह का प्रत्यक्ष रसास्वादन करने का अक्सर भी हाथों हाथ उपलब्ध होता है। तप साधना का भी अन्तिम लक्ष्य यही है। ऋषि ने देवदूत के प्रश्न का उत्तर देते हुए अपनी आन्तरिक आकाँक्षा इतने भर में व्यक्त कर दी कि उन्हें स्वर्ग नहीं चाहिए, न राज्य चाहिए न मुक्ति। मात्र इतनी इच्छा है कि दुख-दैन्य से घिरे हुए प्राणियों की व्यथा निवारण के कुछ काम आ सकूँ।
साधना के दो पक्ष है। एक तप दूसरा योग। तप का अर्थ है तपाना। किसी वस्तु को तपाने से जो उसमें अनावश्यक तत्व हैं वे हट जाते हैं और शुद्ध स्थिति की सुदृढ़ता उत्पन्न होती है। मिट्टी के बने पात्रों को गरम करने से वे सुदृढ़ और टिकाऊ हो जाते है।
साधना कर चुके। तपस्विनी पार्वती ने शिव को वरण कर सकने जैसे कठिन कार्य में तभी सफलता पायी, जब वे कठोर तप की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकीं। ध्रुव, प्रहलाद की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। सप्तऋषियों को वरिष्ठता इसी आधार पर मिली भी। अपने समय में भी महर्षि अरविंद, रमण, पौहारी बाबा आदि की साधनाओं द्वारा उत्पन्न हुए प्रतिफल का गंभीरता पूर्वक मूल्यांकन किया जाता है।
साधना के युग की पूर्णाहुति होगी। इन ग्यारह वर्षों में एक लाख प्राणवान कार्यकर्ता कार्य क्षेत्र में उतार दिये जायेंगे दस वर्ष जीवित रहने के अवकाश शायद हमें न मिले। क्योंकि अन्य अत्यन्त प्रचण्ड चोर्ये इतने विशालकाय हैं जिन्हें सूक्ष्म शरीर की शक्ति से ही तोड़ा जा सकता है। इस विवशता में हमारा स्थूल शरीर अदृश्य हो सकता है, फिर भी अपने वर्तमान दायित्वों को हम शान्तिकुँज में अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहते हुए भी उससे अधिक अच्छी तरह चलाते रहेंगे, जितना कि प्रत्यक्ष शरीर द्वारा कर पाते हैं। हमारी लेखनी बराबर चलती रहेगी, भले ही उसका रेखाँकन किन्हीं अन्य हाथों से होता दिखायी पड़े।
साधनाओं द्वारा उत्पन्न हुए प्रतिफल का गंभीरता पूर्वक मूल्यांकन किया जाता है।
साधनाओं को इसी निमित्त नियोजित करते हैं कि उनका लगाव क्रियाशीलता और कल्पना की प्रतिक्रिया से यथा सम्भव वितर होता चले। स्वार्थ की सीमा से उछलकर परमार्थ संवेदनाओं में वे प्रवेश कर सकें।
साधना की जाती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-May
साधना के विधि विधान का यह परम प्रयोजन है। प्रचलित समस्त कर्मकाण्ड इन्हीं तीन प्रयोजनों के इर्द गिर्द परिभ्रमण करते हैं। उस कर्मकाण्ड की कोई उपयोगिता नहीं, जो जीवनक्रम को प्रभावित न करे, मात्र पूजा-उपचारों की लकीर तो पीटे, पर व्यक्तित्व के किसी क्षेत्र को प्रभावित न करें।
साधना का आश्रय लेने वाला साधक धीरे धीरे इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह इसी साधना से समाधि तक पहुँच जाता है। सुप्रसिद्ध मनीषी सर जान वुडरफ ने भी अपने ग्रन्थ “गारलैण्ड आफ लेटर्स” में लिखा है कि मंत्र या शब्दों की विशेष रचना में गुप्त दिव्य शक्तियों का पुँज बना देती है।
साधनाओं की उच्चस्तरीय क्रिया-पद्धति में नियोजित किया जा सकता है। किसी देव प्रतिमा या महामानव के चित्त जमाकर उसके साथ तन्मय होने की भाव साधना भी ध्यान कहलाती है। ऐसा आए दिन कई-कई बार करते रहने से मनोनिग्रह की सिद्धि मिलती है। निग्रहित मन वाला लक्ष्य के साथ तन्मयता अपना कर बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त करता है।
साधना का उपक्रम जारी रहेगा। गायत्री जप अनुष्ठान, स्वर्णिम सविता का ध्यान, अग्निहोत्र और उपवास के आधार पर .चलने वाली यह साधना अपने प्रतिष्ठा क्षेत्र की प्रयोगशाला में ऐसे प्रवाह प्रवाहित कर सकेगी जो अदृश्य अन्तरिक्ष और अनुकूलता की दिशा में गति देने से लेकर साधनारत व्यक्तियों को भी परिष्कृत व्यक्तित्व के निर्माण में प्रेरणा दे सके।
साधना कर चुकी हैं। प्रारब्धवश पुनः इन्हें जन्म लेना पड़ा और वह भी अमेरिका में। फिर भी इनकी अन्तर्चेतना सदैव भारत से जुड़ी रहेगी। वह भारत जो साँस्कृतिक विरासत का धनी है और अगले दिनों विश्व का नेतृत्व करेगा। जीन के माता-पिता ने हँसते हुए क्रिस्टल बॉल खिलौने के रूप में खेलने के लिए उन्हें दे दी।
साधना में इसी रंग को प्रमुखता दी जाती है। इसे श्रद्धा, भक्ति एवं सत्याचरण की भावना को प्रेरित- उद्वेलित करने वाला माना गया है।
साधना का खाद पानी पाकर मनुष्य क्षुद्र से महान बनता हैं छोटा अंकुर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है। शक्तियों से आत्मसत्ता का भण्डार भरता है।
साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
साधना शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है। श्रीमद्भागवत 2/3/29 में कहा गया है- ब्रह्मतेज की इच्छा वाले को ब्रह्मा की, इन्द्रियभोगों के लिए इन्द्र की, सन्तान के लिए प्रजापति की, सौभाग्य के लिए दुर्गा की, तेज के लिए अग्नि की, धन के लिए वस्तुओं की, वीर्य के लिए रुद्र की एवं अन्न के लिए आदित्यों की, राज्य के लिए विश्वेदेवता की, लोक-प्रियता के लिए साध्यगण की, दीर्घायु के लिए अश्विनी कुमारों की, पुष्टि के लिए वसुन्धरा की, प्रतिष्ठा के लिए अन्तरा देवता की आराधना करनी चाहिए। यश के लिए यज्ञ की, विद्या के लिए शंकर की, दाम्पत्य के लिए गौरी की, रक्षा के लिए यज्ञों की, भोगों के लिए चन्द्रमा आदि देवताओं की उपासना करने से अभीष्ट की पूर्ति होती हैं। परन्तु जिसे कोई इच्छा न हो अथवा मोक्ष का आकाँक्षी साधक परमात्मा की उपासना करें।
साधना में निरत थीं, तब उन्होंने पूर्व दिशा से एक कौंधती हुई बिजली की लहर देखी एवं उसमें एक भारतीय वेशभूषाधारी महिला के गोद में एक सुन्दर गौरवर्ण बच्चा देखा। उस बालक के मस्तक पर अर्धचन्द्र बना हुआ था। इस अलंकारिक भविष्यवाणी की व्याख्या करते हुए कहती हैं कि यह बालक आने वाले युग के क्रान्तिकारी विचार प्रवाह का प्रतीक है जो संघशक्ति का समन्वित रूप भी हो सकता है अथवा संस्कृति .... करने वाला एक देवदूत .... वह आशय नहीं लिया जाना चाहिए कि वह बालक रूप में उन क्षणों में ही जन्मा है जिनमें ध्यानरत जीन डिक्सन ने उसकी झलक देखी। बालक से आशय है उसका निश्छल, भोलाभाला, निष्कलंक सत्ता के रूप में होना, चाहे शारीरिक आयु कितनी ही क्यों न हो।
साधना में भिन्न-भिन्न रंग संवेदनाओं का प्रयोग प्रमुख विधा के रूप में किया जाता रहा है। यह प्रभाव उथली संवेदनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर आध्यात्मिक विकास में अतीन्द्रिय क्षमताओं के उन्नयन में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने लगता है। उचित वर्ण का चुनाव कर उनसे लाभ उठा सकना हर किसी के लिए संभव है।
साधना में इन्हीं सब प्रयोजनों को पूरा करना पड़ता हैं व्यष्टि सत्ता को समष्टि सत्ता से जोड़ने के लिए मन को बार-बार स्मरण दिलाया जाता है क्योंकि वही आत्मा और परमात्मा की मध्यवर्ती कड़ी है। जप द्वारा अनभ्यस्त मन को सही रास्ते पर लाया जाता है और उसे प्रशिक्षित करके ईश्वरीय चेतना को मानस पटल पर जमाया जाता है ताकि उपयोगी प्रकाश की अंतःकरण में स्थापना हो सके। कुएँ की जगत पर लगे पत्थर पर रस्सी की रगड़ बहुत समय तक करते हरने से उसमें निशान बन जाते है। फिर कोई कारण नहीं कि भगवत् नाम को बहुत समय तक दुहराते रहने का गहराई तक जप सकना संभव न हों।
साधना है। सादगी, सज्जनता, संयम, सेवा, के प्रयासों को जीवन व्यवहार के साथ जोड़कर ईश्वर उपासना का प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो जाता है। सृष्टि में इतने जीवधारी हैं पर कोई पूजा पाठ नहीं करता। इन दिनों आधी आबादी नास्तिक वर्ग की है। उन्हें न ईश्वर की मान्यता के प्रति विश्वास है और न पूजा पाठ से सम्बन्ध।
साधना द्वारा सर्वव्यापी सत्ता की अखण्ड अनुभूति। मंत्रयोग अर्थात् मंत्र जप द्वारा आत्म चेतना क ब्रह्म चेतना से समरसता प्राप्त करने का प्रयास। कर्मयोग को प्रखर कर्मनिष्ठ एक जीवन साधना कहा गया है। हठयोग यानी पूर्ण स्वस्थता के लिए की जाने वाली विशिष्ट शारीरिक मानसिक क्रियाओं का साग्रह अभ्यास।
साधना और आराधना के तीन वर्ग। इनसे आत्मा सत्ता के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों ही कृतकृत्य होते हैं। आध्यात्म तत्वज्ञान और योग साधना के विधि विधान का यह परम प्रयोजन है। प्रचलित समस्त कर्मकाण्ड इन्हीं तीन प्रयोजनों के इर्द गिर्द परिभ्रमण करते हैं। उस कर्मकाण्ड की कोई उपयोगिता नहीं, जो जीवनक्रम को प्रभावित न करे, मात्र पूजा-उपचारों की लकीर तो पीटे, पर व्यक्तित्व के किसी क्षेत्र को प्रभावित न करें।
साधना एवं पात्रता क आधार पर ही भवानी तलवार हस्तगत हुई थी। आद्य शंकराचार्य, विवेकानन्द, समर्थ गुरुरामदास, विनोबा आदि महापुरुषों की प्रतिभाओं का मूल स्त्रोत उनकी संयम शक्ति थी। निश्चय ही ब्रह्मचर्य की शक्ति महान है। घेरण्ड संहिता में शिव का वचन है- “बिन्दु को सिद्ध कर लेने पर इस धरती काी कोई सिद्धि ऐसी नहीं जो प्राप्त न हो सकें।”
साधना, कर्म-साधना एवं भाव साधनाओं की उच्चस्तरीय क्रिया-पद्धति में नियोजित किया जा सकता है। किसी देव प्रतिमा या महामानव के चित्त जमाकर उसके साथ तन्मय होने की भाव साधना भी ध्यान कहलाती है। ऐसा आए दिन कई-कई बार करते रहने से मनोनिग्रह की सिद्धि मिलती है। निग्रहित मन वाला लक्ष्य के साथ तन्मयता अपना कर बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त करता है।
साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है। योग, दर्शन में स्पष्ट कहा है- कि मंत्र जप से सिद्धियाँ मिलती हैं। ईश्वर साक्षात्कार का मार्ग खुलता है। वह अभ्यास बहुत काल तक लगातार विधि व्यवस्था से ठीक ठीक किया जाने पर दृढ़ अवस्था वाला होता है। जप साधना का आश्रय लेने वाला साधक धीरे धीरे इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह इसी साधना से समाधि तक पहुँच जाता है।
साधना और आराधना यह तीन प्रयोग प्रकरण है जिनके सहारे ईश्वर प्रदत्त प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं को जगाया और अपने समर्थ शक्तिवान बनाया जा सकता है। हर क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। शरीर को बलवान पहलवान बनाने के लिए कितनों को कितने दिन कितनी तत्परता व कठोर व्यायाम करने पड़ते हैं यह किसी से छिपा नहीं। धनी बनने के लिए कृषि व्यवसाय कल शिल्प आदि का आश्रय लेने वाले कितने लम्बे समय तक कितनी तत्परता के साथ कितना कठोर श्रम करते है वह किसी से छिपा नहीं। उच्च शिक्षा प्राप्त करके उच्च अधिकारी बनने की आकाँक्षा रखने वाले प्रायः चौथाई जीवन जितना समय और इतना धन खर्च करते हैं जिसके ब्याज से ही जिन्दगी भर बैठे गुजारा होता रह सकता था।
साधनाओं का वास्तविक अभीष्ट है और इस परिष्कार में निरन्तर प्रवृत्त रहने की क्षमता ही योगशक्ति है। योग शक्ति का यह स्वरूप स्पष्ट हो जाने पर यह परिणाम भी उतना ही स्पष्ट हो जाने पर यह परिणाम भी उतना ही स्पष्ट हो जाता है कि योगशक्ति व्यक्तित्व का विकास करती है, उसकी संकीर्णताओं को नष्ट कर उसे प्रखर-परिष्कृत बना देती है।
साधना पुरुषार्थ से अर्जित ऋद्धि-सिद्धियों के आधार पर की जाती है।
साधना का प्रयोजन अपनी विशेष शैली में उपलब्ध कर लेते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि आत्मिक प्रगति में उपासना के बिना भी काम चल सकता है। यह राजमार्ग है कोई पुल पर चलने की अपेक्षा नहीं तैरकर गन्तव्य तक जा पहुँचे तो उसे कीर्तिमान भले ही कहा जाय पर वह सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं है।
साधना को पुण्य परमार्थ में उत्सर्ग करते रहना। यही है क्रमशः उपासना, साधना और आराधना के तीन वर्ग। इनसे आत्मा सत्ता के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों ही कृतकृत्य होते हैं। आध्यात्म तत्वज्ञान और योग साधना के विधि विधान का यह परम प्रयोजन है। प्रचलित समस्त कर्मकाण्ड इन्हीं तीन प्रयोजनों के इर्द गिर्द परिभ्रमण करते हैं।
साधना कर लेने से वमुचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। उसके लिए गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास का होना अपरिहार्य है। इस श्रद्धा विश्वास को ही “अमृत” कहते हैं। इसी को पीकर देवता तृप्त होते और प्रसन्न होते हैं। परमसत्ता को इसी कारण “रसौ वै सः” कहकर संबोधित किया गया है व कहा गया है कि उसके प्रति समर्पण होने पर आदर्शों के समुच्चय को देव प्रतीक मानते पर जिस आनन्द की अनुभूति होती है, वह वर्णनातीत है उन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।
साधना दमन का नहीं, परिष्कार एवं ऊर्ध्वीकरण का मार्ग है। इसका सुंदरतम स्वरूप आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा के रूप में दिखाई पड़ता है। इस तथ्य से अवगत होने पर जीवनी शक्ति का क्षरण रुकता है।
साधना विधान में इस पर बल दिया गया है। सूफी मत एवं कैथोलिक मत वाले इसे प्राचीन काल से अपनाये हुए हैं। योगियों ने क्रियायोग में इसे स्वाध्याय का एक अंग माना है।
साधनाओं का आश्रय लेकर अपनी मस्तिष्कीय क्षमताओं को और प्रखर बनायेंगे ताक ब्रेन्वेव्स की परस्पर ट्यूनिंग हो सके। यह असंभव कपोल कल्पना प्रतीत होने वाली कार्य शैली इस तेजी से जनसाधारण द्वारा क्रिया रूप में परिणत की जाने लगेगी कि सम्प्रेषण माध्यम विकसित अतीन्द्रिय सामर्थ्य के रूप में बिना के रूप में बिना तारों के जंजाल, सेटेलाइट्स आदि के ऐसा भी होता है इस पर सभी आश्चर्य करने लगेंगे उपस्थित सभी भविष्य विज्ञानियों ने वक्ताओं के मन्तव्यों का अनुमोदन ही किया।
साधना पुरुषार्थ से यह विकसित-जाग्रत अवस्था में बना-रहता है उसमें भविष्य दर्शन की क्षमता आ जाती है क्योंकि वह “टाइम एवं स्पेस” आयाम परिभ्रमण करने लगता है।
साधना निरुत्साह के कारण न टूटे। इसी प्रकार पूजा उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
साधना का परिणाम सिद्धि है। वह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है। योग, दर्शन में स्पष्ट कहा है- कि मंत्र जप से सिद्धियाँ मिलती हैं। ईश्वर साक्षात्कार का मार्ग खुलता है। वह अभ्यास बहुत काल तक लगातार विधि व्यवस्था से ठीक ठीक किया जाने पर दृढ़ अवस्था वाला होता है।
साधनाओं में तो सूर्योपासना एवं रंगोपचार की अनेक विधाओं का उपयोग साधक की मनःस्थिति को दृष्टिगत रख समर्थ मार्गदर्शकों द्वारा किया जाता रहा है। भारतीय दर्शन के प्रवक्ताओं द्वारा ध्यान साधना में भिन्न-भिन्न रंग संवेदनाओं का प्रयोग प्रमुख विधा के रूप में किया जाता रहा है। यह प्रभाव उथली संवेदनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर आध्यात्मिक विकास में अतीन्द्रिय क्षमताओं के उन्नयन में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने लगता है। उचित वर्ण का चुनाव कर उनसे लाभ उठा सकना हर किसी के लिए संभव है।
साधना प्रक्रिया तीनों शरीरों के विकसित करती है, उन्हें ओजस् तेजस् एवं वर्चस से सराबोर करती हैं।
साधना पुरुषार्थ से इस प्रसुप्त क्षमता को जगाने का विधान बताया है, ताकि भविष्य को जानकर अशुभ सम्भावनाओं को निरस्त करने के लिए वर्तमान के क्रियाकलापों में ही तत्परता पूर्वक कटिबद्ध हुआ जा सके एवं शुभ सम्भावनाओं से लाभ उठाने लिए अपनी एवं औरों की पात्रता विकसित की जा सके। वे महामानव जिन्हें इतिहास में अपनी भविष्य दर्शन की क्षमता के कारण अच्छी खासी ख्याति मिली हुई है, एक मत से कहते हैं कि आने वाली सदी आशाभरी, उमंग और उल्लास से भरी, उज्ज्वल संभावनायें लेकर आ रही हे। आज की परिस्थितियाँ हमें विचलित न करने पायें, सम्भवतः इसीलिए उन्होंने भविष्य के उज्ज्वल पक्ष को पहले से ही लिखकर सामने रख दिया है। ऐसे मनीषियों में सोलहवीं सदी में जन्मे नास्ट्राँडेमस, महायोगी अरविन्द, स्वामी विवेकानन्द एवं प्रो. हरार की चर्चा पिछले अंकों में की जा चुकी है। क्रिस्टल बॉल के माध्यम से भविष्य की झलक झाँकी देखने और दिखाने वाली जीन-.... की आँशिक चर्चा भी हम पहले कर चुके हैं।
साधना के रूप में तपश्चर्या इसी हेतु की जाती है। इन्द्रिय-संयम अर्थ-संयम-समय संयम, विचार-संयम यह उपासना की सार्थकता के चार प्रतिफल हैं। आत्मशोधन के लिए इन्हें अपनाना ही पड़ता है। जीवन साधना इन्हीं के सहारे बन पड़ती है। उस उपासना को निष्फल ही मानना चाहिए जो जीवन के मौलिक स्वरूप में सभ्य आचरण एवं आत्मिक पक्ष को सुसंस्कारिता से सम्पन्न न करे।
साधनाएँ होती रही है और उस पुण्य क्षेत्र में अपनी भागीदारी जोड़ने के लिए तीर्थयात्री यही प्रायोजन लेकर वहाँ पहुँचते है। प्रकृति दर्शन और उच्चस्तरीय सत्संग का लाभ तो उन्हें साथ-साथ मिलता ही रहता था अब वे तीर्थ आयोजन भी धार्मिक मेला भर बनकर रह गये है। स्नान और देवदर्शन भर की दो क्रियायें ही वहाँ पूरी हो पाती है। इसे सुधारा और पुरातन स्तर पर लाया जाना चाहिए। उससे उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होंगे।
साधना पुरुषार्थ साधकों को अगणि गुना प्रतिफल देगा, यह कल्पना सहज ही की जा सकती हैं।
साधना छोड़नी पड़े, तो न सिर्फ उसके अब तक के समय - श्रम बर्बाद होंगे, वरन प्राण - संकट भी उठ खड़े होंगे। इसीलिए ऐसी साधनाओं में लाल रंग के प्रयोग से निकलने वाली लाल प्रकाश तरंगें साधक की भावनाओं को वैसी ही उग्र बनाये रखने में मदद करती हैं, ताकि साधना निरुत्साह के कारण न टूटे। इसी प्रकार पूजा उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
साधना करने वाले अध्यात्म विज्ञानी भी उस अवधि में महत्वपूर्ण अनुसंधान करते रहें है। मध्यकालीन सन्तों को सदा प्रचार-प्रव्रज्या में ही संलग्न रहना पड़ता था। उन्होंने अपने गीत और भजन उसी भाग-दौड़ की स्थिति में रचे हैं।
साधना पड़ता है।
साधना के लिए की जाने वाली कसरत की तरह भी है। चंचल मन को वानर जैसी उछल कूद करते रहने, अपनी शक्ति गँवाने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। असंयम के जीवन के किसी भी पक्ष पर हावी नहीं होने देना चाहिए। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम की घेरा बन्दी करते रहने से शक्तियों का अपव्यय रुकता है, एकाग्रता सधती है और मन को ज्ञान-साधना, कर्म-साधना एवं भाव साधनाओं की उच्चस्तरीय क्रिया-पद्धति में नियोजित किया जा सकता है। किसी देव प्रतिमा या महामानव के चित्त जमाकर उसके साथ तन्मय होने की भाव साधना भी ध्यान कहलाती है।
साधना में प्रायः लाल वर्ण को इसलिए महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि उसमें इष्टदेव को बल और आक्रोशपूर्वक वशवर्ती करना होता है। यह विचार यदि ठण्डे पड़ जायँ और साधक को बीच में ही साधना छोड़नी पड़े, तो न सिर्फ उसके अब तक के समय - श्रम बर्बाद होंगे, वरन प्राण - संकट भी उठ खड़े होंगे। इसीलिए ऐसी साधनाओं में लाल रंग के प्रयोग से निकलने वाली लाल प्रकाश तरंगें साधक की भावनाओं को वैसी ही उग्र बनाये रखने में मदद करती हैं, ताकि साधना निरुत्साह के कारण न टूटे। इसी प्रकार पूजा उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
साधना की ही व्यवस्था करनी पड़ती है। कुंभ पर्व जैसे ज्ञान यज्ञ इसी निमित्त आरम्भ किये गये थे कि उस अवसर पर धर्मानुष्ठान चलें और उससे लोक शिक्षण एवं अदृश्य संशोधन के दोनों ही कार्य सम्पन्न होते रहें। पर्व स्नानों के विशेष अवसरों पर तीर्थ समारोहों की परम्परा भी इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होती रही है। तीर्थों में ऐसा ही धर्मानुष्ठानों का क्रम चलते रहने के कारण उनकी गरिमा समझी जाती रही है। आज तो हर क्षेत्र में विकृतियों का ही साम्राज्य छाया हुआ है, पर भूतकाल में जब अध्यात्म को विज्ञान के समकक्ष प्रामाणिक माना जाता था तब सामूहिक अनुष्ठानों का महान महत्व और प्रभाव सर्वत्र स्वीकारा जाता था।
साधना है। न किसी वस्तु पर अधिकार जमाना जाना चाहिए और न किसी वस्तु पर। यही अनासक्त योग हैं। इसी को शान दृष्टि कहते हैं। लाभदर्शी इसी प्रकार सोचते और जल में रुपसावत रह कर संसार में अपना निर्वाहक्रम जारी रखते हैं।
साधना, आराधना के अवलम्बनों को ध्यानपूर्वक अपनाया ही जाना चाहिए।
साधनाओं में लाल रंग के प्रयोग से निकलने वाली लाल प्रकाश तरंगें साधक की भावनाओं को वैसी ही उग्र बनाये रखने में मदद करती हैं, ताकि साधना निरुत्साह के कारण न टूटे। इसी प्रकार पूजा उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
साधना कहा गया है। हठयोग यानी पूर्ण स्वस्थता के लिए की जाने वाली विशिष्ट शारीरिक मानसिक क्रियाओं का साग्रह अभ्यास।
साधनारत व्यक्तियों को भी परिष्कृत व्यक्तित्व के निर्माण में प्रेरणा दे सके।
साधना विधान में देव-उपासना का महत्वपूर्ण स्थान हैं अध्यात्म शासकों में जहाँ आत्म चिन्तन, ब्रह्मध्यान, मनोनिग्रह, विवेक, वैराग्य आदि का विस्तृत विवेचन हुआ हैं वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है। कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं। उसमें प्रतिपादित देवता के गुण, धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये है। उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।
साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चार विधायें अपना कर आत्मोत्कर्ष का महान प्रयोजन पूरा किया जाता है। पशु कलेवर छूट गया, यह एक उत्साहवर्धक सफलता है पर बात इतने से ही बनती नहीं। मानव गरिमा को प्रकट प्रकाशित करने के लिए भाव भरे प्रयत्न होने चाहिए। समझदारी ईमानदारी, जिम्मेदारी और सदुद्देश्यों के लिए बहादुरी बरते जाने की प्रक्रिया अभ्यास में उतारनी चाहिए। यदि इतना न बन पड़ा तो समझना चाहिए कि विडम्बना ही सिर पर लद कर रह गई।
साधना के लिए अग्रसर करती है और सुसंस्कारों से साधा गया जीवन अपनी उपयोगिता आराधना में-लोकसेवा में निरत रहना अनुभव करता है। यही वह त्रिवेणी है जिसे तीर्थराज की संज्ञा दी गई है। ईश्वर आराधना का अर्थ है दिव्यता के साथ अपनी संवेदनाओं को घनीभूत कर लेना। जीवन के विचार क्षेत्र में भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण को बहिष्कृत कर देना। अपनी कौशल और साधना को पुण्य परमार्थ में उत्सर्ग करते रहना।
साधना इन्हीं के सहारे बन पड़ती है। उस उपासना को निष्फल ही मानना चाहिए जो जीवन के मौलिक स्वरूप में सभ्य आचरण एवं आत्मिक पक्ष को सुसंस्कारिता से सम्पन्न न करे। उस बीज की क्या महिमा जो उर्वर भूमि में भी अंकुर उत्पन्न न करे। उपासना बीज है और उसका अंकुर संयम। तपश्चर्या भी यही है।
साधनाओं में सविता देवता की भौतिक उपासना सूर्य सेवन और आध्यात्मिक उपासना तेजस का ध्यान करते हुए की जाती है। भारतीय तत्वदर्शियों ने सविता को सहस्र किरणों वाला माना है और उनकी प्रधान एवं सुपरिचित किरणों को ‘सात रश्मि’ कहा है। वायु पुराण में उल्लेख है कि सूर्य की सहस्र रश्मियाँ हैं उनमें से सात प्रधान हैं। ऋग्वेद 10/139/1 में, कौशीतकि ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में भी सात रंग की रश्मियों का वर्णन है। उनके नाम - (1) सुषुम्णा (2) हरिकेशः (3) विश्वकर्मा (4) संपहंसु (5) अर्वावसु (6) विश्वश्रवः और (7) स्वराट्- गिनाये गये हैं।
साधना से समाधि तक पहुँच जाता है। सुप्रसिद्ध मनीषी सर जान वुडरफ ने भी अपने ग्रन्थ “गारलैण्ड आफ लेटर्स” में लिखा है कि मंत्र या शब्दों की विशेष रचना में गुप्त दिव्य शक्तियों का पुँज बना देती है।
साधनाओं, उपासनात्मक-क्रिया- कृत्यों-कर्मकाण्ड के विविध विधि-विधानों में भिन्न-भिन्न रंगों का निर्धारण है। तंत्र साधना में प्रायः लाल वर्ण को इसलिए महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि उसमें इष्टदेव को बल और आक्रोशपूर्वक वशवर्ती करना होता है। यह विचार यदि ठण्डे पड़ जायँ और साधक को बीच में ही साधना छोड़नी पड़े, तो न सिर्फ उसके अब तक के समय - श्रम बर्बाद होंगे, वरन प्राण - संकट भी उठ खड़े होंगे। इसीलिए ऐसी साधनाओं में लाल रंग के प्रयोग से निकलने वाली लाल प्रकाश तरंगें साधक की भावनाओं को वैसी ही उग्र बनाये रखने में मदद करती हैं, ताकि साधना निरुत्साह के कारण न टूटे। इसी प्रकार पूजा उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।
साधना एवं भाव साधनाओं की उच्चस्तरीय क्रिया-पद्धति में नियोजित किया जा सकता है। किसी देव प्रतिमा या महामानव के चित्त जमाकर उसके साथ तन्मय होने की भाव साधना भी ध्यान कहलाती है। ऐसा आए दिन कई-कई बार करते रहने से मनोनिग्रह की सिद्धि मिलती है। निग्रहित मन वाला लक्ष्य के साथ तन्मयता अपना कर बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त करता है।
साधना भी ध्यान कहलाती है। ऐसा आए दिन कई-कई बार करते रहने से मनोनिग्रह की सिद्धि मिलती है। निग्रहित मन वाला लक्ष्य के साथ तन्मयता अपना कर बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त करता है।
साधना यदि भावना और श्रद्धापूर्वक की जाय तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगें अनय को निरस्त कर मनुष्य को श्रेय पथ पर अग्रसर करती हैं। श्रद्धा-विश्वास एवं इच्छाशक्ति के साथ जप द्वार मंत्रों में सन्निहित दिव्य शक्तियों को जगाया एवं आत्मसत्ता का स्तर ऊँचा उठाया जा सकता है।
साधना अपने प्रतिष्ठा क्षेत्र की प्रयोगशाला में ऐसे प्रवाह प्रवाहित कर सकेगी जो अदृश्य अन्तरिक्ष और अनुकूलता की दिशा में गति देने से लेकर साधनारत व्यक्तियों को भी परिष्कृत व्यक्तित्व के निर्माण में प्रेरणा दे सके।
साधना का आधार बनता है। सार्थकता उसी उपासना की है जो आत्म परिष्कार की प्रेरणा दे सके। संयम साधना के रूप में तपश्चर्या इसी हेतु की जाती है। इन्द्रिय-संयम अर्थ-संयम-समय संयम, विचार-संयम यह उपासना की सार्थकता के चार प्रतिफल हैं। आत्मशोधन के लिए इन्हें अपनाना ही पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-February
साधना और मूल्य वाला दीपक ही जलना चमकना आरम्भ कर देता है। शान्ति कुँज ने वही आदर्शवादी दुस्साहस किया है। उसकी प्रत्यक्ष प्रशिक्षण प्रक्रिया में ऐसे तत्वों का समावेश है जो आलस्य प्रमाद को उखाड़ने और उसके स्थान पर तत्परता-तन्मयता के ढाँचे में चिन्तन और स्वभाव को विनिर्मित कर सकें। बुद्धिमत्ता और कुशलता के अनुदानों से लाद सकें।
साधनाओं का विधान है। जब भी इस धरा पर विपत्ति के बादल गहराये हैं तब-तब ऐसे ही सामूहिक प्रयत्न हुए हैं जिससे अनिष्ट का निवारण हुआ और सम्पूर्ण मानवता पर गहराते महा विनाश के बादल छटे। प्रस्तुत समय की प्रच्छन्न विभीषिका के निराकरण में सामूहिक अनुष्ठानों की महती भूमिका होगी। यह निश्चित है।
साधना के लिए उपयुक्त बताया है। ओर परिश्रम के लिए उपार्जन के लिए लोक आराधना के लिए पुरे दिन को रखा है।
साधनाओं द्वारा जाग्रत करके अदृश्य प्रतिकूलताओं को परिवर्तित कर लाभकारी परिस्थितियों को जन्म दे सकते हैं।
साधना से ओत प्रोत वातावरण प्राणवान संरक्षण स्वाध्याय संस्कारों से जुड़ क्रिया कलाप। जिस प्रकार सेनेटोरियमों में रह कर वहाँ की जलवायु की विशिष्टता के कारण अपेक्षाकृत अधिक लाभ पाते देखे जाते है। वैसा ही लाभ यहाँ मिलता है आत्मबल जो अन्य सब बलों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वातावरण का प्रतिफल हैं। ओजस तेजस और वर्चस इसकी विशेष उपलब्धियाँ है।
साधना के स्तर एवं चेतना की महानता को बताती है कि व्यक्ति कितना आदर्शवादी है। नील लोहित रंग मानसिक प्रखरता, आध्यात्मिकता,की जागृति, एवं गुहा विद्या की पूर्णता का परिचायक है।
साधना में प्रवृत्त हो कर अपनी प्रचण्ड चेतना द्वारा वातावरण को प्रभावित किया और स्वतंत्रता प्राप्ति के कार्य को आसान बनाया।
साधना में निमग्न हो जाता है,उस समय प्रभामंडल के रंग और अधिक चमकदार एवं प्रभावकारी हो जाते हैं। इसका सीधा संबन्ध व्यक्ति के चिन्तन और भावना क्षेत्र से हे जिसमें आये क्षणिक परिवर्तन से भी इस में अंतर आ जाता है और अपने चारों ओर के वातावरण को प्रभावित करता है।
साधना से गुण, कर्म, स्वभाव में सदाशयता उभरेगी तो परमार्थरत हुए बिना रहा नहीं जा सकेगा। पृथ्वी पर मनुष्य शरीर में निवास करने वाले देवताओं को भूसुर कहते हैं। यह साधु और ब्राह्मण वर्ग के लिए प्रयुक्त होता है। ब्राह्मण एक सीमित क्षेत्र में परमार्थरत रहते हैं। और साधु परिव्राजक के रूप में सत्प्रवृत्ति संवर्धन का उद्देश्य लेकर जहाँ आवश्यकता है वहाँ पहुँचते रहते हैं।
साधनाओं की भाँति स्थिर शरीर और शाँत चित्त रखने की प्रथम शर्त तो पालन करी ही पड़ती है। इसके अतिरिक्त जिह्वा को उलट कर जितना अधिक पीछे ले जाना संभव हो उसके लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए। जब जीभ कुछ पीछे जाने लगे और उसकी नोंक का निचला भाग जब तालु के भीतरी भाग को छूने लगे तब समझना चाहिए कि अब स्थिति ठीक बन गई।
साधना करने के साथ साथ 140 नये पत्रिकाओं के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।
साधना से जीवन को संयमी बनाया। ज्ञान का भण्डार भरा। आदर्श जीवन जिया। परिव्राजकों का बड़ा संगठन खड़ा किया। उनके प्रशिक्षण और निर्वाह के लिये अनेक मठ बिहार बनाये।
साधना के लिए मनोकामना पूर्ति का लक्ष्य रखकर की गयी मनुहार खिलवाड़ ही होती है। उस पर समझदार ध्यान नहीं देते और किसी की अकारण आकस्मिक पूजा पाठ पर उतरने के साहस से अनभिज्ञ नहीं रहते।
साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें है जिनसे लोगों को सुविधाएं मिलती है। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी को पीड़ा का अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके। सुविधा बढ़ाने और पीड़ा दूर करने की सेवा तो कोई धन सम्पन्न भी कर सकते है।
साधना में तल्लीन हो गई।
साधना में सभी दूरदर्शी विवेकवानों को लगना चाहिए। इसी निमित्त लेखनी, वाणी तथा दृश्य श्रव्य आधारों का ऐसा प्रयोग करना चाहिए जिससे सर्व साधारण को युग धर्म पहचानने और कार्यान्वित करने की प्रेरणा मिल सकें। सर्वजनीन और सार्वभौमिक ज्ञान-यज्ञ ही आज का सर्वश्रेष्ठ इसकी उपेक्षा करके, सस्ती वाहवाही पाने के लिए कुछ भी देते, बखेरते और कहते लिखते रहने से कुछ वास्तविक प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है।
साधना विधानों का अध्यात्म उपचारों का निर्माण किया था जिस से मनुष्य का स्थायी परिमार्जन-परिष्कार हो सके। अपने प्रयोग- परीक्षणों में उन्होंने पाया कि भावना-विचारणा के परिवर्तन के साथ ही सफेद,नीली एवं लाल रंग की प्रकाश रश्मियों में भारी फेर–बदल होता है। उत्तेजना - आवेश-ग्रस्तता की स्थिति में गहरे लाल रंग की किरणें निस्सृत होती है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य की भावनाएँ - विचारणाएं कितनी प्रचंड होती है जो अल्ट्रावायलेट किरणों,लेसर किरणों की तरह क्षण भर में कहीं से कहीं भी जा पहुँचती हैं। इसका सुनियोजन श्रेष्ठता की दिशा में होने पर व्यक्ति महामानव, देवता सन्त-ऋषि बनता है एवं उसकी निष्कृष्टता से उसी व्यक्ति को नर पिशाच-नरपशु -दुष्ट-अत्याचारी बनते देखा गया है।
साधना सत्र में सम्मिलित होने के लिए आवेदन पत्र भरे गये। 107 स्थानों पर दीपयज्ञ कराने, सद्वाक्य लिखने तथा पत्रिकाओं के सदस्य बनाने के संकल्प लिए गये।
साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी। सेवा साधना से गुण, कर्म, स्वभाव में सदाशयता उभरेगी तो परमार्थरत हुए बिना रहा नहीं जा सकेगा। पृथ्वी पर मनुष्य शरीर में निवास करने वाले देवताओं को भूसुर कहते हैं। यह साधु और ब्राह्मण वर्ग के लिए प्रयुक्त होता है।
साधनाकाल में। काम, क्रोध, आवेश, अहंकार जैसे मनोवेगों की छोटी लहर भी साधक को पतन पराभव की ओर धकेल देती हे। अतः इस समय विशेष सावधानी एवं संयम बरतने की आवश्यकता है।
साधना की अपनी विशिष्टता है। इस महत्व को समझने वाले इन दिनों शाँतिकुँज में रहकर साधना करने की उपयोगिता उससे कहीं अधिक समझते हैं जो शिविर सत्रों के माध्यम से योग्यता अभिवृद्धि के रूप में सभी छात्रों को मिलती हैं यही कारण है कि कितने ही साधकों ने निश्चय किया है कि वे बारह वर्ष के प्रस्तुत युग धर्म में हर वर्ष न्यूनतम एक लघु पुरश्चरण करने के लिए तो अगले वर्षों में नियमित रूप से आया करेंगे।
साधना करने की उपयोगिता उससे कहीं अधिक समझते हैं जो शिविर सत्रों के माध्यम से योग्यता अभिवृद्धि के रूप में सभी छात्रों को मिलती हैं यही कारण है कि कितने ही साधकों ने निश्चय किया है कि वे बारह वर्ष के प्रस्तुत युग धर्म में हर वर्ष न्यूनतम एक लघु पुरश्चरण करने के लिए तो अगले वर्षों में नियमित रूप से आया करेंगे।
साधना और आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है मनुष्य में देवत्व का अभिवर्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्म धारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी।
साधना सत्र के लिए सैकड़ों परिजनों आवेदन पत्र भरे।
साधना करने साप्ताहिक सत्संग तथा युग संधि पुरश्चरण साधना करने के साथ साथ 140 नये पत्रिकाओं के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।
साधना भी कहा जा सकता है। आश्रम का वातावरण तथा शिक्षण के साथ जुड़ा हुआ मार्ग दर्शन ऐसे है जो आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाने के लिए शिक्षार्थियों को स्वतः प्रेरणा देते है।
साधना से व्यक्तित्व का और आराधना से क्रियाशीलता का परिष्कार और विकास होता है। आराधना उदार सेव्य साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें है जिनसे लोगों को सुविधाएं मिलती है। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी को पीड़ा का अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके।
साधना में दिन-रात एक कर दिये। भगवान् को और क्या चाहिये? उन्हें तो निष्ठा भर की परख होती है, अन्यथा अपने भक्त की सहायता के लिये तो वे अहिर्निशि तत्पर रहते हैं।
साधना सत्रों एवं युगशिल्पी सत्रों में भेजने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर अलग अलग संकल्प पत्र भरे गये। स्थानीय दस टोलियों के माध्यम से दीप यज्ञ सम्पन्न कराने की व्यवस्था बनाई जा रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-September
साधना के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुये भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक, उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती।
साधना ईंधन। उपासना संकल्प है-साधना साहस। उपासना ज्ञान है-साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष।
साधना के लिए चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का जगाने का उससे भी अधिक कष्टसाध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं और इससे अधिक और कुछ करने की आवश्यकता नहीं।
साधनापरक समस्त कर्मकाण्ड इसी की पूर्ति के लिए विनिर्मित किये गये हैं। जो जिस अनुपात से आत्मशोधन करता जाता है उसके भव बन्धन उसी मात्रा में कटते हैं। ब्रह्म सान्निध्य का रसास्वादन करने का अवसर उसे उसी अनुपात में मिलता चला जाता है। जीव का प्रयास ब्रह्म सान्निध्य के लालच के मृग की नाभि में कस्तूरी भरी होने पर भी उसे अन्यत्र ढूँढ़ते फिरने की तरह शास्त्रों में बताया गया है।
साधना पर ही निर्भर रहना होगा। अच्छा हो उस प्रयास पर पूरी तरह ध्यान केन्द्रित किया जाय और शारीरिक बलिष्ठता, मानसिक पवित्रता-प्रखरता एवं आत्मिक प्रचंडता जैसी उपलब्धियों के लिए योजनाबद्ध साहसिक कदम उठाया जाय।
साधना से जिस चमत्कारी शक्ति सम्पदा की उपलब्धि होती है, उसका उद्गम केन्द्र-’सविता’ देवता है। गायत्री का अधिपति-’सविता’ है। उसी के विशिष्ट साधना विधानों की सहायता से दिव्य शक्तियों को आकर्षित किया जाता है और साधक को सर्व समर्थ बनने का अवसर मिलता है।
साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दुष्टता भरी पड़ी है, जिन्हें छल छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ हैं-इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा-पाठ का ढोंग रचते हैं ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
साधना विधान का समन्वय ही उन सत्परिणामों को प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हो सकता है, जिसमें अंतरंग को स्वर्ग मुक्ति का आनन्द और बहिरंग को ऋद्धि-सिद्धि का वैभव उपलब्ध होता है। बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए उसका उचित मूल्य समझने और जुटाने का प्रयत्न करना ही होगा।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
साधना साहस। उपासना ज्ञान है-साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना में नियोजित रखा जा सके तो उसके बदले उत्साह में अनायास ही स्फूर्ति बनी रह सकती है। आलस्य प्रमाद का बोझिल अभिशाप सिर से उतरते ही बहते प्रवाह में तैरने वाली लकड़ी की तरह अपने आप को प्रगतिशीलता के पथ पर चलने की अनुभूति होती है।
साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना अन्तर्मुखी होने से आरम्भ होती है।
साधना और आराधना का त्रिविध प्रयास करना पड़ता है। योग और तप का बहुमुखी आधार इसी निमित्त जाना और किया जाता है। मैले दर्पण में अपनी छवि दिखाई नहीं पड़ती। मैले पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं चमकता। इसी प्रकार दुश्चिन्तन और कुकर्मों से सड़े गले जीवन से अन्तःकरण ऐसा दूषित हो जाता है कि उसमें ईश्वर सत्ता विद्यमान होते हुए भी आभास मिल नहीं पाता।
साधना-आराधना इसलिए करते रह पाते हैं कि वे खुशबूदार और उत्फुल्लतादायक स्थान होते हैं। प्रकृति का सान्निध्य आनन्ददायक माना जाता है, क्योंकि वहाँ का वातावरण वृक्ष-वनस्पतियों और फूलों के सुवास से ओत-प्रोत रहता है। यह खुशबू के प्रभाव-परिणाम हैं, पर यह सिर्फ मन तक ही सीमित होता है, ऐसी बात नहीं है। शरीर पर भी इसका असर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसकी इसी सामर्थ्य को देखते हुए अब चिकित्सा विज्ञान की एक अभिनव शाखा (गंध चिकित्सा) के रूप में इसे विकसित किया जा रहा है।
साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुये भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक, उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दुष्टता भरी पड़ी है, जिन्हें छल छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ हैं-इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा-पाठ का ढोंग रचते हैं ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं।
साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना उपचारों के माध्यम से साधक उसी प्राण शक्ति को आकर्षित करके अपने को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक दृष्टि से सशक्त एवं प्रखर बनाते हैं।
साधना तपश्चर्या में लगाते थे। भारत के हर गृहस्थ का यह अनिवार्य कर्त्तव्य रहा है कि वह जीवन के अन्तिम चरण में सभी सुख सुविधाओं को त्याग कर, कठोर जीवन क्रम को अपनाकर लोक कल्याण और आत्मकल्याण में अपने को नियोजित करे। सुख-सुविधाओं के बीच रहते मनुष्य में जो ढीला-पोलापन आ जाता था उसमें निखार कठोर जीवनचर्या से पुनः आ जाता था।
साधना विधानों की सहायता से दिव्य शक्तियों को आकर्षित किया जाता है और साधक को सर्व समर्थ बनने का अवसर मिलता है।
साधना जैसे अनेकों अध्यात्म उपचार ऐसे हैं जो मानवी चेतना की विभिन्न आवश्यकताओं को, आत्मोत्कर्ष के विभिन्न आयामों को पूरा कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-August
साधनायें सिखाई, विद्याध्ययन के उपरान्त वेदवती का पाणिग्रहण भी वार्क्षी के साथ ही करा दिया।
साधना के उपयुक्त निरहंकारिता को स्वभाव के हर कण में सम्मिलित करना चाहिए। अहंकारी यश लोलुप और अपना वर्चस्व बढ़ाते रहने के लिए लालायित व्यक्ति सेवा साधना के उस उच्च पद के अधिकारी ही बने रहते हैं। जिन्हें अनायास ही सर्व साधारण का विश्वास और सहयोग प्राप्त होते रहना चाहिए।
साधना ही रही है। वैज्ञानिकों-आविष्कारकों ने अपना मानस और समय प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केन्द्रित न किया होता तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती? लोक सेवियों ने अपने समय दान के सहारे एक से एक बड़े कार्य सम्पन्न कर दिखाये हैं। धन से अर्थ सम्पादन सधता है, पर समय को साथ लेकर तो फरहाद जैसे साधन हीन भी अपनी कुदाली के बल पर बत्तीस मील लम्बी नहर खोद कर ला सकने में सफल हो सकते हैं। जिनने इस ऊबड़-खाबड़ धरती को समतल और क्रियाकलाप के उपयुक्त बनाया उनने श्रम साधना को ही अपना आधार बनाया।
साधना को ही अपना आधार बनाया। प्रगति में यों साधनों का भी अपना योगदान रहा है पर उन्हें भी जुटाने में श्रम ही प्रमुख रूप से काम करता दिखाई देता है। साधन तो कुपात्रों के हाथ पड़कर अनर्थ भी कर सकते हैं, जबकि समझदारी के साथ की गई श्रम साधना के सुखद सत्परिणाम देखने को मिलते हैं। यहाँ इतना और याद रखना चाहिए कि समयदान की चर्चा करते समय उसके साथ लगन, मेहनत, हिम्मत और विवेक को भी पूरी तरह समाविष्ट समझा जाय, तभी बात पूरी तरह बन पड़ती है। अन्यथा समय तो किसी तरह भिखारी, आलसी, आवारा और दुर्व्यसनी भी काटते ही रहते है।
साधना के लिए अवकाश पाने के लिए लोभ, मोह और अहंकार को जितना अधिक घटाया जा सकेगा उतना ही स्तर इस योग्य बनता जायेगा कि लोग सच्चे मन से आदर भाव रखें और उनके द्वारा दिये गये परामर्श में अपना हित साधन समझें तथा स्वीकार करें।
साधना “समय” की तपशिला पर बैठ कर ही संभव हुई हैं उनने जो सोचा, जो सृजा है उसके पीछे उनकी तन्मयता भरी समय साधना ही रही है। वैज्ञानिकों-आविष्कारकों ने अपना मानस और समय प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केन्द्रित न किया होता तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती? लोक सेवियों ने अपने समय दान के सहारे एक से एक बड़े कार्य सम्पन्न कर दिखाये हैं। धन से अर्थ सम्पादन सधता है, पर समय को साथ लेकर तो फरहाद जैसे साधन हीन भी अपनी कुदाली के बल पर बत्तीस मील लम्बी नहर खोद कर ला सकने में सफल हो सकते हैं। जिनने इस ऊबड़-खाबड़ धरती को समतल और क्रियाकलाप के उपयुक्त बनाया उनने श्रम साधना को ही अपना आधार बनाया।
साधना के पक्ष में ही तर्क प्रस्तुत करती है और इसी के लिए मन लुभाता ललचाता है कि जिस प्रकार भी संभव हो, अपने स्वार्थ को अधिकार के रूप में परिभाषित प्रस्तुत करते हुए “जिसकी लाठी उसकी भैंस”, वाला मत्स्य न्याय चरितार्थ करके दिखाया जाय।
साधना की तपश्चर्या करनी पड़ती है। साधु और ब्राह्मण भी कार्य क्षेत्र में उतरते हैं जब वे आत्म परिष्कार की कसौटी पर खरे सिद्ध हो पाते हैं। इस प्रकार की आध्यात्मिक सम्पदा में जहाँ ईश्वर भक्ति का, जप-तप का, विधान है वहाँ उससे भी पूर्व यम नियमों के दस अनुशासन पालन करते हुए इस स्तर की तैयारी करने का विधान है, जिसमें मानवोचित सामान्य गुणों से आग बढ़ कर देवोपम पद ता जा पहुँचने का निर्धारण है। ऐसे लोगों को लोभ, मोह की लिप्सा-लालसा में कटौती करके सेवा साधना के उपयुक्त निरहंकारिता को स्वभाव के हर कण में सम्मिलित करना चाहिए। अहंकारी यश लोलुप और अपना वर्चस्व बढ़ाते रहने के लिए लालायित व्यक्ति सेवा साधना के उस उच्च पद के अधिकारी ही बने रहते हैं।
साधना ने जन-जन का मन जीता और परामर्श-प्रतिपादनों को जीवनक्रम में उतारने में कुछ उठा न रखा। व्यक्तित्वों में सन्निहित प्रतिभा इसी आधार पर प्रसुप्ति से विरत होकर जाग्रत कर्म निष्ठा में परिणत हुई और सर्वतोमुखी प्रगति का वातावरण बन बया। यही है, सतयुग में समुन्नत वातावरण बने रहने का प्रमुख कारण।
साधना है। इसमें व्यक्ति को गुणवान बनने के लिए लगातार पुरुषार्थ करना होता है इसके बाद कहीं महानता की सीढ़ी पर चढ़ पाना बन पड़ता है इन महान लोगों के सम्मुख सहज ही लोगों का मस्तक नत होता है। इसे कमाना कष्ट साध्य हैं महत्वाकाँक्षी व्यक्ति की रुचि इन कष्ट साध्य प्रयत्नों में नहीं होती। महानता के महत्व को वह जैसे-तैसे पाना चाहता है, ताकि लोग उसे भी प्रणाम करें, गरिमापूर्ण समझें। इसे यों भी कहा जा सकता है कि उसकी चाहत होने की नहीं दिखाने की है।
साधना के नाम से जानी जाती है। इसी की प्रतिक्रिया व्यक्ति को निश्चिन्त प्रसन्न और प्रफुल्ल बनाती है। समीपवर्ती क्षेत्र में उसी की परिणति सज्जनता, सेवा साधना एवं धर्म धारणा के रूप में परिलक्षित होती है। मनुष्य अपने में स्नेह सौजन्य, सद्भाव और उदार शिष्टाचार बरतने लगे तो स्पष्ट है कि लोगों के बीच चलने वाला सद्व्यवहार ऐसी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करेगा। जिससे तुष्टि, पुष्टि और शक्ति की कमी न रहे।
साधना एवं धर्म धारणा के रूप में परिलक्षित होती है। मनुष्य अपने में स्नेह सौजन्य, सद्भाव और उदार शिष्टाचार बरतने लगे तो स्पष्ट है कि लोगों के बीच चलने वाला सद्व्यवहार ऐसी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करेगा। जिससे तुष्टि, पुष्टि और शक्ति की कमी न रहे। समृद्धि और प्रगति का पथ प्रशस्त होता चले।
साधना गतिविधियाँ, क्रियाकलाप लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
साधना करने ओर संपर्क जोड़ने, सद्व्यवहार करने के लिए मन करेगा।
साधना में निरत रहता था। आज भी चिन्तन को थोड़ा झकझोरा जा सके तो वैसे पुनरावर्तन की व्यवस्था फिर नये सिरे से बन सकती है और रिटायर्ड व्यक्तियों, ब्रह्मचारियों, विधवाओं, विधुरों, परित्यक्ताओं का एक बड़ा समूह पारिवारिक लदान से लदा होने का बहाना ढूंढ़ने से बच सकता है। प्राचीनकाल में लोक सेवियों को विशेषतया चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में भाव परक उत्कृष्टता भरने वाले अध्यात्म प्रयास में निरत रहते देखा जाता था और देश की मान मर्यादा को उच्च शिखर पर बनाये रखने का श्रेय सम्पादित करता रहता था। इन दिनों आदर्शवादी आकाँक्षाओं में बुरी तरह गिरावट आई है। अपनी जीवनचर्या से दूसरों को कारगर प्रकाश दे सकने वाले प्राणवान ढूंढ़े नहीं मिलते।
साधना के सुखद सत्परिणाम देखने को मिलते हैं। यहाँ इतना और याद रखना चाहिए कि समयदान की चर्चा करते समय उसके साथ लगन, मेहनत, हिम्मत और विवेक को भी पूरी तरह समाविष्ट समझा जाय, तभी बात पूरी तरह बन पड़ती है। अन्यथा समय तो किसी तरह भिखारी, आलसी, आवारा और दुर्व्यसनी भी काटते ही रहते है।
साधना ने ही इस देश को ज्ञानक्षेत्र में जगद्गुरु, विज्ञान क्षेत्र में चक्रवर्ती शासक और व्यवसाय क्षेत्र में स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी बनाया था। इतिहास अपनी वज्र चट्टान पर अभी भी अवस्थित है और तुमुलनाद के साथ उद्घोष करता है कि उन पुरातन परम्पराओं को यदि किसी प्रकार फिर जीवन्त किया जा सके तो सतयुग लौट आने की संभावना फिर सुनिश्चित हो सकती है। दुर्बुद्धि के दावानल में जलती हुई दुनिया को फिर से नये वातावरण में साँस लेने की सुखद संभावनाएँ हस्तगत हो सकती हैं।
साधना के उस उच्च पद के अधिकारी ही बने रहते हैं। जिन्हें अनायास ही सर्व साधारण का विश्वास और सहयोग प्राप्त होते रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-March
साधनाओं की भी अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है। उनकी उपयोगिता समझी और प्रक्रिया भी अपनायी जानी चाहिए।
साधना विज्ञान में त्वचा साधना को स्पर्शास्पर्श कहते हैं त्वचा में अति संवेदनशील व्यापक और प्रभावोत्पादक क्षमता होती है। इसे दैनन्दिन जीवन में प्रयुक्त होते हुए उन व्यक्तियों में देखा जा सकता है जिनकी अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ, तन्मात्रायें किसी कारण वश विकसित नहीं हो पातीं। मनुष्य को उपलब्ध एक सामर्थ्य का अभाव जब दूसरी इन्द्रियों में अति चेतना क्षमता को जन्म दे सकता है तो कोई कारण नहीं कि सामान्यस्तर का व्यक्ति अध्यात्म अनुशासनों को, योग पुरुषार्थ सम्पन्न करते हुए अपनी स्पर्शेन्द्रियों को अतीन्द्रिय स्तर तक विकसित न कर सके।
साधनाएँ किये अलौकिक क्षमताओं का परिचय देने लगते है।
साधना असंभव नहीं। जीवन में पवित्रता रख कर उसे हँसते खेलते पूरा किया जा सकता है।
साधना द्वारा भी ध्यान योग की प्रक्रिया पूरी कर तनाव मुक्त होना तथा उच्च स्तरीय आनंद को प्राप्त करना सींव है।
साधनाओं-अध्यात्म उपचारों में मन को वशवर्ती बनाने के लिए ध्यान-धारणा की विधा अपनाई जाती है। इससे पूर्व शारीरिक मानसिक परिशोधन की प्राणायाम प्रक्रिया का आश्रय लिया जाता है जो जटिल, समय -साध्य एवं जोखिम भरी होती है। किन्तु जब इसे रंगों का ध्यान करते हुए प्राणाकर्षण प्राणायाम की तरह संयुक्त रूप से सम्पन्न किया जाता है तो वह सरल भी पड़ती है और प्रतिफल भी जल्दी सामने आते है। “कलरब्रीदिग” की विधा ऐसी ही है जो उक्त दोनों ही प्रयोजनों की पूर्ति करती है। यह हानि रहित भी है।
साधना में लगा। इससे पशुओं को, धोबियों को, गहरे कुओं को, पक्षियों को, मनुष्यों को, नित्य प्रति लाभ मिलेगा। यह पुण्य तुम्हारी स्थिति में बिल्कुल उपयुक्त और महत्वपूर्ण फलदायक सिद्ध होगा। उसने वही किया।
साधना उपासना के क्षेत्र में समर्पण का महत्व असाधारण है। निज के पुरुषार्थ के सहारे एक सीमा तक ही बढ़ना सम्भव है। निज के पुरुषार्थ के साथ अनुदानों का भी महत्व है। व्यवहारिक जगत में भी प्रगति हेतु जितना प्रयत्न स्वयं को करना पड़ता है उससे कहीं अधिक अनुकूलताएँ सुविधाएं सृष्टा ने प्रदत्त की हैं। यदि ये भी बनाये रखना कठिन ही नहीं, अपितु असंभव भी था।
साधनाओं का निर्धारणा है जिनके माध्यम से व्यष्टि चेतना का प्रखर परिष्कृत बनाया जाता है।
साधना की विविध प्रक्रियाएँ अपनाकर इन्हें उभरा जा सकता है और उसके द्वारा विश्व-ब्रह्माण्ड में संव्याप्त परम चेतना से तादात्म्य स्थापित कर लाभान्वित हुआ जा सकता है।
साधना को स्पर्शास्पर्श कहते हैं त्वचा में अति संवेदनशील व्यापक और प्रभावोत्पादक क्षमता होती है। इसे दैनन्दिन जीवन में प्रयुक्त होते हुए उन व्यक्तियों में देखा जा सकता है जिनकी अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ, तन्मात्रायें किसी कारण वश विकसित नहीं हो पातीं। मनुष्य को उपलब्ध एक सामर्थ्य का अभाव जब दूसरी इन्द्रियों में अति चेतना क्षमता को जन्म दे सकता है तो कोई कारण नहीं कि सामान्यस्तर का व्यक्ति अध्यात्म अनुशासनों को, योग पुरुषार्थ सम्पन्न करते हुए अपनी स्पर्शेन्द्रियों को अतीन्द्रिय स्तर तक विकसित न कर सके।
साधना को, तन्मात्राओं की सिद्धि को विशेष महत्व दिया गया है। स्थूल संरचना की दृष्टि से ही जब त्वचा इतनी विलक्षण है कि उसका वर्णन हमें हतप्रभ कर देता है तो उसके सूक्ष्म एवं कारण पक्षों का विकास मनुष्य को अनेकानेक ऋद्धि सिद्धियाँ प्रदान करता है।भय की परिणति बताते हुए एक ऋषि अपने शिष्यों को उसकी भयंकरता एवं परिणति समझा रहे थे। उदाहरण के रूप में कह रहे थे कि आसमान ऊपर से न टूट पड़े इस भय से गिलहरी ऊपर को पैर करके सोती है ताकि वह गिरे तो पैरों पर उसे समेट कर अपना बचाव कर सके। बन्दर पेड़ से बार-बार नीचे उतरता रहता है कि कही धरती नीचे तो नहीं खिसक रही।
साधना की आवश्यकता है।
साधना का विरोध करती हैं उनका त्याग करना। इस समर्पण प्रक्रिया का सारतत्त्व भगवान पर विश्वास और भरोसा साधक का यह भाव होना चाहिए कि मैं भगवान को चाहता हूँ अन्य किसी को नहीं। मैं अपने को पूर्णतया भगवान को ही देना चाहता हूँ और चूँकि मेरी अन्तरात्मा भगवान को ही पाना चाहती है, इसलिए में उनसे अवश्य मिलूँगा और प्राप्त करूंगा। इस भाव को अपने अन्दर बढ़ने देना चाहिए। इस तरह समर्पण की पूर्णता से भगवत चेतना का अवतरण मनुष्य के परिष्कृत अन्तराल में बन पड़ता है।
साधना द्वारा साधन स्तर के व्यक्ति इन्हें जाग्रत विकसित कर लेते हैं। सभी अदृश्य दर्शियों को योगी ऋषि तो नहीं कह सकते पर भविष्य दर्शन की विशिष्टता के कारण उन्हें मनीषी तो कहा ही जा सकता है।
साधनाओं द्वारा त्वचा की संवेदन शीलता को यदि जाग्रत किया जा सके तो आँख आदि की कमी पूरी की जा सकती है।
साधना एवं योगाभ्यास करते-करते मनुष्य में दिव्य शक्तियों का प्रादुर्भाव होने लगता है कि जिन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता हैं। दिव्य दर्शन, दिव्यश्रवण, दूर दृष्टि भूत भविष्य कथन, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व आदि अनेकों सिद्धियों का उल्लेख हैं। वैज्ञानिक आधारों के अभाव में अब तक इन्हें कल्पित माना जाता था, किन्तु अनेकानेक घटनाक्रमों, सिद्धि अवस्था को प्राप्त महामानवों ऋषिकल्प व्यक्तित्वों का विश्लेषण-परीक्षण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया है कि अतीन्द्रिय सामर्थ्य केवल कहने सुनने तक सीमित नहीं है वरन् यह तथ्य पूर्ण और विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है। मनोनिग्रह योग-साधना की विविध प्रक्रियाएँ अपनाकर इन्हें उभरा जा सकता है और उसके द्वारा विश्व-ब्रह्माण्ड में संव्याप्त परम चेतना से तादात्म्य स्थापित कर लाभान्वित हुआ जा सकता है।
साधना के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती है। इसके लिए समर्पण योग की साधना की आवश्यकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-June
साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना का वातावरण विनिर्मित करना है। ज्ञान रथों की संस्थापना और संचालन इसी प्रयोजन के लिए होना है। साइकिल के पहियों वाली मन्टिरनुमा एक हल्की किन्तु सुसज्जित गाड़ी पर युग साहित्य ले जाया जायेगा और उसे उस क्षेत्र के शिक्षितों को बिना भूले, घर बैठे नियमित रूप से पढ़ने के लिए दिया जाया करेगा। पढ़ने पर वापस लेने के लिए भी देने वाला ही पहुँचेगा। यही ज्ञान साधना है।
साधना है। प्रचार प्रमुख है, विक्रय गौण।
साधना का तात्पर्य है, साध लेना, सधा लेना। पशु प्र
साधना है। उसको मूर्ख समझते हुए उसकी गलतियाँ निकालता रहता है। तरह तरह के उलाहने देता है। साथ ही गिड़गिड़ा कर नाक रगड़ कर खीसें निपोर कर अपना उचित अनुचित उल्लू सीधा करने के लिए जाल जंजाल बुनता है। प्रशंसा के पुल बाँधता है।
साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना का भी यही समय है। जिस प्रकार बचपन में व्यायाम और अनुशासन में रुचि ली जाती है। उसी प्रकार यौवन में संयम और पुरुषार्थ का निर्वाह पूरी तरह किया जाना चाहिए। अन्यथा ढलती आयु खोखलेपन के कारण कष्टदायक भी होगी। वानप्रस्थ की ढलती प्रौढ़ावस्था को सदुपयोग इसी में है कि जिस जीवन निर्वाह में असंख्यों का असंख्य प्रकार से सहयोग मिला है, उसका ऋण चुकाने के लिए लोक सेवा प्रयोजनों में, सत्प्रवृत्ति संवर्धन में प्राण पण से जुटा जाय।
साधना करने से तो उसके सत्परिणामों से वंचित ही रहना पड़ता है। शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता, लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा यह चार आधार ले कर की जाने वाली मंत्र साधना कभी निष्फल नहीं होती, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना के इस प्रथम अवरोध को नियंत्रित करने वाला दृष्टिकोण हर जीवन साधना के साधक को अपनाना ही चाहिए।
साधना ही आध्यात्मिक स्वस्थता और बलिष्ठता है। इसी के बदले प्रत्यक्ष जीवन में बिना मरण की प्रतीक्षा किये स्वर्ग, मुक्ति और तृप्ति का रसास्वादन करते रहा जा सकता है। उन लाभों को उपलब्ध किया जा सकता है, जिनका उल्लेख अध्यात्म विद्या की महत्ता बताते हुए शास्त्रकारों ने विस्तार पूर्वक किया है। सच्चे सन्त भक्तों का इतिहास भी विद्यमान है। खोजने पर प्रतीत होता है कि पूजा पाठ भले ही उनका-न्यूनाधिक रहा हो पर उनने जीवन साधना के क्षेत्र में परिपूर्ण जागरूकता बरती।
साधना विधान को मिथ्या बताते हैं या ईश्वर के निष्ठुर होने की मान्यता बनाते हैं।
साधना के माध्यम से ईश्वर के साथ सम्बंध जोड़ने की प्रक्रिया में उसे किसी-न-किसी आकार को कहीं न कहीं ठहरा हुआ कल्पित करना पड़ता है। विभिन्न संप्रदायों और सघन परम्पराओं ने ईश्वर का कोई-न-कोई ऐसा स्वरूप निर्धारित किया है, जिसका ध्यान बन पड़े और उसके साथ भक्ति-भावना का आरोपण संभव हो सके। नितान्त निराकार की कल्पना तक नहीं बन पड़ती।
साधना में ही निकल जाती है। लोभ, मोह और अहंकार के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। वासना तृष्णा की खाई पाटने का प्रयत्न किया जाता है पर वह इतनी गहरी है कि सब कुछ खपा देने पर भी उसे पूरा करने की संभावना बन नहीं पाती। तथ्यों को विस्मृत कर देने का ही यह परिणाम है।
साधनाओं में फिर भी अन्यान्य कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं, पर गायत्री मंत्र की साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना के साधक को अपनाना ही चाहिए।
साधना से ही सम्भव है, जो अद्भुत क्षमता के रूप में हर किसी को सहज उपलब्ध है। बालकों के आहार, वातावरण, पोषण आदि की समान सुविधायें होने पर भी बौद्धिक स्तर में असमानता प्राच्यदर्शन की मान्यताओं का ही समर्थन करती हैं। यह एक तथ्य और दर्शाती हैं कि ज्ञानार्जन, सत्साहित्य का पठन-मनन कभी व्यर्थ नहीं जाता। जितनी अवधि तक सार्थक जीवन जीना हो, मनुष्य को अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जमाने, प्रतिभा को खरादते रहने, स्वाध्यायशील ही बने रहने का प्रयत्न करना चाहिए। यह प्रयास क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह सुनिश्चित प्रतिफल देता है।
साधना समग्र स्वस्थता है। उसके ऊपर पूजा पाठ का श्रृंगार भी सजाया जाय तो शोभा और भी अधिक बढ़ेगी किन्तु यह नहीं माना जाना चाहिए कि मात्र श्रृंगार साधनों के सहारे सुन्दरता बढ़ती है। किसी जीर्ण जर्जर, रुग्ण या मृत शरीर पर श्रृंगार सामग्री चढ़ा ली जाय तो भी कुछ प्रयोजन कहाँ सधता है? उससे तो उपहास ही होगा। इसके विपरीत यदि कोई हृष्टपुष्ट पहलवान मात्र लँगोट पहन कर अखाड़े में उतरता है तो भी उसकी शोभा बन जाती है।
साधना की लम्बी और ऊँची मंजिल पर चल सकना, चढ़ सकना असंभव हो जाता है। भले ही कोई कितने ही पूजा पाठ करते रहें, जिन्हें तथ्यान्वेषी बनना है उन्हें
साधना पर्याप्त है कि सिद्धावस्था तक पहुँचते- पहुँचते विचारणाओं और भावनाओं पर पूरी तरह नियंत्रण हो जाता है। न मन निरर्थक कल्पनाएँ करता है और न भावनाओं में हीनता आती है। सुदृढ़ सुनिश्चित मान्यताओं का परिपक्व होना और आत्मजय प्राप्त कर लेना ही समाधि का व्यावहारिक रूप है जिसकी ओर क्रमशः बढ़ा जा सकता है।
साधना को सफल बनाने में चार तथ्यों का समावेश है- 1-शब्द शक्ति 2- मानसिक एकाग्रता 3-चारित्रिक श्रेष्ठता और 4-अटूट श्रद्धा।
साधना के सत्परिणाम प्राप्त होते हैं। उथली एकाँगी साधना करने से तो उसके सत्परिणामों से वंचित ही रहना पड़ता है। शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता, लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा यह चार आधार ले कर की जाने वाली मंत्र साधना कभी निष्फल नहीं होती, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना-विधानों से भी अधिक आत्म परिष्कार आवश्यक है। देव पूजन के लिए स्थान, उपकरण सभी स्वच्छ, सुसज्जित किए जाते हैं। मैला-कुचैला, दुर्गन्धित, कुरूप वातावरण देखकर वे आने की तैयार नहीं होते, आते हैं तो वापस लौट जाते हैं। यह बात दैवी शक्तियों के अवतरण, अनुग्रह के सम्बन्ध में भी है, उन्हें स्वच्छता और सदुपयोग कर सकने योग्य पात्रता का निरीक्षण परीक्षण करना होता है। इसके उपरान्त ही वह बात बनती है कि दैवी अनुग्रह से लाभान्वित हुआ जाय।
साधनाओं के करने से प्राप्त होती हैं। इस मंत्र की साधना को सफल बनाने में चार तथ्यों का समावेश है- 1-शब्द शक्ति 2- मानसिक एकाग्रता 3-चारित्रिक श्रेष्ठता और 4-अटूट श्रद्धा।
साधना कभी निष्फल नहीं होती, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना की गई। मंत्र का जितना महत्व है, साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि साधक अपनी श्रद्धा तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मंत्र प्रयोग सही निशाना साधने वाली बहुमूल्य बंदूक का काम कर सके।
साधनारत योगी जनों के लिए तथा सर्वसाधारण के लिए अहितकर ही है।
साधना उपलब्ध हो सकें, जो सामान्यतया बहुत प्रयत्न करने पर बहुत दिन में हस्तगत होते हैं।
साधना की यथार्थता और उपलब्धि में जितनी अधिक गहराई के साथ-तन्मयता के साथ-नियोजित किया गया होगा, मंत्र उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा। तांत्रिक की चमत्कारी शक्ति उसी अनुपात से प्रचण्ड होगी। इन तीनों चेतनात्मक आधारों को महत्व देते हुए जिसने मंत्रानुष्ठान किया होगा, निश्चित रूप से वह अपने प्रयोजन में पूर्णतया सफल होकर रहेगा।
साधना विशेष लाभकारी सिद्ध हुई। इलिनायस विश्व विद्यालय के अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने अपने शोध निष्कर्षों में बताया है कि मस्तिष्क की स्मृति क्षमता और आक्सीजन में घनिष्ट सम्बन्ध है। अपने प्रयोग परीक्षणों में उन्होंने देखा कि जिन बच्चों को हल्की साँस अर्थात् आक्सीजन की मात्रा लेने को कहा गया उनकी याददाश्त एवं मेधा में कमी पाई गई। उनके अनुसार आक्सीजन मस्तिष्कीय कोशिकाओं को सही तरीके से अपना काम करने के लिए ईंधन की तरह प्रयुक्त होता है। इसकी आपूर्ति में कमी प्रायः श्वास प्रश्वास की क्रिया को सही रीति से न संपन्न करने के कारण ही होती है।
साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि साधक अपनी श्रद्धा तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मंत्र प्रयोग सही निशाना साधने वाली बहुमूल्य बंदूक का काम कर सके।
साधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर उद्दण्डता का भूत और चढ़ा रहता है जो दूसरों को गिराने, नीचा दिखाने की ही ललक उठाती रहती है। अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा करने में ही ऐसे लोग लगे रहते हैं। इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्म परिष्कार का आधार कैसे बन पड़े?
साधनाएँ और उनकी सिद्धियाँ तो प्रायः गोपनीय रखी जाती हैं। उन्हें प्रदर्शन से बचाया जाता है। कौतुक-कौतूहल का रूप देकर भीड़ इकट्ठी नहीं की जाती। इस आधार पर भावुक लोगों की जेबें भी खाली नहीं कराई जातीं। इन कौतूहलों को देखकर सामान्य जन भ्रम में पड़ते हैं और उद्देश्यों को भूल कर इन तथाकथित सिद्ध पुरुषों के आगे पीछे मनोकामनाएँ पूर्ण कराने के निमित्त चक्कर लगाते हैं।
साधनाएँ हैं, प्रायः उन सब में मंत्र जप का समावेश किसी न किसी रूप में अवश्य होता है। क्योंकि मंत्र विद्या मनुष्य के अंतरंग में सोई उन शक्तियों और क्षमताओं को जाग्रत करती है जो उसे उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँचाती हैं। अन्य मंत्र साधनाओं में फिर भी अन्यान्य कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं, पर गायत्री मंत्र की साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
साधना करनी पड़ती है। निर्वाह के लिए साधारण क्रिया कलाप तक उपेक्षापूर्वक किए जाने पर अस्त व्यस्त और फूहड़ ढंग के ही बन पड़ते हैं। उनसे अनाड़ीपन झलकता है। बुद्धिमानों पर भी अयोग्यता का लाँछन लगता है। इसका कारण एक ही होता है कि क्रिया को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर मनोयोगपूर्वक नहीं किया गया होता।
साधना के क्षेत्र में परिपूर्ण जागरूकता बरती। इसमें व्यतिक्रम नहीं होने दिया। न आदर्श की अवज्ञा की और न उपेक्षा बरती। भाव संवेदनाओं में श्रद्धा-विचार बुद्धि में प्रज्ञा और लोक व्यवहार में शालीन सद्भावना की निष्ठा अपनाकर कोई भी सच्चे अर्थों में जीवन देवता का सच्चा साधक बन सकता है। उसका उपहार वरदान भी उसे हाथों हाथ मिलता चलता है।
साधना सम्पन्न कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-January
साधनाओं में अल्फा-स्थिति उत्पन्न करने के लिए साधक को यम-नियम से लेकर धारणा-ध्यान के विविध योगिक उपक्रमों का आश्रय लेना पड़ता है। सतत अभ्यास से जैसे-जैसे कषाय-कल्मषों का परिशोधन होता जाता है, स्वभाव संचित आदतों, व्यवहार एवं विचारणा में उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ती जाती है। धीरे-धीरे समूचे व्यक्तित्व का ही कायाकल्प हो जाता है। साधक की मस्तिष्कीय चेतना जितनी अधिक समय तक प्रचुर परिमाण में अल्फा-तरंगों से आच्छादित रहेगी, उसी अनुपात से उसकी अंतःक्षमताओं का विकास होगा। शांत मस्तिष्क से ही एकाग्रता सधती है और तदनुरूप सत्परिणाम भी सामने आते हैं।
साधना से संभव है। इस आधार पर शरीर तक सीमित आत्मा ब्रह्मांडव्यापी परमात्मा के साथ अपना सघन संपर्क बनाने और जीवन का लक्ष्य पाने में भी सफल हो सकती है।
साधना। साधना अर्थात अस्त-व्यस्तता को सुव्यवस्था में बदलना। इसके लिए दो प्रयास निरंतर जारी रखने पड़ते हैं। एक अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को बारीकी से देखना, समझना और उन्हें उखाड़ने के लिए अनवरत प्रयत्नशील-संघर्षशील रहना। दूसरा कार्य है— जिन मानवी गरिमा के अनुरूप सत्प्रवृत्तियों की अभी कमी मालूम पड़ती है, उनकी आवश्यकता उपयोगिता को समझते हुए, उसके लिए आकुलता स्तर का मानस बनना।
साधना के लिए भी किया गया प्रयत्न सफल होकर ही रहता है।
साधना यदि भावना और श्रद्धापूर्वक की जाए तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगें निश्चित ही साधक को श्रेयपथ पर अग्रसर करती हैं।
साधना अर्थात अस्त-व्यस्तता को सुव्यवस्था में बदलना। इसके लिए दो प्रयास निरंतर जारी रखने पड़ते हैं। एक अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को बारीकी से देखना, समझना और उन्हें उखाड़ने के लिए अनवरत प्रयत्नशील-संघर्षशील रहना। दूसरा कार्य है— जिन मानवी गरिमा के अनुरूप सत्प्रवृत्तियों की अभी कमी मालूम पड़ती है, उनकी आवश्यकता उपयोगिता को समझते हुए, उसके लिए आकुलता स्तर का मानस बनना। यह उभयपक्षीय क्रम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यवहृत होते चले तो समझना चाहिए कि जीवन-साधना साधने का सरंजाम जुटा।
साधना और गतिविधियों का निर्धारण इन दो माध्यमों के सहारे विकसित की जाती रहे तो समझना चाहिए कि उसका पैनापन कुछ ही समय में इतनी बढ़ी-चढ़ी स्थिति अपना लेगा, जिसके सहारे उलझनों को सुलझाना और श्रेयस्कर दिशाधारा अपना सकना संभव हो सके। प्रतिभा का निखार एवं व्यवस्था-बुद्धि का विकास इन्हीं कुछ आधारों पर अवलंबित है।
साधना द्वारा मस्तिष्क को विश्राम देकर उसके मेधा-प्रज्ञा क्षेत्रों को विकसित, परिष्कृत किया और समाधिपरक परमानंद का लाभ उठाया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मानवी मस्तिष्क से उसकी भावना, विचारणा एवं मनःस्थिति के अनुरूप विभिन्न प्रकार की ऊर्जा-तरंगें प्रस्फुटित होती रहती है। यह मस्तिष्कीय धाराएँ अल्फा, बीटा, थीटा, डेल्टा इन चार भागों में बँटी होती हैं, जिन्हें ई.ई.जी. मशीन द्वारा अलग-अलग अंकित किया जाता है। परीक्षणकर्त्ता विशेषज्ञों ने पाया है कि जिस समय मस्तिष्क से अल्फा-तरंगें निस्सृत हो रही है, उस समय व्यक्ति गहन शांति की स्थिति में होता है। अल्फा-तरंगों की आवृत्ति 8 से 23 साइकल्स प्रति सेकेंड होती है।
साधना के साधकों के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। जो अपनी त्रुटियों की उपेक्षा करता रहता है, जो अगले दिनों अधिक प्रखर और अधिक प्रामाणिक बनने की बात नहीं सोच सकता, उस प्रकार की योजना बनाकर उनके लिए कटिबद्ध होने की तत्परता नहीं दिखा सकता, उसके संबंध में यह आशा नहीं की जा सकती कि वह किसी ऐसी स्थिति में पहुँच सकेगा, जिसमें अपने को गर्व-गौरव अनुभव करने का अवसर मिल सके। साथ ही दूसरों का सहयोग-सम्मान पाकर अधिक ऊँची स्थिति तक पहुँच सकना संभव हो सके।
साधना द्वारा ही हस्तगत होता है। श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण साधने से ही मन की एकाग्रता सधती, चित्त दृढ़ और स्थिर बनता है। मानसिक विकास इसी से होता हैं।
साधना करने वाले योगसाधकों पर किए गए विभिन्न प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर विशेषज्ञों ने जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनके अनुसार ध्यान-प्रक्रिया के अभ्यास से उद्विग्नता मिटती, तनाव घटता और मस्तिष्क शांत होता है। चंचलता मिटती और मन में स्थिरता आती है। नाड़ी की गति कम होती और श्वसन दर घटती है, तथा शरीर का तापमान नीचे उतर जाता है। इससे शारीरिक-मानसिक शक्ति की यथेष्ट बचत होती है तथा अतिरिक्त प्राण-ऊर्जा का भंडारण होता है। परीक्षणों में पाया गया है कि ध्यान की गहराई में उतरने पर साधक की श्वसन की सामान्य गति 18 से घटकर 5 या 6 श्वास प्रति मिनट एवं हृदय दर 72-80 से घटकर 50-60 प्रति मिनट तक जा पहुँचती है।
साधनाएँ की जाती हैं, जिसमें मस्तिष्कीय तरंगों का एकत्रीकरण किया और ब्रह्मांडीय तरंगों से— परम चेतना से उनका सामंजस्य बिठाया जाता है। मंत्रोच्चार के साथ इसकी विशिष्टता बढ़ती मानी गई है। यह साधना यदि भावना और श्रद्धापूर्वक की जाए तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगें निश्चित ही साधक को श्रेयपथ पर अग्रसर करती हैं।
साधना साधने का सरंजाम जुटा।
साधना का साध्यस्थल है। यहाँ सब कुछ एकत्व में परिणत हो जाता है। अद्वैत, एकमेवाद्वितीयं के उत्कर्ष का स्थल यही है, पर इसका यह चरम लाभ मात्र इसको तोते की तरह रटते रहने मात्र से प्राप्त नहीं होता। इसके लिए तो अर्जुन की तरह 'करिष्ये वचनं तव' की कठोर प्रतिज्ञा में आबद्ध होना पड़ता है। निज की क्षुद्र आकांक्षाओं— अभिलाषाओं को भागवत इच्छा में समाहितकर उसी को सहज स्वीकार करना पड़ता है।
साधना के मार्ग पर अग्रसर होने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि निष्पक्षता की मनोभूमि विकसित की जाए। खासतौर से अपने संबंध में उतना ही तीखापन होना चाहिए, जितना कि आमतौर से दूसरों के दोष-दुर्गुण ढूँढने में हर किसी का रहता है। आरोप जगाने और लांछित करने में हर किसी को प्रवीण पाया जाता है। इस सहज वृत्ति को ठीक उल्टा करने से ही आत्मसमीक्षा की वह प्राथमिक आवश्यकता पूरी होती है, जिसके बिना व्यक्तित्व का निखार प्रायः असंभव ही बना रहता है। वह न बन पड़े तो किसी को भी महानता अपनाने और प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकने का अवसर मिल ही नहीं सकता।
साधना नहीं करते तो यह जो हजारों औषधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ, वह कहाँ से प्राप्त हो जाता?
साधना के प्रतिदान— प्रतिफल के रूप में महाराज युधिष्ठिर को अक्षयपात्र मिल गया। अक्षयपात्र की विशेषता यह थी कि उससे जब भी माँगा जाता, वह स्वादिष्ट और मधुर व्यंजन प्रदान करता। परीक्षा हेतु उसी दिन हस्तिनापुर की समग्र जनता को मनपसंद व्यंजन और पकवान ग्रहण करने का सार्वजनिक निमंत्रण दिया। हर किसी को इस अक्षयपात्र से लाभ उठाने की छूट थी।
साधना से इसके रक्तस्तर में कमी आती है और व्यक्ति के अंदर उत्साह, उमंग और स्फूर्ति की नवीन चेतना की लहरें हिलोरें मारने लगती हैं। शरीर की प्रतिरोधी क्षमता— 'इम्यून सिस्टम' में भी आमूल-चूल अभिवृद्धि हो जाती है। त्वचा की प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ जाने पर उसके संपर्क में आने वाले रोगकारक जीवाणुओं का प्रभाव समाप्त हो जाता हैं। मानसिक क्षमता के केंद्रीकरण प्रयोग से कोई भी मंदबुद्धि, दुर्बलकाय मनुष्य अपना कायाकल्प कर सकता हैं।
साधना इसी आधार पर सधती है। मनुष्य जन्म को सार्थक इन्हीं आधारों को अपनाकर बनाया जा सकता है।
साधना में ही सन्निहित है। संसार के सफलतम व्यक्तियों, महानतम विभूतियों की यह एक अनिवार्य विशेषता रही है कि उनका अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण बना रहा है। मस्तिष्कीय चेतना को उन्होंने बिखरने नहीं दिया, जो निश्चय किया, उसी पर अविचल भाव से चलते रहे। मानसिक शक्तियों, ऊर्जा-तरंगों के बिखराव को रोककर एक सुनिश्चित केंद्रबिंदु पर केंद्रित करने की कला जिन्हें ज्ञात है, वे उस मनःस्थिति में जो काम हाथ में लेंगे— सफल होकर रहेंगे।
साधना करने की व्यवस्था बनाई गई। संपर्क-क्षेत्र में अधिकाधिक पत्रिकाओं को हर शिक्षित तक पहुँचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
साधनात्मक प्रगति पर कई फीट तक का विस्तार वाला क्षेत्र।
तीसरे प्रभावशाली आभा परिकर को उन्होंने 'जोन ऑफ एनर्जी' कहा है। पहले में बिंदु होते हैं, दूसरी में रेखाएँ और तीसरे में सघन आयनों का समुच्चय। पहले को स्थूलशरीर या बायोप्लाज्मा, दूसरे को प्लाज्मा एवं तीसरे को आयन विकिरण कहा गया है, जिसमें वास्तव में हीलिंग (चिकित्सा) की क्षमता होती है। प्राण-प्रत्यावर्तन में इसी की प्रधान भूमिका होती है।
साधनाओं में गुजारा था, परंतु कुछ कमजोरियाँ अभी भी शेष थीं, जिन्हें विजित करना था और उनमें एक था— यह सात्त्विक अभिमान।
साधनाओं में आंतरिक परिशोधन, पवित्रता संवर्द्धन, प्राण-ऊर्जा के उन्नयन का महत्त्वपूर्ण कार्य इसी के माध्यम से संपन्न होता है। शारीरिक आरोग्य का लाभ तो इससे सर्वविदित ही है। फेफड़े सुदृढ़ होने, अधिक मात्रा में प्राणवायु के शरीर में प्रवेश करने से जीवन तत्त्व भी अधिक मिलते हैं और परिशोधन की गति भी तीव्र होती है। स्थूल और सूक्ष्मशरीरों पर स्वास्थ्य-संवर्द्धन और मानसिक परिष्कार में प्राणायाम का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है। कारणशरीर के भाव-संस्थान पर भी इस साधन की उपयुक्त प्रतिक्रिया होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-July
साधना में निरत होने के कारण वैयक्तिक सम्बन्धों, सामाजिक प्रचलनों और स्नेह-सौहार्द के आधार पर उभरते-बिखरते आनन्द उल्लास की भी यहाँ कमी नहीं है। तब यह मान्यता सहज ही बनती है कि भारत की भूमि पर ही स्वर्ग का अवतरण हुआ है और धरित्री ही “स्वर्गादपि गरीयसी” है। भगवान के अवतार जितने भी हुए हैं वे 10 या 24 जन्मे इसी धरित्री पर हैं। आकाश में उड़ने और अदृश्य रहने वाले अजर अमर, देवताओं को पकड़ पाना तो मुश्किल था, पर ऋषियों, मुनियों और मनीषियों की प्रज्ञा और आश्चर्यजनक पुरुषार्थ परायणता, कर्तव्यनिष्ठ तत्परता को देखते हुए मान्यता बना ली गई कि देवता संदेह भारत भूमि पर विचरण करते हैं और उनने ही किसी अविज्ञात लोक में अवस्थित धरती पर स्वर्ग को उतार कर ठीक वैसी ही अनुकृति यहाँ तैयार कर ली है।
साधना-यह मूलतः आत्मावलोकन की, आत्मसुधार व आत्मपरिष्कार की साधना है। बड़े आकार के दर्पण को सामने रखकर बैठा जाय। सुखासन में जमीन पर या कुर्सी पर बैठा जा सकता है। खुले शरीर के प्रत्येक भाग पर विश्वास भरी दृष्टि से अवलोकन किया जाय। पहले अपने आपके बारे में चिन्तन कर अंतः के दोष-दुर्गुणों से मुक्त होते रहने की भावना की जाय।
साधना और सामाजिक जीवन में परमार्थ परायणता के फलस्वरूप उद्भूत होती है। संयम-अर्थात् अनुशासन का, नीति मर्यादाओं का कठोरतापूर्वक परिपालन। इसके लिए मनुष्य को तृष्णा, वासना और अहंता के त्रिविधि नागपाशों से छूटना पड़ता है। “सादा जीवन-उच्च विचार” का ब्राह्मणोचित, औसत नागरिक स्तर का जीवन यापन करना पड़ता है। जो इतना कर सके, उसी से परमार्थ सधता है और योगियों में पाई जाने वाली सिद्धियों, शक्तियों, और विभूतियों का अन्तराल में उद्भव और अखिल अन्तरिक्ष से अभिवर्धन होता है।
साधना है। बड़े आकार के दर्पण को सामने रखकर बैठा जाय। सुखासन में जमीन पर या कुर्सी पर बैठा जा सकता है। खुले शरीर के प्रत्येक भाग पर विश्वास भरी दृष्टि से अवलोकन किया जाय। पहले अपने आपके बारे में चिन्तन कर अंतः के दोष-दुर्गुणों से मुक्त होते रहने की भावना की जाय।
साधना। तपश्चर्याएं शरीर प्रधान होती हैं और योग मन को अवांछनियताओं से मुक्ति दिला कर आत्म विस्तार की परिधि में प्रवेश करने को कहते हैं। इस और भी अधिक स्पष्ट एवं सरल रूप में समझना हो तो यों कहा जा सकता है कि अपने कार्यक्षेत्र को ऐसा बनाया जाय जिसमें सुनियोजित व्यवस्था उपक्रम के अतिरिक्त और कुछ दीख न पड़े। मनीषियों को यही सोचना और यही करना होता है। वे अव्यवस्था जन्य दुष्प्रवृत्तियों को लुहार की तरह घन बजाकर सीधी करती हैं और अपेक्षित धातु खण्ड की गलाई-ढलाई करके उन्हें अति महत्वपूर्ण उपकरण का स्वरूप प्रदान करते हैं।
साधना पिछले आधे जीवन की विडम्बना में खप गई। अब आपका कोई पुण्य शेष नहीं है जिसके कारण स्वर्ग की सद्गति मिल सके उन्हें वापस मनुष्य लोक में आना पड़ा। और साधारण स्थिति का जीवन अपनाना पड़ा।
साधना की यही तीन उपलब्धियाँ हैं। जिनने ओजस् तेजस् और वर्चस् की साधना की, समझना चाहिए कि वह सच्चे अर्थों में तपस्वी और मनस्वी हो गया। मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई सिद्धियाँ और विभूतियाँ उसके पैरों पर लौटेगी।
साधना की, समझना चाहिए कि वह सच्चे अर्थों में तपस्वी और मनस्वी हो गया। मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई सिद्धियाँ और विभूतियाँ उसके पैरों पर लौटेगी।
साधना विश्व भर में विख्यात है और उसे मनुष्य में देवत्व उदय करने में सर्वथा समर्थ माना जाता है। वैसे अगणित प्रमाण उदाहरण भी हैं। शाप वरदान देने की शक्तियाँ ऋद्धि−सिद्धियों का परिचय देने का प्रसंग अगणित उदाहरणों समेत इतिहास प्रसिद्ध है। पिछली शताब्दियों में भौतिक विज्ञान के आविष्कारों ने संसार भर को चमत्कृत एवं लाभान्वित किया है। भारत की अपनी विशेषता चिर अतीत से विख्यात रही है।
साधना जुटाने के अवसर मिलते चले गये। वे यह भी कहते हैं कि जड़ माने जाने वाले पदार्थों पर भी प्राणि समुदाय की प्रचण्ड इच्छाशक्ति काम करती है और प्रतिकूलताओं के बीच भी अनुकूलता उत्पन्न कर लेती है। समुद्र की गहराई में उगे उद्यान और पर्वत शिखरों पर दौड़ते पाषाण-कच्छप, यह बताते हैं कि अस्तित्व में कितने आश्चर्य जनक परिवर्तन हो सकते हैं। इसे सम्पन्न करने में एक ही शक्ति विभिन्न प्रकार से अपने रूप दिखाती और चमत्कार उत्पन्न करती है।
साधना विधान अनेक हैं। पर सर्वसुलभ प्रक्रिया यही है कि निजी जीवन इतना हलका-फुलका रखा जाय कि उसका निर्वाह न्यूनतम श्रम और समय में ही संभव होता रहे। इसके उपरान्त ही श्रम, समय और साधन इतनी मात्रा में बच पाते हैं कि उनके आधार पर परमार्थ में निरत रहकर ब्रह्म के साथ आत्मसात् होने का रसास्वादन किया जा सके। देवोपम जीवन जीने का आनन्द लाभ उठाया जा सके।
साधना रत थे। साथ ही वे अध्यात्म प्रशिक्षण का आश्रम भी चला रहे थे। दुहरे कार्य में उनकी व्यस्तता अत्यधिक बढ़ गई थी। सहायक का अभाव बुरी तरह खल रहा था।
साधना और लोक साधना दोनों एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। जहाँ एक को सही रीति से अपनाया जायेगा, वहाँ दूसरा उसके साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ जायेगा।
साधना आदि के नाम से जाना जाता है। उसके फलस्वरूप उपलब्ध हो सकने वाली ऋद्धि सिद्धियों से पुराण गाथाओं का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। यह योगाभ्यास आखिर है क्या? इसकी गहराई तक उतरने वाले बताते हैं कि यह तितिक्षाओं के साथ जुड़ी हुई कर्मकाण्डों की प्रत्यक्ष फलश्रुति प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः मनोबल को उभारने और प्रसुप्त प्राणाग्नि को प्रज्वलित करने की प्रक्रिया मात्र है देव शक्तियों का केन्द्र बिन्दु यही है। वृक्ष पर फल−फूल आकाश से टपककर चिपकते रहने की बात सोचने वाले वस्तुतः गलती पर होते हैं।
साधना विधान, कर्म काण्ड, व्रत, उपवास, पदयात्रा आदि करने के विधान हैं। पर उन्हें साधन मात्र ही माना जा सकता हैं, साध्य नहीं। साध्य नहीं। साध्य तो व्यक्तित्व में परिपक्वता, प्रखरता और शालीनता का ऐसा समावेश करना है जो आकर्षणों और दबावों के आगे डगमगाये नहीं। आन पर अड़ा रहे।
साधना दोनों एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। जहाँ एक को सही रीति से अपनाया जायेगा, वहाँ दूसरा उसके साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ जायेगा।
साधना उपक्रम प्रतिभा परिष्कार के संदर्भ में भी निर्धारित हैं और वे बहुत हद तक सफल होते भी देखे गए हैं। ऐसे कुछ आधारों का जिनका ब्रह्मवर्चस् की शोधप्रक्रिया में प्रयोग किया जाता है अथवा जिन्हें वर्तमान या संशोधित रूप में प्रयुक्त किये जाने की संभावना है, का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है। (1) स्वसंकेत (आँटोसजेशन्)-शान्त वातावरण में स्थिर और एकाग्र मन से बैठा जाया। भावना की जाय कि अपने मस्तिष्क केन्द्र से निस्सृत केन्द्र से निस्सृत प्राण विद्युत का समुच्चय शरीर के अंग अवयवों में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में प्रवाहित हो रहा है। उस आधार पर प्रत्येक अवयव पुष्ट हो रहे हैं।
साधना कहलाती है और व्यक्ति का भावकल्प कर दिखाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-April
साधना का अनवरत क्रम चह और बन पड़ता है, जिसे अनेकानेक लिप्सा लालसाएँ नोंचती कचोंटती रहतीं है। जिन्हें .... तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए व्याकुलता सदा सताती रहती है वे विलासिता और अमीरी के अतिरिक्त और क्या कुछ सोच पायेंगे? इनकी खनक ऐसी मदोन्मत्त होती है कि भगवत् चेतना के साथ जुड़ सकने की कोई संभावना ही नहीं रहती। भले ही इस प्रगति को खेल खिलवाड़ समझने वाले कुछ पूजा पत्री जैसे कर्मकाण्डों की लकीर पीटकर मन समझा लिया करें। संयम जन्य पवित्रता अपनाये बिना किसी भी भगवत् दर्शन कर सकने जैसा दृष्टि कोण प्राप्त नहीं होता।
साधना विज्ञान के नाम से जाना जाता है। इन दिनों तो उसमें भी भ्रष्टाचार घुस पड़ा है और लोग देवता को रिझा कर अपनी उचित अनुचित मनोकामनाओं को पूरी कराने के लिए उसका प्रयोग करते हे। भटकते और निराश होते है, किन्तु उसका वास्तविक उद्देश्य और सिद्धान्त यही है कि अपने प्रयास से अपने व्यक्तित्व को अभीष्ट स्तर का ढाला जाय। इष्ट सिद्धि इसी को कहते है। साधना से सिद्धि की चर्चा आमतौर से होती रहती है।
साधना मार्ग में सफलता मिलनी संभव होगी।
साधना में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है। यदि विश्वास न हो तो उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उतना ही फल मिलेगा जितना कि उतने समय तक किये गये हल्के-फुलके-शारीरिक परिश्रम का। उसी साधन को करते हुए एक व्यक्ति चमत्कारी फल प्राप्त करता है और दूसरे को असफल रहना पड़ता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा में न्यूनाधिकता का होना ही प्रधान कारण होता है। नारद पुराण-पूर्व भाग प्रथम पाद 4/1 में कहा गया है “श्रद्धा से सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से ही भगवान-सन्तुष्ट होते है”।
साधना, मनोयोग एवं कौशल बच रहता है। उसके बदले भगवत् कृपा का अजस्र अनुदान सहज स्वाभाविक रूप से किसी भी विवेकवान को प्रचुर परिणाम में हस्तगत होता चलता है।
साधना है। मौन दा घंटे से कम का नहीं होना चाहिए। मौन काल में प्राणसंचय की साधना साथ-साथ चलती रह सकती है। इस निर्धारित कृत्य के अतिरिक्त दैनिक साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिए उतना करने का प्रयास करना चाहिए। सेवा कार्या के लिए प्रत्यक्ष अवसर सामने ने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए।
साधना विज्ञान में नाड़ी गुच्छकों, चक्र उपत्यिकाओं, प्राणाग्नि-योगाग्नि-कुण्डलिनी आदि के नाम से जाना जाता है, संभव है स्वतः दहन की इन घटनाओं से जुड़ा हो। अभी शरीर के इस सूक्ष्म विद्युत संस्थान पर शोध की काफी गुँजाइश है, ऐसी चुनौती अपवाद स्वरूप होते रहने वाले ये घटनाक्रम देते है।
साधना करने वाले नर रत्न बनकर निकले।
साधना को पहले कला के अंतर्गत रा गया था, पर आज ऐसील बात नहीं रही। वह अब गायकी बन गई है। कुत्साओं के उभार के लिए उसका प्रस्तुत किया जाना जनजीवन को मात्र विषपान ही कराता है।
साधना में चार विशेष नियम विधान अपनाने पड़ते हैं। यह हैं (1)उपवास (2) ब्रह्मचर्य (3) प्राणसंचय (4) मौन। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके लिए मात्र संयम ही अपनाना पड़ता है। दो के लिए कुछ कृत्य विशेष करने पड़ते हैं। जिव्हा और जननेन्द्रिय यही दो दसों इंद्रियों में प्रबल हैं।
साधना .... लिए सामर्थ्यवान साधकों को विनिर्मित करने के .... उसे अनेकों विशेषताओं से सम्पन्न किया गया।....परम्पराओं और नवीनतम विशिष्ट साधनाओं का .... समावेश किया गया है, ताकि वातावरण .... ऊर्जा भरी रहे और इस अध्यात्म संगम का .... करने वाले समुचित लाभ ले सकें।
साधनाओं की पद्धति को प्रचलित किया था। जिसका अवलम्बन व्यक्ति को सदैव ही निषेधात्मक परिणामों से बचाने वाला सिद्ध होता है। आज भी इनकी वैज्ञानिकता यथावत् है। इसका पुनः निरीक्षण-परीक्षण व अवलम्बन व्यक्ति के शरीर-मन को स्वस्थ रूप से सुसंचालित करने में अब भी महती भूमिका निभा सकता है।
साधना में जिव्हा पर नियन्त्रण स्थापित करना प्रथम चरण है।
साधनाएँ आश्विन और चैत्र के नवरात्रियों में नौ-नौ दिन के लिए की जाती हैं। इन दिनों गायत्री मंत्र के 24 हजार जप की परम्परा पुरातन काल से चली आती है। उसका निर्वाह सभी आस्थावान साधकों को करना चाहिए। बिना जाति या लिंग भेद के इसे कोई भी अध्यात्म प्रेमी निःसंकोच कर सकता है। कुछ कमी रह जाने पर भी इस सात्विक साधना में किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका नहीं करना चाहिए।
साधना में किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका नहीं करना चाहिए। नौ दिनों में प्रतिदिन 27 माला गायत्री मंत्र के जप कर लेने से 24 हजार की निर्धारित जप संख्या पूरी हो जाती है। अन्तिम दिन कम से कम .... आहुतियों का अग्निहोत्र करना चाहिए। अन्तिम .... अवकाश न हो तो हवन किसी अगले दिन किया जा सकता है।
साधना बड़ी मात्रा में करते हैं, जो प्रतिदिन कितने ही लक्ष मंत्र ज पके समकक्ष हो जाती है। यह प्रत्यक्ष है। परोक्ष वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा सप्तऋषियों का प्रतीत पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की तपश्चर्या अपना विशेष प्रभाव उत्पन्न करती है।
साधना बन पड़ने पर भी उसके चमत्कारी परिणाम होते हैं। इसके विपरीत श्रद्धा के अभाव में कोई उपासनात्मक कर्म-काण्ड ढेरों समय लगाकर करते रहने पर भी कहने लायक प्रतिफल नहीं होता।
साधना नौ दिन की करनी पड़ती है। इन दो पर्वों की विशेष उपासना को भी अपने निर्धारण में सम्मिलित रखने से बीच में जो अनुत्साह की गिरावट आने लगती है, उसका निराकरण होता रहता है। इनके आधार पर जो विशेष शक्ति उपार्जित होती है उससे शिथिलता आने का अवसाद निबटता रहता है।
साधना नकद धर्म की तरह है। उसका प्रतिफल हाथों हाथ मिलता है। न देवेच्छा उपलब्ध करने के लिए गिड़गिड़ाने की आवश्यकता पड़ती है और न जन्म जन्मान्तरों तक प्रतिफल प्राप्त होने की आशा लगाये बैठे रहने की विवशता से फला पड़ता है। यथार्थता तुरन्त फलित होती है। विशेषतया आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में।
साधना के दो विशेष पर्व हैं-एक साप्ताहिक, दूसरा अर्द्ध-वार्षिक। साप्ताहिक आमतौर से लोग रविवार, गुरुवार को रखते हैं। पर परिस्थितियों के कारण यदि कोई अन्य दिन सुविधाजनक पड़ता है तो उसे भी अपनाया जा सकता है। अर्द्धवार्षिक में आश्विन और चैत्र की दो नवरात्रियाँ आती हैं। इनमें साधना नौ दिन की करनी पड़ती है।
साधना कर मनुष्य मात्र सुन्दरम् को ही नहीं सत्यम् एवं शिवम् को भी प्राप्त कर लेता है, ऐसी मनीषियों की मान्यता है।
साधनाओं का .... समावेश किया गया है, ताकि वातावरण .... ऊर्जा भरी रहे और इस अध्यात्म संगम का .... करने वाले समुचित लाभ ले सकें।
साधना को एक अनिवार्य अंग के रूप में सम्मिलित किया। पूजा-उपासना-जैसे धर्मानुष्ठानों से लेकर वातावरण परिशोधन के विविध उपक्रमों में सुगंधित द्रव्यों को रखने या जलाने का अनिवार्य प्रचलन रखा। पूजा में सुवासित पुष्प इसी की पूर्ति करते है।
साधना की। कभी क्षण भर को गाँधी जी इस आस्था से विचलित नहीं हुए कि वही एक सार्वभौम सत्ता है और वही परम यथार्थ है। इस आस्था ने आत्मशक्ति के उस चमत्कार को जन्म दिया, जिसके सामने सहस्त्रों अणुबमों की शक्ति भी तुच्छ है। गाँधी जी कहा करते थे कि जिसमें श्रद्धा है, उसकी बुद्धि तेजस्वी रहती है। श्रद्धावान मनुष्य पहाड़ों को भी लाँघ सकता है।
साधना का दिन ऐसे ही श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगाना चाहिए।
साधना से सिद्धि प्राप्त होती ह तप के यों हठयोग जैसे कुछ अतिवादी प्रयोग भी है पर जिसे सरल और सर्व सुलभ कहा जा सके, वह है सर्वतोमुखी संयम जिसके चार चरण होते हैं-इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम। इनका समन्वय बन पड़ता है ऐसी तत्परता में, जिसके साथ सादा जीवन उच्च विचार का तत्वज्ञान सघनतापूर्वक जुड़ा हो। इसे ब्राह्मणोचित जीवन अर्थात् औसत नागरिक स्तर को पर्याप्त मानने की अवधारण भी कह सकते है।
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिए उतना करने का प्रयास करना चाहिए। सेवा कार्या के लिए प्रत्यक्ष अवसर सामने ने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि सद्ज्ञान संवर्धन के-ज्ञानयज्ञ के निमित्त लगनी चाहिए। पीड़ितों की सहायता के लिए हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामान्य क्रम में भी सम्मिलित रखना चाहिए।
साधना करें। अन्त में सामूहिक यज्ञ करें सहभोज का प्रबन्ध रखें, साथ ही कथा-प्रवचन, कीर्तन, उद्बोधन का क्रम बनाये रह सकें तो उस सामूहिक आयोजन से सोने में सुगंध जैसा उपक्रम बन पड़ता है। यह प्रकारान्तर से समष्टिगत सूक्ष्म जगत के उपचार की प्रक्रिया है। नवरात्रि के दिनों तो इनका विशेष महत्व ही है।
साधना साथ-साथ चलती रह सकती है। इस निर्धारित कृत्य के अतिरिक्त दैनिक साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिए उतना करने का प्रयास करना चाहिए। सेवा कार्या के लिए प्रत्यक्ष अवसर सामने ने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि सद्ज्ञान संवर्धन के-ज्ञानयज्ञ के निमित्त लगनी चाहिए। पीड़ितों की सहायता के लिए हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामान्य क्रम में भी सम्मिलित रखना चाहिए।
साधना की सिद्धि श्रद्धा की प्रगाढ़ स्थिति में ही संभव है। श्रद्धा चाहे वह गुरु के प्रति हो, महामानवों के प्रति अथवा निराकार परब्रह्म की सत्ता के प्रति, हर स्थिति में मानव जीवन का सम्बल है, प्रगति पथ का षाधेय है एवं .... का मूलभूत आधार है।
साधना और नव सृजन के क्रिया-कलापों को कार्यान्वित करने की विधा, क्रमबद्ध रूप से चलती रहती है। इसी समुद्र मंथन में से कुछ उदीयमान प्रतिभाएँ हस्तगत होती हैं। इन्हें शान्तिकुँज के सत्रों में सम्मिलित होने की प्रेरणा दी जाती है। कुम्हार अपने कच्चे बर्तनों को सुखाकर इकट्ठे करता और आँवे में एक साथ पकाता है। इसी प्रक्रिया का एक रूप शान्तिकुँज की शिविर योजना है, जो इन सत्रों के माध्यम से आरम्भ से ही चल रही है और लक्ष्य पूरा होने तक अनवरत रूप से चलती ही रहेगी।
साधना की सफलता का अनुमान बहुत कुछ इस आधार पर भी लग जाता है।
साधना का कदम उठता है। संयमी ही आदर्शों के समुच्चय पर ब्रह्म के साथ तादात्म्य मिलाने में सफल होता है। संयम के रूप में तप साधना का अनवरत क्रम चह और बन पड़ता है, जिसे अनेकानेक लिप्सा लालसाएँ नोंचती कचोंटती रहतीं है। जिन्हें .... तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए व्याकुलता सदा सताती रहती है वे विलासिता और अमीरी के अतिरिक्त और क्या कुछ सोच पायेंगे? इनकी खनक ऐसी मदोन्मत्त होती है कि भगवत् चेतना के साथ जुड़ सकने की कोई संभावना ही नहीं रहती।
साधना इसी को कहा गया है, जिसमें बिना आँख बंद किये दोनों भौंहों के बीच ध्यान किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञानी इस को “सेल्फ हिप्नोटिज्म” और ‘औटोहिप्नोटिज्म’ के नाम से पुकारने लगे हैं।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा प्रक्रिया को, शिक्षार्थियों को अन्तराल की गहराई तक उतारने की व्यवस्था का सत्रों में समुचित समावेश है। मनोबल और आत्मबल बढ़ाने वाले आहार के साथ दिव्य औषधियों का सेवन भी आवश्यकतानुसार जुड़ा रहता है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में बहुमूल्य यंत्रों द्वारा मूर्धन्य वैज्ञानिक, हर शिविरार्थियों की जाँच पड़ताल करते हैं। साधना की सफलता का अनुमान बहुत कुछ इस आधार पर भी लग जाता है।
साधना और कुछ नहीं केवल अपने मनोबल से अपने व्यक्तित्व को अभीष्ट ढाँचे में ढालने वाले उपाय उपचारों को अपनाना ही है। ध्यान-धारण का तप-तितिक्षा का योगाभ्यासपरक क्रिया-कृत्यों का यही प्रयोजन है। जो लोग साधना का सही उद्देश्य समझते है और उसका उपयोग करते हुए निर्धारित तत्वदर्शन और आचरण-अनुशासन का ध्यान रखते है, वे अपने पुरुषार्थ से अपने को बदलने, सुधारने, अभीष्ट ढाँचे में ढालने में समर्थ और सफल हो जाते है।
साधना की सफलता के लिए नितान्त जरूरी है। मद्य एवं अन्यान्य नशीले पदार्थों का सेवन, माँस, प्याज, लहसुन, चटपटे एवं उत्तेजक मसाले, गरिष्ठ, वासी-बुसे, तमोगुणी प्रकृति के लोगों द्वारा बनाया हुआ अथवा अनीति से कमाया हुआ आहार भी सर्वथा त्याज्य है। इन बातों का ध्यान रखते हुए स्वास्थ्य के लिए या जीवन रक्षा के लिए जो खाद्यान्न मिताहार औषधि रूप समझ कर, भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जायगा, वह शरीर और मन में सतोगुणी स्थिति पैदा करेगा और उसी के आधार पर साधना मार्ग में सफलता मिलनी संभव होगी।
साधना में उच्चस्तरीय तत्परता के साथ निरत और ब्राह्मणोचित निर्वाह में पूरी तरह संतुष्ट और उल्लसित रह कर देखने वाले यह समझ सकते हैं, कि व्यवहार में अध्यात्म तत्वज्ञान और नीति संयम का समावेश कितना सहज और सुखद है।
साधना का प्रयोजन पूरा करता है। नित्य न बन पड़े तो सप्ताह में एक दिन तो जिव्हा को विश्राम देना ही चाहिए, ताकि वह अपने उपरोक्त दुर्गुणों से उबरने का प्रयत्न कर सके।
साधना का सही उद्देश्य समझते है और उसका उपयोग करते हुए निर्धारित तत्वदर्शन और आचरण-अनुशासन का ध्यान रखते है, वे अपने पुरुषार्थ से अपने को बदलने, सुधारने, अभीष्ट ढाँचे में ढालने में समर्थ और सफल हो जाते है।
साधना की और अभीष्ट राशि जमा हो गई।
साधना कहा है जिससे नेत्र रोग तंद्रा और आलस्य दूर होते हैं। दूसरे के मन की बातें जान लेना, प्रभावित करता, मूर्छित करना इसी के द्वारा संभव है। योग-ग्रन्थों में वर्णित ध्यान बिन्दु साधना इसी को कहा गया है, जिसमें बिना आँख बंद किये दोनों भौंहों के बीच ध्यान किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञानी इस को “सेल्फ हिप्नोटिज्म” और ‘औटोहिप्नोटिज्म’ के नाम से पुकारने लगे हैं।
साधना से सिद्धि की चर्चा आमतौर से होती रहती है। यह सिद्धिदायिनी साधना और कुछ नहीं केवल अपने मनोबल से अपने व्यक्तित्व को अभीष्ट ढाँचे में ढालने वाले उपाय उपचारों को अपनाना ही है। ध्यान-धारण का तप-तितिक्षा का योगाभ्यासपरक क्रिया-कृत्यों का यही प्रयोजन है। जो लोग साधना का सही उद्देश्य समझते है और उसका उपयोग करते हुए निर्धारित तत्वदर्शन और आचरण-अनुशासन का ध्यान रखते है, वे अपने पुरुषार्थ से अपने को बदलने, सुधारने, अभीष्ट ढाँचे में ढालने में समर्थ और सफल हो जाते है।
साधना के लिए अस्वाद का व्रत लेना पड़ता है। नमक, मसाले, शक्कर, खटाई आदि के स्वाद जिव्हा को चटोरा बनाते हैं। तल-भुने तेज मसाले वाले, मीठे पदार्थों में जो चित्र-विचित्र स्वाद मिलते हैं उनके लिए जीभ ललचाती रहती है। इस आधार पर अभक्ष्य ही रुचिकर लगता है। ललक में अधिक मात्रा उदरस्थ कर ली जाती है, फलतः पेट खराब रहने लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1989-November
साधना के महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा अध्यात्म-वेताओं ने की है। प्रार्थना वह प्रचण्ड चुम्बकत्व है, जो दैवी सहायता का अपने समीप खींच बुलाती और अभीष्ट स्तर का परिणाम प्रस्तुत करती है। अमेरिका निवासी चार्ल्स फिल्मोर शारीरिक दृष्टि से अशक्त थे। बचपन में स्केटिंग खेलते समय कूल्हे की हड्डी अपने स्थान से हट गई थी। अनेक तरह की चिकित्सा के बाद भी वह स्वस्थ नहीं हुए और एक पैर से लँगड़े हो गये।
साधना ने उनके कण्ठ का सुरीलापन और भी निखारा। उन्होंने वाद्ययन्त्र बजाने से लेकर संगीत के उतार चढ़ाव सीखने के लिए दिन राज परिश्रम किया। परिश्रम से प्रतिभा परिष्कृत हुई और परिष्कृति ने उन्हें सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ाई। सिग्रफिड की गणना अमेरिका के चोटी के संगीतकारों में होने लगी। उनकी ख्याति देश-काल की सीमाओं को लाँघकर फैल गई।
साधना आगे बढ़ती रहेगी। भावी समय भी उन्हीं का होगा जो इस साधना में जुटे है। हमारी अपनी स्थिति क्या है? टटोलें, कहीं पीछे तो नहीं छूट रहे। नए युग की सुखद ऊषा के साथ हम आंखें खोलें और कदम बढ़ाएँ।
साधना की प्रेरणा दी। साधना ने उनके कण्ठ का सुरीलापन और भी निखारा। उन्होंने वाद्ययन्त्र बजाने से लेकर संगीत के उतार चढ़ाव सीखने के लिए दिन राज परिश्रम किया। परिश्रम से प्रतिभा परिष्कृत हुई और परिष्कृति ने उन्हें सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ाई। सिग्रफिड की गणना अमेरिका के चोटी के संगीतकारों में होने लगी।
साधना यही हो सकती है कि नव सृजन के लिए विनिर्मित कार्यक्रम को अपनी योग्यता स्थिति के अनुरूप चुना और उनमें पूरी तत्परता के साथ जुट जाया जाय।
साधना में जुटे है। हमारी अपनी स्थिति क्या है? टटोलें, कहीं पीछे तो नहीं छूट रहे। नए युग की सुखद ऊषा के साथ हम आंखें खोलें और कदम बढ़ाएँ। ये बढ़ते हु कदम व्यक्तिगत जीवन में सरसता और सामाजिक जीवन में सुव्यवस्था लाने वाले होंगे।
साधना में निरत हुए।
साधना द्वारा अधिक शक्ति सम्पन्न किया जाता है।
साधना॥
आएँ सब, ऐसा जादू हो अपनी मुस्कान में॥
साधना में लगाया करते थे। अपने उत्तरार्ध जीवन में उन्होंने जिस ‘सोसायटी ऑफ सायलेण्ड यूनिटी’ नामक संस्था की स्थापना की थी, उसकी अभिप्रेरणा उन्हें दैवी सत्ता द्वारा ही प्राप्त हुई थी। बाद में इस संस्थान ने अमेरिका एवं विश्व के अनेक देशों में अध्यात्म का संदेश पहुँचाने एवं लोगों को एक उत्कृष्टा के मार्ग पर ले चलने का एक अभियान शुरू किया, जिसके परिणाम काफी उत्साहवर्धक रहे। अभी भी यह संस्था पूरी तरह सक्रिय है।
साधना भर था। उनका मन इसे भारभूत समझता। जैसे ही छुट्टी मिलती गदगद हो जाते। किंतु माइकेल तो काम के समय में भी प्रसन्न रहता। उत्साह के साथ सूझ बूझ जगी।
साधना करूं और आपके सान्निध्य में रह सकूँ।”
साधनाओं के सहारे भी प्रयास करना पड़ता है।
साधना के साथ सम्बद्ध किया जाता है, वह उतना ही प्रिय लगने लगता है, प्रिय ही नहीं अपना भी। यह आत्मीयता का चमत्कार है। वस्तुतः सभी वस्तुएँ चलती बदलती रहती हैं, साथ ही निर्जीव भी हैं। ऐसी दशा में वे अपनी विशेषताओं के कारण प्रिय लगें-लगती रहें, यह संभव नहीं। उनका स्वभाव, स्तर, रुझा एवं व्यवहार बदलता रहता है।
साधना का ही नम्बर आता है। साधना का तात्पर्य अपने आपके कुसंस्कारों दोष-दुर्गुणों का परिशोधन परिमार्जन और उसके स्थान पर सज्जनता सदाशयता का संस्थापन। आमतौर से अपने दोष-दुर्गुण सूझ नहीं पड़ते आँखें बाहर की वस्तुऐं ही देख पाती हैं। भीतरी क्षेत्र को देख सकने की उसमें क्षमता नहीं है। यह कार्य विवेक बुद्धि को अन्तर्मुखी होकर करना पड़ता है।
साधना है। उससे आत्मिक स्तर की विशिष्टताएं उत्पन्नं होती हैं। व्यक्ति भावनाशील एवं उदात्त बनता है।
साधनाओं द्वारा करना होता है। किन्तु इस सभी साधनों के लिए मूलभूत उपकरण की आवश्यकता होती है वह प्राणशक्ति की प्रचण्डता ही है। कठोर चट्टानें काटने के लिए हीरे की आरी अथवा वर्मा चाहिए। यह कार्य प्राणशक्ति की विशिष्ट क्षमता द्वारा ही सम्पन्न किये जा सकते हैं। ऐसे प्राणायामों को गुप्त रखा जाने वाले सुपात्र को बताये जाने की ही परम्परा है।
साधना का तात्पर्य अपने आपके कुसंस्कारों दोष-दुर्गुणों का परिशोधन परिमार्जन और उसके स्थान पर सज्जनता सदाशयता का संस्थापन। आमतौर से अपने दोष-दुर्गुण सूझ नहीं पड़ते आँखें बाहर की वस्तुऐं ही देख पाती हैं। भीतरी क्षेत्र को देख सकने की उसमें क्षमता नहीं है। यह कार्य विवेक बुद्धि को अन्तर्मुखी होकर करना पड़ता है। आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण, आत्म विकास इन चार विषयों को कठोर समीक्षण परीक्षण की दृष्टि से अपने आप को हर कसौटी पर परखना चाहिए।
साधना की भावनाएँ जगाने के लिए दिव्य लोक से खींच बुलाने के लिए शारीरिक और मानसिक संयम साधने पड़ते हे। संयमों को ही तप-तितिक्षा कहते है। ऊपर गिरते झरने की धार जहाँ गिरती है वहाँ गड्ढा बन जाता है। बिजली उत्पादन क्षेत्र जैसे संयत्र भी उसी वेग के साथ जुड़ते है। संयमी जिन्हें तपस्वी भी कहते है अपनी संकल्प शक्ति इतनी प्रचण्ड बना सकते है कि देवताओं की सम्पत्ति दिव्य श्रद्धा को हस्तगत करके वे महामानव, ऋषि, देवात्मा एवं अवतार बन सकें।
साधना में जुटा जाय, तो प्रतिभा परिष्कार का लाभ मिलना सुनिश्चित है। वह किसी के वरदान-अनुदान मात्र से प्राप्त नहीं हो सकता है। कोई पूजा पाठ भी इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं कर सकता। इसके लिए सामयिक साधना यही हो सकती है कि नव सृजन के लिए विनिर्मित कार्यक्रम को अपनी योग्यता स्थिति के अनुरूप चुना और उनमें पूरी तत्परता के साथ जुट जाया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-December
साधना पर किया गया श्रम ही क्यों संदिग्ध रहना चाहिए? साधना का प्रतिफल यदि अनिश्चित रहता है तो उसके कारण दो ही हो सकते हैं या तो वह विधि विज्ञान ही कीलतडडडडड है अथवा उन उपचारों को कार्यान्वित करने में कहीं भूल है। इस संदर्भ में ऐसे निष्कर्ष सामने आने चाहिए जो अनिश्चितता के कारण उत्पन्न अश्रद्धा का, अपेक्षा उदासीनता का अन्त कर सकें।
साधना में जिस प्रकार सामूहिक जप का अभिनव प्रयोग है उसी प्रकार यज्ञ आयोजनों में भी सामूहिक सहयोग की, सामूहिकता की नीति अपनायी जानी चाहिए।
साधना प्रयोगों के सम्बन्ध में यह जाँच पड़ताल की जा सके कि उन पर किया गया श्रम अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करता है या नहीं। व्यायाम से लेकर कृषि कर्म तक की हर श्रम साधना का जब प्रतिफल सामने आता है तब आत्म साधना पर किया गया श्रम ही क्यों संदिग्ध रहना चाहिए? साधना का प्रतिफल यदि अनिश्चित रहता है तो उसके कारण दो ही हो सकते हैं या तो वह विधि विज्ञान ही कीलतडडडडड है अथवा उन उपचारों को कार्यान्वित करने में कहीं भूल है। इस संदर्भ में ऐसे निष्कर्ष सामने आने चाहिए जो अनिश्चितता के कारण उत्पन्न अश्रद्धा का, अपेक्षा उदासीनता का अन्त कर सकें।
साधना का प्रतिफल यदि अनिश्चित रहता है तो उसके कारण दो ही हो सकते हैं या तो वह विधि विज्ञान ही कीलतडडडडड है अथवा उन उपचारों को कार्यान्वित करने में कहीं भूल है। इस संदर्भ में ऐसे निष्कर्ष सामने आने चाहिए जो अनिश्चितता के कारण उत्पन्न अश्रद्धा का, अपेक्षा उदासीनता का अन्त कर सकें।
साधना के द्वारा चिन्तन परिष्कार और यज्ञ अभियान के द्वारा कर्म शोधन की प्रक्रिया को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। युग शक्ति के रूप में जिस गायत्री चेतना के अवतरण की बात कही जाती रही है उसके दो रूप हैं। पहला है परोक्ष, जिसे चिंतन परक कहा जा सकता है। तथा दूसरा है प्रत्यक्ष, जिसे कर्म परक कहा जाना चाहिए। परोक्ष स्वरूप में जप, ध्यान धारणा, लय तथा तत्वज्ञान, योगाभ्यास का समावेश किया गया है तथा कर्म परक-प्रत्यक्ष अभियान में यज्ञ आन्दोलन का।
साधना के लक्ष्य प्राप्ति में सिद्धिदायक सिद्ध होते हैं। श्रद्धा भावना न केवल उपासनात्मक क्षेत्र में वरन् जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण तथा उद्देश्य को भी प्रभावित करती है।
साधना विज्ञान का प्रतिफल। इन तीनों को विज्ञान क्षेत्र में पिछले दिनों मान्यता नहीं दी है। फलतः नास्तिकवाद का पथ सबल हुआ है और अनास्थावादी आचरणों ने जोर पकड़ा है। नया अनुसंधान तन्त्र ऐसा खड़ा होना चाहिए जो प्रत्यक्षवाद के प्रत्येक अनास्थावादी प्रतिपादन को चुनौती दे सके और उस क्षेत्र में छायी हुई भ्रान्तियों को परास्त कर सके। आज इन प्रतिद्वन्द्वी प्रयत्नों की इतनी आवश्यकता है जिसे मानवी भविष्य को बनाने-बिगाड़ने की दृष्टि से सर्वोपरि महत्व का माना जा सकता है।
साधना घर रह कर करती रहीं। इन महान गाथाओं में आदर्शवादी संकल्प ही अपनी गरिमा प्रकट करते दिखते हैं।
साधनाएं हैं जिनका उल्लेख उपासन ग्रन्थों में तो मिलता है पर उनकी व्यावहारिक अभ्यास पद्धति के अनुभवी मार्गदर्शक कहीं खोजे नहीं मिलते, ऐसी दशा में एकमात्र उपाय यही रह जाता है कि नये सिरे से उनका अनुसंधान किया जाय और देखा जाय कि इनमें से किस साधना से, किस स्थिति के व्यक्ति को, क्या प्रयोजन पूरा कर सकने में कितनी सहायता मिलती है? भूतकाल के अनुभवी आचार्य भी किसी निष्कर्ष पर शोध प्रक्रिया के सहारे ही पहुँचे होंगे। अब यदि वे परम्पराएं लुप्त हो गई तो क्यों न उसी अनुसन्धान प्रक्रिया को पुनः अपनाया जाय जिसे अपना कर शास्त्रकारों ने उपयोगी निष्कर्ष निकाले थे।
साधना पाद 35)। इसी कारण प्राचीन काल में महर्षि आश्रमों में गाय और सिंह, भेड़िया और बकरी एक ही स्थान पर रह लेते थे, सबमें आत्मदर्शन और किसी को किसी प्रकार कष्ट न पहुँचाने की दृढ़ स्थिति अन्तःकरण में ऐसी सात्विक धारा इतने तीव्र और प्रबल वेग से प्रवाहित कर देती है कि उसके निकटवर्ती तामसी अन्तःकरण भी उससे प्रभावित होकर हिंसक वृत्ति का परित्याग कर देता है। कई बार ऐसा भी होता है कि दूसरे प्राणियों के आक्रमण की अत्यन्त उग्र भावना होती है परन्तु ऐसी स्थिति में भी अहिंसक व्यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ता।
साधना का जब प्रतिफल सामने आता है तब आत्म साधना पर किया गया श्रम ही क्यों संदिग्ध रहना चाहिए? साधना का प्रतिफल यदि अनिश्चित रहता है तो उसके कारण दो ही हो सकते हैं या तो वह विधि विज्ञान ही कीलतडडडडड है अथवा उन उपचारों को कार्यान्वित करने में कहीं भूल है। इस संदर्भ में ऐसे निष्कर्ष सामने आने चाहिए जो अनिश्चितता के कारण उत्पन्न अश्रद्धा का, अपेक्षा उदासीनता का अन्त कर सकें।
साधनाओं की विपुल मात्रा और सुखोपभोग के कुबेर जैसे भण्डार भी उसे तृप्त नहीं कर सकते क्योंकि शरीर की अपनी सीमा मर्यादा है केवल उसके ही सुखों की तृष्णा की पूर्ति में जुट पड़ने वालों का भौतिक जीवन तो व्याधि ग्रस्त बनता ही है, अन्तःकरण क्षेत्र में शुष्क, नीरस, भावना विहीन, चिन्ताग्रस्त, द्वेष और आवेशग्रस्त होता जाता है। इस तरह के व्यक्तियों की स्थिति प्रेत-पिशाच से कम नहीं होती। स्पष्ट है यह स्थिति कितनी भयंकरता उत्पन्न कर सकती है। आज पश्चिमी देशों में यही सब हो रहा है।
साधना से भौतिक समृद्धि का शिखर पार कर लिया पर यदि उसके साथ दुर्भावना व्यक्त की जाये तो प्रकृति में इतनी जबर्दस्त सामर्थ्य है कि मनुष्य को परास्त करके ही छोड़ देती है फिर उसे अपने आपमें चाहे जितना शक्तिशाली और सामर्थ्य होने का ही अभिमान क्यों न हो?
साधना जुड़ी रहती थी। पेट और प्रजनन का जीवन पीने और मनुष्य जीवन की चादर को दाग धब्बों से गन्दी कर लेने वालों को यह तपस्वी ही सच्ची शान्ति का आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाते थे और स्वयं सांसारिक रोग-शोक और प्रकृति की प्रतिकूलता से पड़ने वाली कठिनाइयों में भी आनन्द भरा जीवन जिया करते थे। यह विशेषताएं अब मनुष्य समाज से तो नष्ट हो गई है, पर इस वृक्ष के जीवन में परिव्राजक की इस पवित्रता का ही प्रभाव है कि वह तूफानों, ज्वार-भाटों में भी अपनी सत्ता-सामर्थ्य को बनाये रखता है, विलक्षण साम्य यह है कि न तो भरण-पोषण का कोई आधार परिव्राजक के पास होता है और न ही, इस वृक्ष के पास। क्योंकि चलने वाले वृक्ष की जड़ें स्थिर हो ही नहीं सकती। समाज अपनी सेवा के बदले, सन्त के निर्वाह की व्यवस्था आप करता है।
साधना, तपश्चर्या द्वारा सिद्धि प्राप्त कर लेने के बाद इन ऋषियों ने परिव्रज्या ही अपना नित्यकर्म बना लिया था। वे न एक स्थान पर तीन दिन से अधिक रुकते और न ही संध्या के बाद बचने लायक धान्य ही अपने पास संग्रहीत रखते थे।
साधना से, किस स्थिति के व्यक्ति को, क्या प्रयोजन पूरा कर सकने में कितनी सहायता मिलती है? भूतकाल के अनुभवी आचार्य भी किसी निष्कर्ष पर शोध प्रक्रिया के सहारे ही पहुँचे होंगे। अब यदि वे परम्पराएं लुप्त हो गई तो क्यों न उसी अनुसन्धान प्रक्रिया को पुनः अपनाया जाय जिसे अपना कर शास्त्रकारों ने उपयोगी निष्कर्ष निकाले थे।
साधना का पहला सूत्र है, और वही शरीर निरोग, रह सकता है जो सामान्य जीवन क्रम व्यतीत करते हुए शरीर में उत्पन्न होने वाले दोषों का निवारण कर सके, दैनिक जीवन में खर्च होने वाली शक्ति को पुनरार्जित कर सके और प्रतिकूलता जनित विकारों का संशोधन कर सके।
साधना व तपश्चर्या बनी गयी थी तथा उसे पूरा करना ही जीवन। इस कार्य के अलावा सत्यकाम को किसी दूसरी बात का विचार भी नहीं आता था। धीरे-धीरे कृश गायें पुष्ट होने लगीं। गौओं ने उस यूथ में वृषभ भी थे। गायों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी।
साधनाओं में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है। श्रद्धाहीन कर्मकाण्ड तो सामान्य अंग संचालन के व्यायाम के समान ही लाभप्रद हो सकते हैं। किन्तु वे ही श्रद्धा और विश्वास के आधार पर साधना के लक्ष्य प्राप्ति में सिद्धिदायक सिद्ध होते हैं। श्रद्धा भावना न केवल उपासनात्मक क्षेत्र में वरन् जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण तथा उद्देश्य को भी प्रभावित करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-May
साधना विधानों का आविष्कार किया गया है यदि धैर्य, साहस और संकल्प पूर्वक उन्हें अपनाये रहा जाय तो समयानुसार सफलता मिल जाना निश्चित है। आतुर और अधीर ही हथेली पर सरसों जमने की अपेक्षा करते हैं और वे ही कुछ दिन बहुत अभ्यास करके, मन न लगने का बहाना बना कर अपने प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं। पानी के बुलबुले जैसा क्षणिक उत्साह कभी−कभी महत्वपूर्ण सफलता को प्राप्त करने का आधार नहीं बन सकता। ऐसे अस्थिर चित्त व्यक्ति उपासना के महान प्रयोजन को भी पूरा नहीं कर पाते।
साधना सम्पन्न करने से लेकर अपराह्न तक का समय अन्न कटे खेतों में गिरे हुए दाने बीनने में लगाया था। कठोर तप ने पहले ही उनकी देह कृश कर दी थी उस पर दिन भर का यह तप, निःसंदेह थकान उत्पन्न करने वाले थे, किन्तु आत्मा की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ते हुए तपस्वी की आशा और उत्साह में कहीं कोई अभाव नहीं आया था पर सप्ताहान्त में आये भोजन ग्रहण के समय एकाएक महर्षि दुर्वासा का आगमन निःसन्देह कष्टपूर्ण था किन्तु महर्षि का मन सागर की तरह धीरे गम्भीर, शशि की तरह निर्मल और पारिजात के समान पवित्र था उनके मुख में विषाद का कहीं संकेत भी नहीं था। संतोष की गरिमा मस्तक पर देदीप्यमान थी। मन का यथार्थ निग्रह यही तो कहलाता है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में 45 मिनट की साधना का उपक्रम चल रहा है। उसमें जिन लोगों ने भाग लिया है वे उसे उत्साहपूर्वक जारी रखें। साथ ही इस तथ्य पर भी ध्यान रखें कि उपासना के साथ जीवन साधना के लिए भी प्रयत्नशील रहना है। अपने दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत अधिक उत्कृष्ट और क्रिया−कलाप को अधिकाधिक आदर्श बनाने के लिए निरन्तर जागरूकता बरतें और सचेष्ट रहें।
साधना कहा जा सकता है। उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक।
साधना के प्रत्येक उपचार में मन को एकाग्र रखने पर जोर दिया जाता है। अपने अन्तर की प्रसुप्त शक्तियों को जगाने और उसे उपयोगी प्रयोजनों के लिए प्रशिक्षित करने के लिए उस एकाग्रता की शक्ति का ही उपयोग करना पड़ता है। नोकदार सुई को ही ठीक तरह चुभाया जा सकता है। नोंक पैनी न होने पर छेद करने वाला कोई भी उपकरण अपना काम ठीक तरह न कर सकेगा। चिन्तन को नोकदार बनाने के लिए उसे एकाग्रता के पत्थर पर घिसना पड़ता है।
साधना के लिए भी प्रयत्नशील रहना है। अपने दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत अधिक उत्कृष्ट और क्रिया−कलाप को अधिकाधिक आदर्श बनाने के लिए निरन्तर जागरूकता बरतें और सचेष्ट रहें।
साधना के 14 स्वर्णिम सूत्र” नामक पुस्तिका में छाप दिया गया है। इन आदर्शों को अपने व्यावहारिक जीवन में उतारने का प्रयत्न भी आरम्भ कर देना चाहिए।
साधना के 14 सूत्र धर्मशास्त्रों और आप्त वचनों के सार रूप निचोड़े गये हैं। इन पर साधना वर्ष के सदस्यों को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।
साधना में जिन चमत्कारी सिद्धियों का वर्णन किया गया है उन्हें कान के माध्यम से मनोयोगपूर्वक सुनना और सूक्ष्म जगत के ध्वनि प्रवाहों को ग्रहण करना ही है। वे प्रवाह सनातन हैं और सतत चलते रहते हैं। कानों के छिद्र भी सदा खुले रहते हैं। किन्तु नादयोग की स्वर साधना में सफलता तभी मिलती है जब उस श्रवण प्रयोजन के साथ गहरे मनोयोग का समावेश होता है।
साधना। उपासना पूजा उपक्रम को कहते हैं और साधना—जीवन को परिष्कृत स्तर पर जीने की प्रक्रिया को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की नीति अपना कर सज्जनता और परमार्थ परायणता के समन्वय को जीवन साधना कहा जा सकता है। उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई।
साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
साधना का उपक्रम चल रहा है। उसमें जिन लोगों ने भाग लिया है वे उसे उत्साहपूर्वक जारी रखें। साथ ही इस तथ्य पर भी ध्यान रखें कि उपासना के साथ जीवन साधना के लिए भी प्रयत्नशील रहना है। अपने दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत अधिक उत्कृष्ट और क्रिया−कलाप को अधिकाधिक आदर्श बनाने के लिए निरन्तर जागरूकता बरतें और सचेष्ट रहें।
साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
साधना करते रहें।”
साधना में सफलता तभी मिलती है जब उस श्रवण प्रयोजन के साथ गहरे मनोयोग का समावेश होता है।
साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
साधना में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। ध्यान की उपयोगिता, महत्ता एवं आवश्यकता को साधना विज्ञान के अन्तर्गत बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। साधना के प्रत्येक उपचार में मन को एकाग्र रखने पर जोर दिया जाता है। अपने अन्तर की प्रसुप्त शक्तियों को जगाने और उसे उपयोगी प्रयोजनों के लिए प्रशिक्षित करने के लिए उस एकाग्रता की शक्ति का ही उपयोग करना पड़ता है। नोकदार सुई को ही ठीक तरह चुभाया जा सकता है।
साधना की सफलता की स्थिति आने तक मिल पाती है। उपासना का तीन चौथाई परिश्रम तो मन की एकाग्रता साधने में ही लग जाता है। ईश्वर के साथ आदान−प्रदान तो इसके बाद अति सरल रह जाता है। इसके उपरान्त एक चौथाई श्रम प्रयास में ही ईश्वर सान्निध्य का आनन्द मिलने लगता है।
साधना विज्ञान के अन्तर्गत बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। साधना के प्रत्येक उपचार में मन को एकाग्र रखने पर जोर दिया जाता है। अपने अन्तर की प्रसुप्त शक्तियों को जगाने और उसे उपयोगी प्रयोजनों के लिए प्रशिक्षित करने के लिए उस एकाग्रता की शक्ति का ही उपयोग करना पड़ता है। नोकदार सुई को ही ठीक तरह चुभाया जा सकता है। नोंक पैनी न होने पर छेद करने वाला कोई भी उपकरण अपना काम ठीक तरह न कर सकेगा।
साधना करनी पड़ती है। इस प्रयास में सच्चे मन से संलग्न होने वाले लौकिक और पारलौकिक उभय पक्षीय सुख−शान्ति का लाभ प्राप्त करते हैं और स्वर्ग मुक्ति का इसी जीवन में रसास्वादन करते हैं।
साधना—जीवन को परिष्कृत स्तर पर जीने की प्रक्रिया को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की नीति अपना कर सज्जनता और परमार्थ परायणता के समन्वय को जीवन साधना कहा जा सकता है। उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक।
साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।
साधना वर्ष के सदस्यों को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।
साधना की पृष्ठभूमि पर ही उपासना का कल्पवृक्ष पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।
साधनाओं की आवश्यकता होती हैं। अतएव उपासना और स्वाध्याय हमारे जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण अपेक्षायें हैं, इनके बिना विवेक जागृत ही नहीं होता। स्थूल पदार्थों को ही देखते और उन्हीं में उलझे रहते हैं, सूक्ष्म तत्वों की अनुभूति के लिए हमारी उस तरह की तैयारी भी होनी चाहिए। हमारी पहुँच मन को नियन्त्रित रखने और उसे यथार्थ लक्ष्य की ओर नियोजित रखने की स्थिरता भी चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-August
साधना से व्यक्तित्व का असाधारण विकास होता है। फलतः उसमें अनेकानेक सफलताएं खींच बुलाने की सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है। वृक्षों का चुम्बकत्व आकाश में उड़ते हुए बादलों को खींच लेता है और उन्हें जल बरसाने के लिए विवश करता है। फूल जब खिलता तो भौंरे, मधुमक्खी, तितली, सभी उसका मनुहार करने आते हैं। प्रतिस्पर्धा में जीतने वालों को पुरस्कार मिलता है।
साधना करके धनवान बनते रोज ही देखा जाता है। स्वर्णकार के हाथों में जाकर धातुखण्ड आभूषण के रूप में और सामान्य लोहा औजारों के रूप में परिणत होता है। मनुष्य की हाड़−मांस से बनी काया जीवन साधना के सहारे महामानव, मनीषी ऋषि, देवता एवं परमात्मा के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है। ‘साधन से सिद्ध’ की उक्ति इतिहास के पृष्ठों पर और वर्तमान के पर्यवेक्षण में हम पग−पग पर सार्थक होते देखते हैं।
साधना आदि अनुष्ठानों का आश्रय लेकर इन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।
साधना के अतिरिक्त अन्तःकरण में श्रद्धा तत्व विकसित करने के लिए उपासना का अवलम्ब न लेना पड़ता है। स्थूल शरीर की साधना कर्मयोग से सूक्ष्म शरीर की ज्ञान योग से सम्भव होती है। इसके लिए क्रिया कलाप और दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश करना पड़ता है। जीवात्मा का तीसरा कलेवर ‘कारण’ शरीर है। उसका परिष्कार श्रद्धा के बीजारोपण एवं अभिवर्धन से ही हो सकता है।
साधना है अश्वलायन। इसलिए आत्मोन्नति का अधिकार हर प्राणी को है। इसीलिए हम मानव मात्र को आत्मोत्कर्ष, आत्म−शुद्धि की प्रेरणा और अवसर प्रदान करते हैं। सोचो यदि थोड़े से संत ब्राह्मण धरती को स्वर्ग बना सकते हैं तो हर व्यक्ति के अन्तःकरण में मुखरित ब्राह्मण सृष्टि को सुन्दर बना सकता है। यही तो ब्राह्मण के लिए अभीष्ट है अतएव यदि ब्राह्मण इन पुण्य प्रयत्नों में बाधा डालते हैं तो यह उनकी प्रतिगामिता नहीं हुई क्या?
साधना में ही लगाया जाता था। हिन्दू धर्म वर्णाश्रम धर्म कहलाता है। इस परम्परा में व्यक्ति और समाज को सर्वतोमुखी सुव्यवस्था एवं प्रगति सन्निहित रही है।
साधना ही है। अस्त−व्यस्तता को, व्यवस्था में, अनुशासन में बदलने से अपने भीतर से ही ऐसा नया उभार, नया वर्चस् उत्पन्न होता है इसी को अप्रत्याशित दैवी अनुग्रह जैसा चमत्कार समझा जाने लगता है। आत्म चिन्तन द्वारा दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालना, आत्मसुधार द्वारा विकृतियों की जड़ें उखाड़ना, आत्म−निर्माण द्वारा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाना, आत्मविकास द्वारा आत्मीयता का क्षेत्र सुविस्तृत करते जाना, यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन जाना−यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन साधना सम्पन्न होती है इन्हीं आधारों को अपनाने से आत्मोत्कर्ष के लिए की गई योगाभ्यासी तपश्चर्याओं में उत्साहवर्धक सफलता मिलती है।
साधना की सफलता और स्वल्प प्रयास में ही शक्ति पा जाते हैं। यह शक्ति आत्म विकास का तो प्राण ही है, पर उससे शारीरिक मानसिक और सांसारिक कठिनाइयों में भी उपयोग होता हैं। महापुरुषों और सिद्धपीठों की यात्रायें और सत्संग इसी आधा पर आयोजित होते हैं।
साधना के नहीं, वरन् उनके साथ गुंथे हुये मनोयोग के हैं। मनोयोग का इच्छित नियोजन कर सकने की सामर्थ्य उत्पन्न करना ही ध्यान धारणा का उद्देश्य है। इस प्रकार उसे आत्म-नियन्त्रण, आत्म-परिवर्तन और आत्म-विकास की कुंजी भी कह सकते हैं। ध्यानयोग की गरिमा ऐसे ही अनेकानेक लाभों के साथ जुड़ी हुई है।
साधना करके विद्वान−श्रम साधना करके धनवान बनते रोज ही देखा जाता है। स्वर्णकार के हाथों में जाकर धातुखण्ड आभूषण के रूप में और सामान्य लोहा औजारों के रूप में परिणत होता है। मनुष्य की हाड़−मांस से बनी काया जीवन साधना के सहारे महामानव, मनीषी ऋषि, देवता एवं परमात्मा के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है। ‘साधन से सिद्ध’ की उक्ति इतिहास के पृष्ठों पर और वर्तमान के पर्यवेक्षण में हम पग−पग पर सार्थक होते देखते हैं।
साधना का पुरुषार्थ करने वाले ऐसे ही उभयपक्षीय लाभ उठाते हैं।
साधना, दूसरी उपासना। साधना का तात्पर्य है अपना चिन्तन उत्कृष्टता के और कर्तृत्व आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना। अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। बैल, घोड़ा, रीछ, बानर, सर्प, सिंह जैसे पशुओं को सधा लेने से वे कितने उपयोगी सिद्ध होते हैं और पालने वालों का कितना हित साधन करते हैं यह स्पष्ट देखा जाता है। कुम्हार साधारण मिट्टी से कितने सुन्दर खिलौने बना देता है।
साधना करो तभी पाँचों ऋणों से उऋण होंगे।
साधना से ही प्राप्त की थी। हिमिराज की मानुषी कन्या पार्वती ने महाशिव की अर्धांगिनी बन सकने की सफलता तप के सहारे ही उपलब्ध की। ध्रुव ने तप का आश्रय लेकर ही परम पद पाया। विश्वामित्र तप बल की सामर्थ्य से ही दूसरे प्रकार की सृष्टि बनाने का साहस कर रहे थे। तपस्वी दधीचि की अस्थियों के बने वज्र द्वारा ही दुर्दान्त दैत्य वृत्तासुर मारा जा सका।
साधना से ही प्राप्त की थी। महान् ऋषियों का प्रधान बल उनकी तप सम्पदा ही रही है। भगवान् राम अपने चारों भाइयों समेत अयोध्या छोड़कर हिमालय पर तप करने चले आये थे। पांडवों का अन्तिम जीवन भी इसी प्रयोजन में लगा था। प्राचीन काल की परिपाटी ही यह थी।
साधना उपचारों की रंगाई का प्रभाव दिखाई देगा।
साधना करके पहलवान−मस्तिष्क की साधना करके विद्वान−श्रम साधना करके धनवान बनते रोज ही देखा जाता है। स्वर्णकार के हाथों में जाकर धातुखण्ड आभूषण के रूप में और सामान्य लोहा औजारों के रूप में परिणत होता है। मनुष्य की हाड़−मांस से बनी काया जीवन साधना के सहारे महामानव, मनीषी ऋषि, देवता एवं परमात्मा के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है। ‘साधन से सिद्ध’ की उक्ति इतिहास के पृष्ठों पर और वर्तमान के पर्यवेक्षण में हम पग−पग पर सार्थक होते देखते हैं।
साधना को आहार-विहार की उपमा दी जायगी। उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है। ऐसे ही अनेक सत्परिणाम उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।
साधना के सहारे महामानव, मनीषी ऋषि, देवता एवं परमात्मा के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है। ‘साधन से सिद्ध’ की उक्ति इतिहास के पृष्ठों पर और वर्तमान के पर्यवेक्षण में हम पग−पग पर सार्थक होते देखते हैं।
साधना सम्पन्न होती है इन्हीं आधारों को अपनाने से आत्मोत्कर्ष के लिए की गई योगाभ्यासी तपश्चर्याओं में उत्साहवर्धक सफलता मिलती है।
साधना क्षेत्र का परम पुरुषार्थ माना गया है।
साधना प्रमुख है।
साधना के दो चरण हैं एक ‘योग‘ दूसरा ‘तप’। योग का अर्थ है अपने को लिप्सा और लालसा के भव−बन्धनों से मुक्त करके आदर्शवादिता के प्रति आत्मसमर्पण। ईश्वर को आत्मसमर्पण करना उसी प्रकार होता है जैसा कि नदी अपने आप को समुद्र में, ईंधन आग में और पतंग दीपक में अपनी सत्ता घुला देते हैं। अपनी भौतिक महत्वाकांक्षाओं को लालसा और लिप्साओं को पैरों तले रौंदकर ईश्वरीय संकेतों और आदर्शों का अनुसरण करने का साहस जुटाते हैं। योगी की यही मनःस्थिति होती है।
साधना का यही प्रयोजन हैं।
साधना आवश्यक है। यह कठिन नहीं सरल है। इस मार्ग पर कोई भी बाल−वृद्ध, नर−नारी अपनी−अपनी स्थिति के अनुरूप छोटे या बड़े कदम बढ़ाते हुए बढ़ सकता है। इसमें असफलता का या विपरीत परिणाम का कोई खतरा नहीं है। हाँ, जो जितना श्रम एवं साहस जुटा सकेगा उसे उसी अनुपात की उपलब्धियाँ मिल सकेंगी, इतना तो स्पष्ट है।
साधना का ही मार्गदर्शन है। उपासना को व्यायाम कहा जाय तो साधना को आहार-विहार की उपमा दी जायगी। उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है।
साधना, ब्रह्मवर्चस् और निर्लोभ निरहंकारिता।
साधना को भूमि मानना पड़ेगा। उपासना के क्रिया कृत्यों में संकेत रूप में जीवन साधना का ही मार्गदर्शन है। उपासना को व्यायाम कहा जाय तो साधना को आहार-विहार की उपमा दी जायगी। उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है।
साधना की तरह, चिन्तन में उत्कृष्टता के समन्वय की तरह ही कर्म क्षेत्र में आदर्शवादिता को भी अविच्छिन्न बनना पड़ता है। योग और तप दोनों की ही आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।
साधना में निरत हुईं तो पूर्णता प्राप्त करके ही लौटीं।
साधना कर्मयोग से सूक्ष्म शरीर की ज्ञान योग से सम्भव होती है। इसके लिए क्रिया कलाप और दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश करना पड़ता है। जीवात्मा का तीसरा कलेवर ‘कारण’ शरीर है। उसका परिष्कार श्रद्धा के बीजारोपण एवं अभिवर्धन से ही हो सकता है। इसके लिए उपासना की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
साधनाओं में चक्रवेधन की चक्र जागरण की साधना प्रमुख है।
साधना समर के रूप में यही महाभारत हर साधक को लड़ने के लिए अर्जुन जैसी भूमिका निभानी पड़ती है। वासना, तृष्णा, अहंता के शत्रुओं को परास्त कर लेने पर उस दिव्य साम्राज्य का स्वामित्व हाथ में आता है। उसकी तुलना में संसार क्षेत्र के चक्रवर्ती राज्य और कुबेर की धनराशि को भी तुच्छ कहा जा सकता है।
साधना से विचलित होने और आकर्षणों से बचाने में सहायक हो, मनुष्य जीवन के रहस्यों, आत्मा पर पड़े हुए पर्दे, सृष्टि रचना का आधार और उसकी नियम व्यवस्था जानना सभी कुछ सम्भव है, पर इस दिशा में मिलने वाला संरक्षण और मार्गदर्शन उतना ही प्रौढ़, सूक्ष्म, सम्वेदनशील और कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होना चाहिए। इन जीवों में ऐसी अकल्पित क्षमताएँ हो सकती हैं तो मनुष्य की विवेचन शक्ति का तो कहना ही क्या? पर उसका विकास स्वतः कभी-कभी ही हो सकता है अधिकांश में प्रशिक्षण आवश्यक होता है। वातावरण आवश्यक होता है, जिसकी व्यवस्था बड़ों को ही करनी पड़ती है।
साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है। ऐसे ही अनेक सत्परिणाम उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।
साधना विज्ञान के विद्यार्थी भली−भाँति जानते हैं। इन सबके ऊपर सहस्रार चक्र है। उस समेत यह चक्र संख्या सात हो जाती है। इन्हीं को सात लोक, सात ऋषि, सात द्वीप, सप्त सागर आदि की संज्ञा दी गई है। मेरुदण्ड स्थित छह चक्रों में सूक्ष्म जगत में संव्याप्त आत्मिक और भौतिक विभूतियों के साथ सम्बन्ध जोड़े रहने की क्षमता है।
साधना विधान और युग परिवर्तन के लिए प्रयोग विनियोग का त्रिविधि शिक्षण इस नवीन पत्रिका द्वारा भली प्रकार सम्भव हो सकेगा। युग-निर्माण योजना मासिकों का नाम युग-शक्ति गायत्री बदल दिया गया है और अन्यान्य भाषाओं में इसी नाम से नई पत्रिकाएँ प्रकाशित की जा रही हैं। भाषाई सीमा बन्धन की खाई को पीटते हुए इस प्रयास के आधार पर युग-चेता को देश-व्यापी, विश्व-व्यापी बनाया जा सकेगा। इन पत्रिकाओं में कीर्तिमान स्थापित किया जा रहा है। (1) पंजाबी (2) बंगाली (3) आसामी (4) अंग्रेजी (5) कन्नड़ (6) तेलगू में नई पत्रिकाएँ प्रकाशित होने जा रही हैं (7) हिन्दी (8) गुजराती (9) मराठी (10) उड़िया में इन पत्रिकाओं का प्रकाशन पहले से ही चला आ रहा है उनमें तो नाम भर बदला गया है।
साधना का वैज्ञानिक दृष्टि से क्या महत्व हो सकता है इसकी शोध करने के लिए फ्रांस की हारवर्ड इन्स्टीट्यूट फॉर साइकिक एण्ड कल्चरल रिसर्च की ओर से डॉ0 घेर से ब्रोसे की अध्यक्षता में एक मण्डली ने विश्वव्यापी परिभ्रमण किया था। वह टोली भारत भी आई थी। परीक्षणों के उपरान्त इस शोध प्रयास ने यह स्वीकार किया कि ध्यान अभ्यास से श्वास-प्रश्वास एवं हृदय की सिकुड़न को संकल्पपूर्वक अभीष्ट मात्रा में घटाया जा सकता है। मानसिक उद्वेग भी घटाते-घटाते सघन निद्रा की स्थिति में पहुँचा जा सकता है। यह दोनों ही उपलब्धियाँ शारीरिक और मानसिक दृष्टि से बहुत उपयोगी है।
साधना का तात्पर्य है अपना चिन्तन उत्कृष्टता के और कर्तृत्व आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना। अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। बैल, घोड़ा, रीछ, बानर, सर्प, सिंह जैसे पशुओं को सधा लेने से वे कितने उपयोगी सिद्ध होते हैं और पालने वालों का कितना हित साधन करते हैं यह स्पष्ट देखा जाता है। कुम्हार साधारण मिट्टी से कितने सुन्दर खिलौने बना देता है। मूर्तिकार पत्थर से देव प्रतिमा गढ़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-July
साधना की पूर्णता मान लेते थे उन्हें कहा गया है कि तपश्चर्या की दिशा में बढ़ना चाहिए। इस दिशा में वे जितनी प्रौढ़ता और प्रखरता का परिचय देंगे, उसी अनुपात से वे अपने साधन प्रयत्नों को सफल होते देखेंगे। देवता को अनुनय-विनय से फुसलाया नहीं जा सकता। भागीरथी तप द्वारा उनका अनुग्रह खरीदा जाता है। यह तथ्य क्रमशः परिजनों के सामने उजागर होता चला जा रहा है।
साधनाएँ अतिरिक्त रूप से भी करनी होंगी (1) त्राटक (2) सूर्य भेदन प्राणायाम (3) शक्तिचालिनी मुद्रा (4) खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग सोऽहम् साधना। इन पाँचों का समन्वित साधनाक्रम ऐसा है जिसमें पंच कोशों के अनावरण के अतिरिक्त कुण्डलिनी जागरण का प्रारम्भिक चरण भी इसी अवधि में पूरा हो जाता है। पीछे के लिए आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक ले पहुँचने वाला यह अवरुद्ध द्वार खुल जाता है, जिस पर चलते हुए पग-पग पर भौतिक सिद्धियों से लौकिक सफलता और आत्मिक विभूतियों की अतीन्द्रिय क्षमता उपलब्ध करते चलना सम्भव हो जाता है।
साधना स्थली और समर्थ संरक्षण में ब्रह्मवर्चस् साधना क्रम चल पड़ा है। आरम्भिक प्रक्रिया के रूप में यह साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं। और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है। यह एक महीने चलेगा।
साधना का संक्षिप्त दिशानिर्देश एवं अभ्यास भी जितना सम्भव हो सकेगा सम्मिलित रखा जाएगा।
साधना का समन्वय जिससे हटाये गये संस्कारों का रिक्त हुआ स्थान श्रेष्ठ कुसंस्कार ग्रहण कर सके। इस पुण्य विधान को रचनात्मक प्रयोजन में लगाया जा सके। मात्र पाप बन्द कर देना या उनका दण्ड भुगत लेना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् जो प्रयत्न दुष्कर्मों की हानिकारक प्रक्रिया के लिए चल रहा था वही उलट कर श्रेष्ठता सम्पादन में लग पड़े तब समझना चाहिए कि प्रायश्चित्त प्रक्रिया पूर्ण हुई।
साधना का व्यवहार पक्ष है- क्रियाकलाप में आदर्शवादिता का समन्वय। चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा के अनेक क्रिया-कलाप इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए होते हैं। कषाय कल्मषों की निवृत्ति के लिए अपने कुसंस्कारों को निरस्त करने के लिए तपश्चर्या की नीति अपनानी पड़ती है और अन्तःक्षेत्र का कुसंस्कार विरोधी विद्रोह खड़ा करना पड़ता है। साथ ही निर्वाह से बचने वाली सामर्थ्य को परमार्थ प्रयोजनों में लगाना होता है। इसे सेवा धर्म कहते हैं।
साधना में मिलता है। उसके कितने ही आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे प्रतिफल हैं, जिन्हें क्रमशः आत्मा और परमात्मा की एकता के ही प्रतीक माना जा सकता है। अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करने वाली इस हंसयोग साधना को ब्रह्मवर्चस् योगाभ्यास का महत्वपूर्ण अंग उसकी गरिमा को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया है।
साधनाओं में भी है जो इस प्रक्रिया के लिए निर्धारित की गई है वे सरल तो हैं ही उनमें कोई भूल रहने पर भी किसी प्रकार की हानि की तनिक भी आशंका नहीं है।
साधना कम में इन पाँचों का समन्वय है।
साधना कहते हैं। इसके हलके भारी अनेकों प्रकार हैं। उन्हें अपनाने से मनोभूमि की कुसंस्कारिता हटती है और उर्वरता उत्पन्न होती है। यही भूमि शोधन है जिसमें अंकुर उपजाने जैसे उत्साहवर्धक दृश्य तो तत्काल सामने नहीं आते, पर दूरदर्शिता के सहारे निकट भविष्य में अभीष्ट सफलता मिलने का आश्वासन अवश्य मिलता है। अस्तु साधना की सनातन परम्परा में आत्मशोधन की- तपश्चर्या की भी उतनी ही आवश्यकता और महत्ता बताई गई है जितनी कि उपलब्धियों की झलक दिखाने वाली योग साधनाओं की।
साधना में है। इसका सुनियोजित तप साधना की सामूहिक व्यवस्था से उस युग शक्ति का उद्भव होगा जिसकी सामर्थ्य से नये युग के सृजन की अनेक आवश्यकताएँ पूर्ण हो सकेगी। व्यक्ति में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए जिन सृजन शक्तियों को युगान्तकारी भूमिका निभानी है, उनकी धार तेज करने के लिए यह एक महीने की चान्द्रायण तपश्चर्या अति महत्वपूर्ण सिद्ध होगी, यह सुनिश्चित है।
साधना है। पाँच प्राणों से चेतना का और पाँच तत्वों से काया का निर्माण हुआ है। इन दोनों प्रवाहों के मध्यवर्ती दिव्य शक्ति स्रोतों को पंचकोश कहते हैं। योगशास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि अन्नमय कोश यह पाँच शक्तिशाली आवरण आत्मा पर चढ़े हैं। इन्हें सुरक्षा कवच, वाहन, आयुध आदि भी कहा जा सकता है।
साधना से हमसे से हर किसी को अपनी-अपनी मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप युग धर्म के निर्वाह के लिए युग साधना के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा। मूकदर्शक बने रहना अब किसी जागृत आत्मा के लिए सम्भव न रह जाएगा।
साधना साध्य है। इसके लिए शक्ति चाहिए। कल कारखाने और छोटे-छोटे उत्पादन निर्माणों में किसी न किसी प्रकार शक्ति नियोजित करनी पड़ती है तभी वे चल पाते हैं। फिर युग परिवर्तन युग निर्माण जैसे महान कार्य के लिए भी शक्ति चाहिए ही। यह आत्म शक्ति ही हो सकती है।
साधना कहते हैं। षटचक्रों का नाम सभी ने सुना है। भू-मध्य भाग से मस्तिष्क प्रारम्भ होता है और वह मेरुदण्ड में होकर जननेन्द्रिय क्षेत्र तक चला जाता है। यह समूचा परिधि ब्रह्मलोक या ब्रह्मरंध्र कहलाता है। इसमें सात शक्ति संस्थान हैं।
साधना में इसी का अभ्यास कराया जाता है। साधक अपने भीतर प्राणतत्व की अभिवृद्धि का अनुभव करता है। इस प्रक्रिया के द्वारा उपार्जित प्राण सम्पदा साधन की बहुमूल्य संपत्ति होती है। इस पूँजी को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। इसे बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्र का सामर्थ्य उत्पादक प्रयोग कह सकते हैं।
साधना का प्रथम लक्ष्य माना गया है। संचित अशुभ से पीछा छूट सके-निराकरण समाधान हो सके, तो उसका परिणाम साधन की सफलता में अत्यधिक सहायक हो सकता है। इसी प्रकार यदि प्रार्थना पूजा की साधना के साथ तपश्चर्या का समावेश हो तो उसको अधिक अच्छी तरह फलित होने का अवसर रहता है। विलासिता और शिथिलता की स्थिति में रहकर उपासना करने वालों की तुलना में तपश्चर्या की रीति-नीति अपनाकर भजन प्रयोजनों में लगने वाले व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अधिक अच्छी तरह जा पहुँचते हैं।
साधना से जो दूरदर्शी तत्वदर्शी विवेक जागृत होता है उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। गायत्री मन्त्र का धियः तत्व वही है। इस जागरण को आत्म-जागरण की संज्ञा दी जाती है। इसे भौतिक और आत्मिक जीवन की महा उपलब्धि ही कह सकते हैं।
साधना की सामूहिक व्यवस्था से उस युग शक्ति का उद्भव होगा जिसकी सामर्थ्य से नये युग के सृजन की अनेक आवश्यकताएँ पूर्ण हो सकेगी। व्यक्ति में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए जिन सृजन शक्तियों को युगान्तकारी भूमिका निभानी है, उनकी धार तेज करने के लिए यह एक महीने की चान्द्रायण तपश्चर्या अति महत्वपूर्ण सिद्ध होगी, यह सुनिश्चित है।
साधना इसी का नाम है। गायत्री उपासना के विज्ञान में इसे अजपा गायत्री कहते हैं।
साधना से संचित पाप प्रवृत्तियों और कुसंस्कारों का जहाँ शमन होता है वहाँ आत्मोत्कर्ष के लिए प्रबल प्रयत्नों का भी साथ ही नियोजन होता है। अवांछनीयता का ध्वंस और उपयोगिता का सृजन यह दोनों ही कृत्य चान्द्रायण साधना से होते है, इसलिए उसे दण्ड विधान नहीं वरन् तप साधन की संज्ञा दी गई है। पाप निवारण भी उसका महत्वपूर्ण अंग है।
साधना से होते है, इसलिए उसे दण्ड विधान नहीं वरन् तप साधन की संज्ञा दी गई है। पाप निवारण भी उसका महत्वपूर्ण अंग है।
साधना मार्ग पर चलते हुए आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी हुई अति महत्वपूर्ण सफलताएं जिन्हें सिद्धियों या विभूतियों के नाम से जाना जाता है-प्राप्त कर सकना तभी सम्भव हो सकता है जब आत्मशोधन और आत्म विकास की दोनों ही प्रक्रियाएं समानान्तर चलती रहें।
साधना में मनः स्थिति को ब्राह्मी भूत बनाना पड़ता है। अपने को शरीर मन से ऊपर की स्थिति में अनुभव कराने वाली ब्रह्म चेतना जगानी पड़ती है। अभ्यास करते समय आत्मिक चुम्बकत्व को अधिक प्रखर बनाना होता है। इतनी भूमिका बन पड़ने पर श्वास प्रक्रिया में इतना दिव्य आकर्षण उत्पन्न होता है जिसके सहारे अनन्त अन्तरिक्ष से दिव्य प्राण को अपने लिए आकर्षित करना और उपलब्ध अंश को धारण कर सकना सम्भव होता है। सोऽहम् साधना इसी का नाम है।
साधनाएं अपने प्रभाव का कोई परिचय प्रस्तुत नहीं करतीं और आशा का कुसुम असमय में ही मुरझाने लगता है।
साधना को प्रमुखता दी गई है। ‘वर्चस्’ शब्द ही तप का पर्यायवाची है। उपासनाओं के साथ कई प्रकार की छोटी-बड़ी तप साधनाओं की शृंखला जोड़ी गई है। उसकी आधारशिला चान्द्रायण व्रत पर रखी गई समझी जा सकती है। यह संचित कुसंस्कारों के परिशोधन और प्रसुप्त दिव्य-शक्तियों के जागरण के लिए शरीर और मन के सुविस्तृत क्षेत्र में अनुकूल वातावरण उत्पन्न करता है।
साधना सौम्य वर्ग की है जिसमें भूल रहने पर भी किसी को किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं है। फिर जिस संरक्षण और नियन्त्रण में इतने महान प्रयोजन के लिए यह साधना क्रम चल रहा है, उसमें किसी को किसी प्रकार की आशंका करने या असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। विश्वास किया गया है कि जो इस साधना को करके लौटेंगे वे अपने भीतर कुछ आंतरिक विशेषता उत्पन्न हुई अनुभव करेंगे। यह उपलब्धि भौतिक सुख-शान्ति और आत्मिक सिद्धि प्रगति की दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण है।
साधना से उत्पन्न होने वाली प्रति क्रियाओं का ही अलंकारिक वर्णन है। इन विवेचनाओं से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि यदि भावना और क्रिया का सही समन्वय करके इस साधना को किया जा सके तो चेतना क्षेत्र में आनन्द और कार्य क्षेत्र में उल्लास की उपलब्धि होती है। यह लाभ ही प्रकारान्तर से भौतिक और आत्मिक जगत के अनेक लाभों का आभास कराता है। आत्मिक जगत के अनेक लाभों का आभास मिलता है। त्राटक के ऊपर से और खेचरी का नीचे से प्रभाव पड़ने के कारण साधक का ब्रह्म लोक उसका मध्य बिन्दु सहस्रार अपनी जागृत समर्थता का परिचय देने लगता है।
साधना का यह भूमि शोधन पथ चान्द्रायण तप से पूरा होता है। इसके उपरान्त बीज बोने और खाद पानी लगाने की अभिवर्धन उद्देश्य के लिए की जाने वाली प्रक्रिया योग साधना द्वारा सम्पन्न होती है।
साधना की सफलता के लक्षण प्रकट होने लगे और बारहवां वर्ष पूरा होने पर इष्टदेव का साक्षात्कार हुआ। उन्हीं के अनुग्रह से वह प्रज्ञा प्रकट हुई, जिसके सहारे माधव निदान जैसा महान ग्रन्थ लिखकर अपना यश अमर करने और असंख्यों का हित साधन कर सकने की उपलब्धि उन्हें मिली और जीवन का लक्ष्य पूरा कर सकने में सफल हुए।
साधना का ही अभ्यास किया जाता है।
साधना के उच्चस्तरीय क्षेत्र में पहुँचने पर तपश्चर्या ही प्रमुख हो जाती है। वही बन्दूक का काम करती है। मन्त्र तो उसके साथ कारतूसों की तरह समन्वित रहते हैं।
साधनाओं की शृंखला जोड़ी गई है। उसकी आधारशिला चान्द्रायण व्रत पर रखी गई समझी जा सकती है। यह संचित कुसंस्कारों के परिशोधन और प्रसुप्त दिव्य-शक्तियों के जागरण के लिए शरीर और मन के सुविस्तृत क्षेत्र में अनुकूल वातावरण उत्पन्न करता है। भागीरथ ने गंगा अवतरण के लिए कई प्रकार के उपासना उपचार किये थे। गंगा की आराधना और शिव की अभ्यर्थना की साधना वे लम्बे समय तक करते रहे और अपने उद्देश्य में सफल होकर रहे।
साधना परम शान्तिदायिनी और महान शक्तिशाली साधना है। इसी प्रक्रिया को ब्रह्मवर्चस् का योगाभ्यास साधना पक्ष समझा जाना चाहिए।
साधना की अवधि में मात्र गंगा जल पीना होता है। गंगा अति निकट है। वहीं से अपने पीने के लिए सभी साधक स्वयं गंगाजल लाते है और उसी से प्यास बुझाते है। युवाओं के लिए नित्य गंगा स्नान में भी कोई कठिनाई नहीं पड़ती। वृद्धों को शीत ऋतु में गंगा जल गरम करके स्नान करने की भी सुविधा रहती है।
साधना की प्रौढ़ता में उन दोनों वर्गों का समावेश आवश्यक है। नित्य कर्म की बात दूसरी है उसमें योग और तप के सिद्धान्तों का समावेश अनिवार्य नहीं है। आवश्यकता तो हर किसी के लिए है और बनी ही रहेगी। कौन कितना कर सकता है? किसके लिए कितना साहस कर सकना कितना सरल या कठिन पड़ता है?
साधना पक्ष समझा जाना चाहिए।
साधना की संज्ञा दी जा सकती है।
साधना का इसमें समान रूप से समावेश है। फलतः उससे परिशोधन और अभिवर्धन के दोनों ही उद्देश्य पूरे होते हैं। शरीर और मन को समर्थ सुव्यवस्थित रखने में परिस्थितियों को सुधारने में, प्रतिकूलता को अनुकूलता बनाने में, समग्र परिवर्तन परिष्कार में जो अदृश्य तथ्य काम करते हैं। उन सबका समुचित समावेश इस एक महीने के साधना क्रम में मौजूद है जो व्यक्तित्व को प्रखर और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
साधना सत्र, परामर्श सत्र, वानप्रस्थ सत्र, समय-समय पर सम्पन्न होते रहे हैं। उनमें जो सम्मिलित हो चुके हैं प्रथम आह्वान उन्हीं का है। जिन्हें आरम्भिक ज्ञान और अनुभव पहले से ही मौजूद हों। उनकी प्रगति अधिक सरल रहती है और अपेक्षाकृत अधिक सफल भी होती है।
साधना क्रम भी चलता रहेगा। अतिरिक्त योगाभ्यास साधना में पंचमुखी गायत्री का पंचकोश अनावरण का योगाभ्यास है। इसमें पाँच योगों का समावेश है- (1) त्राटक बिन्दुयोग (2) सूर्यवेधन प्राणायाम, प्राणयोग (3) शक्तिचालिनी, कुण्डलिनी योग (4) खेचरी मुद्रा लययोग (5) सोऽहम् साधना, हंसयोग। इस समन्वय का यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गई कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या भी कह सकते हैं। इस सरल योगाभ्यास का सामान्य परिचय इस प्रकार है-
साधना में पंचकोशों के अनावरण को ग्रन्थि वेधन का रहस्यमय विधान इन्हीं पाँच साधनाओं के अन्तर्गत आ जाता है। अन्तःचेतना के यह पाँच उभार पाँच देवताओं के वरदान जैसे चमत्कारी प्रतीत होते है।
साधना में घृत दीप जला कर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँखें खोलकर देखते हैं। फिर आँखें बन्द कर लेते हैं। भ्रू-मध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाश ज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योतिर्मय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है। इस ध्यान में दीप ज्योति से सहायता मिलती है।
साधनाक्रम ऐसा है जिसमें पंच कोशों के अनावरण के अतिरिक्त कुण्डलिनी जागरण का प्रारम्भिक चरण भी इसी अवधि में पूरा हो जाता है। पीछे के लिए आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक ले पहुँचने वाला यह अवरुद्ध द्वार खुल जाता है, जिस पर चलते हुए पग-पग पर भौतिक सिद्धियों से लौकिक सफलता और आत्मिक विभूतियों की अतीन्द्रिय क्षमता उपलब्ध करते चलना सम्भव हो जाता है।
साधना में व्यक्ति का वर्चस्व और समाज का भविष्य समान रूप से समुन्नत बनते हैं। वस्तुतः यह अभियान एक साथ दोनों प्रयोजन पूरे करता है। व्यक्ति में महानता और समाज में सुसम्पन्नता का एक साथ उद्भव करना अपना उद्देश्य है। वस्तुतः दोनों एक ही हैं। व्यक्तियों का समुदाय ही समाज है।
साधना काल में वृन्दावन रहकर समग्र तन्मयता के साथ गायत्री महा पुरश्चरणों में संलग्न थे। उन्होंने पूर्ण विधि विधान के साथ लगातार ग्यारह वर्षों तक अपनी साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गये ।
साधनाओं की असफलता का मूल कारण यह अधूरापन ही होता है जिसमें परिशोधन जैसी आरम्भिक आवश्यकता को पूरा किये बिना ही आगे की छलाँग लगा दी गई।
साधना करने वाले साधकों को मिलता रहे इसका विशेष प्रबन्ध रखा गया है।
साधना का उद्देश्य है। ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि का वर्णन हठयोग की विवेचना में किया जाता है। ब्रह्मवर्चस् की बन्ध साधना में इन्हीं तीनों को खोलने का विधान है। मूलबन्ध जालन्धर बन्ध और उड्डियान बन्धों की साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती है। इसी लिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।
साधनाओं का विशाल परिकर उसी के साथ समन्वित है। गायत्री का ज्ञान पथ ब्रह्मविद्या और विज्ञान पक्ष वर्चस् कहलाता है। दोनों को मिलाकर ब्रह्मवर्चस् शब्द बनता है। यह आध्यात्मिक प्रौढ़ता और प्रखरता को पृष्ठभूमि बनाने वाली साधना है।
साधना को प्राणयोग कहते हैं। सामान्यतः इसे प्राणायाम कहते हैं। ‘लय’ और ‘ताल’ की महान शक्ति का ज्ञान सर्व साधारण को तो नहीं होता, पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सर्वविदित न होने पर भी यह सामर्थ्य कितनी प्रचंड है।
साधना, हंसयोग। इस समन्वय का यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गई कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या भी कह सकते हैं। इस सरल योगाभ्यास का सामान्य परिचय इस प्रकार है-
साधना का उद्देश्य आत्म सत्ता को परिष्कृत करना है। जीव अपने आप में पूर्ण है। पूर्ण से उत्पन्न हुआ पूर्ण ही होना चाहिए। ज्वाला और चिनगारी के आकार भर में अन्तर है। मूल क्षमता की दृष्टि से दोनों की स्थिति में कोई अन्तर नहीं।
साधना की सिद्धि में प्रधान बाधा क्या है? संचित दुष्कर्म ही उस मार्ग की सफलता में प्रधान रूप से बाधक होते हैं। यदि उनके निराकरण का उपाय सम्भव हो सके तो अभीष्ट सफलता सहज ही मिलती चली जायगी। यही बात संचित पुण्य कर्मों के बहुत देर में फल देने वाली व्यवस्था में जल्दी भी हो सकती है। द्रुतगामी वाहनों पर सवार होकर पैदल चलने से देर में सम्पन्न होने वाली यात्रा अपेक्षाकृत कहीं जल्दी पूरी की जा सकती है।
साधना के साथ सम्पन्न किया जाता है। इस प्रक्रिया का समूचे कुण्डलिनी क्षेत्र पर ऐसा प्रभाव पड़ता है जिससे उस शक्ति के जागरण और ऊर्ध्वगमन के दोनों उद्देश्य पूरे हो सकें। इस प्रयास में उत्पन्न हुई उत्तेजना का सदुपयोग करने वाले अनेक असाधारण काम सम्पन्न कर पाते हैं।
साधना का तत्व ज्ञान गत वर्ष मार्च अप्रैल, मई, जून के चार अंकों में अधिक विस्तारपूर्वक भी समझाया जा चुका है। वस्तुतः इस गायत्री महाशक्ति की उच्च स्तरीय साधना हैं। जिसे पंचाग्नि विद्या अथवा पंचकोशों साधना कहते हैं। गायत्री माता का पाँच मुखी सहित चित्रित करने वाले तत्व ज्ञानियों का संकेत इसी रहस्यमयी तपश्चर्या के सन्दर्भ में है।
साधना में अनभ्यस्त और दुर्बल मनःस्थिति को ही ध्यान में रखकर सारी योजना बनाई गई है। अस्तु ‘चान्द्रायण तप’ भी शिशु स्तर का सरल है। जो बिना किसी हानि कठिनाई के सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। यही बात उन योगाभ्यास साधनाओं में भी है जो इस प्रक्रिया के लिए निर्धारित की गई है वे सरल तो हैं ही उनमें कोई भूल रहने पर भी किसी प्रकार की हानि की तनिक भी आशंका नहीं है।
साधना करनी पड़ती है। कारखाना खड़ा करने से लेकर लाभ मिलने लगने की प्रक्रिया के बीच समय की काफी लम्बाई रहती है। जब हर बड़ा काम समय माँगता है तो कर्मफल मिलने में थोड़ा विलम्ब लगते देखकर धीरज खो बैठना और यह मान बैठना- तत्काल परिणाम नहीं मिला तो कभी मिलेगा ही नहीं-बाल-बुद्धि का चिन्ह है।
साधना वे लम्बे समय तक करते रहे और अपने उद्देश्य में सफल होकर रहे। पर यह सफलता हाथ तभी लगी जब उपासना उपचार के साथ तपश्चर्या को अग्नि शक्ति का समावेश हो सका। यदि वे मात्र पूजा आराधना ही करते रहते और तप के कष्टसाध्य झंझट से बचकर रहना चाहते तो उन्हें उससे अधिक कुछ भी न मिलता जो शिव मन्दिरों और गंगा मन्दिरों के पुजारियों को नगण्य-सा प्रतिफल उपलब्ध होता है।
साधना को उपासना एवं योग साधना का नाम दिया गया है। ब्रह्मवर्चस् साधना में चान्द्रायण तप के साथ इसी प्रयोजन के लिए पाँच प्रकार की उपासनाएँ कराई जाती हैं। (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन (3) खेचरी (4) बंध मुद्रा (5) सोऽहम्। इनसे पाँच तत्वों का, पाँच प्राणों का, पाँच तन्मात्राओं का परिष्कार जागरण एवं उन्नयन सुनियोजित रीति से सम्पन्न होता है। सुव्यवस्थित साधना का सदा सत्परिणाम प्रस्तुत करना सुनिश्चित है।
साधना करने लगे। बीच-बीच में कई डरावनी और लुभावनी परीक्षाएँ होती रहीं। उनका धैर्य और साहस सुदृढ़ बना रहा। सो वर्ष पूरा होते-होते भैरव प्रकट हुए और वरदान माँगने की बात कहने लगे।
साधना का समावेश है। इन्हें योग और तप भी कह सकते हैं। योग धारा में मस्तिष्कीय क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों की गणना है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के चिन्तन परक चारों ही उपचार योग है। तप में वे सभी क्रियाएँ आती हैं, उनमें अभ्यस्त अवांछनीयताओं के विरुद्ध विद्रोह किया जाता है और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष किया जाता है।
साधना में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का सन्तुलित समन्वय है। आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारों प्रक्रियाएँ किस प्रकार सम्पन्न की जानी चाहिए इसका कार्यक्रम साधन की स्थिति के अनुरूप बनाया जाता है। साधना के साथ-साथ स्वाध्याय, संयम और सेवा के तीन अवलम्बन भी अपनाये जाने चाहिए और उनकी अनिवार्य आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह प्रत्येक साधक को विस्तारपूर्वक समझाया और करने को सुव्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। समग्र जीवन में उत्कृष्टता भर देने वाली रीति-नीति को ही आत्मोत्कर्ष की सफलता के लिए अनिवार्य बताकर उसका समुचित मार्ग-दर्शन किया जाता है।
साधना’’ से यह भटकन-क्रम टूटेगा।
‘प्राण-दीप’ यह ‘‘प्रभु का अर्चन’’ बन जाएगा॥
साधना’- जल से हर गहराई को भर।
एक बनालो ‘आत्म-शान्ति’ का ‘मानसरोवर’॥
साधना के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा। मूकदर्शक बने रहना अब किसी जागृत आत्मा के लिए सम्भव न रह जाएगा।
साधना का नाम दिया गया है। ब्रह्मवर्चस् साधना में चान्द्रायण तप के साथ इसी प्रयोजन के लिए पाँच प्रकार की उपासनाएँ कराई जाती हैं। (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन (3) खेचरी (4) बंध मुद्रा (5) सोऽहम्। इनसे पाँच तत्वों का, पाँच प्राणों का, पाँच तन्मात्राओं का परिष्कार जागरण एवं उन्नयन सुनियोजित रीति से सम्पन्न होता है। सुव्यवस्थित साधना का सदा सत्परिणाम प्रस्तुत करना सुनिश्चित है।
साधना शब्द से अभिप्राय इसी क्षेत्र की गतिविधियों तक सीमित होता है। जबकि ज्ञानयोग और कर्म को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी और भक्तियोग को उच्चस्तरीय प्रयोजन समझते हुए उसे सीमित परिमाण में ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए था।
साधना में सन्निहित तपश्चर्या का अभ्यास एक प्रकार से प्रखरता के उत्पादन का जीवन-दर्शन है। उसे अपनाने वाला न केवल आत्मिक क्षेत्र की सफलताओं का अधिकारी बनता है, वरन् भौतिक क्षेत्र में भी-लोक-व्यवहार में भी उसकी सफलताएं दूसरों की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं। इसलिए वह न केवल आत्मिक प्रगति के इच्छुकों के लिए वरन् भौतिक समर्थता प्राप्त करने के उत्सुकों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती हैं।
साधना सत्र में गायत्री की उच्चस्तरीय साधना करने वाले साधकों को मिलता रहे इसका विशेष प्रबन्ध रखा गया है।
साधना में सम्मिलित किया है। तीर्थयात्रा का मूल उद्देश्य है धर्मप्रचार के लिए की गई पदयात्रा। दूर-दूर क्षेत्रों में जनसम्पर्क साधने और धर्मधारणा को लोक मानस में हृदयंगम करने का श्रमदान तीर्थयात्रा कहलाता है। श्रेष्ठ सत्पुरुषों के सान्निध्य में प्रेरणाप्रद वातावरण में रहकर आत्मोत्कर्ष का अभ्यास करना भी तीर्थ कहलाता है। यों गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने के लिए किये गये प्रबल प्रयासों को भी तीर्थ कहा गया है।
साधना का प्रधान अंग माना जाता है। उससे संचित कषाय-कल्मषों का निराकरण होता है और सुसंस्कारों को फलित होने का अवसर मिलता है। प्रगति के प्रधान अवरोध अशुभ प्रारब्ध के निराकरण की प्रक्रिया प्रायश्चित्त कहलाती है। इसे तप साधना का प्रथम लक्ष्य माना गया है। संचित अशुभ से पीछा छूट सके-निराकरण समाधान हो सके, तो उसका परिणाम साधन की सफलता में अत्यधिक सहायक हो सकता है।
साधना का समावेश अनिवार्य कर दिया गया है। ज्ञान यज्ञ के लिए सम्पर्क की तीर्थयात्रा को सामाजिक क्षेत्र की तपश्चर्या कहा गया है और जो जप, मात्र करके अपनी साधना की पूर्णता मान लेते थे उन्हें कहा गया है कि तपश्चर्या की दिशा में बढ़ना चाहिए। इस दिशा में वे जितनी प्रौढ़ता और प्रखरता का परिचय देंगे, उसी अनुपात से वे अपने साधन प्रयत्नों को सफल होते देखेंगे। देवता को अनुनय-विनय से फुसलाया नहीं जा सकता। भागीरथी तप द्वारा उनका अनुग्रह खरीदा जाता है।
साधना में सम्मिलित होने का अनुरोध भी प्रायः इसी स्तर का है। अस्तु यहाँ भी विवशता में प्रयुक्त होने वाले उसी उपाय का अवलम्बन करना पड़ा है। ब्रह्मवर्चस् सत्र दो-दो महीने के स्थान पर सन 85 के लिए एक-एक महीने के कर दिये गये हैं। हर सत्र अंग्रेजी महीने से आरम्भ होकर भारतीय महीनों के अनुसार पूर्णिमा तक चला करेगा। दस-दस दिवसीय सत्र फिलहाल तो अक्टूबर में ही दो हैं।
साधना कहे जाते हैं। उनमें प्रौढ़ता रहती है। प्रखरता की आवश्यकता पड़ती है। समग्र साधना को योग और तप का समन्वय कह सकते हैं। उसका मार्ग भी कष्ट साध्य है और महत्व भी असाधारण है।
साधना का दी गई है। यह एक प्रबल पुरुषार्थ है जिसकी गर्मी से कुसंस्कारों को जलाना और बीज रूप में विद्यमान सुसंस्कारों को विकसित कर सकना सम्भव हो सकता है। चान्द्रायण किसी की मनुहार नहीं है और उसके सहारे किसी देवता को प्रसन्न करके सस्ते मोल में बड़े वरदान पाने की विडम्बना है। इसे विशुद्ध विज्ञान सम्मत प्रयास पुरुषार्थ कहा जा सकता है और यह आशा की जा सकती है कि उससे प्रारब्ध विधान में आवश्यक उलट पुलट किया जा सकना सम्भव है। जब गोली लगे घायलों की जान बचाई जा सकती है और कुरूपों की प्लास्टिक सर्जरी करके उनके अवयवों को सुन्दर बनाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि विधि के विधान को- सृष्टि के उच्चस्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर उनमें आवश्यक हेर फेर न किया जा सके।
साधना विज्ञान की दृष्टि से विविध अनुष्ठानों, पुरश्चरणों एवं तप साधनाओं का विशाल परिकर उसी के साथ समन्वित है। गायत्री का ज्ञान पथ ब्रह्मविद्या और विज्ञान पक्ष वर्चस् कहलाता है। दोनों को मिलाकर ब्रह्मवर्चस् शब्द बनता है। यह आध्यात्मिक प्रौढ़ता और प्रखरता को पृष्ठभूमि बनाने वाली साधना है।
साधना के विशेष वर्ग में गिन लिया जाय तो शेष मध्यवर्ती पाँच चक्र कह सकते हैं। कोश व्याख्या में इन्हें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय विज्ञानमय और आनन्दमय कहते हैं। चक्र वर्णन में इन्हीं को स्वाधिष्ठान मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञाचक्र कहा जाता है। यह एक ही तथ्य का दो रूप में वर्णन विवेचन मात्र है। वस्तुतः है एक ही।
साधना में पंचमुखी गायत्री का पंचकोश अनावरण का योगाभ्यास है। इसमें पाँच योगों का समावेश है- (1) त्राटक बिन्दुयोग (2) सूर्यवेधन प्राणायाम, प्राणयोग (3) शक्तिचालिनी, कुण्डलिनी योग (4) खेचरी मुद्रा लययोग (5) सोऽहम् साधना, हंसयोग। इस समन्वय का यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गई कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या भी कह सकते हैं। इस सरल योगाभ्यास का सामान्य परिचय इस प्रकार है-
साधना की व्यवस्था बनी है। उसे अग्नि दीक्षा कह सकते हैं। शान्तिकुंज में पिछले वर्षों में जिन्हें किसी सत्र में बुलाया जा चुका है। इस प्रशिक्षण में प्राथमिकता उन्हें दी जायेगी। यों नयों के लिए द्वार सर्वथा बन्द नहीं है, प्रश्न प्राथमिकता और प्रमुखता का है।
साधना की सनातन परम्परा में आत्मशोधन की- तपश्चर्या की भी उतनी ही आवश्यकता और महत्ता बताई गई है जितनी कि उपलब्धियों की झलक दिखाने वाली योग साधनाओं की। अदूरदर्शिता की भूमि की उखाड़-पछाड़ बेकार लगती है और अंकुर उपजाना या पौध लगाना प्रत्यक्ष लाभदायक दीखता है। इतने पर भी तथ्य तो तथ्य ही रहेंगे। शोधन की उपेक्षा करके उपार्जन की उतावली अन्ततः निराशाजनक ही सिद्ध होती है।
साधना के उद्देश्य और स्वरूप की संक्षिप्त जानकारी इस अंक में मौजूद है। यों प्रस्तुत साधना का तत्व ज्ञान गत वर्ष मार्च अप्रैल, मई, जून के चार अंकों में अधिक विस्तारपूर्वक भी समझाया जा चुका है। वस्तुतः इस गायत्री महाशक्ति की उच्च स्तरीय साधना हैं। जिसे पंचाग्नि विद्या अथवा पंचकोशों साधना कहते हैं। गायत्री माता का पाँच मुखी सहित चित्रित करने वाले तत्व ज्ञानियों का संकेत इसी रहस्यमयी तपश्चर्या के सन्दर्भ में है।
साधना पद्धति का नामकरण भी यही किया गया है। किन्तु वस्तुतः यह एक अभियान है जिसका उद्देश्य मनुष्य के भीतर दबी हुई विशेषताओं एवं विभूतियों को उभारना है। लघु की विभु-तुच्छ को महान् पुरुष को पुरुषोत्तम-नर को नारायण बनाने की योजना एवं सम्भावना इसमें सन्निहित है। मनुष्य को वर्तमान स्थिति में नहीं रहना है उसे अपने गौरव के अनुरूप ऊँचा उठना है यही देवत्व का उदय है। अपने विश्व और समाज को यह दुर्गति नहीं रहनी चाहिए उससे सद्भावना पर सहकारिता के सहारे प्रगति और समृद्धि की सुख-शान्ति भरी परिस्थितियाँ उत्पन्न होनी चाहिए।
साधना में शरीर और मन की स्थिति को देखते हुए सरलता रखी गई है।
साधना को किया जा सके तो चेतना क्षेत्र में आनन्द और कार्य क्षेत्र में उल्लास की उपलब्धि होती है। यह लाभ ही प्रकारान्तर से भौतिक और आत्मिक जगत के अनेक लाभों का आभास कराता है। आत्मिक जगत के अनेक लाभों का आभास मिलता है। त्राटक के ऊपर से और खेचरी का नीचे से प्रभाव पड़ने के कारण साधक का ब्रह्म लोक उसका मध्य बिन्दु सहस्रार अपनी जागृत समर्थता का परिचय देने लगता है।
साधनाओं के अन्तर्गत आ जाता है। अन्तःचेतना के यह पाँच उभार पाँच देवताओं के वरदान जैसे चमत्कारी प्रतीत होते है।
साधना में समन्वित रखा गया है। यह प्रयास समय साध्य है। इसकी पूर्ण सफलता के लिए अनवरत और सतत प्रयत्न जिस श्रद्धा और तत्परता के साथ चलेंगे उसी अनुपात से सफलताओं का पथ-प्रशस्त होता चला जाएगा।
साधनाक्रम चान्द्रायण व्रत की तपश्चर्या और पंचकोशी योग साधना पद्धति के साथ जुड़ा हुआ है। इसका परिचय प्रशिक्षण और अभ्यास करने के लिए इन दिनों गंगा की गोद, हिमालय की छाया सप्त ऋषियों की साधना स्थली और समर्थ संरक्षण में ब्रह्मवर्चस् साधना क्रम चल पड़ा है। आरम्भिक प्रक्रिया के रूप में यह साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं। और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है।
साधना इसी प्रयोजन के लिए की जाती है। इसे ज्ञानयोग कहते हैं। अध्यात्म विवेचना के ग्रन्थ इसी निमित्त रचे गये हैं।
साधना कहते हैं। गायत्री माता का पाँच मुखी सहित चित्रित करने वाले तत्व ज्ञानियों का संकेत इसी रहस्यमयी तपश्चर्या के सन्दर्भ में है।
साधना पद्धति की जानकारी इस अंक में कराई गई है। यह कठिन दीखते हुए भी सरल है। चान्द्रायण की कठोरता में शिशु स्तर की जितनी सरलता सम्भव थी कर दी गई है। यति चान्द्रायण विशिष्ट लोगों के लिए ही सुरक्षित है। इतने पर भी उसे अनिवार्य नहीं- स्वेच्छा स्वीकृति के रूप में ही रखा गया है।
साधना की उद्देश्य हैं।
साधनाएँ शिशु स्तर की करायी जाती हैं और ऐसी हैं जिनमें प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की तनिक भी आशंका नहीं है। चान्द्रायण तप ‘यति’ स्तर का कठोर भी होता है और शिशु स्तर का सरल भी। ब्रह्मवर्चस् साधना में अनभ्यस्त और दुर्बल मनःस्थिति को ही ध्यान में रखकर सारी योजना बनाई गई है। अस्तु ‘चान्द्रायण तप’ भी शिशु स्तर का सरल है। जो बिना किसी हानि कठिनाई के सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है।
साधना मार्ग का अवलम्बन करना होता है।
साधना पद्धति के साथ जुड़ा हुआ है। इसका परिचय प्रशिक्षण और अभ्यास करने के लिए इन दिनों गंगा की गोद, हिमालय की छाया सप्त ऋषियों की साधना स्थली और समर्थ संरक्षण में ब्रह्मवर्चस् साधना क्रम चल पड़ा है। आरम्भिक प्रक्रिया के रूप में यह साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं। और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है।
साधना का उच्चस्तरीय आधार अगला है। जिसके लिए इन दिनों विशेष रूप से प्रयत्न किया जा रहा है। यों चेतना को परिष्कृत करके भौतिक सम्पत्तियों की तुलना से लाखों गुनी अधिक महत्वपूर्ण विभूतियों के उपार्जन के लिए बहुत समय से समझाया और उकसाया जाता रहा है, पर अब उसके लिए अधिक आग्रह किया जा रहा है। उसके लिए उपयुक्त वातावरण बनाने और साधन जुटाने में भी कमी नहीं रखी जा रही है। यह प्रयास उस आत्मविकास की उस प्रौढ़ प्रक्रिया के संदर्भ में है जिसे उच्चस्तरीय साधना की संज्ञा दी जा सकती है।
साधना
साधना विधान के पीछे यही प्रयास चल रहा है। इसे सामूहिक सम्भावनाओं को श्रेष्ठता की दिशा में घसीट ले चलने की महान प्रक्रिया कह सकते हैं। धरती पर स्वर्ग के अवतरण प्रयासों की दृष्टि से इसे अदृष्ट उपचार की संज्ञा दी सकती है।
साधना का मार्ग अपनाने वाला अपने आपको आत्म-शक्ति से समृद्ध करता है, फलतः उसे स्वर्ग, मुक्ति, सुख-शान्ति, सिद्धि, विभूति, सद्गति नाम दिये जा सकते हैं। चन्दन का वृक्ष बढ़ता है उसकी दूर-दूर तक सुगन्ध फैलती है। बादल उठते हैं तो प्राणियों और वनस्पतियों की प्यास बुझती है। धरती हरी-भरी दिखती है। इसी प्रकार व्यक्ति की उत्कृष्टता की समाज की सम्पन्नता और वातावरण की बसन्ती अनुकूलता के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
साधना’ का जब जीवन में आता है।
तभी अज्ञता-जड़ता का तम मिट पाता है॥
साधना के लिए पाँच योगाभ्यास निश्चित है। जप और ध्यान के अतिरिक्त (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन प्राणायाम (3) खेचरी मुद्रा (4) सोऽहम् साधना एवं शक्तिचालिनी प्रक्रिया के रूप में नित्य ही करनी पड़ती है। इन साधनाओं का चेतना क्षेत्र के पाँच प्राणों का और काया क्षेत्र के पाँच तत्वों का परिष्कार होने के साथ-साथ जीवन में अभिनव प्राण संचार होता है। शास्त्रों में इसे पंचीकरण योगाभ्यास एवं पंचाग्नि तपश्चर्या कहा है। सर्व साधारण के सध सकने जितना ही दबाव इस एक महीने के साधन क्रम में सम्मिलित किया गया है।
साधना क्रम में मौजूद है जो व्यक्तित्व को प्रखर और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
साधना है। इसी प्रक्रिया को ब्रह्मवर्चस् का योगाभ्यास साधना पक्ष समझा जाना चाहिए।
साधना में मूलाधार शक्ति को जगाने-उठाने और पूर्णता के केन्द्र से जोड़ देने का प्रयत्न किया जाता है। मूलाधार को प्रसुप्त कुण्डलिनी को जगाने और अधोमुखी से ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रथम प्रयास शक्तिचालिनी मुद्रा के रूप में सम्पन्न किया जाता है। ऊर्ध्वमुखी कुण्डलिनी अग्नि शिखर की तरह मेरुदण्ड मार्ग से ब्रह्मलोक तक पहुँचती है। अपने अधिष्ठाता सहस्रार से मिलकर पूर्णता प्राप्त करती है। इसी को कुण्ड दग्ध सती का पार्वती के रूप में तप साधन और शिव विवाह के रूप में वर्णन किया गया है।
साधना इसी का नाम है।
साधना। इन पाँचों का समन्वित साधनाक्रम ऐसा है जिसमें पंच कोशों के अनावरण के अतिरिक्त कुण्डलिनी जागरण का प्रारम्भिक चरण भी इसी अवधि में पूरा हो जाता है। पीछे के लिए आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक ले पहुँचने वाला यह अवरुद्ध द्वार खुल जाता है, जिस पर चलते हुए पग-पग पर भौतिक सिद्धियों से लौकिक सफलता और आत्मिक विभूतियों की अतीन्द्रिय क्षमता उपलब्ध करते चलना सम्भव हो जाता है।
साधना का व्यवहार पक्ष हुआ। इसे नीति शास्त्र, धर्मशास्त्र, समाज शास्त्र के नाम से जाना जाता है। इस सारे क्षेत्र को कर्मयोग कह सकते हैं।
साधना के साथ तपश्चर्या का समावेश हो तो उसको अधिक अच्छी तरह फलित होने का अवसर रहता है। विलासिता और शिथिलता की स्थिति में रहकर उपासना करने वालों की तुलना में तपश्चर्या की रीति-नीति अपनाकर भजन प्रयोजनों में लगने वाले व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अधिक अच्छी तरह जा पहुँचते हैं।
साधना को ही उपाय उपचार बताया है। चिड़िया की छाती की गर्मी पाकर ही अण्डे पकते हैं। पौधों के विकसित होने और फूलने-फलने में गर्मी का कितना बड़ा योगदान होता है इसे किसान और माली भली प्रकार जानते हैं। जप का समानान्तर शब्द तप। बोलचाल की भाषा में प्रायः जप, तप-दोनों को मिलाकर बोलने का रिवाज है।
साधना पद्धति का एक महत्वपूर्ण सुनियोजित एवं सुसम्बद्ध साधनाक्रम चान्द्रायण व्रत की तपश्चर्या और पंचकोशी योग साधना पद्धति के साथ जुड़ा हुआ है। इसका परिचय प्रशिक्षण और अभ्यास करने के लिए इन दिनों गंगा की गोद, हिमालय की छाया सप्त ऋषियों की साधना स्थली और समर्थ संरक्षण में ब्रह्मवर्चस् साधना क्रम चल पड़ा है। आरम्भिक प्रक्रिया के रूप में यह साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं। और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है।
साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती है। इसी लिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।
साधना में प्राणयोग के नाम से सम्मिलित है। व्यायाम शरीर का बलवर्धन उद्देश्य पूरा करते हैं और प्राणायाम से मनस्वी तेजस्वी बनने का लाभ मिलता है। सूक्ष्म शरीर में प्रखरता उत्पन्न करना उसका उद्देश्य है।
साधना है।
साधना को, उपासना प्रक्रिया को, आत्मिक प्रगति का उत्तरार्ध कहते हैं।
साधना हैं। जिसे पंचाग्नि विद्या अथवा पंचकोशों साधना कहते हैं। गायत्री माता का पाँच मुखी सहित चित्रित करने वाले तत्व ज्ञानियों का संकेत इसी रहस्यमयी तपश्चर्या के सन्दर्भ में है।
साधना एवं शक्तिचालिनी प्रक्रिया के रूप में नित्य ही करनी पड़ती है। इन साधनाओं का चेतना क्षेत्र के पाँच प्राणों का और काया क्षेत्र के पाँच तत्वों का परिष्कार होने के साथ-साथ जीवन में अभिनव प्राण संचार होता है। शास्त्रों में इसे पंचीकरण योगाभ्यास एवं पंचाग्नि तपश्चर्या कहा है। सर्व साधारण के सध सकने जितना ही दबाव इस एक महीने के साधन क्रम में सम्मिलित किया गया है। गायत्री की पंचमुखी साधना में पंचकोशों के अनावरण को ग्रन्थि वेधन का रहस्यमय विधान इन्हीं पाँच साधनाओं के अन्तर्गत आ जाता है।
साधना का स्तर जैसे-जैसे उठता है वैसे ही वैसे उसमें अधिक तन्मयता और तत्परता का समावेश होता चलाता है। सामान्य उपासना में जप और ध्यान पर्याप्त समझा जाता है। ध्यान आन्तरिक न बन पड़े तो प्रतिमा के सहारे प्रत्यक्ष दर्शन से भी वह काम किसी प्रकार चला जाता है। धीरे-धीरे जब स्तर बढ़ता है तो अनुष्ठानों और पुरश्चरणों के माध्यम से साधक को अधिक कठोर अनुशासनों में कसना आरम्भ कर दिया जाता है। सभी जानते हैं कि पुरश्चरणों में जप की संख्या का नियत होना ही पर्याप्त नहीं वरन् उसके साथ-साथ उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन, अपनी सेवा आप करना जैसे प्रतिबन्ध लगते हैं।
साधना द्वारा सम्पन्न होती है।
साधना का प्रत्यक्ष पक्ष वह है जिसमें अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत किया जाता है। दृष्टिकोण में दूरदर्शी विवेकशीलता का समन्वय करने का तत्व दर्शन ब्रह्म विद्या के नाम से प्रख्यात है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन की साधना इसी प्रयोजन के लिए की जाती है। इसे ज्ञानयोग कहते हैं। अध्यात्म विवेचना के ग्रन्थ इसी निमित्त रचे गये हैं।
साधना का पूर्वार्ध है-आत्मशोधन और उत्तरार्ध है-आत्म विकास। उपासनाएं आत्म-विकास का प्रयोजन पूरा करती हैं। इसके लिए योगाभ्यास वर्ग के अनेकानेक विधि-विधानों का प्रचलन है। अपनी रुचि, आवश्यकता और परम्परा के अनुसार उनमें साधक चुनाव करते हैं और प्रगति का उपक्रम आरम्भ करते हैं, यह उत्तरार्ध है। यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि उत्तरार्ध से लाभ पाने के नये आधार और दृश्य सामने आते हैं और कुछ पाने की आशा तो बंधती है, पर पूर्वार्ध की उपेक्षा करके यह छलांग प्रायः असफल ही होती देखी गई है।
साधनाओं की। अदूरदर्शिता की भूमि की उखाड़-पछाड़ बेकार लगती है और अंकुर उपजाना या पौध लगाना प्रत्यक्ष लाभदायक दीखता है। इतने पर भी तथ्य तो तथ्य ही रहेंगे। शोधन की उपेक्षा करके उपार्जन की उतावली अन्ततः निराशाजनक ही सिद्ध होती है।
साधना का श्रम निरर्थक समझा गया है तो उसे भूल ही कहा जायगा। जो आरम्भ में तो श्रम बचाने की बचाने की बुद्धिमत्ता समझा गया था, पर पीछे उसमें बीज भी गँवा बैठने की निराशा ही हाथ लगती है।
साधना द्वारा किया जाता है।
साधना से उसे पुनर्जीवन मिलता है। उच्च उद्देश्यों से जुड़कर वह पार्वती बनती है। और शिव-विवाह का सहस्रार में संयुक्त होने का आनन्द प्राप्त करती है। इस सफलता के फलस्वरूप गणेश और कार्तिकेय के रूप में तत्वज्ञान और प्रचण्ड पराक्रम के रूप में शारीरिक और बाह्य आनन्द उल्लास उपलब्ध होते चले जाते हैं।
साधना आरम्भ करने से लेकर सिद्धि तक पहुँचने में समय लगता है। यात्रा आरम्भ करने के दिन नहीं लक्ष्य तक कौन पहुँचता है? लम्बी मंजिल पूरा करने में समय तो लग ही जाता है। मुकदमा चलने से लेकर फैसला होने तक में अदालतें बहुत दिन गुजार देती हैं। कर्मफल मिलने में यदि विलम्ब लगे तो समझदारी का परिचय देने वाले मनुष्य को यह विश्वास भी रखना चाहिए कि इस सुनिश्चित सृष्टि व्यवस्था में जो बोया है वही काटना होगा।
साधना को करके लौटेंगे वे अपने भीतर कुछ आंतरिक विशेषता उत्पन्न हुई अनुभव करेंगे। यह उपलब्धि भौतिक सुख-शान्ति और आत्मिक सिद्धि प्रगति की दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण है।
साधना क्रम में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार शौच, स्नान, दंतमंजन, कपड़े धोना, कमरा बुहारना, फर्नीचर झाड़ना, बर्तन माँजना, स्वच्छता बनाये रहने और गन्दगी न जमने से होने वाली हानि से बचने के लिए आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार मनःक्षेत्र में भीतर से उठने वाली गन्दगी और अनुपयुक्त वातावरण से अवांछनीय छाप को निरन्तर हटाते रहने के लिए इतनी उपासना तो हर किसी के लिए आवश्यक है जिसे नित्य नियम कहा गया है और संध्या-वन्दन नाम दिया गया है। इसका इतना ही लाभ है कि मलीनताएं जमते रहने से जिस अशुभ की आशंका थी उससे बचा जा सकता है। आत्मिक प्रगति के लिए जो विशिष्ट पुरुषार्थ करने पड़ते हैं वे साधना कहे जाते हैं। उनमें प्रौढ़ता रहती है।
साधना को ब्रह्मवर्चस् योगाभ्यास का महत्वपूर्ण अंग उसकी गरिमा को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया है।
साधना की सफलता ऐसे ही अनेक सुयोगों का संगम मिल जाने से किस प्रकार सम्भव होती है इसे साधक प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।
साधना को कराने लग जायें। ब्रह्मवर्चस् सत्र में सभी आरम्भिक साधनाएँ शिशु स्तर की करायी जाती हैं और ऐसी हैं जिनमें प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की तनिक भी आशंका नहीं है। चान्द्रायण तप ‘यति’ स्तर का कठोर भी होता है और शिशु स्तर का सरल भी। ब्रह्मवर्चस् साधना में अनभ्यस्त और दुर्बल मनःस्थिति को ही ध्यान में रखकर सारी योजना बनाई गई है। अस्तु ‘चान्द्रायण तप’ भी शिशु स्तर का सरल है।
साधना तो चेतना शक्ति को प्रखर बनाने का एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। उसमें आत्म-शोधन और आत्म-परिष्कार की ही सांगोपांग विधि व्यवस्था है। उस ओर से आँखें बन्द करके मात्र मनोकामनाएँ पूरी करने और संकट हटाने के लिए उनका मनुहार करते हैं जो भाग्य बदलने में समर्थ हैं। जिनके सहारे अपवाद पद्धति से मनोरथ पूरे हो सकते हैं।
साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं। और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है। यह एक महीने चलेगा। साथ ही इसी एक महीने में सवालक्ष गायत्री का पुरश्चरण भी करना होगा।
साधना कहते हैं। इस योगाभ्यास की हठयोग की पद्धति के अन्तर्गत चक्रवेधन एवं कुण्डलिनी जागरण साधना कहते हैं। षटचक्रों का नाम सभी ने सुना है। भू-मध्य भाग से मस्तिष्क प्रारम्भ होता है और वह मेरुदण्ड में होकर जननेन्द्रिय क्षेत्र तक चला जाता है। यह समूचा परिधि ब्रह्मलोक या ब्रह्मरंध्र कहलाता है।
साधना का पारस’’, जीवन का लोहा।
तो वह शुद्ध, दमकता कंचन बन जाएगा॥
साधनाओं का चेतना क्षेत्र के पाँच प्राणों का और काया क्षेत्र के पाँच तत्वों का परिष्कार होने के साथ-साथ जीवन में अभिनव प्राण संचार होता है। शास्त्रों में इसे पंचीकरण योगाभ्यास एवं पंचाग्नि तपश्चर्या कहा है। सर्व साधारण के सध सकने जितना ही दबाव इस एक महीने के साधन क्रम में सम्मिलित किया गया है। गायत्री की पंचमुखी साधना में पंचकोशों के अनावरण को ग्रन्थि वेधन का रहस्यमय विधान इन्हीं पाँच साधनाओं के अन्तर्गत आ जाता है। अन्तःचेतना के यह पाँच उभार पाँच देवताओं के वरदान जैसे चमत्कारी प्रतीत होते है।
साधना का पुरुषार्थ किया जाता है। इस मार्ग पर चलते हुए जो सफलतायें मिलती हैं। उन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। इन्हें अतीन्द्रिय क्षमता के नाम के जाना जाता है। सामर्थ्य का मूल्यांकन करने वाले इसे आत्मबल या ब्रह्मतेज कहते हैं।
साधना में चान्द्रायण तप के साथ इसी प्रयोजन के लिए पाँच प्रकार की उपासनाएँ कराई जाती हैं। (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन (3) खेचरी (4) बंध मुद्रा (5) सोऽहम्। इनसे पाँच तत्वों का, पाँच प्राणों का, पाँच तन्मात्राओं का परिष्कार जागरण एवं उन्नयन सुनियोजित रीति से सम्पन्न होता है। सुव्यवस्थित साधना का सदा सत्परिणाम प्रस्तुत करना सुनिश्चित है।
साधना में इन्हीं तीनों को खोलने का विधान है। मूलबन्ध जालन्धर बन्ध और उड्डियान बन्धों की साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती है। इसी लिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।
साधना क्रम चल पड़ा है। आरम्भिक प्रक्रिया के रूप में यह साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं। और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है। यह एक महीने चलेगा।
साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गये ।
साधनायें की जाती हैं। प्रसुप्ति को जागृति में परिणत करने के लिए आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जाता है। इस मार्ग पर चलते हुए जो सफलतायें मिलती हैं। उन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। इन्हें अतीन्द्रिय क्षमता के नाम के जाना जाता है।
साधना विज्ञान को सही रीति से अपनाया जाय। उचित मूल्य चुकाकर महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने के सिद्धान्त पर विश्वास किया जाय। उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाने के साथ या उससे भी पहले आत्मशोधन की महत्ता और आवश्यकता समझी जाय। प्रगति के प्रयासों में उसे अनिवार्य रूप में सम्मिलित रखा जाय। योग और तप दोनों एक दूसरे के पूरक और अन्योन्याश्रित हैं।
साधना के साथ-साथ स्वाध्याय, संयम और सेवा के तीन अवलम्बन भी अपनाये जाने चाहिए और उनकी अनिवार्य आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह प्रत्येक साधक को विस्तारपूर्वक समझाया और करने को सुव्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। समग्र जीवन में उत्कृष्टता भर देने वाली रीति-नीति को ही आत्मोत्कर्ष की सफलता के लिए अनिवार्य बताकर उसका समुचित मार्ग-दर्शन किया जाता है।
साधना का सदा सत्परिणाम प्रस्तुत करना सुनिश्चित है।
साधनारत होना होता है। इसका सत्परिणाम समुद्र मंथन से निकले 14 प्रसिद्ध रत्नों की तरह साधक को दिव्य विभूतियों के रूप में प्राप्त होता है।
साधना, ये सभी बातें व्यक्तित्व की प्रखरता से सम्बन्धित है। ओछे व्यक्ति प्रचुर साधन हाथ में रहते हुए भी किसी भी क्षेत्र में कहने लायक सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। युग सृजन जैसा महान कार्य तो आन्तरिक तेजस्विता प्राप्त किये बिना सम्भव नहीं हो सकता। स्वार्थ और परमार्थ दोनों का ही समन्वय इस तथ्य पर आधारित है कि किसी भी क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करने के इच्छुक अपना व्यक्तित्व निखारें उसमें ओजस्, तेजस् और वर्चस् की ऊर्जा का समुचित समावेश करें।
साधना क्रम चल रहा है, उसमें किसी को किसी प्रकार की आशंका करने या असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। विश्वास किया गया है कि जो इस साधना को करके लौटेंगे वे अपने भीतर कुछ आंतरिक विशेषता उत्पन्न हुई अनुभव करेंगे। यह उपलब्धि भौतिक सुख-शान्ति और आत्मिक सिद्धि प्रगति की दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण है।
साधना को योग और तप का समन्वय कह सकते हैं। उसका मार्ग भी कष्ट साध्य है और महत्व भी असाधारण है।
साधना चाहिए। परमार्थ के लिए दूसरों को उपदेश देते रहना ही पर्याप्त है। बहुत मन करे तो धर्मात्मा की चादर ओढ़ी जा सकती है। बात वहाँ तक न बढ़ने देनी चाहिए जहाँ स्वार्थ पर किसी प्रकार की चोट पहुँचती हो।
साधना का नाम त्राटक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-October
साधना है। उपासना दिन के एक छोटे से अंश में, निश्चित समय तक की जाती है, साधना एक अविच्छिन्न प्रक्रिया है। वह पूरे जीवन का ही नाम है। साधनामय जीवन आन्तरिक पवित्रता को निखरता जाता है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्य दर्शन कराता है। मानवीय व्यक्तित्व में देवत्व के अवतरण की यह प्रक्रिया है।
साधना पद्धति द्वारा स्थूल, सूक्ष्म कारण तीनों शरीरों का संस्कार-परिष्कार, परिमार्जन और परिवर्धन किया जाता है। इसके तीन प्रयोग हैं-(1) कर्मयोग (2) ज्ञानयोग (3) भक्तियोग। तीनों की सुसंतुलित क्रिया-पद्धति का अवलम्बन ही श्रेयस्कर है। श्रीमद्भगवद् गीता में इसी प्रक्रिया का विवेचन है। धर्मशास्त्रों का विशालकाय-कलेवर भी इसी त्रिविधि तत्वज्ञान की विवेचना में ही खड़ा किया गया है।
साधना करने लगे। विरोचन ने तरह-तरह से दर्पण देखा, वेश-भूषा बदलकर केश विन्यास में परिवर्तन कर सौंदर्य प्रसाधनों में कई बार अन्तर कर उसने जितनी बार दर्पण में देखा उसको अपनी सुडौल देहयष्टि, सुन्दर मुखमण्डल ही स्मरण में आया तो उसने यही माना कि यह शरीर ही आत्मा है उसे ही तरह-तरह से सजाने से उसी की तृप्ति में लगे रहना ही सुख का साधन है, विरोचन को और अधिक रुकने में उकताहट हुई सो उसने अपनी इसी मान्यता को पूर्ण मान लिया और घर लौट आया।
साधना में मानवीयता के उन गुणों का प्रचुर विकास होता था। तब वन्य जीवन राजकीय संरक्षित सम्पदा मानी जाती थी। कौटिल्य ने उनके वध को अपराध मानकर दण्ड की व्यवस्था की थी।
साधना वहाँ नहीं हो सकती। इसके लिए देवताओं को मनुष्य बनना पड़ता है। मनुष्यों में ही बुद्ध-पुरुष का आविर्भाव होता है, जिसकी देवता नमस्कार करते हैं। अतः मनुष्य धर्म देवता धर्म से उच्चतर है, जैसे कि विराग भोग से महत्तर है।
साधनाएँ इसी वर्ग की है। पर यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। भूल होने पर इस राह में खतरे ही खतरे हैं। निश्चय ही इसमें ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होती है। पर उन उपलब्धियों से चमत्कार-प्रदर्शन द्वारा लोगों को विस्मित-चकित कर देने की बात-आकांक्षा मात्र अहंकार ही बढ़ाती है।
साधना का अर्थ है इन तीनों ही शरीरों की समुचित साज-सम्हाल और उत्कर्ष की व्यवस्था। साधना की दिशा में प्राथमिक पग है-उपासना। भजन-पूजन, जप-ध्यान, व्रत-उपवास आदि उपासना-अभ्यास मन की प्रवृत्ति को पदार्थपरकता से चेतना की ओर मोड़ते हैं। विश्वव्यापी चेतना के स्मरण और सान्निध्य की अनुभूति की आकांक्षा जागृत हो जाने पर मनोवृत्तियों का वासना और तृष्णा की दिशा में भटकाव, समय, शक्ति और पुरुषार्थ का भयानक दुरुपयोग प्रतीत होने लगता है। तब मनःशक्ति को संयमित कर परमार्थ में नियोजित करने की प्रवृत्ति दृढ़ होती जाती है।
साधनामय जीवन आन्तरिक पवित्रता को निखरता जाता है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्य दर्शन कराता है। मानवीय व्यक्तित्व में देवत्व के अवतरण की यह प्रक्रिया है।
साधना पद्धति का राजमार्ग सर्वसाधारण के लिए सुगम है। आजीविका-उपार्जन तथा सामान्य गृहस्थ जीवन-यापन करते हुए इस साधना क्रम को अपनाया जा सकता है। इस पथ पर सहज ही गतिशील रहा जा सकता है। इसीलिए शास्त्रकारों और ऋषियों ने सर्वसाधारण को इसी पथ के अवलम्बन हेतु प्रोत्साहित किया है। इस मार्ग द्वार जादूगरी जैसे चमत्कार भले न प्राप्त हो, पर नर को नारायण की स्थिति तक पहुँचा देने का वास्तविक चमत्कार निश्चित ही सम्भव है।
साधना के पुरश्चरण आयोजनों द्वारा सूक्ष्म वातावरण के अनुकूलन का प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, पर जिस गंगावतरण के लिए किए गये भागीरथ प्रयास की उपमा दी जा सकती है वह मिशन का परिव्राजक अभियान ही है। इसमें राम की रीछ-वानर, कृष्ण के ग्वाल-बाल, बुद्ध के श्रमण और गान्धी के सत्याग्रही नये युग के अनुरूप नया कलेवर धारण करके नयी परम्परा अपनाते हुए स्पष्टतः देखे जा सकते हैं।
साधना के सहारे किया जाता है उसका विकास परिपाक जैसे-जैसे होगा वैसे-वैसे करुणा जगेगी और दूसरों के साथ आत्मीयता भरा उदार व्यवहार करने की नीति अपनानी पड़ेगी। साधु और ब्राह्मण परम्परा में संयमी और मितव्ययी जीवन पद्धति अपनाने का प्राविधान है। यह इसलिए कि व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं से विरत होकर दूसरों की सेवा सहायता करने के लिए समय और साधन बनाये जा सकें। अध्यात्म तत्व ज्ञान के प्रधान सूत्र ‘‘आत्मवत् सर्व भूतेषु”-‘‘वासुदैव कुटुम्बकम्”-‘‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्” ‘‘कामये दुःख तल्फानां प्राणिनां आर्त नाशनम्” आदि हैं। इनमें दूसरों से प्यार करने की शिक्षा दी गई है।
साधना इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए है।
साधना। इसे ज्ञान-यज्ञ का रूप देना चाहिए। समाज में सद्विचारों का सर्वाधिक अभाव है। विश्वव्यापी शोक-सन्ताप का यही कारण है। जन-मानस का स्तर परिवर्तित करने पर ही दुःख दारिद्रय की प्रचण्ड आग बुझेगी।
साधना के दो वर्ग हैं- (1) विशिष्ट लोगों की विशिष्ट प्रयोजन हेतु विनिर्मित विशिष्ट प्रक्रिया। (2) सर्वसाधारण के लिए सहज सुगम सौम्य पद्धति।
साधना एवं शिक्षा चलेगी। महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध पृथक रहेगा। पतियों के बाहर चले जाने पर भी इन महिलाओं का उपयोगी शिक्षण चलता रहेगा। सपत्नीक व्यक्तियों को एक ऐसा कमरा मिल जायगा, जिसमें वे चाहें तो अपना भोजन आप भी बन सकें।
साधना एक अविच्छिन्न प्रक्रिया है। वह पूरे जीवन का ही नाम है। साधनामय जीवन आन्तरिक पवित्रता को निखरता जाता है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्य दर्शन कराता है। मानवीय व्यक्तित्व में देवत्व के अवतरण की यह प्रक्रिया है।
साधना सत्र भी उत्साहपूर्वक मनाये गये और यह अंक पाठकों के पास पहुँचते-पहुँचते आश्विन नवरात्रि पर्व पिछले सभी आयोजनों की तुलना में और भी अधिक उल्लास भरे वातावरण में मनाया जा रहा होगा।
साधना आदि नामों में पुकारते हैं। आदर्शों के प्रति किये जाने वाले प्यार को देवत्व कहते हैं। ईश्वर के प्रति प्यार विकसित करने वाले जीवन मुक्त बनते हैं। लक्ष्य के प्यार करने वाले परिश्रम करते और अभीष्ट सफलता के लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं। जिसे इनमें किसी के लिए प्यार नहीं वे उच्छृंखल आवारागर्दी में भटकते और पतन तथा पराभव की दुर्गति की ठोकरें खाते हैं।
साधना जैसे अनेक क्षेत्र ढूँढ़े जा सकते हैं जिनमें लोग अपनी विशेषता बिना दूसरों का तिरस्कार किये या कष्ट पहुँचाये ही सिद्ध कर सकें।
साधना (2) ज्ञान संचय (3) सेवा शिक्षण, इन तीनों का ही समन्वय करके एक पाठ्यक्रम बनेगा। उसे छोटे-बड़े प्रशिक्षण सत्र में पूरा कराने की व्यवस्था ब्रह्मवर्चस् आरण्यक में रहेगी, इसके उपरान्त ही प्रशिक्षित परिव्राजकों को कार्यक्षेत्र में युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए थोड़े या अधिक समय के लिए आवश्यकतानुसार भेजा जाता रहेगा।
साधना के साथ ही ज्ञानयोग की साधना भी जुड़ी है। उस हेतु मन में उत्कृष्ट विचारों का अनवरत समावेश आवश्यक है। प्रेरक स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं पुरानी, किस्से कहानी जैसी किताबों का वासी रहना, घोटना स्वाध्याय नहीं। व्यावहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्य क्रम मानकर किया ही जाना चाहिए।
साधना भी जुड़ी है। उस हेतु मन में उत्कृष्ट विचारों का अनवरत समावेश आवश्यक है। प्रेरक स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं पुरानी, किस्से कहानी जैसी किताबों का वासी रहना, घोटना स्वाध्याय नहीं। व्यावहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्य क्रम मानकर किया ही जाना चाहिए।
साधना का फल प्रदान करेगा।
साधना सत्र :-
साधना का-विभिन्न विधि-विधानों के रूप में, अपने समय के साधकों की मनोभूमि तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मार्ग-निर्देश किया है। इस क्रिया-विधान में कर्मयोग, भक्तियोग एवं ज्ञान योग तीनों का इस ढंग से समावेश किया गया है कि व्यक्ति के तीनों शरीर परिपुष्ट होते चलें और समाज के विकास के पुण्य-प्रयोजन का भी कार्य होता चले।
साधना का संरक्षण परिमार्जन करने के लिए समय से पूर्व ही अपने निश्चय की जानकारी शान्ति-कुँज पहुँचा दें। उत्तर की अपेक्षा हो तो जवाबी पत्र भेजें। निजी उद्देश्यों के लिए पत्र-व्यवहार करने वालों से भी जवाबी पत्र भेजने का अनुरोध है।
साधना के लिए स्थान बदलने की आवश्यकता पड़ती है। वानप्रस्थ में ऐसे परिवर्तन पर बहुत जोर दिया गया है।
साधनाओं को मूल उद्देश्य सुरक्षित रखते हुए कार्यपद्धति में सामयिक हेर-फेर किये जाते रहे हैं और किए जाने ही चाहिए। सृष्टि के आरम्भ से आज तक समय-समय पर ऋषियों ने इसी त्रिविधि साधना का-विभिन्न विधि-विधानों के रूप में, अपने समय के साधकों की मनोभूमि तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मार्ग-निर्देश किया है। इस क्रिया-विधान में कर्मयोग, भक्तियोग एवं ज्ञान योग तीनों का इस ढंग से समावेश किया गया है कि व्यक्ति के तीनों शरीर परिपुष्ट होते चलें और समाज के विकास के पुण्य-प्रयोजन का भी कार्य होता चले।
साधना की महान प्रक्रिया में ऐसे ही वातावरण और अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत कर सकने योग्य बनाने के लिए ही इस आरण्यक को सप्त ऋषियों की सुसंस्कारित तपोभूमि में प्रतिष्ठापित किया गया है।
साधना बताई उन्हें कहा-दर्पण में अपनी छवि देखना। छवि देखने वाले दृगों को देखना, दृगों की पुतलियों के बिन्दु के भीतर प्रविष्ट होकर यह पहचान करना कि यह भीतर कौन देखता है? कैसे देखता है? क्यों देखता है?
साधना-पथ की कठिनाइयों और लम्बाई से निराश होकर या तो विरत हो जाते हैं या फिर अपनी असफलता की झेंप मिटाने के लिए धूर्तता के द्वारा लोगों का चमत्कृत करने का निकृष्ट व्यवसाय अपनाकर स्वयं भी पतित होते और दूसरों को भी गड्ढ़े में धकेलते हैं। मात्र असामान्य साहसी व्यक्ति ही इस मार्ग में बढ़ सकते हैं, सो भी विशिष्ट परिस्थितियाँ बन पड़े तभी।
साधना पूरी कर ली है। उनके लिए ध्यान का अभ्यास आवश्यक माना गया है। ध्यान या समाधि में ही सत्य के दर्शन होते हैं। बिना ध्यान के प्रज्ञा की प्राप्ति नहीं होती और जिसमें प्रज्ञा नहीं है वह ध्यान नहीं कर सकता। अतः ध्यान और प्रज्ञा अन्योन्याश्रित हैं।
साधना क्रम को अपनाया जा सकता है। इस पथ पर सहज ही गतिशील रहा जा सकता है। इसीलिए शास्त्रकारों और ऋषियों ने सर्वसाधारण को इसी पथ के अवलम्बन हेतु प्रोत्साहित किया है। इस मार्ग द्वार जादूगरी जैसे चमत्कार भले न प्राप्त हो, पर नर को नारायण की स्थिति तक पहुँचा देने का वास्तविक चमत्कार निश्चित ही सम्भव है।
साधना की दिशा में प्राथमिक पग है-उपासना। भजन-पूजन, जप-ध्यान, व्रत-उपवास आदि उपासना-अभ्यास मन की प्रवृत्ति को पदार्थपरकता से चेतना की ओर मोड़ते हैं। विश्वव्यापी चेतना के स्मरण और सान्निध्य की अनुभूति की आकांक्षा जागृत हो जाने पर मनोवृत्तियों का वासना और तृष्णा की दिशा में भटकाव, समय, शक्ति और पुरुषार्थ का भयानक दुरुपयोग प्रतीत होने लगता है। तब मनःशक्ति को संयमित कर परमार्थ में नियोजित करने की प्रवृत्ति दृढ़ होती जाती है। यही साधना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-February
साधना है । वानप्रस्थ तपश्चर्या में आर्य परम्परा के अनुसार इन्हीं तीन तथ्यों का अभ्यास अवगाहन करना पड़ता है इन संगतियों के आधार पर कोई चाहे तो ब्रह्म वर्चस् को वानप्रस्थ साधनाश्रम भी कह सकता है। थोड़े−थोड़े समय के छोटे−छोटे सत्र बना देने से ही यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षण वानप्रस्थ साधना से कोई भिन्न वस्तु है। उसे थोड़े−थोड़े समय की वानप्रस्थ साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।
साधना का समुचित लाभ उठाने के इच्छुक हों उन्हें ऐसे ही भाव−भरे अनुकरण का साहस जुटाना चाहिए। बड़ी उपलब्धियों के लिए उदात्त चिन्तन, विवेकपूर्ण निर्धारण और सत्साहस की आवश्यकता है। बसन्त पर्व इसी शर्त पर दिव्य सत्ता के साथ साझीदारी करने और प्रचुर लाभ कमाने का सन्देश अनुरोध, आग्रह लेकर उपस्थित हुआ है। इसे स्वीकार करने में ही समझदारी है।
साधना में तीनों प्रमुख योगाभ्यासों का समन्वय समझा जाय।
साधना कहा गया है। भक्तियोग यही है−इसी के सहारे आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त अध्यात्म उपहार उपलब्ध होते हैं। मनुष्य में देवत्व के उदय और परमेश्वर के प्रकटीकरण की पूरी-पूरी सम्भावना इस प्रेम योग की साधना पर अवलम्बित है। ईश्वर के सान्निध्य में−समर्पण में जो आनन्द आता होगा उसी अनुभूति भाव भरी प्रेम सम्वेदनाओं के उभार में भली प्रकार की जा सकती है।
साधनायें तो उन सम्भावनाओं से भी हजार लाख करोड़ गुनी अधिक सामर्थ्य प्रदान कर सकती है इसे निम्न विवेचन से भली प्रकार समझा सकता है।
साधना के रूप में ज्ञानयज्ञ का महत्व सर्वोपरि है। इन दिनों महाकाल की सामाजिक मांग यही है। इसमें आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों तत्वों का समान समावेश है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चतुर्विधि आत्मोत्कर्ष साधना है आत्मनिर्माण और समाज निर्माण का उचित समन्वय है। अस्तु आत्मा के परमात्मा के हिस्से का लाभांश इसी पुण्य प्रयोजन में लगना चाहिए।
साधना के द्वारा उसे प्रयत्नपूर्वक जागृत किया जा सकता है। इस जागृति के फलस्वरूप जो कुछ इन्द्रियातीत है वह इन्द्रियगम्य बन सकता है। जो बुद्धि की सीमा से बाहर है वह उसकी पकड़ में आ सकता है। जानने और करने के मार्ग में जो व्यवधान है वे दूर हो सकते हैं।
साधना क्रम में −लगभग वे ही तत्व है जो वानप्रस्थ तपश्चर्या में होते हैं। प्रातः तीन घण्टे योग तप मध्याह्न तीन घण्टे ब्रह्म चिन्तन, आत्म चिन्तन सायंकाल तीन घण्टे लोक सेवा शिक्षण। यही नौ घण्टे की दैनिक वर्चस् साधना है । वानप्रस्थ तपश्चर्या में आर्य परम्परा के अनुसार इन्हीं तीन तथ्यों का अभ्यास अवगाहन करना पड़ता है इन संगतियों के आधार पर कोई चाहे तो ब्रह्म वर्चस् को वानप्रस्थ साधनाश्रम भी कह सकता है। थोड़े−थोड़े समय के छोटे−छोटे सत्र बना देने से ही यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षण वानप्रस्थ साधना से कोई भिन्न वस्तु है।
साधना है आत्मनिर्माण और समाज निर्माण का उचित समन्वय है। अस्तु आत्मा के परमात्मा के हिस्से का लाभांश इसी पुण्य प्रयोजन में लगना चाहिए। इस सन्दर्भ में युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य का न्यूनतम अंश प्रतीक चिन्ह के रूप में आरम्भ से ही सदस्यता शर्त के रूप में निर्धारित है। एक घन्टा और दस पैसा नित्य का अनुदान अपने सम्पर्क क्षेत्र में सद्ज्ञान का आलोक फैलाने के लिए निकालने के लिए कहा जाता रहा है। जिनका इतना भी आरम्भ अभी नहीं हुआ है वे उसे आरम्भ करें ।
साधना सब चलते रहे हैं। परिवार निर्माण के लिए कन्या प्रशिक्षण और महिला सत्रों की व्यवस्था की गई । समाज निर्माण के ऐसे शिल्पियों की आवश्यकता थी जो अपनी परिष्कृत आत्म शक्ति से दूसरों के अन्तःकरणों को प्रकाशवान बना सकने में समर्थ एवं सफल हो सकें। इसके लिए उपयुक्त शिक्षण ब्रह्मवर्चस आरण्यक के रूप में अभी−अभी आरम्भ होने जा रहा है।
साधना में अथवा भौतिक उपाय उपचारों से विकसित अवश्य किया जा सकता है। कठिनाई यह रही है कि शोध में समर्थ, सुयोग्य एवं साधन सम्पन्न व्यक्तियों को ऐसे तथ्यों पर विश्वास नहीं हुआ जो व्यक्ति और विश्व में प्रकृति नियमों से ऊपर ही किन्हीं अलौकिक सामर्थ्यों को प्रतिपादित करते हैं। जिन्हें विश्वास था, वे शोध एवं विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकने की स्थिति में नहीं थे।
साधना से कोई भिन्न वस्तु है। उसे थोड़े−थोड़े समय की वानप्रस्थ साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।
साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।
साधनात्मक धर्मानुष्ठानों के साथ उच्चस्तरीय चरित्र−निष्ठा नितान्त आवश्यक है। इस समावेश के बिना मात्र पूजा−पाठ भर से कोई वास्तविक आत्मिक प्रगति का लाभ नहीं ले सकता। आत्म कल्याण के पथिक को चरित्रवान बनने के लिए संकल्पपूर्वक तत्पर होना चाहिए। इस प्रयास में ही आत्मोत्कर्ष की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। शास्त्र कहता है−
साधनाश्रम भी कह सकता है। थोड़े−थोड़े समय के छोटे−छोटे सत्र बना देने से ही यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षण वानप्रस्थ साधना से कोई भिन्न वस्तु है। उसे थोड़े−थोड़े समय की वानप्रस्थ साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चतुर्विधि आत्मोत्कर्ष साधना है आत्मनिर्माण और समाज निर्माण का उचित समन्वय है। अस्तु आत्मा के परमात्मा के हिस्से का लाभांश इसी पुण्य प्रयोजन में लगना चाहिए। इस सन्दर्भ में युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य का न्यूनतम अंश प्रतीक चिन्ह के रूप में आरम्भ से ही सदस्यता शर्त के रूप में निर्धारित है। एक घन्टा और दस पैसा नित्य का अनुदान अपने सम्पर्क क्षेत्र में सद्ज्ञान का आलोक फैलाने के लिए निकालने के लिए कहा जाता रहा है। जिनका इतना भी आरम्भ अभी नहीं हुआ है वे उसे आरम्भ करें ।
साधना आत्मशोधन की है। आत्म निरीक्षण, आत्म समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास की सीढ़ियाँ पार करते हुए ही जीवन लक्ष्य प्राप्ति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना सम्भव होता है।
साधना में अपने ही कुसंस्कारों का अनगढ़पन दूर करने का प्रयोजन सन्निहित है। जीवन क्रम से लोक व्यवहार की सभ्यता और व्यक्तित्व के परिष्कार की संस्कृति की समाविष्टि के लिए किये जाने वाले प्रयत्न ही आत्मोत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करते हैं। योगाभ्यास, तपश्चर्या एवं साधनात्मक धर्मानुष्ठानों के साथ उच्चस्तरीय चरित्र−निष्ठा नितान्त आवश्यक है। इस समावेश के बिना मात्र पूजा−पाठ भर से कोई वास्तविक आत्मिक प्रगति का लाभ नहीं ले सकता। आत्म कल्याण के पथिक को चरित्रवान बनने के लिए संकल्पपूर्वक तत्पर होना चाहिए।
साधना का द्वार खुलने के संदर्भ में एक प्रसंग ब्रह्म वर्चस् साधकों के लिए भी इन्हीं दिनों जुड़ रहा है। वह है कि निवृत्त लोग अपनी पत्नी समेत अधिक समय तक या सदा के लिए रहने को भी आ सकें ऐसा नया प्रबन्ध कर दिया गया है। सामान्यतया एक कमरे में एक ही साधक के रहने की परम्परा है, पर अब नई व्यवस्था के अनुसार ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में भी 16 कमरों का एक अलग प्रखण्ड बनाया गया है जिसमें पति−पत्नी साथ रह सकें एवं अपना भोजन स्वयं पका सकें।
साधना, तपश्चर्या का न्यूनतम रूप यह रहे कि साप्ताहिक व्रतशीलता का निर्वाह किया जाय। गुरुवार या अन्य कोई दिन व्रत पालन का दिन नियत रहे। उस दिन उपवास, ब्रह्मचर्य एवं मौन व्रत का किसी न किसी रूप में निर्वाह किया जाय। उपवास, शाकाहार, फलाहार या दूध, छाछ पर रखा जाता है पर वैसा न बन पड़े तो अस्वाद व्रत नमक, शकर का त्याग तो निवाहा ही जाय। उस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।
साधना की सफलता एवं सार्थकता आँकी जा सकती है।
साधना के अभ्यास करने वाले अपने अन्तरंग में भावनात्मक और बहिरंग में क्रियात्मक प्रेम तत्व की दिव्य सम्वेदनाओं का परिचय देते हैं सत्कर्मों से भरा−पूरा कर्म क्षेत्र− सद् विचारणाओं में निमग्न ज्ञान संस्थान पर ही किसी की प्रेम साधना की सफलता एवं सार्थकता आँकी जा सकती है।
साधना पर अवलम्बित है। ईश्वर के सान्निध्य में−समर्पण में जो आनन्द आता होगा उसी अनुभूति भाव भरी प्रेम सम्वेदनाओं के उभार में भली प्रकार की जा सकती है।
साधना कर सकें और थोड़ा−थोड़ा करके अपनी आत्म सम्पदा को बढ़ाने का अवसर प्राप्त कर सकें। वस्तुतः यह समय−साध्य प्रक्रिया है और अभीष्ट प्रगति के लिए अधिक समय की आवश्यकता है। दो महीने तो न्यूनतम अवधि है। इससे कम में इतने महान प्रयोजन का ताना−बाना ही खड़ा नहीं हो सकता था। इसमें और कमी की गुंजाइश थी नहीं अन्यथा थोड़ा −थोड़ा करके अधिक लोगों को−अधिक लाभ देने के सिद्धान्त को−ध्यान में रखते हुए इससे भी कम समय का शिक्षण क्रम रखे जाने की बात सोची जाती।
साधना प्रशिक्षण की सुविधाएँ तो जुटाई जा रही है, किन्तु अनुशासन एवं मर्यादाओं में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जायेगी। मर्यादाएँ नयी नहीं हैं, किन्तु परिजनों को स्मरण दिलाने के लिए उनका उल्लेख संक्षेप में यहाँ किया जा रहा है।
साधना में निरत प्रौढ़ता सम्पन्न मनस्वी या तपस्वी कहा जा सकता है।
साधना ही सर्वोपरि है। कर्मयोग और ज्ञान योग के सोपानों पर चढ़ते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रेम योग की साधना करनी पड़ती है। इसका तत्काल प्रतिफल मिलता है। जिस अनुभूति के लिए अध्यात्म शास्त्र में रस शब्द आता है−जिसके रसास्वादन से आत्मा को असीम तृप्ति होती है उसे रस कहा गया है। यह रस प्रेम रस के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
साधना पद्धति है। उसी स्थिति में निश्चिन्तता पूर्वक उसका सधना सम्भव होता है। वानप्रस्थ भारतीय गरिमा का मेरुदण्ड है। उस ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता समझी गई और तदनुरूप उपयुक्त साधनों से युक्त ब्रह्म वर्चस् बनाया गया। उसके पाठ्यक्रम में साधना क्रम में −लगभग वे ही तत्व है जो वानप्रस्थ तपश्चर्या में होते हैं।
साधना करनी पड़ती है। इसका तत्काल प्रतिफल मिलता है। जिस अनुभूति के लिए अध्यात्म शास्त्र में रस शब्द आता है−जिसके रसास्वादन से आत्मा को असीम तृप्ति होती है उसे रस कहा गया है। यह रस प्रेम रस के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। ईश्वर का साक्षात्कार अन्तःकरण से शाश्वत प्रेम का अनन्त निर्झर फूट पड़ने के रूप में ही होता है।
साधना एवं प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में विकसित हो रहा है। ऐसे व्यक्ति, जो स्वाभाविक रूप से, अपनी वैराग्य परक प्रवृत्ति के कारण गृहस्थ के जंजाल में उलझे ही नहीं है, उन्हें भी इस प्रयोग परीक्षण का लाभ उठाने का अवसर मिल सकता है। गायत्री नगर बन जाने से उन गृहस्थों के लिए भी व्यवस्था बन सकेगी, जो अभी पारिवारिक उत्तर−दायित्वों से मुक्त होने की स्थिति में नहीं है। इस प्रकार अपने विशाल परिवार के हर स्तर के व्यक्ति के प्रशिक्षण एवं विकास का मार्ग प्रशस्त होता चला जा रहा है।
साधना के लिए प्रतीक प्रतिमाओं की तरह उपकरण हो सकते हैं लक्ष्य नहीं। पति के मार जाने पर पतिव्रता के पति प्रेम में रत्ती भर भी कमी नहीं आती। शरीर न रहने या दूर रहने पर भी किसी आत्मा के साथ अति घनिष्ठता बनाये रखने में कुछ अन्तर नहीं आता। इस दृष्टि से परमात्मा का प्रेम पूर्णतया व्यावहारिक है। इसमें आत्म समर्पण ही प्रधान है।
साधना तपश्चर्या करने के लिए है । यह नया गायत्री नगर सर्वसाधारण के लिए− घर परिवार के लिए−परिष्कृत वातावरण प्रदान कर सकने के लिए उपयुक्त अनुकूल सिद्ध हो सकने जैसा बनाया, बसाया जा रहा है। इसे एक महती आवश्यकता की पूर्ति समझा जाना चाहिए। अब तक गायत्री तपोभूमि, शान्ति−कुञ्ज, ब्रह्म वर्चस् अपने−अपने ढंग से नव−निर्माण के पुण्य प्रयोजनों में उपयोगी भूमिका निभा रहे थे। इस चौथे निर्माण−गायत्री नगर से −इतनी विस्तृत एवं इतनी महत्वपूर्ण युग आवश्यकता पूरी हो सकेगी जिसकी आज तो कल्पना करना भी कठिन है।
साधनात्मक प्रयोगों से उसे विकसित कर लिया जाय तो नेत्रों की बहुत कुछ आवश्यकता उससे भी पूरी हो सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-September
साधनाओं को अथवा उपलब्धियों को भौतिक क्षेत्र से बाहर समझना भूल है। पदार्थों की सहायता से जो किया जाता है अथवा जिनकी अनुभूति मन समेत ग्यारह इन्द्रियों द्वारा होती है उन्हें अभौतिक कहने का साहस बालबुद्धि तो कर सकती है, पर तत्वदर्शन के गले उसे नहीं उतारा जा सकता। इसी प्रकार विज्ञान का उद्भव, अनुसंधान, अभिवर्धन और उपयोग में आदर्शों की तिलांजलि नहीं दी जा सकती है। इस प्रकार धर्म और विज्ञान एक ही उदर से जन्मे दो सहोदर भाइयों की तरह समझे जा सकते हैं और उनमें परस्पर सहयोग से मिलकर काम करने की पूरी गुंजाइश है। देव और दानवों के सहयोग से समुद्रमन्थन किए जाने और उनके फलस्वरूप चौदह रत्न मिलने की पौराणिक गाथा को अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए पाया जा सकता है।
साधना है।
साधना का स्वरूप है। तीनों में से एक की भी कमी अन्न, जल और वायु में से एक की कमी होने जैसा है। जीवन−यात्रा के लिये जैसे ये तीनों जरूरी हैं, जीवन साधना के लिए उसी तरह भजन, मनन, और चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।
साधना का केन्द्र बिन्दु यही है अस्तु सिद्धियों का आधार भी इस उद्देश्य के लिए किये गये पुरुषार्थ को समझा जा सकता है।
साधना यों कहने को तो ईश्वर की अभ्यर्थना भी कही जा सकती है। किन्तु उसका वास्तविक स्वरूप एक ही है अन्तरंग में अवस्थित देव मानव को जागृत, प्रखर और समर्थ बनाने की आकुलता भरी चेष्टा। साधना का केन्द्र बिन्दु यही है अस्तु सिद्धियों का आधार भी इस उद्देश्य के लिए किये गये पुरुषार्थ को समझा जा सकता है।
साधना में सम्मिलित रहने और अपने साथ एक दो नये साधक तैयार करने के लिए कहा जाय। यह प्रयास अभी से आरम्भ करने, आयोजन का स्थान निश्चित करने, साधन जुटाने, सहयोग पाने का काम अभी से प्रारम्भ किया जायगा तो ही रजत जयन्ती वर्ष की प्रथम नवरात्रि शानदार ढंग से मनाई जा सकेगी। इन दो सामयिक कार्यों में अतिरिक्त ज्ञान रथों की सुव्यवस्था, जन्म दिवसोत्सवों का प्रचलन, टोली संगठन, प्रज्ञा मन्दिरों का संस्थापन, पाँच पर्व आयोजनों का सुसंचालन जैसे गत वर्ष के निर्धारित कार्यक्रमों को अधिक उत्साह के साथ सम्पन्न करने में निरत रहा जाय। यह कार्यक्रम उन लोगों के लिए है जो अपने घर रहकर ही समय दान देंगे।
साधना को कर सके उसके लिए मरण का दिन पश्चात्ताप का नहीं वरन् अधिक सुखद परिस्थितियों के लिए विनोद यात्रा पर निकलने की तरह उत्साहवर्धक ही बन कर आता है।
साधनाएं हैं। जिनके लिए ब्राह्ममुहूर्त का अनिवार्य बन्धन नहीं। सुविधा और समय के अनुसार इसे आगे−पीछे भी किया जा सकता है पर एकान्त स्थान तथा शान्त वातावरण जरूरी है, तभी अभीष्ट परिणाम सम्भव है। आंखें बन्दकर विचार किया जाए कि हमारा शरीर मृत अवस्था में पड़ा है। प्राण रूपी हंस इसमें से निकलकर किसी ऊँचे स्थान पर बैठा है।
साधना होती है। गायक, वादक, चित्रकार मूर्तिकार, कवि और साहित्यकार भी अन्य शिल्पियों और कलाकारों की तरह तन्मयता के सहारे ही श्रेय सम्पादन करते हैं। इस विशेषता के न रहने पर समर्थ और साधन सम्पन्न व्यक्ति भी कहने लायक सफलता अर्जित नहीं कर सकता। वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्त्ताओं का कठिन कार्य उसी अनुपात से प्रगति पथ पर आगे बढ़ता है जिसे जितना उनका मन अभीष्ट प्रयोजन की गहराई तक उतरता चला जाता है। धनुष बाण की संरचना का अपना महत्व हो सकता है किन्तु लक्ष्यवेध के लिए समूचा ध्यान अभीष्ट केन्द्र पर केन्द्रित किये बिना कोई चारा नहीं।
साधना का ही अवसर उपहार प्रतीत होगा। स्नेह, सेवा, प्यार की भावनाओं से भरपूर, वातावरण वाला परिवार सम्वेदना, कोमलता नेतृत्व, सुसंचालन, सौजन्य, सद्भाव, सुव्यवस्था, सन्तुलन, समन्वय आदि योग्यताओं के विकास का माध्यम बनता है। यही गुण जीवन−समर में उच्चतर उपलब्धियों के आधार बनते हैं। सुव्यवस्थित परिवार निश्चय ही तपोवन हैं और उनके निवासियों को तपोवन में घर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं हैं।
साधना हो साधा जाय, किन्तु इतना तो ध्यान रहना ही चाहिए कि वाहनों और औजारों तक को सही रखने के लिए जब सतर्कता बरतनी पड़ती है तो शरीर की सुरक्षा की ही क्यों उपेक्षा की जानी चाहिए।
साधना द्वारा आत्म सत्ता के ब्रह्मसत्ता में विलय की अनुभूति तथा अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ब्रह्म−चेतना से ओतप्रोत अनुभव करना। दूसरी मनन द्वारा आत्मबोध अर्थात् जीवन−लक्ष्य का स्मरण, अपनी ऐन्द्रिक तृष्णाओं और आत्मिक आवश्यकताओं का अन्तर समझना। दोनों अभ्यास जितनी अधिक गहराई से किए जाएंगे तथा भावना जितनी ही प्रगाढ़ वह गहरी होगी अन्तर्ज्योति उतनी ही प्रखर−प्रदीप्त होती चली जाएगी। इससे श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ भी सरल होती जाएंगी।
साधना सत्र पूरे उत्साह के साथ मनाने की तैयारी अभी से की जाय। गत बसन्त पर्व, गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा एवं चैत्र नवरात्रि के आयोजनों में जिनने भी भाग लिया हो उन सबसे इन्हीं दिनों सम्पर्क साधा जाय। उन्हें नवरात्रि साधना में सम्मिलित रहने और अपने साथ एक दो नये साधक तैयार करने के लिए कहा जाय। यह प्रयास अभी से आरम्भ करने, आयोजन का स्थान निश्चित करने, साधन जुटाने, सहयोग पाने का काम अभी से प्रारम्भ किया जायगा तो ही रजत जयन्ती वर्ष की प्रथम नवरात्रि शानदार ढंग से मनाई जा सकेगी। इन दो सामयिक कार्यों में अतिरिक्त ज्ञान रथों की सुव्यवस्था, जन्म दिवसोत्सवों का प्रचलन, टोली संगठन, प्रज्ञा मन्दिरों का संस्थापन, पाँच पर्व आयोजनों का सुसंचालन जैसे गत वर्ष के निर्धारित कार्यक्रमों को अधिक उत्साह के साथ सम्पन्न करने में निरत रहा जाय।
साधना का आनन्द अनुदान देते हैं। रात्रि को सोते समय बिस्तर पर जाने पर दिनभर के कर्तव्यों का शक्ति एवं निष्ठा में निर्वाह करने का स्मरण किया जाय। शेष रहे कार्य तथा दायित्व ईश्वर को सौंपकर पूर्ण निश्चिन्तता के साथ अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा−मृत्यु की गोद में विश्राम किया जाय। यही ‘हर दिन नया हर जन्म, हर रात नई मृत्यु’ सूत्र पर आचरण की विधि है। यही श्रेष्ठतम साधना है।
साधना के अभ्यास के साथ ही मनन साधन भी वांछित है। ये सभी भावनात्मक साधनाएं हैं। जिनके लिए ब्राह्ममुहूर्त का अनिवार्य बन्धन नहीं। सुविधा और समय के अनुसार इसे आगे−पीछे भी किया जा सकता है पर एकान्त स्थान तथा शान्त वातावरण जरूरी है, तभी अभीष्ट परिणाम सम्भव है। आंखें बन्दकर विचार किया जाए कि हमारा शरीर मृत अवस्था में पड़ा है।
साधना में संलग्न रही और कई विश्व-विद्यालयों से स्नातकोत्तर परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने में सफल रहीं। वह कहती थीं-‘‘मुझे अपने चारों ओर सौन्दर्य ही सौन्दर्य और आनन्द ही आनन्द बिखरा दीखता है।’’
साधना, ताकि मनुज पशु-सी जिन्दगी बिता न सके ॥6॥
साधना के भाव पक्ष के तीन चरण हैं- (1) भजन (2) मनन और (3) चिन्तन। तीनों का सन्तुलन ही समग्र साधना का स्वरूप है। तीनों में से एक की भी कमी अन्न, जल और वायु में से एक की कमी होने जैसा है। जीवन−यात्रा के लिये जैसे ये तीनों जरूरी हैं, जीवन साधना के लिए उसी तरह भजन, मनन, और चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।
साधना के लिए उसी तरह भजन, मनन, और चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।
साधना में संलग्न होने की प्रेरणा दी है। फलतः युग सृजन में योगदान देने के लिए हर समर्थ-असमर्थ के चरण बढ़ रहे हैं। इस वास्तविकता का प्रमाण गिद्धों और गिलहरियों के उत्साह को देखने से भी मिल जाता है। हनुमान, अंगदों का नल और नील का पराक्रम तो सहज स्वाभाविक ही है।
साधना और जन-सम्पर्क के सहारे नव युग का सन्देश पहुँचाना यही है अपने युग की तीर्थ परम्परा का सामयिक निर्वाह उसके लिए सुनियोजित और सुविस्तृत योजना बनाई गई है। यह क्रम चला तो आरम्भ से ही है, पर इस रजत जयन्ती वर्ष से उसे सुव्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। परिव्राजकों के प्रशिक्षण, निर्वाह, मार्ग व्यय आदि का नया प्रबन्ध किया जा रहा है। इसका शुभारम्भ इसी सितम्बर के सत्र से आरम्भ होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-March
साधना का जप, केवल उसी एक प्रयोजन में लगे रहा जाय तो इसमें एक वर्ष लगेगा। यदि उस साधना के साथ ब्रह्म विद्या का आत्म विज्ञान भी सुनना समझना हो−लोक साधना का समन्वय रखना हो तो अनुमानतः तीन घण्टे ही चल सकेगा और तीन−तीन घण्टे ब्रह्म विज्ञान और सेवा साधना के लिए रखने होंगे। ऐसी दशा में दो वर्ष का समय लगेगा। यह एक पूर्ण साधना एवं प्रशिक्षण कहा जा सकता है। जिनकी स्थिति इस योग्य हो उन्हें यहीं के वातावरण में रहकर वह तपश्चर्या करनी चाहिए।
साधना रहित परिस्थितियों में विकास विस्तार की संगति बिठाने का प्रयत्न करते हैं।
साधना की, तप की और ब्रह्म प्राप्ति की सबसे बड़ी बाधा माना जाता है। किन्तु अपनी गहन तपश्चर्या द्वारा दुर्वासा शक्ति के स्वामी बन चुके थे अतएव उनका अहंकार घटा नहीं, निरन्तर बढ़ता ही गया।
साधना का खाद पानी पाकर ही साधना का कल्प वृक्ष बढ़ता और फलता फूलता है। यह तीनों ही प्रयोजनों वानप्रस्थ में सधते हैं। भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड वही है। इसी खदान में ऐसे लोकसेवी निकलते रहे हैं जो व्यक्ति को परिष्कृत और समाज को समुन्नत बना सकने में समर्थ सिद्ध हो सके। आज की साधु संस्थाओं में निठल्ले पड़े रहने, दिन काटते रहने भर की सुविधा तो है, पर वैसी परिस्थितियाँ जिन्हें अस्पताल, विद्यालय के शोध संस्थान एवं प्रयोगशाला की उपमा दी जा सके कदाचित ही कहीं मिलेगी।
साधना का उतना अंश मिला दिया गया है जो आरम्भिक साधकों को ठीक प्रकार हजम हो सके।
साधना करते थे। एक दिन वन से लौटते हुए मार्ग में उन्हें एक आहत रूपवती स्त्री पड़ी दिखाई दी। कौत्स एक क्षण इसे देखने व उसकी सहायता करने को रुके परन्तु दूसरे ही क्षण वे अपने आश्रम की ओर चल दिए।
साधना सत्रों में उच्चस्तरीय साधना एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था व्यक्ति निर्माण तथा युग परिवर्तन के उच्चस्तरीय उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए की गयी है। उसे कम समय अथवा छुट-पुट प्रयासों से पूरा नहीं किया जा सकता। परिस्थितियों से तालमेल बिठाने के लिए उसे खण्डों में विभाजित तो किया जा सकता है, किन्तु उन्हें भी एक सीमा तक छोटा किया जा सकता है। उसकी न्यूनतम अवधि दो माह रखी गयी है। उससे कम से प्रायश्चित्त, योग साधना, तपश्चर्या एवं प्रशिक्षण की धाराओं को समुचित महत्व दिया जाना सम्भव नहीं।
साधना के लिए शीत प्रधान क्षेत्र उपयुक्त बैठते हैं जलवायु की दृष्टि से वही असाधारण रूप से आरोग्यवर्धक भी है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक इस प्रदेश में जितनी उच्चस्तरीय साधनाएँ इस क्षेत्र में की हैं उसके कारण वहाँ के वातावरण में विशिष्ट अध्यात्म तत्वों की भरमार है।
साधना से विचलित कर दे अतः मैंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के आसक्ति विषय को टाल देना ही उचित समझा” महर्षि कण्व ने कौत्स को समझाया “वत्स निर्धन, दरिद्र व अकर्मण्य मनुष्य यदि यह कहे कि उसे धन−सम्पत्ति का मोह नहीं है−उसे कर्म करने, एवं परिश्रम कर धनोपार्जन में कोई रुचि नहीं तो यह उसकी त्याग वृत्ति का नहीं परन्तु उसकी अक्षमता का सूचक है। संसार में प्रवृत्त रहते हुए भी अपने धन वैभव, ज्ञान, पुत्र पौत्रों में “अलिप्त भाव” से रहना सच्ची साधना है तुम्हारी साधना की सफलता की कसौटी ही यह है कि तुम पानी में रहकर भी पानी से दूर रहो।”
साधना कराइये, तप कराइये जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।
साधना ही प्रमुख रही है।
साधनाएँ वानप्रस्थों के लिए ही अनुकूल पड़ती है। साधना के लिए लम्बा समय लौकिक उत्तरदायित्वों से पूर्ण नहीं तो आंशिक मुक्ति के बिना इस दिशा में सुनिश्चित गति सम्भव नहीं। अस्तु ब्रह्मवर्चस् साधना को प्रकारान्तर से वानप्रस्थ साधना भी कह सकते हैं। आयु की शर्त छोड़ भी दी जाय तो भी मनःस्थिति तथा परिस्थितियों की दृष्टि से वानप्रस्थ स्तर के व्यक्ति ही इसके लिए अपेक्षित है।
साधना के सर्वथा उपयुक्त संस्कारवान देवभूमि समझ लेने के उपरान्त ही इसे सृजन सैनिकों के प्रशिक्षण के लिये उपयुक्त समझा गया और उसे एक छावनी के रूप में विकसित करने का निश्चय किया गया है अन्यत्र स्थानों में व्यापक परिश्रम से भी जो सत्परिणाम उपलब्ध होने असम्भव थे वह यहाँ अल्प प्रयास से सम्भव होंगे क्योंकि यहाँ के वातावरण में चिरकाल से आच्छादि ऋषियों के विचारों के संकल्प का लाभ साधकों को मिलेगा। शान्ति कुञ्ज, ब्रह्मवर्चस और गायत्री नगर का संगम तो उसे तीर्थराज ही बनाने जा रहा है। स्वर्गीय वातावरण के अतिरिक्त दिव्य चिन्तन और युगान्तर सत्ता के प्राणवान् सत्संग का लाभ जुड़ जाने से उसकी महत्ता बहुत अधिक बढ़ गई है। जागृत आत्माओं को इस वातावरण, इस तीर्थ के पर्व स्नान की तैयारी प्रारम्भ कर देनी चाहिये।
साधना को प्रकारान्तर से वानप्रस्थ साधना भी कह सकते हैं। आयु की शर्त छोड़ भी दी जाय तो भी मनःस्थिति तथा परिस्थितियों की दृष्टि से वानप्रस्थ स्तर के व्यक्ति ही इसके लिए अपेक्षित है।
साधना तीसरेपन की इसी अवधि में ठीक तरह बन पड़ती है। बचपन का अल्हड़पन−जवानी का उन्माद−बुढ़ापे की विक्षिप्तता में अपने अपने ढंग की विषमताएँ छाई रहती हैं। साधना के लिए सन्तुलित वय वानप्रस्थ की ही है। जिस किसी ने आत्म समुद्र मन्थन से जो महत्वपूर्ण रत्न पाये हैं उसमें वानप्रस्थ स्तर की साधना ही प्रमुख रही है।
साधना एवं व्यवस्था का समन्वय कहना चाहिए। प्रशिक्षण दो महीने का हो अथवा लम्बे समय का उसमें प्रातः तीन घन्टे योगाभ्यास एवं तपश्चर्या की साधना मध्याह्न तीन घन्टे ब्रह्म विद्या, आत्म विज्ञान का स्वाध्याय सत्संग, सायंकाल तीन घन्टे लोक सेवा का प्रशिक्षण। यही तीनों क्रम निरन्तर चलते रहेंगे। गंगा की गोद, हिमालय की छाया एवं दिव्य चेतना का प्राण भरा अनुदान यही है। ये विशेषताएँ हैं जिनके आधार पर यहाँ का वातावरण ऐसा बन पड़ा है जिसमें उच्चस्तरीय साधनाओं के सफल होने की पूरी−पूरी सम्भावना बनती है।
साधना, तपश्चर्या एवं प्रशिक्षण की धाराओं को समुचित महत्व दिया जाना सम्भव नहीं।
साधना के निमित्त तितीक्षा भरा जीवन यापन करना दूसरी। दरिद्रता के साथ जुड़ी हुई हीनता व्यक्तित्व को दबोचती है। किन्तु आदर्श पालन के साथ जुड़े हुए कष्ट सहन से प्रतिभा और प्रखरता निखारने का अवसर मिलता है। प्राचीन काल में गृहस्थ ब्राह्मणों के संचालकत्व में गुरुकुल चलते थे। बौद्धिक शिक्षण ऋषि करते थे और दुलार भरा व्यवहार ऋषिकाएँ सिखाया करती थीं।
साधना तथा शिक्षा का सुअवसर प्राप्त करेंगे। वरिष्ठ वानप्रस्थ वे है जो पारिवारिक उत्तर−दायित्वों से निवृत्त होकर जीवन के उत्तरार्ध को परमार्थ साधना में लगाना चाहते हैं। उनके लिए ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में समुचित सुविधा रह सके ऐसा प्रबन्ध किया गया है। वानप्रस्थ में पत्नी समेत साधना करने की भी छूट है। साधक अपना भोजन आप बना सकें ऐसी सुविधा भी बनाई गई है।
साधनाएँ कराई जाती थीं। उन दिनों तीर्थ निवासी आज की तरह निरुद्देश्य इधर−उधर भटकते नहीं फिरते थे। वहाँ जाने के ठहरने के पीछे एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उद्देश्य रहता था। साधारणतया मानसिक स्वास्थ्य सम्वर्धन, मानसिक रुग्णता के निवारण से उसकी तुलना की जाती थी। निश्चय ही यह लाभ शारीरिक आरोग्य की तुलना में भी कहीं अधिक उच्चस्तरीय है फिर उस अवधि में सात्विक आहार−विहार व्रत उपवास एवं अन्य चिकित्सा उपचारों से स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान भी साथ−साथ ही मिल जाता है।
साधना होता है। भौतिक उत्तरदायित्व अधेड़ होने तक निपट जाने चाहिए तदुपरान्त आत्मा और परमात्मा के प्रति देश धर्म समाज और संस्कृति के प्रति जो महान जिम्मेदारियाँ मनुष्य के कन्धे पर रहती हैं उन्हें पूर्ण करना चाहिए। इसी में स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित पूर्ति होती हैं। यह जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का उचित, सरल और मध्यम मार्ग है।
साधनाओं के सफल होने की पूरी−पूरी सम्भावना बनती है।
साधना के लिए रखने होंगे। ऐसी दशा में दो वर्ष का समय लगेगा। यह एक पूर्ण साधना एवं प्रशिक्षण कहा जा सकता है। जिनकी स्थिति इस योग्य हो उन्हें यहीं के वातावरण में रहकर वह तपश्चर्या करनी चाहिए। गंगाजल पीना, गंगा स्नान, आहार सम्बन्धी विशेष प्रतिबन्धों का पालन करने वाले, नियमित प्रकाश एवं अनुदान पाने वाले यह अनुभव करेंगे कि उनकी साधना प्रगति पथ पर द्रुत गति से अग्रसर हो रही है।
साधना का कल्प वृक्ष बढ़ता और फलता फूलता है। यह तीनों ही प्रयोजनों वानप्रस्थ में सधते हैं। भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड वही है। इसी खदान में ऐसे लोकसेवी निकलते रहे हैं जो व्यक्ति को परिष्कृत और समाज को समुन्नत बना सकने में समर्थ सिद्ध हो सके। आज की साधु संस्थाओं में निठल्ले पड़े रहने, दिन काटते रहने भर की सुविधा तो है, पर वैसी परिस्थितियाँ जिन्हें अस्पताल, विद्यालय के शोध संस्थान एवं प्रयोगशाला की उपमा दी जा सके कदाचित ही कहीं मिलेगी।
साधना, आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं दिव्यानुदान प्राप्त करने का संयुक्त अवसर देने वाले इन दस दिवसीय अल्पावधि शिविरों का लाभ व्यस्त रहने वाले व्यक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं।
साधना लोक ही हुआ। सप्त ऋषियों की तपस्थली होने के कारण इस भूमि में साधना को सफल बनाने वाले सूक्ष्म तत्व पहले से ही मौजूद हैं।
साधना के लिए लम्बा समय लौकिक उत्तरदायित्वों से पूर्ण नहीं तो आंशिक मुक्ति के बिना इस दिशा में सुनिश्चित गति सम्भव नहीं। अस्तु ब्रह्मवर्चस् साधना को प्रकारान्तर से वानप्रस्थ साधना भी कह सकते हैं। आयु की शर्त छोड़ भी दी जाय तो भी मनःस्थिति तथा परिस्थितियों की दृष्टि से वानप्रस्थ स्तर के व्यक्ति ही इसके लिए अपेक्षित है।
साधना करते रहें, पर जिन्हें किसी ठोस परिणाम की अपेक्षा है, उन्हें ब्रह्म वर्चस् जैसे साधन सम्पन्न आश्रम में ही अपने सुव्यवस्थित प्रयास चलाने चाहिए।
साधना की सफलता की कसौटी ही यह है कि तुम पानी में रहकर भी पानी से दूर रहो।”
साधना सत्र और स्त्रियों के लिए कन्या सत्र और महिला सत्र चलते रहे हैं। उनमें सम्मिलित होने वाले शिक्षार्थियों की संख्या और सफलता आश्चर्यजनक है।
साधना से संगति रखता है। दो−दो महीने के शिक्षार्थी भी उतने समय तक अपने को कनिष्ठ वानप्रस्थ ही अनुभव करेंगे और उसी स्तर की साधना तथा शिक्षा का सुअवसर प्राप्त करेंगे। वरिष्ठ वानप्रस्थ वे है जो पारिवारिक उत्तर−दायित्वों से निवृत्त होकर जीवन के उत्तरार्ध को परमार्थ साधना में लगाना चाहते हैं। उनके लिए ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में समुचित सुविधा रह सके ऐसा प्रबन्ध किया गया है। वानप्रस्थ में पत्नी समेत साधना करने की भी छूट है।
साधनाएँ सामान्य रूप से गूढ़ मानी जाती हैं। सामान्य साधकों की गति उनमें होना कठिन माना जाता है। सामान्य दृष्टि से यह मान्यता गलत भी नहीं हैं। गायत्री का जप अनुष्ठान ही लोग असाधारण मानते हैं, फिर विशिष्ट योग साधनाओं का उसमें समावेश किया जाना अनोखा−सा लगता ही है। लोग समझते हैं कि इनकी मात्र जानकारी भर प्राप्त की जा सकती है, कुछ उल्लेखनीय लाभ पाना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है।
साधनाओं के विधि−विधान इसीलिए है। अध्ययन, सत्संग, मनन, चिन्ता भी इसी के अंग रहे हैं। तीर्थों के संस्कारित वातावरण में इन सभी का प्रभाव और लाभ बढ़ जाना स्वाभाविक हैं। प्रखर साधन और समुचित वातावरण का संयोग सोने में सुहाग की उक्ति चरितार्थ करता रहा है।
साधना प्रगति पथ पर द्रुत गति से अग्रसर हो रही है। ब्रह्म वर्चस् का निर्माण जिन दिव्य शक्तियों ने जिस दिव्य प्रयोजन के लिए कराया है वे इस बात के लिए सजग रहेंगी कि उनकी इस प्रयोगशाला में वो उत्पादन हो उसकी क्वालिटी घटिया न रहे। घटियापन में उत्पादित सामग्री से उत्पादन कर्त्ता और कारखाने की सम्मिलित रूप से बदनामी होती है। सामान्य मनुष्य असफलता और बदनामी से बचना चाहते हैं तो ब्रह्म वर्चस् के सूत्र संचालक ही क्यों अपने सिर यह अपयश आने देंगे।
साधना का चुचुडडडड प्रवेश होकर हीन रह जाय, वरन् उसे उपयुक्त वातावरण, उपयुक्त, मार्गदर्शन, उपयुक्त अनुदान के सहारे अधिक परिपक्व होने का अवसर मिले। माँग उचित और आवश्यक समझी गई। तदनुसार नई व्यवस्था यह बनी है कि दो−दो महीने के ब्रह्म वर्चस् सत्र तो यथा समय चलते ही रहेंगे। व्यस्त लोगों को थोड़ा−थोड़ा करके प्रकाश पाते रहने का लाभ उनसे भी मिलता रहेगा, पर जो लोग अधिक समय ठहरना चाहेंगे उनके लिए व्यवस्था बनी रहेगी।
साधना” कहते हैं भले ही, आत्म सत्ता अशरीरी अतीन्द्रिय चैतन्य मन से भी परे हो पर अन्ततः वह अपने भौतिक शरीर में भी तो निवास करती है। दूर के देव−दर्शन दुर्लभ हो सकते हैं। किन्तु अपने ही भीतर बैठे अधिदेव की प्राप्ति असम्भव कैसे हो सकती है? ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, प्राणायाम, मनोलय आदि यौगिक क्रियाओं से क्रमशः शरीर की चंचलता पर विजय, मन की एकाग्रता, प्राणों पर नियन्त्रण करते हुए अपन अहंकार उसी तत्व में घुल जाता है और “तत्वमसि” अर्थात् जो तत्व वह है वही मैं हूँ के रूप में विकसित हो जाता है।
साधना की पाँच धाराएँ ध्यान, प्राणायाम, त्राटक, नाद एवं मुद्रा आदि को भी जोड़कर रखा जाता है। साधक के स्तर के अनुरूप उसे इन धाराओं के विभिन्न स्तरों का निर्देश देने की व्यवस्था रखी जाती हैं। गायत्री की पंचमुखी उपासना पंचकोष अनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया योग की इन्हीं धाराओं के विभिन्न प्रकार के संयोगों प्रयोगों से सम्भव है।
साधना के सूत्रों को जीवन में उतारने का व्यवस्थित अभ्यास भी उसी के अनुरूप होना आवश्यक है, अन्यथा इच्छा और ज्ञान होते हुए भी कुछ करना सम्भव नहीं होगा।
साधना जिन्हें पर्याप्त अनुभव है। साधना में थोड़ी ही देर में जिनका चित्त उचटने लगे, गम्भीर अध्ययन एवं चिंतन से जो पल्ला बचाकर चलना चाहें, साधना काल में जिनका मन सांसारिक आकर्षण अथवा उत्तरदायित्वों की ओर भाग−भागकर जाये, उन्हें इस प्रक्रिया का समुचित लाभ मिलना शायद ही सम्भव हो।
साधना को भी मानसिक रुग्णता से परित्राण अथवा व्यायामशाला के सहारे स्वास्थ्य सम्वर्धन जैसा प्रयास माना जा सकता है। उसके लिए आवश्यक सहयोग एवं साधनों की सुविधा चाहिए ही। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में उसी प्रकार की सुविधाएँ जुटाई गई हैं जिस प्रकार कि अस्पतालों, सैनेटोरियमों एवं शोध संस्थानों में होती हैं। उपयुक्त संरक्षण एवं वातावरण में रहने पर जो लाभ मिल सकता है वह घरेलू अस्त−व्यस्तता के बीच रहते हुए मिल सकना सम्भव नहीं हैं। गंगा की गोद, हिमालय की छाया का समन्वय एक प्रकार के साधना लोक ही हुआ।
साधना को सफल बनाने वाले सूक्ष्म तत्व पहले से ही मौजूद हैं।
साधनाएँ इस क्षेत्र में की हैं उसके कारण वहाँ के वातावरण में विशिष्ट अध्यात्म तत्वों की भरमार है।
साधना और लोक साधना का खाद पानी पाकर ही साधना का कल्प वृक्ष बढ़ता और फलता फूलता है। यह तीनों ही प्रयोजनों वानप्रस्थ में सधते हैं। भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड वही है। इसी खदान में ऐसे लोकसेवी निकलते रहे हैं जो व्यक्ति को परिष्कृत और समाज को समुन्नत बना सकने में समर्थ सिद्ध हो सके। आज की साधु संस्थाओं में निठल्ले पड़े रहने, दिन काटते रहने भर की सुविधा तो है, पर वैसी परिस्थितियाँ जिन्हें अस्पताल, विद्यालय के शोध संस्थान एवं प्रयोगशाला की उपमा दी जा सके कदाचित ही कहीं मिलेगी।
साधना सत्रों की तुलना प्राचीन काल की तीर्थ यात्रा एवं तीर्थ निवास प्रक्रिया के साथ करनी चाहिए। उन सत्रों में सभी शिक्षार्थियों को नौ दिन का एक गायत्री अनुष्ठान करना होता है। साथ में ब्रह्म वर्चस् साधना से सम्बन्धित विशिष्ठ ध्यान धारणा का अभ्यास कराया जाता है। सोऽहम् का हंस योग−खेचरी मुद्रा का सोम पान, त्राटक द्वारा तृतीय नेत्र उन्मीलन की तीन साधनाएँ जप और ध्यान के अतिरिक्त हैं। इस प्रकार इन छोटे साधना सत्रों में भी ब्रह्म वर्चस् की उच्चस्तरीय साधना का उतना अंश मिला दिया गया है जो आरम्भिक साधकों को ठीक प्रकार हजम हो सके।
साधना करते हुए ब्रह्म लोक गये। वशिष्ठ जी का स्थान वशिष्ठ गुफा के रूप में अभी भी विद्यमान है। इस क्षेत्र में ही देव प्रयोग में राम, लक्ष्मण झूला में लक्ष्मण, ऋषिकेश में भरत, मुनि की रेती में शत्रुघन के तप कुटीर थे।
साधना में जीवन को पवित्र और परमार्थ परायण भी बनाना पड़ता है। आत्म साधना और लोक साधना का खाद पानी पाकर ही साधना का कल्प वृक्ष बढ़ता और फलता फूलता है। यह तीनों ही प्रयोजनों वानप्रस्थ में सधते हैं। भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड वही है। इसी खदान में ऐसे लोकसेवी निकलते रहे हैं जो व्यक्ति को परिष्कृत और समाज को समुन्नत बना सकने में समर्थ सिद्ध हो सके।
साधनात्मक नियमों के अतिरिक्त ब्रह्म विज्ञान एवं सेवा साधना के अभ्यास क्रम की व्यवस्था एवं रूपरेखा आदर्श वानप्रस्थ के अनुरूप ही बनायी गयी है। जीवन की अगणित धाराओं को माया के भूल भटकाव से बचाकर बनाने के लिए किसे कब किन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए यह जाने बिना वानप्रस्थ स्तर के उत्तरदायित्व पूरे नहीं किये जा सकते। सेवा साधना के सूत्रों को जीवन में उतारने का व्यवस्थित अभ्यास भी उसी के अनुरूप होना आवश्यक है, अन्यथा इच्छा और ज्ञान होते हुए भी कुछ करना सम्भव नहीं होगा।
साधना के अभ्यास क्रम की व्यवस्था एवं रूपरेखा आदर्श वानप्रस्थ के अनुरूप ही बनायी गयी है। जीवन की अगणित धाराओं को माया के भूल भटकाव से बचाकर बनाने के लिए किसे कब किन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए यह जाने बिना वानप्रस्थ स्तर के उत्तरदायित्व पूरे नहीं किये जा सकते। सेवा साधना के सूत्रों को जीवन में उतारने का व्यवस्थित अभ्यास भी उसी के अनुरूप होना आवश्यक है, अन्यथा इच्छा और ज्ञान होते हुए भी कुछ करना सम्भव नहीं होगा।
साधना इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि हैं। एकाग्रता से शक्ति उत्पादन के अगणित प्रमाण आये दिन देखे जाते हैं। आतिशी शीशे पर सूर्य ताप का केन्द्रीकरण−भाप के धक्के से इंजन का चलना, बन्दूक के छेद से बारूद का विस्फोटक हो उठना जैसे उदाहरण हमें एकाग्रता की शक्ति का परिचय देते हैं। मस्तिष्क संस्थान में अगणित विद्युत प्रवाह उठते और बहते रहते हैं। इन्हें केन्द्रित करके मनःक्षेत्र को सुविकसित करने में नियोजित कर लिया जाय तो चिन्तन चेतना का असाधारण परिष्कार हो सकता है और हम सहज ही मनोबल सम्पन्न बन सकते हैं।
साधना सत्रों में भी ब्रह्म वर्चस् की उच्चस्तरीय साधना का उतना अंश मिला दिया गया है जो आरम्भिक साधकों को ठीक प्रकार हजम हो सके।
साधना सत्रों में इन दोनों ही प्रक्रियाओं का लाभ साधकों को मिलता रहा है तथा अब और भी अधिक प्रखरता से मिल सकेगा। व्यक्ति अपनी वृत्तियों को मात्र इतना नियन्त्रित कर ले कि प्राप्त अनुदानों को उपयोग ईश्वरीय मर्यादा के अनुकूल ही करे, उन्हें प्रतिकूल दिशा में न जाने दे, तो उसे प्रचुर शक्ति अनुदान मिलते देखा गया है। तीर्थवास, योग साधना, आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं दिव्यानुदान प्राप्त करने का संयुक्त अवसर देने वाले इन दस दिवसीय अल्पावधि शिविरों का लाभ व्यस्त रहने वाले व्यक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं।
साधना किया करते थे। बालजाक को रात में पपीहे का स्वर सुनने को मिल जाता तो वे एक तरह साहित्य साधना में समाधि ही लगा जाते। भावना शील व्यक्तियों ने सदैव ही जीवों से प्रेरणायें पाई हैं। प्रातःकाल उनका चहचहाना, सायंकाल ढलते हुये सूर्य का चंदन करना देख कर हृदय उमड़ने लगता है। यदि मनुष्य ने अपना जीवन कृत्रिम नहीं बनाया होता उसने भी इनकी तरह अपने को बंधन मुक्त रखा होता तो उसका जीवन भी कितना रसमय रहा होता यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है।
साधना कर सकें।
साधना भी कह सकते हैं। आयु की शर्त छोड़ भी दी जाय तो भी मनःस्थिति तथा परिस्थितियों की दृष्टि से वानप्रस्थ स्तर के व्यक्ति ही इसके लिए अपेक्षित है।
साधना एवं प्रशिक्षण कहा जा सकता है। जिनकी स्थिति इस योग्य हो उन्हें यहीं के वातावरण में रहकर वह तपश्चर्या करनी चाहिए। गंगाजल पीना, गंगा स्नान, आहार सम्बन्धी विशेष प्रतिबन्धों का पालन करने वाले, नियमित प्रकाश एवं अनुदान पाने वाले यह अनुभव करेंगे कि उनकी साधना प्रगति पथ पर द्रुत गति से अग्रसर हो रही है। ब्रह्म वर्चस् का निर्माण जिन दिव्य शक्तियों ने जिस दिव्य प्रयोजन के लिए कराया है वे इस बात के लिए सजग रहेंगी कि उनकी इस प्रयोगशाला में वो उत्पादन हो उसकी क्वालिटी घटिया न रहे। घटियापन में उत्पादित सामग्री से उत्पादन कर्त्ता और कारखाने की सम्मिलित रूप से बदनामी होती है।
साधना का रूप दिया जाये तो इसके माध्यम से सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों का भी प्रदर्शन संभव है। जैसा कि भारतीय नृत्यों की शैली से स्पष्ट है।
साधना है तुम्हारी साधना की सफलता की कसौटी ही यह है कि तुम पानी में रहकर भी पानी से दूर रहो।”
साधना क्षेत्र में तीव्र गति से आगे बढ़ते देखकर इस सिद्धान्त पर बरवश विश्वास करना पड़ता है।
साधना सत्रों में मिलने वाला एक विशेष लाभ और भी है जिसकी महत्ता हर भारतवासी समझता है तथा जिसे पाने के लिए लालायित रहता है। वह है अनुभवी मार्गदर्शन, समर्थ, संरक्षण तथा सान्निध्य।
साधना करता है। कष्ट निवारण−परिपोषण, मार्गदर्शन, परामर्श जैसे उद्देश्यों के लिए इस शक्ति का जिस पर प्रयोग किया जाता है वह लाभान्वित होता है। इसे माता द्वारा बच्चे को दूध पिलाने अथवा सम्पन्नों द्वारा जरूरतमन्दों की सहायता करने से समतुल्य कहा जा सकता है। मनुष्य की संचित सम्पदा से धन, बल, बुद्धि, प्रतिभा आदि की ही तरह एक महत्वपूर्ण सामर्थ्य प्राण शक्ति भी है। इसे अपनी प्रगति और दूसरों की भलाई के लिए अच्छी तरह प्रयुक्त किया जा सकता है।
साधना अभ्यास का अवसर मिलता था। उसमें स्थिति के परिवर्तन का समुचित अवसर मिलता था। लोग जिस स्थिति में जाते थे उसकी तुलना में अपना बाहरी और भीतरी स्वरूप बहुत कुछ बदल कर ही आते थे।
साधना मध्याह्न तीन घन्टे ब्रह्म विद्या, आत्म विज्ञान का स्वाध्याय सत्संग, सायंकाल तीन घन्टे लोक सेवा का प्रशिक्षण। यही तीनों क्रम निरन्तर चलते रहेंगे। गंगा की गोद, हिमालय की छाया एवं दिव्य चेतना का प्राण भरा अनुदान यही है। ये विशेषताएँ हैं जिनके आधार पर यहाँ का वातावरण ऐसा बन पड़ा है जिसमें उच्चस्तरीय साधनाओं के सफल होने की पूरी−पूरी सम्भावना बनती है।
साधना करने वाले हर साधक को सहज ही प्राप्त होता रह सकता है।
साधना करने की भी छूट है। साधक अपना भोजन आप बना सकें ऐसी सुविधा भी बनाई गई है। फिलहाल इस प्रकार के लोगों के लिए 16 कक्ष अलग से बने हैं जिनमें पति−पत्नी सुविधा पूर्वक रहकर आत्म−कल्याण की साधना कर सकें।
साधनाओं से बड़ी मात्रा में सम्भव है ही, उसका अनुदान, संचार, हस्तांतरण भी अध्यात्म जगत का एक सर्वमान्य तथ्य है। प्रस्तुत 10 दिवसीय साधना सत्रों में इन दोनों ही प्रक्रियाओं का लाभ साधकों को मिलता रहा है तथा अब और भी अधिक प्रखरता से मिल सकेगा। व्यक्ति अपनी वृत्तियों को मात्र इतना नियन्त्रित कर ले कि प्राप्त अनुदानों को उपयोग ईश्वरीय मर्यादा के अनुकूल ही करे, उन्हें प्रतिकूल दिशा में न जाने दे, तो उसे प्रचुर शक्ति अनुदान मिलते देखा गया है। तीर्थवास, योग साधना, आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं दिव्यानुदान प्राप्त करने का संयुक्त अवसर देने वाले इन दस दिवसीय अल्पावधि शिविरों का लाभ व्यस्त रहने वाले व्यक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं।
साधना में लगाना चाहते हैं। उनके लिए ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में समुचित सुविधा रह सके ऐसा प्रबन्ध किया गया है। वानप्रस्थ में पत्नी समेत साधना करने की भी छूट है। साधक अपना भोजन आप बना सकें ऐसी सुविधा भी बनाई गई है। फिलहाल इस प्रकार के लोगों के लिए 16 कक्ष अलग से बने हैं जिनमें पति−पत्नी सुविधा पूर्वक रहकर आत्म−कल्याण की साधना कर सकें।
साधनात्मक प्रयोगों, चेतना के आह्वान आकर्षण की विशिष्ट शैलियों से उसे जागृत तीर्थ के रूप में विकसित किया गया है। उसका लाभ वहाँ सत् प्रयोजन से साधना करने वाले हर साधक को सहज ही प्राप्त होता रह सकता है।
साधनाओं का उसमें समावेश किया जाना अनोखा−सा लगता ही है। लोग समझते हैं कि इनकी मात्र जानकारी भर प्राप्त की जा सकती है, कुछ उल्लेखनीय लाभ पाना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है। किन्तु अभ्यास तथा वातावरण के संयोग से अन्तःकरण को प्रभावित करने के विज्ञान की जानकारी जिन्हें हैं उनकी मान्यता भिन्न होती हैं।
साधना करने और घर रहकर किसी प्रकार पहिया घुमाते रहने से अस्पताल की भरती और चलती फिरती चिकित्सा जैसा अन्तर रहेगा। जो सफलता मिलने में अन्यत्र दस वर्ष लगेंगे। उसे इस उपयुक्त वातावरण में दो वर्ष में भी पूरा किया जा सकेगा।
साधनात्मक प्रयोगों का प्रचलन रहा है। जप, तप, ध्यान तथा अन्य योग साधनाओं के विधि−विधान इसीलिए है। अध्ययन, सत्संग, मनन, चिन्ता भी इसी के अंग रहे हैं। तीर्थों के संस्कारित वातावरण में इन सभी का प्रभाव और लाभ बढ़ जाना स्वाभाविक हैं। प्रखर साधन और समुचित वातावरण का संयोग सोने में सुहाग की उक्ति चरितार्थ करता रहा है।
साधना का समन्वय रखना हो तो अनुमानतः तीन घण्टे ही चल सकेगा और तीन−तीन घण्टे ब्रह्म विज्ञान और सेवा साधना के लिए रखने होंगे। ऐसी दशा में दो वर्ष का समय लगेगा। यह एक पूर्ण साधना एवं प्रशिक्षण कहा जा सकता है। जिनकी स्थिति इस योग्य हो उन्हें यहीं के वातावरण में रहकर वह तपश्चर्या करनी चाहिए। गंगाजल पीना, गंगा स्नान, आहार सम्बन्धी विशेष प्रतिबन्धों का पालन करने वाले, नियमित प्रकाश एवं अनुदान पाने वाले यह अनुभव करेंगे कि उनकी साधना प्रगति पथ पर द्रुत गति से अग्रसर हो रही है।
साधना काल में जिनका मन सांसारिक आकर्षण अथवा उत्तरदायित्वों की ओर भाग−भागकर जाये, उन्हें इस प्रक्रिया का समुचित लाभ मिलना शायद ही सम्भव हो।
साधना से सम्बन्धित विशिष्ठ ध्यान धारणा का अभ्यास कराया जाता है। सोऽहम् का हंस योग−खेचरी मुद्रा का सोम पान, त्राटक द्वारा तृतीय नेत्र उन्मीलन की तीन साधनाएँ जप और ध्यान के अतिरिक्त हैं। इस प्रकार इन छोटे साधना सत्रों में भी ब्रह्म वर्चस् की उच्चस्तरीय साधना का उतना अंश मिला दिया गया है जो आरम्भिक साधकों को ठीक प्रकार हजम हो सके।
साधना आयोजन होने चाहिए। चैत्र की नवरात्रि 8 अप्रैल से 16 अप्रैल तक है। तैयारी अभी से आरम्भ की जानी चाहिए।
साधनाएँ जप और ध्यान के अतिरिक्त हैं। इस प्रकार इन छोटे साधना सत्रों में भी ब्रह्म वर्चस् की उच्चस्तरीय साधना का उतना अंश मिला दिया गया है जो आरम्भिक साधकों को ठीक प्रकार हजम हो सके।
साधना के लिए सन्तुलित वय वानप्रस्थ की ही है। जिस किसी ने आत्म समुद्र मन्थन से जो महत्वपूर्ण रत्न पाये हैं उसमें वानप्रस्थ स्तर की साधना ही प्रमुख रही है।
साधनाओं के पुण्य स्वरूप हो सकती है किन्तु सर्वसाधारण उसका लाभ नहीं ले सकता इस लिये भारतीय तत्वदर्शियों ने क्रिया विज्ञान की खोज की जिसे “योग साधना” कहते हैं भले ही, आत्म सत्ता अशरीरी अतीन्द्रिय चैतन्य मन से भी परे हो पर अन्ततः वह अपने भौतिक शरीर में भी तो निवास करती है। दूर के देव−दर्शन दुर्लभ हो सकते हैं। किन्तु अपने ही भीतर बैठे अधिदेव की प्राप्ति असम्भव कैसे हो सकती है? ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, प्राणायाम, मनोलय आदि यौगिक क्रियाओं से क्रमशः शरीर की चंचलता पर विजय, मन की एकाग्रता, प्राणों पर नियन्त्रण करते हुए अपन अहंकार उसी तत्व में घुल जाता है और “तत्वमसि” अर्थात् जो तत्व वह है वही मैं हूँ के रूप में विकसित हो जाता है।
साधना के साथ ब्रह्म विद्या का आत्म विज्ञान भी सुनना समझना हो−लोक साधना का समन्वय रखना हो तो अनुमानतः तीन घण्टे ही चल सकेगा और तीन−तीन घण्टे ब्रह्म विज्ञान और सेवा साधना के लिए रखने होंगे। ऐसी दशा में दो वर्ष का समय लगेगा। यह एक पूर्ण साधना एवं प्रशिक्षण कहा जा सकता है। जिनकी स्थिति इस योग्य हो उन्हें यहीं के वातावरण में रहकर वह तपश्चर्या करनी चाहिए। गंगाजल पीना, गंगा स्नान, आहार सम्बन्धी विशेष प्रतिबन्धों का पालन करने वाले, नियमित प्रकाश एवं अनुदान पाने वाले यह अनुभव करेंगे कि उनकी साधना प्रगति पथ पर द्रुत गति से अग्रसर हो रही है।
साधना एवं तीर्थ वास के द्वारा अन्तःकरण को विशेष संस्कारों में रंगने की विशेष उद्देश्य ही सामने रहता था। जानकारियों का महत्व उस दृष्टि से उतना अधिक नहीं है। सिद्धान्तों की जानकारी तो सभी को जाती है, किन्तु अभ्यास तथा वातावरण के प्रभाव से बने हुए संस्कार अपना अलग ही महत्व रखते हैं। कुछ उदाहरणों से यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आ सकती है।
साधना एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था व्यक्ति निर्माण तथा युग परिवर्तन के उच्चस्तरीय उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए की गयी है। उसे कम समय अथवा छुट-पुट प्रयासों से पूरा नहीं किया जा सकता। परिस्थितियों से तालमेल बिठाने के लिए उसे खण्डों में विभाजित तो किया जा सकता है, किन्तु उन्हें भी एक सीमा तक छोटा किया जा सकता है। उसकी न्यूनतम अवधि दो माह रखी गयी है। उससे कम से प्रायश्चित्त, योग साधना, तपश्चर्या एवं प्रशिक्षण की धाराओं को समुचित महत्व दिया जाना सम्भव नहीं।
साधना कराते तथा सत्संग का लाभ पहुँचाते हैं।
साधना में थोड़ी ही देर में जिनका चित्त उचटने लगे, गम्भीर अध्ययन एवं चिंतन से जो पल्ला बचाकर चलना चाहें, साधना काल में जिनका मन सांसारिक आकर्षण अथवा उत्तरदायित्वों की ओर भाग−भागकर जाये, उन्हें इस प्रक्रिया का समुचित लाभ मिलना शायद ही सम्भव हो।
साधना में समाधि ही लगा जाते। भावना शील व्यक्तियों ने सदैव ही जीवों से प्रेरणायें पाई हैं। प्रातःकाल उनका चहचहाना, सायंकाल ढलते हुये सूर्य का चंदन करना देख कर हृदय उमड़ने लगता है। यदि मनुष्य ने अपना जीवन कृत्रिम नहीं बनाया होता उसने भी इनकी तरह अपने को बंधन मुक्त रखा होता तो उसका जीवन भी कितना रसमय रहा होता यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है।
साधना एवं उसकी सफलता के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसके लिए उपयुक्त वातावरण, मार्गदर्शन, संरक्षण एवं वातावरण की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है। वह न मिले तो किये हुए श्रम और प्रयास का सत्परिणाम संदिग्ध ही बना रहेगा। कुशल चिकित्सक के परामर्श बिना मनमाना इलाज यदि रोगी स्वयं ही करने लगे तो बात बनेगी नहीं। औषधि एवं तथ्य जुटाने के लिए भी दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-April
साधना’ की आवश्यकता पड़ती है। इस तप−साधना में ‘परावाक्’ शक्ति का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है।
साधना को इसी स्तर की बुद्धिमत्ता समझा जाना चाहिए।
साधनाएँ जीवन समुद्र में से उच्चस्तरीय विभूतियाँ उत्पन्न करती हैं और उनकी वर्षा से सर्वत्र सुख−शान्ति एवं प्रगति का वातावरण बनता है।
साधना, विज्ञान, कला, वैभव, व्यापार और उदात्त संस्कृति का सम्मान प्रदर्शित है। प्रथम शती इस चित्र में भारत व रोम के व्यापार का दिग्दर्शन है। भारत माता के शीर्ष पर गन्धमुकुट, जो यहाँ के औषधि ज्ञान का प्रतीक है। सिर में गन्ने के दो टुकड़े बीधे हैं जिससे यह बताया गया है कि गन्ने की कृषि भारतवर्ष की देन है। मलमली साड़ी और रोम के सोने का व्यापार जगत विदित है।
साधना में ‘परावाक्’ शक्ति का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है।
साधना प्राणवान बनती है इस रहस्य को यदि समझा और अपनाया जा सके तो किसी को भी इस क्षेत्र में निराश न रहना पड़े।
साधना कर सकने का साहस जुटायें।
साधना के लिए जितने तत्पर रहे, उतना ही उन्होंने लोक सेवा में भी रस लिया है। सत्परम्पराओं की स्थापना ने पीड़ितों सहायता एवं छोटों को बड़ा बनाने में भी भरपूर प्रयास किया है।
साधना के रूप में ही अपनाये हुए हूँ।”
साधना का ताल−मेल बिठाने की दृष्टि से किये जाते हैं।
साधना की जाय। जिसकी रहस्यमय क्षमता पर गहन श्रद्धा हो तथा जिसका अनावश्यक विज्ञापन न करके गोपनीय रखा जाय वे प्रयोग मन्त्राराधन की आवश्यकता पूरी करते हैं।
साधना के प्रति श्रद्धा−विश्वास की कमी न हो। यह सभी बातें जहाँ ठीक प्रकार प्रयुक्त हुई होंगी। वहाँ आराधना का प्रतिफल निश्चित रूप से दृष्टिगोचर हो रहा होगा। उपासना के आधारों का स्तर गिर जाने से ही उसकी सफलता संदिग्ध होती चली जाती है।
साधना में तप तितीक्षा का स्थान मुख्य है। गरम करने से छिपी सामर्थ्य उभरती हैं। भौतिक जगत में इसी अवलम्बन को अपनाया जाता है। मिट्टी गरम होने पर पत्थर बनती है। पानी भाप के रूप में शक्तिशाली होता है।
साधना कहते हैं।
साधना बताइये जिससे मैं भी आप जितना ही सुन्दर हो जाऊँ, ऐसी ही तेजस्विता मुझमें भी आ जाये, आप जैसा नवयौवन मुझमें भी फूट पड़े, जिस दिन यह हो जायेगा, उस दिन मैं आपके धर्म का संसार भर में प्रचार करूंगा, जब तक मेरे पास उक्त आकर्षण नहीं लोग मेरी बात क्यों कर सुनेंगे?
साधना से ही मिलती है। बालकों के आहार, वातावरण, पोषण आदि की समान सुविधायें होने पर भी बौद्धिक असमानता इन्हीं भारतीय मान्यताओं की समर्थक हैं।
साधनाएँ उसी उद्देश्य के लिए की जाती हैं। अनुग्रह के लिए किसी के आगे गिड़गिड़ाने, मनुहार करने को नहीं, आत्म जागरण एवं आत्म−परिष्कार को ही साधना कहते हैं।
साधनाओं की भी प्रामाणिकता सिद्ध होती है। चिन्तन के सूक्ष्मतम होने से ज्ञान चेतना के कोश परस्पर जुड़ते हुए चले जाते हैं और सामान्य मस्तिष्क जो सन्देश, प्रेरणायें अनुभूतियाँ नहीं ग्रहण कर पाते उनके लिये सुलभ हो जाती हैं। सर आलिवर लाज ने भी अपनी बौद्धिक क्षमतायें इसी आधार पर विकसित की थीं और यह माना था हमारी ज्ञान चेतना पदार्थ जन्म न होकर विराट चेतना का ही एक अंश और अंग है। जब तक इस बात को नहीं समझते तब तक हमारे दृष्टिकोण भी भौतिकतावादी बने रहते हैं। तब पाप−पुण्य में कोई अन्तर ही नहीं रहता, नैतिकता का कोई अर्थ ही नहीं होता।
साधना के समतुल्य ही प्रभावोत्पादक होता है।
साधना का उद्देश्य पूरा करता है। सुविधाजनक प्रवाहों में बहते हुए जीवन ऐसे ही निरर्थक व्यतीत हो जाता है। अवरोध उसमें शक्ति भरते हैं। पानी को बाँध में रोक कर उसे छोटी धारा में गिराने से बिजली घर बनते हैं। कितने ही कल कारखाने चलते हैं।
साधना का क्रम मार्गदर्शकों की देख−रेख में धीरे−धीरे बढ़ाया जाता है। शारीरिक अभ्यास, उपवास आदि से ही उच्च क्षमतायें विकसित होती हैं। योगियों पर कोई स्नायविक दबाव नहीं पड़ता, कोई बीमारी नहीं होती। अतएव सूक्ष्म विचारों की महत्ता के साथ−साथ योग साधनाओं की भी प्रामाणिकता सिद्ध होती है। चिन्तन के सूक्ष्मतम होने से ज्ञान चेतना के कोश परस्पर जुड़ते हुए चले जाते हैं और सामान्य मस्तिष्क जो सन्देश, प्रेरणायें अनुभूतियाँ नहीं ग्रहण कर पाते उनके लिये सुलभ हो जाती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-January
साधना के अकिंचन जैसे उपकरण भर हैं। बिना ज्ञान वाला निष्कर्ष, निकालने वाले के वे उपकरण जो सांकेतिक सूचना देते हैं, उतने से किसी तथ्य का पता नहीं चलता। अन्तरिक्षीय सूचनाएँ संकेत रूप से ही प्राप्त होती हैं। उनकी व्याख्या बुद्धिमत्ता पूर्वक करने के उपरान्त ही उपलब्ध सूचनाओं का कुछ सही अर्थ निकलता है।
साधना से भी यह संभव है और उन परा मनोविज्ञानी प्रयोगों से भी जो इस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा इन्हीं दिनों अपनाये जा रहे हैं।
साधना रुचि परिवर्तन की प्रवृत्ति को उकसाने से आरंभ होती है। इस संदर्भ में महर्षि पातंजलि का कथन है।
साधना का उद्देश्य पूर्ण होता है। इनमें से एकाध का ही उपयोग किया जाय तो बात अधूरी रह जाएगी और विचार शक्ति का जो लाभ मिलना चाहिए वह मिल न सकेगा।
साधना से ही वह सब प्राप्त हो सकता है, जिसे जीवन का लक्ष्य और वरदान कहा गया है।
साधनात्मक बनाकर ही पाया जा सकता है।
साधना प्रयोजनों का अवलम्बन आरंभ होता है।
साधना के लिए कुछ लोग भागते हैं। इसके लिए उनकी पूर्व तैयारी तो होती नहीं। जो उत्साह होता है वह भी श्रद्धाजन्य नहीं-जीवन संग्राम की भयंकरता से डरकर कहीं छिपने की पलायनवादी मनोवृत्ति से उत्पन्न हुआ होता है। उसमें न श्रद्धा होती है, और न गहराई। फलतः मन वहाँ भी नहीं लगता।
साधना में लगाया जाय और उसका सत्परिणाम वैसा ही पाया जाय जैसा कि प्रातः स्मरणीय-लोकश्रद्धा के भाजन, विश्व के मार्ग-दर्शक महामानव प्राप्त करते रहे हैं। सुख-शान्ति की आकाँक्षा आन्तरिक उत्कृष्टता के सहारे ही पूरी होती है। साधनों की मृग तृष्णा में भटकने से थकान और खीज ही पल्ले पड़ती है। कस्तूरी का मृग चैन तभी पाता है जब वह सुगन्ध का स्त्रोत अपनी नाभि में होने की जानकारी पा लेता है। सच्ची समृद्धि उत्कृष्ट मनःस्थिति है उसी के आधार पर अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं।
साधनाओं में नियोजित किया जाता है। सबसे ऊँची स्थिति भाव सम्वेदनाओं के उभार उल्लास की है। इसी में भक्तियोग बन पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु-वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता इसी आत्म विश्वास की स्थिति में हृदयंगम हो पाती है। सब हमारे-हम सबके की उच्च मनोभूमि बन पड़ने पर मनुष्य साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, लोकसेवी की तरह आचरण करता है उसका ‘अहम्’ विस्तृत होते-होते ‘त्वम्’ बन जाता है।
साधना करनी पड़ती है। अंडे सेने के लिए आवश्यक ताप तथा मादा की सुरक्षा के लिए वह जिस खोल में रहती है नर उसका मुँह बिल्कुल बंद कर देता है, उतना ही खुला रखता है जिससे चोंच भर बाहर निकल सके। बस इसी से नर अपनी मादा को खिलाता-पिलाता रहता है।
साधना के लिए लगाते रहने में व्यस्त या निर्धन व्यक्ति को भी कठिनाई अनुभव न होती।
साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा।
साधना द्वारा कुसंस्कारों का उन्मूलन और सुसंस्कारों का संस्थापन किया जाता है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा विवेक बुद्धि परिष्कृत होती है और इन्द्रियनिग्रह द्वारा मन चले मन को सत्संकल्प करने वाले उपयोगी चित्र गढ़ने वाला बनाया जाता है। यही है आत्म-साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा।
साधनाओं का उद्देश्य इस चित्त की दिशा धारा मोड़ने, मरोड़ने, भुलाने, सिखाने का अति महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करके व्यक्तित्व का निर्माण करना ही होता है।
साधना की रहस्यमय विद्याएं और सिद्धियाँ खोज निकाली गई थी, उससे कम मनोयोग प्रकृति की अद्भुत क्षमताओं का पता चलाने और मानवी उपयोग में लाने के प्रयत्नों में भी नहीं लगा है। अणु के अन्तराल की रहस्यमय परतों पर से पर्दा उठाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि आत्मा पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों को हटाने में योगियों को कराना पड़ा है।
साधना नहीं ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ का महामंत्र इसी तथ्य का तो बोध कराता है कि कर्त्तव्यों का पालन मनुष्य संपूर्ण निष्ठा के साथ करे।
साधना की जाती है। इस प्रक्रिया को पदार्थ वैज्ञानिक अपने ढंग से और आत्म विज्ञानी अपने ढंग से विकसित कर सकते हैं। ध्यान धारणा एवं तप साधना से भी यह संभव है और उन परा मनोविज्ञानी प्रयोगों से भी जो इस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा इन्हीं दिनों अपनाये जा रहे हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-November
साधना में नया अंग था केवल प्रव्रज्या और लोकशिक्षण का।
साधना है नहीं। यह कोई जादू या चमत्कार नहीं, अपितु शब्द शक्ति, भावशक्ति का प्रत्यक्ष विज्ञान है। जिसे श्रद्धा अश्रद्धालु, तार्किक, अविवेकी कोई भी अपना कर अपने बिगड़े स्वरूप को सुधार और सुधरे को अधिक सँवार कर स्वर्गीय परिस्थितियाँ विनिर्मित कर सकता है, अपने लिए भी संसार के लिए भी।
साधना की कहानियाँ घर-घर पहुँच चुकी हैं। यह स्वाभाविक ही था कि अपने प्रिय सपूत को देखने के लिए नगर का, घर-परिवार का हर परिजन पुलकित हो उठता। बाहर आते प्रत्येक परिजन की गति इस तथ्य का स्पष्ट साक्ष्य थी।
साधना का पूर्वार्ध पूरा होता है। उत्तरार्ध में सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन करना पड़ता है, योगाभ्यास का तत्व ज्ञान यही है। आत्मानुशासन और आत्म परिष्कार के चरण बढ़ाते हुए कोई भी साधक इस परम देव तक पहुँच सकता है और उसके अनुग्रह का अजस्र लाभ पा सकता है।
साधना वत्स।’-अर्चनाना ने कहा।
साधनाओं में सर्वश्रेष्ठ, सर्व सुलभ और तत्काल फलदायक साधना आत्म देव की है। जीवन के प्रकाश पर जो दुष्प्रवृत्तियों के आवरण छाये हुए हैं, उन्हीं को साहसपूर्वक हटाने की तपश्चर्या करने से आत्म देव की साधना का पूर्वार्ध पूरा होता है। उत्तरार्ध में सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन करना पड़ता है, योगाभ्यास का तत्व ज्ञान यही है। आत्मानुशासन और आत्म परिष्कार के चरण बढ़ाते हुए कोई भी साधक इस परम देव तक पहुँच सकता है और उसके अनुग्रह का अजस्र लाभ पा सकता है।
साधना का पाठ्यक्रम ही कहा जा सकता है।
साधना आत्म देव की है। जीवन के प्रकाश पर जो दुष्प्रवृत्तियों के आवरण छाये हुए हैं, उन्हीं को साहसपूर्वक हटाने की तपश्चर्या करने से आत्म देव की साधना का पूर्वार्ध पूरा होता है। उत्तरार्ध में सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन करना पड़ता है, योगाभ्यास का तत्व ज्ञान यही है। आत्मानुशासन और आत्म परिष्कार के चरण बढ़ाते हुए कोई भी साधक इस परम देव तक पहुँच सकता है और उसके अनुग्रह का अजस्र लाभ पा सकता है।
साधना के वह सभी तत्व विद्यमान है। जिनके आधार पर लोगों की आस्थायें बदलती है जनमानस का परिष्कार होता है। जीवन को सचेतन बनाने वाली प्राण ऊर्जा विकसित होती है और मानवीय सुख शान्ति की परिस्थितियाँ मुखरित होती हैं। गायत्री को त्रिपदा भी कहा गया है। जिसका एक अर्थ यह भी होता है कि इस उपासना से मनुष्य अभाव, अशक्ति और अज्ञान से मुक्ति पाता है।
साधनाओं में लगे रहते। उन तापस का एक पुत्र था यवक्रीत- वह भी अपने पिता के समान ही जप-तप में लगा रहता। परन्तु यवक्रीत की यह भी आकांक्षा थी कि वह वेद-वेदांतों का ज्ञात, शास्त्रों में निष्णात और पंडित बने।
साधना कही जा सकती है।
साधनाओं में रत रहने वाले लोगों के लिये सम्भव है। जन-सामान्य के लिये थके हुये मन को राहत पहुँचाने का काम मनोरंजन द्वारा ही सम्भव होता है और लोग थक जाने के बाद इसी कारण सिनेमा देखने, गीत-संगीत सुनने, हल्का-फुल्का साहित्य पढ़ने में अपना खाली समय लगाकर मन को बहलाते हैं।
साधना गृह त्यागी वनवासी लोगों के लिए ही नहीं, वरन् सामान्य जीवन में सरलतापूर्वक अपनाई जाने योग्य व्यक्तित्व का समग्र विकास करने वाली प्रक्रिया है यह प्रमाणित करने में अखण्ड-ज्योति का प्रतिपादन और प्रशिक्षण बहुत सफल ही रहा है।
साधना अभी तक अधूरी है अन्यथा आपको हर्षित होना चाहिए था।
साधना केन्द्र ही बना डाला। कुछ वर्षों बाद उसने क्रम प्रारम्भ किया। उसकी पुस्तकें बाजार में तेजी से बिकने लगीं। इनमें से ‘गोल्डन लाइट ऑफ ए न्यू एरा’ तथा ‘फाल ऑफ द सेन्सेशनल कल्चर’ अधिक प्रसिद्ध हुईं। मनोचिकित्सक एवं सम्मोहन कला विशारद डॉ0 मोरे बर्सटीन से उसकी मैत्री विकसित हुई।
साधना द्वारा वह अपनी अन्तःप्रकृति का परिष्कार कर सकने, उसे नयी विशेषताओं-विभूतियों से सम्पन्न बना सकने में भी सक्षम है। पुनर्जन्म के शास्त्रीय सिद्धान्तों से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि कोई प्राणी बार-बार इसी जगत में जन्म ले, यह आवश्यक नहीं। अनन्त ब्रह्माण्ड के किसी भी ऐसे लोक में वह जन्म ग्रहण कर सकता है, जहाँ जीवन्त प्राणियों का निवास हो और जो लोक उसकी सूक्ष्म इन्द्रियों तथा चेतना-स्तर के अनुरूप हो।
साधना परिपक्व होने पर रुद्र पुत्र मरुद्धाषों ने श्यावाश्व को दर्शन दिये और उनकी कृपा से श्यावाश्व ने मन्त्रदर्शी ऋषि का पद प्राप्त किया। मरुद्धाषों ने श्यावाश्व को रुक्ममाला दी।
साधना के द्वारा ही अन्तःकरण में उच्चस्तरीय श्रद्धा का आरोपण, परिपोषण और अभिवर्धन करके मनुष्य जीवन की ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सृजन प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। अन्तःकरण परिवर्तित किया जा सके तो सामान्य जीवन के क्रिया-कलाप स्वतः बदल जाते हैं।
साधना से वे भी सभी सिद्धियाँ मिल सकती हैं जिनके लिए देवताओं के द्वारा भटकने, दीनता दिखाने और निराश रहने की विडम्बना सहन करनी पड़ती है। देवताओं में सर्वश्रेष्ठ आत्म देव है। उस तक पहुँच अति सरल है। उसकी जैसी उपासना जिसने भी की है उसे उसी अनुपात से अनुग्रह का लाभ मिला है। भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ अभीष्ट परिमाण में प्राप्त करने के लिए आत्म देव से बढ़कर और कोई सुनिश्चित उपास्य है नहीं।
साधना-निरत थे। उनके जीवन का अन्तिम समय निकट था, तभी दैत्यों की एक टोली वहाँ पहुँची और भयानक उपद्रव किया। इस प्रकार अन्तकाल में उनके स्मृति-पटल पर दैत्यों की यह छवि अंकित हो गई। सात्विक प्रकृति के साधक वे थे ही। उनका सूक्ष्म शरीर मृत्यु के तत्काल बाद दैत्यराज हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु में प्रविष्ट हुआ।
साधना में संलग्न हो गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1978-June
साधना के लिए-ब्रह्म सम्बन्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है।
साधना- नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मू. 40 पैसे।
साधना अखण्ड कहलाती है जप ,मौन ,मानसिक होगी। रात्रि में मानसिक जप का ही विधान है। अखण्ड जप बिना होंठ हिलाये ,मानसिक रूप से होना चाहिए। इस साधना में सम्मिलित होने के लिए सभी स्थानीय उपासकों को सम्मिलित होने के लिए अनुरोध करना चाहिए। इसके लिए उनसे सम्पर्क साधना आवश्यक है।
साधना अल्पकाल में ही बूढ़े वटवृक्ष की तरह ढह गई और उनकी सारी तेजस्विता का यों अन्त हो गया, मानों वे जन्म से ही निस्तेज और अशक्त हों।जब पास कुछ न रहा, तब पश्चाताप आ खड़ा हुआ, वे भागे और आचार्य प्रवर के चरणों पर सिर पटक कर रोने लगे। उठो विपश्च! आर्य श्रेष्ठ ने समझाया- यदि प्रारम्भ से ही तुम जनसम्पर्क बनाये रखते, तो आज यह स्थिति न आती! सेवा-साधना का अर्द्धांग है !यदि उसे विस्मृत किया जाये तो साधना निष्फल हो जाती है, पर यदि वह साथ रहे तो साधना के प्रतिफल चिरस्थायी होते हैं। विपश्च ने भूल अनुभव की, पुनः साधना -पथ अपनाया ,पर अब उनने मार्ग बदल लिया था| अब उनकी साधना के साथ सेवा भी जुड़ गई थी।
साधना का ,लाभ देने के लिये जनसंकुल समुदाय में भी जाना चाहिये ! किन्तु विपश्च ने हर बार असहमति ही दर्शायी।
साधना का विराम आने पर अब क्या किया जाये? यह प्रश्न उनके सम्मुख था किन्तु अब आर्यश्रेष्ठ कोई आदेश देने की अपेक्षा मौन धारण कर चुके थे! निर्णय उनने विपश्च पर ही छोड़ा?
साधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है; इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है। आत्मोत्कर्ष का दार्शनिक पक्ष योग में और क्रियापक्ष तप में गिना जाता है।
साधना को अस्वाद व्रत से प्रारम्भकर .एक मात्र उबले हुये आँवले ग्रहण करने तक की लम्बी अवधि में , उनने एक भी दिन मन को पश्चात्ताप नहीं करने दिया।
साधना की | प्राणों को वशवर्ती कर लेने से उनकी अन्तःचेतना विराट् में विचरण करने लगी| उनके आने पर प्रदीप्त प्राण ऐसा झलझलाता था, मानों कोई देवशक्ति धरती पर उतर आई हो। मनोमय कोश की सिद्धि ने विपश्च को ऐसी मानसिक प्रतिभा प्रदान की, जिससे वे खूखार से खूखार जन्तुओं को भी सम्मोहित कर सकते और मृतक में भी नया जीवन फूक सकते थे। आचार्य प्रवर ने पुनः विपश्च से आग्रह किया उन्हें अपने ज्ञान ,अपने तप अपनी साधना का ,लाभ देने के लिये जनसंकुल समुदाय में भी जाना चाहिये ! किन्तु विपश्च ने हर बार असहमति ही दर्शायी।
साधना के पथ पर आगे बढ़ाने का कोई भी उपक्रम रिक्त नहीं छोड़ा।
साधना का दूसरा चरण यह है कि तुम अपनी इस अर्जित साधना का लाभ समाज को भी दो। लोगों को जाकर यह बताओ कि समय न केवल आरोग्य का आधार है अपितु उससे शरीर में प्रसुप्त शक्ति कोशों का जागरण होता है। यह शक्ति अदृश्य जगत से सम्बन्ध जोड़ती और हमारी आध्यात्मिक आस्थाओं का अभिसिंचन करती है।"
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथप्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना के अन्तर्गत आरम्भ की गई धर्मप्रचार यात्रा मण्डलियाँ ही तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य पूरा कर सकती हैं। ऋषि प्रणीत इस पुण्य परम्परा को नव जीवन देने के लिए ऐसी ही सार्थक तीर्थ यात्रा प्रक्रिया देश के कोने-कोने में प्रारम्भ होनी चाहिए।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथप्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना में सम्मिलित होने के लिए सभी स्थानीय उपासकों को सम्मिलित होने के लिए अनुरोध करना चाहिए। इसके लिए उनसे सम्पर्क साधना आवश्यक है। नवरात्रियों में जिनने अनुष्ठान किये थे उन सबसे कहना चाहिए कि वे स्वयं तो सम्मिलित रहें ही। दो चार नये साथी भी तैयार करें। संख्या विदित होने पर क्रम बनाया जाय।
साधना करते-करते उसे पानी पर चलने की एवं मनचाही वस्तु प्राप्त करने की सिद्धि प्राप्त हो गई। वह गुरु के पास दौड़ा-दौड़ा गया व बोला – “महाराज मैं पानी पर चल सकता हूँ तथा जो चाहूँ , –वह वस्तु प्राप्त कर सकता हूँ।”
साधना, 8- गायत्री की विशेष साधना, 9- गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति, 10- गायत्री की असंख्य शक्तियाँ, 11- गायत्री की सिद्धियाँ, 12- गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप, 13- स्त्रियों का गायत्री अधिकार, 14- गायत्री और यज्ञोपवीत, 15- गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना, 4- गायत्री शक्ति का स्रोत सविता देवता, 5- गायत्री और उसकी प्राणप्रक्रिया, 6- गायत्री पंचमुखी और एकमुखी, 7- गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना, 8- गायत्री की विशेष साधना, 9- गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति, 10- गायत्री की असंख्य शक्तियाँ, 11- गायत्री की सिद्धियाँ, 12- गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप, 13- स्त्रियों का गायत्री अधिकार, 14- गायत्री और यज्ञोपवीत, 15- गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना से सम्पन्न किया था। अब उसे ओंर सूक्ष्म रुप युगशक्ति के रूप में उभारने के लिए अपना परिवार नये सिरे से प्रयोगों के साथ सामूहिक उपासना की साधनतपश्चर्या में निरत है। उसे विश्वव्यापी विश्वमाता बनाने का अपना संकल्प है।
साधना -पथ अपनाया ,पर अब उनने मार्ग बदल लिया था| अब उनकी साधना के साथ सेवा भी जुड़ गई थी।
साधना आवश्यक है। नवरात्रियों में जिनने अनुष्ठान किये थे उन सबसे कहना चाहिए कि वे स्वयं तो सम्मिलित रहें ही। दो चार नये साथी भी तैयार करें। संख्या विदित होने पर क्रम बनाया जाय। दिन की अपेक्षा रात्रि में संख्या का घट जाना स्वाभाविक है।
साधना विधानों के लिए किया गया भारी प्रयास पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है। इसलिए तत्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए प्रयत्नशील पथिकों को सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनाव रहित और मस्तिष्क को उत्तेजना रहित रखा जाय। ताकि उस पर दिव्य चेतना का अवतरण निर्वाध गति से होता रह सके। क्रिया-कलापों की भगदड़ से मांस पेशियों में, नाड़ी संस्थान में तनाव रहता है। बाहर से स्थिर होते हुए भी यदि शरीर के भीतर आवेश छाया रहा, तो उस उफान के कारण मन का स्थिर एवं एकाग्र रह सकना भी सम्भव न होगा।
साधना का अर्द्धांग है !यदि उसे विस्मृत किया जाये तो साधना निष्फल हो जाती है, पर यदि वह साथ रहे तो साधना के प्रतिफल चिरस्थायी होते हैं। विपश्च ने भूल अनुभव की, पुनः साधना -पथ अपनाया ,पर अब उनने मार्ग बदल लिया था| अब उनकी साधना के साथ सेवा भी जुड़ गई थी।
साधना का लाभ समाज को भी दो। लोगों को जाकर यह बताओ कि समय न केवल आरोग्य का आधार है अपितु उससे शरीर में प्रसुप्त शक्ति कोशों का जागरण होता है। यह शक्ति अदृश्य जगत से सम्बन्ध जोड़ती और हमारी आध्यात्मिक आस्थाओं का अभिसिंचन करती है।"
साधना निष्फल हो जाती है, पर यदि वह साथ रहे तो साधना के प्रतिफल चिरस्थायी होते हैं। विपश्च ने भूल अनुभव की, पुनः साधना -पथ अपनाया ,पर अब उनने मार्ग बदल लिया था| अब उनकी साधना के साथ सेवा भी जुड़ गई थी।
साधना की दृष्टि से मनःस्थिति शान्त करना प्राथमिक प्रयोग समझा जा सकता है। यदि विचारों की अनियन्त्रित घुड़दौड़ चल रही होगी, चंचलता का आवेश छाया होगा तो फिर उपासना की भाव भूमिका बन ही नहीं सकेगी। अशान्त मन से आत्म-चिन्तन, भक्ति साधन जैसे प्रयोजन सध ही नहीं पाते। किसी प्रकार कर्मकाण्डों की चिन्ह पूजा भर करते रहने की बात कुछ बनती नहीं है।
साधनाएंँ तथा अन्नमय, कोश, मनोमय-कोश, प्राणमय-कोश को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
साधना विषयक विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्दयोग, नादयोग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएंँ तथा अन्नमय, कोश, मनोमय-कोश, प्राणमय-कोश को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
साधना के संस्कार भी उनमें उतने ही सुदृढ़ थे। आत्म-साक्षात्कार की जिज्ञासाऐं किसी के भी अन्तःकरण में जाग सकती हैं, किन्तु ध्येय पूर्ति के लिये मन की भौतिक लालसाओं से निरन्तर लड़ते हुये उन पर विजय प्राप्त करने का साहस किसी-किसी में होता है। विपश्च उसी कोटि की आत्मा थे। आचार्य विद्या बल्लभ को इस तरह का मनस्वी शिष्य प्राप्त करने पर हार्दिक प्रसन्नता थी,सो उनने अपने शिष्य को साधना के पथ पर आगे बढ़ाने का कोई भी उपक्रम रिक्त नहीं छोड़ा।
साधना के साथ सेवा भी जुड़ गई थी।
साधनाओं के प्रति वहाँ व्यापक आकर्षण बढ़ रहा है, उसका अर्थ यही है कि मन को विकृत चिन्तन की परिधि से निकाल कर उसे भावभरी सम्वेदनाओं में गहरा उतारा जाये। हाल की कुछ बिलकुल नई शोधों से यह तथ्य और भी स्पष्ट हुए हैं।
साधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है; इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है।
साधना के लिए समय का बन्धन नहीं है तो भी रात्रि का समय अधिक उपयुक्त रहता है।
साधनाएँ आती हैं ,उनमें आत्मनिरीक्षण और अन्तर - परिशोधन के लिए कई तरह के अभ्यास कराये जाते हैं। इनके द्वारा अन्तः श्रद्धा का स्तर अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा उठाया जाता है। ‘अहम्’ को संकीर्ण सीमाबन्धन से आगे बढ़कर सुविस्तृत क्षेत्र में आत्मभाव विस्तृत करने वाले स्वाध्याय, सत्संग, मनन,- चिन्तन के अभ्यास, योगसाधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए।
साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है; इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है। आत्मोत्कर्ष का दार्शनिक पक्ष योग में और क्रियापक्ष तप में गिना जाता है।
साधना का उद्देश्य इस तरह की तुच्छ शक्तियों की प्राप्ति के लिए ही की थी या केवल भगवद् प्राप्ति – आनन्द के लिए।
साधना को उपयोगी उपचार की तरह काम में लाया जा सकता है। उसकी उपयोगी विधिव्यवस्था अपनाकर न केवल उन्मादी और सनकी रोगरहित किये जा सकते हैं, वरन् वैसे उपद्रवों की रोकथाम भी सहज ही हो सकती है। इस निष्कर्ष पर विचारशील मनःशास्त्री पहुँच रहे हैं और कुछ समय पूर्व जिस नीतिशास्त्र का उपहास किया जा रहा था अब उसका समर्थन मानसोपचार के रूप करने की बात सोची जा रही है। यही है विक्षिप्तता को रोकने और समाप्त करने का स्थिर समाधान।
साधनाओं में अत्यन्त बाधक होती है। उनके कारण महत्वपूर्ण साधना विधानों के लिए किया गया भारी प्रयास पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है। इसलिए तत्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए प्रयत्नशील पथिकों को सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनाव रहित और मस्तिष्क को उत्तेजना रहित रखा जाय। ताकि उस पर दिव्य चेतना का अवतरण निर्वाध गति से होता रह सके। क्रिया-कलापों की भगदड़ से मांस पेशियों में, नाड़ी संस्थान में तनाव रहता है।
साधना, 9- गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति, 10- गायत्री की असंख्य शक्तियाँ, 11- गायत्री की सिद्धियाँ, 12- गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप, 13- स्त्रियों का गायत्री अधिकार, 14- गायत्री और यज्ञोपवीत, 15- गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना के लिए अवसर ही नहीं रहता। इसी प्रकार प्रचलित विचार धारा को ही अन्तिम मानना पड़ेगा | उससे भिन्न प्रकार के तथ्यों को उभारना एवं जन साधारण के सामने प्रस्तुत कर सकने की बात ही शेष न रह जायगी। इससे मानवी प्रगति के इतिहास क्रम में भारी बाधा उत्पन्न होगी। भारतीय संस्कृति की प्रतिपादित एवं समर्थित वैयक्तिक स्वतन्त्रता में कितने ही दोष क्यों न गिनाये जाय, एक गुण तो बना ही रहेगा कि उसकी अन्तरात्मा जीवित रहे और अपने ढंग से अपने निर्णय लेने और गतिविधियाँ अपनाने में समर्थ रह सके। इस विशेषता के रहते आत्म-निर्माण की आत्माभिव्यक्ति की जो सुविधा मनुष्य के हाथ रह जाती है, वह असंख्य व्यवधानों के रहते हुए भी अधिक मूल्यवान है।
साधना के प्रतिफल चिरस्थायी होते हैं। विपश्च ने भूल अनुभव की, पुनः साधना -पथ अपनाया ,पर अब उनने मार्ग बदल लिया था| अब उनकी साधना के साथ सेवा भी जुड़ गई थी।
साधना विज्ञान के अन्तर्गत किया गया है। इनमें अत्यन्त स्पष्ट सिद्धियाँ शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण की हैं। धर्म पालन से शरीर निरोग बनता है और अध्यात्म का अवलम्बन करने से मनोविकारों की जड़ें कटती हैं। प्रस्तुत सन्दर्भ में अन्यान्य लाभों की चर्चा न करते हुए इतना भी सोचा जा सकता है कि जीवन के सुविधा और प्रगति के उभयपक्षीय उद्देश्य पूरे करने वाले आरोग्य की रक्षा में धर्म और अध्यात्म का क्या योगदान हो सकता है और उस योगदान को किस प्रकार व्यवहार में उतारा जा सकता है?
साधना भी आदान-प्रदान के
सूत्र खुले हुए हैं।
साधना” से लोगों को अत्यन्त शान्ति मिलने की आम मान्यता बन गई है। इसी कारण ध्यान और योग-साधनाओं के प्रति वहाँ व्यापक आकर्षण बढ़ रहा है, उसका अर्थ यही है कि मन को विकृत चिन्तन की परिधि से निकाल कर उसे भावभरी सम्वेदनाओं में गहरा उतारा जाये। हाल की कुछ बिलकुल नई शोधों से यह तथ्य और भी स्पष्ट हुए हैं।
साधना, त्याग, उदारता, विनम्रता और क्षमाशीलता के लिए। उनके आत्मिक गुणों के कारण प्रजा जितना सम्मान उनका करती थी उतना अपने शासक सर्वमित्र का भी नहीं। यह बात सर्वमित्र को बहुत खटकती थी। वे अपने आप को कहीं अधिक उपयोगी मानते और बोधिसत्व की निन्दा करते रहते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-April
साधना का भी प्रधान क्षेत्र अचेतन मन ही है। आध्यात्मिक साधनाओं की विशेषता का रहस्य यही है कि वे अचेतन मन को शुद्ध करती हैं, वहीं पर उत्कृष्टता के अंकुर उगा देती है। तन, चेतन में उनका विकास स्पष्ट देखा जा सकता है। उपनिषद् का ऋषि कहता है-
साधना में लगाये और इतने से ही ऊब कर वापस चले गये। किन्तु इन्द्र ने धैर्य न छोड़ा। वे अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञान मय और आनन्दमय कोशों का बीस-बीस वर्ष अभ्यास करने के उपरान्त प्रवीणता के स्तर तक पहुँचे और अमरत्व के पारंगत कहलाये।
साधना का अर्थ है मन की साधना। जिसने मन को साध लिया, उसका व्यक्तित्व सध गया। किन्तु मात्र जागृति की स्थिति में अनुभव में आने वाले भाव ही मन की पहचान नहीं। जागृति, निद्रा, स्वप्न सभी स्थितियों में मन सक्रिय रहता है और चेतन मन से अचेतन-सुषुप्त-मन की परिधि अधिक व्यापक है। अतः मन की साधना का भी प्रधान क्षेत्र अचेतन मन ही है।
साधना एवं दूरदर्शिता का समावेश हुआ है। ऊबड़-खाबड़ धरातल और वनचरों का अनगढ़ प्राणि समुदाय, सभ्य समुन्नत मनुष्य के स्तर तक अनायास ही नहीं आ पहुँचा। क्रमिक प्रगति के बढ़ते हुए चरण, वर्तमान स्तर तक पहुँचने में ना जाने चिन्तन, विकास और साधन सम्पादन में कितनी ठोकरें खाते रहे हैं। उन्हें न जाने कितने खाई-खन्दक पार करने पड़े हैं। स्थिति जब सन्तोष की साँस लेने और अधिक उज्ज्वल भविष्य की आशा करने योग्य बनी है, तो वज्रपात होने जैसा संकट सामने आ खड़ा हुआ है।
साधनाओं की विशेषता का रहस्य यही है कि वे अचेतन मन को शुद्ध करती हैं, वहीं पर उत्कृष्टता के अंकुर उगा देती है। तन, चेतन में उनका विकास स्पष्ट देखा जा सकता है। उपनिषद् का ऋषि कहता है-
साधना के माध्यम से ही सम्भव हो पाता है।
साधना से ही अजेय मेघनाद का वध कर सके। भीष्म पितामह को स्वेच्छा मरण की सिद्धि इसी आधार पर उपलब्ध हुई थी। शंकराचार्य, समर्थ रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द आदि को असाधारण क्षमता सम्पन्न कराने में उनका ब्रह्मचर्य ही एक बहुत बड़ा आधार था। गाँधीजी ने तेतीस वर्ष की आयु में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था। उनकी प्रभाव प्रतिभा में इस संयमशीलता का भी बहुत बड़ा योगदान था।
साधना के फलस्वरूप ही उपलब्ध होते हैं।
साधना। जिसने मन को साध लिया, उसका व्यक्तित्व सध गया। किन्तु मात्र जागृति की स्थिति में अनुभव में आने वाले भाव ही मन की पहचान नहीं। जागृति, निद्रा, स्वप्न सभी स्थितियों में मन सक्रिय रहता है और चेतन मन से अचेतन-सुषुप्त-मन की परिधि अधिक व्यापक है। अतः मन की साधना का भी प्रधान क्षेत्र अचेतन मन ही है।
साधना को अपनी दिनचर्या में एक महत्वपूर्ण स्थान देने पर जहाँ यश, प्रशंसा, श्रद्धा, सद्भावना, सहकारिता का हाथों-हाथ लाभ मिलता है वहाँ उससे भी बड़ी बात यह है कि अपनी शालीनता एवं उदारता बढ़ने से निजी व्यक्तित्व का स्तर गगनचुम्बी बनने लगता है। दूसरों को सन्मार्ग पर चलाने का प्रयास करते हुए कर्ता को लोक-लाज भी यह विवश करती है कि वह वैसा बने जैसा कि और से कहता है। नैतिक शिक्षा के अध्यापक को उस विषय में अपने को पारंगत एवं परिपक्व होना चाहिए। जब गणित विज्ञान, इतिहास भूगोल आदि को अपने विषय में विद्यार्थी को समाधान दे सकने योग्य प्रवीणता अर्जित करनी पड़ती है तो नैतिक आचरणों को प्रेरणा देने वाले को भी उसी स्तर का व्यक्तित्व विनिर्मित करना आवश्यक है। बात यदि नीति शास्त्र पढ़ने-पढ़ाने और प्रश्नकाल हल करने नम्बर लाने वाली पढ़ाई तक ही सीमित होती तो काम कथा-प्रवचन के सहारे भी चल सकता था पर जब शिक्षा आचरण को उस ढाँचे में ढलने को दी जा रही है तो उसके लिए निजी उदाहरण प्रस्तुत करना एक प्रकार से अनिवार्य हो जाता है।
साधना की ही परिणति हैं।
साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है, वह कम है, उन्हें सफल जीवन जीने के लिए अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिए। सो वे कालेज जाने लगीं और 69 साल की उम्र में कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय की स्नातिका बन गईं। इसके बाद उन्होंने हालीवुड का दरवाजा खटखटाया।
साधना में निरत रहने का अवकाश पा सकता है जिसमें पुण्य परामर्श का सम्पादन करते हुए तनिक भी अतिरिक्त दबाव न पड़े और वह विषय अच्छे से अच्छे मनोविनोद की तुलना में अधिक सुखद एवं आनन्द-उल्लास से भरा-पूरा प्रतीत होने लगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-October
साधना में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश यदि ठीक तरह विकसित किए जा सकें तो पाँच स्वतन्त्र व्यक्तित्व विकसित होते हैं और वे अदृश्य स्तर के रहने के कारण दृश्यमान पाँच शरीरों की अपेक्षा पांच गुना अधिक कार्य कर सकते हैं। सूक्ष्मीकरण प्रयास का तात्पर्य यही है। अब तक वे जो काम करते रहे हैं, उनमें अनेक गुनी क्षमताओं का समावेश होने से सफलता भी अनेकों गुनी होगी। इसके अतिरिक्त उन्होंने नये कार्य हाथ में लिए हैं। गगनचुम्बी युद्धोन्माद को ठण्डा करता है।
साधना की जा रही है, उसका प्रयोजन ही अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
साधना को भुला नहीं सकते।
साधना सम्पन्न हो रही है।
साधना है। इसमें विक्षेप उत्पन्न करने का प्रयास किसी भी प्रियजन या शुभ चिन्तक को कभी नहीं करना चाहिए।
साधना करनी पड़ती है। अपना शरीर यथावत् रहते हुए भी छाया की सिद्धि होने पर एक दूसरी शक्ति साथ रहने और काम करने लगती है। यही बात अन्य देवी देवताओं के सम्बन्ध में भी है। वे भीतर से उदय होते हैं, कहीं बाहर से नहीं आते। तामसिक तत्व भी अपने भीतर हैं और राजसिक-सात्विक भी।
साधना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके माध्यम से आत्म-चेतना का उच्चस्तरीय शिक्षण होता है इसी कारण प्रत्येक धर्म चाहे वह हिन्दू हो या सिख, ईसाई, बौद्ध, ताओ, इस्लाम या बहाई कोई भी हो अपनी उपासना पद्धति में जप को अनिवार्य रूप से जोड़ रखा है।
साधना में भी मन्त्र को बार-बार दोहराना पड़ता है। उसके बिना अभीष्ट संस्कार उत्पन्न नहीं होते।
साधनाओं से भिन्न प्रकार की उच्चस्तरीय साधना की जा रही है, उसका प्रयोजन ही अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
साधना में तनिक भी गतिरोध न आएगा एवं उनकी स्वयं की निष्ठा दैनन्दिन और प्रखर होगी।
-ब्रह्मवर्चस्
साधना क्षेत्र में भी इस स्तर की एकाग्रता का बनना अभीष्ट माना जाता है। निर्विचार, निर्विकल्प समाधि की स्थिति इससे ऊँची, काफी आगे की बात है। वह भी इसी मार्ग पर चलते रहने से ही उपलब्ध होती है। अनायास सम्भव नहीं हैं।
साधना का बीज फले फूले इसके लिए “जप” द्वारा उसकी पर्याप्त जुताई आवश्यक होती है जप के द्वारा व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने का अभ्यास होता है जिससे वह अन्तरंग में छिपे कल्मष कषायों को पहचानता है उन्हें नष्ट करने, निकाल बाहर फेंकने की योजना बनाता है। भागवत् संस्कारों को गहराई तक जमाने के लिए इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। जप एक तरह की रगड़, मँजाई, खराद है जिससे मन और अन्तःकरण पर छाई हुई कलुष-कालिमा की धुलाई होती है। भीतर की अंतरात्मा की चमक उसी से प्रारम्भ होती है। इसीलिये प्रत्येक गायत्री उपासक को प्रतिदिन नियमित रूप से नियत स्थान में और सम्भव हो तो नियत संख्या में भी गायत्री मन्त्र जप का क्रम अपनाना चाहिए।
साधना क्रम टूटे। गुरुदेव का संकल्प भी यही है कि वे सम्भवतः बसन्त पर्व पर एक वर्ष का साधना क्रम पूरा होने पर दर्शन तो देंगे पर प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का- बातचीत का क्रम माताजी तक ही सीमित रहेगा। पर्व विशेषों पर दर्शन क्रम तो चलेगा पर होगा वह योगीराज अरविन्द की तरह निमित्त मात्र का ही। इसी में प्रज्ञा परिवार का व समस्त मानव जाति का कल्याण है, ऐसा कभी सोचते व व्यक्त भी करते हैं।
साधना क्षेत्र की सारी उपलब्धियाँ इस तथ्य पर निर्भर है कि मन को भटकने से रोककर उद्देश्यपूर्ण उत्कृष्ट चिन्तन में नियोजित कर दिया जाय। यह मनन प्रक्रिया जितनी सघन होगी- भाव श्रद्धा से अभिपूरित होगी, सफलता उसी क्रम से हस्तगत होती चली जायेगी। इसके लिए प्रतिमा को ही अवलम्बन बनाया जाय, अनिवार्य नहीं। सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय भी एक प्रकार से श्रेष्ठ विचारों का सामीप्य पाना- महामानवों के चिन्तन से तादात्म्य स्थापित करना है। मार्ग कोई भी अपनाया जाए, माध्यम कुछ तो बनाना ही पड़ेगा ही- इसे समझना उतना ही अनिवार्य है जितना कि किसी भाषा को समझने के लिए उसकी लिपि एवं बोल-चाल के स्वरूप को सीखना- हृदयंगम करना।
साधना का नियोजन ही उस पुण्य कार्य में हो रहा है जिससे समस्त मानव जाति को सही विचारने एवं सही काम करने की प्रेरणा मिले। जिसे भी अन्तर्चक्षु प्राप्त हैं, उसने यह अनुभव किया है कि समष्टिगत वातावरण क्रमशः बदला है। ऐसे में कोई नहीं चाहता कि यह साधना क्रम टूटे। गुरुदेव का संकल्प भी यही है कि वे सम्भवतः बसन्त पर्व पर एक वर्ष का साधना क्रम पूरा होने पर दर्शन तो देंगे पर प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का- बातचीत का क्रम माताजी तक ही सीमित रहेगा। पर्व विशेषों पर दर्शन क्रम तो चलेगा पर होगा वह योगीराज अरविन्द की तरह निमित्त मात्र का ही।
साधनाओं के द्वारा इस शरीर के सम्बन्ध में जो कुछ जाना गया है, वह विज्ञान की अपेक्षा कई गुना अधिक महत्वपूर्ण है। इन साधनाओं के कठोर अभ्यास के द्वारा चेतना के गहन अन्तराल में प्रविष्ट हो तत्वदर्शी ऋषियों ने इस शरीर को ब्रह्मांड की प्रतिकृति के रूप में पाया। इसमें ऐसे-ऐसे चक्र, कोश, उपत्यिकाएँ नाड़ी गुच्छक और दिव्य क्षमता सम्पन्न केन्द्र विद्यमान हैं जिन्हें देखकर उन्हें “यत् ब्रह्माण्डे तत्पिण्डे” जो कुछ ब्रह्मांड में है वह सारा का सारा इस पिण्ड (देह) में विद्यमान है। 13 करोड़ प्रकाश वर्ष के विराट् क्षेत्र वाले इस ब्रह्मांड के मॉडल शरीर को वस्तुतः सृष्टि की सबसे विलक्षण मशीन कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जप विज्ञान एक ऐसी विद्या है जिसमें “शब्द” को बार-बार दुहरा कर बाँसुरी के छिद्रों में वायु फूँक कर उसमें से मधुर ध्वनि निकालने के समान इन शरीरस्थ शक्ति केन्द्रों में से वह क्षमताएँ अर्जित कर ली जाएं जो साधारण व्यक्तियों के लिए अद्भुत और चमत्कार जैसी लगें।
साधना के पुण्य प्रयोजन में सहभागी बनने पर वे घाटे में नहीं रहे। प्रत्यक्ष दर्शन या मार्ग दर्शन न मिलने पर भी परोक्ष रूप से उन्हें वे प्रेरणाएँ सतत् मिलती रहीं जिनने उनकी उलझनें स्वतः सुलझा दीं।
साधना के आधार पर अपनी गरिमा सिद्ध करें और बदले में जन सहयोग के सहारे ऊँचे उठें। सच्चा और सार्थक जन समर्थन ही महामानवों के उच्च पद पर प्रतिष्ठित कराता रहा है। तलवार के बल पर तो मात्र दैत्य ही आतंक जमाते और लूट-खसोट करते देखे गये हैं। इतने पर भी वे सद्गुणों के अभाव में न तो सुरक्षित रख पाते हैं और न उपयुक्त उपयोग कर सकने के कारण उसके सहारे कुछ सुख-चैन ही पाते हैं। इस समूची वस्तुस्थिति का पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष तक पहुँचना पड़ता है कि चिरस्थायी, महत्वपूर्ण और वजनदार प्रगति के लिए जन सम्मान और सहयोग अर्जित किया जाय।
साधना द्वारा महान बना लिया जाता है तो फिर ऋषि देवता कहाते- अपनी नाव पर चढ़ा कर असंख्यों को पार करते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है।
साधना कर लेते हैं वे उसका प्रत्यक्ष वरदान प्राप्त कर लेते हैं। यही बात शरीर में अवस्थित अन्य देवताओं की साधना के सम्बन्ध में भी है।
साधना का श्रद्धाँजलि अर्पित करने का भाव रखने का ही प्रतिपादन है।
साधना क्षेत्र के राज मार्ग पर बढ़ पाना अधिक सरल हो जाता है।
साधनाओं में भी साझीदार रही है। इसमें भी हैं। एकदम बाहरी वातावरण से सम्बन्ध काट लेने के कारण मिशन की गतिविधियों की जानकारी देने और आवश्यक निर्देशन- परामर्श प्राप्त करने हेतु वे मध्यस्थ का काम करती रही हैं। शरीर के लिए भोजन, वस्त्र का निर्देशन तो गुरुदेव का ही रहता है, पर उस सामग्री को जुटाने में भागीदार अपनी उनकी रही है। यह प्रबन्ध आरम्भ से ही रहा है।
साधना के सम्बन्ध में भी है।
साधनाओं में ज्ञान, कर्म और भक्ति के सनातन प्रयोग काम दे जाते हैं। उसमें सामान्य उपासनाऐं बिना जोखिम की होती हैं। किन्तु विज्ञान के प्रयोगों में प्रयोक्ता के लिए भी जान जोखिम बन जाती है। अणु संयन्त्र बनाने- बिगाड़ने में तनिक भी अस्त-व्यस्तता बन पड़े तो उसमें अपने लिए तथा दूसरों के लिए खतरा ही खतरा है।
साधना ने प्रचण्ड रूप लिया, सभी को स्वतः ऐसा लगने लगा कि गुरुदेव हमसे दूर नहीं गए, और पास आ गए हैं। इतने समीप कि हम उनकी अनुभूति चौबीस घण्टे करते रह सकते हैं।
साधना करनी चाहिए। जो ऐसी साधना कर लेते हैं वे उसका प्रत्यक्ष वरदान प्राप्त कर लेते हैं। यही बात शरीर में अवस्थित अन्य देवताओं की साधना के सम्बन्ध में भी है।
साधना में प्रगति के लिए किसी देवी अथवा देवता को इष्ट बनाया जाय, यह प्रश्न अधिकाँश नये साधक करते हैं। अपनी अभिरुचि एवं प्रकृति के अनुरूप कोई भी माध्यम चुना जा सकता है। पर यह पक्ष उतना महत्वपूर्ण नहीं है। प्रश्न यह उठना चाहिए कि किस स्तर की श्रद्धा का आरोपण आत्मिक प्रगति में सहायक होगा? इसके उत्तर में जो जितनी गहराई तक प्रवेश करेगा उसे उसी अनुपात में आगे बढ़ने के लिए जीवन्त एवं सशक्त आधार मिलेंगे।
साधना करके उनसे वरदान प्राप्त किए जाते हैं उसी प्रकार सरस्वती की प्रतिनिधि जिव्हा से भी सात्विक अस्वाद भोजन की और मधुर हितकारी वचन बोलने की साधना करनी चाहिए। जो ऐसी साधना कर लेते हैं वे उसका प्रत्यक्ष वरदान प्राप्त कर लेते हैं। यही बात शरीर में अवस्थित अन्य देवताओं की साधना के सम्बन्ध में भी है।
साधना द्वारा यही किया जाता है। एकाग्रता तल्लीनता सम्पादन के साथ-साथ उच्छृंखल विचारों पर नियन्त्रण एक बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अमेरिका के लेसली एम. लीक्रान ने भी प्रयोगोपरान्त प्रज्वलित दीप शिखा का रोगोपचार तथा मनःचिकित्सा में महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध किया है, चर्चों में मोमबत्ती जलाकर उपासना करने एवं पारसियों द्वारा अग्नि पूजा के पीछे यही मनोवैज्ञानिक महत्व है।
साधनाओं में अचेतन मस्तिष्क का नियन्त्रण सुनियोजन कितना तर्क सम्मत व वैज्ञानिक है।
साधना क्षेत्र में किसी के लिए चमत्कारी सिद्ध हो जाती है और किसी के लिए मात्र पाषाण की आकृति भर लगती है, इसका कारण क्या है? अन्तर श्रद्धा भावना के स्तर में सहज ही खोजा जा सकता है। एकलव्य मिट्टी की मूर्ति को गुरु के रूप में प्रतिष्ठापना करके वह अनुदान प्राप्त करने में सफल हो गया जो शरीर धारी गुरु द्रोणाचार्य के अत्यन्त निकट रहकर भी पाण्डव बन्धु नहीं प्राप्त कर सके थे। यह प्रतिमा में आरोपित सघन श्रद्धा का ही चमत्कार था। जिस राम की उपासना से तुलसीदास महान बने, जिस कृष्ण की आराधना से सूर ने अपने जीवन को सफल बनाया, उन राम और कृष्ण की मूर्तियाँ- चित्र आज भी विद्यमान हैं पर तथाकथित उपासकों, भक्तों के लिए वे कुछ विशेष करामाती नहीं सिद्ध हो पाती।
साधनाओं के कठोर अभ्यास के द्वारा चेतना के गहन अन्तराल में प्रविष्ट हो तत्वदर्शी ऋषियों ने इस शरीर को ब्रह्मांड की प्रतिकृति के रूप में पाया। इसमें ऐसे-ऐसे चक्र, कोश, उपत्यिकाएँ नाड़ी गुच्छक और दिव्य क्षमता सम्पन्न केन्द्र विद्यमान हैं जिन्हें देखकर उन्हें “यत् ब्रह्माण्डे तत्पिण्डे” जो कुछ ब्रह्मांड में है वह सारा का सारा इस पिण्ड (देह) में विद्यमान है। 13 करोड़ प्रकाश वर्ष के विराट् क्षेत्र वाले इस ब्रह्मांड के मॉडल शरीर को वस्तुतः सृष्टि की सबसे विलक्षण मशीन कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जप विज्ञान एक ऐसी विद्या है जिसमें “शब्द” को बार-बार दुहरा कर बाँसुरी के छिद्रों में वायु फूँक कर उसमें से मधुर ध्वनि निकालने के समान इन शरीरस्थ शक्ति केन्द्रों में से वह क्षमताएँ अर्जित कर ली जाएं जो साधारण व्यक्तियों के लिए अद्भुत और चमत्कार जैसी लगें। इन शक्तियों को जागृत करने में जप साधना महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
साधना से भी उन्हें शांति न मिली। महत्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था।
साधना करने वालों को श्मशान सेवन, अघोरी आचरण का बहुत पहले ही अभ्यास करना होता है। जब उस कापालिक स्तर की प्रक्रिया उनकी नस-नस में भर जाती है तभी वे भूत, प्रेत, चुड़ैल, डाकिन, जिन्न, मसान स्तर के भयावह कृत्य कर सकने में समर्थ होते हैं। यही बात देवोपम कृत्यों के बारे में है। योगीजन अपने व्यक्तित्व को उपवास, ब्रह्मचर्य धारणा, ध्यान, पुण्य, परमार्थ के कृत्यों में लगाये रहते हैं। इन कार्यों में उनकी गति जितनी गहरी होती है उसी अनुपात से उनकी अनुकृतियाँ, छाया शक्तियाँ विशिष्ट कार्य करने में समर्थ होती हैं।
साधना के परिणाम जन सामान्य को हाथों-हाथ मिलते जा रहे हैं। प्रज्ञा परिजनों का तो एक सीमित परिकर हैं। युग ऋषि के समक्ष सारा मानव समुदाय है। उनकी साधना का नियोजन ही उस पुण्य कार्य में हो रहा है जिससे समस्त मानव जाति को सही विचारने एवं सही काम करने की प्रेरणा मिले। जिसे भी अन्तर्चक्षु प्राप्त हैं, उसने यह अनुभव किया है कि समष्टिगत वातावरण क्रमशः बदला है।
साधना की महत्ता एवं फलश्रुतियों को समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई है, यह प्रसन्नता की बात है। जून, जुलाई, व अगस्त के अंकों ने सभी को वस्तुस्थिति से अवगत कराया व पुरुषार्थ में जुट पड़ने हेतु प्रेरित किया है। सूत्र संचालन तन्त्र को इस प्रतिक्रिया से यह आश्वासन मिला है कि इस युग साधना में तनिक भी गतिरोध न आएगा एवं उनकी स्वयं की निष्ठा दैनन्दिन और प्रखर होगी।
-ब्रह्मवर्चस्
साधना या विधि विशेष से सूक्ष्म शक्ति सम्पन्न बना लिया जाय तो फिर वे असाधारण हो जाते हैं और ऐसी सामर्थ्य का परिचय देते हैं जिसे अद्भुत कहा जा सके।
साधना की सफलता मिल नहीं सकती।
साधना क्रम पूरा होने पर दर्शन तो देंगे पर प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का- बातचीत का क्रम माताजी तक ही सीमित रहेगा। पर्व विशेषों पर दर्शन क्रम तो चलेगा पर होगा वह योगीराज अरविन्द की तरह निमित्त मात्र का ही। इसी में प्रज्ञा परिवार का व समस्त मानव जाति का कल्याण है, ऐसा कभी सोचते व व्यक्त भी करते हैं।
साधना स्तर की उदारता का भी समावेश रखना आवश्यक होता है। ऐसी वास्तविक सज्जनता ही आत्म-संतोष देने और जन-साधारण से स्नेह सहयोग खींच लेने में समर्थ होती है। संकीर्ण स्वार्थपरता में यही सबसे बड़ा दोष है कि अपने साथ उच्चस्तरीय सज्जनता के पैर ही नहीं टिकने देती। जिस पर सवार होती है उसकी नकेल पकड़कर भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण की कंटीली राह पर ही चलने के लिए विवश करती है। इस विवशता के रहते कोई न ऊँचा उठ सकता है और न आगे बढ़ सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-September
साधना के संदर्भ में यह चल रहा है कि युग समस्याओं के समाधान हेतु जिस तप-सामर्थ्य की आवश्यकता है, वह कैसे उपलब्ध हो? निरन्तर बढ़ते विग्रहों- पारस्परिक विलगाव- ईर्ष्या-द्वेष के दावानल से जूझती मानव-जाति को उबारने हेतु जिस स्तर का पुरुषार्थ अभीष्ट है, वह कैसे सम्पन्न हो? उत्तर एक ही है- बहिर्मुखी पक्ष को तिलांजलि देकर युग ऋषि द्वारा यह भूमिका निभाते हुए स्वयं को अन्तर्मुखी साधना में नियोजित किया जाना एवं सीमित समुदाय से ऊँचा उठ कर सारी वसुधा के हित साधन हेतु खपा देना। आज की परिस्थितियों में जो अनिवार्य था वही गुरुदेव ने किया है। उनकी एकाकी सूक्ष्मीकरण साधना का स्तर बहुत ऊँचा है।
साधना से सम्भव है। वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे अपनी मनःशक्ति को माया रूपिणी प्रकृति को समझने में समय नष्ट न करके दिव्यात्मा के अनुभवों की खोज में प्रयुक्त करें, जिससे परम सत्य की जानकारी तथा मानव जीवन के परम उद्देश्य का उद्घाटन हो सके।
साधना क्षेत्र में तेजोवलय- ओजस के रूप में जाना जाता है। थियॉसाफी वाले इसे “ईथरीक डबल” कहते हैं एवं प्लाज्मा से विनिर्मित मानते हैं। शरीर की विद्युत सम्पदा यों तो पूरे शरीर से निस्सृत होती रहती है। परन्तु चेहरे, आंखों, उंगलियों एवं जननेंद्रियों के पास इसकी मात्रा सर्वाधिक होती है। मानव की सूक्ष्मीकृत ऊर्जा की तरह यह एक महत्वपूर्ण झाँकी है जिसके माध्यम से साधक की मनःस्थिति, रोगी होने की भावी संभावनाओं एवं भाव सम्वेदनाओं की गहराई को पढ़ा जा सकता है।
साधना में निरत हैं एवं सारे लीला संदोह को देख रहे हैं जो प्रत्यक्ष में दृश्यमान है, परोक्ष में घटने वाला है।
साधना में सहभागी बने हैं कि नवयुग अवश्य आयेगा। वह श्रद्धायुग कहा जाएगा। आस्थाओं के स्तर के मीटर के आधार पर ही किसी की महानता-क्षुद्रता का मूल्यांकन किया जाएगा। महाप्रज्ञा का तत्वदर्शन जन-जन के मन-मन में प्रविष्ट होगा एवं विवेक का सारथी उन मूर्धन्यों की ज्ञानेन्द्रियों का संचालन करेगा जिनके हाथों में अर्थ, सुरक्षा, शासन एवं विचार तंत्र है। सूक्ष्मीकरण साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते हैं कि छोटे-छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभाएंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके।
साधनाएं कर लीं समझना चाहिए कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया। जिसका इन्द्रिय संयम पर्ण हो गया वह सच्चे अर्थों में तपस्वी है। तपस्वी की वाणी अमोघ होती है। वह शब्द वेध- बोलता है। बैखरी वाणी रोकने पर मध्यमा परा और पश्यन्ती वाणियाँ भी वशवर्ती हो जाती हैं।
साधना है।
साधना इस योगिक तृतीय नेत्र- आज्ञाचक्र के सहयोग से संभव है।
साधना का रास्ता सुझाया गया था।
साधना में सहभागी हैं। हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा। उनकी भविष्य वाणियाँ समय की कसौटी पर खरी उतरेंगी।
साधनाक्रम वे एक-एक वर्ष के लिये चार बार सम्पन्न कर चुके हैं। प्रस्तुत संकल्प बड़ी विकट घड़ियों में युग सन्धि की विषम बेला में लिया गया है। सभी परिजन इस युग साधना में सहभागी हैं। हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा। उनकी भविष्य वाणियाँ समय की कसौटी पर खरी उतरेंगी।
साधना कहलाता और परमात्मा तक पहुँचाता है।’
साधना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ध्यान-साधना का रास्ता सुझाया गया था।
साधना की उपज होते हैं। विधाता का नियम है कि वह पूर्वजन्मों की घटनाक्रमों की स्थूल मस्तिष्क को विस्मृति करा देता है। लेकिन अपवाद रूप में आग के शोलों के रूप में कुछ महापुरुषों में जब-जब मस्तिष्कीय भाण्डागार का अपवाद रूप में प्रस्फुटन होता है, वहाँ भौतिकविद् स्तम्भित होकर रह जाते हैं। वे स्थूल मस्तिष्क में उन विशेषताओं को ढूंढ़ते हैं जो वहाँ है ही नहीं, वे तो चेतना की गहन सूक्ष्म परतों में निहित होती हैं। जब खोजा ही गलत जाएगा, तो मिलेगा क्या?
साधना की तो जाती है अन्तराल में, पर उसका प्रतिफल दैवी शक्तियों का सहयोग लेने पर ही मिलता है।
साधना, स्वाध्याय-सत्संग द्वारा जितना प्रखर बनाया जाता है, उतना ही वह सूक्ष्मतम बनते हुए मस्तिष्क कोष्ठों में सम्पादित होता जाता व मनुष्य को प्रज्ञावान बनाता है। यही ज्ञान की पूँजी जन्म-जन्मांतरों के लिये फिक्सड डिपॉजिट का काम करती है। आगामी जन्मों लोकोत्तर जीवन, वर्तमान जीवन में सूक्ष्म स्थिति में अनेकों महत्वपूर्ण कार्यों हेतु यही ज्ञान-निधि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अल्पायु में विशेष प्रतिभा (‘प्रोडिगी’) के जितने उदाहरण मिलते हैं, उनमें स्थूल मस्तिष्क की संरचना-विशिष्टता को नहीं, मन की सूक्ष्म परतों में निहित ज्ञान की पूर्व जन्मों में अर्जित सम्पदा को महत्ता दी जानी चाहिए। आइन्स्टीन, हाइजेन वर्ग, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सी. वी. रमन, जगदीश चन्द्र बसु प्रभृति प्रतिभाशाली व्यक्तित्व एक जन्म की अकेले को नहीं, जन्म-जन्मांतरों की ज्ञान साधना की उपज होते हैं।
साधना का अवलम्बन लेते हैं। जो भी इस सम्पर्क सान्निध्य की लपेट में आता है, उसे यह तेजोवलय बदलने- प्रभावित करने में सफल होता है। महामानवों के आश्रमों में, सिद्ध पीठों में जो प्रभाव सामर्थ्य रहती है, उसके मूल में यह प्रकाश पुंज- तेजोवलय ही काम करती है जो उनके वहां प्रत्यक्ष रूप में न रहने पर भी बनी रहती है। प्रत्यक्षतः आशीर्वचन-दर्शन, चरण-स्पर्श में छिपे सत्परिणामों के पीछे भी इस आभा मण्डल की ही भूमिका होती है। ऐसे तेजस् सम्पन्न व्यक्ति चिरायु होते हैं क्योंकि उनका छोड़ा हुआ प्रभाव चिरस्थायी होता है।
साधना से इस आयाम में पहुँचने की होड़ मचने लगे एवं “एजींग” (वार्धक्य) पर नियंत्रण में वैज्ञानिक-अध्यात्मवादी सफल हो जायँ।
साधना और विचार और स्वर के साथ सिद्ध करना होता है। इसके लिए प्रवीण पारंगत का संरक्षण चाहिए। जो इन बातों की अपेक्षा करते हैं। स्वेच्छाचार बरतते उनके मंत्र हास्यास्पद बनकर रह जाते हैं। वैसा फल नहीं मिलता जैसा कि शास्त्रों में लिखा हुआ है।
साधना की होंगी, उसकी तुलना में वह तुच्छ है। आभा मण्डल के बहुलीकरण की समष्टि में संव्याप्त होने की यह युग साधना ऋषि तंत्र की विधि व्यवस्था का ही एक है। जो उनके जीवन क्रम से भली-भांति अवगत है, वे जानते हैं कि पूर्व में भी वे ऐसा एकाकी साधनाक्रम वे एक-एक वर्ष के लिये चार बार सम्पन्न कर चुके हैं। प्रस्तुत संकल्प बड़ी विकट घड़ियों में युग सन्धि की विषम बेला में लिया गया है। सभी परिजन इस युग साधना में सहभागी हैं।
साधना प्रक्रिया द्वारा भी मनःस्थिति द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित की जा सकती हैं। विज्ञान का यह स्थूल पक्ष तो इस दिशा में संकेत भर देता है। इससे आगे की- शरीर की ‘सटलर’ जानकारी एवं उसे उपकरण मानकर विद्यमान ऊर्जा सम्पादन का सदुपयोग- सुनियोजन योग शास्त्रों में वर्णित है। इस ज्ञान का लाभ उठाया जा सके तो वह सब कुछ अर्जित कर सकना संभव है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में वर्णित किया जाता है।
साधना पराक्रम द्वारा इस भाव मंडल को ही प्रखर शक्तिशाली बनाया जाता है। इस माध्यम से वे सभी मानवेत्तर पुरुषार्थ सम्पन्न किए जा सकते हैं जो सामान्य व्यक्ति के लिए असम्भव माने जाते हैं। जैन मत के प्रतिपादक तीर्थांकर महावीर ने इसी आधार पर लेक्ष्या के सिद्धान्त को जन्म दिया था जिसका पूरा ढाँचा ही पुद्गल (सूक्ष्माणु) प्राण ऊर्जा एवं भाव मण्डल पर आधारित है।
साधना के द्वारा प्राण ऊर्जा का सम्वर्धन भली प्रकार सम्भव है। इसके लिये उचित वातावरण मिल सके तो ठीक, नहीं तो आत्मशोधन एवं साधना प्रक्रिया द्वारा भी मनःस्थिति द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित की जा सकती हैं। विज्ञान का यह स्थूल पक्ष तो इस दिशा में संकेत भर देता है। इससे आगे की- शरीर की ‘सटलर’ जानकारी एवं उसे उपकरण मानकर विद्यमान ऊर्जा सम्पादन का सदुपयोग- सुनियोजन योग शास्त्रों में वर्णित है। इस ज्ञान का लाभ उठाया जा सके तो वह सब कुछ अर्जित कर सकना संभव है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में वर्णित किया जाता है।
साधना की, परोक्ष में क्रियाशील रहे एवं युग परिवर्तन की प्रचंड आंधियां ला सकने में समर्थ हुए। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द से लेकर रामतीर्थ, योगीराज अरविन्द, महर्षि रमण आदि का नाम इसी सन्दर्भ में लिया जाता है। जिनका नाम इस सूची में नहीं है, वे सदा से उत्तराखण्ड की कंदराओं में तप साधना में निरत हैं एवं सारे लीला संदोह को देख रहे हैं जो प्रत्यक्ष में दृश्यमान है, परोक्ष में घटने वाला है।
साधना मार्गदर्शन दे पाने में भी समर्थ होते हैं।
साधना में नियोजित किया जाना एवं सीमित समुदाय से ऊँचा उठ कर सारी वसुधा के हित साधन हेतु खपा देना। आज की परिस्थितियों में जो अनिवार्य था वही गुरुदेव ने किया है। उनकी एकाकी सूक्ष्मीकरण साधना का स्तर बहुत ऊँचा है। प्रत्यक्ष दर्शन न हो पाने का अभाव खलता तो है पर जो फलदायी परिणतियां उस तप साधना की होंगी, उसकी तुलना में वह तुच्छ है। आभा मण्डल के बहुलीकरण की समष्टि में संव्याप्त होने की यह युग साधना ऋषि तंत्र की विधि व्यवस्था का ही एक है।
साधना की, सूक्ष्मीकरण की तप साधना की प्रतिक्रिया ओजस्, तेजस् वर्चस् की वृद्धि के रूप में होती है। ऐसे ऋषि कल्प महामानव गिने चुने होते हैं लेकिन उनके मौन होते हुए भी दृष्टिपात का, वाणी के द्वारा सत्परामर्श सत्संग का लाभ एक विशाल समुदाय को मिलता है। ओजस के क्षेत्र को रोकने के लिये वे तप-पुरुषार्थ हेतु एकाकी मौन साधना का अवलम्बन लेते हैं। जो भी इस सम्पर्क सान्निध्य की लपेट में आता है, उसे यह तेजोवलय बदलने- प्रभावित करने में सफल होता है। महामानवों के आश्रमों में, सिद्ध पीठों में जो प्रभाव सामर्थ्य रहती है, उसके मूल में यह प्रकाश पुंज- तेजोवलय ही काम करती है जो उनके वहां प्रत्यक्ष रूप में न रहने पर भी बनी रहती है।
साधना क्रम चल रहा है वह ऐसी ही प्रक्रिया का एक अंग है। इसमें सहभागी बनने हेतु जन्मी जागृतात्माएँ जो भूमिकाएँ निभाएंगी, वह समय के दृश्य पटल पर शीघ्र ही परिलक्षित होगा।
साधना बताया है। आहार के संयम से आरोग्य, और दीर्घ जीवन दोनों मिलते हैं। मौन धारण का अभ्यास समस्त तपों में उच्चकोटि का है। एकाग्रता और एकात्मता दोनों की साधनाएँ मौन धारण से बनी हैं। जिसने जिह्वा की यह दोनों साधनाएं कर लीं समझना चाहिए कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया।
साधना का स्तर बहुत ऊँचा है। प्रत्यक्ष दर्शन न हो पाने का अभाव खलता तो है पर जो फलदायी परिणतियां उस तप साधना की होंगी, उसकी तुलना में वह तुच्छ है। आभा मण्डल के बहुलीकरण की समष्टि में संव्याप्त होने की यह युग साधना ऋषि तंत्र की विधि व्यवस्था का ही एक है। जो उनके जीवन क्रम से भली-भांति अवगत है, वे जानते हैं कि पूर्व में भी वे ऐसा एकाकी साधनाक्रम वे एक-एक वर्ष के लिये चार बार सम्पन्न कर चुके हैं। प्रस्तुत संकल्प बड़ी विकट घड़ियों में युग सन्धि की विषम बेला में लिया गया है।
साधना कही जाती है।
साधना का है। इस संदर्भ में मानवी काया का नहीं, चेतन सत्ता की गरिमा का महत्व है। जड़ पदार्थों पर लागू सूक्ष्मीकरण सिद्धान्त जब चेतना क्षेत्र में प्रयुक्त होता है तो उसकी चमत्कारी परिणतियाँ देखने में आती हैं। सुगठित अंग अथवा गौरवर्ण काया मनुष्य की महत्ता नहीं बढ़ाते, उसकी ज्ञान गरिमा एवं भाव संवेदना की प्रखरता ही उसे आत्मिक दृष्टि से ऊँचा उठाते हैं। ज्ञान को मस्तिष्क रूपी खरल में जितना घोटा जाता है, साधना, स्वाध्याय-सत्संग द्वारा जितना प्रखर बनाया जाता है, उतना ही वह सूक्ष्मतम बनते हुए मस्तिष्क कोष्ठों में सम्पादित होता जाता व मनुष्य को प्रज्ञावान बनाता है।
साधना में जुड़ जाती हैं। उसकी सफलता असंदिग्ध होती है जो ऐसे ही उलटे सीधे अक्षर दुहराते रहते हैं जिन्हें शास्त्र विधि का ज्ञान नहीं है, जो मर्यादा पालन नहीं करते, जो व्रत धारण नहीं करते उनके मन्त्र सफल नहीं होते।
साधनाएँ मौन धारण से बनी हैं। जिसने जिह्वा की यह दोनों साधनाएं कर लीं समझना चाहिए कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया। जिसका इन्द्रिय संयम पर्ण हो गया वह सच्चे अर्थों में तपस्वी है। तपस्वी की वाणी अमोघ होती है। वह शब्द वेध- बोलता है।
साधना कहा जा सकता है जो युग समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में समष्टि चेतना को मथने के लिये सम्पादित की जाती है। यह साधना रई की भूमिका निभाती है जो महाकाल के इशारे पर युग ऋषियों द्वारा सम्पन्न की जाती है। प्रत्यक्ष में तो कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता लेकिन इससे परोक्ष वातावरण बनता है एवं परमाणु विखण्डन की पूर्व भूमिका बनती है। चेतना के समुद्र का यह मंथन नियन्ता की विधि-व्यवस्था का ही एक अंग है, जिसे सम्पन्न करने के लिये ऋषि आत्माएँ स्वयं आगे आती हैं।
साधना तत्काल प्रतिफल देने वाली है, लेकिन इसका क्रम ज्ञानयोग, कर्मयोग की सिद्धि के बाद ही आता है। श्रद्धा को श्रेष्ठता से प्यार माना गया है एवं भक्ति को उदार आत्मीयता एवं सेवा सज्जनता। पात्रता प्राप्ति के बाद की गयी निश्छल प्रार्थना निश्चित ही अपने सुपरिणाम दिखाती है साधक को धन्य बना देती है।
साधना ऋषि तंत्र की विधि व्यवस्था का ही एक है। जो उनके जीवन क्रम से भली-भांति अवगत है, वे जानते हैं कि पूर्व में भी वे ऐसा एकाकी साधनाक्रम वे एक-एक वर्ष के लिये चार बार सम्पन्न कर चुके हैं। प्रस्तुत संकल्प बड़ी विकट घड़ियों में युग सन्धि की विषम बेला में लिया गया है। सभी परिजन इस युग साधना में सहभागी हैं। हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल होगा।
साधना के इस पुरुषार्थ के बलबूते ही हम यह कह सकते हैं कि छोटे-छोटे अकिंचन माने जाने वाले मनुष्य इतनी समर्थ भूमिका निभाएंगे कि पर्वत जैसी अवांछनीयताओं को उलट पाना एवं स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों का नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके। जो समर्थ होता है, वही पुरुषार्थ कर दिखाने का दावा कर सकता है। विचार-क्रान्ति शब्द तो अच्छा है किन्तु व्यवहार में इसे प्रयुक्त कर दिखाने के लिये एक समर्थ, दैवी तन्त्र का संरक्षण चाहिए। हमारा दावा है कि असंभव को संभव कर दिखाने का यह पुरुषार्थ आगामी पन्द्रह वर्षों में सम्पन्न होकर रहेगा। विवेक और श्रद्धा के जिस समन्वित ऋतम्भरा रूप का- आद्य शक्ति का अवलम्बन कर लिया है, उसमें लाखों-करोड़ों को अपना सहयोगी बनाया है।
साधना रई की भूमिका निभाती है जो महाकाल के इशारे पर युग ऋषियों द्वारा सम्पन्न की जाती है। प्रत्यक्ष में तो कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता लेकिन इससे परोक्ष वातावरण बनता है एवं परमाणु विखण्डन की पूर्व भूमिका बनती है। चेतना के समुद्र का यह मंथन नियन्ता की विधि-व्यवस्था का ही एक अंग है, जिसे सम्पन्न करने के लिये ऋषि आत्माएँ स्वयं आगे आती हैं।
साधना की प्रतिक्रिया ओजस्, तेजस् वर्चस् की वृद्धि के रूप में होती है। ऐसे ऋषि कल्प महामानव गिने चुने होते हैं लेकिन उनके मौन होते हुए भी दृष्टिपात का, वाणी के द्वारा सत्परामर्श सत्संग का लाभ एक विशाल समुदाय को मिलता है। ओजस के क्षेत्र को रोकने के लिये वे तप-पुरुषार्थ हेतु एकाकी मौन साधना का अवलम्बन लेते हैं। जो भी इस सम्पर्क सान्निध्य की लपेट में आता है, उसे यह तेजोवलय बदलने- प्रभावित करने में सफल होता है। महामानवों के आश्रमों में, सिद्ध पीठों में जो प्रभाव सामर्थ्य रहती है, उसके मूल में यह प्रकाश पुंज- तेजोवलय ही काम करती है जो उनके वहां प्रत्यक्ष रूप में न रहने पर भी बनी रहती है।
साधना, गुरु के संरक्षण, अटूट श्रद्धा यह सभी बातें जिस साधना में जुड़ जाती हैं। उसकी सफलता असंदिग्ध होती है जो ऐसे ही उलटे सीधे अक्षर दुहराते रहते हैं जिन्हें शास्त्र विधि का ज्ञान नहीं है, जो मर्यादा पालन नहीं करते, जो व्रत धारण नहीं करते उनके मन्त्र सफल नहीं होते।
साधना उपक्रमों की चर्चा करते हुए कहते हैं कि इनके माध्यम से अपने बहिरंग वातावरण को ऋण आवेशयुक्त बनाना संभव है।
साधना को उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
साधना, एकान्त सेवन की प्रक्रिया सम्पन्न करते थे, ताकि वर्ष में एक बार प्रत्यावर्तन होता चले एवं आयुष्य बढ़ती रहे।
साधनाजन्य ऊर्जा दृश्यमान काया का ही परिवर्तित रूप है जो तेजस्, वर्चस् के रूप में बहुमूल्य निधि की भूमिका निभाती देखी जाति है। “अणोरणीयान महतो महीयान” का श्रुति वचन इसी तथ्य का साक्षी है कि लघुतम से घटक में महानतम संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं। इसीलिये श्रुति में ऋषि कह बैठते हैं-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-March
साधना से न केवल प्रस्तुत परिकर को, अपितु समस्त मानव समुदाय को युगसन्धि की इस बेला में मथ देने एवं समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए यह अनिवार्य भी था।
साधना॥
गति रहे उर्ध्वगामी सदा इसलिये।
साधना करते थे और प्रतिदिन सायंकाल ग्रामवासियों को एकत्रित कर उन्हें ज्ञान दान भी दिया करते थे। साधु का ही प्रभाव था कि गाँव में न कोई चोरी करता था और न छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष और बेईमानी। सब लोग प्रेम पूर्वक रहते थे।
साधना के लिए पहुँचते हैं, उन्हें सहज ही यह अनुभूति होती है, जैसे सात्विक विचारों की वर्षा हो रही हो। मन अपने आप लगने लगता तथा किसी समर्थ सत्ता के अस्तित्व में विश्वास जमने लगता है।
साधना पूरी करना है। आप थोड़ा ठहरें।
साधना वे जीवन की शेषावधि में पूरी करना चाहते हैं। इसे परोक्षतः महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण सोपान समझा जा सकता है। सूक्ष्मीकृत हो तप साधना से न केवल प्रस्तुत परिकर को, अपितु समस्त मानव समुदाय को युगसन्धि की इस बेला में मथ देने एवं समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए यह अनिवार्य भी था।
साधनारत रह परोक्ष जगत की अपनी प्रचण्ड प्राण ऊर्जा से अभिपूरित करेंगे। चर्मचक्षुओं से दर्शन, मनोकामना की पूर्ति आने वाले इस दृष्टि से निराश होंगे लेकिन वे नहीं जो उनके जीवन दर्शन को समझते हैं। उन्होंने जीवन भर उपासना की है- स्वयं को धोया है- बदले में दैवी अनुकम्पा पाकर उससे अनेकों को अनुदान दिये हैं। अब लगभग अपने पूर्व में सम्पन्न गायत्री महापुरश्चरणों के समकक्ष प्रचण्ड साधना वे जीवन की शेषावधि में पूरी करना चाहते हैं। इसे परोक्षतः महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण सोपान समझा जा सकता है।
साधना कर सकते हैं, उन्हीं को अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने और अफसर बनने का सुयोग मिलता है। जिन्हें आवारागर्दी ही पसन्द है, जो मटरगश्ती करते, ताश-शतरंज में समय गुजारते, किताब बेच कर सिनेमा देखते और फीस जमा करने के लिए मिले पैसों से यारबाजी से सुगल पूरे करते हैं, वे तत्काल तो मस्ती दिखाते और इतराते हुए खुशमिज़ाज दीखते हैं, पर कुछ ही समय बाद यह संकट आ धमकता है, जिसमें भर्त्सना, प्रताड़ना, लज्जा और दुर्गति के प्रहार पर प्रहार होने लगते हैं। अप्रामाणिक ठहरते और जहाँ जाते वहीं दुत्कारे जाते हैं। कुसंग में भटकने वाले बालक किस प्रकार अपना भविष्य बिगाड़ते हैं, इसके ढेरों उदाहरण अपने इर्द-गिर्द ही दृष्टि पसार कर देखे जा सकते हैं। समझदारी ही बताती है कि दूरदर्शिता अपनाने में लाभ है या तत्काल लाभ की आतुरता में कुमार्ग अपनाने में।
साधना के चरण॥
की अंतः ज्ञान की मुक्त आराधना।
साधना सत्रों का क्रम यथावत् रहेगा। दस-दस दिन के तीन सत्र हर माह चलते रहेंगे। अपनी बैटरी चार्ज कराने- जनरेटर से अपना स्थायी सम्पर्क जोड़ने के लिए परिजनों को इन सत्रों में वर्ष में न्यूनतम एक या दो बार तो आना ही चाहिए।
साधना के चरण॥
साथ पग के चलें मन तथा भावना।
साधना करने पर विशेष जोर दिया है। उनका एक ही निर्देश है कि परिजन शरीर दर्शन का मोह छोड़ें, उनका जीवन दर्शन ग्रहण करें। वे स्वयं निवृत्ति परक मोड़ लेकर स्वयं को तप साधना में खपाने जा रहे हैं ताकि प्रज्ञा परिवार में प्रखरता उभरे, सक्रियता आए एवं इस विषम बेला में समुचित दायित्व निभाने हेतु इस मिशन के क्रिया-कलाप और तेजी से चल पड़ें।
साधनाएँ ध्यानयोग कहलाती हैं। उसके कितने ही प्रयोग ऐसे हैं जो सचेतन को शान्त और अचेतन को उत्साहित करने का दुहरा प्रयोजन पूरा कर सके। यह स्थिति जिसमें जितनी मात्रा में बन पड़ती है वह अतीन्द्रिय क्षेत्र की प्रगति में उतना ही अधिक सफल हो सकता है।
साधना नहीं करते, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ पूरा करते रहने का कर्मयोग भी उतना ही फलप्रद है।” तपस्वी का समाधान हुआ अहंकार और अज्ञान गला। कर्मयोग की महत्ता समझते हुए वे बिदा हो गये।
साधना में खपाने जा रहे हैं ताकि प्रज्ञा परिवार में प्रखरता उभरे, सक्रियता आए एवं इस विषम बेला में समुचित दायित्व निभाने हेतु इस मिशन के क्रिया-कलाप और तेजी से चल पड़ें।
साधना के चरण॥
साधना को प्रमुखता देने के कारण आपको प्रतीक्षा करनी पड़ी। इनके लिए क्षमा करें। आज आपकी जिज्ञासा का समाधान करता हूँ। सुने- “मात्र ध्यान योग हठयोग आदि की ही साधना नहीं करते, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को समझदारी, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ पूरा करते रहने का कर्मयोग भी उतना ही फलप्रद है।” तपस्वी का समाधान हुआ अहंकार और अज्ञान गला।
साधना और सहयोग के आदान-प्रदान का द्वारा ही नहीं खुलेगा। इसीलिए नीर-क्षीर विवेक की नीति को बुद्धिमत्तापूर्ण बनाया, सराहा और अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है।
साधना है। मैंने उसी में संलग्न रहकर कितनी ही सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हैं जिसमें से एक दूर की घटनाओं को जान लेना भी है।
साधना जब उच्च स्तर की होती है तो साधक की मनःस्थिति को उत्कृष्ट बनाने एवं संव्याप्त अवांछनीयता के निवारण हेतु अभीष्ट बल देंगे में सहायक होती है।
साधना के चरण।
साधना की सामर्थ्य के रूप में जाना जाता है। इस तप बल के अभाव में व्यक्ति शरीर व मस्तिष्क से स्वस्थ होते हुए भी आत्मबल से वंचित ही रहता है, साधना बिना वस्तुतः साधनों की कोई उपयोगिता नहीं। जीवन साधना जहाँ दैनिक जीवन व्यापार में मानवी काया में बन पड़ने वाले अनगढ़ क्रिया-कलापों को सुगढ़ बना देती है। वहाँ अन्तर्गत की तप साधना जब उच्च स्तर की होती है तो साधक की मनःस्थिति को उत्कृष्ट बनाने एवं संव्याप्त अवांछनीयता के निवारण हेतु अभीष्ट बल देंगे में सहायक होती है।
साधना जहाँ दैनिक जीवन व्यापार में मानवी काया में बन पड़ने वाले अनगढ़ क्रिया-कलापों को सुगढ़ बना देती है। वहाँ अन्तर्गत की तप साधना जब उच्च स्तर की होती है तो साधक की मनःस्थिति को उत्कृष्ट बनाने एवं संव्याप्त अवांछनीयता के निवारण हेतु अभीष्ट बल देंगे में सहायक होती है।
साधना बिना वस्तुतः साधनों की कोई उपयोगिता नहीं। जीवन साधना जहाँ दैनिक जीवन व्यापार में मानवी काया में बन पड़ने वाले अनगढ़ क्रिया-कलापों को सुगढ़ बना देती है। वहाँ अन्तर्गत की तप साधना जब उच्च स्तर की होती है तो साधक की मनःस्थिति को उत्कृष्ट बनाने एवं संव्याप्त अवांछनीयता के निवारण हेतु अभीष्ट बल देंगे में सहायक होती है।
साधना सिद्ध करती है।
साधना है। आवश्यक नहीं कि बड़े या बहुत ही कम आयु समझ वालों को सिखाये। बहुत बार छोटे और अनपढ़ भी बड़ों को इतना अधिक सिखा देते हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
साधना करते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-May
साधना ही वह सुगम और सहज-सुलभ मार्ग है, जिसके माध्यम से समष्टिगत प्राण से स्वयं को ऊर्जावान— प्रकाशवान बनाया जा सकता है।
साधना ग्रंथों, उपनिषदों में पवित्र जीवन-अग्नि, पंचाग्नि के रूप में कुंडलिनी शक्ति का वर्णन है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को उष्ण एवं प्रकाशवान बना देती है, वैसा ही प्रकाश कुंडलिनी जागरण का भी होता है। मंडल ब्राह्मणोपनिषद् में ऋषि लिखते हैं—
साधना उपक्रमों को आरंभ किया जाना चाहिए।
साधना हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए थे। अरविंद जिन दिनों बड़ौदा में रह रहे थे, उन दिनों का एक अनुभव बताते हुए उन्होंने लिखा है कि, “एक बार जब वे कैंप रोड शहर की ओर जा रहे थे, तब एक दुर्घटना से किसी ज्योतिपुरुष ने उन्हें बचाया।”
साधना से बड़ा महत्त्वपूर्ण सहयोग मिलता है। कहा जा सकता है कि कुंडलिनी-साधना ही वह सुगम और सहज-सुलभ मार्ग है, जिसके माध्यम से समष्टिगत प्राण से स्वयं को ऊर्जावान— प्रकाशवान बनाया जा सकता है।
साधना के अनेकों उपक्रम शास्त्रों में वर्णित हैं। ये दोनों मिलकर आत्मिकी की विधा को पूर्ण बनाते हैं। एक शिव है एवं दूसरी शक्ति। दोनों मिलकर संपूर्ण बनते हैं।
साधना के माध्यम से दैवी संपर्क स्थापित करते हैं, जबकि तांत्रिक शक्ति के उपासक होते हैं। वे प्रकृति में विद्यमान अपरिमित शक्ति-स्रोतों से अपना संपर्क स्थापितकर कुंडलिनी केंद्र को जगाने व प्रकृति से आदान-प्रदान का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार शरीर की ये दोनों ही सूक्ष्मपरतें अदृश्य रूप में ब्रह्म एवं प्रकृति से घनिष्ठता स्थापित कर वांछित अनुदान अपने लिए प्राप्त करते, अंतः को बलिष्ठ बनाकर अन्यान्यों को लाभान्वित करते देखे जा सकते हैं। योग एवं तंत्र के समूचे विज्ञान को इस रूप में भली-भाँति समझकर ही साधना उपक्रमों को आरंभ किया जाना चाहिए।
साधना के बिना, कषाय-कल्मषों को हटाए बिना ये चमत्कारी विभूतियाँ हस्तगत होती नहीं। ये कुछ प्रारंभिक शर्तें हैं। जिन्हें पूरी किए बिना न योग-साधना सध पाती है, न तंत्र-साधना ही संभव हो पाती है। योगी अपने प्रचंड आत्मबल के सहारे इस दीवाल को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं। इसी प्रकार तांत्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं, जो उन्हें अभीष्ट होता है।
साधना से सिद्धि का यथार्थवादी रहस्य हस्तगत करके जिन्हें निहाल बनना है, बन सके।
साधनाओं के उपरांत जब तपस्वी उठते हैं, तो वे क्षीण— असमर्थ नहीं होते, वरन पहले की अपेक्षाकृत अधिक समर्थता संचित कर चुके होते हैं।
साधना का आश्रय लेकर इड़ा-पिंगला की आयानिक सघनता बढ़ाई व ऊर्ध्वगमन की प्रतिक्रिया गतिशील बनाई जाती है। यह क्षेत्र जिसकी संज्ञा दक्षिणी ध्रुव से दी जाती है, एक प्रकार का बायो-कंडेंसर है, जहाँ चुंबकीय बल सम मात्रा में केंद्रित एवं सघन होता है।
साधना करनी पड़ती है। आवश्यकता अपनी पुरुषार्थ को पहचानने, आत्मशोधन एवं आत्मविकास के प्रयोजन पूरेकर संकल्पशक्ति के सुनियोजन भर की है।
साधना करने जैसे कार्यों से रोका नहीं, जो प्रत्यक्षतः वियोग या उदासी की स्थिति उत्पन्न करते थे। सच्चे आत्मीयजनों के लिए भी यही बुद्धिमत्ता है कि वे मन छोटा न करें और उस दुस्साहस को सराहें, जिसके कारण ऋषिपरंपरा के पुनर्जीवित जैसा प्रमाण सामने आ रहा है।
साधना द्वारा उपलब्ध की जा सकती हैं; क्योंकि वस्तुतः शरीरगत ध्रुवों का ज्यों-का-त्यों लेखा-जोखा ही कुंडलिनी विज्ञान में सन्निहित है।
साधना में— भैरवसिद्धि में वस्तुतः आत्मसत्ता को ही गुणित किया जाता है। ‘सुकरात’ का अदृश्य सहयोगी ‘डेमन’ इसी प्रकार उत्पन्न किया हुआ था।
साधना में नादबिंदु योग के उपक्रम के विस्तार में जब आज्ञाचक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है, तो रंग-बिरंगी झिलमिल किरणें उपजती, उड़ती और विलीन होती दिखती हैं। यह दिव्यशक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिह्न माना जाता है। यह झिलमिल ऊर्जा-प्रवाह उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरंध्र में चुंबकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करता है। ज्ञातव्य है कि सूर्य इन दोनों ध्रुवों को ही अपनी अत्यधिक शक्ति प्रदान करता है। फिर भी वे इसलिए ठंडे हैं कि वहाँ सूर्य की रोशनी तथा गरमी फैलकर नष्ट हो जाती है।
साधना के विभिन्न उपक्रम हैं, जब कि पाताललोक— अधोलोक— मूलाधार में अवस्थित कुंडलिनी में स्पंदन पैदा करने के लिए तंत्र-साधना के अनेकों उपक्रम शास्त्रों में वर्णित हैं। ये दोनों मिलकर आत्मिकी की विधा को पूर्ण बनाते हैं। एक शिव है एवं दूसरी शक्ति। दोनों मिलकर संपूर्ण बनते हैं।
साधना द्वारा उत्पन्न की है। अब वे इस भांडागार का नए सिरे से समुद्रमंथन करने चले हैं। इस दुस्साहस के पीछे किसी को भी पलायन की गंध भी नहीं सूँघनी चाहिए।
साधना-संदोह को इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया प्रचंड प्रयत्न समझा जा सकता है। ऐसे महान उत्तरदायित्वों का सफल निर्वाह हर कोई नहीं कर सकता। किला तोड़ने के लिए डायनामाइट वाली तोप चाहिए। डूबने वाले जहाज को किनारे तक घसीट लाने के लिए शक्तिशाली क्रेन चाहिए। ग्रीष्म से जलते धरातल को शीतल और हरा-भरा बनाने के लिए सावन के बादल को मूसलाधार बरसना चाहिए।
साधना का आश्रय लेना पड़ता है।
साधना के— तप-तितीक्षा के छोटे-बड़े प्रयोग इसलिए किए जाते हैं कि किसी प्रकार संकल्पशक्ति के जगने एवं सुदृढ़ होने का अवसर मिले। भौतिक-क्षेत्र में अभीष्ट स्तर की सफलता के लिए तदनुरूप प्रयास करने पड़ते हैं। मनःक्षेत्र आत्मिकी की परिधि में आता है। किसी-किसी में संस्कारोंवश सहज ही उभार आता है, जबकि किसी-किसी को पुरुषार्थ— साधना करनी पड़ती है। आवश्यकता अपनी पुरुषार्थ को पहचानने, आत्मशोधन एवं आत्मविकास के प्रयोजन पूरेकर संकल्पशक्ति के सुनियोजन भर की है।
साधना, आत्मनियंत्रण एवं समाज-आराधना पर विशेष बल देता है। यह धर्म का एक अपरिहार्य, अपरिवर्तनशील, सार्वभौम रूप है, जिसमें किसी मिलावट— विकृति की कोई संभावना नहीं। यही वह शाश्वत अध्यात्म है, जिसे पूर्वार्त्त दर्शन के नाम से जाना जाता है। तर्कवाद ने इसे अपनी लपेट में लेने का कभी प्रयास नहीं किया; क्योंकि शाश्वत नैतिक मूल्यों में अपने पैर जमाने का उसे कभी कोई अवसर नहीं मिला। धर्म का पहला आयाम परिवर्तनशील है; लेकिन सुसंगत भी है; किंतु तभी, जबकि इसका स्वरूप शीशे के समान साफ हो।
साधनाक्रम हेतु महत्त्वपूर्ण निर्देश भी मिले।”
साधना-पुरुषार्थ का प्रतिफल ही बताते हैं।
साधना आदि में ऐसी ही स्थिरता अपेक्षित होती है। ऐसी उग्र साधनाओं के उपरांत जब तपस्वी उठते हैं, तो वे क्षीण— असमर्थ नहीं होते, वरन पहले की अपेक्षाकृत अधिक समर्थता संचित कर चुके होते हैं।
साधना सध पाती है, न तंत्र-साधना ही संभव हो पाती है। योगी अपने प्रचंड आत्मबल के सहारे इस दीवाल को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं। इसी प्रकार तांत्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं, जो उन्हें अभीष्ट होता है।
साधना ही संभव हो पाती है। योगी अपने प्रचंड आत्मबल के सहारे इस दीवाल को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं। इसी प्रकार तांत्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं, जो उन्हें अभीष्ट होता है।
साधना एवं किसी से न मिलने के उनके निर्णय की स्थिति में अब यही एक मात्र माध्यम रह गया है। इन पंक्तियों में यही अनुरोध किया जा रहा है कि वर्तमान पाठक जून के अंक की अतिरिक्त तीन प्रतियाँ पाँच रुपया भेजकर और मँगा लें। एक अपनी, तीन अतिरिक्त। कुल तीन को संपर्क क्षेत्र में पढ़ाना आरंभ करें और न्यूनतम बीस विज्ञजनों को पढ़ाएँ। इसे गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सौंपा गया विशेष उत्तरदायित्व समझें और पूरा करें।
साधना की सघन ताप में, छाछ कैसे पिघल पाएगा॥
साधना द्वारा जगाया जा सके, तो एक ही व्यक्तित्व उतने समर्थ व्यक्तियों की भूमिका एक ही समय में संपन्न करता रह सकता है, जितनी कि उसकी परतें जागृत हो सकी होती हैं। इन पाँच कोशों को पाँच देवता कहा गया है। विक्रमादित्य के पास पाँच अदृश्य वीर थे। कंसमर्दन के समय, रासलीला के समय कृष्ण के अनेक स्तर के, अनेकों शरीर देखे गए। यह वस्तुतः अवतार-प्रक्रिया की लीला होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-June
साधना यह तीन परीक्षाएँ, मुझे छोटी उम्र में ही पास करनी पड़ीं। आन्तरिक दुर्बलताएँ और सम्बद्ध परिजनों के दुहरे मोर्चे पर एक साथ लड़ा। उस आत्मविजय का ही परिणाम है कि आत्मबल संग्रह में अधिक लाभ से लाभान्वित होने का अवसर मिला। यदि दूसरों की तरह पूंजी-पत्री के छुटपुट ताने-बाने बुनते हुए आकाश-पाताल जैसे लाभ उठाने के सपने देखता रहता तो कदाचित् अपने हाथ भी विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ न लगा होता।
साधनाओं से अदृश्य जगत का परिशोधन भी होता चलता है। यही कारण है कि अध्यात्म-वेत्ता लोक-साधना और अध्यात्म साधना को समान महत्व देते हैं। दोनों के लिए समान प्रयत्न करते हैं।
साधना का निचोड़ है जिसकी एक-एक पंक्ति में अध्यात्म तत्वज्ञान के रहस्य कूट-कूट कर भरे हैं। समूचे अंक में यही एक सामग्री है। इसे आजीवन संग्रहणीय समझा जाना चाहिए। माननीय तथा जीवन में उभारने योग्य भी।
साधना ही एकमात्र विधान उपचार है। वह सुविधा भरी- विलासी रीति-नीति अपनाकर सम्पादित नहीं की जा सकती। एकाग्रता और एकात्मता संपादित करने के लिए बहुमुखी डडडडब्राहाचरों में प्रचार प्रयोजनों में भी निरत नहीं रहा जा सकता। उससे शक्तियाँ बिखरती हैं। फलतः केन्द्रीकरण का वह प्रयोजन पूरा नहीं होता जो सूर्य किरणों की आतिशी शीशे पर केन्द्रित करने की तरह अग्नि उत्पादन जैसी प्रचण्डता उत्पन्न कर सके।
साधना नहीं बन पड़ी, उसका चिन्तन, चरित्र, आहार, विहार मस्तिष्क अवाँछनीयताओं से भरा रहेगा। फलतः मन लगेगा ही नहीं। लिप्साएं और तृष्णायें जिसके मन को हर घड़ी उद्विग्न किये रहती हैं, उससे न एकाग्रता सधेगी और न चित्त की तन्मयता आयेगी। कर्मकाण्ड की चिन्ह पूजा भर से कुछ बात बनती नहीं। भजन का भावनाओं से सीधा सम्बन्ध है।
साधना बल से जागृत करके एक नया समर्थ सहयोगी सृजा जाता है। भैरव आदि की सिद्धि किन्हीं समर्थ आत्माओं के साथ सहयोग भरी घनिष्ठता प्राप्त कर लेना ही है। यह अदृश्य सहायकों का क्षेत्र है। ऐसी आत्माएँ आवश्यकतानुसार व्यक्ति विशेष की भी उद्देश्य पूर्ण सहायता करती हैं। विशेषतया उनमें से जो उच्चस्तरीय हैं, वे वातावरण की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने, दिव्य प्रेरणाएँ देने, सत्प्रयोजनों की सफलता में हाथ बँटाने जैसे कार्यों में लगी रहती हैं।
साधना और पाना चलता रहा है। इनमें से अधिकाँश को प्रकाश और परिवर्तन का अवसर मिला है।
साधना के परमार्थ का प्रतिफल ऐसा है जो हाथों हाथ मिलता है। आत्मसन्तोष, लोक सम्मान, देवी अनुग्रह के रूप में तीन गुना सत्परिणाम प्रदान करने वाला यह व्यवसाय ऐसा है जिसमें जिसने भी हाथ डाला कृतकृत्य होकर रहा है। कृपण ही हैं जो चतुरता में दम भरते किन्तु हर दृष्टि से घाटा ही घाटा उठाते हैं।
साधना का महत्व तब घटता है जब उसके बदले नामवरी लूटने की ललक होती है। यह तो अखबारों में इश्तहार छपा कर विज्ञापन बाजी करने जैसा व्यवसाय है। एहसान जताने और बदला चाहने से भी पुण्यफल नष्ट होता है। दोस्तों के दबाव से किसी भी काम के लिए चंदा दे बैठने से भी दान की भावनापूर्ण नहीं होती। देखा यह जाना चाहिए कि इस प्रयास के फलस्वरूप सद्भावनाओं का संवर्धन होता है या नहीं, सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने का सुयोग बनता है या नहीं।
साधना से अतिशय प्रसन्न हुए और एक ऐसी अक्षय झोली दे गये, जिसका अन्न कभी निपटा ही नहीं और अभी भी वीरपुर (गुजरात) में उनका अन्न सत्र चलता रहता है, जिसमें हजारों भक्तजन प्रतिदिन भोजन करते हैं। जो अपना लगा देता है उसे बाहर का सहयोग बिना माँगे मिलता है। पर जो अपनी पूँजी सुरक्षित रखता है, दूसरों से मांगता फिरता है, उस चन्दा उगाहने वाले पर लोग व्यंग्य ही करते रहते हैं और यत्किंचित् देकर पल्ला छुड़ाते रहे हैं।
साधनारत सिद्ध पुरुषों द्वारा महान कार्य सम्पन्न होते रहे हैं। यही उनका सिद्धि चमत्कार है। देश में स्वतन्त्रता आन्दोलन आरम्भ कराने के लिए समर्थ गुरु रामदास एक मराठा बालक को आगे करके जुट गये और उसे आश्चर्यजनक सीमा तक बढ़ा कर रहे। बुद्ध ने संव्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध विश्वव्यापी बुद्धिवादी आन्दोलन चलाया और उसे समूचे संसार तक विशेषतया एशिया के कौने-कौन में पहुँचाया। गान्धी ने सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा।
साधना करते रहे हैं। इससे उनके व्यक्तित्व में परिष्कार हुआ है, मनोविकारों से मुक्ति मिली है एवं भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करने में मदद मिली है। विज्ञान सम्मत पद्धति से ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में उनका पर्यवेक्षण थर इसे सत्यापित भी किया गया है।
साधना की सिद्धी कहते चले गए।
साधना से मनुष्य दृश्य और अदृश्य जगत के साथ सम्बन्ध स्थापित कर सकता है और प्रकृति क्षेत्र में जो चल रहा है जो चलने वाला है। उसका पूर्वाभास भी प्राप्त कर सकता है।
साधना के- सम्भव नहीं हो सकती। इसे योगाभ्यास तपश्चर्या का अगला चरण कहना चाहिए।
साधना से सिद्धि” के सिद्धान्त पर जिन्हें अनेकों सन्देह थे, जो फलश्रुतियों को प्रत्यक्ष की कसौटी पर खरा उतरते नहीं देखते थे, उन्हें ऋद्धि-सिद्धियों की बात कपोल-कल्पना भर लगती थी, ऐसे निराशा, उदास, दुःखी, असन्तुष्ट, अन्यमनस्क और अविश्वास की ओर चल पड़े लोगों में से अनेकों ने अपने विचार बदले हैं। प्रत्यक्ष परिणति देखकर उनके डगमगाते हुए पैर रुके हैं। अब जब कि वह प्रत्यक्ष प्रकाश भी बुझने जा रहा है तो अपना और किसी दूसरे का कब किस प्रकार वह विश्वास और साहस प्राप्त कर सकेगा जो पिछले दिनों करता रहा है।
साधना सत्रों की ऐसी व्यवस्था जिसमें साधकों के लिए निवास, भोजन आदि का भी प्रबन्ध है।
साधना से सिद्धि के सिद्धान्त की झाँकी देखी जा सकती है।
साधनाएं घायल परिस्थितियों में चलती रही और सफल हुई। सोचता हूँ, जिन सज्जनों के कारण यह नई भावनात्मक परिपक्वता प्राप्त हुई उनका अहसान क्यों न माना जाय?
साधना है, जो स्थूल शरीर में रहते हुए भी की जा सकती है और उसे त्यागने के उपरान्त भी करनी पड़ती है। दोनों ही परिस्थितियों में यह स्थिति बिना अतिरिक्त प्रयोग-पुरुषार्थ के- तप साधना के- सम्भव नहीं हो सकती। इसे योगाभ्यास तपश्चर्या का अगला चरण कहना चाहिए।
साधना करते हैं। इसी की एक कड़ी इस अनुभव प्रयास के साथ जुड़ती है, जिसमें एकांतवास के साथ उग्र तपश्चर्या करने का निर्धारण है। इसकी सुखद परिणति पर हमें उतना ही विश्वास है जितना अपनी आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व पर।
साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।
साधना बल के सहारे आज अपना और दूसरों का कुछ भला बन पड़ा उसका सुयोग ही न आता। ईश्वर के साथ वह नाता जुड़ता ही नहीं जो पवित्रता ओर प्रखरता से कम में जड़ें जमाने की स्थिति में होता ही नहीं।
साधना सहज सधती रहती है। संयम का अर्थ है- बचत। चारों प्रकार का संयम बरतने पर मनुष्य के पास इतनी अधिक सामर्थ्य बच रहती है, जिसे निर्वाह परिवार के अतिरिक्त महान प्रयोजनों में प्रचुर मात्रा में भली प्रकार लगाया जाता रहे। संयमशीलों को वासना, तृष्णा और अहंता की खाई पाटने में मरना खपना नहीं पड़ता इसलिए सदुद्देश्यों की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता पड़ने पर व्यस्तता, अभावग्रस्तता, चिन्ता, समस्या आदि के बहाने नहीं गढ़ने पड़ते। स्वार्थ-परमार्थ साथ-साथ सधते रहते हैं और हँसती-हँसाती हलकी-फुलकी जिन्दगी जीने का सहज अवसर मिल जाता है।
साधना को समान महत्व देते हैं। दोनों के लिए समान प्रयत्न करते हैं।
साधना करने का अवसर प्रदान कर सके। फिर जो प्रिय है, उपयोगी है, सहयोगी है, उसके गुणानुवादों को यदि थोड़ा बढ़ाकर देखा जा सके तो प्रतीत होगा कि आत्मीयता और सेवा सद्भावना ही चारों ओर से बरस रही हैं। यदा-कदा जो कटुता प्रतीत होती है उसमें भी अपने उस सुधार का तारतम्य छिपा पड़ा है जो अधिक पवित्र, अधिक जागरुक अधिक प्रखर बनने का अवसर प्रदान करता है। यदि प्रतिकूलता न हो तो लोग अपनी जागरुकता ही खो बैठें। सुधार के लिए भी और प्रगति के लिए भी जागरुकता आवश्यक है और वह बिना प्रतिकूलता से पाला पड़े और किसी प्रकार उत्पन्न ही नहीं होती।
साधना सहित विशिष्ट तप करने लगे।
साधना, आराधना के रूप में भली प्रकार बता दिया था। नियमित जप-ध्यान करने का अनुबंधों समेत पालन करने के निर्देशन के अतिरिक्त यह भी बताया था कि चिन्तन में उपासना- चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।
साधना प्रकारांतर से संयम साधना है। उसके द्वारा न्यूनतम में निर्वाह चलाया और अधिकतम बचाया जाता है। समय, श्रम, धन और मन मात्र इतनी ही मात्रा में शरीर तथा परिवार के लिए खर्च करना पड़ता है जिसके बिना काम न चले। काम न चलने की कसौटी है- औसत देशवासियों का स्तर। इस कसौटी पर कसने के उपरान्त किसी भी श्रमशील और शिक्षित व्यक्ति का उपार्जन इतना हो जाता है कि काम चलाने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ बच सके।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त इसी तथ्य का प्रकटीकरण करता है। सिद्धि का अर्थ होता है, असाधारण सफलताएँ। साधारण सफलताएँ तो सामान्य जन भी अपने पुरुषार्थों और साधनों के सहारे प्राप्त करते रहते हैं और कई तरह की सफलताएँ अर्जित करते रहते हैं। अध्यात्म क्षेत्र बड़ा और ऊँचा है इसलिए उसकी सिद्धियाँ भी ऐसी होनी चाहिए जिन्हें सामान्य जनों के एकाकी प्रयास से न बन पड़ने वाली, अधिक ऊँचे स्तर का मानी जा सके।
साधना और आराधना की वे तीनों ही शर्तें पूरी करें जो आध्यात्मिक विभूतियाँ उपार्जित करने के लिए आवश्यक हैं। ऐसे लोगों की औसत भारतीय-स्तर के निर्वाह से अपनी जीवनचर्या का नया अध्याय आरम्भ करना चाहिए और कटिबद्ध होना चाहिए कि जो क्षमता बचती है उसी भगवान के खेत में बोने का साहस जुटायेंगे। निश्चय ही यह साहस सौ गुना हजार गुना होकर फलित होता है।
साधना द्वारा सम्पन्न किया जाता रहा है। ऐसे प्रसंग एक नहीं अनेकों हैं, जिन पर पिछले साठ वर्षों से प्रयत्न चलता रहा है और यह सिद्ध किया जाता रहा है कि लगनशीलता, तत्परता यदि उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न हो तो उसके परिणाम कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
साधना और अध्यात्म साधना को समान महत्व देते हैं। दोनों के लिए समान प्रयत्न करते हैं।
साधना शृंखला का। पिछले तीस वर्षा में जो कुछ बन पड़ा उसमें उसका श्रेय है। कमाई की वह हुण्डी ही अब तक काम देवी रही। अपना, व्यक्ति विशेष का, समाज का, संस्कृति का यदि कुछ भला अपने द्वारा बन बड़ा तो इसमें इस चौबीस वर्ष के संचित भण्डार को खर्च किये जाने की बात ही समझी जा सकती है। उस समय भी मात्र जप संख्या ही पूरी नहीं की गई थी वरन् साथ ही कितने ही अनुबन्ध-अनुशासन एवं व्रत पालन भी जुड़े हुए थे।
साधना, धर्म धारणा तो प्रकट है ही, साथ ही वे अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्ति अर्जित करने के लिए तपश्चर्या भी समय-समय पर अपनाते रहते थे। यह प्रक्रिया अपने-अपने ढंग से हर महत्वपूर्ण व्यक्ति को सम्पन्न करनी पड़ी है, करनी पड़ेगी। क्योंकि ईश्वरप्रदत्त शक्तियों का उन्नयन, परिपोषण इसके बिना हो नहीं सकता। व्यक्तित्व में पवित्रता, प्रखरता और परिपक्वता न हो तो कहने योग्य- सराहने योग्य सफलताएँ प्राप्त कर सकने का सुयोग ही नहीं बनता। कुचक्र छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं।
साधना अपनाई, उस दिन से अपना कायाकल्प कर दिया। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, विल्व मंगल, अजामिल आदि पिछले जीवन में कैसे ही क्यों न रहे हों, जिस दिन से भगवान की शरण में आये, उस दिन से सच्चे अर्थों में सन्त बन गये। हम लोग “राम-नाम जपना पराया माल अपना की नीति अपनाते हैं। कुकर्म भी करते रहते हैं, पर साथ ही भजन-पूजन के सहारे उनके दण्ड से छूट मिल जायेगी, ऐसा भी सोचते रहते हैं। यह कैसी विडम्बना है।
साधना और आराधना के समन्वय से बनती है। यह तीनों कोई क्रियाकाण्ड नहीं है, जिन्हें इतने समय में, इस विधि से इस प्रकार बैठकर सम्पन्न करते रहा जा सके। यह चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में होने वाले उच्च स्तरीय परिवर्तन हैं। जिनके लिए अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर निरन्तर ध्यान देना पड़ता है। दुरितों के संशोधन में प्रखरता का उपयोग करना पड़ता है और नई दिशाधारा में अपने गुण कर्म, स्वभाव को इस प्रकार अभ्यस्त करना पड़ता है जैसे अनगढ़ पशु−पक्षियों को सरकस के करतब दिखाने के लिए जिस-तिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है।
साधना-रत रहे और दूसरों को युग धर्म अपनाने की प्रेरणा देने का प्रयास किया है। कहा जाता है कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का मध्यवर्ती स्वरूप ऋषि है। सन्त अब इसलिए नहीं कहा जा सकता कि उसके साथ अनेकानेक जंजाल गुँथ गये हैं। सन्त भगवान से अपनी मर्जी पूरी कराने लगे हैं। अपने को सर्वतोभावेन भगवान को समर्पण नहीं करते।
साधना इन तीन विभागों में बंटी रही है। इनमें दूसरी और तीसरी धारा के लिए असंख्यों व्यक्तियों से संपर्क साधना और पाना चलता रहा है। इनमें से अधिकाँश को प्रकाश और परिवर्तन का अवसर मिला है।
साधना सत्रों की परम्परा ऐसी है जिसका लाभ अगणित लोग उठा चुके हैं। सभी ने अनुभव किया है कि विज्ञान सम्मत योग साधना का उपक्रम और उसका समुचित लाभ प्राप्त करने का सुनियोजित कार्यक्रम जैसा यहाँ चल रहा है यदि वैसा ही अन्यत्र भी रहा होता तो योग विज्ञान की महत्ता प्रदर्शित करने वाले इस देश का स्थान कहीं से कहीं रहा होता।
साधना का परमार्थ ऐसा है जिसका प्रतिफल हाथों हाथ मिलता है। किसी दुःखी के आँसू पौंछते समय असाधारण आत्म सन्तोष होता है। कोई बदला न चुका सके तो भी उपकारी का मन ही मन सम्मान करता है। आशीर्वाद कहता है। इसके अतिरिक्त एक ऐसा दैवी विधान है जिसके अनुसार उपकारी का भण्डार खाली नहीं होता, उस पर ईश्वरीय अनुग्रह बरसता रहता है और जो खर्चा गया है उसकी भरपाई करता रहा है।
साधना है। हमने इसके लिए अपने को साधा और जो भी अपने साथ जुड़े रहे उन्हें यथा सम्भव सधाया।
साधना है। उसके द्वारा न्यूनतम में निर्वाह चलाया और अधिकतम बचाया जाता है। समय, श्रम, धन और मन मात्र इतनी ही मात्रा में शरीर तथा परिवार के लिए खर्च करना पड़ता है जिसके बिना काम न चले। काम न चलने की कसौटी है- औसत देशवासियों का स्तर। इस कसौटी पर कसने के उपरान्त किसी भी श्रमशील और शिक्षित व्यक्ति का उपार्जन इतना हो जाता है कि काम चलाने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ बच सके।
साधनाओं में मन्त्र शक्ति का स्थान सर्वोपरि है। नाद ब्रह्म और शब्द ब्रह्म की साधना से मनुष्य दृश्य और अदृश्य जगत के साथ सम्बन्ध स्थापित कर सकता है और प्रकृति क्षेत्र में जो चल रहा है जो चलने वाला है। उसका पूर्वाभास भी प्राप्त कर सकता है।
साधना क्रम में प्राण फूँकता है अन्यथा मात्र किया कृत्य खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।
साधना की परिणतियाँ यदि कोई सिद्धि स्तर पर ढूंढ़ना चाहे तो उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। हर कदम अपने कौशल और उपलब्ध साधनों की सीमा से बहुत ऊँचे स्तर का उठा है। आरम्भ करते समय सिद्धि का पर्यवेक्षण करने वालों ने इसे मूर्खता कहा और पीछे उपहासास्पद बनते फिरने की चेतावनी भी दी किन्तु मन में उस ईश्वर क साथ रहने का अटूट विश्वास रहा जिसकी प्रेरणा उसे हाथ में लेने को उठ रही थी। लिप्सा रहित अंतःकरणों में प्रायः ऐसे ही संकल्प उठते हैं जो सीधे लोक मंगल से सम्बन्धित हों और जिनके पीछे दिव्य सहयोग मिलने का विश्वास हो।
साधना, आराधना का जो क्रम बताया था वे तीनों ही एक-से-एक बढ़कर थे। लोग उन अनुशासनों में से मात्र एक अत्यन्त प्रत्यक्ष को ही स्मरण रखे हुए हैं- 24 लक्ष पुरश्चरण को। वस्तुतः हमें जो मिला वह मात्र जप संख्या की परिणति नहीं है, वरन् समग्र जीवन में आध्यात्मिक आदर्शों का पूरी तरह समन्वय किये रहने का ही प्रतिफल है। इसके लिए आवश्यक परामर्श और दबाव देकर गुरुदेव ने हमारा कितना बड़ा उपकार किया इसका अनुमान वे लोग नहीं लगा सकते जिन्हें धन और पद के अतिरिक्त और कुछ चाहिए ही नहीं। जो इतनी ही मर्यादा में वरदान को सीमित रखते हैं।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं इससे अगला कदम सूक्ष्मीकरण का है सिद्ध पुरुष अपनी काया की सीमा में रहकर जो दिव्य क्षमता अर्जित कर सकते हैं, कर लेते हैं। उसी से दूसरों की सेवा सहायता करते हैं। किन्तु सूक्ष्म शरीर विकसित कर लेने वाले उन सिद्धियों के भी धनी देखे गए हैं जिन्हें योगशास्त्र में अणिमा, महिमा, लघिमा आदि कहा गया है। शरीर का हलका, भारी, दृश्य, अदृश्य हो जाना, यहाँ से वहाँ जा पहुँचना, प्रत्यक्ष शरीर के रहते हुए सम्भव नहीं। क्योंकि शरीरगत परमाणुओं की संरचना ही ऐसी नहीं है जो पदार्थ विज्ञान की सीमा मर्यादा से बाहर जा सके।
साधना से सिद्धि का तात्पर्य उन विशिष्ट कार्यों से है , जो लोक-मंगल से सम्बन्धित होते हैं ओर इतने बड़े भारी तथा व्यापक होते हैं, जिन्हें कोई एकाकी संकल्प या प्रयास के बल पर नहीं कर सकता। फिर भी वे उसे करने का दुस्साहस करते हैं- आगे बढ़ने का कदम उठाते हैं और अन्ततः असम्भव लगने वाले कार्य को भी सम्भव कर दिखाते हैं, समयानुसार जन सहयोग उन्हें भी मिलता रहता है। जब सृष्टि नियमों के अनुसार हर वर्ग के मनस्वी को सहयोगी मिलते रहते हैं, तब कोई कारण नहीं कि श्रेष्ठ कामों पर वह विधान लागू न होता हो। प्रश्न एक ही है आध्यात्मवादी साधनों और सहयोगों के अभाव में भी कदम बढ़ाते हैं और आत्म-विश्वास तथा ईश्वर विश्वास के सहारे नाव खेकर पार जाने का भरोसा रखते हैं। सामान्य जनों की मनःस्थिति ऐसी नहीं होती।
साधना में अपने निज के शरीर से ही एक अतिरिक्त सत्ता गढ़ ली जाती है और वह एक समर्थ अदृश्य साथी सहयोगी जैसा काम करती है।
साधना से धरती पर ज्ञान गंगा की- प्रज्ञा अभियान की- अवतरण की क्षमता एवं दिशा मिली। एक बार उत्तर काशी के परशुराम आश्रम में वह कुल्हाड़ा उपलब्ध हुआ जिसके सहारे व्यापक अवाँछनीयता के प्रति लोक-मानस में विक्षोभ एवं आक्रोश उत्पन्न किया जा सके। पौराणिक परशुराम ने धरती पर से अनेक आततायियों के अनेकों बार सिर काटे थे। अपना सिर काटना- “ब्रेन वाशिंग” है। विचार क्रान्ति एवं प्रज्ञा अभियान में सृजनात्मक ही नहीं सुधारात्मक प्रयोजन भी सम्मिलित हैं।
साधना का उपक्रम और उसका समुचित लाभ प्राप्त करने का सुनियोजित कार्यक्रम जैसा यहाँ चल रहा है यदि वैसा ही अन्यत्र भी रहा होता तो योग विज्ञान की महत्ता प्रदर्शित करने वाले इस देश का स्थान कहीं से कहीं रहा होता।
साधना के विज्ञान का आविष्कार एवं अभिवर्धन किया था। आसन प्राणायाम द्वारा शारीरिक रोग निवारण की आरोग्य अभिवर्धन की विधियाँ खोज निकाली गई थीं। ध्यान, धारणा, बेध, मुद्रा द्वारा मनोविकारों के शमन का उपाय खोजा गया था। ध्यानयोग, नादयोग, बिन्दुयोग द्वारा स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों को समर्थ बनाने के विज्ञान हस्तगत किया था। कभी इस देश के बाल, वृद्ध, नर-नारी, गृहस्थ सभी योगाभ्यास में अभ्यस्त थे और उस विज्ञान का समुचित लाभ उठाते थे।
साधना के लिए- गिरह की पूँजी चाहिए। उसके बिना भूखा क्या खाये? क्या बाँटे? यह पूँजी कहाँ से आई? कहाँ से जुटाई?
साधना से सिद्धि” प्रकरण में उन छोटी-छोटी घटनाओं का उल्लेख किया है जो हमारे जीवन क्रम में घटित हुई। कौशल और साधन के अभाव में- आवश्यकता से कम समय में उनका पूरा हो जाना बताता है कि यहाँ अध्यात्म विज्ञान के मौलिक सिद्धान्तों को अपनाया और पालन किया गया। इसमें किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा नहीं है वरन् अध्यात्म विज्ञान के उन मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन है जिन्हें अपनाने वाला कोई भी व्यक्ति आदर्शवादिता के क्षेत्र में द्रुतगति से आगे बढ़ सकता है आश्चर्यजनक सफलता अर्जित कर सकता है।
साधना है। उपासना के साथ उसका अनन्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। बिजली धातु में दौड़ती है, लकड़ी में नहीं। आग सूखे को जलाती है गीले को नहीं। माता बच्चे को गोदी तब लेती है जब वह साफ सुथरा हो।
साधना के हण्टर से सुसंस्कारी न बनाया जा सके।
साधना एवं समष्टि आराधना सम्बन्धी संदर्भ अपनी लेखनी से लिखे हैं। उनका जीवन क्रम बहुमुखी रहा है, तो भी उसमें से जितना भी सम्भव था, सर्वसाधारण हेतु हृदयंगम करने योग्य गायत्री-महाप्रज्ञा विषयक प्रेरणा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
साधना से सिद्धि वाला प्रसंग जुड़ा या नहीं। इसी प्रकार यह भी दृष्टव्य है कि दूसरों के अवलम्बन योग्य आध्यात्मिकता का प्रस्तुतीकरण करते हुए हमारे कदम ऋषि परम्परा अपनाने के लिए बढ़े या नहीं? जिसे जितनी यथार्थता मिले वह उतनी ही मात्रा में यह अनुमान लगाये कि अध्यात्म विज्ञान का वास्तविक स्वरूप यही है। आन्तरिक पवित्रता और बहिरंग की प्रखरता में जो जितना आदर्शवादी समन्वय कर सकेगा वह उन विभूतियों से लाभान्वित होगा जो अध्यात्म तत्वज्ञान एवं क्रिया-विधान के साथ जोड़ी और बताई गई हैं।
साधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष सरलतापूर्वक निभता रहा।
साधना की ऊर्जा सिद्धी के रूप में परिपक्व हुई तो उसने सामयिक आवश्यकताएँ पूरी करने वाले किसी कार्य में उसे खपा देने का निश्चय किया। कार्य प्रारम्भ हुआ और आश्चर्य इस बात का है कि सहयोग का साधन जुटने का वातावरण दीखते हुए भी प्रयास इस प्रकार अग्रगामी बने मानो वे सुनियोजित रहे हों और किसी ने उसकी पूर्व से ही साँगोपाँग व्यवस्था बना रखी हो। पर्यवेक्षकों में से अनेकों ने इसे आरम्भ में दुस्साहस कहा था लेकिन सफलताएँ मिलती चलने पर वे उस सफलता को साधना की सिद्धी कहते चले गए।
साधना बताने का उपक्रम अब मात्र शान्ति-कुँज में ही दृष्टिगोचर होता है। कल्प साधना सत्रों की परम्परा ऐसी है जिसका लाभ अगणित लोग उठा चुके हैं। सभी ने अनुभव किया है कि विज्ञान सम्मत योग साधना का उपक्रम और उसका समुचित लाभ प्राप्त करने का सुनियोजित कार्यक्रम जैसा यहाँ चल रहा है यदि वैसा ही अन्यत्र भी रहा होता तो योग विज्ञान की महत्ता प्रदर्शित करने वाले इस देश का स्थान कहीं से कहीं रहा होता।
साधना बनाने के स्थान पर सृजन के लिए अभी नये निर्माण का क्षेत्र बहुत बड़ा खाली पड़ा है। उसकी ओर मुड़ने में, दिशा बदलने में वर्तमान ढर्रे में उलट-पुलट तो बहुत करनी पड़ेगी पर ऐसी नहीं है जो न हो सके। यह कार्य, चारों मूर्धन्यों के मनःक्षेत्र में यदि नयी सूझ-बूझ उदय हो तो हो सकता है। वह होगी भी। शासनाध्यक्ष अपने ढंग से सोचेंगे और धनाध्यक्षों की पूँजी सुरक्षित रखने और बढ़ाने के नये विकल्प ध्यान में आयेंगे।
साधना को आधार भूत क्षेत्र मन से ही आरम्भ किया गया।
साधना से सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जा सके। ऐसी अगणित घटनाएँ संसार में सम्पन्न हुई हैं जिनमें आरम्भ कर्त्ताओं का कौशल, साधन एवं सहयोग नगण्य था पर आत्मबल असीम था। इतने भर से गाड़ी चल पड़ी और जहाँ-तहाँ से तेल, पानी प्राप्त करती हुई क्रमशः पूर्व से भी अगली मंजिल तक जा पहुँची। सदुद्देश्यों की ऐसी पूर्ति के पीछे साधना से सिद्धि के सिद्धान्त की झाँकी देखी जा सकती है।
साधना आरम्भ कर दी गई थी। कुण्डलिनी जागरण, ईश्वर दर्शन स्वर्ग मुक्ति तो बहुत पीछे की वस्तु है। सबसे प्रथम देवी अनुदानों को पा सकने की क्षमता अर्जित करनी पड़ती है। अन्यथा जो वजन न उठ सके, जो भोजन न पच सके वह उलटे और भी बड़ी विपत्ति खड़ी करता है।
साधना उपक्रम के लिए जाना पड़ा है। इसका उद्देश्य एक ही था। तपश्चर्या के उत्साह और पुरुषार्थ में- श्रद्धा और विश्वास में कहीं कोई कमी न पड़ने पाये। जहाँ कमी पड़ रही हो उसकी भरपाई होती रहे। भगीरथ शिला- गंगोत्री में की गई साधना से धरती पर ज्ञान गंगा की- प्रज्ञा अभियान की- अवतरण की क्षमता एवं दिशा मिली।
साधना तो ऐसी है जिसके लिए गोदी के बच्चे को पालने के लिए निरन्तर ध्यान रखना पड़ता है। फलवती भी वही होती है। जो लोग पूजा को बाजीगरी समझते हैं और जिस-तिस प्रकार क्रिया-कृत्य करने भर के बदले ऋद्धि-सिद्धियों के दिवास्वप्न देखते हैं, वे भूल करते हैं।
साधना करने का निर्देश निबाहना पड़ा। इसमें क्या देखा? इसकी जिज्ञासा बड़ी आतुरता पूर्वक सभी करते हैं। उनका तात्पर्य, किन्हीं यक्ष, गंधर्व, राक्षस, बेताल, सिद्ध पुरुष से भेंट वार्ता रही हो। उनकी उछल-कूद देखी हो।
साधना से सिद्धि के रूप में करते हैं। इनके मूल में मनोबल की प्रखरता एवं व्यक्तित्व का प्रामाणिकता के अतिरिक्त और कोई प्रत्यक्ष कारण दीख नहीं पड़ता। इन्हें कोई चाहे तो ईश्वर का- देवता का वरदान कह सकता है। यह मात्र अपने लिए ही घटित नहीं हुआ। संसार में प्रायः सभी महामानवों की जीवनचर्या में इसी स्तर के चमत्कारों की भरमार है।
साधना पद्धति में इस भूल का समावेश न होने देने का आरम्भ से ही ध्यान रखा गया। अस्तु वह यथार्थ वादी भी है और सर्वसाधारण के लिए उपयोगी भी।
साधना से जहाँ धर्मधारणा और पुण्य प्रक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं वहाँ उनकी विशिष्ट साधनाओं से अदृश्य जगत का परिशोधन भी होता चलता है। यही कारण है कि अध्यात्म-वेत्ता लोक-साधना और अध्यात्म साधना को समान महत्व देते हैं। दोनों के लिए समान प्रयत्न करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-February
साधना का लक्ष्य यही है। स्वाध्याय और सत्संग-मनन और चिन्तन के सहारे साधक उस स्थिति तक पहुँचने का प्रयत्न करता है जिसमें माया से भ्रान्ति से छुटकारा मिल सके। यही मुक्ति की- जीवन मुक्ति की स्थिति है।
साधना मनुष्य को प्राणयुक्त बनाती और उसमें प्रखरता उत्पन्न करती है। गायत्री का अर्थ ही है प्राणों का उद्धार करने वाली। इस प्रकार प्राणवान और विभिन्न शक्तियों में प्रखरता उत्पन्न होने से पग-पग पर सफलताएँ, सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। प्राण की न्यूनता ही समाज विपत्तियों का, अभावों और शोक-संतापों का कारण है। दुर्बल पर हर दिशा से आक्रमण होता है, दैव भी दुर्बल का घातक होता है।
साधना का आवश्यक अंग माना और स्थित प्रज्ञ जैसा निस्पृह स्वभाव बनाकर सन्तुष्ट रहने एवं हँसते-हँसाते समय गुजारने का अभ्यास किया। प्रकृति से विद्रोह करने की अपेक्षा सहयोग देने की दूरदर्शिता अपनाकर उन्होंने जीवन सम्पदा का समुचित लाभ उठाया। उन्हीं लाभों में एक बुढ़ापे को देर तक रोके रहना और कम से कम कष्टदायक बनने देना भी है। वह राजमार्ग अभी भी उन सब के लिए खुला है जो जादुई तरीके अपनाने की अपेक्षा प्रकृति क्रम के साथ तालमेल बिठाकर अधिक नफे में रहने की नीति पर विश्वास करते हैं। आधुनिक विज्ञान ने इस सन्दर्भ में रसायन ढूँढ़ने और शल्यक्रिया की असफलता देखते हुए प्रकृति सहयोग से बुढ़ापा रोकने पर जोर देना आरम्भ किया है।
साधना करते हैं। मार्ग शीर्ष स्नान, माघ स्नान के व्रतधारी गंगा में प्रभातकाल की तेज हवा और ठण्डक में महीने भर तक स्नान करते हैं। इसी प्रकार गर्मी के दिनों में चारों ओर आग जलाकर धूनी तापने वाले लोगों के सम्बन्ध में भी यही बात है। तेज गर्मी और कड़ाके की सर्दी में भी बिना वस्त्र गुजारा करने वाले साधु सन्त अभी भी देखे जाते हैं। कुछ दिन पहले तक गंगोत्री क्षेत्र में कई महात्मा बर्फ जमने की सर्दी के दिनों में वहाँ निर्वस्त्र निवास करते थे।
साधना ग्रन्थों में इसका उल्लेख इसी नाम से हुआ है। तारक अर्थात् तार देने वाला, पार करा देने वाला, तैरा कर पार निकाल देने वाला। गहरे जल प्रवाह को पार करके- निकल जाने को डूबते हुए को बचा लेने को तारना कहते हैं। यह भव सागर ऐसा ही है, जिसमें अधिकाँश जीव डूबते हैं। तरते तो कोई बिरले ही हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-August
साधना से सिद्धि के सार्थक सिद्धान्तों से जन-साधारण लाभान्वित होंगे एवं यथार्थता को पहचानेंगे।
साधना क्रम में पूज्य गुरुदेव स्वयं साकार रूप में सामने खड़े हो उन्हें दिशा दे रहे हैं। उनकी पंचकोशी साधना में प्रगति की सूक्ष्म अनुभूति उन्हें होने लगी। प्रेरणा मिली कि अब शेष जीवन लोक-मंगल हेतु ही नियोजित करना है। उपासना, साधना के चरण पूरे हुए, अब आराधना का- समाज सेवा का समय आ गया। उन्होंने जल्दी ही अनिवार्य सेवा निवृत्ति ले युग देवता के चरणों में अपनी श्रद्धाँजलि चढ़ाने का संकल्प लिया है।
साधना में नियोजित किया भी है। लेकिन उपनिषद् एवं अन्यान्य आर्ष ग्रन्थ आत्मिकी सम्मत विकासवाद के आधार पर एक पूर्ण पुरुष के, सारी सुविधाओं एवं अवसरों को लेकर जन्मे सृष्टा के उत्तराधिकारी के रूप में मनुष्य का वर्णन करते हैं। उपनिषद्कार का कथन है- कि “ब्रह्म की पूर्णता से विश्व की पूर्णता आई। जो शेष रहा, वह भी पूर्ण है।” (ईशोपनिषद)।
साधना के इस पुरुषार्थ की हर परिजन ने अपने ही अन्तः में अनुभूति की है। उन्हें लग रहा है कि वे भी सूक्ष्मीकरण साधना के सहयोगी बन गये हैं ताकि वे अपने लिए निर्धारित भूमिका भली-भांति निभा सकें।
साधना की सफलता एवं चेतना को परमसत्ता के समीप पहुँचाकर उसके दिव्य अनुदानों का रसास्वादन करा सकने में ये चारों आधार प्रमुख भूमिका संपादित करते हैं। इनका अवलम्बन लेकर कोई भी साधक प्रगति के उच्चतम शिखर पर पहुँच सकता है।
साधना में प्रगति की सूक्ष्म अनुभूति उन्हें होने लगी। प्रेरणा मिली कि अब शेष जीवन लोक-मंगल हेतु ही नियोजित करना है। उपासना, साधना के चरण पूरे हुए, अब आराधना का- समाज सेवा का समय आ गया। उन्होंने जल्दी ही अनिवार्य सेवा निवृत्ति ले युग देवता के चरणों में अपनी श्रद्धाँजलि चढ़ाने का संकल्प लिया है।
साधना एवं यज्ञ के माध्यम से उसकी पूर्णता के मूल में दोनों के मध्य पारस्परिक सम्बन्धों को अच्छी तरह समझना होगा। यज्ञ की समूची प्रक्रिया ही सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया है। गायत्री की पूर्णता भी सूक्ष्मीकरण के साथ ही सम्पन्न होती है। गायत्री स्थूल वहाँ तक है, जहाँ तक कि उसके साथ यज्ञोपवीत और शिखा धारण वाले द्विजत्व संस्कार का सम्बन्ध है। यह स्थूल पक्ष है जिसे धूमधाम के साथ मनाया जाता है पर गायत्री की दिव्यता इतने से सम्पन्न नहीं हो जाती।
साधना मय विशिष्ट वातावरण है। गायत्री के दृष्टा ऋषि विश्वामित्र की यह तपस्थली है। किस साधक के लिए क्या विशेषता का समन्वय हो, इसके लिए शारीरिक, मानसिक जाँच-पड़ताल की विशेषज्ञों द्वारा विशेष व्यवस्था है। संरक्षण के लिए उपयुक्त दिव्यात्मा चाहिए। सो यहाँ मौजूद है।
साधना की स्थिति में उनके दर्शन न हो पाने पर निराश होने वालों को इस तत्वज्ञान को भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए।
साधना में निरत हो गए। बहुसंख्य व्यक्ति तो सूक्ष्मीकरण का शब्दार्थ एवं भावार्थ भी नहीं समझ पाते। उनकी दृष्टि में तो पूज्यवर का प्रत्यक्ष मिलने-जुलने, अनुदान स्नेह-अनुग्रह बरसाने, हर व्यक्ति से घुलकर आत्मसात् हो जाने का क्रम बन्द हो गया। पहले गायत्री जयन्ती, फिर गुरु पूर्णिमा पर उनके प्रत्यक्ष चर्म चक्षुओं से दर्शनों की आशा भी धूमिल हो गयी। औरों को लगा- अब इस अभिनव निर्धारण से पूज्य गुरुदेव की झलक झाँकी वे देख नहीं पायेंगे।
साधना को उन्होंने अपनी तपश्चर्या का केन्द्र बनाया एवं चिर पुरातन काल में ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वारा सम्पन्न पुरुषार्थ को आज के युग में साकार कर दिखाया, इसे जन सुलभ बनाने का प्रयास किया। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार “स यत्कृत्सनां गायत्रीमन्वाह, तत् कृत्स्नंप्राणं दधाति” अर्थात्- “जो व्यष्टिगत एवं समष्टिगत जगत की व्यवस्था बिठाती एवं सामंजस्य स्थापित करती है, वही गायत्री है।” गायत्री मन्त्र का मनन करने वाले सिद्ध साधक इसी ऊँचे उद्देश्य के साथ भूःलोक से भुवः एवं स्वः लोक में ऊर्ध्वगमन करते एवं अपने सूक्ष्म किन्तु विराट् रूप द्वारा समष्टि का कल्याण करते हैं।
साधना, जो युग धर्म की माँग पूरी करने हेतु उन्होंने प्रचण्ड तप पुरुषों के रूप में आरम्भ की है, के अंग बन सहज की श्रेयाधिकारी बन सकते हैं।
साधनारत गुरुदेव बसन्त पर दिए गए अपने आश्वासनानुसार वस्तुतः और भी विराट् हो गए एवं अगणित परिजनों को इसकी प्रत्यक्ष अनुभूति न केवल युग तीर्थ आकर अपितु अपने-अपने स्थानों पर गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाते समय एवं यदा-कदा भी इस तरह होती रही, मानो वे सशरीर सामने खड़े हो- कष्ट कठिनाइयाँ सुन रहे हों, उनसे उबरने का साहस प्रदत्त कर लोक मंगल हेतु जुटने की प्रेरणा दे रहे हों।
साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
साधना करके अपेक्षाकृत अधिक लाभ उपलब्ध करते हैं।
साधना है। इसके लिए समय-समय पर अपने से अधिक समुन्नत लोगों से परामर्श भी लेते रहा जा सकता है। साधना के विषय में विस्तृत ऊहापोह पिछले अंक में विस्तार से किया गया है अतः उन्हें दुहराना अनिवार्य नहीं।
साधना के सहयोगी बन गये हैं ताकि वे अपने लिए निर्धारित भूमिका भली-भांति निभा सकें।
साधना के क्षेत्र में आत्मिक प्रगति का जब भी प्रसंग चलता है खाद्य-अखाद्य का प्रश्न पहले आता है। इसका निर्धारण जहाँ तक सम्भव हो, रुचि के आधार पर नहीं, खाद्य की सौम्य प्रकृति के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।
साधना अर्जित उपलब्धियों के अनुरूप एक विशिष्ट प्रभा मण्डल बनाता है एवं उछाल खाता हुआ मेरुदण्ड मार्ग से गुजरता हुआ मलाधार से अधोगामी हो काया से बहिर्गमन कर जाता है। मूलाधार एक कुण्ड है, सहस्रार एक दुर्गम पर्वत जिसकी उपमा कैलाश से दी जा सकती है। दोनों की समस्वरता ही आत्मा-परमात्मा का मिलन-ब्रह्मानंद की रसानुभूति है।
साधना। पूरा नाम है जीवन साधना। जीवनचर्या को मानवी गरिमा के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से सुसंस्कारी बनाना। संक्षेप में यही है- साधना का उद्देश्य। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को निरन्तर काटते रहने पर ही वह मानवी गरिमा के ढांचे में ढलता है।
साधना चेतन सत्ता के चरम बिन्दु तक पहुँचने एवं विराट् रूप में परिवर्धित होने कि प्रक्रिया है। जैसे-जैसे इस विधा के नये आयाम खुलेंगे, साधना से सिद्धि के सार्थक सिद्धान्तों से जन-साधारण लाभान्वित होंगे एवं यथार्थता को पहचानेंगे।
साधना की चरम उपलब्धि है, चाहे उसकी अनुभूति के रूप भिन्न-भिन्न हों।
साधना का उद्देश्य। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को निरन्तर काटते रहने पर ही वह मानवी गरिमा के ढांचे में ढलता है। अन्यथा नर-पशु जैसा अनगढ़ कुसंस्कारी ही बना रहता है। आत्म परिशोधन की आत्म-परिष्कार की प्रक्रिया जीवन साधना कहलाती है।
साधना कहलाती है।
साधना अथवा समाज सेवा की आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्यों अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
साधना अर्थात्-चरित्र। इन दो की चर्चा हो चुकी। अब तीसरी अध्यात्म परिष्कार प्रक्रिया है- आराधना। आराधना किसकी? विराट् ब्रह्म की।
साधना कहा जा सकता है। इनके अन्तराल में समस्त सिद्धियाँ भरी पड़ी हैं। उपासना से दैवी अनुग्रह बरसता है और अदृश्य जगत की अतीन्द्रिय क्षमताओं का लाभ मिलता है।
साधना की बात जिनके मन में आती है, जिनके लिए किसी भी प्रकार सम्भव है, वे नवरात्रि का गायत्री अनुष्ठान करने के लिए शांति-कुँज दौड़ते हैं। भले ही इसके लिए कोई जरूरी काम ही हर्ज क्यों न होता हो।
साधना 9 दिनों में ही पूरी होती है। इस सत्र में जिन्हें आना हो, वे अभी से स्वीकृति प्राप्त कर लें।
साधना से व्यक्तित्व निखरता है। ऐसे व्यक्ति पवित्र, प्रखर और प्रामाणित होते हैं। इस कारण उन्हें सर्वत्र भरपूर सम्मान और सहयोग मिलता है। विभिन्न प्रयोजनों में जो भी ऊँचे उठे और आगे बढ़े हैं उन्हें प्रमुख सहायता जन सम्मान से मिली है। यह मात्र प्रामाणिक व्यक्तियों के लिए ही सुरक्षित है।
साधना के विषय में विस्तृत ऊहापोह पिछले अंक में विस्तार से किया गया है अतः उन्हें दुहराना अनिवार्य नहीं।
साधना के चरण पूरे हुए, अब आराधना का- समाज सेवा का समय आ गया। उन्होंने जल्दी ही अनिवार्य सेवा निवृत्ति ले युग देवता के चरणों में अपनी श्रद्धाँजलि चढ़ाने का संकल्प लिया है।
साधना ही एकमात्र वह राह है, जिस पर चलते हुए दिव्य अनुदान या विभूतिवान् वरदान किसी को उपलब्ध हो सकें। गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना की स्थिति में उनके दर्शन न हो पाने पर निराश होने वालों को इस तत्वज्ञान को भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए।
साधना और आराधना की कसौटी पर कस कर यह जाना जा सकता है कि किसकी भक्ति सच्ची है किसकी झूठी?
साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
साधना से चरित्र को और आराधना से व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश किया जाता है। यह तीनों साथ-साथ चलती हैं। जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का साथ-साथ सेवन क्रम चलता रहता है उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को अपने-अपने ढंग से उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
साधना का कोई नियत स्थान और समय नहीं था। पीछे वे नियमबद्ध हो गये, ताकि दर्शनार्थी आगंतुकों को यहाँ वहाँ तलाश में न भटकना पड़े।
साधना मार्ग में आगे बढ़ाता तथा साँसारिक विक्षोभों से रक्षा करता है। आने वाले प्रलोभनों, आकर्षणों में यह शस्त्र की भूमिका संपादित करता है। आदर्शों एवं सिद्धाँतों को अपनाये रख सकना, श्रेष्ठ मार्ग पर दृढ़ बने रहना चरित्रवान के लिए संभव हो पाता है।
साधना पथ में आगे बढ़ने के लिए विवेक का अवलम्बन अनिवार्य है। इसके प्रकाश में ही हम ईश्वरीय ज्ञान को अपने अन्दर अधिक स्पष्ट रूप में व्यक्त कर पाते हैं यह कारण है कि विवेक शक्ति की महत्ता का प्रतिपादन सभी शास्त्र करते हैं। उसके जागरण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। इस पथ पर चलने वाले आत्मविकास के इच्छुक प्रत्येक साधक के लिए विवेक का अवलंबन अनिवार्य हो जाता है। साधना की पृष्ठभूमि यहीं से बनती है।
साधना के उपादान शरीर की इन्द्रियाँ तथा मन ही है। वे सहचर बन जायें तो कठिन से भी कठिन मंजिल पर पहुँचना सुगम हो सकता है।
साधना एवं यज्ञ विधान दोनों में ही स्थूल की नहीं सूक्ष्म की महत्ता है। वही उस प्रभाव के लिए उत्तरदायी मानी जा सकती है जो साधक को अदृश्य के अधिकाधिक निकट लाने, देवत्व एवं द्विजत्व प्रदान करने तथा उसे ऋषि-महामानव स्तर के पद तक ऊँचा उठाने की महती भूमिका निभाती है।
साधना (3) आराधना। उपासना के भाव क्षेत्र को साधना से चरित्र को और आराधना से व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश किया जाता है। यह तीनों साथ-साथ चलती हैं। जिस प्रकार अन्न, जल और वायु का साथ-साथ सेवन क्रम चलता रहता है उसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए हर किसी को अपने-अपने ढंग से उपासना, साधना और आराधना की त्रिधा अपनानी पड़ती है।
साधना भी स्वल्प फलदायक होती है।
साधना, उपासना, आराधना का त्रिविधि उपक्रम अपना कर प्रज्ञा परिजन पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना, जो युग धर्म की माँग पूरी करने हेतु उन्होंने प्रचण्ड तप पुरुषों के रूप में आरम्भ की है, के अंग बन सहज की श्रेयाधिकारी बन सकते हैं।
साधना का अधिक पुण्य फल माना गया है। फिर यहाँ के वातावरण की भी विशेषता है। नित्य 24 लाख जप, नौकुण्डीय यज्ञशाला में 24 हजार आहुतियाँ, अखण्ड दीपक आदि कारणों से यहाँ साधना मय विशिष्ट वातावरण है। गायत्री के दृष्टा ऋषि विश्वामित्र की यह तपस्थली है। किस साधक के लिए क्या विशेषता का समन्वय हो, इसके लिए शारीरिक, मानसिक जाँच-पड़ताल की विशेषज्ञों द्वारा विशेष व्यवस्था है।
साधना करनी होती है।
साधना पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य निरपेक्ष नहीं होते वरन् परिस्थितियों के अनुसार उनके स्वरूप बदलते रहते हैं। विवेक न हो तो परिस्थितियों का विश्लेषण एवं सत्य असत्य का निर्धारण नहीं हो पाता। तटस्थ बुद्धि तो सत्य को घटनाक्रमों के साथ बाँध भी देती है जबकि वह इनसे परे है। निश्चय कर सकने के अभाव में तो सत्य भी असत्य और असत्य भी सत्य मालूम पड़ता है।
साधना के क्षेत्र में पतंजलि एवं विश्वामित्र को।
साधना हेतु ऋषि मनीषियों ने गहन मन्थन किया है एवं उसे योग की चरम उपलब्धि घोषित किया है। उपनिषद्कारों के अनुसार ज्ञान, भक्ति एवं कर्मयोग की सभी धाराएँ अन्ततः इसी आनन्द रूपी अमृत समुद्र में समा जाता है। हमारे अध्यात्म दर्शन की सभी धाराएं चाहे वे किसी वाद का समर्थन करती हों, हैं अन्ततः आनन्दवाद ही। इसी कारण मुण्डकोपनिषद् में विद्वान ऋषि कहते हैं- तद्विज्ञाने न परिपश्यन्ति धीरा आनन्द रूपमर्भृतम् यद्विभाति।” अर्थात् ज्ञानी लोग विज्ञान से अपने अन्तर में स्थित उस आनन्द रूपी ब्रह्म का दर्शन कर लेते हैं एवं ज्ञानियों में भी परम ज्ञानी हो जाते हैं।
साधना की पृष्ठभूमि यहीं से बनती है।
साधना। जीवनचर्या को मानवी गरिमा के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से सुसंस्कारी बनाना। संक्षेप में यही है- साधना का उद्देश्य। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को निरन्तर काटते रहने पर ही वह मानवी गरिमा के ढांचे में ढलता है। अन्यथा नर-पशु जैसा अनगढ़ कुसंस्कारी ही बना रहता है।
साधना के बीच पुष्पित, पल्लवित हो ही नहीं सकते। इस दृष्टि से प्रेम तत्व के विकास के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। यह पर पीड़ा निवारण, समाज में संव्याप्त दुःख-क्लेशों की निवृत्ति के लिए किया जाने वाले प्रयोग द्वारा ही संभव है।
साधना से उपलब्ध किया। अठारह वर्ष की आयु में उनने अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण कर लिया। दक्षिण भारत में बोली जाने वाली चारों भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। साथ ही अंग्रेजी और संस्कृत का भी। यह भाषा ज्ञान उन्होंने किशोरावस्था में ही प्राप्त कर लिया था।
साधनारत गुरुदेव अपने विराट् रूप में अब विश्वव्यापी हो गए हैं एवं पूर्व की ही तरह परिजनों के उतना ही निकट है जितना कि वे उपासना स्थली पर ध्यान की स्थिति में उन्हें पाते थे। उनका कार्यक्षेत्र अब सारा विश्व है एवं अन्यान्य धर्म सम्प्रदायों के अनुयायियों के लक्ष्य, राष्ट्राध्यक्षों- मनीषियों के मध्य सूक्ष्म रूप में विचरण कर उन्हें सतत् सत्प्रेरणाएँ दे रहे हैं ताकि युग विभीषिकाएँ- देवी विपत्तियाँ टाली जा सकें एवं प्रज्ञायुग का स्वप्न साकार हो सके।
साधना और आराधना की जीवनचर्या में नित्यकर्म की तरह स्थान देना चाहिए। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार के दोनों प्रयोजन इसी आधार पर बन पड़ते हैं।
साधना से इस युग के महर्षि बन गये। आत्मज्ञान उन्होंने अपनी ही साधना से उपलब्ध किया। अठारह वर्ष की आयु में उनने अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण कर लिया। दक्षिण भारत में बोली जाने वाली चारों भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। साथ ही अंग्रेजी और संस्कृत का भी।
साधना अनुशासन तो मन के प्रशिक्षण, परिशोधन एवं अग्रगमन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन गतिशील यन्त्रों को कौन कितनी कुशलतापूर्वक संचालित कर पाता है, इसी पर उसका आध्यात्मिक विकास निर्भर है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-July
साधना क्रम चलाया था। परिणाम आश्चर्यजनक हुआ। मँडराते बादल टल गए। उतना ही नहीं बंगला देश स्वतन्त्र हुआ और शरणार्थियों की समस्या हल हुई। भारत विपत्ति में फँसने के स्थान पर श्रेयाधिकारी बना।
साधना से जन समुदाय को क्या कुछ मिलने वाला है, वर्तमान परिस्थितियों में कैसे परिवर्तन आने वाला है, यह असमंजस सहज ही किसी के मन में उठ सकता है। जो हमारे सहयोगी- सहभागी बने हैं, जिन्होंने हमसे साझेदारी की है एवं वह सब कुछ कर दिखाने को निष्ठापूर्वक संकल्पबद्ध हैं जो हमारे मार्गदर्शक ने हमारे माध्यम से कहलवाया, उन्हें यह बताना भी हमारा ही कर्तव्य है। हम उनके लिए क्या कुछ कर पाएंगे, उनका सहयोग भावी समय में कैसे वाँछित है, यह बताना भी अनिवार्य समझते हुए ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं।
साधना अनुबन्धों का निर्वाह करना पड़ता है। उसे सीमित समय में सीमित विषय वार्ता का अभ्यास करना होता है। अभीष्ट प्रसंग के अतिरिक्त निरर्थक वार्ता न हो। जहाँ तक सम्भव हो, मौन-एकाकी तप साधना में ही निरत रहा जाय।
साधना में मध्यवर्ती समुदाय के लोग ही काम आए हैं। उनमें भी प्रौढ़ स्थिति को प्राप्त व्यक्ति लड़के नई जवानी में अस्थिर रहते हैं, उनमें जोश तो होता है पर होश नहीं। अनुभव की कमी से वे महत्वपूर्ण परिवर्तन जैसे कार्यों को उतना नहीं कर पाते जितना अभीष्ट होता है। यही बात बुजुर्गों के सम्बन्ध में भी है। ढलती वायु में शारीरिक-मानसिक क्षमताएं चुकने लगती हैं।
साधना उन्हीं उच्चस्तरीय उद्देश्यों के निमित्त चल रही है।
साधना के सूक्ष्मीकृत रूप का कितना साम्य है, इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।
साधना एवं दैनन्दिन उपासना- आराधना के क्रम से जो प्रत्यक्ष भूमिका बनायी है, उसके कई अध्याय पूरे हो चुके। अब उपसंहार भर शेष है। यही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होगा जो वर्तमान को आमूल-चूक बदल डालेगा। आत्मसत्ता के सूक्ष्मीकृत रूप में प्रकटीकरण की क्या चमत्कारी परिणतियां हो सकती हैं इसे अगले दिनों स्पष्टतः देखा जा सकेगा।
साधना, आराधना की विधा जिसे जीवन चर्या के साथ गूँथने पर जीवन त्रिवेणी संगम जैसा पवित्र, प्रखर, और प्रामाणिक बनता है और फिर काक के पिक एवं बगुले के हंस बनने में कोई बाधा मार्ग में नहीं आती।
साधना के लिए पन्द्रह मिनट एकान्त चिन्तन मनन हेतु निकालना चाहिए इसमें आत्म समीक्षा-आत्म सुधार की योजना-आत्म निर्माण की विधि और आत्म विकास की स्थिति प्राप्त करने का विचार करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में जो बन सकता हो, उसका ताना बाना बुनना चाहिए। चार संयम ही तप हैं। इन्द्रिय, अर्थ, समय और विचारों में से एक भी विभूति का अपव्यय न किया जाये। न्यूनतम में निर्वाह करने और परिवार छोटा स्वावलम्बी बनाने की नीति अपनानी चाहिए।
साधना का सूक्ष्मीकरण है। जिनमें प्रत्यक्ष क्रियाकलापों पर रोकथाम कर व्यक्तित्व वाणी, प्राणाग्नि एवं आहार आदि के कारण रूप को उभारना-सुनियोजित करना होता है। यज्ञ प्रक्रिया से साधना के सूक्ष्मीकृत रूप का कितना साम्य है, इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।
साधना-तप पुरुषार्थ द्वारा संपन्न होते थे एवं सुनियोजन सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन हेतु होता था। अब उसी कार्य को चिन्तन की उत्कृष्टता, जीवनक्रम के निर्धारण एवं वातावरण के दबाव से सम्पन्न कराया जाएगा। सभी वैसा ही जीवन जीकर सहकारी प्रयासों में निरत होंगे।
साधना व्यक्ति, परिवार और समाज की त्रिविधि संरचना से ही सम्भव होती है। तीनों के बीच सघन तालमेल रहने और परस्पर सहयोगी बने रहने से ही सुख, शान्ति और प्रगति की भूमिका बनती है। इस तथ्य से अवगत होने के कारण प्रज्ञा युग का मनुष्य आज की तरह संकीर्ण स्वार्थपरता में ही निरत न रहेगा। वरन् व्यक्तित्व को प्रखर प्रामाणिक एवं परिवार को सुसंस्कारी स्वावलम्बी बनाने के लिए गम्भीरतापूर्वक ध्यान देगा। और उसके लिए भावभरी तत्परता के साथ प्रयत्न करेगा।
साधना में तपश्चर्या के अनेकानेक प्रयोग हैं। इससे शरीर की स्थिति तथा आदत परम्परा का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। एक ही साधना हर किसी के लिए एक जैसा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकती। इससे उसकी वंश परम्परा- गुरु परम्परा तथा जन्म-जन्मान्तरों तक के संस्कारों का ध्यान रखते हुए निर्धारण करना होता है। ऐसे निर्धारणों में साधक की अपनी निजी बुद्धि ही सब कुछ नहीं होती।
साधना के रूप में सतत् निभाये जाते रहें।
साधना का प्रतीक है। यज्ञ को ही क्यों श्रेष्ठ माना गया, इसका कारण जाँचने पर पता चलता है कि इस पुनीत प्रक्रिया में कारण शक्ति का प्रयोग होता है। स्थूल दृश्यमान है, सूक्ष्म ऐसा अदृश्य जो उपकरणों के माध्यम से ही जाना जा सके एवं अन्तिम कारण वह जो बुद्धि के अतिरिक्त अन्य किसी माध्यम या उपकरण से परखा न जा सके। यज्ञ में यही होता है। कारण शक्ति को उभारा और प्रयुक्त किया जाता है।
साधना पूर्णाहुति क्रम पूरी करते हुए हमने इतने झोंपड़े बना लिए हैं जिनमें 240 ब्राह्मण परिवार रह सकें। कुछ कमी पड़ रही है। उसके सम्बन्ध में विश्वास है कि परिजन थोड़ी और उदारता दिखा देंगे तो जो कमी है वह भी इस वर्ष पूरी हो जायेगी। बसने वालों में उन वानप्रस्थों को प्रधानता दी गई है जो बच्चों के उत्तरदायित्व से निवृत्त हो चुके। इतना तो करना ही होगा कि यहाँ आकर नया सन्तानोत्पादन बन्द कर दें।
साधना :- मध्याह्न काल में जीवन साधना के लिए पन्द्रह मिनट एकान्त चिन्तन मनन हेतु निकालना चाहिए इसमें आत्म समीक्षा-आत्म सुधार की योजना-आत्म निर्माण की विधि और आत्म विकास की स्थिति प्राप्त करने का विचार करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में जो बन सकता हो, उसका ताना बाना बुनना चाहिए। चार संयम ही तप हैं। इन्द्रिय, अर्थ, समय और विचारों में से एक भी विभूति का अपव्यय न किया जाये। न्यूनतम में निर्वाह करने और परिवार छोटा स्वावलम्बी बनाने की नीति अपनानी चाहिए।
साधना उसे वैसा ही पोषण देने में नियोजित होगी जैसा अपेक्षित है।
साधना-उपासना का वैज्ञानिक आधार क्या है? मनःशक्तियों के विकास में साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन कर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है, गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति सम्पन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है, ज्योतिर्विज्ञान के चिर पुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है, ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषि परम्परा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों में अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिये हैं। हमने उनका शुभारम्भ कर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है, आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत् पोषण देते रहेंगे।
साधना में निरत हो वातावरण को गरम करने हेतु विवश किया। यदि हमारी प्रस्तुत सूक्ष्मीकरण दिनचर्या को इसी साधना उपक्रम के समकक्ष समझा जाए तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी। परिजन इसे उतनी ही गम्भीरता से लेंगे भी।
साधनाओं तप-तितीक्षा के सहारे परोक्ष जगत की सभी जानकारी रखते थे। अनुमान नहीं, अपितु दिव्य चक्षुओं द्वारा प्रत्यक्ष जानकारी रखते हुए वे बिना सृष्टि व्यवस्था में व्यतिक्रम डाले स्वयं भी उससे लाभान्वित होते थे एवं जन समुदाय को भी उसके चमत्कारी फलितार्थों से अवगत कराते थे। सूक्ष्मीकरण की साधना वस्तुतः इस परोक्ष जगत के दिग्दर्शन, उसमें परिभ्रमण एवं उसके माध्यम से विराट् समुदाय को लाभ पहुँचाने की ही उच्चस्तरीय प्रक्रिया है।
साधना उपचारों का पोषण देना होता है। उसे जिस प्रयोजन के लिये अभ्यस्त करना होता है, वैसी ही तप साधना में स्वयं को नियोजित करना होता है।
साधना पुरुषार्थ से अर्जित दिव्य दृष्टि सम्पन्न शरीरधारी साधक स्वयं को सूक्ष्म रूप में बदलकर अथवा स्थूल स्थिति में इन आयामों के रहस्यमय संसार का दिग्दर्शन कर सकते हैं। इस संसार में अपने कर्मों के अनुरूप सूक्ष्म आत्माएँ फल पाती हैं एवं उसी आधार पर एक निश्चित अवधि तक उन्हें उसमें रहना पड़ता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना हेतु पांच वर्ष के लिए संलग्न हो सकें। नये युग के अनुरूप नये शिक्षण का, नये निर्माण का एवं अपने तथा दूसरों के जीवन क्रम को ढालने वाले देखने में छोटे किन्तु परिणाम में महान कार्य संपन्न कर सकें ऐसी जीवन-पद्धति के विकास हेतु खपने वाले लोक-सेवी कहीं होंगे तो अवश्य मिलेंगे।
साधना का एक ही स्वरूप है- वाष्पीकरण। इसमें अपनी ही प्राण ऊर्जा को इतना प्रचण्ड किया जाता है कि उससे अपने ही अन्तराल में सन्निहित पाँच कोश इतने गरम हो सकें कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उनकी सत्ता विनिर्मित हो सके। पानी खौलता है तो उनमें अलग-अलग बबूले उठने लगते हैं। हर बबूला अपनी एक स्वतंत्र इकाई बनाता है और जब तक आवश्यकता रहती है अपना अस्तित्व बनाये रखकर दूसरों के साथ विलीन हो जाता है। कितना बड़ा बबूला किस कार्य के लिए, किस विधि से, कितनी शक्तिशाली बनाया या उठाया जाय यह निर्णय करना ऐसे प्रसंगों में साधक और उसके मार्गदर्शक का काम होता है।
साधना है। इससे जहाँ व्यक्ति स्वयं में विभूतियों का स्वामी बनता है, वहाँ परोक्ष से आदान-प्रदान का- अन्यान्य व्यक्तियों, वातावरण एवं समस्त समुदाय को लाभान्वित करने का हित साधन भी सम्भव होता है। हमारी साधना उन्हीं उच्चस्तरीय उद्देश्यों के निमित्त चल रही है।
साधना उपचार किस प्रकार सहायक सिद्ध होते हैं? ऋषिकालीन आयुर्विज्ञान का पुनर्जीवन कर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को कैसे अक्षुण्ण बनाया जा सकता है, गायत्री की शब्द शक्ति एवं यज्ञाग्नि की ऊर्जा कैसे व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान एवं पवित्र तथा काया को जीवनी शक्ति सम्पन्न बनाकर प्रतिकूलताओं से जूझने में समर्थ बना सकती है, ज्योतिर्विज्ञान के चिर पुरातन प्रयोगों के माध्यम से आज के परिप्रेक्ष्य में मानव समुदाय को कैसे लाभान्वित किया जा सकता है, ऐसे अनेकानेक पक्षों को हमने अथर्ववेदीय ऋषि परम्परा के अंतर्गत अपने शोध प्रयासों में अभिनव रूप में प्रस्तुत कर दिये हैं। हमने उनका शुभारम्भ कर बुद्धिजीवी समुदाय को एक दिशा दी है, आधार खड़ा किया है। परोक्ष रूप में हम उसे सतत् पोषण देते रहेंगे। सारे वैज्ञानिक समुदाय का चिन्तन इस दिशा में चल पड़े, आत्मिकी के अनुसंधान में अपनी प्रज्ञा नियोजित कर वे स्वयं को धन्य बना सकें, ऐसा हमारा प्रयास रहेगा।
साधना पुरुषार्थ कर आप्त वचनों की प्रामाणिकता भी सिद्ध करते हैं। जो काम नीरोग, सुघड़, स्फूर्तिवान स्थूल काया कर सकती है, उससे अधिक अनुपात में विचारणा एवं भावना के आयामों द्वारा सूक्ष्म एवं कारण शरीर कर दिखाते हैं।
साधना वस्तुतः आत्म जागृति की ही योग साधना है। इससे जहाँ व्यक्ति स्वयं में विभूतियों का स्वामी बनता है, वहाँ परोक्ष से आदान-प्रदान का- अन्यान्य व्यक्तियों, वातावरण एवं समस्त समुदाय को लाभान्वित करने का हित साधन भी सम्भव होता है। हमारी साधना उन्हीं उच्चस्तरीय उद्देश्यों के निमित्त चल रही है।
साधना करना (3) न्यूनतम में निर्वाह। सतयुग में रहने वाले देव मानव की पहचान इन्हीं तीन गुणों से होती थी। आज तो सब कुछ उल्टा हो गया है। तथाकथित सन्त सोने-चाँदी के छत्रों के आच्छादन ओढ़े हाथियों की सवारी पर हीरे-मोतियों के आभूषण पहनकर निकलते हैं। लोग कुछ भी कहें पर निर्धारित मूल्य तो जहाँ के तहाँ रहेंगे।
साधना में ही निरत रहा जाय।
साधना के माध्यम से यही प्रयोजन पूरा किया जाता है। संतों, महामानवों, ऋषियों का अस्तित्व सदियों तक उनके इसी स्वरूप के कारण बना रहता है जो होता है विचार तरंगों से बने सूक्ष्म शरीर के रूप में। समय-समय पर जो विकट समस्याएँ मानवी पुरुषार्थ से सुलझती दिखाई देती हैं अथवा अदृश्य अनुदान पृथ्वी वासियों को मिलते हैं उनके मूल में सृष्टा की यही विधि-व्यवस्था काम करती है। अनास्था इसे संयोग कहती हैं पर आस्थावानों को दैवी सत्ता की अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञ होने एवं परोक्ष के प्रति अपना श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने का तथ्य भरा आधार उपलब्ध होता है।
साधना द्वारा योगाग्नि का प्रकटीकरण ब्रह्मतेजस् के रूप में देखा जाता है। ठीक उसी प्रकार यज्ञ प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाली हर सामग्री की परिष्कृति चमत्कारी होती है। शरीर रोग एवं मनोविकारों के निवारण तथा जीवनी शक्ति सम्वर्धन में इनकी भूमिका को भली-भांति देखा जा सकता है। चरु जो कि मेवे, खाद्यान्न, दुग्ध, शर्करा का सम्मिश्रण होता है एवं यज्ञाग्नि में पकाया, संस्कारित किया जाता है विशेष रूप से महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि इसके प्रभाव न केवल जीवकोश वरन् डी.एन.ए., जीन्स जैसे सूक्ष्मतम घटक पर पड़ते हैं।
साधना उपक्रम के समकक्ष समझा जाए तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी। परिजन इसे उतनी ही गम्भीरता से लेंगे भी।
साधना द्वारा बोध होते ही बुद्ध बन गए। लेकिन समझ में यह नहीं आता कि अपने बारे में ऐसा क्या है, जो मनुष्य नहीं जानता पूछने पर तुरन्त नाम, गोत्र, वंश व्यक्ति बता देता है। काया अलग है, व उसका प्राण आत्मा अलग, जो उसकी नियामक सत्ता है, यह भी अधिसंख्य व्यक्ति जानते हैं। इस प्रसंग का ऊहापोह करने के लिए लोग जाने कितने शास्त्र पढ़ते, पुराण-कथाओं का श्रवण करते देखे जाते हैं, लेकिन इससे क्या आत्मबोध हो पाता है?
साधना वस्तुतः इस परोक्ष जगत के दिग्दर्शन, उसमें परिभ्रमण एवं उसके माध्यम से विराट् समुदाय को लाभ पहुँचाने की ही उच्चस्तरीय प्रक्रिया है।
साधना का आधार तो सुव्यवस्थित दिनचर्या पर निर्भर रहता है।
साधना हर किसी के लिए एक जैसा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकती। इससे उसकी वंश परम्परा- गुरु परम्परा तथा जन्म-जन्मान्तरों तक के संस्कारों का ध्यान रखते हुए निर्धारण करना होता है। ऐसे निर्धारणों में साधक की अपनी निजी बुद्धि ही सब कुछ नहीं होती। इसके लिए अधिक अनुभव और निष्णात मार्ग दर्शन की आवश्यकता पड़ती है। वह जिन्हें उपलब्ध हो सके वे सफल भी होते हैं।
साधना में निरत रहकर लेखनी वाणी के सशक्त तन्त्र के माध्यम से जन-मानस के चिन्तन को उभारते थे। ऐसी साधना अनेकों उच्चस्तरीय व्यक्तियों को जन्म देती थी- उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को उजागर कर उन्हें सही दिशा देकर समाज में वाँछित परिवर्तन लाती थी। शरीर की दृष्टि से सामान्य दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति भी प्रतिभा-कुशलता-चिन्तन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।
साधना द्वारा जो उसने “मीन केम्फ” के रूप में आरोपित की। बाद में सारे राष्ट्र के पाठ्यक्रम, अखबारों की धारा का मोड़ उसने उस दिशा में मोड़ दिया जैसा कि वह चाहता था। जर्मन राष्ट्र नस्लवाद के अहं में सर्वश्रेष्ठ जाति का प्रतीक कोने के गर्वोन्माद में उन्मत्त हो व्यापक नर संहार कर स्वयं ध्वस्त हो गया। यह भी मनीषा के के एक मोड़ का परिणति है, ऐसे मोड़ की जो सही दिशा में होता तो ऐसे समर्थ सम्पन्न राष्ट्र को कहाँ से कहाँ ले जाता।
साधना के उपरान्त साधक उसी श्रेणी में आ जुड़ता है और पृथ्वी पर शरीर रूप में रहते हुए भी उनमें प्रत्यक्ष सम्बन्ध बनाये रखता है।
साधना का प्रयोजन भी यही है।
साधना से सिद्ध वातावरण भी स्तर को ऊँचा उठाने में मददगार सिद्ध हुआ है। उदाहरण के लिये भारत कभी संसार का मुकुट मणि था। इसका कारण यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा नहीं वरन् शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति थी। उसके विपरीत संसार में अधिक सम्पन्न क्षेत्र भी रहे हैं। पर अपने अनाचरण के कारण निरन्तर कलह पराभव के निमित्त कारण बने रहे।
साधनाएँ हैं। जिन्हें प्राथमिकता देनी हो, सूक्ष्म शरीर उन्हें ही पहल देता है एवं क्रमिक व्यवस्थानुसार शेष को आगे के लिए छोड़ देता है। जिस प्रकार व्यवसाय अनेकों हैं, उसी प्रकार योग के प्रसंग एवं उद्देश्य भी अगणित हैं। साधक को शास्त्र निर्देशानुसार विभिन्न अभ्यासों की प्रयोजन विशेषतानुसार कम व्यवस्था निर्धारित करनी होती है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण चरण साधना का सूक्ष्मीकरण है।
साधना एवं तपश्चर्या की सहायता से भी हो सकता है। ऋषिकल्प- महामानवों का सान्निध्य, सद्भाव और अनुदान तो इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि रहेगा ही।
साधना का उपक्रम न अपनाया गया हो तो वह प्रभाव उत्पन्न न हो सकेगा जो यज्ञ की सूक्ष्म एवं कारण शक्ति उभारने हेतु अभीष्ट है प्रथम होता ज्ञानकाण्डी ऋग्वेद अनुशासनों पर चलने वाला होता है। अध्वर्यु कर्मकाण्डी यजुर्वेदी एवं उद्गाता गायक सामवेदी होता है, साधारण गाने वाला नहीं वरन् भक्ति भाव का धनी समर्पित साधक। ब्रह्मा चतुर्वेदों का जानकार अथर्ववेदी जो सारी प्रक्रिया का नियमन करने वाला, प्रबन्ध निदेशक, व्यवस्था संयोजक है। यह वर्णन यहाँ व्यक्तित्व के सूक्ष्मीकृत उच्चस्तरीय स्वरूप को दर्शाने के लिए किया गया जो कि याजक गणों ऋत्विजों को हस्तगत करना पड़ता है।
साधना, आराधना के निमित्त सुनिश्चित रूप से निकालना चाहिए।
साधना पराक्रम द्वारा मात्र अपनी इच्छा शक्ति के बल पर सूक्ष्म लोकों के एक छोर से दूसरे छोर तक परिभ्रमण कर इन आत्माओं से संपर्क स्थापित कर सकता है। सूक्ष्म शरीर को क्रियाशील बनाने पर सामान्य काया में कोई अन्तर नहीं दिखाई पड़ता। वेश-भूषा एवं जीवनचर्या यथावत् बनाये रखते हुए भी वे अपने सूक्ष्म शरीर से विभिन्न लोकों में आवागमन का क्रम बनाये रख सकते हैं। सूक्ष्मीकरण साधना के माध्यम से यही प्रयोजन पूरा किया जाता है। संतों, महामानवों, ऋषियों का अस्तित्व सदियों तक उनके इसी स्वरूप के कारण बना रहता है जो होता है विचार तरंगों से बने सूक्ष्म शरीर के रूप में।
साधना द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष रूप युग मनीषा का हो सकता है जो अपनी लेखनी शक्ति द्वारा उस उत्कृष्ट स्तर का साहित्य रच सके जिसे युगान्तरकारी कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जो संकल्प हमने आज से सैंतालीस वर्ष पूर्व लिया था, उसे अनवरत निभाते रहने का हमारा नैतिक दायित्व है।
साधना साथ-साथ चलती रहे। इसमें वे घाटे में नहीं नफे में रहेंगे।
साधना समर में व्यष्टि और समष्टि के समन्वय एकात्म होने में दैनन्दिन जीवन के कषाय-कल्मष ही बाधक होते हैं। संस्कारों की संचित सम्पदा लेकर जन्मे देवपुरुषों को उनसे मुक्ति पाने हेतु अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता। वे स्वेच्छा से उस पथ पर चल पड़ते हैं। अदृश्य जगत उच्चस्तरीय आत्माएं धरित्री पर अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा करने के लिए उन्हें वाँछित आत्मबल देती हैं, सामयिक मार्गदर्शन देते हुए उनके प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों में परिवर्तन करती रहती हैं। सामान्य बुद्धि सहज ही उन्हें समझ नहीं पाता, जबकि होना वह सब कुछ नियन्ता की विधि-व्यवस्था का एक अंग ही है।
साधना में निरत हो सूक्ष्मतम बनना पड़ता है ताकि अपना स्वरूप और विराट् व्यापक बनाकर स्वयं को आत्मबल सम्पन्न कर वे युग चिन्तन के प्रवाह को मरोड़-बदल सकें। मुनि जहाँ प्रत्यक्ष साधनों का प्रयोग करने की स्वतंत्रता रखते हैं, वहाँ ऋषियों के लिए यह अनिवार्य नहीं। वे अपने सूक्ष्म रूप में भी वातावरण को आन्दोलित करते- सुसंस्कारित बनाये रख सकते हैं।
साधना व लेखनी के योगाभ्यास के इन क्षणों में हमें योगीराज अरविन्द के कुछ कथन सहसा स्मरण हो आते हैं जो उन्होंने परतन्त्र भारत की उन विषम परिस्थितियों में अपने एकान्तवास में व्यक्त किये थे। उन्हें शब्दशः यहाँ उद्धरित कर रहे हैं।
साधना कर एक ग्रन्थ लिखें। अब वे परिवार, पत्नी, बच्चे कहाँ हैं, जो पुराने कपड़ों को काटकर नये कपड़े बतायें और अपना पेट पालते हुए लेखक को अपनी तपस्या में लगा रहने दें।
साधना में सहभागी बनने हेतु आग्रह किया था। इस उपक्रम में उन्हें पंद्रह-पंद्रह मिनट तान बार की त्रिकाल संध्या के रूप में उपासना, साधना, आराधना के निमित्त सुनिश्चित रूप से निकालना चाहिए।
साधना तपश्चर्या से अनगिनत व्यक्तियों को लाभ पहुँचा सकता है। मन्त्र योगी को भी ऋत्विजों की तरह कुछ साधना अनुबन्धों का निर्वाह करना पड़ता है। उसे सीमित समय में सीमित विषय वार्ता का अभ्यास करना होता है। अभीष्ट प्रसंग के अतिरिक्त निरर्थक वार्ता न हो। जहाँ तक सम्भव हो, मौन-एकाकी तप साधना में ही निरत रहा जाय।
साधना भी निभ सके। इन तथ्यों को मिलाकर यह योजना बनी है।
साधना और योग-उपासना द्वारा अध्यात्म चेतना की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर लिया होता है, वे जन्मते हैं। ये दिव्यात्माएं ऋषि आत्माएं कहलाती हैं एवं आत्म सत्ता को ऊंचा उठाने वाले धर्म के मर्म का परिचय जन-साधारण को देती हैं। समय-समय पर परिस्थिति विशेषानुसार उनका प्राकट्य होता रहता है एवं उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान-सत्पथ के माध्यम से उस काल के सामान्य पुरुष, जिनका वर्णन प्रारम्भ में जागृतावस्था में समय व्यतीत करने वालों के नाम से किया गया, आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते एवं जीवनमुक्त होते जाते हैं। सृष्टि की कल्प- मन्वन्तर व्यवस्था कुछ ऐसी है कि हर समय ऐसी दिव्यात्माएं सूक्ष्म जगत में अपने क्रिया-कलापों में संलग्न रहती हैं। इसी कारण धर्म का- श्रेष्ठता का- आदर्श निष्ठा का सर्वथा लोप नहीं हो पाता।
साधना करने में सफल रहे हैं। उसके लिये संयोग तथा साधना से सिद्ध वातावरण भी स्तर को ऊँचा उठाने में मददगार सिद्ध हुआ है। उदाहरण के लिये भारत कभी संसार का मुकुट मणि था। इसका कारण यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा नहीं वरन् शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति थी। उसके विपरीत संसार में अधिक सम्पन्न क्षेत्र भी रहे हैं।
साधना में स्वयं को नियोजित करना होता है।
साधना प्रयोग के उर्वरक की आवश्यकता है। अध्यात्म वेत्ता इस मरुस्थल की देखभाल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते व समय-समय पर संव्याप्त भ्रान्तियों से मानवता को उबारते हैं। अध्यात्म की शक्ति विज्ञान से भी बड़ी है।
साधना पुरुषार्थ द्वारा वस्तुओं की गहराई में अवस्थित उस चिरस्थायी अक्षर सौंदर्य का दर्शन करना चाहता हूँ जो आप की ही कृति है।” सत्य की खोज, विराट् का अनुसंधान, परोक्ष की शोध एवं अन्ततः उस सूक्ष्म दृष्टि की प्राप्ति उनका सदैव चरम लक्ष्य रहा है।
साधना के उपक्रम से इस तुरीयावस्था को प्राप्त किया है एवं इस सूक्ष्मीकृत स्थिति में वे और भी विराट्, सर्वव्यापी होते चले गए हैं। विधाता की यह विधि व्यवस्था सृष्टि विकास के क्रम में सहज ही सबको उपलब्ध नहीं हो पाती, लेकिन जो इस स्थिति तक पहुँच पाते हैं, मानव कल्याण का एक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ उनसे सम्पन्न होता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा का पग-पग पर क्रियान्वयन करना पड़ता है। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के उभयपक्षीय क्रिया-कलाप उसमें पूरी तरह गुँथे हुए हैं। इसलिए यह खतरा है नहीं कि जो लोग गायत्री नगर में बसेंगे, वे कायिक दृष्टि से उत्कृष्टता-सम्पादन में पिछड़ जायेंगे।
साधना में क्या उपक्रम चल रहा है? क्या विधि व्यवस्था अपनाई जा रही है? यह पूछने की इसलिए आवश्यकता नहीं कि वह एक विशेष प्रयोग है और उसमें मार्गदर्शक का क्रमिक अनुशासन ही सब कुछ है। दूसरों का पूछना इसलिए व्यर्थ है कि इस विधि का अनुकरण किसी अन्य के लिए उपयोगी न पड़ेगा। उन्हें क्या करना है, किसलिए करना है, इन प्रश्नों के विस्तृत विवरण बताते हुए हमें अपने अनुभवी मार्गदर्शक के परामर्श पर चलना होगा।
साधना प्रक्रिया में सहभागी ही बनेंगे।
साधनाओं ध्यान धारणा आदि के माध्यम से खोजबीन कर अन्तः की परतों तथा प्रकृति के सूक्ष्म अन्तराल के मध्य आदान-प्रदान का मार्ग खोज निकालते हैं। शास्त्र निष्कर्षों और आप्त वचनों में इसी रहस्य रोमाँच का उद्घाटन किया गया है जो उतना ही सत्य है जितना कि प्रत्यक्ष दृश्यमान हमारा ब्रह्माण्ड व उसका सौर मण्डल।
साधना अनेकों उच्चस्तरीय व्यक्तियों को जन्म देती थी- उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को उजागर कर उन्हें सही दिशा देकर समाज में वाँछित परिवर्तन लाती थी। शरीर की दृष्टि से सामान्य दृष्टिगोचर होने वाले व्यक्ति भी प्रतिभा-कुशलता-चिन्तन की श्रेष्ठता से अभिपूरित देखे जाते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-November
साधना के फलितार्थों से भी भली−भांति अवगत करा दिया है। सूक्ष्म रूप में गुरुदेव के प्रत्यक्षीकरण को, उन्हें परोक्ष मार्गदर्शन की परिजनों को बड़ी विलक्षण अनुभूतियाँ हुई हैं। चूँकि आह्वान किया गया था, ढेरों पत्र ऐसे विवरणों से भरे इन दिनों शान्तिकुँज आ रहे हैं। परिजनों ने पाया है कि अब शान्ति-कुँज आने पर उन्हें जिस प्राण ऊर्जा युक्त वातावरण का सम्बल मिला है, वह अभूतपूर्व है। इससे पूर्व कभी भी उन्हें इतना सान्निध्य-सामीप्य गुरुदेव का नहीं मिला था, जितना इन दिनों।
साधना द्वारा उसके साक्षात्कार तथा आत्मिक प्रगति के आयामों को खोजने का प्रयास करता है। विज्ञान पदार्थ जगत की- दृश्य प्रकृति- ब्रह्मांडीय जगत की शोध करता है। विज्ञान के पास दृश्य आयामों को जानने के लिये भिन्न-भिन्न साधन हैं बहुमूल्य प्रयोगशालाएं हैं। जबकि अध्यात्म साधना प्रक्रिया के माध्यम से मानवी काया रूपी प्रयोगशाला में ब्राह्मी चेतना तथा अंतर्जगत के रहस्यों को जानने का प्रयास करता है। परम सत्ता की विधि-व्यवस्था को दृश्य आयामों द्वारा समझा भी तो नहीं जा सकता।
साधना के बलबूते ही सम्भव हो पाया। यदि इतनी लम्बी अवधि तक यह साधना पुरुषार्थ न निभाया गया होता तो साहित्य सृजन भी सम्भव न हो पाता।
साधना कभी निष्फल नहीं होती ऐसा विद्वत्जनों का मत है। किसी विद्वान ने कहा है- भय से उत्पन्न मौन जड़ता का प्रतीक है किन्तु संयमजन्य मौन साधुता है, तपस्वी का भूषण है।
साधना निर्देश संबंधी समस्त व्यवहार शान्ति-कुँज हरिद्वार से करें। परिजन इस विभाजन को ध्यान में रखेंगे तो साहित्य प्राप्त होने एवं पत्राचार में सरलता रहेगी।
साधना प्रक्रिया के माध्यम से मानवी काया रूपी प्रयोगशाला में ब्राह्मी चेतना तथा अंतर्जगत के रहस्यों को जानने का प्रयास करता है। परम सत्ता की विधि-व्यवस्था को दृश्य आयामों द्वारा समझा भी तो नहीं जा सकता। दोनों के नजरिए अलग-अलग हैं- लक्ष्य एक ही है। दोनों को ही एक स्थिति तक स्थूल साधन प्रयुक्त करने पड़ सकते हैं। एक स्थिति ऐसी आती है जहाँ कुछ सिद्धान्त मानकर चला जाता है एवं यात्रा पूरी करने हेतु तर्कों, तथ्यों का आश्रय लेना पड़ता है।
साधना पुरुषार्थ न निभाया गया होता तो साहित्य सृजन भी सम्भव न हो पाता।
साधना में जाने से पूर्व गुरुदेव ने लिखा था, वे अपने को अनेकों गुना अधिक सामर्थ्यवान एवं विस्तृत बना लेंगे। इन सौ व्यक्तियों के माध्यम से नव-जागरण का शंखनाद बजाने स्वयं गुरुदेव ही जन-जन तक स्थूल रूप में पहुँच रहे हैं। इन केन्द्रीय प्रतिनिधियों के, जो गुरुदेव-माताजी का सन्देश लेकर पहुँचेंगे, क्षेत्रों में पहुँचने पर जो जन चेतना जागेगी, युगान्तर चेतना के दिव्य सन्देश से जो गर्मी आयेगी, उसकी अभी कल्पना मात्र की जा सकती है। परिजन क्षेत्रों में इसे अनुभव करेंगे कि सूक्ष्मीकरण साधन रूपी युग अनुष्ठान की पूर्णाहुति रूप में आयोजित ये प्रज्ञा आयोजन अपने उद्देश्य में कितने सफल रहे।
साधना के साधक अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों के समक्ष संसार के सभी प्रकार के वैभवों को तुच्छ मानते हैं। मौन साधक अतीत के अनुभवों से अर्जित ज्ञान सम्पदा को मौन स्थिति के क्षणों में पुनः नियोजित कर एक नवीन विचारधारा को एक कलाकार की तरह मूर्त रूप देता है, ऐसी विचारधारा जो युगानुकूल होती है, सर्वकल्याण कारी होती है। युग प्रवर्तक दृष्टा ऋषिगण इसी कारण मौन का महात्म्य बताते रहे हैं।
साधना पुरुषार्थ के क्रम में अपनायी जाती है। मौनावस्था एक योगी के लिये सर्वाधिक मूल्यवान निधि एवं धरोहर है। इस अवस्था में प्रवेश कर वह परमसत्ता के और समीप जा पहुँचता है। बहिरंग से नाता तोड़ कर अंतःक्षेत्र की गुफा प्रवेश साधना उसके लिये फलदायी सिद्ध होती है। मौनावस्था में की गयी प्रार्थना-तप साधना कभी निष्फल नहीं होती ऐसा विद्वत्जनों का मत है।
साधना के लिए हिमालय ही उपयुक्त स्थान है। मात्र गंगा तट एवं देवभूमि होने के कारण ही नहीं उस क्षेत्र में सिद्ध पुरुषों का जमघट भी है। सूक्ष्म शरीर की विशिष्ट तपश्चर्या उसी क्षेत्र में सम्भव है। विशिष्ट सिद्धियाँ, विभूतियाँ वहीं उपार्जित की जाती हैं।
साधनाओं का अवलम्बन लेकर हम वर्तमान की तुलना में अनेकों गुनी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं, प्रफुल्लता एवं अक्षुण्ण आनन्द का रसास्वादन करते रह सकते हैं।
साधना में जुट गये। इसी प्रकार अनपरा मिर्जापुर के एडवोकेट श्री डी.एन. कुशवाहा, जो वर्षों से आने का ताना-बाना बुन रहे थे, शान्ति-कुँज से बुलावे की प्रतीक्षा में हैं क्योंकि इसी वर्ष उनकी सभी पारिवारिक समस्याएँ देखते-देखते स्वतः हल हो गयीं।
साधना का ही पथ पकड़ता है। लांगफेलो के अनुसार मौन और एकान्त, आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं। दार्शनिक बेकन का मत है कि मौन निद्रा के समान है जो विवेक को ताजगी प्रदान करती है।
साधना तो करते हैं पर शरीर रक्षा के लिए आवश्यक निर्वाह सामग्री का प्रबन्ध करते हैं। किन्तु सिद्ध पुरुषों की स्थिति दूसरी होती है। उनका स्थूल शरीर नहीं सूक्ष्म शरीर साधना करता है। सूक्ष्म शरीर को अन्न जल की, सर्दी गर्मी से बचाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। दादा गुरू की स्थिति ऐसी ही है।
साधना 24 वर्षों में 24 गायत्री महापुरश्चरण पूरे करने पर सम्पन्न हो गई थी, पर इसके बाद भी प्रातः 1 बजे से 5 बजे तक 4 घण्टे का साधना क्रम उस समय से लेकर अब तक अनवरत रूप से चलता रहा। यदि निर्धारित पुरश्चरणों को करने के उपरान्त वे शान्त बैठ गए होते तो प्रज्ञा परिवार के लाखों व्यक्तियों को नव सृजन के लिए नई सामर्थ्य दे सकना सम्भव ही न हुआ होता। फिर परिवार बनाया बसाया है, उसे काम सौंपना ही एक काम नहीं है। उनकी निजी आवश्यकताएँ भी हैं। उनकी पूर्ति के लिए तपश्चर्या का नया सिलसिला भी जारी रखना होता है।
साधना क्रम उस समय से लेकर अब तक अनवरत रूप से चलता रहा। यदि निर्धारित पुरश्चरणों को करने के उपरान्त वे शान्त बैठ गए होते तो प्रज्ञा परिवार के लाखों व्यक्तियों को नव सृजन के लिए नई सामर्थ्य दे सकना सम्भव ही न हुआ होता। फिर परिवार बनाया बसाया है, उसे काम सौंपना ही एक काम नहीं है। उनकी निजी आवश्यकताएँ भी हैं। उनकी पूर्ति के लिए तपश्चर्या का नया सिलसिला भी जारी रखना होता है।
साधना में गौ की सेवा ऐसी ही श्रद्धापूर्वक करने का विधान है।
साधनायें करती रहनी होती हैं। ऐसा वे अभाव की पूर्ति या कामना के लिए नहीं करते। वह उनका सात्विक स्वभाव या विनोद होता है। जहाँ भी रुचिकर स्थान अनुकूल पड़ता है वहाँ रम जाते हैं। कोई कुटी, गुफा आदि निश्चित नहीं करनी पड़ती।
साधना है जो समय-समय पर महामानवों द्वारा अपने साधना पुरुषार्थ के क्रम में अपनायी जाती है। मौनावस्था एक योगी के लिये सर्वाधिक मूल्यवान निधि एवं धरोहर है। इस अवस्था में प्रवेश कर वह परमसत्ता के और समीप जा पहुँचता है। बहिरंग से नाता तोड़ कर अंतःक्षेत्र की गुफा प्रवेश साधना उसके लिये फलदायी सिद्ध होती है। मौनावस्था में की गयी प्रार्थना-तप साधना कभी निष्फल नहीं होती ऐसा विद्वत्जनों का मत है।
साधना में ही निरत रहने की आवश्यकता पड़ेगी।
साधना। 4. गायत्री का शक्तिस्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना।
साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप।
साधना करता है। सूक्ष्म शरीर को अन्न जल की, सर्दी गर्मी से बचाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। दादा गुरू की स्थिति ऐसी ही है। अन्य कितने ही सिद्ध पुरुष हिमालय के हृदय केन्द्र में रहते हैं। उनके लिए निर्वाह का कोई उपकरण नहीं चाहिए।
साधनायें और कठोर व्रत उपवास। भोजन की मात्रा घटाते-घटाते एकदम निराहार रहने लगे, वस्त्र इतने कम हो गये कि दिशायें ही वस्त्र बन गयीं। फिर भी प्राप्तव्य दूर ही रहा। तो लगा कि मन की शान्ति ही मृगतृष्णा है। संसार असार तो है ही परन्तु सत्य भी यही है।
साधनात्मक पुरुषार्थ किस तरह अपनी भूमिका निभाते होंगे, इसका एक मोटा अन्दाज मस्तिष्कीय रसायन शास्त्र की जानकारी से लगाया जा सकता है। इन सर्वसुलभ, सुगम अध्यात्म साधनाओं का अवलम्बन लेकर हम वर्तमान की तुलना में अनेकों गुनी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं, प्रफुल्लता एवं अक्षुण्ण आनन्द का रसास्वादन करते रह सकते हैं।
साधना मू. 1 रु.। (द) गायत्री चालीसा मू. 20 पैसे।
साधना करते रहते हैं। उसके लिए भी वे बाधित नहीं होते। स्थूल शरीर धारियों को जिस प्रकार शरीर धारण की दिनचर्या करती रहनी पड़ती है। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर धारियों का अपना समय क्षेप करने के लिए इच्छानुसार साधनायें करती रहनी होती हैं। ऐसा वे अभाव की पूर्ति या कामना के लिए नहीं करते।
साधना कहा जा सकता है। जो जितना गहरा होता है वह उतना ही मौन होता है। स्थिर जल गहरा होता है, यह उक्ति मौन के सम्बन्ध में सही सिद्ध होती है। जो वाचाल होते हैं, वे उतने ही उथले-बहिर्मुखी होते व तिरस्कार के भाजन बनते हैं। मौन बुद्धिमानी का ही दूसरा नाम है जो मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण है।
साधना समर में उतरे थे वह जवाब देने लगा और इस भ्रम से स्वयं को निकालने के लिए उठने लगे। बुद्ध घर वापस लौटने की तैयार करने लगे।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों समुचित समाधान मौजूद है।
साधनाओं की मनःसंस्थान पर प्रतिक्रियाएँ जाँचने की शोध हेतु एक अलग ही विभाग की स्थापना की गई है। इस संस्थान के वैज्ञानिकों का मत है कि प्रसन्नता विषाद के लिये उत्तरदायी ये तीनों ही रसायन समूह पिट्यूटरी ग्रन्थि एवं हाईपोथेलेमस के माध्यम से भावनाओं की प्रतिक्रिया दर्शाते हैं। इनके स्रावों का नियन्त्रण ध्यान साधना, एकाग्रता की ध्यान धारणा एवं योग निद्रा जैसे उपायों से भली प्रकार सम्भव है।
साधना, एकाग्रता की ध्यान धारणा एवं योग निद्रा जैसे उपायों से भली प्रकार सम्भव है।
साधना उनके पिछले समस्त तप उपक्रमों से भिन्न है। परिस्थितियों की विषमता को सभी भली-भाँति समझते हैं। जून व जुलाई के अखण्ड ज्योति अंकों ने परिजनों को झकझोरा, सोये से जगाया है तो अगस्त के अंक ने एक लताड़ सी लगायी है व इस एकाकी तप साधना के फलितार्थों से भी भली−भांति अवगत करा दिया है। सूक्ष्म रूप में गुरुदेव के प्रत्यक्षीकरण को, उन्हें परोक्ष मार्गदर्शन की परिजनों को बड़ी विलक्षण अनुभूतियाँ हुई हैं। चूँकि आह्वान किया गया था, ढेरों पत्र ऐसे विवरणों से भरे इन दिनों शान्तिकुँज आ रहे हैं।
साधना उनकी हॉबी के रूप में विकसित हो गया है।
साधना करते हैं। इसके लिए उन्हें अनुभवी पारंगतों से मार्गदर्शन एवं सहयोग प्राप्त करना होता है। ऋषि कल्प सिद्ध पुरुष इस स्थिति से आगे बढ़ चुके होते हैं। वे बिना सहारे के अपने पैरों खड़े हो सकते और चल सकते हैं। जो रास्ता कई बार चल कर देखा है उसके लिए मार्ग पूछने की तो आवश्यकता नहीं पड़ती।
साधना की सिद्धि का ही एक अंग है। योग विद्या में निष्णात व्यक्ति अपनी चेतन सत्ता को स्थूल काया से कभी भी अलग व सम्बद्ध कर सकते हैं। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।
साधना, अपने निज के लिए नहीं होती, वरन् ईश्वरीय प्रयोजनों में से जो जब उन्हें पूरे करने होते हैं उनके लिए आवश्यकता शक्ति संग्रहित करने के लिए वे ऋषि कल्प साधक सतत् साधना करते रहते हैं। उसके लिए भी वे बाधित नहीं होते। स्थूल शरीर धारियों को जिस प्रकार शरीर धारण की दिनचर्या करती रहनी पड़ती है। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर धारियों का अपना समय क्षेप करने के लिए इच्छानुसार साधनायें करती रहनी होती हैं। ऐसा वे अभाव की पूर्ति या कामना के लिए नहीं करते।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों समुचित समाधान मौजूद है।
साधना की अध्यात्म-दर्शन में बड़ी महत्ता बतायी गयी है। कहा गया है “मौनं सर्वार्थ साधनम्।” मौन रहने से सभी कार्य पूर्ण होते हैं। महात्मा गाँधी कहते थे- मौन में अन्तर्शक्ति को जगाने की प्रभावशाली सामर्थ्य होती है। उनके अनुसार वह व्यक्ति, जो अपने जीवन में निरन्तर अनवरत सत्य की शोध कर रहा हो, मौन साधना का ही पथ पकड़ता है।
साधना में होता है। संग्रहित शक्ति द्वारा ऐसे साधक स्वयं को पूर्णता की दिशा में ले जाते हैं, जीवनमुक्त कहलाते हैं एवं अपनी इस शक्ति द्वारा बहिरंग जगत को भी प्रभावित करते हैं।
साधना करते हैं। उसे जीवित रखने के लिए अन्न, जल, निद्रा, सुरक्षा आदि सभी की जरूरत पड़ती है। उन्हें भी उस सामग्री का प्रबन्ध करना पड़ता रहा है। गंगोत्री, गोमुख, तपोवन, शिवलिंग क्षेत्र में कई योगी, तपस्वी पाए जाते हैं। वे कठिन साधना तो करते हैं पर शरीर रक्षा के लिए आवश्यक निर्वाह सामग्री का प्रबन्ध करते हैं।
साधना। 9. गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार।
साधना में अनियमितता थी, घर में वातावरण सुख-शान्ति भरा नहीं था। जून के उत्तरार्द्ध की बात है। उन्हें रात्रि में भोर 3 बजे गुरुदेव ने थपथपाकर उठाया व कहा- “उठकर उपासना करो, साधना का समय हो गया है।” वे तब से नियमित रूप से प्रातः जल्दी उठने लगे, देखते-देखते वातावरण बदल गया। सारा घर उपासना करने लगा है।
साधना करते रहे। प्रारम्भ में वर्ष में यदाकदा व बाद में वर्ष में मात्र दो बार दर्शन देने का क्रम चला, वह भी अन्तिम वर्षों में माताजी तक सीमित होकर रह गया था। वहाँ जाने वालों के कोई मनोरथ अधूरे रहे हों, वे महर्षि दर्शन न कर पाने से क्षुब्ध हो लौटे हों, यह बात भी नहीं। सभी यह पाते थे सूक्ष्मरूप में उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गयी।
साधना में लगे रहे जब तक कि उन्हें निर्वाण प्राप्त नहीं हो गया।
साधना, किसी से न मिलना, जो शारीरिक गतिविधियाँ अभी भी हो सकती थीं उन सबसे निवृत्ति लेने का तात्पर्य यही है कि जराजीर्ण शरीर को पूर्ण अवकाश देकर उसके स्थान पर नव-निर्मित वीरभद्र को प्रशिक्षित किया जाय और देखा जाय कि वह अपना नवीन उत्तरदायित्व ठीक तरह निभा सक रहा है या नहीं। प्रसन्नता की बात है कि इस नवीन शरीर ने इतनी जल्दी अपनी जिम्मेदारियाँ उठाना आरम्भ कर दिया है, जिसकी कि आशा नहीं थी। चौबीस लाख परिजनों की देखभाल उनकी उलझी समस्याओं का समाधान, आवश्यक क्षमता की नई माँग को पूरा करना, मार्गदर्शन विश्वास में कभी न पड़ने देना, हिम्मत हारने न देना, यह कार्य नवीन शरीर को सौंपे गये थे और 6 महीना होते-होते उसने वे सभी कमियाँ पूरी कर ठीक तरह अंजाम देना शुरू कर दिये हैं। मनुष्य का बच्चा 6 महीने की अवधि में कुछ भी नहीं सीख पाता। पशुओं के बछड़े भी इतने कम समय में कुछ सीख नहीं पाते।
साधना का समय हो गया है।” वे तब से नियमित रूप से प्रातः जल्दी उठने लगे, देखते-देखते वातावरण बदल गया। सारा घर उपासना करने लगा है। अब वे कार्यकर्ता के रूप में भी सक्रिय होने का प्रयास कर रहे हैं।
साधना, 36- गायत्री के पाँच मुख पाँच दिव्य कोश।
साधनाजन्य तीसरा वीरभद्र उस प्रचण्ड पुरुषार्थ में जुटेगा जिसे विचारों की विचारों से काट, नैतिक बौद्धिक क्रान्ति नाम दिया गया है।
साधना को समर्पण योग की साधना कहा जा सकता है। जो जितना गहरा होता है वह उतना ही मौन होता है। स्थिर जल गहरा होता है, यह उक्ति मौन के सम्बन्ध में सही सिद्ध होती है। जो वाचाल होते हैं, वे उतने ही उथले-बहिर्मुखी होते व तिरस्कार के भाजन बनते हैं। मौन बुद्धिमानी का ही दूसरा नाम है जो मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण है।
साधना उसके लिये फलदायी सिद्ध होती है। मौनावस्था में की गयी प्रार्थना-तप साधना कभी निष्फल नहीं होती ऐसा विद्वत्जनों का मत है। किसी विद्वान ने कहा है- भय से उत्पन्न मौन जड़ता का प्रतीक है किन्तु संयमजन्य मौन साधुता है, तपस्वी का भूषण है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-December
साधना सूक्ष्म शरीर के बलबूते ही सम्भव होती है। जिस प्रकार शरीर में बहिरंग और अन्तरंग अवयव होते हैं उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर की संरचना के साथ गुँथे हुए अनेकों अदृश्य अवयव भी हैं और वे सभी अपनी-अपनी विशेषताओं से भरे हुए हैं। इनमें से कुछ का परिचय इस प्रकार है- (1) पंचकोश (अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश), (2) षट्चक्र (मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूरित चक्र, अनाहत चक्र, आज्ञाचक्र, एवं सहस्रार चक्र), (3) त्रिग्रन्थि- (हृदय ग्रन्थि, नाभि ग्रन्थि, मस्तिष्क ग्रन्थि), (4) ब्रह्मरन्ध्र, (5) कुण्डलिनी (प्राण सर्पिणी), (6) तीन नाड़ी- (इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना)। इन सबके स्थानों और कार्यों का वर्णन करना यहाँ सम्भव नहीं। इसके लिए सूक्ष्म शरीर का पूरा ढाँचा बताना पड़ेगा और साथ ही यह विवेचन करना पड़ेगा कि इनमें प्रत्येक की क्या विशेषता और क्या साधना है।
साधना में सहभागी बनने का सौभाग्य मिलेगा।
साधना का वर्ष रहा है। उनकी लेखनी का प्रसाद जिस प्रकार परिजनों को मिलता रहा है, उसमें पिछले अन्य वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष विशिष्ट भूमिका निभाई है। यह क्रम रुकने वाला नहीं है, अनवरत चलेगा। साधना से सिद्धि के रहस्यों का उद्घाटन, मानवी अन्तराल में देवत्व का जागरण, संव्याप्त परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन, सन्धिकाल की बेला में निभाए जाने वाले उत्तरदायित्वों सम्बन्धी मार्गदर्शन आगे उनकी मनीषा के माध्यम से ही प्राप्त होता रहेगा। प्रत्यक्षतः दर्शन देने का, परामर्श का क्रम जो पहले चलता था, उस पर अब पटाक्षेप पड़ चुका है।
साधना में विक्षेप करेगा। जो शान्ति कुंज आएँ, वे उनके संकल्प के बिखरे विराट् रूप का दर्शन करें। आश्रम के कण-कण में उनका व्यक्तित्व, तप, प्राण शक्ति तथा संकल्प बिखरा पड़ा है। वही दर्शनीय है। जो भावनापूर्वक शांतिकुंज-गायत्री तीर्थ का दर्शन करेंगे, उन्हें वही प्रेरणा सतत् मिलती रहेगी जो शरीरधारी गुरुदेव का दर्शन करके तथा प्रत्यक्ष आशीर्वाद मिलने से प्राप्त होती थी।
साधना से सम्बन्धित रहस्यों को भी जानने और स्मरण रखने का प्रयत्न करते हुए साधक पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचे। उद्देश्य उत्तम है पर कठिनाई एक ही रही है कि रहस्यवाद का उद्घाटन करने के पीछे जो माथा पच्ची करनी पड़ती है और उस मार्ग पर चले हुए लोगों की सहायता लेनी पड़ती है उसकी ओर उदासीनता अपनाने के कारण रहस्यों को भुला देने की भूल होती रही है।
साधना की जाय और सभी को बलिष्ठ एवं जागृत बनाया जाय। यह समूचा साधना विज्ञान समय साध्य है। इसमें से जिसकी जब आवश्यकता होती है तब उनका प्रयोग आवश्यक तप संयम अपनाने के बाद किया जाता है।
साधना विज्ञान समय साध्य है। इसमें से जिसकी जब आवश्यकता होती है तब उनका प्रयोग आवश्यक तप संयम अपनाने के बाद किया जाता है।
साधना तो गुरुदेव के साथ पूर्ववत् करेंगी ही, शाम को भी तीन साढ़े तीन बजे से उन्हें गुरुदेव के साथ उस क्रम में बैठना होगा। बाहर से आने वालों एवं दर्शनार्थियों-आश्रमवासियों के लिये वे भेंट-परामर्श हेतु शाम तीन बजे तक ही उपलब्ध रहेंगी। प्रातः से बारह बजे तक वे आश्रम व्यवस्था देखती और स्थायी कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करती रहेंगी।
साधना 24 वर्षों में उन्हीं के निर्देश में हुई। इसके उपरान्त युग परिवर्तन की कार्य पद्धति पूरी करते रहने में 34 वर्ष लग गए। अब एक वर्ष की एकान्त साधना इस निमित्त है कि अपने प्रसुप्त पाँच वीर भद्रों को जागृत करके उन्हें अपने-अपने जिम्मे के क्रिया-कलाप सौंप दिए जायें। इसके उपरान्त वर्तमान स्थूल शरीर जब तक भी रखा जाना अभीष्ट है। तब तक एक घोंसले का काम करता रहेगा।
साधना द्वारा पात्रता परखते हुए गुरुदेव विकसित कर रहे हैं। इन्हीं पाँचों को उन्होंने इस एक वर्ष की अवधि में विकसित पंच वीर भद्रों का नाम दिया है। यह जितने परिमाण में जागृत सशक्त हो सकेंगे, जिस अनुपात में उपयोगी पात्र उन्हें मिलते जायेंगे, उसी अनुपात में विश्व परिवर्तन के- युग परिवर्तन के अनेकानेक प्रयोजनों में इनका सुनियोजन हो सकेगा।
साधना करने के लिए परोपकाररत् रहना ही सर्वश्रेष्ठ है।
साधना का स्तर तथा अनुपात अब निर्धारित योजना की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र हो गया है, साथी ही कार्यक्रम अधिक व्यस्त भी। समस्याओं की उग्रता बढ़ रही है। समाधान की रक्षात्मक शक्ति उसकी तुलना में सन्तोषजनक मात्रा में उत्पादित नहीं हो पा रही। इसलिए थोड़ी राहत दे सकने वाली जिस सुविधा के मिलने की सम्भावना थी, वह अवसर अब मिल नहीं सकेगा।
साधना करने से धड़कन रुक जाती है और योग तन्द्रा में समाधि जैसी स्थिति बन जाती है। मस्तिष्क इन सबसे विलक्षण है। उसकी सात प्रतिशत क्षमता ही दैनिक प्रयोजन में काम आती है। शेष सोई पड़ी रहती है। अभ्यास से अथवा पूर्ण संस्कारों से इनमें कुछ अविज्ञात अनभ्यस्त शक्तियाँ एक सीमा तक जीवित हो जाती हैं।
साधना में भारतीय दर्शन के प्रवक्ताओं द्वारा भिन्न-भिन्न रंग सम्वेदनाओं का प्रयोग किया जाता रहा है। इन प्रभावों को आज भी भली-भांति समझकर उनका लाभ उठाया जा सकना सम्भव है। रंगों के प्रभाव से स्वयं रंग जाने के स्थान पर उनका इच्छानुकूल और मनःस्थिति के अनुरूप प्रयोग करना ही औचित्यपूर्ण है, इसमें कोई सन्देह नहीं। क्यों न हम उचित वर्ण चुनकर उनसे समुचित लाभ उठाए एवं न केवल दैनंदिन जीवन में, अपितु आत्मिक जीवन में भी प्रगति-पथ पर बढ़ने हेतु उनका सदुपयोग करें?
साधनाओं में निरत रहते हैं मैंने यही सुना है। इसलिए उन्हें मेरी चिन्ता नहीं है, यह भी वे लोग कहते हैं।’
साधना में समस्त वृत्तियों का उत्पादक चित्त है। वह निग्रहित न होने पर अपने क्रिया-कलाप का ढिंढोरा भी पीटता फिरता है। दो काम उसे नहीं करने चाहिए थे पर आश्चर्य है कि करता है। माता को पुत्र से ब्याह करना पड़ता है अर्थात् मन के साथ गठजोड़ करना पड़ता है। दोनों का संग न सधे तो कोई प्रयोजन ही पूर्ण न हो।
साधना इस निमित्त है कि अपने प्रसुप्त पाँच वीर भद्रों को जागृत करके उन्हें अपने-अपने जिम्मे के क्रिया-कलाप सौंप दिए जायें। इसके उपरान्त वर्तमान स्थूल शरीर जब तक भी रखा जाना अभीष्ट है। तब तक एक घोंसले का काम करता रहेगा। एक बड़े घोंसले में कई अण्डे बच्चे रहते हैं। जब तक उसमें काम चलता है, निर्वाह करते रहते हैं।
साधनाओं से वह सम्भव है या नहीं यह तो मुझे ज्ञात नहीं, पर जो सच्चे हृदय से दुःखी जनों की सेवा निष्काम भाव से करते हैं उनकी स्वर्ग मुक्ति आत्म-कल्याण सर्वथा अक्षुण्ण है, उसे काई भी उससे विचलित नहीं कर सकता।
साधना में भी सूर्योपासना एवं रंग चिकित्सा की अनेकों विधाओं का उपयोग साधक की मनःस्थिति को दृष्टिगत रख समर्थ मार्गदर्शकों द्वारा किया जाता रहा है। यह प्रभाव उथली संवेदनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर आध्यात्मिक विकास में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने लगता है।
साधना है। आवश्यक नहीं कि उनमें सभी की एक साथ साधना की जाय और सभी को बलिष्ठ एवं जागृत बनाया जाय। यह समूचा साधना विज्ञान समय साध्य है। इसमें से जिसकी जब आवश्यकता होती है तब उनका प्रयोग आवश्यक तप संयम अपनाने के बाद किया जाता है।
साधना सहमी खड़ी है- प्रार्थना के पाँव ठिठके।
बाँसुरी बजती नहीं है प्राण सिसके यमुन तट के।
साधना इन दिनों चल रही है।
साधना चल रही है। एक को पाँच में विभाजित किया जा रहा है। कार्य इतना कठिन है कि सब ओर से ध्यान समेट कर एकान्त एवं मौन का उपक्रम अपनाया गया है। आशा की गयी है कि आगामी बसन्त तक इतनी प्रगति सम्भव हो सकेगी कि उसके सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ कहने लायक कदम बढ़ सकें।
साधना विधान में भी। प्रजनन की प्रक्रिया सरल और सर्वविदित है। पर बिना इस प्रक्रिया के जन्म देना हो तो कार्य कठिन जान पड़ता है।
साधना से सिद्धि के रहस्यों का उद्घाटन, मानवी अन्तराल में देवत्व का जागरण, संव्याप्त परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन, सन्धिकाल की बेला में निभाए जाने वाले उत्तरदायित्वों सम्बन्धी मार्गदर्शन आगे उनकी मनीषा के माध्यम से ही प्राप्त होता रहेगा। प्रत्यक्षतः दर्शन देने का, परामर्श का क्रम जो पहले चलता था, उस पर अब पटाक्षेप पड़ चुका है। उनसे वार्तालाप करने, मार्गदर्शन पाने एवं संरक्षण अनुदान ग्रहण करने का माध्यम अब “अखण्ड-ज्योति” एवं “युग निर्माण योजना” ये दो ही पत्रिकाएँ हैं। जो परिजन जितने अधिक व्यक्तियों तक इस लेखनी प्रसाद को पहुँचाएँगे, वे प्रकारान्तर से पूज्यवर की वाणी एवं परोक्ष शक्ति सामर्थ्य के प्रसार-विस्तार के जन-जन तक इसे पहुँचाने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। इस तरह उन्हें भी गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में सहभागी बनने का सौभाग्य मिलेगा।
साधना करने पर नाड़ी की गति न्यूनाधिक हो जाती है। हृदय की साधना करने से धड़कन रुक जाती है और योग तन्द्रा में समाधि जैसी स्थिति बन जाती है। मस्तिष्क इन सबसे विलक्षण है। उसकी सात प्रतिशत क्षमता ही दैनिक प्रयोजन में काम आती है। शेष सोई पड़ी रहती है।
साधना का सम्मिश्रण कहा जा सकता है। दुर्गम हिमालय स्थिति दादा गुरु के मार्गदर्शन में यह प्रक्रिया चल रही है। आरम्भ में 24 गायत्री महापुरश्चरणों की साधना 24 वर्षों में उन्हीं के निर्देश में हुई। इसके उपरान्त युग परिवर्तन की कार्य पद्धति पूरी करते रहने में 34 वर्ष लग गए। अब एक वर्ष की एकान्त साधना इस निमित्त है कि अपने प्रसुप्त पाँच वीर भद्रों को जागृत करके उन्हें अपने-अपने जिम्मे के क्रिया-कलाप सौंप दिए जायें।
साधना की॥
गीत उस भू का लिखो जो भार ऐसे सही रही है॥
साधना की थी और पाँच पाण्डवों एवं कर्ण को पुत्र रूप में जन्म दिया था। गुरुदेव के और कुन्ती के देवताओं में भी अन्तर है और साधना विधान में भी। प्रजनन की प्रक्रिया सरल और सर्वविदित है। पर बिना इस प्रक्रिया के जन्म देना हो तो कार्य कठिन जान पड़ता है।
साधना पुरुषार्थ का अवलम्बन लिया जाता है। अभी हम चेतना के बोध के तीन आयामों को ही जान पाये हैं। समष्टिगत स्तर पर ब्राह्मी चेतना के पाँच आयामों की जानकारी इसी कारण हमें विलक्षण लगने लगती है। योगी दिव्य दृष्टि सम्पन्न होते हैं। योगीराज अरविन्द ने मानवी विकास की जिन पाँच योनियों का वर्णन ब्रह्माण्डीय पंचकोशों के रूप में किया है, वह एक अभूतपूर्व किन्तु यथार्थ प्रतिपादन है।
साधना से आन्दोलित एक व्यापक जन समुदाय में परिवर्तन अवश्य देखा जा सकता है। परिणति को देखकर ही शक्ति का अनुमान लगाया जा सकना सम्भव है।
साधना की दृष्टि से गुरुदेव के लिए यह एक वर्ष अत्यधिक कठिन रहा है। विघ्नकारी शक्तियाँ उद्देश्य को खण्डित करने के लिए विविध-विधि आक्रमण कर रही हैं। गत बसन्त से पूर्व ही आसुरी शक्तियों का एक आक्रमण हो चुका है। अभी अगला बसन्त आने में काफी समय है। इस बीच भीतरी और बाहरी कोई भी आक्रमण हो सकता है।
साधना के आधार पर करना होता है।
साधना अत्यधिक कठिन है। पाँच कोश और पाँच चक्र सर्वप्रथम अलग किए जायें फिर दोनों का नर-नारी जैसा युग्म बने, इनमें पाँच देवताओं की स्थापना की जाये और नियत अवधि तक इन्हें पकने दिया जाये तब पाँच वीर भद्रों के पकने की समर्थ होने की प्रक्रिया पूरी होती है। गुरुदेव को दादा गुरु के संरक्षण में यह सारी विधा उसी प्रकार एकाकी रहकर निपटानी पड़ रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1984-January
साधना का मंच भी ऐसा है जिसमें गुरु और शिष्य दो को ही साथ रहना चाहिए। प्रसव में जननी और शिशु दो पर ही आफत बीतती है और सब तो परिचर्या, सहानुभूति भर के बाहरी लोकाचार को ही निभाते रहते हैं।
साधना की ध्यान धारणा के पूर्वार्द्ध में दैवी क्षेत्र में संव्याप्त सत्प्रवृत्तियों की गरिमा की व्यापक विवेचना के लिये परिपूर्ण गुंजाइश है। चिन्तन और मनन की प्रक्रिया इसी आधार पर चलती है। प्रार्थना, मनुहार, पूजन सान्निध्य, समर्पण, विलय के रूप में भगवान से तादात्म्य स्थापित करने के आधार पर आत्म शिक्षण का अध्ययन तथा धारण का उभय पक्षीय प्रयोजन पूरा होता है।
साधना उपादानों के माध्यम से भाव संस्थान का उदात्तीकरण ही वे सोपान हैं जिन्हें पास करते हुए यह पद प्राप्त होता है। किसी समझौते की इसमें कोई गुँजाइश नहीं।
साधना द्वारा महान बना लिया जाता है तो फिर वे ऋषि-देवता कहाते, अपनी नाव पर चढ़ाकर असंख्यों को पार कराते हैं। यह स्तर को निखारने और ऊँचा उठाने की महत्ता है कि निरुपयोगी धूलि भी इस विशेष प्रक्रिया से गुजरने के उपरान्त अणु शक्ति बनती और अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय देती है। हर व्यक्ति जन्मता तो साधारण मनुष्य के नाते ही है। कालान्तर में उसकी जीवन साधना ही उसे वह श्रेय दिलाती है जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप माना जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की अपनी महत्ता है।
साधना विधानों के माध्यम से नियन्त्रित, परिमार्जित एवं उत्तेजित करने में सफलता प्राप्त की जाय और उस आधार पर शरीर को वैसा बनाया जाय जैसा कि अभीष्ट है।
साधना के अवसर ढूँढ़ते रहते हैं और जब भी, जहाँ भी सम्भव होता है अपनी उत्कृष्टता का परिचय देते हैं। सेवा धर्म अपनाने वालों को देवता कहा जाता है। देवोपम अन्तःकरण प्राप्त कर लेना मनुष्य का सर्वोपरि सौभाग्य माना गया है।
साधना के सहारे उच्चस्तरीय आत्म-शक्ति का सम्पादन कर सके हैं। गान्धारी ने नेत्र शक्ति, संजय की दिव्य दृष्टि, कुन्ती की देव सन्तान, सुकन्या के पति की वृद्धता निवारण, सावित्री का यम संघर्ष अनुसूया द्वारा तीन देवों को बाल स्वरूप जैसे घटनाक्रमों में तप की क्षमता ही उभरती हुई दिखाई पड़ती है। लोक हित के अनेक महत्वपूर्ण कार्य कर सकने वाले महामानवों में विलक्षण क्षमता का विकास साधना शक्ति के सहारे ही हो सका था। चाणक्य, समर्थ रामदास, गुरुनानक, ज्ञानेश्वर, शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस आदि के द्वारा लोकहित के जो महत्वपूर्ण काम बन पड़े उससे उनके तपस्वी जीवन की गरिमा प्रकट होती है। तप साधना के स्वरूप भिन्न-भिन्न हो सकने पर उन सबमें व्यक्तित्व को पवित्र परिष्कृत, प्रखर बनाने वाली कष्टसाध्य जीवनयापन प्रक्रिया का समावेश तो निश्चित रूप से ही रहेगा।
साधना और निस्पृहता वैसी ही थी जैसी कि सुनी गई थी। राजा ने चरण रज मस्तक पर लगाई और बहुमूल्य भेंट सामग्री सामने प्रस्तुत की।
साधनाओं के निमित्त किया जा सकता है।
साधना का सारभूत सिद्धान्त है। आत्मा की चेतना की प्रगति इसी पर निर्भर है।
साधना क्षेत्र में शब्द शक्ति के बारे में अधिक गम्भीरता के साथ सोचा जाना चाहिए एवं उस प्रतिपादन पर ध्यान देना चाहिए जिसमें ‘शब्द और नाद ब्रह्म’ की महिमा शास्त्रकारों के अनन्त रूपों में और गम्भीरता के साथ प्रस्तुत की है। शब्द ब्रह्म अर्थात् गद्य उच्चारण, नाद ब्रह्म अर्थात् ताल स्वर पर आश्रित गीत वाद्य। मन्त्र विज्ञान को इसी क्षेत्र की महान उपलब्धि कहा जा सकता है। मन्त्र में शब्द गुन्थन की विशेषता भी एक तथ्य है पर उससे भी कहीं अधिक विशिष्टता मांत्रिक की निजी जीवनचर्या के साथ जुड़ी रहती है। मन्त्र शक्ति में वाणी का उच्चारण विधान ही पर्याप्त नहीं माना जाता।
साधना उपचार के अवलम्बन हेतु इसी कारण निर्देश दिये जाते हैं ताकि ये मात्र कौतूहल तक सीमित न रहकर मानव समुदाय के लिये हितकारी भी हो।
साधना अथवा परमार्थ परायणता कहा जाता है। इसे वही कर सकेगा जो अपने समय एवं मनोयोग से शरीरगत वितृष्णाओं को रोककर इस दिशा में मोड़ने की प्राथमिक आवश्यकता समझने एवं उसे करने का साहस जुटाने में समर्थ हो सकेगा।
साधना में संलग्न ऋषि-कल्प व्यक्तियों को ऐसे अनुदान अपनी पात्रता के आधार पर विपुल परिमाण में उपलब्ध होते रहते हैं। ऐसे प्रमाणों की एक लम्बी शृंखला है। पात्रता विकसित की जा सके तो हर कोई दैवी अनुकम्पा पाकर अदृश्य जगत से लाभान्वित हो सकता है।
साधना माना गया है। इससे पहले की बाल कक्षा, क्रियायोग के रूप में ही सम्पन्न करनी पड़ती है।
साधनाओं के साथ अपेक्षाकृत अधिक मनोयोग लगाना होता है। तीर्थयात्रा, व्रत, उपवास में शरीर को अधिक और मन को कम काम करना होता है। किन्तु कुछ योगाभ्यासों में झूलने भर से काम नहीं चलता उनमें मात्रकृत्यों की ही प्रधानता नहीं है साथ में अधिक मनोयोग लगाने की भी आवश्यकता पड़ती है। बँध और मुद्राओं का स्वरूप ऐसा ही है। खेचरी मुद्रा में यदि तालु से जीभ भर सटा ली जाय तो ब्रह्मरन्ध्र से अमृत टपकने के रसास्वादन पर मनोयोग केन्द्रित न हो सके तो समझना चाहिए कि प्रयास अधूरा रहा और श्रम निरर्थक चला गया।
साधनात्मक पुरुषार्थ से पूरी होती है। उसमें बेचारे देवताओं को अनुग्रह ही एक सीमा तक पात्रता के अनुरूप में हो सकता है। बात पात्रता पर आई तो उसे भी पुरुषार्थ ही कहा जायेगा। आत्म क्षेत्र के गहन मन्थन को ही साधना, उपासना आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है।
साधना द्वारा होती है जिसमें मन्त्र को सिद्ध करने के लिए भाव भरे पुरश्चरण किए जाते हैं। इस प्रक्रिया का तात्विक स्वरूप इतना ही है कि मांत्रिक को, साधक को अपनी जीवनचर्या में उत्कृष्टता का सघन समावेश करना चाहिए। उसे ऋषिकल्प होना चाहिए। यहाँ दशरथ की पुत्र प्राप्ति अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए किए गए पुत्रेष्टि यज्ञ का स्मरण करना चाहिए जिसमें वशिष्ठ ने राज्यधान्य खाने के कारण मन्त्र शक्ति उत्पन्न करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की थी। वाणी की प्रखरता वाले शृंगी ऋषि उस कार्य के लिए बुलाये गये थे तब प्रयोजन पूर्ण हुआ था।
साधनाओं का क्षेत्र इससे कुछ हटकर है। उन्हें स्थूल शरीर को परिष्कृत बनाने के लिए जागृत एवं समुन्नत किया जाता है। इसके लिए आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा, जप, ध्यान जैसे कृत्यों का अवलम्बन लिया जाता है।
साधनापरक योगाभ्यास हैं। इन योगों को ज्ञान और कर्म दो में भी बाँटा जा सकता है। ध्यानयोग से व्यक्तित्व का परिष्कार बन पड़ता है। क्रियायोग से जीवन प्रवाह ऐसे प्रयासों के साथ जुड़ता है जिनमें आत्मकल्याण और लोकमंगल के दोनों ही लक्ष्य समान रूप से सध सकें। ध्यानपूर्वक सतर्कता के साथ जीवनचर्या की क्रिया-प्रक्रिया अपनाने पर कोई भी व्यक्ति योगी बन सकता है।
साधना के स्वरूप भिन्न-भिन्न हो सकने पर उन सबमें व्यक्तित्व को पवित्र परिष्कृत, प्रखर बनाने वाली कष्टसाध्य जीवनयापन प्रक्रिया का समावेश तो निश्चित रूप से ही रहेगा। सरलतापूर्वक, स्वल्प श्रम में पूजा पाठ करके गायत्री का अनुग्रह और आलोत्कर्ष का लाभ किसी को भी नहीं मिल सका है। भगवद् भक्ति भावुकता मात्र नहीं है। जीवनयापन की रीति-नीति में आदर्शवादिता के लिए कष्ट सहन करने की नीति का समावेश किये बिना उपासना का मूल प्रयोजन पूरा ही नहीं होता।
साधनात्मक अभ्यास की आवश्यकता समझनी चाहिए। वाणी की कला भी अपने स्थान पर उपयोगी है, पर उठने भर से लोक-मानस की दिशाधारा निकृष्टता से उलटकर उत्कृष्टता की ओर मोड़नी हो तो उसके लिए उच्चस्तरीय शब्द शक्ति चाहिए।
साधना का वर्णन एवं विधान वस्तुतः चेतना क्षेत्र की ऊर्जा का ही प्रयोग परिचय है। प्राणायाम के अनेकानेक विधानों में उसी क्षमता के अनेक रूपों का उत्पादन एवं प्रयोग की रीति-नीति का विवरण बताया एवं विस्तार सिखाया जाता है।
साधना से मानवी काया एक उच्चस्तरीय यन्त्र उपकरणों से भरी प्रयोगशाला का काम देने लगती है। ऊर्जा की आवश्यकता शब्द शक्ति होगी। उच्चारण को मन्त्र स्तर तक पहुँचाना पड़ेगा। परिष्कृत जीवन अर्थात् गाण्डीव। मन्त्र अर्थात् शब्द बेधी बाण।
साधना, कुण्डलिनी विज्ञान के अन्तर्गत आती है। वह चेतना क्षेत्र की प्रतिभा, प्रखरता एवं उत्कृष्टता को बढ़ाने के लिए प्रयुक्त की जाती है। उपत्यिका साधनाओं का क्षेत्र इससे कुछ हटकर है। उन्हें स्थूल शरीर को परिष्कृत बनाने के लिए जागृत एवं समुन्नत किया जाता है। इसके लिए आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा, जप, ध्यान जैसे कृत्यों का अवलम्बन लिया जाता है।
साधना का उद्देश्य रहा है। जहाँ तथ्यों का ध्यान रखते हुए- विद्या को निष्ठापूर्वक अपनाते हुए प्रयास चले हैं वहाँ अभीष्ट सफलता भी मिली है। ऋषि युग का इतिहास इसका साक्षी है।
साधना में लगाते रहने से भली प्रकार बन पड़ता है। किन्तु उन्माद के रहते यह सूझ, सूझे कैसे? उसकी तृप्ति तो साथियों को अपने से हीन सिद्ध करके ही होती है। इसी निमित्त बड़े आदमी ब्याह शादियों में दौलत लुटाते हैं, ताकि अन्य लोग अपने को दीन दयनीय समझें और उन लुटाने वालों के भाग्य को सराहें। दूसरों का व्यंग्य, उपहास, तिरस्कार करके भी कई लोग अपने अहंकार की पूर्ति करते देखे गये हैं।
साधना का लक्ष्य है- परमात्मा का साक्षात्कार, जिसकी अनुभूति अपने अंचल में जड़ चेतन की समस्त स्थूल, सूक्ष्म अनुभूतियों को समेटे हुए है। जबकि विज्ञान का विषय इतना विस्तृत- इतना विराट् नहीं है। ब्रह्माण्ड का एक छोटा-सा भाग ही उसका कार्यक्षेत्र होता है।
साधना, उपासना आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है।
साधना विधानों का मनोवैज्ञानिक महत्व है इस तथ्य को सहज ही समझा और समझाया जा सकता है।
साधना के क्षणों में ईश्वरीय विधि व्यवस्था गतिविधियों का स्मरण करने भर से शिक्षण और धारण के उभय पक्षीय प्रयोजन पूरे होते रहते हैं। यहाँ उन पौराणिक उपाख्यानों की अवहेलना भी करनी चाहिये जो किसी नीति निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाते और महिमा बखानने के लिए ऐसे कुलावे मिलाते हैं जिनमें उत्कृष्टता की कसौटी पर चरित्र नायकों को भी खोटा सिद्ध होना पड़े। पौराणिक उपाख्यानों में भगवान का ऐसा बेतुका चित्रण भी कम नहीं है। ग्रन्थ विशेष को महत्व देकर ऐसी भगवत् कथाओं को भी दूध के साथ मक्खी निगलने की भूल विचारशील को नहीं ही करना चाहिए। भगवत् कथा में उत्कृष्टता के परिपोषण और निकृष्टता के उन्मूलन के अतिरिक्त अन्य कोई घटनाक्रम जुड़ता ही नहीं।
साधना से ही सम्भव हो सका था। तपस्वी दधीचि की अस्थियों से ही व्यापक असुर साम्राज्य को ध्वस्त करने वाला वज्र बना। ध्रुव को परम पद तप से ही मिला। सप्तऋषियों को उच्चस्तरीय गरिमा इसी आधार पर प्राप्त हुई। विश्वामित्र ने इसी शक्ति के आधार पर नई दुनिया बनाने का साहस किया था।
साधना के सम्बन्ध में भी यही बात है उसमें श्वासोच्छास के सन्तुलित रखने के साथ-साथ महाप्राण के परब्रह्म स्वरूप प्रवेश की भावभरी अनुभूति भी होनी चाहिए, साथ ही अहंता के निष्कासन का भी श्वास के बहिर्गमन के साथ-साथ सघन विश्वास जुड़ना चाहिए। क्रिया की सार्थकता इससे कम में बनती नहीं।
साधना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
साधना और परमार्थ परायणता के दोनों ही प्रयोग साथ-साथ चलने चाहिए। इस अवलम्बन के बिना आत्मसत्ता इस योग्य नहीं बनती कि वह उच्चस्तरीय शक्तियों का अवतरण एवं अवधारण सहन कर सके।
साधना की दृष्टि रखकर दूसरों की सहायता कर सकें। ऐसी ही आत्माएँ देवता कहलाती हैं और ये अपनी स्थिति में रहते हुए भी लोक-कल्याण के लिए कुछ न कुछ करती रहती हैं।
साधनादि के क्षेत्र में समय समय पर वातावरण के चयन के सम्बन्ध में महामानवों ने दूरदर्शिता बरती है। ऐसी स्थिति आने पर स्थान विशेष के संस्कारों को परखा एवं तदुपरान्त ही स्वयं को विशिष्ट बनाने वाली तप साधनाओं हेतु वहाँ शेष रूप से योगाभ्यास सम्पन्न किये हैं। उत्तराखण्ड हिमालय का हृदय कहा गया है। लगभग सभी अवतारों, देवदूतों, महामानवों एवं इस सदी मध्यकाल के महापुरुषों ने यहाँ कुछ विशिष्टता पायी एवं आत्मबल सम्पादन हेतु इसी परिधि के विभिन्न स्थानों को चुना और आने वाली पीढ़ी के लिये भी उस स्थान को संस्कारित किया है। ऐसे ही उदाहरण कुसंस्कारी वातावरण के श्रवणकुमार के मय प्रदेश में माता-पिता की अवहेलना तथा कुरुक्षेत्र को महाभारत हेतु श्रीकृष्ण द्वारा चयन किये जाने के रूप में मिलते हैं।
साधना के रूप में ही जाना जाता है। यहाँ एक बात पूरी तरह स्मरण रखी जानी चाहिए कि अकारण काया कष्ट देने को नहीं। उच्चस्तरीय आदर्शों के परिपालन में शारीरिक और मानसिक कष्ट सहना आवश्यक है। इसी को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना तप साधना कहलाता है। गायत्री की कृपा इससे कम में नहीं मिलती।
साधना ऐसी है जिसे निष्ठापूर्वक करते रहने वाले निहाल होकर ही रहते हैं।
साधनाएँ ऐसी हैं जिनमें क्रिया परक साधनाओं के साथ अपेक्षाकृत अधिक मनोयोग लगाना होता है। तीर्थयात्रा, व्रत, उपवास में शरीर को अधिक और मन को कम काम करना होता है। किन्तु कुछ योगाभ्यासों में झूलने भर से काम नहीं चलता उनमें मात्रकृत्यों की ही प्रधानता नहीं है साथ में अधिक मनोयोग लगाने की भी आवश्यकता पड़ती है। बँध और मुद्राओं का स्वरूप ऐसा ही है। खेचरी मुद्रा में यदि तालु से जीभ भर सटा ली जाय तो ब्रह्मरन्ध्र से अमृत टपकने के रसास्वादन पर मनोयोग केन्द्रित न हो सके तो समझना चाहिए कि प्रयास अधूरा रहा और श्रम निरर्थक चला गया।
साधना ही उसे वह श्रेय दिलाती है जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप माना जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जन्म-जन्मान्तरों के संस्कारों की अपनी महत्ता है। वे प्रसुप्त बीजांकुरों के रूप में विद्यमान तो रहते हैं, पर जो उन्हें कुरेदता-उभारता है वह निश्चित ही अपनी स्थिति से ऊँचा उठते हुए महामानव का पद पाता है। अपना परिशोधन, तप-प्रक्रिया द्वारा संस्कारीकरण तथा साधना उपादानों के माध्यम से भाव संस्थान का उदात्तीकरण ही वे सोपान हैं जिन्हें पास करते हुए यह पद प्राप्त होता है। किसी समझौते की इसमें कोई गुँजाइश नहीं।
साधना इसी क्षेत्र में सम्पन्न हुई। सातों ऋषियों की बहुमुखी गतिविधियाँ इसी परिधि में चलती रहीं। आध शंकराचार्य केरल में जन्मे थे तो उनने अपना कार्य क्षेत्र हिमालय चुना और केदारनाथ के समीप शरीर का समापन किया। अभी भी इस क्षेत्र में सरलता, सज्जनता, सात्विकता अन्यत्र की तुलना में वहीं अधिक है। शाँति कुँज के लिए उद्देश्य के अनुरूप स्थान चयन इसी सूक्ष्म पर्यवेक्षण के आधार पर हुआ है।
साधना का निर्वाह भी साथ-साथ चल पड़ा।
साधना से योगीजन पुराने शरीर में रहते हुए भी उसे समय-समय पर बार-बार नवीन कर लेते हैं। एक ही जन्म में कई जन्मों की जीवन यात्रा का लाभ लेते हैं।
साधना पर निर्भर रही है।
साधना शक्ति के सहारे ही हो सका था। चाणक्य, समर्थ रामदास, गुरुनानक, ज्ञानेश्वर, शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस आदि के द्वारा लोकहित के जो महत्वपूर्ण काम बन पड़े उससे उनके तपस्वी जीवन की गरिमा प्रकट होती है। तप साधना के स्वरूप भिन्न-भिन्न हो सकने पर उन सबमें व्यक्तित्व को पवित्र परिष्कृत, प्रखर बनाने वाली कष्टसाध्य जीवनयापन प्रक्रिया का समावेश तो निश्चित रूप से ही रहेगा। सरलतापूर्वक, स्वल्प श्रम में पूजा पाठ करके गायत्री का अनुग्रह और आलोत्कर्ष का लाभ किसी को भी नहीं मिल सका है। भगवद् भक्ति भावुकता मात्र नहीं है।
साधना इसी आधार पर सम्पन्न होती है।
साधना कहलाता है। गायत्री की कृपा इससे कम में नहीं मिलती।
साधना व्यायामों द्वारा मानसिक शक्ति का भी असाधारण विकास किया जा सकता है। क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में तभी चली जाती हैं जब उनका प्रयोग नहीं होता। अभ्यास से उन्हें जगाया जा सकता है और प्रयोग करने पर उन्हें असाधारण रूप से विकसित भी किया जा सकता है।
साधना का तात्विक पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि अध्यात्म विज्ञान का सारा ढाँचा ही प्रगति के लिए आवश्यक ऊर्जा उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है। यह ऊर्जा तपश्चर्या के माध्यम से ही उत्पन्न होती है।
साधनाओं हेतु वहाँ शेष रूप से योगाभ्यास सम्पन्न किये हैं। उत्तराखण्ड हिमालय का हृदय कहा गया है। लगभग सभी अवतारों, देवदूतों, महामानवों एवं इस सदी मध्यकाल के महापुरुषों ने यहाँ कुछ विशिष्टता पायी एवं आत्मबल सम्पादन हेतु इसी परिधि के विभिन्न स्थानों को चुना और आने वाली पीढ़ी के लिये भी उस स्थान को संस्कारित किया है। ऐसे ही उदाहरण कुसंस्कारी वातावरण के श्रवणकुमार के मय प्रदेश में माता-पिता की अवहेलना तथा कुरुक्षेत्र को महाभारत हेतु श्रीकृष्ण द्वारा चयन किये जाने के रूप में मिलते हैं।
साधना भी जुटाए जायँ। यही है सन्तुलन का वह ध्रुव केन्द्र जिस पर दूरदर्शिता नियोजित करने पर किसी उपयुक्त दिशाधारा का अवलम्बन सम्भव हो सकता है। महत्वाकाँक्षाऐं आत्मा की भी तो हैं। उन्हें भी आगे बढ़ने ऊँचे उठने की अभिलाषा आकाँक्षा है। महामानवों की श्रेणी में बैठने, ऋषि कल्प बनने तक की प्रगति करने और अपूर्णता से पूर्णता की ओर चलने के लिए उसका भी मन मचलता रहता है, पर यह कार्य माला घुमाने, धूपबत्ती जलाने भर जैसी खिलवाड़ से सम्भव नहीं हो सकता।
साधना प्रसंग की चल रही थी। उसके लिये शिक्षण, धारण, स्मरण और प्रत्यावर्तन के चारों आधारों का समावेश आवश्यक होता है। यह व्यवस्था एकान्त उपासना के आधार पर ही बन पड़ती है। भक्त और भगवान दो के बीच ही उस स्थिति में आदान प्रदान चलता है। कथा पाठ के आधार पर दिव्य और चरित्रों का दिव्य गुणों का चित्रण मानस पटल पर बनता है।
साधना विधान में आवश्यक है पर, क्रियायोग प्रधान प्रसंगों में उनकी मात्रा कम होने पर भी काम चल जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-June
साधना, (2) ज्ञान-संचय (3) सेवा-शिक्षण; इन तीनों का ही समन्वय करके एक पाठ्यक्रम बनेगा। उसे छोटे-बड़े प्रशिक्षण सत्र में पूरा करने के व्यवस्था देव-संस्कृति विश्वविद्यालय के निर्माणाधीन परिसर में रहेगी। इसके उपरान्त ही प्रशिक्षित परिव्राजकों को कार्यक्षेत्र में युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए थोड़े या अधिक समय के लिए आवश्यकतानुसार भेजा जाता रहेगा।
साधना के लिए जिस उपयुक्त स्थान एवं वातावरण की आवश्यकता थी, उसी के अनुरूप भूमि का चयन किया गया है। यह प्रस्तावित साधना आरण्यक गंगा की धारा से थोड़ी ही दूर पर है। सात ऋषियों की तपोभूमि इसी के पड़ोस में है। गंगा की जलधारा आगे शहरों में जाकर भले ही प्रदूषित हो चुकी हो, पर यहाँ अभी वैसी स्थिति नहीं बनी। यहाँ वह अपनी मौलिक विशेषता को पूर्ववत् बनाए हुए हैं।
साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान पर जाने की आवश्यकता इसी लिए पड़ती है कि पुराने निवासस्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति नहीं बन पाती, जैसी महत्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है।
साधना से प्राप्त प्राणऊर्जा का एक अंश देकर रोगी को स्वास्थ्य-लाभ प्रदान करता है। प्राणऊर्जा प्राप्त करके रोगी जीवनी-शक्ति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि रोगों का नामोनिशान नहीं रहता है।
साधना के सामान्य सूत्रों के शिक्षण के साथ ही विशेष साधना-सत्र आयोजित किए जाएँगे, जो देश और विश्व के किसी भी कोने में जाकर वहाँ की परिस्थितियों और मनःस्थितियों को ध्यान में रखकर हर वर्ग एवं सम्प्रदाय के लोगों को जीवनविद्या के ऋषिमान्य सूत्रों के प्रति आस्थावान् बना सकें। शिक्षा संकाय के अंतर्गत शिक्षण और लोकशिक्षण के संदर्भ से विचारक्रान्ति को सार्वभौम बनाने की प्रभावी योजना लागू की जाएगी। स्वास्थ्य संकाय के माध्यम से देश एवं विदेश में शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य-संवर्द्धन के साथ ही रोगों से बचाव एवं उनके निवारण के लिए ऋषिमान्य जीवन-पद्धति और उपचार प्रक्रिया की शोध-अनुसंधान प्रशिक्षण एवं विस्तार की योजनाबद्ध व्यवस्था की जाती है। स्वावलम्बन संकाय एक ऐसे ज्योति-स्तम्भ के रूप में होगा-जिससे निःसृत होने वाली ज्योतिर्मय किरणें आज के कठिन समय में हर व्यक्ति को स्वावलम्बी जीवननिर्वाह हेतु मार्गदर्शन कर सकें।
साधना-अनुसंधान के साथ-साथ वनौषधियों के स्थूल प्रयोगों व यज्ञपरक प्रभावों का विश्लेषण इसीलिए रखा गया था।
साधना-आरण्यक के निर्माण की बात सोची गयी है। स्थान शान्तिकुञ्ज के समीप होने के कारण यहाँ निर्माण की गयी कुटीरों में साधकगण अपनी गम्भीर साधनाओं के लिए समुचित एकान्त पा सकेंगे। सभी जानते हैं कि साधना की सफलता में स्थान, क्षेत्र व वातावरण का असाधारण महत्व है। विशिष्ट साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान पर जाने की आवश्यकता इसी लिए पड़ती है कि पुराने निवासस्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति नहीं बन पाती, जैसी महत्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है।
साधनाओं के लिए समुचित एकान्त पा सकेंगे। सभी जानते हैं कि साधना की सफलता में स्थान, क्षेत्र व वातावरण का असाधारण महत्व है। विशिष्ट साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान पर जाने की आवश्यकता इसी लिए पड़ती है कि पुराने निवासस्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति नहीं बन पाती, जैसी महत्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है।
साधना का स्वर्गीय दिव्य आनन्द प्राप्त करने के लिए राजा भर्तृहरि बेचैन थे। भर्तृहरि शतक में उनकी अभिव्यक्ति इस प्रकार है-
साधना है।
साधना-सत्र आयोजित किए जाएँगे, जो देश और विश्व के किसी भी कोने में जाकर वहाँ की परिस्थितियों और मनःस्थितियों को ध्यान में रखकर हर वर्ग एवं सम्प्रदाय के लोगों को जीवनविद्या के ऋषिमान्य सूत्रों के प्रति आस्थावान् बना सकें। शिक्षा संकाय के अंतर्गत शिक्षण और लोकशिक्षण के संदर्भ से विचारक्रान्ति को सार्वभौम बनाने की प्रभावी योजना लागू की जाएगी। स्वास्थ्य संकाय के माध्यम से देश एवं विदेश में शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य-संवर्द्धन के साथ ही रोगों से बचाव एवं उनके निवारण के लिए ऋषिमान्य जीवन-पद्धति और उपचार प्रक्रिया की शोध-अनुसंधान प्रशिक्षण एवं विस्तार की योजनाबद्ध व्यवस्था की जाती है। स्वावलम्बन संकाय एक ऐसे ज्योति-स्तम्भ के रूप में होगा-जिससे निःसृत होने वाली ज्योतिर्मय किरणें आज के कठिन समय में हर व्यक्ति को स्वावलम्बी जीवननिर्वाह हेतु मार्गदर्शन कर सकें।
साधनागत सुसंस्कारिता भी ऊँची है। प्राचीनकाल में हिमालय क्षेत्र ही स्वर्गक्षेत्र कहलाता था। देवमानवों की यही भूमि थी। दिव्यद्रष्टा जानते है कि अभी भी दिव्य आत्माएँ वहीं निवास करती है। कृपाचार्य, हनुमान आदि चिरंजीवी उसी क्षेत्र में निवास करते है।
साधना के समस्त उपचार इसी महान उद्देश्य के लिए बनाए गए है।
साधना, किसी भक्त की भक्ति, किसी शूरमा के शौर्य की तरह स्मरणीय होगी एवं रक्त की स्याही व शरीर की लेखनी से कर्मभूमि के भोजपत्र पर लिखे गये सर्वशक्तिमान परमात्मा के संकल्प के स्तोत्र के रूप में युगों तक उसका गायन किया जाएगा।
साधना का अवसर सुलभ हों। विचारक्रान्ति अभियान की विविध-विधि गतिविधियों का केन्द्र बनने के कारण शान्तिकुञ्ज अब पूरी तरह क्रान्तिकुंज में बदल चुका है। यहाँ आने वाले परिजनों की व्यापक भीड़-भाड़ के साथ क्रान्तिकारी परिवर्तनों के लिए ताना-बाना हर पल बुना जाता रहा है समय का तकाजा भी यही है। युगसन्धि का अब थोड़ा ही समय शेष है, इसलिए इन दिनों इस तरह के प्रयत्नों में जितनी भी तीव्रता लायी जा सके, कम है। लोकसेवा के सत्प्रयोजनों में जिस पवित्रता, प्रखरता एवं तेजस्विता की कदम-कदम पर आवश्यकता है, वह साधना से ही अद्भुत होती है।
साधना आरण्यक का निर्माण किया जा रहा है-वह सब तरह से उपयुक्त है। इसे दैवी-अनुग्रह एवं सहयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। इसके निर्माण के लिए परम सात्विक धन भी भावभरी श्रद्धा के लिए अपने को सार्थक बनाने के लिए मचलता हुआ चला आएगा, ऐसा विश्वास किया गया है।
साधना-प्रक्रिया सम्पन्न करें। गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में बनाए जाने वाले इस अभिनव साधना-आरण्यक का उद्देश्य यही है।
साधना की सफलता में स्थान, क्षेत्र व वातावरण का असाधारण महत्व है। विशिष्ट साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान पर जाने की आवश्यकता इसी लिए पड़ती है कि पुराने निवासस्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति नहीं बन पाती, जैसी महत्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है।
साधना के प्रभाव से हुआ गंगावतरण कह सकते हैं। अपनी प्रचण्ड तप-साधना एवं महान ऋषिसत्ताओं के कृपाप्रसाद से ही वे शान्तिकुञ्ज को इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री का रूप देने में समर्थ हुए। सूक्ष्मवेत्ता एवं दिव्यदर्शी हिमालय के इस दिव्यप्रवाह को यहाँ के व्यापक परिसर में सहज की उफनते-उमड़ते आन्दोलित-आलोड़ित होते हुए अनुभव कर सकते हैं। हिमालय की चेतनधाराएँ स्वाभाविक क्रम में यहाँ रहने वाले एवं आने वालों को पवित्रता, प्रखरता एवं तेजस्विता के अनुदान बाँटती रहती है।
साधना-शिक्षा चलेगी। ऐसे लोग सपत्नीक रह सकेंगे। महिलाओं की साधना-शिक्षा का पृथक् प्रबन्ध रहेगा। इस श्रेणी के लोगों में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो रहें तो अपने-अपने घर पर ही, किन्तु समीपवर्ती क्षेत्र में परिभ्रमण करते रहें।
साधना की गौरव-गरिमा के पथ पर चलने वाले के लिए तो बिना परीक्षा की कसौटी पर सही सिद्ध हुए आगे बढ़ने की बात ही नहीं बनती।
साधना का तत्वदर्शन यही है। सरकस में काम करने वाले पशुओं को इस कदर प्रशिक्षित कर देते हैं कि उनके आश्चर्यजनक करतब देखकर बुद्धिमान इनसान भी हैरत में पड़ जाता है। लगभग यही प्रक्रिया अनगढ़ एवं अव्यवस्थित जीवन-सम्पदा को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिए करनी पड़ती है। साधना के समस्त उपचार इसी महान उद्देश्य के लिए बनाए गए है।
साधना के हवनकुण्ड में अपनी आहुति देकर ही स्वयं के व्यक्तित्व में निहित अनन्त शक्तियों का जागरण सम्भव है।
साधना का एक अंश एक माला प्रतिदिन इसी की सफलता के निमित्त तथा कमाई का एक हिस्सा प्रतिमाह एक दिन की आजीविका इस कार्य के लिए नियोजित करने के लिए भावभरा अनुरोध किया जा रहा है। युगदेवता का यह संकल्प पूरा होकर ही रहेगा। यह विश्वास दैनन्दिन दृढ़ रखकर हम सबको इस प्रज्ञावतार की विराट चेतना का दर्शन करने के लिए दिव्यचक्षु धारण करने हेतु स्वयं को उद्यत रखना चाहिए। कोई भी यह मौका चूकने न पाए, विशाल रूप लेने जा रहे कारवाँ से अलग न रहे, इसका हम सभी को विशेष ध्यान रखना है।
साधना में निरत रहते थे। तीर्थसेवन के लिए आने वाले उनके समीप ठहरकर जीवनक्रम पर नए सिरे से विचार करते और तपस्वियों, ज्ञानियों से अपनी समस्याओं के समाधान तथा उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण के लिए परामर्श प्राप्त करते थे। बात भी सही है। जीवन की उलझनों की समीक्षा के लिए इनके जाल-जंजाल से कुछ दूर रहकर उन पर विचार करना जरूरी होता है। व्यक्ति तीर्थ में पहुँचने पर सम्बद्ध लोगों से दूर हो जाता है।
साधना एवं तपश्चर्या के स्तर की श्रेयसाधना मानते है, उन्हें इन पंक्तियों को अपने लिए लिखा गया आमंत्रण-पत्र मानना चाहिए। आज की विश्वव्यापी मानवी दुर्दशा पर जिन्हें वस्तुतः दुख है, जिनके मन में विकृतियों के प्रति आक्रोश है, जिन्हें उत्कर्ष-उत्थान के नवयुग में आस्था है, उनका पवित्रतम कर्तव्य हो जाता है कि परिव्राजक बनने की महान परम्परा का सच्चे मन से समर्थन करें और उसे क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक वातावरण विनिर्मित करें। प्रव्रज्या की पुण्यपरम्परा के बिना विद्या−विस्तार का विश्वव्यापी आयोजन किसी अन्य तरह से पूरा नहीं हो सकता। उच्च मनोभूमि एवं प्रचण्ड कर्मठता को ही अपना सब कुछ मानने वाले परिव्राजक ही विश्वमानव की ठोस एवं गम्भीर सेवा कर सकेंगे।
साधना संकाय के अंतर्गत जीवन-साधना के सामान्य सूत्रों के शिक्षण के साथ ही विशेष साधना-सत्र आयोजित किए जाएँगे, जो देश और विश्व के किसी भी कोने में जाकर वहाँ की परिस्थितियों और मनःस्थितियों को ध्यान में रखकर हर वर्ग एवं सम्प्रदाय के लोगों को जीवनविद्या के ऋषिमान्य सूत्रों के प्रति आस्थावान् बना सकें। शिक्षा संकाय के अंतर्गत शिक्षण और लोकशिक्षण के संदर्भ से विचारक्रान्ति को सार्वभौम बनाने की प्रभावी योजना लागू की जाएगी। स्वास्थ्य संकाय के माध्यम से देश एवं विदेश में शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य-संवर्द्धन के साथ ही रोगों से बचाव एवं उनके निवारण के लिए ऋषिमान्य जीवन-पद्धति और उपचार प्रक्रिया की शोध-अनुसंधान प्रशिक्षण एवं विस्तार की योजनाबद्ध व्यवस्था की जाती है। स्वावलम्बन संकाय एक ऐसे ज्योति-स्तम्भ के रूप में होगा-जिससे निःसृत होने वाली ज्योतिर्मय किरणें आज के कठिन समय में हर व्यक्ति को स्वावलम्बी जीवननिर्वाह हेतु मार्गदर्शन कर सकें।
साधना-तपश्चर्या पूरी हुई वत्स! अब तुम तत्त्वज्ञान के अधिकारी हो गये हो।”
साधना में यही करना पड़ता है। यह प्रयास जितना प्रौढ़, प्रखर एवं परिपक्व होता है उसी अनुपात में विभूतियाँ भी उफनती और बाहर से बरसती और दृष्टिगोचर होने लगती है।
साधना से अखण्ड-ज्योति के पाक चिर-परिचित हैं। यदि उसे पात्रता का समर्थता का, व्यक्तित्व के परिष्कार की प्रक्रिया माना जाए और उस महाप्रयास में निरत हुआ जाए, तो ऐतिहासिक एवं विद्यमान अध्यात्मवादियों की तरह हर कोई आने स्तर को क्रमशः अधिकाधिक ऊँचा उठा सकता है। इतना ऊँचा जिसकी गरिमा को हिमालय से कम नहीं वरन् अधिक ही उत्तुंग, समुन्नत एवं समृद्ध कहा जा सके। इन दिनों लोकसेवा के लिए जिन उत्कृष्ट व्यक्तित्वों को भारी आवश्यकता है, उसका निर्माण इसी जीवन-साधना से ही सम्भव है। जीवन-साधना के हवनकुण्ड में अपनी आहुति देकर ही स्वयं के व्यक्तित्व में निहित अनन्त शक्तियों का जागरण सम्भव है।
साधना से ही अद्भुत होती है। शान्तिकुञ्ज के दिव्यक्षेत्र से आध्यात्मिक विभूतियों, सिद्धियों, शक्तियों के दिव्य-अनुदानों का सिलसिला तो लगातार चलता रहता है, परन्तु इन्हें ग्रहण वही कर पाते हैं, जिनमें साधना की समुचित योग्यता एवं पात्रता है।
साधना के यही दो क्षेत्र है। बहिरंग को सभ्यता की मर्यादा में रहना पड़ता है और अन्तरंग को सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। साधना का तत्वदर्शन यही है। सरकस में काम करने वाले पशुओं को इस कदर प्रशिक्षित कर देते हैं कि उनके आश्चर्यजनक करतब देखकर बुद्धिमान इनसान भी हैरत में पड़ जाता है। लगभग यही प्रक्रिया अनगढ़ एवं अव्यवस्थित जीवन-सम्पदा को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिए करनी पड़ती है।
साधना कहते है। साधना किसकी? इसका एक मात्र एवं सुनिश्चित उत्तर यही है, जीवन की। जीवन मनचाहा फल देने वाला कल्पतरु है। जो भी इसका जितना सदुपयोग कर सका, उतना ही वह धन्य हो जाता है।
साधना में संलग्न होने की प्रेरणा दी है। इसी के परिणामस्वरूप नवसृजन में योगदान देने के लिए हर समर्थ-असमर्थ के चरण बढ़ रहे हैं। इस महाअभियान के पीछे जो दिव्यप्रेरणा सक्रिय है, उसे कठपुतली नचाने वाले बाजीगर के समतुल्य देखा जा सकता है। अपने छोटे-से परिवार पर उसका विशेष अनुग्रह लगता है। अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने का अवसर भाग्यवानों को ही मिलता है।
साधना किसकी? इसका एक मात्र एवं सुनिश्चित उत्तर यही है, जीवन की। जीवन मनचाहा फल देने वाला कल्पतरु है। जो भी इसका जितना सदुपयोग कर सका, उतना ही वह धन्य हो जाता है। उसके होठों पर सदा-सर्वदा मुसकराहट के फूल खिलते हैं।
साधना-शिक्षा का पृथक् प्रबन्ध रहेगा। इस श्रेणी के लोगों में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो रहें तो अपने-अपने घर पर ही, किन्तु समीपवर्ती क्षेत्र में परिभ्रमण करते रहें।
साधना एवं महान ऋषिसत्ताओं के कृपाप्रसाद से ही वे शान्तिकुञ्ज को इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री का रूप देने में समर्थ हुए। सूक्ष्मवेत्ता एवं दिव्यदर्शी हिमालय के इस दिव्यप्रवाह को यहाँ के व्यापक परिसर में सहज की उफनते-उमड़ते आन्दोलित-आलोड़ित होते हुए अनुभव कर सकते हैं। हिमालय की चेतनधाराएँ स्वाभाविक क्रम में यहाँ रहने वाले एवं आने वालों को पवित्रता, प्रखरता एवं तेजस्विता के अनुदान बाँटती रहती है।
साधना तथा मंत्र-विद्या से गुँथा हुआ था। वैद्यक कर्म ऐसे प्रखर व्यक्तित्व वाले महर्षिगण करते थे, जिनमें प्राण-अनुदान देने की अलौकिक सामर्थ्य होती थी। जिनका संकल्प अचूक होता था। जो अपनी गहन अन्तर्दृष्टि द्वारा रोगी के रोग ही नहीं, उसके व्यक्तित्व की गहरी छान-बीन करने में समर्थ होते थे।
साधनारत पुरुषार्थी चमत्कारी सफलताएँ पाते देखे गए हैं। जीवन तो ऐसा विलक्षण क्षेत्र है जो कि जड़-जगत के किसी मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण घटक से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है। जड़ सीमित है, चेतन असीम और अनन्त है। जड़ से केवल साधन भर पाए जा सकते है, जबकि चेतन में तो आनन्द और उल्लास के भण्डार भरे पड़े है। इनकी साधना का एक सुविस्तृत विज्ञान है।
साधना के इन अभ्यासों को ऊपरी तौर पर देखने से यह भ्रान्ति होती है कि यह सब कुछ कहीं बाहर से माँगने-पाने का उपक्रम है, पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। पात्रता का सम्वर्द्धन ही साधना है। इसके लिए जीवन के बहिरंग को व्यवस्थित और अन्तरंग को परिष्कृत को योग एवं व्यवस्थित को तप कहते है। साधना के यही दो क्षेत्र है। बहिरंग को सभ्यता की मर्यादा में रहना पड़ता है और अन्तरंग को सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है।
साधना इसी के लिए की गयी मनुहार है। यह मान्यता बहुत थोड़े अंशों में ही सच है। दुकानदार माँगने से कोई वस्तु निकाल कर दिखा देता है, पर देता तभी है जब उसकी उचित कीमत चुका दी जाए। प्रार्थना को अपनी आवश्यकता की अभिव्यक्ति माना जा सकता है, परन्तु इसे याचना कहना या समझना भारी भूल है। याचना का मतलब तो बिना मूल्य दिए कुछ बहुमूल्य पाने के लिए गिड़गिड़ाना है।
साधना से ही सम्भव है। जीवन-साधना के हवनकुण्ड में अपनी आहुति देकर ही स्वयं के व्यक्तित्व में निहित अनन्त शक्तियों का जागरण सम्भव है।
साधना की समुचित योग्यता एवं पात्रता है।
साधना-उपासना के साथ स्वावलम्बी जीवन का अभ्यास भी प्रारम्भ कर दिया।”
साधना सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए अपना श्रम करना तो आवश्यक है ही-वातावरण का उपयुक्त होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जनकल्याण के लिए किए जाने वाले प्रयासों के साथ स्वयं पूज्य गुरुदेव के जीवन में हिमालय के अधिक एकान्त एवं गहन प्रदेशों में की जाने वाली विशेष तप-साधना की भिन्नता नहीं, अधिक उपयोगी वातावरण का अधिक प्रखर सान्निध्य का लाभ लेना ही था। उचित समझा गया कि अखण्ड-ज्योति के वे परिजन जो लेखों का पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं समझते, बल्कि साधना-क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधना-प्रक्रिया सम्पन्न करें। गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में बनाए जाने वाले इस अभिनव साधना-आरण्यक का उद्देश्य यही है।
साधना संकाय, शिक्षा संकाय, स्वास्थ्य संकाय तथा स्वावलम्बन संकाय।
साधना का यह सिद्धान्त शाश्वत सत्य की तरह स्पष्ट है। उसमें न सन्देह की गुँजाइश है, न विवाद की
साधना है। इसके लिए जीवन के बहिरंग को व्यवस्थित और अन्तरंग को परिष्कृत को योग एवं व्यवस्थित को तप कहते है। साधना के यही दो क्षेत्र है। बहिरंग को सभ्यता की मर्यादा में रहना पड़ता है और अन्तरंग को सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। साधना का तत्वदर्शन यही है।
साधना से सिद्धि तक पहुँचने की बात सौ फीसदी सच है। भौतिक जगत में विविध क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थी चमत्कारी सफलताएँ पाते देखे गए हैं। जीवन तो ऐसा विलक्षण क्षेत्र है जो कि जड़-जगत के किसी मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण घटक से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है। जड़ सीमित है, चेतन असीम और अनन्त है। जड़ से केवल साधन भर पाए जा सकते है, जबकि चेतन में तो आनन्द और उल्लास के भण्डार भरे पड़े है।
साधना किन्हीं कर्मकाण्डों या फिर क्रिया-उपचार विशेष तक सीमित नहीं है। यह अखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राणऊर्जा को ग्रहण एवं संग्रह की विधि है। ब्रह्माण्ड में अनन्त ऊर्जा संव्याप्त है, परन्तु उसे धारण करने के लिए अपने व्यक्तित्व में कतिपय परिवर्तन आवश्यक होते है। असंयमी, वाचाल, कुविचारी इसे ग्रहण नहीं कर सकते। इसीलिए तप का पहला और अनिवार्य चरण है संयम।
साधना के सूत्रों को सीख सकें।
साधना उपलब्ध है, उससे व्याप्त असुरता का समाधान न होते देखा तो इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य को साकार करने के लिए सूक्ष्मजगत में उस दिव्यशक्ति का उद्भव करने चले दिए, जिससे व्यक्ति और समाज के, राष्ट्र और विश्व के सम्मुख उपस्थित विपन्नता का समाधान सम्भव हो सके।
साधना हिमालय में ही सम्पन्न हुई थी। संक्षेप में भारत की आध्यात्मिक विभूतियों की भूमि यदि हिमालय को माना जाए, तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। इस मूर्तिमान् देवता की छाया में कितनों ने न जाने क्या-क्या पाया है? अभी भी उसकी यह विशेषता अक्षुण्य है।
साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है।
साधना की भिन्नता नहीं, अधिक उपयोगी वातावरण का अधिक प्रखर सान्निध्य का लाभ लेना ही था। उचित समझा गया कि अखण्ड-ज्योति के वे परिजन जो लेखों का पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं समझते, बल्कि साधना-क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधना-प्रक्रिया सम्पन्न करें। गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में बनाए जाने वाले इस अभिनव साधना-आरण्यक का उद्देश्य यही है।
साधना का अगला एवं महत्वपूर्ण चरण है-परिशोधन विकारों से ग्रस्त व्यक्ति ब्रह्माण्डव्यापी महाप्राण को धारण नहीं कर सकते। इसके लिए स्वयं का शोधन अनिवार्य है। इस शोधन के पश्चात् ही यह सम्भव हो पाता है कि व्यक्ति प्राणऊर्जा का अजस्र भण्डार बन सके। शोधन के पश्चात् अर्जन की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है और प्राणऊर्जा स्वयमेव ही संग्रहित होने लगती है।
साधना मानते है, उन्हें इन पंक्तियों को अपने लिए लिखा गया आमंत्रण-पत्र मानना चाहिए। आज की विश्वव्यापी मानवी दुर्दशा पर जिन्हें वस्तुतः दुख है, जिनके मन में विकृतियों के प्रति आक्रोश है, जिन्हें उत्कर्ष-उत्थान के नवयुग में आस्था है, उनका पवित्रतम कर्तव्य हो जाता है कि परिव्राजक बनने की महान परम्परा का सच्चे मन से समर्थन करें और उसे क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक वातावरण विनिर्मित करें। प्रव्रज्या की पुण्यपरम्परा के बिना विद्या−विस्तार का विश्वव्यापी आयोजन किसी अन्य तरह से पूरा नहीं हो सकता। उच्च मनोभूमि एवं प्रचण्ड कर्मठता को ही अपना सब कुछ मानने वाले परिव्राजक ही विश्वमानव की ठोस एवं गम्भीर सेवा कर सकेंगे।
साधना क सुअवसर एवं साधक का सौभाग्य मानना चाहिए। ऐसे ही वातावरण में साधना का स्वर्गीय दिव्य आनन्द प्राप्त करने के लिए राजा भर्तृहरि बेचैन थे। भर्तृहरि शतक में उनकी अभिव्यक्ति इस प्रकार है-
साधना का एक सुविस्तृत विज्ञान है।
साधना-क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधना-प्रक्रिया सम्पन्न करें। गंगा की गोद एवं हिमालय की छाया में बनाए जाने वाले इस अभिनव साधना-आरण्यक का उद्देश्य यही है।
साधना की गहनतम स्थिति में ये अनुसंधान किये होंगे, तभी तो वे वह सब कुछ तब लिखकर दे गए जबकि आज का सूक्ष्मदर्शी इलेक्ट्रान-माइक्रोस्कोप उनके पास नहीं था। इसी आधार धन्वन्तरि एवं उनके बाद आयुर्वेद को विस्तार देने वाले चरक, सुश्रुत से लेकर बाग्भट्ट शांग्र्र्डगधर आदि सभी ने स्रष्टा के उस विज्ञान को नये आयाम दिए। वनौषधियों से काया व मन की चिकित्सा, रस-भस्मों के माध्यम से समग्र कायाकल्प एवं शल्यक्रिया द्वारा असाध्य रोगों से मानवमात्र को मुक्ति दिलाने का भागीरथी कार्य इसी समग्र आयुर्वेद के माध्यम से संपन्न होता चला गया।
साधना का निर्देश दिया था। इन्हीं प्रयासों की परिणति है कि समूचे एशिया में बौद्धधर्म तीव्र गति से फैला और वहाँ उन्नति-प्रगति के विभिन्न प्रयास सम्भव हो पाए।
साधना के लिए चले गए। उन्हें पूरा भरोसा था कि उनकी समर्थ मानस सनातन अपने वचन और आश्वासन पर कायम रहेगी और उस ज्ञानदीप को अखण्ड ही रखा जाएगा, जिसका प्रकाश आज नहीं तो कल इन तमसाच्छन्न परिस्थितियों को पलटकर समस्त विश्व को प्रकाशवान बनाने वाला है। हममें से प्रत्येक भावनाशील का कर्तव्य है कि अपने आश्वासन को निभाए और विश्वास की रक्षा करे, जिसे गुरुदेव इन दिनों भी निश्चिन्ततापूर्वक अपने मन में जमाए बैठे होंगे। उनके जाते ही यदि हम कन्धा डाल दें, मुख मोड़ ले पारस्परिक विग्रह खड़े करने लगें, प्रयत्नों को शिथिल कर दें, तो यह शिथिलता गुरुदेव के साथ ही नहीं, विश्व-मानवता के साथ भी विश्वासघात ही होगा, जो यह आशा लगाए बैठी है कि व्यक्ति ओर समाज के नवनिर्माण का, युग-परिवर्तन के महान कार्य का नेतृत्व विचारक्रान्ति अभियान के कर्मवीर सदस्य ही अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर सम्पन्न करेंगे।
साधना की तो जाती है अन्तराल में पर उसका प्रतिफल दैवी शक्तियों का सहयोग लेने पर ही मिलता है।
साधना यों अनेक सन्त-महात्मा करते रहते है, पर उनमें से अधिकाँश का प्रयोजन व्यक्तिगत स्वर्ग, मुक्ति, शान्ति, सिद्धि जैसी विभूतियों तक ही सीमित रहता है। व्यक्तिगत लाभ चाहे आत्मिक हों, चाहे भौतिक, उनसे उपार्जनकर्ता के ही वैभव में वृद्धि होती है। ऐसे तपस्वी जिन्होंने अपने आपे को, अपने लाभ, वैभव को एक प्रकार से विस्मृत-विसर्जित ही कर दिया हो, केवल परदुखकातर अन्तःकरण के साथ लोकमंगल और विश्वमंगल ही लक्ष्य रहा हो, आज कहीं ढूँढ़े नहीं मिलते। ऋषि-परम्परा के प्रतीक हमारे गुरुदेव यों जीवन भर जनमानस में प्रकाश उत्पन्न करने के लिए तिल-तिल करके अपने को ज्योतिर्मय दीपक की तरह जलाते रहे, पर अब तो लगता है उनका तप-यज्ञ पूर्णाहुति के समीप जा पहुँचा है। सूक्ष्मजगत में रहकर जिस उग्रतपश्चर्या का अवलम्बन उन्होंने इन दिनों किया है, उसकी तुलना के उदाहरण अन्यत्र ढूँढ़े नहीं मिलेंगे।
साधना-आरण्यक का उद्देश्य यही है।
साधना गुरुकुलों का उद्देश्य था विद्या-अर्जन एवं व्यक्तित्व का गठन, वहीं आरण्यकों का प्रयोजन था- विद्या का प्रचार तथा व्यक्तित्व का लोकहित में समर्पण। लेकिन शिक्षण की प्रक्रिया और विद्या का स्वरूप दोनों में एक-सा था। प्रागैतिहासिक काल में चतुर्दिक् फैले महर्षि अगस्त्य की वेदपुरी, भारद्वाज की प्रयाग स्थित प्रशिक्षणशाला, विश्वामित्र के सिद्धाश्रम आदि ने जीवन-विद्या के प्रशिक्षण द्वारा अपने समय को माँग को पूरा किया। वेदपुरी में महर्षि अगस्त्य के प्रशिक्षण की सराहना करते हुए आदि कवि वाल्मीकि लिखते हैं-अनीतिकारी आसुरी शक्तियाँ उस दिशा से भय खाती थी। दस हजार छात्रों वाली भारद्वाज की प्रशिक्षणशाला जन-जन को जाग्रत और कर्तव्यनिष्ठा के लिए सचेत रहने वाले प्रहरी तैयार करती थी।
साधना का अपना महत्व होगा। नित्य गंगास्नान, मात्र गंगाजलपान, ठहरना, बैठना, गंगामाता की ही गोद में। इन सभी विशेषताओं के कारण अगले दिनों जिस साधना आरण्यक का निर्माण किया जा रहा है-वह सब तरह से उपयुक्त है। इसे दैवी-अनुग्रह एवं सहयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। इसके निर्माण के लिए परम सात्विक धन भी भावभरी श्रद्धा के लिए अपने को सार्थक बनाने के लिए मचलता हुआ चला आएगा, ऐसा विश्वास किया गया है।
साधना आरण्यक गंगा की धारा से थोड़ी ही दूर पर है। सात ऋषियों की तपोभूमि इसी के पड़ोस में है। गंगा की जलधारा आगे शहरों में जाकर भले ही प्रदूषित हो चुकी हो, पर यहाँ अभी वैसी स्थिति नहीं बनी। यहाँ वह अपनी मौलिक विशेषता को पूर्ववत् बनाए हुए हैं।
साधना चेतनाक्षेत्र का ऐसा पुरुषार्थ है, जिसमें सामान्यश्रम एवं मनोयोग का नियोजन भी असामान्य विभूतियों एवं शक्तियों को जन्म देता है। साधारण स्थिति में हर वस्तु तुच्छ है। पर यदि उसे उत्कृष्ट बना दिया जाए, उसकी सूक्ष्मता तक प्रवेश पा लिया जाए तो उसे ऐसा कुछ मिलता है, जिसे विशिष्ट और महत्वपूर्ण कहा जा के। ऊपरी तौर पर समुद्र में खारे पानी के सिवा और क्या नजर आता है? पर उसकी गहराई में उतरने वाले उसे रत्नाकर के रूप में अनुभव करते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-November
साधना-विज्ञान के ज्ञाता कहते है कि किसी भी साधनापथ के पथिक को उपासना-साधना-जप-प्राणायाम के दौरान होने वाले इन अनुभवों के मूल कारण को समझ उसने उपचार के विषय में अच्छी तरह जान लेना चाहिए। नहीं तो बार-बार साधना की सफलता न मिलने पर निराशा का सामना या मतिभ्रम के कारण व्यवधानों को अनुभूति का एक हिस्सा मान लेने की विडम्बना झेलनी पड़ेगी।
साधना वस्तुतः व्यक्तित्व को विचारों का स्नान कराना है। यह यदि नित्य होती रहे तो कषाय-कल्मष रोज धुलते रहते है। ध्यान अंतर्मन का विश्राम है। इस क्रम में और क्या विघ्न आ सकते है ऐसे कौन-से दुर्गुण है जो किसी भी साधन की प्रगतियों को अवरुद्ध ही नहीं करते-करते के द्वारा में भी ढकेल देते है। इस संबंध में विस्तृत चर्चा आगामी अंक-साधना विशेषांक में करेंगे।
साधना वर्ष हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रायः ४८ स्थानों पर १५ नवम्बर से १५ जनवरी के मध्य रखे जा रहे है। शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की टोलियों कं द्वारा ये पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम उन स्थानों पर संपन्न होने जा रहे है। जहाँ परिजनों का अपना स्वयं का स्थान है तथा जहाँ कार्यकर्ता स्तर के परिजनों का अनुपात सघन है। इन प्रशिक्षण आयोजनों द्वारा जो ५-५ दिन के होंगे साधनावर्ष के ढाई दिवसीय आयोजनों की पूरी रूप-रेखा बनायी जाएगी। विधि-व्यवस्थाएँ समझाई जाएँगी, ताकि महापूर्णाहुति का सारा संगठनात्मक आधार एवं संभावित चौबीस स्थानों (जहाँ महापू�
साधना-विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हो रहें। दिसम्बर १८ का अंक युगसाधना के सैद्धान्तिक पक्ष के स्पष्ट करेगा, तो जनवरी २१ का अंक साधना के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालेगा।
साधना के सभी प्रयोग, प्रकरण सही हो तो उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अधूरा और अस्त-व्यस्त साधनाक्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
साधना के दौरान जिन्हें चक्रों की अनुभूतियाँ हुई थी। उक्त अध्ययन में पाया गया कि जाग्रत चक्रविशेष से संबद्ध कायिक प्रणालियों की गतिविधियों में भी स्पष्ट अंतर होता है यह भी उपर्युक्त मान्यता की ही पुष्टि करता है कि चक्रों का अस्तित्व है।
साधना से लक्ष्य प्राप्त होना तो दूर, उलटा अनिष्ट उत्पन्न हो सकता है।
साधना’ माना जाएगा। दोनों एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण रह जाएगा। ज्ञान और कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ज्ञान के बिना कर्म और कर्म के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा।
साधना, मानसिक परिष्कार के लिए और आसन, प्राणायाम का अभ्यास शारीरिक सुव्यवस्था के लिए है। यदि इन आरम्भिक चरणों को पूरा न किया जाए तो फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्चस्तरीय साधना सम्भव ही न होगी। आहार विहार के प्रतिबन्ध व्रत संयम का विधान व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए ही हैं स्वच्छ दर्पण में ही मुँह साफ दीखता है, साफ कपड़े पर ही ठीक से रंग चढ़ता है। यदि जीवनक्रम दुष्ट और दुराचारी बना रहे, तो फिर मंत्र-साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो, उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
साधना गहनतम होती चली जाती है।
साधनावर्ष के ढाई दिवसीय आयोजनों की पूरी रूप-रेखा बनायी जाएगी। विधि-व्यवस्थाएँ समझाई जाएँगी, ताकि महापूर्णाहुति का सारा संगठनात्मक आधार एवं संभावित चौबीस स्थानों (जहाँ महापू�
साधनावर्ष मनाए जाने एवं इसके लिए साधना प्रशिक्षण सब अभी १५ नवम्बर, १९९८ से आरंभ कर २२ जनवरी, १९९९ तक सारे भारत एवं विश्व में संपन्न कर गायत्री परिवार का संगठनात्मक ढाँचा सशक्त बनाए जाने की रूप-रेखा बनी है। ऐसे स्थान जहाँ से पाँच दिवसीय प्रशिक्षण केन्द्र के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा संपन्न किए जाएँगे।
साधनावर्ष में होने जा रहे ढाई दिवसीय आयोजनों का कार्यभार सँभालने वाले केन्द्रों का निर्धारण शान्तिकुञ्ज से किया गया है व सबकी सहमति मँगा ली गयी है। प्रत्येक केन्द्र का निर्धारित क्षेत्र भी यहीं से बना दिया गया है। इन केन्द्रों पर जो पाँच दिवसीय शिक्षण सत्र चलेंगे, ये प्रशिक्षकों का, सक्रिय कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन करेंगे। इन प्रशिक्षण सत्रों का एक-एक घण्टा अत्यधिक महत्वपूर्ण व भावी योजनाओं की क्रियापद्धति समाये हुए होगा। परिजनों से अनुरोध है कि वे अपने स्थान-क्षेत्र के प्रचारात्मक आयोजनों, सांस्कृतिक महोत्सवों, श्रीमद्प्रज्ञापुराण आयोजनों को संपन्न तो करें भागीदारी भी करें, परन्तु इन साधना प्रशिक्षण आयोजनों को सर्वोच्च वरीयता दें।
साधना द्वारा नियंत्रण करने की विद्या सिखायी जा सके, तो इसे चिकित्सा विज्ञान का मानव जगत को अद्भुत कहा जाएगा।
साधना की सफलता न मिलने पर निराशा का सामना या मतिभ्रम के कारण व्यवधानों को अनुभूति का एक हिस्सा मान लेने की विडम्बना झेलनी पड़ेगी।
साधना अनुष्ठान में प्रायः २४ लाख से २४. लाख लोगों ने प्रतिवर्ष भाग लिया एवं एक अर्द्धपूर्णाहुति आँवलखेड़ा आगरा (गुरुसत्ता की जन्मभूमि) में नवम्बर, १९९५ की कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर संपन्न हुई।
साधना-विज्ञान में चक्रों के रूप में जिन सूक्ष्म-संस्थानों का उल्लेख हुआ है, उनके बारे में मर्मज्ञों का कथन है कि ये वास्तव में दिव्य शक्तिकेन्द्र है। उन केन्द्रों को साधना उपचारों के माध्यम से जब उत्तेजित किया जाता है, तो जाग्रत होने पर वे साधकों को ऐसी ऊर्जा ओर अनुभूति से ओत−प्रोत करते है, जिसे साधारण कहना चाहिए। इस क्षेत्र में दीर्घकालीन अनुसंधान के उपरांत अब विज्ञान भी उन्हें ऐसे संस्थान के रूप में स्वीकारने लगा है, जहाँ से उत्सर्जित शक्ति को म नहीं नहीं, पदार्थ स्तर पर भी जाँचा-परखा जा सके।
साधना-उपचार है जप-प्राणायाम-ध्यान। इनके साथ-साथ सामान्यतया व्रत-उपवासों का निर्वाह भी होता रहता है। कभी इनको करते समय शरीर में गर्मी चढ़ती दिखाई देती है तो कभी चींटियाँ चलती अनुभव होती है। कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है मानों सिर उड़ा जा रहा है। चक्कर आते है व लगता है चारों ओर की दुनिया घूम रही है।
साधना वर्ष के रूप में मनाए जाने की घोषणा केन्द्र द्वारा की जा रही है। यह २२ जनवरी, १९९९ वसंत पंचमी से आरंभ होकर १. फरवरी, २... तक भारत व विश्वभर में चलने वाले ढाई-ढाई दिन के अखण्ड जप प्रधान आयोजनों के रूप में संपन्न होगा, ऐसी योजना बनायी गयी है। अंतिम पूर्णाहुति के पूर्व अपने साधनात्मक पुरुषार्थ की आहुति देने की तरह की यह प्रक्रिया इस एक वर्ष में और गति लेगी, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए। जो कार्य विगत दस वर्षा में संपन्न हुआ है, उससे कहीं सौ गुना अधिक इस अगले एक वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य निश्चित किया गया है। इससे गायत्री चेतना का, युगशक्ति का विस्तार गाँव-गाँव घर-घर तक होता चला जाएगा।
साधना विज्ञान के व्यावहारिक पहलुओं में साधनामय जीवनपद्धति का रहस्योद्घाटन करेगा। आशा है परिजन पाठक इस पत्रिका के विस्तार फैलाव में कोई कसर शेष न रखेंगे।
साधना उसका कर्मपक्ष नहीं, उसकी भी अपनी गरिमा है, फिर भी वह पूर्ण नहीं। कोई व्यक्ति विद्वान, ज्ञानी दार्शनिक शास्त्रज्ञ, वेदांती होने भर से आत्मबलसम्पन्न नहीं हो सकता। इसके लिए उसे साधनात्मक कर्मकाण्ड अपनाने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। विश्वचेतना के साथ व्यक्ति चेतना को जोड़ने का यही मार्ग हैं। मंत्र-साधना इसी राजमार्ग की तरह समझी जानी चाहिए।
साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
साधना विज्ञान के सैद्धांतिक तत्त्वज्ञान वाले पक्ष पर प्रकाश डालेगा, तो जनवरी १९९९ का अंक साधना विज्ञान के व्यावहारिक पहलुओं में साधनामय जीवनपद्धति का रहस्योद्घाटन करेगा। आशा है परिजन पाठक इस पत्रिका के विस्तार फैलाव में कोई कसर शेष न रखेंगे।
साधना के बिना तत्व दर्शन समग्र अध्यात्म का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकेगा।
साधना उपचारों के माध्यम से जब उत्तेजित किया जाता है, तो जाग्रत होने पर वे साधकों को ऐसी ऊर्जा ओर अनुभूति से ओत−प्रोत करते है, जिसे साधारण कहना चाहिए। इस क्षेत्र में दीर्घकालीन अनुसंधान के उपरांत अब विज्ञान भी उन्हें ऐसे संस्थान के रूप में स्वीकारने लगा है, जहाँ से उत्सर्जित शक्ति को म नहीं नहीं, पदार्थ स्तर पर भी जाँचा-परखा जा सके।
साधना प्रभृति क्रिया–कलापों को ‘साधना’ माना जाएगा। दोनों एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण रह जाएगा। ज्ञान और कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ज्ञान के बिना कर्म और कर्म के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा।
साधना विज्ञान में उनका जो स्वरूप बतलाया गया है, वह स्थूल न होकर सूक्ष्म है। इतने पर भी शरीरशास्त्र ने कुछ ऐसे नाड़ीगुच्छक ढूँढ़ निकाले हैं, जिनकी चक्रों के गोचरस्वरूप के रूप में चर्चा की जाती है, पर चह उनकी स्थूल अभिव्यक्तियाँ ही हैं यह कहना कठिन है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि चक्रों की अवधारणा कोई कल्पना- जल्पना न होकर एक सच्चाई है।
साधना करते रहें तो चिरकाल व्यतीत हो जाने और लम्बा कष्टसाध्य अनुष्ठान कर लेने पर भी अभीष्ट लाभ न होगा, किंतु यदि भावभरी मनोभूमि में थोड़ा भरी साधना-विधान अटूट श्रद्धा विश्वास के साथ सम्पन्न किया जाए तो उसका परिणाम तत्काल दृष्टिगोचर होगा। संदिग्ध और आशंकाग्रस्त मनोभूमि मानसिक धरातल को बहुत ही उथला बनाये रखती है, उससे कोई बड़े दैवी अनुदान संजोये नहीं जा सकते। साधनात्मक विधि-विधान का अपना महत्व है, पर यह ध्यान रखने योग्य है कि श्रद्धा को आत्मिक उपलब्धियों का ’प्राण’ ही माना जाएगा। प्राणरहित शरीर को कितना ही संजोया सँभाला जाए, उससे कुछ काम न बनेगा। भावनारहित मनोभूमि मरुस्थल के समान है, जहाँ सफलता की हरी-भरी खेती लहलहाने का स्वप्न कदाचित ही सफल होता है।
साधना विशेषांक में करेंगे।
साधनाक्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
साधनावर्ष की महत्ता बताते रहेंगे एवं महापूर्णाहुति के स्वरूप को खोलते हुए इन आयोजनों की संपन्न किया जाता रहेगा। उनके साथ-साथ इनके ही समानांतर भारत भर में साधना वर्ष हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रायः ४८ स्थानों पर १५ नवम्बर से १५ जनवरी के मध्य रखे जा रहे है। शान्तिकुञ्ज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की टोलियों कं द्वारा ये पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम उन स्थानों पर संपन्न होने जा रहे है। जहाँ परिजनों का अपना स्वयं का स्थान है तथा जहाँ कार्यकर्ता स्तर के परिजनों का अनुपात सघन है। इन प्रशिक्षण आयोजनों द्वारा जो ५-५ दिन के होंगे साधनावर्ष के ढाई दिवसीय आयोजनों की पूरी रूप-रेखा बनायी जाएगी।
साधना सिद्धिदायक बन जाती है। साधना वस्तुतः व्यक्तित्व को विचारों का स्नान कराना है। यह यदि नित्य होती रहे तो कषाय-कल्मष रोज धुलते रहते है। ध्यान अंतर्मन का विश्राम है। इस क्रम में और क्या विघ्न आ सकते है ऐसे कौन-से दुर्गुण है जो किसी भी साधन की प्रगतियों को अवरुद्ध ही नहीं करते-करते के द्वारा में भी ढकेल देते है।
साधना के सैद्धान्तिक पक्ष के स्पष्ट करेगा, तो जनवरी २१ का अंक साधना के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालेगा।
साधनात्मक कर्मकाण्ड अपनाने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। विश्वचेतना के साथ व्यक्ति चेतना को जोड़ने का यही मार्ग हैं। मंत्र-साधना इसी राजमार्ग की तरह समझी जानी चाहिए।
साधना के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालेगा।
साधना-जप-प्राणायाम के दौरान होने वाले इन अनुभवों के मूल कारण को समझ उसने उपचार के विषय में अच्छी तरह जान लेना चाहिए। नहीं तो बार-बार साधना की सफलता न मिलने पर निराशा का सामना या मतिभ्रम के कारण व्यवधानों को अनुभूति का एक हिस्सा मान लेने की विडम्बना झेलनी पड़ेगी।
साधनात्मक पुरुषार्थ की आहुति देने की तरह की यह प्रक्रिया इस एक वर्ष में और गति लेगी, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए। जो कार्य विगत दस वर्षा में संपन्न हुआ है, उससे कहीं सौ गुना अधिक इस अगले एक वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य निश्चित किया गया है। इससे गायत्री चेतना का, युगशक्ति का विस्तार गाँव-गाँव घर-घर तक होता चला जाएगा। समूह बन के जागरण के माध्यम से एक सुरक्षाकवच साधकों के चारों ओर विनिर्मित होकर संभावित विभीषिकाओं से रक्षा का विधान भी बन सकेगा। साथ-साथ मिशन का संगठनात्मक आधार भी मजबूत हो इस स्थिति में आ सकेगा कि महापूर्णाहुति का गोवर्द्धन सबकी लाठी के सहारे उठ सके।
साधना क्षेत्र में सफलता तो दूर कुछ कदम भी आगे बढ़ पाना शक्य नहीं हो सकेगा। जप करते समय यदि हमें ऐसा भान हो कि हमारा सिर उड़ रहा है-दुनिया घूमती दिखाई दे रही है। तो मानना चाहिए मुखचक्र-अग्निचक्र के परिपाक के कारण शरीर में पित्त बढ़ रहा है-अम्ल की प्रधानता हो रही है। ऐसे में आहार को साधक के स्तर का बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। तला-भुना मिर्च मसाले प्रधान भोजन को कम करके सात्विकता का परिमाण बढ़ाना चाहिए।
साधना की सफलता चाहने वाले साधकों को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति को श्रद्धा-शक्ति ही बनाना पड़ता है।
साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो, उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
साधना उपासना तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केंद्रित न कर ऋषिगणों ने यह भी देखा है कि इस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग-उपयोग कि प्रयोजन के लिए किया जा रहा है। इसीलिए भारतीय दर्शन इतना व्यावहारिक व हर देश-काल परिस्थिति के लिए उपादेय माना जाता रहा है।
साधना करते है। वहाँ वे वह निश्चय कर लेते है कि हम जब तक यहाँ रहेंगे अमुक कार्य नहीं करेंगे। आप भी इस कल्पसाधना शिविर में आये है तो व्रतशील हो करके रहिए निश्चय का पालन करते रहिए। यह दृढ़ निश्चय कर लीजिए कि जो नियम बनाया है उसका बराबर पालन करते रहेंगे। भोजन जैसा भी है उसी से काम चला लेंगे।
साधना प्रशिक्षण सब अभी १५ नवम्बर, १९९८ से आरंभ कर २२ जनवरी, १९९९ तक सारे भारत एवं विश्व में संपन्न कर गायत्री परिवार का संगठनात्मक ढाँचा सशक्त बनाए जाने की रूप-रेखा बनी है। ऐसे स्थान जहाँ से पाँच दिवसीय प्रशिक्षण केन्द्र के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा संपन्न किए जाएँगे।
साधना और व्यक्तित्व का समग्र निर्माण करने जैसे कठिन मार्ग पर चलना पड़ते है। चतुर कठिन मार्ग पर चलना पड़ता है। चतुर लोग इस झंझट में पड़कर अपनी विलासी और महत्त्वाकाँक्षी प्रवृत्ति कैसे छोड़ सकते है? वे नकलीपन का आश्रय लेते हे। ऐसे संत महात्मा और सिद्ध योगियों की कमी नहीं जो हाथ ऊपर करके आसमान में से इलायची माँगते और भक्त द्वारा रुपया बनाने जैसे खेलों की भौंड़ी नकल है।
साधना इन शिथिल संबंधों को पुनः प्रतिष्ठापित करने की सुनिश्चित पद्धति हैं। मंत्र-साधना उसका कर्मपक्ष नहीं, उसकी भी अपनी गरिमा है, फिर भी वह पूर्ण नहीं। कोई व्यक्ति विद्वान, ज्ञानी दार्शनिक शास्त्रज्ञ, वेदांती होने भर से आत्मबलसम्पन्न नहीं हो सकता। इसके लिए उसे साधनात्मक कर्मकाण्ड अपनाने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। विश्वचेतना के साथ व्यक्ति चेतना को जोड़ने का यही मार्ग हैं।
साधनात्मक विधि-विधान का अपना महत्व है, पर यह ध्यान रखने योग्य है कि श्रद्धा को आत्मिक उपलब्धियों का ’प्राण’ ही माना जाएगा। प्राणरहित शरीर को कितना ही संजोया सँभाला जाए, उससे कुछ काम न बनेगा। भावनारहित मनोभूमि मरुस्थल के समान है, जहाँ सफलता की हरी-भरी खेती लहलहाने का स्वप्न कदाचित ही सफल होता है। अस्तु, साधना की सफलता चाहने वाले साधकों को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति को श्रद्धा-शक्ति ही बनाना पड़ता है।
साधना में अपना समय काट रहा था। एक दिन उसे अपने मुँहबोले बेटों की याद आयी और उसने उनकी खोज खबर लेने का निश्चय किया। वह एक गरीब भिखारी का वेश बनाकर अपने सबसे बड़े पुत्र के पास पहुँचा। उसने गिड़गिड़ाते हुए उससे खाना माँगा। लेकिन लालची पुत्र ने बेरुखी से कहा-अरे बूढ़े! खाना क्या मुक्त में मिलता है?
साधना के दौरान बहुत भागता है, स्थिर नहीं रह पाता।
साधना का उद्देश्य है। नाली के प्रवाह में कोई रोड़ा आ आए तो पानी इधर-उधर फैलेगा और नाली सूखी पड़ी रहेगी। यही बात हमारे जीवन प्रवाह में भी दृष्टिगोचर होती है अन्न, जल पर जीवित रहने वाला शरीर तो अपना आहार प्राप्त करके गतिशीलता बना रहता है, पर अंतःचेतना को खुराक न मिलने से वह दिन प्रतिदिन दुर्बल एवं मरणासन्न होती चली जाती है। यह है हम सबकी आंतरिक दयनीय दुर्दशा का कारण।
साधना का प्राण कह सकते हैं।
साधना भावनात्मक आकांक्षा भले ही पूरी करे, उससे वैज्ञानिक लाभों का प्रयोजन पूरा न होगा।
साधना दो माध्यम है। आस्था के अंतर्गत नीति धर्म, दर्शन, आत्मज्ञान, ब्रह्म एवं सूक्ष्म जगत का वर्णन विवेचन आता है शास्त्रों में उसी का वर्णन हैं आत्मबोध, लोक व्यवहार, चिंतन परिष्कार को अध्यात्म के निष्ठा पक्ष में लिया जाएगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधना प्रभृति क्रिया–कलापों को ‘साधना’ माना जाएगा। दोनों एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अपूर्ण रह जाएगा।
साधना शिविर में आये है तो व्रतशील हो करके रहिए निश्चय का पालन करते रहिए। यह दृढ़ निश्चय कर लीजिए कि जो नियम बनाया है उसका बराबर पालन करते रहेंगे। भोजन जैसा भी है उसी से काम चला लेंगे। यह नहीं कि साहब। इसका जायका अच्छा नहीं है हम तो कचौड़ी खाएँगे।
साधना प्रशिक्षण आयोजनों को सर्वोच्च वरीयता दें। इनके माध्यम से ही इन विराट महोत्सवों का अनुयाज-कार्यकर्ताओं का गाँव-गाँव तक फैला तंत्रिका का विकास संभव हो सकेगा। सर्वाधिक ध्यान सभी का इस तथ्य पर डालने के लिए प्रस्तुत संपादकीय लिखा गया है। कृपया ध्यान से पढ़ें।
साधनामय जीवनपद्धति का रहस्योद्घाटन करेगा। आशा है परिजन पाठक इस पत्रिका के विस्तार फैलाव में कोई कसर शेष न रखेंगे।
साधना सम्भव ही न होगी। आहार विहार के प्रतिबन्ध व्रत संयम का विधान व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए ही हैं स्वच्छ दर्पण में ही मुँह साफ दीखता है, साफ कपड़े पर ही ठीक से रंग चढ़ता है। यदि जीवनक्रम दुष्ट और दुराचारी बना रहे, तो फिर मंत्र-साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो, उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
साधनापथ के पथिक को उपासना-साधना-जप-प्राणायाम के दौरान होने वाले इन अनुभवों के मूल कारण को समझ उसने उपचार के विषय में अच्छी तरह जान लेना चाहिए। नहीं तो बार-बार साधना की सफलता न मिलने पर निराशा का सामना या मतिभ्रम के कारण व्यवधानों को अनुभूति का एक हिस्सा मान लेने की विडम्बना झेलनी पड़ेगी।
साधनाएँ करते और अपने शिष्यों को विद्याध्ययन कराते थे। शिष्य भी सदा उन्हीं के आश्रम में निवास करते थे। और पढ़ने-लिखने के साथ-साथ भक्तिभाव से गुरुजनों की सेवा-शुश्रूषा करते थे। आश्रम की खेती बाड़ी का काम भी संभालते थे। ऋषिवर अयोद धौम्य ऐसे ही गुरु थे।
साधनात्मक उपचारों के संबंध में लिखा है कि” ये उपचार (उपासना आदि) तो मात्र रेलवे लाइन पर खड़े सिगनल-सड़क पर लगे संकेत-पट मात्र है जो दिशा-निर्देश भर करते है। इन्हें ही हमें सब कुछ नहीं मान लेना चाहिए। संदर्भ है साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के मार्ग में आने वाले विघ्नों का। जब ये विघ्न आते है। तो उन्हें अधिकांश पहचान नहीं पाते एवं कभी-कभी अपनी अनुभूति के प्रतीक रूप में मानकर भ्रमित भी हो जाते है।
साधना के क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के मार्ग में आने वाले विघ्नों का। जब ये विघ्न आते है। तो उन्हें अधिकांश पहचान नहीं पाते एवं कभी-कभी अपनी अनुभूति के प्रतीक रूप में मानकर भ्रमित भी हो जाते है।सामान्य साधना-उपचार है जप-प्राणायाम-ध्यान। इनके साथ-साथ सामान्यतया व्रत-उपवासों का निर्वाह भी होता रहता है।
साधना में निरत रहकर विभूतियों के अधिकारी बने, इस संदर्भ में मंत्र साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
साधना कर ली है। जो बताए हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह से प्रयोग करते है। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव-उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते है इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान नहीं देते।
साधना इसी राजमार्ग की तरह समझी जानी चाहिए।
साधना भी यंत्र-साधना की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। यंत्रों के सिद्धांत
साधना-विधान अटूट श्रद्धा विश्वास के साथ सम्पन्न किया जाए तो उसका परिणाम तत्काल दृष्टिगोचर होगा। संदिग्ध और आशंकाग्रस्त मनोभूमि मानसिक धरातल को बहुत ही उथला बनाये रखती है, उससे कोई बड़े दैवी अनुदान संजोये नहीं जा सकते। साधनात्मक विधि-विधान का अपना महत्व है, पर यह ध्यान रखने योग्य है कि श्रद्धा को आत्मिक उपलब्धियों का ’प्राण’ ही माना जाएगा। प्राणरहित शरीर को कितना ही संजोया सँभाला जाए, उससे कुछ काम न बनेगा। भावनारहित मनोभूमि मरुस्थल के समान है, जहाँ सफलता की हरी-भरी खेती लहलहाने का स्वप्न कदाचित ही सफल होता है।
साधनामय बनाकर जब विवाह के बंधन में बँधेंगे और प्रबुद्ध नई पीढ़ी के उत्पादन का ध्यान रखेंगे तो अर्जुन-द्रौपदी के संपर्क से उत्पन्न अभिमन्यु की तरह घर-घर में सुसंस्कारी महापुरुष जन्मेंगे। उनके जन्मजात सुसंस्कार थोड़े-से शिक्षण से ही खराद किए हुए हीरे की तरह दमकने लगेंगे
साधना की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। यंत्रों के सिद्धांत
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-February
साधना किस चीज का नाम है। साधना बेटे, इस चीज का नाम है, जिसमें हम अपने भीतर वाली क्षमता का, चेतना का विकास करते है। और विकसित करते हुए चले जाते है। चेतना का आप तो मूल्य भी नहीं समझते? मैं क्या करूं?
साधना का स्वरूप क्या हो सकता है? असली साधना क्या है? नकली की तो मैं क्या कहूँगा आपसे। असली साधना कैसे की जाती है? यह बताता हूँ आपको।
साधना से प्राप्त लगाओ यही युगसाधना है। कल्कि अवतार की चेतना तुम्हें समय-समय पर इसके लिए आवश्यक दिशा-दर्शन कराती रहेगी।
साधना पद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर साधकों को दी जा रही है, ताकि वे अध्यात्म एवं युगान्तरकारी गतिविधियों के ध्रुवकेंद्र देवात्मा हिमालय एवं वहां निवास करने वाली विभूतियों से जुड़े रहे और निरंतर हो रहे आसुरी आक्रमणों से सुरक्षित रह सकें। क्रम प्रातः आँख खुलते ही आरम्भ हो जाता है और जब तक नींद नहीं आ जाती तब तक चालू रहता है। इस साधना-प्रक्रिया में सूत्र रूप से सभी साधनाएं समाहित कर दी गई है। जिनके प्रभाव अतिविशिष्ट, रहस्यमय एवं सर्वथा गोपनीय है।
साधना यज्ञ संस्कार देवस्थापना आदि की फलश्रुति प्रधान (ग) पर्यावरण वनौषधि संवर्ग को तत्सम्बन्धी विस्तारपरक तथा (घ) सद्ज्ञान संवर्ग की विद्या−विस्तार साहित्य स्थापना प्रधान प्रदर्शनियां भी यहां से भेजे जाने की व्यवस्था बनायी जा रही हैं प्रस्तुत आयोजनों की श्रृंखला गुरुपूर्णिमा 1998 के बाद आरम्भ होगी किन्तु कार्यकर्ताओं के संगठनपरक अनुयाज दौरे जो केंद्र के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा संपन्न होंगे- मार्च में चुनाव के बाद से ही आरम्भ हो जायेंगे।
साधना यदि आप करें तो बीमार होते हुए भी चंदगीराम पहलवान के तरीके से 22 वर्ष की उम्र में टी.बी. के मरीज होते हुए भी आप अपनी जिंदगी में पहलवान बन सकते है। अगर आप शरीर की साधना करना चाहे तब। साधना किसे कहते है। जैसे किसान अपने शरीर की और मिट्टी की मलाई करता है और रगड़ाई करता है। शरीर के साथ में मलाई कीजिये और आप पहलवान बन जाइये।
साधना करता है वैज्ञानिक। वैज्ञानिक बड़ी मेहनत करता है तो ताकतवर बम बना देता है। यदि वह फंस जाये तो सैकड़ों मील तक ये ताकत कहाँ से आती है। एटम में से नहीं आती है बेटे। साधना से आती है।
साधनाओं में संलग्न हो गये परमपूज्य गुरुदेव भी इसी वर्ष वसन्त पंचमी का अपनी मार्गदर्शक सत्ता के निर्देशानुसार अखण्ड दीप प्रज्वलित कर 24 लाख के 24 गायत्री महापुरश्चरणों की साधना हेतु संकल्पित हुए। इसी वर्ष का श्री अरविन्द ने भागवत चेतना के अवतरण का वर्ष कहा।
साधना किसकी है ये धोबी की साधना है मूर्तिकारी की साधना है पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज से छैनी और हथोड़े को लेकर में मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है कि लक्ष्मी जी है बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है।
साधना एवं उपासना का युग्म कहा जाता है। दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन साधना है। और सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन उपासना। असुरता का उन्मूलन और देवत्व का पोषण, यही धर्म-धारणा है और यही ईश्वर-आराधना। यह तथ्य यदि गहराई से समझ लिया जाए तो तत्वदर्शन के उस मूल प्रयोजन को समझा जा सकता हैं जिसके लिए आस्तिकता और धार्मिकता का विशालकाय कलेवर दूरदर्शी ऋषियों ने खड़ा किया है।
साधना स्थली माया का आच्छन्न करने वाला प्रभाव इसका समीप नहीं आता। देवपुरुष परशुराम का सत्संग पाने के लिए अगणित ऋषि तपस्वीगण भी इसकी गुफाओं में, साधन कानूनों में अपने आराध्य का चिन्तन करते नित्य तन्मय रहते हैं। दिव्य लतातरु, पुष्पित- पल्लवित मधुरफल वनभूमि और रत्नोज्ज्वल गुफाएँ। यहाँ न केवल पशुओं का नाद, पक्षियों का कलरव, भ्रमरों का गुँजन ही, बल्कि निर्झरी की तरंगित ध्वनि में भी ओंकार का दिव्यनाद गूँजता है। यहाँ का पत्ता-पत्ता इस दिव्यगूँज के साथ नर्तन करने में लीन रहता है।
साधना अहर्निश होनी चाहिए एक क्षण भी साधना अहर्निश होनी चाहिए एक क्षण भी साधना विरत नहीं किया जाना चाहिए। प्रमाद जहां भी जब भी आएगा, शैतान को चढ़ दौड़ने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय कि लिए सो जाए, तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतेंगे, तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर तो मस्तिष्क पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। युगपरिवर्तन की अवधि में अपनायी जानें वाली साधना पद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर साधकों को दी जा रही है, ताकि वे अध्यात्म एवं युगान्तरकारी गतिविधियों के ध्रुवकेंद्र देवात्मा हिमालय एवं वहां निवास करने वाली विभूतियों से जुड़े रहे और निरंतर हो रहे आसुरी आक्रमणों से सुरक्षित रह सकें।
साधना यहाँ आने के पश्चात और भी विशिष्ट और महनीय हो गयी थी। आचार्य कृप तो युद्धविद्या के आचार्य थे, कुरु राजकुमारों, पाण्डुपुत्रों को उन्होंने युद्धविद्या का प्रथम पाठ पढ़ाया था। इसका श्रीगणेश करते समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि भाई-भाई आपस में ही इसका प्रयोग करने लगेंगे। उनका आपस का वैर महायुद्ध का रूप ले लेगा।
साधना अर्थात् अनगढ़ से सुगढ़
साधनावर्ष के साथ-साथ में सब भी प्रकाशित हो जायेंगे जिस खण्ड ज्योति संस्थान घीयामंडी मथुरा के पते पर पत्र लिखकर मागा सकते है।
साधना करना। दूसरों के दुःख बँटाने और अपने सुख बाँटने की सहृदयता विकसित करना।
साधनाएं तथा सप्ताह में एक दिन गुरुवार का एक समय का अस्वादव्रत एवं रविवार का उपवास अनिवार्य रूप से करना चाहिए। सूर्य तत्व ही युगपरिवर्तन को हलचलें अहर्निश उत्पन्न कर रहा है इस सत्य से सभी दिव्यद्रष्टा एवं सूक्ष्मवेत्ता सहमत हैं युगपरिवर्तन की अवधि के इन वर्षों में सौरचेतना का महत्व असाधारण है गायत्री सूर्य की ही दिव्यचेतना शक्ति है रविवार का साप्ताहिक उपवास इससे अपने आपको एकात्म करने के लिए समर्थ एवं सार्थक उपाय है साधना के इस क्रम को आन्तरिक श्रद्धा एवं गहन निष्ठापूर्वक अपनाने वाले अनुभव करेंगे कि उसकी प्रखर उपलब्धियां विश्वात्मा के चरणों में समर्पित होने के लिए उमड़ी पड़ रही है। उनकी स्फूर्ति प्रतिभा एवं समर्थता फूटी पड़ रही है। यही नहीं अपने समर्थ व्यक्तित्व के बल पर महापरिवर्तन की इस अवधि में वे ऐसा कुछ कर दिखायेंगे जिसे युगों तक याद किया जा सकें।
साधना का उद्देश्य कि आप अपनी चेतना को परिष्कृत करें, समर्थ बनाए।
साधना है किसकी? धागों की तारें की यह किसकी है साधना? गले की। यह है साधना पत्थर की। ये किसकी है साधना?
साधना पुरुषार्थ की साथ-साथ अपेक्षा थी। वह प्रचुर परिमाण में उभर कर नहीं आया। यदि कहीं अन्यमनस्कता की पारस्परिक अंतर्कलह या विवाद की स्थिति अंतर्कलह या विवाद की स्थिति आयी है तो उसका कारण एह ही है कार्यकर्ता की साध के रूप में तैयारी में कुछ कमी है इस वर्या चुनाव के बाद के आयोजनों की तो तैयारियों हो चुकी “यथानाम तथा” संकल्पमहोत्सव विराट रूप में सभी और सम्पन्न हो भी जाएगी क्योंकि यह कार्य महाकाल की सूक्ष्मचेतना करा रही है किन्तु भीड़ एकत्र करना, मजमा लगाना मात्र कर्म काण्ड करना हमारा उद्देश्य नहीं है न कभी था हमारा उद्देश्य तो ज्ञानयज्ञ है विचारक्रांति है हस युगप्रवर्तक है एवं प्रज्ञावतार की सत्ता के अंशधर है हमारा पुरुषार्थ अब उसी स्तर का होना चाहिए। यही सब सोचकर अब अधिकाधिक परिजनों को शांतिकुंज विशिष्ट संधिकाल के ऊर्जा संचार सत्रों के लिए आमंत्रित किया जा रहा है इसके साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर तीन प्रकार के कार्यक्रम दिए जा रहे हैं जो साथ-साथ भी चल सकते है उवं अलग-अलग अवधि में भी पहला प्रज्ञापुराण के पांच अथवा सात दिवसीय आयोजनों को नौकुण्डीय या चौबीसकुण्डीय यज्ञ के साथ समापन-उसी में संस्कारों को प्रतिदिन सम्पन्न कराते चलना। दूसरा प्रबुद्ध वर्ग की गोष्ठियां मल्टीमीडिया प्रोजेक्टर्स स्लाइड प्रोजेक्ट्स के माध्यम से।
साधना है मूर्तिकारी की साधना है पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज से छैनी और हथोड़े को लेकर में मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है कि लक्ष्मी जी है बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है।
साधना इसी को कहते है नाई क्या करता है? नाई हमारी हजामत बना देता है और हमें ऐसा बना देता है जैसे मूंछें अभी निकली ही नहीं। यह मिरेकिल - जादू है हजामत बनाने वाले का। हमको खूबसूरत करने वाले का दर्जी जो हमारे फटे-पुराने से कपड़े थे उनका कुर्ता बना देता है जाकेट बना देता है अरे बेटे, यह कपड़ा तो वही है ढाई गज जो सबेरे पड़ा हुआ था। अब कैसा सुन्दर बना हुआ है कमाल है यहां भी बटन यहां भी कच्ख यही भी गोट यहां भी बाजू।
साधना विधान के केन्द्रबिन्दु हैं चार वेदों का सारतत्व यही हैं इन्हीं महासत्वों के हृदयंगम करने और उन्हें व्यवहार में उतारने से परमलक्ष्य की प्राप्ति होती हैं जीवनोद्देश्य पूर्ण होता हैं इन महासत्यों को जितनी श्रद्धा और जागरूकता के साथ अपनाया जाएगा, आत्म निर्माण उतना ही सरल और सफल होना चला जाएगा। युग परिवर्तन की प्रक्रिया में युग निर्माण की दिशा में बढ़ते हुए सर्वप्रथम आत्म निर्माण पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए। यहीं से वह शुरुआत होती है जो समग्र परिवर्तन के रूप में चारोँ और दिखाई पड़ती हैं विचारक्रान्ति का बीज है। आत्मनिर्माण।
साधना है पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज से छैनी और हथोड़े को लेकर में मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है कि लक्ष्मी जी है बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है।
साधना कहते है। मन साधे, सब साधे यही साधना का स्वरूप है।
साधना का स्वरूप है।
साधना पराक्रम के साथ - साथ दैवी इच्छा के अनुरूप को ढालकर पार कर लिया जाए तो फिर जीत ही जीत है यह भाव रखा जाना चाहिए।
साधना करना चाहे तब। साधना किसे कहते है। जैसे किसान अपने शरीर की और मिट्टी की मलाई करता है और रगड़ाई करता है। शरीर के साथ में मलाई कीजिये और आप पहलवान बन जाइये। ये तो हुई साधना शरीर की।
साधना हैं जो चीजें ऊबड़-खाबड़ है, बेतुकी है, उन्हें ठीक तरीके से ठीक बना देने का नाम साधना है।
साधना अवधि में संकेत भी सभी को मिलने लगें। इसके कुछ ही माहों बाद तो पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण- साधना आरम्भ हो गयी है। उपरोक्त प्रसंग आज की वेला में यही सोच कर दिया गया कि कही वही अवसाद मतिभ्रम-आत्मसम्मोहन हम सभी के ऊपर हावी तो नहीं हो रहा जिसने गुरुसत्ता को व्यथित किया जाता है। व समझ में नहीं आता यह समय पराक्रम और पौरुष का है शौर्य और साहस का है इस विषम वेला में युग के अर्जुन के हाथों में गाण्डीव क्यों छूटे जा रहे हैं उनके मुख क्यों सूख रहे हैं पसीने क्यों झर रहे हैं। सान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद-मनोरंजन है जिसकी यथार्थता परखी जाने का कोई अवसर ही न आये।
साधना कराते हैं।
साधना? हर चीज की है सोने की साधना मुचा की साधना और जीवन की साधना कि जीवन कैसे जिया जा सकता है जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है जीवन कैसे देवोपम बनाया जा सकता है, जीवन की अस्त-व्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है। जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है अगर ठीक तरीके से आप यह जान पाए तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए।
साधना इसी महत् संकल्प को पूरा करने में नियोजित हो जाती है, फिर चाहे मनुष्य सहायता दे अथवा प्रतिरोध करे, किन्तु उसका काम रुकता नहीं, जब तक संकल्प पूरा न हो जाए। हाँ होशोहवासपूर्वक सहयोग करने वाले युगशिल्पी एवं युगनायक का गौरव अनायास पा लेते हैं
साधना हेतु संकल्पित हुए। इसी वर्ष का श्री अरविन्द ने भागवत चेतना के अवतरण का वर्ष कहा।
साधना करनी चाहिए। आत्मदेव की सद्गुरु परमात्मा का प्रतिनिधि, उद्धारकर्ता एवं इष्टदेव के रूप में नमन करना चाहिए और आग्रह भरा अनुरोध करना चाहिए कि अपनी गतिविधियों का स्तर ऊंचा उठाए ताकि लक्ष्य की ओर सुख-शान्ति पूर्वक बढ़ चलाना संभव हो सके।
साधना का महत्व बना रहा था ये घटिया वाली जिन्दगी बेकार जिन्दगी पत्थर जैसी जिन्दगी को आप बढ़िया और शानदार बना सकते हैं सोने का एक टुकड़ा ले जाइए साहब। अरे हम क्या करेंगे? कहीं गिर पड़ेगा। अच्छा तो अभी हम आते हैं उसका क्या बना दिया। ये कान का बुन्दा बना दिया।
साधनाएं समाहित कर दी गई है। जिनके प्रभाव अतिविशिष्ट, रहस्यमय एवं सर्वथा गोपनीय है।
साधना-प्रक्रिया में सूत्र रूप से सभी साधनाएं समाहित कर दी गई है। जिनके प्रभाव अतिविशिष्ट, रहस्यमय एवं सर्वथा गोपनीय है।
साधनासत्रों में सम्मिलित होना या फिर घर में सवा-लाख के चालीस दिवसीय अनुष्ठानों में संलग्न होना ऐसा है जिसे सामयिक ही कह सकते हैं परिवर्तन में महान दायित्वों को निभाते रहकर सदा इस रीति को अपनाए रखना रहकर असंभव है घर में रहकर रोजमर्रा के जीवनक्रम के साथ किस प्रकार साधनाएं चलाया जाता चाहिए इसकी क्रमबद्ध विधि-व्यवस्था बनाकर साधकों को दी जा रही है साथ ही उनके आशा की जाती है कि वे इस विशिष्ट अवधि में ओर भविष्य में भी इसका निष्ठापूर्वक पालन करते रहेंगे।
साधना कह पूर्णाहुति राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के रूप में की। इसी के बाद नौवीं लोकसभा चुनाव हुए। दिसम्बर 1989 में वी.पी. सिंह जनता दल नेता के रूप में देश के सातवें प्रधानमंत्री बन गये। वर्ष 1990 की जून में परमपूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण हुआ। चंद्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बने।
साधना विरत नहीं किया जाना चाहिए। प्रमाद जहां भी जब भी आएगा, शैतान को चढ़ दौड़ने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय कि लिए सो जाए, तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतेंगे, तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर तो मस्तिष्क पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। युगपरिवर्तन की अवधि में अपनायी जानें वाली साधना पद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर साधकों को दी जा रही है, ताकि वे अध्यात्म एवं युगान्तरकारी गतिविधियों के ध्रुवकेंद्र देवात्मा हिमालय एवं वहां निवास करने वाली विभूतियों से जुड़े रहे और निरंतर हो रहे आसुरी आक्रमणों से सुरक्षित रह सकें।
साधना है। कल्कि अवतार की चेतना तुम्हें समय-समय पर इसके लिए आवश्यक दिशा-दर्शन कराती रहेगी।
साधना अहर्निश होनी चाहिए एक क्षण भी साधना विरत नहीं किया जाना चाहिए। प्रमाद जहां भी जब भी आएगा, शैतान को चढ़ दौड़ने का अवसर मिल जाएगा। चौकीदार थोड़े समय कि लिए सो जाए, तो चोरों को घात लगाने में देर नहीं लगती। हम तनिक भी प्रमाद बरतेंगे, तो मस्तिष्क पर दुर्भावनाओं का और शरीर तो मस्तिष्क पर दुष्प्रवृत्तियों का आक्रमण होते देर नहीं लगेगी। युगपरिवर्तन की अवधि में अपनायी जानें वाली साधना पद्धति इसी तथ्य को ध्यान में रखकर साधकों को दी जा रही है, ताकि वे अध्यात्म एवं युगान्तरकारी गतिविधियों के ध्रुवकेंद्र देवात्मा हिमालय एवं वहां निवास करने वाली विभूतियों से जुड़े रहे और निरंतर हो रहे आसुरी आक्रमणों से सुरक्षित रह सकें।
साधनाकाल पूर्ण हो गया है। अभी तुम्हें भावी अवतार प्रक्रिया के क्रिया–कलापों को साक्षात अपने नेत्रों से देखना है।
साधना इसी का नाम है वह जो हमने अभ्यास कराया था शुरू में कि आपको तमीज सिखाए और तहजीब सिखाए कौन-सी? कल में इसको बताऊंगा कि पालथी मारकर बैठ। अरे तमीज से सीख। कभी ठीक काम करता है कभी अक्ल से काम करता है कभी नहीं करता है कमर ऐसी करके बैठना। हां साहब ऐसे ही करके बैठूंगा।
साधना का प्राण समझें
साधना के माध्यम से की थी। उन्हीं के शब्दों में, अभी बीसवीं सदी के शेष वर्ष ऐसी ही उखाड़ -पछाड़ से भरे है, जिनमें घटाएँ, घुमड़ती, बिजली कड़कती और अनिष्ट की सम्भावना उतरती दीख पड़ेगी। पर अन्ततः इक्कीसवीं सदी में विश्व की, राष्ट्र की कुण्डलिनी जाग्रत होने का प्रभाव इस रूप में देखा जा सकेगा। कि उससे जड़ पदार्थ, जीवनधारी मनुष्य एवं परिस्थितियों के प्रवाह प्रभावित होंगे।
साधना के वे दो दो चरण है। जिनके सहारे जीवन-लक्ष्य की पूर्ति तक क्रमबद्ध रूप से बढ़ा जा सकता हैं इन्हें साधना एवं उपासना का युग्म कहा जाता है। दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन साधना है। और सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन उपासना। असुरता का उन्मूलन और देवत्व का पोषण, यही धर्म-धारणा है और यही ईश्वर-आराधना।
साधना इसी निर्माण की प्रयोगशाला है।
साधना अपने दैनिक कार्यों में समग्र मनोयोग लगाने से ही सम्भव होती हैं उपासना में भी यही अभ्यास काम दे जाता है। यदि हर काम आधे मन से करने की आदत होगी तो फिर पूजा ही तन्मयतापूर्वक कैसे सम्भव होगी।
साधनाओं के द्वारा मेरे अन्तराल में उतरा है। वह रहस्य! जिसे हिमालय की ऋषिसत्ताओं ने मेरे समझ उद्घाटित किया है।
साधना संवर्ग
की गायत्री साधना यज्ञ संस्कार देवस्थापना आदि की फलश्रुति प्रधान (ग) पर्यावरण वनौषधि संवर्ग को तत्सम्बन्धी विस्तारपरक तथा (घ) सद्ज्ञान संवर्ग की विद्या−विस्तार साहित्य स्थापना प्रधान प्रदर्शनियां भी यहां से भेजे जाने की व्यवस्था बनायी जा रही हैं प्रस्तुत आयोजनों की श्रृंखला गुरुपूर्णिमा 1998 के बाद आरम्भ होगी किन्तु कार्यकर्ताओं के संगठनपरक अनुयाज दौरे जो केंद्र के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा संपन्न होंगे- मार्च में चुनाव के बाद से ही आरम्भ हो जायेंगे।
साधना (3) आधा घण्टा गायत्री जप-सूर्यार्घ्यदान।
साधना के बहिरंग क्रिया-कलाप सिखाते हैं आखिर क्या उद्देश्य है इनका क्रिया का कोई उद्देश्य होना चाहिए। क्यों साहब पालथी मारकर क्यों बैठते हैं पद्मासन में क्यों बैठते हैं हम तो ऐसे ही बैठेंगे, टांग पसार कर नहीं बेटे, टांग पसार कर मत बैठिये। नहीं साहब हम तो टांग लम्बी करेंगे। इसको छोटी करेंगे नहीं बेटे ये भी गलत हैं। नहीं हम तो यूं माला जप करेंगे सिर के नीचे तकिए लगाकर।
साधना जिसको भावभरा प्रयोग हमें महाकाल के महाप्राणों से जोड़ता है और एक अद्भुत प्रत्यावर्तन प्रक्रिया साकार रूप लेती है।
साधना दिनोंदिन ऊंची होती जा रही थी। ब्रह्मानंद जी को देखकर स्वामी हरिदास जी दौड़े हुए आये और वयोवृद्ध के चरण छूने के लिए झुके। स्वामी जी ने उन्हें बीच में ही उठाकर कलेजे से लगा लिया। कहा-देखो मैं तुम्हें प्रेम सरोवर के एक कृष्ण कमल से परिचित कराने के हेतु यहाँ आया हूँ।
साधना के साथ में भी परिश्रम जुड़ा हुआ है। सच्ची साधना करता है वैज्ञानिक। वैज्ञानिक बड़ी मेहनत करता है तो ताकतवर बम बना देता है। यदि वह फंस जाये तो सैकड़ों मील तक ये ताकत कहाँ से आती है। एटम में से नहीं आती है बेटे।
साधना के माध्यम से हम अपने व्यावहारिक जीवन को किस तरीके से अनुशासित रूप दे सकते हैं कि तरीके से उस ढाल सकते हैं किस तरीके से अपने कर्मों को अपने विचारों को अपनी इच्छाओं को आस्थाओं को परिष्कृत एवं अनुशासनबद्ध कर सकते हैं। क्रमबद्ध कर सकते हैं असल में साधना इसी का नाम है।
साधना में लगाने से आधा घण्टा हो जाता है शेष आधा घण्टा गायत्री की पांच मालाएं पूरी करने के लिए है।
साधना और कोई करके देता है क्या? नहीं कोई नहीं देता हम अपने आपका विकास स्वयं करते है अपने आपका निखार स्वयं करते है। आत्मशक्ति को आपने देखा नहीं। इंजन कितना बड़ा होता है। इंजन साहब छह लाख रुपये का आता है।
साधना की। सिद्धियां उनकी अनुगामिनी बनी। सूक्ष्मशरीर से लोक-लोकान्तर गमन उनके जीवन का सामान्य सत्य बना। हिमालय की भयावह सत्य बना। हिमालय की भयावह शीत हो या फिर कानपुर फतेहपुर, प्रयाग का सामान्य मौसम दिगम्बर रहना ही उनका स्वभाव था।
साधना है उसने खाबड़-खूबड़ धातु के टुकड़े को कैसी सुन्दर अंगूठी बना दिया कैसा जेवर बना दिया। कैसा नाक का जेवर बना दिया। कैसा-कैसा जेवर बना दिया ये हमारी जिन्दगी, बेतुकी जिन्दगी -बेसिलसिले की जिन्दगी? बेतुकी जिन्दगी। बेहूदी जिन्दगी को हम जिस तरह से संभाल पाते हैं साधना इसका नाम है असल में साधना इसी का नाम है वह जो हमने अभ्यास कराया था शुरू में कि आपको तमीज सिखाए और तहजीब सिखाए कौन-सी?
साधना शरीर की। आप अपनी अक्ल और दिमाग के साथ में मलाई कीजिए, घिसाई कीजिए और देखिए की आपका दिमाग बेअक्ल होते हुए भी आप कालीदास के तरीके से विद्वान बनते है या नहीं। आप विद्वान बन सकते है कालीदास के तरीके से। रस्सी को हम पत्थर पर बार-बार घिसते है तो निशान बन जाता है। राजा के तरीके से और कालीदास के तरीके से बेटे अगर हम रगड़ करना शुरू कर दें तो प्रगति के किसी भी क्षेत्र में हमारे पास सिद्धियाँ आ सकती है और चमत्कार आ सकता है।
साधना करता है किसान। किसके साथ-जमीन के साथ। जमीन के साथ में क्या काम करता है? बेटे! धूप में खड़ा रहता है। साल भर तक अपना शरीर और अपना पसीना इस मिट्टी में मिला देता है।
साधना की है। उनका तपः तेज दुर्धर्ष है।
साधना है और कुछ नहीं है। साधना और कोई करके देता है क्या? नहीं कोई नहीं देता हम अपने आपका विकास स्वयं करते है अपने आपका निखार स्वयं करते है। आत्मशक्ति को आपने देखा नहीं। इंजन कितना बड़ा होता है।
साधना एवं सागर से भी गहरे दैवीरहस्य समाए हैं। इसका संचालन किसी सामान्य व्यक्ति या शक्ति के बस की बात नहीं। व्यक्ति के प्रयासों की सीमा है। सामान्यक्रम में उसे अपने ही जीवन को शुभ और आनन्द से भरा पूरा करना दुष्कर, दूभर लगता है। प्रकृति की शक्तियां भी छोटे-मोटे परिवर्तन, गति परिवर्तन, गति, लय-उभार करने में ही यदि सवाल स्वयं प्रकृति को बदलने का हो, मनुष्य को बदल डालने की आवश्यकता जब अनिवार्य समझी जाने, लगे, समूचा जीवनक्रम एक नए ढाँचे में बदलने के लिए आकुल-आतुर हो उठा हो, तब इसे कौन करे?
साधना जैसा पुण्य फलदायक बन जाता है उसकी सुन्दरता और सफलता देखते ही बनती है।
साधना इसी का नाम है बीज को विकसित करके बरगद कैसे बनाया जा सकता है? साधना उसी प्रक्रिया का नाम है साधना और कुछ नहीं है? अपनी जीवात्मा को, अपनी अन्तर्चेतना को विकसित करते-करते हम महात्मा एक, देवात्मा दो और परमात्मा तीन, यहां तक जा पहुंचते है इसे प्राइमरी स्कूल, हाईस्कूल, इन्टरमीडिएट और कॉलेज की पढ़ाई समझ हैं यही है आत्मा से परमात्मा तक विकसित होने की प्रक्रिया।
साधना करने से। शरीर की साधना यदि आप करें तो बीमार होते हुए भी चंदगीराम पहलवान के तरीके से 22 वर्ष की उम्र में टी.बी. के मरीज होते हुए भी आप अपनी जिंदगी में पहलवान बन सकते है। अगर आप शरीर की साधना करना चाहे तब। साधना किसे कहते है। जैसे किसान अपने शरीर की और मिट्टी की मलाई करता है और रगड़ाई करता है।
साधनाओं के लिए कुल मिलाकर पन्द्रह मिनट हैं प्रतिदिन करना हो तो दोनों साढ़े सात-सात मिनट की जा सकती है अन्यथा यह तरीका भी अच्छा है कि एक दिन पंद्रह मिनट ज्योति-अवतरण और दूसरे दिन सोऽहम् साधना करते रहा जाए, पन्द्रह मिनट खेचरी मुद्रा, पंद्रह मिनट खेचरी मुद्रा, पन्द्रह मिनट प्रकाश का ध्यान तथा सोऽहम् साधना में लगाने से आधा घण्टा हो जाता है शेष आधा घण्टा गायत्री की पांच मालाएं पूरी करने के लिए है।
साधना आरम्भ हो गयी है। उपरोक्त प्रसंग आज की वेला में यही सोच कर दिया गया कि कही वही अवसाद मतिभ्रम-आत्मसम्मोहन हम सभी के ऊपर हावी तो नहीं हो रहा जिसने गुरुसत्ता को व्यथित किया जाता है। व समझ में नहीं आता यह समय पराक्रम और पौरुष का है शौर्य और साहस का है इस विषम वेला में युग के अर्जुन के हाथों में गाण्डीव क्यों छूटे जा रहे हैं उनके मुख क्यों सूख रहे हैं पसीने क्यों झर रहे हैं। सान्तवाद क्या कथा-गाथा जैसा कोई विनोद-मनोरंजन है जिसकी यथार्थता परखी जाने का कोई अवसर ही न आये। “ यह चर्चा यहां इसलिए करनी पड़ी है कि किसी महान प्रयोजन के लिए लम्बी यात्रा पर निकले काफिले के सदस्यों में भटकाव आ गया है उसके कारण और निवारण का समाधान वे स्वयं खोज सके।
साधना हैं ईश्वर-प्रेम का सहारा लेकर अन्तःकरण में अपार प्रेमनिष्ठ की धारणा और उसका लाभ उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाती है। अध्यात्म दर्शन की सारी सफलता इस बात पर निर्भर की सारी सफलता इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तित्व के समग्र निर्माण के लिए कितना साहस किया गया? दुर्गुणों को निरस्त करने और सद्गुणों को बढ़ाने के लिए कितना प्रयास किया गया।
साधनात्मक जीवन जीने वालों के लिए स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य है आज के दिन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे हो सकता है इसका क्रमविभाजन इन्हीं क्षणों में कर लिया जाना चाहिए। स्थूलशरीर (देह), सूक्ष्मशरीर (मन) एवं कारणशरीर (भाव) ये तीन कर्मचारी हमें मिले है। इन्हें क्रिया, विचारणा एवं भावना भी कह सकते है हेय तीनों जब किसी एक काम में पूरे सहयोग और उत्साह के साथ जुटते है तो वह कार्य कर्मयोग की साधना जैसा पुण्य फलदायक बन जाता है उसकी सुन्दरता और सफलता देखते ही बनती है।
साधना क्या है? नकली की तो मैं क्या कहूँगा आपसे। असली साधना कैसे की जाती है? यह बताता हूँ आपको। असली साधना करता है किसान।
साधना उसी प्रक्रिया का नाम है साधना और कुछ नहीं है? अपनी जीवात्मा को, अपनी अन्तर्चेतना को विकसित करते-करते हम महात्मा एक, देवात्मा दो और परमात्मा तीन, यहां तक जा पहुंचते है इसे प्राइमरी स्कूल, हाईस्कूल, इन्टरमीडिएट और कॉलेज की पढ़ाई समझ हैं यही है आत्मा से परमात्मा तक विकसित होने की प्रक्रिया।
साधनामिश्रित क्रियापद्धति के साथ युगसाधकों को वर्ष में दो नवरात्रि साधनाएं तथा सप्ताह में एक दिन गुरुवार का एक समय का अस्वादव्रत एवं रविवार का उपवास अनिवार्य रूप से करना चाहिए। सूर्य तत्व ही युगपरिवर्तन को हलचलें अहर्निश उत्पन्न कर रहा है इस सत्य से सभी दिव्यद्रष्टा एवं सूक्ष्मवेत्ता सहमत हैं युगपरिवर्तन की अवधि के इन वर्षों में सौरचेतना का महत्व असाधारण है गायत्री सूर्य की ही दिव्यचेतना शक्ति है रविवार का साप्ताहिक उपवास इससे अपने आपको एकात्म करने के लिए समर्थ एवं सार्थक उपाय है साधना के इस क्रम को आन्तरिक श्रद्धा एवं गहन निष्ठापूर्वक अपनाने वाले अनुभव करेंगे कि उसकी प्रखर उपलब्धियां विश्वात्मा के चरणों में समर्पित होने के लिए उमड़ी पड़ रही है। उनकी स्फूर्ति प्रतिभा एवं समर्थता फूटी पड़ रही है। यही नहीं अपने समर्थ व्यक्तित्व के बल पर महापरिवर्तन की इस अवधि में वे ऐसा कुछ कर दिखायेंगे जिसे युगों तक याद किया जा सकें।
साधना है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का इसके अतिरिक्त, और कोई उद्देश्य नहीं। ईश्वरप्राप्ति आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग-उपलब्धि ओर जीवन-मुक्ति का तात्विक स्वरूप यही हैं कि व्यक्ति अपनी समस्त क्षुद्रताओं और निकृष्टता को निरस्त करके सदुद्देश्यपूर्ण सत्प्रयोजनों में निरस्त रहने का अभ्यस्त बन जाय। परिष्कृत आत्मा का नाम ही परमात्मा हैं अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण करना ही तप-साधना हैं ईश्वर-प्रेम का सहारा लेकर अन्तःकरण में अपार प्रेमनिष्ठ की धारणा और उसका लाभ उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य उदार सेवा-प्रवृत्ति के रूप में प्राणिमात्र को देना, ईश्वरभक्ति हमें इसी लक्ष्य की ओर ले जाती है। अध्यात्म दर्शन की सारी सफलता इस बात पर निर्भर की सारी सफलता इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तित्व के समग्र निर्माण के लिए कितना साहस किया गया?
साधना पत्थर की। ये किसकी है साधना? हर चीज की है सोने की साधना मुचा की साधना और जीवन की साधना कि जीवन कैसे जिया जा सकता है जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है जीवन कैसे देवोपम बनाया जा सकता है, जीवन की अस्त-व्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है। जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है अगर ठीक तरीके से आप यह जान पाए तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए।
साधना और कुछ नहीं है? अपनी जीवात्मा को, अपनी अन्तर्चेतना को विकसित करते-करते हम महात्मा एक, देवात्मा दो और परमात्मा तीन, यहां तक जा पहुंचते है इसे प्राइमरी स्कूल, हाईस्कूल, इन्टरमीडिएट और कॉलेज की पढ़ाई समझ हैं यही है आत्मा से परमात्मा तक विकसित होने की प्रक्रिया।
साधना में हम में हर किस को अपनी-अपनी मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप युगपरिवर्तन के महाप्रयोजन के लिए सम्भव न रह जाएगा।
साधना की महापूर्णाहुति की। इसी के साथ युग-निर्माण आँदोलन सम्पूर्ण भारत के क्षितिज पर सबसे महान साँस्कृतिक, आध्यात्मिक आँदोलन के रूप में उभरा। नेहरू युग पर सबसे गहरा आघात लगा। 1962 के भारत-चीन युद्ध से। 1964 में नेहरू जी की मृत्यु हुई।
साधना इसी का नाम है।
साधना पुरुषार्थ में संलग्न हो अब प्रत्येक परिजन को अपनी तैयारी युगसैनिक के में कर लेनी चाहिए ताकि युगसंधि महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति तक वे निर्धारित कर सके। कि उन्हें अब किस रूप में युग के इस महाअभियान में स्वयं को नियोजित करना है इस वर्ष संस्कार महोत्सवों की श्रृंखला चली सभी ओर पर्याप्त उत्साह उमड़ा किन्तु जिस साधना पुरुषार्थ की साथ-साथ अपेक्षा थी। वह प्रचुर परिमाण में उभर कर नहीं आया। यदि कहीं अन्यमनस्कता की पारस्परिक अंतर्कलह या विवाद की स्थिति अंतर्कलह या विवाद की स्थिति आयी है तो उसका कारण एह ही है कार्यकर्ता की साध के रूप में तैयारी में कुछ कमी है इस वर्या चुनाव के बाद के आयोजनों की तो तैयारियों हो चुकी “यथानाम तथा” संकल्पमहोत्सव विराट रूप में सभी और सम्पन्न हो भी जाएगी क्योंकि यह कार्य महाकाल की सूक्ष्मचेतना करा रही है किन्तु भीड़ एकत्र करना, मजमा लगाना मात्र कर्म काण्ड करना हमारा उद्देश्य नहीं है न कभी था हमारा उद्देश्य तो ज्ञानयज्ञ है विचारक्रांति है हस युगप्रवर्तक है एवं प्रज्ञावतार की सत्ता के अंशधर है हमारा पुरुषार्थ अब उसी स्तर का होना चाहिए। यही सब सोचकर अब अधिकाधिक परिजनों को शांतिकुंज विशिष्ट संधिकाल के ऊर्जा संचार सत्रों के लिए आमंत्रित किया जा रहा है इसके साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर तीन प्रकार के कार्यक्रम दिए जा रहे हैं जो साथ-साथ भी चल सकते है उवं अलग-अलग अवधि में भी पहला प्रज्ञापुराण के पांच अथवा सात दिवसीय आयोजनों को नौकुण्डीय या चौबीसकुण्डीय यज्ञ के साथ समापन-उसी में संस्कारों को प्रतिदिन सम्पन्न कराते चलना।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवाकार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों ओर मधुरता, स्वच्छता एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूंगा। “ आत्मसुधार एवं गुणों के अवलम्बन द्वारा अध्यात्म मूल्यों को जीवन में कैसे उतारा जाए, इसका समग्र शिक्षण संकल्प के इस खण्ड से मिलता है।
साधना उसी का नाम है। चेतना हमारी कितनी ताकतवर है। यह हमारी भौतिक ओर चेतना दोनों क्षेत्रों का मुकाबला करने में सक्षम है। इसका मैं। उदाहरण देना चाहूंगा।
साधना का शुभारंभ किया। राजीव गाँधी इसी साल देश की जनता का सर्वाधिक बहुमत पाने वाले प्रधानमंत्री बने। उनके दौर में सामयिक विकास एवं राष्ट्रनिर्माण के अनेक प्रयासों के बावजूद देश सांप्रदायिकता, आतंकवाद और बाहरी षड्यंत्रों में फंसता गया। 1987 में परमपूज्य गुरुदेव ने सूक्ष्मीकरण साधना कह पूर्णाहुति राष्ट्रीय एकता सम्मेलन के रूप में की। इसी के बाद नौवीं लोकसभा चुनाव हुए।
साधना इसका नाम है असल में साधना इसी का नाम है वह जो हमने अभ्यास कराया था शुरू में कि आपको तमीज सिखाए और तहजीब सिखाए कौन-सी? कल में इसको बताऊंगा कि पालथी मारकर बैठ। अरे तमीज से सीख। कभी ठीक काम करता है कभी अक्ल से काम करता है कभी नहीं करता है कमर ऐसी करके बैठना। हां साहब ऐसे ही करके बैठूंगा।
साधना मुचा की साधना और जीवन की साधना कि जीवन कैसे जिया जा सकता है जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है जीवन कैसे देवोपम बनाया जा सकता है, जीवन की अस्त-व्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है। जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है अगर ठीक तरीके से आप यह जान पाए तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए।
साधना के इस क्रम को आन्तरिक श्रद्धा एवं गहन निष्ठापूर्वक अपनाने वाले अनुभव करेंगे कि उसकी प्रखर उपलब्धियां विश्वात्मा के चरणों में समर्पित होने के लिए उमड़ी पड़ रही है। उनकी स्फूर्ति प्रतिभा एवं समर्थता फूटी पड़ रही है। यही नहीं अपने समर्थ व्यक्तित्व के बल पर महापरिवर्तन की इस अवधि में वे ऐसा कुछ कर दिखायेंगे जिसे युगों तक याद किया जा सकें।
साधना कि जीवन कैसे जिया जा सकता है जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है जीवन कैसे देवोपम बनाया जा सकता है, जीवन की अस्त-व्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है। जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है अगर ठीक तरीके से आप यह जान पाए तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए।
साधना में सम्मिलित होने की शीघ्रता थी।
साधना है।
साधना किसे कहते है। जैसे किसान अपने शरीर की और मिट्टी की मलाई करता है और रगड़ाई करता है। शरीर के साथ में मलाई कीजिये और आप पहलवान बन जाइये। ये तो हुई साधना शरीर की। आप अपनी अक्ल और दिमाग के साथ में मलाई कीजिए, घिसाई कीजिए और देखिए की आपका दिमाग बेअक्ल होते हुए भी आप कालीदास के तरीके से विद्वान बनते है या नहीं।
साधना वसीयत और विरासत बहुआयामी व्यक्तित्व के भी हमारे गुरुदेव लीला प्रसंग मातँलीलामुत देवदूत आया हम पहचान सकें जीवन
साधनाएं चलाया जाता चाहिए इसकी क्रमबद्ध विधि-व्यवस्था बनाकर साधकों को दी जा रही है साथ ही उनके आशा की जाती है कि वे इस विशिष्ट अवधि में ओर भविष्य में भी इसका निष्ठापूर्वक पालन करते रहेंगे।
साधना को भूलकर लोकसम्मान व यरु अर्जन हेतु मेरे चारों और भीड़ लगाते दीखते है तो मुझे बड़ा क्लेश होता है मैं तो चाहता था कि इन शक्तियों को माध्यम से संगठन का मूल ढांचा खड़ा हो किंतु अब जब संधिवेला की एक घड़ी भारी पड़ रही है तब मैं खिन्नता मन में लिए अपने इस दौरे सके लौटूंगा ताकि कुछ नवीन जो किया जाना चाहिए उस पर तुम सबसे विचार वितश्ज्ञ कर सकूं।” प्रज्ञावतार की सत्ता के मन की वेदना क्यों हो सकती थी आज हर कोई समझ सकता है आते ही परमपूज्य गुरुदेव ने दो सम्पादकीय लिखे-” क्या काफिला बिछड़ा ही जाएगा तथा मलाई को तैरकर ऊपर आने का आमन्त्रण। ये अखण्ड ज्योति की ‘अपनी से अपनी बात ‘ अंतर्गत पृष्ठ 53 से 60 तक के पृष्ठों पर अप्रैल 1982 में प्रकाशित हुए। ये वस्तुतः उनके शब्द नहीं उनके मन की पीड़ा थी महाकाल के स्तर की सत्त की अंतर्वेदना थी, जो उसमें भावों के साथ पिरोकर लिखी गयी थी। इसने अगणित पाठकों को रुलाया अंतर्मंथन हेतु उद्वेलित किया।
साधना उपासना का, स्वाध्याय-सत्संग का एकमात्र प्रयोजन इस आत्मकाल को उत्पन्न करने की, मनः स्थिति बनाना ही है। अवांछनीयताओं के अभिवर्धन का शौर्य साहस प्रदर्शन करने से आत्मबल बढ़ता है। बढ़ा हुआ आत्मबल ही वह शक्ति है,
साधना कैसे की जाती है? यह बताता हूँ आपको। असली साधना करता है किसान। किसके साथ-जमीन के साथ। जमीन के साथ में क्या काम करता है?
साधना? गले की। यह है साधना पत्थर की। ये किसकी है साधना? हर चीज की है सोने की साधना मुचा की साधना और जीवन की साधना कि जीवन कैसे जिया जा सकता है जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है जीवन कैसे देवोपम बनाया जा सकता है, जीवन की अस्त-व्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है।
साधना के मर्म के विषय में पूज्यवर की अमृतवाणी पाठकगण पढ़ चुके है। उसी का उत्तरार्द्ध यहाँ प्रस्तुत है। जहाँ तक पिछला क्रम छोड़ा था, वहाँ चर्चा मनःसंयम, मनोनिग्रह, आत्मबल-संवर्द्धन की चल रही थी।
साधना करते रहा जाए, पन्द्रह मिनट खेचरी मुद्रा, पंद्रह मिनट खेचरी मुद्रा, पन्द्रह मिनट प्रकाश का ध्यान तथा सोऽहम् साधना में लगाने से आधा घण्टा हो जाता है शेष आधा घण्टा गायत्री की पांच मालाएं पूरी करने के लिए है।
साधना और जीवन की साधना कि जीवन कैसे जिया जा सकता है जीवन कैसे उद्यमशील बनाया जा सकता है जीवन कैसे देवोपम बनाया जा सकता है, जीवन की अस्त-व्यस्तता का उदारीकरण कैसे किया जा सकता है। जीवन ठीक तरीके से कैसे जिया जा सकता है अगर ठीक तरीके से आप यह जान पाए तो बेटे आप धन्य हो सकते हैं सब कुछ बन सकते हैं। आप बाहर का ख्याल निकाल दीजिए।
साधनाएँ संपन्न की। समाधि में सतत् लीन रहकर सृष्टि के गुह्यातिगुह्य सत्यों एवं रहस्यों का साक्षात्कार किया। भगवान व्यास तो पहले भर ऋषि थे- तप, योग और ज्ञान के सतत् अभ्यासी उनकी लोकोत्तर साधना यहाँ आने के पश्चात और भी विशिष्ट और महनीय हो गयी थी। आचार्य कृप तो युद्धविद्या के आचार्य थे, कुरु राजकुमारों, पाण्डुपुत्रों को उन्होंने युद्धविद्या का प्रथम पाठ पढ़ाया था। इसका श्रीगणेश करते समय उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि भाई-भाई आपस में ही इसका प्रयोग करने लगेंगे।
साधना है कपड़े की साधना किसकी है ये धोबी की साधना है मूर्तिकारी की साधना है पत्थर का एक टुकड़ा नाचीज से छैनी और हथोड़े को लेकर में मूर्तिकार जा बैठा और घिसने लगा, ठोकने लगा, घिसने और रगड़ने लक्ष्मी की मूर्ति बन गई कि मालूम नहीं पड़ा कि यह वही पत्थर का टुकड़ा है कि लक्ष्मी जी है बेटे ये क्या है? ये साधना है और क्या है।
साधना है और क्या है।
साधना के लिए पाण्डिचेरी चले गए ताकि अपनी आध्यात्मिक शक्ति अपनी आध्यात्मिक शक्ति से भारत की राष्ट्रीय चेतना को और अधिक सक्रिय व जाग्रत सके इस प्रथम दशक में देश को कुछ स्थायी लाभ भी हुए। देश भर में 6 हजार मील लम्बी रेल लाइनें बिछायी गयी। कृषिसुधार के लिए सिंचाई आयोग का गठन हुआ और कृषि अनुसंधान के लिए पूसा इन्स्टीट्यूट बना।
साधना है। और सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन उपासना। असुरता का उन्मूलन और देवत्व का पोषण, यही धर्म-धारणा है और यही ईश्वर-आराधना। यह तथ्य यदि गहराई से समझ लिया जाए तो तत्वदर्शन के उस मूल प्रयोजन को समझा जा सकता हैं जिसके लिए आस्तिकता और धार्मिकता का विशालकाय कलेवर दूरदर्शी ऋषियों ने खड़ा किया है। आत्मिकप्रगति की दिशा में इन्हीं दो कदमों को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाते हुए सभी अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकते है।
साधना बेटे, इस चीज का नाम है, जिसमें हम अपने भीतर वाली क्षमता का, चेतना का विकास करते है। और विकसित करते हुए चले जाते है। चेतना का आप तो मूल्य भी नहीं समझते? मैं क्या करूं? चेतना का आप मूल्य भी नहीं पहचानते, आप तो बाहर ही बाहर तलाशते है।
साधना से आती है। साधना किस चीज का नाम है। साधना बेटे, इस चीज का नाम है, जिसमें हम अपने भीतर वाली क्षमता का, चेतना का विकास करते है। और विकसित करते हुए चले जाते है। चेतना का आप तो मूल्य भी नहीं समझते?
साधना में कुछ समय सास लेते समय ‘सो ओर छोड़ते समय ‘हम्’ की अनुभूति ‘ सो’ के साथ ही युगपरिवर्तन के प्रेरक - प्रवर्तक भगवान महाकाल के महाप्राण का काया के कण -कण और मन की प्रत्येक परत में प्रवेश तथा आधिपत्य की स्थापना। ‘हम ‘ के साथ लोभ मोह भरे अहंकार का पलायन। यही है संक्षेप में सोऽहम् साधना जिसको भावभरा प्रयोग हमें महाकाल के महाप्राणों से जोड़ता है और एक अद्भुत प्रत्यावर्तन प्रक्रिया साकार रूप लेती है।
साधनाभूमि है, जो मनुष्य तो दूर, गन्धर्वादि उपदेवताओं के लिए भी अगाम्य एवं अदृश्य है, उसी अलौकिक एवं अद्भुत भूमि में आज कुछ हलचल जान पड़ती थी। जहाँ अखण्ड शान्ति, नित्य घनीभूत सत्वगुण छाया रहता है। वहाँ समाधि से अचानक व्युत्थान बड़े आश्चर्य की बात थी। हजारों-हजार साल बीत गए-समूचे युग का पटाक्षेप हो चुका, ऐसा कभी यहाँ हुआ ही नहीं। प्रयत्न करने पर भी आचार्य कृप आज पुनः समाधि नहीं लग पाएं विवशतः वे अपने आसन से उठे और महर्षि व्यास से मिलने के लिए चल दिए।
साधना उपासना का प्राण है-समर्पण। बस समर्पण कर लीजिए, फिर देखिए ऐसे ही मारा-मारी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। मैं पहले ही कहे देता हूँ कि माला मत फिरा, समर्पण करना सीख। बेटा ऐसा कर, इसमें बाँस के बाँसुरी की तरह अपने को खाली कर दें। फिर देख मजा आ जायेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-August
साधनाओं की मात्रा अधिक न होने पर भी जो हस्तगत है, उससे इतना आनन्द उठाया जा सकता है, जो परिपूर्ण संतोष प्रदान कर सके। इसी तरह भौतिक विज्ञान द्वारा सुविधा साधनाओं की दिशा में निरंतर किये जा रहे अभिवृद्धि के प्रयासों से भी समुचित लाभ तभी उठाया जा सकेगा, जब भावना एवं दृष्टिकोण को ऊँचा उठा सकने में समर्थ धर्म तत्वों को समझने के लिए भी समानान्तर प्रयास किया जाये। आज जहाँ विज्ञान ने शक्ति को पदार्थ के रूप में और पदार्थ को शक्ति के रूप में परिवर्तित करके यह सिद्ध किया है कि सूक्ष्म को स्थूल में और स्थूल को सूक्ष्म में परिवर्तित किया जा सकता है, वही दर्शन और अध्यात्म हजारों वर्षों पूर्व से यह सिद्ध करता आ रहा है कि विचार को घटना के रूप में विकसित किया जा सकता है और घटनाएँ विचारों का निर्माण कर सकने में समर्थ हैं।
साधना शास्त्रों में पवित्र जीवन अग्नि के रूप में कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन किया गया है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को ऊष्ण एवं बना देती है, वैसा ही प्रकाश कुण्डलिनी जागरण का भी होता हैं
साधना सम्पत्ति होने पर भी न आनन्द मिल सकेगा और न उल्लास व संतोष। विचारणा को उत्कृष्टता के स्तर तक उठाने और सुदृढ़ बनाने में धर्म का तत्त्वज्ञान ही समर्थ हो सकता है। भौतिक विज्ञान इस प्रयोजन की पूर्ति में बहुत अधिक सहायता नहीं कर सकता।
साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।
साधना के सारे रहस्य सन्निहित हैं और उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त और सिद्ध पुरुष बन सकता है।
साधना में ध्यान का प्रमुख स्थान है। ध्यान के लिए कोई आकृति चाहिए। निराकार ब्रह्म को इसी प्रयोजन के लिए साकार रूप में प्रस्तुत किया गया है। नामों और रूपों की भिन्नता वाला देव प्रकरण साधकों की सुविधा भर के लिए है। उससे एक ब्रह्म की सत्ता को चुनौती नहीं दी जाती है और न ही बहुदेववाद का प्रतिपादन होता है।
साधना द्वारा उपलब्ध की जा सकती है, क्योंकि वस्तुतः शरीरगत ध्रुवों का ज्यों-का त्यों लेखा - जोखा ही कुण्डलिनी विज्ञान में सन्निहित है।
साधना विधियाँ सरल हैं। एक ही समय या दो पृथक-पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में सुसंतुलित चित्त से यह दोनों ध्यान चिन्तन किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अन्तर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय-परिणय होने पर जिन दिव्य-सम्पदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए, वे सहज ही करतलगत होती चली जाएँगी।
साधना के रूप में किया जाए तो वही व्यापार, नौकरी, कृषि, शिल्प, बुद्धि, श्रम आदि एक प्रकार से कर्मयोग का क्रिया कृत्य ही माना जायेगा। शरीर को यदि वासना प्रदर्शन, अहंकार, अनाचार के लिए अनीति और उच्छृंखलतापूर्वक सजाया, पोसा और बलिष्ठ बनाया जा रहा है तो उसे शरीराभ्यास के बन्धनकारक स्वार्थपरता की श्रेणी में गिना जायेगा। भोजन यदि भगवान का प्रसाद, शरीर इंजन का ईंधन, क्षुधा रोग की औषधि की तरह किया जा रहा है, तो वह परमार्थ है, किन्तु यदि चटोरेपन की लालसा से अनुपयुक्त आहार किया जा रहा है, तो वही सामान्य दीखने वाली भोजन प्रक्रिया पाप परिणाम प्रस्तुत करेगी।
साधना का तीसरा चरण है- चिन्तन। चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत का तथ्य सामने रखकर आज की समयपरक और भावपरक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात को मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है, इसलिए ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा और वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए, जीवन लाभ लेने के लिए साहस पूर्वक तत्पर होना चाहिए।
साधना बन जाती है। पिता-माता भाई-बहन आदि का भरा पूरा कुटुम्ब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बनाना एक छोटे राज्य का सुशासन चलाने के समान है। नेतृत्व, सुसंचालन सुव्यवस्था की दिशा में किसने कितनी योग्यता प्राप्त की, उसकी परीक्षा पारिवारिक जीवन में बरती गयी रीति-नीति से होती है। जो उसमें उत्तीर्ण होते हैं, उन्हें भगवान अधिक बड़े क्षेत्र का, अधिक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते हैं।
साधना के लिए शायद ही कोई तैयार हो। हर कोई शार्टकट की तलाश में रहता है। इससे वास्तविक विद्या तो नहीं, ठगी विद्या अवश्य सीखी जा सकती हैं।
साधना एवं तपश्चर्या से उन्होंने अपने को पवित्र बना लिया है। उनका मस्तिष्क महानताओं की कल्पना करता है। वे जीवन के सुदूर और श्रेष्ठ रूपों की ही कल्पना करती हैं। उनके स्वप्नों में ईश्वरीय चेतना के दिव्य संकेत की झलक मिलती है। उनके गर्भ से इसलिए एक अतिमहान एवं विशिष्ट पुत्र का जन्म होगा।
साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा-चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है, तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजाती, उड़ती और विलीन होती दीखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिन्ह माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।
साधना-भूमि होने के कारण हमारा भी विश्वास है कि हिमालय में अध्यात्म-विज्ञान की वह अदृश्य तरंगें, वह ज्ञान अब भी विद्यमान है जिसे प्राप्त कर इस भौतिक युग की सम्पूर्ण जड़वादी मान्यताओं, परम्पराओं, सिद्धान्तों को बालू की दीवार की तरह बदला जा सकता है। पुष्प घाटी ऐसे-ऐसे रहस्यों की ही पुष्टि का एक प्रमाण है।
साधना अद्वैत स्थिति का है। इनमें प्रवेश किये बिना न तो मनोलय होता है और न ईश्वरी प्राप्ति। जब तक ईश्वर से भिन्न अपनी अलग सत्ता बनी रहेगी, तब तक अपना विलय परमेश्वर में न होगा तब तक अपूर्णता का, पृथकता का अन्त न होगा। लययोग ही समाधि की, मुक्ति की परम स्थिति तक पहुँचा सकता है।
साधनाओं की दृष्टि से अब हिमालय ही एक पुण्य स्थान बचा है। वहाँ चित्ताकर्षक शान्ति है, अतुलित प्राण और सौंदर्य भरा है, उसमें। जो एक बार इस पुष्प घाटी को ही देख आता है, वह हिमालय का सौंदर्य भूलता नहीं। वह वहाँ बार-बार जाता है। पुष्पघाटी तक पहुँचने के लिए जोशीमठ पहुँचना पड़ता है।
साधना जुटाये जा सके, तो निःसंदेह सामाजिक सुव्यवस्था और राष्ट्रीय समर्पण का प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकता है। सार्वभौम और सर्वकालीन सुख शान्ति की स्थापना धर्म-धारणा को सुदृढ़ और समुन्नत बना कर ही की जा सकती है।
साधना प्राप्त होने पर भी दुर्भाग्य की जलन में झुलसते रहने के पीछे एक ही कारण ढूँढ़ा जा सकता है। कि सहज रीति -नीति को छोड़कर हम जाल-जंजाल भरी विद्रूप विडम्बनाओं में उलझ गये और अपना मार्ग स्वयं कंटकाकीर्ण बना लिया। सहज स्वाभाविकता का नाम है- ‘धर्म’ और इसके विपरीत आचरण को अधर्म कहते हैं। वैयक्तिक और सामाजिक कर्तव्यों को जो सही तरह समझता है और सही तरह पालन करता है, उसे स्वल्प साधनों में भी तुष्ट, पुष्ट और प्रगतिशील देखा जा सकेगा। धर्म की धारणा निश्चित रूप से सुख-शान्ति के प्रतिफल प्रदान करती है।
साधना का कार्यक्रम इसी प्रकार पूरा होता है। व्यक्ति का निजी स्वार्थ भी इसी में सुरक्षित है कि सबके लिये समान व्रत का पालन करे। दूसरों को धोखे में डालकर आत्म-कल्याण का मार्ग प्राप्त नहीं किया जा सकता। साथ-साथ चलकर लक्ष्य तक पहुँचने में जो सुगमता और आनन्द है, वह अकेले चलने में नहीं है। अनुशासन और नियमपूर्वक चलते रहने से समाज में एक व्यक्ति के भी हितों की रक्षा हो जाती है और दूसरों की उन्नति का मार्ग भी अवरुद्ध नहीं होता।
साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाए तो परलोक में निश्चित रूप से परमशान्ति और सद्गति ही मिलेगी।
साधना के समतुल्य है। इसमें पदार्थ सम्बन्धी खोज इतनी सूक्ष्म और गहरी होती है कि दुर्धर्ष तप स्तर के मनोयोग के बिना उस सरस्वती साधना में सफल हो पाना संदिग्ध ही बना रहता हैं। जो इसे भली-भाँति सम्पन्न कर लेते हैं, उनकी स्थिति पदार्थ में गति रखने वाले द्रष्टाओं जैसी होती है।
साधना की पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
साधनात्मक परामर्श न केवल दर्शकों को बाँधे रखता है, समूह चेतना (कलेक्टिव कांशसनेश) को जगाकर एक विलक्षण वातावरण का निर्माण करता है। व्यक्तिगत स्वाध्याय के अलावा भी सामूहिक आयोजनों की दृष्टि से प्रज्ञापुराण कथा के आयोजन बड़े उपयोगी व प्रभावी सिद्ध हुए हैं।
साधना का दूसरा नाम है। तुम मुझे रत्न परखना सिखाओ, मैं तुम्हें रत्न का निर्णय करना सिखलाऊँगा।
साधना है और निर्णय के प्रति कैसा अटल विश्वास है। शब्दों में जिस प्रकार के बलाघात का प्रयोग करती, उससे साफ प्रतीत होता है कि यह सब उसके लिए अत्यन्त मामूली बात है।
साधना के भावपक्ष के तीन चरण हैं- (१) भजन (२) मनन (चिन्तन) इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन-प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन के लिए भजन, मनन, और चिन्तन का सूक्ष्म आहार प्रस्तुत करना पड़ता है। अन्तः करण की स्वस्थता, प्रखरता परिपुष्टता एवं प्रगति इन तीनों आधारों पर ही निर्भर है।
साधना की बात हुई।
साधनाओं के लिए संध्यावन्दन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बन्धन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासना के साथ आगे-पीछे किया जा सकता है। यही बात भजन साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आग-पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए।
साधना नहीं हो सकता। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में संव्याप्त अवांछनीयता पर बलपूर्वक नियंत्रण करने में शासन की अधिकांश क्षमताएँ नष्ट होती रहती हैं, फिर भी कुछ कहने लायक समाधान नहीं मिलता। यदि धर्म-धारणा को प्रखर और समुन्नत बना सकने योग्य वातावरण उत्पन्न किया जा सके, उचित साधना जुटाये जा सके, तो निःसंदेह सामाजिक सुव्यवस्था और राष्ट्रीय समर्पण का प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकता है। सार्वभौम और सर्वकालीन सुख शान्ति की स्थापना धर्म-धारणा को सुदृढ़ और समुन्नत बना कर ही की जा सकती है।
साधना के शिक्षण का समय आयेगा तब बताएँगे कि इस दिव्य साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा-चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है, तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजाती, उड़ती और विलीन होती दीखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिन्ह माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।
साधना के संदर्भ में जब नादबिन्दु साधना के शिक्षण का समय आयेगा तब बताएँगे कि इस दिव्य साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा-चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है, तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजाती, उड़ती और विलीन होती दीखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिन्ह माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।
साधनाओं की दिशा में निरंतर किये जा रहे अभिवृद्धि के प्रयासों से भी समुचित लाभ तभी उठाया जा सकेगा, जब भावना एवं दृष्टिकोण को ऊँचा उठा सकने में समर्थ धर्म तत्वों को समझने के लिए भी समानान्तर प्रयास किया जाये। आज जहाँ विज्ञान ने शक्ति को पदार्थ के रूप में और पदार्थ को शक्ति के रूप में परिवर्तित करके यह सिद्ध किया है कि सूक्ष्म को स्थूल में और स्थूल को सूक्ष्म में परिवर्तित किया जा सकता है, वही दर्शन और अध्यात्म हजारों वर्षों पूर्व से यह सिद्ध करता आ रहा है कि विचार को घटना के रूप में विकसित किया जा सकता है और घटनाएँ विचारों का निर्माण कर सकने में समर्थ हैं।
साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आग-पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए। आँखें बन्द करके आराम कुर्सी पर पड़े हुए होना चाहिए। यह सोचना चाहिए कि शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा।
साधना में सफल हो पाना संदिग्ध ही बना रहता हैं। जो इसे भली-भाँति सम्पन्न कर लेते हैं, उनकी स्थिति पदार्थ में गति रखने वाले द्रष्टाओं जैसी होती है।
साधना कुछ ऐसा अनुदान विश्वमानव के सम्मुख प्रस्तुत करेगी, जो इसके भाग्य और भविष्य की दिशा मोड़ दे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-December
साधना में जो उच्चस्तरीय उल्लास उपलब्ध होता है, उसे ‘काम’ तत्व की परिष्कृत भाव भूमिका कह सकते है। चिंतन की दिशा-धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी- नाले के माध्यम से बाँध बनाकर संग्रह किया जाए और नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुँचाया जाए तो इससे हर प्रकार लाभ-ही-लाभ है। अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है।
साधना करते हुए कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वार्थ-सुविधा में कटौती करके ही परमार्थ की दिशा में कुछ किया जा सकता है। मोटेतौर पर यह घाटे का सौदा है। अभ्यस्त प्रवृत्तियों के विपरीत पड़ने के कारण इसमें कष्ट भी अनुभव होता है। इन कठिनाइयों को पार करने के लिए शरीर की तितिक्षा का, मन की सादगी का तथा इस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने योग्य आन्तरिक साहसिकता का सहारा लेना पड़ता है।
साधना से बन्धनमुक्त हुई आत्माओं की प्रत्येक विचारणा और प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती-छलकती दिखाई पड़ती है। ऐसे लोग अभावग्रस्त और संकटग्रस्त हो सकते हैं, पर अन्तःकरण में उन्हें असीम आनन्द और सन्तोष की अनुभूति हर घड़ी होती रहती है।
साधना के द्वारा अपनी सूक्ष्म सत्ता में प्राणतत्त्व को इच्छित मात्रा में धारण करके अपना चेतना पक्ष बलिष्ठ बनाया जा सकता है। इससे शरीर की भी शोभा-समर्थता बढ़ती है।
साधनात्मक कर्मकाण्ड आते हैं। जप-ध्यान प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरुष चरण आदि अनेकों सम्प्रदायों में प्रचलित अनेकों विधि-विधान इसी उपासना वर्ग में आते हैं।
साधना-प्रयोग का खाद-पानी न मिलने के कारण अपनी उर्वरता गँवा बैठी है और मरुस्थल जैसा अनगढ़ और श्मशान जैसा वीभत्स बन कर रह रही है।
साधना के साथ ही ज्ञानयोग की साधना भी जुड़ी है। उस हेतु मन में उत्कृष्ट विचारों का अनवरत समावेश आवश्यक है। प्रेरक स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं किस्से-कहानी जैसी किताबों का पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्यकर्म मानकर किया ही जाना चाहिए।
साधना वाले स्वरूप से दर्शाया। इस भक्ति का चौथा चरण है- संतपुरुषों के आचरण में लगे रहना-संतपुरुषों के आचरण में लगे रहना-संतपुरुषों में क्रोध नहीं होता, वे सदैव क्षमाशील होते हैं। हम यदि ये दोनों गुण अपना लें-तो संतों का आचरण हमें भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुँचा सकता है।
साधना की है, तो जीवन की मार्मिक संधियों में जीवनसत्ता को उत्तरोत्तर निर्मल एवं जाग्रत करती है। अध्यात्म साधना अपनी संस्कृति की सर्वप्रधान विशेषता है इसलिए शास्त्रकार ऋषियों ने अपने सम्पूर्ण शास्त्रों और संस्थाओं को आत्मा के रंग में रंग डाला है। संस्कारमय जीवन आध्यात्मिक साधना की दृढ़ भूमिका है। संस्कारों के द्वारा आध्यात्मिक जीवन का क्रमशः विकास होता है। संस्कारवान व्यक्ति अनुभव करता है कि उसका सारा जीवन एक महान यज्ञ है और जीवन की प्रत्येक भौतिक क्रिया का सम्बन्ध आध्यात्मिक तत्व से हैं।
साधना को गति देंगे-हमें भवबंधन से मल्लाह की भाँति पार करा जीवनमुक्त बनाएँगे-यह विश्वास हमें रखना ही चाहिए।
साधना को ही सामूहिक स्तर पर सम्पन्न होने की झलक दिखाते हैं।
साधना में निरत जाग्रत आत्मा संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि को लाँघ जाती है। वह सबको अपने में और अपने को सबमें देखती है। इसलिए उसके सामने व्यक्तिवादी आपाधापी फटकने नहीं पाती। उसके चिन्तन एवं कर्तृत्व में व्यापक लोकहित की भावना काम करती है। कहना न होगा कि ज्ञानसाधना से बन्धनमुक्त हुई आत्माओं की प्रत्येक विचारणा और प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती-छलकती दिखाई पड़ती है।
साधना प्रयोजनों को एकाग्रता की नहीं वरन् व्याकुलता की सिद्धि थी। लक्ष्य के प्रति व्याकुलता का भी उतना ही मूल्य है, जितना एकाग्रता का। स्वामी विवेकानन्द से किसी ने पूछा कि ईश्वर-प्राप्ति की सम्भावना किस स्तर की मनोभूमि में होती है? इसका उत्तर देने के लिए उन्होंने बात को फिर कभी के लिए टाल दिया। एक दिन वे उस प्रश्नकर्ता को अपने साथ नदी स्नान के लिए ले गए।
साधना का महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिन्होंने एक दिव्य वातावरण बना दिया था।
साधना के भवबंधन पाकर पूर्णता के लक्ष्य तक की यात्रा सरल होती चली जाती है। गुरु-निष्ठा का एक जीता -जागता उदाहरण सिख धर्म की गुरु-शिष्यपरम्परा है, जिसमें सद्गुरु को उनके निर्देशों को गुरुग्रंथ साहिब को ही सब कुछ मानकर उनके प्रति सारा समर्पण किया जाता है।
साधना मितव्ययिता की, सादगी की गरीबी की करनी चाहिए। इस अभ्यास से ही उसकी परिस्थितियाँ ऐसी रह सकेंगी, जिनमें तपस्वी जीवन की रीति-नीति का निर्वाह सम्भव हो सके और उसको बिना अनीति उपार्जन की अपेक्षा किए, सत्कर्मों के लिए आवश्यक खर्च में बिना कृपणता बरते, बड़ी सरलता और प्रसन्नता के साथ अपना ढर्रा चलाते रह सकना सम्भव हो जाए। तपश्चर्या के विविध अभ्यास इस प्रमुख प्रयोजन को भली प्रकार पूरा कर सकने की सफलता प्रदान करते हैं।
साधनाएँ प्रकृतिपरक हैं, इसलिए आत्मपक्षी हैं। यह देह ही इनकी प्रयोगशाला है। इस देह-यंत्र की तांत्रिक व्यवस्था को समझने पर समष्टि पर नियंत्रण की एवं स्थूल को इच्छानुसार बनाने की प्रभुता हमें प्राप्त ही जाती है। विज्ञान को इस यथार्थ पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि क्रिया में कोई अन्तर नहीं, अन्तर है उपादानों की दृष्टि में। अणु ऊर्जा को प्रयोग में लाने के लिए व्यापक सरंजाम जुटाने पड़ते हैं।
साधनाक्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना पूरा ध्यान शरीर पर जमाता है, वहीं राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्यपद्धतियाँ प्राणिजगत में परिवर्तन व रूपान्तरण का रुख अपनाती है, किन्तु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, वे शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती हैं।
साधना’ है। साधना से ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। यह बात ठीक तरह से समझ लेनी चाहिए कि उपासना शुरुआती शिक्षा है और साधना उच्चस्तरीय प्रशिक्षण। भजन-पूजन से मन की प्रवृत्ति माया से ब्रह्म की ओर मुड़ जाती है। ईश्वर के स्मरण और सान्निध्य की उपयोगिता प्रतीत होती है।
साधना वह है, जिससे अपने भीतर पड़े शक्ति के भाण्डागार को जाग्रत किया जा सके। कुण्डलिनी के रूप में यह महाशक्ति हर मनुष्य के रूप में सुप्तावस्था में पड़ी रहती है परन्तु प्राण-साधना के अभाव में इसके विशेष लाभ नहीं उठाए जा पाते। कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणशक्ति का प्रचण्ड आघात आवश्यक होता है। शरीर में विद्यमान प्राण की मात्रा से इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं हो पाती। निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राणतत्त्व को आकर्षित करना तथा अपने भीतर भरना पड़ता है।
साधनात्मक पुरुषार्थ सामूहिक स्तर पर तीव्र होगा तो ही उन दैवी-प्रकोपों से वह मानवमात्र की रक्षा कर सकेगा, जो आने वाली अवधि में अपेक्षित है। यह चर्चा उस युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण के सदी में की जा रही है, जिसमें देवात्मशक्ति-कुण्डलिनी शक्ति के विश्वस्तर पर जागरण की प्रक्रिया संपन्न करने का पुरुषार्थ संपन्न होने जा रहा है। साधनावर्ष जो वसंत पंचमी सन् १९९९ (२२ जनवरी) से वसंत पंचमी सन् २००० (१० फरवरी) तक सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है, इस महापुरश्चरण का अंतिम तीव्र वेग वाला चरा है, जिसका समापन नवयुग के आगमन की वेला में महापूर्णाहुति के साथ होगा।
साधना के प्रति आक्रोश ही पैदा करता है। इन सारी वजहों के कारण सभी संस्कारों के साथ जुड़े कर्मकाण्डों में युगानुकूल संशोधन भी जरूरी था। उनके साथ जुड़ी शिक्षाओं को सुगम भाषा में समझाए जाने की आवश्यकता भी थी तथा भाव-संवेदनापरक माहौल उभारने के लिए उस स्तर के पुरोहितों के उत्पादन का तंत्र भी अनिवार्य थी। इस सबके समाधान हेतु परमपूज्य गुरुदेव ने संस्कार साधना सम्पन्न करने वालों के शिक्षण हेतु व्यापक प्रक्रिया विकसित की और संस्कारों को साधना का गरिमामय स्वरूप प्रदान किया।
साधना की महिमा-माहात्म्य अध्यात्म शास्त्रों में भरा पड़ा है। तप के प्रताप से देवशक्तियों के द्रवित होने और अभीष्ट वरदान प्रदान करने के कितने ही पौराणिक उपाख्यान पढ़ने और सुनने को मिलते हैं। तपस्वी का सम्मान करने के लिए हमारी सहज श्रद्धा उमड़ती है। जहाँ दूसरे लोग सुख-सुविधाओं का तनिक भी त्याग नहीं कर सकते, वहाँ तपस्वी इन कष्टसाध्य क्रिया-कलापों को खुशी-खुशी अपना लेता है। उसमें संकल्पशक्ति की प्रखरता स्पष्ट है।
साधना की दृढ़ भूमिका है। संस्कारों के द्वारा आध्यात्मिक जीवन का क्रमशः विकास होता है। संस्कारवान व्यक्ति अनुभव करता है कि उसका सारा जीवन एक महान यज्ञ है और जीवन की प्रत्येक भौतिक क्रिया का सम्बन्ध आध्यात्मिक तत्व से हैं। संस्कारों के द्वारा ही कर्म प्रधान सांसारिक जीवन का मेल आध्यात्मिक अनुभव से होता है। इस प्रकार संस्कारवान जीवन से शरीर और उसकी विविध क्रियाएँ पूर्णता की प्राप्ति में बाधक न होकर साधक होती हैं।
साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है। साधना के दो वर्ग हैं- (१) एक विशिष्ट लोगों की-विशिष्ट प्रयोजन के लिए विनिर्मित प्रक्रिया (२) सर्वसाधारण के लिए सहज, सुगम, सौम्य पद्धति। विशिष्ट प्रक्रिया योगी- यती, एकान्तवासी, सांसारिक उत्तर-दायित्वों से निवृत्त असाधारण मनोबल सम्पन्न, कठोर तपश्चर्या के लिए समुद्यत लोगों के लिए है। हठयोग, षट्चक्र-बेधन कुण्डलिनी जागरण, तन्त्र-योग प्राणयोग आदि साधनाएँ इसी प्रकार की है पर यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। भूल होने पर इस राह में खतरे-ही-खतरे हैं।
साधना प्रवृत्ति और निवृत्तिपरक होने के नाते व्यक्ति और समाज दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। संग में विस्तार है और विस्तार की अपनी आवश्यकताएँ हैं, इसलिए तंत्र प्रवृत्तिपरक है किन्तु उस प्रवृत्ति मूल में वह एकत्व को ढूँढ़ता है, इसलिए निवृत्ति उसका चरम है।
साधना प्रणालियों का अन्वेषण, कर विभिन्न विचारकों, महापुरुषों, श्रेष्ठतम योगियों की दृष्टि एक ही बिन्दु पर टिकती है और वह बिन्दु है-सेवा व्यक्ति विशेष की नहीं समाज की-अथवा यों कहें समाज के रूप में विराट पुरुष की। आधुनिक समय में जबकि समाजसेवा एक फैशन के रूप में उभर चुकी है, अनेकों संस्थाएँ यम हो चुकी हैं। ऐसी स्थिति में आध्यात्मिकता का भाव कुछ विचित्र-सा लगता है, क्योंकि इससे यदि आध्यात्मिकता उभरती होती तो समाज-सेवियों की संख्या के अनुरूप साधकों और योगियों की बाढ़ आयी होती, पर स्थिति ऐसी नहीं है।
साधना है। इसकी अनेकों प्रणालियाँ अनेकों स्थानों पर प्रचलित हैं। विभिन्न मत-पंथ अपने अनुरूप इसका विशिष्ट महत्व घोषित करते हैं। सभी का अपना महत्व भी है, पर समग्रता की दृष्टि से विवेचना-विश्लेषण करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः करने पर इनमें से ज्यादातर को प्रायः एकाँगी मानना पड़ता है। समूची मानव प्रकृति को रूपान्तरित कर सके, ऐसी प्रणाली ढूँढ़ने पर शायद ही एक-आध मिले।
साधना और कितने परीक्षण किए थे, इसका ठीक-ठीक अनुमान भी लगा सकना हमारे लिए असम्भवप्राय है। उन्होंने पशुओं और पक्षियों की देह रचना का, उनकी चेष्टाओं और देहगत भिन्नताओं का सूक्ष्म निरीक्षण करके प्रकृति के ग्रह पक्ष को, उसकी कार्यप्रणाली के रहस्य को समझा था। किसी पशु के पेशाब में क्या गुण है, किसी पक्षी की जीभ में क्या विशेषता हैं, किसी जीव के रोम अथवा पंखों में क्या प्राकृतिक विचित्रता है और उनका उपयोग किस काम के लिए, किस तरह से किया जा सकता है, ये सारे निष्कर्ष तंत्र साधना को व्यावहारिक विस्तार देते हैं।
साधनापद्धति में प्रवेश नहीं देते। प्रवेश के बाद शुरू होता है, साधनाक्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना पूरा ध्यान शरीर पर जमाता है, वहीं राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्यपद्धतियाँ प्राणिजगत में परिवर्तन व रूपान्तरण का रुख अपनाती है, किन्तु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, वे शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती हैं।
साधना भी व्यक्ति की क्षुद्रता एवं पाशविक बन्धन-शीलता पर विजय जाने का मंत्र देती है और आश्चर्य यह कि यहाँ विकृतिमय संसार में विकृतियाँ ही चिकित्सक बनती हैं। आप काम के रजोगुणी आवेश से ग्रस्त हैं, तो उसके लिए दूसरा पक्ष भी काम की उत्तेजना से प्रेरित होकर आपको शान्त कर सकेगा। रावण के क्रोधमत् रूप का उपचार राम के रौद्ररूप से ही सका। यह विकृतियों का गणित था, प्रकृति का इससे भिन्न है और ये प्रकृति व विकृति मिलकर ही सम्पूर्ण बनती हैं।
साधना में वह पुरातन प्रचलन है, पर देव वर्ग में से किसी को चुनने से पूर्व यह निरख-परख लेना चाहिए कि उपास्य की प्रकृति क्या है? अनेक देवी देवता तमोगुणी भी हैं। उनका स्वभाव व्यवहार, प्रयास चरित्र जैसे पक्षों में अनैतिकता की भरमार होती है। इसमें से कई मांसभोजी, मद्यपान, आक्रमणकारी और युद्धप्रिय होते हैं। उनकी उपासना साधक में उन्हीं दुर्गुणों का आविर्भाव करेगी।
साधना की सामान्य विधियाँ प्राणायाम के रूप में जन-सामान्य में प्रचलित हैं। अनेकों इसे करना भी जानते हैं, परन्तु यथार्थ में प्राण-साधना प्राणायाम की क्रिया के अलावा भी और कुछ है। इच्छा, भावना, संकल्प की विशेषताएँ जुड़ जाने से ही इसका यथार्थ मूल्य और महत्व प्रकट होता है। वैसे भी सामान्य क्रियाएँ भावना जुड़ जाने से समर्थ परिणाम प्रस्तुत करती हैं। जबकि भावनाविहीन होने पर इनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने-न होने के रूप में समझा जा सकता है।
साधना से अनुभव होने वाली एकता के साथ यह भी सत्य उजागर होता है कि अंशी के सारे गुण सूक्ष्म रूप से अंश में विराजमान रहते हैं। अतएव परमात्मा की समस्त विशेषताएँ तथा सम्भावनाएँ आत्मा में विद्यमान हैं और उन्हें विकसित करने के साधन जुटाकर उच्चतम स्तर तक पहुँचाया जा सकता है।
साधना का सर्वांगीण स्वरूप समझने में सुविधा हो। युग-परिवर्तन की, नवनिर्माण की प्रक्रिया उन्हीं व्यक्तियों के द्वारा सम्पन्न होगी, जिनमें देवत्व का प्रकाश समुचित मात्रा में प्रखर हो चला है। तथाकथित लेखक, वक्ता, नेता, अभिनेता, आन्दोलनकारी, प्रतिभावान व्यक्ति अपने साधनों के आधार पर कुछ समय के लिए चमत्कार जैसा जादू खड़ा कर सकते हैं, पर उनमें स्थिरता तनिक भी न होगी। बालू की दीवार की तरह उनकी कृतियाँ देखते-देखते धूल-धूसरित हो जाती हैं और जिनका आज जयघोष था, कल उनके अस्तित्व का पता लगाना भी कठिन हो जाता है। स्थिरता तो सच्चाई और आत्मबल की गहराई में सन्निहित है।
साधना के प्रभाव से (१) अणिमा, (२) लघिमा, (३) महिमा, (४) गरिमा, (५) प्राप्ति, (६) प्रकाम्य, (७) वशित्व, (८) ईशित्व- जैसी अलौकिक सिद्धियों के मिलने का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। ये सिद्धियाँ पढ़ने-सुनने में अतिरंजित लगती है, परन्तु इनके पीछे एक सुनिश्चित विज्ञान निहित है। सुनिश्चित वैज्ञानिक कारणों से अतिरंजित लगने वाली ये सिद्धियाँ सहज उपलब्ध हो जाती है। दूसरे शब्दों में इन्हें मनुष्य की चेतना-क्षमता का भौतिक वस्तुओं पर नियंत्रण भी कहा जा सकता है।
साधना का सही तात्पर्य यही है-अपना दायरा बड़ा करना। अर्थात् लोभ-मोह स्वार्थपरता के भवबन्धनों को शिथिल करते हुए समष्टि के साथ अपने आपको जोड़ना। उस दृष्टिकोण को अपनाने पर वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना उमंगती है और उसी के साथ जुड़ने को जी मचलता है। दूसरों के दुःख बाँटने, अपना सुख बाँटने का आत्मभाव जब विकसित -विस्तृत होगा, तो उसका उपयोग लोकमंगल के कार्यों के लिए समयदान, अंशदान के रूप में प्रस्तुत किए बिना बिना चैन पड़ेगा ही नहीं।
साधना कहा गया है। यह आसक्त प्रधान होने से उसी स्तर की है, जो सहगामी विकृतियों से उबार सके। दल-दल में फँसे हाथी को प्रशिक्षित हाथी ही जंजीर से जकड़कर किनारे तक घसीट जलाने में सफल होते है। लाठी को रोकने के लिए लाठी और घूँसे की प्रत्युत्तर घूँसे से देने पर ही काम बन पड़ता है। मानवीय आसक्ति संसाधन के अवांछनीयता से विरत करके उसे शालीनता का पक्षधर बनाने के लिए आध्यात्मिक साधना की प्रयोग-प्रक्रिया का अवलम्बन ही एकमात्र उपाय है।
साधना है। उसके साथ मायाजाल की तरह गुँथ गई निकृष्टता के प्रति तो तिरस्कार का भाव रखना ही है। स्मरण रहे, दुष्प्रवृत्तियाँ बिना संघर्ष के हटती नहीं है। इसके लिए तप-तितिक्षा संयम-साधना और परमार्थ-परायणता के त्रिविध अभ्यास भी अनिवार्य रूप से करने होते है।
साधना के अंतर्गत आते हैं। वास्तविकता यह है कि तंत्र-साधना का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि उसमें कुछ भी छूटा नहीं हैं। सारा स्थूल और ज्ञानेन वचसा अगम्य महाकाल भी इसी तंत्र-साधना के विस्तार में आते हैं। तंत्र-साधना के द्वारा परकाया प्रवेश, अणिमा आदि सिद्धियाँ, कायाकल्प आदि सब कुछ सम्भव है। सत्य तो यह है कि साधना है ही असम्भव को सम्भव बनाने वाला विज्ञान, परन्तु इसको करने के लिए आवश्यक पात्रता चाहिए।
साधना का विकास न हो तो उन्नति का मूल उद्देश्य नष्ट होकर दुर्भावनाओं का विकास होने लगेगा। साधन तो होंगे, पर लोग सुखी न होंगे।
साधना में अक्सर ऐसी ही भूल की जाती है। यह भुला दिया जाता है कि इन प्रयोजनों का आविष्कार-आविर्भाव किस निमित्त किया गया है और उसका कितना उपयोग, किस दृष्टिकोण से करने पर कितना लाभ हो सकता है? यह समस्त पृष्ठभूमि ध्यान में रखते हुए ही यदि तप-साधना का अवलम्बन किया जाय तो ही वे लाभ मिल सकेंगे- जिनका वर्णन तप-साधना के महात्म्य प्रकरण में बताया गया है।
साधना करनी पड़ती है। शब्द में अन्तर्हित शक्ति के बीज, न्यूक्लियस का विखण्डन करने के लिए उसे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर एवं शुद्ध अवस्था में लाने के लिए जप करना होता है। इस जप से हमारा अन्तःशरीर शक्ति के प्रबल आवेश को सहन करने की क्षमता प्राप्त करना है और मंत्र की नाभिकीय शक्ति प्रकट होने की योग्यता मिलती है।
साधना के माध्यम से अगले दिनों संपन्न होना हैं
साधना में महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस एवं अरविन्द की साधना का महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिन्होंने एक दिव्य वातावरण बना दिया था।
साधना के क्षेत्र में प्रगति अकल्पनीय है, हमें विश्वास रख, अपना विश्वास प्रतिक्षण दृढ़ बनाते चल युगधर्म को अंगीकार कर इस युगपरिवर्तन की वेला में शिष्यीव से जुट जाना चाहिए। वे हमारी साधना को गति देंगे-हमें भवबंधन से मल्लाह की भाँति पार करा जीवनमुक्त बनाएँगे-यह विश्वास हमें रखना ही चाहिए।
साधना बिना दैवी-अनुग्रह एवं परम लक्ष्य की प्राप्ति होती नहीं।
साधना का मूलभूत उद्देश्य है। साधना के तत्त्वदर्शन को और भी अधिक बारीकी से समझना हो तो इसे चार बिन्दुओं में स्पष्ट करना पड़ेगा- (१) आत्मज्ञान (२) ब्रह्मज्ञान (३) तत्त्वज्ञान, (४) सद्ज्ञान। आत्मज्ञान वह है जिस में जीव का, जीवन का, अन्तः चेतना के उत्थान-पतन का निरूपण किया जाता है और आत्मा-चिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का सूक्ष्मदृष्टि से प्रकाश-युक्त मार्गदर्शन किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इसे जीवात्मा की विवेचना कह सकते हैं।
साधना-विज्ञान का दूसरा पक्ष क्रियापरक है- इसे ‘तप’ कहते हैं। आत्मकल्याण इसका एक चरण है और लोककल्याण दूसरा। इन दोनों के लिए जो कोशिशें करनी पड़ती हैं, उनसे अभ्यस्त पशु-प्रवृत्तियों को चोट पहुँचती है। स्वार्थ-साधनों में कभी आती है और परमार्थ प्रयोजनों की सेवा-साधना करते हुए कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वार्थ-सुविधा में कटौती करके ही परमार्थ की दिशा में कुछ किया जा सकता है।
साधना में गिना जाता है। जो इन उपचारों को क्रियान्वित करते हैं। तपस्वी कहलाते हैं। तप-साधना की महिमा-माहात्म्य अध्यात्म शास्त्रों में भरा पड़ा है। तप के प्रताप से देवशक्तियों के द्रवित होने और अभीष्ट वरदान प्रदान करने के कितने ही पौराणिक उपाख्यान पढ़ने और सुनने को मिलते हैं।
साधना में निरत है, वहीं चिरकाल तक आनन्द पाता है।
साधना जब सिद्धिदात्री बन जाए तो फिर चाहिए क्या एवं यह भक्तियोग के समर्पण वाले, विसर्जन वाले मार्ग पर चलकर प्राप्त करना अत्यन्त सरल है। प्रीति करें तो कैसे? प्रीति होती उससे है, जिसके हम पास रहते हैं- जिसकी हमें हर पल याद बनी रहती है। लौकिक दृष्टि से दो पड़ोसी भी एक साथ रहते हैं, तो लगाव पैदा हो जाता है-आपस में प्रीति भरे संबंध बन जाते हैं। प्रभु के पास रहना आध्यात्मिक दृष्टि से संतों की भाषा में ‘सुमिरन’ (स्मरण) द्वारा संभव है।
साधना से विरत होते चले गए। स्थिति से विरत होते चले गए। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची कि बीते वर्षों में हमने एक अन्धी सुरंग तैयार की ली और जितने रोशनदान थे, वे भी अब बन्द हो चुके हैं। यह किसी तरह की हताशा नहीं, एक जायजा है। हम लगातार चरित्रहीनता एवं अधः पतन की अँधेरी सुरंग से गुजर रहे हैं।
साधना की कठिन परिस्थिति को पार करके मिल सकता था, उतना लाभ इस विशिष्ट अवसर पर मिलने वाला है। इसे दैवी अनुदान कहा जा सकता है। इन दिनों युगसंधि की इस उपासना के माध्यम से उच्चस्तरीय अनुदान वितरण ऋतम्भरा-प्रज्ञा द्वारा किया जा रहा है। जिस प्रकार दुर्भिक्ष आदि संकटकालीन परिस्थितियों में सरकार कुआँ खोदने, उद्योग खड़ा करने, नहर बनाने जैसे कामों के लिए विशेष रूप से धन-राशि देती है, उसी प्रकार इन दिनों ऐसे असंख्य संस्कारवान आत्माओं को दिव्य अनुदान मिलने वाला है, किसी जमाने में राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी के सहयोगियों को प्राप्त हुआ था।
साधना का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान-साधना ही कहा जा सकता है।
साधना से ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। यह बात ठीक तरह से समझ लेनी चाहिए कि उपासना शुरुआती शिक्षा है और साधना उच्चस्तरीय प्रशिक्षण। भजन-पूजन से मन की प्रवृत्ति माया से ब्रह्म की ओर मुड़ जाती है। ईश्वर के स्मरण और सान्निध्य की उपयोगिता प्रतीत होती है। आत्मकल्याण का मार्ग मिलता है।
साधना का उद्देश्य है। इस मार्ग पर जितना आगे बढ़ा जाता है, उतनी ही आन्तरिक पवित्रता निखरती है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्यदर्शन होता है।
साधना का प्रतिफल सर्वथा असंदिग्ध है। दुःख इसी बात का है कि जीवन-साधना का महत्व समझा ही नहीं गया ओर ऋद्धि-सिद्धियों से सुसम्पन्न बनाने की ओर ध्यान गया ही नहीं अन्यथा स्थिति वैसी न होती, जैसी कि सामने है।
साधना के द्वारा देवता के प्रति प्रगाढ़ विश्वास व अर्थ के ध्यान को साथ जप द्वारा ब्रह्माण्ड में एक अनूठा वाद्यमण्डल-इलेक्ट्रॉनिक नाद उत्पन्न होता है। गायत्री मंत्र पर यह सिद्धान्त ऐसा सटीक बैठता है कि इसके परिणाम कभी असंदिग्ध नहीं रहते। साधना महासमर भावविह्वल होकर किये गये सुनिश्चित विधि- विधानपूर्वक गायत्री जप-अनुष्ठान द्वारा जीता जा सकता है एवं भावी विषम संभावनाओं को निरस्त किया जा सकता हैं, यह विश्वास रखकर हर साधक को बिना प्रभाव के इसमें जुटे रहना ही चाहिए।
साधना हो सकती है। जपकाल में इष्ट की छवि को अन्तरात्मा के साथ अपनी आत्मा का समर्पण-विलय अनुभव करते रहने से भी यही परिणाम उपलब्ध किया जा सकता है।
साधना प्रधान प्रयासों में अभी से जुट जाना चाहिए। समय की गति को देखते हुए ये प्रयास अत्यधिक तीव्र गति से बड़े व्यापक स्तर पर होने चाहिए, तभी यह दार्शनिक क्रान्ति -वैचारिक क्राँति -विश्व के भावनात्मक कायाकल्प की भूमिका संपादित कर पाएगी। साधनात्मक पुरुषार्थ सामूहिक स्तर पर तीव्र होगा तो ही उन दैवी-प्रकोपों से वह मानवमात्र की रक्षा कर सकेगा, जो आने वाली अवधि में अपेक्षित है। यह चर्चा उस युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण के सदी में की जा रही है, जिसमें देवात्मशक्ति-कुण्डलिनी शक्ति के विश्वस्तर पर जागरण की प्रक्रिया संपन्न करने का पुरुषार्थ संपन्न होने जा रहा है। साधनावर्ष जो वसंत पंचमी सन् १९९९ (२२ जनवरी) से वसंत पंचमी सन् २००० (१० फरवरी) तक सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है, इस महापुरश्चरण का अंतिम तीव्र वेग वाला चरा है, जिसका समापन नवयुग के आगमन की वेला में महापूर्णाहुति के साथ होगा।
साधना से विमुख होते चले गए। द्वेष, फूट, कलह का तन्तुजाल बुनता चला गया, परिस्थितियों के विपक्ष और विदेशी प्रभाव के कारण ऐसा करने को हम मजबूर हुए हैं। आज बात-बात पर भाषावाद, जातिभेद, प्रान्तवाद के नाम पर हम सभी लड़ने-झगड़ने लगते हैं। पारस्परिक सद्भाव एवं प्रेम की शिक्षा देने वाले धर्म को भी दुर्भाव एवं वैर के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है। क्या इससे कोई राष्ट्रीय समस्या हल हो सकती है।
साधना का फल प्रदान करेगा। फिर रात्रि में शयन पूर्व बिस्तर पर पहुँचते ही दिन की गतिविधियों का लेखा-जोखा कर सफलताओं के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना तथा भूलों के लिए सच्चे पश्चात्ताप के साथ क्षमा-प्रार्थना कर, पूर्ण निश्चिन्तता के साथ शान्तिपूर्वक निद्रा देवी की गोद में सो जाना।
साधनात्मक तत्त्वदर्शन के उपर्युक्त चार और तीन कुल मिलाकर सात सोपान हैं। विभिन्न अलंकारों के साथ इन्हीं सात तथ्यों को मनीषियों ने विभिन्न प्रतिपादनों के साथ प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया है। साधना के तत्त्वदर्शन को समझने के लिए अनेकानेक शास्त्र पढ़ने को और विद्वानों के प्रवचन-प्रतिपादन सुनने को मिलते हैं। उनमें इन सात महातथ्यों के अलावा और कुछ नहीं है। यदि इस तत्त्वदर्शन को सही रीति से समझा, अपनाया और आत्मसात् किया जा सके तो साधनात्मक उपलब्धियों का अर्जन अपने जीवन का अनिवार्य प्रसंग बने बिना नहीं रहेगा।
साधनाओं, तांत्रिक साधनाओं, ज्ञानमार्ग के ग्रन्थों रो अधिक भक्तियोग को महत्व दिया गया है। भक्ति का अर्थ है-सत्य को बुद्धि से नहीं हृदय से पाइए। विचारों से नहीं भाव से पाइए। चिन्तन से नहीं प्रेम से पाइए। भक्ति-सिद्धि में आक्रामक चित्त-ईर्ष्यालु मन एक बाधा को समान है।
साधना से विरत रहने पर काई अभाव-दारिद्र से, पतन-पराभव से घिरा पड़ा रहे तो इसके लिए अन्य किसी को दोष कैसे दिया जाय? जीवन की अवहेलना से बढ़कर पाप इस संसार में और कोई नहीं। अन्य पापों से कर्ता को तत्काल लाभ तो मिल ही जाता है, पर जीवन की उपेक्षा का पातक ऐसा है, जिसमें आरम्भ से अन्त तक नरक भोगना पड़ता है। भाग्योदय का एक ही चिन्ह है कि जीवन के साथ जुड़ी हुई महान सम्भावनाओं को समझा जाए और उसे कषाय-कल्मषों के गर्त से उबारकर परिशोधन-परिष्कार किया जाय।
साधना-पद्धति का मार्ग सर्वसाधारण के लिए सुगम है। आजीविका-उपार्जन तथा सामान्य गृहस्थ जीवनयापन करते हुए इस साधनाक्रम को अपनाया जा सकता है।
साधना का ज्ञान मार्ग है। जिसे आत्मपक्ष कहा जाता है।
साधनाएँ की हैं और उसकी सिद्धियों का अनुभव पाया हैं, वे जानते हैं कि वर्तमान का रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान कितना भी अभिमान करें किन्तु वह प्राचीन तंत्र विद्या से बहुत-बहुत पीछे हैं। इसके अतिरिक्त एक आपत्तिजनक तथ्य यह भी है कि इस विज्ञान में और आविष्कार पद्धति में आगे चलकर मनुष्य गौण ही नहीं, तिरोहित हो जाता है, इसलिए सारा संसार निष्प्राण हो जाता है। जबकि मनुष्य की महिमा सर्वोपरि है, उसकी उपस्थिति एक आश्वस्ति है किन्तु वैज्ञानिक विकास की विडम्बना यह है कि उसने मानव को अनुपस्थित करके उसका अभीष्ट साधन करने की स्वचालित एवं जड़ प्रक्रिया का विस्तार कर डाला है। परिणाम यह है कि व्यक्ति आत्मविमुख हो गया है। उसकी उपलब्धियाँ।
साधना के द्वारा जीवसत्ता के मानवगर्भ में आते ही उस पर छाए मलिनता कषाय-कल्मषों को हटा दिया जाए और उसे ऐसा शिक्षण दिया जाए और उसे ऐसा शिक्षण दिया जाए, जिससे कि वह अपने खोए स्वरूप को पुनः पा सके। ऋषिगणों ने मानवजीवन को आत्मा की विराट यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना वह गहन समीक्षा कर गर्भ में आने को लेकर चिता में समर्पण तथा उसके बाद भी मरणोत्तर विराम तक महत्वपूर्ण मोड़ों पर जीवात्मा को सँभालने-सँवारने की व्यवस्था की है।
साधना विज्ञान में योग’ नाम दिया गया है। ‘योग’ का अर्थ है- जोड़ा देना। किसी किससे जोड़ देना- आत्मा को परमात्मा से जाड़ देना। यह स्मरण रखने योग्य तथ्य है कि परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं, वरन् सर्वव्यापी अलौकिक चेतना है। उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं, आकांक्षाओं के रूप में उसकी अनुभूति, अपने विचार संस्थान में की जा सकती है।
साधना की आवश्यकता पड़ती है।
साधना के ब्रह्मास्त्र संभव हैं अब यह व्यक्ति ही नहीं, सामाजिक आवश्यकता भी बन गयी। इसी कारण सारे भारतवर्ष के चप्पे-चप्पे में, विश्व के कोने-कोने में अखण्ड जप-साधना के, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के ऐसे आयोजन संपन्न होने जा रहे है, जिनसे अभूतपूर्व शक्ति का उपार्जन होगा। इससे जो सुरक्षाकवच विनिर्मित होगा, वह निश्चित ही अंतर्ग्रही प्रभावों ग्रहों की युति के कारण संभावित प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारी रक्षा कर सकेगा। प्रस्तुत साधना अंक में साधना प्रक्रिया के उसी तत्त्वदर्शन पक्ष को स्पष्ट किया गया है। आगामी अंक के व्यावहारिक प्रतिपादन से परिजन जान सकेंगे कि अगले दिनों उन्हें किस स्तर पर अपना साधना -पुरुषार्थ किन-किन रूपों में आगे बढ़ाना हैं यदि हम समय रहते जागकर, अपने जीवन की रीति-नीति को बदलकर, जीवन साधनामय बना सके तो हमसे अधिक सौभाग्यशाली कोई ओर नहीं होगा।
साधना अपनी संस्कृति की सर्वप्रधान विशेषता है इसलिए शास्त्रकार ऋषियों ने अपने सम्पूर्ण शास्त्रों और संस्थाओं को आत्मा के रंग में रंग डाला है। संस्कारमय जीवन आध्यात्मिक साधना की दृढ़ भूमिका है। संस्कारों के द्वारा आध्यात्मिक जीवन का क्रमशः विकास होता है। संस्कारवान व्यक्ति अनुभव करता है कि उसका सारा जीवन एक महान यज्ञ है और जीवन की प्रत्येक भौतिक क्रिया का सम्बन्ध आध्यात्मिक तत्व से हैं। संस्कारों के द्वारा ही कर्म प्रधान सांसारिक जीवन का मेल आध्यात्मिक अनुभव से होता है।
साधना की मान्यता नहीं मिल सकती। इन दिनों जादूगरी और ब्रह्म-विद्या का एक ही अर्थ बनकर रह गया है चमत्कार-कुतूहल दिखाने वालों का उस खुली बिरादरी में जमघट लगा रहता है, पर यह वास्तविकता थोड़े ही है। इसे अधिक-से-अधिक प्रवंचना का प्रपंच भर कह सकते है। साधना-विज्ञान का स्वरूप इससे ऊँचा है। मानवीय अन्तःकरण को इसी से परिष्कृत कर व्यक्ति एवं समाज में परिवर्तन लाए जा सकते है।
साधना की महापूर्णाहुति होगी। इसके लिए एक करोड़ साधकों की तैयारी अगले वर्ष मनाए जाने वाले साधनावर्ष में की जानी है। इस बीच लाखों प्राणवान कार्यकर्ता देवसंस्कृति की संस्थापना के लिए समर्पित-संकल्पित नजर आने लगेंगे। इनका स्तर कुछ इतना अलौकिक होगा, जिन्हें विवेकानन्दों का अभिनव संस्करण कहा जा सके।
साधना का माहात्म्य भी बताया है और उसके स्वरूप एवं तत्त्वदर्शन को समझाने का प्रयत्न करते हुए कहा है-
साधना-परायण जनों का वरण करते हैं और उन्हीं के माध्यम से अपना प्रयोजन पूर्ण करते हैं। प्रज्ञावतार की पुण्यवेला में ऐसा ही सुयोग सामने है। उसमें साधकों के लिए अनुपम अनुदानों का सुअवसर अनायास प्रस्तुत है, किन्तु उसके साथ सदा की तरह अभी भी पुण्य-प्रयोजनों के लिए अनुदानों का उपयोग करने की शर्त जुड़ी हुई है। जो दूसरों की जेब काटकर अपनी मजेदारी का ताना-बाना बुनते है।, उनके लिए तो यह सुयोग भी सन्तोषप्रद सिद्ध न हो सकेगा।
साधना है, पर सर्वस्व को समर्पित करके ही तो सर्वस्व की प्राप्ति की जा सकती है। यदि यह तथ्य ध्यान में रहे एवं कबीर के इन पदों का मर्म समझ में कही कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संत कबीर कहते हैं-
साधना से हमें प्रत्यक्ष लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं। भौतिक ऋद्धियाँ भी और आत्मिक सिद्धियाँ भी। अपनी अंतरात्मा भी शनैः-शनैः परमात्मा का सायुज्य पा लेती है।
साधना की उपलब्धियों की चर्चा किसी को भी चमत्कृत कर देने के लिए पर्याप्त हैं, परन्तु इनका अर्जन उन्हीं के लिए सम्भव है, जो इसके तत्त्वदर्शन को आत्मसात् कर चुके हैं। इस तत्त्वदर्शन के दो आयाम हैं- जिन्हें आस्थापक्ष और क्रियापक्ष का नाम दिया जा सकता है। आस्थापक्ष में विचारों और भावनाओं को प्रभावित करने वाले समस्त ज्ञान-विस्तार को सम्मिलित किया गया है। वेद, शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन आदि इसी प्रयोजन के लिए रचे गए हैं। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन-मनन कथा-प्रवचनों का महात्म्य इसी आधार पर बताया गया है ताकि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे और विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता रहे।
साधना से विकसित उल्लासित-प्रफुल्लित एवं तरंगित होती है।
साधना की भावभूमि एवं इसके सहयोगी कर्मकाण्डों से जुड़े शिक्षण के साथ इन्हें मनाया जाए तो जीवन में श्रेष्ठ प्रेरणाओं का समावेश भी हो सकता है। इस दृष्टि से ये अत्यन्त उपयोगी हैं। इनका विस्तृत विवेचन पढ़ने के लिए परिजन ‘षोडश संस्कार विवेचन’ (वाङ्मय क्रमांक ३३) देख सकते हैं।
साधना-पुरुषार्थ में तत्पर हों, साथ ही अगले वर्ष प्रारम्भ होने वाले साधनावर्ष के कार्यक्रमों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इस क्रम में समय निकालकर उन्हें शान्तिकुञ्ज में चलने वाले नौ दिवसीय सत्र में अवश्य सम्मिलित होना चाहिए। इसके प्रभाव से उनके भीतर दबी पड़ी महानता निखरेगी, साथ ही वे महाकाल की वाणी को अपने अंतर्मन में साफ-साफ सुन सकेंगे।
साधना। जिसे एक शब्द में “चरित्र” की संज्ञा दी जा सकती है। अपने प्रचण्ड चरित्रबल के कारण ही गाँधीजी को समूचे विश्व ने “महात्मा” कहकर सम्मानित किया। कृतज्ञ ने उन्हें पिता का गौरव दिया। दुनिया में अब तक कहीं भी कोई संग्राम बिना शस्त्रों के नहीं लड़ा गया।
साधना की प्रचण्ड ऊर्जा से ओजस्वी बनाना आवश्यक है।
साधना ही है। जिसे जितनी इस दिशा में सफलता मिलेगी वह उतना ही आत्मबल सम्पन्न होता चला जायेगा और विभूतिवान बनेगा।
साधना की फलश्रुति।
साधना प्रक्रिया अपनाकर हर कोई प्राण के लहलहाते महासागर में से अपनी झोली भर सकता और प्राण सम्पन्न बन सकता है।
साधना नकद धर्म है। इसके प्रतिफल प्राप्त करने के लिए समय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़तीं ‘इस हाथ दे उस हाथ ले’ का नकद सौदा इस मार्ग पर चलते हुए हर कदम पर फलित होता रहता है। एक कदम आगे बढ़ने पर मंजिल की दूरी उतनी फुट कम होती है, साथ ही जो पिछड़ापन था, वह पीछे टूटता है। इसी प्रकार जीवनसाधना यदि तथ्यपूर्ण, तर्कसंगत और विवेकपूर्ण स्तर पर की गयी हो तो उसका प्रतिफल दोनों रूप में हाथों हाथ मिलता चलता है। पहला लाभ तो यह होता है।
साधनात्मक पुरुषार्थ की चरम परिणति के रूप में सिद्ध होने का विकास यही है।
साधना की प्रयोग-प्रक्रिया का अवलम्बन ही एकमात्र उपाय है।
साधना हानिकर है। ‘बुद्ध चरित्र’ में आता है कि तथागत जब कठोर उपवासों द्वारा काया को अत्यन्त दुर्बल बना चुके तो एक देवकन्या ने प्रकट होकर उन्हें मध्यम मार्ग को अपनाकर औरों को भी उसी पर चलने का उपदेश देने लगे।
साधना का अवलम्बन किया जाय तो ही वे लाभ मिल सकेंगे- जिनका वर्णन तप-साधना के महात्म्य प्रकरण में बताया गया है।
साधना अकारण नहीं है। उसके पीछे जिस उद्देश्य की पूर्ति का समावेश है- उसे ध्यान में रखकर चला जाय तो अपना और अपने प्रभाव क्षेत्र का आत्मिक स्तर बढ़ता चला जाएगा।
साधना से उनका निराकरण होता है। मानसिकता स्थिरता आने पर चित परब्रह्म परमात्मा में लग जाता हैं।
साधना कर सकते है
साधना करते हैं, तप करते हैं, यज्ञ-हवन करते हैं तथा वातावरण को बदल डालते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भगवान राम के रामराज्य की स्थापना रावण के समाप्त होने से नहीं हुई, वरन् दस अश्वमेध यज्ञों के कारण हुई। भगवान श्रीकृष्ण के जमाने में भी वैसा ही हुआ। महाभारत के बाद उनको भी यज्ञ करना पड़ा। उसके बाद ही वातावरण का सुधार हो सका।
साधना प्रारम्भ होती है।
साधनाओं, ज्ञानमार्ग के ग्रन्थों रो अधिक भक्तियोग को महत्व दिया गया है। भक्ति का अर्थ है-सत्य को बुद्धि से नहीं हृदय से पाइए। विचारों से नहीं भाव से पाइए। चिन्तन से नहीं प्रेम से पाइए। भक्ति-सिद्धि में आक्रामक चित्त-ईर्ष्यालु मन एक बाधा को समान है।
साधना के विस्तार में आते हैं। तंत्र-साधना के द्वारा परकाया प्रवेश, अणिमा आदि सिद्धियाँ, कायाकल्प आदि सब कुछ सम्भव है। सत्य तो यह है कि साधना है ही असम्भव को सम्भव बनाने वाला विज्ञान, परन्तु इसको करने के लिए आवश्यक पात्रता चाहिए। कुपात्र में तो अमृत भी विष बन जाता है। सत्पात्र विष को भी औषधि के रूप में प्रयुक्त पात्र हैं उनके लिए यह द्वार आज भी खुला रहेगा।
साधना-अनुसंधान केन्द्र पर संपन्न हुआ था। अब यह गायत्री परिवार के मुख्यालय शान्तिकुञ्ज में बड़े विराट व्यापक रूप में संपन्न होने जा रहा हैं अभी तक भारत से बाहर के काफी विद्वज्जनों की इस संबंध में आने की स्वीकृतियाँ आ गयी है। एवं ऐसा लगता है कि अनूठे आयोजन में शीतऋतु के बावजूद अच्छा -खासा समागम हो सकेगा। शिविर में भाग लेने वाले योगसाधकों, प्रशिक्षकों के ठहरने की व्यवस्था शान्तिकुञ्ज में ही की गयी है। अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, जापान, इजराइल, हंगरी, इटली, यू.के. आस्ट्रेलिया, अर्जेन्टीना, रूस व दक्षिण अमेरिका आदि देशों से काफी प्रतिभागी इसमें आ रहे है।
साधना में आगामी दो वर्ष अपेक्षाकृत अधिक विशिष्ट और महत्वपूर्ण हैं। इस विशिष्टता का दिव्यदर्शी प्रज्ञावान अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं। अखण्ड ज्योति परिजनों में से प्रत्येक से यह अपेक्षा की गयी है कि इस परिवर्तन पर्व में वे मात्र मौनदर्शक न रहेंगे भीम, अर्जुन अंगद, हनुमान जैसे पराक्रम न सही तो वे शबरी, गिलहरी, गिद्ध जैसी समर्पित भूमिका तो अवश्य निभा सकेंगे। समय का अपना महत्व होता है, जो गुजर जाने पर फिर हाथ नहीं आता। समझा जाना चाहिए कि युगसन्धि के इन बचे हुए दो वर्षों में इतना कुछ सम्पन्न होना है, जिसे चिरकाल तक स्मरण किया जा सके।
साधना की नहीं, गहरी साधना श्रद्धा-विश्वासपूर्वक किये जाने की सर्वाधिक आवश्यकता है।
साधना का उज्ज्वलतम रूप गुरुप्रेम है। जितना तुम मेरे प्रेम में डूबते हो, उतना ही तुम मेरे निकट आते हो, क्योंकि मैं अन्तरम का निवासी हूँ। मैं आत्मा हूँ, विचार या रूप से अछूती आत्मा! मैं अभेद्य, अनश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ। ब्रह्म हूँ।
साधना के, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के ऐसे आयोजन संपन्न होने जा रहे है, जिनसे अभूतपूर्व शक्ति का उपार्जन होगा। इससे जो सुरक्षाकवच विनिर्मित होगा, वह निश्चित ही अंतर्ग्रही प्रभावों ग्रहों की युति के कारण संभावित प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारी रक्षा कर सकेगा। प्रस्तुत साधना अंक में साधना प्रक्रिया के उसी तत्त्वदर्शन पक्ष को स्पष्ट किया गया है। आगामी अंक के व्यावहारिक प्रतिपादन से परिजन जान सकेंगे कि अगले दिनों उन्हें किस स्तर पर अपना साधना -पुरुषार्थ किन-किन रूपों में आगे बढ़ाना हैं यदि हम समय रहते जागकर, अपने जीवन की रीति-नीति को बदलकर, जीवन साधनामय बना सके तो हमसे अधिक सौभाग्यशाली कोई ओर नहीं होगा।
साधना का, आत्मसंयम का पथ छोड़ आज ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है कि सारी मानवजाति का अस्तित्व संकट में दिखाई देता है।
साधनाएँ करने पर भी सम्भव न था। युगावतार साधना-परायण जनों का वरण करते हैं और उन्हीं के माध्यम से अपना प्रयोजन पूर्ण करते हैं। प्रज्ञावतार की पुण्यवेला में ऐसा ही सुयोग सामने है। उसमें साधकों के लिए अनुपम अनुदानों का सुअवसर अनायास प्रस्तुत है, किन्तु उसके साथ सदा की तरह अभी भी पुण्य-प्रयोजनों के लिए अनुदानों का उपयोग करने की शर्त जुड़ी हुई है। जो दूसरों की जेब काटकर अपनी मजेदारी का ताना-बाना बुनते है।
साधना में समुद्र मंथन जैसे प्रयत्न करने पड़ते हैं। फलतः प्रसुप्ति जाग्रति में बदलती है। तप की ऊष्णता पाकर अन्तःऊर्जा उभरती है और ऊपर की ओर चलने का प्रयत्न करती है। गर्मी से वायु, जल आदि सभी का विस्तार होता है। वे ऊपर की ओर उठते हैं।
साधना यदि तथ्यपूर्ण, तर्कसंगत और विवेकपूर्ण स्तर पर की गयी हो तो उसका प्रतिफल दोनों रूप में हाथों हाथ मिलता चलता है। पहला लाभ तो यह होता है। कि पशु प्रवृत्तियों का अभ्यास छूटता है, वातावरण की गंदगी से ऊपर चढ़े कषाय-कल्मष घटते हैं। दूसरा लाभ यह होता है कि नरपशु से देवमानव बनने की विधि -व्यवस्था सही रूप से बन पड़ती है। औरों के साथ स्वयं को भी अनुभव होता रहता है।
साधना में एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। अपनी अमीरी और महत्त्वाकाँक्षाओं को जनकल्याण के लिए समर्पित किए बिना तप-साधना सम्भव नहीं हो सकती। पहाड़ जैसे वैभव के ढेरों में से राई-रत्ती दान-पुण्य करते रहने का कृपण-प्रदर्शन लोगों को बहकाने और आत्मप्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है सच्चे तपस्वी को तो त्याग-बलिदान के अन्तिम चरण तक पहुँचना पड़ता है। उसकी निष्ठा और श्रद्धा का परिचय तो अपनी सम्पदा एवं सामर्थ्य का किस सीमा तक विसर्जन किया जा सका-इसी कसौटी पर कसने के बाद प्राप्त होता है।
साधना के दो वर्ग हैं- (१) एक विशिष्ट लोगों की-विशिष्ट प्रयोजन के लिए विनिर्मित प्रक्रिया (२) सर्वसाधारण के लिए सहज, सुगम, सौम्य पद्धति। विशिष्ट प्रक्रिया योगी- यती, एकान्तवासी, सांसारिक उत्तर-दायित्वों से निवृत्त असाधारण मनोबल सम्पन्न, कठोर तपश्चर्या के लिए समुद्यत लोगों के लिए है। हठयोग, षट्चक्र-बेधन कुण्डलिनी जागरण, तन्त्र-योग प्राणयोग आदि साधनाएँ इसी प्रकार की है पर यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। भूल होने पर इस राह में खतरे-ही-खतरे हैं। निश्चय ही उससे ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होती हैं, पर उन उपलब्धियों से चमत्कार-प्रदर्शन द्वारा लोगों को विस्मित-चकित कर देने की आकांक्षा मात्र अहंकार ही बढ़ाती है।
साधना एक प्रकार से शरीर रूपी मकान में वायरिंग के समान हैं उसका स्विच ऑन करने का काम गुरु ही करता है। भगवान तो निराकार चैतन्यमयी सत्ता है। उसकी साकार प्रतिमा कोई हो सकती है तो वह गुरु ही है। गुरु भगवान का सीधा निर्धारण है-उसी के द्वारा की गयी नियुक्ति है। वह सर्वेसर्वा है।
साधना की धुरी पर केन्द्रित होने के रूप में सामने आयेंगे।
साधनात्मक कर्मकाण्डों के माध्यम से आत्मशिक्षण की प्रसुप्त शक्तियों का जागरण।
साधना में सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकने की क्षमता प्रदान करता है।
साधना समर में सफल होने के लिए शिष्यत्त्व की चौथी पहचान ‘गुरु के प्रति अटूट निष्ठा’ प्रकरण पर थोड़ा प्रकाश डालना चाहेंगे।
साधना करने वाले का परिष्कृत जीवन स्वयं के लिए, परिवार के लिए और समस्त संसार के लिए मंगलमय होता है। निर्मल अन्तःकरण में ईश्वर के दर्शन होते है और उसे देखने पर वह सब उपलब्ध हो जाता है, जो कुछ इस संसार में पाने योग्य है।
साधना से श्रेष्ठ विधि कोई और नहीं।
साधना के सम्बन्ध में कितने ही व्यक्तियों के मस्तिष्क में अनेकों प्रकार की भ्रांतियाँ बैठी हुई हैं। कितने ही अतिवादी यह कहते हैं कि “हम जो भी काम करते हैं वह वास्तव में हमसे कराए जाते हैं और वह कराने वाला परमात्मा है। हमारे द्वारा किया जाने वाला काम अच्छा है या बुरा, इसकी न तो हमें चिन्ता करनी चाहिए और न ही अपने ऊपर उत्तरदायित्व लेना चाहिए। सबके लिए जिम्मेदार परमात्मा है।” इस भ्रान्तियुक्त धारणा के कारण मनुष्य सत्कर्म एवं दुष्कर्म के बीच अन्तर नहीं करता और दोनों ही वे प्रवृत्त होता है।
साधना में सूर्यबेधन स्तर की प्राणसाधना की आवश्यकता पड़ती है।
साधना करके सिद्ध किया गया हो, सुसिद्ध वह जो गुरु परम्परा के अंतर्गत प्राप्त हुआ हो तथा अरिमंत्र शत्रुनाशक प्रभाव वाले। एक वर्गीकरण के अनुसार मंत्र पिण्ड (एक अक्षर का), कर्त्तरि (दो अक्षर का), बीज (३ से १ वर्णों का ), अथवा माला मंत्र (बीस वर्णों का) इस रूपकार हो सकते हैं मंत्र अपनी प्रकृति के अनुसार एक और वर्गीकरण के अनुसार सात्विक, राजसिक, तामसिक भी होते हैं राजसिक जहाँ मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु होते हैं वहाँ तामसिक में तांत्रिकों के मंत्र आते हैं। पाँचवाँ वर्गीकरण साबर व डामर मंत्रों के रूप में वर्णित किया गया हैं साबर मंत्रों में न कोई मेल होता है, न अर्थ-जप का विधान। झाड़ने-फेंकने आदि के लिए ये गाँव-गाँव में प्रचलित हैं। डामर मंत्र प्रेत-पिशाच-यज्ञ-किन्नरों को साधने के लिए हैं।
साधना में मनन और चिन्तन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद जब चित्त शान्त हो तब अपने अन्तरंग -बहिरंग स्थिति का लेखा-जोखा लेना चाहिए और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक है, उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए कि जो वर्तमान स्थिति में बिना समय गँवाकर कार्यान्वित हो सके।
साधनात्मक उपलब्धियों का अर्जन अपने जीवन का अनिवार्य प्रसंग बने बिना नहीं रहेगा।
साधना को फलस्वरूप अनायास ही मिल जाती है। पर विशिष्ट साधना प्रक्रिया अपनाकर हर कोई प्राण के लहलहाते महासागर में से अपनी झोली भर सकता और प्राण सम्पन्न बन सकता है।
साधना की भाषा में इन्हें क्रमशः कुण्डलिनी जागरण, ज्योति अवधारण एवं रसानुभूति के के नाम से जाना जाता हैं। इन तीनों के ग्रहण केन्द्र क्रमशः ब्रह्मरन्ध्र, आज्ञाचक्र एवं हृदयचक्र में है। समर्थता, प्रतिभा, वरिष्ठता यह इन तीनों क्षेत्रों की सिद्धियाँ हैं। सिद्धपुरुष, अध्यात्म क्षेत्र की विभूतियों एवं क्षमताओं से सम्पन्न ऐसे ही व्यक्ति को कहते हैं। युगावतार के इस अनूठे अनुदान को पाने के लिए जो भी प्राणवान परिजन कदम बढ़ाएँगे, निश्चित ही उन्हें महान साधक होने का गौरव मिलेगा।
साधना प्रक्रिया के उसी तत्त्वदर्शन पक्ष को स्पष्ट किया गया है। आगामी अंक के व्यावहारिक प्रतिपादन से परिजन जान सकेंगे कि अगले दिनों उन्हें किस स्तर पर अपना साधना -पुरुषार्थ किन-किन रूपों में आगे बढ़ाना हैं यदि हम समय रहते जागकर, अपने जीवन की रीति-नीति को बदलकर, जीवन साधनामय बना सके तो हमसे अधिक सौभाग्यशाली कोई ओर नहीं होगा।
साधना करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया था। हमारे सामने महात्मा गाँधी आये। उन्होंने भी इस देशों आजाद कराने के लिए सामूहिक शक्ति का ही उपयोग किया। इसके द्वारा ही स्वराज्य मिलना संभव हो सका था। आज का यह युगसंधि महापुरश्चरण भी इसी तरह का एक महत्वपूर्ण सामूहिक प्रयास है।
साधना की जरूरत है, जो हमारे भारत महादेश को समर्थ सशक्त बना सके।
साधना के अभाव में इसके विशेष लाभ नहीं उठाए जा पाते। कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणशक्ति का प्रचण्ड आघात आवश्यक होता है। शरीर में विद्यमान प्राण की मात्रा से इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं हो पाती। निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राणतत्त्व को आकर्षित करना तथा अपने भीतर भरना पड़ता है। कुण्डलिनी जागरण की साधना में सूर्यबेधन स्तर की प्राणसाधना की आवश्यकता पड़ती है।
साधना का एक वर्ष और पूरा हुआ। हममें से प्रत्येक परिजन की नजर आगामी दो वर्ष बाद सम्पन्न होने वाले महापूर्णाहुति आयोजन पर टिकी है। इन दिनों दृश्य और अदृश्य जगत में महापरिवर्तनों की भरी उथल-पुथल होती है, उसमें से कुछ घटनाक्रम तो मन्दगति से चलते रहते है।, पर कुछ ऐसे होते हैं, जिनमें परिवर्तन की प्रक्रिया बढ़े-चढ़े रूप में होती है और हर किसी को दिखाई भी पड़ती है। तपते ग्रीष्म के बाद आने वाली घटाटोप वर्षा के बीच इतने प्रकार के परिवर्तन होते हैं, मानो सृष्टि का क्रम ही बदल रहा हो।
साधना यों प्राणायाम के माध्यम से भी चलती है। श्वास खींचने के साथ सो और छोड़ते समय हम की ध्वनि एकाग्र के साथ ही यह भाव भी सघन रखना पड़ता है कि वह (परमात्मा) हम (आत्मा) दोनों के बीच सघन समन्वय और आदान प्रदान का जो उपक्रम चलता है, उसे अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाय। इस प्रकार प्राणयोग द्वारा भी ध्यान-साधना हो सकती है। जपकाल में इष्ट की छवि को अन्तरात्मा के साथ अपनी आत्मा का समर्पण-विलय अनुभव करते रहने से भी यही परिणाम उपलब्ध किया जा सकता है।
साधना एवं तप से प्राप्त बल के द्वारा ही हमने युगनिर्माण जैसे कठिन कार्य को साहसपूर्वक पूर्ण करने की हिम्मत की है। हमने ध्वंस का समाधान और सृजन का परिपोषण करने के लिए गायत्री जयंती 23 जून, १९८० से बीस वर्ष का युगसंधि महापुरश्चरण आरंभ किया है। इसमें एक लाख नैष्ठिक उपासकों की भागीदारी रहेगी। इसके अलावा दस लाख अनुसाधक होंगे। यह वेला सन् १९८० से सन् २००० तक की होगी अर्थात् यह पुरश्चरण बीस साल का होगा।
साधना का अवलम्बन लेकर साधक जीवन के सामान्य दायित्वों का निर्वाह करते हुए भी स्वर्गमुक्ति का उच्च-स्तरीय आनन्द प्राप्त कर सकता है।
साधना का मूल उद्देश्य इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के साथ प्रचण्ड संघर्ष करना है। जिस महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ने सम्मिलित भूमिका निबाही थी, वह आत्मपरिष्कार में योगसाधना के साथ पूरी तरह सम्बन्धित है। कौरव दल इन्हीं कुसंस्कारों का नाम है, जो निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे है और वातावरण में घुसी अवांछनीयता के कारण भड़कते हैं। कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा।
साधना का वास्तविक अर्थ यही है कि किसी भी काम को पूरी कुशलता के साथ कर्तापन का अभिमान छोड़कर किया जाय और उसके फल के प्रति निर्लिप्त-निस्पृह रहा जाय। निश्चित रूप से यदि इस तत्त्वदर्शन को हृदयंगम किया जा सके तो कर्मयोग की सर्वसुलभ साधना का अवलम्बन लेकर साधक जीवन के सामान्य दायित्वों का निर्वाह करते हुए भी स्वर्गमुक्ति का उच्च-स्तरीय आनन्द प्राप्त कर सकता है।
साधना बन पड़े, तो इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द लेना हर किसी के लिए सम्भव है।
साधना-पद्धति द्वारा स्थूल-सूक्ष्म-कारण तीनों शरीरों का संस्कार-परिष्कार परिमार्जन और परिवर्धन किया जाता है। इसके तीन प्रयोग हैं- (१) कर्मयोग, (२) ज्ञान योग, (३) भक्तियोग। तीनों की सन्तुलित क्रियापद्धति का अवलम्बन ही श्रेयस्कर हैं। श्रीमद्भागवतगीता व अन्य धर्म ग्रंथों में इसी प्रक्रिया का विवेचन है। अपनी विचारपद्धति-कार्यपद्धति और भावस्थिति में यदि इन तीनों आस्थाओं का समुचित समावेश कर या जाय, तो हम अपनी असह्य यंत्रणा की वर्तमान मनोभूमि से मुक्त होकर इसी जीवन में देवत्व के अभ्युदय की अनुभूति कर सकते हैं।
साधना सम्भव नहीं हो सकती। पहाड़ जैसे वैभव के ढेरों में से राई-रत्ती दान-पुण्य करते रहने का कृपण-प्रदर्शन लोगों को बहकाने और आत्मप्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है सच्चे तपस्वी को तो त्याग-बलिदान के अन्तिम चरण तक पहुँचना पड़ता है। उसकी निष्ठा और श्रद्धा का परिचय तो अपनी सम्पदा एवं सामर्थ्य का किस सीमा तक विसर्जन किया जा सका-इसी कसौटी पर कसने के बाद प्राप्त होता है।
साधना अपनाना चाहते हैं, उन्हें प्रथम साधना मितव्ययिता की, सादगी की गरीबी की करनी चाहिए। इस अभ्यास से ही उसकी परिस्थितियाँ ऐसी रह सकेंगी, जिनमें तपस्वी जीवन की रीति-नीति का निर्वाह सम्भव हो सके और उसको बिना अनीति उपार्जन की अपेक्षा किए, सत्कर्मों के लिए आवश्यक खर्च में बिना कृपणता बरते, बड़ी सरलता और प्रसन्नता के साथ अपना ढर्रा चलाते रह सकना सम्भव हो जाए। तपश्चर्या के विविध अभ्यास इस प्रमुख प्रयोजन को भली प्रकार पूरा कर सकने की सफलता प्रदान करते हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ के माध्यम से अपनी पात्रता प्रामाणिकता सिद्ध करे और उसी अनुपात में प्रगति पथ पर अग्रसर कराने वाले अनुदान प्राप्त करता चला जाय।
साधना भी जुड़ी है। उस हेतु मन में उत्कृष्ट विचारों का अनवरत समावेश आवश्यक है। प्रेरक स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं किस्से-कहानी जैसी किताबों का पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्यकर्म मानकर किया ही जाना चाहिए।
साधनाओं के लिए समय उतना है नहीं जितना कि पहले कभी हुआ करता था। दूसरे जिस तरह अशुद्ध मंत्रोच्चारण का उसका अर्थ वह उनसे न ली जाने वाली शिक्षा न समझकर जिस प्रकार इनके नाम पर लकीर पीटी जाती है उससे भी जनउपेक्षा बढ़ी है। प्रत्येक संस्कार के साथ खर्चीले साधन होने व उनके विकल्प न सोचने के कारण भी जनरुचि इनसे हटी है। प्रीतिभोज के नाम पर हर संस्कार के साथ जुड़ा एक अनिवार्य उपक्रम ही इतना खर्चीला हो जाता है कि वह परस्पर प्रीति के स्थान यजमान के मन में धर्म साधना के प्रति आक्रोश ही पैदा करता है। इन सारी वजहों के कारण सभी संस्कारों के साथ जुड़े कर्मकाण्डों में युगानुकूल संशोधन भी जरूरी था।
साधना का सम्पुट लग भर जाय तो न केवल परिवर्तन शीघ्र होगा- हम उसके केन्द्र में एक भूमिका निभा रहे होंगे। आने वाले समय के अनुरूप हम सभी बन सकें- उसमें अपना जीना सुनिश्चित कर सके- उसके लिए हम सभी को अपनी तैयारी करनी होगी। बदलने जा रही-बनने जा रही दुनिया के अनुरूप हमें अपने आपको भी बदलना होगा एवं यह कार्य मात्र साधना के ब्रह्मास्त्र संभव हैं अब यह व्यक्ति ही नहीं, सामाजिक आवश्यकता भी बन गयी। इसी कारण सारे भारतवर्ष के चप्पे-चप्पे में, विश्व के कोने-कोने में अखण्ड जप-साधना के, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के ऐसे आयोजन संपन्न होने जा रहे है, जिनसे अभूतपूर्व शक्ति का उपार्जन होगा। इससे जो सुरक्षाकवच विनिर्मित होगा, वह निश्चित ही अंतर्ग्रही प्रभावों ग्रहों की युति के कारण संभावित प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारी रक्षा कर सकेगा।
साधना कराने का प्रयास किया था, ताकि वातावरण में सुधार कर सके। इसी प्रकार हर विषम समय में व्यक्तियों के द्वारा सामूहिक प्रयास किये गये हैं।
साधनामय बना सके तो हमसे अधिक सौभाग्यशाली कोई ओर नहीं होगा।
साधना का महत्व समझा ही नहीं गया ओर ऋद्धि-सिद्धियों से सुसम्पन्न बनाने की ओर ध्यान गया ही नहीं अन्यथा स्थिति वैसी न होती, जैसी कि सामने है।
साधना प्राणायाम की क्रिया के अलावा भी और कुछ है। इच्छा, भावना, संकल्प की विशेषताएँ जुड़ जाने से ही इसका यथार्थ मूल्य और महत्व प्रकट होता है। वैसे भी सामान्य क्रियाएँ भावना जुड़ जाने से समर्थ परिणाम प्रस्तुत करती हैं। जबकि भावनाविहीन होने पर इनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। भावना और संकल्प का चमत्कार तो सर्वत्र देखा और अनुभव किया जा सकता है।
साधना में जहाँ व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घण्टे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का विधान है। यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है, जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार, वातावरण में सृजन-चेतना का समावेश और नवनिर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान तीनों ही पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की इस भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।
साधना -पुरुषार्थ किन-किन रूपों में आगे बढ़ाना हैं यदि हम समय रहते जागकर, अपने जीवन की रीति-नीति को बदलकर, जीवन साधनामय बना सके तो हमसे अधिक सौभाग्यशाली कोई ओर नहीं होगा।
साधना से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। सरकस के नट-नर्तकों का सारा खेल एकाग्रता की ही सिद्धि पर टिका होता है। वैज्ञानिक, कलाकार, चित्रकार, मूर्तिकार, साहित्यकार आदि अपने-अपने विषयों में तन्मय हो सकने की विशेषता उत्पन्न करते और सफल होते है। निशानेबाजी की प्रतियोगिता एकाग्रता के बली पर ही जीती जाती है। ऐसे ही दूसरे ढेरों काम हैं, जिनसे लोग एकाग्रता सम्पादित करते हैं और चमत्कारी सफलताएँ प्राप्त करते हैं।
साधना है। यमदूत शरीर का प्रतिबिम्ब दिखा सकने वाला आदमकद दर्पण हो तो उत्तम, अन्यथा उसका साइज इतना तो होना ही चाहिए, जिसमें बैठने पर चेहरे की प्रतिछाया समान आकार में दिख पड़। इसको विशुद्ध आत्मसत्ता की प्रत्यक्ष छवि माना जाए और उसमें दिव्यगुणों का सघन समावेश अनुभव किया जाए। साथ ही उसके दुर्गुण, कषाय-कल्मष हिमऋतु में झड़ने वाले पत्तों की तरह झड़ते जाने कि मान्यता को अधिकाधिक प्रखर बनाया जाए। यह आत्मदर्शन हैं इसकी महिमा देवदर्शन के समतुल्य है।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले के लिए कहते थे कि उन्हें यश का दान करना चाहिए। वे कहते हैं कि हम सबसे दान माँगते फिरते हैं, क्या हम कुछ दान दे सकते हैं। हम जो कुछ काम करते हैं उसका यश हमें न लेकर दूसरों को देना चाहिए। श्री रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि “यदि तुम्हारा अहं नहीं गया तो तुम्हारा गुरु स्वयं ब्रह्मा हो तो भी वह तुम्हारा कल्याण नहीं कर सकता।”
साधना की भूमिका प्रमुख रूप से बनी रहनी चाहिए।
साधना के क्रियात्मक पक्ष से होती है, जिसे ‘तप’ कहते हैं। इसे तीन बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है- (१) आत्म-निग्रह के लिए की गयी तितिक्षा (२) परमार्थ प्रयोजनों के लिए त्याग और बलिदान, (३) साधनात्मक कर्मकाण्डों के माध्यम से आत्मशिक्षण की प्रसुप्त शक्तियों का जागरण।
साधना में ही नहीं, भौतिक कार्यों में भी पड़ती है। अनेकों ऐसे व्यक्ति भी उसमें पारंगत होते हैं, जिनका साधना से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। सरकस के नट-नर्तकों का सारा खेल एकाग्रता की ही सिद्धि पर टिका होता है। वैज्ञानिक, कलाकार, चित्रकार, मूर्तिकार, साहित्यकार आदि अपने-अपने विषयों में तन्मय हो सकने की विशेषता उत्पन्न करते और सफल होते है। निशानेबाजी की प्रतियोगिता एकाग्रता के बली पर ही जीती जाती है।
साधना के समस्त उपाय-उपचार इसलिए बनाए गए हैं कि आदर्शवादी जीवन-प्रक्रिया अपनाने में स्वभावतः ही कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इन्हें हँसते-खेलते सहन करते रह सकना अपने स्वभाव का अंग बन जाय। उस तरह की कष्टसाध्य जीवन-प्रणाली अभ्यास में उतरकर सहज-स्वाभाविक बन जाय। स्पष्ट है कि न्यायोपार्जित जीविका सीमित ही रहेगी। फिर उदार व्यक्ति की अन्तरात्मा भी तो निष्ठुर पाषाण जैसी न रहेगी।
साधना का शुभारम्भ होता है। आखिर हम क्यों जी रहे हैं? इन सवालों के जवाब में आत्मवेत्ता, महामनीषियों ने जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उन्हें अपनाया जा सके तो ज्ञानसाधना से बन्धनमुक्ति की बात प्रत्यक्ष नजर आने लगती है।
साधना आदर्शवादी लक्ष्य के अभाव में ऐसे ही अस्त-व्यस्त होते रहते हैं और उस अपव्यय के फलस्वरूप चित्र-विचित्र कुपरिणाम उत्पन्न होते रहते हैं। अपनी ही क्षमता अपनी ही विनाश में संलग्न रहे, तो इसे अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना ही कहा जाएगा।
साधना एवं सिद्ध मंत्र अनेक काम कर देते हैं। विशेष बात यह है, इसके लिए उपकरणों के जंजाल की जरूरत नहीं। यद्यपि ऊर्जा को पाने के लिए हमें भी उतनी ही श्रम-साधना करनी पड़ती है। शब्द में अन्तर्हित शक्ति के बीज, न्यूक्लियस का विखण्डन करने के लिए उसे सूक्ष्म से सूक्ष्मतर एवं शुद्ध अवस्था में लाने के लिए जप करना होता है। इस जप से हमारा अन्तःशरीर शक्ति के प्रबल आवेश को सहन करने की क्षमता प्राप्त करना है और मंत्र की नाभिकीय शक्ति प्रकट होने की योग्यता मिलती है।
साधना की इतनी महत्वपूर्ण फलश्रुतियों के बावजूद इनकी अवज्ञा क्यों होती चली गयी वह आज के आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता प्रधानसमाज में इन्हें उपेक्षा का दृष्टि से क्यों देखा जाता है, यह एक विचारणीय प्रश्न है? परमपूज्य गुरुदेव ने षोडश संस्कारों को युगानुकूल बनाकर इन्हें व्यापक स्तर पर सम्मत प्रतिपादनों द्वारा इन्हें व्यापक स्तर पर सम्पन्न किए जाने की एक सुव्यवस्था प्रक्रिया को जन्म दिया। इसे युगऋषि के द्वारा किया गया संस्कार साधनाओं का अभिनव जागरण भी कह सकते हैं।
साधनावर्ष के कार्यक्रम से में बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभाई जाय।
साधनाओं में प्रायः यही देखने को मिलता है। उसमें तमोगुणी देवताओं की सिद्धि की जाती है और उस आधार पर मिले अनुदानों को मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन जैसे हेय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कर्म अपना प्रतिफल निश्चित रूप से देते है और लौटकर करने वाले स्वयं भी उस कुकृत्य के दुष्परिणाम से बचे नहीं रह सकते। इस तथ्य को समझते हुए प्रारम्भिक चयन में समुचित सावधानी बरती जानी चाहिए। सात्विकता का अवलम्बन ही श्रेयस्कर समझा जाना चाहिए।
साधना प्रशिक्षण के भारतव्यापी सत्र
साधना श्रद्धा-विश्वासपूर्वक किये जाने की सर्वाधिक आवश्यकता है।
साधना का गरिमामय स्वरूप प्रदान किया।
साधना के रूप में दिया है। इसका कर्मकाण्ड और विधि विधान जितना चमत्कारी है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसका तत्त्वदर्शन। कुण्डलिनी विधान जानने से पहला उसका दर्शन जानना आवश्यक है। प्रतिपादन यह है कि काम -कला को ब्रह्मविद्या के रूप में परिवर्तित किया जाए। इसे विज्ञान की भाषा में ट्रान्सफॉर्मेशन-रूपान्तरण कहते हैं।
साधना के साथ पूरी तरह सम्बन्धित है। कौरव दल इन्हीं कुसंस्कारों का नाम है, जो निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे है और वातावरण में घुसी अवांछनीयता के कारण भड़कते हैं। कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा। आत्मिक गरिमा पर असुरता आच्छादित हो रही है।
साधना के चमत्कारी परिणामों का वर्णन योग ग्रंथों में मिलता है। उसे अनेकों प्रकार की सिद्धियों का एक समर्थ माध्यम माना गया है। योगियों में विलक्षण विलक्षण सामर्थ्य विकसित हो जाने का वर्णन पढ़ा-सुना और देखा जाता है। यह संकल्प-युक्त प्राण-साधना का ही परिणाम है। व्यक्तित्व में प्राण का संचय करते रहने से अनेकों प्रकार की शक्तियाँ अपने आप ही विकसित हो जाती हैं।
साधना-विधि में बोले जाने वाले विनियोग एवं न्यास से सिद्ध हो जाता है।
साधना के अनिवार्य कर्तव्य को करते हुए अपनी आन्तरिकता को मुझसे जोड़ो। स्वयं को मेरे अलौकिक अस्तित्व से एकाकार करो। जो मैं हूँ, तुम वही बनो। भगवत् पवित्रता के लिए भक्तों के हृदय विभिन्न मंदिर हैं, जहाँ सुगंधित धूप की तरह विचार ईश्वर की ओर उठते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, उसका आध्यात्मीकरण कर लो।
साधना का प्रयोजन पूरा नहीं होता। आत्मिक प्रगति के लिए मात्र चित्त की नहीं-गहराई में उतरकर चित्तवृत्तियों के निरोध की बात सोची जानी चाहिए। चित्त-निरोध और चित्तवृत्तियों के बीच का अन्तर प्रत्येक विचारशील के मन-मस्तिष्क में स्पष्ट रहना चाहिए।
साधना महासमर भावविह्वल होकर किये गये सुनिश्चित विधि- विधानपूर्वक गायत्री जप-अनुष्ठान द्वारा जीता जा सकता है एवं भावी विषम संभावनाओं को निरस्त किया जा सकता हैं, यह विश्वास रखकर हर साधक को बिना प्रभाव के इसमें जुटे रहना ही चाहिए।
साधना है ही असम्भव को सम्भव बनाने वाला विज्ञान, परन्तु इसको करने के लिए आवश्यक पात्रता चाहिए। कुपात्र में तो अमृत भी विष बन जाता है। सत्पात्र विष को भी औषधि के रूप में प्रयुक्त पात्र हैं उनके लिए यह द्वार आज भी खुला रहेगा।
साधना ने अपनी अनोखी सिद्धि प्राप्त की। आज से ५१ साल पहले १५ अगस्त के दिन पूरा देश थिरक उठा था। पंडित नेहरू ने दिल्ली में लाल किले की प्राचीर से गुलामी के प्रतीक यूनियन जैक के स्थान पर स्वतन्त्रता का तिरंगा झण्डा फहराया था और देशवासी जूझ उठे थे। हमारे सदियों पुराने सपने साकार हो गए थे और चेहरे चमक उठे थे। यह स्वतन्त्रता केवल हमारे लिए ही महत्वपूर्ण नहीं थी।
साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी से योग-साधना में निरत है, वहीं चिरकाल तक आनन्द पाता है।
साधनावर्ष के कार्यक्रमों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इस क्रम में समय निकालकर उन्हें शान्तिकुञ्ज में चलने वाले नौ दिवसीय सत्र में अवश्य सम्मिलित होना चाहिए। इसके प्रभाव से उनके भीतर दबी पड़ी महानता निखरेगी, साथ ही वे महाकाल की वाणी को अपने अंतर्मन में साफ-साफ सुन सकेंगे।
साधना भी है-सिद्धि भी।’ साधना जब सिद्धिदात्री बन जाए तो फिर चाहिए क्या एवं यह भक्तियोग के समर्पण वाले, विसर्जन वाले मार्ग पर चलकर प्राप्त करना अत्यन्त सरल है। प्रीति करें तो कैसे? प्रीति होती उससे है, जिसके हम पास रहते हैं- जिसकी हमें हर पल याद बनी रहती है। लौकिक दृष्टि से दो पड़ोसी भी एक साथ रहते हैं, तो लगाव पैदा हो जाता है-आपस में प्रीति भरे संबंध बन जाते हैं।
साधना का दूसरा चरण है।
साधना से उनने आत्मिक प्रगति के सोपान चढ़े। हमें भक्ति के इस स्वरूप को इसी रूप में समझना चाहिए।
साधनाएँ हमेशा ही किसी साध्य की प्राप्ति के लिए ही जाती है। उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उद्देश्य भावनात्मक स्तर को प्रयत्नपूर्वक ऊँचा उठाना है यदि आस्थाओं का स्तर न बदला जा सके और मात्र चित्र-विचित्र शारीरिक क्रियाओं को करते रहा जाय तो इतने भर का प्रभाव केवल शरीर तक ही सीमित रह जाएगा। चेतना का परिष्कार सम्भव न बन पड़ेगा। जो साधना का मूलभूत उद्देश्य है। साधना के तत्त्वदर्शन को और भी अधिक बारीकी से समझना हो तो इसे चार बिन्दुओं में स्पष्ट करना पड़ेगा- (१) आत्मज्ञान (२) ब्रह्मज्ञान (३) तत्त्वज्ञान, (४) सद्ज्ञान।
साधना एवं कर्म-योग को यदि एक पलड़े पर रखें व दूसरे पर भक्ति को, तो भक्ति वाला पलड़ा ही भारी लगता है। ज्ञान में वेदान्त को शीर्षस्थ माना गया हैं वेद का शीर्ष है-वेदान्त जिस में उपनिषद्, श्रीमद्भागवतगीता एवं ब्रह्मसूत्र के रूप में ‘प्रस्थनत्रयी’ के तीन घटक बताए गए है। ज्ञानमार्ग में वेदान्त के चार महावाक्य हैं-तत्त्वमसि सोऽहम्, अयमात्मा ब्रह्म, सर्व खिल्विदं ब्रह्म। इन चार महावाक्यों को जीवन में प्रतिष्ठित कर लेना सामान्य व्यक्ति के लिए एक बहुत अत्यन्त ही कठिन कार्य है। देह के रहते आज के इस भौतिकवादी युग में किसी एक की भी प्रतिष्ठा लगभग असंभव है।
साधना के उत्कर्ष में यही एक निष्कर्ष निकलता है कि हम विश्व-चेतना के एक अंश मात्र हैं। समष्टि ही आधारभूत सत्ता है, हम उसकी छोटी चिंगारी भर हैं। एकता को शाश्वत समझा जाय-पृथकता को कृत्रिम। सबको अपने में, अपने को सबमें समाया हुआ देखा, समझा और माना जाय। सबके दुःख में अपना दुःख माना जाय, सबके सुख में अपना सुख।
साधना-परायण लोग लोकप्रवाह की परवाह न करके स्वतन्त्र चिन्तन की नीति अपनाते हैं और जीवनमुक्ति का आनन्द लेते है।
साधना मूलतः भाव, ज्ञान और कर्म के अदृश्य तथ्यों पर आधारित है पर सर्वसाधारण का दृश्यमान परिचय प्राप्त हो सके, इसके लिए बारहवर्षीय प्रत्यक्ष पुरश्चरण की आवश्यकता पड़ी। उपयुक्त वातावरण बनाने, इसे अपनाने और प्रवाह में बहने की इससे आशा की गयी है। सन् १९८१ से आरम्भ हुआ यह पुरश्चरण सफलतापूर्वक अपने १० वर्ष पूरे कर रहा है। प्रज्ञासंस्थानों और प्रज्ञामण्डलों में उसकी छोटी अनुकृतियाँ साप्ताहिक सत्संगों के रूप में हो रही है। दीपयज्ञों के विशालकाय समारोह इसी संदर्भ में हो रहे हैं और भी अनेक गतिविधियों का उद्घाटन, शुभारम्भ, विस्तृतीकरण अपने ढंग से होता रहा है, जिनका प्रत्यक्ष परिचय परिजनों को समय-समय पर मिलता रहा है- आगे भी समय-समय पर यही क्रम जारी रहेगा।
साधनाक्षेत्र में समर्पण का असाधारण महत्व बताया गया है। अपने निज के पुरुषार्थ के बलबूते तो एक सीमा तक ही बढ़ा जा सकता है। बाह्य अनुदान न मिले होते तो मनुष्य का प्रगतिपथ पर एक पग भी आगे बढ़ा पाना संभव न रहा होता। गर्भस्थ शिशु की स्थिति से जन्म के बाद भी बहुत समय तक मनुष्य दूसरों के सहयोग के बल पर ही अपनी विकासयात्रा पूरी कर पाता है। माँ के अनुदान न मिलें तो वह गर्भ में दम तोड़ देगा एवं माता-पिता से लेकर समाज का उसे भिन्न-भिन्न रूपों में सहयोग न मिले तो वह जन्म के बाद की प्रगति व्यवस्था के क्रम में आगे बढ़ नहीं सकेगा।
साधना और उसे सम्पन्न करने वाले साधक समाप्त हो गए। उनका विकल्प बनाने की जिम्मेदारी समाज को थी। समाज अपना दायित्व निभा न सका। उसने उनकी जगह जो बुत खड़े किए, वे सब मिट्टी के ऐसे बुत थे, जिनके पेट में जो भी चला जाता था, वह लौटकर नहीं आता थे। उनके लिए मूल्यहीनता हैं।
साधना के महात्म्य प्रकरण में बताया गया है।
साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। धन और ऋण तार मिलने से विद्युत धारा प्रवाहित होती है। दोनों तारों में बहती तो वह पहले से ही है, पर परिचय तभी मिलता है जब दोनों का मिलन हो। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है।
साधना से झरने वाले अमृतबिंदुओं की ओर प्यासे चातक की भाँति टकटकी लगाये है। साधना तो वह विरासत है, जो मैंने तुम्हें सौंपी है। इससे प्राप्त होने वाली अनंतशक्ति तुममें समा जाने के लिए आतुर है। परावाणी की यह गूँज ध्यान के उन्मीलन के बाद भी बनी रही। उनके स्वर अभी भी अन्तर्चेतना में झंकृत हो रहे थे-उठो जागो!! और साधक बनो!!!”
साधना की अनगिनत प्रक्रियाएँ एवं प्रयोग हैं। उनमें से किसी को भी अपनाने से पहले उसके स्वरूप और परिणति के बारे में भली प्रकार विचार कर लेना चाहिए। अन्धश्रद्धा से प्रेरित होकर किसी तथाकथित मार्गदर्शक के कथन-प्रोत्साहन को आँखें बन्द करके अपना नहीं लेना चाहिए अन्यथा अनुपयुक्त चयन हानिकारक भी हो सकता। जिस लाभ की कल्पना की गयी थी, उसकी मिलना तो दूर, उल्टे हानिकारक परिस्थितियों में फँसना पड़ सकता है।
साधना-विज्ञान में मनुष्य के यह तीन शरीर बताए गए हैं। जिस प्रकार केले के तने को चीरने पर उसमें एक के भीतर एक परतें निकलती हैं, उसी प्रकार आँखों से दीख पड़ने वाले रक्त-माँस से बने इस स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर है। इसके भीतर एक कारण शरीर का अस्तित्व विद्यमान है। जिस प्रकार हम शरीर के ऊपर बनियान, उसके ऊपर कुर्ता, उसके ऊपर उपर्युक्त तीन आवरण धारण किए हुए हैं।
साधना। इसे ज्ञानयज्ञ का रूप देना चाहिए। समाज में सद्विचारों का सर्वाधिक अभाव है। विश्वव्यापी शोक-सन्ताप का यही कारण है। जनमानस का स्तर परिवर्तित करने का ही दुःख-दारिद्र्य की प्रचण्ड आग बुझेगी।
साधनाएँ व्यक्ति के अंतराल में ऐसे तत्वों की प्रतिष्ठापना कर सकने में समर्थ होती है, जिनके सहारे विकृतियों के माहौल से लड़ सकना और उन्हें पूरी तरह निरस्त कर सकना हो सके। सामयिक विकृतियों समस्याओं और विभीषिकाओं के समाधान में उसका अनुपम योगदान हो सकता है, साथ ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का सबसे बड़ा आधार भी उसी के सहारे खड़ा हो सकता है। स्मरण रहे, इक्कीसवीं सदी में जिस उज्ज्वल भविष्य का दिव्यदर्शन किया गया है, वह साधनों की बहुलता से नहीं, व्यक्तित्वों की प्रखरता और पवित्रता से ही साकार होगा। अध्यात्म साधनाओं को समझने स्वीकार करने और अपनाने से ही भविष्य में प्रगति और समृद्धि का विस्तार सम्भव बन सकेगा।
साधना का अनिवार्य अंग है, यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए। जो नीतियाँ उन्नत उन्नत राष्ट्र के लिए कही जाती हैं, वे सबकी सब चरित्र साधना के अंतर्गत ही आ जाती हैं। नेकी, ईमानदारी, व्यवहारशुद्धि, सत्य सहयोग और सहानुभूति यह सब उसके अंग हैं। हमारे राष्ट्रीय जीवन में जब तक यह श्रेष्ठता विद्यमान रही, तब तक अपना यह देश संसार भर का सिरमौर बना रहा, किन्तु पिछले दिनों पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण का जो प्रवाह चला, उसने यहाँ की जीवन-गति को ही अशुद्ध बना डाला। जो सिद्धान्त मानवता के विपरीत पड़ते हैं, पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से यह अधिक तेजी से विकसित हुए।
साधना करके सफलता प्राप्त कर सके। पात्रतायुक्त अधिकारी साधक और और अनुभवी सुयोग्य मार्गदर्शक की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही ग्रंथों में इस गूढ़ विद्या पर प्रायः संकेत ही किये गये हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ का अवलम्बन उच्चस्तरीय स्तर तक पहुँचा सकता है वरन् उसे वह विवेक-दृष्टि और साहसिकता भी प्रदान कर सकता है, जिसके सहारे व्यक्तित्व में सन्निहित अनेकानेक प्रतिभाओं को भी प्रखर परिष्कृत किया जा सके। जड़ पदार्थ को भौतिक-विज्ञान ने अनगढ़ स्थिति से अविज्ञान के गर्त से उबारा और मानवीय विधा-सम्पादन की दृष्टि से असाधारण रूप से उपयोगी बनाया है, परंतु व्यक्ति की आंतरिक संरचना एवं समाज की प्रवृत्तियों में अपेक्षित परिवर्तन लाने के लिए अध्यात्म-विज्ञान को भी प्राचीनकाल की तरह इन दिनों अपनी वरिष्ठता सिद्ध करनी है और प्रमाणित करना है। व्यक्तित्व को प्रखर बनाने, स्तर की दृष्टि से असाधारण रूप से समुन्नत बनाने की क्षमता उसमें विद्यमान है। आध्यात्मिक साधनाओं में महान शक्ति हैं निश्चित रूप से विज्ञान से भी बड़ी। विज्ञान मात्र सुविधा-संवर्द्धन में समर्थ है, जबकि आध्यात्मिक साधनाएँ व्यक्ति के अंतराल में ऐसे तत्वों की प्रतिष्ठापना कर सकने में समर्थ होती है, जिनके सहारे विकृतियों के माहौल से लड़ सकना और उन्हें पूरी तरह निरस्त कर सकना हो सके।
साधना में भी प्राणायाम की क्रिया से अधिक महत्व भावना, इच्छा, संकल्प का है। प्रायः देखा जाता है कि एक जैसे साधना विधान पूरे करते हुए भी एक व्यक्ति चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेता है, जबकि दूसरा कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता। साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने-न होने के रूप में समझा जा सकता है।
साधना यही है। इसी में अध्यात्म तत्त्वज्ञान के समस्त सूत्र सँजोये हुए हैं। इस ट्रान्सफॉर्मेशन का-रूपान्तरण का सत्परिणाम, महान जागरण, महान परिवर्तन दिव्य जीवन के रूप में सामने आता है। कामबीज का यह ब्रह्मसमर्पण कितना श्रेयस्कर होता है इसे कुण्डलिनी महाविज्ञान की जागरण साधना एवं तत्वभावना को अपनाकर जाना जा सकता है।
साधना के अंतर्गत ही आ जाती हैं। नेकी, ईमानदारी, व्यवहारशुद्धि, सत्य सहयोग और सहानुभूति यह सब उसके अंग हैं। हमारे राष्ट्रीय जीवन में जब तक यह श्रेष्ठता विद्यमान रही, तब तक अपना यह देश संसार भर का सिरमौर बना रहा, किन्तु पिछले दिनों पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण का जो प्रवाह चला, उसने यहाँ की जीवन-गति को ही अशुद्ध बना डाला। जो सिद्धान्त मानवता के विपरीत पड़ते हैं, पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से यह अधिक तेजी से विकसित हुए। विलासिता एवं प्रदर्शन को यहाँ इतना अधिक महत्व दिया गया, जिससे भोगवाद यहाँ के आकर्षण का मूल बिन्दु बन गया।
साधना के द्वारा ही लाभ प्राप्त हुआ है। गायत्री महापुरश्चरण भी इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें चौबीस लाख परिजन भाग ले रहे हैं। अनेकों कार्यक्रम भी इस श्रृंखला में आयोजित हो रहे हैं, जिसका वातावरण पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। महात्मा गाँधी के आन्दोलन में भी इस प्रकार की सामूहिक साधना का कम महत्व नहीं रहा है।
साधनाओं का अभिनव जागरण भी कह सकते हैं।
साधनाओं के आधार पर ही संभव हो सकते हैं। इन कार्यों का भारी उत्तरदायित्व वहन कर सकने की क्षमता केवल देवत्व-सम्पन्न महामानवों में ही मिलेगी। अतएव नवनिर्माण के कर्णधारों, सूत्र-संचालकों सेनानायकों को इन्हीं दिनों स्वयं के व्यक्तित्व को साधना की प्रचण्ड ऊर्जा से ओजस्वी बनाना आवश्यक है।
साधना के तत्त्वदर्शन को और भी अधिक बारीकी से समझना हो तो इसे चार बिन्दुओं में स्पष्ट करना पड़ेगा- (१) आत्मज्ञान (२) ब्रह्मज्ञान (३) तत्त्वज्ञान, (४) सद्ज्ञान। आत्मज्ञान वह है जिस में जीव का, जीवन का, अन्तः चेतना के उत्थान-पतन का निरूपण किया जाता है और आत्मा-चिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का सूक्ष्मदृष्टि से प्रकाश-युक्त मार्गदर्शन किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इसे जीवात्मा की विवेचना कह सकते हैं।
साधना ग्रन्थों में मिलता है, उसे परमात्मसत्ता के साथ जीवात्मा के सान्निध्य-संपर्क की सुनिश्चित प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। ईश्वरप्राप्ति को जीवन-लक्ष्य की पूर्ति, पूर्णता में परिणति, परमपुरुषार्थ, परमलाभ आदि नामों से पुकारा जाता है। आत्मा को परमात्मा की उच्चस्थिति में विकसित कर लेने वाले व्यक्ति, निस्संदेह नर रूप में नारायण कहे जा सकते है। उनकी विशेषताओं-विभूतियों का पारावार नहीं रहता।
साधना की गहराइयाँ जानी हैं, वे जानते हैं कि वेद मुक्तिमार्ग हैं इसलिए व्यक्तिपरक है, क्योंकि मुक्ति सामूहिक स्तर पर सम्भव नहीं। किन्तु तंत्र-साधना प्रवृत्ति और निवृत्तिपरक होने के नाते व्यक्ति और समाज दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। संग में विस्तार है और विस्तार की अपनी आवश्यकताएँ हैं, इसलिए तंत्र प्रवृत्तिपरक है किन्तु उस प्रवृत्ति मूल में वह एकत्व को ढूँढ़ता है, इसलिए निवृत्ति उसका चरम है।
साधना व श्रीरामनाम जप ने ही उन्हें यह नाम दिलाया।
साधना क्यों न हो, उसके साथ उत्कृष्टता की पक्षधर भाव-संवेदनाओं का जुड़ा रहना आवश्यक है, क्योंकि आत्मपरिष्कार की बात इसी समन्वय के आधार पर बनती है।
साधना का व्यावहारिक पक्ष है और विस्तार का ज्ञान प्राप्त करके उसके मूल रूप को जानना तंत्र साधना का ज्ञान मार्ग है। जिसे आत्मपक्ष कहा जाता है।
साधना का महत्व सर्वाधिक बताया गया है।
साधना विज्ञान का मूलभूत एक ही उद्देश्य है, श्रेष्ठ, सुसंस्कृत देवमानव का निर्माण। ऋषि यह मानते हैं कि जन्म-जन्मान्तरों की वासनाओं का लेप जीवात्मा पर रहता है। मनुष्य योनि में ही वस्तुतः आत्म-तत्व पकड़ में आता है। वैदिक व्यवस्था यह करती है कि संस्कार साधना के द्वारा जीवसत्ता के मानवगर्भ में आते ही उस पर छाए मलिनता कषाय-कल्मषों को हटा दिया जाए और उसे ऐसा शिक्षण दिया जाए और उसे ऐसा शिक्षण दिया जाए, जिससे कि वह अपने खोए स्वरूप को पुनः पा सके। ऋषिगणों ने मानवजीवन को आत्मा की विराट यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना वह गहन समीक्षा कर गर्भ में आने को लेकर चिता में समर्पण तथा उसके बाद भी मरणोत्तर विराम तक महत्वपूर्ण मोड़ों पर जीवात्मा को सँभालने-सँवारने की व्यवस्था की है।
साधना का स्वयं के लिए निर्धारण करे उसका कर्मयोग सध भी जाता है एवं आरोग्य-दीर्घायुष्य के रूप में फलित भी होता है। आज की परिस्थितियों में यह भी बड़ा दुष्कर कार्य है।
साधना का श्रेष्ठतम स्वरूप है। आत्मकल्याण की साधन इससे कम साहस में हो ही नहीं सकती। कहना न होगा कि तप-साधना से निखरा हुआ व्यक्तित्व अपने आप में एक देवता होता है और उसके अपने ही चमत्कार-वरदान इतने अधिक होते हैं कि तपस्वी को देवोपम सिद्ध पुरुष की संज्ञा दी जा सके।
साधना को अपनाने वाला साधक अपनी समस्त इच्छाओं, आकांक्षाओं को परमात्मा को समर्पित कर देता है। कर्मफल के प्रति उसकी आसक्ति नहीं रहती। अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों के प्रति वह तत्पर और सजग रहता है। उनके निर्वाह में सन्तोष की अनुभूति करता है। शरीर से कर्म और मन से चिन्तन करते हुए भी वह सांसारिक पदार्थों एवं व्यक्तियों के प्रति अनासक्त होता है।
साधना में साधक को अपने भाव के अनुरूप लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचे गए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़तापूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त कुण्डलिनी को-प्राणाग्नि को अपने प्रचण्ड आघातों द्वारा जगा रहा है। प्रहार के उपरान्त प्राण को सूर्य नाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता को प्रकाशित-आलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
साधना करो-जीवो ब्रहमेव ना परः’ से ही तुम्हारा कल्याण होगा।” एक दिन नाभादास ने उन्हें भावजगत में ले जाकर गोलोक धाम की सारी लीलाएँ दिखाई। यह आभास कराया कि भक्ति का मार्ग ज्ञानमार्ग से कितना ऊँचा है। नाभादास की सरलता-निष्कपट व्यवहार, कृष्ण सखा वालों स्वरूप ने मधुसूदन को ज्ञानी से भक्त बना दिया। उपर्युक्त संस्कृत श्लोक इसके बाद ही मधुसूदन सरस्वती ने लिखा था।
साधना का पहला भाग है। उत्तरार्ध में प्राण को पिंगला (मेरुदण्ड के दक्षिण मार्ग के धन विद्युतप्रवाह) में से होकर वापस लाया जाता है। जाते समय अन्तरिक्ष स्थित प्राण शीतल होता है। ऋणधारा भी शीतल मानी जाती है। इड़ा को-पूरक को चंद्रवत् कहा जाता है।
साधना के द्वारा प्राणऊर्जा का अभिवर्द्धन साधक की भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करता है।
साधना की सहज पूर्ति कर सकने वाले अनुदान कर सकते हैं। सत्कर्म, सद्ज्ञान और सद्भाव मही वे उपलब्धियाँ हैं, जिनके सहारे महामानव, ऋषि और अग्रदूत बनने का अवसर मिलता है। इनमें से इन दिनों जिसे अपने लिए जिस स्तर की आवश्यकता अनुभव होती हो, वह उन्हें इन दिनों बिना किसी अड़चन के उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध कर सकता है। प्रसाद वितरण चल रहा हो तो उससे राहगीर भी लाभ उठा सकते है।
साधनारत ऋषिगणों की तपश्चर्या के साथ जुड़ने की ठीक यही समय है। धरती के जीवन का भाग्योदय इन्हीं दिनों होने वाला है। दैवी प्रयास इतने तीव्र होने जा रहे है कि उसमें यदि हमारी साधना का सम्पुट लग भर जाय तो न केवल परिवर्तन शीघ्र होगा- हम उसके केन्द्र में एक भूमिका निभा रहे होंगे। आने वाले समय के अनुरूप हम सभी बन सकें- उसमें अपना जीना सुनिश्चित कर सके- उसके लिए हम सभी को अपनी तैयारी करनी होगी। बदलने जा रही-बनने जा रही दुनिया के अनुरूप हमें अपने आपको भी बदलना होगा एवं यह कार्य मात्र साधना के ब्रह्मास्त्र संभव हैं अब यह व्यक्ति ही नहीं, सामाजिक आवश्यकता भी बन गयी।
साधना जगह-जगह पर चल रही है। अगर आप विचार करेंगे तो यह पायेंगे कि यह समय बहुत ही संकटकालीन है। इस समय इस धरती पर महामारी, युद्ध के बादल, वायु-प्रदूषण जैसे अनेक संकट घटाटोप की तरह छाये हुए हैं, जिससे महाप्रलय जैसी स्थिति बनती जा रही है। इस परिस्थिति को देखते हुए हमने आप लोगों को गायत्री महापुरश्चरण करने की सलाह दी थी और इस बात पर जोर डाला था कि आपको यह साधना करनी चाहिए। समय की माँग, समय की पुकार यह है कि इन दिनों वातावरण में जो अवांछनीय तत्वों का घुलन एवं मिलन हो गया है, उसे समय रहते निरस्त किया जाय, ताकि जनसाधारण की स्थिति ठीक हो सके एवं सभी को खुले वातावरण में साँस लेने का मौका मिल सके।
साधना करनी चाहिए। समय की माँग, समय की पुकार यह है कि इन दिनों वातावरण में जो अवांछनीय तत्वों का घुलन एवं मिलन हो गया है, उसे समय रहते निरस्त किया जाय, ताकि जनसाधारण की स्थिति ठीक हो सके एवं सभी को खुले वातावरण में साँस लेने का मौका मिल सके। आवश्यकता इस बात की है कि वातावरण को स्वच्छ बनाया जाय। आज का वातावरण बहुत दूषित हो चुका है। यह ऐसा है जो बच्चे के मस्तिष्क के ऊपर सीधा प्रभाव डालता है।
साधना ही कहा जा सकता है।
साधना से निखरा हुआ व्यक्तित्व अपने आप में एक देवता होता है और उसके अपने ही चमत्कार-वरदान इतने अधिक होते हैं कि तपस्वी को देवोपम सिद्ध पुरुष की संज्ञा दी जा सके।
साधना के रूप में संबोधित किया गया है।
साधना का एक ही अर्थ है राष्ट्रीय चरित्र का विकास। चरित्रबल मानवीय शक्ति का मूल आधार है। पारस्परिक सहयोग द्वारा उद्योगों को बढ़ाना और अर्थव्यवस्था को सुधारना समाज-सुधार के एक अधिक आवश्यक अंग की पूर्ति करना है, पर समाज का वास्तविक उत्थान तभी हो सकता है, जब जन-जन में कर्तव्यपरायणता, धार्मिक सहिष्णुता, सच्चाई और सच्चरित्रता की भावनाओं का भरपूर समावेश हो, अपने देश की प्राचीन संस्कृति की यही विशेषता रही है कि लोग स्वयं का संयम करना सीखें। बढ़ी हुई शक्तियों को सीधे से पचा ले जाना संयम से ही सम्भव है। केवल साधनों की तृष्णा बढ़ती रहे और साधना का विकास न हो तो उन्नति का मूल उद्देश्य नष्ट होकर दुर्भावनाओं का विकास होने लगेगा।
साधनापरक तपश्चर्या की साधना में जहाँ व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घण्टे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का विधान है। यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है, जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार, वातावरण में सृजन-चेतना का समावेश और नवनिर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान तीनों ही पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की इस भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।
साधना कर पाना आज संभव नहीं है-मन के तल से आरंभ कर अंतःकरण की ओर जाना व समर्पण भाव से परमात्मचेतना में स्वयं को प्रतिष्ठित कर सकना भक्तियोग से ही संभव है। गीता में योग को साधने की अनिवार्य शर्तों के रूप में जो वर्णन आया है। उसमें बताया है-
साधना के द्वारा पूर्ण होता है। मनोवृत्तियों की वासना-तृष्णा से विरत कर संयम-परमार्थ में प्रवृत्त करना साधना का उद्देश्य है। इस मार्ग पर जितना आगे बढ़ा जाता है, उतनी ही आन्तरिक पवित्रता निखरती है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्यदर्शन होता है।
साधना परमपूज्य गुरुदेव ने १९७०-७१ की अखण्ड ज्योति में वर्णित की है कि किस तरह इस साधना से उनने आत्मिक प्रगति के सोपान चढ़े। हमें भक्ति के इस स्वरूप को इसी रूप में समझना चाहिए।
साधना है। कोशों के जाग्रत होने पर व्यक्ति का स्तर कैसा होता है, इसकी जानकारी शिव गीता में इस प्रकार दी गई है-
साधना के लक्ष्य को समझा और उसे पूरा करने की दूरदर्शिता का परिचय दिया। तपस्वी जीवन की रीति-नीति अपनाने के लिए जिस साहसिकता का परिचय देना पड़ता है, वह है- दुनियादारी से भिन्न प्रकार की रीति-नीति अपनाने में भय या संकोच न अनुभव करना।
साधना के अमोघ हथियार से। परोक्ष को साधकर ही प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित इस दर्शन को उलटा जा सकता है। उलटे को उलट कर सीधा करना ही विचारक्रांति है। यही इस युग के महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया है।, जिसे युगसाधना के माध्यम से अगले दिनों संपन्न होना हैं
साधना करते रहने की सजीवता जहाँ भी होगी, वहीं जीवन की सारी अलौकिक विभूतियाँ सामने खड़ी दिखाई देंगी।
साधना का बताया गया हैं, जिसकी विशद व्याख्या भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म की पराकाष्ठा के रूप में गीता के छठवें अध्याय में ‘आत्मसंयम योग’ नामक अध्याय में की है। योग में पतंजलि द्वारा बताया राजयोग एवं गोरखनाथ द्वारा बताया गया हठयोग सुप्रसिद्ध हैं। दोनों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है-समय की सुव्यवस्था, खानपान का संयम, नियमित योगाभ्यास। आजकल के प्रदूषण भरे भौतिकता प्रधान युग में संयम कितना सध सकता है, इसे अपने अंदर झाँककर देखा जा सकता है। पत्र-पत्रिकाएँ समाचार पत्र, केबल टीवी-फिल्मों से भरी बहिरंग की दुनिया में सतत् चिंतन क्षेत्र पर कुविचारों का आक्रमण होता रहता है।
साधना निराली थी। उन्होंने मुक्ति संग्राम और अहिंसा को इस तरह एक साथ जोड़ दिया कि दुनिया चकित रह गयी। एक ओर ऐड़ी से चोटी तक हथियारों से लदा हुआ ब्रिटिश साम्राज्यवाद था और दूसरी ओर निहत्थी परन्तु अनोखे चरित्रबल से ओत-प्रोत जनशक्ति थी। परन्तु महात्मा गाँधी के नेतृत्व में राष्ट्रसाधकों ने हथियारों पर विजयी होकर विश्व को एक नयी शक्ति से अवगत कराया। संसार को हमारे स्वतन्त्रता संग्राम की यह नयी देन थी।
साधना चौबीस साल तक करके इस महामंत्र के चौबीस अक्षरों में चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को सुसंस्कृत बनाने वाले सभी तत्व कूट-कूट कर भरे हैं। आपके द्वारा इस तरह की जानकारी अगर जन-जन तक पहुँचायी जा सकी तो हमारा पूर्ण विश्वास है कि लोकचिंतन और व्यवहार-प्रचलन में उस उत्कृष्टता का समावेश हो सकता है।, जो युग विभीषिका से जूझने और उज्ज्वल भविष्य की संरचना में पूर्ण तथा सफल हो सके।
साधना का तत्त्वदर्शन इन चारों ज्ञान प्रक्रियाओं के परिष्कार एवं समन्वय के आधार पर विनिर्मित होता है। इसके पारंगतों को मनीषी, ऋषि, तत्त्वज्ञानी ब्रह्मवेत्ता, द्रष्टा, आत्मदर्शी आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। वे अपने में परमात्मा का दर्शन करते हैं। इन चारों के समन्वयात्मक स्वरूप की अभिव्यक्ति साधना के क्रियात्मक पक्ष से होती है, जिसे ‘तप’ कहते हैं। इसे तीन बिन्दुओं में स्पष्ट किया जा सकता है- (१) आत्म-निग्रह के लिए की गयी तितिक्षा (२) परमार्थ प्रयोजनों के लिए त्याग और बलिदान, (३) साधनात्मक कर्मकाण्डों के माध्यम से आत्मशिक्षण की प्रसुप्त शक्तियों का जागरण।
साधना उच्चस्तरीय प्रशिक्षण। भजन-पूजन से मन की प्रवृत्ति माया से ब्रह्म की ओर मुड़ जाती है। ईश्वर के स्मरण और सान्निध्य की उपयोगिता प्रतीत होती है। आत्मकल्याण का मार्ग मिलता है। इससे आगे का प्रयोजन साधना के द्वारा पूर्ण होता है।
साधना की सफलता में सद्गुरु का महत्व सर्वोपरि बताया गया है। अंतःप्रकृति का, चक्रों-उपत्यिकाओं इड़ा-पिंगला-सुषुम्ना आदि नाड़ियों का, उनके परिष्कार का ज्ञान भी गुरुकृपा से ही मिलता है। गुरु इनसान रूप में वस्तुतः सच्चिदानन्द घनरूपी परमात्मा का दर्शन कराने वाली झरोखे रूपी सत्ता हैं उसी के माध्यम से हमें अनंत का विस्तार दिखाई पड़ता हैं गुरु के बिना अनुभवों में समग्रता नहीं आ पाती। साधना एक प्रकार से शरीर रूपी मकान में वायरिंग के समान हैं उसका स्विच ऑन करने का काम गुरु ही करता है। भगवान तो निराकार चैतन्यमयी सत्ता है।
साधना की उच्चतम सोपानों पर पहुँच सकता है। मानरहित गुरु की भक्ति साधक को सब कुछ दे सकने में समर्थ है गुरु शिष्य के, भक्त के बने बनाए व्यक्तित्व को कूट-कूट कर मिट्टी बनाकर उससे एक नया खिलौना बनाता है, यदि वह उसके प्रति पूर्ण समर्पित हो जाय। परमपूज्य गुरुदेव इसी को गलाई-ढलाई धुलाई-रँगाई नाम से संबोधित करते थे।
साधना का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि उसमें कुछ भी छूटा नहीं हैं। सारा स्थूल और ज्ञानेन वचसा अगम्य महाकाल भी इसी तंत्र-साधना के विस्तार में आते हैं। तंत्र-साधना के द्वारा परकाया प्रवेश, अणिमा आदि सिद्धियाँ, कायाकल्प आदि सब कुछ सम्भव है। सत्य तो यह है कि साधना है ही असम्भव को सम्भव बनाने वाला विज्ञान, परन्तु इसको करने के लिए आवश्यक पात्रता चाहिए। कुपात्र में तो अमृत भी विष बन जाता है।
साधना के द्वारा परकाया प्रवेश, अणिमा आदि सिद्धियाँ, कायाकल्प आदि सब कुछ सम्भव है। सत्य तो यह है कि साधना है ही असम्भव को सम्भव बनाने वाला विज्ञान, परन्तु इसको करने के लिए आवश्यक पात्रता चाहिए। कुपात्र में तो अमृत भी विष बन जाता है। सत्पात्र विष को भी औषधि के रूप में प्रयुक्त पात्र हैं उनके लिए यह द्वार आज भी खुला रहेगा।
साधनाओं में भी इस विशेषता की आवश्यकता पड़ती है। इतना होते हुए भी मात्र इसी विशेषता के आधार पर किसी को योगी नहीं कहा जा सकता।
साधना माना जाय। आत्मसाधना के लिए सर्वस्व का उत्सर्ग करना ही पड़ता है। त्याग-बलिदान का परिचय दिए बिना आत्मकल्याण की साधना में एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। अपनी अमीरी और महत्त्वाकाँक्षाओं को जनकल्याण के लिए समर्पित किए बिना तप-साधना सम्भव नहीं हो सकती। पहाड़ जैसे वैभव के ढेरों में से राई-रत्ती दान-पुण्य करते रहने का कृपण-प्रदर्शन लोगों को बहकाने और आत्मप्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है सच्चे तपस्वी को तो त्याग-बलिदान के अन्तिम चरण तक पहुँचना पड़ता है।
साधना की प्रतिक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। इसमें जो साधक भाग लेंगे, उन्हें आशा से अधिक लाभ प्राप्त होगा। उनको आत्मकल्याण एवं लोककल्याण का दुहरा लाभ मिलता रहेगा। इसके बारे में जब हम चिन्तन करते हैं, तो हमारा मन गर्व से भर उठता है। हमें इस कार्य से काफी संतोष है।
साधना में सबसे सुलभ मार्ग है-भगवान के लीला-प्रसंगों का चिंतन कर-गुणगान कर उनमें मन को लगा देना। देखा जाय तो आर्ष साहित्य में लोकमानस को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, पुराणों के कथा-प्रसंगों ने, जिनमें या तो भक्त की कथा है या भगवान की। आदमी के मन को भगवान के स्वरूप में लीन करने की इनमें जबर्दस्त शक्ति है। श्रीमद्भागवत सर्वाधिक लोकप्रिय है। देवी भागवत एवं रामचरितमानस का भी लगभग इसी के समकक्ष स्थान है।
साधनाओं को समझने स्वीकार करने और अपनाने से ही भविष्य में प्रगति और समृद्धि का विस्तार सम्भव बन सकेगा।
साधना द्वारा प्रविष्ट होता है, वहाँ ईश्वर सर्वदा सन्निकट हैं। वे भौतिक अर्थ में निकट नहीं, किंतु आध्यात्मिक अर्थ में हमारी आत्मा के भी आत्मा के रूप में, वे हमारी आत्मा के सारतत्त्व हैं। स्वयं को साधना के लिए समर्पित कर दो। साधना का उज्ज्वलतम रूप गुरुप्रेम है। जितना तुम मेरे प्रेम में डूबते हो, उतना ही तुम मेरे निकट आते हो, क्योंकि मैं अन्तरम का निवासी हूँ।
साधना जीवात्मा के परिशोधन-परिष्कार की साधना है। जिसके माध्यम से समय-समय पर जीवात्मा पर छाया कषाय- कल्मषों का निष्कासन-निराकरण किया जाता है।
साधना का कम महत्व नहीं रहा है। इसके द्वारा ही दिव्य वातावरण बना और हजारों लोग बलिवेदी पर अपनी कुर्बानी देने के लिए आगे आते चले गये। इस प्रकार की साधना में महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस एवं अरविन्द की साधना का महत्वपूर्ण स्थान हैं, जिन्होंने एक दिव्य वातावरण बना दिया था।
साधनाओं को तपश्चर्या का बहिरंग कलेवर कह सकते है।
साधना उच्चतर आयामों पर पहुँचने लगती है। स्वामी विवेकानन्द ने सच्चे शिष्य के लिए गुरु की कृपा चार शर्तों पर खरा उतरने पर ही बरसने की बात कही है। ये चार शर्तें हैं- (१) सद् और असद् का विवेक (२) ईश्वरप्राप्ति की तीव्रतम इच्छा (३) इस लोक और परलोक के सभी कामनाओं का त्याग (४) गुरु के प्रति अटूट निष्ठा। इसमें चारों ही महत्वपूर्ण है, किंतु यहाँ साधना समर में सफल होने के लिए शिष्यत्त्व की चौथी पहचान ‘गुरु के प्रति अटूट निष्ठा’ प्रकरण पर थोड़ा प्रकाश डालना चाहेंगे।
साधना को व्यावहारिक विस्तार देते हैं।
साधना का अतीव महत्व है। कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण के लिए प्राणऊर्जा की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ती है। यह प्रयोजन इसी से पूरा होता है। प्राण-साधना के द्वारा प्राणऊर्जा का अभिवर्द्धन साधक की भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करता है।
साधना की जाए, तो प्रथम आठ संस्कार प्रवृत्तिमार्ग में शेष आठ मुक्तिमार्ग पर मनुष्य को पहुँचा देते हैं ऐसी महर्षियों की मान्यता है। इस संस्कार साधना की इतनी महत्वपूर्ण फलश्रुतियों के बावजूद इनकी अवज्ञा क्यों होती चली गयी वह आज के आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता प्रधानसमाज में इन्हें उपेक्षा का दृष्टि से क्यों देखा जाता है, यह एक विचारणीय प्रश्न है? परमपूज्य गुरुदेव ने षोडश संस्कारों को युगानुकूल बनाकर इन्हें व्यापक स्तर पर सम्मत प्रतिपादनों द्वारा इन्हें व्यापक स्तर पर सम्पन्न किए जाने की एक सुव्यवस्था प्रक्रिया को जन्म दिया। इसे युगऋषि के द्वारा किया गया संस्कार साधनाओं का अभिनव जागरण भी कह सकते हैं।
साधना अंक में साधना प्रक्रिया के उसी तत्त्वदर्शन पक्ष को स्पष्ट किया गया है। आगामी अंक के व्यावहारिक प्रतिपादन से परिजन जान सकेंगे कि अगले दिनों उन्हें किस स्तर पर अपना साधना -पुरुषार्थ किन-किन रूपों में आगे बढ़ाना हैं यदि हम समय रहते जागकर, अपने जीवन की रीति-नीति को बदलकर, जीवन साधनामय बना सके तो हमसे अधिक सौभाग्यशाली कोई ओर नहीं होगा।
साधनाक्रम को अपनाया जा सकता है।
साधनाओं में महान शक्ति हैं निश्चित रूप से विज्ञान से भी बड़ी। विज्ञान मात्र सुविधा-संवर्द्धन में समर्थ है, जबकि आध्यात्मिक साधनाएँ व्यक्ति के अंतराल में ऐसे तत्वों की प्रतिष्ठापना कर सकने में समर्थ होती है, जिनके सहारे विकृतियों के माहौल से लड़ सकना और उन्हें पूरी तरह निरस्त कर सकना हो सके। सामयिक विकृतियों समस्याओं और विभीषिकाओं के समाधान में उसका अनुपम योगदान हो सकता है, साथ ही उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का सबसे बड़ा आधार भी उसी के सहारे खड़ा हो सकता है। स्मरण रहे, इक्कीसवीं सदी में जिस उज्ज्वल भविष्य का दिव्यदर्शन किया गया है, वह साधनों की बहुलता से नहीं, व्यक्तित्वों की प्रखरता और पवित्रता से ही साकार होगा। अध्यात्म साधनाओं को समझने स्वीकार करने और अपनाने से ही भविष्य में प्रगति और समृद्धि का विस्तार सम्भव बन सकेगा।
साधना का वास्तविक स्वरूप यही है देव-अनुग्रह और अध्यात्मिक प्रगति का स्पष्ट चिन्ह। इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए अनेक आकार-प्रकार की विविध विधि ध्यान-साधनाएँ की जाती हैं। इस तथ्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए।
साधना सम्पन्न करने वालों के शिक्षण हेतु व्यापक प्रक्रिया विकसित की और संस्कारों को साधना का गरिमामय स्वरूप प्रदान किया।
साधना ग्रंथों में अनगिनत स्थानों पर हुआ है। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि, प्राणऊर्जा जीवनशक्ति अथवा कुण्डलिनी कहते हैं। अग्नि में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है, जिसमें अग्नितत्त्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में? होते हैं। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है उसमें सजातीय तत्वों का ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है।
साधनावर्ष जो वसंत पंचमी सन् १९९९ (२२ जनवरी) से वसंत पंचमी सन् २००० (१० फरवरी) तक सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है, इस महापुरश्चरण का अंतिम तीव्र वेग वाला चरा है, जिसका समापन नवयुग के आगमन की वेला में महापूर्णाहुति के साथ होगा।
साधना तो वह विरासत है, जो मैंने तुम्हें सौंपी है। इससे प्राप्त होने वाली अनंतशक्ति तुममें समा जाने के लिए आतुर है। परावाणी की यह गूँज ध्यान के उन्मीलन के बाद भी बनी रही। उनके स्वर अभी भी अन्तर्चेतना में झंकृत हो रहे थे-उठो जागो!! और साधक बनो!!!”
साधना कहलाती है।
साधना के लिए सर्वस्व का उत्सर्ग करना ही पड़ता है। त्याग-बलिदान का परिचय दिए बिना आत्मकल्याण की साधना में एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। अपनी अमीरी और महत्त्वाकाँक्षाओं को जनकल्याण के लिए समर्पित किए बिना तप-साधना सम्भव नहीं हो सकती। पहाड़ जैसे वैभव के ढेरों में से राई-रत्ती दान-पुण्य करते रहने का कृपण-प्रदर्शन लोगों को बहकाने और आत्मप्रवंचना करने के लिए ही उपयुक्त हो सकता है सच्चे तपस्वी को तो त्याग-बलिदान के अन्तिम चरण तक पहुँचना पड़ता है। उसकी निष्ठा और श्रद्धा का परिचय तो अपनी सम्पदा एवं सामर्थ्य का किस सीमा तक विसर्जन किया जा सका-इसी कसौटी पर कसने के बाद प्राप्त होता है।
साधनावर्ष हेतु व्यापक मंथन कर प्रारंभिक प्रशिक्षण सत्रों का स्वरूप निर्धारित कर ४८ स्थानों का चयन कर उनकी तिथियों का निर्धारण कर दिया गया। प्रशिक्षणों का प्रारूप पूर्व निर्धारित ५ दिवसीय आयोजन के स्थान ढाई दिवसीय ही रखा गया हैं एक दिसम्बर से प्रायः जनवरी के तीसरे सप्ताह तक चलने वाले इन क्षेत्रीय प्रशिक्षण सत्रों के नाम व उनकी तिथियाँ इस प्रकार है-
साधना और सत्प्रयोजन का समन्वय हो सके तो उसे व्यावहारिक जीवन का योग कहा जाएगा। इस सुयोग की व्यवस्था जिनने भी बनाई होगी, वे स्वल्प साधनों से भी आशातीत प्राप्ति कर सकने में समर्थ हुए होंगे। जिन्हें यह सन्मार्ग नहीं मिला जो साधनों को, अपनी चित्तवृत्तियों को बालक्रीड़ा के मनोविनोदों में गँवाते रहे और दुर्जनों की भांति उन्हें दुष्कर्मों में नष्ट करते रहे, ऐसे मनुष्यों की जीवन-सम्पदा सुरदुर्लभ होते हुए भी अभिशाप-दुर्भाग्य हो सिद्ध होती रहेगी।
साधना के निर्वाह से जिसका विस्तार बड़े व्यापक क्षेत्र में है, संपन्न होती है एवं इस युग प्रत्यावर्तन की वेला में उसी तीव्रता संपन्न होने जा रही है जिस तीव्रता से अवांछनीयताओं का समावेश चिंतन व चरित्र में हुआ था।
साधना की जाए, जिसकी रहस्यमय क्षमता पर गहन श्रद्धा हो तथा जिसका अनावश्यक विज्ञापन न करके उसे गोपनीय रखा जाए।” गोपनीय से यहाँ आशय है- मिलने वाले फलितार्थ कर उस प्रसंग को हलका न बनाना।
साधना से बन्धनमुक्ति की बात प्रत्यक्ष नजर आने लगती है।
साधनाएँ व्यक्ति के देह कोशों को ही इसके लिए उपयोगी बनाते हैं, ताकि विखण्डन की ऊर्जा को दिशा एवं प्रयोजन के अनुरूप शक्ति के आवेग एवं प्राकट्य को सह सके। यह सब साधना-विधि में बोले जाने वाले विनियोग एवं न्यास से सिद्ध हो जाता है।
साधना है। जिसके माध्यम से समय-समय पर जीवात्मा पर छाया कषाय- कल्मषों का निष्कासन-निराकरण किया जाता है।
साधना प्रशिक्षण सत्रों की घोषणाएँ हो चुकी हैं। सारे भारतवर्ष के ४८ स्थानों पर चार टोलियों द्वारा ये प्रशिक्षण १ दिसंबर १८ से २० जनवरी ११ के बीच पूरे होने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश को हरिद्वार, सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, देहरादून व पूरे गढ़वाल मण्डल हेतु प्रशिक्षण केन्द्र शान्तिकुञ्ज ही रखा गया है। इस क्षेत्र के कार्यकर्ता २९, ३०, ३१ दिसम्बर १९९८ की तारीखों में शान्तिकुञ्ज में एकत्र होंगे। विस्तृत जानकारी हेतु पत्र व्यवहार कर लें।
साधनाएँ इसी प्रकार की है पर यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। भूल होने पर इस राह में खतरे-ही-खतरे हैं। निश्चय ही उससे ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होती हैं, पर उन उपलब्धियों से चमत्कार-प्रदर्शन द्वारा लोगों को विस्मित-चकित कर देने की आकांक्षा मात्र अहंकार ही बढ़ाती है। सिद्धियों द्वारा किसी का तात्कालिक कष्ट-निवारण भी सम्भव है और उसमें थोड़ा-बहुत आत्म–संतोष भी प्राप्त हो जाता है, लेकिन यह मार्ग है जोखिम भरा ही।
साधना के लिए घर से निकलने वालों की संख्या के अनुरूप आत्मोत्कर्ष के धनी कहाँ? इसका सीधा तात्पर्य यह है कि प्रणाली की समग्रता का मर्म नहीं समझा गया। उसे यथारीति अपनाया नहीं गया।
साधना और परमार्थ-परायणता के त्रिविध अभ्यास भी अनिवार्य रूप से करने होते है।
साधना, जो सामूहिक रूप से होने जा रही है, वह भी एक सही कदम है। छेद बन्द करने के साथ ही बर्तन में कुछ भरा भी जाना चाहिए। रोग-निवृत्त ही पर्याप्त नहीं है, पोषण भी मिलना चाहिए। अपराधों को रोकना भी एक काम है, परन्तु इसके साथ ही समाज के अंतर्गत रचनात्मक प्रयत्नों का तारतम्य जोड़ना भी आवश्यक है। वास्तव में इन दिनों यही दोहरी आवश्यकता युग की पुकार बनकर सामने खड़ी है, जिसे पूरा करने के लिए जाग्रत आत्माओं को आगे आना चाहिए।
साधना एवं तत्वभावना को अपनाकर जाना जा सकता है।
साधना को षोडश संस्कार नाम दिया गया है। ऋषिगण इस तथ्य से सुपरिचित थे बार-बार तपाए जाने-सुसंस्कारित किए जाने से मनुष्य से संचित कुसंस्कार नष्ट होते हैं। आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। यही नहीं इन सूक्ष्म उपचारों द्वारा जीवन की मार्मिक संधियों-महत्वपूर्ण अवसरों पर विशिष्टताओं का-देवत्व का अभिवर्द्धन सुनिश्चित सत्य बना देता है।
साधनाप्रणाली में प्रवेश हेतु अनिवार्य योग्यता है, नैतिकता। पतंजलि हों चाहे गोरखनाथ या फिर कृष्ण, बुद्ध, लाओत्से, ताओ कोई भी क्यों न हों, इस अनिवार्य योग्यता के बिना अपनी साधनापद्धति में प्रवेश नहीं देते। प्रवेश के बाद शुरू होता है, साधनाक्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना पूरा ध्यान शरीर पर जमाता है, वहीं राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्यपद्धतियाँ प्राणिजगत में परिवर्तन व रूपान्तरण का रुख अपनाती है, किन्तु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, वे शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती हैं।
साधना का ही परिणाम है। व्यक्तित्व में प्राण का संचय करते रहने से अनेकों प्रकार की शक्तियाँ अपने आप ही विकसित हो जाती हैं। योगीगण इस तथ्य से भली प्रकार परिचित होते हैं कि प्राण का विपुल भण्डार सर्वत्र भरा पड़ा हैं, पर सामान्य जीवनधारी मात्र उस भण्डार में से जीवनयापन करने की आवश्यकता पूरी करने योग्य अल्प मात्रा ही उससे प्राप्त कर पाते हैं। जिस प्रकार बूँद-बूँद के मिलने से घड़ा भरता है, उसी तरह योगी प्राणतत्त्व का संचय और अभिवर्द्धन करते रहते हैं।
साधना के लिए समर्पित कर दो। साधना का उज्ज्वलतम रूप गुरुप्रेम है। जितना तुम मेरे प्रेम में डूबते हो, उतना ही तुम मेरे निकट आते हो, क्योंकि मैं अन्तरम का निवासी हूँ। मैं आत्मा हूँ, विचार या रूप से अछूती आत्मा! मैं अभेद्य, अनश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ।
साधना का विशेष महत्व रहा है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक हुए बहुत से कार्यक्रमों में इस प्रकार की साधना के द्वारा ही लाभ प्राप्त हुआ है। गायत्री महापुरश्चरण भी इसी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें चौबीस लाख परिजन भाग ले रहे हैं। अनेकों कार्यक्रम भी इस श्रृंखला में आयोजित हो रहे हैं, जिसका वातावरण पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा।
साधनावर्ष में की जानी है। इस बीच लाखों प्राणवान कार्यकर्ता देवसंस्कृति की संस्थापना के लिए समर्पित-संकल्पित नजर आने लगेंगे। इनका स्तर कुछ इतना अलौकिक होगा, जिन्हें विवेकानन्दों का अभिनव संस्करण कहा जा सके।
साधना को जीवन का अनिवार्य अंग बनाना ही पड़ेगा। विश्वविख्यात इतिहासकार अरनाल्डटॉयनवी, जिसने भताओं का इतिहास लिखा है। उसने १९४२ में कहा था कि पचास साल में समूचा विश्व संयुक्त राज्य अमेरिका के वर्चस्व के नीचे आ जाएगा। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी में जब प्रौद्योगिकी का स्थान धर्म ग्रहण करेगा, तो यह सुनिश्चित है कि भारत जो आज पराजित देश है, तब विजयी होगा और जो आज विजयी हैं, पराजित हो जाएँगे। टॉयनवी की अवधारण का एक हिस्सा तो आज सत्य सिद्ध हो रहा है।
साधना का अर्थ है-अन्तरात्मा के गहन स्तर में यह अनुभूति एवं आस्था उत्पन्न करते रहना कि हम सत-चित-आनन्द परमात्मसत्ता के अविच्छिन्न अंग है। हमें पूर्णताप्राप्ति के लिए श्रेष्ठतम जीवनक्रम अपनाना है और जो उपलब्ध है, उसे लोकहित के लिए प्रयुक्त करना है। ज्ञानसाधना में निरत जाग्रत आत्मा संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि को लाँघ जाती है। वह सबको अपने में और अपने को सबमें देखती है। इसलिए उसके सामने व्यक्तिवादी आपाधापी फटकने नहीं पाती।
साधना करते रहे। गुरु ने कहा-कहीं जाना मत। सभी को सत्प्रेरणा देते रहना। इस लोक -परलोक का सारा वैभव तुम्हें मिल जाएगा। इतिहास साक्षी है कि उनकी तपश्चर्या की ख्याति बिना बनारस से उनके बाहर निकलें विश्वभर में सुगंधि की तरह फैल गयीं।
साधना अंतःऊर्जा का सुनियोजन भी करती है, साथ ही अतिरिक्त विश्व ऊर्जा की व्यवस्था जुटाकर हमारी जैविक व मनोवैज्ञानिक प्रकृति के रूपान्तरण भी करती है। यह कार्य मात्र ऊर्जा-तरंगों के विज्ञान के सुनियोजन द्वारा ही संभव हैं। वैज्ञानिक-मांत्रिक-तांत्रिक तीनों के लक्ष्य अलग-अलग होते हैं किन्तु ढूँढ़ते तीनों ही सुव्यवस्थित ऊर्जा तरंगों को ही हैं। वैज्ञानिक भौतिक जगत की ऊर्जा को प्रयुक्त करता है, तो योगी-मांत्रिक आध्यात्मिक जगत की ऊर्जा को। तांत्रिक सूक्ष्म भौतिक जगत ऊर्जा का प्रयोग करके अपना कार्य सिद्ध करता है।
साधनाएँ की जाती हैं। इस तथ्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए।
साधना सिद्धान्त इसी आधार पर बना है। कारण कि जो भी तप-साधना अपनाना चाहते हैं, उन्हें प्रथम साधना मितव्ययिता की, सादगी की गरीबी की करनी चाहिए। इस अभ्यास से ही उसकी परिस्थितियाँ ऐसी रह सकेंगी, जिनमें तपस्वी जीवन की रीति-नीति का निर्वाह सम्भव हो सके और उसको बिना अनीति उपार्जन की अपेक्षा किए, सत्कर्मों के लिए आवश्यक खर्च में बिना कृपणता बरते, बड़ी सरलता और प्रसन्नता के साथ अपना ढर्रा चलाते रह सकना सम्भव हो जाए। तपश्चर्या के विविध अभ्यास इस प्रमुख प्रयोजन को भली प्रकार पूरा कर सकने की सफलता प्रदान करते हैं।
साधना के तत्त्वदर्शन को समझने के लिए अनेकानेक शास्त्र पढ़ने को और विद्वानों के प्रवचन-प्रतिपादन सुनने को मिलते हैं। उनमें इन सात महातथ्यों के अलावा और कुछ नहीं है। यदि इस तत्त्वदर्शन को सही रीति से समझा, अपनाया और आत्मसात् किया जा सके तो साधनात्मक उपलब्धियों का अर्जन अपने जीवन का अनिवार्य प्रसंग बने बिना नहीं रहेगा।
साधना पद्धति अपनाने वाले इसे प्रथम चरण में पा लेते हैं, क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यशविहीन क्रियाशीलता चाहिए। इसे ही सत्व का रूपान्तरण समझा जा सकता है। सारे आवेग-कामुकता क्रोध, मोह, लोभ आदि प्राणिक स्तर पर जड़ जमाए रहते हैं। प्रचलित योगों के किसी भी साधक को इनकी जड़ें उखाड़ने में पसीने आ जाते हैं। फिर भी कभी-कभी असफलता हाथ लगती है।
साधना की समग्र प्रणाली माना गया हैं, इसमें नियोजित व्यक्ति के तीनों ही आधार न केवल सशक्त होते हैं, वरन् समूची अंतर्शक्तियाँ अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त होने लगती हैं। उदाहरण के लिए, देह का स्वाभाविक गुण है जड़ता। इस तमस् का सत्व में रूपान्तरण ही अभीष्ट है। समाजसेवा की साधना पद्धति अपनाने वाले इसे प्रथम चरण में पा लेते हैं, क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यशविहीन क्रियाशीलता चाहिए। इसे ही सत्व का रूपान्तरण समझा जा सकता है।
साधना के अग्नि-संस्कार को सहन एवं स्वीकार करे। तप का अर्थ है- सदुद्देश्य के लिए उस हद तक बढ़ चलना, जिसमें भौतिक कष्टों की हँसते-खेलते उपेक्षा की जा सके। इस तथ्य को जीवन-प्रक्रिया में उतारने के लिए, आत्मबल-सम्पन्न तपस्वी जीवन की भूमिका में विकसित होने के लिए ऐसे उपचार-कर्मकाण्ड अपनाने पड़ते हैं, जो अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सकें। इन्हीं साधनाओं को तपश्चर्या का बहिरंग कलेवर कह सकते है।
साधना विधान पूरे करते हुए भी एक व्यक्ति चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेता है, जबकि दूसरा कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता। साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने-न होने के रूप में समझा जा सकता है।
साधना एवं सत्प्रयोजन का समन्वय कर देने पर विजय सर्वथा निश्चित हो जाती है।
साधना में जिन संस्कारों को यहाँ सम्मिलित किया गया है, वे हैं-१ पुँसवन संस्कार (२) नामकरण संस्कार (३)अन्नप्राशन संस्कार (४) मुंडन संस्कार (५) विद्यारम्भ संस्कार (६) यज्ञोपवीत संस्कार (७) विवाह संस्कार (८)वानप्रस्थ संस्कार (९) अन्त्येष्टि संस्कार (१०) मरणोत्तर -श्राद्ध संस्कार (११) जन्मदिवस संस्कार (१२) विवाहदिवस संस्कार।
साधना-विज्ञान का स्वरूप इससे ऊँचा है। मानवीय अन्तःकरण को इसी से परिष्कृत कर व्यक्ति एवं समाज में परिवर्तन लाए जा सकते है।
साधना की इस समग्र प्रणाली के रहते और अपने ऊपर समाजसेवी का लेबल चिपकाने पर भी जो लोग इसके लाभों से वंचित हैं, इसका कारण प्रणाली की गड़बड़ी नहीं, अपितु स्वयं की खामी है। गरीबों को गले लगाने तथा कष्ट-पीड़ितों की मदद करने की बात हर कोई करता है, लेकिन अपने आस-पास के ऐसे लोगों पर ध्यान देना अनावश्यक लगता है, जिन्हें वस्तुतः सहायता की आवश्यकता है। स्वाभाविक है ऐसे लोग समाजसेवा का सिक्का अपनी प्रतिष्ठा जमाने के लिए उपयोग करते हैं। जिसके पास करने को कोई काम नहीं अथवा जो यह समझते हैं कि इसी प्रकार समाज में कुछ इज्जत कमा लेंगे, ऐसे लोग समाजसेवा का मुखौटा लगा लेते हैं।
साधना में यद्यपि पुरुषार्थ ही प्रमुख है। इसके क्षरा ही वातावरण का परिष्कार संभव होगा। अंगद, हनुमान, नल-नील अर्जुन, शिवाजी आदि को यदि पराक्रम करने का मौका न मिला होता तो सभी लोग इसी प्रकार का सामान्य जीवन जीने वाले कहलाते। युग-परिवर्तन एवं नवनिर्माण के कार्य का श्रेय उनको नहीं मिलता। ग्वाल-बालों को श्रेय इसलिए मिला कि भगवान श्रीकृष्ण को अपनी-अपनी लाठी लगाकर थोड़ा-सा सहयोग दिया और कार्य पूरा हो गया।
साधना से ही योग को जानना चाहिए। साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी से योग-साधना में निरत है, वहीं चिरकाल तक आनन्द पाता है।
साधनात्मक पराक्रम करके अधिक तीव्र कर सकता है और उत्कर्ष के अंतिम लक्ष्य तक इसी जीवन में पहुँच सकता हैं यही पंचकोशी साधना है। कोशों के जाग्रत होने पर व्यक्ति का स्तर कैसा होता है, इसकी जानकारी शिव गीता में इस प्रकार दी गई है-
साधना में प्रवृत्त होने का तात्पर्य है-स्वयं के स्वरूप एवं उत्तरदायित्व के बोध के लिए तत्पर होना। इसी के माध्यम से ऐसा कुछ बन पड़ेगा कि पूर्णताप्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय, आदर्श एवं पवित्रतम् जीवन जिया जाय और अपने जीवन की समस्त उपलब्धियों में से न्यूनतम अंश लेकर शेष का परमार्थ प्रयोजनों में उपयोग किया जाय। यही है ज्ञान-साधना की फलश्रुति।
साधना में भाग लेने के लिए अखण्ड ज्योति के प्रत्येक परिजन का आह्वान किया जाता है। अच्छा हो, इसके लिए बहुत दिनों तक सोचने, विचारने में समय न गँवाया जाय, बल्कि आगामी वर्ष सम्पन्न होने वाले साधनावर्ष के कार्यक्रम से में बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभाई जाय।
साधना चल पड़ने से अन्तरिक्ष के परिशोधन एवं वातावरण के अनुकूलन में भरी सहायता मिलेगी। इससे भावी संभावित विपत्तियों के टल जाने की आशा की जा सकती है। उज्ज्वल भविष्य के नवसृजन में इस साधना की प्रतिक्रिया बहुत ही सहायक सिद्ध होगी। इसमें जो साधक भाग लेंगे, उन्हें आशा से अधिक लाभ प्राप्त होगा। उनको आत्मकल्याण एवं लोककल्याण का दुहरा लाभ मिलता रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-May
साधना क्षेत्र के वरिष्ठ लोगों का ध्यान इस स्तर का पुरुषार्थ करने के लिए प्रथम बार आह्वान किया गया है। आत्मबल के बलिष्ठों को सामूहिक शक्ति का अर्जन करने और उसे विश्व संकट के निमित्त झोंके देने का यह प्रयोग और उसके परिणाम दोनों ही दृष्टि से अनोखे रहेंगे। सर्वनाशी विभीषिकाओं आशंकाओं के पर्वत अभी भी जहाँ के तहाँ खड़े हैं। अषुरा संभावनाएँ भविष्यवक्ताओं के द्वारा ही नहीं, प्रत्यक्ष का विवेचन करने वाले लोगों के प्रतिपादनों द्वारा भी स्पष्ट हैं। इनके निराकरण का आंतरिक उपाय आत्मशक्ति के दिव्य आयुधों का प्रयोग ही हो सकता है।
साधना करके सम्वत् 2026 की आषाढ़ पूर्णिमा के दिन स्वरलहरी विराट नाद में लीन हो गई। संगीत की उच्चता और पवित्रता को आज के वातावरण में संव्याप्त वासना एवं कामुकता के पंक से कलुषित कर उसकी शक्ति का दुरुपयोग करने के पाप से बचने के लिए आज के तथाकथित संगीतकार उनके जीवन से कुछ प्रेरणा लें तो वे संगीत विद्या व संगीतकार दोनों की गरिमा की रक्षा कर सकते हैं।
साधना हेतु भारतभूमि को ही उपयुक्त साधनास्थली माना जाता रहा है। भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली गीता कहती हैं-
साधना भी इन्हीं प्रयत्नों की एक कड़ी थी।
साधना का समय अरुणोदय काल है ध्यान प्रक्रिया इतनी ही है कि गायत्री परिवार के लाखों सदस्य अपनी प्रचण्ड ऊर्जा एक साथ एकबारगी एक लक्ष्य की पूर्ति के लिए उत्पन्न कर रहे हैं। वह संकल्प शक्ति पर उठती है और अन्तरिक्ष की ऊँची परतों पर छतरी की तरह छा जाती है। इससे वातावरण एवं वायुमण्डल में भरे हुए दुरित धरातल पर गिरने से पूर्व ही रुक जाते हैं। संयुक्त आत्मशक्ति का छाता उन्हें दूर पर ही रोक देता है। इतना ही नहीं इस छत्र-उपकरण का प्रहार करके अदृश्य जगत पर छाई हुई विभीषिका को किसी अविज्ञात क्षेत्र में धकेल कर भावी विपदाओं से बहुत हद तक परित्राण पाया जाता है।
साधना आवश्यक है। प्रभावशाली श्रेष्ठ सज्जन इस पुनीतकार्य में श्रद्धापूर्वक जुट पड़े तो यह वातावरण उत्पन्न करना तीर्थयात्रा की पुण्य परम्परा में उत्साह भरने से सम्पन्न हो सकता है। यह सारे कार्य ऐसे हैं जो शासकीय अथवा दूसरे मंचों से किए जाने वाले समाज-कल्याण जैसे कार्यों द्वारा किये जाने वाले रचनात्मक प्रयासों की तुलना में कहीं अधिक गहरा एवं चिरस्थायी सत्परिणाम उत्पन्न करेंगे।
साधना ने उनके सभी मार्ग के अवरोधों को दूर कर दिया। गोरे छात्रों का दुर्व्यवहार और कॉलेज के प्रतिबन्ध उनकी प्रगति को रोकने में असमर्थ सिद्ध हुए तथा वे अंतिम परीक्षा में सर्वोच्च अंकों में प्रथम स्थान प्राप्त कर उत्तीर्ण हुए। उनका स्वप्न पूरा हुआ।
साधनाएँ पिछले समय से निष्ठापूर्वक चलती रही हैं, जो कई अनुष्ठान कर चुके और दूसरों को प्रेरणा देने में जिनकी प्रतिभा कारगर सिद्ध होती रही है, उन्हें सुरक्षा-साधना में अग्रणी होना चाहिए। साथ ही दूसरों को भी बना सकते हैं, सहयोग दूसरों से भी ले सकते हैं। किन्तु अग्रणी वरिष्ठों को ही रहना चाहिए। सूर्योदय से पूर्व सस्वर गायत्री पाठ तत्पश्चात आधा घण्टा ध्यान। सर्दियों में यह समय एक घण्टे पहले खिसकाया जा सकता है।
साधना और इष्ट का अटूट विश्वास। 25 वर्ष की आयु में उन्होंने भारत भर में भ्रमण करके कर्नाटक संगीत का प्रचार किया। जहाँ भी वे गये, सामान्य जन से लेकर राजा-महाराजा तक उनसे प्रभावित हुए। मान-सम्मान धन-दौलत उपहार सब इस पर न्यौछावर हुए, किन्तु उन सबको उन्होंने निर्लिप्त भाव से ग्रहण किया। अपनी सम्पदा को उन्होंने ब्रह्म की सम्पदा समझकर विद्वानों, समाज सुधारकों व छात्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मुक्त हाथों से बाँट दी।
साधना की ही तरह है। इसमें साधक को अनेकों परिस्थितियों तितिक्षाओं से गुजरना पड़ता है। यह तुम्हारी भी परीक्षा थी, जिसमें तुम असफल होते-होते बच गये। बजाजी के सामने अपने भावुक हृदय की दुर्बलता प्रत्यक्ष हो उठी अब वह संभल चुके थे। देश-धर्म का गौरव उन्हें याद आ चुका है।
साधना भी आत्म साधना की ही तरह है। इसमें साधक को अनेकों परिस्थितियों तितिक्षाओं से गुजरना पड़ता है। यह तुम्हारी भी परीक्षा थी, जिसमें तुम असफल होते-होते बच गये। बजाजी के सामने अपने भावुक हृदय की दुर्बलता प्रत्यक्ष हो उठी अब वह संभल चुके थे। देश-धर्म का गौरव उन्हें याद आ चुका है।
साधना, तपस्या, ज्ञान और शक्ति।” आगे उन्होंने कहा- “राष्ट्रीयता स्वयं परमात्मा से उद्भूत एक धर्म है। उसका दमन नहीं हो सकता और न हो सकेगा। राष्ट्रीयता अमर है, क्योंकि वह मर्त्य मानव की सृष्टि नहीं है।”
साधनाक्रम नियमित रूप से चल पड़ने चाहिए। ऐसे यूनिट अपनी मण्डली को शाँतिकुँज से पंजीकृत करा लें, ताकि उन्हें इस प्रयोग में काम आने वाली अभीष्ट सामर्थ्य अनुदान के रूप में नियमित रूप से मिलती रहे।
साधना पर मुग्ध हो उठे। एक समाँ-सा बँध गया। संगीत की समाप्ति पर महाराज अपने आसन से उठे और बालक को अपनी भुजाओं पर उठा लिया। उन्हें सिंहासन पर अपनी गोद में बिठाकर मूल्यवान शाल के उपहार के साथ-साथ उनके द्वारा शुभाशीष दिये गये। “ हमारी सभा के गौरव की रक्षा करने वाला यह बालक अपने जीवन में यशस्वी संगीतज्ञ बने।
साधना द्वारा अतिमानवी क्षमताओं का उन्नयन, षोडश संस्कारों के साथ सम्पन्न होने वाली ज्ञान गोष्ठियों द्वारा पारिवारिक वातावरण में शालीनता का सम्वर्द्धन, पर्व-त्यौहारों में सन्निहित-सामाजिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण जैसे अनेकानेक उच्चस्तरीय उद्देश्य धार्मिक क्रियाकृत्यों के सहारे भावभरे वातावरण में सरलतापूर्वक सम्पन्न होते रह सकते हैं। कथा-पुराणों में रोचक-संस्मरणों के सहारे संस्कृति की महान परम्पराओं को बाल-वृद्ध नर-नारी जिस प्रकार सुनते, समझते और अपनाते हैं, उसे देखते हुए प्रतीत होता है-प्रत्यक्ष निर्देशन की अपेक्षा यह देव इतिहासों का कथन-श्रवण अन्तरंग की गहराई तक अधिक अच्छी तरह प्रविष्ट हो सकता है। आदर्शवादी अनुकरण महापुरुषों के द्वारा अपनाई गई देव-परम्पराओं के दृश्य मनःक्षेत्र में विचरते रहने पर भी एक बड़ा काम हो सकता है।अनुकरण का उत्साह उठ सकता है। जन-जागरण को घर-घर पहुँचाना और जन-जन से संपर्क साधना आवश्यक है।
साधना के कारण यह सम्पूर्ण भू-खण्ड आकर्षण का केन्द्र-बिन्दु रहा। महाभारत के भीष्म पर्व में भारत की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-
साधना में अग्रणी होना चाहिए। साथ ही दूसरों को भी बना सकते हैं, सहयोग दूसरों से भी ले सकते हैं। किन्तु अग्रणी वरिष्ठों को ही रहना चाहिए। सूर्योदय से पूर्व सस्वर गायत्री पाठ तत्पश्चात आधा घण्टा ध्यान। सर्दियों में यह समय एक घण्टे पहले खिसकाया जा सकता है।
साधना की थी। उसी का परिणाम था कि वे संगीत की ऊँचाइयों तक पहुँच सके थे।
साधनास्थली माना जाता रहा है। भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली गीता कहती हैं-
साधना है, इस प्रतिपादन को जतीन ने स्वीकार कर क्रांतिकारियों का नेतृत्व सँभाल लिया।
साधना के साथ आन्तरिक जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता भी अब महत्वपूर्ण मानी जाने लगी है। इसी भाव से अनुप्रेरित होकर जेम्स मेक ग्रेगर वर्न्स ने कहा है- आज प्रतिष्ठित व्यक्ति भी कोर बुद्धिवाद से निकलकर किसी सुन्दर भाव संसार में पनाह लेना चाहते हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जितने भी बड़े पदाधिकारी होते हैं, उनका वैयक्तिक एवं पारिवारिक जीवन लगभग असफल एवं असंतुलित-सा रहा है। वर्न्स ने इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहा है कि आई.क्यू. मनुष्य के मस्तिष्क के केवल चार से सात प्रतिशत भाग को ही स्पर्श करता है। संसार मात्र दिमाग के इन केन्द्रों तक ही सीमित नहीं है।
साधना में रत ही थे कि सन् 954 ई. में एक पड़ोसी राज्य ने उनकी मातृभूमि पर आक्रमण कर दिया। ज्ञान और अध्यात्म दर्शन के मूर्तिमान् इस व्यक्तित्व के लिए पराधीनता ऐसी ही थी जैसे कि खुली हवा में उड़ने के लिए पक्षी के लिए बन्द पिंजड़ा। अपनी मातृभूमि को छोड़कर वे पड़ोसी देशों के प्रमुख नगरों में भ्रमणरत रह अध्ययन करने लगे। 997 ई. में एक चन्द्रग्रहण हुआ, जिसका अध्ययन अलबेरूनी ने उपलब्ध साधनों से किया। इसी चन्द्रग्रहण को बगदाद के आबुल वफा नामक ज्योतिषी ने भी देखा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-September
साधना-विज्ञान के आचार्यों का मत है कि नाड़ियों एवं चक्रों का अस्तित्व केन्द्रीय स्नायु संस्थान के अंतर्गत मेरु- रज्जु एवं मस्तिष्क में है। यदि विभिन्न साधना-विधानों द्वारा इनकी शुद्धि करके एवं शक्तिशाली बनाकर इन्हें सही रूप से परस्पर जोड़ा जा सके, तो शरीर एवं मन दोनों का कायाकल्प संभव है। शरीर एवं मन की जटिल क्रिया -प्रणाली इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना -इन तीन आधारभूत शक्तियों के बल पर क्रियाशील रहती है। यह जानने के बाद अब यह समझना सरल होगा कि अधिकांश साधना- उपचारों में इड़ा, पिंगला के प्रवाह में संतुलन एवं इनके उतार-चढ़ावों के प्रति सजगता-वृद्धि को इतना महत्व क्यों दिया जाता है। साधनाविज्ञानियों के अनुसार शारीरिक स्तर पर मस्तिष्क का दांया हिस्सा इड़ा नाड़ी तथा बायाँ हिस्सा पिंगला नाड़ी से सम्बद्ध है।
साधना-ग्रंथों में तारक मंत्र के नाम से इसका उल्लेख इसलिए भी हुआ है कि यह भवसागर से तैराकर पार करा देने वाला है। ‘तारक’ अर्थात् पार करा देने वाला। गहरे जलप्रवाह को पार करके निकल जाने को, डूबते हुए को बचा लेने को तारना कहते हैं। यह भवसागर ऐसा ही है जिसमें अधिकांश लोग डूबते हैं, तैरते तो कोई विरले ही हैं। जिस साधना से तरना संभव हो सके उसे ‘तारक’ कहा जाएगा।
साधना - विधानों को प्राणायाम कहते हैं। यों साधारणतया साँस को गहराई तक खींचने का ‘पूरक’ रोके रहने का ‘अंतः कुंभक पूरी तरह साँस बाहर निकालने को ‘रेचक’ और कुछ देर बिना श्वास के रहने का बाह्य कुंभक कहते हैं। इन चार स्तरों में बँटी हुई श्वासोच्छवास प्रक्रिया प्रक्रिया को प्राणायाम कहा जाता है। दैनिक साधन-उपासना के नित्य-कर्मों में इसी पद्धति का प्रयोग होता है, पर इतने मात्र से ही प्राणायाम को सीमाबद्ध नहीं मान लेना चाहिए। उसके प्रख्यात चौरासी प्रकार हैं।
साधना विशेषांकों में फलश्रुति के साथ पाएँगे। नवम्बर १९९८ से भारत के प्रायः चौबीस केन्द्रों से आरम्भ होने वाली साधना - प्रशिक्षण प्रक्रिया के संबंध में अलग अंक में तथा “प्रज्ञा अभियान पाक्षिक’ एवं ‘युगनिर्माण योजना’ मासिक में पाठक पढ़ सकेंगे।
साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जाएँ, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाए, तो अन्ततः उसके लिए घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म−विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व कितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
साधना, नित्य संध्याकर्म आदि में गायत्री मंत्र जप का साधारण विधान है। विशेष प्रयोजनों के लिए सकाम-निष्काम सजीव-निर्जीव अनुष्ठान एवं पुरश्चरण किये जाते हैं। यह सामान्य क्रम कहलाता है। इससे ऊँचे स्तर की साधना दो भागों में विभक्त है। एक को कहते हैं - ध्यान-धारणा और दूसरे भाग को कहते हैं- प्राण-प्रक्रिया इन्हीं दोनों का अवलम्बन कर साधक उच्च आध्यात्मिक भूमिका में विकसित होता है।
साधना व धर्मशीलों का संगतिकरण सार्थक हैं - यही इस मिशन में चिन्तन का भावी निर्धारणों का मूल आधार बना। १९९. में परमपूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन हो विराट रूप लेने के बाद संपन्न २७ अश्वमेध महायज्ञ, प्रथम पूर्णाहुति आँवलखेड़ा एवं अभी-अभी न्यूजर्सी (यू. एस. ए.) में सम्पन्न वाजपेय यज्ञ की सफलता के मूल में उसी शक्ति को देखा जा सकता है, जिनसे लाखों - करोड़ों की मनःशक्ति का एकीकरण कर इस ब्रह्माण्ड में एक विलक्षण प्रयोग का बीजारोपण १९२६ में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के माध्यम से किया था। समूह चेतना का जागरण इसी आधार पर संभव हो पाया है। एवं अब १९९८ का अंतिम उत्तरार्द्ध का भाग आते - आते हम सबकी महाकाल की युग - प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का स्वरूप स्पष्ट रूप से समझ में आ रहा है।
साधना प्रतिक्रियाओं में प्राणायाम के दौरान बायीं नासिका से गहरी साँस लेने और दायीं से छोड़ने का विधान है। ऐसा करने से मस्तिष्क का दांया अथवा आध्यात्मिक भाग जाग्रत होने लगता है और इसके साथ ही बायें अथवा भौतिक जीवन से गहन संबंध रखने वाले मस्तिष्क खण्ड की सक्रियता मन्द पड़ने लगती है। इस प्रकार उक्त अध्ययन से प्राणायाम की उपादेयता और वैज्ञानिकता सिद्ध हो जाती है। इसके अतिरिक्त ई. ई. जी. द्वारा मस्तिष्क से उत्पन्न अल्फा, बीटा, थीटा, और डेल्टा तरंगों में से किसी की भी प्रमुखता की स्थिति में श्वसन एवं मस्तिष्क गोलार्धों के मध्य एक सुनिश्चित संबंध की सूचना मिलती है।
साधना को ‘जीवन जीने की कला’ नाम देकर उनने सार्वजनीन बनाया एवं लाखों हीरों को तराशकर उनके जीवन-स्तर को उठा दिया।
साधना करके अपने गणेश को परिपुष्ट बना लेगा, वह विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जड़ों में पानी नहीं देगा, उनके विनायक भगवान सूखे मूर्च्छित एक कोने में पड़े होंगे। लड्डू खीर खिलाने स्तोत्र पाठ करने पर भी वे कुछ सहायता न कर सकेंगे बुद्धिमान और विद्वान बन सकता सम्भव ने होगा। हर किसी की भुजाओं में हनुमान का निवास है। व्यायाम करने वाले संयमी, ब्रह्मचारी लोग बजरंगबली के भक्त प्रमाणित हो सकते हैं, पर जिनने अपने असंयमी और भ्रष्ट आचरण से हनुमान जी को पीड़ित - प्रताड़ित करने में कमी नहीं छोड़ी, उनका हनुमान चालीसा पाठ कुछ ज्यादा कारगर नहीं होगा, वे आरोग्य का वरदान अपने रुग्ण हनुमान से कैसे प्राप्त कर सकेंगे?
साधना करते हैं। जो साधक इस प्रकार जानने वाला है कि अव्यक्त ब्रह्म का स्थान अविमुक्त क्षेत्र आदि भौतिक स्थान है और भौंहों तथा नासिका का संधि स्थान ही आध्यात्मिक काशी है, यहीं मन का ध्यान किया जाता है, वहीं ज्ञानी यथार्थ ज्ञानोपदेश में समर्थ हो सकता है। यही सबसे बड़ा तीर्थ और देवताओं के लिए भी पवित्र है, यही परमात्मा प्राप्ति का स्थल है। यहाँ से जब प्राणी की प्राण-चेतना निकलती है, तो अमृतत्व की प्राप्ति होती है। मनोमय शक्ति की यही साधना सही अर्थों में अभीष्ट भी है मुक्ति प्रदाता भी।
साधना विज्ञान की भाषा में कहें, तो इसे यों भी कह सकते हैं कि जब इड़ा और पिंगला नाड़ी अर्थात् नासिका के दोनों स्वर साथ-साथ क्रियाशील हो उठती है। ऐसे समय में व्यक्ति की प्रकृति अन्तर्मुखी हो जाती है, शुभ कार्यों एवं श्रेष्ठ चिन्तन की ओर रुझान बढ़ जाता है, मन बार-बार ईश्वर की ओर उन्मुख होने लगता है एवं व्यक्ति स्वयं को एक असाधारण, आनन्ददायक तथा उदात्त मनोदशा में अनुभव करता है।
साधना आरम्भ करने के बाद और भी अधिक गई-गुजरी स्थिति में चल गये। न तो उनमें कोई प्रत्यक्ष विशेषता देखी गई, न आत्मिक महत्ता। न उन्हें सुख प्राप्त था, न शान्ति। स्वास्थ्य से लेकर सम्मान तक कोई भी सम्पदा उनके पास नहीं थी और विवेक से लेकर आत्मबल तक कोई प्रतिभा - विशेषता उपलब्ध हुई वरन् जिस स्थिति में उन्होंने वह उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई, पीछे उनकी स्थिति पर प्रकार बिगड़ती ही चली गई। भौतिक सुख-सम्पत्ति न सही, आत्मिक शान्ति और विभूति का प्रकाश मिला होता तो भी सन्तोष किया जा सकता था, पर वैसा भी कुछ वे प्राप्त न कर सके।
साधना-मार्ग के अन्वेषकों द्वारा बतलाई गई नाड़ियों का मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का संतुलन संभव है। मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर हुए अनुसंधान इस तथ्य को सिद्ध करते हैं। किंसबोर्न अपने ‘सैड-हेमिस्फीयर, हैपी-हेमिस्फीयर’ नामक शोध-निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारे दृष्टिक्षेत्र की बायीं ओर दीखने वाले दृश्य और बायें कान कान से सुनाई पड़ने वाली ध्वनियाँ - दोनों जब दाहिने मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, तो मस्तिष्क उनके प्रति उतना ग्रहण - शील नहीं होता, जिता कि विपरीत अवस्था होने पर। ऐसे ही इस बात की भी पुष्टि शोधों द्वारा हुई है कि जब व्यक्ति उदास होता है, तो उसकी दृष्टि सामान्यतः बायीं ओर रहती हैं और दायीं मस्तिष्क को प्रभावित करती है, जबकि प्रसन्नता की दशा में ठीक इसका उलटा होता है।
साधनाक्रम का शुभारम्भ किया था, वह संकल्पशक्ति की दुर्बलता मानसिक शिथिलता के कारण थोड़े ही दिन में समाप्त हो जाता है।
साधना दो भागों में विभक्त है। एक को कहते हैं - ध्यान-धारणा और दूसरे भाग को कहते हैं- प्राण-प्रक्रिया इन्हीं दोनों का अवलम्बन कर साधक उच्च आध्यात्मिक भूमिका में विकसित होता है।
साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिए सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं, जो उपर्युक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म−विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व कितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
साधना - प्रशिक्षण प्रक्रिया के संबंध में अलग अंक में तथा “प्रज्ञा अभियान पाक्षिक’ एवं ‘युगनिर्माण योजना’ मासिक में पाठक पढ़ सकेंगे।
साधनाविज्ञानियों के अनुसार शारीरिक स्तर पर मस्तिष्क का दांया हिस्सा इड़ा नाड़ी तथा बायाँ हिस्सा पिंगला नाड़ी से सम्बद्ध है। स्पेरी, माइर्स, गजेनिगा, बोगेन प्रभृति शोधकर्ताओं ने लम्बे काल के अध्ययन-अनुसंधान के उपरान्त यह पता लगाया है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा बुद्धि विचार, तर्क, वाणीं, विश्लेषण आदि के लिए जिम्मेदार है, जबकि दायें भाग का संबंध ज्ञान, अनुभूति, पवित्रता, शान्ति जैसे तत्वों से है। योगशास्त्र के ज्ञाता भी पिंगला की प्रकृति स्थूल बुद्धिपरक एवं इड़ा की सूक्ष्मज्ञान और अनुभूतिपरक बताते हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर विदित होता है कि ज्ञान और विज्ञान पक्ष अलग-अलग मार्गों से चलकर एक ही बिन्दु पर पहुँचते हैं।
साधना से ही सार्थक है। जो इन्हें ठीक-ठीक अपनाते, वे इसी जन्म में स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द-लाभ करते और परमपद पाते हैं।
साधना’ इसे ही कहते हैं। इसके लाभ अनन्त हैं, पर पूर्व में मनोनिग्रह और उस शक्ति को आत्मा में नियोजित करना अत्यावश्यक है।
साधना द्वारा इस ग्रन्थि को नियंत्रित-नियमित कर मनुष्य अपने स्थूल, सूक्ष्म एवं आत्मिक आवरणों का परिमार्जन कर सकता है, पूर्ण मानव बन सकता है।
साधना की मृत्यु का दिन होता है, जिस दिन वो स्वयं को निर्दोष एवं पूर्ण समझ लेता है। सतत् उन्नति एवं विकास के लिए ही साधु-सन्तों ने ‘निन्दक नियरे राखिए’ का सूत्र सुझाया है।
साधनावर्ष की तैयारी के संबंध में इसीलिए अभी से सभी को कटिबद्ध होने का कहा जा रहा है। साधना का स्तर बढ़ाए बिना - प्रखरता का उपार्जन किए बिना उस महासमर की तैयारी नहीं हो सकती, जिसमें आगामी तीन - चार वर्षों में हम सभी को भागीदारी करनी है। साधना का अर्थ है - समर्पण जितना समग्र होगा, गुरुसत्ता की चेतना - सिद्धियों, शक्तियों को हम उतना ही व्यापक परिमाण में धारण भी कर सकेंगे - जीवन उतना तेजी से परिवर्तित भी होने लगेगा। परमपूज्य गुरुदेव इतिहास में ऐसे एक शीर्षपुरुष के रूप में स्वयं को स्थापित कर गए, जिनके माध्यम में जन-सामान्य को यह लगा कि साधारण जीवन जीने वाला भी एक श्रेष्ठ साधक - समष्टिगत चेतना के महाआंदोलन एक अंग बन सकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने मानव इतिहास में पहली बार जीवन और साधना को एक रूप करके दिखा दिया।
साधना द्वारा आत्मशक्ति के उपार्जन का संदेश पहुँचे - इसका मार्गदर्शन अगले कुछ अंकों में परिजन पाठक पढ़ सकेंगे, किन्तु विस्तार से इसे दिसम्बर १९९८ एवं जनवरी १९९९ के साधना विशेषांकों में फलश्रुति के साथ पाएँगे। नवम्बर १९९८ से भारत के प्रायः चौबीस केन्द्रों से आरम्भ होने वाली साधना - प्रशिक्षण प्रक्रिया के संबंध में अलग अंक में तथा “प्रज्ञा अभियान पाक्षिक’ एवं ‘युगनिर्माण योजना’ मासिक में पाठक पढ़ सकेंगे।
साधना का अर्थ है - समर्पण जितना समग्र होगा, गुरुसत्ता की चेतना - सिद्धियों, शक्तियों को हम उतना ही व्यापक परिमाण में धारण भी कर सकेंगे - जीवन उतना तेजी से परिवर्तित भी होने लगेगा। परमपूज्य गुरुदेव इतिहास में ऐसे एक शीर्षपुरुष के रूप में स्वयं को स्थापित कर गए, जिनके माध्यम में जन-सामान्य को यह लगा कि साधारण जीवन जीने वाला भी एक श्रेष्ठ साधक - समष्टिगत चेतना के महाआंदोलन एक अंग बन सकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने मानव इतिहास में पहली बार जीवन और साधना को एक रूप करके दिखा दिया। साधना को ‘जीवन जीने की कला’ नाम देकर उनने सार्वजनीन बनाया एवं लाखों हीरों को तराशकर उनके जीवन-स्तर को उठा दिया।
साधना-पुरुषार्थ बड़े व्यापक स्तर पर सम्पन्न हुआ एवं माध्यम से परोक्ष का अनुकूलन साधा गया। तब जाकर रामराज्य की स्थापना संभव हो सकी। हमें भी आज की परिस्थितियों को इसी परिप्रेक्ष्य में समझकर तदनुसार युगसंधि महापुरश्चरण की भूमिका को - पूर्णाहुति के स्वरूप को आत्मसात् करना होगा।
साधनात्मक से दिखने वाले व्यक्तियों से जीवनसाधना संपन्न कराके दिखा दिया। वह अतुलनीय है। उनकी जीवन-साधना के विषय में उन्हीं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है - “हमारी तपश्चर्या का प्रयोजन संसार के हर देश में, जन-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनेकानेक भागीदारों का सृजन करना है।” इसी पुस्तक में वे लिखते हैं - “नवनिर्माण के उदीयमान नेतृत्व के लिए पर्दे के पीछे हम आवश्यक शक्ति तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे।” आगे भी वे लिखते हैं “हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे, उसकी गर्मी असंख्यों जाग्रत आत्माएँ अनुभव करेंगे।
साधना को सार्वभौम बना दिया। यही प्रज्ञा अभियान, युगनिर्माण योजना की अब तक की सफलताओं की मूल धुरी समझी जानी चाहिए। जनमानस का परिष्कार और अदृश्य जगत के अनुकूलन में जो योगदान दें, वह युगसाधना व धर्मशीलों का संगतिकरण सार्थक हैं - यही इस मिशन में चिन्तन का भावी निर्धारणों का मूल आधार बना। १९९. में परमपूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म में विलीन हो विराट रूप लेने के बाद संपन्न २७ अश्वमेध महायज्ञ, प्रथम पूर्णाहुति आँवलखेड़ा एवं अभी-अभी न्यूजर्सी (यू. एस. ए.) में सम्पन्न वाजपेय यज्ञ की सफलता के मूल में उसी शक्ति को देखा जा सकता है, जिनसे लाखों - करोड़ों की मनःशक्ति का एकीकरण कर इस ब्रह्माण्ड में एक विलक्षण प्रयोग का बीजारोपण १९२६ में अखण्ड दीपक प्रज्ज्वलन के माध्यम से किया था। समूह चेतना का जागरण इसी आधार पर संभव हो पाया है।
साधना मार्ग के पथिकों के अनुसार अस्वस्थता की दशा में गोलार्धों की सक्रियता में व्यक्तिक्रम पैदा हो जाता है और उसकी लयात्मकता समाप्त हो जाती है। उनके अनुसार जब दुःखी (पिंगला) एवं प्रसन्न (इड़ा) गोलार्धों में एक निश्चित समय तक संतुलन बना रहता है, तो चेतना की एक दिव्य अवस्था का अनुभव होता है। साधना विज्ञान की भाषा में कहें, तो इसे यों भी कह सकते हैं कि जब इड़ा और पिंगला नाड़ी अर्थात् नासिका के दोनों स्वर साथ-साथ क्रियाशील हो उठती है। ऐसे समय में व्यक्ति की प्रकृति अन्तर्मुखी हो जाती है, शुभ कार्यों एवं श्रेष्ठ चिन्तन की ओर रुझान बढ़ जाता है, मन बार-बार ईश्वर की ओर उन्मुख होने लगता है एवं व्यक्ति स्वयं को एक असाधारण, आनन्ददायक तथा उदात्त मनोदशा में अनुभव करता है।
साधना-विज्ञान में मुद्राएँ और त्राटक-ध्यान ऐसे साधना उपचार हैं, जो इड़ा और पिंगला को संतुलित करके आज्ञाचक्र का जागरण करते हैं। यदि यह सत्य है और साधना-मार्ग के अन्वेषकों द्वारा बतलाई गई नाड़ियों का मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का संतुलन संभव है। मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर हुए अनुसंधान इस तथ्य को सिद्ध करते हैं। किंसबोर्न अपने ‘सैड-हेमिस्फीयर, हैपी-हेमिस्फीयर’ नामक शोध-निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारे दृष्टिक्षेत्र की बायीं ओर दीखने वाले दृश्य और बायें कान कान से सुनाई पड़ने वाली ध्वनियाँ - दोनों जब दाहिने मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, तो मस्तिष्क उनके प्रति उतना ग्रहण - शील नहीं होता, जिता कि विपरीत अवस्था होने पर। ऐसे ही इस बात की भी पुष्टि शोधों द्वारा हुई है कि जब व्यक्ति उदास होता है, तो उसकी दृष्टि सामान्यतः बायीं ओर रहती हैं और दायीं मस्तिष्क को प्रभावित करती है, जबकि प्रसन्नता की दशा में ठीक इसका उलटा होता है।
साधना द्वारा अर्जित क्षमता का सही उपयोग न हो पाने से मन अशान्त था और अपनी साधना का अगला चरण इसी को मानकर अविरल शान्ति पायी।
साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का संतुलन संभव है। मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर हुए अनुसंधान इस तथ्य को सिद्ध करते हैं। किंसबोर्न अपने ‘सैड-हेमिस्फीयर, हैपी-हेमिस्फीयर’ नामक शोध-निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारे दृष्टिक्षेत्र की बायीं ओर दीखने वाले दृश्य और बायें कान कान से सुनाई पड़ने वाली ध्वनियाँ - दोनों जब दाहिने मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, तो मस्तिष्क उनके प्रति उतना ग्रहण - शील नहीं होता, जिता कि विपरीत अवस्था होने पर। ऐसे ही इस बात की भी पुष्टि शोधों द्वारा हुई है कि जब व्यक्ति उदास होता है, तो उसकी दृष्टि सामान्यतः बायीं ओर रहती हैं और दायीं मस्तिष्क को प्रभावित करती है, जबकि प्रसन्नता की दशा में ठीक इसका उलटा होता है।
साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का संतुलन संभव है। मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर हुए अनुसंधान इस तथ्य को सिद्ध करते हैं। किंसबोर्न अपने ‘सैड-हेमिस्फीयर, हैपी-हेमिस्फीयर’ नामक शोध-निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारे दृष्टिक्षेत्र की बायीं ओर दीखने वाले दृश्य और बायें कान कान से सुनाई पड़ने वाली ध्वनियाँ - दोनों जब दाहिने मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, तो मस्तिष्क उनके प्रति उतना ग्रहण - शील नहीं होता, जिता कि विपरीत अवस्था होने पर। ऐसे ही इस बात की भी पुष्टि शोधों द्वारा हुई है कि जब व्यक्ति उदास होता है, तो उसकी दृष्टि सामान्यतः बायीं ओर रहती हैं और दायीं मस्तिष्क को प्रभावित करती है, जबकि प्रसन्नता की दशा में ठीक इसका उलटा होता है।
साधना-विधानों द्वारा इनकी शुद्धि करके एवं शक्तिशाली बनाकर इन्हें सही रूप से परस्पर जोड़ा जा सके, तो शरीर एवं मन दोनों का कायाकल्प संभव है। शरीर एवं मन की जटिल क्रिया -प्रणाली इड़ा, पिंगला एवं सुषुम्ना -इन तीन आधारभूत शक्तियों के बल पर क्रियाशील रहती है। यह जानने के बाद अब यह समझना सरल होगा कि अधिकांश साधना- उपचारों में इड़ा, पिंगला के प्रवाह में संतुलन एवं इनके उतार-चढ़ावों के प्रति सजगता-वृद्धि को इतना महत्व क्यों दिया जाता है। साधनाविज्ञानियों के अनुसार शारीरिक स्तर पर मस्तिष्क का दांया हिस्सा इड़ा नाड़ी तथा बायाँ हिस्सा पिंगला नाड़ी से सम्बद्ध है। स्पेरी, माइर्स, गजेनिगा, बोगेन प्रभृति शोधकर्ताओं ने लम्बे काल के अध्ययन-अनुसंधान के उपरान्त यह पता लगाया है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा बुद्धि विचार, तर्क, वाणीं, विश्लेषण आदि के लिए जिम्मेदार है, जबकि दायें भाग का संबंध ज्ञान, अनुभूति, पवित्रता, शान्ति जैसे तत्वों से है।
साधना दिवस यही एक प्रेरणा दे रहा है कि हम गुरुसत्ता के आदर्शों के प्रति अपने समर्पण को और भी अधिक प्रगाढ़ बनाएँ। इस वर्ष यह महाप्रयाण दिवस है तो छह सितम्बर भाद्रपद पूर्णिमा के दिन, परन्तु मेरे भारतवर्ष व विश्व में इसे भाद्रपद पूर्णिमा से नवरात्रि समापन के बाद विजयादशमी तक शक्तिपर्व के रूप में मानना चाहिए। इस चौबीस दिन की अवधि में जो भी श्रेष्ठ संकल्प मन में पैदा हों, उन्हें साकार करने, खाद-पानी देकर मजबूत बनाने का विचार किया जाना चाहिए। तभी तो मात्र कर्मकाण्ड स्तर पर हमीं अपनी गुरुसत्ता की गरिमा के अनुरूप हम यह शक्ति दिवस चिरस्मरणीय बना सकेंगे।
साधना संपन्न कराके दिखा दिया। वह अतुलनीय है। उनकी जीवन-साधना के विषय में उन्हीं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है - “हमारी तपश्चर्या का प्रयोजन संसार के हर देश में, जन-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनेकानेक भागीदारों का सृजन करना है।” इसी पुस्तक में वे लिखते हैं - “नवनिर्माण के उदीयमान नेतृत्व के लिए पर्दे के पीछे हम आवश्यक शक्ति तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे।” आगे भी वे लिखते हैं “हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे, उसकी गर्मी असंख्यों जाग्रत आत्माएँ अनुभव करेंगे।
साधना से तरना संभव हो सके उसे ‘तारक’ कहा जाएगा। गायत्री महामंत्र में यह सामर्थ्य है, उसी से उसे ‘तारक मंत्र’ कहा जाता है।
साधना- उपचारों में इड़ा, पिंगला के प्रवाह में संतुलन एवं इनके उतार-चढ़ावों के प्रति सजगता-वृद्धि को इतना महत्व क्यों दिया जाता है। साधनाविज्ञानियों के अनुसार शारीरिक स्तर पर मस्तिष्क का दांया हिस्सा इड़ा नाड़ी तथा बायाँ हिस्सा पिंगला नाड़ी से सम्बद्ध है। स्पेरी, माइर्स, गजेनिगा, बोगेन प्रभृति शोधकर्ताओं ने लम्बे काल के अध्ययन-अनुसंधान के उपरान्त यह पता लगाया है कि मस्तिष्क का बायाँ हिस्सा बुद्धि विचार, तर्क, वाणीं, विश्लेषण आदि के लिए जिम्मेदार है, जबकि दायें भाग का संबंध ज्ञान, अनुभूति, पवित्रता, शान्ति जैसे तत्वों से है। योगशास्त्र के ज्ञाता भी पिंगला की प्रकृति स्थूल बुद्धिपरक एवं इड़ा की सूक्ष्मज्ञान और अनुभूतिपरक बताते हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर विदित होता है कि ज्ञान और विज्ञान पक्ष अलग-अलग मार्गों से चलकर एक ही बिन्दु पर पहुँचते हैं।
साधना को एक रूप करके दिखा दिया। साधना को ‘जीवन जीने की कला’ नाम देकर उनने सार्वजनीन बनाया एवं लाखों हीरों को तराशकर उनके जीवन-स्तर को उठा दिया।
साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है, जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म-उपासना फिर देव - उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के, भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाए, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है, उसे उतना ही मिलेगा।
साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था। प्रामाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं, जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिए सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं, जो उपर्युक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
साधना की मध्यावधि में उनसे आकर जुड़ी माताजी ने कितने ही कष्ट सहकर न केवल अपने आराध्य के तप को चरमलक्ष्य तक पहुँचाने में मदद की स्वयं के जीवन को भी वैसा ही ढालकर एक साधिका स्वयं को बनाया, यह गुरु के प्रति समर्पण की एक ऐसी मिसाल है। जो हम सबके लिए सदैव प्रकाशस्तंभ बनी रहेगी।
साधना करके आना और हमारी लाज रख के आना। आज की बात समाप्त हुई।
साधना का स्तर बढ़ाए बिना - प्रखरता का उपार्जन किए बिना उस महासमर की तैयारी नहीं हो सकती, जिसमें आगामी तीन - चार वर्षों में हम सभी को भागीदारी करनी है। साधना का अर्थ है - समर्पण जितना समग्र होगा, गुरुसत्ता की चेतना - सिद्धियों, शक्तियों को हम उतना ही व्यापक परिमाण में धारण भी कर सकेंगे - जीवन उतना तेजी से परिवर्तित भी होने लगेगा। परमपूज्य गुरुदेव इतिहास में ऐसे एक शीर्षपुरुष के रूप में स्वयं को स्थापित कर गए, जिनके माध्यम में जन-सामान्य को यह लगा कि साधारण जीवन जीने वाला भी एक श्रेष्ठ साधक - समष्टिगत चेतना के महाआंदोलन एक अंग बन सकता है। परमपूज्य गुरुदेव ने मानव इतिहास में पहली बार जीवन और साधना को एक रूप करके दिखा दिया। साधना को ‘जीवन जीने की कला’ नाम देकर उनने सार्वजनीन बनाया एवं लाखों हीरों को तराशकर उनके जीवन-स्तर को उठा दिया।
साधना सही अर्थों में अभीष्ट भी है मुक्ति प्रदाता भी।
साधना का संस्कार ही कहा जा सकता है। पर यह एक बात निर्विवाद है कि सन् सत्तर के दशक में वह अपनी मानसिक एकाग्रता और स्मरणशक्ति के लिख विख्यात रहा है। एक बार किसी दर्शक ने कह दिया कि रेन्स बोलने वालों के होठों की हरकत से बोले जाने वाले शब्द का अनुमान करके उच्चारण करता है। यद्यपि वह बोलने वाले के इतना साथ-साथ बोलता है कि अनुमान की कल्पना ही नहीं की जा सकती, फिर भी उसने तब से अपना मुँह उल्टी दिशा में करके बोलना प्रारम्भ कर दिया। अतीन्द्रिय क्षमताओं की जाँच करने वाले कई विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक उसका परीक्षण करने के उपरान्त भी यह निष्कर्ष नहीं निकाल पाये कि इसका रहस्य क्या है।
साधना के विषय में उन्हीं ने अपनी आत्मकथा में लिखा है - “हमारी तपश्चर्या का प्रयोजन संसार के हर देश में, जन-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अनेकानेक भागीदारों का सृजन करना है।” इसी पुस्तक में वे लिखते हैं - “नवनिर्माण के उदीयमान नेतृत्व के लिए पर्दे के पीछे हम आवश्यक शक्ति तथा परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे।” आगे भी वे लिखते हैं “हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे, उसकी गर्मी असंख्यों जाग्रत आत्माएँ अनुभव करेंगे। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना, जो असंभव को संभव बना दे, नरक को स्वर्ग में परिणत कर दें, यह हमारे ज्वलन्त जीवन क्रम का अंतिम चमत्कार होगा।”
साधना ही आप में विश्वास का अविरल स्रोत खोज निकालेगी। अपने आपको भाग्यशाली-महत्वपूर्ण समझने वालों को संसार भी रास्ता देता है। यह भावना अपने हृदय में कूट-कूट कर भर लें कि आपको किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही धरती पर भेजा गया है। आप अवश्य उस काम को करेंगे। इसी महान श्रद्धा के बल पर आप क्या से क्या बन सकते हैं।
साधना विज्ञान इस तथ्य का प्रतिपादन लम्बे समय से करता आ रहा है। मस्तिष्कीय शोधों से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर अब शरीरशास्त्र भी इस सच्चाई को स्वीकारने लगा है कि मस्तिष्क बुद्धि, प्रतिभा, ज्ञान कौशल जैसी भौतिक विभूतियों का केन्द्र भर नहीं, इसमें अनेकों गुना क्षमतावान, ऐश्वर्य का उद्गम स्थल भी है।
साधना के उच्च सोपानों पर आगे बढ़ने के इच्छुक हर साधक को इस प्रक्रिया को जानना व अपनाना ही चाहिए।
साधनावर्ष की शुरुआत होगी। यह एक वर्ष तक पूरे भारत व विश्व में सघन स्तर पर चलती रहेगी। वसंत पर्व २.. से महापूर्णाहुति का शुभारम्भ होना है। स्वरूप क्रमशः स्पष्ट होता चला जा रहा है। हमें अपने अंदर के साधक को जगाकर निखारने के लिए मात्र पंद्रह माह का समय मिला है।
साधना से कम न था। वनस्पतिशास्त्र के प्राध्यापक का यह कलाबोध अतीव उत्कृष्ट था। उनके संगीत की मधुरता, चित्रकारी का सौंदर्य, कविता की कोमल भावनाएँ, जैसे उनके बनाए भोजन में विविध रस बनकर समा जाती।
साधना के माध्यम से समष्टि मन के जागरण एवं अदृश्य जगत के अनुकूलन की प्रक्रिया को समझना एवं तदनुसार ही अपने जीवन की रीति-नीति का निर्धारण करना चाहिए। इसी में समझदारी हैं।
साधना का अगला चरण इसी को मानकर अविरल शान्ति पायी।
साधना से सृष्टि का वैभव ही नहीं, स्रष्टा के प्रेम को भी पाया जा सकता है।
साधना-पद्धति को अपनाना पड़ता है। इसी विधि-व्यवस्था का नाम प्राण-प्रक्रिया है।
साधना का अंश देकर वरदान-आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। भारत ही नहीं, संसार भर का पुराण-साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है, जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकांश की सामर्थ्य और विशेषताएँ देवप्रदत्त थी। ऋषियों, तपस्वियों, सन्तों के जीवन चरित्रों में अधिकांश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएँ थीं और उनने तप-साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था। प्रामाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं, जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिए सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं, जो उपर्युक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
साधना एवं सकाम पुरश्चरणों से आगे बढ़कर ध्यान-धारणा की उच्च भूमिका में प्रवेश करने से पूर्व एक मध्यवर्ती साधन के रूप में इस प्राण-प्रक्रिया का अपनाना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक हो जाता है। आत्मिक भूमिका में प्रवेश करना शत्रुओं के चक्रव्यूह - किले को भेदने की तरह कठिन है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर रूपी षडरिपु इस कल्याण मार्ग को रोके बैठे रहते हैं। वासना और तृष्णा की दो पिशाचिनियाँ मनुष्य को दुराचारिणी वेश्या की तरह प्रलोभन-आकर्षण के सारे साज-सामान जुटाये बैठी रहती है। इस जंजाल में ही जीवात्मा को जन्म से मृत्यु तक बन्धनबद्ध होकर तड़पना पड़ता है।
साधना उपचार हैं, जो इड़ा और पिंगला को संतुलित करके आज्ञाचक्र का जागरण करते हैं। यदि यह सत्य है और साधना-मार्ग के अन्वेषकों द्वारा बतलाई गई नाड़ियों का मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के भीतर अस्तित्व है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उक्त साधनाओं द्वारा मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का संतुलन संभव है। मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों पर हुए अनुसंधान इस तथ्य को सिद्ध करते हैं। किंसबोर्न अपने ‘सैड-हेमिस्फीयर, हैपी-हेमिस्फीयर’ नामक शोध-निबन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारे दृष्टिक्षेत्र की बायीं ओर दीखने वाले दृश्य और बायें कान कान से सुनाई पड़ने वाली ध्वनियाँ - दोनों जब दाहिने मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, तो मस्तिष्क उनके प्रति उतना ग्रहण - शील नहीं होता, जिता कि विपरीत अवस्था होने पर। ऐसे ही इस बात की भी पुष्टि शोधों द्वारा हुई है कि जब व्यक्ति उदास होता है, तो उसकी दृष्टि सामान्यतः बायीं ओर रहती हैं और दायीं मस्तिष्क को प्रभावित करती है, जबकि प्रसन्नता की दशा में ठीक इसका उलटा होता है।
साधना-पुरुषार्थ के बल पर इस परिक्रमापथ के कुचक्र को तोड़कर अपने उद्गम केन्द्र परमात्मा में लीन-लय हो सकता है।
साधना का आधा काम पूरा कर देता है। स्मरण रखिए, संसार में ऐसा कोई भी काम नहीं जिस आप न कर सकते हों। फिर जिम्मेदारियों से क्यों डरते हैं, क्यों झिझकते हैं? इसलिए जिम्मेदारियों की निभाना सीखिए। काम करने से ही अपनी कर्मठता, अपनी शक्तियों पर विश्वास होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-April
साधना होने के कारण ऐसे समय विभिन्न अनयकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। मनुष्यकृत संकटों ओर प्राकृतिक आपदाओं की वृद्धि जब चरम सीमा पर पहुँचने लगती है, तो उसी समय निर्माणकारी सत्ता अपने सहयोगियों के साथ अवतरित होती है और जहाँ एक ओर अधर्म अन्याय अनाचार बढ़ता है वहाँ ये शक्तियाँ धर्म संस्कृति सदाचार सद्गुण तथा सद्भावों को बढ़ाकर संसार में सुख शान्ति की स्थापना के लिये यत्नशील होती है।
साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित की थी। आदि मानव-देवों में सप्तऋषियों का नाम आता हैं वे सभी गायत्री का सप्त व्याहृतियों के प्रतीक माने जाते हैं राम कृष्ण आदि अवतारों की इष्ट गायत्री रही है। इसी महामन्त्र की व्याख्या में चारों वेद तथा अन्यान्य धर्म-शास्त्र रचे गये हैं दत्तात्रेय के चौबीस गुरु योग और चौबीस तप प्रसिद्ध हैं यह सभी गायत्री के तत्त्वज्ञान और साधना-विधान का विस्तार हैं। गायत्री गुरुमन्त्र है। दीक्षा में उसी को माध्यम बनाया जाता है।
साधना, उन्हें तत्पर तथा सक्षम बनाना एवं कार्यक्षेत्र में उत्तर सकने की सामर्थ्य से सुसम्पन्न करना ही इन दिनों मिशन की परोक्ष गतिविधियों का मूर्धन्य प्रयास है। प्रत्यक्ष कार्यक्रम तो पूर्ववत् है। व्यक्ति, परिवार और समाज के नवनिर्माण की जो रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही है, उनमें हेर फेर कुछ नहीं करना है। मात्र उनका स्तर एवं विस्तार ही बढ़ना है। प्रत्यक्ष क्रिया–कलापों में इतना अभिवर्द्धन होगा, किन्तु परोक्ष ढूँढ़ खोज के लिए उन प्रयासों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जो समर्थ प्रतिभाओं को ढूँढ़ने और उछालने की सामयिक माँग पुरा कर सकें।
साधना का प्रवाह जन-मानस को अनुकरण के लिए अनायास ही आकर्षित और प्रेरित करेगा। पिछले दिनों जहाँ आदर्शवादिता के दोनों आधार धर्म अध्यात्म चर्चा एवं उपचार की विडम्बनाओं में उलझकर रहते रहे है। इन दिनों उन्हें अपनी प्रखरता प्रकट करने का, प्रत्यक्ष कार्यरत होने का अवसर मिलेगा। इंजन चलता है, तो डिब्बे अनायास ही पीछे लुढ़कने लगते है। तूफान उठता है, तो पत्ते और तिनके साथ ही उड़ने लगते हैं।
साधना के रूप में सम्मानित होता है। तत्त्वदर्शी इन्हीं अदृश्य हलचलों को जाग्रत आत्माओं के अन्तःकरणों में उछलती देखते हैं तो कहते है अवतार का आवेश असन्तुलन को सन्तुलन में बदलकर ही रहेगा।
साधना से संचित मानवों का अंत चुटकी बजाने जितने समय में कर सकता हैं। तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या ने यह संकट सामने खड़ा कर दिया है कि एक शताब्दी में ही जीवनयापन के लिये आवश्यक अन्न, जल,वस्त्र, निवास जैसे साधन मिलना कठिन हो जायेगा। जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उस अभिवृद्धि का भार उठा सकने की क्षमता अपनी धरती शताब्दी पूरी होते होते गंवा बैठेगी। कारखाने जिस अनुपात से प्रदूषण और विकिरण उत्पन्न करते है, उसका प्रभाव मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक सन्तुलन स्थिर नहीं रख सकता। शरीर और मन की बढ़ती हुई दुर्बलता प्रकृति का दबाव और विकृत प्रचलनों का दबाव कहाँ तक सहन कर सकेगी, इसमें भारी संदेह है।
साधना मार्ग पर चलने के लिए प्रथम चरण इष्ट-निर्धारण का उठाना पड़ता है। प्रगति की आन्तरिक महत्त्वाकाँक्षा स्वाभाविक है, पर उसका स्वरूप भी तो निश्चित होना चाहिए। उमंगें असीम हैं और उनकी स्वरूप भी तो है और उनकी दिशाधारा भी अनेकों। पानी पर उठने वाली लहर की तरह महत्त्वाकाँक्षाओं की कोई सीमा नहीं। एक के बाद दूसरी लहर उठती है और हवा के झोंकों के साथ अपनी दिशा बदलता है।
साधना स्वर्णजयंती वर्ष में एक लाख साधकों ने मिलकर प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री जाप का अभियान चलाया। यह इस युग का अद्वितीय और अपने आप में अकेला प्रयास था। युगसन्धि महापुरश्चरण अभियान जो 1979 में आरम्भ हुआ, वह तो और भी विलक्षण परिणामदायी है। इस अभियान का वातावरण पर, जन-मानस पर जो सूक्ष्म प्रभाव पड़ा है, उसका गम्भीरतापूर्वक विवेचना किया जाए, तो वह स्पष्टतः दिखाई पड़ सकता है। गायत्री यज्ञों दीपयज्ञों, अश्वमेधों के रूप में सामूहिक आयोजनों की जो अभियान श्रृंखला चल पड़ी है, वातावरण के निर्माण और सूक्ष्मजगत के परिवर्तन में उसका भी अपना विशिष्ट स्थान है।
साधना का विधि - विधान उसी के अनुरूप चलता है। यों उपास्य केवल एक ही है। ’दिव्यजीवन ‘ किन्तु उसके लिए पुरुषार्थ करने की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि, उपासनात्मक उपचारों के सहारे ही बनती है। दिव्य -जीवन की कल्पना करते रहने भर से तो कोई काम नहीं बनता,पहलवान बनने के लिए व्यायाम की, विद्वान बनने के लिए स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है, इसी प्रकार आत्मिक - प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार अपनाने पड़ते है। दिव्य -जीवन की चरम परिस्थिति ही पूर्णता है।
साधना विधान के रूप में अपनाना होता हैं साधना में शिक्षा और प्रेरणा का समावेश होता है फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
साधना से सिद्धि मिलने का माहात्म्य बताया जाता है, वह जीवन-देवता की अभ्यर्थना ही है, परब्रह्म की प्रसन्नता के लिए उसकी मर्यादाओं का पालन करने भर से काम चल जाता है, किन्तु अन्तरात्मा में विद्यमान दिव्य-ज्योति को प्रखर बनाने के लिए विशेष रूप से पुरुषार्थ करने होते हैं और वही साधना कहलाती है।
साधना का आरम्भ अन्तराल में किया जाता है, पर उस आरम्भ को प्रतिफल तक पहुँचने के लिए अन्तरिक्षीय शक्तियों का ही सहयोग लेना पड़ता है।
साधना, स्वाध्याय सत्संग, मनन चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोड़ती थी जिनमें जनमानस का अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरूप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलाता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरी रहता था, इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
साधनावर्ष की शुरुआत होगी, जिसके स्वयं के विषय में गायत्री जयंती गुरुपूर्णिमा पर्व तक सबकी जानकारी हो सकेगी। कार्यक्रम संबंधी निर्धारित प्रारूप भरकर आने पर सभा पक्षों पर विचार विमर्श कर ही कार्यक्रम तय हो सकेंगे। पूर्व निर्धारित सभी कार्यक्रम इसी प्रकार परिवर्धित किये जा रहे हैं।
साधना के लिए इष्ट रूप गायत्री का ही वरण होना चाहिए।
साधना और सामर्थ्य की दिनों कोई कमी नहीं। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के इतिहास में मनुष्य कभी इतना समृद्ध और सशक्त नहीं हुआ जितना इन दिनों है साथ ही यह भी सच है कि वर्तमान में उस पर जितनी विपन्नता छाई है उतनी भूतकाल में कभी भी सहन नहीं करनी पड़ी।
साधना का नियोजन तो होना ही चाहिए, पर उतने से ही इतना बड़ा कार्य सम्पन्न हो नहीं सकेगा। परिवर्तन की अधिकाँश प्रक्रिया सूक्ष्मजगत में सम्पन्न होगी। प्रत्यक्ष में तो उसी की प्रतिक्रिया भर दृष्टिगोचर होगी। इस प्रयोजन के लिए जाग्रत आत्माओं की तत्परता और विभूतियों की सहायता को जहाँ आमंत्रित किया गया है, वहाँ परोक्ष का सहयोग प्राप्त करने की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा गया है।
साधना और योग को ब्रह्मविद्या कहते हैं। आस्तिकता-आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी मिलने से वह त्रिवेणी बनती है, जिसमें स्नान करने पर रामायण में प्रतिपादित ‘काक होहि पिक-बकहु मराला’ का भावनात्मक कायाकल्प सम्भव होता है।
साधना की भाव-सम्वेदनाएँ मचलती रहती हैं उन्हीं पर कुटुम्ब का आनन्द और उत्थान टिका हुआ है। श्रद्धातत्व हटा देने के बाद कुटुम्बियों के बीच आपाधापी, खींचतान, उठक-पटक रोष-प्रतिशोध घृणा-ईर्ष्या के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। परिवार संस्था की गरिमा श्रद्धा-सद्भावना के अतिरिक्त किसी प्रकार न तो स्थिर रह सकती है और न बढ़ सकती है।
साधना-प्रयोजन में इसी के विचित्र उपचार योगाभ्यासों तप-साधनों एवं धर्मानुष्ठानों के रूप में प्रचलित है। इष्ट का लक्ष्य का उपास्य का निर्धारण दिव्यदर्शियों ने गायत्री के रूप में गहन अध्ययन और अनवरत अनुभव अभ्यास के आधार पर किया है। वह प्राचीनकाल की तरह आज भी अपनी उपयोगिता यथावत अक्षुण्ण रखे हुए है। विज्ञ-साधकों के लिए उसी का अवलम्बन ग्रहण करना हर दृष्टि से उपयोगी है।
साधना नियोजन की जा सकती है। समृद्धि-संवर्द्धन के लिए जिस प्रकार सोचा जाता रहा है, जिस प्रकार उसमें साधन, श्रम तथा मनोयोग का नियोजन होता रहा है, उसी तन्मयता तथा तत्परता से यह भावनात्मक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए सक्रियता अपनाई जाएगी, तो कोई कारण नहीं कि प्रयत्न असफल चले जाएँ। असफलता का एक ही प्रमुख कारण है, उपयुक्त तन्मयता तथा अभिरुचि एवं प्रयत्नशीलता का अभाव। इसे यदि दूर किया जा सके, तो प्रगति किसी भी क्षेत्र में हो सकती है, भले ही वह उत्कृष्टता-संवर्द्धन के लिए ही नियोजन क्यों न की गई हो?
साधना मात्र इतनी ही हो सकती है कि सत्ताईस माला प्रतिदिन के हिसाब से उपलब्ध 4 दिनों में 108 माला का एक अनुष्ठान संपन्न हो सके, जब तक नये उपलब्ध न लाये कि स्वीकृति नहीं है तो क्या, ठहरने खाने−पीने को मिल ही जाएगा। मई जून के सत्रों में यह मर्यादा बनाए रखने की अपेक्षा सभी कार्यकर्ता बंधुओं, पाठकगणों से शान्तिकुञ्ज का तंत्र करता है
साधना प्रधान एवं समग्र कार्य क्षेत्र को सँभालने वाले अग्रगामियों का एक एवं तीन माह के प्रशिक्षण तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत सार्थक शिक्षा व सार्थक चिकित्सातन्त्र फिलहाल मात्र यही निवेदन कि महाकुम्भ की सभी तिथियाँ पावन है आप जहाँ है, वही रहकर युगसृजन की प्रक्रिया में और गतिशील होने का संकल्प इन दिनों में ले व स्थूल न सही सूक्ष्म रूप सतत् शान्तिकुञ्ज रहने ज्ञानगंगोत्री में स्नान का ध्यान अवश्य करते रहे।
साधना सम्भव हो सके, तो निश्चित हो मनुष्यों का विशेष लाभ प्राप्त होगा। निश्चय ही इतनी बड़ी सभ्यता के अधिकारी धरती जैसी दरिद्रता और उस पर रहने वाले पतित-पीड़ित लोगों पर आक्रमण करने और यहाँ से लूट ले जाने के लिए इतनी कष्टसाध्य यात्राएँ नहीं कर सकते। उनका उद्देश्य इस लोक के प्राणियों को अपनी उपलब्धियों से लाभान्वित करना ही हो सकता है भारत के ऋषि मुनि समस्त संसार में ज्ञान और विज्ञान का वितरण करने के सदुद्देश्य से परिभ्रमण करते रहे है। इससे कम सदुद्देश्य इन अन्तर्ग्रही महामानवों का भी नहीं हो सकता। वे हमसे संपर्क साधने का प्रयत्न करते है, पर वह साधता नहीं।
साधना है। युगचेतना से परिचित और प्रभावित करना है। इतना ही नहीं संपर्क-प्रशिक्षण और अनुरोध को इतना प्रभावी बनाना है, जिसके दबाव से लोग अपनी आदतों, इच्छाओं और गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने के लिए सहमत ही नहीं, तत्पर भी हो सके। यह कार्य कहने-सुनने में सरल प्रतीत हो सकता है, पर वस्तुतः उतना ही कठिन और जटिल हैं ऐसा उत्तरदायित्व उठाने वालों को कैसा होना चाहिए, उसका अनुमान लगाने पर यही कहना पड़ता है कि उनकी मजबूती घहराती नदियों पर मीलों लम्बे पुल का उस पर दौड़ने वाले वाहनों का बोझ उठा सकने वाले पायों जैसी होनी चाहिए।
साधना कहते है।
साधना का नियोजन सोच सके।
साधना-संदर्भ कहा में एक ही निश्चय पर पहुँची है कि आत्मिक-प्रगति की साधना के लिए इष्ट रूप गायत्री का ही वरण होना चाहिए।
साधना क्षेत्र का प्रथम चरण इष्ट-निर्धारण है। प्रगति के किस बिन्दु तक पहुँचना है, इसका सुदृढ़ निश्चय होना आवश्यक है भव्य भवन बनाने वाला सर्वप्रथम अभीष्ट निर्माण के नक्शे का मॉडल बनाते है। आत्मिक -प्रगति के लिए किस मार्ग से जाना है? किस स्तर का साधन जुटना है, उसके लिए कितने ही प्रकार के निर्धारण अपनाए जाते रहे है। इन्हें इष्टदेव या देव कहते है।
साधना में शिक्षा और प्रेरणा का समावेश होता है फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।
साधनाबल की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता को न तो चन्दा संग्रह करके पूरा किया जा सकेगा और न शासन के लिए इतने बड़े लक्ष्य को पूरा करने की बात सोच सकना सम्भव होगा। इतनी बड़ी सम्पदा जन-जन के मन-मन में उभरने वाली भावश्रद्धा के कारण स्वेच्छा-समर्पित अनुदानों से ही सम्भव होगी।
साधना-विधान का विस्तार हैं। गायत्री गुरुमन्त्र है। दीक्षा में उसी को माध्यम बनाया जाता है। हिन्दू-धर्म के दो प्रतीक हैं-शिखा और सूत्र। दोनों ही गायत्री के प्रतीक है।
साधना, प्रचार, जनसंपर्क और व्यवहार कुशलता के बल पर ख्याति अर्जित कर लेते है। दुर्बल से बलवान, अख्यात से विख्यात, मंदबुद्धि से बुद्धिमान, निर्धन से धनवान् आदि सफलताएँ बहिरंग सत्ता की ही उपलब्धियाँ कही जा सकती है।
साधना कहलाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-July
साधना का पालन करने में सफल होंगे।
साधना की ओर नियोजित करते रहते हैं। उनके द्वारा उड़ेली जा रही गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता इतनी आनंददायक और इतनी समर्थ है कि उसे पाकर हम स्वर्ग में स्थित देवताओं से बढ़कर संतोष का अनुभव करते रह सकते हैं।
साधना का प्राण है।”
साधना को अपनाकर अपने को उत्कृष्ट बनाने और समाज में आदर्शवादिता की प्रतिस्थापना के लिए अधिक-से-अधिक समर्पण करके दिखाया। हमारे मार्गदर्शक ने हमसे यही कराया और इसी मूल्य पर अपना सहयोग, स्नेह, प्रकाश एवं अनुदान प्रदान किया। हम भी उन्हीं को दे सकेंगे, जो विश्वमानव की आज की सबसे बड़ी आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ कर गुजरने की हिम्मत दिखा सकें। नवनिर्माण के ज्ञानयज्ञ में जिसका जितना योगदान होगा, उसके अनुपात में हमारा स्नेह, प्रकाश एवं अनुदान कुछ अधिक ही मिलेगा, कम नहीं। हमारे प्रति सच्चे प्रेम की कसौटी भी यही हो सकती है कि किसने किस हद तक इस पुण्यप्रयोजन के लिए क्या किया?
साधना और तपश्चर्या से दिव्य क्षमताएँ बढ़ती हैं और उससे कितने ही प्रकार के असामान्य कार्य कर सकना संभव होता है। यह आध्यात्मिक उपलब्धियाँ अगले जन्मों तक साथ चली जाती हैं। प्रायः ऐसे ही लोग बिना साधना-तपश्चर्या के भी पूर्व संचित संपदा के आधार पर चमत्कारी क्षमताओं को प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। ऐसी विलक्षणताएँ हर मनुष्य के अचेतन मन में विद्यमान हैं, परन्तु वे प्रसुप्त स्थिति में दबी पड़ी हैं। यदि उन्हें कुरेदा, उभारा, बढ़ाया और परिष्कृत किया जा सके तो मनुष्य सूक्ष्म विभूतियों और स्थूल सफलताओं से परिपूर्ण बन सकता है।
साधना समाप्त करके आसन से उठने ही वाले थे कि उनका उपासना-कक्ष प्रकाश से पूर्ण हो गया। उनके सम्मुख दिव्याम्बर धारी, रत्नकिरीटी, वज्रधर इन्द्र प्रकट हो गए थे।
साधना का माध्यम बन जाता है, तो वह उपासनात्मक प्रतीक का कार्य करने लगता है। पूजा-उपासना के पीछे जो प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं, उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त
साधना के पथ से विचलित हो जाता है। दूसरे उनकी लौकिक जीवन में भी क्या उपयोगिता? शरीर को बड़ा या छोटा करने, परकाया प्रवेश करने, दृश्य-अदृश्य होने, किसी के मन की बात जान लेने या इसी तरह की और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली जाएँ तो भौतिक जीवन में उनसे लाभ क्या होगा? उलटे अनर्थकारी परिणतियाँ ही सामने आयेंगी। अतः आत्मविकास के इच्छुक साधक को सिद्धियों और अतीन्द्रिय क्षमताओं के प्रति आग्रह नहीं करना चाहिए वरन् सरल राजमार्ग पर चलते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए।
साधना है। इसे दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक प्रगति की यात्रा कह सकते हैं। जिस प्रकार इन्द्रियजन्य वासनाओं और तृष्णाओं की पूर्ति भौतिक साधन-सामग्री के आधार पर होती है, उसी प्रकार आन्तरिक समाधान, संतोष, आनन्द की-उल्लास की असीम शान्ति भरी स्थिति अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उपार्जित सम्पदाओं से होती है। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। नर-पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है।
साधना हेतु चले गए थे। एक वर्ष बाद उनने ऋषि परंपरा के बीजारोपण तथा नवयुग की आधारशिला रखने हेतु तपस्वियों का निर्माण करने तथा देव-परिवार बनाने हेतु शान्तिकुञ्ज-गायत्रीतीर्थ में आकर वह पौधा रोपा था, जो आज वटवृक्ष बन गया है एवं सारे विश्व में जिसका संदेश जन-जन तक पहुँच रहा है। विदाई की वेला में अत्यंत मार्मिक संदेश उनके मुख से अमृतवाणी के रूप में चार दिन तक निस्सृत हुए। जिनने भी उन्हें सुना है-उनके लिए वे एक निधि-अनमोल खजाने के रूप में सुरक्षित हैं। उन्हीं संदेशों में भक्ति, समर्पण, गुरुभक्ति परक कुछ अंश यहाँ उद्धत हैं, ताकि जिनने नहीं सुना है, वे इन्हें पढ़कर गुरुतत्त्व की गरिमा का बोध कर सकें एवं अपने लिए किए जाने वाले कर्तृत्वों के संबंध में मार्गदर्शन पा सकें।
साधना से प्राप्त करने की विधि-व्यवस्था भी है, उनके नाम इस प्रकार हैं-(1) अणिमा-लघु शरीर, (2) महिमा-शरीर को विशालकाय बनाना, (3) लघिमा-शरीर को प्रकाश के सदृश बना लेना, (4) गरिमा-शरीर को अधिक भारी बना लेना, (5) प्राप्ति-शरीर को ब्रह्माण्ड के किसी कोने तक पहुँचाना, (6) प्राकाम्य- पानी के भीतर रहना, जमीन के भीतर कई दिनों तक बैठे रहना, आयु को न बढ़ने देना आदि। (7) वाशित्व- लोगों को प्रभावित एवं नियंत्रित करने की क्षमता का विकास, पशु-पक्षी तथा निर्जीव जड़-पदार्थ तक को भी अपनी इच्छानुसार बनाना, (8) ईशित्व- भगवान की शक्तियों-विभूतियों को अर्जित कर लेना। इनके अतिरिक्त भी अनेक ऐसी सिद्धियाँ हैं, जिनका विकास योग-साधनाओं एवं तप-साधनाओं द्वारा होता है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
साधनाओं द्वारा सुविकसित करके न केवल पूर्वाभास, पूर्वानुमान, पूर्वज्ञान, दूरश्रवण, दूरदर्शन जैसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ अर्जित की जा सकती हैं, वरन् ओजस-तेजस का धनी भी बना जा सकता है। परिष्कृत चेतना ही परमात्मा है। अपनी आत्मचेतना को विकसित करके हर कोई इस स्तर को प्राप्त कर सकता है और अलौकिक विभूतियों, ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन सकता है।
साधना के निर्वाह में जुट गए। चतुरों ने इसमें घाटा बताया और हानि सुझायी, किन्तु भावनाशीलों ने समय की माँग को सद्गुरु-विश्वगुरु के रूप में आए ईश्वर का आमंत्रण माना और इसे प्राणपण से स्वीकार कर लिया।
साधना में किसी एक सद्गुण पर पूर्ण रूप से निष्ठावान होना पड़ता है। आजीवन ब्रह्मचर्य रखने वाले भीष्म पितामह, परमभक्त हनुमान, महासती अनुसूया, तपस्वी दुर्वासा, सत्य हरिश्चन्द्र अपने विशिष्ट गुणों के कारण ही उच्चतम सम्मान पाने के अधिकारी बन सके थे। गुणों की विशिष्टता के कारण ही पूज्य-पद प्राप्त होते आये हैं। यह सनातन नियम आगे भी इसी तरह चलता रहेगा।
साधना और संघर्ष का समन्वय है। इसी आधार पर उनने अपने साधनों से सारे विश्व में नवयुग का शंख बजाया और नये जागरण का वातावरण बनाया। उनके न रहने पर अनुयायियों ने अहिंसा की, पूजा-पाठ की सस्ती लकीर पीटते रहना तो जारी रखा, किन्तु अनीति से लड़ने की कष्टसाध्य प्रक्रिया की ओर से मुँह मोड़ लिया। फलतः बौद्ध धर्म मध्य एशिया से चढ़ दौड़ने वाले डाकुओं द्वारा देखते-देखते निष्कासित कर दिया गया। शौर्य, साहस की तेजस्विता खो बैठने वालों की जो दुर्गति होती है, वही अपने देश की भी हुई।
साधना-प्रयास के अचेतन मन का असाधारण विकास पाया जाता है।
साधना-तपश्चर्या के भी पूर्व संचित संपदा के आधार पर चमत्कारी क्षमताओं को प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। ऐसी विलक्षणताएँ हर मनुष्य के अचेतन मन में विद्यमान हैं, परन्तु वे प्रसुप्त स्थिति में दबी पड़ी हैं। यदि उन्हें कुरेदा, उभारा, बढ़ाया और परिष्कृत किया जा सके तो मनुष्य सूक्ष्म विभूतियों और स्थूल सफलताओं से परिपूर्ण बन सकता है।
साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वालों की रुचि जितनी सिद्धियाँ प्राप्त करने की होती है, उतनी आत्मोत्कर्ष की नहीं। ऐसी आकांक्षा क्यों की जाती है? गहराई से विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र इसलिए कि कठोर जीवन-संघर्ष के झंझावातों से न जूझना पड़े और सब कुछ सहज-सरल ढंग से प्राप्त हो जाए। यह परमात्मा के व्यवस्था नियमों को तोड़ने की आकांक्षा ही कही जाएगी, अन्यथा परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को इतने साधन और इतनी शक्तियाँ प्रदान कर रखी हैं कि उनका यदि भली-भाँति उपयोग किया जाए तो विशेष कुछ आवश्यकता रह ही नहीं जाती।
साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।
साधनाओं का लक्ष्य एक ही है। दोनों एक-दूसरे पर अन्योऽन्याश्रित हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके लिए ध्यानमुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यानपूर्वक देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए। यही आत्मबोध की प्रत्यक्ष विधा है।
साधना में साधकों को आत्मबोध और तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों साधनाओं का लक्ष्य एक ही है। दोनों एक-दूसरे पर अन्योऽन्याश्रित हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके लिए ध्यानमुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यानपूर्वक देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए। यही आत्मबोध की प्रत्यक्ष विधा है।
साधना क्षीण होगी। कहीं उसके मन में स्वर्ग को भोग लेने की इच्छा आ गयी-तो कल छिनती अमरावती आज और अभी छिन जाएगी। वह माँ! कहकर मचलेगा तो महेश्वरी सौ अश्वमेधों की मर्यादा भूल जाएँगी। उसमें कामना न जगे, देवधानी वहीं तक निश्चिन्त रह सकती है।
साधनाओं एवं तप-साधनाओं द्वारा होता है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
साधनारत रहते हुए यह तीसरा वर्ष भी पूर्ण किया। और गंगास्नान करके उनके पास जाने के लिए चल दिया।
साधना के परमानन्द को अवश्य पा लेगा। अपने सहित सृष्टि के बाहर सच्चिदानन्द परमात्मा का अस्तित्व कल्पना करने वाले जन्म-जन्मान्तर उसकी अनुभूति प्राप्त नहीं कर सकते। परमात्मा इस सृष्टि में ही है। सृष्टि में जो कुछ है, वह सब उसी का स्वरूप है, उसी का अस्तित्व है।
साधना गायत्री माता का दिव्य-वरदान बनकर सामने आयी। आत्मबोध से लाभान्वित ऐसी आत्माओं की प्रत्येक विचारणा एवं प्रत्येक क्रियापद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती, छलकती दिखाई पड़ती है। भगवान बुद्ध को जिस दिन आत्मबोध हुआ, उसी दिन से वे दिव्य मानव बन गये। बुद्ध को सामान्य राजकुमार से भगवान बना देने का श्रेय उस आँतरिक जागरण को ही दिया जाता है, जिसे ‘आत्मबोध’ के रूप में पुकारते हैं। यह दिव्य उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी, वह बुद्ध की तरह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जाएगा।
साधना के द्वारा प्रायः सम्बन्धित सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं, आकांक्षाओं में क्या हेर-फेर होना चाहिए, गतिविधियों में रीति-नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट-पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभुप्रेरित रूप-रेखा सामने आती है।
साधना-उपासना के क्षेत्र में इसलिए प्रवेश करते हैं कि उन्हें इससे वे सिद्धियाँ मिल जायेंगी, जिसके आधार पर सब कुछ प्राप्त कर लेने का दावा शास्त्र करते हैं। जिस आत्मकल्याण के उद्देश्य को पूरा करने के लिए साधना-उपासना का समग्र स्वरूप ऋषियों ने गहन अनुसंधान के उपरान्त खड़ा किया, वह मात्र चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए नहीं हो सकता। पर इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वालों की रुचि जितनी सिद्धियाँ प्राप्त करने की होती है, उतनी आत्मोत्कर्ष की नहीं। ऐसी आकांक्षा क्यों की जाती है? गहराई से विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र इसलिए कि कठोर जीवन-संघर्ष के झंझावातों से न जूझना पड़े और सब कुछ सहज-सरल ढंग से प्राप्त हो जाए।
साधना-उपासना का समग्र स्वरूप ऋषियों ने गहन अनुसंधान के उपरान्त खड़ा किया, वह मात्र चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए नहीं हो सकता। पर इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि साधना-क्षेत्र में प्रवेश करने वालों की रुचि जितनी सिद्धियाँ प्राप्त करने की होती है, उतनी आत्मोत्कर्ष की नहीं। ऐसी आकांक्षा क्यों की जाती है? गहराई से विचार करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि मात्र इसलिए कि कठोर जीवन-संघर्ष के झंझावातों से न जूझना पड़े और सब कुछ सहज-सरल ढंग से प्राप्त हो जाए। यह परमात्मा के व्यवस्था नियमों को तोड़ने की आकांक्षा ही कही जाएगी, अन्यथा परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य को इतने साधन और इतनी शक्तियाँ प्रदान कर रखी हैं कि उनका यदि भली-भाँति उपयोग किया जाए तो विशेष कुछ आवश्यकता रह ही नहीं जाती।
साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों साधनाओं का लक्ष्य एक ही है। दोनों एक-दूसरे पर अन्योऽन्याश्रित हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके लिए ध्यानमुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यानपूर्वक देखना चाहिए और उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गंभीर मनःस्थिति में करना चाहिए। यही आत्मबोध की प्रत्यक्ष विधा है।
साधना का पहला पाठ भी अभी याद नहीं हुआ। तुम पुनः एकांत में जाकर मौन भाव से उसी मंत्र का जप करो। एक वर्ष बाद पुनः आत्मसाक्षात्कार का उपाय जानने के लिए मेरे पास आना।
साधना तो अपने को समाज का अंग मानकर उसके लिए अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना भर है। यह कोई अतिरिक्त अनुदान नहीं, जो हम समाज को देते हैं। हमारी भावना तो यह रहती है, मानो हम किसी को ऋण दे रहे हों। हम सेवा के लिए समय-साधनों आदि का विनियोग करते हैं। उन्हें इस दिशा में लगाने की क्षमता का विकास भी करते हैं, किन्तु अपनी निश्छल भावना का उपयुक्त विकास करना चूक जाते हैं।
साधना नहीं करनी है। वह एक विस्मयमूलक दृष्टिकोण से उसकी रचना-इस संसार को देखे और परमशिल्पी की परमरचना समझकर उसका सम्मान करे, इतना भर कर लेने से इसकी अनुभव शक्ति स्वतः प्रबुद्ध हो उठेगी और एक बार प्रबुद्ध हो जाने पर वह शक्ति पुनः निहित नहीं होगी।
साधनाओं द्वारा होता है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-October
साधना प्रशिक्षण अवधि के रूप में संपन्न होगा। आश्विन नवरात्रि की पावन वेला एवं विशिष्ट 24 दिवसीय
साधनावधि में जो संकल्प लिये गये होंगे उन्हें इन 3 माह की अवधि में पकाया जाएगा व प्रशिक्षण द्वारा अनेकानेक साधकों की सहभागिता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। यह प्रशिक्षण अभी भारतवर्ष में 40 स्थानों पर सात दिवसीय सत्रों के रूप में आरम्भ हो रहा है जिनमें शाँतिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयं जाकर मार्गदर्शन देंगे एवं इस कार्य के विस्तार हेतु किये जाने वाले समयदान का नियोजन करेंगे। वसंत पंचमी 1999, 22 जनवरी से बसंत पंचमी 2000,10 फरवरी तक एक वर्ष की अवधि को विशिष्ट साधना वर्ष के रूप में सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है। इस पूरे एक वर्ष में सारे विश्व में समूह चेतना के जागरण की प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर एक करोड़ से अधिक साधकों द्वारा संपन्न होने वाले इस महापुरश्चरण महाअभियान के द्वारा होने जा रही है।
साधना-तपश्चर्या द्वारा शरीर को पहले अनुकूल बनाने की सलाह देते है, ताकि उससे उत्पन्न ऊर्जा को ग्रहण-धारण किया जा सके।
साधनाएँ संपन्न कराई। ब्रह्माण्डीय ज्योतिष के ज्ञाता परमपूज्य गुरुदेव ने 1951 से 1958 तक सतत् गायत्री साधना व यज्ञों के भिन्न भिन्न प्रकारों की श्रृंखलायें चलायी एवं सूर्य शक्ति के नवयुग होते दोहन हेतु विशिष्ट 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का सफल संचालन मथुरा में 1958 की कार्तिक पूर्णिमा में आयोजन कर किया। गायत्री परिवार उसके बाद ही बृहत् रूप लेता चला गया। तुरन्त बाद पूज्यवर हिमालय की अज्ञातवास की कठोर तपश्चर्या पर चले गये, जहाँ से उनने साधक की डायरी के कुछ पृष्ठ भेजे जो बाद में सुनसान के सहचर के रूप में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुए। इस विशेष साधना का लक्ष्य भी भारत पर चीन के हमले से संभावित खतरे की गम्भीरता को कम करना, अष्टग्रही योग को टालना एवं जन जन के मनोबल का संवर्द्धन करना था।
साधनात्मक पुरुषार्थों द्वारा सूक्ष्मजगत का क्रुद्ध प्रकृति का सम्भावित विभीषिकाओं का शमन ही इसके मूल में दिखाई पड़ता हैं। मानों स्रष्टा ने यह विशिष्ट दायित्व उस मिशन को विशेष जिम्मेदारी के साथ सौंपा हो। परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण 1926 से आरम्भ होकर प्रायः 1952 के अंत तक चले। पूर्णाहुति अवश्य ज्येष्ठ सुदी सन् 2010 गायत्री जयन्ती सन् 1943 में सम्पन्न हुई किन्तु एकाकी नहीं। पूज्यवर ने सहस्रांशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ में 125 करोड़ गायत्री का जप 125 लाख आहुतियों का हवन 125 हजार से अधिक व्यक्तियों की एक वर्ष तक भागीदारी कराके सम्पन्न कराया अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1952 में दिये गये सम्पादकीय के अनुसार।
साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी है और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे ज्ञानोपकार से बढ़कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
साधना आराधना
साधना पुरुषार्थ प्रखरतम किये जाने व तदुपरान्त पूर्णाहुति संपन्न किये जाने की चर्चा विगत अंक में की थी। भगवत्−सत्ता के अवतरण हेतु हमारा अंतर्मन एक योग्य उपकरण बन सके,इसके लिये सभी को इस पुरुषार्थ में जुटना होगा। इस चार भागों में बंटे समय का प्रथम चरण परम वंदनीय माताजी की महाप्रयाण तिथि 6 सितम्बर 1998 से 30 सितम्बर 1998 की अवधि में संकल्प अवधि के रूप में पूरा होना था। 1 अक्टूबर 1998 विजयादशमी से 22 जनवरी 1999 वसन्तपर्व तक का समय द्वितीय चरण में सारे भारत व विश्व में साधना प्रशिक्षण अवधि के रूप में संपन्न होगा। आश्विन नवरात्रि की पावन वेला एवं विशिष्ट 24 दिवसीय
साधनावधि में जो संकल्प लिये गये होंगे उन्हें इन 3 माह की अवधि में पकाया जाएगा व प्रशिक्षण द्वारा अनेकानेक साधकों की सहभागिता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
साधना कहा जाय तो अत्युक्तिपूर्ण न होगा।
साधना सत्र बारह वर्ष तक चलते रहने का संकल्प प्रकट किया गया है। अन्तरिक्ष का विभाजन बारह राशियों में हुआ है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुये ठीक अपनी उसी स्थिति में बारह वर्ष में आती है। इस तथ्य को देखते हुए प्रस्तुत पुरश्चरण की अवधि बारह वर्ष रखी गयी है।
साधना से सूक्ष्म वातावरण संव्याप्त प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना।
प्रथम सोपान को राजतंत्र अर्थतन्त्र एवं स्वयं सेवी संस्थान पूरा कर रहे है तो भी उसमें यथाशक्ति सहयोग प्रज्ञापरिजनों को भी देना चाहिये।
साधना विज्ञान की मान्यता भी ऐसी ही हैं योगीजन विज्ञान के इस निष्कर्ष से सहमत है कि शरीरस्थं उच्च केन्द्रों को बिरले ही सक्रिय कर पाते है और यदि वे सक्रिय हो भी गए, तो उन्हें सँभाल पाना उनके लिए संभव नहीं होता। यही कारण है कि योगी लोग साधना-तपश्चर्या द्वारा शरीर को पहले अनुकूल बनाने की सलाह देते है, ताकि उससे उत्पन्न ऊर्जा को ग्रहण-धारण किया जा सके।
साधना के साथ साथ आजाद होने जा रहे भारत को ऋषियों की तपश्चर्या का बल कैसे मिलेगा यह प्रतिपादन करते हुये साधकों की शंकाओं का समाधान वे प्रत्येक अंक में करते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समापन एवं भारतवर्ष के विभाजन के समय उनने परिजनों से विशिष्ट साधनाएँ संपन्न कराई। ब्रह्माण्डीय ज्योतिष के ज्ञाता परमपूज्य गुरुदेव ने 1951 से 1958 तक सतत् गायत्री साधना व यज्ञों के भिन्न भिन्न प्रकारों की श्रृंखलायें चलायी एवं सूर्य शक्ति के नवयुग होते दोहन हेतु विशिष्ट 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का सफल संचालन मथुरा में 1958 की कार्तिक पूर्णिमा में आयोजन कर किया। गायत्री परिवार उसके बाद ही बृहत् रूप लेता चला गया। तुरन्त बाद पूज्यवर हिमालय की अज्ञातवास की कठोर तपश्चर्या पर चले गये, जहाँ से उनने साधक की डायरी के कुछ पृष्ठ भेजे जो बाद में सुनसान के सहचर के रूप में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुए।
साधना में अगले ही दिनों करोड़ों सम्मिलित होंगे। एक ही प्रयोजन के लिये एक ही सूत्र में आबद्ध होकर एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है तो उससे बिखराव वाली अस्त–व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है आगे वे इसी लेख में लिखते है यह साधना नहीं है वरन् उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारी द्वारा सम्पन्न हो रहा है जो अपने अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ सम्पन्न कर रहे है। युगसंधि का मध्यान्तर उसकी रूपरेखा लेख से उद्धृत पृष्ठ 25 अखण्ड ज्योति फरवरी 90 पूज्यवर ने लिखा कि अदृश्य वातावरण में सूक्ष्मजगत छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की सम्भावना है।
साधना का लक्ष्य भी भारत पर चीन के हमले से संभावित खतरे की गम्भीरता को कम करना, अष्टग्रही योग को टालना एवं जन जन के मनोबल का संवर्द्धन करना था।1962 में आते ही उनने युगनिर्माण साधना आरम्भ की।
साधना से सिद्धि
साधना में संलग्न रहना है जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा अवतरण संभव कर दिखाया था। महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरन्तर अनवरत गति से शरीर छूटने तक चलते ही जाते है। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरत रहने का संकल्प संजोये रहते है इसी परम्परा का निर्वाह उन्हें भी करना है जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसी उपलब्धियाँ कमानी हो जिन्हें प्रेरणाप्रद अनुकरणीय अभिनन्दनीय एवं अविस्मरणीय कहा जा सके।
साधना एक सुरक्षा कवच के
रूप में ब्रह्मास्त्र के रूप में हम सबकी ढाल बन जाये एव हम सभी इक्कीसवीं सदी में बढ़ी ब्रह्मबल के साथ प्रवेश करें। कोई भी इस काफ़िले से बिछुड़ने न पाये।
साधना की विशिष्ट अवधि बीती जिसमें एक से पाँच बनने की पाँच वीरभद्रों के निर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। 1987 में भारत भर में हुये राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों 108 कुण्डीय महायज्ञों के बाद 1988 में युगसंधि महापुरश्चरणों की घोषणा कर दी गयी जो कि बारहवर्षीय था व जिसकी पूर्णाहुति सन् 2000 में होनी थी इसी महापुरश्चरण के विषय में विस्तार से इस अंक में अन्यत्र प्रायः 24 पृष्ठों में सारी सामग्री एक ही स्थान पर पाठकों की जानकारी के लिये दी जा रही है। जो इस युगसंधि महापुरश्चरण में बाद में जुड़े अभी अभी जुड़े है वे इनके माध्यम से उस गम्भीरता को समझ सकेंगे जिसे दृष्टि में रख अब आगामी दो ढाई वर्षों के साधना पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाया जा रहा है।
साधना का गुहा विवेचन
साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान-भण्डार को अनुभव की तुला पर तौलकर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी है और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे ज्ञानोपकार से बढ़कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
साधना-उपचारों का उद्देश्य मस्तिष्क के दोनों गोंलार्थ के बीच स्थित करना है। साधना-विज्ञान के जानकारों अनुसार आज्ञाचक्र ही सभी चक्रों का संचालक और नियन्ता है। इसी कारण से इसे ‘गुरुचक्र’ के नाम से भी साधना ग्रन्थों में यंत्र-तंत्र अभिहित किया गया है। शरीरविज्ञान के अनुसार लिम्बिक सिस्टम के ऊर्ध्व में पीनियल ग्रन्थि के ठीक सामने थैलमस स्थित है। मस्तिष्क के प्रमुख नियंत्रण केन्द्रों में से थैलमस एक है।
साधना द्वारा स्वतः ज्ञान का भण्डार एकत्र किया था। यों ही वे कुछ थोड़ी-सी पुस्तकें पढ़कर ही ज्ञानी नहीं बन बैठे थे। उन्होंने जीवन का अधिकाँश भाग अध्ययन मनन और चिंतन में लगाया। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान-भण्डार को अनुभव की तुला पर तौलकर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी है और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे ज्ञानोपकार से बढ़कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
साधना से सिद्धि 1
साधना की उस उच्च भूमिका में आरूढ़ हो सकें, तो हमारे लिए भी नित्य वस्तुएँ, नित्य काल, नित्य लोक, नित्य घटनाओं की अनुभूति कर पाना सम्भव होगा, ऐसा योगशास्त्र के मर्मज्ञों का कथन है।
साधना पुरुषार्थ से। इस समय हिमालय में भी एक नहीं प्रायः 88000 ऋषिकल्प स्तर की आत्माएँ तपश्चर्या कर रही है ताकि विश्व के भाग्योदय की वेला में कहीं कुछ अधिक बिगाड़ न हो सब कुछ ठीक से संपन्न हो जाये।
साधना पराक्रम को बार बार और बढ़ाये जाने की बात वे सतत् लिखते रहे।
साधना विज्ञान में वर्णित चक्रों, उपत्यिकाओं, भ्रमरों, प्राणों, मात्रिकाओं की महत्ता, सत्ता और वास्तविकता को समझने लगे है। इससे सर्वसाधारण के मस्तिष्क में छा असमंजस का कुहासा निश्चय ही दूर होगा और वह विश्वास पैदा होगा, जहाँ साधक की निर्द्वंद्व मनःस्थिति के अतिरिक्त और कुछ न हो।
साधनारत रहे। युग संधि के उभयपक्षीय प्रयोजन भी बारह वर्ष की नरदेवों की इतनी लम्बी साधना से ही पूर्ण होंगे।
साधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण सन्निकट की आश्विन नवरात्रि से शाँतिकुँज से आरम्भ किया गया है। नाम है युगसंधि महापुरश्चरण। शाँतिकुँज हरिद्वार में यह पुण्य आयोजन सन् 2000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ के साथ ही इसकी पूर्णाहुति होगी।
साधना नहीं है वरन् उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारी द्वारा सम्पन्न हो रहा है जो अपने अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ सम्पन्न कर रहे है। युगसंधि का मध्यान्तर उसकी रूपरेखा लेख से उद्धृत पृष्ठ 25 अखण्ड ज्योति फरवरी 90 पूज्यवर ने लिखा कि अदृश्य वातावरण में सूक्ष्मजगत छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की सम्भावना है।
साधना विज्ञान के रहस्य अब उस क्षेत्र में होने वाले शोध-अनुसंधानों से घटते-मिटते जा रहे हैं। कुछ समय पूर्व तक तर्कवादी विज्ञानी मस्तिष्क जिसका ‘भ्रम’ कहकर उपहास उड़ाते थे, आज वे ही साधना विज्ञान में वर्णित चक्रों, उपत्यिकाओं, भ्रमरों, प्राणों, मात्रिकाओं की महत्ता, सत्ता और वास्तविकता को समझने लगे है। इससे सर्वसाधारण के मस्तिष्क में छा असमंजस का कुहासा निश्चय ही दूर होगा और वह विश्वास पैदा होगा, जहाँ साधक की निर्द्वंद्व मनःस्थिति के अतिरिक्त और कुछ न हो।
साधना की फलश्रुतियों 1999 की दुनिया कैसी होगी, 21 सदी में प्रवेश करते ही हमें क्या देखने को मिलने जा रहा है वैयक्तिक सामाजिक वैश्विक स्तर पर परिवर्तन कैसे होने जा रहा है इन विषयों पर प्रकाश डाला जायेगा। निश्चित ही कोई भी इनसे वंचित नहीं होना चाहेगा।
साधना करने वाले अपने चरित्र की प्रामाणिकता को हर हालत में बनाये रहते है भले ही उसके लिये अभावग्रस्त स्थिति में रहना पड़े और तात्कालिक मिल सकने वाली सफलता से वंचित रहना पड़े।
साधना की पूर्णाहुति महातेज की अभ्यर्थना होगी ऐसी जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।
साधना गायत्री की उच्चस्तरीय साधना के प्रशिक्षण के रूप में तीन वर्ष तक चलती रही। विशिष्ट तपश्चर्या के कल्पवास चांद्रायण के सत्र भी मथुरा में चले। 1962 में परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी रौद्र रूप लेती हुई अग्नि उगलने लगी थी दिसम्बर 1962 की अखण्ड ज्योति में पृष्ठ 50, 51 पृष्ठ पर लेख प्रकाशित हुआ- अग्निपरीक्षा की घड़ी में हमारा कर्तव्य। इसमें उनने धर्मयुद्ध की सफलता के लिये सभी से एक एक माला प्रतिदिन सम्पन्न करने को कहा। इसी वर्ष उनने श्री अरविन्द का उदाहरण देते हुये एक लेख में लिखा इस समय संसार में बड़ी बुरी से बुरी घटनाएँ घट रही है और मैं कहना चाहता हूँ कि अभी उससे भी कहीं अधिक बुरी परिस्थिति आना निश्चित है।
साधना का समावेश हो जाने से लक्ष्य की पूर्ति में असाधारण योगदान मिलने की आशा है। इसलिये पुरश्चरण में गायत्री मंत्र और सूर्योपासना का महत्व दिया गया हैं दैनिक साधना की पूर्णाहुति महातेज की अभ्यर्थना होगी ऐसी जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।
साधना ही दिखाई होती केवल वही साधन खोजकर दिए होते, जिनसे शारीरिक भोगों की ही सुविधा हो सकी होती तो शायद मनुष्य अब तक मानव-पशु की अवस्था में ही होता। न तो उसे आत्मा का ज्ञान हो पाता और न ईश्वर का परिचय। शरीर ही उसकी आत्मा होती और शरीर ही परमात्मा जिसकी तृप्ति करते रहना ही उसकी पूजा होती। वह आज की तरह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को क्रम-क्रम से प्राप्त कर सकने का मार्ग न पाता। आज की सुन्दर सभ्यता, आनन्दमयी संस्कृति और कल्याणकारी धर्म, जिसके कारण हम मनुष्य संसार के सर्वश्रेष्ठ प्राणी बने है उन ऋषि-मुनियों का वह उपकार ही है जिसको उन्होंने ज्ञान-दान के रूप में हम पर किया है।
साधना शास्त्र के अनुसार मूलाधार चक्र की अवस्थिति पेरेनियम में तथा दूसरे चक्र मेरुदण्ड में ऊपर की ओर सहस्रार तक स्थित है। सहस्रार मनुष्य के चरम विकास तथा चेतना की पराकाष्ठा है। आज्ञाचक्र वह केन्द्र है, जहाँ मनुष्य अपना अस्तित्व ब्रह्माण्ड से पृथक् अनुभव करता है। व्यष्टि और समष्टि चेतना का मिलन अथवा विश्वव्यापी चेतना का प्राकट्य स्थल-सहस्रार है तथा आज्ञाचक्र वह केन्द्र है, जहाँ आदेश ग्रहण किये जाते है।
साधना का वह उपक्रम जिसमें दिव्य अवतरण तो प्रधान है ही पर साथ में जनमानस को परिष्कृत करने वाले ज्ञानयज्ञ का भी समावेश है। युगसंगीत और युगसाहित्य द्वारा आलोक वितरण यह दोनों कार्य इसी स्तर के है जिनके माध्यम से विचार क्रान्ति अभियान का भी विस्तार होता है।
साधना की शक्ति से निखरी हुई तप की सामर्थ्य युगपरिवर्तन में नियोजित हो सके। 1965 का भारत पाक युद्ध 1971 का बंगला देश की मुक्ति हेतु हुआ संग्राम 1968-69 में स्काईलैब के धरती पर आ गिरने से सम्भावित विभीषिका,1980-82 में जुपिटर इफेक्ट के कारण सम्भावित विपत्तियों के निराकरण हेतु विशिष्ट साधनाएँ सभी अखण्ड ज्योति पाठकों परिजनों से कराई जाती रही 1984 से 1986 तक सूक्ष्मीकरण साधना की विशिष्ट अवधि बीती जिसमें एक से पाँच बनने की पाँच वीरभद्रों के निर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। 1987 में भारत भर में हुये राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों 108 कुण्डीय महायज्ञों के बाद 1988 में युगसंधि महापुरश्चरणों की घोषणा कर दी गयी जो कि बारहवर्षीय था व जिसकी पूर्णाहुति सन् 2000 में होनी थी इसी महापुरश्चरण के विषय में विस्तार से इस अंक में अन्यत्र प्रायः 24 पृष्ठों में सारी सामग्री एक ही स्थान पर पाठकों की जानकारी के लिये दी जा रही है। जो इस युगसंधि महापुरश्चरण में बाद में जुड़े अभी अभी जुड़े है वे इनके माध्यम से उस गम्भीरता को समझ सकेंगे जिसे दृष्टि में रख अब आगामी दो ढाई वर्षों के साधना पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाया जा रहा है।
साधना विज्ञजन के इस कथन की पुष्टि होती है कि उच्च आदर्शवादी जीवन, उत्कृष्ट क्रिया−कलाप एवं आन्तरिक क्षमताओं के विकास के लिए मानवीय प्रवृत्ति के दोनों पक्षों के मध्य संतुलन आवश्यक है।
साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा जिसकी तुलना अब तक के किसी विशालतम समापन से भी न की जा सके।
साधनाएँ सभी अखण्ड ज्योति पाठकों परिजनों से कराई जाती रही 1984 से 1986 तक सूक्ष्मीकरण साधना की विशिष्ट अवधि बीती जिसमें एक से पाँच बनने की पाँच वीरभद्रों के निर्माण की प्रक्रिया सम्पन्न हुई। 1987 में भारत भर में हुये राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों 108 कुण्डीय महायज्ञों के बाद 1988 में युगसंधि महापुरश्चरणों की घोषणा कर दी गयी जो कि बारहवर्षीय था व जिसकी पूर्णाहुति सन् 2000 में होनी थी इसी महापुरश्चरण के विषय में विस्तार से इस अंक में अन्यत्र प्रायः 24 पृष्ठों में सारी सामग्री एक ही स्थान पर पाठकों की जानकारी के लिये दी जा रही है। जो इस युगसंधि महापुरश्चरण में बाद में जुड़े अभी अभी जुड़े है वे इनके माध्यम से उस गम्भीरता को समझ सकेंगे जिसे दृष्टि में रख अब आगामी दो ढाई वर्षों के साधना पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाया जा रहा है।
साधना शास्त्र के मर्मज्ञों के अनुसार, मूलाधार चक्र के उन्नयन से वक्तृत्व कला, आरोग्यता, काव्य और लेखन शक्ति जैसे गुणों का विकास होता है, स्वाधिष्ठान से निरहंकारिता, मोहनिवृत्ति, रचना शक्ति, मणिपूरित से वाक्–सिद्धि, अनाहत से इन्द्रियजय, विशुद्धि से दीर्घजीवन, तेजस्विता, सर्वहितपरायणता, आज्ञा से विवेक एवं सहकार से भक्ति तथा अमरता।
साधना का केन्द्र शाँतिकुँज बन रहा है। जिनको उपासना की गरिमा पर विश्वास है उन सभी का आवाहन किया गया है कि इस अवधि में एक अनुष्ठान यहीं सम्पन्न करें और विराट सामूहिक जप यज्ञ के भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त करें। आशा की जाती है कि निर्धारित अवधि में लाखों व्यक्ति इसके सहगामी बन सकेंगे। उद्देश्य तो युगपरिवर्तन के दोनों पक्षों को सम्पन्न कर सकने वाला दिव्य वातावरण बनाना है पर साथ ही यह बात भी है कि दूसरों के लिये मेंहदी पीसने वाले के अपने हाथ उससे पहले ही रच जाते है। साधक अपने लिये सुरक्षा कवच प्राप्त करने में प्रतीक परिष्कार से लाभान्वित होने से सफल हो सकते है।
साधना आरम्भ की।
साधना जैसे विषय पर आधारित होंगे प्रथम अंक में साधना का तत्त्वदर्शन मानवी प्रकृति सूक्ष्म संरचनाओं की जानकारी कुण्डलिनी षट्चक्र पर नवीनतम विस्तार के साथ साथ आज साधना क्यों वे किसलिए की जानी चाहिये इस विषय पर विराट् विवेचन होगा। दूसरे अंक में साधना की फलश्रुतियों 1999 की दुनिया कैसी होगी, 21 सदी में प्रवेश करते ही हमें क्या देखने को मिलने जा रहा है वैयक्तिक सामाजिक वैश्विक स्तर पर परिवर्तन कैसे होने जा रहा है इन विषयों पर प्रकाश डाला जायेगा। निश्चित ही कोई भी इनसे वंचित नहीं होना चाहेगा।
साधना विज्ञान के आचार्यों का तम है कि बालकों की तुलना में वयस्कों में मणिपूरित चक्र प्रायः अधिक विकसित होता है, फिर भी सभी लोगों में ऐसा होना आवश्यक नहीं।
साधना का प्रारम्भिक चरण मानें और उसे भावना पूर्वक अपनाए। इतना करने वाले उस अग्रगामी भूमिका को निभा सकेंगे, जिसके आधार पर महाविनाश को रोकना और महाविकास के सतयुगी वातावरण का नवनिर्माण संभव हो सके। बड़े कार्यों को बड़ी शक्तियाँ सम्पन्न करती है। उच्चस्तरीय बड़प्पन का सम्पादन करने के लिये राज मार्ग बनाना ही प्रस्तुत युगसंधि महापुरश्चरण का प्रमुख उद्देश्य है। इसमें सच्चे स्वार्थ और सच्चे परमार्थ का समन्वय है।
साधना व यज्ञों के भिन्न भिन्न प्रकारों की श्रृंखलायें चलायी एवं सूर्य शक्ति के नवयुग होते दोहन हेतु विशिष्ट 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ का सफल संचालन मथुरा में 1958 की कार्तिक पूर्णिमा में आयोजन कर किया। गायत्री परिवार उसके बाद ही बृहत् रूप लेता चला गया। तुरन्त बाद पूज्यवर हिमालय की अज्ञातवास की कठोर तपश्चर्या पर चले गये, जहाँ से उनने साधक की डायरी के कुछ पृष्ठ भेजे जो बाद में सुनसान के सहचर के रूप में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुए। इस विशेष साधना का लक्ष्य भी भारत पर चीन के हमले से संभावित खतरे की गम्भीरता को कम करना, अष्टग्रही योग को टालना एवं जन जन के मनोबल का संवर्द्धन करना था।1962 में आते ही उनने युगनिर्माण साधना आरम्भ की।
साधना के प्रशिक्षण के रूप में तीन वर्ष तक चलती रही। विशिष्ट तपश्चर्या के कल्पवास चांद्रायण के सत्र भी मथुरा में चले। 1962 में परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी रौद्र रूप लेती हुई अग्नि उगलने लगी थी दिसम्बर 1962 की अखण्ड ज्योति में पृष्ठ 50, 51 पृष्ठ पर लेख प्रकाशित हुआ- अग्निपरीक्षा की घड़ी में हमारा कर्तव्य। इसमें उनने धर्मयुद्ध की सफलता के लिये सभी से एक एक माला प्रतिदिन सम्पन्न करने को कहा। इसी वर्ष उनने श्री अरविन्द का उदाहरण देते हुये एक लेख में लिखा इस समय संसार में बड़ी बुरी से बुरी घटनाएँ घट रही है और मैं कहना चाहता हूँ कि अभी उससे भी कहीं अधिक बुरी परिस्थिति आना निश्चित है।
साधनावधि में जो संकल्प लिये गये होंगे उन्हें इन 3 माह की अवधि में पकाया जाएगा व प्रशिक्षण द्वारा अनेकानेक साधकों की सहभागिता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। यह प्रशिक्षण अभी भारतवर्ष में 40 स्थानों पर सात दिवसीय सत्रों के रूप में आरम्भ हो रहा है जिनमें शाँतिकुँज के वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयं जाकर मार्गदर्शन देंगे एवं इस कार्य के विस्तार हेतु किये जाने वाले समयदान का नियोजन करेंगे। वसंत पंचमी 1999, 22 जनवरी से बसंत पंचमी 2000,10 फरवरी तक एक वर्ष की अवधि को विशिष्ट साधना वर्ष के रूप में सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है। इस पूरे एक वर्ष में सारे विश्व में समूह चेतना के जागरण की प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर एक करोड़ से अधिक साधकों द्वारा संपन्न होने वाले इस महापुरश्चरण महाअभियान के द्वारा होने जा रही है। आशा की जानी चाहिये कि इस अभिनव प्रयोग से जिसका निर्देश पूज्यवर अपने जीवन काल में दे गये थे, भविष्य की आसन्न विभीषिकाएँ निरस्त होगी एवं सतयुग की संभावनाएँ साकार करने वाला स्वरूप स्पष्ट होता चला जाएगा।
साधना पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाया जा रहा है।
साधना-विज्ञान के जानकारों अनुसार आज्ञाचक्र ही सभी चक्रों का संचालक और नियन्ता है। इसी कारण से इसे ‘गुरुचक्र’ के नाम से भी साधना ग्रन्थों में यंत्र-तंत्र अभिहित किया गया है। शरीरविज्ञान के अनुसार लिम्बिक सिस्टम के ऊर्ध्व में पीनियल ग्रन्थि के ठीक सामने थैलमस स्थित है। मस्तिष्क के प्रमुख नियंत्रण केन्द्रों में से थैलमस एक है। यह हमारी इन्द्रियों एवं मोटर क्रियाशीलता इड़ा-पिंगला ललाट में स्थित दोनों इड़ा-पिंगला शामिल है, को नियंत्रित करता है।
साधना
साधना से ही पूर्ण होंगे।
साधना विज्ञान में चक्रों के रूप में जिन शक्ति केन्द्रों की चर्चा है, वह वास्तव में और कुछ नहीं, विभिन्न चेतनात्मक स्तर है। उन भूमिकाओं में पहुँचकर साधक चेतना के भिन्न-भिन्न आयामों की अनुभूति करता हुआ उस सर्वोच्च शिखर पर पहुँचता है, जिसे सहस्रार कहते है। पिछले दिनों तक विज्ञानवेत्ता इन्हें कपोलकल्पित भर मानते थे, पर तंत्रिका शास्त्र के गहन अध्ययन के उपरान्त इनकी संगति मस्तिष्क और मेरुरज्जु के विभिन्न केन्द्रों से बिठाने में वे सफल हो गए है। देखना यह है कि विज्ञान-अध्यात्म का यह समागम सर्वसाधारण के लिए कितना उपयोगी साबित होता है?
साधना एवं ईश्वर
साधना एवं उपलब्धियाँ
साधना में दो ही तत्व प्रमुख है एक सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन दूसरा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। इन दो
साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
साधना वर्ष के रूप में सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है। इस पूरे एक वर्ष में सारे विश्व में समूह चेतना के जागरण की प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर एक करोड़ से अधिक साधकों द्वारा संपन्न होने वाले इस महापुरश्चरण महाअभियान के द्वारा होने जा रही है। आशा की जानी चाहिये कि इस अभिनव प्रयोग से जिसका निर्देश पूज्यवर अपने जीवन काल में दे गये थे, भविष्य की आसन्न विभीषिकाएँ निरस्त होगी एवं सतयुग की संभावनाएँ साकार करने वाला स्वरूप स्पष्ट होता चला जाएगा।
साधना का उपक्रम चले वहाँ से नये सम्मिलित होने वाले श्रद्धालुओं को एक बार एक अनुष्ठान शाँतिकुँज में जाकर पूरा करने के लिये कहा जाय। लौटने पर वे पूरा उत्साह लेकर लौटेंगे और बारह वर्ष तक सम्मिलित होते रहने के व्रत का निर्वाह करेंगे।
साधना में अन्य क्रिया कलाप तो साधारण अनुष्ठानों की भाँति ही रहेंगे। पर एक बात विशिष्ट रहेगी सूर्योपस्थान भगवान सूर्य की निकटता उन्हें ही इस महान प्रक्रिया का अधिष्ठाता वरण किया गया है इसलिये जप गायत्री का पूजन गायत्री का करते हुये भी प्रातः काल उदय होते हुये स्वर्णिम आभा वाले सविता देव का ध्यान करते रहना होगा। ध्यान नहीं प्राण प्रत्यावर्तन का भाव समर्पण भी। साधक का प्राण सविता में प्रवेश करके वैसा ही लाल हो जाता है जैसा भट्टी में कुछ समय पड़ा रहने के उपरान्त सोना लाल हो जाता है। ईंधन को आग में डालने पर भी यही होता है।
साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की सम्भावना है।
साधना चलती है तो उससे बिखराव वाली अस्त–व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है आगे वे इसी लेख में लिखते है यह साधना नहीं है वरन् उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारी द्वारा सम्पन्न हो रहा है जो अपने अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ सम्पन्न कर रहे है। युगसंधि का मध्यान्तर उसकी रूपरेखा लेख से उद्धृत पृष्ठ 25 अखण्ड ज्योति फरवरी 90 पूज्यवर ने लिखा कि अदृश्य वातावरण में सूक्ष्मजगत छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की सम्भावना है।
साधना का तत्त्वदर्शन मानवी प्रकृति सूक्ष्म संरचनाओं की जानकारी कुण्डलिनी षट्चक्र पर नवीनतम विस्तार के साथ साथ आज साधना क्यों वे किसलिए की जानी चाहिये इस विषय पर विराट् विवेचन होगा। दूसरे अंक में साधना की फलश्रुतियों 1999 की दुनिया कैसी होगी, 21 सदी में प्रवेश करते ही हमें क्या देखने को मिलने जा रहा है वैयक्तिक सामाजिक वैश्विक स्तर पर परिवर्तन कैसे होने जा रहा है इन विषयों पर प्रकाश डाला जायेगा। निश्चित ही कोई भी इनसे वंचित नहीं होना चाहेगा।
साधना ग्रन्थों में यंत्र-तंत्र अभिहित किया गया है। शरीरविज्ञान के अनुसार लिम्बिक सिस्टम के ऊर्ध्व में पीनियल ग्रन्थि के ठीक सामने थैलमस स्थित है। मस्तिष्क के प्रमुख नियंत्रण केन्द्रों में से थैलमस एक है। यह हमारी इन्द्रियों एवं मोटर क्रियाशीलता इड़ा-पिंगला ललाट में स्थित दोनों इड़ा-पिंगला शामिल है, को नियंत्रित करता है। भावनाओं की अभिव्यक्ति तथा संगठन के लिए उत्तरदायी एवं अन्तःस्थानी ग्रन्थियों का नियंत्रणकर्ता हाइपोथैलमस एवं गति नियंत्रण में सहयोगी सेरीबेलम का भी लियमन थैलमस द्वारा होता है अर्थात् पीनियल ग्रन्थि द्वारा इन्द्रियों, विचारों, भावनाओं एवं क्रियाशीलता में समन्वय स्थापित होता है।
साधना और तपश्चर्या के प्रभाव एक अलौकिक दीप्ति से उनका शरीर कान्तिमान हो रहा था। वे जब ध्यानस्थ होते, तब ऐसा विदित होता, जैसे संगमरमर की पाषाण प्रतिमा सामने रख दी गयी हो। आत्मा की सुन्दरता शरीर पर स्पष्ट होने लगती और एक अपूर्व आकर्षण उनके व्यक्तित्व में समाहित हो जाता तथा मुखश्री पर अद्भुत शान्ति विराजमान् हो जाती।
साधना क्यों वे किसलिए की जानी चाहिये इस विषय पर विराट् विवेचन होगा। दूसरे अंक में साधना की फलश्रुतियों 1999 की दुनिया कैसी होगी, 21 सदी में प्रवेश करते ही हमें क्या देखने को मिलने जा रहा है वैयक्तिक सामाजिक वैश्विक स्तर पर परिवर्तन कैसे होने जा रहा है इन विषयों पर प्रकाश डाला जायेगा। निश्चित ही कोई भी इनसे वंचित नहीं होना चाहेगा।
साधनाएँ
साधनारत रहे। राम ने चौदह वर्षों में से बारह वर्ष तप प्रयोजन में ओर दो वर्ष असुर संहार में लगाए। पार्वती का भागीरथ का दधिचि का च्यवन का तप भी बारह वर्ष का रहा। बुद्ध अपने में दैवी शक्ति का अवतरण करने हेतु बारह वर्ष तक तप में रहे। शंकराचार्य और चाणक्य भी प्रायः इतने ही दिन साधनारत रहे।
साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
साधना-अभ्यासों द्वारा इस क्षेत्र की संवेदना और शक्ति को जगाकर मनुष्य की सामान्य क्षमता को बढ़ाकर असामान्य किया जा सकता है। परिणाम यह होगा कि हम पदार्थ की सूक्ष्म भूमिका में उतरकर उसका निरीक्षण-परीक्षण कर सकेंगे अर्थात् हम भौतिक सीमाओं को तोड़कर अभौतिक संसार में प्रविष्ट कर सकेंगे।
साधना करने में कितनी अधिक विशेषता हो सकती है उसकी अनुमान कोई भी लगा सकता है। सभी इच्छुकों को अवसर मिल सके इस दृष्टि से नौ दिवसीय साधना सत्र बारह वर्ष तक चलते रहने का संकल्प प्रकट किया गया है। अन्तरिक्ष का विभाजन बारह राशियों में हुआ है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुये ठीक अपनी उसी स्थिति में बारह वर्ष में आती है। इस तथ्य को देखते हुए प्रस्तुत पुरश्चरण की अवधि बारह वर्ष रखी गयी है।
साधना द्वारा गहरी खोज करते हुये ही सम्भव होना है महाप्राणों की इन दिनों इसी कारण भारी खोज हो रही है। उनके बिना युगसन्धि का महाप्रयोजन पूरा भी तो नहीं हो सकेगा। छोटी-सी बात सोंचे तो व्यक्ति की सामयिक एवं क्षेत्रीय समस्याओं का निराकरण भी वातावरण बदले बिना संभव नहीं हो सकता। संसार के अति निजी हो जाने से गुत्थियाँ भी वैयक्तिक न रहकर सामूहिक हो गयी है। उनका निराकरण व्यक्ति को कुछ ले देकर नहीं हो सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-March
साधना का अर्थ होता है- साथ लेना। अपने आपको संभाल लेना, तपा लेना, गरम कर लेना, परिष्कृत कर लेना, शक्तिवान बना लेना, यह सभी अर्थ साधना के हैं साधना के संदर्भ में हम आपको सर्कस के जानवरों का उदाहरण देते रहते हैं कि हाथी, घोड़े, शेर, चीते जब अपने मालिक का पेट पालते तथा सैकड़ों लोगों का मनोरंजन करने, खेल दिखाने में समर्थ होते हैं। इन जानवरों को साध लिया गया होता है जो सैकड़ों लोगों को प्राविडेण्ट फंड देते हैं, पेमेण्ट देते हैं उनका पालन करते हैं। ये कैसे साधे जाते हैं? बेटे, यह रिंगमास्टर के हण्टरों से साधे जाते हैं।
साधना का क्रम इस प्रकार है- (1) नित्यकर्म, स्नान आदि (2) ब्रह्म संध्या- जिसके प्रमुख अंग हैं- पवित्रीकरण, आचमन, रक्षाबंधन, प्राणायाम, न्यास, अधमर्षण, पृथ्वीपूजन, चन्दनधारण, कलशपूजन, दीपपूजन, गुरुवन्दना, सर्वदेव नमस्कार (3) गायत्री- आवाहन, पूजन (4) जप (5) विसर्जन (6) सूर्यार्घ्यदान आदि। यह क्रम नित्य चलना चाहिये, जिन्हें यह ज्ञात न हो, उन्हें इनका विस्तृत विवेचन ‘गायत्री की दैनिक साधना’ नामक पुस्तक में देख लेना चाहिये।
साधना के आन्तरिक उत्कर्ष की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह एक वर्ष की तपश्चर्या साधक को गायत्री महाशक्ति से तादद में करा देती है। श्रद्धा और विश्वास पूर्वक की हुई अभियान साधना अपना फल दिखाये बिना नहीं रहती। यह एक वर्षीय अभियान साधना एक ऐसी तपस्या है जो साधक के अभावों, कष्ट, कठिनाइयों का तो शमन करती ही है, साथ ही इसके परिणामस्वरूप साधक अपने भीतर, बाहर तथा चारों ओर एक दैवी वातावरण का अनुभव करता है।
साधना से सिद्धि अवश्य मिलेगी।
साधना ऐसी है कि हमने सारी जिन्दगी भर धोबी के तरीके से अपने जीवन को धोया है और अपनी कमियों को चुन-चुनकर निकालने का प्रयत्न किया है। आराधना हमने समाज को ऊंचा उठाने के लिये की है। आप यहाँ आइये और देखिये, अपने मुख से अपने बारे में कहना ठीक बात नहीं है। आप यहाँ आइये और दूसरे के मुख से सुनिये। हम सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, असामान्य व्यक्ति हैं।
साधना की सिद्धि होने निश्चित है। साधना सामान्य चीज नहीं है। यह असामान्य चीज हैं परन्तु साधना को साधना की तरह किया जाना परम् आवश्यक हैं। साधना कैसी होना चाहिये, इस सम्बन्ध में हम आपको पुस्तकों का हवाला देने की अपेक्षा एक बात बताना चाहते हैं, जिसके आप जाँच-पड़ताल कभी भी कर सकते हैं।
साधना को साधना की तरह किया जाना परम् आवश्यक हैं। साधना कैसी होना चाहिये, इस सम्बन्ध में हम आपको पुस्तकों का हवाला देने की अपेक्षा एक बात बताना चाहते हैं, जिसके आप जाँच-पड़ताल कभी भी कर सकते हैं।
साधना में जप का एक सुनिश्चित क्रम है। इस साधना में साधारण दिनों में प्रतिदिन 11 मालायें जपनी चाहिये। हर महीने की दोनों एकादशियों को 24 मालाएं जपनी चाहिये। वर्ष में तीन संध्यायें होती हैं, उन्हें नवरात्रियाँ कहते हैं। इन नवरात्रियों में 24-24 हजार के तीन अनुष्ठान पूरे करने होते हैं।
साधना में लगने पड़ते हैं। इतना समय सामान्य रूप से निकाल पाना कठिन होता है। इसके साथ ही इसमें तपश्चर्यापरक कठिन अनुबन्ध भी जुड़े होते हैं जिसे निभाना कमजोर मनःस्थिति के व्यक्तियों के लिये मुश्किल पड़ता है। ऐसे साधकों के लिये जो लम्बी अवधि का संकल्प करना चाहें और प्रतिदिन घंटे-दो घंटे से अधिक समय लगाने की स्थिति में न हों उनके लिये एक विशेष गायत्री साधना बहुत उपयुक्त रहती है। जिसे गायत्री अभियान साधना कहा जाता है।
साधनाओं, तीर्थयात्राओं, सत्संग और नित्य स्वाध्याय के कार्यक्रमों का आध्यात्मिक, धार्मिक और वैराग्यपूर्ण चिन्तन का स्रोत मस्तिष्क में निरन्तर प्रवाहित था कि तब लोग स्वल्प-साधनों में ही अपार सुख-शान्ति का रसास्वादन करते थे।
साधना में व्यतीत हुए हैं। यह दूसरा जीवन एक खुली पुस्तक के रूप में है। हमने साधना की है। उसका परिणाम अवश्य मिला है। और जो कोई भी साधना करेगा, उसे भी परिणाम अवश्य मिलेगा।
साधना और आराधना के द्वारा मिला है। अगर आप इन तीन चीजों का समन्वय अपने जीवन में करेंगे, तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको साधना से सिद्धि अवश्य मिलेगी।
साधना छूट जाने पर उसकी पूर्ति अगले दिन की जा सकती है।
साधना है, अतः एक वर्ष में पाँच लाख जप पूरा करने का अभियान किसी भी महीने की शुक्लपक्ष की एकादशी से आरम्भ किया जा सकता है। गायत्री महाशक्ति का आविर्भाव शुक्लपक्ष की दशमी को मध्यरात्रि में हुआ है, इसलिये उसका उपवास पुण्य दूसरे दिन एकादशी को माना जाता है। अभियान आरम्भ करने के लिए यही मुहूर्त सबसे उत्तम है। जिस एकादशी से आरम्भ किया जाये, एक वर्ष बाद उसी एकादशी को समाप्त करना चाहिये।
साधना का आरम्भ इसी माह से कर देना चाहिये। आगे चलकर माँ भगवती अपने आप संभाल लेती हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि शुभ आरंभ का परिणाम शुभ ही होता है।
साधना के पीछे श्रद्धा की शक्ति ही काम करती है। उसका अभाव रहने पर कर्मकाण्ड मात्र टंट-घंट और लकीर पीटने भर जैसे क्रिया−कलाप रह जाते हैं, उससे कुछ नहीं बनता। अध्यात्म क्षेत्र के सिद्धपुरुषों में से प्रत्येक की अन्तःभूमिका श्रद्धासिक्त होती है। ईश्वर-दर्शन, आत्मसाक्षात्कार, स्वर्ग मुक्ति जैसी दिव्य सफलताएँ भी किसी कृत्य विशेष से नहीं, अपितु श्रद्धा की शक्ति से ही प्राप्त की जा सकती हैं। इस उत्कृष्टता के रहते सामान्य क्रियाकृत्य भी योगसाधना एवं तपश्चर्या का प्रतिफल प्रस्तुत करते हैं, किंतु यदि भीतर नीरसता छाई हो, भाव संवेदनाएँ प्रसुप्त पड़ी हों तो कितना ही कायकष्ट सहा जाय कितना ही जप, तप क्यों न किया जाय उससे कुछ नहीं बनने का।
साधना तब तक सफल नहीं होगी, जब तक आप हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेंगे। यदि आप हमारे कंधे से कंधा मिलाकर और कदम से कदम मिलाकर चल सकें तो हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आपका जीवन धन्य हो जायेगा, पीढ़ियाँ और श्रद्धापूर्वक यह रखेंगी। आज की बात समाप्त।
साधना-उपासना सब कुछ अपूर्ण है। मोक्ष तो नितान्त असम्भव है।
साधना कहा जाता है। यह एक वर्षीय गायत्री साधना है, जिसके अंतर्गत एक वर्ष में निर्धारित तपश्चर्याओं के साथ 5 लक्ष गायत्री मंत्र जप पूरा किया जाता है।
साधना और आराधना कहते हैं। वास्तव में यहीं अध्यात्म की असली शिक्षा है।
साधना’ कहते हैं और संस्कृत में ‘तपस्या’ कहते हैं। यह दोनों एक ही हैं अतः साधना का मतलब है अपने आप को तपाना। खेत की जुताई अगर ठीक ढंग से नहीं होगी, तो उसमें बुवाई भी ठीक ढंग से नहीं की जा सकेगी। अतः अच्छी फसल प्राप्त करने की लिये पहले खेत की जुताई करना आवश्यक है, ताकि उसमें से कंकड़-पत्थर आदि निकाल दिये जायें। उसके बाद बुवाई की जाती है।
साधना या तपस्या कहलाती है। इसी का दूसरा नाम पात्रता का विकास है। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्षा के समय आप बाहर जो भी पात्र रखेंगे- कटोरी, गिलास-जो कुछ भी रखेंगे, उसी के अनुरूप उसमें जल भर जायेगा। इसी तरह आपकी पात्रता जितनी होगी, उतना ही भगवान का प्यार, अनुकम्पा आप पर बरसती चली जायेगी।
साधनात्मक, उपाय-उपचारों द्वारा उभारा और प्रशिक्षित किया गया होता तो वे अबकी अपेक्षा लाखों गुनी क्षमता प्रदर्शित कर सके होते और अपना मस्तिष्क सचमुच कल्पवृक्ष की तरह चमत्कारी सिद्ध होता।
साधना एक ऐसी तपस्या है जो साधक के अभावों, कष्ट, कठिनाइयों का तो शमन करती ही है, साथ ही इसके परिणामस्वरूप साधक अपने भीतर, बाहर तथा चारों ओर एक दैवी वातावरण का अनुभव करता है।
साधना किसकी की जाये? भगवान की? अरे भगवान को न तो किसी साधना की बात सुनने का समय है और न ही उसे साधा जा सकता है। वस्तुतः जो साधना हम करते है वह केवल अपने लिये होती है और स्वयं की होती है। साधना का अर्थ होता है- साथ लेना।
साधना के हैं साधना के संदर्भ में हम आपको सर्कस के जानवरों का उदाहरण देते रहते हैं कि हाथी, घोड़े, शेर, चीते जब अपने मालिक का पेट पालते तथा सैकड़ों लोगों का मनोरंजन करने, खेल दिखाने में समर्थ होते हैं। इन जानवरों को साध लिया गया होता है जो सैकड़ों लोगों को प्राविडेण्ट फंड देते हैं, पेमेण्ट देते हैं उनका पालन करते हैं। ये कैसे साधे जाते हैं? बेटे, यह रिंगमास्टर के हण्टरों से साधे जाते हैं। वह उन्हें हण्टर मार-मारकर साधता है।
साधना है, जिसके अंतर्गत एक वर्ष में निर्धारित तपश्चर्याओं के साथ 5 लक्ष गायत्री मंत्र जप पूरा किया जाता है।
साधना के पश्चात आराधना की बात करता हूँ। आपको कि आराधना क्या है? और किसकी की जानी चाहिये? आराधना कहते हैं समाज सेवा को जन कल्याण को। सेवा धर्म वह नकद धर्म है जो हाथोंहाथ फल देता है।
साधना एवं तपश्चर्या का प्रतिफल प्रस्तुत करते हैं, किंतु यदि भीतर नीरसता छाई हो, भाव संवेदनाएँ प्रसुप्त पड़ी हों तो कितना ही कायकष्ट सहा जाय कितना ही जप, तप क्यों न किया जाय उससे कुछ नहीं बनने का।
साधना हम करते है वह केवल अपने लिये होती है और स्वयं की होती है। साधना का अर्थ होता है- साथ लेना। अपने आपको संभाल लेना, तपा लेना, गरम कर लेना, परिष्कृत कर लेना, शक्तिवान बना लेना, यह सभी अर्थ साधना के हैं साधना के संदर्भ में हम आपको सर्कस के जानवरों का उदाहरण देते रहते हैं कि हाथी, घोड़े, शेर, चीते जब अपने मालिक का पेट पालते तथा सैकड़ों लोगों का मनोरंजन करने, खेल दिखाने में समर्थ होते हैं। इन जानवरों को साध लिया गया होता है जो सैकड़ों लोगों को प्राविडेण्ट फंड देते हैं, पेमेण्ट देते हैं उनका पालन करते हैं। ये कैसे साधे जाते हैं?
साधना खण्डित न होने देने एवं उसका संकल्प पूरा कराने का सूक्ष्म-संरक्षण शाँतिकुँज की संचालक सत्ता ने संभाल रखा है। इस क्षेत्र में कदम बढ़ाने वालों को समुचित उत्साह, प्रेरणा, पथ-प्रदर्शन तथा सहयोग सुनिश्चित रूप से मिलता है। यह आश्वासन ही नहीं, महाकाल की सत्ता की उद्घोषणा भी है।
साधना की ओर।
साधना हो गयी। हमारे ब्राह्मण-जीवन का यही चमत्कार है। यही मेरी पूजा है।
साधना सामान्य चीज नहीं है। यह असामान्य चीज हैं परन्तु साधना को साधना की तरह किया जाना परम् आवश्यक हैं। साधना कैसी होना चाहिये, इस सम्बन्ध में हम आपको पुस्तकों का हवाला देने की अपेक्षा एक बात बताना चाहते हैं, जिसके आप जाँच-पड़ताल कभी भी कर सकते हैं।
साधना’ नामक पुस्तक में देख लेना चाहिये।
साधना का मतलब है अपने आप को तपाना। खेत की जुताई अगर ठीक ढंग से नहीं होगी, तो उसमें बुवाई भी ठीक ढंग से नहीं की जा सकेगी। अतः अच्छी फसल प्राप्त करने की लिये पहले खेत की जुताई करना आवश्यक है, ताकि उसमें से कंकड़-पत्थर आदि निकाल दिये जायें। उसके बाद बुवाई की जाती है। कपड़ों की धुलाई पहले करनी पड़ती है, तब उसकी रंगाई होती है।
साधना का उद्देश्य ससीमता को असीमता के साथ जोड़ देना है। इस प्रयोजन में जो जितना ही सफल होता जाता है, वह उस वैभव पर उतना ही आधिपत्य स्थापित करता चलता है, जिसका प्रभाव जड़-चेतन जगत में अपने चारों ओर फैला हुआ दीख पड़ता है। सीमित रहने और सीमाबद्ध होने से मनुष्य तुच्छ और दरिद्र ही बना रहता है, पर असीम के साथ संलग्न हो जाने पर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती। सम्पन्नता से भरे पूरे भण्डार में अपनी भागीदारी जितनी अधिक होती है, अपनी स्थिति उतनी ही विभूतिवान होती चली जाती है। सिद्धपुरुषों में दिखाई देने वाली विशिष्ट क्षमताएं और कुछ नहीं, विराट के साथ उनकी घनिष्ठता का ही उपहार है।
साधना एक वर्ष में पूरी होती है। इस साधना की महानता को देखते हुए इतना समय कुछ अधिक नहीं है। इस तपस्या के लिये जिनके मन में उत्साह है, उन्हें इस मनोवाँछित फल प्रदान करने वाली शुभ साधना का आरम्भ इसी माह से कर देना चाहिये। आगे चलकर माँ भगवती अपने आप संभाल लेती हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि शुभ आरंभ का परिणाम शुभ ही होता है।
साधना की अनेकों विधियाँ हैं सामान्य साधकों के लिये 9 दिन में 24000 का लघु अनुष्ठान तथा 40 दिन में सवा लक्ष का अनुष्ठान निर्धारित है। जिसे प्रायः लोग आसानी से कर लेते है, परन्तु गायत्री का पूर्ण पुरश्चरण 24 लाख का होता है। जो लोगों को कठिन पड़ता है। जिसमें लगभग 6 घंटे साधना में लगने पड़ते हैं। इतना समय सामान्य रूप से निकाल पाना कठिन होता है।
साधना अभियान में जप संख्या बहुत अधिक नहीं होती, फिर भी दीर्घकालीन श्रद्धाभाव साधना क्रम साधना के आन्तरिक उत्कर्ष की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह एक वर्ष की तपश्चर्या साधक को गायत्री महाशक्ति से तादद में करा देती है। श्रद्धा और विश्वास पूर्वक की हुई अभियान साधना अपना फल दिखाये बिना नहीं रहती। यह एक वर्षीय अभियान साधना एक ऐसी तपस्या है जो साधक के अभावों, कष्ट, कठिनाइयों का तो शमन करती ही है, साथ ही इसके परिणामस्वरूप साधक अपने भीतर, बाहर तथा चारों ओर एक दैवी वातावरण का अनुभव करता है।
साधना ही वास्तविक समाज-सेवा की कुँजी है।
साधना कैसी होना चाहिये, इस सम्बन्ध में हम आपको पुस्तकों का हवाला देने की अपेक्षा एक बात बताना चाहते हैं, जिसके आप जाँच-पड़ताल कभी भी कर सकते हैं।
साधना अपना फल दिखाये बिना नहीं रहती। यह एक वर्षीय अभियान साधना एक ऐसी तपस्या है जो साधक के अभावों, कष्ट, कठिनाइयों का तो शमन करती ही है, साथ ही इसके परिणामस्वरूप साधक अपने भीतर, बाहर तथा चारों ओर एक दैवी वातावरण का अनुभव करता है।
साधना को पूरा करने की और भी तिथियाँ हैं। पहली विधि तो ऊपर बतायी जा चुकी है। दूसरी विधि में साधारणतया 11 माला प्रतिदिन ओर रविवार या अन्य अवकाश के दिन 24 मालाएं करनी होती हैं। यदि अवकाश के दिन अधिक न करनी हों तो पाँच लाख को 360 दिनों में बराबर विभाजन करने पर प्रायः 14 माला का हिसाब बन जाता है। वर्ष में 5 लाख का जप इसी क्रम में पूरा करना आसान हो जाता है।
साधना-विज्ञान पर कुछेक उच्चस्तरीय पुस्तक भी लिखीं। लेखनसंबंधी चर्चा के दौरान वे प्रायः कहा करते कि जब कभी उनकी बुद्धि निरुपाय हो उठती और यह नहीं सूझ पड़ता था कि आगे की जटिलता का समाधान क्या हो, तभी अकस्मात उसका हल दिमाग में कौंध उठता और वे उस बौद्धिक गतिहीनता के अवरोध को सरलतापूर्वक पार कर लेते। कभी गहरी उधेड़बुन में फंसते, तो आगे का मार्गदर्शन उन्हें विस्मयकारी ढंग से मिलता और लेखनकार्य संबंधी गतिरोध से उबर जाते। इसे ईश्वरीय सहायता कह लें या विचार-मंडल से उच्चस्तरीय विचारों का आदान-प्रदान, बात एक ही है। उपरोक्त उदाहरणों से ऐसा प्रतीत होता है कि गहन-चिन्तन की स्थिति और गहरे-ध्यान की अवस्था, दोनों अभिन्न हैं।
साधना की महानता को देखते हुए इतना समय कुछ अधिक नहीं है। इस तपस्या के लिये जिनके मन में उत्साह है, उन्हें इस मनोवाँछित फल प्रदान करने वाली शुभ साधना का आरम्भ इसी माह से कर देना चाहिये। आगे चलकर माँ भगवती अपने आप संभाल लेती हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि शुभ आरंभ का परिणाम शुभ ही होता है।
साधना में न्यूनतम एक माला से लेकर अधिकतम जितना हो सके, उतना जप करने का नियम हैं, किन्तु अभियान-साधना में जप का एक सुनिश्चित क्रम है। इस साधना में साधारण दिनों में प्रतिदिन 11 मालायें जपनी चाहिये। हर महीने की दोनों एकादशियों को 24 मालाएं जपनी चाहिये। वर्ष में तीन संध्यायें होती हैं, उन्हें नवरात्रियाँ कहते हैं। इन नवरात्रियों में 24-24 हजार के तीन अनुष्ठान पूरे करने होते हैं।
साधना की बात सुनने का समय है और न ही उसे साधा जा सकता है। वस्तुतः जो साधना हम करते है वह केवल अपने लिये होती है और स्वयं की होती है। साधना का अर्थ होता है- साथ लेना। अपने आपको संभाल लेना, तपा लेना, गरम कर लेना, परिष्कृत कर लेना, शक्तिवान बना लेना, यह सभी अर्थ साधना के हैं साधना के संदर्भ में हम आपको सर्कस के जानवरों का उदाहरण देते रहते हैं कि हाथी, घोड़े, शेर, चीते जब अपने मालिक का पेट पालते तथा सैकड़ों लोगों का मनोरंजन करने, खेल दिखाने में समर्थ होते हैं। इन जानवरों को साध लिया गया होता है जो सैकड़ों लोगों को प्राविडेण्ट फंड देते हैं, पेमेण्ट देते हैं उनका पालन करते हैं।
साधना में भी यही होता है। मनुष्य के, साधक के मन के ऊपर चाबुक माने से, हण्टर मारने से, गरम करने से, तपाने से वह काबू में आ जाता है। इसलिये तपस्वी तपस्या करते हैं। हिन्दी में इसे ‘साधना’ कहते हैं और संस्कृत में ‘तपस्या’ कहते हैं। यह दोनों एक ही हैं अतः साधना का मतलब है अपने आप को तपाना।
साधना में आपको अपने मन को समझाना होगा। अगर मन नहीं मानता है तो आपको उसकी पिटाई करनी होगी। बैल जब खेतों में हल नहीं खिंचता है तथा घोड़ा जब रास्ते पर चलने अथवा दौड़ने को तैयार नहीं होता तो उसकी पिटाई करनी पड़ती है। हमने अपने आपको इतना पीटा है कि उसका कहना नहीं। हमने अपने आपको इतना धुलने का प्रयास किया है कि उसे हम कह नहीं सकते।
साधना से सिद्धि पाने का क्या रहस्य है? इस रहस्य हो न जानने के कारण ही प्रायः लोग खाली हाथ रह जाते है। मित्रों, साधना की सिद्धि होने निश्चित है। साधना सामान्य चीज नहीं है। यह असामान्य चीज हैं परन्तु साधना को साधना की तरह किया जाना परम् आवश्यक हैं।
साधना बहुत उपयुक्त रहती है। जिसे गायत्री अभियान साधना कहा जाता है। यह एक वर्षीय गायत्री साधना है, जिसके अंतर्गत एक वर्ष में निर्धारित तपश्चर्याओं के साथ 5 लक्ष गायत्री मंत्र जप पूरा किया जाता है।
साधना के संदर्भ में हम आपको सर्कस के जानवरों का उदाहरण देते रहते हैं कि हाथी, घोड़े, शेर, चीते जब अपने मालिक का पेट पालते तथा सैकड़ों लोगों का मनोरंजन करने, खेल दिखाने में समर्थ होते हैं। इन जानवरों को साध लिया गया होता है जो सैकड़ों लोगों को प्राविडेण्ट फंड देते हैं, पेमेण्ट देते हैं उनका पालन करते हैं। ये कैसे साधे जाते हैं? बेटे, यह रिंगमास्टर के हण्टरों से साधे जाते हैं। वह उन्हें हण्टर मार-मारकर साधता है।
साधना का सारा-का-सारा माहौल तीन टुकड़ों में बंटा हुआ है। ये हैं- उपासना, साधना और आराधना। उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा, परन्तु हमने ऐसा नहीं किया। हमने अगरबत्ती जलाकर प्रारम्भ तो अवश्य किया है, परन्तु समाप्त नहीं किया। हमने अपने जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धान्त हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास किया है।
साधना की विधि इस प्रकार है-
साधना से सिद्धि मिल सकती है। हमने इसी आधार पर पाया है और आप भी पा सकेंगे, परन्तु आपको सही रूप से इन तीनों को पूरा करना होगा। आपकी साधना तब तक सफल नहीं होगी, जब तक आप हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेंगे। यदि आप हमारे कंधे से कंधा मिलाकर और कदम से कदम मिलाकर चल सकें तो हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आपका जीवन धन्य हो जायेगा, पीढ़ियाँ और श्रद्धापूर्वक यह रखेंगी। आज की बात समाप्त।
साधना में साधारण दिनों में प्रतिदिन 11 मालायें जपनी चाहिये। हर महीने की दोनों एकादशियों को 24 मालाएं जपनी चाहिये। वर्ष में तीन संध्यायें होती हैं, उन्हें नवरात्रियाँ कहते हैं। इन नवरात्रियों में 24-24 हजार के तीन अनुष्ठान पूरे करने होते हैं। जैसे प्रतिदिन प्रातःकाल, मध्याह्न, सायंकाल की तीन संध्यायें होती हैं, वैसे ही वर्ष में ऋतु-परिवर्तनों की संधियों में तीन नवरात्रियाँ होती हैं।
साधना क्रम साधना के आन्तरिक उत्कर्ष की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यह एक वर्ष की तपश्चर्या साधक को गायत्री महाशक्ति से तादद में करा देती है। श्रद्धा और विश्वास पूर्वक की हुई अभियान साधना अपना फल दिखाये बिना नहीं रहती। यह एक वर्षीय अभियान साधना एक ऐसी तपस्या है जो साधक के अभावों, कष्ट, कठिनाइयों का तो शमन करती ही है, साथ ही इसके परिणामस्वरूप साधक अपने भीतर, बाहर तथा चारों ओर एक दैवी वातावरण का अनुभव करता है।
साधना की तरह किया जाना परम् आवश्यक हैं। साधना कैसी होना चाहिये, इस सम्बन्ध में हम आपको पुस्तकों का हवाला देने की अपेक्षा एक बात बताना चाहते हैं, जिसके आप जाँच-पड़ताल कभी भी कर सकते हैं।
साधना और आराधना। उपासना के नाम पर आपने अगरबत्ती जलाकर और नमस्कार करके उसे समाप्त कर दिया होगा, परन्तु हमने ऐसा नहीं किया। हमने अगरबत्ती जलाकर प्रारम्भ तो अवश्य किया है, परन्तु समाप्त नहीं किया। हमने अपने जीवन में अध्यात्म के जो भी सिद्धान्त हैं, उन्हें अवश्य धारण करने का प्रयास किया है। त्रिवेणी में स्नान करने की बात आपने सुनी होगी कि उसके बाद कौआ कोयल बन जाता है।
साधना अभीष्ट लाभ पहुँचाती है। वृहत्पारासर स्मृति 8-60 में कहा भी गया है “रोग, शोक, द्वेष तथा अभाव की स्थिति में गायत्री महाशक्ति की उपासना करने से इन कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। अग्निपुराण में भी उल्लेख है-
साधना करेगा, उसे भी परिणाम अवश्य मिलेगा। हमें कैसे मिला, इसके संदर्भ में हम दो घटनायें सुनाना चाहते हैं।
साधनाएं, चार बार की हिमालय यात्राएं, प्रचण्ड स्तर की सूक्ष्मीकरण साधना ऐसे विलक्षण प्रयोगों के निमित्त ही सम्पन्न हुई। सूक्ष्मजगत की दिव्यचेतना को झकझोर कर खड़ा कर देने, साथ ही साथ अनर्थों को निरस्त करने हेतु उनसे जूझने के उभयपक्षीय प्रयोजनों में उनकी सूक्ष्म व कारणसत्ता सतत् नियोजित हैं।
साधना इसी का नाम है। अपने अन्दर जो बुराइयाँ हैं, भूलें हैं, कमियाँ हैं, दोष-दुर्गुण हैं, कषाय-कल्मष है, उसे दूर करना व उसके लिये कठिनाइयाँ उठाना ही साधना या तपस्या कहलाती है। इसी का दूसरा नाम पात्रता का विकास है। कहने का तात्पर्य यह है कि वर्षा के समय आप बाहर जो भी पात्र रखेंगे- कटोरी, गिलास-जो कुछ भी रखेंगे, उसी के अनुरूप उसमें जल भर जायेगा। इसी तरह आपकी पात्रता जितनी होगी, उतना ही भगवान का प्यार, अनुकम्पा आप पर बरसती चली जायेगी।
साधना की है। उसका परिणाम अवश्य मिला है। और जो कोई भी साधना करेगा, उसे भी परिणाम अवश्य मिलेगा। हमें कैसे मिला, इसके संदर्भ में हम दो घटनायें सुनाना चाहते हैं।
साधना ऐसे विलक्षण प्रयोगों के निमित्त ही सम्पन्न हुई। सूक्ष्मजगत की दिव्यचेतना को झकझोर कर खड़ा कर देने, साथ ही साथ अनर्थों को निरस्त करने हेतु उनसे जूझने के उभयपक्षीय प्रयोजनों में उनकी सूक्ष्म व कारणसत्ता सतत् नियोजित हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1998-January
साधनात्मक पुरुषार्थ को तीव्रतम नियोजित करने की प्रेरणा दी। इस संकट की घड़ी में उच्चस्तरीय चिन्तन ही हम सब को वरण करना चाहिए, ताकि हम गुरुसत्ता द्वारा सूक्ष्म व कारण जगत से भेजी जा रही आध्यात्मिक प्रेरणाओं को ग्रहण कर सकें
साधना, कर्तव्यपालन, लोकसेवा आदि सात्विक कार्य हो सकते हैं।
साधना में तल्लीन हो गये। उनकी निष्ठा और भय के प्रति एकाग्रता देखकर निराशा उलटे पाँव भागी-सचमुच उनकी वह साधना, वह लगन अद्भुत थी। कष्ट कठिनाइयों के झंझावातों में वह स्थिर रहे। वर्षा, आतप और धूप उनके सहयोगी सिद्ध हो चले उस तरुण तपस्वी के सिर पर प्रलय के मेघ घिरे, बरसे और वह केवल मुस्कुराते रहे मान अपमान दुनियादारों के उपहार-प्रलाप उसे पथ से विरत न कर सके। भूख प्यास उसे क्षुब्ध न कर सकी।
साधना के क्रियापरक कर्मकाण्ड की तुलना शरीर के कलेवर से की जा सकती है। शरीर और चेतना दो भिन्न चीजें हैं। इससे शरीर का लाभ है क्या? शरीर का भी लाभ है। हम क्या सेवा कर सकते हैं, हाथ से?
साधना से ही जाना जाता है वह तप ही अभी तुम्हारे लिए ब्रह्म है अभी और साधना करो। पिता वरुण के वही इन्हें गिने पुराने शब्द थे।
साधना से सिद्धि-1 वांग्मय क्रमाँक 5 से
साधना से ही उसे जानने की इच्छा करो, जाओ प्रयत्न जारी रखो ...... ब्रह्म आ मिलेगा। “ ब्रह्मवेता वरुण ऋषि ने वही शब्द फिर दुहराये।
साधना के लिए पकड़ना पड़ेगा चेतना का स्तर, जहाँ शक्तियाँ निवास करती हैं, जहाँ भगवान निवास करते हैं, जहाँ आस्थाएँ निवास करती हैं। उस स्थान का नाम, उस स्तर कर नाम वह भूमि है जिसे दिव्यलोक कहते हैं, जहाँ गायत्री माँ निवास करती हैं, चेतना निवास करती है, जिसको हमने ऋतंभरा-प्रज्ञा कहा है। चलिए हमें ऋतंभरा-प्रज्ञा ही कहने दीजिए ऋतम्भरा-प्रज्ञा क्या है? वह प्रज्ञा, वह धारणा, वह निष्ठा- जो आदमी को ऊँचा उठा देती है, ऊँचा उछाल लेती है। जिसकी प्रेरणा से आदमी ऊँची बातों पर विचार करता है और नीची बातों से ऊँचा उठता चला जाता हैं, उसे ऋतंभरा-प्रज्ञा कहते हैं।
साधना की है, वह यथार्थ में विचारक्रान्ति का ही मौलिक सूत्र है। मानवीय वृत्तियों एवं विचारों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करने वाला मंत्र। सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन का कारगर चिंतन समाया है इसमें।
साधना-प्रणाली को अपनाने का आदेश दिया है।
साधना से उठकर सूर्य को अर्घ्य-जल चढ़ाना चाहिए और अर्घ्य से बचाकर एक चुल्लू अर्थात्-एक दो चम्मच जल सविता देवता का पुण्य-प्रसाद मानकर स्वयं पीना चाहिए। इस प्रयोग से बन्ध्याएँ गर्भधारण करती हैं, जिनके बच्चे मर जाते हैं या गर्भपात हो जाता है, उनका यह कष्ट मिटकर सद्गुणी संतान पैदा होती है।
साधना को सिखाने की-इस साधना को बताने की। मित्रो! बहुत समय से हम आपको गायत्री उपासना का कर्मकाण्ड एवं क्रिया-कलाप समझाते रहे हैं कि पावन गायत्री मंत्र क्या होता है ओर गायत्री उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है। यह उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
साधना, शक्ति-संवर्धन, सद्ज्ञान, सद्शिक्षा, संस्कृति, नारी-जागरण तथा स्वावलम्बन-युवा शक्ति जागरण-ये छह विराट समारोह क्रमशः गुरुपूर्णिमा से मार्गशीर्ष पूर्णिमा तक बड़ी सफलता के साथ सम्पन्न हो चुके है। प्रत्येक की अपनी उपलब्धियाँ रही हैं जो समय-समय पर पाठक-परिजन “अखण्ड-ज्योति” मासिक एवं “प्रज्ञा अभियान” पाक्षिक में पढ़ते रहे हैं। अब सातवाँ समारो पौष पूर्णिमा पर न होकर हेमन्त की ठिठुरन की समापन बेला में महाकुँभ के साथ वसंत पंचमी की पावन वेला में हो रहा है। भारतीय संस्कृति कैसे विराट व्यापक रूप लेकर विश्व-संस्कृति बनने जा रही है तथा भारत भर में विभिन्न भाषाओं में पूज्यवर के साहित्य के अनुवाद तथा ऑडियो कैसेट्स का ज्ञानयज्ञ का विस्तार किस विराट रूप में सम्पन्न होने जा रहा है, उसकी झलक-झाँकी इस वसंत से परिजन देख सकेंगे।
साधना न हो तब तक भोजन नहीं करना चाहिए- हाँ जल पिया जा सकता है। शुद्ध शरीर, शुद्ध मन और शुद्ध वस्त्र से तैयार होकर पूर्व की ओर मुँह करके उपासना के लिए बैठना चाहिए। केशर डालकर चंदन अपने हाथ से घिसें और मस्तक, हृदय तथा कंठ पर तिलक छाप के रूप में लगावें। तिलक छोटे-से-छोटा भी लगाया जा सकता है। गायत्री मूर्ति या चित्र की स्थापना करके उसकी विधिवत पूजा करनी चाहिए।
साधना करते हैं?
साधना, वह लगन अद्भुत थी। कष्ट कठिनाइयों के झंझावातों में वह स्थिर रहे। वर्षा, आतप और धूप उनके सहयोगी सिद्ध हो चले उस तरुण तपस्वी के सिर पर प्रलय के मेघ घिरे, बरसे और वह केवल मुस्कुराते रहे मान अपमान दुनियादारों के उपहार-प्रलाप उसे पथ से विरत न कर सके। भूख प्यास उसे क्षुब्ध न कर सकी। मोह-ममत्व के फंदे उसे फाँस न सके।
साधना की पृष्ठभूमि पर उनके द्वारा निर्दिष्ट निर्धारणों के अनुरूप सतत् चलते रहें। पूर्ण पुरुष की यदि कोई अवधारणा किसी के मन में हो सकती है तो उसे साक्षात परमपूज्य गुरुदेव के रूप में उनके व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व के रूप देखा जा सकता है। जिस प्रकार स्वामी विवेकानन्द स्वयं को “कन्डेन्स्ठ इण्डिया” घनीभूत संवेदनसिक्त भारत भूमि का पर्याय मानते थे, ठीक उसी प्रकार हम 1911 में जन्मी हमारी गुरुसत्ता को भारत की जीती-जागती रक्तमाँस की प्रतिमा मान सकते हैं, जिनके मन में राष्ट्र के नवोन्मेष के प्रति टीस थी- भारत को पुनः हिंदुत्व के मूल आधारों पर प्रतिष्ठित कर श्रेष्ठतम ऊँचाई तक पहुँचाने की वेदना थी एवं इसी के निमित्त उनके जीवन का हर पल जिया गया। दृष्टिकोण के परिष्कार से समस्याओं का समाधान तथा प्रत्येक व्यक्ति का स्वयं के लिए नहीं- समाज व राष्ट्र के प्रति समर्पित होकर जीना-यही उनके जीवन का मूल शिक्षण रहा। आज झंझावातों में घिरे मानव समुदाय को-नेतृत्वहीन समाज को आस्था संकट से ग्रसित मानवता को यदि कहीं से कोई आशा दिखाई पड़ती है, तो वह गायत्री परिवार से परमपूज्य गुरुदेव के निर्धारणों में से मिलती दिखाई देती है।
साधना के सम्बन्ध में आपको क्यों बुलाना पड़ा? इससे पहले भी हम आपको कई बार साधना की करा चुके हैं, आपको बता चुके हैं, फिर क्या जरूरत पड़ गई इस साधना को सिखाने की-इस साधना को बताने की। मित्रो! बहुत समय से हम आपको गायत्री उपासना का कर्मकाण्ड एवं क्रिया-कलाप समझाते रहे हैं कि पावन गायत्री मंत्र क्या होता है ओर गायत्री उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है। यह उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
साधना करने के बहुत दिनों बाद उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा था कि अन्न ही ब्रह्म है पर हृदय का संशय नहीं मिटा। तर्क बुद्धि ने उससे कहा, नहीं यह ब्रह्म नहीं है। संशय में पड़े-पड़े वह पुनः पिता वरुण के पास जाकर बोले-भगवन् मुझे उस ब्रह्म के बारे में बतलाइये।
साधना किसकी, गायत्री की। गायत्री की साधना के सम्बन्ध में आपको क्यों बुलाना पड़ा? इससे पहले भी हम आपको कई बार साधना की करा चुके हैं, आपको बता चुके हैं, फिर क्या जरूरत पड़ गई इस साधना को सिखाने की-इस साधना को बताने की। मित्रो! बहुत समय से हम आपको गायत्री उपासना का कर्मकाण्ड एवं क्रिया-कलाप समझाते रहे हैं कि पावन गायत्री मंत्र क्या होता है ओर गायत्री उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है।
साधना-सत्रों में इसी निमित्त आह्वान किया जाता रहता है, ताकि ऊर्जा अनुदानों से कोई वंचित न रहने पाए।
साधना बन्द रखनी चाहिए। कोई अनुष्ठान चल रहा हो तो उन दिनों में रोककर रजः स्नान के पश्चात फिर चालू किया जा सकता है। हाँ इस अवधि-में मौन मानसिक जप अवश्य कर लेना चाहिए। इसमें कोई दोष नहीं है।
साधना करो, उसके लिए मन, वचन, कर्म से प्रयत्न प्रारंभ कर दो। हे पुत्र। तुम्हारी प्रबल जिज्ञासा और तप साधना एक दिन तुम्हें उस परम् सत्य का साक्षत्कार अवश्य करा देगी, जिसे ब्रह्म कहते हैं।
साधना करते-करते बुदबुदाये-यह मन ही ब्रह्म है ...... मन से ही जीव उत्पन्न होते हैं-जीते हैं तथा अंत में मरकर उसी में समा जाते हैं। निश्चय ही यह ‘मन’ जगत की उत्पत्ति वृद्धि तथा लय का कारण है। फिर भी अभी भ्राँति बनी हुई थी। अंतर्द्वंद्व बराबर ज्यों का त्यों चल रहा था। वह निश्चय नहीं कर पा रहे थे कि ब्रह्म क्या है?
साधना का अर्थ कर्मकाण्ड मात्र पूरा कर लेना नहीं है और न ही गायत्री कोई देवी है। नहीं साहब, वह देवी होती है जो हंस पर सवारी करती है जो फर्र से इस पेड़ पर उस पेड़ पर चली जाती है। आप जानते हैं गायत्री कहाँ रहती है? हाँ! महाराज जी अपने समझाकर तो भेजा है। एक हाथ में पानी का कमण्डलु लेते हैं।
साधना-सत्र केन्द्र के अतिरिक्त चलेंगे। 1999 का यह वर्ष आयोजन प्रधान नहीं- साधना प्रधान होगा, यह ध्यान रखा जाय ताकि सन् 2000 की पूर्णाहुति के लिए जन-जन की पात्रता विकसित हो सके, संव्याप्त प्रदूषण जो सूक्ष्म जगत में बढ़ता जा रहा है, मिट सके।
साधना से वह जाना जाता है तुम अपनी साधना से ही उसे जानने की इच्छा करो, जाओ प्रयत्न जारी रखो ...... ब्रह्म आ मिलेगा। “ ब्रह्मवेता वरुण ऋषि ने वही शब्द फिर दुहराये।
साधना पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के लिए अधिक सरल और अधिक फलदायिनी है।
साधना में आरुढ़ महाराज भर्तृहरि से किसी ने पूछा, “साधू-सन्त वन में विचरण करते हैं। उनके पास माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी- पुत्र आदि कोई भी परिवारीजन नहीं रहते। उन उनके पास रहने को मकान होता है, न सोने को शय्या और न ही खाने को भोजन। तब वे कैसे जंगल में रहते हैं? यज्ञ में हिंसक जानवरों के बीच में वे कैसे निर्भयता से आत्मसाधना करते हैं?
साधना से स्त्रियों के स्वास्थ्य तथा स्वभाव में एक ऐसा आकर्षण पैदा होता है, जिससे वे सभी को परमप्रिय लगती हैं और उनका समुचित सत्कार होता है। अपना बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य, आर्थिक तंगी, दरिद्रता, बढ़ा हुआ खर्च, आमदनी की कमी, पारिवारिक क्लेश, मनमुटाव, आपसी राग-द्वेष एवं बुरे दिनों के उपद्रव को शान्त करने के लिए महिलाओं को गायत्री उपासना करनी चाहिए। पिता के कुल एवं पतिकुल दोनों ही पक्षों के लिए यह साधना उपयोगी है, पर सधवाओं की मंगलमय गायत्री उपासना विशेष रूप से पतिकुल कुल के लिए ही लाभदायक सिद्ध होती है।
साधना पूर्ण हुई,वत्स! अब तुम्हें लोक सेवा के महाकार्य का शुभारंभ करना है। इसके मार्ग दर्शन के तुम्हें देवात्मा हिमालय के आँगन में आना होगा। हिमालय के हृदय-क्षेत्र में पहुँचकर तुम वहाँ निवास करने वाले सप्तऋषि, दिव्यदेह समर्थ सत्ताओं और सृष्टि की संचालक देव शक्तियों के दर्शन कर सकोगे। उनका अनुग्रह और आशीष ही तुम्हें अपने कार्य के लिए बल देगा, तुम्हें समर्थ बनायेगा। “
साधना को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग कर सकती हैं। जिस दिन से गायत्री साधना आरम्भ की जाती है, उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद्बुद्धि और आत्मसंयम की भावना पैदा होती है। मन पर अपना अधिकार होता है, चित्त की चंचलता नष्ट होती है, विचारों में सतोगुण बढ़ जाता है। इच्छाएँ, क्रियाएं, भावनाएं- सीभी सतोगुणी, शुद्ध और पवित्र रहने लगती है। धीरे-धीरे उसकी साध्वी, तपस्विनी, ईश्वर परायण एवं ब्रह्मवादिनी जैसी सात्विक स्थिति हो जाती है।
साधना में तत्पर ही रहे। उनके रोम-रोम में एक ही ध्वनि उनके प्राणों में एक ही स्पन्दन, विचारों और भावनाओं की एक ही प्रति ध्वनि थी-ब्रह्म क्या है?
साधना करने के लिये बुलाया गया है। इस समय आपको घूमने-फिरने के लिया नहीं, शुद्ध रूप से साधना करने के लिए हमने आपको निमंत्रण दिया था। साधना करने के उद्देश्य से जो आयें है, उनको ठहरना चाहिए। घूमने-फिरने के लिए हरिद्वार आना बहुत व्यर्थ ही रहता है। शुद्ध रूप से इच्छा होनी चाहिए।
साधना के रहस्य समझाऊँगा। यह सारे के सारे रहस्य इस शिविर में बताते हुए चला जाऊंगा, जिसके लिए मैंने आपको बुलाया है।
साधना शीघ्र गर्भ स्थापित करने वाली है। कुन्ती ने इस साधना के बल से गायत्री के दक्षिभाग सूर्य भगवान को आकर्षित करके कुमारी अवस्था में ही कर्ण को जन्म दिया था। यह साधना कुमारी कन्याओं को नहीं करनी चाहिए।
साधना को राष्ट्र के सशक्त, समर्थ एवं जाग्रत बनाने के लिए उत्सर्ग किया था। उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर उनके दस स्वप्न को साकार करने का दायित्व हममें से प्रत्येक उस शख्स का है, जो स्वयं को भारतीय कहने में गर्व की अनुभूति करता है।
साधना सम्पन्न की थी। भगवान दत्तात्रेय ने भी इसी स्थान पर तप और योग की अलौकिक साधनाएँ पूरी कीं। आधुनिक युग में तप और अध्यात्मिक साधनाओं की गौरवपूर्ण परम्पराओं का पुनर्जागरण युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज की स्थापना के साथ प्रारम्भ किया। वे स्वयं परमवंदनीय माताजी के साथ युगान्तरीय तपस्या में प्रवृत्त हुए। उनके इस अलौकिक प्रयास से ही शांतिकुंज ने युगतीर्थ एवं इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री की महिमा प्राप्त की।
साधना को पुरुषों की भाँति ही सुविधापूर्वक कर सकती हैं। अविवाहित या विधवा महिलाओं के लिए तो वैसी ही सुविधाएँ हैं जैसी कि पुरुषों को। जिनके बच्चे बड़े हो गये हैं। गोदी में कोई छोटा बालक नहीं है या जो वयोवृद्ध हैं, उन्हें भी उपासना में कुछ असुविधा नहीं हो सकती। साधारण दैनिक साधना में कोई विशेष नियमोपनियम पालन करने की आवश्यकता नहीं है।
साधना में बैठने से पूर्व प्रातःकाल ऐसे जल से स्नान करें, जो शरीर को सह्य हो, अति शीतल या अति उष्ण जल स्नान के लिए अनुपयुक्त है। वैसे तो सभी के लिए, पर स्त्रियों के लिए विशेष रूप से असह्य तापमान का ठण्डा या गरम जल स्नान के लिए हानिकारक है। स्नान के उपरान्त उपासना के लिए बैठना चाहिए। पास में जल से भरा हुआ पात्र रहे। जप के लिए तुलसी की माला और बिछाने के लिए आसन या चटाई-कुशासन सबसे उपयुक्त रहता है।
साधना-पुरुषार्थ हेतु प्रेरित करता रहता है। नौ दिवसीय साधना-सत्रों में इसी निमित्त आह्वान किया जाता रहता है, ताकि ऊर्जा अनुदानों से कोई वंचित न रहने पाए।
साधना भी करनी पड़ती है। नौ दिन का पूर्ण अनुष्ठान होता है। तत्कालीन आवश्यकता के लिए इन्हें ही प्रयुक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त एक वर्ष का गायत्री उद्यापन सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। महिलाओं के लिए इसकी विशेष महिमा हैं।
साधना करने के लिए हमने आपको निमंत्रण दिया था। साधना करने के उद्देश्य से जो आयें है, उनको ठहरना चाहिए। घूमने-फिरने के लिए हरिद्वार आना बहुत व्यर्थ ही रहता है। शुद्ध रूप से इच्छा होनी चाहिए। साधना किसकी, गायत्री की।
साधना से उठकर जल का अर्घ्य सूर्य को चढ़ा लेना चाहिए और थोड़ा-सा बचा हुआ जल बच्चे पर मार्जन की तरह गायत्री मंत्र बोलते हुए छिड़क देना चाहिए। इस प्रयोग से बच्चा दिन-प्रतिदिन स्वस्थ होता हुआ चला जाता है।
साधना की करा चुके हैं, आपको बता चुके हैं, फिर क्या जरूरत पड़ गई इस साधना को सिखाने की-इस साधना को बताने की। मित्रो! बहुत समय से हम आपको गायत्री उपासना का कर्मकाण्ड एवं क्रिया-कलाप समझाते रहे हैं कि पावन गायत्री मंत्र क्या होता है ओर गायत्री उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है। यह उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
साधना में रत रहता है। संसार के समस्त प्राणी उसके अपने स्वजन हैं।
साधना प्रधान होगा, यह ध्यान रखा जाय ताकि सन् 2000 की पूर्णाहुति के लिए जन-जन की पात्रता विकसित हो सके, संव्याप्त प्रदूषण जो सूक्ष्म जगत में बढ़ता जा रहा है, मिट सके।
साधना से ओत−प्रोत होने के कारण ही यशस्वी संतानों को जन्म देती थीं, तभी यह देश नर-रत्नों की खान हुआ करता था आज भी यह मार्ग सबके लिए खुला हुआ है, इसे अपनाकर हर कोई मनोवाँछित फल प्राप्त कर सकता है।
साधनाएँ दी जा रही हैं जो हर आयु-वर्ग के लिए उपयुक्त हैं। गायत्री मंत्र वही है, परन्तु अन्तर भाव-क्षेत्र का है। माता को प्रसन्न करने के लिए उपासना के साथ-साथ आवश्यकता के अनुरूप भाव-साधना भी करनी पड़ती है। नौ दिन का पूर्ण अनुष्ठान होता है। तत्कालीन आवश्यकता के लिए इन्हें ही प्रयुक्त किया जाता है।
साधना दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने के लिए परम उत्तम है।
साधना का प्राण है। चलिए हमारे साथ-साथ गहराई में डुबकी लगाइए, ताकि आपको गायत्री की बाबत अब तक जो जानकारी है, उसकी अपेक्षा अधिक जानकारी मिलें।
साधना में गायत्री माता का चित्र, प्रतिमा अथवा मूर्ति को किसी छोटे आसन या चौकी पर स्थापित करके उसकी पूजा वैसे ही करनी चाहिए, जैसे अन्य देव प्रतिमाओं की की जाती है। प्रतिमा के आगे एक छोटी तश्तरी रख लेनी चाहिए ओर उसी में चन्दन, धूप, द्वीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, जल, भोग आदि पूजा सामग्री चढ़ानी चाहिए। मूर्ति के मस्तक पर चन्दन लगाया जा सकता है, पर यदि चित्र है तो उस पर चन्दन आदि नहीं लगाना चाहिए, जिससे उसमें मैलापन न आये। नेत्र बन्द करके ध्यान करना चाहिए और मन ही मन कम से कम 24 मंत्र गायत्री के जपने चाहिए। इस प्रकार की नित्य गायत्री साधना कन्याओं को उनके अनुकूल वर, अच्छा घर तथा अचल सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है।
साधनाएँ पूरी कीं। आधुनिक युग में तप और अध्यात्मिक साधनाओं की गौरवपूर्ण परम्पराओं का पुनर्जागरण युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज की स्थापना के साथ प्रारम्भ किया। वे स्वयं परमवंदनीय माताजी के साथ युगान्तरीय तपस्या में प्रवृत्त हुए। उनके इस अलौकिक प्रयास से ही शांतिकुंज ने युगतीर्थ एवं इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री की महिमा प्राप्त की। बसन्त पंचमी यानि 1 फरवरी, 1998 महाकुम्भ के विशेष स्नान पर्व में से प्रथम स्नान पर्व है।
साधना क्षेत्र में पुरुष-स्त्री का भेद नहीं, दोनों ही वर्ग ईश्वर की आँखों के तारे हैं, इस क्षेत्र में सभी आत्माएँ समान हैं। अतः गायत्री महाशक्ति की आराधना का अधिकार सभी को है, चाहे वे नर हों या नारी। जो लोग यह कहते हैं कि गायत्री वेदमंत्र होने से उसका अधिकार नारी को नहीं है, वे भारी भूल करते हैं। प्राचीनकाल में स्त्रियाँ मंत्रदृष्टा रही हैं। वेदमंत्रों का उनके द्वारा अवतरण हुआ है।
साधना में अविचल रहो वत्स। देखना श्रद्धा न डिगे-पथ पर चलते रहना ........ ब्रह्म ज्ञान मिलेगा। “ पिता ने आदेश दिया।
साधना करने के उद्देश्य से जो आयें है, उनको ठहरना चाहिए। घूमने-फिरने के लिए हरिद्वार आना बहुत व्यर्थ ही रहता है। शुद्ध रूप से इच्छा होनी चाहिए। साधना किसकी, गायत्री की। गायत्री की साधना के सम्बन्ध में आपको क्यों बुलाना पड़ा?
साधना उपयोगी है, पर सधवाओं की मंगलमय गायत्री उपासना विशेष रूप से पतिकुल कुल के लिए ही लाभदायक सिद्ध होती है।
साधना नहीं, उसका मखौल है। इसी तरह कितने लोग पूछते रहते हैं कि चंदन की माला अच्छी होती है कि रुद्राक्ष की। अरे बेटे चंदन से क्या मतलब है या रुद्राक्ष से क्या मतलब है। अपने हृदय की बात कहते हैं, अन्तरात्मा की बात कहते हैं। चन्दन में क्या रखा है और रुद्राक्ष में क्या रखा है।
साधना के समान दैवी सहायता के माध्यम कठिनाई से मिलेंगे। कोई विशेष कामना मन में हो और उसके पूर्ण होने में भारी बाधाएँ दिखाई पड़ रही हो, तो सच्चे हृदय से भगवती गायत्री को पुकारना चाहिए। माता जैसे अपनी प्रिय संतान की पुकार सुनकर दौड़ी आती है, वैसे ही गायत्री माता अपनी प्रिय पत्रियों-उपासिकाओं को अपनी अमित करुणा का प्रत्यक्ष परिचय देती और उनकी कष्ट कठिनाइयों को दूर करती है। आवश्यकता मात्र अपने भावभरे अन्तः करण से उन्हें पुकारने भर की है।
साधना में कोई विशेष नियमोपनियम पालन करने की आवश्यकता नहीं है। दाम्पत्य जीवन के साधारण धर्म-पालन करने में उसमें कोई बाधा नहीं। यदि कोई विशेष साधना या अनुष्ठान करना हो तो उतनी अवधि के लिए ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक होता है।
साधना करते रहे। कई वसन्त और पतझड़ आये पर भृगु को ब्रह्म का ज्ञान नहीं हुआ ...... किन्तु उनकी साधना चलती रही, अखण्ड-अनवरत रूप से। उन्होंने कभी यह भी नहीं सोचा कि आखिर जब पिता ब ब्रह्म ज्ञानी है तो वे बुद्धि से, विचारों से मुझे क्यों नहीं समझा देते?
साधना एक दिन तुम्हें उस परम् सत्य का साक्षत्कार अवश्य करा देगी, जिसे ब्रह्म कहते हैं।
साधना के सूत्रों को गूँथकर प्रस्तुत किये जाने की योजना इसी दिन बनी है।
साधना आरम्भ की जाती है, उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद्बुद्धि और आत्मसंयम की भावना पैदा होती है। मन पर अपना अधिकार होता है, चित्त की चंचलता नष्ट होती है, विचारों में सतोगुण बढ़ जाता है। इच्छाएँ, क्रियाएं, भावनाएं- सीभी सतोगुणी, शुद्ध और पवित्र रहने लगती है। धीरे-धीरे उसकी साध्वी, तपस्विनी, ईश्वर परायण एवं ब्रह्मवादिनी जैसी सात्विक स्थिति हो जाती है। गायत्री के वेश में भगवान का उसको साक्षात्कार होने लगता है और ऐसी आत्मशान्ति मिलती है, जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख उसे नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
साधना है। अब हम आपको जवानों की, फिलॉसफरों की, दार्शनिकों की विचारशीलों की गायत्री समझाना चाहेंगे अब आपको साहसियों की विचारशीलों के, तपस्वियों की साधना सिखाना चाहूँगा। मैं समझता हूँ कि अब आप बच्चे नहीं रहे, वरन् जवान हो गए हैं, इसलिए जवानों से जवानों की सी बात कहनी चाहिए। बच्चों को बच्चों की सी बात कहनी चाहिए। जवानों को गायत्री की शिक्षा क्या है?
साधनाएं भी साथ में की जाएँ तो और भी उत्तम हैं।
साधना करने वाले जिस साधु-संत के पास धैर्य रूपी पिता, क्षमा रूपी माता, शान्ति रूपी गृहिणी, सत्य रूपी पुत्र, दया रूपी बहिन, संयम रूपी भाई रहता है। पृथ्वी जिसकी शय्या है, दिशाएँ जिसके वस्त्र हैं, ज्ञानामृत (स्वाध्याय) जिसका भोजन है। इतना विशाल परिवार जिसके पास सदा रहता है, ऐसे योगी को भला किससे भय होगा? वह तो निर्भरतापूर्वक सदा ही आत्मसाधना में रत रहता है। संसार के समस्त प्राणी उसके अपने स्वजन हैं।
साधनाएँ कठिन हैं। ऐसी स्थिति में वे संक्षिप्त साधनाओं से काम चला सकती हैं। जो पूरा गायत्री-मंत्र “द्ध भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् “ याद नहीं कर सकतीं, वे संक्षिप्त गायत्री पंचाक्षरी मंत्र-“ द्ध भूर्भुवः स्वः “ से काम चला सकती हैं। रजस्वला होने के दिनों में उन्हें विधिपूर्वक साधना बन्द रखनी चाहिए। कोई अनुष्ठान चल रहा हो तो उन दिनों में रोककर रजः स्नान के पश्चात फिर चालू किया जा सकता है।
साधना के समय माता उसे दूध पिलाती रहे। बड़ा हो तो उसके सिर पर और शरीर पर हाथ फिराती रहे। बच्चों की शुभकामना के लिए गुरुवार का व्रत उपयोगी है। साधना से उठकर जल का अर्घ्य सूर्य को चढ़ा लेना चाहिए और थोड़ा-सा बचा हुआ जल बच्चे पर मार्जन की तरह गायत्री मंत्र बोलते हुए छिड़क देना चाहिए। इस प्रयोग से बच्चा दिन-प्रतिदिन स्वस्थ होता हुआ चला जाता है।
साधना को बताने की। मित्रो! बहुत समय से हम आपको गायत्री उपासना का कर्मकाण्ड एवं क्रिया-कलाप समझाते रहे हैं कि पावन गायत्री मंत्र क्या होता है ओर गायत्री उपासना कैसे की जा सकती है? कर्मकाण्ड तो कलेवर मात्र है। यह उपासना का शरीर मात्र है, जिसे अभी हमने आपको बताया।
साधनाओं की गौरवपूर्ण परम्पराओं का पुनर्जागरण युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव ने शांतिकुंज की स्थापना के साथ प्रारम्भ किया। वे स्वयं परमवंदनीय माताजी के साथ युगान्तरीय तपस्या में प्रवृत्त हुए। उनके इस अलौकिक प्रयास से ही शांतिकुंज ने युगतीर्थ एवं इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री की महिमा प्राप्त की। बसन्त पंचमी यानि 1 फरवरी, 1998 महाकुम्भ के विशेष स्नान पर्व में से प्रथम स्नान पर्व है। परमपूज्य गुरुदेव के अध्यात्मिक जन्मदिन होने के कारण इस स्नान का महत्व शतगुणित हो जाता है।
साधना या अनुष्ठान करना हो तो उतनी अवधि के लिए ब्रह्मचर्य पालन करना आवश्यक होता है।
साधना एवं गुरु के अनुग्रह ने तुम्हें प्रज्ञापुरुष बनाया है। अब तुम्हारी बारी है-तुम जन-जन की बुद्धि का शोधन करो, उसकी संवेदनाओं को जाग्रत कर उन्हें प्रज्ञापुत्र बनाओ। भावनाओं से ओत-प्रोत शुद्ध-बुद्धि ही तो प्रज्ञा है। ऐसी प्रज्ञावान आत्मायें ही मानव को उज्ज्वलभविष्य की राह दिखायेगी।
साधना सिखाना चाहूँगा। मैं समझता हूँ कि अब आप बच्चे नहीं रहे, वरन् जवान हो गए हैं, इसलिए जवानों से जवानों की सी बात कहनी चाहिए। बच्चों को बच्चों की सी बात कहनी चाहिए। जवानों को गायत्री की शिक्षा क्या है? भाइयों! मैं क्या कह सकता हूँ आपसे, गायत्री की कितनी शिक्षाएँ हैं।
साधना में प्रवेश तथा युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा का कार्य इसी दिन हुआ, साथ ही आगामी पाँच वर्षों में विशिष्ट कार्य कर अपने लीला-संदोह के पटाक्षेप की घोषणा भी इसी दिन हुई।
साधनात्मक पुरुषार्थ को तीव्रतम गति देने के लिए क्षेत्रीय साधना-सत्र केन्द्र के अतिरिक्त चलेंगे। 1999 का यह वर्ष आयोजन प्रधान नहीं- साधना प्रधान होगा, यह ध्यान रखा जाय ताकि सन् 2000 की पूर्णाहुति के लिए जन-जन की पात्रता विकसित हो सके, संव्याप्त प्रदूषण जो सूक्ष्म जगत में बढ़ता जा रहा है, मिट सके।
साधना कन्याओं को उनके अनुकूल वर, अच्छा घर तथा अचल सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है।
साधना चलती रही, अखण्ड-अनवरत रूप से। उन्होंने कभी यह भी नहीं सोचा कि आखिर जब पिता ब ब्रह्म ज्ञानी है तो वे बुद्धि से, विचारों से मुझे क्यों नहीं समझा देते?
साधना कुमारी कन्याओं को नहीं करनी चाहिए।
साधना करो। पिता वरुण के वही इन्हें गिने पुराने शब्द थे।
साधना के बल से गायत्री के दक्षिभाग सूर्य भगवान को आकर्षित करके कुमारी अवस्था में ही कर्ण को जन्म दिया था। यह साधना कुमारी कन्याओं को नहीं करनी चाहिए।
साधनाओं से काम चला सकती हैं। जो पूरा गायत्री-मंत्र “द्ध भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् “ याद नहीं कर सकतीं, वे संक्षिप्त गायत्री पंचाक्षरी मंत्र-“ द्ध भूर्भुवः स्वः “ से काम चला सकती हैं। रजस्वला होने के दिनों में उन्हें विधिपूर्वक साधना बन्द रखनी चाहिए। कोई अनुष्ठान चल रहा हो तो उन दिनों में रोककर रजः स्नान के पश्चात फिर चालू किया जा सकता है। हाँ इस अवधि-में मौन मानसिक जप अवश्य कर लेना चाहिए।
साधना का विज्ञान ज्ञात एवं अभिज्ञात क्षमताओं के नियन्त्रण-संचालन का विज्ञान है। विधिवत् एक विधान है। इसे हृदयंगम कर जीवन क्षेत्र में लागू कर रही हम अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदल सकते हैं।
साधना से वह ऊबे नहीं और ... कई वर्ष बीत गए।
साधना है कि सभी शक्तिमान आत्माएँ भारत के गाँव-गाँव और घर-घर में उज्ज्वल भविष्य का सन्देश पहुँचा दें, तभी समूचे राष्ट्र में नव-जागरण एवं नये जीवन का संचार हो सकता है। ध्यान रहे राष्ट्र सेवा मात्र शरीर से ही नहीं आत्मा से भी की जा सकती है। आत्मा के आह्वान पर बलिदानों के रक्त से मातृभूमि की अर्चना और अभ्यर्थना करनी पड़ती है, आध्यात्मिक जाग्रति के बल पर ही भारत का पुनर्निर्माण सम्भव है।
साधना-तत्वदर्शन। इससे हमें दोनों ही क्षेत्रों में एक-से एक बढ़कर उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं।
साधना के सूत्रों को यजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली में लिखा जो विश्व के समस्त साधकों को इस महामंत्र को बोध कराते हैं कि रोटी, प्राण मन तथा वानादि साधनों में तो सत्य का एक अंश मात्र है। यथार्थ सत्य तो इन बसे परे है। इसी परमसत्य के बोध में ही तो अयमात्मा ब्रह्म का नाद गुँजित होता है।
साधना से जोड़ता है। पर्व ही तो सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज का मूल आधार है। जिस प्रकार पर्व को आधार बनाकर पर्वत समुन्नत होता है, पर्वताकार होता है और जिस प्रकार गन्ने की पोर की तरह मानव शरीर भी पोर-पोर से जुड़ता हुआ जीवन में उत्कर्ष पाता है, उसी प्रकार विभिन्न जीवन-पद्धतियों की समस्त जीवन्त परम्पराओं को मकर-संक्रान्ति का लोकपर्व भारतीय समाज को समुन्नत बनाता रहा है। यह साँस्कृतिक संक्रान्ति पर्व ऋतु चक्र, महाभारत काल की आस्था, पौराणिक जन-विश्वास प्राकृतिक निधि, जलदेवता, वरुणा तथा गंगा वाहन ‘मकर’ से जुड़ा है और सूर्य-रश्मियों के क्रान्तिकारी उत्कर्ष से भरा है। इसी के साथ इसमें एक संदेश भी निहित है, संक्रान्ति के अवसर पर गायत्री महामंत्र से सूर्योपासना का महिमान्वित संदेश।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-July
साधना उनको अच्छे घर पर तथा अत्यन्त सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है। सधवाएं गायत्री साधना द्वारा दाम्पत्ति जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशल क्षेम प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।
साधना गायत्री से ही होती है।
साधना की अपेक्षा निष्काम भावना अधिक श्रेष्ठ है।
साधना द्वारा दाम्पत्ति जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशल क्षेम प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।
साधना तथा उपासना पर इतना भरोसा नहीं था। मेरे अन्तःकरण में शंकाएं बनी ही रहती थीं कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही है या त्रुटिपूर्ण। साधना काल के अनुभवों का अर्थ भी नहीं समझ पाता था। बड़ी दुविधा में पड़ा हुआ था। में बहुत दिनों से योग्य महात्मा, पथप्रदर्शक की तलाश में था।
साधना मार्ग में विनम्र पदार्पण किया है। उत्तराखंड के तपस्वी महात्माओं की कृपा का किंचित प्रसाद प्राप्त करने में भी समर्थ हुआ हूँ। ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव करने का सौभाग्य मुझे दिया गया है-एक अत्यन्त महान प्रचण्ड ज्योति अपना हाथ पर मेरे शरीर को रखकर धीर धीरे उसमें प्रवेश करती हुई विलुप्त हो गईं। इसी प्रकार हृदय चक्र में सूर्य शक्ति का जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है उसका रस कोई भुक्त भोगी ही जानते हैं। माता जिस पर वस्तुतः प्रसन्न होती है उसे माया के झंझटों से छुड़ाकर त्याग और वैराग्य की ओर ले चलती है तथा सत्पात्रता एवं सुसंस्कार प्रदान करती है।
साधना बहुत स्वल्प है, उसका फल यदि हो सकता है तो नैष्ठिक उपासक और पूर्णरूपेण माता को आत्म समर्पण करने वाला साधक यदि बहुत कुछ पाते हैं, ऋद्धि सिद्धियों के स्वामी बनते हैं तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए।
साधना में संलग्न हूँ। यों मेरी साधना निष्काम रही है, पर देखता हूँ कि उसके साँसारिक परिणाम भी बहुत कल्याण कारक हो रहे हैं।
साधनाएं करके अणिमा, महिमा आदि चमत्कारी ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनके शाप और वरदान सफल होते थे तथा वे कितनी ही अद्भुत एवं चमत्कारी सामर्थ्यों से भरे पूरे थे इसका वर्णन इतिहास पुराणों में भरा पड़ा है। वह तपस्याएं और योग साधनाएं गायत्री के आधार पर ही होती थीं। गायत्री महाविद्या से ही 84 प्रकार की योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सबसे बड़ा लाभ आत्म कल्याण है जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।
साधनाएं गायत्री के आधार पर ही होती थीं। गायत्री महाविद्या से ही 84 प्रकार की योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना में कोई भूल रहने में भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, स्वल्प श्रमसाध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है।
साधना का ज्वलंत जीवित उदाहरण था यह भी हो सकता है।
साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
साधना की महान आध्यात्मिक शक्ति को खर्च किया जाय। तप से बड़ा और कोई धन नहीं है। तप के बदले से ही सुख मिलता है। संसार में जितने सुखी, और सुसम्पन्न व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं वे भूतकाल में तपस्वी रहे हैं जब उनका तप समाप्त हो जाएगा तो उन्हें तुच्छ प्राणी की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। तब उनके पास कोई सम्पत्ति शेष न रह जायगी।
साधना का श्रम व्यर्थ ही जायेगा। ऐसी बातों से मेरा चित्त बड़ा ही उदास तथा चिन्ताशील रहा करता था। अनुभवी महात्मा और ऋषि केवल वेदमाता को ही अपना आधार मानने वाला गुरु कैसे प्राप्त हो? बड़ी चिन्ता का विषय बन गया।
साधना काल के अनुभवों का अर्थ भी नहीं समझ पाता था। बड़ी दुविधा में पड़ा हुआ था। में बहुत दिनों से योग्य महात्मा, पथप्रदर्शक की तलाश में था।
साधना से तुम अवश्य परीक्षोत्तीर्ण होंगे। प्रथम तो मुझे विश्वास नहीं हुआ परन्तु उनके बहुत आग्रह करने पर मैंने दूसरे दिन से गायत्री साधना आरम्भ कर दी। हाँलाकि हमारी साधना में बहुत कुछ त्रुटियाँ रह गई थीं और मैंने अच्छी तरह गायत्री साधना को विधि विधान से नहीं अपनाया था। सिर्फ मैं एक माला प्रातःकाल जप लिया करता था।
साधना दूसरी नहीं है।
साधना में बहुत कुछ त्रुटियाँ रह गई थीं और मैंने अच्छी तरह गायत्री साधना को विधि विधान से नहीं अपनाया था। सिर्फ मैं एक माला प्रातःकाल जप लिया करता था।
साधना होती है वहाँ कल्याण की वर्षा होती रहती है।
साधना निष्काम रही है, पर देखता हूँ कि उसके साँसारिक परिणाम भी बहुत कल्याण कारक हो रहे हैं।
साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना करने वालों के लिए यह तपोभूमि अत्यन्त ही महत्वपूर्ण एवं शाँतिदायक है। यहाँ ऐसे सज्जन स्थायी रूप से निवास कर सकेंगे जिन पर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है। जो लोग घरेलू जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं और शान्तिमय जीवन बिताना चाहते हैं उसके लिए आचार्य जी का सान्निध्य, एवं तपोभूमि का अत्यन्त ही पवित्र एवं प्रभावशाली वातावरण बहुत ही अनुकूल एवं शान्तिदायक सिद्ध हो सकता है। जिन्हें भगवान ऐसा सौभाग्य प्रदान करें उन्हें बड़भागी ही समझना चाहिए।
साधना को विधि विधान से नहीं अपनाया था। सिर्फ मैं एक माला प्रातःकाल जप लिया करता था।
साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि-सिद्धियाँ परिलक्षित होने लगती है। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है और वह निर्मल एवं प्रकाशवान होकर ईश्वरीय शक्तियों, गुणों सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाता है।
साधना में राम नाम का जप और गीता का पाठ दो ही प्रधान थे। गीता में मैंने देखा कि गायत्री मन्त्र स्वयं भगवान का स्वरूप है। अन्य सन्त महात्माओं से भी यही सुना था और मेरी अन्तरात्मा ने भी यही कहा। तब से मैंने गायत्री माता की शरण पकड़ी और उन्हें ही अपना आत्म समर्पण कर दिया।
साधना अपनावें जिससे वे दैविक, भौतिक और शारीरिक दुःखों से बचें और पारलौकिक जीवन को उन्नत बना सकें।
साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप ही ब्रह्माजी ने चार मुखों में चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेदमाता कहते हैं। वेद विद्या, गायत्री की व्याख्या मात्र है। गायत्री को जानने वाला वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।
साधना में संलग्न हैं। इनकी आत्मा का तेज इतना प्रखर है कि न बोलते हुए भी उनकी शिक्षा तथा प्रेरणा सामने उपस्थित व्यक्ति को भली प्रकार प्राप्त होती है।
साधनाओं के करते हुए भी मुझको अपनी साधना तथा उपासना पर इतना भरोसा नहीं था। मेरे अन्तःकरण में शंकाएं बनी ही रहती थीं कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही है या त्रुटिपूर्ण। साधना काल के अनुभवों का अर्थ भी नहीं समझ पाता था। बड़ी दुविधा में पड़ा हुआ था। में बहुत दिनों से योग्य महात्मा, पथप्रदर्शक की तलाश में था।
साधना आरम्भ कर दी। हाँलाकि हमारी साधना में बहुत कुछ त्रुटियाँ रह गई थीं और मैंने अच्छी तरह गायत्री साधना को विधि विधान से नहीं अपनाया था। सिर्फ मैं एक माला प्रातःकाल जप लिया करता था।
साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते रहते हैं। जिनके दाम्पत्ति जीवन बड़े कर्कश थे, पति-पत्नी में कुत्ता बिल्ली का सा बैर रहता था, वहाँ प्रेम के निर्झरणी बहती देखी गईं। भाई भाई जो एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे उनमें भरत मिलाप हुआ। जो कुटुम्ब, परिवार, क्लेश और कलह की अग्नि में झुलस रहे थे वहाँ शान्ति की वर्षा हुई। फौजदारी, मुकदमाबाजी, कत्ल, चोरी, डकैती, की आशंका से हर घड़ी भय रहता था वहाँ निर्भयता का एकछत्र राज हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-August
साधना करनी पड़ी होगी। परन्तु नारी के जीवन में उक्त दसों बातें स्वभाव बन गयी हैं। उनके बिना उसे चैन ही नहीं पड़ता। वह उन बातों का कठोरता से पालन करके सारे संसार की पथ प्रदर्शिका बन गयी है।
साधना के साथ साथ गायत्री प्रचार के लिए भी विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिये। जिसके प्रयत्न से लोग सन्मार्ग गामी होते हैं उस प्रयत्नकर्ता को भी विशेष पुण्य-फल प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लगाने का पुण्य फल, अपनी थोड़ी सी एकान्त साधना की अपेक्षा कहीं अधिक मिल जाता है। हमारी प्रार्थना है कि प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपना कुछ न कुछ समय इस कार्य में लगाकर गायत्री माता को श्रम एवं समय का दान करे। धन दान की अपेक्षा समय दान का मूल्य अनेक गुना अधिक होता है।
साधना करने की अपेक्षा अनेक व्यक्तियों को गायत्री उपासना के महत्व को समझाना एवं उपासना के मार्ग पर लगा देना अधिक महत्वपूर्ण है। थोड़े से व्यक्ति आत्म लाभ कर लें या मुक्ति प्राप्त कर लें इसमें केवल उन थोड़े से व्यक्तियों का ही लाभ है पर यदि अनेक व्यक्ति सन्मार्ग गामी हों तो संसार के गन्दे वातावरण को ही बदल सकते हैं। इसलिए गायत्री प्रेमियों को अपनी साधना के साथ साथ गायत्री प्रचार के लिए भी विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिये। जिसके प्रयत्न से लोग सन्मार्ग गामी होते हैं उस प्रयत्नकर्ता को भी विशेष पुण्य-फल प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लगाने का पुण्य फल, अपनी थोड़ी सी एकान्त साधना की अपेक्षा कहीं अधिक मिल जाता है।
साधना के लिए उसे दूसरों की हानि करनी पड़ती है-दूसरों को वह अपना शत्रु मान लेता है, किन्तु वह गलत मार्ग पर है। मनुष्य को अपने को दूसरों से भिन्न व्यक्ति न समझना चाहिये। जिसका स्वार्थ परार्थ ही हो, वही पुरुष वास्तव में ‘पुरुष’ नाम को सार्थक करता है। हम सभी लोग एक परमात्मा के अंश हैं- यही भावना हमको सदैव अपने मन में रखनी चाहिए। यह भावना प्रत्येक मनुष्य को इस योग्य बना देगी कि वह दूसरों को सुख दे सके।
साधना की अपेक्षा कहीं अधिक मिल जाता है। हमारी प्रार्थना है कि प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपना कुछ न कुछ समय इस कार्य में लगाकर गायत्री माता को श्रम एवं समय का दान करे। धन दान की अपेक्षा समय दान का मूल्य अनेक गुना अधिक होता है।
साधना। यह जिसे आत्म-समर्पण करती हैं उसके दोषों को नीलकण्ठ की तरह जीवन भर बूँद-बूँद करके पी जाने में सतत प्रयत्नशील रहा करती हैं और उसे मानती हैं अपना वास्तविक देवता। वह उसे अपने हृदय से कभी विलग नहीं करना चाहती। साथ ही साथ आत्म समर्पण के बाद वह अपने जीवन धन के प्रत्येक कार्य की जानकारी चाहती है केवल घर के कार्यों से ही बस नहीं, वह तो अपने पतिदेव से सम्बद्ध सभी बाहरी कार्यों का भी लेखा चाहती है। यह सब क्यों?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-November
साधना के भी हम उच्चशिखर को पहुँच जाते हैं। इन प्रारम्भिक सद्गुणों के बिना योगसिद्धि प्राप्त होने पर भी अधःपतन की सम्भावना रहती है।
साधना में- जिन साधारण सद्गुणों की आवश्यकता है, वे ये हैं- पवित्र जीवन खुला मन, शुद्ध हृदय, सबके प्रति भ्रातृभाव, सलाह और ज्ञान देने और लेने के लिए सदैव तैयार रहना, गुरु के प्रति श्रद्धा, सत्य पालन में तत्परता, अपने ऊपर अन्याय हो, उसे निर्भयता से सहना, जो नियम हैं, उनके कहने में निर्भय तत्परता, जिनकी अयोग्य निन्दा होती हो, उनका हिम्मत से बचाव करना और मनुष्य जाति की उन्नति और पूर्णता के ध्येय को सदैव ध्यान में रखना- ये वे सुवर्ण-सीढ़ियाँ हैं, जिन पर चढ़ कर जिज्ञासु ब्रह्मज्ञान के मन्दिर में सहज प्रवेश कर सकता है।
साधना में बाधक होता है। भगवद्गीता में कहा है कि युक्त आहार-विहार वाले और कर्मों में युक्त दर्जे तक ही लगने वाले को योग दुःख हरण करने वाला होता है। उसका सोना, जागना भी ठीक-ठीक होना चाहिए।
साधना आरम्भ करने के कम से कम एक वर्ष पूर्व से इनका त्याग हो जाना चाहिए। स्थूल शरीर के हाथ पर, नाखून सब साफ रहें और सारा शरीर भी साफ हो। उसके पहनने, बिछाने और ओढ़ने के कपड़े भी शुद्ध साफ रहें। स्थूल शरीर और मन के भाव शान्तिमय हों। पूर्ण आरोग्यता हो।
साधनाएँ आपको सदा दैवी तत्व से संयुक्त रखती हैं।
साधना क्यों न हो, उसकी बुनियाद ऊँचे से ऊंचा आचार, ऊंचे से ऊंची सच्चरित्रता, पूर्ण निर्मलता, पूर्ण परोपकार भाव है। योग के यम-नियमों में इनका समावेश है। वेदान्त के साधन-चतुष्टय में भी ये ही हैं, भक्तिशास्त्र में, निष्काम कर्मयोग में, इन सबकी आवश्यकता है, पर साधक बहुधा इन सद्गुणों की आवश्यकता और महत्व को न समझ, उनको एक ओर छोड़कर, प्राणायामादि साधनों में लग जाते हैं। इसी कारण उनकी उन्नति नहीं होती। साधक चतुष्टय यम-नियमों के पूर्ण रूप से अपने में आ जाने से अपना विकास आप से आप पूर्ण होकर, हमारी सोती हुई आध्यात्मिक शक्याँ आप से आप जाग उठती हैं और बिना योग साधना के भी हम उच्चशिखर को पहुँच जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-June
साधना न हो सके तो भक्ति तो अपने हृदय से होती है उसके लिये तो कहीं जाने की जरूरत नहीं, कुछ कष्टदायक नहीं होता। सच्चे हृदय से अपने इष्ट महापुरुष का स्मरण व भजन भक्ति करिये।
साधना के, मैंने ये प्राण गला डाले।
साधनाएं, तपश्चर्याएं, प्रयोग, अन्वेषण तथा इस विद्या की शोध अधिक गम्भीर आयोजन होते रहेंगे। देश भर के गायत्री उपासकों को परस्पर सम्बन्धित एवं संगठित रहने का तो यह तीर्थ बहुत ही महत्वपूर्ण माध्यम रहेगा।
साधना करने की तथा आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा रहेगी। समय समय पर यहाँ विशेष साधनाएं, तपश्चर्याएं, प्रयोग, अन्वेषण तथा इस विद्या की शोध अधिक गम्भीर आयोजन होते रहेंगे। देश भर के गायत्री उपासकों को परस्पर सम्बन्धित एवं संगठित रहने का तो यह तीर्थ बहुत ही महत्वपूर्ण माध्यम रहेगा।
साधना सिखाना-इन उद्योगों में उस स्फूर्ति से काम लेने लगे। निष्ठावंत और निष्काम सेवा ज्यादा दिन एकाकी नहीं रहने पाती। परशुराम की अदम्य सेवावृत्ति देख कोंकण के जंगलों के वे अन्य निवासी पिघल गये और आखिर उन्होंने उनका अच्छा साथ दिया। अपने-आपको ब्राह्मण कहलाने वाले उसके पुराने-पुराने अनुयायियों ने तो उनका साथ छोड़कर शहरों की पनाह ली थी, मगर उनके बदले ये नए अवर्ण अनुयायी उन्हें मिले। उनने उन्हें स्वच्छ आचार, स्वच्छ विचार और स्वच्छ उच्चार की शिक्षा दी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-February
साधना भी विषना प्रवृत्ति पर भारी अंकुश लगाती है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन एवं मनोविकारों से लड़ने की तत्परता के आधार पर भी इन्द्रिय लिप्सा पर विजय प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन्द्रियों के चटोरेपन को कभी महत्व न दिया जाय, उनकी पूर्ति करने की सफलता को कभी पुरुषार्थ या सफलता न माना जाय। जब कभी इन्द्रियाँ प्रबल हो रही हों तो उनके समाधान के लिए उस सर्वशक्तिमान सत्ता में सच्चे हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए और जब कभी बुद्धि को इन्द्रियाँ हरा दें तब अपने को धिक्कारते हुए उसका पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए।
साधनान्यपि ॥ 17॥
साधना ही होगी और उसके द्वारा बन्धन से मुक्ति हो सकती है।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं उन्हें मुक्ति मार्ग कहते हैं। भगवान् मनु ने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की शुद्धि के लिए जो उपाय बताए हैं वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं देखिए-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-April
साधना तथा तपस्या का सारा प्रयास है। यदि इस प्रयास से हम लोग एक बार भी उस स्थान तक पहुँच गए तो हम लोग यन्त्रणाओं से मुक्त होकर, सिद्ध बनकर, सत्य और आनन्द की लीला में रहकर इसी मृत्यु लोक को ही स्वर्ग बना देंगे। उस युग के लोग (अर्थात् सतयुग के जीव) इस स्वर्गधाम का पता लगाकर इस पृथ्वीतल से संबन्ध त्यागकर उस महत धाम को पहुँचते थे। पर आज हम लोग इस योग के द्वारा स्वर्गलोक के अधिकारी बन कर भी इस पृथ्वी से सम्बन्ध नहीं त्यागेंगे? जिस प्रकार तपस्वी भागीरथ स्वर्ग से गंगा की धारा बहाकर इस अवनीतल को पवित्र कर सके, उसी प्रकार हम लोग भी अमृत का भांड़ लेकर इस संसार में भी अमरलोक की लीला करेंगे, इस मर्त्यलोक में ही स्वर्ग की लीला का आनन्द लेंगे।
साधना के अंतर्गत देश भर में 125 करोड़ गायत्री जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, तथा 125 हजार उपवासों के विशाल आयोजन की पूर्ति (4) गायत्री तीर्थ का निर्माण (5) एक प्रभाव शाली अखण्ड अग्नि की स्थापना (6) हमारे 24 महापुरश्चरणों की आहुति (7) 24 दिन का केवल गंगाजल पर हमारा उपवास (8) 240 नैष्ठिक गायत्री उपासकों का सम्मिलन। वह सभी कार्य ऐसे हैं जिनके द्वारा यह आयोजन छोटा होते हुए भी अपना विशेष रहस्य रखेगा।
साधना समय के बीच में ही उठना पड़े तो फिर पानी से हाथ मुँह धोकर बैठें।
साधना या परिस्थितियाँ नहीं।
साधना प्रिय, धार्मिक प्रकृति के सज्जनों के परिचय तथा पते हमें भेजिए ताकि उन्हें गायत्री उपासना के लिए प्रेरणा दी जा सके एवं आशीर्वाद प्राप्त किये जा सकें।
साधना। इन तीनों में से परमार्थ में ही अपना परम स्वार्थ समाया हुआ है।
साधना बढ़ा दें। और यज्ञ के तीन दिनों में 20,21,22 जून को दूध फल पर अथवा केवल नमक छोड़ कर उपवास करें। इस प्रकार एक महान व्यापक उपवास में एक भाग आपका भी हो सकता है।
साधना के बाद प्रकाश के दर्शन हुए थे। महावीर को यह ज्योति 12 वर्ष के अन्तर्ध्यान और तपस्या के बाद दीखती है ऋजुकूला नदी के किनारे जम्मक ग्राम में वे परम-आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं। ग्रन्थों की भाषा में अब वे तीर्थंकर, सिद्ध, सर्वज्ञ अथवा महावीर हो जाते हैं। वे अब उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, जिसे उपनिषदों में कैवल्य-दृष्टा की अवस्था कहा है। जैन ग्रन्थों के अनुसार अब उनका नाम ‘केवली’ हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-January
साधना नहीं करनी पड़ती।
साधना की अपेक्षा अनेक अधिक गुना अधिक होता है। दो दो घण्टे रोज 12 दिन तक कीर्तन करने की अपेक्षा 24 घण्टे का एक अखण्ड कीर्तन अधिक फल प्रद है। इसी प्रकार अखण्ड दीपक, अखण्ड जप, अखण्ड पाठ आदि का महत्व बहुत अधिक है। प्राचीन काल में अग्नि को घर में अखण्ड प्रज्वलित रखने की प्रथा थी पारसियों ने अब भी बड़ी श्रद्धा सावधानी एवं पवित्रता के साथ अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है ऐसी अग्नि में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो जाता है जो मनुष्य के लिए अनेक दृष्टियों से लाभ दायक सिद्ध होता है। उसकी समीपता से शरीर तथा मन को तेज, बल, उत्साह एवं पोषण प्राप्त होता है, अनेक प्रकार के विकारों को जलाने की भी ऐसी अखण्ड अग्नि में विशेष क्षमता होती है।
साधना करने का अवसर मिले। लेखन में जप की अपेक्षा मेहनत एवं एकाग्रता अधिक होती है इसलिए उसका फल भी अधिक माना गया है। हर्ष की बात है कि 24 लाख हस्तलिखित मंत्र पिछली गायत्री जयन्ती तक ही हमारे पास जमा हो गये थे। इस समय उनकी संख्या करीब 85 लाख है। साधकों के उत्साह को देखते हुए यह निश्चय जान पड़ता है कि 125 लाख (सवा करोड़) मंत्र आगामी गायत्री जयन्ती के पूर्णाहुति यज्ञ तक आसानी से पूरे हो जावेंगे।
साधनामय होनी चाहिए। पूजा उपासना से लेकर दैनिक जीवन के सामान्य कार्य तक साधनामय हों तभी हम सच्चे साधक एवं ईश्वर विश्वासी बन सकते हैं।
साधना करनी चाहिए। आत्म चिंतन द्वारा हममें से प्रत्येक अपनी त्रुटियाँ मालूम करे और दृढ़ता से उन्हें दूर करने का प्रयत्न करे।
साधनाओं का महत्व साधारण साधना की अपेक्षा अनेक अधिक गुना अधिक होता है। दो दो घण्टे रोज 12 दिन तक कीर्तन करने की अपेक्षा 24 घण्टे का एक अखण्ड कीर्तन अधिक फल प्रद है। इसी प्रकार अखण्ड दीपक, अखण्ड जप, अखण्ड पाठ आदि का महत्व बहुत अधिक है। प्राचीन काल में अग्नि को घर में अखण्ड प्रज्वलित रखने की प्रथा थी पारसियों ने अब भी बड़ी श्रद्धा सावधानी एवं पवित्रता के साथ अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है ऐसी अग्नि में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो जाता है जो मनुष्य के लिए अनेक दृष्टियों से लाभ दायक सिद्ध होता है। उसकी समीपता से शरीर तथा मन को तेज, बल, उत्साह एवं पोषण प्राप्त होता है, अनेक प्रकार के विकारों को जलाने की भी ऐसी अखण्ड अग्नि में विशेष क्षमता होती है।
साधनामय हों तभी हम सच्चे साधक एवं ईश्वर विश्वासी बन सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-October
साधना के लिये बहुत ही उपयुक्त है, इस समय जो जप, तप किया जाता है उसका फल अन्य साधारण समयों की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है। जैसे स्त्री के ऋतुवती होने पर गर्भाधान सफल होने की सम्भावना अधिक रहती है वैसे ही नवरात्रि की गायत्री उपासना भी अधिक फलवती होती है। मिठाई बनाने के लिए चासनी पकाकर तार उठने के समय का जो महत्व है, वही महत्व नवरात्रि काल का है।
साधना के अनुकूल वातावरण उन दिनों पृथ्वी पर छाया रहने से थोड़े ही समय में बहुत महत्वपूर्ण कार्य हो जाता है। इन्हीं सब बातों का ध्यान रखते हुए नवरात्रि में गायत्री की विशेष उपासना करने का जोर दिया जाता रहा है।
साधना की जाय तो वह भी निष्फल नहीं जायगी, उसका परिणाम भी किसी न किसी दृष्टि से उत्तम ही सिद्ध होगा।
साधना के लिए विशेष फलप्रद है। यह ऋतु सन्ध्या नवरात्रि ही है।
साधना-धन ही बटोरना-चाहिए। इस तरह के व्यापार को व्यापार कहकर चोरी कहेंगे। जिस तरह सिपाही राज्य के सुख के लिए जान देता है उसी तरह व्यापारी को जनता के सुख के लिए धन गँवा देना चाहिए, प्राण भी दे देना चाहिए। सिपाही का काम जनता की रक्षा करना है, धर्मोपदेशक का उसको शिक्षा देना है। चिकित्सक का उसे स्वस्थ रखना है, और व्यापारी का उसके लिए आवश्यक माल जुटाना है।
साधना करने के लिये समय निकालें। परीक्षा रूप में इस समय थोड़ी बहुत साधना की जाय तो वह भी निष्फल नहीं जायगी, उसका परिणाम भी किसी न किसी दृष्टि से उत्तम ही सिद्ध होगा।
साधना पर बैठा जाय तो दो घण्टे दिन चढ़े 8॥ बजे तक यह साधन पूरा हो सकता है। जिन्हें प्रातःकाल इतना समय मिलने में असुविधा हो वे कुछ समय प्रातः कुछ समय सायं काल निकाल कर जप की पूर्ति कर सकते हैं।
साधना में गुरु पूजन की विशेष आवश्यकता है क्योंकि अनुष्ठान का कोई ब्रह्मा सा संरक्षक अवश्य होता है।
साधना नहीं कर सकते वे दूसरों से अपने बदले का अनुष्ठान करा सकते हैं। इस प्रकार की समुचित व्यवस्था कराने में गायत्री संस्था की सहायता ली जा सकती है।
साधना नहीं होनी चाहिये वरन् किसी के संरक्षण सहयोग एवं पथ-प्रदर्शन में साधना करनी चाहिए। नवरात्रि साधना में गुरु पूजन की विशेष आवश्यकता है क्योंकि अनुष्ठान का कोई ब्रह्मा सा संरक्षक अवश्य होता है।
साधना क्रम बनने में कठिनाई दिखाई पड़ती है उन्हें भी ऐसा करना चाहिए कि कम से कम इन 9 दिनों में तो थोड़ी बहुत साधना करने के लिये समय निकालें। परीक्षा रूप में इस समय थोड़ी बहुत साधना की जाय तो वह भी निष्फल नहीं जायगी, उसका परिणाम भी किसी न किसी दृष्टि से उत्तम ही सिद्ध होगा।
साधना सम्बन्धी मार्ग दर्शन चाहते थे पर यहाँ पहले व्यवस्था ठीक न थी इसलिए प्रायः सभी को यहाँ न आने के लिए कहा जाता था पर अब ये कठिनाई दूर हो गई है। मथुरा में गायत्री तपोभूमि बनवाने के कारण यहाँ साधकों की ठहरने की व्यवस्था हो गई है। पर जो सज्जन आना चाहें वे पूर्व स्वीकृति अवश्य ले लें क्योंकि सीमित संख्या में ही ठहरने की व्यवस्था है।
साधना करनी चाहिए। नवरात्रि साधना में गुरु पूजन की विशेष आवश्यकता है क्योंकि अनुष्ठान का कोई ब्रह्मा सा संरक्षक अवश्य होता है।
साधना रूप औषधि सेवन करें तो वे अन्य समय के उपचार की अपेक्षा अधिक लाभ उठा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-March
साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।
साधनाओं का विस्तृत वर्णन।
साधना कार्य के लिए नवरात्रि से बढ़कर और कोई शुभ मुहूर्त नहीं हो सकता।
साधना नहीं कर सकते वे दूसरों से अपने बदले का अनुष्ठान करा सकते हैं। इसी प्रकार जो लोग स्वयं हवन आदि नहीं कर सकते, उनके बदले का हवन दूसरे कर सकते हैं। जिन्हें इस प्रकार की असुविधा हो वे गायत्री संस्था द्वारा सहायता ले सकते हैं।
साधना करने का भी नहीं हो पाता वह इन 6 दिनों की साधना से होता देखा जाता है। ऐसे अगणित अनुभवों का हमें भली प्रकार ज्ञान है और उसी आधार पर हम विशेष उत्साह एवं साहस के साथ नवरात्रि में गायत्री उपासना करने के लिए अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वाले सज्जनों से आग्रह एवं अनुग्रह करते हैं।
साधना निष्फल नहीं जाती। अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति में कोई कर्म फल विशेष बाधक हो तो भी किसी न किसी रूप में गायत्री साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं।
साधना के लिए संध्या काल का जो महत्व है, वैसा ही महत्वपूर्ण अवसर अध्यात्मिक कार्यों के लिए नवरात्रि का होता है। सर्दी और गर्मी की ऋतुओं के सम्मिलन की संध्या नवरात्रि है। इसी समय वैद्य लोग पुराने रोगियों को जुलाब देकर उनकी स्थायी कोष्ठ शुद्धि एवं निरोगता का उपचार करते हैं, यही समय आत्मिक दुर्बलताओं को हटाकर अन्तःकरण श्द्धि एवं आत्मबल बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम सिद्ध होता है। साधना कार्य के लिए नवरात्रि से बढ़कर और कोई शुभ मुहूर्त नहीं हो सकता।
साधना पुस्तक में बताये जा चुके हैं। स्नान करके, आसन पर बैठ कर जल और अग्नि को समीप रखें। फिर ब्रह्म संध्या करें। तत्पश्चात् गायत्री और गुरु का पूजन करके जप आरम्भ कर दें। जो लोग निराकार उपासना करने वाले हैं वे अग्नि को गायत्री के तेज का प्रतीक मानकर उस पर घृत एवं सुवासित सामग्री चढ़ाकर पूजन कर लें।
साधना में प्राप्त हुए महान अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन।
साधना से होता देखा जाता है। ऐसे अगणित अनुभवों का हमें भली प्रकार ज्ञान है और उसी आधार पर हम विशेष उत्साह एवं साहस के साथ नवरात्रि में गायत्री उपासना करने के लिए अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वाले सज्जनों से आग्रह एवं अनुग्रह करते हैं।
साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है।
साधना पर बैठा जाय तो प्रातःकाल के समय में ही नियत जप पूरा हो सकता है। जो लोग देर में उठते हैं या जिन्हें जल्दी ही किसी काम पर लगना होता है, वे आधे से कुछ अधिक जप प्रातःकाल और शेष सायंकाल में पूरा कर सकते हैं।
साधना
साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।
साधना का फल तत्काल प्राप्त करता है। इस नीति, एवं कार्य पद्धति को अपनाते ही उसकी अनेकों उलझनें सुलझ जाती हैं और तत्काल अभीष्ट शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
साधना और कोई नहीं है। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति में कोई कर्म फल विशेष बाधक हो तो भी किसी न किसी रूप में गायत्री साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है।
साधना द्वारा शीघ्र ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति करनी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति मनुष्य के जीवन में सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि मनुष्य प्राणायाम के द्वारा ही तो जीवित रहता हैं और इसी प्राणायाम के साधारण स्तर को विकास की और ले जाने से हम अवश्यमेव मनुष्य जीवन की अवधि को भी विकास के पद चिह्नों को अनुगामी बना सकते हैं। जिस प्रकार साधारण प्राणायाम करने से आप जीवन धारण करते हैं उसी प्रकार तदधिक प्राणायाम करने से आप चिरायु भी रह सकेंगे।
साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।
साधना को संरक्षण तथा अनुष्ठान में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ पर किया जाता रहेगा। तप में बहुधा आसुरी शक्तियाँ बहुत विघ्न फैलाती हैं, इसीलिए उसके संरक्षण के लिए ब्रह्मा तथा दृढ़ पुरुष आदि की नियुक्ति की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-September
साधना कर सकते हैं। सावधान, आलस्य एवं व्यसन को पास न फटकने देना। मानव संस्कृति ने जितने महान कार्य किए हैं, वे तीव्र स्थायी इच्छा शक्ति के संतुलन द्वारा ही संपन्न हुए हैं। इच्छा शक्ति ही आपको आगे प्रेरित करने वाली अमोघ शक्ति है। निश्चय में ढले न रहें।
साधना पसन्द करते हैं वे अकेले बैठकर हवन कर सकते हैं। हवन सामग्री तथा घी मिला कर रखलें । ताँबे के छोटे हवन कुण्ड में या निर्धारित वेदी पर स्वयं हवन कर लिया करें।
साधना की है। आप सब लोगों ने मिल कर गत सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ को पूर्ण करने में 125 करोड़ जप 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास तथा लगभग 40 करोड़ का लेखन किया है। गायत्री तपोभूमि जैसे महान तीर्थ का निर्माण, 2400 तीर्थों का जल-रज संग्रह व्यापक गायत्री प्रचार तथा पूर्णाहुति यज्ञ का आयोजन किया है। 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरण 24 दिन का केवल गंगाजल उपवास यह सब भी आपके ही परिवार के एक व्यक्ति ने किया है। यह आगे के भी कार्यक्रम पूर्ण तत्परता पूर्वक चलने वाले हैं और आगे उनका विशेष विकास होने वाला है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-May
साधना से प्राप्त हुई अपनी शक्ति को संचित रखे। बुद्धिमान मनुष्य कभी भी उन शक्तियों को छोटे कामों में खर्च नहीं करते।
साधना-प्रणाली में भी अन्तर नहीं है, क्योंकि ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’।
साधनायै तु गायत्र्याः निश्छेलन हि चेतसा।
वरणीयः सदाचार्यः साधकेन सुभाजनः॥
साधना की सिद्धी के पश्चात् प्राप्त करता है।
साधना के पीछे आदि काल से लेकर अब तक के असंख्य मनस्वी साधकों का साधन बल शोभित है।
साधना आरम्भ करें।
साधना का प्रथम उपाय जिज्ञासा को बताया है जिज्ञासु होना विद्वान होने का पूर्व रूप है।
साधनायास्तु साधकः।
भगवत्यास्तु गायत्र्याः कृपाँ प्राप्नोत्य संशयम् ॥ 77॥
साधनाभिर्यो याति साधकताँ नरः।
स्वप्नावस्थासु जायन्ते तं दिव्या अनभूतयः ॥ 82॥
साधना करने से साधकत्व को प्राप्त हो जाता है उस व्यक्ति को स्वप्नावस्था में दिव्य अनुभव होते हैं।
साधना से साधक भगवती गायत्री की कृपा को प्राप्त कर लेता है।
साधनासिद्धयन्तरम् ॥ 83॥
साधना
साधना में किये गये श्रम के अनुपात से सिद्ध को प्राप्त करता है।
साधनावलम् ॥ 76॥
साधनायास्तु राजतेऽतितराँ सदा।
मनरवीसाधकानाँ हि बहूनाँ साधनावलम् ॥ 76॥
साधना के लिये साधक को चाहिये कि वह श्रद्धा भक्ति के साथ योग्य श्रेष्ठ आचार्य को गुरु वरण करें। गायत्री दीक्षा लेकर साधना आरम्भ करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1953-December
साधना को और कोई ऋषि न कर सका वह था “भगवद् भक्ति का प्रचार।” नारद जी अपनी मुक्ति आदि की चिन्ता में अन्य ऋषियों की भाँति जप तप नहीं करते थे। उन्हें अपनी नहीं भगवद् भक्ति के प्रचार की चिन्ता थी। एक क्षण मात्र का विश्राम लिए बिना वे निरन्तर इसी प्रचार तप से संलग्न रहते थे और यहाँ से वहाँ भगवान का गुणानुवाद करते हुए भी भ्रमण करते रहते थे।
साधनाओं को छोड़कर पैदल यात्रा करते हुए कुम्भ मेले में पहुँचते थे। सन्तों का आपसी विचार विनिमय होता था। लाखों की संख्या में जनता वहाँ पहुँचकर ज्ञान लाभ तथा तीर्थ यात्रा का पुण्य करती थी। आज उन मेलों का ढंग बिगड़ गया है तो भी मूल कारण और उद्देश्य वही है।
साधना का अवलम्ब ग्रहण करना पड़ता है।
साधना की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होती है।
साधना, (6) गायत्री उपासना कैसे करें, (7) गायत्री का अर्थ सन्देश (8) गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध। यह आठ पुस्तकें छापी गई हैं। पुस्तक साइज के 16 पृष्ठ तिरंगे चित्ताकर्षक मुखपृष्ठ इन सबके हैं। पाँच पैसा मूल्य लगभग लागत मात्र है। केवल दस आने का यह सैट साधारणतः गायत्री विद्या का आवश्यक ज्ञान, विधान, महत्व, लाभ, विज्ञान, रहस्य, अर्थ, प्रयोजन, तत्वज्ञान एवं साधन की बहुत कुछ जानकारी करा देता है।
साधना में संलग्न हैं।
साधना की प्रधान श्रद्धाँजलि “गायत्री प्रचार” है। इन गुलदस्ते को पाकर माता अन्य किसी की साधना की अपेक्षा अधिक प्रसन्न होती है।
साधना से अधिक उत्कृष्ट है। बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानन्द, रामतीर्थ, दयानन्द प्रभृति आत्माएं इसी प्रचार मार्ग में आपका जीवन लगा चुकी हैं। शुकदेव, व्याग्र, शौनिक आदि के जीवन भी इसी दिशा में लगे थे। हम लोग अब तक इस दिशा में तत्परतापूर्वक बढ़ते रहे हैं। अब इस सम्बन्ध में एक विशेष आयोजन आरम्भ किया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-December
साधना में सिद्ध होकर सैकड़ों और हजारों प्राणियों के बीच ज्ञान व शक्ति की ज्योति फैलाकर उनमें से अविद्या को दूर करेगा और उनका उद्धार करेगा। एक साधक की शक्ति के प्रभाव से सहस्रों जन भागवत धर्म में दीक्षित होंगे और सच्चिदानन्द के अगाध सागर में निमग्न होंगे।
साधना पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखें। अभ्यास को बिना नागा, नित्य प्रति ठीक समय पर करते जाना चाहिए। एक दिन के लिए भी छूटने पर अभ्यासी कुछ न कुछ अपने स्थान से (जहाँ तक चढ़ाई कर ले गया था) नीचे खिसक आता है और लगातार कुछ दिवस न करने पर तो कोरा रह जाता है।
साधना और आत्मोपलब्धि।
साधना ही है।
साधना
साधना पूर्ण व चरितार्थ नहीं हो सकती।
साधना, छल, प्रपंच, माया, दंभ, भय, अत्याचार, कपट और धूर्तता से दूसरों के अधिकारों को अपहरण कर स्वयं सम्पन्न बनना नास्तिकता का स्पष्ट प्रमाण है। जो पाप करने का दुस्साहस करता है वह आस्तिक नहीं हो सकता, भले ही वह आस्तिकता का कितना ही बड़ा प्रदर्शन क्यों न करता हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-October
साधना के समान है। उसे करते-करते मनुष्य अभीष्ट सिद्धि को ब्राह्मी स्थिति को, प्राप्त कर लेता है।
साधना है। योग का अर्थ है जोड़ना मिलना। मन को महामन में, प्राण को महाप्राण में, आत्मा को परमात्मा में व्यष्टि को समष्टि में, स्वार्थ को परमार्थ में मिलाना, जोड़ना यही योग की प्रक्रिया है। अपने सत् चित् आनन्द स्वरूप को पहचान कर जब आत्मा अपने वास्तविक स्थिति को समझ लेता है और आध्यात्मिक भूमिका में जागृत होता है तो उसके जीवन का दृष्टि कोण ही बदल जाता है। जो अपने आपको अविनाशी आत्मभाव में जाग पड़ता है उसे अपना शरीर एक वस्त्र के समान प्रतीत होता है।
साधना है? उत्तर में निवेदन यह हैं कि ईश्वर प्राप्ति के सभी साधन इसमें सम्मिलित है कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, शरणयोग, सत्संग, तप, संन्यास इत्यादि प्रधानता किसी भी साधन की हो सकती है शेष सब अंतर्गत रहेंगे उल्लेख प्रधान का ही किया जायेगा। स्मरण रहे उपरोक्त कोई भी साधन ध्यान योग के बिना सफल नहीं हो सकते अतएव उसको प्रधान मानने को हम विवश ही हैं।
साधना में इन साधनों का क्या स्वरूप रहता है? ईश्वर स्वरूप पति को मानते हुए उसके ही हित निस्वार्थ भाव से तन, मन और वाणी की प्रत्येक क्रिया ही यही कर्मयोग है। पति को ईश्वर भाव से ध्यान करते हुए एकमात्र उसी का आश्रय लिए रहना और किसी से भी किसी प्रकार की याचना का भाव मन में न रहने देना और यही मेरा सर्व प्रकार से कल्याण करने में समर्थ है यही शरण योग है। हर समय पति में ईश्वर का ध्यान करना उसमें अहं भाव को खो देना ही ज्ञान-योग है। अर्पित करके उनकी सेवा में मन वाणी तथा कर्म से संलग्न रहना ही भक्ति योग है।
साधना कर सकता है।
साधना का ध्यानयोग ही साधना है? उत्तर में निवेदन यह हैं कि ईश्वर प्राप्ति के सभी साधन इसमें सम्मिलित है कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, शरणयोग, सत्संग, तप, संन्यास इत्यादि प्रधानता किसी भी साधन की हो सकती है शेष सब अंतर्गत रहेंगे उल्लेख प्रधान का ही किया जायेगा। स्मरण रहे उपरोक्त कोई भी साधन ध्यान योग के बिना सफल नहीं हो सकते अतएव उसको प्रधान मानने को हम विवश ही हैं।
साधना कुछ कठिन नहीं है। हर स्थिति के हर मनुष्य के लिए सहज है। इसी तथ्य को ध्यान रखते हुए इसको ‘सहज योग’ कहा गया है। अस्वाभाविक, अनावश्यक, असत्य, अहितकर, अनुचित बातें हमेशा कठिन, दुष्कर और अतीव काम साध्य होती हैं किन्तु जो प्राकृतिक, स्वाभाविक, आवश्यक, सत्य एवं लाभदायक होती हैं वे सहज एवं सुलभ होती हैं। जीवन की अत्यंत आवश्यकताओं में सबसे अधिक हवा, फिर पानी, फिर अन्न, फिर वस्त्र आवश्यक हैं।
साधना का मूल मंत्र है नासिका की नोक पर त्राटक करना। एकान्त स्थान पर नीरव समय में किसी भी एक आसन से सीधे बैठकर, गर्दन को तनिक आगे की ओर झुकाकर अपलक नेत्रों से तब तक नासिका के नेत्र को एकाग्र होकर देखते रहना चाहिये, जब तक नेत्रों से अश्रु न गिरने लगें। साधन का स्थान और समय निश्चित होना चाहिए। उसे बदलना नहीं चाहिए। नासिका पर दृष्टि स्थिर करके बराबर यह भावना करते रहना चाहिये कि अब गंध आ रही है।
साधना के प्रारम्भिक काल में भी साधिका अनुभव करती है कि प्रभु पति की आँखों से मायालु भाव से उसको देख रहा है। उसके वरद हस्त उसकी रक्षा तथा कामना पूर्ति को सदैव प्रस्तुत हैं। उसको अनुराग भरी वाणी उसकी आत्म-विभोर बना डालने में सहज समर्थ है, ये भावनायें उसके प्रेमोन्माद को बढ़ाकर प्रभुमयी बना देती हैं और वह मुनि दुर्लभ सिद्धि को अनायास प्राप्त कर लेती है।
साधना में जो भी विघ्न स्वरूप कष्ट मनोवेदनाएं आयें उनको वीरतापूर्वक सहन करना हताश होकर प्रयत्न न छोड़ना ही तप है। सब तरफ ये आसक्ति हटा कर पति रूपी परमात्मा में ही तद्गत रहना संन्यास है। सतियों के चरित्रों का अनुशीलन तथा यदि संभव हो तो उनके दर्शन तथा उनके उपदेशों का श्रवण तथा मनन ही सत्संग है।
साधना में यह सुगमता भी है कि ईश्वर का वैसे ध्यान करने में कल्पना कठिन हो जाती है और मूर्ति में ध्यान करने में प्रारम्भिक काल में साधक को अपना प्रेम एकाँगी सा प्रतीत होता है। दूसरी ओर से उसे प्रोत्साहन दान की अनुभूति नहीं हो पाती है पर इस पतिव्रत साधना के प्रारम्भिक काल में भी साधिका अनुभव करती है कि प्रभु पति की आँखों से मायालु भाव से उसको देख रहा है। उसके वरद हस्त उसकी रक्षा तथा कामना पूर्ति को सदैव प्रस्तुत हैं। उसको अनुराग भरी वाणी उसकी आत्म-विभोर बना डालने में सहज समर्थ है, ये भावनायें उसके प्रेमोन्माद को बढ़ाकर प्रभुमयी बना देती हैं और वह मुनि दुर्लभ सिद्धि को अनायास प्राप्त कर लेती है।
साधना कुछ कठिन अवश्य हो जाती है पर निराशा का अन्धकार अभेद्य नहीं होने पाता, क्योंकि उसके पास इस विश्वास का मणि दीप रहता है कि यदि उसका प्रेम सच्चा एवं अनन्य है तो एक दिन अवश्य ही इन सभी विघ्नों पर उसको विजय प्राप्त होगी तथा भगवान उसको अभिन्नात का वर देंगे। और जीवनपथ पर वह एक त्यागवीर की भाँति सानन्द आत्मोत्सर्ग करती हुई चलती है और निस्सन्देह विजयिनी बनती है।
साधना विधि यह है कि अपने आप में जागरुक रहने का हर घड़ी प्रयत्न करना चाहिए। “मैं अविनाशी आत्मा हूँ। शरीर मेरा वस्त्र मात्र है, मैं जो कुछ करूंगा वह आत्मा के हित की दृष्टि से करूंगा” इस भावना मंत्र को सदा मन में दुहराते रहना चाहिये और बार-बार तीक्ष्ण दृष्टि से यह निरीक्षण करते रहना चाहिये कि हमारे विचार और कार्य नियत भावना के अनुकूल हैं या नहीं। यदि उसमें त्रुटि या प्रतिकूलता प्रतीत हो तो सावधान होकर तुरन्त उसे सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार नियमपूर्वक निरन्तर आत्म निरीक्षण करते रहने और सद्भाव, सद्गुण, सहकार्यों को अधिकाधिक मात्रा में धारण करते रहने से धीरे-धीरे कुछ ही समय में यह वृत्ति स्थायी होकर आदत में सम्मिलित हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-June
साधना के लिए क्या कार्य करना चाहिए? किस प्रकार यह सब सम्भव है? इस प्रश्न का उत्तर गायत्री के अंतिम चरण में दिया हुआ है-”धियो यो नः प्रचोदयात्” इस पद में बुद्धि को प्रेरणा देने की बात कही गई है। कल्पना की तरंगों में अनेक व्यक्ति आकाश में उड़ते फिरा करते हैं। वाचालता की तरह यह काल्पनिकता भी दिल बहलाने की वस्तु है।
साधना में आप तब सफल हो सकेंगे, तभी वह बलवती हो सकेगी जब आप मन में भी किसी के प्रति कुभावनाओं को न ठहरने दें क्योंकि वाणी और क्रियायें हृदय निवासिनी भावनाओं का दर्पण मात्र हैं और इसके विपरीत आचरण विडम्बना मात्र सिद्ध होगा। निन्दनीय कार्यों के कर्त्ता की परिस्थिति, संग और आस-पास के वातावरण पर आप जब निष्पक्ष भाव से उत्तेजना रहित होकर विचारेंगे, तब सहानुभूति की पावन गंगा आपके हृदय से उस अभागे के लिए वह निकलेगी जो कि अपनी मानसिक दुर्बलताओं के कारण अपना भयंकर अहित कर रहा है। दूसरों का सम्मान करने की भावना को जितना ही अधिक आप अपनाते जायेंगे उतना ही अधिक आप अपने स्नेही जनों और प्रशंसकों की वृद्धि होते देखेंगे।
साधना है। अपनी आध्यात्मिक स्थिति को ऊंचा करने, सात्विक सद्गुणों को धारण करने का प्रयास जब सद्बुद्धि द्वारा आरम्भ होता है तो स्वल्पकाल में ही आत्मा-परमात्मा के निकट पहुँच जाता है और लौकिक सर्वपारलौकिक अनेक सिद्धियाँ उसके करतल हो जाती हैं। इस जीवन में ही वह स्वर्ग और मोक्ष के आनन्द का रसास्वादन करने लगता है, गायत्री माता की उपासना के वरदान से उसके लिए कोई भी आवश्यकता अपूर्ण नहीं रह जाती।
साधना पूर्णता को तब प्राप्त होंगी जब पीठ पीछे भी आप निन्दा न करें।
साधना को नष्ट न कर पाये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-September
साधना विधि को, कोई साधक को, कोई भाग्य को और कोई किसी को दोष देते हैं। जिन्हें सुगमतापूर्वक अधिक समृद्धि मिल गई वे अतिशय विश्वासी हो जाते हैं और जिन्हें कठिन प्रयत्न करने पर भी निराश रहना पड़ा वे अविश्वासी हो जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-April
साधना’ शीर्षक पुस्तक छपा दी गई है।
साधना किसी में मौजूद है तो उसके लिए उपरोक्त स्थिति को प्राप्त करना एक हँसी खेल के समान है।
साधना से दुर्जन, सज्जन सबको वशीभूत किया जा सकता है। यहाँ तक कि भवभय-भंजन भगवान् भी प्रेम के आधीन हैं। जिस हृदय मन्दिर में प्रेम-गंगा नहीं लहराती-उसे मरघट और मसान तुल्य ही समझना चाहिये। प्रेम इस सृष्टि का सारभूत पदार्थ है। इसे अभ्यास पूर्वक सम्पादन कर लेना ही जीवन की सीमा है।
साधना को पूर्ण कर सकते हैं। प्रेम इष्ट वियोग और अनिष्ट योग में परीक्षा की कसौटी पर चढ़ता है किन्तु सच्चे साधक इन दुर्निवार अवस्थाओं में प्रेम से विचलित नहीं होते। प्रेम का तत्व यही है कि प्राणी मात्र को प्रेम की दृष्टि से देखा जाय। यह समग्र संसार जगत कर्त्ता के सौंदर्य प्रेम का ही प्रतीक है। प्रेम के साधक के लिये कहा है कि प्रेममय शब्दों के अतिरिक्त और कुछ न कहो।
साधना है, प्रेम अखण्ड ध्यान है, अखण्ड-ज्योति है, अनन्त मूर्ति है आनन्द का लहराता हुआ समुद्र है, प्रेम सिद्ध मन्त्र है, सिद्ध तन्त्र है, प्रेम की भावना सिद्धि दाता है।
साधना है वहाँ पावन प्रेम की गुजर नहीं हो सकती। इसके सम्पादन से मनुष्य अलौकिक कार्यों का सम्पादन कर सकता है? इसीलिए यह आत्मा की और जीवन की सर्वोच्च शक्ति है।
साधना अपरिहार्य है। योग या भोग ये सब प्रेम बिना नहीं हो सकते। सर्व प्रकार सुखों की उपलब्धि व सफलता के लिये प्रेम की खोज व प्रेमोपासना आवश्यक है। प्रेम रस में वह अपूर्व प्रभाव है कि उससे समस्त मल विदूरित हो जाते हैं। जीवन का लोभ, धन का मोह आदि सब नष्ट हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-February
साधना में लगे रहे और उसका आनन्द निरन्तर चखते रहें। अमुक सीमा तक-अमुक सिद्ध तक-पहुँच जाने पर भी ठहरना न चाहिए वरन् निरन्तर आगे ही बढ़ते रहना चाहिए।
साधना। आज हवा में उड़ने वाले जहाजों का और तेज ले जाने वाले मोटरों का क्या महत्व है? कुछ नहीं, इसी प्रकार अन्य इच्छाएं जो आज लालायित किये हुए हैं पूर्ण हो जाने पर नीरस प्रतीत होगी। आनन्द साधना में है। विज्ञ पुरुषों ने सिद्धि पथ पर चलने के लिए हमें इसीलिए प्रेरित किया है कि निरंतर साधना में लगे रहे और उसका आनन्द निरन्तर चखते रहें।
साधना का मार्ग ऐसा आनंदमय है कि उसे प्रत्यक्ष सिद्धि ही कहा जा सकता है।
साधना करने वाले वैश्य है। जिन के पास इन तीनों बलों में से एक भी नहीं है, जो पराधीन रहकर टहल चाकरी करते हैं, वे शूद्र हैं। शूद्रों को हीन समझा जाता है क्योंकि वे शक्ति संचय की ओर ध्यान नहीं देते और निर्बल अवस्था में पड़ा रहना स्वीकार करते हैं किन्तु वे लोग असुर, दैत्य हैं जो इन तीनों शक्तियों के स्वामी होते हुए भी उनका दुरुपयोग करते हैं।
साधना में है। विज्ञ पुरुषों ने सिद्धि पथ पर चलने के लिए हमें इसीलिए प्रेरित किया है कि निरंतर साधना में लगे रहे और उसका आनन्द निरन्तर चखते रहें। अमुक सीमा तक-अमुक सिद्ध तक-पहुँच जाने पर भी ठहरना न चाहिए वरन् निरन्तर आगे ही बढ़ते रहना चाहिए।
साधना स्वयं एक सिद्धि है। काम करने में, संघर्ष रत होने में, आगे बढ़ाने की तैयारी में, पुरुषार्थ में खुद एक आनंद है और वह आनन्द सफलता के उपभोग से अधिक है, कुछ खोदते हुए मनुष्य का अन्तःकरण जितना आशा, उत्साह, उल्लास और भविष्य की कल्पना में आनंद विभोर रहता है। कुआँ खुद जाने पर, उसका पानी प्रयोग में लाने पर उतना नहीं रहता। विवाह से पूर्व कितनी खुशी होती है परन्तु बीबी घर में आ जाने पर, बाल बच्चे हो जाने पर तो एक झमेला खड़ा हो जाता है। सफलता स्वयं अपनी आनन्द दायक नहीं है जितनी उसकी साधना।
साधना में प्रवृत्त रहे। साधना स्वयं एक सिद्धि है। काम करने में, संघर्ष रत होने में, आगे बढ़ाने की तैयारी में, पुरुषार्थ में खुद एक आनंद है और वह आनन्द सफलता के उपभोग से अधिक है, कुछ खोदते हुए मनुष्य का अन्तःकरण जितना आशा, उत्साह, उल्लास और भविष्य की कल्पना में आनंद विभोर रहता है। कुआँ खुद जाने पर, उसका पानी प्रयोग में लाने पर उतना नहीं रहता। विवाह से पूर्व कितनी खुशी होती है परन्तु बीबी घर में आ जाने पर, बाल बच्चे हो जाने पर तो एक झमेला खड़ा हो जाता है।
साधना का एकमात्र क्षेत्र है ‘आत्मोन्नति’। आप अपनी उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हूजिए, अपने को अधिक से अधिक उन्नतिशील बनाने में जुटे रहिये। आत्मोन्नति ही सिद्धि है, यही विश्व की सेवा और परमार्थ है। अपने आप को उन्नतिशील बनाकर एक ऐसा नमूना संसार के सामने पेश किया जा सकता है कि जिसके नकल करने के प्रयत्न मात्र में दूसरों का भला हो। जो महापुरुष इस संसार से चले गये हैं वे भी संसार की बहुत भारी सेवा अब तक कर रहे हैं, उनके चरित्र से असंख्य मनुष्यों को बल मिलता है और पथ प्रदर्शन होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-January
साधना से सिद्धि मिलती है। जो लोग एकाग्रता पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हैं वे ही विजयीश्री को प्राप्त करते हैं।
साधना के फलस्वरूप आपको कल्पवृक्ष जैसी प्रतिभा मिलेगी और उसके द्वारा आपकी सब प्रकार की इच्छा आकाँक्षाएं आसानी से पूरी हो जाया करेंगी।
साधना है उसे उसी मात्रा में ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इनका दुरुपयोग करना बुरा है। सदुपयोग करने से आत्मिक बल वृद्धि होती है। जहाँ इन से बचने के लिए कहा गया है वहाँ उसका तात्पर्य इनका दुरुपयोग न करने से है अथवा कौतूहल पूर्ण बाजीगरी के निरर्थक खेलों में रुचि न लेने से है। योगी को स्वभावतः ऋद्धि सिद्धियाँ मिलती हैं यह प्राकृतिक क्रम है।
साधना के अनुसार न्यूनाधिक मात्रा में प्राप्त करते हैं, जिस सुख की तलाश में बहिर्मुखी व्यक्ति घोर प्रयत्न करते हुए मारे-मारे फिरते हैं फिर भी निराश रहते हैं उससे कई गुना सुख आध्यात्म साधक अनायास ही पा जाते हैं। अष्ट सिद्धि के प्रभाव से उनका जीवन हर घड़ी आनन्द से परिपूर्ण रहता है, दुःखी की छाया भी पास में नहीं फटकने पाती। ऋद्धियाँ व सिद्धियाँ दूसरों के ऊपर प्रभाव करने के लिए हैं। पहलवान शारीरिक बल को बढ़ाकर स्वाधीन जन्य सुख भोगता है, साथ ही उस बल के प्रभाव से दूसरों को हानि लाभ पहुँचाता है, इसी प्रकार आत्मिक पहलवानों की ऋद्धियाँ सिद्धियाँ हैं। सिद्धियों के बल से अपने आप को उन्नत, पवित्र, शाँत, निर्भय एवं आनन्दित बनाता है और ऋद्धियों के बल से दूसरों को हानि लाभ पहुँचाता है।
साधना, तपस्या, आयु, योग्यता का कुछ अंश दूसरों को दान कर सकता है तथा किसी के पाप और कष्टों को स्वयं भुगतने के लिए आत्म बल से अपने ऊपर ले सकता है। यह सातवीं ऋद्धि है। 8- आत्म शक्ति से युक्त अपनी विचारधाराओं को अदृश्य रूप से ऐसे प्रचण्ड प्रभाव के साथ बहा सकता है कि असंख्य जनता को उन विचारों के सामने झुकना पड़े। आपने देखा होगा कि बक्की उपदेशक इधर-उधर कतरनी सी जीभ चलाते फिरते हैं पर उनका कुछ भी प्रभाव नहीं होता, किन्तु सच्चे महापुरुष थोड़ा कहते हैं तो भी उनके प्रचंड विचार बड़े-बड़े कठोर हृदयों में पार हो जाते हैं उनका ऐसा तीव्र प्रभाव होता है कि उपेक्षा करना कठिन हो जाता है, आत्म शक्ति युक्त महापुरुष अपने मनोबल से जनता से विचार पलट सकते हैं, युगान्तर उपस्थित कर सकते हैं। यह आठवीं ऋद्धि है।
साधना की पहली मंजिल पार कर ली है।
साधना में सफलता प्राप्त हो रही है। वे चिह्न यह हैं- (1) चेहरे की स्निग्धता बढ़ने लगती है, चमक आ जाती है (2) शरीर में एक विशेष प्रकार की सोंधी-सोंधी सुगंध आने लगती है (3) किसी वस्तु पर थोड़ी देर दृष्टि जमाई जाय तो उस वस्तु के आस-पास चिनगारियाँ सी उड़ती दिखाई पड़ती है। (4) किसी आदमी को स्पर्श करें तो उसे कुछ फुरहरी रोमाँच या झटका सा मालूम देता है। (5) शरीर में हल्कापन और चित्त में भारीपन प्रतीत होता है। (6) पवित्रता, परोपकार और सात्विकता के विचारों की और रुचि बढ़ती है।
साधना में प्रवृत्त होता है तो वह ऐसा करने के लिए यों ही उद्यत नहीं हो जाता। ज्यादा कीमती चीज के लिए कम कीमती चीज का त्याग किया जाता है। साधना का कष्ट इसलिए सहन करते हैं कि जिन सुखों का त्याग किया गया है, उससे अधिक मूल्यवान सुख प्राप्त हों। यदि ऐसा न होता तो कोई भी व्यक्ति साधना का कष्ट सहने को तैयार न होता।
साधना का कष्ट इसलिए सहन करते हैं कि जिन सुखों का त्याग किया गया है, उससे अधिक मूल्यवान सुख प्राप्त हों। यदि ऐसा न होता तो कोई भी व्यक्ति साधना का कष्ट सहने को तैयार न होता।
साधना से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। अष्ट सिद्धि और नव निधि प्रसिद्धि हैं। विभिन्न योगों द्वारा विभिन्न शक्तियों का मिलना प्रकट ही है। इन्द्रियों के आकर्षक भोगों को, सुख सुविधा को, ऐश आराम को छोड़कर कोई व्यक्ति कष्टदायक, कठोर, नीरस, श्रम साध्य साधना में प्रवृत्त होता है तो वह ऐसा करने के लिए यों ही उद्यत नहीं हो जाता। ज्यादा कीमती चीज के लिए कम कीमती चीज का त्याग किया जाता है।
साधना करते रहो।
साधना
साधनाओं द्वारा हमारे पूजनीय ऋषियों ने उस अमृत की खोज की है, ढूँढ़ा है और ढूँढ़कर हमारे सामने उपस्थित कर दिया है। इसे सब कोई सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकता है और यह प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है कि मैं अमर हूँ। अमर होने पर जो संतोष, शाँति, प्रसन्नता और साहस प्राप्त होने को था वह सब का सब इस ऋषि कल्प-अमृत द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसका दूसरा नाम है- ‘ब्रह्म ज्ञान’।
साधना का कष्ट सहने को तैयार न होता।
साधना पर संतोष कर सकता है।
साधना को जारी रखा जाय तो धीरे-धीरे साधक का ब्रह्मतेज बढ़ता जाता है। यह ब्रह्मतेज आत्मिक उन्नति का मूल है, स्वर्ग मुक्ति और आत्म शान्ति का पथ निर्माण करता है, इसके अतिरिक्त लौकिक कार्यों की कठिनाइयों का भी समाधान करता है, विपत्ति निवारण और अभीष्ट प्राप्ति में इस ब्रह्मतेज द्वारा असाधारण सहायता मिलती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-March
साधना करने वाले ब्रह्मचारी के लिए इस पृथ्वी पर भला किस कार्य में सफलता नहीं मिलती? ब्रह्मचर्य के प्रताप से मनुष्य मेरे (ईश्वर के) तुल्य हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-August
साधना के समय हल्का सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य अपनाना चाहिए और मानसिक उत्तेजनाओं से बचना आवश्यक है। आहार-विहार सर्वथा सात्विक रखने से ही सफलता प्राप्त होती है।
साधना करने वाला सदाचारी साधक शीघ्र ही इस मार्ग से अपने मूल लक्ष्य को प्राप्त करता है।
साधना
साधना ही चलती है। इस प्रकार का शब्द साधन कोई नवीन साधन नहीं है। इस साधन से ऋषिगण भली प्रकार अवगत थे। उपनिषदों में इस साधन का विस्तृत वर्णन है। योग के ग्रन्थों में भी विस्तृत विवेचन है।
साधना यहीं समेट लगाओ॥
सुलझा दो, उलझी गुत्थी जो हुई विषम विपरीत।
साधनाओं का उद्देश्य है।
साधना के साधक धन्य हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1945-November
साधना में सफल होना कठिन है। इस निराशाजनक स्थिति में खिन्न होकर वह अपने प्रयत्नों को छोड़ बैठता है।
साधना समर में विजय प्राप्त करने की स्थिति को देख-कर आयोजन करता रहता है और अन्त में अभीष्ट सफलता प्राप्त कर लेता है।
साधना होती है।
साधना करते हैं। स्वार्थ सम्पादन सभी को अभीष्ट है। आत्मभाव में स्थित जीवन अपने को आत्मा समझता हुआ आत्म कल्याण के लिए सात्विक विचार कार्यों द्वारा अभीष्ट सिद्ध होते देखकर शुभ कर्मों में तत्पर हो जाता है। शरीर सुख की परवाह न करते हुए, आत्मसुख को प्रधानता देता हुआ, त्याग, तप, दान, परमार्थ, संयम, स्वाध्याय, दया, प्रेम, विनय, उदारता, सेवा, पवित्रता आदि से परिपूर्ण कार्य प्रणाली को अपनाता है और देवता कहलाता है। इसके विपरीत जो जीव अपने को शरीर समझता है वह इन्द्रिय सुख, मनोरंजन और शारीरिक लालसाओं का सुख भोगने की इच्छा से भौतिक संपदाएं एकत्रित करने का उद्योग करता है।
साधना। सभी को अपने सुख की अपने कल्याण की, अपनी उन्नति की अभिलाषा है। तीनों के कार्य एक ही प्रेरणा से प्रेरित होकर हो रहे हैं। भेद केवल आत्म स्थिति और शरीर स्थिति है। जो आत्मभाव में स्थिति है उसका स्वार्थ- ‘परमार्थ’ कह कर प्रशंसित किया जाता है।
साधना की विधि व्यवस्थायें शिथिल पड़ जाती हैं और साधक पथ भ्रष्ट हो जाता है। लोभ के अतिरिक्त क्रोध से भी ऐसे ही तूफान खड़े होते हैं। साधक सोचता है सब से विनम्र व्यवहार करेंगे, पर कभी कोई व्यक्ति बहुत ही दुष्टतापूर्ण अकारण करके क्रोध का आवेश जगा देता है, उस आवेश में लड़ पड़ने या शठ के प्रति शठता करने को उतारू हो जाना पड़ता है। इन लोभ या क्रोध के आवेशों में उतर जाने के पश्चात् साधक सोचता है मुझसे भूल हुई। वह दुखी होता है, अपनी निर्बलता का अनुभव करता है और सोचता है कि मेरे जैसे दुर्बल मन वाले का इस साधना में सफल होना कठिन है।
साधना को जारी रखना चाहिए। दृढ़ निश्चयी देर या सवेर में एक दिन अभीष्ट स्थान पर पहुँच ही जाता है।
साधना आरम्भ करते ही नहीं हो सकता। जन्म जन्मान्तरों की बीमारी को एक दिन में दूर नहीं किया जा सकता है। वह क्रमशः और धीरे-धीरे ठीक होती है। साइकिल की सवारी करने वाले जानते हैं कि चढ़ना सीखते समय कई बार उन्हें पटक खानी पड़ती है। तैरने वाले जानते हैं कि पानी में पैर देते ही वे नहीं सीखने लगे थे, वरन् अनेक गोते खाने के उपरान्त वे तैराक बने हैं, पढ़ने वाले जानते हैं कि हर दिन उन्हें भूल के कारण अध्यापक की लताड़ सहनी पड़ती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-July
साधना सेवा के क्षेत्र में हो- यह वानप्रस्थ संस्कार उद्देश्य है। अन्त्येष्टि द्वारा जीवन की नश्वरता और उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की शिक्षा लोगों को हृदयंगम करायी जाती है। श्राद्ध के अंतर्गत - मृतक द्वारा छोड़ी सम्पदा का परमार्थ प्रयोजनों में सदुपयोग कर मृतात्मा को सद्गति प्रदान करने का महत्वपूर्ण निर्देश है।
साधनाओं का अभ्यास करें। कारण शक्ति का केन्द्र अंतर्मन है। वहीं समूचे व्यक्तित्व का संचालन करता है। उसकी उत्कृष्टता-निकृष्टता के अनुरूप ही स्वप्न आते है। स्वप्न विज्ञान के आधार न केवल शारीरिक दुर्बलता एवं रुग्णता को समझा और हटाया जा सकता है, वरन् चेतना की परतों के संबन्ध में भी उनसे महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
साधना और आराधना का खाद पानी चाहता है। तीसरा कार्य यही है कि वातावरण परिशोधन के लिए, उसमें अध्यात्म तत्वों का अभिवर्धन करने के लिए साधना को अनिवार्य कर्तव्य मानें। स्वयं करे और अपने प्रभाव क्षेत्र में अन्यान्यों को उसके लिए प्रोत्साहित करे। एक माला गायत्री जप का भी यदि नियमित क्रम चल पड़े तो अपने चौबीस लाख सदस्य हर दिन चौबीस करोड़ जप का दैनिक अनुष्ठान करते रह सकते है। इससे वातावरण में देव-तत्वों की समर्थता बढ़ेगी और नवयुग के अनुरूप वातावरण बनेगा।
साधना ही विचारशील लोगों के अन्तराल में शालीनता प्रदर्शित करने वालों के प्रति श्रद्धा उमगाती है और साथ ही सम्मान भरे सहयोग के वर्षा करती है। उसमें स्थायित्व भी होता है। आदर्शवादियों के चरित्र एवं व्यवहार का अनुकरण- अभिनंदन किया जाता है। भाव संवेदना की आत्मीयता, ममता, मित्रता की जड़ें मजबूत करती है। जिनका अन्तःकरण ऊसर बंजर की तरह भावनात्मक उर्वरता से रहित है, उस पर न तो सहयोग सम्मान के मेघ बरस सकते है और सेवा, उदारता के उपवन उगते, सुरभित फूल खिलते है।
साधना रत होकर परिमार्जित हुई। और धर्म प्रचार के परमार्थ हेतु देश-विदेश में आजीवन प्रयत्न करती रही। नर्तकी अम्बपाली परम साध्वी कहलाई।
साधना द्वारा योगी अपने को तल्लीन करते हैं। इस प्रकार एकाग्र की हुई मनः शक्ति को विद्याध्ययन से लेकर किसी भी उच्चस्तरीय प्रयोजन में लगाकर चमत्कारिक सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं। ईश्वर प्राप्ति का उपयुक्त साधन बताते हुए ऋग्वेद में आगे (9/85/3) में कहा गया है कि -” अनेक मनीषीगण परमात्मा की ओर संगीतमय स्वर लगाते हैं और उसी के द्वारा उसे प्राप्त करते हैं “। कार्लाइल भी कहा करते थे - “ संगीत के पीछे-पीछे खुदा चलता है।”
साधना में प्रायः’ बिस्तर से उठते ही नये जन्म की और सोते समय मरण की उपमा निद्रा के साथ देने की विधा समझाई जाती है। पर वह भी थोड़े दिन में एक ढर्रा बन जाती हैं। चिन्तन होता रहता है पर अन्तराल की गहराई तक वह प्रकाश नहीं पहुँचता।
साधना के अध्यात्म उपचार इसी उद्देश्य से अपनाये जाते है। जिन्हें अध्यात्म क्षेत्र में आगे कदम रखना हो उन्हें यह प्राथमिक पाठ पहले ही समझ लेना चाहिए।
साधना द्वारा ही संभव है।
साधना है। साधकों को सिद्धों की और सिद्धों को साधकों की आवश्यकता पड़ती हैं दोनों एक दूसरे को खोजते हैं। संयोग मिल जाने पर अंधे पंगों का संयोग बना कर अपूर्णता को पूर्णता में बदलते हैं।
साधनात्मक अनुशासन से प्राप्त ऋतम्भरा प्रज्ञा की सर्च लाइट को जलाना होगा। तभी उस सही मार्ग का निर्धारण होगा जिस पर चलकर परम सत्य का बोध सम्भव है।
साधना सही थी। दूसरे दिन रात को रत्न बरसे, डाकुओं ने उन्हें बटोरा और निहाल हो गये। शर्त के अनुसार उसे छुटकारा भी दे दिया। लूटे गये वस्त्र आभूषण भी लौटा दिये।
साधना विज्ञान द्वारा मिलता है, जिसमें इसके लिए विभिन्न प्रकार की साधनाओं का निर्धारण है।
साधना का समाचार सुनकर उन से रहा नहीं गया। वे गदगद हो उठे। राम ने मातंग मुनि आश्रम जाने और दर्शन करने का निश्चय किया। तलाश करते हुए वे उसकी कुटी तक पहुँच ही गये। माता शबरी भी कभी भगवान के दर्शन का सुयोग मिले, इसकी कामना किया करत थी।
साधना-उपासना करता है, काया से निस्सृत प्राण विद्युत का अदृश्य कंपन वहाँ स्थित जड़ पदार्थों के परमाणुओं में तीव्र प्रकंपन पैदा कर देता है। मनुष्य शरीर से निकली विद्युत तरंगें आस-पास के वातावरण में छा जाती हैं और जड़ चेतन दोनों को प्रभावित आकर्षित करती हैं।
साधनाओं का निर्धारण है।
साधना की और अपने गुरु से वह विद्या सीख ली कि नियत नक्षत्र आने पर आकाश से रत्न वर्षा कराई जा सके और विपुल धन सहज ही पाया जा सके। सफलता मिलने के बाद वह ठाट-बाट से रहने लगे।
साधना-बिंदु समर्पित हो।ज्योति का पुँज प्रकाशित है, साध के दीप प्रज्वलित हो॥
साधना को भी जारी रखता।
साधना अपनायी जाती है। इस माध्यम से स्पर्श शक्ति विकसित कर लेने से दुःख-दर्दों से राहत पाने के लिए किसी बाह्य माध्यम की आवश्यकता नहीं रह जाती।
साधना को अनिवार्य कर्तव्य मानें। स्वयं करे और अपने प्रभाव क्षेत्र में अन्यान्यों को उसके लिए प्रोत्साहित करे। एक माला गायत्री जप का भी यदि नियमित क्रम चल पड़े तो अपने चौबीस लाख सदस्य हर दिन चौबीस करोड़ जप का दैनिक अनुष्ठान करते रह सकते है। इससे वातावरण में देव-तत्वों की समर्थता बढ़ेगी और नवयुग के अनुरूप वातावरण बनेगा।
साधना में जीवन शोधन के प्रयोग से आगे बढ़कर जिस अभ्यास को आरंभ करना पड़ता है। उसका नाम है “शरीराध्या से निवृत्ति।” चेतना शरीर में रहती है यह भी ठीक है। उसका उपयोग वाहन या उपकरण के रूप में होता चला आता है यह भी ठीक है। सभी जानते है कि चेतना की इच्छा आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए शरीर को ही विविध क्रिया कलाप करने पड़ते है।
साधना करनी चाहिए और धर्म प्रचार में लग कर अनेकों को कल्याणकारक मार्ग दर्शन कराना चाहिए। बात समझदारी की थी सो अम्बपाली ने अपना ली और भिक्षु समुदाय में सम्मिलित हो गई।
साधना देखकर धन्य हो गये। अगले दिन प्रातः अनुग्रह सहित उसे मातंग मुनि के पास लाये व उन्हीं के सक्षम प्रार्थना की कि माता अब आश्रम में ही रहा करें। वहीं का कुछ कामकर निर्वाह वहीं से प्राप्त कर लिया करें। लकड़ी काटने बेचने में तो सभी नष्ट होता है।
साधना में लगी रहेगी।
साधना सत्र चलते रहते है- तारीख 1 से 19। 11 से 19। 21 से 29 तक। इनमें से जिनमें भी सुविधा हो, सम्मिलित होने तथा मिशन से परिचित प्रभावित उत्साही नर नारियों को सम्मिलित होने के लिए भेजते रहे।
साधना के प्रति संतोष था वहाँ आकाश-पाताल वाली महत्वाकाँक्षाओं पर संयम भी। वासना तृष्णा का मदोन्मत्त हाथी संयम अपनाये बिना और किसी प्रकार काबू में नहीं आता। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम अपनाते ही मनुष्य इतना सशक्त हो जाता था कि अपव्यय के रुकते ही वैभव का पर्वत सामने खड़ा हो सके।
साधना करना है। सो उस बुढ़िया ने भली प्रकार पूरा कर लिया। किसी नदी या स्थान या देव प्रतिमा का दर्शन करना मात्र ही तीर्थ यात्रा नहीं है।
साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है।
साधनाओं से भी कठिनाई से मिलती है, वह स्वर योग के साधक को अनायास ही मिल जाती है।
साधना को सफल न होने देगा। इसलिए पूर्व अनाचारों का प्रायश्चित भी आवश्यक है। प्रायश्चित का एक ही उपाय है कि जो गड्ढा खोदा गया है उसे भरा जाय। अनाचार का समापन पुण्य परमार्थ द्वारा किया जाय।
साधना की और उसमें अभूतपूर्व सिद्धियाँ पायीं। उन्होंने स्वर मधुर न होने पर भी यह प्रमाणितकर दिखाया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से होता है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जाग्रत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है। इस संदर्भ में डाँ. लीक का कथन है कि यदि संगीत को एक दैनिक शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया जा सके तो मनुष्य जाति का बहुत हित साधन हो सकता है।
साधना सम्पन्न होती रही है। किसी से सत्य कहलवाने के लिए गंगा की शपथ दिलाई जाती है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि गंगा का भारत भूमि में कितना महत्व है। घरों में गंगा जली सुरक्षित रखी जाती है। उसकी पूजा आरती होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-May
साधना से शरीर-क्रिया-विज्ञान पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की खोज का कार्य विभिन्न देशों क मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने किया है। भारत संहिता अमेरिका, इंग्लैण्ड, पश्चिम जर्मनी के विभिन्न संस्थानों में इस प्रकार के अनुसंधान कार्य चल रहे है। तंत्रिका विशेषज्ञों का कहना है कि मननशील एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताएं विकसित हो जाती है। फलतः मनुष्य का संबंध सृजनात्मक बौद्धिकता से जुड़ता और उसी परिणति को प्राप्त होने लगता है।
साधनारत सिद्ध पुरुषों को उसमें घुटन अनुभव होती हैं फलतः वे उन स्थानों को छोड़कर सघन वनों में ऊंचे पर्वतों में इसलिए चले जाते हैं कि उन्हें मानव संकुल से उत्पन्न असुविधा का सामना न करना पड़ें अब यदि उनकी उपस्थिति का पता चल सकें तो खोजी को ऐसे क्षेत्रों में पहुँचना पड़ेगा जो सर्व सुलभ नहीं है। इस कारण अब वह दूरी बहुत बढ़ गई है। जिसको कभी सरलतापूर्वक पार किया जा सकता था ओर सिद्ध पुरुषों से संपर्क साधा जा सकता था। खोजी वर्ग के लोग भी अपनी जीवट और तितीक्षा की दृष्टि से बहुत दुर्बल रहने लगे है। भौतिक लाभ के लिए सिद्ध पुरुषों का संपर्क कुछ विशेष लाभदायक नहीं होता।
साधना विज्ञान के प्राचीन ग्रंथों में समूचे मेरुदण्ड को ही सुषुम्ना कहा गया है। उसके पोले भाग में विशेष क्षमताएं रहने के संबंध में तो जानकारी थी पर वह समूचा संस्थान अति संवेदनशीलता है और भीतरी तथा बाहरी परतों में अन्योन्याश्रय संबंध है। इसलिए पृथक् वर्गीकरण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई है। पूर मेरुदण्ड को ही सुषुम्ना संस्थान माना गया। विद्युत या प्राण संचार का प्रवाह खोल भी उस भीतरी भाग में ही चलता है पर बाहरी खोल भी उस संदर्भ में कम संवेदनशील, कम सहायक या कम प्रभावित नहीं है।
साधना हेतु उपयुक्त स्थान चुनना पड़ता है।
साधना से सिद्धि का मर्म है। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के शार्टकटों की कोई गुँजाइश न अब है, न कभी रहेगी। जो भी व्यक्ति महापुरुषों-सिद्धपुरुषों- महात्माओं की ढूंढ़ खोज मात्र सिद्धि प्राप्ति हेतु करते हैं, उनके सही मार्गदर्शन यही है कि वे सर्व प्रथम इस प्रक्रिया का ककहरा पढें आत्म-शोधन की प्रक्रिया समझें, उसे अपनायें। इतना बन पड़ने पर ही आध्यात्मिक प्रगति की वह कुँजी हाथ लग सकती है जो व्यक्ति को पूर्ण पुरुष बनाती है।
साधनाओं का मूलभूत आधार है-आत्म समीक्षा। बिना इसके हवाई किले की तरह कोई भी साधना टिन नहीं सकती। अपने आपकी समीक्षा करना व्यक्तित्व के वर्तमान स्वरूप को समझना आध्यात्मिकता की दृष्टि से आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन तथा न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है। इस आत्म-निरीक्षण का एक और भी पहलू है कि जो विशिष्टताएं-आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है, उनका यदि विकास नहीं हुआ है तो उसकी आवश्यकता अनुभव करते हुए आत्मोत्कर्ष का प्रयास सम्भव हो सकेगा।
साधनाएं व्यक्ति को पूर्णता ओर ले जाने के निमित्त की जाती है। इन साधनाओं का मूलभूत आधार है-आत्म समीक्षा। बिना इसके हवाई किले की तरह कोई भी साधना टिन नहीं सकती। अपने आपकी समीक्षा करना व्यक्तित्व के वर्तमान स्वरूप को समझना आध्यात्मिकता की दृष्टि से आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन तथा न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है।
साधना में बिजली की दो धाराएं काम करती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। इन दोनों को सही दिशा देने एवं बाहर भटक कर उत्पात मचाने से रोकने का काम स्पाइनल कालम की पोली रज्जु ही करती है। यही वह राजमार्ग है जिसके अंदर स्नायु तंतु केन्द्रीभूत होकर चक्रों के रूप में दृष्टिगोचर होते है। कुण्डलिनी जागरण में इन चक्रों की विद्युत शक्ति और स्नायु प्रवाह को प्रभावित एवं सक्रिय किया जाता है।
साधना द्वारा टोलीबद्ध रूप में काम करने का संकल्प लिया।
साधना का स्वरूप समझने तथा उनका सही रूप में प्रयोग करने की दिशा में कदम बढ़ाना अनिवार्य है।
साधना टिन नहीं सकती। अपने आपकी समीक्षा करना व्यक्तित्व के वर्तमान स्वरूप को समझना आध्यात्मिकता की दृष्टि से आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन तथा न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है। इस आत्म-निरीक्षण का एक और भी पहलू है कि जो विशिष्टताएं-आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है, उनका यदि विकास नहीं हुआ है तो उसकी आवश्यकता अनुभव करते हुए आत्मोत्कर्ष का प्रयास सम्भव हो सकेगा।
साधना-सत्र यथावत् चलते ही रहेंगे।
साधनात्मक प्रयोग इसी निमित्त किये जाते हैं। तपश्चर्या की आग चित्त परिमार्जित करने के लिए ही प्रज्वलित करनी पड़ती है।
साधना अपने आप में एक योग साधना है। उसे कर पाते हैं, भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक ऋद्धियों का लाभ उठाते है।
साधना है। उसे कर पाते हैं, भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक ऋद्धियों का लाभ उठाते है।
साधना, उपासना के विविध विधि उपचारों का सृजन इसीलिए हुआ है। दूसरी प्रक्रिया इवोल्यूशन-अवरोह में अतिमानव विकास के लिए योग मार्ग का आश्रय लेकर भागवत् करुणा का आह्वान करना पड़ता है। सच्चे अर्थों में अध्यात्म जीवी-नास्टिक बीइंग होने का यही राजमार्ग हैं इस अध्यात्म जीविता को प्राप्त करना ही व्यक्तित्व की पूर्णता है, वही उसका पूर्ण विकास भी है। यही मनुष्य में देवत्व की कल्पना है।
साधना का फल अश्वमेधों, वाजपेय यज्ञों से अधिक है।
साधनात्मक पुरुषार्थ से पा सकना ही सम्भव है। चिन्तन में विकृति होने पर इसकी विकृति भी वासना-तृष्णा के रूप में परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासनाएं भी आकर्षक लगती हैं।
साधना करने बन जायेगा। तब उसके भीतर न ईर्ष्या होगी न द्वेष, न कीर्ति की कामना ओर नहीं प्रभुत्व जमान-शासनं करने का लोभ होगा। वह स्वयं तो मुक्त होगा ही, अपनी नाव पर बिठाकर अन्य असंख्यों को भी भवसागर में पार लगायेगा, पूर्णता तक पहुँचायेगा।
साधना विज्ञान ने हट पूर्वक चित्त का परिशोधन करने के लिए कहा गया है। अनेक प्रकार के साधनात्मक प्रयोग इसी निमित्त किये जाते हैं। तपश्चर्या की आग चित्त परिमार्जित करने के लिए ही प्रज्वलित करनी पड़ती है।
साधना-ध्यान चेतना द्वारा संग्रहित प्राण विद्युत के माध्यम से की जाती है। यही वह और औजार है जो सूक्ष्म शरीर के विभिन्न अवयवों में हलचल और उलट-फेर प्रस्तुत करता है। ध्यान-धारण, संकल्प शक्ति, एकाग्रता, प्राण-प्रवाह, भाव संवेदना, प्रगाढ़-निष्ठा जैसी अध्यात्म प्रयोजनों की पूर्ति में सुषुम्ना साधना का असाधारण योगदान रहता है।
साधनात्मक अनुशासन के परिपालन से इनकी बाह्माभिव्यक्ति उसी तरह होती है- जैसी श्री रामकृष्ण, अरविन्द आदि के जीवन में हुई। परम् चेतना से ऐक्य की स्थिति ऐसी ही जागृति पर आती है। जीव-सत्ता भी उसी की तरह सत्-चित् आनन्दमय हो जाती है।
साधना के प्रसंग में सुषुम्ना का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान आता है। योगशास्त्रों में इसकी महिमा और शक्ति का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। साथ ही इड़ा और पिंगला के साथ इसके समन्वय की भी सुविस्तृत चर्चा की गई है। कुण्डलिनी शक्ति के जागरण में इन तीनों के स्वरूप एवं उपयोग को समझ लेना आवश्यक है।
साधना व अपनी गतिविधियों को नियंत्रित कर पाना संभव है। इस पर जो अविश्वास करते थे, उनके लिए बायोफीडबैक यंत्र विविध रूपों सामने आ गए जिसे अब भली प्रकार दर्शाया जा सकता है कि शरीर क्रियाओं में परिवर्तन क्यों व कैसे लाया जाता है?
साधना की परिधि में सब कुछ समा जाता है।
साधना का असाधारण योगदान रहता है।
साधना का यह भौतिक पक्ष है। इससे न केवल जीवन शक्ति के अभिवर्धन तथा एकाग्रताजन्य संतुलित मनःस्थिति का लाभ मिलता है। विश्वव्यापी दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता बना लेते और उसके साथ संपर्क साथ सकने वाले आत्मिक चुम्बकत्व का भी विकास होता है। ध्यान में यदि इस मार्ग पर चलते-चलते मनोनिग्रह लेकर मनोलय तक की स्थिति प्राप्त हो सकती है तथा समाधि का, आत्म-साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन व लाभ मिल सकता है। ध्यानयोग का यही वास्तविक लक्ष्य है।
साधना मार्ग के पथिकों के लिए सरल हो सके। सुषुम्ना तथा दूसरी अन्याय नाड़ियों का अस्तित्व प्रत्यक्ष शरीर में भी है और उससे इस काय कलेवर के महत्वपूर्ण चेतनात्मक प्रयोजन सिद्ध होते है। ठीक इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर के मेरुदण्ड क्षेत्र में ऐसी दिव्य विद्युत धाराएं प्रवाहित होती है। जो चेतना के उच्च स्तरों को प्रभावित करती और बल देती है। साधना-ध्यान चेतना द्वारा संग्रहित प्राण विद्युत के माध्यम से की जाती है।
साधना से बड़ा तीर्थ, जप, ध्यान आदि और कुछ नहीं है। सुषुम्ना ही परमगति है।
साधना इन प्रयोजनों की पूर्ति में अत्यधिक सहायक सिद्ध हो सकती है।
साधना सम्पन्नता और कला के रूप में प्रकट होने वाली भाव-सम्वेदना पहले की अपेक्षा कहीं अधिक है। यह प्रगति क्रम भविष्य में भी तब तक चलता रहेगा जब तक कि पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने की बात बन न जायें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-November
साधना से भक्ति चरितार्थ हो सकती है। देवता प्रतिमा को नहीं देवत्व को कहते है। प्रतिमा तो उसका प्रतीक चिह्न मात्र है। उसे धूप दीप नैवेद्य अक्षत पुष्प चढ़ा देने भर से देवत्व का परिपोषण अभिवर्धन में ही बन पड़ता है।
साधना समग्र स्वास्थ्य बनाने जैसी विद्या है। उसके ऊपर पूजा-पाठ का श्रृंगार सजाया जाये तो शोभा और भी अधिक बढ़ेगी इसमें सुरुचि तो है किन्तु यह नहीं माना जाना चाहिए कि मात्र श्रृंगार साधनों के सहारे किसी जीर्ण-जर्जर रुग्ण या मृत शरीर को सुन्दर बना दिया जाये तो प्रयोजन सध सकता है। इससे तो उल्टा उपहास ही बढ़ता है। इसके विपरीत यदि कोई हृष्ट-पुष्ट पहलवान मात्र लंगोट पहन कर अखाड़े में उतरता है तो भी उसकी शोभा बढ़ जाती है ठीक इसी प्रकार जीवन को सुसंस्कृत बना लेने वाले यदि पूजा अर्चा के लिए कम समय निकाल पाते हैं तो भी काम चल जाता है।
साधना से तात्पर्य है साध लेना सधा लेना। पशु प्रशिक्षक यही करते रहते है। अनगढ़ एवं उच्छृंखल पशुओं को वे एक रीति-नीति सिखाते हैं, उनको अभ्यस्त बनाते और उस स्थिति तक पहुँचाते है जिसमें उस असंस्कृति प्राणी को उपयोगी समझा जा सके। पालने वाला अपने को लाभान्वित हुआ देख सके। सिखाने वाला भी अपने प्रयास की सार्थकता देखते हुए प्रसन्न हो सके।
साधना में रत साधक अपने अन्तराल की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण हेतु प्रयोग-प्रयास करते रहते हैं। उन्हें अपने इस प्रयोजन के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना पड़ता है जो मनः क्षेत्र में तनाव व उद्वेग उत्पन्न करने वाला न हो।
साधना के लिए आवश्यक माना गया है।
साधनारत रहे। विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि अगस्त, नारद आदि ऋषियों के प्रचण्ड तप की अवधि भी प्रायः इतनी ही रही। युगसंधि के उभयपक्षीय प्रयोजन भी बारह वर्ष की नर देवों की इतनी लम्बी साधना से ही पूर्ण होंगे।
साधना में असाधारण बल होता है और यदि वह प्रचंड हो सके तो सहयोग, समर्थन लेने का सुधारने तक का सारा सरंजाम जुट सकता है। शर्त एक ही है कि निर्धारण और क्रियान्वयन पूरी ईमानदारी से और समर्पित भाव से किया गया हो। लेखनी का यह चमत्कार अगले दिनों विश्व चिन्तन एवं प्रवाह को मोड़ने में किस प्रकार सफल हो सकता है, इसका बड़ी योजनाएँ बनाने वाले यदि सूत्र संकेत भर प्राप्त कर सकें, तो अच्छा ही होगा। विश्वास किया जाना चाहिए कि युग चेतना अपनी आवश्यकता किसी अदृश्य प्रेरणा के आधार पर पूरा करेगी और सफलता के चरण लक्ष्य तक जा पहुँचेगी।
साधना के भागीदार भी बनते है एवं अपने यहाँ जाकर प्रज्ञामण्डल बनाकर साप्ताहिक सत्संग-स्वाध्याय-उपासना का क्रम चलाते है।
साधना का संतोष प्राप्त करता रहूं।
साधना का केन्द्र शान्तिकुँज बन रहा है। यहाँ बारह वर्ष तक नौ दिवसीय गायत्री अनुष्ठानों की श्रृंखला चलती रहेगी। जिनको उपासना की गरिमा पर विश्वास है उन सभी का आह्वान किया गया है कि इस अवधि में एक अनुष्ठान यहाँ सम्पन्न करें और विराट् सामूहिक जप यज्ञ के भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त करें। आशा की जाती है कि निर्धारित अवधि में लाखों व्यक्ति इसके सहगामी बन सकेंगे। उद्देश्य तो युग परिवर्तन के दोनों पक्षों को सम्पन्न कर सकने वाला दिव्य वातावरण बनाना है।
साधनाएँ इसी प्रयोजन के साथ जुड़ती हैं।
साधना, स्वाध्याय आदि सत्प्रवृत्तियाँ चलती रहती हैं वहाँ अपने ठाँव बना लेने वाले भी उसी ढाँचे में ढलने लगते हैं। ऐसे बिरले ही होते हैं जो समुद्र के बीच भी टापू की तरह उभरे रहते हैं और अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रहते हैं। अन्यथा खारी झील में पड़ने के उपरान्त मोटी लकड़ी तक नमक बन जाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखा जाय। अपना स्थान बदलकर, अनुपयुक्तता से हटकर उपयुक्तता के समीप निवास बदला जा सके तो सर्वोत्तम।
साधना से सिद्धि के सिद्धान्त को कसौटी पर कसा जा सकता है। पर इस बीच का मध्यान्तर भी इस बात का प्रमाण देता रहता है कि क्रिया की प्रतिक्रिया किस रूप में सही पड़ रही है। इस आधार पर प्रगति का, अवगति का, स्थिरता का मूल्याँकन किया जा सकता है। यदि गलती हो रही हो तो उसे सुधार जा सकता है। अवगति को रोका जा सकता है।
साधना में जुट पड़ने वाले सदा सर्वदा के लिए लोगों के मन पर अपनी प्रामाणिक महानता की गहरी छाप छोड़ती है। जो कालान्तर में उन्हें अनेक माध्यमों से महत्वपूर्ण वरिष्ठता प्रदान कराती है।
साधना में अन्य क्रिया-कलाप तो साधारण अनुष्ठानों की भाँति ही रहेंगे। पर एक बात विशिष्ट रहेगी “सूर्योपस्थान” भगवान सूर्य की निकटता। उन्हें ही इस महान प्रक्रिया का अधिष्ठाता वरण किया गया है। इसलिए जप गायत्री का पूजन गायत्री का करते हुए भी प्रातः काल उदय होते हुए स्वर्णिम आभा वाले सविता देव का ध्यान करते रहना होगा। ध्यान ही नहीं प्राण प्रत्यावर्तन का भाव समर्पण भी।
साधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण सन्निकट की आश्विन नवरात्रि से शांतिकुंज हरिद्वार में यह पुण्य आयोजन सन् 1000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही इसकी पूर्णाहुति होगी। जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा। जिसकी तुलना अब तक के किसी विशालतम समापन से भी न की जा सके।
साधना कुटी बनाकर उस नीरस वातावरण में उत्कृष्टता भर देते हैं। चन्दन वृक्ष अपने समीपवर्ती उगे झाड़-झंखाड़ों को भी सुगंधित कर लेता है। मनस्वी लोग ऐसा ही व्यक्तित्व विकसित करते हैं, जिससे टकराकर अवाँछनीयता वापस लौट चले और उत्कृष्टता अदृश्य वातावरण में से खिंचती चली आवे।
साधना का सुनियोजन यदि इस दिशा में सही निर्धारण के साथ चल सकना संभव हो सके तो मानना चाहिए कि पुण्य परमार्थ का सेवा साधना का वह प्रकाश पा लिया गया जो जीवन लक्ष्य की पूर्ति में पूर्णतया समर्थ है।
साधना बन पड़ना परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं वास्तविक भगवत् कृपा इसी प्रकटीकरण में देखी जा सकती है। इसे ऐसी सिद्धि कह सकते हैं जिसके ऊपर अंधविश्वास एवं भ्रम जंजाल होने जैसा कोई लाँछन लगता ही नहीं।
साधना प्रधान होने से अधिक सूक्ष्म है। इतना सूक्ष्म कि उसे पदार्थ विज्ञान की वर्तमान पकड़ से ऊपर ही समझा जा सकता है। प्रयोगशालाओं के यंत्र उपकरण और वैज्ञानिकों की प्रत्यक्षवादी समझ उसका विवेचन-विश्लेषण आदि करने में समर्थ नहीं हो सकती।
साधना की पूर्णाहुति महातेज की अभ्यर्थना होगी, ऐसी जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।
साधनारत रहे। राम ने चौदह वर्षों में से बारह वर्ष तप प्रयोजन में और दो वर्ष असुर संहार में लगाएं। पार्वती का भागीरथ का दधिचि का च्यवन का तप भी बारह वर्ष का रहा। बुद्ध अपने में देवी शक्ति का अवतरण करने हेतु बारह वर्ष तक तप में रहे। शंकराचार्य और चाणक्य भी प्रायः इतने ही दिन साधनारत रहे।
साधना से सूक्ष्म वातावरण में संव्याप्त प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना। प्रथम सोपान को राजतंत्र अर्थतंत्र एवं स्वयं सेवी संस्थान पूरा कर रहे है। तो भी उसमें यथा
शक्ति सहयोग प्रज्ञा परिजनों को भी देना चाहिए।
साधना के क्षेत्र में परिपूर्ण जागरुकता बरती। इसमें व्यतिक्रम नहीं आने दिया। न आदर्श की अवज्ञा की और न उपेक्षा बरती। भाव संवेदनाओं में श्रद्धा विचार बुद्धि में प्रज्ञा और लोक-व्यवहार में शालीन सद्भावना की निष्ठा अपनाकर कोई भी सच्चे अर्थों में जीवन देवता का सच्चा साधक बन सकता उसका उपहार वरदान भी उसे हाथों हाथ मिलता चला जाता है।
साधनात्मक प्रक्रियाओं, उपासनात्मक प्रविधियों की असफलता का एकमात्र यही कारण है कि उनमें मात्र कर्मकाण्ड तक सीमित कर दिया है। इस तरह उनका प्रभाव कान, आँख, मस्तिष्क तक ही पहुँच पाता है। इन यन्त्रों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि किसी प्रभाव से देर तक प्रभावित नहीं रहते। इसलिए इनकी असफलता का रोना-रोना व्यर्थ है। अन्तः परिष्कार के लिए आवश्यक है कि अन्तःचेतना की गहरी परतों का स्पर्श और परिवर्तन कर सकने योग्य उपाय ढूँढ़ा जाय।
साधना का प्रारम्भिक चरण मानें और उसे भावना-पूर्वक अपनाये। इतना कर लेने वाले उस अग्रगामी भूमिका को निभा सकेंगे जिसके आधार पर महाविनाश को रोकना और महाविकास के सतयुगी वातावरण का नवनिर्माण संभव हो सकें। बड़े कार्यों को बड़ी शक्तियाँ सम्पन्न करती है। उच्च स्तरीय बड़प्पन का सम्पादन करने के लिए राजमार्ग बनाना ही प्रस्तुत युग संधि महापुरश्चरण का प्रमुख उद्देश्य है। इसमें सच्चे स्वार्थ और सच्चे परमार्थ का समन्वय है।
साधना में एकाकीपन रहता है। अन्तर्मुखी होने की चेष्टा चलती है। पर यह चेष्टा सामान्य मनुष्यों के लिए कष्ट कर प्रतीत होती है। वे दुनिया की बहुत बातें सोच सकते हैं और साँसारिक समस्याओं पर काफी ऊहापोह कर सकते हैं किन्तु आत्मनिरीक्षण और आन्तरिक समाधान की बात सोचना और उस दिशा में कुछ आगे तक बढ़ सकना उनके लिए सम्भव ही नहीं हो पाता। इसी प्रकार वे भीड़ के साथ रहने और गपबाजी करने में घन्टों गुजार सकते हैं, पर अकेले थोड़ी देर भी बैठे नहीं रह सकते।
साधना की लम्बी और ऊंची मंजिल पर चल सकना चल पड़ना असंभव हो जाता है। भले ही कोई कितना ही पूजा पाठ क्यों न करता हरें जिन्हें तथ्यान्वेषी बनना है उन्हें इन तीन शत्रुओं से अपना पीछा छुड़ाना ही चाहिए।
साधना गाजीपुर के फलाहारी बाबा, वाराणसी के तेलंग स्वामी, योगी गम्भीरनाथ, महाप्रभु जगत्- बन्धु ने भी सम्पन्न की है।
साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा। जिसकी तुलना अब तक के किसी विशालतम समापन से भी न की जा सके। इस संकल्प के अंतर्गत आयोजन केन्द्र में नाघ् विसीय गायत्री अनुष्ठानों की श्रृंखला अन्त तक अनवरत रूप से जारी रहेगी। यह अपने समय का एक सबसे विराट् अनुष्ठान होगा।
साधना करने में कितनी अधिक विशेषता हो सकती है उसका अनुमान कोई भी लगा सकता है। सभी इच्छुकों को अवसर मिल सके इस दृष्टि से नौ दिवसीय साधना सत्र बारह वर्ष तक चलते रहने का संकल्प प्रकट किया गया है। अन्तरिक्ष का विभाजन बारह राशियों में हुआ है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए ठीक अपनी उसी स्थिति में बारह वर्ष में आती है। इस तथ्य को देखते हुए प्रस्तुत पुरश्चरण की अवधि बारह वर्ष रखी गयी है।
साधना-विधान को मिथ्या बताते है या ईश्वर के निष्ठुर होने की मान्यता बनाते हैं कई पाखण्डी कुछ भी हस्तगत न होने पर भी प्रवंचना रचते हैं और नकटा सम्प्रदाय की तरह अपनी सिद्धि सफलता का बखान करते है। आज का आस्तिकवाद इसी विडम्बना में फंसा हुआ है और वह लगभग नास्तिकवाद के स्तर पर जा पहुँचा है।
साधना से ही पूर्ण होंगे।
साधना ही आध्यात्मिक स्वस्थता ओर बलिष्ठता है। इसी के बदले प्रत्यक्ष जीवन में मरण की प्रतीक्षा किये बिना स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि का रसास्वादन करते रहा जा सकता हैं उन लाभों को हस्तगत किया जा सकता है। जिनका उल्लेख विद्या की महत्ता बताते हुए शास्त्रकारों ने विस्तार पूर्वक किया है। सच्चे सन्तों भक्तों का इतिहास भी विद्यमान है। खोजने पर प्रतीत होता हैं कि पूजा पाठ भले ही उनका न्यूनाधिक रहा हैं, पर उनने जीवन साधना के क्षेत्र में परिपूर्ण जागरुकता बरती।
साधना अपने लिए उन्हीं अति कठिन दीखने वाली परिस्थितियों में ढूंढ़ निकालना है। इस सफलता का श्रेय उस अदृश्य क्षमता को जाता है जो अपनी परिस्थितियों को अनुकूल बनाने हेतु स्रष्टा ने हर किसी को प्रदान की है। मनुष्य अपने दृष्टिकोण से उन सामान्य प्राणियों की क्षमताओं को सामान्य समझ कर हेय मान सकता है पर यदि किसी को उन्हीं की परिस्थितियों में रहने का अवसर मिले तो अनुभव करेगा कि मानव को अपनी परिस्थितियों से निपटने के लिए जो विशेषताएं मिली हुई हैं, उनकी तुलना में इन प्राणियों को मिला अनुदान किसी भी प्रकार कम नहीं है।
साधना करने के लिए आवश्यकता पड़ती है।
साधना का समावेश हो जाने से लक्ष्य की पूर्ति में असाधारण योगदान मिलने की आशा है। इसीलिए पुरश्चरण में गायत्री मंत्र और सूर्योपासना का महत्व दिया गया है। दैनिक साधना की पूर्णाहुति महातेज की अभ्यर्थना होगी, ऐसी जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।
साधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर तो उद्दण्डता व दूसरों को नीचा दिखाने का भूत सदैव चढ़ा रहता है। और दूसरों को गिराने और नीचा दिखाने की ही ललक उठती रहती है। ऐसे लोग अपने प्रशंसा और दूसरों की निंदा करने में ही रहते है। इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्म परिष्कार कैसे बन पड़े?
साधना सत्र बारह वर्ष तक चलते रहने का संकल्प प्रकट किया गया है। अन्तरिक्ष का विभाजन बारह राशियों में हुआ है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए ठीक अपनी उसी स्थिति में बारह वर्ष में आती है। इस तथ्य को देखते हुए प्रस्तुत पुरश्चरण की अवधि बारह वर्ष रखी गयी है।
साधनाओं को पूर्व काल का आधुनिकीकरण कहा जा सकता है। इस तरह की साधना गाजीपुर के फलाहारी बाबा, वाराणसी के तेलंग स्वामी, योगी गम्भीरनाथ, महाप्रभु जगत्- बन्धु ने भी सम्पन्न की है।
साधना के नाम से जाना जाता है। इसका विस्तार तो बहुत लम्बा है पर संक्षेप में इसे इस प्रकार कहा जा सकता है चिन्तन का उन्नयन और साधना का सुनियोजन यदि इस दिशा में सही निर्धारण के साथ चल सकना संभव हो सके तो मानना चाहिए कि पुण्य परमार्थ का सेवा साधना का वह प्रकाश पा लिया गया जो जीवन लक्ष्य की पूर्ति में पूर्णतया समर्थ है।
साधना का वह उपक्रम, जिसमें दिव्य अवतरण तो प्रधान है ही, पर साथ में जन मानस को परिष्कृत करने वाले ज्ञान यज्ञ का भी समावेश है। युग संगीत और युग साहित्य द्वारा आलोक वितरण यह दोनों कार्य इसी स्तर के है। जिनके माध्यम से विचार क्रान्ति अभियान का भी विस्तार होता है।
साधना का उपक्रम चले वहाँ से नए सम्मिलित होने वाले श्रद्धालुओं को एक बार एक अनुष्ठान शांतिकुंज में जाकर पूरा करने के लिए कहा जाय। लौटने पर वे पूरा उत्साह लेकर लौटेंगे और बारह वर्ष तक सम्मिलित होते रहने के व्रत का निर्वाह करेंगे।
साधना करने लगें। विरोचन ने तरह तरह से दर्पण देखा, वेश-भूषा बदलकर केश विन्यास में परिवर्तन कर सौंदर्य प्रसाधनों में कई बार अन्तर कर उसने जितनी बार दर्पण में देखा उसको अपनी सुडौल देह व्यष्टि सुन्दर मुखमण्डल ही स्मरण में आया तो उसने यही माना कि यह शरीर ही आत्मा है उसे ही तरह तरह से सजाने से उसी की तृप्ति में लगे रहना ही सुख का साधन है, विरोचन को ओर अधिक रुकने में उकताहट हुई सो उसने अपनी इसी मान्यता को पूर्ण मान लिया और घर लौट आया।
साधना का वह प्रकाश पा लिया गया जो जीवन लक्ष्य की पूर्ति में पूर्णतया समर्थ है।
साधना को चलायें। इससे मण्डलों की स्थापना क्रियाशील रहेगी और साप्ताहिक सत्संग निष्ठापूर्वक चलते रहेंगे।
साधना हेतु जिन छोटे बड़े योगाभ्यासों का प्रयोग विभिन्न वर्गों के लोग विभिन्न प्रकार से करते रहते हैं, उनमें अन्य क्रिया कृत्यों का समावेश तो रह सकता है, पर ध्यान को नहीं छोड़ा जा सकता। यह ध्यान परब्रह्म का, प्रकार ज्योति का, आत्मिक प्रकाश पुँज का षट्चक्रों का पंचकोशों का, त्रिविध कलेवरों से सम्बन्धित तीन ग्रंथियों का हो सकता है। इष्टदेवों के रूप में अवतारों, देवत्वों, महामानवों अथवा दिव्य शक्तियों को माध्यम बनाया जा सकता है। इन्द्रिय तन्मात्राओं को विकसित करने के लिए शब्द रूप, रस, गंध स्पर्श के कुछ भाव चित्र गढ़े जा सकते हैं। सोऽहम् प्रस्फुटीकरण, कुण्डलिनी जागरण आदि की दिव्य साधनाएँ इसी प्रयोजन के साथ जुड़ती हैं।
साधना बताई उन्हें कहा--दर्पण में अपनी छवि देखना। छवि देखने वाले दृगों की देखना, दृगों की पुतलियों के भीतर प्रविष्ट होकर यह पहचान करना कि यह भीतर कौन देखता है? कैसे देखता है?
साधनात्मक प्रयोजनों के लिए इसकी अनिवार्य आवश्यकता है। गीतकार ने अठारहवें अध्याय में “विविक्तसेवीलघ्वाशी- यत्वाक्कायमानस” के सूच में एकान्त सेवन को प्रथम स्थान प्रदान किया है। इसके अभ्यास से मनोबल बढ़ता है साथ ही व्यक्ति अन्तराल की गहराइयों में उतरने योग्य हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-April
साधनाओं को एकाग्रता का अभ्यास कराने के रूप में आरम्भिक कदम बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए अनेक उपाय, अनेक विधान प्रचलित हैं। उनकी संख्या और भी बढ़ाई जा सकती है। योगशास्त्र में राजयोग, हठयोग, लययोग बिन्दुयोग, मंत्रयोग आदि विशिष्ट हैं। दार्शनिक योगों में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का निर्धारण है।
साधना में निरत होने हेतु सहमत सक्रिय किया है। यही कारण है कि अखण्ड-ज्योति पाठक चरित्रवान, लोकसेवी के रूप में विकसित हुए है। उनने नवसृजन का दायित्व अपने कंधों पर उठाया है।
साधना के अन्य तीन पक्ष साध सकना भी सरल हो जाता है। इन्द्रिय- जयी, समय संयमी, अर्थ संयमी, विचार संयमी बनने में उतनी अधिक कठिनाई अनुभव नहीं करता जितनी की प्रथम चरण की साधना में साहस अपनाना होता है।
साधना के लिए प्रोत्साहित एवं प्रशिक्षित करना चाहिए। स्वयं पीछे रहकर उन्हें आगे बढ़ाना चाहिए। अपने देश में नारी संपर्क के लिए पुरुषों को उपयुक्त नहीं समझा जाता। उन पर संदेह एवं अविश्वास किया जाता है। इसलिए यदि उन्हें कार्य करना है तो साथ ही घर की महिलाओं को अवश्य ले लेना चाहिए।
साधना है। इस उपाय उपचार की असाधारण महिमा गाई जाती है। महात्म्य वर्णन किये जाते हैं। फलश्रुतियों के उत्साहपूर्वक बढ़े-चढ़े अम्बार लगाये जाते हैं। पर तथ्यतः बात इतनी भर है कि अपने को कषाय-कल्मषों की कीचड़ से उबारा जा सके।
साधना विज्ञान की क्षमता पर विश्वास नहीं है, वे भी इसे प्रयोग परीक्षणों के रूप में कुछ समय कार्यान्वित कर सकते हैं। अनुसंधानों में बहुत समय, श्रम लगता रहता है। कोई चाहे तो गायत्री उपासना को अनुसंधान के रूप में प्रयोग, परीक्षण की तरह कसौटी पर कस सकता है। अनेकों का अनुभव सत्परिणाम का साक्षी हैं।
साधना में तपश्चर्या सध जाती है और दूसरों की सेवा सहायता में अपनत्व पर विराट के विशालता के किसी घटक के साथ अपनी आत्मीयता सघन होती है। यही योग साधना की पृष्ठभूमि भी है। सेवा, धर्म को सेवायोग भी कहा जा सकता है। उसे अपनाने वाले को प्रथम चरण लोभ मोह और अहंकार का नियमन करने के रूप में उठाना होता है। सादा जीवन और उच्चविचार का जीवन चर्या में सघन समावेश किया जाता है।
साधना के आधार पर प्रभावित किया जाता है। भली या बुरी उपासनाएँ अपने-अपने विकास और विनाश के आधार खड़े करती हैं।
साधना करनी पड़ती है। तुच्छता को महानता में, कामना को भावना में बदलना पड़ता है। लेने की अभिलाषा, देने की उत्कंठा में जब परिणत होती है तभी सेवा धर्म अपनाने का सुयोग संयोग बनता है।
साधना में साहस अपनाना होता है।
साधनाएँ उसके उपरान्त ही आरम्भ होती हैं। मुख्य द्वारा खुल जाने के उपरान्त ही भवन में प्रवेश मिलता है और उसके भीतर बने हुए कमरों, कोठों, दालानों, तलघरों में जा सकना सम्भव होता है। जब तक ध्यान की एकाग्रता न सधे तब तक अंतर्जगत के प्रवेश के लिए प्रतीक्षा पूर्वक ठहरना पड़ता है। ताकि ध्यान धारणा को अपने स्वाभाविक क्रम में विकसित एवं परिपक्व होने का अवसर मिल जाय। इस प्रसंग में हथेली पर सरसों नहीं बैठती।
साधना, अनुष्ठान जैसे कृत्य प्रयास न करने पर भी सूक्ष्म विशेषताओं से सम्पन्न पाये जाते है। यह उपहार उन्हें जन्मजात रूप में भी मिलता है अथवा नितान्त बचपन से आगे बढ़ती हुई दृष्टिगोचर होने लगती है। यह अनायास का प्रकटीकरण भी संयोगवश होता। उसके पीछे ऐसे कारण सन्निहित होते हैं जिन्हें घटनाएँ या प्रयास तो नहीं कहा जा सकता, पर अदृश्य और, अविज्ञान कारण ऐसे होते हैं जिनके कारण कुछ विशेष व्यक्ति अपने में चमत्कारी क्षमताएँ प्रकट करते हैं किन्तु उनके साथी पड़ोसी उन विशेषताओं से वंचित बने रहते हैं।
साधना भी उपवास वर्ग में आती है। पेट खाल रखना, पाचन तंत्र को विश्राम देना, नमक, शकर, मसाले, चिकनाई का एक निर्धारण अवधि के लिए परित्याग कर देना मनोबल को बढ़ाता है। इसमें दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और उन्हें परास्त करते रहने का साहस उभरता है। यह संकल्प-बल आगे चल कर सत्प्रवृत्ति संवर्धन के अनेक प्रयोजनों में काम आता है।
साधना करते तो है, पर उनका कोई कहने लायक परिणाम न मिलने पर और भी अधिक अश्रद्धालु बन जाते हैं। यहाँ भूल विधि-विधान के किसी भी क्रम में नहीं खोजी जानी चाहिए, वरन् देखा यह जाना चाहिए कि उस प्रयोग में श्रद्धा का समावेश कितना रहा? श्रद्धालु को देव प्रतिमाएँ रामकृष्ण परमहंस की तरह, मीरा की तरह, एकलव्य की तरह शक्ति और यथार्थता परिलक्षित होती है; जबकि अश्रद्धालु प्रतिमाओं का उपहास उड़ाते रहते हैं। मूर्तिकारों के देव प्रतिमाएँ विक्रयार्थ रखी गई वस्तु मात्र होती हैं, जबकि भावनाशील उनके सहारे अपनी श्रद्धा को परिपक्व करते और भाव संवेदनाओं को परिष्कृत करते हैं। यहाँ श्रद्धा विश्वास की शक्ति ही प्रधान रूप से काम करती है।
साधनाओं का आश्रय लिया जाता है। योग साधनाओं की विविध परम्पराओं का सृजन इसी निमित्त हुआ है। उनमें अनेकता विविधता देखते हुए किसी को भी भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों के आहार, पोशाक, भाषा, परम्परा एवं विनोद क्रम में अन्तर पाया जाता है, उसी प्रकार यदि आध्यात्म साधनाओं में अन्तर पाया जाता है तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए और न भ्रम में पड़ना चाहिए। वे सभी उपयोगी हैं। लक्ष्य सभी का एक है आत्म-परिष्कार।
साधना और आराधना के प्रति निष्ठावान ही होकर जीवन-यापन करते है।
साधना आरम्भ कर देते हैं। खाली समय को वे स्वेच्छाचार में नहीं बिताते, वरन् योजनाबद्ध रूप से उसकी उच्च स्तरीय शक्ति संचय का प्रयास करते रहते हैं ताकि समय की पुकार पर किसी भी क्षेत्र की उन्हें जो भी प्रेरणा मिले उसे बिना हिचक क्रियान्वित कर सकें।
साधना होना चाहिए। एकाग्र मन से अपने गुण, कर्म स्वभाव में घुसे हुए दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ा जाना चाहिए और इसके बाद जहाँ भी गन्दगी दिखाई पड़े उसे बुहारना चाहिए। टूट,फूट की मरम्मत करनी चाहिए। बिगाड़ को सुधार में परिवर्तित करना ध्यान धारणा द्वारा उत्पादित सूक्ष्म बुद्धि का प्रधान कार्य है। मनुष्य देवत्व की प्रतिमा है।
साधना में श्रद्धा का समावेश हो तब तो कहना ही क्या? इस समन्वय से सोना सुगन्ध के सम्मिश्रण जैसा उदाहरण सामने आता है। श्रद्धा की सिंचाई पाने पर साधना का वृक्ष तेजी से बढ़ता और फलता, फूलता देखा गया है। यों अश्रद्धालुओं का प्रयोग परीक्षण भी सर्वथा निरर्थक नहीं जाता। वे अपने में आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की मात्रा क्रमशः आगे बढ़ती हुई देखते हैं।
साधना का वृक्ष तेजी से बढ़ता और फलता, फूलता देखा गया है। यों अश्रद्धालुओं का प्रयोग परीक्षण भी सर्वथा निरर्थक नहीं जाता। वे अपने में आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की मात्रा क्रमशः आगे बढ़ती हुई देखते हैं।
साधना और सद्ज्ञान द्वारा ही संभव है।
साधना में संलग्न रहना भी आवश्यक है और उपासना का वास्तविक प्रयोजन तभी पूरा होता है। हेय जीवन जीने और आत्म परिष्कार तथा लोकमंगल के कार्यों की उपेक्षा करने से उन लोगों का श्रम निरर्थक ही चला जाता है जो पूजा-पाठ को ही उपासना समझते है और उतने भर से भगवत् प्रसन्नता की आशा करते है। बदले में ऐसों को कुछ नहीं मिलता।
साधनाओं की विविध परम्पराओं का सृजन इसी निमित्त हुआ है। उनमें अनेकता विविधता देखते हुए किसी को भी भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए जिस प्रकार विभिन्न क्षेत्रों के आहार, पोशाक, भाषा, परम्परा एवं विनोद क्रम में अन्तर पाया जाता है, उसी प्रकार यदि आध्यात्म साधनाओं में अन्तर पाया जाता है तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए और न भ्रम में पड़ना चाहिए। वे सभी उपयोगी हैं। लक्ष्य सभी का एक है आत्म-परिष्कार। वह जिस सीमा तक पूरा होता जाता है, उसी क्रम से गुण कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश होता है।
साधना से होता है। इसी का बढ़ा-चढ़ा स्वरूप तप है। प्रथम को सहज सामान्य और द्वितीय को कठिन असाधारण कहा जा सकता है। संयम का तात्पर्य है- अभ्यस्त कुटैवों को ढूंढ़ना और कठोरतापूर्वक उखाड़ फेंकना। तपस्वी को एक कदम और आगे बढ़ाना पड़ता है, उसे साधना विधानों को अपना कर ऐसी प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न करना है, जो संग्रहित कुसंस्कारों को न केवल उखाड़े, वरन् अपने प्रचण्ड तप से उन्हें भस्मीभूत भी कर दे।
साधनाओं में विधि-विधान सही न होने पर उल्टा परिणाम भी हो सकता है। हानि भी उठानी पड़ सकती है। पर सेवायोग में ऐसा कोई खतरा नहीं है। पुण्य परमार्थ का स्वल्प समयदान भी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करता है। जन-कल्याण में निरत व्यक्ति सज्जन बन कर रहता है।
साधना की दृष्टि से भी गायत्री के वाचक, उपाशु और मानसिक जप के अपने-अपने महत्व हैं। उनके कारण स्नायु संस्थान और मनःसंस्थान उस प्रकार प्रभावित होते है कि अनुपयुक्ताओं का निराकरण और उपयुक्तताओं का अभिवर्धन अनुभव में आने लगे।
साधनाओं में अन्तर पाया जाता है तो इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए और न भ्रम में पड़ना चाहिए। वे सभी उपयोगी हैं। लक्ष्य सभी का एक है आत्म-परिष्कार। वह जिस सीमा तक पूरा होता जाता है, उसी क्रम से गुण कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश होता है। इस प्रकार परिपुष्ट हुआ व्यक्ति अपने में सामान्य जनों की अपेक्षा प्रतिभा, प्रामाणिकता सुव्यवस्था और तत्परता की मात्रा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी देखता है।
साधना बन पड़ेगी। यों करने को तो संसार में अनेकानेक क्षेत्र और कृत्य खाली पड़े है। उनमें से जो अपनी रुचि और योग्यता के अनुरूप सत्प्रवृत्ति संवर्धन की दिशा में अग्रगामी हो सके, वह उतना ही श्रेयाधिकारी और लोक सेवी महामानव बनने की दिशा में अग्रसर हो सकेगा। उपरोक्त चारों कृत्य ऐसे है, जिन्हें हर स्थिति का व्यक्ति अपने क्रिया कृत्यों में सम्मिलित कर सकता है। आवश्यक नहीं कि एक व्यक्ति इन सभी निर्धारणों को एक साथ अपनी क्रिया-प्रक्रिया में सम्मिलित करें, पर यह तो हो ही सकता है कि जितनी मात्रा में जो बन पड़े, उसे उस प्रकार क्रियान्वित किया जाता रहे।
साधनाओं में, सभी उपासना परक कर्मकाण्डों में अनुबंधित हो ऐसी बात नहीं है। एक अति सरल और व्यावहारिक योग भी है-सेवायोग। इसे पुण्य परमार्थ का संचय भी कह सकते हैं। इस निमित्त भी आत्मसंयम बरतना पड़ता है। शक्तियों को अनावश्यक कार्यों में क्षरित होने से रोकना पड़ता है।
साधना के समतुल्य है। नशेबाजी जैसी दुष्प्रवृत्ति भी मनुष्य के ऊपर हावी होकर अमरबेल की तरह उसका रस रक्त चूस रही है। असत्य का अन्धकार हटते ही इस प्रकार के कुप्रचलनों को भी निशाचरों की भाँति मैदान छोड़ कर भागना होगा।
साधना करनी चाहिए।
साधनाएँ इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती हैं।
साधना युक्त न बनाया जाय, तो उस दशा में कोई मंत्र तंत्र सफल नहीं होते। कहा गया है कि -
साधना क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। उन उपचारों के स्वरूप विभिन्न हो सकते है, पर उद्देश्य में अन्तर नहीं रखा जा सकता। आत्म-परिष्कार ही वास्तविक देवाराधन है।
साधना में आहार की कारण शक्ति को आत्मसात करके अंतःकरण को विकसित करने का विशेष विधान विज्ञान सम्मत आधार पर विनिर्मित किया है। मनीषियों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि यदि इस ओर उपेक्षा बरती गई तो आत्मबल संवर्धन के लिए की जाने वाली साधनाओं में सफलता प्राप्त होना संदिग्ध है। यदि सफलता मिली भी तो वह यत्किंचित हो होगी। वस्तुतः आत्मबल का अभिवर्धन ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। यदि वह पूँजी वह अभीष्ट मात्रा में मनुष्य के पास हो तो वह शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और लौकिक दृष्टि से ही नहीं आत्मिक दृष्टि से भी सफल सिद्ध होता है।
साधना से समाज का काया-कल्प होगा। उस तैयारी के लिए अभी से कार्य आरम्भ कर देना चाहिए। नारी-जागरण प्रयासों में अब हर विचारशील नर-नारी को बढ़-चढ़ कर भाग लेना चाहिए।
साधना में निरत हो सकेंगे। पुण्य प्रयोजनों के लिए अपने श्रम, समय मनोयोग एवं साधनों को लगावेंगे। इस स्तर की उत्कृष्ट प्रामाणिकता को सिद्ध करने में जिन्होंने अनेकों बार अग्नि परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने के प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। उन्हें ही देव पुरुष दिव्य प्रयोजनों के लिए वरण करते हैं। दर्शन या अनुग्रह उन्हें ही प्रदान करते हैं।
साधना से विरत नहीं हो सकते। उन्हें वह भी आवश्यक और अनिवार्य स्तर का प्रतीत होता है। ऐसे लोग युग धर्म के निर्वाह को भी ऐसे लाभदायक कामों में सम्मिलित करते है जिसमें आत्म-सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह का विविध समन्वय है। इच्छा यदि बलवती हो तो न समय की कमी रहती है, न अवसर की अथवा सहयोग ही कम पड़ता है।
साधना की पृष्ठभूमि भी है। सेवा, धर्म को सेवायोग भी कहा जा सकता है। उसे अपनाने वाले को प्रथम चरण लोभ मोह और अहंकार का नियमन करने के रूप में उठाना होता है। सादा जीवन और उच्चविचार का जीवन चर्या में सघन समावेश किया जाता है। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाना पड़ता है।
साधना विधानों को अपना कर ऐसी प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न करना है, जो संग्रहित कुसंस्कारों को न केवल उखाड़े, वरन् अपने प्रचण्ड तप से उन्हें भस्मीभूत भी कर दे।
साधना द्वारा इसी शरीर को समर्थ बनाया जाता है। ऋद्धियों और सिद्धियों का स्रोत इस सूक्ष्म शरीर को ही माना जाना चाहिए एवं उसे विकसित कर देवोपम उपलब्धियाँ हस्तगत किये जाने का पुरुषार्थ किया जाना चाहिए। *
साधना से उपासना करने का संकेत है।”
साधना विज्ञान का प्रयोजन इन तीनों को परिष्कृत प्रखर बनाना है। शरीर की स्वस्थता, सुन्दरता, मन की बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, अन्तःकरण की भाव-संवेदना उदार सेवा परायणता इन्हीं तीन क्षेत्रों का समुन्नत बनाती हैं। अनेकानेक साधनाएँ इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए की जाती हैं।
साधना अनिवार्य रूप से करनी होगी। ध्यान योग का आधार यही है। इसी कल्पवृक्ष पर कामनाएँ पूर्ण करने वाले अनेकानेक मधुर फल लगते हैं।
साधना, नाद श्रवण, खेचरी मुद्रा, बिन्दु केन्द्र, प्रेक्षा ध्यान, भावातीत ध्यान आदि अनेक विधि-विधानों का विभिन्न मंचों से प्रचलन है। दक्षिण मार्गी वैदिक और वाममार्गी ताँत्रिक मार्गों में से कोई भी मार्ग या विधान ऐसा नहीं है जिसमें एकाग्रता साधने के लिए अपने-अपने ढंग के विधि-विधान नहीं बनाये। ध्यानयोग का प्रारम्भ न कराया जाता हो आगे की साधनाएँ उसके उपरान्त ही आरम्भ होती हैं। मुख्य द्वारा खुल जाने के उपरान्त ही भवन में प्रवेश मिलता है और उसके भीतर बने हुए कमरों, कोठों, दालानों, तलघरों में जा सकना सम्भव होता है। जब तक ध्यान की एकाग्रता न सधे तब तक अंतर्जगत के प्रवेश के लिए प्रतीक्षा पूर्वक ठहरना पड़ता है।
साधनाओं में सफलता प्राप्त होना संदिग्ध है। यदि सफलता मिली भी तो वह यत्किंचित हो होगी। वस्तुतः आत्मबल का अभिवर्धन ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। यदि वह पूँजी वह अभीष्ट मात्रा में मनुष्य के पास हो तो वह शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और लौकिक दृष्टि से ही नहीं आत्मिक दृष्टि से भी सफल सिद्ध होता है। इस संदर्भ में आहार की कारण शक्ति, सतोगुणी विशेषता का उपयोग होना चाहिए।
साधनाएँ एक प्रकार की चिह्न पूजा भर बन कर रह जाती हैं।
साधना है। इन्हें अनुग्रहपूर्वक माँगने-अपनी दीनता दिखाने में न उनके न अपने गौरव की रक्षा होती है। इसलिए मनुहार करने की अपेक्षा भगवान के सान्निध्य के लिए अपना स्तर तदनुरूप बनाने की बात ही हर दृष्टि से उचित मालूम पड़ती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-December
साधना में बीते तथा एक वर्ष और अज्ञातवास में रहना पड़ा।
साधना को विकास के लिए उपयुक्त पाथेय बताते हैं। भारतीय मनीषी भी “विद्या ददाति विनयं” अर्थात् विनयशीलता को विद्या की ही देन एवं परिणति मानते हैं। जो विनयशील नहीं वह अभी भी “अविद्या” अर्थात् बहुसंख्य हैं जो स्वयं को न जाने क्या मान बैठते हैं, परन्तु उपरोक्त कसौटी पर क्षुद्र अहंकारी ही सिद्ध होते हैं।
साधना दो हाथों या दो घोड़ों को साधने की तरह है। इनके गड़बड़ा जाने पर अपनी समूची क्षमताएं अस्त−व्यस्त हो जाती हैं। प्रति करना तो दूर यथा स्थिति बनाये रहना और अवगत से बचना तक कठिन हो जाता हैं। अन्याय जिम्मेदारियों को वहन करते हुए जिस प्रकार जीवनचर्या चलाई जाती है तो उसी में एक अति महत्वपूर्ण पक्ष यह भी जुड़ा रहना चाहिए कि आरोग्य की स्थिति ठीक है या नहीं। भूख, नींद और मल विसर्जन के तीनों कार्य यथावत हो रहे हैं या नहीं।
साधना के लिए अभी भी अधिक फूल प्रद इसलिए माना जाता है है कि वहाँ चिर पुरातन में अनेक ऋषियों ने तपस्या के उद्देश्य से अपना कार्य क्षेत्र बनाए रखा। उनके व्यक्तित्व और कर्त्तृत्व में अभी भी उन क्षेत्रों की विशिष्टता विद्यमान है। यद्यपि उस निवास को युगों की अवधि बीत गई। भूमि की विशेषता है कि वह न केवल, वर्षा गर्मी से प्रभावित होती है। वरन् वहाँ जो कुछ होता रहा है।
साधना का पक्ष सत्रों का प्रमुख अंग रहता है। उसी में युग-सृजन के लिए कुछ करने की प्रेरणा को इस स्तर पर सम्मिलित रखा जाता है कि वह गले के नीचे उतर से और व्यावहारिक जीवनचर्या में स्थान प्राप्त कर सके।
साधना सत्रों का क्रम तो कभी टूटने ही नहीं पाता। इन विशेषताओं के कारण इस क्षेत्र में प्रवेश एवं निवास करने वाला यह अनुभव करता है कि उसे दिव्य संरक्षण और सान्निध्य प्राप्त हो रहा है।
साधना को मोटे तौर पर देवी देवताओं को प्रसन्न करने का उपाय, उपचार माना जाता है पर देवताओं का अनुग्रह भी इसी शर्त पर मिलता है कि अपनी पा.ता और उत्कृष्टता प्रमाणित करने के लिए व्यक्तित्व को परिष्कृत स्तर का बनाने में प्रयत्नपूर्वक सफलता प्राप्त कर ली जाये। कुपात्रों को देवी अनुग्रह या तो मिलते ही नहीं, यदि कुछ ही समय में जब उस अहंकार में कुकर्म चल पड़ते हैं तो फिर जड़ मूल सहित उखाड़ना पड़ता है। जो सामान्य पुरुषार्थ से कमाया गया था उसका भी लाभ नहीं मिल पता। जो सही रीति से कमाया था वह भी उसी आँधी में उड़ जाता है।
साधना का कितना अधिक प्रतिफल हो सकता है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।
साधना 3 घंटे की गहरी नींद के बराबर स्फूर्ति प्रदान करती है।
साधना ही हनुमान जैसी प्रतापी को जन्म दे सकी। कण्व के संरक्षण में साधना करने वाली शकुन्तला ही चक्रवर्ती भरत की माता कहलाने का श्रेय प्राप्त कर सकी। स्वयं मनु और शतरूपा रानी की तपस्या ही उन्हें अवतारों को जन्म दात्री बना सकी।
साधना के रूप में था जिसमें टेपरिकार्डर से संदेश दिये गये थे।
साधना, अनेकों को प्रभावित उत्तेजित करती हो वहाँ बहुलीकरण शक्ति ही क्रियारत समझी जानी चाहिए।
साधना से सिद्धि” का सिद्धान्त सर्वविदित है। साधना को मोटे तौर पर देवी देवताओं को प्रसन्न करने का उपाय, उपचार माना जाता है पर देवताओं का अनुग्रह भी इसी शर्त पर मिलता है कि अपनी पा.ता और उत्कृष्टता प्रमाणित करने के लिए व्यक्तित्व को परिष्कृत स्तर का बनाने में प्रयत्नपूर्वक सफलता प्राप्त कर ली जाये। कुपात्रों को देवी अनुग्रह या तो मिलते ही नहीं, यदि कुछ ही समय में जब उस अहंकार में कुकर्म चल पड़ते हैं तो फिर जड़ मूल सहित उखाड़ना पड़ता है। जो सामान्य पुरुषार्थ से कमाया गया था उसका भी लाभ नहीं मिल पता। जो सही रीति से कमाया था वह भी उसी आँधी में उड़ जाता है।
साधना प्रातःकाल आँख खुलते समय और रात्रि को सोने आँख बन्द होने के समय की जा सकती है।
साधना भी कहा जा सकता है। इसमें जप, ध्यान, प्राणायाम, संयम जैसे विधानों की व्यवस्था है पर सब कुछ इतने तक ही सीमित नहीं हैं उपासना में ध्यान धारण स्तर के सभी कर्मकांडों आ जाते है। इसके साथ ही जीन के हर क्षेत्र में मानवी गरिमा को उभारने और रुकावटें हटाने जैसे सभी पक्षों को जोड़कर रखा गया है। शरीरसंयम, समयसंयम, अर्थसंयम, विचारसंयम, इस धरा के अलग न हो सकने वाले अंग हैं। दुर्गुणों के, कुसंस्कारों के निराकरण पर जहाँ जोर दिया गया है वहाँ यह भी अनिवार्य माना गया है कि अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक विवेकवान्, चरित्रवान और पुरुषार्थ परायण बनने के लिए चिंतन तथा अभ्यास जारी रखा जाये।
साधना चली और दो वर्ष असुरता से युद्ध लड़ा गया। चौदह वर्ष वनवास में बारह वर्ष तप साधना के थे। पाँडवों का सृजन इन्हीं दो कार्यों के लिए हुआ था। उन्हें जरासंध, कंस, दुर्योधन, शिशुपाल आदि द्वारा फैलाई गई अनीति की निरस्त करना था। साथ ही सिकुड़े हुए अस्त व्यस्त भारत को विशाल बनाने का महाभारत प्रयोजन पूरा करना था।
साधना प्रसिद्ध है।इसी आधार पर वे अजर अमर बने हुए आकाश में चमकते दमकते हैं। ध्रुव एवं ब्रह्मांड का ध्रुव केन्द्र बनने का अवसर तप साधना से मिला था। च्यवन ऋषि जब तप में निरत हुए तो वे सुकन्या जैसी पत्नी, अश्विनी कुमारी जैसे चिकित्सक पा सके और जराजीर्ण शरीर का कायाकल्प करके खोले यौवन को पुनः प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए।
साधना का महान लक्ष्य है। यही अपना परीक्षा क्रम है और इसी में भविष्य में सारी संभावना सन्निहित है।
साधना करनी चाहिये। इसे आत्मदर्शन ही समझा जाना चाहिये, जो थोड़ी विकसित अवस्था में ईश्वर दर्शन के रूप में फलित होता है।
साधना की विशेषता है। साधक को कर्तव्य क्षेत्र में धार्मिकता, मान्यता क्षेत्र में आत्म परायणता और अध्यात्म क्षेत्र में दूरदर्शी विवेकशीलता उत्कृष्ट आदर्शवाद को अपनाने के लिए कहा जाता है। इन सर्वतोमुखी दिशा-धाराओं में समुचित जागरूकता बरतने पर ही यह लाभ मिलता है, जिसे आत्म परिष्कार के नाम से जाना जाता है। यह हर किसी के लिए सरल, संभव और स्वाभाविक भी है।
साधना करने वाली शकुन्तला ही चक्रवर्ती भरत की माता कहलाने का श्रेय प्राप्त कर सकी। स्वयं मनु और शतरूपा रानी की तपस्या ही उन्हें अवतारों को जन्म दात्री बना सकी।
साधना ही महान लक्ष्यों को प्राप्त करने का अभियान, अनुष्ठान है, जिसे कोई भी सम्पन्न कर विजेता बन सकता है, जब भी कभी राष्ट्र या संस्कृति पर कोई संकट आया है, संघ शक्ति ने उससे मोर्चा लिया व उसे निरस्त किया है। आने वाले समय में भी यही शक्ति मानवता को विभीषिका से उबारेगी।
साधना, स्वाध्याय, संयम सेवा के चार पुरुषार्थ में जीवन की प्रगति एवं सफलता बन पड़ती है इसलिये दिनचर्या में उन चारों के लिए समुचित स्थान रहे, उसकी जाँच-पड़ताल आत्म समीक्षा के समय में निरन्तर करनी चाहिये। आत्मसमीक्षा,, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की चतुर्दिक् प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिए मध्यान्तर काल की मनन साधना करनी चाहिये। इसे आत्मदर्शन ही समझा जाना चाहिये, जो थोड़ी विकसित अवस्था में ईश्वर दर्शन के रूप में फलित होता है।
साधना से मिला था। च्यवन ऋषि जब तप में निरत हुए तो वे सुकन्या जैसी पत्नी, अश्विनी कुमारी जैसे चिकित्सक पा सके और जराजीर्ण शरीर का कायाकल्प करके खोले यौवन को पुनः प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए।
साधना का चौथा चरण है- मनन। यह मध्याह्नोत्तर कभी भी नहीं किया जा सकता है। समय पन्द्रह मिनट हो, तो भी काम चल जायेगा। इसमें अपनी वर्तमान स्थिति की समीक्षा की जाती है और आदर्शों के मापदण्ड से जाँच पड़ताल करने पर जो कमी प्रतीत हो, उसे पूरा करने की योजना बनानी पड़ती है। यही मनन है।
साधना का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए इन पंक्तियों में प्रज्ञा योग नाम से वह विधान प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसके सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में अन्याय, उपचारों की अपेक्षा अधिक सरलता पूर्वक कम समय में अधिक सफलता मिल सकती है।
साधना पद्धति के रूप में उपदिष्ट करते हैं। उन्होंने आत्म-विकास की साधना को तीव्र अभीप्सा, सतत् समर्पण, पूर्ण निवेदन के तीन चरणों के रूप में बताते हुए कहा कि तीव्र अभीप्सा से तात्पर्य हैं “अहं” विसर्जन की लालसा किन्तु अहं विसर्जन तुरंत एकदम नहीं बन पड़ता है। इस प्रक्रिया में सातत्य की आवश्यकता है, जो सतत् समर्पण के द्वारा पूर्ण होती है। इस क्षुद्र अहं पूर्णतया विसर्जित हो जाना ही पूर्ण निवेदन है। यह विसर्जन “स्व” का विराट” में, क्षुद्रता का महानता में हैं।
साधना के बाद तीन सन्तों ने सिद्धि मार्ग में प्रवेश किया। एक ने पानी पर चलने की सिद्धि प्राप्त कर ली, दूसरे ने हवा में उड़ने की। तीसरा गड्ढा खोद कर उसमें बैठने और बिना हवा में जीवित रहने की कला सीख गया।
साधना का समन्वय हो सके तो उसे “सोना और सुगन्ध” के सम्मिश्रण जैसा सुयोग समझा जा सकता है।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले न जोन क्या-क्या कपोलकल्पित मान्यताएँ लेकर आते हैं, साथ ही अपना अहंकार भी। बुद्धि का आवरण भाव सत्ता पर, मन इस तरह छाया होता हैं कि वे कभी “मैं की सीढ़ी को पार ही नहीं कर पाते। भक्त विनयशील होता हैं, समर्पित होता है अतः एक छलाँग में बुद्धि को पार कर जाता है। कोई तर्क नहीं करता। उसका अहं होता ही नहीं क्योंकि मैं की हस्ती मिट जाती है।
साधना में विघ्न डालना उचित न समझा और अपनी सात धाराएँ काट कर उन्हें अपने स्थान पर अवस्थित रहने दिया। इसी लिए भूमि का नाम सप्त सरोवर पड़ा है। जिस स्थान पर गायत्री के ऋषि, महर्षि विश्वामित्र तप करते थे उसी पर शाँति कुँज बना है। हिमालय की प्रतीक देवालय प्रतिमा मात्र भारत वर्ष में इसी एक स्थान पर हैं। प्रायः आधी शताब्दी से जलती आ रही अखण्ड ज्योति की यहाँ स्थापना है, जिसके आलोक में अब तक करोड़ों की संख्या में जप किया जा चुका हैं।
साधना को आत्मबोध कहते हैं। आँख खुलते ही यह भावना करनी चाहिये कि आज अपना नया जन्म हुआ। एक दिन ही जीना है। रात्रि को मरण की गोद में चले जाना है। इस अवधि का सर्वोत्तम उपयोग करना ही जीवन साधना का महान लक्ष्य है।
साधना के थे। पाँडवों का सृजन इन्हीं दो कार्यों के लिए हुआ था। उन्हें जरासंध, कंस, दुर्योधन, शिशुपाल आदि द्वारा फैलाई गई अनीति की निरस्त करना था। साथ ही सिकुड़े हुए अस्त व्यस्त भारत को विशाल बनाने का महाभारत प्रयोजन पूरा करना था। इसके लिए भी प्रचण्ड आत्म शक्ति की आवश्यकता पड़ी।
साधना तपश्चर्या के प्रति लोक निष्ठा का अन्त नहीं हुआ है। स्थापना से लेकर अब तक जितना जप और हवन हुआ है उसे देखते हुए इसे गायत्री तीर्थ का नाम दिया जाना उचित ही है। इतनी नियमित साधना अन्यत्र कहीं भी कदाचित ही नहीं होगी।
साधना से शरीर-क्रिया विज्ञान पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की खोज का कार्य तंत्रिका विशेषज्ञों ने ई.ई.जी., ई.सी.जी., ई.एम.जी., पॉलीग्राफ जैसे आधुनिक उपकरणों के माध्यम से किया है और पाया है कि ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताएँ विकसित हो जाती हैं। लम्बे समय तक ध्यान का अभ्यास करते रहने पर व्यक्ति के मस्तिष्क और शरीर में कई तरह की जैव रासायनिक प्रक्रियायें सक्रिय हो उठती है। कई अवाँछनीय प्रक्रियाएँ तो उसी समय निष्क्रिय हो जाती है। ध्यान की गहराई में उतरने पर चेतन मन की शक्तियों का विकास होता है। फलतः मनुष्य का सम्बन्ध सृजनात्मक बौद्धिकता से जुड़ता और उसी परिणति को प्राप्त होने लगता है।
साधना
साधनात्मक प्रक्रिया भी प्रौढ़ता के स्तर तक पहुँचेगी।
साधना से द्रवित होकर सूर्य, धर्मराज, इन्द्र, पवन आदि इनकी गोदी में खेलने के लिए सहमत हुए थे। पाण्डव ऐसी दिव्य शक्तियों से सम्पन्न थे। अंजनी की साधना ही हनुमान जैसी प्रतापी को जन्म दे सकी। कण्व के संरक्षण में साधना करने वाली शकुन्तला ही चक्रवर्ती भरत की माता कहलाने का श्रेय प्राप्त कर सकी। स्वयं मनु और शतरूपा रानी की तपस्या ही उन्हें अवतारों को जन्म दात्री बना सकी।
साधना अन्यत्र कहीं भी कदाचित ही नहीं होगी।
साधना और परमार्थ परायणता की दिशा में अग्रसर होना पड़ता है। समस्त प्राणियों को अपने ही समान तथा समस्त जगत को परमात्मा का स्वरूप मानने वाले ईश्वर परायण व्यक्ति से कभी भी असंगत, अनुचित अथवा अकरणीय कार्य बन ही नहीं पड़ते।
साधनाएँ सम्पन्न सम्पन्न करते हैं। श्रद्धा के अनुरूप उन्हें प्रतिफल भी प्राप्त होता है।
साधना इस महती प्रयोजन की पूर्ति करती हैं।
साधना को तीव्र अभीप्सा, सतत् समर्पण, पूर्ण निवेदन के तीन चरणों के रूप में बताते हुए कहा कि तीव्र अभीप्सा से तात्पर्य हैं “अहं” विसर्जन की लालसा किन्तु अहं विसर्जन तुरंत एकदम नहीं बन पड़ता है। इस प्रक्रिया में सातत्य की आवश्यकता है, जो सतत् समर्पण के द्वारा पूर्ण होती है। इस क्षुद्र अहं पूर्णतया विसर्जित हो जाना ही पूर्ण निवेदन है। यह विसर्जन “स्व” का विराट” में, क्षुद्रता का महानता में हैं।
साधना-उपासना की आध्यात्मिकता जुड़ी रहने से श्रद्धा संवर्धन का पुट भी लगता रहता है। किसी को ऊब नहीं आती और सभी अगले सत्संग का दिन पहले से ही सोचते रहते है। सत्संग यों तो प्रायः किसी स्थिर सुविधाजनक स्थान पर होते रहते है। पर यदि किन्हीं सदस्यों का आग्रह हो तो उनके घरों पर भी आयोजन किये जाते है। आतिथ्य के रूप में किसी को किसी प्रकार का खर्च करने का प्रतिबन्ध है ताकि सभी गरीब अमीर समान रूप से उस सुविधा का लाभ उठा सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-March
साधना की, अपने को कसौटी पर खरा सिद्ध किया और इस प्रकार समाज में मानवी मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वयं प्रेरणा स्रोत बने, तभी आज युग उनकी जय गाथा गा रहा है।
साधनात्मक अनुशासन को स्वीकार कर नहीं सुनिश्चित भी है।
साधनाएं बताते हैं। शिष्य ने यदि किसी साधना का महात्म्य बढ़-चढ़ कर बता दिया है और उसकी ललक उसी में लगी हुई है तो गुरु के लिए यह आवश्यक नहीं है कि जिसके लिए हठ किया जा रहा है, वही बताने लगें। पात्रता की कमी रहते हुए भी वजन लाद देना या हिमाच्छादित पर्वतों का मार्ग बता देना दोनों के लिए हानिकारक ही सिद्ध होता है। दोनों ही अपयश पाते है।
साधनाओं का प्रचलन रहा है। पुस्तकों में उन सभी का वर्णन है कुछ साधनाएं ऐसी भी है, उनका गुरु परम्परा से प्रचलन चला आता है। उनका पुस्तक के रूप में कही उल्लेख नहीं हुआ है। विशेषतया ताँत्रिक साधनाओं का क्रम तो ऐसा ही है, जो परम्परागत चला आता है। गुरु-शिष्यों में से कोई पढ़ा लिखा नहीं होता, फिर उन्हें गोपनीय रखने का प्रतिबंध भी है।
साधना ही जानती है।
साधना का महात्म्य बढ़-चढ़ कर बता दिया है और उसकी ललक उसी में लगी हुई है तो गुरु के लिए यह आवश्यक नहीं है कि जिसके लिए हठ किया जा रहा है, वही बताने लगें। पात्रता की कमी रहते हुए भी वजन लाद देना या हिमाच्छादित पर्वतों का मार्ग बता देना दोनों के लिए हानिकारक ही सिद्ध होता है। दोनों ही अपयश पाते है।
साधना है। शीत कम को सहन शक्ति की सीमा तक सहन करना भी इसी का व्रत गिना जाता है। थोड़ी सर्दी लगती ह रहे, थोड़ी सदी अपना प्रभाव डालती रहे, ऐसी तितिक्षा भी मनोबल .... है। जूते न पहनना, बाल बढ़ा कर सौंदर्य प्रदर्शन के संदर्भ में मन मारना भी ऐसा ही साहस है। ऐसे छोटे छोटे .... थोड़ी थोड़ी अवधि के लिए यदि एक एक करे किये जाते रहे तो उनके पूरा होते रहने पर मन की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है और वह भौतिकता के आकर्षण में बहते जाने जैसे दुर्बल स्थिति में नहीं रहता।
साधना है, उससे मनुष्य का भौतिक जीवन हर दृष्टि से प्रगतिशील बनता है और सुखी समुन्नत बनता है।
साधनारत रहते है। कभी कभी इन साधकों में कुछ सम्पन्न जन भी होते है। वे प्रेरणा पाने पर इन्हीं कुटीरों के इर्द-गिर्द कोई देवालय बना लेते है। कालान्तर में वह किसी पुरातन कथा गाथा के साथ जुड़ जाता है। दर्शनार्थी आने लगते है और भूमि का, भवन का, परिकर का विस्तार होने लगता है।
साधना बढ़ते बढ़ते सिद्धि स्तर तक पहुँच सके।
साधना को संयम कहते है। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम, यह प्रत्यक्ष जीवन की चार तपश्चर्याएं है, जो प्रत्यक्ष जीवन का परिशोधन करती है। व्यक्ति यदि इन्द्रियों को काबू में रखे, विशेषतया जीभ और जननेन्द्रिय का व्यतिरेक न होने दे तो उसकी जीवनी शक्ति घटेगी नहीं, न दुर्बलता न रुग्णता उसे हैरान करेगी। अकाल मृत्यु भी न मरना पड़ेगा। इसी प्रकार अर्थ संयम बरतने वाले आदमी से कम खर्च का बजट बना कर चलने वाले, सादा जीवन, उच्च विचार की नीति अपनाने वाले आर्थिक तंगी नहीं भुगतने और न किसी के ऋणी होते है।
साधना की सफलता इसी रूप में आँकते हैं कि इन्हें छवि की झाँकी हो जाए। हो भी ऐसा ही जाता है। कभी कभी चलती-फिरती धुँधली-सी इष्ट कल्पना से मिलती-जुलती छवियाँ दीख भी पड़ती है। भक्त जन इतने से भी अपनी बिगड़ती बात बना लेते हैं। स्वल्प सन्तोष भी डूबते के लिए तिनके का सहारा बन जाता है।
साधना सबसे उत्तर शासन हैं यदि इससे स्वयं पर अधिकार और नियंत्रण पा सको, तो हर प्रकार से कल्याण ही होगा। इस राह पर लोगों को ले जाने के लिए उनने स्वयं आत्मा साधना की, अपने को कसौटी पर खरा सिद्ध किया और इस प्रकार समाज में मानवी मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वयं प्रेरणा स्रोत बने, तभी आज युग उनकी जय गाथा गा रहा है।
साधना से ही बन पड़ता है।
साधनाएं इस दृष्टि से होती रही है कि अन्तराल में समाहित प्रसुप्त शक्तियों का जागरण संभव हो सके। दिव्य वातावरण मिलता रह सके और उस भूमि की उर्वरता में उनका व्यक्तित्व बीच रूप में समुन्नत होते होते समर्थन सम्पन्न हो सके। साधना बढ़ते बढ़ते सिद्धि स्तर तक पहुँच सके।
साधना करनी पड़ती है। वह संकल्प बल की स्थिति सुदृढ़ न हो तो कुसंस्कारों से पीछा छूटता ही नहीं और उत्कर्ष की कल्पना कार्यान्वित होने के स्तर तक पहुँचती ही नहीं अस्तु साधना क्षेत्र में कारगर प्रगति करने के लिए संकल्प शक्ति को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया से कार्यारंभ करना होता है।
साधना के उपरान्त आपने क्या पाया।
साधनाओं के लिए मात्र कर्म काण्ड ही सब कुछ नहीं है। उसके लिए प्रयुक्त वातावरण भी चाहिए। बीज कितना ही उत्तम क्यों न हो, पर उसे विकसित, पल्लवित होने का अवसर तभी मिलता है जब भूमि उपजाऊ हो। खाद, पानी की व्यवस्था हो और देख रेख करने वाले व्यक्ति का संरक्षण मिले। विशेष क्षेत्र में विशेष प्रकार के फल, शाक, अन्न, वृक्ष वनस्पति, जीव जन्तु आदि जन्मते हैं।
साधना वर्ग के दो प्रयोजन ही कार्यान्वित करने होते है। एक तप दूसरा योग। इसके दार्शनिक और क्रियापरक कितने ही स्वरूप है। अपनी स्थिति और सुविधा के आधार पर उनमें से इस विषय में रुचि लेने वाले अपने लिए मार्ग चयन करते है। तत्परता, तन्मयता अपना कर संकल्प पूर्वक अभीष्ट लक्ष्य की ओर साहसिक प्रयास करते है।
साधना की जाए। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम विचार संयम की चार कसौटियों पर अपने को खरा सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाए। ऐसा करने पर ब्राह्मणोचित जीवन जी सकना सरल और सन्तोषप्रद बन जाता है। न्यूनतम में शरीर यात्रा चलाने की योजना बनाने पर फिर हर किसी के पास इतना समय श्रम कौशल और साधन शेष बच जाता है। जिसे जनहित के परमार्थ में लगाया जा सके।
साधनाएं ऐसी भी है, उनका गुरु परम्परा से प्रचलन चला आता है। उनका पुस्तक के रूप में कही उल्लेख नहीं हुआ है। विशेषतया ताँत्रिक साधनाओं का क्रम तो ऐसा ही है, जो परम्परागत चला आता है। गुरु-शिष्यों में से कोई पढ़ा लिखा नहीं होता, फिर उन्हें गोपनीय रखने का प्रतिबंध भी है। आदिवासियों में ऐसी विलक्षण देवी, देवताओं की मान्यताएं और पूजा की विधियाँ चलती है, जिनका पुस्तक रूप में कहीं वर्णन नहीं हुआ है।
साधना के रूप में अपनाना पड़ता है। स्वाध्याय-सत्संग से सद्विचार तो उठते है और सद्भाव भी उभरते है पर उन्हें प्रत्यक्ष परिपोषण न मिलने से समुन्नत चिन्तन पोषण के अभाव मुरझाते सूखते ही जाता है। इस अड़चन से निपटने के लिए छोटी छोटी दिक्षाएं अपनाने और उन्हें पूरा करते रहने का सिलसिला चलाया जाना चाहिए। तितिक्षाएं प्रमुखतया आदर्शवादी साहसिकता को उभारने के लिए ही की जाती है।
साधनाओं की संख्या असीम है। विभिन्न धर्मों देशों, कालों में विभिन्न प्रकार की साधनाओं का प्रचलन रहा है। पुस्तकों में उन सभी का वर्णन है कुछ साधनाएं ऐसी भी है, उनका गुरु परम्परा से प्रचलन चला आता है। उनका पुस्तक के रूप में कही उल्लेख नहीं हुआ है। विशेषतया ताँत्रिक साधनाओं का क्रम तो ऐसा ही है, जो परम्परागत चला आता है।
साधनाओं का नन्दनवन चरित्र निष्ठा की उर्वरा भूमि पर ही फलता फूलता है।
साधना को सिद्धि में बदलने में अधिक सफलता प्राप्त करते देखे गए है।
साधनाओं के माध्यम से उसी का उन्नयन किया जाता है। देवताओं के माध्यम से उसी का उन्नयन किया जाता है। देवताओं की प्रतिमाओं में कई बार उनके तीन नेत्र दिखाये जाते है। शिव और शक्ति की प्रतिमाओं में यह अंकन विशेष रूप से होना है। शिव द्वारा तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को जला देने की कथा प्रसिद्ध है।
साधना करनी पड़ती है। आरम्भ में यत्किंचित सफलता ही मिलती है। पर निरंतर लगे रहने पर अभ्यास न छोड़ने पर उस प्रयोग की सफलता सुनिश्चित हो जाती है। नींच को समय पर बुला सकना इस आधार पर संभव हो जाता है। इसके अतिरिक्त दिन में कई बार इस प्रयोग को करते हुए थकान से छुटकारा पाया जा सकता है और कई स्फूर्ति का लाभ लिया जा सकता है।
साधना अपनाने पर जो दूसरों से कहा जा रहा है। उसे स्वयं करने के लिए भी दबाव पड़ता है। सेवा धर्म अपनाने वाले जिस प्रकार की शिक्षा दूसरों को देते है। उसका अनुकरण उन्हें स्वयं भी करना पड़ता है। न करें तो उपहास होता है।
साधना के सम्बन्ध में भी है। लक्ष्य एक ही है- भगवान की प्राप्ति। आत्मा और परमात्मा का संयोग। पर उनके लिए योगाभ्यासों की कई विधियाँ और क्रिया-प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इससे साधक की रुचि, क्षमता, श्रद्धा, भावना, शारीरिक और मानसिक स्थिति, अवगत परम्परा आदि अनेकों बातों का ध्यान रखना पड़ता है।
साधना क्षेत्र में कारगर प्रगति करने के लिए संकल्प शक्ति को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया से कार्यारंभ करना होता है।
साधनाओं का क्रम तो ऐसा ही है, जो परम्परागत चला आता है। गुरु-शिष्यों में से कोई पढ़ा लिखा नहीं होता, फिर उन्हें गोपनीय रखने का प्रतिबंध भी है। आदिवासियों में ऐसी विलक्षण देवी, देवताओं की मान्यताएं और पूजा की विधियाँ चलती है, जिनका पुस्तक रूप में कहीं वर्णन नहीं हुआ है। इसी प्रकार अफ्रीकी देशों में हवशी और उनके पुरोहित नर बलि से लेकर अनेक प्रकार के अभिचार करते रहते हैं। वे किसी को लाभ तो नहीं पहुँचा सकते, पर गुह्य तांत्रिक अभिचारों के आधार पर हानि अवश्य पहुँचा देते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-August
साधना में नियोजित करना होता है। पुण्य परमार्थ की ओर बढ़ चलने के लिए प्रोत्साहित करने वाली योजना एवं क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित करना होता है। उसे संयम और उदारता का समन्वय भी कह सकते है।
साधना का माहात्म्य तथा तत्वदर्शन समझाते हुए बताया है कि जिस प्रकार क ख ग घ से अक्षरारम्भ करते हुए तत्वज्ञान प्राप्त हो जाता है।
साधना एक साथ सम्पन्न होती है। इसी में देव साधना, ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष, जीवन लक्ष्य, सर्वतो मुखी प्रगति विकास उल्लास की समस्त तत्वों का समावेश हैं।
साधना, ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष, जीवन लक्ष्य, सर्वतो मुखी प्रगति विकास उल्लास की समस्त तत्वों का समावेश हैं।
साधना में लगे रहते थे। स्वर्ग-मुक्ति उनका लक्ष्य था। पर विश्वामित्र के मन में तो जन-कल्याण ही भरा हुआ था। वे अपने को भूल चुके थे। त्याग मात्र साँसारिक सुखों का ही नहीं किया था वरन् आत्मिक उत्कर्ष की बात भी उन्हें जाँची नहीं।
साधनाओं के द्वारा आत्मशोधन तथा आत्मपरिष्कार के माध्यम से उन्हें विकसित किया जाना सम्भव है। व्यष्टि मन द्वारा विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त परम चेतना से तादात्म्य स्थापित करना और अनेकों लौकिक समस्याओं का समाधान खोज लेना, कष्ट कठिनाइयों की पूर्व सूचना प्राप्त कर लेना भी सम्भव है।
साधना में रोगी “आत्म सम्मोहन” का अभ्यास करता है तथा यह भावना करता है कि उसका मन शान्त, संतुलित और स्वस्थ हो रहा है। दूसरे चरण में उसे रोग ग्रस्त स्थान पर ध्यान धरने को कहा जाता है। जिसे वह प्रबल भावना का आरोपण करता है कि शरीर के श्वेत रक्त कण रोग ग्रस्त क्षेत्र में एकत्र हो रहे हैं तथा रुग्ण कोशिकाओं को शरीर से बाहर निकाल रहे हैं। प्राण ऊर्जा का भण्डार जमा हो रहा है और उस स्थान की कोशिकाओं को प्राणवान बना रहा है। रोगियों को सदैव प्रसन्नचित रहने तथा जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण अपनाए रखने का ही निर्देश दिया जाता है।
साधना और शिक्षण चलाना चाहिए। पर वैसा कुछ नहीं होता। देव दर्शन और पूजापरक कर्मकाण्डों के सहारे दक्षिणा बटोरने की धुन भर लगी रहती है। देवताओं के एजेन्ट स्वरूप में अपने को प्रस्तुत करके भावुकजनों का सहज lEeku Hkh izkIr djrs gSA bu mHk; i{kh; ykHkksa dks NksM+ dj yksd eaxy dh lsok lk/kuk esa u iqjksfgr oxZ yx jgk gS vkSj u lk/kq leqqnk; dk gh mruk /;ku gS ftruk gksu pkfg,A /kkfeZdtuksa dh nso iwtk ds ihNs euksdkeuk iwfrZ dh bPNk dks?kVk;k gVk;k tkuk pkfg, vkSj /keZ /kkj.kk ls uhfr fu/kkZj.k,oa lekt lsok dks izfrf"Br fd;k tkuk pkfg,A
साधना में क्रिया-कृत्यों की तुलना में भावना एवं संकल्प का महत्व अधिक है। साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचें हुए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़ता पूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को-प्राणाग्नि को अपने प्रचण्ड आघातों से जगा रहा है। प्रहार के उपरान्त प्राण को सूर्य नाड़ी पिंगला द्वारा वापस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता को प्रकाशित, अलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
साधना की उच्चतम अनुभूतियों को प्राप्त करने वाले कोरे रहस्यवादी मात्र नहीं रहे। उन्होंने अपने अनुभवों की तर्क सम्मत बौद्धिक व्याख्या भी प्रस्तुत की है। धर्मकीर्ति, गौड़पाद, श्रीहर्ष, कुमारिल आचार्य शंकर, श्री अरविन्द की कृतियाँ इस बात का प्रमाण है। डॉ. एस. के. मैत्र के शब्दों में यहाँ का दर्शन तथ्यों की आलोचना नहीं बल्कि मानव अनुभूतियों को भी सन्तुष्ट करता है। साथ ही यह व्याख्या पूरी तरह से वैज्ञानिक एवं युक्ति सम्मत है।
साधना करता हैं वह उन आकाश स्थित सात तारागणों की श्रृंखला के रूप में चमकने वाले अमर सप्तऋषियों की तरह ब्रह्मवर्चस सम्पन्न बनता हैं श्रद्धा−विश्वास पूर्वक की गई गायत्री की उच्चस्तरीय साधना इस संदर्भ में सुखदायी सत्परिणाम प्रस्तुत करती है।
साधना आिर उपचार वनौषधि चिकित्सा से साधकों की क्रिया प्रणाली में क्या-क्या परिवर्तन आया। अब साधकों को चिकित्सा परामर्श उसी के द्वारा दिया जाएगा।
साधनाक्रम में तीनों का समावेश साथ-साथ किन्तु क्रमिक रूप से करना पड़ता है। इस समग्र साधन को ग्रंथिभेद कहते है। इसमें नाभि, हृदय और ब्रह्मरंध्र के अतिरिक्त तीनों कमलों की मुंदी हुई प्रसुप्त स्थिति में उबारकर जाग्रति में परिणत करना होता है। मुँदी कलियों को खिले हुए कमलों के स्तर तक पहुँचाना होता है। इसके लिए प्रातः कालीन सूर्य सविता की ऊर्जा को ध्यान धारणा द्वारा तीनों शरीरों में उनके प्रतीक केन्द्रों में ओत−प्रोत करना होता है।
साधना के साथ पूरी तरह से सम्बन्धित है। कुसंस्कार कौरव दल से किसी भी कीमत में कम नहीं। ये निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे तथा वातावरण में घुसी अवांछनीयता से उद्दीप्त हो भड़कते है। जिस तरह से कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा।
साधना ठीक प्रकार कर सके तो उससे जैसी भी, जिस प्रकार की भी राग-रागिनी को बनाने, सुनने-सुनाने की आवश्यकता हो उसकी पूर्ति इसी माध्यम से पूरी की जा सकती है।
साधना का मूल उद्देश्य इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के साथ प्रचण्ड संघर्ष खड़ा कर देना है। जिस महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ने सम्मिलित भूमिका निभाई थी, वह आत्म परिष्कार में योग साधना के साथ पूरी तरह से सम्बन्धित है। कुसंस्कार कौरव दल से किसी भी कीमत में कम नहीं। ये निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे तथा वातावरण में घुसी अवांछनीयता से उद्दीप्त हो भड़कते है। जिस तरह से कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी।
साधना, इत्यादि में चित्त की वृत्तियों की निरोध प्रक्रिया द्वारा मनुष्य अनेकों अलौकिक क्षमताएँ और दिव्य शक्तियाँ हस्तगत कर सकता है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, भूत-भविष्य का ज्ञान जैसी विलक्षण उपलब्धियों का उद्भव भी सम्भव है। मनीषियों के अनुसार-कितनों को अणिमा, लघिमा, गरिमा जैसी ऋद्धियाँ सिद्धियाँ भी हस्तगत होती है। कुछ लोग इन्हें कल्पना लोक की उड़ान कहते है। किन्तु अनेकों ऐसे उदाहरण यह सिद्ध करते है कि अतीन्द्रिय सामर्थ्य एक तथ्य पूर्ण सत्य है।
साधना से संभव होता है। तन्त्र कौमुदी में कहा भी गया है कि “मूलाधार से लेकर ब्रह्मरंध्र तक विस्तृत षट्चक्र जिसके अवगाहन से जागरण होता है उसे गायत्री कहते है। “इसकी उपासना से सहस्रार सहित सभी चक्रों और पंकरघ्शों की साधना एक साथ सम्पन्न होती है। इसी में देव साधना, ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष, जीवन लक्ष्य, सर्वतो मुखी प्रगति विकास उल्लास की समस्त तत्वों का समावेश हैं।
साधनाएँ प्रचलित है। पर उनका वर्गीकरण किया जाय तो सभी को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। जप, ध्यान और प्राणायाम। इन्हीं त्रिविध आधारों के भेद-उपभेद अनेकानेक साधनाओं का स्वरूप विनिर्मित करते है। उन्हें समेटा-सिकोड़ा जाय तो फिर वे तीन में सिकोड़ा भी जा सकता है।
साधना किये बिना अभीष्ट सफलता का ना सकने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपने को योग्य बनकर पूरे संकल्पना के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ना होगा। मार्ग में आने वाली बाधाओं का, यह मानकर स्वागत करना होगा कि वे हमारे साहस, निश्चय और संकल्प की परीक्षा लेने आई हैं। कठिनाइयों को देखकर भयभीत होने के स्थान पर उन्हें दूर करने के लिए जीजान से जुट जाना होगा। इस प्रकार पूरे समारोह और साहस के साथ लक्ष्य की ओर अभियान करने पर सफलता की आशा की जा सकती है।
साधना का आश्रय लेकर जन-जन तब पहुँचा जाय, इसका शिक्षण जिन स्लाइडों व वीडियो फिल्मों द्वारा किया जाएगा, वे बन कर तैयार है। यह अंक पाठकों के हाथों में पहुँचने तक सह अभिनव सत्र आरंभ हो चुके होंगे।
साधना एवं वह पुरुषार्थ जो “जीवो ब्रहैवनापरः” की उक्ति सार्थक कर दिखाता है।
साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है। प्रिय परिजनों से बिछुड़ जाने पर जितना कष्ट होता है उतना अन्यत्र कहीं भी कभी नहीं होता। आत्मा के अपनी परम प्रिय परब्रह्म-परमसत्ता से विलग होने पर अहर्निशि पग-पग पर कुकर्म घेरते है और शोक सन्तोष दुःख देते है।
साधनाओं का स्वरूप विनिर्मित करते है। उन्हें समेटा-सिकोड़ा जाय तो फिर वे तीन में सिकोड़ा भी जा सकता है। इसके अतिरिक्त और कोई ऐसा प्रयोग नहीं है जिसे इस परिधि से बाहर किया जा सके।
साधना का प्रयोजन पूरा नहीं होता। आत्मिक प्रगति के लिए मात्र चित्त निरोध और चित्त वृत्तियों के निरोध का अन्तर प्रत्येक विचारशील के मन-मस्तिष्क में स्पष्ट रहना चाहिए।
साधना संभव बन पड़ेगा।
साधना का योजनाबद्ध समन्वय है।
साधना शास्त्रों में की गई उसमें प्रत्येक के सात-सात विवरण दिये गये है (1) तत्व बीज (2) वाहन (3) अधिदेवता (4) दल (5) यन्त्र (6) शब्द (7) रंग। इन्हीं विशेषताओं की भिन्नता से उनके अलग विभेद किये गये है। अन्यथा बाहर से तो उनकी आकृति एक जैसी ही है। उनकी क्षमताओं, विशेषताओं प्रतिक्रियाओं का विवरण इन्हीं सात संकेतों के रूप में समझा जा सकता है।
साधना का रसास्वादन।
साधना इस संदर्भ में सुखदायी सत्परिणाम प्रस्तुत करती है।
साधना के लिए उपयुक्त कितने स्थान थे। उन्हें तीर्थ कहते थे। तीर्थ हर क्षेत्र में थे। ताकि समीपवर्ती लोग सरलतापूर्वक पहुँच सके और वातावरण का मार्ग दर्शन का समस्याओं के समाधान करके परामर्श का समुचित लाभ उठा सकें। तीर्थों में बच्चों के लिए गुरुकुल, गृहस्थों के लिए आश्रम,प्रौढ़ों के लिए वानप्रस्थ आरण्यकों की व्यवस्था रहती थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-January
साधना नियमित नहीं चल रहीं है, वे उसे सुनियोजित कर लें। जो नियमित रूप से कर रहें है वे उसमें कुछ और वृद्धि कर लें। सूर्योदय का समय न चूकें। भले ही स्नानादि न कर पाने के कारण मौन मानसिक रूप से ही क्यों न करना पड़े? जप के साथ उगते स्वर्णिम सूर्य का ध्यान करना चाहिए।
साधना पूरी हो गयी। समस्त आत्म साधनाओं की चरम परिणति यही है कि व्यक्ति का अन्तःकरण रसमय हो जाय, आनन्द से ओत-प्रोत हो जाय। यही है वह रत्नाकर, जिसके मंथन से पौराणिक गाथाओं के अनुसार असाधारण शक्ति सम्पन्न चौदह रत्न निकले थे। श्रद्धा की गरिमा उससे ऊँची है। उसके गर्भ से चौदह लाभ-किरण पारस, कल्पवृक्ष, और अमृतघट भी निकल सकते है।
साधना के आधार पर हुआ था।
साधना प्रक्रिया भी जुड़ी रहती थी। साधना प्रक्रिया में संयुक्त होकर ही उच्च स्तरीय प्रशिक्षण भावना क्षेत्र में उतरता है और जीवन में चरितार्थ होने की स्थिति में पहुँचता है। इस दुहरी प्रक्रिया को सम्पन्न करा सकने में समर्थ थे वे आश्रम, वे शिक्षण संस्थान जिन्हें तीर्थ प्रक्रिया की जीवन-प्राण सार तत्व कहा जा सकता है।
साधनाक्रम तो पूर्ववत् रहेगा। पर नव निर्धारण की नूतन प्रक्रिया से परिचित कराने और उस संदर्भ में आवश्यक मार्ग दर्शन करने की बात भी अतिरिक्त रूप से जोड़ी गई है।
साधना सत्रों में उपलब्ध होती है।
साधना।
साधना और प्रबल पुरुषार्थ को दिशाबद्ध रखने का प्रतिफल है। जबकि बात दूसरी है। शरीर ही प्रत्यक्षतः सारे क्रियाकृत्य करते दीखता है, पर सूक्ष्मदर्शी जानते है कि यह उसके भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान प्राण चेतना का प्रतिफल है। जिन्हें मिशन के सूत्र संचालक की सराहना करने का मन करें उन्हें एक क्षण रुकना चाहिए और खोजना चाहिए कि क्या एकाकी व्यक्ति बिना किसी अदृश्य सहायता के लंका जलाने, पहाड़ उखाड़ने और समुद्र लाँघने जैसे चमत्कार दिखा सकता है। उपरोक्त घटनाएँ हनुमान के शरीर द्वारा भले ही सम्पन्न की गई हो; पर उनके पीछे राम का अदृश्य अनुदान काम कर रहा था।
साधनात्मक पुरुषार्थ चला। योगविज्ञान की अनेक शाखा-प्रशाखाओं का अनुभव अभ्यास एवं प्रतिपादन किया। विश्व के अनेकानेक साधना विधान पातंजलि के सूत्रों की व्याख्या स्वरूप प्रकट हुए है।
साधना उपचारों वनौषधि सेवन अग्निहोत्र शब्द शक्ति एवं नादब्रह्म का क्या प्रभाव मनुष्य के सूक्ष्म संस्थान पर पड़ रहा है यह मंत्र पर देखा जा सकता है। चारों चैनल पर ई ई जी भी लिया जाता है साथ ही त्वचा का प्रतिरोध, मनोभावों का त्वचा विद्युत पर प्रभाव (जी. एस. आर.) मापन भी इससे किया जा सकता है। अलग से दो इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम मशीनें और है जिसके द्वारा माँनीटर पर हृदय विद्युत एवं कार्यक्षमता का व्यायाम शिथिलीकरण एवं ध्यानस्थ स्थिति में आकलन किया जाता हैं .... फोटोग्राफी द्वारा न्यूरान्स तथा अन्यान्य जीव कोशों में विद्यमान डी.सी. पोटेन्शियल्स को नापने की व्यवस्था भी संस्थान में शीघ्र की जा रही है।
साधना से हरितिमा से भरी पूरी उर्वर भूमि बनायें।
साधना करनी पड़ती है और दूसरे समर्थ लोगों का आश्रय भी लेना पड़ता है। इसके लिए उपयुक्त वातावरण और व्यक्ति की मनःस्थिति परिस्थिति के अनुरूप उपयुक्त मार्गदर्शन भी चाहिए। इससे कम में यह सम्भव नहीं कि किसी को अनगढ़ से सुसंस्कृत बनाया जा सके। गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से परिष्कृत स्तर का बनाया जा सकें। इसके लिए आत्म-सत्ता की .... को नये सिरे से सुधारने और सुविकसित करने की आवश्यकता पड़ती है।
साधना के भण्डार से इतना अनुदान मिलता है, कि परिष्कृत जीवन जी सकने के लिए आवश्यक बल और साहस मिल सके। यह शुभारम्भ ऐसा है, जिससे अतीन्द्रिय क्षमता का अवरुद्ध द्वार खुलता है, मूर्च्छित विभूतियों का जागरण सम्भव होता है, अपेक्षाकृत अधिक दूरदर्शी, अधिक विवेकशील बनने का सुयोग उपलब्ध होता है। नित्य गंगा स्नान बन पड़े, तो गंगा तट के पुण्य वातावरण में टहलने, बैठने, आचमन करने में कुछ अड़चन रहती ही नहीं। हिमालय के रूप में प्रकृति शिव का दर्शन तो आँखों के सामने घूमता ही रहता है। ऐसे स्थान पर ही बना है- शान्ति कुंज आश्रम।
साधना प्रशिक्षण दस-दस दिनों के खण्डों में पूरे वर्ष भर चलता है और उसे सदा-सर्वदा जारी रखने का योजनाबद्ध चिरस्थायी निर्धारण है। सरकारी कर्मचारियों के लिए संस्थागत कार्यकर्ताओं के लिए प्रायः एक-एक सप्ताह के प्रशिक्षण शिविर अलग से लगते है। उसके लिए निवास भोजन, प्रवचन कक्ष आदि की सुव्यवस्था इसके अतिरिक्त रखी गई है। वह धारा भी इन दो वर्षों में आशाजनक सत्परिणाम लेकर बहती रही है। योजना यह है कि समस्त भारत के सत्ता-सम्पन्नों को इसी प्रकार अगले बीस वर्ष तक कर्तव्यनिष्ठ और लगन भरी ईमानदार सेवासाधना का पाठ पढ़ाते हुए उनकी क्षमता एवं प्रतिभा को बढ़ाते हुए नवसृजन में महती भूमिका निभाने के लिए कटिबद्ध किया जाय।
साधना का सम्बल भी। शरीर परिवर्तन की बेला आते ही यों तो हमें साकार से निराकार होना पड़ेगा; पर क्षण भर में उस स्थिति से अपने को उबार लेंगे और दृश्यमान प्रतीक के रूप में उसी अखण्ड दीपक की ज्वलन्त ज्योति में समा जायेंगे, जिसके आधार पर अखण्ड-ज्योति नाम से सम्बोधन अपनाया गया है। शरीरों के निष्प्राण होने के उपरान्त जो चर्म चक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे, वे इसी अखण्ड-ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे। दो शरीर अब तक द्वैत की स्थिति में रहे है। भविष्य में दोनों की सत्ता एक में विलीन हो जायगी और उसे तेल-बाती की पृथक सत्ताओं की एक ही लौ में समावेश होने की तरह अद्वैत रूप में गंगा-यमुना के संगम रूप में देखा जा सकेगा।
साधनाओं में जप और ध्यान प्रधान है। उनके साथ कई प्रकार की संयम-साधनाएँ-तपश्चर्याएँ भी जुड़ती है।
साधनाओं से समन्वित कर मानसोपचार कर पाना भी सम्भव है। आधुनिक यंत्रों के प्रयोगों द्वारा प्रत्यक्ष यथासम्भव तथा परोक्ष रूप से तर्कों एवं प्रतिपादनों के माध्यम से यह प्रमाणित करने का प्रयास यहाँ किया गया है कि मानवी–काया में सन्निहित अभूतपूर्व सम्भावनाओं विलक्षण क्षमताओं को ध्यानयोग-.... एवं क्रियायोग की विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा जगा पाना सम्भव है। योग साधना एवं तप .... के साथ जुड़े विभिन्न तथ्यों जिनका वर्णन शास्त्रों में होता रहा है का वैज्ञानिक अनुसंधान एवं उपलब्ध यंत्रों द्वारा प्रत्यक्षीकरण इसी शोध श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। इस प्रयोजन हेतु सूक्ष्म शरीर की महता बनाने वाले प्रभामण्डल अदृश्य किन्तु प्रभावशाली प्राण विद्यूत्परिकर को किसी सीमा तक विज्ञान सम्मत ढंग से प्रमाणित किया जा सकता है यह ब्रह्मवर्चस की शोध का महत्वपूर्ण अंग है।
साधना की तपश्चर्या की निर्धारण है। इस हेतु एक समय भोजन किया जाता है। भोजन आश्रम के भोजनालय में ही बनता है। यह परम सात्विक होता है। जिह्वा पर अंकुश रखने से इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम का द्वार खुलता है।
साधना उसी प्रेरणा के प्रोत्साहन पर बन पड़ती है। नर-पशु को देव मानव बनाने में धरती पर रहते हुए स्वर्गीय आनन्द लेने में इसी की प्रमुख भूमिका रहती है। इसलिए होना यह चाहिए था कि जीवन विज्ञान की संजीवनी विद्या की साँगोपाँग शिक्षा के लिए तीन चौथाई साहित्य का सृजन होता और शेष एक चौथाई मनचले लोगों के लिए छोड़ दिया जाता।
साधना से जन-चेतना उभारने सत्प्रवृत्तियों के उद्यान लगाने, दुष्प्रवृत्तियों के विष वृक्षों को उखाड़ने की श्रद्धा ही इन्हें अहर्निश अपने-अपने हिस्से का काम निपटाने में लगाये रहती है। यह सभी अपने-अपने घरों की सुसम्पन्नता छोड़कर आये है। इनमें से कितने ही उच्च पदाधिकारी और सफल व्यवसायी रहे है। शिक्षा की दृष्टि से उन्हें जनसाधारण की तुलना में कहीं ऊँचा ठहराया जा सकता है। प्रस्तुत जीवनदानियों में प्रायः आधे से ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट स्तर के है।
साधना कठिन है, पर मनुष्य रूप में अवतरित हुए ऋषियों का जीवित होने पर स्थूल शरीर और दिवंगत होने पर उनका सूक्ष्म शरीर ओर भी अधिक समर्थता के साथ काम करता रहा है। इतिहास साक्षी है कि देवात्माओं के अनुदान मनुष्यों को ऋषियों के माध्यम से ही उपलब्ध होते रहे है। इसीलिए गुरु को गोविन्द से भी बढ़कर माना गया है। वस्तुतः ऋषि परम्परा ही अविनाशी गुरु सत्ता है। उसी को ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उपमा दी जाती रही हैं।
साधनाएँ है जो अन्तःकरण की गहराई में जमे कुसंस्कारों को उखाड़ने के साथ-साथ उस भूमि में सुसंस्कारों का उत्पादन अभिवर्धन करती है। साधनाओं में जप और ध्यान प्रधान है। उनके साथ कई प्रकार की संयम-साधनाएँ-तपश्चर्याएँ भी जुड़ती है।
साधना प्रक्रिया में संयुक्त होकर ही उच्च स्तरीय प्रशिक्षण भावना क्षेत्र में उतरता है और जीवन में चरितार्थ होने की स्थिति में पहुँचता है। इस दुहरी प्रक्रिया को सम्पन्न करा सकने में समर्थ थे वे आश्रम, वे शिक्षण संस्थान जिन्हें तीर्थ प्रक्रिया की जीवन-प्राण सार तत्व कहा जा सकता है।
साधना का पाठ पढ़ाते हुए उनकी क्षमता एवं प्रतिभा को बढ़ाते हुए नवसृजन में महती भूमिका निभाने के लिए कटिबद्ध किया जाय।
साधना उपचारों के पूर्व एवं बाद मापन किये जाने एवं हर साधक को अनुकूल साधनाएं एवं वनौषधि सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है।
साधना का खाद पानी नियमित रूप से मिलना चाहिए। अखण्ड-ज्योति जहाँ दार्शनिक स्तर पर पुण्य-परमार्थ के पक्षधर तर्क तथ्य, प्रमाण उपस्थित करती रहीं है वहाँ उसने “अपनों से अपनी बात” शीर्षक के अंतर्गत प्रत्येक संबंधित व्यक्ति का इस हेतु भी उकसाया गया है कि वह समयदान अंशदान को आवश्यक नित्य कर्मों में सम्मिलित करे ओर जनमानस के परिष्कार को-सत्प्रवृत्ति संवर्धन को अनिवार्य धर्म कर्तव्यों की तरह जीवन-चर्या में सम्मिलित करे। शरीर और परिवार तक ही सीमित न रह कर समाज की हित साधना में भी बढ़-चढ़ कर योगदान दे।
साधना सत्रों का एक विभाग ऐसा भी है जिसमें विशेषज्ञों द्वारा शिविरार्थियों की अंतरंग स्थिति को बहुमूल्य उपकरणों द्वारा जाँचा परखा जाता है। उसी जानकारी के आधार पर उसे यह बताया जाता है कि अमुक से छुटकारा पाने के लिए उसे क्या करना चाहिए। उपचार की दृष्टि से क्या उपाय अपनाना ठीक रहेगा?
साधना एवं तप .... के साथ जुड़े विभिन्न तथ्यों जिनका वर्णन शास्त्रों में होता रहा है का वैज्ञानिक अनुसंधान एवं उपलब्ध यंत्रों द्वारा प्रत्यक्षीकरण इसी शोध श्रृंखला को आगे बढ़ाता है। इस प्रयोजन हेतु सूक्ष्म शरीर की महता बनाने वाले प्रभामण्डल अदृश्य किन्तु प्रभावशाली प्राण विद्यूत्परिकर को किसी सीमा तक विज्ञान सम्मत ढंग से प्रमाणित किया जा सकता है यह ब्रह्मवर्चस की शोध का महत्वपूर्ण अंग है।
साधना-सत्रों के बौद्धिक प्रशिक्षण में समाविष्ट किया गया है।
साधना सत्र निरन्तर चलते है। 1 से 9, 11 से 19, 21 से 29 का क्रम हर महीने चलता है। इन्हें जीवन साधना सत्र कहते है। जीवन विद्या ही पुरातन काल की संजीवनी विद्या है। इसमें शरीर तो पूर्ववत ही रहता है।
साधना के पूर्व बाद में मान कर तुलनात्मक अध्ययन किया जाता हैं। साइकोमेट्री के लगभग पन्द्रह उपकरणों तथा मनोआध्यात्मिक प्रश्नावली के माध्यम से बुद्धिलब्धि (आई.क्यू.) एकाग्रता की शक्ति इल्युजन रिएक्शन टाइम एप्टीट्यूड व्यक्तिगत विश्लेषण स्मरण शक्ति के साधना उपचारों के पूर्व एवं बाद मापन किये जाने एवं हर साधक को अनुकूल साधनाएं एवं वनौषधि सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है।
साधना का सुयोग भी मिलता रहे। सभी प्रज्ञापीठों-स्वाध्याय मण्डलों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने क्षेत्र से अनेक शिक्षार्थी प्रशिक्षण के लिए भेजें। ताकि वे लौटने पर उस क्षेत्र में नवजीवन का आलोक वितरण कर सके। नव जागृति का पुनरुत्थान का आधार खड़ा कर सके।
साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी वशिष्ठ-अरुन्धती स्तर की .... जिसका इन दिनों शुभारम्भ किया गया हैं पौधा लगाने के बाद माली अपने उद्यान को छोड़कर भाग नहीं जाता। फिर हमीं क्यों यात्रा छोड़कर पलायन करने की बात सोचेंगे और क्यों उस के लिए उत्सुकता प्रदर्शित करेंगे?
साधना के रूप में प्रयुक्त होती है। यह उनका स्थूल उपयोग है; पर जाना यह भी चाहिए कि उनके भीतर सशक्त अदृश्य शक्ति भी काम करती है। परमाणु ऊर्जा उसका सर्वविदित स्वरूप है। इसके अतिरिक्त असंख्यों अदृश्य पक्ष भी है जिन्हें भाप, बिजली, रेडियो दूरदर्शन आदि के रूप में करते हुए देखा जाता है। इन्हीं में से एक हीं नहीं करती।
साधनाओं की अपेक्षा इसी सरल उपाय की ओर मुड़ गई। अनुकरण प्रियता के लिए मानवी दुर्बलता प्रसिद्ध है। एक को किसी नूतन कार्य में प्रवृत्त होते देख कर उसके साथ अनेकों कौतूहल–प्रिय लग लेते हैं। यह बात स्वभाव तो है ही, बड़े भी इसका अपवाद नहीं है। विशेषतया ढलती आयु में जब सर्वथा निठल्ले रहना और नीरस जीवन बिताना पड़ता है, तब तो कहीं जाने आने की इच्छा और भी तीव्र होती है।
साधना काल बिताते रहे। उन्होंने गायत्री का तत्वदर्शन प्रकट किया और नाद ब्रह्म-शब्द-ब्रह्म से संबंधित सामगान की रूप रेखा बनाई अभिनव विश्व की संरचना उन्हीं का स्वप्न था। जो कारणवश कभी पीछे के लिए टल गया।
साधना के रूप में जीवन साधना का एक अंग माना गया है। इससे अचेतन मन की गतिविधियों को ऊर्ध्वगामी बनने का अवसर मिलता है।
साधना इसके अतिरिक्त है। नित्य यज्ञ करना भी अन्तराल के विकास से सम्बन्धित है। इन सभी को अध्यात्म-साधना के रूप में जीवन साधना का एक अंग माना गया है। इससे अचेतन मन की गतिविधियों को ऊर्ध्वगामी बनने का अवसर मिलता है।
साधना है। उसमें अपनी धुलाई-रंगाई, गलाई-ढलाई करनी पड़ती है। प्रथम चरण में यह आवश्यक नहीं हैं। तलवार पर धार धरी हुई न हो, तो वह मोर्चे पर कमाल दिखाने में किस प्रकार समर्थ हो सकती है? जंग खाया चाकू किस काम आयेगा?
साधनाश्रम उत्तरकाशी था। उनका सुविस्तृत गुरुकुल आरण्यक चलता था। जिसमें अगणित नर-रत्न महामानव विनिर्मित होते थे।
साधना किस प्रकार बन पड़े? आदि आदि।
साधना का विवरण शान्ति-कुँज भेज देंगे। उन्हें उसके संरक्षण एवं संवर्धन की शक्ति प्राप्त होती रहेगी।
साधनात्मक अनुशासन में इस अभीप्सा की बहुत हद तक पूर्ति होती है। वातावरण इस क्षेत्र का पहले से ही सुसंस्कारित है। वर्तमान प्रयत्नों से उसे और भी अधिक प्रखर बनाया जाता है।
साधना सत्रों में सम्मिलित होने वालों को अनायास ही प्रभावित करते है। प्रशिक्षण के जितने भी तंत्र है, उनमें वातावरण की प्रभावशीलता को सर्वोपरि माना गया है। शांतिकुंज का वातावरण ऐसा ही है। जिसमें व्यक्तित्व के परिष्कार की साधना ठीक प्रकार बन पड़ती है। यह कार्य घर के लोग व्यवहार सम्बन्धी उतार-चढ़ावों के बीच रहकर सम्भव नहीं हो सकता।
साधना के लिए समर्पित हुए है। इनमें से कई ऐसे है, जिनने अपनी निजी सम्पत्ति बेचकर बैंक में जमा कर दी है और उसी के सहारे अपना निर्वाह करते है। उनके लिए मिशन को एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता। कई पेंशनर है और कुछ अपने परिवार से अपना गुजारा मँगाकर काम चलाते रहते है अथवा नाम मात्र का निर्वाह लेकर ब्राह्मणोचित जीवन जीते है। यह गरीबी स्वयं की ओढ़ी हुई है व यही इनकी शान है।
साधना विहीन एकाकी, व्यवहार कुशलता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ व्यक्ति बड़े सपने तो देख सकता है; पर बड़े कामों का भार अपने दुर्बल कंधों पर नहीं उठा सकता। विशेषतया उन कामों का जिनकी कल्पनाएँ करते रहने वाले, योजनाएँ बनाते रहने वाले थोड़े बहुत कदम बढ़ाते रहने पर भी हवा में उड़ने वाले गुब्बारों की तरह कुछ ही समय में ठण्डे होते और अपने अस्तित्व को समाप्त करते देखे गये।
साधनाएँ-तपश्चर्याएँ भी जुड़ती है।
साधना-विधान को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। उससे कषाय-कल्मष धुलते हैं और प्रसुप्त प्रखरता को उजागर होने का अवसर मिलता है।
साधना की प्रेरणा अवश्य मिली है पर इतने भर से यह नहीं हो सकता कि कोई अपनी सुख-सुविधाओं को लात मारकर संतमय तपस्वी जीवन जीने के लिए आतुर हो उठे और उस प्रकार का व्रत लेकर रहे, .... उच्च वर्ग के सुशिक्षित नहीं। उन्हें गहराई तक वास्तविकता की जाँच-परख भी करनी पड़ती है। यही हुआ भी है। अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखने वाले ऋषि युग्म-माताजी के व्यक्तित्व को चरित्र को आदि से अन्त तक खुली पुस्तक की तरह पढ़ने के उपरान्त ही यह सम्भव हुआ कि अग्रिम पंक्ति पर चलने वाले के पीछे प्रयाण करने का साहस जुट सके। अखण्ड-ज्योति की पंक्तियों में जो प्राणवान ज्योति ज्वाला रहती है।
साधना के साथ-साथ अग्निहोत्र भी आवश्यक है। उसकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। अब अधिक खर्च अधिक समय की व्यवस्था वाले यज्ञ चल रहें है। यज्ञ भी अति सरल और बिना खर्च के है। उनकी सामूहिकता परिपक्व होती है।
साधना सत्रों के प्रशिक्षण की व्यवस्था थी जिसे तीर्थ सेवन सत्र के नाम से जाता जाता था। उन दिनों तीर्थ यात्री चित्र-विचित्र इमारतों को देखने दृश्य परक विनोद का मजा लूटने के लिए नहीं वरन कुछ ठोस आधार अपनाने के लिए जाते थे। इसके लिए उन्हें न्यूनतम दस दिन तो अपने को तपाने चमकाने के लिए समय देना ही पड़ता था। स्वर्णकार इससे कम समय में कोई शानदार आभूषण गढ़ भी तो नहीं सकता। इसमें एकनिष्ठ रहने की नितान्त आवश्यकता पड़ती है।
साधना की अवधि में इसका ई ई जी व ई सी जी पल्स, ब्लडप्रेशर आदि का विश्लेषण किया जाय। इस संबंध में महत्वपूर्ण ग्रन्थ एवं शोध प्रबन्ध भी जुटाये गये है।
साधना सत्र कहते है। जीवन विद्या ही पुरातन काल की संजीवनी विद्या है। इसमें शरीर तो पूर्ववत ही रहता है। पर व्यक्तित्व को परिष्कृत विकसित करने का उद्देश्य बहुत हद तक पूरा हो जाता है। कारण कि इस शिक्षण में मात्र परामर्श प्रवचन तक ही सीमित नहीं रहा जाता वरन शिक्षार्थी के तीनों शरीरों को स्वस्थ समुन्नत बनाने का प्रयत्न किया जाता है।
साधनाओं की चरम परिणति यही है कि व्यक्ति का अन्तःकरण रसमय हो जाय, आनन्द से ओत-प्रोत हो जाय। यही है वह रत्नाकर, जिसके मंथन से पौराणिक गाथाओं के अनुसार असाधारण शक्ति सम्पन्न चौदह रत्न निकले थे। श्रद्धा की गरिमा उससे ऊँची है। उसके गर्भ से चौदह लाभ-किरण पारस, कल्पवृक्ष, और अमृतघट भी निकल सकते है।
साधनाएँ करनी पड़ती है। अघोरी कापालिक ताँत्रिक साधनाएँ करते है और इस आधार पर दूसरों पर हावी होने में सफलताएँ प्राप्त करते है। अनर्थ करते भी देखे गये है। उनकी आस्था निम्न स्तर का बन जाती है। इसके विपरीत सात्विक साधनाएँ है जो अन्तःकरण की गहराई में जमे कुसंस्कारों को उखाड़ने के साथ-साथ उस भूमि में सुसंस्कारों का उत्पादन अभिवर्धन करती है।
साधना में भी बढ़-चढ़ कर योगदान दे।
साधना की थी। गहन चिन्तन-मनन से ऐसा नवनीत निकाला था जो भू-लोक निवासियों के लिए अमृतोपम सिद्ध हो सके। उनकी तपश्चर्याएँ व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं, वरन विश्व-कल्याण के लिए सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए थी। इन्हीं दोनों में उन्होंने स्वर्ग और मुक्ति का दर्शन किया था। आज देवपूजा तो बहुत है किन्तु ऋषियों द्वारा प्रतिष्ठित मानवी गरिमा की अभ्यर्थना करने का किसी का मन नहीं है।
साधनाएं एवं वनौषधि सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है।
साधना कराने में किसी प्रकार के असमंजस का सामना न करना पड़े।
साधना चलती थी। संस्कृति के साथ घनिष्ठतापूर्वक जोड़ने वाले उपनयन, वानप्रस्थ और अन्य संस्कार कराये जाते थे। इसके अतिरिक्त बन पड़े पाप कर्मों के प्रायश्चित, आत्म-परिष्कार की तपश्चर्याएँ तथा उलझी हुई गुत्थियों का समाधान करने वाले प्रवचन-प्रशिक्षण एवं परामर्श का लाभ मिलता था। जो सुधार परिवर्तन घर के सामान्य वातावरण में बहुत प्रयत्न करने पर भी सम्भव नहीं होता था, वह वहाँ थोड़े ही समय के तीर्थ सेवन से सम्पन्न हो जाता था।
साधना प्रयोजन हेतु बनाये गये थे। बर्फीली चोटियों के मध्य ध्यान लगाने वाले योगीजनों का अनुभव है कि स्थान विशेष के कम्पनों का, उत्तराखण्ड के दिव्य वातावरण का, परोक्ष दैवी सत्ता को तो अपना विशेष महत्व है ही किन्तु संरचना विशेष का अपना महत्व है। परोक्ष से संपर्क स्थापित करने में सम्भवतः पर्वतशिखर “एण्टिना” की भूमिका निभाते है। प्रस्तुत विवेचन पाश्चात्य जगत में इन दिनों “पिरामिहालाँजी” पर चल रहें अनुसंधानों के परिप्रेक्ष्य में किया जा रहा है। पिरामिड जहाँ-जहाँ स्थित है, वहाँ भू-चुम्बकीय धाराओं की सघनता पाई गई है साथ ही यह भी देखा गया है कि उनमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा को केन्द्रीभूत करने की महती सामर्थ्य होती है।
साधना ठीक प्रकार बन पड़ती है। यह कार्य घर के लोग व्यवहार सम्बन्धी उतार-चढ़ावों के बीच रहकर सम्भव नहीं हो सकता।
साधनाएँ करते है और इस आधार पर दूसरों पर हावी होने में सफलताएँ प्राप्त करते है। अनर्थ करते भी देखे गये है। उनकी आस्था निम्न स्तर का बन जाती है। इसके विपरीत सात्विक साधनाएँ है जो अन्तःकरण की गहराई में जमे कुसंस्कारों को उखाड़ने के साथ-साथ उस भूमि में सुसंस्कारों का उत्पादन अभिवर्धन करती है। साधनाओं में जप और ध्यान प्रधान है।
साधना से बढ़कर और कोई सुयोग सौभाग्य है नहीं। इन्हीं की झलक झाँकी शांतिकुंज के जीवन साधना सत्रों में उपलब्ध होती है।
साधना, सत्रों की विधि-व्यवस्था, कार्यपद्धति एवं अनुशासन प्रक्रिया ऐसी है, जिसमें जकड़ जाने पर प्रत्येक शिक्षार्थी को वर्तमान को बदलने और भविष्य को उज्ज्वल बनाने में भारी सहायता मिलती है। कारण कि उसमें प्रवचन-सत्संग मात्र नहीं है, वरन ऐसी ऊर्जा जुड़ी है, जो बदलने और सुधारने के दोनों कार्य साथ-साथ सम्पन्न करती चलती है।
साधना द्वारा न केवल सूक्ष्म काय संस्थान को प्राणाग्नि रूपी कुण्डलिनी संस्थान एवं चक्र-उपत्यिकाओं को अपितु भाव संवेदनाओं को प्रभावित कर वाँछित परिवर्तन ला पाना संभव है। शब्द शक्ति की महता को विज्ञान ने स्वीकारा है एवं अब विभिन्न रोगों के निदान में अल्ट्रासाउण्ड तथा चिकित्सा में भी इनका लेसर की तरह प्रयोग होने लगा है। मंत्र शक्ति एवं यज्ञ ऊर्जा के मिलन से एकाकी अथवा सामूहिक मंत्रोच्चारण से मंत्रगायन अथवा विभिन्न रागों में सूक्तों के प्रयोग से क्या कुछ परिवर्तनकाय पिण्ड एवं सूक्ष्म वातावरण में संभव है यह एक महत्वपूर्ण शोध प्रसंग है। संगीत चिकित्सा मंत्र चिकित्सा को पूर्णतः विज्ञान सम्मत सिद्ध करने के लिए यह अनिवार्य है कि इनकी प्रभाव क्षमता को आधुनिक यंत्रों के माध्यम से मापा जाये। वनस्पतियों जीव−जंतुओं मानव−शरीर एवं मन तथा वातावरण में ये कम्पन क्या किस सीमा तक परिवर्तन लाते है इसे प्रमाणित किया जाये।
साधना का एक अंग माना गया है। इससे अचेतन मन की गतिविधियों को ऊर्ध्वगामी बनने का अवसर मिलता है।
साधना माध्यम से एकत्रित करके उसे सशक्त तोप की तरह अनिष्ट को हटाने के लिए दागा जा सकता है। उसे चुम्बक स्वरूप में बदलकर उस अनुकूलता को आकर्षित भी किया जा सकता है।
साधना सत्र और सरकारी कर्तव्य निष्ठा सत्र अपने-अपने ढंग से चलते रहते है। इन सब में मिलकर सीमित लोग ही तद्विषयक प्रशिक्षण प्राप्त कर पाते है। जो बच जाते है। उन्हें भी बहुत कुछ पूछना जानना होता है। कई बार पेचीदगियाँ इतनी विषम होती है कि उनके लिये सही निष्कर्ष तक पहुँचना कई-कई बार के पत्र व्यवहार से ही सम्भव होता है।
साधना में लगे हुए है। इनने प्राचीन काल की साधु संस्था, ब्राह्मण वर्ग, और वानप्रस्थ परम्परा को युग के अनुरूप धारण किया है, जो अपने-अपने निकटवर्ती कार्यक्षेत्रों में युगशिल्पी की भूमिका निभा रहे है। घर-परिवार की सामान्य देख-भाल करते हुए अधिकाँश समय सार्वजनिक जीवन में रचनात्मक कार्यक्रमों में लगा रहे है। गृहस्थ होते हुए भी विरक्त है। इन्हें पुरातन काल के ब्राह्मण वर्ग में गिना जा सकता है, भले ही वे जन्म से किसी भी जाति में उत्पन्न क्यों न हुए हो।
साधना विधान पातंजलि के सूत्रों की व्याख्या स्वरूप प्रकट हुए है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-February
साधनाएं ऐसी है। जिन्हें सरलता पूर्वक बिना किसी जोखिम के हर कोई अपना सके।
साधना से बचकर आवारागर्दी के गुलछर्रे उड़ाता, व्यापारी कारखाने में लगने वाला धन एयाशी में उड़ा देता तो इन सब का भविष्य अन्धकारमय ही बनता। भले ही आरंभ में वे शौक-मौज का मजा चख लेते।
साधना करनी चाहिए? इसका निर्णय करने से पूर्व शिक्षार्थी की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति की जाँच पड़ता बहुमूल्य वैज्ञानिक यंत्रों से की जाती है। अब तक के जीवन का विवरण, वर्तमान में अड़े हुए अवरोध एक उज्ज्वल भविष्य के लिए किस दिशा में चलने का विचार है यह विस्तारपूर्वक पूछा जाता है और तद्नुसार साधना विषयक परामर्श दिया जाता है। साधारणतया गायत्री का एक लघु अनुष्ठान आवश्यक है। जिन्हें किसी अन्य साधना मार्ग पर विश्वास है उनका तद्नुरूप निर्धारण कर दिया जाता है।
साधना विद्या दूरगामी परिणाम उत्पन्न करती है, जो इन सत्रों में सम्मिलित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति से कहीं उसकी शक्ति एवं स्थिति के अनुरूप कराई जाती है। सभी साधनाएं ऐसी है। जिन्हें सरलता पूर्वक बिना किसी जोखिम के हर कोई अपना सके।
साधना से भी भारी पड़ता है। संयम में तो जहाँ के तहाँ तो भी बैठे रहना पड़ता है, परन्तु परमार्थ में तो अपनी संचित सम्पदा को अन्यान्यों के लिए विसर्जित करते रहना पड़ता है। यह प्रत्यक्षतः घाटे का सौदा है। अपना नुकसान सहकर दूसरों की भलाई करने के लिए जिस उदार साहसिकता की आवश्यकता पड़ती है वह कहाँ से आये? आदर्शवादिता की भावसंवेदना ढीली हो तो फिर उस उत्साह में भी स्थिरता नहीं रह पाती।
साधना में एक प्रकार से शरीर में प्राण और संकल्प के आघात से परमाणु ऊर्जा उत्पन्न की जाती है और उसका नियंत्रण नियमन किया जाता है। मूर्धन्य वैज्ञानिक एवं अनुसंधानकर्ता प्रो0 वौन वैजसेकर ने कुण्डलिनी जागरण में प्राण तत्व के नियंत्रण और नियमन पर अधिक बल दिया है। उनका कथन है कि इसकी संगति भौतिक विज्ञान के क्वाँटम सिद्धान्त से बिठाई जा सकती है। दोनों के परमाणु सूक्ष्म स्तर के होते हैं। सूक्ष्म शरीर का प्राण प्रवाह ही कुण्डलिनी है।
साधना विधानों को अपनाने का योगशास्त्रों में उल्लेख मिलता है।
साधना मार्ग पर विश्वास है उनका तद्नुरूप निर्धारण कर दिया जाता है।
साधना की महत्ता को सर्वोपरि माना गया है और इस पर विस्तृत रूप में प्रकाश डाला गया है। यह वस्तुतः चेतन प्रकृति द्वारा जड़ पदार्थों के नियंत्रण की विद्या कही जा सकती है। पदार्थों, परमाणुओं तथा जड़-जगत की संरचना इसी के अंतर्गत आती हे। विज्ञान की समस्त धाराएं इसी में सन्निहित है। सृष्टि का समस्त व्यापार इसी महाशक्ति से गतिमान है।
साधनारत योगी तपस्वी जब अपने कषाय-कल्मषों का निराकरण कर लेते हैं। साथ ही देवोपम मानवी गरिमा के समस्त आधारों से अपने को सुसज्जित कर लेते हैं तो उन्हें देवात्मा का-सिद्धपुरुष का पद मिल जाता है। फिर वे मिल-जुलकर धरातल की आये दिन उत्पन्न होते रहने वाली समस्याओं के बारे में विचार करते रहते हैं और उसमें समाधान संदर्भ में अपनी भूमिका-योजना का निर्धारण करते रहते हैं।
साधना के उपरान्त ही दैवी शक्तियों का साक्षात्कार हुआ था। ईसामसीह के बारे में भी विख्यात है कि 40 दिन की उपवास तपश्चर्या के पश्चात ही उन्हें दिव्य अनुभूतियाँ हुई थीं। ईसाई धर्म में अब भी लेण्ट के रूप में ईस्टर पर्व से पूर्व चालीस दिन का उपवास रखने की प्रथा परम्परा है। इसमें व्रतधारी उपवास करता हुआ अपने पापों का प्रायश्चित करता हैं ईसाई समुदाय में ऐसी मान्यता है कि इस प्रक्रिया द्वारा व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं। जैन धर्म में व्रत उपवास पर्यूषद पर्व के रूप में मना जाता है।
साधना के लिए श्रम साधना लागते कैसे बन पड़े? मन कैसे खाली हो जो वासना, विलासिता, अहंता, संकीर्णता से ऊँचा उठकर कुछ ऐसा सोच सके जिसमें उत्कृष्टता अपनाने के लिए उमंग-उमँगे और कारगर योजना बने। श्रद्धाविहीन इस दिशा में कुछ भी सोचने में असमर्थ रहते हैं। यह दूसरी बात है कि लोग दिखावे के लिए अपने को पुण्यात्मा और उदारचेता सिद्ध करने के लिए जब तब कोई शिगूफे छोड़ते रहें। पर वह पोल अधिक समय तक बिना खुले रहती भी तो नहीं।
साधना के आधार पर ही किसी को लोकनायक स्तर पर सम्मान मिला है - इस तथ्य को भली प्रकार गाँठ बाँध रखना चाहिए।
साधना सत्र कहा जायगा। आत्म-विकास की प्रतिभा एवं प्रखरता संवर्धन की सभी दिशा धाराएं, परिवार को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने की दिशाधाराएं, समीपवर्ती समाज को अधिक सुव्यवस्थित, समुन्नत बनाने की क्रिया-प्रक्रियाएं जैसी अनेक उपयोगी ऐसी शिक्षाओं का समन्वय रहेगा जो उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में असाधारण योगदान दे सकें। इन सत्रों में एक लघु गायत्री अनुष्ठान का जप, यज्ञ और ध्यान-धारणा की क्रिया-प्रतिक्रिया भी सम्मिलित रहेगी।
साधना करते रहने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।
साधना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। ऐसे ही व्यक्ति उनसे सूक्ष्म संबंध स्थापित करने में सफल हो पाते हैं, जो शुद्ध हृदय, पवित्र मन और सात्विक वृत्तियों वाले होते हैं। इस संदर्भ में लिखी गई पुस्तकों में “दि टीचिंग्स ऑफ दि ट्वेल्व अपोस्टलस” एवं “दि शेफर्ड ऑफ हर्म्स” अत्यधिक लोकप्रिय व प्रामाणिक मानी जाती है। इनमें लेखक ने ऐसे अनेक प्रामाणिक घटनाओं का वर्णन किया है, जिसमें अनेक व्यक्ति ऐसे पितर एवं देव स्तर की आत्माओं से संपर्क कर संकटकालीन घड़ी से उबरे और अनेक अवसरों पर लाभान्वित हुए। यदि हम भी अपनी भावनाओं और वृत्तियों में यत्किंचित परिष्कृति ला सकें, तो कोई कारण नहीं कि ऐसी आत्माओं से सत्परामर्श प्राप्त कर लाभ नहीं उठा सकते।
साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती है उसे शरीरगत अपरा-प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और इस निर्झर का मूल उद्गम जननेन्द्रिय मूल कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।
साधना उपासना से प्राप्त अंतर्दृष्टि से निहारें तो स्पष्ट होगा कि सारा का सारा भ्रमण जंजाल मिटता जा रहा है और यथार्थता वास्तविकता सामने आ रही है। इस वास्तविकता के बोध होने पर तो परम सत्ता ही कण-कण में व्याप्त तथा अपना अन्तःकरण भी उसे से ओत-प्रोत दिखाई देगा और सर्वत्र आनन्द का साम्राज्य ही होगा और उसके मध्य में होंगे भली भाँति आनन्दामृत से परितृप्त हम। अच्छा हो ऐसी वास्तविक बोध की दुनिया में जिया जाय। अपनी अंतर्दृष्टि का जाग्रत कर यथार्थता वस्तुस्थिति से समझने पाने में प्रयत्नशील हुआ जाय। इसीलिए ऋषि कहते आए हैं - “अविद्या से निकलकर ज्ञान की ओर प्रकाश और बढ़ो”।
साधना प्रशिक्षण के निर्मित नये दस कक्ष बनाये गए हैं। इसे युगनायक शिक्षण नाम दिया गया है। प्रौढ़शिक्षा, बाल संस्कार शाला, पुस्तकालय संचालन का शिक्षण, वक्तृत्व कला व संगीत विद्या का अभ्यास, स्वास्थ्य रक्षा से सम्बन्धित विभिन्न विद्याओं का शिक्षण एवं आजीविका अर्जन हेतु सहकारिता व लघु उद्योगों से सम्बन्धित जानकारियाँ सैद्धांतिक व व्यावहारिक रूप में देने का प्रशिक्षण यहाँ आरम्भ किया जा चुका है। इसके लिए विभिन्न स्थानों से मॉडल्स, चार्ट, खादी ग्रामोद्योग व ग्राम्य विकास संबंधित नए उपकरण मंगाकर लगाये गये है जिनके द्वारा शिविरार्थी 3 माह की अवधि में रहकर ऐसा कुछ सीखकर जा सकेंगे। जिसे कार्य क्षेत्र में लागू करने पर व न केवल अनौपचारिक शिक्षा का एक नया तंत्र खड़ा कर सकेंगे, अपितु अनेकों का आजीविका अर्जित कर स्वावलम्बी बनने का लाभ दिला सकेंगे।
साधना के अतिरिक्त तीन मास की लोकनायक युगनायक शिक्षा पद्धति भी चल रही है। इसमें शिक्षा संवर्धन (1) स्वस्थता संरक्षण (3) कुटीर उद्योगों के माध्यम से गरीबी उन्मूलन की अनेक विद्याएं सिखाई जा रही है। भाषण कला एवं संगीत शिक्षा को प्रमुखता दी जा रही है ताकि लोकमानस का परिष्कार करने के साथ-साथ अपनी प्रतिभा में भी चार चाँद लग सकें।
साधनाओं के लिए समय ही न मिलता प्रशंसकों से घिरे रहते। यह देखकर भगवान बुद्ध वहाँ पहुँचे और बोले बेटा मनुष्य ने सदाचार का ध्यान न दिया, लोगों को प्रभावित करने में ही लग गया तो उसकी उन्नति का द्वार ऐसे ही घिर जाता है जैसे तू अपने प्रशंसकों से घिर गया।
साधना साधना प्रशिक्षण के निर्मित नये दस कक्ष बनाये गए हैं। इसे युगनायक शिक्षण नाम दिया गया है। प्रौढ़शिक्षा, बाल संस्कार शाला, पुस्तकालय संचालन का शिक्षण, वक्तृत्व कला व संगीत विद्या का अभ्यास, स्वास्थ्य रक्षा से सम्बन्धित विभिन्न विद्याओं का शिक्षण एवं आजीविका अर्जन हेतु सहकारिता व लघु उद्योगों से सम्बन्धित जानकारियाँ सैद्धांतिक व व्यावहारिक रूप में देने का प्रशिक्षण यहाँ आरम्भ किया जा चुका है। इसके लिए विभिन्न स्थानों से मॉडल्स, चार्ट, खादी ग्रामोद्योग व ग्राम्य विकास संबंधित नए उपकरण मंगाकर लगाये गये है जिनके द्वारा शिविरार्थी 3 माह की अवधि में रहकर ऐसा कुछ सीखकर जा सकेंगे। जिसे कार्य क्षेत्र में लागू करने पर व न केवल अनौपचारिक शिक्षा का एक नया तंत्र खड़ा कर सकेंगे, अपितु अनेकों का आजीविका अर्जित कर स्वावलम्बी बनने का लाभ दिला सकेंगे।
साधना भी अविच्छिन्न रूप से समन्वित रखे जाने की आवश्यकता है। समग्र और सफल आत्मिक प्रगति इसी प्रकार बन पड़ती है।
साधना सत्रों का कार्यक्रम अब और भी अधिक सघन एवं व्यस्त कर दिया गया है। किस-किस प्रयोजन के लिए क्या आत्म साधना करनी चाहिए? इसका निर्णय करने से पूर्व शिक्षार्थी की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति की जाँच पड़ता बहुमूल्य वैज्ञानिक यंत्रों से की जाती है। अब तक के जीवन का विवरण, वर्तमान में अड़े हुए अवरोध एक उज्ज्वल भविष्य के लिए किस दिशा में चलने का विचार है यह विस्तारपूर्वक पूछा जाता है और तद्नुसार साधना विषयक परामर्श दिया जाता है। साधारणतया गायत्री का एक लघु अनुष्ठान आवश्यक है।
साधना। दूसरी परमार्थ परायणता। इन दोनों में ही प्रत्यक्षतः हर किसी को घाटा दिखता है। संयम की दिशा में जितना बढ़ा जाता है, उतना ही सुख सुविधा में, वासना विलासिता में, ठाटबाट में कटौती आरम्भ हो जाती है। औसत नागरिक स्तर का जीवन यापन करने के लिए तत्पर होने पर दूसरों की तुलना में अपना सरंजाम हलका पड़ जाता है।
साधना विषयक परामर्श दिया जाता है। साधारणतया गायत्री का एक लघु अनुष्ठान आवश्यक है। जिन्हें किसी अन्य साधना मार्ग पर विश्वास है उनका तद्नुरूप निर्धारण कर दिया जाता है।
साधना महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्राचीन काल में सामूहिक प्रार्थना, उपासना एवं यज्ञ आयोजनों आदि का बाहुल्य था। परिशोधित वातावरण के कारण जन-जीवन उत्कृष्टता की चरम सीमा पर था। सभी का जीवन आनन्दमय था। उस काल में धार्मिकता ही नैतिकता की पर्यायवाचक थी।
साधना सत्रों के बारे में अधिक कुछ कहना नहीं है, क्योंकि वे पिछले कई वर्षों से लगातार चल रहे है और अपनी असाधारण उपयोगिता सिद्ध कर चुके है। लौट कर जिनने भी उपलब्ध लाभों का वर्णन अपने क्षेत्र में किया है वहाँ से नये लोग अधिकाधिक संख्या में अत्यधिक उत्साहपूर्वक आते रहे हैं।
साधना उपयुक्त थी, क्योंकि कुछ महीने के लिए जेल जाने के लिए हजारों सत्याग्रही मिल गये, पर हिंसा पर उतारू होने पर जो गोलीकाण्ड होते उसके लिए मुट्ठी भर लोग ही मुश्किल से तैयार होते। गाँधी जी के असहयोग सत्याग्रह आन्दोलन को उनकी नीति और धर्म का समन्वय माना गया। यों बीमारी में तड़पते हुए बछड़े को जहर की सुई लगा देने के लिए गाँधी जी ने ही डॉक्टर को परामर्श दिया था।
साधना ही सफल हो सकती है और उस क्षेत्र की विकृतियों का निराकरण कर सकती है।
साधना सर्वत्र सराही जायगी। सेवा-साधना के आधार पर ही किसी को लोकनायक स्तर पर सम्मान मिला है - इस तथ्य को भली प्रकार गाँठ बाँध रखना चाहिए।
साधना लागते कैसे बन पड़े? मन कैसे खाली हो जो वासना, विलासिता, अहंता, संकीर्णता से ऊँचा उठकर कुछ ऐसा सोच सके जिसमें उत्कृष्टता अपनाने के लिए उमंग-उमँगे और कारगर योजना बने। श्रद्धाविहीन इस दिशा में कुछ भी सोचने में असमर्थ रहते हैं। यह दूसरी बात है कि लोग दिखावे के लिए अपने को पुण्यात्मा और उदारचेता सिद्ध करने के लिए जब तब कोई शिगूफे छोड़ते रहें। पर वह पोल अधिक समय तक बिना खुले रहती भी तो नहीं।
साधना विधानों के अंतर्गत उपवास किये जाने की परम्परा अभी भी जीवित है।
साधना के वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा शरीरगत अपरा-प्रकृति की प्रचंड शक्तियों का उद्भव किया जा सकता है। इसी को योगियों के दिव्य कर्तव्य के रूप में देखा जा सकता है। अलौकिकताएं- सिद्धियाँ, चमत्कार एवं असाधारण क्रिया-कृत्यों की जो क्षमता साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती है उसे शरीरगत अपरा-प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और इस निर्झर का मूल उद्गम जननेन्द्रिय मूल कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-September
साधना के प्रति अटूट श्रद्धा भी होनी चाहिए। लक्ष्य ऊँचा रखना चाहिए जिससे मनोकामनाओं के पूरे होने न होने पर कोई अन्तर न आये। जप से उद्भूत हुए अक्षर अपने अपने सम्बद्ध सूक्ष्म केन्द्रों पर प्रभाव डालते और उन्हें उत्तेजित करते हैं। इस प्रसुप्ति के जागरण में अतिरिक्त स्तर की क्षमताएँ जागती हैं। योग्यताएँ उभरती हैं।
साधना करने वाला लोग मंगल के क्षेत्र में सेवा कार्य किये बिना रह ही नहीं सकता। जरथुस्त्र को उनकी परमार्थ साधना एवं आडम्बरों से भरे संसार में विवेकशीलता के विस्तार हेतु सदैव याद किया जाता रहेगा।
साधना है। इसी को परम पुरुषार्थ कहा गया है। जिनने इस लक्ष्य को समझा, जानना चाहिए कि उनने अध्यात्म तत्व ज्ञान का रहस्य और मार्ग हस्तगत कर लिया, चरम लक्ष्य तक पहुंचने का राजमार्ग पा लिया।
साधना - लोक मंगल के कार्यों में बड़ा सहयोगी सिद्ध हुआ।
साधना का मूलभूत उद्देश्य हैं। ईश्वर को न किसी की मनुहार चाहिए और न उपहार। वह छोटी मोटी पेट पूजाओं से या स्तवन गुणगान से प्रसन्न नहीं होता। ऐसी प्रकृति तो क्षुद्र लोगों की होती है। भगवान का ऐसा मानस नहीं।
साधना पद्धति को ही प्राणविद्या या प्राणायाम साधना कहा गया है। इसी का अनिवार्य अंग संकल्प होता हैं। संकल्प शक्ति के सहारे उसी के चुम्बकत्व से ब्रह्मांड व्यापी समष्टिगत प्राणतत्व को आकाश से आकर्षित किया और श्रद्धा के बल पर उसे अपने में धारण किया जाता है। जो जिस सीमा तक समष्टिगत प्राण भी वशवर्ती हो जाता है और साधक प्राण जगत की अनेकानेक दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन जाता हैं। यह मार्ग सभी साधकों के लिए समान रूप से खुला है।
साधना एवं आडम्बरों से भरे संसार में विवेकशीलता के विस्तार हेतु सदैव याद किया जाता रहेगा।
साधना के सामूहिक प्रयोग करने की क्षमता हम सब में बढ़ रही है।
साधना से ही हो सकती थी। इसलिए वरिष्ठों को अपनी प्रतिभा बढ़ाने के लिए सर्वप्रथम अपने आपको ही तपाना पड़ा। हर कसौटी पर खरा सिद्ध हो सकने योग्य बनाना पड़ा। आत्म निमार्ण, आत्म विकास ही अध्यात्म तत्वज्ञान का सार संक्षेप है। इस तथ्य एवं रहस्य को समझने वाले महा मनीषियों ने अपना विवेक विकसित किया।
साधना से ही महान सिद्धियां प्राप्त होती हैं। कस्तूरी के हिरण जैसी बात है। बाहर खोजने में थकान और खीझ ही हाथ लगती हैं। शान्ति तब मिलती हैं जब जब उस सुगंध का केन्द्र अपनी ही नाभि में होने का पता चलता हैं। परमात्मा के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए अन्यत्र खोजबीन करने की योजना व्यर्थ हैं।
साधना का तीसरा आधार है ध्यान। इसमें शारीरिक अंग अवयवों का योगदान नहीं रहता है। समूचा कार्य चेतना को ही करना पड़ता है। कल्पना प्रायः धुँधली और अस्थिर होती है। उसे स्पष्ट, स्थिर और विश्वस्त बनाया जाय।
साधना सत्र आयोजित किया गया। इसमें समीपवर्ती शाखाओं के अधिकाधिक भावनाशील परिजन सम्मिलित हुए। उपस्थित साधकों को विभिन्न तरीके से जनजागरण के प्रयासों में सहयोगी बनने की प्रेरणा दी गई। अपनी-अपनी शाखाओं में महिला मण्डलों के गठन तथा सभी रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरा करने का संकल्प लिया गया।
साधना, आराधना के आधार पर आत्म परिष्कार करेंगे। धार को पैनी करेंगे और इतनी अन्तः क्षमता अर्जित करेंगे जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़ें।
साधना और परमार्थ परायणता के त्रिविध अभ्यास भी अनिवार्य रूप से करने होते है।
साधना से सिद्धि” का सिद्धांत सर्वमान्य हैं। देखना इतना भर है कि साधना किसकी की जाय। अन्यान्य इष्ट देवों के बारे में कहा नहीं जा सकता कि उनका निर्धारित स्वरूप और स्वभाव वैसा है या नहीं, जैसा कि सोचा जाना गया हैं। इसमें संदेह होने का कारण भी स्पष्ट हैं। समूची विश्व व्यवस्था एक है।
साधना में तीन को ही प्रमुखता दी गई है। उन्हें ही सर्वसाधारण के लिए सुगम साथ ही थोड़े प्रयास में अधिक फल देने वाला माना गया हैं। इनमें छोटी मोटी भूल रहने पर भी किसी अनिष्ट की आशंका नहीं हैं। अनेकानेक साधनाओं का आविर्भाव इन्हीं की शाखा प्रशाखाओं के रूप में हुआ भी हैं।
साधना हो सकती है। जप काल में इष्ट प्रतिमा को अन्तरात्मा के साथ अपनी आत्मा का समर्पण, विलय अनुभव करते रहने से भी यही परिणाम उपलब्ध किया जा सकता है।
साधना है। उनके साथ माया जाल की तरह गुंथ गई निकृष्टता के प्रति तो तिरस्कार एवं परिशोधन का भाव रखना ही है। स्मरण रहे दृष्प्रवृत्तियों बिना संघर्ष के हटती नहीं है। इसके लिए तप तितीक्षा भी, संयम साधना और परमार्थ परायणता के त्रिविध अभ्यास भी अनिवार्य रूप से करने होते है।
साधना सिखाना-पढ़ाना पड़ता है। इस आधार पर अनगढ़ स्वभाव के वन्य पशु सर्कसों में आश्चर्यजनक खेल दिखाने और मालिकों के लिए अच्छी कमाई करने लगते है। यह कुशल प्रशिक्षण का प्रतिफल है। विद्यार्थियों से लेकर विशेषज्ञों, कलाकारों, तक सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों को इसी प्रशिक्षण के नीचे होकर गुजरना पड़ता है। मन को सुसंयत एवं सुनियोजित बनाने का भी यह तरीका है।
साधनाओं में से सभी-हर किसी के लिए नहीं हैं उसे अपनी अंतरंग और बहिरंग परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा सकने वाले ही चुनने पड़ते हैं।
साधनायें सफल होती हैं। मर्यादाओं का पालन करने वाले निष्ठावान साधकों का उत्साह और मनोबल देखते ही बनता है।
साधना क्यों न हो उनके साथ उत्कृष्टता के पक्षधर भाव संवेदनाओं का जुड़ा रहना आवश्यक है। क्योंकि आत्म परिष्कार की बात इसी समन्वय के आधार पर बनती है। आत्म परिष्कार प्रवृत्ति दो स्वरूप धारण करती है। एक प्रत्यक्ष और परोक्ष दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण और आदर्शवादी दिव्य सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन। परम कल्याण का, ईश्वर साक्षात्कार का स्वर्ग मुक्ति कस यही आधार है।
साधना है। समस्त शरीर का प्रतिबिम्ब दिखा सकने वाला आदमकद दर्पण हो तो उत्तम। अन्यथा उसका साइज इतना ता होना ही चाहिए, जिसमें बैठने पर चेहरे की प्रतिछाया समान आकार में दीख पड़े। इसको विशुद्ध आत्मसत्ता की प्रत्यक्ष छवि माना जाय। उसमें दिव्य सद्गुणों का सघन समावेश अनुभव किया जाय।
साधना धाराओं में तीन को वरिष्ठता दी गई हैं। एक जय, दूसरा प्राणायाम, तीसरा ध्यान। इनकी श्रेष्ठता भी क्रमशः एक के बाद एक की हैं। जप सामान्य हैं। माला पर
साधना में वही पुरातन प्रचलन है। पर देव वर्ग में से किसी को चुनने से पूर्व यह निरख–परख कर लेना चाहिए कि उपास्य की प्रकृति क्या है। अनेक देवी देवता तमोगुणी भी है। उनका स्वभाव, व्यवहार, प्रयास, चरित्र, जैसे पक्षों में अनैतिकताओं की भरमार होती है। इसमें से कई माँसभोजी, आक्रमणकारी युद्ध प्रिय होते हैं।
साधना जीवन मृत्यु के वास्तविक रहस्य को सुलझाती है और उससे छुटकारा पाने का मार्ग उद्घाटित होता है।
साधना विज्ञान का आविष्कार किया था। जिसके अनुसार विभिन्न यौगिक क्रियाओं के नियमित एवं सतत् अभ्यास एवं गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश करने पर चैतन्य केन्द्रों का जागरण और प्रसुप्त शक्तियों का स्फुरण होता है। तंत्रशास्त और योगशास्त्रों में चैतन्य ऊर्जा केन्द्रों को “कमल” या “चक्र” के नाम से संबोधित किया गया है। शरीर शास्त्रियों एवं चिकित्सा-विशेषज्ञों ने इन केन्द्रों की संगति विशिष्ट ग्रंथों से बिठाई है जिन्हें “अंतःस्रावी ग्रंथियाँ” इण्डोक्राइन ग्लैण्ड कहते हैं। वैज्ञानिकों तथा एक्यूपंचर विशेषज्ञों ने इन्हें विशेष प्रकार के “बायोइलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड़” जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र माना है।
साधनाओं का आविर्भाव इन्हीं की शाखा प्रशाखाओं के रूप में हुआ भी हैं।
साधना करने से काम वासना पर नियंत्रण सधता है और साधक ब्रह्मचारी एवं ऊर्ध्वरेता बनता है।
साधना भी भौतिक और आत्मिक प्रगति के काम आने वाली आवश्यक उपकरण जैसी उपलब्धि ही है। पर उतने तक सीमित रहकर आत्मोत्कर्ष का महान प्रयोजन पूरा नहीं होता।
साधना का उद्देश्य इन आवरण आच्छादनों को हटा देना भर है। इसे प्रसुप्ति को जागरण में बदल देना ही कहा जा सकता हैं।
साधना के साथ न जोड़े और यह आकाँक्षा संजोये रखे कि आदर्शों के परिपालन में अपने को हर किसी से आगे रखना है। सामूहिक उन्नति को ही अपनी उन्नति मानना हैं। यही मनोवृत्ति और रीति नीति अपनाना सच्चे अर्थों में धार्मिकता या आध्यात्मिकता हैं। लोक व्यवहार की भाषा में इसी को समतावाद, समाजवाद,
साधना है जिसके आधार पर सिद्धियां और सफलताएं सुनिश्चित बनती हैं। दूसरे के सामने हाथ पसारने गिड़गिड़ाने भर से पात्रता के अभाव में कुछ प्राप्त नहीं होता। भले कही वह दानी परमेश्वर ही क्यों न हों। कहा गया हैं कि ईश्वर केवल उनकी सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता करने को तत्पर है। आत्मपरिष्कार, आत्मशोधन, यही जीवन साधना है।
साधना यों प्राणायाम के माध्यम से भी चलती है। श्वांस खींचने के साथ “सौ” और छोड़ते समय “अहम्” की ध्वनि पर ध्यान एकाग्र करने के साथ ही यह भाव भी सघन रखना पड़ता है कि वह (परमात्मा) अहम् (आत्मा) दोनों के बीच सघन समन्वय और आदान-प्रदान का जो उपक्रम चलता है उसे अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाये। इस प्रकार प्राणयोग द्वारा भी अद्वैत एकात्मकता की साधना हो सकती है। जप काल में इष्ट प्रतिमा को अन्तरात्मा के साथ अपनी आत्मा का समर्पण, विलय अनुभव करते रहने से भी यही परिणाम उपलब्ध किया जा सकता है।
साधना कर सकते है। कानों को बन्द करके अनाहत दिव्य ध्वनियाँ सुनी जाती है। गहराई में उतरने और अन्तराल में उठती दिव्य ध्वनियों के साथ संबंध जोड़ने पर कई प्रकार के चित्र विचित्र शब्द सुनाई पड़ते है। शंख, घंटा, घड़ियाल, मृदंग, नफीरी, गर्जन, वंशी, आदि से मिलते जुलते वे शब्द होते है। आरंभ में ध्वनियाँ अतीव मन्द होती है।
साधना किसकी की जाय। अन्यान्य इष्ट देवों के बारे में कहा नहीं जा सकता कि उनका निर्धारित स्वरूप और स्वभाव वैसा है या नहीं, जैसा कि सोचा जाना गया हैं। इसमें संदेह होने का कारण भी स्पष्ट हैं। समूची विश्व व्यवस्था एक है। सूर्य, चन्द्र, पवन आदि सार्वभौम हैं।
साधना उपचार बताए हैं। यदि गंभीरतापूर्वक उनका विश्लेषण विवेचन किया जाये तो प्रतीत होगा कि यह प्रतीक पूजा और कुछ नहीं मात्र आत्म परिष्कार का ही बाल बोध स्तर का प्रतिपादन हैं। पात्रता और प्रखरता का अभिवर्धन ही योग और तप का लक्ष्य हैं। पात्रता एक चुम्बक है जो अपने उपयोग की वस्तु-शक्तियों को अपनी और सहज ही आकर्षित करती रहती है। मनुष्य में विकसित हुए देवत्व का चुम्बक संसार में संव्याप्त शक्तियों और परिस्थितियों को अपनी और आकर्षित करता रहता हैं।
साधना की। पन्द्रह वर्ष की आयु में ही वे साधना करने लगे थे और बाईस वर्ष तक करते रहे। बीच के इन सात वर्षों में उन्होंने दूध के सिवाय न अन्न खाया, न फलाहार किया। अंत में उन्हें आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे उसका प्रकाश संसार को देने के लिये चल पड़े। उनका लक्ष्य एक ही था- “अयंनिजःपरोवेति गणनालधुचेतसाम्।
साधना कहा गया है। इसी का अनिवार्य अंग संकल्प होता हैं। संकल्प शक्ति के सहारे उसी के चुम्बकत्व से ब्रह्मांड व्यापी समष्टिगत प्राणतत्व को आकाश से आकर्षित किया और श्रद्धा के बल पर उसे अपने में धारण किया जाता है। जो जिस सीमा तक समष्टिगत प्राण भी वशवर्ती हो जाता है और साधक प्राण जगत की अनेकानेक दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन जाता हैं। यह मार्ग सभी साधकों के लिए समान रूप से खुला है।
साधना में यही होता है और उस आधार पर मिले अनुदानों को मारण, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन जैसे हेय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कर्म अपना प्रतिफल निश्चित रूप से देते हैं और लौट आते है। किसी का अनिष्ट करने वाले स्वयं भी उस कुकृत्य के दुष्परिणाम से बचे नहीं रह सकते। इस तथ्य को समझते हुए प्रारंभिक चयन में समुचित सावधानी बरती जानी चाहिए। सात्विकता का अवलम्बन ही श्रेयस्कर समझा जाना चाहिए।
साधना करने वाला साधक वीर्यवान एवं ओजस्वी तेजस्वी बनता है। वह अद्वितीय एवं अनुपम मेधा शक्ति का धनी प्रतिभावान व्यक्तित्व वाला होता है।
साधना से सध जाता है।
साधना, (3) आराधना। यह तीनों दैनिक जीवन में, आहार परिश्रम-विश्राम, अन्न, जल, और वायु की तरह गुँथे रहने चाहिए। युग साहित्य के नियमित स्वाध्याय को इस प्रयास के लिए मुख्य आधार माना जाय।
साधनाओं के माध्यम से जाग्रत होने पर षट्चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार की यात्रा करती है तथा अनेकानेक अतीन्द्रिय दिव्य क्षमताओं का गुह्य भाण्डागार साधक के सामने खोल देती है। मस्तिष्क को प्राण विद्युत की शक्तिधारा की आपूर्ति इसी केन्द्र के द्वारा होती रहती है। वैज्ञानिकों ने इस केन्द्र का सम्बन्ध प्रजनन ग्रंथों से जोड़ा है। यह शक्ति केन्द्र है जिसमें काम वासना की अधिकता होती है और इसे साधित, नियंत्रित एवं परिष्कृत करके उच्चस्तरीय शक्तियों का स्वामी बना जा सकता हैं मूलाधार चक्र, की साधना करने वाला साधक वीर्यवान एवं ओजस्वी तेजस्वी बनता है। वह अद्वितीय एवं अनुपम मेधा शक्ति का धनी प्रतिभावान व्यक्तित्व वाला होता है।
साधना। जीवन को सुव्यवस्थित बनाना। जीवन सम्पदा को आत्म परिष्कार और लोक मंगल के पुण्य परमार्थ के साथ जोड़ कर, उसे सब प्रकार कृतकृत्य बनाना। इसके लिए आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास जैसी चेष्टाएँ करनी पड़ती हैं। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम अपनाना होता है।
साधना में समुचित उत्साह और तत्परता रखना। इसी परमार्थ परायणता को ईश्वर की आराधना कहते हैं। यही वह पूजा है जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान एवं देवी अनुग्रह के दोनों लाभ प्राप्त होते हैं। स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित सिद्धि होती है। लोक परलोक दोनों बनते हैं।
साधना और आराधना का समन्वित स्वरूप है। यही वह साधना है जिसके आधार पर सिद्धियां और सफलताएं सुनिश्चित बनती हैं। दूसरे के सामने हाथ पसारने गिड़गिड़ाने भर से पात्रता के अभाव में कुछ प्राप्त नहीं होता। भले कही वह दानी परमेश्वर ही क्यों न हों। कहा गया हैं कि ईश्वर केवल उनकी सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता करने को तत्पर है।
साधनाओं; यौगिक क्रियाओं के माध्यम से सिद्धि पथ के साधकों द्वारा किया जाता है।
साधना का पूरा नाम है जीवन साधना। जीवन को सुव्यवस्थित बनाना। जीवन सम्पदा को आत्म परिष्कार और लोक मंगल के पुण्य परमार्थ के साथ जोड़ कर, उसे सब प्रकार कृतकृत्य बनाना। इसके लिए आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास जैसी चेष्टाएँ करनी पड़ती हैं। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम अपनाना होता है।
साधना के कोई कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत नहीं कर पाता और साधना करने वाला लोग मंगल के क्षेत्र में सेवा कार्य किये बिना रह ही नहीं सकता। जरथुस्त्र को उनकी परमार्थ साधना एवं आडम्बरों से भरे संसार में विवेकशीलता के विस्तार हेतु सदैव याद किया जाता रहेगा।
साधना के पीछे भी यह उद्देश्य जुड़ा हुआ है। धूप में या प्रकाश की और पीठ करके खड़ा होने पर शरीर की छाया सामने आ जाती है। उसे अपना शुद्ध स्वरूप सामने उपस्थित समझा जा सकता है। इससे भी अधिक सुगम दर्पण साधना है। समस्त शरीर का प्रतिबिम्ब दिखा सकने वाला आदमकद दर्पण हो तो उत्तम।
साधना करने से शरीर में प्राण ऊर्जा का - तेजस् शक्ति का अभिवर्धन और पाचन संस्थान का शुद्धिकरण होता है।
साधना करने लगे थे और बाईस वर्ष तक करते रहे। बीच के इन सात वर्षों में उन्होंने दूध के सिवाय न अन्न खाया, न फलाहार किया। अंत में उन्हें आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे उसका प्रकाश संसार को देने के लिये चल पड़े। उनका लक्ष्य एक ही था- “अयंनिजःपरोवेति गणनालधुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1988-June
साधना से बिठाया गया है। प्राणयोग के सम्पादन से अपने मस्तिष्क के दोनों भागों को सबल सक्रिय बनाकर न केवल बौद्धिक एवं भावनात्मक क्षमताओं में संतुलन बिठाकर समग्र प्रगति का द्वार खोला जा सकता है वरन् दिव्य क्षमताओं-अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का स्वामी भी बना जा सकता है। यह राजमार्ग अध्यात्म पथ के सभी जिज्ञासु पथिकों के लिए खुला पड़ा है।
साधनाओं द्वारा इसे उभारा और शरीर से बाहर निकाला जा सकता है व जड़-चेतन को प्रभावित भी किया जा सकता है। विद्वान लेखक ए0ई॰ पावेल ने अपनी पुस्तक “दि ईथरिक डबल” में उक्त कार्यों के अतिरिक्त प्राण ऊर्जा को सुपर चेतन से संपर्क सूत्र जोड़ने वाला बताया है। उनके अनुसार प्राण वस्तुतः चेतन ऊर्जा का प्रवाह है। जब उसका संबंध ब्रह्माण्ड व्यापी महाप्राण से हो जाता है तो वही प्राणशक्ति अपनी प्रचंडता और उत्कृष्टता के आधार पर स्तर-भेद एवं रूप भेद से विभिन्न सिद्धियों-समृद्धियों तथा विभूतियों की उद्गाता और प्रदाता सिद्ध होती है। शारीरिक इन्द्रियों की क्रियाशीलता, मन की सजगता और संकल्पशीलता, बुद्धि की प्रखरता तथा अन्तः करण की उदात्त-चेतना का आधार प्राण ऊर्जा ही है।
साधना में निरत रहते हुए सहकारी जीवन जीते होंगे। यह प्रयोग तो अभी भी किया जा सकता हैं कि सज्जनों का समुदाय सद्भाव पूर्वक जहाँ रहेगा। मर्यादाओं का पालन करने और वर्जनाओं से बचने की रीति अपनायेगा वहाँ स्वल्प साधनों में प्रसन्न रहने और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने चलने की स्थिति बनती और टिकती रहेगी।
साधना से प्रसन्न होकर देवता ने वरदान माँगने के लिए कहा।
साधना चाहिए।
साधना से भी स्वयं के लिए विनिर्मित किया जा सकता हैं। वस्तुस्थिति क्या हैं ? इसका निश्चित उत्तर देने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाणों का संग्रह करने में अभी देर हैं, तब तक इस सम्बन्ध में मान्यताओं के आधार पर ही कुछ अनुमान लगाना और विश्वास करना पड़ेगा। परलोक वाले स्वर्ग की तरह ही यह भी मान्यता हैं कि कभी इस धरातल पर सतयुग था। सतयुग की स्थिति भी स्वर्ग के समतुल्य ही समझी जाती हैं अन्तर इतना ही हैं कि स्वर्ग में विलासिता की राजसी सुविधा का बाहुल्य माना गया हैं जबकि धरती वाले सतयुग में व्यक्ति और वातावरण में सात्विकता, सद्भावना, सहकारिता, सुव्यवस्था से भरी पूरी परिस्थितियाँ रहती हैं।
साधना, समाधि के समय साधकों का प्रदीप्त मंडल बहुत चमकीला एवं विस्तृत जाता हैं। इसका कारण वैज्ञानिकों ने भावना, विचारणा एवं अन्तःकरण की पवित्रता, उत्कृष्टता को माना हैं।
साधना के उच्चस्तरीय प्रयोग उपचारों की व्यवस्था प्रभामंडल के प्रखरीकरण की महती उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही बनाई जाती हैं। सत् तत्वों से ओत प्रोत प्रभामंडल में परिवर्तन ही आध्यात्मिक कायाकल्प है।
साधना को खाद पानी की तरह समझना चाहिए जिसके उपलब्ध होते रहने से विश्व उद्यान का हर कोना हरा भरा और फूल फला ही दृष्टिगोचर होता है। जब भी ऐसी परम्परा व्यापक रूप से चल रही होगी, जब भी परिस्थितियों में सात्विकता का समुचित समावेश रहा होगा, तब समूचा वातावरण ऐसी सुख शान्ति और प्रगति से भरा पूरा रहा होगा जिसे सतयुग के नाम निःसंकोच दिया जा सके।
साधनात्मक अनुशासनों में बाँधकर अपनी अन्तश्चेतना का परिष्कार करना होता है। ऐसी परिपक्वता विकसित करने तथा अन्तःकरण की निर्मलता अर्जित करने पर जीवन का रहस्य, सत्य का बोध पा सकना सभी के लिए सम्भव है।
साधना संबंधी रहस्यों की अपेक्षा इसकी विचारधारा को हृदयंगम करने की अधिक कोशिश की है। स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि वह कौन सी चीज है जो गीता के विचारों व सत्य को प्राण शक्ति देती है।
साधना करते रहे और एक दिन समाज की नई व्यवस्था “साम्यवाद” के प्रणेता बने। जीवन भर संघर्षरत रहते हुए भी उन्होंने “कैपिटल” जैसे विश्वविद्यालय ग्रन्थ की रचना की इस कार्य में उनकी पत्नी मेरी ने उनकी पूरी मदद की।
साधना और वरदान का उद्देश्य ही नष्ट हो जायेगा।
साधना क्षेत्र में प्रभामंडल या तेजोवलय के रूप में जाना जाता हैं। अँग्रेजी में इसे ही हेलो या आँरा कहा जाता हैं। यों समस्त शरीर में उसकी मात्रा होती हैं, पर आवाज की भाँति शरीर से निकलकर दूर क्षेत्र में जाते ही उसका प्रभाव कम हो जाता हैं। कहा जाता हैं कि शरीर से निकलते समय यह विद्युतधारा अत्यन्त तीव्र होती हैं। जिसके शरीर में तेजोवलय जितना अधिक प्रखर होता हैं।
साधना करने पर परिशुद्ध चेतना में वह परम ज्योति स्वतः ही प्रकट होती है। यद्यपि यह सभी जगह सभी समय विद्यमान है। किन्तु जब तक बौद्धिक क्रियाओं को ही आत्मानुभूति समझने का भ्रम रहता है। तब एक यह अविज्ञात ही रहती है। बुद्धि तत्व को उस मूल चेतना से जोड़ देने र उसमें पूरी तरह से समर्पित कर देने पर वह परम चेतना अपने आलोक से बुद्धि को प्रकाशित कर देती है स्वयं को प्रकट कर देती है।
साधना कठिनाइयों में होकर निकलने पर ही पूर्ण होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-April
साधना हर सुपात्र को अनेकानेक अनुदान देती है तथा उसके जीवन की अनगढ़ताओं को मिटा कर उसे सत्पथ पर चलना-व्यक्तित्व को सुव्यवस्थित बनाकर जीन जीना सिखाती है। गायत्री मंत्र मात्र एक वैदिक छंद या कविता नहीं अपितु समग्र धर्मशास्त्र अपने में छिपाए एक महान् शक्तिशाली मंत्र हैं। जो भी कुछ लाभ इसके बताये गए हैं वे मिलते तभी है जब व्यक्ति पात्रता का अर्जन करे, स्वयं को पवित्र निष्कलुषित बना ले तथा आचरण में आदर्शों को उतार कर भाव विह्वल होकर इस का जप करे। स्वयं जप करने से ही वह लाभ मिल पाता है जो शास्त्रों में वर्णित है। कइयों को भ्रांति है कि जप किसी और से करा के स्वयं लाभान्वित हुआ जा सकता हैं।
साधना विफल हुई। गुर्जर राजकुमार ने एक लंबी श्वास ली। वे अपने विश्राम कक्ष में एक चंदन की चौकी पर धवल वस्त्र डाले विराजमान् थे। ग्रंथ पाठ समाप्त हो गया और जप भी पूर्ण कर लिया था उन्होंने ध्यान की चेष्टा व्यर्थ रही और वे पूजा स्थान से उठ आए।
साधना की संख्या पूर्ति कर लेनी चाहिए। स्त्रियों के अनुष्ठान के दिनों मासिक धर्म का व्यवधान पड़ जाय तो चार दिन बाद उसकी पूर्ति उतने दिन आगे बढ़ा कर या जप संख्या बढ़ा कर उसकी पूर्ति कर लेनी चाहिए।
साधना किसी भी पुरुषार्थ से, योग से बढ़कर है। इसलिए शास्त्रकार ने कहा-जिते जगत केन? मना ही येन” जिसने मन का लिया उसने संसार को जीत लिया।
साधना स्तर के पुरुषार्थी आश्वमेधिक स्तर के प्रयोगों से चिरकाल से प्रवाहित होते रहने वाले संस्कारों की ऋषि कालीन-सतयुगी विचार-चिन्तन की विलक्षण फौज न जाने ब्रह्माण्ड के किस कोने से दौड़ती आती चली जाती है और बादलों की तरह आच्छादित हो बरसने लगती है।
साधना कीजिए। इस सत्संग की साधना का ज्योति स्थल शान्तिकुञ्ज के रूप में आज हम सब के लिए सौभाग्य स्रोत के रूप में स्थित है बस देर है यहाँ आने और स्वयं के अस्तित्व यहाँ चैतन्य प्रवाह में निमग्न करने की है।
साधना सफल सार्थक बन सकती है।
साधना का ज्योति स्थल शान्तिकुञ्ज के रूप में आज हम सब के लिए सौभाग्य स्रोत के रूप में स्थित है बस देर है यहाँ आने और स्वयं के अस्तित्व यहाँ चैतन्य प्रवाह में निमग्न करने की है।
साधनात्मक पुरुषार्थ को बल मिले। पुरश्चरण इसी स्तर के जप पुरुषार्थ माने गये है जिनमें ढेर सारी एक विचारधारा की साधक मनः स्थिति की जनशक्ति मिलकर अपनी समन्वित विचार तरंगों से श्रेष्ठ वातावरण का निर्माण करे। संधिकाल की नवरात्रि वेला में यदि यह पुरुषार्थ किया जा रहा हो तो यह प्रक्रिया और भी बलवती होती चली जाती है एवं सारे वातावरण के आंदोलित होकर उससे माहौल को फिजा को एक “एरा” को ही बदल डालने की शक्ति उत्पन्न होती देखी जा सकती है। मनः स्थिति प्रचण्ड बल,द्वारा अपने योग्य वातावरण का निर्माण करती है व वैसा ही झंझावात आवेश पूरे परिकर में बनाने की शक्ति रखती है यह एक नितान्त सत्य है। मनुष्य ही वातावरण बनाता और ढालता है और उसी में एक समग्र तत्कालीन मानवजाति ढलती चली जाती है यह ऐतिहासिक तथ्य है।
साधना से सधा हुआ तन और मन चाहिये। विवेक का तराजू देकर ईश्वर ने मनुष्य में अपनी स्थिति जताई है। फिर हम उसका निर्वाह करने में पीछे क्यों रहें? क्यों न आलस्य निद्रा मोह त्याग कर अदम्य साहस और श्रम द्वारा समाज को युग-बौद्ध युग निर्माण की सज्जा के उपयुक्त बना डाले। यही वस्तुतः युगधर्म है आज के लिए हम सबके लिए निर्धारित एक राजमार्ग जिस पर चलकर परमार्थ करते हुए कोई भी सच्चे अर्थों में स्वार्थ निभाता चल सकता है।
साधना उफनती है। संस्कृति की गरिमा इन्हीं में प्रतिष्ठित है। अतः आपको इस प्रपंच से परित्राण पाना चाहिए। दृढ़ होना चाहिए। उसी (सत्संग) की साधना कीजिए।
साधना कीजिए। (एक मात्र) उसी की (निश्चयपूर्वक) साधना कीजिए। इस सत्संग की साधना का ज्योति स्थल शान्तिकुञ्ज के रूप में आज हम सब के लिए सौभाग्य स्रोत के रूप में स्थित है बस देर है यहाँ आने और स्वयं के अस्तित्व यहाँ चैतन्य प्रवाह में निमग्न करने की है।
साधना के आरम्भ काल में वासना विलीन हो गई थी। मन एकाग्रं हो जाता था। उन्हें अपार शान्ति एवं आनंद प्राप्त होता था। अब ये स्थिति है कि मन एक क्षण टिकता नहीं लक्ष्य पर। जिन वासनाओं को वह अत्यन्त हेय समझते रहे है, वे भी अब विक्षिप्त किये रहती है पाठ और जप के समय भी मन विषय−वासनाओं की ही उधेड़ बुन में लगा रहता हैं।
साधना करते हैं तो धुले कपड़े पर अच्छा रंग चढ़ने की तरह विशेष लाभ होता है। अन्यथा दुराचारी पर भी कोई रोक नहीं है। उसकी पाप नाश का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। उसका तात्पर्य पाप फल का नाश होने से नहीं वरन् पाप वृत्तियों से छुटकारा मिलने से है।
साधना साध्य और सिद्धि के जीवंत रूप है। श्रीमान ने सुना नहीं कि लोक प्रसिद्ध योगाचार्य उनके श्री चरणों में उपस्थित होकर अपने मार्ग के लिए प्रकाश की याचना करते रहते है।
साधना की चर्चा करने व विधि बताते रहने पर लोग अपनी अपनी नुक्ताचीनी निकालते और नये विधान बताकर साधक के मन को शंका सिक्त करते रहते है। जितनों से पूछा जाय उतनी ही कुछ नयी मीनमेख निकलेगी और मन भ्रमजाल में फँस कर श्रद्धा गँवा बैठेगा। विधियों में परिवर्तन करेगा और उस शंकास्पद स्थिति में लाभों से विधान को सुनिश्चित मान कर उसे श्रद्धापूर्वक अपनाये रहने की मनोभूमि बनानी चाहिए।
साधना में निरत रहने वालों के लिए ही उपयुक्त बैठती है। क्योंकि पर्यावरणीय तनाव क्षेत्र को सहन करने की सामर्थ्य सामान्य लोगों की अपेक्षा योगी संयमी लोगों में अधिक होती है।
साधना बताई गई है। वीर्य से खींचा गया यह स्वत्व या तत्त्व जिसे ओजस् कहते है न केवल स्थूल शरीर को प्रभावित करता है वरन् सूक्ष्म शरीर, और कारण शरीर को भी प्रभावित एवं रक्त का मंथन होकर रेतस ग्रन्थियों द्वारा वीर्य का निर्माण उसका एक नियत थैली में संचय और स्खलन के साथ उसका मूत्रेन्द्रिय द्वारा बाहर निकल जाना इस मोटी बात को शरीर शास्त्र का सामान्य विद्यार्थी भी जानता है पर यह जानकारी किसी-किसी को ही है कि कामवासना के विचार समस्त शरीर में फैले हुए प्राण तत्त्व का मंथन करते है और सम्भोग के समय वीर्यपात के साथ साथ ही इस प्राण प्रवाह का एक अंश भी बाहर जाता है। फलतः इससे व्यक्ति क्रमशः दुर्बल हो जाता है। शरीर दृष्टि से उतना नहीं जितना कि मानसिक दृष्टि से उतना नहीं जितना कि मानसिक दृष्टि से।
साधना में असत् में सत् अंधकार में प्रकाश तथा अज्ञान में ज्ञान की स्थापना की वह विलक्षण शक्ति है जो अपने आप में अनूठी है। यदि एकाकी साधना द्वारा वह साधक का ब्रह्मवर्चस् जगाती है तो सामूहिक उपासना, प्रार्थना में सारे वातावरण को हिला देने की शक्ति होती है इसी आधार पर अगले दिनों सभी धर्म सम्प्रदायों के व्यक्तियों द्वारा सामूहिक स्तर पर अपनी अपनी उपासना के प्रयोग मानव मात्र के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के निमित्त एक ही संयम किये जाने का प्रयोग पूरे भारत के महानगरों कस्बों देहातों में प्रयोग स्तर पर आँवलखेड़ा की प्रथम पूर्णाहुति तक बारबार सम्पन्न किये जाने की योजना बनी है ताकि युग परिवर्तन का माहौल बन सके। किसी को अपना धर्म बदलने उपासना पद्धति में परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है धियो यो नः प्रचोदयात् की भावना से सब एक साथ सन्मार्ग पर चले इस संज्ञा व सूक्त की भाव श्रद्धा के साथ उज्ज्वल भविष्य का पथ सभी के लिए एक साथ प्रशस्त हो इसी चिंतन चेतना के उदात्तीकरण के साथ यह सामूहिक प्रयोग जप उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें।
साधना किसी कारणवश किसी दिन छूट जाय तो उसका विकल्प यह है कि अगले दिनों थोड़ा थोड़ा जप बढ़ा कर उस छूटी गई साधना की संख्या पूर्ति कर लेनी चाहिए। स्त्रियों के अनुष्ठान के दिनों मासिक धर्म का व्यवधान पड़ जाय तो चार दिन बाद उसकी पूर्ति उतने दिन आगे बढ़ा कर या जप संख्या बढ़ा कर उसकी पूर्ति कर लेनी चाहिए।
साधना द्वारा वह साधक का ब्रह्मवर्चस् जगाती है तो सामूहिक उपासना, प्रार्थना में सारे वातावरण को हिला देने की शक्ति होती है इसी आधार पर अगले दिनों सभी धर्म सम्प्रदायों के व्यक्तियों द्वारा सामूहिक स्तर पर अपनी अपनी उपासना के प्रयोग मानव मात्र के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के निमित्त एक ही संयम किये जाने का प्रयोग पूरे भारत के महानगरों कस्बों देहातों में प्रयोग स्तर पर आँवलखेड़ा की प्रथम पूर्णाहुति तक बारबार सम्पन्न किये जाने की योजना बनी है ताकि युग परिवर्तन का माहौल बन सके। किसी को अपना धर्म बदलने उपासना पद्धति में परिवर्तन करने की जरूरत नहीं है धियो यो नः प्रचोदयात् की भावना से सब एक साथ सन्मार्ग पर चले इस संज्ञा व सूक्त की भाव श्रद्धा के साथ उज्ज्वल भविष्य का पथ सभी के लिए एक साथ प्रशस्त हो इसी चिंतन चेतना के उदात्तीकरण के साथ यह सामूहिक प्रयोग जप उपासना दीपयज्ञों अनुष्ठानों आदि रूप में सम्पन्न किये जाते रहेंगे एवं देखते देखते सारा वातावरण गायत्रीमय विवेक श्रद्धा से परिपूरित होता देखा जा सकेगा। गायत्री महामंत्र की प्रेरणा सभी को समान रूप से अनुष्ठान के पूर्व के आगामी सात माहों में यह भी प्रयोग किया जा रहा है कि इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवादों का मंत्र व भावार्थ का सीमित ही सही बड़े व्यापक पैमाने पर लेखन का क्रम चल पड़े जो मंत्र जप सके वे जपे किन्तु जो लिख सके वे पाँच ही सही पर अपनी अपनी भाषा में उसी भावचेतना से अनुप्राणित हो मंत्र? के भावार्थ का भी लेखन करें। वे उर्दू गुरु अंग्रेजी तमिल तेलगू असमी बंगाली कन्नड़ मलयालम मलयाली गुजराती किसी भी भाषा में हो सकता है बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस अभियान में सम्मिलित हो प्रसुप्त संस्कारों को जगाने की प्रक्रिया को साकार कर सकते है यह प्रयोग सारे भारत व विश्व में एक साथ चल पड़े तो देखते देखते वातावरण के बदलने युग शक्ति के व्यापक होने की सुखद कल्पना सहज की जा सकती है।
साधना में निरत हुआ जाय और अविचल भाव से उस मार्ग पर चलते रहा जाय। अनेकों से अपनी साधना की चर्चा करने व विधि बताते रहने पर लोग अपनी अपनी नुक्ताचीनी निकालते और नये विधान बताकर साधक के मन को शंका सिक्त करते रहते है। जितनों से पूछा जाय उतनी ही कुछ नयी मीनमेख निकलेगी और मन भ्रमजाल में फँस कर श्रद्धा गँवा बैठेगा। विधियों में परिवर्तन करेगा और उस शंकास्पद स्थिति में लाभों से विधान को सुनिश्चित मान कर उसे श्रद्धापूर्वक अपनाये रहने की मनोभूमि बनानी चाहिए।
साधना को गुप्त रखने का आधार इतना ही है कि एक बार सारी शंकाओं का निराकरण करके साधना में निरत हुआ जाय और अविचल भाव से उस मार्ग पर चलते रहा जाय। अनेकों से अपनी साधना की चर्चा करने व विधि बताते रहने पर लोग अपनी अपनी नुक्ताचीनी निकालते और नये विधान बताकर साधक के मन को शंका सिक्त करते रहते है। जितनों से पूछा जाय उतनी ही कुछ नयी मीनमेख निकलेगी और मन भ्रमजाल में फँस कर श्रद्धा गँवा बैठेगा। विधियों में परिवर्तन करेगा और उस शंकास्पद स्थिति में लाभों से विधान को सुनिश्चित मान कर उसे श्रद्धापूर्वक अपनाये रहने की मनोभूमि बनानी चाहिए।
साधना में किसी तरह की बाधा न आएगी सुबह होते ही मंजिल की ओर तेजी से कदम बढ़ाकर पहुँचने का प्रयास करूँगा
साधना से मिल सकती है। गायत्री उपासना के व्यापक विस्तार से वह प्रयोजन पूर्ण हुआ माना जाना चाहिए, जिससे की सतयुगी सम्भावना ही साकार की ही जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-January
साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धाँतों का गंभीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्वक अनुगमन आवश्यक है, तभी दिव्य शक्तियों का वरद् हस्त प्राप्त हो सकता है।
साधनाओं में प्रायः इन्हीं से बने यंत्र प्रयुक्त होते हैं। ये यंत्र केवल रेखाओं और त्रिकोणों आदि से बन ज्यामिति विज्ञान के प्रदर्शक चित्र ही नहीं होते, वरन् उनकी रचना विशेष आध्यात्मिक दृष्टिकोण से की जाती है। जिस प्रकार से विभिन्न देवी-देवताओं के रंग-रूप के रहस्य होते हैं, उसी तरह सभी यंत्र विशेष उद्देश्य से बनाये गये हैं। इन यंत्रों में पिण्ड और ब्रह्माण्ड का दर्शन पिरोया हुआ है। भारतीय दर्शन का मत है कि जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वह सारी देवशक्तियां पिण्ड अर्थात् मानवीकाया में भी सूक्ष्म रूप में विद्यमान है।
साधना भगवान के विषय में और भी गंभीर दावा करती है। यह मानव के संवेदनशील और सक्रिय भागों, हृदय, संकल्प और जीवन सत्ता को भी लेती है और उन्हें आत्मा के ढाँचे के अनुरूप विकसित करने का यत्न करती है। इसलिए तंत्र राष्ट्र के प्रगतिशील तथा आत्म–विस्तारशील आध्यात्मिक आँदोलन में एक महत्वपूर्ण और यहाँ तक कि एक अनिवार्य सोपान रहा है।”
साधना के तुरंत बाद जन-साधारण के समक्ष पर्वों पर दिये गये उद्बोधनों में अंतिम व अत्यधिक महत्वपूर्ण है। गुरुपूर्णिमा 1986 के बाद वे कभी शाँतिकुँज के मुख्य मंच पर नहीं आए। आइए, 1995 क वसंत की पूर्वबेला में इस अमृत धारा में अवगाहन करें व कुछ निज की आत्म समीक्षा करें।
साधना की है, उसकी पुण्य संपदा जो हमारे पास जमा है, उसमें आपका हिस्सा बराबर है। माँ के पेट में जब बच्चा आता है तब कानूनन उसका हक बाप की जायदाद पर हो जाता है। इसी तरह हमारी कमाई पर आपका हक है। प्रार्थना मत कीजिए, निवेदन मत कीजिए, मनुहार मत कीजिए, वरदान मत माँगिये। आप अपना हक माँगिये कि हम आपका काम करते हैं और आपको हक चुकाना पड़ेगा।
साधना प्रणालियों की खोज बीन कर विभिन्न विचारकों महापुरुषों, श्रेष्ठतम योगियों की दृष्टि एक ही बिंदु पर टिकती है और वह बिंदु-सेवा है।
साधनायें शक्ति के स्रोत हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थित षट्चक्रों और यौगिक ग्रंथियों-उपत्यिकाओं को जगाकर साधक को एक शक्तिशाली चुँबक बना देती है। अंग-प्रत्यंग से शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और यही आकर्षण शक्ति ईश्वर की विभिन्न शक्तियों, जिन्हें देवता कहते हैं, को अपने अनुकूल बनाकर अपनी ओर आकर्षित करती हैं और मनोवाँछित सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। सूक्ष्म देवताओं के लिए सूक्ष्म साधनों की आवश्यकता रहती है और इस कार्य के लिए मंत्र सर्वोपरि साधन स्वीकार किये गये हैं। तंत्रों ने मंत्रों के साथ बीजाक्षरों का प्रयोग भी बताया है।
साधनायें, उपासनायें एवं तपश्चर्या का आश्रय लेना पड़ता है। इनमें भावनाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है। यही वह सूक्ष्म उपाय-उपचार है जिसकी पहुँच गुप्त मन तक होती है सही भावनायें हमारे गुप्त मन का नव निर्माण करती हैं और हमारे चारों ओर का संसार वैसा ही बनता चला जाता है। भाव प्रवणता से अचेतन मन परिष्कृत होता जाता है और प्रसुप्त पड़ी अतीन्द्रिय क्षमतायें जाग्रत होने लगती हैं। अंदर से बाहर की ओर एक आध्यात्मिक प्रवाह चलने लगता है, परिणाम स्वरूप शक्तियों का नवसृजन होता है, बिखरी शक्तियाँ एकाग्र होकर दिव्यताओं एवं महानताओं का नवनिर्माण करती हैं जिनसे इच्छानुसार भौतिक सिद्धियों एवं आध्यात्मिक विभूतियों के लाभ प्राप्त होते हैं।
साधना, क्रिया पर जोर देते हुए कहा है-”स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः।” जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है उसे ही सिद्धि मिलती है। कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है।
साधनाओं द्वारा उन्हें पकड़ा जाता है, उनको प्राणवान बनाया जाता है, जाग्रत, क्रियाशील और चैतन्य बनाया जाता है। चैतन्य होने पर वह साधक पर आक्रमण करती हैं। यदि साधक इस आक्रमण से भयभीत न हुआ तो वह ग्रंथियाँ उस साधक के वश में हो जाती हैं और अप्रत्यक्ष शरीर से उसके सभी कार्य सिद्ध करती हैं। यदि वह भयभीत हो जाय तो उसे हानि की भी संभावना होती है। प्राचीनकाल में जब तंत्र अपने विशुद्ध रूप में चरमोत्कर्ष पर था तब अदृश्य लोक की इन चेतना ग्रंथियों को जाग्रत कर वह सभी कार्य कर लिये जाते थे जो आजकल भौतिक विज्ञान की शोधों से यंत्रों द्वारा किये जाते हैं।
साधना महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न करती है।
साधना एक मास के युगशिल्पी प्रशिक्षण के साथ एक सुनियोजित विधा जलागम परियोजना के द्वारा राष्ट्र के आर्थिक विकास के कार्यक्रमों से भी जुड़ गयी। दो बड़े प्राँत मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के चुने हुए ब्लाकों में आरंभ हुई यह प्रक्रिया प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के द्वारा अब विभिन्न रूपों में दोनों प्राँतों के सभी जिलों में अश्वमेधिक अनुयाज क्रम में पहुँचा दी जाएगी, ऐसा विश्वास किया गया है।
साधना प्रणाली में प्रवेश हेतु अनिवार्य योग्यता है, नैतिकता। पतंजलि हों या गोरखनाथ, कपिल हों या भगवान श्रीकृष्ण, लाओत्से, ताओ, बुद्ध, बाषो कोई भी क्यों न हों, इस अनिवार्य योग्यता के बिना अपनी प्रणाली में प्रवेश नहीं देते। यदि प्रवेश मिलता भी है, तो प्रवेशिका स्तर पर। इसे उत्तीर्ण किए बगैर, पूर्ण नैतिक हुए बिना साधना पद्धति में स्थान नहीं। लोक सेवा के लिए भी यही शर्त है।
साधना पद्धति के रूप में अपना लिया है, वे इसे प्रथम चरण में ही पा लेते हैं। क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यश, विहीन क्रियाशीलता चाहिए। इसे ही तमस् का सत्व में रूपांतरण समझा जा सकता है। सारे आवेग, कामुकता, क्रोध, मोह, लोभ आदि प्राणिक स्तर पर अपनी जड़ जमाए रहते हैं। प्रचलित योगों के किसी भी साधक को इनकी जड़े उखाड़ने में पसीने आ जाते हैं।
साधना की इस समग्र प्रणाली के रहते अपने ऊपर लोक-सेवी का लेबल चिपकाने पर भी जो लोग इसके लाभों से वंचित हैं, इसका कारण क्या है? स्वयं की खामीं, दो टूक जवाब था उनका। गरीबों को गले लगाने तथा कष्ट पीड़ितों की मदद करने की बात हर कोई करता है, लेकिन अपने आस-पास के ऐसे लोगों पर ध्यान देना अनावश्यक लगता है। जिन्हें वस्तुतः सहायता की आवश्यकता है। इस संदर्भ में उन्होंने एक घटना क्रम सुनाते हुए कहा था-मैं नाम तो नहीं लूँगी उनका, यद्यपि उस समय उनका बहुत नाम था।
साधना का प्रचार उच्चशिखर पर था, साधक इससे अनेकों प्रकार की असाधारण सिद्धियाँ प्राप्त करते थे, जो आज सर्वथा असंभव दृष्टिगोचर होती हैं। प्राचीन काल के साधक इससे बड़े-बड़े लाभ उठाते थे। रावण और अहिरावण हजारों मील की दूरी से बिना वैज्ञानिक यंत्रों के आपस में वार्तालाप करते थे। नल-नील ने पानी पर तैरने वाले पत्थरों से पुल बनाया था। हनुमान मच्छर की तरह छोटा बन सकते थे और बृहदाकार पर्वत खंडों को उठाने की सामर्थ्य भी रखते थे।
साधना के लिए तपस्या के लिए घर से निकलने वालों की संख्या के अनुरूप आत्मोत्कर्ष के धनी संत-महात्मा कहाँ हैं? इसका सीधा मतलब यही है कि बात को समझा नहीं गया। उसे ठीक ढंग से अपनाया नहीं गया।
साधना क्रम। इसमें हठयोग जहाँ अपना समूचा ध्यान शरीर पर जमाता है। राजयोग मानसिकता में फेर-बदल करता है। तंत्र की गुह्य पद्धतियाँ प्राणिक जगत में परिवर्तन व रूपांतरण का रुख अपनाती हैं। किंतु इन तीनों आधारों में एक साथ निखार आए, ये शुद्धात्म चेतना का प्रवाह धारण कर सकें, ऐसी स्थिति नहीं बन पाती है।
साधनाओं के विधि-विधान का मार्गदर्शन ही इनका मुख्य कार्य है।’
साधना पंचकोशों को पार करने एवं षट्चक्र जागरण कुण्डलिनी उन्नयन की उच्चतम प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करती है। अन्नमय कोष से आनंदमय कोष की ओर बढ़ते हुए चलना इनका उद्देश्य है। तंत्र साधनायें शक्ति के स्रोत हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थित षट्चक्रों और यौगिक ग्रंथियों-उपत्यिकाओं को जगाकर साधक को एक शक्तिशाली चुँबक बना देती है। अंग-प्रत्यंग से शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और यही आकर्षण शक्ति ईश्वर की विभिन्न शक्तियों, जिन्हें देवता कहते हैं, को अपने अनुकूल बनाकर अपनी ओर आकर्षित करती हैं और मनोवाँछित सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।
साधनात्मक प्रवृत्तियों एवं मंत्र-जप और भजन-कीर्तन संबंधी उपासनात्मक उपचारों का लंबे काल तक आश्रय लेना पड़ता है। कारण कि चेतना और मन को प्रभावित करने की जितनी सामर्थ्य शब्द और संकल्प में है उतना सरल और समर्थ उपाय शायद और कोई नहीं। मंत्र ध्वनि के बार-बार के आघात से चेतना-केन्द्र परिष्कृत होने लगते हैं और मन विगलित होकर विकसित होता जाता है। फिर एक शून्य जैसी स्थिति पैदा होती है। इसीसे नाद का स्फुरण होता है।
साधना विज्ञान में विशेषकर वाममार्गी ताँत्रिक साधनाओं में ‘यंत्र-साधना’ का बड़ा महत्व है। जिस तरह देवी देवताओं की प्रतीकोपासना की जाती है और उनमें सन्निहित दिव्यताओं, प्रेरणाओं की अवधारणा की जाती है, उसी तरह ‘यंत्र’ भी किसी देवी या देवता के प्रतीक होते हैं। इनकी रचना ज्यामितीय होती है। यह बिंदु, रेखाओं, वक्र-रेखाओं, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों और पद्मदलों से मिलाकर बनाये जाते हैं और अलग-अलग प्रकार से बनाये जाते हैं। कई का तो बनाना भी कठिन होता है।
साधना द्वारा दूसरों के मन को प्रभावित किया जा सकता है और उसकी गतिविधियों को अपनी इच्छानुसार मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। निर्बल मन व शरीर वाले व्यक्तियों को स्वस्थ बनाया जा सकता है। बिच्छू एवं सर्पदंश तथा विषैले फोड़ों का समाधान भी तंत्र द्वारा मिलता है। अनिष्टग्रह, भूतोन्माद, नजर लगने आदि के उपचार तंत्र द्वारा होते हैं। मानसिक उद्वेग, असहनीय वेदना व अन्य शारीरिक अव्यवस्थाओं में तंत्र सहायक सिद्ध होता है।
साधना के कष्टों को सहना पड़ता है। संतति सुख को प्राप्त करने में माता-पिता को अमित कष्ट उठाने पड़ते हैं। कष्ट और कठिनाई का व्यवधान उन्नति की हर दिशा में मौजूद रहता है। ऐसी एक भी सफलता नहीं है जो कठिनाइयों से संघर्ष किये बिना ही प्राप्त हो जाती हो। जीवन के महत्वपूर्ण मार्ग, विघ्न बाधाओं से सदा भरे रहते हैं।
साधना पद्धति में स्थान नहीं। लोक सेवा के लिए भी यही शर्त है। अनैतिक व्यक्ति कभी सच्चा लोक सेवी नहीं बन सकता।
साधनारत है और शिष्य पृथ्वी के दूसरे छोर-अमेरिका में रह रहा है। दोनों के मध्य कोई भौतिक संचार माध्यम उपलब्ध नहीं, किंतु फिर भी शिष्य का मार्गदर्शन होता रहता है। यह सब घड़ी भर में घटित हो जाता है। यदि उस घटना को जिसे उसने अनुभूति स्तर पर आत्मसात् किया है, लिखें तो कदाचित् घंटे भर का भी समय लग सकता है, किंतु टेलीपैथी क्रम में उतना बड़ा प्रसंग क्षणमात्र में घट जाता है। कारण कि घटनाक्रम को सुस्त बनाने वाले भौतिक व्यवधान वहाँ नहीं रहे।
साधना की समग्र प्रणाली कहा है, इसे अपनाने पर व्यक्ति के तीनों ही आधार न केवल सशक्त होते हैं, निखार आता है, वरन् समूची अंतर्शक्तियां अपने यथार्थ रूप में अभिव्यक्त होने लगती हैं। बात को और स्पष्ट करते हुए वह कहने लगे अपना शरीर पार्थिव चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका गुण है जड़ता। इस तमस् का सत्व में रूपांतरण ही अभीष्ट है। जिन्होंने लोकसेवा को साधना पद्धति के रूप में अपना लिया है, वे इसे प्रथम चरण में ही पा लेते हैं। क्योंकि सच्चे साधक को तो नाम, यश, विहीन क्रियाशीलता चाहिए।
साधना से साधक में तद्नुरूप ही शक्तियों का विकास होता है और वह उत्तरोत्तर प्रगति करते हुए आत्मोत्कर्ष के चरमलक्ष्य तक जा पहुँचता है।
साधनाओं में ‘यंत्र-साधना’ का बड़ा महत्व है। जिस तरह देवी देवताओं की प्रतीकोपासना की जाती है और उनमें सन्निहित दिव्यताओं, प्रेरणाओं की अवधारणा की जाती है, उसी तरह ‘यंत्र’ भी किसी देवी या देवता के प्रतीक होते हैं। इनकी रचना ज्यामितीय होती है। यह बिंदु, रेखाओं, वक्र-रेखाओं, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों और पद्मदलों से मिलाकर बनाये जाते हैं और अलग-अलग प्रकार से बनाये जाते हैं। कई का तो बनाना भी कठिन होता है।
साधनायें व सिद्धाँत प्रचलित हैं वे धर्म से दूर का भी रिश्ता न रखते हों। हो सकता है वे विरोधी भी हों। पर वे प्रचलन में आ गई हैं इसलिये धर्म बन गयीं हैं। ऐसी स्थिति में धर्म की कोई उपयोगिता नहीं रह जायेगी।
साधना होती है और कई बार भ्रम में भटक कर हम गलत साधनों का उपयोग कर बैठते हैं। फलतः साध्य के प्राप्त होने का जो संतोष और प्रसन्नता मिलनी चाहिए उससे हम वंचित रह जाते हैं।
साधना क्षेत्र को भ्रष्ट कर दिया, जिससे बौद्धिक क्षेत्र में इनके प्रति घृणा के बीज उत्पन्न हो गये। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है। जहाँ ‘मद्य’ के प्रयोग का आदेश है वहाँ नशा उत्पन्न करने वाले पेय से अभिप्राय नहीं है, वरन् वह दिव्य ज्ञान है जिससे साधक बाहरी जगत से नाता तोड़कर आँतरिक क्षेत्र में प्रवेश करता है। परमात्मा को सर्वस्व समर्पित करना ही तो ‘माँस’ का सेवन कहलाता है। ‘मत्स्य’ का अभिप्राय उस स्थिति से है जब सभी तरह के सुख-दुख एक समान हो जाते हैं।
साधना ही साध्य की अर्चना है।
साधना करते हैं। विषयी प्रकृति के व्यक्ति अपनी वासनाओं को तृप्त करने के लिए एक प्रकार का षडयंत्र करते हैं और तंत्रशास्त्र को बदनाम करते हैं जिससे यह व्यावहारिक रूप में जनसाधारण से दूर चला गया है। इसकी वास्तविकता को समझना और तद्नुरूप आचरण करना ही अभीष्ट है जिससे जीवन विकास में इस विज्ञान का लाभ उठाया जा सके।
साधना की जा सके तो सिद्धि अवश्य मिलती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
साधनाओं में मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन के प्रयोग का निर्देश किया गया है। अलंकारिक भाषा में प्रयुक्त इन शब्दों को साधारण कोटि के साधक न समझ सके और इनका प्रत्यक्ष प्रयोग करके इस उच्चस्तरीय साधना क्षेत्र को भ्रष्ट कर दिया, जिससे बौद्धिक क्षेत्र में इनके प्रति घृणा के बीज उत्पन्न हो गये। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है। जहाँ ‘मद्य’ के प्रयोग का आदेश है वहाँ नशा उत्पन्न करने वाले पेय से अभिप्राय नहीं है, वरन् वह दिव्य ज्ञान है जिससे साधक बाहरी जगत से नाता तोड़कर आँतरिक क्षेत्र में प्रवेश करता है। परमात्मा को सर्वस्व समर्पित करना ही तो ‘माँस’ का सेवन कहलाता है।
साधना मार्ग का निष्ठापूर्वक अनुगमन आवश्यक है, तभी दिव्य शक्तियों का वरद् हस्त प्राप्त हो सकता है।
साधना से ही उत्कर्ष होता है। यंत्र के बीच में बिंदु होता है, जो गतिशीलता का, प्रतीक है। शरीर और ब्रह्माण्ड का प्रत्येक परमाणु अपनी धुरी पर तीव्रतम गति से सतत् चक्कर काट रहा हैं यह सर्वव्यापक है। अतः हमें भी उन्नति के मार्ग पर संतुष्ट नहीं रहना है, वरन् हर क्षण आगे बढ़ने के लिए तत्पर और गतिशील रहना है, तभी शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा गतिशील हो सकते हैं। बिंदु आकाशतत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है क्योंकि इसमें अनुप्रवेश भाव रहता है जो आकाश का गुण है।
साधनाओं का लक्ष्य बड़ा विस्तृत है। वशीकरण, मारण, मोहन, उच्चाटन, दृष्टिबंध, परकाया प्रवेश, सर्पविद्या, प्रेतविद्या, अदृश्य वस्तुओं को देखना, भविष्य ज्ञान, संतान, सुयोग, आकर्षण, मोहन मंत्र, घात-प्रतिघात आदि की क्रियायें इससे संचालित की जा सकती है। इस साधना द्वारा दूसरों के मन को प्रभावित किया जा सकता है और उसकी गतिविधियों को अपनी इच्छानुसार मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। निर्बल मन व शरीर वाले व्यक्तियों को स्वस्थ बनाया जा सकता है। बिच्छू एवं सर्पदंश तथा विषैले फोड़ों का समाधान भी तंत्र द्वारा मिलता है।
साधना की जाती है। इन साधनाओं में मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन के प्रयोग का निर्देश किया गया है। अलंकारिक भाषा में प्रयुक्त इन शब्दों को साधारण कोटि के साधक न समझ सके और इनका प्रत्यक्ष प्रयोग करके इस उच्चस्तरीय साधना क्षेत्र को भ्रष्ट कर दिया, जिससे बौद्धिक क्षेत्र में इनके प्रति घृणा के बीज उत्पन्न हो गये। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है। जहाँ ‘मद्य’ के प्रयोग का आदेश है वहाँ नशा उत्पन्न करने वाले पेय से अभिप्राय नहीं है, वरन् वह दिव्य ज्ञान है जिससे साधक बाहरी जगत से नाता तोड़कर आँतरिक क्षेत्र में प्रवेश करता है।
साधना की जा रही है, उसके अनुसार उन्हीं प्रकार की चेतना ग्रंथियों को जाग्रत किया जाता है, ताकि वह क्रियाशील होकर अनुकूल परिणाम प्रस्तुत शरीर से अपने स्वामी को सभी आज्ञाओं का पालन करता है वैसे ही अप्रत्यक्ष शरीर से वह चेतना ग्रंथियाँ सदैव उसके साथ रहती हैं और अपनी शक्ति के अनुसार साधक की आज्ञाओं को पूर्ण करती हैं। जैसे कहा जाता है कि ताँत्रिक को भैरव, छाया पुरुष, ब्रह्मराक्षस, मसान, पिशाच, आदि सिद्ध हैं।
साधना-उपासना में भावना का होना निताँत आवश्यक माना गया है, अन्यथा पूर्ण लाभ की आशा-अपेक्षा नहीं की जा सकती। भावना को शास्त्रकारों ने पारसमणि कहा है। पारस-पत्थर लोहे को सोना बना देता है, भावना भी मनुष्य को तदनुरूप ही ढाल देती है। कहा भी गया है-”यादृषी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृषी।” अर्थात् जिसकी जैसी भावना होती है उसे वैसी ही सिद्धि मिला करती है।
साधनायें करनी पड़ती हैं। इनका संकेत-सूत्र यंत्र के विभिन्न अंगों से परिलक्षित होता है। उनका चिंतन-मनन करना होता है। विचार परिष्कार एवं भाव-साधना से ही उत्कर्ष होता है। यंत्र के बीच में बिंदु होता है, जो गतिशीलता का, प्रतीक है।
साधना-उपासना के फलीभूत होने का तात्पर्य शक्तियों का गतिमान होना ही है।
साधना-उपासना की सफलता का मूल आधार भावना ही है। इसके अभाव में सारे कर्मकाँड भारभूत ही सिद्ध होते हैं।
साधना इसी की होनी चाहिए, पर साथ ही ध्यान इस बात का भी रखा जाना चाहिए क भोग-विलास में डूब कर मूल प्रयोजन को ही हम भूल न जायें। त्यागपूर्वक रहते हुए विराट् ब्रह्म की सेवा करें और अंततः उसे प्राप्त कर जीवन-मुक्तों जैसा आनंद लाभ करें। मिथ्या के रूप में संसार का यही तात्पर्य हो सकता है, पर जहाँ मूल को छोड़ कर पत्र-पल्लवों जैसे बाह्य अवयवों में उलझा जायेगा, वहाँ इससे पलायनवाद को ही प्रश्रय मिलेगा। इसमें दोष दर्शन का नहीं, उस बुद्धि का है, जो अपने अंदर सत्य को समझने वाला विज्ञान पैदा न कर सकी और शब्दों में उलझ कर यथार्थ से दूर हटती गई।
साधना का उद्देश्य ब्रह्म की एकता की सिद्धि प्राप्त करना है। यंत्र द्वारा इस अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए विभिन्न प्रकार की साधनायें करनी पड़ती हैं। इनका संकेत-सूत्र यंत्र के विभिन्न अंगों से परिलक्षित होता है। उनका चिंतन-मनन करना होता है। विचार परिष्कार एवं भाव-साधना से ही उत्कर्ष होता है।
साधना में साधक यंत्र का ध्यान करते हुए ब्रह्माण्ड का ध्यान करता है और क्रमशः आगे बढ़ते हुए अपनी पिण्ड चेतना को वह ब्रह्म जितना ही विस्तृत अनुभव करने लगता है। एक समय आता है जब दोनों में कोई अंतर नहीं रहता और वह अपनी ही पूजा करता है। उसके ध्यान में पिण्ड और ब्रह्माण्ड का ऐक्य हो जाता है। वह भगवती महाशक्ति को अपना ही रूप समझता है, फिर उसे सारा जगत ही अपना रूप लगने लगता है। वह अपने को सब में समाया हुआ पाता है, अपने अतिरिक्त उसे और कुछ दृष्टिगोचर ही नहीं होता।
साधना, लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव होगी जब साध्य और साधन को जोड़कर मनुष्य साधन-निष्ठा बनेगा।
साधना’ का बड़ा महत्व है। जिस तरह देवी देवताओं की प्रतीकोपासना की जाती है और उनमें सन्निहित दिव्यताओं, प्रेरणाओं की अवधारणा की जाती है, उसी तरह ‘यंत्र’ भी किसी देवी या देवता के प्रतीक होते हैं। इनकी रचना ज्यामितीय होती है। यह बिंदु, रेखाओं, वक्र-रेखाओं, त्रिभुजों, वर्गों, वृत्तों और पद्मदलों से मिलाकर बनाये जाते हैं और अलग-अलग प्रकार से बनाये जाते हैं। कई का तो बनाना भी कठिन होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-November
साधना की कसौटी पर कस-कस कर और भगवती प्रकृति के व्यवहार को देख-देखकर उसने न का अद्वितीय भण्डार अर्जित कर लिया। इतरा के पुत्र का यश संसार में चन्द्रमा की कला के समान विकसित होने लगा।
साधना करने के लिए अरण्य में जाना औचित्य पूरा समझा। अपने इस निर्णय से उन्होंने महाराज को अवगत कराकर एकान्त वन में चले गए।
साधनाओं के बल पर जगत को कुछ दे पाने में सफलता प्राप्त की।
साधना किसे कहते हैं आपको मालूम नहीं? आप हनुमान जी की पूजा करते है, संतोषी माता की पूजा करते हैं यह मंत्र हैं, न यंत्र है न पूजा है। आप हनुमान जी, संतोषी माता को साधते हैं। अरे पहले अपने आपको तो साधिये न, पर यह जो जादूगरी आप करते है वह बदमाशी के सिवा कुछ नहीं है। अगर आप पूजा-उपासना करते हैं तो ठीक यह आपकी मर्जी है, पर यह न तो कोई मंत्र जप है, न भजन है यह मात्र धूर्तगीरी है।
साधना के सहारे सम्पन्न नहीं हो पाते। उनके लिए अधिक समर्थ साधन जुटाने होते है। बन्दूकों के दाँत खट्टे करने के लिए तोप के गोलों का प्रहार ही विकल्प रहता है। मजदूरों द्वारा न उठ सकने वाले भार को मजबूत क्रेनें उठाती हैं। जिन चट्टानों को हथौड़ों से नहीं तोड़ा जा सकता।
साधना के नाम पर आप जादूगरी बन्द कीजिये। देवता को गुमराह करने वाली, मनोकामना सिद्ध करने वाली पूजा बन्द कीजिये।
साधना के विद्यार्थी लालायित रहते है। और जिसके न मिलने पर अपने अभ्यास की असफलता अनुभव करके खिन्न होते हैं।
साधना करने के लिए चल पड़े। दिन बीतते गए और उनकी तप की आभा लोक-लोकान्तर में फैलने लगी। कैलाश शिखर भी इससे अछूता न रहा।
साधना कर रहा हूँ। मेरे द्वारा तुम्हारी कोई हानि न होगी।”
साधना में स्थिरता की नहीं एक दिशाधारा में मन को नियोजित किये रहने की आवश्यकता है। परब्रह्म में आत्म समर्पण और उस परा-शक्ति का आत्म सत्ता में अवतरण ही ध्यान का मुख्य प्रयोजन है। उसके लिए कितने ही प्रकार की साकार-निराकार ध्यान-धारणाएँ विद्यमान हैं उनमें से जो उपयोगी एवं रुचिकर लगे उसे अपनाया जा सकता है।
साधना द्वारा ऐतरेय ने अपनी माता का ही मुख उज्ज्वल नहीं कर दिया वरन् इस बात का प्रमाण भी दे दिया कि शुद्र हो तो क्या संस्कार से ही मनुष्य ब्राह्मण हुआ करते है।
साधना के लिए सब कुछ करने पर उतारू व्यक्ति, इन दिनों अपने तथाकथित स्वजनों को ही सर्वाधिक विरोधी पाता है। आज के वातावरण में हर किसी को सम्पन्नता और विलासिता की सुविधाएँ ही सब कुछ प्रतीत होती है। वे अपनी मान्यता के अनुरूप एक ही परामर्श दे सकते हैं कि परमार्थ की कष्ट-साध्य प्रक्रिया से व्यवहारतः कोसों दूर रहना ही लाभदायक है।
साधना अभ्यस्त विडम्बना में ही खप जाते हैं, तो वह कैसे करते बन पड़े, जिसके लिए महाकाल का आमंत्रण हुँकारने और युगधर्म को अपनाने के लिए अन्तरात्मा में दबाव डालता है। जो अपने भीतरी असमंजस से निपट लेता है, अपनी राह आप बनाने के लिए कटिबद्ध हो जाता है, उसी के लिए यह सम्भव है कि “क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं, त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप” वाले गीता-प्रवचन को जीवन में उतार सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-July
साधना द्वारा सम्पन्न हो, चाहे भौतिक उपचारों द्वारा वर्तमान मानव की यह महती आवश्यकता है। इसे उपलब्ध किया ही जाना चाहिए।
साधना को देखते हुये कोई अदूरदर्शी इस प्रयास को निरर्थक भी कर समता है। पर वह समय आता है जब फसल पकती है और अनाज से घर को बड़ी-बड़ी कोठरियाँ भरती है विद्यार्थियों को भी यही मार्ग अपनाना पड़ता है। वे स्नातक बनने के लिये चौदह वर्ष का अध्ययन तप करते है। पुस्तकों को खरीदने,फीस चुकने जैसे प्रयासों में प्राण-पथ से लगे रहते है। पढ़ाई के दिनों का वह श्रम उन दिनों बेकार लग सकता है किन्तु समय आता है जब वह कॉलेज व विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी करके निकलता है और बड़ा अफसर बनता है।
साधना।
स्नेह का अमृत पिलाती, भव्य उनकी भावना॥
साधना की दृष्टि से कोई आदमी आना चाहे तो इस स्थान पर आकर वह महत्वपूर्ण लाभ उठा सके। इसलिये यह बनाया गया है। मुनासिब जगह पर मुनासिब काम होते है। हिमालय में बहुत सारे ऋषि रहते है और जो भी आये है। उन्हीं ऋषियों का स्मरण दिलाने के लिये हमने यह कोशिश की है कि जो उन्होंने काम किये थे, उनकी समेट करके पूरा न सही-थोड़ा-थोड़ा काम करें तो अच्छा होगा।
साधनायें किया करते थे और उपासनायें करते थे। वे कहाँ रहते थे बुद्ध के पास? नहीं बुद्ध के पास नहीं रहते थे। कुछ कहीं तो कुछ कही। बुद्ध की परम्परा को भी हमने कायम रखा है।
साधना क्षेत्र में आस्था श्रद्धा भावना आकांक्षा के नाम से पुकारा जाता है तब तक बनने वाली नहीं इन दिनों इसके अनेक उदाहरण भी देखें जाते है कई बार रोगी को अच्छी से अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बावजूद भी परिणाम निराशा जनक सामने आता है और उसकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है पर जब मरीज की आस्था चिकित्सक के प्रति इस स्तर तक सुदृढ़ बना दी जाती है कि उसे गहन विश्वास हो चलता है कि उक्त डॉक्टर का उपचार उसे अवश्य ठीक कर देगा तो दावा के स्थान पर प्लेसिबो (चीनी की गोली) का प्रयोग भी उसे ठीक करने लगता है और बीमार शीघ्रता से स्वास्थ्य लाभ करता दिखाई पड़ने लगता है यह दवा नहीं श्रद्धा की परिणति है जिसका चमत्कारी परिणाम, जादुई असर प्रस्तुत करता है।
साधनाएँ आदि गहराई तक प्रभावित करते है। सूक्ष्म से भी गहरे जाकर नाड़ी गुच्छकों को उत्तेजित कर रसस्रावों द्वारा व्यक्ति का भावकल्प कर देने वाले यह प्रयोग स्वयं में अनूठे व रहस्यमय हैं। यदि इनकी गहराई तक जानकारी न भी हो किन्तु प्रारम्भिक प्रयास उचित मार्गदर्शन के साथ किया जा सके तो प्राणाग्नि को उद्दीप्त प्रज्वलित कर अपना व औरों का हित किया जा सकता है। यह विद्याशास्त्र सम्मत भी है व विज्ञान सम्मत भी। जीने का आनन्द लेना ही तो सभी को इस दिशा में एक कदम उठाना ही चाहिए।
साधना के प्रयोग द्वारा चमत्कारिक ढंग से स्वस्थ हो सके। वे कहते हैं कि यदि उसे एक संयोग मात्र मान लिया जाय तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्वर-संगीत की मधुर ध्वनियों से मेरे मनोभावों पर इसका कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने अपनी उक्त पुस्तक में इस बात की भी चर्चा की है कि भिन्न-भिन्न स्वरों का भिन्न-भिन्न अंग-अवयवों पर पृथक्-पृथक् प्रभाव पड़ता है। शब्द-कौतूहल नामक ग्रंथ में मंद मुनि ने इस संदर्भ में विस्तृत वर्णन किया है। इस ग्रंथ में तीन प्रकरण है-प्रथम में रोगी के स्वर द्वारा रोग निदान का उल्लेख है।
साधना मन को एकाग्र करने का अच्छा साधन है। इससे मानसिक तनाव और अवसाद जैसे मनोरोगों से सरलतापूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है। इतना ही नहीं स्वर साधना से शरीर की जैव-विद्युत एवं रासायनिक क्रियायें भी परिवर्धित, परिवर्तित और परिष्कृत की जा सकती है।
साधनाओं का सहारा लिया जाता है एवं विकृति के मूल में स्थित विकृति को परिष्कृत कर चेतना को स्वस्थ, सुन्दर और समुन्नत स्तर का बनाया जाता है। अध्यात्म की भाषा में इसे ही मनःशक्ति का विकास कहा गया है। शरीरशास्त्र की भाषा में इसे प्रतिभा परिष्कार कहते है। यह विकास चाहे अध्यात्म साधना द्वारा सम्पन्न हो, चाहे भौतिक उपचारों द्वारा वर्तमान मानव की यह महती आवश्यकता है। इसे उपलब्ध किया ही जाना चाहिए।
साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
साधना का आश्रय लेना पड़ता हैं सही जानकारी के अभाव में जन समुदाय भटकता रहता है, इधर-उधर हाथ पैर मारकर हठयोग की कुछ क्रियाएँ सीख तो लेता है पर फास्टफूड से लेकर द्रुतगति से चलने वाले वाहनों वाले इस युग में वह इनमें भी उनके पल्ले पड़ जाता है जो योग के नाम पर दुकानें तो चलाते है पर उसका मर्म उसके जीवन नहीं पाते। इसमें कुछ उसकी भी मजबूरी होती है कि वह हर काम जल्दी चाहता है, हथेली पर सरसों उगाना चाहता है किन्तु बहुधा जल्दबाजी दूसरी ओर से होती है क्योंकि वहाँ साधक, जिज्ञासु व गुरु का रिश्ता कम, फिटनेस लाने वाले एक वेतन भोगी शिक्षक का स्वरूप अधिक बन गया है।
साधना से शरीर की जैव-विद्युत एवं रासायनिक क्रियायें भी परिवर्धित, परिवर्तित और परिष्कृत की जा सकती है।
साधना विज्ञान में इसके लिए विभिन्न प्रकार की साधनाओं का सहारा लिया जाता है एवं विकृति के मूल में स्थित विकृति को परिष्कृत कर चेतना को स्वस्थ, सुन्दर और समुन्नत स्तर का बनाया जाता है। अध्यात्म की भाषा में इसे ही मनःशक्ति का विकास कहा गया है। शरीरशास्त्र की भाषा में इसे प्रतिभा परिष्कार कहते है। यह विकास चाहे अध्यात्म साधना द्वारा सम्पन्न हो, चाहे भौतिक उपचारों द्वारा वर्तमान मानव की यह महती आवश्यकता है। इसे उपलब्ध किया ही जाना चाहिए।
साधना प्रधान सत्रों में आना होगा जिन्हें नियमित रूप से सम्पन्न तो किया जा रहा है किन्तु कुछ और विशेषताओं के साथ इस वर्ष शीतकाल में उन्हें चार माह तक प्रयोग के रूप में चलाया जायेगा।
साधना करो।
साधना के कारण अधिकारी थे उससे भी वंचित होते चले जाते है।
साधना करके ब्रह्मानंद के समतुल्य परमानन्द को अनुभूति की गयी। राग-रागनियों के रूप में स्वरों के पृथक्-पृथक् व्यक्तित्वों का निर्धारण उनमें देवशक्तियों का अधिष्ठान और उनके माध्यम से ब्रह्म सदृश अपूर्व आनन्द की प्राप्ति होती इस रूप में प्राचीन ऋषि मनीषियों द्वारा भारतीय संगीत को अमरता प्रदान की गई।
साधना, परमार्थ परायणता के आधार पर मिलने वाले आत्म संतोष को ही पर्याप्त मानने की विवेक दृष्टि रहती है, वे अनचाहा यश पाते है। उन्हें वह गहरा स्नेह सद्भाव प्राप्त होता है जिसके साथ साथियों, परिचितों का विश्वास और सहयोग प्रचुर मात्रा में जुड़ा रहता है। दूरदर्शिता इसी में है कि लोक सेवी सच्चे मन से यश, पद लोलुपता अहंता छोड़ें विनम्रता अपनाये। दूसरों को आगे रखें। स्वयं पीछे रहें।
साधना उपचारों से बाँधा है कि उन्हें जीवन में उतारने वाला कभी कारण शरीर की दृष्टि से व्याधिग्रस्त हो ही नहीं सकता। सिम्पैथेटिक पैश्रासिम्पेथेटिक सिस्टम इड़ा व पिंगला नाड़ी के रूप में हमारे स्नायु संस्थान का हृदय मानी जाने वाली स्पाइनल कार्ड रूपी कुण्डलिनी शक्ति के चारों ओर विद्यमान रह स्थान-स्थान पर पारस्परिक संबंधों के गुच्छक बनाकर रसस्राव करते रहते है। इस पूरे संस्थान को आसन मुद्रा, बंध, प्राणायाम, हठयोग के विभिन्न उपचार ध्यान साधनाएँ आदि गहराई तक प्रभावित करते है। सूक्ष्म से भी गहरे जाकर नाड़ी गुच्छकों को उत्तेजित कर रसस्रावों द्वारा व्यक्ति का भावकल्प कर देने वाले यह प्रयोग स्वयं में अनूठे व रहस्यमय हैं। यदि इनकी गहराई तक जानकारी न भी हो किन्तु प्रारम्भिक प्रयास उचित मार्गदर्शन के साथ किया जा सके तो प्राणाग्नि को उद्दीप्त प्रज्वलित कर अपना व औरों का हित किया जा सकता है।
साधना सत्रों में आयोजनों में वे सभी भाग ले सकते हैं जो किसी भी आयु, वर्ग, लिंग के है किन्तु अपना आत्मबल मनोबल, शरीर बल बढ़ाने की जिज्ञासा होते हुये भी कभी इतना अवसर अब तक निकाल न पाए। कई शान्तिकुञ्ज न आ जाये वे इतना अधिक सीखने के क्रम में इन साधना उपचारों पर अधिक ध्यान न दे पाये। इन आयोजनों को 25 सितम्बर तक सतत् 12 टोलियों के माध्यम से चलाया जाना रहेगा तथा प्रत्येक के साथ रंगीन 35 एम-एम की स्लाइड प्रोजेक्टर इन विषयों पर विशिष्ट स्लाइड प्रोजेक्टर्स के साथ भेजी जाएँगी। शाम के समय हॉलों में दिखाई जाने वाली इन स्लाइडों से बहुत कुछ वह समझा जा सकेगा जो सामान्यतः पढ़ने आदि से कम समझ में आता है।
साधना कर लीजिये।
‘पूर्ण’ की गुरु-पूर्णिमा पर धारणा कर लीजिये॥3॥
साधना
साधना कर सकने में समर्थ हो सकें। यदि उनका पालन किया गया तो वही दुर्गति होगी जो भोजन न करने तथा मल विसर्जन में उपेक्षा बरतने पर प्राण संकट के रूप में उत्पन्न होती है। लोकसेवी को जनता सम्मान देती है, वह वस्तुतः उस सेवा धर्म की पुण्य परम्परा का सूत्र संचालक तंत्र का सम्मान है। सत्प्रयोजनों के लिये लोक श्रद्धा बनी रहे मात्र इसी एक प्रयोजन के लिये सम्मान के प्रकटीकरण की प्रथा चली है। गलती यह होती है कि सेवाभावी उसे अपनी व्यक्तिगत योग्यता का प्रतिफल मानते हैं।
साधना धन्य है। मेरे पास आने की प्रथम कसौटी तो आप ही हैं। इसीलिये जब लोग मेरी उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ। घाट का पत्थर गदगद हो उठा और दुगुने उत्साह से लोगों का मैल धोने लगा।
साधना का पंथ छोड़ कर वह अमर विजय के स्थान पर क्षणिक प्राप्ति में डूबा रहता है।
साधना शिविर कराये जाते है, अन्य दूसरे शिविर कराये जाते है, और यहाँ योगाभ्यासों का, प्राणायामों का विधि-सिखाया जाता है, वह हमने भी किया है और आपको सिखाते है। पुराने जमाने के ऋषियों में याज्ञवल्क्य का महत्वपूर्ण स्थान है? उन्होंने यज्ञ के सम्बन्ध में की थी। यज्ञ से किस तरीके से मनुष्य के शारीरिक और मानसिक रोगों का निराकरण होना सम्भव है और यज्ञ से किस प्रकार पृथ्वी के वातावरण को ठीक किया जाना सम्भव है? ऐसी बहुत-सी बातों महत्ता थी तब, लेकिन लोग उस महत्वपूर्ण यज्ञ को भूल-भाल गये थे।
साधना में निरत व्यक्ति योगी व तपस्वी का सम्मिलित स्वरूप होता है, यदि यह कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है।
साधना उपचारों पर अधिक ध्यान न दे पाये। इन आयोजनों को 25 सितम्बर तक सतत् 12 टोलियों के माध्यम से चलाया जाना रहेगा तथा प्रत्येक के साथ रंगीन 35 एम-एम की स्लाइड प्रोजेक्टर इन विषयों पर विशिष्ट स्लाइड प्रोजेक्टर्स के साथ भेजी जाएँगी। शाम के समय हॉलों में दिखाई जाने वाली इन स्लाइडों से बहुत कुछ वह समझा जा सकेगा जो सामान्यतः पढ़ने आदि से कम समझ में आता है।
साधनाओं पर ही अवलम्बित मनः परिष्कार प्रधान है। वे उपाय-उपचार अन्य प्रकार भी हो सकते हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उसे मनःचेतना की परिष्कार साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
साधनात्मक है। उनके माध्यम से मनःशक्ति विकसित और परिष्कृत की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-December
साधना तपश्चर्या, सिद्धि जिम्मेदारी एवं भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं से सम्बन्धित है, उन्हें समय से पूर्व वर्णन न किया जाय।
साधना पूरी होती रह सकती है। त्याग करना ही है, तो अंतः के विकारों एवं भ्रम जंजालों का कर।” व्यक्ति ने वास्तविकता समझी एवं लौट पड़ा अपने घर को-अपनी व्यवहारिक साधना की पूर्ति हेतु।
साधना करने के लिए बुलाया है।
साधना वाला पक्ष आज्ञाचक्र से मुड़कर फेफड़ों की तरह श्वास-प्रश्वास का रूप धारण करता है और वहीं से दूसरी धारा मेरुदण्ड की ओर मुड़कर शक्ति जागरण का काम करती है। सोऽहम् साधन के हिमालय से निकलने वाली गंगा, यमुना भावोत्कर्ष एवं शक्ति संवर्धन के दोनों प्रयोजन पूरे करती है-इससे भौतिक और आत्मिक प्रगति के दोनों ही प्रयोजन पूरे करती हैं। शक्ति सम्पन्न और भावोत्कर्ष की उभय पक्षीय उपलब्धियाँ ही समग्र अध्यात्मिक हैं। उसे प्राप्त करने में सोऽहम् साधना कितनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदण्ड को सीधा रख कर ही एवं पालथी मार कर ही बैठना पड़ता है।
साधना करायी। चारों भाइयों समेत भगवान वहीं रहे।
साधना।
साधना की पूर्ति हेतु।
साधना सम्पत्ति महर्षि को भी संकुचित करती है उसका प्रणाम स्वीकार करने में। संसार की कर्मभूमि में जीवन वृक्ष की अवस्थिति साधन सुमनों का प्राकट्य करके ही परिपूर्ण होती है। ज्ञान और समाज यही इन सुमनों के सौरभ और मधु में मकरन्द और पराग की उपलब्धि ही सुमन की सम्पूर्णता है।
साधना जब परिपक्व होने लगती है तो भावोत्कर्ष क्षेत्र से आगे बढ़ कर सुविस्तृत अन्तरिक्ष में संव्याप्त हलचलों को समझने का अवसर मिलता है। इस संसार को प्रभावित करने वाली अगणित ब्रह्म प्रेरणाओं के प्रवाह बहते रहते हैं। उनके स्पन्दन हमारी कर्णेन्द्रिय से शब्दरूप में टकराते हैं। उन्हें पहचानने और पकड़ने की सफलता, साधना में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है। और क्या होने जा रहा है।
साधना का चमत्कारी प्रयोजन भी कम नहीं है। यह प्राणयोग की महती साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण इस प्रकार चौंसठ प्राणायामों का साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताये गये है। इन सबमें सर्वप्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्’ साधना से सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि है उसकी प्राणयोग के विविध साधना विधानों से सर्वोच्च मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है।
साधना में तल्लीन हो गए। योग का उद्देश्य क्या है? सायंकालीन हवन समाप्त हो चुका था, धवल ज्योत्सना में स्फटिक की शिला पर मृग चर्म के ऊपर महर्षि देवल इस प्रकार आसीन थे, जैसे ब्रह्मचारियों के सामगान तथा सोम मिश्रित आज्य की आहुति से संतुष्ट अग्निदेव आवाहनीय कुण्ड से मूर्तिमान् होकर अपने कृष्ण मेष की पीठ पर आ विराजे हों। शिष्यों के धूम्राक्त जटा-जाल चरणों में क्रमशः अवनत हुए और आज्ञा पाकर बैठ जाने के अनन्तर एक ने उस गम्भीर शान्ति को जाग्रत किया।
साधना के प्रयासों का कोई प्रभाव नहीं होगा। स्वामी रामतीर्थ का यह वचन “लोकसेवियों को याद रखना चाहिए कि सामाजिक कार्यकर्ता की वाणी ही नहीं उसका पूरा व्यक्तित्व ही बोलता है और वाणी की अपेक्षा उसका व्यक्तित्व सुना जाता है। वाणी और कर्म जब मिल जाते हैं तो व्यक्तित्व प्रखर बन जाता है। लोकसेवी ही नहीं अन्य प्रकृति के व्यक्तियों का भी तभी प्रभाव होता है, जबकि उनके विचार और कर्म एक हों। एक वेश्या किसी साधारण व्यक्ति को आकर्षित करती है, तो उसमें वेश्या की वाणी ही सफल नहीं होती, उसके कर्म भी उसी स्तर के होते हैं।
साधना इसी स्थान में हुई है। इसलिए हिमालय का अपना वातावरण है। गंगा की महत्ता तो आप जानते हैं न? गंगा की कितनी बड़ी महत्ता। गंगा को सारा संसार जाने क्या-क्या मानता है।
साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है। यों शब्द, रूप, रस, गन्ध स्पर्श, की किसी भी प्रक्रिया के आधार पर बनी हुई साधना पद्धति से भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। पर नादयोग का इसी प्रयोजन के लिए अपना अत्यधिक महत्व है।
साधना की तरह ही रखना चाहिए।
साधना स्तर की मान्यताएँ गहराई तक अन्तःकरण में जड़ जमा लें और वे कार्य रूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठें तो समझना चाहिए इस एक ही साधना ने जीवन लक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।
साधना कितनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती है इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है।
साधना से सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि है उसकी प्राणयोग के विविध साधना विधानों से सर्वोच्च मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायामों का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का-आलस्य प्रमाद जैसी दुष्कृतियों की, मन से लोभ-मोह जैसी तृष्णाओं का, अन्तराल से जीव भावी अहन्ता का, निवारण-निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएँ अत्यंत प्रगाढ़ होनी चाहिए दुर्भावनाएँ और दुष्कृतियाँ और दुष्टताएँ-क्षुद्रताएँ और हीनताएँ सभी निरस्त हो रही हैं-सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त ही हलकापन जो सन्तोष-जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरंतर बना रहता है उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बना गया।
साधना को सफल बनाने में समर्थ है। यह सप्तर्षियों की तपस्थली गायत्री के ऋषि विश्वामित्र जिन्होंने गायत्री महामंत्र का साक्षात्कार किया था, ठीक इसी स्थान पर तप करते थे। सात ऋषि हैं, उनमें से एक विश्वामित्र भी हैं। विश्वामित्र कहाँ रहते थे? उनकी कुटिया कहाँ थी?
साधना विज्ञान के व्यवहारिक स्वरूप को समझकर यह कार्य कोई भी सहज रूप में कर सकता है। हम नर पथ का जीवन जियें, जीवनावधि के एक पल का-कायपिंड के एक-एक कृपा का सदुपयोग करें, यही विधाता चाहता है।
साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताये गये है। इन सबमें सर्वप्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्’ साधना से सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि है उसकी प्राणयोग के विविध साधना विधानों से सर्वोच्च मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायामों का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
साधना के अभ्यास में प्रायः पौन घण्टा प्रतिदिन लगता है। इसमें से आरम्भ के पन्द्रह मिनट श्वास ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की धारणा में लगने चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरम्भ में अतिमन्द स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। इसके उपरान्त शेष आधा घण्टे में चिन्तन का स्तर यह होना चाहिए कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे हैं। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है वरन्! प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है।
साधना विधानों से सर्वोच्च मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायामों का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
साधना में इन श्रवणातीत ध्वनियों का उत्पादन अतिरिक्त रूप से होता है और वे अपने क्षेत्र में असाधारण प्रभाव डालती हैं।
साधना पद्धति से भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। पर नादयोग का इसी प्रयोजन के लिए अपना अत्यधिक महत्व है।
साधना है। भक्ति तो कृपासिन्धु भगवान का प्रसाद है। इसे समस्त साधनाओं का फल भी कह सकते हैं।
साधना का तत्त्वज्ञान। श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से-सो और हम् ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जाग्रत किया जाता है कि अपना स्वरूप बदल रहा है अब शरीर ओर मन पर से लोभ-मोह का, वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारों शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान सत्य न्याय ओर प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधना से ही पूरा होता है।
साधना के यों कई अभ्यास हैं, पर उनमें अधिक सरल और अधिक सफल सोऽहम् साधना ही रहती है। यह विशुद्ध रूप से प्राणयोग है। उसमें प्राणायाम के, षट्चक्रवेधन, ग्रंथिवेधन, कुण्डलिनी जागरण, स्वर साधन, गन्धानुभूति, भावोत्कर्ष जैसी योगाभ्यास की अनेक ऐसी धाराएँ समाविष्ट हैं जिनके माध्यम से साधक को उच्चस्तरीय आत्मविकास का लाभ मिल सकता है।
साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते है। प्राणायाम मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी, जितनी मन्दगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे-धीरे उसे वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए, गहरी और पूरी साँस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकरा कर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता हैं इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे सुना जा सके। कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही उसे अनुभव किया जा सकता है।
साधना सत्र 1982-83 में शान्तिकुञ्ज परिसर में दिया गया प्रवचन)
साधना ने उसे समर्थ बना दिया था। ब्रह्मलोक पहुँचना उसके लिए कोई समस्या नहीं थी।
साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बना गया।
साधना काल के बहुत पश्चात् तक चलती रहती है और साधक की आत्मिक विशेषता को गतिशील एवं सुस्थिर बनाये रहती है।
साधना के साथ-साथ उपर्युक्त भाव चित्रों को मनः क्षेत्र पर अति सघन चित्रित किया जाना चाहिए इससे वह चिन्तन कुछ ही समय में जीवन का एक प्रवाह बन जाता है और साधक का आन्तरिक कायाकल्प होने से बाह्य जीवन अनासक्त कर्मयोगी जैसा उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होने लगता है। ऐसा व्यक्ति सांसारिक दृष्टि से कृषक, पशुपालक, श्रमिक, व्यवसायी जैसे सामान्य आजीविका में निरत होने के कारण छोटा भले ही समझा जाय पर वस्तुतः आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण वह होता अत्यन्त महान ही है अध्यात्म मूल्याँकनों की कसौटी पर कसने से उसे महामानव एवं ऋषिकाय ही ठहराया जा सकता है। राजा जनक यों साँसारिक दृष्टि के कारण से सदा ब्रह्मवेत्ता ही माने गये। किसी को साधारण स्तर का जीविकोपार्जन करना पड़े इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं यदि सोऽहम् साधना स्तर की मान्यताएँ गहराई तक अन्तःकरण में जड़ जमा लें और वे कार्य रूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठें तो समझना चाहिए इस एक ही साधना ने जीवन लक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।
साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।
साधना ही रहती है। यह विशुद्ध रूप से प्राणयोग है। उसमें प्राणायाम के, षट्चक्रवेधन, ग्रंथिवेधन, कुण्डलिनी जागरण, स्वर साधन, गन्धानुभूति, भावोत्कर्ष जैसी योगाभ्यास की अनेक ऐसी धाराएँ समाविष्ट हैं जिनके माध्यम से साधक को उच्चस्तरीय आत्मविकास का लाभ मिल सकता है।
साधनायें की हैं। वह वातावरण अयोध्या में कहाँ था। वहाँ तो राजपाट होता था, लड़ाई झगड़े होते थे, मुकदमें होते थे, दूसरी बातें होती थीं, पर वहाँ तप का वातावरण नहीं था। हजारों वर्षों से विश्वामित्र सहित अन्यान्य ऋषि-मुनियों ने जो तप किया है उससे हिमालय का वातावरण उच्चस्तरीय बन गया अतः श्री रामचंद्र जी को भी गुरु वशिष्ठ की आज्ञा मानकर देव प्रयाग में रहना पड़ा। अयोध्या में रहकर गुरु वशिष्ठ जी रामचंद्र जी के योग वशिष्ठ नहीं पढ़ा सकते थे।
साधना में प्रवृत्त कार्यकर्ताओं को अपनी आहार व्यवस्था सादगी पूर्ण और औसत स्तर की ही रखनी चाहिए। इससे एक तो स्वास्थ्य की सुरक्षा हो जाती है, दूसरे लोगों पर उसका प्रभाव भी पड़ता है। भोजन के सम्बन्ध में कुछ व्रत भी लिए जा सकते हैं। घर में रहते हुए तो सादा भोजन सभी करते हैं, पर लोकसेवी बाहर जनसंपर्क या सेवा कार्यों के लिए निकलता है, तो लोग सम्मान और श्रद्धा के वशीभूत होकर कई तरह की स्वादिष्ट वस्तुओं की व्यवस्था करते हैं। उनकी सद्भावना को उपेक्षित न करते हुए भी इस बात का ध्यान रखा जाए कि हमारा चटोरापन न बढ़ जाए।
साधना है, व्यवसाय नहीं सेवा को व्यवसाय के रूप में अपनाने वालों की बात ओर है। कर्मचारी, नौकर, अधिकारी वर्ग भी जनसेवक की गणना में आते है, पर जनसेवा के प्रति न उनमें टीस होती है न लगन। जिन्होंने सेवा को ही अपना पाथेय चुना है, उन लोकसेवी कार्यकर्ताओं को तो सेवा का स्तर साधना की तरह ही रखना चाहिए।
साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।
साधना के साथ जुड़ा हुआ अत्यन्त महत्वपूर्ण तत्व दर्शन।
साधना करने के लिए परोपकार-रत रहना ही सर्वश्रेष्ठ है, चाहे व्यक्ति किसी भी आश्रम में हो।”
साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।
साधनाओं में शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है इसलिए उनमें आराम कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पढ़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम् साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदण्ड को सीधा रख कर ही एवं पालथी मार कर ही बैठना पड़ता है।
साधना विधानों में एक महत्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उँगलियों से, शीशी वाले कार्क से, कपड़े की गोली से इस प्रकार बन्द किया जाता है कि बाहर की वायु का स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि आधार से विलग किया जाता है और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतीन्द्रिय जगत से आने वाले शब्द प्रवाह को अन्तःचेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेन्द्रिय का-उसकी शब्द तन्मात्रा का योगदान तो रहता है पर वह श्रवण है, वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनि लहरी सुनने के लिए, कर्णेन्द्रिय और अन्तःकरण का इसे संयुक्त प्रयास भी कह सकते है।
साधना में होती है, इसके लिए एक नियम बना कर चला जाए। जैसे रोटी के साथ एक लगाव साग ही खायेंगे या एक ही दाल खायेंगे। थाली में भोज्य पदार्थों की संख्या दो या तीन से अधिक नहीं होने देंगे। बाहर क्षेत्रों में सेवा कार्य करने निकलने पर लोग श्रद्धा और स्नेह के वशीभूत होकर कुछ न कुछ चीजें बनाकर खिलाने के लिए आते है। यहाँ यह धर्म संकट भी उत्पन्न होता है कि यदि उन्हें लेने से एकदम इनकार कर दिया जाय, तो उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचती है और ले लिया जाय, तो अपना व्रत टूटता है, मर्यादा भंग होती है।
साधना तथा भगवत् भक्ति की भिक्षा-दीक्षा ली थी। कुछ समय तक गृहस्थ धर्म में रहकर उन्होंने साधना की ओर बाद में समय आने पर जब उन्हें सहज वैराग्य हो गया तो वे संन्यासी हो गए। महात्मा श्रीचन्द्र ने एक सौ पचास साल की आयु पाई थी और उनके सामने सिक्खों के छः गुरु गद्दी पर बैठे थे।
साधना माध्यमों के आधार पर अपने को परमेश्वर के साथ जोड़ कर अभीष्ट आदान-प्रदान का लाभ प्राप्त करते हैं।
साधना की प्राणयोग प्रक्रिया भी सम्मिलित है इन दोनों में कमर को सीधी रख कर, पालथी मार कर सुखासन में बैठना पड़ता है। ध्यान साधनाओं में शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है इसलिए उनमें आराम कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पढ़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम् साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदण्ड को सीधा रख कर ही एवं पालथी मार कर ही बैठना पड़ता है।
साधना की ओर बाद में समय आने पर जब उन्हें सहज वैराग्य हो गया तो वे संन्यासी हो गए। महात्मा श्रीचन्द्र ने एक सौ पचास साल की आयु पाई थी और उनके सामने सिक्खों के छः गुरु गद्दी पर बैठे थे।
साधना में सोऽहम् साधना की प्राणयोग प्रक्रिया भी सम्मिलित है इन दोनों में कमर को सीधी रख कर, पालथी मार कर सुखासन में बैठना पड़ता है। ध्यान साधनाओं में शरीर को ढीला और मन को खाली करना पड़ता है इसलिए उनमें आराम कुर्सी, दीवार, पेड़ का सहारा लेकर बैठने अथवा चित्त लेटने की आवश्यकता पढ़ती है। गायत्री उपासना और सोऽहम् साधना को अजपा गायत्री भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। अस्तु उसके लिए भी मेरुदण्ड को सीधा रख कर ही एवं पालथी मार कर ही बैठना पड़ता है।
साधना के बड़े-बड़े अनुष्ठान सम्पन्न होते थे। हम सभी यही कर रहे हैं। यहाँ चौबीस-चौबीस लक्ष्य के कितने अनुष्ठान हो चुके हैं, आप जानते हैं न। हर साल यहाँ नवरात्र में चौबीस करोड़ का पुरश्चरण हो जाता है। हर दिन वहाँ नौ कुण्डीय यज्ञ में हजारों आहुतियाँ दी जाती हैं।
साधना ने जीवन लक्ष्य प्राप्त कराने का प्रयोजन पूरा कर दिया।
साधना से मनुष्य को सभी महासिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। कस्तूरी के हिरण की तरह मनुष्य अपने आप को महानता के मूल केन्द्र नाभिक को बाहर खोजता फिरता है। एक बार वह अपने भीतर झाँक कर उसे अपने अंतःकरण में देख ले तो उसे इस इष्ट सत्ता का दिव्य दर्शन हो जाएगा जो उसे महानता की श्रेष्ठतम ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। जिस दिन यह हो जाता है, उस दिन मनुष्य के सौभाग्य का द्वार खुल जाता है। इसी दिन की प्रतीक्षा सतत् भगवान को भी बनी हुई है।
साधना के पूर्वार्द्ध में अपने काय कलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की-परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के-प्रत्यक्ष तथ्य के-रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगे।
साधना आपके लिए सौभाग्य से भरा पूरा होगा और हमारे लिए संतोष का। आज की बात समाप्त। ॐ शाँति
साधना की अवधि में लिखी गयी ये पंक्तियाँ पुनर्प्रकाशित की जा रही हैं। इसमें उनने एक वर्ष के समयदान की बात कही है जो कि आज पुनर्गठन की वेला में और भी सामयिक है। आँवलखेड़ा की पूर्णाहुति जो कि अन्तिम पूर्णाहुति के पूर्व की युग संधि महापुरश्चरण रूपी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की प्रथम पूर्णाहुति कही गयी है, एक मध्यविराम के रूप में हमारे समक्ष आयी। इसमें एक ही सन्देश दिया गया कि हमें अब बड़े विराट् आयोजन न सम्पन्न कर एक वर्ष तक युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को साकार रूप देने के लिए आगामी पाँच वर्ष की अपनी क्रियापद्धति का निर्धारण करने के लिए अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी है तथा गाँव-गाँव में महाकाल का सन्देश पहुँचा देना है। यह अनुयाज प्रक्रिया एक वर्ष तक सक्रिय रूप में चलनी है।
साधना में जिसकी समीपता का आभास होता है समाधि में जिसका साक्षात्कार होता है, लोक सेवा में उसी परमतत्व की सघन अनुभूति होती है। मैं सेवक सचराचर, रूप स्वामी भगवन्त इस भाव से की गयी सेवा ही समस्त साधन सुमनों का फल है।”
साधना में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है। और क्या होने जा रहा है। किसी व्यक्ति विशेष क्षेत्र, देश अथवा लोक के सम्बन्ध में इस प्रकार की सही स्थिति का पूर्वाभास होने लगता है। अविज्ञात को ज्ञात स्तर पर उतारने में नादयोग की साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है। यों शब्द, रूप, रस, गन्ध स्पर्श, की किसी भी प्रक्रिया के आधार पर बनी हुई साधना पद्धति से भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है।
साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण इस प्रकार चौंसठ प्राणायामों का साधना विज्ञान के अंतर्गत विधि-विधान वर्णित है और उनके अनेकानेक लाभ-परिणाम बताये गये है। इन सबमें सर्वप्रथम और सर्वोपरि ‘सोऽहम्’ साधना से सन्निहित प्राणयोग ही है। जिस प्रकार मन्त्रों में गायत्री सर्वोपरि है उसकी प्राणयोग के विविध साधना विधानों से सर्वोच्च मान्यता सोऽहम् के अजपा गायत्री जाप की है। सभी प्राणायामों का लाभ इस एक से ही उठाया जा सकता है।
साधनाओं का फल भी कह सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-September
साधना अर्थात् अपने आपको साध लेना संभाल लेना सुधार लेना। अनगढ़ को सुसंस्कृत बना लेना। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों के कारण मनुष्य के गुण कर्म स्वभाव में नर पशु स्तर की निकृष्टताओं भरी होती है वे अनायास ही उभरती रहती है मन भी पानी जैसी प्रकृति का है जो ढलान की ओर ही सहज गिरता है। इस गिरावट को रोकने और ऊँचा उठाने के लिये घोर प्रयत्न करना अविवेक और अनाचार से लड़ पड़ने का साहस सँजोना, यह वह प्रयास है जिसे साधना कहते हैं। गीता में जिस महाभारत का धर्मयुद्ध का वर्णन है।
साधना वर्ष व पूर्णाहुति वर्ष की मिलन वेला में आया है एवं हमें सोचने पर विवश करता है कि इस अग्निपरीक्षा में-तप−साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है।
साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है।
साधना वर्ष में स्वयं को परिपक्वता के शिखर तक पहुँचाएँगे एवं अपने को दस से अधिक व्यक्तियों के रूप में बहुगुणित कर महापूर्णाहुति के निमित्त दो करोड़ साधकों के एक विराट जाग्रत संगठन के रूप में प्रस्तुतीकरण कर सकेंगे। ऐसे बीस लाख परिजन भी यदि हम इस प्रखर साधना वर्ष में संकल्पित कर लेते हैं। जिनने 48 साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधना अर्थात् यमुना, सरस्वती अर्थात् आराधना। यही है वह समन्वय का महातीर्थ जिसका अवगाहन करने से आध्यात्मिक कायाकल्प होता है और कौआ, कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। रामायण के प्रतिपादनानुसार मात्र स्थान विशेष में जाकर पानी में डुबकी लगाने भर से वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
साधना करनी है, उनकी बात दूसरी है पर जिन्हें आपत्तिकालीन समय की माँग को देखते हुये जन आन्दोलन के क्रिया–कलापों में लगना है उन्हें अपनी साधना में ऐसे तत्वों का समन्वय करना चाहिये। जो व्यक्तित्व के इस प्रयोजन की सिद्धि में सहायक हो सके।
साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिये। स्मरण रहे, त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों में इन तीनों विशिष्टताओं को मनोभूमि में ओत प्रोत कर लेने की आवश्यकता है।
साधना में इसी आचार संहिता का परिपालन किया जाता है। नेतागिरी गाँठने वाले यहाँ पाते कुछ नहीं अपनी प्रतिष्ठा का श्राद्ध तर्पण अपने हाथों ही करते चलते हैं।
साधना में ऐसे तत्वों का समन्वय करना चाहिये। जो व्यक्तित्व के इस प्रयोजन की सिद्धि में सहायक हो सके।
साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण संभव कर दिखाया था। महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरंतर अनवरत गति से शरीर छूटे तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरंतर रहने का संकल्प संजोये रहते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह उन्हें भी करना है जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में अनुकरणीय-अभिनंदनीय उपलब्धियाँ कमानी हैं।
साधना और भगवान के भजन से वह शुद्ध हो गया, तो उसे स्वतन्त्र नहीं कर देना चाहिए। इस संसार में पवित्रता भी है, गन्दगी भी है। मन का स्वभाव है, वह गन्दगी में जायेगा और मनुष्य देह को दूषित करने से नहीं चूकेगा। इसलिए उसे गन्दगी से बचाये रखने के लिए एक बाड़े की जरूरत होती है, जिसमें वह घिरा रहे। गन्दगी की सम्भावनाओं वाले स्थानों में न जा सके।
साधना में प्रवृत्त होकर वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो ही जाएगा अथवा उत्तीर्ण तो होगा ही। उसी प्रकार मनस्वी, श्रमशील और पुरुषार्थी व्यक्ति विपत्ति रूपी पाठशाला में पढ़ कर स्वयं को सफल और धन्य भी बना लेंगे तथा अन्य औरों के लिए भी ऐसा अनुकरणीय आदर्श उपस्थित कर जायेंगे जिसके प्रकाश में अन्य लोग भी चलते रहें।
साधना का यही सुनिश्चित स्वरूप चलता रहा।
साधना सम्बन्धी कार्य पद्धति में कुछ नये तत्वों के समावेश की आवश्यकता पड़ी, जिन्हें एकान्त साधना करनी है, उनकी बात दूसरी है पर जिन्हें आपत्तिकालीन समय की माँग को देखते हुये जन आन्दोलन के क्रिया–कलापों में लगना है उन्हें अपनी साधना में ऐसे तत्वों का समन्वय करना चाहिये। जो व्यक्तित्व के इस प्रयोजन की सिद्धि में सहायक हो सके।
साधना में संलग्न होने वालों की तीन धारा वाले उस उपक्रम को भी जीवनचर्या के हर पक्ष में सम्मिलित करना चाहिये जो साधक को त्रिवेणी संगम जैसी स्थिति में पहुँचा देता है।
साधना और लोक सेवा में तत्पर श्रमण उद्रायण बहुत समय तक देश का भ्रमण और तीर्थाटन कर अपनी आत्मिक क्षमताएँ बढ़ाने में लगे रहे। धर्म साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार के फैल गया। उनकी कठोर तपश्चर्या के उदन्त सारे लोक में गाए जाने लगे। उनके चमत्कारी व्यक्तित्व के सान्निध्य में जो कोई भी आता, स्वयं को धन्य अनुभव करने लगता।
साधना वर्ष के शुभारंभ तक 400 को पार कर गई के द्वारा भारतीय संस्कृति के निर्धारण प्रायः चार करोड़ से अधिक सामान्यजनों तक जो गाँव-शहरों-महानगरों में रहते थे, पहुँचे। प्रखर साधना वर्ष वसंत पर्व 22 प्रायः सात माह पूरा होने को आ रहे हैं। अब महापूर्णाहुति वर्ष 10 फरवरी 2000(वसंत पंचमी) से आरंभ होने जा रहा हैं। इस गुरु पर्व पर हम एक के उत्तरार्द्ध एवं दूसरे की पूर्व तैयारी के संधि-स्थल पर खड़े हैं। एक ऐतिहासिक महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कैसे-क्या होने जा रही है, यह सबके लिए एक कुतूहल का विषय हो सकता है।
साधना में सुख भी छोड़ने पड़ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी सहन करनी पड़ती है, परंतु सेवासाधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तप-साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधना उसी अनुपात से सफल हुई। माली अनगढ़ पेड़ पौधों को काटता छाँटता रहता है उसके साथ उगे हुये खर पतवार को उखाड़ फेंकता है तभी वह नये किस्म की कलमें लगाता है और उसका उद्यान शोभायमान बन पड़ता है।
साधना के अतिरिक्त तीसरा चरण आराधना का कार्यान्वित करना होता है। आराधना का अर्थ है। लोकमंगल की पुण्य-परमार्थ की सेवा साधना। सेवा धर्म का परिपालन भी ईश्वर भक्ति का ही एक चरण है।
साधना करनी पड़ती है जिसके बिना आध्यात्मिक उत्कृष्टता पनपती ही नहीं। जोंक जहाँ अपने पंजे गड़ा लेती है वहाँ से भरपेट रक्त पीकर ही छूटती है। छुड़ाने का एक ही उपाय है कि उस पर पिसा नमक छिड़क दिया जाय तो देखते-देखते गलने लगती है और छूटकर तत्क्षण एक कोने पर गिर पड़ती है उससे पीछा छुड़ाने के लिए ऐसे छोटे काम अपने हाथों करने होते हैं जिन्हें आमतौर से छोटे लोगों द्वारा किए जाने योग्य समझा जाता है।
साधना वर्ष वसंत पर्व 22 प्रायः सात माह पूरा होने को आ रहे हैं। अब महापूर्णाहुति वर्ष 10 फरवरी 2000(वसंत पंचमी) से आरंभ होने जा रहा हैं। इस गुरु पर्व पर हम एक के उत्तरार्द्ध एवं दूसरे की पूर्व तैयारी के संधि-स्थल पर खड़े हैं। एक ऐतिहासिक महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कैसे-क्या होने जा रही है, यह सबके लिए एक कुतूहल का विषय हो सकता है। इस संबंध में बड़ा ही स्पष्ट चिंतन एवं एक सुनिश्चित लक्ष्य पूज्यवर हमारे समक्ष रख गए हैं।
साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधना और आराधना के समन्वय को तीर्थराज प्रयाग का त्रिवेणी-संगम कहा गया है। उपासना अर्थात् गंगा, साधना अर्थात् यमुना, सरस्वती अर्थात् आराधना। यही है वह समन्वय का महातीर्थ जिसका अवगाहन करने से आध्यात्मिक कायाकल्प होता है और कौआ, कोयल तथा बगुला हंस बन जाता है। रामायण के प्रतिपादनानुसार मात्र स्थान विशेष में जाकर पानी में डुबकी लगाने भर से वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।
साधना नितान्त आवश्यक है। इसके सहारे व्यक्तित्व में वह विशिष्टता उपजती है, जो दूसरों को प्रभावित कर सके यह प्रयोजन आत्मसत्ता को प्रखर किये बिना सम्भव नहीं। यश-कामना के साथ साथ दूसरे स्वार्थ साधने के लिये तो कितने ही व्यक्ति लोकसेवी को चोगा पहनते है कुछ उछल कूद भी करते है, पर जब निष्कर्ष निकालने का अवसर आता है तो प्रतीत होता है कि कोई महत्वपूर्ण परिणति हाथ नहीं लगी। व्यर्थ ही लोकरंजन होता रहा। उसके साथ लोक मंगल का उद्देश्य पूरा न हो सका।
साधना का स्वरूप भी प्रायः इसी प्रकार का है। किसान बैलों से महावत हाथियों से काम लेते है। सरकस वाली वैसी ही कुशलता जीवन शोधन में भी दिखाने पड़ती है। सरकस वाले शेर, घोड़े, हाथी, रीछ, कुत्ते आदि जैसे जानवरों को ऐसे कर तब दिखाने के लिये प्रशिक्षित कर लेते है। जिन्हें देखकर दर्शकों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहे।
साधना के उग्र तपश्चर्या-परक बारह वर्षीय उत्तरार्द्ध वाले एक विश्वव्यापी महाअनुष्ठान के रूप परिवर्धित हुए इस उपक्रम की घोषणा परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आश्विन नवरात्र 1988 को की गई थी। अब उस महापुरश्चरण की अंतिम समापन घड़ियाँ आ पहुँची हैं। यह सारी अवधि सारी मानवजाति के लिए प्रतिकूलताएँ झेलते हुए अग्नि परीक्षा की तरह बीती हैं। इस सदी का अंतिम गुरुपूर्णिमा पर्व भी इस महापुरश्चरण के साधना वर्ष व पूर्णाहुति वर्ष की मिलन वेला में आया है एवं हमें सोचने पर विवश करता है कि इस अग्निपरीक्षा में-तप−साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं।
साधना जीवन साधना उसी अनुपात से सफल हुई। माली अनगढ़ पेड़ पौधों को काटता छाँटता रहता है उसके साथ उगे हुये खर पतवार को उखाड़ फेंकता है तभी वह नये किस्म की कलमें लगाता है और उसका उद्यान शोभायमान बन पड़ता है।
साधना का कष्ट सहने को तैयार न होता।
साधना के नाम से पुकारते है। साधना का अर्थ है व्यक्तित्व को चरित्र को आदर्श बनाना। इस प्रकार के व्यक्ति ही दूसरों पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं उनके कथन का मूल्य समझा जाता है और प्रभाव भी पड़ता है। जो उपदेशों के अम्बार लगाते रहते है पर निज के जीवन में खोखले रहते है। उनका कला कोशल सराहा जाता है पर उनका अनुसरण करने के लिये कोई तैयार नहीं होता है।
साधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तप-साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधना के साथ-साथ निरंतर मोर्चे पर लड़ते रहने वाले सैनिक के रूप में परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम ‘मत्त’ जी ने निष्कर्ष आजादी के 24 वर्ष बाद दिए, निश्चित ही उसके पीछे उनके जीवन के 45 महत्त्वपूर्ण वर्षों कि गहन चिंतन एवं द्रष्टा स्तर की शक्ति ही थी वे लिखते हैं कि “दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दीं और राजमुकुट पहन लिए, पर अपने लिए आजीवन उस चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
साधना का यही स्वरूप रखा। रात्रि में शयन के अतिरिक्त उपासना सम्पन्न कर ली। दिन में अपने प्रति कठोरता और दूसरों के प्रति उदारता का व्यवहार करते रहे। आत्मशोधन ओर लोकमंगल की साधना का यही सुनिश्चित स्वरूप चलता रहा।
साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधना में लिये यों ही उद्यत नहीं हो जाता। ज्यादा कीमती चीज के लिए कम कीमती चीज का त्याग किया जाता है। साधना का कष्ट इस लिये सहन करते हैं, कि जिन सुखों का त्याग किया गया है उससे अधिक मूल्यवान सुख प्राप्त हो। यदि ऐसा न होता तो कोई भी व्यक्ति साधना का कष्ट सहने को तैयार न होता।
साधना वर्ष की समापन की समापन की अवधि व महापूर्णाहुति की तैयारी में संलग्न परिजनों का निश्चित ही समाधान करेगा, उनके मनोबल को ऊँचा उठायेगा। इससे पूर्व जुलाई 1961 में लिखे पूज्यवर के लिखे एक लेख प्रतिष्ठापना होनी ही है’, (पृष्ठ 60) के कुछ अंश उद्धत हैं।
साधना में सूक्ष्म जगत से आने वाले दैवी प्रवाह में अभिवृद्धि होगी।
साधना व आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों, से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
साधना का कष्ट इस लिये सहन करते हैं, कि जिन सुखों का त्याग किया गया है उससे अधिक मूल्यवान सुख प्राप्त हो। यदि ऐसा न होता तो कोई भी व्यक्ति साधना का कष्ट सहने को तैयार न होता।
साधना से मन को दुष्प्रवृत्तियों से जूझने योग्य सशक्त बनाया जाता है एवं आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरी उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।
साधना व आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिए इन्हीं त्रिविधि सोपानों को अपनाना पड़ता है।
साधना और आराधना। यदि विधान के साथ तत्त्वज्ञान का सम्मिश्रण रखा गया। तो उसका समुचित लाभ प्राप्त होगा। अपने अनुभव की साक्षी देकर जब यह प्रतिपादन समझाया तो सम्पर्क में आने वालों में अधिकाँश ने उस मार्ग पर चलना अंगीकार किया। यही कारण है जहाँ मात्र पूजा पाठ करने वाले सर्वथा खाली हाथ रहते और प्रपंच रचते देखे गये है वहाँ हमारे द्वारा प्रशिक्षित गायत्री साधकों में से अधिकाँश ने अपने व्यक्तित्व का कायाकल्प किया और लोकसेवा के क्षेत्र में बढ़ चढ़ कर भूमिका निबाही।
साधना ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिए इन्हीं त्रिविधि सोपानों को अपनाना पड़ता है।
साधना। सेवा धर्म का परिपालन भी ईश्वर भक्ति का ही एक चरण है।
साधना वर्ष में संकल्पित कर लेते हैं। जिनने 48 साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधना में रत हो गए। साधना और लोक सेवा में तत्पर श्रमण उद्रायण बहुत समय तक देश का भ्रमण और तीर्थाटन कर अपनी आत्मिक क्षमताएँ बढ़ाने में लगे रहे। धर्म साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार के फैल गया। उनकी कठोर तपश्चर्या के उदन्त सारे लोक में गाए जाने लगे। उनके चमत्कारी व्यक्तित्व के सान्निध्य में जो कोई भी आता, स्वयं को धन्य अनुभव करने लगता।
साधना की धुरी पर दो मोर्चे आरंभ किए जाने की बात कही थी-पहला-आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारना और एक परिकर, एक सूत्र में संबद्ध करना, साथ ही कुछ नियमित-सृजनात्मक गतिविधियों का आरंभ होना, जो सद्विचारों को सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका निभा सकें। दूसरा-अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जाना। उसे एक प्रयास से आरंभ कर विशाल-विकराल बनाया जाना।
साधना है। इसके लिये हर समय अपने ऊपर तीखी नजर रखनी पड़ती है। और जहाँ भी लोभ या दबाव के क्रम पैर डगमगाने लगें, वहीं अपने को संभालना पड़ता है। त्रिपदा गायत्री को जीवनचर्या में सम्मिलित करने के लिये उपासना साधना के अतिरिक्त तीसरा चरण आराधना का कार्यान्वित करना होता है। आराधना का अर्थ है।
साधना कहते है। साधना अर्थात् अपने आपको साध लेना संभाल लेना सुधार लेना। अनगढ़ को सुसंस्कृत बना लेना। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों के कारण मनुष्य के गुण कर्म स्वभाव में नर पशु स्तर की निकृष्टताओं भरी होती है वे अनायास ही उभरती रहती है मन भी पानी जैसी प्रकृति का है जो ढलान की ओर ही सहज गिरता है। इस गिरावट को रोकने और ऊँचा उठाने के लिये घोर प्रयत्न करना अविवेक और अनाचार से लड़ पड़ने का साहस सँजोना, यह वह प्रयास है जिसे साधना कहते हैं।
साधना का अर्थ है व्यक्तित्व को चरित्र को आदर्श बनाना। इस प्रकार के व्यक्ति ही दूसरों पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं उनके कथन का मूल्य समझा जाता है और प्रभाव भी पड़ता है। जो उपदेशों के अम्बार लगाते रहते है पर निज के जीवन में खोखले रहते है। उनका कला कोशल सराहा जाता है पर उनका अनुसरण करने के लिये कोई तैयार नहीं होता है।
साधना से सिद्धियाँ प्राप्त होती है। अष्ट-सिद्धि और नव-निधियाँ प्रसिद्ध हैं। विभिन्न योगों द्वारा विभिन्न शक्तियों का मिलना प्रकट ही है। इन्द्रियों के आकर्षक भोगो को, सुख-सुविधा को, ऐश आराम को, छोड़कर कोई व्यक्ति कष्ट दायक, कठोर नीरस, श्रम-साध्य साधना में लिये यों ही उद्यत नहीं हो जाता। ज्यादा कीमती चीज के लिए कम कीमती चीज का त्याग किया जाता है।
साधना हेतु ही इस विषम वेला में एक सामूहिक उसकी समापन घड़ियाँ हमारे सामने हैं। सारा मार्गदर्शन जो 1988 से 1990 तक लिखे पूज्यवर के अमृत वचनों के माध्यम से मिलता है-वह एक ही धूरी पर घूमता है। “प्राणवान प्रतिभाओं का परिष्कार उनके माध्यम से युगपरिवर्तन रूपी दैवी प्रयोजन पूरा किया जाना।” इसके लिए उनने साधना की धुरी पर दो मोर्चे आरंभ किए जाने की बात कही थी-पहला-आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारना और एक परिकर, एक सूत्र में संबद्ध करना, साथ ही कुछ नियमित-सृजनात्मक गतिविधियों का आरंभ होना, जो सद्विचारों को सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका निभा सकें। दूसरा-अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जाना।
साधना के क्षेत्र में भी उनका यश पहले की ही भाँति सारे संसार के फैल गया। उनकी कठोर तपश्चर्या के उदन्त सारे लोक में गाए जाने लगे। उनके चमत्कारी व्यक्तित्व के सान्निध्य में जो कोई भी आता, स्वयं को धन्य अनुभव करने लगता।
साधना कहते हैं। गीता में जिस महाभारत का धर्मयुद्ध का वर्णन है। वस्तुतः वह आत्मशोधन की प्रक्रिया है जिसके लिये स्वभावगत दुष्प्रवृत्ति से जूझना पड़ता है।
साधना चिन्तन से सूक्ष्म शरीर से और आराधना के कारण शरीर अन्तःकरण से सम्बन्धित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-February
साधना में ही मनुष्य का सच्चा स्वार्थ सन्निहित है।
साधना कक्ष से लगा हुआ है एकत्र हों। उसी महत्वपूर्ण कार्यकर्ता गोष्ठी के कुछ बिंदु जो हमने अपनी डायरी में नोट किए थे, यहाँ प्रस्तुत हैं।
साधना के प्रभाव से संपन्न वैभवशाली, और आध्यात्मिकता से भरे पूरे भारत का निर्माण होगा।
साधना की बात कही, तो वह बिना एक पल की देर लगाए तुरंत तैयार हो गईं। हमें भी उनके इस साहस भरे समर्पण को देखकर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई।’
साधना समर कहते हैं।
साधना से आत्मबल प्राप्त करके महिलाएँ समाज में अपना बहुमुखी विकास कर सकें। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर शाँतिकुँज की स्थापना हुई। इस भाव पूर्ण प्रयास को गुरुदेव के शब्दों में कहें तो-’शांतिकुंज की स्थापना का मूल प्रयोजन माताजी के मार्गदर्शन में महिला जागरण अभियान का आरंभ करके उसे नारी के समग्र उत्कर्ष को अनेकानेक गतिविधियों को विश्वव्यापी बनाना है।’
साधना आयोजित कर उन सभी याजकों को जिनने भाग लिया था उस सुरक्षा कवच के अंतर्गत लाना जो इक्कीसवीं सदी में उनकी रक्षा करेगा। ये घरों के मुहल्लों के, प्रज्ञा संस्थानों के तथा जिला सम्मेलनों के स्तर पर आयोजित हो सकते हैं। इन सभी के घरों को मंदिर बनाने के लिए देवस्थापना से लेकर ‘वेद स्थापना’ के उपक्रम ताकि वैदिक संस्कृति का प्रकाश घर-घर पहुँचे व हर घर एक संस्कार मंदिर बन जाय।
साधनात्मक प्रयास भी तीव्र होते जा रहे थे। दो हिमालय यात्राएँ भी मथुरा के जीवनकाल में ही हुईं।
साधना के पथ पर अग्रसर होने का प्रमाण मिलना चाहिए। धर्म धारणा में एक ही प्रमाण पाया जाता है कि मनुष्य अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार बने। अपने को तपाये, गलाये और देवमानवों के अनुरूप दृष्टिकोण और क्रिया−कलाप का उपक्रम बना हुआ दृष्टिगोचर होना चाहिए। यदि वैसा कुछ न बन पड़े तो समझना चाहिए कि लोभ-मोह के भव-बंधनों की हथकड़ी बेड़ी जान-बूझकर पहन ली गई है।
साधना द्वारा साधक स्तर के कार्यकर्ताओं का निर्माण तथा प्रज्ञापुराण-गीता विश्वकोश- वैदिकवाङ्मय के वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण की घोषणा कर उनने एक नयी करवट ले इस मिशन को शिखर पर पहुँचाने की प्रक्रिया में एक सोपान पूरा किया था। तत्पश्चात, प्रचारात्मक, रचनात्मक, सुधारात्मक, क्रिया–कलापों तथा नूतन प्राणवान सृजन सेना वाहिनी के माध्यम से आज तक की स्थिति में पहुँचा कर ला खड़ा किया है।
साधना समर्पण के माध्यम से देव संस्कृति विस्तार की प्रक्रिया के निमित्त गीता के अठारह अध्याय की तरह अठारह दिग्विजयी पुरुषार्थ अश्वमेधों के रूप में दो वर्ष की अवधि में संपन्न हो गए। यही शक्ति का प्राकट्य है जो पहले स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता, फिर अपनी शक्ति का झंझावाती आभास देकर सूक्ष्म में विलीन हो और प्रखर-शक्तिशाली रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है।
साधना में थे। शिविर में आने वाले सभी लोग माता जी से मिलते-जुलते थे। मैं भी अपनी पत्नी के साथ पाँच दिवसीय शिविर में शाँतिकुँज पहुँचा। पहुँचने के दूसरे दिन से ही पत्नी को खूनी पेचिश शुरू हो गयी। मुँह से भी खून आने लगा।
साधनात्मक जीवन की कठोर तप तितिक्षा ही हैं। जिसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारने पर व्यक्तित्व कुँदन की तरह चमक उठता है।’ फिर हमने तो परिवार को छोड़कर भागने, उसे घटाने की जगह बढ़ाया है। पहले ओम्–प्रकाश, दया, सतीश (मृत्युँजय) और शैल, मैं और गुरुजी। फिर हुआ अखण्ड ज्योति परिवार इसमें 10-20 हजार लोग रहे होंगे।
साधना तब से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, हमेशा आगे की लाइन में चले। उन्होंने कहा कि क्राँति करेंगे तो जन क्राँति करेंगे। आध्यात्मिक क्षेत्र में क्राँति है तो क्राँति है इसको कोई पीछे नहीं हटा सकता। अवरोध तो आते ही रहते हैं। अवरोधों की परवाह उन्होंने नहीं की।
साधना समर’ का अलंकारिक निरूपण है। असुर प्रबल होते हैं, देवता उनसे दुःख पाते हैं, अंत में दोनों पक्ष लड़ते हैं, देवता अपने को हारता-सा अनुभव करते हैं वे भगवान के पास जाते हैं। प्रार्थना करते हैं। भगवान उनकी सहायता करते हैं। अंत में असुर मारे जाते हैं, देवता विजयी होते हैं।
साधना की है, पर अपने घर को तपोवन बनाकर। गृहस्थ जीवन में आने वाली तकलीफें, परेशानियां साधनात्मक जीवन की कठोर तप तितिक्षा ही हैं। जिसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकारने पर व्यक्तित्व कुँदन की तरह चमक उठता है।’ फिर हमने तो परिवार को छोड़कर भागने, उसे घटाने की जगह बढ़ाया है। पहले ओम्–प्रकाश, दया, सतीश (मृत्युँजय) और शैल, मैं और गुरुजी।
साधना सत्रों, मंत्रलेखन-संकल्पित जप अनुष्ठानों के रूप में संपन्न हो रहा है। साधना का यह उपार्जन अनिवार्य है। इस विराट स्तर की तैयारी के लिए जिसका वर्णन ऊपर किया गया। इसके साथ-साथ दैवी प्रवाह के अनुकूलन के लिए जहाँ-जहाँ अश्वमेधिक ऊर्जा बिखरी है जहाँ पर भी अब तक बाईस व आगामी तीन, कुल पच्चीस अश्वमेधिक अनुष्ठान संपन्न हुए हैं, वहाँ उसका सुनियोजन करने के लिए सभी परिजनों को सक्रिय हो जाना चाहिए। संस्कारों की दृष्टि से सुसंपन्न इस राष्ट्र को एक दिशा-दर्शक अग्रगामी की आवश्यकता समय-समय पर पड़ती है।
साधना, उस जीवन में जुड़कर।
प्रगति पंथ पर चला पथिक, फिर देखा कभी न मुड़कर॥
साधना सिर पटकती रहे जिंदगी भर, सिद्धि ऐसी कभी भी नहीं पाएगी।”
साधना के लिए हिमालय चले गए। यहाँ माता जी ने नारी के अभ्युदय एवं विकास के लिए अनवरत साधना का क्रम अपनाया। अनेकों कन्याओं को उन्होंने इसमें भागीदार बनाया। पहले इन लड़कियों की संख्या चार थी, बाद में चौबीस हुई, बाद में बढ़ते-बढ़ते सौ से भी अधिक पहुँच गई। साधना के साथ इन लड़कियों के शिक्षण का काम भी वह स्वयं संपन्न करती रहीं।
साधना का यह उपार्जन अनिवार्य है। इस विराट स्तर की तैयारी के लिए जिसका वर्णन ऊपर किया गया। इसके साथ-साथ दैवी प्रवाह के अनुकूलन के लिए जहाँ-जहाँ अश्वमेधिक ऊर्जा बिखरी है जहाँ पर भी अब तक बाईस व आगामी तीन, कुल पच्चीस अश्वमेधिक अनुष्ठान संपन्न हुए हैं, वहाँ उसका सुनियोजन करने के लिए सभी परिजनों को सक्रिय हो जाना चाहिए। संस्कारों की दृष्टि से सुसंपन्न इस राष्ट्र को एक दिशा-दर्शक अग्रगामी की आवश्यकता समय-समय पर पड़ती है। वही अपने परिजनों को बनना होगा।
साधना के नित नए आयामों का विकास। ऐसे में वे अपने बच्चों से प्यार भले ही कितना करते रहे हों पर सान्निध्य-सामीप्य के अवसर तो दुर्लभ ही थे।
साधना का क्रम अपनाया। अनेकों कन्याओं को उन्होंने इसमें भागीदार बनाया। पहले इन लड़कियों की संख्या चार थी, बाद में चौबीस हुई, बाद में बढ़ते-बढ़ते सौ से भी अधिक पहुँच गई। साधना के साथ इन लड़कियों के शिक्षण का काम भी वह स्वयं संपन्न करती रहीं। शिक्षण के इस क्रम में औपचारिक शिक्षा के साथ संगीत-कर्मकाण्ड, पौरोहित्य के साथ वक्तृत्व कला का भी समुचित स्थान रहता।
साधनात्मक प्रक्रियाएँ भी शामिल थीं। जिसे निभालेना सरल न था। पर वह तो जैसे कठिन कार्य के लिए ही जन्मी थीं। गुरुदेव इसे बड़ी मार्मिक भाषा में अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं-’कार्य विभाजन में दूसरी जिम्मेदारी माताजी के ऊपर डाली गई है। यों वे रिश्ते में हमारी धर्म पत्नी लगती हैं, पर वस्तुतः वे अन्य सभी की तरह हमें भी माता की भाँति दुलारती रही हैं।
साधना’ है। साधना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। तम की दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा केवल इस एक ही उपाय से हो सकता है। सच्ची शाँति और प्रगति का मार्ग भी यही है।
साधना का प्रचार हुआ। ऋषि युग्म के तप प्रभाव से गायत्री शक्ति युग शक्ति बनकर अवतरित हुई। इस काम में संकट कम नहीं आए पंडे, पुजारियों, धर्माचार्यों ने कम विरोध नहीं किया। विरोध का यह क्रम अपमान-तिरस्कार तक ही सीमित नहीं रहा। मृत्यु संकट के कुचक्र भी खड़े किए गए।
साधना कक्ष के सामने खुली जगह थी। वहीं धूप में कपड़े सूखने के लिए डाल दिए जाते थे। अपनी धोती को तार पर फैला कर अभी वह हटी ही थीं कि आसमान से एक घायल तोता ‘लुढ़क-पुढ़क’ करता हुआ छत पर गिरा और पंख फैला गया। उन्होंने समझा कि वह मर गया। स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी।
साधना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। तम की दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा केवल इस एक ही उपाय से हो सकता है। सच्ची शाँति और प्रगति का मार्ग भी यही है।
साधना है। सादगी-सरलता एवं सात्विकता की त्रिवेणी यहाँ से प्रवाहित है। इसकी अधिष्ठात्री तो प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं। मैं इस संस्थान की उत्तरोत्तर उन्नति की कामना करता हूँ।
साधनात्मक उपक्रम भी आवश्यक हैं। इसी को पूरा करने के लिए महिलाओं को गायत्री जप का अधिकार दिया गया। इसका उपयोग सबसे पहले माताजी ने स्वयं किया। फिर गुरुदेव के साथ देशभर में घूम-घूम कर हजारों-हजार महिलाओं को गायत्री मंत्र में दीक्षित किया।
साधना, सामाजिक क्रिया–कलापों एवं अध्ययन लेखन में बीतता रहता। अपने व्यस्त जीवन में शायद ही कुछ क्षण वह परिवार को दे पाते हों। कुल मिलाकर परिवार का संचालन भार माताजी पर ही था। पिता का प्यार और माँ का दुलार दोनों उन्हें ही जुटाने पड़ते थे।
साधना के साथ इन लड़कियों के शिक्षण का काम भी वह स्वयं संपन्न करती रहीं। शिक्षण के इस क्रम में औपचारिक शिक्षा के साथ संगीत-कर्मकाण्ड, पौरोहित्य के साथ वक्तृत्व कला का भी समुचित स्थान रहता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-August
साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार (8) गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
साधना-आराधना (3) उपासना समर्पण योग (4) साधना पद्धतियों का ज्ञान एवं विज्ञान (5) गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन (6) गायत्री साधना का गुह्य विवेचन (7) गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार (8) गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
साधनायें प्रसिद्ध हैं (1) महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियानबंध (4) जालन्धर बन्ध (5) मूलबन्ध (6) महाबन्ध (7) खेचरी (8) विपरीत किरणें (9) योनि मुद्रा (10) वज्रोली (11) शक्ति चालिनी (12) तडापी (13) माण्डवी (14) शाम्भवी (15) आश्विनी (16) पाशिनी (17) काक्री (18)मातंगी (19) भुंजगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कयकी (24) आकाशी। इसके अतिरिक्त आठ प्राणायाम (1) सूर्यभेदन (2) उज्जायी (3) सीत्कारी (4) शीतली (5) भस्रिका (6) भ्रामरी (7) मुर्छा (8) प्लाविनी। यह भी इन्हीं सूक्ष्म संस्थानों के जागरण के लिए है।
साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
साधना में इन पाँचों को समान रूप से विकसित होने का अवसर मिलता है तदनुसार इस ब्रह्मलोक में, देवलोक में निवास करने वाला जीवात्मा स्वर्गीय परिस्थितियों के बीच रहता हुआ अनुभव करता है।
साधनायें यहीं से फलित होती और विकसित होती है। ओजस् तेजस और ब्रह्मवर्चस् के रूप में पराक्रम, विवेक एवं आत्मबल की उपलब्धियों का अभिवर्धन यहीं से उभरता है। ईश्वरीय अनुदान इसी पर अवतरित होता है। इस सहस्रार चक्र की साधना द्वारा वह क्षमता विकसित की जा सकती है जिसमें चैतन्य प्रवाहों को ग्रहण कर अपने को दैवीय गुणों से सुसम्पन्न बनाया जा सकें।
साधना करेंगे,
साधना हुआ शरीर रे!
सारे बंधन तोड़ हुआ यह मनवा मस्त फकीर रे!
साधना की, अगणित पुस्तकों का स्वाध्याय किया किंतु जो एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि उनकी रही है, जिसने गायत्री परिवार रूपी विराट संगठन को भी जनम देने का मुख्य निमित्त बनने का श्रेय प्राप्त किया, वह है उनकी लेखनी की साधना। युगव्यास की तरह जीवन भर वे लिखते रहें व अपने वजन से भी अधिक भार का साहित्य, हर विषय पर युग-संजीवनी के रूप में लिख गए।
साधना सम्बन्धी पहला विश्वकोष जो गायत्री महाविज्ञान के रूप में प्रकाशित हुआ, भी सम्मिलित है तथा इस विषय पर लिखी गयी ढाई सौ से अधिक पुस्तकें। यही एक मात्र प्रामाणिक साहित्य विश्वभर में है जो गायत्री साधना पर उपलब्ध है। ऋषि स्तर की सत्ता जिसने गायत्री मय अपने को बना लिया हो, यही यह सृजन कर सकती है।
साधना से सृष्टि में सत्वगुण को सुरक्षा देते रहे, उनका संकल्प लोक मंगल का विस्तार करे इसलिए मैंने रस सिद्धि का प्राकट्य किया। “
साधनाओं द्वारा जो इन अन्तरंग शक्तियों पर अधिकार कर लेता है उसके लिए वे वैसी ही उपयोगी हो जाती है जैसी बिजली एटम, भाप आदि की शक्तियों पर अधिकार प्राप्त करके आज वैज्ञानिकों ने उन्हें मानव की सेवा में प्रयुक्त कर दिया हैं भौतिक जगत में जो शक्ति भौतिक क्षमता सम्पन्न दिखाई पड़ती है वहीं अंतर्जगत में आध्यात्मिक क्षमता के रूप में प्रकट होती है। गायत्री की आध्यात्मिक शक्ति साधक के सम्मुख सिद्धियों के रूप में सामने आती है। उसे हर क्षण लगता है कि अदृश्य लोक के कोई देव, दानव हर पल उसकी सेवा में उपस्थित रहते है और उसकी आज्ञा पालन करने के लिए हर क्षण तत्पर रहते है। यक्ष, राक्षस, गंधर्व, अप्सरा, किन्नर, आदि उसके वश में हो जाते है और उसकी सेवा में उपस्थित हो जाते है।
साधना के पिपीलिका मार्ग दादरा मार्ग, विहंगम मार्ग यह तीन मार्ग है। इन पर चलने से परा पश्यन्ती, मध्यमा वैखरी चारों वाणियाँ प्रस्फुटित होती है। अविद्या होती है। अविद्या अस्मिता राम, द्वेग अभिनिवेश यह पाँचों क्लेश दूर होते है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय यह चारों अवस्थायें परिमार्जित होती है।
साधना द्वारा वे सूक्ष्म चक्र भी जागृत होते है-
साधना, हम सब लोगों को करनी चाहिये। प्रज्ञा-योग क्या है? प्रज्ञा-योग में ज्ञान, कर्म और भक्ति की जिनको आप सरस्वती लक्ष्मी, काली, कहते है। ये तीनों शक्तियाँ शामिल है। जिन्हें आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहते है, तीनों ही चीजों का इसमें समावेश है।
साधना-मंत्रलेखन-संस्कार संवर्धन की प्रतिक्रिया क्या होगी इसे स्थूल नेत्रों व तर्क बुद्धि से नहीं देखा व समझा जा सकता। इसे तो ऋषि रक्त के संचय व देव शक्तियों के सम्मिलन से उपजने वाली महाकाली के जन्म लेने की प्रक्रिया माना जाना चाहिए जो चेतना के स्तर पर सूक्ष्म जगत में छाए प्रदूषण को मिटाकर वह कार्य सम्पन्न करेगी जो कभी रक्त बीजों को शुम्भ निशुम्भ, मधु-कैटभ जैसे दैत्यों महाराक्षसों के विनाश के लिए उसने संपादित किया था। दुर्गावतरण सामूहिक धर्मानुष्ठान व विशिष्ट तान्त्रिक स्तर के उपचार की प्रक्रिया से ही होता है। वही अब नवम्बर 15 से होने जा रहा है व सतत् विस्तार लेते-लेते पूरी विश्ववसुधा को अपनी परिधि में ले लेगा।
साधनाएँ सिद्धियाँ और व्यक्तित्व परक ऋद्धियाँ अनेकानेक है। उनका वर्गीकरण चौबीस भागों में करने से विस्तार को समझने में सुविधा होती है। अन्तरंग के परिष्कार और साधन सुविधाओं के विस्तार यह दोनों ही तथ्य मिलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय और समाज में स्वर्णिम परिस्थितियों के विस्तार की संभावनाएँ प्रशस्त होने लगती है। प्रज्ञावतार का कार्य क्षेत्र यहीं है। वह व्यक्ति नहीं शक्ति नहीं शक्ति के रूप में प्रकट होने जा रहा है।
साधना पर उपलब्ध है। ऋषि स्तर की सत्ता जिसने गायत्री मय अपने को बना लिया हो, यही यह सृजन कर सकती है।
साधना की ध्यान धारण जैसी उच्चस्तरीय प्रक्रियायें ही उपयुक्त हो सकती है, जिन्हें कुण्डलिनी जागरण के नाम से जाना जाता है।
साधना की जाती है। इन महाविद्याओं का विस्तृत वर्णन इन पंक्तियों में संभव नहीं। यहाँ तो इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि गायत्री के तीनों अक्षर एक प्रकार से आध्यात्मिक त्रिवेणी के समान है। जिस प्रकार गंगा, यमुना और सरस्वती के मिलन से तीर्थराज प्रयाग की भौतिक त्रिवेणी बनी है उसी प्रकार गायत्री के तीन अक्षरों से निहित इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की तीन महाधाराओं के मिलन से आध्यात्मिक त्रिवेणी बनती हैं प्रयाग की त्रिवेणी में खान करने का जो महाफल है उसका तो वर्णन ही हो सकना कठिन है। शास्त्रों में उल्लेख है कि-
साधना का गुह्य विवेचन (7) गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार (8) गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
साधना विज्ञान के अनुसार बन्ध एवं मुद्राओं का विधान शास्त्रों में मौजूद है गायत्री के 24 अक्षरों से सम्बन्धित इस प्रकार की 24 साधनायें प्रसिद्ध हैं (1) महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियानबंध (4) जालन्धर बन्ध (5) मूलबन्ध (6) महाबन्ध (7) खेचरी (8) विपरीत किरणें (9) योनि मुद्रा (10) वज्रोली (11) शक्ति चालिनी (12) तडापी (13) माण्डवी (14) शाम्भवी (15) आश्विनी (16) पाशिनी (17) काक्री (18)मातंगी (19) भुंजगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कयकी (24) आकाशी। इसके अतिरिक्त आठ प्राणायाम (1) सूर्यभेदन (2) उज्जायी (3) सीत्कारी (4) शीतली (5) भस्रिका (6) भ्रामरी (7) मुर्छा (8) प्लाविनी। यह भी इन्हीं सूक्ष्म संस्थानों के जागरण के लिए है।
साधनाएँ कैसे सम्पन्न कैसे सम्भव बनाया जाय, शारीरिक-मानसिक-आध्यात्मिक स्वास्थ्य कैसे हस्तगत किया जाय एवं राष्ट्र के नवनिर्माण का परिवार -संस्था रूपी प्रजातंत्र के मेरुदण्ड का पुनरुत्थान कैसे हो, ऐसे हर विषय पर पूज्यवर छूटा नहीं। जिस विषय को उनने छुआ, पूरी गहराई से उसकी तह तक जाकर उसके सरल व्यावहारिक पक्ष को जन समुदाय के समक्ष रखा। यह उनकी लेखनी का जादू ही था कि ममत्व में लिपटे उनके शब्द लाखों व्यक्तियों को उनके अंग-अवयव बनाते चले गए व एक विराट गायत्री परिवार विनिर्मित हो गया। शब्द, भाव-संवेदना को छलकाते हुए हर लेख में ऐसे, मानों किसी विशेष राग पर मन को शाँति देने वाली-तपन में तनाव लाने वाली कोई धुन कहीं बज रही हो।
साधना कीजिये। इस समय यह आपके लिये पर्याप्त है। आज की बात समाप्त।
साधना करने वाला साधक योगमार्ग के नौ विघ्नों व्याधि, भ्रांति संशय, प्रमाद, आलस्य, आदि पर विजय प्राप्त कर उच्चस्तरीय प्रगति को प्राष्ठ होता है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना से योगी का चित्त स्थिर होकर आत्म-भाव में लीन हो जाता है। तब वह समग्र शक्तियों से सम्पन्न हो जाता हैं। और भव-बंधन से छूट जाता है। सहस्रार से निस्सृत हो रहे अमृत पर भी विजय प्राप्त कर लेता है।
साधनात्मक परामर्श प्रधान ममत्व व स्नेह की स्याही में लिखें गए दुर्लभ पत्र भी प्रकाशित किया जा रहे है। अपने आप में अनूठा यह संकल्प परिजनों के लिए अपने घरों में रखने योग्य है। स्वाध्याय मण्डलों, शक्तिपीठों पर अमूल्य निधि की तरह रखने के लिए, उपहार आदि के लिए देने हेतु, वाचनालय में अपनी ओर से स्थापना कराने के निमित्त, दहेज व विरासत के रूप में बच्चों या रिश्तेदारों के देने योग्य श्रेष्ठतम भेंट इससे अधिक और कोई नहीं हो सकती। पितरों के प्रति श्रद्धा निमित्त श्रद्धा निमित्त श्राद्ध-तर्पण के साथ-साथ यह साहित्य विद्यालयों में, संगठनों में भेंट के रूप में या प्रतिभाशाली छात्रों को पारितोषिक रूप में दिया जा सकता है। इतने विराट परिमाण में प्रकाशित हो रहे साहित्य का पुनर्रचना
न मिशन के बढ़ते दायित्वों को देखते हुए सम्भव नहीं है, अतः यह अवसर चूका नहीं जाना चाहिए।
साधना के द्वारा अन्तर जगत से भी प्राप्त का जा सकता है। बाहर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जो भीतर न हो। शिव संहिता में कहा गया है- कि ‘इस देह में मेरु सप्तद्वीप, सरिता, सागर, शैल, क्षेत्र, क्षेत्रपाल, ऋषि मुनि, नक्षत्र, ग्रह, पीठ, पीठदेवता, शिव, चन्द्र, सूर्य, आकाश, वायु, अग्नि जल, पृथ्वी, तीनों लोक सब प्राणी निवास करते है। जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में है। इस रहस्य को जो जान लेता है वही योगी है।
साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
साधना से ही निखरता है। उदारता बरतें और बदलें में आत्म-संतोष लोक सम्मान तथा दैवी अनुग्रह की विभूतियाँ कमाएँ।
साधना पद्धतियों का ज्ञान एवं विज्ञान (5) गायत्री महाविद्या का तत्त्वदर्शन (6) गायत्री साधना का गुह्य विवेचन (7) गायत्री साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार (8) गायत्री की दैनिक एवं विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना (9) गायत्री की पंचकोशी साधना व उपलब्धियाँ (10) गायत्री साधना की वैधानिक पृष्ठभूमि (11) सावित्री, कुण्डलिनी एवं तंत्र (12) मरणोत्तर जीवन तथ्य एवं सत्य (13) विलक्षण अद्भुत यह मानव शरीर (14) चमत्कारी विशेषताओं से भरा मानवी मस्तिष्क (15) शब्दब्रह्म-नादब्रह्म (16) व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान (17) अपरिमित संभावनाएँ का आगार मानवी व्यक्तित्व (18) चेतन, अचेतन व सुपरचेतन मन (19) विज्ञान और अध्यात्म, परस्पर पूरक (20) भविष्य का धर्मः वैज्ञानिक धर्म (21) यज्ञ का ज्ञान-विज्ञान (22) यज्ञ एक समग्र उपचार प्रक्रिया (23) युगपरिवर्तन कैसे व कब? (24) सतयुग की वापसी (25) सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण (26) मर्यादा पुरुषोत्तम राम (27) संस्कृति संजीवनी श्रीमद्भागवत एवं गीता (28) रामायण की प्रगतिशील प्रेरणाएँ (29) षोडश संस्कार विवेचन (30) भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व (31) अमृतवाणी-1 (32) अमृतवाणी -2 (33) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (34) धर्म तत्व का दर्शन व मर्म (35) नव्य समाज का अभिनव निर्माण (36) निरोग जीवन के महत्वपूर्ण सूत्र (37) जीवेम शरदः शतम् (38) इक्कीसवीं सदी नारी सदी (39) समाज का मेरुदण्ड ‘सशक्त परिवार तंत्र (40) अमर हो गए मरकर भी जो। (41) हमारी संस्कृति-इतिहास के कीर्ति स्तम्भ (42) महापुरुषों के अविस्मरणीय जीवन प्रसंग (43) विचार सार एवं शक्तियाँ भाग 1 (44) विचार-सार एवं शक्तियाँ भाग-2(45) शिक्षा एवं विद्या। ये सभी इन दिनों प्रेस छपाई पर है तथा शेष 15 भी इस माह के अंत तक प्रेस में पहुँच जाएँगे। निश्चित ही यह संग्रह जो युग व्यास की लेखनी से निस्सृत चिंतन चेतना का है, हर किसी के लिए प्राणों से भी बढ़कर निधि हैं।
साधना में इन्हें संयुक्त रूप में प्रयुक्त प्रभावित करने का विधान है।
साधना आदि अनेकों के साथ मिल कर पत्रकारिता का एक इतिहास विनिर्मित करती चली आयी है। इस पत्रिका को अब प्रायः अट्ठाईस वर्ष प्रकाशित होते हो गये हैं, क्योंकि पहला अंक 1937 में पूज्यवर ने हाथ से बने कागज पर छापा था पर यह मासिक नियमित न रहकर दो-ढाई वर्ष तक एक पाती का ही काम करता रहा। बाद में नियमित रूप से वसन्तपर्व 1490 से यह पत्रिका पहले आगरा व फिर मथुरा से प्रकाशित होने लगी। इस व अन्य सारी पत्रिकाओं को अकेले एक व्यक्ति द्वारा लिखा जाना एक ऐसा पुरुषार्थ है, जो अवतारी स्तर की सत्ता द्वारा ही संभव है। व्यास जी को भी लेखनी के लिए गणेश जी की आवश्यकता पड़ी थी किंतु पूज्यवर अकेले लिखते चले, अगणितों को प्रेरणा देकर पत्रकारिता के क्षेत्र में जोड़ते चले गए, शताधिक व्यक्तियों को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित कर उनने रोजी-रोटी कमाने योग्य बना दिया व स्वयं इस पत्रिका के अतिरिक्त 2700 पुस्तकें भी लिख गए।
साधना है, इसलिए जो ‘दुख’ इस प्रयोजन की पूर्ति करता है, उसे बुरा कैसे कह सकते हैं?”
साधना कर सूक्ष्म जगत को प्रचण्ड ऊर्जा से अनुप्राणित करने की। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम आचार्य इसी धारा में इस सदी के प्रथम दशक में भारत भूमि के उत्तर क्षेत्र में आगरा, जनपद के आँवलखेड़ा गाँव के जन्मे, एक साधारण किसान के पुत्र से महासाधक युगऋषि बनते हुए गायत्री की गंगा का अवतरण करने वाले भागीरथी पुरुषार्थ को सम्पन्न कर करोड़ों व्यक्तियों में आशा का संचार करने वाले एक प्रकाश पुँज करते चले गए। ऐसे ही महापुरुष की जन्मस्थली करोड़ों भारतवर्ष में तथा विश्वभर में निवास करने वाली आस्थावानों की प्रेरणा स्थली है। आगामी नवम्बर माह में होने वाली अनुष्ठान जो आस्था संवर्धन व अनीति से संघर्ष के निमित्त किया जा रहा है, प्रथम पूर्णाहुति तो है ही एक उद्घोषक है सबके समक्ष कि देवतत्व अब संगठित हो रहे है तथा असुरता से लड़ने को कटिबद्ध हो उठे है। यह इस तथ्य का भी परिचायक है कि जब-जब आस्था संकट की घड़ी में मनुष्य का पौरुष लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लम्बे हाथ असंतुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते इस रूप में दिखाई पड़ते है।
साधना। युगव्यास की तरह जीवन भर वे लिखते रहें व अपने वजन से भी अधिक भार का साहित्य, हर विषय पर युग-संजीवनी के रूप में लिख गए।
साधना नहि। वह सृष्टि का निगूढ़ रहस्य है और केवल उन सिऋद्ध सत्व अधिकारियों के लिए है, जिनका ‘अहं’ सर्वात्मा को अर्पित हो चुका है।
साधना द्वारा वह क्षमता विकसित की जा सकती है जिसमें चैतन्य प्रवाहों को ग्रहण कर अपने को दैवीय गुणों से सुसम्पन्न बनाया जा सकें।
साधना, संयम, सेवा, सदाचार का पालन करता हुआ अपने भौतिक कर्तव्य पूरे करें। इस प्रकार आध्यात्मिक जीवन द्वारा अपनी आत्मशक्ति संवर्धित करता हुआ अन्ततः उस भूमिका में पहुँचें, जहाँ समस्त लौकिक बन्धन ढीले पड़ जाते है। इस विज्ञता का ही परिणाम है कि भारतीय जीवन शैली आज भी अपने ही ढंग की है। उसमें पाश्चात्य ढंग के विचारों के लिए कोई स्थान नहीं।
साधना विज्ञान का विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण से लेकर सर्वधर्म संभव, यज्ञ विज्ञान व यज्ञोपैथी, मनोविकारों का आध्यात्मिक उपचार, मरणोत्तर जीवन व मानवी काया से लेकर सृष्टि-ब्रह्माण्ड की विलक्षण गुत्थियों को उनने अपने साहित्य के द्वारा जनसमुदाय के समक्ष रखा। व्यक्ति परिवार और समाज निर्माण के आधारभूत सिद्धान्त क्या हों, कैसे दाम्पत्य जीवन को शुचिता पूर्ण तथा परिवार संस्था को अटूट गरिमामय बनाया जा सकता है, नारी का उत्थान कैसे सम्भव है यह युग ऋषि के चिंतन-नवनीत के रूप में प्रकाशित वह निधि है जो प्रत्येक के लिए मार्गदर्शिका के रूप विद्यमान है। रामचरितमानस से प्रगतिशील प्रेरणा से लेकर प्रज्ञापुराण रूपी 19 वें पुराण के अठारह खण्डों का निर्माण कर उनने वह साहित्य निधि समाज को दी जो जीवन के कायाकल्प का माध्यम बन गयी। सामाजिक जीवन में छाई कुरीतियों-मूढ़-मान्यताओं से कैसे मोर्चा लिया जाय, अंधविश्वासों को मिटाकर कैसे भव्य समाज की अभिनव संरचना हो, राष्ट्र एक व अखण्ड कैसे बने, यह मार्गदर्शन भी पत्रिका व पुस्तकों के माध्यम से युगऋषि ने सतत् किया। संस्कार परम्परा का उनने पुनर्जागरण किया व षोडश संस्कारों को लोक प्रचलित कर धर्मतन्त्र से लोक शिखर का एक सशक्त माध्यम खड़ा कर भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने, इसे विश्व संस्कृति बनने के सारे आधार खड़े कर दिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-October
साधनाओं में कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास आवश्यक समझा गया है। इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तन्द्राग्रस्त हो ही जाते हैं, पर चित्त में संकल्प जीवन्त रखे जा सकते हैं। इन संकल्पों से अचेतन मन को प्रशिक्षित किया जाता है। अतीन्द्रिय स्वप्न व्यक्ति चेतना और विराट् चेतना के बीच कोई सेतु होने का परिचायक है और सिद्ध करते हैं कि स्वप्नों के माध्यम से भी आत्म-परिष्कार सम्भव है, लेकिन उसके लिए योगनिद्रा जैसी स्थिति प्राप्त करना आवश्यक है। आत्म-परिष्कार की प्रधान योगसाधना इसी प्रकार सम्भव होती है।
साधनाओं का 11 वर्ष तक अभ्यास किया। इसका परिणाम वर्तमान सफलता के रूप में प्रस्तुत है। इस क्षेत्र का और अधिक गहरा अध्ययन करने के लिए रूस ने भारत सरकार से कुछ योगियों को जिन्होंने योग साधना के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलतायें अर्जित की थीं-रूस भेजने के लिए भी आग्रह किया था। न केवल रूस में वरन् अन्य पश्चिमी देशों में भी इस प्रकार के प्रयोग सफलतापूर्वक किये गये हैं तथा इस दिशा में बहुत आगे पहुँच गये व्यक्तियों से कई महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोग लिया गया है।
साधना क्षेत्र में उसका परिणाम अवरोध उत्पन्न करने के अलावा और क्या हो सकता है।
साधनाएँ न करने पर भी जो वीर्य को अखण्ड रख लेते हैं, वे अपने अन्दर शक्ति का अक्षय भण्डार अनुभव करते हैं और कुछ भी कर सकने की क्षमता रखते हैं। सामाजिक कर्तव्यों के पालन द्वारा भी ऐसा सम्भव है, पर उसके लिए आज की पारिवारिक परिस्थितियों से लेकर शिक्षा पद्धति तक में परिवर्तन करना पड़ेगा। वीर्य, सृष्टि का मूल उपादान है। उसकी सामर्थ्य को समझा जाना चाहिए उसकी रक्षा की जानी चाहिए तथा ऊर्ध्वरेता के लाभों से लाभान्वित होकर जीवन को सफल-समुन्नत बनाने का प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिए।
साधना है, उसे विस्मरण मत करो। विद्वत्ता की विजय के पीछे शिष्य की विनयशीलता का विस्मरण नहीं होना चाहिए।”
साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिए उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है। स्वप्नावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रहता और न ही स्वसंकेत देने तथा अपने बलबूते पर अपने को इच्छित दिशा में मोड़ पाना सम्भव है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाओं में कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास आवश्यक समझा गया है। इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तन्द्राग्रस्त हो ही जाते हैं, पर चित्त में संकल्प जीवन्त रखे जा सकते हैं। इन संकल्पों से अचेतन मन को प्रशिक्षित किया जाता है।
साधना कठिन है और साधना के बिना उपयुक्त परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। मंत्र जप की साधना में जिह्वा समेत समस्त उपकरणों का परिशोधन करना पड़ता है। जो तथ्य को समझते हैं विधिविधान तक ही सीमित नहीं रहते अपितु जीवन प्रक्रिया को उच्चस्तरीय बनाने की सुविस्तृत रूप रेखा भी तैयार करते हैं। उस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसके जप तप उसी अनुपात में सफल होते देखे जा सकते हैं।
साधना की दृष्टि से सामान्य व्यवहार में उसके रसना प्रयोजन एवं वार्ताक्रम में साधकों जैसी रीति-नीति का समावेश किया जाये। अनीति की, हराम की कमाई न खाई जाये। परिश्रम और न्याय के सहारे जितना कुछ कमाया जा सके उतने में ही मितव्ययितापूर्वक गुजारा किया जाये। चटोरेपन की बुरी आदत से लड़ा जाये और सात्विक सुपाच्य पदार्थों को औषधि भाव से उतनी ही मात्रा में लिया जाये जितनी की पेट की आवश्यकता एवं क्षमता है। इस दृष्टिकोण को अपनाने वाले के लिए मद्य, माँस जैसे अभक्ष्यों को ग्रहण करने की तो बात ही क्या उत्तेजक मसाले और नशीले पदार्थों-मिष्ठान्न पकवानों तक से परहेज करने की जरूरत पड़ती है।
साधना काल में जागरूकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।
साधना और कठिन तपश्चर्या के लिए पुनः तैयार हूँ, आप मुझे रास्ता दिखाइये, ताकि मैं उस छोड़े हुए अधूरे कार्य को पूरा कर सकूँ।”
साधना में गतिरोध सा उन्हें अनुभव होता था। अवसर से लाभान्वित होने वह भी पहुँचे।
साधना सम्पन्न होकर वाक् बनती है तो उसका विस्तार श्रवण क्षेत्र तक सीमित न रहकर तीनों लोकों की परिधि तक व्यापक होता है। वाणी में ध्वनि है ध्वनि में अर्थ। किन्तु वाक् शक्ति रूपा है। उसकी क्षमता का उपयोग करने पर वह सब जीता जा सकता है जो जीतने योग्य है।
साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है। मंत्रों की एक यति सबके लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकांक्षा को ध्यान में रख कर यति का लय का-निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिए उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना नहीं, इसके लिए समूचे व्यक्तित्व को-मन वाणी, कर्म, स्वभाव को, चिन्तन एवं चरित्र को, उच्चस्तरीय बनाने के भागीरथी प्रयत्न में जुटना होता है। मन्त्रोच्चारण की विधि-व्यवस्था कुछ घंटों में सीखी जा सकती है- उसका परिपूर्ण अभ्यास कुछ दिनों में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व की मूल सत्ता का स्तर ऊँचा उठाना काफी कठिन है। उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। दूसरों को सुधारने में जितनी कठिनाई पड़ती है अपने को सुधारना उससे भी अधिक कष्ट साध्य और श्रम साध्य है।
साधना का − आत्म साधना का उद्देश्य है।
साधना के लिए भौतिक वैभव आवश्यक लगता है।” विद्रूप ने अपनी भूल स्वीकार की। महात्मा ने आशीर्वाद दिया-तुम्हारी साधना आगे ......................... लिए भौतिक वैभव का .................................... उसका भार ही गतिरोध ..................................। लोक मर्यादा के लिए भी आवश्यक पड़े तो तुम उसका प्रत्यक्ष समाधान देख ही चुके हो।”
साधना में प्रवेश दिया जाये?
साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है। आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिए वमन, विरेचन, स्नेहन, संवेदन नस्य यह पंच कर्म शरीर शोधन के लिए हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार-ऋषि छन्द, देवता, बीज और तत्व हैं। जो इन सब साधनों को जुटा कर मंत्र साधन कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर ही रहती है।
साधना का महत्वपूर्ण प्रकरण है। रेडियो, टेलीफोन तो निर्धारित स्थान से निर्धारित स्थान पर ही सन्देश पहुँचाते हैं उन्हें विशेष यंत्रों द्वारा ही प्रेषित किया जाता है और विशेष यंत्र ही सुनते हैं। कर्ण पिशाचिनी विद्या से कहीं पर भी हो रहे शब्द प्रवाह को सुना जा सकता है। स्थूल शब्दों के अतिरिक्त अन्य घटनाक्रमों की हलचलें विद्युत के रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान रहती हैं, उन किरणों को प्रकाश रूप में देखा जा सकता है और शब्द रूप में सुना जा सकता है। तांत्रिक साधना से इस सिद्धि को उपलब्ध करने वाले अपने ज्ञान भण्डार को असाधारण रूप से बढ़ा सकते हैं और उस स्थिति से विशेष लाभ उठा सकते हैं।
साधना विशेष प्रयोजन के लिए विशेष विधि-विधानों के साथ की थी और उससे उन्होंने अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त किये। दशरथ जी का ...................... यज्ञ वशिष्ठ जी पूरा न करा सके तब ............ ऋषि ने उसे सम्पन्न कराया, यह श्रृंगी ऋषि की आयातयामता शक्ति ही थी।
साधनाओं से प्राप्त होने की बात करते हैं। मैले दर्पण को साफ कर लेने पर जिस प्रकार उसमें स्पष्ट छवि देखी जा सकती है उसी प्रकार अपनी अन्तरंग चेतना पर चढ़े मलीनता के आवरणों को हटाकर उसमें संसार की दृष्ट-अदृष्ट सभी वस्तुओं, घटनाओं को देखा जा सकता है, इसमें कोई दो राय नहीं है।
साधना में चेतन मन के उत्पातों को रोकने के लिए शिथिलता, शून्यावस्था, समाधि, शवासन आदि को बहुत महत्व दिया जाता है। इन्हें योगनिद्रा कहते हैं। ................. संस्थान पर से तनाव दबाव हटाकर यदि श्राँत, विश्राँत और सौम्य मनःस्थिति प्राप्त की जा सके तो उसे जाग्रत निद्रा समतुल्य माना जा सकता है। स्मरणीय है ध्यान धारणा की सीढ़ियाँ पार करते हुए समाधि तक पहुँचना साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है। स्वप्नावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रहता और न ही स्वसंकेत देने तथा अपने बलबूते पर अपने को इच्छित दिशा में मोड़ पाना सम्भव है।
साधना और सिद्धि साफल्य के क्षेत्रों में वह विचार क्रान्ति करेगा।
साधना में जिह्वा समेत समस्त उपकरणों का परिशोधन करना पड़ता है। जो तथ्य को समझते हैं विधिविधान तक ही सीमित नहीं रहते अपितु जीवन प्रक्रिया को उच्चस्तरीय बनाने की सुविस्तृत रूप रेखा भी तैयार करते हैं। उस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसके जप तप उसी अनुपात में सफल होते देखे जा सकते हैं।
साधना द्वारा साधक के मनःक्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण चुम्बकत्व से परिपूर्ण कर देती हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थान को विकसित करना-अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही तो योग साधना का − आत्म साधना का उद्देश्य है।
साधना पास रहकर कर चुके, किन्तु उनके मन में एक क्षण के लिए भी काम-विकार और साँसारिक आकर्षण जाग्रत न हुआ तो कोशा की रही-सही आशाएँ टूट गईं।
साधना का फल नहीं, वरन् उसके पीछे दिया अनुदान ही काम करता रहा। अब हमें भी यह चिन्ता लगने लगी है कि इस जीवन का अन्त करते हुए वे प्रतिभायें कहाँ से पायें, जो हमारी अपेक्षा हजारों गुना काम जो करने के लिए पड़ा है, उसे सम्पन्न कर सकें और हमारी ही तरह दैवी अनुग्रह का अनुदान पाकर अपने को धन्य कर सकें।
साधना और योगाभ्यास करना पड़ता है। जीवन के सुख और इन्द्रियों के आकर्षण त्याग कर लम्बे समय तक तप करना पड़ता है। वह न आपके लिए सम्भव है, न आप जान सकते हैं, आपको तो जिस काम के लिए बुलाया है, उसी के लिए यहाँ आ जाइये।”
साधनाएँ कठिन बतायी जाती हैं, पर सिद्धि का संवरण उससे भी कठिन बात है। वह जिस दिन मगध की राजनर्तकी घोषित हुई, उसी दिन से उसे प्राप्त करने के लिए श्रीमन्तों, सामन्तों, राजकुमारों तक में होड़ लग गयी। स्वयं मगध नरेश की दृष्टि भी निष्कलुष न रह सकी। पर उसके मस्तिष्क में आचार्य देव के वह शब्द अभी सुप्त नहीं हुए थे जो उन्होंने आश्रम से विदा करते वक्त कहे थे− “भद्रे! राजनर्तकी का गौरव प्राप्त हुआ तो क्या, तुम भारतीय नारी हो, भारतीय नारी सदैव एक पुरुष का वरण करती है और उसके आदर्शों के लिए अपने को न्योछावर करती रही है, उस परम्परा को भूलना मत।”
साधना अनेक व्यक्तियों को तथा पदार्थों को परमाणु जीवाणुओं को प्रभावित करती है तो वह बहुलीकरण शक्ति ही काम कर रही होती है।
साधनाओं के अनवरत अभ्यास से प्राप्त होती है किन्तु, यदा कदा सामान्य स्थिति में भी इसकी अनुभूति हो जाती है।
साधना से कहीं अधिक पवित्र है। अब तुम आश्रम में रहकर शिक्षा कार्य करो, तुम्हारी गाथा चिरकाल तक भारतीय नारी को चरित्र का उपदेश देती रहेगी।"
साधना के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलतायें अर्जित की थीं-रूस भेजने के लिए भी आग्रह किया था। न केवल रूस में वरन् अन्य पश्चिमी देशों में भी इस प्रकार के प्रयोग सफलतापूर्वक किये गये हैं तथा इस दिशा में बहुत आगे पहुँच गये व्यक्तियों से कई महत्वपूर्ण कार्यों में सहयोग लिया गया है।
साधनाओं का अधिकार प्रदान किया जाये अथवा नहीं। उनकी करुणा, उनका सहज स्नेह उमड़ता और कहता सौभरि ने तुम्हारी बड़ी सेवाएँ की हैं, उसे यह अधिकार मिलना ही चाहिए। किन्तु शास्त्र, अनुभव आड़े आ खड़े होते और पूछते-क्रौष्टक सिद्धि पाने के बाद भी क्या तुझे विचलित करने वाली परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा? क्या तुझे इन्द्रिय लालसाओं के दमन में अत्यधिक कठोरता बरतनी नहीं पड़ी? क्या यह सम्भव है कि सिद्धि पाने के बाद सौभरि को ऐसे सामाजिक जीवन के अनिवार्य सन्दर्भों का सामना नहीं करना पड़ेगा?
साधना का उद्देश्य है।
साधना में श्रेष्ठ गति प्राप्त की।
साधना के बिना उपयुक्त परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। मंत्र जप की साधना में जिह्वा समेत समस्त उपकरणों का परिशोधन करना पड़ता है। जो तथ्य को समझते हैं विधिविधान तक ही सीमित नहीं रहते अपितु जीवन प्रक्रिया को उच्चस्तरीय बनाने की सुविस्तृत रूप रेखा भी तैयार करते हैं। उस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसके जप तप उसी अनुपात में सफल होते देखे जा सकते हैं।
साधना और तप कराना चाहता हूँ, पर उसकी पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ सो गयी हैं, इस जन्म के संस्कार और परिस्थितियाँ उसे खींचती हैं, इसलिए साधना में आरुढ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ, वह न हो पाएगा, इसलिए आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।
साधना में आरुढ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ, वह न हो पाएगा, इसलिए आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।
साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन तत्वदर्शी मनीषी तथा दिव्यदृष्टि मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका उपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप साधनों एवं कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मंत्राराधन वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।
साधना ग्रन्थ पढ़ने वाले प्रेस कर्मचारी और पुस्तक विक्रेता पहले ही लाभान्वित हो लेते। पाठक को उनका बचा खुचा ही शायद कुछ हाथ लगता। शब्दोच्चारण में जप के अति सरल कर्मकाण्ड के लिए थोड़ा-सा समय लगा देने में किसी को क्या कुछ असुविधा होगी? उतना तो कोई बालक-नासमझ या वृद्ध अशक्त भी कर सकता है, फिर समर्थ व्यक्ति तो उसे उत्साह पूर्वक करते और भरपूर लाभ उठाते। ऐसा कहाँ होता है?
साधना थी, यह तो तुम भूल ही गये। शास्त्रार्थ के दसों दिन उन्होंने जल लेकर सफलता के लिए उपवास किया और इससे पूर्व पढ़ाने में कितना श्रम किया, इसका तो तुम्हें स्मरण ही नहीं रहा। विजय की अहंता तुम्हारे चेहरे पर झलकती है और अभिवादन में चिह्न पूजा भर का शिष्टाचार था।
साधना से इस सिद्धि को उपलब्ध करने वाले अपने ज्ञान भण्डार को असाधारण रूप से बढ़ा सकते हैं और उस स्थिति से विशेष लाभ उठा सकते हैं।
साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारिक शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्रबल से पृथ्वी देव-लोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तान्तरण, शक्ति को, पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना, एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक-एक जोड़ की ही अलौकिक शक्ति थी।
साधना, कष्टसाध्य तितीक्षा के द्वारा मंत्र की गुह्य शक्ति के करतलगत हो जाने का भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मनःक्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण चुम्बकत्व से परिपूर्ण कर देती हैं।
साधना अधूरी रह गयी। अब मैं फिर उससे लोक मंगल के लिए साधना और तप कराना चाहता हूँ, पर उसकी पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ सो गयी हैं, इस जन्म के संस्कार और परिस्थितियाँ उसे खींचती हैं, इसलिए साधना में आरुढ नहीं हो पा रहा। मैंने उसे प्रेरणा देकर बुलाया है वह आया और निर्देशित स्थान न पा सका तो उसे भ्रम होगा और मैं जो चाहता हूँ, वह न हो पाएगा, इसलिए आप वह स्थान तुरन्त खाली कर दें।
साधना मार्ग पर अग्रसर होते हुए साधक में जब आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि होने लगती है तो उन तत्वों का स्थान नियुक्त होने से पूर्व संचित का निष्कासन आवश्यक हो जाता है। उन संस्कारों के निष्कासन की प्रतिक्रिया स्वरूप जो विक्षोभ उत्पन्न होता है, उसे स्वप्नावस्था में भयंकर, अस्वाभाविक, अनिष्ट एवं उपद्रवकारी रूप में देखा जाना स्वाभाविक ही है। दूसरी श्रेणी के स्वप्न वे होते हैं, जिनसे इस बात का पता चलता है कि साधक के भीतर सात्विकता की वृद्धि हो रही है। सात्विक कार्यों को करने या किसी अन्य के द्वारा इस तरह के कार्य होते दिखाई देने वाले स्वप्न ऐसा ही परिचय देते हैं।
साधना, दैवी संकेतों के समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप और भावनात्मक आदान प्रदान करने में समर्थ हो सकती है। साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थान को विकसित करना-अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही तो योग साधना का − आत्म साधना का उद्देश्य है।
साधना तो सफल हो ही कैसे सकती है।
साधना का प्रभाव कहीं अधिक होता है। सामूहिक प्रयास,सत्संग, कथा, कीर्तन, यज्ञानुष्ठान, परिक्रमा, तीर्थ यात्रा आदि की क्षमता सामान्य गणना में कहीं अधिक होती है।
साधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मंत्र जप में, ध्यान तन्मयता में चित्त के भीतर उच्च स्तरीय संकल्प जाग्रत रखे जाते हैं। यदि इन प्रयोगों का सही उद्देश्य समझकर सही रीति से कार्यान्वित किया जाये जो उसके आशाजनक परिणाम सामने आना सुनिश्चित है। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने इसीलिए योगनिद्रा एवं समाधि के स्तर सामान्य असामान्य सभी तरह के साधकों की मनोभूमि को ध्यान में रखते हुए बनाये हैं। इनमें सचेतन को तन्द्रित करने और अन्तर्मन को प्रशिक्षित करने के तीनों ही उद्देश्य पूरे होते हैं।
साधना में कुहरा, धुँआ, सूर्य, वायु और अग्नि के समान तथा जुगनू बिजली, स्फटिक मणि और चन्द्रमा के समान बहुत से दृश्य योगी के सामने प्रकट होते हैं। ये सब योग की सफलता को स्पष्ट रूप से सूचित करते हैं।
साधना इसी आपे की जाती है। वेदान्त में जिस देव की ............................
साधना आगे ......................... लिए भौतिक वैभव का .................................... उसका भार ही गतिरोध ..................................। लोक मर्यादा के लिए भी आवश्यक पड़े तो तुम उसका प्रत्यक्ष समाधान देख ही चुके हो।”
साधनाएँ तथा यज्ञों की वैज्ञानिकता असाधारण महत्वपूर्ण एवं विज्ञान सम्मत सिद्ध हो चुकी हैं। इस प्रयोगशाला में 24 से अधिक उच्च शिक्षित एम.डी., एम.एस., एम.बी.बी.एस., बी.ए.एम.एस., एम.एस.सी. स्तर के वैज्ञानिक कार्य कर रहे हैं। वेदों के “आकल्ट” विषयों का शोध अनुसंधान करने की भी व्यवस्था यहाँ की गई है। किन्तु यह शोध कार्य बड़े उपकरणों की अपेक्षा रखता है। इस तरह के उपकरण अम्बाला, चण्डीगढ़, बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली के अलावा विदेश से भी मँगाए जाने की व्यवस्था की जा रही है, किन्तु स्वर विज्ञान, मंत्र-विद्या संगीत चिकित्सा, समागान, आँरा विज्ञान, प्लाज्मा विज्ञान, ब्रह्माण्ड के विलक्षण विकिरणों के प्रभाव पर अध्ययन के लिए अति संवेदनशील बहुमूल्य उपकरणों की आवश्यकता है।
साधना और कुछ नहीं अचेतन का परिष्कार एवं स्व का उभार है। इस पुरुषार्थ में जिसने अपने को खपा दिया उसने आत्मोत्थान की प्रगति की दिशा में कुछ चरण आगे बढ़ाये। व्यक्तित्व का विकास इसी कटघरे से आरम्भ होता है और चलते-चलते अतिमन की स्थिति में व्यक्ति को महामानवों की श्रेणी में पहुँचाता है। साधना इसी आपे की जाती है। वेदान्त में जिस देव की ............................
साधना में विभिन्न प्राणायाम साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को प्रज्ज्वलित कर इसी वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है, तब फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरु दण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है। साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचाता है। शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहस्रार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है। ऐसे व्यक्ति को ही भगवान शिव ने अपने समान सिद्ध और पूर्ण योगी बताया है।
साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को प्रज्ज्वलित कर इसी वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है, तब फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरु दण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है। साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचाता है। शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहस्रार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है। ऐसे व्यक्ति को ही भगवान शिव ने अपने समान सिद्ध और पूर्ण योगी बताया है।
साधना में रत थे। अपनी साधना में गतिरोध सा उन्हें अनुभव होता था। अवसर से लाभान्वित होने वह भी पहुँचे।
साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार-चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो।
साधनाएँ हैं। उन्हें वही प्राप्त कर सकता है, जिसमें असीम श्रद्धा, निष्ठा और चारित्रिक पवित्रता भी हो। यह संस्कार आत्मा से सम्बन्ध रखते हैं-समृद्धि सवर्णता और कुल की श्रेष्ठता से नहीं। सो जब उन्होंने कोशा को उस रूप में पाया तो उनकी वर्षों की निराशा दूर हो गयी। कोशा को पाकर उनका आचार्यत्व एवं वात्सल्य दोनों एक साथ उमड़ पड़े।
साधना विधान है। कानों के बाहरी छेद बन्द कर देने पर उसमें स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब ईश्वर से चल रहे ध्वनि कम्पनों को उस नीरवता में सुन समझ सकना सरल हो जाता है। नाद योग के अभ्यासी आरम्भ में कई प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ कानों के छेद बन्द करके मानसिक एकाग्रता के आधार पर सुनते हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग,
साधना भी एक विज्ञान है और उसके अपने सुनिश्चित सिद्धान्त हैं। विज्ञान का यह सिद्धान्त जिस प्रकार अपने आप में अकाट्य है कि हाइड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन का एक अणु मिलकर पानी बनता है उसी प्रकार योग विज्ञान के भी अकाट्य, अनुभूत और परीक्षित सिद्धान्त हैं, जिन्हें अपनाकर अभीष्ट दिशा में असाधारण सामर्थ्य अर्जित कर लेता है।
साधना में भौतिक वैभव बाधक बनता है किन्तु उसको छोड़ा भी नहीं जा सकता और बिना छोड़े प्रगति भी नहीं। कृपया कोई मार्ग बतावें।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-June
साधना द्वारा इसी आवरण को हटाना पड़ता है।
साधना विज्ञान के आचार्यों का मत है कि इसका अभ्यास यदि भस्त्रिका और अनुलोम-विलोम प्राणायामों के उपरान्त उच्चस्तरीय साधकों द्वारा किया जाय, तो अपेक्षाकृत कम समय में ही साधक की स्थिरता परिपक्व होने लगती है और दिव्य अनुभूतियों का द्वारा खुल जाता है।
साधना कराई थी। शाँतिकुँज में प्रज्ञापुत्र उत्पन्न करने के विशिष्ट प्रयास इसी स्तर के चल रहे हैं।
साधना का निर्धारण, व्यक्तिगत एवं पारिवारिक समस्याओं का निराकरण तथा अपने कुछ समय निकाल कर लोक मंगल हेतु उसका नियोजन। इतना ही नहीं, वे लोगों के स्वास्थ्य का भी पूरा-पूरा ध्यान रखते और जिन्हें आवश्यक समझते उनके पास वे विशेष बलपूर्वक स्वनिर्मित जड़ी-बूटियों का रसायन भी भेजते। यदा-कदा यदि कोई बीमार और अशक्त परिजन मथुरा उपस्थित नहीं हो पाता, और दीक्षा का आग्रह करता डाक द्वारा दीक्षा की सामग्री, जिसमें रोली, कलावा-चन्दन अक्षत, माला, आदि सम्मिलित होते, उसे भेज कर एक निश्चित मंगल तिथि बता देते और उक्त दिन उपवास रख कर उन्हें धारण कर लेने को कह देते। यही परिजन के लिए उनके द्वारा दी गयी दीक्षा होती। कष्ट कठिनाइयों में उनका सूक्ष्म संरक्षण और सहायता मिलती,, सो अलग।
साधना मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ इस बीच उनकी आयु 25-30 वर्ष के नवयुवक जितनी प्रतीत होती थी, जबकि उनके वास्तविक आयु कई सौ वर्ष बतायी जाती थी। हिमालय की कन्दराओं में अब भी अनेक ऐसे होती है जिनकी उम्र के बारे में सही सही अनुमान लगा पाना संभव नहीं।
साधना दान, साधन दान के रूप में भागीदारी हो, यह अभी से सुनिश्चित कर लिया जाना चाहिए।
साधना पर बैठते ही कुछ ही समय में शिथिल होने लगता है। उसका आन्तरिक जागरण हो चुका होता है। वह हर समय उसका ध्यान साधना के लिए तत्पर और तैयार रहता है। शरीर कई चरणों में धीरे-धीरे गिरता है। बायें, दायें अथवा पीछे किसी भी ओर गिर सकता है।
साधना से मानसोपचार जैसे विषय अपने हाथ में लेकर इस संस्थान द्वारा न केवल चिकित्सा की एक नई विधा का क्षेत्र जनमानस के लिए खोला गया है अपितु तर्क, तथ्य, प्रमाणों के द्वारा दार्शनिक अनुसंधान की प्रक्रिया से अध्यात्म को विज्ञान सम्मत प्रमाणित करने का प्रयास भी किया गया है, जो कि अपने आप में अद्वितीय है।
साधना के निमित्त इसी आधार पर उपचार प्रयोग चलते हैं।
साधनारत रह उन्होंने उसे संस्कारित किया था, उसे एक भावनाशील समर्पित समुदाय को सौंपकर हमेशा के लिए उसे नमन कर वे उत्तराखण्ड हिमालय की ओर चल दिये। एक वर्ष की तपश्चर्या के बाद वे पुनः शान्तिकुञ्ज लौटकर वंदनीय माता भगवती देवी के साथ साधना में संलग्न हो गये। यहाँ नियमित शिक्षण सत्रों की शृंखला चलाई गई। साधन, वानप्रस्थी, लोकसेवी परिव्राजक एवं नारी जाग्रति हेतु संकल्पित कन्याओं एवं महिलाओं का शिक्षण चला, साथ ही भारत तथा विश्वव्यापी विशाल प्रज्ञा अभियान युग निर्माण परिवार का संगठन संचालन भी। 1979 में विज्ञान और आध्यात्म के समन्वय हेतु संकल्पित एक संस्थान की वैज्ञानिकों की टीम के संयोजन एवं युग ऋषि के मार्ग दर्शन में स्थापना हुई जिसका नाम रखा गया ‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान।
साधना और तपश्चर्या की अग्नि में तपा कर खरे सुवर्ण की भाँति प्रामाणिक प्रखर बनाया, ऐसा जिसका अन्दर बाहर एक-सा हो, कथनी और करनी में एकरूपता हो। आज कल अधिकांश संगठन इसलिए असफल हो जाते हैं, क्योंकि संचालक का व्यक्तित्व इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता। वे जैसा कहते हैं, वैसा करते नहीं अथवा बाहर से जैसा उपक्रम अपनाते देखे जाते हैं भीतर से उनका व्यक्तित्व वैसा होता नहीं। गुरुदेव इस व्यतिरेक से बचे और हर क्षण मनसा-वाचा कर्मणा में अटल एकरूपता के साथ-साथ ब्राह्मणत्व जीवन में कैसा उतारा जाता है। प्रस्तुत कर रहे।
साधना’ में लिखते हैं कि भारत ने अब तक जितने ऋषि पैदा किये हैं, उतना कदाचित् किसी अन्य ने नहीं। इसका कारण एक ही रहा है कि यहाँ साधना प्रधान आत्मिकी को अधिक महत्त्व मिला है, जबकि पश्चिमी दुनिया भौतिकी के मकड़ी-जाले में उलझ कर रह गई। इसलिए उसने मनीषी तो उत्पन्न किये, पर व्यक्तित्व सम्पन्न ऋषियों का उत्पादन नहीं कर सकी। भौतिक चिन्तन प्रधान है, तो आत्मिकी चरित्र प्रधान। अतएव पदार्थ जगत की साधना करने वालों ने मस्तिष्क को विकसित करके चिन्तन व पैनापन तो प्राप्त कर लिया पर इसके आगे समग्र व्यक्तित्व अविकसित स्थिति में ही पड़ा रहा।
साधना के लिए आवश्यक हो जाता है।
साधना की इसके अतिरिक्त पूर्वकाल में महर्षि पिप्पलाद रहते थे। वे पीपल के फलों पर निर्वाह करते थे। यह आहार कल्प है। उनके साथ रहने वाले भी आहार से मन और मन से प्राण परिष्कृत करने की प्रक्रिया चलाते थे। शाँतिकुँज में आज की स्थिति के अनुरूप अमृताशन (उबले अन्न) की कल्प चिकित्सा चलाई जाती है।
साधना सम्बन्धी नये प्रयोग बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
साधना में संलग्न हो गये। यहाँ नियमित शिक्षण सत्रों की शृंखला चलाई गई। साधन, वानप्रस्थी, लोकसेवी परिव्राजक एवं नारी जाग्रति हेतु संकल्पित कन्याओं एवं महिलाओं का शिक्षण चला, साथ ही भारत तथा विश्वव्यापी विशाल प्रज्ञा अभियान युग निर्माण परिवार का संगठन संचालन भी। 1979 में विज्ञान और आध्यात्म के समन्वय हेतु संकल्पित एक संस्थान की वैज्ञानिकों की टीम के संयोजन एवं युग ऋषि के मार्ग दर्शन में स्थापना हुई जिसका नाम रखा गया ‘ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान।’ यह संस्थान शान्तिकुञ्ज गायत्री तीर्थ से लगभग 1/2 मील दूरी पर गंगा तट के किनारे सप्त सरोवर क्षेत्र में सप्तर्षि मार्ग पर बना है एवं अपनी यज्ञ विज्ञान, शब्द विज्ञान तथा साधना विज्ञान पर बहुमूल्य यंत्र उपकरणों के माध्यम से की जा रही शोध तथा उपलब्धियों के लिए इस अल्प अवधि में ही ख्याति प्राप्त कर चुका है।
साधना बन पड़ने के उपाय पक्षीय प्रयोजन सिद्ध होते हैं।
साधना करने वाला इस अवस्था को उपलब्ध करने में समर्थ होता है। त्राटक साधना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे पिछले जन्म के सभी संस्कार नष्ट होते जाते है और चित्त-शुद्धि की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। चेतना का शनैः-शनैः परिष्कार होता जाता है और चिन्तन काँच की तरह पारदर्शी और स्वच्छ बन जाता है। उसे परम सिद्धि ही मानना चाहिए। जब निर्विचार अवस्था में चित्त पूर्ण रूप से अवस्थान करता है, तो दिव्य दर्शन के दौरान उभरने वाली झांकियों का अन्त हो जाता है।
साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।” की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो।
साधना है। जीवन-क्रम देखने में सामान्य भले ही रहे, अन्तरंग की उत्कृष्टता को जो समुन्नत कर सके वस्तुतः वही महापुरुष है। पुरुष का महापुरुष के रूप में, नर का नारायण के रूप में, क्षुद्र का महान् के रूप में परिणित हो जाना यही जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति है।
साधना है। मित्रता हृदय के निर्बाध आदान-प्रदान पर टिकती है। मैत्री पूर्ण सम्बन्ध एक परिवार के सदस्यों में भी नहीं हो सकते है और दो अनजान व्यक्तियों में हो सकते है।
साधना करनी पड़ती है। इसमें कष्ट कठिनाइयों भरे जीवन को सहज स्वीकार किया जाता है। प्रायः सभी प्रकार की तपश्चर्याएँ शरीर को कष्ट देने वाली तथा मन को अखरने वाली होती है। उन्हें आमंत्रित करने का उद्देश्य प्रतिकूलताओं से टकराने पर उत्पन्न शक्ति से लाभ उठाने का होता है। जल प्रपातों की धारा से घूमने वाले पहिये जोड़ दिये जाते है।
साधना आरम्भ की थी।
साधना में सफल हो सकेगा। ऐसा नहीं माना जा सकता। जिसका मन निरोग, निर्विकार और निर्मल होगा उसका मन न केवल प्रसन्न ही रहेगा बल्कि प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा आदि की सद्भावनाओं से भरा भी रहेगा। जिसे गुणों की यह सम्पत्ति प्राप्त हो जाये उसे श्रेष्ठता की ओर बढ़ने से कौन रोक सकता है।
साधना में हमने आपको अभी ध्यान करना सिखाया था। आगे चलकर हम इसकी सांगोपांग तैयारी करायेंगे, परन्तु इसके पहले हम यह जानना चाहते हैं कि आपके भीतर संकल्प बल है कि नहीं। यह सारा का सारा अध्यात्म संकल्प बल पर टिका है। हम आपको चांद्रायण व्रत में इसी की इम्तहान लेने एवं प्रारम्भिक जानकारी देने हेतु बुलाते हैं कि आप में संकल्पबल है या नहीं। यह हिम्मत वालों का, बहादुरों का काम है, संकल्पबल वालों का काम है।
साधना सिखायेंगे अगर आप पहलवान बनना चाहते हैं तो चलिए हमारे साथ अखाड़े में। अखाड़े में उतरे बिना आप पहलवान नहीं बन सकते। इसी प्रकार जब आपका भीतर वाला हिस्सा हमारी बातों को, दबाव को मान लेगा, तो हम समझेंगे कि आप हमारे इम्तहान में पास हो गये। एक महीने का इम्तिहान आपका इसीलिए रखा गया है। आपके ऊपर एक महीने के अनुष्ठान का दबाव इसलिए रखा गया है जिससे यह पता चल सके कि इसे आप कर सकते हैं या नहीं।
साधनाओं की प्रतिक्रिया वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण के आधार पर सम्पन्न की जाती हैं। अब तक इस प्रयोग परीक्षण का उत्साह भरा प्रतिफल सामने आ है। भविष्य के लिए आशा है कि बुद्धिवाद एवं प्रत्यक्षवाद को अध्यात्म की गरिमा से सहमत किया जा सकेगा।
साधना या व्यापार नहीं है मैत्री। स्वार्थ पूर्ति के लिए, अपना उल्लू सीधा करने या कोई लाभ के लिए मैत्री जोड़ने वाले ढेरों मिल जाते हैं लेकिन सच्चे मित्र इस दुनिया में बिरले सौभाग्यशालियों को ही मिल पाते है।
साधना का विधान था, जो कि मनुष्य में अन्तर्निहित चुम्बकत्व शक्ति का विकास-अभिवर्धन करता था। कृष्ण और रुक्मिणी ने बद्रीनाथ में बारह वर्ष तक तप कर अपनी प्राण चुम्बकीय शक्ति को अत्यधिक उत्कृष्ट बना लिया था, तभी उन्हें प्रद्युम्न के रूप में मनोवाँछित संतान प्राप्त हो सकी थी।
साधना का एक ऐसा अंग है, जिसका अभ्यास योगीजन दीर्घकाल से करते रहे है। यों तो इसकी अनेक विधियाँ है, कई प्रतीकों का उपयोग बताया गया है पर आकाश त्राटक एक ऐसी विधि है, जिसका यदि सही-सही अभ्यास हो गया, तो साधक आत्म साक्षात्कार तक प्राप्त कर सकता है।
साधना द्वारा उपार्जित किया जाता है। इन गुणों की सिद्धि के लिये बहुत कुछ छोड़ना और बहुत ग्रहण करना पड़ता है। उन परिस्थितियों में रहना अथवा वैसी परिस्थितियाँ बनानी पड़ती है जो इनकी साधना में सहायक हो सकें।
साधना जारी रखे, तो लक्ष्य तक पहुँचना सरल-सहज हो जाता है और समय भी अपेक्षाकृत कम लगता है।
साधना बड़ी हमारी वाचालता ही है जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसे आदेशों को सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी उत्तम भाषा बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”
साधना के लिए, विज्ञजन से लेकर उपासना तक के लिए अपने अन्नमय कोष की ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य, सक्षम स्थिति में लाना आवश्यक होता है। उसके लिए उसकी मूल इकाइयों को विशेष रूप से गढ़ना-ढालना पड़ता है। इसे ही अन्नमय कोष का परिष्कार-विकास की साधना कहा जाता है।
साधना एवं चिकित्सा का निर्धारण करते थे। यही रीति-नीति शाँतिकुँज की है। कल्प साधना की एक प्रकार की माइक्रो सर्जरी है। इस में कोई प्रयोग तब बताया जाता है जब व्यक्ति के हर स्तर की गंभीर जाँच पड़ताल कर ली जाती है। इसके लिए ऐसे बहुमूल्य परीक्षण यंत्र लगाये गये हैं जैसे अच्छे-अच्छे अस्पतालों में भी मिलने मुश्किल हैं।
साधना के रूप में सजा गया है। उन्हें उसी रूप में देखा समझा जाना चाहिए।
साधना के मध्य उसे इस प्रकार की अनुभूति होती है, तो वह सोचने लगता है कि यह स्वप्नवत् संसार ही वस्तुतः उस पूर्ण सत्य को समझ पाने के मार्ग में बाधक बना हुआ था। बाह्य संसार के मिटते ही दोनों का विलय-विसर्जन एकत्व और अद्वैत की स्थिति का स्पष्ट आभास मिलने लगता है और ‘पूर्णमदः ‘पूर्णमिदं........ ‘ का तत्त्वज्ञान स्फुट होने लगता है। गणित के साधारण विद्यार्थी को यह असमंजस हो सकता है कि पूर्ण में से पूर्ण को घटाने या जोड़ने पर पूर्ण किस प्रकार शेष रहेगा? परन्तु अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिए इसमें कोई उलझन नहीं दिखाई पड़ती और साधना क्षेत्र में वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, वैसे-ही-वैसे सत्य का साक्षात्कार होने लगता है, जिसे वह अब तक सिद्धान्त रूप में स्वीकारा था, उसका प्रत्यक्षीकरण हो जाने से वह पूर्ण संतुष्ट होकर प्रश्न से परे की भूमि में प्रतिष्ठित हो जाता है। इस अवस्था में जब वह जीवात्मा की पूर्णता को अनुभव करता और उत्पत्ति, स्थिति, एवं विनाश की तीनों दशाओं को स्वप्नवत् देखता है, तो उसे इस असार संसार का रहस्य समझ में आता है।
साधना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे पिछले जन्म के सभी संस्कार नष्ट होते जाते है और चित्त-शुद्धि की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। चेतना का शनैः-शनैः परिष्कार होता जाता है और चिन्तन काँच की तरह पारदर्शी और स्वच्छ बन जाता है। उसे परम सिद्धि ही मानना चाहिए। जब निर्विचार अवस्था में चित्त पूर्ण रूप से अवस्थान करता है, तो दिव्य दर्शन के दौरान उभरने वाली झांकियों का अन्त हो जाता है। यह इस तथ्य की परिचायक है कि साधके जाग्रत संस्कारों का क्षय हो गया।
साधना कहा जाता है।
साधना है जिसमें पाँच देवों का वर्णन आता है। जिसे हम कल बता रहे थे। गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में हमने आपको अभी ध्यान करना सिखाया था। आगे चलकर हम इसकी सांगोपांग तैयारी करायेंगे, परन्तु इसके पहले हम यह जानना चाहते हैं कि आपके भीतर संकल्प बल है कि नहीं। यह सारा का सारा अध्यात्म संकल्प बल पर टिका है।
साधना करने वालों ने मस्तिष्क को विकसित करके चिन्तन व पैनापन तो प्राप्त कर लिया पर इसके आगे समग्र व्यक्तित्व अविकसित स्थिति में ही पड़ा रहा। आत्मजगत के अन्वेषकों का लक्ष्य चूँकि संस्कार कोशों का परिवर्तन, परिवर्धन और जागरण होता है, इसलिए उनकी यात्रा उस मूल इकाई से आरम्भ होती है, जहाँ पर समग्र व्यक्तित्व दबा पड़ा होता है। साधना द्वारा इसी आवरण को हटाना पड़ता है।
साधना की एक प्रकार की माइक्रो सर्जरी है। इस में कोई प्रयोग तब बताया जाता है जब व्यक्ति के हर स्तर की गंभीर जाँच पड़ताल कर ली जाती है। इसके लिए ऐसे बहुमूल्य परीक्षण यंत्र लगाये गये हैं जैसे अच्छे-अच्छे अस्पतालों में भी मिलने मुश्किल हैं।
साधना द्वारा शरीरस्थः जैवीय विद्युत को प्रखर बना कर मंत्रों के माध्यम
साधना का नाम है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसलिये जिस तरह इन्द्रिय संयम के लिये ब्रह्मचर्य आदि का विधान है उसी तरह वाणी के संयम के लिये मौन की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।
साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो।” फ्रेंकलिन के शब्दों में चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती हे।” कोर्लाइल ने कहा है-मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्षक्ति होती है।
साधना से साधित होता है।
साधना रूपी ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान द्वारा जिसकी प्रथम पूर्णाहुति इसी वर्ष 1995 में नवम्बर में 4, 5, 6, 7, कार्तिक पूर्णिमा को आँवलखेड़ा में में सम्पन्न होगी, एक दधिचि स्तर का पराक्रम पूरे गायत्री परिवार द्वारा संपन्न हो रहा है। निश्चित ही उसमें प्रमुख भूमिका उस ऋषितन्त्र की है जिसने गायत्री परिवार की आधारशिला रखी, अपने तपोबल से जिसे इतना विराट बनाकर खड़ा कर दिया। परम पूज्य गुरुदेव व परम वंदनीय माता जी ने जन-जन की सुरक्षा के लिए वह कवच प्रदान किया है जिसे पहनने के बाद कोई भी आसुरी सत्ता आक्रमण नहीं कर सकती, न ही कोई अहित कर सकती है। समय की आवश्यकता है कि जनसाधारण इन सभी प्रयासों की गंभीरता समझें व स्वयं को ऋषियुग्म की तपःस्थली से ऋषि परम्पराओं की कार्य स्थली से जोड़े रहने का प्रयास करें व इस सम्बन्ध को अक्षुण्ण बनाए रखें। इसी में उनका हित है।
साधना की थी और अनेकों को इस विद्या में पारंगत बनाया था। शाँतिकुँज की आसन-चिकित्सा प्राणायाम-चिकित्सा आहार चिकित्सा, प्रज्ञायोग साधनाओं ने अपने समय में योग साधना को सर्वसुलभ बनाने में आशातीत सफलता पाई है। साधना सम्बन्धी नये प्रयोग बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
साधना सुविधा युक्त सृजन सेनानी चतुरंगिणी सेना की तरह आ जुटे। भौंरे भी उन्हीं फूलों के आस-पास मंडराते हैं, जो सुवासित होते और सुगन्ध बिखेरते हैं। सर्वथा गंधहीन और दुर्गन्धयुक्त फूलों से तो वे भी किनारा काट जाते हैं, फिर परम पूज्य गुरुदेव के सम्बन्ध में ही ऐसा क्यों होता? वे तो मलयानिल की तरह अपनी खुशबू यत्र-तत्र-सर्वत्र दसों दिशाओं में बिखेर रहे थे, जिससे खिंची-घिसटती उच्चस्तरीय आत्माएँ अनायास उनकी मादकता के वशीभूत हो चली आ रही थी। यह क्रम उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक तथा उसके बाद भी चलता रहा है।
साधना करते समय नेत्रों के आगे दीवार, तार, खम्भा अथवा अन्य कोई भी वस्तु पड़ती हो, तो वह एक से दो होती प्रतीत होगी। यदि ऊपर गगन में कोई बादल का टुकड़ा हो, तो वह भी पहले दो में विभाजित होता दृश्यमान होगा, पीछे दो के एक हो जायेंगे। यह अनुभूति तब होती है, जब एकाग्रता बढ़ने लगती है और नेत्र करीब-करीब स्थिर हो जाते है। अतः इसे प्रगति का लक्षण कहा जा सकता है।
साधना में सहायक हो सकें।
साधना जितनी समझ होगी, उतना ही आत्म-विकास हुआ माना जाएगा साधना के केन्द्र पर यदि ध्यान दिया जाय तो समग्र व्यक्तित्व की समवेत साधना होती चलती है मनुष्य-जीवन का यही प्रयोजन एवं सार्थकता है।
साधना के लिए तत्पर और तैयार रहता है। शरीर कई चरणों में धीरे-धीरे गिरता है। बायें, दायें अथवा पीछे किसी भी ओर गिर सकता है। शरीर का लुढ़कना एक आश्वासन है कि एकाग्रता सुनिश्चित है और वह उच्च स्थिति में पहुँचने के लिए तैयार है। आकाश त्राटक में शरीर के शिथिल होने के बाद मन भी शिथिल हो जाता है।
साधना के केन्द्र पर यदि ध्यान दिया जाय तो समग्र व्यक्तित्व की समवेत साधना होती चलती है मनुष्य-जीवन का यही प्रयोजन एवं सार्थकता है।
साधना के मार्ग का स्वाभाविक पड़ाव है। इतिहास और शास्त्र इस तथ्य की साक्षी है। आज तक जो भी महामानव हुये है, उनकी सफलता सार्थकता महिमा-महानता का आधार बाह्य साधन और सुविधायें कभी नहीं रहीं। अधिकांश महापुरुषों को तो बाहरी दृष्टि से सफलता प्राप्त ही नहीं हुई। भौतिकता की कसौटियों पर तो वे विफल ही करार दिये जा सकते है।
साधना को सर्वसुलभ बनाने में आशातीत सफलता पाई है। साधना सम्बन्धी नये प्रयोग बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
साधना करना अधिक सुविधाजनक रहता है। अनुभवी लोगों का कथन है कि इस मुद्रा में बैठने की तुलना में कम समय में ही स्थिरता आ जाती है। सुविधानुसार दोनों में से किसी एक के चयन के पश्चात् आकाश की ओर स्थिर दृष्टि से देखने का अभ्यास आरम्भ करना पड़ता है। शुरू में आंखें अनभ्यस्त होती है, अतः उसे धीरे-धीरे कर इसका अभ्यास दिलाना पड़ता है। प्रारम्भ में थोड़े समय की ही अपलक दृष्टि रखनी चाहिए।
साधनाओं के लिए शरीर के शिथिलीकरण की कल्पना की जाती है, परन्तु त्राटक की यह विशेषता है कि इसमें कल्पना की अपेक्षा नहीं रहती। सफल साधक का शरीर त्राटक साधना पर बैठते ही कुछ ही समय में शिथिल होने लगता है। उसका आन्तरिक जागरण हो चुका होता है। वह हर समय उसका ध्यान साधना के लिए तत्पर और तैयार रहता है। शरीर कई चरणों में धीरे-धीरे गिरता है।
साधना का क्रम भी शामिल है। आज की बात समाप्त ॐ शान्ति।
साधना के शक्ति स्रोत अखण्ड दीपक के प्रकाश में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका एकाकी लिखी, जो कि अपनी लम्बी यात्रा पूरी कर पाँच वर्ष पूर्व ही अपनी स्वर्ण जयन्ती मना चुकी है।
साधना में सहयोगी बन जाता है। श्रेष्ठ चित्रकार जब किसी चित्र की कल्पना करता है, तो उसके शरीर की हर इकाई उसके स्पन्दनों से प्रभावित होती है। शरीर की हलचल में उस कल्पना के स्पन्दन समाविष्ट हो जाते हैं। तथा निर्जीव तूलिका सामान्य रंगों में ही जीवन्त चित्र का निर्माण कर देती है। वाणी के साधक गायक के मन में जो भाव उभरते हैं, वह उसके हाव-भाव तथा स्वर लहरी में न जाने कहाँ से कैसे गुँथ जाते हैं और उसमें अद्भुत प्रभाव पैदा कर देते हैं।
साधना विज्ञान पर बहुमूल्य यंत्र उपकरणों के माध्यम से की जा रही शोध तथा उपलब्धियों के लिए इस अल्प अवधि में ही ख्याति प्राप्त कर चुका है। वनौषधि अनुसंधान, आहार चिकित्सा, साधना से मानसोपचार जैसे विषय अपने हाथ में लेकर इस संस्थान द्वारा न केवल चिकित्सा की एक नई विधा का क्षेत्र जनमानस के लिए खोला गया है अपितु तर्क, तथ्य, प्रमाणों के द्वारा दार्शनिक अनुसंधान की प्रक्रिया से अध्यात्म को विज्ञान सम्मत प्रमाणित करने का प्रयास भी किया गया है, जो कि अपने आप में अद्वितीय है।
साधना स्वाध्याय व स्वतंत्रता संग्राम के एक सेनानी के रूप में मातृभूमि की सेवा के त्रिसूत्री कार्यक्रम के साथ-साथ उन्हें चार बार हिमालय यात्रा करनी पड़ेगी संभावित समय व स्थान के निर्देश भी मिले व जीवन यात्रा के आगामी कार्यक्रम का एक स्वरूप उन्हें समझा दिया गया। तब से बसंत पंचमी को ही उनके आध्यात्मिक जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है।
साधनाओं ने अपने समय में योग साधना को सर्वसुलभ बनाने में आशातीत सफलता पाई है। साधना सम्बन्धी नये प्रयोग बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
साधना’ कहलाती है। ये गायत्री के पाँच मुख हैं, जिनका सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर से है। स्थूल शरीर याने हाथ-पैर से हम आठ घण्टे काम करके किसी तरह आठ-दस रुपये कमा लेते हैं। यह स्थूल शरीर कमजोर है।
साधना प्रधान आत्मिकी को अधिक महत्त्व मिला है, जबकि पश्चिमी दुनिया भौतिकी के मकड़ी-जाले में उलझ कर रह गई। इसलिए उसने मनीषी तो उत्पन्न किये, पर व्यक्तित्व सम्पन्न ऋषियों का उत्पादन नहीं कर सकी। भौतिक चिन्तन प्रधान है, तो आत्मिकी चरित्र प्रधान। अतएव पदार्थ जगत की साधना करने वालों ने मस्तिष्क को विकसित करके चिन्तन व पैनापन तो प्राप्त कर लिया पर इसके आगे समग्र व्यक्तित्व अविकसित स्थिति में ही पड़ा रहा। आत्मजगत के अन्वेषकों का लक्ष्य चूँकि संस्कार कोशों का परिवर्तन, परिवर्धन और जागरण होता है, इसलिए उनकी यात्रा उस मूल इकाई से आरम्भ होती है, जहाँ पर समग्र व्यक्तित्व दबा पड़ा होता है।
साधना होती चलती है मनुष्य-जीवन का यही प्रयोजन एवं सार्थकता है।
साधनात्मक प्रयोग का परिणाम और भी अधिक उत्साहवर्धक हो सकता है।
साधना-अभ्यास ज्यों-ज्यों पुष्ट होता जाता है वैसे-ही-वैसे अनेक प्रकार के दिव्य-दर्शन होने लगते है। पंच तत्त्वों में आकाश सबसे सूक्ष्म है। वह बिल्कुल पोला व शून्य है। उसका कुछ भी आकार नहीं है। जब नेत्र स्थिर होते, तो साधक को विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ दिखाई पड़ने लगती हैं।
साधना कराते हैं, ध्यान कराते हैं। पंचकोश साधना भी करायेंगे, पर इसके लिए हिम्मत चाहिए। आप में हिम्मत होनी चाहिए। यह इन्द्रियाँ जो बार-बार तंग करती हैं उसे रोकना चाहिए। अभी हम सिद्धान्तों की बात कहते हैं, क्योंकि सिद्धान्त के नाम पर आपके पास कुछ नहीं है।
साधना है। और इस साधना बड़ी हमारी वाचालता ही है जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसे आदेशों को सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी उत्तम भाषा बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”
साधना प्रयत्नों से शरीर की अन्तः प्रक्रिया में परिवर्तन लाया जा सकता है। उससे जीन्स की स्थित बदलने और पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य की आशा की जाती है। इतना ही नहीं, पैतृक प्रभाव के कारण वयस्क व्यक्ति का जो ढाँचा बन गया है, उसमें भी सुधार-परिष्कार संभव हो सकता है। शारीरिक कायाकल्प-मानसिक ब्रेनवाशिंग की चर्चा होती रहती है। व्यक्तियों के परिवर्तन में साधनात्मक प्रयोग का परिणाम और भी अधिक उत्साहवर्धक हो सकता है।
साधना क्षेत्र में वह जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाता है, वैसे-ही-वैसे सत्य का साक्षात्कार होने लगता है, जिसे वह अब तक सिद्धान्त रूप में स्वीकारा था, उसका प्रत्यक्षीकरण हो जाने से वह पूर्ण संतुष्ट होकर प्रश्न से परे की भूमि में प्रतिष्ठित हो जाता है। इस अवस्था में जब वह जीवात्मा की पूर्णता को अनुभव करता और उत्पत्ति, स्थिति, एवं विनाश की तीनों दशाओं को स्वप्नवत् देखता है, तो उसे इस असार संसार का रहस्य समझ में आता है। इसी के पश्चात् उसके भीतर से एक अलौकिक शान्ति प्रस्फुटित होती है, उसका शरीर भाव मिटता और आत्मभाव जाग्रत होता है। इस स्थिति में परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहता। यही आत्म साक्षात्कार है।
साधना व स्वाध्याय के चमत्कारी परिणाम तो मथुरा व हरिद्वार के वर्णन में अधिक देखने को मिलते हैं। यहाँ तो उनकी स्वतंत्रता संग्राम में सेनानी, स्वयंसेवक एक समाज सेवी के नाते जो भूमिका रही, उसका वर्णन करना ही समीचीन होगा। उन्हें साथियों में ‘श्रीराम मत्त’ नाम से जाना जाता था। 1928 से 1935 की अवधि में वे कई बार अल्पावधि के लिए जेल गए, अंग्रेजों से लाठी की मार सही, किसानों के हित के लिए लगान बन्दी के जुल्म के आँकड़े एकत्र कर काँग्रेस के बड़े नेताओं के पास भिजवाये, जिन्हें देखकर स्वयं वायसराय आश्चर्य चकित हो गये थे कि एक अकेला 18-19 वर्षीय किशोर यह काम कैसे कर सका? तथा मालवीय जी, पं. जवाहर लाल नेहरू की माता स्वरूपा रानी नेहरू, रफी, अहमद किदवई, श्री देवदास गाँधी जैसे स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूतों के साथ आसनसोल जेल में रहने का अवसर मिला।
साधना भी करायेंगे, पर इसके लिए हिम्मत चाहिए। आप में हिम्मत होनी चाहिए। यह इन्द्रियाँ जो बार-बार तंग करती हैं उसे रोकना चाहिए। अभी हम सिद्धान्तों की बात कहते हैं, क्योंकि सिद्धान्त के नाम पर आपके पास कुछ नहीं है। जब स्वार्थ सामने आता है तब उस समय आदमी इतना कमजोर मालूम पड़ता है कि हम कुछ कह नहीं सकते मन जो कहता है हम वही करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-March
साधना बड़ी महत्त्वपूर्ण है न केवल संसार है बल्कि हमारा सारा कुटुंब जो है उसके लिए भी अपने कुटुंब के लिए इतनी बड़ी सेवायें जो की है उसके हमको अभी संतोष नहीं हो रहा है अब ये हमारा मन कि हमारे जो कुटुंबी है गायत्री परिवार के परिजन है इनकी कुछ और ज्यादा सेवा करे ज्यादा सेवा के लिए पूँजी की आवश्यकता है संपदा तो होनी ही चाहिए। हमारे पास कुछ साधन तो हो जिससे हम सेवा करें। सेवा मुँह जबानी थोड़े ही हो जाती है। उसके लिए तीन वर्ष इसीलिए बीत गये है कि संसार का वातावरण संशोधित हो और अपने प्रज्ञा-परिवार के जितने भी व्यक्ति है उनकी सेवा करने का उनकी सहायता करने का उनके लायक शक्ति एकत्रित करने के लिए उपार्जित करने के लिए भी ये यज्ञ है।
साधना बनकर उत्तर चुकी थी और वह उसका मूल्य चुकाना अच्छी तरह जानते थे।
साधनाओं के विधान में त्रुटि रहने पर उनके असुरता प्रधान इष्ट देव नाराज होकर अनर्थ भी कर सकते है। किंतु गायत्री तो क्षमा ओर करुणा से भरी पूरी सहृदय माता है। वह तो अपने बच्चे की तोतली बोली सुनकर भी प्रसन्न होती है। यह ऐसी कामधेनु गौ है जो किसी को लात मारना जानती ही नहीं।
साधना साधना शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिए वे अविराम तप करने लगे।
साधना में लग जाय तो वह क्या नहीं कर सकता। यह उनकी समझ में आज आया।
साधनाएँ सिखाएंगे।”
साधना है जिसके माध्यम से रोम रोम को प्राणों की प्रखरता से भरा जाता है सामान्य गायत्री उपासना जब आरोग्य प्रदान कर सकती है दीर्घजीवन देती है तब असामान्य युग संधि महापुरश्चरण साधना की फलश्रुति की तो कल्पना भी कठिन हैं। समूचे राष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण तो एक प्रकार से भव्यतम अभियान है जिसका सूत्रपात परम पूज्य गुरुदेव ने इस उसकी प्रथम पूर्णाहुति 4,5,6,7,नवम्बर 1995 में परम पूज्य गुरुदेव की पावन जन्मभूमि आँवलखेड़ा (आगरा) में सुनिश्चित की गई है विगत 1 नवम्बर को उसका कलश स्थापना समारोह संपन्न हुआ अब इस अनुक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अनुष्ठान को षट्चक्रवेधन साधना में प्रवेश कराने के लिए परम पूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माता जी की कारण सत्ता मचल रही है। महाभारत जैसा यह पुरुषार्थ गायत्री परिवार के पाँडवों द्वारा ही संभव होगा।
साधना शुरू किया। व नियमित रूप से निकटवर्ती गाँवों में जाते रहते लोगों को स्वच्छता का महत्त्व समझाते स्वयं झाडू लेकर गली कूचों की सफाई करते तथा गरीब गंदे बच्चों को स्नान कराते। ग्रामीणों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने का यह क्रम महीनों तक नियमित रूप से चलता रहा। बापू के इस प्रयास का कोई विशेष परिणाम निकलता न देखकर एक कार्य कर्ता ने कहा बापू! इन पिछले लोगों को समझाने एवं आप के स्वयं सफाई करने से भी इन पर कोई प्रभाव तो पड़ता नहीं फिर भी आप क्यों तन्मय होकर इस कार्य में लगे रहते हैं?
साधना में लगे रहे। ऐसे परिपक्व विचारों के कारण ही विश्व विख्यात कवियों की श्रेणी में उनका नाम आज भी बड़े गौरव और आदर से लिया जाता है।
साधना उपलब्ध करने के लिए यंत्र उपकरण कारखाने लगाये पर वही दूसरे हाथ से वायु प्रदूषण जल प्रदूषण तापमान में वृद्धि जैसी विकट समस्याएँ उत्पन्न कर ली। मनोरंजन के लिए कामुकता उभारने वाले अनेक कुचेष्टाएँ चली जनसंख्या स्वरूप तलाक और जनसंख्या वृद्धि का संकट सामने आया। हर काम के लिए जमीन की कमी पड़ने लगी। आवास व कृषि की समस्या सामने आयी किंतु उसे अनदेखा कर देशों के बीच शीत युद्ध भड़काये और इसी शताब्दी में दो विश्व युद्ध और प्रायः 200 स्थानीय युद्ध उभरे।
साधना की जा सकती है। इच्छा हो तो उसे पहने भी रहना चाहिए।
साधना समर के लिए मूर्धन्य महारथी आगे आएँ, भीरु न कहाए
साधना का प्रयोजन अंतःकरण पर चढ़े हुए उन मल, आवरणों, विक्षेपों को हटाना है, जो हमें देवत्व से वंचित कर नर पशु की स्थिति में डाले हुए हैं। तपश्चर्या इसी मलिनता को स्वच्छ करती और इसी मलिनता को स्वच्छ करती और प्रसुप्त ऋद्धि सिद्धियों को जाग्रत करके दैवी वरदान की तरह लघु को महान् बना देती है।
साधना को समर अर्थात् युद्ध की संज्ञा दी गई है। छः द्वारों वाले किले के भीतर सप्तपुरी में बैठी भगवती को जाग्रत् कर पृथ्वी आदि स्थल तत्त्वों से बने महिषासुर मन को मारकर उसे ज्योति रूप प्रदान करना किसी भी महाभारत प्रारंभ में ही बताया गया है कि यह चेतन ऊर्जा निर्बलों निर्जीवों को नहीं बलवानों पुरुषार्थियों को मिलती है अब जब राष्ट्र की कुण्डलियों के जागरण का मोर्चा खुल रहा है तो मूर्धन्य महारथियों के दुम दबाने से काम नहीं चलेगा उन्हें चक्रव्यूह वेधन जैसे अभिमन्यु पुरुषार्थ के लिए तत्काल तत्पर होना पड़ेगा अब प्रतीक्षा का समय नहीं रहा। अब तो 21 वीं सदी के लिए मात्र छः वर्ष शेष रहे हैं तब तक तो महामाया का अवतरण हो चुका होना चाहिए। कल्पना की जा सकती है कि इस अवधि में साधना समर की गति को कितना तीव्र करना पड़ेगा
साधना सफल हुई। देश को आत्मबोध हुआ करोड़ों लोगों की आराध्य अवलंबन हुआ करोड़ों लोगों की आराध्य अवलंबन बन गई भगवत् गायत्री। फिर से यज्ञ धूम्र उठा वैदिक ऋचाएँ गूँजने लगी।
साधनाओं से भी प्राप्त नहीं होती है।
साधनाओं में विधानों का कम और भावनाओं का अधिक महत्त्व है। गायत्री उपासना विधि में कोई भूल रह जाने पर भी किसी का अनर्थ नहीं हुआ। फिर भी भय हो तो किसी सिद्ध पुरुष को साधना का संरक्षण करते रहने के लिये उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है।
साधना समर की गति को कितना तीव्र करना पड़ेगा
साधना हैं दुर्भाग्य से हम इन दिनों बनावट विडंबना भ्रांति और दुर्बुद्धि से भरे युग में रह रहे है। अज्ञान भरे अंधकार युग ने कुछ ऐसा कृत्रिम वातावरण बना रखा है जिसने बरसात की काली घटाओं में छिपे हुए सूर्य की तरह सत्य को एक प्रकार से छिपा दिया है। छल और कृत्रिमता का दूसरा नाम ही सभ्यता पड़ गया है। जो जितनी कृत्रिमता बरत सकता है, कुछ को कुछ बनाकर दिखा सकता है वह उतना ही बड़ा सभ्य और कलाकार माना जाता है। पिछली शताब्दियों और सहस्राब्दियों से असत्य और कृत्रिमता की आराधना में मानवीय मस्तिष्क संलग्न रहे है और अब वह उपार्जन इतना विशालकाय इतना सघन और प्रचलित हो गया है कि आमतौर से उसे ही सत्य माना जाने लगा है।
साधना की गति अवरुद्ध हो जाती है। जप और ध्यान की साधनाएँ भी उतनी सहयोगी नहीं बन पातीं जितनी कि होनी चाहिए, क्योंकि परिशुद्ध अंतःकरण में ही ईश्वरीय सत्ता का प्रकाश अवतरित होता है। वह स्थिति नहीं बन पड़ने पर दिव्य अनुदानों से वंचित रहना पड़ता है। प्रायः देखा भी जाता है कि अनेक लोग घंटों जप-ध्यान करते है, पर उनकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है, कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती। इस विफलता का एक ही कारण है कि अंतः की मलिनता का परिमार्जन नहीं हो सका।
साधना में प्रवेश कराने के लिए परम पूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माता जी की कारण सत्ता मचल रही है। महाभारत जैसा यह पुरुषार्थ गायत्री परिवार के पाँडवों द्वारा ही संभव होगा।
साधना की दूसरी पूर्णाहुति बारह वर्ष में 2001 के वसंत पर होगी जिसमें प्रायः छह करोड़ भागीदार सम्मिलित होंगे। विश्वास किया गया है कि वह दिव्य शक्तिसम्पन्न अनुष्ठान इस युग का ऐसा धर्मानुष्ठान होगा जिसे न भूतो न भविष्यति कहा जा सके। बाद के पाँच वर्ष नव सृजन का बचा सरंजाम पूरा होने के है उस समय क्या किया जाना है वह समय समय पर बताया जाता रहेगा।
साधना का क्या विज्ञान है? किस तरीके से संभव हुयीं? ये हम अखण्ड ज्योति के जनवरी के अंक में बतायेंगे और इक्कीसवीं सदी का फरवरी अंक होगा इक्कीसवीं सदी का फरवरी अंक होगा इक्कीसवीं सदी कैसे आयेगी? नया युग कैसे आयेगा? नये युग में क्या क्या बातें होगी?
साधना में कोई अंतर नहीं पड़ा एक शरद गई दूसरी ने प्रवेश किया। कार्तिक के सुहावने दिन प्रकृति की हरीतिमा और नव्य-कुसुमों की शोभा वन-श्री को नई आभा प्रदान कर रही थी। नंदिनी चरते-चरते कैलाश शिखर तक जा पहुँची दिलीप प्रकृति के अजस्र सौंदर्य का पान करते उसके पीछे-पीछे चलते चले गये।
साधनाएँ इसके साथ जुड़कर ही फलीभूत होती रही है एवं रहेगी।
साधना हुई है वह भी सारे विश्व कल्याण के लिए हुईं है वातावरण संशोधन के लिये हुई है और जो संसार में पाप-अनाचार फैले हुये है उसके साथ संघर्ष के लिए उसके साथ में लोहा लेने की शक्ति पैदा करने के लिए हुई है। ये साधना बड़ी महत्त्वपूर्ण है न केवल संसार है बल्कि हमारा सारा कुटुंब जो है उसके लिए भी अपने कुटुंब के लिए इतनी बड़ी सेवायें जो की है उसके हमको अभी संतोष नहीं हो रहा है अब ये हमारा मन कि हमारे जो कुटुंबी है गायत्री परिवार के परिजन है इनकी कुछ और ज्यादा सेवा करे ज्यादा सेवा के लिए पूँजी की आवश्यकता है संपदा तो होनी ही चाहिए। हमारे पास कुछ साधन तो हो जिससे हम सेवा करें। सेवा मुँह जबानी थोड़े ही हो जाती है। उसके लिए तीन वर्ष इसीलिए बीत गये है कि संसार का वातावरण संशोधित हो और अपने प्रज्ञा-परिवार के जितने भी व्यक्ति है उनकी सेवा करने का उनकी सहायता करने का उनके लायक शक्ति एकत्रित करने के लिए उपार्जित करने के लिए भी ये यज्ञ है।
साधना के तुरंत पश्चात् का है जो दिसम्बर 1986 में जन साधारण के समक्ष नव वर्ष की पूर्व वेला में दिया गया। इस अमृत धारा में उज्ज्वल भविष्य के लिए किये जाने वाले विशद गायत्री महायज्ञों की विस्तृत झाँकी प्रस्तुत की गयी है और सब को उसमें सहयोग देने के लिए कहा गया है। आइये इस अमृत धारा का अवगाहन करे।
साधना में जुटे है और प्रतिदिन लगभग 240 करोड़ गायत्री मंत्र जप का महाअनुष्ठान अग्रसर हो रहा है उसकी प्रथम पूर्णाहुति 1995 में संपन्न करने की घोषणा भी उन्होंने ही की घोषणा भी उन्होंने ही की ताकि उपासना के माध्यम से उपार्जित प्राण सत्ता को परिपक्व किया जा सके।
साधना के प्रताप से दिलीप और सुदक्षिणा ने रघु को जन्म दिया। जिनके नाम पर दिलीप के वंश का नाम ‘रघुवंश’ पड़ा।
साधना हर स्थिति का हर स्तर का, मनुष्य कर सकता है। उस पर कोई रोक नहीं है। उसके दुर्गुण तो अपने आप ही समयानुसार घटने लगेंगे।बीमार को दवा नहीं देनी चाहिए। जैसे जिस प्रकार यह तर्क अनुचित है।
साधना शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिए वे अविराम तप करने लगे।
साधना गायत्री की उच्चस्तरीय साधना है जिसके माध्यम से रोम रोम को प्राणों की प्रखरता से भरा जाता है सामान्य गायत्री उपासना जब आरोग्य प्रदान कर सकती है दीर्घजीवन देती है तब असामान्य युग संधि महापुरश्चरण साधना की फलश्रुति की तो कल्पना भी कठिन हैं। समूचे राष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण तो एक प्रकार से भव्यतम अभियान है जिसका सूत्रपात परम पूज्य गुरुदेव ने इस उसकी प्रथम पूर्णाहुति 4,5,6,7,नवम्बर 1995 में परम पूज्य गुरुदेव की पावन जन्मभूमि आँवलखेड़ा (आगरा) में सुनिश्चित की गई है विगत 1 नवम्बर को उसका कलश स्थापना समारोह संपन्न हुआ अब इस अनुक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अनुष्ठान को षट्चक्रवेधन साधना में प्रवेश कराने के लिए परम पूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माता जी की कारण सत्ता मचल रही है। महाभारत जैसा यह पुरुषार्थ गायत्री परिवार के पाँडवों द्वारा ही संभव होगा।
साधना की फलश्रुति की तो कल्पना भी कठिन हैं। समूचे राष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण तो एक प्रकार से भव्यतम अभियान है जिसका सूत्रपात परम पूज्य गुरुदेव ने इस उसकी प्रथम पूर्णाहुति 4,5,6,7,नवम्बर 1995 में परम पूज्य गुरुदेव की पावन जन्मभूमि आँवलखेड़ा (आगरा) में सुनिश्चित की गई है विगत 1 नवम्बर को उसका कलश स्थापना समारोह संपन्न हुआ अब इस अनुक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अनुष्ठान को षट्चक्रवेधन साधना में प्रवेश कराने के लिए परम पूज्य गुरुदेव एवं शक्तिस्वरूपा माता जी की कारण सत्ता मचल रही है। महाभारत जैसा यह पुरुषार्थ गायत्री परिवार के पाँडवों द्वारा ही संभव होगा।
साधना का संरक्षण करते रहने के लिये उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है।
साधनाएँ भी उतनी सहयोगी नहीं बन पातीं जितनी कि होनी चाहिए, क्योंकि परिशुद्ध अंतःकरण में ही ईश्वरीय सत्ता का प्रकाश अवतरित होता है। वह स्थिति नहीं बन पड़ने पर दिव्य अनुदानों से वंचित रहना पड़ता है। प्रायः देखा भी जाता है कि अनेक लोग घंटों जप-ध्यान करते है, पर उनकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी रहती है, कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती। इस विफलता का एक ही कारण है कि अंतः की मलिनता का परिमार्जन नहीं हो सका। अध्यात्म मनीषियों ने इस अवरोध को दूर करने का उपयुक्त माध्यम तप बताया है।
साधना का प्राण कहा गया है। उसमें जो कुछ भी शाश्वत उदात्त उपादेय तथा महत्त्वपूर्ण है वह सब तप से संभूत है।
साधना साधना साधना शरीर को तपाने से लेकर मन को ईश्वरीय सत्ता में घुलाने के लिए वे अविराम तप करने लगे।
साधनायें करने वाले स्नातक और वानप्रस्थ पर्ण-कुटीरों में रहते थे, उन्हें भी एक पर्ण-कुटीर रहने के लिये दे दी गई। बिलकुल सामान्य, राज-वंश की शान के अनुकूल विशेषता का एक भी अंश उसमें नहीं था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1995-May
साधना करनी पड़ती है और आत्मिक बल वर्धन के लिए क्षुधा बुझाने वाले सुपाच्य आहार की व्यवस्था करनी पड़ती है। यह नित्य कर्म है। नित्य ही नहीं, अनवरत भी। साँस लेकर शरीर के भीतर ऑक्सीजन पहुँचाई जाती है और साँस छोड़ने के साथ शरीर में उत्पन्न विषाक्तता को निकाल बाहर किया जाता है। यह अपने स्वास्थ्य को सही बनाने के लिए किया जाने वाला आवश्यक कृत्य है।
साधना की है, आत्मशोधन किया है वह अपने को निखार कर गुणों की खेती आत्मसत्ता रूपी खेत पर की है। गीताकार ने ऐसे ही व्यक्ति को 'क्षेत्रज्ञ' कहा है व उसी को सफलता सदैव मिलेगी, यह भी बताया है।
साधना से परमसत्ता का प्यार भरा यथार्थवादी शिक्षण अनायास ही अमृतपान की तरह उपलब्ध होता चला जाता है। यही साधना से सिद्धि का मूलभूत तत्त्वदर्शन है। इसी को समझकर इस क्षेत्र में उतरा जाना चाहिए।
साधना विज्ञान को ही कोसने लगते हैं। भविष्य के लिए तो वे श्रद्धा विश्वास ही गवाँ बैठते है। ऐसे लोग यदि उतावली न करें, अधिक कोई साधन न करे, तो भी कम-से-कम आशा तो बनी रहेगी। उतावली में वह भी चली जाती है। गायक वादक अभिनेता अपना अभ्यास नित्य जारी रखते हैं।
साधना से सिद्धि का मूलभूत तत्त्वदर्शन है। इसी को समझकर इस क्षेत्र में उतरा जाना चाहिए।
साधना निराली।
नये सृजन की रास सम्हाली॥
साधना की क्रियापद्धति को ही काम में लाया। इस तरीके से फिर मुझे जाना पड़ा फिर माताजी के बीमार होने पर पंद्रह दिन के लिए मैं उनके पास आया। फिर तीन दिन के लिए चला गया। इस तरीके से एक वर्ष पूरा करने के बाद फिर मुझे लोक शिक्षण का कार्य सौंप दिया गया। जबकि एक साल पहले तप करने का मुझे मौका दिया गया था।
साधना क्षेत्र में आज जो असफलताएँ देखी जाती है, उपासना फलीभूत नहीं होती, उसका मूल कारण यही है कि उतावलापन बरता गया। बहिरंग कर्मकाण्ड को ही सबकुछ समझ कर उसी से सब कुछ प्राप्त कर लेने-सिद्ध पुरुष बन जाने की, शेखचिल्ली जैसी कल्पना कर ली गयी। निरन्तरता, गहन श्रद्धा एवं सतत् अभ्यास द्वारा जब साधना उपक्रमों के मर्म को समझते हुए उन्हें जीवन में उतारा जाता है तो वह सिद्धियों को फलीभूत करता चला जाता है। यह उस हर सफल व्यक्ति का इतिहास है जिसने जीवन समर में आतुरता, तुरन्त सफलता मिलने की जल्दबाजी न दिखाकर, धैर्य व निष्ठापूर्वक साधना की है, आत्मशोधन किया है वह अपने को निखार कर गुणों की खेती आत्मसत्ता रूपी खेत पर की है। गीताकार ने ऐसे ही व्यक्ति को 'क्षेत्रज्ञ' कहा है व उसी को सफलता सदैव मिलेगी, यह भी बताया है।
साधना के माध्यम से, हम अपने व्यक्तित्व को विकसित एवं परिष्कृत करते हैं, फलस्वरूप अन्तः क्षेत्र की प्रसुप्त गरिमा ऋद्धि सिद्धि बनकर प्रकट होती है। ऐसे ही पराक्रमी लोगों पर देवताओं की अनुकम्पा बरसती है।
साधना की पाठशाला मात्र है। इसमें उनकी प्रसन्नता और विकास की बात सोची जाती है। इसमें उठाये गये कष्ट में संतोष की अनुभूति होती है। यह आरम्भिक प्रशिक्षण है, पर जब अपने सगे संबंधियों की प्रसन्नता-समृद्धि के लिए उचित अनुचित का ध्यान नहीं रहता और आदर्शों की बलि दे दी जाती है, तो वह प्रेम नहीं रहता, मोह बन जाता है। इसे ही गोस्वामी तुलसीदास ने ‘मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला’ कहकर अभिहित किया है।
साधना के फल स्वरूप वृद्धावस्था में नोबुल पुरस्कार मिला। जर्मन कवि गेटे ने भी 80 वर्ष की आयु में अपनी महत्वपूर्ण कृति “फास्ट” पूर्ण की। इसी प्रकार बुढ़ापा आने से जब लोग निष्क्रिय होकर बैठने की सोचते हैं उसी समय में विश्व प्रसिद्ध उद्योगपति हेनरी फोर्ड ने 82 वर्ष की अवस्था में अपने पिता से वह उत्तरदायित्व सम्हाला था और उसमें इतनी वृद्धि की कि विश्व के धनाढ्य व्यक्तियों में श्रेष्ठता प्राप्त की।
साधना से सिद्धि' प्राप्त करने के लिए अनवरत प्रयास की आवश्यकता पड़ती है। जिन्हें बहुत जल्दी हो, उनके लिए विज्ञजनों का एक ही परामर्श है कि वे इस झंझट से दूर रहें।
साधना करनी है और कैसे न्यूट्रोफिल्स के भाव-चित्र बनाने हैं- इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक समझाया गया।
साधना में निरत हो जाता है।
साधना दान के स्वरूप का बोध व तब-तब किए जाने वाले हर कार्य का स्वरूप को समझाया जाएगा। प्रायः 15 अप्रैल से पूर्व ये सभी टोलियाँ अपना-अपना लक्ष्य पूरा कर शान्तिकुंज वापस लौट आएँगी गोष्ठी प्रत्येक स्थान पर अपराह्न 1 से 5 के बीच होगी व न्यूनतम 250 कार्य कर्ताओं की उपस्थित में सम्पन्न होगी। इन गोष्ठियों में आँवलखेड़ा यज्ञ से जुड़ी व्यवस्थाओं का विस्तार तथा क्षेत्रीय ये प्रव्रज्या के स्वरूप का विवेचन एवं सभी जिज्ञासाओं का यथोचित समाधान कर दिया जायेगा।
साधना की शक्ति भी कह सकते हैं। बस, वहाँ से इशारा चला मेरा उसी क्रम से मेरे लिये वह भी उतना ही महत्वपूर्ण था कार्य कौन-सा जो कि 24 वर्षों की उपासना प्रारंभ की थी मेरे लिए वह श्रद्धा का विषय था। वह श्रद्धा ज्यों की त्यों बनी रही, बल्कि ज्यादा ही बढ़ी। बस, सहस्र कुण्ड यज्ञ हो गया।
साधना उपक्रमों के मर्म को समझते हुए उन्हें जीवन में उतारा जाता है तो वह सिद्धियों को फलीभूत करता चला जाता है। यह उस हर सफल व्यक्ति का इतिहास है जिसने जीवन समर में आतुरता, तुरन्त सफलता मिलने की जल्दबाजी न दिखाकर, धैर्य व निष्ठापूर्वक साधना की है, आत्मशोधन किया है वह अपने को निखार कर गुणों की खेती आत्मसत्ता रूपी खेत पर की है। गीताकार ने ऐसे ही व्यक्ति को 'क्षेत्रज्ञ' कहा है व उसी को सफलता सदैव मिलेगी, यह भी बताया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-June
साधना की जायगी तो 100 से अधिक साल तक की इन्द्रियों का ठीक उसी दिशा में लगातार कार्य करते हुए चला जाना सम्भव है।
साधना में ही प्रारम्भ भी हो गया है। योगियों के लिये सब कुछ सम्भव है। शिक्षा, समाज, राजनीति, शिल्प और वाणिज्य आदि सभी क्षेत्रों में योगियों को अपूर्ण प्रतिभा, विचित्र सृष्टि तैयार कर सकती है। यह निश्चय है। इस समय योगियों द्वारा ही संसार में एक विचित्र नवीन परिवर्तन भगवान करना चाहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-April
साधना है। धर्म से विमुख हो कर मनुष्य स्वार्थ सिद्धि को ही अपना इष्ट बना रहे हैं। संसार में वस्तुएं एक नियत मात्रा में हैं, वे उतनी रहती हैं, जितनी से प्राणियों का उचित पालन पोषण हो सके ! यदि सभी अपने-अपने भाग का उपभोग करें, तो विश्व की शान्ति स्थापित रहेगी, समाज की सारी व्यवस्था बड़ी सुविधापूर्वक चलती रहेगी। किन्तु मनुष्य स्वभाव में अक्सर पशुता का उदय होता है, वह अपने लिये बहुत चाहता है और दूसरों को कुछ नहीं देना चाहता दूसरों को नहीं देना चाहता। दूसरों को कष्टकारक स्थिति में धकेल कर अपने लिये अधिक सुख-सुविधायें एकत्रित करता है, फलस्वरूप दूसरे लोग अभाव से दुखी रहते हैं और जब उनमें प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, तो प्रतिशोध लेने के लिए तत्पर हो जाते है, तदनुसार कलह का सूत्रपात होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-January
साधना, सच्चा स्वरूप, भूला शेर, जीव की महिमा, कर्म महिमा, सर्व शक्तिमान जीव, जीव और संसार, योगाभ्यास, आत्याय मान, सच्चा योग, अपनी भूल, योग व्यायाम, योग साधन, हम कौन हैं, मन की महिमा, मतलबी दुनिया शीर्षक बड़े ही सुन्दर पद्य हैं। जिनके द्वारा गायन तथा आत्मज्ञान दोनों का आनन्द प्राप्त होता है। तत्वज्ञान के जिज्ञासुओं के लिये बड़े काम की चीज है।
साधना-तपस्या द्वारा देह, इन्द्रिय, मन शुद्ध करके गृहस्थाश्रम में अनेक प्रकार के कर्तव्य का पालन करके संन्यास आश्रम में प्रवेश करो। तो तुम माया के बन्धन काट कर सब भूतों में आत्म दर्शन करके, अहंभाव का प्रसार करके साधन पूर्वक परब्रह्म में लीन होकर, चिर अद्वैतानन्द सम्भोग कर सकोगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-August
साधनाएं बड़ा महत्व रखती हैं और इच्छानुसार फल भी देती है। सारा महत्व श्रद्धा और विश्वास में है। विश्वास के साथ की गई एक छोटी सी क्रिया भी विचित्र फल दिखाती है, किन्तु अविश्वास और अश्रद्धा के साथ किया हुआ अश्वमेध भी निष्फल है। यही गुप्त साधनाओं का रहस्य है।
साधना करना कष्ट साध्य है। किन्तु फल की कामना छोड़ के इन कर्मों को करते हुए अन्तःकरण की शुद्धि द्वारा निश्श्रेयस् प्राप्त करना चाहिये। देवऋण, पितृ ऋण और ऋषिऋण को चुका कर ही मनुष्य बन्धन-मुक्त हो सकता है। जो बिना ऋण चुकाये भाग निकलता है, वह अवश्य पकड़ा जाता है, उसे येन-केन प्रकारेण ऋण को चुकाना ही पड़ता है। एक जन्म में न सही, तो अनेक जन्मों में।
साधनाओं का रहस्य है।
साधना के अतिरिक्त शरीर, धर्म और बच रहता है। यह विभाजन हम समझने की सरलता की दृष्टि से कर रहे हैं, अन्यथा शारीरिक कर्मों और आत्म-साधना के दो भाग नहीं किये जा सकते। जैसे भोजन से रक्त और रक्त से वीर्य बनता है, वैसे ही शारीरिक कर्मों से विचार और विचारों से आध्यात्मिक स्थिति उत्पन्न होती है। यदि कोई यों भी कहना चाहे कि शुभ कर्मों से आत्म कल्याण होता है, तो भी एक ही बात है। मन और विचारों का पवित्र करना ही केन्द्र बिन्दु है, इसी में सफलता प्राप्त करने से मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है।
साधनाओं की शिक्षा पुस्तकों द्वारा दी जाया करेगी।” इस परिवर्तन का कारण यह था कि सर्व साधारण की रुचि के साथ आध्यात्मिक तत्वों को मिला देने से हमारा उद्देश्य भी पूरा होता रहेगा और पत्रिका का प्रचार भी पर्याप्त होगा। देखा जाता है कि जिस अंक में कथाएं अधिक रहती हैं, उसकी माँग बहुत बढ़ जाती है। गम्भीर आध्यात्मिक लेखों के प्रेमी कम हैं। जो हैं वे अपने प्रिय विषय की उन्नति के सम्बन्ध में बड़े उदासीन रहते हैं।
साधना की बात।
साधना करेंगे और ब्रह्म तेज को प्राप्त करेंगे। ब्रह्म तेज पर वे इतने मुग्ध हुए कि अनायास ही उनके मुँह से निकल पड़ा कि-’धिग् बलं, क्षत्रिय बलं, ब्रह्म तेजो बलं बलम्’ क्षत्रिय बल तुच्छ है, बल तो ब्रह्म तेज ही है।
साधना के दो भाग नहीं किये जा सकते। जैसे भोजन से रक्त और रक्त से वीर्य बनता है, वैसे ही शारीरिक कर्मों से विचार और विचारों से आध्यात्मिक स्थिति उत्पन्न होती है। यदि कोई यों भी कहना चाहे कि शुभ कर्मों से आत्म कल्याण होता है, तो भी एक ही बात है। मन और विचारों का पवित्र करना ही केन्द्र बिन्दु है, इसी में सफलता प्राप्त करने से मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है। यही ताली है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-May
साधना के फल हैं, ये शब्द एक ऐसे महापुरुष के मुख से निकले हैं, जिसने ईश्वर का अनुभव प्रत्यक्ष किया है, जिसने ईश्वर से संलाप किया है, जिसे ईश्वर के सहवास का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। वह सहवास भी एक बार या दो बार नहीं, बल्कि हम आप जितनी बार भी इस मंदिर या गिरजे का दर्शन करते हैं, इससे सैकड़ों गुना अधिकार।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-July
साधना करती है?
साधना से उत्तम प्रतीत होने लगा। वे क्रियात्मक रूप से संसार के झगड़े मिटाने में भाग लेते और उत्तम कार्यों के आयोजना में बड़ी दिलचस्पी दिखाते। अभी विष्णु और लक्ष्मी का विवाह कराने की साठ गाँठ कर रहे हैं तो अभी इन्द्र और पुरुरवा का झगड़ा सुलझाने लगे हुए हैं। उर्वसी नामकी अप्सरा को प्राप्त करने के लिए इन्द्र और राजा पुरुरवा लड़ रहे थे, भयंकर युद्ध होने की संभावना थी, नारद बीच में जा धमके उन्होंने एक वेश्या के लिये दोनों को लड़ने के लिये धिक्कारा और इन्द्र को इसकी ओर से उदासीन करके झगड़ा मिटवाया। उन्हें पापों के जल्दी नाश कराने की बड़ी उतावली रहती थी, इसीलिए वे ऐसी कूटनीतिक चालें रचा करते थे, जिससे दुष्टों का शीघ्र नाश हो।
साधना विषय पुस्तकों के रूप में और ज्ञान का प्रसार अखण्ड-ज्योति द्वारा हुआ करेगा। -सम्पादक।
साधनाएं प्रचलित हैं। रास्ते पृथक हैं, पर उनका केन्द्र एक ही है। वे सब सत्यनारायण के निकट ले पहुँचते हैं। आध्यात्मिकता उर्ध्व गति है। पर्वत पर ऊपर की ओर बढ़ने का निरन्तर प्रयत्न करते रहने वाला जिस प्रकार देर सबेर में एक न एक दिन सर्वोच्च शिखर पर पहुँच ही जाता है, उसी प्रकार अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी बनाने वाला, सत्य का अवलम्बन ग्रहण करने वाला एक न एक दिन-कठिनाई से या आसानी से परमात्म-सत्ता के निकट पहुँच ही जाता है।
साधना अपनी अपनी रुचि के अनुसार प्रयोग में आती है। परन्तु मनुष्य प्राणी की शक्ति कमजोर और स्वभाव कोमल होने के कारण लौकिक और पारलौकिक कार्यों में सरलता ढूंढ़ता है। सरलता, सुविधा एवं सरसता के मार्ग सब को पसन्द होते हैं। आध्यात्मिक साधनाओं की विभिन्नता का यह भी एक कारण है कि जिसे जो मार्ग सरल और सुविधाजनक प्रतीत हुआ है, उसने पिछले मार्गों की अपेक्षा उसी अनुभूत सरल मार्ग का प्रतिपादन किया है।
साधना की समता कर सकता है। वह अशिक्षित स्त्री पण्डित नहीं थी और न थी शास्त्रकार। वह तर्क और प्रमाणों द्वारा संन्यासी का समाधान करने में समर्थ न थी, इसलिये उसने कहा-पुत्र मैं तुझे अच्छी तरह इस विषय को समझा नहीं सकूँगी इसलिये तू अमुक नगर में चला जा, वहाँ अमुक मुहल्ले में एक कसाई माँस की दुकान करता है, वह तुझे इसका सारा रहस्य समझा सकेगा।
साधना में जीवन को पुष्ट किये बिना आगे बढ़ना तथा अपनी शुद्ध वासनाओं को प्रभु के चरणों पर उत्सर्ग किये बिना किसी भी कार्य में शान्ति नहीं मिल सकती। परमात्मा को एक शक्ति का केन्द्र मान कर उसके आधार पर बहुत कुछ किया जा सकता है। हमारे नेताओं की यदि अर्न्त दृष्टि हो, वे आध्यात्मिकता को ध्यान में रखकर काम करें, तो सर्वत्र एक विचित्रता दिखाई देने लगे। भारत को सब से अधिक आवश्यकता कर्मनिष्ठ योगियों की है।
साधनाओं के अलग-अलग मार्ग होने पर भी उनमें से कोई एक साधक को चुनना होता है। वह अपने अनुभव या किसी पथप्रदर्शक की सम्मति से अपने लिये रास्ता चुनता है। एक व्यक्ति कई मार्गों पर एक साथ नहीं चल सकता। सब मार्ग सच्चे होने पर भी रुचि, बुद्धि, सुविधा के अनुसार किसी एक को स्वीकार करना पड़ता है। सब पगडंडियों पर एक साथ चलने का प्रयत्न कोई बुद्धिमान रास्ता पार नहीं करता, इसी प्रकार अन्य साधनाओं से द्वेष न करता हुआ एक जिज्ञासु अपने लिये अपनी स्वतन्त्र साधना चुनता है और यदि उस पर ही दृढ़तापूर्वक अन्त तक आरुढ़ रहा, तो अपने चरम लक्ष तक पहुँच जाता है।
साधनाओं की विभिन्नता का यह भी एक कारण है कि जिसे जो मार्ग सरल और सुविधाजनक प्रतीत हुआ है, उसने पिछले मार्गों की अपेक्षा उसी अनुभूत सरल मार्ग का प्रतिपादन किया है।
साधनाओं में इन दो साधनाओं का समावेश करना मत भूलना। हृदय पलट पर इन शब्दों को अंकित कर लो-
साधना मार्ग निर्धारित करने के सम्बन्ध में हमारी सम्मति चाहतें हैं। इनमें से अलग-अलग जिज्ञासुओं को उनकी स्थिति के अनुसार पृथक-पृथक सम्मति देनी पड़ती है, फिर भी दो साधन ऐसे हैं जो समान रूप से सब के लिए उपयोगी हैं, और बाल वृद्ध, स्त्री पुरुष सभी के लिए इनका पालन करना सरल, सरस और सुन्दर है। साथ ही फल की दृष्टि से भी यह इतने ही महत्वपूर्ण है जितने कि अन्य कठोर साधन।
साधना नहीं है। सच्चे हृदय से अपने कर्तव्य धर्म का पालन करना भी योग है और यह भी वैसी ही ऊंची साधना है जैसी समाधि लगाना। मैं बिलकुल साधारण स्त्री हूँ। मेरे पति बीमार हैं। जिस समय तू भिक्षा के लिए आया उस समय मैं उनकी आवश्यक सुश्रूषा कर रही थी, इसलिए तुझे थोड़ा ठहरने के लिए मैंने कहा था।
साधनाएं तक है। इन सभी साधकों को संतोष मिलता है, परन्तु सरलता और कठिनता का महत्व अपनी-अपनी दृष्टि में अलग है। राजयोग से लेकर हठयोग और तन्त्रयोग तक की साधना अपनी अपनी रुचि के अनुसार प्रयोग में आती है। परन्तु मनुष्य प्राणी की शक्ति कमजोर और स्वभाव कोमल होने के कारण लौकिक और पारलौकिक कार्यों में सरलता ढूंढ़ता है। सरलता, सुविधा एवं सरसता के मार्ग सब को पसन्द होते हैं।
साधना है जैसी समाधि लगाना। मैं बिलकुल साधारण स्त्री हूँ। मेरे पति बीमार हैं। जिस समय तू भिक्षा के लिए आया उस समय मैं उनकी आवश्यक सुश्रूषा कर रही थी, इसलिए तुझे थोड़ा ठहरने के लिए मैंने कहा था। मैंने अपने पति को ईश्वर समझ कर आदर भाव से उनकी सेवा की है, और सदैव उनकी आज्ञा का अनुसरण किया है यही मेरी योगसाधना है और यही मेरी तपश्चर्या है इसी के आधार पर गुप्त बातों को जान लेने का मुझे अभ्यास हो गया है।
साधना के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानती, कैसे मनोगत विचारों को जान लेती है और कैसे भूतकाल की घटनाओं का ज्ञान रखती है? संन्यासी बड़ी दुविधा में पड़ गया। इतने में वह स्त्री भिक्षा लेकर बाहर निकल आई। भिक्षा लेने से पूर्व संन्यासी आग्रहपूर्वक उससे पूछने लगा कि-’माता तूने वह दोनों गुप्त बातें जिन्हें मेरे अतिरिक्त और दूसरा कोई मनुष्य नहीं जानता तूने क्यों कर जाना? क्या तू कोई योग साधना करती है?
साधना है और यही मेरी तपश्चर्या है इसी के आधार पर गुप्त बातों को जान लेने का मुझे अभ्यास हो गया है।
साधना पर निर्भर है। इसलिए आध्यात्मिक दृष्टि से यह आश्रम मुख्य है। इसके लुप्त हो जाने से हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति की बड़ी क्षति हुई है। प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है कि इस आश्रम को तेजपूर्ण बचावे।
साधना चुनता है और यदि उस पर ही दृढ़तापूर्वक अन्त तक आरुढ़ रहा, तो अपने चरम लक्ष तक पहुँच जाता है।
साधना है। अपने जीवन में हम जो कुछ कर रहे हैं, वह सब भगवान के लिए ही कर रहे हैं। ऐसा ज्ञान रखकर ही कर्म करना चाहिए। कुछ न कुछ करना ही चाहिए, ऐसा समझ कर जो कुछ सामने आए उसी में लग जाय, यह कोई उचित बात नहीं है। हमें कर्म करना चाहिए, किन्तु अपनी अन्तरात्मा की पूर्ण आज्ञा से।
साधनाओं का समावेश करना मत भूलना। हृदय पलट पर इन शब्दों को अंकित कर लो-
साधना के बाद बहुत दिनों तक कठोर तपस्या करने के पश्चात उसे कुछ सिद्धियाँ प्राप्त होने लगी थीं। युवा संन्यासी एक दिन वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था। डाल पर बैठे हुए पक्षी ने जो पर फड़फड़ाये तो वहाँ की सूखी पत्तियाँ झड़ पड़ीं। तरुण ने क्रोध से ऊपर की ओर आँख उठाई तो क्षण भर में जलता-झुलसता हुआ पक्षी नीचे आ गिरा। संन्यासी को अपनी सफलता पर बड़ी प्रसन्नता हुई।
साधनाओं को पत्रिका में प्रकट करने की अपेक्षा पुस्तकों द्वारा बताना उपयुक्त समझ कर साधना विषय पुस्तकों के रूप में और ज्ञान का प्रसार अखण्ड-ज्योति द्वारा हुआ करेगा। -सम्पादक।
साधनाओं से द्वेष न करता हुआ एक जिज्ञासु अपने लिये अपनी स्वतन्त्र साधना चुनता है और यदि उस पर ही दृढ़तापूर्वक अन्त तक आरुढ़ रहा, तो अपने चरम लक्ष तक पहुँच जाता है।
साधनाओं के अनेक मार्ग हैं। विभिन्न मतों के अनुसार अलग-अलग साधनाएं प्रचलित हैं। रास्ते पृथक हैं, पर उनका केन्द्र एक ही है। वे सब सत्यनारायण के निकट ले पहुँचते हैं। आध्यात्मिकता उर्ध्व गति है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-December
साधना है, पर बीमारों को मोहन भोग नहीं, मूँग की दाल का पानी देना है। तृषातुर को पहले पानी पिलाना है, पीछे ज्ञानोपदेश करना है। पहले ज्ञानोपदेश और पीछे पानी पिलाने की व्यवस्था होगी, तो कुछ ठीक परिणाम न निकलेगा। इस समय हमारा समाज बहुत भटक गया है। पिता अपने पुत्रों को सुखी और स्वाधीन देखना चाहता है, उन्हें बहुत कुछ देना चाहता है, पर लेने वालों की दशा ही विचित्र हो गई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-November
साधनाओं में दूर हटते जाने के कारण हमारी मनोभूमि ऐसी जड़ बन गई हैं कि अपनी उन अदृश्य सहायताओं के स्वरूप को पहचानना तो दूर उन सहायताओं तक को नहीं जानते। काश; आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा हमने अपनी अन्त दृष्टि को कुछ स्वच्छ किया होता तो देखते कि हमारे ऊपर कितनी अयाचित सहायताओं की वर्षा हो रही है और हम दूसरों के जरा से उपकार के लिये कितनी आनाकानी करते हैं।
साधनाओं द्वारा हमने अपनी अन्त दृष्टि को कुछ स्वच्छ किया होता तो देखते कि हमारे ऊपर कितनी अयाचित सहायताओं की वर्षा हो रही है और हम दूसरों के जरा से उपकार के लिये कितनी आनाकानी करते हैं।
साधना द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।
साधना का यह प्रथम फल बहुत ही महत्व-पूर्ण है कि अपनी अपरिमेय शक्ति का समुचित उपयोग करना मालूम हो जाये।
साधनाओं का उपहास कर सकते हैं, अविश्वास कर सकते हैं, परन्तु विश्व की प्रचण्ड अनुभूतियों का तेज हमसे कहता है कि अज्ञानियों ! आत्मा ही सत्य है। आध्यात्म-विद्या ही सत्य है। प्राणियों! असत् की ओर नहीं सत् की ओर चलो।
साधना द्वारा ही संभव हैं।
साधनाओं के अभ्यासों में हम क्यों प्रवृत्त हों? उनसे हमारा क्या प्रयोजन? हमें क्या लाभ मिलेगा? यह प्रश्न यथार्थ में महत्वपूर्ण है। आइये आज इन पर विचार करें।
साधना कर रहा था। उसने बहुत-सी अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं और पूर्ण सिद्ध बनने के लिए घोर तप में प्रवृत्त था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-February
साधना भ्रष्ट तान्त्रिकों की तरह बड़े भारी खतरे का सामना करना पड़ता है। कई साधना, बहुत समय, श्रम और धन चाहती हैं।
साधना करनी चाहिए।
साधना, बहुत समय, श्रम और धन चाहती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-October
साधना में पारंगत साधुओं को छोड़कर साधारण लोगों के लिये संभव नहीं है, छोटी श्रेणी की समाधि साधारण लोगों को भी प्राप्त हो जाती है, और उसके लिये संज्ञाहीन होने की कोई आवश्यकता नहीं है। हठयोग की पुस्तकों में समाधि की सात कक्षाएं बताई हैं। उनकी कुछ आरंभिक कक्षाएं थोड़ा सा अभ्यास करने पर कई साधकों को प्राप्त हो जाती हैं। कितने ही उदाहरण ऐसे देखे जाते हैं, जिनमें अशिक्षित, असभ्य और अज्ञानी मनुष्यों में यह सामर्थ्य जागृत होती है, और वे गुप्त बातों को आश्चर्यजनक रीति से बताते हैं।
साधना में प्रवृत्त होते ही अनेक प्रलोभन और विघ्न आपको सत्य मार्ग से डिगाने की चेष्टा करेंगे। कभी ऐसा भी देखोगे कि मिथ्या का आश्रय लेने से ही आप धन, ऐश्वर्य, यश, गौरव आदि पार्थिव सुख भोग की वस्तुएं अनायास प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु उस दशा में ऐसे प्रलोभन के हाथ से बचने की चेष्टा करो। मिथ्या का आश्रय लेकर समस्त पृथ्वी का आधिपत्य भी मिले तो उसे तुच्छ समझो। सत्य-धर्म के आश्रय में रह कर यदि सदा दरिद्री रहना पड़े, भिक्षा से निर्वाह करना पड़े, लाच्छिंत होना पड़ो, चाहे मृत्यु भी हो जाय तो उसे सहस्र गुण श्रेय समझो, ऐसा मनोबल लाने की चेष्टा करो।
साधना में अधिक मन लगावें, तो हम समाधि अवस्था के निकट होते जा सकते हैं।
साधना करके इस विद्या को और ऐसी ही और भी अनेकों लुप्त विद्याओं को सीखा है। यह अत्यन्त ही जटिल और दुर्गम विषय है- इसका दायित्व भी अत्यन्त अधिक है। इसीलिये आचार्यगण सहसा किसी को यह विषय नहीं सिखाते।’
साधना का नशा होना चाहिये। साँसारिक कार्य करते हुए भी यदि संसार से भूले रहें और आध्यात्मिक लोक में भ्रमण करने का अभ्यास डालें, तो यह दिव्य शक्ति हमें धीरे-धीरे प्राप्त हो सकती है। दूसरों के मन की बात जानने में, स्वभाव जानने में, इतिहास जानने में अपनी आरंभिक योग्यता की परीक्षा शुरू करनी चाहिए। पहले यदि एक चौथाई बातें ठीक निकलें तो हताश नहीं प्रसन्न होना चाहिए। जैसे-जैसे अभ्यास बढ़ता जायेगा, तिहाई, आधी, पौना बातें ठीक आने लगेंगी।
साधना करने से एक-एक चूड़ी रह जाने की तरह शोर मिट जाता है और शान्ति मिल जाती है, ऋषि उस लड़की को भी गुरु बना लेते हैं। आगे उसने एक बालक को देखा जिसमें साँसारिक माया का प्रवेश नहीं हुआ है। और उसका हृदय बिल्कुल पवित्र है। पवित्र हृदय वाला ही सच्चा योगी है, ऐसा समझते हुए उन्होंने उस बच्चे को भी गुरु बनाया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-March
साधना बड़ी कठिन और ऊँचे दर्जे की होती है। वे अपनी जिन्दगी में आप बहुत कम सफलता देख पाते हैं। दूसरे प्रकार के काम करने वाले अपने परिश्रम का फल बहुत जल्द-अपनी आँखों के सामने देख लेते हैं, परन्तु धर्म प्रचार ‘गंगा में जौ बोना’ है। पेट काट कर बचाये हुए जौ साधक गंगा के पानी में डालना है, वह बीज बह जाते हैं। पानी के साथ वे किस भूमि में पहुँचेंगे, किस-किस प्रकार उगेंगे, उससे किसका पेट भरेगा, इस बात को वह नहीं देखना चाहता या नहीं देख सकता।
साधना करते रहिए। आठवें दिन सातों फूलों को घी में भिगो कर उसी मंत्र से हवन दे दीजिये। मंत्र सिद्ध हो जावेगा। बाद जिस प्रश्न का उत्तर जानना हो, रात में उसकी धारण कर सो जाइये। प्रातः काल उठकर विचार कीजिये, स्वप्न में उसका क्या उत्तर आया?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1941-September
साधना है इसका परिणाम कुछ क्षण के लिए सुखद भले ही प्रतीत हो, अन्ततः वह समूल नाश का कारण बन जाता है। उत्तम बल सात्विक बल है। हमें चाहिए कि सात्विक बल की आराधना करें। सत्य और अहिंसा के आधार पर जो आध्यात्मिक बल संपादन किया जाएगा वह आसुरी बल की अपेक्षा अधिक दृढ़ और स्थायी होगा एवं उसी के द्वारा सुख शान्ति का साम्राज्य स्थापित किया जा सकेगा।
साधना में प्रवृत्त होना तो दूर रहा, वरन् अपने इन्द्रिय स्वार्थ पर आत्मज-पुत्र तक का बलिदान करने को तैयार हो गये। इन लोगों को शरीर की नश्वरता का बोध हुए बिना सद्गति प्राप्त नहीं हो सकती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-March
साधना आत्म-कल्याण के लिए लौकिक कामनाओं से रहित होकर की जाती है।
साधना मार्ग का मुकुट-मणि कहा है। योगी अरविंद तथा अन्य अनेक तत्व-दर्शियों ने इसी माध्यम से आत्मोत्कर्ष का प्रयास किया और उसे उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही उसको पाया भी जैसा कि शास्त्रकारों ने वर्णन किया है।
साधना को अपनाने वाली नारी अहंताजन्य अगणित पापदोषों से मुक्त होकर द्वैत की मंजिल पार करती हुई अद्वैत की ब्रह्म निर्वाण की जीवन स्थिति प्राप्त करती है और अपने सद्गुणों के कारण जिस घर में रहती है वहाँ स्वर्गीय सुख-शाँति का वातावरण प्रस्तुत कर देती है। पातिव्रत का यह एक ही लाभ भौतिक-दृष्टि से इतना बड़ा है कि उसे अन्य सफलताओं एवं सम्पन्नताओं से कहीं अधिक बढ़-चढ़ कर माना जायगा। दो आत्माएँ एक बनकर जब जीवन यापन करती हैं तो उनका बल साहस एवं अन्तस्तल इतना अधिक विकसित होने लगता है जिसके माध्यम से अनेक कठिनाइयों से लड़ते हुए प्रगति पथ पर बढ़ते चलना और शक्तिमय सार्थक जीवनयापन कर सकना सहज ही संभव हो जाता है। प्रगतिशील लोगों के जीवन में उनकी धर्मपत्नियों का भारी सहयोग रहा है। यदि उन्हें ऐसी नारी न मिली होती जो मनोबल बढ़ाने और जीवन को व्यवस्थित रखने में सहायता कर सके तो सम्भवतः वे गिरी स्थिति में ही गुजर करते और महापुरुष एवं प्रगतिशील बनने के लाभ से वंचित हो रह जाते।
साधना।
साधना जिसे छोटे स्तर की बाल साधना कहते हैं, क्रियाकाण्ड भर की होती है। ऐसे कितने ही व्यक्ति हैं जो केवल जप मात्र को ही सब कुछ समझते हैं। जप, हवन, अनुष्ठान पूजन आदि बाह्य प्रतीक उपचार ही उनकी समझ में सब कुछ होता है। जप की संख्या पूरी करनी, फिर चाहे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह के कुविचार उस समय कितनी ही उच्छृंखल गति से उठते क्यों न रहें। जगजननी की छवि को देखने का ध्यान करना उनके लिए सब कुछ होता हैं।
साधना तो किसी भी स्थिति में कर सकते है। चलते फिरते भी वह की जा सकती है। भगवान का नाम अविधिपूर्वक लेने में भी कुछ हर्ज नहीं। विधिपूर्वक की हुई उपासना निश्चय ही अधिक फल देती हैं पर जिन्हें अवकाश की कमी है वे मानसिक साधना बिना किसी नियम प्रतिबन्ध का पालन किये भी कर सकते हैं।
साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना भी उपयोगी है। जितना समय और श्रम उनका लगता है उसकी तुलना में कहीं अधिक लाभ उन्हें निश्चित रूप से प्राप्त हो जाता है। जो कुछ चाहा जाय वह सब पूर्ण होना ही चाहिये इसकी तो गारन्टी नहीं, पर इतना दावे से कहा जा सकता है कि जितने समय आराधना की गई है उतने समय का लाभ उसकी अपेक्षा कहीं अधिक होगा जो उस प्रयोजन के लिए भौतिक प्रयत्न करने में किया जाता। गायत्री उपासना में लगाया हुआ समय कभी किसी का व्यर्थ नहीं जाता।
साधना से ही वह परिणाम होता है जिसके आधार पर शास्त्रों में वर्णित गायत्री महात्म्य का सत्य माना जा सके। विगत 24 वर्षों से हम गायत्री उपासना की शिक्षा सर्व साधारण को देते रहे हैं। इस महामंत्र की महत्ता जन-मानस में प्रवेश कराने के लिए व्यापक आन्दोलन गठित करके लाखों व्यक्तियों को इस मार्ग पर लगाया है। इन पर हुए प्रयोग का अनुभव कि गायत्री उपासना निष्फल तो किसी की नहीं जाती, पर सच्चा लाभ वे ही उठाते हैं जिनने उच्चस्तरीय उपासना का अवलम्बन किया है। इस प्रकार के व्यक्तियों में से एक को भी असफलता की शिकायत करते नहीं सुना।
साधना पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और अमृत के समान उपयोगी है। कितने साधकों को वैसे ही लाभ मिले भी हैं। उनके चरित्र और उदाहरण सामने आते हैं तो विश्वास और भी बढ़ता है। प्राचीनकाल में समस्त ऋषि मुनि, राम कृष्ण और अवतार, महापुरुष ज्ञानी मनस्वी और विचारशील व्यक्ति गायत्री उपासना ही करते रहे हैं। यही हमारी एक मात्र जातीय आराधना रही है।
साधना स्नान करके विधिपूर्वक की जाती है उसका विधान गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक लिखा जा चुका है। वह जिनमें जितनी बन सके उन्हें उस प्रकार करना चाहिए पर जिन्हें सचमुच ही अवकाश न मिलता हो या अन्य कोई कठिनाइयाँ, बाधक होती हो वे सोते, उठते, खाते, पीते जप ध्यान की मानसिक साधना तो किसी भी स्थिति में कर सकते है। चलते फिरते भी वह की जा सकती है। भगवान का नाम अविधिपूर्वक लेने में भी कुछ हर्ज नहीं। विधिपूर्वक की हुई उपासना निश्चय ही अधिक फल देती हैं पर जिन्हें अवकाश की कमी है वे मानसिक साधना बिना किसी नियम प्रतिबन्ध का पालन किये भी कर सकते हैं।
साधना बिना किसी नियम प्रतिबन्ध का पालन किये भी कर सकते हैं।
साधना का प्रतिफल भी उसी स्तर के अनुसार मिलता है। इसी प्रकार गीता में चार प्रकार के भक्त बताये गये हैं। 1. आपत्ति आने पर उसका निवारण करने के लिए भगवान को पुकारने वाले। 2. जानकारी का कौतूहल पूरा करने के लिए परमात्मा की खोज बीन करने वाले। 3. सिद्धियाँ और विभूतियाँ पाने के लालच से जप, तप, करने वाले।
साधना के पश्चात शिथिल एवं समाप्त होते देखा जाता है।
साधना में तत्व-दृष्टि, भावना और श्रद्धा का समावेश करना पड़ता हैं। इन तत्वों का जिस-जिसकी साधना में समावेश होगा उसे उतना ही आत्मविकास का उत्कृष्ट लाभ प्राप्त होगा। गायत्री क्या है, उसकी उपासना में क्या दृष्टि रहे और किन गुणों का समावेश अपनी मनोभूमि में होना चाहिए, जिसे सब बातों का ध्यान रहेगा उसकी थोड़ी भी साधना बहुत फलदायक होगी।
साधना का परिणाम है।
साधना की। यदि यह सब घटिया रहा होगा तो उसके अनुसार घटिया परिणामों की ही आशा की जा सकती है। गायत्री उपासना को महात्म्यों का शास्त्रकारों ने विशद वर्णन किया है। उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि यह साधना पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और अमृत के समान उपयोगी है। कितने साधकों को वैसे ही लाभ मिले भी हैं।
साधना विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह, गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना में समावेश होगा उसे उतना ही आत्मविकास का उत्कृष्ट लाभ प्राप्त होगा। गायत्री क्या है, उसकी उपासना में क्या दृष्टि रहे और किन गुणों का समावेश अपनी मनोभूमि में होना चाहिए, जिसे सब बातों का ध्यान रहेगा उसकी थोड़ी भी साधना बहुत फलदायक होगी।
साधना कहते हैं, क्रियाकाण्ड भर की होती है। ऐसे कितने ही व्यक्ति हैं जो केवल जप मात्र को ही सब कुछ समझते हैं। जप, हवन, अनुष्ठान पूजन आदि बाह्य प्रतीक उपचार ही उनकी समझ में सब कुछ होता है। जप की संख्या पूरी करनी, फिर चाहे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह के कुविचार उस समय कितनी ही उच्छृंखल गति से उठते क्यों न रहें। जगजननी की छवि को देखने का ध्यान करना उनके लिए सब कुछ होता हैं।
साधना कहना ही नहीं चाहिए, वह तो किसी लौकिक प्रयोजन को पूरा करने के लिए एक लौकिक माध्यम मात्र थी, साधना आत्म-कल्याण के लिए लौकिक कामनाओं से रहित होकर की जाती है।
साधना में लग गया उस पर पश्चाताप प्रकट करते हैं। ऐसे निम्नस्तरीय साधक अपनी घटिया मनोभूमि के कारण कोई बड़ा लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि घट-घट वासिनी महाशक्ति आखिर भावना स्तर को भी तो देखना जानती है। बाहरी कर्मकाँड ही तो उसके लिए सब कुछ नहीं हैं। प्रभु की प्रसन्नता उच्च-स्तरीय भावनाओं द्वारा ही सम्भव है।
साधना
साधना बहुत फलदायक होगी।
साधना करनी चाहिए।
साधनात्मक कर्मकाँड साधारण रहने पर भी उनकी भावना ने उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति कराई जब कि निकृष्ट उद्देश्य के साधन करने वाले मेघनाद, कुम्भकर्ण, रावण, भस्मासुर, हिरण्यकश्यप को प्राप्त अतुल वरदान भी उनके पतन में ही सहायक हुये। ईश्वर के राज्य में वह अध्यात्म क्षेत्र में भावना का ही सबसे बड़ा महत्व है। गायत्री उपासना की एक-सी ही साधना पद्धति अपनाने वाले व्यक्तियों में से सब को एक-सा परिणाम नहीं मिलता। कोई स्वल्प काल में ही आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करते हैं और कुछ तो बहुत समय बीत जाने पर भी कोई प्रकाश दृष्टिगोचर नहीं होता।
साधना पद्धति अपनाने वाले व्यक्तियों में से सब को एक-सा परिणाम नहीं मिलता। कोई स्वल्प काल में ही आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करते हैं और कुछ तो बहुत समय बीत जाने पर भी कोई प्रकाश दृष्टिगोचर नहीं होता।
साधना है। भगवान को भक्त जब अपना समर्पण करता है तो वह अपने ‘अहम्’ को समाप्त कर देता है और स्वतन्त्र इच्छाओं का परित्याग कर भगवान की इच्छा को अपनी इच्छा बना लेता है। इस प्रकार द्वैत को मिटाने और अद्वैत को प्राप्त करने का साधन बन जाता है। ‘तृष्णा, अहंता, कामना, लोभ, मोह, मान और स्वार्थ की समाप्ति आत्म-समर्पण के साथ ही होती है और साधक को वह मनोभूमि प्राप्त होती है जिसमें भक्ति-मार्ग की सारी कठिनाइयों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। गीता में आत्म-समर्पण योग को साधना मार्ग का मुकुट-मणि कहा है।
साधना करने में कोई अड़चन नहीं। जब पत्थर, नदी, वृक्ष, पौधों को भगवान माना जा सकता है और उनकी पूजा की जा सकती है तो मनुष्य शरीर धारी आत्मा के प्रति वैसी मान्यता बनाने में क्या कठिनाई हो सकती है? योग साधना के प्रथम चरण में गुरुभक्ति को ईश्वर भक्ति का प्रारम्भ माना जाता है। गुरु को आत्मसमर्पण करके शिष्य ईश्वर परायणता का अभ्यास करता है और जब उसमें निष्ठा जम जाती है तब उसी का विकसित स्वरूप परमात्मा में आत्मा का लय करने देने का निमित्त बन जाता है। तात्पर्य इतना ही है कि मनुष्य को भी भगवान का स्वरूप मानकर उसके माध्यम से आत्मसमर्पण का अभ्यास किया जा सकता है और योग साधन का लक्ष प्राप्त करने में इस सरल माध्यम से आगे बढ़ा जा सकता है।
साधना के प्रथम चरण में गुरुभक्ति को ईश्वर भक्ति का प्रारम्भ माना जाता है। गुरु को आत्मसमर्पण करके शिष्य ईश्वर परायणता का अभ्यास करता है और जब उसमें निष्ठा जम जाती है तब उसी का विकसित स्वरूप परमात्मा में आत्मा का लय करने देने का निमित्त बन जाता है। तात्पर्य इतना ही है कि मनुष्य को भी भगवान का स्वरूप मानकर उसके माध्यम से आत्मसमर्पण का अभ्यास किया जा सकता है और योग साधन का लक्ष प्राप्त करने में इस सरल माध्यम से आगे बढ़ा जा सकता है।
साधना में निरन्तर संलग्न रहा जाय। एक दिन भी ऐसा न बीते जिसमें ज्ञान की आराधना न की गई हो।
साधनाएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना नहीं।
साधना का माध्यम समझती हुई एक भावुक भक्त की भूमिका में उतरती है तो उसके लिए आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त कर लेना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना जिसने आरम्भ कर दी उसे अष्ट-सिद्धि नव-निद्धि न सही पर जीवन को सुविकसित करने की सफलता बहुत बड़ी मात्रा में अवश्य ही मिलकर रहेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-April
साधना, संयम, सेवा ज्ञानवृद्धि, परमार्थ जैसी दैवी सम्पदाओं को बढ़ाने के लिए, ज्ञानवृद्धि, परमार्थ जैसी दैवी सम्पदाओं को बढ़ाने के लिए हो। आसुरी सम्पदाएं बढ़ाने का असंतोष तो जितना ही बढ़ेगा उतनी ही अशान्ति उत्पन्न करेगा। संघर्षों की जड़ यही है। अधिकारों के लिए सब जागरुक हैं, कर्त्तव्यों की किसी को चिन्ता नहीं। हर व्यक्ति के मुँह से यही शिकायत सुनी जाती हैं कि मुझे यह नहीं मिला, यह नहीं दिया गया, इससे मैं वंचित हूँ।
साधना बन्द करके केवल ध्यान प्रार्थना ही करते रहा जाय यह तो घाटे की बात होगी। नियमित साधना का अपने स्थान पर अपना महत्व है। उससे एक प्रकार का योगाभ्यास होता है। सूक्ष्म शरीर के चक्रों और उपत्यकावडडडडडडडडड का जागरण होता है और संस्कारों में दृढ़ता आती है। हमारे घरों में पूजा, आरती, योग प्रसाद जप, तप, और ध्यान का कार्यक्रम चलते ही रहने चाहिए।
साधना करनी पड़ती है। सुखी जीवन का आधार है प्रेम, न्याय, अपरिग्रह, सच्चरित्रता, सौहार्द सौजन्य और विवेक। इन्हें धारण करने से ही व्यक्ति दूसरी दुनिया अर्थात् आध्यात्मिक जगत में देर तक टिक सकता है। उनका अनुशीलन करने से ही उस महान उद्देश्य की पूर्ति किया जाना सम्भव है जिसके लिये मनुष्य का जन्म हुआ है। विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि’ की भावना बनाने उसी से ही यह सम्भव है कि आध्यात्मिक दिशा में कुछ प्रगति की जा सके।
साधना में उपयोग किया है, और इतना लाभ उठाया है जितना सामान्य व्यक्ति पूरे समय उसी कार्य में लगे रहने पर उठा सकते है।
साधना का अपने स्थान पर अपना महत्व है। उससे एक प्रकार का योगाभ्यास होता है। सूक्ष्म शरीर के चक्रों और उपत्यकावडडडडडडडडड का जागरण होता है और संस्कारों में दृढ़ता आती है। हमारे घरों में पूजा, आरती, योग प्रसाद जप, तप, और ध्यान का कार्यक्रम चलते ही रहने चाहिए। यह स्थान, जिसका, उल्लेख इन पंक्तियों में किया जा ऐसा है कि उसे प्रातः साँय उठते सोते तो करना ही चाहिए अन्य किसी अवकाश के समय में भी किया जा सकता है।
साधना को जो कोई भी कर सकेगा उसे सिद्धियाँ मिले बिना रहेंगी नहीं। लक्ष्य भौतिक हो चाहे आध्यात्मिक तरीका यही अपनाना पड़ता है। जिन्हें भौतिक प्रगति अभीष्ट है वे अपनी भौतिक क्षमताओं का अपव्यय रोक कर उस कार्य में संलग्न करते हैं जिससे लाभ होने की आशा हो। इसी प्रकार आध्यात्मिक लक्ष्य वाले व्यक्ति निरन्तर यह ध्यान रखते हैं कि उनकी सामर्थ्य का प्रतिकूल दिशा में तनिक भी प्रयोग हो रहा हो तो उसे रोक कर अभीष्ट मार्ग पर लगाये जाने में पूरी-पूरी सावधानी बरती जाय।
साधना
साधना उपासना का क्रम बनाया। पड़ोस वालों ने देखा तो लगे उपहास करने। बस उसका उत्साह ढीला पड़ गया। ऐसी अवस्था में सत्य की खोज करना एवं अपनी दुर्बलताओं से जूझना कहाँ बन पड़ेगा? पर दूसरे वे होते हैं जो यह मानते हैं कि उपहास करने वाले व्यक्ति हमें बुराइयों से सावधान रखने वाले पहरुये हैं।
साधना पर निर्भर करता है। कई लोग अच्छा काम पाकर भी उसमें कोई लाभ नहीं उठा पाते और असफल ही रहते हैं। इसके साथ ही ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो अपने साधारण से कार्यों से जीवन में असाधारणता प्राप्त कर लेते। सभी छोटे-बड़े काम अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं किन्तु उन्हें करने की कुशलता पर ही उनका महत्व निर्भर करता है। अपने कार्य में की जाने वाली छोटी-छोटी भूलों से मनुष्य बड़े और महत्वपूर्ण कार्यों द्वारा भी जीवन में विशेष लाभ नहीं उठा सकता।
साधना ही उनका लक्ष होता हैं। जीवन की गतिविधियों का और अपनी कार्य पद्धति का निर्माण वे इसी आधार पर करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को अध्यात्मवादी कह सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-November
साधनायें इतनी सामर्थ्यवान, प्रभावशाली हैं कि उनके द्वारा भौतिक विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण सफलतायें उपलब्ध की जा सकती हैं। हमारे देश में अनेकों ऋषियों, महर्षि-सन्त, महात्माओं, योगी, यतियों का जीवन इसका प्रमाण है। बिना साधनों के उन्होंने आज से हजारों वर्ष पूर्व अन्तरिक्ष, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा आदि के सम्बन्ध में अनेकों महत्वपूर्ण तथ्य खोज निकाले थे। अनेकों विद्यायें, कला-कौशल, ज्ञान-विज्ञान में उनकी गति असाधारण थी। बड़े-बड़े राजमुकुट उनके पैरों में झुकते थे।
साधना जीवन की जयन्ती भी उसी दिन है। इन कारणों से भी यह माघ मास अधिक शुभ अवसर बन जाता है।
साधना मनुष्य की सबसे अधिक सतर्क और जागरुक अवस्था का नाम है। इसलिए साधना का दूसरा नाम ‘विचारों की तपश्चर्या’ भी है। साँसारिक और आत्मिक दोनों प्रकार के विचारों की रस्साकशी में मनुष्य कभी इधर कभी उधर खिंचता रहता है जिससे दुःख और सुख दोनों ही अनुपाततः प्रभावित करते रहते हैं।
साधना है, जिससे मनुष्य अपने अन्तर्बाह्य जीवन का पर्याप्त विकास कर सकता है।
साधना से समाज के हितों को नुकसान पहुँचाते हों। समाज में जहाँ अन्य लोगों को सरलता से पेट भरने को अन्न न मिले और हम अपने भण्डारों में अन्न संग्रहीत करें, समाज के बहुत बड़े वर्ग को जहाँ रोटी, कपड़ा, आवश्यक शिक्षा, चिकित्सा आदि की व्यवस्था न हो और हम अपने लिए कोठी बंगले, आमोद-प्रमोद के साजो सरंजाम एकत्र करें तो यह ऋषियों की भाषा में पाप होगा। किसी भी स्थिति में हमें उन कार्यों से बचना चाहिए जिससे अपने लाभ के लिए सम्पूर्ण समाज का ही अहित कर रहे हों।
साधना कोई भी किसी भी परिस्थिति में कर सकता है। सेवा के लिए पैसे की आवश्यकता नहीं है। उत्कृष्ट भावना, अपनी संकुचितता छोड़ कर जन जीवन के साथ एक रूप होना ही सेवा के लिए पर्याप्त है।
साधना का दूसरा नाम ‘विचारों की तपश्चर्या’ भी है। साँसारिक और आत्मिक दोनों प्रकार के विचारों की रस्साकशी में मनुष्य कभी इधर कभी उधर खिंचता रहता है जिससे दुःख और सुख दोनों ही अनुपाततः प्रभावित करते रहते हैं।
साधना में, जन सेवा में, परमार्थ में, जीवन लगा देने पर ही मौत के आनंददायी क्षण प्राप्त होते है मनुष्य को।
साधनाओं की शोध में इन छोटी-छोटी बातों से समय बचा कर अधिक समय आध्यात्मिक शोधों में लगाने की आवश्यकता रही हो-तब लम्बी जटाओं को कुछ महत्व दिया जाता रहा हो। पर अब जब न तो ऐसे साधु संत और महात्मा रहे और न ही उनके काटने में किसी परेशानी का सामना करना पड़ता हो तो लम्बे बाल रखने की कोई उपयोगिता समझ में नहीं आती। सिर में व्यर्थ का बोझ बनाये रखना बुद्धिमानी की बात नहीं हो सकती। हलके छोटे बालों से सिर साफ और ज्ञान तन्तु ताजे बने रहते हैं। इससे सात्विकता बनी रहती है।
साधनामय जीवन बिताने से ही पहुँचा जा सकता है। जिस तरह बिना सीढ़ियों के छत पर नहीं पहुँचा जा सकता, उसी तरह संसार में अपने कर्तव्य उत्तरदायित्वों को पूर्ण किए बिना जीवन मुक्ति की मंजिल तक नहीं पहुँचा जा सकता। ऋषियों ने जीवन के सहज पथ का अनुगमन करके पारिवारिक जीवन में रहकर ही अपूर्व आध्यात्मिक उत्कर्ष प्राप्त किया था - ब्रह्म का साक्षात्कार भी।
साधनात्मक
साधना के समक्ष वे सब कुछ महत्वहीन समझते थे और निरन्तर अपने ध्येय में संलग्न रहते थे।
साधना का अंग मान कर हम आँशिक रूप में ही चालू कर सकते हैं। अधिक नहीं प्रति दिन एक दो घण्टे ही निकाल लें तो बहुत है। और यह किसी के लिए कठिन नहीं है। जब लोग खेल-कूद मनोरंजन सैर-सपाटों के लिए समय निकाल लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि वे प्रति दिन कुछ भी समय सेवा के लिए न निकाल सकें ।
साधना हमें नीचे से, छोटी-छोटी बातों में दूसरों की सहायता करके शुरू करनी चाहिए।
साधना और आत्मा ज्ञान प्राप्त करना निःसन्देह उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है किन्तु दम्भाचार बढ़ने से मनुष्य के सर्वनाश की भी आशंका बनी रहती है, इसलिए यह नहीं कह सकते कि साधक जीवन सभी के लिए ही उपयोगी है।
साधनाओं से भी प्राप्त नहीं होती है।
साधनाओं, कर्मकाण्ड, उपासनाओं से प्राप्त होता है वह मनुष्य को सेवा के द्वारा सहज ही मिल जाता है। स्व. वल्लभ भाई पटेल ने कहा है “गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” गौतम बुद्ध ने यही कहा है- “जिसे मेरी सेवा करनी है वह पीड़ितों की सेवा करे।” सेवा के महान् व्रती बापू ने कहा था “लाखों गूँगों के हृदय में ईश्वर विराजमान हैं, मैं इन लाखों की सेवा के द्वारा ही ईश्वर की पूजा करता हूँ।” सेवा से मनुष्य का तन, मन, धन सब कुछ पवित्र बन जाता है।
साधना में मनुष्य को अपने बड़प्पन, पद प्रतिष्ठा की भावना का त्याग करना आवश्यक है। स्मरण रहे सेवक का पद संसार में सबसे नीचा होता है। उसका स्थान जनता जनार्दन के पैरों के नीचे होता है तभी तो वह विराट मानव की सेवा कर सकता है। जनसेवी को पद, प्रतिष्ठा, बड़प्पन के सभी अलंकारों का त्याग करना आवश्यक है। महात्मा गाँधी के पास एक संन्यासी आये।
साधना है। यह जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था है जिसमें मनुष्य एक ऐसी संकरी पगडण्डी से होकर चलता है जिसके एक ओर मोक्ष और दूसरी ओर बन्धन, एक तरफ सुख और दूसरी ओर दुःख होता है। साधना मनुष्य की सबसे अधिक सतर्क और जागरुक अवस्था का नाम है। इसलिए साधना का दूसरा नाम ‘विचारों की तपश्चर्या’ भी है। साँसारिक और आत्मिक दोनों प्रकार के विचारों की रस्साकशी में मनुष्य कभी इधर कभी उधर खिंचता रहता है जिससे दुःख और सुख दोनों ही अनुपाततः प्रभावित करते रहते हैं।
साधना का पर्याय है। हमारा लक्ष्य मन, बुद्धि और शरीर इन तीनों की शक्तियों को विकसित और शुद्ध करना होना चाहिए। हमारा शरीर निरोग, स्वस्थ, चपल और बलवान हो ऐसे अपने आप में गुण पैदा करने चाहिएं। मन ऐसा हो जो सात्विक विषयों में रुचि ले और संकल्पवान हो। बुद्धि शुद्ध विचारों से अनुप्राणित-अर्थात् सत्-असत् का विवेक भाव बनाये रखे, हमारा यह प्रयत्न होना चाहिये।
साधना है। यों साधारण गायत्री अनुष्ठान कोई भी अपने घर रहकर कर सकता है पर गायत्री तपोभूमि जैसे पवित्र स्थान में, चान्द्रायणव्रत करते हुए उसका महत्व बहुत बढ़ जाता है। साधारण परिस्थितियों में जो लाभ दस अनुष्ठान करने से मिलता है वह यहाँ की विशेष परिस्थितियों में एक में ही मिल जाता है। आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से भी यह एक महीना प्रत्येक साधक के लिए बहुत उपयुक्त सिद्ध हुआ।
साधना का महत्व इसलिए होता है कि इससे मानवीय दोषों का निवारण होता है। कठिन इसलिए होती है कि मनुष्य का दम्भ बढ़ने का भय बना रहता है।
साधना की दृष्टि से भी यह एक महीना प्रत्येक साधक के लिए बहुत उपयुक्त सिद्ध हुआ।
साधना प्रारम्भ होती है।
साधना, उपासना का वह अभ्यास करने लगा। आहार-विहार में उसने कठोरता और संयम प्रारम्भ किया। देह-दमन और तरह-तरह की यातनाएँ सहन करके देखीं, किंतु सुखों की कल्पना का वह सर्वथा त्याग नहीं कर सकता। कठोर तपश्चर्या के कारण भी उसकी वह इच्छा समाप्त न हुई तो लगा जैसे जीवात्मा मौलिक रूप से आनन्द प्राप्ति की कामना से ही इस संसार में अवतरित हुई है और जब तक उसकी यह आकाँक्षा सही रूप से तृप्त नहीं होती है तब तक उसके जीवन में हलचल, उद्यम और उद्योग बने ही रहते हैं।
साधना है। जो फल अनेक तरह की तपश्चर्याओं, साधनाओं, कर्मकाण्ड, उपासनाओं से प्राप्त होता है वह मनुष्य को सेवा के द्वारा सहज ही मिल जाता है। स्व. वल्लभ भाई पटेल ने कहा है “गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” गौतम बुद्ध ने यही कहा है- “जिसे मेरी सेवा करनी है वह पीड़ितों की सेवा करे।” सेवा के महान् व्रती बापू ने कहा था “लाखों गूँगों के हृदय में ईश्वर विराजमान हैं, मैं इन लाखों की सेवा के द्वारा ही ईश्वर की पूजा करता हूँ।
साधना कर सकेगा, अपने शारीरिक मानसिक प्रतिरोध को हाल कर सकेगा, जीवन विद्या के उपयुक्त प्रशिक्षण प्राप्त करेगा, प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ लेगा, ज्ञान प्राप्त करेगा और साथ ही गीता का मर्म समझकर आत्म कल्याण कर सकने तथा जन जागरण का उद्देश्य पूर्ण करने के लिये धर्म प्रचारक की भूमिका भी अदा कर सकेगा। अपने शिविरों को स्वर्ण सुयोग कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
साधनाओं के लिए बहुत ही उपयुक्त है। माघ स्नान का पुण्य फल प्रख्यात है। प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर पूरे एक महीने सहस्रों नर-नारी हर वर्ष माघ मास में ‘कल्पवास’ करते हैं। गीता शिक्षा चान्द्रायण तप, एवं गायत्री उपासना की यह त्रिवेणी भी कल्पवास के उपयुक्त ही है। आन्तरिक कायाकल्प और दूध-कल्प, छाछ-कल्प, शाक-कल्प, अन्न-कल्प आदि की योजनायें इस अवसर को सच्चे अर्थों में कल्पवास बना देंगी।
साधना है। यही उसके विकास का उत्तम मार्ग है। इसी से मनुष्य का जीवन लक्ष्य भी पूरा हो जाता है।
साधना स्वाध्याय संयम एवं पारलौकिक जीवन का अभ्यास करना पड़ता है तब उस शक्ति का अभ्युदय होना सम्भव हो सकता है।
साधना भी सतत् चलती रहनी चाहिये ताकि हमारे जीवन का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पहलू आँखों से ओझल न होने पाये। एक भाग अप्रकाशित ही न बना रहे इसके लिये विवेक की अखण्ड-ज्योति प्रत्येक मनुष्य के जीवन में जगमगाती ही रहनी चाहिये। हमारा हृदय इतना शुद्ध और पवित्र होना चाहिये कि प्रत्येक भावना का सूक्ष्मतर प्रत्युत्तर वह दे सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-December
साधना का अर्थ घर छोड़कर एकान्त में जाना अथवा अपने कर्त्तव्यों से विमुख हो जाना नहीं है, अपितु अपना कर्त्तव्य पालन करते हुए दिन भर किए जाने वाले अनावश्यक प्रलाप, हा-हा ही-ही, पर नियन्त्रण किया जाय। वाचाल वाणी और उच्छृंखल गति-विधियों पर अंकुश रखा जाय। वही किया जाय, वही बोला जाय, जो आवश्यक, उपयोगी और सर्व हितकारी हो। सत्य और मधुर वचन बोले जाएं। इससे गृहस्थ जीवन में रहते हुए अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए भी मौन की साधना की जा सकती है।
साधना में। सब सहारों की तरफ से दूसरों के सहयोग सहायता की आशा छोड़कर अपने आप पर भरोसा करें अपने अकेले को जीवन का आधार बनायें।
साधनाओं का उद्देश्य है। तृष्णा और वासनाओं के तूफान में मनुष्य की आध्यात्मिक आकाँक्षाएं धूमिल हो जाती हैं। अस्तु वह जीवन-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए न तो ध्यान दे पाता है और न प्रयत्न कर पाता है। आज के तुच्छ स्वार्थों में निमग्न लोभी मनुष्य भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए तत्पर नहीं होता। अहंकार और अदूरदर्शिता को यदि छोड़ा जा सके, अपने-पन का दायरा बड़ा बनाकर यदि लोक हित को अपना हित मानने का साहस किया जा सके तो इतने- से ही ईश्वर प्राप्ति हो सकती है।
साधना करने की क्षमता ही नहीं रहती, ऐसे लोगों में। इससे चरित्र की दृढ़ता, मन की सबलता स्वतन्त्र चिन्तन के लिए अत्यावश्यक है। जिस तरह गंगा को धारण करने के लिए—शिवजी जैसे सामर्थ्यवान् व्यक्तित्व की आवश्यकता हुई, ठीक इसी तरह अन्तराकाश से आने वाली वेगयुक्त विचार-गंगा को धारण करने के लिए सबल मस्तिष्क, सशक्त मन, बुद्धि की आवश्यकता होती है। चरित्रहीन व्यक्तियों को तो निस्संदेह दूसरों के विचारों का गुलाम बनना ही पड़ता है।
साधना है। शास्त्रों में इसे
साधनाओं को सफलता में सबसे बड़ी बाधा आत्मिक मलीनता की ही होती है। चान्द्रायणव्रत का आश्रय लेने पर अन्य उपासनाओं की सफलता वैसे ही अधिक संभावित हो जाती है जैसे खेत को भली प्रकार जोतने के बाद बोये गये बीज के उगने का विश्वास रहता है। जो लोग लम्बे समय में अपनी उपासना करते रहे हैं और आवश्यक लाभ न मिलने की शिकायत करते रहते हैं उन्हें चान्द्रायणव्रत के साथ वह साधना करने के उपराँत वैसी निराशा का कोई कारण नहीं रहता। गायत्री तपोभूमि जैसे पुण्य तीर्थ में रहकर की हुई गायत्री उपासना सोने में सुगन्ध का काम करती है फिर उसके साथ चान्द्रायणव्रत का समन्वय हो जाने पर तो उसे शुद्ध स्वर्ण के रत्नजटित आभूषण की तुलना दी जा सकती है। ऐसी साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।
साधना में आवश्यक भी है। उसका प्रयोग करना भी चाहिए। एकान्त शान्त स्थानों में चित विक्षेप नहीं पड़ते। किन्तु मौन का आधार बाह्य वातावरण नहीं अपितु अपना अन्तर-प्रदेश है। मौन का सम्बन्ध अन्तर से अधिक है।
साधना, तपश्चर्या एवं चिकित्सा की दृष्टि से चान्द्रायणव्रत-साधना का अपना विशेष महत्व है। उसे शरीर, मन और आत्मा को निर्मल बनाने का एक प्रभावशाली उपाय कहा जा सकता है। तपोभूमि में चलने वाले शिविरों में जीवन विद्या के प्रशिक्षण की जो व्यवस्था की गई है, वह इस व्रत साधना के महत्व को दूना चौगुना कर देती है। मोटर चलाने वाले उसकी मशीन तथा गतिविधियों के बारे में आवश्यक जानकारी सीखते हैं, पर कितने खेद की बात है कि मनुष्य शरीर जैसे बहुमूल्य यन्त्र को ठीक तरह प्रयोग करने की विद्या से प्रायः अनभिज्ञ ही बने रहते हैं। अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में बढ़िया मोटर भी जिस प्रकार दुर्घटना-ग्रस्त होती रहती है, उसी प्रकार हम जीवन में भी पग-पग पर असफलताओं एवं व्यथाओं की दुर्घटना देखते—सहते रहते हैं।
साधना प्रयास में लगे हुए व्यक्ति हमारे आध्यात्मिक प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी कहे जा सकेंगे।
साधना का प्रमुख कर्तव्य यही होना चाहिये कि हमारी मानसिक चेष्टायें पतनोन्मुख न हों। मन जितना उदात्त बनेगा, जीवन उतना ही विशाल बनेगा। सुख और शान्ति मनुष्य जीवन की इसके विशालता में ही सन्निहित हैं दुःख तो मनुष्य स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों के कारण पाता है।
साधना का कुछ विशेष महत्व भी है। इसलिये जिन्हें सुविधा हो वे इस अवसर पर मथुरा आ सकते हैं। इसके बाद 10-10 दिन के तीन शिविर ज्येष्ठ में भी होंगे। माघ से ज्येष्ठ के बीच में कोई शिविर नहीं है। लगातार हर महीने शिविर चलाने की व्यवस्था तो संभवतः अगले वर्ष से ही बन सकेगी।
साधना में ही नहीं लोक सेवा में भी समुचित अभिरुचि लेंगे। युग-निर्माण योजना इसी प्राथमिक परीक्षा के रूप में हमने अपने परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत की है। उस कसौटी पर खरे-खोटे सहज में परख में और पकड़ में आते चले जा रहे हैं।
साधना की जा सकती है। ऋषि परम्परा में इसी तरह मौन का पालन किया जाता रहा है। जिन्हें विशेष सुविधा अनुकूलता हो वे सप्ताह में माह में एक दिन या अधिक समय निश्चित समय मौन व्रत रख सकते हैं। मौनी अमावस्या का विधान तो इसी लिए रखा गया था। जिस किसी भी रूप में मौन की साधना हो सके अवश्य करनी चाहिए।
साधना माना गया है। समस्त वृत्तियों को एकाग्र करके जीवन की गति में सामञ्जस्य एवं समस्वरता प्राप्त कर जब मनुष्य चेतना की गहन अन्तरात्मा में प्रवेश करता है तो एक दिन वह विराट की उस परमसत्ता का साक्षात्कार करता है जिसे योगी, तपस्वी, मोक्षार्थी श्रेयार्थी सभी अपना लक्ष्य बनाकर कठिन साधनायें करते हैं। मौन मनुष्य के समक्ष जीवन, संसार और प्रकृति के रहस्यों को एक-एक कर खोल देता है। मौन की गति सर्वत्र ही होती है। इस तरह वह शीघ्र ही समस्त की अनुभूति, दर्शन प्राप्त कर लेता है।
साधना के महत्व को दूना चौगुना कर देती है। मोटर चलाने वाले उसकी मशीन तथा गतिविधियों के बारे में आवश्यक जानकारी सीखते हैं, पर कितने खेद की बात है कि मनुष्य शरीर जैसे बहुमूल्य यन्त्र को ठीक तरह प्रयोग करने की विद्या से प्रायः अनभिज्ञ ही बने रहते हैं। अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में बढ़िया मोटर भी जिस प्रकार दुर्घटना-ग्रस्त होती रहती है, उसी प्रकार हम जीवन में भी पग-पग पर असफलताओं एवं व्यथाओं की दुर्घटना देखते—सहते रहते हैं। यदि हमें जीना होता तो शरीर और मन का ठीक उपयोग जानते होते। गुण, कर्म, स्वभाव को व्यवस्थित बना सके होते तो निश्चय ही स्थिति उससे बहुत भिन्न होती जैसी कि आज है।
साधनायें करते हैं। मौन मनुष्य के समक्ष जीवन, संसार और प्रकृति के रहस्यों को एक-एक कर खोल देता है। मौन की गति सर्वत्र ही होती है। इस तरह वह शीघ्र ही समस्त की अनुभूति, दर्शन प्राप्त कर लेता है। मौन से दुष्प्रवृत्तियों का संयम होकर शील सदाचार, सादगी, सौजन्यता, सदाशयता जैसे महत्वपूर्ण सद्गुणों की प्राप्ति होती है।
साधना करने के उपराँत वैसी निराशा का कोई कारण नहीं रहता। गायत्री तपोभूमि जैसे पुण्य तीर्थ में रहकर की हुई गायत्री उपासना सोने में सुगन्ध का काम करती है फिर उसके साथ चान्द्रायणव्रत का समन्वय हो जाने पर तो उसे शुद्ध स्वर्ण के रत्नजटित आभूषण की तुलना दी जा सकती है। ऐसी साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।
साधना करनी होगी, तभी वह अपने अमूल्य वरदानों से हमें कृतार्थ कर सकेगी।
साधनाओं में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया है।
साधना का प्रयोजन सिद्ध करते हैं। ऐसे अवसरों पर भाषण को नहीं भावना को—उसके परिणाम को ही सत्य का आधार माना जाएगा।
साधना सभी उपासक करते हैं। पंचकोशी उपासना भी कितने ही लोग कर रहे हैं। यह शास्त्रीय विधान है जिसे बताना हमारे लिए आवश्यक ही था। कुछ विशेष उपलब्धियाँ इस क्षेत्र में ऐसी भी हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए साधकों को स्वयं तो प्रयत्न करना ही होगा, साथ ही हमारा प्रयास भी कम न होगा। दोनों मिलकर ही उसे सफलता एवं पूर्णता की मंजिल तक पहुँचा सकेंगे।
साधना का अपना विशेष महत्व है। उसे शरीर, मन और आत्मा को निर्मल बनाने का एक प्रभावशाली उपाय कहा जा सकता है। तपोभूमि में चलने वाले शिविरों में जीवन विद्या के प्रशिक्षण की जो व्यवस्था की गई है, वह इस व्रत साधना के महत्व को दूना चौगुना कर देती है। मोटर चलाने वाले उसकी मशीन तथा गतिविधियों के बारे में आवश्यक जानकारी सीखते हैं, पर कितने खेद की बात है कि मनुष्य शरीर जैसे बहुमूल्य यन्त्र को ठीक तरह प्रयोग करने की विद्या से प्रायः अनभिज्ञ ही बने रहते हैं। अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में बढ़िया मोटर भी जिस प्रकार दुर्घटना-ग्रस्त होती रहती है, उसी प्रकार हम जीवन में भी पग-पग पर असफलताओं एवं व्यथाओं की दुर्घटना देखते—सहते रहते हैं।
साधना से मनुष्य का अन्तर-बाह्य जीवन दिव्य बन जाता है।
साधना, के क्षेत्र में पश्चिम का अनुकरण करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें वहाँ के साहित्य का अध्ययन नहीं करना चाहिए यह तो किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिए आवश्यक है, किन्तु अपने मौलिक-साँस्कृतिक तथ्यों प्रेरणाओं को भुलाकर पश्चिम का अन्धानुकरण करना हमारी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है। इससे वह कमजोर होती है।
साधना इसी में होती है। जो लोग गृहस्थ जीवन को मौजमजा उड़ाने, इन्द्रिय-जनित सुखों को भोगने, में थोड़ा बहुत धन, प्रतिष्ठा आदि कमा लेने का अवसर समझते हैं वे इसके महत्व को कम करते हैं। इसके प्रति लापरवाही प्रकट करते हैं।
साधना दोनों ही हमारे कार्य क्षेत्र रहे हैं। हम जानते हैं कि जिनके कन्धों पर हम अपनी परम्परा को आगे ले चलने का उत्तरदायित्व सौंपें वे दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से निष्ठावान् हों। उपासना की भाँति ही उन्हें लोकसेवा में भी अभिरुचि हो। एकाँगी अभिरुचि वाले व्यक्ति हमारी दृष्टि से आधे अध्यात्मवादी हैं उन्हें एक टाँग का, एक हाथ का, एक आँख का, अर्धांग, बात पीड़ित ही कहा जायगा। फौज में डाक्टरी मुआयने में ‘फिट’ युवक ही भर्ती होते हैं।
साधना एवं सम शिक्षा के लिए अनुपम अवसर
साधना हो सके अवश्य करनी चाहिए।
साधना कर सकते हैं।
साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।
साधना उपासनाओं और व्रत तप साधनों के माहात्म्य धर्म ग्रन्थों में लिखे मिलते हैं। इनकी ओर हमारा उतना ध्यान नहीं जा पाता था पर अज्ञात वास से लौटने के बाद तपोभूमि में आने वाले साधकों की शारीरिक चिकित्सा में थोड़ी अभिरुचि लेनी जब शुरू की और प्राकृतिक चिकित्सा के संदर्भ में कुछ रोगियों को चान्द्रायणव्रत कराये तो उसके प्रतिफल को देखकर यह विश्वास बहुत बढ़ा कि यह तपश्चर्या आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं शारीरिक दृष्टि से भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक लोगों के विषय में तो अप्रत्यक्ष होने के कारण उन्हें संदेहास्पद भी कहा जा सकता है पर शारीरिक लाभ तो पूर्ण प्रत्यक्ष होने के कारण उनमें किसी प्रकार के सन्देह की भी गुंजाइश नहीं है। शरीर-शोधन की उसे एक अनुपम पद्धति कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
साधना के लिए सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण जो बात है,वह यह कि अपनी अन्तरात्मा की वाणी सुनें। हमारी आत्मा निरन्तर बोलती है, कहती है, हमें परामर्श देती है। उसे सुनने का यदि हम प्रयत्न करें तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी समस्याओं और शंकाओं का समाधान न कर सकें, हम अपना मार्ग न ढूँढ़ सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-January
साधना आरम्भ कर दी।
साधना की प्राथमिक आवश्यकता है। इसके अभाव में कोई भी तत्वज्ञान, आध्यात्मिक अनुभूति का अधिकारी नहीं है।” जीवन में सामान्य बातों से लेकर असाधारण सफलताओं के लिए व्यक्तित्व का ठोस, सबल और सर्वांगपूर्ण विकसित होना आवश्यक है। इसके बिना सफलता की आशा करना दुराशा मात्र ही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रहन-सहन, बोल-चाल, काम करने का तरीका आदि विभिन्न बातें व्यक्तित्व के अंग हैं।
साधना है।
साधना भी उसी अनुपात से समयसाध्य और कष्टसाध्य है बाल-बुद्धि के लोग यह आशा किया करते हैं कि कुछ ही दिन छोटा-मोटा कर्मकाण्ड करके उस स्थिति की सफलता प्राप्त कर लेंगे। बरगद का पेड़ बड़ा समृद्धिशाली और चिरस्थायी माना गया है पर उसके उगने, बढ़ने और फलने-फूलने की स्थिति तक पहुँचने में भी देर लगती है। उतावली में हथेली पर सरसों जमाने की बालक्रीड़ा उपहासास्पद ही सिद्ध होती है। योगाभ्यास की साधन विधियाँ भले ही बहुत कठिन न हों, पर उनके फलित होने लायक साधक की पूर्व भूमिका तो शुद्ध हो चुकनी ही चाहिये। यदि साधक का बाह्य जीवन-दूषित कलुषित, निष्कृष्ट एवं अस्त−व्यस्त रहा होगा तो उसे लौकिक समृद्धि सफलता एवं सुख-शान्ति भी प्राप्त न हो सकेगी, ऐसी दशा में आत्मबल एवं उच्च विभूतियों की उपलब्धि की आशा तो की ही कैसे जा सकती है?
साधना, रहस्यमयी एवं चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न करती है। उसका अवलम्बन लेकर मनुष्य अपना जीवनलक्ष्य प्राप्त करने के अतिरिक्त संसार की भी इतनी बड़ी सेवा कर सकता है जितनी बड़ी से बड़ी भौतिक क्षमता सम्पन्न व्यक्ति यों की सम्मिलित शक्ति यों के द्वारा भी सम्भव नहीं।
साधना विधि का महत्व औषधि के समान माना जाये तो जीवन को सुव्यवस्थित एवं सन्तुलित बनाये रखने की सावधानी को पथ्य कहा जा सकता है। पथ्य से रहने वाला, आहार-विहार की सावधानी बरतने वाला बिना औषधि के भी प्राकृतिक प्रयत्नों के आधार पर रोगमुक्त हो सकता है। किन्तु बहुमूल्य औषधि लेते रहने पर भी यदि कुपथ्य से रहा जाय तो रोग घटेगा नहीं, औषधि का लाभ निष्फल चला जायगा और कुपथ्य के कारण रोग उलटा बढ़ता चलेगा। इसलिए चिकित्साशास्त्री सदा से यही कहते आये हैं कि पथ्य मुख्य और औषधि गौण है। कोई चमत्कारी औषधि तत्काल कुछ लाभ दिखा भी दे तो भी कुछ समय बाद वह असर समाप्त होते ही फिर रोग घेर लेंगे।
साधना के अखण्ड घृत-दीप की प्रतीक पूजा इसी दिन स्थापित हुई थी। ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका भी उन्होंने इसी दिन निकाली।
साधना ही है। उसका प्रतिफल भी लौकिक सफलताओं एवं सुसंबद्धताओं के रूप में ही उपलब्ध होता है। इस सफलता के बाद उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधनाएँ सरल हो जाती हैं और उनकी सफलता में भी कठिनाई नहीं आती। जो साधक जप-तप तो बहुत करते है किन्तु लौकिक जीवन निकृष्ट बनाये रहते हैं उनको प्रायः निराश ही रहना पड़ता है।
साधना, स्वाध्याय संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
साधना का फल आकर्षक चमत्कारी एवं आश्चर्यजनक तो अवश्य है पर उसकी साधना भी उसी अनुपात से समयसाध्य और कष्टसाध्य है बाल-बुद्धि के लोग यह आशा किया करते हैं कि कुछ ही दिन छोटा-मोटा कर्मकाण्ड करके उस स्थिति की सफलता प्राप्त कर लेंगे। बरगद का पेड़ बड़ा समृद्धिशाली और चिरस्थायी माना गया है पर उसके उगने, बढ़ने और फलने-फूलने की स्थिति तक पहुँचने में भी देर लगती है। उतावली में हथेली पर सरसों जमाने की बालक्रीड़ा उपहासास्पद ही सिद्ध होती है। योगाभ्यास की साधन विधियाँ भले ही बहुत कठिन न हों, पर उनके फलित होने लायक साधक की पूर्व भूमिका तो शुद्ध हो चुकनी ही चाहिये। यदि साधक का बाह्य जीवन-दूषित कलुषित, निष्कृष्ट एवं अस्त−व्यस्त रहा होगा तो उसे लौकिक समृद्धि सफलता एवं सुख-शान्ति भी प्राप्त न हो सकेगी, ऐसी दशा में आत्मबल एवं उच्च विभूतियों की उपलब्धि की आशा तो की ही कैसे जा सकती है?
साधना क्षेत्र में प्रगति करने की वास्तविक इच्छा करने वालों के लिए शरीर और मन का शोधन आवश्यक है। धुले कपड़े पर ही ठीक तरह रंग चढ़ता है। तेल से चिकना, कालिख से गन्दा बना हुआ वस्त्र कीमती रंगों से भी ठीक तरह रंगा न जा सकेगा। यही नियम अध्यात्म मार्ग में भी चरितार्थ होता है। अन्नमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश, आनन्दमयकोश के अनावरण की पञ्चकोशी उच्चस्तरीय गायत्री उपासना का प्रशिक्षण गत तीन वर्षों से किया जा रहा है।
साधनाओं को भी निष्फल बना देती है। साधना के द्वारा आत्मबल प्राप्त करते हुए जीवन-लक्ष प्राप्त करने की स्थिति तक पहुँच सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव हो सकता है जिन्होंने उसकी प्रारम्भिक भूमिका के रूप में बाह्य जीवन को संतुलित बनाने में आवश्यक सफलता प्राप्त कर ली है। शरीर और मन को सुसंतुलित बना लेना, सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति यों को जागृत करके अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त करने की अपेक्षा कहीं सरल है। सरल कार्य में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त ही कठिन कार्यों का बोझ उठा सकना संभव होता है। प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं की पढ़ाई बिना कालेज में प्रवेश कैसे मिलेगा?
साधनाएँ सरल हो जाती हैं और उनकी सफलता में भी कठिनाई नहीं आती। जो साधक जप-तप तो बहुत करते है किन्तु लौकिक जीवन निकृष्ट बनाये रहते हैं उनको प्रायः निराश ही रहना पड़ता है।
साधनाओं से करना चाहिए। सामाजिक, शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में भी अध्यात्म का प्रयोग उसी प्रकार हो सकता है जैसे धर्म एवं उपासना के क्षेत्र में उस प्रयोग की प्रथा आजकल प्रचलित है। प्रकाश जिस चीज पर भी पड़ेगा वही चमकने लगेगी। आग के संपर्क में जो भी चीज आवेगी वही गरम हो जायगी। बर्फ का स्पर्श जिससे भी कराया जायगा वही ठण्डा होगा।
साधना क्षेत्र में भी लागू होती है। उपासना विधि एक-सी रहने पर भी प्रगति में बहुत भारी अन्तर पाया जाता है।
साधना के बिताये इसे कोई नहीं जानता। केवल लोग यह जानते हैं कि उसने शब्दकोष बनाकर बहुत बड़ा काम कर डाला। जब वह शब्दकोष प्रकाशित हुआ तो प्रकाशक ने उसका पारिश्रमिक बत्तीस हजार रुपया दिया जिसके उसकी आर्थिक स्थिति भी सुधरी और ख्याति भी प्राप्त हुई। सरकार ने भी उसके कार्य से प्रभावित होकर जीवन भर के लिए पेन्शन बाँध दी और रोटी की समस्या से छुटकारा मिल गया।
साधना से ऐसे उत्साहवर्धक अनुभव हुए हैं जैसे गिरि गुफाओं में दीर्घकाल से रहने वाले योगीजनों को भी नहीं हो पाते। किन्तु साथ ही ऐसे भी अनेक साधक हैं जिन्हें मन को एकाग्र करने की समस्या का हल भी अभी तक नहीं मिला है। लकीर पीटने की तरह वे कुछ करते तो रहते हैं पर न तो उन्हें प्रकाश मिलता है और न आनन्द ही आता है।
साधना में जब सफलता न मिली तो महर्षि उद्दालक ने सोचा- असफल होकर जीना क्या? निराहार रहकर मृत्यु का वरण करना चाहिए। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर मरण की साधना आरम्भ कर दी।
साधना भी निरर्थक सिद्ध होती है।
साधना
साधना ही शक्ति संवर्द्धन का प्रमुख आधार है। कर्म कैसा भी क्यों न हो अन्ततः वह कर्म है। सैनिक, व्यापारी, लेखक, उपदेशक, श्रमिक, मजदूर सभी अपने-अपने स्थान पर कर्मशील हैं। किसी कार्य को दृढ़ लगन, निष्ठा, सचाई से साथ-साथ दिल खोल कर करना, ‘कर्म साधना’ है जिससे शक्तियों के स्त्रोत खुलते जाते है। ये शक्ति स्त्रोत ही जीवन में सिद्धियाँ बन जाते हैं।
साधना के द्वारा आत्मबल प्राप्त करते हुए जीवन-लक्ष प्राप्त करने की स्थिति तक पहुँच सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव हो सकता है जिन्होंने उसकी प्रारम्भिक भूमिका के रूप में बाह्य जीवन को संतुलित बनाने में आवश्यक सफलता प्राप्त कर ली है। शरीर और मन को सुसंतुलित बना लेना, सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति यों को जागृत करके अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त करने की अपेक्षा कहीं सरल है। सरल कार्य में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त ही कठिन कार्यों का बोझ उठा सकना संभव होता है। प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं की पढ़ाई बिना कालेज में प्रवेश कैसे मिलेगा? कोई जबरदस्ती घुस भी पड़े तो उसे एम.ए. की परीक्षा देते समय अपनी अनधिकार चेष्टा पर पश्चाताप करना पड़ेगा।
साधना’ है जिससे शक्तियों के स्त्रोत खुलते जाते है। ये शक्ति स्त्रोत ही जीवन में सिद्धियाँ बन जाते हैं। ये सिद्धि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के वरदान प्राप्त कराती हैं। मनुष्य को समर्थ, शक्तिवान बनाती हैं।
साधनात्मक आनन्द एवं प्रगति से वञ्चित रहना पड़े तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।
साधना की जाय तो उससे भी अनेक सुख सुविधाओं की प्राप्ति सम्भव हो सकती है। आरम्भ हमें इन्हीं साधनाओं से करना चाहिए। सामाजिक, शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में भी अध्यात्म का प्रयोग उसी प्रकार हो सकता है जैसे धर्म एवं उपासना के क्षेत्र में उस प्रयोग की प्रथा आजकल प्रचलित है। प्रकाश जिस चीज पर भी पड़ेगा वही चमकने लगेगी। आग के संपर्क में जो भी चीज आवेगी वही गरम हो जायगी।
साधना के उपयुक्त पवित्र स्थान में यह व्रत किया जाय। वह स्थान आध्यात्मिक भावनाओं से परिपूर्ण होना चाहिए। अपनी दिनचर्या उन दिनों मौन, आत्म-चिन्तन, मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजन्य प्रभाव उत्पन्न न हो तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यवसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्त्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ तृष्णा क्रोध-वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-June
साधना करते हुए अपने को निर्मल बनाना चाहिए ताकि गायत्री उपासना का समुचित लाभ मिल सके। कपड़े पर रंग तभी ठीक चढ़ता है जब उसे पहले अच्छी तरह धो लिया जाय। मैला कुचैला कपड़ा रंग के महत्व को भी नष्ट कर देता है। अपनी दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को शोधन करते हुए जो साधना की जाती है उसका समुचित लाभ मिलता ही है। यह धैर्यपूर्वक साधना करने वालों के लिए ही संभव है।
साधना की भावना नहीं पनपती और ग्रहण किये गये व्रत या नियम के लिये ठीक तरह चरित्र का बल उत्पन्न नहीं होता, तब तक बाहर के व्रतों और नियमों का क्या मूल्य है? बाहरी व्रत और नियम तो आन्तरिक की रक्षा के लिये है, वे अन्दर की वस्तु की रक्षा करने वाली चहारदीवारी की तरह हैं। हमने अपने वास स्थानों में दीवारें खड़ी की हैं वे मिट्टी या पत्थर के रूप में खड़ी हैं। यदि उनके अन्दर कुछ भी नहीं है कोई व्यक्ति नहीं हैं कोई उपयोगी सामग्री नहीं है, केवल दीवारें ही दीवारें हैं, तो उनका क्या मूल्य है? दीवारों का मूल्य तभी है जब वहाँ सम्पत्ति बिखरी हो और आदमियों की चहल-पहल हो।
साधना का सत्परिणाम मिलना ही चाहिए। विलम्ब होते देखकर किसी साधक को अधीर नहीं होना चाहिये।
साधना से उपासना की तरह ही लोकहित के आयोजनों में समय लगाना भी आवश्यक है। यह उभय विधि प्रशिक्षण एक वर्ष की अवधि में जो प्राप्त किया जायेगा उसे भावी जीवन में निष्ठापूर्वक करते रहने से मानव शरीर को सार्थक बनाने और लक्ष्य को प्राप्त करने का भी सहयोग बन सकता है।
साधना भी समयानुसार ही फलित होती है। पूर्व संचित दुष्कर्मों को शुद्ध करने में जो समय अभीष्ट है उसके पूरा हो जाने पर ही सफलता की प्राप्ति हो सकती है।
साधना, तपश्चर्या एवं पुण्य परमार्थ से किसी भी प्रकार कम श्रेयस्कर न होगा।
साधना, सच्चे आदर्शों पर आधारित साधना सहज ही पूरी होती है। भगवान शंकर उनके तप से प्रसन्न हुए और चाण्डाल के रूप में उन्हें दर्शन दिया। शंकराचार्य नदी में स्नान करके वापिस लौट रहे थे कि मार्ग में एक चाण्डाल में उन्हें छू दिया। इस पर वे कुपित होने लगे। चाण्डाल ने नम्रतापूर्वक पूछा-भेद-बुद्धि तक का आप त्याग न कर सके तो त्यागी कैसे कहलाते हैं?
साधना का ही सिद्ध होगा। सत्कर्म करने की स्थिति प्रत्येक आयु में-प्रत्येक आश्रम में रहती है। व्यक्तिगत जीवन के भौतिक उत्कर्ष के साथ-साथ आत्म-कल्याण एवं लोकहित के पारमार्थिक कार्य भी चलते रह सकते है। संसार के अधिकाँश महापुरुषों ने अपने गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए युवावस्था में भी जनहित के महत्वपूर्ण कार्यों का सम्पादन किया है।
साधना। जब तक सद्गुण न बढ़ेंगे, आत्म-शोधन का प्रयत्न न चलेगा तब तक पूजा अर्चना की प्रक्रिया एक विडम्बना ही बनी रहेगी।
साधना सामग्री, अनुकूल परिस्थिति एवं जन सहयोग को सहज ही प्राप्त कर लेता है, किन्तु जो दोष, दुर्गुणों से भरा पड़ा है, उसकी सम्पदा और साधना सामग्री भी देर तक ठहर न सकेगी। लक्ष्मी कुपात्रों के पास नहीं रहती इसी प्रकार ओछे लोगों को सच्चे मित्रों और सहायकों से भी वंचित रहना पड़ता है।
साधना में लगा है वह क्षत्रिय, जिसने समृद्धि की अभिवर्धन में मन लगाया वह वैश्य और जो श्रम देवता का अनुष्ठान करके इस गंदे, अव्यवस्थित एवं कुरूप संसार को सुन्दर बनाने का तप कर रहा है वह तपस्वी शूद्र कहलाता है। यह विशुद्ध कर्म विभाजन है, इसमें ऊंच-नीच की क्या बात हुई? एक ही परिवार के कई व्यक्ति कई तरह का काम करते हैं। उनमें से कोई ऊंच-नीच नहीं होता। वृद्ध पिता जी पूजा पाठ एवं कथा वार्ता एवं समाज सेवा में लगे रहते हैं वे ब्राह्मण हुए, एक लड़का सेना में हवलदार है वह क्षत्रिय हुआ, दो लड़के दुकान चलाते हैं वे वैश्य हुए, स्त्रियाँ घर का काम-धंधा, रोटी चौका का प्रबंध करती हैं वे शूद्र हुई।
साधना का आधार है। गीताकार ने कहा है-
साधना करनी पड़ती है।
साधना करते हैं पर पूर्व जन्मों का और इस जन्म का पाप भार इतना अधिक होता है कि उसकी सफाई हुए बिना कोई विशेष आध्यात्मिक प्रकाश प्राप्त होना संभव नहीं होता। आतुरता में हम जब अभीष्ट परिणाम नहीं देखते तो निराश हो उठते हैं। यह अधीरता उन लोगों के लिए उचित नहीं जो आत्मकल्याण का महान लक्ष्य लेकर साधना पर अग्रसर हुए हैं। इस आत्म-शोधन की साधना करते हुए अपने को निर्मल बनाना चाहिए ताकि गायत्री उपासना का समुचित लाभ मिल सके। कपड़े पर रंग तभी ठीक चढ़ता है जब उसे पहले अच्छी तरह धो लिया जाय।
साधना से प्रसन्न होकर वर देने आये हैं। माधवाचार्य ने कहा- विश्वास नहीं होता, इसलिए कृपा कर सामने उपस्थित हूजिए और दर्शन दीजिए ताकि मैं वस्तु स्थिति को समझ सकूँ।
साधना थी। रात को चलना और दिन में काम करना यही उनका तरीका था। रात में चलने के खतरे की ओर से जब लोग उन्हें आगाह करते थे तो वे यही कहते- डरने से मरना अच्छा। जो मुसीबत रात को अंधेरे में आ सकती है वह दिन में न आवेगी, इसका क्या भरोसा।
साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधन करो। विधि मैं बता दूँगा।
साधना पर अग्रसर हुए हैं। इस आत्म-शोधन की साधना करते हुए अपने को निर्मल बनाना चाहिए ताकि गायत्री उपासना का समुचित लाभ मिल सके। कपड़े पर रंग तभी ठीक चढ़ता है जब उसे पहले अच्छी तरह धो लिया जाय। मैला कुचैला कपड़ा रंग के महत्व को भी नष्ट कर देता है। अपनी दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को शोधन करते हुए जो साधना की जाती है उसका समुचित लाभ मिलता ही है।
साधना में यह बात नहीं है। उससे लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन है। पर मिलता जल्दी है। जिन्हें धैर्य नहीं, उन आतुर लोगों के लिए जल्दी लाभ दिखाने वाली ताँत्रिक साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधन करो।
साधनाओं की रक्षा के लिये ही बाहर के क्रियाकाण्ड के दीवारें हमको खड़ी करनी है। जीवन में यदि तत्व है, सत्य है, भीतर में चरित्र बल है, आध्यात्मिक बल है तो उनके द्वारा भी हमारे आन्तरिक जीवन की रक्षा होगी। कभी-कभी ऐसा होता है कि अन्दर का घर खाली है, भीतर कुछ भी नहीं है किन्तु बाहर बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी हैं। ऐसे स्थान में सिवाय भ्रम के कुछ नहीं होता। पर अन्दर यदि चरित्र बल है और बाहर-व्रत, नियम, उपवास आदि है, तो वे भी बहुमूल्य माने जायेंगे।
साधना की जाती है उसका समुचित लाभ मिलता ही है। यह धैर्यपूर्वक साधना करने वालों के लिए ही संभव है। फल, समय पर ही आता है। उतावली करने से भी पौधा अपनी क्रमिक गति से ही बढ़ता है। साधना भी समयानुसार ही फलित होती है।
साधना का अन्तिम अध्याय पूर्ण करें।
साधना करने लगे। अघोरी ने उन्हें बता दिया था कि श्मशान में रहने वाली दुष्ट आत्मा उन्हें भय एवं प्रलोभन के दृश्य दिखा कर साधना भ्रष्ट करने का प्रयत्न करेंगी, सो वे किसी की ओर ध्यान न देते हुए अपने कार्य में एकनिष्ठ भाव से लगे रहें। माधवाचार्य वही करने लगे। रोज ही उन्हें डरावने और प्रलोभन भरे आकर्षण दिखाई देते पर वे उनसे तनिक भी विचलित न होते। इस प्रकार उन्हें एक वर्ष बीत गया।
साधनायें हैं वे बहुमूल्य गुणों के रूप में होनी चाहिये। इन साधनाओं की रक्षा के लिये ही बाहर के क्रियाकाण्ड के दीवारें हमको खड़ी करनी है। जीवन में यदि तत्व है, सत्य है, भीतर में चरित्र बल है, आध्यात्मिक बल है तो उनके द्वारा भी हमारे आन्तरिक जीवन की रक्षा होगी। कभी-कभी ऐसा होता है कि अन्दर का घर खाली है, भीतर कुछ भी नहीं है किन्तु बाहर बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी हैं। ऐसे स्थान में सिवाय भ्रम के कुछ नहीं होता।
साधना में सफलता उसी को मिलती है जो अपना आत्मशोधन करने के लिए प्रायः प्रारंभ से प्रयत्न करता है। ऐसे साधकों की थोड़ी-सी उपासना भी उन्हें उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। इसके विपरीत यदि अन्तःकरण पाप अंक में डूबा रहा तो भजन से भी कुछ काम न चलेगा।
साधना
साधनात्मक कर्मकाण्ड आवश्यक है पर अन्तःशुद्धि के बिना वह निष्प्राण ही बना रहता है। कितने ही व्यक्ति जीवन भर भजन पूजन करते रहते हैं पर अपने दोष दुर्गुणों को सुधारने की ओर ध्यान नहीं देते। काम, क्रोध, लोभ, मोह में उनका मन घटिया श्रेणी के लोगों की तरह ही डूबा रहता है। स्वार्थपरता और संकीर्णता उन्हें बुरी तरह घेरे रहती है। दोष और दुर्गुणों से मन भरा रहता है।
साधना करने वालों के लिए ही संभव है। फल, समय पर ही आता है। उतावली करने से भी पौधा अपनी क्रमिक गति से ही बढ़ता है। साधना भी समयानुसार ही फलित होती है। पूर्व संचित दुष्कर्मों को शुद्ध करने में जो समय अभीष्ट है उसके पूरा हो जाने पर ही सफलता की प्राप्ति हो सकती है।
साधना, स्वाध्याय, व्यायाम आदि द्वारा आत्म-विकास करें और एक घंटा नित्य अपने परिवार को सुशिक्षित एवं विचारशील बनाने के लिए गोष्ठी का कार्यक्रम चलाया करें। घर का कोई वयस्क व्यक्ति ऐसा न बचे जो अखण्ड-ज्योति पढ़ता या सुनता न हो। घर के लोगों को और अपने को आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते रहने की समाज-सेवा तो हर परिजन के जिम्मे आई है। इसे अधिकाँश सदस्य पूरा कर रहे हैं जिसने अभी शिथिलता बरती है उनसे जल्दी इस क्रम को आरंभ कर देने की आशा की जाती है।
साधना में आवश्यकता है उसी प्रकार उपासक को अपनी मनोभूमि शुद्ध रखने का भी प्रयत्न करना चाहिए। कहा भी है-
साधना सामग्री भी देर तक ठहर न सकेगी। लक्ष्मी कुपात्रों के पास नहीं रहती इसी प्रकार ओछे लोगों को सच्चे मित्रों और सहायकों से भी वंचित रहना पड़ता है।
साधना सहज ही पूरी होती है। भगवान शंकर उनके तप से प्रसन्न हुए और चाण्डाल के रूप में उन्हें दर्शन दिया। शंकराचार्य नदी में स्नान करके वापिस लौट रहे थे कि मार्ग में एक चाण्डाल में उन्हें छू दिया। इस पर वे कुपित होने लगे। चाण्डाल ने नम्रतापूर्वक पूछा-भेद-बुद्धि तक का आप त्याग न कर सके तो त्यागी कैसे कहलाते हैं?
साधना का एक आवश्यक अंग है।
साधना चरित्र के लिए अपेक्षित है। चरित्र कोई कल्पना नहीं। यह तो जीवन का जगमगाता सूर्य है। राम के कर्त्तव्य पालन में, भरत के त्याग-तप में, मीरा के प्रेम से, हरिश्चन्द्र के सत्यव्रत में, दधीचि के दान में कृष्ण के अनासक्ति योग में चरित्र की पूर्णता के दर्शन होते हैं। चरित्र जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है जिसके अभाव में एक कदम भी जीवन की गति आगे नहीं बढ़ सकती।
साधना भ्रष्ट करने का प्रयत्न करेंगी, सो वे किसी की ओर ध्यान न देते हुए अपने कार्य में एकनिष्ठ भाव से लगे रहें। माधवाचार्य वही करने लगे। रोज ही उन्हें डरावने और प्रलोभन भरे आकर्षण दिखाई देते पर वे उनसे तनिक भी विचलित न होते। इस प्रकार उन्हें एक वर्ष बीत गया।
साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान कर दिया। अब आप नये सिरे से पुनः उसी उपासना को आरंभ कीजिए। सफलता मिलेगी। प्रसन्न मन माधवाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये। उन्होंने पुनः गायत्री उपासना आरंभ की और फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ।
साधना पिछले 13 सालों के पापों का शमन करने में लग गई। जब तक दुष्कर्मों से उत्पन्न कुसंस्कार दूर नहीं हो जाते तब तक गायत्री उपासना उसी की सफाई में खर्च होती रहती है। आपकी विगत गायत्री साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान कर दिया। अब आप नये सिरे से पुनः उसी उपासना को आरंभ कीजिए। सफलता मिलेगी।
साधना में किसी भी प्रकार कम नहीं है। जिसने यह आदर्श स्वीकार कर लिया है और जो लोक-सेवा का परमार्थ करने के लिए घर से बाहर भी कुछ समय देने लगे हैं उन्हें अखण्ड-ज्योति परिवार का ‘शाखा संचालक’ कहा जाता है।
साधना”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-September
साधना यदि सच्ची हो, सच्चे उद्देश्य से की गई हो तो उसका परिणाम यह होना ही चाहिए कि उपासक के मन में प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगे वह प्राणी मात्र को अपनी आत्मा में और अपनी आत्मा को प्राणिमात्र में देखे। दूसरों का दुःख उसे अपने निज के दुःख जैसा कष्टकारक प्रतीत हो और दूसरों को सुखी, समुन्नत देखकर अपनी श्री समृद्धि की भाँति ही सन्तोष का अनुभव करे। प्रेम का अर्थ है -- आत्मीयता और उदारता। जिसके साथ प्रेम भाव होता है उसके साथ त्याग और सेवापूर्ण व्यवहार करने की इच्छा होती है। प्रेमी अपने को कष्ट और संयम में रखता है और अपने प्रेमपात्र को सुविकसित, सुन्दर एवं सुरम्य बनाने का प्रयत्न करता है।
साधना का एक अंग है। अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापना एक ही रथ के दो पहिये होते हैं। दोनों का क्रम चक्र ठीक चलते रहने से सृष्टि का सन्तुलन ठीक रहता है इसलिए धर्म की रक्षा के लिए एक उपाय पर निर्भर न रहकर दोनों का ही अवलम्बन करना चाहिये। परशुराम की धर्म - संघर्ष - वृत्ति अनुचित तनिक भी नहीं। उसमें आदि से अन्त तक औचित्य ही भरा पड़ा है।
साधना का चिन्तन और मनन का, तप और आदर्श का मूर्तिमान प्रतिफल ही कहे जा सकने योग्य है।
साधना स्थल है। सेवा-शुश्रूषा, पालन-पोषण, शिक्षण एक दूसरे के प्रति प्रेम, त्याग, सहिष्णुता के माध्यम से मनुष्य की कामशक्ति संस्कारित, निर्मल होकर मनुष्य को व्यवस्थित संगत, दिव्य बनाने का आधार बन जाती है।
साधना में चार चाँद लग गये।
साधनात्मक
साधना में लग जाना चाहिए। इस प्रकार की परिस्थिति वालों को तपोभूमि सादर आमन्त्रित करती है। सभी शिक्षार्थी निवास की सुविधा प्राप्त कर सकेंगे, पर उन्हें अपनी भोजन व्यवस्था स्वयं करनी होगी।
साधना ही उनका लक्ष्य बन गया। छोटी आयु में ही उनकी कविताएं प्रकाशित होने लगीं। कविताएं ही नहीं, नाटक, उपन्यास और निबन्ध भी उन्होंने लिखने आरम्भ किये। मनोयोग, अध्ययन और सदुद्देश्यपूर्वक लिखी गई उनकी रचनाएं सम्मान प्राप्त करने लगीं। यौवन के द्वार में प्रवेश करते-करते उनने बहुत कुछ लिख डाला ।
साधना की एक रचनात्मक प्रयोगशाला है। मनुष्य की काम वासना को पति-पत्नी में एक दूसरे के प्रति कर्त्तव्य, निष्ठा, प्रेम में परिवर्तित कर कामोपभोग को एक साँस्कृतिक संस्कार बनाकर सामाजिक मूल्य में बदल देना गृहस्थाश्रम की ही देन है। स्मरण रहे गृहस्थाश्रमी शरीर-निष्ठ अथवा रूप-निष्ठ नहीं होता। कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व, प्रेम की निष्ठा ज्यों-ज्यों बढ़ती है, शारीरिकता नष्ट होने लगती है और क्रमशः पूर्णरूपेण शारीरिकता का अन्त होकर उक्त दिव्य आधार मुख्य हो जाते हैं। कामुकता भी नष्ट हो जाती है।
साधना में लगाता है, इसे कई सूक्ष्म शक्तियों में परिवर्तित कर कला, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, आदि का सृजन करने लगता है।
साधना-अभ्यास किया जाता है। आर्थिक क्षेत्र में मितव्ययिता के अभ्यास से मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी अपनी विभिन्न शक्तियों का सदुपयोग करता है। यह ध्रुव सत्य है कि आर्थिक क्षेत्र में अपव्ययी स्वभाव वाला व्यक्ति आध्यात्मिक, नैतिक, धार्मिक क्षेत्रों में भी संयमी और अपनी शक्तियों का सदुपयोग करने वाला रहे, इसकी सम्भावना कम ही है। मितव्ययिता जहाँ हमारी आर्थिक व्यवस्था को दृढ़, समर्थ बनाती है, वहाँ हमारे मानस पटल पर भी ऐसे संस्कार छोड़ती है, जिसके द्वारा हम सर्वत्र ही अपने जीवन धन का, अपनी शक्तियों का सही सही उपयोग कर सकें।
साधना है, जिससे आत्म बल प्राप्त होता है। निर्भीकता, दृढ़ता, साहस, पवित्रता, त्याग, सत्यनिष्ठा और कर्त्तव्य- भावना का आधार शुद्ध और पवित्र प्रेम है। इसे अपने जीवन में धारण करने वाला पुरुष मानव न रहकर महामानव और देवता बन जाता है। जाति का जीवन खिल उठता है। ऐसे कर्त्तव्य - निष्ठ नागरिकों के बाहुल्य से ही राष्ट्रों के हित फलते फूलते रहते हैं।
साधना। भोगों के पथ पर चलकर शक्ति का, महानता का, विश्वास का पथ संधान नहीं किया जा सकता। यह उतना ही सत्य है जितना छिद्र युक्त घड़े में पानी का संचय नहीं किया जा सकता। संयम को छोड़कर अन्य कोई मार्ग नहीं है अपने उत्कर्ष का, जीवन का, महानता का, सुख का, शांति का।
साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता।
साधना करने का यह जो शान्तिमय वातावरण है, वह वृद्धावस्था के उद्देश्यों को पूरा करके पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। अब तपोभूमि में स्थान सम्बन्धी जो नई सुविधा हो गई है, वह घर से निवृत्त हो जाने वालों के लिए बहुत ही सुविधाजनक है। जो अपने खर्च की व्यवस्था घर से चला सकते हों, उन वयोवृद्धों को मथुरा आकर अपना जीवन सफल बनाने की साधना में लग जाना चाहिए। इस प्रकार की परिस्थिति वालों को तपोभूमि सादर आमन्त्रित करती है। सभी शिक्षार्थी निवास की सुविधा प्राप्त कर सकेंगे, पर उन्हें अपनी भोजन व्यवस्था स्वयं करनी होगी।
साधना की। कला को कला के लिए सीमित नहीं रखा जा सकता। उसे सत्यं, शिवं, सुंदरं की सेवा के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए। इस तथ्य को उन्होंने मूर्तमान करने के लिए जो तपस्या की उसे चिर-काल तक भुलाया न जा सकेगा।
साधना करने का प्रतिफल कुछ दूसरी ही तरह का होगा। आत्म-बल बढ़ने और अन्तःकरण पर चढ़े हुए, कषाय कल्मषो का शमन करने के लिए यह एक महीना किसी के लिए भी बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।
साधनायें वह कैसे कर सकेगा? और तो और कमजोर की तो दैव भी सहायता नहीं करता। नीतिकार ने कहा है--”देवोऽपि दुर्बल घातकः” कमजोर को तो देवता भी मारता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-October
साधना—दूरवर्ती स्थिर फल देने वाली श्रेय-योजना ही सन्निहित होनी चाहिए। जीवन की यही सर्वोत्कृष्ट नीति हो सकती है। इसी में मानव जीवन की सफलता और सार्थकता मानी जा सकती है। प्रेमी स्वभाव बनाने की साधना को ही ईश्वरभक्ति या पूजा अर्चा कहते हैं। इस उद्देश्य में हम जितने ही सफल होते जाते हैं ईश्वर उतना ही हमारे निकट खिंचता चला आता है।
साधना का यह एक महत्वपूर्ण अभ्यास है।
साधना में लगाने का क्रम बनाया। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित अगणित लोग उनके पास आते और उनकी शिक्षाएँ प्राप्त करके अपना पथ निर्धारित करते। उनके घर में सत्संग का क्रम चलता ही रहता। जूते बनाते हुए भी वे धर्म चर्चा करते रहते।
साधना के अभ्यासियों को प्रथम वर्ष में गायत्री को अपनी माता मानकर उसकी गोदी में एक वर्ष के छोटे बालक की तरह क्रीड़ा करते, अपने मातृ प्रेम का और माता के वात्सल्य के भाव स्मरण करते हुए आनंद में आह्लादित होने का अभ्यास कराया गया है।
साधना का आवश्यक अंग है।
साधना है। साधना का केन्द्र-बिन्दु इसी प्रयास एवं पुरुषार्थ को कहा जाता है।
साधना में एक सीमा तक सहायता मिल सकती है पर एकाग्रता को ही मन को जीतना कहा जाय तो यह वज्र-मूर्खता से कम भ्रान्ति न होगी।
साधना के अभ्यास में उतनी ही सहायता मिलेगी। मनोमय कोश के परिष्कार की यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं उत्कृष्ट साधना है। उपासकों को इसे पूरी श्रद्धा के साथ अपनाना चाहिए।
साधना इसी स्तर की विभूति है, जो इसे अपनाता है, वह धन्य हो जाता है।
साधना करने वाले नैष्ठिक साधकों को बताये गए थे। इन तीनों को एक-एक वर्ष किया जाना था। साधकों ने वैसा ही किया भी है।
साधना और कहीं देखने को नहीं मिलती। संसार में सब से अधिक अवतार (युग पुरुष) दार्शनिक,ऋषि-मुनि, सन्त-महात्माओं की उपज हमारी इस स्वतन्त्र बुद्धि-निष्ठा और ज्ञान से प्रति स्वतन्त्र चिन्तन का ही परिणाम है।
साधना का विस्तृत स्वरूप था।
साधना का पाठ्यक्रम है। इसे जो जितने उत्साहपूर्वक अपनायेगा, उसे आत्मिक प्रगति की दिशा में गायत्री की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना के अभ्यास में उतनी ही सहायता मिलेगी। मनोमय कोश के परिष्कार की यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं उत्कृष्ट साधना है। उपासकों को इसे पूरी श्रद्धा के साथ अपनाना चाहिए।
साधना जरथुस्त्र की, कन्फ्यूशियस की अमर उपदेश-माला का वितान॥डडडडडड;
साधना की होगी। उस ज्ञान की—जिसके कारण समस्त संसार भारत को सभ्यता का सूर्य, ज्ञान विज्ञान का देश मानते रहे, जिसके बल पर भारत जगद्गुरु कहलाया।
साधना द्वारा ही पूर्णता तक पहुँचने का अलंकारिक संकेत छिपा हुआ है।
साधना में प्रबुद्ध साहित्य के स्वाध्याय का महत्वपूर्ण स्थान है।
साधना का क्रम
साधना क्रम में बाधा ही पड़ेगी। सामूहिक जल पात्रों में जहाँ हर कोई मन माने ढंग से बिना हाथ धोये पानी भरता पीता है, काँच के गिलास बिना माँजे धोये काम में आते रहते हैं, वहाँ तभी पानी पीना चाहिए जब उसके बिना काम न चलता हो। होटलों की चाय दुहरी हानि पहुँचाती है। चाय का नशा तो हानिकारक है ही। होटलों की गन्दगी उसमें “गिलोय नीम चढ़ी” की उक्ति चरितार्थ करती है।
साधना क्रम की ही चर्चा करनी है। गत तीन वर्षों से हर अक्टूबर मास की अखण्ड-ज्योति में एक वर्ष का साधना क्रम छापते रहे हैं। साधकों ने इस मार्ग पर चलते हुए आशातीत लाभ भी उठाया हैं। तीन वर्ष से चलते हुए उस साधना क्रम का यह चौथा वर्ष इस अक्टूबर मास से आरम्भ होना है। अस्तु अगले वर्ष का पाठ्यक्रम ही इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया जायगा।
साधना मात्र है, जिसे मैस्मरेजम विद्या के ज्ञाता त्राटक आदि की सहायता से बड़ी आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। हिसाब जोड़ने वाले मुनीम, निशाना साधने वाले बन्दूकची, मैस्मरेजम का खेल दिखाने वाले बाजीगर, सरकस में खेल करने वाले नट, शोध करने वाले वैज्ञानिक इस कला में निष्ठगत होते हैं, उनको अपना मन एक दिशा में लगा देने की सिद्धि मिली हुई होती है। यदि ऐसे लोग चाहें तो ईश्वर की अमुक छवि पर घन्टों ध्यान लगाये आसानी से बैठे रह सकते हैं। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि उनका मन संग्रहीत हो गया और वे मोक्ष के अधिकारी हो गये। माना कि एकाग्रता भी मन की एक सफलता है और उससे ध्यान साधना में एक सीमा तक सहायता मिल सकती है पर एकाग्रता को ही मन को जीतना कहा जाय तो यह वज्र-मूर्खता से कम भ्रान्ति न होगी।
साधना का मार्ग छोड़ बैठे। आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व जो तथ्य थे, ज्ञान का जो विकास हुआ था उसे ही हम लोग गले से लटकाये फिरने लगे। परिणाम यह हुआ कि हम ज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ गये और बँधी बँधायी लकीर ही पीटते रहे। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पूर्वज ऋषियों के उत्तराधिकार को पूरा-पूरा निभायें और ज्ञान की खोज, बुद्धि की साधना का क्रम शुरू करें। भारत और भारतीय संस्कृति की यदि कोई विशेषता है तो वह यही है ज्ञान की उपासना-और उससे नई खोज नई शोध प्रस्तुत करना।
साधना की उपज, बुद्धि निष्ठा का फल कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी।
साधना विश्वात्मा का भाव दर्शन और उसकी सत्कर्मों द्वारा पूजा करने की है। उसे जो जितनी सच्चाई एवं श्रद्धा के साथ करेगा, उसे उसी अनुपात से आत्म-संतोष आत्मानन्द की प्राप्ति होगी।
साधना करनी पड़ती है। जिन लोगों की उपासना नित्य कर्म तक सीमित है, वे थोड़ा जप नित्य करके भी काम चला सकते हैं, पर जिन्हें आत्म-साक्षात्कार की पूर्ण कक्षा तक पहुँचना है, उन्हें गायत्री योग के अंतर्गत पञ्चकोशी उपासना को भी अपनाना ही पड़ता है। गायत्री माता की पाँच मुख वाली आकृति कल्पना के पीछे भी पञ्चकोशों की साधना द्वारा ही पूर्णता तक पहुँचने का अलंकारिक संकेत छिपा हुआ है।
साधना में ही व्यतीत हुआ। स्वतंत्रता सैनिक के रूप में भी और ज्ञान गंगा के अवतरण में संलग्न तपस्वी के रूप में वे एक ही लक्ष्य में निरन्तर लगे रहे। भारत माता अपने अरविन्द जैसे सच्चे सपूतों पर ही गर्व कर सकती है, ऐसे लोगों को जन्म देने से ही उसका गौरव बढ़ सकता है।
साधना भी आवश्यक होती है। पिछले वर्षों एक-एक ही प्रकार के प्राणायामों का अभ्यास करना होता था। इस वर्ष तीनों का सम्मिश्रित स्वरूप पाँच मिनट—कुल मिलाकर पन्द्रह मिनट करना होगा। विगत तीन वर्षों के तीनों प्राणायामों का उल्लेख यहाँ फिर किया जाता है, जिससे कि नये साधकों को उनका स्वरूप समझने और साधक क्रम आरम्भ करने में सुविधा हो।
साधना का परिणाम है। इसीलिए गायत्री को वेद माता कहा गया है। भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के मूल स्रोत-आधार वेद अर्थात् ज्ञान हैं और ज्ञान बुद्धि की देन है। अस्तु हमारी समस्त जीवन पद्धति का सञ्चालन बुद्धि के द्वारा होता आया है। कौटिल्य ने कहा है “जिस मनुष्य की बुद्धि का विकास नहीं होता अथवा जो बुद्धि द्रोही या अविवेकी होता है वह मनुष्यता से गिर जाता है।
साधना की ओर मुड़ी। उन्हें लगा कि उथले व्यक्तित्व, बुद्धि कौशल और शारीरिक धमा चौकड़ी मात्र से कोई बड़ा काम नहीं कर सकते। बड़ा काम आत्मबल द्वारा ही सम्पन्न होता है और आत्मबल की प्राप्ति के लिए आत्म-चिन्तन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास आवश्यक हैं। ‘व्यक्ति को अपना व्यक्तित्व समष्टि की सत्ता में समर्पित करना चाहिए।’ इस लक्ष्य को लेकर वे पाण्डिचेरी गये और व्यक्ति गत स्वार्थ के लिए नहीं, विश्व-मानव के पुनरुत्थान के लिए वैसा ही तप करने लगे जैसा कि भगीरथ ने गंगा को लाने के लिए किया था।
साधना क्रम छापते रहे हैं। साधकों ने इस मार्ग पर चलते हुए आशातीत लाभ भी उठाया हैं। तीन वर्ष से चलते हुए उस साधना क्रम का यह चौथा वर्ष इस अक्टूबर मास से आरम्भ होना है। अस्तु अगले वर्ष का पाठ्यक्रम ही इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया जायगा।
साधना से शक्ति संचारक साधना क्रम का विशेष महत्व है। इस साधना के माध्यम से हिमालय स्थित गायत्री के परम सिद्ध देवपुरुषों की शक्ति एवं सहायता प्राप्त की जा सकती है। इस साधना क्रम में भी कोई विशेष परिवर्तन इस वर्ष नहीं है।
साधना नहीं है। हाथी के पैर के सामने जिस प्रकार सब छोटे हैं, उसी प्रकार सब साधन ब्रह्मचर्य में विलीन हो जाते हैं। एक गुलाम को उनकी तुलना में अधिक सम्मान मिले। ईसप से जल-भुन कर उन्होंने तरह-तरह के षड़यंत्र करने आरंभ कर दिये। एक दिन जब ईसप कहीं गये हुए थे तो उनके बिस्तर में राजा की एक कीमती सुराही छिपा कर रख दी गई और उन्हें पुलिस से पकड़वा कर न्यायालय में उपस्थित किया गया।
साधना में पेय पदार्थों की ओर कदम बढ़ाया जाना चाहिए। जो खाते हैं वही नहीं, वरन् जो पीते हैं, वह भी अन्न है। हमारा पेय शुद्धता युक्त हो। पीने का पानी शुद्ध बर्तन में हो, छना हुआ और ढका हुआ रहे, हाथ धोकर उसे लिया जाय और मंजे हुए शुद्ध बर्तन में पिया जाय। पीते समय एक साथ गट-गट ही न चढ़ा लिया जाय, वरन् धीरे-धीरे एक-एक घूँट को मुँह में रखकर उसे चूसते हुए- अमृत की भावना करते हुए- प्रसन्न चित्त से उसे पीना चाहिए।
साधना कराई गई थी। पुतली की ज्योति का सुविस्तृत होकर साधक के चारों ओर आभा के स्वरूप में आच्छादित होना, और उसके अन्तःकरण में प्रविष्ट होना यह उस साधना का विस्तृत स्वरूप था।
साधना के लिए इस वर्ष गायत्री के उच्चस्तरीय पञ्चकोशी साधकों को उपरोक्त विधि व्यवस्था को ध्यानपूर्वक समझना चाहिए और तत्परतापूर्वक उसका प्रयोग आरंभ करना चाहिए।
साधना क्रम का विशेष महत्व है। इस साधना के माध्यम से हिमालय स्थित गायत्री के परम सिद्ध देवपुरुषों की शक्ति एवं सहायता प्राप्त की जा सकती है। इस साधना क्रम में भी कोई विशेष परिवर्तन इस वर्ष नहीं है।
साधना गत वर्षों में बताई जा चुकी है।
साधना के लिये नियत रखा जा सकता है।
साधना मात्र है। नित्य-प्रति प्रत्येक द्विजाति दिन में कम से कम तीन समय परमात्म-तत्व का ध्यान करते हुए उससे ‘सद्बुद्धि’ की-विवेक की प्रार्थना करता है।
साधना का केन्द्र-बिन्दु इसी प्रयास एवं पुरुषार्थ को कहा जाता है।
साधना मन को सुसंस्कृत बनाने का प्रयास है। परिष्कृत और पवित्र मन निस्सन्देह आत्मिक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है फिर चाहे वह किसी छवि पर एकाग्र होता हो, चाहे न होता हो। एकाग्रता मस्तिष्क की सफलता है और विशालता हृदय की गरिमा। मन को एकाग्र करना एक तृण समान लाभ है, उसकी तुलना में हृदय का विशाल बना लेना हिमालय जैसी सफलता माना जा सकता है। गायत्री की पंचकोशी साधना में मन को एकाग्र होना उतना आवश्यक नहीं माना गया है, जितना अन्तःकरण का उदार, विशाल, महान् और पवित्र बनाना है।
साधना के मनोमय कोश परिष्कार साधन में यह प्रयत्न करना पड़ता है कि हमारा मन कुसंस्कारिता से विरत होकर वैसा बने जैसे एक श्रेष्ठ मनुष्य का होना चाहिए। एक भ्रान्त धारणा यह फैल पड़ी है कि “पूजा के समय भगवान की छवि पर जिसका मन एकटक लगा रहे उसका मन वश में हो गया।” यह एकाग्रता की साधना मात्र है, जिसे मैस्मरेजम विद्या के ज्ञाता त्राटक आदि की सहायता से बड़ी आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। हिसाब जोड़ने वाले मुनीम, निशाना साधने वाले बन्दूकची, मैस्मरेजम का खेल दिखाने वाले बाजीगर, सरकस में खेल करने वाले नट, शोध करने वाले वैज्ञानिक इस कला में निष्ठगत होते हैं, उनको अपना मन एक दिशा में लगा देने की सिद्धि मिली हुई होती है। यदि ऐसे लोग चाहें तो ईश्वर की अमुक छवि पर घन्टों ध्यान लगाये आसानी से बैठे रह सकते हैं।
साधना के संदर्भ में रविवार को बिना नमक शक्कर का अस्वाद व्रत, भोजन को एक दो लगावन तक सीमित करने की शिक्षा दी गई है। आहार शुद्धि पर इसलिए जोर दिया जाता है कि मन की शुद्धता-अशुद्धता का आधार वही है। यदि अन्न अशुद्ध होगा तो मन भी अशुद्ध रहेगा और अशुद्ध मन न कभी ध्यान भजन में एकाग्र होता है। और न श्रद्धा-विश्वास को ही ग्रहण करता है। मन का परिशोधन अन्न की शुद्धि पर निर्भर है।
साधना बताई जा चुकी हैं। हमारी मनोभूमि में क्या आस्थाएं जमें? इसकी एक सुव्यवस्थित संहिता ‘युग-निर्माण सत्संकल्प’ की थोड़ी-सी पंक्तियों में समाविष्ट हैं। इन थोड़ी-सी पंक्तियों में वह सब कुछ बता दिया गया है, जो हमारी मान्यताओं और आस्थाओं का आधार होना चाहिए। इस सत्संकल्प को हमें बहुत ही ध्यानपूर्वक, पूरे मनोयोग के साथ, दिन में कम से कम एक बार अवश्य ही पढ़ना चाहिए और चिन्तन एवं मनन द्वारा समय-समय पर यह विचार करते रहना चाहिए कि इस आस्था को जीवन में कितना उतार लिया गया तथा कितना उतारना शेष है।
साधना के लिए अन्ध श्रद्धा को कोई स्थान नहीं है। न वह किसी एक लकीर पर फकीर होने या “बाबा वाक्य प्रमाणम्” के रूढ़िवाद में अवरुद्ध होती है। यही कारण है कि हमारा धर्म हमारी संस्कृति किसी एक व्यक्ति को या एक पुस्तक को लेकर नहीं चलती, न किसी घिसी-पिटी मान्यता को ही दुहराने की आज्ञा देती है। अनेकों वेद शास्त्र, पुराण, स्मृति, आगम, नियम, अनेकों धर्म ग्रन्थ ज्ञान की नाना दिशाओं का बोध कराते हैं, बिना किसी आग्रह अनुग्रह के। ऋग्वेद तत्व ज्ञान, आत्मा-परमात्मा आदि का ज्ञान कराता है।
साधना क्रम का यह चौथा वर्ष इस अक्टूबर मास से आरम्भ होना है। अस्तु अगले वर्ष का पाठ्यक्रम ही इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया जायगा।
साधना के द्वारा उन्हें विकसित करने के पश्चात् मनुष्य महान् ऐश्वर्यवान् बन सकता है।
साधना
साधना क्रम का स्वरूप था।
साधना के साधकों को जप से पूर्व पन्द्रह मिनट प्राणमय कोश की साधना भी आवश्यक होती है। पिछले वर्षों एक-एक ही प्रकार के प्राणायामों का अभ्यास करना होता था। इस वर्ष तीनों का सम्मिश्रित स्वरूप पाँच मिनट—कुल मिलाकर पन्द्रह मिनट करना होगा। विगत तीन वर्षों के तीनों प्राणायामों का उल्लेख यहाँ फिर किया जाता है, जिससे कि नये साधकों को उनका स्वरूप समझने और साधक क्रम आरम्भ करने में सुविधा हो।
साधना कर सकते हैं। यह सप्ताह में एक बार ही आधा घण्टा की जाती है। रविवार गुरुवार में से प्रातः या रात को जो भी आधा घण्टा अपनी सुविधा का हो उसे नियत कर लेना चाहिए और फिर उसी क्रम को साल भर तक चलाते रहना चाहिये।
साधना है। उपासकों को इसे पूरी श्रद्धा के साथ अपनाना चाहिए।
साधना के माध्यम से हिमालय स्थित गायत्री के परम सिद्ध देवपुरुषों की शक्ति एवं सहायता प्राप्त की जा सकती है। इस साधना क्रम में भी कोई विशेष परिवर्तन इस वर्ष नहीं है।
साधना को ही ईश्वरभक्ति या पूजा अर्चा कहते हैं। इस उद्देश्य में हम जितने ही सफल होते जाते हैं ईश्वर उतना ही हमारे निकट खिंचता चला आता है। वस्तुतः ईश्वर हमारे नितान्त निकट है। रोम रोम में समाया हुआ है। प्रत्येक श्वाँस प्रश्वाँस में उसी की बंशी बजती है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के मंगलमय सुकृत्य मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं। जिन्होंने सदाचार की महत्ता को समझ लिया वे जीवन पथ पर आधे पार हो गये, ऐसा समझना चाहिए किन्तु जिन्हें अभी तक स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, कलह और कटुता से ही छुटकारा नहीं मिला, उनके भाग्य में पशुवत् यंत्रणायें ही भोगनी लिखी हैं। मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर पाकर भी जो आगे न बढ़ सका, उसे जितना धिक्कारा जाय वह कम ही है।
साधना का क्रम शुरू करें। भारत और भारतीय संस्कृति की यदि कोई विशेषता है तो वह यही है ज्ञान की उपासना-और उससे नई खोज नई शोध प्रस्तुत करना। इस कार्यक्रम को हम जितना जल्दी शुरू करेंगे उतना ही अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर सकेंगे।
साधना की तपस्थली जगत को बनाकर ही लक्ष्य सन्धान करना होगा। जगत में ही मुक्ति प्राप्त करनी होगी, ऐसी हिन्दू-धर्म की मान्यता है। हिन्दू-धर्म समस्त ब्रह्माण्ड की आध्यात्मिक एकता को लेकर चलता है और उसका प्रयोग मानव-जीवन में करके उसे व्यापक एवं महान् बनाना है। यही “सर्वोच्च तादात्म्य” है। सीमित-लघु में अपूर्णता है, अज्ञान है, इसलिए असन्तोष भी है।
साधना में मन को एकाग्र होना उतना आवश्यक नहीं माना गया है, जितना अन्तःकरण का उदार, विशाल, महान् और पवित्र बनाना है। हमें इस तथ्य को भली प्रकार बार-बार हृदयंगम कर लेना चाहिए।
साधना क्रम में भी कोई विशेष परिवर्तन इस वर्ष नहीं है।
साधना भी चल पड़ती है तब उसमें प्रौढ़ता आती है और तदनुरूप वह आत्म-बल भी प्राप्त होता है जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। पंचकोशी साधना इसी स्तर की विभूति है, जो इसे अपनाता है, वह धन्य हो जाता है।
साधना- समर में उतरने वाले को सबसे पहले आहार शुद्धि पर ध्यान देना पड़ता है। शुद्ध कमाई का, शुद्धता-पूर्वक बनाया हुआ, भगवान का प्रसाद मानकर, औषधि एवं अमृत की भावना से भोजन करना आवश्यक है। स्वाद के लिए नहीं, वरन् शरीर रक्षा के लिए ही खाया जाना चाहिए। पेट की थैली को देखते हुए उसमें आधा आहार, चौथाई जल और चौथाई वायु के लिए स्थान रहने देना चाहिए । अर्थात् भोजन की मात्रा इतनी रहनी चाहिए, जिससे पेट पर अनावश्यक भार न पड़े, आलस्य न आवे।
साधना फलित हुई। 75 वर्ष के तप ने ठीक उनके जन्म दिन पर ही भारत में अपना पूर्ण स्वतन्त्रता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया।
साधना का महत्वपूर्ण आधार है। पंचकोशी साधना के मनोमय कोश परिष्कार साधन में यह प्रयत्न करना पड़ता है कि हमारा मन कुसंस्कारिता से विरत होकर वैसा बने जैसे एक श्रेष्ठ मनुष्य का होना चाहिए। एक भ्रान्त धारणा यह फैल पड़ी है कि “पूजा के समय भगवान की छवि पर जिसका मन एकटक लगा रहे उसका मन वश में हो गया।” यह एकाग्रता की साधना मात्र है, जिसे मैस्मरेजम विद्या के ज्ञाता त्राटक आदि की सहायता से बड़ी आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। हिसाब जोड़ने वाले मुनीम, निशाना साधने वाले बन्दूकची, मैस्मरेजम का खेल दिखाने वाले बाजीगर, सरकस में खेल करने वाले नट, शोध करने वाले वैज्ञानिक इस कला में निष्ठगत होते हैं, उनको अपना मन एक दिशा में लगा देने की सिद्धि मिली हुई होती है।
साधना के लिए कराया गया था। ज्योतिर्मय माता को अपने में और अपने को माता में ओत-प्रोत अनुभव करते हुए द्विधा को मिटा देना और एकात्म भाव को प्रत्यक्ष देखना, यही उस साधना क्रम का स्वरूप था।
साधना अनुकूल हो वे उसी को कर सकते हैं। ताँत्रिक विधान तथा योगाभ्यास पद्धति से भी विशिष्ट गायत्री उपासना की जाती है और उसके लघु-मध्यम एवं पूर्ण पुरश्चरण भी होते हैं। उनका उल्लेख यहाँ किया जाना अनावश्यक है। वह सब कुछ हम अपने गायत्री ग्रन्थों में लिख चुके हैं और समयानुसार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर उसका विस्तृत विवेचन आगे चलकर फिर करेंगे। अभी तो हमें गायत्री उपासना के उस उच्चस्तरीय-आत्मोन्नति के प्रयोजन से किये जाने वाले पञ्चकोशी साधना क्रम की ही चर्चा करनी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-August
साधना करता है उसी तरह काम भी कला समझ कर किया जाय। हम अनुभव करेंगे कि जिस तरह कलाकार को अपनी कला साधना से मिलने वाला आनन्द, स्फूर्ति प्रसन्नता, कृति के भौतिक मूल्य से कहीं अधिक मूल्यवान होती है उसी तरह कर्म-साधना हमें वह आनन्द प्रसन्नता, चेतना प्रदान करेगी जो उसके भौतिक परिणाम से कहीं अधिक कीमती होंगे।
साधना या व्यक्तिगत हवन आदि सबका नित्य कर्तव्य है उसके समाचार भेजने की आवश्यकता नहीं है। केवल सामूहिक धर्मानुष्ठानों का प्रकाशन होना ही उचित है। छोटे साप्ताहिक हवन सत्संग जो हर शाख में होते ही रहते हैं उनके समाचार बार-बार भेजने की भी आवश्यकता नहीं, कोई विशेष महत्वपूर्ण बात जिन आयोजनों में हुई हो उन्हीं का समाचार प्रकाशित होना उचित है।
साधना चरित्र है। सच्चे सुख का आधार भी यही है। इसलिए प्रयत्न यही रहे कि हमारा चरित्र सदैव उज्ज्वल रहे, उद्दात्त रहे।
साधना में लगे रहते। इस प्रकार पुरवा, फतेहपुर, उन्नाद के स्कूलों में उन्होंने चार वर्ष काटे । घर की आर्थिक दुरवस्था ने आगे पढ़ने की सम्भावना नष्ट कर दी। स्कूली शिक्षा यहीं समाप्त हो गई।
साधना का मूलाधार मानसिक पवित्रता है। जीवन के प्रत्येक छोटे-मोटे व्यवसाय व क्रिया-कलापों में मानसिक स्थिति का प्रभाव पड़ता ही है। आत्मिक पवित्रता का परिणाम सदाचरण है जिससे सुख मिलता है। कुविचारों से कुकर्म उठ खड़े होते हैं, जिससे कष्ट, क्लेश और मुसीबतें आ उपस्थित होती हैं। इसलिए छोटे-से-छोटे कार्य में भी पवित्रता का भाव बनाये रखने से चारित्रिक-विकास होता है।
साधना करते रहे। उन्होंने विशाल ज्ञान राशि इकट्ठी कर ली। नौकरी के दिनों में ही उनकी संचित साहित्यिक विद्वता का परिचय लोगों को मिलने लगा था रेलवे की नौकरी छोड़ने पर उन्हें नया काम मिलने में देर न लगी। मातृ-भाषा की सेवा करना चाहते थे। हर सच्चे मन से चाहने वाले की तरह उन्हें भी उनका अभीष्ट माध्यम मिल गया।
साधना का सुफल है।”
साधना में पूर्ण तन्मय हो जाएँ। काम के प्रति छोटे बड़े, रुचि-अरुचि, “कब तक करेंगे” आदि शिकायतें न करें। तभी हम देखेंगे कि हमारा काम ही हमें जीवन के महान् वरदानों से परिपूर्ण कर देगा। वस्तुतः काम करना हमारे स्वभाव का आवश्यक अंग होना चाहिए। जो काम हमारे सामने हैं यदि हम भली प्रकार उसे करने को तत्पर हो जाते हैं तो कोई सन्देह नहीं कि एक दिन वह भी आयेगा जब हमें अपनी रुचि के अनुसार बड़े-बड़े काम मिलेंगे और उनसे हमारी महानता का पथ प्रशस्त हो सकेगा।
साधना स्वस्थ सन्तुलित मनोभूमि में ही फलित हो सकती है। जो क्षण-क्षण में उत्तेजित हो जाता हो, सामान्य सी घटनायें जिसे उद्वेलित कर देती हों, ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य भली प्रकार नहीं कर सकेगा। न वह अपने काम के बारे में ठीक-ठीक सोच समझ ही सकेगा।
साधनामय बनाए तो ही ज्ञानवान् बनने का सच्चा सुख प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान ही इस संसार की सर्वोपरि सम्पत्ति है।
साधना हमें वह आनन्द प्रसन्नता, चेतना प्रदान करेगी जो उसके भौतिक परिणाम से कहीं अधिक कीमती होंगे।
साधना सबसे अधिक आवश्यक है। इसे हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपना धर्म कर्तव्य समझ कर आरम्भ करे इसी तरह सामूहिक सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए भी नियमित रूप से कुछ समय देना आरम्भ करें। पिछले जुलाई अंग में इस संबंध में सर्वांगपूर्ण कार्यक्रम छपा है। जेष्ठ के शिविर में हुआ निश्चय अखण्ड-ज्योति परिवार का अगले वर्ष का कार्यक्रम है। उसे पूरा करने के लिए आवश्यक वातावरण बनाने के उद्देश्य से यह पाक्षिक निकालना पड़ा है।
साधना है जिसकी सिद्धियाँ अनन्त हैं।
साधना के लिए हम में से प्रत्येक को 10 कार्यक्रम अपनाने आरम्भ कर देने चाहिएं। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, और सभ्य समाज की अभिनव रचना हमारे लक्ष्य की आवश्यक माध्यम है। इसके संदर्भ में आरोग्य के लिए 10 और मनोबल बढ़ाने के लिए 10 कार्यक्रम निर्धारित किये गए हैं। इस बीस सूत्री योजना के आधार पर हम में से प्रत्येक को अपना निज का निर्माण करना है। अपना निर्माण करने से ही युग-निर्माण आरम्भ होगा।
साधना के होंगे। इनमें जो सज्जन अपनी पत्नी या अन्य कुटुम्बियों समेत जाना चाहें आ सकते हैं। किन्तु इसकी पूर्व स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। यहाँ जितना स्थान है, जितनों की चिकित्सा परिचर्या आदि कर सकना सम्भव होगा उतने ही व्यक्तियों को स्वीकृति मिलेगी। बिना स्वीकृति आने वालों के लिये तत्काल व्यवस्था न हो सकेगी।
साधना छोड़ी नहीं, वरन् ‘दि रावर ब्रदर्स’ दी जिरासीज’ जैसे काव्य लिखे, उनमें ‘काकेशस का कैदी’ तो बहुत अधिक प्रसिद्ध हुआ। उन दिनों के शासक अलेक्जेण्डर प्रथम ने उन्हें उनके जन्म ग्राम ‘मिखाइ लोवस्कोय’ में कैद कर दिया ताकि उस छोटे दायरे में रहकर जन-संपर्क से वंचित रह जावें। इस एकान्त-वास में वे चिन्तन और मनन में संलग्न रहकर अधिक मनोबल संग्रह करते रहे और वहाँ भी उनने कुछ ग्रन्थों की रचना कर डाली।
साधना से मिलने वाला आनन्द, स्फूर्ति प्रसन्नता, कृति के भौतिक मूल्य से कहीं अधिक मूल्यवान होती है उसी तरह कर्म-साधना हमें वह आनन्द प्रसन्नता, चेतना प्रदान करेगी जो उसके भौतिक परिणाम से कहीं अधिक कीमती होंगे।
साधना, कला मान लिया जाय तो फिर वाणी का व्यभिचार किसे कहा जा सकेगा? मध्य काल के सामन्तवादी युग में भारत की तरह अन्य देशों में भी रीति-काव्य और नायिका-भेद का बोलबाला रहा है पर जब मानवीय चेतना ने सत्य को खोजने और उपयुक्त को ग्रहण करने की आकाँक्षा जागृत की तो इस तरह की कृतियाँ अनुपयुक्त ही मानी जाएंगी।
साधना भी सरल हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-July
साधना है। मित्रता हृदय के निर्बाध आदान-प्रदान पर टिकती है। मैत्रीपूर्ण संबंध एक परिवार के सदस्यों में भी नहीं हो सकते हैं और हो अनजान व्यक्तियों में दो सकते हैं।
साधना का श्रेष्ठतम मार्ग है। अमुक भजन ध्यान से केवल ईश्वर को ही प्रसन्नता हुई या नहीं? इसमें सन्देह हो सकता है, पर दूसरों को सुखी एवं समुन्नत बनाने के लिए जिसने कुछ किया है उसे आत्म-सन्तोष, सहायता द्वारा सुखी हुए जीवों का आशीर्वाद और परमात्मा का अनुग्रह मिलना सुनिश्चित है।
साधनाओं द्वारा तथा व्यावहारिक उपाय बताकर किया जायगा। प्रयत्न यह होगा कि मानसिक दृष्टि से भी शिक्षार्थी रोग मुक्त होकर जाय।
साधना का लक्ष्य हो।
साधना के उपयुक्त वातावरण तथा वानप्रस्थों के निवास की विशेष व्यवस्था यहाँ बनाई गई है। जिन्हें अनुकूलता हो वे प्रसन्नतापूर्वक मथुरा आने के लिए तैयारी कर सकते हैं। पत्र व्यवहार द्वारा स्वीकृति प्राप्त की जा सकती है। बालकों के चार वर्षीय पाठ्यक्रम की बात अगले वर्ष कार्यान्वित होगी। एक साथ इतनी प्रशिक्षण योजनाएँ चालू कर सकना सम्भव भी न था।
साधना और तपस्या का जीवन बिताते हुए उन्हें जन-कल्याण के लिए प्रबल प्रयत्नों में संलग्न होना चाहिये। लक्ष्य स्थिर होते ही उन्होंने संन्यास ले लिया क्योंकि लोक-सेवा में निरत परमार्थी लोगों के लिए वही जीवनक्रम उपयुक्त पड़ता है। जब उनका नाम नारायण से बदल कर रामदास हो गया।
साधना के लिए भी समुचित प्रयत्न न किया जायगा तब तक उपासना एकाँगी एवं अपूर्ण रहेगी और उसका समुचित लाभ उपलब्ध न हो सकेगा। इसलिए जिन्हें वस्तुतः आत्मिक प्रगति करनी हो उन्हें उच्च आदर्शों को अपने दैनिक व्यवहार में समाविष्ट करना चाहिए। इस तथ्य को इन शिविरों में ऐसी अच्छी तरह प्रतिपादित किया गया कि आगन्तुकों में से प्रत्येक ने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाने की प्रतिज्ञा की और इसके लिए आरम्भिक शुभारम्भ उसी समय से आरम्भ कर दिया। स्थिति को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि जो भी सज्जन इन शिविरों में आये वे उत्कृष्ट एवं आदर्श जीवन-यापन के लिए अपने प्रयत्नों को और भी तीव्र करेंगे। यदि यह प्रयत्न जारी रहे तो यह निश्चित है कि इन शिक्षार्थियों में से अनेकों प्रकाशवान् उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकते हुए दृष्टिगोचर होंगे।
साधना से मनुष्य की चेतना असाधारण रूप से विकसित हो जाती है और वह महान् बन जाता है, जिससे जीवन में अपार और अनन्त आनन्द का लाभ प्राप्त होता है। जो परमार्थ में लीन हैं उनके लिए संसार में कुछ भी तो दुर्लभ नहीं है।
साधना है जो मनुष्य को क्रमशः उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती है। पाश्चात्य विद्वान विक्टर-हयूगो ने लिखा है—”हम परोपकार के लिए जितना अपने आपको लुटाते हैं उतना ही हमारा हृदय भरता जाता है।” परमार्थ साधना से मनुष्य की चेतना असाधारण रूप से विकसित हो जाती है और वह महान् बन जाता है, जिससे जीवन में अपार और अनन्त आनन्द का लाभ प्राप्त होता है। जो परमार्थ में लीन हैं उनके लिए संसार में कुछ भी तो दुर्लभ नहीं है।
साधना ज्यों-ज्यों उत्कृष्ट होती जाती है तदनुसार ही परमार्थ का स्वरूप भी निखरता जाता है।
साधनाओं से तुलसी का अनन्य संबंध है। तुलसी के सेवन, उसकी सेवा पूजा, सान्निध्य रखने से सात्विकता की वृद्धि होती है और आत्मिक गुण बढ़ते हैं। जिस तरह शरीरगत दोषों को तुलसी दूर करती है उसी तरह मानसिक दोषों को भी दूर कर सद्गुणों का विकास करने में लाभप्रद होती है। अक्सर तुलसी की माला, कण्ठी आदि शरीर में धारण करने का विधान है हमारे यहाँ। यह इसी ठोस सिद्धान्त पर आधारित है।
साधना की इस पद्धति को दैनिक कार्यक्रम में सम्मिलित करने का संकल्प किया और विश्वासपूर्वक कहा कि वे इसे दृढ़तापूर्वक आजीवन निबाहते रहेंगे। शिविरों में जो परिजन परिस्थिति वश पधार नहीं सके उन्हें भी इस प्रेरणा को अपनाना चाहिए और इस शिक्षण में सम्मिलित होने का लाभ लेना चाहिए।
साधना उपासना किस प्रकार की होनी चाहिये यह निर्णय करते देर न लगी। जब कि दूसरे संत, महात्माजन जीवन की दुर्दशा की ओर से आँख बन्द करके भजन, ध्यान में अपनी मुक्ति का प्रयोजन पूर्ण करने के लालच में लगे थे, रामदास ने दूसरा मार्ग चुना। अपनी आत्मा को अधिकाधिक बल सम्पन्न बनाने वाली तपश्चर्या करते हुए अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जनता में साहस भरते हुए गाँव-गाँव घूमने लगे।
साधना का एक विशेष आनन्द है। रसखान के शब्दों में ब्रजभूमि इतनी सुन्दर है कि उस पर तीनों लोकों को निछावर किया जा सकता है। यह विशेषताएँ आज भी किसी न किसी रूप में विद्यमान मिल सकती हैं।
साधना के लिये, सत्य का दर्शन करने के लिए, हमें जगत और आध्यात्म को, सृष्टि और सृष्टिकर्ता को, वस्तु पदार्थ और इनको प्रकाशित करने वाली विश्व-चेतना को समग्र रूप से जानना, समझना और देखना पड़ेगा। एवं इसे ही अपने चिन्तन का आधार बनाना पड़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-May
साधना करने से साधक का इष्ट भी भ्रष्ट हो जाता है और उससे जिस प्रतिफल की आशा की गई थी वह प्रायः नहीं की प्राप्त होता।
साधना तथा गायत्री उपासना में लगे हुए लोग यदि वर्ष में एकबार अपनी प्रगति का परिचय दे जाया करें, प्रस्तुत कठिनाइयों का हल पूछ जाया करें, तथा अगले वर्ष का क्रम क्या रहे इस संबंध में विचार विनिमय कर लिया करें तो यह हम सभी के लिए उत्तम रहेगा। नौकरी पर दूर देशों में रहने वाले लोगों को वर्ष में एक बार तो अपने कुटुम्ब से मिलने घर जाने की छुट्टी मिलती है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का एक घर वह है जहाँ वे रहते हैं पर दूसरा उनकी भाव प्रेरणा का केन्द्र मथुरा भी है, इसलिए यह भी उनका घर है। माता-पिता के घर की भाँति ही ‘गुरु गृह’ भी अपना ही होता है, वहाँ भी वर्ष में एक बार जाया जाय तो यह ठीक ही है।
साधना मानते हुए जन-कल्याण की प्रवृत्तियों में पूरे उत्साह के साथ भाग ले। संयम, सदाचार, त्याग, उदारता, निर्लोभता और निरहंकारता का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करें। यह तीनों बातें जिनके जीवन क्रम का अंश बन गई समझना चाहिए कि वानप्रस्थ धर्म अपनाते हुए उसने मानव-जीवन की सफलता का द्वार प्रशस्त कर लिया।
साधना क्रम, चान्द्रायण व्रत और गायत्री पुरश्चरणों की सम्मिलित साधना विधि कितनी प्रभावशाली हो सकती है। फिर उसके लिये गायत्री तपोभूमि का तीर्थ तथा सुयोग्य सान्निध्य एवं मार्ग दर्शन का लाभ साधना की सफलता के लिये कितना उपयोगी प्रसिद्ध हो सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वाध्याय और सत्संग की कितनी समर्थ सुविधा यहाँ उपलब्ध है। जीवन शोधन के अनुकूल जहाँ सारा वातावरण हो वहाँ अनायास ही अपने संस्कार भी वैसे ही ढलने लगते हैं। कोई वानप्रस्थ का सच्चा लाभ प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति मथुरा आकर प्रस्तुत शिक्षण योजना का लाभ ले तो वही विश्वास करना चाहिए कि उसे खाली हाथ न लौटना पड़ेगा।
साधना की सफलता के लिये कितना उपयोगी प्रसिद्ध हो सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वाध्याय और सत्संग की कितनी समर्थ सुविधा यहाँ उपलब्ध है। जीवन शोधन के अनुकूल जहाँ सारा वातावरण हो वहाँ अनायास ही अपने संस्कार भी वैसे ही ढलने लगते हैं। कोई वानप्रस्थ का सच्चा लाभ प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति मथुरा आकर प्रस्तुत शिक्षण योजना का लाभ ले तो वही विश्वास करना चाहिए कि उसे खाली हाथ न लौटना पड़ेगा।
साधना उतनी ही बढ़ी चढ़ी मानी जायेगी। यह उद्देश्य कन्याओं की उपस्थिति से सहज ही पूरा होता है। लड़कों के द्वारा कमाई या सेवा प्राप्त होने का लाभ रहता है। वे सदा घर में रहेंगे इसलिए उनसे मोह भी बढ़ता है। उद्दण्ड और अवज्ञाकारी होने से उन पर क्रोध भी आता है।
साधना विधि कितनी प्रभावशाली हो सकती है। फिर उसके लिये गायत्री तपोभूमि का तीर्थ तथा सुयोग्य सान्निध्य एवं मार्ग दर्शन का लाभ साधना की सफलता के लिये कितना उपयोगी प्रसिद्ध हो सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वाध्याय और सत्संग की कितनी समर्थ सुविधा यहाँ उपलब्ध है। जीवन शोधन के अनुकूल जहाँ सारा वातावरण हो वहाँ अनायास ही अपने संस्कार भी वैसे ही ढलने लगते हैं। कोई वानप्रस्थ का सच्चा लाभ प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति मथुरा आकर प्रस्तुत शिक्षण योजना का लाभ ले तो वही विश्वास करना चाहिए कि उसे खाली हाथ न लौटना पड़ेगा।
साधना में लगे और वानप्रस्थ जीवन के नियम धर्मों का पालन करना आरंभ कर दें। (1) स्वाध्याय सत्संग और चिन्तन मनन में समुचित समय लगाते हुए अपनी अन्तःभूमिका को अधिकाधिक परिष्कृत करने का प्रयत्न करें। (2) ईश्वर उपासना में अधिक मन लगावें। (3) अपने स्वभाव और संस्कारों को परमार्थ वृत्ति से सम्पन्न करने के लिए लोक-सेवा के कार्यक्रमों को विशुद्ध अध्यात्मिक साधना मानते हुए जन-कल्याण की प्रवृत्तियों में पूरे उत्साह के साथ भाग ले। संयम, सदाचार, त्याग, उदारता, निर्लोभता और निरहंकारता का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करें।
साधना-मार्ग में सफलता मिलनी संभव होगी।
साधना स्वाध्याय के अतिरिक्त इन्हें इस ज्ञान-दान में भी हाथ बंटाने का अवसर मिलेगा। सेवा धर्म अपनाये बिना किसी का भी अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो सकता इसलिये यह धर्म सेवा भी उन्हें आत्म-कल्याण का एक श्रेष्ठ साधन मानते हुए करनी होगी।
साधना करनी चाहिये जिनके जी में देश और धर्म के नव-निर्माण का उत्साह और साहस है, जो शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ और समर्थ हैं, जिनकी शिक्षा सुशिक्षित कहे जाने लायक जितनी है और जो अपना भोजन, वस्त्र आदि का निर्वाह व्यय स्वयं वहन कर सकें , अभी ऐसे ही थोड़े से वानप्रस्थ लिये जाने हैं। आगे सुविधा और आवश्यकतानुसार उनकी संख्या बढ़ाई जाती रहेगी।
साधना करते हुए आत्मा की उमंगों को तृप्त किया जाता है। छोटे बच्चों का उत्तरदायित्व जब बड़ा बच्चा संभाल ले, युवावस्था समाप्त हो जाय और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ हल्की हो जायं तो हर मनुष्य का परम पवित्र कर्त्तव्य है कि ढलती आयु को आध्यात्मिक परिष्कार में लगावे। युवावस्था की आँधी मन के ऊपर कुछ कूड़ा कचरा बखेर जाती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह से सना हुआ जीवन क्रम स्वभावतः कुछ ऐसे कलुषित अन्तःकरण पर जमा कर देता है कि यदि उन्हें शुद्ध न किया जाय तो स्वभाव का अंग एवं संस्कार रूप धारण करके वे जीव के लिए भव-बंधन में बाँधने वाले रस्से बन जाते हैं और उनमें जकड़ा हुआ वह पुनः चौरासी के चक्र में घूमने लगता है।
साधना में लगाया जाय। उपासना, जीवन शोधन और परमार्थ के त्रिविध आध्यात्मिक कार्यक्रमों में पूरी तरह लग जाने का ठीक यही समय है। यदि इस ओर से उपेक्षा बरती गई तो शरीर त्यागते समय कुसंस्कारों में घिरा हुआ जीव बहुत ही त्रास पाकर विदा होता है। उस समय की मोह ममता तथा वासना तृष्णा उसे सद्गति का अधिकारी नहीं बनने देती। फिर उन्हीं प्रियजनों की, प्रिय वस्तुओं की समीपता पाने के लिए कर्मानुसार भली-बुरी योनियों में जन्मता मरता रहता है, जिसने मोह बन्धनों से छुटकारा प्राप्त नहीं किया उसके लिए जीवन मुक्ति असम्भव ही बनी रहेगी।
साधना करनी होगी क्यों उसे अपनाये बिना जीवन की सार्थकता का मार्ग अनुरुद्ध ही बना पड़ा रहेगा। भावना को आदर्शवादी उत्कृष्टता की दिशा में तरंगित करने और उन्हें कार्य रूप से परिणत करते हुए परिपक्व होने देने के प्रयोजन से शुभ कार्य करते रहने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना पड़ेगा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारी विचार धारा यदि आदर्शवादी परम्पराओं का अवलम्बन करके अग्रसर हो, व्यावहारिक जीवन में उतरे और जीवन क्रम को ओत-प्रोत करे तो समझना चाहिए कि अब हम सचमुच अध्यात्मवादी बने और उस महान जीवन लाभ से पाने के अधिकारी बने जिसे प्राप्त करके मनुष्य धन्य बन जाता है, अमृतत्व का अनुभव करते हुए अक्षय आनन्द में निमग्न रहता है और पूर्णता एवं जीवनमुक्ति का परम लाभ प्राप्त करता है।
साधना-विधान से अपरिचित होने पर भी प्रभु का अनुग्रह प्राप्त कर सके, जब कि विधि विधान के ज्ञाता कर्मकाण्डी ज्ञानी-ध्यानी लोग भी खाली हाथ रहते देखे गये हैं। त्याग और प्रेम का, श्रद्धा और विश्वास का अभाव कठोर से कठोर कर्मकाण्ड को भी निष्प्राण और निर्जीव बना देता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1964-February
साधना के लिए तत्पर होता है उसे अपने इस इष्ट-मंत्र का स्वरूप समझने के साथ-साथ उपरोक्त तथ्य एवं रहस्य को भी हृदयंगम करना पड़ता है। जिसने इस तत्वज्ञान को समझा और जीवन में उतारा उसका सारा वातावरण ही बदल गया। यह परिवर्तन जहाँ भी संभव हुआ वहाँ निश्चित रूप में आनंद एवं उल्लास का स्त्रोत फूटा। सच्चे गायत्री उपासक का जीवन सब प्रकार धन्य हुए बिना रह ही नहीं सकता।
साधना,
साधना करना, और उसके अनुसार आचरण करना, अपने उपार्जित ज्ञान से दूसरों का मार्ग दर्शन करना ज्ञान-यज्ञ कहा गया है जिसे सर्वोत्कृष्ट बताते हुए गीताकार ने लिखा है-
साधना करता है और लम्बी साधना के बाद ब्रह्ममय शब्द की अपार शक्ति को अनुभूति कर उसका उद्घोष प्रथम बार वाणी से करता है। एक आज की स्थिति है कि मेले ठेले में, बाजार सड़कों पर सामान्य लोग ब्रह्मज्ञान और तत्वज्ञान की ऊंची-ऊंची बातें करते हैं। थोड़े बहुत पढ़-लिखकर या सुनकर अपने आपको विद्वान, ज्ञानी ध्यानी न जाने क्या-क्या समझने लग जाते हैं। स्टेज, माध्यमों में लोग बोलने की होड़ में व्यग्र रहते है। फलस्वरूप स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि लोगों को शब्दों के प्रति अविश्वास और संदेह होने लग गया है।
साधना का प्रथम सोपान कहा जाता है। यह चिन्तन ईश्वर जीव-प्रकृति की उच्च से आरम्भ नहीं किया जा सकता। कदम तो क्रमशः ही उठाये जाते हैं। नीचे की सीढ़ियों को पार करते हुए ही ऊपर को चढ़ा जा सकता है। सोऽहम्, शिवोऽहम् की ध्वनि करने से पूर्व, अपने को सच्चिदानन्द ब्रह्म मानने से पूर्व हमें साधारण जीवन पर विचार करने की आवश्यकता पड़ेगी और यह देखना पड़ेगा कि ईश्वर का पुत्र-जीव आज कितने दोष दुर्गुणों से ग्रसित होकर पामरता का उद्विग्न जीवन-यापन कर रहा है।
साधना और तपस्या का जीवन बिताना पड़ा है। सन्तान के लिये माता को कितना त्याग करना पड़ता है और अनेक बार आत्म-बलिदान तक कर देना पड़ता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। नारी का केवल यही एक गुण इतने महत्व का है जिनके कारण पुरुष को उसके सामने सदैव नतमस्तक रहना चाहिए और कभी उसके हीनत्व की भावना का मन में उठाना भी न चाहिये। यदि नारी आज शारीरिक शक्ति, विद्या, बुद्धि में कुछ पिछड़ी हुई दिखाई देती है तो इसका कारण यही है कि उसने अपनी समस्त शक्ति और साधनों को पुरुष के उच्च निर्माण में लगा दिया है। इस स्थिति में उसमें हीनात्मा की कल्पना करना विवेक शून्यता के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता।
साधना, चालाकी, धूर्तता को छिपाने के लिये बड़े मीठे बोलते हैं। शब्दों के जाल में न मालूम क्या-क्या करते है। किस-किस को फँसाते हैं। किंतु इतना निश्चित है कि यह मनुष्य का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। शब्द की शक्ति प्रतिष्ठा को नष्ट कर देना मनुष्य का बड़ा अहित है, जिसने एक गम्भीर समस्या खड़ी कर दी है।
साधना के बाद ब्रह्ममय शब्द की अपार शक्ति को अनुभूति कर उसका उद्घोष प्रथम बार वाणी से करता है। एक आज की स्थिति है कि मेले ठेले में, बाजार सड़कों पर सामान्य लोग ब्रह्मज्ञान और तत्वज्ञान की ऊंची-ऊंची बातें करते हैं। थोड़े बहुत पढ़-लिखकर या सुनकर अपने आपको विद्वान, ज्ञानी ध्यानी न जाने क्या-क्या समझने लग जाते हैं। स्टेज, माध्यमों में लोग बोलने की होड़ में व्यग्र रहते है। फलस्वरूप स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि लोगों को शब्दों के प्रति अविश्वास और संदेह होने लग गया है।
साधना को उसने अपना लक्ष्य माना और अध्ययन को प्राण प्रिय विषय मानकर उसके साधन जैसे भी जुट सकें जुटाता ही रहा।
साधना। झूठा स्वार्थ वासनाओं और तृष्णा से ग्रसित होकर अकर्म या कुकर्म करने से माना गया है। ऐसे मार्ग पर चलने वाला क्षणिक लाभ भले ही प्राप्त कर ले अन्ततः उसे लोकनिन्दा, अविश्वास, घृणा, असन्तोष, राजदण्ड, आत्म-प्रताड़ना, विक्षोभ, असंतोष, नरक एवं पतन के रूप से ही भोगना पड़ता है। इसलिए मनीषियों ने उसे निन्दित एवं हेय ठहराया है। परमार्थ की प्रशंसा इसलिए की है कि वह प्रारम्भ में थोड़ा कष्ट साध्य भले ही हो, वासना और तृष्णा की सीमित पूर्ति ही उससे भले होती है पर अन्ततः सब प्रकार की प्रगति के द्वार उसी से खुलते हैं।
साधना के अंतर्गत आता है।
साधना भी आरम्भ करनी चाहिए और उसका श्रीगणेश तप-त्याग जैसे उच्च आदर्शों से नहीं, गुण-धर्म स्वभाव का मानवोचित परिष्कार करते हुए व्यक्तित्व को सुविकसित करने में संलग्न होकर करना चाहिए।
साधना करनी पड़ती है। ब्रह्मचर्य, तप, त्याग, सत्य, अहिंसा आदि उच्चतम आध्यात्मिक तत्वों को अपनाने से पहले उसे छोटी-छोटी त्रुटिओं को संभालना होता है। परीक्षार्थी पहले सरल प्रश्नों को हाथ में लेते हैं और कठिन प्रश्नों को अन्त के लिए छोड़ रखते हैं। लड़कियाँ गृहस्थ की शिक्षा गुड़ियों के खेल से आरम्भ करती हैं। युद्ध में शस्त्र चलाने की निपुणता पहले साधारण खेल के रूप में उसका अभ्यास करके ही की जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-March
साधना की पूर्णता हुई।
साधना भी चिरकालीन व अल्पकालीन होती है, दीर्घकालीन साधना में अडिग धैर्य की बड़ी आवश्यकता होती है। जब चाहा, फल नहीं मिल जाता। फल देने की शक्ति विकसित हो जाय व अपने गुण ग्रहण की योग्यता हो तभी फल मिल सकता है। किसी-किसी साधना को वर्षों तक निरन्तर करना पड़ता है, उसका फल तुरन्त चाहें तो कैसे मिल सकता है? कहा गया है-
साधना से सिद्धि का घनिष्ठतम संबंध है। यावत साधना की पूर्णता ही सिद्धि है। वस्तुतः एक ही वस्तु के दो छोर हैं। एक छोर से आरंभ होता है। जितना-जितना आगे बढ़ा जाता है दूसरा छोर नजदीक आने लगता है।
साधना करते समय तो दत्तचित्त हो उसको आगे बढ़ाने का ही प्रयत्न करते रहना चाहिये। फल की उस समय चिन्ता न हो। फल तो अवश्य मिलेगा ही, यह आत्मविश्वास भर चाहिये। हर समय फल प्राप्ति सम्मुख रहा, वही मुख्य रहा तो साधना ठीक से नहीं होगी। मन की शक्ति बिखर जायेगी।
साधना तो बहुत बड़ी चीज है। उसके लिए और भी अधिक तल्लीनता एवं प्रयत्न की आवश्यकता होगी ही, अतः सिद्धि चाहिये, तो साधना करते रहिये।
साधना करते रहिये।
साधना है।
साधना 8. प्रतिष्ठा का सोपान 9. उल्लास का विकास 10. आगे बढ़ने की तैयारी 11. अध्यात्म धर्म का अवलम्बन 12. ब्रह्म विद्या का रहस्य 13. ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग 14. विवेक सतसई 15. अध्यात्म विद्या का प्रवेश 16. वैज्ञानिक अध्यात्मवाद 17. प्रेम का रहस्य 18. भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र यज्ञोपवीत 19. यज्ञोपवीत द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति 20. जीवन संगीत 21. दैनिक जीवन में मनोविज्ञान के प्रयोग 22. हंसी-खुशी का जीवन 23. क्यों खायें? क्या खायें? कैसे खायें?
साधना ठीक से नहीं होगी। मन की शक्ति बिखर जायेगी। यह ठीक है कि लक्ष्यविहीन साधना निष्फल है। लक्ष्य एवं साध्य निश्चित हो। पर हर समय ही यदि फल का ही ध्यान रहा तो फल पाने में देरी होने लगेगी।
साधना से स्वर एवं वादन की कुशलता प्राप्त होती है। तो आध्यात्मिक साधना तो बहुत बड़ी चीज है। उसके लिए और भी अधिक तल्लीनता एवं प्रयत्न की आवश्यकता होगी ही, अतः सिद्धि चाहिये, तो साधना करते रहिये।
साधना द्वारा ही शक्ति प्रकट व प्राप्त की जा सकती है। फिर इसका उपयोग सही दिशा में किया जाय या उल्टी दिशा में, यह तो साधक पर निर्भर है। मंत्र को लीजिए, अक्सर वही है जो हम रात दिन व्यवहार करते हैं, केवल उनका अमुक शक्ति का संयोजन, उच्चारण कर दिया जाता है, पर इतने ही से उनका फल नहीं मिलता है। उसमें जो फलदात्री शक्ति का विकास या प्रादुर्भाव होता है, उसका कारण तो उस मंत्र की साधना करने में है। अमुक परिमाण में, अमुक तरीके से उसका जप किया जाय, तो शब्दों में साधना के द्वारा एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है।
साधनायस्य-सिर्द्धिर्भवति तादृशी...’
साधना प्रारंभ करना चाहिये। प्रभु को देखकर अपनी अन्तर्निहित प्रभुता का भान होता है, और महापुरुषों की साधना पर विचार करने से ही साधना की प्रेरणा मिलती है, मार्गदर्शन व बल मिलता है, दृष्टान्त के लिए कहा गया है-
साधना की प्रेरणा मिलती है, मार्गदर्शन व बल मिलता है, दृष्टान्त के लिए कहा गया है-
साधना में अडिग धैर्य की बड़ी आवश्यकता होती है। जब चाहा, फल नहीं मिल जाता। फल देने की शक्ति विकसित हो जाय व अपने गुण ग्रहण की योग्यता हो तभी फल मिल सकता है। किसी-किसी साधना को वर्षों तक निरन्तर करना पड़ता है, उसका फल तुरन्त चाहें तो कैसे मिल सकता है? कहा गया है-
साधना को वर्षों तक निरन्तर करना पड़ता है, उसका फल तुरन्त चाहें तो कैसे मिल सकता है? कहा गया है-
साधना अधूरी है उसकी फलरूप सिद्धि की अधूरी रहेगी, साधना जितनी ही निर्बल होगी, फल सिद्धि उतनी ही कच्ची होगी। अतः उतावले करने से काम नहीं चलता है। जिसको जितने समय तक जिस ढंग से करना आवश्यक है, उसे उसी प्रकार, उतने समय तक करते रहने से फल मिलेगा, स्त्री गर्भ में वीर्य पड़ते ही बच्चा नहीं हो जाता, उसे परिपक्व बनने के लिए 9 महीने लग जाते हैं, इससे पहले यदि प्रसव होता है, तो कच्चाई रह जाती है, 2-4 महीने में प्रसव हुआ बच्चा आकार नहीं पा सकेगा। माँस पिंड उसी रूप में ही निकल जायेगा। उतावली करने से नुकसान है, उसी प्रकार जितना प्रयत्न, समय व श्रम उपेक्षित है उतना होने से ही फल मिलेगा।
साधना को आगे बढ़ाने के लिये यह परमावश्यक है कि साधना में अहंकार न आने का लक्ष्य रखा जाय। मैं ऐसी व इतनी अच्छी साधना करता हूँ, दूसरा वैसी कर नहीं सकता, वह मेरे सामने तुलना में करता ही क्या है? जब भी ऐसा अहंकार हृदय में उदित हुआ कि आगे बढ़ना रुक जायेगा, पतन का वहीं से प्रारंभ हुआ समझिये। जब तक वह यह मानता है कि अभी चलना बहुत दूर है, अभी तक पहुँचे ही कितनी दूर हैं, अमुक महापुरुष ने कैसी जबर्दस्त साधना की, उसके सामने मेरी साधना का ठिकाना ही क्या? तो वह अपनी कमी देखकर और अधिक बल के साथ आगे बढ़ने का प्रयत्न करेगा, पर जहाँ अहंभाव बढ़ा कि बेपरवाही आई।
साधना निष्फल है। लक्ष्य एवं साध्य निश्चित हो। पर हर समय ही यदि फल का ही ध्यान रहा तो फल पाने में देरी होने लगेगी। प्रयत्न शौथल्य से दूसरी बात यह है कि जो फल माँगता है उसे तो उतना ही मिलता है, पर जो माँगता नहीं जो अपना कार्य ठीक से किये जाता है, उसे अपेक्षाकृत फल अधिक ही मिलेगा। फल माँगना तो सौदा हो गया।
साधना की, उसके सामने मेरी साधना का ठिकाना ही क्या? तो वह अपनी कमी देखकर और अधिक बल के साथ आगे बढ़ने का प्रयत्न करेगा, पर जहाँ अहंभाव बढ़ा कि बेपरवाही आई। अहं में क्रोध आदि बढ़ते हैं। गाड़ी पटरी से उतर जाती है, पीछे उसके पतन का क्या ठिकाना। जहाँ तक उसको सम्भालने वाला साधन नहीं मिलेगा, पतनोन्मुख पत्थर लुढ़कता ही रहेगा।
साधना प्रारंभ करने के लिए उत्कट इच्छा, दृढ़ निश्चय, परिपूर्ण आत्मविश्वास व पूरी लगनपूर्वक निरन्तर प्रयत्न का होना परम आवश्यक है, उत्कट इच्छा के बिना साधना में रस नहीं मिलेगा। रस न मिलने पर अधिक दिन चलाये रखना कठिन हो जाता है। सिद्धि के लिए जितनी भूख, इच्छा, बेचैनी होगी, साधना में उतना ही बल एवं रस मिलेगा। इस प्रकार दृढ़-निश्चय के बिना उत्साह मन्दता आती रहेगी। विघ्न बाधाएं आते ही मन उचट जायेगा, आगे बढ़ने का उत्साह जाता रहेगा।
साधना जितनी ही निर्बल होगी, फल सिद्धि उतनी ही कच्ची होगी। अतः उतावले करने से काम नहीं चलता है। जिसको जितने समय तक जिस ढंग से करना आवश्यक है, उसे उसी प्रकार, उतने समय तक करते रहने से फल मिलेगा, स्त्री गर्भ में वीर्य पड़ते ही बच्चा नहीं हो जाता, उसे परिपक्व बनने के लिए 9 महीने लग जाते हैं, इससे पहले यदि प्रसव होता है, तो कच्चाई रह जाती है, 2-4 महीने में प्रसव हुआ बच्चा आकार नहीं पा सकेगा। माँस पिंड उसी रूप में ही निकल जायेगा। उतावली करने से नुकसान है, उसी प्रकार जितना प्रयत्न, समय व श्रम उपेक्षित है उतना होने से ही फल मिलेगा।
साधनाएं 17. योग के नाम पर मायाचार 18. जादूगरी या छल 19. सम्मोहन विज्ञान 20. चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग 21. मधुर संबंधों का रहस्य।
साधनात्मक कार्य ठीक प्रकार नहीं हो पाते इसलिए इसमें भी अधिक संख्या में लोग सम्मिलित न किये जावेंगे। जिन्हें मथुरा आना हो वे अपना परिचय लिखकर स्वीकृति प्राप्त कर लें। आगन्तुकों को ता. 15 की रात तक आ जाना चाहिए ताकि ता. 16 को प्रातः काल यज्ञ में भाग ले सकें।
साधना का एक प्रधान भाग है। जप अनुष्ठान की अपेक्षा यह ‘अनुज्ञान’ साधना भी किसी प्रकार माता को कम प्रसन्न करने वाली नहीं है।
साधना करते जाना अनुकूल साधन जुटाते जाना व उसका बल बढ़ाते जाना आवश्यक है।
साधना के कारण।
साधना का बुझता है-
मन में यदि विश्वास नहीं है!
साधना पर मत देखो, कैसा शुभ परिणाम मिलेगा।
ऋद्धि सिद्धि की बात न सोचो, तुम्हें स्वयम् वरदान मिलेगा॥
साधना कहते किसे हैं? साधक साध्य की प्राप्ति के लिए जो अनुकूल प्रयत्न करता है वही प्रयत्न साधना है। किसी कार्य को अनेक बार करना अभ्यास कहलाता है, और साध्य को ठीक कर उस दिशा में अभ्यास बढ़ाते जाना ही साधना है।
साधना सिद्धि के योग्य हो जायेगी, फल स्वयं मिल जायेगा। साधना से सिद्धि का घनिष्ठतम संबंध है। यावत साधना की पूर्णता ही सिद्धि है। वस्तुतः एक ही वस्तु के दो छोर हैं। एक छोर से आरंभ होता है।
साधना से आत्म विश्वास ही फलता है। शब्द तो निमित्त मात्र हैं, शब्द मंत्र तो वही का वही है पर साधना की कमीवेशी के कारण सबको सिद्धि एक जैसी नहीं मिलती। किसी का झण्डा ऐसा रामबाण होता है कि तुरन्त फल देता है। तब वही मन्त्र दूसरा व्यक्ति बोलता है पर उससे वैसा चमत्कार उत्पन्न नहीं देखा जाता। साधना के तारतम्य से ही सिद्धि का तारतम्य होता है, साधना का तारतम्य योग्यता व प्रयत्न के अन्तर के कारण रहता है, व हर प्रकार की सिद्धि में साधना की आवश्यकता ही है।
साधना में अहंकार न आने का लक्ष्य रखा जाय। मैं ऐसी व इतनी अच्छी साधना करता हूँ, दूसरा वैसी कर नहीं सकता, वह मेरे सामने तुलना में करता ही क्या है? जब भी ऐसा अहंकार हृदय में उदित हुआ कि आगे बढ़ना रुक जायेगा, पतन का वहीं से प्रारंभ हुआ समझिये। जब तक वह यह मानता है कि अभी चलना बहुत दूर है, अभी तक पहुँचे ही कितनी दूर हैं, अमुक महापुरुष ने कैसी जबर्दस्त साधना की, उसके सामने मेरी साधना का ठिकाना ही क्या? तो वह अपनी कमी देखकर और अधिक बल के साथ आगे बढ़ने का प्रयत्न करेगा, पर जहाँ अहंभाव बढ़ा कि बेपरवाही आई।
साधना द्वारा जो चाहे हो सकता है। जो पहले विचार रूप में था, वह प्राप्त होने पर सम्मुख व प्रत्यक्ष हो जाने से साकार हुआ ही समझिये। साधना से असाध्य सुसाध्य एवं असंभव सम्भव हो जाता है।
साधना पूर्ण नहीं होगी। मन में यदि दुविधा रही तो फल पाते न देख उसे व्यर्थ समझते ही शिथिलता आ जायेगी, अतः मन में अखण्ड आत्म विश्वास होना चाहिये कि फल में देरी कारणवश हो सकती है, पर साधना कभी निष्फल नहीं जाती। देर सबेर फल अवश्य मिलेगा ही। अतः बीच में छोड़ देने की आवश्यकता नहीं। कार्य करते रहना है।
साधना की आवश्यकता है उसके बिना सिद्धि नहीं मिल सकती। साधना द्वारा सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं, एवं जाग्रत शक्तियाँ सबल बनती है, जिससे सिद्धि सहज हो जाती है। वास्तव में आत्मा की अनेक शक्तियाँ सुषुप्त अवस्था में पड़ी हुई हैं, जो आवरित हैं उनका भान ही पहले नहीं होता। इसलिए मनुष्य कह बैठता है कि मैं इसे नहीं कर सकता, या मेरे लिए यह असंभव है, क्योंकि अंतर्गत गुप्त शक्तियों के संबंध में उनकी कल्पना ही नहीं होती, जब दूसरे व्यक्तियों को उस काम को करते देखता है, तो विचार होता है कि यदि वह परमार्थ कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकूँगा? इसलिए कहा गया है कि साधनाओं में बल प्राप्त करने के लिए किसी पूर्ण साधक का आदर्श सामने रखना चाहिये।
साधना की आवश्यकता ही है।
साधना करना ही अधिक उत्तम है। आशा है कि पर्व मनाते समय विज्ञ पुरुष ऐसे ही शुभ आयोजनों की महत्ता पर ध्यान केन्द्रित करेंगे।
साधना भी किसी प्रकार माता को कम प्रसन्न करने वाली नहीं है।
साधना का उद्देश्य साकार से निराकार की ओर बढ़ना है, व उसकी पूर्णता तक पहुँच जाना है। साधन, भजन साकार होता है पर उसके द्वारा निराकार में पहुँच जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो भावना से निराकार भी साकार हो जाता है, प्रारंभ में जो सिद्धि हमें हृदयगम्य व अगोचर होती है, वही साधना के द्वारा अनुभवगम्य व दृष्टिगोचर हो जाती है। कल्पना का सत्य साकार उपस्थित होता है। कल्पना के पंख लग जाते हैं।
साधना ठीक से नहीं करेगा तो सिद्धि नहीं मिलेगी या कम मिलेगी। तब दूसरे व्यक्ति को साधन कम ही मिले हों पर साधना ठीक करता है, तो सिद्धि सहज में ही परिपूर्ण मिलेगी। एक धनी के लड़के को पुस्तकें व शिक्षा आदि के साधनों की कमी नहीं होती पर वह उतनी लगन व निष्ठा से काम नहीं करता। अतः उतनी सफलता नहीं मिलती। जबकि गरीब विद्यार्थियों को पुस्तकें इधर-उधर से माँग जाँच कर देखनी पड़ती है, पूछताछ भी दौड़ धूप करके करनी होती है।
साधना की इच्छा है, वह ध्यानपूर्वक साधन जुटा ही लेगा, स्वयं भी मिल जायेंगे उसका काम रुकेगा नहीं।
साधना ठीक करता है, तो सिद्धि सहज में ही परिपूर्ण मिलेगी। एक धनी के लड़के को पुस्तकें व शिक्षा आदि के साधनों की कमी नहीं होती पर वह उतनी लगन व निष्ठा से काम नहीं करता। अतः उतनी सफलता नहीं मिलती। जबकि गरीब विद्यार्थियों को पुस्तकें इधर-उधर से माँग जाँच कर देखनी पड़ती है, पूछताछ भी दौड़ धूप करके करनी होती है। पर उसे साधना अधिक करने से सफलता अधिक मिलती है।
साधना में ही है या साधना द्वारा ही शक्ति प्रकट व प्राप्त की जा सकती है। फिर इसका उपयोग सही दिशा में किया जाय या उल्टी दिशा में, यह तो साधक पर निर्भर है। मंत्र को लीजिए, अक्सर वही है जो हम रात दिन व्यवहार करते हैं, केवल उनका अमुक शक्ति का संयोजन, उच्चारण कर दिया जाता है, पर इतने ही से उनका फल नहीं मिलता है। उसमें जो फलदात्री शक्ति का विकास या प्रादुर्भाव होता है, उसका कारण तो उस मंत्र की साधना करने में है। अमुक परिमाण में, अमुक तरीके से उसका जप किया जाय, तो शब्दों में साधना के द्वारा एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है।
साधना करता हूँ, दूसरा वैसी कर नहीं सकता, वह मेरे सामने तुलना में करता ही क्या है? जब भी ऐसा अहंकार हृदय में उदित हुआ कि आगे बढ़ना रुक जायेगा, पतन का वहीं से प्रारंभ हुआ समझिये। जब तक वह यह मानता है कि अभी चलना बहुत दूर है, अभी तक पहुँचे ही कितनी दूर हैं, अमुक महापुरुष ने कैसी जबर्दस्त साधना की, उसके सामने मेरी साधना का ठिकाना ही क्या? तो वह अपनी कमी देखकर और अधिक बल के साथ आगे बढ़ने का प्रयत्न करेगा, पर जहाँ अहंभाव बढ़ा कि बेपरवाही आई। अहं में क्रोध आदि बढ़ते हैं।
साधना का ठिकाना ही क्या? तो वह अपनी कमी देखकर और अधिक बल के साथ आगे बढ़ने का प्रयत्न करेगा, पर जहाँ अहंभाव बढ़ा कि बेपरवाही आई। अहं में क्रोध आदि बढ़ते हैं। गाड़ी पटरी से उतर जाती है, पीछे उसके पतन का क्या ठिकाना। जहाँ तक उसको सम्भालने वाला साधन नहीं मिलेगा, पतनोन्मुख पत्थर लुढ़कता ही रहेगा।
साधना में विघ्न बाधाएं भी आती हैं, उनसे विचलित नहीं होना चाहिए। विघ्न बाधाएं परीक्षा रूप हैं। उनमें डटे रहने से बल मिलता है, सिद्धि सहज व शीघ्र हो जाती है। विघ्न बाधाओं से विचलित हुआ तो, किये कराये पर पानी फिर जाता है, व्यर्थ चला जाता है। भविष्य में उस निराशा व असफलता के कारण मन निरुत्साह हो जाता है।
साधना द्वारा सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं, एवं जाग्रत शक्तियाँ सबल बनती है, जिससे सिद्धि सहज हो जाती है। वास्तव में आत्मा की अनेक शक्तियाँ सुषुप्त अवस्था में पड़ी हुई हैं, जो आवरित हैं उनका भान ही पहले नहीं होता। इसलिए मनुष्य कह बैठता है कि मैं इसे नहीं कर सकता, या मेरे लिए यह असंभव है, क्योंकि अंतर्गत गुप्त शक्तियों के संबंध में उनकी कल्पना ही नहीं होती, जब दूसरे व्यक्तियों को उस काम को करते देखता है, तो विचार होता है कि यदि वह परमार्थ कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकूँगा? इसलिए कहा गया है कि साधनाओं में बल प्राप्त करने के लिए किसी पूर्ण साधक का आदर्श सामने रखना चाहिये। संभव हो तो उसके सान्निध्य में साधना प्रारंभ करना चाहिये।
साधना का तारतम्य योग्यता व प्रयत्न के अन्तर के कारण रहता है, व हर प्रकार की सिद्धि में साधना की आवश्यकता ही है।
साधना से असाध्य सुसाध्य एवं असंभव सम्भव हो जाता है।
साधना पर अवलम्बित है। संगीत को ही लीजिये, कई वर्षों की साधना से स्वर एवं वादन की कुशलता प्राप्त होती है। तो आध्यात्मिक साधना तो बहुत बड़ी चीज है। उसके लिए और भी अधिक तल्लीनता एवं प्रयत्न की आवश्यकता होगी ही, अतः सिद्धि चाहिये, तो साधना करते रहिये।
साधना है। किसी कार्य को अनेक बार करना अभ्यास कहलाता है, और साध्य को ठीक कर उस दिशा में अभ्यास बढ़ाते जाना ही साधना है।
साधना : नवरात्रि के 9 दिन गायत्री उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। खेती में जिस प्रकार बीज बोने का एक विशेष समय होता है। ऋतु काल गर्भावान के लिए उपयुक्त होता है, उसी प्रकार गायत्री की विशेष साधना के लिए नवरात्रि का पर्व बहुत ही शुभ है। दिन और रात्रि की मिलन बेला को संध्या कहते हैं और सन्ध्याकाल में ‘सन्ध्या’ करना विशेष फलप्रद होता है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं की मिलन बेला में आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि आती है। इन दिनों में किया हुआ साधन अन्य समयों की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है।
साधना पर विचार करने से ही साधना की प्रेरणा मिलती है, मार्गदर्शन व बल मिलता है, दृष्टान्त के लिए कहा गया है-
साधना करने में है। अमुक परिमाण में, अमुक तरीके से उसका जप किया जाय, तो शब्दों में साधना के द्वारा एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है। वही उस मंत्र की सिद्धि है, वही फलती है। वास्तव में साधना से आत्म विश्वास ही फलता है। शब्द तो निमित्त मात्र हैं, शब्द मंत्र तो वही का वही है पर साधना की कमीवेशी के कारण सबको सिद्धि एक जैसी नहीं मिलती।
साधना पर आश्रित है। एक व्यक्ति को साधन अधिक मिलने पर ही यदि वह साधना ठीक से नहीं करेगा तो सिद्धि नहीं मिलेगी या कम मिलेगी। तब दूसरे व्यक्ति को साधन कम ही मिले हों पर साधना ठीक करता है, तो सिद्धि सहज में ही परिपूर्ण मिलेगी। एक धनी के लड़के को पुस्तकें व शिक्षा आदि के साधनों की कमी नहीं होती पर वह उतनी लगन व निष्ठा से काम नहीं करता। अतः उतनी सफलता नहीं मिलती।
साधना की पूर्णता ही सिद्धि है। वस्तुतः एक ही वस्तु के दो छोर हैं। एक छोर से आरंभ होता है। जितना-जितना आगे बढ़ा जाता है दूसरा छोर नजदीक आने लगता है। और उस छोर पर पहुँच जाना ही तो सिद्धि है।
साधना में रस नहीं मिलेगा। रस न मिलने पर अधिक दिन चलाये रखना कठिन हो जाता है। सिद्धि के लिए जितनी भूख, इच्छा, बेचैनी होगी, साधना में उतना ही बल एवं रस मिलेगा। इस प्रकार दृढ़-निश्चय के बिना उत्साह मन्दता आती रहेगी। विघ्न बाधाएं आते ही मन उचट जायेगा, आगे बढ़ने का उत्साह जाता रहेगा।
साधना के द्वारा अनुभवगम्य व दृष्टिगोचर हो जाती है। कल्पना का सत्य साकार उपस्थित होता है। कल्पना के पंख लग जाते हैं। साधना द्वारा जो चाहे हो सकता है। जो पहले विचार रूप में था, वह प्राप्त होने पर सम्मुख व प्रत्यक्ष हो जाने से साकार हुआ ही समझिये।
साधना की कमीवेशी के कारण सबको सिद्धि एक जैसी नहीं मिलती। किसी का झण्डा ऐसा रामबाण होता है कि तुरन्त फल देता है। तब वही मन्त्र दूसरा व्यक्ति बोलता है पर उससे वैसा चमत्कार उत्पन्न नहीं देखा जाता। साधना के तारतम्य से ही सिद्धि का तारतम्य होता है, साधना का तारतम्य योग्यता व प्रयत्न के अन्तर के कारण रहता है, व हर प्रकार की सिद्धि में साधना की आवश्यकता ही है।
साधना के लिए नवरात्रि का पर्व बहुत ही शुभ है। दिन और रात्रि की मिलन बेला को संध्या कहते हैं और सन्ध्याकाल में ‘सन्ध्या’ करना विशेष फलप्रद होता है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं की मिलन बेला में आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि आती है। इन दिनों में किया हुआ साधन अन्य समयों की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है।
साधना अधिक करने से सफलता अधिक मिलती है।
साधना के द्वारा एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है। वही उस मंत्र की सिद्धि है, वही फलती है। वास्तव में साधना से आत्म विश्वास ही फलता है। शब्द तो निमित्त मात्र हैं, शब्द मंत्र तो वही का वही है पर साधना की कमीवेशी के कारण सबको सिद्धि एक जैसी नहीं मिलती। किसी का झण्डा ऐसा रामबाण होता है कि तुरन्त फल देता है।
साधनाओं में बल प्राप्त करने के लिए किसी पूर्ण साधक का आदर्श सामने रखना चाहिये। संभव हो तो उसके सान्निध्य में साधना प्रारंभ करना चाहिये। प्रभु को देखकर अपनी अन्तर्निहित प्रभुता का भान होता है, और महापुरुषों की साधना पर विचार करने से ही साधना की प्रेरणा मिलती है, मार्गदर्शन व बल मिलता है, दृष्टान्त के लिए कहा गया है-
साधना में है।
साधना करते हुए जो विघ्न-बाधाएं आयें उनको शाँति के साथ सहन करते हुए, पार कर जाना पड़ता है।
साधना के तारतम्य से ही सिद्धि का तारतम्य होता है, साधना का तारतम्य योग्यता व प्रयत्न के अन्तर के कारण रहता है, व हर प्रकार की सिद्धि में साधना की आवश्यकता ही है।
साधना के द्वारा सिद्धि मिलना सुनिश्चित प्रतीत नहीं होगा। अतः साधना पूर्ण नहीं होगी। मन में यदि दुविधा रही तो फल पाते न देख उसे व्यर्थ समझते ही शिथिलता आ जायेगी, अतः मन में अखण्ड आत्म विश्वास होना चाहिये कि फल में देरी कारणवश हो सकती है, पर साधना कभी निष्फल नहीं जाती। देर सबेर फल अवश्य मिलेगा ही। अतः बीच में छोड़ देने की आवश्यकता नहीं।
साधना का फल अपरिमित है। इसीलिए गीता में कहा गया है कि कार्य करते जाओ, फलाकाँक्षा न रखो। प्रकृति के घर में अन्धेर नहीं, जो बिना माँगे मिलेगा नहीं, उसे उलटा अधिक मिलेगा, निस्वार्थ साधना के कारण।
साधना करने में पूरी लगन से जुटना आवश्यक है।
साधना का फल ही सिद्धि है। सिद्धि मिली तो साधना की पूर्णता हुई।
साधना कार्यकारी नहीं होती। इसलिए जो सहायक हों उन्हें अपनावें व जो बंधन हों उनसे दूर रहने का ध्यान करें। जिस कार्य के लिये जिन साधनों की आवश्यकता है पहले उनको सरल करने का प्रयत्न करिये। सीरा बनाना है तो आटा, चीनी, घी, अग्नि, पानी, कढ़ाई, कड़छी, सब साधन चाहिये। उनके बिना सीरा बनेगा कैसे?
साधना कभी निष्फल नहीं जाती। देर सबेर फल अवश्य मिलेगा ही। अतः बीच में छोड़ देने की आवश्यकता नहीं। कार्य करते रहना है। जब साधना सिद्धि के योग्य हो जायेगी, फल स्वयं मिल जायेगा।
साधना में उतना ही बल एवं रस मिलेगा। इस प्रकार दृढ़-निश्चय के बिना उत्साह मन्दता आती रहेगी। विघ्न बाधाएं आते ही मन उचट जायेगा, आगे बढ़ने का उत्साह जाता रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-July
साधना आरम्भ कर दी। और एक वर्ष में 125000 (सवालक्ष) मन्त्र लिखने का एक अनुष्ठान पूर्ण कर लिया। किसी दिन कम किसी दिन ज्यादा लिखा गया है। किसी दिन तो 800 तक लिखे गये। औसत 360 प्रतिदिन लिखने का पड़ा।
साधना की जा सकती है। इन दो सज्जनों में से एक अभी जीवित है।
साधना का एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रकार है।
साधना से एक बड़ा लाभ यह हुआ कि मेरी औरत जो 10 साल से प्रेतबाधा से पीड़ित थी। प्रतिदिन जोर-जोर से रोती थी एक-एक घण्टा तक रोती रहती, गाँव के सारे लोग जमा हो जाते थे। हाथ पैर भी खिंचा जाता था। जोर भी बहुत करती मैंने विद्वान ब्राह्मण से उसका उपाय पूछा लेकिन वे न बता सके। इधर-उधर से ताबीज धागा लाकर बाँधता पर उनसे कोई लाभ न होता।
साधना जिस गति से बढ़ती है उसी अनुपात से मुझे माता की कृपा के अनेकों अनुभव भी होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई शक्ति मेरे चारों ओर भरी हुई है और वह मुझे निरन्तर प्रेरणा एवं पथ प्रदर्शन प्रदान करती है। अनेकों व्यक्ति मुझसे अनेकों अज्ञात बातें पूछने आते हैं उन्हें ऐसा विश्वास है कि मुझे कोई विशेष सिद्धि प्राप्त है। कारण कि बताई हुई प्रायः सभी बातें सही निकलती हैं और जिसे जो कार्य बता देते हैं वह उनके लिए सफलता प्रदान करने वाला ही बन जाता है।
साधनाएँ चलती रहती हैं। नित्य भी काफी समय तक वह गायत्री उपासना करती हैं।
साधनाएं, तपश्चर्याएँ, नवरात्रि साधनाएँ चलती रहती हैं। नित्य भी काफी समय तक वह गायत्री उपासना करती हैं।
साधना प्राप्त होती या नहीं।
साधना अवश्य करें। यह साधना का एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रकार है।
साधना का पूर्ण अधिकार है। मैं छोटी-छोटी लड़कियों और बालकों को इस ओर लाने की बहुत कोशिश करता हूँ।
साधना चालू रखे तो यह लीला, न करे तो मन नहीं मानता था। जैसे तैसे चालू रक्खा छोड़ा नहीं, माँ की दयालुता पर भरोसा था। मैंने ठान लिया था, कि चाहे जो कुछ हो, उसे छोड़ नहीं सकते। यह विकट परिस्थिति बहुत कम लोगों के आगे आयी होगी। मेरे पास कातर वाणी, दृढ़ श्रद्धा और विश्वास के सिवा और क्या था?
साधना जो नहीं करें उनके समान अभागा इस दुनिया में और कौन है। मेरे अनुभव तथा मेरा दृढ़ विश्वास इस बात का द्योतक है कि वेदमाता गायत्री की शरण में रहने वाला कभी भी दुःखी नहीं रहता है।
साधना कभी किसी की निष्फल नहीं जाती और फिर सरल है और विघ्न भी वैसे नहीं आते।
साधना है उसके हिसाब से देखा जाय तो हम लोगों को माता का सहारा भी सन्तोषप्रद मिल रहा है। गत वर्ष गर्मियों में तो हम लोग एक भारी दुर्घटना तथा जान-माल की भयंकर क्षति से बाल-बाल बच गये। रक्षा में गायत्री माता की कृपा ही प्रधान कारण थी।
साधना के फलस्वरूप सूक्ष्म शरीर के कुछ गुप्त, कोषों, चक्रों, गुच्छकों, ग्रंथियों का विकास होता है, जिसके कारण दिव्य शक्तियों का बढ़ना अपने आप शुरू हो जाता है। बुद्धि की तीव्रता, शरीर की स्वस्थता, सत्पुरुषों की मित्रता, व्यावसायिक सहायता, कीर्ति, प्रतिष्ठा, पारिवारिक सुख-शान्ति, सुसन्तति व्याधियों से निवृत्ति, शत्रुता का निवारण सरीखे अनेकों लाभ अनायास ही मिलने लगते हैं। कारण यह है कि आत्मबल बढ़ने से, दिव्य शक्तियाँ विकसित होने से, गुण कर्म स्वभाव में आशाजनक परिवर्तन हो जाने से अनेक ज्ञात अज्ञात बाधाएँ हट जाती हैं और सूक्ष्म तत्व अपने में बढ़ जाते हैं, जो उन्नति की ओर ले जाते हैं।
साधना की इच्छा थी वह भी पूर्ण हो गई। अधिक क्या लिखूँ वहाँ मैंने सर्वस्व पाया।
साधना करने की इच्छा है फिर माता की इच्छा।
साधना का ही एक चमत्कार सुनिये। हमारी जन्म भूमि घीसामिसर का पुरवा नामक गाँव में है जो सुल्तानपुर जिले में है। छुट्टी पर एक बार घर गया हुआ था। दरवाजे पर बैठा रामायण पढ़ रहा था कि पड़ौसी की धोबिन के रोने धोने का कोलाहल मचा। मैं रामायण बन्द करके वहाँ गया तो देखा कि उसका बच्चा मर रहा है।
साधना बन पड़ती है करता रहता हूँ। इससे मुझे ऐसा प्रतीत होता रहता है कि कोई महान शक्ति हर घड़ी साथ-साथ फिरती है और उसकी सहायता समय पर आसानी से प्राप्त की जा सकती है।
साधना प्रारम्भ कर दी दो वर्ष की कठिन साधना के बाद मेरा रोग दूर हो गया मैं स्वस्थ हूँ परन्तु एक मानसिक रोग शेष रह गया। अन्त में उस रोग का इलाज बहुत कुछ आचार्य जी पूज्यनीय श्रीयुत श्रीराम शर्मा जी अखण्ड-ज्योति के सम्पादक एवं गायत्री तपोभूमि के अधिष्ठाता ने किया। इनके श्री चरणों की कृपा से मुझे गायत्री माता की महिमा का अनुभव हुआ। तब से मैंने माँ के श्री चरणों में आश्रय ले लिया है एवं भगवती की अनुकम्पा से बड़े-2 कठिन टी. बी. सरीखे रोगियों को अच्छा करने में सफलता प्राप्त कर चुका हूँ एवं अब धीरे-2 यह विश्वास होने लगा है कि माँ के आशीष से मैं अवश्य अपने पिता का नाम और यश फिर से स्थापित करने में सफल हो सकूँगा।
साधना में शीघ्र प्रगति होती है। 4- किसी प्रकार की मानसिक शान्ति या चिन्ता दूर होकर मन को शान्ति मिलती है। 5-मन्त्र लेखन पुस्तिका में और स्थान में आध्यात्मिक आन्दोलन और शक्ति पैदा होती है जो साँसारिक तथा आध्यात्मिक प्रवृत्तियों में अदृश्य सहायता करती है। 6- मन्त्र योग का यह प्रकार (लेखन) आधुनिक चंचल स्वभाव की जनता के लिए अधिक सिद्धिप्रद है। उनके लिए माला की सहायता से जप करने में चित्त को बाहरी जगत् की वस्तुओं में भटकने से रोकना अति कठिन है।
साधना को आरम्भ कर दिया। उस समय मकान मालिक ने मकान से निकालने के लिये कैन्टोमेंट से मुकदमा चलवा दिया था, मैंने परीक्षा का यही अवसर अच्छा समझा, विधि विधान से करना उस समय मुश्किल था, जैसे तैसे 1 माला जपने लगा। और मुकदमा जिता देने की प्रार्थना करने लगा। कैन्टोमेंट बोर्ड के कई मेम्बर मकान मालिक के दोस्त थे। सरकारी मुकदमा मेरे ऊपर चल रहा था।
साधना के बाद मेरा रोग दूर हो गया मैं स्वस्थ हूँ परन्तु एक मानसिक रोग शेष रह गया। अन्त में उस रोग का इलाज बहुत कुछ आचार्य जी पूज्यनीय श्रीयुत श्रीराम शर्मा जी अखण्ड-ज्योति के सम्पादक एवं गायत्री तपोभूमि के अधिष्ठाता ने किया। इनके श्री चरणों की कृपा से मुझे गायत्री माता की महिमा का अनुभव हुआ। तब से मैंने माँ के श्री चरणों में आश्रय ले लिया है एवं भगवती की अनुकम्पा से बड़े-2 कठिन टी. बी. सरीखे रोगियों को अच्छा करने में सफलता प्राप्त कर चुका हूँ एवं अब धीरे-2 यह विश्वास होने लगा है कि माँ के आशीष से मैं अवश्य अपने पिता का नाम और यश फिर से स्थापित करने में सफल हो सकूँगा।
साधना नहीं है पर इस छोटी सी साधना का ही एक चमत्कार सुनिये। हमारी जन्म भूमि घीसामिसर का पुरवा नामक गाँव में है जो सुल्तानपुर जिले में है। छुट्टी पर एक बार घर गया हुआ था। दरवाजे पर बैठा रामायण पढ़ रहा था कि पड़ौसी की धोबिन के रोने धोने का कोलाहल मचा। मैं रामायण बन्द करके वहाँ गया तो देखा कि उसका बच्चा मर रहा है।
साधना कर और उनसे विनय कर कि हे माता! अपने पुत्र को सफलता दे। मैंने दादा के कथन मानकर माता के चरणार्विन्दों में मन लगा परीक्षा में सम्मिलित हुआ माता की कृपा दृष्टि हुई और परीक्षा परिणाम घोषित होने पर मैं अपनी देय परीक्षा संस्कृत प्रथमा में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। तब से निरन्तर मेरा मन माता के श्री चरणों में लगा रहता है तथा मेरा जीवन सुखमय व्यतीत हो रहा है। मैं इस समय अपने जिले से शिक्षक पदारुढ होकर अध्ययन कार्य करता हूँ। यह माता की ही अनुकम्पा है, कि मेरी जटिल से जटिल समस्याएँ शीघ्र ही हल हो जाती हैं।
साधना में लगा हूँ।
साधना में लगाकर विरक्त जीवन व्यतीत करने का अवसर मिल रहा है। दुकान चलाने के लिए एक विश्वस्त साथी भी माता की कृपा से मिल गया है। जिसके कारण पूजा पाठ तथा व्यापार में किसी प्रकार अड़चन नहीं होती।
साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होगी।
साधना करे तो एक वर्ष में पूरी कर सकता है। पर अपनी आरम्भ की शिथिलता को पूरा करने के लिए मुझे तो अन्तिम दिनों में आठ-आठ, दस-दस घण्टे लिखना पड़ा है। मेरे जैसे 60 वर्ष की आयु के व्यक्ति के लिए निस्संदेह इतना श्रम कठिन ही है। पर माता ने ही यह साहस तथा उत्साह दिया जिसके बल पर एक वर्ष में यह अनुष्ठान पूर्ण हो गया। गत चैत्र की नवरात्रि में गायत्री तपोभूमि में आकर इस लेखन का दशाँश 12500 आहुत का हवन मैंने कर दिया।
साधना सिद्धि मैं नहीं जानता गायत्री ही मेरा इष्ट है। इसी की जो कुछ साधना बन पड़ती है करता रहता हूँ। इससे मुझे ऐसा प्रतीत होता रहता है कि कोई महान शक्ति हर घड़ी साथ-साथ फिरती है और उसकी सहायता समय पर आसानी से प्राप्त की जा सकती है।
साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होगी।
साधना की ऐसी ही अनेक विशेषताएं मुझे सूझ पड़ी और 1-5-53 से गायत्री मन्त्र लेखन की साधना आरम्भ कर दी। और एक वर्ष में 125000 (सवालक्ष) मन्त्र लिखने का एक अनुष्ठान पूर्ण कर लिया। किसी दिन कम किसी दिन ज्यादा लिखा गया है। किसी दिन तो 800 तक लिखे गये। औसत 360 प्रतिदिन लिखने का पड़ा।
साधना टूटी फूटे नियम से कर रहा हूँ। माता की दया और गुरुदेव की कृपा से जन्म जन्मान्तर के पड़े कुसंस्कार धीरे-2 हटते जा रहा हैं।
साधना का वर्णन अखण्ड-ज्योति में पढ़ा तो उस पर विशेष मनोयोग पूर्वक विचार किया तो लगा कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होगी।
साधना से हमारी आध्यात्मिक उन्नति बढ़ती है। साधन बढ़ाने की भी तमन्ना होती है। हमें कार्य में सफलता भी मिली है। भय, शोक, क्रोध, लोभ, मोह वगैरह दुर्गुण कम होते हैं। पुण्य पुरुषों की प्राप्ति होती है।
साधना से क्या-क्या लाभ होते हैं इनका मैं निजी अनुभव कर चुका हूँ, मेरे बगैर माँगे माता ने मुझे सब सुख साधन, विद्या, यथा शक्ति, धन, सुशील स्त्री, दो पुत्र, दो लड़कियाँ, अच्छा परिवार दिया है और अब तक हर काम में माता सहायता करती है।
साधना का विचार करने लगा। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। इसी अवसर पर मेरे मित्र विश्वनाथ प्रसाद जी के बड़े भाई दुर्गाप्रसाद जी ने “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका मंगाया था, मैंने मन बहलाने के लिए मंगाकर पढ़ने लगा। गायत्री महिमा पढ़कर मन प्रसन्न हुआ, और कई छोटी-छोटी पुस्तकें मंगवाकर पढ़ी, पढ़ कर खाट पर बैठे-बैठे ही मानसिक साधना को आरम्भ कर दिया। उस समय मकान मालिक ने मकान से निकालने के लिये कैन्टोमेंट से मुकदमा चलवा दिया था, मैंने परीक्षा का यही अवसर अच्छा समझा, विधि विधान से करना उस समय मुश्किल था, जैसे तैसे 1 माला जपने लगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-November
साधना में चौबीस घण्टे लगे रहने पर भी सम्भव नहीं है।
साधनाएँ करते होंगे इसकी एक प्रत्यक्ष झाँकी देखकर दर्शक के मन में सहज ही आस्तिकता का उदय होता था।
साधना करने की अपेक्षा यहाँ के शक्तिशाली वातावरण में किया हुआ तप निश्चय ही अनेक गुना अधिक परिणाम कारक होगा। यह एक सिद्धपीठ इस तपोभूमि को बनाने के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में यहाँ महापुरश्चरणों की सदा ही व्यवस्था रहेगी। अगले चैत्र के महापुरश्चरण के अन्त में पूर्णाहुति के दिन ही नरमेध यज्ञ भी होगा। जिसमें गायत्री माता, यज्ञ पिता एवं भारतीय संस्कृति के लिए जो लोग जीवन दान करेंगे, उनके महत्व पूर्ण संकल्पों को शास्त्रोक्त विधि से वृहत समारोह पूर्वक सम्पन्न कराया जायगा और बताया जायगा कि प्राचीन काल में किस प्रकार नरमेध यज्ञ होते थे।
साधना करते हुए साधकों का दृश्य बड़ा ही हृदयग्राही होता था। प्राचीन काल में तपोवनों में ऋषिगण इकट्ठे होकर किस प्रकार वेदोक्त साधनाएँ करते होंगे इसकी एक प्रत्यक्ष झाँकी देखकर दर्शक के मन में सहज ही आस्तिकता का उदय होता था।
साधना के साथ यज्ञ का, दान का, ब्राह्मण भोजन का सम्बन्ध इसलिए जोड़ा गया है कि केवल अकेला एक व्यक्ति चुपचाप जप करके एक कोने में न बैठा रहे वरन् संसार की वायु शुद्धि एवं शुभ वातावरण के निमित्त हवन भी करे, दान देकर समाज की कुछ भलाई भी करे। सच्चे लोक सेवकों परमार्थ प्रसारक ब्राह्मणों को भोजन आदि से तृप्त करके उनकी सामर्थ्य भी बढ़ावें। यह सब बातें परमार्थ रूप हैं-सामूहिक लाभ के लिए हैं। गायत्री की मूल भावना जो “नः” शब्द में स्पष्ट है। हमें सामूहिक रूप से कार्य करने के लिए बलात् प्रेरित करती है।
साधना रह गई है अधूरी,
साधना में प्रवृत्त हो गए। तपस्वी जीवन के कष्टसाध्य नियमों को प्रायः सभी ने बड़ी प्रसन्नता पूर्वक निभाया। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सब लोग नित्यकर्म स्नानादि से निवृत्त होकर गायत्री जप में संलग्न हो जाते थे। पीले दुपट्टे ओढ़े हुए पंक्ति बद्ध साधना करते हुए साधकों का दृश्य बड़ा ही हृदयग्राही होता था। प्राचीन काल में तपोवनों में ऋषिगण इकट्ठे होकर किस प्रकार वेदोक्त साधनाएँ करते होंगे इसकी एक प्रत्यक्ष झाँकी देखकर दर्शक के मन में सहज ही आस्तिकता का उदय होता था।
साधना की अपेक्षा-सामूहिक गायत्री विस्तार के आयोजनों का महत्व किसी भी प्रकार-रत्ती भर भी कम नहीं समझते। वरन् अधिक उत्साह पूर्वक इस दिशा में अवसर होते हैं।
साधना की प्रक्रिया का प्रसार करना मानव जीवन की अनेक कठिनाईयों को सरल करने का परम पुनीत मार्ग है। आज के समय में यह सर्वोपरि आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-January
साधना बढ़ेगी तब जब उसके सम्बन्ध में समुचित जानकारी हो। आज तो लोग गायत्री विद्या का महत्व और विज्ञान जानना तो दूर, उसका नाम तक नहीं जानते। इसलिए यदि भारत भूमि में प्राचीन काल की भाँति गायत्री माता की पुनः प्रतिष्ठा करनी है, इस महाशक्ति से भारत माता को प्राचीन वैभव, गौरव एवं बल से सुसज्जित करना है तो निश्चय ही पहला कार्य गायत्री माता के महत्व से जनता को परिचित कराना ही होगा। इस कार्य को पूरा करने की जिम्मेदारी हम सब गायत्री उपासकों की है। यह कुम्भ पर्व 12 वर्ष बाद आता है।
साधना ने ही उन्हें भगवान का प्राणप्रिय आत्मीय बना दिया था।
साधनाएं छोड़कर महात्मा ज्ञानी, विद्वान कुम्भ पर पहुँचते थे और जनता को सद्ज्ञान की शिक्षा देते थे। आज सभी अव्यवस्थाओं की भाँति कुम्भ पर्व भी मेला ठेला बनता जा रहा है पर उसके मुख्य उद्देश्य में तनिक भी परिवर्तन नहीं होता। ज्ञान प्रसार ही उसका उद्देश्य है। इसको जो जितनी मात्रा में पूरा करता है वह उतना ही कुम्भ पर्व का फल प्राप्त करता है।
साधना विशेष द्वारा अपने शरीर की धातुओं, चक्रों-उपकरणों, ग्रंथियों को तथा ब्रह्मरंध्र के मस्तिष्कीय चुम्बक केन्द्र को ऐसा ढाल दें कि वे आकाश में फली हुई अभीष्ट देव शक्ति को अपनी ओर खींच सके तो उस साधन को देवोपासना कहेंगे। ऐसी देवोपासना जब सफल हो जाती है तो अभीष्ट सत्परिणामों से उपासक को तृप्त कर देती है। पश्चिमीय देशों के भौतिक विज्ञानी मशीन बनाने में संलग्न होकर रुद्र की बारात को को प्रसन्न कर रहे हैं, हमारे पूर्वज आत्म साधना, तपश्चर्या, मन्त्र, भोगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान् शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते रहे थे।
साधना का एक छोटा अनुकरण करें, जिस प्रकार हम अपनी कन्या के विवाह में, मेम्बरी जीतने में, व्यापार में प्रियजनों की बीमारी में, भयंकर मुकदमे से जी-जान एक कर देते हैं, खाना-सोना भूल जाते हैं, हानि-लाभ की परवाह नहीं करते, इस प्रकार की तत्परता के साथ हम कुछ समय माता के निमित्त, उसका गौरव बढ़ाने के लिए लगावें तो निश्चय ही यह कार्य एक साधारण महत्व के अनुष्ठान एवं यज्ञ की अपेक्षा भी अधिक सत्परिणाम उत्पन्न करेगा, वह हमें माता के अधिक समीप जायेगा। ज्ञान प्रसार से बढ़कर और कोई पुण्य इस भूतल पर नहीं है। जिनने अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं किया है। वे आज ही कुछ करने की योजना बनावें, जो कुछ कर चुके हैं उन्हें और अधिक करना चाहिए। अत्यन्त ही सुन्दर तिरंगे मुख पृष्ठों की बहुत सस्ती पुस्तिकाएँ केवल इसी उद्देश्य के लिए छापी गई हैं।
साधना (7) गायत्री उपासना कैसे करें? (8) गायत्री से यज्ञ का संबंध, आठों ही पुस्तकें गायत्री विद्या सम्बन्धी बहुत कुछ जानकारी उपस्थित करती है। इस पूरे सैट का मूल्य दस आना मात्र है, 14 जनवरी मकर संक्रान्ति से होकर 13 फरवरी कुम्भ संक्रान्ति तक इस साहित्य को बेचने या उपहार देने के लिए हम सब पूरा-पूरा प्रयत्न करें, प्रतिदिन 1 के हिसाब से 20 दिन में 30 सैट प्रसारित करने का प्रयत्न सफल होना बहुत सरल है। 1) की पुस्तकें बेच सकना या वितरण कर सकना कोई ऐसा कार्य नहीं हैं जिसे थोड़ी सी भी इच्छा, श्रद्धा, भावना और सामर्थ्य रखने वाला व्यक्ति न कर सके। जो इतना भी न कर सके वे 10 सैट) को तो प्रचारित कर ही सकते हैं।
साधनाओं में हवन अनिवार्य है। जितने भी पाठ, पुरश्चरण, जप, साधन किये जाते हैं, वे चाहें वेदोक्त हों चाहे तान्त्रिक, हवन उनमें किसी न किसी रूप में अवश्य करना पड़ेगा। गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवाँ भाग हवन करने का विधान है। परिस्थितिवश दसवाँ भाग आहुतियाँ न दी जा सके तो शताँश (सौ वाँ भाग) आवश्यक है।
साधना मार्ग की कठिनाई, सफलता के रहस्य आदि का बहुत विस्तृत विज्ञान है। इस यज्ञ सम्बन्धी पुस्तक मे
साधना में तुम कर दो अर्पित तन, मन, धन।
आज यज्ञ की बेला, साधक! करो हृदय पावन॥
साधना, तपश्चर्या, मन्त्र, भोगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान् शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते रहे थे।
साधना में संलग्न हों।
साधना से किये हुए सत्कर्म से ही है। हवन तो मनुष्य हर घड़ी कर नहीं सकता, हवन के अतिरिक्त भी उसे बहुत से काम करने पड़ते हैं। यहाँ तो परमार्थ की कर्त्तव्यमयी स्वार्थ रहित भावना द्वारा जीवन का प्रत्येक कार्य करने का आदेश है। जो कर्म इस भावना से नहीं किये जाते अर्थात् स्वार्थ की संकुचित बुद्धि से किये जाते हैं वे जीवन को जन्म मरण की फाँसी में बाँधने वाले सिद्ध होते हैं।
साधनाओं से परिपूर्ण हो। आहुतियों के अन्त में ‘इदमनमम’ कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि शुभ कर्मों को भी यश आदि स्वार्थों की दृष्टि से नहीं परमार्थ के उद्देश्य से ही करना चाहिए। इदमनमम- यह मेरा नहीं है। जो कुछ भी अच्छा चाहिए अपने को नहीं।
साधना देते हैं। हमें किसी को कुछ नहीं देना चाहिए? अवश्य ही देना हमारा कर्त्तव्य होना चाहिए ‘देव’ वे कहलाते है कि जो देते है। देने वालों की श्रेणी में अपने को रखने से हम भी ‘देव’ बन सकते हैं। धन देना ही दान नहीं है।
साधना थी। इस अद्भुत साधना ने ही उन्हें भगवान का प्राणप्रिय आत्मीय बना दिया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-October
साधना है, एक बलिदान है जो आत्मा को पवित्रता प्रदान करता है और देता है त्याग की भव्य भावना जिससे रस लोलुपता की पिपासा नहीं शान्त होती वरन् आत्मिक शान्ति प्राप्त होती है। स्नेह व्यथा नहीं देता, देता है सच्चा सन्तोष और अनन्त शान्ति। इसके विपरीत कुछ व्यक्ति स्वार्थ सिद्धि तथा सन्निकटता में ही स्नेह का स्थायित्व देखते हैं। किन्तु, स्वार्थ सिद्धि माया का अल्पकालिक बाह्य प्रदर्शन है तथा सन्निकटता मोह का प्रतिरूप है स्नेह नहीं।
साधना पर बहुत अधिक जोर देते हैं। योगी अरविन्द घोष ने अपने ग्रन्थों में सबसे अधिक इस बात पर जोर दिया है कि माता के चरणों में यदि जीव सच्चे हृदय से आत्म समर्पण कर दें तो उसे और कुछ करना तथा पाना शेष नहीं रह जाता। गीता में भगवान कृष्ण ने भी पग-पग पर इसी महान प्रक्रिया का संदेश दिया है।
साधना क्षेत्र के साधारण उपासकों को भी ऊंची कक्षा में चढ़ना चाहिये। सकाम उद्देश्यों तक सीमित रहने वाले उपासना के वास्तविक लाभ को प्राप्त नहीं कर सकते। भिखारी लोग किसी दानी के दरवाजे पर खड़े रहते हैं तो उनकी पात्रता और दानी की दया के अनुसार उन्हें यथा अवसर कुछ मिलता रहता है, पर भिखारियों की हर कामना को पूर्ण करना दानी का कर्त्तव्य नहीं है। भिखारियों की आवश्यकता का समाधान भी दान से नहीं हो सकता। प्रार्थना करने मात्र में जो लाभ प्राप्त होता है वह सीमित होता है।
साधना के रूप में इसलिए उपस्थित किया है कि इसके द्वारा ममता ओर मोह के बन्धनों पर सीधा एवं तीव्र प्रहार होता है। मकान जायदाद को, पशु को, वस्तुओं को बेच देने पर जब मन में यह भाव समा जाता है कि अब इन पर हमारा स्वामित्व नहीं रहा तो उनके प्रति चिर संचित ममता बात में समाप्त हो जाती है। फिर उसके संबन्ध में चिन्ता करने की कोई बात शेष नहीं रह जाती। कन्या दान कर देने पर पिता की अपनी बेटी के सम्बन्ध में चिन्ताएँ ओर जिम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती है। मुनीम को यद्यपि मालिक से अधिक काम करना पड़ता है पर उसे अपने भीतर चिन्ता और परेशानी प्रतीत नहीं होती।
साधनाएं हैं। भगवान ने गीता में कहा है-’गायत्री छन्दसामहम्’ वेद मन्त्रों में गायत्री मैं स्वयं ही हूँ। भगवती गायत्री माता को आत्म समर्पण वस्तुतः ईश्वर को ही आत्म समर्पण है। पिता से माता का दर्जा बड़ा है। आदि गुरु माता ही होती है।
साधना के द्वारा ही जाना जा सकता है। उसके लिये अनन्त शान्ति को छोड़ कर और कोई रहने का स्थान नहीं है- “अयम् आत्मा सन्तो” आत्मा शान्त मौन है।
साधना, इक तान,
साधनाओं का यह एक ही उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही ऋषियों ने देश काल पात्र के अनुसार अनेक प्रकार के साधन विधानों का निर्माण किया है।
साधनाएं बताई गई हैं वे आत्म कल्याण की उत्तम एवं सरल साधनाएं हैं। भगवान ने गीता में कहा है-’गायत्री छन्दसामहम्’ वेद मन्त्रों में गायत्री मैं स्वयं ही हूँ। भगवती गायत्री माता को आत्म समर्पण वस्तुतः ईश्वर को ही आत्म समर्पण है। पिता से माता का दर्जा बड़ा है। आदि गुरु माता ही होती है।
साधना पथ पर चलने के उपरान्त साधक वस्तुस्थिति को समझ लेगा और उपासना के भौतिक नहीं आध्यात्मिक लाभ को लेने के लिये तत्पर हो जायगा।
साधना नहीं कर सकते हैं तथा औद्योगिक प्रवृत्ति में हम सदैव आगे बढ़ने से हिचकते रहेंगे।
साधना के प्रतिरूप में, प्रतिदान की भावना से प्रेरित होकर नहीं। अतः उसका स्नेहालोक सर्वहिताय विश्वव्यापी है। इस प्रकार का रवि-रश्मि तुल्य स्नेह दो ही रूपों में प्राप्त हो सकता है- ईश्वर की कृपा तथा जननी की वात्सल्यता में। मानव श्रद्धा, शक्ति तथा उपासना द्वारा स्वर्गीय स्नेह के ऋण से उऋण होने का दम्भयुक्त प्रयास करता है। ऐसा प्रयास उपहासास्पद है, क्योंकि उपासना तथा भक्ति आदि प्रतिदान नहीं हैं, वह तो उपास्य के प्रति उपासक की कृतज्ञता का प्रकटीकरण नाम है।
साधना में।
साधना जैसा शुभ फलदायक होता है। इसलिए अध्यात्म विद्या के वेत्ता लोग समर्पण की साधना पर बहुत अधिक जोर देते हैं। योगी अरविन्द घोष ने अपने ग्रन्थों में सबसे अधिक इस बात पर जोर दिया है कि माता के चरणों में यदि जीव सच्चे हृदय से आत्म समर्पण कर दें तो उसे और कुछ करना तथा पाना शेष नहीं रह जाता। गीता में भगवान कृष्ण ने भी पग-पग पर इसी महान प्रक्रिया का संदेश दिया है।
साधना में वह तीव्र आलोक है जिसके समक्ष विलासिता का वैभव प्रकम्पित होकर अस्तित्व विहीन हो जाता है। इसके विपरीत स्नेह के रूप में मोह तथा विलासिता मानव के पतन का द्वार खोलती है।
साधना करते हुए न मालूम कितनी जगहों से उन्हें विचलित होना पड़ता हैं। कभी-कभी हानि भी उठानी पड़ती है। तब कहीं जाकर उन्हें सफलता मिलती है। सच है सुकार्य सदा ही कष्टसाध्य है। एकलव्य को गुरु जी महाराज किन्हीं शब्दों द्वारा दुत्कार देते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-February
साधना में इस पर बड़ा जोर दिया गया है। क्योंकि असंयमित व विवेक रहित स्वच्छन्द जीवन ही मनुष्य के पतन का प्रधान व एकमात्र कारण है।
साधना, तन्मयता, एकाग्रता की ही आवश्यकता पड़ती है। प्रेम भाव से किसी स्थान, अवस्था, समय व परिस्थिति में जप किया जा सकता है। गायत्री जप से जो मन की एकाग्रता होती है उसका वैज्ञानिक आधार भी है।
साधनारुढ़ करके मन को शनैःशनैः जीतना चाहिए। मन पर नियंत्रण किये बिना साधन सफल नहीं होता और साधक निरुत्साह हो जाता है।
साधना का उद्देश्य है, गुफा में बैठे ध्यान करने से मन की एकाग्रता इसलिए अधिक होती है कि वहाँ बाहरी शब्द सुनाई नहीं देता। बाहरी चीजों का अवलोकन वहाँ से किया नहीं जा सकता, न गुफा में कुछ दर्शनीय वस्तुएं ही होती है कि जिससे इन्द्रियाँ क्षुब्ध हों, विकार जाग्रत हों, न चंचल हो, वहाँ गंध भी कुछ नहीं रहती न अस्वाद योग्य खाद्य व स्पर्श योग्य स्निग्ध व कोमल वस्तुएं ही होती हैं, इसलिए वहाँ मन को संयमित रखना सहज होता है वहाँ वचन व्यवहार भी करे किससे? अतः सहज ही मौन रह जाता है क्रमशः मन उस अवस्था में अभ्यास और उस वातावरण से शाँत हो जाता है।
साधना तो तप और संयम का अपूर्व और आदर्श उदाहरण है। जैन धर्म के अनुसार संसार में अनादि काल से परिभ्रमण करते रहने के कारण उसके कर्म ही हैं, आत्मा के हाथ कर्म का बन्धन मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, मन वचन काया हरत्रि योग और प्रमाण्द से होता है। कर्मों के आने के मार्ग को आश्रम कहा जाता है। कर्मबंधन को रोकने को संसार या संयम कहते हैं। पूर्व कर्म का आत्मा में अलग हो जाना निर्जरा कहलाता है और कर्मों से सर्वथा छुटकारा पाना ही मुक्ति मोक्ष कहलाता है।
साधना का एक मार्ग है और सामूहिक शिक्षा का एक ढंग है। अतः यह आवश्यक है कि अपने संगीत को पुनः अनुप्रमाणित करने के लिए हम इन दोनों पक्षों से इसका संबंध फिर जोड़ दें। मुझे शंका है कि इस बारे में उतना विचार नहीं किया गया है जितना कि होना चाहिए।
साधना द्वारा अनेक सिद्धियों के स्वामी बन जाते हैं। सबसे बड़ी अपने आपको भवबन्धनों से मुक्त कर लेना तथा आत्मा का साक्षात्कार करके जीवन मुक्त बनना है। इस महासिद्धि के लिए भी चित्त की चंचलता को दूर करके एकाग्रता का अभ्यास बढ़ाना ही है।
साधना के विशेष अवसर के संबंध में लागू होती है वही बात और भी जोरदार कारणों के साथ कुम्भ वर्ष के संबंध में है।
साधना की एकाग्रता द्वारा सक्रिय एवं प्रकट होते हैं। बहिर्मुखी लोग व्यर्थ की बातों में लगाकर अपने मन के लाभ से अपरिचित तथा वंचित रह जाते हैं। किन्तु जो लोग अन्तर्मुखी होकर अपने चित्त को जप, ध्यान आदि में एकाग्रता को बढ़ाते हैं वे अपनी अनेक आत्मिक शक्तियों का दर्शन करते हुए आत्म साक्षात्कार का परमानन्द प्राप्त करते हैं। निरन्तर आत्मा में दत्त चित्त होकर सरकस में काम करने वाले नट जिस पर अपने शरीर द्वारा आत्मिक एवं मानसिक शक्तियों पर चित्त एकाग्र करके साधना द्वारा अनेक सिद्धियों के स्वामी बन जाते हैं। सबसे बड़ी अपने आपको भवबन्धनों से मुक्त कर लेना तथा आत्मा का साक्षात्कार करके जीवन मुक्त बनना है।
साधना है और साँसारिक दुखों से मुक्ति प्रदान करने और ब्रह्म तक मानव को ले जाने वाला मार्ग है। संगीत के इस स्वभाव और ध्येय को हमारे लोगों ने हमारी सभ्यता के प्रभाव से पहचान लिया था और जानबूझ कर संगीत का विकास इन्हीं आदर्शों के अनुकूल किया था। उन्होंने संगीत और जीवन में किसी प्रकार की खाई न खोदी, किसी प्रकार की दीवार न खड़ी की। यह कहना अनुचित न होगा कि उन्होंने संगीत को हमारे जीवन में इस प्रकार बुन दिया कि सहस्र शताब्दियों के पश्चात भी वह उसका अविच्छिन्न अंग बना हुआ है। संसार में सम्भवतः ऐसा अन्य कोई देश नहीं है जहाँ संगीत इतने पुराने युग से जन जीवन में इतना व्याप्त हो जितना कि वह भारत में सहस्रों वर्षों से रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-August
साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए, निराशा एवं असफलता के अंधकारपूर्ण वातावरण पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
साधनात्मक प्रवचनों के अतिरिक्त जीवन को उत्तम बनाने के लिए व्यवहारिक एवं मनोवैज्ञानिक शिक्षा की भी व्यवस्था रहेगी। पिछले शिक्षण शिविर में जिन विषयों पर शिक्षा दी गई थी उन सबका भी समावेश रहेगा। अधिकारी, अनुभवी और सुलझे हुए विद्वानों के प्रवचन सुनने एवं अपनी व्यक्तिगत समस्याओं पर परामर्श करने का यह सर्वोत्तम अवसर है। पिछले शिविर में सीमित संख्या में ही छात्र लिये गये थे, इसलिये अनेक प्रार्थना पत्र अस्वीकृत किये गये थे। इस बार भी वैसी ही स्थिति रहेगी, इसलिए जिन्हें आना हो पहले से ही स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न करें।
साधना में अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन इस पुस्तक में है। किन व्यक्तियों को किस-किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए, निराशा एवं असफलता के अंधकारपूर्ण वातावरण पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
साधनाएं की जाती थी। इन लाभों से भी तीर्थ यात्रा का बड़ा महत्व था। देवालयों की दर्शन झाँकी, पवित्र नदी सरोवरों का स्नान तो एक गौण लाभ था मूल लाभ तो उन स्थानों की आध्यात्मिक विशेषताएं ही थीं।
साधना की दृष्टि से 24 हजार का लघु गायत्री अनुष्ठान भी घर रह कर गायत्री तपोभूमि में करना अधिक उत्तम है। अनुष्ठान के साथ हवन भी आवश्यक होता है उसकी ठीक व्यवस्था हर कोई नहीं करता। यहाँ बड़े सामूहिक यज्ञ में सबको शास्त्रोक्त हवन में सम्मिलित होने का लाभ मिलेगा।
साधना के नौ रत्न, अन्यत् आवश्यक नियम गायत्री द्वारा संध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं मन्त्र का अर्थ माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना के लिए वह उत्तम स्थान है।
साधना का विस्तृत वर्णन है। गायत्री के पाँच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों का परिचय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय आदि पंचकोषों की साधना, हठयोग, राजयोग, लययोग नादयोग, ऋजुयोग प्राणयोग, शब्दयोग, स्वरयोग की विधियाँ। बन्ध, मुद्रा, पंच तन्मात्रा, ग्रन्थि भेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन, सोऽहं का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग मनोनिग्रह मैस्मरेजम की बेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिए।
साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अन्यत् आवश्यक नियम गायत्री द्वारा संध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं मन्त्र का अर्थ माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना, हठयोग, राजयोग, लययोग नादयोग, ऋजुयोग प्राणयोग, शब्दयोग, स्वरयोग की विधियाँ। बन्ध, मुद्रा, पंच तन्मात्रा, ग्रन्थि भेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन, सोऽहं का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग मनोनिग्रह मैस्मरेजम की बेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिए।
साधना या शिक्षा के समय काम में न लाया जा सकेगा। तपोभूमि में सीमित व्यक्तियों के लायक स्थान है इसलिए जिन्हें आना हो उन्हें अपना पूरा परिचय, नाम, पता, आयु, जाति शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय आदि सब बातों के सहित लिखना चाहिए। एक छोटी सीमित संख्या में ही व्यक्तियों के लिए वहाँ व्यवस्था हो सकती है। इसलिए जिन्हें आना हो उन्हें पहले ही स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। बिना स्वीकृति पत्र प्राप्त किए कोई सज्जन न आवें।
साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना द्वारा गुप्त 24 शक्तियों का जागरण, अनेक शक्तियों का आविर्भाव वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान, अनेकों अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध निष्काम और सकाम साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अन्यत् आवश्यक नियम गायत्री द्वारा संध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं मन्त्र का अर्थ माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना को अपनाकर प्राप्त की जा सकती है। ऋषियों ने इसी आधार को अपना प्रथम लक्ष्य माना था और वे अपना तथा संसार का बहुत कुछ कल्याण करने में समर्थ हो सके थे। मुझे लगा कि उस प्राचीन गौरव को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक आधार है इस मान्यता के आधार पर मैं गायत्री उपासक बन गया। गायत्री ज्ञान की अधिक पिपासा मुझे मथुरा खींच लाई। यहाँ केवल दर्शनों को आया था पर दर्शनों के बाद वापिस लौटना सम्भव नहीं हो सका।
साधना
साधनाओं का पूरा विधान या विज्ञान बताया जाना सम्भव नहीं। संचित और अधूरे उत्तरों से जिज्ञासुओं का ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। इसलिए कोई पूछताछ करने से पहले गायत्री महाविद्या आदि ग्रन्थों को मंगा लेते हैं व गायत्री परिवार के सदस्य माने जाते हैं और उनकी उन्नति के लिए समय-समय पर अनेक आवश्यक बातें एवं सूचनायें इधर से ही भेजी जाती रहती हैं।
साधनाएं मन्त्र का अर्थ माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधनाएं
साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-December
साधना का परिपाक इस एक ही गायत्री महायज्ञ में हो सकता है। जिस स्थान पर अलाव लगाया जा सकता है वहाँ की मिट्टी बिना प्रयत्न के पक कर लाल हो जाती है उसी प्रकार गायत्री तपोभूमि में जहाँ यह महान आयोजन होगा उस स्थान को सहज ही एक प्रचंड शक्ति स्रोत बन जाने का सौभाग्य मिलेगा। इस शक्ति स्रोत से चिर काल तक लाभ उठाते रहने का गायत्री परिवार को सुअवसर मिलता रहेगा। प्राचीन काल में ऐसे ही शक्ति केन्द्रों का नाम तीर्थ होता था, वहाँ समय-समय पर ऐसे ही महान आयोजन होते रहते थे। जिसके प्रभाव से वह भूमि वहाँ आने वालों को बहुत कुछ ऊँचे की सामर्थ्य धारण किये रहती थी।
साधनाओं से सम्भव नहीं है। यह संकल्प अत्याधिक महान सम्भावनाओं से ओत-प्रोत है। इसे पूर्ण करने में सच्चा सहयोग करने की सभी गायत्री प्रेमियों, सभी धार्मिक प्रकृति के सत्य पुरुषों से हमारी हार्दिक प्रार्थना है।
साधना है जो जप, हवन, प्राणायाम आदि में समय लगाने से कहीं अधिक श्रेयष्कर सिद्ध होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-April
साधना से किस प्रकार क्या प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हुए, निराशा एवं असफलता के अन्धकार पूर्ण वातावरण पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण।
साधना के प्रतिफल को यों न भुलाओ!
इसको कहकर भाग्य न तुम मुझको भरमाओ!
साधनाएँ), 5-अनादि गुरुमन्त्र गायत्री), 6-सचित्र गायत्री), 7-गायत्री के 14 रत्न (प्र0 भाग), 8-गायत्री के 14 रत्न (द्वि0 भाग), 9-विपत्ति निवारण गायत्री), 10-स्त्रियों का गायत्री अधिकार), 11- गायत्री सहस्रनाम पाठ)
साधना। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
साधना द्वारा गुप्त 24 शक्तियों का जागरण, वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान, अनेकों अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन, यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा संध्या बंधन प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विधियाँ, अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक प्रयोग।
साधना में हुए महान अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन किन व्यक्तियों को किस-किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हुए, निराशा एवं असफलता के अन्धकार पूर्ण वातावरण पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण।
साधना की अपेक्षा इस वृहद् अभियान में तीन दिन सम्मिलित होना प्रत्येक दृष्टि से उत्तम ही होगा। जो अधिक कार्य व्यस्त एवं अन्य कारणों से आने में असमर्थ न हों उन्हें इस अवसर पर सम्मिलित होने के लाभ से वंचित न रहना चाहिये। परन्तु स्मरण रहे हर किसी को यज्ञ में सम्मिलित होने की स्वीकृति न मिलेगी। जिन्हें सम्मिलित होना हो वे अपना स्थान पहले से ही निश्चित अवश्य करा लें। यह विज्ञप्ति ही सबके लिए आमंत्रण पत्र है।
साधना के उपरान्त वे अपनी महानता खोज लेते है।
साधना), 7-गायत्री उपासना कैसे करें), 8-गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध), 9-गायत्री चालीसा), 10-गायत्री का तिरंगा चित्र)
साधना का विस्तृत वर्णन है गायत्री के पाँच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य, हठयोग, राजयोग, लययोग, नादयोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, शब्दयोग, स्वरयोग की विधियाँ, बन्ध, मुद्रा, पंच, तन्मात्रा, ग्रन्थिभेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि, समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन, सोऽहं का साधन, तन्त्र तथा वाममार्ग, मैस्मरेजम गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-June
साधना में श्रम, संयम, त्याग एवं सेवा साधन करना आवश्यक माना गया है उससे दूर भागते हैं तो प्रकट होता है कि इन लोगों की मनोभूमि भी क्या है? राज नैतिक शासक, सामाजिक नेता, धार्मिक सन्त महन्त आदि जो लोग त्याग एवं परमार्थ को अपना लक्ष घोषित करते है उनकी भी जब यह स्थिति है तो सामान्य लोग भौतिक प्रयोजनों पर ही जीवन भर जान देते रहें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है।
साधना करने में समय तथा शक्ति का व्यय करें। हम यदि यह समझते हों कि हमारी वाणी का प्रसार बिना यन्त्र के केवल वहीं तक है जहाँ तक वह सुनाई देती हो तो हम भूल करते है। एक बड़े जलाशय में आप एक छोटा सा कंकड़ डालें तो देखेंगे कि उस छोटे से कंकड़ की ताड़ित संघर्षणा में जल में चक्र बनकर समस्त तड़ाग के घेरे में पड़ता ही जायगा ठीक उसी प्रकार जो शब्द हमारे कण्ठ से निकलता है वह सारे वायुमण्डल में फैलकर अपनी तरंगों का प्रभाव डालता है। हमारी मानसिक शक्ति का प्रसाद और संघर्ष बल इससे भी अधिक है क्योंकि मन की प्रगति और बल शरीर से अत्यन्त प्रबल और तीव्र है। हम यहाँ बैठे-बैठे संसार के किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में लाकर उस पर अपनी प्रबल इच्छा शक्ति द्वारा अपने विचारों का प्रभाव डाल सकते है।
साधना द्वारा आत्मिक रूप से परिपुष्ट किया जाएगा। ऐसा बलिष्ठ आत्माओं की बलि ही अभीष्ट परिणाम उपस्थित करेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-May
साधना का वैसा परिपाक हुआ जैसा अलग-अलग से अनेक वर्षों तक प्रयत्न करने पर भी सम्भव न था। अनेकों साधकों ने प्रत्यक्ष रूप से यह अनुभव किया कि इस वातावरण में तीन-चार दिन ही रहकर हमने वह पाया है जो वर्षों तक लम्बी साधना करने पर भी उपलब्ध न हो सका था। साधकों की पारस्परिक प्राण शक्ति का आपसी विनिमय तपोभूमि के प्रभावशाली वातावरण का प्रभाव, गुप्तवेश में उपस्थित अत्यन्त उच्च कोटि के तपस्वियों की सान्निध्य, महायज्ञ एवं महापुरश्चरण द्वारा आहूत देव शक्तियों का स्थापत्य, यज्ञ संयोजक की विशेष प्रेरणा इन सब बातों के कारण-यह आयोजन देखने में सामान्य होते हुए भी वस्तुतः असामान्य था। इस असामान्य वस्तुस्थिति को उन दिनों तपोभूमि में ठहरे हुए प्रत्येक व्यक्ति ने प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया। जिस सूक्ष्म शक्ति का अनुभव इस आयोजन द्वारा किया गया है, वह अपना काम कर रही है।
साधना जारी रखें एवं नये मंत्र लेखक उत्पन्न करें। साधारणतः 2400 मंत्रों की प्रत्येक साधक से आशा की गई। इससे अधिक लिखना यह लेखन साधना बारंबार जारी रखना और भी अधिक प्रशंसनीय है।
साधना का दीप बन जलता रहूँगा।
मैं तुम्हारी भावना का पुष्प बन खिलता रहूँगा॥
साधना तथा तपश्चर्या को बढ़ाते हुये भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए अपना जीवन लगाना चाहे वे गायत्री तपोभूमि अपना घर बनाकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए अग्रसर हो सकते हैं। ऐसे सज्जन पत्र व्यवहार करें। उनके जीवन निर्वाह की व्यवस्था तपोभूमि करेगी।
साधना करने पर भी उपलब्ध न हो सका था। साधकों की पारस्परिक प्राण शक्ति का आपसी विनिमय तपोभूमि के प्रभावशाली वातावरण का प्रभाव, गुप्तवेश में उपस्थित अत्यन्त उच्च कोटि के तपस्वियों की सान्निध्य, महायज्ञ एवं महापुरश्चरण द्वारा आहूत देव शक्तियों का स्थापत्य, यज्ञ संयोजक की विशेष प्रेरणा इन सब बातों के कारण-यह आयोजन देखने में सामान्य होते हुए भी वस्तुतः असामान्य था। इस असामान्य वस्तुस्थिति को उन दिनों तपोभूमि में ठहरे हुए प्रत्येक व्यक्ति ने प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया। जिस सूक्ष्म शक्ति का अनुभव इस आयोजन द्वारा किया गया है, वह अपना काम कर रही है। सूक्ष्म दर्शी लोग ही जानते हैं कि इसके परिणाम किस-किस क्षेत्र में कितने व्यापक एवं कितने महान होने जा रहे हैं।
साधना यह अर्चना है॥
साधना की थी और सुप्त शक्तियों को जागृत व विकसित करके ही वे महापुरुषों की कोटि में सम्मिलित हुए। हम सब प्रतिपल जीवन में शक्ति की आवश्यकता का अनुभव करते हैं। शक्ति के बिना जीवन एक तरह से जीवन ही नहीं है। मुर्दों का सा जीवन भला जीवन ही क्या? जिसमें उमंग नहीं, उत्साह नहीं, साहस व दृढ़ता नहीं, वह जीवन ही बेकार है।
साधना पर जोर दिया है। फलतः आत्मिक शक्ति के जो चमत्कार उन्होंने दिखलाये, वे विश्व भर में अनोखे हैं।
साधना बारंबार जारी रखना और भी अधिक प्रशंसनीय है।
साधना से पुनः उस ग्रन्थ रत्न को स्मृति से लिख दिया।
साधना का दीप बन जलता रहूँगा॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1954-September
साधना एकाँगी, अपूर्ण, अधूरी एवं असफल ही रहेगी। जिस प्रकार गाड़ी के दो पहिये होते हैं, एक पहिये का रथ नहीं चलता उसी प्रकार आत्म कल्याण के लिए आत्मावलम्बन तथा आत्म सिंचन दोनों की ही आवश्यकता है। आत्म कल्याण रूपी पौधे के लिए एक को खाद कहा जा सकता है तो दूसरे को पानी दोनों की ही समान उपयोगिता है। पर खेद यह है कि आज सर्वत्र एकाँगी लंगड़ी दौड़ हो रही है। सार्वजनिक सेवा के लिये उत्साह रखने वाले, ईश्वर उपासना की ओर ध्यान नहीं देते उसे अनावश्यक समझते हैं।
साधना बना लिया था। साधारण दैनिक नित्य नियमित उपासना के अतिरिक्त वे अपना अधिकाँश समय लोकहित के लिये ही लगाते थे। समय की पुकार के कारण सत्पुरुषों को अनेक बार ऐसे ही कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं। मुहल्ले में आग लगे तो सब लोग अपना आवश्यक कार्य छोड़ कर उसे बुझाने दौड़ते हैं ताकि वह आग अन्य घरों को नष्ट करती हुई उनके घर को भी स्वाहा न कर दे। अधिक विकृत समय की भी ऐसे ही अग्निकाण्ड से तुलना की जाती है।
साधना का प्रधान अंग धर्म प्रचार को बनाने वाले हैं। कई ऐसे व्यक्ति जो पारिवारिक उत्तरदायित्व को पूर्ण कर चुके हैं, पैंशन पा रहे हैं, जिनके बाल बच्चे घर का काम सम्भाल रहे हैं अथवा जिनकी स्थायी आमदनी है कि आश्रितों का काम भली प्रकार चलता रह सकता है, अब अपना पूरा समय देश की मनोदशा सुधारने की साधना में लगाने के लिये कटिबद्ध हो रहे हैं। योगियों और साधकों की साधनाएं अनेक प्रकार की होती हैं, इन सब साधनाओं में आज के युग के उपयुक्त साँस्कृतिक पुनरुत्थान की साधना है। क्योंकि उसमें आत्मा का कल्याण वैसा ही होता है जैसा हठयोग, जपयोग लययोग, प्राणयोग आदि द्वारा होना सम्भव है। अपने कल्याण के साथ संसार का भी कल्याण होने से यह साधना दुहरे पुण्यफल का हेतु बन जाती है।
साधना के साथ अवश्य करते रहते थे पर कुछ ऋषियों का उदाहरण तो ऐसा है कि उन्होंने लोक सेवा को ही अपनी सर्वोपरि साधना बना लिया था। साधारण दैनिक नित्य नियमित उपासना के अतिरिक्त वे अपना अधिकाँश समय लोकहित के लिये ही लगाते थे। समय की पुकार के कारण सत्पुरुषों को अनेक बार ऐसे ही कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं। मुहल्ले में आग लगे तो सब लोग अपना आवश्यक कार्य छोड़ कर उसे बुझाने दौड़ते हैं ताकि वह आग अन्य घरों को नष्ट करती हुई उनके घर को भी स्वाहा न कर दे। अधिक विकृत समय की भी ऐसे ही अग्निकाण्ड से तुलना की जाती है।
साधना, स्वाध्याय, यज्ञ, व्रत तथा ज्ञान प्रसार के कार्यों के लिये शेष जीवन को देना चाहें तो मथुरा में उनको इस परिवार में भर्ती किया जा सकता है। थोड़े समय श्रम करने से वे अपने निर्वाह खर्च तो बड़ी आसानी से वहाँ ही उपार्जित कर सकती हैं। एक दो ऐसी अशिक्षित देवियों के लिये भी गुंजाइश हो सकती है जो शारीरिक श्रम में उत्साही हों और घरेलू काम काजों में हाथ बंटा लिया करें। इच्छुक महिलाएं- इस पते पर पत्र व्यवहार कर सकती हैं। श्रीमती भगवती देवी धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा।
साधना का संरक्षण, पथ प्रदर्शन, तथा विधि-विधान में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन मथुरा में किया जाता रहेगा। इससे अनुष्ठान की पूर्णता अधिक सुनिश्चित हो जाती है। जो सज्जन अपना हवन स्वयं न कर सकते हों उनकी सूचना आने पर उनके निमित्त शास्त्रोक्त हवन गायत्री तपोभूमि में कर दिया जायेगा।
साधना है। क्योंकि उसमें आत्मा का कल्याण वैसा ही होता है जैसा हठयोग, जपयोग लययोग, प्राणयोग आदि द्वारा होना सम्भव है। अपने कल्याण के साथ संसार का भी कल्याण होने से यह साधना दुहरे पुण्यफल का हेतु बन जाती है। इस प्रकार यह अन्य साधनाओं की अपेक्षा दूना सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है। यह सोच के विचारवान आत्मत्यागी, भागवत भक्त, परमार्थ प्रेमी, विरासत एवं साधुता की ओर अग्रसर होने वाले कर्त्तव्यपरायण साधु बनने में अधिक महानता देख रहे हैं।
साधना करने हिमालय में गये थे पर उन्हें वहाँ ईश्वरीय प्रेरणा हुई कि लोक सेवा ही सर्वोत्तम योग साधना है। स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञान ग्रस्त जनता में ज्ञान प्रसार करने को ही अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष्य में विषपान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही पण्डित शब्द का वास्तविक प्रमाण है।
साधना की जाय उसकी पूर्णाहुति अन्तिम दिन की जा सकती पर यदि उतना समय न हो तो दसवें दिन 6 अक्टूबर को भी हवन कर लें।
साधनाओं में आज के युग के उपयुक्त साँस्कृतिक पुनरुत्थान की साधना है। क्योंकि उसमें आत्मा का कल्याण वैसा ही होता है जैसा हठयोग, जपयोग लययोग, प्राणयोग आदि द्वारा होना सम्भव है। अपने कल्याण के साथ संसार का भी कल्याण होने से यह साधना दुहरे पुण्यफल का हेतु बन जाती है। इस प्रकार यह अन्य साधनाओं की अपेक्षा दूना सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है। यह सोच के विचारवान आत्मत्यागी, भागवत भक्त, परमार्थ प्रेमी, विरासत एवं साधुता की ओर अग्रसर होने वाले कर्त्तव्यपरायण साधु बनने में अधिक महानता देख रहे हैं।
साधना मान लेते हैं और उस कार्य में वैसी ही श्रद्धा तथा तत्परता पूर्वक संलग्न होते हैं। जैसे कोई हठयोगी अपनी कष्टसाध्य तपस्या में पूर्ण तन्मयतापूर्वक लग जाता है। समय-समय पर अनेकों योगी, महापुरुष, देवदूत, अवतार इस युग धर्म का अनुसरण करके लोग सेवा के लिए कटिबद्ध होते रहे हैं। इसमें उनकी करुणा, दया, सेवा भावना आदि महात्माओं का प्रकाश तो होता ही है साथ ही लाभ की दृष्टि से भी वे एकान्त सेवी साधकों से किसी भी प्रकार घाटे में नहीं रहते। शास्त्रों में बताया गया है कि-अन्नदान, वस्त्रदान, गौदान, स्वर्णदान आदि जितने भी दान संसार में है उन सबसे हजार गुना अधिक पुण्य फल ज्ञानदान का होता है।
साधना करने जा रहे थे तो उनको दैवी सन्देश प्राप्त हुआ कि लोग अज्ञान में डूबे हुये हैं उनको ज्ञान देने में लगो आज के समय यही तपस्या सर्वश्रेष्ठ है। भगवान बुद्ध ने कठोर तप किया तो उन्हें अन्तः प्रेरणा हुई कि संसार में बुद्धत्व का प्रकाश करो, वे अपनी तपोभूमि छोड़ कर प्रवचन करते हुए भ्रमण करने लगे। भगवान महावीर ने भी यही किया भीम ने राज महल छोड़कर अपना स्थान भक्तजनों के बीच बनाया सूत शौनक तो सदा कथा प्रवचन ही करते रहते थे। व्यास जी का पूरा जीवन सत् साहित्य निर्माण करते रहने में ही व्यतीत हो गया। देवर्षि नारद का सबसे ऊँचा पद इसलिए मिला कि अन्य ऋषि जहाँ व्यक्तिगत शक्ति सम्पादन के लिए नाना प्रकार की योग साधनाओं में अधिक समय लगाते थे वहाँ नारद जी उस ओर अधिक ध्यान न देकर आत्मशक्ति के प्यासे संसार पर अमृत वर्षा करने के लिए निरन्तर भ्रमण करते रहने का महान् संकल्प लेकर उस पुनीत कार्य में सर्वतोभावेन जुट गये।
साधना, स्वास्थ्य, परमार्थ आदि के लिए रुचि और समय न बचने देगा, इन प्रवृत्तियों से रहित मनुष्य को बिना सींग पूँछ का पशु ही समझना चाहिए। ऐसे ही पशुओं से सारी पृथ्वी को वह भौतिक संस्कृति भर देगी।
साधनाओं तपश्चर्याओं द्वारा वह शक्ति उत्पन्न करना जिससे यह महान साँस्कृतिक अभियान सफल हो सके। प्रधान रूप से यह तीन कार्यक्रम मथुरा में आरम्भ होने जा रहे हैं। इनके और भी सहायक कार्य समय-समय पर होते रहेंगे।
साधना करनी चाहिए और आत्म सिंचन के लिए अपने- अपने क्षेत्र में ज्ञान प्रसार का कोई न कोई कार्य अवश्यमेव करते रहना चाहिए। हमें हमारे जीवन के लिए भी यही कार्यक्रम अपनाने का दैवी आदेश हुआ है तद्नुसार हम निष्ठापूर्वक एक स्थिर कार्यक्रम में संलग्न हैं। हमारे परिजनों के लिए भी यही मार्ग श्रेयस्कर हो सकता है। आज चारों और और अज्ञान फैला हुआ है, कुविचारों और कुकर्मों की बाढ़ आई हुई है। धन की तृष्णा और इन्द्रिय लिप्सा सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है।
साधना से किसी भी प्रकार सम्भव न होता। बीमा कम्पनी के एजेन्टों को एक रिन्यूअल कमीशन मिलता है। बीमेदार का बीमा जब तक चलता रहेगा तब तक उस बीमे को कराने वाला एजेन्ट घर बैठे अपना कमीशन बीमा कम्पनी से पाता रहेगा। शुभ कर्मों में दूसरों को प्रेरित करना भी एक प्रकार की बीमा एजेन्सी लेना है, इसमें एक बार का प्रयत्न, चिरकाल तक पुण्य लाभ कराते रहने वाला फलदार वृक्ष सिद्ध होता है।
साधना उपासना को साधारण सीमा तक रख कर लोक में फैली हुई बुराइयों के लिये कटिबद्ध हो जाती हैं। श्री शंकराचार्य जी ने अपना पूरा समय ज्ञान प्रसार के लिये दर-दर भटकते रहने में लगाया। भगवान शंकर ने उन्हें स्वयं यह आदेश दिया था कि तुम समाधि लगाने में नहीं संसार से अज्ञान मिटाने की साधना करो। स्वामी दयानन्द सरस्वती हिमालय की कन्दराओं में साधना करने जा रहे थे तो उनको दैवी सन्देश प्राप्त हुआ कि लोग अज्ञान में डूबे हुये हैं उनको ज्ञान देने में लगो आज के समय यही तपस्या सर्वश्रेष्ठ है। भगवान बुद्ध ने कठोर तप किया तो उन्हें अन्तः प्रेरणा हुई कि संसार में बुद्धत्व का प्रकाश करो, वे अपनी तपोभूमि छोड़ कर प्रवचन करते हुए भ्रमण करने लगे।
साधना दुहरे पुण्यफल का हेतु बन जाती है। इस प्रकार यह अन्य साधनाओं की अपेक्षा दूना सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है। यह सोच के विचारवान आत्मत्यागी, भागवत भक्त, परमार्थ प्रेमी, विरासत एवं साधुता की ओर अग्रसर होने वाले कर्त्तव्यपरायण साधु बनने में अधिक महानता देख रहे हैं। निवृत्त प्रधान एकान्तवासी महानुभाव उस मार्ग को बदल कर इस अत्युत्तम कार्यक्रम की उपयोगिता स्वीकार करने जा रहे हैं।
साधना को करना चाहते हैं क्योंकि अभी कुछ महत्वपूर्ण घरेलू काम करने उन्हें शेष रह गये हैं। तीसरे प्रकार के वे लोग हैं जिनका उत्साह इन कार्यों के लिए बहुत भारी है परन्तु परिवार के कारण पोषण की जिम्मेदारी अपने ऊपर रहने के कारण आजीविका सम्बन्धी कार्यों को करते रहना भी आवश्यक है। वे अपने बचे हुए समय को इस सेवा कार्य में लगाने के उत्सुक हैं। विद्यार्थी वर्ग विद्याध्ययन करते हुए साँस्कृतिक ज्ञान उपार्जन करने को उत्सुक मालूम पड़ता है। कुछ महिलाओं के पत्र भी ऐसे आये हैं जिनकी अधिक उपयोगिता उनके परिवार में नहीं है।
साधना तथा लोक सेवा के दो महान कर्त्तव्यों को भी पूरा करना है। लोक सेवा के अनेक कार्य हैं, सभी का महत्व है, पर साँस्कृतिक पुनरुत्थान का लोक सेवी कार्यक्रम ऐसा है जिसकी महानता अन्य सभी कार्यक्रमों से अधिक है। गरीबी और बेकारी के लिए उद्योग का विकास होना चाहिए, अस्वस्थता और दुर्बलता निवारण के लिए पौष्टिक खाद्य और व्यायाम का प्रसार होने की आवश्यकता है। सरकार पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा बहुत से उपयोगी कार्य प्रारम्भ कर रही है। अनेक संस्थाएं, राजनैतिक पार्टियाँ अपने-अपने ढंग से जनता की सुख-सुविधाओं को बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है।
साधनारत व्यक्ति लोकहित की भावना को तिलाँजलि देकर केवल अपनी इष्ट सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि की बात सोचते रहते हैं। प्राचीन काल के सभी ऋषि मुनि, सत्पुरुष, महात्मा ज्ञानी इन दोनों ही कार्यों को समान रूप से महत्व देते थे। तभी वे अभीष्ट परिणाम प्राप्त करने में सफल होते थे।
साधना नहीं करते उन्हें, भी नवरात्रि में थोड़ी बहुत गायत्री उपासना अवश्य करनी चाहिये।
साधनाओं की अपेक्षा दूना सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है। यह सोच के विचारवान आत्मत्यागी, भागवत भक्त, परमार्थ प्रेमी, विरासत एवं साधुता की ओर अग्रसर होने वाले कर्त्तव्यपरायण साधु बनने में अधिक महानता देख रहे हैं। निवृत्त प्रधान एकान्तवासी महानुभाव उस मार्ग को बदल कर इस अत्युत्तम कार्यक्रम की उपयोगिता स्वीकार करने जा रहे हैं।
साधना करने से किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण कार्य नहीं है। गायत्री माता और यज्ञ पिता की उपासना के साथ भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिये काम करने का कार्यक्रम ऐसा है जिसमें आत्मावलम्बन और आत्मसिंचन के दोनों उद्देश्य पूर्ण होते हैं और अपना तथा संसार का भला करते हुये जीवन लक्ष प्राप्त करने का मार्ग सरल होता है।
साधना तथा सेवा का कार्य आरम्भ कर सकते हैं, पर आत्म-त्यागियों का कार्यक्रम दूसरा ही होगा। उनके संकल्प को समारोहपूर्वक घोषित किया जायेगा। एक बड़ा विशाल नरमेध यज्ञ अगले वर्ष हम करने जा रहे हैं। इसमें कोई मनुष्य काट कर हवन नहीं किया जायेगा पर वह अपने मन, बुद्धि, प्राण, जीवन, इच्छा, आकाँक्षा आदि को परमार्थ के लिए-यज्ञ भगवान के लिये आहुति देता हुआ संकल्प करेगा। नरमेध यज्ञ के बारे में लोगों की बड़ी भ्राँतियाँ हैं, उन्हें निवारण करने और उस और उस वैदिक संस्कृति के महान उपकरण को प्रत्यक्ष करने के लिये यह आयोजन किया जा रहा है।
साधना
साधना, भक्ति, ज्ञान, दीक्षा आदि के द्वारा अनीति निवारण और धर्म विस्तार का कार्य करते रहे हैं।
साधनाएँ
साधनाओं में अधिक समय लगाते थे वहाँ नारद जी उस ओर अधिक ध्यान न देकर आत्मशक्ति के प्यासे संसार पर अमृत वर्षा करने के लिए निरन्तर भ्रमण करते रहने का महान् संकल्प लेकर उस पुनीत कार्य में सर्वतोभावेन जुट गये। भगवान ने उनकी यह उत्कृष्ट परमार्थ भावना निस्वार्थता, करुणा, सहृदयता देखी तो अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें देवर्षि माना तथा यह विशेष छूट दी कि वे किसी भी समय बे रोक-टोक सशरीर भगवान के लोक में जा सकते थे। यह सौभाग्य और किसी ऋषि या देवता को प्राप्त न था क्योंकि उतनी उत्कृष्ट परमार्थ भावना भी और किसी की न थी।
साधना है। स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञान ग्रस्त जनता में ज्ञान प्रसार करने को ही अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष्य में विषपान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही पण्डित शब्द का वास्तविक प्रमाण है।
साधनाओं में अधिक समय लगाती हैं पर जब संसार की परिस्थितियाँ विपन्न होती हैं, लोग कुमार्ग गामी हो जाते हैं, तो बुराई के आक्रमण से भलाई की रक्षा करने के लिये वे लोग लोक कल्याण के प्रयत्नों को ही साधना मान लेते हैं और उस कार्य में वैसी ही श्रद्धा तथा तत्परता पूर्वक संलग्न होते हैं। जैसे कोई हठयोगी अपनी कष्टसाध्य तपस्या में पूर्ण तन्मयतापूर्वक लग जाता है। समय-समय पर अनेकों योगी, महापुरुष, देवदूत, अवतार इस युग धर्म का अनुसरण करके लोग सेवा के लिए कटिबद्ध होते रहे हैं। इसमें उनकी करुणा, दया, सेवा भावना आदि महात्माओं का प्रकाश तो होता ही है साथ ही लाभ की दृष्टि से भी वे एकान्त सेवी साधकों से किसी भी प्रकार घाटे में नहीं रहते। शास्त्रों में बताया गया है कि-अन्नदान, वस्त्रदान, गौदान, स्वर्णदान आदि जितने भी दान संसार में है उन सबसे हजार गुना अधिक पुण्य फल ज्ञानदान का होता है।
साधनाएं अनेक प्रकार की होती हैं, इन सब साधनाओं में आज के युग के उपयुक्त साँस्कृतिक पुनरुत्थान की साधना है। क्योंकि उसमें आत्मा का कल्याण वैसा ही होता है जैसा हठयोग, जपयोग लययोग, प्राणयोग आदि द्वारा होना सम्भव है। अपने कल्याण के साथ संसार का भी कल्याण होने से यह साधना दुहरे पुण्यफल का हेतु बन जाती है। इस प्रकार यह अन्य साधनाओं की अपेक्षा दूना सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है। यह सोच के विचारवान आत्मत्यागी, भागवत भक्त, परमार्थ प्रेमी, विरासत एवं साधुता की ओर अग्रसर होने वाले कर्त्तव्यपरायण साधु बनने में अधिक महानता देख रहे हैं।
साधना करो। स्वामी दयानन्द सरस्वती हिमालय की कन्दराओं में साधना करने जा रहे थे तो उनको दैवी सन्देश प्राप्त हुआ कि लोग अज्ञान में डूबे हुये हैं उनको ज्ञान देने में लगो आज के समय यही तपस्या सर्वश्रेष्ठ है। भगवान बुद्ध ने कठोर तप किया तो उन्हें अन्तः प्रेरणा हुई कि संसार में बुद्धत्व का प्रकाश करो, वे अपनी तपोभूमि छोड़ कर प्रवचन करते हुए भ्रमण करने लगे। भगवान महावीर ने भी यही किया भीम ने राज महल छोड़कर अपना स्थान भक्तजनों के बीच बनाया सूत शौनक तो सदा कथा प्रवचन ही करते रहते थे। व्यास जी का पूरा जीवन सत् साहित्य निर्माण करते रहने में ही व्यतीत हो गया।
साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष्य में विषपान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही पण्डित शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह कामना हो तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिखों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये।
साधना के लिए तथा जन सेवा के कार्यों में लगाते रहना। जिस प्रकार शरीर का, परिवार का एवं अर्थ व्यवस्था का ध्यान रखा जाता है उससे कम ध्यान लोक सेवा का न रखा जाय। ऐसे लोग सद्गृहस्थ एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान सेना के सैनिक तथा स्वयं सेवक कहे जा सकते हैं।
साधना में लगाने के लिये कटिबद्ध हो रहे हैं। योगियों और साधकों की साधनाएं अनेक प्रकार की होती हैं, इन सब साधनाओं में आज के युग के उपयुक्त साँस्कृतिक पुनरुत्थान की साधना है। क्योंकि उसमें आत्मा का कल्याण वैसा ही होता है जैसा हठयोग, जपयोग लययोग, प्राणयोग आदि द्वारा होना सम्भव है। अपने कल्याण के साथ संसार का भी कल्याण होने से यह साधना दुहरे पुण्यफल का हेतु बन जाती है। इस प्रकार यह अन्य साधनाओं की अपेक्षा दूना सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-December
साधना विधि अपनाने के लिये परिजनों से इसीलिये अनुरोध किया जाता है कि वे अपने सूक्ष्म शरीर में- मानसिक चेतना में- ज्ञानयोग का समावेश कर देवत्व का जागरण करने की दिशा में आशाजनक प्रगति कर सकें।
साधना के लिये स्वाध्याय को अनिवार्य आवश्यकता को समझने के लिये आग्रह किया गया है। देवत्व के अभिवर्धन का- सूक्ष्म शरीर के परिष्करण का यह एक असाधारण उपाय है। हमें नित्य ही अनिवार्य रूप से इस ‘युग निर्माण साहित्य’ का अध्ययन करना चाहिये। कुछ समय इसके लिये पूजा उपासना, आहार, स्नान आदि की तरह ही निर्धारित कर लेना चाहिये और कितने ही आवश्यक कार्यों की उपेक्षा कर इस आत्मिक आहार के लिये समय निकालना चाहिये। यह प्रेरक विचारधारा जिन अन्तःकरणों से निकलती है वह इतने समर्थ हैं कि पाठक में अपनी ज्योति एवं प्रेरणा उत्पन्न कर सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-August
साधना है। अर्थात् जो लोग अपने शुभ संकल्पों को बढ़ाते हैं और दुर्वासनाओं को उनकी खाद बनाकर डालते जाते हैं अन्त में उनके प्रयत्नों की कृषि सफल होती है और सविता-आत्मा उनकी बुद्धि को धारण करते हैं अर्थात् उनको अपने ही समान प्रखरता और तेजस्विता से भर देते हैं।
साधना के ग्राह्य और सुधरे हुए स्वरूप को समझने और प्रयत्नपूर्वक उन्हें अपने आत्म-विकास में नियोजित करने की बुद्धि जिन लोगों में आ जाती है उन्हें अपने आपको सौभाग्यशाली समझना चाहिये। आत्म-जिज्ञासा आत्म-कल्याण का मुख्य द्वार है। जो उसे पा लेता है वह अपनी जीवन-यात्रा की मंजिल भी आसानी से प्राप्त कर लेता है। गीता अध्याय 1 के 10वें लोक में भगवान् कृष्ण ने भी कहा है-
साधना, उपासना, आध्यात्मिक ज्ञान से ओत-प्रोत साहित्य के निरन्तर स्वाध्याय, मनन, चिन्तन, व्रत, उपवास आदि की आवश्यकता शिक्षा से भी अधिक है। प्राचीन काल के गुरुकुलों में शिक्षा संबन्धी विषय गौण माने जाते थे, आत्म-विद्या के विषय अनिवार्य होते थे। मनुष्य के दार्शनिक स्वरूप को यथार्थ, शाश्वत और पूर्णानन्द की प्राप्ति का पाथेय माना जाता था। इसलिये उस पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता था जो व्यक्ति के आत्म गुणों का परिवर्द्धन करती थी। उसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही नहीं बल्कि वर्तमान विकृत परिस्थितियों में तो उससे भी अधिक है।
साधना की प्रारम्भिक अवस्था है। उसे पार कर लेने पर जब वह नितान्त ब्राह्मी स्थिति अर्थात् तदाकार में बदल जाता है तो उसका अहंभाव एक विशाल शक्तिमान् रूप में परिणत हो जाता है । वह अपने को ही ब्रह्म के रूप में देखने लगता है। “मैं ही ब्रह्म हूं” यह स्थिति ऐसी है जिस में जीव की शक्तियाँ विस्तीर्ण होकर ईश्वरीय शक्तियों में बदल जाती हैं।
साधना से उदात्त जीवन की जो प्रेरणा और प्रखरता अन्तःकरण में आनी चाहिए वह नहीं आती तो परमात्मा का उपासक निराश होता है और साधना की व्यर्थता अनुभव करने लगता है। इस सीढ़ी पर पाँव रख कर आत्म-कल्याण के इच्छुकों को जानना चाहिए-देव शक्तियों और परमात्मा के जो सनातन नियम हैं उनकी अवहेलना करने की शक्ति उनमें भी नहीं है।
साधना मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने मार्ग की दिशा एवं तात्त्विकता को भी समझना चाहिये। अनजान रहने पर न तो पूरा विश्वास होता है और न पक्की श्रद्धा जमती है। अज्ञान एक अन्धकार है जिसमें पग−पग पर आशंका एवं अश्रद्धा की संभावना बनी रहती है। ऐसी मनःस्थिति में आध्यात्मिक सफलता का पथ कंटकाकीर्ण ही बना रहता है।
साधना-
साधना की व्यर्थता अनुभव करने लगता है। इस सीढ़ी पर पाँव रख कर आत्म-कल्याण के इच्छुकों को जानना चाहिए-देव शक्तियों और परमात्मा के जो सनातन नियम हैं उनकी अवहेलना करने की शक्ति उनमें भी नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-July
साधना करने वाले आत्मज्ञानी पुरुषों ने भावी घटनाओं पर विचार करते हुए एक बात विशेष रूप से कही है कि वर्तमान युग का अन्त ‘चौदहवीं सदी’ में हो जायगा और तभी इस्लाम खत्म होकर कोई अन्य मजहब संसार में फैल जायगा। इस सिद्धाँत का स्पष्टीकरण करते हुये ‘कुरान’ में कहा गया है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-March
साधना के आधार पर करते रहना चाहिए। शरीर के लिये कितनी शक्ति खर्च की? और आत्मा के लिये कितना प्रयत्न किया? यह प्रश्न बार-बार अपने से पूछना चाहिये और ऐसी गति-विधि निर्धारित करनी चाहिए जिससे अन्तरात्मा को सन्तोषजनक उत्तर एवं आधार मिल सके।
साधना का उल्लेख है। वह हमारी जीवन साधना में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होनी चाहिए। अध्यात्म को व्यवहार में परिणत करने की प्रेरणा उसी से मिलेगी। आलस्य और प्रमाद को उसी आधार पर जीता जा सकेगा। भूलों के सुधार के लिए वही अमोघ उपचार है।
साधना तथा तपश्चर्या का यथा योग अभ्यास। 4. जूनियर हाईस्कूल (कक्षा 8) की योग्यता के 15 वर्ष से अधिक आयु के छात्रों के लिए 4 वर्षीय कालेज स्तर की शिक्षा। यद्यपि सरकारी उपाधि प्राप्त न की जा सकेगी, पर इस प्रशिक्षण से निकले हुए छात्रों में बी.ए. के छात्रों की तुलना में हर दृष्टि से कहीं अधिक ज्ञान होगा। वे नौकरी करना पसंद ही न करेंगे क्योंकि तब उनके पास इतना ज्ञान, अनुभव एवं मनोबल होगा कि वे दूसरों को नौकर रखने की बात ही सोच सकेंगे।
साधना सरल अवश्य है पर उसका प्रतिफल किसी भी कठोर तपश्चर्या से कम नहीं है।
साधना वर्ग में चार वर्षों के अंतर्गत एक 24 लक्ष्य गायत्री महापुरश्चरण कराया जायेगा। इसके लिए गायत्री तपोभूमि की सिद्ध पीठ हर दृष्टि से उपयुक्त है। यहाँ अखण्ड-ज्योति व नित्य यज्ञ व्यवस्था रहने से तथा गायत्री माता के सान्निध्य में निरन्तर जप पुरश्चरण होते रहने से भूमि में वह प्रभाव है जिससे गायत्री साधना भली प्रकार सफल हो सकती है। साथ-साथ उच्चस्तरीय पञ्चकोषी गायत्री उपासना का भी साधना क्रम चलेगा। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष इन पाँचों आवरणों के हटने से आत्म साक्षात्कार तथा ब्रह्म निर्वाण का लक्ष्य पूरा होता है।
साधना में आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण करने और जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के उद्देश्य से संलग्न होना चाहिए। साधना सरल अवश्य है पर उसका प्रतिफल किसी भी कठोर तपश्चर्या से कम नहीं है।
साधना 2. स्वाध्याय 3. सेवा, इन तीनों भागों में विभक्त है।
साधना आजीवन चलाता रहता था। अपने दैनिक जीवन की हर विचारणा में, हर क्रिया-पद्धति में अध्यात्म आदर्शों की गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता का समावेश करता था। अतएव वह चाहे घर में रहे, चाहे वन में समान रूप से बाह्य और अन्तःजीवन के हर क्षेत्र में विकास होता चला जाता था और जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर लेता था। आज के कल्पित अध्यात्मवाद में चरित्र निर्माण की उपेक्षा है। कहा जाता है कि दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाये रहने पर भी उनके दुष्परिणाम से पूजा-पाठ का थोड़ा-सा उपचार ही बचा देगा।
साधना को भी जोड़ लेना चाहिये। इस आधार पर जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिये आँतरिक प्रकाश एवं मार्ग-दर्शन मिलता रह सकता है।
साधना है। सद्विचारों का निरन्तर चिन्तन करना-सत्प्रवृत्तियों में भावना-स्तर को निमग्न करना वस्तुतः अन्तःकरण में परमेश्वर की प्रतिष्ठापना करने का ही एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग है।
साधना की समग्र योजना बनाई गई है जो- 1. साधना 2. स्वाध्याय 3. सेवा, इन तीनों भागों में विभक्त है।
साधना का अभ्यास करना पड़ता है। प्राचीन काल में प्रत्येक ब्रह्म-परायण व्यक्ति के जीवन में सेवा-धर्म के लिए प्रमुख स्थान रहता था। कोई ब्राह्मण, कोई साधु, कोई भक्त ऐसा न था जो ईश्वर की प्रतिकृति इस विश्व वसुधा को सुखी-समुन्नत बनाने के लिए आवश्यक योगदान न करता रहा हो। आज वही राजमार्ग हमारे लिये भी है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमें सेवा-धर्म को अपनी भावना तथा प्रक्रिया में प्रमुख स्थान देना ही होगा अन्यथा न तो हम आत्मा को प्राप्त कर सकेंगे और न परमात्मा को।
साधना भली प्रकार सफल हो सकती है। साथ-साथ उच्चस्तरीय पञ्चकोषी गायत्री उपासना का भी साधना क्रम चलेगा। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष इन पाँचों आवरणों के हटने से आत्म साक्षात्कार तथा ब्रह्म निर्वाण का लक्ष्य पूरा होता है। इन कोष के अनावरण से आत्मा की प्रसुप्त अन्तः कक्षायें जागृत होती हैं और ये छिपी पड़ी दिव्य विभूतियों का अनुभव होता है। इस साधना क्रम के आधार पर बढ़ी हुई आत्म शक्ति से साधक आत्मकल्याण का श्रेय प्राप्त करते हुए मानव जाति की, समस्त संसार की महती सेवा कर सकने में समर्थ हो सकता है।
साधना की त्रिवेणी में हमें स्नान करते रहना चाहिए।
साधना का पुनः वैसा ही अवसर आता है। इससे मरणोत्तर जीवन बनता है। आत्मा को परमात्मा की दिशा में बढ़ने का अवसर मिलता है और समस्त संसार की, देश, धर्म, समाज, संस्कृति की सेवा करने का मंगलमय सौभाग्य मिलता है। जीवनकाल में ढलती आयु के गृह निवृत्त वानप्रस्थ ही लोक निर्माण की समस्त सत्प्रवृत्तियों का संचालन करते थे। वे ही अपने समय एवं समाज के सच्चे नेता और निर्माता होते थे।
साधना को तपश्चर्या कहा जाये तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। प्रिय परिजनों को इस साधना में आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण करने और जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के उद्देश्य से संलग्न होना चाहिए। साधना सरल अवश्य है पर उसका प्रतिफल किसी भी कठोर तपश्चर्या से कम नहीं है।
साधना के समय के अनुरूप श्रेष्ठतम स्तर की साधना को तपश्चर्या कहा जाये तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। प्रिय परिजनों को इस साधना में आध्यात्मिक प्रयोजन पूर्ण करने और जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के उद्देश्य से संलग्न होना चाहिए। साधना सरल अवश्य है पर उसका प्रतिफल किसी भी कठोर तपश्चर्या से कम नहीं है।
साधना में यह भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
साधना’ लेख के अंतर्गत प्रातः उठने और रात को सोते समय की आत्म-निरीक्षण साधना का उल्लेख है। वह हमारी जीवन साधना में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होनी चाहिए। अध्यात्म को व्यवहार में परिणत करने की प्रेरणा उसी से मिलेगी। आलस्य और प्रमाद को उसी आधार पर जीता जा सकेगा। भूलों के सुधार के लिए वही अमोघ उपचार है।
साधना जवानी में गृहस्थ को सुखी समृद्धि बनाती है। ढलती आयु में पुनः वैसा ही समय आता है। वानप्रस्थ में आध्यात्मिक शिक्षा-साधना का पुनः वैसा ही अवसर आता है। इससे मरणोत्तर जीवन बनता है। आत्मा को परमात्मा की दिशा में बढ़ने का अवसर मिलता है और समस्त संसार की, देश, धर्म, समाज, संस्कृति की सेवा करने का मंगलमय सौभाग्य मिलता है।
साधना के अंतर्गत शुष्क मनःक्षेत्र को प्रेम-भावनाओं से ओत-प्रोत करने का साधन-विधान समझाया गया। यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं फलदायक है। अन्तःकरण में प्रेम तत्व का प्रादुर्भाव एवं विकास होना सच्ची आत्मिक प्रगति का चिन्ह है। प्रेम जिसके अन्तःकरण में पैदा हो, समझना चाहिए कि वहाँ परमेश्वर उत्पन्न हो गया। वह दिव्य प्रेम, उपकार, सेवा, सहायता, करुणा, दया आदि सत्प्रवृत्तियों के रूप में ही प्रकट होता है।
साधना में अनिवार्य रूप से सम्मिलित होनी चाहिए। अध्यात्म को व्यवहार में परिणत करने की प्रेरणा उसी से मिलेगी। आलस्य और प्रमाद को उसी आधार पर जीता जा सकेगा। भूलों के सुधार के लिए वही अमोघ उपचार है। उसे हर परिजन कार्य-रूप में परिणत कर दे।
साधना क्रम चलेगा। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, विज्ञानमय कोष, आनन्दमय कोष इन पाँचों आवरणों के हटने से आत्म साक्षात्कार तथा ब्रह्म निर्वाण का लक्ष्य पूरा होता है। इन कोष के अनावरण से आत्मा की प्रसुप्त अन्तः कक्षायें जागृत होती हैं और ये छिपी पड़ी दिव्य विभूतियों का अनुभव होता है। इस साधना क्रम के आधार पर बढ़ी हुई आत्म शक्ति से साधक आत्मकल्याण का श्रेय प्राप्त करते हुए मानव जाति की, समस्त संसार की महती सेवा कर सकने में समर्थ हो सकता है।
साधना अनुपम प्रतिफल उत्पन्न करेगी। प्रातः सायं आत्म-निरीक्षण और दिनचर्या के सुव्यवस्थित निर्धारण से व्यक्तित्वों में प्रखरता आयेगी। लोग प्रतिभाशाली, सुसंस्कृत, सहृदय एवं सुविकसित बनेंगे।
साधना क्रम के आधार पर बढ़ी हुई आत्म शक्ति से साधक आत्मकल्याण का श्रेय प्राप्त करते हुए मानव जाति की, समस्त संसार की महती सेवा कर सकने में समर्थ हो सकता है।
साधना’ स्तम्भ के अंतर्गत जो भावनात्मक उपासना पद्धति बताई गई है, वह जितनी सरल है, उतनी ही प्रेरक भी है। प्रत्येक परिजन से आशा की गई है कि उसे आरंभ कर दिया जाये। आत्म-विकास में वह निश्चित रूप से बड़ी सहायक होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-May
साधनाक्रमों पर अवलम्बित है जन्म दिनों का मनाना और मथुरा में आरम्भ किये गये विद्यालय को सफल बनाना यह दो कार्यक्रम शाखाओं और संचालक केन्द्र बिन्दु को सुदृढ़ बनाने वाले आधार हैं। ये सफल हो सकें तो त्रिविध साधना क्रम को विश्वव्यापी बना सकने की संगठनात्मक संभावना बढ़ जाएगी। इसलिए इन दो कार्यों को प्रथम पञ्चवर्षीय योजना के हाथ पैर कह सकते हैं। वस्तुतः उसका प्राण तो उपरोक्त त्रिविधि साधना क्रम पर ही अवलम्बित है, उसी से धरती पर स्वर्ग अवतरित होने का भगीरथ प्रयास पूर्ण होगा इसी माध्यम से सुख-शान्ति की सुधा-सुरसरि इस पुण्य धरित्री पर प्रवाहित करने का स्वप्न साकार बनेगा।
साधना पद्धति का निर्देश किया है उसे ही कर्म योग ज्ञान और भक्ति-योग की त्रिवेणी कहते हैं। इसमें स्नान करके जीव समस्त कषाय कल्मषों और पाप तापों से छुटकारा पाकर परम निर्मलता का मंगल आनंद उल्लास उपलब्ध करता है। यह त्रिविधि साधना जितनी सरल है उतनी ही महान् भी है। जिनने भी इस मार्ग को अपनाया उसी ने अपने भौतिक एवं आत्मिक जीवन को सुख-शांति, प्रगति एवं समृद्धि से परिपूर्ण किया है। आत्मबल बढ़ाने के लिए-आत्म -कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये-यह त्रिविधि साधना पद्धति निर्विवाद एवं निश्चित रूप से सफल होती रही है।
साधना पद्धति निर्विवाद एवं निश्चित रूप से सफल होती रही है।
साधना-
साधना सफल बन जाती है। हम पात्रत्व के अनुरूप ईश्वरीय विशेष अनुग्रह प्राप्त करते चलते हैं और बाह्य जीवन को समृद्धियों से तथा भीतरी जीवन विभूतियों से भरा-पूरा देखकर आनन्दित होते हैं। आन्तरिक जीवन की सफलताओं को ऋद्धियाँ और बाह्य जीवन की सफलताओं को सिद्धियाँ कहते हैं। सच्ची साधना इन दोनों ही स्तरों पर फलित होती है।
साधना जितनी सरल है उतनी ही महान् भी है। जिनने भी इस मार्ग को अपनाया उसी ने अपने भौतिक एवं आत्मिक जीवन को सुख-शांति, प्रगति एवं समृद्धि से परिपूर्ण किया है। आत्मबल बढ़ाने के लिए-आत्म -कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये-यह त्रिविधि साधना पद्धति निर्विवाद एवं निश्चित रूप से सफल होती रही है।
साधना अपने तक ही सीमित न रहकर आज की परिस्थितियों के अनुरूप उसे ज्ञान-यज्ञ का भी रूप देना पड़ेगा। समाज में सबसे बड़ा दुर्भिक्ष सद्विचारणाओं का है। इस अकाल के कारण सारा संसार अपराधी, कुकर्मी और उद्धत बना हुआ है। शोक सन्ताप की-दुःख दारिद्रय की आग में जल रहा है । इस स्थिति को बदला ही जाना चाहिये।
साधना विज्ञान का स्वरूप समझाया जाएगा जो सर्व साधारण के लिए गृहस्थ जीवन यापन करते हुए-कामकाजी दिनचर्या एवं परिस्थितियों के बीच भी सरल तथा सम्भव हो सकता है।
साधना क्रम पर ही अवलम्बित है, उसी से धरती पर स्वर्ग अवतरित होने का भगीरथ प्रयास पूर्ण होगा इसी माध्यम से सुख-शान्ति की सुधा-सुरसरि इस पुण्य धरित्री पर प्रवाहित करने का स्वप्न साकार बनेगा।
साधना इन दोनों ही स्तरों पर फलित होती है।
साधना का एकमात्र प्रयोजन है। ईश्वरीय अनुकम्पा के लिये दैवी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए भगवान् से कुछ कहना सुनना नहीं पड़ता। वह हर किसी को उसकी पात्रता के अनुदानों की निरन्तर वर्षा करता रहता है। यह सोचना ठीक नहीं कि जितना ज्यादा अनुरोध किया जाएगा उतना ही ईश्वर देगा। वरन् सच तो यह है कि वह सारी सृष्टि को एक विधि व्यवस्था के अनुसार चला रहा है, यहाँ तक कि वह स्वयं भी अपने नियमों में आबद्ध रहता है।
साधना है। उत्कृष्ट विचारों को मन में भरे रहना उसमें ईश्वर की भावनात्मक प्रतिमा प्रतिष्ठापित किए रहना ही है। इसलिए प्रेरक स्वाध्याय वस्तुतः एक प्रकार की ईश्वर उपासना ही है। यों रूढ़िवादी लकीर पीटकर कूड़े करकट जैसी किन्हीं बूढ़ी, पुरानी, किस्से कहानियों की किताबों को घोटते रहना भी आज स्वाध्याय के नाम से पुकारा जाता है पर वास्तविक स्वाध्याय वह है जिसकी एक-एक पंक्ति हमें व्यवहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा से ओत-प्रोत हो। ऐसा स्वाध्याय दैनिक-जीवन का एक अविच्छिन्न नित्य-कर्म माना जाए।
साधना सम्पत्ति कमाने वाला वास्तव में चोर बना रहता है। उसकी सारी वृत्तियाँ चोर जैसी ही निष्कृष्ट एवं निम्न-कोटि की हो जाती हैं। इस स्थिति में किसी को कितना कष्ट होता होगा और कौन-सी दुर्दशा नहीं हो जाती होगी यह नहीं बताया जा सकता । जिस सुविधा साधन, धन दौलत अथवा वैभव ऐश्वर्य से सुख नहीं, शान्ति नहीं, प्रसन्नता अथवा प्रफुल्लता नहीं उसका होना न होना बराबर ही नहीं बल्कि असुखकर सम्पत्ति की वर्तमानता भयानक रूप से दुःखदायी बन जाती है। पाप अपने स्वभाव के अनुसार अपने आश्रयदाता को न केवल इस जन्म में ही खाता रहता है बल्कि वह जन्मान्तरों में साथ लगा हुआ लोक परलोक को नष्ट करता रहता है।
साधना सम्पन्न करके इसी प्रयोजन की पूर्ति की जाती है। आरंभ कैसे और कहाँ से किया जाए, इसका पथ प्रदर्शन अपनी प्रथम पंच वर्षीय योजना के प्रथम तीन कार्यक्रम पूरा करते हैं। साधना की प्रगति के अनुरूप हर वर्ष आगे का पथ प्रदर्शन मिलता रहेगा जिस पर चलते हुए परिजन इतना आगे बढ़ सकते हैं कि उन्हें फिर आगे का मार्ग-दर्शन किसी दूसरे की सहायता पर अपेक्षित न रहेगा, वरन् अन्तःप्रकाश के आधार पर ही वे पूर्णता के लक्ष्य पर द्रुतगति से अग्रसर होते रहेंगे।
साधना क्रम को विश्वव्यापी बना सकने की संगठनात्मक संभावना बढ़ जाएगी। इसलिए इन दो कार्यों को प्रथम पञ्चवर्षीय योजना के हाथ पैर कह सकते हैं। वस्तुतः उसका प्राण तो उपरोक्त त्रिविधि साधना क्रम पर ही अवलम्बित है, उसी से धरती पर स्वर्ग अवतरित होने का भगीरथ प्रयास पूर्ण होगा इसी माध्यम से सुख-शान्ति की सुधा-सुरसरि इस पुण्य धरित्री पर प्रवाहित करने का स्वप्न साकार बनेगा।
साधना है जिसे अतिशय सरल और साथ ही अभिशाप महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। इसमें व्यक्ति के लिये स्वर्ग मुक्ति की पूरी-पूरी सम्भावनायें विद्यमान हैं। वह उत्कृष्ट व्यक्तित्व उपलब्ध करके महापुरुषों की पंक्ति में बैठने का अधिकारी बन सकता है और उन सफलताओं तथा विभूतियों का अधिकारी बन सकता है जो समर्थ व्यक्तियों को अनायास ही मिलती रहती हैं। किसी को आश्चर्य में डाल देने वाले खेल तमाशे दिखा देना तो जादुई करामात है, आध्यात्म की जो असली ऋद्धि-सिद्धियाँ विकसित व्यक्तित्व के आधार पर मिलती हैं उन्हें पाकर मनुष्य उतना आगे बढ़ जाता है जिस पर पहुँचकर “भक्त के वश में भगवान् होने की” उक्ति सार्थक सिद्ध होती है।
साधनाओं की विशेष प्रक्रियाएं इसी स्तर की हैं। हठ-योग, लय-योग प्राण-योग, ऋजु-योग, कुण्डलिनी योग, ग्रन्थि भेद, पश्चागिन विद्या, तंत्र प्रयोग आदि 84 प्रकार के योग साधन इसी प्रकार के हैं इनके लिये असाधारण अभ्यास करने पड़ते हैं और असाधारण वातावरण में असाधारण क्रम का जीवन-यापन करना पड़ता है। वनवासी तपस्वी और योगी इसी स्तर का साधना मार्ग अपनाते हैं । इसके विशेष लाभ भी हैं और विशेष चमत्कार भी। पर सर्व साधारण के लिये यह अति कठिन मार्ग है।
साधनाओं के मूल उद्देश्य को सुरक्षित रखते हुए कार्य पद्धति में सामयिक हेर-फेर किये जाते हैं। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक समय-समय पर ऋषियों ने इस त्रिविधि साधना का-विभिन्न विधि विधानों के रूप में, अपने समय के साधकों की मनोभूमि और समाज की परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए, मार्ग-दर्शन किया है। आज की स्थिति के अनुरूप-अखण्ड ज्योति परिवार के -आज के साधक वर्ग के लिये -उपयोगी क्रिया विधान प्रस्तुत है।
साधना प्रकरण भी उन्हें सामान्य स्तर का ही उपयुक्त हो सकता है।
साधना मार्ग अपनाते हैं । इसके विशेष लाभ भी हैं और विशेष चमत्कार भी। पर सर्व साधारण के लिये यह अति कठिन मार्ग है।
साधनात्मक एवं भावनात्मक प्रयोजन पूर्ण करते हैं। अतएव इसमें सन्देह तथा विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।
साधना विधान की चर्चा करना ही उचित है। जो अधिकारी है उनके लिये षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी योग, ग्रन्थिभेदन, प्राण योग, हठ योग आदि की अन्यत्र चर्चा की जाएगी। इन पंक्तियों में तो उस सामान्य साधना विज्ञान का स्वरूप समझाया जाएगा जो सर्व साधारण के लिए गृहस्थ जीवन यापन करते हुए-कामकाजी दिनचर्या एवं परिस्थितियों के बीच भी सरल तथा सम्भव हो सकता है।
साधना के दो स्तर हैं एक असामान्य दूसरा सामान्य। असामान्य स्तर की साधना की सरकस में दिखाये जाने वाले कौतूहलपूर्ण करतबों से तुलना की जा सकती है। सरकस के कलाकार विशेष मनोयोग से, विशेष मुस्तैदी के साथ, विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में विशेष रूप में शिक्षा प्राप्त करते हैं और वे पतले तार के ऊपर एक पहिये की साइकिल चलाने, आकाश में टँगे झूलों पर आश्चर्यजनक रीति से झूलने, ऊँची सीढ़ी से कूदने, कुंए में मोटर साइकिल चलाने जैसे आश्चर्यजनक प्रदर्शन कर सकने में सफल होते हैं। ऐसे कलाकारों को वेतन भी अधिक मिलता है और सरकस का भी आकर्षण बढ़ता है। योग साधनाओं की विशेष प्रक्रियाएं इसी स्तर की हैं।
साधना की सरकस में दिखाये जाने वाले कौतूहलपूर्ण करतबों से तुलना की जा सकती है। सरकस के कलाकार विशेष मनोयोग से, विशेष मुस्तैदी के साथ, विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में विशेष रूप में शिक्षा प्राप्त करते हैं और वे पतले तार के ऊपर एक पहिये की साइकिल चलाने, आकाश में टँगे झूलों पर आश्चर्यजनक रीति से झूलने, ऊँची सीढ़ी से कूदने, कुंए में मोटर साइकिल चलाने जैसे आश्चर्यजनक प्रदर्शन कर सकने में सफल होते हैं। ऐसे कलाकारों को वेतन भी अधिक मिलता है और सरकस का भी आकर्षण बढ़ता है। योग साधनाओं की विशेष प्रक्रियाएं इसी स्तर की हैं। हठ-योग, लय-योग प्राण-योग, ऋजु-योग, कुण्डलिनी योग, ग्रन्थि भेद, पश्चागिन विद्या, तंत्र प्रयोग आदि 84 प्रकार के योग साधन इसी प्रकार के हैं इनके लिये असाधारण अभ्यास करने पड़ते हैं और असाधारण वातावरण में असाधारण क्रम का जीवन-यापन करना पड़ता है।
साधना का-विभिन्न विधि विधानों के रूप में, अपने समय के साधकों की मनोभूमि और समाज की परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए, मार्ग-दर्शन किया है। आज की स्थिति के अनुरूप-अखण्ड ज्योति परिवार के -आज के साधक वर्ग के लिये -उपयोगी क्रिया विधान प्रस्तुत है।
साधनाओं का भी अपना महत्व है। घर गृहस्थी सम्भालने वाले, साधारण जीवनक्रम अपनाने वाले भी यदि ठीक तरह से अपना कार्यक्रम निबाहें तो सरकस के कलाकारों से भी बढ़कर स्वास्थ्य, यश और धन कमा सकते हैं । जो लाभ सरकस वालों को मिलते हैं उससे भी बढ़कर उन्हें मिल सकते हैं। इसलिए यह सोचना ठीक नहीं कि यदि सामान्य परिस्थितियों का जीवनयापन करना पड़ता है तो आत्मिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध बना रहेगा और जो लाभ योगी यती प्राप्त करते हैं वह हमें प्राप्त न हो सकेगा। वस्तुतः आत्मिक प्रगति का मार्ग उनके लिये भी योगियों की तरह ही खुला पड़ा है।
साधना का फल प्रदान करेगा। रात को सोते समय अपनी सफलताओं के लिये ईश्वर के धन्यवाद और भूलों के लिये सम्बन्धित जीवों से सच्चे पश्चात्ताप के साथ क्षमा प्रार्थना करते हुए निद्रा देवी की-माता की गोद में शान्तिपूर्वक सो जाया जाए तो इस सामान्य क्रम के आधार पर हम दिन-दिन अधिक उत्कृष्ट स्तर के कार्य करते हुए अन्ततः इसी जीवन में सच्चे कर्मयोगी की तरह नर से नारायण बन सकते हैं।
साधना बहुत दिनों से हम करते रहे हैं। अब यदि उसमें उपरोक्त स्तर का भाव समावेश भी किया जा सके तो उससे भक्ति योग की आवश्यकता पूर्ण हो जाएगी।
साधना इसी दिशा में अग्रसर होने का विज्ञान सम्मत, शास्त्र सम्मत अनुभूत उपाय है कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग की त्रिविधि साधना सम्पन्न करके इसी प्रयोजन की पूर्ति की जाती है। आरंभ कैसे और कहाँ से किया जाए, इसका पथ प्रदर्शन अपनी प्रथम पंच वर्षीय योजना के प्रथम तीन कार्यक्रम पूरा करते हैं। साधना की प्रगति के अनुरूप हर वर्ष आगे का पथ प्रदर्शन मिलता रहेगा जिस पर चलते हुए परिजन इतना आगे बढ़ सकते हैं कि उन्हें फिर आगे का मार्ग-दर्शन किसी दूसरे की सहायता पर अपेक्षित न रहेगा, वरन् अन्तःप्रकाश के आधार पर ही वे पूर्णता के लक्ष्य पर द्रुतगति से अग्रसर होते रहेंगे।
साधना की प्रगति के अनुरूप हर वर्ष आगे का पथ प्रदर्शन मिलता रहेगा जिस पर चलते हुए परिजन इतना आगे बढ़ सकते हैं कि उन्हें फिर आगे का मार्ग-दर्शन किसी दूसरे की सहायता पर अपेक्षित न रहेगा, वरन् अन्तःप्रकाश के आधार पर ही वे पूर्णता के लक्ष्य पर द्रुतगति से अग्रसर होते रहेंगे।
साधना के अंतर्गत आ जाएगा।
साधना द्वारा गतिविधियाँ ही नहीं, प्रवृत्तियाँ भी बदल जाती हैं। यह परिवर्तन ही व्यक्तित्व को एक स्थिर ढाँचे में ढाल देने का प्रयोजन पूरा करता है।
साधनायें -आत्मा के त्रिविधि परिधानों को सुविकसित एवं सर्वांग सुन्दर बनाने में समर्थ रही हैं । कर्म योग से शरीर, ज्ञान योग से मन और भक्ति योग से अन्तःकरण की महान महत्ताओं का विकास होता है। यों मोटे तौर से आहार व्यायाम से शरीर, शिक्षा से मन और वातावरण से अन्तःकरण के विकास का प्रयत्न किया जाता है पर यह तरीके बाह्योपचार मात्र हैं।
साधना करनी होगी। दिव्यता की यह उपलब्धि श्रम एवं समयसाध्य है जिसको केवल वह व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जो क्षण-क्षण पर अपने आचार विचार तथा व्यवहार में सावधान रह कर चलेगा। देव अनुग्रह के उपयुक्त पात्रता प्राप्त किये बिना कोई भी व्यक्ति केवल देवदर्शन अथवा दक्षिणा-प्रदक्षिणा द्वारा मनोरथ की सिद्ध नहीं कर सकता।
साधना पथ भी है और उसका एक विशेष विज्ञान भी। पर उसकी चर्चा यहाँ अप्रासंगिक है। अखण्डज्योति के पाठक उस स्तर के नहीं हैं । उनके लिए सामान्य जीवन यापन ही सुविधाजनक है इसलिये साधना प्रकरण भी उन्हें सामान्य स्तर का ही उपयुक्त हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-November
साधना भी चल रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-January
साधना के लिए हिमालय चले जायेंगे। अपने वर्तमान निष्ठावान परिजनों से हम यह आशा करेंगे कि वे उपेक्षा, लापरवाही, ढील-पोल की आदत छोड़ दें और जो कुछ करना है उसे पूरे मन से ठीक तरह करने का स्वभाव बनायें। जो करना सो करना, न करना तो न करना। सत्पुरुषों की यही रीति-नीति रहती है। वर्तमान साथियों की गतिविधि यही रहनी चाहिए।
साधना का ऐसा ही विधान रखा गया है जो आत्मबल की, साहस की अपेक्षा रखता है। अपने परिवार एवं परिजनों में नव-निर्माण की विचार-धारा फैलने में एकमात्र कठिनाई अपनी झिझक एवं संकोच-शीलता ही है। किसी से हुई बात कैसे कहें? कोई क्या समझेगा? इसमें अपनी हेटी होती है, हम क्यों किसी के पास जाएं?
साधना है।
साधना-
साधना का पाँच साल तक अभ्यास करते रहना है। धैर्यवान उसे जारी रखेंगे, उतावली वाले छोड़ बैठेंगे तो समझ लिया जायेगा कि इनका स्तर इतना विकसित नहीं हुआ कि पूर्णता तक पहुँचने की पात्रता सिद्ध कर सकें। पञ्च कोशी साधना के निष्ठावान साधकों के धैर्य की परीक्षा को यह पाँच साल का समय रखा गया है।
साधना में विश्वास किये बैठे हैं अथवा एक दर्शक की तरह तटस्थ भाव से अलग खड़े लीला देखते रहते हैं। बहुत से सत्पुरुष ऐसे भीरु स्वभाव के भी होते हैं जो समाज की विकृतियों से इस डर से संघर्ष में नहीं आते कि कोई विकृतियां उन्हें भी न पकड़ लें। और ऐसे विरागी व्यक्तियों की तो कमी नहीं है-जो हर उत्थान, हानि-लाभ, अच्छाई-बुराई को भगवान की इच्छा अथवा लोगों का कर्मभोग समझते हैं और उसमें दखल देने के लिए न तो अपने को अधिकारी समझते हैं और न हस्तक्षेप करना उचित ही। जैसा जो कुछ चल रहा है, चलने दिया जाये। ठीक होने को होगा ठीक हो जायेगा नहीं तो हरि इच्छा।
साधना में विश्वास रखने वाले उस स्वार्थी गृहस्थ की तरह, भौतिक न सही आध्यात्मिक स्वार्थी हैं जो घर में आग लगी होने पर असहाय स्त्री बच्चों की चिन्ता न करके सबसे पहले अपने बचाव का उपक्रम करता है। अलग से खड़े लीला देखने वाले तटस्थों को एक क्षण भी यह न भूलना चाहिए पड़ोस की आग से उपराम रहने वाले अपना घर भी जला लिया करते हैं। जिन विकृतियों को आज वे समाज को ग्रास करते देख रहे हैं, उनके प्रति उपेक्षा मान लिये बैठे हैं, वे विकृतियाँ उनकी उपेक्षा न कर सकेंगी और देर सबेर उन पर भी आक्रमण कर अशाँत एवं असन्तुष्ट बना देंगी। दुरित जब दुर्दमनीय हो जाते हैं तब समान भाव से अच्छे-बुरे, साधु-असाधु सबको धर लिया करते हैं। दिग्व्यापी अंधड़ चलने पर सभी प्रभावित होते हैं क्या वटवृक्ष क्या पौधे, सभी में कम्पन आता है और सभी समान रूप से धूल धूसरित हो जाते हैं।
साधना वस्तुतः सद्ज्ञान की ही साधना है।
साधनायें बताई जाती रहेंगी पर उनका उपयोग अधिकारी पात्र अनुभवी मार्ग दर्शकों के सहयोग से ही कर सकते हैं। सामान्य प्रशिक्षण जिसका मार्ग-दर्शन अखण्ड-ज्योति में होगा, हर साधक को एक अनुपम प्रकाश एवं आह्लाद प्रदान करेगा। उसकी तैयारी हमें करनी चाहिए। एक महीने का समय इसलिए दिया गया है कि जिनके घर में पूजा स्थली नहीं है वे उसकी व्यवस्था कर लें और जिनसे उपासना क्रम छोड़ रखा है या जिसने अभी आरंभ ही नहीं किया वे उसका आरंभिक उपचार तो चालू कर सकें।
साधना की प्रथम साधन प्रक्रिया प्रस्तुत करेंगे। उसे दो बार ध्यानपूर्वक पढ़ा जाए, ताकि जो विधि व्यवस्था समझाई गई है वह ठीक तरह समझ में आ जाए। उसका आरंभ बसंत पंचमी से किया जाना है। गायत्री तत्व ज्ञान का महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन करने वाले लेख तो अगले पाँच वर्ष तक छपे रहेंगे, कितनी ही साधनायें बताई जाती रहेंगी पर उनका उपयोग अधिकारी पात्र अनुभवी मार्ग दर्शकों के सहयोग से ही कर सकते हैं। सामान्य प्रशिक्षण जिसका मार्ग-दर्शन अखण्ड-ज्योति में होगा, हर साधक को एक अनुपम प्रकाश एवं आह्लाद प्रदान करेगा।
साधना के निष्ठावान साधकों के धैर्य की परीक्षा को यह पाँच साल का समय रखा गया है।
साधना रही है उसे बहुत शीघ्र पूरा करा देंगे। अभी तो उन्हें सीखी हुई साधना का पाँच साल तक अभ्यास करते रहना है। धैर्यवान उसे जारी रखेंगे, उतावली वाले छोड़ बैठेंगे तो समझ लिया जायेगा कि इनका स्तर इतना विकसित नहीं हुआ कि पूर्णता तक पहुँचने की पात्रता सिद्ध कर सकें। पञ्च कोशी साधना के निष्ठावान साधकों के धैर्य की परीक्षा को यह पाँच साल का समय रखा गया है।
साधना’ बिना चल ही नहीं सकता। सेवा से रहित व्यक्ति पाषाण की तरह है। जिस प्रकार पुष्प पकता है तो उसकी पंखुरियाँ फैलती और सुगंध उड़ती है उसी प्रकार आध्यात्मिक उत्कृष्टता जिस किसी के भीतर भी विकसित होगी उसके स्वभाव में उदारता एवं सेवा की भावना झरने की तरह फूटेगी। यही सच्ची आध्यात्मिकता की एकमात्र कसौटी है। जो स्नान, ध्यान, भजन, दर्शन, पाठ की विद्या में तो प्रवीण है पर सेवा की हूक अन्तःकरण में नहीं उठती तो समझना चाहिये कि इनका धर्म और अध्यात्म अभी विडम्बना की कक्षा में ही भ्रमण कर रहा है।
साधना है। इसमें मनोबल एवं साहस उपेक्षित है। सन्मार्ग पर चलने में जो आलस, प्रमाद एवं संकोच आदि आता है, उसे भी परास्त करने की बात है। परिजन सारा साहस बटोर कर इस दिशा में कदम बढ़ावें। अपने घर वालों में शिक्षितों को नव-निर्माण का साहित्य-पढ़ाने और सुनाने का कार्यक्रम आरंभ करें।
साधना का पुट अवश्य रहें। कहना न होगा कि अन्न, वस्त्र, जल, निवास आदि के दान तो बहुत ही स्थूल स्तर के शरीरों को थोड़ी देर के लिये लाभ पहुँचा सकने मात्र की सुविधा देते हैं। वास्तविक दान तो किसी की मनोदशा विचारधारा को सन्मार्ग की ओर मोड़ देने में ही है। अपनी सेवा भी इसी में है और दूसरों की सच्ची सेवा-सहायता भी इसी प्रकार हो सकती है। इसी दृष्टि से ज्ञान-दान को सबसे बड़ा दान और ज्ञान-यज्ञ को सबसे बड़ा यज्ञ माना गया है।
साधना में क्यों न लगे हों, समाज कल्याण के कर्त्तव्य का ध्यान रखें और अपने सुझावों, कार्यक्रमों एवं आदर्श चरित्रों से जनसाधारण को प्रकाश दें, राह दिखलायें। भारतीय समाज का नेतृत्व सदैव से धार्मिक पुरुषों ने किया है। जिस दिन से वे अपने इस अधिकार से उदासीन हो गये समाज का विकास एवं सुधार बंद हो गया। वे सावधान होकर अपने अधिकार को कर्त्तव्य समझ कर संभालें, बस समाज का कल्याण हो गया।
साधना आरंभ करने वाले अपने साहस और आत्मबल में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि हुई देखेंगे और इससे दूसरों की ही नहीं अपनी भी भावनात्मक प्रगति होगी। यह प्रगति व्यक्ति और समाज के नव-निर्माण की आधार शिला होगी।
साधना, उपासना तक ही सीमित माना जाने लगा है। अस्तु आज के साँस्कृतिक कार्यक्रम धर्म की सीमा छोड़कर अन्य परिवेश में आ गये हैं। किन्तु उनका मूल उद्देश्य तो बदल ही नहीं सकता। साँस्कृतिक कार्यक्रमों का निश्चय ही ऐसा आयोजन है जिससे मनुष्य के मन का संस्कार हो।
साधना का जो कार्यक्रम परिजनों के लिये आवश्यक है उसे चालू कर देना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-October
साधना द्वारा ही आत्म कल्याण की मंजिल पार किया करेंगे।
साधना की संक्षिप्त चर्चा इसी अंक के अन्तिम लेख में है। सब मिल कर एक केन्द्र बिन्दु का निर्माण कर रहे हैं। संग्रहीत ऋषि रक्त से सीता उपजी थी और संग्रहीत देव शक्ति से दुर्गा। यह संग्रह नदियों द्वारा समुद्र को किये गये योगदान की तरह एक केन्द्र बिन्दु को परिपुष्ट करेगा। और मंडल के ग्रह-उपग्रहों का सम्मिलित संगठित सौर परिवार जिस प्रकार विश्व ब्रह्मांड की स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रहा हैं उसी प्रकार दशम निष्कलंक अवतार-नवनिर्माण का प्रचार अभियान भी एक अत्यन्त सामयिक भूमिका प्रस्तुत करेगा।
साधना क्षेत्र में नारी ने जब भी प्रवेश किया है वह पुरुष की तुलना में सौ गुनी तीव्र गति से आगे बढ़ी है। उसे इस दिशा में अधिक शीघ्र और अधिक महत्वपूर्ण सफलतायें मिलती हैं। माता को कन्यायें अधिक प्रिय होती हैं, उन्हें वे दुलार भी अधिक करती हैं और अनुग्रह भी। अध्यात्म की अधिष्ठात्री महाशक्ति का अवतरण अनुग्रह यदि नारी साधकों पर अधिक सरलता से, अधिक मात्रा में होता है तो यह उचित ही है। भावी नव निर्माण में जिस स्तर की क्षमता, योग्यता पूँजी एवं तत्परता की आवश्यकता होगी वह स्वभावतः नारी में ही प्रचुरता पूर्वक मिलेगी।
साधना जारी रखने का निश्चय किया। अतः कालान्तर में इनका पुरुषार्थ सफल हुआ। स्वर्ग में रहने वाली गंगा पृथ्वी पर आने को सहमत हो गई। भागीरथ ने तप द्वारा यह कठिन कार्य सम्भव बना दिया कि अज्ञान ग्रस्त संसार में स्वर्गीय ज्ञान-गंगा का अवतरण हो। अविवेक से समुत्पन्न, अनाचार की दावानल में जलते हुए अगणित मानव पुत्रों का उद्धार आखिर और कर भी कौन सकता है।
साधना के अनुकूल चलती थी। ऋतुएं अपना ठीक काम करती थी और धरती-आकाश सभी मंगलमय उपलब्धियाँ उत्पन्न करते थे। मनुष्य की चेतन प्रकृति का सृष्टि की जड़ प्रकृति के साथ अद्भुत सामंजस्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। जब सज्जनता का बाहुल्य होगा तो सुख समृद्धि की परिस्थितियाँ भी उत्पन्न होंगी। किन्तु यदि दुष्टता, दुर्बुद्धि और दुष्कर्मों का पलड़ा भारी रहा तो बाह्य प्रकृति पर भी उसकी बुरी प्रतिक्रिया होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-April
साधना करते हैं। मीरा, सूर, तुलसी कबीर, चैतन्य, नारद आदि ने अपनी गीत साधनाओं से ही अपने उपास्य देवों का सामीप्य पाया था, ऋषि सामगान करके ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे। दीपक राग से बुझे दीपकों का जलना और मेघ मल्हार की स्वर लहरी से वर्षा होने लगना प्रसिद्ध है। गीत-शास्त्र के ज्ञाता जानते हैं कि किस ऋतु में, अथवा दिन के किस भाग में कौन से राग-रागिनी का गायन किया जाय तो सुनने वालों पर उसका क्या सूक्ष्म प्रभाव पड़ेगा? गीत का अपना एक वैज्ञानिक स्वरूप भी है, जिसकी शोध कर के आधुनिक पदार्थ विज्ञानवेत्ता अमुक स्वर लहरियों को ध्वनि विस्तारक यन्त्रों द्वारा प्रसारण कर के पशुओं से अधिक दूध लेना, पेड़-पौधों को अधिक फलदायक बनाना, रोगियों को कष्ट मुक्त करना आदि अनेक प्रकार के लाभ उठाने लगे हैं फौज में जब बिगुल बजता है, मार्च की ध्वनि बजती है तक कायर सैनिकों में भी वीरता के भाव लहराने लगते हैं।
साधना के वैज्ञानिक प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। कविता थोड़ी दोषयुक्त भी हो तो हर्ज नहीं, उनमें शब्द-ब्रह्म का उसी तरह, उसी क्रम में प्रयोग हुआ है जिससे कि आत्म-बल एवं ब्रह्म-वर्चस्व के उद्भव का वास्तविक प्रयोजन ठीक तरह पूरा हो सके।
साधना करता फिरे, सेवा और त्याग का प्रमाण देता घूमे, क्यों न किसी प्रकार से धन बटोरकर उसे प्राप्त किया जाये? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अन्ध आर्थिकता में खो दिया है।
साधना करके आत्म-विज्ञान के वैज्ञानिक अपने शरीर एवं मन को इतना सामर्थ्यवान् बना लेते हैं कि वे अपनी आत्मिक एवं भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी दूसरे पर निर्भर न रहें। सृष्टि का विधान जिस विधि-व्यवस्था पर चलता है उसके संचालन तक की क्षमता जिनमें विकसित हो गई, उन्हें देवाधीन अथवा प्रारब्धाधीन भी नहीं रहना पड़ता। वे अपने लिये अपनी स्वतन्त्र परिस्थितियाँ एवं संभावनाएँ विनिर्मित कर सकते हैं।
साधना असम्भव नहीं। जीवन में पवित्रता रखकर उसे हँसते खेलते पूरा किया जा सकता है।
साधना विज्ञान के अनुसार बन्ध और मुद्राओं का विधान मौजूद है । गायत्री के 24 अक्षरों से सम्बन्धित इस प्रकार की 24 साधनाएँ प्रसिद्ध हैं। उनमें से प्रसिद्ध मुद्राओं और बंधो के नाम नीचे दिए जाते हैं-(1)महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियान (4) जालंधर बन्ध (5) मूल बन्ध (6) महाबन्ध (7) खेचरी मुद्रा (8) विपरीत करणी (9) योनि मुद्रा (10) वज्रोली (11) शक्ति चालनी (12) तडागी (13) माण्डवी (14) शाँभवी (15) अश्विनी (16) पाशिनी (17) काकी (18) मातंगी (19) भुजंगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कथठी (24) आकाशी।
साधनाओं से ही अपने उपास्य देवों का सामीप्य पाया था, ऋषि सामगान करके ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे। दीपक राग से बुझे दीपकों का जलना और मेघ मल्हार की स्वर लहरी से वर्षा होने लगना प्रसिद्ध है। गीत-शास्त्र के ज्ञाता जानते हैं कि किस ऋतु में, अथवा दिन के किस भाग में कौन से राग-रागिनी का गायन किया जाय तो सुनने वालों पर उसका क्या सूक्ष्म प्रभाव पड़ेगा? गीत का अपना एक वैज्ञानिक स्वरूप भी है, जिसकी शोध कर के आधुनिक पदार्थ विज्ञानवेत्ता अमुक स्वर लहरियों को ध्वनि विस्तारक यन्त्रों द्वारा प्रसारण कर के पशुओं से अधिक दूध लेना, पेड़-पौधों को अधिक फलदायक बनाना, रोगियों को कष्ट मुक्त करना आदि अनेक प्रकार के लाभ उठाने लगे हैं फौज में जब बिगुल बजता है, मार्च की ध्वनि बजती है तक कायर सैनिकों में भी वीरता के भाव लहराने लगते हैं। इसी प्रकार की अपनी विशेषताएँ अन्य गीतों की भी हैं।
साधनानाँ वरानने॥
साधना में भी 24 प्रत्यावर्तन मुख्य हैं। यों संख्या की दृष्टि से वे 84 हैं, पर प्रमुख उनमें से 24 ही हैं। इन 24 प्राणायामों, 24 मुद्राओं, 24 बंधो की साधना करके आत्म-विज्ञान के वैज्ञानिक अपने शरीर एवं मन को इतना सामर्थ्यवान् बना लेते हैं कि वे अपनी आत्मिक एवं भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी दूसरे पर निर्भर न रहें। सृष्टि का विधान जिस विधि-व्यवस्था पर चलता है उसके संचालन तक की क्षमता जिनमें विकसित हो गई, उन्हें देवाधीन अथवा प्रारब्धाधीन भी नहीं रहना पड़ता। वे अपने लिये अपनी स्वतन्त्र परिस्थितियाँ एवं संभावनाएँ विनिर्मित कर सकते हैं।
साधना के बिना सम्पन्न न हो सकेगी। कोई संस्थान एवं अभियान कैसे चलाया जा सकता है, इसका व्यावहारिक मार्ग दर्शन वे लोग चार वर्ष मथुरा रह कर प्राप्त कर लेंगे और युग-निर्माण की एक बड़ी आवश्यकता को पूरा करेंगे।
साधना है जिसके द्वारा इन सभी शक्ति संस्थानों को अति सरलतापूर्वक सक्रिय बनाया जा सकता है।
साधना और उसकी सिद्धियाँ यदि इतनी ही सरल और सस्ती होतीं तो प्राचीन ऋषि-मुनि आत्म-परिष्कार, चिन्तन-मनन तथा स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते? आध्यात्मिक सिद्धियों के धनी क्या इस प्रकार गली-गली पैसा और प्रतिष्ठा माँगते घूमते हैं? क्या यह शंका और सन्देह का विषय नहीं है कि जो दूसरों को धन, वैभव, संपत्ति, सन्तान का वरदान देने की क्षमता रखता है वह क्यों स्वयं दरिद्री, भिखारी तथा पैसे-पैसे के लिए जान दे रहा है? क्या दूसरों को लाखों का वरदान देकर दो पैसे माँग ले जाने वाला सिद्ध हो सकता है उसकी पूजा की जानी चाहिए ? इस मान्यता में कौन -सी तुक है-यह बात समझ में नहीं आती।
साधनाओं का फल प्राप्त कर मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है।
साधना निष्फल नहीं जाती। समस्त योग साधनाओं का आधार गायत्री ही है।
साधनाओं का आधार गायत्री ही है।
साधनाओं के आधार पर जागृत होते हैं।
साधना, सेवा श्रम और पुरुषार्थ के आधार पर इतनी सस्ती और आसानी से मिल सकती है तब किसी ने क्या भाँग खाई है कि वह प्रतिष्ठापूर्ण जीवन जीने के लिए संयम तथा साधना करता फिरे, सेवा और त्याग का प्रमाण देता घूमे, क्यों न किसी प्रकार से धन बटोरकर उसे प्राप्त किया जाये? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अन्ध आर्थिकता में खो दिया है।
साधनाएँ प्रसिद्ध हैं। उनमें से प्रसिद्ध मुद्राओं और बंधो के नाम नीचे दिए जाते हैं-(1)महामुद्रा (2) नभोमुद्रा (3) उड्डियान (4) जालंधर बन्ध (5) मूल बन्ध (6) महाबन्ध (7) खेचरी मुद्रा (8) विपरीत करणी (9) योनि मुद्रा (10) वज्रोली (11) शक्ति चालनी (12) तडागी (13) माण्डवी (14) शाँभवी (15) अश्विनी (16) पाशिनी (17) काकी (18) मातंगी (19) भुजंगिनी (20) पार्थिवी (21) आपम्भरी (22) वैश्वानरी (23) कथठी (24) आकाशी।
साधना लोके न कस्यापि कदापि हि॥
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-September
साधना के भी परमात्मा को जीत लेते हैं और उसके प्राणप्रिय बन जाते हैं।
साधना में लगे रहते थे। वे प्रायः उषाकाल से लेकर अर्ध रात्रि तक शारीरिक अथवा मानसिक श्रम करते ही रहते थे।
साधना से मनुष्य जीता जा सकता है। देवता मनाये जा सकते हैं किन्तु परमात्मा का प्यार केवल गुणी और संतत सदाचारी व्यक्ति को मिलता है। सद्गुणी व्यक्ति बिना किसी तप साधना के भी परमात्मा को जीत लेते हैं और उसके प्राणप्रिय बन जाते हैं।
साधना में लगाकर अपने अनुयायियों पर उन उपायों एवं आदर्शों को खोज-खोज कर अनुग्रह किया है, जिनके आधार पर जीवन को स्वर्ग सुख के साथ जीते हुए मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। जब तक भारतवासी ऋषियों द्वारा निदिष्ट आदर्शों पर चलते रहे संसार में उनके लिए सफलता के द्वार खुले रहे। प्रत्येक व्यक्ति अपने में एक पूर्ण व्यक्तित्व बन कर निर्भय निर्द्वंद्व तथा श्रेयस्कर जीवन का अधिकारी बना रहा। उनको न कभी पराभव का मुख देखना पड़ा और न पराधीनता का। किन्तु जब वे प्रमाद आलस्य एवं अकर्मण्यतावश उन आदर्शों से गिर गये, उनको पराभूत एवं पराधीन होते देर न लगी।
साधना उपासना की उपयोगिता तो बताई है, पर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मुझे पाने के लिये श्रद्धा, विश्वास, संयम, विरति, विनयशीलता, प्रसन्नता और सरल स्वभाव आदि गुणों का आविर्भाव भी आवश्यक है।
साधना है, जिसके करते रहने से सदा वाँछित फल प्राप्त हो जायेंगे वे भ्रम में हैं। उपासना की आवश्यकता है, किन्तु वह आवश्यकता है ईश्वरीय प्रसन्नता के लिये जिससे कि उसको और शक्ति, स्फूर्ति, साहस एवं संलग्नता मिलती रहे और हम अबाध रूप से कर्तव्य पर चलते जाये। अन्य मोक्ष उपासना की सफलता सदा ही संदिग्ध है।
साधना पद्धति आत्म-निर्माण का उद्देश्य पूरा करेगी। ज्ञान-यज्ञ अपने घर में रहने वाले तथा घर से बाहर बिखरे पड़े परिवार का अभिनव निर्माण करेगी। समाज-निर्माण के लिये यों शतसूत्री कार्यक्रम बहुत पहले घोषित किया जा चुका है पर उसका आरम्भ अपने परिवार के सदस्यों को शाखा संगठन के अंतर्गत संगठित करने और जन्मदिन मनाने की प्रक्रिया द्वारा आरम्भ किया जाना चाहिए। जहाँ यह दो कदम आगे बढ़ गये वहाँ अन्य रचनात्मक एवं संगठनात्मक कार्यक्रम की पूर्ति हो सकने की भी आशा की जा सकेगी।
साधना के द्वारा योगीजन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं। नाम रूप सुविधानुसार कोई भी माना जाय पर वस्तुतः यह सविता देवता ही सबका उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिये प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है। देखिये-
साधना अनिवार्य रूप से करनी चाहिये। गुण रहित उपासना कभी किसी की फलित नहीं हो सकती पर उपासना रहित गुण मनुष्य की जीवात्मा को ऊर्ध्वगामी बना सकते हैं। उसे स्वर्ग और मुक्ति के पद पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।
साधना-
साधनात्मक पुस्तकें
साधना के उपयुक्त बनाता है। इन्हीं तीनों तथ्यों का ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में उल्लेख है। ऋग्-ब्रह्मा, यजु-विष्णु और साम-शिव है। इन तीनों के द्वारा त्रिकाल संध्या द्वारा गायत्री उपासना करने वाले को ज्ञान, वैभव एवं सद्गुणों की उपलब्धि होती है। इसी आधार पर एक ही पर ब्रह्म महत्व सविता को तीन प्रकार से तीन चित्रों में चित्रित किया गया है-
साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुए उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-February
साधना एवं तपस्या करनी पड़ती है। कोई भी मनुष्य जो कि अपने त्याग, तपस्या तथा प्रयत्न द्वारा शक्ति का जिस मात्रा में मूल्य चुका सकता है, कितना ही निर्बल होने पर भी वह उसी अनुपात से शक्तिशाली बन सकता है।
साधना क्रम आरंभ करने वालों की वह स्थिति बन जानी चाहिए जिससे हमें भी सन्तोष मिले, और साधना पथ के पथिक को भी अपना निर्धारित लक्ष प्राप्त होने की स्थिति बिल्कुल समीप दृष्टिगोचर हो सके।
साधना पथ के पथिक को भी अपना निर्धारित लक्ष प्राप्त होने की स्थिति बिल्कुल समीप दृष्टिगोचर हो सके।
साधनाओं का स्वरूप एवं विवेचन प्रस्तुत किया जाता रहेगा ताकि अधिकारी व्यक्ति आवश्यकतानुसार उनसे लाभ ले सकें। अखण्ड-ज्योति परिजन उन्हें समझने को तो पूरी तरह चेष्टा करते रहें पर साधना उसी क्रम से करें जो उनके स्तर के अनुरूप हो। अभी तो इस लेख में प्रस्तुत साधना ही अधिकाँश परिजनों के लिए उपर्युक्त रहेगा।
साधना क्रम को सफल बनाने के लिए विशेष रूप से सहयोग देते रहने का एक नियमित क्रम यहाँ से भी चलाया जाता रहे।
साधना उसी क्रम से करें जो उनके स्तर के अनुरूप हो। अभी तो इस लेख में प्रस्तुत साधना ही अधिकाँश परिजनों के लिए उपर्युक्त रहेगा।
साधना भी छोड़ दी जाए। रोगी, अपाहिज, जरा जीर्ण और असमर्थ व्यक्ति भी जिस साधना को कर सके वस्तुतः वही साधन है। मैले कुचैले गंदे शरीर समेत उत्पन्न हुये नवजात बछड़े की गाय अपनी जीभ से चाट कर उसे शुद्ध कर देती है तो क्या हमारी साध्य माता-स्नान न कर सकने जैसी आपत्तिकालीन असुविधा को क्षमा न कर सकेगी?
साधना जो मंजिल दर मंजिल चलने की ही हो सकती है। दूरदर्शी साधक धैर्यपूर्वक उसी आधार का श्रद्धापूर्वक अवलम्बन करते हैं।
साधना क्षेत्र का प्रथम सोपान है।
साधना में प्रथम प्रयत्न यह करना पड़ता है कि मन की एकाग्रता हो और हृदयगत तन्मयता बढ़े। यह प्रयोजन पूरा हो जाने पर तीन चौथाई मंजिल पूरी हुई समझनी चाहिए। उच्चस्तरीय साधना की पूर्णांध इसी पर आधारित है। उत्तरार्ध में वे विशिष्ट साधनायें करनी पड़ती हैं जो 1. प्राण शक्ति की प्रखरता, 2. शारीरिक तपश्चरण, 3. मानसिक एकाग्रता, 4. भावनात्मक तन्मयता एवं 5. उग्र मनोबल के आधार पर विशिष्ट विधि-विधानों के साथ पूरी की जाती हैं। षट् चक्रों के वेधन, ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु गं्रथि, रुद्र ग्रन्थि का नियोजन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार कमल का प्रस्फुरण, देव तत्वों का आमरण जैसी महत्वपूर्ण साधनायें केवल वे लोग कर सकते हैं जो मन क्षेत्र में एकाग्रता तथा तन्मयता की मंजिल पार कर चुके हैं।
साधना सत्र इसी वर्ष आरंभ होने जा रहा है।
साधना सत्र इस बसंत पंचमी (14 फरवरी 67) से आरंभ कर रहे हैं। हमारे निर्देश, प्रोत्साहन, मार्ग दर्शन एवं सहयोग से जो भी व्यक्ति गायत्री उपासना करते रहे हों या नये सिरे से करने के इच्छुक हों उन्हें इस शुभ मुहूर्त से अपनी साधन व्यवस्था सुव्यवस्थित कर लेनी चाहिये। इसे आरंभ को यह मान कर करना चाहिए कि इसे पाँच वर्ष तक जारी रखेंगे। हर वस्तु समय पर अपना फल देती है। यों शुभ कार्य का प्रारंभ भी तत्काल आनंद उल्लास की एक किरण प्रदान करता है और सन्मार्ग पर चलने की प्रत्यक्ष अनुभूति नकद धर्म की तरह अविलम्ब होती है, फिर भी किसी तथ्य के समुचित विकास में कुछ समय तो लगता ही है।
साधना-
साधना से भावनाओं का समावेश कर के उसे सर्वांगपूर्ण बनाऊंगा। मेरी उपासना आत्मिक प्रगति में सार्थक रूप से सहायक हो ऐसा सच्चे मन से प्रयत्न करूंगा। माता मेरी इस प्रतिज्ञा को सफल बनाने में सहायता करे।’ आधा घंटा इस संकल्प को ही मनन-चिन्तन किया जाए। अन्त में 108 गायत्री मंत्र माला की सहायता से अथवा उंगलियों पर गिन कर पूरे किए जाएं।
साधना की क्या दिशा है, उसे किस प्रकार की शक्ति श्रेयस्कर है और उसकी पात्रता तथा परिस्थितियाँ शक्ति के किस रूप के योग्य, अनुकूल अथवा अनुरूप हैं, तब तक वह किस प्रकार की शक्ति को लक्ष्य बनाकर उसे प्राप्त करने के लिए उद्योगवान हो सकता है? इस प्रकार अपनी निर्बलता को दूर करने और शक्तिसंचय करने के लिये ज्ञान की नितान्त आवश्यकता है।
साधना क्रम को अवलम्बन तो रखा जायेगा पर आधार ध्यान को बनाया जायेगा। इस प्रक्रिया में ध्यान प्रधान हो जायेगा और जप गौण। प्रारंभिक बाल कक्षा में अक्षर लिखना प्रधान कार्य रहता है और पुस्तक पढ़ना गौण माना जाता है उसी प्रकार नियमितता के प्रारंभिक अभ्यास की प्राथमिकता साधना में जप संख्या को प्रधानता दी जाती है। ध्यान के लिए थोड़ा-सा आधार इतना ही रहता है कि गायत्री माता का स्वरूप चित्र या प्रतिमा के रूप में सामने रखकर इसका दर्शन अधखुले नेत्रों से करते रहा जाये ताकि वह स्वरूप ध्यान का आधार बन सके। उच्चस्तरीय साधना में यह क्रम बदल जाता है।
साधना से भगवान को अपना कोई साँसारिक संबंधी माता-पिता भाई बहिन, सखा आदि कल्पित करना पड़ता है ताकि प्रेम भावना का, भक्ति रस का विकास हो सके। भक्ति भावना-प्रेम धारणा-का विकास उपासना का प्राण है। और यह प्रेम किसी व्यक्तित्व के माध्यम से ही विकसित होता है इसलिये उपासना क्षेत्र में इष्ट देव की कोई रूप कल्पना कर के चलना ही समीचीन माना गया है। इतने पर भी किसी को निराकार का ही आग्रह हो तो अन्य तीन प्रकार के ध्यान किए जा सकते हैं।
साधना की जा सकती है। उपासना का प्रधान उपकरण शरीर नहीं मन है। फिर ध्यान साधना में तो उसी को प्रमुखता है। बाहर से स्नान कर लेने पर भी भीतर तो इस देह में फिर भी गंदगी भरी रहती है। इसलिये शारीरिक शुद्धि की अधिकाधिक व्यवस्था तो की जाए पर उसे इतना अनिवार्य न बनाया जावे कि स्नान न हो सका तो साधना भी छोड़ दी जाए।
साधना पाँच वर्ष अभ्यास पक्का करने के लिए रुकवा दी है, दोनों ही वर्गों को कारण शरीर की साधना सम्पन्न करा देंगे। उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे गुरुदेव हमसे अति दूर रहते हुए भी निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग देकर हमें आगे बढ़ाते रहे हैं। जिनकी निष्ठा परिपक्व है, उनकी आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होकर रहती है।
साधना की पूर्णांध इसी पर आधारित है। उत्तरार्ध में वे विशिष्ट साधनायें करनी पड़ती हैं जो 1. प्राण शक्ति की प्रखरता, 2. शारीरिक तपश्चरण, 3. मानसिक एकाग्रता, 4. भावनात्मक तन्मयता एवं 5. उग्र मनोबल के आधार पर विशिष्ट विधि-विधानों के साथ पूरी की जाती हैं। षट् चक्रों के वेधन, ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु गं्रथि, रुद्र ग्रन्थि का नियोजन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार कमल का प्रस्फुरण, देव तत्वों का आमरण जैसी महत्वपूर्ण साधनायें केवल वे लोग कर सकते हैं जो मन क्षेत्र में एकाग्रता तथा तन्मयता की मंजिल पार कर चुके हैं। दूर दर्शन, दूर श्रवण, दिव्य दृष्टि, शरीर का हलका या भारी बनाना परकाया प्रवेश, प्राण प्रत्यावर्तन, कायाकल्प, अनुपस्थित वस्तुओं की उपलब्धि, व्यक्तित्वों का परिवर्तन, परिस्थितियों का मोड़-तोड़, शाप वरदान आदि अगणित प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ जिस स्तर पर प्राप्त होती हैं उसे प्राप्त करने के लिए वैसी उच्चस्तरीय भूमिका आवश्यक है, जैसी कि उपासना का उच्चस्तरीय उत्तरार्ध पूरा करने वालों को उपलब्ध होती है। ऐसे लोगों में कई प्रत्यक्ष विशेषतायें देखी जाती हैं, उनका शरीर चन्दन, गुलाब जैसी सुगंधियों से गंधमान रहता है और उनकी देह स्पर्श करने से बिजली के करेंट से लगने वाले झटके जैसा स्पन्दन अनुभव होता है।
साधना का नये सिरे से शुभारंभ करें, वे अपने संकल्प की सूचना हमें दें दें ताकि उनके साधना क्रम को सफल बनाने के लिए विशेष रूप से सहयोग देते रहने का एक नियमित क्रम यहाँ से भी चलाया जाता रहे।
साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
साधना ही अधिकाँश परिजनों के लिए उपर्युक्त रहेगा।
साधनायें केवल वे लोग कर सकते हैं जो मन क्षेत्र में एकाग्रता तथा तन्मयता की मंजिल पार कर चुके हैं। दूर दर्शन, दूर श्रवण, दिव्य दृष्टि, शरीर का हलका या भारी बनाना परकाया प्रवेश, प्राण प्रत्यावर्तन, कायाकल्प, अनुपस्थित वस्तुओं की उपलब्धि, व्यक्तित्वों का परिवर्तन, परिस्थितियों का मोड़-तोड़, शाप वरदान आदि अगणित प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ जिस स्तर पर प्राप्त होती हैं उसे प्राप्त करने के लिए वैसी उच्चस्तरीय भूमिका आवश्यक है, जैसी कि उपासना का उच्चस्तरीय उत्तरार्ध पूरा करने वालों को उपलब्ध होती है। ऐसे लोगों में कई प्रत्यक्ष विशेषतायें देखी जाती हैं, उनका शरीर चन्दन, गुलाब जैसी सुगंधियों से गंधमान रहता है और उनकी देह स्पर्श करने से बिजली के करेंट से लगने वाले झटके जैसा स्पन्दन अनुभव होता है। गाय और सिंह एक घाट पानी पीने वाले दृश्य ऐसे ही लोगों के समीपवर्ती वातावरण में देखे जाते हैं। अंगुलिमाल और बाल्मीक जैसे दस्यु, अम्बपाली जैसी वारवनिता जैसे निम्नस्तरीय व्यक्तित्व ऐसे ही लोगों के सान्निध्य में उच्चस्तरीय बनते हैं।
साधना में जप संख्या न्यूनतम एक माला (108 मंत्र) और अधिकतम 5 माला (540 मंत्र) पर्याप्त है। शेष जितना भी समय बचता हो ध्यान में लगाया जाना चाहिए।
साधना में ध्यान को प्रमुखता देनी पड़ती है। जप को नित्य-कर्म की संज्ञा में रखकर उसे चालू तो रखा जाता है। समय भी उसी पर अधिक लगाया जाता है। इस स्तर की साधना में जप संख्या न्यूनतम एक माला (108 मंत्र) और अधिकतम 5 माला (540 मंत्र) पर्याप्त है। शेष जितना भी समय बचता हो ध्यान में लगाया जाना चाहिए।
साधना में व्यथा का अभ्यास-नियमितता का स्वभाव बनाना होता है। नियत समय-नियत संख्या-नियत विधि-व्यवस्था-यह तीन आधार प्राथमिक साधन के हैं। उनका अभ्यास में ढाल लेना भी कोई कम महत्व की बात नहीं। देखा जाता है कि उपासना करने वाले का समय व्यवस्थित नहीं होता। आलस और गपशप में, व्यर्थ की बातों में समय गंवाते रहते हैं और उपासना के समय में घंटों का हेरफेर कर देते हैं।
साधना में तो उसी को प्रमुखता है। बाहर से स्नान कर लेने पर भी भीतर तो इस देह में फिर भी गंदगी भरी रहती है। इसलिये शारीरिक शुद्धि की अधिकाधिक व्यवस्था तो की जाए पर उसे इतना अनिवार्य न बनाया जावे कि स्नान न हो सका तो साधना भी छोड़ दी जाए। रोगी, अपाहिज, जरा जीर्ण और असमर्थ व्यक्ति भी जिस साधना को कर सके वस्तुतः वही साधन है। मैले कुचैले गंदे शरीर समेत उत्पन्न हुये नवजात बछड़े की गाय अपनी जीभ से चाट कर उसे शुद्ध कर देती है तो क्या हमारी साध्य माता-स्नान न कर सकने जैसी आपत्तिकालीन असुविधा को क्षमा न कर सकेगी?
साधना करने की है उन्हें विशेष अनुरोधपूर्वक आमंत्रित किया जा रहा है। उनका एक साधना सत्र इसी वर्ष आरंभ होने जा रहा है।
साधना का इतना ही विधान है। इसे करने के लिए साधना-मार्ग पर चलने वाले आरंभिक साधकों को निर्देश दिया जाता है।
साधना पद्धति गायत्री महाविज्ञान के प्रथम व द्वितीय भागों में बताई जा चुकी है। समय-समय पर साधकों को उसका प्रशिक्षण भी करते रहे हैं। अब जिनकी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण हो चुकी, उन्हें दूसरी कक्षा में अग्रसर किया जा रहा है। उन्हें उच्चस्तरीय सूक्ष्म शरीर द्वारा संभव हो सकने वाली इस साधना पद्धति को अपनाना चाहिए। इस कक्षा में पाँच वर्ष लगेंगे इस सन् 67 की बसंत पञ्चमी से यह ध्यान साधना शुरू की जाये तो सन् 72 की बसंत पञ्चमी को उसकी पूर्णाहुति करा देंगे।
साधना पद्धति को अपनाना चाहिए। इस कक्षा में पाँच वर्ष लगेंगे इस सन् 67 की बसंत पञ्चमी से यह ध्यान साधना शुरू की जाये तो सन् 72 की बसंत पञ्चमी को उसकी पूर्णाहुति करा देंगे। यही दिन हमारी सम्पूर्ण दृश्य गतिविधियाँ समाप्त करने का है। इसके पश्चात दूर रहकर इन साधकों को तथा उन्हें जिनकी पंचकोशी साधना पाँच वर्ष अभ्यास पक्का करने के लिए रुकवा दी है, दोनों ही वर्गों को कारण शरीर की साधना सम्पन्न करा देंगे। उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे गुरुदेव हमसे अति दूर रहते हुए भी निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग देकर हमें आगे बढ़ाते रहे हैं।
साधना समाप्त हो जाती है। उत्तम तो यह है कि यह उपासना स्नान कर के, धुले वस्त्र पहन कर की जाए। इससे शरीर और मन हल्का रहने से मन ठीक तरह लगता है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक दुर्बलता अथवा साधनों की असुविधा के कारण स्नान करने में असमर्थ हो तो इस कठिनाई के कारण उपासना भी छोड़ बैठना ठीक नहीं। हाथ पैर मुँह धोकर-यथा संभव वस्त्र आदि बदलकर भी साधना की जा सकती है।
साधना-मार्ग पर चलने वाले आरंभिक साधकों को निर्देश दिया जाता है।
साधना क्रम में सम्मिलित हो जाना चाहिये। देर से जो लोग उपासना करते चले आ रहे हैं पर जो अभी तक नियमित नहीं हो गये उन्हें भी गिनती भूलजाने पर नये सिरे से गिनने का क्रम आरंभ करना चाहिए। यदि लगन सच्ची है और इस मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प किया गया हो तो ‘नियमितता’ का प्रारंभिक अभ्यास तीन महीनों में भी पूरा हो सकता है।
साधना में यह क्रम बदल जाता है। ऊंची कक्षाओं के छात्रों में पढ़ना अधिक होता है और लिखना कम। इसी प्रकार उच्चस्तरीय साधना में ध्यान को प्रमुखता देनी पड़ती है। जप को नित्य-कर्म की संज्ञा में रखकर उसे चालू तो रखा जाता है। समय भी उसी पर अधिक लगाया जाता है।
साधना को कर सके वस्तुतः वही साधन है। मैले कुचैले गंदे शरीर समेत उत्पन्न हुये नवजात बछड़े की गाय अपनी जीभ से चाट कर उसे शुद्ध कर देती है तो क्या हमारी साध्य माता-स्नान न कर सकने जैसी आपत्तिकालीन असुविधा को क्षमा न कर सकेगी?
साधना करने के लिये पूरा-पूरा अवसर मिलेगा।
साधना में भावना स्तर का विकास करना होता है। प्रथम साधना में व्यथा का अभ्यास-नियमितता का स्वभाव बनाना होता है। नियत समय-नियत संख्या-नियत विधि-व्यवस्था-यह तीन आधार प्राथमिक साधन के हैं। उनका अभ्यास में ढाल लेना भी कोई कम महत्व की बात नहीं। देखा जाता है कि उपासना करने वाले का समय व्यवस्थित नहीं होता।
साधना स्नान, पूजन, जप आदि क्रिया-कलापों से आरंभ होती है। जिनने आध्यात्म मार्ग में प्रारंभिक कदम उठाये हैं, उनके लिये कर्मकाँड का अवलम्बन आवश्यक है। इस स्तर के साधक जब सामने आते हैं, तब उनकी मनोभूमि के अनुरूप यही बताया जाता है कि-’वे शरीर और वस्त्रों को शुद्ध कर, पवित्र आसन बिछाये, जल और अग्नि का सान्निध्य लेकर बैठे। जल-पात्र पास में रख लें और अगरबत्ती या अग्नि जला लें। गायत्री माता की प्रतिमा, साकार होने पर चित्र के रूप में और निराकार होने पर दीपक के रूप में स्थापित कर लें जिससे माता का सान्निध्य प्राप्त होता रहे।
साधना का प्रमुख प्रयोजन है, भावनात्मक विकास, विचारणा एवं चेतना का परिष्कार। इसके लिए आवश्यक कर्मकाण्ड विधि विधान जारी तो रहते हैं पर सारा जोर इस बात पर दिया जाता है कि तन्मयता एवं एकाग्रता बढ़े। आमतौर से साधकों का मन जहाँ-तहाँ भागता फिरता है, चित्त स्थिर नहीं रहता, उपासना के समय न जाने कहाँ-कहाँ के विचार आते हैं। यह स्थिति आत्मिक विकास में प्रथम बाधा है। पातञ्जलि योग दर्शन में चित्त वृत्ति के निरोध को ही योग कहा गया है।
साधनायें करनी पड़ती हैं जो 1. प्राण शक्ति की प्रखरता, 2. शारीरिक तपश्चरण, 3. मानसिक एकाग्रता, 4. भावनात्मक तन्मयता एवं 5. उग्र मनोबल के आधार पर विशिष्ट विधि-विधानों के साथ पूरी की जाती हैं। षट् चक्रों के वेधन, ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु गं्रथि, रुद्र ग्रन्थि का नियोजन, कुण्डलिनी जागरण, सहस्रार कमल का प्रस्फुरण, देव तत्वों का आमरण जैसी महत्वपूर्ण साधनायें केवल वे लोग कर सकते हैं जो मन क्षेत्र में एकाग्रता तथा तन्मयता की मंजिल पार कर चुके हैं। दूर दर्शन, दूर श्रवण, दिव्य दृष्टि, शरीर का हलका या भारी बनाना परकाया प्रवेश, प्राण प्रत्यावर्तन, कायाकल्प, अनुपस्थित वस्तुओं की उपलब्धि, व्यक्तित्वों का परिवर्तन, परिस्थितियों का मोड़-तोड़, शाप वरदान आदि अगणित प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियाँ जिस स्तर पर प्राप्त होती हैं उसे प्राप्त करने के लिए वैसी उच्चस्तरीय भूमिका आवश्यक है, जैसी कि उपासना का उच्चस्तरीय उत्तरार्ध पूरा करने वालों को उपलब्ध होती है। ऐसे लोगों में कई प्रत्यक्ष विशेषतायें देखी जाती हैं, उनका शरीर चन्दन, गुलाब जैसी सुगंधियों से गंधमान रहता है और उनकी देह स्पर्श करने से बिजली के करेंट से लगने वाले झटके जैसा स्पन्दन अनुभव होता है। गाय और सिंह एक घाट पानी पीने वाले दृश्य ऐसे ही लोगों के समीपवर्ती वातावरण में देखे जाते हैं।
साधना की कक्षा में प्रवेश करने का समय आ गया।
साधना में गायत्री माता के प्रति प्रेम भावना का विकास करना पड़ता है फिर उसका सर्वांग सुन्दर स्वरूप भी प्रस्तुत है। सर्वांग सुन्दर प्रेम की अधिष्ठात्री गायत्री माता का चिन्तन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है। अतएव मन को रोकने, वश में करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक आवश्यकता भी इस साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
साधना, समाधि, तन्मयता, एकान्त स्थिति, परम क्षेम गति, ब्रह्म निर्वाण, जीवन मुक्ति, आत्म-साक्षात्कार प्रभु-दर्शन आदि उपलब्धियाँ इस भूमिका में मिलती है। तीनों की कक्षायें क्रमशः अग्रगामी होती हैं। प्रथम कक्षा की स्थूल शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधना पद्धति गायत्री महाविज्ञान के प्रथम व द्वितीय भागों में बताई जा चुकी है। समय-समय पर साधकों को उसका प्रशिक्षण भी करते रहे हैं। अब जिनकी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण हो चुकी, उन्हें दूसरी कक्षा में अग्रसर किया जा रहा है।
साधना क्रम पूर्ण हो गया। जब तक ऐसी स्थिति न आये तब तक पूर्वाभ्यास ही जारी रखना होता है। अनुभवी मार्ग-दर्शन, साधकों को तब तक इस प्राथमिक उपासना में ही लगाये रहते हैं जब तक वे समय, संख्या और व्यवस्था इन तीनों क्षेत्रों में नियमित नहीं हो जाते-कर्मकाण्ड-विधि विधान-साधना क्षेत्र का प्रथम सोपान है।
साधना शुरू की जाये तो सन् 72 की बसंत पञ्चमी को उसकी पूर्णाहुति करा देंगे। यही दिन हमारी सम्पूर्ण दृश्य गतिविधियाँ समाप्त करने का है। इसके पश्चात दूर रहकर इन साधकों को तथा उन्हें जिनकी पंचकोशी साधना पाँच वर्ष अभ्यास पक्का करने के लिए रुकवा दी है, दोनों ही वर्गों को कारण शरीर की साधना सम्पन्न करा देंगे। उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे गुरुदेव हमसे अति दूर रहते हुए भी निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग देकर हमें आगे बढ़ाते रहे हैं। जिनकी निष्ठा परिपक्व है, उनकी आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होकर रहती है।
साधना के परिपाक में इतना समय तो चाहिए ही। हम पाँच वर्ष बाद जब अपनी स्थूल प्रवृत्तियों को पूर्णाहुति करेंगे तब तक बसंत पंचमी से साधना क्रम आरंभ करने वालों की वह स्थिति बन जानी चाहिए जिससे हमें भी सन्तोष मिले, और साधना पथ के पथिक को भी अपना निर्धारित लक्ष प्राप्त होने की स्थिति बिल्कुल समीप दृष्टिगोचर हो सके।
साधना में जप संख्या को प्रधानता दी जाती है। ध्यान के लिए थोड़ा-सा आधार इतना ही रहता है कि गायत्री माता का स्वरूप चित्र या प्रतिमा के रूप में सामने रखकर इसका दर्शन अधखुले नेत्रों से करते रहा जाये ताकि वह स्वरूप ध्यान का आधार बन सके। उच्चस्तरीय साधना में यह क्रम बदल जाता है। ऊंची कक्षाओं के छात्रों में पढ़ना अधिक होता है और लिखना कम। इसी प्रकार उच्चस्तरीय साधना में ध्यान को प्रमुखता देनी पड़ती है।
साधना इसी स्तर की हैं। कारण शरीर की साधना, समाधि, तन्मयता, एकान्त स्थिति, परम क्षेम गति, ब्रह्म निर्वाण, जीवन मुक्ति, आत्म-साक्षात्कार प्रभु-दर्शन आदि उपलब्धियाँ इस भूमिका में मिलती है। तीनों की कक्षायें क्रमशः अग्रगामी होती हैं। प्रथम कक्षा की स्थूल शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधना पद्धति गायत्री महाविज्ञान के प्रथम व द्वितीय भागों में बताई जा चुकी है। समय-समय पर साधकों को उसका प्रशिक्षण भी करते रहे हैं।
साधना सम्पन्न करा देंगे। उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे गुरुदेव हमसे अति दूर रहते हुए भी निरन्तर प्रकाश एवं सहयोग देकर हमें आगे बढ़ाते रहे हैं। जिनकी निष्ठा परिपक्व है, उनकी आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होकर रहती है।
साधनाभ्यास के समय में विष समान अप्रिय विदित होता है, किन्तु परिणाम में अमृत तुल्य प्रिय तथा हितकारी होता है वह भगवत्-विषयक बुद्धि के प्रसाद उत्पन्न हुआ सुख सात्विक सुख है। जो सुख विष और इन्द्रियों के संभोग से उत्पन्न होता है, और जो पहले भोग-काल में अमृत के समान प्रिय लगता है, किन्तु जो परिणाम में विष-फल के समान दुःखदाई होता है-वह सुख राजस सुख है! किन्तु जो सुख आदि अन्त अर्थात् भोग काल और परिणाम दोनों में आत्मा में मोह उत्पन्न करने वाला होता है, वह निद्रा, आलस्य एवं प्रमाद से उत्पन्न होने वाला सुख तामस सुख है।
साधना सेवा आदि से ही संभव है, तब उसको विषय भोग में खोजना निश्चय ही विपरीत दिशा में दौड़ने के समान ही है। किन्तु खेद का विषय है कि मनुष्य जो चाहता है उसकी ओर तो ध्यान देता नहीं किन्तु जिस दुःख को वह नहीं चाहता उसके लिए तत्परता से प्रयत्न किया करता है। निम्नांकित श्लोक में शास्त्रकार ने मनुष्य की इसी विपरीत बुद्धि का चित्रण किया है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1967-June
साधना किसी भी पुरुषार्थ से, योग से बढ़कर है इसीलिए शास्त्रकार ने कहा-”जितं जगत केन? मनो हि यने” जिसने मन को जीत लिया उसने संसार को जीत लिया।
साधना में गायत्री का आश्रय लिया है। भगवान कृष्ण का कथन है।
साधना मनुष्य को मुनि बना देती है। मौन का आश्रय लिये बिना कोई भी मुमुक्षु लक्ष्य की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। जीवन की सारी साधनाओं में मौन का विशेष स्थान है। किन्तु लौकिक, दृष्टि तथा साँसारिक व्यवहार में भी इसका मूल्य, महत्व कम नहीं है।
साधनाओं में मौन का विशेष स्थान है। किन्तु लौकिक, दृष्टि तथा साँसारिक व्यवहार में भी इसका मूल्य, महत्व कम नहीं है।
साधना से उस शारीरिक तथा मानसिक शक्ति का विकास किया जा सकता है। कहावत प्रसिद्ध है कि एक चुप सौ बालाओं को टालती है। जहाँ किसी अप्रिय प्रसंग के समय मौन हो जाने वाला पक्ष संघर्ष टालने में सहायता करता है वहाँ मौन का सामान्य अभ्यासी अपने मितभाषी अथवा मौन स्वभाव के कारण परिस्थिति का प्रारंभ ही नहीं होने देता। बहुत बोलने और बात करने से एक छोटी-सी बात भी तूल पकड़ जाती है। उत्तर-प्रत्युत्तर से क्रोध बढ़ता है और बात सुलझाने के स्थान पर अधिक उलझ जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-March
साधना का आधार देखते हैं। प्रशिक्षित, अनजान, भोले भाले, छल−छिद्रों के वातावरण से दूर रहने वाले, ग्रामीण ही नहीं, पढ़े लिखे शहरी और अपने को शिक्षित कहने वाले लोग भी भ्रम में पड़ जाते हैं और वे इन खेलों में किसी अदृश्य सत्ता का हाथ देखने लगते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-July
साधना के अनेकों विधान और उनके अद्भुत लाभों का दिग्दर्शन कराया है।
साधना- अपना गौरव एवं महानता स्थिर रखने तथा बढ़ाने के सुदृढ़ सिद्धान्तों का दिग्दर्शन।
साधना।
साधनाओं द्वारा समाधि प्राप्त होती हो सो बात नहीं है। क्रिया योग में भी ऐसी साधनाएं मौजूद हैं जिन्हें करते हुए काम काजी मनुष्य भी चित्त को एकाग्र कर सकता है और समाधि का आनंद पा सकता है। योगदर्शन के साधन पाद में महर्षि पातंजलि ने तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को क्रियायोग बताया है। (तपस्स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योगः) और इस क्रिया योग का फल लिखते हुए उन्होंने कहा है कि इस क्रियायोग से क्लेश तथा व्यथाएं दूर होकर समाधि प्राप्त होती है। (समाधि भावनार्थः केश तनूकरणार्थंच) इस प्रकार प्रकट है कि क्रियायोग से भी समाधि की सिद्धि हो सकती है।
साधनाएं होती हैं।
साधना का मूल आधार है।
साधना है। इस पुस्तक में बताई हुई व्यवस्था पर आचरण करने से अपना घर स्वर्ग के समान आनन्द मय बन सकता है।
साधना ही करते हैं और योग के फल को प्राप्त करते हैं। अपने निजी सीमित स्वार्थ की दृष्टि को विस्तृत करके जब मनुष्य उसे स्त्री, पुत्र, पौत्र, परिजन आदि में फैलाता है, तब वह अहंभाव का विस्तार द्रुतगति से होने लगता है। फिर ग्राम, देश, विश्व से बढ़कर वसुधैव कुटुम्बकम् की उसकी दृष्टि हो जाती है और सब कुछ अपना-आत्मा का, परमात्मा का दीखने लगता है, यही जीवन मुक्ति है।
साधनाओं को नये ढंग से इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि हर कोई इनका अभ्यास सुगमतापूर्वक कर सके और योग के महान फल प्राप्त कर सके।
साधनाएं हैं।
साधनाएं की हैं, भारत वर्ष का कोना कोना जिन्होंने योगियों की तलाश में छाना है, संसार के विविध देशों और भाषाओं के अध्यात्म शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया है, उनके अनुभवों का निचोड़ है। जो लाभ किसी सुविज्ञ आध्यात्मविद्या के ज्ञाता के पास रहकर प्राप्त किया जा सकता है वही लाभ यह पुस्तकें प्राप्त करा सकती हैं।
साधनाएं ऐसी नहीं हैं जिनमें कुछ भूल हो जाने से किसी अनिष्ट की संभावना हो। थोड़ा सा भी इनका साधन किया जाय तो भी बहुत लाभ मिल जाता है। यह पुस्तकें योग के महान लाभों से लाभान्वित होने का सर्व सुलभ मार्ग हैं।
साधना है उसमें चतुर्मुखी सिद्धियाँ मिलती हैं। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक, चारों प्रकार के दुख दूर करने में और इन चारों दिशाओं में उन्नति एवं समृद्धि प्राप्त करने में प्रसन्नता एक अचूक ब्रह्मास्त्र है।
साधनाओं से दूर करने और मनचाही स्तम्भन शक्ति प्राप्त करने की गुणवत्ता ।
साधना- वेदमाता गायत्री की मंत्र साधना के अनेकों विधान और उनके अद्भुत लाभों का दिग्दर्शन कराया है।
साधना की आवश्यकता होती है, वह सभी इन पुस्तकों में मौजूद है। यह 66 पुस्तकें योग विद्या के कर्म कौशल के 66 पाठ हैं। हर एक पुस्तक का लागत मात्र छः-छः आना रखा गया है।
साधनाएं- इस पुस्तक में अनुभव पूर्ण बड़ी ही चमत्कारी सरल साधनाएं हैं।
साधनाएं मौजूद हैं जिन्हें करते हुए काम काजी मनुष्य भी चित्त को एकाग्र कर सकता है और समाधि का आनंद पा सकता है। योगदर्शन के साधन पाद में महर्षि पातंजलि ने तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान को क्रियायोग बताया है। (तपस्स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योगः) और इस क्रिया योग का फल लिखते हुए उन्होंने कहा है कि इस क्रियायोग से क्लेश तथा व्यथाएं दूर होकर समाधि प्राप्त होती है। (समाधि भावनार्थः केश तनूकरणार्थंच) इस प्रकार प्रकट है कि क्रियायोग से भी समाधि की सिद्धि हो सकती है।
साधना क्रम है, जिसका नित्य एक दो घंटे अभ्यास करने पर थोड़े ही दिनों में चमत्कारिक आत्म शक्तियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। योगी लोग वर्षों कठिन परिश्रम के पश्चात जिन शक्तियों को प्राप्त करते हैं, उन्हें सुगमता पूर्वक घर रहकर स्वल्प काल में प्राप्त करने की यह एक सीधी पगडंडी है। इन पुस्तकों में दी हुई साधनाएं ऐसी नहीं हैं जिनमें कुछ भूल हो जाने से किसी अनिष्ट की संभावना हो। थोड़ा सा भी इनका साधन किया जाय तो भी बहुत लाभ मिल जाता है। यह पुस्तकें योग के महान लाभों से लाभान्वित होने का सर्व सुलभ मार्ग हैं।
साधनाएं-चतुर्थ मास का पाठ्यक्रम
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-December
साधना में इस प्रकार की कठिनाई नहीं है।
साधना शिक्षण से शिक्षार्थियों को आत्मिक शक्तियों की जागृति एवं अभिवृद्धि होगी।
साधना विधियाँ भी पृथक-पृथक हैं। इन मंत्रों का विनियोग अनुष्ठान, जागरण, उत्थापन विभिन्न प्रकार से होता है। जिसकी शिक्षा अनुभवी गुरु द्वारा होनी चाहिए। अविधिपूर्वक जपे हुए मंत्र कई बार उल्टा परिणाम उपस्थित करते हैं। अजपा जाप की ‘सोऽहम्’ साधना में इस प्रकार की कठिनाई नहीं है।
साधना
साधना प्रशिक्षण-इसे नौ बार का आध्यात्मिक यज्ञोपवीत धारण भी कह सकते हैं-इस साधना शिक्षण से शिक्षार्थियों को आत्मिक शक्तियों की जागृति एवं अभिवृद्धि होगी।
साधना है। मौन वह अमोघ अस्त्र है जिसके द्वारा हम विभिन्न कुविचारों को समाप्त कर सकते हैं। मौन वह प्रतिबिम्ब है, जिसमें हम आत्मस्वरूप के वास्तविक रूप को पहिचानने का प्रयास करते हैं। अब हम मौन होते हैं, तो हमारा मस्तिष्क अधिक तीव्रता से अपना कार्य करता है। इस कारण विचारों को स्थायित्व प्रदान करने के लिए मौन सर्वथा आवश्यक है।
साधनाएं
साधना के महा लाभों की प्राप्ति होती है।
साधना के लिए जब भी अवसर और अवकाश हो। शान्त चित्त से मन को एकाग्र करना चाहिए। आँखें बन्द करके हृदय कमल में स्थित सूर्यचक्र का ध्यान करना चाहिए, यह चक्र सूर्य के समान प्रकाशवान है। ध्यान करने से धीरे-धीरे उसकी ज्योति बढ़ती हुई ध्यान में दृष्टि गोचर होती जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-May
साधनाएं मन को वश में करने की बताई गई हैं। यह मन को वश में करना और कुछ नहीं, “निराकुलता” ही हैं। दुख-सुख, हानि-लाभ, जय-अजय के कारण उत्पन्न होने वाले आवेशों से बचना ही योग की सफलता है। गीता कहती है :-
साधना द्वारा मन पुष्ट, बलवान्, सुसंस्कृत कुशल, सूक्ष्मदर्शी, सावधान, निभ्रान्त बनाया जा सकता है और उसके आधार पर उन सब वैभवों को प्राप्त किया जा सकता है जो मनःशक्ति द्वारा प्राप्त होते हैं। तलवार पास में होना एक चीज है और तलवार को पास रखना और साथ ही चलाना जानना भी दूसरी चीज है मन तो सभी के पास है पर उसका लाभदायक प्रयोग करना, योग के आधार पर ही जाना जा सकता है। यह जानकारी सर्वसाधारण के लिए आवश्यक है इसलिए योग की शिक्षा भी हर व्यक्ति के लिए जरूरी है, वह किसी भी स्थिति में क्यों न हो।
साधना में लग जाइये, उसी को प्राप्त कर अपनी प्रतिभा का परिचय संसार को दीजिये। तुम आत्म विश्वास लेकर जिस क्षेत्र में प्रविष्ट होंगे वही तुम्हारी प्रतिभा से दीप्तिवान् हो उठेगा।
साधनाओं से किसी प्रकार कम नहीं है।
साधना का आरम्भ किन्हीं पूर्ण विश्वासी, परखे हुए, उच्च चरित्र वाले, उदारमना मित्रों से आरम्भ किया जा सकता है। कुछ ऐसे सच्चे मित्र चुनने चाहिएं जिनके सामने अपने पेट की बातें उसी रूप में कही जा सकें जिस रूप में कि अपने मन में आती हैं। इस प्रकार “गोय्य प्रकाशन वार्तालाप” द्वारा मन हलका होता रहता है, दुराव-ग्रन्थियों की गाँठ खुलती रहती है और मनोविज्ञान के डॉक्टरों को भारी फीस देने पर जो लाभ मिलते हैं वह अपने आप मिलने लगते हैं। यहाँ एक बात ध्यान रखने की आवश्यकता है कि यह सच्चे मित्र उदार अवश्य हों कि थोड़ा विरोध होने पर उन बातों को अधिकारियों में फैलाकर कोई संकट उपस्थित न करा दें।
साधना द्वारा जो लाभ होते हैं उन्हें अपने ढंग का अद्भुत ही कहा जा सकता है।
साधना की जा सकती है। आत्मा मानव शरीर को धारण करने के लिए जिस लोभ से तैयार होती है, प्रयत्न करती है, उस रस को अनुभव करना उसी दशा में सम्भव है जब धन संचय का बुखार उतर जाय और उस बुखार के साथ साथ जो अन्य अनेकों उपद्रव उठते हैं उनका अन्त हो जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-August
साधना के अनेकों विधान और उनके अद्भुत लाभों का दिग्दर्शन कराया है।
साधनाएं हैं।
साधना का मूल आधार है।
साधना की जीवन को आनन्दित बनाने के लिये आवश्यकता है वे सभी उसे उपलब्ध हो जाते हैं। हो सकता है कि उसके पास लाख करोड़ की सम्पत्ति न हो पर जो कुछ स्वस्थ मनुष्य के पास होता है वह इतना अधिक एवं इतना वास्तविक होता है कि उसकी तुलना में चाँदी का मैदान और सोने का पहाड़ भी तुच्छ है, जिन्हें यह त्रिविधि स्वस्थता प्राप्त है। उनके लिये यह परमात्मा का परम पुनीत उपवन-संसार सब प्रकार आनन्दमय है। सब ओर उसे प्रसन्नता और सुख शाँति का झरना झरता दृष्टि गोचर होता है। प्रभु की पुण्य कृति यह वसुधा वसुन्धरा, माता की गोद के समान सुखद दृष्टि गोचर होती है।
साधना- अपना गौरव एवं महानता स्थिर रखने तथा बढ़ाने के सुदृढ़ सिद्धान्तों का दिग्दर्शन।
साधना।
साधना है। इस पुस्तक में बताई हुई व्यवस्था पर आचरण करने से अपना घर स्वर्ग के समान आनन्द मय बन सकता है।
साधना क्रम है, जिसका नित्य एक दो घंटे अभ्यास करने पर थोड़े ही दिनों में चमत्कारिक आत्म शक्तियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। योगी लोग वर्षों कठिन परिश्रम के पश्चात जिन शक्तियों को प्राप्त करते हैं, उन्हें सुगमता पूर्वक घर रहकर स्वल्प काल में प्राप्त करने की यह एक सीधी पगडंडी है। इन पुस्तकों में दी हुई साधनाएं ऐसी नहीं हैं जिनमें कुछ भूल हो जाने से किसी अनिष्ट की संभावना हो। थोड़ा सा भी इनका साधन किया जाय तो भी बहुत लाभ मिल जाता है। यह पुस्तकें योग के महान लाभों से लाभान्वित होने का सर्व सुलभ मार्ग हैं।
साधनाओं को नये ढंग से इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि हर कोई इनका अभ्यास सुगमतापूर्वक कर सके और योग के महान फल प्राप्त कर सके।
साधनाएं-चतुर्थ मास का पाठ्यक्रम
साधनाओं से दूर करने और मनचाही स्तम्भन शक्ति प्राप्त करने की गुणवत्ता ।
साधना- वेदमाता गायत्री की मंत्र साधना के अनेकों विधान और उनके अद्भुत लाभों का दिग्दर्शन कराया है।
साधना की आवश्यकता होती है, वह सभी इन पुस्तकों में मौजूद है। यह 66 पुस्तकें योग विद्या के कर्म कौशल के 66 पाठ हैं। हर एक पुस्तक का लागत मात्र छः-छः आना रखा गया है।
साधनाएं की हैं, भारत वर्ष का कोना कोना जिन्होंने योगियों की तलाश में छाना है, संसार के विविध देशों और भाषाओं के अध्यात्म शास्त्रों का गंभीर अध्ययन किया है, उनके अनुभवों का निचोड़ है। जो लाभ किसी सुविज्ञ आध्यात्मविद्या के ज्ञाता के पास रहकर प्राप्त किया जा सकता है वही लाभ यह पुस्तकें प्राप्त करा सकती हैं।
साधनाएं ऐसी नहीं हैं जिनमें कुछ भूल हो जाने से किसी अनिष्ट की संभावना हो। थोड़ा सा भी इनका साधन किया जाय तो भी बहुत लाभ मिल जाता है। यह पुस्तकें योग के महान लाभों से लाभान्वित होने का सर्व सुलभ मार्ग हैं।
साधनाएं- इस पुस्तक में अनुभव पूर्ण बड़ी ही चमत्कारी सरल साधनाएं हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-February
साधना होगी साधक! बढ़े चलो पथ पर अविचल॥
साधनामय तपश्चर्या का साहस उनमें होता नहीं, ऐसी दशा में वे धूर्तता, प्रवंचना, पाखंड, षडयन्त्र, प्रचार, जादूगरी के आधार पर सिद्ध बनने का मायाचार करते हैं। प्रलोभन से आकर्षित होकर अन्य स्वार्थी लोग भी उनके षडयंत्र में शामिल हो जाते हैं और वह गिरोह भोले भाले लोगों को लूटता खाता रहता है।
साधना होगी साधक! बढ़े चलो पथ पर अविचल।
साधना और तपश्चर्या के बिना सच्ची सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकतीं। साधनामय तपश्चर्या का साहस उनमें होता नहीं, ऐसी दशा में वे धूर्तता, प्रवंचना, पाखंड, षडयन्त्र, प्रचार, जादूगरी के आधार पर सिद्ध बनने का मायाचार करते हैं। प्रलोभन से आकर्षित होकर अन्य स्वार्थी लोग भी उनके षडयंत्र में शामिल हो जाते हैं और वह गिरोह भोले भाले लोगों को लूटता खाता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-April
साधना के लिए बैठना चाहिए। आराम कुर्सी पर अथवा दीवार वृक्ष या मसनद के सहारे बैठ कर यह साधना भली प्रकार होती है।
साधना के लिए रात्रि का निस्तब्ध, कोलाहलरहित समय अधिक उत्तम है। शुद्ध होकर शाँतिपूर्वक ऐसे सुविधाजनक आसन पर बैठिए जिसे कष्ट के कारण साधना समय के बीच में फिर न बदलना पड़े। गोली, पोटली, कार्क, रुई या उंगली लगा कर कान के छेदों को बन्द कर लीजिए ताकि बाहर के शब्द कानों के भीतर न पहुँचने पाएं। नेत्रों को बन्द कर लीजिए। मेरुदण्ड सीधा रखिए।
साधना।
साधना के लिए थोड़ा समय है वे इन में से किसी एक दो साधनाओं को अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार चुन सकते हैं। उसमें सफलता मिलने पर अन्य साधनाओं को हाथ में लिया जा सकता है।
साधना की जरूरत पड़ती है। रोज जमने वाले मानसिक मैलों की सफाई के लिए और मन की आत्मा विरोधी प्रवृत्तियों को हटाने के लिए योग साधना आवश्यक है। और इतनी आवश्यक है कि उसे स्नान, शौच, भोजन, शयन की ही भाँति नित्य कर्मों में स्थान मिलना चाहिए। साधना, अन्तःकरण का शौच और आहार है इसलिए उसकी ओर तो शरीर की अपेक्षा अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है।
साधना के लिए आवश्यक है। दोनों नेत्रों से एक साथ नासिका के अग्रभाग पर त्राटक नहीं हो सकता इसलिए एक मिनट दाहिनी ओर तथा एक मिनट बाई ओर करना उचित है। दाहिने नेत्र को प्रधानता देकर उससे नाक के दाहिने हिस्से को और फिर बाएं नेत्र को प्रधानता देकर बाएं हिस्से को गम्भीर दृष्टि से देखना चाहिए आरम्भ में एक-एक मिनट से करके अन्त में पाँच पाँच मिनट तक बढ़ाया जा सकता है। इस त्राटक से नासिका की सूक्ष्म शक्तियाँ जाग्रत होती हैं।
साधना पथ पर कदम बढ़ाने वाला अपनी वास्तविक महत्ता को शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।
साधनाओं को हाथ में लिया जा सकता है।
साधना के लिए चुनना चाहिए। इस प्रकार के स्थान पर घर का स्वच्छ, हवादार कमरा भी हो सकता है और नदी तट अथवा उपवन भी। हाथ मुँह धोकर साधना के लिए बैठना चाहिए। आराम कुर्सी पर अथवा दीवार वृक्ष या मसनद के सहारे बैठ कर यह साधना भली प्रकार होती है।
साधना के लिए त्राटक का अभ्यास किया जाता है। त्राटक दो प्रकार के होते हैं वाह्य और आभ्यंतरिक दोनों की साधना नीचे लिखी जाती है।
साधना भली प्रकार होती है।
साधना काल में कम से कम वस्त्र शरीर पर रखने चाहिएं। स्वच्छ वस्त्र ही शरीर पर रहें।
साधना- जो फल आपको खाने में सबसे अधिक स्वादिष्ट लगता हो उसे इस साधना के लिए लीजिए जैसे आपको कलमी आम अधिक रुचिकर हैं तो उसके पाँच छोटे टुकड़े लें। एक टुकड़ा लेकर जिव्हा के अग्रभाग पर एक मिनट तक रखे रहें और उसके स्वाद का अनुभव करें। फिर इस टुकड़े को फेंक दें और उस पूर्व स्वाद का ध्यान करें बिना आम के आम का स्वाद जिव्हा को होता रहे। दो मिनट में वह अनुभव शिथिल होने लगेगा फिर दूसरा टुकड़ा जबान पर रखिए और पूर्ववत उसे फेंक कर आम के स्वाद का अनुभव कीजिए इस प्रकार पाँच बार करने में पन्द्रह मिनट लगते हैं।
साधना के अंतर्गत बारह आसन हो जाते हैं इसकी नियमित साधना करने से थोड़े ही दिनों में स्वास्थ्य का आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है।
साधना- नासिका के अग्रभाग पर त्राटक करना इस साधना के लिए आवश्यक है। दोनों नेत्रों से एक साथ नासिका के अग्रभाग पर त्राटक नहीं हो सकता इसलिए एक मिनट दाहिनी ओर तथा एक मिनट बाई ओर करना उचित है। दाहिने नेत्र को प्रधानता देकर उससे नाक के दाहिने हिस्से को और फिर बाएं नेत्र को प्रधानता देकर बाएं हिस्से को गम्भीर दृष्टि से देखना चाहिए आरम्भ में एक-एक मिनट से करके अन्त में पाँच पाँच मिनट तक बढ़ाया जा सकता है। इस त्राटक से नासिका की सूक्ष्म शक्तियाँ जाग्रत होती हैं।
साधना को करने के लिए खड़े हो जाइए। यदि अधिक सर्दी गर्मी या हवा हो तो हल्का कपड़ा शरीर पर पहने रहिए अन्यथा लंगोट या नेकर के अतिरिक्त सब कपड़े उतार दीजिए। खुली हवा में या स्वच्छ खुली खिड़कियों के कमरे में कमर सीधी रख कर खड़े हो जाइए। मुख पूर्व की ओर कर लीजिए। नेत्र बन्द करके हाथ जोड़कर भगवान सूर्य नारायण का ध्यान कीजिए और भावना कीजिए सूर्य की तेजस्वी आरोग्यमयी किरणें आपके शरीर में चारों ओर से प्रवेश करती हुई आपको तेज और आरोग्य प्रदान कर रही हैं।
साधना समय के बीच में फिर न बदलना पड़े। गोली, पोटली, कार्क, रुई या उंगली लगा कर कान के छेदों को बन्द कर लीजिए ताकि बाहर के शब्द कानों के भीतर न पहुँचने पाएं। नेत्रों को बन्द कर लीजिए। मेरुदण्ड सीधा रखिए।
साधना की बड़ी मान्यता है। नाद विन्दोमनिषद में इस नाद योग का विस्तृत वर्णन है।
साधना मंदिर का पहिला द्वार आत्म जागरण है। ‘मैं आत्मा हूँ- इस भाव का अन्तःकरण में प्रत्यक्ष होना उस पर पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा तथा इस आस्था का होना साधना का प्रयोजन है। सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ केवल वही विचार और कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।” यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो। इन भावनाओं को जितनी अधिक बार हो सके मानसिक जप की तरह हृदयंगम करना चाहिए।
साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाय तो आगे सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। दूसरी भूमिका की साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है।
साधना इस योग में प्रथम साधना है। जब यह साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाय तो आगे सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। दूसरी भूमिका की साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है।
साधना के बाद इन्हें निकाल कर ठीक तरह से साफ कर लेना जरूरी है जिससे कि कान का मैल उससे चिपका रह कर गन्दगी की वृद्धि न करे।
साधना को बड़ा महत्व दिया है। एकादशी, रविवार, अमावस्या, पूर्णमासी, चतुर्थी प्रभूति व्रत हर महीने निश्चित हैं। इसके अतिरिक्त हर महीने दो चार विशेष व्रत भी होते हैं, इनके लम्बे चौड़े महात्म्यों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। इन महात्म्यों का इतना आकर्षक वर्णन इसलिए है कि लोगों की रुचि इस ओर आकर्षित हो और वे उपवास के द्वारा प्राप्त होने वाले शारीरिक तथा आत्मिक लाभों को उठावें।
साधना के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का ही है।
साधना- (1) बर्फ या कोई अन्य शीतल वस्तु, शरीर पर एक मिनट लगा कर फिर उसे हटा लें और दो मिनट तक अनुभव करें कि वही ठंडक मिल रही है। सह्य उष्णता का गरम किया हुआ पत्थर का टुकड़ा शरीर से स्पर्श करा कर उसकी अनुभूति कायम रखने की भावना करनी चाहिए। पंखा झोल कर हवा करना, चिकना काँच का गोला या रुई की गेंद त्वचा पर स्पर्श कर के फिर उस स्पर्श को ध्यान रखना भी इसी प्रकार का अभ्यास है। ब्रश से रगड़ना लोहे का गोला उठाना जैसे अभ्यासों की भी इसी प्रकार ध्यान भावना की जा सकती है।
साधनाओं से मन वश में होता है, चित्तवृत्तियों का निरोध होता है और विचारों पर काबू होता है। योग के समस्त साधनों का यही उद्देश्य है। एकाग्रता की सफलता तथा आत्म विजय जीवन की सब से बड़ी सफलताएं हैं। इनके आधार पर मनुष्य अपनी इच्छानुसार जो चाहे सो बन सकता है। जो चाहे सो कर सकता है।
साधना हो सके तो और भी अच्छा। सुविधानुसार यदि समय और भी अधिक बढ़ाया जा सके तो और भी अच्छा है। मौन के समय अन्य शारीरिक कार्य न करने चाहिएं। पूर्ण विश्राम लेते हुए एकान्त स्थान में रहना चाहिए। मौन काल में पुस्तकें नहीं पढ़नी चाहिएं और न विविध विषयों पर मन ढ़ुलाना चाहिये इस समय चित्त को सब ओर से हटा कर इष्ट देव का या प्रकाश ज्योति का ध्यान करना चाहिए।
साधना से एक बड़ी आध्यात्मिक समस्या का हल हो जाता है। जहाँ चाहें वहाँ मन लगा देना और जहाँ चाहे वहाँ से मन हटा लेना यह एक ऐसी सिद्धि है जिसके द्वारा शोक, क्रोध, चिन्ता, भय, काम, निराशा, आवेश आदि अवाँछनीय स्थिति से मन हटा कर समस्त मानसिक दुखों का अन्त किया जा सकता है। संसार में तीन चौथाई दुख मानसिकता और एक चौथाई दुख शारीरिक है। शारीरिक दुख को भी तब मनुष्य भूल जाता है। जब उसका चित्त किसी आनन्ददायक विचारधारा में रमण कर रहा हो।
साधना जीवन का एक नित्य कर्म होना चाहिए। संसार के वातावरण का कुप्रभाव मन पर जमता है, इसको नित्य ही साफ करने की जरूरत पड़ती है। कमरे में नित्य धूलि जमती है, इसलिए नित्य झाड़ू लगानी पड़ती है, त्वचा पर, नाक कान, आँख, दाँत, जीभ पर नित्य मैल जमता है इसलिए उनको जल से नित्य स्वच्छ करते हैं, इसी प्रकार मन पर साँसारिक दुष्प्रवृत्तियों के कुसंस्कार नित्य जमते हैं। उनको हटाने के लिए नित्य योग साधना की जरूरत पड़ती है। रोज जमने वाले मानसिक मैलों की सफाई के लिए और मन की आत्मा विरोधी प्रवृत्तियों को हटाने के लिए योग साधना आवश्यक है।
साधना, अन्तःकरण का शौच और आहार है इसलिए उसकी ओर तो शरीर की अपेक्षा अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
साधना के बिना केवल वाचक ज्ञान से, किसी का वास्तविक भला नहीं हो सकता।
साधना- उपरोक्त शिथिलासन के साथ आत्म दर्शन करने की साधना इस योग में प्रथम साधना है। जब यह साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाय तो आगे सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। दूसरी भूमिका की साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है।
साधना में यम नियम के बाद आसन का नम्बर आता है। आसन अपने ढंग के अनोखे व्यायाम हैं। पहलवान जिन डंड बैठक आदि कठोर व्यायामों को करते हैं, सर्व-साधारण के लिए उपयोगी नहीं बैठते। जिनके शरीर मजबूत हैं जिनके आहार में घी दूध की पर्याप्त मात्रा रहती है, जिन्हें मानसिक संघर्ष में अधिक नहीं उलझना पड़ता उनके लिए पहलवान बनने वाले कठोर व्यायाम ठीक हैं। पर जिनकी ऐसी स्थिति नहीं है।
साधना मनुष्य की एक दैनिक आवश्यकता है। योग का कार्य है :- मिलना। दो बिछुड़े हुओं का मिलाप बड़ा आनन्ददायक होता है। यही आनन्द हम योग साधना द्वारा प्राप्त करते हैं। आत्मा का परमात्मा से जब मिलना होता है तो बिछुड़ी हुई भावुक माता और छोटी बिटिया के अन्तःस्तलों की जो दशा होती है वही अनुभूति साधक को प्राप्त होती है।
साधना में सफलता प्राप्त करने पर शारीरिक कष्टों को हँसते हँसते सहने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।
साधना का आसन माला आदि अलग रखने चाहिए उसे दूसरे लोग प्रयोग न करें। एक नियत स्थान अभ्यास के लिए चुन लेना चाहिए रोज-रोज जगह बदलना ठीक नहीं।
साधना नीचे लिखी जाती है।
साधना में लग जाना चाहिए। साधना के लिए सर्वोत्तम समय प्रातःकाल का ही है।
साधना :- कबीर पंथ और राधा स्वामी मत में शब्द साधना की बड़ी मान्यता है। नाद विन्दोमनिषद में इस नाद योग का विस्तृत वर्णन है।
साधना में एक फल एक सप्ताह तक प्रयोग होना चाहिए।
साधना पर बैठना चाहिए। दोनों कानों के छिद्रों के बीच में एक सीधी रेखा खींची जाय और भूमध्य भाग से लेकर शिरा के पीछे की ओर एक रेखा खींची जाय तो वह दोनों रेखाएं आपस में जहाँ मिलती हैं वहाँ त्रिकुटी ब्रह्मरंध्र या सहस्रकमल का स्थान है। इस स्थान पर शाँत चित्त से ध्यान जमाने पर एक छोटा सा प्रकाश बिन्दु दृष्टिगोचर होता है कुछ दिन के बाद एक के स्थान पर अनेक तथा लाल, पीले हरे, काले, विभिन्न वर्णों के विभिन्न आकृतियों के बिन्दु मस्तक के भीतर चारों ओर बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। दीर्घ कालीन सतत अभ्यास से वे बिखरे हुए विभिन्न आकार प्रकार के बिन्दु उस मूल बिन्दु में लय होने लगते हैं और अन्त में एक ही शुभ्र ब्रह्म ज्योति रह जाती है। इसके दर्शन से अन्तः प्रदेश में बड़ी आनन्ददायक शान्ति वर्षा होती है।
साधना :- रूप साधना के लिए त्राटक का अभ्यास किया जाता है। त्राटक दो प्रकार के होते हैं वाह्य और आभ्यंतरिक दोनों की साधना नीचे लिखी जाती है।
साधना करने से थोड़े ही दिनों में स्वास्थ्य का आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है।
साधना का प्रयोजन है। सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ केवल वही विचार और कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।” यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो। इन भावनाओं को जितनी अधिक बार हो सके मानसिक जप की तरह हृदयंगम करना चाहिए। लगातार बहुत दिनों तक इस तथ्य पर अन्तःकरण को केन्द्रित करने से मन पर वैसे ही संस्कार जम जाते हैं और साधक अपने वास्तविक स्वरूप को समझ जाता है।
साधना :- प्रातःकाल जब नींद पूरी तरह खुल जाय तो एक अंगड़ाई लीजिए। तीन पूरे लम्बे साँस खींच कर सचेत हो जाइए।
साधना द्वारा प्राप्त करते हैं। आत्मा का परमात्मा से जब मिलना होता है तो बिछुड़ी हुई भावुक माता और छोटी बिटिया के अन्तःस्तलों की जो दशा होती है वही अनुभूति साधक को प्राप्त होती है।
साधना द्वारा स्वर्गीय आनन्द की प्राप्ति की जाती है। इस साधना मंदिर का पहिला द्वार आत्म जागरण है। ‘मैं आत्मा हूँ- इस भाव का अन्तःकरण में प्रत्यक्ष होना उस पर पूर्ण श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा तथा इस आस्था का होना साधना का प्रयोजन है। सोते जागते, चलते, काम करते, साधक के मन में यह गहरा विश्वास होना चाहिए कि मैं ईश्वर का पवित्र अंश अविनाशी आत्मा हूँ केवल वही विचार और कार्य अपनाऊँगा जो मेरे वास्तविक आत्मिक स्वार्थ के अनुकूल हैं।” यह छोटी शब्दावली एक कागज पर लिखकर उस स्थान पर टाँग लेनी चाहिए जहाँ बराबर नजर पड़ती हो।
साधना
साधना संक्षिप्त रूप से आगे लिखी जाती हैं।
साधना कहते हैं।
साधना के लिए लीजिए जैसे आपको कलमी आम अधिक रुचिकर हैं तो उसके पाँच छोटे टुकड़े लें। एक टुकड़ा लेकर जिव्हा के अग्रभाग पर एक मिनट तक रखे रहें और उसके स्वाद का अनुभव करें। फिर इस टुकड़े को फेंक दें और उस पूर्व स्वाद का ध्यान करें बिना आम के आम का स्वाद जिव्हा को होता रहे। दो मिनट में वह अनुभव शिथिल होने लगेगा फिर दूसरा टुकड़ा जबान पर रखिए और पूर्ववत उसे फेंक कर आम के स्वाद का अनुभव कीजिए इस प्रकार पाँच बार करने में पन्द्रह मिनट लगते हैं।
साधना विधियों का उल्लेख कर चुके हैं जिनके द्वारा आत्म दर्शन की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है। आत्म दर्शन के लिए इस प्रकार के विचार और विश्वासों को मन में स्थान देना चाहिए कि ‘मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ।” अपने अहम् को शमार से भिन्न अविनाशी आत्मा और शरीर मन बुद्धि को अपना औजार समझने की मान्यता जब सुदृढ़ हो जाती है तो मनुष्य उसी ढाँचे में ढलने लगता है जो आत्मा के स्वार्थ एवं गौरव के अनुरूप है।
साधनाओं को एक साथ ही किया जाय यह आवश्यक नहीं। जिनके पास साधना के लिए थोड़ा समय है वे इन में से किसी एक दो साधनाओं को अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार चुन सकते हैं। उसमें सफलता मिलने पर अन्य साधनाओं को हाथ में लिया जा सकता है।
साधना- जब दूसरी भूमिका का ध्यान भली प्रकार होने लगे तो तीसरी भूमिका का ध्यान कीजिए।
साधना ही एक आधार है। उस आधार के लिए यों तो जितना अधिक से अधिक समय लगाया जा सके उतना अच्छा है, पर कम से कम 2 घण्टे नित्य अनिवार्य रूप से लगना चाहिए। साधना के बिना केवल वाचक ज्ञान से, किसी का वास्तविक भला नहीं हो सकता।
साधना के लिए बैठिए। यदि सत कम है तो ब्रह्म का ध्यान कीजिए। मस्तिष्क के मध्य भाग में सहस्र दल कमल के ऊपर अवस्थित परम सात्विकता के पुँज, वेद ज्ञान के अक्षय भंडार, विवेक वृद्ध, ब्रह्मा जी का ध्यान कीजिए, आप उनके समीप नतमस्तक श्रद्धाभाव से बैठे हैं और वे अनन्त सात्विकता की शुभ्र किरणें आपके ऊपर फेंक रहे हैं। दाहिना हाथ उठा कर आपको प्रचंड सात्विक शक्तियों की अभिवृद्धि का वरदान दे रहे हैं। इस ध्यान को एकाग्र मन से दृढ़ कल्पना और पूर्ण श्रद्धा के साथ कीजिए।
साधना विधि।
साधना पर बैठना चाहिए। यदि सुविधा न हो तो हाथ पैर मुख धोकर कार्य आरम्भ कर देना चाहिए।
साधना को करते रहने से मौन में सफलता मिलती है। साधक मुनि बनता है। मौनी की वाणी बड़ी प्रभावशाली होती है। उसका शाप वरदान सफल होता है। चित्त में शान्ति रहती है और आत्म बल बढ़ता है।
साधना क्या है? उसकी रूप रेखा क्या है? उसके द्वारा किस प्रकार हमारा क्या लाभ होता है? इन प्रश्नों का ठीक प्रकार उत्तर प्राप्त कर लेने पर इस मार्ग पर अग्रसर होना सुविधाजनक होगा।
साधनाओं में उपवास का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रायश्चित्तों के लिए तथा आत्म शुद्धि के लिए उपवास सर्वोत्तम साधन माना जाता है। किसी शुभ कार्य को आरम्भ करते हुए प्रायः उपवास का आश्रय लिया जाता है। कन्यादान के दिन माता पिता उपवास रखते हैं। यज्ञोपवीत व्रतबन्ध, समावर्तन , वेदारम्भ आदि संस्कारों के दिन ब्रह्मचारी को उपवास रखना आवश्यक है।
साधना के लिए किसी स्वच्छ शान्तिदायक स्थान में आसन बिछा कर बैठिए दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रखिए। मेरुदण्ड सीधा रहे। नेत्र बन्द कर लीजिए।
साधना द्वारा उसका संचय हो सकता है। अब क्रमशः पाँचों साधना संक्षिप्त रूप से आगे लिखी जाती हैं।
साधना की परिपक्वावस्था का चिन्ह है। साधन दो मिनट से आरम्भ करके एक-एक मिनट नित्य बढ़ाना चाहिए। आँखों में पानी भर आवे तो त्राटक अवश्य ही समाप्त कर देना चाहिए।
साधना है। जब यह साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाय तो आगे सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। दूसरी भूमिका की साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है।
साधना की सिद्धावस्था प्राप्त हो गई यही जागृत समाधि या जीवन मुक्त अवस्था है।
साधना करनी चाहिए। सप्ताह में एक दिन या पखवाड़े में एक दिन मौन व्रत होना चाहिए। यह कम से कम 4 घन्टे लगातार का होना चाहिए। यदि प्रति 2 घन्टे की साधना हो सके तो और भी अच्छा। सुविधानुसार यदि समय और भी अधिक बढ़ाया जा सके तो और भी अच्छा है।
साधना का प्रयोजन यह है कि “हम अपने वास्तविक स्वरूप को समझें, आत्मा का दर्शन और अनुभव करें एवं विचार और कार्यों को उस ढाँचे में ढालें जो आत्मा की रुचि के अनुरूप हो।”
साधनाओं को अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार चुन सकते हैं। उसमें सफलता मिलने पर अन्य साधनाओं को हाथ में लिया जा सकता है।
साधना आवश्यक है। और इतनी आवश्यक है कि उसे स्नान, शौच, भोजन, शयन की ही भाँति नित्य कर्मों में स्थान मिलना चाहिए। साधना, अन्तःकरण का शौच और आहार है इसलिए उसकी ओर तो शरीर की अपेक्षा अधिक सावधानी बरतनी चाहिए।
साधना को अपनाना आवश्यक है। इससे उनके आत्मिक दोष घटते और आत्मबल बढ़ता चले। उपवास तीन प्रकार के होते हैं (1) दैनिक (2) नियत कालीन (3) विशिष्ट। इन तीनों का विवेचन नीचे किया जाता है।
साधनाओं में तल्लीन होते हैं। क्योंकि उन्हें इस त्याग की अपेक्षा आत्म प्राप्ति का सुख अनेक गुना महत्वपूर्ण लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-June
साधना में अन्तर दिखाई देता है पर वास्तव में कोई अन्तर है नहीं। मान लीजिये माता के कई बालक हैं एक बालक रोटी खाने के लिये रसोई घर में बैठा है, दूसरा धुले कपड़ों की माँग करता हुआ कपड़ों के बक्स के पास खड़ा है, तीसरा पैसे लेने के लिए माता का बटुआ टटोल रहा है, चौथा गोदी में चढ़ने के लिये मचल रहा है। बालकों की आकाँक्षाएं भिन्न हैं वे माता के उसी गुण पर सारा ध्यान लगाये बैठे हैं जिसकी उन्हें आवश्यकता है। गोदी के लिये मचलने वाले बालक के लिये माता एक मुलायम पालना, या बढ़िया घोड़ा है। पैसे चाहने वाले बालक के लिए वह एक चलती फिरती बैंक है, भोजन के इच्छुक के लिये वह एक हलवाई है, कपड़े चाहने वाले के लिये वह घरेलू दर्जी या धोबी है।
साधना है। इसके अतिरिक्त और कुछ जप तप मैं नहीं जानती। यदि आपको अधिक जानना हो तो तुलाधार वैश्य के पास चले जाइए।
साधना है। अपने नियत कर्म को श्रद्धापूर्वक, कर्तव्य की धर्म भावना से जो अनन्य मन द्वारा करता है वह योग साधन ही करता है। उस पतिव्रता का पतिव्रत, तुलाधार का धर्म व्यापार, मेरा सेवा धर्म, यह सब भी योग साधन से भिन्न नहीं हैं। श्रद्धा के साथ इन साधनाओं में रत रहने से भी आत्म साक्षात्कार होता है और ब्रह्मनिर्वाण मिलता है।
साधना मुझे बतलाइए।
साधना नहीं जानता। इस साधना से ही मेरी शक्ति बढ़ी है। यदि आपको इस साधना विधि से संतोष न हो तो कृपया मूक चाण्डाल के पास चले जाइए। वह आपको आत्मशक्ति का रहस्य बता देगा।
साधना से ही मेरी शक्ति बढ़ी है। यदि आपको इस साधना विधि से संतोष न हो तो कृपया मूक चाण्डाल के पास चले जाइए। वह आपको आत्मशक्ति का रहस्य बता देगा।
साधना के लिए निकाल सकता है।
साधना सफल हो। फिर जब तक माता पिता जीवित रहे नरोत्तम उनकी अनन्य भाव से सेवा करता रहा।
साधना
साधना विज्ञान के आचार्यों का अभिमत है कि ईश्वर की जिस शक्ति को अपने में अभिप्रेत करना हो उसका विचार, चिन्तन, ध्यान और धारण करना चाहिये। विचार शक्ति का चुम्बकत्व ही मनुष्य के पास एक ऐसा अस्त्र है जो अदृश्य लोक की सूक्ष्म शक्तियों को खींच कर लाता है। धनवान बनने के लिये धन का चिन्तन और विद्वान बनने के लिये विद्या का चिंतन आवश्यक है। संसार का जो भी मनुष्य जिस विषय में आगे बढ़ा है, पारंगत हुआ है, उसमें उसने एकाग्रता और आस्था उत्पन्न की है। इसका एक आध्यात्मिक उपाय यह है कि ईश्वर की उस शक्ति का चिन्तन किया जाय।
साधनाओं में रत रहने से भी आत्म साक्षात्कार होता है और ब्रह्मनिर्वाण मिलता है।
साधना ऐसी निरर्थक चीज है जिसके लिए दुनियादारी के साधारण कामकाजों में से बचाकर समय का एक टुकड़ा भी न फेंका जा सके? घर में कुत्ते और भिखारी को थोड़ा बहुत भोजन दिया जाता है सोचना चाहिए कि आत्मा का महत्व क्या कुत्ते और भिखारी से भी कम है जिसकी झोली में समय का एक छोटा सा टुकड़ा भी न डाला जा सके? शरीर की भूख बुझाने के लिए हम तरह तरह के बढ़िया-बढ़िया साधन जुटाते हैं, काफी समय खर्च करके भोजन सामग्री कमाते हैं, पर आत्मा की भूख बुझाने के लिए-स्वाध्याय, चिन्तन, मनन तथा साधन के लिए-थोड़ा भी समय नहीं लगाया जा सकता? क्या सचमुच आत्मा ऐसी तुच्छ वस्तु है, जिसकी शरीर के मुकाबले में इतनी उपेक्षा की जाय?
साधना के लिए अक्सर लोग यह कहा करते हैं कि “क्या करें, फुरसत नहीं मिलती।” वे अपने को बहुत कार्य व्यस्त बताते हैं। जरूरी कामों से फुरसत पाये बिना भला आध्यात्मिक कामों के लिए इन्हें किस प्रकार समय मिल सकता है।
साधना ही अभीष्ट है बल्कि सामूहिक अथवा राष्ट्रीय जीवन में भी हमें सक्रिय भाग लेने की आवश्यकता है। हमें न केवल स्वतः ही मुक्ति के पथ में अग्रसर होना पड़ेगा बल्कि दूसरों को भी इसी पथ पर अग्रसर होने के लिये प्रेरित करना पड़ेगा। तभी हमारे जीवन में पूर्णता आ सकेगी, तभी हम वास्तविक अर्थ में विश्व-मित्र हो सकेंगे और तभी हमारा सार्वभौम प्रेम फलदायक होगा। भगवान बुद्ध इस तत्व से पूर्णतया परिचित थे और इसीलिये उन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि व्यक्तिगत मुक्ति तब तक न होगी जब तक कि विश्व का प्रत्येक जीव मुक्ति न हो जावेगा।
साधना में मूर्ति बड़ी सहायक होती है। लक्ष्मी जी की मूर्ति की उपासना करने से मानस लोक में धन के भाव उत्पन्न होते हैं और वे भाव ही अभीष्ट सफलता तक ले पहुँचते हैं। इस प्रकार लक्ष्मी जी की उपासना से श्री वृद्धि होने में सहायता मिलती है। यही बात गणेश, शिव, विष्णु, हनुमान, दुर्गा आदि देवताओं के संबन्ध में है।
साधना की दृष्टि से उसकी शक्तियों को प्रथक-2 देवताओं के रूप में मान लेता है।
साधना विधि से संतोष न हो तो कृपया मूक चाण्डाल के पास चले जाइए। वह आपको आत्मशक्ति का रहस्य बता देगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-September
साधना नहीं की जा सकती। यह हो सकता है तो सिर्फ सत्य के बारे में ही, क्योंकि दूसरे चार तो सत्य में छिपे हुये हैं। और इस युग के लिये तो पाँच की नहीं, ग्यारह व्रतों की जरूरत है। विनोबा ने उन्हें मराठी में सूत्ररूप में रख दिया है।
साधनाएं यम, नियम हैं। दया पात्रों पर दया, सत्य व्यवहार, चोरी या छल न करना, शक्ति संचय, अत्यधिक लोभी न बनना, स्वच्छता, अनुद्विग्नता, परिश्रमशीलता, इन्द्रियों को वशवर्ती रखना, विद्या, कर्मफल की निश्चिंतता में विश्वास रखना, यह दस बातें यम और नियम हैं। इन पर आरुढ़ हुए बिना कोई व्यक्ति अध्यात्म जीवन में प्रवेश नहीं कर सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-January
साधनाएं ‘आस्तिक्य’ की भावनाओं को परिपुष्ट करने के लिए हैं। इन क्रियाओं के करने से लगातार ईश्वर विषय में ही लुप्त हो जाता है और शरीर की क्रिया उसी कार्य कार्यान्वित रहने से तदनुकूल वृत्तियों का निर्माण होता है।
साधना विधियाँ बताई जावेंगी, जिनके आधार पर मन का सुनिर्माण एवं आत्मसाक्षात्कार हो सकता है।
साधनाएं हैं। व्रत, तीर्थ यात्रा देवदर्शन, हवन अनुष्ठान, आदि धार्मिक कर्मकाण्डों का विधान जिन शास्त्रों में है उनमें इनके बड़े-बड़े लंबे चौड़े महात्म्य भी लिखे गये हैं। बताया गया है कि इस कर्मकाण्ड को करने से इतने जन्म के पाप नाश हो जाते हैं, मनुष्य निष्पाप हो जाता है। बहुत बड़ा पुण्य फल प्राप्त होता है, भगवान प्रसन्न होते हैं, स्वर्ग मिलता है तथा लौकिक अनेक आनन्दों की उपलब्धि होती है। इस महात्म्य से प्रेरित होकर लोग धार्मिक-कर्म काण्ड करते हैं।
साधना—जो कुछ भी मिलता है शक्ति के द्वारा मिलता है। अशक्तों को अपने लिए कुछ प्राप्त करना तो दूर आत्म रक्षा भी कठिन है। शारीरिक निर्बलों को रोगों तथा बलवानों के आक्रमण का शिकार होना पड़ता है। आर्थिक निर्बलों को गरीबी, अभाव, भूख आदि घेरे रहती हैं, मानसिक निर्बलों को चालाकों द्वारा ठगा जाता है। उन्हें भोंदू बुद्धू मूर्ख बनाया अपमानित किया जाता है।
साधना है। अंतर्मन के इच्छित ढाँचे में ढल जाने पर दोनों मन निर्विरोध हो जाते हैं, इससे बड़ी शाँति मिलती है। इन दोनों के विरोध में अशाँति एवं बेचैनी है जब इन दोनों का एकीभाव हो जाता है तो अपनी स्थिति पर मनुष्य को बड़ा संतोष होता है। विचारों के अनुसार कार्य भी तभी होते है जब उस प्रकार का स्वभाव बन जाता है। इस प्रकार का स्वभाव या संस्कार बन जाना ही आध्यात्मिक साधना की सफलता है।
साधनाएं, सोऽहम् तत्वमसि, सर्वखिल्विदं ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म के सिद्धान्त पर टिकी हुई है। आत्म से ही परमात्मा का दर्शन करना, हृदय को परमात्मा की क्रीड़ा भूमि शरीर को आत्मा का मंदिर अपने को राजाओं के राजा परमात्मा का राजकुमार अनुभव करना आत्मनिष्ठा को बढ़ाने वाले विश्वास हैं। तपश्चर्या की साधनाओं द्वारा मनुष्य आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेकों प्रकार की साधनाएँ करते हुए अनेक साधक देखे जाते हैं।
साधना का वैज्ञानिक आधार
साधना है।
साधनाएं दृष्टिगोचर होती है उनमें कुछ साधनायें मन की स्वस्थता के लिए हैं। योग कर्मकाण्ड शरीर के साथ मन को भी स्वस्थ बनाता है।
साधनाएं अलग अलग प्रकार की होती हैं। यह गुरु परम्परा से चलती है और गुप्त रखी जाती है, इन साधनाओं का मेरुदंड सुदृढ़ विश्वास है। मरघटों में, जल में, रात्रि के सुनसान अंधकार में, कष्ट साध्य प्रक्रियाओं द्वारा कोई मंत्र सिद्ध किये जाते हैं। इन अद्भुत, भयंकर, दुस्साहस पूर्ण, कष्ट साध्य साधना प्रणालियों को प्रयोग में लाने वाला व्यक्ति ऐसा अनुभव करता है कि मैंने कोई भारी दुर्गम पथ पार किया है। मृत्यु तुल्य कठिनाई से लड़कर सफल हुआ हूँ।
साधना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है। वह स्त्री, पुरुष सबके लिए समान रूप से उपयोगी है। संन्यासी और गृहस्थ समान रूप से उसे अपना सकते हैं और लाभ उठा सकते हैं। इस विद्या में जो जितना प्रवेश करता है उसे उसी अनुपात से आत्मलाभ प्राप्त होता है।
साधनायें मन की स्वस्थता के लिए हैं। योग कर्मकाण्ड शरीर के साथ मन को भी स्वस्थ बनाता है।
साधनाओं का उद्देश्य मनुष्य की अन्तःभूमि में उपरोक्त सात संस्कार जमाना है। जब यह संस्कार जम जाते हैं तब इन साधनाओं की आवश्यकता पूरी हो जाती है।
साधना द्वारा हम अंतर्मन का वैसा निर्माण करते हैं जैसा कि अपने भावी जीवन को बनाना या चलाना चाहते हैं।
साधनाओं की आवश्यकता पूरी हो जाती है।
साधना में सफल भी नहीं हो पाते।
साधना का यही उद्देश्य है। जिस क्रिया पद्धति से अंतर्मन को इच्छित ढाँचे में ढाला जाता है उसका ही नाम साधना है। अंतर्मन के इच्छित ढाँचे में ढल जाने पर दोनों मन निर्विरोध हो जाते हैं, इससे बड़ी शाँति मिलती है। इन दोनों के विरोध में अशाँति एवं बेचैनी है जब इन दोनों का एकीभाव हो जाता है तो अपनी स्थिति पर मनुष्य को बड़ा संतोष होता है। विचारों के अनुसार कार्य भी तभी होते है जब उस प्रकार का स्वभाव बन जाता है।
साधना में, योग साधना से, अपना संबंध करके, अपनी शक्तियों को प्रस्फुटित करके उपयोगी तत्वों का आविर्भाव होता है। योग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जिसके अनुसार अपने शरीर और मन की प्रयोग शाला में अन्वेषण, परीक्षण, प्रयोग के आधार पर महत्वपूर्ण तथ्यों का आविष्कार किया जाता है। इस विज्ञान द्वारा हमारे पूर्वज योग की चमत्कारिक सिद्धियाँ प्राप्त कर चुके हैं। अब डॉक्टर फ्रायड डॉक्टर मेस्मर, डॉक्टर ली प्रभृति मनोविज्ञान शास्त्रियों ने आधुनिक तरीके से वैज्ञानिक खोज आरम्भ की है।
साधनाएं घूमती हैं।
साधना की सफलता है। यह सफलता प्राप्त होते ही समस्त आत्मिक संपन्नताएं करतलगत हो जाती हैं।
साधना आवश्यकीय है। हर दृष्टि से बलवान बनना अध्यात्मवादियों का आवश्यक कर्तव्य है।
साधना की जाती है। अस्वाद व्रत लेकर चटोरेपन पर काबू करते हैं। मौन व्रत से वाचालता असत्य भाषण निरर्थक भाषण पर संयम करते हैं। समय समय पर अन्य प्रतिबंध अपने ऊपर लगाकर कठोर कष्ट सहिष्णुता का अभ्यास किया जाता है। सर्दी, गर्मी, नींद, भूख, प्यास आदि।
साधना में अगणित साधकों को लगे हुए हम देखते हैं।
साधना में पूरा विश्वास होना, भली प्रकार चित्त लगना कठिन है। यदि श्रद्धा के आधार पर किसी प्रकार मन लग भी जाय तो कोई सन्देहास्पद प्रसंग आते ही वह श्रद्धा ढिलमिला जाती है। इसलिए ‘विचार के बाद काम’ वाली नीति के अनुसार पहले उन तथ्यों, मान्यताओं और विश्वासों को भली प्रकार परखना और समझना चाहिए जिनके द्वारा हमें अपनी मनोभूमि का निर्माण करना है। जब तर्क और प्रमाण के वैज्ञानिक आधार पर हम किन्हीं सिद्धान्तों की परीक्षा कर लेते हैं तब उन पर दृढ़ विश्वास हो जाता है और उनके अनुसार आत्मनिर्माण करने के लिए साधन करने में सुगमता पड़ती है। योग की सात भूमिका बताई गई हैं जिनका विवेचन नीचे किया जाता है।
साधना आत्म विस्तार के लिए की जाती है। अद्वैत भाव यही है। अपने को अलग सत्ता न मानकर समाज का एक अंग मात्र मानना समाज के हित अनहित में अपना अनहित देखना, विश्वात्मा में परमात्मा में अपने को घुला देना, यही आत्म विस्तार का दृष्टिकोण है।
साधनाओं का निर्माण हुआ है। योग साधना का यही उद्देश्य है। जिस क्रिया पद्धति से अंतर्मन को इच्छित ढाँचे में ढाला जाता है उसका ही नाम साधना है। अंतर्मन के इच्छित ढाँचे में ढल जाने पर दोनों मन निर्विरोध हो जाते हैं, इससे बड़ी शाँति मिलती है। इन दोनों के विरोध में अशाँति एवं बेचैनी है जब इन दोनों का एकीभाव हो जाता है तो अपनी स्थिति पर मनुष्य को बड़ा संतोष होता है।
साधना—संसार में सुख पूर्वक रहने के लिए शक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। स्वर्ग, मुक्ति, आत्म, साक्षात्कार, ईश्वर प्राप्ति आदि आध्यात्मिक संपदाएँ भी पुरुषार्थी, शक्ति सम्पन्न साधकों को ही मिलती हैं। अपना आत्मिक और भौतिक अस्तित्व कायम रखने, अपने अधिकारों की रक्षा करने तथा आवश्यक वस्तुएं प्राप्त करने के लिए शक्ति की अनिवार्य आवश्यकता है। साधक शक्ति की उपासना करते हैं और उसे शिव का अभिन्न अंग मानते हैं। दुर्गा, राधा, सीता लक्ष्मी, सरस्वती पार्वती आदि रूपों में साधक भगवती शक्ति की शरण में जाता है।
साधनाएं विनिर्मित की हैं और इस मार्ग के पथिकों को साधना में प्रवृत्त होने का आदेश किया है।
साधना से ही हम अभीष्ट बलों को प्राप्त करते हैं और लक्ष स्थान तक पहुँचते हैं। स्वर्ग, मुक्ति और ब्रह्म प्राप्ति यह सब भिक्षा रूप में किसी की कृपा से नहीं मिलते वरन् पुरुषार्थियों द्वारा अपनी अटूट शक्ति से प्राप्त किये जाते हैं। आन्तरिक और बाह्य, लौकिक और पारलौकिक उन्नति के लिए, सुख−शांति के लिए, शक्ति साधना आवश्यकीय है। हर दृष्टि से बलवान बनना अध्यात्मवादियों का आवश्यक कर्तव्य है।
साधना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम ही तो है जिसके द्वारा साधन शक्ति संपन्न होकर ऋद्धि सिद्धि प्राप्त करते हैं और अभीष्ट लक्ष तक पहुँचता है। साधनाएं किसी न किसी शक्ति को प्राप्त करने के लिए ही की जाती हैं।
साधनाएं की जाती हैं। मंत्रों का जप, इष्ट देव का ध्यान, कानों में रुई या उंगली लगाकर अनहद नाद का श्रवण, किसी वस्तु पर दृष्टि जमाकर देखने का त्राटक, व्रत्याहार धारण, ध्यान, समाधि, शिथिलीकरण मुद्रा, खेचरी मुद्रा, षट्चक्र भेदन, सहस्रार भेदन आदि कितने ही मन को एकाग्र करने के साधन हैं। इन साधनों से एकाग्रता मिलती है और फिर एकाग्रता को जिस मार्ग पर भी लगा दिया जाय उसी दिशा में आश्चर्य जनक सफलता उपलब्ध होती है। विचारों का संयम, मन को विचार रहित, निर्विकल्प करके किया जाता है। विचार शून्यता की स्थिति में चित्त को बड़ा हलकापन अनुभव होता है।
साधना प्रणालियों को प्रयोग में लाने वाला व्यक्ति ऐसा अनुभव करता है कि मैंने कोई भारी दुर्गम पथ पार किया है। मृत्यु तुल्य कठिनाई से लड़कर सफल हुआ हूँ। आत्म विश्वास सफलता का गर्व, गुरु वचनों पर श्रद्धा, मंत्र विज्ञान पर विश्वास, यह सब मिलकर साधक के अन्तःकरण में एक सुदृढ़ ग्रन्थि उत्पन्न करती हैं। इस ग्रन्थि की परिपक्वता के साथ साथ मंत्र बल एवं सिद्ध देवता का कर्तृत्व सबल होता है और उस शक्ति से कुछ अद्भुत कार्य पूरे होते हैं। अनेकों अनुष्ठान अपने नियत विधि विधान द्वारा पूरे होने के उपरान्त कृत कार्य होते देखे गये हैं।
साधनाओं द्वारा प्राप्त करते हैं।
साधनाएँ करते हुए अनेक साधक देखे जाते हैं।
साधनाएं हैं। उन समस्त साधनाओं का उद्देश्य मनुष्य की अन्तःभूमि में उपरोक्त सात संस्कार जमाना है। जब यह संस्कार जम जाते हैं तब इन साधनाओं की आवश्यकता पूरी हो जाती है।
साधनाएं अभ्यास, आध्यात्मिक प्रक्रियाएं इन सात आधारों को मजबूत करने के लिए हैं, मन को समझा देना और उसका निर्माण करना दो अलग बातें हैं। पुस्तक पढ़ कर, भाषण सुनकर, वार्तालाप से, सत्संग विचार विनिमय, चिन्तन, आदि के द्वारा मन एक बात को समझ लेता है, उसे ठीक मान लेना है। पर इतने मात्र से ही वह मान्यता व्यवहार रूप में परिणत नहीं हो जाती संस्कार नहीं बन जाती। कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जो सत्य, दया, प्रेम न्याय, संयम आदि सत् सिद्धान्तों को ठीक मानते हैं, उनकी महत्ता स्वीकार करते हैं और उनका समर्थन करते हैं फिर भी व्यवहार में उनके कार्य उन मान्यताओं के बिलकुल विपरित होते हैं। सत्य का उपदेश करने वाले मिथ्याचारी साधु का वेष धरे हुए दुराचारी, आडम्बरी बगुलाभगत, बाहर के मीठे भीतर के कड़ुए अनेकों मनुष्य देखे जाते हैं।
साधना का यही उद्देश्य है यही प्रयोजन है। साधना द्वारा हम अंतर्मन का वैसा निर्माण करते हैं जैसा कि अपने भावी जीवन को बनाना या चलाना चाहते हैं।
साधनाओं द्वारा मनुष्य आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अनेकों प्रकार की साधनाएँ करते हुए अनेक साधक देखे जाते हैं।
साधना में प्रवृत्त होने का आदेश किया है।
साधनाओं द्वारा हम अपनी उन्हीं विभिन्न शक्तियों को जगाते हैं और योग के चमत्कारों को उपलब्ध करते हैं।
साधना से, अपना संबंध करके, अपनी शक्तियों को प्रस्फुटित करके उपयोगी तत्वों का आविर्भाव होता है। योग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जिसके अनुसार अपने शरीर और मन की प्रयोग शाला में अन्वेषण, परीक्षण, प्रयोग के आधार पर महत्वपूर्ण तथ्यों का आविष्कार किया जाता है। इस विज्ञान द्वारा हमारे पूर्वज योग की चमत्कारिक सिद्धियाँ प्राप्त कर चुके हैं। अब डॉक्टर फ्रायड डॉक्टर मेस्मर, डॉक्टर ली प्रभृति मनोविज्ञान शास्त्रियों ने आधुनिक तरीके से वैज्ञानिक खोज आरम्भ की है।
साधनाएं करते हैं जिससे शरीर निरोग एवं सुदृढ़ रहे। अनेक साधनाएं दृष्टिगोचर होती है उनमें कुछ साधनायें मन की स्वस्थता के लिए हैं। योग कर्मकाण्ड शरीर के साथ मन को भी स्वस्थ बनाता है।
साधना एक मनोवैज्ञानिक अभिचार है। इसमें सफल वे ही हो पाते हैं जो एकनिष्ठ हैं। बिना पढ़े, एकान्त प्रिय, गुरु भक्त, धुनि के पक्के, दुस्साहसी, प्रकृति के मनुष्य इसमें सफल होते हैं। विचारशील, तर्कवान, बुद्धिवादी, साधारण जीवन बिताने वाले प्रायः इस दिशा में बहुत कम सफल होते देखे गये हैं। क्योंकि वे मंत्र शक्ति और देवी देवताओं के अस्तित्व के विषय में संदिग्ध रहते हैं।
साधनाओं का मेरुदंड सुदृढ़ विश्वास है। मरघटों में, जल में, रात्रि के सुनसान अंधकार में, कष्ट साध्य प्रक्रियाओं द्वारा कोई मंत्र सिद्ध किये जाते हैं। इन अद्भुत, भयंकर, दुस्साहस पूर्ण, कष्ट साध्य साधना प्रणालियों को प्रयोग में लाने वाला व्यक्ति ऐसा अनुभव करता है कि मैंने कोई भारी दुर्गम पथ पार किया है। मृत्यु तुल्य कठिनाई से लड़कर सफल हुआ हूँ। आत्म विश्वास सफलता का गर्व, गुरु वचनों पर श्रद्धा, मंत्र विज्ञान पर विश्वास, यह सब मिलकर साधक के अन्तःकरण में एक सुदृढ़ ग्रन्थि उत्पन्न करती हैं।
साधना होती है। पाषाण से कठोर, शुष्क हृदय वाले व्यक्ति, भक्तिरस के दैवी स्वाद का आस्वादन नहीं कर सकते।
साधनाएं किसी न किसी शक्ति को प्राप्त करने के लिए ही की जाती हैं।
साधना बना लिया था। दधीचि ऋषि ने तो लोक कल्याण के लिए अपनी हड्डियाँ तक दे दीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-November
साधना की जाती थी, संन्यास लेकर लोक कल्याण के लिए अपने ज्ञान पुष्ट जीवन को समर्पित किया जाता था। अंत्येष्टि के साथ जीवात्मा को सद्भावना युक्त बधाई ही जाती थी। इस प्रकार षोडश संस्कार युक्त हिन्दू जीवन वस्तुतः एक साधन व्यवस्था थी जिसके आधार पर वह आत्मा को परमात्मा, लघु को महान् बनाया जाता था।
साधना के लिए कठोर तप करते हुए तितीक्षा भावना से शान्त रहो और सहन करो का आदर्श अपनाते हैं। जन साधारण के लिए यह कठिन है कि वह उत्तेजनात्मक वातावरण में इन आदर्शों को अक्षरशः पालन करे। हम भी ऐसी आशा किसी से नहीं करते और न ऐसे उपदेश करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1947-October
साधना में प्रवृत्त होता है। ऐसे व्यक्ति के विचार, संकल्प एवं कार्य सामयिक होते हैं। उसे किसी बात में विरोध नहीं जान पड़ता। समृद्धि एवं ज्ञान का अक्षय भंडार वह अपनी शक्तियों में पा लेता है।
साधना कर सके।
साधना नहीं करना चाहता। वह केवल उन विचारों, आदर्शों को तोते की भाँति रट लेना चाहता है, आत्मविश्वास को उनसे सम्बन्धित नहीं करना चाहता। उसमें आत्म बल नहीं। यदि है, तो बहुत कम। जिसका निश्चय दृढ़ हो, वही आत्मबली है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-February
साधनाओं एवं तपस्याओं की ओर आप्तकाम बने हैं। सप्तऋषियों को प्रधानता गायत्री द्वारा ही मिली। बृहस्पति इसी शक्ति को दक्षिणमार्गी साधना करके देवगुरु बने। शुक्राचार्य ने इस महामंत्र का वाममार्गी भाग अपनाया और वे असुरों के गुरु हुए। साधारण ऋषि, मुनि उन्नति करते हुए महर्षि, ब्रह्मर्षि एवं देवर्षि का पद प्राप्त करते थे।
साधना करके देवगुरु बने। शुक्राचार्य ने इस महामंत्र का वाममार्गी भाग अपनाया और वे असुरों के गुरु हुए। साधारण ऋषि, मुनि उन्नति करते हुए महर्षि, ब्रह्मर्षि एवं देवर्षि का पद प्राप्त करते थे। इन ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रन्थों में गायत्री की मुक्त कण्ठ से एक स्वर से महिमा गायी है और बताया है कि गायत्री उपासना के लाभ असंदिग्ध है। यदि इसे नित्य नियमित रूप से किया जाता रहे तो उपासना के सत्परिणाम सुनिश्चित दिखाई देते हैं।
साधना करने के पश्चात् पूर्व जन्मों के और इस जन्म के पाप, कुसंस्कारों की अधिकता के कारण जब आध्यात्मिक प्रकाश नहीं पाते, अभीष्ट परिणाम नहीं देखते तो निराश हो उठते हैं। यदि धैर्यपूर्वक गायत्री उपासना को श्रद्धा विश्वासपूर्वक एक निष्ठ होकर अपनाते रहा जाय, तो गायत्री साधना के लाभों से सुनिश्चित रूप से लाभान्वित होते रहा जा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।
साधना में बाधक नहीं बन सकती “ और उस दिन जन्म हुआ एक और सुप्रिया का । एक सुप्रिया जो कभी बुद्ध के समय में अकाल पीड़ितों-क्षुधितों को तारने जन्मी थी, वह पुनः ईसा के साथ भी अवतरित हुई। सत्साहस हमेशा छोटों के संकल्प से ही उभरता है।
साधना मार्गों के लिए-विशेषकर उन मार्गों के लिए जो गीता की तरह भगवान के सनातन अंश के रूप में व्यक्तिगत जीवन के सत्य को स्वीकार करते हैं अथवा जो यह विश्वास करते हैं कि भगवान और भक्त दोनों सत्य हैं, गुरु की सहायता पर उसे एक अनिवार्य साधन समझकर निर्भर किया गया है, ऐसा महर्षि अरविन्द का मत है।
साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधना करो। विधि में बता दूँगा।’
साधना ग्रन्थों-योगशास्त्रों में कहा गया है कि कुण्डलिनी प्राणाग्नि है । उसमें सजातीय तत्वों का ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है । सूर्यभेदन प्राणायाम द्वारा सूर्य से प्राणशक्ति आकर्षित करके उसे इड़ा-पिंगला के माध्यम से मूलाधार में अवस्थित चिनगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता है तो वह भभकती है और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी सत्ता को अग्निमय बनाती है । प्राण का मूलाधार स्थित जीवनी शक्ति पर प्रहार तथा उद्दीपन-यही है सूर्यभेदन प्राणायाम का लक्ष्य इसकी सफलता पूरी तरह इच्छा भावना एवं संकल्प की दृढ़ता के ऊपर निर्भर करती है । विधि इस प्रकार है ।
साधना का मार्ग निष्कंटक किया तो और भी धन्य हूँ।
साधना संग्राम में शिष्य की सहायता करते और कृष्ण की तरह अर्जुन को महाभारत लड़ने को आग्रह करते हैं। जब वह तैयार हो जाता है, समग्र रूप से समर्पण कर देता है, तो वह उसका रथ चलाने, घोड़ा हाँकने, रास्ता बताने और विजय दिलाने के लिए वचनबद्ध हो जाते हैं। इसके लिए साधक को ही अग्रगामी बनना पड़ता है। गाण्डीव उठाने और “करिष्ये वचनं तव” का संकल्प लेने के उपरान्त ही सामान्य सा पाण्डु पुत्र भगवान का अनन्य सहचर अर्जुन बनता है। यही है गुरु के अनुदानों से लाभान्वित होने और साधना से सिद्धि की पृष्ठभूमि ।
साधना-उपासना से जो प्रगति मनुष्य के व्यक्तित्व में होनी चाहिए वह सच्चे लोकसेवी में भी विकसित होती देखी जा सकती है। उसका भी अहंकार नष्ट होकर भावनाएँ उदात्त हो जाती हैं। उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं होती। वह मात्र विश्वमानव के कल्याण की बातें सोचता और ईर्ष्या, द्वेष, ऊँच-नीच के भेदभाव से रहित जीवन जीता है। धीरे-धीरे वह प्राणि मात्र की सेवा के लिए अपने को समर्पित करता जाता है।
साधना में दुग्ध, मट्ठा फलाहार सबकी छूट रखी गयी। शाकाहार अर्थात् कच्चे रूप में सलाद-पालक-टमाटर गाजर, मूली आदि लेने वालों का अनुपात अधिक रहा। बल्क बन जाने से व रेशे की समुचित मात्रा होने से पेट में दर्द-अपच-कब्ज आदि की परेशानी भी किसी को नहीं हुई। साथ ही सुसंस्कारिता का भी समुचित ध्यान रखा गया। कहा गया है “अन्नौ वै मनः” जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन”।
साधना करो। विधि में बता दूँगा।’
साधना से सिद्धि आदि पुस्तकों सहित 32 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। गायत्री परिवार मासिक पत्रिका भी नियमित निकल रही है।
साधना के पूर्व जो स्थिति थी उससे अब श्रेष्ठतर है व क्रमशः आत्मबल की वृद्धि हो रही हैं । सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी शक्ति-संचार की प्रक्रिया का समापन किया जाय ।
साधना करते रहे हैं। कर्मठता, चरित्र निष्ठ, देश प्रेम आदि की भावना उनके जीवन में कूट-कूट कर भरी थी। व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरतायुक्त एकांगी चिन्तन से सर्वथा ऊँचे उठकर समाज के लोगों से सहानुभूति रखने और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहारों से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करने वाले महामानव ही अपने नैतिक जीवन और आदर्श चरित्र को चरितार्थ करते हैं।
साधना-उपासना का, भजन-पूजन का भी यही उद्देश्य है कि सद्गुणों में दैवी सम्पदा में अभिवृद्धि हो, सत्कर्मरत् रहा जाय और अन्ततोगत्वा शुद्र अहं का विराट सत्ता में विलीन होकर सबकुछ उसका हो जाय। जड़ चेतन में समायी परमसत्ता ही मार्गदर्शिका बन जाय। अहं विसर्जन की फलश्रुति भी यही है।
साधना से प्रसन्न होकर वरदान देने आये हैं। श्रीमाध्वाचार्य ने कहा विश्वास नहीं होता, इसलिए पहले कृपया सामने आइये और दर्शन दीजिये ताकि मैं वस्तु स्थिति समझ सकूँ।
साधना हेतु पंजीकरण का क्रम आरंभ हो चुका है। वंदनीया माताजी द्वारा अभिमंत्रित संकल्प सूत्र (कलाव) सभी भागीदारों को यहाँ से भेजा जा रहा है। इच्छुक साधकों से नाम, पूरा पता तथा जन्मतिथि लिखकर शाँतिकुँज हरिद्वार 249411 (उ. प्र.) के पते पर भेजने को कहा जा रहा है। पत्र पर ऊपर एक कोने में लिख दिया जाय “शक्ति संचार साधना” ताकि डाक की सुव्यवस्था करने में यहाँ कोई कठिनाई न हो। सभी साधकों को संकल्प सूत्र के साथ विस्तृत मार्गदर्शन करने वाली एक छोटी पुस्तिका भी भेजी जाएगी, जिसमें शक्ति संचार साधना की आवश्यकता व प्रक्रिया का विवरण होगा।
साधना के लाभों से सुनिश्चित रूप से लाभान्वित होते रहा जा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।
साधना विज्ञान व दर्शन के अनुसार एक तप-तितिक्षा माना गया है। जहाँ चिन्तन का परिष्कार करने वाली विधा का नाम ‘योग‘ है, वहाँ चरित्र में निखार लाने वाली प्रक्रिया ‘तप’ कहलाती है। आत्मिक प्रगति व व्यक्तित्व परिष्कार के ये दो महत्वपूर्ण आधार हैं। इसीलिए साधना प्रक्रिया में ध्यान-धारणा इत्यादि महत्वपूर्ण सोपानों की सफलता तभी मानी जाती है, जब तप-तितिक्षा द्वारा व्यक्ति ने अपने को अग्निपरीक्षा से गुजर जाने दिया हो। तप यों कई प्रकार के हैं, पर ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया में उसके आहार पक्ष को प्रमुखता देते हुए साधकों पर प्रयोग परीक्षण किये गये कि किस प्रकार आहार का अंतःकरण मन व शरीर पर प्रभाव पड़ता है तथा उस माध्यम से आँतरिक परिशोधन कैसे संभव हो पाता है?
साधना की सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
साधना का एक अंश पूर्व जन्मों के पाप निवारण में लग जाता है। श्रीमाध्वाचार्य एवं स्वामी विद्यारण्य जैसे महान साधकों के जीवन में इस घटनाक्रम को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
साधना का आश्रय लेना पड़ता है।
साधना प्रक्रिया में एक सम्पुट और जोड़ते हुए अब शक्ति संचार की प्रक्रिया की सम्मिलित किया जाना है । यह और कुछ नहीं, जिनकी आत्मशक्ति के संवर्धन हेतु स्वयं को दैवी प्रवाह से जोड़ने की प्रक्रिया है । युगशक्ति गायत्री कार्यक्षेत्र सारा विश्व है , यह समग्र सृष्टि है । वह अनुकूल प्रवाह विनिर्मित कर अपना पुरुषार्थ आरंभ कर चुकी है । अब परिवर्तन के लिए तत्पर साधक को स्वयं को , उस बहती धारा से जोड़ा भर देना है ।
साधना में लगे भिक्षु संघ का परिजन हूँ।”
साधना से सिद्धि की पृष्ठभूमि । चरित्र की उत्कृष्टता एवं व्यक्तित्व की समग्रता ही गुरु अनुग्रह की वास्तविक उपलब्धि है। यह जिस भी साधक में जितनी अधिक मात्रा में दीख पड़े, समझा जाना चाहिए गुरु की उतनी ही अधिक कृपा बरसी, अनुदान-वरदान मिला। स्पष्ट है कि मानव जीवन के सर्वांगीण विकास हेतु गुरुतत्त्व कितना जरूरी है। शास्त्रों में उल्लेख है कि-यदि कोई सद्गुरु न मिले तो आत्मतत्त्व को गुरु मानकर उसके माध्यम से अपनी समीक्षा करनी चाहिए व मार्गदर्शन लेना चाहिए।
साधना का यह उपक्रम व्यक्ति का एक माह में सर्वांगपूर्ण कायाकल्प कर सकने में संभव है, यदि व्रतशील साधक सारे व्रतों का निर्वाह करते हुए अपनी पूर्णता तक पहुँच सके। पुराने अभ्यस्त ढर्रे से छुटकारा पाना व नवीन जीवनक्रम आरंभ कर पाना एक प्रकार से नये जन्म के समान हैं। शरीर में हलकापन लगने से लेकर स्फूर्ति में वृद्धि, मनन एकाग्र होने से लेकर नीरोग-दीर्घायुष्य होने जैसे लाभ सभी को अभीष्ट हैं व ये सभी आहार साधना से मिलते हैं। -क्रमशः
साधना प्रक्रिया द्वारा किया जाता है तो व्यक्ति के निजी जीवन में मनोनुकूल परिस्थितियों के निर्माण से लेकर समष्टिगत अनुकूलन व नवसृजन की प्रक्रिया आरंभ होने लगती है । यही है युगऋषि द्वारा आरंभ किये गए युगपरिवर्तन की प्रक्रिया का सुनिश्चित आधार ।
साधना के उपक्रम में पूरे भारत व विश्वभर में संपन्न अखण्ड गायत्री जप आयोजनों ने जो सबसे बड़ा कार्य किया है, वह है जन-जन की प्रसुप्ति को मिटाना तथा सूक्ष्मजगत में अनुकूल प्रवाह विनिर्मित करना । यह कार्य बड़ी सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है व आगामी नौ वर्षों तक यह इसी प्रकार पलता रहेगा ।
साधना प्रक्रिया में ध्यान-धारणा इत्यादि महत्वपूर्ण सोपानों की सफलता तभी मानी जाती है, जब तप-तितिक्षा द्वारा व्यक्ति ने अपने को अग्निपरीक्षा से गुजर जाने दिया हो। तप यों कई प्रकार के हैं, पर ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया में उसके आहार पक्ष को प्रमुखता देते हुए साधकों पर प्रयोग परीक्षण किये गये कि किस प्रकार आहार का अंतःकरण मन व शरीर पर प्रभाव पड़ता है तथा उस माध्यम से आँतरिक परिशोधन कैसे संभव हो पाता है?
साधना में क्रिया-कृत्यों कि तुलना में भावना आस्था एवं संकल्प का महत्व अधिक है । साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है । श्वास द्वारा खींचे हुए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़तापूर्वक करता पड़ता है । यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से सूर्य मण्डल या अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड-सुषुम्ना मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और वहाँ प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को प्राणाग्नि को अपने प्रचण्ड आघातों से जगा रहा है ।
साधना में दीक्षित मिहिरकुल चला रहा था दूसरी ओर हिम श्रेणियों में दूर-दूर और उसकी वह धुँधली छाया नेत्रों में अदृश्य हो गयी।
साधना में संलग्न रहे। एक वर्ष बीत गया। एक दिन अदृश्य से आवाज आई कि तुम्हारा मंत्र सिद्ध हो गया, कुछ उपचार-वरदान माँगो। पहले तो उनका उधर ध्यान नहीं गया, पर जब बार-बार यही आवाज सुनाई दी तो उनने पूछा-आप कौन हैं? किस प्रकार का उपहार दे सकते हैं उत्तर मिला हम भैरव हैं।
साधना” ताकि डाक की सुव्यवस्था करने में यहाँ कोई कठिनाई न हो। सभी साधकों को संकल्प सूत्र के साथ विस्तृत मार्गदर्शन करने वाली एक छोटी पुस्तिका भी भेजी जाएगी, जिसमें शक्ति संचार साधना की आवश्यकता व प्रक्रिया का विवरण होगा। समय कम है। सभी परिजनों से शीघ्र संपर्क करने का अनुरोध इन पंक्तियों के माध्यम से किया जा रहा है।
साधना” के रूप में एक उपक्रम का शुभारंभ किया जा रहा है व सभी को बिना किसी जाति , लिंग , वर्ण , धर्म , संप्रदाय के भेद के इस में भागीदारी करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है ।
साधना ग्रन्थों में गायत्री उपासना के सत्परिणामों की चर्चा की गयी है और कहा गया है कि जिनने भी इस महामंत्र का आश्रय लिया उन्होंने आशाजनक और उत्साहवर्धक फल पाया है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक ऐसी अनेकों घटनायें घटित होती रही हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि कभी भी किसी भी साधक की गायत्री उपासना निष्फल नहीं जाती। वह साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण समस्याओं को सुलझाने से लेकर सुख-सम्पदा ऋद्धि एवं स्वर्ग-मुक्ति तक के चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करती रही है।
साधना करने लगे। उन्हें नित्य डरावने और प्रलोभन भरे आकर्षण दिखाई देते, पर कापालिक के निर्देशानुसार वे उनसे तनिक भी विचलित हुए बिना साधना में संलग्न रहे। एक वर्ष बीत गया। एक दिन अदृश्य से आवाज आई कि तुम्हारा मंत्र सिद्ध हो गया, कुछ उपचार-वरदान माँगो। पहले तो उनका उधर ध्यान नहीं गया, पर जब बार-बार यही आवाज सुनाई दी तो उनने पूछा-आप कौन हैं?
साधना में यह बात नहीं है। उसमें लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन है, पर मिलता जल्दी है। जिन्हें धैर्य नहीं उन आतुर लोगों के लिए जल्दी लाभ दिखाने वाली तांत्रिक साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधना करो। विधि में बता दूँगा।
साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान किया है और अब नये सिरे से पुनः उसी पुरश्चरण साधना को आरंभ करने से सफलता मिलेगी। समाधान पाकर प्रसन्न मन श्रीमाध्वाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये और गायत्री उपासना आरंभ की। फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ। भगवती का साक्षात्कार हुआ और वे कृतकृत्य हुए।
साधना नहीं है। साधना-उपासना से जो प्रगति मनुष्य के व्यक्तित्व में होनी चाहिए वह सच्चे लोकसेवी में भी विकसित होती देखी जा सकती है। उसका भी अहंकार नष्ट होकर भावनाएँ उदात्त हो जाती हैं। उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं होती। वह मात्र विश्वमानव के कल्याण की बातें सोचता और ईर्ष्या, द्वेष, ऊँच-नीच के भेदभाव से रहित जीवन जीता है।
साधनायें देर में फल देती है। बरगद की तरह वे धीरे-धीरे बढ़ती हैं, समय पर परिपक्व होकर साधक का कल्याण करती हैं और चिरस्थायी फल देती हैं। इसमें धैर्यवान् साधक ही सफल होते हैं। पर तांत्रिक साधना में यह बात नहीं है। उसमें लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन है, पर मिलता जल्दी है।
साधना की आवश्यकता व प्रक्रिया का विवरण होगा। समय कम है। सभी परिजनों से शीघ्र संपर्क करने का अनुरोध इन पंक्तियों के माध्यम से किया जा रहा है।
साधना को सिद्ध होने देती है और न उस निमित्त श्रद्धा जमने-मन लगने देती है। कुसंस्कार ही हैं जो यमदूतों की तरह पग-पग पर त्रास देते रहते हैं, व्यक्तित्व को हेय बनाते हैं। आत्मबल सम्पन्न गुरु का वरण इसीलिये किया जाता है। अपने आत्मबल द्वारा वह शिष्य में ऐसी प्रेरणाएँ भरते हैं जिससे वह सदमार्ग पर चल सके। साधनामार्ग के अवरोधों एवं विक्षोभों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान होता है वह शिष्य को अन्तः शक्ति से परिचित ही नहीं कराते, वरन् उसे जाग्रत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय बताते और प्रयास करते हैं।
साधना से मिलते हैं। -क्रमशः
साधना प्रयोजन में सफलता संदिग्ध ही रहेगी।
साधना को आरंभ करने से सफलता मिलेगी। समाधान पाकर प्रसन्न मन श्रीमाध्वाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये और गायत्री उपासना आरंभ की। फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ। भगवती का साक्षात्कार हुआ और वे कृतकृत्य हुए।
साधना अनुष्ठान के
साधनामार्ग के अवरोधों एवं विक्षोभों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान होता है वह शिष्य को अन्तः शक्ति से परिचित ही नहीं कराते, वरन् उसे जाग्रत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय बताते और प्रयास करते हैं। उनके यह अनुदान शिष्य अपनी आँतरिक श्रद्धा के रूप में उठाता है। जिस शिष्य में आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रति जितनी अधिक निष्ठ होगी, वह गुरु के अनुदानों से उतना ही अधिक लाभान्वित होगा।
साधना पिछले 13 जन्मों के पापों के शमन में लग गयी। जब तक दुष्कर्म जन्य कुसंस्कार दूर नहीं होते तब तक गायत्री उपासना उसी की सफाई में खर्च होती रहती है। तुम्हारी विगत साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान किया है और अब नये सिरे से पुनः उसी पुरश्चरण साधना को आरंभ करने से सफलता मिलेगी। समाधान पाकर प्रसन्न मन श्रीमाध्वाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये और गायत्री उपासना आरंभ की। फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ।
साधना पद्धतियों में बड़ी प्रमुख भूमिका मानी जाती है।
साधना का ही एक अंग है। सप्ताह में एक बार अग्निहोत्र भी संपन्न किया जाय। यह पारिवारिक स्तर पर घर पर भी हो सकता है व समूह स्तर पर प्रज्ञा संस्थानों-शक्ति पीठों अथवा ऐसे स्थानों पर जहाँ सभी परिजन एक साथ सप्ताह या पखवाड़े में एक साथ एकत्रित होते हों। 10 फरवरी से 8 जून कुल चार माह तक यह क्रम चलेगा। व इसकी पूर्णाहुति 8−9−10 जून की अवधि में आयोजित त्रिदिवसीय विशिष्ट शिविर में भागीदारी करके शाँतिकुँज में संपन्न की जाएगी।
साधना में निरत साधक का आतिथ्य करने के लिए सारा महल और सभा-कक्ष विशेष रूप से सजाया गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-September
साधना उपचारों के प्राण हैं व इनकी उपयोगिता लाखों वर्षों के बाद उतनी ही है। तंत्र व योग दोनों ही साधना पद्धतियों का अद्भुत समन्वित रूप देव-संस्कृति करती आयी है।
साधना कुण्डलिनी व षट्चक्र जागरण तथा प्राण प्रत्यावर्तन से लेकर चाँद्रायण कल्प साधनाएँ भी संपन्न करालीं। क्या यह एक असाधारण व असंभव मानी जाने वाली उपलब्धि नहीं है?
साधना पद्धतियों का प्रतिपादन कर उन्हें लोकप्रिय किया। अपने-अपने बौद्धिक व भावनात्मक विकास के अनुरूप हिन्दू संस्कृति में कोई भी सुगम पड़ने वाला कोई सा भी उपचार अपनाकर अगले सोपान पर बढ़ सकता है। “योगः कर्मसु कौशलम् “ कहकर जहाँ देव-संस्कृति कर्मयोग को महत्व देती है वहाँ “श्रद्धावान लभते ज्ञानम्” कहकर समर्पण व भक्ति तथा ज्ञानयोग को भी उतना ही श्रेष्ठ ठहराती है। अपनी सार्वभौमिकता के कारण ही, सर्वजनीन होने के कारण ही, इन साधना उपचारों के प्राण हैं व इनकी उपयोगिता लाखों वर्षों के बाद उतनी ही है। तंत्र व योग दोनों ही साधना पद्धतियों का अद्भुत समन्वित रूप देव-संस्कृति करती आयी है।
साधनाओं के तंत्रवेत्ता इन नवरात्रियों में ही सम्पन्न करते थे। वाममार्गी साधक अभी भी अभीष्ट इच्छापूर्ति हेतु इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते हैं। सतोगुणी साधनाओं को अपनाने वाले दक्षिणमार्गी साधक आत्मिक प्रगति हेतु इसे एक विशिष्ट अनुदान रूप में मानकर अपनी तथा साधना का सुयोग बिठाते हैं। मानवी चेतना के परिमार्जन-परिशोध हेतु योग साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिए संधिका की नवरात्रिबेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधनाओं को अपनाने वाले दक्षिणमार्गी साधक आत्मिक प्रगति हेतु इसे एक विशिष्ट अनुदान रूप में मानकर अपनी तथा साधना का सुयोग बिठाते हैं। मानवी चेतना के परिमार्जन-परिशोध हेतु योग साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिए संधिका की नवरात्रिबेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधना निष्फल चली जीयेगी। साथ ही अन्तरात्मा भी पाप भार से लदता, बोझिल होता चला जाएगा।
साधनाओं जैसे मंत्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदे विधि-विधानों का झंझट भी नहीं रहता। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिए उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय-पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों। इसी तरह वाममार्गी ताँत्रिक विधान-प्रयोग भी कठिन है। यह विधान प्रयोग मनुष्य में तमोगुणी तत्वों को बढ़ा सकते हैं। इसीलिए ऋषियों ने श्रेय पंथ के पथिकों को 24 सहस्र जप की संकल्पित गायत्री साधना ही नवरात्रि के लिए सर्वश्रेष्ठ बतायी है।
साधना इन दिनों करनी चाहिए।
साधना ही एक मात्र यह उपाय है जिससे आत्मकल्याण और लोक कल्याण की दोनों आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। आत्मा और परमात्मा को समान रूप से तुष्टि, तृप्ति और शान्ति मिलती है। शरीर यात्रा तो जीवन रहने के लिए शान्ति मिलती है। शरीर यात्रा तो जीवन रहने के लिए अनिवार्य रूप से करनी पड़ती है। उपेक्षा, आत्मिक कर्त्तव्यों की ही होती रहती है।
साधना कहलाती है। रात्रि का अर्थ ही है-अन्धकार । जो मनुष्य इन नौ द्वारों से-नौ इन्द्रियों के विषयों से जागरुक रहता है, वह उनमें लिप्त नहीं होता और न ही उनका दुरुपयोग करके अपने ओजस्-तेजस् और वर्चस् को गँवाता है। अज्ञानान्धकार से प्रकाश में लाने का नाम ही नवरात्रि जागरण है। अनुष्ठान भी इसी अन्धकार को-अज्ञानता को नष्ट करने के लिये किया जाता है।
साधना तथा सन्निहित क्षमताओं को उभारना ही वस्तुतः नवरात्रि की साधना कहलाती है। रात्रि का अर्थ ही है-अन्धकार । जो मनुष्य इन नौ द्वारों से-नौ इन्द्रियों के विषयों से जागरुक रहता है, वह उनमें लिप्त नहीं होता और न ही उनका दुरुपयोग करके अपने ओजस्-तेजस् और वर्चस् को गँवाता है। अज्ञानान्धकार से प्रकाश में लाने का नाम ही नवरात्रि जागरण है। अनुष्ठान भी इसी अन्धकार को-अज्ञानता को नष्ट करने के लिये किया जाता है।
साधना क्षेत्र में श्रद्धा अपरिमित शक्ति चमत्कारी परिणाम प्राप्त करता है। कर्मकाण्डों की भरमार रहते हुए भी श्रद्धा के अभाव में साधनाएँ निष्फल रह जाती हैं।
साधना, गायत्री की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना कुण्डलिनी व षट्चक्र जागरण तथा प्राण प्रत्यावर्तन से लेकर चाँद्रायण कल्प साधनाएँ भी संपन्न करालीं। क्या यह एक असाधारण व असंभव मानी जाने वाली उपलब्धि नहीं है?
साधना ही आज महाकाल को हम सबसे अभीष्ट है।
साधना करने, साधन प्रदान करने से ऋग्वेद के अनुसार दुर्लभ रत्नों(धन, धान्य, संतति, सद्गति) की प्राप्ति होती है। ऐसा सुयोग महाभारत के बाद पहली बार बन सका है।
साधना द्वारा संभव हो सकेगा। सामाजिक उन्नति और प्रगति का लक्ष्य इन्हीं माध्यमों से प्राप्त हो सकेगा। इसी से धरती पर स्वर्गीय वातावरण का सृजन हो सकेगा।
साधनाओं, नय भाग्य विधान गढ़ने में समर्थ आध्यात्मिक प्रक्रियाओं की रचना की और उन्हें उच्चतर पुरुषार्थ कहा।
साधना पद्धति को सर्व श्रेष्ठ कहा जाता है ?
साधनाएँ भी संपन्न करालीं। क्या यह एक असाधारण व असंभव मानी जाने वाली उपलब्धि नहीं है?
साधना उस झंझट में नहीं पड़ती। इस वर्ष आश्विन नवरात्रि 27 सितम्बर से 5 अक्टूबर 92 की तारीखों में है।
साधना परायण आत्मायें अदृश्य प्रेरणाशक्ति से बरबस प्रेरित होकर आत्मकल्याण व लोक-मंगल के क्रियाकलापों में नियोजित होती और बहुमूल्य रत्न-राशि उपलब्ध कर कृतकृत्य बनता है। संधिकाल के इन अवसरों पर न केवल मानवी चेतना को प्रभावित करने वाली, वरन् अनुकूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बन जाती हैं। मनुष्य का चिन्तन ही नहीं, कर्म भी ऐसी दिशा विशेष में तनिक से प्रयास-पुरुषार्थ से बढ़ने लगता है जिसकी किसी को कभी संभावना नहीं होती। जो इस अवसर के पहचानते हैं वे कभी चूकते नहीं। आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनाते और साधना-पुरुषार्थ के लिए कटिबद्ध होते हैं।
साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। इसमें उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा है जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में 24 हजार का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। इसमें वाममार्गी साधनाओं जैसे मंत्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदे विधि-विधानों का झंझट भी नहीं रहता। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिए उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय-पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों।
साधना एवं संकल्पित अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि की प्रत्येक अहोरात्रि महत्वपूर्ण मानी जाती है और उन प्रत्येक क्षणों को साधक अपनी चेतना को परिष्कृत-परिशोधित करने-उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने में लगता है।
साधना है। इसमें उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा है जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में 24 हजार का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। इसमें वाममार्गी साधनाओं जैसे मंत्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदे विधि-विधानों का झंझट भी नहीं रहता। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिए उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय-पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों।
साधना-पुरुषार्थ के लिए कटिबद्ध होते हैं।
साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिए संधिका की नवरात्रिबेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधना के लिए आवश्यक प्रबल जिज्ञासा , सत्य निष्ठा और तपश्चर्या का भाव देखकर यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या ( कुण्डलिनी जागरण ) सिखाई , जिससे नचिकेता ने अमरत्व की शक्ति पाई।
साधनाएँ निष्फल रह जाती हैं।
साधना में ही लगा रहता है। आत्मिक आवश्यकताओं की बात भूल जाता है। व्यस्तता के दिनों में तो कुछ पता नहीं चलता, पर जब गंभीरतापूर्वक विचार किया जाता है कि आत्मा के साथ अन्याय बरता गया। यह भूल उस समय और भी अधिक स्पष्ट होती है जब मरण समय निकट आता है और परमात्मा के दरबार में जाने की तैयारी होती है। वहाँ मात्र एक ही प्रश्न पूछा जाता है कि विश्व का सबसे बड़ा अनुदान-मनुष्य जन्म, जिस प्रयोजन के लिए मिला था, उसका उपयोग सौंपे गये उत्तरदायित्वों के निर्वाह में हुआ या नहीं?
साधना का सुयोग बिठाते हैं। मानवी चेतना के परिमार्जन-परिशोध हेतु योग साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिए संधिका की नवरात्रिबेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधना नहीं। सुप्रसिद्ध मनीषी डब्लू. बी. कोनार लिखते हैं कि युग की विशेष प्रेरणाएँ प्रायः श्रद्धावान, भावनाशील अंतःकरणों को छू सकने में समर्थ होते हैं। दास प्रथा की करुण कहानी हैरियट स्टो ही सुना सकने में सफल हो सकीं, जब कि उनके पूर्व और उपरान्त में अनेकों लेखक कहानीकार कलाकार हुए हैं। किन्तु उन सभी में दासों के प्रति बरते गये अमानवीय अत्याचारों के प्रति संवेदनाएँ, सहानुभूति और आत्मीयता उतनी नहीं थी जितनी कि श्रीमती स्टो के संवेदनशील हृदय में।
साधना में लगे रहते हैं।
साधना आरंभ नहीं की थी । अतः यह पूर्व जन्म की ही साधना का फल है, यह बात स्वयं उन्होंने स्वीकारी है। आचार्य विनोबा कहा करते थे कि इससे पूर्व के जन्म में एक बंगाली परिवार में बंगाल में पैदा हुए थे। अपने सादा-सात्विक जीवन को वे इसी पिछले जन्म की कमाई मानते थे।
साधना उपचारों का विशेष स्थान है। ऐसी क्या विशेषता देव-संस्कृति में है कि भारतीय साधना पद्धति को सर्व श्रेष्ठ कहा जाता है ?
साधनात्मक प्रयास संकल्प बल के सहारे शीघ्र ही गति पाते व साधक का वर्चस् बढ़ाते चले जाते हैं। ऐसे अवसरों पर बिना किसी अतिरिक्त पुरुषार्थ के अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल जाता है। उस काल विशेष में किया गया संकल्प, अनुष्ठान, जप, तप, योगाभ्यास आदि साधक को सफलता के अभीष्ट द्वार तक घसीट ले जाता है। कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाता ऋषियों ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशिष्ट उभारों को दृष्टिगत रखकर ही ऋतुओं के इस मिलन काल की संधिवेला को “नवरात्रियों” की संज्ञा दी है। नवरात्रि पर्वों का साधना विज्ञान में विशेष महत्व है।
साधना पुरुषार्थ द्वारा इस सोये दैत्य भारत की क्षमताओं को जगाया जा सके तो आने वाले कुछ वर्षों में ही आस्था संकट मिटता व चारों ओर ऋतम्भरा प्रज्ञा का साम्राज्य छाया दिखाई देने लगेगा। दुर्गम हिमालय की ऋषि सत्ताएँ यही सब करने को आतुर भी हैं, परोक्ष जगत के ऋषि प्रयासों के साथ निमित्त बनने हेतु हम सभी का पुरुषार्थ जुड़ जाए तो इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य का, संस्कृति पुरुष का, कथन सार्थक-सत्य होता दिखाई पड़ेगा। यह युग साधना ही आज महाकाल को हम सबसे अभीष्ट है।
साधनायें करनी पड़ती हैं। इतने पर भी वह प्रकृति संकेतों की बारीकियों को पूर्णतया समझ पाने में समर्थ नहीं हो पाता।
साधना को नवरात्रि में विशिष्ट महत्ता प्राप्त है। इसमें प्रतिदिन 27 माला जप करने से नौ दिनों में पूरी हो जाती है। अनुष्ठान काल में नियत जप संख्या तो पूरी करनी पड़ती है साथ ही कुछ विशेष तपश्चर्यायें भी इन दिनों करनी पड़ती हैं। ब्रह्मचर्य व्रत-पालन, भोजन में उपवास तत्व का समावेश, तपस्वी जैसी मनःस्थिति जिसमें अपनी शरीर सेवा दूसरों से कम से कम करायी जाय, भूशयन, कम वस्त्र, नशे का, चमड़े का परित्याग जैसी तितिक्षायें और अन्त में अनुष्ठान की पूर्णाहुति ये-अनुष्ठान की सामान्य मर्यादायें हैं। इस प्रकार नवरात्रियों में अनुष्ठानों की विशेष तपश्चर्या की व्यवस्था बनाना पड़ती है।
साधना ही नवरात्रि के लिए सर्वश्रेष्ठ बतायी है। गायत्री परम सतोगुणी-शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का-आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्मकल्याण का मार्ग है। गायत्री साधकों को यही साधना इन दिनों करनी चाहिए।
साधना ही है। उसकी उपेक्षा करके न कोई भगवद् भक्त बन सकता ही है और न कर्तव्य, उत्तर दायित्वों के परिपालक का श्रेय अर्जित कर सकता है।
साधना पद्धतियों का अद्भुत समन्वित रूप देव-संस्कृति करती आयी है।
साधना विज्ञान में विशेष महत्व है।
साधना का फल है, यह बात स्वयं उन्होंने स्वीकारी है। आचार्य विनोबा कहा करते थे कि इससे पूर्व के जन्म में एक बंगाली परिवार में बंगाल में पैदा हुए थे। अपने सादा-सात्विक जीवन को वे इसी पिछले जन्म की कमाई मानते थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-May
साधना में भावनाओं का महत्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भावसूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है। भावसंवेदनाओं से भरपूर व्यक्ति असंख्यों को अपना बना लेते और सहयोग करने के लिए विवश कर देते हैं। वस्तुतः यह भावनाओं का ही खेल है। मनुष्य को एकता के सूत्र में बाँधने के अन्य प्रयत्नों की सफलता तब तक संदिग्ध ही बनी रहेगी जब तक कि भव संवेदनाओं की सहृदयता को विकसित करने की उपेक्षा होती रहेगी। मनुष्य जीवन का सौभाग्य और आनन्द सहृदयता-आत्मीयता के सहारे ही उपलब्ध होता है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में हमने एक कार्यक्रम सुपुर्द किया है कि इस तत्त्वज्ञान को घर-घर पहुँचाने का जिम्मा उठाइए। हम आपको बदले में इनाम देंगे । दौड़ लगा के दिखाइये, इनाम पाइए । नहीं साहब, वैसे ही दे दीजिए । नहीं मित्रों ! भगवान इस युग में जितनी भी देवात्माएँ हैं, उन्हें कुछ उपहार देना चाहता है।
साधनायें प्रायः इन्हीं दो केन्द्रों के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं।
साधना बहिरंग को सुव्यवस्थित कर बनाने के लिये है। लक्ष्य तक पहुँचने की यात्रा इन्हीं दो कदमों को अनवरत क्रम से उठाते रहने पर सम्पन्न होती है। उपासना का प्रतिफल है सुसंस्कारिता। साधना का प्रयोजन है-शालीनता इन्हीं दोनों को संस्कृति और सभ्यता कहते हैं। जीवन सम्पदा का स्तर उठाने और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने से ही मनुष्य व्यक्तित्ववान बनता है।
साधना जीवनयापन की चिन्तन एवं कर्मपरक पद्धति है। उपासना उच्चस्तरीय कक्ष का योगाभ्यास कहलाती है और साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।
साधनात्मक उपचारों में सन्निहित आत्म निर्माण के मर्म को जो जान लेते हैं
साधना के दोनों ही प्रयोग मिलकर इसी एक उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। ब्रह्मविद्या का तत्त्वदर्शन और धर्मानुष्ठानों का साधना प्रकरण इसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनीषियों द्वारा सृजा गया है।
साधना है।
साधना ही होती है।
साधना। उपासना में भजन-पूजन के संदर्भ में किये जाने वाले जप, ध्यान, प्राणायाम, हवन, कीर्तन आदि क्रिया-कृत्यों को करते हैं । साधना जीवनयापन की चिन्तन एवं कर्मपरक पद्धति है। उपासना उच्चस्तरीय कक्ष का योगाभ्यास कहलाती है और साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।
साधना के व्यापक परिणाम देखने में आ रहे हैं। जन-जन का उत्साह जागा है एवं एक विराट स्तर पर देवसंस्कृति बनाने की ललक जागी है। वस्तुतः शपथ समारोह परम पूज्य गुरुदेव द्वारा निर्दिष्ट आगामी दस वर्षों की कार्य प्रणाली के अंतर्गत श्रद्धाञ्जलि समारोह के बाद दूसरा मील का पत्थर है, जिसके द्वारा मानव मात्र, जो इस मिशन से जुड़ा है, की सदस्यता की थाह लेने का प्रयास किया जाएगा। मेले- समागम तो बहुत से होते हैं किन्तु उद्देश्यों की अस्पष्टता या उनके न होने से वे मात्र तमाशे बन कर रह जाते हैं, अपना समागम तमाशबीनों का हो हल्ला नहीं है अपितु विराट पुरुष को भारत-भूमि से उदित हो रही नूतन चेतना द्वारा दिया जा रहा आश्वासन है कि भारतीय संस्कृति-हिंदू संस्कृति विश्व मात्र का मार्गदर्शन आने वाली कई सदियों तक करेगी। इसी के लिए हम सब एक जुट होकर यह संकल्प ले रहे हैं।
साधना द्वारा अपने दृष्टिकोण, स्वभाव और व्यवहार में सुधार किया जाता है।
साधना कार्यक्रम की तैयारी में जुटे थे । संयोग से वसंत पंचमी भी साथ में होने से परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस भी साथ ही मनाया जा रहा था।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त अकाट्य है। प्रयास के साथ जुड़ी हुई उपलब्धि का प्रमाण, परिचय हर साधक कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है।
साधना है। इसके परम पुरुषार्थ माना गया है। अपने कुसंस्कारों से निरन्तर लड़ते रहना, जीवन क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों की फसल उगाना, पशुता को देवत्व में परिणत कर देना यही है साधना का का स्वरूप। विभिन्न पूजा उपचारों के द्वारा मनन, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग जैसे विचारमंथनों द्वारा आत्मशोधन की जो प्रक्रिया चलती है उसी को देखते हुये यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है।
साधना के निमित्त ली गयी इस शपथ को पूरा करने की प्रेरणा व शक्ति देती रहे।
साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है। अपवाद रूप में किसी को कोई दैवी अनुग्रह मिल भी जाय तो उसका परिणाम अंततः भस्मासुर, रावण, कुँभकरण, मारीच, कंस, हिरण्यकश्यप, आदि की तरह घोर विपत्ति के रूप में सामने आता है। फलित तो विभीषण, हनुमान जैसे सद्भाव सम्पन्न लोगों की साधना ही होती है।
साधना का उद्देश्य है। इस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलती है, वह उतना ही बड़ा संत होता है। आत्मकल्याण और लोक-कल्याण में समर्थ अति महत्वपूर्ण क्षमता ऐसे ही लोगों को उपलब्ध होती है पेड़ों के आकर्षण से बादल बरसते हैं। चुम्बक के खिंचाव से लौह कण खिंचते चले जाते हैं। फूल खिलता है तो उस पर मधुमक्खियों, तितलियों और भ्रमरों के झुण्ड मँडराते हैं।
साधना जैसा प्रतिफल प्राप्त करके धन्य हो गये।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के परिप्रेक्ष्य में युगशक्ति गायत्री के अवतरण की उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं की एवं मानव मात्र के कल्याण हेतु गायत्री के तत्त्वदर्शन की महत्ता का प्रतिपादन है। भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ है-गायत्री आज हम ज्यों ज्यों बीसवीं सदी के अंतिम दशक में कदम दर कदम आगे बढ़ रहे हैं, यह समग्र तत्त्वदर्शन उतना ही सामयिक और युगानुकूल होता चला जा रहा है, प्रस्तुत है-परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी।
साधना सिद्धि में परिणत भी होगी। तुम कैसे नियम भूल गए?” युवक की समझ में मर्म आ गया।
साधना यदि सही रीति से की जा सके तो वही अपने अमृत फलों से साधक को कल्पवृक्ष बना देता है। ईश्वर ने श्रम, समय, बुद्धि, प्रतिभा जैसी दिव्य सम्पदायें हर व्यक्ति को प्रचुर परिमाण में हर व्यक्ति को प्रचुर परिमाण में दी हैं। इनका सदुपयोग ही उस बुद्धिमत्ता का परिचायक है जिसे शास्त्रकारों ने “ऋतम्भरा “प्रज्ञा या ब्रह्म विद्या गायत्री कहा है। मानवी निर्माण की आवश्यकता नितान्त स्वल्प है। उपार्जन की क्षमता असीम है।
साधना का का स्वरूप। विभिन्न पूजा उपचारों के द्वारा मनन, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग जैसे विचारमंथनों द्वारा आत्मशोधन की जो प्रक्रिया चलती है उसी को देखते हुये यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है। अपवाद रूप में किसी को कोई दैवी अनुग्रह मिल भी जाय तो उसका परिणाम अंततः भस्मासुर, रावण, कुँभकरण, मारीच, कंस, हिरण्यकश्यप, आदि की तरह घोर विपत्ति के रूप में सामने आता है। फलित तो विभीषण, हनुमान जैसे सद्भाव सम्पन्न लोगों की साधना ही होती है।
साधना में भी किया जाता है। शरीर भी वीणा के समान है। यदि इसे समत्व स्थिति में रखोगे तो साधना सिद्धि में परिणत भी होगी। तुम कैसे नियम भूल गए?” युवक की समझ में मर्म आ गया।
साधना प्रकरण इसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनीषियों द्वारा सृजा गया है।
साधना में इतने सिद्ध हस्त हो गये थे कि प्रकृति के कण-कण से वे प्यार करने लगे और प्यार बाँटने लगे। उनकी सहृदयता से प्रभावित होकर वनस्पतियों को भी अपने गुण, कम, स्वभाव में परिवर्तन लाने को मजबूर होना पड़ा। उनके बगीचे में जो भी वृक्ष-वनस्पति हैं, उनसे वे पुत्रवत् आत्मीयता रखते हैं। इससे उनके बगीचे में काँटे रहित गुलाब उगते हैं और दिन में कुमुदिनी खिलती है। अख़रोट के वृक्ष जो 32 वर्ष में फल देने योग्य होते हैं, 17 वर्ष में ही फलने फूलने लगते हैं।
साधना कहते हैं। अपना प्रसुप्त अंतरंग ही सर्वसिद्धि-दाता देवता है। उसी को जगाने, प्रखर बनाने के लिये पूजा-उपचारों की विधि व्यवस्था शास्त्रकारों ने बनाई है। जो तथ्य को समझते हैं, भजन पूजन के साथ जुड़े रहस्यों को ढूँढ़ते हैं और अपनी कुसंस्कारिता को परास्त करने का पराक्रम करते हैं वे ही सच साधक हैं। साधनात्मक उपचारों में सन्निहित आत्म निर्माण के मर्म को जो जान लेते हैं
साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।
साधना का प्रयोजन है-शालीनता इन्हीं दोनों को संस्कृति और सभ्यता कहते हैं। जीवन सम्पदा का स्तर उठाने और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने से ही मनुष्य व्यक्तित्ववान बनता है। इसी विकास क्रम पर चलते हुये मनुष्य सामान्य आत्मा से अगली सीढ़ियाँ प्राप्त करता है। महामानव, ऋषि, देवदूत एवं अवतार बनने का सौभाग्य इसी मार्ग की मंजिल है।
साधना के अनुष्ठान का शुभारंभ कब से किस प्रकार किया जाय? इसका तरीका भी बहुत सुलभ है और मुहूर्त निकालना हो तो आज का दिन ही श्रेष्ठतम शुभारंभ है। विधान ऐसा है जिसमें कुछ खर्च करना नहीं पड़ता और किन्हीं ऐसे साधनों को जुटाना नहीं पड़ता जो कष्टसाध्य हों जिन्हें तलाशने कहीं अन्यत्र जाना पड़े ।
साधना॥
साधना उपक्रमों के साथ जुड़े हुये इस दिशा निर्धारण को जो समझते हैं और बिना हारे अनवरत प्रयास करते हैं उन्हें सिद्धि पुरुष होने का अवसर निश्चित रूप से मिलता है। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त अकाट्य है। प्रयास के साथ जुड़ी हुई उपलब्धि का प्रमाण, परिचय हर साधक कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है।
साधना-और पाण्डवों जैसी युग-परिवर्तन की आराधना॥
साधना का तात्पर्य है-अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। जंगली जानवरों को उपयोगी एवं पालतू और जंगली झाड़ियों को सुरम्य उद्यान के रूप में विकसित करने के लिये जो उपाय अपनाने पड़ते हैं, लगभग वही कुसंस्कारी व्यक्तित्व को संस्कारवान, शालीन बनाने के लिये भी कार्यान्वित करने होते हैं, यही साधना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-June
साधना पद्धतियों ने इस ईश्वर पुत्र के हृदय में इतना गहरा आकर्षण उत्पन्न किया कि वे सोलह वर्षों तक यहाँ के ब्राह्मणों और साधुओं के साथ रहे ।” नोट विक ने जिस गहरे सत्य की शोध की है उसका निष्कर्ष बहुतों को आश्चर्यजनक लग सकता है । पर संस्कृत साहित्य में संजोई विचार सम्पदा ने न जाने कितने यूरोपीय विद्वानों को इसके अध्ययन के लिए अपना जीवन समर्पित करने को विवश किया है । इस सर्वप्रचलित और बहुपरीक्षित तथ्य से सभी सहमत हैं ।
साधना की चर्चा परम पूज्य गुरुदेव ने की है जो गीता में बताए योगशास्त्र का व्यावहारिक प्रतिपादन है। अपनी क्रान्तिकारी लेखनी द्वारा वे हमें बताते हैं कि “तस्मात् योगी भावार्जुन” के द्वारा श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, नेति, धौति वाला योगी बनने को नहीं कहा वरन् अर्जुन को जीवन में उतरने वाला व्यावहारिक योग समझाया है। जीवन आदर्शों के साथ जुड़ जाय यही योग है। योगी वे होते हैं जो स्वयं तो बंधनों से मुक्त होते ही हैं, औरों को भी वह पथ दिखाते हैं।”
साधना में नियोजित कर देता है उसी के बारे में यह मानना चाहिए कि वह जीवनमुक्त है। बंधन सदा दुष्प्रवृत्तियों के होते हैं।”
साधना-इस कारण आवश्यक है-जिससे समाधि के क्षणों में मंत्र के गुह्यार्थ को जाना जा सके। परन्तु वेदों में उन मंत्रों की संख्या भी कम नहीं है, जो सामान्य जीवनक्रम में मार्गदर्शन करते मधुर और उदात्त भावों को उमगाते हैं। उदाहरण के लिए अथर्ववेद का एक अंश जिव्हा अग्रे........ भूयासं मधुसध्शं (अथर्व 1/34) मेरी जिव्हा के अग्र भाग में मधु हो, जिव्हा का मूल मधुर हो। मेरा निकलना और दूर-दूर तक जाना अर्थात् मेरा आचरण और व्यवहार मधुर हों। मैं वाणी से मीठा बोलूँ और मधुर बन जाऊँ, एक अन्य स्थान पर ऋषि अन्दर बाहर से एक बनने का निर्देश देता है “यदन्तरं तद् वाह्यं यद् बाह्यं तदन्तरम्” (अथर्व 2/30/4)।
साधनादि उपक्रम में मदद करते रहें । कितने ट्रक मिट्टी डाली गयी , इसकी कोई गिनती नहीं है । दायीं और शिवालिक बायीं ओर गढ़वाल हिमालय तथा बीच में गंगा नहीं के किनारे स्थित यह स्थान अपने रमणीक नैसर्गिक सौंदर्य के कारण नहीं अपितु इस स्थान की उस विशेषता के कारण चुना गया, जिसकी चर्चा कभी उनने अंतरंग क्षणों में इन पंक्तियों के लेखक से की थी । उनका कहना था कि “मैं ऐसा स्थान चाहता था, जहाँ की भूमि में तपस्या के संस्कार हों । ऐसी जगह आश्रम बनाना चाहता था जहाँ इतनी अधिक संख्या में पहले ही गायत्री मंत्र शक्ति की साधना संपन्न हो चुकी हो कि थोड़ा सा मानवी पुरुषार्थ और लगा देने पर वह जाग्रत-जीवन्त सिद्ध पीठ बन जाए ।
साधना पद्धतियों बनीं जिनमें भोगों से त्याग की प्रधानता थी।” यह कथा कितनी सत्य है, यह ज्ञात नहीं पर इस अलंकारिक प्रतिपादन से एक सत्य उभर कर आता है कि दो प्रकार की जातियाँ उपनिषद् कालीन समाज में थीं। एक आर्य, जिसके प्रतिनिधि थे इन्द्र देवसत्ताओं के प्रतिनिधि, संस्कारी पुरुष। दूसरी दस्यु जातियाँ अथवा अनार्य जातियाँ। इन्हीं को सुर व असुर कहा गया।
साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग की साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग कर्मयोग की साधना की चर्चा परम पूज्य गुरुदेव ने की है जो गीता में बताए योगशास्त्र का व्यावहारिक प्रतिपादन है। अपनी क्रान्तिकारी लेखनी द्वारा वे हमें बताते हैं कि “तस्मात् योगी भावार्जुन” के द्वारा श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, नेति, धौति वाला योगी बनने को नहीं कहा वरन् अर्जुन को जीवन में उतरने वाला व्यावहारिक योग समझाया है। जीवन आदर्शों के साथ जुड़ जाय यही योग है। योगी वे होते हैं जो स्वयं तो बंधनों से मुक्त होते ही हैं, औरों को भी वह पथ दिखाते हैं।”
साधना की पराकाष्ठा व मातृत्व का आदर्श है। चारों संतानों को उसने अपने ही ढाँचे में ढाल दिया। घोड़े पर सवार होकर घर से निकलकर गर्भस्थ शिशु की रक्षा करने वाली जीजाबाई ने ही संस्कृति रक्षक छत्रपति शिवाजी को उस योग्य बनाया। विश्ववंद्य बापू के संस्कारों की निर्मात्री अक्षर ज्ञान की दृष्टि से अशिक्षित किन्तु ईश्वर-निष्ठ उनकी माता थी।
साधनादि चुनने का अधिकार सबको दे दिया। जो जिस मार्ग से चाहे, परमात्मा के रूप को माने उसका ध्यान करे। अंततः वह आस्तिकतावादी तो बनेगा यह चिन्तन ऋषियों का रहा है। गुरु अपने शिष्य की रुचि व अधिकार के अनुसार उसे विभिन्न साधनों में से एक बतलाते आए हैं। एक ही गुरु के विभिन्न शिष्यों में कोई योगी कोई ज्ञान मार्गी, कोई भक्त, कोई वैष्णव, कोई शैव तथा कोई शाक्त कुछ भी बन सकता है।
साधना की सफलता का हेतु बनता है किन्तु यदि इनमें दोष उत्पन्न हो जाएँ इनके अर्थ को न समझते हुए उनके विकृत रूप का जीवन में समावेश हो तो यह मनुष्य के लिए विपत्ति का कारण बन सकता है। कैसे?
साधना में निरत हो सके तो अन्यान्य महामानवों की तरह लक्ष्य सिद्धि कर पूर्णता को प्राप्त हो सकता है। मौलिकता की महत्ता को समझते हुए अपने भीतर छिपे शक्ति के बीज की महत्ता को अंकुरित करते हुए कर्मयोग द्वारा हम सभी अपना विकास कर सकते हैं, ऐसी देव संस्कृति की मान्यता है। किसी भी महामानव ने किसी की नकल नहीं की। हाँ आदर्शों से प्रेरणा अवश्य ली। समर्थ रामदास की अपनी मौलिकता है तो विवेकानन्द की अपनी, अरविन्द की अपनी विशिष्टता है तो गाँधी जी की अपनी।
साधना की बात क्रान्तिधर्मी साहित्य के माध्यम से कही व जन-जल के मन को मथा उनके अनुसार आज का हमारा कर्म सामूहिक हो संस्कारों के जागरण हेतु-भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन हेतु-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन हेतु हमारा समग्र पुरुषार्थ नियोजित हो। परमात्मा यदि प्रसन्न होगा तो उसी से। उनका कहा है कि नवयुग आने वाला है। प्रतिकूलताएँ निरस्त होने वाली हैं। ऐसे परिवर्तन के क्षणों में हमें एकाकी अपने तक सीमित बने रहकर समाजनिष्ठ बनना चाहिए व सामूहिक चेतना के जागरण की आवश्यकता को समझना चाहिए।
साधना की ऊँचाइयों की पराकाष्ठा के स्तर का था। नारी को इस रूप में जब-जब भी भावभरा सम्मान मिला है, वह समाज, वह युग, सुख-शान्ति से भरा रहा है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता।” की उक्ति अकारण नहीं है।
साधना कर लेगा, वह आत्मिक क्षेत्र में तो प्रगति करेगा ही मानव मात्र के लिए एक श्रेष्ठ लोकसेवी बनने की प्रेरणा भी प्राप्त करेगा , मैंने यह आश्रम नहीं, चेतना जगत में हेरा-फेरी हेतु एक लैबोरेटरी बनायी है । तुम कभी आगे रिसर्च करो तो इसी विषय पर करना ।”
साधना” के शब्दों में आज की शोध प्रक्रियाएँ जिन्हें विज्ञान की विभिन्न शाखा-उपशाखाओं का समूह कह लें विश्लेषण करने में समर्थ बुद्धि की उपज है। देव संस्कृति के विभिन्न पक्षों की खोज के पीछे अन्तर्ज्ञान सम्पन्न संवेदनशील मन को ढूँढ़ा जा सकता है। आज के जीवन में यदा-कदा ऐसे अवसर आ जाते हैं जब पुरानी शोध को नवीन मूल्याँकन से गुजरना पड़ता है। परिणति आश्चर्यजनक ढंग से सुखद होती है। लेकिन पुरानी प्रक्रियाओं के खो जाने के कारण आधुनिक प्रयोगकर्ताओं को इस विवशता का सामना करना पड़ता है, कि ऋषि मुनि कहे जाने वाले शोध विज्ञानी यन्त्रों और बहुमूल्य प्रयोगशालाओं के अभाव में इन निष्कर्षों तक कैसे पहुँच सकें समस्या को सुलझा सकने में अक्षम बुद्धि को एक ही बात समझ में आती है कि इन सब तथ्यों को संयोग कहकर चुप्पी साध ले।
साधना’ पर विभोर होकर उन्हें मूर्ति का गौरव दिया। उनके द्वारा सौंपी ज्ञान की इस विरासत को हमारे हाथ लेने के लिए आतुर हो उठें, आँखें पढ़ने के लिए ललक उठें हृदय में उन सत्यों को स्वीकारने के लिए व्याकुलता, जग पड़े और समूचा जीवन इस सोऽहम् ज्ञान का महोत्सव बन जाय। हम सब को जो स्वयं को उनकी सन्तान मानते हैं यही कर्तव्य है।
साधनारत रहती हैं, वहीं सप्तर्षि मार्ग के पास आकर परम पूज्य गुरुदेव ने रुककर कहा कि इस भूमि के दाम बताइये । हम तो यही जमीन लेंगे । दलाल ने बहुत कहा कि “आप को और बहुत सो अच्छी जमीनें दिखाई हैं, उनमें से चुन लीजिए । यह तो ऐसी जमीन है जिसमें सतत् पानी चूता है । यहाँ धान भी मुश्किल से उगता है ।
साधना बन जाती है। संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव ने अपने महाप्रयाण से 2 वर्ष पूर्व अपनी लेखनी से इसी युगसाधना की बात क्रान्तिधर्मी साहित्य के माध्यम से कही व जन-जल के मन को मथा उनके अनुसार आज का हमारा कर्म सामूहिक हो संस्कारों के जागरण हेतु-भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन हेतु-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन हेतु हमारा समग्र पुरुषार्थ नियोजित हो। परमात्मा यदि प्रसन्न होगा तो उसी से। उनका कहा है कि नवयुग आने वाला है। प्रतिकूलताएँ निरस्त होने वाली हैं।
साधना की प्रेरणा हेतु ही होता है। ऐसी स्थिति में समष्टिगत कर्म-युगधर्म एक हो जाते हैं, उस समय विशेष की आवश्यकतानुसार स्वयं को समूह के साथ नियोजित करना। यही युगसाधना बन जाती है। संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव ने अपने महाप्रयाण से 2 वर्ष पूर्व अपनी लेखनी से इसी युगसाधना की बात क्रान्तिधर्मी साहित्य के माध्यम से कही व जन-जल के मन को मथा उनके अनुसार आज का हमारा कर्म सामूहिक हो संस्कारों के जागरण हेतु-भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन हेतु-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन हेतु हमारा समग्र पुरुषार्थ नियोजित हो। परमात्मा यदि प्रसन्न होगा तो उसी से।
साधना आवश्यक तत्व बताए गए हैं श्रद्धा की जरूरत इसलिए है कि अलंकारिक भाषा में कहे गए सत्यों को पढ़कर बुद्धि भ्रम में न पड़े। साधना-इस कारण आवश्यक है-जिससे समाधि के क्षणों में मंत्र के गुह्यार्थ को जाना जा सके। परन्तु वेदों में उन मंत्रों की संख्या भी कम नहीं है, जो सामान्य जीवनक्रम में मार्गदर्शन करते मधुर और उदात्त भावों को उमगाते हैं। उदाहरण के लिए अथर्ववेद का एक अंश जिव्हा अग्रे........ भूयासं मधुसध्शं (अथर्व 1/34) मेरी जिव्हा के अग्र भाग में मधु हो, जिव्हा का मूल मधुर हो। मेरा निकलना और दूर-दूर तक जाना अर्थात् मेरा आचरण और व्यवहार मधुर हों।
साधना के गुह्य प्रदेश की गहन अनुभूतियों का रोचक कथाओं में वर्णन है। ग्रन्थ की रोचकता इतनी अद्भुत है कि शायद ही कोई इसे एक बार हाथ में थामकर पूरा पढ़े बिना छोड़ सके। रानी चुडाला की कहानी, उद्दालक की कथा, सरघु की कथा, वीतहव्य का वृत्तांत, भास और विलास का संवाद विपश्चित की कथा पटधाना राजकुमारों की कथा जैसी ढेर की ढेर कथाओं में लुभावने ढंग से सृष्टि रहस्य मन की शक्तियाँ लोक-लोकान्तर के तत्व-गूढ़ दार्शनिकता का सरस निरूपण किया गया है।
साधना की कुञ्जी । इसी अभाव के कारण आधुनिक मन इसे आदिम, जंगली और अत्याधिक बर्बर समाज की स्तोत्र संहिता मान बैठा है। यूरोपीय पाण्डित्य ने इसे जंगली शान्तिकरण सम्बन्धी यज्ञ बलिदानों का जखीरा मानकर अपनी समझ के बौने पन का ढिंढोरा पीट दिया। देव भाषा संस्कृत ज्ञान से अनभिज्ञ सामान्य जन का इन हल्के प्रयासों से भ्रमित होना अस्वाभाविक नहीं है।
साधना के नाम पर चलने वाली हिंस्र और घृणास्पद पद्धतियाँ किसी से छुपी नहीं है। जगदम्बा की जीवन्त मूर्ति नारी को भोग की वस्तु मानना तो जैसे सामान्य बात है।”
साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग कर्मयोग की साधना की चर्चा परम पूज्य गुरुदेव ने की है जो गीता में बताए योगशास्त्र का व्यावहारिक प्रतिपादन है। अपनी क्रान्तिकारी लेखनी द्वारा वे हमें बताते हैं कि “तस्मात् योगी भावार्जुन” के द्वारा श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, नेति, धौति वाला योगी बनने को नहीं कहा वरन् अर्जुन को जीवन में उतरने वाला व्यावहारिक योग समझाया है। जीवन आदर्शों के साथ जुड़ जाय यही योग है। योगी वे होते हैं जो स्वयं तो बंधनों से मुक्त होते ही हैं, औरों को भी वह पथ दिखाते हैं।”
साधना संपन्न हो चुकी हो कि थोड़ा सा मानवी पुरुषार्थ और लगा देने पर वह जाग्रत-जीवन्त सिद्ध पीठ बन जाए । तुम जानते नहीं हो, इसीलिए शान्तिकुञ्ज की यह जगह चुनी है मैंने । यहाँ आकर एक बार यहाँ की हवा में भी जो श्वास ले लेगा, उसके कुसंस्कार नष्ट होंगे व वह धन्य हो जाएगा । जो यहाँ रहकर थोड़ी भी साधना कर लेगा, वह आत्मिक क्षेत्र में तो प्रगति करेगा ही मानव मात्र के लिए एक श्रेष्ठ लोकसेवी बनने की प्रेरणा भी प्राप्त करेगा , मैंने यह आश्रम नहीं, चेतना जगत में हेरा-फेरी हेतु एक लैबोरेटरी बनायी है । तुम कभी आगे रिसर्च करो तो इसी विषय पर करना ।
साधना की जानी चाहिए। मरने पर शरीर को सुरक्षित सुसज्जित किया जाना चाहिए। प्रलय तक आत्मा उसी में रहती है। जब अंततः सृष्टि प्रलय के समय नष्ट होगी तब कर्मों का निर्णय होगा। जबकि इन्द्र ने आत्मसत्ता के उत्कर्ष का प्रतिपादन किया व इसके लिए मानवधर्म का निर्धारण किया।
साधना बना लेता है तो वह उसके व्यक्तित्व को पूर्णता की दिशा में ले चलते वाला एक साधन बन जाते हैं। हर आदमी की स्वाभाविक रुचि व दायित्व भिन्न-भिन्न होते है। कमल का फूल कमल का ही रहेगा। यदि उसे गमले में लगा दें तो गुलाब का नहीं बन सकता। इसी तरह गुलाब का फूल अपनी जगह अपनी विशिष्टता लिये हैं वह पानी में डालने पर अस्तित्व खो बैठेगा।
साधना को जीवन में स्थान देना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अध्येता पूज्यवर सृष्टि को सोद्देश्य बताते हैं, मानव के प्रयोजन की विशिष्टता भी समझाते हैं व आज की परिस्थितियों में उसे उसका कर्तव्य भी सुझाते हैं।
साधना के रूप में उसी की वरिष्ठता को चरितार्थ होते देखा जाता है।”
साधना व्यक्ति यदि करे तो महामानव-देवमानव बनने की संभावनाएँ उसमें हैं वह बन सकता है। किन्तु कभी-कभी ऐसे समय आते हैं जब वैयक्तिक व सामूहिक कर्म एकाकार हो जाते हैं। अवतार का अवतरण जब भी होता है तो सामूहिक कर्म साधना की प्रेरणा हेतु ही होता है। ऐसी स्थिति में समष्टिगत कर्म-युगधर्म एक हो जाते हैं, उस समय विशेष की आवश्यकतानुसार स्वयं को समूह के साथ नियोजित करना। यही युगसाधना बन जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-November
साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले वे जप साधना कम कर पायें। जो इस तप साधना में भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले ही वे जप साधना कम कर पाये जो इस साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं।
साधना करने वाले व्यक्ति लाखों की संख्या में तैयार हो रहे हैं।
साधनाएं सम्पन्न की ओर अक्टूबर 1958 में 4 दिन का यज्ञ कर शरदपूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति दी। इस प्रयोग के बाद उनके प्रयोगों की श्रृंखला मन्द नहीं पड़ी। प्रज्ञा पुरश्चरण सूर्य ध्यान कल्प साधनाएं महायज्ञों की देशव्यापी श्रृंखला ऐसे ही अध्ययन और प्रयोग का परिणाम रहे हैं इनका उद्देश्य उन उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित कराना है जो ऐसे अवसरों पर देव शक्तियों से सुविधापूर्वक अर्जित की जा सकती है।
साधना से लेकर यज्ञ प्रक्रिया में भागीदारी का सुयोग्य प्रशिक्षण भी दिया। वे लिखते हैं कि यज्ञ में प्रयुक्त मंत्रोचार की प्रक्रिया ही अश्वमेध की सफलता का प्राण है।
साधनात्मक लहर तीव्रतर की जा रही है।
साधना शक्ति सम्पन्न सहज में देख समझ सकते है। इसका प्रत्यक्ष दर्शन 1999 के बाद सभी कर सकेंगे। अपने दैनिक जीवन में सूर्य की शांत स्थिति प्रातः और सन्ध्या के समय होती है। नवरात्रि भी इसी तथ्य को अपने में संजोए है। इन अवसरों पर साधना करने का विज्ञान सूर्य की भौतिक प्रकृति की खोज कर फल है जो पूर्णतया विज्ञान सम्मत है।
साधना ज्ञानार्जन ओर संयम में उनकी वृत्ति बढ़ेगी ऐसे लोग ही आगे चलकर विश्व का मार्गदर्शन करेंगे।
साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले ही वे जप साधना कम कर पाये जो इस साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं। पाश्चात्य विद्वान आर्थरकोयस्लर ने तो इसे परमाणु शक्ति से भी अधिक प्रबल एवं प्रभावकारी कहा है।
साधनाएँ करायी जाती हैं। यज्ञ के समय उन प्रतीकों की स्थापना जगह−जगह की जाती है, जिसे देखकर याजकों की श्रद्धा उमड़े। यज्ञ संसद भी अनुशासन एवं संचालन में श्रद्धा को लक्ष्य करके ही सारे कार्यों का सम्पादन करते−कराते हैं।
साधनाएं महायज्ञों की देशव्यापी श्रृंखला ऐसे ही अध्ययन और प्रयोग का परिणाम रहे हैं इनका उद्देश्य उन उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित कराना है जो ऐसे अवसरों पर देव शक्तियों से सुविधापूर्वक अर्जित की जा सकती है।
साधना एवं उसकी पूर्णाहुति से कितनी जबर्दस्त शक्ति प्रस्फुटित हुई? देव संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाने, असुर संस्कृति को मार भगाने के लिए एक जुट हुए देवत्व का शपथ समारोह कितना बृहत् ओर व्यापक था? जिस तरह प्राचीन काल में भगवती हारे हुए देवताओं की रक्षा का उद्घोष करती रही है, उसी तरह शपथ समारोह के अवसर पर ही देव संस्कृति दिग्विजय दशाश्वमेधों की घोषणा हुई। यहाँ से महाकाल के युग निर्माण संकल्प का उत्तरार्द्ध प्रारम्भ हुआ।
साधना में भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले ही वे जप साधना कम कर पाये जो इस साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं। पाश्चात्य विद्वान आर्थरकोयस्लर ने तो इसे परमाणु शक्ति से भी अधिक प्रबल एवं प्रभावकारी कहा है।
साधना एवं उसके निमित्त आहुतियों को ही प्रधानता दी जाती है।
साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं। पाश्चात्य विद्वान आर्थरकोयस्लर ने तो इसे परमाणु शक्ति से भी अधिक प्रबल एवं प्रभावकारी कहा है।
साधना द्वारा अंतःकरण में यज्ञीय भाव जाग्रत करने वाले भावनापूर्वक आहुतियाँ समर्पित करने वाले याजक होते हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ ही मनुष्य ही अधिकार क्षेत्र के अधिकार क्षेत्र में हैं यों अगर यह पुरुषार्थ व्यापक स्तर किया जाय तो देव अनुग्रह .....उसके साथ स्वभावतः जुड़ जाता है। इसलिये ..... प्रयोजनों के लिये स्थूल व्यवस्था से भी अधिक साधना पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है।
साधना की बात हुई। नये जुड़ने
साधनात्मक पुरुषार्थ पर से ध्यान हटने नहीं दिया जा सकता। यज्ञ को फलित करने के लिये सूक्ष्म जगत में अनुकूल शक्ति प्रवाह उत्पन्न करने के लिये साधनात्मक प्रयोगों को व्यापक ओर प्रखर बनाया जान आवश्यक है। यज्ञ के समस्त उपकरण उपलब्ध हो पर अरणि मंथन न किया जाये तो यज्ञाग्नि प्रकट कैसे हों? गाड़ी एम्बैसउरी दो ढाई लाख की पर उसमें दस रुपये लीटर वाला पेट्रोल ईंधन न डाला जाये तो ऊर्जा कैसे पैदा हो? इतने बड़े यज्ञ कृत्य के रक्षा कवच के लिये शास्त्रकारों ने जिस ऊष्मा की आवश्यकता अनुभव की उसके लिये व्यापक सावित्री अर्थात् गायत्री उपासना और विशेष अनुष्ठानों प्रावधान किया गया है।
साधनाएं सम्पन्न करने वाले प्रयोजकों, इस समूचे अश्वमेध अभियान को सेवायें देने वाले परिजनों, उनके सम्बन्धियों तथा सामान्य महिला पुरुष याजकों, अनुयाजकों के लिए यज्ञकुंडों की प्रथक व्यवस्था रखी गई है। देवपूजन के यजमान विशिष्ट लोग होंगे। इस सबके लिए आवश्यक जानकारियाँ परिपत्र, प्रवेशपत्र आदि के लिए शान्तिकुँज हरिद्वार और अलग−अलग उन स्थानों से संपर्क साधा जा सकता है, अयं यज्ञों देवया अयं मियेध। − ऋग्वेद 1/188/4
साधना तथा उसके प्रति आहुति प्रदान करने का भी विधान है। शतपथ ब्राह्मण का वह प्रकरण यहाँ दिया जा रहा है।
साधना कम कर पायें। जो इस तप साधना में भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले ही वे जप साधना कम कर पाये जो इस साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं।
साधना विज्ञान के आचार्यों का मत है कि मनुष्य की भावनाओं का भी सूर्य से घनिष्ठतम सम्बन्ध है। गैलीलियो ने इसी सूक्ष्म विज्ञान पर प्रकाश डालते हुये कहा था- दिखाई देने वाला सूर्य सम्पूर्ण है ही नहीं। वास्तविक सूर्य तो एक प्रकार की चेतना है जो सौर मण्डल के प्रत्येक परमाणु में प्रतिभासित हैं यही नहीं परमाणुओं पाये जाने वाले सौर बीज उतने ही शक्तिशाली और समर्थ है जितना स्वयं सूर्य। उस समय तो इन बातों की उपेक्षा की गई पर बाद में वैज्ञानिकों ने विस्तृत अध्ययन किया और अब तक जो कुछ जाना गया है उससे यह बात सिद्ध हो चुकी है कि मनुष्य पूर्णतया सूर्य पर आश्रित हैं उससे मानसिक सम्बन्ध स्थापित करके अनेक प्राकृतिक रहस्य और शक्तियां प्राप्त करने एवं आत्म विकास में प्रकाश पाने की विस्तृत खोज इस देश में गायत्री विद्या के नाम से हुई।
साधना का ही उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। सूर्य प्राण रूप है, तो गायत्री प्राणों का त्राण करने वाली दिव्य प्राण विधा है। शास्त्र मतानुसार गायत्री और सविता को परस्पर पूरक माना गया है।
साधना से जाग्रत मेधा महाप्रज्ञा अब गतिशील पराक्रम को सही दिशा प्रदान करने के लिए संकल्पित है। गतिशील प्रतिभा अपना पराक्रम युग प्रज्ञा के निमित्त ऋषि चेतना के निर्देशानुसार नियोजित करने का तत्पर है। अस्तु आश्वमेधिक अनुष्ठान का सफल प्रयोग एक बार पुनः राष्ट्र को गरिमा प्रदान करने के लिए किया जा रहा है।
साधना करने का विज्ञान सूर्य की भौतिक प्रकृति की खोज कर फल है जो पूर्णतया विज्ञान सम्मत है।
साधनात्मक प्रयोगों को व्यापक ओर प्रखर बनाया जान आवश्यक है। यज्ञ के समस्त उपकरण उपलब्ध हो पर अरणि मंथन न किया जाये तो यज्ञाग्नि प्रकट कैसे हों? गाड़ी एम्बैसउरी दो ढाई लाख की पर उसमें दस रुपये लीटर वाला पेट्रोल ईंधन न डाला जाये तो ऊर्जा कैसे पैदा हो? इतने बड़े यज्ञ कृत्य के रक्षा कवच के लिये शास्त्रकारों ने जिस ऊष्मा की आवश्यकता अनुभव की उसके लिये व्यापक सावित्री अर्थात् गायत्री उपासना और विशेष अनुष्ठानों प्रावधान किया गया है। इस निर्धारण को ध्यान में रखकर अधिकाधिक व्यक्तियों को यज्ञ के निमित्त गायत्री उपासना सविता साधना के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
साधना के अनुपात में मिलता है। जो साधकगण दिग्विजय अभियान अथवा यज्ञीय व्यवस्था क्रम में श्रम कर रहे है उनको इस तप साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले वे जप साधना कम कर पायें। जो इस तप साधना में भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले ही वे जप साधना कम कर पाये जो इस साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है।
साधना के लिये प्रेरित किया जा रहा है। उसी आधार पर याजक पंजीकृत भी किये जा रहे है सभी भावनाशीलों श्रद्धालुओं का इस हेतु सादर आमंत्रण है।
साधना को विशेष स्थान देना आवश्यक होता है। वर्तमान अश्वमेध श्रृंखला के अंतर्गत गाँव-गाँव, घर-घर जाकर जन-जन को उनकी क्षमतानुसार गायत्री उपासना करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। अश्वमेध यज्ञ के लिए अनिवार्य देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के क्रम में करोड़ों व्यक्ति दिव्यचेतना के अवतरण की पृष्ठभूमि बनाने के लिए गायत्री उपासना में संलग्न हो रहे हैं।
साधना के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
साधनाएँ भी कराई जाती थीं। इनका संचालन सिद्धों, समर्थों एवं विद्वान तत्वदर्शियों के हाथ हुआ करता था। “अश्वमेध” की एक परिभाषा−मानवीय बौद्धिक क्षमता को शक्तिशाली बनाए रखना भी होता है वह अध्यात्म से ही संभव है। सभी जानते हैं कि सूर, मीरा, नानकदेव, कबीर बहुत पढ़े नहीं थे। कबीर तो अनपढ़ थे पर उनके बोधात्मक साहित्य सृजन की व्याख्या करने में आज का योग्यतम बुद्धि कौशल भी समर्थ नहीं है।
साधना आसमान को हिला सकती है।
साधना पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है।
साधनातत्व के मर्मज्ञों के अनुसार कुछ विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट रीति से गायत्री उपासनाएं और यज्ञादि प्रक्रियाएं सम्पन्न की जाये तो उनसे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं आकर्षित किया जा सकता है उनसे न केवल अपने लिये वरन् समर्पण समाज राष्ट्र और विश्व के लिये सुख समृद्धि और शांति का अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है।
साधना के माध्यम से जब सूर्य के साथ स्वयं को जोड़ते है तो हमें उसके आध्यात्मिक लाभ स्वास्थ्य तेजस्विता मनस्विता के रूप में मिलते है। अश्वमेध प्रक्रिया का एक महान प्रयोजन मानव समाज को इस विद्या का ठीक ठीक ज्ञान देना है। ताकि धरती पर सुख शांति और समृद्धि का कोई अभाव न रहे। युग परिवर्तन की सन्धि और संक्रान्ति अवस्था में उन लोगों को अधिक श्रेय सम्मान मिलेगा, जो इस तत्व ज्ञान का अवगाहन कर सारे विश्व में इस आलोक को फैलाने का प्रयत्न करेंगे।
साधनागम्य इन रहस्यों की जो अनुभूति कर सकेंगे उन्हें अश्वमेध प्रक्रिया के प्रयोजन और
साधना कम कर पाये जो इस साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं। पाश्चात्य विद्वान आर्थरकोयस्लर ने तो इसे परमाणु शक्ति से भी अधिक प्रबल एवं प्रभावकारी कहा है।
साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं। पाश्चात्य विद्वान आर्थरकोयस्लर ने तो इसे परमाणु शक्ति से भी अधिक प्रबल एवं प्रभावकारी कहा है।
साधना करने वाले में सूर्य शक्ति का प्रवाह आने लगता है। विज्ञान का नियम है कि उच्चतर या अधिक शक्ति का प्रवाह निम्न स्तर अथवा कम शक्ति वाले केन्द्र की ओर तब तक बहता है जब तक दोनों समान न हो जायें। गायत्री से प्राप्त सिद्धियाँ इसी तादात्म्य की परिपक्व अवस्था ही हैं तब मनुष्य इसी भौतिक शरीर में सूर्य चेतना के समान सर्वव्यापी सर्वदर्शी और सर्व समर्थ हो जाता है। वह न केवल जलवायु लोगों के स्वास्थ्य मन की बातें जान लेने की सामर्थ्य पा लेता है बल्कि इससे भी अधिक सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियों ओर शक्तियों का स्वामी हो जाता हैं। इन सामर्थ्यों की व्यापकता इतनी अधिक है जिसका विवरण कुछ पंक्तियों में दे पाना सम्भव नहीं।
साधना के छोटे−छोटे लक्ष्य स्वीकार करने की नैष्ठिक घोषणा देव दक्षिणा के अंतर्गत आती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-August
साधना की, गहराई को अनुभव और उपलब्धियों को हस्तगत किया। ऋषियों के अनुभूत कोश स्पष्ट करते हैं कि विश्वव्यापी ब्रह्म चेतना के साथ मनुष्य का सघन और सुनिश्चित सम्बन्ध है। पर उसमें मल-विक्षेप आवरण जैसे अवरोधों ने एक प्रकार से विक्षेप जैसी स्थिति पैदा कर दी है। बिजली घर और कमरे के पंखे के बीच लगे तारों में यदि कहीं गड़बड़ी उत्पन्न हो जाय तो पंखा और बिजली दोनों के अपने-अपने स्थान पर रहते हुए भी सन्नाटा छाया रहेगा। मंत्र साधना इन शिथिल सम्बन्धों को पुनः प्रतिष्ठापित करने वाली सुनिश्चित पद्धति है।
साधनाएँ करना। सूर्य का ध्यान व गायत्री जप, नित्य शक्ति संचार हेतु प्राणायाम बस इतना भर तुम करते रहो व सबको बताते रहो। समय आने पर ग्रन्थि’-बेधन से लेकर चक्र जागरण, पंचकोशी साधना से लेकर कुण्डलिनी जागरण आदि पहले बतायी गयी मेरी समस्त साधनाएँ तुम्हारे लिए सरल होती चली जायेंगी। वैसे मैं यह सब लिखकर जा रहा हूँ सारी साधना पद्धतियों को मैंने समय के अनुसार बदलकर लिख दिया है किन्तु लोग इन्हें कर तभी पायेंगे जब सूक्ष्म जगत की ऋषि-सत्ताएँ ऐ सा चाहेंगी।”
साधना की प्रक्रियाएँ जहाँ ऋषियों के अनुभूतिकोश, योगशास्त्रों से ली जाती हैं। वहीं परीक्षण के आधुनिकतम बहुमूल्य यंत्रों की व्यवस्था है। पूज्य गुरुदेव देश-काल परिस्थितियों के मुताबिक साधनाक्रम में कहीं-कहीं व्यापक परिवर्तन भी निर्देशित किए हैं। जिनके प्रभावों की जाँच करने के लिए उन्हीं के निर्देश में नई-नई तकनीकें विकसित की गई हैं।
साधना के बूते लोकजीवन में स्वर्ग सृष्टि की। श्री रामकृष्ण परमहंस ने पचास वर्श की आयु में विशुद्ध तीस वर्श तप साधना में लगाए।
साधना बन जाते हैं। संत एकनाथ को रामेश्वर की तीर्थ यात्रा का पुण्य, प्यास से विकल गधे को गंगा जल पिलाने से मिल जाता है।
साधनाओं की क्रिया-प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया जाय। इस दृष्टि से देव संस्कृति में हिमालय की महत्ता का आदिकाल से गुणगान होता आया है।
साधना कर सकना-उस दिव्य स्तर तक जा पहुँच सकना-किसी के लिये भी सम्भव नहीं। कक्षाएँ उत्तीर्ण करके ही विद्यार्थी स्नातक की उपाधि पाते-उच्च पदाधिकारी बनते हैं। छलाँगें भौतिक जगत में कई क्षेत्रों में लगाई जाती हैं और सफल भी होती हैं, पर आत्मिक क्षेत्र में ऐसी सुविधा नहीं है। संचित दुष्कर्मों से विनिर्मित प्रारब्ध न केवल विपत्तियों-असफलताओं का त्रास देता है, वरन् उच्चस्तरीय प्रगति के पथ पर चलने में भी अनेकों विघ्न उपस्थित करता है। रास्ते में अड़ी इन चट्टानों को हटाने-सरकाने के लिए साहसपूर्ण पराक्रम करना होता है।
साधना-पद्धतियों को उनके प्रणेताओं ने जन्म दिया। सबका उद्देश्य एक ही-रहा है-मुक्ति, कैवल्य, विदेह मुक्ति, फुलफिलमेण्ट या सेल्फ एक्चुअलाइजेशन। चाहे वेदान्तिक हों, यौगिक हों अथवा ताँत्रिक गीता के परमभाव के रूप में परमसत्ता के भावातीत रूप को समझना ही साधना पद्धतियों का लक्ष्य रहा है। व्यावहारिक जीवन में साधक के व्यक्तित्व के संपूर्ण घटकों में परिपूर्णता को लाना-बौद्धिक, नैतिक, धार्मिक एवं कलात्मक हर पहलू को परिष्कृत करना, एक सर्वांगपूर्ण मानव को अव्यवस्था से व्यवस्था में बदलकर विनिर्मित करना ही हर साधना पद्धति का उद्देश्य रहा है।
साधना हेतु बलिदान व त्याग का अभ्यास तथा साधनात्मक कर्मकाण्डों (जप, ध्यान, प्राणायाम, देवपूजन, संध्या, अनुष्ठान आदि) के माध्यम से आत्मशिक्षण कर प्रसुप्त को जगाना-ये सब प्रक्रियाएँ तप के अंतर्गत आती हैं।
साधना प्रक्रिया भी डालने के लिए सक्रिय हुई है। इसका अर्थ, आर्य होना, सुसंस्कृत होने के बराबर समझा जाना चाहिए। यह महर्षि प्रयोगों का अति व्यापक और सुविस्तृत सामूहिक अनुष्ठान, उदय कालीन एक समय ध्यान-आदि अनेकों ऐसी गहन प्रक्रियाएँ हैं जिनके दुर्विचारों की प्रेरक आसुरी शक्तियाँ नष्ट होने के लिए विवश हैं। सामूहिक मन का परिशोधन अपने अन्तिम चरण में है। उन्होंने प्रारम्भ से लेकर अब तक साधना की जो प्रणालियाँ सुझाई हैं सबका उद्देश्य व्यष्टि का समष्टि में विलय माना जाना चाहिए।
साधना तथा सूर्य के ध्यान की फलश्रुतियों से लेकर अष्टाँग योग के विभिन्न सूत्रों को विस्तार से समझाया। फिर अचानक चुप होकर लेट गए व बोले कि “अभी वातावरण बनना है तब तुम लोग चह सब साधनाएँ करना। सूर्य का ध्यान व गायत्री जप, नित्य शक्ति संचार हेतु प्राणायाम बस इतना भर तुम करते रहो व सबको बताते रहो। समय आने पर ग्रन्थि’-बेधन से लेकर चक्र जागरण, पंचकोशी साधना से लेकर कुण्डलिनी जागरण आदि पहले बतायी गयी मेरी समस्त साधनाएँ तुम्हारे लिए सरल होती चली जायेंगी। वैसे मैं यह सब लिखकर जा रहा हूँ सारी साधना पद्धतियों को मैंने समय के अनुसार बदलकर लिख दिया है किन्तु लोग इन्हें कर तभी पायेंगे जब सूक्ष्म जगत की ऋषि-सत्ताएँ ऐ सा चाहेंगी।
साधनात्मक कर्मकाण्डों (जप, ध्यान, प्राणायाम, देवपूजन, संध्या, अनुष्ठान आदि) के माध्यम से आत्मशिक्षण कर प्रसुप्त को जगाना-ये सब प्रक्रियाएँ तप के अंतर्गत आती हैं।
साधना में वरिष्ठता-प्रमुखता दी गयी है।
साधना पद्धति में जन्म लेती दिखाई पड़ती है।
साधना बन सकी सिद्धि मिल सकी”।
साधना के इतिहास में हिमालय की ऊँचाई और गंगातट की पवित्रता का लाभ उठाने वाले साधकों की संख्या अत्यधिक है। ऐतिहासिक तीर्थ तो अन्यत्र भी हैं, पर आत्म-साधना के तीर्थों की संख्या जितनी इस क्षेत्र में है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं।
साधना के लिए गायत्री को अलंकारिक रूप में पाँच मुखों वाली बताया है तथा इस माध्यम से सूक्ष्म शरीर के पाँच कोशों की प्रसुप्त क्षमता को जगाने और इस महाविद्या का समुचित लाभ उठाने की बात कही गयी है। कायसत्ता की चेतन प्रयोगशाला में अनुसंधान करने वाले ऋषिगणों ने जीवात्मा के कायकलेवर को अपनी दिव्य दृष्टि से पाँच भागों में विभक्त माना है। ये हैं अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश अर्थात्-जखीरा, भण्डार, खजाना। सारी प्रसुप्त क्षमताएँ-अस्तित्व की पाँच भूमिकाएँ इनमें छिपी पड़ी हैं। कोश का एक अर्थ आवरण या पर्दा भी होता है।
साधना में एक चौथाई जन नेतृत्व में लगाया। आदि गुरु शंकराचार्य ने बीस वर्षों की ऐसी ही गहन साधना के बूते लोकजीवन में स्वर्ग सृष्टि की। श्री रामकृष्ण परमहंस ने पचास वर्श की आयु में विशुद्ध तीस वर्श तप साधना में लगाए।
साधना में जप, तप, ध्यान, प्राणायाम, बंध, मुद्रा आदि का प्रयोग करना पड़ता है। इसके राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, ऋतुयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, तत्वयोग आदि 84 योगों के आधार पर अनेकानेक व्यायाम क्रम बताये गये हैं साधक उन्हें अपनी परम्परा एवं पात्रता के अनुसार अपनाते हैं। इन सब साधनाओं में ज्ञान और कर्म से सम्मिश्रित तत्वयोग की साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। निश्चित ही यह साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।
साधना की बलवती सामर्थ्य ही है। चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में उसी के द्वारा श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति सम्भव है। दूसरे प्राणी न तो किन्हीं आदर्शों के प्रति समर्पित होना जानते न ही अन्तः प्रेरणा से स्वयं को मर्यादित अनुशासित करना । इन दायित्वों का बोध और निर्वाह ही इंसान की विशेषता हो सकती है। शील परमार्थ परायणता और कर्मठता से युक्त, चारित्रिक, भावनात्मक, वैचारिक, उत्कृष्टता का वरण ही मनुष्य संबा मानवी विशेषता को सार्थक करता है।
साधना उपक्रमों का स्वरूप ऐसा था कि सभी अपने योग्य साधनाएँ उचित मार्गदर्शक को माध्यम बनाकर सम्पन्न कर लिया करते थे। वैदिक युग की इस व्यवस्था में नर-नारी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यासी सभी अपने-अपने लिए साधना उपक्रम चुनकर देवोपम जीवन जीते थे। कालान्तर में विभिन्न साधना-पद्धतियों को उनके प्रणेताओं ने जन्म दिया। सबका उद्देश्य एक ही-रहा है-मुक्ति, कैवल्य, विदेह मुक्ति, फुलफिलमेण्ट या सेल्फ एक्चुअलाइजेशन। चाहे वेदान्तिक हों, यौगिक हों अथवा ताँत्रिक गीता के परमभाव के रूप में परमसत्ता के भावातीत रूप को समझना ही साधना पद्धतियों का लक्ष्य रहा है।
साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया। पर यहीं तो उनका ऋषि पक्ष उद्घाटित होता है। जो नये सूत्र चेतना जगत के क्षेत्र को दे, वह युग ऋषि नहीं तो और क्या है?
साधना जैसे गुह्य विषय संबंधी अनेकानेक भ्रांतियों का निवारण कर उनने वह कुहासा हटाया जो एक युग से इस साधना पर छाया हुआ था। एक अभूतपूर्व स्तर के ताँत्रिक के रूप में कुण्डलिनी शक्ति द्वारा प्रसुप्त का जागरण तथा व्यक्तित्व के परिष्कार में उसका सुनियोजन इस युगऋषि की विलक्षण स्थापना है। यह साधना सदा से ही व्यक्तिगत सिद्धियों के जागरण हेतु की जाती रही है । किन्तु इसे परम पूज्य गुरुदेव ने समष्टिगत मोड़ दिया। उनने कहा कि ब्रह्माण्ड-व्यापी सविता शक्ति का बीज-तत्व मानवी कायकलेवर में विद्यमान है ।
साधना में लगाए।
साधना का विधान पूर्णतः विज्ञान सम्मत भी है।
साधना के लिए भी ऐसे स्थान तलाश किये जाते हैं। आत्मिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए भी उपयोगी वातावरण मिल सके तो उसका विशेष लाभ होता है। तपस्वी पर्वतों की गुफाओं में निवास करने, कंदमूल जुटाने, वल्कल वस्त्र पहनने जैसे निर्वाह के साधन ढूँढ़ लेते हैं। धूनी जलाकर शीत निवारण की-लौकी, नारियल आदि के वर्तनों की-घास की चटाई बनाने की जैसी सुविधाएँ वहाँ मिल जाती हैं। तप-साधना के इतिहास में हिमालय की ऊँचाई और गंगातट की पवित्रता का लाभ उठाने वाले साधकों की संख्या अत्यधिक है।
साधना के द्वारा विश्वराष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण सम्पन्न किया। सामान्यतया कुण्डलिनी के नाम पर व्यक्तिगत अर्जन की बात सोची समझी जाती है। परन्तु युगावतार के जीवन में तो व्यक्तिगत शब्द जैसी कभी रही ही नहीं। उनके द्वारा किया गया यह प्रयोग पुरातन काल में विश्वामित्र द्वारा सम्पन्न हुआ था उस बार भी विश्व वसुधा का कायाकल्प हुआ था। इस बार भी वैसा ही होने जा रहा है ।
साधना के लिए समीप के वन में आ गए थे। वनवासियों का समुदाय उनके आश्रम पहुँचा।
साधना उत्तरकाशी में सम्पन्न हुई थी।
साधना के दौरान शाँतिकुँज में चली है वह अगले दिनों विराट रूप ले लेगी।
साधनाओं तक केन्द्रित थी। जनसामान्य से लेकर विशिष्ट कहे जाने वाले तक इसी के लिए प्रायः इच्छुक, प्रयत्नशील और व्यस्त रहते थे। जिस प्रकार निजी स्वार्थी लोग व्यक्तिगत रूप से धनवान-सम्पन्न बनने तक ही अपनी इच्छाओं को सीमित रखते हैं उसी प्रकार साधु, सन्त साधक भी स्वर्ग-मुक्ति की व्यक्तिगत उपलब्धियों, या कुछ विशिष्ट शक्तियों के संचय को ही अपना लक्ष्य बनाते रहे हैं । उनके ये क्रियाकलाप बाहर से कितने ही उत्कृष्ट लगें पर भिन्न-भिन्न स्वार्थपरक रुचियों के कारण इससे देव -मन को विखण्डित होना पड़ा है, जब कि असुरता अपनी समस्त दुष्प्रवृत्तियों के बावजूद परस्पर संगठित और एकात्म होने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में यदि देवसंस्कृति को अपन पुत्रों की वजह से पराजय का मुख देखना पड़ा तो आश्चर्य क्या ?
साधना का मार्ग बताती आयी है। प्राच्य अध्यात्म के अंतर्गत आने वाली सभी साधना पद्धतियों का एक ही लक्ष्य है जीव को ब्रह्म के समकक्ष बना देना, “जीवों ब्रह्मैव नापरः” की शक्ति को सार्थक करना , अनगढ़ मानव में निहित असीम संभावनाओं का द्वार खोल उसके देवमानव, महामानव-अवतारी पुरुष के रूप में विकसित होने का पथ प्रशस्त करना। मानवी चेतना का कायाकल्प करने वाली साधना उपचार प्रक्रिया को ब्रह्मविद्या के अंतर्गत दो भागों में बाँटा गया है- एक योग दूसरा तप। “योग” आस्था पक्ष से संबंधित है और “तप” क्रियापक्ष से। योग एक प्रकार से चिंतन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली साधना है जो अवाँछनीयता के पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों को छुड़ाने में आत्मसत्ता की मदद करती है।
साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना से विमुख होकर पराजित होकर मुझे फिर कहीं विश्राम मिल सकेगा? यह तो असम्भव है।
साधना का अवलम्बन लेकर सूक्ष्म प्रयोगों द्वारा उनमें हलचल उत्पन्न की जाती है तो इसके परिणाम तो और भी अद्भुत एवं रहस्यमय होंगे। अभी तक जितना भी कुछ वैज्ञानिक इस सम्बन्ध में जान पाए हैं, वह जानकारी अध्यात्म को विज्ञान सम्मत बनाने के पक्षधर विद्वत् जनों को उत्साहित करने में सफल रही है।
साधना विज्ञान के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो पता चलता है कि सफल साधकों में से अधिकाँश ने हिमालय में डेरा डाला और वहाँ अपना निर्माण कार्य सम्पन्न किया है। इसके कितने ही कारण रहे हैं। सामान्य धरातल से ऊंचे स्थानों का वायुमण्डल शीतल रहता है। सर्वविदित है कि नीचे स्थानों में गर्मी भी अधिक रहती है और ऊपर से गिरने वाले अवाँछनीय रज-कण भी अधिक जमते हैं। इस धूलि के साथ धुआँ जैसे प्रदूषण और विक्षोभकारी विचार भी उतरते बरसते हैं।
साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया। पर यहीं तो उनका ऋषि पक्ष उद्घाटित होता है। जो नये सूत्र चेतना जगत के क्षेत्र को दे, वह युग ऋषि नहीं तो और क्या है?
साधना करने लगे। बीच-बीच में कई डरावनी, लुभावनी, परीक्षायें होती रहीं। उनका धैर्य और साहस सुदृढ़ बना रहा। एक वर्श पूरा होते-होते ही भैरव प्रकट हुए और वरदान माँगने की बात कहने लगे।
साधना प्रमुख लाभ व्यक्ति को प्राण शक्ति उपलब्ध कराना है। प्रसुप्त अंतः शक्तियों का जागरण कर वह ब्रह्म तेज का संवर्धन करती है। देवी भागवत का सारा आख्यान, गायत्री की इसी महिमा से भरा पड़ा है। शास्त्रकार इस ग्रन्थ में कहता है-”ब्रह्मण्य तेजो रूपा च सर्व संस्कार रूपिणी पवित्र रूपा सावित्री वाँछतिह्यात्म शुद्धये”। अर्थात्- गायत्री ब्रह्मतेज रूप है।
साधनात्मक प्रयास उच्चस्तरीय व्यापक आदर्शों के लिए समर्पित होना निश्चित हुए। इस साधना का केन्द्र उन्होंने भगवान सूर्य को माना। सूर्य के बारे में अभी तक बहुत कुछ कहा सुना लिखा पढ़ा गया है। पर इन पंक्तियों में सिर्फ उन्हीं सन्दर्भों की चर्चा है जो लोक स्पर्श से अछूते और गुह्य रहे हैं।
साधना (1986) तथा राष्ट्र की देवात्म-शक्ति का कुण्डलिनी जागरण (1987) क्रमशः चले आने वाले वे विशिष्ट उपादान हैं, जिनसे इस साधक की महायात्रा का आभास मिलता है। अति कठिन शास्त्रोक्त साधना पद्धतियों को अति सरल बनाकर यज्ञ प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन कर उसे प्रगतिशील मोड़ देना एक असाधारण साधक स्तर के युगऋषि का ही कार्य हो सकता है।
साधना पद्धतियाँ कभी भिन्न-भिन्न समूहों में बँटकर कुछ पंथों तक सीमित रह गयी थीं, उन्हें जनसाधारण के नित्यकर्म का एक अंग बना देना, षट्चक्र जागरण-कुण्डलिनी जागरण ग्रन्थिभेदन जैसी प्रक्रियाओं को अति सरल रूप में एक गायत्री साधना रूपी वटवृक्ष के नीचे लाकर खड़ाकर प्रतिपादित कर देना एक ऋषि स्तर के व्यक्ति का काम है। चौथी बार की हिमालय यात्रा (1971-1972) के बाद आने पर प्राण प्रत्यावर्तन साधना के द्वारा प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान जैसी प्रक्रिया आरंभ करना जिसमें खेचरी मुद्रा, सोऽहम् साधना, ज्योति अवतरण की बिन्दु साधना, नादयोग की साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की।
साधनाएँ अभी सर्व-सामान्य की जानकारी से अछूती हैं। निकट भविष्य में अखण्ड-ज्योति के पृष्ठ इन गुह्य और गहन पर्तों को खोलने वाले सिद्ध होंगे। लोक जीवन उनके तंत्र उद्धारक स्वरूप से परिचय प्राप्त कर सकेगा।
साधना है जो अवाँछनीयता के पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों को छुड़ाने में आत्मसत्ता की मदद करती है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा उस परिष्कृत मनःस्थिति का नाम है जो ज्ञान साधना से प्राप्त होती है। योग का अर्थ है जोड़ देना-आत्मा को परमात्मा से। परमात्मा यहाँ व्यक्ति नहीं शक्ति है -उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं-आकाँक्षाओं के समुच्चय के रूप में । आत्म साक्षात्कार का अर्थ यही है कि अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की हो जाएँ, संवेदना इतनी उच्चस्तरीय हो जाय कि सब ओर अपनी ही आपा बिखरा दिखाई देने लगे।
साधना बनती है और न प्रतिक्रिया उत्पन्न होती हैं । अतएव ‘शब्द के साथ ताप’ शक्ति का समावेश भी होना चाहिए। अर्थात् गायत्री उपासना में अग्निहोत्र को भी जुड़ा रहना चाहिए। होता भी यही है। अनुष्ठानों की पूर्णाहुति यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होती है।
साधना है) तथा तुरंत आते ही युग निर्माण योजना को जन्म देकर जन-जन को पंचकोशी साधना द्वारा साधना पथ पर एक ऊँचे सोपान पर चल पड़ने को प्रेरित किया। सामान्यतया नारी शक्ति से तप के स्थान पर भाव प्रधान अपेक्षाएँ की जाती रही हैं किन्तु युगऋषि ने एक विराट नारी समुदाय को भी इस कठोर साधना का भागीदार बनाया, पंचकोशी साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना की चल रही थी। साधना का प्रसंग चलने पन लौकिक जीवन में कभी भी गहराई तक उसका विवेचन न करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने उस चर्चा के दौरान गुह्य प्रसंगों पर पड़े आवरण को हटा दिया। विगत हजारों वर्षों से चली आ रही साधना पद्धतियों की एक समीक्षा कर उनने प्रायः डेढ़ घण्टे तक ध्यान प्राणायाम से लेकर पंच तन्मात्राओं की साधना तथा सूर्य के ध्यान की फलश्रुतियों से लेकर अष्टाँग योग के विभिन्न सूत्रों को विस्तार से समझाया। फिर अचानक चुप होकर लेट गए व बोले कि “अभी वातावरण बनना है तब तुम लोग चह सब साधनाएँ करना। सूर्य का ध्यान व गायत्री जप, नित्य शक्ति संचार हेतु प्राणायाम बस इतना भर तुम करते रहो व सबको बताते रहो।
साधना पद्धति से लेकर समाज व्यवस्था में युगानुकूल नूतन निर्धारण कर डाले व एक विराट समुदाय को उनका पालन करने को विवश कर दे। ऋषि वह जो आत्मसत्ता रूपी प्रयोगशाला में गहन अनुसंधान कर मानवमात्र के लिए चेतना जगत संबंधी कुछ ऐसे सूत्र दे जिनसे तत्कालीन समाज की मनःस्थिति चमत्कारी ढंग से बदलती देखी जा सके।
साधना से जोड़ दिया।
साधना में उनने अपने सहचरों को अनुयायियों को नियोजित कर दिया जिससे उनका अचेतन, जन्म-जन्मान्तरों से संचित प्रारब्धों की शृंखला का क्रम परिष्कृत व्यवस्थित होता चले। इतना बन पड़ने पर पवित्र मन वालों का समष्टिगत आधार विकसित होगा तो चेतना जगत में इनकी सामूहिक साधना निश्चित ही व्यापक परिवर्तन लाएगी ऐसा उनका विश्वास था। प्रज्ञा पुरश्चरण प्रातःकाल का सामूहिक तीन शरीरों का महाकाल के घोंसले के रूप में शाँतिकुँज को मानते हुए नित्य वहाँ पहुँचने की ध्यान-धारणा, स्वर्ण जयन्ती साधना, शक्ति−संचार साधनादि उपक्रम उसी कड़ी के अंग हैं।
साधना का केन्द्र उन्होंने भगवान सूर्य को माना। सूर्य के बारे में अभी तक बहुत कुछ कहा सुना लिखा पढ़ा गया है। पर इन पंक्तियों में सिर्फ उन्हीं सन्दर्भों की चर्चा है जो लोक स्पर्श से अछूते और गुह्य रहे हैं।
साधनाएँ तुम्हारे लिए सरल होती चली जायेंगी। वैसे मैं यह सब लिखकर जा रहा हूँ सारी साधना पद्धतियों को मैंने समय के अनुसार बदलकर लिख दिया है किन्तु लोग इन्हें कर तभी पायेंगे जब सूक्ष्म जगत की ऋषि-सत्ताएँ ऐ सा चाहेंगी।”
साधना है। वाममार्गी साधना जो तंत्र प्रधान है वह सावित्री साधना कहलाती है।
साधना पर छाया हुआ था। एक अभूतपूर्व स्तर के ताँत्रिक के रूप में कुण्डलिनी शक्ति द्वारा प्रसुप्त का जागरण तथा व्यक्तित्व के परिष्कार में उसका सुनियोजन इस युगऋषि की विलक्षण स्थापना है। यह साधना सदा से ही व्यक्तिगत सिद्धियों के जागरण हेतु की जाती रही है । किन्तु इसे परम पूज्य गुरुदेव ने समष्टिगत मोड़ दिया। उनने कहा कि ब्रह्माण्ड-व्यापी सविता शक्ति का बीज-तत्व मानवी कायकलेवर में विद्यमान है ।
साधना की प्रक्रिया अपने परिणाम में संस्कृति निखारने लगती है। जड़ वस्तुएँ हों, या चेतन प्राणी प्रकृतितः वे अनगढ़ होते हैं। उन्हें गढ़ने, सुघड़, सुन्दर, प्रकृष्ट, उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयास करने होते हैं। अनायास ही उनका संस्कार सम्पन्न सुसंस्कृत-समुन्नत हो सकना सम्भव नहीं होता । वस्तुएँ या धातुएँ पकाई गलाई ढाली खरीदी जाती हैं और संशोधन संस्कार की इस सुदीर्घ प्रक्रिया द्वारा ही वे सुन्दर उपयोगी बन पाती हैं।
साधना के तीर्थों की संख्या जितनी इस क्षेत्र में है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं।
साधना हिमालय में पुनः 1960-61 में की (जो उनकी चौबीस लक्ष की चौबीस महापुरश्चरणों के बाद की साधना है) तथा तुरंत आते ही युग निर्माण योजना को जन्म देकर जन-जन को पंचकोशी साधना द्वारा साधना पथ पर एक ऊँचे सोपान पर चल पड़ने को प्रेरित किया। सामान्यतया नारी शक्ति से तप के स्थान पर भाव प्रधान अपेक्षाएँ की जाती रही हैं किन्तु युगऋषि ने एक विराट नारी समुदाय को भी इस कठोर साधना का भागीदार बनाया, पंचकोशी साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना की जो प्रणालियाँ सुझाई हैं सबका उद्देश्य व्यष्टि का समष्टि में विलय माना जाना चाहिए। इनमें युग ऋषि की ओर हिमालय की दिव्य सत्ताओं की ओर स्वयं को खोलना होता है।
साधनाओं में तो उपयुक्त वातावरण की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कवि, कलाकार, शोधकर्त्ता, विद्यार्थी आदि बुद्धि कर्मियों के लिए एकाग्रता-पूर्वक अपने काम करने पड़ते हैं इसके लिए उन्हें विक्षोभ रहित एकान्त चाहिए। ठीक इसी स्तर का अति महत्वपूर्ण कार्य आत्म-निर्माण एवं आत्म-परिष्कार का भी है। इसके लिए वातावरण की अनुकूलता चाहिए। विक्षोभकारी वातावरण में कर्मकाण्ड तो हो सकते हैं।
साधना के माध्यम से संपन्न होता है तथा जिस प्रकार से मनःक्षेत्र पर छाए अवसाद- कुण्ठाएँ-हीनता-विक्षुब्धता आदि मनोविकारों का शमन इन आध्यात्मिक अवलम्बनों के माध्यम से होता है उतना संभवतः कोई और माध्यम से किसी अन्य साधना पद्धति में नहीं देखा जाता। अध्यात्म क्षेत्र में प्राण की परिभाषा चेतना की बलिष्ठता के रूप में की गयी है। प्राण से ऋषियों का तात्पर्य जीवात्मा की उस आँतरिक क्षमता से है जो शरीर में ओजस, चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं में वर्चस् नाम से जानी जाती है। इस अंतरु “अतः क्षमता को -आत्म शक्ति को -प्राणतत्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने हेतु जीवन का अधिकतम आनन्द लेने हेतु गायत्री महाशक्ति का आश्रय लेने की बात ही श्रुति कहती है।
साधनाएँ सम्पन्न कीं। उनके द्वारा लिखा गया सौंदर्य लहरी नामक ग्रन्थ तंत्र ग्रन्थों में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। इसकी पैंतीस टीकाएँ प्राप्त हैं जिसमें लक्ष्मीधर टीका उत्तम मानी गई है।
साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना कुण्डलिनी जागरण की विधि, व्यवस्था, शिव शक्ति का संगम यहीं बन पड़ता है। मानव के भाव पक्ष को उभारने एवं उसे महामानव-अतिमानव बनाने का पुरुषार्थ यहीं सम्पन्न होता है। भक्ति और शक्ति के समन्वय का प्रतीक आनन्दमयकोश बहुत कुछ रहस्यों को अपने अन्दर समाए हुए हैं।
साधना क्षेत्र में पृथ्वी और सूर्य का संयोग कहते हैं। कुण्डलिनी साधना इसी केन्द्र बिन्दु पर पहुँचने की चेष्टा को कह सकते हैं।
साधनाएँ सम्पन्न कर मानव मन के विक्षोभों के शान्त कर सुप्त देवत्व को जाग्रत करने की पृष्ठभूमि तैयार की है। लेकिन बाह्य प्रकृति के विक्षोभ जो प्रदूषण महामारी, खनिजों के घटने, सौर-कलंक, ओजोन की परतों के टूटने के रूप में प्रकट हो रहे हैं उनका क्या किया जाय ? समूची प्रकृति आज क्षुब्ध एवं क्रुद्ध है। उसी का क्रोध-अकाल, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि बनकर बरस रहा है। मौसम का क्रम अस्त व्यस्त है।
साधना से नष्ट हुए हैं। अब आप नये सिरे से फिर उसी उपासना को करें। संचित प्रारब्ध की निवृत्ति हो जाने से आपको अब के प्रयास में सफलता मिलेगी।
साधनाकृत अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न कर सकने में सफल हो नहीं पाते। अस्तु यह आवश्यकता सदा से अनुभव की जाती रहीं है कि आत्मोत्कर्ष की-साधनाओं की क्रिया-प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया जाय। इस दृष्टि से देव संस्कृति में हिमालय की महत्ता का आदिकाल से गुणगान होता आया है।
साधना माना गया है। इसी समूचे सत्ता क्षेत्र को त्रिपदा गायत्री की परिधि कहा गया है।
साधना से सम्भव न था और सामूहिक मन पर इसके परिणाम के रूप में विश्व के कर्णधार यह मानने के लिए विवश होंगे कि वर्तमान गठन अनुपयुक्त है। उसके स्थान पर नित नवीन का कलेवर धारण करना पड़ रहा है। उनके मस्तिष्क कुछ ऐसा ताना-बाना बुनेंगे जिसमें विश्व की एकता का व्यवहार में व्यापक उथल-पुथल की अनुभूत की जा सकेगी। समूचा विश्वचिंतन ऐसी उलट-फेर से भर जाएगा जिसे आज की तुलना में शीर्षासन की संज्ञा दी जा सके।
साधना का अवलम्बन ही त्रिदेवों से लेकर अवतारी सत्ताओं, ऋषि मुनिगणों से लेकर सामान्य नर-नारियों ने लिया तथा अपना प्रगति पथ प्रशस्त किया है। गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। त्रिपदा अर्थात् तीन पद-तीन चरण वाली। तीन शरीर, तीन लोक , तीन ग्रन्थियाँ, तीन गुण, त्रैत ब्रह्म, तीन देव तथा तीन ही शक्तियों का विस्तार इस सृष्टि में माना और उसका विवेचन किया जाता है। इन तीनों की ही व्याख्या त्रिपदा के तीन चरणों में विस्तार से मिलती है ।
साधना पद्धति का सुनियोजित निर्धारण किया। साधना द्वारा परमतत्व की प्राप्ति का मार्ग बताकर योग−साधकों को योगामृत संजीवनी प्रदान की। नाथ सिद्धों की वाणियाँ सीधे सरल शब्दों में लिखी गयीं व उनसे इस साधना के परिष्कृत रूप को जन्म लेने में मदद मिली। घेरण्ड संहिता व गोरक्ष संहिता आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ इसी समय के हैं।
साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गये।
साधना के महात्म्य से भरा पड़ा है-
साधना जो तंत्र प्रधान है वह सावित्री साधना कहलाती है।
साधना का स्वरूप और उसकी सफलता समष्टि के विधानों में परिवर्तन करने की शक्ति प्राप्त करना तथा ऐसे हस्तक्षेप करना नहीं है। तुम भटक गए हो अपने मार्ग से।”
साधना में वर्ष बीतने लगे।
साधना के नाम पर होती देखी जा सकती हैं। तब क्या इन्हीं की बदौलत वैदिक ऋषि चमत्कारी सामर्थ्य हस्तगत करने देवोपम संस्कृति का निर्माण करने में सफल हुए ? मनीषी ओल्डेन वर्ग के चिन्तनकोश ‘वैदिक सेज एण्ड हिजे कल्चरे’ के पृष्ठों में इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में मिलता है-नहीं उनके अनुसार भभसाधना कर्म के तत्व का ज्ञान और उसकी सामर्थ्य का सही सुनियोजन है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी को योगः कर्मसु कौशलम्य कहकर सूत्र बद्ध करते हैं।
साधना सदा से ही व्यक्तिगत सिद्धियों के जागरण हेतु की जाती रही है । किन्तु इसे परम पूज्य गुरुदेव ने समष्टिगत मोड़ दिया। उनने कहा कि ब्रह्माण्ड-व्यापी सविता शक्ति का बीज-तत्व मानवी कायकलेवर में विद्यमान है । साधना प्रयोजनों द्वारा सामूहिक रूप से उस बीज को प्रसुप्ति से जाग्रति में लाकर साधक के “स्व” को “असीम” में बदला जा सकता है। इस माध्यम से उनने कल्पना की , कि विश्व की कुण्डलिनी जागरण की जो प्रक्रिया उनकी सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान शाँतिकुँज में चली है वह अगले दिनों विराट रूप ले लेगी।
साधना कर्म के तत्व का ज्ञान और उसकी सामर्थ्य का सही सुनियोजन है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी को योगः कर्मसु कौशलम्य कहकर सूत्र बद्ध करते हैं।
साधना पद्धतियों को मैंने समय के अनुसार बदलकर लिख दिया है किन्तु लोग इन्हें कर तभी पायेंगे जब सूक्ष्म जगत की ऋषि-सत्ताएँ ऐ सा चाहेंगी।”
साधनाओं के माध्यम से स्थान-स्थान पर प्रतिपादित की।
साधनाएँ उचित मार्गदर्शक को माध्यम बनाकर सम्पन्न कर लिया करते थे। वैदिक युग की इस व्यवस्था में नर-नारी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यासी सभी अपने-अपने लिए साधना उपक्रम चुनकर देवोपम जीवन जीते थे। कालान्तर में विभिन्न साधना-पद्धतियों को उनके प्रणेताओं ने जन्म दिया। सबका उद्देश्य एक ही-रहा है-मुक्ति, कैवल्य, विदेह मुक्ति, फुलफिलमेण्ट या सेल्फ एक्चुअलाइजेशन। चाहे वेदान्तिक हों, यौगिक हों अथवा ताँत्रिक गीता के परमभाव के रूप में परमसत्ता के भावातीत रूप को समझना ही साधना पद्धतियों का लक्ष्य रहा है।
साधना के नाम से बताए गए इस प्रयोग का उद्देश्य मनुष्य मात्र की आन्तरिक प्रकृति और बाह्य प्रकृति की अस्त-व्यस्तता को सुधारना-सँवारना रहा है। इसे तंत्र का उत्कृष्टतम प्रयोग कहा जा सकता है। जिसकी परिणति विश्व राष्ट्र की कुण्डलिनी के रूप में सामने आयी।
साधना गायत्री साधना है। आदिकाल से जब इस सृष्टि की उत्पत्ति अपौरुषेय वाणी के माध्यम से हुई है, गायत्री साधना का अवलम्बन ही त्रिदेवों से लेकर अवतारी सत्ताओं, ऋषि मुनिगणों से लेकर सामान्य नर-नारियों ने लिया तथा अपना प्रगति पथ प्रशस्त किया है। गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। त्रिपदा अर्थात् तीन पद-तीन चरण वाली। तीन शरीर, तीन लोक , तीन ग्रन्थियाँ, तीन गुण, त्रैत ब्रह्म, तीन देव तथा तीन ही शक्तियों का विस्तार इस सृष्टि में माना और उसका विवेचन किया जाता है।
साधना मुझे ज्ञात नहीं।”
साधना के वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा शरीरगत अपरा प्रकृति की प्रचण्ड शक्तियों का उद्भव किया जा सकता है। इसी को योगियों के दिव्य कर्तव्य के रूप में देखा जा सकता है। अलौकिकतायें-सिद्धियाँ चमत्कार एवं असाधारण किया कृत्यों की जो क्षमता साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती हैं उसे शरीरगत अपरा प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और उस निर्झर का मूल उद्गम जननेन्द्रिय मूल-कुण्ड कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।
साधना का, सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी । पृथ्वी अर्थात्-भौतिक सम्पदा-अहंता-सूर्य अर्थात् आत्मिक सत्ता-ब्रह्म चेतना इन दोनों को जो जितना जोड़ सकता है उसे कुण्डलिनी जागरण के साथ जुड़ी विभूतियाँ मिलती हैं। स्वार्थ को परमार्थ से जोड़ने का, शारीरिक वासनाओं को आत्मिक उल्लासों में घुला देने का नाम ही आत्म समर्पण है।
साधना क्या ? जिज्ञासुओं का यह प्रश्न अस्वाभाविक होने पर असाधारण तो है ही। इसका उत्तर संकेत में ही समझ कर सन्तुष्ट हो जाना चाहिए। पौराणिक आख्यान के अनुसार ब्रह्माजी की दो पत्नियाँ हैं गायत्री और सावित्री । इस अलंकारिक भाषा के तत्व अपरा प्रकृति समझा जाना चाहिए।
साधना, सूर्य का ध्यान, प्राण
साधना उपक्रम चुनकर देवोपम जीवन जीते थे। कालान्तर में विभिन्न साधना-पद्धतियों को उनके प्रणेताओं ने जन्म दिया। सबका उद्देश्य एक ही-रहा है-मुक्ति, कैवल्य, विदेह मुक्ति, फुलफिलमेण्ट या सेल्फ एक्चुअलाइजेशन। चाहे वेदान्तिक हों, यौगिक हों अथवा ताँत्रिक गीता के परमभाव के रूप में परमसत्ता के भावातीत रूप को समझना ही साधना पद्धतियों का लक्ष्य रहा है। व्यावहारिक जीवन में साधक के व्यक्तित्व के संपूर्ण घटकों में परिपूर्णता को लाना-बौद्धिक, नैतिक, धार्मिक एवं कलात्मक हर पहलू को परिष्कृत करना, एक सर्वांगपूर्ण मानव को अव्यवस्था से व्यवस्था में बदलकर विनिर्मित करना ही हर साधना पद्धति का उद्देश्य रहा है।
साधना (1981-82) अति प्रचण्ड सूक्ष्मीकरण साधना (1984-85) पंचवीर भद्रों के जागरण की सावित्री साधना (1986) तथा राष्ट्र की देवात्म-शक्ति का कुण्डलिनी जागरण (1987) क्रमशः चले आने वाले वे विशिष्ट उपादान हैं, जिनसे इस साधक की महायात्रा का आभास मिलता है। अति कठिन शास्त्रोक्त साधना पद्धतियों को अति सरल बनाकर यज्ञ प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन कर उसे प्रगतिशील मोड़ देना एक असाधारण साधक स्तर के युगऋषि का ही कार्य हो सकता है।
साधना के इन प्रभावों की अनुभूति इस सदी के अन्त तक भली प्रकार की जा सकेगी। तंत्र का पुनरुद्धार करने वाले युग ऋषि साधकों का मार्गदर्शन करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। उन्हीं के शब्दों में किसी सत्पात्र को यह अनुभव होने दिया जायेगा कि लिखने वाले के अभाव में आत्मिक प्रगति की उचित आवश्यकता कुण्डलिनी जागरण का विधान न मालूम होने के कारण इच्छा पूर्ति न हो सकी। बस आवश्यकता स्वयं में संयम, साहस, श्रद्धा, निष्ठा तथा लोकहित के लिए समर्पित भाव की हो । युगऋषि के मार्गदर्शन में ऐसे साधक ही साधना रहस्यों के निष्णात् होकर सुख-सन्तोष से भरी-पूरी परिस्थितियों को जन्म देंगे।
साधना प्रयोजनों द्वारा सामूहिक रूप से उस बीज को प्रसुप्ति से जाग्रति में लाकर साधक के “स्व” को “असीम” में बदला जा सकता है। इस माध्यम से उनने कल्पना की , कि विश्व की कुण्डलिनी जागरण की जो प्रक्रिया उनकी सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान शाँतिकुँज में चली है वह अगले दिनों विराट रूप ले लेगी।
साधना का विशाल कलेवर, सूक्ष्मदर्शी ऋषि-मनीषियों ने इसी उद्देश्य से तैयार किया ताकि वह प्रखर प्रकाश स्तम्भ बनकर मानवीय प्रगति का मार्गदर्शन करता रह सके। उस प्रकाश में मनुष्य अपनी चेतना का निरन्तर परिष्कार करता रहे व्यक्तित्व को लगातार विकसित करता रह और उसी केन्द्र से जुड़े वैयक्तिक सुख-सन्तोष तथा सामाजिक सुरक्षा-सुविधाओं का सम्पूर्ण आधार सुदृढ़ बना रहे यही मनीषी पूर्वजों का दृष्टिकोण था।
साधना सम्प्रदायों के कलेवर को देखें तो विवरण भी मिल सकेंगे। गजनी के आक्रमण के समय फेरुक वज्र नाम के विख्यात ताँत्रिक थे । उनकी शक्तियाँ जन सामान्य को अभिभूत किये थीं । आक्रमण के लिए बढ़ती आ रही सेना का दुर्मद वेग देखकर तत्कालीन समाज के व्यक्तियों ने बड़े विश्वास से उनसे प्रार्थना की कि गजनवी के पाँव मोड़ दें । फेरुक वज्र अपने सारे प्रयासों के बावजूद असफल रहे।
साधना की जाती है।
साधना’-उपासना करने से पूर्व सबसे प्रथम कदम इस जन्म में बन पड़े पाप कर्मों का प्रायश्चित किया जाना चाहिए। यों कुविचार भी हानिकारक हैं और कालान्तर में वे भी परिपक्व होकर दुर्गति के कारण बनते हैं। पर कुकर्म तो प्रत्यक्ष हैं, उनके तत्काल संस्कार बनते हैं और उनका ऐसा भला बुरा कर्मफल विनिर्मित होता है जिसे भुगते बिना और कोई मार्ग नहीं। कर्म की गति अति गहन है। श्रवण कुमार को तीर मारने के फलस्वरूप दशरथ को पुत्र शोक का शाप लगा था और उन्हें राम वनवास के अवसर पर बिलख-बिलख कर प्राण त्यागने पड़े थे।
साधना पद्धतियाँ भी सफल सिद्ध हुईं। सदा से गुरुजनों ने अपने जीवन में प्रयोग किया है तथा सफल पाने पर सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लैबोरेटरी की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
साधना का अपने सशक्त प्रतिपादनों द्वारा खण्डन किया स्वयं उनने जीवन में तंत्र से लेकर अन्यान्य सभी साधनाएँ कीं, सौंदर्य लहरी जैसा अभिनव विलक्षण काव्य रचा किन्तु जन-जन के लिए निराकार उपासना के साथ-साथ पंचदेव उपासना का प्रचलन किया। उनका आगमन व मात्र 32 वर्ष की आयु में कार्य कर सारी महत्वपूर्ण स्थापनाएँ कर जाना हमारी संस्कृति की एक ऐतिहासिक घटना है।
साधना पथ पर एक ऊँचे सोपान पर चल पड़ने को प्रेरित किया। सामान्यतया नारी शक्ति से तप के स्थान पर भाव प्रधान अपेक्षाएँ की जाती रही हैं किन्तु युगऋषि ने एक विराट नारी समुदाय को भी इस कठोर साधना का भागीदार बनाया, पंचकोशी साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना इसी केन्द्र बिन्दु पर पहुँचने की चेष्टा को कह सकते हैं।
साधना की जाय तो निश्चित ही अभीष्ट की प्राप्ति होती है, यह एक अनुभूत सत्य है।
साधना कोई कर्म विशेष नहीं है और न इसके लिए कहीं आने-जाने दौड़ने-भागने की जरूरत है। यह तो स्वयं को सुसंस्कारित करने की पद्धति है। जिसके लिए सुबह से शाम तक होशो-हवासपूर्वक हर छोटे-बड़े काम को परमात्म समर्पित भाव से करना पड़ता है। फिर तो नामदेव की दर्जी गीरी, रैदास को जूता गाँठना, कबीरदास का कपड़ा बुनना सभी साधना बन जाते हैं। संत एकनाथ को रामेश्वर की तीर्थ यात्रा का पुण्य, प्यास से विकल गधे को गंगा जल पिलाने से मिल जाता है।
साधना पद्धतियों के विभिन्न सूत्रों, खोई कड़ियों को ढूँढ़कर गूँथना एक सबसे जरूरी काम था। वह उनने किया। जब तक उस स्तर की पात्रता न बने एक ऐसी युगसाधना में उनने अपने सहचरों को अनुयायियों को नियोजित कर दिया जिससे उनका अचेतन, जन्म-जन्मान्तरों से संचित प्रारब्धों की शृंखला का क्रम परिष्कृत व्यवस्थित होता चले। इतना बन पड़ने पर पवित्र मन वालों का समष्टिगत आधार विकसित होगा तो चेतना जगत में इनकी सामूहिक साधना निश्चित ही व्यापक परिवर्तन लाएगी ऐसा उनका विश्वास था। प्रज्ञा पुरश्चरण प्रातःकाल का सामूहिक तीन शरीरों का महाकाल के घोंसले के रूप में शाँतिकुँज को मानते हुए नित्य वहाँ पहुँचने की ध्यान-धारणा, स्वर्ण जयन्ती साधना, शक्ति−संचार साधनादि उपक्रम उसी कड़ी के अंग हैं।
साधना कहलाती है।
साधनात्मक प्रयोगों से गुजरने के लिए शिविरों में उत्साहपूर्वक सम्मिलित होना चाहिए। जो मनीषी वैज्ञानिक, युग ऋषि के इस शोध प्रयोजन के लिए समर्पित होना चाहते हैं। शोध में भागीदारी के लिए उन्हें भावपूर्ण आमंत्रण है। उनके द्वारा वर्तमान में किया गया समर्पित योगदान-कल के साँस्कृतिक गौरव बोध के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा।
साधना पद्धतियों का एक ही लक्ष्य है जीव को ब्रह्म के समकक्ष बना देना, “जीवों ब्रह्मैव नापरः” की शक्ति को सार्थक करना , अनगढ़ मानव में निहित असीम संभावनाओं का द्वार खोल उसके देवमानव, महामानव-अवतारी पुरुष के रूप में विकसित होने का पथ प्रशस्त करना। मानवी चेतना का कायाकल्प करने वाली साधना उपचार प्रक्रिया को ब्रह्मविद्या के अंतर्गत दो भागों में बाँटा गया है- एक योग दूसरा तप। “योग” आस्था पक्ष से संबंधित है और “तप” क्रियापक्ष से। योग एक प्रकार से चिंतन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली साधना है जो अवाँछनीयता के पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों को छुड़ाने में आत्मसत्ता की मदद करती है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा उस परिष्कृत मनःस्थिति का नाम है जो ज्ञान साधना से प्राप्त होती है।
साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस वर्श तक उसी में लगे रहे। परम पूज्य गुरुदेव अपनी इसी विशिष्टता के कारण तपोनिष्ठ कहलाये। उनके अस्सी वर्श के जीवन का एक-एक दिन साधना के गहरे तत्वों से भरा है।
साधना के उपयुक्त मनःस्थिति स्वतः बन जाती है। इस दृष्टि से हिमालय की महत्ता असंदिग्ध है।
साधनाओं से लेकर स्वप्न आदि के प्रयोगादि के क्रम तो विश्वभर में चले हैं किन्तु उनका आधार प्रत्यक्षवादी विज्ञान होने के कारण वे चेतना की गहराई तक नहीं पहुँच पाए। बस यहीं पर ब्रह्मवर्चस् अपनी अद्भुतता का प्रमाण देता है।
साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीन काल की तरह अभी भी बना हुआ है और सम्भवतः सदा ही बना रहेगा। ब्रह्मवर्चस् शाँतिकुँज की स्थापना हिमालय की छाया में उपयुक्त वातावरण को ध्यान में रख कर ही की गई है। यहाँ आकर रहना ही एक उच्चस्तरीय तप है। यदि साधना की जाय तो निश्चित ही अभीष्ट की प्राप्ति होती है, यह एक अनुभूत सत्य है।
साधना से लेकर कुण्डलिनी जागरण आदि पहले बतायी गयी मेरी समस्त साधनाएँ तुम्हारे लिए सरल होती चली जायेंगी। वैसे मैं यह सब लिखकर जा रहा हूँ सारी साधना पद्धतियों को मैंने समय के अनुसार बदलकर लिख दिया है किन्तु लोग इन्हें कर तभी पायेंगे जब सूक्ष्म जगत की ऋषि-सत्ताएँ ऐ सा चाहेंगी।”
साधना द्वारा परमतत्व की प्राप्ति का मार्ग बताकर योग−साधकों को योगामृत संजीवनी प्रदान की। नाथ सिद्धों की वाणियाँ सीधे सरल शब्दों में लिखी गयीं व उनसे इस साधना के परिष्कृत रूप को जन्म लेने में मदद मिली। घेरण्ड संहिता व गोरक्ष संहिता आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ इसी समय के हैं।
साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती हैं उसे शरीरगत अपरा प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और उस निर्झर का मूल उद्गम जननेन्द्रिय मूल-कुण्ड कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।
साधना के ढाँचे में ढालने के निमित्त करते थे। इसी से वह ऊर्जा मिलती है, जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमे बुराइयों के आकर्षक कुसंस्कारों को हटाकर अच्छाइयों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकें।
साधना का सुअवसर एवं साधक का सौभाग्य ही माना जाना चाहिए। ऐसे ही वातावरण में निवास करने का स्वर्गीय दिव्य आनन्द प्राप्त करने के लिए राजा भर्तृहरि बेचैन थे। इसके लिए उन्होंने राजपाट का सारा जंजाल त्यागा और योगी का देव जीवन अपना कर उच्चस्तरीय मनोरथ पूरा करने में सफल हुए। जब तक यह स्थिति न आई तब तक वे उसी के मनोरम सपने देखते रहे। साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है कूर्मपुराण में ऋषि कहते हैं।
साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है कूर्मपुराण में ऋषि कहते हैं।
साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन तत्वदर्शी, मनीषी तथा दिव्य द्रष्टा मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका जपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप साधनों एवं कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मन्त्राराधन वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।
साधना की सिद्धि में प्रधान बाधा क्या है? संचित दुष्कर्म ही उस मार्ग की सफलता में प्रधान रूप से बाधक होते हैं। यदि उनके निराकरण का उपाय सम्भव हो सके तो अभीष्ट सफलता सहज ही मिलती चली जायगी। प्रायश्चित्त का विधान इसी निमित्त निर्धारित किया गया है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार सम्पन्न होती है।
साधना (1984-85) पंचवीर भद्रों के जागरण की सावित्री साधना (1986) तथा राष्ट्र की देवात्म-शक्ति का कुण्डलिनी जागरण (1987) क्रमशः चले आने वाले वे विशिष्ट उपादान हैं, जिनसे इस साधक की महायात्रा का आभास मिलता है। अति कठिन शास्त्रोक्त साधना पद्धतियों को अति सरल बनाकर यज्ञ प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन कर उसे प्रगतिशील मोड़ देना एक असाधारण साधक स्तर के युगऋषि का ही कार्य हो सकता है।
साधना रहस्यों के निष्णात् होकर सुख-सन्तोष से भरी-पूरी परिस्थितियों को जन्म देंगे। ज्ञान की इस अनूठी विधा का गौरव पुनः प्रकट हो सकेगा।
साधना पद्धतियों की एक समीक्षा कर उनने प्रायः डेढ़ घण्टे तक ध्यान प्राणायाम से लेकर पंच तन्मात्राओं की साधना तथा सूर्य के ध्यान की फलश्रुतियों से लेकर अष्टाँग योग के विभिन्न सूत्रों को विस्तार से समझाया। फिर अचानक चुप होकर लेट गए व बोले कि “अभी वातावरण बनना है तब तुम लोग चह सब साधनाएँ करना। सूर्य का ध्यान व गायत्री जप, नित्य शक्ति संचार हेतु प्राणायाम बस इतना भर तुम करते रहो व सबको बताते रहो। समय आने पर ग्रन्थि’-बेधन से लेकर चक्र जागरण, पंचकोशी साधना से लेकर कुण्डलिनी जागरण आदि पहले बतायी गयी मेरी समस्त साधनाएँ तुम्हारे लिए सरल होती चली जायेंगी। वैसे मैं यह सब लिखकर जा रहा हूँ सारी साधना पद्धतियों को मैंने समय के अनुसार बदलकर लिख दिया है किन्तु लोग इन्हें कर तभी पायेंगे जब सूक्ष्म जगत की ऋषि-सत्ताएँ ऐ सा चाहेंगी।
साधना का संकेत गीता में है। जीवन रूपी समिधा को समाज रूपी यज्ञ में होम देने की कई स्तर की प्रेरणाएँ यज्ञ कृत्य के विभिन्न क्रिया-कृत्यों में कितने ही प्रकार से समाविष्ट हैं। ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में यज्ञाग्नि को पुरोहित की संज्ञा दी है और वरण करने वालों को देवत्व की, विभूतियों की रत्नराशि उपलब्ध होने का आश्वासन दिया गया है। अध्यात्मदर्शन और विज्ञान के दोनों ही पक्षों में यज्ञ की जितनी चर्चा हुई है, जितनी व्यवस्था बताई, महिमा गाई गयी है उतना ऊहापोह कदाचित् ही किसी अन्य प्रसंग पर हुआ हो। यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण तथा सूत्रों-ग्रंथों में यज्ञ चर्चा की ही प्रमुखता है।
साधना उपचार प्रक्रिया को ब्रह्मविद्या के अंतर्गत दो भागों में बाँटा गया है- एक योग दूसरा तप। “योग” आस्था पक्ष से संबंधित है और “तप” क्रियापक्ष से। योग एक प्रकार से चिंतन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली साधना है जो अवाँछनीयता के पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों को छुड़ाने में आत्मसत्ता की मदद करती है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा उस परिष्कृत मनःस्थिति का नाम है जो ज्ञान साधना से प्राप्त होती है। योग का अर्थ है जोड़ देना-आत्मा को परमात्मा से।
साधना उपचारों का क्रिया प्रधान पक्ष है। एक चरण इसका आत्म निमार्ण है, दूसरा लोक कल्याण। स्वार्थ सुविधा में कटौती करके परमार्थ की दिशा में किये जा रहे प्रयास तप की परिधि में आते हैं। आत्म निग्रह के लिए की गयी तितिक्षा, वासना तथा तृष्णा का निग्रह-नियंत्रण सेवा साधना हेतु बलिदान व त्याग का अभ्यास तथा साधनात्मक कर्मकाण्डों (जप, ध्यान, प्राणायाम, देवपूजन, संध्या, अनुष्ठान आदि) के माध्यम से आत्मशिक्षण कर प्रसुप्त को जगाना-ये सब प्रक्रियाएँ तप के अंतर्गत आती हैं।
साधना संपन्न हो जाती है तथा व्यक्ति ब्रह्म से, परमसत्ता से आत्म साक्षात्कार कर लेता है।
साधनाक्रम में कहीं-कहीं व्यापक परिवर्तन भी निर्देशित किए हैं। जिनके प्रभावों की जाँच करने के लिए उन्हीं के निर्देश में नई-नई तकनीकें विकसित की गई हैं।
साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया।
साधना पद्धतियों का लक्ष्य रहा है। व्यावहारिक जीवन में साधक के व्यक्तित्व के संपूर्ण घटकों में परिपूर्णता को लाना-बौद्धिक, नैतिक, धार्मिक एवं कलात्मक हर पहलू को परिष्कृत करना, एक सर्वांगपूर्ण मानव को अव्यवस्था से व्यवस्था में बदलकर विनिर्मित करना ही हर साधना पद्धति का उद्देश्य रहा है।
साधना, शक्ति−संचार साधनादि उपक्रम उसी कड़ी के अंग हैं।
साधनाओं में ज्ञान और कर्म से सम्मिश्रित तत्वयोग की साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। निश्चित ही यह साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।
साधना से लेकर अघोरी स्तर की अन्यान्य साधनाओं ने अध्यात्म तंत्र को विकृत कर दिया था। तब गुरु मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य अनंग वज्र आगे आये जो बाद में गोरक्षनाथ कहलाए। उनने इस सारे अनाचार का विरोध कर नाथ सम्प्रदाय की योगसाधना पद्धति का सुनियोजित निर्धारण किया। साधना द्वारा परमतत्व की प्राप्ति का मार्ग बताकर योग−साधकों को योगामृत संजीवनी प्रदान की। नाथ सिद्धों की वाणियाँ सीधे सरल शब्दों में लिखी गयीं व उनसे इस साधना के परिष्कृत रूप को जन्म लेने में मदद मिली।
साधना क्षेत्र की उपलब्धियों का विश्लेषण कर उनकी युग ऋषि के रूप में अपरिमित उपलब्धियों का विश्लेषण कर उनकी युग ऋषि के रूप में अपरिमित उपलब्धियों के विषय में पूरा न्याय न कर पाएँ किन्तु इतना अवश्य बताना चाहेंगे कि जो साधना पद्धतियाँ कभी भिन्न-भिन्न समूहों में बँटकर कुछ पंथों तक सीमित रह गयी थीं, उन्हें जनसाधारण के नित्यकर्म का एक अंग बना देना, षट्चक्र जागरण-कुण्डलिनी जागरण ग्रन्थिभेदन जैसी प्रक्रियाओं को अति सरल रूप में एक गायत्री साधना रूपी वटवृक्ष के नीचे लाकर खड़ाकर प्रतिपादित कर देना एक ऋषि स्तर के व्यक्ति का काम है। चौथी बार की हिमालय यात्रा (1971-1972) के बाद आने पर प्राण प्रत्यावर्तन साधना के द्वारा प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान जैसी प्रक्रिया आरंभ करना जिसमें खेचरी मुद्रा, सोऽहम् साधना, ज्योति अवतरण की बिन्दु साधना, नादयोग की साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की।
साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया। पर यहीं तो उनका ऋषि पक्ष उद्घाटित होता है। जो नये सूत्र चेतना जगत के क्षेत्र को दे, वह युग ऋषि नहीं तो और क्या है?
साधनाएं और तपश्चर्याएं सम्पन्न की जाती हैं।
साधना काल में वृन्दावन रहकर समग्र तन्मयता के साथ गायत्री महापुरश्चरणों में संलग्न थे, उन्होंने पूर्ण विधि-विज्ञान के साथ लगातार ग्यारह वर्षों तक अपनी साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गये।
साधना व्यक्तित्व का सुनियोजन करती है तथा उसे मनःशक्ति आत्मबल संपन्न बनाती है।
साधना पद्धति में नहीं देखा जाता। अध्यात्म क्षेत्र में प्राण की परिभाषा चेतना की बलिष्ठता के रूप में की गयी है। प्राण से ऋषियों का तात्पर्य जीवात्मा की उस आँतरिक क्षमता से है जो शरीर में ओजस, चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं में वर्चस् नाम से जानी जाती है। इस अंतरु “अतः क्षमता को -आत्म शक्ति को -प्राणतत्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने हेतु जीवन का अधिकतम आनन्द लेने हेतु गायत्री महाशक्ति का आश्रय लेने की बात ही श्रुति कहती है।
साधना का तत्व और उसकी सिद्धि ईश्वर से प्रेम है-चमत्कार-सिद्धि प्रदर्शन-उसके विधान में हेर-फेर करने का दुःसाहस-इसमें बाधक तत्व हैं। ईश्वर के प्रति प्रेम करने का अर्थ है लोक के प्रति करुणा से भर जाना और लोक के प्रति करुणावान होने का अर्थ है जन-जन में सद्भावों-सत्चिंतन-सत्कर्म-को उमगा देना। स्वयं में यदि आदर्शों के प्रति प्रेम उमड़ सका लोक हृदय में उनके प्रति श्रद्धा, निष्ठा उमगायी जा सकी तो समझो साधना बन सकी सिद्धि मिल सकी”।
साधना और प्रकाश की याचना की चर्चा मिलती है। यह प्रकाश बल्ब, बत्ती अथवा सूर्य, चंद्र आदि से निकलने वाला उजाला नहीं वरन् वह परम ज्योति है जो इस विश्व में चेतना का आलोक बनकर जगमगा रही है। गायत्री का उपास्य सविता देवता इस परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण-कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर भी देख सकता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।
साधना रूपी वटवृक्ष के नीचे लाकर खड़ाकर प्रतिपादित कर देना एक ऋषि स्तर के व्यक्ति का काम है। चौथी बार की हिमालय यात्रा (1971-1972) के बाद आने पर प्राण प्रत्यावर्तन साधना के द्वारा प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान जैसी प्रक्रिया आरंभ करना जिसमें खेचरी मुद्रा, सोऽहम् साधना, ज्योति अवतरण की बिन्दु साधना, नादयोग की साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की।
साधनारत व्यक्ति विधाता द्वारा दी गई कर्म की स्वतंत्रता का ठीक-ठीक उपयोग करने में समर्थ होता है। वह स्वयं की अभिरुचियों, आदतों, प्रवृत्तियों को नए सिरे से गढ़ता है। उसके अंतराल में नए संस्कार जन्म लेते हैं। कर्म के प्रेरक तत्व स्वार्थों का जखीरा जमा करने की लालसा, अहंकार का झण्डा ऊँचा करने की चाहत नहीं रह जाती। प्रत्येक काम लोक के प्रति करुणा आत्म विकास के सोपानों पर चढ़ने के उद्देश्य से होता है।
साधना द्वारा साधना पथ पर एक ऊँचे सोपान पर चल पड़ने को प्रेरित किया। सामान्यतया नारी शक्ति से तप के स्थान पर भाव प्रधान अपेक्षाएँ की जाती रही हैं किन्तु युगऋषि ने एक विराट नारी समुदाय को भी इस कठोर साधना का भागीदार बनाया, पंचकोशी साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना अक्षम है।
साधना प्रयोजनों में अग्निहोत्र के अनेकानेक प्रयोगों का उपयोग एवं उल्लेख करते रहे हैं। उपासना-उपचार में दीपक, अगरबत्ती धूपबत्ती, अग्निहोत्र आदि के प्रयोग होते हैं। न केवल भारतीय धर्म में वरन् संसार भर के सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। अगरबत्ती धूपबत्ती, लोबान, धूनी जैसे उपचार मन्दिर , गिरजाघर, गुरुद्वारे चैत्य आदि सभी जगह प्रयुक्त होते हैं। पारसी धर्म में तो यह मान्यता और भी अधिक है।
साधना का परिणाम उन्हीं के शब्दों में कहें तो विश्व की राष्ट्र की कुण्डलिनी जाग्रत होने का प्रभाव इस रूप में देखा जा सकेगा कि उससे पदार्थ, जीवधारी, मनुष्य एवं परिस्थितियों के प्रवाह प्रभावित होंगे। मृतिका की उर्वरता बढ़ेगी, खनिजों के भण्डार तथा , उत्खनन का अनुपात बढ़ेगा। धातुएँ मनुष्य की आवश्यकताओं से अधिक उत्पन्न होंगी। खनिज तेलों की कमी न पड़ेगी। रसायनें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होंगी।
साधना माना जाता है। पृथ्वी मूलाधार स्थित शरीरगत शक्ति-सूर्य ब्रह्म रंध्र स्थित सहस्र दल कमल-इन दोनों के परस्पर सुयोग संयोग का नाम ही कुण्डलिनी जागरण है। साधनात्मक कर्म-काण्ड के आधार पर अभ्यासी लोग इन दोनों को जोड़ने के लिए प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का, षट्चक्र बेधन का, हठयोग का, मन्त्र साधना का, सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी ।
साधना ही सभ्यता और संस्कृति की पहचान बन सकी है।
साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया।
साधना पद्धतियाँ प्रचलित हो गयीं। इस्लाम संप्रदाय आया तो ईसाई संप्रदाय भी अपनी रहस्यवाद सिद्धान्त लेकर आया। रीतिकाल में भक्ति योग का वर्चस्व रहा। इस सदी के प्रारंभ से कुछ दशक पूर्व रामकृष्ण परमहंस का इस धरती पर अवतरण हुआ जिनने विवेकानन्द जैसे सुयोग्य शिष्य के माध्यम से अध्यात्म तंत्र के परिशोधन तथा पूरे विश्व के मार्गदर्शन की बात कही। स्वयं विवेकानन्द निर्विकल्प समाधि चाहते थे किन्तु श्री रामकृष्ण ने उन्हें ऐसी स्थिति में जाकर समाज के लिए अनुपयोगी होने के बजाय साधना का परमार्थ में आराधना में नियोजन करने की बात कही।
साधना आत्मविश्वास उपार्जन के लिए देव संस्कृति के प्रणेताओं ने सर्वश्रेष्ठ बतायी है व ऐसे माहात्म्यों से आर्ष साहित्य भरा पड़ा है। यदि आत्मशक्ति प्रचण्ड मात्रा में उपलब्ध हो सके तो ऐसे अगणित व्यक्तित्वों से युगपरिवर्तन का वातावरण बनेगा, इसमें किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए।
साधना इन शिथिल सम्बन्धों को पुनः प्रतिष्ठापित करने वाली सुनिश्चित पद्धति है। विश्व चेतना के साथ व्यक्ति को जोड़ने वाला राजमार्ग है।
साधना को सूर्य के माध्यम से संपन्न कर कैसे अति मानस की इस दिव्य ज्योति द्वारा समष्टिगत वातावरण को प्रभावित करना संभव है, यह परमपूज्य गुरुदेव द्वारा सन् 1958 की शरदपूर्णिमा पर संपन्न किये गए 1008 कुण्डी गायत्री महायज्ञ के माध्यम से समझा जा सकता है। यह विलक्षण प्रयोग किया ही विश्व मानवता के भविष्य के निर्धारण के लिए गया था । लगभग उसी समय पांडिचेरी में श्री माँ ने सुप्रामेण्टल के अवतरण की घोषणा की थी। 1 जुलाई 1957 से 31 दिसम्बर 1958 तक-खगोल शास्त्रियों से अन्तर्राष्ट्रीय शाँत सूर्य वर्ष (इंटरनेशनल इयर ऑफ दि क्यायेट सन्) संक्षेप में ‘इक्विसी‘ मनाया। यह नाम इसलिये रखा गया कि इन दो वर्षों में सूर्य बिलकुल शाँत रहा और वैज्ञानिकों को उस पर अनेक प्रयोग और अध्ययन करने का अवसर मिला।
साधना पद्धतियों को अति सरल बनाकर यज्ञ प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन कर उसे प्रगतिशील मोड़ देना एक असाधारण साधक स्तर के युगऋषि का ही कार्य हो सकता है।
साधनात्मक कर्म-काण्ड के आधार पर अभ्यासी लोग इन दोनों को जोड़ने के लिए प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का, षट्चक्र बेधन का, हठयोग का, मन्त्र साधना का, सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी । पृथ्वी अर्थात्-भौतिक सम्पदा-अहंता-सूर्य अर्थात् आत्मिक सत्ता-ब्रह्म चेतना इन दोनों को जो जितना जोड़ सकता है उसे कुण्डलिनी जागरण के साथ जुड़ी विभूतियाँ मिलती हैं। स्वार्थ को परमार्थ से जोड़ने का, शारीरिक वासनाओं को आत्मिक उल्लासों में घुला देने का नाम ही आत्म समर्पण है।
साधना (1976), विशिष्ट ब्रह्मवर्चस् साधन (1977-78), युग सन्धि महापुरश्चरण (1980) आध्यात्मिक कायाकल्प की चाँद्रायण स्तर की कल्पसाधना (1981-82) अति प्रचण्ड सूक्ष्मीकरण साधना (1984-85) पंचवीर भद्रों के जागरण की सावित्री साधना (1986) तथा राष्ट्र की देवात्म-शक्ति का कुण्डलिनी जागरण (1987) क्रमशः चले आने वाले वे विशिष्ट उपादान हैं, जिनसे इस साधक की महायात्रा का आभास मिलता है। अति कठिन शास्त्रोक्त साधना पद्धतियों को अति सरल बनाकर यज्ञ प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन कर उसे प्रगतिशील मोड़ देना एक असाधारण साधक स्तर के युगऋषि का ही कार्य हो सकता है।
साधना में है। ऋषियों ने उच्चस्तरीय साधना के लिए गायत्री को अलंकारिक रूप में पाँच मुखों वाली बताया है तथा इस माध्यम से सूक्ष्म शरीर के पाँच कोशों की प्रसुप्त क्षमता को जगाने और इस महाविद्या का समुचित लाभ उठाने की बात कही गयी है। कायसत्ता की चेतन प्रयोगशाला में अनुसंधान करने वाले ऋषिगणों ने जीवात्मा के कायकलेवर को अपनी दिव्य दृष्टि से पाँच भागों में विभक्त माना है। ये हैं अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश अर्थात्-जखीरा, भण्डार, खजाना। सारी प्रसुप्त क्षमताएँ-अस्तित्व की पाँच भूमिकाएँ इनमें छिपी पड़ी हैं।
साधना का भागीदार बनाया, पंचकोशी साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।
साधनात्मक सम्भावनाओं के कारण मानव संस्कृति सिरमौर, ईश्वर का राजकुमार है। निरन्तर अग्रगमन, आरोहण-उत्कर्ष ही तो उसके गौरव योग्य कार्य हैं। मानवीय गरिमा सतत् अभ्युदय में उत्थान में ही तो है। पशु प्रवृत्तियों में ही लिप्त रहना मनुष्य का कोई महिमानव लक्षण कैसे कहा जा सकता है ?
साधना का यही स्थान है। शिव ताण्डव भी यहीं हुआ था। उस अवसर पर प्रयुक्त हुआ त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप-साधना उत्तरकाशी में सम्पन्न हुई थी।
साधना निश्चित ही व्यापक परिवर्तन लाएगी ऐसा उनका विश्वास था। प्रज्ञा पुरश्चरण प्रातःकाल का सामूहिक तीन शरीरों का महाकाल के घोंसले के रूप में शाँतिकुँज को मानते हुए नित्य वहाँ पहुँचने की ध्यान-धारणा, स्वर्ण जयन्ती साधना, शक्ति−संचार साधनादि उपक्रम उसी कड़ी के अंग हैं।
साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया। पर यहीं तो उनका ऋषि पक्ष उद्घाटित होता है। जो नये सूत्र चेतना जगत के क्षेत्र को दे, वह युग ऋषि नहीं तो और क्या है?
साधना के गहरे तत्वों से भरा है।
साधना क्षेत्र में ऊँचाइयों को प्राप्त हुए। गुरु जो कहे बिना कोई विकल्प प्रस्तुत किए, बिना कोई तर्क किए उसे करना ही साधना है।
साधना है।
साधना के द्वारा प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान जैसी प्रक्रिया आरंभ करना जिसमें खेचरी मुद्रा, सोऽहम् साधना, ज्योति अवतरण की बिन्दु साधना, नादयोग की साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया।
साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। निश्चित ही यह साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।
साधना का प्रसंग चलने पन लौकिक जीवन में कभी भी गहराई तक उसका विवेचन न करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने उस चर्चा के दौरान गुह्य प्रसंगों पर पड़े आवरण को हटा दिया। विगत हजारों वर्षों से चली आ रही साधना पद्धतियों की एक समीक्षा कर उनने प्रायः डेढ़ घण्टे तक ध्यान प्राणायाम से लेकर पंच तन्मात्राओं की साधना तथा सूर्य के ध्यान की फलश्रुतियों से लेकर अष्टाँग योग के विभिन्न सूत्रों को विस्तार से समझाया। फिर अचानक चुप होकर लेट गए व बोले कि “अभी वातावरण बनना है तब तुम लोग चह सब साधनाएँ करना। सूर्य का ध्यान व गायत्री जप, नित्य शक्ति संचार हेतु प्राणायाम बस इतना भर तुम करते रहो व सबको बताते रहो। समय आने पर ग्रन्थि’-बेधन से लेकर चक्र जागरण, पंचकोशी साधना से लेकर कुण्डलिनी जागरण आदि पहले बतायी गयी मेरी समस्त साधनाएँ तुम्हारे लिए सरल होती चली जायेंगी।
साधना को रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा की साधना माना गया है। इसी समूचे सत्ता क्षेत्र को त्रिपदा गायत्री की परिधि कहा गया है।
साधना से अन्तर्चेतना में कुछ ऐसी फेर-बदल होती है जिसकी वजह से ईश्वरीय शक्ति और आनन्द का अवतरण होने लगता है।
साधना से प्राप्त होती है। योग का अर्थ है जोड़ देना-आत्मा को परमात्मा से। परमात्मा यहाँ व्यक्ति नहीं शक्ति है -उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं-आकाँक्षाओं के समुच्चय के रूप में । आत्म साक्षात्कार का अर्थ यही है कि अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की हो जाएँ, संवेदना इतनी उच्चस्तरीय हो जाय कि सब ओर अपनी ही आपा बिखरा दिखाई देने लगे। ‘योग’ की परिभाषा इस प्रकार पशु प्रवृत्तियों को देव आस्थाओं में बदल देने वाले मानसिक उपचार के रूप में बताई गयी है।
साधनात्मक अवलम्बनों में ऋषिगणों द्वारा गायत्री साधन, सविता के ध्यान, तथा गायत्री जप के साथ जुड़े प्राणायाम से सर्वाधिक मात्रा में अर्जित होती बतायी गयी है। “चेतना क्षेत्र का यह पुरुषार्थ जितना सशक्तता से गायत्री साधना के माध्यम से संपन्न होता है तथा जिस प्रकार से मनःक्षेत्र पर छाए अवसाद- कुण्ठाएँ-हीनता-विक्षुब्धता आदि मनोविकारों का शमन इन आध्यात्मिक अवलम्बनों के माध्यम से होता है उतना संभवतः कोई और माध्यम से किसी अन्य साधना पद्धति में नहीं देखा जाता। अध्यात्म क्षेत्र में प्राण की परिभाषा चेतना की बलिष्ठता के रूप में की गयी है। प्राण से ऋषियों का तात्पर्य जीवात्मा की उस आँतरिक क्षमता से है जो शरीर में ओजस, चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं में वर्चस् नाम से जानी जाती है। इस अंतरु “अतः क्षमता को -आत्म शक्ति को -प्राणतत्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने हेतु जीवन का अधिकतम आनन्द लेने हेतु गायत्री महाशक्ति का आश्रय लेने की बात ही श्रुति कहती है।
साधना द्वारा व्यक्ति अपने विचारों में मन को स्नान करा सके तो यह प्राण शक्ति उसके रोम-रोम में उतरकर उसे ब्रह्मवर्चस सम्पन्न बना देती है। आप्त वचनों के अनुसार ‘गा’ कारो गतिदः प्रोक्त, ’य’ कारो शक्ति दायिनी। ‘त्र’ त्राताच, ‘ई’ कार स्वयं परम्। गा अर्थात् गति, य अर्थात् गति, य अर्थात्-शक्ति, त्र अर्थात् त्राता ई अर्थात् परब्रह्म। इसका मतलब हुआ गायत्री वह परमसत्ता है- पर ब्रह्म की प्रत्यक्ष सत्ता है जो मानव जीवन में प्राण का संचार करती है उसको गति प्रदान करती है, शक्ति देती है, उसकी रक्षा करती है, निर्भय बनाती है, प्रकारान्तर से मनोबल-आत्मबल से अभिपूरित कर उसे ब्रह्मवर्चस् संपन्न बना देती है।
साधना विज्ञान के तत्वदर्शी वैज्ञानिकों ने तीन ग्रंथियों का विस्तृत विवेचन एवं निरूपण किया है। उन्हें खोलने के साधन एवं विधि-विधान बनाये हैं। उनके नाम हैं- ब्रह्म ग्रन्थि , विष्णु ग्रन्थि, और रुद्रग्रन्थि। रुद्र ग्रन्थि का स्थान नाभि संस्थान माना गया है। इसे अग्नि चक्र भी कहते हैं।
साधना रहस्यों की अनुभूति की। वहीं कुछ ऐसे विशिष्ट प्रयोग किए जो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के बाद दुबारा कभी सम्पन्न नहीं हुए। सावित्री साधना के नाम से बताए गए इस प्रयोग का उद्देश्य मनुष्य मात्र की आन्तरिक प्रकृति और बाह्य प्रकृति की अस्त-व्यस्तता को सुधारना-सँवारना रहा है। इसे तंत्र का उत्कृष्टतम प्रयोग कहा जा सकता है। जिसकी परिणति विश्व राष्ट्र की कुण्डलिनी के रूप में सामने आयी।
साधना की सफलता के लक्षण प्रकट होने लगे और बारहवाँ वर्श पूरा होने पर इष्टदेव का साक्षात्कार हुआ। उन्हीं के अनुग्रह से वह प्रज्ञा प्रकट हुई जिसके सहारे “माधव-निदान” जैसा महान ग्रन्थ लिखकर अपना यश अमर करने और असंख्यों का हितसाधन कर सकने की उपलब्धि उन्हें मिली और जीव का लक्ष्य पूरा कर सकने में सफल हुए।
साधनाएँ कीं, सौंदर्य लहरी जैसा अभिनव विलक्षण काव्य रचा किन्तु जन-जन के लिए निराकार उपासना के साथ-साथ पंचदेव उपासना का प्रचलन किया। उनका आगमन व मात्र 32 वर्ष की आयु में कार्य कर सारी महत्वपूर्ण स्थापनाएँ कर जाना हमारी संस्कृति की एक ऐतिहासिक घटना है।
साधना, ज्योति अवतरण की बिन्दु साधना, नादयोग की साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया।
साधना, नादयोग की साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया।
साधना उसे पार्थिव चेतना से एकत्व का आभास करा सकती है। यही भूतत्व की अनुमति है। भुव तत्व के निम्न उच्चास्तरों के अनुरूप प्रेत-पिशाचों की भयंकरता और यज्ञ आदि प्राणिक शक्तियों की सौम्यता के दर्शन के रूप में हो सकती है। दैनन्दिन क्रम में स्वप्न के माध्यम से इसे यत्किंचित् अनुभव करते हैं। जागरुकता का अभाव इसे स्पष्ट नहीं होने देता।
साधनाओं के अवलम्बन से वाँछित परिवर्तन सम्भव कैसे हो जाता है, इसका समाधान चिकित्सा विज्ञानियों के पास नहीं है।
साधना बहुतों ने की होगी। पर उसके 24 अक्षरों में एक अक्षर नः का तत्वज्ञान कितनों सद्बुद्धि के अर्जन और उपार्जन की यह प्रक्रिया ‘मम्’ अर्थात् मेरे लिए न होकर नः अर्थात् हमारे (हम सब) के लिए है। उपदिष्ट साधना प्रक्रिया भी डालने के लिए सक्रिय हुई है। इसका अर्थ, आर्य होना, सुसंस्कृत होने के बराबर समझा जाना चाहिए। यह महर्षि प्रयोगों का अति व्यापक और सुविस्तृत सामूहिक अनुष्ठान, उदय कालीन एक समय ध्यान-आदि अनेकों ऐसी गहन प्रक्रियाएँ हैं जिनके दुर्विचारों की प्रेरक आसुरी शक्तियाँ नष्ट होने के लिए विवश हैं।
साधना कितनी महात्म्य भरी होगी, उसकी कल्पना की जा सकती है। पंचकोशी साधना का विधान पूर्णतः विज्ञान सम्मत भी है।
साधना का स्वरूप समझने में सुविधा हो सकती है। व्यक्तिगत जीवन में मनुष्य कलेवर में परा प्रकृति के चेतन प्रवाह का केन्द्र स्थान मस्तिष्क के मध्य अवस्थित ब्रह्मरंध्र-सहस्रार कमल है। इसी को कैलाशवासी शिव या शेषशायी विष्णु एवं कालाग्नि कहते हैं। दूसरा केन्द्र जननेन्द्रिय के मूल गह्वर में है। उसे अपरा प्रकृति का केन्द्र कहना चाहिए ।
साधनाओं का आतंक था। हठयोग के माध्यम से सिद्धियाँ प्राप्त करके वे उनका जन-जन में प्रदर्शन करते थे। तंत्रयोग के इस विकृत स्वरूप ने नारी शक्ति के गौरव को अतिक्षीण कर दिया था क्योंकि उसका दुरुपयोग ताँत्रिकों द्वारा वज्रोली प्रक्रिया द्वारा निज की भौतिक शक्ति-वर्चस् उपार्जन हेतु किया जाने लगा था। शव साधना से लेकर अघोरी स्तर की अन्यान्य साधनाओं ने अध्यात्म तंत्र को विकृत कर दिया था। तब गुरु मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य अनंग वज्र आगे आये जो बाद में गोरक्षनाथ कहलाए।
साधना द्वारा सम्भव है ऐसा योगवेत्ताओं का मत है।
साधना की। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग जीवन साधना में एक चौथाई जन नेतृत्व में लगाया। आदि गुरु शंकराचार्य ने बीस वर्षों की ऐसी ही गहन साधना के बूते लोकजीवन में स्वर्ग सृष्टि की। श्री रामकृष्ण परमहंस ने पचास वर्श की आयु में विशुद्ध तीस वर्श तप साधना में लगाए।
साधना शक्ति के सम्मिलित प्रवाह को लोक-मानस के-परिष्कार, लोक जीवन में सुख संचार के लिए मोड़ने की कसक थी। पर उनकी वेदना को किसने पहचाना ?
साधनाक्रम में सम्मिलित होने वाले साधकों से यही अनुरोध है कि वे गायत्री महामंत्र के नः अक्षर का तत्वदर्शन समझें । स्वयं को सूर्य से एकाकार हुए गुरुदेव की चेतना से जोड़े । विश्वास रखें हिमालय की दिव्य शक्ति धाराएँ उनकी ओर दौड़ पड़ने के लिए आतुर हो उठेंगी वह सब सहज मिल जायेंगे जो युगों की साधना से सम्भव न था और सामूहिक मन पर इसके परिणाम के रूप में विश्व के कर्णधार यह मानने के लिए विवश होंगे कि वर्तमान गठन अनुपयुक्त है। उसके स्थान पर नित नवीन का कलेवर धारण करना पड़ रहा है। उनके मस्तिष्क कुछ ऐसा ताना-बाना बुनेंगे जिसमें विश्व की एकता का व्यवहार में व्यापक उथल-पुथल की अनुभूत की जा सकेगी।
साधना का परमार्थ में आराधना में नियोजन करने की बात कही। इस सदी के प्रारंभ तक रामकृष्ण मिशन के वेदान्तिक प्रतिपादनों से लेकर, महर्षि रमण व महर्षि अरविन्द व श्री माँ के भागवत चेतना अवतरण से लेकर अधिमानस व अतिमानस के अवतरण के प्रसंगों का साहित्य व जन प्रचलन में बाहुल्य हम देखते हैं। साथ ही विदेश व भारत में श्री कृष्ण भक्ति के माध्यम से प्रभुपाद स्वामी का हरेकृष्ण (इस्कॉन) संप्रदाय महर्षि महेशयोगी का भावातीत ध्यान तथा ओशो रजनीश का नव संन्यास व प्रचलन से हट कर एक अलग ढंग की एण्टी थीसिस साधना पद्धति में जन्म लेती दिखाई पड़ती है।
साधना पद्धति का उद्देश्य रहा है।
साधना का माहात्म्य समझाने वाले ‘परम पूज्य गुरुदेव’ ने वह रूप क्यों दिखाया यह किसी के मन में भी असमंजस हो सकता है। वस्तुतः लीला पुरुषों के जीवनक्रम बड़े अद्भुत होते हैं। परम पूज्य गुरुदेव का जीवन तो बहुआयामी व्यक्तित्व लिये था। एक साधारण प्यार बाँटने वाले पिता से लेकर समाज की पीड़ा मन में लिए उसके उद्धार को कृतसंकल्प एक सुधारक स्तर के मनीषी, जीवन विधा के अंतरंग पहलुओं को खोलने वाले एक मनः विश्लेषक से लेकर कुशल संगठनकर्त्ता वाले स्वरूप को हमने देखा है। किन्तु चौबीस चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण कठोर तप−तितिक्षा द्वारा सम्पन्न कर जिसने अपना जीवन क्रम आरंभ किया हो, उसके लिए तो मूलतः एक विराट समुदाय के लिए साधना पद्धतियों के विभिन्न सूत्रों, खोई कड़ियों को ढूँढ़कर गूँथना एक सबसे जरूरी काम था।
साधनाओं ने अध्यात्म तंत्र को विकृत कर दिया था। तब गुरु मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य अनंग वज्र आगे आये जो बाद में गोरक्षनाथ कहलाए। उनने इस सारे अनाचार का विरोध कर नाथ सम्प्रदाय की योगसाधना पद्धति का सुनियोजित निर्धारण किया। साधना द्वारा परमतत्व की प्राप्ति का मार्ग बताकर योग−साधकों को योगामृत संजीवनी प्रदान की। नाथ सिद्धों की वाणियाँ सीधे सरल शब्दों में लिखी गयीं व उनसे इस साधना के परिष्कृत रूप को जन्म लेने में मदद मिली।
साधना की प्रक्रियाएँ आहार-विहार के प्रयोग वनौषधि कल्प यथा उचित क्रम में शुद्धाई जाती हैं। जिन्हें शान्तिकुँज के दिव्य वातावरण में सुनिश्चित वैज्ञानिक क्रम में सम्पन्न करना पड़ता है। इसमें किसी मनमानी की गुँजाइश नहीं है। साधना की प्रक्रियाएँ जहाँ ऋषियों के अनुभूतिकोश, योगशास्त्रों से ली जाती हैं। वहीं परीक्षण के आधुनिकतम बहुमूल्य यंत्रों की व्यवस्था है।
साधना जगत का गुह्य रहस्य है, जिसे कोई भी सुपात्र अनुभव कर सकता है। मनुष्य जहाँ व्यष्टि है वहीं विराट भी है। वह स्वयं में जब जैसा होता है, चेतना के उन्हीं स्तरों, शक्तियों की अनुभूति उसे होती रहती है। शरीर के स्तर पर की गई साधना उसे पार्थिव चेतना से एकत्व का आभास करा सकती है। यही भूतत्व की अनुमति है।
साधना के लिए सदैव उपयुक्त वातावरण की अपेक्षा रहती है। साधक की आन्तरिक मनःस्थिति एवं बाह्य परिस्थिति का अपना प्रभाव होता है, उससे वातावरण बनता है और प्रवाह-प्रभाव उत्पन्न होता है। आत्मोत्कर्ष के लिए की जाने वाली साधनाओं में तो उपयुक्त वातावरण की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कवि, कलाकार, शोधकर्त्ता, विद्यार्थी आदि बुद्धि कर्मियों के लिए एकाग्रता-पूर्वक अपने काम करने पड़ते हैं इसके लिए उन्हें विक्षोभ रहित एकान्त चाहिए। ठीक इसी स्तर का अति महत्वपूर्ण कार्य आत्म-निर्माण एवं आत्म-परिष्कार का भी है।
साधना के परिष्कृत रूप को जन्म लेने में मदद मिली। घेरण्ड संहिता व गोरक्ष संहिता आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ इसी समय के हैं।
साधना-संस्कारादि द्वारा सब ब्राह्मण बन सकते हैं, यह सबकी मान्यता रही है। हमने ब्राह्मणत्व के वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत तथा परिव्रज्या, वानप्रस्थ के आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत नवजागरण व विस्तार का संकल्प लिया है। निश्चित ही अगले दस वर्षों में पूरा होगा।
साधनादि उपक्रम उसी कड़ी के अंग हैं।
साधना प्रयोगों में स्वस्थ व्यक्तियों (साधकों) ने स्वयं नई क्षमता, अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ भी हासिल की हैं। चेतना के ऐसे नए क्षितिज प्रकाश में आए हैं जिनके स्वरूप के बारे में आधुनिकतम मनोविज्ञान अभी अनजान बना हुआ है। ये तथ्य जहाँ ऋषियों द्वारा सौंपी विरासत की प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं वहीं इनका अपनाया जाना मनुष्य में नयी चेतना के विकास का विश्वास भी दिलाता है।
साधना द्वारा उनसे जुड़े रहें, उनकी दैवीसत्ता को सूर्य मण्डल के मध्य स्थितमान ध्यान करें तो पायेंगे कि पवित्रता सतत् बढ़ रही है व शक्ति की निरन्तर वर्षा हो रही है। जब तक अंतिम आदमी उनसे जुड़ा मुक्त नहीं हो जाता, उनकी सत्ता सक्रिय है युगऋषि के रूप में, कृतसंकल्प है हमें बदलने को तथा सतयुग लाने को। फिर मन में कैसा असमंजस, कैसा ऊहापोह ?
साधना अब भी अव्याहत गति से चल रही है ?” महायोगी में साधना शक्ति के सम्मिलित प्रवाह को लोक-मानस के-परिष्कार, लोक जीवन में सुख संचार के लिए मोड़ने की कसक थी। पर उनकी वेदना को किसने पहचाना ?
साधना-दोनों एक दूसरे से गहराइयों में जुड़ी आपस में घुली-मिली हैं। एक के बारे में सोचते ही, दूसरे का स्वरूप उभरने लगता है। साधना की प्रक्रिया अपने परिणाम में संस्कृति निखारने लगती है। जड़ वस्तुएँ हों, या चेतन प्राणी प्रकृतितः वे अनगढ़ होते हैं। उन्हें गढ़ने, सुघड़, सुन्दर, प्रकृष्ट, उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयास करने होते हैं।
साधना की गति निम्न और उच्च दोनों स्तरों में अव्याप्त है। इसका उद्देश्य आत्मलाभ, परमशिव, चित् शक्ति की अवस्था की प्राप्ति है।
साधना प्रसंग तथा संस्कृति का प्रकरण अधूरा रह जाता है। स्वयं भारत को जगद्गुरु की उपमा इस कारण दी जाती रही है कि उसने विश्व-मानवता का न केवल मार्गदर्शन किया ब्राह्मणत्व के आदर्शों को जीवन में उतार कर औरों के लिए वह प्रेरणा स्रोत बना। गुरु व शिष्य के परस्पर महान संबंधों एवं समर्पण भाव द्वारा अपने अहंकार को गला कर ज्ञान प्राप्ति की महत्ता का विवरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर मिलता है। सुकरात व उनके शिष्य प्लेटो तथा प्लेटो के शिष्य अलक्षेन्द्र एवं गुरजिएफ व आस्पेन्स्की की परम्पराएँ तो बाद के विकास की हैं, जैसा कि ऊपर कहा गया। आदिकाल से ही भारतवर्ष में यह परम्परा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अविद्या-अज्ञान के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़ कर मार्ग दर्शन करें।
साधना को करने के लिए किसी का आतुर हो उठना सहज है। लोग होते भी हैं। भूखे रहने, एक गाँव के बल खड़े होने, कील-कीटों की शय्या पर लेटने, समाज को उपेक्षित-तिरस्कृत कर कही एकान्त में पलायन कर जाने जैसी अनेकानेक क्रियाएँ साधना के नाम पर होती देखी जा सकती हैं। तब क्या इन्हीं की बदौलत वैदिक ऋषि चमत्कारी सामर्थ्य हस्तगत करने देवोपम संस्कृति का निर्माण करने में सफल हुए ? मनीषी ओल्डेन वर्ग के चिन्तनकोश ‘वैदिक सेज एण्ड हिजे कल्चरे’ के पृष्ठों में इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में मिलता है-नहीं उनके अनुसार भभसाधना कर्म के तत्व का ज्ञान और उसकी सामर्थ्य का सही सुनियोजन है।
साधना है। आदिकाल से जब इस सृष्टि की उत्पत्ति अपौरुषेय वाणी के माध्यम से हुई है, गायत्री साधना का अवलम्बन ही त्रिदेवों से लेकर अवतारी सत्ताओं, ऋषि मुनिगणों से लेकर सामान्य नर-नारियों ने लिया तथा अपना प्रगति पथ प्रशस्त किया है। गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। त्रिपदा अर्थात् तीन पद-तीन चरण वाली। तीन शरीर, तीन लोक , तीन ग्रन्थियाँ, तीन गुण, त्रैत ब्रह्म, तीन देव तथा तीन ही शक्तियों का विस्तार इस सृष्टि में माना और उसका विवेचन किया जाता है।
साधना-पद्धतियों का समावेश गायत्री साधना में है। ऋषियों ने उच्चस्तरीय साधना के लिए गायत्री को अलंकारिक रूप में पाँच मुखों वाली बताया है तथा इस माध्यम से सूक्ष्म शरीर के पाँच कोशों की प्रसुप्त क्षमता को जगाने और इस महाविद्या का समुचित लाभ उठाने की बात कही गयी है। कायसत्ता की चेतन प्रयोगशाला में अनुसंधान करने वाले ऋषिगणों ने जीवात्मा के कायकलेवर को अपनी दिव्य दृष्टि से पाँच भागों में विभक्त माना है। ये हैं अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश अर्थात्-जखीरा, भण्डार, खजाना। सारी प्रसुप्त क्षमताएँ-अस्तित्व की पाँच भूमिकाएँ इनमें छिपी पड़ी हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-March
साधना में एकनिष्ठ होकर जुटते हैं और अभीष्ट सफलता प्राप्त करके कृतकृत्य बनते हैं ।
साधना है उसकी । पीड़ितों की सेवा, असहायों की सहायता एकमेव ध्येय है उसका और तुत जानते हो कि देह सत्ता है । सत्ता का ठीक संयम होगा तो चित् और आनन्द उनसे भिन्न नहीं रहेंगे ।
साधना से सिद्धि” उक्ति का अर्थ था-”जीवन का परिष्कार” चिंतन का कायाकल्प व परिस्थितियों का अनुकूलन।” व्यक्ति यदि संकल्पबद्ध पुरुषार्थ करे तो सिद्धियाँ स्वयं उस पर आकर बरसती हैं, यह उनने जीवन भर प्रतिपादित किया। सर्वसाधारण को संभवतः इस तथ्य पर विश्वास न हो अतः हमने यही उचित समझा कि एक साक्षी के रूप में, जीती जागती चित्रकला के रूप में परमपूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़े उन प्रामाणिक प्रसंगों को ही सबके सम्मुख रख दिया जाय ताकि वे स्वयं निर्णय लें कि यह सब क्यों व कैसे हो पाना शक्य बन पड़ा?
साधना उपक्रमों के साथ-साथ आहार को भी महत्वपूर्ण माना गया है। आत्मिक प्रगति भलीभाँति होती रहे, इसके लिए साधना का ही नहीं, वरन् आहार का भी सही और सात्विक चयन आवश्यक है। अस्तु इस पथ के पथिकों को इसके निर्धारण में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि आहार से रक्त और माँस ही नहीं, मन भी बनता है तथा उसका मानसिक कार्यक्षमता पर अनिवार्य रूप से असर पड़ता है। चाय, काफी जैसे गरम व उत्तेजक पदार्थ मन पर उत्साहवर्धक प्रभाव डालते हैं। शीतल पेय पीने पर मुँह एवं पैर में ही ठंडक नहीं लगती, मन भी शान्त होता है।
साधना भी है एवं एक चिकित्सा भी। इसके लिए सबसे पहले शरीर शुद्धि की बात सोची जाती है। शरीर में मल एवं त्याज्य विजातीय द्रव्य यदि संचित हुए रखे हों तो न आहार प्रभाव डाल सकता है, न किसी प्रकार की विलक्षण जड़ी-बूटी। जिस प्रकार सोने के अयस्क को पहले शोधन प्रक्रिया से गुजारा जाता है, तपाया जाता है व फिर शुद्ध सोना निखरकर आता है लगभग उसी प्रकार पहले शरीर का समग्र शोधन किया जाना-तपाया जाना अनिवार्य है। आयुर्वेद में इसीलिए पंचकर्म पर अत्यधिक जोर दिया जाता है।
साधना के संस्कार संचित में कभी नहीं फेंके जाते। वे सदा प्रारब्ध बनाने के लिए चुने जाते हैं।
साधनाएँ इनमें से किसी एक अथवा तीनों के सम्मिश्रण से पूर्ण करते हैं। सामान्य आहार में तीनों के सम्मिश्रण से पूर्ण करते हैं। सामान्य आहार में भी इनको आधार मानकर चला जाय तो उससे शरीर और मन में सात्विकता का अंश और बढ़ेगा, साधना-तपस्या में आशाजनक प्रगति होगी।
साधना का ही नहीं, वरन् आहार का भी सही और सात्विक चयन आवश्यक है। अस्तु इस पथ के पथिकों को इसके निर्धारण में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि आहार से रक्त और माँस ही नहीं, मन भी बनता है तथा उसका मानसिक कार्यक्षमता पर अनिवार्य रूप से असर पड़ता है। चाय, काफी जैसे गरम व उत्तेजक पदार्थ मन पर उत्साहवर्धक प्रभाव डालते हैं। शीतल पेय पीने पर मुँह एवं पैर में ही ठंडक नहीं लगती, मन भी शान्त होता है। क्रोध से उद्विग्न व्यक्ति को ठंडे पेय पीने पर आवेश में कभी अनुभव होती है।
साधना-तपस्या में आशाजनक प्रगति होगी।
साधना में लग चुके थे।
साधना पूरी करूंगा।’ बच्चे की सब बातों का यही साराँश था।
साधना के विरोधी भाव न आवें। कुछ प्रमादवश आ गए तो वे अगले प्रारब्ध बनते समय संचित में चल जाएँगे और फिर मैं साधना में आगे बढूँगा। साधक का पतन नहीं होता। वह जितना चल चुका, अब उससे आगे ही उसे चलना रहता है।
साधना के अतिरिक्त उसे और चाहिए भी था क्या ?
साधना ध्यान-धारण सफल नहीं हो सकती। ऐसा अन्न पेट में जाकर ऐसे उपद्रव खड़े करता है, जिनके कारण मन में न शाँति रहती है, न स्थिरता। इस विग्रह के निवारणार्थ साधक सबसे पहले अपने आहार में सात्विक तत्वों के समावेश का प्रयास करते हैं। इस प्रयोजन के लिए मिर्च-मसालों से रहित सात्विक अन्न सर्वाधिक उपयोगी है।
साधना विज्ञान में विभिन्न प्रकार के साधना उपक्रमों के साथ-साथ आहार को भी महत्वपूर्ण माना गया है। आत्मिक प्रगति भलीभाँति होती रहे, इसके लिए साधना का ही नहीं, वरन् आहार का भी सही और सात्विक चयन आवश्यक है। अस्तु इस पथ के पथिकों को इसके निर्धारण में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि आहार से रक्त और माँस ही नहीं, मन भी बनता है तथा उसका मानसिक कार्यक्षमता पर अनिवार्य रूप से असर पड़ता है। चाय, काफी जैसे गरम व उत्तेजक पदार्थ मन पर उत्साहवर्धक प्रभाव डालते हैं। शीतल पेय पीने पर मुँह एवं पैर में ही ठंडक नहीं लगती, मन भी शान्त होता है।
साधना करके पूर्ण हो सकता है।’
साधना को इस जीवन में भी पूर्ण न कर सके।” सवाल पूछने वाला बच्चे को आदरपूर्वक ही सम्बोधित कर रहा था, क्योंकि उसे मालूम था कि उपेक्षा इसे असन्तुष्ट कर सकती है।
साधना के अनुरूप उपयुक्त सात्विक आहार का निर्णय और निर्धारण करना चाहिए। ऐसा आहार स्वास्थ्य की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण होता ही है, उसका मुख्य लक्ष्य अन्तःकरण चतुष्ट्य का स्तर तमोगुणी, रजोगुणी भूमिका से ऊँचा उठाकर सतोगुणी स्तर तक पहुँचाना है इसीलिए साधना विज्ञान में आहार को इतना महत्वपूर्ण माना गया है और उसके चयन में पूर्ण सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।
साधना जो कल्प प्रक्रिया से जुड़ी है, इसीलिए अस्वादव्रत को प्रधानता देती आयी है क्योंकि इससे मनोबल की परीक्षा होती है-आत्मानुशासन का कड़ा अभ्यास होता है व मन के मजबूत बन पड़ने पर आगे वह पृष्ठभूमि बन जाती है, जिसके आधार पर और भी विशिष्ट प्रयोग आहार एवं औषधि के किये जा सकें। शाँतिकुँज में गायत्री तीर्थ के आरण्यक में इसी कारण अस्वाद का साप्ताहिक अभ्यास हर साधक को कराया जाता है ताकि वे इन्द्रियसंयम का अभ्यास करते चल सकें। अध्यात्म उपचार जो परम पूज्य गुरुदेव ने जन-जन के लिए सुलभ बनाये हैं, में उनने किसी प्रकार के अतिवाद से बचने व सरल-सूत्रों को हृदयंगम किये जाने पर विशेष जोर दिया है। यदि इतना भर होता चले तो व्यक्ति नीरोग व दीर्घायुष्य भरा जीवन जी सकता है।
साधना में संलग्न रह कर ऐसे दिव्य आध्यात्मिक प्रवाह विकीर्ण कर रहे हैं, जो अगले दिनों समस्त संसार में युगान्तरकारी परिवर्तन लाने में समर्थ सिद्ध होंगे। उनके आध्यात्मिक विचार इतने क्रान्तिकारी होंगे कि उस चिनगारी के ज्वालमाल में बदलने और देखते-देखते पूरी दुनिया में फैल जाने का दृश्य लोगों को आश्चर्य में डाले बिना न रहेगा। लोग उनकी सशक्त, प्रगतिशील और वर्तमान समस्याओं का सर्वमान्य हल सुझाने वाली विचारधारा को अपनाने में ही अपनी एवं सम्पूर्ण विश्व की भलाई समझेंगे। इस प्रकार विश्व धीरे-धीरे अध्यात्म की ओर झुकता चला जायेगा और पूर्णतः अध्यात्मवादी बन जायेगा, जो लम्बे काल तक लोगों को इस धरित्री में ही स्वर्ग की सुखद अनुभूति कराता रहेगा।”
साधनाओं के साथ सही आहार व औषधि ली जाय तो वस्तुतः कल्प प्रक्रिया आज भी संभव है, यह ब्रह्मवर्चस् ने शोध द्वारा निर्धारण कर प्रतिपादित ही नहीं वरन् प्रयोग रूप में करके भी दिखाया है। कल्प एक साधना भी है एवं एक चिकित्सा भी। इसके लिए सबसे पहले शरीर शुद्धि की बात सोची जाती है। शरीर में मल एवं त्याज्य विजातीय द्रव्य यदि संचित हुए रखे हों तो न आहार प्रभाव डाल सकता है, न किसी प्रकार की विलक्षण जड़ी-बूटी। जिस प्रकार सोने के अयस्क को पहले शोधन प्रक्रिया से गुजारा जाता है, तपाया जाता है व फिर शुद्ध सोना निखरकर आता है लगभग उसी प्रकार पहले शरीर का समग्र शोधन किया जाना-तपाया जाना अनिवार्य है।
साधना करते-करते पदार्थों की विविधता में ही उलझ कर रह गये । पशु-पक्षी, अन्य जन्तु, मछलियाँ, साँप, कीड़े, मकोड़ों में शरीरों और प्रवृत्तियों की भिन्नता होने पर भी शुद्ध अहंकार और चेतना की एकता तो समझ में आ गयी, पर विस्तृत पहाड़, टीले, जंगल, नदी, नाले, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकाश, और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध खनिज , धातुएँ, गैसें, ठोस आदि क्या हैं ? क्यों हैं ? और इनमें यह विविधता कहाँ से आयी है ? यह उनकी समझ में नहीं आया।
साधना विज्ञान में आहार को इतना महत्वपूर्ण माना गया है और उसके चयन में पूर्ण सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।
साधना में भाग लेने वाले उन सभी संकल्पनिष्ठों को जो अपना समय समाज व संस्कृति के लिए निकालेंगे, इसी निमित्त जुटाया जाएगा व यह वर्ष विशेष रूप से देव संस्कृति विस्तार वर्ष के रूप में मनाया जाएगा।
साधना में आगे बढूँगा। साधक का पतन नहीं होता। वह जितना चल चुका, अब उससे आगे ही उसे चलना रहता है।
साधना स्थल बनाया, यह वृद्ध वनवासी कोल उनके यहाँ सूखी समिधाएं, कन्द और फल प्रतिदिन रख जाता है। वह आता है, भूमि में मस्तक रखकर ऋषि को प्रणाम करता है, अपना गट्ठर एक ओर रखता है समिधाएँ एक ओर और फल तथा कुछ बड़े-बड़े पते एक ओर रखकर गुहा के आस-पास की भूमि बुहारने लगता है और यह काम पूरा करके फिर भूमि पर मस्तक रखकर चला जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-January
साधना का प्रश्न है जिव्हा और हृदय दोनों का सहयोगात्मक समन्वय अनिवार्य है ।
साधना है । उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है । अपने हर विचार और कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है । जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया वहाँ तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ अनीति देखी, तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है ।
साधना विज्ञान का अनिवार्य पक्ष है । उसके लिए यही करना पड़ता है कि चिन्तन क्षेत्र में अवाँछनीयताएँ उद्दण्डतायें पनपने न पायें । जब उठें तो तत्काल उन्हें खेत के खरपतवार की तरह उखाड़ फेंका जाय । आँगन के कूड़ा करकट की तरह बुहार दिया जाय ।
साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है । अपने हर विचार और कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है । जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया वहाँ तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ अनीति देखी, तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है ।
साधना से निश्चित ही सिद्धि की दिशा में पथ प्रशस्त होगा। जो भी संकल्प सूत्रों से बँधेंगे, उन्हें पूर्णाहुति यहीं आकर गायत्री जयंती (8,9,10 जून 1992) पर करनी होगी। स्मरण रखा जाना चाहिए कि आहुतियाँ यज्ञ में किसी की व्यक्तिगत भी हो सकती हैं पर पूर्णाहुति सभी एक साथ एक स्थान पर ही करते हैं।
साधनाओं में ध्यान को प्रधानता दी गई है। इसके बिना इस क्षेत्र में बढ़ सकना संभव ही नहीं हो सकता। जिनकी अति चंचल प्रकृति है, जिन्हें अध्यात्म क्षेत्र का कुछ भी अनुभव नहीं है, उन्हें चिंतन को इस प्रयोजन के लिये एकाग्र करने तथा गहराई में उतरने के लिये आकर्षक उपचार खड़े करने पड़ते हैं। देव पूजा के लिये प्रतिमाओं का आधार बनाया जाता है और उनकी अर्चना के लिये कतिपय कर्मकाण्डों के विधान बनाये जाते हैं। देव प्रतिमाओं की आकृति यौवन से उत्फुल्ल नख-शिख तक आकर्षक होती है।
साधना । इसमें साँस लेते समय सो, बाहर निकालते समय “हम्” की ध्वनि प्रकट होने की कल्पना करनी चाहिए । सो अर्थात् वह परमेश्वर वह साँस के साथ अन्तराल में प्रवेश करता है और अन्तःचेतना के कण-कण में अपनी विशिष्टता भर देता है । साँस छोड़ते समय जो “हम “ की ध्वनि होती है उस समय सोचना चाहिए कि अपना अहंकार तिरस्कृत बहिष्कृत होकर चिन्तर और भाव क्षेत्र को छोड़कर बहिर्गत हो रहा है । अहंकार मिट जाने पर आत्म सत्ता का स्वरूप “तत्वमसि” “अयमात्मा ब्रह्म “ जैसा बन रहा है और आत्मा में परमात्मा का रूप ओतप्रोत दृष्टिगोचर हो रहा है यह भावना नियमित अभ्यास द्वारा परिपक्व बनायी जाती है ।
साधना को निरालस्य अप्रमत्त भाव से करता रहे तो प्राकृतिक शक्तियों को भी विवश होकर उसकी मदद करनी पड़ती है। सभी विघ्नों के बावजूद अन्तिम परिणाम है, निष्ठ की विजय।”
साधना वर्ष की पूर्णाहुति हेतु संकल्पित भागीदारी का आह्वान
साधना व शिथिलीकरण के अभ्यास के साथ-साथ गायत्री मंत्र का ध्यान सहित मानसिक जप भी सोने में सुहागा सिद्ध होता है, ऐसे प्रयोग बताते हैं। प्रातः सायं जाग्रत प्राणमय वातावरण में चल रहे दैनन्दिन क्रम में सम्मिलित होना, श्रेष्ठता की प्रेरणा देने वाले गीतों का श्रवण भी तनावमुक्ति का एक श्रेष्ठतम उपाय है। इतना यदि नियमित रूप से किया जा सके तो समझना चाहिए कि व्यक्ति के जीवन में तनावजन्य परिस्थितियाँ कभी आएँगी ही नहीं । नवयुग के लिए आत्मबल सम्पन्न महामानव जन्में, इसके लिए तनाव जैसी युग व्याधि का उपचार इस प्रकार विचारना ही होगा।
साधना भी अन्योन्याश्रित हैं । एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा । इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्ममार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है ।
साधना आयोजनों की एक अभूतपूर्व व महत्वपूर्ण फलश्रुति है-जन-जन में आत्मबल का संचार, प्रतिकूलताओं से लड़ने हेतु साहस का अभिवर्धन तथा सूक्ष्मजगत में संव्याप्त विषाक्तता का शमन। प्रत्येक के मन में आशावादी उत्साह का संचार हुआ है व उसे लगा है कि आत्मशक्ति के उपार्जन-गायत्री महाशक्ति के आश्रम में की गयी साधना द्वारा भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है। गायत्री उपासना की सार्वभौम सत्ता को सबने एक स्वर से सादर स्वीकारा है व सामूहिक आध्यात्मिक पुरुषार्थ की दिशा में संघबद्ध प्रयास गतिशील हुए हैं। अब इस वसंतपर्व से एक कदम और इस दिशा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। वह है ब्राह्मीचेतना से और अधिक तादात्म्य जोड़ने-शक्ति स्रोत से स्वयं को संबंधित करने के लिए व्यक्तिगत उपासना का स्तर बढ़ा देना।
साधना पराक्रम का प्रतिफल भी अति विशिष्ट होगा, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
साधना में हर भावनाशील को अपनी भागीदार सुनिश्चित करनी चाहिए। यह अवसर कभी-कभी ही आते हैं, ऐसा मानते हुए फरवरी माह के प्रथम सप्ताह तक सभी पत्राचार द्वारा अपना पंजीकरण शाँतिकुँज में करा लें।
साधना नहीं। यह असंख्य सिद्धियों का द्वार खोलती है। रास्ता लम्बा जरूर है, श्रम साध्य एवं कष्ट साध्य भी। किन्तु इस मार्ग का अवलम्बन लेने वाले किस तरह श्रेयार्थी बनते प्रगति के उच्चतम सोपानों का पार करते चले जाते हैं, यह महामानवों के जीवन को देखकर भली भाँति जाना जा सकता है।
साधना वर्ष की घोषणा तभी हुई व सारे भारत व विश्व भर में तीन दिवसीय अखण्ड जप आयोजनों की घोषणा हुई व दो सौ चालीस टोलियों द्वारा यह कार्य संपन्न किया जाने लगा । प्रथम पुण्यतिथि पर संपन्न अखण्ड जप व शाँतिकुँज की दैवी चेतना का एक अंश इस प्रकार सारे देश ही नहीं विश्व के कोने-कोने में यहाँ से भेजे गए अग्रदूतों के माध्यम से पहुँचा है व इसने प्रसुप्त देवात्म शक्ति को जागने व जन-जन में देवत्व का उभारने का एक महत्वपूर्ण कार्य पूरा किया है ।
साधना के साथ उच्चारण करती है तो उस शब्द समूह को ‘मन्त्र’ कहते हैं। मन्त्रों की चमत्कारी शक्ति से अध्यात्म विज्ञान का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। जप के बिना किसी धर्म सम्प्रदाय की कोई साधना नहीं हो सकती। इसे आत्मशक्ति सम्वर्धन का मूल स्रोत कहा गया है।
साधना का भी है । हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए । जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और संतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए । इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है । उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है ।
साधना की प्रखरता इसी कसौटी पर परखी जाती है। इसी से अपना भला होता है इसी से संसार का।
साधना की जा सके तो अदृश्य और अप्रत्यक्ष विभूतियाँ हमारे जीवन में दृश्य और प्रत्यक्ष हो सकती हैं ।
साधना के द्विविध मार्ग को अपनाकर व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है । पूर्णता प्राप्त करने ऋद्धि-सिद्धियों से भरापूरा सफल जीवन जीने का यही राजमार्ग है ।
साधना उसी रूप में अपने परिणाम प्रस्तुत करेगी । वाणी के संयम और भावों के परिशोधन के बिना जा मन्त्र जप की उपलब्धियाँ बटोरना चाहते हैं उन्हें निराश होना स्वाभाविक है । यदि सत्य प्रिय हितकारक वचनों के रूप में वाक् देवी की अर्चना की जा सके आत्मीयता, उदारता, गहन श्रद्धा आदि अनेकानेक सद्भावों के पुष्प हृदय देवता पर चढ़ाए जा सके सभी मन्त्र विद्या के महान विज्ञान की प्राप्ति के हम अधिकारी बन सकते हैं । ऐसी स्थिति में शब्द ब्रह्म की भावनापूर्वक साधना की जा सके तो अदृश्य और अप्रत्यक्ष विभूतियाँ हमारे जीवन में दृश्य और प्रत्यक्ष हो सकती हैं ।
साधना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । आध्यात्मिक प्रगति के लिए दोनों अवलम्बनों को साथ-साथ लेकर चलना अनिवार्य है । अन्यथा एक के बिना दूसरा अपूर्ण है । जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं । एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा ।
साधना पुरुषार्थ की परोक्ष भूमिका द्वारा वातावरण को इस कदर इतना गर्म किया कि एक साथ गाँधी, विनोबा, सुभाष चन्द्र बोस, भगतसिंह, आजाद प्रभृति इतने महामानवों का अवतरण हुआ जिनने गुलामी के पाश को एक झटके में तोड़ कर देश को स्वतंत्र बना दिया।
साधना करता और तद्नुसार शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों का पूर्ण विकास करता है । शास्त्र कथन है कि जिस प्रकार समुद्र को पार करने का नौका एक उत्तम उपाय है , उसी प्रकार इस संसार से पार होने का उत्कृष्ट साधन ब्रह्मचर्य है ।
साधना, आराधना का अवलम्बन अपनाया जा सकता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी का अवगाहन का पुण्य फल इतना ही है कि जीवन को परिष्कृत, समुन्नत, एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। इतना बन पड़े तो खिले हुए फूल पर मंडराने वाले भौरों की तरह अनेक दैवी अनुग्रह और वरदान अनायास ही अपनी समीपता का परिचय देने लगते हैं।
साधना के अखण्ड जप आयोजनों का उद्देश्य था कि शक्ति का बीजारोपण विश्व मात्र में कण-कण में हो । सामूहिक शक्ति के , देवात्मशक्ति के जागरण की प्रक्रिया का यह पूर्वार्ध था । अब उत्तरार्ध है व्यक्ति की निज की आत्मशक्ति का जागरण । इसके लिए शक्ति उन्हें केन्द्र से मिलेगी न्यूनतम व्यक्तिगत साधना वे करेंगे तथा चार माह बाद इसकी पूर्णाहुति शाँतिकुँज आकर गायत्री जयंती , जो परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि है, पर 8-9-10 जून 1992 की तारीखों में आयोजित तीन दिवसीय सत्र में करेंगे। यह विशिष्ट सत्र एक विशिष्ट समारोह में रूप में मनाया जाएगा जिसमें देव संस्कृति के उद्धार एवं विश्वव्यापी विस्तार की शपथ सभी उपस्थित मूर्धन्य साधकों द्वारा ली जाएगी।
साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं । जितना महत्व उपासना का है उतना ही साधना का भी है । हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए । जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और संतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए । इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है ।
साधना परस्पर गुँथे हुए है । दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है एवं एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायगी, यह सोचना उचित नहीं ।
साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए । जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और संतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए । इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है । उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है । अपने हर विचार और कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है ।
साधना भी अनिवार्य है । गायत्री की भावनात्मक पूजा की तरह ही सद्आचरण द्वारा भी उपासना की जा सकती है । हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने गुण , कर्म , एवं स्वभाव में सात्विकता का , पवित्रता प्रखरता का समुचित विकास करके जीवन को दिव्य बनावें और उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें । अभिन्न रूप से जुड़े उपासना-साधना के द्विविध मार्ग को अपनाकर व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है । पूर्णता प्राप्त करने ऋद्धि-सिद्धियों से भरापूरा सफल जीवन जीने का यही राजमार्ग है ।
साधना को वर्तमान दलदल से सुरक्षित बच निकलने का सर्वोत्तम और सर्वोपरि हल बताते हैं। उनके अनुसार हर व्यक्ति में वह तत्व विद्यमान है, जिसे यदि प्रयासपूर्वक उभारा जा सके, तो न सिर्फ कर्ता आनन्द की गंगोत्री में अहर्निशि निमज्जन करता रह सकेगा, वरन् संपर्क में आने वाले अन्य अनेकों को इससे लाभान्वित कर सकेगा।
साधना अथवा साधना है । उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है । अपने हर विचार और कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है । जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया वहाँ तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ अनीति देखी, तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है ।
साधनाएँ यही सिखाती हैं कि कैसे अनगढ़ता से सुगढ़ता की यात्रा पूरी की जाय। चिंतन को कैसे परिष्कृत किया जाय तथा आत्मसत्ता को विराट सत्ता के प्रति समर्पित होने का शिक्षण कैसे दिया जाय? इतना भर करने से ऋद्धि-सिद्धियों का रहस्योद्घाटन अपने ही अंतराल से होने लगता है।
साधना द्वारा बिखराव का एकीकरण मनःशक्ति का सुनियोजन कर मनोविकारों एवं भ्रान्तियों का शमन तथा शरीर को स्वस्थता प्रदान करने वाले विचारों, बहिरंग के उद्दीपनों का प्रयोग। शिथिलीकरण के अभ्यास द्वारा शारीरिक व मानसिक तनाव का प्रबन्ध।
साधना नहीं हो सकती। इसे आत्मशक्ति सम्वर्धन का मूल स्रोत कहा गया है।
साधना की जाय तो सफलता के अंतिम शिखर पर चढ़ते-चढ़ते वहाँ पहुँचा हुए हैं ।
साधनात्मक मनोयोग का भी हो सकता है और परमार्थ परायण सेवा साधना के प्रति प्रबल उत्साह और प्रवाह के रूप में भी इसे मोड़ा जा सकता है । आदर्शवादी तत्परता ऐसी होनी चाहिए कि हर समय उच्चस्तरीय चिन्तन में ही मन रमा रहे । परमार्थ स्तर की योजनायें ही बनती रहें । इतना ही नहीं , वरन् क्रियाकलाप भी ऐसे होने चाहिए जिसमें शरीर का श्रम, समय और मन का एकाग्र भाव पूरी तरह नियोजित रहे ।
साधना की प्रेरणा के रूप में जन्मा व अखण्ड जप प्रधान कार्यक्रमों द्वारा विगत गायत्री जयन्ती से पूरे राष्ट्र व विश्व की देवात्मशक्ति को मथने का कार्य शाँतिकुँज तंत्र द्वारा संपन्न किया गया । साधनात्मक पराक्रम का महत्व सभी की समझ में आया एवं सामूहिक तप साधना की एक शृंखला विश्वस्तर की समस्याओं के समाधान के लिए पूरे विश्व भर में संपन्न हुई । तज ही वस्तुतः शक्ति का मूलस्रोत है जिसके आधार पर सूक्ष्म जगत की प्रतिकूलताओं से मोर्चा लिया जा सकता है । गंगा को धरती पर लाने जैसा पुरुषार्थ करने के लिए भगीरथ को प्रचण्ड स्तर का तप करना पड़ा था । भगवान को अपनी गोदी में खिला सकें , इसके लिए स्वयंभू मनु और रानी शतरूपा को कठिन तपस्या करनी पड़ी थी ।
साधनाओं के अंतर्गत प्रायः इष्टदेव की क्रूरकर्मा छवियों का आश्रय लिया जाता है।
साधनाओं का लक्ष्य होता है। ध्यान जब भी किया जाय, इस चिन्तन के साथ किया जाय तो सार्थक भी होता है व अन्तरंग- बहिरंग में अनेकानेक परिवर्तन भी लाता है। हम अपने भाग्यविधाता स्वयं हैं, यह बोध सतत् करते हुए अंतर्जगत का प्रबल पुरुषार्थ करते चलें तो हमारी वह यात्रा आरंभ होती है, जिसका लक्ष्य है देवतत्व श्रेष्ठता-उत्कृष्टता। यही तो हम सबका इष्ट भी है गंतव्य भी।
साधना आयोजनों की शृंखला चली है, उसके सारे अब तक के महत्वपूर्ण निर्धारण चली है, वसन्तपर्व पर होते रहे है । वसंत पंचमी परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस है । अपनी परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता से बाल्यकाल में साक्षात्कार उनका इसी दिन हुआ था । अखण्ड दीपक का प्रज्ज्वलन से लेकर चौबीस महापुरश्चरणोँ का शुभारम्भ, “अखण्ड-ज्योति “ पत्रिका से लेकर गायत्री परिवार की स्थापना, आर्षग्रन्थों के भाष्य से लेकर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिकल्पना तथा युग निर्माण योजना के सूत्रपात से लेकर देश भर में चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण के संकल्प इसी पावन वेला में लिये गये । ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व गायत्री नगर की स्थापना इसी पावन दिन हुई ।
साधनात्मक पराक्रम का महत्व सभी की समझ में आया एवं सामूहिक तप साधना की एक शृंखला विश्वस्तर की समस्याओं के समाधान के लिए पूरे विश्व भर में संपन्न हुई । तज ही वस्तुतः शक्ति का मूलस्रोत है जिसके आधार पर सूक्ष्म जगत की प्रतिकूलताओं से मोर्चा लिया जा सकता है । गंगा को धरती पर लाने जैसा पुरुषार्थ करने के लिए भगीरथ को प्रचण्ड स्तर का तप करना पड़ा था । भगवान को अपनी गोदी में खिला सकें , इसके लिए स्वयंभू मनु और रानी शतरूपा को कठिन तपस्या करनी पड़ी थी । सृष्टि की संरचना में हाथ डालने से पूर्व ब्रह्माजी को भी उग्र तपस्या संपन्न करनी पड़ी थी ।
साधनाओं की सिद्धि इतनी ही है कि मानवी चेतना को उस जाल जंजाल से परित्राण मिले जो लक्ष्य को विस्मृत करती और कुत्साओं के अनेकानेक प्रतिपादनों का एक मात्र उद्देश्य है कि व्यक्ति आत्मबोध की भूमिका से जाग पड़े । उस प्रसुप्ति से छुटकारा पाये जिसमें वासना, तृष्णा और अहंता का गुलाम बनकर नर वानर की तरह निरर्थक उचक मचक करते रहने की उसकी आदत पड़ जाती है । पेट और प्रजनन के लिए पशु जीते हैं । मनुष्यों में भी कितने ही नर पशु होते हैं जिन्हें लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं । वह सत्य को उतने तक ही सीमित मान लेते हैं जो इन्द्रियों की ललक के सहारे अनुभव में आता है ।
साधना है ।
साधना से सिद्धि का प्रसंग आए तो हमें जानना चाहिए कि पात्रता का विकास आत्मशोधन, परोपकार के अर्जन से बड़ी कोई योग साधना नहीं। यह असंख्य सिद्धियों का द्वार खोलती है। रास्ता लम्बा जरूर है, श्रम साध्य एवं कष्ट साध्य भी। किन्तु इस मार्ग का अवलम्बन लेने वाले किस तरह श्रेयार्थी बनते प्रगति के उच्चतम सोपानों का पार करते चले जाते हैं, यह महामानवों के जीवन को देखकर भली भाँति जाना जा सकता है।
साधना में अंतःकरण को प्रबल बनाना पड़ता है। वह मन पर अनुशासन स्थापित करने के लिये तत्पर होता है। उसके अनगढ़पन को- अल्हड़पन को उच्छृंखलता छोड़ने और व्यवस्था के अंतर्गत रहने के लिये सधाता है । यह कार्य लगभग वैसा ही है जैसा कि सरकस के लिये हिंस्र पशुओं को साधने सिखाने के लिये रिंग मास्टर द्वारा किया जाता है । ध्यान में न केवल मन की अनियंत्रित भाग-दौड़ को रोक कर किसी सीमित परिधि में चिन्तन करने के लिये विवश किया जाता है वरन् उसे सदुद्देश्य अपना कर उपयोगी मार्ग पर चलने के लिये भी सहमत किया जाता है ।
साधना के उपक्रम में हर परिजन को ब्राह्ममुहूर्त में सूर्योदय से 1/2 घण्टे पूर्व से 1/2 घण्टे बाद तक की अवधि में कोई समय निकालकर उपासना विशेषाँक (अक्टूबर 91) में बताए गए विधि-विज्ञान द्वारा न्यूनतम 1/2 घण्टे जप की व्यवस्था बनानी चाहिए। इस अवधि में शाँतिकुँज पहुँचने, प्रखर-प्रज्ञा-सजल श्रद्धा का दर्शन कर अखण्ड दीपक का दर्शन तथा वंदनीया माताजी के आशीर्वाद से तीनों शरीरों में शक्ति−संचार का ध्यान करना है। सप्ताह में एक बार अग्निहोत्र की भी व्यवस्था बनायी जाय। गायत्री चालीसा का पारायण जितना संभव हो सके, स्वयं भी करें व दस सहयोगी परिजनों को करायें, प्रेरित करें। आत्मशक्ति का उपार्जन हर साधक कर सके इसके लिए यह न्यूनतम उपाय-उपचार हैं कहना न होगा कि दैवी विभूतियाँ बरसने से लेकर सम्मान-सहयोग की प्राप्ति तथा मनोकामनाओं की पूर्ति से लेकर वातावरण अपनी इच्छानुकूल बनने जैसे चमत्कार इसी उपासनापरक पुरुषार्थ की ही फलश्रुति है।
साधना से विरत नहीं देखा गया। आज वे ही मोहमयी (आज की बम्बई) के सम्मुख किसी सागरस्थ उपत्यिका तक जा रहे थे।
साधना कक्ष में चले गए व एक घण्टे बाद निकल कर बोले कि कोई भी शिवशंकर का बाल नहीं बांका कर सकता, उनने अपने समीपस्थ एक चिकित्सक कार्यकर्ता को उनके साथ दिल्ली रवाना किया व घरवालों को आश्वस्त करने को कहा। उनकी पत्नी के लिए कहलवाया कि तेरा सुहाग हम अभी जिन्दा रखेंगे, अभी उसका समय नहीं आया है। सभी इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि मस्तिष्क में बढ़ रहे रक्त के दबाव को कम नहीं किया गया तो वाइटल सेर्ण्टस पर प्रभाव पड़ने से कभी भी जान जा सकती है व यह निर्णय तुरन्त लिया जाना चाहिए। दिल्ली से हरिद्वार फोन करने पर यही कहा गया कि ऑपरेशन नहीं कराना है। बेहोशी माँ गायत्री की कृपा से टूटेगी।
साधना के प्रति प्रबल उत्साह और प्रवाह के रूप में भी इसे मोड़ा जा सकता है । आदर्शवादी तत्परता ऐसी होनी चाहिए कि हर समय उच्चस्तरीय चिन्तन में ही मन रमा रहे । परमार्थ स्तर की योजनायें ही बनती रहें । इतना ही नहीं , वरन् क्रियाकलाप भी ऐसे होने चाहिए जिसमें शरीर का श्रम, समय और मन का एकाग्र भाव पूरी तरह नियोजित रहे ।
साधना द्वारा भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है। गायत्री उपासना की सार्वभौम सत्ता को सबने एक स्वर से सादर स्वीकारा है व सामूहिक आध्यात्मिक पुरुषार्थ की दिशा में संघबद्ध प्रयास गतिशील हुए हैं। अब इस वसंतपर्व से एक कदम और इस दिशा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। वह है ब्राह्मीचेतना से और अधिक तादात्म्य जोड़ने-शक्ति स्रोत से स्वयं को संबंधित करने के लिए व्यक्तिगत उपासना का स्तर बढ़ा देना। निजी स्तर पर शाँतिकुँज की दैवीचेतना के ध्यान के साथ न्यूनतम आधा घण्टा गायत्री जप अब अभी संकल्पित साधकों द्वारा किया जाना चाहिए।
साधना की एक शृंखला विश्वस्तर की समस्याओं के समाधान के लिए पूरे विश्व भर में संपन्न हुई । तज ही वस्तुतः शक्ति का मूलस्रोत है जिसके आधार पर सूक्ष्म जगत की प्रतिकूलताओं से मोर्चा लिया जा सकता है । गंगा को धरती पर लाने जैसा पुरुषार्थ करने के लिए भगीरथ को प्रचण्ड स्तर का तप करना पड़ा था । भगवान को अपनी गोदी में खिला सकें , इसके लिए स्वयंभू मनु और रानी शतरूपा को कठिन तपस्या करनी पड़ी थी । सृष्टि की संरचना में हाथ डालने से पूर्व ब्रह्माजी को भी उग्र तपस्या संपन्न करनी पड़ी थी ।
साधना पुरुषार्थ में प्रवृत्त होने का मार्गदर्शन करें । उसी के निमित्त एक विराट श्रद्धाँजलि समारोह अक्टूबर 1990 में संपन्न हुआ तथा तब से परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म व कारण सत्ता के सतत् संरक्षण व परम वंदनीया माताजी के मार्ग दर्शन में इस विराट मिशन ने अपनी यात्रा तय करते-करते एक मंजिल पूरी की है । इसी क्रम में विगत गायत्री जयंती पर प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर पाँच दिवसीय अखण्ड जप प्रधान कार्यक्रम का आयोजन शाँतिकुँज में किया गया तथा पाँच दिन में दस हजार से अधिक व्यक्तियों द्वारा चौबीस करोड़ गायत्री मंत्रों का जाप एक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के रूप में संपन्न हुआ । शक्ति साधना वर्ष की घोषणा तभी हुई व सारे भारत व विश्व भर में तीन दिवसीय अखण्ड जप आयोजनों की घोषणा हुई व दो सौ चालीस टोलियों द्वारा यह कार्य संपन्न किया जाने लगा । प्रथम पुण्यतिथि पर संपन्न अखण्ड जप व शाँतिकुँज की दैवी चेतना का एक अंश इस प्रकार सारे देश ही नहीं विश्व के कोने-कोने में यहाँ से भेजे गए अग्रदूतों के माध्यम से पहुँचा है व इसने प्रसुप्त देवात्म शक्ति को जागने व जन-जन में देवत्व का उभारने का एक महत्वपूर्ण कार्य पूरा किया है ।
साधना है । जबकि उपासना मनोभूमि में उगने वाला बीज है, जिसके फलने-फूलने की आशा तभी की जा सकती है जब मनोभूमि का उसी प्रकार परिष्कार किया जाय जिस प्रकार कृषक अपने खेतों का करता है । खेत में बीज डालने से पूर्व वह पहले उसे पानी से भर कर उसकी अच्छी तरह जुताई करता है । कूड़ा कचरा निकालता है । खाद डालता है तब भूमि इस योग्य हो पाती है कि उसमें बीज डालने और उसके उगने की संभावनायें सुनिश्चित होती हैं ।
साधना वर्ष की समापन अवधि के अंतिम चार माह “शक्ति संचार” प्रक्रिया के हों, शक्ति साधना के अखण्ड जप आयोजनों का उद्देश्य था कि शक्ति का बीजारोपण विश्व मात्र में कण-कण में हो । सामूहिक शक्ति के , देवात्मशक्ति के जागरण की प्रक्रिया का यह पूर्वार्ध था । अब उत्तरार्ध है व्यक्ति की निज की आत्मशक्ति का जागरण । इसके लिए शक्ति उन्हें केन्द्र से मिलेगी न्यूनतम व्यक्तिगत साधना वे करेंगे तथा चार माह बाद इसकी पूर्णाहुति शाँतिकुँज आकर गायत्री जयंती , जो परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि है, पर 8-9-10 जून 1992 की तारीखों में आयोजित तीन दिवसीय सत्र में करेंगे। यह विशिष्ट सत्र एक विशिष्ट समारोह में रूप में मनाया जाएगा जिसमें देव संस्कृति के उद्धार एवं विश्वव्यापी विस्तार की शपथ सभी उपस्थित मूर्धन्य साधकों द्वारा ली जाएगी।
साधना में एकाग्रता का तथा मनोयोगपूर्वक गंभीर चिंतन का अभ्यास होता है। इसमें जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसकी मानसिक प्रखरता उतनी ही तीक्ष्ण होती चली जायेगी। कहना न होगा कि इस उपलब्धि के कारण न केवल आत्मिक क्षेत्र में वरन् भौतिक क्षेत्र में विचित्र प्रकार की सफलताएँ प्राप्त होती हैं। ध्यान-धारणा के सहारे उपलब्ध होने वाली मानसिक प्रखरता जीवन के हर क्षेत्र में सहयोगी बनकर सफलताओं का द्वार खोलती है। आत्मिक प्रगति का उद्देश्य तो पूरा होता ही है।
साधना द्वारा शक्ति का उपार्जन करें व आने वाले युग परिवर्तन के लिए जनमानस को साधना पुरुषार्थ में प्रवृत्त होने का मार्गदर्शन करें । उसी के निमित्त एक विराट श्रद्धाँजलि समारोह अक्टूबर 1990 में संपन्न हुआ तथा तब से परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म व कारण सत्ता के सतत् संरक्षण व परम वंदनीया माताजी के मार्ग दर्शन में इस विराट मिशन ने अपनी यात्रा तय करते-करते एक मंजिल पूरी की है । इसी क्रम में विगत गायत्री जयंती पर प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर पाँच दिवसीय अखण्ड जप प्रधान कार्यक्रम का आयोजन शाँतिकुँज में किया गया तथा पाँच दिन में दस हजार से अधिक व्यक्तियों द्वारा चौबीस करोड़ गायत्री मंत्रों का जाप एक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के रूप में संपन्न हुआ । शक्ति साधना वर्ष की घोषणा तभी हुई व सारे भारत व विश्व भर में तीन दिवसीय अखण्ड जप आयोजनों की घोषणा हुई व दो सौ चालीस टोलियों द्वारा यह कार्य संपन्न किया जाने लगा । प्रथम पुण्यतिथि पर संपन्न अखण्ड जप व शाँतिकुँज की दैवी चेतना का एक अंश इस प्रकार सारे देश ही नहीं विश्व के कोने-कोने में यहाँ से भेजे गए अग्रदूतों के माध्यम से पहुँचा है व इसने प्रसुप्त देवात्म शक्ति को जागने व जन-जन में देवत्व का उभारने का एक महत्वपूर्ण कार्य पूरा किया है ।
साधना वे करेंगे तथा चार माह बाद इसकी पूर्णाहुति शाँतिकुँज आकर गायत्री जयंती , जो परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि है, पर 8-9-10 जून 1992 की तारीखों में आयोजित तीन दिवसीय सत्र में करेंगे। यह विशिष्ट सत्र एक विशिष्ट समारोह में रूप में मनाया जाएगा जिसमें देव संस्कृति के उद्धार एवं विश्वव्यापी विस्तार की शपथ सभी उपस्थित मूर्धन्य साधकों द्वारा ली जाएगी। युगसंधि की विषम वेला में एक विराट अभियान की शुरुआत का यह प्रारंभिक चरण होगा जिसकी फलश्रुतियाँ परिजन अगले दिनों साकार होती देखेंगे।
साधना जप-तप करता है यह सब कुछ उसके व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित है, पर सामाजिक जीवन को कितना शिष्ट, सुसंस्कृत एवं सुव्यवस्थित बनाया गया, इस आधार पर ही उसके व्यक्तित्व की प्रभाव परिधि और सुविकसित स्तर को आँका जा सकना संभव है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-April
साधना व सर्वोपरि लक्ष्य है। इन विपरीत विचार तरंगों से ऋषि तिलमिला उठे। बेचैनी उनके चेहरे पर स्पष्ट झाँकने लगी। निर्णय करने की बुद्धि जाती रही । वे दुविधा में ही पड़े थे कि आवाज पुनः गूंजी।
साधना की पूर्णाहुति एक विराट शपथ समारोह में होगी व फिर देव संस्कृति विस्तार वर्ष का शुभारंभ हो जाएगा। इस प्रकार यह अवसर हर दृष्टि से अति विलक्षण व लाखों वर्षों में कभी-कभी आने वाले क्षणों में से एक है।
साधना के चमत्कार आपने सुने हैं वह आपके जीवन में फलित हो जायँ। आप जिस मकसद से आए थे वह पूरा हो व आप जब भी अनुष्ठान करें समूचा लाभ उठा सकें इसलिए आपको यह समझ में आए व आप लाभान्वित हों। हमारी बात समाप्त । ॐ शाँतिः शाँतिः शाँतिः।
साधना करी पूर्णाहुति का क्रम चलेगा जिसमें सभी को समान अवसर मिलेगा। 12 संस्कारों का दृश्य प्रदर्शन अलग से विनिर्मित एवं संस्कारशाला में चलेगा। दीक्षा संस्कार स्वयं परम वंदनीया माताजी के श्री मुख से संपन्न होगा। सभी परिव्राजक जो व्रत लेंगे एकसी वसंती वेशभूषा धारण कर परमपूज्य गुरुदेव की जन्म स्थली की रज व सप्तसरोवर कास गंगाजल हाथ में लेकर देवसंस्कृति के उद्धार व विस्तार की शपथ 10 जून को लेंगे। उसी दिन महापूर्णाहुति, वंदनीय माताजी का उद्बोधन व एक विराट ब्रह्मदीप यज्ञ भी संपन्न होगा।
साधना देखते-देखते समाप्त हो जायेगी-मनीषा संत्रस्त हो रही थी ।
साधना संबंधी कार्यक्रम संबंधी अगणित स्थानों से इसी प्रकार के व प्रत्यक्ष घटनाक्रम लोगों ने लिख भेजे हैं।
साधना क्या इसी को कहते हैं? योगाभ्यास सिद्धान्त यही है? मैं आपसे ही पूछता हूँ, जरा बताइए तो सही।
साधना की बात सोचे, उसे ब्रह्मज्ञानी कौन कहेगा? निष्ठुर पाषाण से कम उन्हें दूसरी उपमा क्या दी जाए? यह सोचने के बाद ही कदाचित कोई दूसरा शब्द मिल सके।”
साधना भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से अनेकों उपलब्धियाँ हस्तगत कराती है।
साधना से उपजी यह साधना देखते-देखते समाप्त हो जायेगी-मनीषा संत्रस्त हो रही थी ।
साधना वर्ष में स्थान स्थान पर अखण्ड जप आयोजन के साथ ये कार्यक्रम संपन्न हुए। इन सभी आयोजनों के पूरे दक्षिण भारत,पूर्वी भारत, पंजाब व जम्मू कश्मीर क्षेत्र तक विस्तार के निमित्त अगणित लोकसेवियों के समय की अब आवश्यकता प्रतीत हो रही है। अपने अपने क्षेत्रों में कार्यरत मूर्धन्य प्रतिभाओं को तलाशने के लिए ही यह विराट शपथ समारोह आयोजित किया जा रहा है।
साधना सफल मानी जाएगी।
साधना को भुला बैठे उसे, पागल के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है। हममें से भी अनेकों ऐसे अर्धविक्षिप्त पाये जाते हैं, जो रोटी, कपड़ा, घर आदि को तो याद रखते हैं पर यह भूल जाते हैं कि अपने भीतर इतनी अजस्र शक्तियाँ भरी पड़ी हैं कि यदि उन्हें विस्मरण न कर दिया जाय। योजना बद्ध रूप से चलने अपनी सामर्थ्यों का समुचित प्रयोग करते रहने की रीति-नीति अपनाई जाय, तो उन अड़चनों से कदाचित ही वास्ता पड़े, जो आये दिन हैरान करतीं और निराशा जैसी स्थिति उत्पन्न करती हैं। उत्साह, परिश्रम और समझदारी के त्रिविध उपयोग यदि सहकार से बन पड़ें तो कोई कारण नहीं कि अभीष्ट प्रगति से भरी-पूरी संभावनाओं का रास्ता रुके और आये दिन असफलता का रोना रोते रहना पड़े ।
साधना वर्ष में संपन्न कर रहे हैं। सर्वविदित है कि युगसंधि काल के अंतिम बारह वर्षों के चौथे वर्ष में हम प्रवेश कर चुके हैं। आने वाले नौ वर्ष नवयुग के देवत्व प्रधान युग के अवतरण के पूर्ववेला के वर्ष हैं व इनका एक एक दिन नवरात्रि की नौ दिवसीय वेला के एक -एक पल की तरह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस अवधि में बड़े व्यापक स्तर पर परिवर्तन हम सभी पूरे विश्व पटल पर संपन्न होते देखेंगे। सूक्ष्म जगत में छायी विषाक्तता के शमन हेतु सामूहिक आध्यात्मिक पुरुषार्थ की महत्ता सभी जानते हैं ।
साधना कार्यक्रम में अखण्ड जप में हजारों परिजनों ने भाग लिया था। समापन दीपयज्ञ द्वारा होना था । परमपूज्य गुरुदेव व वन्दनीया माताजी के चित्र के समक्ष रखा हुआ कलश सभी परिजनों ने बड़ी तेजी से अपने स्थान पर घूमते देखा । सभी दृश्य देखकर भाव विभोर हो गए थे। सभा में उपस्थित बुद्धिजीवी स्तर के कई व्यक्ति भी सूक्ष्म की यह लीला देखकर हतप्रभ से थे, चमत्कृत थे कुछ ही मिनटों में पूर्णाहुति पूरी होते ही कलश का घूमना बन्द हो गया ।
साधना पद्धतियों का निर्धारण भी उसी में आता है। मन, आत्मा, मोक्ष, परलोक और पुनर्जन्म की व्याख्याएँ इसी धारा में स्पष्ट की जाती हैं। वेदों का सार है गायत्री व उसकी समग्र व्याख्या इसी चिन्तन पक्ष में आती हैं। गायत्री सार्वभौम है, विश्वमाता है व आने वाले भविष्य के समाज का आधार बनेगी । गायत्री की दार्शनिक व व्यवहारिक विवेचना, उपासना पद्धतियाँ, प्राणाग्नि-कुण्डलिनी तथा मंत्र शक्ति का विज्ञान सम्मत विवेचन इसी पक्ष के अंतर्गत आता है।
साधना के पीछे-अपने स्वार्थ एवं अपनी उन्नति के पीछे भाग रहा है- अपने निज की उन्नति के पीछे। नहीं इस तुच्छ प्रयोजन के लिए तू समाज का अंग है। उसके प्रति अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता । अपने दायित्वों को तिलाँजलि नहीं दे सकता । इस संकट की घड़ी में समस्या का हल ढूंढ़ना ही तुम्हारी सबसे बड़ी साधना व सर्वोपरि लक्ष्य है।
साधना और परमार्थपरक आराधना को साथ लिए बिना वह सर्वथा अपूर्ण रहेगी और कोई उत्साहवर्धक परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगी। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम से त्रिवेणी बनती है जिसका महात्म्य वर्णन करते-करते शास्त्रकार थकते नहीं । इनमें से किसी अकेली को तीर्थराज त्रिवेणी संगम नहीं कहा जा सकता। यही तथ्य भक्ति की समग्रता पर भी लागू होता है। अपूर्ण उपक्रम में असफलता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
साधना नहीं कर सकता ।
साधना और परमार्थ आराधना के अपेक्षित पुरुषार्थ किये जायँ। जो इन दोनों से वंचित है, उस भक्ति को ऐसा ही समझाना चाहिए जैसे ऊसर भूमि में बीज तो उग गया, पर उसमें खाद, पानी देने की आवश्यकता न समझी गयी।
साधना के वे भागीदार जो नियमित उपासना एक घण्टा व बीस पैसा प्रतिदिन अथवा एक दिन की आजीविका माह में एक बार शाँतिकुँज को देवसंस्कृति विस्तार के निमित्त देने के अनुबंध का पालन करें।
साधना पर बड़ा गर्व था । एक दिन देव ऋषि नारद उधर से निकले । उसने कहा भगवान् यदि आपकी भगवान से भेंट हो तो, इतना पूछने का कष्ट अवश्य करें कि मेरी मुक्ति कब तक होगी और साधकों में मेरा स्थान कौन-सा है?
साधना कार्यक्रमों से कई ऐसे घटनाक्रम प्रकाश में आए हैं, जिनमें ऐसे व्यक्ति जिनने कभी स्थूल नेत्रों से
साधना से करोड़ों नहीं, अरबों की संख्या में गायत्री जप स्थान-स्थान पर भारत व पूरे विश्व में संपन्न हुआ। अब विगत वसंत से शक्ति संचार की प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ है जिसमें विशिष्ट पुरुषार्थ द्वारा साधक अतिरिक्त देवत्व व आत्मशक्ति पाने के लिए परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म व कारणसत्ता से अपना संबंध जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं । जून में इस वर्ष की साधना की पूर्णाहुति एक विराट शपथ समारोह में होगी व फिर देव संस्कृति विस्तार वर्ष का शुभारंभ हो जाएगा। इस प्रकार यह अवसर हर दृष्टि से अति विलक्षण व लाखों वर्षों में कभी-कभी आने वाले क्षणों में से एक है।
साधना के चलते कभी किसी प्रकार की कोई व्याधि पूज्यवर को नहीं हुई। ऐसे में कभी किसी प्रकार की तकलीफ उन्हें हुई भी तो वह किसी का कष्ट निज पर ओढ़ना ही उसके मूल में था। श्रीमती मायावर्मा से सभी अखण्ड-ज्योति परिजन उनकी काव्य प्रतिभा के कारण परिचित हैं । 6/12/67 को अपने हस्तलिखित पत्र में पूज्यवर उन्हें लिखते हैं कि
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1992-December
साधना नहीं है। उसमें प्रमाद किसी को भी नहीं करना चाहिए।
साधना से विरत रहने के कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगी है।
साधना यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह से अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि संस्कार के साथ शरीर सौंप दिया जाता है। यज्ञ को इतना महत्व ऋषियों ने इसलिये दिया था कि वह न केवल अनेकों भौतिक शक्तियों को देने वाला है, वरन् आत्मा का कल्याण करने वाला शरीर और मन को निर्मल, निर्विकार बनाकर शांतिदायक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाला भी है।
साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दृष्टता भरी पड़ी है जिन्हें छल−छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ−मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ है−इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा−पाठ का ढोंग रचते हैं−ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
साधना में लग जाइये।
साधना भला क्यों न पूरी होगी?
साधना एवं योगाभ्यास तक छोड़ बैठते हैं और इस तरह आत्मिक प्रगति की यात्रा उनकी अधूरी ही रह जाती है।
साधना के माध्यम से उन तत्वों को नष्ट−भ्रष्ट करना, जो प्राण−संचय में विघ्न−उपस्थित करते और उसके भण्डार को निरन्तर खाली करते रहते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि ऐसे ही अवाँछनीय तत्व हैं, जो हमारे शरीर चुम्बकत्व को−जीवनी शक्ति को लगातार घटाते रहते हैं। यदि इस ऊर्जा को बढ़ाया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हमारी शारीरिक−मानसिक स्वस्थता न बढ़ सके हम अक्षुण्ण स्वास्थ्य न प्राप्त कर सकें। इतना ही नहीं, फिर हम चाहे कितने ही न्यून भू−चुम्बकीय क्षेत्र में चले जायँ, उससे हमारा स्वास्थ्य सर्वथा अप्रभावित ही रहेगा और किसी प्रकार के अवाँछित असर उत्पन्न करने में वह एकदम विफल बन जायेगा। कहावत है कि निर्बल को सभी सताते हैं, पर सबल का सामना करने से कतराते हैं।
साधना यही हो सकती है कि परिवार में सद्विचार की गरिमा बताने वाले साहित्य को पढ़ाया जाय। बिना पढ़ों के पढ़कर सुनाया जाय। इन प्रसंगों पर पारस्परिक चर्चा करते रहा जाय। इसके लिये झोला पुस्तकालय चलाने का एक काम ऐसा है जिसके लिये नियमित रूप से नित्य समयदान, अंशदान, देते रहा जा सकता है।
साधना साहस। उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना की दिशा में वाँछित प्रगति कर सकता है।
साधना। उपासना के दौरान इष्ट से प्राण−ऊर्जा ग्रहण−धारण करने की प्रबल भावना और साधना के माध्यम से उन तत्वों को नष्ट−भ्रष्ट करना, जो प्राण−संचय में विघ्न−उपस्थित करते और उसके भण्डार को निरन्तर खाली करते रहते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि ऐसे ही अवाँछनीय तत्व हैं, जो हमारे शरीर चुम्बकत्व को−जीवनी शक्ति को लगातार घटाते रहते हैं। यदि इस ऊर्जा को बढ़ाया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हमारी शारीरिक−मानसिक स्वस्थता न बढ़ सके हम अक्षुण्ण स्वास्थ्य न प्राप्त कर सकें। इतना ही नहीं, फिर हम चाहे कितने ही न्यून भू−चुम्बकीय क्षेत्र में चले जायँ, उससे हमारा स्वास्थ्य सर्वथा अप्रभावित ही रहेगा और किसी प्रकार के अवाँछित असर उत्पन्न करने में वह एकदम विफल बन जायेगा।
साधना नहीं करता तो यह जो हजारों औषधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ वह कहाँ से मिल पाता?
साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुए भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दृष्टता भरी पड़ी है जिन्हें छल−छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ−मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ है−इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा−पाठ का ढोंग रचते हैं−ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं।
साधनाओं द्वारा जाग्रत किया। फलस्वरूप उनकी पकड़ने की शक्ति इतनी बलवान हो गई कि जिस प्रकार सारस अपनी लम्बी गर्दन पानी में डुबोकर चाहे जहाँ से मछली पकड़ लेता है, उसी प्रकार से वे आकाश क्षेत्र में से नाना प्रकार की
साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि, नवनिधि सरीखी लोकोत्तर शक्तियां उपलब्ध रहती थीं। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की, और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे, वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। यह निर्विवाद है।
साधना में मन ही न लगा।
साधना में रत थे- माँ बुला रही थी वत्स इधर देखो बोलो क्या चाहते हो?
साधना और संयम के द्वारा परिपुष्ट बनाया जाता है। मनोबल और आत्मबल के कारण जो अद्भुत विशेषताएँ लोगों में देखी जाती हैं, उन्हें इन सूक्ष्म शरीरों की बलिष्ठता ही समझना चाहिए। साधना का उद्देश्य उसी बलिष्ठता को सम्पन्न करना है।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
साधना विधान का समन्वय ही उन सत्परिणामों को प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हो सकता है, जिसमें अंतरंग को स्वर्ग मुक्ति का आनन्द और बहिरंग को ऋद्धि−सिद्धि का वैभव उपलब्ध होता है। बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए उसका उचित मूल्य समझने और जुटाने का प्रयत्न करना ही होगा।
साधना विज्ञानियों की जानकारियों से लाभ उठाया जाना चाहिए और अन्तरिक्ष के सूक्ष्म प्रवाह संचार में पिछले दिनों जो परिवर्तन हुए हैं, मानवी कलेवर के स्तर में जो भिन्नता आयी है, उसे ध्यान में रखते हुए हमें शोध कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए।
साधना का लक्ष्य हस्तगत हो गया।
साधनात्मक कदम उठाता है तो वह अपने प्रभाव से प्रकृति को अपने नियम बदलने के लिये बाध्य भी कर सकता है।
साधना प्राण। उपासना चिनगारी है−साधना ईंधन। उपासना संकल्प है−साधना साहस। उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल।
साधना है। इससे स्वल्प साधनों में निर्वाह बनता है, किन्तु व्यक्ति की उपार्जन क्षमता तो असीम है। उसे जितना अधिक विकसित किया जा सके करना चाहिए। अधिक उपार्जन व स्वल्प उपभोग करने पर बड़ी बात का सिलसिला चल सकता है। इसे परमार्थ के लिए नियोजित किया जाना चाहिए।
साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। यह निर्विवाद है।
साधना में सारा जीवन लगाना पड़ता है। जन्म जन्मान्तरों के संग्रहित कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाना किसी भयंकर भूल से पल्ला छुड़ाने से कम नहीं है, फिर भी पराक्रमी लोग निरन्तर लगे रहते हैं तो सफलता पाकर ही रहते हैं। आत्मा पर विजय प्राप्त करने वालों की कमी नहीं रही है। प्रण करने वाले उसे पूरा करके भी रहते हैं।
साधनाओँ द्वारा उस चेतना से सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते है। अध्यात्म विज्ञान में जड़ को गौण और चेतना को प्रमुख स्थान इसलिये मिला है कि वह स्थूल प्रकृति की मर्यादाओं से बंधी हुई नहीं है और अपना स्वतंत्र विकास करने से सक्षम है।
साधना में। प्रचण्ड तप की अगाध श्रृंखला चल पड़ी। तन सूख गया प्राण प्रवाह अवरुद्ध होता दिखा पर उसकी चिन्ता किसे .............अन्दर दिव्य करुणा का प्रवाह जो सतत् उफन उमंग रहा था और समय आया कि भगीरथ मौन साधना में रत थे- माँ बुला रही थी वत्स इधर देखो बोलो क्या चाहते हो?
साधना को विकसित करना चाहिए। धन दान को पुण्य परमार्थ समझा जाता है। पर इसमें कुपात्रों के हाथों अपनी सहायता जाने पर उससे दुष्प्रवृत्तियों का परिपोषण भी हो सकता है। फिर हर किसी की स्थिति भी ऐसी नहीं होती जो आये दिन दान देते रहने की व्यवस्था कर सके। उतनी सम्पदा जुटा सके।
साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
साधना परक, ज्ञान परक अथवा विज्ञान परक, वह सब गायत्री के बीज से ही विकसित हुई है। सारे का सारा विस्तार गायत्री बीज से ही हुआ है। बीज वही है, टहनियाँ बहुत सारी हैं। हिन्दूधर्म में चौबीस अवतार हैं। ये चौबीस अवतार क्या हैं?
साधना ईंधन। उपासना संकल्प है−साधना साहस। उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष।
साधना के लिये चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को जगाने का उससे भी अधिक कष्ट साध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है, जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं।
साधना के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुए भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती।
साधना का उद्देश्य उसी बलिष्ठता को सम्पन्न करना है।
साधना कन्धों पर लेकर यह किया जा सकता है कि उनमें विवेकशीलता, शालीनता उभारी जाय और उन्हें अपने को परिष्कृत बनाने की दिशा अपनाने के लिये प्रभावी मार्गदर्शन किया जाय। यह कार्य झोला पुस्तकालय चलाने के लिए नियमित समय लगाकर जना-संपर्क साधते हुए आसानी से हो सकता है। प्रत्येक परमार्थ परायण को अपने परिवार में तथा संपर्क क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के रूप में इन प्रवृत्तियों को सम्पादित करते रहने के लिये समुचित उत्साह प्रदर्शित उत्साह प्रदर्शित करना चाहिए।
साधना बनेगी। संवेदना से उपजा चिन्तन उसका मार्ग दर्शक बनेगा। चिन्तन की यह नयी प्रणाली मानव की नियति है। इसे स्वीकारे बिना अन्य कोई उपाय नहीं। किन्तु किसी को यह नहीं सोचना चाहिए विज्ञान कैसे जीवित रहेगा?
साधना करनी पड़ती है। संचित दोष-दुर्गुणों से अनवरत संघर्ष करना होता है। गुण, कर्म, स्वभाव में घुसे हुए दोष दुर्गुण सहज ही पीछा नहीं छोड़ते। एक बार हटाने पर वे दूसरी बार दरवाजे से नहीं खिड़की खुली देखकर घुस आते हैं। यही बात सत्प्रवृत्तियों के बारे में है।
साधनाओं का अभ्यास कर सकता है और अध्यात्म साधना की दिशा में वाँछित प्रगति कर सकता है।
साधना का उद्देश्य मनुष्य को इसी एकरूपता, समग्रता और सम्पन्नता से अवगत कराना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-May
साधना का सहारा अनिवार्य रूप से लेना पड़ेगा। परिजनों को याद होना चाहिए कि अपना यह विराट अभियान तीन विशिष्ट पुरुषार्थ के संयोग से आगे बढ़ रहा है। वे हैं-
साधना करनी पड़ती है, तब ध्यान और समाधि की स्थिति सिद्ध होती है। गीताकार ने इसी तथ्य को निरूपित करते हुए कहा है-अनेक जन्मों के संस्कार बल से इस जन्म में संसिद्धि होती है।
साधना भी कर्म के उत्प्रेरक कारण हो सकते हैं। फिर कर्म कामना से मुक्त कैसे हो, इसकी व्याख्या इस माध्यम सके अगले श्लोकों में है, जहाँ यज्ञार्थाय कर्म करने की बात कही गई है। इसी में आसक्ति से मुक्त होकर यज्ञ के निमित्त कर्म करने की बात बड़े विस्तार से समझाई गई हैं। अब उस प्रकरण को परिजन अगले अंक की युगगीता में पढ़ेंगे, पर यहाँ कर्म के विषय में थोड़ा चिंतन परमपूज्य गुरुदेव की लेखनी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है। परमपूज्य गुरुदेव नियत लेखनी के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत हैं परमपूज्य गुरुदेव नियत कर्म की परिभाषा ऐसी जीवनचर्या के रूप में करते हैं।
साधनामार्ग में मिलने वाली सफलता को यों समझा जा सकता है। अनुभव किया जाता है कि ध्यान-धारणा भली-भाँति चल रही है, शरीर में स्वास्थ्य का अनुभव होने लगता है। ऐसा नहीं कि यह किसी चमत्कार के कारण होता है। वस्तुतः ध्यान-धारणा चित्त को संतुलित करती है, उसमें चलने वाले उद्वेगों और विक्षोभों को भी नियंत्रित करती है। चित्त शाँत, संतुलित और उद्वेगरहित होने पर आहार-विहार भी संतुलित होने लगता है।
साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
साधना में भावपक्ष प्रबल हो तो सिद्धि शीघ्र ही मिलती है, इसका परिचायक है। गुरु-शिष्य अनुदानों का आदान-प्रदान कैसे किस स्तर पर होता है, इसका भी संकेत इससे मिलता है। पत्रों को माध्यम बनाकर भावभरा हृदय अनुदानों के लिए बैठा दिखाई देता है। वे अपनी प्रखर मेधा से सतत् लाखों को मार्गदर्शन करते रहे । आज पूज्यवर हमारे बीच सशरीर नहीं हैं, पर उनकी अमूल्य धरोहर ये पत्र हैं जो उनके कथामृत के अंश रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ थोड़ा सा ही क्यों न हो, हजार बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा उत्तम है। बातों से भावनाएँ जाग सकती हैं, किंतु उस सिद्धाँत की अनुभूति के लिए यदि आवश्यक पुरुषार्थ न किया गया, तो समझो समय तथा भावना बेकार नष्ट हुई। आदर्शोन्मुखी आध्यात्मिक कर्म में ही तो जीवन का सच्चा सदुपयोग है।
साधना में सुषुम्ना द्वारा कुँडलिनी जागरण को प्रत्यक्ष कर लेंगे।”
साधना करते रहने की बात कही हैं यह पत्र न केवल एक गुरु-शिष्य के मध्य का संवाद है, अपितु साधना विज्ञान संबंधी एक गंभीरतम स्तर का प्रशिक्षण भी। यह सही है कि पास बैठकर-उपदेश सुनकर सब कुछ सीखा-समझा जा सकता है, परंतु पत्रों से भी यह कार्य विधि-व्यवस्थापूर्वक संभव है। इसका नमूना है यह पत्र।
साधना के ‘भर्ग’ पर ध्यान केंद्रित कर कषाय-कल्मषों से मुक्त, पापरहित अंतःकरण वाला बना सके। इसी प्रारंभिक उपदेश में भगवान दो प्रकार की निष्ठाओं की बात करते हैं। ‘निष्ठा’ शब्द को प्रयोग यहाँ साधना की पराकाष्ठा के संदर्भ में किया गया है। निष्ठा ही आस्तिकता का प्राण है। वे कहते हैं कि निष्ठाओं में एक ज्ञानयोग से सधती है, दूसरी कर्मयोग से ।
साधना करें, ऐसा प्यार भरा मार्गदर्शन पूज्यवर ने दिया है। पीठ भी थपथपाई है तथा कुछ शब्दों में गूढ़ दर्शन की बात कहकर उन्हें निरंतर गायत्री साधना करते रहने की बात कही हैं यह पत्र न केवल एक गुरु-शिष्य के मध्य का संवाद है, अपितु साधना विज्ञान संबंधी एक गंभीरतम स्तर का प्रशिक्षण भी। यह सही है कि पास बैठकर-उपदेश सुनकर सब कुछ सीखा-समझा जा सकता है, परंतु पत्रों से भी यह कार्य विधि-व्यवस्थापूर्वक संभव है। इसका नमूना है यह पत्र।
साधना के अपने लाभ हैं। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने गीता के इस वचन का आशय स्पष्ट करते हुए लिखा है, “सोलह-सत्रह वर्षों तक स्कूल-कॉलेज जाते रहने पर ही शिक्षा पूरी होती है। स्नातकोत्तर कक्षाएं पास कर लेने के बाद ही छात्र अपने को पूर्ण शिक्षित कह पाता है॥ शिक्षा आरंभ करते हुए बच्चा भी यह जानता है और उसके अभिभावक भी सोलह-सत्रह वर्षों की इस अवधि को छात्र कितने धीरज, शाँति और आनंद से व्यतीत कर लेते हैं। जिन्हें ध्यान अथवा योग से परमपद प्राप्त करना है, उन्हें भी धीरज रखना चाहिए। फिर इस मार्ग पर चलते हुए संसिद्धि तक खाली हाथ नहीं रहना पड़ता।
साधनाएँ होती हैं। वह हो जाने पर किसी साधना की आवश्यकता नहीं हैं। आत्मसाक्षात्कार ही तो जीवन लक्ष्य होता है।”
साधना निष्फल नहीं जाती । अभीष्ट मनोरथ पूरे न भी हों तो भी प्रकाराँतर से आत्मिक और सांसारिक सुविधाएं बढ़ने में किसी न किसी प्रकार सहायता अवश्य मिलती हैं। जितना समय, श्रम और शक्ति साधना में खरच होती हैं, उसका मुआवज़ा अवश्य ही मिलकर रहता है। आप अपनी साधना को निष्ठा, धैर्य और स्थिरतापूर्वक जारी रखें । इससे आपकी जीवनदिशा में परम सात्विक परिवर्तन होगा।
साधना के प्रबल प्रचारक और बिहार योग विद्यालय के संस्थापक स्वामी सत्यानंद परमहंस ने लिखा है कि दस मिनट, सिर्फ दस मिनट भी यदि निश्चल, शाँत बिना हिले-डुले चुपचाप बैठा जा सके तो ध्यान आरंभ हो जाता है। ध्यान आरंभ होने के बाद साधक अनुपयुक्त आहार-विहार के प्रति अनायास ही उदासीन, विरक्त होने लगता है। उसकी रुचि असंयमित और कृत्रिम जीवन से हटने लगती है। अच्छा हो इस दिशा में स्वयं ही प्रवृत्त हुआ जाए अर्थात् अपने आहार-विहार को संयमित किया जाए। उसके बाद सफलता के अगले लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
साधना-आराधना
साधना के सहारे ही संभव है। इसलिए इसे प्रारंभ से ही अनिवार्य चरण के रूप में मान्यता दी जाती रही है। साधना अभियान को व्यापक आँदोलन का रूप देने के लिए इस क्षेत्र में विश्वास रखने वाली तमाम प्रतिभाओं को इस दिशा में संकल्पपूर्वक लगाया जाना है। साधक किसी भी संप्रदाय विशेष की उपासनापद्धति को मानने वाला हो,उसे युगसाधना के लिए सहमत करना जरा भी कठिन नहीं है। लेकिन इसके लिए उन्हें जप-पूजा, कर्मकाँड, उपासना और जीवन-साधना का अंतर भली प्रकार समझना होगा।
साधना-विज्ञान को किस रूप में समझना चाहिए, उसका मार्गदर्शन भी मिलता है। पत्र-लेखन के द्वारा आध्यात्मिक प्रगति संबंधी सूक्ष्म स्तर का दिग्दर्शन भी पूज्यवर किस कुशलता के साथ करते थे, इसका नमूना इन पत्रों से मिलता है।
साधना मत करो, शनि की शाँति हेतु वह करो, परंतु वास्तव में उसके मनोबल को बढ़ाकर कैसे जीवनरक्षा की जा सकती है, यह मार्गदर्शन हमें पूज्यवर की लेखनी-पाती से मिलता है।
साधना का परिणाम जादू बनकर छा गया।
साधना-सिद्धि को अंधविश्वास बताने वाले आलोचक इन लक्षणों को कोरी बकवास बताते हैं, लेकिन प्रारंभिक सफलताएं अथवा सिद्धियाँ एक निश्चित प्रक्रिया के अंतर्गत मिलती है।
साधना करने के बाद ही वह परिपक्व स्थिति आती है कि ध्यान सधने लगे। शास्त्र तो यहाँ तक कहते हैं कि कई जन्मों तक साधना करनी पड़ती है, तब ध्यान और समाधि की स्थिति सिद्ध होती है। गीताकार ने इसी तथ्य को निरूपित करते हुए कहा है-अनेक जन्मों के संस्कार बल से इस जन्म में संसिद्धि होती है।
साधना में खरच होती हैं, उसका मुआवज़ा अवश्य ही मिलकर रहता है। आप अपनी साधना को निष्ठा, धैर्य और स्थिरतापूर्वक जारी रखें । इससे आपकी जीवनदिशा में परम सात्विक परिवर्तन होगा। भविष्य के लिए आप तनिक भी चिंता न करें। लालच की बात न सोचें ।
साधना विज्ञान संबंधी एक गंभीरतम स्तर का प्रशिक्षण भी। यह सही है कि पास बैठकर-उपदेश सुनकर सब कुछ सीखा-समझा जा सकता है, परंतु पत्रों से भी यह कार्य विधि-व्यवस्थापूर्वक संभव है। इसका नमूना है यह पत्र।
साधना अभियान को व्यापक आँदोलन का रूप देने के लिए इस क्षेत्र में विश्वास रखने वाली तमाम प्रतिभाओं को इस दिशा में संकल्पपूर्वक लगाया जाना है। साधक किसी भी संप्रदाय विशेष की उपासनापद्धति को मानने वाला हो,उसे युगसाधना के लिए सहमत करना जरा भी कठिन नहीं है। लेकिन इसके लिए उन्हें जप-पूजा, कर्मकाँड, उपासना और जीवन-साधना का अंतर भली प्रकार समझना होगा। उनसे कहा जाएगा कि वे भले ही उपासना, कर्मकाँड और मंत्र आदि से कोई भी अपनाएं, लेकिन उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है।
साधना के लिए सहमत करना जरा भी कठिन नहीं है। लेकिन इसके लिए उन्हें जप-पूजा, कर्मकाँड, उपासना और जीवन-साधना का अंतर भली प्रकार समझना होगा। उनसे कहा जाएगा कि वे भले ही उपासना, कर्मकाँड और मंत्र आदि से कोई भी अपनाएं, लेकिन उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
साधना शक्ति संवर्द्धन, शिक्षा-विद्याविस्तार, जन स्वास्थ्य संवर्द्धन स्वावलंबन, पर्यावरण परिशोधन, महिला-जागरण तथा व्यसन-मुक्ति व कुरीति -उन्मूलन) में से एक या अधिक की जिनने जिम्मेदारी उठाई है, वे भी इसमें भागीदारी करेंगे। इन विधाओं के विशेषज्ञ, जो गायत्री परिवार की विचारधारा से सहमति रखते हैं, भी इसमें सम्मिलित हो सकते हैं।
साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
साधना करके ही जीवन के रहस्य को जाना जा सकता है। समस्त दुर्बलताओं पर विजय पाई जा सकती है।
साधना-मार्ग में जैन आचार्य अवधान नामक एक क्रिया सिखाते हैं। उसमें चौबीस और बत्तीस अंकों तक की संख्या के गुणा भाग और भिन्न आदि सवाल पलक झपकते हल किए जा सकते हैं। यह मानसिक क्षमता के अधिक सजग और ग्रहणशील होने का ही द्योतक है। गंभीरता और नियमपूर्ण किया गया ध्यान इस स्तर की कुशलता की विकसित कर देता है। चाहे तो इसे सिद्धि कह सकते हैं और चाहें तो कुशलता ।
साधना की परिपक्वावस्था में क्या स्थिति होती है, उसका संकेत इसमें है व पाठकों के लिए एक प्रेरक मार्गदर्शन भी ।
साधना का अंतर भली प्रकार समझना होगा। उनसे कहा जाएगा कि वे भले ही उपासना, कर्मकाँड और मंत्र आदि से कोई भी अपनाएं, लेकिन उपासना की शक्ति से आत्मपरिष्कार और लोककल्याण का भाव बनाए रखें । इसके लिए साधनावर्ष के लिए निर्धारित साधनाक्रम की पुस्तिका में दिए गए मार्गदर्शन का लाभ उठाया और दिया जा सकता है। साधकों को उनकी मनः स्थिति और परिस्थिति के अनुसार उपासनाक्रम एवं शेष दिन के लिए सुझाए गए साधना के विभिन्न चरणों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। सृजनशिल्पियों-युग साधकों को अपनी क्षमता और कौशल में इतना विकास करना है कि किसी भी उपासनापद्धति से जुड़े नैष्ठिकों को जीवन-साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
साधना केन्द्र के रूप में ढलकर बीस वर्षों में ऐसी स्थिति में आ गया है कि यहाँ तेजस्वी-मनस्वी ढाले जा सकते हैं। लव-कुश, चक्रवर्ती भरत की ढलाई ऐसे ही वातावरण में होती है। नररत्न साधना द्वारा स्वयं का परिमार्जन कर अपने को सशक्त प्राणवान के रूप में उभारते थे, ऐसे अनेकों तीर्थ-तपोवन प्राचीनकाल में थे। आज भारतीय संस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर के निर्माण में साधना को एक स्थापित विधा मानकर जीवनविद्या के सर्वांगीण प्रशिक्षण को बीड़ा जो शाँतिकुँज ने उठाया है, उसे क्षेत्र के कई छोटे-छोटे निर्झर केन्द्र गायत्री शक्तिपीठ, प्रज्ञा-संस्थान पूरा करेंगे। गायत्री तीर्थ-ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के रूप में गायत्री साधना-यज्ञविज्ञान की जो आरंभ की गई थी, उसका अब बहुगुणित बिस्तर होना है।
साधना-विज्ञान का इतना सरल-सुगम व व्यावहारिक मार्गदर्शन इससे श्रेष्ठ और क्या हो सकता है।
साधना द्वारा अपनी अंतःभूमिका का पकाते रहें। जब आप आवश्यक कर्त्तव्यों से छुटकारा पा जाएँगे, तब आप एक सप्ताह की साधना में सुषुम्ना द्वारा कुँडलिनी जागरण को प्रत्यक्ष कर लेंगे।”
साधना करते हुए यदि श्रेष्ठ कर्म किए जाएंगे, तो क्रियमाण-कर्म काटे जा सकते हैं। संचित-प्रारब्ध का हिसाब-किताब यदि भगवान इन झंझटों के माध्यम से-दैनंदिन जीवन में आती तकलीफों के रूप में ले रहा हो, तो इसे हंसकर स्वीकार करना चाहिए, यह व्यवहारिक अध्यात्म परक शिक्षण इस पत्र से मिलता है। पत्र लिखा तो एक साधक को गया है, वह भी आज से 49 वर्ष पूर्व, किंतु शाश्वत चिंतन के रूप में हम सबके लिए है। आज भी यह तथ्य अपनी जगह है कि हमें कष्टों को तप बनाकर जीवन जीने का अभ्यास डालना चाहिए। आत्मिक प्रगति तो सतत् अभ्यास से होती रहेगी, किंतु थोड़े-बहुत छोटे-मोटे लौकिक अवरोधों से हममें से किसी को भी विचलित नहीं होना चाहिए।
साधना साधना में लग गए। हम सबके लिए भी आज के समय को स्वतंत्रता संग्राम एक ही है-युगनिर्माण को आँदोलन-विचारक्राँति-ज्ञानयज्ञ अभियान। शरीर बीमार है, मन परेशान है, तो भी कोई दिक्कत नहीं। शरीर धुल जाएगा स्वतः ही, मन भी स्वस्थ हो जाएगा इस तप से। कुसंस्कार रूपी पत्ते यदि इस कर्म के माध्यम से झड़ते रहें, तो निश्चित ही दैवी अनुकंपा महानता के रूप में बरसेगी।
साधना के स्वर्णिम सूत्र
साधना एवं स्वाध्याय से उभरे विवेक के आधार पर हर किसी को यह समझाया जा सकता है कि किस प्रकार हम अपने ही साधनों से अपना हित कर रहे हैं और इन्हें सही दिशा में लगाकर हम कितना लाभ और पुण्य कमा सकते हैं। विभिन्न नशों, फैशनपरस्ती, मनोरंजन के नाम पर समय और आदतें खराब करने के चलन, प्रचलित परंपराओं के नाम पर चल रही तमाम कुरीतियों को दूर करने के लिए प्राणवान अभियान विचारशीलों और कर्मठों के द्वारा हर क्षेत्र में चलाए जा सकते हैं।
साधना से बनाया है। इस वातावरण के लिए लोग तरसते हैं। आपको जो यहाँ नौ दिन की उपासना के लिए स्थान ही नहीं वरन् पिता और माता की छत्रछाया में आपको उपासना करने को मिली, इसका महत्व क्यों नहीं समझ रहे हैं आप ? आप वहाँ से पत्र डालते हैं कि माताजी हमारा दोष परिमार्जन कर देना, हम अनुष्ठान कर रहे हैं । तो जब आप यहाँ कर रहे हैं हमारे पास तो कितने भाग्यशाली हैं आप।
साधना के मार्ग में तरह तरह की श्रेयस्कर उपलब्धियाँ मिलती रहती है। उनका आनंद लौकिक सुखों की तुलना में कई गुना महत्तर होता है।”
साधना में संलग्न होने की, कठोर तप में प्रवृत्त होने की बात बैठती है, इंद्रियाँ विरोध करने लगती हैं। शरीर पूछने लगता है, “रे मन भला क्या यह आरामदायक होगा ?”
साधना की संपत्ति वही हम आपको देना चाहते हैं। आप लोगों का नवरात्रि अनुष्ठान सफल हो, इसी कामना के साथ आज ही बात समाप्त।
साधना की, उपासना की हमारे अंदर जल रही है और जो गुरुजी के अंदर जल रही थी, उसमें से चिंगारी का एक कण छोटा सा आप भी लेकर जाइए, ताकि आप भी धन्य होते चले जाएँ।
साधना-यज्ञविज्ञान की जो आरंभ की गई थी, उसका अब बहुगुणित बिस्तर होना है।
साधना की शक्ति से सूक्ष्मजगत् का परिशोधन होकर एक ‘समूह-मन’ के जागरण की प्रक्रिया संपन्न हो, इस निमित्त यह पुरुषार्थ नियोजित हुआ है और बड़ी संख्या में विभूतिसंपन्नों-समर्थ प्रतिभाशालियों में नवसृजन के लिए संकल्पपूर्वक कुछ कर गुजरने को उत्साह जगा रहा है।
साधना में लग गए। हम सबके लिए भी आज के समय को स्वतंत्रता संग्राम एक ही है-युगनिर्माण को आँदोलन-विचारक्राँति-ज्ञानयज्ञ अभियान। शरीर बीमार है, मन परेशान है, तो भी कोई दिक्कत नहीं। शरीर धुल जाएगा स्वतः ही, मन भी स्वस्थ हो जाएगा इस तप से। कुसंस्कार रूपी पत्ते यदि इस कर्म के माध्यम से झड़ते रहें, तो निश्चित ही दैवी अनुकंपा महानता के रूप में बरसेगी।
साधना के कच्चे फल तोड़ने का अपराध किया है। अब वह वृक्ष सूख गया । फिर साधना करो और वैसी गलती मत करना।” लेकिन बहुत प्रयत्न करने के बाद भी साधक का मन फिर ध्यान-धारणा में नहीं लगा।
साधना की पराकाष्ठा के संदर्भ में किया गया है। निष्ठा ही आस्तिकता का प्राण है। वे कहते हैं कि निष्ठाओं में एक ज्ञानयोग से सधती है, दूसरी कर्मयोग से । पहला मार्ग बुद्धि प्रधान है, विचारतंत्र से संबंधित है ज्ञानतंतुओं को झकझोरता है, तो दूसरा मार्ग सक्रियता का-कर्मठता का है। फिर वे कहते हैं कि न तो कर्मों के त्याग मात्र से सिद्ध हस्तगत होती है, न ही कर्मों को आरंभ किए आदमी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है।
साधना का प्रयोजन आत्मज्ञान की प्राप्ति और चेतना का उच्चतम विकास है, सिद्धि प्राप्त करना बिलकुल ही नहीं। चेतना के विकास की तुलना में सिद्धियों का स्थान बहुत ही तुच्छ है। विभूतियाँ अथवा सिद्धियाँ सही है। ध्यानमार्ग पर चल रहे साधक के पास वे अवश्य आती हैं। इन सिद्धियों को प्राप्त करने वाले अगणित साधक हुए हैं और होते रहे हैं।
साधना
साधना को एक स्थापित विधा मानकर जीवनविद्या के सर्वांगीण प्रशिक्षण को बीड़ा जो शाँतिकुँज ने उठाया है, उसे क्षेत्र के कई छोटे-छोटे निर्झर केन्द्र गायत्री शक्तिपीठ, प्रज्ञा-संस्थान पूरा करेंगे। गायत्री तीर्थ-ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के रूप में गायत्री साधना-यज्ञविज्ञान की जो आरंभ की गई थी, उसका अब बहुगुणित बिस्तर होना है।
साधना द्वारा स्वयं का परिमार्जन कर अपने को सशक्त प्राणवान के रूप में उभारते थे, ऐसे अनेकों तीर्थ-तपोवन प्राचीनकाल में थे। आज भारतीय संस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर के निर्माण में साधना को एक स्थापित विधा मानकर जीवनविद्या के सर्वांगीण प्रशिक्षण को बीड़ा जो शाँतिकुँज ने उठाया है, उसे क्षेत्र के कई छोटे-छोटे निर्झर केन्द्र गायत्री शक्तिपीठ, प्रज्ञा-संस्थान पूरा करेंगे। गायत्री तीर्थ-ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के रूप में गायत्री साधना-यज्ञविज्ञान की जो आरंभ की गई थी, उसका अब बहुगुणित बिस्तर होना है।
साधना में लगे, युगधर्म का पालन किया । जब पूज्यवर ने अपने गुरु के आदेशानुसार 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण आरंभ किए तो एक और आदेश साथ में मिला कि आध्यात्मिक पुरुषार्थ के अतिरिक्त लौकिक दृष्टि से स्वयं को 3 वर्ष के लिए स्वतंत्रता संग्राम के लिए भी नियोजित करना होगा। ऐसे में 24 वर्ष के महापुरश्चरण यदि 27 वर्ष में संभव होते हों तो कोई हर्ज नहीं, किंतु उसे भी वे युगधर्म मानकर करें। बिना किसी कामना के, आसक्ति भाव के, जब तक बताया गया तब तक पूज्यवर ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते भागीदारी की एवं पुनः साधना साधना में लग गए। हम सबके लिए भी आज के समय को स्वतंत्रता संग्राम एक ही है-युगनिर्माण को आँदोलन-विचारक्राँति-ज्ञानयज्ञ अभियान।
साधना की आवश्यकता नहीं हैं। आत्मसाक्षात्कार ही तो जीवन लक्ष्य होता है।”
साधना करने के लिए, लेखन करने के लिए गए हैं। अगर मैं उन्हें नहीं जाने देती, तो आपे ये कहते कि माताजी बड़ी स्वार्थी हो गई हैं और उनको आगे नहीं बढ़ने दिया। नहीं ये मेरा कर्त्तव्य नहीं है।
साधना है। उसके लिए सुपात्र बनना आवश्यक है, यह कोई नहीं समझता। नासमझी के आधार पर धूर्त मूर्खों को ठगते देखे जाते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने सभी को एक सुव्यवस्थित मार्गदर्शन देते हुए साधना के सभी सोपानों को यथासमय अखण्ड ज्योति पत्रिका में भी दिया एवं पत्रों द्वारा भी उनका मार्गदर्शन किया।
साधना हेतु प्रेरित करके उन्हें नवसृजन के लिए विकसित करने का चक्र चला सके।
साधना न हो पाने का कारण शारीरिक सुख-सुविधाओं की चिंता और इंद्रियभोगों की लालसा ही है। क्योंकि जैसे ही मन में आध्यात्मिक साधना में संलग्न होने की, कठोर तप में प्रवृत्त होने की बात बैठती है, इंद्रियाँ विरोध करने लगती हैं। शरीर पूछने लगता है, “रे मन भला क्या यह आरामदायक होगा ?”
साधना संबंधी मार्गदर्शन देते हुए उन्हें धैर्य बनाए रखने को कहते हैं। किसी के द्वारा यह कह दिए जाने पर कि आपकी जीवनरेखा छोटी है, अब अंतकाल आ गया है, पूज्यवर करते हुए उन्हें आश्वासन देते हुए हैं कि इसकी वे तनिक भी चिंता न करें। पाठकगण यदि पत्र अच्छी तरह पढ़े तो समझ पाएंगे कि इसमें जीवनदान किस तरह दिया गया है। हस्तरेखा विज्ञान की गहराइयों को न समझने वाले भी बिना भयभीत हुए अपने भाग्य का निमार्ण स्वयं कर सकते हैं। पत्र इस प्रकार है-
साधना की धुरी पर ही यह कार्य हो सकता है। शाँतिकुँज एक जाग्रत तीर्थ-साधना केन्द्र के रूप में ढलकर बीस वर्षों में ऐसी स्थिति में आ गया है कि यहाँ तेजस्वी-मनस्वी ढाले जा सकते हैं। लव-कुश, चक्रवर्ती भरत की ढलाई ऐसे ही वातावरण में होती है। नररत्न साधना द्वारा स्वयं का परिमार्जन कर अपने को सशक्त प्राणवान के रूप में उभारते थे, ऐसे अनेकों तीर्थ-तपोवन प्राचीनकाल में थे। आज भारतीय संस्कृति के विश्वविद्यालय स्तर के निर्माण में साधना को एक स्थापित विधा मानकर जीवनविद्या के सर्वांगीण प्रशिक्षण को बीड़ा जो शाँतिकुँज ने उठाया है, उसे क्षेत्र के कई छोटे-छोटे निर्झर केन्द्र गायत्री शक्तिपीठ, प्रज्ञा-संस्थान पूरा करेंगे।
साधना पर उन्होंने पर्याप्त बल दिया, ताकि मनुष्य की तमाम शक्तियों को भटकाव से रोककर नवसृजन में लगाया जा सके। इस हेतु उन्होंने हमें शतसूत्रीय युगनिर्माण योजना दी।
साधना मानकर नियमित करना चाहिए।
साधना के प्रारंभिक परिणाम हैं संकल्प-सिद्धि, कार्यसिद्धि और अतींद्रिय क्षमताएं इन प्रारंभिक लक्षणों के बाद ही मिलती हैं। साधकों को सावधान किया जाता है, वे सफलता के इन लक्षणों पर ही मुग्ध होकर ठहर न जाएँ, साधना-सिद्धि को अंधविश्वास बताने वाले आलोचक इन लक्षणों को कोरी बकवास बताते हैं, लेकिन प्रारंभिक सफलताएं अथवा सिद्धियाँ एक निश्चित प्रक्रिया के अंतर्गत मिलती है।
साधना को निष्ठा, धैर्य और स्थिरतापूर्वक जारी रखें । इससे आपकी जीवनदिशा में परम सात्विक परिवर्तन होगा। भविष्य के लिए आप तनिक भी चिंता न करें। लालच की बात न सोचें । वह सोचें जिसके लिए जीवन प्राप्त होता है।
साधना कर रहे एक साधक को वाक् सिद्धि प्राप्त हुई थी। वह जो कहता था, वैसा ही हो जाता था। रोगी को स्वस्थ होने का आशीर्वाद देता तो बीमार चंगा हो जाता । दरिद्र व्यक्ति संपन्न होने की बात कहते ही उस व्यक्ति में आत्मविश्वास जागता और वह दीन-हीन स्थिति से ऊपर उठने लगता। उसकी कही बातें सही होने की ख्याति फैलने लगी।
साधना करो और वैसी गलती मत करना।” लेकिन बहुत प्रयत्न करने के बाद भी साधक का मन फिर ध्यान-धारणा में नहीं लगा।
साधना के सभी सोपानों को यथासमय अखण्ड ज्योति पत्रिका में भी दिया एवं पत्रों द्वारा भी उनका मार्गदर्शन किया।
साधना सत्र)
साधना को प्रखर करने की बात कही। पत्रलेखन, जनसंपर्क, विशिष्ट शोधपरक लेखन हमारे लिए गुरु द्वारा निर्धारित नियत कर्म हैं, तो उसमें श्रमदान नैमित्तिक कर्म है, जो हमारे व्यक्तित्व के उच्चस्तरीय विकास का पथ प्रशस्त करता है। कर्म करते रहने से अंतः करण की शुद्धि होती है एवं हमें इसे योगसाधना मानकर नियमित करना चाहिए।
साधना और ईश्वर प्रेम में बाधक नहीं बनेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-January
साधना महापूर्णाहुति वर्ष के रूप में आरंभ करने जा रहे हैं - जहाँ देखें, वहाँ तप−साधना एवं संवेदना परस्पर गुँथी देखी जा सकती है। ‘स्वस्थ शरीर -स्वच्छ मन ‘ के विकास से आरंभ हुई हमारी महापूर्णाहुति की पहली मंजिल व उसके अनुयाज की अवधि से हम गुजर रहे हैं एवं सभ्य समाज के विकास हेतु 10 फरवरी 2000 वसंत पंचमी से आरम्भ हो रहे दूसरे चरण की शुरुआत करने जा रहे हैं । यह महापुरुषार्थ अब सतत् चलता रहकर 1 जून 2001 गायत्री जयंती को समाप्त न होकर नई करवटें लगा लेगा एवं 8.2.2011 से 28.1.2012 (वसंत पर्व से वसंत पर्व) तक मनाए जाने वाले महाशताब्दी वर्ष तक चलेगा। इस प्रगति यात्रा में हम सभी प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के अनुदानों से लाभान्वित तो हों , पर कभी भी तप−साधना ममत्व-संवेदना के मूल बीज को जो कि इस संगठन का प्राण है, भूलने न पाएँ यही परमसत्ता से -कण-कण में समाई गुरुसत्ता से प्रार्थना है।
साधना क्षेत्र में सहयोगी बनते हैं किंतु आज बाहुल्य ऐसे व्यक्तियों का है, जो मायावी कालनेमि की भूमिका निभाते अच्छे भले आदमी को पथभ्रष्ट कर देते हैं। हर समाजसेवी संस्था को ऐसे कालनेमियों से बचना पड़ता है। रावण के भाई कालनेमि का अपने काले कारनामे के कारण पुराण-कथाओं में बहुत स्थानों पर वर्णन आया है। वह त्रेता में आया था, पर काल से बद्ध नहीं था। दुर्बुद्धि देने का काम वह हर युग में करता आया है।
साधना की पृष्ठभूमि पर गायत्री परिवार को खड़ा किया है।’अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के 1937 से आरंभ होते समय भी उनका अनुष्ठान चल रहा था एवं जब 1942 में राजनीतिक क्षितिज पर ‘भारत छोड़ो’ आँदोलन की घूम मची थी, तब विक्रम संवत् की 2000 आरंभ होते ही उन्होंने घोषणा कर दी थी कि आज से 55 से 65 वर्ष का समय भारत के उत्कर्ष का -अभ्युदय का समय होगा।भारतभूमि तपस्वियों की भूमि रही है।यहाँ गायत्री साधना का बीज कण-कण में बसा हुआ है। बस, उस पुरातन ऋषि संस्कार को पुनर्जीवित करना भर शेष है।
साधना प्रारंभ करता है तो उसका सीधा संपर्क अवचेतन स्तर से हो जाता है जिससे पुरानी और विस्मृत स्मृतियाँ , घृणा , भय द्वेष क्रोध उभर उभर कर सामने आने लगते हैं। इनका आवेग इतना प्रबल होता है कि अभ्यासी को असह्य कष्ट की अनुभूति होती और वह तड़प उठता है। यों चेतन तल पर आकर ये स्मृतियाँ अपनी सत्ता क्षीण और कमजोर कर अंततः स्वयं को समाप्त कर लेती हैं, फिर भी एक बार में ही ऐसा नहीं हो जाता।अस्तु अंतर्मौन की साधना द्वारा उन्हें बार बार अवचेतन परत से बाहर आने का मौका दिया जाता है। इस क्रम में एक ऐसी स्थिति आती है, जब अवचेतन मन एकदम खाली एवं दमित इच्छा आकाँक्षाओं , वासनाओं एवं पूर्व संचित संस्कारों से रहित हो जाता है।
साधना प्रारंभ करदी गई और भीतरी स्वच्छता और सफाई का ध्यान नहीं रखा गया तो साधना का संपूर्ण प्रयास भीतरी गंदगी का निरस्त करने में ही खपता रहेगा। इससे प्रगति यात्रा बहुत लंबी और समयसाध्य बन जाती है। इसीलिए साधना विज्ञान के आचार्यों ने कुछ ऐसे उपाय उपचार सुझाए हैं। जिन्हें यदि साथ−साथ जारी रखा गया तो आत्मविकास अपेक्षाकृत कम समय में सरलतापूर्वक संपन्न हो जाता है। अंतर्मौन का अभ्यास इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है।
साधना का प्रचार करना है। तुम गृहस्थ ही रहोगे, साधु नहीं बनोगे। यदि तुम साधु बन गए तो जो बहुत से व्यक्ति तुम से लाभान्वित होने वाले हैं, वे कैसे होंगे।
साधना की धुरी बन गया। पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पर्व की वेला में सूर्योदय के पूर्व गायत्री उपासना कर रहे साधक श्रीराम के पिताजी की आँवलखेड़ा स्थित हवेली के कक्ष (जो एक स्मारक के रूप में आज विनिर्मित है) में दीपक के प्रकाश से एक ज्योति पुरुष प्रकट हुए व उन्होंने अपने शिष्य को सूक्ष्मशरीर से दीक्षा दी,विगत जन्मों की जानकारी कराई व भविष्य में क्या कुछ किया जाना है, इस संबंध में विस्तृत मार्गदर्शन दिया। उन्होंने तीन महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए- 1. अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में उसका संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका को समय आने पर प्राण चेतना के संदेशवाहक के रूप में क्राँतिकारी चिंतन प्रसारित कर राष्ट्र की स्वतंत्रता की आधारशिला के रूप में प्रकाशित किया जाना।
साधना इससे मुक्ति का उपाय है। यह साधना उस सिद्धाँत पर आधारित है, जो यह प्रतिपादित करता है कि गंदगी के निष्कासन से स्वच्छता का संपादन स्वतः हो जाता है। उसे निकलने से रोकना अथवा उस पर आवरण चढ़ा देना थोड़े समय के लिए सफाई की भ्राँति पैदा कर सकता है। पर यह एक प्रकार से कीड़े को ढ़ककर सड़ने और बदबू पैदा करने देने जैसी ही प्रक्रिया हुई। इसीलिए इस साधना में साक्षी भाव से मन की क्रिया का निहारना पड़ता है।
साधना के क्षेत्र में अनेक आयाम स्थापित कर गया। इस युग के महानायक यदि ठाकुर रामकृष्ण परमहंस व उनके मानसपुत्र स्वामी विवेकानंद को माना जाए, तो अत्युक्ति न होगी।
साधना एवं संवेदना परस्पर गुँथी देखी जा सकती है। ‘स्वस्थ शरीर -स्वच्छ मन ‘ के विकास से आरंभ हुई हमारी महापूर्णाहुति की पहली मंजिल व उसके अनुयाज की अवधि से हम गुजर रहे हैं एवं सभ्य समाज के विकास हेतु 10 फरवरी 2000 वसंत पंचमी से आरम्भ हो रहे दूसरे चरण की शुरुआत करने जा रहे हैं । यह महापुरुषार्थ अब सतत् चलता रहकर 1 जून 2001 गायत्री जयंती को समाप्त न होकर नई करवटें लगा लेगा एवं 8.2.2011 से 28.1.2012 (वसंत पर्व से वसंत पर्व) तक मनाए जाने वाले महाशताब्दी वर्ष तक चलेगा। इस प्रगति यात्रा में हम सभी प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के अनुदानों से लाभान्वित तो हों , पर कभी भी तप−साधना ममत्व-संवेदना के मूल बीज को जो कि इस संगठन का प्राण है, भूलने न पाएँ यही परमसत्ता से -कण-कण में समाई गुरुसत्ता से प्रार्थना है।
साधना ममत्व-संवेदना के मूल बीज को जो कि इस संगठन का प्राण है, भूलने न पाएँ यही परमसत्ता से -कण-कण में समाई गुरुसत्ता से प्रार्थना है।
साधना की प्रक्रिया समझाई। वह उत्तम अधिकारी उचित सत्पात्र तो था ही , अतः सहज ही योग−साधना में गति होने लगी।
साधना स्तर पर करने में भूल हो जाती है। भूलें स्वभावगत हों या परिस्थितियों के कारण , लोकसेवी को उसके साधनापथ से दूर हटाती है।
साधना सफल होती थी। यदि सच्चे मन से उच्चस्तरीय दृष्टिकोण लेकर सेवाधर्म अपनाया जाए ता उसका परिणाम लोकमंगल से भी अधिक आत्मोत्कर्ष के रूप में उपलब्ध होता है। इन तथ्यों का ध्यान में रखते हुए प्रज्ञापरिजनों का युगशिल्पी की भूमिका निभाने के लिए अग्रसर होते समय इस बात को गिरह बाँधकर रखना है कि उन्हें अपन स्तर से , व्यक्तित्व की दृष्टि से सामान्य लोगों के तुलना में कहीं ऊँचा उठकर रहना है।
साधना। फलतः धीरे-धीरे एक के बाद एक उन्हें सभी शक्तियाँ प्राप्त होती गई। वे चेतना के शीर्षतम स्तर पर आरुढ हो गए। 1885 ई. में जब वे सरकारी नौकरी से मुक्त हुए, तोकाशी के बाबा व योगीराज के रूप में सर्वत्र प्रसिद्ध हो गए।उन्होंने बहुतों को दीक्षा दी।
साधना में खरे उतरेंगे।”
साधना में ऐसा कुछ नहीं जिसके लिए शरीर निर्वाह एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने में कोई बाधा पड़ती हो। मात्र लोभ और मोह का मद्यपों जैसा अतिवाद ही एकमात्र अवरोध है, जो वस्तुतः तिनके जैसा हलका होते हुए भी पर्वत जैसा भारी बनकर दिग्भ्रांतों के मनःक्षेत्र पर भूत पिशाच की तरह चढ़ बैठता है और भली-चंगी परिस्थिति होते हुए भी नारकीय उत्पीड़नों की तरह निरंतर संत्रस्त करता रहता है।
साधना से पिछले दुर्गुणों से मुक्ति पा गए। राज प्रबंध उनकी माता और साथियों ने सँभाला। गोपीचंद , भर्तृहरि और जालंधर नाथ का त्रिगुट सुदूर क्षेत्रों में परिभ्रमण करता रहा और धर्म धारणा का प्रशंसनीय वातावरण निर्मित किया।
साधनापथ में दीक्षित करने के लिए ही मैं यहाँ आया हूँ।”
साधना एवं योगविद्या उत्कृष्टतम है। उनके पास जो ज्ञान है, वह तपोधन महर्षि को लोग स्वयं भगवान् का प्रतिनिधि मानते हैं। आसपास की ग्रामीण जनता इन्हें देवपुरुष समझती है।राजा ने सोचा- इन महर्षि से ही अपने प्रश्नों का समाधान पाया जाए।
साधना में जिनकी रुचि रही हो, ऐसे बालक श्रीराम ने बारह वर्ष की आयु में महामना मदनमोहन मालवीय जी से दीक्षा में गायत्री मंत्र पाया। यही उनकी जीवनसाधना की धुरी बन गया। पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पर्व की वेला में सूर्योदय के पूर्व गायत्री उपासना कर रहे साधक श्रीराम के पिताजी की आँवलखेड़ा स्थित हवेली के कक्ष (जो एक स्मारक के रूप में आज विनिर्मित है) में दीपक के प्रकाश से एक ज्योति पुरुष प्रकट हुए व उन्होंने अपने शिष्य को सूक्ष्मशरीर से दीक्षा दी,विगत जन्मों की जानकारी कराई व भविष्य में क्या कुछ किया जाना है, इस संबंध में विस्तृत मार्गदर्शन दिया। उन्होंने तीन महत्त्वपूर्ण निर्देश दिए- 1. अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना। इसी ज्योति के ज्ञान शरीर रूप में ‘अखण्ड दीपक जिसमें से उनका प्रकाश शरीर प्रकटा था, निरंतर प्रज्वलित रखना, अखण्ड यज्ञ के रूप में उसका संचालन किया जाना तथा उसके प्रकाश में ही भविष्य के सभी निर्णय लिए जाना।
साधना-स्वाध्याय में लगाना चाहती थी, किंतु मानसिक धरातल पर वह अपरिपक्व ही थी। वयस्क होने पर भी वह विवाह के लिए तैयार न होती थी। पिता का बहुत आग्रह पर उसने एक विद्वान् वयोवृद्ध से विवाह की स्वीकृति दे दी, ताकि उसका व्रत भी निभता रहे और लोकापवाद भी वन रहे। वयोवृद्ध पति की सेवा करते और उनसे ज्ञान-अनुदान का पाते बहुत समय बीत गया।
साधना में साधक एक साथ अपने विचारों दृश्यों आवाजों अनुभूतियों तथा अपने इर्द-गिर्द के लोगों एवं वस्तुओं के प्रति सजग रहता है। यह प्रत्याहार की दिशा में पहला कदम है।
साधना का मूलमंत्र है। इसी को उन्होंने हमेशा -हमेशा अपनाया। यह मार्ग हमारे और आपके लिए भी है।
साधना द्वारा उन्हें बार बार अवचेतन परत से बाहर आने का मौका दिया जाता है। इस क्रम में एक ऐसी स्थिति आती है, जब अवचेतन मन एकदम खाली एवं दमित इच्छा आकाँक्षाओं , वासनाओं एवं पूर्व संचित संस्कारों से रहित हो जाता है। इसी अवस्था में एकाग्रता सधती है। अतएव अंतर्मौन का प्रत्याहार की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ उपचार बतलाया गया है। धारणा और ध्यान की उपलब्धि इसी के बाद होती है।
साधना से उपजा समाधान इनमें से किसी के पास भी न था।
साधना द्वारा आरंभ कर इनकी तपऊर्जा से एक विराट् गायत्री परिवार खड़ा करना। जन्म जन्माँतरों से पुण्य संग्रह करती आ रही देवताओं की पक्षधर जागृतात्माओं को संगठित कर एक ही माला में पिरोया जाना ताकि सतयुग की आधारशिला वे रख सकें।
साधना उस सिद्धाँत पर आधारित है, जो यह प्रतिपादित करता है कि गंदगी के निष्कासन से स्वच्छता का संपादन स्वतः हो जाता है। उसे निकलने से रोकना अथवा उस पर आवरण चढ़ा देना थोड़े समय के लिए सफाई की भ्राँति पैदा कर सकता है। पर यह एक प्रकार से कीड़े को ढ़ककर सड़ने और बदबू पैदा करने देने जैसी ही प्रक्रिया हुई। इसीलिए इस साधना में साक्षी भाव से मन की क्रिया का निहारना पड़ता है। विचार शुभ हों अथवा अशुभ , अंतर्मन में जैसा कुछ घटित हो रहा हो, उसे अंगीकार करना पड़ता है।
साधना का प्रचार करना है। थोड़े ही दिनों में तुम्हें दानापुर लौट जाना पड़ेगा। तुम दुःखी मत होओ। देखो , मैंने ही तुम्हें यहाँ बुलवाया है। तुम अपने साहब का टेलीग्राम पाकर यहाँ बुलवाया है।
साधना में साक्षी भाव से मन की क्रिया का निहारना पड़ता है। विचार शुभ हों अथवा अशुभ , अंतर्मन में जैसा कुछ घटित हो रहा हो, उसे अंगीकार करना पड़ता है। बाह्य हस्तक्षेप सर्वथा निषिद्ध है। मन को एकाग्र करने का प्रयास भी आरंभ में वर्जित है। साधक को बिलकुल निरपेक्ष रहते हुए सावधानी पूर्वक उस पर नजर रखनी पड़ती है।
साधना करने वाले -स्थान स्थान पर दीपक जलाकर आहुति देने वाले आएँगे व तब समझ लेना कि नया युग आ गया है। मसीहा आ गया है। परमपूज्य गुरुदेव का चित्र व माथे का चंद्रमा देखते ही उन्होंने कहा कि यही कुछ तो हमें हमारे गुरुदेव भी बता गए है कि ऐसे महापुरुष आएँगे। यों स्पष्ट नहीं लग रहा था किंतु अब, जब आपका आसपुर में शक्तिपीठ बना व वहाँ गायत्री स्तवन के पाठ के साथ साथ दीपयज्ञ हुआ, हमारा विश्वास सुनिश्चित हो गया कि पूर्ण निष्कलंक प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की वेला आ पहुँची है।
साधना में गति होने लगी।
साधना समर में भागीदारी की। ऋषि-ऋषिका का युग्म पुरातनकाल में जो भूमिका निभाता चला आ रहा था, उसी की पुनरावृत्ति अब हुई एवं उसी आंवे में तप कर एक विराट् गायत्री परिवार खड़ा होता चला गया है।
साधना-प्रखर’ से शुभ अवतरण तुम्हारा॥
साधना द्वारा विचारक्राँति अभियान को विश्वव्यापी बनाना है -यह मार्गदर्शन गुरुसत्ता द्वारा दिया गया।
साधना विज्ञान के आचार्यों ने कुछ ऐसे उपाय उपचार सुझाए हैं। जिन्हें यदि साथ−साथ जारी रखा गया तो आत्मविकास अपेक्षाकृत कम समय में सरलतापूर्वक संपन्न हो जाता है। अंतर्मौन का अभ्यास इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। इसे कई चरणों में संपादित किया जाता है।
साधना का संपूर्ण प्रयास भीतरी गंदगी का निरस्त करने में ही खपता रहेगा। इससे प्रगति यात्रा बहुत लंबी और समयसाध्य बन जाती है। इसीलिए साधना विज्ञान के आचार्यों ने कुछ ऐसे उपाय उपचार सुझाए हैं। जिन्हें यदि साथ−साथ जारी रखा गया तो आत्मविकास अपेक्षाकृत कम समय में सरलतापूर्वक संपन्न हो जाता है। अंतर्मौन का अभ्यास इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है।
साधनापथ से दूर हटाती है।
साधना वर्ष के पूर्वार्द्ध का समापन कर रहे हैं व अगला वर्ष साधना महापूर्णाहुति वर्ष के रूप में आरंभ करने जा रहे हैं - जहाँ देखें, वहाँ तप−साधना एवं संवेदना परस्पर गुँथी देखी जा सकती है। ‘स्वस्थ शरीर -स्वच्छ मन ‘ के विकास से आरंभ हुई हमारी महापूर्णाहुति की पहली मंजिल व उसके अनुयाज की अवधि से हम गुजर रहे हैं एवं सभ्य समाज के विकास हेतु 10 फरवरी 2000 वसंत पंचमी से आरम्भ हो रहे दूसरे चरण की शुरुआत करने जा रहे हैं । यह महापुरुषार्थ अब सतत् चलता रहकर 1 जून 2001 गायत्री जयंती को समाप्त न होकर नई करवटें लगा लेगा एवं 8.2.2011 से 28.1.2012 (वसंत पर्व से वसंत पर्व) तक मनाए जाने वाले महाशताब्दी वर्ष तक चलेगा। इस प्रगति यात्रा में हम सभी प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के अनुदानों से लाभान्वित तो हों , पर कभी भी तप−साधना ममत्व-संवेदना के मूल बीज को जो कि इस संगठन का प्राण है, भूलने न पाएँ यही परमसत्ता से -कण-कण में समाई गुरुसत्ता से प्रार्थना है।
साधना में सफलता नहीं मिल सकती । इसी प्रकार जो सिद्ध -साधक बनना चाहते हैं, उन्हें यौन इच्छा को तिलाँजलि देनी होगी। इतना ही नहीं, हर प्रकार से मन को नियंत्रित करना पड़ेगा।ये दो विपरीत और विरोधाभासी स्थितियाँ हैं। इससे असमंजस पैदा होता और दुविधा उत्पन्न होती है, अतएव वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मानसिक निरोध के लिए कोई सरल और सुविधाजनक उपाय ढूंढ़ना पड़ेगा।
साधना व मानसपुत्र छत्रपति शिवाजी के माध्यम से न केवल दक्षिणी भारत में यवनों के आक्रमण का प्रतिरोध किया वरन् एक अखंड बृहत्तर भारत के निर्माण की नींव रखने में भी वे सफल हुए। स्थान स्थान पर हनुमान मंदिरों की स्थापना कर उन्होंने धर्म चेतना का अलख जगाया। स्वस्थ-सबल-संयमी नागरिक ही राष्ट्र के कर्णधार हो सकता है। यह तथ्य समर्थ रामदास की दृष्टि में थाव उनका सारा पुरुषार्थ इसी निमित्त नियोजित हुआ। समर्थ व छत्रपति शिवाजी के युग्म न वह कार्य किया जो तत्कालीन पराधीन परिस्थितियों में बप्पारावल व राणाप्रताप द्वारा राजस्थान में तथा प्राणनाथ महाप्रभु व छत्रसाल द्वारा मध्य भारत में संपन्न हो रहा था।
साधनाओं में यही किया जाता है। उसका प्रयोजन अपनी मसीमता को असीमता के साथ जोड़ देना है। इस उद्देश्य में जितनी सफलता मिलती जाती है उतनी ही मात्रा में मनुष्य उस वैभव पर आधिपत्य जमाता जाता है, जिसके प्रभाव को हम जड़ चेतन जगत् में अपने चारों और फैला हुआ देखते हैं। सीमाबद्ध स्थिति में हम तुच्छ और दरिद्र होते हैं, पर असीम के साथ जुड़ जाने में-महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रहती। अध्यात्म इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है।
साधनाओं में रुचि लेने के लिए परामर्श दिया जाता है, किंतु पुरातन तत्वज्ञान को हृदयंगम कराए बिना उस दिशा में न तो विश्वास जमता है , न मन टिकता है। बदली हुई परिस्थितियों में हम कर्मयोग का ईश्वरप्राप्ति का आधार मान सकते हैं। कर्त्तव्य को, संयम को, नीति-नियम एवं पुण्य -परमार्थ को ईश्वर का निराकार रूप मान सकते हैं। कार्यों के साथ आदर्शवादिता का समावेश रखा जा सके तो वह सम्मिश्रण इतना मधुर एवं सरस बन जाता है कि उस पर मन टिक सके। बया अपने घोंसले को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर तन्मयतापूर्वक बनाती है।
साधना के उच्च मार्ग में अवस्थान के समय ही तुमने अपना वह पूर्व शरीर छोड़ दिया था, परंतु ईश्वर की इच्छा है कि तुम संसार में कुछ करो, अतः तुम्हारी साधन-संपदा न्यास के रूप में मेरे पास रखी हुई है । तुम्हें फिर से साधनापथ में दीक्षित करने के लिए ही मैं यहाँ आया हूँ।”
साधना का बीज कण-कण में बसा हुआ है। बस, उस पुरातन ऋषि संस्कार को पुनर्जीवित करना भर शेष है। पूज्यवर की घोषणा को बल मिला उनके 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों की समाप्ति पर हुए एक विराट् अनुष्ठान द्वारा जिसमें 24 लाख आहुतियों का यज्ञ किए जाने की घोषणा हुई। गायत्री तपोभूमि विनिर्मित हुई एवं तदुपरांत ही 1958 के सहस्रकुंडी महायज्ञ का संकल्प घर घर गूँजने लगा। परमवंदनीया माताजी जिनके स्नेह एवं ममत्व ने गायत्री परिवार की धुरी बनने का काम किया, ने कंधे से कंधा मिलाकर परमपूज्य गुरुदेव के साधना समर में भागीदारी की।
साधना वर्ष 1999 के दौरान ही आरंभ हो गई थी, प्रथम चरण भी 3 दिसंबर 1999 को प्रायः एक लाख स्थानों पर न्यूनतम एक करोड़ व्यक्तियों की -सभी संप्रदायों के व्यक्तियों की भागीदारी द्वारा आरंभ हो गया। अब द्वितीय चरण जो वसंत पर्व 10 फरवरी गुरुवार के दिन है, के लिए सभी परिजन प्रथम चरण के दिन है, के लिए सभी परिजन प्रथम चरण के विचारक्राँति प्रधान क्राँतिधर्मी साहित्य की घर घर स्थापना व मिशन की पत्रिकाओं के न्यूनतम पाँच गुना विस्तारपरक अनुयाज के साथ-साथ जुट गए हैं, कमर, कसकर तैयारी में लग गए हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ के साथ यह भूमिका सामयिक ही है - यह बताया गया। तत्पश्चात् जनसंपर्क व साहित्य साधना द्वारा विचारक्राँति अभियान को विश्वव्यापी बनाना है -यह मार्गदर्शन गुरुसत्ता द्वारा दिया गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-June
साधना के क्षेत्र में इस तरह के प्रयत्नों को सामूहिक उपासना का नाम दिया जा सकता है। इन दिनों मानव सभ्यता आस्था संकट के दौर से गुजर रही है। इस कारण तनाव कुंठा निराशा क्षोभ हिंसा विग्रह रोग शोक जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है। उन्हें आसमान फट पड़ने की तरह देख जा सकता है। विनाश चारों ओर से उमड़ रहा है।
साधना द्वारा ही होना संभव है।
साधना का तेज है। मेरी इस धर्म साधना की महिमा और महात्म्य को समूचे संसार में प्रसिद्ध होना चाहिए। आखिर मैंने विपरीत क्षणों में कठोर तपस्या करके विजय पाई है। कोई भी कठिनाई, किसी तरह की बाधा मेरे तप में विघ्न-व्यवधान नहीं डाल सकी। अतः अब अपनी इस तपस्थली से मैं सीधे मनुष्य-समाज में पहुँचूँगा और उन सभी को धर्म के रहस्य और अपनी महिमा से परिचित करवाऊँगा, साथ ही यह भी पता लगाऊँगा कि समूचे विश्व में क्या कोई मेरे जैसा दूसरा भी हैं ?
साधना से गायत्री की विलुप्त शक्तियों को फिर से उजागर किया। गायत्री महाविद्या एवं इसके तत्त्वज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए संकल्पित हुए। चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णता की वेला में अगस्त 1951 की अखण्ड ज्योति में उन्होंने अपने अनुभवों को बताते हुए लिखा, “हमारे जीवन का अधिकाँश भाग गायत्री माता की गोदी में व्यतीत हुआ है। इस महामंत्र के संबंध में हजारों आर्षग्रंथों का अनुसंधान करके हमने यह पाया है कि आध्यात्मिक साधनाओं में गायत्री साधना से बड़ी दूसरी कोई साधना नहीं है।”
साधना से उत्पन्न आत्म-शक्ति ही प्रधान थी। तब यह देश अपने आचरण और आँतरिक बल के कारण संसार का प्रकाश-स्तंभ ध्रुवतारा बना हुआ था और जगद्गुरु कहलाता था। इस रूप में इसकी भावी प्रतिष्ठा का आधार भी यही होगा।
साधना की महिमा और महात्म्य को समूचे संसार में प्रसिद्ध होना चाहिए। आखिर मैंने विपरीत क्षणों में कठोर तपस्या करके विजय पाई है। कोई भी कठिनाई, किसी तरह की बाधा मेरे तप में विघ्न-व्यवधान नहीं डाल सकी। अतः अब अपनी इस तपस्थली से मैं सीधे मनुष्य-समाज में पहुँचूँगा और उन सभी को धर्म के रहस्य और अपनी महिमा से परिचित करवाऊँगा, साथ ही यह भी पता लगाऊँगा कि समूचे विश्व में क्या कोई मेरे जैसा दूसरा भी हैं ? “इस आत्मप्रशंसा एवं अहंभाव से उनका समूचा अंतःकरण ओत-प्रोत था।
साधना समर में उतरे तो हो सकता है कि चार कदम चलने पर ही लड़खड़ा जाएँ। लेकिन सामूहिक उपासना में कमजोर लोग भी सहज ही विकास करने लगते हैं। कोई वाहन या चालक यह तो नहीं देखता कि अमुक यात्री कमजोर है, इसलिए उसे धीरे धीरे ले जाएँ और कोई ज्यादा समर्थ है, तो उसे जल्दी मंजिल तक पहुंचा दे। सामूहिक उपासना को जीवंत और गतिमान बनाया जा सके, तो वह अक्षम -कमजोर साधकों का विकास भी उसी तेजी से करने लगती है, जितना की समर्थ साधकों को आगे बढ़ाती है। वाहन में सवार होना पर्याप्त नहीं है, उसमें गति भी आनी चाहिए।
साधना, संस्कार और शुचिता के मार्ग का आग्रह रखते हुए साधकों के लिए एक स्थिति में वेद और शास्त्र को ही प्रमाण मानना ठीक था, लेकिन आग्रह ने जब अंधानुकरण का रूप ले लिया, तो उसका विरोध आवश्यक था। यह विरोध वेद-शास्त्रों का नहीं मन-मस्तिष्क में आ बैठी जड़ता का था।
साधना से बड़ी दूसरी कोई साधना नहीं है।”
साधना का समय है। कोई भी जागृतात्मा इस पावन सुयोग से वंचित न रहने पाए।
साधना! रात-दिन, वर्षा-धूप शीत-ग्रीष्म किसी की भी चिंता किए बगैर अविचल भाव से महारण्य में उन्होंने निराहार तपोमयी जीवन बिताया और वाराणसी के साधारण से एक दुकानदार तुलाधार वैश्य की तुलना में उनकी समूची तप-साधना निष्फल है। वह साधारण सा वैश्य तुलाधार उनसे कहीं श्रेष्ठ है। अंतर्द्वंद्व से उनके मन-अंतःकरण में कुहराम मच गया। उनकी तप साधना की समूची स्थिरता-एकाग्रता जल के फेन की भाँति न जाने कहाँ विलीन हो गई।
साधना नहीं है।”
साधना शक्तिपात के ‘शार्टकट’ से उत्पन्न होती है एकाधबार के नृत्य ध्यान से ही जिस चमत्कार का आश्वासन दिया जाता है, वह प्रायः वंचनामूलक ही होता है। गुरु लोग ‘कुँडलिनी जग गई ओर जागी रहेगी। कहकर साधक का भारी अहित कर देते हैं। उसकी भारी संभावनाओं पर भी रोक लगा देते हैं।
साधना भी पूरी हुई और इसी के साथ सहस्रांशु ब्रह्मयज्ञ के रूप में युगपरिवर्तन का महासंकल्प भी उभरा।
साधना में गति और ऊर्जा लाने के आपने नियम -विधान है, उन्हें संपन्न किया जाये, तो सामूहिक उपासना भी प्राणवान हो उठती है।
साधना का सारा कलेवर खड़ा ही इसलिए किया गया है कि व्यक्तित्व को उत्कृष्ट एवं गतिविधियों को आदर्श बनाया जाए। धर्म, चरित्र गठन का नाम है, तो अपनी क्षमताएँ लोकमंगल के लिए समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाएं श्रेष्ठतम हों व लोकमंगल के लिए अर्पित हो तो ही उनकी सार्थकता है।
साधना रूपी कल्पवृक्ष को छिन्न-भिन्न करने वाला अहंकार कुठार दीर्घ साधना के बाद भी आप में छिपा रहा। इसी घोर शत्रु से छुटकारा दिलाने के लिए देववाणी सुनाई दी और आप यहाँ आए। अब आप ही बताएँ कि मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य करूं, जिससे आपका कल्याण हो ?”
साधना अवरुद्ध हो जाती है। लक्ष्य तक पहुँचे बिना ही वहाँ पहुँचा मान लिया जाए तो प्रगति का रुक जाना स्वभाविक है। आत्मवंचना की यह स्थिति साधना शक्तिपात के ‘शार्टकट’ से उत्पन्न होती है एकाधबार के नृत्य ध्यान से ही जिस चमत्कार का आश्वासन दिया जाता है, वह प्रायः वंचनामूलक ही होता है। गुरु लोग ‘कुँडलिनी जग गई ओर जागी रहेगी। कहकर साधक का भारी अहित कर देते हैं।
साधना से ही संभव है। यही मेरा उत्तम व्रत है और मेरी जीवन-साधना का मूलमंत्र है अपने गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए मैं नित्य-निरंतर आत्मपरिष्कार में लीन रहता हूँ। यही मेरी सिद्धी और यही मेरा धर्मतत्त्व हैं।”
साधना की निष्ठा ने उन्हें तपोनिष्ठ बनाया और वे वेदमाता के वरद पुत्र होकर वेदमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित हुए। वेदमाता गायत्री सृष्टि की आदि शक्ति है। सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने घोर तप करके इसके तत्त्वज्ञान को जाना था। इसी से वे सृष्टि रचना के लिए आवश्यक ज्ञान-विज्ञान एवं शक्ति-सामर्थ्य प्राप्त करने में सक्षम हुए थे।
साधना के प्रभाव से देवों, असुरों और मनुष्यों की स्वभावानुसार भोगेच्छा, हिंसा और साँसारिक आसक्ति की भावनाएँ समाप्त होने लगी। विरक्तभाव से वे सभी अध्यात्म-चिंतन में लग गए।
साधना करें। एक वर्ष की अवधि पूर्ण होने पर मैं तुम सबको अमृत तत्व की शिक्षा दूँगा।”
साधनात्मक प्रयोगों की रूपरेखा बनाई गई है। राहत सामग्री की कमी नहीं है। कमी है तो कर्मठ, प्रामाणिक चुस्त स्वयंसेवकों की । सरकारी व गैरसरकारी प्रयास प्रभावी हो सकें, इसके लिए परिजनों को कमर कसकर तैयार होना होगा, विशेषकर राजस्थान व गुजरात में। अस्थायी गोशालाएँ, पशुशालाएँ एवं चारा-भंडार स्थान-स्थान पर बने हैं।
साधना के बाद भी आप में छिपा रहा। इसी घोर शत्रु से छुटकारा दिलाने के लिए देववाणी सुनाई दी और आप यहाँ आए। अब आप ही बताएँ कि मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य करूं, जिससे आपका कल्याण हो ?”
साधना निष्फल है। वह साधारण सा वैश्य तुलाधार उनसे कहीं श्रेष्ठ है। अंतर्द्वंद्व से उनके मन-अंतःकरण में कुहराम मच गया। उनकी तप साधना की समूची स्थिरता-एकाग्रता जल के फेन की भाँति न जाने कहाँ विलीन हो गई।
साधना संबंधी आकर्षण, तरह-तरह की अनुभवों की चर्चा किसी को भी अपनी गुरुसत्ता से जिज्ञासाएँ पूछने को विवश कर देती हैं। ऐसा ही कुछ इस सज्जन के साथ भी हुआ व उनको स्पष्ट परामर्श मिल गया कि उनका पथ क्या है व गृहस्थ में रहकर उसे ही तपोवन बनाते हैं।
साधनाओं में गायत्री साधना से बड़ी दूसरी कोई साधना नहीं है।”
साधना का मूलमंत्र है अपने गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए मैं नित्य-निरंतर आत्मपरिष्कार में लीन रहता हूँ। यही मेरी सिद्धी और यही मेरा धर्मतत्त्व हैं।”
साधना युगपरिवर्तन जैसा कार्य कर दिखाती है। बिना किसी संदेश के हर साधक को इसमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
साधना से धर्म के तत्त्व को प्राप्त करने वाला महासाधक मैं और कहाँ साँसारिक वस्तुओं को खरीदने -बेचने में जुटा यह महासंसारी वणिक तुलाधार! यह तो लाभ-हानि से भरे लोभ-लिप्सा से मग्न क्षणों का ही जीवन बिता रहा है।द्वंद्व से विचलित उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। वे चुपचाप उसी स्थान पर खड़े रहे और तुलाधार से एकाँत में वार्ता की प्रतीक्षा करने लगे।
साधनाओं से निर्मल हुए चित्त में केवल अनुभव ही किया जा सकता है। स्वामी सत्यानंद के अनुसार मस्तिष्क में विद्यमान उस गहर अथवा कुँड को जगा दिया जाए तो व्यक्ति के संपूर्ण अस्तित्व में स्थित शक्तिकेंद्र जाग उठते हैं। सामान्य स्थिति में ये केंद्र सोए पड़े रहते हैं।
साधना के क्षेत्र में वह पहले से स्थित था। भगवान बुद्ध ने उन्हें ऊर्जा प्रदान की।”
साधना सर्वथा अविचल एवं अडिग बनी रही। इसी भावना ने उन्हें गर्व के उन्माद से भर दिया और वे आत्मप्रशंसा करते हुए अपने अंतर्मन की बातें कहने लगे, “अकेला मैं ही हूँ,जिसने इस धरती पर धर्म का रहस्य जान लिया है। सहस्रों किरणों वाले सूर्य की तेजस्विता से बढ़कर भी मेरी तप-साधना का तेज है। मेरी इस धर्म साधना की महिमा और महात्म्य को समूचे संसार में प्रसिद्ध होना चाहिए। आखिर मैंने विपरीत क्षणों में कठोर तपस्या करके विजय पाई है।
साधना आवश्यक होती है, इसी प्रकार नानाविधि पापों−तापों से त्रास देने वाली इस घनघोर अंधकारमयी नियति का परिवर्तन करके शाँतिदायी सतोगुणी ऊषा के स्वागत में यह महायज्ञ किया जा रहा है।”
साधना-मार्ग पर ही चलेंगे। दूसरा अवसाद यह कि अब साधु बनकर हिमालय चले जाएँगे। परमपूज्य गुरुदेव का अभिमत होता था कि ऐसे में विवेक का आश्रय लें, समझदारी से काम कर अपनी पत्नी-परिवार को साथ लेकर चलें। श्री रामदास जी जो कानपुर के निवासी हैं, को लिखा पत्र यहाँ प्रस्तुत है।
साधना द्वारा लाने वाले पूज्य गुरुदेव को इस युग का विश्वामित्र कहना अतिशयोक्ति न होगी। गायत्री महामंत्र के साथ आदि ऋषि के रूप में विश्वामित्र का नाम जुड़ा हुआ है। वे ही इसे प्रथम द्रष्टा ऋषि हुए हैं। गायत्री जयंती के महापर्व के दिन ही उन्होंने इसका साक्षात्कार किया था। इसके अवलंबन से वे ब्रह्मर्षि पद पर प्रतिष्ठित हुए थे और सृष्टि के निर्माण व संचालन की शक्ति से संपन्न बने थे।
साधना के मार्ग पर प्रगति हो रही है। सिद्धियां उस मार्ग पर मील के पत्थर की तरह है। साधक के लिए शास्त्र और गुरु का निर्देश है कि इन सिद्धियों में अपने आपको भूले नहीं। उन्हें देखकर उत्साह बढ़ता अनुभव करें और मुक्ति तक पहुँचकर ही विराम लें। परमपूज्य गुरुदेव ने साधना से सिद्धि में इस संबंध में विशेष निर्देश दिये है।
साधना करके कोई भी इस के माहात्म्य से परिचित हो सकता है। इस साधना में जीवन का अभ्युदय एवं पूज्यवर का आशीष दोनों समाए हैं।
साधनाएँ निजी स्तर पर की जाती रही है। निजी स्तर पर संध्यावंदन, ध्यान,जप,पूजन,अग्निहोत्र जैसे कर्म भी किया जाते रहे है। साथ ही राष्ट्र या समाज में चेतना जगाने के लिए सामूहिक अनुष्ठान आरम्भ से ही किये जा रहे है। वेद मंत्रों का सामूहिक सस्वर पाठ, स्वाध्याय,आध्यात्मिक व्यायाम और प्रार्थना आदि कृत्य सभी कालों में चले रहे है। प्राकृतिक विपदाओं के निवारण के लिए विभिन्न आध्यात्मिक प्रयोगों का स्वरूप भी सामूहिक ही रहा है।
साधना-प्रक्रिया को विलक्षण ढंग से सरल बना दिया है। साधकों के लिए एकाँत में रहने वही भजन पूजन करने और आहार में सात्विकता के समावेश के लिए अपना भोजन स्वयं तैयार करने जैसे अनुशासन अपनाये जाते हैं। इन अनुशासन नियमों का एक ही उद्देश्य है कि साधक दुनियादारी अथवा बाहरी प्रभावों से यथासंभव बच्चा रहे। बाहरी प्रभाव ध्यान में विक्षेप लाते हैं। एकाँत में रहने की बात इसलिए कही जाती है।
साधनाक्रम शर्त किसी न किसी रूप में जरूर पूरी करें। इसी तरह का एक विशिष्ठ विधान बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण रहा है। लाखों करोड़ों की उसमें भागीदारी रही है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे ब्रह्मामण अनुष्ठान नाम दिया है। उसी की महापूर्णाहुति इस वर्ष संपन्न हो रही है।
साधना की समूची स्थिरता-एकाग्रता जल के फेन की भाँति न जाने कहाँ विलीन हो गई।
साधना को सफल मानने लगे।
साधना कर कर्मयोग करते हुए पत्नी व पिता-माता सभी को साथ लेकर चलने का मार्गदर्शन कितना व्यवहारिक है, भलीभाँति समझा जा सकता है। मानवी चिंतन के रुझान के अनुरूप उँगली पकड़कर दिग्दर्शन कराना, यही तो सद्गुरु का कार्य रहा है। आज गायत्री जयंती की पुण्यवेला में जब हम पूज्यवर को स्मरण करते हैं, तो उनकी ये पंक्तियाँ अंदर तक स्पर्श कर जाती हैं। लाखों सद्गृहस्थों का निर्माण कर उन्हें धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की दिशा में अग्रगामी बनाने वाली सत्ता जिस लक्ष्य को लेकर आई थी, उसकी पूर्ति हेतु काफी पूर्व आज से पचास साल पहले ही तत्पर हो गई थी।
साधना के मार्ग में उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाता । वे मात्र यह संकेत देती है कि साधना के मार्ग पर प्रगति हो रही है। सिद्धियां उस मार्ग पर मील के पत्थर की तरह है। साधक के लिए शास्त्र और गुरु का निर्देश है कि इन सिद्धियों में अपने आपको भूले नहीं। उन्हें देखकर उत्साह बढ़ता अनुभव करें और मुक्ति तक पहुँचकर ही विराम लें।
साधना-आराधना का त्रिविध अवलंबन लेने की बात आदिकाल से कहते रहे हैं। उपासना का उद्देश्य है- आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना। आत्मा अर्थात् अंतःकरण, भाव-संस्थान जिसके साथ मान्यताएँ, आकाँक्षाएँ लिपटी रहती हैं। परमात्मा अर्थात् उत्कृष्ट आदर्शवादिता। इन दोनों के मिलन में यदि को सहायक हो समता है, तो वह सद्गुरु ही हैं।
साधना नाम देंगे।
साधना सिद्धि को अपने आप से छलावा ही कहेंगे। घंटे आधा घंटे के अभ्यास से महीने पंद्रह दिन में कुँडलिनी जगाने के आश्वासन साधक के लिए प्रवचन मात्र ही है। पंडित गोपीनाथ कविराज लिखते हैं कि महीने पंद्रह दिन के अभ्यास में इतना व्यतिक्रम आने से वापस सो भी सकती है। जो पात्र मामूली प्रयत्न से चमक उठता है, वह थोड़ी सी गंदगी के कारण मलीन भी हो सकता है। यह अनुभूत तथ्य है कि महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्रचंड पुरुषार्थ और निरंतर साधना से ही प्राप्त हो सकती है।
साधना से ही प्राप्त हो सकती है। प्रयत्न उसी स्तर के होने चाहिए।
साधना उपासना के क्षेत्र में वही ग्रहण किया जाना चाहिए। आध्यात्मिक अर्थ यह है कि सामान्य मनोभूमि सामान्य संकल्प और औसत अभीप्सा के लोग एक साथ संकल्प करें तो भी भगवान की शक्तियाँ सक्रिय हो उठती है। उनके अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं और सामान्य लोगों के लिए वह आच्छादन मिल जाता है। जो नहीं मिलता तो संभव है कि भारी अनर्थ हो जाता।
साधना ही करनी थी, तो गार्हस्थ्य में प्रवेश ही क्यों किया? अपने आप पर, अपने जीवनसाथी पर झल्लाते हैं कि इस के कारण हम आत्मिक प्रगति नहीं कर पा रहे। व्यावहारिक अध्यात्मवाद की प्रणेता, हर किसी का सूक्ष्म अध्ययन कर उसका सच्चा मार्गदर्शन करने वाली गुरुसत्ता अपने पत्रों द्वारा उस संबंध में बड़ा स्पष्ट मार्गदर्शन करती थी।
साधनादान मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त करने जा रहे हैं।
साधनाओं के अलावा सिद्ध संतों की खोज में पूरा जीवन बिता देने वाले महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज एवं परमपूज्य गुरुदेव ने कुँडलिनी जागरण के इन अभ्यासों को छलावा कहा है। दोनों के अनुसार सिर्फ मान लेने या कल्पना करने से ही कुँडलिनी जाग्रत नहीं हो जाती व्यक्ति में दिव्य क्षमताओं का परिचय भी मिलना चाहिए। इन क्षमताओं में सृजन की क्षमता साहित्यिक व कलात्मक प्रतिभा का उदय संकल्प सिद्धि दूसरों के मान की बात जान लेना,अतींद्रिय क्षमताएँ जाग्रत हो जाना सूक्ष्मशरीरधारी जीवों से संपर्क बना लेना और मोक्ष प्राप्त कर लेने जैसी सिद्धियां मुख्य है। सिद्धियों को साधना के मार्ग में उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाता । वे मात्र यह संकेत देती है कि साधना के मार्ग पर प्रगति हो रही है।
साधना में जीवन का अभ्युदय एवं पूज्यवर का आशीष दोनों समाए हैं।
साधना की सफलता थी कि इन पक्षियों का परिवार उनकी जटाओं में इतनी लंबी अवधि तक बना रहा और वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनकी साधना सर्वथा अविचल एवं अडिग बनी रही। इसी भावना ने उन्हें गर्व के उन्माद से भर दिया और वे आत्मप्रशंसा करते हुए अपने अंतर्मन की बातें कहने लगे, “अकेला मैं ही हूँ,जिसने इस धरती पर धर्म का रहस्य जान लिया है। सहस्रों किरणों वाले सूर्य की तेजस्विता से बढ़कर भी मेरी तप-साधना का तेज है। मेरी इस धर्म साधना की महिमा और महात्म्य को समूचे संसार में प्रसिद्ध होना चाहिए।
साधना से सिद्धि में इस संबंध में विशेष निर्देश दिये है।
साधना में लीन हो गये। तप-साधना के प्रभाव से देवों, असुरों और मनुष्यों की स्वभावानुसार भोगेच्छा, हिंसा और साँसारिक आसक्ति की भावनाएँ समाप्त होने लगी। विरक्तभाव से वे सभी अध्यात्म-चिंतन में लग गए।
साधना आसानी से बन पड़े, उतनी कर लिया करो। घट-घटवासिनी माता सब कुछ जानती हैं। तुम्हारी आत्मा में जो श्रद्धा-भक्ति है उसे वे भली प्रकार पहचानती हैं। गृहस्थ में रहकर तुम तपस्वी की भाँति जीवनयापन करती रहो। इसमें जीवन का लक्ष्य पूरा हो जाएगा।
साधना भी उत्कृष्ट हैं, फिर भी तुम धर्म के गूढ रहस्य से अनभिज्ञ हों। वाराणसी नगरी के तुलाधार वश्य तत्त्वज्ञानी हैं। वे कभी भी गर्वभरी वाणी नहीं बोलते, जबकि तुम अहंकार के वशीभूत होकर स्वयं की महिमा का झूठा बखान करते फिर रहे हो”। इन वचनों से तपस्वी जाजलि उद्विग्न हो उठे।
साधनाओं का मूलतत्व है। इसे जीवन -विद्या भी कह सकते हैं और जीवन जीने की कला भी। यह हमारे हाथों में टार्च की तरह है, जिसके सहारे हम असत् के अंधेरे को पारकर स्वप्रकाशित परम सत्य तक पहुंचते हैं। यद्यपि यह यात्रा किंचित दुष्कर अवश्य है, पर असंभव चैतन्य एवं आनंद से परिपूर्ण है, क्योंकि असत् ही अज्ञान है और इस अज्ञान में ही अभाव है। इस अभाव में ही सारे दुःख दैन्य अपने आप ही हट-मिट जाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-July
साधनाविहीन साधु को एक ओर वासना की पीड़ाएँ सताती है; उनकी ज्वालाओं में उसका जीवन तपता-झुलसता रहता है; तृष्णा की दुष्पूर दौड़ उसे हर पल दुःख देती रहती है; दूसरी ओर उसे दमन और आत्म उत्पीड़न की अग्निशिखाएँ जलाती है। एक ओर कुआं है तो दूसरी ओर खाई। सच्ची साधन के बिना इन दोनों में से किसी एक में गिरना ही पड़ता है।
साधना का समय है। कोई भी जागृतात्मा इस पावन सुयोग से वंचित न रहने पाए।
साधना का सारा कलेवर खड़ा ही इसलिए किया गया है कि व्यक्तित्व को उत्कृष्ट एवं गतिविधियों को आदर्श बनाया जाए। धर्म, चरित्र गठन का नाम है, तो अपनी क्षमताएँ लोकमंगल के लिए समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाएं श्रेष्ठतम हों व लोकमंगल के लिए अर्पित हो तो ही उनकी सार्थकता है।
साधना में हैं। साधना के अभाव में साधु का जीवन या तो मात्र अभिनय हो सकता है या फिर दमन हो सकता है। ये दोनों ही बातें शुभ नहीं है। तप-साधना का मिथ्या अभिनय पाखंड है। जबकि कोरा दमन और भी महाघातक है।
साधनावान व्यक्ति अपने मन की अपरिमित शक्ति से भी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। टेलीपैथी उपचार प्रक्रिया भी इन्हीं में से एक है। जैक्विटा हाँक्स, जो ब्रिटेन महोत्सव के लिए पुरातत्व परामर्शदात्री थी एवं प्रीस्टले भी उसमें सहयोगी थे।
साधना का प्रमुख आधार कहा गया है। जिन्हें धर्मसाधना में कोई रुचि नहीं, उन्हें भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि लौकिक उद्देश्यों जैसे यश, वैभव, सफलता और सत्ता पाने के लिए शरीर का स्वस्थ-समर्थ होना जरूरी है, ने केवल जरूरी बल्कि अनिवार्य है। किसी भी दृष्टि से कमजोर और रुग्ण शरीर अपने उद्देश्य तक नहीं पहुँचता। उसकी उपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए।
साधना वेश-विन्यास की विविधता या कौतुक भरे प्रदर्शन का नाम नहीं है। यह नर से नारायण बनने की अंतर्यात्रा है, जो पशु-भाव का दमन करके नहीं, उसे सर्वथा छोड़कर परमात्मा-भाव में प्रतिष्ठित होने में ही संपन्न होती है।
साधना द्वारा न्यूरोपेप्टाइड को काफी मात्रा में बढ़ाया जा सकता है। वैज्ञानिकों की मान्यता है कि किसी विशेष परिस्थिति में न्यूरोपेप्टाइड बढ़ जाते हैं। अतः योग के माध्यम से न्यूरोपेप्टाइड को बढ़ा संभव है। इससे व्यक्ति की भाव-संवेदना का प्रभावित होना तय है। मन को शाँत एवं प्रसन्न रखकर जीवनयापन करते हुए भाव-संवेदना का जागरण संभव है।
साधना उतनी ही सफल होगी।
साधनाओं का केंद्रबिंदु भी मन को पवित्र एवं ऊर्ध्वगामी बनाए रखना है। ऐसे प्रखर साधनावान व्यक्ति अपने मन की अपरिमित शक्ति से भी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। टेलीपैथी उपचार प्रक्रिया भी इन्हीं में से एक है। जैक्विटा हाँक्स, जो ब्रिटेन महोत्सव के लिए पुरातत्व परामर्शदात्री थी एवं प्रीस्टले भी उसमें सहयोगी थे।
साधना में शिव को अर्द्धनारीश्वर कहा गया है। संसार के किन्हीं और साधना संप्रदायों या धर्म-धारणाओं में इस तथ्य का प्रतिपादन नहीं मिलता। अर्द्धनारीश्वर भारतीय धर्मपरंपरा की अनूठी धारणा है। आधुनिक मनोविज्ञान ने इस धारणा की एक तरह से पुष्टि की है कि मनुष्य न तो अकेला पुरुष ही है और न ही स्त्री, बल्कि उसके कलेवर में स्त्री और पुरुष दोनें है। जो तल ऊपर होता है, वही दिखाई देता है, अन्यथा मन की दृष्टि से तो प्रत्येक व्यक्ति उभयलिंगी है।
साधना में कोई रुचि नहीं, उन्हें भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि लौकिक उद्देश्यों जैसे यश, वैभव, सफलता और सत्ता पाने के लिए शरीर का स्वस्थ-समर्थ होना जरूरी है, ने केवल जरूरी बल्कि अनिवार्य है। किसी भी दृष्टि से कमजोर और रुग्ण शरीर अपने उद्देश्य तक नहीं पहुँचता। उसकी उपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए।
साधना में प्रवेश नहीं होता तब तक कोई उत्तर या समाधान नहीं है। समाधान करने से आते हैं। संक्षेप में यह कि तंत्र समाधान नहीं देता, वह समाधान की विधि देता है। यह समाधान बौद्धिक नहीं, प्रायोगिक है। उदाहरण के लिए, अंधे व्यक्ति से प्रकाश के बारे में कुछ कहा जाए तो वह निरा बौद्धिक होगा।
साधना से जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आँधियों से मुक्त कर लेते हैं, वे उस कुँजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का द्वार खुलता है और तभी वह साधुता प्रकट होती है, जिसकी अलौकिक सुगंध से अनेकों दूसरी सुप्त और मुरझाई आत्माएँ भी जाग्रत होकर मुस्कराने लगती है।
साधना न तो भोग में है और न दमन में। यह तो आत्मजागरण में है। इन दोनों अतियों के द्वंद्व में से उबरने और परमेश्वर में स्वयं को विसर्जित करने में है। साधना वेश-विन्यास की विविधता या कौतुक भरे प्रदर्शन का नाम नहीं है। यह नर से नारायण बनने की अंतर्यात्रा है, जो पशु-भाव का दमन करके नहीं, उसे सर्वथा छोड़कर परमात्मा-भाव में प्रतिष्ठित होने में ही संपन्न होती है।
साधना नहीं है। साधन के बिना साधुता कागज के फूलों की तरह है। जिनमें बहुरंगी आकर्षण तो भरपूर है, लेकिन सुगंध का एकदम अभाव है। सब तरफ आज ऐसे ही कागज के फूल दिखाई देते हैं। इसी वजह से धर्म की प्रखरता-तेजस्विता मंद पड़ गई है।
साधना के लिए सदैव इसी का तट अभीष्ट रहा है। इसी के किनारे साँसारिक ताप से पीड़ित, मानवता को शाँति-मुक्ति देने वाले प्रमुख तीर्थों का निर्माण हुआ इसी के आँचल में देव-संस्कृति का विकास हुआ और सभ्यताएँ फली-फूली। इसके जल को अमृत की संज्ञा दी गई। सुविख्यात वैज्ञानिकों ने अपने परीक्षणों से इसकी अलौकिक विशेषता की पुष्टि की। भारतवासियों के साथ विदेशियों ने भी इसकी श्रेष्ठता को आश्चर्य विभोर होकर स्वीकारा।
साधना के अभाव में साधु का जीवन या तो मात्र अभिनय हो सकता है या फिर दमन हो सकता है। ये दोनों ही बातें शुभ नहीं है। तप-साधना का मिथ्या अभिनय पाखंड है। जबकि कोरा दमन और भी महाघातक है। उसमें संघर्ष की यातना तो है, पर उपलब्धि कुछ भी नहीं।
साधना का मिथ्या अभिनय पाखंड है। जबकि कोरा दमन और भी महाघातक है। उसमें संघर्ष की यातना तो है, पर उपलब्धि कुछ भी नहीं। जिसे दबाया जाता है, मरता नहीं, बल्कि और गहरी परतों में सरक जाता है। साधनाविहीन साधु को एक ओर वासना की पीड़ाएँ सताती है; उनकी ज्वालाओं में उसका जीवन तपता-झुलसता रहता है; तृष्णा की दुष्पूर दौड़ उसे हर पल दुःख देती रहती है; दूसरी ओर उसे दमन और आत्म उत्पीड़न की अग्निशिखाएँ जलाती है।
साधना संप्रदायों या धर्म-धारणाओं में इस तथ्य का प्रतिपादन नहीं मिलता। अर्द्धनारीश्वर भारतीय धर्मपरंपरा की अनूठी धारणा है। आधुनिक मनोविज्ञान ने इस धारणा की एक तरह से पुष्टि की है कि मनुष्य न तो अकेला पुरुष ही है और न ही स्त्री, बल्कि उसके कलेवर में स्त्री और पुरुष दोनें है। जो तल ऊपर होता है, वही दिखाई देता है, अन्यथा मन की दृष्टि से तो प्रत्येक व्यक्ति उभयलिंगी है। तंत्र ने हजारों साल पहले इस तथ्य को जानकर शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप को अनुभव किया, उसकी आराधना की।
साधनादान मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति के निमित्त करने जा रहे हैं।
साधना एक समर है। इसमें साधक को संकल्प और शक्ति के साथ उतरना होता है। स्वामी रंगनाथानंद ने आचार्य शंकर के मत का परिचय देते हुए लिखा है, “वे पूर्णता की यात्रा के रूप में मानव जीवन की क्रियाशील दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। यह यात्रा के रूप में मानव जीवन की क्रियाशील दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। यह यात्रा दो दिशाओं की है।
साधना का अर्थ किसी को पकड़ना नहीं है, वरन् सारी पकड़ को एक साथ छोड़ना है। सारी अतियों से, सभी द्वंद्वों से ऊपर उठना-उबरना है। इस सच्ची साधना से जो अपनी चेतना की लौ को द्वंद्वों की आँधियों से मुक्त कर लेते हैं, वे उस कुँजी को पा लेते हैं, जिससे सत्य का द्वार खुलता है और तभी वह साधुता प्रकट होती है, जिसकी अलौकिक सुगंध से अनेकों दूसरी सुप्त और मुरझाई आत्माएँ भी जाग्रत होकर मुस्कराने लगती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-March
साधना पौधे के साथ और आपकी जीवात्मा की साधना अपने जीवन के साथ। जीवन को अगर परिष्कृत बना ले, व्यक्तित्व को अगर ऊँचा आप उठा ले, फिर मजा आ जाएगा। फिर देखिए आपकी हैसियत कितनी बड़ी हो जाती है और आपकी जितनी हैसियत है, उसी हिसाब से आपको कीमत मिलनी शुरू हो जाएगी। आप एम॰ए॰ तक पढ़े है, तो ज्यादा पैसा मिलेगा-मैट्रिक तक पढ़े है, तो कम पैसा मिलेगा और बिना पढ़े आदमी है, तो उससे भी कम पैसा मिलेगा। पात्रता बढ़ाइए न, कीमत बढ़ाइए न अपनी।
साधना क्रमबद्ध है कि नहीं हमने अपने को साध लिया है कि नहीं। साध लेने से आदमी का मूल्य बढ़ जाता है। आप जानते हैं न! साँप को मदारी लोग पाल लेते हैं और सिखा लेते हैं। वह साँप जो आमतौर से हर आदमी को काट खाता है, वही साँप मदारी के बाल-बच्चों के गुजारे का माध्यम बन जाता है। बंदर के बारे में आप जानते हैं न।
साधना के मानदंड? मेरा स्वरूप तो संन्यासी का है, राजा का नहीं।”
साधना जैसे जंगली जानवरों की, की जा सकती है, उसी के तरीके से जीवन की भी जा सकती है। साधना अगर न की जाए तब? आदमी प्राकृतिक रूप से बड़ा वाहियात है, वनमानुष है। डार्विन ने कहा था कि इनसान बंदर नहीं है, वह बंदर का भाई बंधु है। वनमानुष होते हैं, जंगलों में रहते हैं, देखो है न आपने?
साधना कीजिए साधना के चमत्कार देखिए। साधना से सिद्धि मिलती है- इस सिद्धाँत को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी फायदा उठा सकेंगे, जिसके लिए कल्पसाधना में आप आए है। हमारी बात समाप्त।
साधना के लिए सादगी जिन कारणों से आवश्यक है, वे कारण भी पूरे नहीं हो सकेंगे- जैसे सादगी के कारण जनसाधारण में अपनत्व की भावना जागती है। कहना नहीं होगा कि लोग लोकसेवी के साथ-साथ परिवार के संपर्क में भी आएँगे। परिवार के संपर्क में आने पर जब ठाठ-बाट और वैभव-विलास ही दिखाई देगा, तो लोकसेवी के रहन-सहन को नाटकीय समझने लगेंगे। यह भी हो सकता है कि से सोचें-अपने और परिवार के लिए तो इन्होंने सारे साधन जुटा लिए हैं और सादगी से रहने का उपदेश दे रहे हैं।
साधना इसी का नाम है। साधना करने से आपने देखा है न, कितनी घटिया-घटिया चीजें, मामूली चीजें, क्या से क्या बन जाती है। आदमी पेड़ों को काटता है, छाँटता है, कलम लगाता है। जंगली पेड़ और माली के बगीचे के लगाए हुए पेड़, उनको आपने देखा नहीं है क्या? कैसे बढ़िया-बढ़िया गुलाब के फूल आते हैं।
साधना से ही, अपने ही दबाव से भगवान बना लेते हैं। मीरा ने अपने ही दबाव से पत्थर को गिरिधर गोपाल बना लिया ओर एकलव्य ने अपने दबाव से ही मिट्टी के पुतले को द्रोणाचार्य बना दिया था और रामकृष्ण परमहंस ने अपने ही व्यक्तित्व के दबाव से पत्थर को काली बना दिया था। अपने आपके व्यक्तित्व का उजागर होना और स्वच्छ, निर्मल होना यह बहुत बड़ी बात है। इसके लिए आपको क्या करना चाहिए? चौबीसों घंटे आपको ध्यान रखना चाहिए।
साधना जिस हिसाब से आपकी पूर्ण होगी आप देखेंगे सारा समाज आपका सहयोग करता है, अंतरात्मा आपका सहयोग करता है, भगवान आपका सहयोग करते हैं, पात्रता जैसे ही विकसित होती चलेगी। इसलिए मैंने कल कहा था- आपके भीतर फूल जैसे ही खिलना शुरू हो जाएगा, वैसे ही आपके ऊपर भौंरे अपने शुरू हो जाएँगे, तितलियां आनी शुरू हो जाएगी बच्चे आपको ललचाई आंखों से देखने लगेंगे। भगवान अपेक्षा करेंगे कि ये फूल हमारे गले में है, सिर पर होते तो कैसा अच्छा होता? कृपा करके कीजिए, साधना कीजिए साधना के चमत्कार देखिए। साधना से सिद्धि मिलती है- इस सिद्धाँत को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी फायदा उठा सकेंगे, जिसके लिए कल्पसाधना में आप आए है।
साधना से उच्च आत्मिक स्थिति प्राप्त की है । इस तथ्य को समझाने के लिये हथियारों का रूपक दिया जाता है । उपयोग से शस्त्र की मारक क्षमता या धार तेज होती है । जितने लोग उसे चलाते हैं, उतनों का बल और प्रयोग शस्त्र को समर्थ बनाता है । मंत्र को भी साधकों की प्राणचेतना माँजती रहती है उसे समर्थ बनाती है ।
साधना भी होनी चाहिए । प्रबल धारा को सबल किनारे ही दिशा दे सकते हैं । धारा धीमी हो अथवा कूल कमजोर, दोनों ही अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति में बाधक है । दोनों सबल और सशक्त मों तो प्रेम की महाशक्ति का महाप्रयोग हो सकने की व्यवस्था बनती है ।
साधना में आप आए है। हमारी बात समाप्त।
साधना अनिवार्यतः सविता शक्ति के तेज को अंदर धारण करने की प्रार्थना से जुड़ी हुई है । गायत्री उपासक इस रहस्य को समझते हुए सूर्योपस्थान, सूर्यार्घदान आदि क्रियाकृत्य संपन्न करते हैं और बदले में सद्बुद्धि का अनुदान प्राप्त करते हैं ।
साधना द्वारा चक्रों के उन्नयन से प्राण-ऊर्जा का ऊर्ध्वीकरण होता और साधक पशु-प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर पेट-प्रजनन से आगे की बात सोचता एवं प्रगति की दिशा में अग्रगमन करता है, परन्तु आत्मोन्नति का मार्ग इतने से ही प्रशस्त नहीं हो जाता। इससे आगे का मुख्य सोपान है- गुण-कर्म-स्वभाव को परिष्कृत करना एवं हृदय की अंतः मलिनता को धोना, उसकी जटिल गाँठों को खोलना। हृदयग्रंथि यदि परिष्कृत हो जाए, तो फिर मनुष्य, मनुष्य नहीं रह जाता, वह देवमानव- महामानव बन जाता है। बुद्धत्व और नारायणत्व की ओर बढ़ने का राजमार्ग यही है। जब तक अंतर में वासनाओं का दुर्भावनाओं का घटाटोप छाया रहता है, मनुष्य क्षुद्र स्थिति से ऊपर नहीं उठ सकता, पुण्यपरमार्थ की- उदार सहकार की बातें नहीं सोच सकता, किंतु जब हृदय में ईश्वरप्रेम की, उच्चादर्शों एवं सिद्धाँतों की स्थापना कर ली जाती है और उसके परिपालन की ओर मानवी मन उन्मुख हो जाता है, तो यहीं से उसके ग्रंथियों की गांठें खुलनी प्रारंभ हो जाती हैं, हृदयचक्र की ओर बढ़ने और हृदय गुफा में निवास करने का मार्ग खुल जाता है।
साधना का अभियान ज्ञानयज्ञ की क्राँतिकारी प्रक्रिया एवं संस्कारों का घर-घर विस्तार। तभी तो सतयुगी समाज की स्थापना होगी।
साधना अगर न की जाए तब? आदमी प्राकृतिक रूप से बड़ा वाहियात है, वनमानुष है। डार्विन ने कहा था कि इनसान बंदर नहीं है, वह बंदर का भाई बंधु है। वनमानुष होते हैं, जंगलों में रहते हैं, देखो है न आपने? न इनको कपड़ा पहनना आता है, न इनकी कोई सभ्यता है, न इनकी कोई बातचीत है।
साधना का लक्ष्य भी है।
साधना के चमत्कार देखिए। साधना से सिद्धि मिलती है- इस सिद्धाँत को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी फायदा उठा सकेंगे, जिसके लिए कल्पसाधना में आप आए है। हमारी बात समाप्त।
साधनारत राजर्षि अजितसेन का दर्शन किया । मैंने उनमें समग्रता की शक्ति, अनावेगशीलता की स्थिति ओर समता की दृष्टि का विकास पाया । वे काट रहे थे ध्यान रूपी कुठार से भववृक्ष को । सचमुच प्रभो ! भावविभोर कर दिया था उनकी वृषभ सी भद्रता, वायु-सी निस्संगता, सूर्य-सी तेजस्विता और मेरु-सी निश्चलता ने मुझे ।”
साधना करने से आपने देखा है न, कितनी घटिया-घटिया चीजें, मामूली चीजें, क्या से क्या बन जाती है। आदमी पेड़ों को काटता है, छाँटता है, कलम लगाता है। जंगली पेड़ और माली के बगीचे के लगाए हुए पेड़, उनको आपने देखा नहीं है क्या? कैसे बढ़िया-बढ़िया गुलाब के फूल आते हैं। रंग-बिरंगे फूल आते हैं ये माली के हाथ की करामात है।
साधनाएँ, योग-तप आदि मन को साधने एवं परिष्कृत करने के विविध उपाय-उपचार हैं।
साधना में निमग्न होने ही जा रहे थे कि वह शीघ्रता से उनके सम्मुख जा पहुँचा । उनको अभिवादन कर वह वहीं उनके पास बैठ गया और बोला-”मैं आ गया हूँ महर्षि, आप बताएँ, मेरे लिए क्या सेवा है ? मैं आपके लिए क्या करूं ?” उसके इन स्वरों में उसका अहं ध्वनित हो रहा था ।
साधना अपने जीवन के साथ। जीवन को अगर परिष्कृत बना ले, व्यक्तित्व को अगर ऊँचा आप उठा ले, फिर मजा आ जाएगा। फिर देखिए आपकी हैसियत कितनी बड़ी हो जाती है और आपकी जितनी हैसियत है, उसी हिसाब से आपको कीमत मिलनी शुरू हो जाएगी। आप एम॰ए॰ तक पढ़े है, तो ज्यादा पैसा मिलेगा-मैट्रिक तक पढ़े है, तो कम पैसा मिलेगा और बिना पढ़े आदमी है, तो उससे भी कम पैसा मिलेगा। पात्रता बढ़ाइए न, कीमत बढ़ाइए न अपनी।
साधना संभव होती है। मनुष्य के पास थोड़ी-सी शक्तियाँ और छोटा-सा जीवन है। उसे लौकिक प्रयोजनों में लगा दिया जाए अथवा पारमार्थिक प्रयोजनों में, यह निश्चित स्वयं ही करना पड़ता है। अपने स्वार्थों के लिए हर कोई प्रयत्न करता है। लोकसेवी अपनी शक्तियों का सुनियोजन जनसेवा के लिए, परमार्थ कार्यों के लिए करता है।
साधना के लिए इन बातों पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है।
साधना पूर्ण को जाएगी। जीवन साधना जिस हिसाब से आपकी पूर्ण होगी आप देखेंगे सारा समाज आपका सहयोग करता है, अंतरात्मा आपका सहयोग करता है, भगवान आपका सहयोग करते हैं, पात्रता जैसे ही विकसित होती चलेगी। इसलिए मैंने कल कहा था- आपके भीतर फूल जैसे ही खिलना शुरू हो जाएगा, वैसे ही आपके ऊपर भौंरे अपने शुरू हो जाएँगे, तितलियां आनी शुरू हो जाएगी बच्चे आपको ललचाई आंखों से देखने लगेंगे। भगवान अपेक्षा करेंगे कि ये फूल हमारे गले में है, सिर पर होते तो कैसा अच्छा होता? कृपा करके कीजिए, साधना कीजिए साधना के चमत्कार देखिए।
साधना आप कीजिए। अपने आपके विरुद्ध बगावत खड़ी कर दीजिए। अपने जन्म-जन्मान्तर को तोड़-मरोड़कर फेंक दीजिए और जो अच्छाई आपके भीतर नहीं है, जो विशेषताएं अभी तक पैदा नहीं कर सके है, उन गुणों, कर्म और स्वभाव के बारे में आप अभी तक अभावग्रस्त है, कृपा करके वे ठीक कीजिए, उनको सुधारिए। यह पुरुषार्थ कीजिए। बुराइयों को छोड़ने का पुरुषार्थ, अच्छाइयों को बढ़ाने का पुरुषार्थ।
साधना। साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब यह है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्माँतरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनका परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा।
साधना-उपासना, ध्यान जैसे आत्मोत्थानपरक उपचार नदियों, पहाड़ों पर करने का आप्तवचन है । आजकल इसकी उपेक्षा हो रही है, अतः उस लाभ से वंचित रह जाना पड़ता है ।
साधना की उच्च कक्षा में पहुँचने पर अर्थविचार की आवश्यकता प्रायः नहीं रह जाती । एक स्थिति आने पर उसका निषेध भी किया जाता है । इसका कारण चित्त की एकाग्रता का ध्यान रखना नहीं है, मंत्र-विज्ञान के सूक्ष्म नियम मुख्य कारण है । जिनके चलते मंत्रजप के साथ उसके अर्थ पर ध्यान नहीं देने का निर्देश दिया जाता है ।
साधना करती पड़ती है। भगवान को प्राप्त करने के लिए उपासना और अपने आपको पात्र बनाने के लिए साधना। साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब?
साधना के स्पर्श से सुनियोजित और सुव्यवस्थित हो जाती है । फिर उन्हें जहाँ जितनी मात्रा में प्रवाहित करना हो किया जा सकता है । ऐसा यदि बन सके तो संसार की विविधता-विषमता के रूप में नहीं, होली की रंग-रंगीली मस्ती के रूप में सामने आएगी । मन के मलाल धुल जाएँगे स्नेह का गुलाल सब पर छा जाएगा, बस आनंद आ जाएगा । जो सामने आए, मन का मैल मिटाकर उसी पर अपना प्रेम उड़ेल दें ।
साधना से सिद्धि मिलती है- इस सिद्धाँत को आपको जीवन में प्रयोग करके दिखाना है, तभी फायदा उठा सकेंगे, जिसके लिए कल्पसाधना में आप आए है। हमारी बात समाप्त।
साधना तो आपके हाथ की बात है। आपने आपको सुसंस्कारी बनाने के लिए जो भी मुमकिन हो, आप पूरी शक्ति से और पूरी ईमानदारी से मेहनत कीजिए। आपको अनगढ़ और सुगढ़ बनाना है। हमारा जीवन अनगढ़ है; चौरासी लाख योनियाँ घूमने के बाद में न जाने कितने कुसंस्कार हमारे पास जमा है। और वे कुसंस्कार अगर इसी तरीके से जमा रहे, तो दीवार के तरीके से खड़े रहेंगे और फिर हमको आगे नहीं बढ़ने देंगे और ये हथकड़ियों और बेड़ियों के तरीके से रास्ता रोक लेंगे, न हमको ऊँचा उठने देंगे, न आगे बढ़ने देंगे।
साधना में डूबा हुआ पाया । जिन्हें देखकर मेरे हृदय में अपार श्रद्धा उमड़ी । क्या उस समय उनकी स्थिति सातवें नरक में जाने जैसी थी ? नहीं ऐसा नहीं हो सकता, पर भगवान् का कथन भी तो कभी निष्फल-निरर्थक नहीं हो सकता । तो क्या जो मैंने देखा वह निरा भ्रम था ?
साधना ! क्या कोई है इनके तुल्य अन्य राजर्षि ? विचारों की यह भोर हुई थी कोशल नरेश के अंतर क्षितिज में ।
साधना का विचार परिष्कार का अभ्यास आवश्यक है।
साधना के । वे सोचने लगे-भला जिस साधक को मैंने अपनी आँखों से ध्यान−साधना में डूबा हुआ पाया । जिन्हें देखकर मेरे हृदय में अपार श्रद्धा उमड़ी । क्या उस समय उनकी स्थिति सातवें नरक में जाने जैसी थी ? नहीं ऐसा नहीं हो सकता, पर भगवान् का कथन भी तो कभी निष्फल-निरर्थक नहीं हो सकता ।
साधना सफल हो गई हैं। मंदिर का निर्माण पूर्ण हो गया है।”
साधना करनी पड़ेगी। अपनी कमियों को खोजना और दूर करना, दुष्प्रवृत्तियों को हटाना तथा सत्प्रवृत्तियों को आने स्वभाव का अंग बनाना होगा। व्यक्तित्व की दृष्टि से लोकसेवी को अपना विकास इतना प्रखर और उच्च करना चाहिए कि उसकी वाणी से अधिक उसके कर्म प्रेरक बनें।
साधना किसकी? अपनी। अपनी से क्या मतलब? अपनी से मतलब यह है कि जो हमारे भीतर जन्म-जन्माँतरों के कुसंस्कार जमे पड़े हैं, उनका परिशोधन करना पड़ेगा, बचकानापन दूर करना पड़ेगा। बच्चों को तो कोई कह नहीं सकता।
साधना के द्वार। साधना जैसे जंगली जानवरों की, की जा सकती है, उसी के तरीके से जीवन की भी जा सकती है। साधना अगर न की जाए तब? आदमी प्राकृतिक रूप से बड़ा वाहियात है, वनमानुष है। डार्विन ने कहा था कि इनसान बंदर नहीं है, वह बंदर का भाई बंधु है।
साधना अभियान में भागीदारी। (ब) स्वाध्याय द्वारा श्रेष्ठ चिंतन की प्रवृत्ति को बढ़ावा। (स) व्यसन मुक्ति अभियान में स्वयं व औरों की भागीदारी। परिवार निर्माण के तीन सूत्र है- (अ) परिवार में सुव्यवस्था श्रमशीलता मितव्ययिता शालीनता-सहकार की पंचशील वृत्तियों का पालन। (ब) पुँसवन संस्कार द्वारा माता शिशु का कल्याण-जन्मदिवस व विवाह दिवस संस्कारों का प्रचलन।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-February
साधनास्थली-हर स्थान पर उस साधना की ऊर्जा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती हैं, जिससे उन्होंने इस मिशन के संगठन को खड़ा किया हैं। हिमालय उन्होंने यात्रा से लौटकर विशिष्टों के लिए प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के लिए जीवनसत्ता-संजीवनी साधना सत्र, 1980 से आरंभ किए गए बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं।
साधनाओं के फलस्वरूप उन्हें इस सत्य की स्पष्ट अनुभूति हो गई कि उनमें कोई मूल विरोध नहीं हैं। किसी भी धर्म या संप्रदाय के मत अंततः एक ही गंतव्य स्थल तक पहुँचते हैं। मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार इन मार्गों को अपनाने की आवश्यकता साधक को पड़ती हैं। समस्त प्रचलित धर्मसाधनाएँ करके भी रामकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि समस्त धर्मों का धर्ममत अनेक मार्ग हैं। सारे मत-संप्रदाय एक ही सत्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हैं।
साधना को एकाकार कर प्रस्तुत कर लाखों में उज्ज्वल समझाकर अपने आचरण से प्रस्तुत कर लाखों में उज्ज्वल भविष्य हेतु स्वयं के निर्माण की प्रक्रिया को गतिशील बना दिया।
साधना को नए स्वर दिए। उनके स्वरों में वह ओज था, जिसका स्पर्श पाकर मराठा शिवाजी जननायक बन गए। उनका व्यक्तित्व प्रत्येक भारतीय का आदर्श बन गया। समर्थ के पुरुषार्थ में वह समर्थ गर्जन था, जिसने औरंगजेब की कमर झुका दी। समर्थ सद्गुरु रामदास का समूचा जीवन-संगठन का संदेश था।
साधना अवधि में उन्होंने पहले सीता जी के दर्शन किए। बाद में इसी भावानुराग में उन्होंने श्री रघुवीर के दर्शन पाए। हनुमान भाव के साथ ही उन्होंने भगवान् राम की बालभाव में साधना की और प्रभू की बालमूर्ति का दर्शन किया।
साधना में संलग्न हुए। विधिवत् दीक्षा लेने के बाद जल्द ही उनका मन निर्विकल्प समाधि में डूब गया। उनका ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान का भेद समाप्त हो गया। इस अवस्था में वह छह माह तक रहे। अद्वैत भावभूमि में आरुढ़ श्री रामकृष्ण ने समझ लिया था कि समस्त साधनाओं को अंतिम लक्ष्य अद्वैतभाव हैं।
साधना में उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव श्री रघुवीर की साधना दास्य भक्तिभाव से करना शुरू की। इसके लिए उन्होंने रामभक्त हनुमान का भाव अपने ऊपर आरोपित किया। वे महावीरमय हो गए। इस साधना अवधि में उन्होंने पहले सीता जी के दर्शन किए। बाद में इसी भावानुराग में उन्होंने श्री रघुवीर के दर्शन पाए।
साधना के बाद उन्होंने निराकार सगुण साधनाएँ भी की। इसके अंतर्गत उनकी इस्लाम तथा ईसाई धर्म की साधना प्रमुख हैं। वे उस समय की साधना के बारे यदा-कदा बताया करते तब मैं अल्लाह का जाप किया करता था। पाँच बार नमाज पढ़ता। इस साधना में सर्वप्रथम लंबी दाढ़ी युक्त एक गंभीर ज्योतिर्मय पुरुष का दिव्य दर्शन हुआ।
साधनाओं के कारण। ये सभी संत अपने-अपने क्षेत्र और अंचल के अध्यात्म का प्राणदीप जलाए हुए थे। यह युग भक्ति का युग था। लगातार हो रहे अनाचारों-अत्याचारों एवं अन्यायी चीख-पुकारों के बीच ज्ञानचेतना का मंद पड़ना स्वाभाविक था। सामान्य जनता को जो नित्यप्रति लट-खसोट और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था, उसे वे भ्रम मानकर ब्रह्म की दुहाई कैसे दें?
साधना, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं स्वावलंबन चार विधाएँ विकसित की जा रही हैं। समस्त धर्मों व भाषाओं का एक शिक्षण तंत्र एवं साधना विज्ञान का विस्तृत प्रशिक्षण केंद्र इसे बनाया जा रहा हैं। अध्यात्म जीवन के जीन की कब का नाम हैं। इसका व्यावहारिक जीवनसाधना वाला सार्वभौम स्वरूप क्या हो, इसे देश व विशेषज्ञ के सभी परिजन यहाँ सीखेंगे। आयुर्वेद एवं समस्त वैकल्पिक चिकित्सातीकरण तथा नंगे पैर चिकित्सकों का निर्माण तंत्र भी यहाँ बन रहा हैं।
साधनात्मक आँदोलन में शामिल हुए। प्रणामी संप्रदाय धरनीश्वरी संप्रदाय, दरियादासी संप्रदाय, बाबा, बली संप्रदाय, शिवनारायणी संप्रदाय, चरणदासी पंथ, गरीब पंथ, रामस्नेह संप्रदाय, सरभंगी पंथ आदि सभी को मानने वालों ने अपने निकटस्थ जनजीवन के बीच कष्टपीड़ित लोगों को ईश्वरीय चेतना की ओर उन्मुख-अभिमुख करने का प्रयास किया।
साधना के शुभारंभ से ही वह प्रचंड ऊर्जा उमंगनी थी, जिसके भारतीय स्वतंत्रता का नया अध्याय लिखा जाना था।
साधना प्रारंभ करने के कुछ वर्षों के बाद ही न केवल भारतवर्ष की स्वतंत्रता को देख लिया था, बल्कि यह भी समझ लिया था कि स्वाधीनता के पश्चात् राष्ट्र के सामने कौन-सी मौलिक समस्याएँ उभरकर आएँगी। इसके सार्थक समाधान की खोज में जुटें तपोनिष्ठ आचार्य जी ने अपने साधनाकाल में ही ‘अखण्ड ज्योति’ नामक मासिक पत्रिका (1937 ई. से) का प्रकाशन-प्रवर्तन किया। उनका यह कार्य मात्र साहित्य साधना तक सीमित न था। यह तो उनके नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति रूप त्रिविध संकल्प की अभिव्यक्ति थी, विचारक्राँति के महाचक्र का प्रवर्तन था, युगनिर्माण आँदोलन की शुरुआत थी।
साधनाएँ हैं। यहाँ साधन से ही संस्कृति का निर्माण होता है। यह संस्कृति ही समाज को गति देती थी और गतिशील समाज ही राष्ट्र को उसका गौरव देता है।
साधना से प्राप्त दिव्य क्षमताओं के बल पर इस सत्य का उद्घाटन किया कि अगली सहस्राब्दी की प्रथम सदी में ही भारत अपने खोए गौरव को पुनः प्राप्त करके ही रहेगा। सहस्राब्दी के इस सफर के बारे में यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य शंकर द्वारा सौंपी गई विरासत को लेकर देश ने सन् 1000 में अपनी जिस संघर्ष यात्रा की शुरुआत की, उसकी परिसमाप्ति एवं सतयुग की वापसी की प्रक्रिया आचार्य श्रीराम शर्मा की तप-साधना से प्रारंभ हुई सृजनात्मक में संपन्न होगी।
साधना में पड़े गए। इसी वर्ष को उनने भागवत चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष घोषित किया था। उनकी उत्कट तप−साधना से अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया। अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया महर्षि रमण भी इसी महत् उद्देश्य के लिए तिरुवन्नामलाई में अरुणाचलम् पर्वत की गुफा में तपोलीन थे। महायोगियों की इस तप−साधना से स्वतंत्रता संघर्ष और अधिक तीव्र हो उठा और सफलता सुनिश्चित हो गई।
साधना के बाद हिमालय अज्ञातवास के तप से लौटने पर उन्होंने सन् 62 से 69 तक विभिन्न स्तर की तप−साधनाएं स्वयं कीं, औरों से कराई। जिसकी जैसी पात्रता थी, कर पाने की क्षमता थी उसे सीमा तक परिष्कृत कर साधक बनाया। श्रेष्ठ साधक-चिंतक स्तर के स्वाध्यायशील व्यक्ति ही कर्मठ लोकसेवी संगठन बन पाते हैं। सामूहिक साधना द्वारा सामूहिक मन के जागरण की प्रक्रिया सक्रिय बना एक तीव्र चिंतनप्रवाह को जन्म देना एक अवतारी स्तर की सत्ता का ही काम हैं। हमारी गुरुसत्ता का जीवनक्रम हम देखते हैं, तो बहुआयामी रूप में उनके व्यक्तित्व रूपी विराट् हिमालय का दर्शन करते हैं।
साधना के बिखरे सुरों को लय दी। इनमें सिखों के दशम गुय गोविंद सिंह सबसे अग्रणी रहे। उन्होंने भी अत्याचार के खिलाफ जंग छेड़ते हुए ऐलान किया-सवा लाख तें एक लड़ाऊँ, चिड़ियन ते में बाज तुडाऊँ, तब गोविन्दसिंह नाम कहाऊँ। और हुआ भी ऐसा ही। उनके परमशिष्य बंदावैरागी आक्राँतियों के लिए कहर बन गए इसी तरह बुँदेलखंड में बावा प्राणनाथ ने बुँदेब राजा छत्रसाल में प्राण भरें।
साधना से अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया। अखण्ड ज्योति का आलोक और अधिक प्रखर हो गया महर्षि रमण भी इसी महत् उद्देश्य के लिए तिरुवन्नामलाई में अरुणाचलम् पर्वत की गुफा में तपोलीन थे। महायोगियों की इस तप−साधना से स्वतंत्रता संघर्ष और अधिक तीव्र हो उठा और सफलता सुनिश्चित हो गई। अपनी इस गहन एकाँत तप−साधना के दिनों में सन् 1926 के कुछ समय बाद ही उन्होंने भारत के शीघ्र स्वतंत्र होने की बात कहीं। उन्हीं के शब्दों में-”यह दैवी आज्ञा जारी हो चुकी हैं, उसके क्रियान्वयन में विलंब नहीं होगा।
साधनाएँ भी की। इसके अंतर्गत उनकी इस्लाम तथा ईसाई धर्म की साधना प्रमुख हैं। वे उस समय की साधना के बारे यदा-कदा बताया करते तब मैं अल्लाह का जाप किया करता था। पाँच बार नमाज पढ़ता। इस साधना में सर्वप्रथम लंबी दाढ़ी युक्त एक गंभीर ज्योतिर्मय पुरुष का दिव्य दर्शन हुआ।
साधना अभियान की शुरुआत एवं प्रज्ञापुराण रूपों अद्वितीय 19वाँ पुराण भी इसी वेला में लिखा गया। (शेष पृष्ठ 6 पर)
साधना की सफलता का श्रेय आप किसे देते हैं, एक व्यक्ति ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस से पूछा। उन्होंने उत्तर दिया- हर असफल साधक को। सौ कैसे? उस व्यक्ति ने पुनः प्रश्न किया। परमहंस ने कहा-मैंने जब भी देखा तो यह मालूम करने की कोशिश की कि वह किन कारणों से असफल हुआ।
साधना के बाद उन्होंने बहुविधि तंत्र साधनाएँ कीं। इस प्रसंग में उन्होंने भैरवी ब्राह्मणी द्वारा तंत्रमार्ग की दीक्षा ली। तंत्रमार्ग में उन्होंने अनेक भावों एवं विविध मार्गों की सभी साधनाएँ पूर्ण कीं और उस परम चित् शक्ति का साक्षात्कार किया। साधना अवधि में स्पष्ट अनुभव किया कि यह समस्त सृष्टि उसी महाशक्ति की क्रीड़ा-कल्लोल हैं। इन साधनाओं के निष्कर्ष रूप में वे समस्त स्त्रीजाति को मातृभाव में ही भावी नारीयुग के अभ्युदय के संकेत निहित थे।
साधनाओं को अंतिम लक्ष्य अद्वैतभाव हैं। समस्त धर्मों की साधनाएं इसी लक्ष्य की ओर अग्रसर होती है।
साधना थी। लोकमंगल की साध एवं उत्कट ईश्वरप्रेम ने उन्हें तपस्वी बनाया था। बारह वर्ष की आयु में विवाहवेदी छोड़कर उठे नारायण पंचवटी के पास गोदावरी के तट पर टाकली गाँव में तपोलीन हो गए। उनकी एकनिष्ठा एवं कठोर तपस्या की कहानियाँ-किंवदंतियाँ गाँव में फैल गई। यह तपस्या बारह वर्षों तक अनवरत चली।
साधनापद्धतियों में समन्वय की स्थापना करने जुटी थी, ताकि इस संक्राँतिकाल में एक नया अभ्युदय जन्म ले सके। नया युग मुस्करा सके।
साधनापक्ष को प्रभावकारी ढंग से बताया। लरिटेन के विद्वान थामस डाहनहार्ट कबीर से सूफी अंदाज से प्रभावित हैं जर्मन विद्वान बेटार लत्से ने तो कबीर के दोहों का जर्मन अनुवाद भी कर डाला है। स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय की लिडाहेस यह साफ−तौर पर कहती हैं कि अब कबीर अकेले भारत के लिए ही नहीं, समूची दुनिया के हो गए उनके अनुसार सहस्राब्दी की प्रथम संक्राँति के नायक कबीर का महत्व सहस्राब्दी की इस अंतिम महासंक्राँति के समय कही अधिक बढ़ गया हैं। जग−जाहिर बात यह भी है कि मनीषी और बुद्धिजीवी ही नहीं, सामान्यजन भी उनके दोहों एवं पदों को उत्साह के साथ अपना रहा हैं। अपने यहाँ के सांई, जोगी, मलंग, नट, भाट आदि लोक गायकों के कंठ स्वरों से होते हुए उनके पद अब पश्चिमी पॉप धुनों की भी शान बनते जा रहे हैं।
साधना संपादन की घोषणा के साथ महापूर्णाहुतिसंपन्न होगी। इसमें आम जनता नहीं, चुने हुए विशिष्ट प्रतिभाशाली ही भाग लेंगे। यज्ञक्षेत्र ऋषिकेश से रुड़की तक गंगा जी के दोनों ओर बनाया जा रहा हैं।
साधना उनके नरेन-जिन्हें विश्व ने स्वामी विवेकानंद के रूप में जाना-के माध्यम से अभिव्यक्त हुई। उनके द्वारा की गई देवसंस्कृति दिग्विजय ने भारत के इतिहास में युगाँतरकारी परिवर्तन कर डाल।
साधना में लीन रहते थे। इनका पंथ अद्वैत चिंतन से प्रभावित था।
साधना की विजय थी, महर्षियों के सतानत संदेश की विजय थी, जिसमें श्री रामकृष्ण देव के तापमान भी ओत–प्रोत थे।
साधना के अनुभवों को बताते हुए उन्होंने कहा भी राधारानी की अंगक्राँति को मैंने नागकेसर पुष्प के केसरों की भाँति गौरवर्ण देखा था। छह माह चली इस साधना की उत्कट अवस्था में वह महाभाव में पहुँच गए और सच्चिदानंद श्रीकृष्ण का पावन दर्शनलाभ किया। अन्य मूर्तियों की ही भाँति श्रीकृष्णमूर्ति भी उनमें लीन हो गई।
साधना में लीन ग्राम से उभरे युवा ‘श्रीराम मत्त’ भी राष्ट्रीय संघर्ष की यज्ञवेदी में अपनी आहुति देने के लिए बढ़-चढ़कर आगे आए। स्वाधीनता संघर्ष के गौरवगान में उनका स्वर भी मुखर हुआ। अपनी बलिदानी भावनाओं के चलते उन्हें अनेकों यातनाएँ सहनी पड़ी जिनका क्रम 1936-37 तक चलता रहा। जेल की काल-कोठरी में घंटे और दिन नहीं, वर्ष गुजारते पड़े, परंतु संघर्ष के ये समवेत स्वर अब सफलता के निकट जा पहुँचे थे। सन् 1947 की वह घड़ी भी आ गई जब भारत स्वतंत्र हुआ।
साधना की और दूसरी ओर बौद्ध, इस्लाम, ईसाई, सिख आदि धर्मों के गूढ़ रहस्यों का अनुभव भी किया। उनके जीवन का प्रधान प्रतिपाद्य विषय था। अभिनव समाज को प्रायोगिक रूप से विभिन्न धर्मानुभावों के मूल ऐक्य पर प्रतिष्ठित करना। यह स्पष्ट करना कि सभी मत एक दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं।
साधना का प्रचार करने वालों में रामनंद और उनका रामानंदी संप्रदाय सबसे अवतरित हुआ। इस क्रम में रसिक संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय एवं महाप्रभु चैतन्य द्वारा प्रेरित-परिवर्तन गौड़िय संप्रदाय ने मुरझाए जनजीवन को अपने भक्तिरस से नवचेतना देने का काम किया। निंबार्क संप्रदाय, मध्य संप्रदाय आदि संप्रदायों के प्रवर्तक आयार्च एवं उनकी परंपरा को मानने वाले साधक, संत भी सगुण भक्ति का प्रचार करने में पीछे नहीं रहे। तुलसी और सूर इस काल के संत भले ही न रह हों, परंतु उनकी तपचेतना इस युग में भी अपना प्रकाश-प्रभाव बिखेरती रही। इसी तरह राजस्थान की भक्तिमती संत मीराबाई भी काल की सीमा का अतिक्रमण कर इन दिनों भी नारी चेतना की प्रखर ज्योतिपुंज बनीं रहीं।
साधनाएँ पूर्ण कीं और उस परम चित् शक्ति का साक्षात्कार किया। साधना अवधि में स्पष्ट अनुभव किया कि यह समस्त सृष्टि उसी महाशक्ति की क्रीड़ा-कल्लोल हैं। इन साधनाओं के निष्कर्ष रूप में वे समस्त स्त्रीजाति को मातृभाव में ही भावी नारीयुग के अभ्युदय के संकेत निहित थे।
साधना, स्वावलंबन, शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी विधाओं द्वारा देवसंस्कृति के निर्धारण का विस्तार होने जा रहा है। निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य से भरे सतयुग के निर्माण में शाँतिकुँज एवं इससे जुड़े हर व्यक्ति की भागीदारी ईश्वरीय संकल्प की पूर्ति का निमित्त बनकर रहेगी।
साधनापद्धतियों में समन्वय तार्किक विश्लेषण या बौद्धिक प्रतिपादन की विषयवस्तु नहीं हैं। यह तो विभिन्न साधनापद्धतियों की गहन साधनाओं के अंतस् से उपजे निष्कर्षों के सरलीकरण से ही संभव हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस अपने जीवनकाल में इन्हीं आध्यात्मिक प्रयोगों में संलग्न रहे और निष्कर्ष रूप में उन्होंने कहा साधन भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सभी लोग उसकी खोज तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। सभी लोग उसकी खोज में हैं चाहे वे भिन्न से ही उसे खोजते हों। उसका यह कथन किसी दार्शनिक का वैचारिक प्रतिपादन मात्र नहीं हैं, बल्कि एक आत्मद्रष्टा, ईश्वरभावोन्मत, महान् ध्यानस्थ योगी का सत्यपुँज हैं, जिसका साक्षात् संबंध उस आदिशक्ति से था जिसे ब्रह्मशक्ति, काली, गॉड या अल्लाह आदि नामों से जाना जाता है।
साधनाओं, मंत्रविज्ञान, वनौषधि विज्ञान की प्रामाणिकता ठहराने का प्रयास उनको एक उच्चस्तरीय वैज्ञानिक घोषित करता है, तो प्रज्ञापुराण ग्रंथ उनके एक द्रष्टा स्तर के मनीषी होने का द्योतक बन जाता है। उज्ज्वल भविष्य के प्रवक्ता आचार्य श्री अपने जीवन के प्रारंभ काल से ही 1942, जब उनकी ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मात्र पाँच वर्ष की आयु की थी, सतयुग की वापसी की घोषणा करते हैं-वैसे समाज का निर्माण ही नहीं करते, अपितु अपने अथक् पुरुषार्थ से अपने पाँच करोड़ से अधिक की जनमेदिनी भी आदर्शों के मोरचे पर खड़ी कर देते हैं। इस लाख से अधिक समय-साधन समाज के निमित्त देने वाले युगसैनिकों का निर्माण एवं उनके माध्यम से दो करोड़ प्रतिभाओं का परिष्कार कर उन्हें नवसृजन में झोंक देना किसी को एक कागजी योजना लग सकता है, जब यह समष्टि स्तर पर गतिशील हो, तो लगता है, पर जब सहस्राब्दी के युगनायक द्वारा वस्तुतः एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ संपन्न हुआ हैं।
साधनासत्र, व्यक्तित्व परिष्कार सत्र, एक मास से युगशिल्पी सत्रों में जो गलाई-ढलाई होती हैं, उससे महामानवों की टकसाल के रूप में इसके बनने की भविष्यवाणी सही लगती हैं। पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी सशरीर भले ही यहाँ न हों, पर उन्हीं के आश्वासन के अनुसार शाँतिकुँज के कण-कण में उनकी चेतना का वास हैं। दृश्यमान प्रतीक के रूप में उनकी चेतना विद्यमान हैं। यहाँ आने वाला परिजन अनुभव करता व कण-कण में उस शक्ति का साक्षात्कार कर आनंद से सराबोर हो वापस लौटता है।
साधना में सिद्ध श्री रामकृष्ण अब तोतापुरी नामक संन्यासी के निर्देशन में अद्वैत साधना में संलग्न हुए। विधिवत् दीक्षा लेने के बाद जल्द ही उनका मन निर्विकल्प समाधि में डूब गया। उनका ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान का भेद समाप्त हो गया। इस अवस्था में वह छह माह तक रहे। अद्वैत भावभूमि में आरुढ़ श्री रामकृष्ण ने समझ लिया था कि समस्त साधनाओं को अंतिम लक्ष्य अद्वैतभाव हैं।
साधना हेतु मैं पहाड़ों जैसी शाँति चाहता हूँ। गुरु ने कहा वत्स! पहाड़ों का परमार्थ अनिश्चित हैं। तू सुदूर क्षेत्रों में जा-जहां अज्ञान का तिमिर व्याप्त है। व्यक्ति दीनहीन स्थिति में अपना जीवनयापन कर रहें हैं। तू नगरों में जा-जहां अज्ञान मानव-मानव के बीच भेदभाव, छल, कपट और विषमता के बीज बो रहा हैं।
साधनाएँ के प्रशिक्षण सत्र भी इसी बीच गायत्री तपोभूमि पर संपन्न होने लगे। युगनिर्माण योजना के सूत्रधार हमारे परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय की तप अवधि से बैठते ही युगपरिवर्तन की प्रक्रिया के प्राण युगनिर्माण सत्संकल्प की घोषणा की। नवयुग के संविधान के रूप में प्रसारित इस घोषणा पत्र के 18 सूत्रों में युगगीता के अठारह अध्यायों के मर्म छिपा पड़ा हैं। महासंक्राँति के महानायक ने महासमर की घोषणा कर वैश्विक स्तर पर पड़े रहे घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में भारतवर्ष की नई भूमिका दृश्यपटल पर रख दी थी।
साधनापद्धतियों में समन्वय के साथ धर्म में नए प्राण भरे। उन्होंने अपनी जीवनसाधना से यह प्रमाणित किया कि वास्तव में सभी धर्मों का सारतत्व मानव धर्म हैं और इसके अनुशीलन की यथार्थ उपलब्धि हैं- मानव में देवत्व का जागरण रामकृष्ण परमहंस परस्पर चर्चा में शिष्यों को बता रहे थे- मनुष्यों में कुछ देवता पाए जाते हैं, शेष तो नरपिशाच ही होते हैं।
साधना भी अपनी पूर्णता को पा रही हैं। नववर्ष 2000 इस साधना महोत्सव की पूर्णता का वर्ष हैं। वसंतपर्व से प्रारंभ हो रहा महापूर्णाहुति का यह उत्सव अपनी दृश्य व्यापकता से कहीं अधिक व्यापक हैं। इनका समूची शताब्दी-सहस्राब्दी में किए गए वे प्रयास-तप−साधनाएं शामिल हैं, जिनका उद्देश्य उज्ज्वल भविष्य की वासंती उमंगों को विस्तारित करना रहा हैं।
साधना को पूरा किया। इसी के साथ प्रारंभ हुई उनकी विधिवत् दार्शनिक लेखन यात्रा।
साधनाओं के अंतस् से उपजे निष्कर्षों के सरलीकरण से ही संभव हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस अपने जीवनकाल में इन्हीं आध्यात्मिक प्रयोगों में संलग्न रहे और निष्कर्ष रूप में उन्होंने कहा साधन भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सभी लोग उसकी खोज तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। सभी लोग उसकी खोज में हैं चाहे वे भिन्न से ही उसे खोजते हों। उसका यह कथन किसी दार्शनिक का वैचारिक प्रतिपादन मात्र नहीं हैं, बल्कि एक आत्मद्रष्टा, ईश्वरभावोन्मत, महान् ध्यानस्थ योगी का सत्यपुँज हैं, जिसका साक्षात् संबंध उस आदिशक्ति से था जिसे ब्रह्मशक्ति, काली, गॉड या अल्लाह आदि नामों से जाना जाता है।
साधना में सर्वप्रथम लंबी दाढ़ी युक्त एक गंभीर ज्योतिर्मय पुरुष का दिव्य दर्शन हुआ। तदंतर सगुण विराट् ब्रह्म की उपलब्धि के पश्चात् तुरीय निर्गुण ब्रह्म ने उनका मन लीन हो गया। ईसाई धर्म की साधना के समय वह बाहबिल सुना करते। गिरजाघर भी जाते। उनकी यह भावधारा साधनाकाल में बनी रही।
साधनात्मक आँदोलन इस युग में सक्रिय हुए। इनमें से पहला था निर्गुण भक्ति का प्रचार करने वालों में नानक देव का पंथ अग्रणी था। हालांकि बाद के दिनों में इसमें भी सगुण भक्ति का प्रवेश हो गया। यह प्रवेश यों तो गुरु अमरदास के समय में ही हो गया था, परंतु बाद में यह तो एकदम साफ तौर पर नजर आने लगा। दादू ने
साधना यहाँ स्वामी विवेकानंद के रूप में साकार हुई थी। शिकागो सम्मेलन में स्वामी जी ने जिस ज्ञान, जिस उदारता, जिस विवेक और जिस वाग्मिता का परिचय दिया, उससे समस्त विश्व चमत्कृत हो उठा। वहाँ के सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर भारतीय संस्कृति के सनातन स्वरों में विभोर होने लगे। उनके प्रखर एवं ओजस्वी भाषणों पर टिप्पणी करते हुए ‘द न्यूयार्क हैराल्ड’ ने लिखा कि धर्मों की पार्लियामेंट में सबसे प्रखरतम एवं महान् व्यक्ति स्वामी विवेकानंद हैं। उनका भाषण सुनकर अनायास ही यह प्रश्न उठा खड़ा होता है कि ऐसे ज्ञानी देश को सुधारने के लिए धर्मप्रचारक भेजने की बात कितनी मूर्खतापूर्ण हैं।
साधना का उद्देश्य किसी मोक्ष या निर्वाण की खोज नहीं हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जीवन और अस्तित्व का परिवर्तन हैं।” विश्वमानवता के प्रति उफनती संवेदना ने ही विश्वात्मबोध जगाया एवं उन्हीं के शब्दों में जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भागीरथों-शुनिक्षेपों का सृजन करना तपश्चर्या का लक्ष्य रहा हैं।
साधना सत्रों की श्रृंखला तथा विश्वामित्र परंपरा में सिद्धपीठ के रूप में गायत्रीतीर्थ की स्थापना कर संजीवनी विद्या का शिक्षण व नवयुग की पृष्ठभूमि का निर्माण यहाँ की कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ बनीं। कणाद परंपरा के अंतर्गत वैज्ञानिक अध्यात्मवाद पर शोध, पिप्पलाद-परंपरा में संस्कारी आहार से कल्पसाधना, सूत-शौनक परंपरा में रामचरितमानस, गीत कथा, प्रज्ञापुराण कथा द्वारा ज्ञानयज्ञ, आद्य, शंकर की परंपरा में चौबीस सौ गायत्री शक्तिपीठों व पाँच प्रमुख केंद्रों की स्थापना तथा बुद्ध-परंपरा के अंतर्गत परिव्राजकों का निर्माण, नालंदा, तक्षशिला विश्वविद्यालय स्तर का युगतीर्थ का विकास कुछ ऐसी भागीरथी संकल्पनाएँ हैं, जो इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शाँतिकुँज में 1971 से 2000 तक अवधि में पूरी हो गति पकड़ चुकी हैं।
साधना प्रमुख हैं। वे उस समय की साधना के बारे यदा-कदा बताया करते तब मैं अल्लाह का जाप किया करता था। पाँच बार नमाज पढ़ता। इस साधना में सर्वप्रथम लंबी दाढ़ी युक्त एक गंभीर ज्योतिर्मय पुरुष का दिव्य दर्शन हुआ। तदंतर सगुण विराट् ब्रह्म की उपलब्धि के पश्चात् तुरीय निर्गुण ब्रह्म ने उनका मन लीन हो गया।
साधना के द्वारा हमें समझा जाते हैं। पहली बार किसी ने मानव इतिहास में जीवन और साधना को एकाकार कर प्रस्तुत कर लाखों में उज्ज्वल समझाकर अपने आचरण से प्रस्तुत कर लाखों में उज्ज्वल भविष्य हेतु स्वयं के निर्माण की प्रक्रिया को गतिशील बना दिया।
साधना कुटीर हो, अखण्ड ज्योति संस्थान व गायत्री तपोभूमि का उनका साधनाकक्ष हो अथवा शाँतिकुँज स्थित मुख्य भवन में ऊपर की मंजिल की उनकी साधनास्थली-हर स्थान पर उस साधना की ऊर्जा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती हैं, जिससे उन्होंने इस मिशन के संगठन को खड़ा किया हैं। हिमालय उन्होंने यात्रा से लौटकर विशिष्टों के लिए प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के लिए जीवनसत्ता-संजीवनी साधना सत्र, 1980 से आरंभ किए गए बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं।
साधना में लग गए थे। उन्हें यह भी आभास था कि सतयुग-नवयुग के आगमन की पूर्ववेला में ब्रह्ममुहूर्त में उन्हें किस उद्देश्य से ऋषिसत्ताओं ने भेजा हैं। पहले भी भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, गौतमबुद्ध, कबीर, समर्थ रामदास, रामकृष्ण के समय लीलावतार के प्रकटीकरण के समय ऐसे ही अवतरण संपन्न हुए थे। इस बार की विशेषता थी लाखों-करोड़ों की चेतना में प्रज्ञावतार की सत्ता का-विचारप्रवाह का अवतरण। इसी तथ्य को आगे उन्होंने सूक्ष्मीकरण की साधना के दौरान लिखा था-”हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे, उसकी गरमी असंख्य जाग्रतात्माएँ अनुभव करेंगी।
साधना महोत्सव की पूर्णता का वर्ष हैं। वसंतपर्व से प्रारंभ हो रहा महापूर्णाहुति का यह उत्सव अपनी दृश्य व्यापकता से कहीं अधिक व्यापक हैं। इनका समूची शताब्दी-सहस्राब्दी में किए गए वे प्रयास-तप−साधनाएं शामिल हैं, जिनका उद्देश्य उज्ज्वल भविष्य की वासंती उमंगों को विस्तारित करना रहा हैं।
साधना सत्रों का प्रारंभ हुआ। साथ ही गायत्री महाअभियान का आयोजन और गायत्री उपासना के सामूहिक आयोजन किए जाने लगे। राष्ट्रीय आपत्तियों की शाँति के लिए विशद् महायज्ञ का आयोजन किया गया। इसके अंतर्गत 1. चारों वेदों का परायण यज्ञ 2. महामृत्युंजय यज्ञ 3. रुद्रयज्ञ 4. विष्णु यज्ञ 5. शतचंडी यज्ञ 6.नवग्रह यज्ञ 7. गणपति यज्ञ 8. सरस्वती यज्ञ 9. ज्योतिष्टोम 10. अग्निष्टोम आदि अनेक यज्ञों की प्रक्रियाएँ शामिल थीं यह समष्टि हित के लिए संपन्न हुआ एक विराट् आध्यात्मिक प्रयोग था। आचार्य जी के शब्दों में इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्णफल प्राप्तकर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं हैं।
साधना में संलग्न हुए। द्वैतभाव की साधना में उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव श्री रघुवीर की साधना दास्य भक्तिभाव से करना शुरू की। इसके लिए उन्होंने रामभक्त हनुमान का भाव अपने ऊपर आरोपित किया। वे महावीरमय हो गए। इस साधना अवधि में उन्होंने पहले सीता जी के दर्शन किए।
साधनाकक्ष हो अथवा शाँतिकुँज स्थित मुख्य भवन में ऊपर की मंजिल की उनकी साधनास्थली-हर स्थान पर उस साधना की ऊर्जा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती हैं, जिससे उन्होंने इस मिशन के संगठन को खड़ा किया हैं। हिमालय उन्होंने यात्रा से लौटकर विशिष्टों के लिए प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के लिए जीवनसत्ता-संजीवनी साधना सत्र, 1980 से आरंभ किए गए बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं।
साधनाएं इसी लक्ष्य की ओर अग्रसर होती है।
साधना भारतवर्ष की राष्ट्रीय जीवनी शक्ति का मूल स्रोत हैं। किसी भी राष्ट्र का प्राणसंचार सामान्यक्रम में जिन नस-नाड़ियां से प्रवाहित होता है, वे हैं-शासन की शक्ति सैन्यशक्ति भी पुली-मिली रहती हैं और संक्षेप में यही राजनीतिक चेतना का पर्याय हैं। इसके अलावा आर्थिक शक्ति, सामाजिक शक्ति एवं साँस्कृतिक शक्ति के प्राणप्रवाह को एक छोर से सुदूर दूसरे छोर तक प्रवाहित किए रहता है। इसके चलते देश का कोई भी अंग-अवयव सूखने या मुरझाने नहीं पाता। हर जगह जीवन की उमंगें मुस्कराती रहती हैं।
साधना से प्रारंभ हुई सृजनात्मक में संपन्न होगी।
साधना थी, साधक भी थे, पर सब बिखरें हुए बँटे हुए। जो भारतवासी हैं, भारतीयता की प्रकृति को पहचानते हैं, उन्हें यह भी मालूम है कि इस देश की ऊर्जा का मूल स्रोत आध्यात्म हैं, आध्यात्मिक साधनाएँ हैं। यहाँ साधन से ही संस्कृति का निर्माण होता है। यह संस्कृति ही समाज को गति देती थी और गतिशील समाज ही राष्ट्र को उसका गौरव देता है।
साधनात्मक आँदोलनों के बिखरें स्वरों को पुनः अपनी लय मिलने लगी और भारत देश की राष्ट्रीय जीवनी शक्ति फिर से सक्रिय होने लगी।
साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं। लोककल्याण के लिए तप-अहर्निश तप की इस प्रक्रिया को क्यों किया गया, किस के लिए किया गया, इसका एक ही जवाब है, मानवमात्र के कल्याण हेतु-आस्थासंकट के दुर्भिक्ष से लड़ने हेतु-जनप्रवाह बनाने के लिए तथा सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए।
साधना अवधि में स्पष्ट अनुभव किया कि यह समस्त सृष्टि उसी महाशक्ति की क्रीड़ा-कल्लोल हैं। इन साधनाओं के निष्कर्ष रूप में वे समस्त स्त्रीजाति को मातृभाव में ही भावी नारीयुग के अभ्युदय के संकेत निहित थे।
साधनाओं के करने के पश्चात् उनकी यह निश्चयात्मक वाणी उच्चरित हुई कि समस्त धर्मों-मतों का मिलन बिन्दू वह एक ही ईश्वर हैं जिसमें विभिन्न धर्मावलंबी लोग अपने धर्म की पूर्णता पाते हैं। उनका समूचा जीवन “एकं सद्विपाः बहुधा वदंति” के वैदिक महामंत्र को प्रमाणित करने वाला महाप्रयोग था। उन्होंने प्रत्येक धर्म-संप्रदाय एवं मतों के संघर्ष को अपने जीवन में समन्वय एवं एकता के द्वारा निस्सृत किया। इस प्रसंग में उनके कठोर साधनामय जीवन की झलक देखना अनिवार्य हैं।
साधना के अगले चरण में उन्होंने मधुर स्वर भाव की साधना की। वह स्वयं को व्रज की गोपी रूप में अनुभव कर श्रीकृष्णप्रेम में डूब गए। इस साधना के अनुभवों को बताते हुए उन्होंने कहा भी राधारानी की अंगक्राँति को मैंने नागकेसर पुष्प के केसरों की भाँति गौरवर्ण देखा था। छह माह चली इस साधना की उत्कट अवस्था में वह महाभाव में पहुँच गए और सच्चिदानंद श्रीकृष्ण का पावन दर्शनलाभ किया। अन्य मूर्तियों की ही भाँति श्रीकृष्णमूर्ति भी उनमें लीन हो गई।
साधना में प्रवृत्त रहना है, तुम्हारे लिए यही पराक्रम अत्याचारियों-अन्यायियों से महासंघर्ष हैं। इस संघर्ष में तुम्हारी विजय होगी। अफजल का वध तुम्हारे हाथों होगा। अब जाओ शिवा, कर्तव्य तुम्हें पुकार रहा हैं। भवानी तुम्हारा मंगल करे- “शुभास्ते सन्तु पन्थानः” तुम्हारा मार्ग निष्कंटक रहे।
साधनाओं के निष्कर्ष रूप में वे समस्त स्त्रीजाति को मातृभाव में ही भावी नारीयुग के अभ्युदय के संकेत निहित थे।
साधना का केन्द्र बन गया था और वहाँ मद्य-मैथुन की पूर्ण स्वतंत्रता थी। ब्रह्मवादी ब्राह्मण संध्या, तर्पण एवं षट्कर्म में लीन रहते थे। उनमें ब्रह्मचर्य का इतना बाहुल्य था कि वे जीवन जीने की कला से विमुख हो चुके थे। शैवों में अनेक संप्रदाय हो चुके थे और वे योगियों के अभ्युदय के पूर्व ही अपनी गतिमयता खो चुके थे। सूफी संत भी यहाँ आकर झाड़-फूँक करने लगे तरह-तरह के चमत्कारों एवं करामातों पर उनका विश्वास बढ़ गया।
साधना से यह प्रमाणित किया कि वास्तव में सभी धर्मों का सारतत्व मानव धर्म हैं और इसके अनुशीलन की यथार्थ उपलब्धि हैं- मानव में देवत्व का जागरण रामकृष्ण परमहंस परस्पर चर्चा में शिष्यों को बता रहे थे- मनुष्यों में कुछ देवता पाए जाते हैं, शेष तो नरपिशाच ही होते हैं।
साधनाएँ कीं। बौद्ध भाव में डुलाकर एक बार उन्होंने कहा-श्री बुद्धदेव निश्चित ही ईश्वरावतार थे। उनके प्रवर्तित मत तथा वैदिक ज्ञानमार्ग में कोई भेद नहीं हैं। जैन तीर्थंकरों के प्रति भी वे श्रद्धावान् थे। उनके मरे में महावीर की पाषाण मूर्ति होना एवं उसको धूप देना इस तथ्य के स्पष्ट प्रमाण हैं।
साधना से आध्यात्मिक चेतना को नई प्रखरता दी। संक्राँति के इस द्वितीय पर्व पर वारकरी संप्रदाय के संतों में जो सबसे अग्रणी रहे, वे हैं-तुकाराम जी अपनी भगवद्भक्ति से स्वयं भक्ति का एक अनुपम आदर्श बन गए।
साधनाकाल में बनी रही। एक दिन उन्होंने एक सुँदर गौरवर्ण देवमानव को अपनी ओर आते हुए देखा। उन्हें देखते ही उनके अंतःकरण में प्रतिध्वनित होने लगा-ईसामसीह! डनके इस प्रकार सोचते ही देवमानव ईसा श्री रामकृष्ण का आलिंगन कर उनके शरीर में लीन हो गाए। उनकी बातयचेतना लुप्त हो गई और उनका मन सगुण विराट् ब्रह्म के साथ एकाकार हो गया।
साधना तक सीमित न था। यह तो उनके नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति रूप त्रिविध संकल्प की अभिव्यक्ति थी, विचारक्राँति के महाचक्र का प्रवर्तन था, युगनिर्माण आँदोलन की शुरुआत थी।
साधना विज्ञान का विस्तृत प्रशिक्षण केंद्र इसे बनाया जा रहा हैं। अध्यात्म जीवन के जीन की कब का नाम हैं। इसका व्यावहारिक जीवनसाधना वाला सार्वभौम स्वरूप क्या हो, इसे देश व विशेषज्ञ के सभी परिजन यहाँ सीखेंगे। आयुर्वेद एवं समस्त वैकल्पिक चिकित्सातीकरण तथा नंगे पैर चिकित्सकों का निर्माण तंत्र भी यहाँ बन रहा हैं। सार्थक, अनौपचारिक संस्कार प्रधान शिक्षा के विस्तार हेतु प्राणवान् शिक्षकों के निर्माण का तंत्र भी यहाँ स्थापित हो रहा हैं।
साधना की पूर्णाहुति भी हैं। इसमें भागीदार अपने जीवन में महेश्वर महाकाल के अलौकिक अनुदानों के साथ वासंती उल्लास एवं उमंग लाने वाली सिद्ध होगी।
साधनाकाल में ही ‘अखण्ड ज्योति’ नामक मासिक पत्रिका (1937 ई. से) का प्रकाशन-प्रवर्तन किया। उनका यह कार्य मात्र साहित्य साधना तक सीमित न था। यह तो उनके नैतिक क्राँति एवं सामाजिक क्राँति रूप त्रिविध संकल्प की अभिव्यक्ति थी, विचारक्राँति के महाचक्र का प्रवर्तन था, युगनिर्माण आँदोलन की शुरुआत थी।
साधना की ऊर्जा की उपस्थिति अनुभव की जा सकती हैं, जिससे उन्होंने इस मिशन के संगठन को खड़ा किया हैं। हिमालय उन्होंने यात्रा से लौटकर विशिष्टों के लिए प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र सामान्य वर्ग के व्यक्तियों के लिए जीवनसत्ता-संजीवनी साधना सत्र, 1980 से आरंभ किए गए बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं।
साधना, हजारों से मिलना, समस्याओं का समाधान करना, देशभर में दौरे लगाने के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण चिंतन में निमग्न थे। वह था 1967 में घोषित महाकाल की युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया, इसके लिए महामानवों की तलाश एवं देव-परिवार बसाने के लिए एक टकसाल विनिर्मित करने के लिए एक सिद्धपीठ का निर्माण।
साधनापद्धतियों की गहन साधनाओं के अंतस् से उपजे निष्कर्षों के सरलीकरण से ही संभव हैं। श्री रामकृष्ण परमहंस अपने जीवनकाल में इन्हीं आध्यात्मिक प्रयोगों में संलग्न रहे और निष्कर्ष रूप में उन्होंने कहा साधन भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सभी लोग उसकी खोज तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। सभी लोग उसकी खोज में हैं चाहे वे भिन्न से ही उसे खोजते हों। उसका यह कथन किसी दार्शनिक का वैचारिक प्रतिपादन मात्र नहीं हैं, बल्कि एक आत्मद्रष्टा, ईश्वरभावोन्मत, महान् ध्यानस्थ योगी का सत्यपुँज हैं, जिसका साक्षात् संबंध उस आदिशक्ति से था जिसे ब्रह्मशक्ति, काली, गॉड या अल्लाह आदि नामों से जाना जाता है।
साधना से ही मुमकिन था।
साधनामय जीवन की झलक देखना अनिवार्य हैं।
साधना में संलग्न रहकर उसे प्रेमी बनाओ। इस तरह सत्कर्म को पाठ तक नहीं, कर्त्तव्य में उतार लिया जाए तो जीवन में सच्चे अर्थों में समग्रता आ जाती है।
साधना के सुर बिखर रहे थे- अध्यात्म का संगीत मद्धिम पड़ गया था। इन बिखरे सुरों को किसी नए संगीतकार की तलाश थी, जो संक्राँति के पर्व में अर्थ खोज सके।
साधना को जो गति दी, वह इस युग में ही नहीं हर युग के लिए उदाहरण हैं। नामदेव, एकनाथ, ज्ञानेश्वर, जनार्दन पंत, विसोबा खेचर, सावंतामाली जैसे वंदनीय संत इसी भूमि में हुए। मुक्ताबाई, जानबाई, सहजोबाई जैसी धर्मप्राण नारियों ने भी अपनी साधना से आध्यात्मिक चेतना को नई प्रखरता दी। संक्राँति के इस द्वितीय पर्व पर वारकरी संप्रदाय के संतों में जो सबसे अग्रणी रहे, वे हैं-तुकाराम जी अपनी भगवद्भक्ति से स्वयं भक्ति का एक अनुपम आदर्श बन गए।
साधना दास्य भक्तिभाव से करना शुरू की। इसके लिए उन्होंने रामभक्त हनुमान का भाव अपने ऊपर आरोपित किया। वे महावीरमय हो गए। इस साधना अवधि में उन्होंने पहले सीता जी के दर्शन किए। बाद में इसी भावानुराग में उन्होंने श्री रघुवीर के दर्शन पाए।
साधना वाला सार्वभौम स्वरूप क्या हो, इसे देश व विशेषज्ञ के सभी परिजन यहाँ सीखेंगे। आयुर्वेद एवं समस्त वैकल्पिक चिकित्सातीकरण तथा नंगे पैर चिकित्सकों का निर्माण तंत्र भी यहाँ बन रहा हैं। सार्थक, अनौपचारिक संस्कार प्रधान शिक्षा के विस्तार हेतु प्राणवान् शिक्षकों के निर्माण का तंत्र भी यहाँ स्थापित हो रहा हैं। ग्रामीण स्वावलंबन से लेकर कुटीर उद्योगों द्वारा आर्थिक क्राँति का एक समग्र ढाँचा यहाँ बनाया गया हैं।
साधनामार्ग पर आरुढ़ होता चला गया।
साधना की शुरुआत की। इस क्रम में उन्होंने साधना में बाधक सभी वस्तुओं एवं भावों का परित्याग कर दिया। अभिमान को समाप्त करने के लिए उन्होंने भंगी रसिक के घन का मैल साफ किया। वैराग्य एवं व्याकुलता की इसी भावदशा में उन्हें माँ काली के दर्शन हुए। इस दर्शन के पश्चात् वह द्वैतभाव के साकार सगुण, निराकार-सगुण एवं अद्वैतभाव के निराकार-निर्गुण की साधना में संलग्न हुए।
साधना के साथ अवतरित होकर निराश हताश समूचे विश्व को उज्ज्वल भविष्य का संदेश दे सकते हैं। इक्कीसवीं सदी में इन चारों देवपुरुषों के चार ही संदेश होंगे-इनमें से संत कबीर का स्वर होगा-1. साँप्रदायिक सद्भाव समर्थ गुरु की ललकार होगी- 2. संगठित होकर अनाचार का प्रतिरोध। श्री रामकृष्ण परमहंस की पुकार होगी- 3. देवसंस्कृति की दिग्विजय के रूप में देवत्व की विजय एवं वेदमूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य श्री की विचारक्राँति के साथ-साथ उद्घोषणा है-सबके लिए सद्बुद्धि सबके लिए उज्ज्वल भविष्य। यही इन चारों देवपुरुषों के समन्वित संक्राँति दर्शन का सार हैं और इनकी ओर से सहस्राब्दी संदेश हैं, जो भारत देश के वासियों को ही नहीं समूची विश्वमानवता को इस महासंक्राँति की वेला में दिया जा रहा हैं।
साधनाएं शामिल हैं, जिनका उद्देश्य उज्ज्वल भविष्य की वासंती उमंगों को विस्तारित करना रहा हैं।
साधना के इन स्वरों में हुँकार का वह गर्जन न था, जिसे सुनकर अत्याचारियों के कलेजे काँप उठें। उसके दिल दहल जाएँ, सीने फट जाएँ उनके पाँव के नीचे की जमीन खिसक जाए और वे पीछे मुड़ने और भाग निकलने को विवश हो जाएँ। यह ललकार और हुँकार ही समर्थ गुरु रामदास के तपस्वी जीवन का पर्याय थी, जिन्होंने इस युग में अध्यात्मिक साधना को नए स्वर दिए। उनके स्वरों में वह ओज था, जिसका स्पर्श पाकर मराठा शिवाजी जननायक बन गए। उनका व्यक्तित्व प्रत्येक भारतीय का आदर्श बन गया।
साधना के समय वह बाहबिल सुना करते। गिरजाघर भी जाते। उनकी यह भावधारा साधनाकाल में बनी रही। एक दिन उन्होंने एक सुँदर गौरवर्ण देवमानव को अपनी ओर आते हुए देखा। उन्हें देखते ही उनके अंतःकरण में प्रतिध्वनित होने लगा-ईसामसीह! डनके इस प्रकार सोचते ही देवमानव ईसा श्री रामकृष्ण का आलिंगन कर उनके शरीर में लीन हो गाए।
साधना की अलख जगाई हाबँई उन्होंने यह भी कहा कि परमात्मा सगुण हैं या निर्गुण इस चक्कर में मत उलझो। तुम तो उसे पुकारों। अपनी आत्मशक्ति जगाओ। अपनी आत्मचेतना को पहचानो तभी तुम्हारे कष्ट दूर होंगे
साधना के दौरान लिखा था-”हम जिस अग्नि में अगले दिनों तपेंगे, उसकी गरमी असंख्य जाग्रतात्माएँ अनुभव करेंगी। भावी महाभारत का संचालन करने के लिए कितने ही कर्मनिष्ठ महामानव अपनी वर्तमान मूर्च्छना को छोड़कर आगे आते हैं, इस चमत्कार को अगले ही दिनों प्रत्यक्ष देखने के लिए सहज ही हर किसी को प्रतीक्षा करनी चाहिए। लोकसेवियों की एक ऐसी उत्कृष्ट चतुरंगिणी खड़ी कर देना जो असंभव को भी संभव बना दे, नरक को स्वर्ग में परिणत कर दे, हमारे ज्वलंत जीवनक्रम का चमत्कार होगा।”
साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं। लोककल्याण के लिए तप-अहर्निश तप की इस प्रक्रिया को क्यों किया गया, किस के लिए किया गया, इसका एक ही जवाब है, मानवमात्र के कल्याण हेतु-आस्थासंकट के दुर्भिक्ष से लड़ने हेतु-जनप्रवाह बनाने के लिए तथा सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए।
साधना, सूत-शौनक परंपरा में रामचरितमानस, गीत कथा, प्रज्ञापुराण कथा द्वारा ज्ञानयज्ञ, आद्य, शंकर की परंपरा में चौबीस सौ गायत्री शक्तिपीठों व पाँच प्रमुख केंद्रों की स्थापना तथा बुद्ध-परंपरा के अंतर्गत परिव्राजकों का निर्माण, नालंदा, तक्षशिला विश्वविद्यालय स्तर का युगतीर्थ का विकास कुछ ऐसी भागीरथी संकल्पनाएँ हैं, जो इक्कीसवीं सदी की गंगोत्री शाँतिकुँज में 1971 से 2000 तक अवधि में पूरी हो गति पकड़ चुकी हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ हमारे पूज्य गुरुदेव के जीवन की एक मुख्य धारा बनकर आया हैं। सामान्यतया साधक स्वयं के जीवन के परिशोधन-मोक्ष या सिद्धि रूप में जीवन लक्ष्य पाने का पुरुषार्थ करते रहते हैं, पर आचार्य श्री ने स्पष्ट कहा-”मेरी साधना का उद्देश्य किसी मोक्ष या निर्वाण की खोज नहीं हैं। इसका मुख्य उद्देश्य जीवन और अस्तित्व का परिवर्तन हैं।” विश्वमानवता के प्रति उफनती संवेदना ने ही विश्वात्मबोध जगाया एवं उन्हीं के शब्दों में जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भागीरथों-शुनिक्षेपों का सृजन करना तपश्चर्या का लक्ष्य रहा हैं।
साधना की शुरुआत की थी, वह 27 वर्षों के बाद 1953 में पूरी हो गई। इस बीच स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष के साथ-साथ वे हिमालय भी गए। उनका हिमालय प्रवास वहाँ की दिव्य सत्ताओं के संरक्षण में किसी अलौकिक साधना के लिए था। अपने महाअनुष्ठान की पूर्णाहुति स्वरूप उन्होंने अपने आध्यात्मिक प्रयोगों की प्रथम प्रयोगशाला के रूप में गायत्री तपोभूमि का निर्माण गायत्री जयंती 1953 ई. में किया। यद्यपि मथुरा में तपोभूमि निर्माण के लिए चुना गया यह स्थान पहले कभी महर्षि दुर्वासा की तपस्थली रह चुका था, लेकिन इसे उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयास किए।
साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं। लोककल्याण के लिए तप-अहर्निश तप की इस प्रक्रिया को क्यों किया गया, किस के लिए किया गया, इसका एक ही जवाब है, मानवमात्र के कल्याण हेतु-आस्थासंकट के दुर्भिक्ष से लड़ने हेतु-जनप्रवाह बनाने के लिए तथा सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए।
साधना की उत्कट अवस्था में वह महाभाव में पहुँच गए और सच्चिदानंद श्रीकृष्ण का पावन दर्शनलाभ किया। अन्य मूर्तियों की ही भाँति श्रीकृष्णमूर्ति भी उनमें लीन हो गई।
साधनाएं स्वयं कीं, औरों से कराई। जिसकी जैसी पात्रता थी, कर पाने की क्षमता थी उसे सीमा तक परिष्कृत कर साधक बनाया। श्रेष्ठ साधक-चिंतक स्तर के स्वाध्यायशील व्यक्ति ही कर्मठ लोकसेवी संगठन बन पाते हैं। सामूहिक साधना द्वारा सामूहिक मन के जागरण की प्रक्रिया सक्रिय बना एक तीव्र चिंतनप्रवाह को जन्म देना एक अवतारी स्तर की सत्ता का ही काम हैं। हमारी गुरुसत्ता का जीवनक्रम हम देखते हैं, तो बहुआयामी रूप में उनके व्यक्तित्व रूपी विराट् हिमालय का दर्शन करते हैं।
साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं। लोककल्याण के लिए तप-अहर्निश तप की इस प्रक्रिया को क्यों किया गया, किस के लिए किया गया, इसका एक ही जवाब है, मानवमात्र के कल्याण हेतु-आस्थासंकट के दुर्भिक्ष से लड़ने हेतु-जनप्रवाह बनाने के लिए तथा सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए।
साधना के लिए था। अपने महाअनुष्ठान की पूर्णाहुति स्वरूप उन्होंने अपने आध्यात्मिक प्रयोगों की प्रथम प्रयोगशाला के रूप में गायत्री तपोभूमि का निर्माण गायत्री जयंती 1953 ई. में किया। यद्यपि मथुरा में तपोभूमि निर्माण के लिए चुना गया यह स्थान पहले कभी महर्षि दुर्वासा की तपस्थली रह चुका था, लेकिन इसे उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयास किए।
साधना, परिचय दिया था। इस प्रकार वैदिक चिंतनराशि को एक अखंड-सुसंबद्ध भाषा में इसके पूर्व कभी किसी ने विदेशियों, प्राचीन वैदिक सत्यद्रष्टा महर्षियों के समान श्रोताओं को ‘अमृत के पुत्रों’ कहकर संबोधित करते हुए महान् ब्रह्मर्षि के स्वर तथा भाषा में कहा- ‘अमृत के पुत्रों!’ कैसा मधुर और आशाजनक संबोधन हैं यह। बंधुओं! मैं इसी मधुर नाम से तुम लोगों को संबोधित करना चाहता हूँ। तुम अमृत के अधिकारी हो। हिंदू तुम्हें पापी कहने से इनकार करता है।
साधना की। वह स्वयं को व्रज की गोपी रूप में अनुभव कर श्रीकृष्णप्रेम में डूब गए। इस साधना के अनुभवों को बताते हुए उन्होंने कहा भी राधारानी की अंगक्राँति को मैंने नागकेसर पुष्प के केसरों की भाँति गौरवर्ण देखा था। छह माह चली इस साधना की उत्कट अवस्था में वह महाभाव में पहुँच गए और सच्चिदानंद श्रीकृष्ण का पावन दर्शनलाभ किया। अन्य मूर्तियों की ही भाँति श्रीकृष्णमूर्ति भी उनमें लीन हो गई।
साधनाएँ संपन्न करवाई। पंचकोशी साधनाएँ के प्रशिक्षण सत्र भी इसी बीच गायत्री तपोभूमि पर संपन्न होने लगे। युगनिर्माण योजना के सूत्रधार हमारे परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय की तप अवधि से बैठते ही युगपरिवर्तन की प्रक्रिया के प्राण युगनिर्माण सत्संकल्प की घोषणा की। नवयुग के संविधान के रूप में प्रसारित इस घोषणा पत्र के 18 सूत्रों में युगगीता के अठारह अध्यायों के मर्म छिपा पड़ा हैं। महासंक्राँति के महानायक ने महासमर की घोषणा कर वैश्विक स्तर पर पड़े रहे घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में भारतवर्ष की नई भूमिका दृश्यपटल पर रख दी थी।
साधना शुरू होने के दस वर्षों बाद ही यानि कि सन् 1920 के बाद ही स्वाधीनता आँदोलन के निर्णयकारी दौर की शुरुआत हो गई। उसकी आकारहीनता समाप्त हो गई और स्वरूप निश्चित हो गया। उनके पूर्ण एकाँत यानि सन् 1926 के बाद तो इसमें आश्चर्यजनक परिवर्तन दिखाई पड़ने लगे। पूर्वाभास बार-बार रेखाँकित होने लगा। इस अवधि में तीन महान् नेताओं का चमत्कारी नेतृत्व सामने आया-महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू एवं नेताजी सुभाषचंद्र बोस।
साधनाएँ करके भी रामकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया कि समस्त धर्मों का धर्ममत अनेक मार्ग हैं। सारे मत-संप्रदाय एक ही सत्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हैं।
साधना सत्र, 1980 से आरंभ किए गए बीसवर्षीय साधना-अनुष्ठान के अंतर्गत विशिष्ट अभियान साधना-प्राण अनुदान वितरण की महासाधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं। लोककल्याण के लिए तप-अहर्निश तप की इस प्रक्रिया को क्यों किया गया, किस के लिए किया गया, इसका एक ही जवाब है, मानवमात्र के कल्याण हेतु-आस्थासंकट के दुर्भिक्ष से लड़ने हेतु-जनप्रवाह बनाने के लिए तथा सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए।
साधना में बाधक सभी वस्तुओं एवं भावों का परित्याग कर दिया। अभिमान को समाप्त करने के लिए उन्होंने भंगी रसिक के घन का मैल साफ किया। वैराग्य एवं व्याकुलता की इसी भावदशा में उन्हें माँ काली के दर्शन हुए। इस दर्शन के पश्चात् वह द्वैतभाव के साकार सगुण, निराकार-सगुण एवं अद्वैतभाव के निराकार-निर्गुण की साधना में संलग्न हुए। द्वैतभाव की साधना में उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव श्री रघुवीर की साधना दास्य भक्तिभाव से करना शुरू की।
साधनाएँ कीं। इस प्रसंग में उन्होंने भैरवी ब्राह्मणी द्वारा तंत्रमार्ग की दीक्षा ली। तंत्रमार्ग में उन्होंने अनेक भावों एवं विविध मार्गों की सभी साधनाएँ पूर्ण कीं और उस परम चित् शक्ति का साक्षात्कार किया। साधना अवधि में स्पष्ट अनुभव किया कि यह समस्त सृष्टि उसी महाशक्ति की क्रीड़ा-कल्लोल हैं। इन साधनाओं के निष्कर्ष रूप में वे समस्त स्त्रीजाति को मातृभाव में ही भावी नारीयुग के अभ्युदय के संकेत निहित थे।
साधना के इन स्वरों में ज्ञान था, भक्ति की वितनलता थी, जनजीवन में समाई तड़प थी, प्रत्येक हृदय से उठाने वाली पुकार का दरद था, परंतु परिस्थितियों की चुनौती को स्वीकार करने का साहस नहीं था। इसमें अत्याचार और अनाचार को ललकार की क्षमता न थी। साधना के इन स्वरों में हुँकार का वह गर्जन न था, जिसे सुनकर अत्याचारियों के कलेजे काँप उठें। उसके दिल दहल जाएँ, सीने फट जाएँ उनके पाँव के नीचे की जमीन खिसक जाए और वे पीछे मुड़ने और भाग निकलने को विवश हो जाएँ। यह ललकार और हुँकार ही समर्थ गुरु रामदास के तपस्वी जीवन का पर्याय थी, जिन्होंने इस युग में अध्यात्मिक साधना को नए स्वर दिए।
साधना में तत्पर हुए। सन् 1950 ई. में उन्होंने दार्शनिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त कर अपनी साधना को पूरा किया। इसी के साथ प्रारंभ हुई उनकी विधिवत् दार्शनिक लेखन यात्रा।
साधना से स्वतंत्रता संघर्ष और अधिक तीव्र हो उठा और सफलता सुनिश्चित हो गई। अपनी इस गहन एकाँत तप−साधना के दिनों में सन् 1926 के कुछ समय बाद ही उन्होंने भारत के शीघ्र स्वतंत्र होने की बात कहीं। उन्हीं के शब्दों में-”यह दैवी आज्ञा जारी हो चुकी हैं, उसके क्रियान्वयन में विलंब नहीं होगा।”
साधना करो। जो अंधकार में भटक गए हैं, उन्हें ज्ञान का प्रकाश दो। चारों और अर्जित संपदा बिखेर दो। शिष्य चला पड़ा अपना मोह तोड़कर और मानवता के देवदूत के रूप में अग्रगामियों की टोली में सम्मिलित हो गया।
साधना से ओत–प्रोत था। समर्थ की यह ललकार-
साधना द्वारा सामूहिक मन के जागरण की प्रक्रिया सक्रिय बना एक तीव्र चिंतनप्रवाह को जन्म देना एक अवतारी स्तर की सत्ता का ही काम हैं। हमारी गुरुसत्ता का जीवनक्रम हम देखते हैं, तो बहुआयामी रूप में उनके व्यक्तित्व रूपी विराट् हिमालय का दर्शन करते हैं। इसीलिए वह प्रचंड प्राणप्रवाह वाली लेखनी बनकर कभी लाखों अखण्ड ज्योति पाठकों के मनों को मथती हैं, उन्हें कुछ कर दिखाने के लिए तत्पर करती हैं, एक रचनात्मक घटक बनने को प्रेरित करती हैं। कभी वह उनकी ओजस्वी वाणी के प्रवाह से निस्सृत हो दृश्यजीवन में प्रखर तप व गहन ममत्व से भरी प्राण फूँक देने वाली अपनी इस विधा से अनेकों के जीवन की दिशाधारा बदले देती हैं। आध्यात्म मंच से समाज व राष्ट्र के अभिनव निर्माण के रचनात्मक क्रिया–कलाप जब उस साधक-संगठन के माध्यम से चलते हैं, तो गायत्री परिवार को सरकार के समानाँतर एक विराटतम आदर्श स्वयंसेवी संगठन के रूप में स्थापित कर देते हैं।
साधना के बारे यदा-कदा बताया करते तब मैं अल्लाह का जाप किया करता था। पाँच बार नमाज पढ़ता। इस साधना में सर्वप्रथम लंबी दाढ़ी युक्त एक गंभीर ज्योतिर्मय पुरुष का दिव्य दर्शन हुआ। तदंतर सगुण विराट् ब्रह्म की उपलब्धि के पश्चात् तुरीय निर्गुण ब्रह्म ने उनका मन लीन हो गया। ईसाई धर्म की साधना के समय वह बाहबिल सुना करते।
साधना, सूक्ष्मीकरण साधना की अवधि (1984 से 1986) में विशिष्ट ऊर्जा का उत्पादन-देवात्मा भारत की कुंडलिनी जागरण प्रक्रिया एवं 1988 की आश्विन नवरात्रि से आरंभ किए गए बारहवर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण द्वारा अनिष्ट का निवारण एवं इक्कीसवीं सदी का आगमन उनकी सतत् चलती रही। साधनामय जीवनयात्रा के मील के पत्थर हैं। ब्रह्मवर्चस् संपादन-आत्मबल उत्पादन हेतु वे स्वयं सक्रिय रहे, औरों को भी गतिशील करते रहे। परमवंदनीया माताजी ने 1946 में उनके साथ भागीदारी की व 1994 तक उनके हर संकल्प में साथ निभाती रहीं। लोककल्याण के लिए तप-अहर्निश तप की इस प्रक्रिया को क्यों किया गया, किस के लिए किया गया, इसका एक ही जवाब है, मानवमात्र के कल्याण हेतु-आस्थासंकट के दुर्भिक्ष से लड़ने हेतु-जनप्रवाह बनाने के लिए तथा सतयुग की वापसी की प्रक्रिया को गतिशील करने के लिए।
साधना के दिनों में सन् 1926 के कुछ समय बाद ही उन्होंने भारत के शीघ्र स्वतंत्र होने की बात कहीं। उन्हीं के शब्दों में-”यह दैवी आज्ञा जारी हो चुकी हैं, उसके क्रियान्वयन में विलंब नहीं होगा।”
साधना से वह सभी साधनापद्धतियों में समन्वय की स्थापना करने जुटी थी, ताकि इस संक्राँतिकाल में एक नया अभ्युदय जन्म ले सके। नया युग मुस्करा सके।
साधना की और प्रभू की बालमूर्ति का दर्शन किया।
साधना के ये स्वर समूचे भारत में, इसके उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम के कोने में फैल-बिखरें थे। इनमें ऊर्जा तो थी, पर संगठन नहीं था। साधना के इन स्वरों में ज्ञान था, भक्ति की वितनलता थी, जनजीवन में समाई तड़प थी, प्रत्येक हृदय से उठाने वाली पुकार का दरद था, परंतु परिस्थितियों की चुनौती को स्वीकार करने का साहस नहीं था। इसमें अत्याचार और अनाचार को ललकार की क्षमता न थी। साधना के इन स्वरों में हुँकार का वह गर्जन न था, जिसे सुनकर अत्याचारियों के कलेजे काँप उठें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-September
साधना के इर्द-गिर्द सिमट गए थे। स्वामी विवेकानन्द सहित सारे गुरुभाई उन्हें सच्चे संन्यास की उज्ज्वल प्रतिमा के रूप में देखते और मानते थे। निश्चित ही वे सच्चे संन्यासी थे।
साधना-संस्कार ही व्यक्ति की आत्मचेतना को अगली कक्षा के द्वार तक पहुँचाते हैं। एक जन्म को एक कक्षा माने तो नौवीं कक्षा में पढ़े विषय ही दसवीं में भी पढ़ने होते हैं। परीक्षा, परिणाम और नई कक्षा में प्रवेश को तैयारी तथा नया जन्म कह सकते हैं। नई कक्षा में पहले अर्जित की हुई शिक्षा को ही आगे बढ़ाने के रूप से नए जन्म में मिले धर्म को समझा जा सकता है। निर्मल वर्मा ने महात्मा गाँधी की चिंतन की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रकृति स्वयं किसी भी चेतना को पूर्ववर्ती संस्कार और स्तर के अनुरूप वातावरण में भेजती है।
साधना करूं।
साधना-विधियों की खुले आम चर्चा नहीं की जातीं किसी समय में वह परमाणु बम जैसी शक्तिशाली रही होगी, आज तो गोला-बारूद की तरह ही है। गोला-बारूद ही नहीं छुरी-तलवार जैसी हो तो भी उनके अभ्यास और उपयोग की छूट नहीं दी जाती। कारण गलत हाथों में पड़ने से उस व्यक्ति का अपना और दूसरों का अनिष्ट होने की आशंका ही रहती है। तंत्र को इसीलिए अधिकार और अधिकारी के विवेक से समझाया गया है। यह भी सावधान किया गया है कि ये साधनाएँ हर कोई नहीं कर सकता।
साधना में इस अभ्यास को सम्मिलित करने का अर्थ हैं, आँतरिक सुदृढ़ता का विकास। मानसिक दृष्टि से बली हुए बिना सत्य के तेज को धारण नहीं किया जा सकता। क्रोध आने पर चुप रह जाने का नियम मानसिक शक्ति को इस तरह ढालता है कि वह अप्रिय स्थितियों को झेल सके।
साधनाओं से मिलने वाली सिद्धियों और सफलताओं के रोमाँचकारी वर्णन पुराण ग्रंथों से मिलते हैं। योगियों, सिद्धों और ताँत्रिक परंपराओं में जैसे आश्चर्यजनक उल्लेख आते हैं, उन पर विश्वास करना कठिन है। सीधे उन्हें परी कथाएँ कहकर या कल्पना-लोक की उड़ान बताकर छोड़ देना पड़ता है। इस युग के प्रसिद्ध ताँत्रिक विद्वान् महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज का मानना था कि पुराण ग्रंथों में मिलने वाले उल्लेख कपोल कल्पित नहीं है। वे संभावनाएँ है, जो इसी मनुष्य शरीर में जगाई जा सकती हैं।
साधनाएँ हर कोई नहीं कर सकता। कारण यह हैं कि सिद्धियाँ मिलती है, शक्ति आती है, तो उनकी अपनी शर्तें भी होती हैं। शर्तों का अथवा नियम-अनुशासन का पालन किया जाना अनिवार्य हैं। उसी में शुभ और कल्याण हैं जो उन कठोर नियम-अनुशासनों को निभा सकें, उन्हें ही तंत्र-मार्ग पर चलने की बात सोचनी चाहिए।
साधना ही उनका जीवन था। निरन्तर गायत्री महामंत्र का जप एवं सूर्य का ध्यान करने से उनका व्यक्तित्व भी सविता की तरह प्रखर एवं तेजस्वी हो गया था। उनका व्यक्तित्व अलौकिक विभूतियों का भंडार था। सभी ऋद्धि-सिद्धियाँ उनके चरणों की दासी थी। उनकी ख्याति सुदूर क्षेत्रों तक व्याप्त थी।
साधना-पक्ष की चर्चा कर रहें हैं। योगसाधना में जिन यम-नियमों का उल्लेख किया गया है, उनमें सत्य का स्थान दूसरे क्रम पर आता है। प्रचलित व्याख्या में सत्य का स्थान दूसरे क्रम पर आता है। प्रचलित व्याख्या में सत्य का अर्थ जैसा अनुभव किया गया हो, वैसा ही व्यक्त करना है। यह अर्थ साधन-क्षेत्र में कम ही सहायक सिद्ध होता है।
साधना वर्ष (1333) आते-आते इस विराट् महापुरश्चरण की परिधि बड़ी व्यापक हो गई एवं प्रायः चौबीस हजार करोड़ का गायत्री जप प्रतिवर्ष संपन्न होने लगा है। विगत वर्ष दिसंबर में विकलांगता निवारण दिवस से आरम्भ हुई, इस विराट् अनुष्ठान की महापूर्णाहुति अब चौथे चरण में जा पहुँची, जहाँ दो आयोजन सम्पन्न होने है। पहला विभूति महायज्ञ, जो नई दिल्ली में आठ अक्टूबर रविवार को सायं 5 से 6 की अवधि में संपन्न हो रहा है तथा सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ जो नवम्बर माह में देवोत्थान एकादशी (9 नवंबर) से आरम्भ होकर कार्तिक पूर्णिमा (11 नवंबर) को समाप्त हो रहा है। पहले की व्याख्या विगत लेख में कि जा चुकी अब समझें कि यह नवंबर का अनुष्ठान किसी स्तर का है।
साधना द्वारा अर्जित क्षमता का सही उपयोग न हो पाने से मत अशाँत था और अपनी साधना का अगला चरण इसी को मानकर अविरल शाँति पाई। मुनि कह उठे, “मुझे मालूम होता कि परमात्मा दीन-दुखियों की सेवा का प्यासा है, तो क्यों इतना समय व्यर्थ जाता।”
साधना-संपदा को समृद्ध करते रहने के लिए नियत की गई। यद्यपि वह एक सामाजिक व्यवस्था ज्यादा है, लेकिन कर्म को ही साधना और जीवन को ही यज्ञ अनुष्ठान मानने वाले विचार में वर्ण धर्म भी मोक्ष की दिशा में अनवरत यात्रा ही हैं।
साधना का विकास भी इसी तरह हो चुका था। अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के बाद उनकी दिनचर्या, जीवन के सारे क्रिया-कलाप तप-साधना के इर्द-गिर्द सिमट गए थे। स्वामी विवेकानन्द सहित सारे गुरुभाई उन्हें सच्चे संन्यास की उज्ज्वल प्रतिमा के रूप में देखते और मानते थे। निश्चित ही वे सच्चे संन्यासी थे।
साधना का नियोजन। इसे नाम दिया गया है युगसंधि महापुरश्चरण। यह आयोजन शाँतिकुँज हरिद्वार के अंतर्गत बारह वर्ष तक सन् 2000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही इसकी महापूर्णाहुति होगी।” अखण्ड ज्योति नवंबर 1399, पृष्ठ 61 बाद में परमपूज्य गुरुदेव ने फरवरी 133 की अखण्ड ज्योति में सभी को संबोधित करते हुए कहा, “एक ही व्रष्सेजप के लिए, एक ही सूत्र में संबद्ध होकर, एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है, तो उससे बिखराव वाली अस्तव्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है।
साधना की महिमा भी उन्हें चकित कर रही थी। जिसके लिए राजकुमार ने अपने राज्य को तिनके की तरह त्याग दिया और फिर से तप करने चले गए।
साधना की ख्याति आसपास के गाँवों में भी फैल गई। पुष्प खिल गया हो तो सुरभि अपने ही आप चारों और फैलने लगती है। स्वामी तुरीयानंद की तप-साधना का विकास भी इसी तरह हो चुका था। अपने गुरुदेव श्री रामकृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के बाद उनकी दिनचर्या, जीवन के सारे क्रिया-कलाप तप-साधना के इर्द-गिर्द सिमट गए थे। स्वामी विवेकानन्द सहित सारे गुरुभाई उन्हें सच्चे संन्यास की उज्ज्वल प्रतिमा के रूप में देखते और मानते थे।
साधना करने जा रहा हूँ। गायत्री साधना में ही मानव-जीवन की सार्थकता है। उपस्थित जन पुनर्जन्म, पूर्व जन्म के इस अनोखे चमत्कार को देखकर हतप्रभ थे। गायत्री साधना की महिमा भी उन्हें चकित कर रही थी। जिसके लिए राजकुमार ने अपने राज्य को तिनके की तरह त्याग दिया और फिर से तप करने चले गए।
साधना चाहिए।
साधना में ही मानव-जीवन की सार्थकता है। उपस्थित जन पुनर्जन्म, पूर्व जन्म के इस अनोखे चमत्कार को देखकर हतप्रभ थे। गायत्री साधना की महिमा भी उन्हें चकित कर रही थी। जिसके लिए राजकुमार ने अपने राज्य को तिनके की तरह त्याग दिया और फिर से तप करने चले गए।
साधना संसार का विज्ञान था। गीता में श्रीकृष्ण जिसे स्वधर्म कहते हैं, वह अपने व्यक्तित्व और संस्कार के अनुरूप कर्म का चुनाव ही है। वर्ण-धर्म चुनना नहीं पड़ता था। वह जन्म से ही सिद्ध होता था। कभी-कभार अपवाद होते थे, जिसमें ब्राह्मण क्षत्रिय का धर्म अंगीकार कर लेते या क्षत्रिय और दूसरे वर्ण के लोग अतिक्रमण कर जाते थे।
साधना और जीवन को ही यज्ञ अनुष्ठान मानने वाले विचार में वर्ण धर्म भी मोक्ष की दिशा में अनवरत यात्रा ही हैं।
साधना करने पर भी उन्हें पूर्णता प्राप्त न हुई, तब वे घर लौट आए। बेटे को पाकर माँ के हर्ष का ठिकाना न रहा। उन्होंने कहा, बेटा! तूने दुःखी का दुःख पहचान लिया, तुझे पूर्णता प्राप्त होगी। माँ के आशीर्वाद का ही फल था कि महीधर को वेद-ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने चारों वेदों का भाष्य करने का गौरव प्राप्त किया।
साधना का आधारभूत अंग यहीं है। शिवजी और दमयंती द्वारा क्रमशः कामदेव और बहेलिये को तीसरे नेत्र द्वारा जलाकर भस्म करने का जो पौराणिक आख्यान मिलता है, वह कोई आलंकारिक उल्लेख मात्र नहीं है, वरन् उसमें इसी ग्रंथि की शक्ति और सामर्थ्य को दर्शाया गया है।
साधना में विघ्न पड़ने लगा। उन परमयोगी की तप-साधना में भीड़ की वजह से व्यवधान पड़ने लगा था। अतः वे नीचे गुफा छोड़कर पहाड़ के और ऊपर वाली गुफा में चले गए। अपने दोनों शिष्यों को उन्होंने पुराने वाले स्थान पर ही रहने दिया। अब दर्शनार्थियों की भीड़ को बाबा तक नहीं पहुँचने दिया जाता था।
साधना से ही करना पड़ता है आरंभ अपने और दूसरों के बारे में चर्चा से करना चाहिए। बातचीत के तीन-चौथाई विषय वार्तालाप में लगे दो व्यक्तियों में प्रत्येक स्वयं और तीसरा कोई अन्य ही होता है। चर्चा का स्वरूप अपनी स्थापना और दूसरों को रद्द करने जैसा होता है। बातचीत कर रहे व्यक्ति या तो अपनी प्रशंसा कर रहे होंगे अथवा दूसरे या वहाँ अनुपस्थित व्यक्ति की निंदा।
साधना में इन चेतना-ग्रंथियों, उपत्यिकाओं अथवा कृत्याओं में से अपने लिए विशिष्ट अंशों को जगाया, चैतन्य बनाया और सक्रिय किया जाता है। सक्रिय होने के बाद में ग्रंथियाँ अनुचर की तरह काम करने लगती है। लोक व्यवहार में इन ग्रंथियों के समुच्चय को मसान, पिशाच, भैरव, छाया−पुरुष, बेताल, महि, प्रेत आदि की सिद्धि बताया जाता है। ग्रंथियाँ अथवा सूक्ष्म शक्तियों के गुच्छक सिद्ध ताँत्रिक के लिए इस तरह परिणाम उत्पन्न करते हैं, जैसे कोई आज्ञाकारी सेवक काम कर रहा हो। शक्तियाँ उस सिद्ध साधक के वश में रहती हैं और व्यक्ति उससे अपनी इच्छा अनुसार काम लेता है।
साधना के लिए प्रवृत्त हुए थे। स्वयं गाँधी जी ने कई अवसरों पर यह बात कही है। मोक्ष एकाध जन्म में सिद्ध होने वाला लक्ष्य नहीं है। उसके लिए कई जन्मों की साधना चाहिए।
साधना में आता है। सत्य की साधना में इस अभ्यास को सम्मिलित करने का अर्थ हैं, आँतरिक सुदृढ़ता का विकास। मानसिक दृष्टि से बली हुए बिना सत्य के तेज को धारण नहीं किया जा सकता। क्रोध आने पर चुप रह जाने का नियम मानसिक शक्ति को इस तरह ढालता है कि वह अप्रिय स्थितियों को झेल सके।
साधना का शुभारंभ है। इस अभ्यास को ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ हटने और अच्छी तरह समझ-सीख लेने के बाद आगे बढ़ने की तरह महत्व दिया जाना चाहिए। ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ नहीं सीखेंगे, तो अगले कोई पाठ नहीं पढ़े जा सकेंगे, ‘आत्मप्रशंसा’ और ‘परनिंदा’ से नहीं बचेंगे तो सत्य के अगले चरणों में भी प्रवेश संभव नहीं होगा।
साधना चलती है, तो उससे बिखराव वाली अस्तव्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है। प्रस्तुत युगसंधि महापुरश्चरण को उसी स्तर का, जिसमें देवताओं की बिखरी शक्ति से प्रजापति द्वारा महाकाली का सृजन किया गया था, एक सामयिक प्रयोग समझा जा सकता है।” (पृष्ठ 25)
साधना का अगला चरण इसी को मानकर अविरल शाँति पाई। मुनि कह उठे, “मुझे मालूम होता कि परमात्मा दीन-दुखियों की सेवा का प्यासा है, तो क्यों इतना समय व्यर्थ जाता।”
साधना में गहराई थी। कर्म उसने पूजा मानकर किया, जो उसे पूर्णता की ओर ले गया। सफाई करते-करते जब लक्ष्य प्राप्ति रसिक भंगी को हो सकती है, रैदास को जूता गाँठते-गाँठते हो सकती है, सिखों के गुरु अर्जुन देव जी को बरतन माँजते हुए हो सकती है, तो हम सभी को हो सकती है, यदि हम उसे श्रेष्ठतम कर्म मानकर चलेंगे, गुरु का दिया दायित्व मानकर निभाएँगे।
साधना में भीड़ की वजह से व्यवधान पड़ने लगा था। अतः वे नीचे गुफा छोड़कर पहाड़ के और ऊपर वाली गुफा में चले गए। अपने दोनों शिष्यों को उन्होंने पुराने वाले स्थान पर ही रहने दिया। अब दर्शनार्थियों की भीड़ को बाबा तक नहीं पहुँचने दिया जाता था। उनके दोनों शिष्य ही उन्हें आशीर्वाद देकर वापस लौटा देते थे।
साधना में लगे श्रद्धावान् मनुष्य को ही प्राप्त होता है।
साधना में जिन यम-नियमों का उल्लेख किया गया है, उनमें सत्य का स्थान दूसरे क्रम पर आता है। प्रचलित व्याख्या में सत्य का स्थान दूसरे क्रम पर आता है। प्रचलित व्याख्या में सत्य का अर्थ जैसा अनुभव किया गया हो, वैसा ही व्यक्त करना है। यह अर्थ साधन-क्षेत्र में कम ही सहायक सिद्ध होता है। मन गलत भी तो अनुभव कर सकता है, वह भ्रमित भी हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-November
साधना से प्रसन्न होकर ही आदिशक्ति गायत्री मानवी चेतना में अवतरित होने के लिए संकल्पित हुईं। गुरुदेव कहा करते थे, मनुष्य के जन्म एवं मृत्यु दोनों ही उल्लास भरे त्योहार है।, उस उसे जीना आना चाहिए। उनकी यह उक्ति उन पर खरी प्रमाणित हुई। वसंत पंचमी से जिन जीवन की उन्होंने उल्लासमय शुरुआत की थी, वह उल्लासपूर्ण ढंग से गायत्री में विलीन हो गया।
साधना का समावेश हो, तो फिर ब्राह्मणत्व पनपता है। अपनी बातें कहते-कहते वे एकदम जोश में आ जाते, देखना मैं एक दिन सच्चा ब्राह्मण बनूँगा। उनके बाल मित्रों को ये बातें प्रायः समझ में न आतीं और उन्हें समझाने लगते, तुम तो ब्राह्मण हो ही, अब और क्या ब्राह्मण बनोगे।
साधनाक्रम के मध्य में ही एक दिन उन्हीं की भाषा में, “हमारे हृदय का बेतार का तार बज उठा।” इस एक वाक्य में इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उनकी चेतना हिमालय के स्वरों को साफ−तौर पर सुनने-समझने लगी थी। उनके मार्गदर्शन ने उन्हें बतलाया कि ऋषि सत्ताओं की निवास-स्थली हिमालय का यह दिव्य क्षेत्र सब तरह से गुह्य और अलौकिक है सामान्य मानव मो क्या, अति श्रेष्ठ एवं समर्थ साधक भी यहाँ तक नहीं पहुँच सकते। यह दिव्य स्वरूप मात्र पर्वत शिखरों की सौंदर्य गाथा तक सीमित नहीं हैं पर्वत-शिखरों की ऊंचाइयों को तो हर साल सैकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक सैलानी छूते रहते है। समाचार पत्रों में, विभिन्न पत्रिकाओं में उनकी कथा-गाथा छपती रहती है पर यह सब हिमालय का भौतिक सौंदर्य है।
साधनाओं के विविध रूप वेद-शास्त्रों पर ही निर्भर है। वेद-शास्त्र अर्थात् ऋषिप्रणीत और प्रमाणित प्रज्ञा दृष्टि। बीस हजार मंत्रों में फैली हुई वैदिक संहिता उस प्रज्ञा का स्थूल प्रतीक है। जब तक वह अंतश्चेतना में उद्भूत नहीं होती, तब तक वेद-शास्त्रों से ही प्रमाण लेने होते है। अध्यात्म विद्या या दर्शन शास्त्र की दो विपरीत धाराएँ भी वेदों से ही पुष्टि ओर समर्थन लेती है।
साधना और उसकी परिणति-खंड 1 व 2’। उनमें उन्होंने लिखा है कि उनकी साधना की जो मूल धुरी रही है वह है अंतः करण में प्रेमतत्व का अभिवर्द्धन। यह प्रेम उन्होंने परमात्मा से किया गुरुसत्ता से किया तथा उसकी तीसरी धारा परिवार क्षेत्र में प्रवाहित की। यह परिवार उनका अपना गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार था। वे लिखते थे, “ हमारी उपासना पद्धति के अंतराल में सन्निहित यह प्रेम-साधना ही थी जो सामान्य को असामान्य में, तुच्छता को महानता में परिणत करने का चमत्कार दिखा सकी।
साधना सत्रों में एक सामान्य विधान का पालन कराने के अलावा गुरुदेव ने संचित संस्कारों के निष्कासन-मार्जन की भी विधि-व्यवस्था की। साधकों से वे निजी तौर पर मिलते और सान्निध्य, बोध, अनुभूति मार्जन आदि की प्रक्रिया जब तक गति नहीं पकड़ लेती, उनसे वार्तालाप करते। यों उनकी दृष्टि ही इतनी समर्थ थी कि साधकों का अंतस् जानने के लिए इन उपायों की आवश्यकता नहीं थी लेकिन जिसका मार्जन-प्रक्षालन किया जा रहा है उसे भी बोध रहना चाहिए।
साधना की दिशा धर्म कलेवर की पृष्ठभूमि बनाकर ज्ञानयज्ञ की ज्योतिर्मय प्रखरता उत्पन्न करना ही हो सकती है। (पृष्ठ 20)।
साधना प्रधान एक या दो विशेषाँक होंगे। जनरुचि के सामान्य ज्ञान के विषय अधिक होंगे टाइप ऐसा होगा कि हर वय के व्यक्ति को पढ़ने में आसानी हों हर लेख के साथ चित्र भी हो, यह प्रयास किया जा रहा हैं रंगीन पृष्ठ चार प्रत्येक पत्रिका में होंगे सतयुगी संभावनाओं से भरे तथा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद प्रधान लोक-शिक्षण के ज्ञान-क्राँति लाने वाले लेखों की भरमार होगी।
साधनाओं में लीन रहे। अध्यात्म के विविध आयाम उनके जीवन में प्रत्यक्ष और प्रकट हुए। इनमें से बहुत कुछ ऐसा था, जिसे अध्यात्म के इतिहास में पहली बार सुना एवं जाना गया। विश्व राष्ट्र की कुँडलिनी का जागरण एवं ब्रह्माँड आनंदमय कोश का जागरण ऐसे ही तथ्य है।
साधना से जुड़ाव हुआ, देवत्व की ओर जीवन की प्रवृत्तियाँ मुड़ी। जीवन में लौकिक तो पाया ही, अलौकिक भी कुछ ऐसा मिला जिसे बता पाने में मेरे शब्द असमर्थ हैं।”
साधना, अपने गुरु के प्रति गहन श्रद्धा-भक्ति, तप के विलक्षण प्रयोग, इन सबने मिलकर न केवल उनके लिए चेतना जगत् के सभी द्वारा खोले, बल्कि गायत्री का तत्त्वबोध भी प्रदान किया। उनके अनुभव में आ गया कि गायत्री समस्त वेदज्ञान का सार हैं इसके प्रयोग से मानव प्रकृति का समग्र परिशोधन-परिमार्जन सम्भव एवं सुगम है। मनुष्य के आचार-विचार ही नहीं, संस्कार भी गायत्री साधना से परिवर्तित-रूपांतरित होते हैं। अन्य साधना-पद्धतियाँ, अन्य मंत्र लाभप्रद हैं, परन्तु ये लाभ तात्कालिक हैं, सामयिक हैं। इनसे चेतना आंशिक रूप से ही प्रभावित होती है, जबकि गायत्री महामन्त्र का प्रभाव शाश्वत एवं समग्र है।
साधना को गति दी अपना आपा और बड़ा कर लिया, इसीलिए वे फरवरी 19 की अपनों से अपनी बात में लिखते है “प्यार-प्यार यही हमारा मंत्र है। आत्मीयता, ममता, स्नेह और श्रद्धा यही हमारी उपासना है।”
साधना के दौरान संपन्न किया। उन दिनों के एक प्रत्यक्षदर्शी श्री दिगंबर दत्त थपलियाल अभी कुछ दिनों पूर्व शाँतिकुँज आए। उन्होंने अपनी लगभग चालीस वर्ष पुरानी यादों में विभोर होते हुए बताया कि किस तरह परमपूज्य गुरुदेव एक गुफा में साधनारत रहकर उपनिषदों का भाष्य किया करते थे। अनवरत ध्यान और समाधि में निमग्नता, अवकाश मिलने पर उपनिषदों का भाष्य लेखन। ऐसा था तत्त्ववेत्ता का तत्त्वदर्शन लेखन।
साधनाओं का उन्मेष तो किया ही, त्वरित विकास करने वाली विद्याओं का भी विवेचन किया। वह विवेचन फलश्रुति बताने वाला नहीं युक्ति तर्क और विज्ञान के आधार पर इन विद्याओं के रहस्य उद्घाटित करने वाला था। गायत्री की साधनाएँ सौम्य सत्व प्रधान होती है। वे दक्षिणमार्गी श्रेणी में आती है। गुरुदेव ने इस पक्ष के साथ तंत्र, योग, और दिव्य पक्ष को भी उद्घाटित किया।
साधनाओं के माध्यम से जीवन एवं अस्तित्व के विविध आयामों की खोज की। जीवन के सदुपयोग एवं सम्भावनाओं के मार्ग ढूँढ़े और सबका सार-निष्कर्ष बताते हुए कहा, “मनुष्य देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते” अर्थात् मनुष्य की देह क्षुद्र कामों के लिए नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि जब क्षुद्र कामों और कामनाओं के पीछे भागते हैं, तो दुःख हमें लपेट लेता है, अवसाद हमें घेर लेता है, संताप का कुहासा हमारे समूचे जीवन पर छा जाता है।
साधना-तपस्या से। दूसरे बाहरी परिवेश से। पहले से वह अपने को माँजता तराशता रहा है तो दूसरे से उसे इस कार्य में सहायता मिलती है। निजी प्रयत्नों से व्यक्ति जितना ऊपर उठ सकता है बाहरी वातावरण यदि अनुकूल हो, तो चेतना निजी प्रयत्नों की तुलना में हजार गुना ऊँची उठ सकती है। परमपूज्य गुरुदेव ने निजी प्रयत्नों का साधना-उपासना का व्यावहारिक स्वरूप बताने के साथ साधकों के लिए बाहरी वातावरण बनाने पर भी ध्यान दिया तीर्थों के विकास शक्तिपीठ प्रज्ञापीठ, चरणपीठ आदि स्थापनाओं को इन्हीं प्रयत्नों के रूप में देखा जा सकता है।
साधना उपक्रम के लिए है। जब प्रयोजन विशेष हो, तब आयोजन भी विशिष्ट होना चाहिए। इसीलिए अखंड दीप अनिवार्य है। इस दीप से उठने वाली ज्योति सात्विकता एवं निष्कामता की ही प्रभा बिखेरे, इसलिए इसमें घृत गौ का ही होना चाहिए, क्योंकि समूची धरती पर गौ ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो पूर्णतः सात्विक है। प्राचीनकाल में ऋषि-महर्षियों द्वारा गौ-पालन में सात्विकता की शुभेच्छा ही निहित थी।
साधना की दो मंजिले पूरी हो चुकी, ‘मातृवत् परदारेषु’ ‘ परद्रव्येषु लोष्ठवत्।’ माता के समान हर परनारी को तथा दूसरे के द्रव्य को अकिंचन-गौण मानकर जीवन-संग्राम में वासना, तृष्णा से मोरचा लेना। अब साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते है वह है ‘6 आत्मवत् सर्वभूतेषु।” मातृवत् परदारेषु परद्रव्येकषु लोष्ठवत् की साधना विवेक के सहारे सध गई। तीसरी साधना थी अपने समान सबको देखना।
साधना पंचकोशों के अनावरण की है जिसकी थोड़ी-सा शिक्षण अखण्ड ज्योति के माध्यम से कर चुके हैं अभी इस विद्या को साँगोपाँग बताया जाना शेष है। उसी प्रकार तंत्रमार्ग की गायत्री कुँडलिनी कहलाती है। उसकी छिटपुट चर्चा इन दिनों हम कर रहे हैं। अगले दिनों नैष्ठिक साधकों को योगमार्ग की पंचकोशों के अनावरण की साधना और तंत्रमार्ग की कुँडलिनी जागरण की शिक्षा अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही मिलेगी। अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया गया यह शिक्षण सर्वथा होगा और उससे अनेक निष्ठावान् भारी लाभ उठा सकेंगे।
साधना की परमावस्था में निमग्न साधक स्वयं में स्वयं को अनुभव कर रहा था। उसने स्वयं को श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप में देखा। कामारपुकुर से लेकर दक्षिणेश्वर के गंगातट तक के अनगिन दृश्य उनकी अंतर्लीन चेतना में मुखर हो उठे। माता-पिता, बन्धु-सखा, अनन्य सहयोगिनी-सहधर्मिणी या यों कहें कि स्वयं की चेतना का अर्द्धांश सभी का परिचय यहाँ मिला। बड़ा ही सुस्पष्ट एवं घनिष्ठ परिचय था।
साधना के दो पक्ष है। (1) योग (2) तंत्र। योगमार्ग में उच्चस्तरीय साधना पंचकोशों के अनावरण की है जिसकी थोड़ी-सा शिक्षण अखण्ड ज्योति के माध्यम से कर चुके हैं अभी इस विद्या को साँगोपाँग बताया जाना शेष है। उसी प्रकार तंत्रमार्ग की गायत्री कुँडलिनी कहलाती है। उसकी छिटपुट चर्चा इन दिनों हम कर रहे हैं।
साधना को जन-जन के जीवन का एक अंग बना दिया। उन्होंने एक ही बात कहीं, “तुम मुझे अपनी क्षुद्रता, संकीर्णता दे दो, मैं तुम्हें महानता से लाद दूँगा।” यही होता चला गया। आज भारत व विश्वभर के सौ से अधिक राष्ट्रों में यदि नवजागरण का अलख गूँज रहा है, साँस्कृतिक मूल्यों के प्रति जन-जन के मन में अनुराग बढ़ रहा है तो उसका पूरा श्रेय उन आदर्शों को जाता है, जो पूज्यवर स्थापित कर गए।
साधनाकाल में सात्विकता का प्रकाश चतुर्दिक् बिखरना चाहिए। यों तो गायत्री जप स्वयं में यज्ञ है, परन्तु जप यज्ञ की यह प्रक्रिया मन-प्राण-अंतःकरण तक ही सीमित रहती है। इसका बहिरंग स्वरूप भी आवश्यक है। जपकाल में घृतदीप इसी हेतु जलाया जाता है।
साधना के रहस्यों को स्वयं ही उद्घटित करने लगीं।
साधना सूत्र भी दिया कि “सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” ये सूत्र उनके लिए हैं, जो उनके हैं और उनके होना चाहते हैं। गीता के साथ गंगा एवं गौ में निहित संस्कृति तत्त्व उनके जीवन में सहल परिव्याप्त थे, हालाँकि उनका जीवन ऊपर से दिखने में सामान्य गृहस्थ का था, जिसे उन्होंने तपोवन बना लिया था।
साधनाओं की सफलता भावना निर्भर है। श्रद्धा-विश्वास के अनुपात से ही उनके परिणाम सामने आते हैं। तंत्र प्रक्रिया है विज्ञान है आपकी श्रद्धा हो या न हो परिणाम होगे ही आग को छुएँगे तो जलन होगी ही, श्रद्धाभाव हो या न हो बिजली, मशीन, हथियार आदि के प्रति किसी भी तरह की भावनाएँ रखी जाएँ सावधानी से प्रयोग करें, तो उपयुक्त परिणाम आएँगे। और असावधानी-लापरवाही बरतेंगे तो हानि उठानी ही पड़ेगी।
साधना के समन्वय से मानव के जीवन के उत्तरार्द्ध का कैसे श्रेष्ठतम उपयोग किया जा सकता है, कैसे उसका नियोजन परमार्थ प्रधान प्रवृत्तियों के, राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों के विस्तार हेतु हो सकता है, इसका नमूना है गायत्री परिवार। वेद संन्यास के द्वारा, सामूहिक वानप्रस्थ दीक्षा द्वारा इस पूर्णाहुति वर्ष में इस माह के सौत्रामणी प्रयोग, पुरुषमेध महायज्ञ में उसी प्रक्रिया का पुनरावर्तन किया जा रहा है। यही परंपरा तो देवसंस्कृति के उत्कर्ष का आधार बनी है, जिसके कण-कण में उल्लास-ही-उल्लास छाया दिखाई देता हैं जीवन को जो उत्सवमय बना देती है।
साधना पर प्रकाश डालते हुए लिखा। “हमारी साधना की दो मंजिले पूरी हो चुकी, ‘मातृवत् परदारेषु’ ‘ परद्रव्येषु लोष्ठवत्।’ माता के समान हर परनारी को तथा दूसरे के द्रव्य को अकिंचन-गौण मानकर जीवन-संग्राम में वासना, तृष्णा से मोरचा लेना। अब साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते है वह है ‘6 आत्मवत् सर्वभूतेषु।” मातृवत् परदारेषु परद्रव्येकषु लोष्ठवत् की साधना विवेक के सहारे सध गई।
साधना के कुछ ही वर्षों बाद साधक श्रीराम के चैतन्य में सर्वमयता स्थिर हो गई। जो बाहर हो रहा था, वह भीतर होता हुआ प्रतीत होने लगा। अहम् और इदम् के मध्य जो आच्छादन था, दूर हो गया। साधक के कण-प्रतिकण में, अणु-परमाणु में जो अव्यक्त नाद है, वह सुनाई पड़ने लगा। कभी तो भेरी बजती, कभी मृदंग, कभी वीणा, कभी शंख ध्वनि होती और कभी सब मिलकर एक आलौकिक संगीत की सृष्टि करते।
साधना के लिए इन दिनों हमें एक ही केंद्र पर केंद्रित होना है। वह है, ज्ञानपज्ञ, ज्ञानयज्ञ। विचारक्राँति, विचारक्राँति, विचारक्राँति। चूँकि अपना कार्य भावनाओं के परिष्कार से संबंध रखता है, इसलिए उसके साथ आध्यात्मिक पृष्ठभूमि अनिवार्य है।.........वानप्रस्थों की सेवा-साधना की दिशा धर्म कलेवर की पृष्ठभूमि बनाकर ज्ञानयज्ञ की ज्योतिर्मय प्रखरता उत्पन्न करना ही हो सकती है।
साधना से उद्धृत है। उन्हें पढ़ने वाला या सुनने वाला इस अनोखेपन का अहसास पाए बिना नहीं रहता।
साधना के द्वारा उसी के संचालक बने, फिर भी उनका क्रोध गया नहीं।
साधना-सामर्थ्य से अपने अंतराल में देवत्व का अकूत एवं अक्षय भंडार जुटाया था, जिसे वह सतत् अपने संपर्क में आने वाले स्वजनों परिजनों में वितरित करते रहते थे। यद्यपि सामान्यक्रम में उनके पास लोग जीवन की कष्ट कठिनाइयों का समाधान पाने के लिए जुटते थे। यह समाधान तो उन्हें मिलता ही था, पर साथ में उन्हें देवत्व का अनुदान भी मिलता था। उनके मनों में कुछ अच्छा करने के लिए नई उमंग भी जगती थी। ऐसे लोगों के अगणित घटना-प्रसंग संस्कृति पुरुष गुरुदेव की जीवनगाथा में सिमटे-सँजोए हैं।
साधनारत रहकर उपनिषदों का भाष्य किया करते थे। अनवरत ध्यान और समाधि में निमग्नता, अवकाश मिलने पर उपनिषदों का भाष्य लेखन। ऐसा था तत्त्ववेत्ता का तत्त्वदर्शन लेखन।
साधना चौबीस वर्षों में की जानी थी। इस साधना में अखंड घृतदीप के सामने छह घंटे नियमित जप करते हुए मात्र जौ की रोटी एवं छाछ पर निर्वाह करना था। इंद्रिय-संयम, विचार-संयम, समय-संयम एवं अर्थ-संयम इसके ऐसे व्रतबंध थे, जिन्हें पूरा करने के लिए साधक प्रवर श्रीराम की चेतना पहले से ही निष्णात हो चुकी थी।
साधना की प्रभा फिर से फैली। वेदों की सार, साधना-शक्ति के रूप में गायत्री का फिर से अवतरण हुआ। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के रूप में संस्कृति के पुण्य प्रवाह में फिर से पावनता आई। उसमें आया ठहराव फिर से तीव्रगामी हुआ। सच ही है कि ऋषियों की वाणी को कोई ऋषि ही उद्भासित कर सकता है और ऋषि तो वही है, जिसने अपने भीतर विद्यमान परात्पर को जान लिया, अंतस् की भगवत्ता का बोध पा लिया।
साधनात्मक पुरुषार्थ की महापूर्णाहुति इस वर्ष सम्पन्न हो रही है। परमपूज्य गुरुदेव ने भारतीय संस्कृति के खोए आदर्शों को, जीवन-मूल्यों को पुनः स्थापित किया। जीवन साधना को जन-जन के जीवन का एक अंग बना दिया। उन्होंने एक ही बात कहीं, “तुम मुझे अपनी क्षुद्रता, संकीर्णता दे दो, मैं तुम्हें महानता से लाद दूँगा।” यही होता चला गया।
साधना में बैठते, तो उनके सहस्र चक्र में कण-कोशिकाएं और कोष्ठक विद्युत की सतत् गति से इंद्रियातीत अनुभवों, दृश्यों की सृष्टि करते और भूत एवं भविष्य को दर्पण में प्रतिबिंबित प्रस्तुत करते रहते। उनके हृदय पुँडरीक के कुछ ऊपर स्थित सौषुम्न ज्योति स्वयमेव प्रकाशित होती रहती। उनको समूचा ब्रह्माण्ड अपने भीतर विद्युत् बिन्दु और अनाहत नादबिंदु के रूप में अनुभूत होता और वह इस महादृश्य में निमग्न हो जाते। आदिमाता गायत्री के प्रभाव से उनको समग्रता और अद्वैतता स्थायी रूप से प्राप्त हो गई। वह खंड बोध से ऊपर उठकर अखंड ज्ञान में पहुँच गए।
साधना का पूर्णाहुति समारोह था। इससे जो संगतिकरण उभरा, उसी से गायत्री परिवार का संघबद्ध स्वरूप उजागर हुआ।
साधनाएँ तथा गायत्री मंत्र का लघु अनुष्ठान जुड़ा रहता था वर्ष भर में ऐसा छत्तीस प्रत्येक माह में तीन सत्र आयोजित होते रहे हैं। 1972 से 1990-94 तक पूज्यवर एवं शक्तिस्वरूपा माताजी का सान्निध्य यहाँ आने वालों के लिए स्वयं एक तीर्थ का अनुभव था। शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित एवं विख्यात हो चला था एवं 1970 तक उसने यह मान्यता प्राप्त कर ली थी सन् 1979 की वसंत पंचमी पर परमपूज्य गुरुदेव ने घोषणा की कि भारतभर में चौबीस गायत्री तीर्थों की स्थापना की जाएगी। ये स्थापनाएँ परंपरा से चले आ रहे शक्तिपीठों से अलग और विशिष्ट स्तर की निर्धारित हुई थी बहुतों के मन में यह प्रश्न उठा कि देश में पहले ही सैकड़ों तीर्थ, हजारों-लाखों मंदिर विद्यमान है फिर इन नए संस्थानों के निर्माण का क्या औचित्य ?
साधना से उठी ऊर्जा को राष्ट्रोत्थान और जनकल्याण के लिए गायत्री परिवार ने जिन आँदोलनों का सूत्रपात किया है, वे बहुत ही महत्वपूर्ण है।” परिवार के सात रचनात्मक आँदोलन है, साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण, नारी जागरण, व्यसन एवं कुरीति निवारण। मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने भी शाँतिकुँज के समाज एवं युगपरिवर्तन के लिए किए जा रहे आध्यात्मिक प्रयासों की सराहना की। दैनिक जागरण के संपादक एवं मनीषी नरेन्द्र मोहन देवत्व का प्रत्यक्ष अवतरण होते देख भावविभोर थे और परमपूज्य गुरुदेव के स्वप्न को साकार होते देख रहे थे। वस्तुतः विभूतियों को राष्ट्र, समाज हित एवं नवसृजन के लिए नियोजित करने की दिशा में यह अभूतपूर्व आयोजन था।
साधना के इस सतत् क्रम में साधक श्रीराम को वितर्क, विचार,अस्मिता और आनन्द में संप्रज्ञात समाधि लगने लगी। वह जब तक चाहते, प्रकाशमय शून्य में दिव्य पक्षी की तरह भ्रमण करते पक्षी की तरह भ्रमण करते रहते। वृत्ति निरोध से उनके द्वंद्व दग्ध होते गए। अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश ही नहीं स्मृति, ग्लानि, शोक, भय, जुगुप्सा, लज्जा, गर्व, क्रोध आदि तैंतीस संचारी और आठ स्थायी भावादि से भी चित्त मुक्त हो गया। उनमें चेतना सर्वदा प्रशांत शारदीय गंगाधारा-सी बहने लगी।
साधनाओं के विज्ञान पक्ष की चर्चा में यह कहना जरूरी होगा कि सन् 1969 से ही गुरुदेव ने धर्म और अध्यात्म का प्रतिपादन विज्ञान के आधार पर करना शुरू किया। जाने बिनु होई न परतीती जाने बिना विषय का ज्ञान नहीं हुआ ओर जानकारी के अभाव में उस मार्ग पर चलने का उत्साह नहीं उमड़ता। इच्छा भी नहीं होती। आज का युग तर्क, तथ्य और विज्ञान का युग है। लोग वहीं बात स्वीकार करते है जो युक्तियों और त्यों के आधार पर गले उतरती हो।
साधना ही थी जो सामान्य को असामान्य में, तुच्छता को महानता में परिणत करने का चमत्कार दिखा सकी।” (अखण्ड ज्योति अप्रैल 1969)। वे इसी लेखमाला में लिखते है “ईश्वर भक्ति का अभ्यास हमने गुरुभक्ति की प्रयोगशाला में, व्यायामशाला में आरंभ किया और क्रमिक विकास करते हुए प्रभु-प्रेम के दंगल में जा पहुँचे।
साधनाजन्य अनुभूति इन्हें यहाँ ले आई थी। इन्होंने परमपूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी का भगवान् शिव एवं आदिमाता पार्वती के रूप में साक्षात्कार किया था। पं. मदनमोहन मिश्र अपनी तप-शक्ति व योग-सामर्थ्य से कठिन-से-कठिन लौकिक कार्यों को तुरत-फुरत कर देते थे। जब उनसे पूछा गया कि ऐसी अतुलनीय सामर्थ्य के स्वामी होते हुए वह यहाँ क्यों आए हैं, तब उन्होंने अपनी अनुभूति का भेद खोला। उन्होंने थोड़ा दुखी होते हुए कहा, लगता है मेरी तप-साधना में कुछ न्यूनता है, तभी तो गुरुदेव ने अपना रहस्य जीते-जी मेरे ऊपर प्रकट नहीं होने दिया।
साधना आदि में भाग लेने वाले साधकों के लिए भोजन निर्माण की व्यवस्था में भी गंगाजल का प्रयोग करवाया, जिसके तद्नुरूप परिणाम भी सामने आए। वह कहा करते थे, गंगा जल की महिमा जितनी वैज्ञानिक है, उससे अनगिन अनन्त गुना साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक है। यदि परिस्थितिवश किसी के लिए गंगा स्नान एवं गंगाजल पान सम्भव न हो, तो मानसिक एवं भावनात्मक रूप से गंगा स्नान एवं गंगाजल पान करना चाहिए। गंगा, गायत्री का ही रूप है। तभी तो शायद गंगा दशहरा एवं गायत्री जयन्ती के रूप में दोनों की अवतरण तिथि एक है।
साधना का विज्ञान-विधान बतलाया, उसके अनुसार तो ये तीनों ही प्रतीक उनकी साधना का अभिन्न अंग बन गए। उन्होंने गौ, गंगा, गीता को गायत्री से अभिन्न जाना और अनुभव किया।
साधनाओं में ये विलक्षणताएँ नहीं दिखाई देती। वाममार्गी अथवा तंत्र ओर योग की उच्च कक्षाओं में पहुँचने पर वैसे प्रभाव दिखाई देते हैं।
साधना सत्र में विधि साधनाएँ तथा गायत्री मंत्र का लघु अनुष्ठान जुड़ा रहता था वर्ष भर में ऐसा छत्तीस प्रत्येक माह में तीन सत्र आयोजित होते रहे हैं। 1972 से 1990-94 तक पूज्यवर एवं शक्तिस्वरूपा माताजी का सान्निध्य यहाँ आने वालों के लिए स्वयं एक तीर्थ का अनुभव था। शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित एवं विख्यात हो चला था एवं 1970 तक उसने यह मान्यता प्राप्त कर ली थी सन् 1979 की वसंत पंचमी पर परमपूज्य गुरुदेव ने घोषणा की कि भारतभर में चौबीस गायत्री तीर्थों की स्थापना की जाएगी। ये स्थापनाएँ परंपरा से चले आ रहे शक्तिपीठों से अलग और विशिष्ट स्तर की निर्धारित हुई थी बहुतों के मन में यह प्रश्न उठा कि देश में पहले ही सैकड़ों तीर्थ, हजारों-लाखों मंदिर विद्यमान है फिर इन नए संस्थानों के निर्माण का क्या औचित्य ?
साधनात्मक प्रवृत्तियाँ भी इन क्षेत्रों को जीवंत ऊर्जा केंद्र बनाने के लिए पर्याप्त थी। फिर भी उन्होंने स्थानों का चुनाव करते समय पूर्व पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा। मथुरा में जिस जगह गायत्री तपोभूमि स्थित है वहाँ के बारे में पूज्यवर यह जानते थे कि अति प्राचीनकाल में महर्षि दुर्वासा ने यहाँ तप किया था। आज भी दुर्वासा को मेला वहाँ से थोड़ी दूर यमुना नदी के किनारे लगता है। शाँतिकुँज के संबंध में पूज्यवर का मत है कि गायत्री मंत्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र ने यहीं तप किया था।
साधना के प्रारंभिक काल से ही गायत्रीयम होने के साथ गीतामय भी हो गए थे। कर्म, भक्ति एवं ज्ञान के रूप में गीता की यह त्रिवेणी उनके अंतरंग एवं बहिरंग जीवन में शाश्वत एवं सतत् प्रवाहित थी। वह मानव-जीवन में इन तीनों के प्रवाह को सतत् एक साथ महत्त्व देते थे। उन्हीं के शब्दों में कहें, तो भक्ति एवं ज्ञान से विमुख कर्म केवल महत्त्वाकाँक्षा की पूर्ति का साधन व जीवन में भटकन का पर्याय बनकर रह जाता है। इसी तरह कर्म एवं ज्ञान से विमुख भक्ति कोरी भावुकता बन जाती है और यदि ज्ञान, कर्म एवं भक्ति से विमुख हो, तो कोरी विचार तरंगें ही पल्ले पड़ती हैं, जो मात्र दिवास्वप्नों की सृष्टि करती रहती हैं।
साधना में प्रवृत्त होना पड़ेगा। उसी के सत्परिणामस्वरूप तुम्हें गायत्री का देवसंस्कृति की आदिमता के रूप में साक्षात्कार हो सकेगा। शिष्य एवं गुरु के इस अंतरंग संवाद में गायत्री साधना का विज्ञान-विधान प्रकट होने लगा।
साधना जगत् के निर्मित नियोजित होती है स्वामी विवेकानन्द के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण घटना यहाँ उल्लेखनीय है। फिजी के पास प्रशाँत महासागर के एक द्वीप में हुए ज्वालामुखी विस्फोट एवं उससे फैले विषाक्त धुएँ से हजारों नागरिकों की पीड़ा उनकी दैनंदिन साधना में व्यवधान डाल उनके लिए प्रार्थना करने हेतु उन्हें विवश कर देती घटना की जानकारी जनमानस को बाद में होती है किंतु विश्वात्मा के एक घटक होने के नाते वे उसे पहले ही अनुभव कर अपने एक सेवक-शिष्य के समक्ष अपनी मनोव्यथा बेचैनी का बखान कर देते हैं। परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के अनेक घटनाक्रमों में विश्व-वसुधा की कष्ट भरी घड़ियों में उनकी सहभागिता व उनकी उस अवधि में विशिष्ट साधना के ढेरों प्रमाण देखने को मिलते हैं।
साधना, महर्षि पतंजलि की योगविद्या, वेदव्यास का लेखन, भगवान् परशुराम का विचारक्राँति अभियान, याज्ञवल्क्य का यज्ञ विधान, देवर्षि नारद का संगीत, महर्षि चरक का आयुर्वेद आदि सभी ऋषि-परंपराओं को नवजीवन देना शुरू किया।
साधना ने भी अखंड एवं अविराम गति पकड़ ली और इसके परिणामस्वरूप अंतर्यात्रा भी अविराम हो चली। इसमें आने वाले विविध पड़ाव, विभिन्न अनुभूतियाँ गायत्री साधना के रहस्यों को स्वयं ही उद्घटित करने लगीं।
साधना विवेक के सहारे सध गई। तीसरी साधना थी अपने समान सबको देखना। कहने-सुनने में यह सब मामूली शब्द लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्त्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है। पर वस्तुतः उस तत्त्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्मसत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है (अखण्ड ज्योति फरवरी 1971)।
साधना एवं अथक पुरुषार्थ की फलश्रुति, यह तूफान उठ चुका है। इसकी वृहद योजना अपने आरंभ से ही विश्व को एक नया रंग और वातावरण एक उच्चतर भावना, एक बेहतर उद्देश्य देने के लिए कटिबद्ध रही है। नवयुग की साँस्कृतिक चेतना के रूप में इसका पुनरोदय हो रहा है। जिसका अंतिम परिणाम होगा, विश्वराष्ट्र का नया युग। व्यवस्थाओं, प्रणालियों, नीतियों की दृष्टि से अद्भुत होने के साथ व्यक्तित्व संरचना की दृष्टि से भी यह अभूतपूर्व होगा।
साधना परिपक्व स्थिति में दिखाई दे रही है। चारों ओर उससे वातावरण में उल्लास को, शक्ति को, सृजन प्रक्रिया की गतिविधियों को सक्रिय देखा जा सकता है। उस पर भी शास्त्रोक्त पुरुषमेध महायज्ञ एवं सौत्रामणी प्रयोग। ऐसा श्रौतयाग का अभिनव प्रयोग, जो अभूतपूर्व हो, विगत 2000 वर्षों में कहीं संपन्न न हुआ हो, किंतु इस विराट् अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा संपन्न किया जा रहा हो, उस विराट् पुरुष के जागरण हेतु, जो नवयुग लाने को संकल्पित है।
साधना ये तीनों मिलकर धर्म को उसका समग्र स्वरूप प्रदान करते हैं।
साधना में सर्वत्र अणु-परमाणुओं के विद्युत् कणों के नृत्य-घूर्णन होते दिखाई देते। उनके सतत् वेधन, ध्वंस और नए-नए समुच्चयों से अनन्त पदार्थों की सृष्टि, विकास और समाप्ति के सिलसिले अंतःकरण में प्रतिबिंबित होने लगे। जपकाल में साधक के पिंड में अस्यकाँत मणियाँ सक्रिय हो गईं.......। गुरुत्वाकर्षण पहले भी था, चुम्बक सभी में होता ही है, किन्तु अब यह चुम्बक उनमें शतगुणित हो गई।
साधना आसानी से देखी-परखी जा सकती है। इसलिए तो अपनी संस्कृति ‘गुरुदेव परब्रह्म’ कहकर गुरु-चरणों में श्रद्धा से शीश नवाती है।
साधना द्वारा आत्मबलसंपन्न बनाया गया। इसके तुरंत बाद जुलाई 1873 में उन्होंने एक विशेषाँक प्रकाशित किया, जिसकी विषयवस्तु थी, ‘वानप्रस्थ परंपरा का पुनर्जीवन’। परमपूज्य गुरुदेव ने लिखा, “राष्ट्र निर्माण हेतु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है, सुयोग्य, भावनाशील, अवैतनिक और सेवा की लगन के साथ जुट पड़ने वाले कर्मठ कार्यकर्त्ताओं की। इस प्रयोजन को वानप्रस्थ परंपरा का पुनर्जागरण करके ही पूरा किया जा सकता है।” (जुलाई पृष्ठ 16)
साधना और तपश्चर्या के द्वारा ऊर्जावान बनाया गया हो जहाँ प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने तप किया हो अथवा संत-महात्माओं ने दीर्घकाल तक वास किया हो, साधना-उपासना की प्रवृत्तियाँ लंबे समय तक चलती रही हो, वहीं तर्भ-चेतना जाग्रत हो सकती है।
साधनाकाल में ही नहीं, बल्कि नित्य अखंड अविराम जो दीप जलाया जाना था, उसमें गौघृत होना अनिवार्य था। मार्गदर्शक सत्ता ने इसकी अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए बतलाया था कि साधनाकाल में सात्विकता का प्रकाश चतुर्दिक् बिखरना चाहिए। यों तो गायत्री जप स्वयं में यज्ञ है, परन्तु जप यज्ञ की यह प्रक्रिया मन-प्राण-अंतःकरण तक ही सीमित रहती है। इसका बहिरंग स्वरूप भी आवश्यक है। जपकाल में घृतदीप इसी हेतु जलाया जाता है।
साधना थी अपने समान सबको देखना। कहने-सुनने में यह सब मामूली शब्द लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्त्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है। पर वस्तुतः उस तत्त्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्मसत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है (अखण्ड ज्योति फरवरी 1971)।
साधना, योगाभ्यास के लिए भी यही आश्रम श्रेष्ठ माना जाता रहा है। दबी हुई आँतरिक प्रखरता इसी मार्ग से निखरती थी। तीसरा सोपान इस आश्रम का होता था, सेवा-साधना। जन-मानस में उत्कृष्टता बोना, उगाना और बढ़ाना। देखा जाना चाहिए कि यह ब्राह्मण वर्ग, यह वानप्रस्थ वर्ग समाज में से कैसे हटता चला गया और क्षति पहुँचाता चला गया।
साधना। जन-मानस में उत्कृष्टता बोना, उगाना और बढ़ाना। देखा जाना चाहिए कि यह ब्राह्मण वर्ग, यह वानप्रस्थ वर्ग समाज में से कैसे हटता चला गया और क्षति पहुँचाता चला गया।
साधनाओं के द्वारा प्रभु के संकल्प को मूर्त करना चाहते है। सबने अपने-अपने ढंग से इस बात का आश्वासन दिया कि जो भी हमारी परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक होगा, उसे हम अपनी तप-शक्ति का बहुमूल्य अंश प्रदान करेंगे।
साधना में अखंड घृतदीप के सामने छह घंटे नियमित जप करते हुए मात्र जौ की रोटी एवं छाछ पर निर्वाह करना था। इंद्रिय-संयम, विचार-संयम, समय-संयम एवं अर्थ-संयम इसके ऐसे व्रतबंध थे, जिन्हें पूरा करने के लिए साधक प्रवर श्रीराम की चेतना पहले से ही निष्णात हो चुकी थी।
साधना को तीव्र गति देने वाली विधाएँ रही है। अनन्य साधना को तीव्र गति देने वाली विधाएँ रही हैं अनन्य भाव से भगवद् जप, प्रभु समर्पित जीवन और संकीर्तन तपादि भी ईश्वर को प्राप्त करने के साधन हैं। जिन्हें ज्यादा झंझट करने की आदत नहीं है, जो सिर्फ आत्मिक शाँति या ईश्वर अनुभूति में ही रुचि रखते हैं उनके लिए ‘भक्ति’ सुलभ मार्ग है। वे उसी का अवलंबन लेते हैं, लेकिन जिन्हें साधना करते हुए ईश्वर का वैभव भी देखना है उसके ऐश्वर्य को भी धारण करना है ओर प्रमाणित करना है कि वे इस सृष्टि से सृजनहार से संबंध स्थापित किए हुए हैं। उनके लिए गुह्य विद्याओं का आश्रम लेना जरूरी है।
साधना भूमि यही है। मीरा यहीं विह्वल हुई थीं। भक्त रसखान तो हर जन्म में ब्रजभूमि में ही रहना चाहते थे, भले ही उन्हें पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति यहाँ तक कि पाषाण होकर ही क्यों न रहना पड़े। ब्रज की धरती का यह साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक अनूठापन निश्चित ही विधाता को भी भा गया। तभी तो नियति ने अपनी अकाट्य लिपि लिखी।
साधना-उपासना का व्यावहारिक स्वरूप बताने के साथ साधकों के लिए बाहरी वातावरण बनाने पर भी ध्यान दिया तीर्थों के विकास शक्तिपीठ प्रज्ञापीठ, चरणपीठ आदि स्थापनाओं को इन्हीं प्रयत्नों के रूप में देखा जा सकता है।
साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण, नारी जागरण, व्यसन एवं कुरीति निवारण। मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने भी शाँतिकुँज के समाज एवं युगपरिवर्तन के लिए किए जा रहे आध्यात्मिक प्रयासों की सराहना की। दैनिक जागरण के संपादक एवं मनीषी नरेन्द्र मोहन देवत्व का प्रत्यक्ष अवतरण होते देख भावविभोर थे और परमपूज्य गुरुदेव के स्वप्न को साकार होते देख रहे थे। वस्तुतः विभूतियों को राष्ट्र, समाज हित एवं नवसृजन के लिए नियोजित करने की दिशा में यह अभूतपूर्व आयोजन था। विद्यमान सभी विचारशील वर्ग एकमत था कि सामाजिक क्राँति के लिए बौद्धिक एवं नैतिक क्राँति का सबल आधार बनाया ही जाना चाहिए।
साधना का अंतिम परिणाम है। सामान्य व्यक्तियों की बात तो दूर, महामानवों में से बहुत कम ही इस अंतिम सीढ़ी पर चढ़ सकने में सफल होते है।
साधना से परिवर्तित-रूपांतरित होते हैं। अन्य साधना-पद्धतियाँ, अन्य मंत्र लाभप्रद हैं, परन्तु ये लाभ तात्कालिक हैं, सामयिक हैं। इनसे चेतना आंशिक रूप से ही प्रभावित होती है, जबकि गायत्री महामन्त्र का प्रभाव शाश्वत एवं समग्र है।
साधनात्मक प्रवृत्तियाँ भी इन क्षेत्रों को जीवंत ऊर्जा केंद्र बनाने के लिए पर्याप्त था। फिर भी उन्होंने स्थानों का चुनाव करते समय पूर्व पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा। मथुरा में जिस जगह गायत्री तपोभूमि स्थित है वहाँ के बारे में पूज्यवर यह जानते थे कि अति प्राचीनकाल में महर्षि दुर्वासा ने यहाँ तप किया था। आज भी दुर्वासा का मेला वहाँ से थोड़ी दूर यमुना नदी के किनारे लगता है। शाँतिकुँज के संबंध में पूज्यवर का मत है कि गायत्री मंत्र के द्रष्टा महर्षि विश्वामित्र ने यहीं तप किया था।
साधनाओं का साक्षी।
साधना एवं दीपयज्ञ आयोजन के रूप में 3 दिसंबर 11 को सारे भारत में एक साथ, एक ही समय संपन्न हुआ। भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ जुड़कर यह जनचेतना जागरण के रूप में रहा। पूरे भारत एवं विश्व में सभी धर्म संप्रदायों एवं पारमार्थिक संगठनों की इसमें भरपूर भागीदारी रही। शारीरिक विकलाँगता के साथ इससे कहीं अधिक भयंकर तनाव, मनोरोगजन्य मानसिक विकलाँगता से भी मुक्ति एवं सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के साथ यह कार्यक्रम एक लाख स्थानों पर लगभग एक करोड़ व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न किया गया। इस सामूहिक आध्यात्मिक प्रयोग से सूक्ष्म जगत् में जो जबरदस्त स्फोट हुआ है, वह निश्चित रूप से सबके उज्ज्वल भविष्य की दिशा में एक ठोस कदम रहा है।
साधना करने वालों में आरंभ में ईश्वरीय आभा भले न दिखाई देती हो, लेकिन कतिपय अलौकिक शक्तियाँ उनमें अवश्य आ जाती है। दिव्य शक्तियों से संपन्न होने का दावा कर लोगों को ठगने वाले धूर्तों की बात नहीं की जा रही। जो सचमुच निष्ठा ओर तन्मयता से तंत्र-मंत्र की उपासना करते है उनकी आत्मिक शक्ति प्रबल होने लगती है। बड़े प्रयोजन सिद्ध होने लायक सामर्थ्य आरंभ में नहीं दिखाई देती, लेकिन वाणी में तेज, कही हुई बातें सच होने और आशीर्वाद-अभिशाप जैसी भावनाएँ चरितार्थ होने लगती है। दक्षिणमार्गी साधनाओं में ये विलक्षणताएँ नहीं दिखाई देती।
साधना और तंत्रमार्ग की कुँडलिनी जागरण की शिक्षा अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही मिलेगी। अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया गया यह शिक्षण सर्वथा होगा और उससे अनेक निष्ठावान् भारी लाभ उठा सकेंगे।
साधना कर तंत्र की उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त करने वालों की संख्या हजारों में होगी। उन सिद्ध-साधकों की निजी अनुभूतियाँ साधना के विज्ञान पक्ष को प्रमाणित करने के लिए उद्धृत नहीं की जा सकती। गुरुदेव के अनुदान-प्रेरणाओं और परिणामों की चर्चा ही यहाँ अभीष्ट है।
साधना का विज्ञान-विधान प्रकट होने लगा।
साधना के गूढ रहस्यों के उद्घाटन पर ही केंद्रित हो गया। गुरुदेव ने मथुरा से प्रयाण करने से पूर्व अपने भावी कार्यक्रमों के बारे में लिखा था। परिजनों से संवाद के रूप में अखण्ड ज्योति के स्तंभ “अपनों से अपनी बात” में उन्होंने लिखा, “गायत्री उपासना का सर्वसाधारण के लिए जितना प्रयोग सरल और उपयुक्त था, उसे हम गत कई वर्षों से सिखाते-समझाते चले आ रहे हैं। इस विद्या की उच्चस्तरीय साधना के दो पक्ष है। (1) योग (2) तंत्र।
साधना का ही परिणाम है कि भारतीय धर्म एवं संस्कृति के साथ शाश्वत-सनातन जैसे विशेषण जोड़े जाते हैं। इन्होंने ही संस्कारों की भट्टी में गलाई-ढलाई कर सामान्य मानवों को देवमानव बनाया और जिनमें पिछले जन्मों की संस्कार सम्पत्ति थी, उन्हें गढ़-सँवार कर देवदूत, युगपुरुष एवं अवतार का स्वरूप प्रदान किया। गोरखनाथ को गढ़ने में मत्स्येंद्रनाथ की ही कुशलता थी। ज्ञानेश्वर का भव्य स्वरूप सोपानदेव के हाथों निखारा गया था। भगवान् श्रीराम एवं देवकीनंदन श्रीकृष्ण की दिव्यता के पीछे महर्षि वशिष्ठ, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और गुरु संदीपनि की तप-साधना आसानी से देखी-परखी जा सकती है।
साधना-उपासना की प्रवृत्तियाँ लंबे समय तक चलती रही हो, वहीं तर्भ-चेतना जाग्रत हो सकती है।
साधनाकाल में हिमालय प्रवास में किया। उपनिषदों का भाष्य इन्हीं में से एक है। यह उन्होंने उत्तरकाशी में अपनी विशेष साधना के दौरान संपन्न किया। उन दिनों के एक प्रत्यक्षदर्शी श्री दिगंबर दत्त थपलियाल अभी कुछ दिनों पूर्व शाँतिकुँज आए। उन्होंने अपनी लगभग चालीस वर्ष पुरानी यादों में विभोर होते हुए बताया कि किस तरह परमपूज्य गुरुदेव एक गुफा में साधनारत रहकर उपनिषदों का भाष्य किया करते थे।
साधना, तप-योग एवं सेवा-साधना के समन्वय से मानव के जीवन के उत्तरार्द्ध का कैसे श्रेष्ठतम उपयोग किया जा सकता है, कैसे उसका नियोजन परमार्थ प्रधान प्रवृत्तियों के, राष्ट्र निर्माण की गतिविधियों के विस्तार हेतु हो सकता है, इसका नमूना है गायत्री परिवार। वेद संन्यास के द्वारा, सामूहिक वानप्रस्थ दीक्षा द्वारा इस पूर्णाहुति वर्ष में इस माह के सौत्रामणी प्रयोग, पुरुषमेध महायज्ञ में उसी प्रक्रिया का पुनरावर्तन किया जा रहा है। यही परंपरा तो देवसंस्कृति के उत्कर्ष का आधार बनी है, जिसके कण-कण में उल्लास-ही-उल्लास छाया दिखाई देता हैं जीवन को जो उत्सवमय बना देती है।
साधनाओं को गुह्य, गहन और गोपनीय मानने की परंपरा रही है। इसी तरह देवसंस्कृति के विविध पहलुओं को श्रद्धा एवं विश्वास के दायरे में सीमित किया जाता रहा है। गुरुदेव ने पहली बार इस क्षेत्र में तर्क, तथ्य एवं प्रमाणसम्मत प्रयोगधर्मिता की आवश्यकता समझी। उन्होंने स्पष्ट किया कि विज्ञान और अध्यात्म की समन्वित शक्ति के आविर्भाव तथा उसकी समग्र प्रगति के लिए उपयोग करने का प्रयत्न जितना ही सफल होगा, उतना ही मानवी गरिमा को सुरक्षित और देवसंस्कृति को जीवित रहने का अवसर मिलेगा।
साधना से ही सम्भव है। अभी तक तुम जो साधना कर रहे थे, वह गायत्री की सामान्य साधना थी। अब तुम्हें इसकी विशिष्ट साधना में प्रवृत्त होना पड़ेगा। उसी के सत्परिणामस्वरूप तुम्हें गायत्री का देवसंस्कृति की आदिमता के रूप में साक्षात्कार हो सकेगा। शिष्य एवं गुरु के इस अंतरंग संवाद में गायत्री साधना का विज्ञान-विधान प्रकट होने लगा।
साधना-शक्ति के रूप में गायत्री का फिर से अवतरण हुआ। परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के रूप में संस्कृति के पुण्य प्रवाह में फिर से पावनता आई। उसमें आया ठहराव फिर से तीव्रगामी हुआ। सच ही है कि ऋषियों की वाणी को कोई ऋषि ही उद्भासित कर सकता है और ऋषि तो वही है, जिसने अपने भीतर विद्यमान परात्पर को जान लिया, अंतस् की भगवत्ता का बोध पा लिया। ऋषि-ग्रंथों की भाषा में कहें, तो चारों ओर बहते, भीतर बहते ‘ऋत्’ को पहचान लिया, विराट् अस्तित्व के कण-कण को जोड़ने वाले परम विराट् अस्तित्व के कण-कण को जोड़ने वाले परम अंतर्सूत्र को खोज लिया, पा लिया।
साधना-पद्धतियाँ, अन्य मंत्र लाभप्रद हैं, परन्तु ये लाभ तात्कालिक हैं, सामयिक हैं। इनसे चेतना आंशिक रूप से ही प्रभावित होती है, जबकि गायत्री महामन्त्र का प्रभाव शाश्वत एवं समग्र है।
साधना जब तक उच्चस्तरीय लक्ष्य को केंद्रित कर संपन्न नहीं होती, उसका परिणाम सीमित ही होगा। परमपूज्य गुरुदेव ने जीन भर अगणित व्यक्तियों प्यार-ममत्व के माध्यम से जोड़ा उन्हें अपना बनाया व येन-केन प्रकारेण उन्हें श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति समर्पित हो जीना सिखा दिया। यही कारण था कि वे अपने विराट् परिवार से अंतिम समय तक भी अतिशय प्रेम करते रहे। जनवरी 1969 की अखण्ड ज्योति में जब वे मथुरा से हिमालय तप-प्रवाह हेतु विदाई की घड़ियां और हमारी व्यथा वेदना। वे लिखते हैं, कोई अपनी चमड़ी उघाड़कर भीतर का अंतरंग परखने लगे, तो उसे माँस और हड्डियों में एक तत्त्व उफनता दिखाई देगा, वह है असीम प्रेम।
साधना में कुछ न्यूनता है, तभी तो गुरुदेव ने अपना रहस्य जीते-जी मेरे ऊपर प्रकट नहीं होने दिया। अब तो मैं वंदनीया माताजी से दीक्षा लेने आया हूँ, ताकि मरने से पूर्व मेरा कल्याण हो सके।
साधना परस्पर एकाकार हो चले थे कि तभी साध्य के रूप में एक ज्योतिपुंज प्रकट हुआ। इस ज्योतिपुँज में स्वर्गीय उजास थी और इसकी शीतल प्रभा में जीवात्मा के भय-तापों को हरने की क्षमता थी। धीरे-धीरे ज्योतिपुँज में स्वर्गीय उजास थी और इसकी शीतल प्रभा में जीवात्मा के भय-तापों को हरने की क्षमता थी। धीरे-धीरे ज्योतिपुँज ने मानव का आकार लिया। यह आकृति किसी आलौकिक तपस्वी एवं महायोगी की थी।
साधना को तीव्र गति देने वाली विधाएँ रही हैं अनन्य भाव से भगवद् जप, प्रभु समर्पित जीवन और संकीर्तन तपादि भी ईश्वर को प्राप्त करने के साधन हैं। जिन्हें ज्यादा झंझट करने की आदत नहीं है, जो सिर्फ आत्मिक शाँति या ईश्वर अनुभूति में ही रुचि रखते हैं उनके लिए ‘भक्ति’ सुलभ मार्ग है। वे उसी का अवलंबन लेते हैं, लेकिन जिन्हें साधना करते हुए ईश्वर का वैभव भी देखना है उसके ऐश्वर्य को भी धारण करना है ओर प्रमाणित करना है कि वे इस सृष्टि से सृजनहार से संबंध स्थापित किए हुए हैं। उनके लिए गुह्य विद्याओं का आश्रम लेना जरूरी है।
साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते है वह है ‘6 आत्मवत् सर्वभूतेषु।” मातृवत् परदारेषु परद्रव्येकषु लोष्ठवत् की साधना विवेक के सहारे सध गई। तीसरी साधना थी अपने समान सबको देखना। कहने-सुनने में यह सब मामूली शब्द लगते हैं और सामान्यतया नागरिक कर्त्तव्यों का पालन, शिष्टाचार, सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है। पर वस्तुतः उस तत्त्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है जहाँ परमात्मसत्ता के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है (अखण्ड ज्योति फरवरी 1971)।
साधना प्रारम्भ करते समय यह मात्र एक प्रत्यय थी, अब प्रतीति हो गई। अनित्यता नित्यता में, रूपांतरित हो गया। आदिशक्ति माता गायत्री की अनुकम्पा से सम्यक् ज्ञान हो गया, विद्या की पराकाष्ठा विवेक ख्याति पा गई। उनका राग अब प्राणिमात्र के कल्याण की कामना का पर्याय बन गया। उनकी अंतर्चेतना ब्रह्माण्ड सरोवर में ब्रह्मकमल की तरह खिल उठी।
साधनाकाल में ही उनके गृहस्थ जीवन की शुरुआत हो गई थी। वंदनीया माताजी ने आकर यहाँ संस्कृति संजीवनी की फसल उगाई। गृहस्थ संस्कारों की पौधशाला ही तो है, जहाँ परिवार के सभी सदस्यों को उनकी स्थिति के अनुरूप संस्कार मिलते हैं। प्यार-सुधार के संस्कारपूर्ण वातावरण में यहाँ परिवार के सभी स्वजन सुसंस्कृत बनते हैं। वंदनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव की गृहस्थी कुछ ऐसी ही रही।
साधना वहीं से संचालित हुई थी। कठोर तप के साथ गुरुदेव द्वारा यज्ञशाला में अखण्ड अग्नि की स्थापना एवं चौबीस सौ तीर्थ का जल-रज संग्रह भी किया गया। साथ ही ऐसे धर्म-तंत्र का निर्धारण भी किया गया, जिसे अगले दिनों लोक-शिक्षण की महती भूमिका निभानी थी।
साधना का अभिन्न अंग बन गए। उन्होंने गौ, गंगा, गीता को गायत्री से अभिन्न जाना और अनुभव किया।
साधना सत्रों में आने वाले साधकों-प्रज्ञा पुत्रों को नियमित गंगा-भ्रमण एवं गंगाजल के पान के लिए प्रोत्साहित किया करते थे। उनका कहना था कि गंगाजल में तप की उर्मियाँ उमंगती हैं। गंगा का किसी भी तरह सान्निध्य, सुवास आध्यात्मिक उत्थान के लिए हितकर है। उन्होंने प्राण प्रत्यावर्तन, कल्पसाधना, चाँद्रायण साधना आदि में भाग लेने वाले साधकों के लिए भोजन निर्माण की व्यवस्था में भी गंगाजल का प्रयोग करवाया, जिसके तद्नुरूप परिणाम भी सामने आए। वह कहा करते थे, गंगा जल की महिमा जितनी वैज्ञानिक है, उससे अनगिन अनन्त गुना साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक है।
साधना भी हैं। परमात्मा में जिन्हें रुचि न हो वे इनका उपयोग प्रकृति के ज्ञात-अज्ञात रहस्यों को खोजने और उनसे लाभ उठाने के रूप में भी करते हैं। तंत्र-मंत्र की साधना करने वालों में आरंभ में ईश्वरीय आभा भले न दिखाई देती हो, लेकिन कतिपय अलौकिक शक्तियाँ उनमें अवश्य आ जाती है। दिव्य शक्तियों से संपन्न होने का दावा कर लोगों को ठगने वाले धूर्तों की बात नहीं की जा रही। जो सचमुच निष्ठा ओर तन्मयता से तंत्र-मंत्र की उपासना करते है उनकी आत्मिक शक्ति प्रबल होने लगती है।
साधना के विज्ञान पक्ष को प्रमाणित करने के लिए उद्धृत नहीं की जा सकती। गुरुदेव के अनुदान-प्रेरणाओं और परिणामों की चर्चा ही यहाँ अभीष्ट है।
साधना कर रहे थे, वह गायत्री की सामान्य साधना थी। अब तुम्हें इसकी विशिष्ट साधना में प्रवृत्त होना पड़ेगा। उसी के सत्परिणामस्वरूप तुम्हें गायत्री का देवसंस्कृति की आदिमता के रूप में साक्षात्कार हो सकेगा। शिष्य एवं गुरु के इस अंतरंग संवाद में गायत्री साधना का विज्ञान-विधान प्रकट होने लगा।
साधना सत्रों में भी चरितार्थ हुआ। प्राण प्रत्यावर्तन शक्पात, जीवन साधना कुंडलिनी योग और योगमार्ग का व्यावहारिक अभ्यास सिखाने वाले सत्र परिजनों को आज भी याद हैं। उनमें गुरुदेव स्वयं निर्देश देते थे और अंतर्यात्रा में एक-एक पल के साक्षी बनकर साधकों को गहराई तक ले जाते थे। जिन साधकों ने इन शिविरों में कुछ गति की, वे जानते थे कि जन्माँतरों के पुरुषार्थ से जो विकास संभव नहीं हो सकता था, वह नौ-दस दिन या महीने भर के सूत्रों में सहज ही संभव हो गया। यात्रा मार्ग की बारीकियों को समझते हुए संपन्न हो गई।
साधना प्रारम्भ करने से पहले गंगा जल से तीन बार आचमन मन-प्राण-अंतःकरण में एक अलौकिक पवित्रता का संचार करता है। इसके प्रभाव से चित्तवृत्तियाँ सहज निरुद्ध होती हैं, एकाग्रता अपने आप सधती है।
साधना एवं इनके द्वारा सर्वस्व की प्राप्ति के लिए किया गया उपक्रम ही पुरुषमेध है।
साधना, चाँद्रायण साधना आदि में भाग लेने वाले साधकों के लिए भोजन निर्माण की व्यवस्था में भी गंगाजल का प्रयोग करवाया, जिसके तद्नुरूप परिणाम भी सामने आए। वह कहा करते थे, गंगा जल की महिमा जितनी वैज्ञानिक है, उससे अनगिन अनन्त गुना साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक है। यदि परिस्थितिवश किसी के लिए गंगा स्नान एवं गंगाजल पान सम्भव न हो, तो मानसिक एवं भावनात्मक रूप से गंगा स्नान एवं गंगाजल पान करना चाहिए। गंगा, गायत्री का ही रूप है। तभी तो शायद गंगा दशहरा एवं गायत्री जयन्ती के रूप में दोनों की अवतरण तिथि एक है।
साधना कुंडलिनी योग और योगमार्ग का व्यावहारिक अभ्यास सिखाने वाले सत्र परिजनों को आज भी याद हैं। उनमें गुरुदेव स्वयं निर्देश देते थे और अंतर्यात्रा में एक-एक पल के साक्षी बनकर साधकों को गहराई तक ले जाते थे। जिन साधकों ने इन शिविरों में कुछ गति की, वे जानते थे कि जन्माँतरों के पुरुषार्थ से जो विकास संभव नहीं हो सकता था, वह नौ-दस दिन या महीने भर के सूत्रों में सहज ही संभव हो गया। यात्रा मार्ग की बारीकियों को समझते हुए संपन्न हो गई।
साधना एवं पुरुषार्थ-पराक्रम का चरमोत्कर्ष है। 12 वर्ष के इन विकट समय में विराट् श्रद्धांजलि समारोह, शपथ समारोह, देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत 18 अश्वमेध महायज्ञ, 800 से अधिक विराट् संस्कार महोत्सव, विराट् वाजपेय यज्ञ जैसे साँस्कृतिक क्राँति का अलख जगाने वाले विशाल आयोजन किए। युगमानस भी संस्कृति के युगानुकूल उपयोगी एवं प्रगतिशील स्वरूप को देखकर इसे अपनाने के लिए आगे बढ़ा है। इस दौरान 250 करोड़ गायत्री मंत्र जप का प्राथमिक लक्ष्य भी बढ़ते-बढ़ते 25000 करोड़ प्रतिवर्ष तक जा पहुँचा है। इसकी महापूर्णाहुति के अंतर्गत तीन चरण पूरे हो चुके व चौथे का अंतिम चरण पूरा होने वाला है।
साधनारत श्रीराम अपनी बंद कोठरी में इन देवपुरुष की अद्भुत उपस्थिति को देखकर निर्वाक् थे। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि वे क्या बोलें और क्या करें ? फिर भी उनके मन-प्राण किसी अनजाने आध्यात्मिक प्रभाव से शीतल हो रहे थे। उनकी आत्मा अपने चिर सखा एवं परम स्नेही को पहचानने का प्रयास कर रही थी।
साधना के कठोर अनुबन्धों में बाँधकर वह दिव्य सत्ता अंतर्ध्यान हो गई। अब पंद्रह वर्षीय श्रीराम को चौबीस अक्षर वाले गायत्री महामंत्र के चौबीस लाख के चौबीस महापुरश्चरण सम्पन्न करने थे। यह तप-साधना चौबीस वर्षों में की जानी थी। इस साधना में अखंड घृतदीप के सामने छह घंटे नियमित जप करते हुए मात्र जौ की रोटी एवं छाछ पर निर्वाह करना था। इंद्रिय-संयम, विचार-संयम, समय-संयम एवं अर्थ-संयम इसके ऐसे व्रतबंध थे, जिन्हें पूरा करने के लिए साधक प्रवर श्रीराम की चेतना पहले से ही निष्णात हो चुकी थी।
साधना करते हुए ईश्वर का वैभव भी देखना है उसके ऐश्वर्य को भी धारण करना है ओर प्रमाणित करना है कि वे इस सृष्टि से सृजनहार से संबंध स्थापित किए हुए हैं। उनके लिए गुह्य विद्याओं का आश्रम लेना जरूरी है।
साधनाएँ सौम्य सत्व प्रधान होती है। वे दक्षिणमार्गी श्रेणी में आती है। गुरुदेव ने इस पक्ष के साथ तंत्र, योग, और दिव्य पक्ष को भी उद्घाटित किया। उनके सान्निध्य और मार्गदर्शन में साधना कर तंत्र की उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त करने वालों की संख्या हजारों में होगी। उन सिद्ध-साधकों की निजी अनुभूतियाँ साधना के विज्ञान पक्ष को प्रमाणित करने के लिए उद्धृत नहीं की जा सकती।
साधना और लोक-मंगली की प्रवृत्ति के युग्म द्वारा समग्र उत्थान की बात जन-जन सोचने लगे। अंदर की इसी आग को सँजोए परमपूज्य गुरुदेव ने अखण्ड ज्योति पत्रिका का अगस्त 1969 का अंक ‘विचारक्राँति अंक’ के रूप में लिखा। इस अंक में संस्कृति पुरुष के व्यक्तित्व के दो महत्त्वपूर्ण पहलू दृष्टिगोचर होते हैं पहला विचारक्राँति के माध्यम से युगनिर्माण योजना की संघर्षात्मक-रचनात्मक गतिविधियों को जन्म देने वाले संगठन का, तो दूसरा एक ऐसे अभिभावक का, जो अपने परिजनों से बिछुड़ने की बात मन में सोचते ही द्रवित हो उठता है उसकी व्यथा-वेदना ऐसे प्रकट होती है, “अखण्ड ज्योति परिवार में हमने गिन-गिनकर चुन-चुनकर परख-परखकर मणिमुक्तक खोजे हैं और उन्हें एक शृंखला-सूत्र में आबद्ध किया है। वे हमें भले ही भूल गए हों, पर हमें उन्हें भूले नहीं है। हम उन सभी के पूर्व चित्र और चरित्रों को भी जानते हैं जिनके साथ हमारा अति घनिष्ठ संबंध लगातार कई जन्मों से रहा है।
साधना थी। अब तुम्हें इसकी विशिष्ट साधना में प्रवृत्त होना पड़ेगा। उसी के सत्परिणामस्वरूप तुम्हें गायत्री का देवसंस्कृति की आदिमता के रूप में साक्षात्कार हो सकेगा। शिष्य एवं गुरु के इस अंतरंग संवाद में गायत्री साधना का विज्ञान-विधान प्रकट होने लगा।
साधना, उपासना और ज्योतिष की तरह आयुर्वेद भी भारतीय विज्ञान का एक पक्ष है। आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां शरीर में होने वाले रोगों को बाहरी विकारों का आक्रमण मानती है। उन्हें विषाणु या जीवाणु की संज्ञा देते है। शरीर में जब इनकी घुसपैठ होती है तो बीमारियाँ जन्म लेती है। उन विकारों को दबा दिया जाए, तो व्यक्ति स्वस्थ हो सकता है।
साधना अपने व्यक्तिगत वर्चस्व के लिए नहीं, विशुद्ध रूप से लोक-मंगल के लिए करने जा रहे है और जो कुछ हमें मिलेगा, उसकी राई-रत्ती सार्वजनिक ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करते रहेंगे। जब तक जीवन शेष रहेगा, तब तक यही करना है।”
साधनात्मक पराक्रम की महापूर्णाहुति। जो भी हो, चतुर्थ चारण आते-आते राष्ट्र-साधना परिपक्व स्थिति में दिखाई दे रही है। चारों ओर उससे वातावरण में उल्लास को, शक्ति को, सृजन प्रक्रिया की गतिविधियों को सक्रिय देखा जा सकता है। उस पर भी शास्त्रोक्त पुरुषमेध महायज्ञ एवं सौत्रामणी प्रयोग। ऐसा श्रौतयाग का अभिनव प्रयोग, जो अभूतपूर्व हो, विगत 2000 वर्षों में कहीं संपन्न न हुआ हो, किंतु इस विराट् अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा संपन्न किया जा रहा हो, उस विराट् पुरुष के जागरण हेतु, जो नवयुग लाने को संकल्पित है।
साधना की प्रभावकारी परिणति मानी जाए, जो आगामी कुछ दशकों में ही साकार होकर रहेगी।”
साधना का जो विधि-विज्ञान बतलाया, उसमें गौ कि महिमा स्वयमेव ओत-प्रोत थी। छह घंटे के नियमित साधनाकाल में ही नहीं, बल्कि नित्य अखंड अविराम जो दीप जलाया जाना था, उसमें गौघृत होना अनिवार्य था। मार्गदर्शक सत्ता ने इसकी अनिवार्यता को स्पष्ट करते हुए बतलाया था कि साधनाकाल में सात्विकता का प्रकाश चतुर्दिक् बिखरना चाहिए। यों तो गायत्री जप स्वयं में यज्ञ है, परन्तु जप यज्ञ की यह प्रक्रिया मन-प्राण-अंतःकरण तक ही सीमित रहती है। इसका बहिरंग स्वरूप भी आवश्यक है।
साधनात्मक गतिविधियाँ प्रारंभ हुई। इस साधनाक्रम के मध्य में ही एक दिन उन्हीं की भाषा में, “हमारे हृदय का बेतार का तार बज उठा।” इस एक वाक्य में इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उनकी चेतना हिमालय के स्वरों को साफ−तौर पर सुनने-समझने लगी थी। उनके मार्गदर्शन ने उन्हें बतलाया कि ऋषि सत्ताओं की निवास-स्थली हिमालय का यह दिव्य क्षेत्र सब तरह से गुह्य और अलौकिक है सामान्य मानव मो क्या, अति श्रेष्ठ एवं समर्थ साधक भी यहाँ तक नहीं पहुँच सकते। यह दिव्य स्वरूप मात्र पर्वत शिखरों की सौंदर्य गाथा तक सीमित नहीं हैं पर्वत-शिखरों की ऊंचाइयों को तो हर साल सैकड़ों देशी-विदेशी पर्यटक सैलानी छूते रहते है।
साधना में व्यवधान डाल उनके लिए प्रार्थना करने हेतु उन्हें विवश कर देती घटना की जानकारी जनमानस को बाद में होती है किंतु विश्वात्मा के एक घटक होने के नाते वे उसे पहले ही अनुभव कर अपने एक सेवक-शिष्य के समक्ष अपनी मनोव्यथा बेचैनी का बखान कर देते हैं। परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के अनेक घटनाक्रमों में विश्व-वसुधा की कष्ट भरी घड़ियों में उनकी सहभागिता व उनकी उस अवधि में विशिष्ट साधना के ढेरों प्रमाण देखने को मिलते हैं।
साधना के ढेरों प्रमाण देखने को मिलते हैं।
साधना था। जिसका अंकुरण बचपन में ही उन्हें असहाय, बूढ़ी, कुष्ठ रोग से पीड़ित मेहरबानी की सेवा करने, कसाई के हाथ पड़ी गाय की जीवन रक्षा करने के लिए विवश करने लगा। धीरे-धीरे जीवन की हर चेष्टा संवेदना की कसक बन गई। इस स्थिति में उनकी अंतःभूमि की क्या दशा थी, उन्हीं के शब्दों में, “इन दिनों बहुत करके रात में जब आँख खुल जाती है, तो हमें विदाई का दृश्य दिखाई देने लगता है। स्मृति पटल पर स्वजनों की हँसती बोलती मोह ममता से भरी एक कतार उमड़ती चली आती है।
साधना की जो मूल धुरी रही है वह है अंतः करण में प्रेमतत्व का अभिवर्द्धन। यह प्रेम उन्होंने परमात्मा से किया गुरुसत्ता से किया तथा उसकी तीसरी धारा परिवार क्षेत्र में प्रवाहित की। यह परिवार उनका अपना गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार था। वे लिखते थे, “ हमारी उपासना पद्धति के अंतराल में सन्निहित यह प्रेम-साधना ही थी जो सामान्य को असामान्य में, तुच्छता को महानता में परिणत करने का चमत्कार दिखा सकी।” (अखण्ड ज्योति अप्रैल 1969)।
साधना करके वह संस्कृति पुरुष ओर लक्ष-कोटि जनों के परमपूज्य गुरुदेव बने।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-August
साधना की पहली शर्त है, आहार का अनुशासन। अनुशासन में सर्वप्रथम यह आता है कि भोजन जहाँ-तहाँ नहीं किया जाए और जब भी इच्छा, सुविधा और अवसर मिल न किया जाए। क्या खाया जाता है यह जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि कब खाया जाए और किन परिस्थितियों में खाया जाए। शुरुआत में साधकों को माँस-मदिरा और नशीली चीजों के सेवन की मनाही की जाती है। भगवान् बुद्ध ने अपने अनुयायियों को जिन दस व्रतों का पालन करने के लिए कहा था उनमें एक आहार के चुनाव से संबंधित भी था।
साधना करने के बाद यह स्थिति योगियों की आती है। थोड़े ही दिनाँक में आप पूर्ण समाधि-सुख प्राप्त करेंगे। आपकी साधना को पूर्ण बनाने के लिए हम यहाँ से शक्ति प्रेरित करते रहते हैं। आपका यह जन्म अंतिम हो, इसी में पूर्णता प्राप्त करें, ऐसा प्रयत्न हम कर रहे हैं।
साधना-सुविधाएँ व्यक्ति को सफलता नहीं दिलाती। बड़े और सामाजिक उद्देश्यों में तो ये और भी गौण हो जाती है। लगन और समर्पण की भावना ही व्यक्ति को उच्च उद्देश्य की प्राप्ति कराती है।
साधना संबंधी भ्राँति फैलाने पर क्षोभ हुआ, तो उन्होंने पत्र लिखकर समाधान चाहा। उतर तुरंत पहुँचा। 3-11-56 को लिखे इस पत्र में वे लिखते हैं।-
साधनाओं में यह काम स्मरण और निवेदन से ही संपन्न कर लिया जाता है।
साधनाओं में आहार पर बारीकी से ध्यान देना होता है। आत्मशक्ति के प्रबल जागरण, इच्छाशक्ति के प्रयोगों अथवा अलौकिक सत्ताओं से संबंध स्थापित करने के लिए भोजन के एक एक ग्रास का निर्धारण किया जाता है । इच्छाशक्ति या अशरीरी सत्ताओं को लौकिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए लगाना हो , तो ग्रास के आकार की चिंता भी करनी पड़ती है। तंत्रशास्त्रों में ग्रास के आकार की चिंता भी करनी पड़ती है । तंत्रशास्त्रों में ग्रास के भिन्न परिणाम बताएं हैं।
साधना की है। तुम जो साधारण अपनी उपासना करती हो, उसे करती रहो। अब आगे की विशेष, अत्यंत महत्वपूर्ण और सब साधनाओं से अधिक श्रेयस्कर तपस्या यह करो कि जो गायत्री परिवार तुमने वहाँ बना लिया है, उसका मार्गदर्शन, संगठन, प्रेरणा एवं प्रकाश देने के लिए अबकी अपेक्षा और भी अधिक समय लगाना। यह तपस्या किसी भी बड़े योगाभ्यास से कम नहीं है। अभी तुम्हारे गायत्री परिवार में 65 सदस्य हैं, यह बढ़कर 108 होने चाहिए।
साधना नियमित करती रहें ।
साधना के क्षेत्र में गति होने ओर उच्च स्थिति की ओर अग्रसर होते जाने के साथ विवेक का उदय भी होता चलता है। सजगता सिद्ध हो जाने के बाद ज्यादा सावधानी रखने की आवश्यकता नहीं रह जाती। आहार सामने आने के बाद आँतरिक विवेक स्वयं ही निर्धारण कर लेता है। यह स्थिति प्राप्त करने के लिए एक न्यूनतम अनुशासन को तो अभ्यास में लाना ही पड़ता है। वह अभ्यास सिद्ध होने के बाद आहार शुद्ध होने लगता है और छाँदोग्य के ऋषि के अनुसार आहार-शुद्धि के बाद सत्व शुद्ध होने लगता है।
साधना का प्रतिनिधि कहा है। यह पद है -
साधना संबंधी मार्गदर्शन भी करता है, अध्यात्मपरक लोकशिक्षण पर गुरुसत्ता की लेखनी का द्योतक भी है। 11-8-52 को लिखे पत्र में वे लिखते हैं।
साधनाओं में इस तरह की बारीकियों पर ध्यान देना जरूरी नहीं है, उन साधनाओं में आहार के संबंध में जागरुकता बरतने, सावधानी रखने और आत्मिक प्रगति में सहायक सिद्ध होने वाला आहार लेने पर ही जोर दिया गया है।
साधना का यह भौतिक पक्ष है, जो स्वास्थ्य-संवर्द्धन एवं प्राण उन्नयत तक सीमित है। ध्यान की गहराई में प्रवेश करने से न केवल जीवनी शक्ति के अभिवर्द्धन एवं संतुलित मनःस्थिति का लाभ मिलता है, वरन् विश्वव्यापी दिव्यसत्ता के साथ घनिष्ठता बना लेते और उसके साथ संपर्क-सान्निध्य साध सकने वाले आत्मिक चुंबकत्व का भी विकास होता है। आत्म-विकास ही ध्यानयोग का वास्तविक लक्ष्य है।
साधना के भी उतनी ही प्रभावशाली हो सकी है। जितनी कि विधि-विधान के साथ किए गए नियमित उपासना-साधना की।
साधना-मार्गों से उन्होंने समाज को संस्कार की प्रेरणा भी दी है। समर्थकों का कहना है कि वे अपने समय के शासकों से तनिक भी रुष्ट नहीं थे। उनके साहित्य में तत्कालीन शासन-व्यवस्था के प्रति कही भी रोष या आक्रोश नहीं है। लेकिन यह अधूरा सत्य है। कोई भी साहित्यकार अपने समय की परिस्थितियों से अछूता नहीं रहता।
साधना-पद्धतियों में तीन-चार बार नहाने, वस्त्र बदलने, घंटों तक विधि-विधान से पूजा करने, दूसरों का छुआ, बनाया, लाया हुआ आहार नहीं लेने जैसे कितने ही प्रतिबंध है। कुछ विधि-निषेध तो इतने कड़े है। कि उनका पालन करते रहने में ही साधक उलझ जाता है, विकास के लिए वह साधना-उपासना की दिशा में बढ़ नहीं पाता। उदाहरण के लिए, वैष्णव मत में दीक्षित कुछ साधक दूसरों की छाया पड़ जाने से ही आहार और जल को दूषित हुआ मान लेते हैं। वे छायाविष्ट अन्न या जल को ग्रहण नहीं करते।
साधनाओं से अधिक श्रेयस्कर तपस्या यह करो कि जो गायत्री परिवार तुमने वहाँ बना लिया है, उसका मार्गदर्शन, संगठन, प्रेरणा एवं प्रकाश देने के लिए अबकी अपेक्षा और भी अधिक समय लगाना। यह तपस्या किसी भी बड़े योगाभ्यास से कम नहीं है। अभी तुम्हारे गायत्री परिवार में 65 सदस्य हैं, यह बढ़कर 108 होने चाहिए। इनकी सामूहिक उपासना, सामूहिक यज्ञ, सामूहिक प्रार्थना समय-समय पर होती रहे, तो यह एक बहुत बड़ा काम है।”
साधना करने लगें, सभी हमारी मान ले, अनिवार्य नहीं । बरस- शास्त्रार्थ में न उलझकर जो सुनें ,उन्हें सुनाएँ। नहीं तो अपनी साधना नियमित करती रहें ।
साधना मार्गों से उन्होंने समाज को संस्कार हुआ है ओर इन साधना-मार्गों से उन्होंने समाज को संस्कार की प्रेरणा भी दी है। समर्थकों का कहना है कि वे अपने समय के शासकों से तनिक भी रुष्ट नहीं थे। उनके साहित्य में तत्कालीन शासन-व्यवस्था के प्रति कही भी रोष या आक्रोश नहीं है। लेकिन यह अधूरा सत्य है। कोई भी साहित्यकार अपने समय की परिस्थितियों से अछूता नहीं रहता।
साधना-उपासना की दिशा में बढ़ नहीं पाता। उदाहरण के लिए, वैष्णव मत में दीक्षित कुछ साधक दूसरों की छाया पड़ जाने से ही आहार और जल को दूषित हुआ मान लेते हैं। वे छायाविष्ट अन्न या जल को ग्रहण नहीं करते। पूजा-पाठ से पहले किसी से छू जाएँ या छाया अविष्ट हो जाएँ, तो नहाते हैं। पहने हुए वस्त्र को बदलते और फिर पूजा-पाठ करते हैं।
साधना-स्थल मान लिया। यह भी हुआ कि लोग इस छूट या सुविधा का लाभ उठाकर अपने दोष-दुर्गुणों और लिप्साओं को हवा देने लगे।
साधना व्यक्ति को इतना विनम्र बना दे, उससे परिचय पाकर उन्होंने कहा, काशी रूपी आनंदवन में तुलसीदास चलता-फिरता तुलसी का पौधा है। उसकी कविता रूपी मंजरी बड़ी ही सुँदर है, जिस पर श्रीराम रूपी भँवरा सदा मँडराया करता है।
साधनाओं में आहार के माध्यम से अभियार कर्म किए जाने की आशंका प्रबल रहती है । योग्य गुरु इस तरह के उपायों द्वारा अनर्थकारी प्रभावों के निवारण का उपाय सुझाते हैं । दक्षिणमार्गी साधनाओं में यह काम स्मरण और निवेदन से ही संपन्न कर लिया जाता है।
साधना सत्र में आए हुए हैं, उसमें महत्वपूर्ण काम आपको यह करना है कि किसी ऐसी सत्ता के साथ में अपने आपको जोड़ दें, जो बड़ी सामर्थ्यवान् है। अकेले आप सीमित हैं, अकेले आप जो काम करते हैं, उससे गुजारा तो हो सकता है, लेकिन और ज्यादा ऊँचा उठना अकेले के बलबूते पर संभव नहीं है। अकेले प्राणियों को भगवान् ने इतना दिया है, जिससे कि अपना गुजारा कर पाएँ। हर आदमी को इतनी अक्ल दी है, हाथ-पैर भी दिए हैं, शरीर दिया है, जिससे अपने शरीर का गुजारा कर लें और अपने बीबी-बच्चों का गुजारा कर लें और इससे अधिक किसी के पास नहीं है! मनुष्य के पास, इतना तो हर किसी के पास है, प्राणी के पास है, लेकिन इससे ज्यादा की जरूरत पड़े तो फिर आपको भगवान् का सहारा लेना पड़ेगा, ऐसे शक्तिपुँज का सहारा लेना पड़ेगा, जिसके पास शक्तियों के भंडार भरे पड़े हैं। भगवान् कौन भगवान् आप यह मानकर चलते हैं कि एक बहुत बड़ा बिजलीघर है, जिसके साथ में बल्ब लगे हरते हैं, पंखे लगे रहते हैं, छोटी-छोटी मशीनों लगी होती है और जनरेटर के साथ में जुड़ जाने की वजह से यह काम करते रहे हैं।
साधनाओं में अपने आत्मीयजनों के हाथ का बना भोजन ही करने का नियम है। यह नियम अपने सत्परिणामों के साथ दिनचर्या में अनुशासन को भी साधता है। अनुशासन का अपना लाभ है। असल बात भोजन को विजातीय संस्कारों से बचाना है। सामान्य स्थिति में किया गया किसी भी तरह का भोजन मात्र उदरपूर्ति करा है।
साधनाएँ सार्थक हो सकती है। अगर आपने अपनी धुलाई नहीं की, अपने कषाय-कल्मषों को धोया नहीं, तो फिर बहुत मुश्किल है, फिर आपके लिए बहुत कठिन हो जाएगा । खेत को अगर आप जाएगी ? यह खेत की जुताई , राम नाम का जप करना अथवा अन्य किसी तरीके से अपने आपका परिष्कार करना सब एक ही है जोव करके अगर आपने खेत ठीक तरीके से तैयार कर लिया है, तो बुआई में आपको कोई दिक्कत नहीं पड़ेगी , बुआई सरल हो जाएगी , खेत तो जोता हुआ है और अगर जोता हुआ न हो तब ? कंकड़-पत्थर वाला खेत हो तब ?
साधना क्षेत्र युगनिर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है।
साधनात्मक पुरुषार्थों के बड़े ही विलक्षण परिणाम होते हैं। समय-समय पर अवतारी चेतना भी देवशक्तियों को संघबद्ध होने, संयमित जीवन जीते हुए साधना प्रधान जीवनचर्या में शक्ति नियोजित करने की प्रेरणा देती रही है। महाकाली की एक ही प्रेरणा है कि सभी बल की उपासना करें, मिल−जुल करें, ताकि अन्य से आगत आसुरी घटाटोप से जूझा जा सके। इन दिनों हमारी गुरुसत्ता के निर्देश के अनुरूप ही न केवल राष्ट्र व विश्व का सघन मंथन करने वाली तीर्थयात्राएँ संपन्न हुई, गाँवों से लेकर सींगीय स्तर तक सृजन संगठन प्रधान एक लाख से अधिक समारोह भी पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुए। 108 संभागीय दीप महायज्ञों के माध्यम से परिष्कृत प्रतिभाएं उभरकर आई है।
साधना के लिए क्यों अपने को समर्पित करते हैं ऋषिगण भी विलासियों की रह साधन-सामग्री उपार्जित कर सके थे। फिर क्यों उन्होंने गरीबों जैसा बाना पहना इसका उत्तर भी उस समाधान के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें दबाने की तुलना में खिलाने के जायके को अत्यधिक स्वादिष्ट पाया जाता है। “ नाचते हुए शब्दों की तरह लिखा उपर्युक्त कथन भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है।
साधना को प्रखरतम बना सके।
साधना के दूसरे पक्षों को अनदेखा सा कर दिया हैं रोशनी नहीं करने, मुँह पर पट्टी बाँधकर रहने, वाहनों में नहीं बैठने, बीमार पड़ने पर औषधि उपचार नहीं लेने जैसे विषयों पर इतना जोर दिया गया कि अहंकार, मात्सर्य, दर्प, क्रोध जैसे विकार अछूते ही छूट गए।
साधना से ही मिल सकता है।
साधनाओं में आहार के संबंध में जागरुकता बरतने, सावधानी रखने और आत्मिक प्रगति में सहायक सिद्ध होने वाला आहार लेने पर ही जोर दिया गया है।
साधनाओं में माँ और पत्नी के अलावा किसी के हाथ का बना खाना पूरी तरह वर्जित है। साधना के एक स्तर पर पहुँचने के बाद साधक से स्वपोशी बनने की अपेक्षा भी की जाती है कि वह अपने हाथ से बना हुआ भोजन ही करे। लेकिन सौम्य और सहज साधनाओं में अपने आत्मीयजनों के हाथ का बना भोजन ही करने का नियम है। यह नियम अपने सत्परिणामों के साथ दिनचर्या में अनुशासन को भी साधता है। अनुशासन का अपना लाभ है।
साधना-तपश्चर्या के द्वारा प्राप्त करे हैं। सच्ची प्रार्थना से अंतरात्मा के गहनतर भाग से एक आंतरिक दिव्य चैतन्य प्रकाश प्रस्फुटित होता है, जिस के लिए शास्त्रों में कहा गया है, “तमेव भान्तमनुमति सर्व तस्य भासा सकलं विभा” अर्थात् यही वही गूढ़ आँतरिक प्रकाश है, जो जगत् के समस्त चराचर प्राणियों को आलोक प्रदान करता है। प्रार्थना असय से सय की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाली दिव्य प्री है। इसके द्वारा हम ईश्वर से अपना संबंध जोड़कर महान् विभूतियों के स्वामी बन सके है और समस्त आधि-व्याधियों, कष्ट-कठिनाइयों एवं रोग-शोकों से मुक्ति पा सकते हैं।
साधना नहीं, गुरुप्रसाद हैं, इसे वे अगली पंक्ति में स्पष्ट करते हैं, जब लिखते हैं कि आपकी साधना पूर्णावस्था में पहुँचे, इसके लिए सारी शक्ति जिस एक केंद्र से प्रवाहित हो रही है, उसके उत्पादक-नियंता वे स्वयं हैं। हम यदि इस पत्र को एक-एक पंक्ति एक-एक शब्द को अपने लिए भी मार्गदर्शन मानकर चलें, तो ऐसे ही उच्चस्तरीय ध्यान-धारणा की उपलब्धियों के आनंददायी सुख हम भी प्राप्त कर सकते हैं। संभवतः इन शब्दों का ही चमत्कार था कि अनेक साधक अपनी जीवन-साधना को प्रखरतम बना सके।
साधनाओं में साधक सहज सामान्य जीवन जीते हुए भी ऋषि की शुभकामना-आशीर्वाद या दिव्य शक्तियों से प्रार्थना को पुरी कर सकता है। इस युग में भी कई विभूतियों ने पत्नी को माँ के रूप में देखने या पति को पुत्र बना लेने वाली सिद्धियाँ हस्तगत की है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने विवाहित जीवन आरंभ करते ही पत्नी को महाशक्ति के रूप में देखा। उन्होंने संतान की कभी कामना नहीं की । लीलाप्रसंग में किसी ने उनसे पूछा भी सही कि माँ (शारदामणि) के मन में कभी संतान की इच्छा नहीं हुई।
साधना अपने भीतर विद्यमान् दिव्य शक्ति के विशिष्ट जागरण, आहान और अर्जन की विधान है। उसे गुरु अर्थात् समर्थ मार्गदर्शक के साथ संपन्न किया जा सकता है। अपने आप किए गए प्रयास या प्रयोगों में लाभ के साथ हानि की संभावना भी है, बल्कि नुकसान का जोखिम ही ज्यादा है।
साधनाओं में आहार के संतुलन का तात्पर्य यही है कि वह शरीर-पोषण के लिए ही लिया जाए। स्वाद, लिप्सा, दिखावा या कोई और प्रयोजन उसके साध न जोड़े जाएँ। इन प्रयोजनों में किसी का आतिथ्य स्वीकार करने के लिए पार्टियों में जाना, दावतें उड़ाना और आमोद-प्रमोद के लिए होटलों में खाना भी शामिल हैं। घर आए आगंतुक का स्वागत-सत्कार करने के लिए समय के अनुसार चाय-पानी करना या भोजन परोसना अलग बात है। कहीं जाने पर स्वयं भी इस तरह चाय-नाश्ता और भोजन आदि किया जा सका हैं।
साधना और विद्या की धारा ही अवरुद्ध हो गई । श्री अरविंद ने इस अनर्थ को रेखाँकित करते हुए लिखा हैं, तंत्र में विशेषकर उसके वाममार्ग में ऐसी बातें आ गई, जिनके कारण अच्छे-बुरे का , पाप-पुण्य का कोई विचार नहीं रह गया। इतना ही नहीं स्वभाव नियत सद्धर्म के स्थान पर अनियंत्रित कामाचार, असंयत सामाजिक व्यभिचार और दुराचार को मानो एक पंथ मिल गया । तथापि तंत्र असल में एक बड़ी चीज थी, बड़ी बलवती योगपद्धति थी । इसके दक्षिण और वाप दोनों ही मार्ग बड़ी गंभीर अनुभूति के फल थे।
साधना के एक स्तर पर पहुँचने के बाद साधक से स्वपोशी बनने की अपेक्षा भी की जाती है कि वह अपने हाथ से बना हुआ भोजन ही करे। लेकिन सौम्य और सहज साधनाओं में अपने आत्मीयजनों के हाथ का बना भोजन ही करने का नियम है। यह नियम अपने सत्परिणामों के साथ दिनचर्या में अनुशासन को भी साधता है। अनुशासन का अपना लाभ है। असल बात भोजन को विजातीय संस्कारों से बचाना है।
साधना से आगे बढ़ाकर सामूहिकता की साधना एवं अंतः आराधना बना लेने का इससे उत्तम स्तर का प्रशिक्षण और क्या हो सका है। संभवतः पाठकों को अब समझने में कठिनाई नहीं होगी कि कैसे कुछ गायत्री साधकों से आरंभ हुआ यह परिवार क्रमशः बढ़कर एक विराट् संगठन का विस्तार पाता चला गया।
साधनाओं के माध्यम से स्वयं को एक ऐसी भूमिका में प्रतिष्ठित कर लेते हैं कि इच्छानुसार अपने प्राण- कंपन परिवर्तित कर सकें । ऐसी स्थिति में वस्तु, व्यक्ति या स्थान संबंधी भूतकालीन घटनाएँ उनके समक्ष मूर्तिमान् हो उठती है। इसे चेतना की परिष्कृति कह लें , उसकी संवेदनशीलता या प्राण-कंपन की उच्चता , बात एक ही हैं।
साधनाओं में तो इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। वहाँ देवी, शिव अथवा भैरव को भोजन केवल समर्पित ही नहीं किया जाता, थाली में रखे व्यंजनों को नए सिरे से सजाया जाता है। उन व्यंजनों से त्रिकोण, चतुर्भुज ,व्यास ,षट्कोण और स्वस्तिक जैसी आकृतियाँ बनाई जाती है। कुछ ताँत्रिक साधक भोजन को छुरी या अँगुली से लकीर खींचकर भी संस्कारित करते हैं।इन उपायों के जरिये समझा जाता है कि अब भोजन विजातीय संस्कारों से मुक्त हो गया ।
साधना में जुटे हैं, वह वास्तव में स्तुत्य है। ऐसे व्यक्ति इहलोक में ही स्वर्ग-मुक्ति के उस आयाम को प्राप्त कर लेते हैं, जिसके लिए शास्त्रों में अन्य लोकों की चर्चा हैं।
साधना के अनुकूल भोजन चुनने का विकल्प नहीं रह जाता। स्वादिष्ट, मधुर चिकना और तला-गला जो भी भोजन तैयार किया जाता है वही ग्रहण करना होता है। दावतों में इसी तरह गरिष्ठ भोजन बनाया भी जाता है।
साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर करना होगा। इसके अलावा कोई और चारा है भी तो नहीं।
साधना करें लोकमंगल की ,
तभी धार हम मोड़ सकेंगे आने वाले कल की ,
साधना सबसे पहली शर्त है। आज हम प्रकृति की विभिन्न शक्तियों का संरचनात्मक नियोजन कर चाहे बाँध बनाकर, चाहे विभिन्न स्रोतों से उसका दोहन कर जनसाधारण जीवन को सुखी-समुन्नत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। विगत डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास विज्ञान की प्रगति का, प्रकृति के संसाधनों के दोहन व सुनियोजन का इतिहास है। किंतु जो भी इकॉलाजिकल अनुशासन प्रकृतिचक्र के विरुद्ध खड़ा होने की हिम्मत करेगा, वह उस महान् कर्मचक्र द्वारा निर्दयतापूर्वक कुचल दिया जाएगा, यह एक कड़ाई के साथ दी जा रही चेतावनी है, जो भगवान् के श्रीमुख से निकली है। मनुष्य जन्म मात्र भोगवादी जीवन, उपभोग प्रधान जीवन जीने के लिए नहीं है।
साधना नहीं, गुरुप्रसाद हैं, पूज्यवर लिखते हैं कि न इस स्थिति से डरें, न स्वयं को रोकें। यह स्वयं उनकी उपार्जित तप-साधना नहीं, गुरुप्रसाद हैं, इसे वे अगली पंक्ति में स्पष्ट करते हैं, जब लिखते हैं कि आपकी साधना पूर्णावस्था में पहुँचे, इसके लिए सारी शक्ति जिस एक केंद्र से प्रवाहित हो रही है, उसके उत्पादक-नियंता वे स्वयं हैं। हम यदि इस पत्र को एक-एक पंक्ति एक-एक शब्द को अपने लिए भी मार्गदर्शन मानकर चलें, तो ऐसे ही उच्चस्तरीय ध्यान-धारणा की उपलब्धियों के आनंददायी सुख हम भी प्राप्त कर सकते हैं। संभवतः इन शब्दों का ही चमत्कार था कि अनेक साधक अपनी जीवन-साधना को प्रखरतम बना सके।
साधना चालू रखें । “
साधना और सिद्धि भी है। यह भी सर्वमान्य है। निश्चित ही इस विद्या में अपनाए गए सिद्धाँतों में कुछ तथ्य की दृष्टि से सही सिद्ध नहीं होते। उदाहरण के लिए, पृथ्वी इस जगत का केंद्र नहीं है। जिसे आधार मानकर आकाश को बारह खानों में बाँटा गया और प्रत्येक खाने की राशि का नाम दिया गया।
साधना है। जो इसे भली प्रकार संपन्न कर लेता है, समझना चाहिए उसने सब कुछ पा लिया । यों ईश्वरप्राप्ति जीवन का चरम लक्ष्य है, पर जहाँ निर्दोष और निर्विकार सहयोग, सम्मान,यश, कीर्ति आदि हो, वहाँ भी ईश्वरीय अंश प्रकाशित हो रहा होता है, ऐसा आप्तवचन हैं। ऐसे में वह व्यक्ति चमत्कारिक ईश-विभूतियों को भले ही न पा सके , पर आत्मिक ऋद्धि और भौतिक सिद्धियों का स्वामी तो हो ही जाता है। इसीलिए सेवा को सर्वोपरि ईश्वर-उपासना कहा गया है।
साधनाओं में इतना ही ध्यान रखना पर्याप्त है कि भूख से काफी कम भोजन किया जाए। इतना नहीं खा लिया जाए कि उसके बाद शरीर भारी होने लगे। आलस्य आ जाए या स्थिरता से बैठा न जाए। ध्यान की विधि बताने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत आहार के संबंध में सावधानी बरतने के लिए कहते हैं। भगवद्गीता का अध्ययन करने वालों ने इन श्लोकों को कई बार दोहराया होगा, जिनमें कहा गया है कि वस्तुतः योग उसके लिए नहीं है, जो बहुत अधिक खाता है और न उसके लिए जो बिलकुल नहीं खाता।
साधना नहीं, न स्वयं को रोकें। यह स्वयं उनकी उपार्जित तप-साधना नहीं, गुरुप्रसाद हैं, पूज्यवर लिखते हैं कि न इस स्थिति से डरें, न स्वयं को रोकें। यह स्वयं उनकी उपार्जित तप-साधना नहीं, गुरुप्रसाद हैं, इसे वे अगली पंक्ति में स्पष्ट करते हैं, जब लिखते हैं कि आपकी साधना पूर्णावस्था में पहुँचे, इसके लिए सारी शक्ति जिस एक केंद्र से प्रवाहित हो रही है, उसके उत्पादक-नियंता वे स्वयं हैं। हम यदि इस पत्र को एक-एक पंक्ति एक-एक शब्द को अपने लिए भी मार्गदर्शन मानकर चलें, तो ऐसे ही उच्चस्तरीय ध्यान-धारणा की उपलब्धियों के आनंददायी सुख हम भी प्राप्त कर सकते हैं। संभवतः इन शब्दों का ही चमत्कार था कि अनेक साधक अपनी जीवन-साधना को प्रखरतम बना सके।
साधना-मार्ग नहीं है। सूर, तुलसी, मीरा, तुकाराम, समर्थ रामदास, चैतन्य महाप्रभु, नरसी भगत आदि संत-महात्माओं की प्रार्थनाएं प्रख्यात हैं। श्रद्धा-भक्ति से ओत-प्रोत होकर हृदय की गहराई से विश्वासपूर्वक थोड़े समय के लिए भी की गई प्रार्थना उतना ही प्रतिफल प्रदान करती है जितना कि योगी, यती, तपस्वी लंबे समय तक कष्ट-साध्य साधना-तपश्चर्या के द्वारा प्राप्त करे हैं। सच्ची प्रार्थना से अंतरात्मा के गहनतर भाग से एक आंतरिक दिव्य चैतन्य प्रकाश प्रस्फुटित होता है, जिस के लिए शास्त्रों में कहा गया है, “तमेव भान्तमनुमति सर्व तस्य भासा सकलं विभा” अर्थात् यही वही गूढ़ आँतरिक प्रकाश है, जो जगत् के समस्त चराचर प्राणियों को आलोक प्रदान करता है। प्रार्थना असय से सय की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने वाली दिव्य प्री है।
साधना सफलतापूर्वक आगे चल रही हैं । इसे आप माता का दर्शन ही समझे । मूर्ति के रूप में दर्शन होना सबके लिए आवश्यक नहीं किसी को प्रतिभा के रूप में दर्शन होता है। आपको प्रकाश रूप में जो साक्षत्कार हो रहा है, उसे माता का पूर्ण साक्षत्कार मानें । आपकी साधना सब प्रकार सफल है।
साधना दिनों-दिन प्रबल प्रखरता पाए।
साधनाएँ बिना गुरु के भी संपन्न की जा सकती हैं। उन्हें करने में कोई झंझट नहीं है। नाम−जप, स्तुति पाठ, स्मरण, कीर्तन आदि का क्रम चलाने में सतत् मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है। ये साधनाएँ एक बार गुरु से सुनकर, दीक्षा लेकर कहीं भी चलाई जा सकती हैं। तंत्र के संबंध में ऐसा नहीं है।
साधना करने वालों के विशेष प्रयोगों-अभ्यासों से समझाया है। सामान्य स्वास्थ्य के लिए सुबह टहलना, आधा घंटा दौड़ लेना, कुछ आसन आदि कर लेना और आहार-विहार में संयम रखना पर्याप्त है। जिन्हें शरीर को सुदृढ़, महाबली बनाना हो, उन्हें योग्य-समर्थ पहलवानों, उस्तादों की देख−रेख में घंटों नियमित व्यायाम करना पड़ता है। घंटों प्रतिदिन वर्षों तक अभ्यास करने के बाद वे कड़ी प्रतिद्वंद्विता में टिकी रहने वाली सामर्थ्य अर्जित कर पाते हैं। उस सामर्थ्य को स्थिर रखते हैं।
साधना के उपयुक्त बनाता है। दोनों ही स्थितियाँ आहार-विवेक से बनती हैं । जब ध्यान को यदि अपनी दिनचर्या का अंग बनाना हो तो इस विवेक को अपनाना ही पड़ेगा ।
साधना संप्रदायों में भोजन को समर्पित करने का विधान है। ताँत्रिक साधनाओं में तो इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। वहाँ देवी, शिव अथवा भैरव को भोजन केवल समर्पित ही नहीं किया जाता, थाली में रखे व्यंजनों को नए सिरे से सजाया जाता है। उन व्यंजनों से त्रिकोण, चतुर्भुज ,व्यास ,षट्कोण और स्वस्तिक जैसी आकृतियाँ बनाई जाती है। कुछ ताँत्रिक साधक भोजन को छुरी या अँगुली से लकीर खींचकर भी संस्कारित करते हैं।
साधना की।
साधना की धारा में रहकर ही उसकी मान्यताओं को पानी पी पीकर कोसने वालों के गोस्वामी जी कट्टर विरोधी थे। कबीर, दादू आदि संतों ने साकार उपासना और वेद-शास्त्रों की जमकर निंदा की थी। जायसी , कुतुबन , मंझन और उस्मान आदि सूफी संतों ने कहानी, उपाख्यान आदि से वैसा ही प्रतिपादन किया । गोस्वामी तुलसीदास ने ऐसे संतों के निदावाद की जमकर आलोचना की । उन्होंने कहा है-
साधना को पूर्ण बनाने के लिए हम यहाँ से शक्ति प्रेरित करते रहते हैं। आपका यह जन्म अंतिम हो, इसी में पूर्णता प्राप्त करें, ऐसा प्रयत्न हम कर रहे हैं।
साधना नहीं थे। मित्रों और संबंधियों ने सहयोग किया। आयुर्विज्ञान की पढ़ाई उत्साह से पूरी की। चैन्नई में शिक्षा पूरी करने के बाद वे 1923 में इंग्लैंड गए। वहाँ से कुछ समय बाद अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय की शोधवृत्ति मिल गईं।
साधना प्रधान जीवनचर्या में शक्ति नियोजित करने की प्रेरणा देती रही है। महाकाली की एक ही प्रेरणा है कि सभी बल की उपासना करें, मिल−जुल करें, ताकि अन्य से आगत आसुरी घटाटोप से जूझा जा सके। इन दिनों हमारी गुरुसत्ता के निर्देश के अनुरूप ही न केवल राष्ट्र व विश्व का सघन मंथन करने वाली तीर्थयात्राएँ संपन्न हुई, गाँवों से लेकर सींगीय स्तर तक सृजन संगठन प्रधान एक लाख से अधिक समारोह भी पूरी गरिमा के साथ संपन्न हुए। 108 संभागीय दीप महायज्ञों के माध्यम से परिष्कृत प्रतिभाएं उभरकर आई है। तथा नवसृजन लिए संकल्पित हुई है।
साधना शिव की तभी सफल है,
शिव की शक्ति भवानी हम पर कृपा-मेघ बरसाए।
साधना एवं अंतः आराधना बना लेने का इससे उत्तम स्तर का प्रशिक्षण और क्या हो सका है। संभवतः पाठकों को अब समझने में कठिनाई नहीं होगी कि कैसे कुछ गायत्री साधकों से आरंभ हुआ यह परिवार क्रमशः बढ़कर एक विराट् संगठन का विस्तार पाता चला गया।
साधनाएँ एक बार गुरु से सुनकर, दीक्षा लेकर कहीं भी चलाई जा सकती हैं। तंत्र के संबंध में ऐसा नहीं है। उस मार्ग पर चलते हुए मार्गदर्शन और संरक्षण की सतत् आवश्यकता है। उसके बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ा जा सकता, क्योंकि तंत्र-साधना करते हुए साधक का विकास तीव्रगति से होता है। सहज सामान्य विकास अपने ढंग से चलता रहता है, वहाँ कोई जोखिम नहीं।
साधना सब प्रकार सफल है। उसकी प्रगति एवं सफलता में किसी प्रकार का संदेह न किया करें ।”
साधना के क्षेत्र में निरंतर प्रगति करने के लिए प्रार्थना का महत्वपूर्ण स्थान हैं। श्रद्धासिक्त समर्पचा इसी का नाम हैं । प्रार्थना करना जिन्हें आ है वे योग, जप , तप आदि जैसे कष्टसाध्य उपक्रमों के बिना ही ईश्वर से वार्तालाप करने की सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक प्रणाली है, जिसमें न किसी मंत्र की , छंद की आवश्यकता पड़ती है और न किसी कर्मकाँड की । वह तो हृदय की, अंतःकरण की निश्छल पुकार है, जो सीधे परमात्मा तक पहुँचती हैं और बदले में प्रार्थी को कृतकृत्य करके छोड़ती है।
साधनाओं में ऊर्जावान चित, स्तर मनःस्थिति और सुदृढ़ मनोभूमि चाहिए । सौ में एकाध साधक ही यह स्थिति अर्जित कर पाते हैं। इसलिए जनसामान्य भक्तिमार्ग अपनाकर ही आत्मिक विकास कर सकता है। नाथ पंथियों और योग मार्गी सिद्धों के प्रभाव को क्षोभ से याद करते हुए गोस्वामी जी ने कहा, “ गोरख जगाए योग, भक्ति भगाए लोग।”
साधना पूर्णावस्था में पहुँचे, इसके लिए सारी शक्ति जिस एक केंद्र से प्रवाहित हो रही है, उसके उत्पादक-नियंता वे स्वयं हैं। हम यदि इस पत्र को एक-एक पंक्ति एक-एक शब्द को अपने लिए भी मार्गदर्शन मानकर चलें, तो ऐसे ही उच्चस्तरीय ध्यान-धारणा की उपलब्धियों के आनंददायी सुख हम भी प्राप्त कर सकते हैं। संभवतः इन शब्दों का ही चमत्कार था कि अनेक साधक अपनी जीवन-साधना को प्रखरतम बना सके।
साधना करते हुए साधक का विकास तीव्रगति से होता है। सहज सामान्य विकास अपने ढंग से चलता रहता है, वहाँ कोई जोखिम नहीं। लेकिन तंत्र एक विशिष्ट विधा हैं उसके अनुभव से गुजरते हुए सतत् देखभाल चाहिए।
साधनाओं में कामभाव का प्रत्यक्ष का परोक्ष उपयोग किया जाता है । उस तरह के प्रयोग उलझनों से भरे हुए है। दक्षिणमार्गी साधनाओं में साधक सहज सामान्य जीवन जीते हुए भी ऋषि की शुभकामना-आशीर्वाद या दिव्य शक्तियों से प्रार्थना को पुरी कर सकता है। इस युग में भी कई विभूतियों ने पत्नी को माँ के रूप में देखने या पति को पुत्र बना लेने वाली सिद्धियाँ हस्तगत की है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने विवाहित जीवन आरंभ करते ही पत्नी को महाशक्ति के रूप में देखा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2000-April
साधना से असंख्य मुमुक्षुओं को मार्ग मिलना था उनके योग का संदेश है कि साधक ही मुक्ति की कामना नहीं करता, मुक्त करने में उसका अपना पुरुषार्थ ही काम नहीं आता, दिव्य शक्तियाँ भी सहयोग करती हैं। मुक्त होने की तीव्र आकाँक्षा हो तो दिव्यचेतना भी उतरकर आती है और साथ ही पथप्रदर्शन करती है। श्री अरविंद की साधना जगत् हित के लिए भी थी, इसलिए कई दिव्य शक्तियाँ और मुक्त आत्माएं उनकी सहायता के लिए आती थी। श्री अरविंद जिन दिनों साधना कर रहे थे, उन दिनों रामकृष्ण परमहंस की ओर से संदेश आया, ‘मंदिर बनाओ,’ मंदिर बनाओ’।
साधना उपासना में प्रवृत्त होता है, तो उस मार्ग पर आगे तक पहुँची विभूतियाँ सहायता और पथप्रदर्शन के लिए दौड़ी आती है। श्री अरविंद के संबंध में कहते हैं कि उनकी साधना से असंख्य मुमुक्षुओं को मार्ग मिलना था उनके योग का संदेश है कि साधक ही मुक्ति की कामना नहीं करता, मुक्त करने में उसका अपना पुरुषार्थ ही काम नहीं आता, दिव्य शक्तियाँ भी सहयोग करती हैं। मुक्त होने की तीव्र आकाँक्षा हो तो दिव्यचेतना भी उतरकर आती है और साथ ही पथप्रदर्शन करती है। श्री अरविंद की साधना जगत् हित के लिए भी थी, इसलिए कई दिव्य शक्तियाँ और मुक्त आत्माएं उनकी सहायता के लिए आती थी। श्री अरविंद जिन दिनों साधना कर रहे थे, उन दिनों रामकृष्ण परमहंस की ओर से संदेश आया, ‘मंदिर बनाओ,’ मंदिर बनाओ’।
साधना में प्रवृत्त हुए और उन्हें सिद्ध संतों की कृपा मिलने लगी, तो एक प्रेरणा स्वामी रामकृष्ण परमहंस की ओर से भी आई। सूक्ष्मजगत का नियम है कि जब भी कोई निष्ठापूर्वक साधना उपासना में प्रवृत्त होता है, तो उस मार्ग पर आगे तक पहुँची विभूतियाँ सहायता और पथप्रदर्शन के लिए दौड़ी आती है। श्री अरविंद के संबंध में कहते हैं कि उनकी साधना से असंख्य मुमुक्षुओं को मार्ग मिलना था उनके योग का संदेश है कि साधक ही मुक्ति की कामना नहीं करता, मुक्त करने में उसका अपना पुरुषार्थ ही काम नहीं आता, दिव्य शक्तियाँ भी सहयोग करती हैं। मुक्त होने की तीव्र आकाँक्षा हो तो दिव्यचेतना भी उतरकर आती है और साथ ही पथप्रदर्शन करती है। श्री अरविंद की साधना जगत् हित के लिए भी थी, इसलिए कई दिव्य शक्तियाँ और मुक्त आत्माएं उनकी सहायता के लिए आती थी।
साधना करने वाला अपने आपको लक्ष्य के साथ लय कर देता है। इस तरह का तप विराट् आत्मचेतना में लीन कर देने के समान ही है।
साधना के बारे में कहूँगी। साधना माने अपना परिष्कार और उपासना माने भगवान् के समीप बैठना। अगर हम भगवान् के समीप बैठ रहे है, तो अपनी मलिनताओं को अपने दोष-दुर्गुणों को निकाल रहे हैं। ये तो हुई उपासना और साधना हुई अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए। यदि आपने साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं।
साधना कभी निष्फल नहीं जाती। यह एक उच्चकोटि का पुण्य-परमार्थ है तथा अदृश्य रूप में उनका (परमपूज्य गुरुदेव का) सतत् मार्गदर्शन उन्हें मिलता रहेगा। किसी भी साधक के लिए इससे स्पष्ट आश्वासन और क्या हो सकता है।
साधना माने अपना परिष्कार और उपासना माने भगवान् के समीप बैठना। अगर हम भगवान् के समीप बैठ रहे है, तो अपनी मलिनताओं को अपने दोष-दुर्गुणों को निकाल रहे हैं। ये तो हुई उपासना और साधना हुई अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए। यदि आपने साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं। यदि आपने अपने उपासना की है, साधना की है कि नहीं की है।
साधना सत्रों की शृंखला पुनः आरंभ हो जाएगी। महापूर्णाहुति के शांतिकुंज में होने वाले आयोजनों में सक्रिय भागीदारी करने वाले स्वयंसेवकों को 18-7-2000 के बाद शाँतिकुँज बुलाया जाएगा। इस बीच 27, 29, 30 अप्रैल को विभिन्न अश्वमेधों संस्कार महोत्सवों व प्रथम महापूर्णाहुति व श्रद्धाँजलि समारोह में भागीदारी करने वाले विभिन्न विभागों के प्रभारियों का एक त्रिदिवसीय सत्र शाँतिकुँज में रखा गया है। इस संबंध में परिजन पत्राचार कर भागीदारी सुनिश्चित करें। जिन्हें इस वर्ष गरमी के 7 दिवसीय सत्रों में आना है, पूर्व अनुमति लेकर ही रिजर्वेशन कराएँ।
साधना संबंधी मार्गदर्शन करते हुए परमपूज्य अपने एक साधक शिष्य को 1 नवंबर 1954 को लिखे एक पत्र में बताते हैं -
साधना की दृष्टि से इसका विशेष महत्व है। जिस तरीके से सोमवती अमावस्या को स्नान करने क्यों जाते हैं ? गंगा तो वही है ना। यों तो गंगा में जब भी नहाया जाएगा तब ही उसका महत्व है, लेकिन विशेष पर्व का विशेष महत्व होता है। जिस तरीके से कुँभ लगता है और कुँभस्नान का विशेष महत्व होता है, उसी प्रकार साधना की दृष्टि से नवरात्रि का भी विशेष महत्व है।
साधना में ही - कर्म में ही भगवत्पूजा की। ऐसे में मन में व्यामोह पैदा होना, असमंजस होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में हमें पुनः भगवत्स्वरूप गुरुवर योगेश्वर की शरण में जाकर उनसे उनकी ही कही उस उलटबाँसी की व्याख्या हेतु निवेदन करना चाहिए।
साधनाएँ विशेष फलवती सिद्ध होती हैं। प्रजा परिजन आरंभ से ही नवरात्रियों में बरसने वाले इन अनुदानों से लाभान्वित होते रहे हैं।
साधना मार्ग को अवरुद्ध किए रहने वाले व्यवधान से भी छुटकारा मिल जायगा। यह शरीरगत उपवास हुआ। मनोगत उपवास यह है कि आहार को प्रसाद एवं औषधि की तरह श्रद्धा भावना से ग्रहण किया जाए। आध्यात्मिक दृष्टि से सात्विक आहार वह है, जो ईमानदारी और मेहनत के साथ कमाया गया है। उपवास का अपना तत्वज्ञान है।
साधना किसी भी प्रकार की हो लौकिक अथवा आध्यात्मिक, पथप्रदर्शक की आवश्यकता दोनों ही दिशा में रहती है। अध्यात्म मार्ग में तो वह और भी जरूरी है। महर्षि कहा करते थे कि लौकिक सफलता का मार्ग जमीन पर बनी हुई सड़क की तरह है। एक बार समझ लिया जाए, तो आराम से चलते रह सकते हैं। अध्यात्म का क्षेत्र खुले आकाश की तरह है।
साधना और अनुष्ठान आदि किए जाएं, सेवाकार्य या सामाजिक उद्देश्यों में लीन रहते हुए भी व्यक्ति उसी स्तर पर पहुँच सकता है, जिन पर गहन साधनाएं पहुँचाती है। आवश्यकता इतनी ही है कि समाज साधना निष्काम भाव से चलती रहे। एक बार जमनालाल बजाज उनके आश्रम में आए। आश्रम उन दिनों अध्यात्मिक गतिविधियों के लिए विख्यात था। उन्होंने पूछा- क्या स्वराज के लिए काम करना और इच्छा रखना उचित है ?
साधनाओं के विशिष्ट परिणाम भी मिलने वाले हैं। यह तथ्य ध्यान में रखने के साथ साथ यह रहस्य भी हृदयंगम किया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी रहने वाली सिद्धियों की दृष्टि से नवरात्रि अनुष्ठानों का मर्म दस अवसर पर किए जाने वाले अनुशासनों के साथ जुड़ा हुआ है। अनुष्ठान का अर्थ ही है- विशेष साधना, जिसमें कुछ तपश्चर्याएं भी जुड़ी रहती है, उन्हें न अपनाने पर वह साधारण उपासना मात्र रह जाती है, अनुष्ठान नहीं कहलाती।
साधना में विघ्न नहीं फैलाते।”
साधना है कि कोई भी टोना-टोटका जादू-तंत्र उसके सामने निष्प्रभावी ही रहती है। इतना संरक्षण गुरुसत्ता का मिलने के बाद शिष्य निश्चित हो जाता है। यह पत्र न केवल उन सज्जन ( श्री शिवशंकर गुप्ता नई दिल्ली व उनके भाई) के लिए एक शिक्षण के रूप में था, आज भी इतने वर्षों बाद भी हम सबके लिए जो समय-समय पर भटक जाते हैं- एक प्रकार से लोकशिक्षण का एक नमूना है।
साधना करने से किसी की गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती। यह एक उच्चकोटि का पुण्य-परमार्थ है तथा अदृश्य रूप में उनका (परमपूज्य गुरुदेव का) सतत् मार्गदर्शन उन्हें मिलता रहेगा। किसी भी साधक के लिए इससे स्पष्ट आश्वासन और क्या हो सकता है।
साधनाक्रम दो बार में पूरा किया जा सकता है। नवरात्रि के इस गायत्री अनुष्ठान में सुख शाँति, समुन्नति, आत्मकल्याण तथा पारमार्थिक प्रयोजनों की पूर्ति के सभी बीज विद्यमान हैं।
साधना की पूर्ति करते हैं। उन्होंने एक श्रद्धालु से गुय का अर्थ बताते हुए कहा था-
साधना निष्फल नहीं जाती। मंत्रलेखन आप जारी रखें। जो मंत्र लिखे हैं, सो भेज दें और उस प्राँत में गायत्री प्रचार के लिए कुछ विशेष परिश्रम करें। यह एक बहुत ही उच्चकोटि का पुण्य परमार्थ होगा।
साधना में लगता हुआ चला जाता है। यदि किसी साधक का मन नहीं लगता, तो हम यह मानकर चलेंगे कि वह भौतिक जंजालों में फँसा हुआ है, इसलिए उसका मन भगवान् की गायत्री माता की उपासना में नहीं लग रहा है। उपासना में दिलचस्पी है या नहीं, उसमें कैसे फर्क माना जाए। इसकी पहचान साधक की मनोभूमि और अंतःकरण के आधार पर की जायगी। अंतःकरण अर्थात् उसकी भूमि कैसी है ?
साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं। यदि आपने अपने उपासना की है, साधना की है कि नहीं की है। उपासना की है, तो आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए और आपके द्वारा दूसरों को भी ऊँचा उठना चाहिए।
साधनाओं द्वारा नहीं मिल पाता। सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि इस ऋतुकाल में विशिष्ट प्रकार का चैतन्य प्रवाह प्राणऊर्जा प्रवाह सूक्ष्मजगत् में चलता है, जिसे गायत्री अनुष्ठान के माध्यम से साधक खीचते, धारण करते और अपनी शक्ति बढ़ाते हैं। नवरात्रियों में सूक्ष्म प्रकृति से जो दिव्य अनुदान बरसते हैं, उन अनुदानों के प्रभाव से आत्मिक प्रगति की दिशा में की गई साधनाएँ विशेष फलवती सिद्ध होती हैं। प्रजा परिजन आरंभ से ही नवरात्रियों में बरसने वाले इन अनुदानों से लाभान्वित होते रहे हैं।
साधना का अवलंबन-शब्दशक्ति के प्रयोग-यज्ञविज्ञान की उपचार प्रक्रिया का अवलंबन इसके अंतर्गत आता है। जो भी घटक पर्यावरण को बिगाड़े, उसके विरुद्ध एक आँदोलन।
साधना इतनी प्रखर बन जाए कि साधक का व्यक्तित्व नवसृजन के लिए ईश्वर के साथ साझेदारी में युगधर्म के निर्वाह में सक्षम हो जाए। आत्मशक्ति के निखार से ही युगशक्ति का उद्भव होगा। इसी के प्रशिक्षण समग्र रूप में जन-जन तक विस्तार हेतु देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का एक प्रभाग भाषा एवं धर्म विद्यालय के रूप में खोला जा रहा है।
साधना में लीन होने लगे।
साधना संबंधी अनेकानेक भ्राँतियाँ जन-जन के मन में थीं। उन्हें निताँत निर्मूल कर हमारी गुरुसत्ता ने कभी पत्रों द्वारा, कभी उद्बोधन से, कभी लेखनी से पत्रिका द्वारा इस सीमा तक झकझोरा कि वे सारे रूढ़िवादी बंधन मिटते चले गए। आज प्रायः सारे उत्तर व मध्य भारत में, उड़ीसा, गुजरात आदि क्षेत्रों में इस संबंध में काफी जागरुकता मिलती है। गायत्री मंत्र के कई प्रकार में आडियो कैसेट बनकर तैयार हैं। जिसे कभी जोर से कहने का निषेध किया जाता था, आज वह जन-जन तक ध्वनि-विस्तारक द्वारा पहुँच रहा है।
साधना जगत् हित के लिए भी थी, इसलिए कई दिव्य शक्तियाँ और मुक्त आत्माएं उनकी सहायता के लिए आती थी। श्री अरविंद जिन दिनों साधना कर रहे थे, उन दिनों रामकृष्ण परमहंस की ओर से संदेश आया, ‘मंदिर बनाओ,’ मंदिर बनाओ’।
साधनासत्र में आ करके उपासना करना सार्थक हो जाएगा। यह तप विचार-संयम है। विचारों को भटकने मत दें। विचारों की शक्ति आप समझते नहीं हैं। पैसे की शक्ति समझते हैं, विचारों को क्यों नहीं समझते ?
साधना-उपचारों को ही दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, मंदिर के बाहर परकोटे और परिक्रमा में रतिक्रीड़ा चित्रित करती मूर्तियां है। इस तरह की मूर्तियां और मुद्राएं कहीं और चित्रित होती, तो उन्हें देखकर मन में निश्चित रूप से कामविकार उत्पन्न होता। लेकिन कोणार्क के बाहर बनी मुद्राओं के संबंध में ऐसा नहीं है। उन्हें शांतचित्त से देखने पर गर्भगृह में पहुँचने पर साधकों को ध्यान की गहरी अनुभूति हुई है।
साधना और अध्यात्म का वैभव साथ लेकर आए थे। उन्हें बचपन से ही समाधि लगने लगी थी। या तो वे गहन ध्यान में डूबे रहते अथवा सोए रहते। सत्रह वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड़ दिया। तिरुवन्नामलाई में मीनाक्षी मंदिर में जाकर संन्यास ले लिया।
साधना निष्काम भाव से चलती रहे। एक बार जमनालाल बजाज उनके आश्रम में आए। आश्रम उन दिनों अध्यात्मिक गतिविधियों के लिए विख्यात था। उन्होंने पूछा- क्या स्वराज के लिए काम करना और इच्छा रखना उचित है ? उसके लिए प्रयत्न करने पर आत्मविकास में बाधा आती है ?
साधना-उपचार के अनुष्ठान भी किए जाते हैं, वे मंदिर को आरंभ से ही ऊर्जावान बनाते हैं।
साधना करने वाले अनुभव करते हैं कि इन दिनों किया गया पुरुषार्थ तत्काल कुछ न कुछ चमत्कारी परिणाम दर्शाता है। इस प्रकार के दैवी चमत्कारों की एक ही पृष्ठभूमि है-उत्कृष्ट चिंतन को आदर्शवादी उपक्रम में उभारने वाला पराक्रम-पुरुषार्थ। जो इसे हजम कर पाते हैं, वे ही विभूतिवान् और सिद्धपुरुष कहलाते हैं।
साधना लोकमंगल के निमित्त नियोजित करने वाले ही इसमें भागीदारी करेंगे।
साधना में अधिकाधिक प्रखरता का समावेश किया जा सके। तपश्चर्याओं के तत्वदर्शन का सार संक्षेप यही है कि आदर्शवादी उद्देश्यों के लिए स्वेच्छापूर्वक कष्ट सहन किया जाए और उस अवसर पर संकल्पशक्ति एवं आस्था को परिपक्व बनाया जाए। इस प्रकार की निष्ठा एवं सत्साहस ही मनोबल की वृद्धि करते हैं तथा उच्चस्तरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए ऊर्जाभंडार की तरह काम आते हैं।
साधना शिविरों में बुलाने का उद्देश्य था, आपको तपस्वी बनाना। आप यहाँ से जाएँ, तो तपस्वी होकर जाएँ। यहाँ हैं, तो तपस्वी होने का अभ्यास करे। तपश्चर्या में कितनी शक्ति भरी पड़ी है ? इसका वर्णन मैंने अभी आपसे किया।
साधना कर रहे थे, उन दिनों रामकृष्ण परमहंस की ओर से संदेश आया, ‘मंदिर बनाओ,’ मंदिर बनाओ’।
साधना-अनुष्ठान तक वहाँ जो प्रवृत्तियाँ चलती रहीं, जो प्रयास किए गए, उनके संस्कार अवशेष रूप में मंदिर को टिकाए रहे। यदि वह पूर्ण जाग्रत् होता, तो वहाँ जाने वाले पर्यटकों को आत्मिक उत्थान की दिशा में बढ़े बिना चैन नहीं पड़ता। मंदिर किसी समय जीवंत हरा होगा। उसकी सामर्थ्य और जीवनीशक्ति के बारे में यह आँशिक प्रमाण ही है कि तूफान जिसने पूरे इलाके में प्रलय मचा दी और कोणार्क का कुछ नहीं बिगड़ा। मात्र कोणार्क ही क्यों, बहुसंख्य मंदिर-उपासनागृह निताँत सुरक्षित बने रहे।
साधना के सूत्रों का अभ्यास करना चाहिए। यह साधना इतनी प्रखर बन जाए कि साधक का व्यक्तित्व नवसृजन के लिए ईश्वर के साथ साझेदारी में युगधर्म के निर्वाह में सक्षम हो जाए। आत्मशक्ति के निखार से ही युगशक्ति का उद्भव होगा। इसी के प्रशिक्षण समग्र रूप में जन-जन तक विस्तार हेतु देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का एक प्रभाग भाषा एवं धर्म विद्यालय के रूप में खोला जा रहा है।
साधना की दृष्टि से नवरात्रि का भी विशेष महत्व है।
साधना को प्रखर बनाने एवं साधक की निष्ठा परिपक्व करने के लिए अनुष्ठानों में जो नियम अनुबंध रखे गए है, उन्हें ‘व्रत’ कहते हैं। इन व्रतों के पालन की परंपरा शास्त्रकारों ने इस दृष्टि से बनाई है कि साधना में अधिकाधिक प्रखरता का समावेश किया जा सके। तपश्चर्याओं के तत्वदर्शन का सार संक्षेप यही है कि आदर्शवादी उद्देश्यों के लिए स्वेच्छापूर्वक कष्ट सहन किया जाए और उस अवसर पर संकल्पशक्ति एवं आस्था को परिपक्व बनाया जाए। इस प्रकार की निष्ठा एवं सत्साहस ही मनोबल की वृद्धि करते हैं तथा उच्चस्तरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए ऊर्जाभंडार की तरह काम आते हैं।
साधना की है कि नहीं की है। उपासना की है, तो आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए और आपके द्वारा दूसरों को भी ऊँचा उठना चाहिए।
साधना-उपासना के कारण तेजस् इतना घनीभूत था कि लाख प्रयत्न करते हुए भी कोई उसे नष्ट नहीं कर सका। जो पुजारी घोड़ों की टापों से कुचल दिए गए, वे युद्ध भी कर सकते थे। लेकिन किन्हीं गुह्य कारणों से उन्होंने आत्मोत्सर्ग का मार्ग चुना। उनके बलिदान से मंदिर युद्धभूमि में बदलने से बच गया।
साधना का जा लाभ मिलता है, वह अन्य अवसरों पर की गई साधनाओं द्वारा नहीं मिल पाता। सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि इस ऋतुकाल में विशिष्ट प्रकार का चैतन्य प्रवाह प्राणऊर्जा प्रवाह सूक्ष्मजगत् में चलता है, जिसे गायत्री अनुष्ठान के माध्यम से साधक खीचते, धारण करते और अपनी शक्ति बढ़ाते हैं। नवरात्रियों में सूक्ष्म प्रकृति से जो दिव्य अनुदान बरसते हैं, उन अनुदानों के प्रभाव से आत्मिक प्रगति की दिशा में की गई साधनाएँ विशेष फलवती सिद्ध होती हैं। प्रजा परिजन आरंभ से ही नवरात्रियों में बरसने वाले इन अनुदानों से लाभान्वित होते रहे हैं।
साधनाएं पहुँचाती है। आवश्यकता इतनी ही है कि समाज साधना निष्काम भाव से चलती रहे। एक बार जमनालाल बजाज उनके आश्रम में आए। आश्रम उन दिनों अध्यात्मिक गतिविधियों के लिए विख्यात था। उन्होंने पूछा- क्या स्वराज के लिए काम करना और इच्छा रखना उचित है ?
साधना और धर्मधारणा के समतुल्य ही बताते। उसमें निष्ठापूर्वक लगे रहने के लिए प्रेरित करते। यहाँ तक कि वे सेवा को भी योग का सरल उपाय बताते थे। उनके अनुसार समाज और लोक की सेवा करते हुए भी व्यक्ति अध्यात्म के उच्चलक्ष्य पर पहुँच सकता है। जरूरी नहीं कि उच्चकोटि की तप−साधना और अनुष्ठान आदि किए जाएं, सेवाकार्य या सामाजिक उद्देश्यों में लीन रहते हुए भी व्यक्ति उसी स्तर पर पहुँच सकता है, जिन पर गहन साधनाएं पहुँचाती है।
साधना पूरे नौ दिन की होती है। नवरात्रि नाम ही इसलिए दिया गया है कि उस तिथियों की घट बढ़ को कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इन दिनों की विशेष उपासनाएँ इस प्रकार हो सकती हैं-
साधना, जिसमें कुछ तपश्चर्याएं भी जुड़ी रहती है, उन्हें न अपनाने पर वह साधारण उपासना मात्र रह जाती है, अनुष्ठान नहीं कहलाती।
साधना की चमत्कारी परिणति का लाभ ले सकना तनिक भी कठिन नहीं है।
साधना - उपासना पद्धति भले ही भिन्न क्यों न हो, सभी को जीवन साधना के सूत्रों का अभ्यास करना चाहिए। यह साधना इतनी प्रखर बन जाए कि साधक का व्यक्तित्व नवसृजन के लिए ईश्वर के साथ साझेदारी में युगधर्म के निर्वाह में सक्षम हो जाए। आत्मशक्ति के निखार से ही युगशक्ति का उद्भव होगा। इसी के प्रशिक्षण समग्र रूप में जन-जन तक विस्तार हेतु देवसंस्कृति विश्वविद्यालय का एक प्रभाग भाषा एवं धर्म विद्यालय के रूप में खोला जा रहा है।
साधना भी नियमित रूप से चलती रहे।
साधना से लेकर जीवन व्यापार संबंधी सही समय पर दिए गए मार्गदर्शन ने परिजनों को दिशा दी एवं वे गायत्री परिवार के अभिभावक संरक्षक आचार्यजी से जुड़ते चले गए। जुड़ाव भी घर के एक बुजुर्ग सदस्य जैसा। समय समय पर परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अपने परिजनों को लिखे गए पत्रों से सही दिग्दर्शन मिलता है।
साधना के दिनों जिन अनुशासनों, व्रतों या तपश्चर्याओं का पालन किया जाता है, उनमें से पाँच प्रमुख हैं। ये हैं-उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, अपनी शरीर सेवा स्वयं करना और चमड़े की वस्तुओं चमड़े के बने जूते चप्पल, कोट, बैग, बेल्ट आदि का परित्याग। यथा-संभव इन नियमों, व्रतों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। परंतु परिस्थितिवश यह संभव न हो तो उसमें कुछ सरलता बरतने की गुंजाइश भी है। कृच्छ चाँद्रायण और सौम्य चाँद्रायण व्रत का अंतर जो जानते हैं, वे इस तथ्य से भली-भाँति अवगत हैं कि साधक की शारीरिक, मानसिक एवं सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप व्रतबंधों में ढील रखने का प्रावधान भी रखा गया है।
साधना हुई अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए। यदि आपने साधना की है, तो अपने व्यक्तित्व को बनाया या नहीं। यदि आपने अपने उपासना की है, साधना की है कि नहीं की है। उपासना की है, तो आपका व्यक्तित्व बनना चाहिए और आपके द्वारा दूसरों को भी ऊँचा उठना चाहिए।
साधना के स्तर पर इस मिशन के - विराट् गायत्री परिवार के नींव के पाए विनिर्मित कि गए हैं।
साधना के क्षेत्र में सफल होने के लिए इन्हीं चीजों की आवश्यकता है। संकल्प, प्रगाढ़ संकल्प मन की सोई हुई शक्तियों को जगा देता है। मन आकाश में संव्याप्त ऊर्जा को सोखता और घनीभूत करता है। घनीभूत ऊर्जा प्रकृति के हज न्रपरह करे गति देती है और दीर्घकाल में मिलने वाले परिणाम कुछ ही समय में दिखाई देने लगते हैं।
साधनाक्रम ठीक चल रहा है, उसे चालू रखें। हमारा मार्गदर्शन आपको अदृश्य रूप से बराबर प्राप्त होता रहेगा। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।
साधनाओं में शक्तिसंचय करने की दृष्टि से नवरात्रि पर्व का असाधारण महत्व है। गायत्री उपासक चैत्र एवं आश्विन नवरात्रियों में अपनी आँतरिक संपदा बढ़ाने के लिए गायत्री अनुष्ठान करते हैं। इस संधिवेला में साधना का जा लाभ मिलता है, वह अन्य अवसरों पर की गई साधनाओं द्वारा नहीं मिल पाता। सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि इस ऋतुकाल में विशिष्ट प्रकार का चैतन्य प्रवाह प्राणऊर्जा प्रवाह सूक्ष्मजगत् में चलता है, जिसे गायत्री अनुष्ठान के माध्यम से साधक खीचते, धारण करते और अपनी शक्ति बढ़ाते हैं। नवरात्रियों में सूक्ष्म प्रकृति से जो दिव्य अनुदान बरसते हैं, उन अनुदानों के प्रभाव से आत्मिक प्रगति की दिशा में की गई साधनाएँ विशेष फलवती सिद्ध होती हैं।
साधना की गहराइयों में, ज्ञान के महासागर में डूबकियाँ लगवाते हैं, तो कभी कहते हैं कि सेवाधर्म ही श्रेष्ठतम है। लगता है कि यह सब लौकिक प्रपंच क्यों ? कर्म किसलिए, जब ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं, इससे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं तो नहीं कर्म करने की आवश्यकता क्यों है ?
साधना करते हैं, उनके लिए नवरात्रि साधना की चमत्कारी परिणति का लाभ ले सकना तनिक भी कठिन नहीं है।
साधनाओं का विशेष महत्व हैं। इन साधनाओं के विशिष्ट परिणाम भी मिलने वाले हैं। यह तथ्य ध्यान में रखने के साथ साथ यह रहस्य भी हृदयंगम किया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी रहने वाली सिद्धियों की दृष्टि से नवरात्रि अनुष्ठानों का मर्म दस अवसर पर किए जाने वाले अनुशासनों के साथ जुड़ा हुआ है। अनुष्ठान का अर्थ ही है- विशेष साधना, जिसमें कुछ तपश्चर्याएं भी जुड़ी रहती है, उन्हें न अपनाने पर वह साधारण उपासना मात्र रह जाती है, अनुष्ठान नहीं कहलाती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-July
साधना पूरी हो जाने पर अनेक प्रयोगों में मुझे आश्चर्यजनक सफलता दिखाई दी है। विषाक्त कीटाणुओं, रोग दर्द उन्माद आदि से पीड़ित व्यक्तियों को अच्छा कर देना, पथ भ्रष्टों में सुबुद्धि उत्पन्न होना, वस्तुओं का पारदर्शक दीखना आदि। मेरे लिए गायत्री की साधना सर्वश्रेष्ठ और सर्व सुलभ सिद्ध हुई है।
साधना को भोजन करने जैसा दैनिक कृत्य नियुक्त किया गया है।
साधना काल में हमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य सब साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
साधना भ्रष्ट होने के कारण कोई विपत्ति सिर पर आ जाती है।
साधना किया करता था, तब मुझे बड़े दिव्य अनुभव होते थे। एक रात्रि को मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि दक्षिण दिशा से कोई सितार पर गाता हुआ मेरी कुटी के निकट आया और कुछ देर ठहर कर उत्तर दिशा की ओर चला गया। उठकर देखना चाहा तो अपने को असमर्थ पाया। शरीर ऐसा जड़ हो गया था जैसे लोहे की जंजीरों से जकड़ा हुआ हो। जब वह संगीत काफी दूर चला गया तब उठ सका वह उस समय प्रत्यक्ष दर्शन के लिए कुछ न था।
साधना करने का आदेश किया। नियत विधि-विधान के साथ मैंने काशी के मणिकर्णिका घाट पर अनुष्ठान आरम्भ कर दिया। ग्यारहवें दिन से ही मुझे दिव्य से अनुभव होने लगे। स्वप्न में मुझे एक दिव्य मूर्ति देवी के दर्शन होते वह मुझसे कुछ कहती, उसके होंठ हिलते, पर मेरी समझ में कुछ न आता। यह स्वप्न बार -बार दिखाई दिया।
साधना के परिणामों को स्थूल दृष्टि से नापना शुरू किया था, नवीनता के अभाव में मन ऊबने लगा तो उत्साह ठंडा पड़ जाता है। देखा है कि पिपीलिका मार्ग पर चलने वाले साधक कुछ समय पश्चात हतोत्साह हो जाते हैं और अपना प्रयत्न छोड़ बैठते है। हठ योग का मार्ग कष्ट साध्य है। उसमें इतनी गर्मी में अपने का तपाना होता है कि यदि साधक में पर्याप्त साहस, धैर्य और शौर्य न हो तो उसके पैर लड़खड़ा जाते हैं और थोड़ा बहुत आगे चल कर वह बैठ जाता है। तंत्र शीघ्र फलदाता है पर उसमें खतरे काफी हैं।
साधना से यह कुसंस्कार उखड़ जाते हैं जिससे उन विषवृक्षों का वन नष्ट हो जाता है जो भविष्य में अपने लिए अथवा दूसरों के लिए घातक परिणामों को उपस्थित करता है।
साधना का लेख छपा था उसी के अनुकूल मैंने सवा लक्ष गायत्री मंत्र का अनुष्ठान पन्द्रह दिन में पूरा करने का संकल्प किया और पंद्रहवें दिन गायत्री मंत्र से हवन कराके ब्राह्मण भोजन कराया। अब डेढ़ वर्ष हो चुका है मेरी स्त्री पूर्ण स्वस्थ रहती है। ईश्वर की कृपा से रोग के बाद एक बालक पैदा हुआ है और मैं अगर गायत्री मंत्र से किसी को झाड़ दूँ तो वह अच्छा हो जाता है।
साधना करता हूँ मैंने इसका लाभ स्वयं आँखों देखा है। मेरे विद्यार्थी जीवन का अनुभव है कि मैं कक्षा 10 में अध्ययन करता था कि दैवी कुचक्र से छमाही परीक्षा के समय मेरे परिवार के आधार मेरे ताऊजी का स्वर्गवास हो गया। परीक्षा न दे सका और इसके 3 माह बाद ही मेरे पिताजी का देहान्त हो गया। मेरे अध्ययन में महा संकट उपस्थित हुए जब मेरे पिताजी का देहान्त हुआ वार्षिक परीक्षा के केवल 25 दिन रह गये थे। परन्तु मैं इसी महा मंत्र के विश्वास पर डटा रहा पिताजी की क्रिया समाप्त कर परीक्षा देने गया सफल होने की कोई आशा न थी पर परीक्षा के पश्चात ग्रीष्मावकाश में मैंने इस महामंत्र की साधना बढ़ा दी और इसी के प्रभाव से मैं परीक्षा में सफल हो गया।
साधना क्षेत्र में और किसी साधना का इतना सर्व सम्मत समर्थन नहीं हुआ जितना कि गायत्री का हुआ है अपने अपने ढंग से सभी ने उसका समर्थन किया है। आगे कुछ ऐसे ही अभिवचन दिये जाते हैं जिससे पाठक गायत्री के सम्बन्ध में आर्ष ग्रन्थों और आप्त पुरुषों का अभिमत जान सकें।
साधना करने वालों को अवश्य ही आशाजनक लाभ होगा।
साधनाओं में आता है।
साधना करता था, जितने दिन मैंने साधना की उतने दिन एक प्रकार का उल्लास सा मेरे दिल में बना रहता था और आनन्द मय दिन व्यतीत करता था।
साधना के तौर पर गायत्री का जप बताया है।”
साधना सर्वश्रेष्ठ और सर्व सुलभ सिद्ध हुई है।
साधना काल में हमें व्यक्तिगत रूप से कितने ही अनुभव हुए हैं। राजमार्ग में-पिपीलिका मार्ग में कथा, कीर्तन, संध्या, पूजा, प्रमुख हैं। इस मार्ग पर साधक को एक निष्ठा के साथ लम्बे समय तक चलते रहने की तैयारी करनी पड़ती है। यदि उसका मन फल की ओर झुका या साधना के परिणामों को स्थूल दृष्टि से नापना शुरू किया था, नवीनता के अभाव में मन ऊबने लगा तो उत्साह ठंडा पड़ जाता है। देखा है कि पिपीलिका मार्ग पर चलने वाले साधक कुछ समय पश्चात हतोत्साह हो जाते हैं और अपना प्रयत्न छोड़ बैठते है।
साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
साधनाएं करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अनेक सुयोग्य और कई अयोग्य गुरुओं के संरक्षण में हमने अनेकों, दीर्घकालीन कष्ट साध्य साधनाएं की हैं, अनेकों तपश्चर्याओं में अपने को काफी तपाया है। इस लम्बे साधना काल में हमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य सब साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
साधना का वर्णन इस प्रकार किया है-
साधना से सब पापों की और सब दुखों की निवृत्ति के अनेक प्रमाण मिलते हैं जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं-
साधना की, जब पुरश्चरण समाप्त हुआ तो अर्ध रात्रि को भगवती गायत्री ने बड़े दिव्य स्वरूप में उन्हें दर्शन दिये और वर दिया कि तुम्हारे सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। तुम्हारे इस घर में ही अमुक स्थान पर एक स्वर्णघट रखा हुआ है उसे निकाल कर अपनी दरिद्रता दूर करो। तुम्हें शीघ्र ही पुत्र भी प्राप्त होगा। यह कह कर गायत्री देवी अंतर्ध्यान हो गईं । पं0 जी ने स्वर्ण से भरा हुआ घड़ा निकाला और वे निर्धन से धन पति हो गये।
साधनाएं की हैं, अनेकों तपश्चर्याओं में अपने को काफी तपाया है। इस लम्बे साधना काल में हमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य सब साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
साधना समझ कर उसकी उपेक्षा न करो वरन् एक अनिवार्य नित्यकर्म समझ कर प्रतिदिन कई कई बार उसमें गर्भित तथ्य को अपने अन्तःकरण में धारण करो। बुद्धि की शुद्धि करना, उसे सात्विक बनाना, आत्म निर्माण का सर्व प्रथम कार्य है, गायत्री इसकी शिक्षा देती है और सफलता प्रदान करने का मार्ग बताती है। यह इतना बड़ा लाभ है जिसकी तुलना और किसी लाभ से नहीं हो सकती। बुद्धि की शुद्धता प्राप्त होने पर आत्मिक आनंदों का समुद्र उमड़ पड़ता है और साथ ही भौतिक जगत् में जो उन्नति होती है वह स्थायी, एवं प्रतिष्ठा युक्त होती है, उस समृद्धि को भोगने से मनुष्य को भोग का सच्चा आनन्द मिलता है। अशुद्ध बुद्धि से उपार्जित किये हुए भोग ऐसे हैं जैसे शरीर में बादी भर जाने से उसका फूल कर फफ्फस हो जाना, ऐसे फूल कर फफ्फस हुए मनुष्य बाहर से चाहे कैसे ही मोटे दिखाई पड़े पर भीतर से उनका वह मोटापा उनके लिए भार स्वरूप, कष्टदायी होता है।
साधना का केन्द्र गायत्री को नियुक्त किया है। सवा करोड़ जप का पुरश्चरण कर चुकने पर हमें दृढ़ विश्वास हो गया है कि इससे कम परिश्रम और कम खतरे में इससे अधिक सत्य परिणाम उपस्थित करने वाला साधन शायद ही कोई होगा। जो सत्य परिणाम हमारे स्वयं के अनुभव में आये हैं उन सबका वर्णन यहाँ संभव नहीं, पर इतना कहा जा सकता है कि आत्मिक पवित्रता, ईश्वर की ओर प्रगति, तथा कष्ट ग्रस्त व्यक्तियों की सेवा में गायत्री शक्ति ने हमें महत्वपूर्ण सहायताएं दी हैं और संकटपूर्ण क्षणों में हमारा प्रत्यक्ष पथ प्रदर्शन किया है।
साधना द्वारा राजसिक फल चाहते हैं। बहुत कम संख्या के लोग सत् प्रधान हैं, इसलिए ईश्वर प्राप्ति के लिए विरले ही साधना को पकड़ते हैं। तीनों मार्ग की साधनाएं साधारणतः अलग अलग हैं। कई बार तो उनमें भारी अंतर होता है। राजमार्गी को अहिंसा का पालन करना होता है।
साधना में ढील करते हों उन्हें सावधान होकर इस श्रेष्ठ उपासना में प्रवृत्त होना चाहिए।
साधना काल में तलवार की धार पर होकर गुजरना होता है। थोड़ी भी भूल हो जाने पर अनर्थ हो सकता है। उस साधना के समय में विशेष रूप से ऐसे भय और प्रलोभन उपस्थित होते हैं जिससे फिसल जाने से सारा प्रयत्न निष्फल हो जाता है और साधना भ्रष्ट होने के कारण कोई विपत्ति सिर पर आ जाती है।
साधनाएं साधारणतः अलग अलग हैं। कई बार तो उनमें भारी अंतर होता है। राजमार्गी को अहिंसा का पालन करना होता है। राजमार्गी को अहिंसा का पालन करना होता है दूसरी ओर तंत्र मार्गी शाक्त, पशु बलि करने से भी नहीं हिचकते।
साधनाएं निर्वाध हैं। कथा, कीर्तन, भजन, व्रत, उपवास से आत्म शुद्धि होती है। इन्हें निरंतर करते रहने से मन के कषाय कल्मष दूर होते जाते हैं। यह पिपीलिका मार्ग कहलाता है। चींटी धीरे धीरे चलती हुई भी कालान्तर में सुदूर देशों की यात्रा कर लेती है।
साधना के समय मेरे मुकदमे की एक तारीख थी, जिसमें मैं नहीं जा सकता था और जो एक महत्वपूर्ण मुकदमा था, वह भी मेरे अनुकूल हुआ, क्योंकि उस दिन दूसरे फरीक का वकील ही गैर हाजिर हो गया।
साधना को पकड़ते हैं। तीनों मार्ग की साधनाएं साधारणतः अलग अलग हैं। कई बार तो उनमें भारी अंतर होता है। राजमार्गी को अहिंसा का पालन करना होता है। राजमार्गी को अहिंसा का पालन करना होता है दूसरी ओर तंत्र मार्गी शाक्त, पशु बलि करने से भी नहीं हिचकते।
साधना बढ़ा दी और इसी के प्रभाव से मैं परीक्षा में सफल हो गया।
साधनाओं में होते हैं वे इसमें नहीं होते और सफलताएं अपेक्षाकृत अधिक शीघ्रता पूर्वक मिलती है। हम ऐसे महात्माओं और महापुरुषों को जानते हैं जिन्होंने केवल गायत्री का आश्रय लेकर आत्मसाक्षात्कार किया है और ईश्वर के समीप पहुँचे हैं। समाधि सुख, परमानंद, जीवन मुक्ति और तुरीयावस्था का सर्वोच्च सुख उन्होंने गायत्री की कृपा से प्राप्त किया है। हमने अपनी आँखों ऐसे सिद्ध पुरुष देखे हैं, उनके साथ सहवास किया है जिन्होंने असाधारण आत्मिक बल संग्रह किया है और चमत्कारी सिद्धियाँ दिखाने की क्षमता प्राप्त की है। उनको वह सिद्धियाँ गायत्री द्वारा ही मिली हैं।
साधना की थी। उसी रात हठात् आकाशमण्डल का भेदन करती हुई गायत्री देवी आविर्भूत हुईं और बोलीं-“वत्स, मैं तुम्हें सिद्ध हो गई। अब तुम्हें और अधिक जप करने की आवश्यकता नहीं। मैं प्रसन्न हूँ, तुम वर माँगो।” मैंने यथा-विधि अभिवादन पूर्वक कहा-माता, मैं इस समय साधु हो गया हूँ, मैंने संसार छोड़ दिया है, अब कोई वासना नहीं है।
साधना में उपरोक्त तीनों भागों का समन्वय है। उससे तीनों प्रयोजन सिद्ध होते हैं और जो विघ्न अन्य साधनाओं में होते हैं वे इसमें नहीं होते और सफलताएं अपेक्षाकृत अधिक शीघ्रता पूर्वक मिलती है। हम ऐसे महात्माओं और महापुरुषों को जानते हैं जिन्होंने केवल गायत्री का आश्रय लेकर आत्मसाक्षात्कार किया है और ईश्वर के समीप पहुँचे हैं। समाधि सुख, परमानंद, जीवन मुक्ति और तुरीयावस्था का सर्वोच्च सुख उन्होंने गायत्री की कृपा से प्राप्त किया है। हमने अपनी आँखों ऐसे सिद्ध पुरुष देखे हैं, उनके साथ सहवास किया है जिन्होंने असाधारण आत्मिक बल संग्रह किया है और चमत्कारी सिद्धियाँ दिखाने की क्षमता प्राप्त की है।
साधना में भक्ति पूर्वक निरत रहते थे। तपश्चर्या में उनका शरीर अस्थि पंजर मात्र रह गया था।
साधना में ब्रह्मचर्य, शुचिता, सत्यता इन बातों का विशेष ध्यान रखा जावे।
साधना जारी रखो, माँ भगवती इन की रक्षा करेंगी। मैं स्नानादि से निवृत्त होकर जप करने बैठ गया, इसी समय मेरी आँखों के सामने पूर्ण वेग के साथ मेरी पत्नी को फिर वमन हुआ। मैंने प्रार्थना की-माँ अब मेरी लाज तेरे हाथ में है-और मैं पूजन में लग गया-सचमुच ही आश्चर्य की बात है कि सवेरे 6:30 बजे जबकि मैं पूजा से उठा मुझे बताया गया कि मेरी पत्नी को चमत्कारिक लाभ हुआ है और वे इस समय स्वस्थ व प्रसन्न हैं।
साधना के साथ आँवला सेवन करने से दीर्घजीवन का वर्णन किया है।
साधना क्षेत्र के इन वन उपवनों में परिभ्रमण करने के उपरान्त हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि गायत्री साधना में उपरोक्त तीनों भागों का समन्वय है। उससे तीनों प्रयोजन सिद्ध होते हैं और जो विघ्न अन्य साधनाओं में होते हैं वे इसमें नहीं होते और सफलताएं अपेक्षाकृत अधिक शीघ्रता पूर्वक मिलती है। हम ऐसे महात्माओं और महापुरुषों को जानते हैं जिन्होंने केवल गायत्री का आश्रय लेकर आत्मसाक्षात्कार किया है और ईश्वर के समीप पहुँचे हैं। समाधि सुख, परमानंद, जीवन मुक्ति और तुरीयावस्था का सर्वोच्च सुख उन्होंने गायत्री की कृपा से प्राप्त किया है। हमने अपनी आँखों ऐसे सिद्ध पुरुष देखे हैं, उनके साथ सहवास किया है जिन्होंने असाधारण आत्मिक बल संग्रह किया है और चमत्कारी सिद्धियाँ दिखाने की क्षमता प्राप्त की है।
साधना को करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है पर इसकी शक्ति बड़ी भारी है।”
साधना द्वारा अपनी शक्ति को ओर भी बढ़ाता रहा। मैंने ईश्वरी शक्ति की प्रणव, दुर्गा बीजमंत्र, गायत्री मंत्र द्वारा उपासना की इसके द्वारा इस प्रकार लाभ हुआ कि एक बार मैं एक ऐसे स्थान पर था कि जहाँ वैद्य इत्यादि कोई न था। वह स्थान ज्वर का भंडार था कोई व्यक्ति इससे न बचता था। मुझे भी भयंकर ज्वर हुआ। परन्तु ईश्वरीय शक्ति की कृपा से शीघ्र इससे छुटकारा मिला व स्वप्न में यह बताया गया कि अमुक दिवस तुम ज्वर मुक्त हो जाओगे।
साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
साधना का इतना सर्व सम्मत समर्थन नहीं हुआ जितना कि गायत्री का हुआ है अपने अपने ढंग से सभी ने उसका समर्थन किया है। आगे कुछ ऐसे ही अभिवचन दिये जाते हैं जिससे पाठक गायत्री के सम्बन्ध में आर्ष ग्रन्थों और आप्त पुरुषों का अभिमत जान सकें।
साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
साधना की मंजिल पूरी कर ली।
साधना के समय में विशेष रूप से ऐसे भय और प्रलोभन उपस्थित होते हैं जिससे फिसल जाने से सारा प्रयत्न निष्फल हो जाता है और साधना भ्रष्ट होने के कारण कोई विपत्ति सिर पर आ जाती है।
साधना की उतने दिन एक प्रकार का उल्लास सा मेरे दिल में बना रहता था और आनन्द मय दिन व्यतीत करता था।
साधनामय रहा है। स्वाध्याय, चिन्तन, आत्मनिर्माण, उत्तर दायित्वों की पूर्ति और लोक सेवा के साथ हमें आध्यात्मिक साधनाएं करने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। अनेक सुयोग्य और कई अयोग्य गुरुओं के संरक्षण में हमने अनेकों, दीर्घकालीन कष्ट साध्य साधनाएं की हैं, अनेकों तपश्चर्याओं में अपने को काफी तपाया है। इस लम्बे साधना काल में हमने जो अनुभव प्राप्त किये हैं, उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अन्य सब साधना विधियों की अपेक्षा गायत्री की साधना अपेक्षाकृत सरल है, शीघ्र सफल होने वाली और अधिक उत्तम परिणाम उत्पन्न करने वाली है। इस साधना में वैसा कोई विक्षेप नहीं आता जैसा कि अन्य साधनाओं में आता है।
साधना को निरन्तर कई महीने तक किया अरसा 14 मास का हुआ। अतः अपना रोज का कर्म है प्रातः सायं दोनों समय गायत्री का जाप। कोई नियम संख्या नहीं है। दिन में किसी समय भी मन में चिन्तन रहता है या गुनगुनाया करता हूँ।
साधना ने ही उन्हें महान सिद्ध बना दिया था। वे करने और न करने प्रत्येक कार्य को करने की शक्ति रखते थे और इसे उन्होंने कई बार अपने भक्तों के कल्याण के लिए प्रकट भी किया। लेकिन वे विज्ञापन और प्रसिद्धि से हमेशा ही दूर रहे। अपनी सिद्धता का कभी उन्होंने प्रदर्शन नहीं किया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-February
साधनाओं द्वारा हम ‘ईश्वर’ की समीपता प्राप्त करने में अधिक सुविधा तथा सफलता पाते हैं अतः यह भी गौण श्रेणी की उपासना है। अन्तरात्मा के आदेश को पालन करके ‘उपासना’ की सार्थकता होना और समझना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-August
साधना-अपना गौरव एवं महानता स्थिर रखने तथा बढ़ाने के सुदृढ़ सिद्धान्तों का दिग्दर्शन।
साधना है। इस साधना से अपना घर स्वर्ग के समान आनन्दमय बन सकता है।
साधना।
साधनाओं को नये ढंग से इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि हर कोई इनका अभ्यास सुगमता पूर्वक कर सके।
साधना के अनेकों विज्ञान और उनके अद्भुत लाभों का दिग्दर्शन कराया है।
साधना और संयम से काम लेना पड़ा है। अनेक अवसरों पर उसे प्रलोभन से बचकर भविष्य के लिए अपनी शक्तियाँ संग्रहीत करनी पड़ी हैं। तुरन्त के थोड़े से लाभ को टालकर भविष्य के बड़े लाभ की चिंता करनी पड़ी है। यदि मनुष्य निरन्तर इन प्रलोभनों, आकर्षक विषयों, काम वासनाओं के हेतुओं को उच्च दिशा में विकसित न करता, तो कदापि वह सर्वश्रेष्ठ पशु न बन पाता।
साधना से मनुष्य पशुत्व से ऊँचा उठकर देवत्व की श्रेणी में जा बैठता है। इन्हीं के अभ्यास से उसका व्यक्तित्व स्थूल से सूक्ष्म, भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर बढ़ता है।
साधना। क्योंकि बिना इनके जो अशुभ है उससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता। और जब तक अशुभ से मुक्ति नहीं मिलती आत्मा पवित्र नहीं बन सकती। आत्मा के पवित्र बने बिना इस संसार में प्रकाश फैलाने के लिए साधक माध्यम भी नहीं बन सकता। साधक को तो ईश्वर की ज्योति से सम्पन्न होकर संसार की सभी अशुद्धताओं और कुसंस्कारों को दूर करना होगा।
साधना न पूर्ण हो सकती है और न चरितार्थ हो सकती है। अतः मानव समाज के उद्धार का एक ही मार्ग है और वह मार्ग है आत्मसाक्षात्कार एवं शक्ति साधना। क्योंकि बिना इनके जो अशुभ है उससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता। और जब तक अशुभ से मुक्ति नहीं मिलती आत्मा पवित्र नहीं बन सकती। आत्मा के पवित्र बने बिना इस संसार में प्रकाश फैलाने के लिए साधक माध्यम भी नहीं बन सकता।
साधना-वेदमाता गायत्री की मन्त्र साधना के अनेकों विज्ञान और उनके अद्भुत लाभों का दिग्दर्शन कराया है।
साधना से अपना घर स्वर्ग के समान आनन्दमय बन सकता है।
साधना के लिए साधक को उस पथ पर चलने की आवश्यकता है जहाँ से ईसा की पवित्रता व पूर्णता, मुहम्मद का आत्म-विश्वास और आत्म-समर्पण, श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रेम व आनन्द तथा रामकृष्ण परमहंस का संसार के सभी धर्मों में समन्वय व एकीकरण करने की बुद्धि व अतिमानव तत्व की प्राप्ति हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-April
साधना की आवश्यक जानकारियाँ।
साधना की पाँच शर्तें।
साधना से समस्त मंत्रों का लाभ।
साधना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-March
साधना संबंधी आवश्यक नियमोपनियम।
साधना से अलौकिक चमत्कारी सिद्धियों की प्राप्ति।
साधना की गुप्त विधियों को इसमें प्रकट किया गया है जिनके आधार पर वेदपाठी पंडित से लेकर साधारण साक्षर व्यक्ति तक समान सुविधा के साथ उन साधनाओं के द्वारा अलौकिक लाभों को प्राप्त कर सके।
साधनाओं के द्वारा अलौकिक लाभों को प्राप्त कर सके।
साधना में डुबोना चाहता हूँ। मैं अपने प्रभु का साक्षात्कार करने के लिए व्यग्र हूँ। मेरा प्रभु सत्य स्वरूप है लेकिन अपनी साधना के प्रारंभ में ही मैंने पहचान लिया था कि अगर मुझे जीवन का चरम सत्य पाना है तो मुझे प्रेम हुकूमत के सामने सर झुका देना होगा। हमें अपने गाँव को प्यार करना चाहिए, फिर अपने जिले को प्यार करना चाहिए, फिर देश, और अन्त में विश्व प्रेम में अपने आपको लीन कर देना चाहिए। मेरे पास तो प्रेम के अतिरिक्त किसी पर भी किसी प्रकार का अधिकार नहीं है।
साधनाएं
साधना
साधना के स्वयं प्राप्त हुए तथा दूसरों के सामने आये हुए अनुभवों को-सत्परिणामों को-लेख रूप में भेजने के लिए गायत्री साधकों से प्रार्थना है। जो इस विषय में विवेचनात्मक एवं खोजपूर्ण लिख सकें वे भी अपने लेख अप्रैल के अन्त तक भेजने की कृपा करें।
साधना के प्रारंभ में ही मैंने पहचान लिया था कि अगर मुझे जीवन का चरम सत्य पाना है तो मुझे प्रेम हुकूमत के सामने सर झुका देना होगा। हमें अपने गाँव को प्यार करना चाहिए, फिर अपने जिले को प्यार करना चाहिए, फिर देश, और अन्त में विश्व प्रेम में अपने आपको लीन कर देना चाहिए। मेरे पास तो प्रेम के अतिरिक्त किसी पर भी किसी प्रकार का अधिकार नहीं है। प्रेम देता है, कभी कुछ माँगता नहीं, प्रेम सदा दुःख सहता है, कभी दुःख नहीं देता, कभी बदला नहीं लेता। जहाँ प्रेम है, वहीं भगवान् हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-June
साधनायै तु गायत्रयाः निष्छलेन हि चेतसा।
बरखीयः सदाचार्यः साधकेन सुभाजनः॥
साधनाओं का दुहरा फल मिलता है और योग विद्या का वह मूलभूत सिद्धान्त की पूरा होता है, जिसके अनुसार आत्मनिग्रह और परमार्थ परायणता के आधार पर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की व्यवस्था की गई हैं।
साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।
साधना का आनंद भी कुछ ऐसा ही अनोखा है उसकी तुलना अन्यों समयों में नहीं हो सकता।
साधना से साधक में एक सूक्ष्म दैवी चेतना का आविर्भाव होता है। प्रत्यक्ष रूप से उसके शरीर या आकृति में कोई विशेष अन्तर नहीं आता पर भीतर ही भीतर भारी हेर−फेर हो जाता है। आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि से प्राणमय कोष, विशान्मयडडडडडडडड कोश और मनोमय कोषों में जो परिवर्तन होता है उसकी दाया अन्नमय कोष में बिलकुल ही दृष्टि गोचर न हो ऐसा नहीं हो सकता। यह सच है कि शरीर का ढांचा आसानी से नहीं बदलता, पर यह भी सच है कि आन्तरिक हेर फेर के चिन्ह शरीर में प्रकट हुए बिना नहीं रह सकते।
साधना द्वारा उसके समीप तक पहुँच जावें तो निःसंदेह आप अपनी समस्त आकांक्षायें पूर्ण कर सकेंगे, इस कल्पवृक्ष के पास पहुँचने का जो मार्ग है उसे ही आध्यात्मवाद, ब्रह्म विद्या या योग साधन कहते है। प्रफुल्ल, आनन्द मय और सन्तुष्ट जीवन बिताने के लिए हरएक व्यक्ति को इसी मार्ग से चलना पड़ता है।
साधना के लिए क्षेत्र उर्वर होगा। मन की पवित्रता स्वच्छ आहार और शुद्ध विचारों पर रहता है। यह उक्ति सर्वथा सत्य है कि “जैसा खावें अन्न−वैसा बने मन”।
साधनाएं बताते है। वैद्य के औषधालय में अनेक प्रकार की दवाएं भरी रहती है। पर उनमें से रोगी को वही दी जाती है जो उसके रोग के अनुकूल है। जिस प्रकार सभी औषधियों का उद्देश्य रोग निवारण और स्वास्थ्य संस्थापन है वैसे ही सब योगों का उद्देश्य भी अनात्म तत्वों का निवारण और आध्यात्मिकता की स्थापना, बंधन का निवारण और मुक्ति की स्थापना है। परन्तु हर औषधि हर रोगी के लिए उपयोगी नहीं होती इसी प्रकार हर व्यक्ति के लिए हर योग ठीक नहीं होता।
साधना पूर्ण हो जाती है तो दूसरे ही लक्षण प्रकट होने लगते हैं। माता के उदर में जब गर्भ पकता है तब तक माता का शरीर भारी, गिरा−गिरा सा रहता है उसमें अनुत्साह देखा जाता है पर जब प्रसूति से निवृत्ति हो जाती है तो वह अपने में एक हलकापन, उत्साह एवं चैतन्य अनुभव करती है।
साधना पूर्ति की जप संख्या में नहीं गिनना चाहिए। कभी कभी कई दिन तक साधना बन्द रखने की स्थिति सामने आ सकती है।
साधना संबंधी शंकाओं तथा समय समय पर उठने वाले प्रश्नों का, विघ्नों का समाधान उसके द्वारा होता रहे। बीच−बीच में ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं, ऐसे अनुभव होते रहते हैं जिनके कारण चित्त विचलित हो जाता हैं, मन में संकल्प विकल्प उठने लगते हैं, उन विक्षेपों का समाधान न हो तो साधनों में मन नहीं लगता हैं, संदेहों की वृद्धि से श्रद्धा और विश्वास में न्यूनता आ जाती है। इस प्रकार के विघ्नों को टालने के लिए ऐसे शिक्षक की आवश्यकता है जो उसकी मानसिक स्वास्थ्यता की रक्षा कर सकें।
साधना के लिए कोई शिक्षक−आचार्य−चरण करे। जिससे साधना संबंधी शंकाओं तथा समय समय पर उठने वाले प्रश्नों का, विघ्नों का समाधान उसके द्वारा होता रहे। बीच−बीच में ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं, ऐसे अनुभव होते रहते हैं जिनके कारण चित्त विचलित हो जाता हैं, मन में संकल्प विकल्प उठने लगते हैं, उन विक्षेपों का समाधान न हो तो साधनों में मन नहीं लगता हैं, संदेहों की वृद्धि से श्रद्धा और विश्वास में न्यूनता आ जाती है। इस प्रकार के विघ्नों को टालने के लिए ऐसे शिक्षक की आवश्यकता है जो उसकी मानसिक स्वास्थ्यता की रक्षा कर सकें।
साधना काल में तो वह अनिवार्य है। कारण यह है कि मेरुदंड में होकर इडा, पिंगला और सुषुम्ना नामक तीन नाड़ियां प्रवाहित होती है, जो मूलाधार चक्र में स्थित कुंडलिनी शक्ति तक प्राण वायु पहुँचाकर उसे रेचक कुँभक पूरक कराती रहती है। सुप्त कुंडलिनी के स्वभाविक प्राणायाम से शरीर में प्राण स्थिर रहता है मेरुदंड के मुड़ने से इस प्राणायाम में बाधा पड़ती है और प्राण निर्बल होता है। इस दोष के निवारण के लिए उचित तो यह है कि यथा संभव सदा सीधा ही रहने का प्रयत्न किया जाय पर साधन काल में तो इसकी सर्वोपरि उपयोगिता है, कुँडलिनी को पूरा प्राण पहुँचाने के लिए मेरु दंड का सीधा रखना आवश्यक है।
साधना मिथुन है।
साधना सिद्धयनन्तरम्॥
साधना पथ में अधिक बढ़ता है उसके निद्रित और जागृत स्वप्न अधिक स्पष्ट सार्थक और सत्य होते हैं।
साधना की सफलता में बड़ी सहायता मिलती है।
साधना सिद्धयनन्तरं) साधना की सिद्धि के पश्चात (प्राप्नुते) प्राप्त करता है।
साधना के संबंध में भी यही बात है। उसे नियमानुसार करने से ही लाभ प्राप्त होता है। अविधि पूर्वक करने से अन्य साधनाओं की भाँति वेद माता गायत्री कोई भयंकर अनिष्ट तो उपस्थित नहीं करती पर उसके लाभ से बंधित ही रहना पड़ता है। यह समय और श्रम की व्यर्थता भी एक हानि ही है इसलिए गायत्री साधकों को उन चार बातों को भली प्रकार समझ लेना चाहिए जो इस साधना के लिए आवश्यक है।
साधना बंद रखी तो उसे दो हजार मंत्र−नियत योजना कम के अतिरिक्त जपने होंगे। जहाँ तक हो सके ऐसे अवसर कम से कम आने देने चाहिए। क्योंकि टूटी हुई रस्सी को चाहे कितनी ही सावधानी और चतुरता से जोड़ दिया जाय तो भी वहाँ गाँठ तो रह ही जाती है।
साधनाओं से होने वाले आत्म विकास द्वारा प्राप्त होते हैं। यह आत्म विकास अन्य साधनों से भी हो सकता है, और वे ही लाभ तथा उनके अतिरिक्त अन्य भी अनेकों लाभ प्राप्त हो सकते हैं।
साधना द्वारा आध्यात्मिक नये तत्वों की वृद्धि साधक के अन्तःकरण में हो जाती है। जहाँ तक वस्तु रखी जाती है वहाँ से दूसरी को हटाना पड़ता है। गिलास में पानी भरा जाय तो उसमें पहले से भरी हुई हवा को हटाना पड़ेगा। रेल के डिब्बे में नये मुसाफिरों को स्थान मिलने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें बैठे हुए पुराने मुसाफिर उतरें। दिन का प्रकाश आने पर अन्धकार को भागना ही पड़ता है।
साधना किस प्रकार हो? यह प्रश्न उपस्थित होता है।
साधनाओं का आयोजन हुआ है। इनके द्वारा अंतर्जगत और दिव्यलोक के महत्व की ओर चित्त आकर्षित होता है और भोगोन्मुखी माया बंधनों में बाँधने वाली, स्वार्थपूर्ण तुच्छ वृत्तियों की ओर से मन विमुख होकर एक अदृश्य आनन्द की ओर अग्रसर होता है। उस अदृश्य आनन्द की प्राप्ति के लिए उसे जो कर्मकाण्ड और साधन करने होते हैं उनका सूक्ष्म निरीक्षण करने से पता चलता है कि इन सबकी साधक के अंतर्मन पर एक विशेष छाप पड़ती है और वह छाप उन दो मूल धर्म तत्वों का आत्म निग्रह और परमार्थ परायणता का−पोषण करती है। यह समस्त धर्म और आध्यात्म एक मानसिक शासन है जिसे विश्वासों और कर्मकाण्डों के आधार पर मानव मस्तिष्क के ऊपर स्थापित किया जाता है। इस भाव शासन में बंध कर मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता है और उस आनन्द को प्राप्त करता है जो उसके लिए अभीष्ट है।
साधना करनी चाहिए।
साधना को स्थगित रखा हो तो प्रतिदिन जितना जप करते है उतना एक दिन का जप प्रायश्चित्त स्वरूप, जुर्माने में करना चाहिए और उसे साधना पूर्ति की जप संख्या में नहीं गिनना चाहिए। कभी कभी कई दिन तक साधना बन्द रखने की स्थिति सामने आ सकती है।
साधना विधि में अन्तर कराकर इस एक ही औषधि से, एक ही मंत्र से चंगा किया जा सकता है, अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त कराया जा सकता है। इस रामबाण साधना में वे सब लाभ बल और रहस्य छिपे हुए है जो संसार भर की किसी भी साधना में पाये जाते है।
साधना से विशेष दिशा में मनोभूमि का निर्माण होता है। श्रद्धा विश्वास तथा साधना विधि की कार्य प्रणाली के अनुसार अन्तःकरण पर एक विशेष प्रकार की छाप पड़ती है तद्नुसार आन्तरिक क्रियाएं उसी दिशा में प्रवाहित होने लगती है? जिससे मन, बुद्धि और चित्त अहंकार का चतुष्टय वैसा ही रूप धारण करने लगता है। भावनाओं के संस्कार अंतर्मन में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं। गायत्री साधक की मानसिक गतिविधि में आध्यात्मिकता एवं सात्विकता का प्रमुख स्थान बन जाता है।
साधना विधि की कार्य प्रणाली के अनुसार अन्तःकरण पर एक विशेष प्रकार की छाप पड़ती है तद्नुसार आन्तरिक क्रियाएं उसी दिशा में प्रवाहित होने लगती है? जिससे मन, बुद्धि और चित्त अहंकार का चतुष्टय वैसा ही रूप धारण करने लगता है। भावनाओं के संस्कार अंतर्मन में गहराई तक प्रवेश कर जाते हैं। गायत्री साधक की मानसिक गतिविधि में आध्यात्मिकता एवं सात्विकता का प्रमुख स्थान बन जाता है।
साधना कालेऽसध्यायः स्यात्प्रमादतः।
तदा प्रायश्चितं नूनं कार्य मन्येद्युरेव हिं।
प्रायश्चितं समाख्यातं तस्मै सद्भिर्मनीषिमिः।
दिन स्यैकस्य गायत्री मंत्राणामधिकं जपः।।
साधना करने के लिए अनेक ग्रन्थों में अनेक मार्ग बताये गये है। इसी प्रकार गुस्डडडडडडडड परम्परा से चली आने वाली साधनाएं भी विविध प्रकार की है। इन सभी मार्गों से उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है, सफलता मिल सकती है पर शर्त यह है कि उसे पूर्ण विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा और उचित पथ प्रदर्शक की संरक्षकता में किया जाए।
साधना की व्यवस्थित क्रिया प्रणाली में विक्षेप पड़ जाता है। रात्रि को कारण वश अधिक जागने में ऐसा हो सकता है कि प्रातःकाल देर तक सोते रहे और साधना का ब्राह्ममुहूर्त निकल जाए। कोई बीमारी उठ खड़ी होने, घर में कोई आकस्मिक घटना घटित हो जाने से, तथा किसी प्रकार की आपत्ति जनक परिस्थिति सामने आजाने से साधना में विघ्न पड़ सकता है। और कुछ समय के लिए साधन स्थगित करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में यह नहीं समझ लेना चाहिए कि हमारा साधन खंडित हो गया।
साधना विषय में उसी की बात को प्रामाणिक मानना चाहिए। जब तक उस गुरु का परित्याग न कर दिया जाय तब तक साधना विषय उसका अनुशासन मान्य होना चाहिए। गलत पथ प्रदर्शन का दोष और दुष्परिणाम उस शिक्षक पर ही पड़ता हैं−शिष्य पर नहीं।
साधना शृंखला पुनः जुड़ जाती है।
साधना के संबंध में बहुत सारी पुस्तकें मौजूद हैं, उन्हें पढ़कर बहुत भारी लाभ उठाया जाता है, परन्तु जो साधना के मर्मस्थल है उनके लिए अनुभवी शिक्षक की क्रियात्मक सहायता ही चाहिए। डाक्टरी विज्ञान पर बड़े−बड़े ग्रन्थ मौजूद हैं, यह सभी ग्रन्थ अत्यन्त आवश्यक है और डाक्टरी शिक्षा के विद्यार्थी की उन्हें पढ़ना जरूरी है। क्योंकि इतना विस्तृत विज्ञान बिना समझे कोई छात्र अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता। लेकिन कोई छात्र यह कहे कि पुस्तकें निरर्थक हैं यह सब ज्ञान तो मैं गुरुमुख से ही प्राप्त करूंगा तो यह असंभव है। बेचारा शिक्षक कहाँ तक उस महाविज्ञान को कहेगा।
साधना काल में प्रायः इस प्रकार के स्वप्न आया करते हैं। किसी मृतक प्रेमी के दर्शन, सुन्दर दृश्यों का अवलोकन, स्त्रियों से मिलना जुलना, मनोवाँछाओं का पूरा होना था। इच्छित वस्तुओं का और भी अधिक अभाव अनुभव होना आदि की घटनाओं के स्वप्न भी विशेष रूप से दिखाई देते हैं। इसका अर्थ है कि अनेकों दबी हुई अतृप्त तृष्णाएं, कामनाएं, वासनायें धीरे−धीरे करके अपनी विदाई की तैयारी कर रही हैं। आत्मिक तत्वों की वृद्धि के कारण ऐसा होना स्वाभाविक भी हैं।
साधना में पाये जाते है।
साधनाभिर्योयाति साधकताँ नरः।
स्वप्नावस्थासु जायन्ते तं दिव्या अनुभूतयः॥
साधनाएं करते हैं, एक बाहु को ऊपर उठाये रहना, चौरासी धूनी तपना, एक आसन से बैठना, रात्रि को न सोना जैसे साधनों को करते हैं पर हम अपने पाठकों को बिना किसी अनुभवी गुरु की आज्ञा के इस प्रकार के तीव्र कष्ट सहन का निषेध करते हैं क्योंकि इनमें थोड़ी भी भूल हो जाने से अनिष्ट का काफी खतरा रहता है। साधारणतः निम्न कष्ट सहन ऐसे है जिनमें से अपनी सुविधा और आवश्यकतानुसार किसी को अपनाया जा सकता है। गर्मी में पंखा, छाता और बरफ का त्याग, सर्दी में बिना गरम (ताजे) जल से स्नान, प्रातःकाल एक दो घंटा रात रहे उठकर नित्य कर्म में लग जाना, सर्दी में अधिक वस्त्रों का उपयोग अथवा अग्नि पर तापने का त्याग, अपने हाथ से भोजन बनाना, एक हाथ से कुँए से जल खींचकर अपने लिए पीने को रखना, पैदल तीर्थ यात्रा करना, अपने हाथ से अपने सब काम वस्त्र सीना, धोना, झाड़ू लगाना, बर्तन मलना आदि काम करना, दूसरों की सेवा और सहायता कम से कम लेना आदि ऐसे कष्ट सहन किये जा सकते हैं जिनमें उस कष्ट सहिष्णुता का कुछ प्रत्यक्ष लाभ भी होता हो।
साधना काल में आत्मोन्नति के लिए जो विविध प्रकार के कर्म काण्ड किये जाते हैं उनसे इन चक्रों में निहित गुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती है और उस जागरण से आत्मबल बढ़ता है, दिव्यत्व की वृद्धि होती है और अलौकिक सम्पत्तियों का भंडार जमा होता है। यदि मेरुदंड झुका रहे, टेढ़ा रहे तो उसके भीतर होने वाली क्रिया प्रणाली पर स्वभावतः दबाव पड़ेगा और उस दबाव से शारीरिक और आत्मिक दोनों ही प्रकार की क्षति होगी। इन सब बातों को ध्यान में रखकर यह आवश्यक नियम बनाया गया है कि साधना काल में मेरुदंड सीधा रख जाय।
साधना के लिए (तु) तो (साधकेन) साधक को चाहिए कि यह (निष्छलेन चेतसा) छल रहित वित्त से (सुभाजनः) योग्य (सदाचार्यः) श्रेष्ठ आचार्य का (वरणीयः) वरण करें।
साधना काल में मेरुदंड सीधा रख जाय।
साधना से अद्भुत सिद्धियाँ मिलने का वर्णन योग दर्शन में किया है। यदि गायत्री की साधना और सात्विक आचरण इन दोनों का एक साथ समन्वय हो जाने से दो साधनाओं का दुहरा फल मिलता है और योग विद्या का वह मूलभूत सिद्धान्त की पूरा होता है, जिसके अनुसार आत्मनिग्रह और परमार्थ परायणता के आधार पर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की व्यवस्था की गई हैं।
साधना बन्द रखने की स्थिति सामने आ सकती है।
साधना ऐसी ही आध्यात्मिक अमृत धारा है जिससे अनेक औषधियों की अनेक योग साधनाओं की आवश्यकता पूरी हो जाती है, अनेक रोगियों को, अनेक साधकों को, उपचार भेद से−साधना विधि में अन्तर कराकर इस एक ही औषधि से, एक ही मंत्र से चंगा किया जा सकता है, अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त कराया जा सकता है। इस रामबाण साधना में वे सब लाभ बल और रहस्य छिपे हुए है जो संसार भर की किसी भी साधना में पाये जाते है।
साधनाओं से एक से एक बढ़कर चमत्कारी शक्तियां प्राप्त होती है। यह चमत्कार उन नियमों से या साधनाओं से होने वाले आत्म विकास द्वारा प्राप्त होते हैं। यह आत्म विकास अन्य साधनों से भी हो सकता है, और वे ही लाभ तथा उनके अतिरिक्त अन्य भी अनेकों लाभ प्राप्त हो सकते हैं।
साधनाभिः) साधना करने से (साधकताँ) साधकत्व को (याति) प्राप्त हो जाता है (तं) उस व्यक्ति को (स्वप्नावस्थासु) स्वप्नावस्था में (दिव्या अनुभूतयः) दिव्य अनुभव (जायन्ते) होते हैं।
साधना गुरु” का प्रथक से वरण किया जा सकता है। इस वरण से साधना की सफलता में बड़ी सहायता मिलती है।
साधनाओं की भाँति वेद माता गायत्री कोई भयंकर अनिष्ट तो उपस्थित नहीं करती पर उसके लाभ से बंधित ही रहना पड़ता है। यह समय और श्रम की व्यर्थता भी एक हानि ही है इसलिए गायत्री साधकों को उन चार बातों को भली प्रकार समझ लेना चाहिए जो इस साधना के लिए आवश्यक है।
साधना संक्रांति को ठीक प्रकार से पार कर पाते है।
साधना−गायत्री अनुष्ठान, ब्रह्मसंध्या, गायत्री हवन, पुरश्चरण गायत्री, योग आदि साधनों से आत्मबल सतेज किया जा सकता है।
साधना से किसी प्रकार कम नहीं, इसके द्वारा आत्म विकास होता है और उस विकास के साथ साथ आलौकिक शक्तियां उत्पन्न होती हैं। साधक को उनका अनुभव होता है, आभास मिलता हैं, पर जैसे किशोर बालक अपने नव उत्पन्न वीर्य को सुरक्षित रखते हैं उसे बाहर नहीं निकलने देते उसी प्रकार बुद्धिमान साधक भी अपनी इन शक्तियों को अपने अन्दर ही धारण किये रहते हैं। प्रकट नहीं करते, उन्हें साँसारिक कर्मों में खर्च नहीं करते। वरन् आत्म कल्याण में परमानंद की प्राप्ति में, जीवन मुक्ति में उसे लगाते हैं। परमात्मा की सृष्टि का क्रम कर्म भोगों के आधार पर चल रहा हैं, कर्म की, प्रयत्न की, श्रम की प्रधानता से व्यक्ति की उन्नति होने का ईश्वरीय नियम है।
साधना प्रहालियों की निर्धारित दिशा एक ही है। एक स्थान पर पहुँचने के अनेकों रास्ते होते है। जो पूर्व में है वह निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचने के लिए पच्छिम को चलता है और जो पच्छिम में है उसे पूर्व की ओर चलना पड़ता है। देखने में दोनों भिन्न दिशाओं में चलते हुए दीखते हैं, यह भिन्नता होते हुए भी वे एक ही स्थान पर जा पहुँचते है।
साधना है जो किसी भी अन्य साधना से किसी प्रकार कम नहीं, इसके द्वारा आत्म विकास होता है और उस विकास के साथ साथ आलौकिक शक्तियां उत्पन्न होती हैं। साधक को उनका अनुभव होता है, आभास मिलता हैं, पर जैसे किशोर बालक अपने नव उत्पन्न वीर्य को सुरक्षित रखते हैं उसे बाहर नहीं निकलने देते उसी प्रकार बुद्धिमान साधक भी अपनी इन शक्तियों को अपने अन्दर ही धारण किये रहते हैं। प्रकट नहीं करते, उन्हें साँसारिक कर्मों में खर्च नहीं करते। वरन् आत्म कल्याण में परमानंद की प्राप्ति में, जीवन मुक्ति में उसे लगाते हैं। परमात्मा की सृष्टि का क्रम कर्म भोगों के आधार पर चल रहा हैं, कर्म की, प्रयत्न की, श्रम की प्रधानता से व्यक्ति की उन्नति होने का ईश्वरीय नियम है।
साधना को ब्राह्ममुहूर्त में करना चाहिए। सूर्योदय से एक घंटा पीछे तक ब्राह्ममुहूर्त रहता है। यह परम सात्विक शाँति दायक, चैतन्यता पूर्ण तथा दिव्य वातावरण से युक्त होता है। प्राणी रात्री में निद्रा लेकर अपनी थकान मिटाते है और विश्राम के द्वारा शक्ति संचय करके प्रातःकाल चैतन्य उठते है, उस समय हर एक के मन में स्फूर्ति, ताजगी एवं स्थिरता होती है। उस दशा में जो भी कार्य किया जाता है बहुत उत्तम होता है।
साधना करनी होती है। रेडियो यंत्र में लगी हुई सुई जिस दिशा की आकाशवाणी सुनने के लिए घुमा दी जाती है उधर की ही शब्दावली हम सुनने लगते है। हमारा मुख भी एक प्रकार के रेडियो की सुई है इसे जिस दिशा में घुमा देते है उस दिशा के सूक्ष्म तत्वों से हमारा सान्निध्य हो जाता है। ब्राह्ममुहूर्त में संध्या−वन्दन करने के लिए हमें पूर्व की ओर मुँह करके बैठना चाहिए जिससे ब्रह्म दिशा से प्रवाहित होकर आने वाले सूक्ष्म सतोगुणी तत्वों को हम अधिक मात्रा में ग्रहण कर सकें, उनसे लाभान्वित हो सकें।
साधना और सात्विक आचरण इन दोनों का एक साथ समन्वय हो जाने से दो साधनाओं का दुहरा फल मिलता है और योग विद्या का वह मूलभूत सिद्धान्त की पूरा होता है, जिसके अनुसार आत्मनिग्रह और परमार्थ परायणता के आधार पर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की व्यवस्था की गई हैं।
साधना के समय−कारण वश बीच में ही उठना पड़ता है। मल, मूत्र, कफ, नाक आदि की शुद्धि के लिए कभी कभी बीच में उठने की आवश्यकता होती है। कुत्ते, बिल्ली, बन्दर आदि का उपद्रव, कोई वस्तु गिरना, जरूरी आदेश करना, भली हुई वस्तु उठाना, किसी आगन्तुक को आसन देना आदि कार्यों के लिए जब कोई दूसरा व्यक्ति नहीं होता और वह अपने को ही करना होता है तो उठना आवश्यक हो जाता है। वैसे ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि वहाँ तक हो सके ऐसे अवसर न आवें या कम से कम आवें, पर यदि आवें ही तो उठने के पश्चात् पुनः ज्यों का त्यों ही न बैठ जाना चाहिए, वरन् शुद्ध जल से हाथ पाँव तथा मुख धोकर आचमन करके तब आसन पर बैठना चाहिए।
साधना करने से (साधकताँ) साधकत्व को (याति) प्राप्त हो जाता है (तं) उस व्यक्ति को (स्वप्नावस्थासु) स्वप्नावस्था में (दिव्या अनुभूतयः) दिव्य अनुभव (जायन्ते) होते हैं।
साधना के समय बोल जाना, अशुद्ध गुप्त अंगों का स्पर्श कर लेना, नींद की झपकी ले जाना, छींक आदि असावधानी से लेकर पूजा सामग्री को अशुद्ध कर देना आदि आकस्मिक भूलों के लिए प्रायश्चित स्वरूप एक हजार मंत्र जपने चाहिए।
साधना जब तक साधक के गर्भ में पकता रहता है, कच्चा रहता है तब तक उसके शरीर में आलस्य और अवसाद के चिन्ह रहते हैं, स्वास्थ्य गिर हुआ और चहरा उतरा हुआ दिखाई देता है पर जब साधना पक जाती है और सिद्धि की सुकोमल सन्तति का प्रसव होता है तो साधक में एक हलकापन, चैतन्य, उत्साह आ जाता है वैसा −जैसा कि केंचुली बदलने के बाद सर्प में आता है। सिद्धि प्रसव हुआ या नहीं इसकी परीक्षा इन लक्षणों से हो सकती है। यह दस लक्षण नीचे दिए जाते है।
साधना के फल स्वरूप एक सन्तान मिलती है जिसे शक्ति या सिद्धि कहते हैं। मुतिडडडडडड समाधि, ब्राह्मी स्थिति, सुर्यावस्था आदि नाम भी इसी के हैं। यह सन्तान आरंभ में बड़ी निर्बल तथा लघु आकार की होती है। जैसे अंडे से निकलने पर बच्चे बड़े ही लुँज पुँज होते हैं, जैसे माता के गर्भ से उत्पन्न हुए बालक बड़े ही कोमल होते हैं वैसे ही साधना पूर्ण होने पर प्रसव हुई नवजात सिद्धि भी बड़ी कोमल होती है, बुद्धिमान साधक उसे उसी प्रकार पाल−पोस कर बड़ा करते हैं जैसे कुशल माताएं अपनी संतान को अनिष्टों से बचाती हुई पौष्टिक पोषण देकर पालती हैं।
साधनाएं भी विविध प्रकार की है। इन सभी मार्गों से उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है, सफलता मिल सकती है पर शर्त यह है कि उसे पूर्ण विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा और उचित पथ प्रदर्शक की संरक्षकता में किया जाए।
साधना के कारण उखड़कर अपना स्थान खाली करती हैं। इस परिवर्तन काल में वे अपने गुप्त रूप को प्रकट करती हुई विदा होती है। तद्नुसार साधक को साधना काल में प्रायः इस प्रकार के स्वप्न आया करते हैं। किसी मृतक प्रेमी के दर्शन, सुन्दर दृश्यों का अवलोकन, स्त्रियों से मिलना जुलना, मनोवाँछाओं का पूरा होना था। इच्छित वस्तुओं का और भी अधिक अभाव अनुभव होना आदि की घटनाओं के स्वप्न भी विशेष रूप से दिखाई देते हैं।
साधना भी है। आध्यात्मिक ज्ञान और साधना के संबंध में बहुत सारी पुस्तकें मौजूद हैं, उन्हें पढ़कर बहुत भारी लाभ उठाया जाता है, परन्तु जो साधना के मर्मस्थल है उनके लिए अनुभवी शिक्षक की क्रियात्मक सहायता ही चाहिए। डाक्टरी विज्ञान पर बड़े−बड़े ग्रन्थ मौजूद हैं, यह सभी ग्रन्थ अत्यन्त आवश्यक है और डाक्टरी शिक्षा के विद्यार्थी की उन्हें पढ़ना जरूरी है। क्योंकि इतना विस्तृत विज्ञान बिना समझे कोई छात्र अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता। लेकिन कोई छात्र यह कहे कि पुस्तकें निरर्थक हैं यह सब ज्ञान तो मैं गुरुमुख से ही प्राप्त करूंगा तो यह असंभव है।
साधना के मर्मस्थल है उनके लिए अनुभवी शिक्षक की क्रियात्मक सहायता ही चाहिए। डाक्टरी विज्ञान पर बड़े−बड़े ग्रन्थ मौजूद हैं, यह सभी ग्रन्थ अत्यन्त आवश्यक है और डाक्टरी शिक्षा के विद्यार्थी की उन्हें पढ़ना जरूरी है। क्योंकि इतना विस्तृत विज्ञान बिना समझे कोई छात्र अच्छा डॉक्टर नहीं बन सकता। लेकिन कोई छात्र यह कहे कि पुस्तकें निरर्थक हैं यह सब ज्ञान तो मैं गुरुमुख से ही प्राप्त करूंगा तो यह असंभव है। बेचारा शिक्षक कहाँ तक उस महाविज्ञान को कहेगा।
साधना विषय उसका अनुशासन मान्य होना चाहिए। गलत पथ प्रदर्शन का दोष और दुष्परिणाम उस शिक्षक पर ही पड़ता हैं−शिष्य पर नहीं।
साधना को मैथुन कहा है। जैसे मैथुन को गुप्त रखा जाता है वैसे ही साधना को गुप्त रखने का आदेश किया गया है। आत्मा जब परमात्मा से लिपटती है, उसका आलिंगन करती है तो उसे एक अनिवर्चनीय आनन्द आता है, इसे भक्ति की तन्मयता कहते हैं, जब दोनों का प्रगाढ़ मिलन होता है, एक दूसरे में आत्मसात होते हैं तो उस स्खलन को “समािडडडड” कहा जाता है। आध्यात्मिक मैथुन का समाधि सुख अन्तिम स्खलन है। गायत्री उपनिषद् और सावित्री उपनिषद् में अनेक मिथुनों का वर्णन किया गया है।
साधना
साधना काल में (अनध्यायः स्यात्) अनध्याय हो जावे (तदा) तो (अन्येद्यु एवं) दूसरे ही दिन (नूनं) निश्चय से प्रायश्चित करे। (तस्मै) उसके लिए (सद्भिमनीषिभिः) सत्पुरुषों ने (एकस्य दिनस्य) एक दिन के (गायत्री मंत्राणाँ) गायत्री मंत्रों को (अधिक जपः) अधिक जप करना (प्रायश्चित) प्रायश्चित (समाख्यातं) कहा है।
साधनायै) साधना के लिए (तु) तो (साधकेन) साधक को चाहिए कि यह (निष्छलेन चेतसा) छल रहित वित्त से (सुभाजनः) योग्य (सदाचार्यः) श्रेष्ठ आचार्य का (वरणीयः) वरण करें।
साधना पक जाती है और सिद्धि की सुकोमल सन्तति का प्रसव होता है तो साधक में एक हलकापन, चैतन्य, उत्साह आ जाता है वैसा −जैसा कि केंचुली बदलने के बाद सर्प में आता है। सिद्धि प्रसव हुआ या नहीं इसकी परीक्षा इन लक्षणों से हो सकती है। यह दस लक्षण नीचे दिए जाते है।
साधना पाठको के सामने उपस्थित करना चाहते हैं जिसके द्वारा गायत्री शक्ति षट्चक्रों का जागरण बड़ी सुविधा पूर्वक हो सकता है और अन्य साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।
साधना की भाँति गायत्री साधना के संबंध में भी यही बात है। उसे नियमानुसार करने से ही लाभ प्राप्त होता है। अविधि पूर्वक करने से अन्य साधनाओं की भाँति वेद माता गायत्री कोई भयंकर अनिष्ट तो उपस्थित नहीं करती पर उसके लाभ से बंधित ही रहना पड़ता है। यह समय और श्रम की व्यर्थता भी एक हानि ही है इसलिए गायत्री साधकों को उन चार बातों को भली प्रकार समझ लेना चाहिए जो इस साधना के लिए आवश्यक है।
साधनाओं के साधकों के संबंध में है। जिस शिक्षक ने जिस मार्ग से अनुभव किया है वह अपने अनुयायी को उसी मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है इस परम्परा के अनुसार अनेकों मार्ग बन जाते है और वे स्वतंत्र नामों से पुकारे जाने लगते है। दूसरी बात यह है कि अलग अलग व्यक्तियों की मनोभूमि, इच्छा, स्थिति और आवश्यकता अलग अलग होती है। उसे देखते हुए अध्यात्म मार्ग के सुयोग्य शिक्षक साधकों को प्रथक प्रथक साधनाएं बताते है। वैद्य के औषधालय में अनेक प्रकार की दवाएं भरी रहती है।
साधनाएं
साधना देर तक नहीं पकती और साधक को आगे का मार्ग नहीं मिलता तो उसे अनुभवी गुरु ही सहायता की आवश्यकता होती है, वह जैसा उपाय बतावे वैसे उसे करना होता है। इसी प्रकार धीरे धीरे क्रमशः छहों चक्रों को पार करता हुआ साधक मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी तक पहुँचता है और वहाँ उस ज्वालामुखी, कराल काल स्वरूप, महाशक्ति सर्पिणी के विकराल रूप का दर्शन करता है। महाकाली का प्रचण्ड स्वरूप यही दिखाई पड़ता है। कई साधक इस सोते सिंह को जगाने का साहस करते हुए काँप जाते है।
साधना में विघ्न पड़ सकता है। और कुछ समय के लिए साधन स्थगित करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में यह नहीं समझ लेना चाहिए कि हमारा साधन खंडित हो गया।
साधना काल में दो इनका अधिक ध्यान रखना चाहिए और जितना अधिक इससे बचे रहा जा सके।
साधनाओं की आवश्यकता पूरी हो जाती है, अनेक रोगियों को, अनेक साधकों को, उपचार भेद से−साधना विधि में अन्तर कराकर इस एक ही औषधि से, एक ही मंत्र से चंगा किया जा सकता है, अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त कराया जा सकता है। इस रामबाण साधना में वे सब लाभ बल और रहस्य छिपे हुए है जो संसार भर की किसी भी साधना में पाये जाते है।
साधना में वे सब लाभ बल और रहस्य छिपे हुए है जो संसार भर की किसी भी साधना में पाये जाते है।
साधना से अष्ट सिद्धि, नव निद्धि और सात शुभ गतियों की प्राप्ति होती है यह 24 महीन लाभ गायत्री के अंतर्गत है।
साधनाओं में आहार, व्यवहार और विचारों की सात्विकता एक स्वतंत्र साधना है। इसको बिना किसी जप तप आदि को क्रिया जाय तो भी वह आश्चर्य जनक ऋद्धियों को प्रदान करती है। पातंजलि ऋषि ने यम नियमों की, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि उत्तम आचरणों की साधना से अद्भुत सिद्धियाँ मिलने का वर्णन योग दर्शन में किया है। यदि गायत्री की साधना और सात्विक आचरण इन दोनों का एक साथ समन्वय हो जाने से दो साधनाओं का दुहरा फल मिलता है और योग विद्या का वह मूलभूत सिद्धान्त की पूरा होता है, जिसके अनुसार आत्मनिग्रह और परमार्थ परायणता के आधार पर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की व्यवस्था की गई हैं।
साधना भी ऐसा ही मर्मस्थल है जिसके लिए अनुभवी गुरु की आवश्यकता है।
साधना के लिए आवश्यक है।
साधना करने बैठता है तो अपने अन्दर एक प्रकार का आध्यात्मिक गर्भ धारण करता है। तंत्र शास्त्रों में साधना को मैथुन कहा है। जैसे मैथुन को गुप्त रखा जाता है वैसे ही साधना को गुप्त रखने का आदेश किया गया है। आत्मा जब परमात्मा से लिपटती है, उसका आलिंगन करती है तो उसे एक अनिवर्चनीय आनन्द आता है, इसे भक्ति की तन्मयता कहते हैं, जब दोनों का प्रगाढ़ मिलन होता है, एक दूसरे में आत्मसात होते हैं तो उस स्खलन को “समािडडडड” कहा जाता है। आध्यात्मिक मैथुन का समाधि सुख अन्तिम स्खलन है।
साधना काल में बड़े आचार विचार के साथ रहने का आदेश करते हैं रजस्वला या गर्भवती स्त्रियों से मिलता जुलता आहार विहार साधकों को अपनाना होता है। तभी वे साधना संक्रांति को ठीक प्रकार से पार कर पाते है।
साधना की एक महत्वपूर्ण सिद्धि है।
साधना की सिद्धि के पश्चात (प्राप्नुते) प्राप्त करता है।
साधना की शृंखला टूटने पर भी एक विशेष संस्कार की आवश्यकता होती है, जिसे जल प्रक्षालन कहते है। जल शुद्धि से अवसाद चला जाता है और उत्साह जाता है। उचटा हुआ मन जल शुद्धि से पुनः शाँत एवं शीतल होकर अपने काम में लगता है और टूटी हुई साधना शृंखला पुनः जुड़ जाती है।
साधना प्रवाह टूट जाता है। इस अवरोध से उसी प्रकार नियत क्रम में गड़बड़ पड़ जाती है जैसे पकती हुई देगची के नीचे की आग बुझ जाने से दाल ठंडी हो जाय और फिर दुबारा लकड़ी जलाकर उसे पकाया जाय। कुम्हार का ‘अवा’ पकने के लिए लगातार आग चाहता है, पर आधा पक कर वह ठंडा हो जाय और फिर दुबारा आग जलानी पड़े तो उसमें कुछ न कुछ दोष ही रह जाता है। इस गड़बड़ी को सुधारने के लिए कुछ विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ती है। सूत कातते समय तागा टूट जाय तो टूटे हुए स्थान को एक विशेष प्रकार से ऐंठ कर दोनों सिरे जोड़े जाते हैं, टूटे हुए लोहे को जोड़ने के लिए उसका विशेष संस्कार करना पड़ता है आग में तपा कर पीटना पड़ता है तब वह टुकड़े जुड़ते हैं।
साधना गर्म में पकती है तो उसे कुछ उदासी, भारीपन, अनुत्साह एवं शिथिलता के लक्षण प्रतीत होते हैं पर जब साधना पूर्ण हो जाती है तो दूसरे ही लक्षण प्रकट होने लगते हैं। माता के उदर में जब गर्भ पकता है तब तक माता का शरीर भारी, गिरा−गिरा सा रहता है उसमें अनुत्साह देखा जाता है पर जब प्रसूति से निवृत्ति हो जाती है तो वह अपने में एक हलकापन, उत्साह एवं चैतन्य अनुभव करती है।
साधना है। इसको बिना किसी जप तप आदि को क्रिया जाय तो भी वह आश्चर्य जनक ऋद्धियों को प्रदान करती है। पातंजलि ऋषि ने यम नियमों की, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि उत्तम आचरणों की साधना से अद्भुत सिद्धियाँ मिलने का वर्णन योग दर्शन में किया है। यदि गायत्री की साधना और सात्विक आचरण इन दोनों का एक साथ समन्वय हो जाने से दो साधनाओं का दुहरा फल मिलता है और योग विद्या का वह मूलभूत सिद्धान्त की पूरा होता है, जिसके अनुसार आत्मनिग्रह और परमार्थ परायणता के आधार पर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की व्यवस्था की गई हैं।
साधना के साधक पर सब से प्रथम प्रतिक्रिया यह होती है कि वह निष्पाप हो जाता है। पाप पुण्य की उलझन जिस श्रेणी के लोगों को परेशान करती है वह उससे ऊंचा उठ जात है। हमारा कोई अंग जब तक जल की सतह से नीचा रहता है तब तक वह पानी में भीगा रहता है पर जब वह ऊँचा उठ जाता है तो पानी उसे स्पर्श नहीं करता। जब तक मनुष्य का ‘अहम्’ संकुचित, सीमित, स्वार्थ रहा रहता है। अपने तुच्छ ‘अहंकार’ को तृप्त करने के लिए कार्य करता है तब तक किये हुए कार्य पाप पुण्य बनकर उसके पीछे पड़ते हैं और उनका परिणाम भोगने के लिए उसे विवश होना पड़ता है।
साधना का ब्राह्ममुहूर्त निकल जाए। कोई बीमारी उठ खड़ी होने, घर में कोई आकस्मिक घटना घटित हो जाने से, तथा किसी प्रकार की आपत्ति जनक परिस्थिति सामने आजाने से साधना में विघ्न पड़ सकता है। और कुछ समय के लिए साधन स्थगित करना पड़ सकता है। ऐसी दशा में यह नहीं समझ लेना चाहिए कि हमारा साधन खंडित हो गया।
साधना की जा सकती है, उसमें विक्षेप नहीं पड़ता। पऽसन के अनेक रहस्यों में से यह भी एक महत्व पूर्ण रहस्य है।
साधना काले) साधना काल में (अनध्यायः स्यात्) अनध्याय हो जावे (तदा) तो (अन्येद्यु एवं) दूसरे ही दिन (नूनं) निश्चय से प्रायश्चित करे। (तस्मै) उसके लिए (सद्भिमनीषिभिः) सत्पुरुषों ने (एकस्य दिनस्य) एक दिन के (गायत्री मंत्राणाँ) गायत्री मंत्रों को (अधिक जपः) अधिक जप करना (प्रायश्चित) प्रायश्चित (समाख्यातं) कहा है।
साधनाओं से अनेक सिद्धियाँ मिलती है। उन सिद्धि दायक साधनाओं में आहार, व्यवहार और विचारों की सात्विकता एक स्वतंत्र साधना है। इसको बिना किसी जप तप आदि को क्रिया जाय तो भी वह आश्चर्य जनक ऋद्धियों को प्रदान करती है। पातंजलि ऋषि ने यम नियमों की, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि उत्तम आचरणों की साधना से अद्भुत सिद्धियाँ मिलने का वर्णन योग दर्शन में किया है। यदि गायत्री की साधना और सात्विक आचरण इन दोनों का एक साथ समन्वय हो जाने से दो साधनाओं का दुहरा फल मिलता है और योग विद्या का वह मूलभूत सिद्धान्त की पूरा होता है, जिसके अनुसार आत्मनिग्रह और परमार्थ परायणता के आधार पर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की व्यवस्था की गई हैं।
साधना करने से वह प्रस्फुटित हो जाता है, ध्यान में उसके लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते है और चक्र के स्थान पर उससे संबंधित मातृकाओं, ज्ञानेन्द्रियों कर्मेन्द्रियों में अचानक कम्पन, रोमाँच, प्रस्फुरण, उत्तेजना, दाह, खुजली जैसे अनुभव होते है, यह इस बात के चिन्ह है कि चक्रों का जागरण हो रहा है। एक मास या न्यूनाधिक काल में इस प्रकार के चिन्ह प्रकट होने लगें ध्यान में चक्र का रूप स्पष्ट होने लगे तो उससे बढ़कर नीचे की ओर दूसरे चक्र में प्रवेश करना चाहिए। विधि वही है− मार्ग वही है। गायत्री ज्योति में मन को तपाकर ब्रह्मनाड़ी में प्रवेश करना और उसमें होकर पहले चक्र में जाना−फिर उसे पार करके दूसरे में जाना−इस प्रकार प्रत्येक चक्र में लगभग एक मास का समय लगता है। जब साधन पक जाती है तो एक चक्र से दूसरे चक्र से दूसरे चक्र में जाने का द्वार खुला जाता है।
साधना का यह रौद्ररूप बड़ा विचित्र है। इसे ‘साधन समझ’ कहते है।
साधना में पड़े हुए विघ्न के लिए शास्त्रकारों ने एक प्रायश्चित्य बताया है वह यह कि एक दिन की छुट्टी के लिए एक हजार मंत्र अधिक जप करने चाहिए। यह एक प्रकार का जुर्माना है जो मूलधन में शुमार नहीं होता। जैसे किसी व्यक्ति ने दो दिन साधना बंद रखी तो उसे दो हजार मंत्र−नियत योजना कम के अतिरिक्त जपने होंगे। जहाँ तक हो सके ऐसे अवसर कम से कम आने देने चाहिए। क्योंकि टूटी हुई रस्सी को चाहे कितनी ही सावधानी और चतुरता से जोड़ दिया जाय तो भी वहाँ गाँठ तो रह ही जाती है।
साधना पूर्ण होने पर प्रसव हुई नवजात सिद्धि भी बड़ी कोमल होती है, बुद्धिमान साधक उसे उसी प्रकार पाल−पोस कर बड़ा करते हैं जैसे कुशल माताएं अपनी संतान को अनिष्टों से बचाती हुई पौष्टिक पोषण देकर पालती हैं।
साधना को गुप्त रखने का आदेश किया गया है। आत्मा जब परमात्मा से लिपटती है, उसका आलिंगन करती है तो उसे एक अनिवर्चनीय आनन्द आता है, इसे भक्ति की तन्मयता कहते हैं, जब दोनों का प्रगाढ़ मिलन होता है, एक दूसरे में आत्मसात होते हैं तो उस स्खलन को “समािडडडड” कहा जाता है। आध्यात्मिक मैथुन का समाधि सुख अन्तिम स्खलन है। गायत्री उपनिषद् और सावित्री उपनिषद् में अनेक मिथुनों का वर्णन किया गया है। वहाँ बताया गया है कि सविता और सावित्री का मिथुन है।
साधनावस्था में साधक को कैसी विषम स्थिति में रहना पड़ता है। इसलिए वे अपने अनुयायियों को साधना काल में बड़े आचार विचार के साथ रहने का आदेश करते हैं रजस्वला या गर्भवती स्त्रियों से मिलता जुलता आहार विहार साधकों को अपनाना होता है। तभी वे साधना संक्रांति को ठीक प्रकार से पार कर पाते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-September
साधना करना चाहिए। हमेशा स्मरण रखने की बात यही है कि जब तक वासना रहेगी। भगवान दिखाई नहीं देंगे। जिन्हें भगवान देखते हैं उन्हें अपनी वासनाएं दूर करनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-October
साधना कर्मयोग की भूमिका होती है।
साधना है, अपने जीवन में हम जो कुछ कर रहे हैं, वह सब भगवान के लिए कर रहे हैं ऐसा समझ कर या ऐसा ज्ञान रखकर ही कर्म करना चाहिए। कुछ न कुछ करना ही चाहिए ऐसा समझ कर जो कुछ सामने आ जावे उसी में लग जावें यह तो कोई उचित बात नहीं है। कर्म तो हमें करना ही चाहिए- लेकिन अन्तरात्मा की पूर्ण आज्ञा से। भीतर से जिस काम को करने के लिए हमें प्रेरणा मिले, उसी के अनुसार कर्म करने के लिए हमें तत्पर रहना चाहिए, प्रत्येक कार्य में भगवान का हाथ और उनकी लीला का दर्शन करते रहने की भावना और बुद्धि दोनों ही रहना चाहिए।
साधना के लिए अपना सब कुछ समर्पण कर देता है उसी प्रकार अपने मन में द्वैत की भावना न रखकर पति को ही अपना आराध्य देव मानकर अपना भला और बुरा सब कुछ उन्हें सौंप दे। अपने लिए बचाकर कुछ भी शेष न रखे। जो कुछ करे पति के लिए। पति कुमार्ग गामी हो तो उसे सुमार्ग पर लाने के लिए अपना सर्वस्व तक चढ़ा दे। ध्यान रहे पत्नी को शासक नहीं बनना है।
साधना का फल है।
साधना में विलीन हो जावें यह ज्यादा अच्छा है। इसीलिए वृद्धावस्था प्राप्त होने पर व्यक्तियों को सांसारिक मोह छोड़कर आत्मशान्ति के लिए संन्यासयोग की अवश्य दीक्षा लेनी चाहिए। शास्त्रों में भी अन्त्ययोग अर्थात् संन्यास योग लेकर शरीर छोड़ने की बात का समर्थन किया है।- योगेनान्ते तनुत्यजाम्।
साधना करनी पड़ती है। आज की सभ्यता इस साधना का स्पर्श करके भी नहीं चल रही है। यह कथित सभ्यता कितनी दूर है प्रगति से।
साधना में चित्त लगाकर काम करते जाना चाहिए, बाहरी उत्तेजना में न फँसकर, भीतर में भगवान की दिव्य मूर्ति को प्रकट होने देना चाहिए। ऐसी साधना से जो चीज पैदा होगी। आज व्यक्ति कल्याण एवं समष्टि के कल्याण के लिए उसी की आवश्यकता है।
साधना और उपासना से बुद्धि का परिमार्जन और संशोधन होता है। साथ ही सरलता पूर्वक हो सकती है जिसके द्वारा बड़ी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक गुप्त शक्तियों को जागृत करके जीवन सिद्धि को प्राप्त किया जा सकता है। अनेक प्रकार की सफलताएं एवं समृद्धियाँ देने तथा संकटों एवं अभावों का निवारण करने की गायत्री में असाधारण शक्ति है। इसलिए इस एक मंत्र का आश्रय लेकर भी योग की पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए हिन्दू धर्म ने गायत्री को सर्वोच्च प्रतिष्ठा, महत्ता एवं मान्यता प्रदान की है।
साधना करने से अधिक कठिनाई है। पर जो जितनी अधिक कठिनाईयों को सहन करते हुए अविचलित होता है वह उतना ही महान् योगी होता है इस दृष्टि से गृहस्थ कर्मयोगी की प्रशंसा की जाती है। यहाँ तक कि उसी को कर्मयोगी कहा जाता है जो घर में रहकर, घर की जिम्मेदारियों को पूरा करता हुआ विश्वकल्याण में दत्तचित्त होता है।
साधना से जो चीज पैदा होगी। आज व्यक्ति कल्याण एवं समष्टि के कल्याण के लिए उसी की आवश्यकता है।
साधना बढ़ती जाती है, निराशा उन पर से अपना दबाव हटाती जाती है। और वे धीरे धीरे साधना की परिपक्वता प्राप्त करते हुए कर्मयोगी हो जाते हैं। उद्देश्य कर्मयोग न होने पर भी संन्यास योग के अनुकूल उनका स्वभाव नहीं होता इसलिए संन्यास योग में उतर जाने के बाद भी वे कर्मयोगी बन जाते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि दाँभिकपन न हो और निठल्लेपन में रह कर जीवन बिताने की वृत्ति न हो, उनका जीवन प्रमाद से न घिर गया हो तो कोई युवा, युवात्मक शक्ति रहते हुए संन्यास योग में टिका रह ही नहीं सकता, उसे तो कर्मयोग की ओर प्रवृत्त होना ही पड़ता है। स्वामी विवेकानन्द का जीवन इस कर्मयोग से ओत प्रोत दिखाई देगा।
साधना तुरन्त ही कारगर नहीं होती। उसके लिए तो जन्म से ही श्रम करना होता है, मन को वासना शून्य बनाना पड़ता है, तब कहीं सिद्धि के दर्शन होते हैं। इसीलिए तो जीवन के आरम्भ काल से स्वाध्याय शील एवं सदाचार-परायण बनने का आदेश दिया है। शास्त्रों में जो बार बार धर्म पर सत्यं वद, स्वाध्यायान्मा प्रमद, आदि आदेश वाक्य मिलते हैं उनका एक मात्र कारण अन्त गति को सुधारता रहना है जिसे जीवन में शाँति रहे और मृत्यु भी शान्ति से हो।
साधना का आश्रम है यहाँ जीवन की- धर्म, अर्थ और काम की साधना की जाती है।
साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गयी है। गायत्री संध्या-गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गयी हैं।
साधना करना आरम्भ कर दें यह संभव है। लेकिन न तो संघर्ष से अलग रहना इनका उद्देश्य होता है और न जनसेवा से विमुख होना। बिना पूर्व तैयारी के कर्मयोगी बनना आसान भी नहीं है क्योंकि जन सेवा बिना जन संघर्ष में आये संभव नहीं होती और जो जन संघर्ष में आकर उससे प्रभावित हो उठते हैं वे जनसेवा कर भी नहीं सकते। इसलिए वे कर्मयोग के उपयुक्त पात्र भी नहीं होते। उपयुक्त पात्र बनने के लिए कुछ समय पृथक रहना उनके लिए आवश्यक हो जाता है इसलिए देखने में वे भले ही संन्यास योगी दिखाई दें पर होते हैं वे कर्मयोगी, क्योंकि कर्मयोगी बनने के लिए- जनसंघर्ष में आने के लिए वे अपने को योग्य बनाते हैं।
साधना की परिपक्वता प्राप्त करते हुए कर्मयोगी हो जाते हैं। उद्देश्य कर्मयोग न होने पर भी संन्यास योग के अनुकूल उनका स्वभाव नहीं होता इसलिए संन्यास योग में उतर जाने के बाद भी वे कर्मयोगी बन जाते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि दाँभिकपन न हो और निठल्लेपन में रह कर जीवन बिताने की वृत्ति न हो, उनका जीवन प्रमाद से न घिर गया हो तो कोई युवा, युवात्मक शक्ति रहते हुए संन्यास योग में टिका रह ही नहीं सकता, उसे तो कर्मयोग की ओर प्रवृत्त होना ही पड़ता है। स्वामी विवेकानन्द का जीवन इस कर्मयोग से ओत प्रोत दिखाई देगा। यद्यपि वे संघर्ष से भाग कर संन्यासी नहीं हुए थे फिर भी उनकी युवात्मक वृत्तियों ने उन्हें कर्मयोग के मार्ग का ही पथिक बनाया था।
साधना ही आरम्भ नहीं होती। इसलिए किसी के अच्छे करने पर या किसी के द्वारा बुराई करने पर उसमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होते। संन्यास योगी जहाँ सदाचारी होता है वहाँ वह स्वावलम्बी भी होता है, एकान्त प्रिय, तपस्वी और सहिष्णु होता है।
साधनाओं का पथ प्रदर्शन किया गया है।
साधना विधि भली प्रकार बताई गयी है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमतापूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह सब इस पुस्तक में बताया गया है। साथ ही गायत्री उपनिषद् भी है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है।
साधना की जाती है।
साधना हो सकती है। प्रणव योग, विश्वयोग, ध्यान योग, सूर्ययोग, प्राणयोग, दिव्ययोग, विभुयोग, विज्ञान योग, लययोग, नादयोग, षट्चक्रयोग, ग्रन्थियोग इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना विधि भली प्रकार बताई गयी है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमतापूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह सब इस पुस्तक में बताया गया है। साथ ही गायत्री उपनिषद् भी है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है।
साधना का स्पर्श करके भी नहीं चल रही है। यह कथित सभ्यता कितनी दूर है प्रगति से।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-May
साधना के लिए तो अनुभव पूर्ण शिक्षा की अत्यधिक आवश्यकता है। क्योंकि प्रत्येक साधक की मनोभूमि, स्वास्थ्य, एवं परिस्थिति में भिन्नता होती है। इस भिन्नता के कारण उनकी साधनाओं में अन्तर करने की आवश्यकता पड़ती है। किसी के लिए कोई विधि व्यवस्था, उपयोगी बैठती है तो किसी के लिए उसमें हेर फेर करना जरूरी होता है। इन बातों को साधक स्वयं नहीं जान सकता।
साधना की छोटी मोटी भूलें, कर्मकाण्ड में अज्ञानवश हुई त्रुटियाँ तिनके के समान बह जाती हैं।
साधना की अथवा कोई योगाभ्यास या ताँत्रिक अनुष्ठान किया। साधना की नियत रीति में कोई भूल हो गई अथवा किसी प्रकार वह अनुष्ठान खंडित हो गया तो उसके कारण साधक को भारी विपत्ति में पड़ना पड़ता है। कई आदमी तो पागल तक होते देखे गये हैं। कई को रोग, मृत्यु, धन नाश आदि का अनिष्ट सहना पड़ा है। ऐसे प्रमाण इतिहास प्रमाणों में भी मिलते हैं।
साधना में लगाना चाहिए। बिखरी हुई बारूद को जला देने से वह भक् से जल जाती है और उसकी शक्ति समाप्त हो जाती है किन्तु यदि उसे बन्दूक की एक छोटी नाली में डालकर एक ही दिशा में जलाया जाय तो भयंकर आवाज करती है और जिधर चलाई जाती है उधर प्राणघातक परिणाम उपस्थित करती है। थोड़ी सी जगह में बिखरी हुई सूर्य किरणें कोई विशेष कार्य नहीं करती पर जब उन्हें आतिशी काँच द्वारा एक स्थान पर केन्द्रित कर दिया जाता है तो वे अग्नि उत्पन्न कर देती हैं। इसी प्रकार एकाग्रचित्त से की हुई साधना आशाजनक फल उपस्थित करती है, पर यदि अस्थिर मन से किया जाय तो प्रयत्न उतना ही अल्पफल दाता सिद्ध होता है। अतएव स्थिर चित्त होना साधना की पहली शर्त है।
साधना की प्रगति किस दिशा में, किस गति से हो रही है। यों कोई भी रोगी किसी चिकित्सा पुस्तक को लेकर अपनी दवा दारु कर सकता है, पर इस उपाय से अभीष्ट लाभ प्राप्त होगा ही यह नहीं कहा जा सकता। इसलिए किसी चतुर वैद्य के हाथ में चिकित्सा का उत्तरदायित्व सौंपना होता है। वैद्य देखता है कि रोगी को क्या रोग है, उसके लिए क्या चिकित्सा अच्छी पड़ेगी, इस निर्णय के लिए वह अपने चिर अनुभव को काम में लाता है और औषधि व्यवस्था करता है, फिर देखता है कि औषधि का क्या असर हो रहा है, उनके अनुसार हेर फेर करता है। मूत्र परीक्षा, जिह्वा परीक्षा, नाड़ी परीक्षा, वजन, थर्मामीटर, स्टोस्थेस्कोप आदि द्वारा यह जाँचता रहता है कि कितनी प्रगति हो रही है, उस प्रगति को संतुलित रखने के लिए वह रोगी को आवश्यक सलाह, पथ्य, परिचर्या आदि का आदेश करता रहता है।
साधनाओं की भी कभी छुट्टी नहीं होती। रोग, अशुद्ध, असमर्थ तथा विपन्न परिस्थितियों में पड़े होने का अवसर आवे तो अविधि पूजा की जा सकती है उस समय नियमित कर्मकाण्ड की छूट मिल सकती है। किसी भी विधि से सही पर उसका करना आवश्यक है क्योंकि वह नित्य कर्म है। नित्य कर्म में अनध्याय नहीं होता है। अनेकों मनुष्य आत्मिक साधन करने में प्रायः आलस्य और उपेक्षा बरतते हैं, फलस्वरूप उनका आन्तरिक जीवन, नाना प्रकार के विषय विकारों से भरा रहता है, आत्म शान्ति के दर्शन उनके लिए दुर्लभ हो जाते हैं, वे जीवन के महान लक्ष से वंचित रहकर, भोगैश्वर्य की तुच्छ कीचड़ में वुजवुजाते हुए अमूल्य मानव जन्म को निरर्थक बना देते हैं।
साधना में कोई भूल रह जाय तो भी उलटा परिणाम नहीं निकलता। किसी विपत्ति, संकट या अनिष्ट का सामना नहीं करना पड़ता। भूलों का, त्रुटियों का परिणाम यह हो सकता है कि आशा से कम फल मिले या अधिक से अधिक यह कि वह निष्फल चला जाय। इस साधना को किसी भी थोड़े से भी रूप में आरंभ कर देने से उसका फल हर दृष्टि से उत्तम होता है। उस फल के कारण ऐसे भयों से मुक्ति मिल जाती है जो अन्य उपायों से बड़ी कठिनाई से हटाये या मिटाये जा सकते हैं।
साधना के लाभ से वंचित न रहना पड़े इसलिए शिखा में गाँठ लगा दी जाती है। फुटबाल के भीतर की रबड़ में एक हवा भरने की नली होती है इसमें गाँठ लगा देने से भीतर भरी हुई वायु बाहर नहीं निकलने पाती। साइकिल के पहिए में भरी हुई हवा को रोकने के लिए भी एक छोटी वाल ट्यूब नामक रबड़ की नली लगी होती है, जिसमें होकर हवा भीतर तो जा सकती है पर बाहर नहीं आ सकती, गाँठ लगी हुई शिखा से भी यही प्रयोजन पूरा होता है। वह बाहर के विचार और शक्ति समूह को ग्रहण तो करती है पर भीतर के तत्वों का अनावश्यक व्यय नहीं होने देती।
साधना हम करते हैं उसी प्रकार का चुम्बकत्व हमारे जड़ और चैतन्य परमाणुओं में बढ़ता है फलस्वरूप संसार में से उसी प्रकार के तत्व खिंचकर हमारे पास जमा होते हैं और थोड़े ही दिनों में उसी प्रकार की एक बड़ी खान हमारे पास जमा हो जाती है। इस खान को स्थूल दृष्टि वाले लोग साधना की सिद्धि कहकर पुकारते हैं। जिस प्रकार की आन्तरिक शक्तियाँ हमारे अन्दर बढ़ती हैं उस प्रकार की बाह्य सफलताएं पग पग पर मिलना बिल्कुल स्वाभाविक है। इस स्वाभाविकता को ही लोग मंत्र बल की अद्भुत शक्ति समझते हैं। देखने में यह अद्भुत सा भले ही लगे पर वस्तुतः इसमें असाधारण कोई बात नहीं है, यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके आधार पर सूक्ष्म सिद्धान्तों द्वारा स्थूल लाभ प्राप्त किया जाता है।
साधना के लिए वरन् जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए लागू होती हैं। इन उपरोक्त पाँच शर्तों के साथ जो भी कार्य किया जायेगा वह उचित रीति से उन्नति की ओर बढ़ेगा और सन्तोष जनक परिणाम उपस्थित करेगा।
साधना क्लिष्टता का भी रहस्य यही है कि जिनकी लगन सच्ची है, निष्ठा पक्की है वे ही उस लाभ को प्राप्त करें। शरीर को जैसे हम कई कपड़ों से ढके रहते हैं उसी प्रकार ब्रह्म संध्या भी पंच कोषों के आवरण से आवृत है। इन आवरणों को (1) आचमन (2) शिखा बन्धन (3) प्राणायाम (4) अघमर्षण (5) न्यास, कहते हैं। इनका विवेचन नीचे किया जाता है।
साधना करनी चाहिए पर साथ ही इस आशंका को मन से निकाल देना चाहिए कि किंचित मात्र भूल हो गई तो बुरा होगा। इस भय के कारण गायत्री साधना से वंचित रहने की आवश्यकता नहीं है, यह बात उपरोक्त श्लोक में स्पष्ट कर दी गई है कि वेदमाता अपने भक्तों की भक्ति भावना का प्रधान रूप से ध्यान रखती है और अज्ञानवश हुई छोटी मोटी भूलों को क्षमा करती रहती है।
साधना से वंचित रहने की आवश्यकता नहीं है, यह बात उपरोक्त श्लोक में स्पष्ट कर दी गई है कि वेदमाता अपने भक्तों की भक्ति भावना का प्रधान रूप से ध्यान रखती है और अज्ञानवश हुई छोटी मोटी भूलों को क्षमा करती रहती है।
साधना से सब प्रकार के दुखों का वस्तुतः नाश हो जाता है।
साधना हो उसी प्रकार की साधना सामग्री व्यवहृत करनी चाहिए। नीचे इस संबंध में एक विवरण दिया जाता है:-
साधना की श्रद्धा है।
साधना के आधार पर साधक की मनोभूमि का ऐसा निर्माण किया जाता है कि वह मंत्र शक्ति के ऊपर अटूट विश्वास कर ले। यह विश्वास जितना ही गहरा सुदृढ़ एवं संदेह रहित होता है, जितना ही उस पर श्रद्धा का पुट चढ़ा होता है उसी अनुपात से मंत्र की सिद्धि मिलती है और उस सिद्धि के चमत्कार दृष्टि गोचर होते हैं।
साधना की पहली शर्त है।
साधना में सफलता मिल सकती है। वे शर्तें यह हैं कि (1) स्थिर चित्त (2) श्रद्धा (3) दृढ़ता (4) निरन्तर (5) समय पर साधना करना। अब इनका विवेचन नीचे किया जाता है।
साधनाओं में अन्तर करने की आवश्यकता पड़ती है। किसी के लिए कोई विधि व्यवस्था, उपयोगी बैठती है तो किसी के लिए उसमें हेर फेर करना जरूरी होता है। इन बातों को साधक स्वयं नहीं जान सकता। स्कूल में जाने वाले बच्चे स्वयं यह निर्णय करने में समर्थ नहीं होते कि हमें कौन पुस्तकें, किस क्रम से पढ़नी चाहिए यदि वे अपने आप, अपनी इच्छा से मन-मर्जी का पाठ्यक्रम चुनें और स्वयं अपनी शिक्षा विधि निर्धारित करें तो उनके लिए सफलता प्राप्त करना कठिन होगा, वे समय और शक्ति का दुरुपयोग करेंगे और उस लाभ से वंचित रहेंगे जो गुरु की मर्जी के अनुसार पढ़ने से उन्हें प्राप्त हो सकता था।
साधनाओं के विषय में मतभेद हो सकता हैं पर शिखा सूत्र धारी किसी भी हिन्दू को गायत्री की महानता में सन्देह नहीं हो सकता। क्योंकि वह ‘वेदमाता’ है, उसकी महत्ता को सम्पूर्ण शास्त्रों, सम्प्रदायों और ऋषियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है। जिसने भी इस महा साधन का अनुभव किया है उसने उसकी सर्वोत्कृष्टता को माना है। हम भी गायत्री उपासना को अपना नित्य नियम नित्य कर्म बनावें तो उन्हीं लाभों को प्राप्त कर सकते हैं, जिन्हें असंख्यों ने अब तक प्राप्त किया है।
साधना काल में कई बार कुछ विक्षेप उत्पन्न हो जाते हैं, उन विक्षेपों के, भूलों के, सुधार के लिए उपाय जानने की आवश्यकता होती है, कई बार विचित्र अनुभव आते हैं उनका कारण समझने की जरूरत पड़ती है, बीच बीच में परीक्षा करने की आवश्यकता अनुभव होती है जिससे यह मालूम पड़ता रहे कि साधना की प्रगति किस दिशा में, किस गति से हो रही है। यों कोई भी रोगी किसी चिकित्सा पुस्तक को लेकर अपनी दवा दारु कर सकता है, पर इस उपाय से अभीष्ट लाभ प्राप्त होगा ही यह नहीं कहा जा सकता। इसलिए किसी चतुर वैद्य के हाथ में चिकित्सा का उत्तरदायित्व सौंपना होता है। वैद्य देखता है कि रोगी को क्या रोग है, उसके लिए क्या चिकित्सा अच्छी पड़ेगी, इस निर्णय के लिए वह अपने चिर अनुभव को काम में लाता है और औषधि व्यवस्था करता है, फिर देखता है कि औषधि का क्या असर हो रहा है, उनके अनुसार हेर फेर करता है। मूत्र परीक्षा, जिह्वा परीक्षा, नाड़ी परीक्षा, वजन, थर्मामीटर, स्टोस्थेस्कोप आदि द्वारा यह जाँचता रहता है कि कितनी प्रगति हो रही है, उस प्रगति को संतुलित रखने के लिए वह रोगी को आवश्यक सलाह, पथ्य, परिचर्या आदि का आदेश करता रहता है।
साधना को किसी भी थोड़े से भी रूप में आरंभ कर देने से उसका फल हर दृष्टि से उत्तम होता है। उस फल के कारण ऐसे भयों से मुक्ति मिल जाती है जो अन्य उपायों से बड़ी कठिनाई से हटाये या मिटाये जा सकते हैं।
साधना के लिए तीसरी शर्त दृढ़ता रखी गई है।
साधना पर भी समय का प्रभाव होता है क्योंकि मन पर वातावरण का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है।
साधना पद्धति से, निर्धारित कर्मकाण्ड के अनुसार, मंत्रों का अनुष्ठान, साधन, पुरश्चरण करना होता है। आमतौर से अविधि पूर्वक किया हुआ अनुष्ठान, साधक के लिए हानिकारक सिद्ध होता है और लाभ के स्थान पर उसके अनिष्ट की संभावना रहती है।
साधना के फलस्वरूप असंख्यों साधकों को अब तक मिल चुके हैं।” इस प्रकार की भावनाओं का मन में उठते रहना, उनके कल्पना चित्र मस्तिष्क में घूमते रहना तथा उन विचार धाराओं के प्रति अधिकाधिक विश्वास भाव दृढ़ होते जाना, गायत्री साधना की श्रद्धा है।
साधना के इस आवश्यक अंग-ध्यान में-मन लगा देने से वह एक कार्य में उलझा रहता है और जगह-2 नहीं भागता। भागे तो उसे रोक रोक कर बार बार ध्यान भावना पर लगाना चाहिए। इस विधि से एकाग्रता की दिन दिन वृद्धि होती चलती है।
साधना सामग्री व्यवहृत करनी चाहिए। नीचे इस संबंध में एक विवरण दिया जाता है:-
साधनाएं, विधियाँ बड़ी कठोर होती हैं। उनके सिद्ध करने में साधक को अपने पुरुषार्थ का परिचय देना होता है। यह विधियाँ गुप्त रखी जाती हैं और गुरु उन्हें अपने शिष्य को गुप्त रखने की प्रतिज्ञा के साथ बताते हैं। इस प्रकार की गोपनीयता, मंत्र की महापुरुषार्थ पूर्ण कठोर साधना के आधार पर साधक की मनोभूमि का ऐसा निर्माण किया जाता है कि वह मंत्र शक्ति के ऊपर अटूट विश्वास कर ले। यह विश्वास जितना ही गहरा सुदृढ़ एवं संदेह रहित होता है, जितना ही उस पर श्रद्धा का पुट चढ़ा होता है उसी अनुपात से मंत्र की सिद्धि मिलती है और उस सिद्धि के चमत्कार दृष्टि गोचर होते हैं।
साधना लेख में दी हुई है वे तीनों गुण वाली लेनी चाहिए पर आध्यात्मिक हवन हो तो सतोगुणी सामग्री आधी और चौथाई चौथाई रजोगुणी तमोगुणी लेनी चाहिए। यदि किसी भौतिक कामना के लिए हवन किया गया हो रजोगुणी आधी और सतोगुणी तमोगुणी चौथाई चौथाई लेनी चाहिए। सामग्री को भली प्रकार साफ कर धूप में सुखा कर जौ कुट कर लेना चाहिए। सामग्रियों की किसी वस्तु के न मिलने पर या कम मिलने पर उसका भाग उसी गुण वाली दूसरी औषधि को मिला कर किया जा सकता है।
साधना किस उद्देश्य के लिए है, सत, रज, तम में से किस तत्व की वृद्धि के लिए है। जिस प्रकार की साधना हो उसी प्रकार की साधना सामग्री व्यवहृत करनी चाहिए। नीचे इस संबंध में एक विवरण दिया जाता है:-
साधना की एक विशेष विधि व्यवस्था होती है। नियत साधना पद्धति से, निर्धारित कर्मकाण्ड के अनुसार, मंत्रों का अनुष्ठान, साधन, पुरश्चरण करना होता है। आमतौर से अविधि पूर्वक किया हुआ अनुष्ठान, साधक के लिए हानिकारक सिद्ध होता है और लाभ के स्थान पर उसके अनिष्ट की संभावना रहती है।
साधना के द्वारा आत्मबल प्राप्त करने पर मनुष्य की आन्तरिक स्थिति काफी मजबूत और प्रफुल्लित हो जाती है, उसके द्वारा दैनिक जीवन की गतिविधि का संचालन बड़ी ही आशापूर्ण उत्तमता के साथ होता है।
साधना की सिद्धि कहकर पुकारते हैं। जिस प्रकार की आन्तरिक शक्तियाँ हमारे अन्दर बढ़ती हैं उस प्रकार की बाह्य सफलताएं पग पग पर मिलना बिल्कुल स्वाभाविक है। इस स्वाभाविकता को ही लोग मंत्र बल की अद्भुत शक्ति समझते हैं। देखने में यह अद्भुत सा भले ही लगे पर वस्तुतः इसमें असाधारण कोई बात नहीं है, यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके आधार पर सूक्ष्म सिद्धान्तों द्वारा स्थूल लाभ प्राप्त किया जाता है। विज्ञान का आधार ही सूक्ष्म तत्वों से स्थूल लाभ प्राप्त करना है, आध्यात्म विज्ञान भी उस चिर सनातन आधार पर ही अवलंबित है।
साधनाएं हैं वे सब विश्वास बल के चमत्कार मात्र हैं। परमात्मा की प्राप्ति, आत्म दर्शन, ब्रह्मनिर्वाण, जीवन मुक्ति और परमानन्द को उपलब्ध करने के लिए एक मात्र अवलंबन विश्वास ही है। यदि यह पतवार हाथ से छूट जाय तो साधक का किसी भी निश्चित केन्द्र विन्दु पर पहुँचना कठिन ही नहीं असंभव भी है।
साधना करने कि शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए। अकारण भूल करने से क्या प्रयोजन ? अपनी माता अनुचित व्यवहार को भी क्षमा कर देती है पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसके प्रति श्रद्धा, भक्ति में कुछ, ढील या उपेक्षा की जाय। जहाँ तक बन पड़े पूरी पूरी सावधानी के साथ साधना करनी चाहिए पर साथ ही इस आशंका को मन से निकाल देना चाहिए कि किंचित मात्र भूल हो गई तो बुरा होगा। इस भय के कारण गायत्री साधना से वंचित रहने की आवश्यकता नहीं है, यह बात उपरोक्त श्लोक में स्पष्ट कर दी गई है कि वेदमाता अपने भक्तों की भक्ति भावना का प्रधान रूप से ध्यान रखती है और अज्ञानवश हुई छोटी मोटी भूलों को क्षमा करती रहती है।
साधना पकने का माप दंड सवा लक्ष जप है। पकी हुई साधना ही मधुर फल देती है।
साधना का विपरीत फल न होने का विश्वास भगवान कृष्ण ने गीता में दिलाया है-
साधना से आत्मा में सात्विक चैतन्यता की मात्रा बढ़ती जाती है, फलस्वरूप जीवन की सभी दिशाओं में उसका प्रगति-परिचय मिलने लगता है। जब शरीर में रक्त बढ़ता है तो हाथ, पाँव, छाती, नाक, गाल, ओठ सभी में चैतन्यता, पुष्टि और लालिमा दृष्टि गोचर होने लगती है। जब कमरे में प्रकाश जलता है तो सभी खिड़कियों में से उसकी रोशनी बाहर निकलती है। आत्मा में जब बल बढ़ता है तो वह भी कई दिशाओं में उत्साहवर्धक ढंग से प्रकट होता है।
साधना से मनोभूमि का इस प्रकार विकास होता कि ज्ञान, शक्ति और समृद्धि का बाहुल्य प्रत्यक्ष रूप से दृष्टि गोचर होने लगता है। इस वृद्धि के साथ साथ दुखों के मूल हेतु भी घटने लगते हैं, फलस्वरूप साधक अपने चारों ओर सुख शान्तिमयी परिस्थितियाँ बढ़ती हुई देखता है।
साधना करनी होती है उसी के अनुरूप उन्हीं तत्वों वाली, उन्हीं प्राणों वाली, उन्हीं गुणों वाली सामग्री उपयोग में लानी होती है। सबसे प्रथम यह देखना चाहिए कि हमारी साधना किस उद्देश्य के लिए है, सत, रज, तम में से किस तत्व की वृद्धि के लिए है। जिस प्रकार की साधना हो उसी प्रकार की साधना सामग्री व्यवहृत करनी चाहिए। नीचे इस संबंध में एक विवरण दिया जाता है:-
साधनाओं के संबंध में कितने ही लेख भी भेजे हैं, पर उनको इसलिए न छापा जा सकता कि कितनी ही विधियों का वर्णन होने से पाठकों की उलझन बढ़ती और इनमें से किसे ग्रहण करें और किसे त्यागें इस द्विविधा में पढ़ कर उन्हें बुद्धि विक्षेप में पड़ना होता। साधकों के लिए एक ही प्रणाली निष्ठा उत्पन्न कर सकती है, इसलिए इस अंक में वैसा ही प्रयत्न हुआ है।
साधना से जो लाभ हुआ हो उनका संग्रह करके भेजें। आशा है कि पाठक अपनी पत्रिका के लिए इस दिशा में सद्सेवा करके लेख भिजवाने का प्रयत्न करेंगे।
साधना की दूसरी आवश्यक शर्त माना है।
साधना करना। अब इनका विवेचन नीचे किया जाता है।
साधना की पांचवीं शर्त यह है कि समय पर नियत मर्यादा में, नियमित रूप से साधना की जाय।
साधना, पूजा, भजन, स्वाध्याय, आत्म चिन्तन, आदि नामों से पुकारते हैं। इन उपायों से आत्मबल प्राप्त होता है, आत्मिक थकान मिटती है, प्रकाश, स्फूर्ति और ताजगी मिलती है। जैसे पूरी निद्रा लेकर, पौष्टिक आहार प्राप्त करके प्रसन्न चित्त हुआ मनुष्य जिस कार्य में जुटता है उसे उत्साह चतुरता और शीघ्रता से पूरा कर लेता है उसी प्रकार साधना के द्वारा आत्मबल प्राप्त करने पर मनुष्य की आन्तरिक स्थिति काफी मजबूत और प्रफुल्लित हो जाती है, उसके द्वारा दैनिक जीवन की गतिविधि का संचालन बड़ी ही आशापूर्ण उत्तमता के साथ होता है।
साधना से जहाँ शक्ति प्राप्त होती है। इसलिए शास्त्रकारों ने आध्यात्मिक साधना को नित्य कर्म कहा है। उसमें आलस्य, अनध्याय, विराम, छुट्टी की गुंजाइश नहीं रखी गई है। हम कुल्ला दातौन, मलमूत्र त्याग, तथा जल वायु सेवन की कभी छुट्टी नहीं करते उसी प्रकार आत्मिक साधनाओं की भी कभी छुट्टी नहीं होती। रोग, अशुद्ध, असमर्थ तथा विपन्न परिस्थितियों में पड़े होने का अवसर आवे तो अविधि पूजा की जा सकती है उस समय नियमित कर्मकाण्ड की छूट मिल सकती है।
साधना। इस साधना से आत्मा में सात्विक चैतन्यता की मात्रा बढ़ती जाती है, फलस्वरूप जीवन की सभी दिशाओं में उसका प्रगति-परिचय मिलने लगता है। जब शरीर में रक्त बढ़ता है तो हाथ, पाँव, छाती, नाक, गाल, ओठ सभी में चैतन्यता, पुष्टि और लालिमा दृष्टि गोचर होने लगती है। जब कमरे में प्रकाश जलता है तो सभी खिड़कियों में से उसकी रोशनी बाहर निकलती है। आत्मा में जब बल बढ़ता है तो वह भी कई दिशाओं में उत्साहवर्धक ढंग से प्रकट होता है।
साधनानि अपि) साधन भी (अभिजायन्ते) पैदा होते हैं।
साधना के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। इस कार्य के लिए ब्रह्मनिष्ठ, आत्मदर्शी, का वरण करना चाहिए। कोई श्रेष्ठ, अनुभवी, आत्मिक दृष्टि वाले सदाचारी व्यक्ति अपने समीप न हों तो दूरस्थ व्यक्तियों से भी यह हो सकता है। शरीर दूर दूर रहते हुए भी आत्माओं के लिए दूरी का कोई प्रश्न नहीं। दूरस्थ आत्माएं उसी प्रकार एक दूसरे की समीपता कर सकती हैं जिस प्रकार पास पास रहते हुए दो व्यक्ति आपस से निकटता अनुभव करते हैं।
साधना से मनुष्य के अन्तःकरण में एक मौलिक परिवर्तन होता है। उसकी वृत्तियाँ-इन्द्रिय भोग, धन संचय, अहंकार, मनोरंजन, मोह, स्वार्थ, द्वेष जैसी तुच्छ तृष्णाओं से विमुख हो जाती हैं, उनमें कुछ भी रस प्रतीत नहीं है, और न इनकी पूर्ति का लाभ कोई वास्तविक लाभ दिखाई देता है। इस अज्ञान के, माया के, भोगवाद के, बन्धन शिथिल पड़ जाते हैं और आध्यात्मिक रसों में आनन्द आने लगता है। इसकी इच्छाएं लोक सेवा, परोपकार, दया, प्रेम, उदारता, त्याग, संयम, धर्म, सेवन, सतोगुण परायणता एवं ईश्वर प्राप्ति की ओर मुड़ती हैं और दिन दिन इसी मार्ग पर बढ़ती चली जाती हैं।
साधना की हो, अखंड ज्योति के प्रतिनिधि की तरह उनके पास जा कर उनसे उनके अनुभव पूछें और कहीं अन्यत्र भूत काल में किसी को इस साधना से जो लाभ हुआ हो उनका संग्रह करके भेजें। आशा है कि पाठक अपनी पत्रिका के लिए इस दिशा में सद्सेवा करके लेख भिजवाने का प्रयत्न करेंगे।
साधना में अनध्याय न करें, अन्यथा उनकी भी गणना शूद्रों में होगी, उन्हें भी उसी श्रेणी का समझा जायगा।
साधना ही मधुर फल देती है।
साधना कौन सी करनी चाहिए। इस प्रश्न के संबंध में क्या कहा जाय। अन्य साधनाओं के विषय में मतभेद हो सकता हैं पर शिखा सूत्र धारी किसी भी हिन्दू को गायत्री की महानता में सन्देह नहीं हो सकता। क्योंकि वह ‘वेदमाता’ है, उसकी महत्ता को सम्पूर्ण शास्त्रों, सम्प्रदायों और ऋषियों ने एक स्वर से स्वीकार किया है। जिसने भी इस महा साधन का अनुभव किया है उसने उसकी सर्वोत्कृष्टता को माना है।
साधना की नियत रीति में कोई भूल हो गई अथवा किसी प्रकार वह अनुष्ठान खंडित हो गया तो उसके कारण साधक को भारी विपत्ति में पड़ना पड़ता है। कई आदमी तो पागल तक होते देखे गये हैं। कई को रोग, मृत्यु, धन नाश आदि का अनिष्ट सहना पड़ा है। ऐसे प्रमाण इतिहास प्रमाणों में भी मिलते हैं। वृत्त और इन्द्र की कथा इसी प्रकार की है वेदमंत्रों का अशुद्ध उच्चारण करने पर उन्हें घातक संकट सहना पड़ा था।
साधना जिस समय पर की जाती है, उस समय के वातावरण के अनुसार मनोभूमि में एक विशेष प्रकार के अंकुरों का निर्माण होता है जो अपने विशेष क्रम से परिपुष्ट होने के लिए बढ़ते हैं, परन्तु यदि समय की अव्यवस्था रहे तो एक प्रकार के जमे हुए अंकुर मुर्झाते हैं, दूसरे प्रकार के नये जमते हैं फिर वे भी परिवर्तनों के अनुसार सूखते हरे होते रहते हैं इस गड़बड़ी से यह फसल वैसे अच्छे फल नहीं ला पाती जैसे कि लाने की आशा करनी चाहिए। इसलिए साधना की पांचवीं शर्त यह है कि समय पर नियत मर्यादा में, नियमित रूप से साधना की जाय।
साधना से सतोगुण की वृद्धि होती है, आत्मबल उन्नत होता है फल स्वरूप उन तत्वों का शासन और दमन होता रहता है जो उन्नति और सुख शान्ति में बाधक होते हैं। स्वभाव और दृष्टिकोण में अन्तर आ जाने से, उनके परिमार्जित हो जाने से, अनेकों ऐसे कारण स्वयमेव समाप्त हो जाते हैं, उनका अवसर ही नहीं आ पाता जिनके कारण दुख दारिद्र की पीड़ाएं मनुष्य को भुगतनी पड़ती हैं। विपत्ति और सम्पत्ति प्रधानतः मान्यता का विषय है। एक व्यक्ति जिस स्थिति में रहते हुए प्रसन्नतापूर्वक जीवन यापन करता है दूसरा उसमें पहुँचने को एक विपत्ति अनुभव करता है। जब दृष्टि कोण में सतोगुणी, दार्शनिक परिवर्तन हो जाता है तो मनुष्य के लिए कोई भी बात विपत्ति नहीं रहती।
साधना अत्यन्त आवश्यक है। शूद्र उसे कहते हैं जो मनुष्य शरीर तो धारण किये हुए है, पर मनुष्य आत्मा जिसके अन्दर नहीं है। ऐसे मानव प्राणियों की कमी नहीं जो नैतिक और आत्मिक दृष्टि से पशुओं से भी गये बीते हैं ऐसे लोग न तो आत्मा को ही पहचानते हैं और न ही आत्मा के उत्तर दायित्व को समझते हैं, उनके लिए न तो साधना का महत्व है और न आत्मा प्राप्ति का। ऐसे लोगों की प्रवृत्ति ही इस मार्ग में नहीं होती, शास्त्रों के आदेश और सत्पुरुषों के उपदेशों की ओर उनका मन आकर्षित नहीं होता। ऐसी मनोभूमि के लोगों को शास्त्रकारों ने छोड़कर ठीक ही किया है, वे स्वयं ही इधर आँख उठाकर नहीं देखते, उनकी रुचि इधर मुड़ती ही नहीं, ऐसे लोगों पर क्या उत्तरदायित्व लादा जाय।
साधना विधियाँ भी अनेक हैं, उनके फल भी प्रथक प्रथक हैं, उनकी शक्तियों में भिन्नता है। इतना सब होते हुए भी उन सबका मूल तत्व एक ही है। एक ही मिट्टी से कुम्हार विविध प्रकार के खिलौने और बर्तन बना देता है। एक ही धातु से अनेक प्रकार के शास्त्र, पात्र, आभूषण एवं पदार्थ बनते हैं उनमें भिन्नता रहते हुए भी मूल में एक ही चीज है इसी प्रकार मंत्र बहुत से है, पर उनका आधार एक मात्र विश्वास ही है। साधकों की संतुष्टि और श्रद्धा की पुष्टि के लिए अनेक गुरु परम्पराओं से अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक मंत्र प्रचलित हैं पर तात्विक दृष्टि से विवेचन किया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इस पृथकता का एकीकरण भी किया जा सकता है।
साधना का महत्व है और न आत्मा प्राप्ति का। ऐसे लोगों की प्रवृत्ति ही इस मार्ग में नहीं होती, शास्त्रों के आदेश और सत्पुरुषों के उपदेशों की ओर उनका मन आकर्षित नहीं होता। ऐसी मनोभूमि के लोगों को शास्त्रकारों ने छोड़कर ठीक ही किया है, वे स्वयं ही इधर आँख उठाकर नहीं देखते, उनकी रुचि इधर मुड़ती ही नहीं, ऐसे लोगों पर क्या उत्तरदायित्व लादा जाय। राज के कानून बनते हैं वे बन्दरों पर लागू नहीं होते। ऐसा ही विचार करके शास्त्रकारों ने उस श्रेणी के लोगों का अलग रहना स्वीकार कर लिया है, पर उन चैतन्य लोगों पर, द्विजों पर, इस बात के लिए अत्यधिक जोर दिया है कि वे साधना में अनध्याय न करें, अन्यथा उनकी भी गणना शूद्रों में होगी, उन्हें भी उसी श्रेणी का समझा जायगा।
साधना को नित्य कर्म कहा है। उसमें आलस्य, अनध्याय, विराम, छुट्टी की गुंजाइश नहीं रखी गई है। हम कुल्ला दातौन, मलमूत्र त्याग, तथा जल वायु सेवन की कभी छुट्टी नहीं करते उसी प्रकार आत्मिक साधनाओं की भी कभी छुट्टी नहीं होती। रोग, अशुद्ध, असमर्थ तथा विपन्न परिस्थितियों में पड़े होने का अवसर आवे तो अविधि पूजा की जा सकती है उस समय नियमित कर्मकाण्ड की छूट मिल सकती है। किसी भी विधि से सही पर उसका करना आवश्यक है क्योंकि वह नित्य कर्म है।
साधना आशाजनक फल उपस्थित करती है, पर यदि अस्थिर मन से किया जाय तो प्रयत्न उतना ही अल्पफल दाता सिद्ध होता है। अतएव स्थिर चित्त होना साधना की पहली शर्त है।
साधनान्यपि।।
साधना सामग्री उपयोग करने से साधक में उन्हीं गुणों की अभिवृद्धि होती है तद्नुसार सफलता का मार्ग अधिक सुगम हो जाता है।
साधना की जाय।
साधना में साधक के लिए गुरु वही कार्य करता है जो रोगी के लिए वैद्य करता है।
साधना से सतोगुण की ब्राह्मी भावनाएं अन्तः प्रदेश में अपना केन्द्र स्थापित करती हैं। उन भावनाओं के अनुरूप आन्तरिक जीवन बन जाता है और उसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ वाह्य जीवन में भी दृष्टि गोचर होती हैं।
साधना पद्धति से उसकी साधना करने कि शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए। अकारण भूल करने से क्या प्रयोजन ? अपनी माता अनुचित व्यवहार को भी क्षमा कर देती है पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसके प्रति श्रद्धा, भक्ति में कुछ, ढील या उपेक्षा की जाय। जहाँ तक बन पड़े पूरी पूरी सावधानी के साथ साधना करनी चाहिए पर साथ ही इस आशंका को मन से निकाल देना चाहिए कि किंचित मात्र भूल हो गई तो बुरा होगा। इस भय के कारण गायत्री साधना से वंचित रहने की आवश्यकता नहीं है, यह बात उपरोक्त श्लोक में स्पष्ट कर दी गई है कि वेदमाता अपने भक्तों की भक्ति भावना का प्रधान रूप से ध्यान रखती है और अज्ञानवश हुई छोटी मोटी भूलों को क्षमा करती रहती है।
साधना का अधिकारी बन जावे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-January
साधना का संकेत करता है? हाय नारी! तुम्हारी ही पूजा में सनातन पुरुष जीवन को सार्थक बनाते आये हैं और तुम उसी पुरुष को कोसा करती हो! पुरुष सरस्वती के रूप में नारी को ही तो पूजता है? लक्ष्मी के रूप में नारी की ही तो आराधना करता है? रण चण्डी के रूप में नारी का ही तो आवाहन करता है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-November
साधना सामग्री का मोह यदि न हो तो निर्माण और उत्पादन न हो और रक्षा की व्यवस्था भी न की जा सके। ममता का भाव न रहे तो “मेरा कर्तव्य” भी न सोचा जा सकेगा “मेरी मुक्ति-मेरा कल्याण” भी कौन सोच सकेगा? अपनी संस्कृति अपनी देशभक्ति को भी लोग भुला देंगे। एक दूसरे प्रति प्रेम का बंधन कायम न रह सकेगा और सब लोग आपस में उदासीन की तरह रहा करेंगे। क्या ऐसा नीरस जीवन जीना कोई मनुष्य पसंद कर सकता है?
साधना कैसे की जाय? विचार करना परमावश्यक है। यह तो निश्चित है कि मरना अवश्यंभावी है, पर वह मृत्यु होगी कब? यह अनिश्चित है, इसीलिए लक्ष्य को निर्धारित कर उसी तक पहुँचने के लिये प्रगतिशील बना जाए, समय को व्यर्थ न खोकर प्राप्त साधनों को लाभ के अनुकूल बनाया जाए और लक्ष्य पर पहुँचकर ही विश्राम लिया जाय। यही हमारा परम कर्त्तव्य है।
साधनाएं दी गई हैं वे इतनी व्यापक हैं कि किसी भी बड़ी से बड़ी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए और किसी शिक्षा की आवश्यकता न पड़ेगी। इन पुस्तकों की प्रशंसा करूं या आपकी कुछ कहते नहीं बनता।
साधना के अनुकूल हो जाती है और साधना की अनुकूलता ही सिद्धि प्राप्ति का साधन है।
साधना नहीं छोड़ देनी चाहिए। भगवान सर्वशक्ति मान हैं, इसलिए वे कितने ही भयंकर गड्ढे में चाहे क्यों न फेंक दें फिर भी किसी न किसी दिन वे हमारा वहाँ से अवश्य उद्धार करेंगे यह निश्चित है।
साधना से इस पद्धति का ज्ञान रहता है और वह व्यक्ति
साधना हमें दिये हैं वे उसके श्रेष्ठ वरदान हैं, उनके द्वारा हमारा कल्याण ही होता है। विपरीत का कारण तो हमारा दुरुपयोग है। हमें चाहिए कि अपने प्रत्येक शारीरिक और मानसिक औजार के ऊपर अपना पूर्ण नियंत्रण रखें, उनसे उचित काम लें, उनका सदुपयोग करें। ऐसा करने से जिन्हें आज निंदित कहा जाता है, शत्रु समझा जाता है कल वे ही हमारे मित्र बन जाते हैं। स्मरण रखिए प्रभु ने हमें श्रेष्ठ तत्वों से बनाया है, यदि उनका दुरुपयोग न किया जाय तो जो कुछ हमें मिला हुआ है हमारे लिए सब प्रकार श्रेयष्कर ही है।
साधना द्वारा पुरुषार्थी हो जाता है तब वह उसकी चेरी हो जाती है अपनी समस्त शक्तियाँ उसे प्रकट कर देती हैं, उसके आगे अपनी गुप्त निधियाँ बिखेर देती हैं और उसे पुरुष (या ईश्वर) बना देती है।
साधना का सीधा सच्चा और अनुभव में आया हुआ रास्ता जान सकें। आपकी इन गायत्री विद्या की पुस्तकों ने उस कठिनाई को दूर कर दिया हैं योग के समस्त रहस्य इन पुस्तकों में मौजूद है इसमें जो साधनाएं दी गई हैं वे इतनी व्यापक हैं कि किसी भी बड़ी से बड़ी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए और किसी शिक्षा की आवश्यकता न पड़ेगी। इन पुस्तकों की प्रशंसा करूं या आपकी कुछ कहते नहीं बनता।
साधना की अनुकूलता ही सिद्धि प्राप्ति का साधन है।
साधना से मुँह मोड़ लेना और प्राप्त सिद्धि को सब कुछ समझ कर उसी के भोग में लग जाना। साधना की ये दोनों ही विपत्तियाँ विघ्न हैं। इसलिए साधक को सदा इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वह भी भगवान का अंश है और भगवती महा माया आदि शक्ति उसके अन्तराल में बैठी हुई उसका संचालन कर रहीं हैं। सर्व शक्तिमान भगवान की लीला के अधीन होकर चुपचाप बैठे रहना साधक के लिए उचित नहीं है। यह तो उसके अहंकार की विद्यमानता का फल है जब तक अहंकार रहता है तब तक वास्तविक धारणा का उत्पन्न होना ही सम्भव नहीं है इस लिए अहंकार को निर्मूल कर देने पर ही साधक उन विपत्तियों से बच सकता है।
साधना मार्ग पर चलने वालों का मार्ग बड़ा कठिन है उन्हें ऐसे सद्गुरुओं की प्राप्ति नहीं हो पाती जिनके द्वारा साधना का सीधा सच्चा और अनुभव में आया हुआ रास्ता जान सकें। आपकी इन गायत्री विद्या की पुस्तकों ने उस कठिनाई को दूर कर दिया हैं योग के समस्त रहस्य इन पुस्तकों में मौजूद है इसमें जो साधनाएं दी गई हैं वे इतनी व्यापक हैं कि किसी भी बड़ी से बड़ी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए और किसी शिक्षा की आवश्यकता न पड़ेगी। इन पुस्तकों की प्रशंसा करूं या आपकी कुछ कहते नहीं बनता।
साधना के समय साधक को साहस और धैर्य रखने की आवश्यकता है। सिद्धि मिलने में कितना भी समय क्यों ना लगे साधक को घबराना नहीं चाहिए। यहाँ तक कि यदि सिद्धि मिलने के पहले कोई अनर्थकारी घटना भी घट जावे तब भी घबराकर अपनी साधना नहीं छोड़ देनी चाहिए। भगवान सर्वशक्ति मान हैं, इसलिए वे कितने ही भयंकर गड्ढे में चाहे क्यों न फेंक दें फिर भी किसी न किसी दिन वे हमारा वहाँ से अवश्य उद्धार करेंगे यह निश्चित है।
साधना की ये दोनों ही विपत्तियाँ विघ्न हैं। इसलिए साधक को सदा इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वह भी भगवान का अंश है और भगवती महा माया आदि शक्ति उसके अन्तराल में बैठी हुई उसका संचालन कर रहीं हैं। सर्व शक्तिमान भगवान की लीला के अधीन होकर चुपचाप बैठे रहना साधक के लिए उचित नहीं है। यह तो उसके अहंकार की विद्यमानता का फल है जब तक अहंकार रहता है तब तक वास्तविक धारणा का उत्पन्न होना ही सम्भव नहीं है इस लिए अहंकार को निर्मूल कर देने पर ही साधक उन विपत्तियों से बच सकता है।
साधना का काम अत्यन्त कठिन है। पर जो आरंभ में दृढ़ विश्वास के साथ अग्रसर होते हैं उनके लिए यह मार्ग अत्यन्त सरल हो जाता है। क्योंकि दृढ़ता होने पर मनुष्य की प्रकृति साधना के अनुकूल हो जाती है और साधना की अनुकूलता ही सिद्धि प्राप्ति का साधन है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1948-December
साधनायें
साधनावस्था में साधकों को सहनशील होकर रहना आवश्यक होता है। आसक्ति का त्याग करना पड़ता है। आसक्ति का अर्थ भोग नहीं है। आसक्ति के कारण मनुष्य के कर्म संस्कार सृष्टि के कारण होते हैं। जो लोग बुद्धि के साथ भगवान की इच्छा का मिलान कर लेते हैं वे आसक्ति को पार कर लेते हैं।
साधनाएं जनहितकारी हों तब भी वह योगी कर्मयोगी न कहला कर सारस्वत योगी ही कहलावेगा।
साधना
साधना वाले तेजस्वी महात्मा निवास करते हैं वहाँ का वातावरण ऐसा शान्ति दायक हो जाता है कि गौ और सिंह आपस में प्रेमपूर्वक निर्भय होकर रहते हैं। अपना स्वाभाविक बैर भाव भूल जाते हैं। इस प्रकार जहाँ कोई अवतारी, कलाधारी, अलौकिक आत्माएं रही हैं वहाँ का वातावरण भी उनके दिव्य तेज से भर जाता है और वह बहुत समय तक उन आत्माओं के चले जाने के चिरकाल पश्चात् तक बना रहता है। तपस्वी महात्मा अपनी तपश्चर्या के लिए प्रायः ऐसे स्थानों को चुना करते हैं जहाँ इस प्रकार के आत्म तेज पूर्वकाल से ही विद्यमान हों। क्योंकि इससे उनको बल प्राप्त होता है, साधनों के विघ्नों से अनायास ही बहुत अंशों में छुटकारा मिलता है।
साधना की अवस्था में सारी वासनायें छोड़कर चलना पड़ता है। यह साधना की आरंभिक अवस्था है। इसे यम कहते हैं। लेकिन संयम का अर्थ निग्रह या बन्ध नहीं है। वासना की तरंगों के आघातों से मन विचलित न हो जाय इसके लिए तपस्या करना ही संयम कहलाता है।
साधना की आरंभिक अवस्था है। इसे यम कहते हैं। लेकिन संयम का अर्थ निग्रह या बन्ध नहीं है। वासना की तरंगों के आघातों से मन विचलित न हो जाय इसके लिए तपस्या करना ही संयम कहलाता है। चित्त के स्थिर हो जाने पर वासनाओं की जगह भगवान की इच्छा का ही उदय हो जाता है, सिद्धावस्था में वासना और चेष्टा का एकदम नाश हो जाता है, अपने आप ही शुद्ध कर्म प्रकट होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-July
साधना शिक्षण' चलते रहने से वह दश वर्ष में पूर्ण हो जाएगा।
साधना-पद्धति को जिन्होंने अपनाया है, उनके लिए दूसरे वर्ष का यह अगला पाठ्यक्रम है। इसी प्रकार हर साल अक्टूबर अंकों में एक−एक वर्ष का 'पंचकोशी-साधना शिक्षण' चलते रहने से वह दश वर्ष में पूर्ण हो जाएगा।
साधना' का अगले वर्ष का साधना क्रम रहेगा। गत अक्टूबर अंक के अनुसार प्रथम वर्ष की साधना-पद्धति को जिन्होंने अपनाया है, उनके लिए दूसरे वर्ष का यह अगला पाठ्यक्रम है। इसी प्रकार हर साल अक्टूबर अंकों में एक−एक वर्ष का 'पंचकोशी-साधना शिक्षण' चलते रहने से वह दश वर्ष में पूर्ण हो जाएगा।
साधना का वरदान कल उपलब्ध करेगा। जिसने आज नीरस दीखने वाले कार्यक्रम को भी, कठिन दीखने वाले मार्ग को भी, भविष्य की उज्ज्वल आशाओं को ध्यान में रखते हुए अपनाने का साहस दिखाया, वही वस्तुतः इस संसार में धीरवान महापुरुष कहलाने का अधिकारी बन सकता है। ऐसे धीर-वीर लोगों के द्वारा ही यह धरती शोभा को प्राप्त करती है, उन्हीं के प्रताप से यह लोक स्वर्गलोक बनता है। वे ही अपने पराक्रम से युग का परिवर्तन एवं निर्माण किया करते हैं। समाज की रचना के ईंट-चूने का काम यह धीरे-धीरे ही पूरा किया करते हैं।
साधना क्रम रहेगा। गत अक्टूबर अंक के अनुसार प्रथम वर्ष की साधना-पद्धति को जिन्होंने अपनाया है, उनके लिए दूसरे वर्ष का यह अगला पाठ्यक्रम है। इसी प्रकार हर साल अक्टूबर अंकों में एक−एक वर्ष का 'पंचकोशी-साधना शिक्षण' चलते रहने से वह दश वर्ष में पूर्ण हो जाएगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-January
साधना में पहले यम-नियमों की साधना करनी पड़ती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह—यम और शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान—नियम इन दसों बातों पर बारीकी से ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इनका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुव्यवस्था ही है। ब्रह्मचर्य, शौच और तप का कार्यक्रम शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से रखा गया है। इन्द्रियों का संयम ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत आता है। शरीर, वस्त्र, घर एवं उपकरणों की स्वच्छता का तात्पर्य शौच है।
साधना का पहला चरण संयम है। व्रत, उपवास ब्रह्मचर्य, मौन, जप, ध्यान आदि साधनाओं का उद्देश्य संयम साधना ही तो है। अनुशासन और नियमितता जैसे महान गुण इस साधना के साथ जुड़े हुए हैं।
साधनाओं का उद्देश्य संयम साधना ही तो है। अनुशासन और नियमितता जैसे महान गुण इस साधना के साथ जुड़े हुए हैं।
साधना के प्राथमिक कार्यक्रम हैं। योग से ही आत्मा की प्राप्ति संभव है। इसलिए लक्ष पूर्ति की सच्ची अभिलाषा जिन्हें है उन्हें सच्चा मार्ग भी अपनाना पड़ता है।
साधना में संलग्न रह रहे हैं। पक्षी दो पंखों से उड़ता है, हमारी आन्तरिक और बाह्य प्रगति मिलकर ही एक उभय-पक्षीय सर्वांगपूर्ण प्रगति सिद्ध हो सकेगी।
साधना एकाँगी रहेगी, अपूर्ण मानी जायगी और सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
साधना का मार्ग अपनाकर लोग इन तीनों साधनों को शुद्ध करते थे। आज के जल्दबाज लोगों ने अमुक जगह स्नान कर लेने, अमुक पुस्तक पढ़ लेने, अमुक जप कर लेने मात्र से चुटकियों में परम-लक्ष की प्राप्ति की कल्पना आरम्भ कर दी है। स्नान, पाठ, जप का पूरा लाभ उन्हीं को मिल सकता है जिनके साधन सबल हैं। सब प्रकार की हीन और पतित स्थिति में पड़े हुए लोगों का केवल इन उपचारों का मात्र सहारा लेकर भव-सागर से पार हो सकना कठिन है। यदि यह मार्ग इतना ही सरल होता तो प्राचीन काल में किसी को इतनी कष्ट-साध्य, श्रम-साध्य और समय साध्य साधनाऐं न करनी पड़तीं।
साधना भी उनके लिए सिद्धि दायिनी बन जाती है।
साधना की अपेक्षा सामूहिक धर्मानुष्ठानों का महत्व कहीं अधिक है।
साधना और तपश्चर्या के द्वारा इस योग्य बना चुके हैं कि जो कुछ कहें उसे दूसरे सुनें, जो कुछ करें उसका दूसरे अनुकरण करें, कुछ प्रेरणा करें तो दूसरे उस पर चलना शुरू करें। हमारा लक्ष सत्य है, हमारे साधन शुद्ध हैं, हमारा कर्तृत्व भावना पूर्ण है तो क्यों हमारी बात सुनी न जायगी? क्यों हमारी प्रेरणा मानी न जायगी?
साधना-रत व्यक्तियों के लिए भी उस कीचड़ को पार कर सकना कठिन होगा। बलवान हाथी भी दलदल में फंस जाता है, पतित-समाज की परिस्थितियाँ ध्यान, भजन में संलग्न व्यक्तियों का मन भी अपने जाल में उलझा लेती है।
साधना ही तो है। अनुशासन और नियमितता जैसे महान गुण इस साधना के साथ जुड़े हुए हैं।
साधना अवश्य ही करनी चाहिए।
साधना करनी पड़ती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह—यम और शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान—नियम इन दसों बातों पर बारीकी से ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इनका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुव्यवस्था ही है। ब्रह्मचर्य, शौच और तप का कार्यक्रम शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से रखा गया है। इन्द्रियों का संयम ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत आता है। शरीर, वस्त्र, घर एवं उपकरणों की स्वच्छता का तात्पर्य शौच है।
साधना का प्रथम सोपान, बाह्य-जीवन को सुव्यवस्थित बनाते हुए आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करना है। इस प्रथम कक्षा को उत्तीर्ण किये बिना जो लोग छलाँग मारकर ऊपर चोटी पर चढ़ना चाहते हैं, सीधे प्रत्याहार, समाधि, चक्र-वेधन, कुण्डलिनी जागरण की बात सोचते हैं उन्हें असफलता ही मिलती है। आत्मिक पूर्णता का लक्ष मलीन और दूषित साधनों से कैसे प्राप्त किया जा सकेगा?
साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष-परिमार्जन एवं संरक्षण यहाँ किया जाता रहेगा।
साधना के साथ-साथ ज्ञान यज्ञ का महाअभियान आरंभ किया जा रहा है। युग-निर्माण की पृष्ठभूमि यही है।
साधना रहित व्यक्ति की आत्मा मलीन और पतनोन्मुख हो जाती है। स्वार्थ और भोग का नशा उसे पाप की नारकीय ज्वाला में घसीट ले जाता है। इसलिए अपने अस्तित्व का सही रूप जानने और अपने लक्ष के प्रति गतिशील रहने के लिए उसे आध्यात्म का सहारा लेना पड़ता है। आत्म−कल्याण का यही मार्ग है।
साधनाश्रम कोटा में 108 कुण्डों का गायत्री महायज्ञ ता॰ 6,7,8,9 फरवरी को होगा। उसके यज्ञ का सामूहिक 24 करोड़ का जप संकल्प पूरा करने के लिए श्री शंभूसिंह जी कौशिक दौरा कर रहे हैं।
साधना करने वाले तथा सामूहिक आयोजन करने वाले सज्जन इस अक्टूबर अंक की अधिक प्रतियाँ मँगाकर धर्मप्रेमियों को दान करें। गायत्री चालीसा, गायत्री माता के चित्र तथा दो−दो आने मूल्य की दस पुस्तकों का सवा रुपये वाला सस्ता गायत्री सैट भी इस उद्देश्य के लिए बहुत उपयुक्त है। जप और हवन करने वाले ज्ञान−दान का सच्चा ब्रह्मभोज भी इस अवसर पर अवश्य करें। अनुष्ठानों के अन्त में कन्या भोजन भी कराये जावें।
साधना बना लिया था। वे जानते थे कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज का अधिक भाग पतित स्थिति में पड़ा रहे तो थोड़े से साधना-रत व्यक्तियों के लिए भी उस कीचड़ को पार कर सकना कठिन होगा। बलवान हाथी भी दलदल में फंस जाता है, पतित-समाज की परिस्थितियाँ ध्यान, भजन में संलग्न व्यक्तियों का मन भी अपने जाल में उलझा लेती है।
साधनाऐं न करनी पड़तीं। वे भी आज के लोगों की तरह कुछ उपचार मात्र करके सब कुछ प्राप्त कर लेने की बात क्यों न सोच लेते?
साधना की आवश्यकता होती है; यह हमारी अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए ऋषियों, शास्त्रों एवं पुरोहितों ने हमें कुछ−न−कुछ समय नित्य लगाते रहने का आदेश दिया है उपासना और साधना रहित व्यक्ति की आत्मा मलीन और पतनोन्मुख हो जाती है। स्वार्थ और भोग का नशा उसे पाप की नारकीय ज्वाला में घसीट ले जाता है। इसलिए अपने अस्तित्व का सही रूप जानने और अपने लक्ष के प्रति गतिशील रहने के लिए उसे आध्यात्म का सहारा लेना पड़ता है। आत्म−कल्याण का यही मार्ग है।
साधना के साथ जुड़े हुए हैं।
साधना से भी उन्हें आत्म−दर्शन का मुक्ति एवं साक्षात्कार का लक्ष सहज ही प्राप्त हो जाता है। स्वल्प साधना भी उनके लिए सिद्धि दायिनी बन जाती है।
साधना की सूचना मथुरा भेज देंगे तो उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष-परिमार्जन एवं संरक्षण यहाँ किया जाता रहेगा।
साधना की जा सकती है। अन्तिम दिन 240 आहुतियों का हवन कर लेना चाहिए।
साधना कर सकते हैं वे ही सच्चे वीर कहे जा सकते हैं।”
साधना क्रम चल रहा है। अशुभ अनिष्ट की शान्ति के लिए सामूहिक धर्मानुष्ठानों की गतिविधियाँ सक्रिय हैं। युग निर्माण की दिशा में जो कार्यक्रम पिछले पच्चीस वर्षों से किसी रूप में चल रहा था उसे भी अब सुव्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। आत्मिक उत्कृष्टता और भौतिक श्रेष्ठता के दोनों लक्ष प्राप्त करने के लिए अब तक के चलते आ रहे अभियान को इस पुण्य पर्व पर बहुत ही सुव्यवस्थित रूप दिया गया है और इसे सुसंयत रूप से अग्रगामी बनाया जायेगा। अखण्ड ज्योति जिस मिशन को लेकर अवतीर्ण हुई थी उसे उसने अब तक बहुत शानदार ढंग से निबाहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-June
साधना और तपश्चर्या करने में लगे हुए लोग किसी छोटे से कारण से विचलित होकर अपना मार्ग बदल देते हैं पर जितने विवेक और ज्ञानपूर्वक बहुत चिन्तन और मनन के बाद इस मार्ग को अपनाया है वे जीवन भर सुनिश्चित रूप से लक्ष की ओर चलते रहते हैं। वेदान्त में ज्ञान की पूर्णता को ही मुक्ति माना गया है। ज्ञान और विवेक बिना अध्यात्म की गाड़ी एक पग भी आगे नहीं बढ़ती।
साधना सफल हुई है और उन्हीं के नाम इतिहास के पृष्ठों पर अमर रहें हैं।
साधना के लिए कितना समय लगाया और उपासना के लिए कितना समय लगाया और उपासना के कर्मकाण्ड के साथ−साथ जो भावनाऐं रखनी चाहिए वे कितनी श्रद्धा के साथ कितनी गहराई तक रखीं? (2) आज हमने स्वाध्याय की दृष्टि से कौन सी पुस्तकें के कितने पृष्ठ पढ़े और उन में प्राप्त हुई महत्वपूर्ण बातों पर कितनी देर मनन-चिन्तन किया? (3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? (4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है।
साधनाओं को अपनाकर प्राप्त कर सकना संभव है। शरीर शास्त्र की दृष्टि से मनुष्य का सौ वर्ष जीवित रह सकना सन्तोष ही नहीं आश्चर्य का विषय भी माना जाता है, पर योगशास्त्र की दृष्टि से मनुष्य कई सौ वर्षों तक बिना जरा जीर्णता अनुभव किये जीवित रह सकता है। अभी भी कई ऐसे संत महात्मा देखे जा सकते हैं जिनकी आयु आरोग्य शास्त्रियों की कल्पना से बहुत आगे है। पौष्टिक आहार में जिन वस्तुओं की गणना है उनका दर्शन न होने पर भी घास−पात या कंदमूल के बल पर दीर्घ जीवन एवं सुदृढ़ आरोग्य प्राप्त करने की सफलता के पीछे केवल एक ही तथ्य काम करता दीखता है और वह है मनोबल की प्रचंडता।’ योग विद्या का एकमात्र आधार भी यही तथ्य है।
साधना (2) स्वाध्याय (3) नियम (4) सेवा। इन चार कामों के लिए अपनी दिनचर्या में निश्चित रूप से अपनी स्थिति के अनुरूप स्थान देना चाहिए।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा चतुर्विधि कार्य−क्रम युग निर्माण का आधार है। इसे ही अपना कर व्यक्ति का व्यक्तित्व महान बनना है मन की स्वच्छता भी इन चार साधनों पर निर्भर है इन्हें हम प्राण−प्रण से अपनायें इसी से जीवन लक्ष की सफलता संभव हो सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-October
साधना में प्राणायाम का विशेष महत्त्व माना गया है। पर वही सब कुछ नहीं है, प्रारंभिक साधकों को श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया की विशेष विधि द्वारा अखिल-आकाश में से प्राणतत्त्व की आवश्यक मात्रा खींचकर अपने भीतर धारण करनी पड़ती है, जिससे शरीर और मन में आवश्यक बलिष्ठता का समावेश हो सके। पीछे प्राणतत्त्व को आकाश से अभीष्ट मात्रा में खींचकर उसका उपयोग संसार के विभिन्न कार्यों में करने की क्षमता प्राप्त हो जाती है तो यह नरदेह एक प्रकार का विशाल बिजलीघर बन जाता है, जिससे अपना ही नहीं, दूसरे अनेकों का भी हित-साधन हो सकता है। किसी बड़े बिजलीघर से संबंधित अनेक कल-कारखाने चलते रहते हैं और हजारों-लाखों घरों में रोशनी, पंखा, रेडियो आदि की आवश्यकता पूरी होती है। प्राणविद्या का निष्णांत व्यक्ति अखिल आकाश में व्याप्त प्राण-प्रवाह को मनमानी मात्रा में उपलब्ध करके उससे इतना बड़ा श्रेष्ठ-साधन कर सकता है, जितना कर सकना किसी अमीर, धनी, सत्तावान एवं शासन के लिए संभव नहीं है।
साधना में सफलता प्राप्त कर सकना किसी के लिए संभव नहीं हो सकता।
साधना तो क्या, सामान्य भजन-साधन भी बन नहीं पड़ता, जो किया जाता है वह चिह्नपूजामात्र रह जाता है।
साधना के साधकों को शिक्षण दिया गया था। एक वर्ष में 52 दिन वह अस्वाद व्रतपालन कर लेने वालों को उसमें आवश्यक आनंद मिलना शुरू हो गया होगा। कुछ दिन ही जीभ बदमाशी करती है। फीका, अलौना भोजन करने में बहुत नाक-भौं सिकोड़ती है और कई बार तो स्वास्थ्य पर असर पड़ने की बहानेबाजी भी गढ़ लेती है। कई लोग कब्ज रहने, कमजोरी आने आदि की कल्पना करने लगते हैं, जबकि सच बात यह है कि नमक-शक्कर की अनावश्यक मात्रा से अनेक प्रकार के रक्त, हृदय और पेशाब संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं और अस्वादव्रतपालन करने से रक्त इतना शुद्ध हो जाता है कि साँप के काटने तक का असर उस पर नहीं होता।
साधना बताई जा रही है। अगले नौ वर्षों में यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। हर अक्टूबर में अखण्ड ज्योति का एक विशेष अंक गायत्री उपासकों के मार्गदर्शन के लिए निकलता रहेगा, शेष अंकों में युगनिर्माण योजना की विचारधारा रहा करेगी। लौकिक और पारलौकिक सुख-शांति के लिए गायत्री उपासना की उपयोगिता असाधारण है। उसका प्रथम चरण हमें सद्बुद्धि प्रदान करके जीवन की अधिकांश उलझनों को सुलझा देता है और द्वितीय चरण में प्रस्तुत आत्मशक्ति के जागरण का जो रहस्य सन्निहित है, उसके द्वारा मनुष्य नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है।
साधना का लक्ष्य है।
साधना-क्षेत्र में भी ऐसे परिवर्तन का होना कोई आश्चर्य, विरोध या मतभेद की बात नहीं, वरन एक स्वाभाविक विकासक्रम है। भारतीय धर्म में साकार और निराकार की जो द्विधा परंपराएँ चली आ रही हैं, इनमें न तो कोई विरोध है और न विभ्रम। दोनों ही एकदूसरे की पूरक हैं। अपने-अपने स्थान पर दोनों ही उपयुक्त हैं और आवश्यक भी। पंचकोशी गायत्री उपासना का विधानक्रम निराकार उपासना जैसा ही है।
साधना बतलाई गई है, जैसे जपयोग, प्राणयोग, शब्दयोग, कुण्डलिनी योग आदि। पंचकोशों को सिद्ध करने का मार्ग दिग्दर्शन भी किया गया है। मू. 3॥)
साधना एवं उपासना की तरह मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना और उस पर मनन रखना चाहिए।
साधना का विधान बताकर दिव्य ज्योति के साक्षात्कार का मार्ग सरल कर दिया जाएगा। भ्रू-मध्य भाग में तीसरा दिव्य नेत्र रहता है। शंकर, दुर्गा आदि के चित्रों में भृकुटी स्थान पर एक तीसरा—तिरछा नेत्र बना हुआ देखा जाता है। यह हर मनुष्य के आज्ञाचक्र में भी प्रसुप्त पड़ा रहता है। यह जब ज्योतिर्मय हो जाता है तो सूक्ष्मजगत की महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ एवं अदृश्य अनुभूतियाँ सहज ही परिलक्षित होने लगती हैं।
साधना का प्रथम चरण अन्न की शुद्धि है। दूध, मलाई खाकर शरीर मोटा हो सकता है, पर मन को निर्मल बनाने के लिए अन्न में सात्त्विकता की आवश्यक मात्रा का मिला होना आवश्यक है।
साधना के उच्चस्तरीय शिक्षा के शिक्षार्थियों को मनोमयकोश का परिमार्जन करने के लिए उपरोक्त 'विचार शोधन' की प्रक्रिया ही प्रस्तुत की जा रही है।
साधना तपश्चर्या नाम से पुकारी जाती है। उसे आहार की तपश्चर्या और विहार की तपश्चर्या, दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। आहार की तपश्चर्या को अस्वाद व्रत और पदार्थ सीमाबंध के रूप में पिछले लेख में प्रस्तुत कर चुके हैं। विहार की तपश्चर्या में (1) ब्रह्मचर्य और (2) निरालस्य, इन दो बातों को रखा गया है। कामसेवन की समस्या व्यक्तिगत मानी जाती है, पर वस्तुतः वह पूर्णतया सामाजिक है।
साधना का उद्देश्य स्वर्ग, मुक्ति या सिद्ध चमत्कारों की खोज करना ही नहीं, वरन व्यावहारिक जीवन को सुसंयत और सुविकसित बनाना है। मन की शक्ति उस जलप्रपात की तरह है, जो साधारणतः यों ही मुद्दतों से गिरता और बहता रहता है, पर यदि उसी से पनचक्की या बिजली बनाने का कार्य किया जाए तो आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त होने की सुविधा बन जाती है और वह निरर्थक दीखने वाला झरना बहुत लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध होता है। मन में जो प्रचंड शक्ति भरी है, उसका महत्त्व जिनने जान लिया, वे अपना सारा ध्यान मन को नियंत्रित करने में लगाते हैं। उसकी चंचलता को रोकते और एकाग्रता को बढ़ाते हैं। अच्छे नंबरों से, ऊँचे डिवीजनों से पास होने वाले विद्यार्थी, महत्त्वपूर्ण अन्वेषण करने वाले वैज्ञानिक, मेधावी वकील, डॉक्टर, इंजीनियर और कारीगर एकाग्रता के बलबूते पर ही गौरवान्वित होते हैं।
साधनाएँ बनाकर मानव अंतःकरणों को इन कषाय-कल्मषों से विमुक्त करने का प्रयत्न किया करते हैं। अन्नमयकोश की साधना के लिए हमारे दो प्रयत्न भी इस दिशा में उठाए गए आरंभिक कदम हैं, जिनका सत्परिणाम, सादगी, संतोष, सौम्यता और सज्जनता के रूप में कुछ ही समय में प्रस्फुटित हुआ देखा जा सकता है।
साधनासंलग्न तपस्वियों की खोज की है, उनके चरण धो−धोकर उनके अनुभव का सार एकत्रित किया है। स्वयं भी अपने जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण समय एकनिष्ठ भाव से उसी उपासना में लगाया है। इतने प्रयास का निचोड़ यह निकाला है कि गायत्री उपासना में लगाए हुए किसी भी व्यक्ति के, कोई क्षण निष्फल नहीं जा सकते। उसका कोई-न-कोई सत्परिणाम उसे मिलता ही है और वह निश्चित रूप से उससे कहीं अधिक होता है, जितना कि उपासना में लगे हुए समय का मूल्य हो सकता है। हमारे सानिध्य और सहचरत्व में जिन लोगों ने यह उपासना की है, उनका भी ऐसा ही अनुभव है।
साधनाओं से लाभ उठा सकता है।
साधनाओं में गायत्री उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है। गायत्री को बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की देवी कहा गया है। इस महामंत्र में तेज और ज्ञान की शक्तियों का आह्वान किया गया है और सच्चे मन से की गई इस साधना से यह दोनों वस्तुएँ मिलती भी देखी जा सकती हैं। सद्बुद्धि की विभूति जैसे−जैसे अपने भीतर बढ़ती है, वैसे ही मनुष्य के गुण, कर्म और स्वभाव में सात्विकता की मात्रा की अभिवृद्धि होती है और इसके फलस्वरूप वह परिस्थितियाँ उत्पन्न होनी आरंभ हो जाती हैं, जिनमें सफलता, सहयोग, समृद्धि, संतुष्टि और शांति की प्राप्ति हुआ करती है।
साधना करने वाला उसका लाभ उठा सकता है। गत वर्ष उसके लिए एक विशेष विधि भी भेजी गई थी। इस वर्ष इन्हीं पंक्तियों में अगले वर्ष का शक्ति-संचार विधान प्रस्तुत किया जा रहा है।
साधना आरंभ नहीं की है, उनके लिए एक वर्ष तक उपरोक्त साधना करते रहना ही उचित है। किंतु जो एक वर्ष तक इसे कर चुके, उनके लिए 'लोम-विलोम, सूर्यवेधन प्राणायाम' साधना का द्वितीय वर्षीय कार्यक्रम उचित एवं उपयुक्त रहेगा। यह साधना इस प्रकार करनी चाहिए—
साधना का, तो प्रकाशित पंथ होगा, दूर तम!
साधना का प्रथम लक्ष्य अन्तःकरण में सद्बुद्धि की स्थापना करना है। इस प्रयोजन के लिए यों स्वाध्याय एवं सत्संग की बहुत महत्ता बताई है, पर उसके साथ−साथ साधना का समावेश होना भी आवश्यक है। साधना को बीज माना जाए तो स्वाध्याय और सत्संग को खाद-पानी कहना पड़ेगा। ‛श्रेय’ का पौधा इसी प्रकार फलता−फूलता है। साधनाओं में गायत्री उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है।
साधना को बीज माना जाए तो स्वाध्याय और सत्संग को खाद-पानी कहना पड़ेगा। ‛श्रेय’ का पौधा इसी प्रकार फलता−फूलता है। साधनाओं में गायत्री उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है। गायत्री को बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की देवी कहा गया है। इस महामंत्र में तेज और ज्ञान की शक्तियों का आह्वान किया गया है और सच्चे मन से की गई इस साधना से यह दोनों वस्तुएँ मिलती भी देखी जा सकती हैं।
साधना से यह दोनों वस्तुएँ मिलती भी देखी जा सकती हैं। सद्बुद्धि की विभूति जैसे−जैसे अपने भीतर बढ़ती है, वैसे ही मनुष्य के गुण, कर्म और स्वभाव में सात्विकता की मात्रा की अभिवृद्धि होती है और इसके फलस्वरूप वह परिस्थितियाँ उत्पन्न होनी आरंभ हो जाती हैं, जिनमें सफलता, सहयोग, समृद्धि, संतुष्टि और शांति की प्राप्ति हुआ करती है।
साधना की है, उन्होंने आशातीत सत्परिणाम प्राप्त किया है। जो निरुत्साह और निराश रहा करते थे, जिनकी नस−नाड़ियाँ शिथिल रहा करती थीं, जरा-सा काम करने पर जो थक जाते थे, थोड़ी भी कठिनाई में जिनका दिल धड़कने लगता है। चिंता और आकांक्षा से जिनका चित्त आतंकित रहा करता था, वे इस प्राणायाम के प्रयोग से अपने अंदर जादू जैसा परिवर्तन अनुभव करने लगे हैं। उन्हें अनुभव होता है कि कोई अतिरिक्त शक्ति उनके शरीर में प्रवेश कर गई है और उसकी सहायता से आत्मविश्वास एवं आत्मबल दूना हो गया है। काम में मन लगने और आशावादी रहने का एक विशेष परिवर्तन 90 प्रतिशत साधकों में हुआ है।
साधना को सफल बनाना चाहिए।
साधनाएँ बतलाई गई हैं और गायत्री के एक−एक अक्षर में सन्निहित आध्यात्मिकता, धार्मिकता तथा मानवता की शिक्षाओं का वर्णन किया गया है। 6 रु.से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाकखरच माफ। 5) से कम की वी. पी. नहीं भेजी जाती।
साधना अंक आपको पसंद आया होगा। नवंबर, दिसंबर के जीवन-विद्या अंक होंगे, जिनमे जीव की विविध समस्याओं को सुलझाने वाला हल रहेगा। यह चारों अंक इस वर्ष के सबसे महत्त्वपूर्ण अंक हैं। आप इन चारों को घर-घर पहुँचाने का प्रयत्न कीजिए। अपनी ओर से अपने स्वजन संबंधियों को यह चारों अंक उपहार में भेजिए।
साधना में केवल उतना ही लाभ होता है, जितना अपना पुरुषार्थ रहता है, पर इसमें एक ओर से अपना पुरुषार्थ और दूसरी ओर से उन आत्माओं द्वारा प्रेरित पुण्य प्राण−प्रवाह उपलब्ध होने से दूना लाभ होता है और अभीष्ट लक्ष्य सफलता की आशा अधिक सुनिश्चित बनती जाती है। इस साधना में हमारा भी एक सीमा तक प्रोत्साहन एवं सहयोग सन्निहित है।
साधनाओं में अधिक तीव्रता उत्पन्न करके अधिक लाभ उठा सकते हैं। प्राण को निग्रहीत करने से मनुष्य मनचाही आयु प्राप्त कर सकता है। भीष्म की तरह शरशैय्या पर पड़े हुए भी छह महीने तक मृत्यु को टाल सकता है। इच्छानुसार जब चाहे समाधि लेकर प्राण त्याग कर सकता है। साधारण जीवन में वह एक शक्तिपुंज, बिजलीघर के समान सिद्ध होता है जिसकी प्रेरणा से उनका निज का जीवन ही नहीं, संबंधित वातावरण भी सुदूर देशों तक प्रभावित होता है।
साधना-पद्धति का अंग मानते हुए धर्म और नीति का मार्ग पकड़े रहने वाले कर्मयोगी के लिए घर ही तपोवन की तरह शांतिमय हो सकता है। ओछे दृष्टिकोण के कारण मन में जो कुविचार उठते हैं और शरीर से दुष्कर्म बनते हैं, उन्हीं के कारण जीव भवबंधनों में बँधता है। यदि अपनी भावनाएँ अध्यात्म दृष्टिकोण से ओत−प्रोत रखते हुए गृहस्थ जीवन का सुलझे हुए दृष्टिकोण से संचालन किया जाए तो हम जीवनमुक्ति की स्थिति में रह सकते हैं और इस धरती पर ही निवास करते हुए स्वर्गीय सुख−शांति का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी स्थिति तक साधक का पहुँचना पंचकोशी, पंचमुखी गायत्री साधना का उद्देश्य है। हमें इस मार्ग पर चलने का साहस प्राप्त हो, यही सर्वशक्तिमान सत्ता से प्रार्थना है।
साधना करके आत्मा की प्राप्ति करने के इच्छुकों को सबसे पहले अपने आचार और विचार शुद्ध करने चाहिए।
साधना सारे जीवन चलने वाली है, इसलिए वैसा निषेधात्मक प्रतिबंध तो इसमें नहीं है, पर इतना प्रत्येक साधक को मानकर चलना पड़ेगा कि वह अपनी कामसेवन संबंधी गतिविधियों पर आगे क्रमशः अधिक ध्यान देगा और उसे अधिक सीमाबद्ध करेगा। सृष्टि के सभी जीव-जंतु संतानोत्पादन की प्रचंड स्फुरणा होने पर ही नियत समय पर एक बार कामसेवन करते हैं और जब तक दूसरे बच्चे की आवश्यकता न हो नर-मादा का संयोग नहीं होता। मादा की प्रेरणा पर ही नर उत्तेजित होता है, अपनी ओर से वह कभी मादा से छेड़−छाड़ नहीं करता। मनुष्य को पशु-पक्षियों से अधिक विवेकवान और संयमी होना चाहिए न कि अधिक मूर्ख और अधिक असंयमी।
साधना की जाती है, उसे साधारण स्तरीय उपासना कहते हैं। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के प्रथम भाग में इसी विधान और विज्ञान का वर्णन किया गया है। जिनकी अभिरुचि अध्यात्म की दिशा में बहुत गतिशील नहीं हुई है, जिनके पास अवकाश कम ही रहता है, उनके लिए अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य की तरह वही क्रम उपयुक्त है। इस प्रथम स्तरीय साधना को ऋषियों ने ‘एकमुखी’ गायत्री कहा है। चित्रों में एक मुख और दो हाथ वाली गायत्री माता का चित्र इसी स्तर के उपासकों के लिए निर्धारित किया है।
साधना कर सकते हैं। कुपात्रों के हाथ तंत्र विज्ञान का जाना दूसरों के लिए ही नहीं, वरन उन साधकों के खुद के लिए भी संकट का कारण बनता है। इसलिए तंत्रशास्त्र की परंपरा यह है कि वस्तुस्थिति को छिपाकर रखा जाए। साधारणतया कुछ कहा और लिखा भी जाए तो वह चर्चा एवं विवेचना तक ही सीमित रहे, उसकी प्रयोगविधि की गोपनीयता पर आचार्यों ने कठोर प्रतिबंध लगाये हैं, वे उचित भी हैं और आवश्यक भी। इसी परंपरा के अनुसार गायत्री महाविज्ञान के दूसरे भाग में गायत्री तंत्र का उल्लेख तो हुआ है, पर अनादि परंपरा के कारण उसकी विस्तृत विवेचना को अप्रकट ही रखा गया है।
साधना का अगला पाठ हमें पढ़ना है। गत वर्ष माता और पुत्र के क्रीड़ा-विनोद के एक बड़े चौड़े दायरे में ध्यान करने की गुंजाइश थी। आगे−आगे इस दायरे को छोटा और सीमित करते चलना पड़ेगा। इस वर्ष सूर्यप्रकाश मध्य गायत्री माता के मुखमंडलमात्र का ध्यान करना पड़ेगा और उनके दाहिने नेत्र में जो ज्योतिबिंदु काला तिल है, उस पर अपना ध्यान एकाग्र करना होगा। आरंभ में कुछ दिनों यह तिल काला ही दिखाई देगा।
साधना ही समझना चाहिए।
साधनाक्रम बताया जा रहा है। जिन्हें अधिक अवकाश है, जिनका समय और मस्तिष्क खाली रहता है वे इन साधनाओं में अधिक तीव्रता उत्पन्न करके अधिक लाभ उठा सकते हैं। प्राण को निग्रहीत करने से मनुष्य मनचाही आयु प्राप्त कर सकता है। भीष्म की तरह शरशैय्या पर पड़े हुए भी छह महीने तक मृत्यु को टाल सकता है। इच्छानुसार जब चाहे समाधि लेकर प्राण त्याग कर सकता है।
साधना के लिए नियत है। प्रातःकाल के 1.5 घंटा और सायंकाल के एक घंटा, कुल 2.5 घंटा में से अपनी सुविधानुसार शक्तिसंचार-साधना के लिए नियत कर लेना चाहिए। इस साधना में स्नान करना अनिवार्य नहीं है। हाथ, पैर, मुँह धोकर बैठा जा सकता है।
साधना के लिए प्रातःकाल किया जाना चाहिए। जप के साथ यह ध्यान चलता रह सकता है। माला लेकर इस ध्यान को करने में कठिनाई पड़ती हो तो नित्य-नियम की एक माला फेरने के बाद मानसिक जप और ध्यान का कार्यक्रम बना लेना चाहिए। यह पहले ही बताया जा चुका है कि इस उच्चस्तरीय साधनाक्रम में शारीरिक क्रियाएँ घटती जाती हैं और मानसिक धारणा-ध्यान का क्रम बढ़ता जाता है। पंचकोशों की साधना करते हुए इस वर्ष तो नहीं, पर अगले वर्षों में एक माला नियमित गायत्री जप और नवरात्रियों के दो लघु अनुष्ठान, इतना ही कार्यक्रम शेष रह जाता है, बाकी तो सब कुछ धारणा और ध्यान क्षेत्र में ही श्रम करना पड़ता है।
साधनाश्रम, पो.बोरखेड़ा जि.कोटा। वार्षिक मूल्य 4 रु॰। 15 अगस्त से प्रकाशित होने लगा है।
साधनाएँ आडंबरमात्र हैं। मन को निर्मल बनाए बिना न भक्ति प्राप्त होती है, न उपासना बन पड़ती है। जिस ज्ञान से आचार शुद्ध न हो, सद्गुण न बढ़े, वह निरर्थक भारवहनमात्र है। जिस कर्म के पीछे उच्च भावनाएँ न हों, वह बंधन में बाँधने वाला ही होता है। इसलिए ज्ञान, कर्म और भक्तियोग की साधना करके आत्मा की प्राप्ति करने के इच्छुकों को सबसे पहले अपने आचार और विचार शुद्ध करने चाहिए।
साधना का उद्देश्य है। हमें इस मार्ग पर चलने का साहस प्राप्त हो, यही सर्वशक्तिमान सत्ता से प्रार्थना है।
साधना ही गिनी जाएगी। जप, तप न बन पड़े तो भी ब्रह्मर्चय का सीमाबंध और आलस्य के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खड़ा करने के लिए हममें से प्रत्येक को खड़ा हो ही जाना चाहिए। सबेरे जल्दी उठने की आदत निरालस्यता का पहला चिह्न है। जिन्हें रात की कोई खास ड्यूटी करनी पड़ती है, उनकी बात दूसरी है। इन अपवादों को छोड़कर हममें से प्रत्येक को सूर्योदय से कम-से-कम एक घंटा पूर्व तो उठ ही बैठना चाहिए।
साधना का द्वितीय वर्षीय साधनक्रम (1) एक सप्ताह में दो दिन नमक-शक्कर छोड़कर अस्वादक्रम का पालन और (2) भोजन में एक बार में खाद्य वस्तुओं की संख्या दो तक सीमित रखना, यह दो बातें रखी गई हैं। दुर्बल मनोभूमि वाले एक सप्ताह में एक बार अस्वाद व्रत रखते हुए और भोजन में वस्तुओं की संख्या तीन या चार रखते हुए भी धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं।
साधना में माता का पूरा आवरण इस शुभ्र ज्योति के स्वरूप में ही परिलक्षित होता है। प्रकाशपुंज के रूप में ही गायत्री माता का दर्शन, ध्यान और साक्षात्कार हो जाता है। जिस प्रकार प्रथम स्तर के साधकों को हंसारूढ़ गायत्री माता का नारी देह में दर्शन, साक्षात्कार, जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में होता रहता है, उसी प्रकार उच्च भूमिका के साधक को प्रकाश की छोटी-छोटी चिनगारियों के रूप में, किरणों के रूप में और तेजस्वी ज्योतिपिंड के रूप में दर्शन एवं साक्षात्कार होता है। स्तर बदलने के साथ साधनों एवं उपकरणों की श्रृंखला भी बदल जाती है। स्कूल की प्रारंभिक कक्षाओं में लकड़ी की तख्ती पर खड़िया और मोटी कलम से बड़े-बड़े अक्षर लिखने का अभ्यास करना पड़ता है, पर आगे चलकर कापी और फाॅउन्टेन पेन के माध्यम से लिखने की क्रिया संपन्न होती है।
साधना के लिए अग्रसर होना होता है।
साधनाक्रम में शारीरिक क्रियाएँ घटती जाती हैं और मानसिक धारणा-ध्यान का क्रम बढ़ता जाता है। पंचकोशों की साधना करते हुए इस वर्ष तो नहीं, पर अगले वर्षों में एक माला नियमित गायत्री जप और नवरात्रियों के दो लघु अनुष्ठान, इतना ही कार्यक्रम शेष रह जाता है, बाकी तो सब कुछ धारणा और ध्यान क्षेत्र में ही श्रम करना पड़ता है।
साधना के यह दो व्रत भले ही छोटे लगें, पर उनके परिणाम वासना पर नियंत्रण होते चलने से मनुष्य की श्रेष्ठता बढ़ाने के लिए बहुत ही सहायक हो सकते हैं। वासना और तृष्णा की डाकिनों में से एक को— वासना को, यदि कुछ काबू में रखा जा सके तो निःसंदेह इस संसार की आधी विपत्ति हल हो सकती है। मानवीय शरीर और मन का सत्यानाश करने वाली डाकिन वासना है, जिससे समाज में अगणित प्रकार के पाप, द्वेष, अनाचार, अत्याचार उत्पन्न होते हैं। इन दोनों को सीमित किए बिना आत्मिक सद्गुणों का असीम विस्तार हो सकना संभव नहीं। इसलिए अध्यात्म विद्या के आचार्य विविध विधि साधनाएँ बनाकर मानव अंतःकरणों को इन कषाय-कल्मषों से विमुक्त करने का प्रयत्न किया करते हैं।
साधना करने वालों को असंयम से लड़ना चाहिए और आलस से भी। इस मोर्चे को फतह करके ही आगे की प्रगति के द्वार खुलते हैं।
साधना इस प्रकार करनी चाहिए—
साधना का द्वितीय वर्षीय कार्यक्रम उचित एवं उपयुक्त रहेगा। यह साधना इस प्रकार करनी चाहिए—
साधना करते हुए इस वर्ष तो नहीं, पर अगले वर्षों में एक माला नियमित गायत्री जप और नवरात्रियों के दो लघु अनुष्ठान, इतना ही कार्यक्रम शेष रह जाता है, बाकी तो सब कुछ धारणा और ध्यान क्षेत्र में ही श्रम करना पड़ता है।
साधना करते रहना ही उचित है। किंतु जो एक वर्ष तक इसे कर चुके, उनके लिए 'लोम-विलोम, सूर्यवेधन प्राणायाम' साधना का द्वितीय वर्षीय कार्यक्रम उचित एवं उपयुक्त रहेगा। यह साधना इस प्रकार करनी चाहिए—
साधना माना गया है और उसे भजन के समकक्ष ही पुण्य फलदायक माना गया है। पंचकोशी साधना में साधकों के लिए तो वह नितांत अनिवार्य ही है।
साधना ही बन उठेगी साध्य-शुभ, यदि मिले शृंगार-साधन उचित-श्रम!
साधना की अन्य समस्त साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका लाभ हममें से किसी को भी छोड़ना नहीं चाहिए।
साधना का अधिकांश कार्यक्रम स्थूल वस्तुओं या स्थूल विधि-विधानों पर निर्भर है। माला, आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, अक्षत, चित्र, मूर्ति, हवन-सामग्री, मंत्रोच्चारण, व्रत-उपवास, पाठ, कीर्त्तन, अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, तर्पण, मार्जन आदि यह सभी कुछ स्थूल आधार हैं। इसे साकार उपासना कह सकते हैं। प्रथम कक्षा के लिए यह सब आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इस आधार के बिना ऊपर की कक्षा में प्रवेश कर सकना उसी प्रकार संभव नहीं, जिस प्रकार सीढ़ी या जीने की सहायता के बिना छलाँग मारकर छत पर चढ़ जाना कठिन होता है।
साधना, आरोग्य-रक्षा पर बहुत अधिक जोर दिया है और नेति-धोति, बस्ति, वज्रोली, कपालभाति, न्योली, आसन, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, व्रत, उपवास, चांद्रायण, पैदल तीर्थयात्रा, परिक्रमा, नदीस्नान, तप, प्रतीक्षा आदि के अगणित विधान बताए हैं। उन्हें धर्म, पुण्य और ईश्वरप्राप्ति का साधन माना गया है, जबकि इसका प्रधान उद्देश्य स्वास्थ्य-रक्षा ही है। आरोग्य-रक्षा को अध्यात्म-साधना से भिन्न मानना भारी भूल है। दोनों का अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। देह को नश्वर या भवबंधन समझकर उसकी उपेक्षा करना अविवेक का ही चिह्न है।
साधना के उपयुक्त मनोभूमि उपलब्ध कर सका।
साधना का लक्ष्य है। इस मार्ग को अवरुद्ध करने वाले वे मल−विक्षेप और आवरण ही हैं, जिनके कारण महान संभावनाएँ साथ लेकर आई हुई आत्मा, इन तुच्छ परिस्थितियों में पड़े रहने के लिए विवश होती है। मानव शरीर ही इन आवरणों की सफाई कर लेने का एकमात्र अवसर है। यदि यह ऐसे ही बर्बाद चला गया या कुविचारों और कुकर्मों में मस्त रहकर उन आवरणों को और भी बढ़ा लिया गया तो फिर चौरासी लाख योनियों की लंबी अवधि तक उसी भार में दबा पड़ा रहना पड़ता है।
साधना में साधकों के लिए तो वह नितांत अनिवार्य ही है।
साधना, तपश्चर्या, चिकित्सा, शिक्षा एवं आत्मिक एकता का लाभ प्राप्त करने के लिए मथुरा आवें।”
साधना में प्राणायाम को प्रमुख स्थान दिया है। संध्या-वंदन, हवन, अनुष्ठान आदि प्रत्येक नित्य-नैमित्तिक धर्मकार्यों में प्राणायाम को अनिवार्य स्थान मिला हुआ है। कोई भी धर्मकार्य ऐसा नहीं, जिसे आरंभ करते हुए प्राणायाम न करना पड़ता हो। यों सभी कार्यों में प्राण चाहिए पर असुरता एवं दुष्प्रवृत्तियों से लड़ते हुए धर्मचेतना को आगे बढ़ाने में पग-पग पर प्रलोभनों से संग्राम करना पड़ता है, इसलिए आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने वाले को अतिरिक्त प्राण की भी आवश्यकता होती है। इसलिए प्राणायाम को आवश्यक महत्त्व मिलना उचित ही है।
साधना-क्षेत्र में गुरु−शिष्य परंपरा से इस शक्ति का आदान−प्रदान होता रहता है। अध्यापक अपने शिष्यों को केवल ज्ञान देते हैं, पर गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा के साथ−साथ शक्ति का एक भाग भी दिया करते हैं। इसलिए गुरु को धर्मपिता कहा जाता है। शरीर को जन्म देने वाला पिता अपनी संतान की शिक्षा−दीक्षा भी करता है और अपनी कमाई हुई संपत्ति का एक बड़ा भाग उन पर खरच भी करता है। गुरुओं को भी ऐसा ही करना पड़ता है।
साधना मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, उनके लिए उच्चस्तरीय उपासना का एक व्यवस्थित दसवर्षीय शिक्षण क्रम बता दिया गया है। गत अक्टूबर अंक में प्रथम वर्ष का पाठ्यक्रम प्रस्तुत किया गया था, अब इस अंक के साथ द्वितीय वर्ष की साधना बताई जा रही है। अगले नौ वर्षों में यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। हर अक्टूबर में अखण्ड ज्योति का एक विशेष अंक गायत्री उपासकों के मार्गदर्शन के लिए निकलता रहेगा, शेष अंकों में युगनिर्माण योजना की विचारधारा रहा करेगी। लौकिक और पारलौकिक सुख-शांति के लिए गायत्री उपासना की उपयोगिता असाधारण है।
साधना विधिः−
साधना के लिए तपश्चर्या की ओर साधकों का ध्यान आकर्षित किया गया था और इसके लिए ‘अस्वाद व्रत’ की सरल साधना बताई गई थी। सप्ताह में कम-से-कम एक दिन ऐसा रखना, जिसमें नमक और मीठा दोनों ही स्वाद छोड़ रखे जाएँ, स्वाद विजय के लिए एक कारगर उपाय माना गया है। जिनके लिए संभव है, वे अधिक दिनों तक लगातार नमक या मीठा अथवा दोनों ही छोड़ सकते हैं। इनके छोड़ने से हानि कुछ नहीं, लाभ बहुत है। जितना नमक और शक्कर शरीर के लिए आवश्यक है, उतना अन्न, शाक, दूध आदि में पहले से ही मौजूद है।
साधना में प्राणविद्या का क्रमिक शिक्षण प्राप्त करना पड़ता है। गतवर्ष इस संदर्भ में प्राणाकर्षण प्राणायाम की शिक्षा दी गई थी। और बताया गया था कि—
साधना का क्रम ब्रह्मचर्य की उपेक्षा करके आगे नहीं बढ़ सकता। पाठक जानते हैं कि गायत्री के छोटे−बड़े अनुष्ठानों के समय ब्रह्मचर्य का अनिवार्य रूप से पालन करना पड़ता है। अन्नमयकोश की साधना सारे जीवन चलने वाली है, इसलिए वैसा निषेधात्मक प्रतिबंध तो इसमें नहीं है, पर इतना प्रत्येक साधक को मानकर चलना पड़ेगा कि वह अपनी कामसेवन संबंधी गतिविधियों पर आगे क्रमशः अधिक ध्यान देगा और उसे अधिक सीमाबद्ध करेगा। सृष्टि के सभी जीव-जंतु संतानोत्पादन की प्रचंड स्फुरणा होने पर ही नियत समय पर एक बार कामसेवन करते हैं और जब तक दूसरे बच्चे की आवश्यकता न हो नर-मादा का संयोग नहीं होता। मादा की प्रेरणा पर ही नर उत्तेजित होता है, अपनी ओर से वह कभी मादा से छेड़−छाड़ नहीं करता।
साधना आरंभ कर दी है। इस वर्ष पंचकोशी गायत्री साधना के उच्चस्तरीय शिक्षा के शिक्षार्थियों को मनोमयकोश का परिमार्जन करने के लिए उपरोक्त 'विचार शोधन' की प्रक्रिया ही प्रस्तुत की जा रही है।
साधना में प्रथम स्थान मिला हुआ है। वस्तुतः यह विषय प्राथमिकता देने योग्य ही है। गायत्री तपोभूमि की गतिविधियों में, साधन-प्रक्रियाओं में आरोग्य-रक्षा पर समुचित ध्यान दिया जाता है और उसका समुचित कार्यक्रम भी बन रहा है।
साधना के ही अंग हैं। प्राकृतिक चिकित्सा को अन्नमयकोश की एक सरल साधन-पद्धति भी कह सकते हैं। इस वर्ष मई अंक में निरोग रहने की क्रम-व्यवस्था और अगस्त अंक में रोग होने पर उसकी चिकित्सा कर सकने लायक आवश्यक जानकारी दी जा चुकी है। इसे सर्वसाधारण के लिए अन्नमयकोश की एक साधना ही समझना चाहिए।
साधना
साधना है, जिसका प्राणमयकोश के परिमार्जन में महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है।
साधनाएँ समय की बर्बादी नहीं हैं। भौतिक पुरुषार्थों से प्राप्त होने वाले लाभों की अपेक्षा विधिवत किए हुए आध्यात्मिक पुरुषार्थों का लाभ निश्चय ही अत्यधिक होता है। प्राणाकर्षण प्राणायाम एक चुनी हुई सरल साधना है, जिसका प्राणमयकोश के परिमार्जन में महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है।
साधना वस्तुतः आध्यात्मिक चिकित्सा है, उसका प्रधान लाभ तो आत्मा को ही मिलने वाला है। शारीरिक चिकित्सा का लाभ तो एक गौण लाभ रह जाता है।
साधना के नाम से गत वर्ष उसकी जानकारी साधकों को हो चुकी है। प्रत्येक रविवार को सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व से लेकर आधा घंटे पूर्व तक के, एक घंटा समय में कोई उच्च-आत्माएँ अपने परिवार के लिए एक प्राण-प्रेरणा भेजती हैं। उसे हममें से कोई भी निर्बाध रूप से प्राप्त कर सकता है। गत वर्ष कुछ सीमित व्यक्तियों को इसका लाभ मिल सका था। सब साधकों के लिए प्रेरणा-प्रवाह उपलब्ध न था।
साधना स्तर
साधना के लिए हमारे दो प्रयत्न भी इस दिशा में उठाए गए आरंभिक कदम हैं, जिनका सत्परिणाम, सादगी, संतोष, सौम्यता और सज्जनता के रूप में कुछ ही समय में प्रस्फुटित हुआ देखा जा सकता है।
साधना के साधकों को अनुभव होगा। इससे अगले वर्ष विशुद्ध प्रकाश-ज्योति के दिव्य दर्शन के लाभ का सुअवसर सभी निष्ठावान् साधकों को प्राप्त होगा। जिनको इसमें कठिनाई होगी, उन्हें घृत-दीपक पर त्राटक करके आज्ञाचक्र में तृतीय नेत्रोन्मीलन वाली साधना का विधान बताकर दिव्य ज्योति के साक्षात्कार का मार्ग सरल कर दिया जाएगा। भ्रू-मध्य भाग में तीसरा दिव्य नेत्र रहता है। शंकर, दुर्गा आदि के चित्रों में भृकुटी स्थान पर एक तीसरा—तिरछा नेत्र बना हुआ देखा जाता है।
साधना के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि विधानों का वर्णन किया गया है। गायत्री संबंधी कई महत्त्वपूर्ण रचनाएँ भी प्राचीन शास्त्रों से दी गई हैं। मू.3॥)
साधना में अपनी सोचने की प्रक्रिया को हमें परिमार्जित करना होगा। हीन श्रेणी के जिन विचारों ने हमारी मनोभूमि पर अधिकार कर रखा है, उसकी सफाई करनी पड़ेगी। यों आमतौर से हर आदमी अपने को बुद्धिमान, सही सोचने वाला और निर्दोष मानता है। गलतियाँ उसे दूसरे में दीखती हैं और अपने आप में कोई दोष सूझ नहीं पड़ता, पर थोड़ी बारीकी से ढूँढ़ने पर अपने मान्यताओं और विचारधाराओं में से आधी से अधिक भ्रांत, अनुपयुक्त एवं दोषपूर्ण सिद्ध होती हैं। इस स्थिति में सुधार करना ही मनोमयकोश की साधना का लक्ष्य है।
साधना पाठकों ने आरंभ की थी और अखण्ड ज्योति के लेखों या किसी भी जीवन निर्माण करने वाली प्रेरणाप्रद पुस्तक को पढ़ने और उस पर मनन चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है।
साधना अथवा पंचमुखी गायत्री उपासना है। उच्च कक्षा में प्रवेश करने वाले साधकों के लिए इसी आराधना का प्रयोग करना पड़ता है। प्रथम स्तरीय साधना का अधिकांश कार्यक्रम स्थूल वस्तुओं या स्थूल विधि-विधानों पर निर्भर है। माला, आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, अक्षत, चित्र, मूर्ति, हवन-सामग्री, मंत्रोच्चारण, व्रत-उपवास, पाठ, कीर्त्तन, अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, तर्पण, मार्जन आदि यह सभी कुछ स्थूल आधार हैं। इसे साकार उपासना कह सकते हैं।
साधना कहलाती है। इसे ही ‘गायत्री योग’ भी कहते हैं। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के तीसरे खंड में उसी का उल्लेख किया गया है। जानकारी की दृष्टि से वह ग्रंथ महत्त्वपूर्ण है, पर इस मार्ग पर बढ़ने वाले साधक का कार्य उसे पढ़ने मात्र से ही नहीं चल सकता। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ ‘चरक संहिता’ में आरोग्य रक्षा और चिकित्सा के बारे में बहुत कुछ लिखा हुआ है, पर कोई रोगी उसे पढ़कर ही अपना काम नहीं चला सकता, रोगी को, किस प्रकार के रोग में, किस आयु में, किस ऋतु में, किन परिस्थितियों में, किस उपचार के साथ, क्या औषधि देनी चाहिए, इसका निर्णय करने के लिए एक विचारपूर्ण मार्गदर्शक भी आवश्यक होता है।
साधना-पथ के पथिकों को उनके मार्गदर्शक वह शिक्षा दिया करते हैं, जिससे उनका शरीर निरोग, सक्रिय और स्फूर्तिवान बने। प्राचीन गुरुकुलों में छात्रों की शिक्षा में उनके स्वास्थ्य पर बारीकी से ध्यान दिया जाता था। योगाभ्यास का आरंभ भी यहीं से होता है। अन्नमयकोश को गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में प्रथम स्थान मिला हुआ है। वस्तुतः यह विषय प्राथमिकता देने योग्य ही है।
साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका लाभ हममें से किसी को भी छोड़ना नहीं चाहिए।
साधना के लिए नियत कर लेना चाहिए। इस साधना में स्नान करना अनिवार्य नहीं है। हाथ, पैर, मुँह धोकर बैठा जा सकता है।
साधना से भिन्न मानना भारी भूल है। दोनों का अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। देह को नश्वर या भवबंधन समझकर उसकी उपेक्षा करना अविवेक का ही चिह्न है। शरीर को भगवान का मंदिर कहा गया है। अपने इष्टदेव के मंदिर की तोड़-फोड़ करना, गंदा-गलीज बनाना किसी भावनाशील भक्त के लिए शोभा नहीं देता।
साधना करे तो उसे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती। मन और शरीर की भाँति भावनाओं की शुद्धि करने की भी आवश्यकता होती है। विज्ञानमयकोश के परिमार्जन में इसी प्रकार का कार्यक्रम अपनाना पड़ता है।
साधना आरंभ न की हों, उन्हें यह अंक मिलते ही तुरंत आरंभ कर देनी चाहिए। प्राणतत्त्व जितना बहुमूल्य है, उतना ही सुलभ भी। इतनी सुलभ वस्तु जो भावनापूर्वक साँस खींचनेमात्र से अपने को उपलब्ध हो सकती है और गुणों की दृष्टि से जो संसार की किसी भी मूल्यवान वस्तु से कम महत्त्व की नहीं है, उसकी उपेक्षा किया जाना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। आध्यात्मिक साधनाएँ समय की बर्बादी नहीं हैं। भौतिक पुरुषार्थों से प्राप्त होने वाले लाभों की अपेक्षा विधिवत किए हुए आध्यात्मिक पुरुषार्थों का लाभ निश्चय ही अत्यधिक होता है।
साधना का विधान है। दूसरे में तंत्र और तीसरे भाग में पंचमुखी−पंचकोशी−उच्चस्तरीय गायत्री उपासना की विवेचना की गई है। तंत्र का विषय गोपनीय है। केवल वह परीक्षित, विश्वस्त भूमिका के व्यक्तियों को ही कहा और बताया जाता है, ऐसे लोग ही उसकी साधना कर सकते हैं। कुपात्रों के हाथ तंत्र विज्ञान का जाना दूसरों के लिए ही नहीं, वरन उन साधकों के खुद के लिए भी संकट का कारण बनता है।
साधना बताई गई थी। सप्ताह में कम-से-कम एक दिन ऐसा रखना, जिसमें नमक और मीठा दोनों ही स्वाद छोड़ रखे जाएँ, स्वाद विजय के लिए एक कारगर उपाय माना गया है। जिनके लिए संभव है, वे अधिक दिनों तक लगातार नमक या मीठा अथवा दोनों ही छोड़ सकते हैं। इनके छोड़ने से हानि कुछ नहीं, लाभ बहुत है। जितना नमक और शक्कर शरीर के लिए आवश्यक है, उतना अन्न, शाक, दूध आदि में पहले से ही मौजूद है।
साधना को ऋषियों ने ‘एकमुखी’ गायत्री कहा है। चित्रों में एक मुख और दो हाथ वाली गायत्री माता का चित्र इसी स्तर के उपासकों के लिए निर्धारित किया है। शिक्षापद्धति को ‘स्कूल’ और ‘काॅलेज’ इन दो विभागों में विभक्त किया जाता है। आरंभिक छात्र स्कूली पढ़ाई पढ़ते हैं और आगे चलकर वे कालेज में प्रवेश करते हैं। यही बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए निर्धारित गायत्री उपासना के संबंध में भी है।
साधना में स्नान करना अनिवार्य नहीं है। हाथ, पैर, मुँह धोकर बैठा जा सकता है।
साधना का समावेश होना भी आवश्यक है। साधना को बीज माना जाए तो स्वाध्याय और सत्संग को खाद-पानी कहना पड़ेगा। ‛श्रेय’ का पौधा इसी प्रकार फलता−फूलता है। साधनाओं में गायत्री उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है। गायत्री को बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की देवी कहा गया है।
साधना में हमारा भी एक सीमा तक प्रोत्साहन एवं सहयोग सन्निहित है।
साधना के लिए इस वर्ष हम सब निरहंकारिता का अभ्यास करेंगे। अपने कार्यों में जहाँ−जहाँ अहंकार की गंध आती हो ,वहाँ से उसकी सफाई करेंगे। नम्रता, सज्जनता और सादगी अपने हर काम में बढ़नी चाहिए। दूसरों को—छोटों को भी—हाथ जोड़कर अभिवादन करने की आदत डालनी चाहिए और ‘तू’ का बहिष्कार करके ‘तुम’ या ‘आप’ का प्रयोग करने का प्रयत्न करते हुए, इसे धीरे−धीरे अपने स्वभाव में सम्मिलित कर लेना चाहिए। यह सुधार आध्यात्मिक दृष्टि से जितना श्रेष्ठ है, उतना ही सामाजिक दृष्टि से भी उपयोगी सिद्ध होगा।
साधना कर सकना कठिन प्रतीत हो तो उसके उपयोगी अंशों को तो अपना ही लेना चाहिए, वह भी साधना ही गिनी जाएगी। जप, तप न बन पड़े तो भी ब्रह्मर्चय का सीमाबंध और आलस्य के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खड़ा करने के लिए हममें से प्रत्येक को खड़ा हो ही जाना चाहिए। सबेरे जल्दी उठने की आदत निरालस्यता का पहला चिह्न है। जिन्हें रात की कोई खास ड्यूटी करनी पड़ती है, उनकी बात दूसरी है। इन अपवादों को छोड़कर हममें से प्रत्येक को सूर्योदय से कम-से-कम एक घंटा पूर्व तो उठ ही बैठना चाहिए।
साधना बताई गई थी। और कहा गया था कि, ‟गायत्री जप करते हुए अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में निर्मल, निष्काम मानना चाहिए और गायत्री माता को अपनी सगी जननी मानकर उसके साथ क्रीड़ा-विनोद करने, पयपान एवं स्नेह पाने की ध्यान-धारणा करनी चाहिए, इस ध्यान के साथ जिन लोगों ने जप किया है, उनके आनंद में वृद्धि हुई है, मन लगा है और यह शिकायत दूर हो गई है कि चित्त नहीं लगता। मन प्रेम का गुलाम है। जो भी वस्तु प्यारी लगती है, मन भाग−भागकर वहीं जाता है। रूखे, नीरस, व्यर्थ और उपेक्षणीय समझे जाने वाले कार्यों में ही मन नहीं लगता।
साधना में कुछ और ही हो जाता है।
साधना की हैं। जैसे नर−नारी का जोड़ा होता है, वैसे ही दो−दो सद्गुणों का यह जोड़ा दस की संख्या में हो जाता है। इन्हें पंचमुखी गायत्री की दस भुजाएँ अथवा दस सिद्धियाँ कह सकते हैं।
साधना करके उनके लिए सर्वश्रेष्ठ तप-त्याग किया होता। हर तपस्या का एक श्रेष्ठ वरदान मिलता है, ब्रह्मचर्य की तपस्या से शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक उन्नति के अनेकों लाभ, वरदानों के साथ एक ईश्वरीय उपहार यह भी है कि ऐसी होनहार संतान मिले, जो पिता−माता के गौरव एवं यश को बढ़ाकर सच्चे अर्थों में वंश चलाने वाली सिद्ध हो।
साधना में गायत्री माता का हंस वाहन बन जाता है। इस माला पर वे विहार और विचरण करने लगती है। इसी वीणा में उनकी झंकार उठने लगती है और इसी स्थल से नीर-क्षीर विवेक का हंसगुण साधक की अंतरात्मा में उत्पन्न होने लगता है।
साधना’—संपादक श्री. शंभु सिंह जी कौशिक, साधनाश्रम, पो.बोरखेड़ा जि.कोटा। वार्षिक मूल्य 4 रु॰। 15 अगस्त से प्रकाशित होने लगा है।
साधना का हमारा प्रथम प्रयास ही लड़खड़ाने लगेगा, यदि इतना भी न बन पड़ा तो आगे जो कठिन तपश्चर्याएँ करने का अवसर प्रस्तुत होगा, उसे किस प्रकार किया जा सकेगा?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-December
साधना से अतिरिक्त जपते रहना चाहिए। सामूहिक आर्थिक आयोजनों और सत्संगों में पाँच मिनट मौन रहकर विजय के लिए ईश्वर प्रार्थना की जाया करे। इस उद्देश्य के लिए सामूहिक अनुष्ठान यज्ञ आदि भी किये जा सकते हैं। इनमें मितव्ययिता का पूरा ध्यान रखा जाय।
साधनामय बना कर जब विवाह बन्धन में बन्धेंगे और प्रबुद्ध नई पीढ़ी के उत्पादन का ध्यान रखेंगे तो अर्जुन द्रौपदी के सम्पर्क से उत्पन्न अभिमन्यु की तरह घर−घर में सुसंस्कारी महापुरुष जन्मेंगे। उनके जन्मजात सुसंस्कार थोड़े−से शिक्षण से ही खराद किये हुए हीरे की तरह दमकने लगेंगे।
साधना करके अपने को इस योग्य बनाते थे कि उनके संयुक्त प्रयत्न से सुसंस्कारी संतति का अवतरण हो सके। इसी आधार पर यह देश नर रत्नों की खान था, इसी कारण यहाँ घर−घर में महापुरुष पैदा होते थे। खेद की बात है कि आज यह प्रक्रिया बन्द हो गई। अविचारी माता-पिता कुत्सित वासना से प्रेरित होकर इन्द्रिय तृप्ति के लिए मिलते हैं तो उसी लक्ष के अनुरूप निम्न स्तर की मनोभूमि लेकर संतान उत्पन्न होती है, जिसका सुधार शिक्षा, उपदेशों से भी उतना नहीं हो पाता जितना होना चाहिए। आज का जन समाज प्रायः इसी प्रकार का हीन संस्कारी उत्पादन है।
साधना की दृष्टि से अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं। इन्हें अतिरिक्त संख्या में भी छपा लिया गया है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि यह चार अंकों का सैट एक रुपया मूल्य लेकर विचारशील व्यक्तियों में बेचा जाय, ज्ञानदान के रूप में उपहार दिया जाय। अथवा इन अंकों के कुछ सैट अपने पास रखकर उन्हें दूसरों को पढ़ाते रहने के काम में लाया जाय। चार अंकों का यह सैट अपनी योजना एवं भावनाओं की ठीक अभिव्यक्ति कर सकता है।
साधना समारोह मनाये जाया करें। अन्तिम दिन सार्वजनिक हवन समारोह हुआ करें। प्रत्येक समारोह के बाद युग निर्माण संकल्प को एक पढ़े सब दुहरावें वाला कार्यक्रम अवश्य चलना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-November
साधना, चिकित्सा और सत्संग वाले, अक्टूबर अंक में पृष्ठ 54 पर छपे कार्यक्रम में सम्मिलित होने की तैयारी करें। कुछ लोग अधिक कार्यव्यस्त हो सकते हैं, जिनके लिए एक महीना कठिन है। उनके लिए दस दिन वाला शिक्षणक्रम रखा जाया करेगा। जो बात एक महीने में की जाती थी, वह सभी संक्षिप्त रूप से दस दिन में की जाया करेगी। 'अधिक गुड़ डालने से अधिक मीठा' वाली कहावत के अनुसार लाभ तो अधिक समय देने वालों को ही मिलेगा, पर विवशता में दस दिन की बात से भी काम चल सकता है।
साधना आदि के अधिक उपयुक्त माने गये हैं; इसलिए चांद्रायण व्रत द्वारा आत्मशोधन, तपश्चर्या, प्रायश्चित्त, पुरश्चरण करने का कार्यक्रम वर्ष में इन चार महीने गायत्री तपोभूमि में रहा करेगा। साथ ही प्राकृतिक चिकित्सा एवं अरोग्य-रक्षा का कार्यक्रम रहेगा। जिन्हें छोटे−मोटे रोग हों, वे उनका चांद्रायणकल्प भी इसी महीने की अवधि में करके रोगमुक्त बनने का प्रयत्न करेंगे। इन्हें स्वास्थ्य−शिविर भी कह सकते हैं। जो समुचित शिक्षण प्राप्त कर सकेंगे, वे प्राकृतिक चिकित्सालय द्वारा दूसरों की चिकित्सा कर सकने की क्षमता भी इसी एक महीने में प्राप्त कर लेंगे।
साधना अंक, नवंबर और दिसंबर के संजीवन विद्या अंक—इस प्रकार यह चार अंक अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। युगनिर्माण योजना की संक्षिप्त विचारधारा इन चारों में आ गई है। चार−चार आने का प्रत्येक अंक होने से यह चार अंक एक रुपये के हो जाते हैं। अपने दस−पाँच मित्रों, स्वजनों को यह एक−एक रुपये के चार−चार अंक अपनी ओर से भिजवाने का दिवाली प्रेमोपहार भेजा जा सकता है। यह उच्चकोटि का ज्ञानदान सच्चा ब्रह्मभोज कहा जा सकता है।
साधना का ही उद्देश्य प्रधान रहता है। ऐसी दशा में बाहर से धर्मजीवी दीखते हुए भी वे लोग साधारण जेबकटों की अपेक्षा धर्मबुद्धि का शोषण करने का पाप भी करते हैं और दुहरे अपराधी ठहरते हैं। सामूहिक आयोजनों और संस्थाओं की सेवा-व्यवस्था करने वाले जब टट्टी की ओट शिकार करते है, तो उनका पाप अधिक प्रबल ही माना जाता है। बाहर के लोग जिन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं है, वे सत्कर्मों में लगे लोगों की प्रशंसा ही करेंगे, आदर ही देंगे, पर कर्त्ता को उसका परिणाम उस दृष्टिकोण के अनुरूप ही मिलेगा, जिससे प्रेरित होकर उसने वह कार्य किया है।
साधना और योगाभ्यास की तरह सत्कर्म सिद्ध होगा और उसी में जीवनोद्देश्य के पथ पर भारी प्रगति होती चली जाएगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-April
साधना में लगाते हुए किसी को कोई अड़चन न होनी चाहिए। यह समय भगवान के स्मरण में लगाना चाहिए। (1) भगवान के हमारे ऊपर किए उपकार, उनकी दी हुई अनेक सुविधाओं का बाहुल्य, अनेक कठिनाइयों में उपलब्ध होती रहने वाली उनकी अदृश्य सहायताओं का बार-बार चिंतन करना चाहिए। अपनी व्यक्तिगत शक्ति स्वल्प है, जो सफलताएँ मिली हैं, उसमें अपना श्रेय न मानकर ईश्वर की ही अनुकंपा माननी चाहिए और अहंकार को तनिक भी न पनपने देना चाहिए। सफलताओं का श्रेय अपने ऊपर लेने वाले मनुष्य वास्तव में नास्तिक होते हैं।
साधना की जा सकती है। इन दोनों मार्गों में से जिसे जो अनुकूल जँचा है, उसे उसने स्वीकार किया है। प्राचीनकाल में अनेकों ऋषि गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए साधनासंलग्न रहे और बहुतों ने एकाकी जीवन को सुविधाजनक समझकर ब्रह्मचारी या संन्यासी रहकर आत्मिक प्रगति की।
साधना के लिए न इच्छा जगे और न अवकाश मिले। दूसरा वह जिसमें सीमित आकांक्षाओं के साथ संतोषपूर्वक समय गुजारते हुए कर्मयोगी की तरह संसार के प्रस्तुत उत्तरदायित्वों को शांतिपूर्वक निवाहते हुए परमार्थ का भी संपादन कर लिया जाए। निश्चित रूप से दूसरा जीवनक्रम अधिक दूरदर्शितापूर्ण एवं अधिक लाभदायक है। किंतु आश्चर्य और खेद की बात है कि आज हम सब उस जीवनक्रम को अपनाए हुए हैं, जिसमें अशांति, बर्बादी और पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ मिलने वाला नहीं है। तुलनात्मक दृष्टि से इन दोनों प्रकार के जीवनक्रमों पर विचार किया जाना चाहिए और सोचा जाना चाहिए कि लाखों-करोड़ों वर्ष बाद मिले हुए मानव जीवन का सदुपयोग करने की समस्या का हल करना आवश्यक है या नहीं?
साधनात्मक तपश्चर्या करने का सर्वश्रेष्ठ समय है। जिस प्रकार प्रातः और सायंकाल दिन और रात्रि की मिलन वेला—संध्या—उपासना के लिए उत्तम मानी जाती है उसी प्रकार सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन आश्विन और चैत्र में होता है। इन महीनों के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक की 9−9 दिन की दो ऋतु संधि बेलाऐं आती हैं जिन्हें नवरात्रि कहते हैं। जिस प्रकार नारी के शरीर में ऋतुकाल की उपयोगिता गर्भ धारण की दृष्टि से है वैसे ही वर्ष−शरीर में नवरात्रि का महत्व आध्यात्मिक उपासनाओं की सफलता की दृष्टि से है। इस अलभ्य अवसर को हमें व्यर्थ न जाने देना चाहिए और जिनसे जितनी अधिक बन पड़े उन्हें उतनी साधना करनी चाहिए।
साधना प्रारंभ कर दें। इससे उन्हें आशाजनक आत्मिक प्रगति का प्रत्यक्ष अनुभव होगा।
साधना विज्ञान का आविर्भाव हुआ है। जीव जब अपनी सत्ता को भुलाकर के ईश्वर में लीन हो जाता है, तब समाधि का, मुक्ति का सुख मिलता है। लौकिक जीवन में भी सुख-शांति का यही मार्ग है। व्यक्ति अपने संकुचित स्वार्थों की शैली में सोचना छोड़कर समाज की, समूह की बात सोचने लगे तो सर्वांगीण मुक्ति का वातावरण विनिर्मित हो सकता है। राजनैतिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता आदि स्वतंत्रता के विविध आंदोलन चलते रहते हैं।
साधना के आधार पर पाठक मथुरा से दूर रहते हुए भी उन क्षणों में दूरी को भुलाकर समीपता अनुभव करते हैं और परस्पर विचार विनिमय का सुखद आनन्द अनुभव होता है। प्रेरणा, प्रकाश, उत्साह एवं बल भी मिलता है। जो नैष्ठिक उपासक इस प्राण संचार साधना क्रम को चला रहे हैं वे 1 अप्रैल से 1 जून तक अपना साधना समय 411 से 511 तक का कर लें। जिन्होंने आरम्भ नहीं किया है वे इस चैत्र की नवरात्रि से आरम्भ कर दें और इस सूक्ष्म सम्पर्क, प्राण संचार विधान की पीली पुस्तिका बिना मूल्य मंगालें।
साधना का उपयोग करना है। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आत्मिक पवित्रता बढ़ नहीं रही है, पारमार्थिक विधियों को जीवन में स्थान नहीं मिल पा रहा है तो हमारा पूजा और पाठ कहीं-न-कहीं अपूर्ण है —वह एकांगी एवं अपूर्ण ही बना हुआ है, अन्यथा अन्य सभी सच्चे तथ्यों की तरह अध्यात्म भी प्रत्यक्ष है। अध्यात्मवादी का जीवन उत्कृष्टता से विभूषित होना ही चाहिए। उसमें मानवता को शोभायमान करने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन होना ही चाहिए। नशा पीकर तुरंत मस्ती आती है, आध्यात्मिकता का नशा इस धरती का सबसे बड़ा नशा है, उसकी दो बूँदें भी जिसके अंतःकरण तक जा पहुँचेंगी, उत्कृष्टता की मस्ती में लहराए बिना रह नहीं सकते।
साधनाओं तक ही सीमित न रहकर मन द्वारा की जाने वाली ध्यानपरक उच्चस्तरीय साधना के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। नवीन संवत्सर के समय इस चैत्र की नवरात्रि से यह उच्च स्तर प्रवेश का शुभारंभ कर देना चाहिए। अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के अनावरण की साधना अखण्ड−ज्योति के अक्टूबर 61 के अंक में विस्तारपूर्वक बताई जा चुकी हैं। कितने ही नैष्ठिक उपासक उसे अपना भी चुके हैं। जिनने अभी तक उसे अपनाया न हो वे उपरोक्त अंक को पढ़ लें और इसी चैत्र की नवरात्रि से वह साधना प्रारंभ कर दें।
साधना (2) स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा, यह चार कार्य मिलने से एक सर्वतोमुखी सर्वांगपूर्ण अध्यात्मवाद बनता है। जिस प्रकार दोनों हाथ और दोनों पैर ठीक होने से हमारी शारीरिक क्षमता ठीक कार्य करती है, उसी प्रकार इन चारों साधनों की समस्वरता से ही कोई व्यक्ति स्वस्थ अध्यात्मवादी बन सकता है। जिस व्यक्ति के दो हाथ और दो पैर के चार अंगों में से यदि एक या दो ही अवयव काम करें, शेष अपंग या नष्ट हो जाएँ तो वह अपने जीवन को सक्षम कैसे बनाएँ रख सकेगा? जिनका अध्यात्मवाद केवल थोड़े से भजन तक सीमित रह गया है, स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए उनके जीवन में कोई स्थान नहीं, वे वैसे ही अपंग हैं जैसे केवल एक हाथ या केवल एक पैर वाला व्यक्ति होता है।
साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य-मार्ग की ओर गतिशील होता है।
साधनाओं को छोड़ दे और केवल एक सत्य को ही पकड़े रहे तो वह संसारसागर से पार हो सकता है।
साधना की उच्च भूमिका
साधना अखण्ड−ज्योति के अक्टूबर 61 के अंक में विस्तारपूर्वक बताई जा चुकी हैं। कितने ही नैष्ठिक उपासक उसे अपना भी चुके हैं। जिनने अभी तक उसे अपनाया न हो वे उपरोक्त अंक को पढ़ लें और इसी चैत्र की नवरात्रि से वह साधना प्रारंभ कर दें। इससे उन्हें आशाजनक आत्मिक प्रगति का प्रत्यक्ष अनुभव होगा।
साधना के लिए पर्याप्त समय मिल सकता है। वासनाओं और तृष्णाओं पर यदि नियंत्रण प्राप्त कर लिया जाए, तो मस्तिष्क को काफी अवकाश आत्मचिंतन के लिए मिल सकता है। वासनाओं की,तृष्णाओं की महत्वकांक्षाएँ ही मनुष्य का सारा समय, सारा मस्तिष्क, सारा ओज जोंकों की तरह चूसती रहती हैं। यदि इन नागिनों से छुटकारा पाया जा सके तो फिर आदमी के पास आत्मकल्याण के लिए कुछ सोचने और कुछ करने को इतनी बड़ी मात्रा में समय बच सकता है कि वह अपना लक्ष्य पूर्ण कर ले। 84 लाख योनियों में लाखों वर्षों तक भ्रमण कराने वाली पीड़ाओं से छूट जाए और इस सुरदुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग करके भावी पीढ़ी के लिए प्रकाश दीप की तरह युगयुगांतरों तक यशस्वी बने रहने के लिए अमरता प्राप्त कर ले।
साधनाऐं अपनानी पड़ती हैं। शरीर की साधना से मन शुद्ध होता है और मन के द्वारा आत्मा की प्राप्ति होती है। शुद्ध आत्मा का तादात्म्य परमात्मा में हो जाता है। यही सनातन आत्म−विकास का क्रम चला आ रहा है। जिनकी उपासनाऐं पाँच से नियमित चल रही हैं उन्हें अब शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधनाओं तक ही सीमित न रहकर मन द्वारा की जाने वाली ध्यानपरक उच्चस्तरीय साधना के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।
साधना
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों कार्यक्रम हमारे जीवन में यदि स्थान प्राप्त करने लगें— यदि अखण्ड ज्योति परिवार के बीस हजार सदस्य अपने कार्यक्रम में इस प्रस्तुत योजना को स्थान देने लगें तो उसका परिणाम बहुत ही दूरगामी होगा और युग निर्माण का वह स्वप्न जो आज एक कल्पना जैसा दीखता है, निकट भविष्य में साकार होकर रहेगा। हम अपनी आँखों से सभ्य समाज का सुखद स्वर्गीय वातावरण देखकर शांति और संतोष प्राप्त कर सकेंगे।
साधना करनी चाहिए।
साधना के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। नवीन संवत्सर के समय इस चैत्र की नवरात्रि से यह उच्च स्तर प्रवेश का शुभारंभ कर देना चाहिए। अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के अनावरण की साधना अखण्ड−ज्योति के अक्टूबर 61 के अंक में विस्तारपूर्वक बताई जा चुकी हैं। कितने ही नैष्ठिक उपासक उसे अपना भी चुके हैं। जिनने अभी तक उसे अपनाया न हो वे उपरोक्त अंक को पढ़ लें और इसी चैत्र की नवरात्रि से वह साधना प्रारंभ कर दें।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार भागों में अध्यात्म विभक्त है। चारों को मिलाकर ही आत्मकल्याण की कोई सर्वांगपूर्ण व्यवस्था बन सकती है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम विश्वासपूर्वक इस आदर्श पर निष्ठा रखें कि अन्य आवश्यक कार्यों की तरह आत्मकल्याण का कार्यक्रम भी उपेक्षणीय नहीं, वरन अन्य साधारण कार्यों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है और महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए सोच-विचार करते रहना पड़ता है। यह तीनों ही साधन जब तक आत्मकल्याण योजना में न लगेंगे, तब तक उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार संभव न होगी। हमें अपने मस्तिष्क में आत्मकल्याण की आवश्यकता और योजना को अधिकाधिक स्थान देते चलना होगा और उसके लिए समय मिलते ही गहराई से सोच-विचार करते रहना होगा।
साधना का लक्ष्य है, इससे आत्मकल्याण और लौकिक सुख−शांति का दुहरा लाभ है। हमारे लिए यही श्रेष्ठ एवं श्रेयस्कर है।
साधना आत्मकल्याण के लिए निष्काम और निस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सच्चे प्रेम की सच्ची भक्ति का विकास ही साधना का लक्ष्य है, इससे आत्मकल्याण और लौकिक सुख−शांति का दुहरा लाभ है। हमारे लिए यही श्रेष्ठ एवं श्रेयस्कर है।
साधना से मन शुद्ध होता है और मन के द्वारा आत्मा की प्राप्ति होती है। शुद्ध आत्मा का तादात्म्य परमात्मा में हो जाता है। यही सनातन आत्म−विकास का क्रम चला आ रहा है। जिनकी उपासनाऐं पाँच से नियमित चल रही हैं उन्हें अब शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधनाओं तक ही सीमित न रहकर मन द्वारा की जाने वाली ध्यानपरक उच्चस्तरीय साधना के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। नवीन संवत्सर के समय इस चैत्र की नवरात्रि से यह उच्च स्तर प्रवेश का शुभारंभ कर देना चाहिए।
साधना को कहने−सुनने मात्र से काम चलने वाला नहीं है, उसे जीवन में उतारना ही पड़ेगा, तभी भगवान की प्रसन्नता का पुण्यफल प्राप्त हो सकना संभव होगा।
साधना समय 411 से 511 तक का कर लें। जिन्होंने आरम्भ नहीं किया है वे इस चैत्र की नवरात्रि से आरम्भ कर दें और इस सूक्ष्म सम्पर्क, प्राण संचार विधान की पीली पुस्तिका बिना मूल्य मंगालें।
साधना का उद्देश्य
साधना के बाद तुरंत स्वाध्याय आरंभ कर सकते हैं। अन्य धर्मग्रंथ पढ़ने हों तो उन्हें भी प्रसन्नतापूर्वक पढ़ा जाए। जिस प्रकार गायत्री उपासना के साथ−साथ अन्य मंत्र या देवता की उपासना करने की छूट है, उसी प्रकार जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म की सामयिक प्रेरणा देने वाले अखण्ड ज्योति के पृष्ठ आधा घंटा तक पढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य ग्रंथ भी पढ़े जा सकते हैं, पर स्वाध्याय का जो एक व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों से प्राप्त करते रहना ही चाहिए।
साधनासंलग्न रहे और बहुतों ने एकाकी जीवन को सुविधाजनक समझकर ब्रह्मचारी या संन्यासी रहकर आत्मिक प्रगति की।
साधना आत्मिक पवित्रता प्राप्त करने का साधन है— लक्ष्य नहीं, साध्य नहीं। लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसके उपायरूप में साधना का उपयोग करना है। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आत्मिक पवित्रता बढ़ नहीं रही है, पारमार्थिक विधियों को जीवन में स्थान नहीं मिल पा रहा है तो हमारा पूजा और पाठ कहीं-न-कहीं अपूर्ण है —वह एकांगी एवं अपूर्ण ही बना हुआ है, अन्यथा अन्य सभी सच्चे तथ्यों की तरह अध्यात्म भी प्रत्यक्ष है। अध्यात्मवादी का जीवन उत्कृष्टता से विभूषित होना ही चाहिए। उसमें मानवता को शोभायमान करने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन होना ही चाहिए।
साधना क्रम को चला रहे हैं वे 1 अप्रैल से 1 जून तक अपना साधना समय 411 से 511 तक का कर लें। जिन्होंने आरम्भ नहीं किया है वे इस चैत्र की नवरात्रि से आरम्भ कर दें और इस सूक्ष्म सम्पर्क, प्राण संचार विधान की पीली पुस्तिका बिना मूल्य मंगालें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-August
साधना करनी पड़ती है। अन्यथा जन्म भर से पड़ी चली आ रही चटोरेपन की आदत को कैसे काबू में रखा जा सकेगा? क्षण−क्षण में रोग मुक्ति के लिए उतावला मृगतृष्णा में व्यथित, कस्तूरी के हिरन की तरह उछलते फिरने वाला एक−एक दिन एक−एक डाक्टर की आजमायश करने वाला रोगी क्यों कर देर तक शरीर की शुद्धि में स्थिर मति से लगा रह सकेगा? रोग के दिनों की विपन्न स्थिति में भी जिसने धैर्य और विवेक की परीक्षा में उत्तीर्णता प्राप्त करने का निश्चय किया हुआ है वह व्यक्ति भावी जीवन में अवश्य ही धैर्यवान और विवेकशील बनेगा। इन महान् सद्गुणों की अभिवृद्धि आत्मिक लाभ की दृष्टि से इतनी महत्वपूर्ण है कि शारीरिक स्वास्थ्य लाभ तो उसकी तुलना में बहुत ही तुच्छ श्रेणी का लाभ रह जाता है।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना को यदि मिले श्रम।
साधना का एक अत्यन्त उपयोगी एवं सार्थक प्रकार हो सकता है। धर्म और अध्यात्म पूजाघर तक सीमित रहने की नहीं जीवन में ओतप्रोत हो जाने की वस्तु हैं। संयम और नियमितता शरीर का धर्म एवं अध्यात्म है जो इसे पालन करने लगा उसकी प्रवृत्ति आन्तरिक अध्यात्म को व्यवहारिक जीवन में उतारने के लिए अवश्य अग्रसर होगा। उच्च सिद्धान्तों को कार्य रूप में परिणत करने का व्यवहारिक अभ्यास आगे बढ़ेगा ही और उसका सत्परिणाम अध्यात्मिक जीवन में प्रत्यक्ष परिलक्षित होगा ही।
साधना विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामंत्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
साधना के लिए लोग अनेक प्रकार के कर्मकाण्डों को अपनाते हैं उनमें से कई सार्थक कई निरर्थक होते हैं। इन कर्मकाण्डों में प्राकृतिक जीवन की पद्धति के अनुसार अपनी दिनचर्या को ढाल लेना आत्मिक साधना का एक अत्यन्त उपयोगी एवं सार्थक प्रकार हो सकता है। धर्म और अध्यात्म पूजाघर तक सीमित रहने की नहीं जीवन में ओतप्रोत हो जाने की वस्तु हैं। संयम और नियमितता शरीर का धर्म एवं अध्यात्म है जो इसे पालन करने लगा उसकी प्रवृत्ति आन्तरिक अध्यात्म को व्यवहारिक जीवन में उतारने के लिए अवश्य अग्रसर होगा। उच्च सिद्धान्तों को कार्य रूप में परिणत करने का व्यवहारिक अभ्यास आगे बढ़ेगा ही और उसका सत्परिणाम अध्यात्मिक जीवन में प्रत्यक्ष परिलक्षित होगा ही।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-March
साधना, दूसरी है सेवा। भीतरी, अन्तःकरण की सफाई के साथ−साथ, बाहरी सामाजिक सफाई के लिए भी सक्रिय होना आवश्यक है। इसी प्रयत्नशीलता पर युग निर्माण का आज का सपना कल सार्थक एवं मूर्तिमान होकर सामने प्रस्तुत हो सकता है।
साधना का अभ्यास भी उपासना की पूजा अर्चा द्वारा ही संभव है।
साधनाँक एवं युग−निर्माण अंक निकल चुके हैं। इस वर्ष के प्रत्येक अंक को हमें दो बार ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए और इस विचारधारा को 5 पढ़े लोगों को पढ़ाकर एवं 5 बिना पढ़ों को सुनाकर आगे बढ़ाना चाहिए। यह दस व्यक्तियों का अपना विचार−परिवार अखण्ड−ज्योति का प्रत्येक सदस्य बनाने लगे तो उन सब का सम्मिलित एक विशाल विश्व−विद्यालय सरीखा शिक्षण सत्र व्यापक पैमाने पर चलता रह सकता है और जनवरी अंक में प्रस्तुत कार्यक्रम बहुत ही सरलतापूर्वक कार्यान्वित हो सकता है। थोड़ी इच्छा शक्ति, थोड़ी सेवा और थोड़ी परमार्थ बुद्धि हम जगा लें तो बड़ी आसानी से उस अभाव की पूर्ति हो सकती है जिसके लिए आज चारों ओर से पुकार उठ रही है। युग वाणी की उपेक्षा करना हम प्रबुद्ध अध्यात्म प्रेमी व्यक्तियों के लिए न तो उचित ही होगा और न शोभनीय।
साधना कर ली जाय तो जन मानस में हेर−फेर होते ही उसका परिणाम बाह्य जीवन में तुरंत और प्रत्यक्ष दीखने लगता है। विचार बदलने से ही मनुष्य बदलता है। मनोभूमि का परिवर्तन बाह्य जीवन में दृष्टिगोचर न हो ऐसा सम्भव नहीं। पर बिना विचारों का परिवर्तन हुए बलात् किन्हीं बुराइयों को रोकने को प्रयत्न किया जाय तो वे बुराइयाँ कुछ समय के लिए दब तो सकती हैं पर थोड़ी ही देर में वे कोई और रूप धारण कर प्रकट हो जाती हैं या चुपके−चुपके भीतर ही भीतर बढ़ती रहती हैं। दहेज जैसी घातक कुरीति का भी उन्मूलन नहीं हो पा रहा है।
साधना को अधूरी लंगड़ी एवं एकांगी रखने की अपेक्षा उसे सर्वांगपूर्ण बनाने का प्रयत्न क्यों न करें? युग निर्माण योजना के लिए अग्रसर होना इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आवश्यक भी है और अनिवार्य भी।
साधना का श्रेष्ठ तरीका है। इन प्रयत्नों से कोई और न सुधरे, केवल हमारा परिवार ही सम्भ्रान्त बन जावे तो उसकी सज्जनता से हमारा आज का समय भी आनंद से कटेगा और बुढ़ापा भी उनके बीच रहते हुए शान्ति से बीतेगा। कुसंस्कारी परिजन नरक में रहने वाले यमदूतों से अधिक दुख देते हैं इसका अनुभव उन्हें भली−भाँति होगा जिनको स्त्री, पति, पुत्र, पुत्री, भाई, भतीजे, दामाद, बहनोई, कर्कश, उद्दण्ड एवं कुमार्गगामी मिले हैं। उनकी गतिविधियों से जिसका जी दिन−रात जलता रहता है, वह बेचारा घायल से भी बुरा पड़ता है। घायल अपने कष्ट को कह तो सकता है, कराह तो सकता है पर उस बेचारे के लिए तो इस पर भी प्रतिबंध है।
साधना वही है। अवतारों ऋषियों, महापुरुषों एवं सर्व-साधारण ने इसे युग−युगों से अपनाये रखा है। पिछले अन्धकार युग में जब अनेक मत मतान्तर और देवी देवता उपज पड़े तो उपासना विधानों का बहुसंख्यक हो जाना भी स्वाभाविक ही था। आज विविध-विधि उपासनाऐं हिन्दू धर्म में प्रचलित हैं। वे चलती रहें तो भी कुछ हानि नहीं, पर गायत्री उपासना को भावात्मक एकता एवं प्राचीनतम साधन परम्परा को सजीव रखने के लिए प्रथम स्थान देना होगा।
साधना
साधना है क्योंकि उससे अपना तो लौकिक और पारलौकिक हित साधन होता ही है साथ ही आस−पास का वातावरण भी सुधारता है, दूसरों को भी लाभ मिलता है। युग−निर्माण कार्यक्रम की योजना सफल होने से दूसरों को लाभ है ही किन्तु साथ ही अपना दुहरा लाभ है। जिस सुधार कार्य को हम आरंभ करेंगे वह सबसे पहले हमारे निकटवर्ती लोगों को प्रभावित करेगा क्योंकि यह प्रचार और प्रसार कहीं दूर देश में नहीं वरन् अपने घर कुटुम्ब और पड़ौस से ही आरंभ करना है। उनके विचार उत्कृष्ट बनने से उनमें श्रेष्ठता और देवत्व की मात्रा बढ़ने से निश्चय ही हम पर उसका अत्यधिक प्रभाव पड़ेगा। वे असहयोगी एवं आक्रमणकारी न रह कर हमारे लिए प्रेम, सहयोग एवं सज्जनता से बरतने वाले बनेंगे।
साधना करने वाले को ऐसा आधार ढूँढ़ना पड़ता है जो अपरिवर्तनशील एवं उच्च संभावनाओं से ओत−प्रोत हो। इस विश्व में परमात्मा ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जो मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ रसानुभूति प्रेम भावना की अभिवृद्धि में सहायक हो सकती है। भक्ति भावना अपने आप में एक विभूति है और जिसे इसका एक कण भी प्राप्त हो गया वह धन्य हो जाता है। इस भक्ति साधना का अभ्यास भी उपासना की पूजा अर्चा द्वारा ही संभव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-September
साधना, स्वाध्याय संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों और मधुरता, स्वच्छता एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूँगा।”
साधना भी बड़ा कठिन कार्य है। निरन्तर प्रेरणा के बिना वह श्रद्धा भी आज की परिस्थितियों में देर तक नहीं टिक पाती। अब उस भूल को सुधार लिया गया है और युग−निर्माण योजना के सदस्य, सहयोगी एवं अपने स्वजन केवल उन्हें ही गिनना आरम्भ किया है जो कम से कम हमारी बात सुनने में हमारे विचारों को पढ़ने समझने में तो दिलचस्पी लेते हों।
साधना का एक सुनिश्चित अंग मानना चाहिये। भजन−पूजन की उपासना सरल है। घण्टा, आधा घण्टा पूजा−पाठ की विधि पूरी कर लेना कुछ कठिन नहीं है। ढर्रे पर पड़ जाने पर वह भी दैनिक जीवन का एक अंग बन जाता है और उसकी पूर्ति में कुछ कठिनाई नहीं दीखती। जिसे साधना कहा जाता है वह कार्य कठिन है।
साधना की उच्च स्तरीय शिक्षा क्रमबद्ध रूप में देते चलने का कार्य−क्रम हम अगले 9 वर्षों तक निरन्तर चलाते रहेंगे। गत अक्टूबर 61 में पंचकोशी गायत्री उपासना का पाठ्यक्रम छापा था, अब दूसरे वर्ष का पाठ्यक्रम आगामी अक्टूबर 62 के अंक में छपेगा। इसी प्रकार एक अंक हर साल निर्धारित पाठ्यक्रम का शिक्षण करते हुए निकलते रहेंगे और इन दस वर्षों में गायत्री का उच्च स्तरीय कोर्स पूर्ण हो जायेगा।
साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
साधना का कुछ न कुछ अभ्यास नित्य ही करते रहना चाहिए। आत्म शक्ति जब कभी जिस किसी को भी प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह−पन्द्रह मिनट भगवान सर्वव्यापक, निष्पक्ष न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप से दैनिक उपासना तो किया ही करें। नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधिवत् थोड़ी पूजा बन पड़े, इसमें फुरसत का प्रश्न नहीं, अभिरुचि का प्रश्न है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग से आनन्द आने लगता है और फुरसत उसके लिए सहज ही मिल सकती है।
साधना के लिए किया जाय तो उसका भी समुचित लाभ मिल जाता है। हमारे मनःक्षेत्र में विचरण करने वाली इन नौ देवियों के नाम है :—
साधना का प्रत्यक्ष परिणाम भी मिलता है। देव−लोक वासिनी देवियों के प्रसन्न होने और न होने की बात संदिग्ध भी हो सकती है पर शरीर लोक में रहने वाली इन देवियों की साधना का श्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता। यदि थोड़ा भी प्रयत्न इनकी साधना के लिए किया जाय तो उसका भी समुचित लाभ मिल जाता है। हमारे मनःक्षेत्र में विचरण करने वाली इन नौ देवियों के नाम है :—
साधना अनिवार्य है
साधना के अन्तर्गत उपासना का कार्यक्रम आ जाता है पर साधनाविहीन उपासना तो एकांगी अधूरी और विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। ‘अखण्ड−ज्योति’ के पाठकों को साधक बनाया जा रहा है और उन्हें इसके लिए आवश्यक अस्त्र और शस्त्र, औजार और साधना, विचार और सुझाव, प्रेरणा और प्रकाश केवल मात्र स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन निर्माण के लिए प्रेरणाप्रद विचारों को अपनाते रहने से जिसे ज्ञान उत्पन्न न हो सका, उसका साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
साधना, विचार और सुझाव, प्रेरणा और प्रकाश केवल मात्र स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन निर्माण के लिए प्रेरणाप्रद विचारों को अपनाते रहने से जिसे ज्ञान उत्पन्न न हो सका, उसका साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
साधनाओं के लिए विशेष समय भी उपासना में लगाया जाना चाहिए, पर साधारण परिस्थितियों के व्यक्तियों के लिए नियमित रूप से सच्चे मन से की गई एक घण्टे की उपासना भी पर्याप्त हो सकती है। परमार्थ के लिए निकाले गये छह घण्टे में से उपासना का एक घण्टा कम कर देने के बाद शेष पाँच घण्टे जो बचते हैं उनमें से एक घण्टा स्वाध्याय के लिए निश्चित रूप से रखा जाना चाहिए। यह कार्य भजन से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। आत्म−निर्माण की समस्याओं को, जीवन की विभिन्न गुत्थियों को सुलझाने में सहायता करने वाला साहित्य ही स्वास्थ्य की आवश्यकता पूरी करता है। कथा पुराणों की धर्म गाथाऐं सुनना पढ़ना उचित है पर उसे स्वाध्याय नहीं मानना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा वर्तमान काल की परिस्थितियों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कोई क्रमबद्ध सुझाव प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।
साधना में लगा रहता है वह अभागा चाहे योगी यती ही क्यों न हो, आत्म कल्याण के लक्ष को कदापि प्राप्त न कर सकेगा। स्वार्थ जब तक परमार्थ में न बदलेगा तब तक आत्मा भी परमात्मा पद को प्राप्त नहीं कर सकती।
साधना का श्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता। यदि थोड़ा भी प्रयत्न इनकी साधना के लिए किया जाय तो उसका भी समुचित लाभ मिल जाता है। हमारे मनःक्षेत्र में विचरण करने वाली इन नौ देवियों के नाम है :—
साधना स्वाध्याय और आत्मोन्नति के लिए परमार्थ के लिए छोड़े गये छह घंटों में से आधा समय अर्थात् तीन घंटे खर्च किये जा सकते हैं। शेष तीन घंटे परिवार और समाज की सेवा में लगाने चाहिएं। जिन्हें अपना परिवार सभ्य और सुविकसित देखना हो तो उन्हें कम से कम एक घंटा अपनी परिवार गोष्ठी के लिए बिलकुल निश्चित रूप से नियत रखना चाहिए। जब सब लोग फुरसत में होते हैं तब परिवार की दैनिक समस्याओं पर विचार विनिमय करने के लिए एक नियत समय पर ज्ञान गोष्ठी का कार्यक्रम रखा जाया करे। आज के दिन किसके मन में क्या भले−बुरे भाव उठे और क्या प्रिय−अप्रिय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा इसकी चर्चा इस गोष्ठी में की जाती रहनी चाहिए और उलझनों को सुलझाने वाले सुझाव भी साथ−साथ ही प्रस्तुत किये जाते रहने चाहिए।
साधना किया करते थे। आज वैसा वातावरण बाहर कहीं नहीं दीखता। अब यह कार्य प्रत्येक अभिभावक को स्वयं करना पड़ेगा। अपने घर का वातावरण ऐसा बनाना पड़ेगा जिसमें रहने और साँस लेने से परिवार का प्रत्येक व्यक्ति सभ्य नागरिक बनने की सुविधा प्राप्त कर सके। हमारे घरों को दीक्षा विद्यालयों में परिणत होना चाहिए।
साधना करनी ही पड़ी है और इन्हीं के अनुग्रह से उन्हें उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ने का अवसर मिला है।
साधना कहा जाता है वह कार्य कठिन है। उसमें जीवन के हर पहलू को सुधारने और सँभालने का लक्ष रहता है और आन्तरिक अव्यवस्था के हर मोर्चे पर डटकर लोहा लेना पड़ता है। उपासक बनना सरल है पर साधक बनना तो लोहे के चने चबाना है। साधना के अन्तर्गत उपासना का कार्यक्रम आ जाता है पर साधनाविहीन उपासना तो एकांगी अधूरी और विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। ‘अखण्ड−ज्योति’ के पाठकों को साधक बनाया जा रहा है और उन्हें इसके लिए आवश्यक अस्त्र और शस्त्र, औजार और साधना, विचार और सुझाव, प्रेरणा और प्रकाश केवल मात्र स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवाकार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूँगा। परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व दूँगा। अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करूँगा। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को रखूँगा।
साधनाओं में जिनकी विशेष अभिरुचि है उनका मार्गदर्शन पूर्ववत चलता रहेगा। साधारण गायत्री उपासना का शिक्षण गत 12 वर्षों से निरन्तर दिया जाता रहा है। अपरिचितों को इससे परिचित कराने और प्रारंभिक मार्ग दर्शन कराने का कार्य अब हमने अपने कंधे पर न रखकर पाठकों के जिम्मे छोड़ दिया है। क्योंकि उनमें से अधिकाँश ऐसे हैं जो इस संबंध में दूसरों को शिक्षण करने की योग्यता प्राप्त कर चुके हैं। गायत्री साधना की उच्च स्तरीय शिक्षा क्रमबद्ध रूप में देते चलने का कार्य−क्रम हम अगले 9 वर्षों तक निरन्तर चलाते रहेंगे।
साधना रूपी औषधि तभी काम करती है जब आत्म−सुधार रूपी पथ्य का समुचित ध्यान रखा जाय। दुर्गुणों और दुर्भावों से भरे दुष्ट मानस वाले व्यक्ति न इस लोक में कोई सफलता पाते हैं न परलोक में उनकी सद्गति होती है।
साधनाविहीन उपासना तो एकांगी अधूरी और विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। ‘अखण्ड−ज्योति’ के पाठकों को साधक बनाया जा रहा है और उन्हें इसके लिए आवश्यक अस्त्र और शस्त्र, औजार और साधना, विचार और सुझाव, प्रेरणा और प्रकाश केवल मात्र स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन निर्माण के लिए प्रेरणाप्रद विचारों को अपनाते रहने से जिसे ज्ञान उत्पन्न न हो सका, उसका साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1962-May
साधना है। बिगड़े हुए शरीर को रोग रहित और सतेज बनाने के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। आत्म नियंत्रण करके अपनी बुरी आदतों पर विजय प्राप्त करने एवं प्रकृति का अनुसरण करते हुए अपने आपको मानवोचित विधि व्यवस्था में ढालने के लिए जो लोग दृढ़तापूर्वक कदम उठाने का साहस कर सकें उन्हें ही स्वस्थ शरीर का दिव्य वरदान प्राप्त करने की आशा करनी चाहिए। जिन्हें इतना धैर्य न हो, उन्हें मृगतृष्णा में भटकते हुए हिरन की तरह अपनी शक्तियों को बर्बाद करते रहने और पग-पग पर पछताते हुए जादू भरे इलाज की खोज में लगा रहना चाहिए। उनकी बालबुद्धि को इसी में सन्तोष मिल सकता है चाहे वह क्षण स्थायी ही क्यों न हो।
साधना, भजन, ध्यान, धर्म−कर्म जैसे पुण्य कर्मों के लिए जिस मनोबल की आवश्यकता है वह अस्वस्थ रहने वालों में कहाँ होता है। थोड़ी खींचतान कर गाड़ी आगे चलाते हैं पर दूर तक वह भी चल नहीं पाती। यश कीर्ति की कामना करने वालों को जो त्याग करना पड़ता है उसके लायक अस्वस्थ व्यक्ति में न तो साहस होता है और न साधन ही जुड़ पाता है। मौज-मजा करने की कामना भी ऐसे लोग कहाँ पूरी कर पाते हैं। विनोद और मनोरंजन के लिए अवकाश की भी जरूरत पड़ती है और मनः स्थिति की भी, यह दोनों ही बातें अस्वस्थता की स्थिति में नहीं बन पड़ती।
साधना करते हैं और स्वास्थ्य के देवता का अभीप्सित वरदान प्राप्त करते हैं। कोई पहलवान आज तक ऐसा नहीं हुआ जिसने व्यायामशाला में जाने से इनकार किया हो, कसरत कुश्ती से जी चुराया हो। कोई खिलाड़ी तब तक प्रशंसा का पात्र नहीं बन सकता जब तक वह खेल के मैदानों में अपने शरीर को उछालने कुदाने में संकोच करता रहे। क्या कोई कुशल कारीगर ऐसा हो सकता है जो परिश्रम से जी चुराता रहा हो? जिनके हट्टे−कट्टे और मजबूत शरीर दिखाई पड़ते हैं उनमें से प्रत्येक व्यक्ति परिश्रमी रहा होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-September
साधना और सत्संग करने वाले बन्दियों और रोगियों पर, प्रभु की अपार करुणा, धारा वाही रूप में बरस रही है और हम उसे प्राप्त कर रहे हैं। ये सत्संगादि साधन, प्रभु की दया का प्रसाद ही है। सभी इसे कहाँ प्राप्त करते हैं?
साधना, जो कसाई थी, भक्त थी। स्त्रियाँ भी भगवान् का सान्निध्य प्राप्त कर सकती हैं। कारण कि उनका हृदय बड़ा कोमल और स्वभावतः प्रेम पूर्ण होता है। वे पुरुषों से अधिक भगवद्भक्ति कर सकती हैं। उनके चित्त में स्वभाव से ही स्नेह−वृत्ति रहती है।
साधना के लिये पहले इस मंत्र के रूप, महत्त्व, अर्थ, पुरश्चरण, सिद्धि तथा सिद्धि प्राप्त महापुरुषों के विषय में जानना परमावश्यक है। प्रथम गायत्री का क्या स्वरूप है? गायत्री के स्वरूप के विषय में भगवान् शंकराचार्य जी ने कहा है कि—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-June
साधना जिन्होंने की है, वे अनुभव से कहते आये हैं कि ‘आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः’। इस सूत्र के दो अर्थ हो सकते हैं, क्योंकि सत्व के दो माने हैं—शरीर का संगठन और चारित्र्य। अगर आहार शुद्ध है, याने स्वच्छ है, ताजा है, परिपक्व है, सुपाच्य है, प्रमाणयुक्त है और उसके घटक परम्परानुकूल हैं तो उसके सेवन से शरीर के रक्त, मज्जा, शुक्र आदि सब घटक शुद्ध होते हैं। वात, पित्त, कफ आदि की साम्यावस्था रहती है और सप्तधातु परिपुष्ट होकर शरीर सुदृढ़, कार्यक्षम तथा सब तरह के आघात सहन करने के योग्य बनता है और इस आरोग्य का मन पर भी अच्छा असर होता है। ‘आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः’ का दूसरा और व्यापक अर्थ यह है कि आहार अगर प्रामाणिक है, हिंसाशून्य है, द्रोहशून्य है और यज्ञ, दान, तपका फर्ज अदा करने के बाद प्राप्त किया गया है तो उससे चारित्र्य शुद्धि को पूरी पूरी मदद मिलती है।
साधनाओं द्वारा ‘जिन’ पद पाया। और आज भी हम उपवास सहित अनेक साधनाएँ और व्रत सम्पन्न करते ही हैं।
साधनाएँ और व्रत सम्पन्न करते ही हैं।
साधना। ठंडे लोहे को पीट पीट कर उसे मन चाहे आकार में परिवर्तित करना उतना सरल नहीं है जितना कि गर्म किए हुए लोहे को। ठंडे लोहे की उपमा हम भरे हुए पेट से दे सकते हैं और लाल गर्म लोहे की खाली पेट से। अतएव खाली पेट रहने पर हम अधिक प्रभाव-ग्राही होते हैं उस समय जो कुछ भी हम करते हैं उसका प्रभाव हम पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा मन किन्हीं विशेष प्रकार के विचारों में रमने लगे तो हमें वे विचार उपवासी होकर पढ़ने चाहिए, उपवासी रह कर ही उन पर मनन करना चाहिए।
साधना उतनी फलवती नहीं होती जितनी खाली पेट से की हुई साधना। ठंडे लोहे को पीट पीट कर उसे मन चाहे आकार में परिवर्तित करना उतना सरल नहीं है जितना कि गर्म किए हुए लोहे को। ठंडे लोहे की उपमा हम भरे हुए पेट से दे सकते हैं और लाल गर्म लोहे की खाली पेट से। अतएव खाली पेट रहने पर हम अधिक प्रभाव-ग्राही होते हैं उस समय जो कुछ भी हम करते हैं उसका प्रभाव हम पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा मन किन्हीं विशेष प्रकार के विचारों में रमने लगे तो हमें वे विचार उपवासी होकर पढ़ने चाहिए, उपवासी रह कर ही उन पर मनन करना चाहिए।
साधना है। गीता के दिव्य विचारों को मन में जमाओ। उपनिषद् और योगवाशिष्ठ के उन्नत विचारों का ध्यान करो। आत्मा में उन्मुख बन कर आन्तरिक ध्यान करो, विचार करो, तर्क करो। साँसारिक विचार, घृणा, द्वेष, प्रतिशोध, क्रोध काम आदि भावनाएँ तत्काल नष्ट हो जायेंगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-May
साधना को पूर्ण करने के लिए एक महीने के लिए फिर पधारे। इन महाभाग की अंतर्दृष्टि बहुत ही पैनी है। उन्हें आर से पार देखने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती। गायत्री महायज्ञ का अत्यन्त महान कार्यक्रम, उसमें सहयोग करने की लोगों की कंजूसी, आचार्य जी का अपने आपको सर्वमेध के लिए समर्पण, उनके ऊपर पड़ी हई जिम्मेदारियों का भारी बोझ आदि की विचित्र परिस्थितियों को देख कर इस ऋषि दम्पत्ति की अन्तरात्मा में एक कोलाहल उठ खड़ा हुआ और वे सोचने लगे कि क्या हम लोग आध्यात्मिक सहयोग के अतिरिक्त इस महान आयोजन में कुछ भौतिक सहयोग नहीं कर सकते? अन्ततः उन्होंने एक उपाय सोच निकाला।
साधना में अनन्य भाव से संलग्न हैं। उनका व्यक्ति गत जीवन इतना उत्कृष्ट है कि उसे देखने और विचारने से अनायास ही बड़ी प्रेरणा प्राप्त होती है। प्रोफेसर साहब की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला देवी उतनी विद्वान तो नहीं हैं, पर साधना, श्रद्धा, तपश्चर्या एवं आदर्शवादिता में अपने पतिदेव से किसी प्रकार पीछे नहीं है। इन थोड़ी सी पंक्ति यों में इन ऋषि दम्पत्ति का परिचय करा सकना कठिन है। यहाँ तो उनकी अनेकों महान् प्रक्रियाओं में से एक का उल्लेख किया जा रहा है जो तपोभूमि के साथ अभी हाल में जुड़ी है।
साधना, श्रद्धा, तपश्चर्या एवं आदर्शवादिता में अपने पतिदेव से किसी प्रकार पीछे नहीं है। इन थोड़ी सी पंक्ति यों में इन ऋषि दम्पत्ति का परिचय करा सकना कठिन है। यहाँ तो उनकी अनेकों महान् प्रक्रियाओं में से एक का उल्लेख किया जा रहा है जो तपोभूमि के साथ अभी हाल में जुड़ी है।
साधना है−जिसकी महत्ता का वर्णन नहीं किया जा सकता। राजा को अपना यश गान करने वाले चारण तथा सेवा सुश्रूषा करने वाले सेवकों की अपेक्षा वे मंत्री तथा सेनापति अधिक प्रिय होते हैं जो उसके राज्य की रक्षा, व्यवस्था, एवं वृद्धि के लिए जी जान से जुटे रहते हैं। गायत्री माता के लिए जो लोग ऐसा तप करते हैं वे साधारण पूजा उपासना करने वालों की अपेक्षा किसी भी प्रकार घाटे में नहीं रहते।
साधना अतीव उपयोगी, अधिक फलदायिनी और बहुत सरल सिद्ध हो सकती है। कदाचित किसी के शुभ संस्कार जागृत न भी हों, तो भी आपने जो प्रयत्न और परिश्रम किया है उसका मूल्य और महत्व अन्तर्यामी प्रभु से छिपा न होगा और वह उसका समुचित प्रतिफल देगा। ग्रीष्म ऋतु को पुनीत काल आरंभ हो गया। इन दिनों सूर्य तपता है। पृथ्वी तपती है, नदी, समुद्र, तपते हैं आप भी कुछ तप कीजिए।
साधना में ही सर्वतोभावेन लगेंगे। संस्कृत के उद्भट विद्वान प. जय नारायण जी ब्रह्मचारी ने गायत्री तपोभूमि में रह कर संस्कृति विद्यालय चलाने का व्रत लिया। खण्डवा के पं. नन्दकिशोर जी उपाध्याय जो सार्वजनिक सेवा एवं स्वाध्याय में ही अपना जीवन लगाते रहे हैं। उन्होंने घोषणा की कि गायत्री ज्ञान प्रसार में अपना जीवन लगाने को संकल्प करते हैं और अगले वर्ष इसी चैत्र में होने वाले नरमेध यज्ञ में अपना जीवन विधिवत् होने देंगे। सिद्ध श्री स्वामी सन्तोषानन्द जी महाराज यहाँ की वस्तुस्थिति को देखकर इतने प्रभावित हुए हैं कि उन्होंने अपने अन्यत्र के कार्यक्रमों को स्थगित करके यहीं निवास करने का निश्चय किया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-February
साधना स्थविर वक्कुल की थी। बुद्ध−उपदेश सुनने के सातवें दिन ही उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। जैसा कि उन्होंने कहा भी है—”सप्ताह भर ही मैंने चित्त−मल युक्त हो राष्ट्र का अन्न खाया। आठवें दिन शुद्ध अर्हत्व−ज्ञान उत्पन्न हुआ।” आश्चर्य नहीं कि अपने स्वस्थ, खिलते हुए चेहरे वाले भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए, भगवान ने एक दिन उद्घोषित किया, “भिक्षुओं! मेरे स्वस्थ, निरोग शिष्य भिक्षुओं में यही सबसे आगे है, यही वक्कुल।
साधना पर संलाप होने लगता है। वक्कुल से उनके अनुभवों पर बातचीत करते हुए अचेल काश्यप उनसे पूछता है—
साधना आदि प्रतिबन्ध नहीं रखे गये हैं। जिससे अधिक लोगों को इसमें भाग लेने की सुविधा है।
साधना कहाँ तक जा सकती है, इसका एक चित्र स्थविर वक्कुल के जीवन में देखिए।
साधना बहुत बढ़ी−चढ़ी थी। उनका कठिन तप और उग्र साधना महाकाश्यप के समान ही थी, किन्तु सारिपुत्र के समान धर्म प्रवचन करने में उनकी रुचि नहीं थी। यही कारण है कि उनके अधिक उपदेश हमें त्रिपिटक में उपलब्ध नहीं होते। वक्कुल एक ऐसे साधक के रूप में चित्रित किये गए हैं जिसका अवधूत व्रतों का पालन बड़ा परिपूर्ण है किन्तु जो दूसरों के लिए उनका उपदेश या अनुशासन नहीं करता। इसीलिए उनके विषय में कहा गया हैं—“तीयदं आयुष्मा वक्कुलो धुतो न धुतवादोति” अर्थात् यह आयुष्मान् वक्कुल स्वयं अवधूत तो है, किन्तु अवधूत−व्रतों के उपदेशक नहीं।
साधना महाकाश्यप के समान ही थी, किन्तु सारिपुत्र के समान धर्म प्रवचन करने में उनकी रुचि नहीं थी। यही कारण है कि उनके अधिक उपदेश हमें त्रिपिटक में उपलब्ध नहीं होते। वक्कुल एक ऐसे साधक के रूप में चित्रित किये गए हैं जिसका अवधूत व्रतों का पालन बड़ा परिपूर्ण है किन्तु जो दूसरों के लिए उनका उपदेश या अनुशासन नहीं करता। इसीलिए उनके विषय में कहा गया हैं—“तीयदं आयुष्मा वक्कुलो धुतो न धुतवादोति” अर्थात् यह आयुष्मान् वक्कुल स्वयं अवधूत तो है, किन्तु अवधूत−व्रतों के उपदेशक नहीं। इससे मालूम पड़ता है कि इस विचित्र साधक में लोक−संग्रह का भाव कम था।
साधना एवं सेवा के लिए, यह ध्यान में रखें भूलें नहीं। इनके द्वारा कोई बुराई नहीं हो भलाई ही हो, इसके विषय में सतर्क रहें धन प्राप्त हुआ है भोग के साथ साथ परोपकार के लिए। इन्द्रियाँ प्राप्त हुई हैं ज्ञान सम्पादन व सदाचरण के लिये, उन्हें अच्छे अच्छे कार्यों में लगाये रखें। प्राप्त सभी साधनों का सदुपयोग करिये, कम से कम दुरुपयोग तो नहीं ही कीजिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-April
साधना में दिन रात रत रहते हैं और सर्वांगीण विकास की ओर पैर बढ़ाते चले जाते हैं।
साधना है भावनाओं पर विजय। गन्दी वासनायें दग्ध की जाएं, तथा दैवी सम्पदाओं का विकास किया जाय तो उत्तरोत्तर आत्मविकास हो सकता है। कुत्सित भावनाओं में क्रोध, घृणा, द्वेष, लोभ और अभिमान, निर्दयता, निराशा अनिष्ट भाव प्रमुख हैं। धीरे धीरे इनका मूलोच्छेदन कर देना चाहिए। इनसे मुक्ति पाने का एक यह भी उपाय है कि इनके विपरीत गुणों, धैर्य, उत्साह, प्रेम, उदारता, दानशीलता, उपकार, नम्रता, न्याय, सत्यवचन, दिव्य भावों का विकास किया जाय।
साधना होगा, क्योंकि संसारी मनुष्यों के मन मलीन होते हैं इसलिए वह निष्काम कर्म के सच्चे भाव को नहीं समझ सकते। कुछ समय तक तीव्र सेवा करो तब आपको निष्काम कर्म−योग का भाव समझ में आवेगा। यदि आप में सच्ची लगन है और नित्य अपने लक्ष्य को सामने रख कर दृढ़ प्रयत्न करते हो तो लक्ष्य को प्राप्त करने का समय दूर नहीं है।
साधना और तपस्या करनी है। यदि इस प्रयत्न से एक बार भी हम लोग उस स्थान तक पहुँच गये तो पीड़ाओं तथा वेदनाओं से छुटकारा पाकर सिद्ध बनकर सत्य और आनन्द की लीला में प्रविष्ट होकर इस मृत्युलोक को ही स्वर्ग में बदल देंगे। सतयुग के लोग स्वर्ग लोग का पता लगा कर इस भूलोक को छोड़ कर वहाँ उस महत् लोक में पहुँचते थे। लेकिन हम लोग स्वर्ग लोक के अधिकारी बन कर इस पृथिवी को नहीं त्यागेंगे। हम इस मृत्युलोक में ही स्वर्ग की लीला का आनन्द लेंगे।
साधना एवं शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त के लिए समुचित अवसर मिलता है। सायंकाल के 4 बजे से नियमित रूप से शास्त्रीय शिक्षा की कक्षा आरंभ हो जाती है। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् ब्रह्मचारी जगतनारायणजी एवं आचार्य जी इन कथाओं का अध्यापन करते हैं। अतः सायं विधिवत् वेद मन्त्रों से गायत्री माता की पूजा अर्चा सामूहिक रूप से बड़े ही हृदयग्राही रूप से की जाती है। अब तक प्रातःकाल में अध्ययन काल तक गायत्री मन्त्र से हवन करने का काम क्रम चल रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-December
साधनाएं, गायत्री तत्वज्ञों की खोज में यात्राएँ आदि जो कुछ बन पड़ा है सो एकाग्र निष्ठा के साथ करते रहे। ‘कुछ’ सफलता भी मिली है। अब गायत्री माता की तरह यज्ञ पिता की भी कुछ उपासना आवश्यक प्रतीत होती है सो उस कार्य को विशद् गायत्री महायज्ञ के साथ आरम्भ किया गया है। चैत्र में होने वाली पूर्णाहुति उस शोध कार्य का श्रीगणेश शिलान्यास एवं उद्घाटन मात्र है। यहाँ से उस कार्य की पूर्ण तत्परता पूर्वक शोध आरम्भ करने का विचार है ताकि ऋषियों के इस रत्न भण्डार का कुछ पता चल सके।
साधना द्वारा उसे सिद्ध करना यही मंत्र साधकों का परमलक्ष होता है। जो इस मार्ग का अवलम्बन करते हैं वे सफल मनोरथ होते हैं। यजुर्वेद में उपाख्यान है कि- “नृमेध और “यरुच्छेप” नामक दो याज्ञिकों में विवाद हुआ कि देखें हममें से कौन सच्चा दृष्टा है। दोनों ने निश्चय किया कि जो गीले काठ में मन्त्र शक्ति से अग्नि उत्पन्न कर दे वही निष्णात माना जाय। नृमेध ने मन्त्र प्रयोग किया तो गीले काठ में से धुँआ मात्र निकला पर यरुच्छेप ने मन्त्रों से गीली लकड़ी प्रज्वलित हो गई अस्तु वही निष्णात माना गया।
साधना तो विधि विधान के साथ ही की जाती है। इस विधि में यह तो जानना चाहिए कि वह काम सत्य है या असत्य। निष्काम-साधना भी सक्रम ही होनी चाहिये। अक्रम या व्युत्क्रम सकामना से या तो निष्कामना से करे हानि पहुँचाता ही है। कुतूहल के लिए अथवा मन्त्रशक्ति की परीक्षा के लिए साधना नहीं करनी चाहिए कुमारी कुन्ती का कुतूहल तो महाभारत का कारण हुआ।
साधना धन का धनी समझता है और संसार में अपनी निष्ठा के अनुरूप प्रतिष्ठा प्राप्त करता था।
साधना में गुरु की प्रधानता होना परमावश्यक है और श्रेयस्कर है गुरु की कृपा से मन्त्र वीर्यवान हो जाता है!
साधना चलती थी। पीढ़ी पर पीढ़ी इस विशेषता को कायम रखा जाता था। अब तो एक ही पंडित सम्पूर्ण प्रकार के कृत्य करा देने का साहस करता है, जिन यज्ञ पात्रों से विवाह का हवन करते हैं उन्हीं से अंत्येष्टि भी होती है। परस्पर विरोधी प्रक्रियाओं के कारण विरोधी तत्वों का आविर्भाव होता है और उनके प्रयोग से लाभ होना तो दूर उल्टे निष्फलता एवं प्रत्यवाय की ही आशंका रहती है। मन्त्र की ‘अयातयातमा’ शक्ति से परिचित व्यक्ति सीमित मर्यादा से विशेष शक्ति उत्पादन करते हैं तदनुसार उन्हें ही समुचित सफलता मिलती है।
साधना नहीं करनी चाहिए कुमारी कुन्ती का कुतूहल तो महाभारत का कारण हुआ। अतः मंत्र साधना में गुरु की प्रधानता होना परमावश्यक है और श्रेयस्कर है गुरु की कृपा से मन्त्र वीर्यवान हो जाता है!
साधनादि को भगवान का रूप कहा है। ‘यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्य मेवतत्’ (18।5) यहाँ पर यज्ञ कर्म का त्याग निषिद्ध किया गया है। यज्ञोदानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणामः यहाँ पर यज्ञ को पवित्र करने वाला बताया गया है। ‘यज्ञ शिष्टामृतुयजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (4।
साधना भी सक्रम ही होनी चाहिये। अक्रम या व्युत्क्रम सकामना से या तो निष्कामना से करे हानि पहुँचाता ही है। कुतूहल के लिए अथवा मन्त्रशक्ति की परीक्षा के लिए साधना नहीं करनी चाहिए कुमारी कुन्ती का कुतूहल तो महाभारत का कारण हुआ। अतः मंत्र साधना में गुरु की प्रधानता होना परमावश्यक है और श्रेयस्कर है गुरु की कृपा से मन्त्र वीर्यवान हो जाता है!
साधना करने के पक्षपाती रहे है। भविष्य में भी वैसे ही छोटे कार्यक्रम रखेंगे। हमारे जीवन का संभवतः यह एक मात्र विशाल आयोजन हैं
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-August
साधना नियमित रूप से चलती है या नहीं। (6) आपके द्वारा कितने गायत्री अंकों का वितरण हुआ? (7) महायज्ञ के दिनों में क्या आप तपोभूमि में आ चुके हैं? यदि नहीं आये तो कब आने का विचार है? (8) महायज्ञ की भागीदारी काल में आपको या किन्हीं अन्य गायत्री उपासकों को यदि कोई दैवी सहायता जैसे लाभ प्राप्त हुये हों तो उन्हें विस्तार पूर्वक अखंड ज्योति में प्रकाशित करने के लिये फोटो के साथ छपने भेजें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-July
साधना करें। आप यही कामना लेकर यज्ञ भोक्ता भगवान का यज्ञ द्वारा यजन करें, जिससे वे आपको पुत्र प्रदान करेंगे।31−32। पुत्र कामी राजा अंग को ऋषिगण कह रहे हैं:—
साधना से दिलीप को बड़ा ही प्रतापी पुत्र प्राप्त हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-March
साधना विशद् गायत्री महायज्ञ की भागीदारी में जुड़ जाने से दुहरा लाभ उत्पन्न करती है। यों विशद् गायत्री महायज्ञ में गायत्री परिवार के सभी सदस्य उत्साह पूर्वक भाग ले रहे हैं पर जिन्हें सुविधा एवं अवकाश की कमी हो वे यज्ञ काल के सवा वर्ष में आने वाली तीन नवरात्रियों में तीन अनुष्ठान करके तीन भागीदारी तो बड़ी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। जो अधिक भागीदारी न ले सकते हों उन्हें इन तीन नवरात्रियों में तीन शेयर लेने का प्रयत्न तो अवश्य ही करना चाहिए।
साधना मार्ग में रुचि रखने वालों को गायत्री उपासना के लिए कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। जिन्हें इन 9 दिनों प्रतिदिन एक बार सवेरे अथवा सुबह शाम दोनों वक्त, मिलकर 2॥−3 घण्टे का समय मिल सके वे 24 हजार का लघु अनुष्ठान कर लें। एक घण्टे में साधारणतः 10 मालाएँ हो जाती हैं और 9 दिन में 24 हजार जप करने के लिये 26 मालाएँ प्रतिदिन करनी पड़ती हैं जिनमें साधारणतः 3 घण्टे से अधिक समय नहीं लगता। जिन्हें इतना भी समय न मिल सके वे 1 घण्टा प्रतिदिन लगाकर 9 दिन में दस हजार जप करने का प्रयत्न तो अवश्य करें। जो समय इन दिनों साधना में लगाया जायगा वह कदापि निष्फल न जायगा।
साधना भी अन्य समयों की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। जैसे दिन और रात्रि का मिलन काल ‘सन्ध्या समय’ कहलाता है और उस समय अध्यात्मिक पूजा उपासना अधिक उपयुक्त रहती है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतु की मिलन वेला आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि होती है। वैद्य लोग उदर रोग रक्त विकार आदि पुराने रोगों के रोगियों को इन्हीं दिनों वमन विरेचन आदि पञ्च कर्मों द्वारा शरीर की भीतरी सफाई कराते हैं। विशेष रूप से साधना करने के लिए प्रेरणा देते हैं। क्योंकि इन दिनों की हुई साधना भी अन्य समयों में की हुई बहुत बड़ी साधना के समान फलवती होती है।
साधना करने के लिए प्रेरणा देते हैं। क्योंकि इन दिनों की हुई साधना भी अन्य समयों में की हुई बहुत बड़ी साधना के समान फलवती होती है। नवरात्रि में किया हुआ 24 हजार का लघु अनुष्ठान अन्य काल में किये हुए सवालक्ष पुरश्चरण के समान प्रभावशाली होता है।
साधना करने की अपेक्षा मथुरा आने का प्रयत्न करें। जिनकी गोदी में बहुत छोटे बच्चे न हों वे स्त्रियाँ भी आ सकती हैं। गत नवरात्रि की भाँति इस चैत्र की नवरात्रि में भी 4 दिन निकटवर्ती तीर्थों की सामूहिक यात्रा का कार्यक्रम रखा जायगा। मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, महावन, दाऊजी, नन्दगाँव, बरसाना, गोवर्धन, राधाकुण्ड, जतीपुरा आदि दर्शनीय स्थानों को सुविधा पूर्वक दिखाने की व्यवस्था कर दी जाती है और एक साथ मोटर किराये कर लेने पर 5) से भी कम भाड़ा इन सब स्थानों का पड़ता है। देश के कौने कौने से आने वाले उपासकों के अनुभव सुनने, इस विद्या के ज्ञाता विशेषज्ञों का सत्संग करने एवं महत्व पूर्ण शिक्षा दीक्षा ग्रहण करके शंका समाधान एवं यज्ञोपवीत लेने आदि की दृष्टि से भी नवरात्रि में मथुरा आना बड़ा उपयोगी रहता है।
साधना करके देखें तो उन्हें निश्चित रूप से आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिलेगा। जितना समय इस साधन में लगा है उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मूल्य का सत्परिणाम उपलब्ध होने की पूरी आशा की जा सकती है।
साधना से वञ्चित रहने की आवश्यकता नहीं है। बिना कुछ भेजे भी सूचना मिलने पर हवन यहाँ कर दिया जा सकता है। इसी प्रकार जितने अंकों की आवश्यकता हो पत्र भेजते ही उतने गायत्री अंक भेजे जा सकते हैं। इनका पैसा फिर कभी जब सुविधा हो तब भेजा जा सकता है। महायज्ञ की भागीदारी के लिए इन नवरात्रियों में साधना करना अतीव श्रेयष्कर है।
साधना को ही संरक्षक शक्ति वरण किया है। यज्ञ की रक्षार्थ गायत्री मन्त्र की एक एक माला सत्पुरुषों द्वारा किया जाना ही वह आध्यात्मिक तलवारें हैं, जिनसे आसुरी आक्रमणों एवं विघ्नों का निवारण होने की सम्भावना है। विशद् गायत्री महायज्ञ इस युग का असाधारण यज्ञ है। इतना बड़ा संकल्पित आयोजन चिरकाल से नहीं हुआ। 125 करोड़ जप, 125 लाख हवन, चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र का पारायण यज्ञ, रुद्रयज्ञ, विष्णु यज्ञ, शतचण्डी यज्ञ, महामृत्युञ्जय यज्ञ, गणपति यज्ञ, सरस्वती यज्ञ, अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम आदि अनेक यज्ञों की शृंखला चलाने का आयोजन इस युग का भूतपूर्व संकल्प है।
साधना तपस्या, यज्ञ, सत्संग आदि के पुण्य आयोजनों के कारण आजकल गायत्री तपोभूमि में प्राचीन काल के ऋषि आश्रमों के स्वर्गीय दृश्य दृष्टिगोचर रहते हैं। सब कार्य अपने ढंग से बहुत शान्ति और व्यवस्था पूर्वक चल रहा है। परन्तु एक ही कमी यहाँ सबको खटकती रहती है वह है महायज्ञ की सुरक्षा−संरक्षण व्यवस्था की कमजोरी।
साधना करें वे ब्रह्मभोज के रूप में कुछ “गायत्री अंक” अवश्य दान करें। जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत बुरी नहीं है वे 5) मूल्य के 40 अंक मँगा लें। जिन्हें इतना खर्च कठिन प्रतीत होता हो वे कम से कम 10 अंक तो अवश्य ही मँगा लें। सवा रुपये में दस ब्राह्मणों को भोजन कराने का श्रेय प्राप्त करना कुछ बहुत बड़ा बोझ नहीं है। इसे हर कोई बड़ी आसानी से कर सकता है।
साधना के नियम बहुत साधारण हैं। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धता पूर्वक आसन पर बैठना चाहिए। प्रातःकाल पूर्व की ओर तथा सायंकाल पश्चिम की ओर मुख रहे। जप काल में घी का दीपक या धूपबत्ती जलती रहे, जल का पात्र, पास में हो सन्ध्या करके गायत्री और गुरु का पूजन करना चाहिए, तदुपरान्त जप आरम्भ कर दिया जाय। जप समाप्त हो जाने पर पूजा के जल को सूर्य के सम्मुख चढ़ा देना चाहिए।
साधना प्रायः सभी श्रद्धालु उपासक करते हैं पर इस बार वह साधना विशद् गायत्री महायज्ञ की भागीदारी में जुड़ जाने से दुहरा लाभ उत्पन्न करती है। यों विशद् गायत्री महायज्ञ में गायत्री परिवार के सभी सदस्य उत्साह पूर्वक भाग ले रहे हैं पर जिन्हें सुविधा एवं अवकाश की कमी हो वे यज्ञ काल के सवा वर्ष में आने वाली तीन नवरात्रियों में तीन अनुष्ठान करके तीन भागीदारी तो बड़ी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। जो अधिक भागीदारी न ले सकते हों उन्हें इन तीन नवरात्रियों में तीन शेयर लेने का प्रयत्न तो अवश्य ही करना चाहिए।
साधना के समान फलवती होती है। नवरात्रि में किया हुआ 24 हजार का लघु अनुष्ठान अन्य काल में किये हुए सवालक्ष पुरश्चरण के समान प्रभावशाली होता है।
साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा संरक्षण यहाँ पर किया जाता रहेगा।
साधना करना अतीव श्रेयष्कर है। यह अलभ्य अवसर है इस लाभ से वञ्चित रहना उचित नहीं। इसलिए न करने की अपेक्षा हवन तथा ब्रह्मदान के लिए कुछ उधार कर लेना भी बुरा नहीं है।
साधना में लगाया जायगा वह कदापि निष्फल न जायगा।
साधना के अतिरिक्त जप करते रहें और जप के बाद दाहिने हाथ में जल लेकर यह संकल्प करें—“यह जप विशद् गायत्री महायज्ञ की रक्षा के लिए किया गया।” तदुपरान्त जल को पृथ्वी पर छोड़ दें। यह संरक्षण का दैनिक कृत्य है।
साधना भी अन्य समयों में की हुई बहुत बड़ी साधना के समान फलवती होती है। नवरात्रि में किया हुआ 24 हजार का लघु अनुष्ठान अन्य काल में किये हुए सवालक्ष पुरश्चरण के समान प्रभावशाली होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-October
साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सबसे बड़ा लाभ आत्म कल्याण है। जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।
साधना करने में होता है। जो लाग विधिवत हवन घर पर न कर सकते हो, उनका हवन यहाँ पर कर दिया जायगा। जो साधक अपने नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्व सूचना हम दे देंगे, उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा सुरक्षा का संरक्षण हम करते रहेंगे।
साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, स्वल्प श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है। समस्त धर्म ग्रन्थों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। अथर्ववेद में गायत्री को आयु विद्या, संतान कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है।
साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा सुरक्षा का संरक्षण हम करते रहेंगे।
साधना जाये मेरी टूट
तुम्हारी कैसी भोली सीख,
नहीं रच सकें मिलन का पन्थ, विरह की पलकों के नीहार!
करे मत श्रद्धा से व्यापार!
माँगने लेने का व्यवसाय
परायेपन की है पहचान,
तुम्हारे बन जाने का देव
युगों से व्याकुल मेरे प्राण,
श्वास की सरिता को कर पार, हृदय से आती करुण पुकार!
करो मत श्रद्धा से व्यापार!
साधना आरम्भ की। फलतः कुछ दिनों के उपरान्त लड़के ने स्वतः ही आकर पिता से माफी माँगी और अब पिता के साथ मिलकर सदाचार सहित अपनी जीविका का उपार्जन करता है।
साधना की है तब से अब तक मुझको बहुत सुख और शान्ति प्राप्त हुई है। जिस आर्थिक चिन्ता से हृदय नित्य प्रति दग्ध रहा करता था, उसमें महान शान्ति प्राप्ति है और आत्म बल बहुत उन्नति की ओर बढ़ता जा रहा है। भगवत् कृपा और निर्भयता का आनन्द अनुभव होता जा रहा है। इससे पूर्व भी जब जब मैंने गायत्री जप किया था, मुझे यही गुण और शक्तियाँ प्राप्त हुई थीं अतः मेरा यह अनुभव है कि निर्भयता और महान शान्ति एवं विवेक बुद्धि के लिये यह गायत्री उपासना एवं अद्वितीय महौषधि है।
साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी व्यर्थ नहीं होता।
साधना के लिए सर्वोत्तम समय है। जिस प्रकार प्रातः सायं की मिलन-बेला-संध्या--को पूजा के लिए उत्तम काल माना जाता है, उसी प्रकार शीत ग्रीष्म ऋतुओं की मिलन-बेला में अश्विन और चैत्र की नवरात्रि आती है। जिस प्रकार गर्भाधान के लिए एक विशेष ऋतुकाल आता है, जिस प्रकार खेत बोने को एक विशेष समय आता है और उस समय का कार्य अन्य समयों की अपेक्षा अत्याधिक प्रभावशाली होता है इसी प्रकार नवरात्रि में की हुई उपासना वर्ष के अन्य सभी साधारण समयों की अपेक्षा कहीं अधिक फलदायक होती है।
साधना के अनुसार स्वर्ग और मुक्ति को देने वाली हैं। गायत्री मन्त्र, ईश्वर प्राप्ति का अचूक साधन है, भक्ति प्रदाता और जन−मन निर्मल कर्त्ता है। माताओं को स्वयं इसकी उपासना करने हुए शैशव काल से ही बच्चों को इसमें प्रवृत्त करना चाहिये। मैं तो यहाँ तक कहना चाहती हूँ कि यदि भारत की प्रत्येक नर−नारी इस परमोद्वारक मन्त्र को धारण कर ले, तो देश का उद्धार हो जाय।
साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती।”
साधना आरम्भ कर दी। इसके फल स्वरूप मैंने माता जी की सेवा करना व पूनम का व्रत भी गायत्री उपासना के साथ साथ आरम्भ कर दिया। कुछ ही समय बाद मुझे 60) मासिक वेतन पर पेंटर की जगह मिल गई। दो माह बाद राजकीय पदाधिकारियों द्वारा ट्रेसर के पद पर नियुक्त कर दिया गया और वेतन में सन्तोषजनक वृद्धि हुई अब वेतन से हमारा खर्च आराम से चलने लगा। और कर्ज भी चुक गया।
साधना करने तथा तपोभूमि में आकर साधना करने में होता है। जो लाग विधिवत हवन घर पर न कर सकते हो, उनका हवन यहाँ पर कर दिया जायगा। जो साधक अपने नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्व सूचना हम दे देंगे, उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा सुरक्षा का संरक्षण हम करते रहेंगे।
साधना करने का आदेश दिया। वहाँ सिद्धनाथ महादेव का भी एक स्थान है। मुझे चिंता थी कि मेरे भोजन आदि के निर्वाह व्यय की व्यवस्था कैसे होगी?
साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशमान होकर ईश्वरीय शक्तियों, गुणों,सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।
साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं, तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋषि−सिद्धियाँ परिलक्षित होने लगती हैं। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है। उसी प्रकार गायत्री साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशमान होकर ईश्वरीय शक्तियों, गुणों,सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।
साधना दूसरी नहीं है। समस्त धर्म ग्रन्थों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। अथर्ववेद में गायत्री को आयु विद्या, संतान कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है।
साधना से साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है। विवेक, दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और ऋतम्भरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञान जन्य दुःखों का निवारण हो जाता है। प्रारब्धवश, अनिवार्य कर्म फल के कारण कष्ट साध्य परिस्थितियाँ हर एक के जीवन में आती रहती है। हानि, शोक,वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण, विरोध, आघात आदि की विभिन्न परिस्थितियों से जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग मृत्यु तुल्य कष्ट पात हैं वहाँ आत्म बल सम्पन्न गायत्री साधक अपने विवेक,ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा,धैर्य, संतोष, संयम और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते−हँसते आसानी से काट लेता है। बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी वह अपने आनन्द का मार्ग ढूंढ़ निकालता है और मस्ती, प्रसन्नता एवं निराकुलता का जीवन बिताता है।
साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई थी। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप हो ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेदमाता कहते हैं। चारों वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं।” गायत्री को जानने वाला वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।
साधना करने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया है ऐसी परम सुखदा गायत्री माता के पावन चरणों में मैं बार बार नमस्कार करता हूँ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-January
साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ,अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग,स्त्रियों की पृथक साधनाएँ मन्त्र का अर्थ, माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएँ, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
साधनाओं जैसी महान फल दायक है। इससे सरल, स्वल्प श्रम साध्य, हानि रहित तथा शीघ्र फलदायिनी साधना कुछ त्रुटि रहने पर भी इससे कभी किसी को, किसी प्रकार की हानि नहीं होती ।
साधना द्वारा गुप्त 24 शक्ति यों का जागरण, अनेक शक्ति यों का आविर्भाव, वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान,अनेकों अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन, यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध, निष्काम और सकाम साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ,अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग,स्त्रियों की पृथक साधनाएँ मन्त्र का अर्थ, माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएँ, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधनाओं से संभव नहीं। यह संकल्प अधिक महान संभावनाओं से ओत प्रोत है इसे पूर्ण करने में सच्चा सहयोग करने में सभी गायत्री प्रेमियों सभी धार्मिक प्रकृति के पुरुषों से हमारी हार्दिक प्रार्थना है।
साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं, तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि−सिद्धियां परिलक्षित होने लगती हैं। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है उसी प्रकार गायत्री साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशवान होकर ईश्वरीय शक्ति यों, गुणों, सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।
साधना आरम्भ करती हैं उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद्बुद्धि और आत्मसंयम की भावना पैदा होती है। वैधव्य उनके लिए तप साधना जैसा शान्ति प्राप्त करती हैं जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख भी नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
साधना निष्फल नहीं जाती । इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं होता।
साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप ही ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेद माता कहते हैं। चारों वेद गायत्री की व्याख्या मात्र है।” गायत्री को जानने वाला,वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।
साधना का अपने क्षेत्र में व्यापक प्रचार कीजिए। धार्मिक प्रकृति के पढ़े लिखे लोगों को गायत्री मंत्र लिख लिख कर तपोभूमि भेजते रहने की साधना में लगाइए। कभी चर्खा कतई यज्ञ की तरह गायत्री मंत्र की लिखाई के सामूहिक आयोजन भी किये जा सकते हैं।
साधनाओं में से जो सर्व साधारण के लिए उचित एवं आवश्यक समझी हैं वे गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के तीनों खण्डों में लिख दी हैं। जिनका प्रकट करना सर्व साधारण के लिए उपयुक्त नहीं समझा है, उन्हें बताना किन्हीं विशेष अधिकारी व्यक्ति यों की पात्रता पर निर्भर रहता है। उतनी बारीकियों में न जाया जाय तो साधारणतः इतना ही जान लेने से भी काम चल सकता है कि शरीर को स्नान से शुद्ध करके साधना पर बैठना चाहिए, किसी विवशता ऋतु प्रतिकूल या अस्वस्थता की दशा में हाथ मुँह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। आसन बिछा कर पालती मार कर सीधे साधे ढंग से स्थिर चित्त से बैठना चाहिए। माला तुलसी या चंदन की लेनी चाहिए।
साधना को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग कर सकती हैं। जिस दिन से वे यह साधना आरम्भ करती हैं उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद्बुद्धि और आत्मसंयम की भावना पैदा होती है। वैधव्य उनके लिए तप साधना जैसा शान्ति प्राप्त करती हैं जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख भी नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
साधना न हो सकती हो या गायत्री उपासना न की जा सकती हो सो बात नहीं है। ईश्वर की वाणी, वेद ऋचा, भगवती महाशक्ति गायत्री को अपनाने में कोई प्रतिबंध नहीं हैं। शास्त्र विधान के अनुसार ब्राह्मण बालक का 10 वर्ष, क्षत्रिय का 12 वर्ष, वैश्य का 14 वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत होना चाहिए । इससे अधिक आयु हो जाने पर जल्दी की दृष्टि से बिना किसी विशेष समारोह के, किसी भी यज्ञ आदि के शुभ अवसर पर साधारण रीति से यज्ञोपवीत धारण किया जा सकता है। पर जिनको ऐसी सुविधा भी न हो उन्हें यज्ञोपवीत के लिए गायत्री उपासना रोकने की आवश्यकता नहीं है।
साधना वाले व्यक्ति मिल सकें वहाँ 10 दिन में या 15 दिन में 24 हजार का लघु अनुष्ठान अपने अपने घरों पर करने को तैयार कीजिए। अन्तिम दिन हवन सबको शामिल कराइए। प्रवचन कीर्तन, भजन आदि का प्रबंध भी कीजिए। इस प्रकार 1। लक्ष या 24 लक्ष के सामूहिक पुरश्चरण कराये जा सकते हैं।
साधना है जो जप, हवन, प्राणायाम आदि में समय लगाने से कहीं अधिक श्रेयष्कर सिद्ध होगी।
साधना का सूक्ष्म प्रभाव घर भर पर पड़ता है और चिन्ता जनक मनोविकारों का शमन होने तथा सुमति, एकता, प्रेम, अनुशासन तथा सद्भाव की परिवार में बढ़ोतरी होती हुई स्पष्ट रूप से दृष्टि−गोचर होती है। साधना निर्बल हो तो प्रगति धीरे−धीरे होती हैं पर होती अवश्य है।
साधना पंथ बना लिए फिर भी ऐसी साधना जो पूर्ण सिद्धावस्था तक साधक को पहुँचा सके गायत्री के अतिरिक्त और कोई सिद्ध न हो सकी। जिसने भी पूर्णता एवं परम सिद्धावस्था पाई है, उनने गायत्री माता का आश्रम अवश्य लिया है। मध्यकाल में महाभारत से लेकर अब तक के सभी सिद्ध पुरुष प्रायः इसी राजमार्ग से चले हैं। उनका मत ग्रन्थ तथा विशेष साधन चाहे प्रथक भले ही रहे है पर मूल आश्रय को किसी ने भी नहीं छोड़ा है। वर्तमान काल में भी जिनने आत्मिक दृष्टि से कुछ विकास किया है, उन्हें वेदमाता का पय पान करने का सौभाग्य अवश्य मिला है।
साधना करने से साधकों को अनेक गुनी सफलता मिलती है। कइयों के यहाँ साक्षत्कार हुए हैं। यहाँ विशेष अनुष्ठान साधन और यज्ञ होते रहने से इस तीर्थ की गुप्त शक्ति में भारी वृद्धि होती रहती है। जिस प्रकार बर्फ खाने में घुसते ही ठंडक और आग की भट्टी के पास जाते ही गर्मी लगती है, उसी प्रकार इस तपोभूमि में प्रवेश करते ही मनुष्य एक आध्यात्मिक पवित्रता एवं शान्ति अनुभव करता है।
साधना से क्या क्या सूक्ष्म प्रक्रियायें हो रही है तो वह समझने में देर न लगेगी कि यह सब कुछ कहीं से अनायास दान नहीं मिल रहा है वरन् आत्म विद्या की सुव्यवस्थित वैज्ञानिक प्रक्रिया का यह परिणाम है। गायत्री साधना कोई अन्धविश्वास नहीं एक ठोस वैज्ञानिक कृत्य है और उसके द्वारा लाभ भी सुनिश्चित ही होते हैं।
साधना कुछ त्रुटि रहने पर भी इससे कभी किसी को, किसी प्रकार की हानि नहीं होती ।
साधना के फलों का प्रधान हेतु है।
साधना की शिक्षा लेना चाहिए उसे अपना पथ प्रदर्शक नियुक्त करना चाहिए । विश्वामित्र का अर्थ है− संसार की भलाई करने वाला परमार्थी, और सच्चरित्र एवं कर्तव्य निष्ठ । गायत्री का शिक्षक केवल वशिष्ठ गुण वाला होना ही पर्याप्त नहीं उसे विश्वामित्र भी होना चाहिए। तपस्वी और परमार्थी दोनों ही गुण जिनमें हों उन्हें वशिष्ठ एवं विश्वामित्र श्रेणी का व्यक्ति कहा जा सकता है। ऐसे ही लोगों से गायत्री की विधिवत शिक्षा दीक्षा लेने पर इस महामंत्र में वह लाभ उठाना संभव होता है।
साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशवान होकर ईश्वरीय शक्ति यों, गुणों, सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।
साधनाएं:-
साधनाएँ हैं। सभी का अपना अपना महत्व है और उनके परिणाम भी अलग अलग हैं। ‘स्वाध्याय’ से सन्मार्ग की जानकारी होती है। सत्संग से स्वभाव और संस्कार बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएं जागृत होती हैं।
साधना, आराधना, के आधार पर उत्पन्न किया गया सम्बन्ध, यह दोनों ही कारण गायत्री शक्ति को ऐसी बलवान बनाते हैं जो साधकों के लिए दैवी वरदान सिद्ध होती है।
साधना सफल होती है।” इस अलंकारिक वर्णन में विधिवत् गायत्री साधना करने, उसकी शास्त्रीय प्रक्रिया को समझने एवं अनुभवी पथ प्रदर्शक के संरक्षण में साधना क्रम को आगे बढ़ाने का आदेश दिया गया है। ‘वशिष्ठ’ कहते हैं−विशेष रूप से श्रेष्ठ का । प्राचीन काल में जो व्यक्ति सवा करोड़ गायत्री जप कर लेते थे उन्हें वशिष्ठ की पदवी दी जाती थी। रघुवंशियों के कुलगुरु सदा ऐसे ही वशिष्ठ पदवी धारी होते थे।
साधना से अभीष्ट परिणाम प्राप्त न भी हो तो भी उसका शुभ परिणाम अन्य मार्ग से अवश्य प्राप्त हो जाता है। कोई बड़ी कुश्ती पछाड़ने के लिए कोई अखाड़े में आया करे तो उसका शरीर दिन दिन अवश्य मजबूत होगा। वह मनोवांछित कुश्ती पछाड़ने में सफल न भी हो तो यह नहीं सोचना चाहिये कि उसका व्यायाम तथा पौष्टिक आहर व्यर्थ चला गया। कुश्ती वह भले ही हार जाय पर निरोगता,स्फूर्ति, जीवन शक्ति, दीर्घजीवन, कमाने की क्षमता, बलवान सन्तान शत्रुओं से निपट लेने की सामर्थ्य आदि अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं, जिन्हें पछाड़ने से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इसी प्रकार गायत्री उपासना कभी भी असफल नहीं होती।
साधना ।-)
साधनाएँ करके अणिमा,महिमा आदि चमत्कारी ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनके शाप और वरदान सफल होते थे। तथा वे कितनी ही अद्भुत एवं चमत्कारी सामर्थ्यों से भरे पूरे थे इसका वर्णन इतिहास पुराणों में भरा पड़ा है। वह तपस्याएँ और योग साधनाएँ गायत्री के आधार पर ही होती थीं गायत्री महाविद्या से ही 84 प्रकार की महा योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना ही सिद्ध होता है। सितार में कई तार होते हैं इनको बजाने के कई क्रम होते हैं। अमुक नम्बर के तार के बाद अमुक नम्बर का, फिर अमुक प्रकार की स्वर लहरी निकलती है। उस क्रम को बदल कर कोई और प्रकार के क्रम से उन तारों को बजाया जाय तो दूसरी स्वर लहरी निकलती है। इसी प्रकार मंत्रों में जो अक्षर हैं उनके उच्चारण का क्रम भी शरीर में विशेष प्रकार की शक्ति यों का संचार करता है।
साधना की जाती है।
साधना में हुए अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन इस पुस्तक में है। किन व्यक्ति यों को किस किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए निराशा एवं असफलता के अन्धकार पूर्ण वातावरण को पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
साधना का विस्तृत वर्णन है। गायत्री के पाँच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य स्थूल,सूक्ष्म, कारण शरीरों का परिचय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय, आदि पंचकोशों की साधना, हठ−योग,राजयोग, लययोग नादयोग, ऋजुयोग, प्राण योग, शब्द योग, स्वरयोग की विधियाँ। बन्ध, मुद्रा, पञ्च तन्मात्रा, ग्रन्थिभेदन, पञ्जीकरण,भूत शुद्धि,समाधि, तुरीयावस्था,आत्म दर्शन सोऽहं का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग, मनोनिग्रह, मैस्मरेजम की बेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
साधना में वैसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है फिर भी यदा कदा हवन करते रहना गायत्री उपासकों का कर्तव्य है। हवन की विस्तृत विधि ‘गायत्री यज्ञ विधान’ ग्रन्थ में है। उसके आधार पर अथवा अन्य किसी हवन पद्धति के आधार पर अग्नि होत्र कर लेना चाहिए। न्यूनतम 24 आहुतियों का हवन होना चाहिए। 108 या 240 आहुतियों का हवन हों सके तो और भी उत्तम है।
साधना’ कहते हैं। इसका नियम इस प्रकार है −
साधना के साथ यज्ञ का, दान का,ब्रह्म भोज का संबंध इसीलिए जोड़ा गया है कि कोई व्यक्ति चुपचाप जप करके एक कोने में न बैठा रहे,वरन्−संसार की वायु शुद्धि एवं शुभ वातावरण के निमित्त हवन भी करें, दान देकर समाज की कुछ भलाई भी करें, सच्चे लोक सेवकों परमार्थ प्रसार के ब्राह्मणों को भोजन आदि से तृप्त करके उन्हें सहयोग दें उनकी सामर्थ्य बढ़ावे। यह सब बातें सामूहिक लाभ के लिए लोकहित के लिए “नः” शब्द का भावना के अनुसार करनी पड़ती हैं, जिससे हम केवल स्वार्थ की बात ही न सोचते रहें दूसरों की भलाई के लिए भी कुछ न कुछ अनिवार्य रूप से करते रहें।
साधना निष्फल नहीं जाती । वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सब से बड़ा लाभ आत्म कल्याण है। जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।
साधनाएँ, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना में लगाइए। कभी चर्खा कतई यज्ञ की तरह गायत्री मंत्र की लिखाई के सामूहिक आयोजन भी किये जा सकते हैं।
साधनाओं का संरक्षण नियुक्त किया जाता है जो विघ्नों संरक्षण तथा त्रुटियों का दोष परिमार्जन करता रहे जिन्हें ऐसी संरक्षण प्राप्त करने में कठिनाई होवे गायत्री तपोभूमि मथुरा से इस प्रकार की सेवा सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
साधना पर प्रकाश डालने वाले सहस्रों श्लोक भरे पड़े है। इन सबका संग्रह किया जाय तो एक बड़ा भारी गायत्री पुराण ही बन सकता है।
साधना जो पूर्ण सिद्धावस्था तक साधक को पहुँचा सके गायत्री के अतिरिक्त और कोई सिद्ध न हो सकी। जिसने भी पूर्णता एवं परम सिद्धावस्था पाई है, उनने गायत्री माता का आश्रम अवश्य लिया है। मध्यकाल में महाभारत से लेकर अब तक के सभी सिद्ध पुरुष प्रायः इसी राजमार्ग से चले हैं। उनका मत ग्रन्थ तथा विशेष साधन चाहे प्रथक भले ही रहे है पर मूल आश्रय को किसी ने भी नहीं छोड़ा है। वर्तमान काल में भी जिनने आत्मिक दृष्टि से कुछ विकास किया है, उन्हें वेदमाता का पय पान करने का सौभाग्य अवश्य मिला है।
साधना, हठ−योग,राजयोग, लययोग नादयोग, ऋजुयोग, प्राण योग, शब्द योग, स्वरयोग की विधियाँ। बन्ध, मुद्रा, पञ्च तन्मात्रा, ग्रन्थिभेदन, पञ्जीकरण,भूत शुद्धि,समाधि, तुरीयावस्था,आत्म दर्शन सोऽहं का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग, मनोनिग्रह, मैस्मरेजम की बेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
साधना पर बैठना चाहिए, किसी विवशता ऋतु प्रतिकूल या अस्वस्थता की दशा में हाथ मुँह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। आसन बिछा कर पालती मार कर सीधे साधे ढंग से स्थिर चित्त से बैठना चाहिए। माला तुलसी या चंदन की लेनी चाहिए। प्रातः काल सूर्योदय के दो घंटे पूर्व से लेकर सायंकाल सूर्य अस्त होने के एक घंटे बाद तक दिन में कभी भी उपासना की जा सकती है पर प्रातः सायंकाल का समय अधिक उत्तम है। यदि अधिक रात्रि हो जाये या चलते फिरते जप करना हो तो मन ही मन मौन मानसिक जप करना चाहिए।
साधना करने, उसकी शास्त्रीय प्रक्रिया को समझने एवं अनुभवी पथ प्रदर्शक के संरक्षण में साधना क्रम को आगे बढ़ाने का आदेश दिया गया है। ‘वशिष्ठ’ कहते हैं−विशेष रूप से श्रेष्ठ का । प्राचीन काल में जो व्यक्ति सवा करोड़ गायत्री जप कर लेते थे उन्हें वशिष्ठ की पदवी दी जाती थी। रघुवंशियों के कुलगुरु सदा ऐसे ही वशिष्ठ पदवी धारी होते थे। रघु, भज, दिलीप, दशरथ, राम, लव− कुश इन छह पीढ़ियों के गुरु एक वशिष्ठ नहीं, अलग अलग ऋषि थे पर उन सभी ने उपासना के आधार पर वशिष्ठ पद पाया था।
साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते रहते हैं। जिनके दंपत्ति जीवन बड़े कलैश थे, पति−पत्नी में कुत्ता बिल्ला का
साधना का बहुत भारी महत्व है। वे आत्म संयम, सदाचार, विवेक, ब्रह्मचर्य पालन, इन्द्रिय निग्रह एवं मन को वश में करने के लिए गायत्री साधना को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग कर सकती हैं। जिस दिन से वे यह साधना आरम्भ करती हैं उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद्बुद्धि और आत्मसंयम की भावना पैदा होती है। वैधव्य उनके लिए तप साधना जैसा शान्ति प्राप्त करती हैं जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख भी नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
साधनाएँ की जाती हैं। कठिन से कठिन रोगों के निवारण के लिए, मन्द बुद्धि लोगों की बुद्धि को तीव्र बनाने के लिए सर्प आदि प्राण घातक विषैले जन्तुओं का विष निवारण करने के लिए, राजकीय अदालती कार्यों में सफलता के लिए दरिद्रता नाश के लिए, मनोवांछित सन्तान प्राप्त करने के लिए, शत्रुता का संहार करने के लिए, भूत बाधा की शाँति के लिए, पथ भ्रष्टों को रास्ते पर लिए आवुमण की संभावना−से आत्म रक्षा के लिए विभिन्न रीतियों से अनेक बीज मन्त्र एवं सम्पुट लगा कर गायत्री साधना की जाती है।
साधना ही नहीं अदृश्य वातावरण को बदले देने, अभीष्ट परिस्थितियाँ आश्चर्यजनक रूप से उत्पन्न कर देने, मनः क्षेत्रों और मस्तिष्कों की गति विधि बदल देने जैसी चैतन्य प्रक्रियाएं भी सम्पन्न की जाती थीं। स्वर्ग, मुक्ति, आत्म साक्षात्कार और ऋद्धि सिद्धियों के केन्द्र भी यज्ञ ही थे। ऋषियों ने यज्ञ का महत्व समझा था और वे यज्ञ को समाज का अतीव उपयोगी एवं आवश्यक कार्य समझ कर उनके विशाल आयोजन समय समय पर करते कराते रहते थे। ब्राह्मण के छह कर्मों में (1) यज्ञ करना और (2) यज्ञ कराना यह दो आवश्यक कर्म हैं। अर्थात् उसके जीवन की एक तिहाई भाग यज्ञ के निमित्त लगाना आवश्यक माना गया है।
साधना करें या न करे केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
साधना जैसा शान्ति प्राप्त करती हैं जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख भी नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
साधनाएँ गायत्री के आधार पर ही होती थीं गायत्री महाविद्या से ही 84 प्रकार की महा योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना की जाती है। वस्तुतः सब के हित में ही अपना हित छिपा हुआ है। परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ है। गायत्री साधना के साथ यज्ञ का, दान का,ब्रह्म भोज का संबंध इसीलिए जोड़ा गया है कि कोई व्यक्ति चुपचाप जप करके एक कोने में न बैठा रहे,वरन्−संसार की वायु शुद्धि एवं शुभ वातावरण के निमित्त हवन भी करें, दान देकर समाज की कुछ भलाई भी करें, सच्चे लोक सेवकों परमार्थ प्रसार के ब्राह्मणों को भोजन आदि से तृप्त करके उन्हें सहयोग दें उनकी सामर्थ्य बढ़ावे। यह सब बातें सामूहिक लाभ के लिए लोकहित के लिए “नः” शब्द का भावना के अनुसार करनी पड़ती हैं, जिससे हम केवल स्वार्थ की बात ही न सोचते रहें दूसरों की भलाई के लिए भी कुछ न कुछ अनिवार्य रूप से करते रहें।
साधनाएँ मन्त्र का अर्थ, माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएँ, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना उस प्रेरक के लिए कटती रहती है। उसकी पूर्ति तभी हो सकती है जब वह नये साधक बनाकर अपने लिए उतना पुण्य फल प्राप्त करे। कुछ लोग अपने आड़े वक्त के लिए कुछ जमीन जायदाद खरीद लेते हैं ताकि उसके ब्याज भाड़े से आसानी से खर्च निकलता रहे। अनेक उपासक बना देना एक प्रकार से आध्यात्मिक जायदाद खरीद लेने के समान है जिसका पुण्य फल अपने को सदा ही निरन्तर प्राप्त होता रहता है। इस प्रकार दूसरों को गायत्री उपासना के मार्ग में लगाने, गायत्री का मंत्र का ज्ञानदान देने के शुभ कार्य में जहाँ अनेक आत्माओं का कल्याण,एवं संसार की महान सेवा है वहाँ अपने लिए अत्यन्त पुण्य फल का संचय भी है।
साधना का नाम ‘अनुज्ञान’ है। जैसी यह सस्ती पुस्तक आपके हाथ में है वैसी ही या अन्य किन्हीं गायत्री पुस्तकों को अपनी श्रद्धानुसार 24,108,240,1008,2400 की संख्या में धार्मिक प्रकृति के मनुष्यों को पढ़वाना, दान देना या खरीदवाना “अनुज्ञान” है। मकर संक्रान्ति पर, नवरात्रियों में,गायत्री जयन्ती, गंगा दशहरा,अपना जन्म दिन, पूर्वजों के श्राद्ध,पुत्र जन्म,विवाह, सफलता, उन्नत,व्रत त्यौहार,उत्सव आदि के शुभ अवसरों पर ऐसे “अनुज्ञान”करते रहना एक उच्च कोटि की माता को प्रसन्न करने वाली श्रद्धाञ्जलि है। अन्नदान की अपेक्षा ब्रह्मदान का फल हजार गुना अधिक माना गया है।
साधना की आधी मंजिल पार करली, ऐसा समझना चाहिए। यह शाप मोचन एवं उत्कीलन है। गायत्री जैसी विश्व जननी महाशक्ति को कोई भी सत्ता शाप देने में समर्थ नहीं हो सकती । गुरु की महत्ता का प्रतिपादन करने के लिए ही अलंकारिक रूप में शाप लगने की बात कही गई है।
साधना क्रम को आगे बढ़ाने का आदेश दिया गया है। ‘वशिष्ठ’ कहते हैं−विशेष रूप से श्रेष्ठ का । प्राचीन काल में जो व्यक्ति सवा करोड़ गायत्री जप कर लेते थे उन्हें वशिष्ठ की पदवी दी जाती थी। रघुवंशियों के कुलगुरु सदा ऐसे ही वशिष्ठ पदवी धारी होते थे। रघु, भज, दिलीप, दशरथ, राम, लव− कुश इन छह पीढ़ियों के गुरु एक वशिष्ठ नहीं, अलग अलग ऋषि थे पर उन सभी ने उपासना के आधार पर वशिष्ठ पद पाया था।
साधनाओं द्वारा स्थूल और सूक्ष्म शरीर में अवस्थित जिन गुप्त शक्ति यों को जागृत करते हैं वे गायत्री जब से अनायास ही जागृत होने लगती हैं। उस प्रकार यह साधना सरल होते हुए भी अत्यन्त उच्च कोटि की योग साधनाओं जैसी महान फल दायक है। इससे सरल, स्वल्प श्रम साध्य, हानि रहित तथा शीघ्र फलदायिनी साधना कुछ त्रुटि रहने पर भी इससे कभी किसी को, किसी प्रकार की हानि नहीं होती ।
साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ,अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग,स्त्रियों की पृथक साधनाएँ मन्त्र का अर्थ, माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएँ, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना सफल नहीं हो पाती। इन विघ्नों से बचने के लिए किसी सुयोग्य अनुभवी साधक को अपनी साधनाओं का संरक्षण नियुक्त किया जाता है जो विघ्नों संरक्षण तथा त्रुटियों का दोष परिमार्जन करता रहे जिन्हें ऐसी संरक्षण प्राप्त करने में कठिनाई होवे गायत्री तपोभूमि मथुरा से इस प्रकार की सेवा सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए निराशा एवं असफलता के अन्धकार पूर्ण वातावरण को पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
साधनाओं का पूरा विधान या विज्ञान बताया जाना सम्भव नहीं । संक्षिप्त और अधूरे उत्तरों से जिज्ञासुओं का ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। इसलिए कोई पूछ ताछ करने से पहले गायत्री महाविज्ञान आदि ग्रन्थों को पढ़ना आवश्यक है। जो सज्जन इन पुस्तकों को मँगा लेते हैं वे गायत्री परिवार के सदस्य माने जाते हैं और उनकी उन्नति के लिए समय समय पर अनेक आवश्यक बातें एवं सूचनाएँ इधर से ही भेजी जाती रहती हैं।
साधना एक बहुमूल्य दिव्य सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को इकट्ठी करके साधक उसके बदले में साँसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है।
साधना द्वारा दंपत्ति जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों की कुशल क्षेत्र प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी बुद्धिमान, दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती है। सब से उत्तम यह है कि निष्काम होकर अटूट श्रद्धा और भक्ति भाव से गायत्री की उपासना की जाय, कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट−घट वासिनी सर्व शक्ति मान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती ।
साधना होती है वहाँ कल्याण की निरन्तर वर्षा होती रहती है।
साधना सरल होते हुए भी अत्यन्त उच्च कोटि की योग साधनाओं जैसी महान फल दायक है। इससे सरल, स्वल्प श्रम साध्य, हानि रहित तथा शीघ्र फलदायिनी साधना कुछ त्रुटि रहने पर भी इससे कभी किसी को, किसी प्रकार की हानि नहीं होती ।
साधना से साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है। विवेक दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और ऋतंभरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञान जन्य दुःखों का निवारण हो जाता है। प्रारब्ध, अनिवार्य कर्म फल के कारण कष्ट साध्य परिस्थितियाँ हर एक के जीवन में, आती रहती हैं। हानि शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण विरोध, आघात आदि को विभिन्न परिस्थितियों से जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग मृत्यु तुल्य कष्ट पाते हैं वहाँ आत्म बल सम्पन्न गायत्री साधक अपने विवेक, ज्ञान वैराग्य, साहस, आशा, धैर्य, सन्तोष, संयम और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते हँसते आसानी से काट लेता है। बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी वह अपने आनंद का मार्ग ढूँढ़ निकालता है और मस्ती, प्रसन्नता एवं निराकुलता का जीवन बिताता है।
साधना निर्बल हो तो प्रगति धीरे−धीरे होती हैं पर होती अवश्य है।
साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल,स्वल्प श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं हैं।
साधनाओं का उद्भव हुआ है।
साधना के तौर पर गायत्री का जप बताया है।
साधना से प्रवृत्त होता है इसलिए उसकी दशाँश साधना उस प्रेरक के लिए कटती रहती है। उसकी पूर्ति तभी हो सकती है जब वह नये साधक बनाकर अपने लिए उतना पुण्य फल प्राप्त करे। कुछ लोग अपने आड़े वक्त के लिए कुछ जमीन जायदाद खरीद लेते हैं ताकि उसके ब्याज भाड़े से आसानी से खर्च निकलता रहे। अनेक उपासक बना देना एक प्रकार से आध्यात्मिक जायदाद खरीद लेने के समान है जिसका पुण्य फल अपने को सदा ही निरन्तर प्राप्त होता रहता है। इस प्रकार दूसरों को गायत्री उपासना के मार्ग में लगाने, गायत्री का मंत्र का ज्ञानदान देने के शुभ कार्य में जहाँ अनेक आत्माओं का कल्याण,एवं संसार की महान सेवा है वहाँ अपने लिए अत्यन्त पुण्य फल का संचय भी है।
साधना दूसरी नहीं हैं।
साधना होती है।
साधना कोई अन्धविश्वास नहीं एक ठोस वैज्ञानिक कृत्य है और उसके द्वारा लाभ भी सुनिश्चित ही होते हैं।
साधना में भी सिद्धि का प्रारम्भ ऐसी ही अवस्था है जब साधक अपने अन्दर एक नवीन आत्मिक चेतना अनुभव करता है और उत्साहित होकर प्रदर्शनों द्वारा दूसरों पर अपनी महत्ता की छाप बिठाना चाहता है। यह क्रम चल पड़े तो वह कच्चा वीर्य प्रारंभिक सिद्धि तत्व−स्वरूप काल में ही अपव्यय होकर समाप्त हो जाता है और साधक को सदा के लिए छूँछ एवं निकम्मा हो जाना पड़ता है, इसलिए नवीन साधकों को उचित है कि अपनी सिद्धियों को गुप्त रखें, किसी पर प्रकट न करें, किसी के सामने प्रदर्शन न करें। उनका दुरुपयोग न करें। और साथ ही जा दैवी चमत्कार दृष्टिगोचर हों उन्हें विश्वस्त अभिन्न हृदय मित्रों के अतिरिक्त और किसी से न कहें।
साधनाएँ।=)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1955-November
साधना है।” स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञान-प्रस्त जनता में ज्ञान-प्रसार करने को ही अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष-पान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है।
साधना करते हुए जीवन लक्ष की प्राप्ति में-ईश्वर और मुक्ति के निश्चित रूप से प्राप्त होने में विश्वास रखते हों वे अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन करने के लिए इस संगठित महान कार्यक्रम में अपने आपको सौंप दें। जिनकी भावनाएं ऊँची तथा योग्यताएं कम है उनकी योग्यताएं बढ़ाने के लिए यहाँ पर प्रयत्न हो सकता है। नर और नारी दोनों ही समान रूप से इस कार्य के लिए उपयोगी हैं। जो लोग पूरा समय नहीं दे सकते वे अपना बचा हुआ समय, अपने निकटवर्ती क्षेत्र देकर भी बहुत कुछ कर सकते हैं।
साधना का विस्तृत वर्णन है। गायत्री के पांच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य, स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरों का परिचय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय आदि पंच कोषों की साधना, हठ योग, राजयोग, लययोग, नादयोग, ऋजु योग, प्राण योग, शब्द योग, स्वर योग की विधियां। बन्ध, मुद्रा, पंच तन्मात्रा ग्रन्थिभेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि, समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन सोऽह का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग, मनोनिग्रह मैस्मरेजम की वेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत् विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
साधना, अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा आदि अनेक समस्याओं पर परिमार्जित दृष्टिकोण से लिखे हुए उच्चकोटि के लेख हर महीने इस पत्रिका में छपते हैं, जिन्हें पढ़कर घर बैठे उच्चकोटि के आध्यात्मिक सत्संग का लाभ उठाया जा सकता है।
साधना में संलग्न हो जाता था। दूसरे दिन 22.09.55 को मैं जप कर रहा था। आंखें खुली थी। सहसा ही मेरे आगे एक त्रिमुखी देवी प्रगट हुई। उनके अंगों से सुनहले रंग का प्रकाश निकलकर टार्च के प्रकाश की भाँति मेरे अंगों को पवित्र कर रहे थे।
साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए निराशा एवं असफलता के अन्धकारपूर्ण वातावरण को पलटकर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
साधना का होना चाहिये। जिन्होंने अभी तक गायत्री अंक वितरण नहीं किये हैं उन्हें 40 अंक मंगा लेने चाहिये। अनुष्ठान की सफलता के लिये 5) खर्च करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। जो लोग सामर्थ्यवान हैं वे 40 तक ही सीमित न रहकर 108, 240, 1080 अंक मँगाकर अपने प्रदेश में दूर-दूर तक उन्हें वितरण करें और ब्रह्मभोज का पुण्य लाभ करें।
साधना,
शीश झुकेगा, हो जायेगी शान्त युगों की भावना,
बन जायेगी अमिट, अधूरी रह कर मन की कामना,
पत्थर बन कर मूर्तिमान हो जायेगी आराधना,
मैं, मेरे पूजित का मन्दिर, मौन नियति की चेतना,
साधना में हुए अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन इस पुस्तक में है। किन व्यक्तियों को किस-किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए निराशा एवं असफलता के अन्धकारपूर्ण वातावरण को पलटकर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
साधना का विधिवत् विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
साधनाएं
17- योग के नाम पर मायाचार
18- जादूगरी या छल
19- चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग
20- मधुर सम्बन्धों का रहस्य
21- हमारी सभ्यता के कलंक
साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वंदन, प्राणायाम ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियां, अनेक प्रयोजनों के लिए गायक के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं, मन्त्र का अथ, माता का साक्षात्कार, साधन में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं गायत्री द्वारा, वाममार्गी भयंकर तांत्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधनाओं का पूरा विधान या विज्ञान बताया जाना सम्भव नहीं। संक्षिप्त और अधूरे उत्तरों से जिज्ञासुओं का ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। इसलिए कोई पूछ ताछ करने से पहले गायत्री महाविज्ञान आदि ग्रन्थों को पढ़ना आवश्यक है। जो सज्जन इन पुस्तकों को मंगा लेते हैं वे गायत्री परिवार के सदस्य माने जाते हैं और उनकी उन्नति के लिए समय पर अनेक आवश्यक बातें एवं सूचनाएं इधर से ही भेजी जाती रहती हैं।
साधना द्वारा गुप्त 24 शक्तियों का जागरण, अनेक शक्तियों का आविर्भाव, वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान अनेकों के अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन, यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध, निष्काम और सकाम साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वंदन, प्राणायाम ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियां, अनेक प्रयोजनों के लिए गायक के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं, मन्त्र का अथ, माता का साक्षात्कार, साधन में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं गायत्री द्वारा, वाममार्गी भयंकर तांत्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना में संलग्न हों। व्यक्तिगत स्वार्थों को यहाँ तक कि स्वर्ग और मुक्ति को भी इस महान आदर्श के लिए ठुकरा कर हम सच्चे त्याग का परिचय देंगे, तो अपना ही नहीं असंख्यों अन्य आत्माओं का भी कल्याण करने में समर्थ हो सकेंगे। ईश्वरीय इच्छा और प्रेरणा का यह प्रवाह हमें और आपको बलात् इस कार्यक्रम में लगाना चाहता है।
साधना, भक्ति ,ज्ञान, दीक्षा आदि के द्वारा अनीति निवारण और धर्म विस्तार का कार्य करते रहे हैं।
साधना
साधनाएं, मन्त्र का अथ, माता का साक्षात्कार, साधन में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं गायत्री द्वारा, वाममार्गी भयंकर तांत्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष-पान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह कामना हो, तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिक्खों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये।
साधनाएँ
साधना करते थे और अपना सेवा-क्षेत्र अमुक परिवारों या क्षेत्रों तक सीमित करके पूरी तत्परता के साथ वहाँ कार्य करते रहते थे।महात्मा गाँधी प्रत्येक ग्राम में एक ‘ग्राम सेवक’ द्वारा रचनात्मक कार्य किये जाने पर जोर देते थे, वह योजना साँस्कृतिक आधार पर प्राचीन काल में हमारे दूरदर्शी पूर्वजों द्वारा बहुत ही मजबूती से स्थापित की गई थी। एक पंडित या पुरोहित के जिम्मे अमुक ग्राम या परिवारों के निवासी यजमान किये गये और उन्हें काम सौंपा गया कि उन परिवार के व्यक्तियोँ को सुसंस्कृत बनाने के लिए पूरी तत्परता के साथ संलग्न रहे। व्रत, पर्व, त्यौहार, संस्कार आदि विशेष समयों पर विशेष रूप में और सामान्य समयों पर सामान्य रूप से उन परिवारों से बालकों, पुरुषों और स्त्रियों को उनकी स्थिति के अनुसार मनोबल, शिक्षण, उपदेश एवं वैदिक सहयोग देकर ऊँचा उठाने के लिए विविध आयोजन करते रहते थे। इन आयोजनों को ही कर्म-काण्ड कहा जाता था।
साधना करने हिमालय में गये थे, पर उन्हें वहाँ ईश्वरीय प्रेरणा हुई कि लोक सेवा ही सर्वोत्तम योग-साधना है।” स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञान-प्रस्त जनता में ज्ञान-प्रसार करने को ही अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष-पान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है।
साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वंदन, प्राणायाम ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियां, अनेक प्रयोजनों के लिए गायक के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं, मन्त्र का अथ, माता का साक्षात्कार, साधन में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं गायत्री द्वारा, वाममार्गी भयंकर तांत्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
साधना, हठ योग, राजयोग, लययोग, नादयोग, ऋजु योग, प्राण योग, शब्द योग, स्वर योग की विधियां। बन्ध, मुद्रा, पंच तन्मात्रा ग्रन्थिभेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि, समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन सोऽह का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग, मनोनिग्रह मैस्मरेजम की वेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत् विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-March
साधना के फलस्वरूप जो वस्तुएं मिलनी चाहिए वह यहाँ है। पैसा हमारे पास नहीं है इसलिए वह विशाल विस्तार भी यहाँ नहीं है जो पैसे के द्वारा ही संभव है।
साधना में प्रवृत्त रहे हैं। जहाँ ऐसे ब्रह्मर्षि जलवायु की उत्तमता के कारण, एवं ऐतिहासिक महत्व के कारण, अधिक संख्या में रहते हैं वह स्थान तीर्थ कहे जाते हैं। तीर्थ यात्रा में वायु परिवर्तन होता है, ऐतिहासिक स्मृतियों का अनुभव होता है और उन ब्रह्मर्षियों से सत्संग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है जिनमें दूसरों पर अच्छा असर डालने की योग्यता का बाहुल्य होता है। तीर्थ यात्रा में पुण्य फल प्राप्त होता है इसका तात्पर्य यही है कि श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति का उत्तम प्रभाव पड़ता है और उस प्रभाव के कारण अपने अन्दर जो सद्गुण उत्पन्न होते हैं उनके फलस्वरूप सुखदायक आनन्दमयी परिस्थितियाँ होती हैं।
साधना-रत मानव की, नित्य पिपासा बढ़ती जाती!!
साधना, सच्चरित्रता और तपस्या ऊँचे दर्जे की नहीं होती। यह तो उन्हीं में पाई जाती है जो ब्राह्मण वृत्ति को अपना कर लोक सेवा, ईश्वर आराधना, स्वाध्याय, और साधना में प्रवृत्त रहे हैं। जहाँ ऐसे ब्रह्मर्षि जलवायु की उत्तमता के कारण, एवं ऐतिहासिक महत्व के कारण, अधिक संख्या में रहते हैं वह स्थान तीर्थ कहे जाते हैं। तीर्थ यात्रा में वायु परिवर्तन होता है, ऐतिहासिक स्मृतियों का अनुभव होता है और उन ब्रह्मर्षियों से सत्संग करने का सौभाग्य प्राप्त होता है जिनमें दूसरों पर अच्छा असर डालने की योग्यता का बाहुल्य होता है। तीर्थ यात्रा में पुण्य फल प्राप्त होता है इसका तात्पर्य यही है कि श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति का उत्तम प्रभाव पड़ता है और उस प्रभाव के कारण अपने अन्दर जो सद्गुण उत्पन्न होते हैं उनके फलस्वरूप सुखदायक आनन्दमयी परिस्थितियाँ होती हैं।
साधना करनी चाहिए जब तक आत्मा से एक न हो जाए। चूँकि आत्मा ही मनुष्य में ईश्वरीय अंश है इसलिए इस एकता का अंतिम परिणाम “परमेश्वर के साथ एकता” होता। ईश्वरपरायण मनुष्य को आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान विश्वासी मनुष्य को स्वतंत्र, वीर, अमर और आत्म विश्वासी बना देता है। सच्चे अभिमान के प्रकाश में मनुष्य वास्तविक मनुष्यत्व प्राप्त करता है, वह अपने व्यक्तित्व को दृढ़ बना लेता है, उसकी शक्ति को सभी मनुष्य स्वीकार करते हैं, जिनके संपर्क में वह आता रहता है वह भी उसी के सदृश हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-January
साधना का एक बहुत ही छोटे दर्जे का तुच्छ सा खेल है। ऐसे खेल करने पर भारतीय योगी उतरते तो हजारों तरह की मैस्मरेजमों की रचना हो जाती और वे सब एक से एक अद्भुत होती। मनुष्य का मन जादू का पिटारा है, इसकी हर एक लहर आश्चर्यमयी है। एकाग्रता के द्वारा जो दिव्य शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं उनका वारापार नहीं मिल सकता। श्रीमती ओ. हष्णु हारा ने अपने ग्रन्थ च्च्ष्टशठ्ठष्द्गठ्ठह्लह्ड्डह्लद्बशठ्ठ ड्डठ्ठस्र ह्लद्धद्ग ्नष्ह्नह्वद्बह्द्गद्वद्गठ्ठह्ल शद्ध क्कद्गह्ह्यशठ्ठड्डद्य रुड्डठ्ठद्दद्गह्लद्बह्यद्वज्ज् में विशद वैज्ञानिक विवेचना करते हुए यह साबित कर दिया है कि मनुष्य का मन अद्भुत शक्तियों का भण्डार है और मानसिक एकाग्रता द्वारा आश्चर्यजनक शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं और हो सकती हैं।
साधना से अपना क्या हित साधन किया जा सकता है।
साधना बताई गई है उसका अभ्यास करने से छोटी मोटी कई सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं जैसे- (1) कठिन साध्य और असाध्य रोगों को दूर किया जा सकता है, इनकी विधि हम अपनी ‘प्राणचिकित्सा, विज्ञान पुस्तक में सविस्तार बात चुके हैं। (2) निकटस्थ या दूरस्थ व्यक्तियों के मन में किन्हीं संस्कारों को जमाया जा सकता है जिसकी विधि हमारी परकाय प्रवेश पुस्तक में है। (3) दूसरों से मन की बातें जानी जा सकती हैं। (4) अपने कुसंस्कारों और रोगों को हटाया जा सकता है। (5) अपनी मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का विकास किया जा सकता है।
साधना का कमरा ऐसा होना चाहिये, जिसमें न अधिक प्रकाश रहे न अन्धेरा। न अधिक सर्दी हो न गर्मी। पाल्थी मार कर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुये बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान है, उसपर दृष्टि जमाओ। चित्त की सारी भावनायें एकत्रित करके उस बिन्दु को इस प्रकार देखो मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उसमें प्रवेश कर देना चाहते हो। ऐसा सोचते रहो कि मेरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है।
साधना के लिए एक हजार व्यक्तियों ने भी रुचि न दिखाई होगी। जिनकी आध्यात्म मार्ग में रुचि हैं ऐसे साधकों में उनकी संख्या अधिक हैं जो मैस्मरेजम की चमत्कारी पद्धति को जानना ओर सीखना चाहते हैं। अपने प्रियजनों को सदा से ही हम यह बताते रहें हैं कि मैस्मरेजम में कोई अनोखी बात नहीं है, यह योग साधना का एक बहुत ही छोटे दर्जे का तुच्छ सा खेल है। ऐसे खेल करने पर भारतीय योगी उतरते तो हजारों तरह की मैस्मरेजमों की रचना हो जाती और वे सब एक से एक अद्भुत होती। मनुष्य का मन जादू का पिटारा है, इसकी हर एक लहर आश्चर्यमयी है।
साधना करने के लिए ठहर जाना चाहिए। अभ्यास के दिनों में सात्विक आहार विहार रखना, ब्रह्मचर्य पालन करना और उत्तम भावनाएं रखनी चाहिए।
साधना है।
साधना सुरक्षित बनी रहे।
साधनाओं को मैस्मरेजम विज्ञान की भाषा में ‘स्वसम्मोहन’ कहा जायगा। साधक लोग मंत्रों का जप करके, पुस्तकों का पाठ करके, ध्यान करके, अमुक अनुष्ठान कर्म काण्ड करके अपने ऊपर अमुक प्रकार के संस्कार जमाते हैं। यह संस्कार जितने मजबूत होते जाते हैं, बाह्य जीवन में वैसी ही परिस्थितियाँ इकट्ठी होती जाती है।
साधना करनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-June
साधना के निमित्त उन्हीं कार्यों को करना अपनाना चाहिए। स्वयं इन सातों बलों को अपने पास एकत्रित करना धर्म कर्तव्य समझ कर सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए और महा सम्पत्तियाँ दूसरों को भी प्राप्त हों इसके लिए परोपकार भावना के साथ उद्योग करना चाहिए। ऐसी सभा संस्थाओं का स्थापन संचालन और सहयोग करना चाहिए जो स्वास्थ्य की उन्नति करती हो, जिनके द्वारा ज्ञान की वृद्धि होती हो, आर्थिक दशा सुधरती हो, गंदगी, मलीनता, कुरुचि हटती हो, मेल, ऐक्य भ्रातृभाव बढ़ता हो तथा सद्गुणों में सदाचार में न्याय में उन्नति होती हों। बलों की वृद्धि करना ही धर्म साधना का प्रधान कार्य है। रक्षा करने का एक मात्र हथियार ‘बात’ है।
साधना’ शीर्षक लेख छपा था। हर्ष की बाती है कि उस ओर अखंड ज्योति के पाठकों ने बहुत ही दिलचस्पी ली है। हमारा अनुमान था कि वर्तमान के कारण पाठक बहुत थोड़ी संख्या में इधर ध्यान देंगे । परन्तु आशा से कई गुणी संकल्प सूचनाएं आ जाने पर हमने जाना कि कर्तव्य, परमार्थ, आध्यात्मिकता और सत्य की लगन बड़े तीव्र वेग से बढ़ रही है। भगवान अब अधर्म का भार इस पृथ्वी पर से हटाकर धर्म की स्थापना मानव हृदय में कर रहें है।
साधना का प्रधान कार्य है। रक्षा करने का एक मात्र हथियार ‘बात’ है। धर्म का गुण रक्षा करना माना जाता है। इसलिए वे ही कार्य धर्म ठहराये जा सकते है जिनके द्वारा हमारा व्यक्तिगत और सामूहिक बल बढ़ता हो, उन्नति होती हो, सुख बढ़ता हो और आत्म रक्षा की क्षमता प्राप्त होती हो।
साधना-के लिए यथा संभव निरन्तर प्रयत्न करते रहने का संकल्प कीजिए।” उस लम्बे लेख का केवल मात्र इतना साराँश था। जहाँ सामूहिक रूप से संभव हो वहाँ कई व्यक्ति मिलजुल कर कार्य करें जहाँ ऐसा न हो सके वहाँ एक अकेला व्यक्ति ही अपने को इस मार्ग पर अग्रसर करे। यह कार्य संचालन की योजना का सार था।
साधना करें। जनता जिन लोगों का पेट पालती है, जिनके जीवन की रक्षा करती है उन्हें भी उचित है कि बदले में जनता की रक्षा का कार्य करे, यही तो धर्म है। नौकरी और दान में यह अन्तर है कि नौकर तो जितने पैसे लेता है उतना ही काम करके छुट्टी पा जाता है परन्तु दान लेने वालों की जिम्मेदारी अनेक गुनी है क्योंकि उसने पैसे के अतिरिक्त श्रद्धा को भी प्राप्त किया है इसलिये उसे नौकरी की अपेक्षा कई गुना अधिक काम करके धर्म की मर्यादा की रक्षा करनी है। इसी प्रकार धर्म के नाम पर चलने वाली संस्थाओं का कर्तव्य है कि यजमानों के हित साधन के लिए प्राप्त पैसे की अपेक्षा अनेक गुना काम करके दिखायें। परन्तु हम देखते है कि धर्म के नाम पर चलने वाले व्यक्ति और संस्थान दोनों ही इस कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त खरे नहीं उतरते।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-April
साधना उपासना, पूजा पुरुषार्थ करते हैं तो यह उनका एक आध्यात्मिक व्यापार हैं। इसके लिए किसी दूसरे से न तो भिक्षा माँगनी चाहिए और न स्वीकार करनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-August
साधना पर विश्वास होना चाहिए। यही विश्वास वह बल है जिससे मंत्र सजीव होता है और अपना चमत्कार दिखाता है। अक्षर रचना के पश्चात यह धारणा एवं विश्वस्तता ही सफलता की आधार भूमि है।
साधना को पूरा किया है निश्चय ही उसे अपनी साधना पर विश्वास होना चाहिए। यही विश्वास वह बल है जिससे मंत्र सजीव होता है और अपना चमत्कार दिखाता है। अक्षर रचना के पश्चात यह धारणा एवं विश्वस्तता ही सफलता की आधार भूमि है।
साधना के फलस्वरूप अनेक सिद्ध, महात्मा, सत्पुरुष, अवतार तथा देवताओं की शक्तियाँ आकर अपने प्रभाव डालती हैं और मानसिक दुर्गुणों को दूर करके श्रेष्ठतम सद्भावनाओं का बीज जमाती हैं। सद्भावों के कारण ही यह लोक और परलोक आनन्दमय बनता है यह तथ्य बिलकुल निश्चित और स्वयं सिद्ध है।
साधना पर विश्वास है, जो दूसरों को अपने प्रभाव में लेने की कला से परिचित हैं उनके मंत्र कभी झूठे नहीं होते। ऐसे मंत्र योगी आमतौर से अपने उद्देश्य को पूरा कर ही लेते हैं उनके प्रयोग प्रायः व्यर्थ नहीं ही जाते हैं। अगले अंक में गायत्री मंत्र को सिद्ध करने की विधि बताई जाएगी।
साधना में प्रतिकूलता पर विजय प्राप्ति के अनेक ज्वलंत उदाहरण दृष्टिगोचर होते हैं। प्रताप के निरन्तर प्रयत्न महमूद गजनवी के 18 आक्रमण अनेक प्रतिघातों के अनन्तर सिद्धि को प्राप्त हुए थे।
साधनाएं देखने में छोटी और सरल हैं तो भी इनका लाभ अत्यन्त विषद है। नित्य पाँचों तत्वों का जो साधन कर सकते हैं। वे इन सबको करें जो पाँचों को एक साथ न कर सकते हों वे एक एक दो दो करके किया करें। कौन सा साधन पहले कौन सा पीछे यह भी अपनी अपनी सुविधा के ऊपर निर्भर है। जिन्हें प्रतिदिन करने की सुविधा न हो वे सप्ताह में एक दो दिन के लिए भी अपना कार्यक्रम निश्चित रूप से चलाने का प्रयत्न करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-May
साधना परलोक तक में सुख दे सकती हैं वह इस लोक में संतोष जनक परिस्थितियाँ उत्पन्न क्यों न करेगी? वह करेगी और अवश्य करेगी। यदि न करे तो समझना चाहिए यहाँ असत्य हैं, पाखंड हैं, भ्रम हैं, अज्ञान हैं। सत्य ऐसा सुगंधित पुष्प हैं जिसकी गंध दूर दूर तक फैलती हैं, पर पास में तो और भी अधिक रहती हैं। धर्म से परलोक सुधरता हैं पर यह लोक तो निश्चय ही सुधरता हैं।
साधना के लिये व्यय होती है। गणितज्ञों ने हिन्दू जाति की धार्मिक अवस्था पर गहरी खोज की है और हिसाब लगाकर बताया है कि संध्या, पूजा, जप, कीर्तन, तीर्थयात्रा, कर्मकाण्ड, संस्कार, मन्दिर दर्शन, कथा श्रवण, शास्त्रपठन, धार्मिक शिक्षा के निमित्त सर्वसाधारण का जो बहुत सा समय खर्च होता है और साधु, सन्त, पुरोहित, पुजारी, उपदेशक धर्म संस्थाओं तथा धर्म स्थानों के कर्मचारी आदि का जो पूरा समय खर्च होता है इस सारे समय को जोड़ कर इसका औसत फैलाया जाय तो हर एक छोटे बड़े हिन्दू के हिस्से में पौने तीन घंटे प्रतिदिन का समय आता है। निद्रावस्था को छोड़कर शेष समय का यह करीब पाँचवाँ भाग है। इसी प्रकार उपरोक्त कार्यों एवं व्यक्तियों के ऊपर करीब 2 अरब 96 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष व्यय होता है। इसकी औसत हर हिन्दू के ऊपर 1॥ पैसा प्रतिदिन पड़ती है।
साधना करते रहते हैं। सामूहिक रूप से हिसाब लगाया जाय तो भारत वासियों की एक पंचमाश शक्ति धर्म साधना के लिये व्यय होती है। गणितज्ञों ने हिन्दू जाति की धार्मिक अवस्था पर गहरी खोज की है और हिसाब लगाकर बताया है कि संध्या, पूजा, जप, कीर्तन, तीर्थयात्रा, कर्मकाण्ड, संस्कार, मन्दिर दर्शन, कथा श्रवण, शास्त्रपठन, धार्मिक शिक्षा के निमित्त सर्वसाधारण का जो बहुत सा समय खर्च होता है और साधु, सन्त, पुरोहित, पुजारी, उपदेशक धर्म संस्थाओं तथा धर्म स्थानों के कर्मचारी आदि का जो पूरा समय खर्च होता है इस सारे समय को जोड़ कर इसका औसत फैलाया जाय तो हर एक छोटे बड़े हिन्दू के हिस्से में पौने तीन घंटे प्रतिदिन का समय आता है। निद्रावस्था को छोड़कर शेष समय का यह करीब पाँचवाँ भाग है। इसी प्रकार उपरोक्त कार्यों एवं व्यक्तियों के ऊपर करीब 2 अरब 96 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष व्यय होता है।
साधना से बढ़कर और कोई पुण्य कर्म इस विश्व में नहीं हैं।
साधना करके जीवन मुक्त हो सकता हैं, परमात्मा को प्राप्त कर सकता हैं। आत्म कल्याण के लिए, ज्ञान की सब से अधिक आवश्यकता हैं।
साधना सच्ची है या झूठी है। जिस बाग के पौधे सूख सूख कर मुरझाये जा रहे हैं उससे फलों की भारी फसल प्राप्त होने की आशा कोई मूर्ख ही कर सकता है। इसी प्रकार जिन लोगों की शारीरिक मानसिक और सामाजिक दशा छिन्न भिन्न हो रही है उनके लिए कोई पागल ही ऐसी आशा करेगा कि इनके लिए इन्द्र का सिंहासन खाली पड़ा होगा। धर्म कोई अन्धा कुआँ नहीं है जिसमें चाहे जितना डालते जाओ पर कुछ फल ही दृष्टि गोचर न हो। धर्म प्रयत्न को ऐसा फिक्स डिपॉजिट या सेविंग सार्टीफिकेट समझा जाता हैं जिसका भुगतान मृत्यु के उपरान्त होगा, परन्तु यह ठीक नहीं असल में धर्म प्रयत्न एक व्यापार हैं जिसमें उसी दिन से लाभ होना आरम्भ हो जाता हैं।
साधना से सिद्ध होकर भारतवर्ष नवयुग की स्थापना करेगा।
साधना से बढ़कर और कोई पुण्य कर्म इस संसार में नहीं हैं। भगवान ने कहा-’ज्ञान ज्ञानवतामहम्’ अर्थात् ज्ञानवानों में जो ज्ञान हैं वह मैं ही हूँ। निःसंदेह ज्ञान ईश्वरीय दिव्य शक्ति ही हैं। सर्वश्रेष्ठ यज्ञ भी यही हैं। गीता कहती हैं- “श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञात् ज्ञान यज्ञः परंतप।
साधना संकल्प इत्यादि चलते रहें तब ही विजय प्राप्ति होती हैं।
साधनायें करता है और तरह तरह के नियमों का पालन करता हुआ विविध कर्मकाण्डों में लगा रहता है। छोटे से छोटा कार्य भी त्याग और परिश्रम के बिना पूरा नहीं होता, फिर परलोक सुख तो बिना तपस्या के प्राप्त हो ही कैसे सकता है। निस्संदेह किसी वस्तु की प्राप्ति का मार्ग प्रयत्न ही है, प्रयत्न से ही परलोक में भी सुख प्राप्त हो सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-February
साधना का एक आरंभिक अंग प्रकाशित किया गया है। सर्व साधारण के सम्मुख जितना प्रकट किया जा सकता है उतना ही उसमें छप गया है। वह आरंभिक अभ्यास है। विभिन्न मार्गों से साधक गहरी आत्म साधना में जब प्रवेश करता है तो उसे असाधारण लाभ और बलों का अपने अंदर बोध होता है उसकी योग्यताएँ दिन दिन निखरती आती हैं। खतरे का यही समय है।
साधना में प्रवृत्त होते देखे जाते हैं तो उसमें कुछ विशेष लाभ होना ही साबित होता है। प्राचीन काल में जितने भी तपस्वी हुए हैं और आज भी जो सच्चे तपस्वी हैं वे विवेक प्रेरित होकर इस मार्ग में आते हैं। उनकी व्यापार बुद्धि ने गंभीरतापूर्वक निर्णय किया है कि भोग की अपेक्षा आत्म साधना में अधिक लाभ है। लाभ का लोभ ही उन्हें स्थूल वस्तुओं में रस लेने की अपेक्षा सूक्ष्म संपदाओं का संचय करने की ओर ले जाता है।
साधना में जब प्रवेश करता है तो उसे असाधारण लाभ और बलों का अपने अंदर बोध होता है उसकी योग्यताएँ दिन दिन निखरती आती हैं। खतरे का यही समय है। यदि उन शक्तियों का उपयोग ठीक न हुआ तो वैसा ही अनिष्ट उत्पन्न होता है जैसा कि मूर्ख बालक दियासलाई की डिब्बी हाथ में लेकर भयंकर अग्निकाण्ड उपस्थित कर सकता है। योग शास्त्र में स्थान स्थान पर ऋषि सिद्धियों के प्रलोभन में न फंसने का कठोर आदेश है। कारण यह है कि यदि साधक चमत्कार दिखाने में लग गया तो वाहवाही के लोभ तथा शक्तिमत्ता के अभिमान में नष्ट भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाएगा।
साधना मनुष्य की प्रेम भावना को ऊँची उठाने के लिए है। भक्ति द्वारा मनुष्य प्रेम वृत्ति को उन्नत करता है, जिससे स्वर्गीय आनन्द सहज ही उसे प्राप्त हो जाता है। यदि प्रेम भावना न हो तो केवल कर्मकाण्ड मात्र की जाने वाली पूजा पत्री निरर्थक है। महात्मा मलूक दास ने कहा है कि-
साधनाओं के पश्चात् जिन्हें कुछ आत्मबल प्राप्त हो, उनके लिए हमारी शास्त्र सम्मत सलाह है कि उस शक्ति को वाहवाही लूटने में किसी को भौतिक वस्तुएं दिलाने में खर्च न करें। वाहवाही लूटने में इस कष्ट साध्य शक्ति का व्यय करना ऐसा है जैसा नोट जला कर आग तापना। भौतिक वस्तुएं तो पुरुषार्थ से कमाई जाती हैं। वस्तुओं का अभाव होने पर मनुष्य अधिक पुरुषार्थ और जागरुकता सीखता है, यदि मुफ्त का माल मिले तो उसकी आत्मिक प्रगति रुक जाती है इसलिये इस झंझट में भी नहीं पड़ना चाहिए। अभाव ग्रस्तों को पुरुषार्थ के लिए उत्साहित करना चाहिए और भौतिक वस्तुओं से सहायता करनी-करानी चाहिए।
साधना के फलस्वरूप कुछ ऐसी विशेष योग्यताएं प्राप्त होती हैं जो सर्व साधारण में नहीं देखी जाती। यदि इस प्रकार का विशेष लाभ न होता तो मनुष्य प्राणी जो स्वभावतः वैभव और आनन्द की तलाश करता रहता है। इन्द्रिय भोग को त्याग कर योग की कठोर साधनाओं की ओर आकर्षित न होता। रूखी, नीरस, कठोर, अरुचिकर कष्ट साध्य, साधनाएं करने को कोई कदापि तैयार न होता यदि उसके फल स्वरूप कोई ऊंचे दर्जे की वस्तु प्राप्त न होती।
साधना में लगाया जाता है तो और भी अद्भुत, आश्चर्यजनक, परिणाम उपस्थित होते हैं, जिन्हें ऋद्धि सिद्धि के नाम से पुकारते हैं। निःसंदेह आध्यात्मिक साधना के फलस्वरूप कुछ ऐसी विशेष योग्यताएं प्राप्त होती हैं जो सर्व साधारण में नहीं देखी जाती। यदि इस प्रकार का विशेष लाभ न होता तो मनुष्य प्राणी जो स्वभावतः वैभव और आनन्द की तलाश करता रहता है। इन्द्रिय भोग को त्याग कर योग की कठोर साधनाओं की ओर आकर्षित न होता। रूखी, नीरस, कठोर, अरुचिकर कष्ट साध्य, साधनाएं करने को कोई कदापि तैयार न होता यदि उसके फल स्वरूप कोई ऊंचे दर्जे की वस्तु प्राप्त न होती।
साधना में लीन हैं वे ऊंचे दर्जे के व्यापारी हैं। छोटा रोजगार छोड़ करके बड़ी कमाई में लगे हुए हैं। यह कमाई पूर्णतः प्रत्यक्ष है यदि वह लाभ सच्चा और ऊंचा न होता तो एक भी विवेकवान व्यक्ति उस झंझट भरे, कठिन मार्ग में प्रवृत्त न होता।
साधनाएं करने को कोई कदापि तैयार न होता यदि उसके फल स्वरूप कोई ऊंचे दर्जे की वस्तु प्राप्त न होती।
साधना में प्रवृत्त हैं उनका उत्पादन कार्य अच्छी फसल उत्पन्न करता है। उनमें एक खास तौर की शक्ति बढ़ती है जिसे आत्मबल कहते है। यह बल साँसारिक अन्य बातों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल में राजा विश्वामित्र की समस्त सेना और संपदा, तपस्वी वशिष्ठ के आत्मबल के सामने पराजित हो गई तो “धिक्बलं क्षत्रिय बलं, ब्रह्म तेजो बलं बलम्।” कहते हुए विश्वामित्र राजपाट छोड़कर आत्म साधना के मार्ग पर चल पड़े।
साधना के ही अंग हैं और उनका मूल स्थान भारतवर्ष ही है। हिमालय के अनेक सिद्ध महात्माओं और तिब्बत के लामाओं की विचित्र बातें तो आज भी देखी सुनी जा रही हैं। इस तरह साधक और अभ्यार्थी के पक्ष में क्या योग, क्या जादू, क्या आग में चलकर वहाँ के विज्ञानाचार्यों को आश्चर्य विमुग्ध कर दिया था। इसी एक योगी द्वारा आँख में पट्टी बाँधकर क्रिकेट आदि के खेल खेलने को भारतीय करामातों का भी प्रदर्शन हुआ था। भारतीय बाजीगरी के अद्भुत खेलों के सम्बन्ध में पश्चिमी देशों के निवासी पूर्ण विश्वास रखते हैं और इसके लिये उन के यहाँ नाना प्रकार की खोजें जारी हैं।
साधना में जो आनन्द, आत्म संतोष और उल्लास है उसका मजा अपने ढंग का अनोखा ही है। मैं अब करीब 60 वर्ष का हो चला हूँ और विगत 20 वर्षों से मन वचन तथा काया से ब्रह्मचर्य की साधना कर रहा हूँ। इसमें मुझे जितना आनन्द आता है उसका वर्णन लेखनी द्वारा कर सकना मेरे लिए संभव नहीं है। यह गूँगे का गुड़ है। जो भाई बहिन इस व्रत का पारायण करेंगे वे ही मेरी तरह इस अमृत रस को चखेंगे।
साधना करनी चाहिए यही शास्त्रों की आज्ञा है और यही मेरा निवेदन है।
साधना में अधिक लाभ है। लाभ का लोभ ही उन्हें स्थूल वस्तुओं में रस लेने की अपेक्षा सूक्ष्म संपदाओं का संचय करने की ओर ले जाता है।
साधना के मार्ग पर चल पड़े। राजा की अपेक्षा ऋषि को उन्होंने अधिक बलवान पाया। साँसारिक बल की अपेक्षा आत्मबल को उन्होंने महान अनुभव किया। छोटी चीज को छोड़कर लोग बड़ी की ओर बढ़ते हैं। राज त्याग कर विश्वामित्र का योगी होना इसका ज्वलंत प्रमाण है।
साधना का पहिले से ही आस्तित्व कायम है।
साधनाओं द्वारा “मारण” -आत्मविद्युत के प्रहार से किसी को मार डालना, “मोहन”-बुद्धि का मोहित करके इच्छानुसार कार्य कराना, “उच्चाटन”-किसी स्थान कार्य या व्यक्ति से मन उचटा देना, द्वेष करा देना, “वशीकरण” - वश में कर लेना आज्ञानुवर्ती बना लेना, “आकर्षण”- किसी को आकर्षित करना, “स्तम्भन”- किसी कार्य की अधूरी अवस्था में छुड़ा देना, रोक देना, जरूरत उत्पन्न कर देना, आदि भयंकर सफलताएं मिलती हैं। देवी देवता तथा प्रेत पिशाचों की सहायता भी किन्हीं को प्राप्त होती है। इन सब योग्यताओं द्वारा दूसरे व्यक्ति को भौतिक वस्तुओं का हानि लाभ भी पहुँचाया जाता है। अपनी योग्यताओं का प्रदर्शन करके चमत्कार दिखाने पूजा और कीर्ति भी प्राप्त की जाती है। बदले में धन और भोग लिए जाते हैं।
साधनाओं की ओर आकर्षित न होता। रूखी, नीरस, कठोर, अरुचिकर कष्ट साध्य, साधनाएं करने को कोई कदापि तैयार न होता यदि उसके फल स्वरूप कोई ऊंचे दर्जे की वस्तु प्राप्त न होती।
साधना कर रहा हूँ। इसमें मुझे जितना आनन्द आता है उसका वर्णन लेखनी द्वारा कर सकना मेरे लिए संभव नहीं है। यह गूँगे का गुड़ है। जो भाई बहिन इस व्रत का पारायण करेंगे वे ही मेरी तरह इस अमृत रस को चखेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-July
साधना करते रहो।
साधना में लगे हुए, जीवन मुक्त महात्मा ईश्वर की उसी अवतारमयी प्रेरणा से प्रेरित होकर लोक सेवा के, जन कल्याण के कार्यों में साधारण मनुष्यों की भाँति जुट गये हैं। अखंड ज्योति भी एक ऐसा ही मिशन है। जिसका कार्यक्रम मनुष्य जाति को सन्मार्ग की ओर सदाचार की ओर, सद् विचारो की ओर, कर्त्तव्य-परायणता की ओर प्रेरित करना है, जिससे दुखों की निवृत्ति और आनन्द की प्राप्ति हो सके।
साधना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-December
साधना अपने को दिव्य शक्ति से सम्पन्न करने के लिए है। साधना के दिनों में मनुष्य कुश होता है उसका वजन घट जाता है परन्तु दो बातें बढ़ जाती हैं एक तो शरीर की त्वचा पर पहले की अपेक्षा कुछ-कुछ चमकदार तेज दिखाई पड़ने लगता है, दूसरे एक विशेष प्रकार की गंध आने लगती है। जिसमें यह दोनों लक्षण प्रकट होने लगे समझना चाहिए कि उस साधक ने गायत्री के द्वारा अपने अन्दर दिव्य शक्ति का संचय किया है। इस शक्ति को वह अपने और दूसरों के अनिष्टों को दूर करने एवं कई प्रकार के लाभ उठाने में खर्च कर सकता है। अच्छा तो यही है कि इस शक्ति को अपने अन्दर छिपा कर रखा जाय और साँसारिक सुखों की अपेक्षा आध्यात्मिक, पारलौकिक आनन्द प्राप्त किया जाय।
साधना उपस्थित की जा रही है। शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से इस साधना को आरम्भ करना चाहिये। साधक को निम्न नियमों का पालन करना उचित है (1) ब्रह्मचर्य से रहे (2) शय्या पर न शयन करे (3) अन्न का आहार केवल एक समय करें (4) सेंधा नमक और कालीमिर्च के अतिरिक्त अन्य सब मसाले त्याग दें (5) लकड़ी के खड़ाऊ या चट्टी पहने, बिना बिछाये हुए, जमीन पर न बैठे। इन पाँच नियमों का पालन करते हुए गायत्री की उपासना करनी चाहिये।
साधना के दिनों में मनुष्य कुश होता है उसका वजन घट जाता है परन्तु दो बातें बढ़ जाती हैं एक तो शरीर की त्वचा पर पहले की अपेक्षा कुछ-कुछ चमकदार तेज दिखाई पड़ने लगता है, दूसरे एक विशेष प्रकार की गंध आने लगती है। जिसमें यह दोनों लक्षण प्रकट होने लगे समझना चाहिए कि उस साधक ने गायत्री के द्वारा अपने अन्दर दिव्य शक्ति का संचय किया है। इस शक्ति को वह अपने और दूसरों के अनिष्टों को दूर करने एवं कई प्रकार के लाभ उठाने में खर्च कर सकता है। अच्छा तो यही है कि इस शक्ति को अपने अन्दर छिपा कर रखा जाय और साँसारिक सुखों की अपेक्षा आध्यात्मिक, पारलौकिक आनन्द प्राप्त किया जाय।
साधना और सवालक्ष अनुष्ठान की विधियाँ पिछले अंकों में पाठक पढ़ चुके हैं। इस अंक में चालीस दिन की एक तीसरी साधना उपस्थित की जा रही है। शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से इस साधना को आरम्भ करना चाहिये। साधक को निम्न नियमों का पालन करना उचित है (1) ब्रह्मचर्य से रहे (2) शय्या पर न शयन करे (3) अन्न का आहार केवल एक समय करें (4) सेंधा नमक और कालीमिर्च के अतिरिक्त अन्य सब मसाले त्याग दें (5) लकड़ी के खड़ाऊ या चट्टी पहने, बिना बिछाये हुए, जमीन पर न बैठे। इन पाँच नियमों का पालन करते हुए गायत्री की उपासना करनी चाहिये।
साधना के दिनों में तुलसी दल को जल के साथ दिन में दो तीन बार नित्य लेते रहें।
साधना को आरम्भ करना चाहिये। साधक को निम्न नियमों का पालन करना उचित है (1) ब्रह्मचर्य से रहे (2) शय्या पर न शयन करे (3) अन्न का आहार केवल एक समय करें (4) सेंधा नमक और कालीमिर्च के अतिरिक्त अन्य सब मसाले त्याग दें (5) लकड़ी के खड़ाऊ या चट्टी पहने, बिना बिछाये हुए, जमीन पर न बैठे। इन पाँच नियमों का पालन करते हुए गायत्री की उपासना करनी चाहिये।
साधना में कुछ त्रुटि समझनी चाहिए और बारीकी से अपने कार्यक्रम का अवलोकन करके अपने अभ्यास को अधिक सावधानी के साथ चलाने का प्रयत्न करना चाहिए। नेत्र बन्द करके ध्यान करते समय, मन्त्र जपते समय मानसिक नेत्रों के आगे कुछ चमकदार गोलाकार प्रकाश पुँज से दृष्टिगोचर हो तो उन्हें जप द्वारा प्राप्त हुई आत्मशक्ति का प्रतीक समझना चाहिए।
साधना, शिक्षा, सेवा और सत्संग में ही व्यतीत हुआ है। भारत वर्ष के एक कोने से दूसरे कोने तक कई बार यात्राएं की हैं। देश के ऊँचे से ऊँचे महापुरुषों के निकट संपर्क में रहने का सौभाग्य प्राप्त किया है। विभिन्न भाषाओं के हजारों ग्रन्थों का अध्ययन किया है।
साधना की है और परम पद पाया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-November
साधनाएं की जाती हैं उन्हीं में से एक गृहस्थ योग की साधना है। अन्य साधनाओं की अपेक्षा यह अधिक सुलभ और स्वाभाविक है। इसलिए आचार्यों ने गृहस्थ योग का दूसरा नाम सहज योग भी रखा है। महात्मा कबीर ने अपने पदों में सहज योग की बहुत चर्चा और प्रशंसा की है।
साधना करनी चाहिए, जिनके मन में तीव्र इच्छा है वे ही सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
साधना करनी चाहिए। अदृष्ट शक्तियाँ हृदयगत भावों को परखती हैं और उस भाव शृंखला के अनुरूप ही फल देती हैं। अपने कार्य के लिए जितनी तीव्र इच्छा, निष्ठा, एकाग्रता और आराधना स्वयं की जा सकती है उतनी किराये के व्यक्ति द्वारा कदापि नहीं हो सकती इसलिए इतना अच्छा फल भी दूसरों द्वारा की हुई पूजा से हरगिज नहीं मिल सकता। अपने कार्य के लिए आप ही साधना करनी चाहिए, जिनके मन में तीव्र इच्छा है वे ही सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
साधना करना है। इसमें परमार्थ, सेवा, प्रेम, सहायता, त्याग, उदारता और बदला पाने की इच्छा से विमुखता, यही दृष्टि कोण प्रधान है। जो इस दृष्टि को धारण किये हुए हैं वह ब्राह्मी स्थिति में हैं, वह घर में रहते हुए भी संन्यासी है।
साधना की तुलना में बहुत ही तुच्छ है। अपने काम के लिए आप ही साधना करनी चाहिए। अदृष्ट शक्तियाँ हृदयगत भावों को परखती हैं और उस भाव शृंखला के अनुरूप ही फल देती हैं। अपने कार्य के लिए जितनी तीव्र इच्छा, निष्ठा, एकाग्रता और आराधना स्वयं की जा सकती है उतनी किराये के व्यक्ति द्वारा कदापि नहीं हो सकती इसलिए इतना अच्छा फल भी दूसरों द्वारा की हुई पूजा से हरगिज नहीं मिल सकता। अपने कार्य के लिए आप ही साधना करनी चाहिए, जिनके मन में तीव्र इच्छा है वे ही सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
साधना से जो चमत्कारी फल प्राप्त होते हैं वे मन शास्त्र की वैज्ञानिक विधि के आधार पर ही होते हैं। निष्ठा, विश्वास, एकाग्रता और तीव्र इच्छा इन चारों का एक स्थान पर केन्द्रीकरण करने से एक वैसा ही अदृश्य तेज उत्पन्न होता है जैसा कि आतिशी शीशे के द्वारा सूर्य की किरणें एक स्थान पर केन्द्रित कर देने से अग्नि उत्पन्न हो जाती है। गायत्री की शब्द रचना-अक्षर शास्त्र के अनुसार बड़ी अद्भुत है वेद की वह माता है, आदि काल से लेकर अब तक करोड़ों-करोड़ उच्च आत्माओं ने इस मन्त्र का असीमित और अनन्य श्रद्धा के साथ जप किया है ऐसे ही अनेक कारणों से एक तो गायत्री मन्त्र स्वयं ही बहुत शक्तिपूर्ण सत्ता बन गया है, दूसरे जब उसे उच्च मनोभावों के साथ सविधि सिद्ध किया जाता है तो एक ऐसी तेजस्वी ब्रह्म शक्ति पैदा होती है जो असफलताओं का निवारण और सफलताओं का वरदान देने में पूर्ण तथा समर्थ होती है। गायत्री द्वारा प्राप्त हुए फल किसी अन्य सत्ता द्वारा दिया हुआ पुरस्कार नहीं है वरन् अपनी निजी शक्ति द्वारा एक प्रकार की अध्यात्म मल्ल विद्या का पुरुषार्थ है। पुरुषार्थी व्यक्तियों को लक्ष्मी मिलती है और साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है, वह बिलकुल साधारण और स्वाभाविक बात है, इसमें आश्चर्य और अविश्वास की कोई बात नहीं है।
साधनाओं की अपेक्षा यह अधिक सुलभ और स्वाभाविक है। इसलिए आचार्यों ने गृहस्थ योग का दूसरा नाम सहज योग भी रखा है। महात्मा कबीर ने अपने पदों में सहज योग की बहुत चर्चा और प्रशंसा की है।
साधना है। अन्य साधनाओं की अपेक्षा यह अधिक सुलभ और स्वाभाविक है। इसलिए आचार्यों ने गृहस्थ योग का दूसरा नाम सहज योग भी रखा है। महात्मा कबीर ने अपने पदों में सहज योग की बहुत चर्चा और प्रशंसा की है।
साधना सफल होगी। शरीर को सुख चाहिए, आत्मा को सन्तोष चाहिए। शरीर के लिए बल की जरूरत है आत्मा को सेवा की जरूरत है। शरीर की आकाँक्षा स्वार्थ की रहती है आत्मा को परमार्थ की। इन दोनों को योग करो जोड़ो मिलाओ एकत्रित करो, तभी जीवनोद्देश्य प्राप्त होगा तभी सच्चे सुख की उपलब्धि होगी।
साधना से किस प्रकार की कैसी और क्योंकर सिद्धि मिलती है इसका वैज्ञानिक विवेचन उसमें रहेगा कागज कन्ट्रोल के कारण पृष्ठ संख्या साधारण अंक से ड्यौढ़ी से अधिक न होगी, फिर भी जो कुछ इसमें रहेगा वह “गागर में सागर” की उक्ति चरितार्थ करेगा।
साधना भी घर से ही आरम्भ होनी चाहिए। प्रेम, त्याग और सेवा का अभ्यास करने के लिए अपने घर का क्षेत्र सब से अच्छा है। इन तत्वों का प्रकाश जिस स्थान पर पड़ता है वही चमकने लगता है। जब तक आत्मीयता के भावों की कमी रहती है तब तक औरों के प्रति दुर्भाव, घृणा, क्रोध, उपेक्षा के भाव रहते हैं किन्तु जब अपने पन के विचार बढ़ने लगते हैं तो हलके दर्जे की चीजें भी बहुत सुन्दर दिखाई पड़ने लगती हैं। माता अपने बच्चे के प्रति आत्म भाव रखती है इसलिए यदि वह लाभदायक न हो तो भी उसे भरपूर स्नेह करती है, पतिव्रता पत्नियों को अपने काले कलूटे और दुर्गुणी प्रति भी इन्द्र जैसे सुन्दर और बृहस्पति जैसे गुणवान लगते हैं।
साधना जरथुस्त्र की, कन्फ्यूशियस की अमर उपदेश-माला का बितान॥
साधना में प्रवृत्त होने वाले को अपना दृष्टिकोण देने का-त्याग और सेवा का बनाना पड़ता है। आप प्रेम की उदार भावनाओं से अपने अन्तःकरण को परिपूर्ण कर लीजिए और सगे संबंधियों के साथ त्याग एवं सेवा का व्यवहार करना आरम्भ कर दीजिए। कुछ ही क्षणों के उपरान्त एक चमत्कार हुआ दिखाई देने लगेगा। अपना छोटा सा परिवार जो शायद बहुत दिनों से कलह और क्लेशों का घर बना हुआ है-सुख शान्ति का स्वर्ग दीखने लगेगा। अपनी आत्मीयता की प्रेम भावनाएं परिवार के आसपास के लोगों से टकराकर अपने पास वापिस लौट आती हैं और वे आनन्द की भीनी-भीनी सुगन्धित फुहार को छिड़क कर मुरझाये हुए अन्तःकरण को हरा कर देती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-September
साधना में, सेवा पथ में, यदि आनन्द कम और कष्ट अधिक होता तो कोई भी बुद्धिमान और विवेकवान व्यक्ति इस पथ पर चलने को तत्पर न होता। भगवान रामचन्द्र, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा, सुकरात आदि की समझदारी कम न थी। यदि वे देखते कि धर्म का मार्ग आनन्द रहित और दुखदायी है तो वे कदापि उस ओर कदम न बढ़ाते। जीवन का वास्तविक सुख, वास्तविक आनन्द, वास्तविक साफल्य, परमार्थ में है इस बात को हर एक महापुरुष ने पहचाना है, समझा है और अनुभव किया है, परन्तु हममें से कितने ही मनुष्य उस ध्रुव सत्य पर विश्वास करते हुए हिचकते हैं, उस राजमार्ग पर कदम रखते हुए डरते हैं।
साधना करे तो उसकी आपत्तियाँ कट जाती हैं और जो कार्य बहुत कठिन तथा असंभव प्रतीत होते थे वे सहज और सरल हो जाते हैं।
साधना है उसका तात्पर्य अपनी चेतना को सूक्ष्म परमात्म तत्व के निकटवर्ती प्रदेश तक पहुँचा देना है।
साधना
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1944-October
साधना जब अपनी विकसित अवस्था तक पहुँचती है तो आत्मा, परमात्मा बन जाती है। अपूर्णता से छुटकारा पाकर पूर्णता उपलब्ध करती है और योग का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो जाता है।
साधनाओं द्वारा अद्भुत, आश्चर्यजनक एवं महत्वपूर्ण सिद्धियों का प्राप्त होना प्रत्यक्ष है। इस अंक में ऐसे साधन बताये जायेंगे जिनके आधार पर मामूली आदमी मामूली अभ्यासों द्वारा बहुत 2 अद्भुत शक्तियाँ प्राप्त कर सकता है और उन चमत्कारों सिद्धियों द्वारा स्वयं अपने तथा दूसरों के दुखों को मिटाकर स्वर्गीय आनन्द का अनुभव कर सकता है।
साधना कराने के लिए अखण्ड ज्योति कार्यालय तैयार रहेगा।
साधना है जिससे आत्मिक उन्नति होती है, स्वर्ग मिलता है, मुक्ति प्राप्त होती है और ब्रह्म निर्वाण की सिद्धि मिलती है। प्राचीन समय में अधिकाँश ऋषि गृहस्थ थे। वशिष्ठ जी के सौ पुत्र थे, अत्रि जी की स्त्री अनुसूया थी, गौतम की पत्नी अहिल्या थी, जमदग्नि के पुत्र परशुराम थे, च्यवन की स्त्री सुकन्या थी, याज्ञवल्क्य की दो स्त्री गार्गी और मैत्रेयी थीं, लोमश के पुत्र शृंगी ऋषि थे। वृद्धावस्था में संन्यास लिया हो यह बात दूसरी है परन्तु प्राचीन काल में जितने भी ऋषि हुए हैं वे प्रायः सभी गृहस्थ रहे हैं। गृहस्थ में ही उन्होंने तप किये हैं और ब्रह्म निर्वाण पाया है।
साधना । =)
साधना के संबंध में लिखेंगे। पाठक प्रतीक्षा करें।
साधना करते हैं, संसार को अधिक सुख शान्तिमय बनाने का प्रयत्न करते हैं। यह “लोक” और “संसार” क्या है? दूसरे शब्दों में गृहस्थाश्रम ही है। तीनों आश्रम एक ओर और गृहस्थ आश्रम दूसरी ओर यह दोनों पलड़े बराबर हैं। यदि गृहस्थाश्रम की व्यवस्था बिगड़ जाय तो अन्य तीनों आश्रमों की मृत्यु ही समझिए।
साधना पद्धति एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है तो भी इन सबकी जड़ में एक ही तथ्य काम कर रहा है। माध्यम सबके अलग-अलग हैं पर सभी माध्यमों द्वारा एक ही तत्व ग्रहण किया जाता है। तुच्छता से महानता की ओर, अपूर्णता से पूर्णता की ओर, असत् से सत् की ओर, तम से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर जो प्रगति होती है उसी का नाम योग है। अणु आत्मा का परम आत्मा बनने का प्रयत्न ही योग है। यह प्रयत्न जिन जिन मार्गों से होता है उन्हें योग मार्ग कहते हैं।
साधना’ लेख में यह बताया गया था कि प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जप किस प्रकार करना चाहिए। उस विधि के अनुसार यथाशक्ति संख्या में नित्य जप करने से शरीर का स्वास्थ्य, चेहरे का तेज और वाणी का ओज बढ़ता जाता है। बुद्धि में तीक्ष्णता और सूक्ष्मदर्शिता की मात्रा में वृद्धि होती है एवं अनेक मानसिक सद्गुणों का विकास होता है, यह लाभ ऐसे हैं जिनके द्वारा जीवन यापन में सहायता मिलती है।
साधना को सिद्ध करके आशातीत लाभ उठाया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-September
साधना करनी चाहिये। देवताओं की साधना से हमें चिर-स्थायी सुख मिल सकता है, यह निर्विवाद बात है। यों तो ऐसा मानता हूँ कि किसी भी ‘साधना’ के बिना मनुष्य महान् बन ही नहीं सकता। किसी एक वस्तु को अवश्य सिद्ध कर रखना ही चाहिये। कर्ण, भीष्म, द्रोण आदि के पास महान सिद्धियाँ थी।
साधना सफल नहीं हुई। इस पर भी मैंने प्रयोग को चालू ही रखा। एक दिन एकाएक मेरे मन की स्फुरणा हुई कि इन मंत्रों को श्री महादेवजी ने कील रखा है। उत्कीलन किये बिना सिद्धि नहीं मिलती। तब मैंने मन्त्र को उत्कील किया।
साधना करे, हाथ में आई हुई बाजी भी छटक जाती है और साधना व्यर्थ होती है।
साधना की ओर है जिससे हृदय की सच्ची शाँति प्राप्त हो।
साधना के अशक्य है किन्तु साधना के लिये चाहे वह इहलौकिक हो अथवा पारलौकिक, मन में एक स्थायी शाँति, और निश्चल नीरवता की आवश्यकता है, अन्यथा संभव है कि किसी अंश में सफलता प्राप्त हो किन्तु स्थायी लाभ कुछ भी प्राप्त न होगा। विशेषकर पारलौकिक साधना के लिये बहुत अधिक शाँति तथा नीरवता की आवश्यकता है, क्योंकि “एकै साधै सब सधै सब साधे सब जाय।” मेरा लक्ष्य केवल पारलौकिक साधना की ओर है जिससे हृदय की सच्ची शाँति प्राप्त हो।
साधना के एक महत्वपूर्ण अंग में फलीभूत हो चुके! क्योंकि अनुकूल अवस्था में सम और स्थिर होना तो मामूली बात है किन्तु विपरीत अवस्था में ही मनुष्य की स्थिरता, शान्ति और समता की परख हो सकती है।
साधना, योगाभ्यास और पूर्ण वैराग्य को धारण करते हुए समाधि, स्वर्ग या मुक्ति प्राप्त की जा सकती है पर वह लाभ अपने लिए ही तो रहा। दूसरों का उससे क्या हित हुआ? ऐसी साधना का परिणाम आत्म कल्याण तो है परन्तु परमार्थ नहीं। दूसरे मार्ग की साधना सीधी-सादी, सरल और विडम्बनाहीन दिखाई देती है पर वास्तव में वह भी पहली के समान ही कठिन और कष्ट साध्य है। किन्तु फल की दृष्टि से वह दूनी है।
साधना से भड़कने का कोई कारण नहीं है। भूख मिटाने के लिये हमें रोज का अन्न सिद्ध करना पड़ता है। यह जैसे हमेशा का ‘रुटीन’ है; इसी प्रकार किसी बड़े काम की सिद्ध के लिये हम बड़े लोगों की मदद लिया करते हैं। ठीक, इसी प्रकार हमें देवताओं की साधना करनी चाहिये। देवताओं की साधना से हमें चिर-स्थायी सुख मिल सकता है, यह निर्विवाद बात है।
साधना के लिए उपयुक्त होते हैं तभी साधना सिद्ध होती है।
साधना व्यर्थ होती है।
साधना करते हैं और जरूरत पड़ने पर किसी-किसी समय वे उन्हें आजमाते हैं। बिच्छू और साँपों का जहर उतारने वाले मन्त्र-साधक तो हम लोग बहुतेरे देखते हैं। हमारे राज्य में तो ऐसे एक सज्जन सौ रुपये मासिक वेतन पर नियुक्त हैं।
साधना सिद्धि प्राप्त होने के बाद भी साधक को चालू रखनी चाहिये। नहीं तो, उस दैवी सिद्धि को अदृश्य होते देर नहीं लगती; और फिर उसका हाथ लगना असम्भव हो जाता है।
साधनायें हुआ करती हैं। चाहे जिस साधना से चाहे जो साध्य प्राप्त नहीं होता। इह लोक अथवा भौतिक प्राप्ति के लिये संग्रह साधना होती है, पारलौकिक अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिये त्याग साधना होती है।
साधना में अनेक प्रकार की विरोधी परिस्थितियाँ उपस्थित हुआ करती हैं किन्तु ऐसी परिस्थितियों के आने पर (जो एक प्रकार की परीक्षा है) विचलित न हो धैर्य से उनका सामना करना चाहिए। क्योंकि दुःख और कष्ट में यदि तुमने समता बनाये रखी तो समझ लो कि साधना के एक महत्वपूर्ण अंग में फलीभूत हो चुके! क्योंकि अनुकूल अवस्था में सम और स्थिर होना तो मामूली बात है किन्तु विपरीत अवस्था में ही मनुष्य की स्थिरता, शान्ति और समता की परख हो सकती है।
साधना में लाभ नहीं होता तो नुकसान जरूर होता है। दक्षिण मार्ग में तत्काल लाभ नहीं दीखता, धीरे-धीरे कल्याण होता है, परन्तु वाम मार्ग में तत्काल ही लाभ-हानि हो जाती है।
साधना कष्टसाध्य है। द्वादश मुद्राओं के साधन से इनको सिद्धि प्राप्त हो सकती है, परन्तु अगर कहीं जरा भी चूके कि फिर चौकड़ी भूलते देर नहीं लगती।
साधना के लिये बहुत अधिक शाँति तथा नीरवता की आवश्यकता है, क्योंकि “एकै साधै सब सधै सब साधे सब जाय।” मेरा लक्ष्य केवल पारलौकिक साधना की ओर है जिससे हृदय की सच्ची शाँति प्राप्त हो।
साधना में साधक को लाभ चाहे न हो, परन्तु हानि तो होती ही नहीं। पर वाम मार्ग की साधना में लाभ नहीं होता तो नुकसान जरूर होता है। दक्षिण मार्ग में तत्काल लाभ नहीं दीखता, धीरे-धीरे कल्याण होता है, परन्तु वाम मार्ग में तत्काल ही लाभ-हानि हो जाती है।
साधना करना पड़ती है। जीवन भी एक बड़ी साधना है, प्रेम साधन, भक्ति साधन, मोक्ष साधन, योग साधन इत्यादि अनेक हैं।
साधना में दिन-प्रतिदिन मेरी श्रद्धा दृढ़ होती जा रही है।
साधना शुरू की। उन्हें सामने के पहाड़ से एक अघोरी उतरता दिखाई दिया। अघोरी ने श्मशान में पहुँच कर एक बच्चे की गड़ी हुई लाश निकाली और उसे सेक कर खा गया। फिर वहीं गुम हो गया। यह देखकर मेरे मित्र का शरीर मारे डर के पसीने-पसीने हो गया, वे बड़े जोर से चीख मारकर वहीं ढुलक पड़े।
साधना की जाती है, कल उससे अनिच्छा भी हो सकती है; और भौतिक वस्तु की प्राप्ति के प्रायः यही फल हुआ करते हैं। मनुष्य वासनाओं का दास है इसी से भौतिक अथवा इहलोक साधना को और उसका झुकाव अधिक रहता है, किन्तु व्यावहारिक साँसारिक विभूतियों में भय है इसी से ब्रह्म ज्ञानियों ने संसार की नश्वर विभूतिओं को विभूतियाँ न कह कर भूति मात्र कहा है जिससे भौतिक शब्द की रचना हुई है। साँसारिक वैभव ‘बहुत कुछ’ है किन्तु ‘सब कुछ’ नहीं ढ्ढह्ल द्बह्य द्वह्वष्द्ध ड्ढह्वह्ल ठ्ठशह्ल ड्डद्यद्य. इस वैभव से मित्र, दास, दासी, रासी, राजपाट बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है, किन्तु प्रेम, स्वास्थ्य, शाँति और सुख नहीं मिल सकता, हृदय की शाँति के लिये दूसरी विधि की खोज करना होगा। कितने ही ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो साँसारिक सम्पत्ति रहते हुए भी उस शाँति, सुख और प्रगाढ़ निद्रा के लिये लालायित रहते पाये जाते हैं जिसे सड़क के किनारे सोने वाले अनुभव करते हैं। साँसारिक सम्पत्ति गगनचुम्बी अट्टालिम्र बना सकती है किन्तु प्रत्येक मनुष्य को चाहे वह धनिक हो या दरिद्री अटूट समाधि के लिये 6 फुट जमीन से अधिक आवश्यकता न होगी।
साधना को और उसका झुकाव अधिक रहता है, किन्तु व्यावहारिक साँसारिक विभूतियों में भय है इसी से ब्रह्म ज्ञानियों ने संसार की नश्वर विभूतिओं को विभूतियाँ न कह कर भूति मात्र कहा है जिससे भौतिक शब्द की रचना हुई है। साँसारिक वैभव ‘बहुत कुछ’ है किन्तु ‘सब कुछ’ नहीं ढ्ढह्ल द्बह्य द्वह्वष्द्ध ड्ढह्वह्ल ठ्ठशह्ल ड्डद्यद्य. इस वैभव से मित्र, दास, दासी, रासी, राजपाट बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है, किन्तु प्रेम, स्वास्थ्य, शाँति और सुख नहीं मिल सकता, हृदय की शाँति के लिये दूसरी विधि की खोज करना होगा। कितने ही ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो साँसारिक सम्पत्ति रहते हुए भी उस शाँति, सुख और प्रगाढ़ निद्रा के लिये लालायित रहते पाये जाते हैं जिसे सड़क के किनारे सोने वाले अनुभव करते हैं। साँसारिक सम्पत्ति गगनचुम्बी अट्टालिम्र बना सकती है किन्तु प्रत्येक मनुष्य को चाहे वह धनिक हो या दरिद्री अटूट समाधि के लिये 6 फुट जमीन से अधिक आवश्यकता न होगी।
साधना अथवा आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करना है उसे सबसे पहले अपने हृदय में भगवान का मन्दिर बनाकर उनकी शरण में अन्य गौण साधन करने होंगे।
साधना’ का शास्त्र ‘वरदान’ या शाप का शास्त्र नहीं है। साधना से भड़कने का कोई कारण नहीं है। भूख मिटाने के लिये हमें रोज का अन्न सिद्ध करना पड़ता है। यह जैसे हमेशा का ‘रुटीन’ है; इसी प्रकार किसी बड़े काम की सिद्ध के लिये हम बड़े लोगों की मदद लिया करते हैं। ठीक, इसी प्रकार हमें देवताओं की साधना करनी चाहिये।
साधना सिद्ध होती है।
साधना को मुझे भी कराओ। पर मैं आपकी आज्ञा के कारण किसी को न बताने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हूँ। मेरे स्वभाव में एकदम तब्दीली हो जाने की वजह से मिलने वाले ताज्जुब में है और स्त्री तो हैरत में है कि तुम क्या हो गये हो। यह बात मैं अपने पहले खत में अर्ज़ कर चुका हूँ कि मेरा मिज़ाज बहुत तेज है। जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता है।
साधना की आवश्यकता है। मकान बनवाना है, कुँआ खुदवाना है, लेख लिखना है, इन सब बातों के लिये मन में विचार उत्पन्न होकर उस समय के कर्म की साधना करना पड़ती है। जीवन भी एक बड़ी साधना है, प्रेम साधन, भक्ति साधन, मोक्ष साधन, योग साधन इत्यादि अनेक हैं।
साधना है, प्रेम साधन, भक्ति साधन, मोक्ष साधन, योग साधन इत्यादि अनेक हैं।
साधना के लिये चाहे वह इहलौकिक हो अथवा पारलौकिक, मन में एक स्थायी शाँति, और निश्चल नीरवता की आवश्यकता है, अन्यथा संभव है कि किसी अंश में सफलता प्राप्त हो किन्तु स्थायी लाभ कुछ भी प्राप्त न होगा। विशेषकर पारलौकिक साधना के लिये बहुत अधिक शाँति तथा नीरवता की आवश्यकता है, क्योंकि “एकै साधै सब सधै सब साधे सब जाय।” मेरा लक्ष्य केवल पारलौकिक साधना की ओर है जिससे हृदय की सच्ची शाँति प्राप्त हो।
साधना की बाह्य रूप रेखाओं में मतभेद है। कर्म संन्यास, और कर्मयोग मुख्य दो मार्ग हैं इनकी अनेक शाखा प्रशाखायें हैं। संन्यास धर्म, कर्म त्याग, वन सेवक, अहर्निशि तप साधन, यह विरक्त मार्ग हैं दूसरा रास्ता कर्म योग का है। शरीर से गृह धर्म का पालन करते हुये मन से ईश्वर के चरणों में अपने को निछावर कर देना।
साधना से हमें चिर-स्थायी सुख मिल सकता है, यह निर्विवाद बात है। यों तो ऐसा मानता हूँ कि किसी भी ‘साधना’ के बिना मनुष्य महान् बन ही नहीं सकता। किसी एक वस्तु को अवश्य सिद्ध कर रखना ही चाहिये। कर्ण, भीष्म, द्रोण आदि के पास महान सिद्धियाँ थी। इसी से वे महान् बन सके थे।
साधना से चाहे जो साध्य प्राप्त नहीं होता। इह लोक अथवा भौतिक प्राप्ति के लिये संग्रह साधना होती है, पारलौकिक अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिये त्याग साधना होती है।
साधना होती है, पारलौकिक अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिये त्याग साधना होती है।
साधना आरम्भ की। जप, तर्पण, मार्जन, होम और ब्राह्मण भोजन सभी साधनों में आवश्यक है। कुछ खास-खास जप-तप प्रायश्चित्तादि तो दोष निवारण के लिये करने पड़ते हैं। इस प्रकार करते उक्त वकील मित्र को लगभग तीन महीने बीत गये। ब्रह्मचर्य का व्रत भंग हुआ।
साधना’ हिन्दू को ही सिद्ध होती है, ऐसी बात नहीं है। कोई भी हो, आस्तिकता और श्रद्धा के साथ करने पर साधना सभी को फल देती है।
साधना दो प्रकार की होती है दैवी और आसुरी। इन्हीं को शास्त्र में दक्षिण और वाम मार्ग कहा गया है। दक्षिण मार्ग की साधना में साधक को लाभ चाहे न हो, परन्तु हानि तो होती ही नहीं। पर वाम मार्ग की साधना में लाभ नहीं होता तो नुकसान जरूर होता है। दक्षिण मार्ग में तत्काल लाभ नहीं दीखता, धीरे-धीरे कल्याण होता है, परन्तु वाम मार्ग में तत्काल ही लाभ-हानि हो जाती है।
साधना सीधी-सादी, सरल और विडम्बनाहीन दिखाई देती है पर वास्तव में वह भी पहली के समान ही कठिन और कष्ट साध्य है। किन्तु फल की दृष्टि से वह दूनी है। आत्म कल्याण के साथ ही परमार्थ भी इसमें है।
साधना शीघ्र सिद्ध होती है। बस, इतना सुनकर मेरे एक वकील मित्र ने गणपति की साधना आरम्भ की। जप, तर्पण, मार्जन, होम और ब्राह्मण भोजन सभी साधनों में आवश्यक है। कुछ खास-खास जप-तप प्रायश्चित्तादि तो दोष निवारण के लिये करने पड़ते हैं। इस प्रकार करते उक्त वकील मित्र को लगभग तीन महीने बीत गये।
साधना सभी को फल देती है।
साधना होती है।
साधना कर्म के लिये पहले विचार उत्पन्न होते हैं अतएव विचारों पर नियंत्रण होना चाहिये, जिसका विचारों पर नियंत्रण नहीं है, यदि वह अपने विचारों का अनुमन्ता और स्वामी नहीं है तो वह मनुष्य पूर्ण मनोमय नहीं हो सकता।
साधना का परिणाम आत्म कल्याण तो है परन्तु परमार्थ नहीं। दूसरे मार्ग की साधना सीधी-सादी, सरल और विडम्बनाहीन दिखाई देती है पर वास्तव में वह भी पहली के समान ही कठिन और कष्ट साध्य है। किन्तु फल की दृष्टि से वह दूनी है। आत्म कल्याण के साथ ही परमार्थ भी इसमें है।
साधना शब्द का प्रयोग देवी देवताओं को उपासना के लिए भी होता है, जिससे अभीष्ट महान् कार्य की सिद्धि होती है। देश, काल, क्रिया, वस्तु और कर्त्ता में पाँचों जब साधना के लिए उपयुक्त होते हैं तभी साधना सिद्ध होती है।
साधना और उग्र फल की प्राप्ति के लिए बहुत बार अपने प्राणों को हथेली पर रख देना पड़ता है। गाँवों और शहरों में कितने ही ऐसे साधू फकीर मिलते हैं, जो कुछ शून्य साधना करते हैं और जरूरत पड़ने पर किसी-किसी समय वे उन्हें आजमाते हैं। बिच्छू और साँपों का जहर उतारने वाले मन्त्र-साधक तो हम लोग बहुतेरे देखते हैं। हमारे राज्य में तो ऐसे एक सज्जन सौ रुपये मासिक वेतन पर नियुक्त हैं।
साधना के बाद ही उनका विवाह हुआ। इस समय वे बाल बच्चे वाले और ढेले-तबेले वाले सुखी हैं।
साधना’ के बिना मनुष्य महान् बन ही नहीं सकता। किसी एक वस्तु को अवश्य सिद्ध कर रखना ही चाहिये। कर्ण, भीष्म, द्रोण आदि के पास महान सिद्धियाँ थी। इसी से वे महान् बन सके थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-November
साधना नहीं कर रहा हूँ परन्तु पढ़ते-पढ़ते मुझे ऐसा अनुभव होने लगता है मानो मैं आत्म स्वरूप का दर्शन कर रहा हूँ और जीवन मुक्त हो गया है। ऐसा अनुपम ज्ञान सर्वसुलभ करने के लिए निश्चय ही जिज्ञासु जन आपके चिर कृतस रहेंगे।
साधना को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है कि किसी की गन्दगी टटोलकर अपनी नाक को दुर्गन्धित न किया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-May
साधना से, आर्य समाज शान्ति की गोद में सोता था। उसी शिक्षा का ध्वंसावशेष अब भी भारत की रक्षा कर रहा है।
साधना द्वारा शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय और इसके बदले किसी गरीब अमीर से पाई पैसा का कोई ठहराव न किया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त किया जाय। लाभ होने पर बिना माँगे कोई कुछ दे दे तो संतोषपूर्वक उसी से साधक जीवन निर्वाह करें।
साधना यंत्र, कवच, रक्षा विधान आदि सब चीजें अपने पैसे से बिलकुल मुफ्त भेजते हैं। पर डाक खर्च का भी भार उठाने में हम अभी असमर्थ है। इसके लिए रोगी को ही व्यवस्था करनी पड़ेगी। पत्र के साथ एक आने का टिकट जरूर भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जा सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-February
साधनाओं का वर्णन करना उचित न होगा जिनको योगी लोग ही अपने कार्यक्रम में सम्मिलित कर सकते हैं। यहाँ कुछ ऐसी साधारण प्राणायाम क्रियाओं का बताना अधिक उपयोगी होगा जिन्हें साधारण काम काजी लोग अपने दैनिक कार्यक्रम में शामिल कर सकें और यदि कोई छोटी-मोटी भूल हो जाय तो किसी खतरे का सामना न करना पड़े।
साधना की फिक्र करते रहेंगे तो साध्य के दर्शन किसी न किसी दिन तो कर ही लेंगे। इतना निश्चय किया कि बेड़ा पार हुआ। हमारे मार्ग में चाहे जो संकट आवें, बाह्य दृष्टि से देखने में हमारी चाहे जितनी हार होती दिखाई पड़े तथापि विश्वास को न डिगाते हुए हम एक ही मन्त्र जपे, जो सत्य है वही परमेश्वर है, इसके साक्षात्कार का एक ही मार्ग, एक ही साधन, अहिंसा है, उसे कभी न छोड़ूँगा। जिस सत्य रूप परमेश्वर के नाम यह प्रतिज्ञा की है, उसका पालन करने का वह बल दे।
साधना करने से ही उसके दर्शन हो सकते हैं।लेकिन सत्य के संपूर्ण दर्शन तो देह द्वारा हो नहीं सकते असम्भव हैं। उसकी तो केवल कल्पना ही की जा सकती है, क्षण भंगुर देह द्वारा शाश्वत धर्म का साक्षात्कार होना संभव नहीं। इसलिए आखिर श्रद्धा का उपयोग तो करना ही होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-January
साधना करते हैं जिसके द्वारा वे ऐसी अपूर्व शक्ति अपने अन्दर जागृत कर लेते हैं जिसके द्वारा दूसरों का भला बुरा भी आसानी से हो सकता है। उनकी अनुष्ठान, पुरश्चरण, जप, मुद्रा आदि क्रियाओं के द्वारा एक प्रकार के सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न होते हैं चूंकि यह निश्चित उद्देश्य के साथ किसी खास काम के लिये उत्पन्न किये जाते है, इसलिए उनका प्रवाह एक ही दिशा में होता है और जैसे आतिशी शीशे द्वारा एकत्र की हुई सूर्य की किरणें एक स्थान पर केन्द्रित होकर अग्नि समान बन जाती हैं वहाँ बात इन कम्पनों की होती है। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन आदि सब कुछ तन्त्र विद्या द्वारा होता रहा है और हो सकता है। फिर भी अविश्वासी लोग अपनी हठ पर दृढ़ रह सकते हैं। पृथ्वी गोल और भ्रमणशील है।
साधना कठिन है। बिना किसी सहारे के एक दम सिर नीचे को और पैर ऊपर को करके कुछ देर खड़े रहने का अभ्यास नहीं हो सकता। इसलिए दीवार या दूसरे साथी की सहायता लेनी चाहिए। शीर्षासन करते समय कोई गुदगुदा बिछौना बिछा लेना चाहिए। और दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में मिला कर उन्हें सिर के पीछे के भाग में लगा कर उल्टा होने की कोशिश करनी चाहिए।
साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछुता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रिया कलाप अथवा वस्तुओं का हेरफेर भर जुड़ा रहता है वे प्रायः बाल क्रीड़ा बन कर ही रह जाती हैं उनसे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
साधनायें इसी प्रयोजन को पूरा करती हैं। देखने में उनमें भी तपश्चर्या, योग साधना, एवं विधि विधानों का ही वाह्य कलेवर गठित होता है पर उनके साथ-साथ भावोत्कर्ष को ध्यान धारणा अत्यन्त सघन रूप में जुड़ी रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि प्रत्येक साधना विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं वरन् भाव भरी मनःस्थिति में सम्पन्न किया जाय।
साधना पूरी कर ली। मनुष्य नहीं पशु पक्षी और देवता भी उसके वश में हैं। पर्वत उसे रास्ता देंगे और कटीली झाड़ियाँ उस पर छाया करेंगी। व्याघ्र और सर्पादि उसके मित्र होंगे एवं उसे सर्वत्र प्रेम का सागर लहराता नजर आवेगा।
साधना क्रम यदि सही रीति से सम्पन्न हो सके तो तत्काल उसका प्रतिफल देखा जा सकता है। जीवन का जो कुछ भी भला बुरा स्वरूप है वह मनुष्य के चिन्तन और कर्तृत्व की प्रतिक्रिया मात्र है । उत्थान और पतन की अन्तःस्थिति का प्रतिबिम्ब मात्र कहना चाहिए । विक्षोभ और उल्लास का तात्विक विवेचन किया जाय तो उन्हें चेतना के श्वासोच्छास भर कह सकते हैं और आन्तरिक स्तर में हेरफेर सम्भव हो सके तो परिस्थितियों के बदलने में एक क्षण भर की भी देर नहीं लगती। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं कि मनुष्य की अन्तःनिष्ठा एवं आकांक्षा प्रवाह में परिवर्तन हुआ तो वाह्य जीवन का सारा ढाँचा ही उलट गया।
साधना में सिद्धि न जाने मिलती। है या नहीं।
साधना, एवं विधि विधानों का ही वाह्य कलेवर गठित होता है पर उनके साथ-साथ भावोत्कर्ष को ध्यान धारणा अत्यन्त सघन रूप में जुड़ी रखी जाती है और यह प्रयत्न किया जाता है कि प्रत्येक साधना विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं वरन् भाव भरी मनःस्थिति में सम्पन्न किया जाय।
साधना के विरोधी मार्गों का सम्मिलन कराया, और उनके सरल व्यक्तित्व ने पण्डित पाधाओं की अहंमन्यता पर सदा के लिए एक स्थायी प्रभाव डाला था।
साधना ठीक प्रकार नहीं हो सकती। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छ वायु, स्वच्छ भोजन और स्वच्छ जल का विधान है। वायु का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि बिना भोजन और जल के कुछ समय तक जीवन टिक सकता है किन्तु वायु के अभाव में क्षण भर भी जीवित रहना कठिन है। अशुद्ध अन्न जल से जितनी हानि होती है अशुद्ध वायु से उससे कहीं अधिक हानि होती है। रोगी आँतों वाला जितने दिन जी सकता है उतने दिन रोगी फेफड़े वाला व्यक्ति नहीं जी सकता।
साधना विधान की लकीर पीटने के लिए नहीं शारीरिक हलचल मात्र के रूप में नहीं वरन् भाव भरी मनःस्थिति में सम्पन्न किया जाय।
साधना विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछुता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रिया कलाप अथवा वस्तुओं का हेरफेर भर जुड़ा रहता है वे प्रायः बाल क्रीड़ा बन कर ही रह जाती हैं उनसे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
साधना उपक्रमों की बाल पोथी के साथ भावनात्मक उत्कर्ष की उचस्तरीय शिक्षा व्यवस्था की जाती है। सीड़ियों के सहारे ऊपर चढ़ते हैं केवल मुंगदरों के सहारे पहलवान बनते हैं पुस्तकों के सहारे विद्या प्राप्त करते हैं ठीक इसी प्रकार साधना विधानों के सहारे भावनात्मक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा किया जाता है। जिन साधनाओं में भावोत्कर्ष का तथ्य अछुता छोड़ दिया जाता है और शारीरिक क्रिया कलाप अथवा वस्तुओं का हेरफेर भर जुड़ा रहता है वे प्रायः बाल क्रीड़ा बन कर ही रह जाती हैं उनसे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
साधना के साथ जो भावना जुड़ी हुई है उसे आत्मसात् करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें। प्रयल इतना गहरा होना चाहिए कि क्रिया-प्रक्रिया अनुभूति के रूप में परिणित, प्रति विम्बित होने लगे। इस प्रकार भावोत्कर्ष का प्रयोजन सरलता पूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है । इस अन्त: स्फुरण को व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकता और पिछले ढरें को बदलकर उपलब्ध आलोक के आधार पर किस प्रकार किस दिशा में क्या परिवर्तन किया जा सकता है तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं तो आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट ढाँचा सामने आ खड़ा होता है। कहना न होगा कि इस परिष्कृत प्रक्रिया में जब जिस क्षण भी प्राण प्रतिष्ठा होती है उसी क्षण मनुष्य की क्षुद्रता महानता में परिणत हुई दीखने लगती है।
साधना विधान सम्पन्न करने पड़ते हैं पर उनके साथ-साथ यह तथ्य भली प्रकार हृदयङ्गम करा दिया जाता है कि क्रियाकृत्य को ही सब कुछ न मान बैठे उसके भीतर गहराई तक प्रवेश कर और जिस साधना के साथ जो भावना जुड़ी हुई है उसे आत्मसात् करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें। प्रयल इतना गहरा होना चाहिए कि क्रिया-प्रक्रिया अनुभूति के रूप में परिणित, प्रति विम्बित होने लगे। इस प्रकार भावोत्कर्ष का प्रयोजन सरलता पूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है । इस अन्त: स्फुरण को व्यावहारिक जीवन में किस प्रकार उतारा जा सकता और पिछले ढरें को बदलकर उपलब्ध आलोक के आधार पर किस प्रकार किस दिशा में क्या परिवर्तन किया जा सकता है तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं तो आध्यात्मिक जीवन का एक स्पष्ट ढाँचा सामने आ खड़ा होता है। कहना न होगा कि इस परिष्कृत प्रक्रिया में जब जिस क्षण भी प्राण प्रतिष्ठा होती है उसी क्षण मनुष्य की क्षुद्रता महानता में परिणत हुई दीखने लगती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-August
साधना हमारे सामने है। इस शक्ति भंडार में से एक सीप यूरोप के पण्डितों के हाथ भी लगी है। मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म नामक उनके दो छोटे आध्यात्मिक आविष्कार है। जिनके द्वारा, सिद्ध की आत्मशक्ति साधक में प्रवेश करके उस पर अपना पूर्ण आधिपत्य जमा लेती हैं। तब मोह निद्रा में डूबा हुआ साधक अनेक आश्चर्यजनक और गुप्त बातें बताता है।
साधनाएं एक दिन में पूरी नहीं हो जाती। उसके लिए निष्ठा, एकाग्रता और बहुत काल तक निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है। कच को शिक्षा प्राप्त करते हुए वर्षों बीत गए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-April
साधना द्वारा अपने शारीरिक रोग आसानी से दूर किये जा सकते हैं, निर्बल और कुरूप अंगों को सुडौल बनाया जा सकता है। विज्ञापन बाजों द्वारा दिखाये गये सब्ज बाग या उच्च कोटि के योगियों जैस काया कल्प तो नहीं परन्तु हाँ साधारण ऐसा कायाकल्प किया जा सकता है जिससे शरीर बदला हुआ मालूम पड़े। सब अवयव ऐसे हो जाय जिनमें पर्याप्त चेतना और स्फूर्ति भरी हुई हो। नसों में नवीन खून दौड़ता हुआ प्रतीत हो। फिर भी यह स्मरण रखना चाहिए कि शरीर का ढांचा जैसा बन चुका है वह घट बढ़ नहीं सकता।
साधना का प्रयोग भी उनमें उपयोगी है। ईश्वर साक्षात्कार का यह सुगम और अल्प समय साध्य उपाय हो सकता है।
साधना, दैवी खोज की ओर है उनके लिए इस विद्या का थोड़ा सा साधन भी अन्य क्रियाओं को वर्षों करने की अपेक्षा अधिक लाभप्रद होगा। मैस्मरेजम विद्या हमारे सूक्ष्म शरीर को परिपुष्ट बनाती है, उसकी गुप्त शक्तियों को जगाती है। इस प्रकार अदृश्य शरीर इतना बलवान हो जाता है कि शरीर के अन्दर की पाचन क्रिया रक्त संचार आदि को प्रत्यक्ष देख सके। दूर- दूर की चीजों को देख सके। उड़कर दूसरे स्थानों पर जा सके और वहाँ के घटनाओं का दर्शन कर सकें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-March
साधना द्वारा प्राप्त शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय और इसके बदले किसी गरीब अमीर से पाई पैसा का कोई ठहराव न किया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त किया जाय। लाभ होने पर बिना माँगें कोई कुछ दे दे तो संतोषपूर्वक उसी से साधक जीवन निर्वाह करें।
साधना के अभ्यास से इन शक्तियों का आविर्भाव भी किया जा सकता है-एक विद्वान का कथन है।
साधनायंत्र, विधि, कवच, विधान आदि सब चीजें अपने पैसे से बिल्कुल मुफ्त भेजते हैं। हाँ, डाकखर्च का भी भार उठाने में हम अभी असमर्थ हैं। इसके लिए तो रोगी को ही व्यवस्था करनी पड़ेगी। पत्र के साथ एक आने का टिकट जरूर भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जा सकेगा।
साधना चाहता है। भगवान कृष्ण ने दो ही शब्दों में अनुभवगम्य ज्ञान देकर मनोनिग्रह का उपाय बता दिया है। ‘अभ्यासेनतु कौन्तेय बैराग्ये च प्रहृते।’ हे अर्जुन, वह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है। मन का संयम करने के लिये अभ्यास और वैराग्य से सुन्दर और कोई मार्ग नहीं हो सकता।
साधना अष्टाँग योग जितनी कठिन नहीं है किन्तु उससे लाभ भी सीमित ही होता है। मनोनिग्रह के बाद यह दूसरी मंजिल है। इससे आत्मशक्ति बढ़ाई जाती है और उसके द्वारा दूसरों को हानि लाभ पहुँचाया जा सकता है।
साधना में इतनी थकान उतर जाती है जितनी चार घण्टे की गहरी नींद में उतरती है। इससे नवीन चेतना और स्फूर्ति मिलती है एवं शरीर सतेज होकर फिर से कठिन कार्यों को करने योग्य हो जाता है।
साधना के आठ अंगों से प्राणायाम को चौथा स्थान देकर इसकी उपयोगिता का सम्मान किया है। आज के बाबू लोग इस महाक्रिया को ‘फेफड़ों की छोटी सी कसरत’ कह कर उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं उनके लिए अभी वैज्ञानिक यंत्रों द्वारा प्रमाणित उत्तर हमारे पास नहीं हैं परन्तु फिर भी पारस, पारस ही रहेगा जिसका जी आवे अपने लोहे को उससे छूकर देख लेने प्रत्यक्ष के लिए और प्रमाण क्या चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-October
साधना में यदि कुछ विघ्न उपस्थित होते हैं तो उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है और सफलता नहीं मिलती। आप यदि किसी महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं और उसमें सफलता प्राप्त करने की हार्दिक कामना करते हैं तो आपको उन विघ्न बाधाओं से बचाव करना होगा जो मार्ग को कंटकाकीर्ण बना देती है। विद्याध्ययन, अन्वेषण, कोई महान कार्य पूरा करना, दैवी साधना, ईश्वर प्राप्ति आदि किसी लक्ष को आपने स्थिर किया है तो साधना के विघ्नों से भी परिचित होना जरूरी है। नीचे उन विघ्नों का कुछ विवरण किया जाता है।
साधना कहलाती है। इस साधना में यदि कुछ विघ्न उपस्थित होते हैं तो उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है और सफलता नहीं मिलती। आप यदि किसी महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं और उसमें सफलता प्राप्त करने की हार्दिक कामना करते हैं तो आपको उन विघ्न बाधाओं से बचाव करना होगा जो मार्ग को कंटकाकीर्ण बना देती है। विद्याध्ययन, अन्वेषण, कोई महान कार्य पूरा करना, दैवी साधना, ईश्वर प्राप्ति आदि किसी लक्ष को आपने स्थिर किया है तो साधना के विघ्नों से भी परिचित होना जरूरी है। नीचे उन विघ्नों का कुछ विवरण किया जाता है।
साधनाएं किस प्रकार करेगा? साधन के लिये स्वस्थ रहने की आवश्यकता है। सोने, काम करने, खाने, पीने आदि का ऐसा नियम रखना चाहिये जिससे स्वास्थ्य बिगड़ने न पावे। प्रकृति सेवन, नियमित व्यायाम तथा आसनों से स्वास्थ्य को बड़ा लाभ पहुँचता है।
साधना, ईश्वर प्राप्ति आदि किसी लक्ष को आपने स्थिर किया है तो साधना के विघ्नों से भी परिचित होना जरूरी है। नीचे उन विघ्नों का कुछ विवरण किया जाता है।
साधना के विघ्नों से भी परिचित होना जरूरी है। नीचे उन विघ्नों का कुछ विवरण किया जाता है।
साधना का मूल तत्व होने से मानव कितना ही विकृत क्यों न हो, वह मूल तत्व एक दम विस्मृत नहीं हो सकता, इसी कारण मनुष्य के अनेक कार्यों में उनके अनजान में ‘अहं भाव’ का प्रसार अधिकार कर लेता है। इन्द्रिय परितृप्ति के लिये ही साधारण गृहस्थ विवाह करते हैं, सन्तान होने पर उनके अहं का प्रसार और बढ़ जाता है। अपने परिवार को अपना समझने पर क्रम से अन्य परिवारों पर भी सहानुभूति की स्वाभाविकता से ‘मैं’ का प्रसार उत्पन्न होता है और धीरे धीरे मानवमात्र में फैल जाता है। कार्यक्षेत्र जितना ही बढ़ता जाता है, मनुष्य उतना ही भिन्न भिन्न देशों में भ्रमण करता है, भिन्न भिन्न भाषायें सीखता है, भिन्न भिन्न देश के रहने वालों से मिलता है उतना ही वह अपने को उनके स्थान में स्थापन करना सीखता है। विदेश में भ्रमण करने से विदेश के भ्रमण के कष्ट अनुभव होते हैं, फिर यदि कोई विदेशी हमारे देश में आवे तो उसके साथ सौजन्य और सद्व्यवहार करने को व्याकुल होते हैं।
साधनाएं हैं। किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने तक की जो मंजिल है वह साधना कहलाती है। इस साधना में यदि कुछ विघ्न उपस्थित होते हैं तो उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है और सफलता नहीं मिलती। आप यदि किसी महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं और उसमें सफलता प्राप्त करने की हार्दिक कामना करते हैं तो आपको उन विघ्न बाधाओं से बचाव करना होगा जो मार्ग को कंटकाकीर्ण बना देती है। विद्याध्ययन, अन्वेषण, कोई महान कार्य पूरा करना, दैवी साधना, ईश्वर प्राप्ति आदि किसी लक्ष को आपने स्थिर किया है तो साधना के विघ्नों से भी परिचित होना जरूरी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1940-June
साधना का कमरा ऐसा होना चाहिए जिसमें न अधिक प्रकाश रहे न अन्धेरा न अधिक सर्दी हो न गर्मी। पाल्थी मारकर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुये बैठो और काले गोले के बीच में जो पीला निशान है उस पर दृष्टि जमा लो। चित्त की सारी भावनाएं एकत्रित करके उस बिन्दु को इस प्रकार घूरो मानो तुम अपनी सारी शक्ति नेत्रों द्वारा उस में प्रवेश कर देना चाहते हो? ऐसा सोचते रहो कि मरी तीक्ष्ण दृष्टि से इस बिन्दु में छेद हुआ जा रहा है। कुछ देर इस प्रकार देखने से आँखों में दर्द होने लगा और पानी बहने लगेगा तथा अभ्यास को बन्द कर दो।
साधना योगविज्ञान सापेक्ष है। अस्तु शृंगाल कुक्कुट सिंह व्याघ्र वागवास आदि इतर प्राणियों की तरह हम भी अहंभाव में व्यस्त हैं। अपनी अपनी इन्द्रिय लालसा पूरी होना यथेष्ट समझते हैं। अब कहिये, यदि अन्य प्राणियों की भाँति मनुष्य भी एक टुकड़ा माँस ही जीवन का चरम उद्देश्य मानलें तो फिर मनुष्य कहाँ रहे? वस्तुतः दिव्य नेत्रों द्वारा देखने से समाज जिनको मनुष्य कहता है उनमें बहुत थोड़े मनुष्य मिलेंगे और जिनको आप कुत्ते और सियार समझकर दुर दुराते हैं, जिनकी छाया पड़ जाने पर भी स्नान करके पवित्र होते हैं शायद वन में भी अनेक यथार्थ मनुष्य पावेंगे।
साधना द्वारा प्राप्त शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय और इसके बदले किसी गरीब अमीर से पाई पैसा का कोई ठहराव न किया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त किया जाय। लाभ होने पर बिना माँगे कोई कुछ दे दे तो संतोषपूर्वक उसी से साधक जीवन निर्वाह करें।
साधना यंत्र, कवच, रक्षा विधान आदि सब चीजें अपने पैकिट से बिलकुल मुफ्त भेजते हैं। पर डाक खर्च का भी खर्च उठाने में हम अभी असमर्थ है। इसके लिए रोगी को अपनी ही व्यवस्था करनी पड़ेगी। पत्र के साथ एक आने का टिकट जरूर भेजना चाहिए अन्यथा उत्तर न दिया जा सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-January
साधनाओं के बल पर—सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए—व्यक्तित्व को परिष्कृत ढाँचे में ढाल सकते हैं और महामानवों की श्रेणी में गिने जा सकने की स्थिति में सरलतापूर्वक जा पहुँचते हैं। ऐतिहासिक महापुरुषों के जीवन तत्त्व का विश्लेषण करने पर विशेषता एक ही दिखाई पड़ती है कि उन्होंने अपने चिन्तन तन्त्र को व्यवस्थित किया, अभ्यस्त विचार-पद्धति का नये सिरे से पर्यवेक्षण किया, अनौचित्य को साहसपूर्वक सुधारा और विवेक का आश्रय लेकर विचारणा को उच्चस्तरीय बनाया। लोक-प्रवाह के विपरीत आदर्शवादी मौलिकता अपनाई, फलस्वरूप उनका चिन्तनात्मक काया-कल्प हो गया। आरम्भ में ऐसे लोगों को मखौल बनता और विरोध होता है, पर जब वे अपनी निष्ठा का परिचय देते हैं तब दुनिया उनके चरणों में झुक जाती है और सिर आँखों पर बिठाकर भाव भरी श्रद्धाँजलि समर्पित करती है।
साधना से बढ़कर और कोई उपाय नहीं है। इसका लाभ आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मिलता है। अभीष्ट प्रयोजनों में पूरी तन्मयता, तत्परता नियोजित करने से ही किसी कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का सही मार्ग मिलता है और बढ़ी−चढ़ी उपलब्धियाँ पाने का अवसर मिलता है। आत्मिक क्षेत्र में भी यही तन्मयता प्रसुप्त शक्तियों के जागरण से लेकर ईश्वर प्राप्ति तक का महत्वपूर्ण माध्यम बनती हैं।
साधना का दूसरा पक्ष है- मंथन। समुद्र मंथन की वह पौराणिक आख्यायिका सर्वविदित है जिसमें देव-दानवों ने मिल कर समुद्र मथा था और चौदह बहुमूल्य रत्न पाये थे। जीवन एक समुद्र है। इसमें इतनी रत्न राशि भरी पड़ी हैं जिनकी संख्या सीमित नहीं की जा सकती। सिद्धियों और रिद्धियों की गणना अमुक संख्या में की जाती रहती है, पर वह बालकों की अपनी अनुभूति भर है जिसने जितना खोजा पाया उसने उतना बताया।
साधनाएँ एक साथ चलती रहती हैं। आवश्यक नहीं कि एक के बाद दूसरी आरम्भ की जाय। एक ही कक्षा में गणित, इतिहास और साहित्य जैसे कई वर्ग चलते रहते हैं। कुछ में कइयों का सम्मिश्रण भी होता है, पोलो जैसे कई खेलों में शारीरिक स्फूर्ति और मानसिक सूझ−बूझ का समान रूप से समन्वय करना पड़ता है। भोजन में रोटी दाल, शाक की मिली−जुली व्यवस्था रहती है।
साधना क्रम में मध्यवर्ती विधान के अन्तर्गत तीन कृत्य आते हैं । (1) जप (2) ध्यान (3) प्राणायाम। न केवल भारतीय परम्परा में वरन् समस्त विश्व के विभिन्न साधना प्रचलनों में भी किसी न किसी रूप में इन्हीं तीन का सहारा लिया गया है। प्रकार कई हो सकते हैं, पर उन्हें इन तीन वर्गों के ही अंग−प्रत्यंग के रूप में देखा जा सकता है।
साधना के विद्यार्थी को विदित हो सकता है कि उसे आखिर करना क्या पड़ेगा? पहलवान मात्र कसरत करके ही निश्चित नहीं हो जाता वरन् पौष्टिक भोजन की, संयम ब्रह्मचर्य की, तेल मालिश की, उपयुक्त दिनचर्या की, प्रसन्नता निश्चिन्तता की भी व्यवस्था करता है। यदि उन सब बातों की उपेक्षा की जाय और मात्र दंड बैठकों को ही जादू की छड़ी मान लिया जाय तो सफलता दूर की चीज ही बनी रहेगी। एकाकी कसरत से कुछ भला न हो सकेगा। उपासनात्मक विधि−विधान की अपनी महत्ता है, पर उतने भर से ही काम नहीं चलता।
साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नए जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवंत बनाया जाता है।
साधना है। साधना यदि सही दिशा में इसी प्रक्रिया को अपनाते हुए की जा सके तो उसकी सिद्धि सुनिश्चित है।
साधना के अन्तर्गत किये जाने वाले सरल संक्षिप्त कर्मकाण्डों द्वारा आरम्भ होती है और इस आधार पर स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से अनन्त में- प्रवेश करती चली जाती है। आरम्भ के छात्रों को जो कृत्य बताये जाते हैं वे उपहासास्पद लगते हैं और यह समझ में नहीं आता कि इतनी स्वल्प सी शारीरिक, मानसिक हलचलों से इतनी बड़ी उपलब्धियाँ किस प्रकार करतल गत हो सकती हैं। यहाँ इतना ही समाधान प्रस्तुत किया जा सकता है कि उपासनात्मक कर्मकाण्ड दिशा निर्देश है। दिशा सही होने और पहिया लुढ़कने लगने पर उसके परिणाम दूरगामी होना आश्चर्यजनक नहीं है।
साधना है। साधना का परिणाम सिद्धि के रूप में सामने आता है। यह नितान्त स्वाभाविक और सुनिश्चित है। यदि अपने आपे को साधा जाय−व्यक्तित्व को खरादा जाय तो वह सब कुछ प्रचुर परिमाण में अपने ही घर पाया जा सकता है, जिसकी तलाश में जहाँ-तहाँ मारे−मारे फिरना और मृग−तृष्णा की तरह निराश भटकना पड़ता है।
साधनारत योगसाधक ही ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करता है।
साधना कहते हैं। कितने ही देवी-देवताओं की साधना की जाती है और उससे कतिपय वरदान पाने की बात पर विश्वास किया जाता है। इस मान्यता के पीछे सत्य और तथ्य इतना ही है कि इस मार्ग पर चलते हुए अन्तःक्षेत्र की श्रद्धा को विकसित किया जाता है। आदतों को नियन्त्रित किया जाता है। चिन्तन प्रवाह को दिशा विशेष में नियोजित रखा जाता है और सात्विक जीवन के नियमोपनियमों का तत्परता पूर्वक पालन किया जात है।
साधना विज्ञान में हृदय गुफा में अंगुष्ठ प्रमाण प्रकाश ज्योति का ध्यान करने का विधान है। यहाँ जीवात्मा की ज्योति और उसका निवास ‘अहम्’ मान्यता के भाव केन्द्र में माना गया है। शरीर में इसका केन्द्र जिस “हृदय” में है। उसे अन्तःकरण नाम दिया गया है। ‘कारण शरीर’ के रूप में इसी की व्याख्या की जाती है।
साधना की देन हैं।
साधना एवं तपश्चर्या कहा जाता है।
साधना कर लेने पर लोग चमत्कारी पहलवान, खिलाड़ी, सरकस के जादूगर−दुस्साहस भरे कीर्तिमान स्थापित करने वाले वस्तुतः शरीर साधना के निष्णात ही कहे जा सकते हैं। यों मनोयोग का समन्वय भी उनकी सफलताओं में जुड़ा रहता है। अकेला पंचतत्वों का शरीर तो बिना चेतन मन की सहायता के हिल−डुल तक नहीं सकता। फिर बड़ी उपलब्धियाँ तो उसके लिए संभव कैसे हो सकती हैं। यह मनोयोग जो शरीर संचालन के काम आता है स्थूल शरीर का ही एक भाग माना गया है।
साधना में वैसा कोई डर नहीं है। इसमें जप,ध्यान और प्राण इन तीनों ही आधारों का समन्वय है इसीलिए उसे गंगा-यमुना सरस्वती के संगम की तरह तीर्थराज तुल्य माना गया है उससे स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर की बलिष्ठता, बुद्धिमत्ता और सद्भाव सम्पन्नता के त्रिविध लाभ उपलब्ध होते हैं।
साधनात्मक कर्मकाण्ड आते हैं। जप ध्यान, प्राणायाम, देवपूजा, संध्या, अनुष्ठान, पुरश्चरण आदि अनेकों सम्प्रदायों में प्रचलित अनेकों विधिविधान इसी उपासना वर्ग में आते हैं।
साधना के क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि अर्जित न की जा सकेगी।
साधना को सर्वांगपूर्ण बनाना पड़ता है।
साधना विज्ञान का ढाँचा खड़ा किया गया है।
साधना काल की आरम्भिक प्रक्रिया या आवश्यकता किसी भी दृष्टि से नहीं है। उसके लिए न तो लालायित होना चाहिए न खिन्न। प्रयत्न करते रहना भर पर्याप्त है। मीरा, सूर, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस आदि भक्तजनों की भावस्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे एकाग्रता नहीं तन्मयता प्राप्त कर सके और उसी में उनका लक्ष्य मिल गया। भक्त सम्प्रदाय में प्रणय, वियोग, अश्रुपात, समर्पण आलिंगन जैसे भावोन्मादों की घटाएँ ही उमड़ती रहती हैं।
साधना का शुभारम्भ करना पड़ता है और स्कूल के घण्टे तथा घर पर अभ्यास का समय मिलाकर प्रतिदिन लगभग छह घण्टे का मानसिक श्रम करना पड़ता है। इस श्रम में जितनी एकाग्रता, अभिरुचि तथा तन्मयता होती है, उसी अनुपात से प्रगति होती है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होना इसी मनोयोग तथा उत्साहपूर्ण परिश्रम पर अवलम्बित रहता है। विद्वान समझा जाने वाला व्यक्ति बालकपन से आरम्भ किये अध्ययन क्रम को स्नातक बन जाने पर भी समाप्त करके चुप नहीं बैठा है, वरन् अपनी रुचि के विषयों को पढ़ने के लिए अनेकानेक ग्रन्थों को घण्टों तक पढ़ते रहने का स्वभाव बनाये रहा है। आज वह विद्वान समझे जाने पर भी अध्ययन से विरत नहीं हुआ है।
साधना को सिद्धि बनने का अवसर मिलता है।
साधना करने वाले को मूर्च्छा भूख, प्यास, आलस्य, रोग, बुढ़ापा आदि नहीं सताते हैं, उसकी स्थिति देवोपम हो जाती है।
साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनाना ही चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त का समय अमृतोपम है। उस समय किया गया हर कार्य बहुत ही सफलतापूर्वक संपन्न होता है। अस्तु, जो भी अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य प्रतीत होता हो, उसे उसी समय में करना चाहिए। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए संभव है, जो रात्रि को जल्दी सोते हैं।
साधना को सर्वोपरि माना गया है क्योंकि उसके साथ जो संकल्प जुड़ा हुआ है वह चेतना में उच्चतम स्तर तक उछाल देने में जीव और ब्रह्म का समन्वय करा देने में विशेष रूप से समर्थ है। इतनी—इस स्तर की—भाव संवेदना और किसी प्राणायाम में नहीं है। अस्तु उसे सामान्य प्राणायामों की पंक्ति में रखकर स्वतंत्र नाम दिये गये हैं। इसे “हंस योग” कहा गया है। हंस योग का महात्म्य, प्रयोग और परिणाम इतने विस्तारपूर्वक साधना शास्त्र में लिखा है कि वह उसे एक स्वतन्त्र योग शाखा मानने जैसी स्थिति बन जाती है।
साधना ही सर्वोत्तम है। आहार वही आदर्श माना जाता है जिसमें पोषण के सभी तत्व मौजूद हों। प्रोटीन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, अकेले उसी को खाना लाभदायक न रहेगा। अमुक देवता की उपासना अकेली प्रोटीन, अकेली कैल्शियम खाने की तरह है। आवश्यकता पड़ जाने पर चिकित्सा उपचार की तरह कोई विशेष तत्व अमुक मात्रा में लिया जाता है, इसी प्रकार विशेष प्रयोजन के लिए कोई देव−साधना उपयोगी हो सकती है, पर सर्वतोमुखी प्रगति के लिए—सर्वकालिक साधना समग्र ब्रह्म की ही होनी चाहिए।
साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।
साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।
साधना भी की जा सकती है, पर अपना अनुभव और परामर्श यह है कि समग्र ब्रह्म की साधना ही सर्वोत्तम है। आहार वही आदर्श माना जाता है जिसमें पोषण के सभी तत्व मौजूद हों। प्रोटीन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, अकेले उसी को खाना लाभदायक न रहेगा। अमुक देवता की उपासना अकेली प्रोटीन, अकेली कैल्शियम खाने की तरह है। आवश्यकता पड़ जाने पर चिकित्सा उपचार की तरह कोई विशेष तत्व अमुक मात्रा में लिया जाता है, इसी प्रकार विशेष प्रयोजन के लिए कोई देव−साधना उपयोगी हो सकती है, पर सर्वतोमुखी प्रगति के लिए—सर्वकालिक साधना समग्र ब्रह्म की ही होनी चाहिए।
साधना के संबंध में भी कही जा सकती है। इस सन्दर्भ में प्रयुक्त होने वाले देवी−देवता एवं विधि−विधान अपनी जेब से कुछ नहीं देते। साधक की निष्ठा भर पकाते हैं उसे कार्य−पद्धति भर सिखाते हैं। इतने का अभ्यस्त बनना ही साधनात्मक कर्मकाण्डों का प्रयोजन है। इतने भर से बात बन जाती है और राह मिल जाती है।
साधनाओं का लक्ष्य है। उसमें लगता भर ऐसा है मानो बाहर के किसी देवी−देवता को प्रसन्न करने के लिए अनुनय विनय की, भेंट उपहार की, गिड़गिड़ाहट भरी दीनता की, अभिव्यक्ति की जा रही है और साधक उसी का ताना−बाना बुनता है। पर वस्तुतः ऐसा कुछ होता नहीं। देवी−देवताओं को अपने निजी कार्य उत्तरदायित्व और झंझट भी तो कम नहीं होंगे। हमारी ही तरह वे भी अपने निजी गोरख−धन्धे में लगे होंगे।
साधना क्रम भी चलता है। साथ−साथ तीनों का समान रूप से विकास भी होता चलता है।
साधना प्रत्यक्ष है। नकद धर्म की तरह उसकी उपासना कभी भी—किसी की भी—निष्फल नहीं जाती। यदि उद्देश्य समझते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया जा सके और विधिवत् साधना की जा सके तो जीवन साधना को अमृत, पारस और कल्प−वृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती है।
साधना समर’ शब्द का अध्यात्म विज्ञान में बार−बार उल्लेख होता है। देवासुर संग्राम के अनेकानेक प्रसंग पौराणिक उपाख्यानों में आते हैं, यह अलंकारिक रूप मनुष्य जीवन के अंतरंग और बहिरंग क्षेत्रों में सदा होते रहने वाले संघर्षों का ही चित्रण है। दुर्गा सप्तशती और गीत की पृष्ठ भूमि इसी संघर्ष के आधार पर खड़ी है भगवती दुर्गा द्वारा असुरों का संहार और कृष्ण द्वारा अर्जुन के माध्यम से महाभारत का आयोजन प्रकारान्तर से इसी तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि साधना समर के क्षेत्र में प्रवेश किये बिना उन अवरोधों से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता जो मनुष्य को दयनीय दुर्दशा में डाले रहने के लिए प्रधान रूप से उत्तरदायी हैं।
साधना में चित्त−वृत्तियों के निरोध और उन्हें आत्मा एवं परमात्मा के बीच सघनता के बंधन में बाँधने के लिए प्रयुक्त किये जाने की चर्चा की गई है अब उसी प्रसंग में यह जानना होगा कि यह आत्मा और परमात्मा आखिर है क्या? और उनकी सघनता एवं एकता, किसलिए आवश्यक है और किस प्रकार सम्भव है?
साधना में कई प्रकार के शारीरिक, मानसिक क्रिया कृत्य अपनाने पड़ते हैं। इनका उद्देश्य आत्म चेतना को परमात्मा चेतना से जोड़ने वाली मनःस्थिति उत्पन्न करना है। यह तथ्य ध्यान से रखकर चला जाय तो ही लक्ष्य की पूर्ति होनी संभव है। यदि चेतनात्मक परिष्कार के लिए प्रयत्न न किया जाय और मात्र उन क्रिया−कृत्यों को ही योगाभ्यास मान लिया जाय तो उस भ्रान्ति के कारण घोर परिश्रम करते रहने पर भी कोल्हू के बैल की तरह जहाँ के तहाँ बने रहना पड़ेगा।
साधना कह सकते हैं। पशुता को परिष्कृत करके उसे मनुष्यता के—देवत्व के रूप में विकसित करना, अनगढ़ पत्थर को कलात्मक प्रतिमा के रूप में गढ़ देने के सदृश एक विशिष्ट कौशल है। इस प्रवीणता में पारंगत होने का नाम ही आत्म−साधना है। पशुओं को प्रशिक्षित करने और पत्थर से मूर्तियाँ बनाने की तरह कार्य कुछ कठिन तो है—पर है ऐसा जिसमें लाभ ही लाभ भरा पड़ा है।
साधनाओं का उद्देश्य इस संस्थान को प्रभावित एवं परिष्कृत करना ही होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में वह साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नए जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवंत बनाया जाता है।
साधना साकार और निराकारवादी दोनों ही पक्षों के लिए समाधान कारक है। सभी धर्म सम्प्रदायों ने किसी न किसी रूप में प्रकाश ध्यान की महत्ता स्वीकार की है। इसलिए उसे सार्वभौम भी कह सकते हैं। गायत्री मन्त्र का देवता सविता है। छवि स्थूल, विचारणा सूक्ष्म, भावना कारण इन तीनों का समन्वय करते हुए अपना उपास्य सद्ज्ञान रूपी सूर्य हो, उसकी किरणों में गायत्री मन्त्र की सदाशयता और अंतराल में अनन्य प्रेम से ओत−प्रोत मातृ सत्ता की झाँकी की जा सकती है।
साधना से सम्पन्न होता है।
साधना साबुन का काम करती है। विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता है और विवेक युक्त दूर दर्शिता का पथ-प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतंभरा इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है। ‘ज्ञानामुक्ति’, ‘नहिं ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते’ जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को अध्यात्म का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान साधना ही कहा जा सकता है।
साधना प्रचलनों में भी किसी न किसी रूप में इन्हीं तीन का सहारा लिया गया है। प्रकार कई हो सकते हैं, पर उन्हें इन तीन वर्गों के ही अंग−प्रत्यंग के रूप में देखा जा सकता है।
साधना कहते हैं। यह साहसिकता के बिना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। बाहरी शत्रुओं से लड़ने के लिए जितना युद्ध कौशल चाहिए उतना ही शौर्य साहस अपने भीतर घुसे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद−मत्सर जैसे आत्म−शत्रुओं से लड़ने और परास्त करने के लिए आवश्यक होता है। दुर्बल मनः स्थिति के लोग अपनी भीतरी कमजोरियों को जानते हैं, उन्हें हटाना चाहते हैं, पर साहस के अभाव से उनके साथ लड़ने का पराक्रम प्रदर्शित नहीं कर सकते। फलतः आत्म−सुधार एवं आत्म−निर्माण का प्रयोजन पूरा कर सकना उनसे बन नहीं पड़ता।
साधना का परिणाम सिद्धि के रूप में सामने आता है। यह नितान्त स्वाभाविक और सुनिश्चित है। यदि अपने आपे को साधा जाय−व्यक्तित्व को खरादा जाय तो वह सब कुछ प्रचुर परिमाण में अपने ही घर पाया जा सकता है, जिसकी तलाश में जहाँ-तहाँ मारे−मारे फिरना और मृग−तृष्णा की तरह निराश भटकना पड़ता है।
साधना विज्ञान के ज्ञाताओं ने सर्वप्रथम आत्मशोधन की ओर ध्यान देने का विधान बनाया है। प्रस्तुत कर्मकाण्डों के सहारे जीवन में परिष्कार की ओर अधिकाधिक तत्परता बरतने के लिए उत्साह उत्पन्न किया जाता है।
साधना शास्त्र में लिखा है कि वह उसे एक स्वतन्त्र योग शाखा मानने जैसी स्थिति बन जाती है।
साधना में कई प्रकार के कठोर नियम पालन करने पड़ते हैं। व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य जैसी तितीक्षाओं से शरीर को इस योग्य बनाया जाता है कि वह कठिनाइयाँ सहने का अभ्यस्त तथा तज्जनित गर्मी से सुदृढ़ होने का अवसर प्राप्त कर सके।
साधना में जितनी कुछ जैसी कुछ अनुभूति दे सकती हैं, उसे देकर समाप्त हो जायेंगी। भाव−विहीन साधना से शरीर की स्वस्थता और मन की एकाग्रता भले ही कुछ सीमा तक बढ़ सके; आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा। इसके लिए भावनाएं तरंगित करनी पड़ेंगी। ‘भक्ति भावना’ शब्द का प्रयोग इसीलिए किया जाता है कि उसमें भावनाओं का तरंगित होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना सारे अभ्यास निष्प्राण ही बने रहेंगे।
साधनात्मक कर्मकाण्डों का प्रयोजन है। इतने भर से बात बन जाती है और राह मिल जाती है। साधक अपनी मूर्छना जगाकर उज्ज्वल भविष्य की असीम सम्भावनाएं स्वयं जगा लेता है।
साधना भी अपने ही पाँवों के सहारे चलकर पूरी करनी पड़ती है और इसके लिए योग और तप जैसे दोनों ही आधार पूरी निष्ठा के साथ अपनाने पड़ते हैं।
साधना के चार और तप साधना के तीन कुल मिलाकर अध्यात्म के सात सोपान हैं। इन्हीं को सप्तलोक- सप्तऋषि- सप्तमहाव्रत कहा गया है। सप्त-द्वीप, सप्त-समुद्र, सप्त-शिखर, सप्त-रत्न, सप्त-धातु, सप्त-सरोवर, सप्त-शिखर, स्वर सप्तक, सप्तसूर्य किरणें, सप्ताह आदि की संगति इन्हीं सात सोपानों से मिलती है। विभिन्न अलंकारों के साथ इन्हीं सात तथ्यों को मनीषियों ने विभिन्न प्रतिपादनों के साथ निरूपित किया है और जन मानस में विभिन्न प्रतिपादनों के साथ प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया है। अध्यात्म के ज्ञान पक्ष और विज्ञान पक्ष को समझने के लिए जो अनेकानेक शास्त्र पढ़ने को और विद्वानों के प्रवचन प्रतिपादन सुनने को मिलते हैं, उनमें इन सात महा तथ्यों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
साधना में पंचतत्वों और तीन गुणों से बने घिरे शरीर को ईश्वर मानने के लिए नहीं कहा गया है। ऐसी मान्यता तो उलटा अहंकार लगा देगी और उत्थान के स्थान पर पतन का नया कारण बनेगी। यह दिव्य संकेत आत्मा के शुद्ध स्वरूप का विवेचन है। वह वस्तुतः ईश्वर का अंश है। समुद्र और लहरों की, सूर्य और किरणों की, मठाकाश और घटाकाश की, ब्रह्माण्ड और पिण्ड की, आग और चिनगारी की उपमा देकर परमात्मा और आत्मा की एकता का प्रतिपादन करते हुए मनीषियों ने यही कहा है कि मल−आवरण, विक्षेपों से—कषाय−कल्मषों से मुक्त हुआ जीवन वस्तुतः ब्रह्म ही है।
साधना से यों उसे धन भी मिलता है और सम्मान भी। पर इससे बड़ी उपलब्धि है उसका आत्म−सन्तोष। ‘स्वान्तः सुखाय’ उद्देश्य को ध्यान में रखकर वह भले−बुरे दिनों में—हारी−बीमारी में भी—अन्तः प्रेरणा से किसी न किसी प्रकार पढ़ने के लिए समय निकालता रहता है। इसके बिना उसे अन्तःतृप्ति ही नहीं मिलती। आत्म−साधक की मनःस्थिति भी यही होनी चाहिए।
साधना को अमृत, पारस और कल्प−वृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती है।
साधना यदि सही दिशा में इसी प्रक्रिया को अपनाते हुए की जा सके तो उसकी सिद्धि सुनिश्चित है।
साधना चलती ही रहती है, विघ्न अवरोध न आते हों सो बात भी नहीं—उनसे भी जैसे बनता है निपटता रहता है, पर उपेक्षा कभी भी खेत की नहीं होती। उसकी आवश्यकता पूरी किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। समयानुसार फसल पकती भी है। अनाज भी पैदा होता है। उसे ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ घर ले जाता है।
साधना का सबसे स्थूल रूप पार्थिव पूजा है जो मात्र उपकरणों से धन एवं पदार्थों से संपन्न हो जाता है। प्रतिमा पूजन यही प्रथम बाल कक्षा है। देव मन्दिरों में स्थापित प्रतिमाओं को वस्त्र, नैवेद्य आरती, पुष्पहार, धूप, दीप आदि से पूजा जाता है। सूर्य को अर्घ्य धन दान, ब्रह्मभोज, भोग प्रसाद जैसे कार्य पार्थिव पूजा में गिने जाते हैं, इनमें से कुछ तो हवन यज्ञ अपंग असमर्थों की सहायता, सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में दान पुण्य जैसे लोकोपयोगी भी होते हैं, शेष उपकरणों की सहायता से किये जाने वाले कर्मकाण्डों तक सीमित रहते हैं। उन्हें भी निरर्थक नहीं कहा जा सकता है।
साधनाओं में प्रायः सभी चिन्तन-परक होती हैं और उनमें कितने ही स्तर के ध्यान करने पड़ते हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, हंसयोग, षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण जैसे बिना किसी श्रम या उपकरण के लिये जाने वाले मात्र मनोयोग के सहारे संपन्न किये जाने वाले सभी कृत्य ध्यानयोग की श्रेणी में गिने जाते हैं। इसके साकार और निराकार दो वर्ग हैं। साकार में अमुक देवी−देवताओं के स्वरूप एवं सान्निध्य की भावना की जाती है। प्रकाश का—सूर्य का ध्यान भी साकार ध्यान में ही गिना जाता है।
साधना में गुलाब पुष्प की सुगंध पर ध्यान एकाग्र करते हुए भी यह प्रश्न उपस्थिति होगा और उस सुगन्ध को पुष्प की आकृति से सर्वथा बचाते हुए ध्यान में लाया जा सकना सम्भव न होगा। इस विवाद को पूर्वाग्रहों से नहीं उपयोगिता की दृष्टि से ही हल किया जाना उचित है।
साधना की अन्तिम स्थिति में शारीरिक या मानसिक कोई कृत्य करना शेष नहीं रहता। मात्र अनुभूति, संवेदना, भावना तथा संकल्प शक्ति के सहारे विचार रहित शून्यावस्था प्राप्त की जाती है। इसी को समाधि अथवा तुरियावस्था कहते हैं। ब्रह्मानन्द का —परमानन्द का अनुभव इसी स्थिति में होता है। इसे ईश्वर और जीव के मिलने की चरम अनुभूति कह सकते हैं।
साधनात्मक निष्ठाएँ मिलकर उस प्रकार की प्रतिमा का स्वरूप वस्तुतः सामने ले आती हैं और वह ‘इष्टदेव’ साधक की सहायता के लिए प्रस्तुत दीखने लगता है। साधक का व्यक्तित्व और संकल्प इस भाव निर्मित इष्टदेव में प्राण फूँकता है। उस उपास्य में साधक के स्तर के अनुरूप ही शक्ति होती है। दुर्बल मनःस्थिति वाले साधक के इष्टदेव मात्र छाया जैसा आभास देकर तिरोहित हो जाते हैं। जब कि प्राणवान साधक का वही इष्टदेव प्रचण्ड सामर्थ्य का परिचय देता है।
साधना का दूसरा चरण है।
साधना इसी का नाम है। इन्द्रियों के समूह को—मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय को वन्य पशुओं से समकक्ष गिना जा सकता है। अपने स्वाभाविक रूप में यह सारा ही चेतना परिवार उच्छृंखल होता है। जन्म−जन्मान्तरों के पाशविक कुसंस्कारों की मोटी परत उस पर जमा होती है। उसे उतारने के लिए जिस खराद का उपयोग किया जाता है उसे साधना कह सकते हैं।
साधना को ज्ञान और विज्ञान—इन दो पक्षों में विभाजित कर सकते हैं। ज्ञान पक्ष वह है जो पशु और मनुष्य के बीच का अंतर प्रस्तुत करता है और प्रेरणा देता है कि इस सुरदुर्लभ अवसर का उपयोग उसी प्रयोजन के लिए किया जाना चाहिए जिसके लिए वह मिला है। इसके लिए किस तरह सोचना और किस तरह की रीति−नीति अपनाना उचित है, इसे हृदयंगम कराना ज्ञान पक्ष का काम है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, प्रवचन, पाठ, मनन, चिन्तन जैसी प्रक्रियाओं का सहारा इसी प्रयोजन के लिए लिया जाता है।
साधना आत्मिक क्षेत्र में भी होती है और भौतिक क्षेत्र में भी। कदम जिस भी दिशा में बढ़ते हैं प्रगति उसी ओर होती है। अपनी सतर्कता पूर्ण सुव्यवस्था जिस भी मार्ग पर गतिशील कर दी जाय उसी में एक के बाद एक सफलता के मील पत्थर मिलते चले जायेंगे।
साधना का चमत्कार है। जो वातावरण मस्तिष्क में छाया रहता है व्यक्तित्व उसी ढाँचे में ढलने लगता है। भगवत् चिन्तन से न केवल मन:स्थिति, वरन् सारी जीवन सत्ता ही उसी ढाँचे में ढलने लगती है।
साधना समर के क्षेत्र में प्रवेश किये बिना उन अवरोधों से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता जो मनुष्य को दयनीय दुर्दशा में डाले रहने के लिए प्रधान रूप से उत्तरदायी हैं।
साधना है। पशुओं को प्रशिक्षित करने और पत्थर से मूर्तियाँ बनाने की तरह कार्य कुछ कठिन तो है—पर है ऐसा जिसमें लाभ ही लाभ भरा पड़ा है।
साधना से उन मलीनताओं का—मनोविकारों का निष्कासन होता है जो प्रगति के हर क्षेत्र में चट्टान बनकर अड़े रहते हैं और पग−पग पर व्यवधान उत्पन्न करते हैं।
साधना नित्य निरन्तर करनी पड़ती है। ‘रियाज’ न किया जाय तो गायक का स्वर छितराने लगता है और वादक की उँगलियाँ जकड़−मकड़ दिखाने लगती हैं। संगीत सम्मेलन तो यदा−कदा ही होते हैं, पर वहाँ पहुँचने पर सफलता का श्रेय देने वाली स्वर साधना को नित्य ही अपनाये रहना पड़ता है। गीत सुनने वालों ने कितनी प्रशंसा की और कितनी धन राशि दी यह बात गौण रहती है। संगीत साधक, आत्म−तुष्टि की नित्य मिलने वाली प्रसन्नता को ही पर्याप्त मानता है और बाहर से कुछ भी न मिले तो भी वह एकान्त जंगल की किसी कुटिया में रहकर भी आजीवन बिना ऊबे संगीत साधना करता रह सकता है।
साधना के तीन कुल मिलाकर अध्यात्म के सात सोपान हैं। इन्हीं को सप्तलोक- सप्तऋषि- सप्तमहाव्रत कहा गया है। सप्त-द्वीप, सप्त-समुद्र, सप्त-शिखर, सप्त-रत्न, सप्त-धातु, सप्त-सरोवर, सप्त-शिखर, स्वर सप्तक, सप्तसूर्य किरणें, सप्ताह आदि की संगति इन्हीं सात सोपानों से मिलती है। विभिन्न अलंकारों के साथ इन्हीं सात तथ्यों को मनीषियों ने विभिन्न प्रतिपादनों के साथ निरूपित किया है और जन मानस में विभिन्न प्रतिपादनों के साथ प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया है। अध्यात्म के ज्ञान पक्ष और विज्ञान पक्ष को समझने के लिए जो अनेकानेक शास्त्र पढ़ने को और विद्वानों के प्रवचन प्रतिपादन सुनने को मिलते हैं, उनमें इन सात महा तथ्यों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
साधना हमारे लिए सर्वोपरि श्रेय साधन है उसमें अपनी प्रवृत्तियों को तत्परतापूर्वक लगाया जा सके उसी में कल्याण है।
साधना को नित्य ही अपनाये रहना पड़ता है। गीत सुनने वालों ने कितनी प्रशंसा की और कितनी धन राशि दी यह बात गौण रहती है। संगीत साधक, आत्म−तुष्टि की नित्य मिलने वाली प्रसन्नता को ही पर्याप्त मानता है और बाहर से कुछ भी न मिले तो भी वह एकान्त जंगल की किसी कुटिया में रहकर भी आजीवन बिना ऊबे संगीत साधना करता रह सकता है। आत्म−साधक की मनः−स्थिति इतनी तो होनी ही चाहिए।
साधनात्मक कर्मकाण्डों के माध्यम आत्म शिक्षण की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया।
साधना विज्ञान का प्रथम चरण और शरीर के आरोग्य का रक्षण और उसकी सक्रियता को व्यवस्थित एवं परिष्कृत करने के लिए है। योग की यह प्रथम उपलब्धि है। स्वास्थ्य रक्षा के मोटे नियम सर्वविदित हैं। आहार विज्ञान के अन्तर्गत यह पढ़ाया जाता है कि भोजन में क्या वस्तुएं किस अनुपात से होनी चाहिएं। श्रम व्यायाम, दिनचर्या सफाई जैसी अनेक बातें स्वास्थ्य रक्षा के लिए आवश्यक बताई जाती हैं।
साधना की प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए।
साधना के निष्णात ही कहे जा सकते हैं। यों मनोयोग का समन्वय भी उनकी सफलताओं में जुड़ा रहता है। अकेला पंचतत्वों का शरीर तो बिना चेतन मन की सहायता के हिल−डुल तक नहीं सकता। फिर बड़ी उपलब्धियाँ तो उसके लिए संभव कैसे हो सकती हैं। यह मनोयोग जो शरीर संचालन के काम आता है स्थूल शरीर का ही एक भाग माना गया है।
साधना को ‘अजपा जाप’ अथवा प्राण गायत्री भी कहा गया है। मान्यता है कि श्वास के शरीर में प्रवेश करते समय ‘स’ जैसी साँस रुकने के तनिक से विराम समय में “सो” जैसी—और बाहर निकलते समय ‘हम’ जैसी अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि होती रहती है। इसे श्वास क्रिया पर चिरकाल तक—ध्यान केन्द्रित करने की साधना द्वारा सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय द्वारा सुना जा सकता है। चूँकि ध्वनि सूक्ष्म है स्थूल नहीं—इसलिए उसे अपने छेद वाले कानों से नहीं—सूक्ष्म शरीर में रहने वाली सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय द्वारा—शब्द तन्मात्रा के रूप में ही सुना जा सकता है। कोई खुले कानों से इन शब्दों को सुनने का प्रयत्न करेगा तो उसे कभी भी सफलता न मिलेगी।
साधना करते हुए कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वार्थ सुविधा में कटौती करके ही परमार्थ की दिशा में कुछ किया जा सकता है। प्रत्यक्षतः यह सांसारिक दृष्टि से घाटे का सौदा है और अभ्यस्त प्रवृत्ति से विपरीत पड़ने के कारण कष्ट, भय भी अनुभव होता है, इन कठिनाइयों को पार करने के लिए शरीर की तितीक्षा का, मन की सादगी का तथा इस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का, सामना करने योग्य आन्तरिक साहसिकता का सहारा लेना पड़ता है। अपने आपे को इसी ढाँचे में ढालने के लिए, जितने भी प्रयास किये जाते हैं; वे सब ‘तप’ की श्रेणी में गिने जाते हैं।
साधना उपयोगी हो सकती है, पर सर्वतोमुखी प्रगति के लिए—सर्वकालिक साधना समग्र ब्रह्म की ही होनी चाहिए।
साधना है जिसका प्रतिफल उसे सम्मान तथा अर्थ लोभ के रूप में- पौधों का हरे-भरे, फले-फूले सौन्दर्य के रूप में तथा सर्व साधारण को छाया, सुगन्ध, फल, सुषमा आदि के रूप में उपलब्ध होता है। माली की उद्यान साधना सर्वतोमुखी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करती है।
साधना से शरीर की स्वस्थता और मन की एकाग्रता भले ही कुछ सीमा तक बढ़ सके; आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा। इसके लिए भावनाएं तरंगित करनी पड़ेंगी। ‘भक्ति भावना’ शब्द का प्रयोग इसीलिए किया जाता है कि उसमें भावनाओं का तरंगित होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना सारे अभ्यास निष्प्राण ही बने रहेंगे। यही कारण है कि क्रियाकृत्यों को सब कुछ मानकर उन्हीं की प्रवीणता के लिए माथापच्ची करते रहने वाले व्यक्ति प्रायः निराश रहते और असफलता की शिकायत करते ही पाये जाते हैं।
साधना में तपश्चर्या को केन्द्र मान कर चलने वाले विधि-विधानों का उद्देश्य है- प्रसुप्ति से निवृत्ति- मूर्छना से मुक्ति। इसके लिए गर्मी उत्पन्न करनी पड़ती है। गर्मी पाकर प्रसुप्ति से मुक्ति मिलती है। सूर्योदय की बेला निकट आने पर प्राणियों की निद्रा टूटती है और वे जागते उठते एवं कार्यरत होते हैं। रात्रि में कलियाँ सिकुड़ी पड़ी रहती हैं; पर जैसे ही सूर्य निकलता है वे हँसने खिलने लगती हैं।
साधना और कर्मकाण्ड प्रक्रिया को कई तरह से निर्धारित किया है; पर सभी का मूल प्रयोजन समान है। समस्त संसार में प्रचलित अध्यात्म के ज्ञान पक्ष को योग और क्रिया पक्ष को तप की ही संज्ञा दी जा सकती है। गायत्री को योग और यज्ञ को तप के अर्थ में ही प्रयुक्त साधन के रूप में देखा समझा जाना चाहिए।
साधना का अर्थ है अपने अन्तरंग और बहिरंग को उच्चस्तर तक उठा ले चलना। इसे जीवन का अभिनव निर्माण एवं व्यक्तित्व का काया-कल्प भी कह सकते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे योगाभ्यास तपश्चर्या कहते हैं।
साधना सर्वतोमुखी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करती है।
साधना में उत्तीर्ण होकर प्रखर प्रतिभा विकसित कर सकें।
साधना की जा सके तो जीवन साधना को अमृत, पारस और कल्प−वृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती है।
साधना की सही पृष्ठभूमि बन चली।
साधना द्वारा कष्टसाध्य परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं और उन्हें सहन करने की तितीक्षा का सहारा लेकर अपने को परिष्कृत करना पड़ता है, सोने को आग में तपाकर ही विविध प्रकार के आभूषण बनते हैं। अन्य धातुओं से भी उपकरण तभी बनते हैं जब उन्हें आग में डालकर कोमल बनाया जाय। मनुष्य की जड़ता एवं कठोरता को सुकोमलता में बदलने और अमुक ढाँचे में ढालने के लिए तपश्चर्या की रीति−नीति अपनाना आवश्यक होता है। आरामतलबी और सुख−सुविधा के भरे वातावरण में पलने वाले लोग अविकसित स्थिति में पड़े रहते हैं उनकी विविध क्षमताएँ विकसित होने की बात बनती ही नहीं। उस्तरे पर धार रखने से ही उसमें पैनापन बढ़ता है और चमक दीखती है।
साधना से परिष्कृत होता और सुदृढ़ बनता है।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को अपने चरित्र और चिन्तन को उच्चस्तरीय बनाने के लिए प्रथम प्रयास के रूप में तत्परता बरतनी होती है। अन्यथा मात्र कर्मकाण्डों के सरल विधि−विधान अपनाने भर से देवत्व की उपलब्धि जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति न हो सकेगी।
साधना की मूर्ति पूजा एवं इष्टदेव के साकार ध्यान में दो कक्षाएँ हैं। मूर्तिपूजा को प्राइमरी शिक्षा और इष्ट ध्यान को हाईस्कूल स्तर की पढ़ाई कह सकते हैं। इसके आगे की कालेज कक्षा है। उसे निराकार साधना कह सकते हैं। उसमें भगवान को मनुष्य रूप में कल्पित नहीं किया जाता और न व्यक्ति के लिए किये जाने वाले स्वागत, सत्कारों की आवश्यकता पड़ती है।
साधना से किसी पूजा प्रयोजन का संकल्प लेने वाला समाधान हो सकता है पर आत्म−साधक को इतने भर से सन्तोष नहीं मिलता। वह जानता है कि प्यास बुझाने के लिए रोज ही कुँए से पानी खींचना पड़ता है और सफाई रखने के लिए रोज ही कमरे को बुहारना पड़ता है। मानवी सत्ता की स्थिति भी ऐसी ही है, उसकी हीरों भरी खदान को हर दिन खोदना, कुरेदना चाहिए। तभी नित्य नये उपहार मिलने सम्भव होंगे। शरीर को स्नान कराना , दाँत माँजना , कपड़े धोना नित्य कर्म है।
साधनाओं का है जो प्रकृति प्रदत्त—सहज उपलब्ध शक्तियों को सुरक्षित रखने एवं केन्द्रीभूत करने के उद्देश्य से बनाई गई हैं।
साधना कहते हैं।
साधना जैसे महान प्रयोजन में संलग्न होने का कोई प्रतिफल उपलब्ध न हो।
साधना का एक उद्देश्य आत्मबल का उपार्जन भी है। प्राणायाम द्वारा उत्पन्न हुई आन्तरिक ऊर्जा इस उत्पादन में विशेष रूप से सहायक होती है। इन्द्रिय दमन, मनोनिग्रह, कुसंस्कारों का उन्मूलन, सत्प्रयोजन की दिशा में अनवरत प्रयाण, कठिनाइयों से संघर्ष, जन उपहास एवं विरोध का सहन जैसे महत्वपूर्ण कार्य बिना आन्तरिक साहस के अन्य किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकते।
साधना का शेष भाग पूरा हो सकता है।
साधना की जाती है और उससे कतिपय वरदान पाने की बात पर विश्वास किया जाता है। इस मान्यता के पीछे सत्य और तथ्य इतना ही है कि इस मार्ग पर चलते हुए अन्तःक्षेत्र की श्रद्धा को विकसित किया जाता है। आदतों को नियन्त्रित किया जाता है। चिन्तन प्रवाह को दिशा विशेष में नियोजित रखा जाता है और सात्विक जीवन के नियमोपनियमों का तत्परता पूर्वक पालन किया जात है। इन सबका मिला-जुला परिणाम व्यक्तित्व पर चढ़ी हुई दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण करने तथा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाने में सहायक सिद्ध होता है।
साधना प्रक्रिया को किसी न किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।
साधना का साधक भी प्रगति के मार्ग में उत्पन्न होते रहने वाले अनेक अवरोधों पर विजय प्राप्त करता है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ता चला जाता है।
साधना कहते हैं। साधना का अर्थ है अपने अन्तरंग और बहिरंग को उच्चस्तर तक उठा ले चलना। इसे जीवन का अभिनव निर्माण एवं व्यक्तित्व का काया-कल्प भी कह सकते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे योगाभ्यास तपश्चर्या कहते हैं।
साधना प्रयोजन में प्रयुक्त होते हैं।
साधना ग्रन्थों में मिलता है; उसे परमात्म सत्ता के साथ जीवात्मा के सान्निध्य सम्पर्क की सुनिश्चित प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। ईश्वर प्राप्ति को जीवन लक्ष्य की पूर्ति- पूर्णता में परिणिति-परम पुरुषार्थ, परम लाभ आदि नामों से पुकारा जाता है। आत्मा को परमात्मा की उच्च स्थिति में विकसित कर लेने वाले व्यक्ति, निस्संदेह नर रूप में नारायण कहे जा सकते हैं। उनकी विशेषताओं और विभूतियों का वारापार नहीं रहता।
साधनात्मक कर्मकाण्डों की शक्ति अधिक से अधिक एक चौथाई मानी जा सकती है। तीन चौथाई सफलता तो संकल्प की प्रखरता पर अवलम्बित रहती है। संकल्प शिथिल हो तो कई तरह के क्रिया-कृत्य करते रहने पर भी योग साधना के क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि अर्जित न की जा सकेगी।
साधना इस घर्षण प्रयोजन के लिए बहुत करके काम में लाई जाती है।
साधना का ही आश्रय लेना पड़ा था। भागीरथ द्वारा तप करके गंगा को धरती पर लाया जाना, पार्वती का शिव से विवाह संपन्न होना, ध्रुव का तप करके ब्रह्माण्ड का केन्द्र बनना, दधीचि की अस्थियों से वज्र बनना और उससे असुरों का मारा जाना, अगस्त्य का समुद्र शोषण, विश्वामित्र का नई सृष्टि का निर्माण, सात सामान्य मनुष्यों का सप्तऋषि बनना—जैसी अगणित कथाएँ तप की शक्ति का परिचय प्रस्तुत करती हैं।
साधना का उद्देश्य मनःक्षेत्र में भरी कुण्ठाओं और शरीर क्षेत्र में अभ्यस्त कुत्साओं के निराकरण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सर्वतोमुखी निर्मलता का अभिवर्धन ही ईश्वर प्राप्ति की दिशा में बढ़ने वाला महान् प्रयास माना गया है। सोऽहम्−साधना की प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए।
साधना को दूसरे शब्दों में समग्र जागरण का अभिनव प्रयास ही कह सकते हैं। आत्मबोध का प्रथम और तत्वबोध का द्वितीय चरण जब क्रमिक गति से उठना आरम्भ होता है तो उस प्रयास से महान जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने वाला पथिक प्रत्येक कदम पर एक से एक बढ़ी−चढ़ी उपलब्धियाँ, ऋद्धि−सिद्धियाँ प्राप्त करता चला जाता है।
साधना में अग्निपिंड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है, उनकी मूल सत्ता ‘दिव्य ज्ञान’ कही गई है। निराकार ‘प्रज्ञा’ तत्व का साकार रूप ‘सविता’ है। सविता अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म। ध्यान करते समय सूर्य पर एकाग्रता तो करनी चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘दिव्य आलोक’ का सद्ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतीक मात्र है। मात्र जड़ पिंड नहीं।
साधना के पथ पर अग्रसर होने की दिशा में प्रथम कक्षा साकार उपासना की है। उसमें आकृति सहित परमात्मा की कल्पना करनी पड़ती है। उसे उच्चस्तरीय श्रेष्ठताओं से सम्पन्न माना जाता है, समीप उपस्थित अनुभव किया जाता है, सघन श्रद्धा का आरोपण करते हैं, गहरी प्रेम भावना उमगाते हैं और उनके साथ घनिष्ठता बनाते हैं। इसी कृत्य के अंतर्गत आने वाले विविध उपचार भक्ति साधना कहे जाते हैं। ‘लय’ प्रक्रिया का यह प्रथम सोपान है।
साधना संपन्न करने के लिए किन आदर्शों को सामने रखा जाय इसी का दिशा निर्देश इस पंचोपचार पूजा में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों के साथ जुड़ा हुआ है।
साधना गंगा, यमुना और सरस्वती का त्रिवेणी संगम बनकर अपने भीतर ही जीवन्त तीर्थराज उत्पन्न करती है।
साधना कह सकते हैं। उसमें भगवान को मनुष्य रूप में कल्पित नहीं किया जाता और न व्यक्ति के लिए किये जाने वाले स्वागत, सत्कारों की आवश्यकता पड़ती है। यों चिर अभ्यास को बनाये रहने के लिए नित्य कर्म में उसे सम्मिलित रखे रहना भी आवश्यक है। इससे संग्रहीत श्रद्धा परिपुष्ट होती रहती है। उच्चस्तरीय स्थिति पर पहुँचे हुए साधक भी नित्य कर्म के प्रतीक पूजा को छोड़ते नहीं वरन् आस्था को परिपक्व करने के लिए उसे भी पूर्ववत् अपनाये रहते हैं।
साधना में त्याग बलिदान में उत्साह और अभ्यास (3) साधनात्मक कर्मकाण्डों के माध्यम आत्म शिक्षण की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया।
साधनाएँ हैं। उसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साधन—विधान का ढाँचा खड़ा किया गया है। यह तथ्य समझ लेने पर ही साधक को तत्व ज्ञान उपलब्ध हो गया माना जायगा।
साधना, संस्कृति के उच्च सोपान पर पहुँचने का उच्च शिखर है, उस पर खड़ा होने वाला जो देखता, अनुभव करता और देता है, उसे निस्संकोच अनुपम और अद्भुत कहा जा सकता है।
साधना को किसी अध्ययन प्रिय की तरह ‘स्वान्तः सुखाय’ ही अपनाना चाहिए। परिणाम तो हर भले−बुरे कर्म का होता है फिर कोई कारण नहीं कि आत्म−साधना जैसे महान प्रयोजन में संलग्न होने का कोई प्रतिफल उपलब्ध न हो।
साधना में तपश्चर्या को प्रमुखता दी गई है। तप के कारण उसकी गर्मी से प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की परिस्थितियाँ बनती हैं।
साधना है।
साधना का क्षेत्र अन्तःजगत है। अपने ही भीतर इतने खजाने दबे पड़े हैं कि उन्हें उखाड़ लेने पर ही कुबेर जितना सुसंपन्न बना जा सकता है। फिर किसी बाहर वाले से माँगने जाँचने की दीनता दिखाकर आत्म−सम्मान क्यों गँवाया जाय? भीतरी विशिष्ट क्षमताओं को ही तत्वदर्शियों ने देवी−देवता माना है और बाह्योपचारों के माध्यम से अन्तः संस्थान के भांडागार को करतलगत करने का विधि−विधान बताया है। शारीरिक बल वृद्धि के लिए डम्बल, मुद्गर उठाने घुमाने जैसे कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं।
साधना विज्ञान का लक्ष्य है। इसके लिए अपने चिन्तन एवं कर्तव्य का बिखराव रोककर अभीष्ट प्रयोजन के केन्द्र बिन्दु पर केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इसके लिए अपनी गति विधियाँ लगभग उसी स्तर की रखनी पड़ती हैं जैसे कि भौतिक क्षेत्र में सफलताएँ पाने वाले लोगों को अपनानी होती हैं।
साधना का दूसरा पक्ष उत्तरार्ध उपासना है। विविध−विधि शारीरिक और मानसिक क्रिया कृत्य इसी प्रयोजन के लिए पूरे किये जाते हैं। शरीर से व्रत, मौन, अस्वाद, ब्रह्मचर्य, तीर्थयात्रा, परिक्रमा, आसन, प्राणायाम, जप, कीर्तन, पाठ, बन्ध, मुद्राएँ, नीति, धोति वस्ति, न्योलि, वज्रोली, कपाल भाति जैसे क्रियाकृत्य किये जाते हैं। मानसिक साधनाओं में प्रायः सभी चिन्तन-परक होती हैं और उनमें कितने ही स्तर के ध्यान करने पड़ते हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, हंसयोग, षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण जैसे बिना किसी श्रम या उपकरण के लिये जाने वाले मात्र मनोयोग के सहारे संपन्न किये जाने वाले सभी कृत्य ध्यानयोग की श्रेणी में गिने जाते हैं।
साधनात्मक कर्मकाण्ड करने की आवश्यकता पड़ती है।
साधना कोई जादू चमत्कार नहीं वरन् विशुद्ध विज्ञान है। इसमें देवी-देवताओं को प्रसन्न करके अमुक वरदान पाने की बात सोची और कही जाती है इस बालबोध में भी कुछ हर्ज नहीं, पर तथ्य दूसरा ही है। मानवी सत्ता के कण-कण में जो भरा है वह दिव्य है- अद्भुत है और अनन्त है। उसी को प्राप्त करने के लिए आकांक्षा, साहसिकता, सक्रियता और तत्परता को जुटा देना साधना है। साधना यदि सही दिशा में इसी प्रक्रिया को अपनाते हुए की जा सके तो उसकी सिद्धि सुनिश्चित है।
साधना का प्रतिफल आरोग्य के मूल संस्थानों तक पहुँचता और उस जीवट−जिजीविषा को जगाता है जिसे पाकर हर स्तर का शरीर ऐसे काम कर सकता है जो सामान्य लोगों को चमत्कार जैसे प्रतीत हों।
साधना कैसे की जाती है और साधक को कैसा होना चाहिए यह किसान से सीखा जा सकता है।
साधना द्वारा सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय द्वारा सुना जा सकता है। चूँकि ध्वनि सूक्ष्म है स्थूल नहीं—इसलिए उसे अपने छेद वाले कानों से नहीं—सूक्ष्म शरीर में रहने वाली सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय द्वारा—शब्द तन्मात्रा के रूप में ही सुना जा सकता है। कोई खुले कानों से इन शब्दों को सुनने का प्रयत्न करेगा तो उसे कभी भी सफलता न मिलेगी।
साधना द्वारा मन को इसी तरह सधाया जाता है; जिस प्रकार सरकस वाले सिंह जैसे आक्रमणकारी जन्तु को स्वामिभक्त, आज्ञाकारी एवं उत्पादक बनाने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। सरकस के पशु शिक्षक उन जन्तुओं की अनगढ़ आदतों को छुड़ाने और नये प्रकार के अभ्यास डालने में भारी माथापच्ची करते हैं। उन्हें मार और प्यार की दुहरी भूमिका निभानी पड़ती है। तप साधना और कुछ नहीं। मन की चंचलता और सुख लिप्सा वाली अनगढ़ आदतों को छुड़ाने और उसे उपयोगी प्रवृत्तियों में संलग्न होने का अभ्यस्त बनाने के लिए ऐसे काम करने पड़ते हैं जिन्हें मोटेतौर से क्रूर कर्म की संज्ञा भी दी जा सकती है।
साधना का उद्देश्य इस विस्मृति को स्मृति में बदलना है। कोई वस्तु खो जाती है तो ध्यान करते हैं कि उसे घर से लेकर चले थे तब कहाँ−कहाँ तक साथ थी और फिर कहाँ से खाली हाथ चले। पैसा घटता है तो ध्यान करते हैं कि कहीं रखा तो नहीं—किसी को दिया तो नहीं—कहीं गिरा तो नहीं। मस्तिष्क पर अधिक जोर देने से स्मृति पहले उभरती है और प्रायः याद आ जाती है कि वस्तु या पैसा कहाँ रहा होगा। भौतिक जीवन में हम प्रायः ध्यान के सहारे ही विस्मृति के कारण उत्पन्न होती रहने वाली कठिनाईयों से पीछा छुड़ाते हैं और जो गुम गया है, उसे प्राप्त करते हैं।
साधना और कुछ नहीं। मन की चंचलता और सुख लिप्सा वाली अनगढ़ आदतों को छुड़ाने और उसे उपयोगी प्रवृत्तियों में संलग्न होने का अभ्यस्त बनाने के लिए ऐसे काम करने पड़ते हैं जिन्हें मोटेतौर से क्रूर कर्म की संज्ञा भी दी जा सकती है। तप का बाह्य स्वरूप कुछ ऐसा ही निष्ठुरतापूर्ण है, यद्यपि उसके पीछे आत्मोत्कर्षण का दूरगामी दुलार ही दुलार छलकता देखा जा सकता है।
साधना को संग्राम कहा गया है। ‘साधना समर’ शब्द का अध्यात्म विज्ञान में बार−बार उल्लेख होता है। देवासुर संग्राम के अनेकानेक प्रसंग पौराणिक उपाख्यानों में आते हैं, यह अलंकारिक रूप मनुष्य जीवन के अंतरंग और बहिरंग क्षेत्रों में सदा होते रहने वाले संघर्षों का ही चित्रण है। दुर्गा सप्तशती और गीत की पृष्ठ भूमि इसी संघर्ष के आधार पर खड़ी है भगवती दुर्गा द्वारा असुरों का संहार और कृष्ण द्वारा अर्जुन के माध्यम से महाभारत का आयोजन प्रकारान्तर से इसी तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि साधना समर के क्षेत्र में प्रवेश किये बिना उन अवरोधों से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता जो मनुष्य को दयनीय दुर्दशा में डाले रहने के लिए प्रधान रूप से उत्तरदायी हैं।
साधना कहे जाते हैं। ‘लय’ प्रक्रिया का यह प्रथम सोपान है। अचिन्त्य चिन्तन में असमर्थ—स्थूल भूमिका की मनःस्थिति के लिए यही कृत्य सरल पड़ता है और चेतना का स्तर आगे बढ़ाने में सहायता करता है। प्रतीक उपासना का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ समझा जाना चाहिए।
साधना काल के बहुत पश्चात् तक चलती रहती है और साधक की आत्मिक विशेषता को गतिशील एवं सुस्थिर बनाये रहती है।
साधना रत होने से उनका स्वतंत्र अस्तित्व भासने लगता है। ध्यान की सुविधा के लिए इन शक्ति तत्वों का मनुष्याकृति वाला शरीर भी कल्पित किया गया है। पूर्व मान्यताएँ और साधनात्मक निष्ठाएँ मिलकर उस प्रकार की प्रतिमा का स्वरूप वस्तुतः सामने ले आती हैं और वह ‘इष्टदेव’ साधक की सहायता के लिए प्रस्तुत दीखने लगता है। साधक का व्यक्तित्व और संकल्प इस भाव निर्मित इष्टदेव में प्राण फूँकता है। उस उपास्य में साधक के स्तर के अनुरूप ही शक्ति होती है।
साधना विज्ञान में दिव्य−शक्ति के उत्पादन का महत्व बहुत है, उसके लिए विधि−विधान और कर्मकाण्ड भी बहुत है। पर इससे भी अधिक विस्तार उन साधनाओं का है जो प्रकृति प्रदत्त—सहज उपलब्ध शक्तियों को सुरक्षित रखने एवं केन्द्रीभूत करने के उद्देश्य से बनाई गई हैं।
साधनाएँ स्वास्थ्य संवर्धन के उस गहन अन्तराल तक प्रवेश करती हैं जहाँ तक आहर विहार के सामान्य नियम पालने की प्रतिक्रिया नहीं पहुँचती। देखा गया है कि स्वास्थ्य रक्षा के सामान्य नियम ठीक तरह पालन करने वालों में से भी कई व्यक्ति दुर्बलता और रुग्णता से घिरे रहते हैं। इसका कारण नाड़ी देख कर नहीं जाना जा सकता। कोशिकाओं में तन्तुओं में, पाचक स्रावों में, विशिष्ट ग्रन्थियों में कुछ विलक्षण प्रकार की उलझनें ऐसी खड़ी हो जाती हैं जो शरीर शक्तियों द्वारा किये गये गम्भीर परीक्षणों की पकड़ में भी नहीं आती और अशक्तता एवं रुग्णता की उलझी हुई गुत्थी सुलझने में नहीं आती। इन प्रसंगों में योग विज्ञान के वे प्रयोग आश्चर्यजनक सत्परिणाम उपस्थित करते देखे गये हैं जिनकी विस्तृत व्याख्या विवेचना—प्रयोगशाला के स्तर पर तो नहीं की जा सकती, पर परिणामों की कसौटी पर यह जाना जा सकता है कि यह उपचार कितने अधिक सफल होते हैं।
साधना के लिए उसी छोटी−ब्रह्म परिधि के साथ हमारा सम्पर्क मिला लेना पर्याप्त माना गया है। उपासना का केन्द्र बिन्दु यह ईश्वर ही रहता है।
साधना को अपने साथ बरती गई कठोरता ही कह सकते हैं। दूसरे शौक−मौज में निरत साथी इसे मूर्खता भी कह सकते हैं, पर वस्तुतः वह आरम्भ में बीज की तरह गलने के लिए और पीछे विशाल वृक्ष के रूप में विकसित करने वाली दूरगामी बुद्धिमत्ता ही है।
साधना की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक माना जाय इस मान्यता को सुदृढ़ बनाने की बात ध्यान में बनी रहे यह उद्देश्य दूसरे आचमन का है।
साधना द्वारा चिन्तन को उत्कृष्ट और कर्तृत्व को आदर्श बनाया जाता है। यह जमीन को जोतकर खाद, पानी लगाकर उर्वर बना लेने की तरह है। ऐसी ही परिष्कृत मनोभूमि पर उपासना का बीजारोपण किया जाता है। तभी बोई हुई फसल लहलहाती है। ऐसी ही उर्वरा भूमि पर लगाया गया उद्यान फलता−फूलता देखा जाता है।
साधना, जिसमें चौबीसों घंटे निमग्न रहकर और इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास आनंद और मुक्ति जैसे आनंद का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।
साधना करता रह सकता है। आत्म−साधक की मनः−स्थिति इतनी तो होनी ही चाहिए।
साधना जीवन के बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्रों में सुसंस्कारित सुव्यवस्था उत्पन्न करने का नाम है। इसे समझ पाने और कर पाने का प्रतिफल, जंगली जानवरों को पकड़ कर पालतू बनाने की कला में प्रवीण व्यवसाइयों जैसा ही प्राप्त होता।
साधना जैसी अति उच्चस्तरीय प्राण-प्रक्रिया के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या? उसे यदि सही रीति से सम्पन्न किया जा सके तो आत्म-चेतना के महा समुद्र का मंथन करके वैसे ही रत्न प्राप्त किये जा सकते हैं जैसे कि पौराणिक गाथाओं में समुद्र मंथन के फलस्वरूप उपलब्ध हुए बताये गये हैं।
साधना से वाक् सिद्धि, दूरदृष्टि, दूर श्रवण, सूक्ष्म दृष्टि, परकाया प्रवेश, आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ता है। साधना कोई जादू चमत्कार नहीं वरन् विशुद्ध विज्ञान है। इसमें देवी-देवताओं को प्रसन्न करके अमुक वरदान पाने की बात सोची और कही जाती है इस बालबोध में भी कुछ हर्ज नहीं, पर तथ्य दूसरा ही है। मानवी सत्ता के कण-कण में जो भरा है वह दिव्य है- अद्भुत है और अनन्त है। उसी को प्राप्त करने के लिए आकांक्षा, साहसिकता, सक्रियता और तत्परता को जुटा देना साधना है।
साधना मनोरंजक भटकाव ही कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक क्रियाकृत्यों को योगाभ्यास के आधार साधन मानना ही पर्याप्त है। उन कृत्यों को ही जादुई मान बैठना और उनकी प्रवीणता मिल जाने मात्र से लक्ष्य पूरा हो जाना मान लिया जायगा तो वह विशुद्ध भ्रान्ति ही सिद्ध होगी। एक व्यक्ति दूसरे तक अपने मनोभाव पहुँचाने के लिए कागज कलम का प्रयोग करता है। यह उपकरण निश्चय ही बड़े महत्वपूर्ण हैं।
साधना को सर्वोपरि महत्त्व की तथा सर्व-सुलभ स्तर की माना है। अन्य प्राणायामों के विधि-विधान में अन्तर पड़ने से हानि होने की संभावना भी है पर हंसयोग में —सोऽहम् प्राण साधना में वैसा कोई डर नहीं है। इसमें जप,ध्यान और प्राण इन तीनों ही आधारों का समन्वय है इसीलिए उसे गंगा-यमुना सरस्वती के संगम की तरह तीर्थराज तुल्य माना गया है उससे स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर की बलिष्ठता, बुद्धिमत्ता और सद्भाव सम्पन्नता के त्रिविध लाभ उपलब्ध होते हैं।
साधना समग्र ब्रह्म की ही होनी चाहिए।
साधना का महत्व किसान जानता है। पूरे वर्ष अपने खेत की मिट्टी के साथ अनवरत गति से लिपटा रहता है और फसल को स्वेद कणों से नित्य ही सींचता रहता है। सर्दी−गर्मी की परवाह नहीं—जुकाम−खाँसी की चिन्ता नहीं। शरीर की तरह ही खेत उसका कर्म क्षेत्र होता है। एक−एक पौधे पर नजर रहती है।
साधना अपने आप में एक छोटा उपकरण मात्र है। उसका महत्व इसलिए है कि वह ‘साध्य’ को प्राप्त कराने में सहायता करती है। कई लोग साधन को ही ‘साध्य’ समझ बैठते हैं और उन उपचारों को ही योग कहने लगते हैं जो साधना प्रयोजन में प्रयुक्त होते हैं।
साधनात्मक क्रिया कृत्यों का यह उद्देश्य समझ लिया जाय तो फिर किसी को भी न तो अनावश्यक आशा बाँधनी पड़ेगी और न अवांछनीय रूप से निराश होना पड़ेगा।
साधना ही कहा जा सकता है।
साधना जिसे वह होश संभालने के दिन से लेकर मरणपर्यन्त सतत् निष्ठा के साथ चलाता ही रहता है। न विश्राम, न थकान, न ऊब, न अन्यमनस्कता। साधना कैसे की जाती है और साधक को कैसा होना चाहिए यह किसान से सीखा जा सकता है।
साधना का एकमात्र उद्देश्य है। इसमें जो कड़ाई बरतनी पड़ती है उसे सुधार प्रयोजन के लिए कुछ क्षण के लिए बरती गई विवशता भर समझना जाना चाहिए। उसे प्रसव पीड़ा की उपमा दी जा सकती है। ऐसे तो सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए मन मारना पड़ता है और अपने रूखे नीरस प्रयोजनों में तन्मय होना पड़ता है। मोटेतौर से इस साधना को अपने साथ बरती गई कठोरता ही कह सकते हैं।
साधना विज्ञान की दौड़ इन्हीं दो क्षेत्रों के विकास में सहायता करने वाले विधि-विधान बनाने में केन्द्रीभूत है। इतना बन पड़े तो अगली बात निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त दिव्य चेतना के प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन पर छोड़ी जा सकती है। अपना आपा ही इतना ऊंचा उठ जाता है कि पृथ्वी की आकर्षण शक्ति से ऊपर निकल जाने के बाद राकेट जिस प्रकार अपनी यात्रा अपने बल-बूते चलाने लगते और अमुक कक्षा बनाकर भ्रमण करने लगते हैं, उसी प्रकार स्वयमेव आत्म साधना का शेष भाग पूरा हो सकता है।
साधना की चमत्कारी सिद्धि के रूप में देखा जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-May
साधना है॥
साधना में भगवान की प्राप्ति जल्दी ही होती है।
साधना को निरन्तर श्रद्धापूर्वक अपनाना चाहिए।
साधना और तपस्वी जीवन क्रम अपनाकर समग्र तादात्म्य की मनःस्थिति में अधिक समय तक की जाने वाली उपासना का निश्चित रूप से अधिक प्रतिफल होता है। आत्मबल संवृद्धि की दिशा में बढ़ने के लिए उपयुक्त प्रकाश प्राप्त करना इन अनुष्ठान पुरश्चरणों का प्रमुख प्रयोजन होता है। साधन की कठिनता के अनुरूप ही उनकी उपलब्धियाँ भी बढ़ी-चढ़ी होती हैं।
साधनाओं के बल पर जगत् को कुछ दे पाने में सफलता प्राप्त की। यदि शिक्षा और विद्या के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ अथवा सम्पन्नावस्था इतनी ही आवश्यक थी तो इन सब का उच्चकोटि के सृजनशील साहित्यकार हो पाना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी था।
साधना मन्दिर स्थापित होगा। साधना मण्डल इन दिनों स्थापित हो रहे हैं। उन्हें साधना मन्दिरों के रूप में विकसित एवं परिपुष्ट होना चाहिए।
साधना का स्वर्ण-जयंती वर्ष है। विगत पचास वर्षों से हम अपनी अगाध आस्था ईश्वर भक्ति के केन्द्र पर केन्द्रित किये रहे हैं। इस मार्ग पर चलते हुए जिन उपलब्धियों का दिव्य अनुदान मिलता रहा है उनने इस प्रयत्न के लिए विवश कर दिया है कि इस विशेष वर्ष में आस्तिकता के विस्तार का अधिक प्रयत्न किया जाय। तद्नुसार 45 मिनट की सामूहिक साधना का उपक्रम बना- सम्बद्ध परिजनों को उसमें सम्मिलित होने का आमन्त्रण दिया गया। प्रसन्नता की बात है कि अपने प्रस्तुत परिजनों में से एक लाख को सम्मिलित करने की सीमा लगभग पूरी होने को है।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष में उपासना उपचार में उत्साह उत्पन्न करने के साथ-साथ उसके पीछे प्राण चेतना की तरह काम करने वाले तथ्यों को भी हृदयंगम कराया जा सकता तो ही इस प्रबल प्रयत्न की सार्थकता समझी जा सकती है- जिसमें एक लाख भावनाशील परिजनों को आग्रहपूर्वक सम्मिलित किया गया है। उपासना की 45 मिनट वाली पूजा प्रक्रिया जिस उत्साह से की जा रही है उतने ही विश्वासपूर्वक उस तत्वज्ञान को, जीवन दर्शन को, परमलक्ष्य को अपनाया जाना चाहिए जिनसे इस सुरदुर्लभ मनुष्य की सार्थकता सिद्ध होती है। दर्शन की अपेक्षा करके मात्र उपचार ही अपनाया गया तो समझना चाहिए कि निष्प्राण शरीर की सेवा, सज्जा मात्र के लिए श्रम किया जा रहा है।
साधना को अनुष्ठान तो नहीं कह सकते, पर सामान्य जप क्रमशः उनका विशेष महत्व है। इसे न्यूनतम तीन दिन में और अधिकतम दस दिन में पूरा करना चाहिए। उपवास, ब्रह्मचर्य यह दो नियम तो इसमें भी आवश्यक है। उपवास में फलाहार पर रहना कठिन हो तो एक अन्न और एक शाक पर निर्वाह करना भी सामान्य उपवास में गिना जा सकता है। इस सामान्य साधनाओं के सम्बन्ध में निर्देश इस प्रकार मिलते हैं-
साधना मन्दिरों के रूप में विकसित एवं परिपुष्ट होना चाहिए।
साधना में निरत है। धन तो सबसे हलकी वस्तु होने के कारण उसकी एक-एक पाई पहले से ही समर्पित हो चुकी है। समर्पण की अध्यात्म दर्शन में असीम महिमा है। यह समर्पण-शरणागति- वाचालता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए उसे यथार्थवादी होना चाहिए।
साधना। दोनों के समन्वय है- “सद्भाव सम्वर्धन की लोक साधना” इस प्रयत्न में संलग्न रहकर ही मनुष्य अपनी पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाता है और आत्म विस्तार के साथ जुड़े हुए देवत्व का अधिग्रहण करता है।
साधना को प्राण के रूप में प्रतिपादित किया जा रहा है। मनुष्य शरीर और प्राण दोनों का ही समन्वय है। इनमें से कोई भी अकेला होने पर अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकता । उपासना में हमें श्रद्धावान होना चाहिए साथ ही सेवा साधना की गरिमा के प्रति भी निष्ठा में त्रुटि नहीं आने देनी चाहिए।
साधना’ कहते हैं। उसमें भावनाओं के विकास को आगे रखना होता है। भावनाओं में सर्वोपरि है- प्रेम। इसी के इर्द गिर्द दिव्य सम्वेदनाओं का सारा परिकर जुड़ा होता है।
साधना में लगती है तब वह शक्ति रूप होती है। शक्ति भी ऐसी जिसकी परिधि में वह सब कुछ आ जाता है जिसे अद्भुत एवं महान कह सकते हैं।
साधना’। ‘सेवा-पूजा’ समानार्थक शब्द है और बोलचाल में साथ-साथ प्रयुक्त होते हैं। भक्ति भावना की आत्मीयता के विस्तार के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ माना गया है। इसमें अपनेपन की- सीमित परिधि को अधिकाधिक विस्तृत करने का स्पष्ट संकेत है। अपना सुख बाँट देने और दूसरों का दुःख बंटा लेने की उदारता जहाँ जिस सीमा तक उमंगती हो समझना चाहिए कि वहीं उसी सीमा तक सच्ची भक्ति भावना प्रवाहित हो रही है।
साधना करने वाले साधक अपने लक्ष्य में सफल होकर ही रहते हैं।
साधना की गरिमा के प्रति भी निष्ठा में त्रुटि नहीं आने देनी चाहिए।
साधना के साथ ध्यान प्रक्रिया इसीलिये जोड़ी गई कि उच्चारण के साथ-साथ मानसिक एकाग्रता बनी रहे और प्रयुक्त शब्द प्रवाह को सामर्थ्यवान बनने के लिए एकाग्रताजन्य ऊर्जा की सहायता मिलती रहे।
साधना के लिए आधार खड़ा करना भर है। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम एवं भगवान कृष्ण को पूर्ण पुरुष कहा जाता है। उनकी वास्तविक प्रतिमा बना सकना कठिन है। क्योंकि उनके अवतरण काल में यथार्थ चित्रकला का कोई प्रमाणिक आधार उपलब्ध नहीं है। जो भी चित्र या प्रतिमा गढ़ी हैं वे मानवी कल्पना पर अवलम्बित हैं।
साधना” इस प्रयत्न में संलग्न रहकर ही मनुष्य अपनी पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाता है और आत्म विस्तार के साथ जुड़े हुए देवत्व का अधिग्रहण करता है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के साधकों ने जिस उत्साह से उपासनात्मक सरल प्रक्रिया अपनायी है उसी उत्साह से उन्हें कठिन परीक्षण के लिए भी साहस जुटाना चाहिए। अंशदान की बात न तो अनावश्यक है और न अपेक्षणीय। सच तो यह है कि अंशदान प्राण है और उपचार आवरण। उपासना की एक बार उपेक्षा की जा सकती है और अंश दान की अभिवृद्धि करते हुए जीवन लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, पर मात्र मन्त्र तन्त्र तक सीमित कृपणता की परिधि में जकड़ी हुई उपासना कोई महत्वपूर्ण प्रतिफल प्रस्तुत न कर सकेगी। ईश्वर की अनुकम्पा भावना-स्तर की परख पर आधारित है, उसे मात्र टंट-घंट के सहारे आकर्षित नहीं किया जा सकता, इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह, जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही अच्छा है।
साधना के साथ-साथ उदार आत्मविस्तार का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने वाली अंशदान प्रतिज्ञा का समावेश करना प्रत्येक अध्यात्मवादी का पुनीत कर्तव्य है। अखण्ड ज्योति परिजनों से इसी त्रिवेणी में स्नान करके परम पद प्राप्त करने का अनुरोध है। अंशदान की प्रवृत्ति को प्रखर बनाने और उसे इसी गायत्री जयन्ती से गुरुपूर्णिमा के बीच कार्यरूप में परिणत कर देने के आग्रह सहित यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं।
साधना का उपक्रम बना- सम्बद्ध परिजनों को उसमें सम्मिलित होने का आमन्त्रण दिया गया। प्रसन्नता की बात है कि अपने प्रस्तुत परिजनों में से एक लाख को सम्मिलित करने की सीमा लगभग पूरी होने को है। गायत्री जयन्ती 8 जून 76 को उसमें प्रवेश बन्द हो जायगा। इसके पश्चात प्रस्तुत साधक अपने क्षेत्र में अनुसाधक बनाते रहेंगे और स्थानीय साधना मण्डलों का गठन करके उनकी गतिविधियाँ वार्षिक सूत्रों आधार पर सजीव बनाये रहने के लिए प्रयत्न करते रहेंगे।
साधना और प्रयोगों द्वारा ही समझा जा सकता है। सामान्य स्वप्नों के माध्यम से भविष्य को परखने की विद्या हमारे यहाँ स्वप्नों के शुभाशुभ निर्णय करने वाले विज्ञान के रूप में भी विकसित हुई है, पर उस सम्बन्ध में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता क्योंकि साहित्य और इतर सूत्रों द्वारा इस सम्बन्ध में जो भी जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं वे तथ्यों पर आधारित हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि जीवन में विविध दिशाओं से उस अविज्ञात तत्व का नियंत्रण मिलता रहता है जिसे चेतन कहते हैं। वह अपनी उपस्थिति का आभास किन्हीं न किन्हीं रूपों में कराता ही रहता है।
साधना है।
जिन्दगी सोना नहीं है जिन्दगी तो जागना है॥
साधना वर्ष को अंशदान आरम्भ करने का आग्रह स्थानीय परिजनों को समझायें तो बड़ी आसानी से 24 ज्ञान घट स्थापित करने में सफलता मिल सकती है। चौबीस अक्षर के गायत्री मंत्र का एक-एक अक्षर 24 ज्ञानघटों के रूप में साधना मन्दिर स्थापित होगा। साधना मण्डल इन दिनों स्थापित हो रहे हैं। उन्हें साधना मन्दिरों के रूप में विकसित एवं परिपुष्ट होना चाहिए।
साधना के सहारे ही विकसित होती है।
साधना में वाणी से ही सारा कार्य पूरा नहीं कर लिया जाता वरन् भीतरी अवयवों में से प्रत्येक द्वारा एक विशिष्ट ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करना पड़ता है। उसकी क्षमता श्रवणातीत ध्वनियों के स्तर की होती है। शरीर के अवयवों से ध्वनि तरंगें निकलती हैं यह तथ्य वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रमाणित हो चुका है।
साधना मण्डल इन दिनों स्थापित हो रहे हैं। उन्हें साधना मन्दिरों के रूप में विकसित एवं परिपुष्ट होना चाहिए।
साधना से परिष्कृत अन्तः चेतना को अपनी सघन आत्मीयता एवं सहृदयता का परिचय पग-पग पर देना होता है। इससे प्रेमी तो धन्य होता ही है- प्रेम पात्र को भी अति महत्वपूर्ण लाभ मिलता है। गंगा स्वयं तो पवित्र होती ही है उसमें स्नान करने वाले भी पवित्र बनने लगते हैं।
साधना हमें दृष्टि की प्रखरता और व्यापकता का अनुपम उपहार दे सकती है।
साधना का सम्मिलित रूप है उससे सृष्टि के विराट् और अणु से अणु कण का भेदन भी सम्भव हो जाता है।
साधना मण्डलों का गठन करके उनकी गतिविधियाँ वार्षिक सूत्रों आधार पर सजीव बनाये रहने के लिए प्रयत्न करते रहेंगे।
साधना करने से वह अन्तर्ज्योति विकसित हो सकती है जिसके माध्यम से लोक लोकान्तरों की भू गर्भ की पंचभौतिक परिस्थितियों को देखा और समझा जा सके। इतना ही नहीं इस नेत्र में वह शक्ति भी है कि जीवित प्राणियों की मनःस्थिति, भावना, कल्पना, योजना, इच्छा, आस्था एवं प्रकृति को भी समझा जा सके। इस आज्ञाचक्र को विकसित करने की साधना हमें दृष्टि की प्रखरता और व्यापकता का अनुपम उपहार दे सकती है।
साधना का एक अनिवार्य अंग मानें और उसके लिए नित्य तकाजा करने वाले ज्ञान घटों को पुनः स्थापित कर दें, इस बार उनकी स्थापना इतनी निष्ठा से करें कि वे फिर उपेक्षा अवज्ञा के गर्त में न गिर पड़े।
साधना का उद्देश्य यह है कि जीवन अपनी मलीनताओं से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयत्न करे और अपने इष्टदेव की-भगवान की- समीपता समता प्राप्त करता हुआ आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ता चला जाय। इस प्रगति का परिचय इसी कसौटी पर मिलता है कि व्यक्ति ने संकीर्ण स्वार्थपरता को किस सीमा तक छोड़ा और अपनी आत्मीयता का विस्तार कितनी परिधि तक फैलाया।
साधना प्रक्रिया अपनाई जाती है।
साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा विकसित कर लिया जाये तो नेत्रों की बहुत आवश्यकता उनके माध्यम से भी पूरी हो सकती है। इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियों के कार्य एक सीमा तक दूसरे अंग कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये गये पवहारी बाबा प्रत्यक्षतः वायु ही ग्रहण करते थे, अन्न जल सेवन नहीं करते थे पर शरीर के अन्य अंगों द्वारा अदृश्य जगत से सूक्ष्म आहार बराबर मिलता रहता था। इसके बिना किसी के लिए भी जीवन धारण किये रहना असम्भव है।
साधना कह सकते हैं। इस ओजस् तेजस्विता के सामने या सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति ही प्रभावित नहीं होते वरन् वातावरण भी विनिर्मित होता है। जहाँ सज्जन निवास करते हैं वहाँ बसन्त जैसी सुरभित प्रफुल्लता छाई हुई देखी जा सकती है और उस सुषमा से कितनों को कितनी प्रेरणा मिल रही है यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। यह सब प्राण शक्ति के विस्तृत होने का ही परिणाम है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष की उपासना आरम्भ की है उसी श्रद्धा से अंशदान का उसमें प्राण संचार होना चाहिए। विदाई समारोह पर लोगों ने अपने-अपने यहाँ ‘ज्ञान घट’ स्थापित किये थे लगता है वह उत्साह पानी के बुलबुलों की तरह ठंडा पड़ गया। वे डिब्बे समझ गये और जहाँ-तहाँ छितरा दिये गये। प्रत्येक प्रतिमाएं टंगी रहें और भाव निष्ठा मर जाये तो यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। उपासना संलग्न और बिना उपासना वाले सभी परिजनों से इस बार पुनः आग्रह है कि अंशदान को आत्मोत्कर्ष साधना का एक अनिवार्य अंग मानें और उसके लिए नित्य तकाजा करने वाले ज्ञान घटों को पुनः स्थापित कर दें, इस बार उनकी स्थापना इतनी निष्ठा से करें कि वे फिर उपेक्षा अवज्ञा के गर्त में न गिर पड़े।
साधना का लाभ मिलता है।
साधना करता है उसकी श्री भीतर ही बनी रहती है। स्वर ही श्री है। जो उसे भीतर ही रखता है सो तृप्त हो जाता है- उसके अभाव पूर्ण हो जाते हैं।
साधनाओं के सम्बन्ध में निर्देश इस प्रकार मिलते हैं-
साधना वर्षों में वे रात को मजदूरी करते और दिन में कार का काम करते थे। यह लगन जब पूरी हुई तो फोर्ड चमत्कृत हो उठे। जब उनकी कार ने पहली बार कुछ दूरी तय की तो उन्हें इस पर विश्वास ही नहीं हो सका।
साधना केवल कुछ शब्दों के संग्रह को बार-बार दुहराते रहना भर नहीं है वरन् शब्द शक्ति का विज्ञान समस्त उपयोग है। उनमें मंत्र साधक को संयम, मनोनिग्रह और भाव संवर्धन के तीनों तत्व मिलाने पड़ते हैं तब कहीं शब्द शक्ति के चमत्कारी विकास का अवसर मिलता है। शरीर के विकास में अन्न, जल और वायु का पोषण चाहिए। उसी प्रकार शब्द को मंत्र शक्ति का रूप धारण करने के लिए साधक को त्रिविध परिष्कार की आवश्यकता पड़ती है। यों शब्द समुच्चय के रूप में बने हुए मंत्रों की अपनी निजी विशेषता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
साधना के लिए-समर्पित किया जाय। इस दिशा में बढ़ते हुए प्रत्येक चरण ने हमें असीम आनन्द दिया है और अनुदान की मात्रा बढ़ाते चलने के लिए विवश किया और अन्ततः इस स्थिति तक पहुँचाया है कि अपनी जैसी कोई भी वस्तु शेष नहीं रह गई है। समय, श्रम, चिन्तन एवं कौशल का एक-एक कण लोक-साधना में निरत है। धन तो सबसे हलकी वस्तु होने के कारण उसकी एक-एक पाई पहले से ही समर्पित हो चुकी है। समर्पण की अध्यात्म दर्शन में असीम महिमा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-June
साधना का विस्तार विश्व-व्यापी उत्साह के साथ हुआ है। इस अवधि में वामाचार के अनेक सम्प्रदाय प्रकट हुए और अनेक ग्रन्थ रच गये। 17 वीं सदी में फ्राँस के शासक 14 वें लुई के जीवन वृत्तान्त में उसकी एक ऐसी प्रेमिका का विस्तृत वर्णन है जो काला जादू जानती थी और शासन सूत्र में अपने इशारों से भारी उलट-पुलट प्रस्तुत करती थी। काला जादू अभी भी पाश्चात्य देशों में ब्लैक मास के नाम से प्रसिद्ध है। इसी साधना का प्रधान उपचार यह है कि मनुष्य आकृति का क्रूस बनाकर उसे उलट दिया जाता है और उस पर एक युवती को नग्न करके लिटाया जाता है।
साधना’ इसी प्रयत्न का नाम है। अपनी अविज्ञात अलौकिकताओं को विज्ञात एवं प्रत्यक्ष बनाने में सफलता प्राप्त होती है उसी का नाम सिद्धि है। यह कोई जादुई आकस्मिकता नहीं, वरन् पूर्णतः वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक सूत्रों के साथ जुड़ी हुई विधि व्यवस्था है।
साधना से नहीं पाई जा सकती। इसके लिए तो गुरु चरणों की शरण लेनी होगी और विनम्रता पूर्वक उनके निर्देशों का पालन करते हुए सतत अभ्यास करना होगा। तुम जिस मार्ग पर साधना कर रहे हो वह विद्या प्राप्ति की नहीं वरन् आत्मा पर आच्छादित राग द्वेष क्रोध लोभ आदि विकारों को उन्मूलित करने की है।”
साधना कर रहे हो वह विद्या प्राप्ति की नहीं वरन् आत्मा पर आच्छादित राग द्वेष क्रोध लोभ आदि विकारों को उन्मूलित करने की है।”
साधना द्वारा प्रजनन तत्व को परिष्कृत किया जाय तो वह उद्देश्य सहज ही पूरा हो सकता है जिसके लिए संसार का विचारशील वर्ग इतना व्यग्र है और औंधे सीधे उपायों की उलट-पुलट कर रहा है।
साधना सम्मेलन सम्भव हो सके। स्पष्ट है कि सम्मेलनों की उपयोगिता संगठन को सुदृढ़ बनाने और उत्साहवर्धक गतिविधियाँ उत्पन्न करने की दृष्टि से असंदिग्ध है, साधनों, मण्डलों और अपने-अपने क्षेत्र में उपासना, उपचार और साधना व्यवहार की उभय-पक्षीय प्रक्रिया आरम्भ करके प्रखर अध्यात्म का पुनर्निर्माण करने में कटिबद्ध होना चाहिए।
साधना व्यवहार की उभय-पक्षीय प्रक्रिया आरम्भ करके प्रखर अध्यात्म का पुनर्निर्माण करने में कटिबद्ध होना चाहिए।
साधना से लाभान्वित व्यक्ति का आभार और संसार में आनन्द वृद्धि का लाभ उपकारी को मिलेगा-- यह निश्चित है। पर उतना ही व्यर्थ है यह भी कि उसकी आशा की जाय। अध्यात्म की दृष्टि से समूचा विश्व ही एक शरीर है। शरीर के किसी अंग में या कि पैर के तलुओं में खुजली उठे तो हाथ दौड़कर तुरन्त उस स्थान को खुजलाते हैं। लेकिन उस समय वह आशा नहीं की जाती कि हाथ को उसके परिश्रम का प्रतिदान मिलेगा।
साधना द्वारा आत्मबलवर्धन का प्रत्यक्ष लाभ भी इस आधार पर प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके। भाषण कला की सारभूत शिक्षा प्राप्त करना भी इन सत्रों में बन पड़ता है यह इनका दुहरा लाभ है।
साधना से अनंत गुना परिणाम प्राप्त करता है।
साधना के दुष्परिणामों के विरुद्ध उस मार्ग के पथिकों को सचेत करे। भारत में समय समय पर इस प्रकार की विकृतियों के उभार को निरस्त किया जाता रहा है तो क्यों नहीं हमें आगे बढ़कर विदेशों में फैलने वाली उस योग विकृति का निराकरण करना चाहिए।
साधना सत्रों में पहुँच सकना सम्भव हो सके उन्हें अपने लिए यथा सम्भव जल्दी ही स्थान सुरक्षित करा लेने चाहिएं।
साधना का प्रधान उपचार यह है कि मनुष्य आकृति का क्रूस बनाकर उसे उलट दिया जाता है और उस पर एक युवती को नग्न करके लिटाया जाता है। फिर उसके अंगों को मद्य, माँस केक आदि के मधुपर्क से पूजा जाता है और नृत्य, वाद्य का कीर्तन जैसा अभिचार चलता है। यह सामान्य विधान हुआ। विशेष उपचार इसके अतिरिक्त है जिनमें ऐसे कृत्यों का आश्रय लिया जाता है जो सामान्य तथा अश्लील या असभ्य माने जाते हैं। अपने अघोरी कापालिक भी ऐसी ही वीभत्स रीति-नीति अपनाते रहते हैं।
साधना मण्डल बना लें। एक कार्यवाहक चुन लें और प्रयत्न यह करें कि उसकी चार दिवसीय साधना सम्मेलन सम्भव हो सके। स्पष्ट है कि सम्मेलनों की उपयोगिता संगठन को सुदृढ़ बनाने और उत्साहवर्धक गतिविधियाँ उत्पन्न करने की दृष्टि से असंदिग्ध है, साधनों, मण्डलों और अपने-अपने क्षेत्र में उपासना, उपचार और साधना व्यवहार की उभय-पक्षीय प्रक्रिया आरम्भ करके प्रखर अध्यात्म का पुनर्निर्माण करने में कटिबद्ध होना चाहिए।
साधना पथ इसी आवश्यकता पूर्ति के लिए है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में एक लाख साधकों को प्रकाश देने का संकल्प किया गया था वह संख्या पूरी हो चुकी अस्तु गायत्री जयन्ती 7 जून 76 से वह पंजीकरण बन्द कर दिया गया है। जो साधक बने हैं उनसे अपेक्षा की गई है कि अपने-अपने सम्पर्क क्षेत्र में उसी शृंखला के अन्तर्गत अनुसाधक बनायें। जहाँ बीस साधक हो सकें वहां उनका एक साधना मण्डल बना लें। एक कार्यवाहक चुन लें और प्रयत्न यह करें कि उसकी चार दिवसीय साधना सम्मेलन सम्भव हो सके। स्पष्ट है कि सम्मेलनों की उपयोगिता संगठन को सुदृढ़ बनाने और उत्साहवर्धक गतिविधियाँ उत्पन्न करने की दृष्टि से असंदिग्ध है, साधनों, मण्डलों और अपने-अपने क्षेत्र में उपासना, उपचार और साधना व्यवहार की उभय-पक्षीय प्रक्रिया आरम्भ करके प्रखर अध्यात्म का पुनर्निर्माण करने में कटिबद्ध होना चाहिए।
साधना की महत्ता को वह भूल जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर सफल-लेखक, कवि, वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक एवं महापुरुषों ने अपनी साधना की पूर्णता के पूर्व अपने क्रियाकलापों को गुप्त रखा, प्रशंसा और प्रसिद्धि से अपने को अछूता रखा और अहंकार के शिकंजे से कोसों दूर रहे।
साधना और तप को उपासना कहा गया है। प्राचीनकाल में इस दिशा में उत्साहवर्धक प्रगति हुई थी और इस विद्या के विशेषज्ञों ने अपनी उपलब्धियों को ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में सर्व साधारण के सामने रखा था। अपने शरीर और मस्तिष्क को एक अच्छी-खासी वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रूप में परिणत करके उन्होंने इस तथ्य को प्रमाणित किया था कि “पूर्ण मदः पूर्ण मिदं” पूर्ण से उत्पन्न हुआ यह भी पूर्ण है। आवश्यकता केवल प्रसुप्ति को जागृति में परिणत करने भर की है। ‘साधना’ इसी प्रयत्न का नाम है।
साधना पनपी थी तो उसके दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए विज्ञ मनीषियों ने उसे निरस्त किया था। भगवान बुद्ध जब जन्मे तब उन्होंने अपने चारों ओर हिंसावादी तन्त्राचार पनपता पाया उन्होंने उसके विरुद्ध क्रान्तिकारी प्रतिरोध प्रस्तुत किया। बुद्धदर्शन इसी प्रतिरोधात्मक विचार क्रान्ति का नाम है। भगवान महावीर जी उन्हीं दिनों जन्मे उन्होंने भी जैन दर्शन की अहिंसावादी आस्था की जड़ जमाई और असुरता समर्थक वाम मार्ग को उखाड़ा। इस संदर्भ में भगवान शंकराचार्य के प्रयत्न भी कम सराहनीय नहीं हैं।
साधना और श्रम देखकर हतोत्साह हो गया। उसने तप द्वारा विद्या प्राप्ति का निश्चय किया। यह निश्चय कर वह सघन वन में सरिता तट पर कुटी बना तप करने लगा, उसके तपोबल से प्रसन्न हो इन्द्रदेव ने उसके सम्मुख प्रकट हो कहा- तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो तुम्हें वरदान देने आया हूँ। तुम्हारी इस तपस्या का क्या प्रयोजन है?
साधना में लगे रहना उनके लिए सर्वथा उपयुक्त था। उनकी वेश-भूषा भी परिस्थिति-जन्य थी। प्रायः अधिकाँश ऋषियों के पत्नी और बच्चे थे। जगत व्यापार में लोक-व्यवहार करते हुए भी आत्मा की निर्मलता उनका लक्ष्य था। वायु में गंध मिली होती है।
साधना के लिए गये थे और बेर के फल खाकर वे दोनों दीर्घकालीन साधन करते रहे थे। इसके उपरान्त इन्हें प्रद्युम्न पुत्र प्राप्त हुआ था जो आकृति-प्रकृति में पूर्णतया अपने पिता जैसा ही था। पुराण ग्रन्थों को ध्यान पूर्वक पढ़ने से यह विदित होता है कि तपस्वी ऋषि अपनी पत्नियों समेत रहते थे और पुनीत आरण्यकों में ऐसी सन्तान उत्पन्न करते थे जो ऋषि परम्परा के अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह आगे बढ़ा सके। व्यास, वशिष्ठ, शुकदेव, परशुराम, शृंगी, अत्रि, भरद्वाज, याज्ञवलक्य आदि अधिकाँश ऋषि अपने ऋषि माता-पिताओं से ही उत्पन्न हुए थे। उनमें से भी अधिकाँश ने संतानोत्पादन किया।
साधना करें जैसी कि स्वायंभु मनु और शतरूपा रानी ने इसी उद्देश्य के लिए तप करके दशरथ और कौशल्या का शरीर धारण करके भगवान राम जैसे परिष्कृत व्यक्तित्व को जन्म दिया था। भगवान कृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी को लेकर संतानोत्पादन तप करने के लिए बद्रीनाथ स्थल में हिमालय साधना के लिए गये थे और बेर के फल खाकर वे दोनों दीर्घकालीन साधन करते रहे थे। इसके उपरान्त इन्हें प्रद्युम्न पुत्र प्राप्त हुआ था जो आकृति-प्रकृति में पूर्णतया अपने पिता जैसा ही था। पुराण ग्रन्थों को ध्यान पूर्वक पढ़ने से यह विदित होता है कि तपस्वी ऋषि अपनी पत्नियों समेत रहते थे और पुनीत आरण्यकों में ऐसी सन्तान उत्पन्न करते थे जो ऋषि परम्परा के अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह आगे बढ़ा सके। व्यास, वशिष्ठ, शुकदेव, परशुराम, शृंगी, अत्रि, भरद्वाज, याज्ञवलक्य आदि अधिकाँश ऋषि अपने ऋषि माता-पिताओं से ही उत्पन्न हुए थे।
साधना की तुलना में अत्यधिक उच्चस्तर के सत्परिणाम मिल सकते हैं। आत्म निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज-निर्माण की व्यावहारिक शिक्षा भी प्रेरणाप्रद प्रवचनों एवं परामर्शों के रूप में मिलती रहेगी। भाषण कला का अभ्यास कराना इस बार के सत्रों में विशेष रूप से जोड़ दिया गया है। साधना परामर्श के साथ प्रवचन कला के समन्वय से यह सत्र पूर्व सत्रों की अपेक्षा भी अधिक उपयोगी सिद्ध होंगे।
साधना शृंखला के सदस्यों को यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि वे एक गायत्री पुरश्चरण शान्ति कुँज के अति प्रभावी वातावरण से सम्पन्न करने का अवसर प्राप्त करेंगे। दस दिवसीय सत्रों की व्यवस्था इसी दृष्टि से की गई है कि न केवल सान्निध्य, सम्पर्क, प्रकाश परामर्श का वरन् साधना द्वारा आत्मबलवर्धन का प्रत्यक्ष लाभ भी इस आधार पर प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके। भाषण कला की सारभूत शिक्षा प्राप्त करना भी इन सत्रों में बन पड़ता है यह इनका दुहरा लाभ है।
साधना भारत में वाम मार्ग कहलाई और पाश्चात्य देशों में उसे मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, ऑकल्ट साइन्स, टेलीपैथी आदि नाम दिये गये। पाश्चात्य लोगों का योग संकल्पबल मनोबल और इच्छा शक्ति के अभिवर्धन तक सीमित रहा जबकि भारतीय वामाचार में अमुक देवी देवताओं की सहायता से साँसारिक सफलताओं को प्राप्त करने वाली बात भी सम्मिलित थी।
साधना जयन्ती वर्ष में तो इसी दिशा में व्यापक वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
साधना सत्र चलेंगे। शिक्षित महिलाएं भी उतने समय के लिए संक्षिप्त महिला प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आ सकती हैं। वानप्रस्थ सत्र एक महीने के होंगे। उस अवधि में भी अलग से एक महीने के महिला सत्र चला करेंगे। दस दिन वाले तथा एक महीने वाले सत्रों में पाठ्य-क्रम तो स्वभावतः न्यूनाधिक रहेगा, पर विषय एक जैसे ही रहेंगे।
साधना ही उनका जीवन था। उस समय वन सम्पदा का बाहुल्य था- वहाँ अपने आश्रम बनाकर अपनी ज्ञान-साधना में लगे रहना उनके लिए सर्वथा उपयुक्त था। उनकी वेश-भूषा भी परिस्थिति-जन्य थी। प्रायः अधिकाँश ऋषियों के पत्नी और बच्चे थे। जगत व्यापार में लोक-व्यवहार करते हुए भी आत्मा की निर्मलता उनका लक्ष्य था।
साधना परामर्श के साथ प्रवचन कला के समन्वय से यह सत्र पूर्व सत्रों की अपेक्षा भी अधिक उपयोगी सिद्ध होंगे।
साधना सत्र प्रत्येक महीने तीन होंगे (1) पहली तारीख से दस तक (2) ग्यारह से बीस तक (3) इक्कीस से तीस तक। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ अनुशासन प्रिय और सज्जनोचित स्वभाव वाले लोगों को ही इनमें आने के लिए आवेदन करने चाहिएं। छपे हुए आवेदन पत्र-जवाबी लिफाफा भेजकर मँगा लेने चाहिएं और उन्हें भेजकर स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए। बिना स्वीकृति आ पहुँचने वालों को प्रवेश न मिल सकेगा।
साधनाएं कराई जायेंगी। गंगा तट, हिमालय की गोद आश्रम का प्राणवान वातावरण-दिव्य संरक्षण यह चारों ही अतिरिक्त आधार मिल जाने से घर पर की जाने वाली साधना की तुलना में अत्यधिक उच्चस्तर के सत्परिणाम मिल सकते हैं। आत्म निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज-निर्माण की व्यावहारिक शिक्षा भी प्रेरणाप्रद प्रवचनों एवं परामर्शों के रूप में मिलती रहेगी। भाषण कला का अभ्यास कराना इस बार के सत्रों में विशेष रूप से जोड़ दिया गया है। साधना परामर्श के साथ प्रवचन कला के समन्वय से यह सत्र पूर्व सत्रों की अपेक्षा भी अधिक उपयोगी सिद्ध होंगे।
साधना के भी उलटे सीधे प्रयोग नई उमंगों के साथ चल रहे हैं। इन दिनों वामाचार पाश्चात्य देशों में जिस तेजी से पनपा है उसे देखते हुए आश्चर्य होता है कि वहाँ भूतकाल में भारत में छाये हुए तंत्र युग को भी पीछे छोड़ देने वाला उत्साह उमड़ने लगा है।
साधना का-उपकार भावना का यथार्थ आनन्द लिया जाय।
साधना की पूर्णता के पूर्व अपने क्रियाकलापों को गुप्त रखा, प्रशंसा और प्रसिद्धि से अपने को अछूता रखा और अहंकार के शिकंजे से कोसों दूर रहे।
साधनाओं का प्रचलन अब पाश्चात्य देशों में तेजी के साथ हो रहा है। अमेरिका और इंग्लैंड में इस प्रकार के साधन-रत लोगों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। वहाँ उसे “शैतान सिद्धि” का नाम दिया जाता है। अघोरी तथा कापालिकों जैसी क्रियाएँ की जाती हैं और आशा की जाती है कि इस प्रकार वे भौतिक लाभ की चमत्कारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त कर सकेंगे।
साधना के बदले जो लोक श्रद्धा संचय करता है उसकी प्रतिक्रिया सामान्य नहीं असामान्य होती है। समृद्धि भले ही कम पड़े, पर शान्ति प्रसन्नता और तुष्टि की सम्पदा इतनी अधिक बढ़ जाती है कि व्यक्ति हर घड़ी अपने को सुखी, समुन्नत और गौरवशाली अनुभव कर सके।
साधना के प्रति भी विश्व व्यापी उत्साह का पुनर्जागरण हुआ है। इस विषय की चर्चा खूब है और साधना के भी उलटे सीधे प्रयोग नई उमंगों के साथ चल रहे हैं। इन दिनों वामाचार पाश्चात्य देशों में जिस तेजी से पनपा है उसे देखते हुए आश्चर्य होता है कि वहाँ भूतकाल में भारत में छाये हुए तंत्र युग को भी पीछे छोड़ देने वाला उत्साह उमड़ने लगा है।
साधना का वास्तविक लाभ तभी उठाया जा सकता है जब उसके साथ अध्यात्मवादी योग दर्शन भी जुड़ा हुआ हो। इस शिक्षण को विश्व व्यापी बनाने की आज भारत की विशेष जिम्मेदारी है- योग विज्ञान के आविष्कर्ता और प्रसारकर्ता होने के नाते।
साधना द्वारा वशवर्ती किया जा सकता है और उनसे इच्छानुसार लाभ प्राप्त करने में सहयोग लिया जा सकता है। योगिनी, कर्ण पिशाची, भक्षणी, भैरवी, बगलामुखी, छिन्नमस्ता, चामुण्डा, भद्रकाली आदि देवियाँ और भैरव, वेताल, वीरभद्र, महाकाल, चण्ड, रुद्र जैसे देवता वाम-मार्ग में विशेष रूप से उपास्य हैं। यह पद्धति योरोप में भी पहुँची उन्होंने विधि विधान में तो मद्य-मत्स्य-माँस, मुद्रा, मैथुन जैसी कौल प्रवृत्तियों को थोड़े हेर-फेर के साथ अपना लिया, पर अनेक आकृति−प्रकृति वाले तान्त्रिक देवी−देवताओं के स्थान पर एक महा असुर को ही प्रतिष्ठापित किया। ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी महादानव का नाम ‘शैतान’ है। पश्चिमी वाम मार्ग में शैतान पूजा की प्रधानता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-August
साधनाओं और आचारों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।उस दिन सभा में किसी आसुरी प्रवृत्ति के तान्त्रिक उपासक ने सभा में प्रवेश किया। लोगों की धारणा इस प्रकार बनी हुई थी कि नैतिक और सात्विक उपायों को छोड़कर शक्ति सम्वर्धन के लिए अन्य प्रयास करने वाले लोग राक्षस होते हैं। आगन्तुक की वेशभूषा भी कुछ इसी प्रकार की थी। उसने आते ही राजा का अभिवादन किया और अपना अभिप्राय व्यक्त करते हुए कहा-राजन मुझे एक विशेष साधना के लिए नर बलि की आवश्यकता है और मैं इसके लिए आपकी अनुमति प्राप्त करने आया हूँ।
साधना के लिए नर बलि की आवश्यकता है और मैं इसके लिए आपकी अनुमति प्राप्त करने आया हूँ।
साधना रत उत्तंक दिखाई दिये। जब महाभारत की पृष्ठभूमि बन ही रही थी तभी उत्तंक ने संन्यास धारण कर लिया था। अतः कृष्ण भगवान का जब उनसे साक्षात् हुआ तो उत्तंक ने कौरवों और पाण्डवों के विग्रह का समाचार पूछा। श्रीकृष्ण ने आद्योपान्त सारा विवरण कह सुनाया।
साधनाओं के प्रति-मद्य, माँस, मीन, मैथुन आदि उपचारों के प्रति भय से ही सही इतनी विरक्ति व्याप गई थी कि कोई उनका नाम तक नहीं लेता था और यह साधक तो उन प्रतिबन्धों के सृष्टा अधिष्ठाता के सामने खड़ा होकर ही कितने निःशंक भाव से अनुनय कर रहा था। सम्राट ने तुरन्त उत्तर दिया-‘‘किसी भी दशा में मैं नर बलि की अनुमति नहीं दे सकता ?”
साधना की जा रही हो तब प्रति-पक्षी की रुचि का ध्यान आवश्यक है। जहाँ तक हो सके अपनी जानकारी के अनुसार उसी विषय की बात की जाय और उन विषयों में कोई जानकारी न हो तो धैर्यपूर्वक प्रश्न पूछकर अपना ज्ञान बढ़ाना भी एक अच्छा तरीका है। इससे एक अच्छे श्रोता बनने और ज्ञान का क्षेत्र व्यापक होने का दोहरा लाभ मिलेगा।
साधना में संरत उत्तंक ने कहा-‘आपका दर्शन कर लेने के बाद भी और कौन-सा वरदान चाहिए?’
साधना के ऐसे कौतुक कौतूहल दिखाते हैं जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह अतिरिक्त वस्तुतः सामान्य ही होता है। मूर्छित स्थिति में ऐसी अगणित विशेषताएं मानवी काया में विद्यमान हैं जो दैनिक जीवन में दृष्टिगोचर न होने से असामान्य अथवा चमत्कारी दीखती हैं, पर वस्तुतः यहाँ चमत्कार कुछ भी नहीं है। जो कुछ हो रहा है, हो सकता है वह प्रकृति की नियत विधि-व्यवस्था के अन्तर्गत ही होता है।
साधना, संयम, सेवा, ज्ञान-बुद्धि और परमार्थ जैसी दैवी-सम्पदाओं को बढ़ाने के लिए हो। आसुरी सम्पदाएँ बढ़ाने का असंतोष तो जितना ही बढ़ेगा-उतनी ही अशान्ति उत्पन्न करेगा। संघर्षों की जड़ यही है। अधिकारों के लिए सभी जागरुक हैं-कर्त्तव्यों की किसी को चिन्ता नहीं। जिन्हें हर घड़ी तृष्णा सताती रहती है, वे उद्विग्न प्रेत, पिशाच की तरह इस मरघट से उस मरघट में भटकते रहते हैं।
साधना की तपश्चर्या का ही प्रतिफल है।
साधना की जा सकती है और उसका प्रतिफल महानात्मा के रूप में असीम श्रेय सहित प्राप्त किया जा सकता है। अपने भौतिक साधनों को जितने अधिक अनुपात से ब्रह्मार्पित किया जा सके उसी अनुपात से साकार उपासना का अधिक उच्चस्तरीय प्रतिफल प्राप्त किया जा सकता है। संसार के अवतारी महामानवों का उज्ज्वल यश और प्रकाश स्वयं धन्य बनता और दूसरों को धन्य बनाता है यह लोक साधना की तपश्चर्या का ही प्रतिफल है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-November
साधना-विधानों में सर्वोच्च है। इस एक के ही द्वारा सभी प्राणायामों का लाभ प्राप्त हो सकता है।
साधना द्वारा एक अन्य लाभ है। दिव्य गन्धों की अनुभूति । गन्ध वायु तत्व की तन्मात्रा है। इन तन्मात्रा द्वारा देवतत्वों की अनुभूति का माध्यम है। नासिका सोऽहम् साधना, गन्ध तन्मात्रा को विकसित करती है, परिणामस्वरूप दिकगन्धों की अनायास अनुभूति समय-समय पर होती रहती है।
साधना उसी जीवन नीति का एक छोटा-सा अवसर कहा जा सकता है। नये उत्तरदायित्वों के निर्वाह के लिए अभीष्ट शक्ति प्राप्त करने के लिए उसे सामयिक एवं सामान्य प्रयास ही समझा जाना चाहिए। उसमें न तो कोई आश्चर्य की बात है और न अनोखी, न अटपटी। आवश्यकतानुसार आगे भी ऐसे ही या उससे भी बड़े-छोटे फिर कभी कोई अनुष्ठान हों और उनकी जानकारी संयोगवश किन्हीं को मिल जाय तो इससे परिजनों में से किसी को भी असमंजस में नहीं पड़ना चाहिए, वरन् उसके सत्परिणामों की आशा भरी दृष्टि से अपेक्षा करनी चाहिए। मार्गदर्शक शक्ति, सदा से कठिन प्रसंगों में हमारी सहायता करती रही है और वही अभी भी आगे कभी जब तक अपना वरद्हस्त हमारे सिर पर रखे हैं तब तक किसी अकल्याणकारी अनिष्ट की आशंका नहीं की जानी चाहिए।
साधनात्मक कर्मकाण्डों का भी महत्वपूर्ण स्थान है, पर तभी जब उनका उद्देश्य चिन्तन के स्वरूप को ऊँचा उठाने की दिशा में अग्रसर होता है। योग का बहिरंग रूप इन व्यायामों, कर्मकाण्डों के रूप में सामने आना आपत्तिजनक नहीं। किन्तु यह है योग का कलेवर ही, यह स्मरण रखा जाना और कराया जाना चाहिए। प्राण है- उपनिषद् प्रतिपादित वह अध्यात्म-दर्शन जो उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देता था तथा जिसे प्राचीनकाल में ब्रह्म-विद्या कहा जाता था।
साधनाओं का समय-समय पर विशिष्ट तपश्चर्याओं का सिलसिला किसी न किसी प्रकार-किसी न किसी रूप में चलता ही रहा है। आत्म-परिष्कार और लोक-कल्याण की दिशा में यदि कुछ बन पड़ा तो उसे बुद्धि का, साधनों का, परिस्थितियों का, सहयोग सम्पादन का नहीं, मात्र तप शक्ति का नगण्य-सा चमत्कार ही मानना चाहिए।
साधना में कोई रुचि है या नहीं। साधना के अविच्छिन्न अंग स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है। परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते।
साधना प्रयोजनों में लगने वाली शक्ति मनुष्य को सूक्ष्म विभूतियाँ और स्थूल सफलताओं से परिपूर्ण बना सकने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होती है। अस्तु उस उपार्जन में संलग्न होना भी दूरदर्शी बुद्धिमत्ता का चिन्ह है।
साधना उनमें सर्वाधिक सरल व सफल है। इस प्राणयोग द्वारा षट्चक्र वेधन सरल होता है। पंचकोशों के अनावरण हेतु अपेक्षित प्रखर प्राण-शक्ति भी इसी प्राणयोग के द्वारा सहज प्राप्त होती है।
साधना के चेतना का असाधारण विकास पाया गया है, पर वह अनायास दीखते हुए भी वस्तुतः पूर्व जन्मों की संग्रहीत सम्पदा होती है। कुछ बालक जन्म से ही कुशाग्र बुद्धि होते हैं। कम आयु में भी उनकी प्रतिभा कई विषयों में वयस्कों जैसी विकसित होती है। कुछ बालक छोटी उम्र में गायक, वादक, वक्ता आदि विशेषताओं से सम्पन्न होते हैं। उन्हें कुछ विशेष शिक्षण भी नहीं मिला होता, पर लगता है, अपने विषय में पारंगत हैं।
साधना को सार्थक बनाती है। चिन्तन जीवन-प्रवाह बन जाए, तभी वह चिन्तन है। अन्यथा मानसिक रति-विनोद ही कहा जाएगा।
साधनाएँ आमतौर से व्यक्तिगत समझी जाती हैं। यद्यपि उनका प्रभाव समष्टिगत भी होता है। जो हो यह गत उपवास का ऐसा पूर्वार्ध है जिसके सम्बन्ध में परिजनों को अधिक तो नहीं, पर इतना तो प्रभाव ग्रहण करना ही चाहिए कि आत्म-परिष्कार के लिए-आत्मबल सम्वर्धन के लिए अपनी सामर्थ्यानुसार तप-साधना की दिशा में उन्मुख रहने का प्रयत्न करना हर किसी के लिए श्रेयस्कर हो सकता है। प्रयास के अनुपात और स्तर के अनुरूप हर किसी को उस मार्ग पर चलने में न्यूनाधिक लाभ प्राप्त करने का सुअवसर मिल सकता है।
साधना के अविच्छिन्न अंग स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है। परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते। ढेरों समय आवारागर्दी और आलस्य में गुजर जाता है, उतना यदि नव-निर्माण प्रयोजनों में लग सका होता तो जीवन का स्वरूप ही दूसरा होता।
साधना स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिकगन्ध आती रहेगी। ऐसी दिकगन्ध, एकाग्रता की अभिरुचि का चिन्ह है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों में घ्राण-शक्ति का महत्व सर्वविदित है। उसी के सहारे वे रास्ता ढूँढ़ते शत्रु को भाँपते और सुरक्षा का प्रबन्ध करते, प्रणय-सहचर को आमंत्रित करते, भोजन की खोज करते तथा मौसम की जानकारी प्राप्त करते हैं। इसी घ्राण-शक्ति के आधार पर प्रशिक्षित कुत्ते अपराधियों को ढूँढ़ निकालते हैं।
साधना भी आनन्द और उल्लास की अनवरत अभिवृद्धि करती है।
साधना का है। शरीर और मन की स्थिति में ऋण एवं धन विद्युत आवेशों की घट-बढ़, इड़ा तथा पिंगला, नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र-सूर्य स्वर के प्रभाव अनुसार होती रहती है। स्वर स्थिति का सही ज्ञान अपनी अन्तः-क्षमता की दशा को जानने में सहायक होता है और तब किस समय कौन सा काम हाथ में लेना अधिक उचित होगा, यह निर्णय लेना भी सरल हो जाता है। सामान्यतः अविज्ञात जानकारियाँ भी स्वरयोग के द्वारा अधिक अच्छी तरह समझी जा सकती हैं।
साधना का भौतिक पक्ष शब्द संरचना-स्वर विनियोग-उपचार विधान एवं उपकरणों का स्तर जैसी व्यवस्थाओं से सम्बन्धित है। इन सब का सही आधार बन जाने से आत्मिक प्रगति के उत्तरार्ध की पूर्ति होती है। उभय-पक्षीय समन्वय से आत्मिक प्रगति का वह आधार खड़ा होता है जो अन्तःचेतना का स्तर ऊँचा उठाकर भौतिक क्षेत्र में बहुमुखी सुलताएँडडडडड प्रस्तुत कर सके।
साधना सम्पन्नों की कमी नहीं। पर देखते हैं कि उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है उसे वे जुटा नहीं पाते। सोचते बहुत हैं, पर करने का समय आता है तो बगलें झाँकने लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो अब तक अपने ही परिवार में से इतनी प्रतिभाएँ निकल पड़तीं जो कम से कम भारत भूमि को नर-रत्नों की खदान होने का श्रेय पुनः दिला देतीं। व्यस्तता, अभावग्रस्तता, उलझन, अड़चन आदि के बहाने उपहासास्पद हैं।
साधना में निरत मनुष्य जीवन को हर दृष्टि से सार्थक बनाता है।
साधना, उपवास से भी कठिनतापूर्वक पाई जा सकती है।”
साधना विज्ञान के अन्तर्गत है। इनके विविध लाभ हैं। इन सभी प्राणायामों में सोऽहम् साधना रूपी प्राणयोग सर्वोपरि है। यह अजपा गायत्री जप प्राणयोग के अनेक साधना-विधानों में सर्वोच्च है। इस एक के ही द्वारा सभी प्राणायामों का लाभ प्राप्त हो सकता है।
साधना विज्ञान के आधार पर तैयार की जाती है, चमत्कारी परिणाम उत्पन्न कर सके तो इसे अबुद्धि सम्मत नहीं कहा जा सकता । मन्त्र शक्ति के प्रयोगों में जहाँ दंभ और बहकावे की भी भरमार रहती है वहाँ ऐसे प्रामाणिक प्रसंगों की भी कमी नहीं होती जिनके आधार पर इस अलौकिकता का आधार समझ में न आने पर भी उसे अविश्वस्त नहीं कहा जा सकता ।
साधना का अधिकाधिक लाभ सम्भव है। शरीर को ढीला और मन को खाली करने के बाद जिह्वा को उलट का तालु से लगाना, धीरे-धीरे उसे सहलाना और उस आधार पर सोमरस पान की दिव्य अनुभूति करना-यही सामान्यतः खेचरी मुद्रा है। स्वर्णजयन्ती साधना वर्ष में दैनिक उपासना क्रम में की जाने वाली खेचरी साधना के लिए शिथिलीकरण और मन को रिक्त करने की अलग से प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं। मन्त्र-जाप की उत्कृष्ट स्थिति में, जब चिन्तन एकाग्र और एकरस हो जाता है, जो शरीर-मन स्वयमेव उसी स्थिति में पहुँच जाते हैं।
साधना का एक अन्य विशिष्ट पक्ष स्वर साधना का है। शरीर और मन की स्थिति में ऋण एवं धन विद्युत आवेशों की घट-बढ़, इड़ा तथा पिंगला, नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र-सूर्य स्वर के प्रभाव अनुसार होती रहती है। स्वर स्थिति का सही ज्ञान अपनी अन्तः-क्षमता की दशा को जानने में सहायक होता है और तब किस समय कौन सा काम हाथ में लेना अधिक उचित होगा, यह निर्णय लेना भी सरल हो जाता है। सामान्यतः अविज्ञात जानकारियाँ भी स्वरयोग के द्वारा अधिक अच्छी तरह समझी जा सकती हैं।
साधनाओं से भी काम चल सकता है। ब्रह्म-विद्या के मान्य तत्वदर्शन को स्वाध्याय, सत्संग एवं मनः चिन्तन के आधार पर हृदयंगम किया जाता रहे तो आत्मबोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और ज्ञान वैराग्य का प्रकाश अन्तरात्मा में परिलक्षित हो सकता है। वेदान्त साधनाओं की अहं-ब्रह्मादिकपरक-सोऽहम् शिवोऽहम् की उद्बोधक वृत्ति ज्ञानयोग का प्रयोजन पूरा कर सकती है। उसे आत्मबोध की स्थिति जागृत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
साधना के पौराणिक उपाख्यान सर्वविदित हैं।
साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।
साधना के अनेक अभ्यास हैं, पर सोऽहम् साधना उनमें सर्वाधिक सरल व सफल है। इस प्राणयोग द्वारा षट्चक्र वेधन सरल होता है। पंचकोशों के अनावरण हेतु अपेक्षित प्रखर प्राण-शक्ति भी इसी प्राणयोग के द्वारा सहज प्राप्त होती है।
साधना से दिव्य क्षमता बढ़ती है और उससे कितने ही प्रकार के असामान्य कार्य कर सकना सम्भव होता है। यह आध्यात्मिक उपलब्धियाँ अगले जन्मों तक साथ चली जाती है। ऐसे लोग बिना साधना के भी पूर्व संचित सम्पदा के आधार पर चमत्कारी आचरण प्रस्तुत करते देखे गये हैं। ऐसे ही लोगों में एक नाम ‘यूरीगेलर’ का भी है।
साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण, कुल चौंसठ प्राणायामों का विधि-विधान साधना विज्ञान के अन्तर्गत है। इनके विविध लाभ हैं। इन सभी प्राणायामों में सोऽहम् साधना रूपी प्राणयोग सर्वोपरि है। यह अजपा गायत्री जप प्राणयोग के अनेक साधना-विधानों में सर्वोच्च है।
साधना के बिना और किसी प्रकार मिलता नहीं है। भागीरथ का गंगावतरण, विश्वामित्र का नवयुग प्रवर्तन, पार्वती का शिव वरण, परशुराम का कुठार, अगस्त का समुद्र शोषण, ध्रुव का ब्रह्माण्ड केन्द्र पद, दधीचि का अस्थि वज्र, तपश्चर्या के ही परिणाम थे। सृष्टि सृजन के लिए ब्रह्माजी का कमल पुष्प पर-सम्वर्धन पोषण के लिए विष्णु का शेषासन पर सन्तुलन, परिवर्तन के लिए शिव की श्मशान साधना के पौराणिक उपाख्यान सर्वविदित हैं।
साधनाएँ, आविष्कार और अनुभूतियाँ की जा चुकीं। लेकिन ‘इदमित्थं’ नहीं कहा जा सकता है। अभी उस क्षेत्र में प्रगति की प्रचण्ड सम्भावनाएँ शेष हैं।
साधना, गन्ध तन्मात्रा को विकसित करती है, परिणामस्वरूप दिकगन्धों की अनायास अनुभूति समय-समय पर होती रहती है। इन गन्धों को कुतूहल या मनोविनोद की दृष्टि से नहीं लेना चाहिए। अपितु इनमें सन्निहित विभूतियों का उपयोग कर दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का प्रयास किया जाना चाहिए। उपासना स्थल में धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चन्दन, कपूर आदि के लेपन या इत्र -गुलाबजल के छिड़काव द्वारा सुगन्ध पैदा की जाती है और उपासना अवधि में उसी की अनुभूति को सहज बनाया जाता है। यह अनुभूति गहरी होती चले, तो साधना स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिकगन्ध आती रहेगी।
साधना का क्रम पूर्ण हो चुका होगा। जिन दिनों यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं उन दिनों वह चल रहा है। यह साधना विशुद्ध व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक है। इसके पीछे न तो कोई आग्रह था और न उत्तेजना उत्पन्न करना। यह शक्ति-सम्पादन एवं आत्म-शोधन के अभिप्राय से किया गया एवं विशुद्ध धर्मानुष्ठान कहा जा सकता है।
साधना भावोत्कर्ष एवं शक्ति-अवतरण की प्रक्रिया है। इसे अजपा गायत्री जाप भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम’ ध्वनि का अन्तःभूमिका में अनुभव करना होता है।
साधना को ‘समर’ कहा गया है। भगवान के चौबीसों अवतार स्वयं संघर्षरत रहे हैं और अपने अनुचरों को उसी युद्ध क्षेत्र में घसीट ले गये हैं। लंका काण्ड में रीछ, बानरों की सेना को अड़ा देने के पीछे भगवान का यही प्रयोजन रहा है कि असुरता को निरस्त करने में देवत्व को संघर्षरत होना चाहिए। साधनों की दृष्टि से कौन बड़ा है- अधिकार कितना जमा लिया इसकी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। सत्य देखने में दुर्बल लगता हो तो भी अन्ततः विजय उसी की होती है।
साधना के भी पूर्व संचित सम्पदा के आधार पर चमत्कारी आचरण प्रस्तुत करते देखे गये हैं। ऐसे ही लोगों में एक नाम ‘यूरीगेलर’ का भी है।
साधना में अत्यन्त निष्ठापूर्वक संलग्न रहकर मानवी आदर्शों का अभिवर्धन करने वाले, रचनात्मक कार्यों में कीर्तिमान स्थापित करते हुए कहे जाते हैं। किसी हद तक यह मूल्याँकन सही भी है। पर इतने से हमें तो सन्तोष नहीं होता। हमें अधिक चाहिए। परिजनों की जीवन विद्या प्रकाशपूर्ण, अनुकरणीय और प्रेरणाप्रद बन सके, यही अपनी अपेक्षा है।
साधना रूपी प्राणयोग सर्वोपरि है। यह अजपा गायत्री जप प्राणयोग के अनेक साधना-विधानों में सर्वोच्च है। इस एक के ही द्वारा सभी प्राणायामों का लाभ प्राप्त हो सकता है।
साधना वर्ष में दैनिक उपासना क्रम में की जाने वाली खेचरी साधना के लिए शिथिलीकरण और मन को रिक्त करने की अलग से प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं। मन्त्र-जाप की उत्कृष्ट स्थिति में, जब चिन्तन एकाग्र और एकरस हो जाता है, जो शरीर-मन स्वयमेव उसी स्थिति में पहुँच जाते हैं।
साधना विशुद्ध व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक है। इसके पीछे न तो कोई आग्रह था और न उत्तेजना उत्पन्न करना। यह शक्ति-सम्पादन एवं आत्म-शोधन के अभिप्राय से किया गया एवं विशुद्ध धर्मानुष्ठान कहा जा सकता है। तो भी उसके कुछ पक्ष ऐसे हैं जिनसे सर्वसाधारण को, विशेषतया अखण्ड-ज्योति के परिजनों को अवगत होना ही चाहिए। यह आवश्यकता न समझी गई होती तो सम्भवतः उसे गोपनीय और नितान्त व्यक्तिगत ही रखा गया होता, जैसी कि हमारी अन्यान्य कठिन तप-साधनाएँ समय-समय पर होती रहीं हैं और होती रहेंगी।
साधना के लिए शिथिलीकरण और मन को रिक्त करने की अलग से प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं। मन्त्र-जाप की उत्कृष्ट स्थिति में, जब चिन्तन एकाग्र और एकरस हो जाता है, जो शरीर-मन स्वयमेव उसी स्थिति में पहुँच जाते हैं।
साधना से ही किया था। शृंगी ऋषि ने दशरथ का पुत्र वरदान और परीक्षित को अकाट्य शाप देकर तप की शक्ति का परिचय दिया था। ऐसे असंख्यों पुराण उपाख्यान तप द्वारा उत्पन्न शक्ति का प्रतिपादन करते हैं। भगवान् बुद्ध योगी अरविन्द जैसे अनेकों तपस्वी अपने तपोबल से युग समस्याओं के समाधान में प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान देते रहे हैं। जिसके मार्ग-दर्शन में हमारा जीवन प्रवाह बहता आया है वह महामानव भी तप के आधार पर ही सिद्ध समर्थ बना है।
साधनाएँ समय-समय पर होती रहीं हैं और होती रहेंगी।
साधना की दिशा में उन्मुख रहने का प्रयत्न करना हर किसी के लिए श्रेयस्कर हो सकता है। प्रयास के अनुपात और स्तर के अनुरूप हर किसी को उस मार्ग पर चलने में न्यूनाधिक लाभ प्राप्त करने का सुअवसर मिल सकता है।
साधना सार्थक होगी।
साधना इसी शक्ति को विकसित करती है।
साधनाओं की अहं-ब्रह्मादिकपरक-सोऽहम् शिवोऽहम् की उद्बोधक वृत्ति ज्ञानयोग का प्रयोजन पूरा कर सकती है। उसे आत्मबोध की स्थिति जागृत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
साधना में गहरे श्वास-प्रश्वास के कारण यह ध्वनि प्रवाह तीव्रतर हो जाता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि खुले कानों से भी ये ध्वनि-प्रवाह सुने जा सकते हैं। उन्हें तो कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही अनुभव किया जाता है।
साधना और संघर्ष का समन्वय है। इसी आधार पर उनने अपने साधनों से सारे विश्व में नव-युग का शंख बजाया और नये जागरण का वातावरण बनाया। उनके न रहने पर अनुयायियों ने अहिंसा की पूजा-पाठ की सस्ती लकीर पीटते रहना तो जारी रखा किन्तु अनीति से लड़ने की कष्टसाध्य प्रक्रिया की ओर से मुँह मोड़ लिया। फलतः बौद्ध धर्म भारत-मध्य एशिया से चढ़ दौड़ने वाले डाकुओं द्वारा देखते-देखते पद-दलित कर दिया गया। शौर्य, साहस की तेजस्विता खो बैठने वालों की जो दुर्गति होती है, वही अपने देश की भी हुई।
साधना और चारित्रिक परिष्कार की तपश्चर्या व्यक्तित्व को निखारने के लिए है। यह विशुद्ध अध्यात्म पक्ष हुआ। दूसरा पक्ष भौतिक है, जिस के शब्द और स्वर दोनों ऐसे हैं जिन्हें पंच-तत्वों से बने शरीर अवयवों की प्रतिक्रिया कह सकते हैं। शब्द मूलतः पदार्थ है। उसे रेंगने, धकेलने और प्रभावी बनाने में आत्मशक्ति का उपयोग होता है, पर स्वतः शब्द तो भौतिक हलचलों से उत्पन्न, भौतिक उपकरणों से नापा तोला जा सकने वाला पदार्थ मात्र है।
साधना स्तर पर निबाहा जा सकता है। परिवार सदुद्देश्यों की प्रयोगशाला बन सकता है। तपोवन में घर बना लेना सरल है, पर घर को तपोवन में बदलने के लिए कुशलता की आवश्यकता पड़ती है जिसकी चर्चा करते हुए गीताकार ने ‘‘योग कर्मषु कौशलम्’’ कर्म-कौशल को योग के नाम से पुकारा है।
साधना प्रयास करने पर ही सम्भव होती है। योगाभ्यास एवं तपश्चर्या की सारी विधि-व्यवस्था इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुई हैं। कभी-कभी ऐसे अपवाद भी देखे जाते हैं कि बिना किसी साधना के चेतना का असाधारण विकास पाया गया है, पर वह अनायास दीखते हुए भी वस्तुतः पूर्व जन्मों की संग्रहीत सम्पदा होती है। कुछ बालक जन्म से ही कुशाग्र बुद्धि होते हैं। कम आयु में भी उनकी प्रतिभा कई विषयों में वयस्कों जैसी विकसित होती है।
साधना द्वारा प्रेतात्माओं का कृपा पात्र बना ले और अपने साथ अदृश्य सहायकों का अनुग्रह जोड़ कर अपनी शक्ति को असामान्य बना ले एवं महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करने का पथ प्रशस्त करे।
साधना का चमत्कारी परिणाम भी अतुल है। यह प्राणयोग की विशिष्ट साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण, कुल चौंसठ प्राणायामों का विधि-विधान साधना विज्ञान के अन्तर्गत है। इनके विविध लाभ हैं। इन सभी प्राणायामों में सोऽहम् साधना रूपी प्राणयोग सर्वोपरि है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-February
साधना का अविच्छिन्न अंग है। सेवा धर्म को अपनाये बिना किसी की भी आत्मा पवित्र नहीं हो सकती। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करने वाला योगाभ्यास−लोकमंगल में योगदान देने के अतिरिक्त और दूसरा हो ही नहीं सकता। प्राचीन काल के ऋषि जीवन में जितना भजन, पूजन का स्थान रहता था उससे कई गुना समय, श्रम वे गुरुकुल संचालन, शास्त्र लेखन, चिकित्सा, धर्म प्रचार आदि प्रयोजनों के लिए लगाते थे। यह दुर्भाग्य ही है कि आज मात्र भजन, पूजन को ही साधना समझा जाने लगा है।
साधना के दो ही तरीके हो सकते हैं। (1) पीड़ा निवारण (2) पतन निवारण। दूसरे शब्दों में दुखियों की सहायता एवं उत्कर्ष की प्रेरणा कह सकते हैं। धन और श्रम से दुखियों की स्थूल एवं सामयिक सहायता बन पड़ती है। भूखे, प्यासे, नंगे, बीमार, आपत्तिग्रस्त लोगों की सहायता धन एवं श्रम के सहारे हो सकती है।
साधना सत्र लगातार चले हैं और इनमें दस हजार से अधिक संख्या में लोगों ने आकर प्रशिक्षण प्राप्त किया है। अब 76 बसन्त पर्व से आरम्भ हो कर 77 के बसन्त पर्व तक चलने वाले अपने अध्यात्म वर्ष में यह व्यवस्था सिकोड़ दी गई है। इस वर्ष दस−दस दिवसीय मात्र पाँच सत्र होंगे। इनमें आने वालों को, जीवन साधना और गायत्री उपासना का समन्वय रहेगा। शिक्षार्थियों को एक 24 हजार गायत्री पुरश्चरण इसी पुनीत भूमि में रहकर करना होगा।
साधना समझा जाने लगा है। यह व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरता की देन है कि अध्यात्मवाद की दुहाई देने वाले व्यक्ति भी व्यक्तिगत सम्पत्ति न सही चमत्कारी ऋद्धि−सिद्ध उपार्जन की छोटी सी परिधि में सीमाबद्ध बन कर रह जाएं।
साधना वर्ष का लाभ लेने के लिए कहा जाय। इससे वे कम समय में अधिक उत्साह पा सकेंगे और भविष्य में अपना साधन क्रम बिना किसी बाहरी सहायता के अपने ही उपयोगी अनुभव के आधार पर जारी रख सकेंगे। अभी एक लाख की सदस्यता पूरी होने में थोड़ी गुंजाइश भी है और चार महीने का समय भी। इस बीच उन पिछड़े साधकों तक सूचना पहुँच सके तो निश्चित रूप से उनमें से अधिकाँश पुनः अपना उत्साह सजग करेंगे और इस अलभ्य अवसर का लाभ ले सकेंगे।
साधना विधान की समस्त संरचना इसी एक प्रयोजन के लिए की गई है। जो इस तथ्य को समझेगा वही सही गतिविधियाँ अपनायेगा और अभीष्ट सफलता सुनिश्चित रूप से प्राप्त करके रहेगा।
साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। पर अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करना पड़ता है।
साधना की आवश्यकता इस रज के निविड़ बन्धनों से छुड़ाने के लिए ही की जाती हैं। तम से बना जड़ शरीर समय आने पर आसानी से मर जाता है और उसे जला, सड़ाकर देखते देखते समाप्त कर दिया जाता है। चेतन आत्मा ईश्वर अंश होने से निर्मल है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से बनी जड़−चेतन मिश्रित जीवन चेतना ही हर घड़ी अशान्त रहती है और कृत्य−कुकृत्य करने में जुटी रहती है। परिमार्जन इसी का करना पड़ता है।
साधना करने के लिए, अनुरोध किया गया है। प्रसन्नता की बात है कि उसका महत्व समझा गया और परिजनों में से अधिकाँश ने इस साधन शृंखला की सदस्यता स्वीकार कर ली है। जिनकी सूचना मिली है उनके नाम नोट कर लिये गये हैं। उनका उपासना क्रम ठीक तरह चले इस पर आवश्यक ध्यान रखा जा रहा है और उन्हें प्रगति की दिशा में अग्रसर करने वाला आवश्यक सहयोग दिया जा रहा है। आशा की जानी चाहिए कि इस साधना उपक्रम से उतना लाभ उठाया जा सकेगा जितना कई वर्षों की−कई घण्टे की उपासना से ही सम्भव होता है।
साधना मंडलियाँ भी कुछ उपयोगी ही कार्य करेंगी और उतने से भी बहुतों का बहुत कल्याण होगा। अस्तु जहाँ भी−जिनके लिए भी जो सम्भव हो वह प्रयत्न उन्हें अपनी स्थिति और सुविधा के अनुसार आरम्भ कर देना चाहिए और स्थानीय साधना मंडली की व्यवस्था यथासम्भव जल्दी ही बना लेनी चाहिए।
साधना और गायत्री उपासना का समन्वय रहेगा। शिक्षार्थियों को एक 24 हजार गायत्री पुरश्चरण इसी पुनीत भूमि में रहकर करना होगा। सोऽहम् साधना, खेचरी मुद्रा, जप, ध्यान, आत्मशोधन, देव सान्निध्य की सभी साधनाएँ साथ−साथ चलेंगी। इन प्रयोजनों को ठीक तरह पूरा कर सकने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन एवं सहयोग सभी शिक्षार्थियों को मिलेगा। पूरे दस−दस दिन के यह सत्र होंगे।
साधना वर्ष की सदस्यता स्वीकार की हो वे मिशन के सन्देश वाहक का एक अतिरिक्त उत्तरदायित्व भी उठायें और अपनी पहुँच के सम्पर्क क्षेत्र में यह तलाश करें कि ऐसे कौन लोग थे जिनका कभी गायत्री उपासना में उत्साह था, पर अब वह छूट गया। ऐसे लोगों तक स्वर्ण−जयन्ती वर्ष की−साधन शृंखला की जानकारी पहुँचाई जानी चाहिए। यह कार्य उन्हें जनवरी, फरवरी के अखण्ड−ज्योति अंकों का साराँश बताकर समझाई जा सकती है। इससे यदि उनका उत्साह जगे तो उनका मार्ग−दर्शन करने का कार्य प्रविष्ट सदस्यों द्वारा स्वयं ही उठाया जा सकता है। चूँकि वे पत्रिका नहीं पढ़ते इसलिए भविष्य में भी आवश्यक निर्देश उन तक पहुँच न सकेंगे।
साधना का संरक्षण एवं परिमार्जन भी वहाँ से किया जाता रहेगा। जवाबी पत्र भेजने वालों को सफलता शुभ−कामना का उत्तर मिलेगा।
साधनाएँ भी विशेष रूप से सफल होती हैं। तदनुसार चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष आरम्भ होते ही नौ−नौ दिन के नवरात्रि पर्व मनाये जाते हैं।
साधना के चारों विषयों का समावेश करके यथा सम्भव प्रयत्न किया गया है।
साधना को दूसरे शब्दों में संस्कृति कह सकते हैं। शरीरगत, क्रियाशीलता, मनोगत, विचारणा और अन्तरात्मा देवत्व में परिणत किया जा सकता है, इसी विद्या का नाम साधना है। अपने आपकी साधना करके कोई भी सिद्ध पुरुष बन सकता है।
साधना इसी का नाम है। साधना के दो स्तर हैं− एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म। स्थूल साधना में व्यायाम, अध्ययन, अनुभव, शिल्प, कला, वाणिज्य आदि विषय आते हैं। सूक्ष्म साधना में अपने दृष्टिकोण, क्रिया−कलाप, गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत किया जाता है। प्रमुख शक्तियों को जगाया जाता है।
साधना सहज ही होती चली जाती है। उपासना में मन लगना आवश्यक माना जाता है। भजन में मन न लगे तो निराशा होती है। उस बात में इतना और बढ़ा देना चाहिए कि हर उपयुक्त काम कर्मयोग है और उसमें श्रम ही नहीं पूरी तन्मयता का भी समावेश होना चाहिए। यदि हर काम में मन लगाने का अभ्यास हो जायगा तो भजन भी एक काम होने से उसमें भी मन लगेगा।
साधना विज्ञान में गायत्री उपासना को सर्वोपरि माना जाता रहा है। उसके माहात्म्यों का वर्णन सर्वसिद्धिप्रद कहा गया है और लिखा है कि तराजू के एक पलड़े पर गायत्री को और दूसरे पर समस्त अन्य उपासनाओं को रखकर तोला जाय तो गायत्री ही भारी बैठती है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की−देवताओं और ऋषियों की उपासना पद्धति गायत्री ही रही है। उसे सर्वसाधारण के लिए उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है।
साधना मार्ग अपनाना पड़ता है उनमें यही दो तथ्य प्रधान होते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता अपनाकर जिया जाने वाला आदर्श जीवन आध्यात्मिक साधना का प्रथम चरण है और लोक मंगल के बढ़−चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत करना दूसरा। इस प्रक्रिया को गतिशील एवं सुविधाजनक बनाने के लिए ही पूजा पाठ के अनेकानेक कर्मकाण्डों एवं विधि−विधानों का सृजन हुआ है।
साधना का आश्रय लेकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप का भी परिमार्जन, परिशोधन किया जाना है। जीवन साधना को−उर्वरा भूमि की और उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है। उभय−पक्षीय व्यवस्था बन पड़ने पर ही आत्मिक प्रगति का रथ ठीक तरह अग्रसर होता है। दोनों पहिये समान आकार−प्रकार के और सही सुदृढ़ होने चाहिएं।
साधना में व्यायाम, अध्ययन, अनुभव, शिल्प, कला, वाणिज्य आदि विषय आते हैं। सूक्ष्म साधना में अपने दृष्टिकोण, क्रिया−कलाप, गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत किया जाता है। प्रमुख शक्तियों को जगाया जाता है। स्थूल साधना में मस्तिष्कीय प्रशिक्षण तथा शरीर को अभ्यास कराने की क्रिया−पद्धति चलती है। सूक्ष्म साधना में आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाया जाता है।
साधना का उपक्रम गत अंक में समझाया जा चुका है। इस अंक में यह अनुरोध है कि जिनकी निष्ठा, साधना में अधिक परिपक्व हो तथा जिन्हें सुविधा हो वे सन् 76 की दोनों नवरात्रियों की अनुष्ठान, तपश्चर्या में भी सम्मिलित होने का साहस करें। चैत्र की नवरात्रि 1 अप्रैल से और आश्विन की नवरात्रि 24 सितम्बर से आरम्भ होगी और पूरे 9-9 दिन चलेंगे। इसमें ढाई−तीन घण्टे जप तथा ब्रह्मचर्य उपवास आदि के नियम, पालन जिनके लिए सम्भव हों वे इस तपश्चर्या का भी लाभ उठायें। इसमें सम्मिलित होने वालों को अलग से सूचना देनी चाहिए ताकि उनकी इस अतिरिक्त साधना का−अतिरिक्त संरक्षण कर सकना सम्भव हो सके।
साधना सत्र एवं वानप्रस्थ शिक्षा के चारों ही स्तर के शिक्षार्थी यदि अगले दो तीन महीने के भीतर ही अपने स्थान सुनिश्चित करा लें तो आगे की खटखट से शांति−कुंज में भी सुविधा रहेगी और शिक्षार्थियों को भी स्थान सुरक्षित करा लेने पर निश्चिन्तता अनुभव होगी। अस्तु जिन्हें भी अगले वर्ष किसी प्रशिक्षण में सम्मिलित होना हो उनके लिए समय रहते आवेदन कर देने और स्वीकृति प्राप्त कर लेने में ही सुविधा है।
साधना में यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। व्यक्ति अपनी क्रियाशीलता और बौद्धिक स्थिति में प्रवीणता उत्पन्न करते और भौतिक प्रगति का पथ−प्रशस्त करते हैं सूक्ष्म साधना में अन्तरात्मा का स्तर ऊँचा उठाना पड़ता है। इसके लिए परमात्म सत्ता के साथ सम्पर्क बनाना पड़ता है। भौतिक प्रगति के लिए भौतिक क्षमता और आत्मिक प्रगति के लिए आत्मिक क्षमता चाहिए। इसके लिए जो प्रयोग प्रयत्न करने पड़ते हैं− उन्हें अध्यात्म साधना कहते हैं।
साधनाएँ साथ−साथ चलेंगी। इन प्रयोजनों को ठीक तरह पूरा कर सकने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन एवं सहयोग सभी शिक्षार्थियों को मिलेगा। पूरे दस−दस दिन के यह सत्र होंगे। इतने समय यहाँ रहना होगा अस्तु रास्ते के आने−जाने का समय ध्यान में रखते हुए ही आगन्तुकों को अवकाश लेना चाहिए। संक्षेप में इन्हें साधना सत्र कहा जा सकता है।
साधना−क्रम आरंभ कर देना है।
साधना में सबसे महत्वपूर्ण है− निरालस्यता का अभ्यास। आमतौर से लोग अपनी आधे से अधिक श्रम−शक्ति आलस्य में गँवाते हैं। सुस्ताने के नाम पर ढेरों समय नष्ट किया जाता है। मन में उत्साह न रहने रोते−खीजते किसी प्रकार मन्द गति के नाम की लकीर, बेगार भुगतने की तरह पीटी जाती है। आलस्य से शरीर और प्रमाद से आच्छादित मन जो भी काम कर है वह आधा, अधूरा, लँगड़ा, काना, कुबड़ा और फूहड़ होता है।
साधना की दृष्टि से नवरात्रियों को कालचक्र के अनुसार कितना अधिक महत्व दिया गया था और वह प्रथा किसी न किसी रूप में अभी भी भिन्न−भिन्न स्थानों में भिन्न−भिन्न प्रकार से चलती हुई पाई जाती है।
साधना का व्यावहारिक रूप इतना ही है कि भक्त और भगवान के बीच उच्चस्तरीय आदान−प्रदान चलना चाहिए। भक्त अपनी समस्त आकाँक्षाओं और सम्पदाओं को ईश्वर के लिए समर्पित करता है और इसके बदले में वह सब कुछ पाता है जो ईश्वर स्वयं है। मनुष्य को स्पष्ट करने वाली ईश्वरीय सत्ता अपनी अनुभूति, आनन्द और उल्लास के रूप में छोड़ती है। भगवान से कुछ मिला या नहीं इसकी परख इस रूप में की जा सकती है कि उल्लास−आदर्शवादिता के प्रति उत्कंठा भरा उभार अन्तःकरण में उमगना आरम्भ हुआ या नहीं सद्भावना और सत्प्रवृत्ति अपनाने वाले को सहज ही मिलते रहने वाला आत्म−सन्तोष आनन्द अनुभव में आता है या नहीं। ईश्वर दर्शन के सम्बन्ध में यह भ्रान्त धारणा निरस्त की जानी चाहिए कि सपने में या जागृति में इष्टदेव की किसी आकृति की झाँकी मिलती है अथवा प्रकाश आदि दीखने जैसा कोई चित्र−विचित्र दृश्य दिखाई पड़ता है।
साधना आरम्भ नहीं की है, उन्हें बसन्त पर्व के बाद भी करने की छूट है। 5 फरवरी 76 से अपना साधना वर्ष आरम्भ हो गया। ठीक एक वर्ष में 77 के बसन्त पर इसकी पूर्णाहुति हो जायगी। बीच के महीनों से भी इस साधन शृंखला की सदस्यता अपनाई जा सकती है और जब भी अवसर मिले तब से भी इसमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, पर उसकी समाप्ति हर हालत में 77 के बसन्त को ही करनी होगी। बीच में−देर से सम्मिलित होने वालों की साधना पूरे वर्ष न चलकर उतने समय कम चलेगी जितने कि वे देर में सम्मिलित हुए।
साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।
साधना के दो स्तर हैं− एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म। स्थूल साधना में व्यायाम, अध्ययन, अनुभव, शिल्प, कला, वाणिज्य आदि विषय आते हैं। सूक्ष्म साधना में अपने दृष्टिकोण, क्रिया−कलाप, गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत किया जाता है। प्रमुख शक्तियों को जगाया जाता है। स्थूल साधना में मस्तिष्कीय प्रशिक्षण तथा शरीर को अभ्यास कराने की क्रिया−पद्धति चलती है।
साधना के लिए विशेष मार्ग−दर्शन एवं विशेष संरक्षण मिल सके तो उससे सफलता की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है। वैसे प्रत्येक शुभ कर्म का संरक्षण भगवान स्वयं ही करते हैं।
साधना सत्र होंगे। प्रथम सत्र 1 फरवरी से 10 फरवरी तक का बसन्त पर्व के अवसर पर होगा जो यह अंक पहुँचने से पूर्व ही सम्पन्न हो चुका होगा। अब जिनमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, वे केवल चार ही शेष हैं।
साधना में अन्तरात्मा का स्तर ऊँचा उठाना पड़ता है। इसके लिए परमात्म सत्ता के साथ सम्पर्क बनाना पड़ता है। भौतिक प्रगति के लिए भौतिक क्षमता और आत्मिक प्रगति के लिए आत्मिक क्षमता चाहिए। इसके लिए जो प्रयोग प्रयत्न करने पड़ते हैं− उन्हें अध्यात्म साधना कहते हैं। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर है।
साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
साधना, उपासना का तत्वज्ञान, स्वरूप, आधार और प्रयोग हर महीने विस्तारपूर्वक समझाया जा सकता है। पर अनुसदस्य तो केवल उपासना प्रक्रिया ही जान पायेंगे और इस सन्दर्भ का तत्वज्ञान उन तक छन−छनकर ही थोड़ा बहुत पहुँच पावेगा। स्कूल में नियमित रूप से पढ़ने वाले छात्रों में और घर पर ही अभ्यास करके परीक्षा देने वाले छात्रों में कुछ तो अन्तर रहता ही है। वह कमी तो यहाँ भी रहेगी फिर भी न कुछ से कुछ अच्छा की उक्ति के अनुसार यह स्थानीय साधना मंडलियाँ भी कुछ उपयोगी ही कार्य करेंगी और उतने से भी बहुतों का बहुत कल्याण होगा। अस्तु जहाँ भी−जिनके लिए भी जो सम्भव हो वह प्रयत्न उन्हें अपनी स्थिति और सुविधा के अनुसार आरम्भ कर देना चाहिए और स्थानीय साधना मंडली की व्यवस्था यथासम्भव जल्दी ही बना लेनी चाहिए।
साधनाओं के लिए भी यह समय अधिक उपयुक्त है, पर प्रचलन इन दिनों दुर्गा पूजा के नाम से ही चल पड़ा है। बंगाल, आसाम, उड़ीसा, मणिपुर, नेपाल, भूटान एवं गुजरात में दुर्गा पूजा के विशेष समारोह होते हैं। बंगाल में तो उन दिनों सरकारी छुट्टियाँ भी रहती हैं। इन प्रचलनों से यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि प्राचीन काल में साधना की दृष्टि से नवरात्रियों को कालचक्र के अनुसार कितना अधिक महत्व दिया गया था और वह प्रथा किसी न किसी रूप में अभी भी भिन्न−भिन्न स्थानों में भिन्न−भिन्न प्रकार से चलती हुई पाई जाती है।
साधना में क्रिया−कृत्य से भी अधिक प्रभावी स्थान वातावरण एवं सान्निध्य का पड़ता है। यह विशेष उपलब्धियाँ शांति−कुंज में रह कर उपासना करने वालों को कितनी अधिक मात्रा में मिली हैं, इन्हें अनुभव के आधार पर ही जाना जा सकता है। इस वर्ष केवल पाँच साधना सत्र होंगे। प्रथम सत्र 1 फरवरी से 10 फरवरी तक का बसन्त पर्व के अवसर पर होगा जो यह अंक पहुँचने से पूर्व ही सम्पन्न हो चुका होगा। अब जिनमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, वे केवल चार ही शेष हैं।
साधना में मस्तिष्कीय प्रशिक्षण तथा शरीर को अभ्यास कराने की क्रिया−पद्धति चलती है। सूक्ष्म साधना में आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाया जाता है।
साधना−क्रम में सौभाग्य से ऐसा ही संयोग जुड़ गया है।
साधना दर्शन एवं व्यवहार के चार आधार (1) आत्म−ज्ञान (2) ब्रह्म−ज्ञान (3)तत्व−ज्ञान (4) सद्ज्ञान। इन चारों के अन्तर्गत चारों वेदों में वर्णित ब्रह्म विद्या के समस्त ज्ञान−विज्ञान का समावेश हो जाता है।
साधना में। हर दिन जो आधा घण्टा जप करना पड़ता था वह अलग से नहीं करना होता वरन् नहीं 27 मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।
साधना में लगभग असंभव ही है, उसकी बात नहीं सोची जानी चाहिए। ध्यान साधना का व्यावहारिक रूप इतना ही है कि भक्त और भगवान के बीच उच्चस्तरीय आदान−प्रदान चलना चाहिए। भक्त अपनी समस्त आकाँक्षाओं और सम्पदाओं को ईश्वर के लिए समर्पित करता है और इसके बदले में वह सब कुछ पाता है जो ईश्वर स्वयं है। मनुष्य को स्पष्ट करने वाली ईश्वरीय सत्ता अपनी अनुभूति, आनन्द और उल्लास के रूप में छोड़ती है। भगवान से कुछ मिला या नहीं इसकी परख इस रूप में की जा सकती है कि उल्लास−आदर्शवादिता के प्रति उत्कंठा भरा उभार अन्तःकरण में उमगना आरम्भ हुआ या नहीं सद्भावना और सत्प्रवृत्ति अपनाने वाले को सहज ही मिलते रहने वाला आत्म−सन्तोष आनन्द अनुभव में आता है या नहीं।
साधना पूरी हो जाने पर दसवें दिन अनुष्ठान की पूर्णाहुति समझी जानी चाहिए इन दिनों (1) हवन (2) ब्रह्मदान (3) कन्याभोज के तीन उपचार पूरे करने चाहिएं।
साधना का एक अति महत्वपूर्ण अंग है−सादगी। ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ की उक्ति सोलह आने सत्य है। उच्च विचारों को जीवन−क्रम में स्थान मिल सके इसके लिए सादगी की नीति अपनाया जाना नितान्त आवश्यक है।
साधना में अपने दृष्टिकोण, क्रिया−कलाप, गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत किया जाता है। प्रमुख शक्तियों को जगाया जाता है। स्थूल साधना में मस्तिष्कीय प्रशिक्षण तथा शरीर को अभ्यास कराने की क्रिया−पद्धति चलती है। सूक्ष्म साधना में आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाया जाता है।
साधना को−उर्वरा भूमि की और उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है। उभय−पक्षीय व्यवस्था बन पड़ने पर ही आत्मिक प्रगति का रथ ठीक तरह अग्रसर होता है। दोनों पहिये समान आकार−प्रकार के और सही सुदृढ़ होने चाहिएं।
साधना के अंग बन जाते हैं। कामों में विकृतियाँ तभी उभरती हैं जब उन्हें संकीर्ण स्वार्थ स्थिति के लिए किया जाता है। कर्त्तव्य−निष्ठ सैनिक की तरह यदि ईश्वर की सेना का अकिंचन सिपाही अपने को माना जाय और जिस तरह सैनिक राष्ट्रहित के लिए बड़े से बड़ा बलिदान करने और कड़े से कड़ा अनुशासन मानने के लिए तैयार रहता है, वैसी ही साधक की मनःस्थिति होनी चाहिए। इस चिन्तन को ध्यान में रखकर किये गये सभी काम कर्मयोग की श्रेणी में गिने जाएंगे ओर उनका परिणाम योगाभ्यास के लिए की गई तप साधना जैसा श्रेयस्कर ही होगा।
साधना तो हर घड़ी चलती रहनी चाहिए। मन, वचन और कर्म का स्तर ऊंचा रखकर जो सोचा, बोला और किया जाता है, वह सब कुछ योगाभ्यास की तरह सत्परिणाम उत्पन्न करता है। कर्मयोग की साधना सर्वांगपूर्ण है। वह जीवन−लक्ष्य को प्राप्त करने और अगणित दिव्य सिद्धियों को प्रदान करने में सुनिश्चित रूप से सफल होती है।
साधना सत्र अथवा वानप्रस्थ सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। अपने घरों की महिलाओं और कन्याओं को भी इस शिक्षा से लाभान्वित होने दिया जाय। इसी की चर्चा अन्तिम दो लेखों में है। इस समूचे प्रशिक्षण को पूरे ध्यान और मननपूर्वक पढ़ा, समझा जायगा और प्रस्तुत प्रेरणाओं को अपनाया जायगा ऐसी अपेक्षा की गई है।
साधना विशेष रूप से इन्हीं दिनों सम्पन्न की जाती है। मध्य काल में तन्त्र प्रयोजनों की मान्यता बहुत थी इसलिए देवी आराधना के विभिन्न उपचारों के लिए इन्हीं दिनों वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से विशेष क्रिया−कृत्य किये जाते थे। अभी भी जहाँ−जहाँ देवियों के मन्दिर हैं, वहाँ−वहाँ छोटे−बड़े तान्त्रिक आयोजन होते हैं। यों सतोगुणी साधनाओं के लिए भी यह समय अधिक उपयुक्त है, पर प्रचलन इन दिनों दुर्गा पूजा के नाम से ही चल पड़ा है। बंगाल, आसाम, उड़ीसा, मणिपुर, नेपाल, भूटान एवं गुजरात में दुर्गा पूजा के विशेष समारोह होते हैं।
साधना वर्ष में अखण्ड−ज्योति के प्रिय परिजनों को आत्मिक प्रगति के लिए−विशेष प्रयत्न करने का अनुरोध किया गया है। इस प्रयास के तीन पक्ष हैं− (1) उपासनात्मक विधि−विधान, जिसमें 45 मिनट नियमित जप ध्यान, हंसयोग तथा लययोग की प्रक्रिया सम्मिलित है। सोते और उठते समय का आत्मबोध चिन्तन और तत्वबोध मनन भी इसी से जुड़ा हुआ है। (2) जीवन के स्तर को परिष्कृत करने के लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।
साधना का प्रथम चरण है और लोक मंगल के बढ़−चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत करना दूसरा। इस प्रक्रिया को गतिशील एवं सुविधाजनक बनाने के लिए ही पूजा पाठ के अनेकानेक कर्मकाण्डों एवं विधि−विधानों का सृजन हुआ है।
साधना−क्रम आरम्भ किया था और किसी न किसी रूप में हमारा सहयोग लिया था। इनमें से कुछ तो निष्ठापूर्वक हमारे कदम से कदम मिलाकर बढ़ते चले आये हैं और आत्मिक प्रगति की दृष्टि से आज वहाँ हैं जिस पर वे और हम दोनों ही सन्तोष व्यक्त कर सकते हैं। किन्तु कितने ही ऐसे भी रहे हैं जिनका उत्साह देर तक स्थिर न रह सका। कारणवश उनमें शिथिलता आई और वह प्रयास छूट गया। अच्छा होता वे गिरते−उठते किसी प्रकार उस क्रम को जारी रखे रहते और पूरा न सही अधूरा लाभ तो पा लेते।
साधना मंडली की व्यवस्था यथासम्भव जल्दी ही बना लेनी चाहिए।
साधनात्मक साहस हो वे अतिरिक्त समय निकाल कर और आत्म नियन्त्रण करके इस विशेष साधना का लाभ उठायें। इनका सम्पुट लग जाने से सामान्य साधना में वैसी ही सफलता मिलेगी, जैसे उपयुक्त समय पर वर्षा हो जाने से अच्छी फसल होने में विशेष सहायता मिलती है।
साधना प्रक्रिया में ही निरत रहना होगा। स्मरण रखने योग्य यह है कि 45 मिनट की उपासना एवं नवरात्रि आदि की तपश्चर्या पर जितना ध्यान दिया जाना है उतना ही जीवन साधना का आश्रय लेकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप का भी परिमार्जन, परिशोधन किया जाना है। जीवन साधना को−उर्वरा भूमि की और उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है। उभय−पक्षीय व्यवस्था बन पड़ने पर ही आत्मिक प्रगति का रथ ठीक तरह अग्रसर होता है। दोनों पहिये समान आकार−प्रकार के और सही सुदृढ़ होने चाहिएं।
साधना वर्ष आरम्भ हो गया। ठीक एक वर्ष में 77 के बसन्त पर इसकी पूर्णाहुति हो जायगी। बीच के महीनों से भी इस साधन शृंखला की सदस्यता अपनाई जा सकती है और जब भी अवसर मिले तब से भी इसमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, पर उसकी समाप्ति हर हालत में 77 के बसन्त को ही करनी होगी। बीच में−देर से सम्मिलित होने वालों की साधना पूरे वर्ष न चलकर उतने समय कम चलेगी जितने कि वे देर में सम्मिलित हुए। तीन महीने पीछे सम्मिलित होने वाले मात्र 9 महीने में विशिष्ट सहयोग का लाभ उठा सकेंगे।
साधना का लाभ उठायें। इनका सम्पुट लग जाने से सामान्य साधना में वैसी ही सफलता मिलेगी, जैसे उपयुक्त समय पर वर्षा हो जाने से अच्छी फसल होने में विशेष सहायता मिलती है।
साधना बनती है। दो घण्टे इस चिन्तन को कर्मरूप में परिणत करने के लिए लगने चाहिएं। लोक−मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में यह समय लगना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन ही सब कुछ नहीं है−अपने लिए जिन्दा रहते वासना, तृष्णा की और मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति की बात सोचते रहना स्वार्थ साधन ही कहा जायगा। मनुष्य जीवन ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए−इस संसार को अधिक सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए मिला है।
साधना का पुनर्जागरण हो रहा है उनके सदस्यों को सम्पर्क जन्य लाभ किस प्रकार मिल पावेगा?
साधना का−अतिरिक्त संरक्षण कर सकना सम्भव हो सके।
साधना करनी हो, वे दोनों बार समय से पूर्व उसकी सूचना हरिद्वार भेज दें। ताकि उन दिनों साधक को सुरक्षात्मक, संरक्षण और उस क्रम में रहने वाली भूलों के दोष परिमार्जन का लाभ मिलता रहे। विशेष साधना के लिए विशेष मार्ग−दर्शन एवं विशेष संरक्षण मिल सके तो उससे सफलता की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है। वैसे प्रत्येक शुभ कर्म का संरक्षण भगवान स्वयं ही करते हैं।
साधना। इसके मध्य में रामनवमी का पर्व भी आता है।
साधनासत्र हम लोगों की अनुपस्थिति में किस प्रकार चलेंगे कह नहीं सकते, पर जब तक उपस्थिति है तब तक यहाँ आकर कई तरह के प्राण अनुदान पाने की इच्छा हर परिजन की बनी ही रहनी चाहिए। जो आ सकें वे साधना सत्र अथवा वानप्रस्थ सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। अपने घरों की महिलाओं और कन्याओं को भी इस शिक्षा से लाभान्वित होने दिया जाय। इसी की चर्चा अन्तिम दो लेखों में है। इस समूचे प्रशिक्षण को पूरे ध्यान और मननपूर्वक पढ़ा, समझा जायगा और प्रस्तुत प्रेरणाओं को अपनाया जायगा ऐसी अपेक्षा की गई है।
साधना मण्डलियों का−क्रम हर हालत में गायत्री जयन्ती 7 जून 76 तक पूर्ण हो जाना है। इसके उपरान्त सम्बद्ध सूत्रों का सिलसिला नहीं चलेगा। अनुसदस्यों को भी मार्ग−दर्शन, संरक्षण के लिए अपनी सूची में इससे आगे सम्मिलित न किया जा सकेगा।
साधना का भी अतिरिक्त रूप से होता रहेगा।
साधना सम्पन्न होती है।
साधना के नाम पर हमारे जीवन का जो भी बहुमूल्य समय लगा है उसका प्रत्येक क्षण गायत्री को आधार मानकर ही प्रयुक्त किया गया है। इस प्रयोग में जो अनुभव हुए हैं उनने व्यक्तिगत रूप से भी हमारी निष्ठा को क्रमशः अधिकाधिक परिपक्व ही किया है। ऐसी दशा में हमारा परामर्श भी अपने विश्वास एवं अनुभव के आधार पर ही हो सकता है। दैनिक सामान्य उपासना के लिए तथा विशेष शक्ति संचय के लिए गायत्री उपासना ही हमें सर्वश्रेष्ठ लगी है तदनुसार जिनने भी हमारा परामर्श एवं सहयोग माँगा है, उन्हीं के लिए कहा है। अन्य कोई मार्ग देखा ही नहीं तो उसका मार्ग−दर्शन किया भी कैसे जा सकता है।
साधना में आकाँक्षाओं का स्तर अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसी को परखते हुए किसी की आन्तरिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है। जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने की जिन्हें वस्तुतः आकाँक्षा हो उन्हें उसका मूल्य चुकाने के लिए तैयार होना चाहिए।
साधना एवं प्रवचनों में सम्मिलित रहने के लिए सत्र संचालकों से विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता रहा करेगी।
साधना सत्र कहा जा सकता है। उनमें पिछले प्राण प्रत्यावर्तन−जीवन साधना और योगतप के शिक्षण का सार तत्व और स्वर्ण जयन्ती वर्ष का विशेष अनुदान सम्मिलित है साधना में क्रिया−कृत्य से भी अधिक प्रभावी स्थान वातावरण एवं सान्निध्य का पड़ता है। यह विशेष उपलब्धियाँ शांति−कुंज में रह कर उपासना करने वालों को कितनी अधिक मात्रा में मिली हैं, इन्हें अनुभव के आधार पर ही जाना जा सकता है। इस वर्ष केवल पाँच साधना सत्र होंगे। प्रथम सत्र 1 फरवरी से 10 फरवरी तक का बसन्त पर्व के अवसर पर होगा जो यह अंक पहुँचने से पूर्व ही सम्पन्न हो चुका होगा।
साधना एवं तपश्चर्या का उद्देश्य जीव संध्या का परिमार्जन करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
साधना। द्वितीय−सफलता के लिए प्रखर कर्म और उसके लिए संकल्प बल चाहिए। तृतीय−अध्यात्म बनाम परमार्थ। इस प्रकार कुल 13 लेखों में जीवन−साधना के चारों विषयों का समावेश करके यथा सम्भव प्रयत्न किया गया है।
साधना, खेचरी मुद्रा, जप, ध्यान, आत्मशोधन, देव सान्निध्य की सभी साधनाएँ साथ−साथ चलेंगी। इन प्रयोजनों को ठीक तरह पूरा कर सकने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन एवं सहयोग सभी शिक्षार्थियों को मिलेगा। पूरे दस−दस दिन के यह सत्र होंगे। इतने समय यहाँ रहना होगा अस्तु रास्ते के आने−जाने का समय ध्यान में रखते हुए ही आगन्तुकों को अवकाश लेना चाहिए। संक्षेप में इन्हें साधना सत्र कहा जा सकता है।
साधना उपचार इसी भ्रान्ति के इर्द−गिर्द चक्कर काटते हैं। किस तरकीब से किस देवता को कितनी जल्दी वश में किया जा सकता है लोग इसी के चित्र−विचित्र ताने−बाने बुनते रहते हैं। पर उससे बनता कुछ नहीं। देवता सद्गुणों को कहते हैं। वे अपने व्यक्तित्व में सोये हुए पड़े होते हैं।
साधना कहते हैं। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर है। चेतना की उच्चस्तरीय सम्वेदना को ईश्वर कहते हैं। साधना प्रयोजनों में इसी के साथ सम्पर्क बनाना पड़ता है।
साधना में प्रधान प्रयत्न पतन का निवारण ही हो सकता है। पतन का कारण दृष्टिकोण का दूषित होना−मनोविकारों की भरमार। दुर्बुद्धिग्रस्त दुष्प्रवृत्ति निरत ही अनेकानेक शोक−सन्तापों में कष्ट क्लेशों में, अभाव दारिद्रय में ग्रसित पाये जाते हैं। पत्ते सींचने से नहीं जड़ सींचने से काम बनता है काँटे तोड़ने से नहीं बबूल की जड़ काटने से आये दिन की चुभन दूर होती है। जन−मानस के परिष्कार पर ही प्राचीन काल के साधु, ब्राह्मणों का ध्यान केन्द्रित रहता था और वे उसी को मनुष्य की सर्वोपरि सहायता एवं ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा मानते थे।
साधना वर्ष के उपलक्ष में अखण्ड−ज्योति परिवार के जिन परिजनों ने एक वर्ष की गायत्री साधना आरम्भ की हो उनको हमारा एक परामर्श यह भी है कि यदि सम्भव हो तो वे इस वर्ष आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में 9-9 दिन के गायत्री अनुष्ठान करने के लिए समय निकालने के लिए प्रयत्न करें। यह विशेष तपश्चर्या उनके लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।
साधना को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार−विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है।
साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।
साधना सत्र और योगतप साधना सत्र लगातार चले हैं और इनमें दस हजार से अधिक संख्या में लोगों ने आकर प्रशिक्षण प्राप्त किया है। अब 76 बसन्त पर्व से आरम्भ हो कर 77 के बसन्त पर्व तक चलने वाले अपने अध्यात्म वर्ष में यह व्यवस्था सिकोड़ दी गई है। इस वर्ष दस−दस दिवसीय मात्र पाँच सत्र होंगे। इनमें आने वालों को, जीवन साधना और गायत्री उपासना का समन्वय रहेगा। शिक्षार्थियों को एक 24 हजार गायत्री पुरश्चरण इसी पुनीत भूमि में रहकर करना होगा।
साधना प्रयोजनों में इसी के साथ सम्पर्क बनाना पड़ता है।
साधना स्थल का वातावरण शांति−कुंज से मिलता जुलता बन सके इसके लिए उपयुक्त स्थान पहले से ही चुना जाना चाहिए और आवश्यक व्यवस्था बनाने में पहले से ही पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
साधना वर्ष में परिजनों से (1) 45 मिनट के उपासना क्रम में स्वयं सम्मिलित होने (2) दोनों नवरात्रियों की तपश्चर्या करने (3) अनुसाधक तलाश करके उनकी स्थानीय मण्डली चलाने एवं (4) चार दिवसीय सत्र व्यवस्था बनाने के चार कार्यों का अनुरोध किया गया है। इसके लिए आरम्भ के दो महीने कुछ अधिक सोचने, करने और तैयारी का ढाँचा बिठाये में लगेंगे। इसके बाद तो निश्चिन्ततापूर्वक शेष वर्ष की साधना प्रक्रिया में ही निरत रहना होगा। स्मरण रखने योग्य यह है कि 45 मिनट की उपासना एवं नवरात्रि आदि की तपश्चर्या पर जितना ध्यान दिया जाना है उतना ही जीवन साधना का आश्रय लेकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप का भी परिमार्जन, परिशोधन किया जाना है। जीवन साधना को−उर्वरा भूमि की और उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है।
साधना पूरे वर्ष न चलकर उतने समय कम चलेगी जितने कि वे देर में सम्मिलित हुए। तीन महीने पीछे सम्मिलित होने वाले मात्र 9 महीने में विशिष्ट सहयोग का लाभ उठा सकेंगे। पीछे उपक्रम को जारी तो आजीवन रखा जा सकता है, पर सूत्र सम्बद्धता का सिलसिला टूट जायगा।
साधनाओं की अपेक्षा अनेक गुने परिमाण में− अनेक गुना उच्चस्तरीय लाभ उठा सकेंगे।
साधना का क्रम भी चलना चाहिए। पूजा और पाठ का बीजारोपण, उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के रूप में अंकुरित और पल्लवित होना चाहिए।
साधना वर्ष में अखण्ड−ज्योति के सभी सदस्यों से गायत्री महाशक्ति की संक्षिप्त, सरल किन्तु अति महत्वपूर्ण साधना करने के लिए, अनुरोध किया गया है। प्रसन्नता की बात है कि उसका महत्व समझा गया और परिजनों में से अधिकाँश ने इस साधन शृंखला की सदस्यता स्वीकार कर ली है। जिनकी सूचना मिली है उनके नाम नोट कर लिये गये हैं। उनका उपासना क्रम ठीक तरह चले इस पर आवश्यक ध्यान रखा जा रहा है और उन्हें प्रगति की दिशा में अग्रसर करने वाला आवश्यक सहयोग दिया जा रहा है। आशा की जानी चाहिए कि इस साधना उपक्रम से उतना लाभ उठाया जा सकेगा जितना कई वर्षों की−कई घण्टे की उपासना से ही सम्भव होता है।
साधना जैसा श्रेयस्कर ही होगा।
साधना सर्वांगपूर्ण है। वह जीवन−लक्ष्य को प्राप्त करने और अगणित दिव्य सिद्धियों को प्रदान करने में सुनिश्चित रूप से सफल होती है।
साधना क्रम को अपनायें तो प्रसन्नतापूर्वक अपनायें, पर उन्हें विशेष संरक्षण की सुविधा न मिल सकेगी। उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर आधी संख्या 5 फरवरी 76 के बसन्त पर्व पर ही पूरी हो चुकेगी। शेष आधी के पूरा होने में सम्भवतः चार महीने और लग सकते हैं। आगामी गायत्री जयन्ती 7 जून की है। उस दिन निश्चित रूप से साधन की शृंखला सदस्यता का प्रवेश बन्द कर दिया जायगा।
साधना उन्माद बनकर रह गई है। यहाँ तक कि ईश्वर भी चापलूसी और रिश्वत उपहार के आधार पर कृपा करता बता दिया गया। पाप से डरने की और परमार्थ करने की अब तनिक भी आवश्यकता नहीं रही क्योंकि तनिक−तनिक से कर्मकाण्ड पाप नाश करने और अक्षय पुण्य पाने के लिए पर्याप्त बता दिये गये हैं। जीवन का मूल्य और उद्देश्य न समझ पाने के कारण लोग पशु और पिशाच का जीवन जी रहे हैं। यह सब जन−मानस में घुसे हुए अज्ञान असुर का ही प्रभाव है।
साधना का प्रथम लक्ष्य होना चाहिए। इन मोर्चों को जीतने पर ही भौतिक और आत्मिक प्रगति का पथ−प्रशस्त हो सकता है। विरक्त होने का मतलब तृष्णा, वासना और अहंकारिता से अनुराग छोड़ना है। श्रम−निष्ठा और कर्त्तव्य परायणता तो साँस रहने तक छोड़ने की वस्तु नहीं है जवानी में कठोर और बुढ़ापे में हलके काम चुने जाएं यह दूसरी बात है, पर अपनी योग्यता एवं स्थिति के अनुरूप श्रम संलग्न हर किसी को रहना चाहिए और समय रूपी जीवन सम्पदा का एक कण भी निरर्थक नहीं गँवाना चाहिए।
साधना उपक्रम से उतना लाभ उठाया जा सकेगा जितना कई वर्षों की−कई घण्टे की उपासना से ही सम्भव होता है। भूमि की उर्वरता और बीज की प्रखरता का महत्व तो है ही, पर साथ ही अनुभवी माली का सहयोग मिल जाय तो पौधे के सुविकसित होने की सम्भावना और भी अधिक सुनिश्चित रहती है। इस वर्ष के साधना−क्रम में सौभाग्य से ऐसा ही संयोग जुड़ गया है।
साधना वर्ष की विशेष एवं व्यापक प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए यहाँ की शिक्षण प्रक्रिया में कमी करना आवश्यक हो गया और करना भी पड़ा है।
साधना से बच कर मात्र भजन, पूजन में निरत रहने वाले तथाकथित साधक इसी कारण छूंछ रहते हैं कि वे उदारता को चरितार्थ करने वाला सत्साहस जुटा नहीं पाते और व्यक्तिगत उपलब्धियों की संकीर्णता में ही घिर कर रह जाते हैं।
साधना वर्ष के साधकों से चार अनुरोध
साधना सम्बन्धी हैं और दो लेख प्रशिक्षण सम्बन्धी। नवरात्रि सम्बन्धी दो लेखों में इस वर्ष चैत्र और अश्विन नवरात्रियों में 24 हजार गायत्री अनुष्ठान तपश्चर्या का महत्व और विधान बताया गया है, साथ ही अपेक्षा की गई है कि जिनमें साधनात्मक साहस हो वे अतिरिक्त समय निकाल कर और आत्म नियन्त्रण करके इस विशेष साधना का लाभ उठायें। इनका सम्पुट लग जाने से सामान्य साधना में वैसी ही सफलता मिलेगी, जैसे उपयुक्त समय पर वर्षा हो जाने से अच्छी फसल होने में विशेष सहायता मिलती है।
साधना है। इसे अपनाये बिना सद्भावनाओं को सत्प्रवृत्तियों का रूप धारण करने का अवसर ही नहीं मिल पायेगा और परमार्थ चिन्तन के अंकुर खाद पानी के अभाव में मुरझाते सूखते चले जाएंगे। सेवा साधना से बच कर मात्र भजन, पूजन में निरत रहने वाले तथाकथित साधक इसी कारण छूंछ रहते हैं कि वे उदारता को चरितार्थ करने वाला सत्साहस जुटा नहीं पाते और व्यक्तिगत उपलब्धियों की संकीर्णता में ही घिर कर रह जाते हैं।
साधना है। इस पुण्य प्रयोजन के लिए आत्म−साधना की बात सोचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को दो घण्टे नित्य समय देने की योजना बनानी ही चाहिए।
साधना की पृष्ठभूमि इसी केन्द्र बिन्दु पर आधारित है।
साधना में संलग्न होने से ही पूरा हो सकता है। देश, धर्म, समाज, संस्कृति के उत्कर्ष में अपना पसीना, समय एवं मनोयोग लगाना आत्मिक प्रगति की साधना का अविच्छिन्न अंग है। सेवा धर्म को अपनाये बिना किसी की भी आत्मा पवित्र नहीं हो सकती। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करने वाला योगाभ्यास−लोकमंगल में योगदान देने के अतिरिक्त और दूसरा हो ही नहीं सकता। प्राचीन काल के ऋषि जीवन में जितना भजन, पूजन का स्थान रहता था उससे कई गुना समय, श्रम वे गुरुकुल संचालन, शास्त्र लेखन, चिकित्सा, धर्म प्रचार आदि प्रयोजनों के लिए लगाते थे।
साधना को उतना ही महत्व देना चाहिए जितना उपासना एवं स्वाध्याय को। आत्मिक प्रगति के चार सूत्र प्रख्यात हैं (1) साधना (2) स्वाध्याय, (3) संयम और (4) सेवा। इन चारों को चारपाई के चार पाये की तरह कमरे के चार कोनों की तरह, चार दिशाओं की तरह परस्पर अविच्छिन्न माना जाना चाहिए। उपासना और स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है।
साधना की दृष्टि से गायत्री को सर्वांगपूर्ण एवं सर्व समर्थ कहा गया है। अमृत, पारस, कल्प−वृक्ष और कामधेनु के रूप में इसी महाशक्ति की चर्चा हुई है। पुराणों में ऐसे अनेकानेक कथा प्रसंग भरे पड़े हैं जिनमें गायत्री उपासना द्वारा भौतिक ऋद्धियाँ एवं आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने का उल्लेख है। साधना विज्ञान में गायत्री उपासना को सर्वोपरि माना जाता रहा है। उसके माहात्म्यों का वर्णन सर्वसिद्धिप्रद कहा गया है और लिखा है कि तराजू के एक पलड़े पर गायत्री को और दूसरे पर समस्त अन्य उपासनाओं को रखकर तोला जाय तो गायत्री ही भारी बैठती है।
साधना में सबसे प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण स्थान आलस्य और प्रमाद को निरस्त करने का है। इसके लिए यह आवश्यक है कि समय को बहुमूल्य सम्पदा समझा जाय और एक−एक क्षण का पूरा मूल्य वसूल करने के लिए श्रम संलग्न रहा जाय। प्रातःकाल उठते ही− अथवा रात्रि को सोते समय अगले दिन निपटाये जाने वाले कामों को ध्यान में रखते हुए दिनचर्या बना ली जाय और जब तक कोई अनिवार्य कारण न आ जाय तब तक उस दिनचर्या को मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ पूरा किया जाय। सुस्ताने का अवकाश भी रखा जा सकता है, पर उसके लिए बहुत सा समय गँवाने की आवश्यकता नहीं है। काम को खेल मनोरंजन मानकर किया जाय और उसी प्रयोजन में कार्य−पद्धति का थोड़ा−थोड़ा फेर बदल कर लिया जाय तो उस परिवर्तन से ही ऊब दूर हो जाती है वस्तुतः शरीर को सुस्ताने की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती, जितनी मन की ऊब उतारने की।
साधना की बात सोचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को दो घण्टे नित्य समय देने की योजना बनानी ही चाहिए।
साधना वर्ष में प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री पुरश्चरण सम्पन्न होते चलने की- एक लाख संकल्प निष्ठ साधकों की तपश्चर्या का प्रभाव सूक्ष्म जगत के परिशोधन में अपनी असाधारण भूमिका सम्पन्न करेगा। इसमें सम्मिलित रहने वाले साधक इतने ही समय में की जा सकने वाली सामान्य साधनाओं की अपेक्षा अनेक गुने परिमाण में− अनेक गुना उच्चस्तरीय लाभ उठा सकेंगे।
साधना करके कोई भी सिद्ध पुरुष बन सकता है।
साधना करनी पड़ती है। मात्र पूजा−पत्री की थोड़ी सी ‘हथ फेरी’ कर लेने जैसे तुच्छ प्रयत्न से उतना बड़ा लाभ नहीं मिल सकता जिसके आधार पर तुच्छ से नर कीटक को−महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा बनने की परमसिद्धि प्राप्त होती है। सामान्य लोग अपना जीवन भार भी शाँति से नहीं ढो पाते जब कि देवात्माएँ अपनी नाव में बिठा कर असंख्यों का बेड़ा पार करती हैं। इतनी बड़ी सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए जो तप करना पड़ता है उसका प्रवेश द्वार सादगी अपनाने को ही समझा जाना चाहिए।
साधना आरम्भ की हो उनको हमारा एक परामर्श यह भी है कि यदि सम्भव हो तो वे इस वर्ष आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में 9-9 दिन के गायत्री अनुष्ठान करने के लिए समय निकालने के लिए प्रयत्न करें। यह विशेष तपश्चर्या उनके लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।
साधना के लिए गायत्री उपासना में संलग्न होना चाहिए। उसी समय आकाशवाणी ने ब्रह्माजी को गायत्री मन्त्र सुनाया। ब्रह्मा ने उसकी उपासना की। शक्ति पाई। सृष्टि रची और ज्ञान की धारा गायत्री और विज्ञान की धारा सावित्री को प्रवाहित करके जीवधारियों के लिए सुख−शांतिदायिनी गंगा−यमुना बहाई।
साधना ऐसी-
साधना माना जाता है, वे ही कुपात्रों के हाथों में पहुँचकर दुरुपयोग में प्रयुक्त होते हैं और सुख देने के स्थान पर दुःखदायी संकट उत्पन्न करते हैं।
साधना है। अपने आपकी साधना करके कोई भी सिद्ध पुरुष बन सकता है।
साधना वर्ष के उपलक्ष में चल रही 45 मिनट की प्रातःकालीन उपासना और प्रातः सायं का आत्मबोध, तत्वबोध, चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
साधना अभ्यर्थना इसी की की जाती है। अनुग्रह और वरदान इसी से प्राप्त होते हैं। वस्तुतः इसे विश्वात्मा अथवा मानवी उत्कृष्टता की चरमावस्था कह सकते हैं। परब्रह्म की असंख्य हलचलों में से एक यह परमात्म सत्ता तरंग भी है, जिसके साथ सम्पर्क बनाकर मानवी अन्तरात्मा को अपने विकास का अवसर मिलता है। अस्तु, उपासना में आस्तिकता को−ईश्वर भक्ति को परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाले प्रयोग प्रयोजनों को अनिवार्य माना गया है।
साधना के दिव्य चमत्कारों के रूप में शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक किया है।
साधना सिखाये तो उसे गुरु का दिया मन्त्र तो कहा जा सकता है, पर जब भी गुरु मन्त्र शब्द को शास्त्रीय परंपरा के अनुसार प्रयुक्त किया जायगा तो उसका तात्पर्य गायत्री मन्त्र से ही होगा। इस्लाम धर्म में कलमा का −ईसाई धर्म में बपतिस्मा का जो अर्थ है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मंत्र गायत्री को प्राप्त है।
साधना (2) स्वाध्याय, (3) संयम और (4) सेवा। इन चारों को चारपाई के चार पाये की तरह कमरे के चार कोनों की तरह, चार दिशाओं की तरह परस्पर अविच्छिन्न माना जाना चाहिए। उपासना और स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है। चौथा चरण सेवा साधना है।
साधना विज्ञान की रीड़ कह सकते हैं। ज्ञान दृष्टि से देखा जाय तो स्पष्ट है कि इन्हीं चौबीस अक्षरों की व्याख्या से चारों वेद रचे गये। वेदमाता नाम से प्रख्यात इस महामन्त्र के सम्बन्ध में यही माना जाता है कि भारतीय धर्म और अध्यात्म का कल्प−वृक्ष जिस बीज के कारण , बढ़ा और सुविस्तृत हुआ वह गायत्री मन्त्र ही है। चारों वेद गायत्री के चार चरणों के चार व्याख्यान हैं ॐ भूर्भुवः स्वः यह शीर्ष है और तत्सवितुर्वरेण्यं−भर्गो देवस्य धीमहि−धियो योनः प्रचोदयात्−यह तीन चरण हैं। इन चारों को मिलाकर ही पूर्ण गायत्री मन्त्र बनता है।
साधना और योगतप के शिक्षण का सार तत्व और स्वर्ण जयन्ती वर्ष का विशेष अनुदान सम्मिलित है साधना में क्रिया−कृत्य से भी अधिक प्रभावी स्थान वातावरण एवं सान्निध्य का पड़ता है। यह विशेष उपलब्धियाँ शांति−कुंज में रह कर उपासना करने वालों को कितनी अधिक मात्रा में मिली हैं, इन्हें अनुभव के आधार पर ही जाना जा सकता है। इस वर्ष केवल पाँच साधना सत्र होंगे। प्रथम सत्र 1 फरवरी से 10 फरवरी तक का बसन्त पर्व के अवसर पर होगा जो यह अंक पहुँचने से पूर्व ही सम्पन्न हो चुका होगा। अब जिनमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, वे केवल चार ही शेष हैं।
साधना से जीव और ब्रह्म की एकता हो जाती है। जिस प्रकार जल में जल डाल देने से वे परस्पर मुक्त होकर मिल जाते हैं। उसी प्रकार योगाभ्यास से आत्मा भी परमात्मा बन जाता है।
साधना में अधिक परिपक्व हो तथा जिन्हें सुविधा हो वे सन् 76 की दोनों नवरात्रियों की अनुष्ठान, तपश्चर्या में भी सम्मिलित होने का साहस करें। चैत्र की नवरात्रि 1 अप्रैल से और आश्विन की नवरात्रि 24 सितम्बर से आरम्भ होगी और पूरे 9-9 दिन चलेंगे। इसमें ढाई−तीन घण्टे जप तथा ब्रह्मचर्य उपवास आदि के नियम, पालन जिनके लिए सम्भव हों वे इस तपश्चर्या का भी लाभ उठायें। इसमें सम्मिलित होने वालों को अलग से सूचना देनी चाहिए ताकि उनकी इस अतिरिक्त साधना का−अतिरिक्त संरक्षण कर सकना सम्भव हो सके।
साधना में आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाया जाता है।
साधना को निपटा लिया जाना चाहिए। समय लगाने के अतिरिक्त उपवास अथवा संयत स्वल्प एवं सात्विक भोजन का नियम अपनाना पड़ेगा। ब्रह्मचर्य उन नौ दिनों में अनिवार्य रूप से आवश्यक है। कुछ और भी छुट−पुट प्रतिबन्ध हैं जिनकी चर्चा अगले पृष्ठों पर अंकित है।
साधना की विचारणा एवं कार्य−पद्धति पर प्रकाश डाला गया है और उसे किस प्रकार कार्यान्वित किया जा सकता है, इसका व्यावहारिक परामर्श दिया गया है।
साधना की दृष्टि से नियमित दिनचर्या का बनना और उस पर कठोरतापूर्वक आरुढ़ रहना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है। कर्मयोग का इसे व्यावहारिक और सर्वप्रथम कदम कहा जा सकता है। निठल्लापन जड़ता का−तामसिकता का चिन्ह है। इसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य माना जाना चाहिए। शरीर की क्रिया शक्ति और मस्तिष्क की कुशाग्रता को नष्ट करने में आलस्य, प्रमाद से बढ़कर और कोई शत्रु नहीं हो सकते।
साधना में संलग्न रहते बीतनी चाहिएँ। तिथियों की घट−बढ़ अक्सर होती रहती है उनका कोई प्रभाव इन पूरे नौ दिनों पर नहीं पड़ता।
साधना में वैसी ही सफलता मिलेगी, जैसे उपयुक्त समय पर वर्षा हो जाने से अच्छी फसल होने में विशेष सहायता मिलती है।
साधना जितने सत्परिणाम की अपेक्षा भी नहीं रहेगी। फिर भी जितना कुछ विशेष साधन−नियम पालन इस नवरात्रि पर्व पर बन पड़े उत्तम ही है।
साधना में संलग्न रहना ही इस आकाँक्षा पूर्ति के दो मार्ग हैं। ईश्वर प्राप्ति−स्वर्ग, मुक्ति सिद्धि आदि को लक्ष्य मानकर जो साधना मार्ग अपनाना पड़ता है उनमें यही दो तथ्य प्रधान होते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता अपनाकर जिया जाने वाला आदर्श जीवन आध्यात्मिक साधना का प्रथम चरण है और लोक मंगल के बढ़−चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत करना दूसरा। इस प्रक्रिया को गतिशील एवं सुविधाजनक बनाने के लिए ही पूजा पाठ के अनेकानेक कर्मकाण्डों एवं विधि−विधानों का सृजन हुआ है।
साधना मन−क्षेत्र में उत्कृष्टता स्थापित करने की है। यह प्रयोजन पुराने कुसंस्कारों से निरन्तर जूझते रहने और सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव में सम्मिलित करने से ही पूरा होता है। इसके लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की चतुर्मुखी चेष्टा अमुक समय से ही नहीं, वरन् हर घड़ी अपनानी पड़ती है कुशल अध्यापक की तरह अपनी ही अन्तरात्मा को कठोर समीक्षक और अभिनव मार्ग−दर्शक की तरह नियुक्त करना पड़ता है। वह आत्म-मंथन कुछ दिन तो कठिन जान पड़ता है किन्तु कुछ ही समय में सब कुछ सरल और स्वाभाविक बन जाता है।
साधना नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-October
साधना से मिलती हैं। साधना का ही दूसरा नाम एकाग्रता है। एकाग्रता के दो अविच्छिन्न पथ हैं-तन्मयता और तत्परता। सफलताओं के वट वृक्ष के मूल में एकाग्रता की जड़ें ही गहराई तक प्रवेश होती और सक्रिय रहती देखी जा सकती हैं। आलस्य पर नियन्त्रण स्थापित करने के लिए श्रम और समय का पूरी तत्परता के साथ अभीष्ट प्रयोजन में समावेश करना पड़ता है।
साधना में ही उन्हें जीवन सम्पदा की सार्थकता दिखती है अस्तु निर्वाह की आवश्यकताओं को सीमित करते हैं। सादगी से रहते हैं। मितव्ययिता बरतते हैं। परिवार के पिछले उत्तरदायित्वों के निर्वाह में ही जब कमी रह जाती है तो नये बच्चे-कच्चे पैदा करते जाने की मूर्खता तो उनसे बन ही नहीं पड़ती। भौतिक एषणाओं को निग्रहीत करने के उपरान्त ही इतनी कुछ सामर्थ्य बच सकती है जिसके सहारे आत्मिक प्रगति के लिए-ईश्वर प्राप्ति के लिए-अनिवार्य रूप से आवश्यक आदर्शवाद परमार्थ परायणता को अपनाया जाना सम्भव हो सके।
साधना के प्रत्येक साधक को ऐसा ही अन्तःयुद्ध करना पड़ता है। गीता और रामायण पढ़ने-सुनने का लाभ तभी है जब इन महायुद्धों में लड़ने वाले वीर धर्म प्रेमियों की तरह हमारा भी उत्साह, उमंगें और वैसा ही पराक्रम करने के लिए शौर्य, साहस क्रियाशील हो चले ।
साधना ही अपनानी पड़ी है। वही पद्धति भविष्य में आपने साथ सम्पर्क सूत्र में बँधे हुए साधकों को अपनानी पड़ेगी। जब तक वह प्रबन्ध नहीं बन पड़ता तब तक वर्तमान आश्रम में ही कुछ उलट फेर करके उस तरह का प्रबन्ध किया जायगा कि सूत्रों की रूप रेखा में साधना तत्व का अधिकाधिक समावेश हो सके।
साधना है।
साधनाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। अपने युग में मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक स्तर जिस प्रकार का है उसी को ध्यान में रखकर बनाये गये और बताये गये विधान फलप्रद हो सकते हैं।
साधना में रुचि रखने वालों के प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन करने के लिए शिविर चलेंगे। इसके अतिरिक्त शोध संदर्भ में परीक्षण चलते रहेंगे और युग के अनुरूप साधना का निर्धारण करने के लिए इतना महत्वपूर्ण समुद्र मंथन चलता रहेगा जिसके द्वारा मनुष्य जाति को कुछ उपयोगी रत्न राशि उपलब्ध होने की अपेक्षा की जा सके। उपरोक्त गतिविधियों में जिनकी रुचि है-जो इन क्रियाकलापों का महत्व समझते हैं इस सम्बन्ध में अधिक परिचित हो सकें और इन प्रयासों को सफल बनाने में अपने-अपने ढंग का योगदान कर सकें, इसी उद्देश्य से यह पंक्तियाँ लिखी गई हैं।
साधना के निम्न उद्देश्य हैं।
साधना पद्धति का निर्धारण करते समय यह ध्यान रखना होगा कि उस क्षेत्र में जिन मान्यताओं की स्थापना रखनी अथवा की जानी है, वे सभी तर्क एवं तथ्यों के आधार पर प्रामाणिक होने चाहिएं। बुद्धिवाद के इस युग में क्यों और कैसे का समाधान किये बिना अब कोई बात बन नहीं सकती। श्रद्धा की-गरिमा स्वीकार तो की जा सकती है, पर वह श्रद्धा भी विवेक सम्मत होनी चाहिए। साथ ही यह हृदयंगम कराया जाना चाहिए कि इस स्तर की श्रद्धा अपनाने में किस प्रकार-किस स्तर का सत्परिणाम प्राप्त हो सकेगा। मात्र परंपराओं एवं शास्त्र वचनों के आधार पर कुछ भी कहते सुनते रहा जाय उसे हृदयंगम न कराया जा सकेगा।
साधना में चिन्तन एवं कर्म की समाप्ति वाली आत्मिक अथवा कृत्रिम निःचेष्टता अभीष्ट हो सकती है। सामान्य स्थिति में तो यह अनुत्पादक ही है। इससे कोई लाभ दिखाई नहीं पड़ता। बहुधा ध्यान की तन्मयता में मस्तिष्कीय निःचेष्टता की अपेक्षा की जाती है, यह व्यर्थ है। उपयोगी यह है कि मात्र बिखराव को रोका जाय।
साधना का निर्धारण करने के लिए इतना महत्वपूर्ण समुद्र मंथन चलता रहेगा जिसके द्वारा मनुष्य जाति को कुछ उपयोगी रत्न राशि उपलब्ध होने की अपेक्षा की जा सके। उपरोक्त गतिविधियों में जिनकी रुचि है-जो इन क्रियाकलापों का महत्व समझते हैं इस सम्बन्ध में अधिक परिचित हो सकें और इन प्रयासों को सफल बनाने में अपने-अपने ढंग का योगदान कर सकें, इसी उद्देश्य से यह पंक्तियाँ लिखी गई हैं।
साधना का स्वरूप कलेवर विधि-विधान एवं कर्म-काण्ड निर्धारित करते समय प्राचीन परिपाटी का अन्धानुकरण करते रहने से भी काम नहीं चलेगा। अब च्यवन ऋषि जैसी सारे शरीर पर दीमक छा जाने पर भी अविचल समाधि स्थिति प्राप्त कर सकना कदाचित किसी के लिए भी सम्भव न हो सकेगा। पार्वती की तरह पत्ते खाकर, जल पीकर और वायु के आधार पर-चिरकाल तक साधना रत रह सकना आज की परिस्थिति में किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। अन्यान्य साधनाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। अपने युग में मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक स्तर जिस प्रकार का है उसी को ध्यान में रखकर बनाये गये और बताये गये विधान फलप्रद हो सकते हैं।
साधनाओं में नये सिरे से कुछ निर्धारण करने पड़े तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए।
साधनाओं में से अधिकाँश का उद्देश्य एकाग्रता की क्षमता उत्पन्न करना ही है। ध्यानयोग के अन्तर्गत ही नादानुसंधान, चक्र वेधन, शक्ति भावना जैसी उपासनाओं को गिना जाता है। राजयोग में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के रूप में जिसे चार चरणों में बाँटा गया है उसकी वस्तुतः एक ही प्रक्रिया है-उच्चस्तरीय चिंतन सहित एकाग्रता की साधना। एक ही चेतना की चार गतिविधियों को मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को अन्तःकरण चतुष्टय की संज्ञा दी गई है। चार स्वरूप और व्याख्याएँ होते हुए भी वस्तुतः यह एक ही सत्ता की विवेचनाएँ हैं।
साधना अनवरत रूप से करनी चाहिए। आत्मिक और भौतिक प्रगति के उभय-पक्षीय लाभ इस सत्प्रयत्न के साथ जुड़े हुए हैं। भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए हमें एकाग्रता का महत्व समझना चाहिए और उस पूजा काल की विशेषता नहीं समूचे जीवन क्रम को सारभूत एवं स्वर्णिम उपलब्धि मानकर परिपूर्ण श्रद्धा के साथ उसके उपार्जन में संलग्न रहना चाहिए।
साधना का स्वरूप और आधार खड़ा करना अपने समय का अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए प्राचीन परिपाटी का गहनतम अध्ययन-समय का सूक्ष्मदर्शी विश्लेषण-विसंगतियों का संगतिकरण-निज का क्रियात्मक अनुभव एवं दिव्य प्रकाश की समन्वयात्मक आवश्यकता पड़ेगी। यह कार्य किसी न किसी को तो करना ही था यदि अपने कन्धे पर वह उत्तरदायित्व लद रहा है तो उसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। ईश्वर की इच्छा है तो अपने युग की इस महती आवश्यकता की भी पूर्ति होगी। युग साधना का ऐसा ढाँचा सम्भवतः अगले ही दिनों खड़ा होगा जिसे तथ्यपूर्ण एवं प्रत्यक्ष लाभदायक पाया जा सके।
साधना और क्षमता की न्यूनता को लगन के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। संसार के महामानवों में अधिकाँश की प्रारम्भिक स्थिति बड़ी शोचनीय थी। न उसके पास साधन थे और कौशल न सहयोग। वे अपने स्वल्प क्षमता के सहारे ही अभीष्ट लक्ष्य की ओर धैर्य और साहस का सहारा लेकर लोग संकल्प पूर्वक आगे बढ़े। निष्ठा और तत्परता की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वालों को भगवान प्रगति की ओर बढ़ चलने के अनेक अवसर प्रदान करते हैं-अभावों की पूर्ति होने लगती है और मनस्वी कर्मनिष्ठों को सहयोग की कमी नहीं रहती।
साधना का ही दूसरा नाम एकाग्रता है। एकाग्रता के दो अविच्छिन्न पथ हैं-तन्मयता और तत्परता। सफलताओं के वट वृक्ष के मूल में एकाग्रता की जड़ें ही गहराई तक प्रवेश होती और सक्रिय रहती देखी जा सकती हैं। आलस्य पर नियन्त्रण स्थापित करने के लिए श्रम और समय का पूरी तत्परता के साथ अभीष्ट प्रयोजन में समावेश करना पड़ता है। कर्म के बिखराव को रोक देना और विचारों पर अंकुश रखना इसी का नाम मनोनिग्रह है।
साधना विधान का क्रिया-पक्ष दोनों ही तथ्यों और तर्कों के आधार पर प्रमाणित किये जाने हैं। सोने को अग्नि परीक्षा और कसौटी की रगड़ के बिना जब खरा स्वीकार नहीं किया जा सकता तो आत्म विज्ञान के काल्पनिक अथवा प्रामाणिक होने की बात की जाँच पड़ताल क्यों न होगी? प्राचीनकाल में जन मानस तर्क को इतनी मान्यता नहीं देता था, पर आज तो इसके बिना गाड़ी एक कदम आगे नहीं बढ़ती। अस्तु ब्रह्मविद्या के प्राचीन आधारों को युग की आवश्यकता के अनुरूप नये ढाँचे में ढालना पड़ेगा।
साधना में उनने भारी पुलिस की सहायता की थी। बालक इस समय कहाँ है, उसका सही पता, ठिकाना एवं चुराने वालों के नाम आदि सही रूप में बता देने के कारण पुलिस ने तत्काल वहाँ धावा बोला और अपने प्रयास में सफलता पाई। इस सहयोग के उपलक्ष में टामफीचर को दो हजार डालर का सरकारी पुरस्कार दिया गया था।
साधना प्रधान होंगे। उनमें प्रकाश प्रशिक्षण भी रहेगा, पर वह स्वल्प एवं सूत्र रूप में ही रहेगा। विशेष व्यवस्था प्रेरणात्मक-साधना की रहेगी। शिक्षार्थियों का अधिक समय साधना में और कम शिक्षण सत्संग में लगेगा। अभी तो शांति−कुंज में सामूहिक निवास एवं सामूहिक साधना की ही व्यवस्था है, पर निकट भविष्य में जिस ‘ब्रह्म वर्चस् आरण्य’ के निर्माण की बात सामने है उसमें हर साधक को एक कुटिया में-एकाकी रहने और एकांत साधना करने की व्यवस्था उसी प्रकार बनाई जायगी जिस प्रकार योगियों को एकान्त गुफा में निवास करने और अन्तर्मुखी रहने की रीति-नीति अपनानी पड़ती है।
साधनाओं के विभिन्न स्वरूप और विधान भी एकाग्रता का प्रयोजन पूरा करते हैं। सभी साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान उपलब्ध एकाग्रता की मात्रा को देखकर ही लगाया करते हैं।
साधनाएँ जुड़ी हुई हैं वे अविदित ही रहने दी गई हैं। इस तप का प्रभाव उनके शरीर पर कितना पड़ेगा? उसे वे किस प्रकार सह पावेंगे? इस बात पर जब विचार किया जाता है तो भारी चिन्ता एवं बेचैनी उत्पन्न होती है।
साधना की ही व्यवस्था है, पर निकट भविष्य में जिस ‘ब्रह्म वर्चस् आरण्य’ के निर्माण की बात सामने है उसमें हर साधक को एक कुटिया में-एकाकी रहने और एकांत साधना करने की व्यवस्था उसी प्रकार बनाई जायगी जिस प्रकार योगियों को एकान्त गुफा में निवास करने और अन्तर्मुखी रहने की रीति-नीति अपनानी पड़ती है। एक-एक वर्ष के लिए हमें भी हिमालय में जिस विशिष्ट साधना के लिए जाना पड़ा है उसमें भी एकान्त साधना ही अपनानी पड़ी है। वही पद्धति भविष्य में आपने साथ सम्पर्क सूत्र में बँधे हुए साधकों को अपनानी पड़ेगी। जब तक वह प्रबन्ध नहीं बन पड़ता तब तक वर्तमान आश्रम में ही कुछ उलट फेर करके उस तरह का प्रबन्ध किया जायगा कि सूत्रों की रूप रेखा में साधना तत्व का अधिकाधिक समावेश हो सके।
साधना में निरत महामानव, लोक मंगल के लिए अपना सर्वस्व लुटा देने वाले भू सुर के रूप में अपनी प्रखर उत्कृष्टता का परिचय देती है। विडम्बना रचने वाले और भ्रम जंजालों में उलझे रहने वालों की बात दूसरी है, वे चित्र-विचित्र कर्मकाण्डों में स्तवन उपहारी से ईश्वर को प्रसन्न करने और उससे तरह-तरह की मनोकामनाएँ पूरी कराने के ताने-बाने रहते हैं। इन दिनों अन्य क्षेत्रों में फैले हुए बुद्धि विभ्रम की तरह अध्यात्म क्षेत्र में भी ऐसी ही विडम्बना चरम सीमा पर पहुँची हुई है और लोग ईश्वर को अपनी चालबाजियों में फुसला लेने के लिए नित नये जाल बुनते रहते हैं। इस बाल बुद्धि से किसे कितना प्रतिफल मिलता है इसे तो वे ही जानें, पर तथ्य यह है कि यथार्थवादी ईश्वर भक्ति का परिणाम एक ही है अन्तःकरण की सद्भाव सम्पदा का अधिकाधिक विस्तार और परिष्कार। यह वैभव जिन्हें भी प्राप्त होता है वे देव मानव होकर जीते हैं।
साधनाएँ प्राचीन काल में सह्य और सरल मालूम पड़ती थीं, वे अब अति कठिन बन गई हैं। मानसिक बलिष्ठता के कारण जो ध्यान धारणा सहज की बन पड़ती थी वह अब मनस्वी लोगों के लिए भी अति कठिन पड़ती है।
साधना के अन्तर्गत राजयोग, हठयोग, भक्ति योग और लययोग की चारों दिशाएँ, चारों विद्याएँ अपनी-अपनी सड़क पर चलते हुए अन्ततः जिस केन्द्रबिन्दु पर जा मिलती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। किसी गोले पर भिन्न दिशाओं में खींची गई रेखाएँ भी किसी जगह एकत्रित होकर ही रहती हैं, इसी प्रकार साधनाओं के विभिन्न स्वरूप और विधान भी एकाग्रता का प्रयोजन पूरा करते हैं। सभी साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान उपलब्ध एकाग्रता की मात्रा को देखकर ही लगाया करते हैं।
साधना की सफलता के लिए विशेष रूप से करते रहना चाहिए।
साधना पद्धति निर्धारित करें और फिर पिछले का लेखा-जोखा देने तथा आगे की नई कक्षा के अनुरूप पाठ पढ़ने तथा कार्य पद्धति बनाकर जाने की व्यवस्था बना लिया करें। जिनके पास अधिक समय हो, गृह कार्यों से निवृत्त हो चुके हैं वे अधिक समय यहाँ रह सकेंगे और साधना क्रम को अनवरत रूप से आगे बढ़ा सकेंगे। साधना के चार चरण सर्वविदित हैं स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए साथ मिली रहने वाली साधना ही सार्थक होती है। यही हमें भी आजीवन करते रहना पड़ा है और यही समन्वय उन सबको भी रखना पड़ेगा जो हमारे कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए उत्सुक हैं।
साधना ने हमें भविष्य के निर्धारण कर्त्ता का श्रेय दिया है विज्ञान के बढ़ते चरण हमें भूत के अनुग्रह से मिल सकने वाली सिद्धियों और उपलब्धियों से भी लाभान्वित कर सकेंगे ऐसी सम्भावना की नींव पड़ चुकी, अब उसके मूर्तिमान होने पर ही विश्वास किया जा सकता है।
साधना का वैज्ञानिक-सुव्यवस्थिति एवं बदली परिस्थितियों के अनुरूप ढाँचा खड़ा करने के लिए हमें नये सिरे से प्रयत्न करने होंगे। हर युग की मनः स्थिति और परिस्थिति अलग होती है। प्राचीनकाल में तर्क शक्ति का विकास नहीं हुआ था। उन दिनों श्रद्धा से ही आवश्यक समाधान हो जाते थे। शास्त्र विधान, आप्त वचन, गुरु निर्देश, परंपरा निर्वाह मात्र को ही पर्याप्त मानकर अनुशासन स्वीकार कर लिया जाता था, पर अब वैसा नहीं हो सकता।
साधना परक होंगे। उनमें आत्मबल वृद्धि की विशेष साधनाओं एवं प्रेरणाओं की प्रमुखता रहेगी। इसके लिए ब्रह्मवर्चस्, आरण्यक की योजना प्रकाशित की जा चुकी है। वह प्रशिक्षण आश्रम बनने की प्रतीक्षा न करके, फिलहाल शान्तिकुंज के ही आधे भाग में आरम्भ किया गया है, और अक्टूबर से दस-दस दिवसीय नये सत्र इस योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ हो रहे हैं। इस अभिनव उत्तरदायित्व का निर्वाह करने के लिए अभीष्ट आत्म शक्ति का सम्पादन इसका एक कारण है।
साधना बनकर रहेंगे। अपनी लोभ, मोह-ग्रसित दूषित दृष्टि से लड़-झगड़कर ही ऐसी निर्मल मति उत्पन्न की जा सकती है।
साधना रत रह सकना आज की परिस्थिति में किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। अन्यान्य साधनाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। अपने युग में मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक स्तर जिस प्रकार का है उसी को ध्यान में रखकर बनाये गये और बताये गये विधान फलप्रद हो सकते हैं।
साधना में और कम शिक्षण सत्संग में लगेगा। अभी तो शांति−कुंज में सामूहिक निवास एवं सामूहिक साधना की ही व्यवस्था है, पर निकट भविष्य में जिस ‘ब्रह्म वर्चस् आरण्य’ के निर्माण की बात सामने है उसमें हर साधक को एक कुटिया में-एकाकी रहने और एकांत साधना करने की व्यवस्था उसी प्रकार बनाई जायगी जिस प्रकार योगियों को एकान्त गुफा में निवास करने और अन्तर्मुखी रहने की रीति-नीति अपनानी पड़ती है। एक-एक वर्ष के लिए हमें भी हिमालय में जिस विशिष्ट साधना के लिए जाना पड़ा है उसमें भी एकान्त साधना ही अपनानी पड़ी है। वही पद्धति भविष्य में आपने साथ सम्पर्क सूत्र में बँधे हुए साधकों को अपनानी पड़ेगी। जब तक वह प्रबन्ध नहीं बन पड़ता तब तक वर्तमान आश्रम में ही कुछ उलट फेर करके उस तरह का प्रबन्ध किया जायगा कि सूत्रों की रूप रेखा में साधना तत्व का अधिकाधिक समावेश हो सके।
साधना प्रक्रिया निर्धारण में हर साधक की मनः स्थिति, परिस्थिति, स्तर एवं उद्देश्य का ध्यान रखना पड़ता है। दैनिक संध्या वंदन, नवरात्रि अनुष्ठान, सामूहिक यज्ञ जैसे साधन तो सबके लिए एक जैसे हो सकते हैं, पर यदि व्यक्तिगत दुर्बलताओं के निराकरण एवं समस्याओं के समाधान की बात हो तो चिकित्सा स्तर पर ही उसका प्रबन्ध करना होता है। एक ही मर्ज के रोगियों के लिए चिकित्सक उनकी स्थिति की भिन्नता को देखते हुए उपचार का निर्धारण करते हैं। ज्वर से आक्रान्त सभी रोगियों को एक सी दवा नहीं दी जाती। बच्चे, गर्भिणी, तरुण, वृद्ध, रोगी की प्रकृति, रोग की जीर्णता, नवीनता आदि को ध्यान में रखकर भिन्न भिन्न प्रकार के उपचार, अनुपान एवं पथ्य बताये जाते हैं।
साधना अनवरत रूप से करनी चाहिए। आत्मिक और साधना अनवरत रूप से करनी चाहिए। आत्मिक और भौतिक प्रगति के उभय-पक्षीय लाभ इस सत्प्रयत्न के साथ जुड़े हुए हैं। भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए हमें एकाग्रता का महत्व समझना चाहिए और उस पूजा काल की विशेषता नहीं समूचे जीवन क्रम को सारभूत एवं स्वर्णिम उपलब्धि मानकर परिपूर्ण श्रद्धा के साथ उसके उपार्जन में संलग्न रहना चाहिए।
साधना का ऐसा ढाँचा सम्भवतः अगले ही दिनों खड़ा होगा जिसे तथ्यपूर्ण एवं प्रत्यक्ष लाभदायक पाया जा सके। ऐसी स्थापना से अध्यात्म तत्व ज्ञान को नव जीवन प्राप्त हो सकता है यह मानने को सहज ही जी करता है।
साधना का ऐसा ढाँचा खड़ा करना होगा जो प्रस्तुत मनः स्थिति एवं परिस्थिति के साथ मेल खाता हो। यह व्यवस्था बन पड़ी तो ही उस से समय का समाधान होगा और लोक रुचि उसे स्वीकार करेगी। समय की आवश्यकता एवं माँग को पूरी सकने वाले तथ्यों को ही जीवित रहने और बढ़ने का अवसर मिलता रहा है। अध्यात्म विज्ञान के सम्बन्ध में भी यही सिद्धान्त लागू होगा। परम्परागत ढर्रे से आगे न बढ़ने का दुराग्रह किया जाता रहा तो स्थिति के साथ ताल-मेल न बैठ सकेगा और असफलताजन्य निराशा ही पल्ले बँधती चली जायगी।
साधना करने की व्यवस्था उसी प्रकार बनाई जायगी जिस प्रकार योगियों को एकान्त गुफा में निवास करने और अन्तर्मुखी रहने की रीति-नीति अपनानी पड़ती है। एक-एक वर्ष के लिए हमें भी हिमालय में जिस विशिष्ट साधना के लिए जाना पड़ा है उसमें भी एकान्त साधना ही अपनानी पड़ी है। वही पद्धति भविष्य में आपने साथ सम्पर्क सूत्र में बँधे हुए साधकों को अपनानी पड़ेगी। जब तक वह प्रबन्ध नहीं बन पड़ता तब तक वर्तमान आश्रम में ही कुछ उलट फेर करके उस तरह का प्रबन्ध किया जायगा कि सूत्रों की रूप रेखा में साधना तत्व का अधिकाधिक समावेश हो सके।
साधना के चार चरण सर्वविदित हैं स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए साथ मिली रहने वाली साधना ही सार्थक होती है। यही हमें भी आजीवन करते रहना पड़ा है और यही समन्वय उन सबको भी रखना पड़ेगा जो हमारे कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए उत्सुक हैं।
साधना भी एक प्रकार से सूक्ष्म एवं कारण शरीरों का उपचार ही है, इसलिए उसमें भिन्नता रहनी भी स्वाभाविक है। यह प्रयोजन पत्र व्यवहार से नहीं, निकटवर्ती निदान परीक्षण एवं परामर्श से ही सम्भव होता है। अस्तु अगले दिनों साधना में रुचि रखने वालों के प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन करने के लिए शिविर चलेंगे। इसके अतिरिक्त शोध संदर्भ में परीक्षण चलते रहेंगे और युग के अनुरूप साधना का निर्धारण करने के लिए इतना महत्वपूर्ण समुद्र मंथन चलता रहेगा जिसके द्वारा मनुष्य जाति को कुछ उपयोगी रत्न राशि उपलब्ध होने की अपेक्षा की जा सके। उपरोक्त गतिविधियों में जिनकी रुचि है-जो इन क्रियाकलापों का महत्व समझते हैं इस सम्बन्ध में अधिक परिचित हो सकें और इन प्रयासों को सफल बनाने में अपने-अपने ढंग का योगदान कर सकें, इसी उद्देश्य से यह पंक्तियाँ लिखी गई हैं।
साधना ही सार्थक होती है। यही हमें भी आजीवन करते रहना पड़ा है और यही समन्वय उन सबको भी रखना पड़ेगा जो हमारे कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए उत्सुक हैं।
साधना तत्व का अधिकाधिक समावेश हो सके।
साधना। एक ही चेतना की चार गतिविधियों को मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को अन्तःकरण चतुष्टय की संज्ञा दी गई है। चार स्वरूप और व्याख्याएँ होते हुए भी वस्तुतः यह एक ही सत्ता की विवेचनाएँ हैं। ठीक इसी प्रकार एकाग्रता की उपयोगी विद्या में दक्षता प्राप्त करने के लिए योगसाधना के अन्तर्गत राजयोग, हठयोग, भक्ति योग और लययोग की चारों दिशाएँ, चारों विद्याएँ अपनी-अपनी सड़क पर चलते हुए अन्ततः जिस केन्द्रबिन्दु पर जा मिलती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। किसी गोले पर भिन्न दिशाओं में खींची गई रेखाएँ भी किसी जगह एकत्रित होकर ही रहती हैं, इसी प्रकार साधनाओं के विभिन्न स्वरूप और विधान भी एकाग्रता का प्रयोजन पूरा करते हैं।
साधना भी बन सकता है, बनता है। इस रीति नीति को अपनाने के लिए आध्यात्मिक विश्वास और उसे साकार रूप देना एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर व्यक्ति आत्म-कल्याण और लोकहित दोनों प्रयोजनों को एक साथ पूरा कर सकता है।
साधना की रहेगी। शिक्षार्थियों का अधिक समय साधना में और कम शिक्षण सत्संग में लगेगा। अभी तो शांति−कुंज में सामूहिक निवास एवं सामूहिक साधना की ही व्यवस्था है, पर निकट भविष्य में जिस ‘ब्रह्म वर्चस् आरण्य’ के निर्माण की बात सामने है उसमें हर साधक को एक कुटिया में-एकाकी रहने और एकांत साधना करने की व्यवस्था उसी प्रकार बनाई जायगी जिस प्रकार योगियों को एकान्त गुफा में निवास करने और अन्तर्मुखी रहने की रीति-नीति अपनानी पड़ती है। एक-एक वर्ष के लिए हमें भी हिमालय में जिस विशिष्ट साधना के लिए जाना पड़ा है उसमें भी एकान्त साधना ही अपनानी पड़ी है। वही पद्धति भविष्य में आपने साथ सम्पर्क सूत्र में बँधे हुए साधकों को अपनानी पड़ेगी।
साधना के लिए जाना पड़ा है उसमें भी एकान्त साधना ही अपनानी पड़ी है। वही पद्धति भविष्य में आपने साथ सम्पर्क सूत्र में बँधे हुए साधकों को अपनानी पड़ेगी। जब तक वह प्रबन्ध नहीं बन पड़ता तब तक वर्तमान आश्रम में ही कुछ उलट फेर करके उस तरह का प्रबन्ध किया जायगा कि सूत्रों की रूप रेखा में साधना तत्व का अधिकाधिक समावेश हो सके।
साधना के फलस्वरूप चमत्कारी ऋषि सिद्धियों के प्रदर्शन का दौर चला था और किसी के योगी होने का प्रमाण उसका चमत्कार प्रदर्शन कर सकना माना जाने लगा था। फलतः असली सिद्ध पुरुष तो कोई-कोई कभी-कभी ही देखने में आये पर नकलची बाजीगरों की घात भली प्रकार बन आईं। उनने जादूगरी के धन्धे को अध्यात्म से मिलाकर लोगों को मूर्ख बनाना और ठगना आरम्भ कर दिया। बालों में से रंगीन बालू निकाल देने या ऐसे ही अन्य बाजीगरी के खेल दिखाने वाले धूर्त इस बुद्धिवाद के युग में भी सिद्ध पुरुष होने का दावा करते हैं। और अगणित अन्धविश्वासी उनके चंगुल में फँसकर अपना समय और सद्भाव नष्ट करते हैं।
साधनाओं एवं प्रेरणाओं की प्रमुखता रहेगी। इसके लिए ब्रह्मवर्चस्, आरण्यक की योजना प्रकाशित की जा चुकी है। वह प्रशिक्षण आश्रम बनने की प्रतीक्षा न करके, फिलहाल शान्तिकुंज के ही आधे भाग में आरम्भ किया गया है, और अक्टूबर से दस-दस दिवसीय नये सत्र इस योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ हो रहे हैं। इस अभिनव उत्तरदायित्व का निर्वाह करने के लिए अभीष्ट आत्म शक्ति का सम्पादन इसका एक कारण है।
साधना क्रम को अनवरत रूप से आगे बढ़ा सकेंगे। साधना के चार चरण सर्वविदित हैं स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए साथ मिली रहने वाली साधना ही सार्थक होती है। यही हमें भी आजीवन करते रहना पड़ा है और यही समन्वय उन सबको भी रखना पड़ेगा जो हमारे कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए उत्सुक हैं।
साधना विधानों में सामयिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक हेर फेर करना होता है। आहार बिहार, क्रिया कलाप एवं वातावरण के अनुरूप शरीर और मन के स्तरों में समयानुसार भारी अन्तर पड़ता रहता है। किसी समय लोगों के रक्त इतने शुद्ध थे कि तुलसी के पत्ते, कालीमिर्च, अदरक, गिलोय, सोंठ, अजवायन जैसी घरेलू वस्तुओं से बड़े-बड़े रोग अच्छे हो जाते थे, अब तीक्ष्ण एन्टीबायोटिक्स लिए बिना जुकाम, खाँसी जैसे छोटे रोगों तक से छुटकारा नहीं मिलता। किसी समय खाने और पचाने में पेट पूरी तरह सक्षम थे, आज हर कोई कब्ज को जन्मजात साथी की तरह छाती से चिपकाये बैठा है। श्रम की दृष्टि से हर कोई असमर्थ बनता जाता है।
साधनाएँ उसी प्रयोजन के लिए की जाती हैं। यह ऊँची स्थिति एवं आगे की बात हुई। ऊपर की पंक्तियों में ब्रह्म सम्बन्ध बनाने और योगी की दिव्य शक्ति प्राप्त करने का प्रसंग है। इससे पहले की हलकी स्थिति वह है जिसमें आत्म-शक्ति बढ़ाने के लक्षण तो नहीं मिलते पर मस्तिष्कीय चेतना से सीमाबन्धन टूटते और असीम के साथ सम्बन्ध बनते हैं। यह पंच भौतिक प्रकृति के व्यापक क्षेत्र में प्रवेश की बात है।
साधनाओं के माध्यम से सम्भव हो सकता है।
साधना आदि का अभ्यास लोगों को कराते थे। बड़े-बड़े लोग उनसे प्रभावित थे पर प्रचार-प्रसार की बात दिमाग में थी ही नहीं। पर एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आकर इस पुनीत कार्य के प्रचार प्रसार को देखकर एक संस्था का प्रस्ताव रखा और ‘सोसायटी आफ सायलेंट यूनिटी’ नामक संस्था का निर्माण भी हो गया। कार्यालय के लिए अनायास ही कंसास शहर को लोगों ने प्रस्तावित किया और वही स्थान जिसे फिलकोर ने स्वप्न में देखा था और एक अखबार भी ‘यूनिटी’ नाम से निकला गया जिसका पहला अक्षर ‘यू’ ही था। बाद में और भी पत्र पत्रिकाएँ वहाँ से छपीं और स्वप्न का तथ्य सत्य हो गया।
साधना कहा जा सकता है। भक्तियोग के माध्यम से भी यह सफलता मिल सकती है। ईश्वर गुरु या आप्त मानवों के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न करके उनके साथ सघन आत्मीयता स्थापित करने की मनोविज्ञान समर्पित अध्यात्म साधना से तन्मयता उत्पन्न होती है और एकाग्रता उत्पन्न होने का साधन बन जाता है। किसी वस्तु का लाभ एवं मूल्य विदित होने पर उसे पाने की ललक उठती है, इस प्रकार रुचि उभारने और तत्परता उत्पन्न करने का आधार बनता है। ईश्वरीय अनुग्रह-योग का चमत्कार, कर्मकांडों का माहात्म्य, धर्म धारणा का स्वर्ग फल जैसे माहात्म्यों का विस्तृत वर्णन इसीलिए किया गया है कि उस मार्ग के पथिकों में आवश्यक उत्साह बना रहे तथा धैर्यपूर्वक लम्बी मंजिल को क्रमिक गति से पार करते चलते का साहस स्थिर बना रहे।
साधनाएँ किस मात्रा में सफल हो रही हैं इसकी एकमात्र कसौटी यही है कि उस व्यक्ति के अन्तःकरण में निर्मलता एवं कोमल संवेदनाओं का परिमाण कितना बढ़ा, यदि भीतरी स्वार्थपरता और निष्ठुरता यथावत बनी रहे तो समझना चाहिए कि ईश्वर प्राप्ति के लिए किये जाने वाले साधनात्मक प्रयत्नों का कोई परिणाम नहीं निकला। मनुष्य की श्रेष्ठता का यदि आधार ढूंढ़ा जाय तो वह उसकी उन प्रदीप्त सद्भावनाओं में ही देखा जा सकता है जो अपनी प्रखरता के कारण सत्प्रवृत्तियों में परिणत हुए बिना रह नहीं सकतीं। ब्रह्म के असंख्य क्रिया कलाप हैं, पर जब परमात्म चेतना का आत्म चेतना के साथ सम्बन्ध होता है तो बिजली के दोनों तार छूने पर चिंगारियां निकलने की तरह उस श्रेष्ठता के ही लक्षण प्रकट होते हैं जिन्हें उत्कृष्ट आदर्शवादिता कहा जाता है। पशु और मनुष्य के बीच इसी विशेषता के अभिवर्धन का अन्तर होता है। इसे अतिरिक्त ईश्वरीय अनुग्रह या अनुदान कह सकते हैं।
साधनाएँ चलती थीं। इस मार्ग पर चलते हुए अनायास ही जो ऋद्धियाँ मिलती थीं, उनका प्रदर्शन एवं अपव्यय भी हानिकारक माना जाता था और इस प्रकार के उपयोग का निषेध था। पर आज तो वैसी निस्पृह मनः स्थिति नहीं रही। इन दिनों की आकाँक्षा व्यक्तित्व के ऐसे परिष्कार की है जिसके सहारे भौतिक सफलताएँ और आन्तरिक विभूतियों की उपलब्धि समान रूप से सम्भव हो सके।
साधना को ‘समर’ कहा गया है। जीवन को ‘संग्राम’ माना गया है। महाभारत का ऐतिहासिक रूप जो भी रहा हो, वह हमारे जीवन-क्रम में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। अंतर्द्वंद्व के रूप में वह समुद्र मंथन हर घड़ी सामने खड़ा रहता है। दैवी और आसुरी वृत्तियाँ अपनी-अपनी ओर जीव को घसीटने के लिए घोर प्रयास करती रहती हैं।
साधना प्रक्रिया के हैं। इस सन्दर्भ में हर परिजन को गम्भीरतापूर्वक यह विचार करना चाहिए कि उपवास के प्रथम तीन उद्देश्यों को पूरा कर सकने में उनका क्या और किस प्रकार सहयोग हो सकता है? साथ ही चौथे आधार में जिस दुष्ट दुर्बुद्धी के प्रति गुरुदेव का आक्रोश है उसे अपने बीच कभी भी प्रवेश करने का अवसर न मिलने पाये इसके लिए तीक्ष्णतम प्रतिरोध की नीति अपनाई जानी चाहिए।
साधना से तन्मयता उत्पन्न होती है और एकाग्रता उत्पन्न होने का साधन बन जाता है। किसी वस्तु का लाभ एवं मूल्य विदित होने पर उसे पाने की ललक उठती है, इस प्रकार रुचि उभारने और तत्परता उत्पन्न करने का आधार बनता है। ईश्वरीय अनुग्रह-योग का चमत्कार, कर्मकांडों का माहात्म्य, धर्म धारणा का स्वर्ग फल जैसे माहात्म्यों का विस्तृत वर्णन इसीलिए किया गया है कि उस मार्ग के पथिकों में आवश्यक उत्साह बना रहे तथा धैर्यपूर्वक लम्बी मंजिल को क्रमिक गति से पार करते चलते का साहस स्थिर बना रहे।
साधना ही आज की परिस्थितियों में अभीष्ट हो सकती है।
साधनाओं के सम्बन्ध में भी है। अति प्राचीन काल के विधि विधान उस समय के मनुष्यों और परिस्थितियों के लिए निस्सन्देह उपयुक्त थे, पर आज के और उस समय के अन्तर को देखते हुए नये सिरे से शोध करने और वर्तमान के अनुरूप क्रिया पद्धति निर्धारण करने की आवश्यकता होगी। हुई भी है। प्राचीनकाल में अनुष्ठान, जप का दशांश होम करने का विधान था। आज की परिस्थिति में वैसा करना मुट्ठी भर सुसम्पन्न लोगों के लिए ही सम्भव हो सकता है।
साधनात्मक उपायों से घटाते हैं और आत्मिक तीक्ष्णता उत्पन्न करते हैं। ऐसे लोग रात्रि स्वप्न, दिवा स्वप्न, योग तन्द्रा जैसी स्थितियों में कई ऐसे संकेत प्राप्त करते हैं जिनके फलितार्थ बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकें।
साधना के दो प्रयोजन हैं-एक संचित कुसंस्कारों का उन्मूलन-दूसरे सत्प्रवृत्तियों की सुदृढ़ संस्थापना। अवरोधों को हटाने और सहायक साधनों को बढ़ाने की हर प्रयोजन में आवश्यकता पड़ती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी यही उभय-पक्षीय प्रयत्न करना पड़ता है।
साधना द्वारा विशिष्ट शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं।
साधना में प्रगति के लिए उपकरण का काम देता है। मशीनें खराब हो जाएं, उन्हें लापरवाही से चलाया जाय और उनका कोई अंग टूट फूट जाय तो उसका जिस तरह ध्यान रखा जाता है, उसी तरह आत्मा के इस उपकरण की टूट-फूट को भी दृष्टिगत रखना चाहिए और इस पर ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य, शक्ति और युवावस्था को जिस बेतरह बर्बाद किया जाता है, व्यर्थ के कार्य में, वह ठीक मशीन को लापरवाही से चलाने जैसा है। इस महत्वपूर्ण उपकरण की उपेक्षा करने वाले पहले वर्ग के तो वे लोग हैं जिनकी चर्चा इस लेख के आरम्भ में की गई है और दूसरे वे जो उपयुक्त साधन सुविधाएँ होती हुए भी इसकी भली भाँति देख रेख नहीं करते। न उचित खान पान, न स्वस्थ स्थान में निवास और न पर्याप्त विश्राम।
साधना द्वारा आन्तरिक निर्मलता प्राप्त करने से ही बिठाया जा सकता है, पर उसका आधा-अधूरा काम स्वप्नों के माध्यम से भी चल सकता है। स्वप्नों को स्थूल और सूक्ष्म के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी कहा जा सकता है।
साधना का उद्देश्य क्या हो, उस पुरुषार्थ के प्रतिफल की क्या अपेक्षा की जाय यह भी सामयिक प्रश्न है। प्राचीनकाल में भौतिक आवश्यकताएँ न्यूनतम थीं और लौकिक महत्वाकांक्षाओं को हेय समझा जाता था। अस्तु आत्मिक प्रगति का सीधा सादा सा लक्ष्य स्वर्ग मुक्ति, ईश्वर दर्शन, आत्म साक्षात्कार की परिधि तक सीमित थे। उसी प्रयोजन के लिए तत्वदर्शी ऋषि मनीषियों की साधनाएँ चलती थीं। इस मार्ग पर चलते हुए अनायास ही जो ऋद्धियाँ मिलती थीं, उनका प्रदर्शन एवं अपव्यय भी हानिकारक माना जाता था और इस प्रकार के उपयोग का निषेध था।
साधनात्मक प्रयत्नों का कोई परिणाम नहीं निकला। मनुष्य की श्रेष्ठता का यदि आधार ढूंढ़ा जाय तो वह उसकी उन प्रदीप्त सद्भावनाओं में ही देखा जा सकता है जो अपनी प्रखरता के कारण सत्प्रवृत्तियों में परिणत हुए बिना रह नहीं सकतीं। ब्रह्म के असंख्य क्रिया कलाप हैं, पर जब परमात्म चेतना का आत्म चेतना के साथ सम्बन्ध होता है तो बिजली के दोनों तार छूने पर चिंगारियां निकलने की तरह उस श्रेष्ठता के ही लक्षण प्रकट होते हैं जिन्हें उत्कृष्ट आदर्शवादिता कहा जाता है। पशु और मनुष्य के बीच इसी विशेषता के अभिवर्धन का अन्तर होता है। इसे अतिरिक्त ईश्वरीय अनुग्रह या अनुदान कह सकते हैं।
साधना में चिरकाल तक निरत रहने से ही सम्भव होती है। एकाग्रता का कल्प वृक्ष प्राप्त करने के लिए हमें आलस्य और प्रमाद को मार भगाने की-अभीष्ट प्रयोजन में तन्मयता और तत्परता उत्पन्न करने की जीवन साधना अनवरत रूप से करनी चाहिए। आत्मिक और साधना अनवरत रूप से करनी चाहिए। आत्मिक और भौतिक प्रगति के उभय-पक्षीय लाभ इस सत्प्रयत्न के साथ जुड़े हुए हैं। भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए हमें एकाग्रता का महत्व समझना चाहिए और उस पूजा काल की विशेषता नहीं समूचे जीवन क्रम को सारभूत एवं स्वर्णिम उपलब्धि मानकर परिपूर्ण श्रद्धा के साथ उसके उपार्जन में संलग्न रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-July
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक साधक में श्रद्धा तत्व की परिपक्वता का आधार खड़ा करना आवश्यक समझा जाना चाहिए।
साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि उन लौह श्रृंखलाओं में जकड़ कर श्रद्धा विश्वास रूपी महादैत्य को उपयोगी प्रयोजन उत्पन्न कर सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। श्रद्धा से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है-श्रद्धा से अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन और उन्हें सफलता के उच्चस्तर तक पहुँचा सकना सम्भव होता है। आत्मा का सब से विश्वस्त और सबसे घनिष्ठ सचिव श्रद्धा ही है। उसी के सहारे आत्मिक प्रगति से लेकर सिद्धि चमत्कार के वरदान पाने और आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त दिव्य उपहार प्राप्त होते हैं।
साधना इसी प्रयोजन के लिए करायी जाती हैं आकर्षक महात्म्य इसीलिए सुनाये बताये जाते हैं कि साधक की श्रद्धा अधिकाधिक परिपुष्ट हो सके और अभीष्ट सत्परिणाम प्राप्त कर सकने का अधिकारी बन सके।
साधना में दो तथ्यों का समावेश करना ही होगा-एक तो यह कि जो कहना है उनमें धर्म कथाओं का पुट लगाते हुए कथन को श्रद्धा सिक्त बनाते चला जाय। दूसरे संगीत, सहगान, कीर्तन, भजन को प्रमुखता दी जाय। संगीत में स्वभावतः जन-साधारण की रुचि होती है-बाल-वृद्ध शिक्षित-अशिक्षित उसे चावपूर्वक सुनते हैं। बौद्धिक प्रभाव ग्रहण करने के साथ-साथ भावान्दोलन की विशेषता भी उसमें रहती है। अस्तु तीर्थयात्रा पर निकलने वाली प्रचार मंडलियों को जन-मानस में नवयुग के अनुरूप प्रगतिशीलता स्थापित करने के लिए प्रवचन शैली में धर्म-कथाओं का समावेश एवं सहगान कीर्तन की समन्वित शैली को अपना कर चलना चाहिए।
साधना करके ही प्राप्त किये हैं। कृषि, पशु पालन, वस्त्र, वाहन, वस्तु विनिमय, परिवार, शासन, शिक्षा, चिकित्सा, स्वच्छता जैसी उपलब्धियाँ शारीरिक अथवा पदार्थपरक नहीं-विशुद्ध रूप से सुविकसित चिन्तन की ही प्रतिक्रिया है। इन्हें सभ्यता की प्रगति के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता।
साधना में प्रयुक्त होने वाले चक्र तो छह ही हैं। सातवाँ सहस्रार कमल तो ब्रह्मलोक है। उससे तो लय होने की यह बात है। सात या छह के भेद -भाव को इस तरह समझा जा सकता है। कि अपने स्थान से अमुक देवालय सात मील है।
साधना है, जिनके पास यह आधार मौजूद है वे सामान्य स्थिति में रहते हुये भी देवोपम जीवन का आनंद ले सकते और उस आलोक से असंख्यों को लाभान्वित कर सकते हैं। यही सच्चे अर्थों में अध्यात्म का चमत्कार है।
साधनाएँ एवं उग्र तपश्चर्याएँ इसी शरीर को परिपुष्ट बनाने के लिए की जाती हैं। संक्षेप में इसे ‘दैत्य’ सत्ता कहा जा सकता है। सिद्धि और चमत्कारों की घटनाएँ- संकल्प शक्ति के बढ़े-चढ़े प्रयोग इसी स्तर के समर्थ होने पर सम्भव होते हैं। सामान्य सपने तो सभी देखते हैं। पर जब चेतना इस पाँचवे शरीर में जमी होती है तो किसी घटना का सन्देश देने वाले सपने भी दीख सकते हैं।
साधना जिस प्रकार छोड़नी पड़ी थी उसी प्रकार यह भी न छोड़नी पड़े और उसमें भी कोई दोष वैसा ही न घुसा हो जैसा कि पहली वाली में निकल पड़ा था। कभी कोई चर्चा इस नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य के पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है संदिग्ध, शंका-शंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती फिर अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित है। यदि मूल तथ्य का अभाव रहा तो फिर ज्यों-त्यों करके कर्म-काण्डों की लकीर पीटते रहने से बात बनेगी नहीं। तब असफलताओं का कारण विधि-विधानों की होरा-फेरी में ढूंढ़ा जाने लगेगा और यह खोज की जाने लगेगी कि किसी क्रिया-कृत्य में कोई अन्तर तो नहीं रह गया जिससे असफलता मिली या उलटा परिणाम निकला।
साधना की सिद्धि श्रद्धा की प्रगाढ़ स्थिति में ही सम्भव हो सकती है यह मान कर चलने वालों को आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में असफल नहीं रहना पड़ता।
साधना है। यह सद्भावना जितनी मात्रा में उपार्जित की जा सकेगी उतना ही मनुष्य सज्जन, सहृदय, उदार, सेवा भावी बनता चला जायगा और न केवल स्वयं आन्तरिक उल्लास का अनुभव करेगा वरन् सम्पर्क क्षेत्र में भी शालीनता की प्रभावी शक्ति से स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न करेगा। तत्काल कर्मफल न मिलने से अधीर होकर लोग दुष्कर्म करने पर उतारू होते और सत्कर्मों में निराश होते देखे गये हैं। इस विलम्ब के कारण आस्तिक को अधीर नहीं होना पड़ता और सज्जनता की नीति शान्तिपूर्वक अपनाये रहता है।
साधना की जाती है और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है। पूजा, उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अन्तर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
साधना के विपक्ष और किसी अन्य के पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है संदिग्ध, शंका-शंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती फिर अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित है। यदि मूल तथ्य का अभाव रहा तो फिर ज्यों-त्यों करके कर्म-काण्डों की लकीर पीटते रहने से बात बनेगी नहीं। तब असफलताओं का कारण विधि-विधानों की होरा-फेरी में ढूंढ़ा जाने लगेगा और यह खोज की जाने लगेगी कि किसी क्रिया-कृत्य में कोई अन्तर तो नहीं रह गया जिससे असफलता मिली या उलटा परिणाम निकला।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करके आत्मिक प्रगति और उसके आधार पर मिलने वाली उपलब्धियों को श्रद्धा तत्व की गरिमा समझनी चाहिए और आप्त वचनों के सहारे तर्क तथ्यों का आश्रय लेकर अपने-आदर्शों और साधनों पर विश्वास भरी निष्ठा परिपक्व करनी चाहिए। साधना की सिद्धि श्रद्धा की प्रगाढ़ स्थिति में ही सम्भव हो सकती है यह मान कर चलने वालों को आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में असफल नहीं रहना पड़ता।
साधना आरम्भ कर दी। कुछ ही समय बाद किसी दूसरे ने उस विधान के दोष बता दिये और किसी नये प्रयोग के माहात्म्य सुना दिये बस इतने भर से मन शंका-शंकित हो गया और पिछला प्रयोग छोड़ कर नया मार्ग अपना लिया गया। इस परिवर्तन के बीच यह नई आशंका बनी रहती है कि पिछली साधना जिस प्रकार छोड़नी पड़ी थी उसी प्रकार यह भी न छोड़नी पड़े और उसमें भी कोई दोष वैसा ही न घुसा हो जैसा कि पहली वाली में निकल पड़ा था। कभी कोई चर्चा इस नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य के पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है संदिग्ध, शंका-शंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती फिर अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित है। यदि मूल तथ्य का अभाव रहा तो फिर ज्यों-त्यों करके कर्म-काण्डों की लकीर पीटते रहने से बात बनेगी नहीं।
साधना विज्ञान में एक चौथाई और श्रद्धा विश्वास का तीन चौथाई है। सघन श्रद्धा के रहते अटपटे विधि-विधान भी चमत्कारी परिणाम उपस्थित कर सकते हैं जब अविश्वासी संदिग्ध मनःस्थिति में पंडिताऊ ढंग से किये गये परिपूर्ण कर्म-काण्ड भी निष्प्राण होकर रह जाते हैं और उनका परिणाम निराशाजनक ही रहता है। अस्तु साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक साधक में श्रद्धा तत्व की परिपक्वता का आधार खड़ा करना आवश्यक समझा जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-March
साधना इस मानवी विद्युत भण्डार को असाधारण रूप से उत्तेजित करती और उभारती है। यदि सही ढंग से साधना की जाय तो मनुष्य प्राणवान और ओजस्वी बनता है। उपार्जित प्राण विद्युत की ऊर्जा के सहारे स्वयं कितनी ही अद्भुत सफलताएँ प्राप्त करता है और दूसरों को सहारा देकर ऊँचा उठाता है।
साधनाओं की क्रिया−प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया जाय।
साधना के लिए अन्यत्र की अपेक्षा यहाँ अधिक अनुकूलता रहती है।
साधना सत्रों की व्यवस्था की गई है। उनको 24 हजार गायत्री अनुष्ठान द्वारा संपन्न किया जाता है। साथ ही विचार−पद्धति एवं जीवन−प्रक्रिया में काया−कल्प प्रस्तुत करने वाली प्रेरणाएँ भी उपलब्ध की जाती हैं। साधकों की अपनी तपश्चर्या का सत्परिणाम तो हर जगह मिल सकता है, पर यहाँ वातावरण और सान्निध्य के दो अतिरिक्त लाभ और भी हैं और जिससे सत्परिणामों में तीन गुनी वृद्धि हो सकती है। हिमालय क्षेत्र और गंगा तट की अपनी विशेषता है।
साधना क्षेत्र में स्वर का अर्थ वाक्शक्ति के माध्यम से किये जाने वाले सशक्त जप अनुष्ठान से ही है।
साधना वर्ष की अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह हो सकती है कि दिव्य अवतरण से सम्पन्न अनेकों व्यक्तियों का उदय इस पुण्य बेला में हो सके। उनके मिले−जुले प्रयास ही रीछ, वानरों की सेना की भूमिका प्रस्तुत कर सकेंगे। समुद्र पर पुल बाँधने, अभेद्य समझी जाने वाली लंका को धराशायी करने और संस्कृति की सीता को वापस लाने जैसे असंभव कार्यों को संभव बनाना जिन व्यक्तित्वों द्वारा सम्भव हो सकता है, उन्हीं का बहुत संख्यक निर्माण इन दिनों होना चाहिए। यदि ऐसा हो सके तो निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी− साधना वर्ष की।
साधना क्षेत्र के छात्रों को यह नियम बरतने का शारीरिक और मानसिक संयम बरतने की प्राथमिक तैयारी करने के लिए कहा गया है। यदि इन दोनों बड़े छेदों में होकर मानवी विद्युत नष्ट होती रहे तो फिर मन्त्र रूपी इंजन को चलाने के लिए तेल, कोयला, ईंधन- कहाँ से आयेगा। मात्र शब्दोच्चारण का नाम ही तो मन्त्र साधना नहीं है।
साधना से व्यष्टि और समष्टि को समान रूप से लाभ मिलता है।
साधना में अनासक्त कर्त्तव्य-परायण की- भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की- स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।
साधना शृंखला की नई कड़ियाँ जुड़ने से उसकी लम्बाई निश्चित रूप से कई गुनी बढ़ जायगी। अनुमान है कि साधना मंडलों की स्थापना और वहाँ होने वाले साधना सत्रों की संख्या एक हजार से कम नहीं, वरन् अधिक ही होकर रहेगी। शान्ति−कुञ्ज के छोटे स्वरूप यदि इतने स्थानों पर इसी वर्ष खड़े हो जाते हैं तो निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी बात होगी और भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण परम्परा चल पड़ने की सम्भावना प्रत्यक्ष होती देखी जा सकेगी।
साधनाओं के समतुल्य ही है कार्य के समय उत्कृष्ट दृष्टिकोण रखने वाले ही कर्मयोगी हैं और उन्हें ही कर्मयोग की सिद्धि होती है। कितना व्यावहारिक है अध्यात्म जो कार्य के अनन्त गुणा प्रसाद परिणाम उपस्थित करता है।
साधना वर्ष बसन्त से बसन्त तक का है 5 फरवरी 76 से आरम्भ होकर वह एक वर्ष में पूरा हो जायगा। इसके प्रथम चार महीनों में वे परामर्श और प्रयास पूरे हो जाने चाहिएं जिन्हें शेष आठ महीने फलित होने में ही निश्चिंतता पूर्वक लग सके। इस दृष्टि से शान्तिकुञ्ज में चल रही सत्र प्रक्रिया को अधिक विस्तृत और अधिक प्रखर बनाया गया है।
साधना के तीर्थों की संख्या जितनी इस क्षेत्र में है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं।
साधना उसी के लिए की जाती है। शक्ति के अभाव में दुर्बलता और दुर्गति होने की चर्चा इस प्रकार आती है।
साधना स्वर्ग जयन्ती वर्ष को मात्र हर्षोल्लास का−उपलब्धियों पर सन्तोष अनुभव करने का−वर्ष न माना जाय, वरन् इसका उपयोग इस तरह किया जाय, जिसमें अपने मिशन को− उससे सम्बद्ध परिजनों को−नव जीवन उपलब्ध हो सके और उसके सत्र संचालक अपनी सफलता अनुभव कर सकें।
साधना इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए है। साधना समर में यदि आत्म-तत्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्त काम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधनाकाल दैवी आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की- अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस को प्रयोग करना पड़ता है।
साधना आरम्भ कर दी है। जो कारणवश अभी नहीं कर सके हैं वे अगले ही दिनों शृंखला में जुड़ने की सूचना भेज चुके हैं। साधना एक लाख तक ही सीमित न रह जाय, वरन् क्षेत्र विस्तार के लिए पूर्ण प्रयत्न किया जाय यह उत्साह भी सर्वत्र उभरा है। अनुसाधक तेजी से बनते ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रगति को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि साधना शृंखला की नई कड़ियाँ जुड़ने से उसकी लम्बाई निश्चित रूप से कई गुनी बढ़ जायगी।
साधना वर्ष−नव चेतना उत्पन्न करने, कार्य क्षेत्र बढ़ाने, सूक्ष्म वातावरण में देवत्व की ऊर्जा भरने जैसे कितने ही प्रयोजन पूरे कर सका तो ही उसकी सार्थकता सराही जा सकेगी। इन प्रयोजनों में अति महत्वपूर्ण कार्य यह होना चाहिए कि संस्कारवान आत्माएँ ऊर्ध्वगामी प्रगति के लिए अभीष्ट प्रेरणा एवं सामर्थ्य प्राप्त करें। पचास वर्ष पूर्व ऐसी ही घटना घटित हुई थी। प्रकाश की एक दिव्य धारा ने 25 वर्षीय बालक का कायाकल्प कर दिया था। उसका चिन्तन मरोड़ा और कर्तृत्व मोड़ा गया था।
साधना के लिए अभीष्ट वातावरण
साधना सत्रों को ऐसे समय पर रखा है जिससे काम चक्र के अनुसार सूक्ष्म जगत से अनायास ही दिव्य तत्वों की अनवरत वर्षा होती है। सत्रों का समय निर्धारित करते समय इस तथ्य को भी ध्यान में रखा गया है।
साधनाकाल दैवी आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की- अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस को प्रयोग करना पड़ता है। यह युद्ध उपेक्षा पूर्व- ज्यों-त्यों करके- ढीले-पोले मन से बेगार भुगतने की तरह नहीं लड़ा जा सकता है। उसमें पूरे मनोयोग एवं प्रबल पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है।
साधना की दृष्टि से जीवन्त एवं प्राणवान कहा जा सकता है। अपने प्रयत्न से भी यहाँ के वातावरण में कुछ और प्रखरता लाने का प्रयत्न किया गया है। पचास वर्ष से निरन्तर चलती आ रही अखण्ड−ज्योति की घृत दीप शिखा यहीं प्रतिष्ठापित है। गायत्री मन्दिर के निकट चलते रहने वाले जप, अनुष्ठानों का क्रम अनवरत है। नित्य गायत्री यज्ञ भी सुसंचालित है।
साधना में स्थिति प्रज्ञ की- कर्म साधना में अनासक्त कर्त्तव्य-परायण की- भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की- स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।
साधना ‘टी0 एम0’ के नाम से बहु विख्यात है। अमेरिका के कई कालेजों ने उसे अपनाया है। शिक्षा मन्त्रालय ने स्कूलों में इसके प्रचार के लिए विशेष अनुदान स्वीकृत किया है। नशेबाजी की अपनी बुरी आदत से छुटकारा पाने में इस योग के सहारे बहुत सफलता मिल रही है। महेश योगी के ‘इंटरनेशनल मेडीटेशन सोसाइटी की भी शाखा प्रशाखाएँ बढ़ती ही जा रही हैं।
साधना विज्ञान के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो पता चलता है कि सफल साधकों में से अधिकाँश ने हिमालय में डेरा डाला और वहाँ अपना निर्माण कार्य सम्पन्न किया है। इसके कितने ही कारण रहे हैं। सामान्य धरातल से ऊँचे स्थानों का वायुमण्डल शीतल रहता है सर्वविदित है कि नीचे स्थानों में गर्मी भी अधिक रहती है और ऊपर से गिरने वाले अवाँछनीय रज−कण भी अधिक जमते हैं। इस धूलि के साथ धुँआ जैसे प्रदूषण और विक्षोभकारी विचार भी उतरते बरसते हैं। गर्मी में फैलाव की शक्ति रहती है।
साधना मंडलों की स्थापना और वहाँ होने वाले साधना सत्रों की संख्या एक हजार से कम नहीं, वरन् अधिक ही होकर रहेगी। शान्ति−कुञ्ज के छोटे स्वरूप यदि इतने स्थानों पर इसी वर्ष खड़े हो जाते हैं तो निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी बात होगी और भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण परम्परा चल पड़ने की सम्भावना प्रत्यक्ष होती देखी जा सकेगी।
साधना वर्ष के आरम्भिक चार महीनों में दो और होने शेष हैं। एक−चैत्र की नवरात्रि का− दूसरा जेष्ठ की गायत्री जयन्ती का। दोनों ही दस−दस दिवसीय हैं। दोनों में ही 24 हजार गायत्री अनुष्ठानों की तथा योग तप साधना विधानों का घोषित समन्वय यथावत् है। इनमें आने की जिन्हें स्वीकृति दी गयी है वह यथावत् है।
साधना सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए अपना श्रम करना तो आवश्यक है ही− वातावरण का उपयुक्त होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जन−कल्याण के लिए किये जाने वाले अपने प्रयासों के साथ हिमालय के अधिक एकान्त एवं गहन प्रदेश में विशेष तप−साधना का जुड़ा होना भी सर्वविदित है। इसका कारण विधि−विधान की भिन्नता नहीं, अधिक उपयोगी वातावरण का−अधिक प्रखर सान्निध्य का लाभ लेना ही था। उचित समझा गया कि अखण्ड−ज्योति के वे परिजन जो लेखों का पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं समझते एवं साधना क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधन प्रक्रिया सम्पन्न करें।
साधना स्वर्ण, जयन्ती वर्ष में यदि कुछ हर्षोल्लास की सन्तोष और गर्व की बात हो तो उसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य को समान रूप से भागीदार माना जायगा।
साधना का जुड़ा होना भी सर्वविदित है। इसका कारण विधि−विधान की भिन्नता नहीं, अधिक उपयोगी वातावरण का−अधिक प्रखर सान्निध्य का लाभ लेना ही था। उचित समझा गया कि अखण्ड−ज्योति के वे परिजन जो लेखों का पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं समझते एवं साधना क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधन प्रक्रिया सम्पन्न करें।
साधना की प्रखरता कहते हैं। जब दोनों का सघन मिलन होता है तो आत्म-विभोर स्थिति को समाधि कहा जाता है। आवश्यक नहीं कि उस स्थिति में योगनिद्रा अथवा मूर्छा ही आवे। ज्ञान साधना में स्थिति प्रज्ञ की- कर्म साधना में अनासक्त कर्त्तव्य-परायण की- भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की- स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है।
साधना एक लाख तक ही सीमित न रह जाय, वरन् क्षेत्र विस्तार के लिए पूर्ण प्रयत्न किया जाय यह उत्साह भी सर्वत्र उभरा है। अनुसाधक तेजी से बनते ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रगति को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि साधना शृंखला की नई कड़ियाँ जुड़ने से उसकी लम्बाई निश्चित रूप से कई गुनी बढ़ जायगी। अनुमान है कि साधना मंडलों की स्थापना और वहाँ होने वाले साधना सत्रों की संख्या एक हजार से कम नहीं, वरन् अधिक ही होकर रहेगी। शान्ति−कुञ्ज के छोटे स्वरूप यदि इतने स्थानों पर इसी वर्ष खड़े हो जाते हैं तो निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी बात होगी और भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण परम्परा चल पड़ने की सम्भावना प्रत्यक्ष होती देखी जा सकेगी।
साधना काल कहते हैं, जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिए कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।
साधनाकृत अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न कर सकने में सफल हो नहीं पाते। अस्तु यह आवश्यकता सदा से अनुभव की जाती रही है कि आत्मोत्कर्ष की− साधनाओं की क्रिया−प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया जाय।
साधना मण्डल खड़े करने और अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वालों को नया उत्साह देने के लिए कहा गया है। जहाँ साधना मण्डल हों वहाँ चार दिवसीय साधना सत्र का आयोजन किया जाय और उनमें प्राण−प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया अपनायी जाय। यह शान्ति−कुञ्ज में चल रही साधनात्मक एवं शिक्षणात्मक प्रक्रिया का अनुकरण है। भवन निर्माण न सही−प्रक्रिया की दृष्टि से तो सर्वत्र छोटे शान्ति−कुञ्ज चल सकते हैं यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण है इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यों प्रस्तुत वर्ष में हर दिन 24 करोड़ गायत्री जप सम्पन्न होते चलने और उससे वातावरण में देवत्व की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होने की बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
साधना जब साधक का सर्वप्रिय विषय बन जाय- उसमें निरत रहने को स्वयमेव मन चले- उन क्षणों को घटाने की नहीं बढ़ाने की ललक रहे- उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिए कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है। आरम्भ में यह स्थिति नकली रूप में बनानी पड़ती है। थोड़े समय में वह स्थिति स्वाभाविक बन जाती है। बलपूर्वक मार-धाड़ और धड़ पकड़ द्वारा बलात्कार पूर्वक उच्चस्तरीय मनःस्थिति बनाने के काल को ही साधना काल कहते हैं, जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिए कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।
साधना में दिलचस्पी लेनी शुरू की है तब से इस मिशन के प्रति जनता में उत्साह और भी अधिक बढ़ा है। स्वामी जी की ‘साइन्स आफ रिलीजन’−सोंगस आफ सोल−मैटाफिजिकल मेडीटेशन, कास्यिक चार्टस, ह्विस्पर्श फ्राम इटनिटी−पुस्तकें अमेरिका में बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ी जाती हैं।
साधना के लिए भी ऐसे स्थान तलाश किये जाते हैं। आत्मिक स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए भी उपयोगी वातावरण मिल सके तो उसका विशेष लाभ होता है। तपस्वी अपने लिए अमीरों जैसी व्यवस्था तो नहीं बना पाते, पर पर्वतों की गुफाओं में निवास करने, कंदमूल जुटाने, वल्कल वस्त्र पहनने जैसे निर्वाह के साधन ढूँढ़ लेते हैं। धूनी जलाकर शीत निवारण की−लौकी, नारियल आदि के बर्तनों की−घास की चटाई बनाने की जैसी सुविधाएँ वहाँ भी मिल जाती है। तप−साधना के इतिहास में हिमालय की ऊँचाई और गंगातट की पवित्रता का लाभ उठाने वाले साधकों की संख्या अत्यधिक है।
साधनाएँ प्रयुक्त होती हैं उनके कारण चिन्तन में उत्कृष्टता और प्रखरता उत्पन्न करने के दोनों प्रयोजन पूरे होते हैं।
साधना करने वाला वाला सहज ही उठा लेता है।
साधना जुटाना और बिना थके बिना हिम्मत खोये अनवरत श्रम करने रहना यह तीन आधार ही सफलताओं के उद्गम स्रोत हैं।
साधना का क्रम चलाकर आश्रम के वातावरण में ऐसी विशेषता उत्पन्न करने का प्रयत्न करते हैं जिससे यहाँ के रहने वालों में अनायास ही प्रखरता उत्पन्न हो सके।
साधना का उद्देश्य इस चेतना विद्युत शक्ति का अभिवर्धन करना भी है। इसे मनोबल, प्राणबल और आत्मबल भी कहते हैं। संकल्प शक्ति और इच्छा शक्ति के रूप में इसी के चमत्कार देखे जाते हैं।
साधना सत्र का आयोजन किया जाय और उनमें प्राण−प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया अपनायी जाय। यह शान्ति−कुञ्ज में चल रही साधनात्मक एवं शिक्षणात्मक प्रक्रिया का अनुकरण है। भवन निर्माण न सही−प्रक्रिया की दृष्टि से तो सर्वत्र छोटे शान्ति−कुञ्ज चल सकते हैं यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण है इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यों प्रस्तुत वर्ष में हर दिन 24 करोड़ गायत्री जप सम्पन्न होते चलने और उससे वातावरण में देवत्व की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होने की बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को उस मन्त्रशक्ति की- दीक्षा की- महत्ता समझनी चाहिए। मन्त्र की माता उसे ही मानना चाहिये, सिद्धियों का उद्गम स्थल, भगवान को द्रवित एवं प्रभावित कर सकने का माध्यम उसे ही मानना चाहिए।
साधना की जाय तो मनुष्य प्राणवान और ओजस्वी बनता है। उपार्जित प्राण विद्युत की ऊर्जा के सहारे स्वयं कितनी ही अद्भुत सफलताएँ प्राप्त करता है और दूसरों को सहारा देकर ऊँचा उठाता है।
साधना से अमेरिका के फिल्म कलाकार सिनावे और शर्लें मेवलेन बहुत प्रभावित हुए हैं और वे योग की अगली सीढ़ियां सीख रहे हैं।
साधना के उपयुक्त मनःस्थिति स्वतः बन जाती है।
साधना सत्रों की संख्या एक हजार से कम नहीं, वरन् अधिक ही होकर रहेगी। शान्ति−कुञ्ज के छोटे स्वरूप यदि इतने स्थानों पर इसी वर्ष खड़े हो जाते हैं तो निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी बात होगी और भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण परम्परा चल पड़ने की सम्भावना प्रत्यक्ष होती देखी जा सकेगी।
साधना के इतिहास में हिमालय की ऊँचाई और गंगातट की पवित्रता का लाभ उठाने वाले साधकों की संख्या अत्यधिक है। ऐतिहासिक तीर्थ तो अन्यत्र भी हैं, पर आत्म−साधना के तीर्थों की संख्या जितनी इस क्षेत्र में है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं।
साधना के लिए उपयुक्त वातावरण की भी अपेक्षा रहती है। साधक की आन्तरिक मनःस्थिति एवं बाह्य परिस्थिति का अपना प्रभाव होता है, उससे वातावरण बनता है और प्रवाह प्रभाव उत्पन्न होता है। आत्मोत्कर्ष के लिए की जाने वाली साधनाओं में तो उपयुक्त वातावरण की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कवि, कलाकार, शोधकर्त्ता, विद्यार्थी आदि बुद्धि कर्मियों के लिए एकाग्रता पूर्वक अपने काम करने पड़ते हैं इसके लिए उन्हें विक्षोभ रहित एकान्त चाहिए। ठीक इसी स्तर का अति महत्वपूर्ण कार्य आत्म−निर्माण एवं आत्म−परिष्कार का भी है।
साधना विधानों का घोषित समन्वय यथावत् है। इनमें आने की जिन्हें स्वीकृति दी गयी है वह यथावत् है। उसमें कोई हेर−फेर नहीं है।
साधनारत होकर मनुष्य इस प्राण विद्युत की इतनी अधिक मात्रा अपने में संग्रह कर सकता है कि उस आधार पर अपना ही नहीं अन्य अनेकों का भी उपकार, उद्धार कर सके।
साधना काल में प्रयोग किया जाता है। अनेक विधि निषेध एवं वस्तु प्रयोग इसी दृष्टि से बने हैं। किस मन्त्र की सिद्धि के लिए किन पदार्थों से हवन किया जाय। आहार में क्या वस्तुएँ अयुक्त की जायँ। पूजा के उपकरणों में किस स्तर को प्रधानता दी जाय।
साधना के लिए उपयुक्त माना जाता रहा है तो यह मान्यता उचित ही थी।
साधना के द्वारा आत्मबल को बढ़ा लिया जाय तो हम आज से हजारों वर्ष पहले घटित घटनाओं को भी यथार्थ रूप से आकाश मण्डल में सुन या देख सकते हैं। विज्ञान से तो अब यह सिद्ध ही हो चुका है कि जो भी ध्वनियाँ निसृत होती हैं वे कभी भी नष्ट नहीं होतीं।
साधनाएँ तथा मनोबल, आत्म−बल एवं संकल्प जन्य सिद्धियों का केन्द्रबिन्दु इसी स्थान पर है।
साधना वर्ष में अपने निर्माण ऐसे होने चाहिए जिनकी तुलना उत्तुंग पर्वत शिखरों से की जा सके। इन दिनों अपने मन में यही विचार चल रहा है कि उभरे हुए उत्साह को ऐसी दिशा मिलनी चाहिए जिससे मिशन के लक्ष्य की निकट से निकटतम आने की सम्भावना साकार हो सके। व्यक्ति, परिवार एवं समाज निर्माण के−बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति के−अपने प्रयास इस वर्ष जितने प्रखर हो सके उतनी ही साधना वर्ष की सफलता एवं सार्थकता मानी जा सकती है।
साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ, मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है और अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलतायें पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जायगा तो यह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जायगी।
साधना करने में उनके साथ सायुज्यता प्राप्त होती है। साधक उसी स्तर का उन्हीं विशेषताओं से युक्त बनता जाता है।
साधना द्वारा प्रेरक क्षमता अर्जित कर ली है तो किसी दूसरे को प्रेरित कर लाभ पहुँचाया जा सकता है।
साधनाओं में तो उपयुक्त वातावरण की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कवि, कलाकार, शोधकर्त्ता, विद्यार्थी आदि बुद्धि कर्मियों के लिए एकाग्रता पूर्वक अपने काम करने पड़ते हैं इसके लिए उन्हें विक्षोभ रहित एकान्त चाहिए। ठीक इसी स्तर का अति महत्वपूर्ण कार्य आत्म−निर्माण एवं आत्म−परिष्कार का भी है। इसके लिए वातावरण की अनुकूलता चाहिए। विक्षोभकारी वातावरण में कर्मकाण्ड तो हो सकते हैं।
साधना क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधन प्रक्रिया सम्पन्न करें।
साधना वर्ष की सफलता एवं सार्थकता मानी जा सकती है।
साधना मण्डल हों वहाँ चार दिवसीय साधना सत्र का आयोजन किया जाय और उनमें प्राण−प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया अपनायी जाय। यह शान्ति−कुञ्ज में चल रही साधनात्मक एवं शिक्षणात्मक प्रक्रिया का अनुकरण है। भवन निर्माण न सही−प्रक्रिया की दृष्टि से तो सर्वत्र छोटे शान्ति−कुञ्ज चल सकते हैं यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण है इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यों प्रस्तुत वर्ष में हर दिन 24 करोड़ गायत्री जप सम्पन्न होते चलने और उससे वातावरण में देवत्व की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होने की बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
साधना करने के लिए कहा गया है। हर स्थान पर साधना मण्डल खड़े करने और अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वालों को नया उत्साह देने के लिए कहा गया है। जहाँ साधना मण्डल हों वहाँ चार दिवसीय साधना सत्र का आयोजन किया जाय और उनमें प्राण−प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया अपनायी जाय। यह शान्ति−कुञ्ज में चल रही साधनात्मक एवं शिक्षणात्मक प्रक्रिया का अनुकरण है। भवन निर्माण न सही−प्रक्रिया की दृष्टि से तो सर्वत्र छोटे शान्ति−कुञ्ज चल सकते हैं यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण है इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
साधनात्मक एवं शिक्षणात्मक प्रक्रिया का अनुकरण है। भवन निर्माण न सही−प्रक्रिया की दृष्टि से तो सर्वत्र छोटे शान्ति−कुञ्ज चल सकते हैं यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण है इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यों प्रस्तुत वर्ष में हर दिन 24 करोड़ गायत्री जप सम्पन्न होते चलने और उससे वातावरण में देवत्व की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होने की बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की- स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।
साधना वर्ष की।
साधना से बहुत प्रभावित हुए थे। इससे उस ओर जनता का ध्यान भी तेजी से बढ़ा। ‘लान्स सेट’ पत्रिका के द्वारा भी उनका प्रचार बहुत हुआ। फिल्म कलाकार भी उस शिक्षा प्रक्रिया में सम्मिलित हुए हैं। अब तक तीन हजार से ऊपर अमरीकी उनकी दीक्षा ले चुके हैं।
साधना नहीं है।
साधना समर में यदि आत्म-तत्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्त काम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधनाकाल दैवी आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की- अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस को प्रयोग करना पड़ता है। यह युद्ध उपेक्षा पूर्व- ज्यों-त्यों करके- ढीले-पोले मन से बेगार भुगतने की तरह नहीं लड़ा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-December
साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा दूरदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
साधना में संलग्न ब्राह्मण और इससे आगे परिपक्व स्थिति में पहुँचे हुए साधु कहलाते हैं। ब्राह्मण परिवार बना कर रहते हैं और ज्ञान संवर्धन को सेवा में संलग्न रहते हैं। साधु पके फल की तरह परिवार भर के उत्तराधिकारों से छुटकारा पाकर विश्व नागरिकों में सम्मिलित हो जाते हैं। उनका अपनापन असीम हो जाता है। व्यापक लोकहित को महत्व देते हैं और ऊँचा उठाने वाली प्रेरणाएँ देने की पुण्य-प्रक्रिया में संलग्न रहते हैं।
साधना। साधना वह प्रक्रिया है जिसमें अमुक विधि-विधानों कर्मकाण्डों के साथ अमुक स्तर की भावनाओं का समावेश करके आन्तरिक अवसादों को दूर किया जाता है। चेतना पर छाई प्रसुप्ति को जागृति में परिवर्तित करना आत्म-साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु -प्रवृत्तियां अभ्यास में आती रही हैं उनकी छाप अभी भी छाई रहती है।
साधना के लिए एकाकी या अपनी पत्नी समेत अभीष्ट अवधि तक निवास कर सकें। ऐसे लोगों को अपने भोजन, वस्त्र आदि का निर्वाह व्यय तो स्वयं ही उठाना पड़ता। निवास तथा प्रशिक्षण की सुविधा आश्रम में मिल जायगी। अब तक स्थान की कमी के कारण इस प्रकार की इच्छा करने वालों को इनकार ही किया जाता रहा है, पर अब नया आश्रम बनने से नई सुविधा बढ़ गई है। हिमालय क्षेत्र, गंगा तट, सज्जनों का संग, आध्यात्मिक वातावरण, प्रखर मार्ग-दर्शन के पाँचों लाभ मिलने से आत्मिक प्रगति का पथ-प्रशस्त होने में संदेह नहीं रह पाता।
साधनाओं से वह सम्भव है या नहीं यह तो मुझे ज्ञान नहीं, पर जो सच्चे हृदय से दुःखी जनों की सेवा निष्काम भाव से करते हैं उनकी स्वर्ग मुक्ति आत्म-कल्याण सर्वथा अक्षुण्ण है, उसे कोई भी उससे विचलित नहीं कर सकता।
साधना एवं लोकसेवा की गरिमा समझने वालों का व्यावहारिक मार्ग-दर्शन। इसके लिए सत्र प्रशिक्षण प्रक्रिया में कुछ नये तत्वों का समावेश किया गया है। उपयुक्त प्रक्रिया अपनाने से हर काम सफल होता है। साधनों के सम्बन्ध में तो यह बात विशेष रूप से लागू होती है। व्यस्त लोगों के लिए थोड़ा-सा अवकाश लागू होती है।
साधना में पड़ती है। आये दिन उतार-चढ़ाव और मोड़-तोड़ आते रहते हैं। उनके समाधान का दूरदर्शी निष्कर्ष अनगढ़ बुद्धि से नहीं निकल पाता, वह प्रायः भटकती और अनुपयुक्त निर्णय करती देखी गयी है। ऐसी दशा में यदि सत्परामर्श की समुचित व्यवस्था बन सके तो सर्वतोमुखी प्रगति के उपयोगी आधार खड़े होते चले जाते हैं। ऐसे ही अनेकों लाभ हैं।
साधना का उद्देश्य है- व्यक्ति का काया-कल्प, चेतना का परिमार्जन-परिष्कार इतना बन पड़े तो अपना आपा ही कल्प-वृक्ष बन जाता है और स्वर्गीय उपलब्धियों को सहज ही प्रस्तुत करता है। कितने ही साधकों को विभिन्न देवताओं द्वारा विभिन्न प्रकार के वरदान मिलने के कथानक कथा-गाथाओं में पढ़ने सुनने को मिलते हैं। यह वरदाता इष्टदेव अपना उच्चस्तरीय अंतस् ही है। जो कल्पना के अनुरूप वेष बनाकर सामने आ खड़ा होता है। दर्शन देता है और मनोकामनाएँ पूरी करता है।
साधना सत्र चलेंगे। पहला 1 से 10 तक दूसरा 11 से 20 तक तीसरा 21 से 30 तक हर महीने चला करेगा। बीच-बीच में होली आदि के अवसर पर एक दो सत्र स्थगित भी रहेंगे। वानप्रस्थ सत्र और महिला सत्र अगले दिनों तीन हैं। फरवरी, मई एवं जून 77।
साधना एवं तपश्चर्या की समन्वित साधना पद्धति का आश्रय लेकर अध्यात्म विज्ञान का उपयोग किया जाता है और उससे चित्-शक्ति के सम्वर्धन का अलौकिक लाभ मिलता है।
साधना के अनेक प्रयोग हैं। अनेकानेक परम्पराओं में अगणित विधि-विधान बताये गये हैं। भारतीय साधना विज्ञान के अन्तर्गत 84 योग प्रधान हैं। उनकी शाखा उपशाखाएँ बढ़ते-बढ़ते हजारों तक पहुँचती हैं। फिर संसार के अन्यान्य क्षेत्रों में प्रचलित साधनाओं की गणना करना और उनका लेखा जोखा रखना तो और भी कठिन है।
साधना की प्रक्रिया अपनाई जाय तो उससे दुहरा लाभ है। संकल्प बल तो निश्चित रूप से बढ़ता है साथ ही उस अभिवर्धन को अन्तः क्षेत्र में प्रसुप्त पड़ी हुई दिव्य विभूतियों को उभारने का भी अवसर मिलता है। यदि केवल संकल्प बल ही बढ़ाना हो और वह भी मात्र भौतिक स्तर का रखना हो तो वह प्रयोजन साहसिक कार्य करते रहने और उत्साह अनुभव बढ़ाते चलते से भी सम्भव हो सकता है। पर यदि उत्कृष्टतावादी उस आत्मबल की आवश्यकता हो, जो जीवात्मा को क्रमशः महानात्मा, देवात्मा और परमात्मा बना सके- जीवन को सार्थक बना सकने वाले आधार खड़े कर सके तो फिर साधना मार्ग पर चलते हुए उस मनोबल को, संकल्प शक्ति को प्राप्त करना होगा जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘ब्रह्म वर्चस’ कहते हैं। चेतन सत्ता का यही सबसे बड़ा वैभव है, समस्त सिद्धियों का उद्गम स्त्रोत इसी को कहा गया है।
साधना में अधिक स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ने लगता है।
साधनाएँ विनिर्मित की गई हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग यह तीनों ही ध्यान प्रधान हैं और उनमें अपनी मस्तिष्कीय चेतना को श्रद्धासिक्त बना कर अन्तरंग खोजने के लिए अन्तरंग में उतरना पड़ता है।
साधनाओं में भी ‘रूप’ को ही प्राथमिकता मिली है। दर्शन झाँकी के लिए धार्मिकजनों का कितना समय, श्रम और धन व्यय होता है, इसे सभी जानते हैं। देवालयों, तीर्थों, स्मारकों, सन्तों को देखने के लिए तीर्थयात्रियों के-पर्यटकों के झुण्ड प्रायः परिभ्रमण करते रहते हैं।
साधना द्वारा जागृत किये थे। ध्यान, धारणा प्रत्याहार और समाधि यह चार साधनाएँ मस्तिष्कीय संस्थान के परिशोधन का उद्देश्य पूरा करती हैं।
साधनाओं के क्रिया कलाप द्वारा वंचित कुसंस्कारों को उखाड़ने और उत्कृष्ट आस्थाओं जमा सकने में समर्थ प्राणशक्ति को प्रखर बनाया जाय।
साधना’ प्रक्रिया को अपना कर जिस प्रकार हो सकता है। वैसे अन्य किसी उपाय से सम्भव नहीं है। मानवी अवगति का एकमात्र कारण उसकी आन्तरिक दुर्बलता एवं विपन्नता ही होती है। यदि उस भार को हटाया जा सके तो मनुष्य गरिमा- महामानवों जैसे-नर देवताओं जैसी बनी रह सकती है। परिष्कृत मनःस्थिति में रहने वाले सहज ही समुन्नत परिस्थिति प्राप्त कर लेते हैं- वह तथ्य सर्वविदित है।
साधना का ही प्रतिफल है। नाला गंगा में मिल कर गंगा बनता है-बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र हो जाती है। स्त्री आत्म-समर्पण करके पति की प्राणबल्लभा बनती है। आत्मा ईश्वर में जुड़कर परमात्मा बनता है। योग का लक्ष्य है आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना।
साधना द्वारा व्यक्तित्व का परिशोधन करते हुए सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर असंदिग्ध रूप से बढ़ा जा सकता है।
साधना का केन्द्र बिन्दु इसी को मान कर चलना पड़ा था। अध्यात्म की भाषा में इसे योग कहते हैं। योग का अर्थ है जोड़ना। यह चिन्तन पर प्रक्रिया है। आत्मा को परमात्मा से -जीव को ब्रह्म से -सामान्य के असामान्य से सम्बद्ध करने के लिए चिन्तन का उपयोग भी करना पड़ता है और भावनाओं का भी।
साधनाओं की गणना करना और उनका लेखा जोखा रखना तो और भी कठिन है। इन योग साधनाओं में चक्रवेधन की एक प्रक्रिया ऐसी है जिसका महत्व संसार भर के सभी योगाभ्यासियों ने स्वीकार किया है। षट्चक्र वेधन के स्वरूपों और विधि-विधानों में थोड़ा अन्तर- मतभेद रहते हुए भी उनके अस्तित्व और प्रभाव को सर्वत्र स्वीकारा गया है। कुण्डलिनी शक्ति जागरण की चर्चा साधना क्षेत्र में बहुधा होती रहती है। यह चक्र वेधन में मिलने वाली सफलता की अन्तिम परिणति है।
साधना सत्रों में सम्मिलित हो सकें।
साधना मार्ग में भी इसके अतिरिक्त और कोई गति नहीं। निज के समाधान के लिए किन्हीं सिद्धान्तों की उपयोगिता पर जितना कुछ तर्क विवाद अन्वेषण करना हो, उतना पूरी गहराई के साथ कर लेना चाहिए। इसी प्रकार इस मार्ग का पथ-‘प्रदर्शक चुनने से पूर्व उसके ज्ञान, अनुभव एवं चरित्र के सम्बन्ध में जितनी भी कुरेद बीन करनी सम्भव हो वह कर लेनी चाहिए। पर अन्ततः ऐसी स्थिति में पहुँचना ही चाहिए कि किसी के निर्णय और निर्देश को स्वीकार्य अनुशासन की तरह ग्रहण किया जाय और पूर्ण विश्वास के साथ निर्धारित गतिविधि अपनाते हुए आगे बढ़ चला जाय। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए अनिश्चितता और आशंका की स्थिति का अन्त हो गया।
साधना के छैनी हथौड़े से जीवन के अनगढ़ रूप को कलात्मक देव प्रतिमा के रूप में परिणत किया जाता है। अध्यात्म शब्द का तात्पर्य ही आत्मा का दर्शन एवं विज्ञान है। इस सन्दर्भ के सारे क्रिया-कलापों का निर्माण निर्धारण मात्र एक ही प्रयोजन के लिए किया गया है कि व्यक्तित्व को-चेतन की उच्चतम-परिष्कृत-सुविकसित-सुसंस्कृत स्थिति में पहुँचा दिया। इस लक्ष्य की उपलब्धि का नाम ही ईश्वर प्राप्ति है। आत्म साक्षत्कार एवं ईश्वर दर्शन इन दोनों का अर्थ एक ही है।
साधना मार्ग पर चलते हुए उस मनोबल को, संकल्प शक्ति को प्राप्त करना होगा जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘ब्रह्म वर्चस’ कहते हैं। चेतन सत्ता का यही सबसे बड़ा वैभव है, समस्त सिद्धियों का उद्गम स्त्रोत इसी को कहा गया है। भौतिक और आत्मिक सफलताओं को सुदूर क्षेत्र से घसीट कर चरणों में ला पटकने वाला प्रचण्ड चुम्बकत्व यही है। इसे ईश्वर का सर्वोपरि वरदान कहा जा सकता है। आत्मा के प्रबल पुरुषार्थ के फलस्वरूप मिल सकने वाला उपहार यही है।
साधना विधानों की संरचना इसी निमित्त की गई है। प्रत्येक साधक को तप पुरुषार्थ करने पड़ते हैं और उसी के फलस्वरूप अनुदानों, वरदानों के महत्वपूर्ण प्रतिफल प्राप्त होते हैं।
साधना इस तृतीय नेत्र को प्रदीप्त करने की विधि है। इसमें साधक अपने हृदय, फुफ्फुस, आँतें, आमाशय, वृक्क आदि अंगों-प्रत्यंगों तथा मस्तिष्क में एक प्रखर ज्योति को प्रज्वलित अनुभव करता है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सभी इस ज्योति से जगमगा रहे हैं। सत्ता का एक-एक अणु भ्रूमध्य केन्द्र से निकलने वाले प्रखर प्रकाश के दिव्य प्रवाह से आलोकित है और आलस्य, जड़ता, प्रमाद, अन्धकार इस अरुणोदय से दूर भाग गया है। अदम्य स्फूर्ति, अविकल उल्लास उद्याम सक्रियता तथा उत्कृष्ट आह्लाद से सम्पूर्ण सत्ता समुद्र भासित हो उठी है।
साधना क्षेत्र में बहुधा होती रहती है। यह चक्र वेधन में मिलने वाली सफलता की अन्तिम परिणति है।
साधना द्वारा सम्भव हो सकता है। शरीर के अंग प्रत्यंगों पर उसकी गतिविधियों पर नियन्त्रण कर लेने से शारीरिक विद्युत का संचय और उपयोग सीख जाने से मनुष्य अपनी इतनी विशेषताएँ- असामान्यताएँ प्रदर्शित कर सकता है। जिन्हें देखकर लोग आश्चर्यचकित होने लगें।
साधना अपने वैज्ञानिक रूप में प्रयुक्त की जाती थी तो उसके सत्परिणाम भी प्रत्येक साधक को मिलते थे। यदि उसी प्राचीन परिपाटी को पुनः अपनाया जा सके तो इस महान् अवलम्बन का आश्रय लेकर मनुष्य में देवत्व का अवतरण और धरती पर स्वर्ग का वातावरण पुनः परिलक्षित हो सकता है।
साधनाओं का आश्रय लेकर हम सहज ही अपनी आत्मिक और भौतिक सामर्थ्यों को जगा सकते हैं और उस दिशा में मिलने वाली सफलता का इतना लाभ ले सकते हैं, जितना सामान्य पुरुषार्थ से सम्भव नहीं हो सकता।
साधना कहते हैं। तप से अपने ही अन्तस् के प्रसुप्त को जागृत किया जाता है और उसके फलस्वरूप दिव्य अनुदानों-वरदानों का प्रतिफल मिलता है। यही देवाराधन का उजाला पक्ष है। इस मान्यता के पीछे तर्क भी हैं और तथ्य भी। साधना में सिद्धि मिलने वाली मान्यता इस आधार पर पूर्णतया प्रामाणिक मानी जा सकती है।
साधना का एक अंग कहा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमता का विकास-अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का दिव्य वरदान इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत आता है।
साधना इन दिनों तो एक खिलवाड़ मात्र बन गई है। उसे जादू विद्या जैसा कुछ खेल तमाशा सोच लिया गया है। असल में वह जीवनयापन का एक विशिष्ट विज्ञान है। जिसका आश्रय लेकर सामान्य स्थिति का मनुष्य महामानव बन सकता है और देवोपम गरिमा का अधिकारी बन सकता है। मनुष्य के अंतरंग में इतनी महत्वपूर्ण विभूतियाँ एवं विशेषताएँ छिपी हुई हैं।
साधना प्रक्रिया में अन्तर रहेगा। जो पिछले दिनों सीखा गया है, उसे प्रकाश की और जो अगले दिनों मिलना है उसे प्रेरणा की संज्ञा दी गयी है। पिछले को पूर्वार्ध और अगले को उसका पूरक उत्तरार्ध माना जाना चाहिए। अगले दिनों चलने वाले दस दिवसीय सत्रों में प्रत्येक शिक्षार्थी को विशेष विधि से, विशेष नियम प्रतिबन्धों के साथ एक साधना अनुष्ठान करना होगा। इसे आत्म-शक्ति सम्वर्धक तपश्चर्या स्तर का प्रयास माना जाना चाहिए इसमें शिक्षण कम होगा और तप−साधना में अधिक तत्परतापूर्वक संलग्न रहना पड़ेगा।
साधना में अधिक तत्परतापूर्वक संलग्न रहना पड़ेगा। कहना न होगा कि अब तक कोई भी शिक्षार्थी शान्ति-कुंज के प्रशिक्षण सत्रों में आने के उपरान्त खाली हाथों नहीं गया है। उसे यह शिकायत नहीं रही है कि हमारा समय और किराया भाड़ा बेकार चला गया। आगे की प्रशिक्षण प्रक्रिया पिछलों की अपेक्षा उच्चस्तरीय होगी, वस्तु उसका लाभ भी अधिक ही होना चाहिए।
साधना का समन्वय। समाधान- संशयों और लालसाओं से छुटकारा।
साधना कैसे की जा सकती है? इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन इन वानप्रस्थ सत्रों में मिलता है। एक महीने की अवधि में प्रयत्न यह भी किया जाता है कि शिक्षार्थी को भाषण कला का अनुभव, अभ्यास हो जाए और वह जन-मानस में नवजागरण का सन्देश पहुँचाने में अपनी वाक्-शक्ति का सफल उपयोग कर सके। एक महीने का समय इतना है कि उसमें कोई साधना तपश्चर्या भी ठीक ढंग से हो सकती है। दस दिन की साधना तो अति व्यस्त लोगों के लिए रखी गई है।
साधना, मानवी प्रगति का अति महत्वपूर्ण आधार है। व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाने से बढ़कर जीवन की सार्थकता सिद्ध करने वाला और कोई उपाय नहीं। अंतस् में छिपी पड़ी प्रसुप्त विभूतियों को ढूंढ़ निकालने की तुलना में और कोई सम्पत्ति उपार्जन का लाभदायक व्यवसाय इस संसार में है नहीं। इसी मार्ग पर चलकर हम भौतिक और आत्मिक प्रगति के उभय प्रयोजन सिद्ध कर सकते हैं।
साधना की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं।
साधना भी इसी का नाम है। साधना के आधार पर मानवी चेतना मात्र जीवन निर्वाह भर के क्रिया-कलापों में उलझी न रहकर उस स्तर पर पहुँच सकती है। जहाँ से बाहर ब्रह्मसत्ता की प्रतीक प्रतिनिधि होने का दावा कर सके। उसी स्तर के अनुरूप अपने वर्चस्व का परिचय दे सके।
साधना से भरी-पूरी 24 गायत्री महापुराणों की शृंखला बसन्त पंचमी को ही आरम्भ हुई। अखण्ड घृत दीप ने उसी दिन दिव्य आलोक धारण किया। अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास, युग-निर्माण योजना का आरम्भ बसन्त पंचमी को ही हुआ है। वेद,शास्त्र, पुराण आदि आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद, सम्पादन के कार्य किसी न किसी वर्ष को बसन्त पंचमी में ही शुरू किये जाते रहे हैं। शान्ति कुँज की नींव उसी मुहूर्त में रखी गई और महिला जागृति अभियान का अंश उसी दिन फूँका गया और अनेकों प्रकट अप्रकट क्रिया-कलाप हैं, जिनका शुभारम्भ बसन्त पर्व के अवसर पर उठने वाली प्रकृतिगत ही नहीं आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उठने वाली उमंगों के सहारे ही सम्पन्न किया जाता है।
साधनाएँ मस्तिष्कीय क्षेत्र में ही की जाती हैं। भौतिक शक्तियों के केन्द्र मूलाधार और आत्मिक शक्तियों के उद्गम सहस्रार के बीच एक कड़ी है, जिसे बोल-चाल की भाषा में मेरुदण्ड और अध्यात्म की परिभाषा में सुषुम्ना संस्थान कहते हैं। रीढ़ की हड्डी का क्या महत्व है? इसे शरीर-शास्त्र के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं। इसके अन्तराल में प्रवाहित होने वाले विद्युत प्रवाह के साथ उच्चस्तरीय विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं इसे तत्वदर्शी आत्मवेत्ता भली प्रकार जानते हैं।
साधना कहा जा सकता है। यदि यह सब न बन पड़ा होता तो आदिमकाल के पिछड़ेपन से आगे बढ़ सकने का अवसर कदाचित अभी तक भी न आ पता।
साधना का शास्त्रीय योगाभ्यास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान है। मध्यकालीन सन्त परम्परा में उसे और भी अधिक प्रधानता मिली है। नाथ सम्प्रदाय कबीर सम्प्रदाय, राधास्वामी मत, दादू मत आदि की साधनाओं के शब्द सुरत के नाम से नाद समाधि की सुविस्तृत फल श्रुति है। विज्ञान ने विश्वव्यापी शब्द शक्ति का मूल्याँकन किया है और उसके माध्यम से भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की सम्भावनाओं का प्रतिपादन किया है।
साधना का उद्देश्य पशु-प्रवृत्तियों के साथ देव-प्रवृत्तियों की टक्कर करना और पिछड़ेपन को उलट कर उस जगह प्रगतिशील की प्राण-प्रतिष्ठा करना है। इस प्रयास को आन्तरिक महाभारत, लंका-दहन, समुद्र-मंथन आदि पौराणिक गाथाओं के साथ जोड़ा जा सकता है। विश्वामित्र द्वारा नई सृष्टि बनाने-च्यवन ऋषि का काया-कल्प होने ओर उपाख्यानों की संगति भी साधना समर के साथ जोड़ी जा सकती है। निश्चित रूप से यही वह देवासुर संग्राम है, जिसे आत्मोत्कर्ष की विजय श्री का वरण करने वाले हर साधक को अनिवार्य रूप से लड़ना पड़ता है। भगवान का अंतरात्मा में अवतरित होने का आभास इसी से मिलता है कि उस धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में पांचजन्य बजा या नहीं, गाण्डीव खटका या नहीं, धर्म की संस्थापना और अधर्म के विनाश की दो हलचलें एक ही समुद्री हिलोर के ज्वार-भाटे जैसी दो विलग दीखने वाली किन्तु वस्तुतः अन्योन्याश्रित एकात्म गतिविधि ही समझी जानी चाहिए।
साधना का पुरुषार्थ किया जा सके- तो उसका अभीष्ट परिणाम मिलना सुनिश्चित है। असफलता तो उन्हें मिलती है जो राजमार्ग छोड़कर पगडंडियों में भटकते हैं और स्वल्प प्रयत्न से बढ़े-चढ़े परिणाम तुर्त-फुर्त प्राप्त कर लेने की लाटरी पद्धति से अध्यात्म साधना की तुलना करते हैं। प्राचीन काल में जब साधना अपने वैज्ञानिक रूप में प्रयुक्त की जाती थी तो उसके सत्परिणाम भी प्रत्येक साधक को मिलते थे। यदि उसी प्राचीन परिपाटी को पुनः अपनाया जा सके तो इस महान् अवलम्बन का आश्रय लेकर मनुष्य में देवत्व का अवतरण और धरती पर स्वर्ग का वातावरण पुनः परिलक्षित हो सकता है।
साधना क्षेत्र में रूप के पश्चात् अधिकतर प्रयुक्त किया जाता है।
साधना कहा जाता है।
साधना कहते हैं। संक्षेप में साधना भी इसी का नाम है। साधना के आधार पर मानवी चेतना मात्र जीवन निर्वाह भर के क्रिया-कलापों में उलझी न रहकर उस स्तर पर पहुँच सकती है। जहाँ से बाहर ब्रह्मसत्ता की प्रतीक प्रतिनिधि होने का दावा कर सके। उसी स्तर के अनुरूप अपने वर्चस्व का परिचय दे सके।
साधना से ही सम्भव होता है।
साधना प्रयासों की तुलना में आत्मिक प्रगति के लिए किये जाने वाले पुरुषार्थ को असंख्य गुना महत्वपूर्ण बताया है।
साधना द्वारा हो सकता है। जो तथ्यों पर आधारित हो। प्रयत्न ऐसी ही साधना सिखाने का है जो हमने प्रयत्नपूर्वक सीखी है और जिन सत्पात्रों को सिखलाने के लिए हमारा मन आकुल-व्याकुल हो रहा है। ऐसे सत्पात्रों की तलाश और परख के लिए ही विशेष रूप से इन साधना-सत्रों का आयोजन किया गया है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चार आध्यात्मिक प्रगति के चार-उपचारों को अधिक प्रखर बनाने में जो उपेक्षा बरती जाती रही है उसका अब अन्त होना चाहिए। दैनिक जीवन में इन तथ्यों के लिए भाव भरा एवं सुनिश्चित स्थान रहना चाहिए। कौन, क्या, कैसे करे, यह तो व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर है, अस्तु स्वयं निर्धारण करने और स्वयं कार्यक्रम बनाने की बात है। दूसरे परामर्श भर दे सकते हैं, पर करना तो स्वयं ही पड़ता है। अपनी मनः स्थिति और परिस्थिति के साथ उत्कृष्टता का ताल-मेल बिठाना अपना ही काम है।
साधना कहे जा सकते हैं। नादयोग इन सब में अधिक गूढ और अधिक रहस्यमय है। नेत्रों के बाद दूसरी विशिष्ट संवेदनशील इन्द्रिय ‘कान’ है। बहरे मनुष्य गूँगे भी होते हैं। कारण है कि कान द्वारा शब्द ग्रहण करके मस्तिष्क तक न पहुँचा सकने की कठिनाई के कारण उच्चारण के ज्ञान तन्तुओं को प्रेरणा मिल ही नहीं पाती और वे बोलने में असमर्थ ही बने रहते हैं।
साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्प शक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है। अध्यात्म साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा दूरदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
साधना मार्ग के सम्बन्ध में भी है। प्रखर व्यक्तियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने पर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य बनते देखे गये हैं। फिर विधिवत श्रद्धासिक्त आत्मीयता के सूत्र में बाँधने वाली गुरु दीक्षा की प्रतिक्रिया उपयोगी परिणाम क्यों न उत्पन्न करेगी। उपासना के विधि-विधान का मार्ग दर्शन तो सरल है। उतनी आवश्यकता तो पुस्तकें भी पूरी कर देती हैं।
साधना अनुष्ठान करना होगा। इसे आत्म-शक्ति सम्वर्धक तपश्चर्या स्तर का प्रयास माना जाना चाहिए इसमें शिक्षण कम होगा और तप−साधना में अधिक तत्परतापूर्वक संलग्न रहना पड़ेगा। कहना न होगा कि अब तक कोई भी शिक्षार्थी शान्ति-कुंज के प्रशिक्षण सत्रों में आने के उपरान्त खाली हाथों नहीं गया है। उसे यह शिकायत नहीं रही है कि हमारा समय और किराया भाड़ा बेकार चला गया। आगे की प्रशिक्षण प्रक्रिया पिछलों की अपेक्षा उच्चस्तरीय होगी, वस्तु उसका लाभ भी अधिक ही होना चाहिए।
साधनाओं के शब्द सुरत के नाम से नाद समाधि की सुविस्तृत फल श्रुति है। विज्ञान ने विश्वव्यापी शब्द शक्ति का मूल्याँकन किया है और उसके माध्यम से भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की सम्भावनाओं का प्रतिपादन किया है।
साधना करने पर भी अपने विश्वास के अनुरूप निश्चित रूप से सत्परिणाम ही मिल जायगा।
साधना की इन्हीं में से किसी के साथ तुलना की जा सकती है।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष के-उपवास उद्बोधन के सन्दर्भ में परिजनों ने यदि कुछ उभार अपने भीतर भी अनुभव किया हो तो उसे ऐसे ही-पानी के बुलबुले तरह ठण्डा न हो जाने दिया जाय, वरन् उपलब्ध चिनगारी की तरह उसे अधिकाधिक ज्वलन्त किया जाय। उठती हुई भावनाओं का, यथार्थता और सशक्तता मूल्याँकन कर्म की कसौटी पर ही होता है। जिन अंतःकरणों में इस बसन्त पर्व पर ऐसी हलचलें उठें, उनके सामने उपरोक्त न्यूनतम कार्यक्रम प्रस्तुत है। इसमें से जिससे जितना बन पड़े उसे कर-गुजरने का साहस संजोये और संकल्पपूर्वक वैसा कुछ करने में जुट जाय, जिससे बचे खुचे जीवन की सार्थकता सिद्ध हो सके।
साधना से ही उभरती है। अन्तः और बाह्य क्षेत्र में घुसी हुई अवाँछनीयताओं से संघर्ष करना- प्रतिपक्ष के आघात बिना उद्विग्न हुए सहते रहना यह शूर-वीरों और दुस्साहसियों का ही काम है। ऐसा दिव्य स्वभाव प्रायः पूत मनःस्थिति में ही उत्पन्न होता है। निकृष्टताओं को उत्कृष्टताओं के साथ जोड़ देने का प्रयोजन तभी पूरा होता है। जब तप में कष्टसाध्य परिस्थितियों से रस आने लगे और उस मार्ग पर चलने में अपना वास्तविक हित दृष्टि-गोचर होने लगे।
साधना शृंखला।
साधना सम्प्रदाय, प्रकाश के ध्यान का निर्देश करते हैं। योग शास्त्र के नाटक एवं बिन्दुयोग के सुविस्तृत विधान इसी आधार पर बने हैं उपनिषदों में विशेष रूप से प्रकाश ध्यान पर ही जोर दिया है-
साधना का उद्देश्य अन्तरात्मा में ब्रह्मसत्ता का अवतरण करना है। यह प्रयास किस मात्रा में सम्भव हो सका, इसकी परख यही हो सकती है कि पशु को देवता बनाने की गतिविधियाँ कितनी ज्वलंत हो रही हैं। अग्नि परीक्षा प्रक्रिया सीता जी की वापसी के समय हुई थी, आत्मा रूपी सीता को परमात्मा रूपी राम से मिलने के लिए इसी जाँच में होकर गुजरना पड़ता है। रावण रूपी पशुत्व का कोई प्रभाव तो शेष नहीं है,सम्भवतः यही जाँचने के लिए अग्नि परीक्षा का उपक्रम किया गया था। सोने को खरा-खोट घोषित करने से पूर्व भी अग्नि परीक्षा और कसौटी की रगड़ आवश्यक होती है।
साधना द्वारा अन्तरात्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाया जा सकता है। और वह स्थिति पैदा की जा सकती है कि ईश्वर साक्षात्कार का आत्मसाक्षात्कार का परमानन्द लाभ लिया जा सके। ईश्वर ही इस सृष्टि का अधिपति और यदि गहन सम्पर्क सम्भव हो सके- आत्मीयता जुड़ सके- तो फिर पारस्परिक आदान-प्रदान में कोई कमी-कोताही नहीं रहती। व्यक्ति आत्म-समर्पण करके ईश्वर को अपना सब कुछ सौंपता है। साथ ही जो उसके पास है वह सब कुछ प्राप्त भी कर लेता है।
साधना के क्षेत्र में उतर सकते हैं और मिल जुल कर बहुत काम कर सकते हैं, पर यह सम्भव तभी है जब वे सन्तानोत्पादन के झंझट को सिर पर न ओढ़ें। बच्चे सदा अपनी माता को अपनी ही सेवा में जुटाये रहते हैं और बाप को भी उनके लिए अनेक साधन जुटाने में अपनी अधिकाँश व्यक्ति खर्च करनी पड़ती है। ऐसी दशा में उनके पास समय, श्रम, वृद्धि आदि का ऐसा कुछ बचता ही नहीं जिसे लोकमण्डल में लगा सकें। अस्तु सृजनशिल्पियों की नई पीढ़ी राष्ट्र को उठाने के अपने संकल्प के पीछे ऐसे ही लोगों को ढूंढ़ने और प्रशिक्षित करने का स्वप्न है। उनकी मनःस्थिति लोकेषणा-वित्तेषणा और पुत्रेषणा से बच सकने की हो और जो विशुद्ध अध्यात्म वृत्ति को अपना कर नव-युग के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।
साधना पुरुषार्थ में उसी प्रकार बलिष्ठ बनाया जा सकता है जैसे व्यायाम से माँसपेशियों को और अध्ययन से मस्तिष्कीय ज्ञानकोषों को। कारण शरीर का व्यायाम भी तप साधन है। इससे देव संस्थानों को जागृत होने का अवसर मिलता है। देवताओं की सुषुप्ति और जागृति के रोचक कथानक पुराण साहित्य में भरे पड़े हैं। आषाढ़ सुदी एकादशी देवशयनी मानी जाती है और पूरे चार महीने गहरी निद्रा का आनन्द लेकर कार्तिक सुदी एकादशी को देव उठनी(देवोत्थान) पर्व मनाया जाता है।
साधना के आधार पर मानवी चेतना मात्र जीवन निर्वाह भर के क्रिया-कलापों में उलझी न रहकर उस स्तर पर पहुँच सकती है। जहाँ से बाहर ब्रह्मसत्ता की प्रतीक प्रतिनिधि होने का दावा कर सके। उसी स्तर के अनुरूप अपने वर्चस्व का परिचय दे सके।
साधना-विधानों की ध्यान प्रक्रिया अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का एक चरण भी आगे नहीं बढ़ता। ध्यान के आधार और प्रकरण तो अनेक हैं, पर उसका मूल स्वरूप एक ही है कि हम अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति को समेटने और अन्तर्मुखी बनाने का प्रयास करें। भीतर देखें और अन्तरंग को खोजें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न स्तर की ध्यान-साधनाएँ विनिर्मित की गई हैं।
साधना तपश्चर्या भी ठीक ढंग से हो सकती है। दस दिन की साधना तो अति व्यस्त लोगों के लिए रखी गई है।
साधना’ को अतीव उपयोगी माना जाता है यों यह प्रयोजन मनोयोगपूर्वक सत्प्रयोजनों में संलग्न रहने से भी अनेकों मनस्वी लोगों की तरह पूरा किया जा सकता है, पर जितनी सरलता आत्म-साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्प शक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है। अध्यात्म साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा दूरदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
साधना का सही स्वरूप और सही उद्देश्य समझा जा सके- यदि सही रीति-नीति अपनाकर आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जा सके- तो उसका अभीष्ट परिणाम मिलना सुनिश्चित है। असफलता तो उन्हें मिलती है जो राजमार्ग छोड़कर पगडंडियों में भटकते हैं और स्वल्प प्रयत्न से बढ़े-चढ़े परिणाम तुर्त-फुर्त प्राप्त कर लेने की लाटरी पद्धति से अध्यात्म साधना की तुलना करते हैं। प्राचीन काल में जब साधना अपने वैज्ञानिक रूप में प्रयुक्त की जाती थी तो उसके सत्परिणाम भी प्रत्येक साधक को मिलते थे। यदि उसी प्राचीन परिपाटी को पुनः अपनाया जा सके तो इस महान् अवलम्बन का आश्रय लेकर मनुष्य में देवत्व का अवतरण और धरती पर स्वर्ग का वातावरण पुनः परिलक्षित हो सकता है।
साधनारत व्यक्ति उसके मनोवाँछित वरदान प्रदान करते हैं। इस मान्यता का एक अन्धा पक्ष है दूसरा उजाला। अन्धा यह है कि देवी-देवताओं के लिए उनके मुँह में लार टपकती रही हो और प्रशंसा सुनने एवं सस्ते भेंट उपहार पाने भर से वे किसी पर लट्टू होकर ऐसे वरदान देते हों जो भारी उच्चस्तरीय पात्रता सम्पन्न व्यक्तियों को ही मिल सकते हैं। यदि यह मान्यता सही हो, तो फिर देवी-देवताओं को रिझाना ही लाटरी लगाने की तरह अत्यन्त लाभप्रद व्यवसाय है। साधना विज्ञान में छाई हुई इस मूढ़ मान्यता का कोई आधार नहीं है।
साधना तो अति व्यस्त लोगों के लिए रखी गई है।
साधना के द्वारा इस प्रसुप्ति को जागृति में बदला जा सकता है। सामान्य से असामान्य बन सकने की इस प्रक्रिया को आत्मा-साधना का एक अंग कहा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमता का विकास-अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का दिव्य वरदान इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत आता है।
साधना उपक्रम ‘शब्द’ साधना कहे जा सकते हैं। नादयोग इन सब में अधिक गूढ और अधिक रहस्यमय है। नेत्रों के बाद दूसरी विशिष्ट संवेदनशील इन्द्रिय ‘कान’ है। बहरे मनुष्य गूँगे भी होते हैं। कारण है कि कान द्वारा शब्द ग्रहण करके मस्तिष्क तक न पहुँचा सकने की कठिनाई के कारण उच्चारण के ज्ञान तन्तुओं को प्रेरणा मिल ही नहीं पाती और वे बोलने में असमर्थ ही बने रहते हैं।
साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु -प्रवृत्तियां अभ्यास में आती रही हैं उनकी छाप अभी भी छाई रहती है। मनुष्य की जो उच्च स्थिति है उसे देखते हुए वे पशु-प्रवृत्तियां अनावश्यक एवं अवाँछनीय बन जाती है। छोटे बच्चे नंग-धड़ंग फिर सकते हैं और कहीं भी मल-मूत्र का त्याग बिना संकोच के कर सकते हैं।
साधना भारतीय विज्ञान की भौतिक विशेषता है, इसी आधार पर इस देश के तैंतीस कोटि नागरिक देव मानवों में गिने जाते थे और उनकी यह निवास स्थली भारत भूमि ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ मानी जाती थी। श्रेष्ठ व्यक्तियों का जहाँ निवास होगा, वहाँ उत्कृष्ट परिस्थितियाँ अनायास ही बनी रहेंगी। ऐसा ही यहाँ हुआ भी है। इतिहास साक्षी है कि भारतीय नागरिकों की समुन्नत आत्मिक स्थिति ने अपनी गौरव-गरिमा का लाभ स्वयं तो लिया है। साथ ही वे उन विभूतियों से समस्त संसार का पिछड़ापन दूर करने के लिए बादलों की तरह इस धरती के कोने-कोने में परिभ्रमण करते रहें।
साधनाएँ मस्तिष्कीय संस्थान के परिशोधन का उद्देश्य पूरा करती हैं।
साधना में तो गुरु वरण करने की आवश्यकता एक प्रकार से अनिवार्य ही मानी गई है। इस व्यवस्था में श्रद्धा तत्व के विकास में एक उपयोगी आधार खड़ा करना होता है। यदि इस चयन एवं नियुक्ति के लिए कोई उपयुक्त सत्पात्र मिल गया तो समझना चाहिए कि सफलता की आधी मंजिल पार हो गई। निष्णात अध्यापक एवं चिकित्सक का सम्पर्क सध जाने से शिक्षा की-चिकित्सा की सफलता प्रायः असंदिग्ध ही हो जाती है, यही बात साधना मार्ग के सम्बन्ध में भी है। प्रखर व्यक्तियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने पर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य बनते देखे गये हैं।
साधना पद्धति का आश्रय लेकर अध्यात्म विज्ञान का उपयोग किया जाता है और उससे चित्-शक्ति के सम्वर्धन का अलौकिक लाभ मिलता है।
साधना विज्ञान का आश्रय लेकर मनुष्य इसी जीवन में स्वर्गीय अनुभूतियों का आनन्द और उन्मुक्त जीवन का रसास्वादन कर सकता है, पर यह सम्भव उसी साधना द्वारा हो सकता है। जो तथ्यों पर आधारित हो। प्रयत्न ऐसी ही साधना सिखाने का है जो हमने प्रयत्नपूर्वक सीखी है और जिन सत्पात्रों को सिखलाने के लिए हमारा मन आकुल-व्याकुल हो रहा है। ऐसे सत्पात्रों की तलाश और परख के लिए ही विशेष रूप से इन साधना-सत्रों का आयोजन किया गया है।
साधना पड़ता है। कृषि, व्यवसाय शिल्प, कला आदि के जो भी कार्य शरीर से कराने हैं। उनके लिए, उसे अभ्यस्त एवं क्रिया-कुशल बनाने के लिए आवश्यक ट्रेनिंग देनी पड़ती है। लुहार, सुनार, दर्जी बुनकर, मूर्तिकार आदि काम करने वाले शिल्पों को बहुत समय तक सीखते हैं, तब उनके हाथ उपयुक्त प्रयोजन के लिए ठीक प्रकार सधते हैं। गायक, चित्रकार, अभिनेता, पहलवान आदि को अपने-अपने कार्यों को ठीक तरह कर सकने की देर तक शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है।
साधना में सिद्धि मिलने वाली मान्यता इस आधार पर पूर्णतया प्रामाणिक मानी जा सकती है।
साधना उपचार से सम्भव होता है। संकल्प शक्ति का बिखराव रोकने-उसे प्रचण्ड बनाने और अभीष्ट प्रयोजन में नियोजित किये रहने की अन्ततः क्षमता विकसित करने के लिए ‘साधना’ को अतीव उपयोगी माना जाता है यों यह प्रयोजन मनोयोगपूर्वक सत्प्रयोजनों में संलग्न रहने से भी अनेकों मनस्वी लोगों की तरह पूरा किया जा सकता है, पर जितनी सरलता आत्म-साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्प शक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है। अध्यात्म साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा दूरदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
साधना विधानों के सम्बन्ध में भी यही बात है। ऐसी दशा में किसे अपनाया जाय किसे न अपनाया जाय-यह निर्णय कर सकना सामान्य बुद्धि के लिए अति कठिन होता है। संदिग्ध, शंकाशील और अनिश्चित मनःस्थिति में कोई बात न तो पूरी तरह गले उतरती है और न बताये मार्ग पर उत्साह के साथ चल सकना सम्भव होता है। आधे-अधूरे मन से प्रयोग परीक्षण की तरह किये गये साधन सदा निर्जीव होते हैं। उनका कोई कहने लायक परिणाम नहीं निकलता।
साधना विज्ञान के अन्तर्गत 84 योग प्रधान हैं। उनकी शाखा उपशाखाएँ बढ़ते-बढ़ते हजारों तक पहुँचती हैं। फिर संसार के अन्यान्य क्षेत्रों में प्रचलित साधनाओं की गणना करना और उनका लेखा जोखा रखना तो और भी कठिन है। इन योग साधनाओं में चक्रवेधन की एक प्रक्रिया ऐसी है जिसका महत्व संसार भर के सभी योगाभ्यासियों ने स्वीकार किया है। षट्चक्र वेधन के स्वरूपों और विधि-विधानों में थोड़ा अन्तर- मतभेद रहते हुए भी उनके अस्तित्व और प्रभाव को सर्वत्र स्वीकारा गया है।
साधना में सविता-देवता का -ज्योति पुँज का ध्यान किया जाता है। निराकारवादी साधना सम्प्रदाय, प्रकाश के ध्यान का निर्देश करते हैं। योग शास्त्र के नाटक एवं बिन्दुयोग के सुविस्तृत विधान इसी आधार पर बने हैं उपनिषदों में विशेष रूप से प्रकाश ध्यान पर ही जोर दिया है-
साधना का एकमात्र उद्देश्य आत्मसत्ता को क्रमशः अधिकाधिक पवित्र और परिष्कृत बनाते जाना है। यही सुनिश्चित ईश्वर की प्राप्ति और साथ ही उस मार्ग पर चलने वालों को जो विभूतियाँ मिलती रही हैं, उन्हें उपलब्ध करने का राजमार्ग है।
साधना विज्ञान में छाई हुई इस मूढ़ मान्यता का कोई आधार नहीं है। न इसके पीछे कोई तर्क है और न आधार।
साधना स्वर्ण-जयंती वर्ष की इसी अवसर पर पूर्णाहुति है। 24 दिन के जल-उपवास में प्रत्येक प्राणवान परिजन से निरन्तर एक ही अनुरोध किया जाता रहा है कि वे युग संध्या की इस विशिष्ट बेला में वे अपने विशिष्ट अवतरण का महत्व समझें लोभ, मोह की पशु-प्रवृत्तियों से ऊँचे उठें। वासना−तृष्णा के बँधनों से उतने न जकड़े रहें जितने कि पिछले दिनों जकड़े रहे हैं। उन्हें ढीले करें। उपलब्ध मनुष्य जीवन के महत्व, स्वरूप एवं लक्ष्य को समझें।
साधना सिखाने का है जो हमने प्रयत्नपूर्वक सीखी है और जिन सत्पात्रों को सिखलाने के लिए हमारा मन आकुल-व्याकुल हो रहा है। ऐसे सत्पात्रों की तलाश और परख के लिए ही विशेष रूप से इन साधना-सत्रों का आयोजन किया गया है।
साधना के अन्तर्गत आने वाले मेरुदण्ड के सुषुम्ना संस्थान में अवस्थित छह चक्रों के नाम हैं- (1) मूलाधार चक्र (2) स्वाधिष्ठान चक्र (3) मणिपुर चक्र (4) अनाहत चक्र (5) विशुद्ध चक्र (6) आज्ञाचक्र।
साधना की तुलना करते हैं। प्राचीन काल में जब साधना अपने वैज्ञानिक रूप में प्रयुक्त की जाती थी तो उसके सत्परिणाम भी प्रत्येक साधक को मिलते थे। यदि उसी प्राचीन परिपाटी को पुनः अपनाया जा सके तो इस महान् अवलम्बन का आश्रय लेकर मनुष्य में देवत्व का अवतरण और धरती पर स्वर्ग का वातावरण पुनः परिलक्षित हो सकता है।
साधना-सत्रों का आयोजन किया गया है।
साधना विज्ञान में दैवी और आसुरी दोनों प्रकार के विधान हैं दैवी स्तर की उपासना दक्षिण मार्गी कहलाती है उससे साधक में सत तत्वों की वृद्धि होती है और देव अनुग्रह उपलब्ध होता है। इसके प्रतिपक्षी तन्त्रोक्त वाम मार्ग द्वारा आसुरी शक्तियों से भी संपर्क साधा जा सकता है। उनके सहयोग से मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण जैसे क्रूर कर्म किये जा सकते हैं।
साधना वह प्रक्रिया है जिसमें अमुक विधि-विधानों कर्मकाण्डों के साथ अमुक स्तर की भावनाओं का समावेश करके आन्तरिक अवसादों को दूर किया जाता है। चेतना पर छाई प्रसुप्ति को जागृति में परिवर्तित करना आत्म-साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु -प्रवृत्तियां अभ्यास में आती रही हैं उनकी छाप अभी भी छाई रहती है। मनुष्य की जो उच्च स्थिति है उसे देखते हुए वे पशु-प्रवृत्तियां अनावश्यक एवं अवाँछनीय बन जाती है।
साधना का उद्देश्य, समझा जाता है कि भक्तजनों अथवा योगी तपस्वियों को कई तरह की जो ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं, वे किसी देव-दानव के अनुदान, अनुग्रह का प्रतिफल हैं। पर वास्तविकता यह है कि जो कुछ अद्भुत असाधारण अतीन्द्रिय कहा जाता है। वह भीतर से ही उभरता है। आत्म-परिष्कार का ही दूसरा नाम ईश्वर साक्षात्कार है। यह तथ्य यदि समझा जा सके तो हम सत्य को समझने वाले कहे जा सकेंगे।
साधना को किसी समृद्ध देवता की चापलूसी करके कुछ इनाम पुरस्कार झपट लेने की तिकड़म नहीं समझा जाना चाहिए जैसा कि आजकल आमतौर से समझा जाता है। जन्त्र-मन्त्रों को जादू नहीं समझा जाना चाहिए जिनके सहारे सहज ही लम्बे-चौड़े लाभ और चमत्कार प्राप्त होने की इन दिनों बाल कल्पना की जाती रहती है। उपासना विशुद्ध विज्ञान है जिसमें आत्म-परिष्कार के लिए प्रबल प्रयत्न करना पड़ता है। यह जितना गम्भीर वास्तविक और प्रखर होता है उसी अनुपात से व्यक्तित्व निखरता है निखार के साथ ही भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों को ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं।
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष इसी बसन्त पर्व को समाप्त होगा। इसमें उपासना, भावना एवं शुभ-कामना के स्तर पर प्रायः सभी परिजन भागीदार बने हैं। इस वर्ष की पूर्णाहुति अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की संख्या दुगनी कर देने के रूप में की जा सकती है। यह प्रकट तथ्य है कि मिशन का विस्तार पत्रिका के पृष्ठों पर लिपटे रहने वाले प्राण द्वारा ही सम्भव हुआ है। उसका सम्पर्क क्षेत्र बढ़ेगा तो अभीष्ट वातावरण बनने और समर्थ सहकर्मी मिलने की सम्भावना बढ़ेगी।
साधना में ‘ध्यान’ का महत्व सर्वोपरि है। विश्व के कोने-कोने में प्रचलित अनेकानेक साधना-विधानों की ध्यान प्रक्रिया अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का एक चरण भी आगे नहीं बढ़ता। ध्यान के आधार और प्रकरण तो अनेक हैं, पर उसका मूल स्वरूप एक ही है कि हम अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति को समेटने और अन्तर्मुखी बनाने का प्रयास करें। भीतर देखें और अन्तरंग को खोजें।
साधनाओं में चक्रवेधन की एक प्रक्रिया ऐसी है जिसका महत्व संसार भर के सभी योगाभ्यासियों ने स्वीकार किया है। षट्चक्र वेधन के स्वरूपों और विधि-विधानों में थोड़ा अन्तर- मतभेद रहते हुए भी उनके अस्तित्व और प्रभाव को सर्वत्र स्वीकारा गया है। कुण्डलिनी शक्ति जागरण की चर्चा साधना क्षेत्र में बहुधा होती रहती है। यह चक्र वेधन में मिलने वाली सफलता की अन्तिम परिणति है।
साधनाओं में निरत रहते हैं मैंने यही सुना है। इसलिए उन्हें मेरी चिन्ता नहीं है, यह भी वे लोग कहते हैं।
साधना समर के साथ जोड़ी जा सकती है। निश्चित रूप से यही वह देवासुर संग्राम है, जिसे आत्मोत्कर्ष की विजय श्री का वरण करने वाले हर साधक को अनिवार्य रूप से लड़ना पड़ता है। भगवान का अंतरात्मा में अवतरित होने का आभास इसी से मिलता है कि उस धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में पांचजन्य बजा या नहीं, गाण्डीव खटका या नहीं, धर्म की संस्थापना और अधर्म के विनाश की दो हलचलें एक ही समुद्री हिलोर के ज्वार-भाटे जैसी दो विलग दीखने वाली किन्तु वस्तुतः अन्योन्याश्रित एकात्म गतिविधि ही समझी जानी चाहिए। साधना का उद्देश्य अन्तरात्मा में ब्रह्मसत्ता का अवतरण करना है। यह प्रयास किस मात्रा में सम्भव हो सका, इसकी परख यही हो सकती है कि पशु को देवता बनाने की गतिविधियाँ कितनी ज्वलंत हो रही हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-September
साधना के कारण ही निखरा था। आज भी वह सनातन तथ्य अपने स्थान पर जहाँ का तहाँ मौजूद है।
साधना-पुरश्चरण प्रक्रिया की असंख्य धाराएं उसके साथ मिलती चली गई हैं। दैनिक उपासना के रूप में उसे अब तक अगणित व्यक्तियों द्वारा प्रयुक्त किया गया है। इससे उस दिव्य शक्ति की क्षमता युग युगों से निरन्तर बढ़ती चली आई है और वह अधि देवता अधिकाधिक परिपुष्ट होता चला आया है। गायत्री की शक्ति अन्य मन्त्रों से अधिक है। इस स्पष्ट तथ्य का कारण उसके अधि देवता का शक्ति सम्पन्न होना है।
साधनाएँ ‘योग’ विज्ञान के अन्तर्गत आती हैं। राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, कुण्डलिनी योग जैसी उपासना परक और ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग जैसी भावना पर कितनी ही साधनाएँ हैं जो पात्रता और स्तर के अनुरूप बताये और अपनाये जाते हैं। मनःस्थिति का निर्माण इसी आधार पर सम्भव होता है। बौद्धिक शिक्षण तो उसकी पृष्ठभूमि भर बनाता है।
साधना प्रमुख रहेगी। दस दिवसीय सत्रों में गायत्री अनुष्ठान अनिवार्य होगा और एक महीने के वानप्रस्थ सत्रों में पुरश्चरण करना होगा। इसके अतिरिक्त व्यक्ति की स्थिति और आवश्यकताओं को देखकर तदनुरूप अन्य साधनाएँ अन्तःकरण की चिकित्सा स्तर पर कराई जायेंगी। यह साधनाएँ ‘योग’ विज्ञान के अन्तर्गत आती हैं। राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, कुण्डलिनी योग जैसी उपासना परक और ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग जैसी भावना पर कितनी ही साधनाएँ हैं जो पात्रता और स्तर के अनुरूप बताये और अपनाये जाते हैं।
साधनाएँ अन्तःकरण की चिकित्सा स्तर पर कराई जायेंगी। यह साधनाएँ ‘योग’ विज्ञान के अन्तर्गत आती हैं। राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, कुण्डलिनी योग जैसी उपासना परक और ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग जैसी भावना पर कितनी ही साधनाएँ हैं जो पात्रता और स्तर के अनुरूप बताये और अपनाये जाते हैं। मनःस्थिति का निर्माण इसी आधार पर सम्भव होता है। बौद्धिक शिक्षण तो उसकी पृष्ठभूमि भर बनाता है।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष में ही शान्तिकुँज की द्वितीय पंचवर्षीय योजना आरम्भ हो रही है उसमें कई अति महत्वपूर्ण कार्यों को हाथ में लिया गया है। अब तक ‘धर्म मंच में लोक-शिक्षण’ की प्रक्रिया हिन्दू धर्म की प्रयोगशाला में ही प्रयुक्त होती रही है। अब उसका कार्यक्षेत्र विश्व के अन्य प्रमुख धर्मों की परिधि में विस्तृत किया जायगा। इसके लिए लगभग वैसा ही प्रस्तुतीकरण और प्रसार अभियान व्यापक रूप से चलाना पड़ेगा जैसा कि अब तक हिन्दू धर्म के क्षेत्र में चलता रहा है। अब तक हिन्दी भाषा ही अपने विचार विस्तार का प्रमुख माध्यम रही है।
साधना की कठोरता जुड़ जाने से घुसपैठियों का प्रवेश पा सकना सम्भव न रहेगा और जो नर-नारी वस्तुतः अभीष्ट प्रयोजन के लिए आने वाले होंगे उन्हीं की व्यवस्था हमें करनी पड़ेगी।
साधना के लिए अधिक समय भी यहाँ ठहर सकेंगे। कुछ पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त व्यक्ति आजीवन परमार्थ प्रयोजनों में निरत रहना चाहते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व यदि समाज सेवा के उपयुक्त सिद्ध हुए तो उन्हें देर तक इधर रुकने की स्वीकृति दी जा सकती है। लोक मंगल के लिए समर्पित जीवनों का स्वागत करने के लिए अपने मिशन का द्वार सदा से खुला है। उनके ब्राह्मणोचित स्तर के निर्वाह की व्यवस्था भी यहाँ मौजूद है, पर ऐसे समर्पण स्वीकार तभी होंगे जब उन्हें कई कसौटियों पर परख कर खरा मानने की स्थिति सामने आ जायगी।
साधना प्रयोजनों में लगने वाली शक्ति कम नहीं अधिक ही सत्परिणाम उत्पन्न करती है। अधीरता और अनास्था के वातावरण में स्वर्ण-जयन्ती साधन शृंखला ने नये उत्साह और नये विश्वास का संचार किया है। अपेक्षा की जानी चाहिए कि इससे आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की शक्तियाँ सुदृढ़ होंगी और उनके पल्लवित होने एवं फल-फूलों से लदने का सुखद अवसर प्राप्त होगा।
साधना शिक्षा (4) एक महीने के वानप्रस्थ शिविर चलते रहे हैं। इस आरण्यक शिक्षा-पद्धति के सत्परिणाम देखते हुए निकटस्थ व्यक्ति को यह विश्वास उत्पन्न हुआ है कि व्यक्ति, परिवार और समाज का नवनिर्माण करने के लिए इस प्रकार की शिक्षण प्रक्रिया से बढ़कर युग परिवर्तन का आरम्भिक प्रयास और कोई हो ही नहीं सकता।
साधना स्वर्ण जयन्ती की सार्थकता इसी में है कि अपने परिवार का हर सदस्य आत्म-विकास की दिशा में अधिक कारगर कदम उठाये और अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक आदर्शवादी, अधिक उत्कृष्ट एवं अधिक कर्त्तव्यनिष्ठ हो सके। आत्मोन्नति एक प्रकार की योग साधना है इसके लिए लोक-सेवा का व्रत लेकर चलना पड़ता है। स्वार्थों की उपेक्षा करते हुए परमार्थ में जो जितना उत्साह प्रदर्शित कर सके समझना चाहिए उसे उतना ही ईश्वरीय अनुग्रह उपलब्ध हो गया। इस सम्बन्ध में हम में से प्रत्येक को एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। स्वयं बढ़ते हुए अपने साथ अन्य साथियों को घसीट ले चलें–पीठ पर लाद ले चलने का साहस जुटाना चाहिए।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के लगभग छह महीने इस अंक के पाठकों के हाथ में पहुँचने के समय तक पूरे हो चुकेंगे। लगभग इतना ही समय और शेष है। इस अवधि में वह भावभरा उत्साह दिन-दिन बढ़ता रहना चाहिए जिसे उभारने के लिए इस महान अध्यात्म अनुष्ठान का आयोजन किया गया है। मनुष्य में देवत्व का अवतरण करने वाली सद्भावनाएँ और सत्प्रवृत्तियां मात्र चिन्तन तक सीमित न रह जायं वरन् उन्हें प्रस्फुटित होने का समुचित अवसर मिले हम सब के यही प्रयास तत्परतापूर्वक होने चाहिएं। इस संदर्भ में क्या किया जाना है इसकी संक्षिप्त सी न्यूनतम रूपरेखा ऊपर दी गई है।
साधना की, प्रक्रिया व्यक्ति की मनःस्थिति को व्यापक बनाने के लिए ही रची गई है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की, विश्व परिवार की मान्यता ही आत्म विस्तार का आत्म कल्याण का प्रयोजन पूरा करती है। व्यक्तिगत सुख-सुविधा को पद दलित करके उन्हें परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियोजित करना इसी का नाम परमार्थ साधना है। व्यक्ति का स्वार्थ जितना व्यापक होता है उतना ही वह परमार्थी बनता है। परमार्थी को ही ईश्वरभक्त, अध्यात्मवादी, महामानव तत्वदर्शी आदि का दूसरा नाम दिया जाता है।
साधना स्वर्ण जयन्ती की अन्तरात्मा को पहचानने में उसने उतनी ही सफलता प्राप्त कर ली। हम इसी कसौटी पर इस साधना वर्ष की सफलता का मूल्याँकन करेंगे। अस्तु हर परिजन को आत्म- निर्माण एवं समाज-निर्माण की दिशा में अपने प्रयासों को तीव्रतम बनाने के लिए पूरी तत्परता के साथ अपनी गति-विधियों को अग्रसर करना चाहिए।
साधना प्रक्रिया पर जोर दिया जायगा, शिक्षण का यों समावेश तो रहेगा, पर उसे उतना ही पर्याप्त मान लिया जायगा जितना अभीष्ट प्रयोजन के लिए नितान्त आवश्यक है।
साधना का एक और भी तरीका हो सकता है कि सेवा कार्यों की योग्यता अपने में न्यून हो तो दूसरे अधिक उपयुक्त व्यक्तियों द्वारा वह कार्य सम्पन्न कराये जायं और उसके निर्वाह का एवं साधन जुटाने का उत्तरदायित्व स्वयं उठाया जाय। एक व्यापारी जन जागरण जैसे बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर की क्षमता द्वारा सम्पन्न हो सकने वाले कार्य स्वयं तो नहीं कर सकता, पर जो लोग उस प्रकार की क्षमता से सम्पन्न हैं उन्हें निर्वाह की चिन्ता से मुक्त करने के लिए अपने उपार्जन को उदारतापूर्वक देता रह सकता है। लोक-मंगल के कार्यों में कितने ही उपकरणों एवं साधनों की आवश्यकता पड़ती है। उनके बिना खाली हाथ सेवा-भावी व्यक्ति भी कुछ अधिक कार्य नहीं कर सकते। इन साधनों को जुटाने में अर्थसम्भव उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है।
साधना वर्ष का लक्ष्य पूरा करने में उत्साहवर्धक भूमिका सम्पन्न करेगी।
साधना भक्तियोग के अन्तर्गत की जाती है। पाषाण प्रतिमाओं की पूजा अर्चा करने वाले न तो प्रतिदान पाते हैं और न प्रत्युत्तर। फिर भी वे एकाँगी-एकाकी उपासना श्रद्धा पूर्वक अपनाये रहते है।
साधना हो सकता है। सुसंस्कारी बालक अपनी प्रतिभा से स्वावलम्बी जीवन जी सकते हैं अनेकों को सहारा दे सकने योग्य हो सकते हैं। कुसंस्कारी सन्तान के लिए दौलत छोड़ मरना उन्हें दुर्गुणी, दुर्व्यसनी और आत्मघाती बनाने का ही पथ प्रशस्त करना है।
साधना सम्पन्न होती आई है उसे अब इस भूमि पर लाकर स्थापित कर दिया गया है। आरम्भ के दिन से लेकर आज पर्यन्त करोड़ों गायत्री मन्त्र के जप पुरश्चरण-नित्य यज्ञ, शास्त्र प्रवचन, स्वाध्याय परायण जैसे अनेकों आत्मशक्ति सम्वर्धक प्रयोग यहाँ चलते रहते हैं। इसका प्रभाव इस भूमि को सच्चे अर्थों में युग तीर्थ बना सकने में समर्थ हो गया है। हिमालय की दिव्य सत्ताओं का यहाँ संरक्षण है। इसके सूत्र संचालक तत्व इसे अधिकाधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए प्राण-प्रण से प्रयत्नशील हैं।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष की उपलब्धियों पर जितनी गहराई से विचार किया जाता है उतनी ही उसकी गरिमा स्पष्ट होती और निखरती चली जाती है। लगता है कि इस अवसर पर उत्पन्न हुआ उत्साह अति महत्वपूर्ण सृजनात्मक प्रयोजनों में लगा है और उसका समस्त विश्व को प्रभावित करने वाला सत्परिणाम उभर कर ऊपर आया है।
साधना भी आत्मिक प्रगति के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है अधीर और अस्थिर मन हथेली पर सरसों जमाने के लिए आतुर रहता है और तुर्त-फुर्त मनोकामनाएं पूरी होते न देखकर निराश हो बैठता है। यदि इस दोष का परिमार्जन हो सके-श्रद्धा की परतें अन्तःकरण की गहराई तक प्रवेश पा सकें तो प्रतीत होगा कि किसी भी लाभदायक व्यवसाय की तुलना में साधना प्रयोजनों में लगने वाली शक्ति कम नहीं अधिक ही सत्परिणाम उत्पन्न करती है। अधीरता और अनास्था के वातावरण में स्वर्ण-जयन्ती साधन शृंखला ने नये उत्साह और नये विश्वास का संचार किया है। अपेक्षा की जानी चाहिए कि इससे आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की शक्तियाँ सुदृढ़ होंगी और उनके पल्लवित होने एवं फल-फूलों से लदने का सुखद अवसर प्राप्त होगा।
साधना मंडली द्वारा अपने-अपने स्थान पर इस युग साधना की पूर्णाहुति अधिक उत्साहपूर्वक यथासम्भव बड़े रूप में सम्पन्न की जाय। यों बसन्त पर्व अपने परिवार का सबसे बड़ा पर्व है और उसे हम लोग पूरे उत्साह के साथ मनाते एवं नये-नये संकल्प लेकर आत्मिक प्रगति के मार्ग पर क्रमशः भाव भरे कदम उठाते रहे हैं। इस बार उसमें स्वर्ण-जयन्ती की विशेषता जुड़ गई है। इसलिए उसके लिए उत्साह भी तदनुरूप ही प्रदर्शित किया जाना चाहिए। सन् 77 का बसन्त पर्व कहाँ किस प्रकार किस तैयारी के साथ मनाया जाय ?
साधना का दूसरा चरण होगा ‘तप’। तप का अर्थ है-शारीरिक सुविधाओं और मन की ललक लिप्साओं पर कठोरतापूर्वक अंकुश नियन्त्रण की स्थापना। कष्टसाध्य तितीक्षाएँ इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए होती हैं, स्पष्ट है कि तपाने की गर्मी से हर वस्तु में प्रखरता और परिपक्वता आती है। कच्ची ईंटें पकाने से चिरस्थायी बनती हैं। कुम्हार के बर्तन अवे में पककर ही सुदृढ़ बनते हैं।
साधना की सुविधा के लिए इन अधि देवताओं को मनुष्य की आकृति दी गई है और शस्त्रों, आभूषणों एवं वाहनों से अलंकृत किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि वे कोई मनुष्य जैसे ही देव दानव स्तर के होंगे और मनुष्यों की तरह खाते, सोते, बोलते और क्रुद्ध, प्रसन्न होते होंगे। आलंकारिक दृष्टि से इस प्रतिपादन में समझाने समझने की सुविधा रह सकती है, पर यदि यथार्थता जाननी हो तो इन अलंकारों के पीछे छिपे हुए तथ्यों को जानना पड़ेगा।
साधना और वानप्रस्थ सत्रों के साथ प्रकाश अनुदान के लिए ब्रह्म-विद्या स्तर के प्रशिक्षण-मनोनिग्रह के लिए योगाभ्यास तथा प्रसुप्त दिव्य शक्तियों के जागरण के लिए तपश्चर्या का त्रिविधि समन्वय बनाकर चला जायगा। इस त्रिवेणी संगम से कुछ महत्वपूर्ण परिणाम दृष्टिगोचर हो सकेंगे यह सुनिश्चित है।
साधना वर्ष की सफलता का मूल्याँकन करेंगे। अस्तु हर परिजन को आत्म- निर्माण एवं समाज-निर्माण की दिशा में अपने प्रयासों को तीव्रतम बनाने के लिए पूरी तत्परता के साथ अपनी गति-विधियों को अग्रसर करना चाहिए।
साधना प्रयोजनों की प्रमुखता रहेगी। शिक्षार्थियों को योग-साधना एवं तपश्चर्या में निरत रहना पड़ेगा। प्रथम पाँच वर्षों में शान्तिकुँज के आरण्यक का प्रशिक्षण स्कूली स्तर का समझा जा सकता है और इस प्रकार सोचा जा सकता है कि अब वह कालेज स्तर में परिणत हो चला। उसमें साधना प्रक्रिया पर जोर दिया जायगा, शिक्षण का यों समावेश तो रहेगा, पर उसे उतना ही पर्याप्त मान लिया जायगा जितना अभीष्ट प्रयोजन के लिए नितान्त आवश्यक है।
साधना है इसके लिए लोक-सेवा का व्रत लेकर चलना पड़ता है। स्वार्थों की उपेक्षा करते हुए परमार्थ में जो जितना उत्साह प्रदर्शित कर सके समझना चाहिए उसे उतना ही ईश्वरीय अनुग्रह उपलब्ध हो गया। इस सम्बन्ध में हम में से प्रत्येक को एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। स्वयं बढ़ते हुए अपने साथ अन्य साथियों को घसीट ले चलें–पीठ पर लाद ले चलने का साहस जुटाना चाहिए। इस दिशा में जो जितना अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए जो जितना प्रयत्न कर रहा होगा समझना चाहिए कि साधना स्वर्ण जयन्ती की अन्तरात्मा को पहचानने में उसने उतनी ही सफलता प्राप्त कर ली।
साधना एवं तपश्चर्या में निरत रहना पड़ेगा। प्रथम पाँच वर्षों में शान्तिकुँज के आरण्यक का प्रशिक्षण स्कूली स्तर का समझा जा सकता है और इस प्रकार सोचा जा सकता है कि अब वह कालेज स्तर में परिणत हो चला। उसमें साधना प्रक्रिया पर जोर दिया जायगा, शिक्षण का यों समावेश तो रहेगा, पर उसे उतना ही पर्याप्त मान लिया जायगा जितना अभीष्ट प्रयोजन के लिए नितान्त आवश्यक है।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष का चिरस्थायी स्मारक कहा जा सकेगा। इसमें एक-एक कुटिया अपनी और से बनवा देने के लिए समर्थ परिजनों से आग्रह किया गया है। एक छोटी कुटिया प्रायः दो -ढाई हजार और बड़ी कुटियामय बरामदा, रसोई, स्नानघर, स्टोर सहित चार हजार की बनेगी। अपने परिवार में ऐसे सौ भावनाशील व्यक्ति निकल सकते हैं। जो यह छोटा-छोटा अनुदान देकर नये आश्रम के निर्माण में हमारा हाथ बढ़ा लें।
साधना और वानप्रस्थों के लिए न्यूनतम समय तो घोषित कर ही दिया गया है, पर जिनकी आकाँक्षा एवं पात्रता होगी वे विशेष अध्ययन एवं विशेष साधना के लिए अधिक समय भी यहाँ ठहर सकेंगे। कुछ पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त व्यक्ति आजीवन परमार्थ प्रयोजनों में निरत रहना चाहते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व यदि समाज सेवा के उपयुक्त सिद्ध हुए तो उन्हें देर तक इधर रुकने की स्वीकृति दी जा सकती है। लोक मंगल के लिए समर्पित जीवनों का स्वागत करने के लिए अपने मिशन का द्वार सदा से खुला है। उनके ब्राह्मणोचित स्तर के निर्वाह की व्यवस्था भी यहाँ मौजूद है, पर ऐसे समर्पण स्वीकार तभी होंगे जब उन्हें कई कसौटियों पर परख कर खरा मानने की स्थिति सामने आ जायगी।
साधना में - (1) मात्र गंगाजल ही पीना (2) स्थिति के अनुरूप व्रत उपवास (3) हविष्यान्न एवं आंवला कल्प का सेवन (4) मौन (5) नंगे पैर रहना (6) अपनी शारीरिक सेवाएँ करना (7) भूमि शयन (8) ब्रह्मचर्य पालन (9) आश्रम की स्वच्छता के निमित्त श्रमदान (10) निर्धारित दिनचर्या का बिना आलस्य-प्रमाद के परिपालन। मुख्यतया यही दस तप साधन हैं जो साधकों की स्थिति के अनुरूप बताये कराये जायेंगे।
साधना प्रक्रिया अपनायें। जहाँ ऐसा न हो सके वहां इतना तो होना ही चाहिए-प्रातः 6 से 9 तक सभी साधक-अनुसाधक तथा दूसरे आस्थावान व्यक्ति एकत्रित होकर सामूहिक जप एवं हवन करें और पहुँचे हुए प्रतिनिधि के साथ विचार-विनियम करते हुए अपनी साधना को अधिक प्रखर बनाने का प्रयत्न करें।
साधना अपनी असीमता को असमता के साथ जोड़ देना है। इस प्रयोजन में जितनी ही सफलता मिलती जाती है उतनी ही आधिपत्य जमाता जाता है जिस प्रभाव को हम जड़-चेतना जगत में अपने चारों ओर फैला हुआ देखते हैं, सीमाबद्ध स्थिति में हम तुच्छ और दरिद्र होते हैं, पर असीम के साथ जुड़ जाने पर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती। संपन्नता से - भरे पूरे भण्डार से हमारी भागीदारी जितनी अधिक होती है उतनी ही अपनी स्थिति भी विभूतिमयी बनती चली जाती है। सिद्ध पुरुषों में देखी गई विशिष्ट क्षमताएं और कुछ नहीं विराट के साथ उन की घनिष्ठता का आरम्भिक उपहार भर है। बढ़ी-चढ़ी स्थिति तो ऐसी बन जाती है जिसमें आत्मा और परमात्मा के बीच कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं रह जाता, दोनों से सम तुल्य ही दिखते हैं।
साधना को अधिक प्रखर बनाने का प्रयत्न करें।
साधना और सिद्धि का समन्वय भी एक ऐसा ही अकाट्य सिद्धान्त है। उसकी सच्चाई समझने का साधन-शृंखला के सदस्यों को अवसर मिलेगा, ऐसी आशा करने में कोई अतिवाद नहीं है।
साधना है। व्यक्ति का स्वार्थ जितना व्यापक होता है उतना ही वह परमार्थी बनता है। परमार्थी को ही ईश्वरभक्त, अध्यात्मवादी, महामानव तत्वदर्शी आदि का दूसरा नाम दिया जाता है। आत्मा का दायरा जिसने असीम बना दिया-परम कर लिया वही परमात्मा है। जिसने संकीर्ण स्वार्थपरता से छुटकारा पा लिया समझना चाहिए उसे जीवन मुक्ति का लाभ मिल गया।
साधना प्रक्रिया और सम्मेलन की व्यवस्था हुई। आगे की बात आत्म निर्माण और समाज निर्माण के मूल प्रसंग की है जिसके लिए अपने मिशन को बनाया और चलाया गया है। अपने व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास करके ही हम अध्यात्म परायणता को सार्थक सिद्ध कर सकते हैं। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार करने के साथ आत्मिक प्रगति के सारे सूत्र जुड़े हुए हैं उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व ही धर्म धारणा का एकमात्र प्रमाण है। चरित्रनिष्ठा और समाज-निष्ठा किसमें कितनी परिपक्व हुई इसी कसौटी पर कस के किसी की आत्मबल-वृद्धि एवं आत्मिक प्रगति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है।
साधना प्रयोजनों में समुचित उत्साह है और जहाँ कई निष्ठावान साधक हैं उन सभी स्थानों पर प्रतिनिधि भेजे जायं और वहाँ उपरोक्त प्रकार के दो दिवसीय आयोजन सम्पन्न हों। फिर भी प्रतिनिधियों की कमी और यातायात की कठिनाइयों को देखते हुए कुछ स्थान छूट भी सकते हैं। प्रयत्न यही रहेगा कि यथासम्भव अधिकाधिक स्थानों में इस प्रकार के छोटे सम्मेलन आयोजन सम्भव हो सके।
साधना-परक उत्साह है वहां अपने प्रतिनिधि भेजे जायं। उनका कार्यक्रम एक केन्द्र पर दो दिन का हो। अच्छा तो यह है कि सभी साधक एक जगह रहने और पूरे दो दिन की सामूहिक साधना प्रक्रिया अपनायें। जहाँ ऐसा न हो सके वहां इतना तो होना ही चाहिए-प्रातः 6 से 9 तक सभी साधक-अनुसाधक तथा दूसरे आस्थावान व्यक्ति एकत्रित होकर सामूहिक जप एवं हवन करें और पहुँचे हुए प्रतिनिधि के साथ विचार-विनियम करते हुए अपनी साधना को अधिक प्रखर बनाने का प्रयत्न करें।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष में इस शिक्षण प्रक्रिया का स्तर और भी ऊँचा उठा दिया गया है। यह सत्र तो भविष्य में भी जारी रहेंगे, पर उनके छात्रों की पात्रता को अधिक परखने के बाद ही प्रवेश दिया जायगा और जो आवेंगे उनके प्रशिक्षण में प्रकाश के अतिरिक्त प्रेरणा तत्व का अधिक मात्रा में समावेश रहेगा। प्रकाश से तात्पर्य है बौद्धिक शिक्षण-ज्ञान सम्पदा का अभिवर्धन। स्वाध्याय और सत्संग से इसी प्रयोजन की पूर्ति होती हैं। लेखनी और वाणी द्वारा-दृश्य और श्रव्य माध्यम द्वारा जानकारियों का विस्तार और बुद्धिबल का विकास होता है।
साधना में परायणता होती है कि अपना दूरगामी हित साधन भी दृष्टि से ओझल हो जाता है। स्वास्थ्य खोखला हो चले-अकाल मृत्यु से मरना पड़े इसकी चिन्ता नहीं, लोकनिन्दा, परलोक पतन-जैसे संकट आयें परवाह नहीं-हर हालत में, हर कीमत पर-उचित-अनुचित का विचार किये बिना इन्द्रिय लिप्सा, इन्द्रिय वासना पूरी होती रहनी चाहिए।
साधना सत्रों में पिछले दिनों जिन्दगी जीने की कला का सिद्धान्त पक्ष समझाया जा चुका है अगली बार उनमें व्यावहारिक क्रिया-कलाप की सुनिश्चित रूपरेखा व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों को देखते हुए बना दी जायगी। वानप्रस्थ सत्रों में धर्म-तन्त्र से लोक-शिक्षण के लिए कथा, प्रवचन, पर्व, संस्कार, यज्ञ कर्मकाण्ड आदि का अभ्यास कराया जाता रहा है। उन प्रयोजनों को अधिक प्रभावशाली कैसे बनाया जा सकता है, यह उत्तरार्ध में अगली बार सिखाया जायगा। वानप्रस्थ स्तर के लोग, साधु व ब्राह्मण की उभय-पक्षीय प्रक्रिया का समन्वय करते हैं और आत्म-निर्माण तथा समाज निर्माण की अति महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करते हैं। यह सब किस प्रकार सम्भव हो सकता है इसके मार्मिक प्रशिक्षण की विधि-व्यवस्था इन सत्रों में सम्मिलित होने वालों को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए पृथक-पृथक प्रकार की बनाते रहने का क्रम चलाया गया है।
साधना प्रक्रिया का महत्व, प्रथम चरण की-पिछले पाँच वर्ष वाले प्रशिक्षण की तुलना में अत्यधिक है। इसलिए इसका लाभ उठाने के लिए उन सब को पुनः आमन्त्रित किया जा रहा है जो पिछले किसी शिविर में आ चुके या जो अभी तक नहीं आयें हैं। यहाँ अधिक समय तक ठहर सकना एवं स्थायी निवास बना लेना तो और भी उच्चस्तर का सौभाग्य है। जागृत आत्माओं के साथ रहने और साथ रखने की हमारी आकाँक्षा की पूर्ति इन सत्रों के माध्यम से ही सम्भव हो सकेगी, इसलिए उस ओर भावनाशील परिजनों में से प्रत्येक का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है।
साधना करनी चाहिए। सिद्धान्तों के शब्द जाल में उलझकर व्यक्ति ज्ञानी तो नहीं अभिमानी जरूर बन जाता है और एक साधक को अभिमान से वैसे ही दूर रहना चाहिए जिस प्रकार जल से कमल।’’
साधना में लगा सकते थे। लिप्सा लालसाएं छोड़े बिना यह बचत अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकती। अस्तु जिन्हें आत्मिक प्रगति-ईश्वर की अनुभूति वस्तुतः ही अपेक्षित हो उन्हें अपने साधनों का श्रेय और प्रेय के बीच उचित विभाजन करने की योजना बनानी चाहिए।
साधनाओं का विवरण तथा निष्कर्ष। इन दिनों इस दिशा में जो किया जाता हो उसका परिचय। पुराने आठ और नये पाँच कुल तेरह प्रश्नों के उत्तर आदि कागज पर लिख कर भेजे जाने चाहिए और स्वीकृति मिलने पर नियत समय पर पहुँचने की तैयारी करनी चाहिए। यदि किसी कारणवश समय पर पहुँचना सम्भव न हो सके अथवा तारीख बदलवाना हो तो समय से पूर्व ही उसकी सूचना दे देनी चाहिए ताकि उस खाली स्थान का लाभ किसी अन्य साधक को मिल सके। भोजन व्यय एक महीने का 70) और दस दिन का 25) है।
साधना की पूर्णाहुति अधिक उत्साहपूर्वक यथासम्भव बड़े रूप में सम्पन्न की जाय। यों बसन्त पर्व अपने परिवार का सबसे बड़ा पर्व है और उसे हम लोग पूरे उत्साह के साथ मनाते एवं नये-नये संकल्प लेकर आत्मिक प्रगति के मार्ग पर क्रमशः भाव भरे कदम उठाते रहे हैं। इस बार उसमें स्वर्ण-जयन्ती की विशेषता जुड़ गई है। इसलिए उसके लिए उत्साह भी तदनुरूप ही प्रदर्शित किया जाना चाहिए। सन् 77 का बसन्त पर्व कहाँ किस प्रकार किस तैयारी के साथ मनाया जाय ?
साधना के स्वाति-घन छाओ,
साधनाएँ हैं जो पात्रता और स्तर के अनुरूप बताये और अपनाये जाते हैं। मनःस्थिति का निर्माण इसी आधार पर सम्भव होता है। बौद्धिक शिक्षण तो उसकी पृष्ठभूमि भर बनाता है।
साधनात्मक आयोजन का कार्यक्रम सोचा, सँजोया गया है। अभीष्ट उद्देश्य को समझा जा सके और उसे पूरा किया जा सके तो ही उसकी सार्थकता है अन्यथा आये दिन खड़े रहने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों में से ही एक अपना यह प्रयोग भी गिना जायगा और थोड़ी ही चर्चा एवं हलचल दृष्टिगोचर होने के बाद इसकी भी पानी के बबूले जैसी दुर्गति होगी।
साधना में अपने को नियोजित कर देते हैं। श्रेय किसको मिले यह कृपणता यदि मन में न हो तो परोक्ष रूप से श्रेय दोनों पक्षों को प्रकारांतर से लगभग समान ही मिल जाता है। ईसाई धर्म का पुनर्निरूप सेन्टपाल ने अपने अथक परिश्रम और अजस्र अनुदान से सम्पन्न किया था। वे स्वयं ईसा तो न बन सकें, पर सन्त ईसा को परमेश्वर का बेटा बना देने के श्रेयाधिकारी वे ही माने गये। सेन्टपाल का यह उपलब्धि परोक्ष रूप से ईसा के समतुल्य ठहराई जाय तो तथ्य स्वीकारने में किसी विचारशील को कोई बड़ी आपत्ति न होगी।
साधना स्वयं की जाय या दूसरों से कराई जाय यह निर्णय परिस्थितियों को देखकर भिन्न-भिन्न प्रकार से हो सकता है। बात क्रिया की नहीं भावना की है। अपने लिए न्यूनतम, परमेश्वर के लिए-आदर्शवाद के लिए अधिकाधिक का मार्ग अपना कर ही कोई आत्मचेतना को विकसित कर सकता है। सदाशयता और आस्था का प्रमाण इसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर मिलता है। सहृदयता यदि वस्तुतः है तो उसे सेवा में अनिवार्य रूप से परिणत होना चाहिए।
साधना पद्धति के अतिरिक्त परिजनों की व्यक्तिगत मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप उनका मार्गदर्शन किया जा सके और सिद्धान्तों को व्यवहार में उतारने का उपाय बताया जाय। उपरोक्त सम्पर्क आयोजनों की चार महीने तक चलने वाली सम्पर्क योजना का उद्देश्य यही है। प्रतिनिधि सभी शाखा केन्द्रों में इसी प्रयोजन के लिए भेजे जा रहे हैं कि साधकों के व्यक्तित्व का परिष्कार और नव-निर्माण के लिए रचनात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन जहाँ जिस प्रकार सम्भव हो सकता हो वहाँ उसके लिए विचार-विनिमय द्वारा रास्ता खोज निकाला जाय।
साधना की-प्रेरणा की गरिमा को आरम्भ से ही समझा गया है और प्रकाश प्रशिक्षण के साथ उसे जुड़ा रखने का प्रयास निरन्तर किया गया है। वह शान्तिकुँज की शिक्षण प्रक्रिया आरम्भ करते समय यह निश्चय किया गया था कि अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति दो खण्डों में पूरी हो सकेगी। इसलिए उसके लिए दो पाठ्य-क्रम निर्धारित किये जायं। भूमि जोतने और बीज बोने की प्रक्रिया में यों परस्पर सम्बन्ध है, पर किसान उसे एक-एक करके दो बार में सम्पन्न करता है। प्रथम पाँच वर्षों में शान्तिकुँज की शिक्षण प्रक्रिया प्रकाश प्रधान रही है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1976-April
साधना एवं तपश्चर्या के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मविद्या में इसी “चित्त शक्ति” के विकास पर जोर दिया गया है और कहा गया है कि मनुष्य शरीर में सन्निहित प्रकट और अप्रकट रहस्यमय शक्ति संस्थानों को जागृत करके मनुष्य देव स्तर की विशेषताओं से सम्पन्न हो सकता है। भौतिक जगत के विकास प्रयोजनों में बिजली का जो उपयोग है उससे कहीं अधिक उपयोगिता व्यक्तित्व के समग्र विकास में मानवी विद्युत की है। उसका स्वरूप, आधार और उपयोग जानने के लिए हमें विशेष उत्साहपूर्वक प्रयत्न करने चाहिएं।
साधना द्वारा ही किया जा सकता है। संसार में ज्ञान का अभाव नहीं है, अभाव है उस बौद्धिक सामर्थ्य का जिसके कारण हम उसे प्राप्त करने में अक्षम हैं। शिक्षा साधना द्वारा इसी सामर्थ्य और शक्ति का विकास करना होता है।
साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिए उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारिक शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्रबल से पृथ्वी, देवलोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तांतरण शक्ति को पदार्थ और पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक एक जोड़ की जानकारी तक मंत्र की ही अलौकिक शक्ति थी।
साधना अनेक व्यक्तियों को तथा पदार्थों को परमाणु जीवाणुओं को प्रभावित करती है तो यह बहुलीकरण शक्ति ही काम कर रही होती है।
साधना के रूप में भी आरम्भ की जा सकती है। एकान्त हो या काम करने का समय, हर घड़ी प्रसन्न मुद्रा में रहने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए दर्पण की सहायता ली जा सकती है। अपनी परीक्षा आप लेते रहना चाहिए कि भारी, दवा, पिसा, मरा, टूटा, हारा जीवन क्रम होने की चुगली करने वाला घटियापन कहीं चेहरे पर झाँक तो नहीं रहा है। उदासी, खीज, क्रोध, चिन्ता का एक भी चिन्ह कहीं दीख पड़े तो तुरन्त सजग हो जाना चाहिए और प्रयत्नपूर्वक उसे हटाकर मुस्कान की प्रतिष्ठापना करनी चाहिए।
साधना और प्रकाश की याचना की चर्चा मिलती है। यह प्रकाश बल्ब बत्ती अथवा सूर्य चन्द्र आदि से निकलने वाला उजाला नहीं वरन् वह परम ज्योति है जो इस विश्व में चेतना का आलोक बनकर जगमगा रही है। गायत्री का उपास्य सविता देवता इसी परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर भी देख सकता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।
साधना न करें। मनु भगवान ने भी ऐसा ही कहा है।
साधना द्वारा इसी सामर्थ्य और शक्ति का विकास करना होता है।
साधना को अपनाया जाना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझना चाहिए।
साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है। मंत्रों की एक यति सब के लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का लय का- निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिए उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना न भी करे तो भी ब्राह्मण गायत्री का आश्रय लेकर पार हो जाता है। इस उपासना से स्वर्ग भी मिलता है और मोक्ष भी अतएव नित्य नियमित रूप से गायत्री की भक्तिपूर्वक जप साधना करनी चाहिए।
साधना को भी अपनाये रहना चाहिए। यदि इस ओर उपेक्षा बरती गई और मात्र पूजा प्रक्रिया को ही पर्याप्त मान लिया गया तो काम नहीं चलेगा। उसके साथ साथ उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की समन्वित प्रक्रिया-द्विजत्व का जुड़ा रहना भी आवश्यक है। संध्या का सामान्य निर्देश तो हर किसी के लिए है पर साथ ही यह भी बताया जाता रहा है कि उपासना का पूरा लाभ लेना हो तो द्विजत्व के नाम से जानी जाने वाली जीवन साधना को अपनाया जाना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझना चाहिए।
साधना करते हैं, वे वैसे ही हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को त्यागकर रत्नों की इच्छा करने वाले होते हैं।
साधना की प्रथम सीढ़ी बताई गई है।
साधना का मार्ग अपनाया जाता है।
साधना का एक छोटा किन्तु अति महत्वपूर्ण सोपान मिल गया और आकर्षण शक्ति का दैवी वरदान हाथ लग गया।
साधना विधान के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासक की आत्मिक पूँजी निरन्तर बढ़ती चली जाती है और यदि धैर्य और साहस के साथ आत्म संशोधन करते हुए अपने मार्ग पर बढ़ता ही चले तो एक दिन नर से नारायण स्तर पर पहुँचा हुआ सिद्ध पुरुष बनकर रहता है। कहा भी है-
साधना विधानों के परिवार में मूर्धन्य मन्त्र गायत्री मन्त्र को ठहराया जाए। यह भी एक कारण मनीषिओं का गायत्री मंत्र को सर्वोपरि ठहराने का रहा होगा।
साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मेलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है पर पूरा सत्परिणाम देखना हो तो पवित्र जीवन कम अपनाने की साधना के साथ ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वरा भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिये।
साधना में संलग्न रहते हैं।
साधनारत योगियों और तपस्वियों ने अपने प्रयोग, परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर जो तुलनात्मक उत्कृष्टता देखी है उसी से प्रभावित होकर उन्होंने इस महाशक्ति की सर्वोपरि स्थिति बतायी है। यह निष्कर्ष अभी भी जहाँ का तहाँ है। मात्र जप पूजन से तो नहीं, अभीष्ट साधन प्रक्रिया अपनाते हुए अभी भी कोई इस साधना को कर सके तो उसका निजी अनुभव शास्त्र प्रतिपादित इस सर्वश्रेष्ठता का समर्थन ही करेगा। इस सन्दर्भ में मिलने वाले शास्त्र वचनों में से कुछ इस प्रकार हैं-
साधना द्वारा अपनी कमजोरियों को दूर कर हमें अपने चतुर्दिक् फैली हुई आनन्द और सफलताओं के तत्वों का लाभ उठाना चाहिए।
साधना में लगे रहना ही है। रविवार की पूजा भी मैं इसी तरह पूरी कर लेता हूँ।
साधना का महत्वपूर्ण सोपान है। इस दिशा में जिन्हें बढ़ना हो, उन्हें हँसने, मुस्कराने का अभ्यास आरम्भ करना चाहिए और उसे उस स्तर तक विकसित परिपक्व करना चाहिए जिसमें हर घड़ी अपनी मुख मुद्रा सहज स्वभाव बनी ही रहे। कहना न होगा कि इसके लिए मात्र अभ्यास ही पर्याप्त न होगा वरन् चिन्तन को हल्का फुलका रखने वाले दृष्टिकोण को भी अपनाने का प्रयास करना होगा। समग्र प्रसन्नता का मूल उद्गम वही तो है।
साधना कष्टसाध्य तितीक्षा के द्वारा मंत्र की गुह्य शक्ति के करत लगत हो जाने का भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मन क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण कुम्बकत्व से परिपूर्ण कर देती है।
साधनाओं का प्रथम सोपान माना गया है। व्रत उपवासों में, तप अनुष्ठानों में नमक त्याग एक आवश्यक नियम माना जाता है। योगी, तपस्वी, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उपयोगी कदम है। जीभ को चटोरी बनाने से कामेन्द्रिय तथा अन्य इन्द्रियाँ उत्तेजित होती हैं और अनेकों शारीरिक मानसिक विकास उत्पन्न करती हैं।
साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है। आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिए वमन, विरेचन, स्नेहन, स्वेदन, नस्व यह पंच कर्म शरीर शोधन के लिए हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार ऋषि, छन्द, देवता, बीज और तत्व हैं। जो इन सब साधनों को जुटाकर मंत्र साधन कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर ही रहती है।
साधना में लगाया जाय तो अपने भीतर से ही एक ऐसे देव मानव का उद्भव हो सकता है जो सारे सम्पर्क क्षेत्र को दैवी विभूतियों से भरा पूरा बनादे। दुष्ट दुर्जन जहाँ रहते हैं वहाँ उत्पीड़न और आतंक का वातावरण उत्पन्न करते हैं। दीन, दुर्बल, अनाथ असहाय मूर्छित, अर्ध मृतक जहाँ रहते हैं वहाँ घिनौनी सड़न से, विकृतियों से दम घोंटने वाली गंदगी भरते हैं। इसके विपरीत देव मानव अपने उत्कृष्ट दृष्टिकोण से सुसंस्कृत व्यक्तित्व से-आदर्श क्रियाकलाप से ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं जिन पर स्वर्ण निछावर किया जा सकता है। वस्तुतः गुण, कर्म, स्वभाव की सम्पत्ति ही असली वैभव है उसी के सहारे आन्तरिक विभूतियाँ और भौतिक सम्पत्तियाँ उत्पन्न होतीं, बढ़ती और उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचती हैं।
साधना विशेष प्रयोजन के लिए विशेष विधि विधानों के साथ की थी और उससे उन्होंने अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त किये। दशरथ जी का पुत्रेष्टि यज्ञ वशिष्ठ जी पूरा न करा सके तब शृंगी ऋषि ने उसे सम्पन्न कराया यह शृंगी ऋषि की आयातयामता शक्ति ही थी।
साधना बताया गया है।
साधना करनी चाहिये। दो औंकारों द्वारा संपुट की गई और तीन व्याहृति वाली देवी गायत्री की उपासना करके जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों वर्गों को नहीं साधता वह अंधी बुद्धि वाला है। गायत्री के द्वारा द्विजत्व को प्राप्त करके जो अन्य देवताओं की साधना करते हैं, वे वैसे ही हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को त्यागकर रत्नों की इच्छा करने वाले होते हैं।
साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन तत्वदर्शी मनीषी तथा दिव्यदृष्टा मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका उपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप साधनों तथा कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मंत्राराधन वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।
साधना करनी चाहिए।
साधना द्वारा साधक के मन क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण कुम्बकत्व से परिपूर्ण कर देती है।
साधना को कर सके तो उसका निजी अनुभव शास्त्र प्रतिपादित इस सर्वश्रेष्ठता का समर्थन ही करेगा। इस सन्दर्भ में मिलने वाले शास्त्र वचनों में से कुछ इस प्रकार हैं-
साधना के साथ ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वरा भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिये। इसी प्रतिपादन को गायत्री और द्विजत्व का समन्वय करने की संगति बिठाकर किया गया है। तथ्य को समझा जाना चाहिए।
साधना से उत्पन्न आन्तरिक प्रखरता ही देव शक्ति बनकर हमें आत्म सम्पदा से ओत प्रोत करती है। यह सम्पत्ति जिसके पास है उसे सुखी और समुन्नत रहने तथा दूसरों को महत्वपूर्ण अनुदान देते रहने का श्रेय मिलता है। कहा भी है :-
साधना काल में जागरुकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।
साधना है। इस साधना द्वारा अपनी कमजोरियों को दूर कर हमें अपने चतुर्दिक् फैली हुई आनन्द और सफलताओं के तत्वों का लाभ उठाना चाहिए।
साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो। गुरु का यह कर्तव्य भी हो सकता है कि शिष्य को न केवल पग प्रदर्शन करे वरन् उसे अपनी शक्ति का अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भी बनाये। अस्तु ऋषि का आश्रय मंत्र साधना की प्रथम सीढ़ी बताई गई है।
साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त नहीं करते वे अन्ध बुद्धि वाले है। जो गायत्री जैसे मन्त्र के होते हुए भी अन्य मन्त्रों की उपासनाएँ करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ आई चिन्तामणि को फेंक कर छोटे छोटे रत्न कर्णों को ढूंढ़ने वाले मूर्ख।
साधना के लिए सैनिक क्षेत्र का चुनाव किया। उसके मन में बड़प्पन और विजयाकाँक्षा उत्तरोत्तर बढ़ती रही। उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण उसमें सृजनात्मक दृष्टिकोण का अभाव ही रहा फलतः उसकी दाम्भिकता भी बढ़ती रही और शक्ति भी। एक दिन यही व्यक्ति जर्मनी का प्रसिद्ध डिक्टेटर और दो-दो विश्व युद्धों का जनक हिटलर बना। उसके पास प्रतिभा थी, शक्ति थी और उनसे उसने सारे विश्व को चमत्कृत भी किया पर कुण्ठाग्रस्त विध्वंसात्मक महत्वाकाँक्षाओं के कारण वह विनाश की ओर ही अग्रसर हुई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-March
साधना आरंभ की गई है, उसका क्रियात्मक स्वरूप इस शिविर में उपस्थित व्यक्ति और भी अधिक व्याख्या एवं विवेचना के साथ समझ सके। यों फरवरी अंक को पढ़-कर देश भर में बिखरे हुए विशिष्ट परिजनों ने उसे आरम्भ कर ही दिया है, पर शिविर में रहने वाले साधक चूँकि व्यक्तिगत रूप से भी यहाँ उपस्थिति थे इसलिए इन्हें इस प्रकाश का अनुभव अधिक प्रत्यक्ष रूप से करने का अवसर मिला।
साधनाएँ की हैं। साँसारिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उन्हें एक सफल व्यक्ति कहा जा सकता है। वे इसी शिविर के अन्तिम दिन वानप्रस्थ संस्कार कराने मथुरा आये। ता0 14 फरवरी को उनके जीवन का 50 वाँ वर्ष पूरा होकर 51 वाँ आरम्भ होता है। प्रचलित परम्पराओं के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था के जन्म से 25 वे वर्ष में रजत-जयन्ती, 50 वे वर्ष में स्वर्ण-जयन्ती, 75 वे वर्ष में हीरक-जयन्ती और 100 वे वर्ष में शताब्दी मनाई जाती है।
साधना और अपनी तपश्चर्या के लाभ हमने सारे संसार को बाँट दिये हैं। उस अनुदान का लाभ सारा विश्व उठा रहा है, किन्तु हमने तो अपने प्राचीन गौरव को ही भुला दिया। अपने आदर्शों से च्युत होकर अपनी सारी भौतिक विभूतियाँ एवं आध्यात्मिक सम्पदायें खोकर रख दीं। समय उन्हें फिर से जागृत करने का संदेश दे रहा है। वह युग आ गया है जब इस आवाहन को अनसुना कर टाल नहीं सकते।
साधना में किसी एक सद्गुण पर पूर्ण रूप से निष्ठावान् होना पड़ता है। आजीवन ब्रह्मचर्य रहने वाले भीष्मपितामह, परम भक्त हनुमान, महासती अनुसुइया, तपस्वी दुर्वासा, सत्य वाही हरिश्चन्द्र अपने विशिष्ट गुणों के कारण ही उच्चतम सम्मान पाने के अधिकारी बन सके थे। गुणों की विशिष्टता के कारण ही पूज्य-पद प्राप्त होते आये हैं। यह सनातन नियम आगे भी इसी तरह चलता रहेगा।
साधना पूरी कर सकता है। अतः इन से वैराग्य उत्पन्न करने और इनकी ओर चित्तवृत्तियों को न भटकने देने में ही कल्याण है। जिनके सन्तान है उन्हें तो अपने कर्त्तव्य का पालन करना ही चाहिए पर जिन्हें सन्तान उपलब्ध नहीं हुई उन्हें अकारण परेशान नहीं रहना चाहिए। “पुत्र होता तो सुख मिलता” यह कल्पना सर्वथा निराधार है। अनेक व्यक्तियों को सन्तान के द्वारा कष्ट पाते देखा गया है।
साधना की है नियम भी अनुगता ॥ 2 ॥
साधना योगियों जैसी है। गृहस्थ में रहकर उन्होंने घर को ही गुफा बनाकर कठिन तपश्चर्याएँ एवं साधनाएँ की हैं। साँसारिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उन्हें एक सफल व्यक्ति कहा जा सकता है। वे इसी शिविर के अन्तिम दिन वानप्रस्थ संस्कार कराने मथुरा आये। ता0 14 फरवरी को उनके जीवन का 50 वाँ वर्ष पूरा होकर 51 वाँ आरम्भ होता है।
साधना का कार्यक्रम इसी प्रकार पूरा होता है। व्यक्ति का निजी स्वार्थ भी इसी में सुरक्षित है कि सबके लिये समान व्रत का पालन करे। दूसरों को धोखे में डालकर आत्म-कल्याण का मार्ग प्राप्त नहीं किया जा सकता। साथ-साथ चल कर लक्ष्य तक पहुँचने में जो सुगमता और आनन्द है, वह अकेले चलने में नहीं है। अनुशासन और नियम पूर्वक चलते रहने से समाज में एक व्यक्ति के भी हितों की रक्षा हो जाती है और दूसरों की उन्नति का मार्ग भी अवरुद्ध नहीं होता।
साधना एवं सामाजिक स्थिति निखरी हुई है।
साधना से जगाओ, जीवन की सार्थकता का यही एक मात्र मार्ग है।
साधना जो इस जीवन में नहीं कर लेता उसके लिये इस सुर-दुर्लभ अवसर का कुछ भी उपयोग नहीं, श्रीमद्भागवत में बताया है—
साधना” का शब्द जोड़ दिया जाता है, वह इसी शक्ति का ही बोधक है। आध्यात्मिक शक्तियों के विकास पर ही सम्पूर्ण प्राणियों के हित का सिद्धान्त निश्चयात्मक रूप से चल सकता है। बिना इसके सामाजिक जीवन की सुव्यवस्था का और कोई दूसरा ठोस आधार हो नहीं सकता। इसी रूप में हम अपने आपको पूर्ण शक्ति-सम्पन्न, श्रेष्ठ और शिरोमणि सिद्ध कर सके हैं। विक्टर कोसिन ने इसी तथ्य का दावा करते हुए लिखा है—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-June
साधना से विद्वान लोग मृत्यु को जीत सकते हैं। इसी प्रकार युग-पुरुष भगवान कृष्ण ने भी कहा है—यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति। अर्थात्-जो परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हो, तो ब्रह्मचर्य का पालन किया करो।
साधनायें जगाईं उनका प्रकाश आज भी हमारी संस्कृति को प्रकाशमान बनाये है। इस पुण्य की परम्परा की भागीदारी हमें भी प्राप्त करना है ताकि हमारे देश की आध्यात्मिक आस्थायें, हमारा भविष्य ऊँचा, बहुत ऊँचा उठे। सभी महापुरुषों का यही उद्देश्य रहा है, अपना भी लक्ष्य ऐसा ही हो।
साधना में लगने में विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह शरीर परोपकार के लिये मिला है और परोपकार में ही इसकी इति होनी चाहिये।
साधनाओं में खर्च करना चाहिये। अनावश्यक आसक्ति और मोह के कारण प्रायः लोग परिवार को छोड़ना नहीं चाहते, उसी से चिपटे रहना चाहते हैं। उन्हें यह गलतफहमी होती है कि यदि वे नहीं रहेंगे तो शायद बालकों का जीवित रहना कठिन हो जायगा। यह मोह-बुद्धि परिवार में अनेक बखेड़ों का कारण बनती है। गृहस्थी का संचालन सुचारु रूप से चलते रहने देने की दृष्टि से अपना शरीर परिवार से हटा लेना कुछ बुरा नहीं, वरन् यह एक नैतिक धर्म कर्त्तव्य है।
साधना को सार्थक समझे तो यह उचित ही होगा। भले ही छोटे दिखाई पड़ें पर हमारे प्रयत्न निस्संदेह महान हैं।
साधनावस्था है इसलिये गम्भीर देख−रेख तथा पूर्ण नियन्त्रण की आवश्यकता पड़ती है।
साधना में अन्तर आ सकता है किन्तु ब्रह्मचर्य किसी न किसी स्थिति में प्रत्येक विधि के साथ आवश्यक कहा गया है।
साधनायें पूर्ण निष्ठा के साथ करते रहें।
साधनाओं एवं कष्ट-दायक प्रक्रियाओं की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी सभी साँसारिक कामनायें नष्ट हो जाती हैं। उसके लिए ईश्वर का प्रेम ही लक्ष्य बन जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
साधना है इसके लिये अपना शरीर, अपना साधन और अपनी सम्पदायें भोगनी पड़ती हैं। जो जितने अंशों में इन नियमों का पालन करता है उसका हृदय उतना ही खुला हुआ, साहसी और विशाल होता है।
साधना भी चलती रहे तो मनुष्य स्वस्थ और स्वाभाविक जीवन जीते हुये भी अपना जन्म उद्देश्य पूरा कर सकता है, शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-October
साधना चल रही थी, उसे ही इस वर्ष परिपक्व कर लेना चाहिये। आगामी साधना क्रम अगले वर्ष बतावेंगे।
साधना ही पतिव्रत का मुख्य अंग है और इसी के कारण चरित्र निष्ठा की गम्भीरता बढ़ती है। केवल ‘यौन-सदाचार’ स्थिर रखकर ही इस मर्यादा की पूर्णता नहीं हो जाती, वरन् वह सामूहिक विकास के आधार रूप में जीवन-भर चलती है। इसलिये इसका महत्व ही बहुत बड़ा है और तभी इसे योग साधना का रूप भी माना गया है।
साधना किसी योग से कम नहीं। पुरुष, परमात्मा का स्नेह और साहचर्य प्राप्त करने के लिये आत्म-समर्पण करता है, अपनी सारी कामनायें परमेश्वर को सौंपकर केवल कर्त्तव्यपालन में सुख अनुभव करता है। नारी पुरुष को देवता मानकर इसी आत्म-समर्पण की भावना का विस्तार करती है तो परमात्मा की उपासना के सत्परिणाम उसके जीवन में उतरते हैं। आत्मिक सुख, सन्तोष और शान्ति की उसे तुरन्त प्राप्ति होती है, यही सद्गति के आधार है और इन्हीं से समाज निर्माण के कार्य भली भाँति चल पाते हैं।
साधना उसे बोझ मालूम होने लगती है।
साधना और संयम किए जाते हैं, वे सब आत्म विस्तार के लिए ही किये जाते हैं। साधारणतः लोग इस जप तप तथा संयम नियम को ही अध्यात्म का सच्चा स्वरूप समझ लेते हैं। जप-तप पूजा पाठ करने पर वे अपने को अध्यात्मिक व्यक्ति समझ लेते हैं। जब कि ये सारी क्रियायें आध्यात्मिक प्रगति करने के लिये एक आँशिक प्रयत्न मात्र हैं।
साधना के लिये हितकर नहीं होता।
साधना के लिये अनन्य मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक शक्ति की आवश्यकता है। जो संसार में रहकर शारीरिक समर न जीत सका, वह अध्यात्म क्षेत्र के साधना-समर को क्या जीत सकेगा?
साधना-समर को क्या जीत सकेगा?
साधना का असंयम भी ऐसा कारण है, जो उपासक में वाँछित गम्भीरता नहीं आने देता, मन और मस्तिष्क पर वे अपेक्षित संस्कार नहीं पड़ने देता, जिनके बल पर उपासना में निरन्तरता आती है और उपासक अध्यात्म लाभ की ओर अग्रसर होता है। कभी किसी समय उपासना करना उसी प्रकार की धार्मिक अथवा अध्यात्मिक अनियमितता है, जिस प्रकार आहार-बिहार की। इस प्रकार की अनियमित उपासना व्यक्ति को विशुद्ध आध्यात्मिक न बना कर आध्यात्मिक रोगी बना देती है, जिससे किसी सुख शान्ति की आशा करना असामान्य कल्पना मात्र ही होगी।
साधना है, जिससे स्त्री का आत्म-बल उद्दीप्त होता है, आध्यात्मिक गुणों का आविर्भाव होता और कर्त्तव्यपालन की दृढ़ता आती है। इन विशिष्टताओं को धारण करके ही नारी समाज के दीक्षा-कर्म को उत्तम रीति से निभा सकती है।
साधना के प्रथम चरण में भक्त अपने गुरु पर अपनी भावनाएं आरोपित कर उन्हें भगवान के रूप में पूजता है तो उसे ईश्वर उपासना के पूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं। किसी देव प्रतिमा, पीपल या तुलसी की उपासना और अर्घ्यदान की अपेक्षा यदि स्त्रियाँ अपने पतियों को उस भाव से देखा करें तो इससे जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, उससे पारस्परिक आनन्द, बाल-निर्माण और समाज की सुव्यवस्था का वातावरण भी बनता है।
साधना क्रम अगले वर्ष बतावेंगे।
साधना-निष्ठ हों सभी, राष्ट्र के लोग।
साधना को कामनाओं की कसौटी पर कसता रहता है और जब उसकी कामनायें फलीभूत होती नहीं दीखतीं तो वह धीरे-धीरे उपासना से ऊबने लगता है और शीघ्र ही निरर्थक कार्य समझ कर उससे विरत हो जाता है। कामनाओं के कारण उपासना से विरत हुआ उपासक मृत्यु से भयभीत और जीवन से निराश कायर की तरह त्रासपूर्ण जिन्दगी बिताता है।
साधना का नया पाठ्यक्रम नहीं बनाया जा रहा है। गत वर्ष जो क्रम चला था वही इस वर्ष भी चलने देना चाहिये। पिछले तीन वर्षों से अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के अनावरण की जो साधना चल रही थी, उसे ही इस वर्ष परिपक्व कर लेना चाहिये। आगामी साधना क्रम अगले वर्ष बतावेंगे।
साधना का रूप भी माना गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-February
साधना और अभ्यास करना पड़ता है, इसलिए हमारा सारा उपासना विधान, कर्मकाण्ड, योगशास्त्र आदि सभी मनः शोधन पर ही आधारित हैं। जिस तरह पहलवान बनने के लिए, शरीर को शक्ति शाली बनाने के लिए नित्य-प्रति व्यायाम और पौष्टिक भोजन की आवश्यकता पड़ती है उसी तरह मन को शक्ति शाली बनाने के लिए, मनः शक्ति के शोधन के लिए मानसिक साधनाएँ, मानसिक व्यायाम करने पड़ते हैं, मन को भी पौष्टिक भोजन देना पड़ता है, उत्कृष्ट विचार और उदात्त भावनाओं का। सचमुच सधा हुआ, निर्मल, स्वस्थ मन जीवन सिद्धि के लिए एक वरदान है।
साधना का अर्थ केवल पूजा ही नहीं, वरन् जीवन की गति विधियों की उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना भी हैं। हमें भारतीय जनता की गतिविधियों में इस श्रद्धा का समावेश करना ही होगा कि आस्तिकता के प्रधान आधार सदाचरण और लोक मंगल को सत्प्रवृत्तियों के अपनाने और बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास किया जाय। इसके बिना राष्ट्र का वास्तविक उत्थान ही नहीं सकेगा। अतएव इस महान आवश्यकता की देशव्यापी पूर्ति के लिए एक अभियान जारी रखना ही पड़ेगा और उन जारी रखने वालों में समुचित आत्मबल रहना ही चाहिए ताकि, इतने बड़े प्रयोजन को अग्रसर कर सकने में वे समर्थ हो सकें।
साधना गत तीन वर्ष से चल रही है। अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश, यह गायत्री माता के पाँच मुख हैं। इन पाँचों का अनावरण कैसे हो इसका योग शास्त्र में वर्णित विधान हम प्रतिवर्ष अक्टूबर मास के अंकों में छाप
साधना प्रायः कठिन ही होता है। इसलिए जहाँ तक बने साधना के अनुकूल, शान्त, निर्विघ्न परिस्थितियों में रहकर मन को एकाग्र करने की साधना की जाय, तो अपेक्षाकृत जल्दी सफलता मिलेगी।
साधनायें भी बताई गई हैं और जिन्होंने निष्ठा पूर्वक उन्हें अपनाए रखा है, उन्होंने आश्चर्य जनक परिणाम भी प्रत्यक्ष देखा है। कुछ नैष्ठिक उपासकों की पंचकोशी साधना गत तीन वर्ष से चल रही है। अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश, यह गायत्री माता के पाँच मुख हैं। इन पाँचों का अनावरण कैसे हो इसका योग शास्त्र में वर्णित विधान हम प्रतिवर्ष अक्टूबर मास के अंकों में छाप
साधना, क्रिया पर जोर देते हुए कहा है-”स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः।” जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है, उसे ही सिद्धि मिलती है । कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है।
साधना, विचारों की अर्चना करना आवश्यक है। ज्ञान, विचार-साधना के क्षेत्र में हम जितने अधिक प्रयत्न करेंगे, उतना ही हमारी बुद्धि का विकास होगा।
साधनायें उस शाश्वत सत्य का अनुसरण करके चलते हैं। इसी लिये भारतीय साहित्यकार, कलाकार लौकिक दृष्टि से अभावग्रस्त पाया जाता है। यहाँ नंगे, घर विहीन साधु संन्यासियों को अधिक महत्व दिया गया है राजा महाराजाओं से। धनवान् की अपेक्षा एक ऋषि की, तपस्वी की अधिक प्रतिष्ठा मानी गई है हमारे यहाँ और इसी कारण हमारे देश ने संसार को सबसे अधिक महान् पुरुष दिये। ऐसे महान् पुरुष जिन्होंने संसार को विघटन के बजाय एक सूत्र में बाँधा, युद्ध और संघर्षों के बजाय शान्ति और सह-जीवन का सन्देश दिया।
साधना होती है। और कई बार भ्रम में भटक कर हम गलत साधनों का उपयोग कर बैठते है। फलतः साध्य के प्राप्त होने का जो सन्तोष और प्रसन्नता मिलनी चाहिए, उससे हम वंचित रह जाते हैं।
साधनाएँ, मानसिक व्यायाम करने पड़ते हैं, मन को भी पौष्टिक भोजन देना पड़ता है, उत्कृष्ट विचार और उदात्त भावनाओं का। सचमुच सधा हुआ, निर्मल, स्वस्थ मन जीवन सिद्धि के लिए एक वरदान है।
साधना, समाज आदि के नाम पर जीवन को शुष्क नीरस बना कर बिताने की गुँजाइश नहीं है भारतीय संस्कृति में। जो ऐसा समझते हैं वे भूल करते हैं। जल्दी-जल्दी आने वाले पर्व त्यौहारों की हमारे यहाँ भरमार है, जिन पर मनुष्य आमोद-प्रमोद, प्रफुल्लता का अनुभव कर सके, हँसी खुशी का जीवन बिता सके और वह भी सामुदायिक रूप से। इतना ही नहीं इनके साथ-साथ कई मनोवैज्ञानिक तथ्य जुड़े हुए हैं, जिनसे मनुष्य के मानसिक स्तर में सुधार और परिवर्तन होते हैं।
साधना के क्षेत्र में हम जितने अधिक प्रयत्न करेंगे, उतना ही हमारी बुद्धि का विकास होगा।
साधना करने वाले के लिए अपनी ग्रहण शक्ति को एकाँगी नहीं बनाना चाहिए। अपने आपको किसी एक ही विचारधारा में कैद नहीं कर लेना चाहिए। जो ऐसी भूल कर बैठते हैं, उनकी बुद्धि भी एकाँगी बन जाती है। वह नाना दिशाओं में विकसित नहीं हो पाती।
साधना करते हैं, उन्हें ही ईश्वर का सच्चा प्रेम और आशीर्वाद प्राप्त होता है। आत्म-बल भी उन्हीं का बढ़ता है और दूसरों का उपकार करने, प्रेरणा देने, जीवन बदलने, प्रकाश पहुँचाने एवं आशीर्वाद देकर भला करने की क्षमता की निष्काम उपासकों में ही रहती है। कामनाशील उपासकों के अन्तःकरण में उतनी स्पष्ट एवं गहरी श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो सकती, जिससे परमेश्वर को द्रवित किया जा सके। फिर जो कुछ वे कामते हैं, वह उनके भौतिक प्रयोजनों में ही पूरा हो जाता है, ऐसी दशा में वे उस पूँजी का संग्रह कर नहीं पाते, जिससे बड़े आध्यात्मिक प्रयोजनों की पूर्ति हो सके। अतएव जिन्हें आत्म-बल संग्रह करने की, नर से नारायण रूप में विकसित होने की आकाँक्षा हो उन्हें सकाम उपासना के स्तर से ऊँचा उठकर निष्काम भावना अपनानी पड़ेगी और अपनी साधना का उद्देश्य परमार्थ ही रखना पड़ेगा।
साधना क्रम में भी इस वसन्त पंचमी से कुछ हेर-फेर कर देना होगा, जिसका वर्णन अगले लेख में किया जा रहा है।
साधना सम्भव नहीं होती। जब मोटर के अंचर-पंचर, कील-काँटे ही ढीले-ढाले, टूटे-फूटे होंगे, तो कोई भी ड्राइवर अपनी क्षमता का उपयोग नहीं कर सकता। छिद्रयुक्त घड़े में दूध का दोहन सम्भव नहीं होता। अस्वस्थ शरीर में मनःशक्ति के प्रकट होने की आशा नहीं की जा सकती, क्योंकि शरीर की शिकायत पर ही मन बारबार लगेगा। इसके अतिरिक्त अस्वस्थता के कारण मानसिक संस्थान भी ठीक-ठीक काम नहीं कर सकेगा।
साधना ही साध्य की अर्चना है।
साधना, लक्ष्य की प्राप्ति तभी सम्भव होगी जब साध्य और साधन को जोड़कर मनुष्य साधननिष्ठ बनेगा।
साधना की जाय, तो अपेक्षाकृत जल्दी सफलता मिलेगी।
साधना ही जीवन सिद्धि का मूलमन्त्र है।
साधना का उद्देश्य परमार्थ ही रखना पड़ेगा। जो इस शर्त को स्वीकार करते हुए गायत्री उपासना करने को तत्पर हों, वे ही हमारे उत्तराधिकार का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने में समर्थ हो सकेंगे।
साधना थाल दो,
साधना क्षेत्र में भी उतरेंगे एवं बढ़ेंगे ताकि आत्म-बल का वह स्रोत उन्हें उपलब्ध हो सके, जो नर को नारायण बना सकने में समर्थ हो सकता है।
साधना से प्राप्त होगा। साधना का अर्थ केवल पूजा ही नहीं, वरन् जीवन की गति विधियों की उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना भी हैं। हमें भारतीय जनता की गतिविधियों में इस श्रद्धा का समावेश करना ही होगा कि आस्तिकता के प्रधान आधार सदाचरण और लोक मंगल को सत्प्रवृत्तियों के अपनाने और बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास किया जाय। इसके बिना राष्ट्र का वास्तविक उत्थान ही नहीं सकेगा। अतएव इस महान आवश्यकता की देशव्यापी पूर्ति के लिए एक अभियान जारी रखना ही पड़ेगा और उन जारी रखने वालों में समुचित आत्मबल रहना ही चाहिए ताकि, इतने बड़े प्रयोजन को अग्रसर कर सकने में वे समर्थ हो सकें।
साधना के अनुकूल, शान्त, निर्विघ्न परिस्थितियों में रहकर मन को एकाग्र करने की साधना की जाय, तो अपेक्षाकृत जल्दी सफलता मिलेगी।
साधना के लिए उपयुक्त वातावरण, अनुकूल परिस्थितियों का होना भी आवश्यक है। जिस तरह चीनी के भण्डार में रखकर सामान्य मनुष्य से चीनी खाने की आदत छुड़ाई नहीं जा सकती, उसी तरह मन की चंचलता को बढ़ाने वाले वातावरण में रहकर उनको साधना प्रायः कठिन ही होता है। इसलिए जहाँ तक बने साधना के अनुकूल, शान्त, निर्विघ्न परिस्थितियों में रहकर मन को एकाग्र करने की साधना की जाय, तो अपेक्षाकृत जल्दी सफलता मिलेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-November
साधनायें भी संकल्प पर ही आधारित हैं, पर वे इतनी कठोर नहीं हैं जितना विचारधाराओं का प्रवाह मोड़ना कठिन होता है। इसलिए इन्हें आवश्यकता और स्थिति के अनुसार घटाया, बढ़ाया भी जा सकता हैं। ये साधनायें व्रत कहलाती हैं। व्रत यद्यपि संकल्प का ही रूप है, पर वह अपेक्षाकृत छोटा और कोमल होता है। उसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है।
साधना महापुरश्चरण प्रारम्भ किया गया है। गायत्री सर्वोपरि शक्ति है। उसके साथ कुछ विशिष्ट बीज मन्त्र एवं सम्पुट जोड़ने से उसे विभिन्न भौतिक कार्यों के लिये भी प्रयुक्त किया जा सकता है। ‘श्रीं’ बीज सफलता एवं समृद्धि के लिये, ‘ह्रीं’ बीज बुद्धि एवं भावना, विकास के लिये और ‘क्लीं’ बीज शक्ति सम्पन्नता एवं अनिष्ट निवारण के लिये किया जाता है। वर्तमान परिस्थितियों में देश में सर्वतोमुखी बल, साहस, शौर्य एवं पराक्रम का बढ़ना आवश्यक है।
साधना संभव नहीं हो सकती।
साधना को दूषित करना हैं। “मैं” ओर “मेरे” का भाव जब तक रहता है, तब तक आत्मोत्सर्ग की भावना दृढ़ नहीं होती। ईश्वर उपासक को “मेरा कुछ नहीं जो कुछ है सब तेरा है” की धारणा अपनानी पड़ती है। यह धारणा जितनी बलवती होती है, उतनी ही विनम्रता आती है। यह स्थिति बन जाती है तो विश्वास आदि भाव सहज रूप से उठने लगते हैं और आनन्द की अनुभूति होने लगती है।
साधनायें की थीं। वशिष्ठ के सौ पुत्र थे, उनकी पत्नी न रही होती तो ये बच्चे कहाँ से आते। महर्षि जमदग्नि की पत्नी रेणुका थी, गौतम की अहिल्या, अत्रि की अनुसुइया आदि अधिकाँश ऋषि पत्नीव्रत पालन करने वाले हुये हैं। बीच में जब बुद्ध धर्म का प्रभाव इस देश में बढ़ा उस समय कुछ भ्रान्त धारणायें समाज में फैलीं और नारी को अभिशाप समझा जाने लगा। यह कहना वस्तुतः अपने कर्त्तव्य से विमुख होना ही था।
साधना कर सकते थे? जनता की न्यायपूर्ण आवाज का समर्थन न करके, उस समय किसी अन्य प्रकार के साहित्य का सृजन करना स्वयं एक अन्याय होता। अतएव उन्होंने जन आन्दोलनों में सक्रिय भाग लेना अपना परम कर्तव्य समझा। इसके साथ ही उन्होंने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर एक पत्रिका भी निकाली जिसके लिये लेख वे स्वयं ही लिखा करते थे। उनके तथ्यपूर्ण लेखों से अधिकारों के लिये संघर्ष करने वाली जनता को बड़ा बल मिला।
साधना की वह सभी अन्तरंग क्रियायें अनिवार्य हैं जिनसे सामर्थ्य का विकास होता है।
साधनायें व्रत कहलाती हैं। व्रत यद्यपि संकल्प का ही रूप है, पर वह अपेक्षाकृत छोटा और कोमल होता है। उसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है।
साधना सफल हो सकती और परमात्मा की शरणागति प्राप्त हो सकती है।
साधनाओं का तत्व-ज्ञान समझ सका होगा उसके लिये लोक सेवा ईश्वर भक्ति का सर्वोपरि माध्यम बनी हुई होगी। जिसके पत्थर जैसे मन में इस प्रकार की भावनायें नहीं उठतीं, समझना चाहिये कि उस ऊसर में अध्यात्म का अमृत जल बरसा ही नहीं। जप ध्यान के बहाने वह कुछ ताना-बाना जरूर बुन रहा है पर है वह क्रिया कृत्य माक्ष ही और क्रियाकृत्य का तब तक कोई मूल्य नहीं जब तक उसके पीछे भावनाओं का उभार न हो। देवताओं को लूट लेने के लिये मन्त्र-तन्त्र की रिश्वत से काम चलाने की बात सोचते रहने वाले लोग अध्यात्मवादी नहीं हो सकते। यह त्यागी और बलिदानियों का मार्ग है- लुटेरों का नहीं।
साधना क्रम में लग गये हैं। यह प्रसन्नता की बात है। कुछ लोगों ने समय सम्बन्धी कठिनाई के कारण उतना करने में असमर्थता प्रकट की है और साधारण रीति से एक माला करते रहने की बात कही है। ‘न कुछ से कुछ अच्छा,’ एक माला करके भी पुरश्चरण में भागीदार रहा जा सकता है ‘ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं क्लीं ॐ’ इस शक्ति मन्त्र की एक माला तो हम को जब तक संकट की घड़ियां विद्यमान हैं तब तक करते ही ही रहना चाहियें।
साधना को दे ही सकता है। जो जप न कर सकें, वे प्रतिदिन 24 मन्त्र लिखने का क्रम भी बना सकते हैं। किसी न किसी रूप में उस धर्मानुष्ठान में हमें सम्मिलित रहना चाहिये। वर्तमान संघर्ष ऐसे लोगों के विरुद्ध है जिनसे परास्त होने पर हमारा धर्म और संस्कृति भी सुरक्षित नहीं है। इसलिये इस उपासना क्रम को धर्म रक्षा का एक आवश्यक अंग मानकर ही करना चाहिये।
साधना का सम्पूर्ण भार ईश्वर पर आ जाता है। यह अभ्यास करते हुए साधक भी ईश्वर-बोध की स्थिति तक सरलतापूर्वक पहुँच जाता है।
साधना के मूल में एक ही तथ्य काम करता हैं कि-प्राणिमात्र में प्रभु की झाँकी करते हुए उन्हें सुखी एवं समुन्नत करने के लिये श्रद्धापूर्वक संलग्न होना। भक्ति शब्द का स्पष्ट अर्थ सेवा हैं। ‘भज सेवायाँ’ धातु से यही अर्थ निकलता है कि सेवा-संलग्नता का अर्थ ही भजन है।
साधना का मुख्य उद्देश्य हैं।
साधना से हैं।
साधना में श्रद्धा रखने वाले परिवारों ने प्रतिदिन आठ माला के हिसाब से एक महीने में एक 24 हजार शक्ति पुरश्चरण आरम्भ कर दिया है। परिवार के लगभग आधे सदस्य उस साधना क्रम में लग गये हैं। यह प्रसन्नता की बात है। कुछ लोगों ने समय सम्बन्धी कठिनाई के कारण उतना करने में असमर्थता प्रकट की है और साधारण रीति से एक माला करते रहने की बात कही है। ‘न कुछ से कुछ अच्छा,’ एक माला करके भी पुरश्चरण में भागीदार रहा जा सकता है ‘ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं क्लीं ॐ’ इस शक्ति मन्त्र की एक माला तो हम को जब तक संकट की घड़ियां विद्यमान हैं तब तक करते ही ही रहना चाहियें।
साधनायें मिलकर ही शरीर शुद्धि, हृदय की शुद्धि में सहायक होती हैं। इसलिए यह सभी ईश्वर प्राप्ति के उपयोगी तत्व हैं। जीवात्मा के ऊपर यह प्रकृति का आवरण चढ़ा हुआ है। उसका भेदन किये बिना कोई व्यक्ति केवल भावनाओं द्वारा ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि प्रकृति शुद्ध हुये बिना हृदय से प्रस्फुटित होने वाले विचार पूर्ण एकाकी नहीं हो सकते कामनायें और वासनायें शान्त नहीं हो सकतीं। इच्छाओं के रहते हुए ब्रह्म की ओर प्रयाण कर पाना संभव भी नहीं हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-April
साधना होती साध न होती॥
साधना और ‘ब्रह्म विद्या’ के निष्णात आचार्य यह समझते थे कि साधना काल में साधक के जीवन में जो मोड़ और परिवर्तन लाने होते हैं उसके लिये विद्यार्थी जीवन सब से उचित है। इस समय मस्तिष्क में श्रद्धा और विश्वास अधिक होता है किन्तु मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर लेने के बाद लोगों के विचार और संस्कारों को बदलना कठिन हो जाता है। इसके लिए अधिक शक्ति, समय और श्रम लगा कर भी परिणाम थोड़े ही निकलते हैं। विद्यार्थी जीवन में बुद्धि का उदय होता है इसलिए उसमें आसानी से श्रद्धा उत्पन्न करके ब्रह्मतत्त्व की ओर प्रेरित किया जा सकता है। इस बात को भारतीय आचार्यों ने गहराई तक समझ लिया था, इसीलिए जीवन के प्रारम्भ में ही शिक्षा के साथ साधना का समन्वय किया गया था।
साधना का भाव तो पशु पक्षियों तक में पाया जाता है। अतः इसमें कोई बुद्धिमानी नहीं हो सकती कि मनुष्य सम्पूर्ण जीवन केवल अपनी ही स्वार्थपूर्ण प्रवंचनाओं में बिता दे। इससे अन्त तक मानवीय शक्तियाँ प्रसुप्त बनी रहती हैं। प्रेम और आत्मीयता की भावनाओं का परिष्कार नहीं हो पाता। स्वार्थपरता नहीं संकीर्णता के कारण मनुष्य का जीवन कितना दुःखमय कितना कठोर हो सकता है यह सर्व विदित है।
साधना पूर्ण योगासन करना चाहिये।
साधना अनुभवी पथ-प्रदर्शक की देख रेख में ही सम्पन्न हो सकती है। गुरु शब्द में ‘ब्रह्म विद्या’ का बोध होता है। साधना और ‘ब्रह्म विद्या’ के निष्णात आचार्य यह समझते थे कि साधना काल में साधक के जीवन में जो मोड़ और परिवर्तन लाने होते हैं उसके लिये विद्यार्थी जीवन सब से उचित है। इस समय मस्तिष्क में श्रद्धा और विश्वास अधिक होता है किन्तु मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर लेने के बाद लोगों के विचार और संस्कारों को बदलना कठिन हो जाता है। इसके लिए अधिक शक्ति, समय और श्रम लगा कर भी परिणाम थोड़े ही निकलते हैं।
साधना की कठिनाइयों को झेलने की कसौटी है। आवेशपूर्ण श्रद्धा से जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं होता किन्तु जो लोग दृढ़तापूर्वक साधन की कठिनाइयों को सहन करते रहते हैं उनकी श्रद्धा और भी तेजस्वी बनती है और मन पर तथा इन्द्रियों पर संयम करना आसान हो जाता है।
साधना साध न होती॥
साधना जितना अधिक तेज होगी समाज में सद्गुणों का प्रसार उसी गति से होता रहेगा। और एक दिन मनुष्य पूर्ण विकास की अवस्था भी प्राप्त कर लेगा।
साधना की आवश्यकता भी होती है। साधना अनुभवी पथ-प्रदर्शक की देख रेख में ही सम्पन्न हो सकती है। गुरु शब्द में ‘ब्रह्म विद्या’ का बोध होता है। साधना और ‘ब्रह्म विद्या’ के निष्णात आचार्य यह समझते थे कि साधना काल में साधक के जीवन में जो मोड़ और परिवर्तन लाने होते हैं उसके लिये विद्यार्थी जीवन सब से उचित है। इस समय मस्तिष्क में श्रद्धा और विश्वास अधिक होता है किन्तु मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर लेने के बाद लोगों के विचार और संस्कारों को बदलना कठिन हो जाता है।
साधना- विगत बसन्त पंचमी से ‘ज्योति अवतरण’ की साधना क्रम जिन लोगों ने आरम्भ किया है उन्हें इस थोड़ी ही अवधि में आशाजनक मनोबल प्राप्त हुआ है। यह ध्यान अतीव प्रेरणाप्रद है। प्रायः सूर्योदय से पूर्व का कुछ समय हममें से प्रत्येक को इस ध्यान धारणा के लिए निकालना चाहिए। समयाभाव हो तो जप संख्या में कुछ कमी की जा सकती है। पर उसे सूर्योदय के बाद भी किया जा सकता है।
साधना क्रम जिन लोगों ने आरम्भ किया है उन्हें इस थोड़ी ही अवधि में आशाजनक मनोबल प्राप्त हुआ है। यह ध्यान अतीव प्रेरणाप्रद है। प्रायः सूर्योदय से पूर्व का कुछ समय हममें से प्रत्येक को इस ध्यान धारणा के लिए निकालना चाहिए। समयाभाव हो तो जप संख्या में कुछ कमी की जा सकती है। पर उसे सूर्योदय के बाद भी किया जा सकता है।
साधना के क्षेत्र में जो अनेक विघ्न व बाधायें आती हैं, उनसे बचाने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है। ब्रह्मा-ज्ञान की पूर्णता तक पहुँचने के लिए जिज्ञासु के अन्तःकरण में तरह तरह की शंकायें उठा करती हैं, वह कभी ब्रह्मा की ओर, कभी माया की ओर खिंचता रहता है। इनमें मायावी तत्व, साँसारिक भोग वासनाओं में ऐसी आकर्षक शक्ति भरी होती है कि वह एक क्षण में मनुष्य को साधन-विरत कर देती है। इनसे बचाने का एक मात्र पाथेय मनुष्य की आन्तरिक श्रद्धा है। हृदय में श्रद्धा और मन में विश्वास हो तो अनेक कठिनाइयों के होते भी मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ चला जायगा।
साधना इस देश की विशेषता रही है।
साधना काल में साधक के जीवन में जो मोड़ और परिवर्तन लाने होते हैं उसके लिये विद्यार्थी जीवन सब से उचित है। इस समय मस्तिष्क में श्रद्धा और विश्वास अधिक होता है किन्तु मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर लेने के बाद लोगों के विचार और संस्कारों को बदलना कठिन हो जाता है। इसके लिए अधिक शक्ति, समय और श्रम लगा कर भी परिणाम थोड़े ही निकलते हैं। विद्यार्थी जीवन में बुद्धि का उदय होता है इसलिए उसमें आसानी से श्रद्धा उत्पन्न करके ब्रह्मतत्त्व की ओर प्रेरित किया जा सकता है। इस बात को भारतीय आचार्यों ने गहराई तक समझ लिया था, इसीलिए जीवन के प्रारम्भ में ही शिक्षा के साथ साधना का समन्वय किया गया था।
साधना का समन्वय किया गया था।
साधना और स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्म-ज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान पुँज ही नहीं शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा न होती थी तब वे अधिकार नहीं कर्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे। साहस और कर्मठता उनमें कूट-कूट कर भरी होती थी।
साधना का तेजस्वी जीवन बिताते थे। तपोवेष्ठित होने से उनका शरीर स्वर्ण जैसा देदीप्यवान् होता था। संसार की कठिनाइयों से संघर्ष करने की उनमें शक्ति होती थी। वार्तालाप, विवेचन, विश्लेषण और विचार-विनिमय के द्वारा उनमें गंभीर चिंतन की प्रवृत्ति जागती थी। साधना और स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्म-ज्ञान की अनुभूति हो जाती थी।
साधना, निर्माण परक प्रयत्न, समाज और राष्ट्र की व्यवस्था, वैयक्तिक जीवन के नियम और अनुशासन, कला शिल्प, स्थापत्य, संगीत, नृत्य, वाद्य, सौंदर्य रचना के अनेक विधान तथा उपकरण- यह सब उसी संस्कृति के अर्थ में आ जाते है। यह उससे अलग नहीं हैं पर पाश्चात्य संस्कृति की तरह यह मनुष्य जीवन का पूरक अंश है। धर्म और दर्शन, जीवन और उसका तात्विक स्वरूप यह उसकी प्रमुख स्थिति है। यह न रहे तो दूसरी आवश्यकताओं का महत्व गिर जायगा। जो वस्तुयें सुख-प्राप्ति के लिए निश्चित की गई थीं उन्हीं से उलटे परिणाम उत्पन्न होने की आशंका बढ़ जाती है, जैसा कि इन दिनों दिखाई दे रहा है।
साधना होती साध न होती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-December
साधना आदि सम्पूर्ण क्रियाओं का स्वामी मन है। मन की प्रचंड हुँकार से देवासन हिल जाते हैं, राष्ट्र बदल जाते हैं, व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है। जागृत मन मनुष्य को परमात्मा की शक्ति वाला बना देता है।
साधना करनी पड़ेगी।
साधनाओं का वर्णन मिलता है। बाह्य कलेवर की दृष्टि से उनमें भिन्नता भले ही दिखाई देती हो, पर उनका दृष्टिकोण एक ही है और वह है पंचकोषों के विकास द्वारा आत्म-साक्षात्कार का पथ प्रशस्त करना।
साधना का एक उद्देश्य है, शारीरिक शक्ति को जागृत करना। यह भी आध्यात्म का ही एक अंग है। शास्त्रों में बताया है कि “दुर्बल शरीर वालों के लिए तो दैव भी घातक होता है।” अतः आत्म-कल्याण के प्रत्येक इच्छुक की पहली साधना शरीर को स्वस्थ बनाने की करनी चाहिये।
साधना में लग जाये। मनुष्य को करना यह चाहिये कि वह साधारण जीवन क्रम को ही आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ओत-प्रोत करले।
साधना में लगे हुए वयोवृद्ध व्यक्ति अपना लोक परलोक सुधारेंगे, आत्म-कल्याण और ईश्वर प्राप्ति का लाभ प्राप्त करेंगे तथा देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति के पुनरुत्थान में योगदान देकर अक्षय पुण्य अर्जित करेंगे।
साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50।-
साधना की जरूरत है। साधना की आग में तपकर ही वह शक्ति आती है, जिसके द्वारा मनुष्य अपना तथा सैकड़ों औरों का कल्याण कर सकने में समर्थ हो पाता है।
साधना के कोई भी तो लौकिक कामना पूर्ण नहीं होती।
साधना है। इसको जीवन का एक सामान्य कार्य-क्रम मानकर अपनाने से अधिकतर असफलता ही हाथ आती है।
साधना शिविर होने वाला था, वह आपत्तिकालीन परिस्थितियों के कारण न होगा। आगामी शिविर परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर जेष्ठ में ही होगा।
साधना का क्षेत्र बहुत व्यापक, बड़ा विशाल है। अधिकाँश उपनिषद् इसी तत्व की व्याख्या में लिखे गये हैं। अनेक प्रकार के योगों का प्रादुर्भाव हुआ है। उनमें अनेक प्रकार की प्रक्रियाएं चलती हैं। उन सबका उद्देश्य केवल शक्तियों को विकसित करना ही होता है।
साधना का एक उपयोगी अंग मानना चाहिए।
साधना। विद्यार्थी प्रतिदिन पैदल चलकर विद्यालय जाता है, फीस के पैसे देता है, मास्टरों की डाँट सुनता है। जब घर वाले सैर-सपाटे को गये होते हैं, तब वह किताबों से जूझता है। पाठ याद करता है। यह क्या हुई?
साधना का मूल्य उद्देश्य भी मानसिक शक्तियों के प्रवाह को रोककर उसे कल्याणकारी मार्ग में लगाना ही है। अतः यह समझ लेना चाहिये कि मनोनिग्रह जीवन निर्माण की प्रमुख शर्त है। हमारे कल्याण के लिए मन की शक्तियों का विकास होना ही चाहिये। उसे स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन आदि के माध्यम से ऊर्ध्वगामी होना ही चाहिये। मन सुधर जाय तो जीवन सुधर जाय।
साधना की आग में तपकर ही वह शक्ति आती है, जिसके द्वारा मनुष्य अपना तथा सैकड़ों औरों का कल्याण कर सकने में समर्थ हो पाता है।
साधना और अनुभवों के आधार पर निकाला। इसी नीति पर चल कर ही संसार की रक्षा और सुखों का विकास हो सकता है। इससे विलग मनुष्य की शान्ति का दूसरा उपाय नहीं। जिसे न्याय और अन्याय का ज्ञान है, जो सब प्राणियों में एक आत्म-तत्व समाया हुआ देखता है, जो ग्रहण करने योग्य और अग्रहणीय का भेद समझता है, संसार के वैभव अपने आप चक्कर काटते हुए उसके पास जा पहुँचते हैं। त्याग का सुख मनुष्य को अनायास ही मिल जाता है और न मिले न सही, पर मानवता से पूरित अन्तःकरण में इतनी शक्ति व सामर्थ्य भरी होती है, जिसे पाकर मनुष्य को संसार के भोग तुच्छ से लगते हैं।
साधना की वैज्ञानिक स्थिति का वर्णन करना है। हम यह बताना चाहेंगे कि आत्म-कल्याण के लिए लौकिक सफलताओं से कहीं अधिक बड़ी और कड़ी साधना की जरूरत है। साधना की आग में तपकर ही वह शक्ति आती है, जिसके द्वारा मनुष्य अपना तथा सैकड़ों औरों का कल्याण कर सकने में समर्थ हो पाता है।
साधना का दूसरा क्षेत्र है- प्राण। यह प्राण शरीर के कण-कण में व्याप्त होकर जड़ देह को गतिमान करता है। निष्प्राण शरीर किसी काम का नहीं होता। उसी प्रकार शरीर के प्राण की विकृति से भी अनेकों रोग-शोक उत्पन्न हो जाते हैं। प्राण का महत्व इससे भी अधिक है।
साधना भी आवश्यक होगी। प्राण जीवन की बड़ी शक्ति है। इसके बिना आत्म-विकास संभव नहीं।
साधना यही हो सकती है कि इस देवभूमि भारत को धरती का स्वर्ग बनाने के लिए जन-जन में विवेकशीलता एवं आदर्शवादिता की भावनाएं उत्पन्न की जायें। इस साधना में लगे हुए वयोवृद्ध व्यक्ति अपना लोक परलोक सुधारेंगे, आत्म-कल्याण और ईश्वर प्राप्ति का लाभ प्राप्त करेंगे तथा देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति के पुनरुत्थान में योगदान देकर अक्षय पुण्य अर्जित करेंगे।
साधना विषय विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नादयोग, हठयोग, कुण्डलिनी योग, षट्चक्र-बेधन की समस्याएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। 3.50।-
साधना शरीर को स्वस्थ बनाने की करनी चाहिये।
साधना की और जो निष्कर्ष निकले, उन्हें दृष्टि में रखते हुए पितामहों ने एक सर्वथा पृथक आचार-संहिता तैयार की और उसके अनुरूप जीवन ढालने की शिक्षा दी। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का रूप-रंग बिल्कुल ही नया तैयार किया गया- ऐसा जैसा किसी देश में व्यवहृत नहीं हुआ। इतनी विलक्षण, इतनी सर्वांगपूर्ण जिस पर थोड़ा चिन्तन करने से भी ऋषियों के प्रति श्रद्धा से हृदय गदगद हो जाता है।
साधना है। चाहे वह भौतिक समृद्धि के लिए हो चाहे आध्यात्मिक उन्नति के लिए। शक्ति अपेक्षित हो तो साधना करनी पड़ेगी।
साधना का जन्म इसी प्रेरणा से हुआ और इससे जो सिद्धि मिली वह अलौकिक थी, महान् थी, जिसका एक कण बिखर जाने से भी संसार में स्वर्गीय सुख का वातावरण छा जाता है। नाम है उसका-मानवता अर्थात् “मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिये”। मेरा कुछ नहीं सब परमात्मा का है। परम पिता की वस्तु का उपभोग मिल बाँट कर ही करना चाहिये, यह निष्कर्ष मनीषियों ने गहन साधना और अनुभवों के आधार पर निकाला। इसी नीति पर चल कर ही संसार की रक्षा और सुखों का विकास हो सकता है।
साधना। ठीक है, बिना साधना के कोई भी तो लौकिक कामना पूर्ण नहीं होती।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-August
साधना के लिए उनमें गम्भीर आस्था थी। आत्मिक शक्तियों की भी उनके पास कोई कमी न थी। पर भूल एक क्षण की उनके लिए घातक बन गई। क्षणिक कामावेश को महर्षि रोक न सके फलस्वरूप बहुत-काल की साधना के फल से उन्हें वंचित होना पड़ा। हर बुराई मेनका का-सा सुन्दर रूप बना कर ही आती है।
साधनाओं और सिद्धांतों को प्रकट न किया जाता था। श्रद्धावान् विद्यार्थी ही ज्ञान का, आत्म-दर्शन का महान् लाभ प्राप्त करते थे।
साधना जागृत होगी तो निश्चय ही राष्ट्र का ब्राह्मणत्व जागृत होगा। ब्राह्मण जागृत होगा तो यह राष्ट्र जागृत हो जायेगा और यह देश पुनः अपने अतीत कालीन ज्ञान, गौरव और समृद्धि की ओर बढ़ने लगेगा। ब्राह्मण इस देश के विकास की रीढ़ है उसे अब जागृत होना ही चाहिये।
साधना के फल से उन्हें वंचित होना पड़ा। हर बुराई मेनका का-सा सुन्दर रूप बना कर ही आती है। चतुर-जन उसे दूर से ही नमस्कार कर लेते हैं किन्तु जो बिना विचारे ही उसे आश्रय दे देते हैं महर्षि की तरह बाद में उन्हें पश्चाताप ही करना पड़ता है।
साधना की आवश्यकता होगी। ब्राह्मण का आविर्भाव कठिन तपश्चर्या से होता है, पर इस युग की परिस्थितियाँ इतना गिर गई हैं कि लोग साधारण स्तर की तपश्चर्या से, कठिनाई से भी भय खाते हैं। लोगों का नैतिक स्तर जितना गिरा है मनोबल उससे भी अधिक गिरता हुआ चला जा रहा है। ऐसी स्थिति में साधना की कठिनाइयों में देर तक टिके रहना सबके लिये कठिन हो जाता है और एक महान् आवश्यकता की पूर्ति यों ही अधूरी पड़ी रह जाती है।
साधना की कठिनाइयों में देर तक टिके रहना सबके लिये कठिन हो जाता है और एक महान् आवश्यकता की पूर्ति यों ही अधूरी पड़ी रह जाती है।
साधना को सरल बना देती है, सुखरूप कर देती है।
साधनाओं से भी सम्भव न था। भक्त ध्रुव की अचल श्रद्धा के परिणाम स्वरूप देवर्षि को पृथ्वी पर आना पड़ा और कुमार का मार्ग-दर्शन करना पड़ा। अपनी उत्कृष्ट श्रद्धा से उसने परमात्मा को जीत लिया। ध्रुव ने नहीं उसकी श्रद्धा ने उसे पाँच वर्ष की आयु में ही पूर्णता की स्थिति को पहुँचा दिया।
साधना पद्धति अपनाना, अन्य किसी उपासना से कम श्रेयस्कर नहीं है। जिन परिजनों ने समय-दान का व्रत लिया है उनने सचमुच बहुत बड़ी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, उदारता एवं उत्कृष्ट आध्यात्मिकता का परिचय दिया है, इसके लिये उनकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है।
साधना-उपासना ही नहीं है। यह सारे कर्म-काण्ड जीवन को धार्मिक पथ पर चलाने और उसका अभ्यस्त बनाने के साधन मात्र हैं। पवित्र कर्म-काण्ड करने से मनुष्य के कुसंस्कार तथा अहितकर अभ्यास मिटते हैं और उनके स्थान पर सुसंस्कार और कल्याणपूर्ण अभ्यासों का समावेश होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-January
साधना जिन्होंने की हैं वे अपने अनुभव से कहते आये है :-
साधना पथ का पथिक तो कहा जा सकता है पर उसे मिलने वाली उपलब्धियों के बारे में निराशा ही व्यक्त की जा सकती है।
साधना देशधर्म, समाज एवं संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए होनी चाहिए। उसी के उपयुक्त अपने विचारों और कार्यक्रमों को ढालने के लिए हर आध्यात्मिक व्यक्ति को कटिबद्ध होना चाहिए।
साधना सामग्री भी जुटानी पड़ती हैं। यदि कोई पिता बच्चे को स्नेह तो दे, उपदेश भी दिया करे पर उसके लिए पुस्तक, फीस, भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था न करे, तो बालक की प्रगति का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। बिल्कुल यही बात आध्यात्मिक क्षेत्र में लागू होती है। साधना कैसे करनी चाहिए इसका विधान बना देना ही पर्याप्त नहीं, यह उद्देश्य तो पुस्तकों से भी पूरा हो सकता है। मार्ग-दर्शक या गुरु की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि वह रुकी हुई गाड़ी को गतिशील बनाने के लिए शिक्षा मात्र ही न दिया करें वरन् अपनी सामर्थ्य एवं तपश्चर्या का अनुदान देकर साधक को मंजिल तक पहुँचाने के लिए सक्रिय सहायता देता रहे।
साधना परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे मजबूत हाथों में सौंप दिया जाय। जो उपयुक्त व्यक्ति होंगे उन्हें इसी बसन्त पंचमी से उस साधन क्रम का आरम्भ भी करा देंगे। साधना का विस्तृत विवरण फरवरी के अंक में होगा। बसन्त पंचमी 4 फरवरी की है। तब तक शायद सब के पास अखण्ड-ज्योति न पहुँच पाये ऐसी दशा में उस दिन इतना ही करना पर्याप्त होगा कि उस दिन उपवास रखा जाय।
साधना आरम्भ कराने वाले हैं और उसमें उनका ही नहीं हमारा भी योग रहेगा।
साधना नहीं कहना चाहिए। क्योंकि उनका उद्देश्य ही भिन्न है। आत्मा की मलिनता और संकीर्णता का परिष्कार कर उसे उदात्त, महान् एवं परमार्थ परायण बनाना ही अध्यात्म होता है। इस दिशा में जितनी आकांक्षा प्रबल हो, जितना प्रयत्न प्रबल हो, जितनी प्रगति हो रही हो, वहाँ उतनी ही अध्यात्म की विद्यमानता माननी चाहिए। ऐसा अध्यात्म ही कल्प-वृक्ष, अमृत, पारस आदि के नाम से पुकारा जाता है, उसी को पाकर जीव ईश्वर बनता है।
साधना पद्धति है कि उसके माध्यम से हम अपने आप में अनेकों आध्यात्मिक, मानसिक, चारित्रिक गुण, विशेषताओं का अर्जन कर सकते हैं। विक्टर ह्यूगो ने कहा है “ज्यों-ज्यों धन की थैली दान में खाली हो जाती है त्यों-त्यों दिल भरता जाता है।” क्या दान के बाद मिलने वाला सन्तोष, प्रसन्नता का धन भौतिक सम्पत्ति से कम मूल्यवान है? स्वामी विवेकानन्द अमेरिका प्रवास में थे। एक दिन की बात है वे अपना भोजन बनाकर ही चुके थे कि बच्चों की एक टोली हँसती -खेलती आ निकली।
साधना का फल भी किसी को क्या मिलेगा ?
साधना के साथ ही साथ चित्त की एकाग्रता, स्थिरता, दृढ़ता और मानसिक गुणों का विकास होता है। आगे चलकर प्राणायाम से प्राण पर नियन्त्रण प्राप्त करते हैं और शरीरस्थ प्राणों को जागृत करते हैं। इनका स्वास्थ्य पर विलक्षण प्रभाव पड़ता है जिसे एक प्रकार से चमत्कार ही माना जा सकता है। हमारे यहाँ इस सम्बन्ध में बड़ी तत्परतापूर्वक खोज की गई है।
साधना में निमग्न कलाकार, देश को एक सूत्र में बाँधकर उन्नति प्रगति की ओर अग्रसर करने वाले राजनीतिज्ञ की अभावग्रस्तता समाज की भूख है इसे तृप्त करना समाज का उत्तरदायित्व है। यदि ये लोग इन महान कार्यों को छोड़ कर जन साधारण की तरह अपने पेट पालन में लगे रहेंगे तो समाज का विकास रुक जायगा। ये लोग जनकल्याण के लिए अपनी साधना निश्चिन्त होकर जारी रख सकें इसके लिए आवश्यक है कि समाज उनका निर्वाह, भरण पोषण करता रहे। दान की परम्परा इसीलिए कायम हुई। इन लोगों का निर्वाह करना ठीक समाज की ही भूख बुझाता है।
साधना मार्ग का यह एक प्रकट रहस्य है कि साधक अकेला ही, केवल अपने जप-तप के बल पर ही तेजी के साथ सफलता की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। उसे कभी मार्ग-दर्शक ही नहीं, अनुदान-दाता की भी आवश्यकता होती है। यदि वह न मिले तो मंजिल कठिन पड़ती है। यों असम्भव तो कुछ भी नहीं, आत्मा में अपरिमित शक्ति विद्यमान है, वह बिना सहायता के भी अपने प्रबल पुरुषार्थ और अविच्छिन्न मनोयोग के बल पर सब कुछ कर सकने में समर्थ हो सकती है। फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि इस प्रकार के एकाकी प्रयत्न कष्टसाध्य अवश्य हैं।
साधना निर्वाध रूप से की जा सके बिना किसी को हानि पहुँचाये।
साधना और उसकी सफलता-
साधना का मार्ग भी ऐसा ही है। इसमें सहचर, स्नेही, मार्गदर्शक ही नहीं अनुदान दाता की आवश्यकता भी पड़ती है और जब यह आवश्यकता पूरी हो जाय तो सफलता की सम्भावना अधिक असंदिग्ध हो जाती है।
साधना, गुरु, शिष्य, ईश्वर सिद्धि आदि शब्दों की दुर्गति हो रही ही कही जा सकती है। उन परिस्थितियों में गुरु-परम्परा क्या निभेगी। उस नकली साधना का फल भी किसी को क्या मिलेगा ?
साधना की तरह ही प्रभावशाली बना देता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।
साधना
साधना योजना उस आधार पर बनावें।
साधना से आध्यात्मिक भावनाओं का तेजी से विकास होने लगता है इसलिए हमारे धर्म और संस्कृति में उपासना को सर्वप्रथम और अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है।
साधना निश्चिन्त होकर जारी रख सकें इसके लिए आवश्यक है कि समाज उनका निर्वाह, भरण पोषण करता रहे। दान की परम्परा इसीलिए कायम हुई। इन लोगों का निर्वाह करना ठीक समाज की ही भूख बुझाता है। जब इनके माध्यम से समाज के पेट में दिया गया दान पाचन होकर रस रूप में परिवर्तित होता है, वह समाज के ही अंग-अंग में समा जाता है। यह समाज को ही पुष्ट करता है।
साधना का विस्तृत विवरण फरवरी के अंक में होगा। बसन्त पंचमी 4 फरवरी की है। तब तक शायद सब के पास अखण्ड-ज्योति न पहुँच पाये ऐसी दशा में उस दिन इतना ही करना पर्याप्त होगा कि उस दिन उपवास रखा जाय। दूध, दही, शाक, फल पर रहा जाय। प्रातःकाल सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व उठकर शरीर को शान्त और मन को स्थिर रखकर ऐसा ध्यान किया जाय कि-”हमारे चारों ओर एक प्रकाश पुंज आच्छादित है और उसकी सूक्ष्म तरंग हमारे शरीर एवं मन के कण-कण में प्रवेश करती हुई नया प्रकाश, नया उल्लास एवं नया सन्देश धारण करा रही है।
साधनाएँ हैं इनसे मानवीय शक्तियों के गुप्त केन्द्रों का प्रकाश प्रस्फुटित होने में सहायता मिलती है। शास्त्रकारों ने जिस विधि-विधान का उल्लेख किया है, उन विधानों को सही रूप में जन-साधारण तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य था। ऋषि ऋण से उऋण होने के लिए यह हमें करना ही चाहिए था। किया भी है और करते भी रहेंगे। अब गुरु परम्परा का प्रश्न आता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।
साधना है। सचाई, ईमानदारी से धन कमाना और उसे जन कल्याण के लिए लुटा देना क्या कम तपस्या है?
साधना का व्यवस्थित विधान है। सभी भाँति उन्नत, विकसित कल्याणकारी, आनन्दयुक्त जीवन जीने का कर्मशास्त्र है- धर्म। इसीलिए डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में “धर्म की शक्ति ही जीवन की शक्ति है। धर्म की दृष्टि ही जीवन की दृष्टि है।” जीवन और धर्म की अनन्यता आवश्यक है, अनिवार्य है।
साधना कैसे करनी चाहिए इसका विधान बना देना ही पर्याप्त नहीं, यह उद्देश्य तो पुस्तकों से भी पूरा हो सकता है। मार्ग-दर्शक या गुरु की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि वह रुकी हुई गाड़ी को गतिशील बनाने के लिए शिक्षा मात्र ही न दिया करें वरन् अपनी सामर्थ्य एवं तपश्चर्या का अनुदान देकर साधक को मंजिल तक पहुँचाने के लिए सक्रिय सहायता देता रहे।
साधना पुनीत आमरण।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-September
साधनायें मन को पकड़ कर ही की जाती हैं इस लिये ध्यान की प्रक्रिया अत्यन्त आवश्यक है। ध्यान से मन की एकाग्रता बढ़ती है और मनुष्य लक्ष्यवेध के लिये तैयार होता है।
साधनायें प्रयुक्त होती हैं, किन्तु उनका मूल जप और तप है। इन दो पहियों के सहारे ही आत्म-विकास की यात्रा पूरी होती है। इन्हें लक्ष्यवेध का मुख्य अंग मानकर अपनाना चाहिये।
साधना की बढ़ती हुई कठिनता के अनुरूप शक्ति और सामर्थ्य जप और तप द्वारा पूरी होती है। साधना की इस वैज्ञानिक पद्धति को छोड़कर कोई भी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता।
साधना के बाद पाये आत्मानन्द से किसी दशा में कम नहीं थी। दीन दुखियों के साथ बैठकर सच्ची सहानुभूति से उनका दुख बटाने में जो आनन्द है उसका अनुभव वे भाग्यवान ही कर सकते हैं जिनका हृदय पर-पीड़ा से कातर हो उठता है। जिसने लोभ, मोह, काम, क्रोध और अहंकार के शत्रुओं को परास्त कर लिया उसका हृदय अवश्य ही विश्व प्रेम से भरकर धन्य हो उठेगा। जो सुख चाहता है शान्ति की कामना रखता है वह निःसार साधनाओं को छोड़कर स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तरह जाये और दीन दुखियों की सेवा करता हुआ उनकी कातर तथा करुणा मूर्ति में परमात्मा की झाँकी प्राप्त करे। जिसे आनन्द की प्यास हो वह दुखियों के पास जाये और अनुभव करे कि दूसरे का दुख बटाने पर हृदय में किस दिव्य आनन्द का उद्रेक होता है?
साधना, राग, वैराग्य, निष्काम कर्मयोग और आत्मा-परमात्मा की प्रमाणयुक्त विवेचना करने पर भी अर्जुन का मोह-भाव समाप्त न हुआ, आसक्ति न गई, अहंकार न मिटा, तो भगवान को अपना अंतिम अस्त्र उठाना पड़ा। अपने विराट् रूप का प्रदर्शन किया भगवान ने। उनके विकराल रूप का दर्शन कर अर्जुन काँपने लगा। उसने साश्चर्य देखा- वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, सूर्य, चन्द्रमा सब उसी विराट के नन्हें-नन्हें टुकड़े हैं। सारा संसार उन्हीं में समाया हुआ है।
साधना में शिथिलता आ जाती है।
साधना द्वारा ज्ञान और अनुभव में परिपक्व हुये ‘वर्द्धमान’ ने देखा चारों ओर किस कदर हाहाकार उठा हुआ है। लोग अज्ञानान्धकार में इधर-उधर भटक रहे हैं। उनको एक आन्तरिक प्रेरणा हुई कि वे विश्व के अज्ञानी प्राणियों के कल्याण के लिये कोई युग के अनुरूप मार्ग खोज निकालें।
साधना में कभी नहीं पाया था।
साधना का अभ्यास भी क्रमेक पद्धति से होता है। सर्वं प्रथम पूजा में जप करना बताया जाता है। कई व्यक्ति इसे अनावश्यक, उपहासास्पद एवं काल्पनिक मानते हैं किन्तु आत्म साक्षात्कार के लिये जप प्रारम्भिक शर्त है उसके बिना ऊँची कक्षा में प्रवेश पाना कठिन पड़ता है।
साधना की इस वैज्ञानिक पद्धति को छोड़कर कोई भी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता।
साधना की पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शुरू-शुरू में यह बताया जाता है कि अमुक चित्र का, गायत्री माता या भगवान राम के चित्र का दोनों भौंहों के बीच ध्यान किया करो। उस ध्यान में इष्ट का साक्षात्कार भले ही न होता हो पर आत्म-विवेचन की, विचार-मंथन क्रिया उसी समय से प्रारम्भ हो जाती है। जापक का मन पहले पहल इधर-उधर दौड़ता है तो मन में विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है। वह हर एक वस्तु को संदिग्ध रूप से देखने लगता है।
साधना नहीं करनी है। वह एक विस्मय मूलक दृष्टि-कोण से उसकी रचना इस संसार को देखे और परम शिल्पी की परम रचना समझकर उसका सम्मान करे, इतना भर कर लेने से उसकी अनुभव शक्ति स्वतः प्रबुद्ध हो उठेगी, और एक बार प्रबुद्ध हो जाने पर वह शक्ति पुनः निहित नहीं होगी।
साधनाओं को छोड़कर स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तरह जाये और दीन दुखियों की सेवा करता हुआ उनकी कातर तथा करुणा मूर्ति में परमात्मा की झाँकी प्राप्त करे। जिसे आनन्द की प्यास हो वह दुखियों के पास जाये और अनुभव करे कि दूसरे का दुख बटाने पर हृदय में किस दिव्य आनन्द का उद्रेक होता है?
साधना के द्वारा इस सत्य को सिद्ध किया और लोक शिक्षण के मार्ग पर तभी प्रवृत्त हुये जब उन्हें जितेन्द्रिय होने का अधिकार मिला। आत्म-साधना द्वारा ज्ञान और अनुभव में परिपक्व हुये ‘वर्द्धमान’ ने देखा चारों ओर किस कदर हाहाकार उठा हुआ है। लोग अज्ञानान्धकार में इधर-उधर भटक रहे हैं। उनको एक आन्तरिक प्रेरणा हुई कि वे विश्व के अज्ञानी प्राणियों के कल्याण के लिये कोई युग के अनुरूप मार्ग खोज निकालें।
साधना में जो सिद्धियाँ उन्हें प्राप्त हुई वे नर-नारायण की सेवा में प्राप्त सुख की तुलना में बड़ी ही तुच्छ तथा हेय थीं। उनमें उतना ही अन्तर था जितना एक लोलुप धनवान और आत्म तुष्ट योगी में हो सकता है। इस निःसारता का अनुभव करके उन्होंने तृण के समान तुच्छ तान्त्रिक साधना को त्याग कर जन सेवा की महान गुणमयी साधना को अपना लिया।
साधना को अपना लिया।
साधना के योग्य हो सके। कठिनाइयाँ मनुष्य को चमकाने और उसे तेजवान बनाने के लिए ही आती हैं। कठिनाइयों का जीवन में वही महत्व है जो उद्योग में श्रम का और भोजन में रस का।
साधना में उपरोक्त तीनों तथ्य समान रूप से गुंथे रहे हैं। फलस्वरूप अधिक नहीं तो इतना कहा जा सकता है कि हमारी साधना निरर्थक नहीं गई, सार्थक हुई है। दूसरे लोग हैं जो दिन-रात माला ही फेरते हैं और जनकल्याण के पुनीत धर्म कर्तव्य का महत्व नहीं समझते। उनकी उसी भूल ने उनके सारे भजन-पूजन में किये गये श्रम को एक प्रकार से निरर्थक बनाकर नष्ट कर दिया। हम ऐसे हजारों मनुष्यों को जानते हैं जो भजन हम से अधिक करते हैं, यों कहना चाहिये कि भजन के अतिरिक्त और कुछ काम ही उनके पास नहीं है।
साधना के बाद प्राप्त हुआ था। जब तक कोई अपने आपको शक्ति सम्पन्न न बना ले, अभ्यन्तर शत्रु-राग, द्वेष मोह और इन्द्रियों पर विजय न पा ले तब तक वह विश्व-कल्याण के लिये कुछ ठोस निर्देशन कर भी नहीं सकता। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत साधना के द्वारा इस सत्य को सिद्ध किया और लोक शिक्षण के मार्ग पर तभी प्रवृत्त हुये जब उन्हें जितेन्द्रिय होने का अधिकार मिला। आत्म-साधना द्वारा ज्ञान और अनुभव में परिपक्व हुये ‘वर्द्धमान’ ने देखा चारों ओर किस कदर हाहाकार उठा हुआ है। लोग अज्ञानान्धकार में इधर-उधर भटक रहे हैं।
साधना में तत्पर हो उसी को पूरा करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। अपनी परिस्थितियों से बहुत अधिक की कामना करना ही मनुष्य की दुःखद स्थिति का कारण है। अनियन्त्रित मनोरथ का त्याग करना ही अपने पूर्व-प्रारब्ध के लिये संतोष करने का अच्छा उपाय है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि आगे के लिये अधिक सुँदर परिस्थितियाँ प्राप्त करने की चेष्टा न करे। श्रेय की इच्छा करने वाले मनुष्य को न तो निष्क्रिय रहना चाहिये और न ही विविध कामनायें करनी चाहिये।
साधना को त्याग कर जन सेवा की महान गुणमयी साधना को अपना लिया।
साधना से मोक्ष पाकर गये हुये रामकृष्ण परमहंस से न संसार को कोई लाभ होता और न संसार उन्हें जानता। इसके विपरीत नर-नारायण की उपासना तथा भक्ति करने पर उन्हें मोक्ष तो मिला ही होगा, इसके अतिरिक्त संसार उनकी सेवाओं का लाभ पाकर उन्हें एक अवतारी पुरुष के रूप में याद करता रहेगा।
साधना कर सकता है।
साधना तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश लिया। अनन्तर उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
साधना क्यों न हो, वह कर्त्ता को दबा देगी, ऊँचे उठाने के बजाय नीचे गिरा देगी।
साधना उपासना के साथ ‘लोक सेवा’ भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसकी उपेक्षा करने पर न किसी की साधना सफल हुई है और न होगी। हमने स्वयं इसी मार्ग का अवलम्बन किया है और जब तक जीवित है इसी मार्ग पर चलते रहेंगे। उपासना को जितना महत्व हम देते हैं उससे कम जीवन शोधन और लोक सेवा को नहीं देते। हमारी जीवन साधना में उपरोक्त तीनों तथ्य समान रूप से गुंथे रहे हैं।
साधना भी की। इस तान्त्रिक साधना में जो सिद्धियाँ उन्हें प्राप्त हुई वे नर-नारायण की सेवा में प्राप्त सुख की तुलना में बड़ी ही तुच्छ तथा हेय थीं। उनमें उतना ही अन्तर था जितना एक लोलुप धनवान और आत्म तुष्ट योगी में हो सकता है। इस निःसारता का अनुभव करके उन्होंने तृण के समान तुच्छ तान्त्रिक साधना को त्याग कर जन सेवा की महान गुणमयी साधना को अपना लिया।
साधना बड़ी और तप महान था। उन्होंने जन -सेवा द्वारा भगवत् प्राप्ति का जो मार्ग निकाला वह कोई कल्पना अथवा मात्र धारणा नहीं थी बल्कि एक चिरन्तन वास्तविकता तथा त्रयकालिक सत्य था। नर-नारायण की सेवा का निर्देश स्वयं उनका नहीं था। वह अवश्य ही उनकी निर्विकार आत्मा में प्रतिध्वनित परमात्मा का ही आदेश था, जिसका पालन उन्होंने स्वयं किया और वैसे ही करने का उपदेश अपने शिष्यों, भक्तों एवं अनुयायियों को भी दिया।
साधना सफल हुई है और न होगी। हमने स्वयं इसी मार्ग का अवलम्बन किया है और जब तक जीवित है इसी मार्ग पर चलते रहेंगे। उपासना को जितना महत्व हम देते हैं उससे कम जीवन शोधन और लोक सेवा को नहीं देते। हमारी जीवन साधना में उपरोक्त तीनों तथ्य समान रूप से गुंथे रहे हैं। फलस्वरूप अधिक नहीं तो इतना कहा जा सकता है कि हमारी साधना निरर्थक नहीं गई, सार्थक हुई है।
साधना-निष्काम कर्म की भावना ही है। कठोर साधनों की अपेक्षा यह मार्ग अधिक सरल है जिसे गीता में “निष्काम कर्म योग” के नाम से प्रतिपादित किया गया है। कर्तव्य भावना का ज्ञान और मनोरथ के परित्याग से परमात्मा की स्थिति का बोध हो जाता है और मनुष्य जन्म मरण के भव बन्धन से मुक्ति पा लेता है। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसके लिये निष्काम-कर्म से बढ़कर और कोई दूसरा उपाय श्रेष्ठ नहीं है।
साधना तक ही सीमित रहने से काम न चलेगा, उन्हें नव-निर्माण का उत्तरदायित्व भी वहन करना होगा। उन्हें एक संगठनकर्ता, धर्मोपदेशक एवं युग-निर्माता के रूप में परिणत होना चाहिए। अपने व्यक्तिगत कार्य करते हुए इन प्रयोजनों के लिये भी उन्हें समय निकालना ही चाहिये। सेवा के बिना मानव जीवन की सार्थकता नहीं। ईश्वर की भक्ति का सच्चा स्वरूप मानव प्राणी का आन्तरिक स्तर उठाने के लिए किया गया प्रयत्न ही हो सकता है।
साधना
साधना के रूप में उन्होंने उपासना का मार्ग अपनाया। स्वयं अपनी विधि एवं बुद्धि से की हुई उपासना जब कोई उत्साहवर्धक फल लाते दिखलाई न दी तब उन्होंने क्रम से भारती ब्रह्मचारी और नग्न वेदान्ती तोतपुरी से सगुण साधना तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश लिया। अनन्तर उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
साधनावस्था से होकर आगे बढ़ना ही स्वाभाविक नियम है। अकुलाहट, तीव्रता या चित्त में विकार आना मनोरथ पूरा न होने का लक्षण है।
साधना से निर्विकार एवं निर्मल हृदय, दूसरे दीन दरिद्रों तथा आकुल समाकुलों की सेवा, फिर क्यों न उनको एक ऐसी कारुणिक अनुभूति का लाभ होता जो युग-युग की साधना के बाद पाये आत्मानन्द से किसी दशा में कम नहीं थी। दीन दुखियों के साथ बैठकर सच्ची सहानुभूति से उनका दुख बटाने में जो आनन्द है उसका अनुभव वे भाग्यवान ही कर सकते हैं जिनका हृदय पर-पीड़ा से कातर हो उठता है। जिसने लोभ, मोह, काम, क्रोध और अहंकार के शत्रुओं को परास्त कर लिया उसका हृदय अवश्य ही विश्व प्रेम से भरकर धन्य हो उठेगा। जो सुख चाहता है शान्ति की कामना रखता है वह निःसार साधनाओं को छोड़कर स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तरह जाये और दीन दुखियों की सेवा करता हुआ उनकी कातर तथा करुणा मूर्ति में परमात्मा की झाँकी प्राप्त करे। जिसे आनन्द की प्यास हो वह दुखियों के पास जाये और अनुभव करे कि दूसरे का दुख बटाने पर हृदय में किस दिव्य आनन्द का उद्रेक होता है?
साधना निरर्थक नहीं गई, सार्थक हुई है। दूसरे लोग हैं जो दिन-रात माला ही फेरते हैं और जनकल्याण के पुनीत धर्म कर्तव्य का महत्व नहीं समझते। उनकी उसी भूल ने उनके सारे भजन-पूजन में किये गये श्रम को एक प्रकार से निरर्थक बनाकर नष्ट कर दिया। हम ऐसे हजारों मनुष्यों को जानते हैं जो भजन हम से अधिक करते हैं, यों कहना चाहिये कि भजन के अतिरिक्त और कुछ काम ही उनके पास नहीं है। इतने पर भी वे आत्मिक प्रगति के नाम पर छूँछ ही बने हुए हैं।
साधना करने लगे। साधना के रूप में उन्होंने उपासना का मार्ग अपनाया। स्वयं अपनी विधि एवं बुद्धि से की हुई उपासना जब कोई उत्साहवर्धक फल लाते दिखलाई न दी तब उन्होंने क्रम से भारती ब्रह्मचारी और नग्न वेदान्ती तोतपुरी से सगुण साधना तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश लिया। अनन्तर उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
साधना करनी होती है। जीवन के जिस भाग को शुद्ध करते चलते हैं उसी में परमात्मा का प्रकाश झलकने लगता है और बढ़ने का साहस मिलने लगता है। श्रद्धा और विश्वास की प्रशस्ति निरन्तर बढ़ती रहती है तो लक्ष्य की समीपता भी बढ़ती है और पूर्ण समर्पण की स्थिति दिखाई देने लगती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-May
साधना शक्ति का ह्रास हुआ। 16 वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक हिन्दू-धर्म पर निरन्तर प्रहार होते रहे, जिससे साधना का दक्षिण मार्ग प्रायः विलुप्त हो गया। मुसलिम शासकों ने हिन्दुओं को हीन जाति मानकर हमारे मन्दिरों को भ्रष्ट तथा शिक्षण पद्धति को नष्ट करके ऐसे भ्रामक तथ्य भर दिये, जिससे हिन्दुओं ने भी अपने आप पर अविश्वास करना प्रारम्भ कर दिया। असंरक्षित धर्म इस तरह गिरता ही चला गया। वेद लुटे, स्मृतियों, पुराणों में स्वार्थी और चाटुकार हिन्दुओं ने ही भ्रम पैदा करने वाले श्लोक गढ़-गढ़कर भर दिये।
साधना बल जागृत हो जाय तो हिन्दू धर्म पुनः अपना पूर्व गौरव प्राप्त कर सकता है। इसे ही अब जगाना शेष रहा है।
साधना आदि अनेकों क्षेत्रों में संकल्प शक्ति से द्रुतगामी सफलता अर्जित की जा सकती है।
साधना-निर्गत होने के कारण ही प्रामाणिक माना गया हैं। उस में शंकाओं के लिये कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई। जो सिद्धान्त बनाये गये है, वे पूर्ण वैज्ञानिक हैं। यही कारण है कि अनेक ऐतिहासिक आघातों के बावजूद आज भी यह फल-फूल रहा है। कठिनाइयों में भी उसकी आन्तरिक शक्ति ज्यों की त्यों विद्यमान रही है और आगे भी बनी रहेगी।
साधनाओं को लोग बिलकुल ही भूल गये। धर्मान्तर ने इस ह्रास को और सहयोग दिया। कुल मिला कर साधना शक्ति का यहाँ लोप-सा हो गया।
साधना शक्ति का यहाँ लोप-सा हो गया।
साधना के पूर्ण वैज्ञानिक अभ्यासों का भी समावेश होना चाहिये। धर्म की रक्षा भी शक्ति से ही होती है। वह शक्ति व्यक्ति की भी हो सकती है, और समाज की भी। पर भारतीय धर्म में साधना-शक्ति का जो सुन्दर योग रहा है, वह अधिक श्रेष्ठ है, अब उसी के विकास का आवश्यकता भी अधिक है।
साधना-शक्ति का जो सुन्दर योग रहा है, वह अधिक श्रेष्ठ है, अब उसी के विकास का आवश्यकता भी अधिक है।
साधना का दक्षिण मार्ग प्रायः विलुप्त हो गया। मुसलिम शासकों ने हिन्दुओं को हीन जाति मानकर हमारे मन्दिरों को भ्रष्ट तथा शिक्षण पद्धति को नष्ट करके ऐसे भ्रामक तथ्य भर दिये, जिससे हिन्दुओं ने भी अपने आप पर अविश्वास करना प्रारम्भ कर दिया। असंरक्षित धर्म इस तरह गिरता ही चला गया। वेद लुटे, स्मृतियों, पुराणों में स्वार्थी और चाटुकार हिन्दुओं ने ही भ्रम पैदा करने वाले श्लोक गढ़-गढ़कर भर दिये। तप और उसके प्रभाव को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया कि या तो उसे लोग असम्भव ही मान बैठें या उन पर पूरी तरह से अविश्वास करने लगें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1965-July
साधना है। उद्देश्य उसका भौतिक है या आध्यात्मिक यह दूसरी बात है पर जीवन की एक दिशा होती जरूर है। प्रत्येक उद्देश्य की पूर्ति के लिये जो उपक्रम किये जाते हैं, सफलता के लिये उनमें एकाग्रता तथा संलग्नता बहुत जरूरी है। शिकारी तीर चलाने के पूर्व साँस रोक कर सारा ध्यान अपने शिकार पर जमा देता है। मनोयोग थोड़ा-सा भी अस्थिर हो जाय तो तीर कहीं का कहीं जा गिरे।
साधनाओं के लिये तो संयम साक्षात् कामधेनु है। बड़े-बड़े चमत्कार दिखाने वाले पहलवान राममूर्ति संयम के बल से बड़ी-बड़ी गाड़ी मोटरों को रोक लेते थे। हाथी को छाती पर चढ़ा लेना उनके लिये सहज कार्य था। संयम ही वस्तुतः साधना की पृष्ठ भूमि है इसके बिना कोई विशेष शक्ति पाना प्रायः असम्भव ही है।
साधनायें मनुष्य की अन्तिम आवश्यकतायें पूरी करती हैं किन्तु सद्भावनाओं तथा सद्गुणों में ऐसी विलक्षण प्रतिभा होती है जिससे मनुष्य के बाह्य एवं आन्तरिक दोनों तरह के जीवन का मूलभूत उद्देश्य भी सिद्ध हो जाता है। धर्म की प्रारम्भिक शिक्षा यह होती है कि मनुष्य अपनी सद्बुद्धि का विकास करे और उसका अन्तिम उद्देश्य पूर्ण शान्ति की प्राप्ति होती है।
साधना के समस्त उपयोगी उपकरण इसमें मौजूद हैं अतः शरीर की यदि कुछ उपयोगिता हो सकती है तो वह इतनी ही है कि अपने ज्ञान, बुद्धि और विवेक के द्वारा, शिक्षा, विचार और वाणी के द्वारा बाह्य और आन्तरिक स्थिति का सही ज्ञान प्राप्त कर लें ताकि फिर दूसरी योनियों में भटकना न पड़े। शरीर के सुख इस दृष्टि से न तो आवश्यक ही हैं और न उपयोगी ही हैं। हमारा उद्देश्य जीवन-शोधन और पारमार्थिक लक्ष्य की प्राप्ति ही होना चाहिये। मृत्यु से डरने की आवश्यकता इसलिये भी नहीं है कि वह एक अनिवार्य स्थिति है। मनुष्य यदि डरे भी तो भी उससे छुटकारा नहीं मिल सकता।
साधना की जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करना है तो साहित्य की शरण लेनी ही पड़ेगी। ऐसा साहित्य खोजना पड़ेगा जिससे ज्ञान संवर्द्धन हो और आत्मा का परिष्कार हो। साहित्य हमारी शक्ति का उद्रेक है हमें साहित्य के द्वारा अपनी प्रतिभा जगाने का कार्य अविलम्ब शुरू कर देना चाहिये।
साधना है। इन्द्रियों की लालसायें, क्रोध, मोह, पापकर्म आदि से जो लोग घिरे रहते हैं उनके शरीर और मन का पतन निश्चित है। इस कारण उन्हें व्याधियाँ सताती रहें तो यह कुछ अनहोनी बात न कही जायेगी। हीनता, दुर्बलता और मानसिक दुर्दशा का कारण ये वासनायें ही हैं उनसे मुक्त हुये बिना आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। मनमें जब तक क्रोध है, तब तक विष की क्या आवश्यकता?
साधना की पृष्ठ भूमि है इसके बिना कोई विशेष शक्ति पाना प्रायः असम्भव ही है।
साधना परमात्मा की ध्यान-आराधना ही है। इससे अपनी आत्मा में परमात्मा का सूक्ष्म दिव्यतत्व झलकने लगता है और अपूर्व शक्ति की अनुभूति होती है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रार्थना से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति कर सकते हैं। नियमपूर्वक की गई प्रार्थना कभी असफल नहीं हो सकती।
साधना का कार्य है, अतः संसार में रह कर यहाँ की परिस्थितियों का सही लाभ प्राप्त करने के लिए विचारों के महत्व को स्वीकार किया जाता है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए विचार शक्ति के सदुपयोग की जरूरत होती है, इससे मुमुक्षता प्राप्त होती है।
साधना की सफलता के लिये विचारों की आवश्यकता प्रमुख है। विचार संचालन करते हैं इसलिये वे श्रेष्ठ हैं इस बात से इनकार करने का कोई कारण भी खोज में नहीं आया।
साधना से और व्यवहार से जब तक जीवन की दिशा सात्विक नहीं होती, गुण, कर्म और स्वभाव में सद्तत्वों का समावेश नहीं होता, जड़ता तब तक दूर हो नहीं सकती। आत्म-विद्या के देवालय में प्रवेश प्राप्त किये बिना न तो शाँति मिल सकती है न संतोष। विद्या सुखी जीवन की प्रमुख आवश्यकता है इसे यों ही ठुकराया नहीं जा सकता।
साधना और एकाग्रता से संचय करें और उसे इन्द्रिय-छिद्रों से निर्बाध बहजाने दे तो शक्ति शाली बन सकने का अनुमान गलत ही सिद्ध होगा। प्रयत्न और परिश्रम का फल संयम से मिलता है । जो अपने आवेगों, भावों और इच्छाओं को वश में रखता है, आत्म-विजय की कीर्ति का वही सच्चा अधिकारी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-November
साधना का चरम लक्ष्य है। जिसने अपने को जान लिया, उसने संसार को इच्छानुकूल बनाने और पदार्थों तथा प्राणियों को उल्लास प्रदान कर सकने का मार्ग हस्तगत कर लिया।
साधना सम्भव है।
साधना कर चुके कर रहे हैं वे उसी अनुपात से चमत्कारी और सिद्ध पुरुष कहलाते हैं। इन विशेषताओं का परिचय जहाँ-तहाँ अनायास भी मिलता रहता है। प्रयत्नपूर्वक तो उन्हें कोई भी कभी भी उपार्जित कर सकता है।
साधना विज्ञान का का आरम्भ भी आत्मबोध से होता है। अपने आपको जानने के लिए गम्भीर चिन्तन, मनन अध्ययन और निदिध्यासन करने के लिए अग्रसर होने का निश्चय ही आत्म साधना का उपासना, तपश्चर्या और योग साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-
साधना स्तर के विभिन्न प्रयोग करते रहे हैं।
साधना करते, प्रशिक्षण पाते तथा प्रेरणाप्रद वातावरण का असाधारण लाभ लेते थे। ऐसे कारणों से ही तीर्थों की स्थापना हुई थी। उन कसौटियों पर कसने के उपरान्त ही कल्प साधना जैसे परिष्कार-उपचार की बात सोचनी चाहिए।
साधना का प्रतिफल भी अपेक्षाकृत कुछ कम ही रहता है। सर्दी के दिनों में उत्तराखण्ड यात्रा बन्द हो जाने से भीड़ भी स्वभावतः कम हो जाती है। साधना में मन लगना है। वातावरण शान्त रहता है और मार्गदर्शकों को पर्यटकों की हठवादिता से उत्पन्न खोज भी नहीं रहती। ऐसी दशा में साधना की सफलता का अनुपात भी बढ़ा चढ़ा रहना स्वाभाविक है।
साधना इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर की जाती है।
साधना की इस अवधि में ईश्वर की असीम कृपा से हस्तगत हो रहा है।
साधना सत्र चलते तो निरन्तर है पर गर्मी के दिनों में पर्यटकों की घुस पैठ और अनगढ़ अनुशासन हीनता फैलाते रहने के कारण भी वातावरण अशान्त बना रहता है। ऋतु भी साधना के अनुकूल नहीं पड़ती। इसलिए साधना का प्रतिफल भी अपेक्षाकृत कुछ कम ही रहता है। सर्दी के दिनों में उत्तराखण्ड यात्रा बन्द हो जाने से भीड़ भी स्वभावतः कम हो जाती है। साधना में मन लगना है।
साधनाओं के लिए भी सर्वोत्तम मानी जाती है। शीत प्रदेश के निवासी अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर, बलिष्ठ और दीर्घ जीवी होते हैं हिमालय में साधनात्मक सफलताएँ वहाँ की जिन विशेषताओं के कारण उपलब्ध होती हैं उनमें वहाँ का शीत प्रधान वातावरण भी एक बड़ा कारण है।
साधना से अर्जित उपलब्धियाँ ऐसी असाधारण हैं जिन्हें असंभाव्य ही कहा जा सकता है।
साधना के सम्बन्ध में भी। यदि मन को भी यहीं रोक रखा गया होता तो श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का भी समावेश रहता है और क्रिया के साथ विचारणा भावना का समुचित संयोग रहने से दोनों तार मिलने पर बिजली की धारा बहती, दो पहिए की गाड़ी आगे चलती है।
साधना व्यवस्था भी वैसी ही उपलब्ध है, जैसी कि थके माँदों को सेनिटोरियमों में राहत मिलती है।
साधना के लिए स्थान विशेष में रहा जाय, उतने दिनों अपने आपको गृह निवृत्त, एकान्त सेवी, योगी-तपस्वी की मनोभूमि बनाकर रहा जाय। अपने कमरे को एक गुफा माना जाय और जिस प्रकार तपसी अपनी गुफा में एकान्त सेवन करते हैं लगभग उसी स्तर की मनोदशा अपनाकर रहा जाय। इन दिनों साँसारिक समस्याएँ सुलझाने, लोगों के साथ उलझने, लिपटने से दूर रहकर आत्म-समीक्षा में निरत रहा जाय। संचित कुसंस्कारों से छूटने और उज्ज्वल भविष्य का ढाँचा खड़ा करने की योजना बनाने में संलग्न रहा जाय। इसके लिए चिन्तन, स्वभाव, समय निर्धारण, कार्यक्रम, व्यवहार में जो परिवर्तन अभीष्ट है उसका शुभारंभ इन्हीं दिनों किया गया जाना चाहिए और इस अवसर को अभीष्ट प्रयोजन के लिए सर्वोत्तम मुहूर्त मानना चाहिए।
साधना की सफलता का अनुपात भी बढ़ा चढ़ा रहना स्वाभाविक है।
साधना के अनुकूल नहीं पड़ती। इसलिए साधना का प्रतिफल भी अपेक्षाकृत कुछ कम ही रहता है। सर्दी के दिनों में उत्तराखण्ड यात्रा बन्द हो जाने से भीड़ भी स्वभावतः कम हो जाती है। साधना में मन लगना है। वातावरण शान्त रहता है और मार्गदर्शकों को पर्यटकों की हठवादिता से उत्पन्न खोज भी नहीं रहती।
साधना हेतु हिमालय की ओर प्रस्थान कर दिया।
साधनाओं में से प्रत्येक में पूरा मनोयोग लगाना चाहिए और निर्धारित विधि विधान को भली-भाँति समझकर उसे यथावत् करने का प्रयत्न करना चाहिए। जितनी रुचि जागेगी उतना ही मन लगेगा और उतना ही आनन्द तथा प्रतिफल उपलब्ध होगा। प्रमुख बात है- अनुशासन का परिपालन, समय का निर्धारण तथा हर घड़ी व्यस्त रहने का उपक्रम। आलस्य-प्रमाद को हटा दिया जाय। जो भी काम सामने हो उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर भली प्रकार सम्पन्न करने का प्रयत्न किया जाय।
साधना एवं तपश्चर्या द्वारा समुन्नत बनते हैं और स्वर्ग वासियों की तरह जीवन मुक्तों की स्थिति में रहते हैं। सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व दृश्यमान काया में रहते हुए मनोबल के रूप में प्रकट होता रहता है। गुण कर्म, स्वभाव की विशेषताएं सूक्ष्म शरीर में ही केन्द्रीभूत रहती हैं। साहस, संकल्प, पराक्रम एवं दृष्टिकोण की जाँच पड़ताल करके सूक्ष्म शरीर के उत्थान, पतन का अनुमान लगाया है। प्रतिभावान ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी, देखने में सामान्य होते हुए भी सूक्ष्म शरीर की दृष्टि से प्रखर पहलवान होते हैं।
साधना ने ही सम्भव कर दिखाया। प्रस्तुत नरक जैसी विपन्नताओं को स्वर्गोपम सतयुगी सुसम्पन्नता में बदलने के लिए व्यक्ति तो अपनी विवशता भी व्यक्त कर सकते हैं। पर उस सृष्टा को असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के वचन से मुकरना नहीं है। जो बात मनुष्य के वश से बाहर की होती है, उसकी अनिवार्यता देखकर भगवान स्वयं आते और चमत्कारी परिवर्तन कर दिखाते हैं।
साधना तो साथ-साथ चलती ही रहती है। यह लाभ अतिरिक्त है।
साधना का उपासना, तपश्चर्या और योग साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-
साधना अवधि पूरी करने के उपरान्त घर पहुँचने पर यही कैसे सिद्ध किया जाय कि ‘कल्प परिवर्तन’ सार्थक हुआ या व्यंग-विनोद का निमित्त कारण बना। शरीर संरचना में अन्तर आना कठिन है किन्तु गुण, कर्म, स्वभाव में भाव संरचना में महत्वपूर्ण हेर-फेर करना निश्चित रूप से सम्भव है। साधकों को यही करना चाहिए। इस संदर्भ में कुछ प्रसंग ऐसे हैं जिनमें यदि थोड़ा-सा परिवर्तन स्थायी रूप से करने का निश्चय कर लिया जाय तो उसका आश्चर्यजनक सत्परिणाम सामने हाथों-हाथ उपलब्ध होने लगेगा।
साधना में सुविधा और सफलता अधिक रहती है।
साधना में मग्न था। ध्यान बंटते ही उसने आगंतुकों से सत्कार पूर्वक आगमन का कारण पूछा।
साधना में मन लगना है। वातावरण शान्त रहता है और मार्गदर्शकों को पर्यटकों की हठवादिता से उत्पन्न खोज भी नहीं रहती। ऐसी दशा में साधना की सफलता का अनुपात भी बढ़ा चढ़ा रहना स्वाभाविक है।
साधना के माध्यम से जगाया उभारा जा सके तो मनुष्य अतीन्द्रिय शक्ति सम्पन्न बन सकता है। कारण शरीर जीवात्मा की क्रीडा स्थली है परमात्मा की दिव्य अनुभूतियाँ इसी क्षेत्र में रमण करती हैं। उनका जागरण सम्भव हो सके तो प्राप्य उपलब्धियों से अपना ही नहीं दूसरों का भी हित साधना सम्भव है।
साधनात्मक सफलताएँ वहाँ की जिन विशेषताओं के कारण उपलब्ध होती हैं उनमें वहाँ का शीत प्रधान वातावरण भी एक बड़ा कारण है।
साधना का प्रथम द्वार सोपान है। शास्त्रकारों का इस संदर्भ में निर्देश परामर्श इस प्रकार है-
साधना से पूरी हो जाती है।
साधना को भी चिन्तन तथा व्यवहार के साथ जोड़ना पड़ता है। आदर्शों की कसौटी पर खरा उतरने के लिए शौर्य, पराक्रम एवं त्याग बलिदान की वरिष्ठता का भी परिचय देना पड़ता है। सूक्ष्म शरीर ऐसे ही आधार अपनाने से बलिष्ठ होता है। उसका सहयोग पाकर स्थूल शरीर की क्षमता अनेक गुनी बढ़ जाती है। व्यक्तित्व की प्रखरता प्रतिभा के रूप में प्रकट होती है।
साधना शारीरिक श्रम को नहीं कहते। श्रम करते रहने में श्रमिक बेमन से भी समय काटते और पैसा कमाते देखे गए हैं, पर विचारणा और भावना के क्षेत्र में वैसा बन सकना सम्भव नहीं है। कोई विद्यार्थी किताब पढ़ता-सुनता तो रहे पर समझे कुछ नहीं तो उसका उत्तीर्ण होना कठिन है। भावना क्षेत्र तो उससे भी ऊँचा है। उसमें क्रिया, विचारणा और भावना तीनों का समुचित समावेश होना चाहिए।
साधना जैसे परिष्कार-उपचार की बात सोचनी चाहिए।
साधना में प्रवृत्त होना होगा, जिस -साइन्स आफ सोल’ आत्म-विज्ञान’ के नाम से प्राचीन काल से जाना जाता रहा है। चेतना के विज्ञान के रूप में वह आज भी उतना ही प्रामाणिक एवं उपयोगी है जितना प्राचीन काल में था। आवश्यकता इतनी भर है कि इस क्षेत्र में उसी गम्भीरता से अनुसन्धान किया जाय जितना कि भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-December
साधना का प्रथम प्रयास अपने गुण कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना है। मात्र वाणी का संयम करने से उसे वाक् रूप में परिणत नहीं किया जा सकता। मौन, सत्य, मधुर वचन, सत्प्रयोजन, सन्तुलित एवं स्वल्प समाज जिह्वा साधना के बाह्य उपचार है। अन्तःकरण में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का समन्वय अन्तः उपचार है। प्याज, मूली, शराब, हींग आदि खाने पर मुँह में वैसी ही गन्ध आती हैं, अन्तःकरण में यदि असन्तुलन भरा हो तो जिह्वा की रोक बाँध में भी चूक होती ही रहेगी और वस्तुस्थिति उभरकर जिह्वा के माध्यम से प्रकट होती रहेगी।
साधना है, ऐसा विद्वानों का मत है।
साधनारत रहते देखे गये हैं। अलेक्जेण्ड्रा ने 14 वर्षों तक इनकी प्रक्रियाओं का अध्ययन किया और पाया कि तिब्बत के योगी अत्यधिक सर्दी के दिनों में जब नदी, झरनों का पानी जम जाता है, वे नंगे बदन अथवा एक पतले कपड़े को शरीर पर लपेटकर साधना करते रहते हैं। बर्फ में एक गहरा गड्ढा खोदकर उसी में बैठ जाते हैं और रात भर चन्द्रमा की शीतल रोशनी में साधना करते रहते हैं। कड़ी ठण्डक का उनके शरीर के ऊपर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
साधनाओं से शुरू होता है। उनमें अपनी श्रद्धा भावना का जितना ही अधिक अभिसिंचन किया जायेगा, उतनी ही सफलता मिलेगी। कहा जा चुका है कि जीव में बीज-रूपेण ब्रह्म बनने की सभी सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। अभिव्यक्ति के लिए जीवात्मा छटपटाती भी रहती है पर अभीष्ट स्तर का पोषण न मिल पाने तथा विकास के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति न जुट पाने से ही वह दीन-हीन गई गुजरी स्थिति में पड़ी रहती है। इससे निकलने के लिए क्या कमर कसकर तैयार हो जाने का नाम ही साधना पुरुषार्थ है; परम पुरुषार्थ इसे ही कहा गया है।
साधना की महत्ता मानने को जी करता है। फिर भी जीते जी मक्खी कैसे निगली जाय? धन के लिए गरिमा को कैसे और कहाँ तक गिराया जाय?
साधना पुरुषार्थ है; परम पुरुषार्थ इसे ही कहा गया है। जीवात्मा अपने ईष्ट से विलग रहकर छटपटाती रहती है। यह बेचैनी उस परम सत्ता से मिलकर ही मिटती है। जितना समर्थ वह है उतना ही जीव भी बन सकता है, बशर्ते कि अपने को उसकी सत्ता में धुला मिला दे। यही है आत्मतत्व का जीवन दर्शन-बंधनमुक्ति जिसका अलंकारिक वर्णन विभिन्न रूपों में शास्त्रों में किया गया है।
साधना में जप का प्रमुख स्थान है। उसकी साधना ही जप द्वारा की जाती है। मंत्र जप का अर्थ बताते हुए कहा गया है।
साधना से असंख्यों व्यक्तियों को जीवनदान दिया है। पर अनुसंधान की इस शृंखला में कुछ महत्वपूर्ण कड़ियाँ और भी जोड़नी होंगी। अंगों की टूट-फूट, रुग्णता की भाँति मन भी विघटित होता है-व्याधियों से घिरता है। अन्तःक्षेत्र जो आत्मा की क्रीड़ा स्थली है, की परत और भी गहरी है। असन्तुलन इस क्षेत्र में भी पैदा होता है।
साधनारत योगी अपने शरीर की रक्तवाहनियों को संकुचित कर लेते हैं और शरीर का तापमान वातावरण के अनुकूल बना लेते हैं।
साधनाओं का भी अन्तिम लक्ष्य यही है। “विराट् सत्ता की आत्म-सत्ता में अनुभूति।”
साधना है, युगानुकूल उपासना आराधना है।
साधना करते रहते हैं। कड़ी ठण्डक का उनके शरीर के ऊपर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
साधना की सबसे बड़ी साधना है, ऐसा विद्वानों का मत है।
साधना नहीं समझना चाहिए वरन् अन्तःकरण की शुद्धि से उनका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध समझना चाहिए। तभी वाणी का प्रत्यावर्तन वाक् रूप में होता है और उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र सफल व सार्थक होता है। ऐसी वाक् शक्ति की शास्त्रों में पग-पग पर महिमा गाई गयी है। कहा गया है -
साधना द्वैत से आरम्भ करनी पड़ती है। अहम् ब्रह्मास्मि, सोऽहम्, तत्वमसि, सच्चिदानंदोऽहम्, वस्तुतः अद्वैत अनुभूतियों के उद्घोष है। पर इस स्थिति तक पहुँचने के लिए साधना का आरम्भ भक्ति भावना से करना पड़ता है अन्यथा शाश्वत अनुभूतियों के अभाव में सत्य की मात्र वैचारिक स्वीकारोक्ति तो अहम् को घोषित करती है आत्म प्रवंचना की यह स्थिति साधक को ले डूबती है। स्वसम्मोहन के एक ऐसे आवरण से घिर जाता है, जिससे प्रायः निकलते नहीं बनता। आत्मिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
साधना में निरत रहने को ही वे सच्चा पथ मानते हैं। नीति पर चलते व अनीति से बचते हुए वे क्रमशः लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। मानवी प्रकृति की भिन्नता के कारण दोनों ही मत अपने-अपने स्थान पर सही है।
साधना की कमी थी और नहीं महान उत्कृष्टता सम्पन्न व्यक्तित्वों की। पर कालान्तर ज्ञान की दोनों ही धाराएँ एक-दूसरों से काटकर अलग हो गयी, अपनी ढपली आप बजाने लगी। अपना राग आप अलापने लगीं। इस विलगाव ने ही संसार में अगणित समस्याएँ पैदा की हैं।
साधना ही जप द्वारा की जाती है। मंत्र जप का अर्थ बताते हुए कहा गया है।
साधना को मात्र शब्द साधना नहीं समझना चाहिए वरन् अन्तःकरण की शुद्धि से उनका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध समझना चाहिए। तभी वाणी का प्रत्यावर्तन वाक् रूप में होता है और उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र सफल व सार्थक होता है। ऐसी वाक् शक्ति की शास्त्रों में पग-पग पर महिमा गाई गयी है। कहा गया है -
साधना ‘जप’ कहते हैं।
साधना करते रहते हैं। बर्फ में एक गहरा गड्ढा खोदकर उसी में बैठ जाते हैं और रात भर चन्द्रमा की शीतल रोशनी में साधना करते रहते हैं। कड़ी ठण्डक का उनके शरीर के ऊपर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
साधना का परिचय देते हैं। युग साहित्य के सृजन और विस्तार की प्रस्तुत योजना को गिलहरी द्वारा समूह को परों की बाजू से पाटने जैसा दुस्साहस कहा जा सकता है। इतने पर भी किसी को अविश्वास या उपहास नहीं करना चाहिए। आखिर समुद्र का पुल बाँधा तो गया ही था। भले ही उसे गिलहरी ने नहीं किसी अन्य ने बाँधा।
साधना का आरम्भ भक्ति भावना से करना पड़ता है अन्यथा शाश्वत अनुभूतियों के अभाव में सत्य की मात्र वैचारिक स्वीकारोक्ति तो अहम् को घोषित करती है आत्म प्रवंचना की यह स्थिति साधक को ले डूबती है। स्वसम्मोहन के एक ऐसे आवरण से घिर जाता है, जिससे प्रायः निकलते नहीं बनता। आत्मिक प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। लक्ष्य प्राप्ति से वह भटक जाता है।
साधना या अभ्यास प्रयास के भी अनायास फूट पड़ती देखी गई है। इसलिए अतीन्द्रिय क्षमता का एक स्वतन्त्र विज्ञान ही बन गया है और उसे अनुसंधान की पर मनोविज्ञान शाखा के अंतर्गत मान्यता मिल गई है। इस दिशा में जो हुई हैं खोजें उनसे पता चला है कि मानवी क्षमता की मूलभूत सीमा उससे कहीं अधिक है जितना कि वह दैनिक जीवन में प्रयुक्त करता है। अब प्रश्न इस बात का शेष रह जाता है कि उस सामर्थ्य को विकसित करने का उपाय क्या हो सकता है? अध्यात्मवादी इस संदर्भ में योग और तप का प्रयोग परीक्षण बहुत पहले से ही करते रहे हैं।
साधना प्रणाली अपनायी थी। साधना की परिपक्व अवस्था में उन्होंने पाया कि सभी धर्म उसी एक सत्ता में ही जाकर मिलते हैं।
साधना और उपासना में व्यक्तित्व को और अधिक प्रखर बनाया जाय। स्मरण रखा जाना चाहिए कि वाणी से उपासना करना ही पर्याप्त नहीं है, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है, कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सकें। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है। पर वह सम्भव तभी होता है जबकि उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय।
साधना में संलग्न हो गया।
साधना के बाह्य उपचार है। अन्तःकरण में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का समन्वय अन्तः उपचार है। प्याज, मूली, शराब, हींग आदि खाने पर मुँह में वैसी ही गन्ध आती हैं, अन्तःकरण में यदि असन्तुलन भरा हो तो जिह्वा की रोक बाँध में भी चूक होती ही रहेगी और वस्तुस्थिति उभरकर जिह्वा के माध्यम से प्रकट होती रहेगी। असद् वाणी साधना को मात्र शब्द साधना नहीं समझना चाहिए वरन् अन्तःकरण की शुद्धि से उनका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध समझना चाहिए। तभी वाणी का प्रत्यावर्तन वाक् रूप में होता है और उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र सफल व सार्थक होता है।
साधना की परिपक्व अवस्था में उन्होंने पाया कि सभी धर्म उसी एक सत्ता में ही जाकर मिलते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-February
साधना सम्पन्न करती है, उनके लिए शान्तिकुँज में एक-एक महीने के युग श्ल्पी सत्र हर महीने चलते रहे हैं जब डाक्टर, इंजीनियर प्रोफेसर, कलाकार, शिल्पी अपने-अपने विषयों का लम्बे समय तक प्रशिक्षण प्राप्त करने और प्रवीण होने पर काम में हाथ डालते हैं तो युग सृजन जैसे असाधारण कार्य के लिए शिक्षण प्राप्त न करना पड़े ऐसा हो नहीं सकता। मोटर कितनी ही बढ़िया क्यों न हो, रास्ता कितना ही निरापद क्यों न हो पर ड्राइविंग का अभ्यास तो होना ही चाहिए अन्याि लक्ष्य तक पहुँचने के साथ एक्सीडेन्ट होने और ड्राइवर समेत सवारियों की जान-जोखिम का संकट सोमने खड़ा रहेगा। युग सृजन में अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन कर सकने वाले युग समस्याओं के अनुरूप अनेक कार्यक्रमों का समावेश है। जनमानस का परिष्कार और आस्था संकट का उन्मूलन किसी एक स्थान पर नहीं 450 करोड़ मनुष्यों को एक-एक मोर्चा मान कर उन सभी पर एक साथ सम्पन्न किया जाना है। इतने बड़े उत्तरदायित्व को उठाने वाले, अनुीव और अभ्यास न होने पर भी उसे ठीक तरह कर गुजरेंगे इसकी आशा कोई नहीं कर सकता।
साधना का मार्ग अपनाकर वह क्षमता भी विकसित की जा सकती है जिसे दिव्य दृष्टि के नाम से अध्यात्म जगत में जाना जाता है।
साधना में प्रवृत्त लोगों के लिए प्राथमिक स्तर पर वाणी पर संयम, धन का अनावश्यक संग्रह न करना, भौतिक साधनों की (आर्थिक मात्रा में) आशा छोड़ना, कामनाओं का त्याग करना और नित्य एकान्त में रहना- अपेक्षित होता है।
साधना नौ दिन की, हरिद्वार कनखल, ऋषीकेश, लक्ष्मण झूला, तीर्थों का परिभ्रमण एक दिन का। इस प्रकार यह सत्र रहेगा तो दस दिन के ही पर साधना नौ दिन करने से काम चल जायेगा। जिन्हें दोनों में से जिस सत्र में स्थान प्राप्त करना हो वे समय रहते अपनी सुविधा वाले सत्र में आवेदन पत्र भेजकर स्थान सुरक्षित करालें।
साधना चला करेगी। अपराह्न 12 से 8 तक युग शिल्पी शिक्षा का समावेश रहेगा। अब यह दो पाली में चलेगा। अब इस विद्यालय में दो शिफ्टों का समावेश रहेगा। दोनों के लिए पूरे आठ-आठ घन्टे का समय है।
साधना पुरुषार्थ का परिचय देना होता है।
साधना नौ दिन करने से काम चल जायेगा। जिन्हें दोनों में से जिस सत्र में स्थान प्राप्त करना हो वे समय रहते अपनी सुविधा वाले सत्र में आवेदन पत्र भेजकर स्थान सुरक्षित करालें।
साधना सत्र में यह अनुशासन सहज ही निभ गया। जिनने इसका लाभ देख लिया है वे अब उसे सदा अपनाते ही रहेंगे और दस वर्ष अधिक जियेंगे, ऐसी आशा की गई हैं। कल्प-सत्रों की अद्वितीय विशेषता यह है कि यहाँ हर शिक्षार्थी को शारीरिक और मानसिक जाँच-पड़ताल उच्च शिक्षित एम.डी., एम.एस. स्तर के डॉक्टरों द्वारा बारीकी से की जाती है। प्रत्येक अंग अवयव का परीक्षण करके यह जाना जात है कि शिक्षार्थी में न्यूनता एवं रुग्णता के बीजाँकुर कहाँ हैं? इसी आधार पर जड़ीबूटी कल्प का प्रबन्ध होता है।
साधना के साथ-साथ भली प्रकार संपर्क में आने वालों को अनुप्राणित करती है। उच्चस्तरीय विचार-विनिमय और परामर्श मार्ग-दर्शन से किस प्रकार भ्रान्तियों से उबरने और श्रेय पथ पर चल पड़ने की प्रेरणा मिलती है, इस तथ्य को भी यहाँ रहकर भली प्रकार अनुभव किया जा सकता है। अनुदान, वरदान, आशीर्वाद किसे कहते हैं और वे किस आधार पर कितनी मात्रा में किसे कहते हैं और वे किस आधार पर कितनी मात्रा में किसे मिलते हैं। इसका तत्व-दर्शन यहाँ पहुँचने पर जिस प्रकार समझने को मिलता है उससे नया प्रकाश मिलता है। नये सिरे से सोचने और नया आधार प्राप्त करने का द्वार खुलता है।
साधना के लिए साहस जुटाने वाले व्यक्ति अपने अन्तराल में प्रविष्ट करते हैं। इनका काम वैसा ही होता है जैसा कि एक वैज्ञानिक का धूल जैसे परमाणु कणों से परमाणविक ऊर्जा प्राप्त करना। फलतः शरीर के सूक्ष्म परतों में दबी शक्ति को करतलगत करके असीम शक्ति से सम्पन्न बन जाते हैं। साधक योगी इसी स्तर के होते हैं।
साधना शिक्षा के निमित आने वालों के लिए ही सुरक्षित रखा जाय।
साधना तपश्चर्या स्तर के विशेष प्रयोग पुरुषार्थ करने पड़ते हैं।
साधना, योग निद्रा का उच्चस्तरीय प्रयोग होता रहा है उसका छोटा-सा रूप आधुनिक सम्मोहन विज्ञान है। इलेक्ट्रोडो द्वारा सुप्त को जगाने के लिए जो झटके दिये जाते हैं वह प्रयोजन ध्यान धारणा के सहारे प्रसुप्त संस्थानों को पुनर्जीवित करने के द्वारा भली प्रकार पूरा हो सकता है। प्राणायाम से आक्सीजन उपचार के सुविस्तृत विज्ञान का समावेश है। इन उपचारों के सहारे सामान्य मनुष्य का अनेक दृष्टियों से असामान्य बन सकना सम्भव है। विस्मृति के गर्त से निकलकर स्मृति का वरदान पाया जा सकता है।
साधना इसी लक्ष्य की आपूर्ति करती है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ साधक को आत्मपरिष्कार आत्मसुधार का अवलम्बन लेना पड़ता है। दोहरे मोर्चे पर किया गया साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है। इस साधना पक्ष में लगभग उसी स्तर का मनोबल जुटाना एवं पुरुषार्थ करना होता है। जितना कि समुद्र से मोती निकाल लाने वाले गोताखोर।
साधना द्वारा मूर्छित पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण किया जाता है। सविता की प्राण साधना इसी लक्ष्य की आपूर्ति करती है। कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ साधक को आत्मपरिष्कार आत्मसुधार का अवलम्बन लेना पड़ता है। दोहरे मोर्चे पर किया गया साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है। इस साधना पक्ष में लगभग उसी स्तर का मनोबल जुटाना एवं पुरुषार्थ करना होता है।
साधना सत्र की तुलना में कही अधिक कठिन और जटिल है। ऐसी दशा में एक महीने से कम में उनकी शिक्षा भी पुरी नहीं हो सकती। वह नई व्यवस्था कैसे हो? आवश्यकता आविष्कार की जननी कही गई है। अतः इस असमंजस का भी हल खोज निकाला गया है।
साधना सत्र जिस आश्चर्यजनक सफलता के साथ सम्पन्न हो रहे हैं उनमें ने केवल सम्मिलित होने वाले साधकों को आशातीत सन्तोष मिला है वरन् दर्शकों को भी चकित कर दिया हैं अमृताशन के आहार से पुराने कब्ज दूर हुए हैं। जिसके पेट सदा भारी रहते थे, सड़ी वायु नीचे ऊपर चलती रहती थी और धड़कन बढ़ा देने तथा सिर दर्द जैसे उपद्रव खड़े करती थी, उनका समाधान हो गया। इस आहार-उपचार से सभी को विश्वास हुआ है कि पाचक-रेचक औषधियाँ खाते रहने की अपेखा यह कहीं अधिक अच्छा है कि आहार पर संयम बरता जाय और जीभ प अंकुश रखा जाय। यह अब सैद्धान्तिक रुप् में तो अनेक वार सुना जाता रहा है, पर व्यवहार में वैसा कभ्ज्ञी वन ही नहीं पड़ा। कल्प साधना सत्र में यह अनुशासन सहज ही निभ गया।
साधना की श्क्षा साधना चला करेगी। अपराह्न 12 से 8 तक युग शिल्पी शिक्षा का समावेश रहेगा। अब यह दो पाली में चलेगा। अब इस विद्यालय में दो शिफ्टों का समावेश रहेगा। दोनों के लिए पूरे आठ-आठ घन्टे का समय है।
साधना पक्ष में लगभग उसी स्तर का मनोबल जुटाना एवं पुरुषार्थ करना होता है। जितना कि समुद्र से मोती निकाल लाने वाले गोताखोर। अंतर्निहित शक्ति स्रोतों को जागृत किया जा सके तो मनुष्य इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर सकता है। जिसे सामान्यतया सिद्ध और चमत्कार के नाम से जाना जाता है।
साधना सत्र तो चलेंगे ही। साथ-साथ (1) 1 से 10, (2) 11 से 20 (3) 21 से 30 तक के दस दिवसीय सत्र भी आरम्भ कर दिये गये हैं। साधना नौ दिन की, हरिद्वार कनखल, ऋषीकेश, लक्ष्मण झूला, तीर्थों का परिभ्रमण एक दिन का। इस प्रकार यह सत्र रहेगा तो दस दिन के ही पर साधना नौ दिन करने से काम चल जायेगा। जिन्हें दोनों में से जिस सत्र में स्थान प्राप्त करना हो वे समय रहते अपनी सुविधा वाले सत्र में आवेदन पत्र भेजकर स्थान सुरक्षित करालें।
साधना के लिए इतना पुरुषार्थ साहस एवं धैर्य नहीं जुटा पाते। फलतः असीम शक्ति के लाभों से वंचित बने रहते हैं। पेट और प्रजनन तक में ही उनका जीवन समाप्त हो जाता है। जबकि साधना के लिए साहस जुटाने वाले व्यक्ति अपने अन्तराल में प्रविष्ट करते हैं। इनका काम वैसा ही होता है जैसा कि एक वैज्ञानिक का धूल जैसे परमाणु कणों से परमाणविक ऊर्जा प्राप्त करना।
साधना तो वे ही सब हो, उपक्रम तो ठीक वैसा ही चले और अन्तर इतना ही रखा जाय कि एक महीने के स्थान पर उसे सिकोड़कर दस दिन का कर दिया जाय। इस प्रकार न कुछ से कुछ अच्छा वाला साधन तो सच ही जायेगा।’ अधिक लोगों का अधिक समाधान सन्तोष बन पड़ने और सुयोग का लाभ कम समय में अधिक लोगों द्वारा उठाये जाने का अवसर मिलने की बात को ध्याम में रखते हुए यह नया निर्धारण भी अपने स्थान पर उपयुक्त ही समझा गया है और उसका भुभारम्भ वसन्त पर्व से आरम्भ कर दिया गया है। जब पूर्ववत् हर महने 1 से 29 तक एक मास के कल्प साधना सत्र तो चलेंगे ही। साथ-साथ (1) 1 से 10, (2) 11 से 20 (3) 21 से 30 तक के दस दिवसीय सत्र भी आरम्भ कर दिये गये हैं।
साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है। इस साधना पक्ष में लगभग उसी स्तर का मनोबल जुटाना एवं पुरुषार्थ करना होता है। जितना कि समुद्र से मोती निकाल लाने वाले गोताखोर। अंतर्निहित शक्ति स्रोतों को जागृत किया जा सके तो मनुष्य इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर सकता है। जिसे सामान्यतया सिद्ध और चमत्कार के नाम से जाना जाता है।
साधना उपासना का संपर्क श्रवण का सुयोग भी व्यवस्थापूर्वक वन जाया करेगा। घोड़े पर सवार भगदड़ मचाने वालों के लिए तो ऐसा कुछ बन पड़ना सम्भव नहीं है। बसों में आये यात्री मात्र 12 से 3 की निर्धारित अवधि में ही भेंट कर सकेंगे चाहे जब नहीं।
साधना और युग शिल्पी सत्र के जो दुहरे उपक्रम पूरा करना चाहें उन्हें अब वैसी सुविधा व्यवस्था बना दी गई है। जो इनमें से एक ही शिक्षा प्राप्त करना चाहें उन पर कोई दबाव नहीं है कि उन्हें दोनों ही पूरी करनी पड़ेगीं। वे अपना इच्छित एक सत्र भी चलाते रह सकते हैं।
साधना सत्र का एक दस दिवसीय ‘मिनी कल्प साधना सत्र’ भी साथ-साथ चलाया जाय। जिसमें साधना तो वे ही सब हो, उपक्रम तो ठीक वैसा ही चले और अन्तर इतना ही रखा जाय कि एक महीने के स्थान पर उसे सिकोड़कर दस दिन का कर दिया जाय। इस प्रकार न कुछ से कुछ अच्छा वाला साधन तो सच ही जायेगा।’ अधिक लोगों का अधिक समाधान सन्तोष बन पड़ने और सुयोग का लाभ कम समय में अधिक लोगों द्वारा उठाये जाने का अवसर मिलने की बात को ध्याम में रखते हुए यह नया निर्धारण भी अपने स्थान पर उपयुक्त ही समझा गया है और उसका भुभारम्भ वसन्त पर्व से आरम्भ कर दिया गया है। जब पूर्ववत् हर महने 1 से 29 तक एक मास के कल्प साधना सत्र तो चलेंगे ही।
साधना सत्र’ भी साथ-साथ चलाया जाय। जिसमें साधना तो वे ही सब हो, उपक्रम तो ठीक वैसा ही चले और अन्तर इतना ही रखा जाय कि एक महीने के स्थान पर उसे सिकोड़कर दस दिन का कर दिया जाय। इस प्रकार न कुछ से कुछ अच्छा वाला साधन तो सच ही जायेगा।’ अधिक लोगों का अधिक समाधान सन्तोष बन पड़ने और सुयोग का लाभ कम समय में अधिक लोगों द्वारा उठाये जाने का अवसर मिलने की बात को ध्याम में रखते हुए यह नया निर्धारण भी अपने स्थान पर उपयुक्त ही समझा गया है और उसका भुभारम्भ वसन्त पर्व से आरम्भ कर दिया गया है। जब पूर्ववत् हर महने 1 से 29 तक एक मास के कल्प साधना सत्र तो चलेंगे ही।
साधना के लिए चल पड़े।
साधनाएँ सम्पन्न कर सकते हैं। टाइम टेबिल ऐसा बना दिया गया है कि इस दुहरी पद्धति को बिना थके, ऊबे भली प्रकार सम्पन्न किया जा सके।
साधना सत्रों का भविष्य में नया स्वरूप यह होगा कि प्रातः 4 से 12 तक कल्प साधना की श्क्षा साधना चला करेगी। अपराह्न 12 से 8 तक युग शिल्पी शिक्षा का समावेश रहेगा। अब यह दो पाली में चलेगा। अब इस विद्यालय में दो शिफ्टों का समावेश रहेगा। दोनों के लिए पूरे आठ-आठ घन्टे का समय है।
साधना कर रहे हैं। वहाँ पहुँचकर विनय पूर्वक दूत ने महर्षि को भगवान विष्णु का सन्देश सुनाया कि आपको देवाधिदेव ने शीघ्र ही बुलाया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-March
साधना’- ओमर गैरिसन की- ‘तन्त्र यौन योग’- उलरिख हास रोकर की ‘हठयोग प्रदीपिका’ - फिलिप रासन की, ‘तान्त्रिक कला’ - जान दि बाइट की - ‘चेतना का सीमान्त’ हाइन रिख जीमर की ‘भारतीय सभ्यता में उपाख्यान और प्रतीक’ - जॉन वुडरफ की ‘दि सर्पेन्टाइन पावर’ आदि पुस्तकें तन्त्र के दर्शन सिद्धांत और विधि-विधान पर यत्किंचित् प्रकाश डालती है तो भी यह विषय ऐसा है कि जिसमें निजी अनुभव के आधार पर सामयिक विधि-व्यवस्था और उसकी वर्तमान परिस्थितियों में सम्भावित उपलब्धियों पर प्रकाश डाला जा सकता है एवं इस विषय में जन-मानस में बैठी भ्रांतियों को काफी सीमा तक हटाया जा सकता है।
साधना पुरुषार्थ करना होता है। मेण्टल बॉडी (मानसगत चेतन स्वरूप) कला सौंदर्य, विज्ञान एवं नूतन कल्पनाओं के विकास की स्थिति है। कवि, कलाकार, मनीषी, वैज्ञानिक, विचारक इसी भाव लोक में विचरण करते हैं। यह स्पष्ट माना जा सकता है कि जिस किसी भी समूह, जाति, समाज अथवा देश में सुविकसित मानस गत चेतन शरीर वाले व्यक्तियों की बहुतायत होती है वहाँ महत्वपूर्ण वैचारिक और आध्यात्मिक क्रांतियां जन्म लेती हैं। एक से बढ़कर एक विचारक, मनीषी, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक पैदा होते हैं।
साधना तो पड़ता है, पर यह मानकर चलना चाहिए कि जितनी अनुकूलता मिल सके उतने से ही काम चलाया जाय और अधिक पाने के लिये प्रयास जारी रखे जायं। जो नहीं मिला, उससे खिन्न रहने की अपेक्षा यही अधिक अच्छा है कि जो हस्तगत हुआ, उस पर मोद मनाते हुए जीवन शकट को नियति पथ पर आगे बढ़ाया जाय। महत्वाकाँक्षी होने में हर्ज नहीं, पर वे उमंगें मात्र सुखद कल्पनाओं तक ही सीमित रहे। उनका उपयोग प्रयत्नशीलता को अधिकाधिक बढ़ाते रहने के लिए ही करना चाहिए। इससे आगे बढ़ना और आतुरता की सीमा तक पहुंचना हानिकारक है।
साधनाओं के लिए दोनों का प्रयोग करना पड़ता है। कुण्डलिनी साधना के लिए मनोगत संकल्प चाहिए और योग साधना के लिए जननेंद्रिय संयम ब्रह्मचर्य। इस प्रकार दो धाराएँ गंगा-यमुना की तरह पृथक-पृथक होते हुए भी मूलतः हिमाचल के एक विशेष क्षेत्र के साथ समान रूप से जुड़ी हुई हैं।
साधना करायी जाय।
साधनाएँ भी की जाती हैं। किन्तु स्मरण रखने योग बात एक ही है उन सभी फसलों का उगना और फलना-फूलना तभी संभव है जब खाद पानी वाली उपयुक्त भूमि पर उन्हें बोया जाय। यह मनुष्य का चिन्तन और चरित्र ही है जिसे महानता सम्पन्न व्यक्तित्व कहते हैं। यदि उसकी उपेक्षा की जाय और मात्र क्रिया-कृत्यों के साथ दिव्य विभूतियों, सिद्धियों को अर्जित करने की बात सोची जाय तो यह उपहासास्पद होगा। मात्र कृत्यों के आधार पर जो चमत्कार दिखाये जाते हैं उन्हें जादूगरी बाजीगरी कहते हैं।
साधना पुरुषार्थ करना पड़ता है। सप्तलोकों में एक से बढ़कर एक सम्पदाएँ एवं विभूतियाँ का उल्लेख शास्त्र ग्रंथों में मिलता है। वे सभी विभूतियाँ, ऋद्धियां एवं सिद्धियां मनुष्य के भीतर विद्यमान इन गहन परतों में सन्निहित हैं। भौतिक क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ उन्हें ही करतलगत होती हैं, जो असाधारण पुरुषार्थ के लिए साहस जुटाते हैं। इससे भी आगे की आत्मिक क्षेत्र की चमत्कारी विभूतियाँ उन्हें ही प्राप्त होती हैं, जो उच्चस्तरीय साधना पुरुषार्थ के लिए साहस संजोते तथा तत्पर होते हैं।
साधना सत्रों में कराया जाता है। इस कल्प वृक्ष उद्यान में जो प्रवेश करते हैं उन्हें इस अध्यात्म विज्ञान की जानकारी, प्रेरणा एवं विद्या हस्तगत होती है जिसके आधार पर शेष जीवन को सुखी, समृद्ध, सम्मानित, सुसंस्कारी और आदर्श अनुकरणीय स्तर का बनाया जा सके।
साधना के सहारे इस नेता ने सहज ही साम्यवादियों की श्रमशीलता का -कर्तव्य निष्ठा का- शिक्षण दिया और इसी के बलबूते वे समाज निर्माण के साम्यवादी स्वरूप को आधे विश्व में फैला सकने में सफल हुए।
साधना सफल सार्थक हो सकती है। ऐसी व्यवस्था बना लेने के उपरान्त ही अब यह साहस किया गया है कि उपयुक्त वातावरण में उच्चस्तरीय साधना करने के लिए साधकों को आमन्त्रित किया जाय और उन्हें त्रिविधि प्रयोजनों की पूर्ति में सन्तोषजनक सहायता कर सकने वाली कल्प साधना करायी जाय।
साधना के सम्बन्ध में भी है। वह विशुद्ध रूप से शरीरगत पंच तत्वों में सन्निहित वरिष्ठ ऊर्जा का उत्पादन है। उपयोग प्रयोक्ता की मर्जी पर निर्भर है।
साधना से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। सिद्धियां अर्थात् समर्थता एवं सम्पदा के सहारे मिल सकने वाली सफलताएँ।
साधना सत्र में उच्चस्तरीय प्रशिक्षण इसलिए प्रभावी सिद्ध होता है कि उसमें उपरोक्त तीनों ही तथ्यों का सघन समावेश है। जिनका प्रतिपादन है, जो प्रशिक्षण की प्रक्रिया संजोते हैं, वे भले ही स्वयं बोलें या दूसरों की वाणी से अपनी बात कहें हर हालत में उन्हें अध्यात्म प्रवक्ता के लिए आवश्यक कसौटी पर खरा पाया जा सकता है। कथनी और करनी में अन्तर का यहाँ प्रश्न नहीं। गान्धी, बुद्ध आदि के प्रवचन इसीलिए कोई-कोई मानवों के गले उतरे की उनके प्रतिपादन में वचन ही नहीं, चरित्र एवं व्यक्तित्व भी बोलता था। लगभग ऐसी ही प्रेरक परिस्थितियाँ यहाँ भी हैं।
साधना द्वारा अपनी चेतना का जिस सीमा तक विकास कर लेता है, उसके अंदर उसी अनुपात में क्षमताएँ उभरती और दृष्टिगोचर होने लगती हैं। एक ही व्यक्ति में एक से लेकर सात तक किसी भी स्वरूप के अपनी आत्मिक प्रगति के अनुपात में दर्शन हो सकते हैं। यह वह राजमार्ग है जिस पर अध्यात्म पथ के हर पथिक को गुजरना ही होता है। भ्रूण एक कोश की स्थिति से बहुगुणित होकर विकसित हो शिशु रूप लेता है। मानवी चेतना भी योग एवं तप के द्विविधि साधनों से विकसित होती हुई अन्तिम स्थिति को पहुँचती है।
साधना के, योग-तप के इन उपक्रमों को आप्त वचनों के प्रति श्रद्धा के सहारे अपनाया जाना था और वे अपने चमत्कार दिखा पाने में समर्थ थे। अब धर्मश्रद्धा लड़खड़ा गई तो प्रखर तथ्यों के सहारे उस प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है। विज्ञान की साक्षी इन दिनों प्रामाणिकता की परिचायक बन गई है। वरिष्ठता विज्ञान के पलड़े पा जा बैठी है। ऐसी दशा में विचार और भावना क्षेत्र को शालीनता समर्थक बनाने वाले तथ्यों को ढूंढ़ निकालने में उसे अग्रगामी होना चाहिए।
साधना विधि को अध्यात्म विज्ञान की- ब्रह्म विद्या की पृष्ठभूमि पर आधारित किया जा सकता है। यह शिक्षा नहीं विद्या है। “सा विद्या या विमुक्तये।” विद्या वह जो बन्धन मुक्त करे। “विद्ययामृत मश्नुते” विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है।
साधना के राजपथ पर चल पड़े। उन्हें यह बोध न मिला होता तो सम्भवतः रोगों से ग्रसित वह काया कष्ट निवारण के बाद पुनः उस अधोगामी पथ पर चल पड़ते अन्तबोध- आत्म जागृति की प्रेरणा सदैव मनुष्य को श्रेष्ठ पथ पर ले जाने की होती है। जरा कोलाहल तो थमे, उस ओर ध्यान तो जाए।
साधना का प्रतिफल यह निकाला कि उसने अपने जानलेवा व्यसन को छोड़ने में सफलता पायी। इस दृढ़ता से उसके संकल्प शक्ति में वृद्धि हुई। विधेयात्मक चिन्तन के कारण उसे असाध्य जान पड़ने वाले रोग से छुटकारा मिला। जीवन, जो उसे भारभूत निरर्थक जान पड़ता था। अब उत्साह उमंग से भरा तथा सार्थक लगने लगा।
साधना में जो कराया जाता है उसकी पृष्ठभूमि तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर नवम्बर 1982 के अंक में भली-भांति समझाई गई है। इसके लिए आवश्यक पाठ्य सामग्री भी छाप दी गयी है और वह प्रत्येक साधक को अनिवार्यतः पढ़ना होता है। सारे साहित्य का सैट सभी के पढ़ने के लिए निःशुल्क वाचनालय में उपलब्ध रहता है। इसके अतिरिक्त वाणी में भी उनका ऐसा समाधान किया जाता रहता है जो शास्त्र कथन, आप्त वचन की दुहाई देकर थोपा नहीं जाता वरन् बुद्धि संगत आधारों पर हृदयंगम कराया जाता है। यही कारण है कि प्रतिपादन और प्रशिक्षण बेबी फूड की तरह पौष्टिक स्वादिष्ट होने के साथ-साथ हाथों-हाथ पचता भी जाता है।
साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। यह किन परिस्थितियों में- किस मात्रा में, किस प्रकार, क्या करना चाहिए इसी का प्रशिक्षण इन दिनों शांति-कुज के विभिन्न साधना सत्रों में चलता रहता है। यह अपने युग की महती आवश्यकता है कि 450 करोड़ के मनुष्य समुदाय में अधिक न सही 4500 मनुष्य ऐसे निकले जो सच्चे अर्थों में महामानव बनने की ठान ठाने, साध साधें तो काम चल जाय। लाख पीछे एक मनुष्य भी यदि सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी बन सके तो समझना चाहिए कि युग समस्याओं के समाधान का पथ प्रशस्त हो गया और जिस व्यवधान के कारण असंख्यों को रोते, कलपते जीवन जीना पड़ता था, उन सभी के परिभ्रमण का सुदिन आ गया।
साधना तथा शिक्षा, गंगा की गोद- हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की साधना भूमि, गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र की तपस्थली, प्राण प्रखरता की प्रचण्ड ऊर्जा, दिव्य सान्निध्य एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शन- संरक्षण जैसी विशेषताओं में से एक-एक का पर्यवेक्षण प्रतीत होता है कि यहाँ वह वातावरण विद्यमान है जिसमें मिलने वाली शिक्षा और की जाने वाली साधना सफल सार्थक हो सकती है। ऐसी व्यवस्था बना लेने के उपरान्त ही अब यह साहस किया गया है कि उपयुक्त वातावरण में उच्चस्तरीय साधना करने के लिए साधकों को आमन्त्रित किया जाय और उन्हें त्रिविधि प्रयोजनों की पूर्ति में सन्तोषजनक सहायता कर सकने वाली कल्प साधना करायी जाय।
साधना के लिए मनोगत संकल्प चाहिए और योग साधना के लिए जननेंद्रिय संयम ब्रह्मचर्य। इस प्रकार दो धाराएँ गंगा-यमुना की तरह पृथक-पृथक होते हुए भी मूलतः हिमाचल के एक विशेष क्षेत्र के साथ समान रूप से जुड़ी हुई हैं।
साधना के लिए जननेंद्रिय संयम ब्रह्मचर्य। इस प्रकार दो धाराएँ गंगा-यमुना की तरह पृथक-पृथक होते हुए भी मूलतः हिमाचल के एक विशेष क्षेत्र के साथ समान रूप से जुड़ी हुई हैं।
साधना के साधकों की मनोभूमि जिस स्तर की है- उन्हें जो उपयुक्त जँचता रहा है उसके साथ भी उस आदर्शवादी शिक्षण की संगति भली प्रकार बैठ जाती है, जो इस अवसर पर सिखाये- हृदयंगम कराये जाते हैं। यहाँ तक कि विशुद्ध स्वार्थान्ध महत्वाकांक्षा और अहंकारी तक में बिना उसके रुझान को चोट पहुँचाये उत्कृष्टतावादी सिद्धांतों को उसी के अनुकूल अनुरूप सिद्ध किया जा सकता है। प्रज्ञा साहित्य की- प्रज्ञा मंच की यही विशेषता है। उसे आज के प्रत्यक्षवादी चिन्तन प्रवाह को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण आदि के आधार पर वैज्ञानिक दृष्टि से लिखा और कहा जाता है फलतः उसका प्रभाव भी जन साधारण को अनुप्राणित करता है।
साधना सत्रों में चलता रहता है। यह अपने युग की महती आवश्यकता है कि 450 करोड़ के मनुष्य समुदाय में अधिक न सही 4500 मनुष्य ऐसे निकले जो सच्चे अर्थों में महामानव बनने की ठान ठाने, साध साधें तो काम चल जाय। लाख पीछे एक मनुष्य भी यदि सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी बन सके तो समझना चाहिए कि युग समस्याओं के समाधान का पथ प्रशस्त हो गया और जिस व्यवधान के कारण असंख्यों को रोते, कलपते जीवन जीना पड़ता था, उन सभी के परिभ्रमण का सुदिन आ गया।
साधना में मस्तिष्क के अचेतन भाग का एक रहस्यमय केन्द्र झकझोरा जाता है। इस केन्द्र को अविज्ञात, रहस्यमय या अतीन्द्रिय संस्थान के नाम से जाना जाता है। इसकी सहायता से ही जननेंद्रिय मूल में सन्निहित कुण्डलिनी क्षमता को उभारने, नियन्त्रित करने एवं दिशा विशेष में मोड़ने का प्रयोजन पूरा किया जाता है। संकल्प बल के अभाव में तो जननेन्द्रिय स्वस्थ समर्थ होने पर भी यौन कर्म ठीक तरह कर सकने तक में समर्थ नहीं होते। मानसिक नपुंसकता प्रायः संकल्प बल की कमी से समर्थों को भी असमर्थ बना देती है इस सम्बन्ध में की गई वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि मानवी मस्तिष्क का एक बड़ा क्षेत्र ‘साइलेण्ट एरिया’ मौन क्षेत्र- कहलाता है।
साधना भूमि, गायत्री के दृष्टा विश्वामित्र की तपस्थली, प्राण प्रखरता की प्रचण्ड ऊर्जा, दिव्य सान्निध्य एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शन- संरक्षण जैसी विशेषताओं में से एक-एक का पर्यवेक्षण प्रतीत होता है कि यहाँ वह वातावरण विद्यमान है जिसमें मिलने वाली शिक्षा और की जाने वाली साधना सफल सार्थक हो सकती है। ऐसी व्यवस्था बना लेने के उपरान्त ही अब यह साहस किया गया है कि उपयुक्त वातावरण में उच्चस्तरीय साधना करने के लिए साधकों को आमन्त्रित किया जाय और उन्हें त्रिविधि प्रयोजनों की पूर्ति में सन्तोषजनक सहायता कर सकने वाली कल्प साधना करायी जाय।
साधनाएँ सहज सिद्ध थीं, पर अब तर्क युग में हर व्यक्ति अध्यात्म प्रतिपादनों के सम्बन्ध में शंकाशील और उदास है। इसी प्रकार चिन्तन व क्रिया दोनों में इन्द्रिय संयम घटते चले जाने से मनोबल में भी कमी आई है। आहार की शुद्धता न रहने से चित्त की चंचलता भी असाधारण रूप से बढ़ गई है। फिर प्रत्यक्ष कुछ कर गुजरने वाले अपनी सफलता देखकर अनुचरों में प्रगाढ़ विश्वास उत्पन्न करने वाले मार्गदर्शक भी कहां रहे हैं? फिर भी अध्ययन पर आधारित निष्कर्ष इस सम्बन्ध में असीम संभावनाओं का स्रोत मानवी काया को बताते हुए उस दिशा में पराक्रम पुरुषार्थ की महत्ता सिद्ध करते हैं।
साधनाएँ या चर्चा करने वाले निराश देखे जाते हैं। उनकी वह निष्ठा भी चली जाती है जो आरम्भ करने से पूर्व थी।
साधना-निग्रह, आहार-विहार, ध्यान-धारणा, योग-तप जैसे अध्यात्म उपचारों की सफलता में देव अनुग्रह को माध्यम माना जाता था। अब इन्हीं को क्रिया-कृत्यों के सहारे स्वसम्मोहन, अचेतन-परिशोधन, प्रसुप्त शक्तियों का जागरण, संकल्पबल, एकाग्रता एवं इच्छाशक्ति का चमत्कार कहा एवं सिद्ध किया जा सकता है।
साधना में रोगी ‘आटोसजेशन’ का अभ्यास करता है तथा यह भावना करता है कि उसका मन शान्त सन्तुलित और स्वस्थ हो रहा है। दूसरे चरण में उसे कैंसर ग्रस्त स्थान पर ध्यान करना पड़ता है, जिसमें वह प्रबल भावना का आरोपण करता है कि शरीर के श्वेत कण कैन्सरग्रस्त स्थान पर एकत्रित हो रहे हैं तथा रुग्ण कोशिकाओं को शरीर के बाहर निकाल रहे हैं। रोगियों को सदा प्रसन्नचित रहने तथा आशावादी दृष्टिकोण अपनाये रखने का ही निर्देश दिया जाता है। डॉ. साइमन्टन को अब तक डेढ़ सौ से भी अधिक कैंसर के रोगियों के उपचार में पूर्ण सफलता मिली है। स्वस्थ रोगियों में से अधिकांश वे हैं, जो आशावादी विचारणा के थे।
साधना कहते हैं। योगाभ्यास की धारा उससे सर्वथा भिन्न है। उसमें आत्मा और परमात्मा के मध्यवर्ती चेतनात्मक-भावनात्मक प्रयोजन पूरे किये जाते हैं। उस क्षेत्र की सफलताओं को ‘ऋद्धि’ कहा जाता है। वे ऋषियों में देखी जाती है।
साधनाएं इस पांचवें शरीर, स्थिति या आयाम को ही प्रबल बनाने, परिपुष्ट करने के लिए की जाती हैं। संकल्प शक्ति के बढ़े-चढ़े प्रयोग, सिद्धि और चमत्कारों की घटनाएं इसी स्तर के समर्थ होने पर सम्भव होती हैं। यों तो सामान्य तरह के सपने सभी देखते हैं पर किन्हीं-किन्हीं के सपने बिल्कुल यथार्थ होते तथा पूर्व बोध की अद्भुत क्षमता रखते हैं। जिनका पांचवां शरीर सुविकसित होता है उन्हें भूत-भविष्य अथवा महत्वपूर्ण घटनाओं का सन्देश देने तथा रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन करने वाले सपने आते हैं। त्रिकालज्ञ, सिद्ध स्तर के व्यक्तियों में पांचवां शरीर ही जागृत होता है।
साधना करने के लिए साधकों को आमन्त्रित किया जाय और उन्हें त्रिविधि प्रयोजनों की पूर्ति में सन्तोषजनक सहायता कर सकने वाली कल्प साधना करायी जाय।
साधना पुरुषार्थ के लिए साहस संजोते तथा तत्पर होते हैं। आध्यात्मिक जगत की इस रीति नीति से अवगत होना हर मनुष्य शरीर धारी जीव के लिये अनिवार्य है। इस ज्ञान को पाकर ढर्रे का जीवन न जीकर कुछ ऊंचा कर गुजरना एवं अधिक न सही तो भौतिक दृष्टि से ही लाभान्वित हो सकना हर किसी के लिये सहज ही शक्य है।
साधना। तन्त्र प्रयोगों के द्वारा साधक के शरीर की विद्युत को सामान्य स्तर की तुलना में कही अधिक प्रखर किया जा सकता है और उसका उपयोग अपने तथा दूसरों के लिए प्रायः वैसा ही हो सकता है जैसे कि प्रकृति साधनों में से किन्हीं के द्वारा किया जाता रहा है। यह उपयोग भला भी हो सकता है, बुरा भी। आग से शीत निवारण का लाभ भी मिल सकता है और किसी घर नगर को भस्म कर देने का अनर्थ भी हो सकता है। यही बात तन्त्र साधना के सम्बन्ध में भी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-September
साधना तथा अन्तरात्मा को पवित्र, उदार बनाकर अन्तःकरण में विराजमान ईश्वर की प्रतिमूर्ति की पूजा करता है। सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर परिलक्षित होना ही परमानन्द की, ब्रह्मा निर्वाण की, सहज समाधि की स्थित प्रज्ञ की, परमहंस की स्थिति है। जितनी मात्रा में साधक इस तथ्य को हृदयंगम करता चला जाता है उसी अनुपात में वह माया मुक्त होता चला जाता है। इस जीवन में ही वह स्वर्ग का आनन्द उठा लेता है।
साधना के दर्शन को जन्म देने वाले भारत में भी यही प्रचलन आधुनिकता के नाम पर शनैः शनैः फैले रहा है।
साधना के रूप में तो युग सन्धि की उपासना साथ चल ही रही है। जन-मानस से आद्य शक्ति के युग शक्ति के रूप में बदलने की सम्भावना को साकार होते देखने में अब कोई संशय नहीं रहना चाहिए।
साधना शान्ति-कुंज में करना चाहते हैं। वे समय रहते स्वीकृति प्राप्त कर लें और स्थान सुरक्षित करा लें ।
साधना ने उसे स्वर्गलोक तो दिया, पर अप्सराओं के प्रलोभन को देख उस सम्पदा को देखते-देखते गँवा बैठा और सर्प बनकर दुर्गतिग्रस्त हुआ। ययाति जैसे पुण्यात्मा इसी प्रसंग में अपयश और भर्त्सना के भागी बने। पाण्डु की रुग्णता को देखते हुए चिकित्सकों ने उन्हें ब्रह्मचर्य पूर्वक रहने का कहा था। वह मर्यादा उन्होंने पाली नहीं। फलतः अकाल ही काल के ग्रास बने।
साधना पुरुषार्थ करने की। समुद्र में से मोती निकालने में सफल दुस्साहसी गोताखोर होते हैं जबकि समुद्र के अन्तराल में मोती होने के तथ्य से सुपरिचित होते हुए भी साहस एवं पुरुषार्थ के अभाव में गहराई में मोती के लिए गोता लगाते नहीं बनता है। अपने आपे का स्वरूप जानने एवं उसमें सन्निहित शक्तियों को प्राप्त करने के लिए जो साधना पुरुषार्थ का अवलम्बन लेकर दृढ़ता से आगे बढ़ने के लिए कटिबद्ध होते हैं क्रमशः एक से बढ़कर एक विभूतियों के करतलगत करते जाते हैं। तब से यह अनुभव करते हैं कि उस दयालु परम पिता परमात्मा ने एक से बढ़कर एक विभूतियों से सुसम्पन्न करके जीवात्मा को भेजा है। यह मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि विस्मृति की चादर ओढ़कर असहाय असमर्थ स्थिति में जीवन व्यतीत करे अथवा आत्म गठरी को खोलने का पुरुषार्थ करने उसमें छिपी आत्मिक विभूतियों का लाभ उठाये।
साधना सत्र के रूप में उत्साहपूर्वक मनाया जाये। जो लोग अनुष्ठान करें, उनकी सूची शान्ति कुंज भेजकर संरक्षण परिमार्जन का प्रबन्ध करा लिया जाये। जो लोग अपनी नवरात्रि साधना शान्ति-कुंज में करना चाहते हैं। वे समय रहते स्वीकृति प्राप्त कर लें और स्थान सुरक्षित करा लें ।
साधना
साधना पुरुषार्थ का अवलम्बन लेकर दृढ़ता से आगे बढ़ने के लिए कटिबद्ध होते हैं क्रमशः एक से बढ़कर एक विभूतियों के करतलगत करते जाते हैं। तब से यह अनुभव करते हैं कि उस दयालु परम पिता परमात्मा ने एक से बढ़कर एक विभूतियों से सुसम्पन्न करके जीवात्मा को भेजा है। यह मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि विस्मृति की चादर ओढ़कर असहाय असमर्थ स्थिति में जीवन व्यतीत करे अथवा आत्म गठरी को खोलने का पुरुषार्थ करने उसमें छिपी आत्मिक विभूतियों का लाभ उठाये। विस्मृति से आत्म जागृति की दिशा में अग्रगमन करते ही मनुष्य की दरिद्रता, असमर्थता के दूर होते एवं समर्थ सम्पन्न बनते देरी नहीं लगती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-May
साधना सफल होगी।”
साधना के भाव से पहुँचते रहते थे। गाँधारी की आँखों की विद्युतशक्ति ही थी जिसने दुर्योधन को लोहे जैसा सुदृढ़ बना डाला था। बाली की शक्ति के शाप वरदान के कितने ही वर्णन दुर्वासा-अम्बरीश, शृंगी, परीक्षित, कपिल मुनि-सागर के आख्यानों के रूप में मिलते हैं।
साधना ही योग साधना है। पातंजली के योग दर्शन का प्रथम सूत्र है- ‘योगः चित्त वृत्ति निरोधः’ अर्थात्- चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है। चित्त वृत्ति से तात्पर्य यहाँ चंचलता से है। संक्षेप में चंचलता के अवरोध को रोककर उसकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाकर अभीष्ट प्रयोजन में निरत करने के अभ्यास को योगाभ्यास कहा जा सकता है।
साधना के लिए सबसे सरल और सुनिश्चित अभ्यास एक ही है कि जो भी काम हाथ में लिया जाय उसे योगाभ्यास मानकर चला जाय। उसकी योजना एवं व्यवस्था बनाने के लिए जिन साधन सामग्री की, जिस सहयोग की, जिस क्रम को अपनाने की आवश्यकता है उसके लिए कार्यारंभ से पूर्व ही साँगोपाँग चिन्तन कर लिया जाय। कठिनाइयों को समझ लिया जाय और उन्हें कितने समय तक श्रम करना पड़ेगा। इसकी सुविस्तृत कल्पना करते हुए परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते हुए योजनाबद्ध निर्धारण स्थिर कर लिया जाय। इसके बिना ऐसे ही आवेशग्रस्त होकर किसी कार्य में लग पड़ना भूल है।
साधना के सूक्ष्म उपचार किये जाते थे जो आज भी विभिन्न स्थानों पर व्यक्तिगत स्तर पर छिटपुट रूप में प्रचलित हैं। सूर्य एवं चन्द्रग्रहण के बाद नदियों आदि में स्नान करने की परम्परा है जो पूर्णतया वैज्ञानिक है। वैज्ञानिकों का मत है कि प्रवाहित जल में प्राण ऊर्जा की प्रचुरता होती है। शरीर पर सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण से बढ़ने वाले वायुमण्डलीय विषाणुओं का आक्रमण होता है। स्नान करने से नदी के जल की प्राण ऊर्जा उन्हें मार डालती है।
साधना से जिस आत्म सन्तोष शान्ति एवं आनन्द की अनुभूति होनी चाहिए, हरिदास का अन्तःकरण कोसों दूर था। पहले की अपेक्षा मन की व्याकुलता और भी बढ़ी। समर्पण में कहाँ किस तरह की गलती रह गयी है, राजा को यह नहीं सूझ रहा था।
साधना द्वारा प्राण बलिष्ठ करें।
साधना करनी पड़ती है फिर अनगढ़ मन को सुगढ़ सुसंस्कृत बनाने के लिए साधने का काम चुटकी बजाते ही हो सकने की आशा कैसे की जाय। कुछ दिन की ‘मेडीटेशन’ बाल क्रीड़ा से, इस संदर्भ में किसी चिरस्थायी सफलता की आशा नहीं करनी चाहिए। जिन्हें और अभीष्ट हो उन्हें दीर्घकालीन एवं सतत् प्रयत्न के लिए कटिबद्ध होना चाहिए।
साधना का अनिवार्य अंग माना। पीड़ितों की सेवा से अहं विगलित हुआ आत्म विस्तार का अवरुद्ध मार्ग खुल गया। धीरे-धीरे आत्म सत्ता की प्रकाश किरणें भी अन्तःकरण में झिलमिलाने लगीं। उस पावन आलोक में हरिदास ने सर्वत्र अपनी सत्ता को ही एक अखण्ड रूप में क्रीड़ा-कल्लोल करते देखा। अन्तस् का तमस् सच्ची समर्पण योग की साधना से जाता रहा अवतरित दिव्य प्रकाश के आलोक ने हरिदास के समूचे व्यक्तित्व की कायाकल्प कर दिया।
साधना व आराधना भी इसी के साथ स्मरण किये जाने वाले कृत्य हैं जिनमें क्रमशः विचारणा व गतिविधियों को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जाता है। उपासना यदि भक्तियोग है तो साधना ज्ञानयोग एवं आराधना- कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिये इन्हीं विविध सोपानों को अपनाना पड़ता है।
साधना ज्ञानयोग एवं आराधना- कर्मयोग है। कारण, सूक्ष्म, स्थूल शरीर के रूप में इनके कार्यक्षेत्र हैं। आत्म सत्ता को महानता के पथ पर पहुँचाने के लिये इन्हीं विविध सोपानों को अपनाना पड़ता है।
साधना से मन को दुष्प्रवृत्तियों से जूझने योग्य सशक्त बनाया जाता है एवं आराधना द्वारा अपने क्रिया-कलापों को सोद्देश्य बनाकर ईश्वरीय उद्यान को और भी सुन्दर-सुव्यवस्थित बनाने आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना का विकास किया जाता है। सतत् हर क्षण इनका अभ्यास जीवन में अनिवार्य है।
साधना करनी चाहिए। यही है वह उपलब्धि जिसके सहारे अकेला भी हजारों लाखों से बढ़कर समर्थ सिद्ध होता है।
साधना भी इस जन्म में काम आती देखी गई है। अनायास ऐसी अद्भुताएँ प्रकट होना इसी कारण सम्भव होता। जिनमें यह क्षमताएँ प्रकट हों उसका उत्तरदायित्व है कि वे उन्हें खिलवाड़ में खर्च न करें। मात्र उच्चस्तरीय प्रयोजनों में ही लगायें।
साधना की तन्द्रा की स्थिति में भीतर से आवाज आयी- ‘सबसे मूल्यवान वस्तुओं का समर्पण कर, तुझे लक्ष्य की प्राप्ति होगी। महाराज संशय में पड़े सर्वाधिक मूल्यवान चीजें कौन-कौन-सी हैं। वापस राजदरबार लौटे। राजपुरोहित महामन्त्री तथा प्रधान सेनापति को अविलम्ब परामर्श के लिए बुला भेजा। उनके आते ही संशय प्रकट करते हुए तीनों से जानना चाहा कि मनुष्य के लिए सबसे मूल्यवान कौन-कौन सी चीजें हैं।
साधना के लिए सहमत किया जाना चाहिए। उनके व्यक्तित्व का ही अगली पीढ़ी से हस्तांतरण जो होना है। इसका अर्थ यह नहीं कि माता की अपेक्षा की जाय। उनमें से अधिकाँश में भावनात्मक वरिष्ठता प्रकृति प्रदत्त परम्परागत रूप से पाई जाती है। तो भी उन्हें गर्भ धारण के समय की तथा पालन-पोषण के दिनों की उत्कृष्टता तथा सतर्कता जानने तथा अभ्यस्त करने का प्रयत्न समय रहते किया जाना चाहिए।
साधनाएँ कीं। तपाग्नि में जलकर काया अत्यन्त दुर्बल हो गयी। आत्मदेव की उपासना में शरीर का भी ध्यान न रहा। पर इन कठोर साधनों के बावजूद भी हरिदास का मन व्यग्र तथा असन्तुष्ट बना हुआ था। आत्मसाक्षात्कार का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा था।
साधना जितनी समृद्ध होती है, वे उसी अनुपात से रहस्यों को समझ पाते हैं। उनका ज्ञान उतना ही प्रशंसनीय होता है।
साधना है। पातंजली के योग दर्शन का प्रथम सूत्र है- ‘योगः चित्त वृत्ति निरोधः’ अर्थात्- चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है। चित्त वृत्ति से तात्पर्य यहाँ चंचलता से है। संक्षेप में चंचलता के अवरोध को रोककर उसकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाकर अभीष्ट प्रयोजन में निरत करने के अभ्यास को योगाभ्यास कहा जा सकता है।
साधना से जाता रहा अवतरित दिव्य प्रकाश के आलोक ने हरिदास के समूचे व्यक्तित्व की कायाकल्प कर दिया। अब वे राजा हरिदास नहीं तत्व ज्ञानी हरिदास थे।
साधना द्वारा अपने मन में उस मन्त्र के प्रति जमी श्रद्धा के आधार पर ही सफलता प्राप्त करते हैं। जिस मन्त्र से श्रद्धालु ताँत्रिक चमत्कारी काम कर दिखाता है, उस मन्त्र की अश्रद्धालु साधक चाहे जिस तरह आराधना करे, उसे कुछ लाभ नहीं होता। गायत्री मन्त्र के सम्बन्ध में भी यही तथ्य बहुत सीमा तक काम करता है। जब साधक श्रद्धा और विश्वासपूर्वक आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और विश्वास विज्ञान दोनों की विशेषताओं से संयुक्त गायत्री मन्त्र का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्धि होती है।
साधना के सत्परिणाम प्रस्तुत करती है।
साधना भी प्रचण्ड होती चली गयी। चित्त की वृत्तियों के निरोध तथा मन की मलीनताओं के परिशोधन के लिए उन्होंने जप, तप एवं तितीक्षा की कठोर साधनाएँ कीं। तपाग्नि में जलकर काया अत्यन्त दुर्बल हो गयी। आत्मदेव की उपासना में शरीर का भी ध्यान न रहा। पर इन कठोर साधनों के बावजूद भी हरिदास का मन व्यग्र तथा असन्तुष्ट बना हुआ था।
साधना जानते हैं जो ऐसी शिक्षा देते हैं। स्वामी जी ने कहा- मैंने कभी बन्दूक छुई तक नहीं, फिर भी आप कहें तो मैं ध्यान का अभ्यस्त होने के कारण निशाना साधकर दिखा सकता हूँ। उस व्यक्ति ने कौतूहल वश छह नली का रिवाल्वर हाथ में थमा दिया। स्वामीजी ने इतना अपनी ओर से किया कि लक्ष्य बेध के छह अलग अलग निशान अपनी ओर से बना दिये। इसके बाद निशाने साधे गए और एक-एक करके छह बार घोड़ा दबाने पर छह ही लक्ष्य बेध दिये गए।
साधना द्वारा सम्भव हो सकता है। किन्हीं-किन्हीं की पूर्व जन्मों की साधना भी इस जन्म में काम आती देखी गई है। अनायास ऐसी अद्भुताएँ प्रकट होना इसी कारण सम्भव होता। जिनमें यह क्षमताएँ प्रकट हों उसका उत्तरदायित्व है कि वे उन्हें खिलवाड़ में खर्च न करें। मात्र उच्चस्तरीय प्रयोजनों में ही लगायें।
साधना एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे भली-भाँति सम्पन्न किया जाये तो उसके सत्परिणाम प्राप्त होना सुनिश्चित है।
साधना रत रहकर पूरा करना पड़ता है। सुप्रजनन की दृष्टि से उपयुक्त पिताओं को तलाश करना और उन्हें अपना महान उत्तरदायित्व सम्भाल सकने के लिए लम्बे समय तक आत्म निर्माण साधना के लिए सहमत किया जाना चाहिए। उनके व्यक्तित्व का ही अगली पीढ़ी से हस्तांतरण जो होना है। इसका अर्थ यह नहीं कि माता की अपेक्षा की जाय। उनमें से अधिकाँश में भावनात्मक वरिष्ठता प्रकृति प्रदत्त परम्परागत रूप से पाई जाती है।
साधना व आराधना के इन तीन उपायों से ही ईश्वर जीवसत्ता में प्रवेश करता है तथा मनुष्य को देवोपम चिन्तन चरित्र विनिर्मित करने की प्रेरणा देता है। साहसी मनस्वी इस पथ पर चलकर असीम सामर्थ्य प्राप्त करते हैं, स्वयं को ऊँचा उठाते हैं और दैवी अनुकम्पा उन पर सतत् बरसती रहती है। योगाभ्यास एक पराक्रम है, अपनी अन्तः की दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष है। जो इस देवासुर संग्राम में जितना अधिक सफल होता है वह बहिरंग जगत में सुसंस्कृत एवं अन्तरंग की दृष्टि से महान बनता चला जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-April
साधना एवं तपश्चर्या की समन्वित साधना पद्धति का आश्रय लेकर अध्यात्म विज्ञान का उपयोग किया जाता है और उससे चित् शक्ति के संवर्धन का लाभ मिलता है।
साधना किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार सम्पन्न करे। सभी को एक जैसी साधना नहीं कराई जाती।
साधना तो सरल भी है। मुझे इसका दर्शन और विधान समझादें।
साधना पूरी करके भिक्षा दूँगी।” योग साधना में बोलना कैसा? किवाड़ के छेद में झाँककर देखा तो वह अपने पति की सेवा में निरत थी। “ऐसा ही होता है-योग। मेरे साथ ठिठोली कर रही।
साधना प्रयासों की तुलना में आत्मिक प्रगति के लिए किए जाने वाले पुरुषार्थ का असंख्य गुना महत्वपूर्ण बताया है।
साधना में भाव सम्वेदना के रूप में प्रकट होकर साधर-साध्य के मध्य दिव्य आदान-प्रदान करने में काम की प्रमुख भूमिका होती है। गंगा हिमालय से चलती है। उसका प्रचण्ड वेग विविध नदी नहरों से होकर अपने पावन जल से जीव-जन्तु एवं वनस्पतियों को तृप्त करता विशाल समुद्र में मिल जाता है। इस प्रकार की उमंगों को प्रकृतिगत काम-क्रीड़ा कहा जा सकता है। सृजनात्मक दिशा में मोड़ने एवं श्रेष्ठ उद्देश्यों में नियोजित करने से वह उदात्त बनती और अन्ततः समष्टिगत प्राण शक्ति से मिलकर एकाकार हो जाती है।
साधना में बोलना कैसा? किवाड़ के छेद में झाँककर देखा तो वह अपने पति की सेवा में निरत थी। “ऐसा ही होता है-योग। मेरे साथ ठिठोली कर रही।” तपस्वी की आँखें लाल हो गई।
साधना की प्रमुखता है। शबरी ही है जो रात-रात भर जागकर आश्रम से लेकर सरोवर तक का कंटीला रास्ता साफ करती रही और सज्जनों का पथ प्रशस्त करने के लिए अपना अविज्ञात निरहंकारी भावभरा योगदान प्रस्तुत करती रही भक्तजनों का समाधान हो गया। उन्होंने जाना कि भक्त की और भगवान की दृष्टि में अन्तर क्या है।
साधना में भुला देते थे। चिकित्सकों को आश्चर्य था कि कौन-सी शक्ति हैं जिसके कारण इतनी विकृतियों के बावजूद वे जीवित हैं।
साधना को प्रमुखता दी गई है। मन्त्र विज्ञान का समूचा आधार ही ध्वनि शक्ति के विभिन्न उपयोगों, उपचारों, निर्धारणों पर ही ठहरा हुआ है। मंत्रों की संरचना में भाषा विज्ञान और व्याकरण अनुबन्धों का उतना ध्यान नहीं रखा गया है जितना कि अक्षरों के पारस्परिक गुँथन क्रम के आधार पर उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रकार के स्तर एवं प्रभाव का। गायत्री मन्त्र की प्रमुखता न उसके अर्थ पर निर्भर है और न व्याकरण शास्त्र की दृष्टि से उसकी परख की गई है। उसके उच्चारण क्रम में ही वह विशेषता है जिसके आधार पर अन्तराल के प्रसुप्त चक्रों उपत्यिकाओं में जगाने का उद्देश्य पूरा होता हैं।
साधना के द्वारा इस प्रसुप्ति को जागृति में बदला जा सकता है। सामान्य से असामान्य बन सकने की इस प्रक्रिया को आत्म-साधना का एक अंग कहा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमता का विकास-अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का दिव्य वरदान इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।
साधना में तन्मय यह साधक कभी अपने मर्द की चिन्ता न कर निरन्तर स्वयं व अपने शिष्यों के साथ चित्र बनाया करता। सत्तर वर्ष से अधिक आयु हो जाने पर भी उसकी साधना में कोई कमी नहीं आयी। वे अपने दर्द को इस साधना में भुला देते थे। चिकित्सकों को आश्चर्य था कि कौन-सी शक्ति हैं जिसके कारण इतनी विकृतियों के बावजूद वे जीवित हैं।
साधना, उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का सान्निध्य, तीर्थसेवन, वातावरण संपर्क इसी निमित्त किये जाते रहे हैं। स्वाध्याय की महत्ता भी इसीलिए मानी गयी है। गर्भाधान की अवधि में माता को श्रेष्ठता का ही वातावरण मिले, उसके लिये आवश्यक है कि अमर्यादित प्रजनन तो रुके ही; साथ ही ऐसा वातावरण भी बने जिससे कामुकता को प्रश्रय न मिलकर सत्प्रवृत्ति संवर्धन श्रेष्ठता का महत्व मिले। दायित्व न केवल व्यक्ति एवं परिवार का है वरन् सारे समाज का है। यह मात्र आस्तिकता एवं आध्यात्मिकता का वातावरण बनने पर ही सम्भव है।
साधना ही एक असंदिग्ध मार्ग है।
साधना का एक अंग कहा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमता का विकास-अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का दिव्य वरदान इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।
साधना’ को अतीव उपयोगी माना गया है। यों यह प्रयोजन मनोयोगपूर्वक सत्प्रयोजनों में संलग्न रहने से अनेकों मनस्वी लोगों की तरह पूरा किया जा सकता है, पर जितनी सरलता आत्म-साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्पशक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है। अध्यात्म साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा अनुभवों के आधार पर प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
साधना है। इससे नाड़ी मण्डल और स्नायु संस्थान पर इच्छित नियमन की क्षमता उपलब्ध होती है फलतः मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य अपना स्वामी आप बन जाता है। जबकि अव्यवस्थित कल्पनाओं और अनुपयुक्त इच्छाओं में उलझा हुआ व्यक्ति अपने साथ ठठोली करने और अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने जैसी विडम्बनाएँ रचता रहता है। निरोग और दीर्घायु वे ही रह सकते हैं जो अपने के स्वामी आप हैं। इच्छाओं और आदतों के गुलाम को आत्म निरीक्षण करने तक की फुरसत नहीं मिलती और न इतना साहस रहता है कि पतनोन्मुख प्रवाह को रोकें और उसे श्रेय पथ की दिशा में मोड़ें।
साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु-प्रवृत्तियाँ अभ्यास में आती है, उनकी छाप अभी भी छाई रहती है। मनुष्य की जो उच्च स्थिति है, उसे देखते हुए वे पशु-प्रवृत्तियाँ अनावश्यक एवं अवाँछनीय बन जाती है। छोटे बच्चे नंग-धड़ंग फिर सकते है और कहीं भी मल-मूत्र का त्याग बिना संकोच के कर सकते हैं, पर प्रौढ़ावस्था में तो वैसा करना अनुपयुक्त ही माना जायगा।
साधना प्राण-प्रक्रिया की इसी लय-तालबद्धता का विकसित रूप है। अनायास फूट पड़ने वाली गुनगुनाहट प्राणतत्व की इसी लय-ताल की हठात् अभिव्यक्ति है। साधकों और उत्कर्षशीलों को इस लय-तालबद्ध श्वास-प्रश्वास का सचेत अभ्यास करना चाहिए। श्वास-प्रश्वास की स्वयं की सामान्य गति निश्चित कर ली जाय और प्रयास किया जाय कि अधिकाधिक समय इस गति में एकतानता, समस्वरता बनी रहे। आरम्भ यहीं से किया जाता है।
साधना पद्धति का आश्रय लेकर अध्यात्म विज्ञान का उपयोग किया जाता है और उससे चित् शक्ति के संवर्धन का लाभ मिलता है।
साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा अनुभवों के आधार पर प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
साधना सत्र चलते हैं और मध्याह्न से सायंकाल तक युग शिल्पी सत्र। अब दोनों का एक साथ समावेश हैं साथ-साथ चलने के कारण दोनों का पाठ्यक्रम एक मास में ही पूरा हो जाता है। शिक्षकों और शिक्षार्थियों पर दबाव तो निश्चित रूप से अधिक पड़ता हैं, किन्तु दुहरा लाभ भी प्रत्यक्ष है। हर महीने तारीख एक से उनतीस तक यह सत्र चलते हैं। जिन्हें सम्मिलित होना हो आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लें।
साधना में लगाये रहें। प्रकारान्तर से यह मनःक्षेत्र में सुसंस्कारिता परिपक्व करने की प्रक्रिया है। इसमें कामुकता अश्लील चिन्तन एवं अवाँछनीय क्षरण से बचाव करने का ध्यान तो रखना ही होगा। साधना, उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का सान्निध्य, तीर्थसेवन, वातावरण संपर्क इसी निमित्त किये जाते रहे हैं। स्वाध्याय की महत्ता भी इसीलिए मानी गयी है।
साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्पशक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है। अध्यात्म साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा अनुभवों के आधार पर प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।
साधना का स्वरूप समझें तथा प्रयोग करने की दिशा में भी कदम बढ़ाने चाहिए।
साधना उपचार से सम्भव होता है। संकल्पशक्ति का बिखराव रोकने-उसे प्रचण्ड बनाने और अभीष्ट प्रयोजन में नियोजित किए रहने की अन्तःक्षमता विकसित करने के लिए ‘साधना’ को अतीव उपयोगी माना गया है। यों यह प्रयोजन मनोयोगपूर्वक सत्प्रयोजनों में संलग्न रहने से अनेकों मनस्वी लोगों की तरह पूरा किया जा सकता है, पर जितनी सरलता आत्म-साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्पशक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है।
साधनात्मक प्रयत्न करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी यह भी है कि मन को सही दिशा दें। इच्छाओं-आकाँक्षाओं का सही स्वरूप समझें ताकि उनमें से उचित का ही वरण कर सकें। श्रेय मार्ग के पथिक को लक्ष्य ही नहीं अपने चिन्तन का स्वरूप भी निर्धारित करना पड़ता है। कारण कि उत्कृष्ट जीवन की ओर चलने में सर्वाधिक सहायक अथवा बाधक अपना चिन्तन एवं दृष्टिकोण ही होता है।
साधना प्रक्रिया को अपनाकर ही सम्भव हो सकता है। आन्तरिक दुर्बलता एवं विपन्नता के भार को यदि किसी प्रकार हटाया जा सके तो मनुष्य की गरिमा महामानवों जैसी, नर देवताओं जैसी बनी रह सकती है। परिष्कृत मनःस्थिति में रहने वाले सहज ही समुन्नत मनःस्थिति प्राप्त कर लेते हैं, यह तथ्य सर्वविदित है।
साधना में कोई कमी नहीं आयी। वे अपने दर्द को इस साधना में भुला देते थे। चिकित्सकों को आश्चर्य था कि कौन-सी शक्ति हैं जिसके कारण इतनी विकृतियों के बावजूद वे जीवित हैं।
साधना में लग पड़ा। बिन पढ़ा हूँ। शास्त्र नहीं जानता। कुछ पूछना हो तो मेरे गुरुदेव के पास चले जाइये।” सन्त के आश्चर्य का ठिकाना न था।
साधना सत्र चल रहे हैं। उनमें आत्मोत्कर्ष की, परिष्कार परिशोधन की प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिये साधना एवं प्रेरणा की उभयपक्षीय व्यवस्था का समावेश है। शारीरिक और मानसिक परीक्षण ब्रह्मवर्चस् प्रयोगशाला निष्णात् शरीर शास्त्रियों द्वारा कराने के उपरान्त निर्णय होता है कि कौन क्या साधना किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार सम्पन्न करे। सभी को एक जैसी साधना नहीं कराई जाती।
साधना। उस लक्ष्य की प्राप्ति तो बाद की बात है। किन्तु प्राणतत्व का अधिकाधिक लाभ लेना चाहने वालों को लय-तालयुक्त श्वास-प्रक्रिया का अभ्यास तो आरम्भ कर ही देना चाहिए।
साधना का अविच्छिन्न अंग मानकर करते रहा जाय तो वह कर्म-योग भी एक तपस्या है। उसका प्रतिफल भी अन्यान्य योगाभ्यासों के समान ही होता है। त्रिकालदर्शी होने की सिद्धि मुझे इसी आधार पर मिली है।
साधना नहीं कराई जाती।
साधना एवं प्रेरणा की उभयपक्षीय व्यवस्था का समावेश है। शारीरिक और मानसिक परीक्षण ब्रह्मवर्चस् प्रयोगशाला निष्णात् शरीर शास्त्रियों द्वारा कराने के उपरान्त निर्णय होता है कि कौन क्या साधना किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार सम्पन्न करे। सभी को एक जैसी साधना नहीं कराई जाती।
साधना और शिक्षा की सत्र व्यवस्था। युग शिल्पियों को प्रशिक्षित करने एवं तपाने के लिए एक मास के, नौ दिन के, चार दिन के सत्र निरन्तर चलते रहते हैं। इनमें सम्मिलित होने वालों से वाँछित अनेकों प्रकार की अध्यापक, व्यवस्थापक एवं श्रमिक स्तर की व्यवस्था करनी पड़ती है। इनमें से प्रत्येक हलका भारी काम ऐसा है जिसे खरीदा हुआ श्रम किसी भी प्रकार पूरा नहीं कर सकता। उसके लिए आदर्शवादी प्रतिभाओं का समयदान ही काम देता है।
साधना। साधना वह प्रक्रिया है-जिसमें अमुक विधि-विधानों, कर्म-काण्डों के साथ अमुक स्तर की भावनाओं का समावेश करके आन्तरिक अवसादों को दूर किया जाता है। चेतना पर छाई प्रसुप्ति को जागृति में परिवर्तित करना आत्म-साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु-प्रवृत्तियाँ अभ्यास में आती है, उनकी छाप अभी भी छाई रहती है।
साधना द्वारा भी उत्पन्न कर सकते हैं। किन्हीं-किन्हीं में अनायास ही प्रकट होते देखा जाता है। यह प्रकटीकरण यह बताता है कि यह क्षमताएँ तो हर किसी में विद्यमान है, पर उनका दृश्य स्वरूप यदि संयोगवश देखा जा सकता है तो यह आशा करने का भी औचित्य है कि प्रयत्नपूर्वक उन्हें जागृत किया जा सके तो उन्हें भी वैसी ही मानसिक विशेषताओं की तरह प्रयुक्त किया जा सके जैसी कि कला-कौशल आदि के रूप में जगाया और काम में लाया जाता है। अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न मनुष्यों के कितने ही उदाहरण समय-समय पर सामने आते रहते हैं।
साधना विधान से अपरिचित रहने पर भी उसे इतना श्रेय क्यों मिला? हम लोग उस श्रेय सम्मान से वंचित क्यों रहें?”
साधना वह प्रक्रिया है-जिसमें अमुक विधि-विधानों, कर्म-काण्डों के साथ अमुक स्तर की भावनाओं का समावेश करके आन्तरिक अवसादों को दूर किया जाता है। चेतना पर छाई प्रसुप्ति को जागृति में परिवर्तित करना आत्म-साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु-प्रवृत्तियाँ अभ्यास में आती है, उनकी छाप अभी भी छाई रहती है। मनुष्य की जो उच्च स्थिति है, उसे देखते हुए वे पशु-प्रवृत्तियाँ अनावश्यक एवं अवाँछनीय बन जाती है।
साधना के सहारे आगे बढ़ता और सफल होता है। वास्तविकता यह है कि परिष्कृत व्यक्तित्व ही साधन एकत्रित करता और उनके सदुपयोग का लाभ उठाता है। घटिया व्यक्तित्व अवसर होते हुए भी उसका लाभ नहीं उठा पाता। जबकि प्रतिभावान् प्रतिकूलताओं के बीच भी अनुकूलता खोज निकालते हैं और अवसर न होते हुए भी उसे अपने कौशल से उपार्जित करते हैं।
साधना में निरत हो गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-July
साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियां। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप।
साधना द्वारा गन्ध शक्ति का विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोग करने हेतु जो उपयोग होता था, उसे पुनर्जीवित कर निष्क्रिय समझे जानी वाली इस सामर्थ्य से भी अतीन्द्रिय शक्तियों को जगाया जा सकना सम्भव है। घ्राण एवं प्राण दोनों ही कैसे सुनियोजित किये जायँ, योगविज्ञान इसका सही मार्गदर्शन भी देता है।
साधना से सिद्धि प्राप्ति की दिशा में विभूतियों का सहयोग तभी मिलता है और वे श्रेष्ठ भी होती हैं। जब मनुष्य अपने को मनुहार द्वारा नहीं, पात्रता सम्पादन द्वारा तद्रूप-तद्नुकूल बनाने का प्रयास करता है। यही है ब्रह्म को परब्रह्म से जोड़ने का तत्वदर्शन तथा समस्त सिद्धियों उच्चस्तरीय उपलब्धियों की प्राप्ति का राजमार्ग। इसी पर चलकर भौतिकी के विभिन्न मनीषियों ने- अध्यात्मविज्ञान के ऋषियों ने बहुमूल्य मणिमुक्तक खोज निकाले हैं, स्वयं को देवदूत स्तर तक पहुँचाया है। इसी कड़ी को पकड़ कर ही वह आधार बनाया जा सकता है जो व्यक्तित्व की मग्रता, पूर्णता की लक्ष्य प्राप्ति में सहायक बन सकेगा।
साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भ्रष्ट जीवन के रहते दैवी अनुकम्पाएँ मिल सकना संभव नहीं। जो देवताओं को फुसलाकर अपना उल्लू साधना चाहते हैं पर चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है। इसी प्रकार लोग विभिन्न शंकाएं उठाते देखे गये हैं और कुतर्क का जाल बुनकर भावना के क्षेत्र में कुहराम मचाते पाये गये हैं।
साधनात्मक प्रचण्ड पुरुषार्थ किया जाना चाहिए।
साधना में स्वर विधा को इतना अधिक महत्व इसी तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए दिया गया है। प्राणायाम अभ्यास द्वारा मनुष्य भी अपनी दिव्य घ्राण शक्ति को विकसित करके अतीन्द्रिय क्षमताओं के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ सकता है।
साधना, मनोयोग, साधनों का दुरुपयोग आदि सभी आवश्यक हैं।
साधना, (42) गायत्री के पाँच मुख पाँच दिव्य कोश।
साधना में प्राण-पण से जुटने को जब प्रभू ने कहा तो सारा राष्ट्र उस किशोरी के त्याग से झकझोर उठा। सामान्य गृहणियों का स्तर भी देवियों जैसा बनने लगा। मधूलिका के समर्पण से परिवारों में स्वर्गीय सुसंस्कारिता की हरीतिमा उगने- लहलहाने लगी।
साधना के मध्य अविच्छिन्न संबंध। दोनों परस्पर पूरक हैं। उपासना से तात्पर्य है- उत्कृष्टता की देवसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करना, साधना का अर्थ है- अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात अधिकाधिक मात्रा में बढ़ाना। यदि गायत्री तत्वज्ञान को सही रूप में समझा गया होगा तो साधक को निर्धारित उपासना कृत्य श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना पड़ेगा, साथ ही आत्म-परिष्कार की जीवन साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
साधना है जिसके सुनियोजित प्रतिफलों ने आज युग को भौतिकी की दृष्टि से चरमावस्था पर पहुँचा दिया है। प्रश्न यह उठता है कि अनगढ़ प्रकृति तथा जीव जगत को सुगढ़ बनाते समय वह चेतना सत्ता को सुव्यवस्थित बनाने का- उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर करने का प्रयास क्यों नहीं करता? प्रगति के इस राजमार्ग का सुनिश्चित पथ जानते हुए भी वह चौराहे पर भटक क्यों जाता है? यही है वह विडम्बना जिसके चलते व्यक्ति दिग्भ्रान्त, अशान्त, उद्विग्न नजर आता है। सभ्य और सुसंस्कृत बनाने की दिशा में, अपने आपे को सुव्यवस्थित- सुगढ़ बनाने में यदि उसी स्तर का पुरुषार्थ किया जाता तो आज जैसी परिस्थितियाँ सम्भवतः दृष्टिगोचर नहीं होतीं।
साधना मू. 60 पैसे (द) गायत्री चालीसा मू. 10 पैसे।
साधना। 4. गायत्री का शक्तिस्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7.गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना।
साधना करनी चाहिये जो शेष 11 महीनों तक अभीष्ट ऊर्जा प्रदान करती रहे। यह सभी प्रयोजन एक महीने के कल्प सत्रों में सम्मिलित होने से सम्पन्न होते हैं। यही कारण है कि जुलाई, अगस्त, सितम्बर के तीन कल्प साधना सत्र विशेष रूप से प्रज्ञा पुंजों के लिये ही लगाये जा रहे हैं उनमें नये पुराने सभी प्रज्ञा पुत्रों को अपनी सुविधा के महीने में सम्मिलित होने- स्थान सुरक्षित करा लेने- के लिये कहा जा रहा है।
साधना में बाह्य शत्रुओं- अवरोधों से जितना लड़ना- जूझना पड़ता है, उनसे कहीं अधिक अपनी वृत्तियों से युद्ध करना पड़ता है। जन्म जन्मांतरों के संस्कारों तथा इस जन्म के विकृत अभ्यासों से आसानी से छुटकारा नहीं मिल पाता। वे इतने दृढ़ एवं हठीले होते हैं कि न तो उन्हें बाँधा जा सकता है, न ही जड़ से उखाड़ फेंकना सम्भव है। कर्मयोग, ज्ञानयोग की साधनाएँ शरीर, मन एवं बुद्धि की परतों को ही प्रभावित कर पाती हैं। अन्तःकरण की गहरी परतों में जमे सूक्ष्म संस्कारों का परिशोधन, भावों के उदात्तीकरण के बिना सम्भव नहीं होता।
साधनाएँ शरीर, मन एवं बुद्धि की परतों को ही प्रभावित कर पाती हैं। अन्तःकरण की गहरी परतों में जमे सूक्ष्म संस्कारों का परिशोधन, भावों के उदात्तीकरण के बिना सम्भव नहीं होता। यह प्रयोजन भक्तियोग के माध्यम से ही पूरा हो पाता है।
साधना चाहते हैं पर चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है। इसी प्रकार लोग विभिन्न शंकाएं उठाते देखे गये हैं और कुतर्क का जाल बुनकर भावना के क्षेत्र में कुहराम मचाते पाये गये हैं।
साधना का अर्थ है- अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात अधिकाधिक मात्रा में बढ़ाना। यदि गायत्री तत्वज्ञान को सही रूप में समझा गया होगा तो साधक को निर्धारित उपासना कृत्य श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना पड़ेगा, साथ ही आत्म-परिष्कार की जीवन साधना में भी उतनी ही तत्परता के साथ संलग्न होना पड़ेगा। दोनों का मिलन होते ही चमत्कार दृष्टिगोचर होने लगते हैं। भ्रष्ट जीवन के रहते दैवी अनुकम्पाएँ मिल सकना संभव नहीं। जो देवताओं को फुसलाकर अपना उल्लू साधना चाहते हैं पर चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश नहीं करते, ऐसे ही लोगों की उपासना प्रायः निष्फल रहती है।
साधना’ प्रक्रिया में समाविष्ट किया जाता है।
साधना का परिचय देता है। बंजर अनुपजाऊ भूमि को खेत का रूप देकर धरती को सोना उगलने वाली देवी बना देना किसान की अथक साधना का ही प्रतिफल है। इसी प्रकार अणु-विखण्डन द्वारा, भूगर्भ की पुरुषार्थ भरी खोजों तथा अन्तरिक्ष की गहरी छानबीन करते हुए आधुनिक मानव ने बहुमूल्य सुख-साधन प्राप्त किए हैं। यह भी एक साधना है जिसके सुनियोजित प्रतिफलों ने आज युग को भौतिकी की दृष्टि से चरमावस्था पर पहुँचा दिया है। प्रश्न यह उठता है कि अनगढ़ प्रकृति तथा जीव जगत को सुगढ़ बनाते समय वह चेतना सत्ता को सुव्यवस्थित बनाने का- उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर करने का प्रयास क्यों नहीं करता?
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना करते रहे हैं। शारीरिक व मानसिक श्रम में संतुलन रख निरन्तर लगे रहकर उन्होंने महानता अर्जित की। गाँधी इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। व्यक्तिवादी संकीर्ण चिन्तन सर्वथा एकाँगी है। आदर्श व्यक्ति आत्म-कल्याण की साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है।
साधना-जीवन साधना- आदतों एवं मान्यताओं को साध लेना इतना व्यापक शब्द है जिसमें व्यक्तित्व की परिष्कृति का सारा स्वरूप छिपा पड़ा है। किसान अपने उच्छृंखल बैल को नकेल डालकर साधता है जबकि सर्कस का रिंगमास्टर शेर, हाथी, रीछ जैसे उग्र प्रकृति के जीवों को नरम व्यवहार द्वारा- कभी कड़ाई से साधकर पालतू बना लेता है। गुलाब के पौधों में ‘बडिंग’ (कलम) लगाकर भाँति-भाँति के रंगीन फूल पैदाकर माली अपनी कला-सौंदर्य की साधना का परिचय देता है। बंजर अनुपजाऊ भूमि को खेत का रूप देकर धरती को सोना उगलने वाली देवी बना देना किसान की अथक साधना का ही प्रतिफल है। इसी प्रकार अणु-विखण्डन द्वारा, भूगर्भ की पुरुषार्थ भरी खोजों तथा अन्तरिक्ष की गहरी छानबीन करते हुए आधुनिक मानव ने बहुमूल्य सुख-साधन प्राप्त किए हैं।
साधना कहा गया है।
साधना का ही प्रतिफल है। इसी प्रकार अणु-विखण्डन द्वारा, भूगर्भ की पुरुषार्थ भरी खोजों तथा अन्तरिक्ष की गहरी छानबीन करते हुए आधुनिक मानव ने बहुमूल्य सुख-साधन प्राप्त किए हैं। यह भी एक साधना है जिसके सुनियोजित प्रतिफलों ने आज युग को भौतिकी की दृष्टि से चरमावस्था पर पहुँचा दिया है। प्रश्न यह उठता है कि अनगढ़ प्रकृति तथा जीव जगत को सुगढ़ बनाते समय वह चेतना सत्ता को सुव्यवस्थित बनाने का- उत्कर्ष की दिशा में अग्रसर करने का प्रयास क्यों नहीं करता? प्रगति के इस राजमार्ग का सुनिश्चित पथ जानते हुए भी वह चौराहे पर भटक क्यों जाता है?
साधना की थी। वे रात में राम नाम जपते, दिन में पीड़ितों की सेवा पतितों की सहायता करने में लगे रहते।
साधना के अनेकानेक पक्षों की चर्चा इसी संदर्भ में होती रही है। योग और तप, साधना के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। ‘योग’ जहाँ शरणागति एकत्व की स्थिति है, वहाँ ‘तप’ शोधन की अग्नि-संस्कार वाली प्रक्रिया है। आत्म-सम्पादन हेतु वाँछित ऊर्जा इसी काया से ‘तप’ प्रक्रिया के माध्यम से ही उद्भूत होती है। ऊर्जा जहाँ भौतिकी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण- बलशाली शक्ति है, वहाँ अध्यात्म क्षेत्र में भी सामर्थ्य उपार्जन का यही एक मात्र आधार है।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। ‘योग’ जहाँ शरणागति एकत्व की स्थिति है, वहाँ ‘तप’ शोधन की अग्नि-संस्कार वाली प्रक्रिया है। आत्म-सम्पादन हेतु वाँछित ऊर्जा इसी काया से ‘तप’ प्रक्रिया के माध्यम से ही उद्भूत होती है। ऊर्जा जहाँ भौतिकी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण- बलशाली शक्ति है, वहाँ अध्यात्म क्षेत्र में भी सामर्थ्य उपार्जन का यही एक मात्र आधार है। चेतना को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता के साथ जोड़ देना ‘योग’ और शरीरगत अस्त-व्यस्तता को सुसंस्कारिता के अनुशासन में जकड़ देना ‘तप’ है।
साधना है जिसका ब्रह्मचर्य भी एक अंग है। इन्द्रिय लिप्सा जब पूरे जोश-खरोश पर है, ऐसी दशा में संयम समर्थक तर्क, तथ्य, प्रमाण और वैज्ञानिक प्रतिपादनों के आधार पर सत्यापन नितान्त आवश्यक है। अन्यथा आत्मिकी के प्रयोग परीक्षणों के लिए द्वारा बन्द ही पड़ा रहेगा। जब साधक की सत्ता आत्मिकी का अवधारण ही न कर सकेगी तो उससे लाभ उठाने की बात ही कैसी बनेगी? इन्द्रिय छिद्रों में से जीवन रस टपकता रहेगा और आत्मिक दृष्टि से छूंछ बना हुआ व्यक्ति उच्चस्तरीय पुरुषार्थ करने एवं तद्नुरूप सफलताएँ प्राप्त कर सकने में सफल कैसे होगा?
साधना से तरंगित होता तथा अपनी भाव तरंगों को निस्सृत करता रहता है। भक्ति उस परम तत्व की अनुभूति का एक महत्वपूर्ण साधन है। सामान्य व्यक्ति के लिए ज्ञानयोग, कर्मयोग के मार्ग का परिपालन प्रायः कठिन पड़ता है। क्योंकि प्रचण्ड वैराग्य तथा प्रखर विवेक के अभाव में कर्माकर्म का सही निर्णय करते नहीं बनता। ध्यान धारणा की उच्चस्तरीय साधनाओं के लिए जिस एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है, वह जुट नहीं पाती।
साधनाओं के लिए जिस एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है, वह जुट नहीं पाती। भक्तियोग इन दुर्बलताओं से मुक्त है। वह अभ्यासगत संस्कारों की परिधि को चीरते हुए मनोवैज्ञानिक तरीके से अध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। सहज मानवी वृत्तियों को समाप्त करना सम्भव नहीं है, उनका उदात्तीकरण करके सद्वृत्तियों में परिवर्तन सम्भव है। भक्ति के माध्यम से यह प्रयोजन सहज ही पूरा हो सकता है।
साधना- आदतों एवं मान्यताओं को साध लेना इतना व्यापक शब्द है जिसमें व्यक्तित्व की परिष्कृति का सारा स्वरूप छिपा पड़ा है। किसान अपने उच्छृंखल बैल को नकेल डालकर साधता है जबकि सर्कस का रिंगमास्टर शेर, हाथी, रीछ जैसे उग्र प्रकृति के जीवों को नरम व्यवहार द्वारा- कभी कड़ाई से साधकर पालतू बना लेता है। गुलाब के पौधों में ‘बडिंग’ (कलम) लगाकर भाँति-भाँति के रंगीन फूल पैदाकर माली अपनी कला-सौंदर्य की साधना का परिचय देता है। बंजर अनुपजाऊ भूमि को खेत का रूप देकर धरती को सोना उगलने वाली देवी बना देना किसान की अथक साधना का ही प्रतिफल है। इसी प्रकार अणु-विखण्डन द्वारा, भूगर्भ की पुरुषार्थ भरी खोजों तथा अन्तरिक्ष की गहरी छानबीन करते हुए आधुनिक मानव ने बहुमूल्य सुख-साधन प्राप्त किए हैं।
साधना से सम्पन्नता की सिद्धि या सफलता प्राप्त के शाश्वत सिद्धांत पर ये सभी बातें लागू होती हैं। छुटपुट कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेने से अभीष्ट सफलता कहाँ मिलती है? उसके लिये श्रम साधना, मनोयोग, साधनों का दुरुपयोग आदि सभी आवश्यक हैं।
साधना के साथ-साथ समाज की भी भलाई करता है। वह समाज के लोगों से सहानुभूति रखता है और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहार से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करता है।”
साधना सत्र विशेष रूप से प्रज्ञा पुंजों के लिये ही लगाये जा रहे हैं उनमें नये पुराने सभी प्रज्ञा पुत्रों को अपनी सुविधा के महीने में सम्मिलित होने- स्थान सुरक्षित करा लेने- के लिये कहा जा रहा है।
साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियां।
साधना मार्ग पर आगे बढ़ता है। श्रद्धा विश्वास शक्ति के स्रोत हैं। सन्त तुलसीदास इन्हीं की अभ्यर्थना शक्ति और शिव के रूप में करते हैं। “भवानी शंकरी वन्दे श्रद्धा विश्वास रुपिणों” के रूप में उपरोक्त तथ्य का ही रहस्योद्घाटन किया गया है। श्रद्धा से अभिप्राय है- श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति असीम प्यार।
साधना’ नाम से जाना जाता है।
साधना के लाभ भी शीघ्र ही मिलने लगेंगे। क्रिया के साथ मनोयोग को घनिष्ठ कर देने की सफलता बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे अपनाने वाले भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र में समान रूप से सफल होते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-January
साधना शारीरिक परिशोधन के लिए की जाती है। पूर्णयोग की साधना में शरीर ही नहीं मन, वाणी, प्राण और अंतःकरण अर्थात् समूची मानवी प्रकृति का परिष्कार आवश्यक है।
साधनाओं का मूलाधार गायत्री ही है।
साधना समर्थ मार्गदर्शक के निर्देशन में ही सफल हो सकती है।
साधना मार्ग में आत्म-शुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। प्रत्येक साधना प्रणाली में परिशुद्धि का विधान है। शुद्धि का क्षेत्र व्यापक है। बाहर और भीतर दोनों ही क्षेत्र का परिशोधन आवश्यक है। हठयोग की साधना शारीरिक परिशोधन के लिए की जाती है।
साधना में मन, विचार एवं प्राण-प्रवाह तीनों की ही साधना अन्तर्निहित है। मन और विचारों को एक ही दिशाधारा में नियोजित रखते हुए प्राण-प्रवाह पर नियन्त्रण प्राप्त करने का अभ्यास ही प्राणायाम है।
साधना प्रणाली में परिशुद्धि का विधान है। शुद्धि का क्षेत्र व्यापक है। बाहर और भीतर दोनों ही क्षेत्र का परिशोधन आवश्यक है। हठयोग की साधना शारीरिक परिशोधन के लिए की जाती है। पूर्णयोग की साधना में शरीर ही नहीं मन, वाणी, प्राण और अंतःकरण अर्थात् समूची मानवी प्रकृति का परिष्कार आवश्यक है।
साधना अन्तर्निहित है। मन और विचारों को एक ही दिशाधारा में नियोजित रखते हुए प्राण-प्रवाह पर नियन्त्रण प्राप्त करने का अभ्यास ही प्राणायाम है।
साधना मात्र श्वास-प्रश्वास का साधारण व्यायाम और फेफड़ों की कसरत होकर रह जाती है। उससे स्वास्थ्य लाभ तो सम्भव है, किन्तु वह न तो योग है और न ही उसके द्वारा प्राण-शक्ति पर नियन्त्रण हो सकता है।
साधना द्वारा शक्ति के जागरण का। चेतना के यह दो ध्रुव हैं, जो परस्पर एक दूसरे से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े हुए हैं। ऋण और धन विद्युत के दो तारों के रूप में ये दो ध्रुव चैतन्य आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं। ये परस्पर पूरक हैं। उपनिषद् में वर्णन है-
साधनानां तु हे प्रिये।
गायव्येव मतालोके मूलाधारा विदो वरैः॥
-गायत्री मंजरी
साधना है। ये सभी प्राण-उपप्राण एक ही व्यष्टि प्राण के वर्गीकरण मात्र हैं। मूलतः प्राण सत्ता एक ही है और विराट् प्राण-सता का ही अंश है।
साधना का उद्देश्य स्पष्ट है। वह है- पिण्डस्थ प्राण-शक्ति का ब्रह्मांडव्यापी प्राण-शक्ति से योग एवं इस योग की प्रक्रिया पर अपना अधिकार। वही प्राण-शक्ति मनुष्यों में चेतना, ऊर्जा, शक्ति, स्फूर्ति, तत्परता, तन्मयता, साहस, शौर्य, उमंग, उत्साह, वीरता, चमक या सौंदर्य, तेजस्विता, सजीवता, प्रखरता, दृढता आदि के रूप में अभिव्यक्त होती है। जिनमें यह प्राण-शक्ति प्रचुर मात्रा में विद्यमान होती है, वे ही महामानव- महाप्राण कहलाते हैं।
साधना की जाती है, जिसकी उपलब्धि पंचदेवों के रूप में होती है। निद्राग्रस्त होने पर ये मृत तुल्य पड़े रहते और किसी काम नहीं आते। फलस्वरूप मनुष्य दुर्बल एवं हेय बना रहता है। यदि इन देवों को जगाया जा सके- उपयोग किया जा सके, तो तो मनुष्य असामान्य सामर्थ्य का स्वामी बन सकता है। शरीरगत पाँच तत्वों को पंचदेवों का उल्लेख निम्न प्रकार मिलता है-
साधना में जुटने के लिए जागृत आत्माओं को अग्रिम मोर्चे पर खड़ा होना ही पड़ेगा। बाद में तो रेल मोटरों के पीछे-पीछे रेत और कूड़ा भी दौड़ते देखा गया है। बात आगे चलने की है। प्रभात बेला में सूर्य निकलता है तो सब ओर चहल-पहल मचने लगती है। जिम्मेदार लोग तो न केवल समय से पहले स्वयं उठ पड़ते हैं वरन् दूसरों को भी जगाने उठाने में कुक्कुट की तरह बाग लगाते और पहल करते हैं।
साधना वह सामर्थ्य इतनी अधिक विकसित कर देती है कि व्यक्ति समष्टिगत महाप्राण की वाँछित मात्रा स्वयं में खींच सके तथा उस एकत्र शक्ति का अधिकतम उपयोग उत्कृष्ट रीति से कर सके।
साधनाओं द्वारा इसे परिष्कृत-परिशोधित किया जाता है। सविता-ध्यान के माध्यम के महाप्राण का अवतरण कर इस केन्द्र को जगाया जा सकता है।
साधनात्मक विशेष उपाय उपचारों से ही अर्जित करनी पड़ती है।
साधना तो असम्भव है ही, अस्त व्यस्त मन की स्थिति में प्राणायाम का अधिक समय तक अभ्यास व्यक्तियों को पागल भी बना देता है। अतः प्राणायाम सदैव तत्त्वबोध एवं ध्यान अभ्यास के साथ करना चाहिए। मन की प्रचण्ड संकल्प शक्ति को अभीष्ट दिशा में नियोजित किये बिना प्राण-साधना मात्र श्वास-प्रश्वास का साधारण व्यायाम और फेफड़ों की कसरत होकर रह जाती है। उससे स्वास्थ्य लाभ तो सम्भव है, किन्तु वह न तो योग है और न ही उसके द्वारा प्राण-शक्ति पर नियन्त्रण हो सकता है।
साधनाक्रम का सारभूत सिद्धान्त है। आत्म की, चेतना की प्रगति इसी पर निर्भर है।
साधना में शरीर ही नहीं मन, वाणी, प्राण और अंतःकरण अर्थात् समूची मानवी प्रकृति का परिष्कार आवश्यक है।
साधना द्वारा इन पांचों कोशों का अनावरण सम्भव है।
साधना से यही प्रयोजन पूरा होता है। गायत्री की प्राण शक्ति मूलाधार चक्र से संबंधित होने का उल्लेख गायत्री मंजरी में मिलता है-
साधना परस्पर अन्योन्याश्रित है। मन-प्राण में जनक-जन्य का सम्बन्ध है। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है-
साधनाओं द्वारा योगी, ऋषि-मुनि अपनी आत्मा में प्राण धारण करते और उससे विश्व का कल्याण करते हैं।”
साधना-प्रविधि प्राणायाम है।
साधना द्वारा जगाने पर विभिन्न प्रकार की अनुभूतियां होती हैं। प्राणमय कोश प्रकाश पुंज के रूप में जगमगाता हुआ दीखता है।
साधना-अभ्यास किया जा सके।
साधना सामग्री। स्वल्प आवश्यकता को साधनों के अम्बार से पाट दिया जाए तो स्वाभाविक ही है कि वह आवश्यकताएं दूषित होंगी। आज का भौतिक क्षेत्र इसी कारण अश्लील, अपवित्र और अत्यधिक उत्तेजनापूर्ण बन गया है। सामान्य बाधाएँ भी मनुष्य को आत्महत्या जैसी क्रूर स्थिति में पटक देती हैं।
साधना या मनःशुद्धि एवं प्राण-साधना परस्पर अन्योन्याश्रित है। मन-प्राण में जनक-जन्य का सम्बन्ध है। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-August
साधनात्मक उपचार और ज्ञान यज्ञ की उभयपक्षीय व्यवस्था साथ-साथ चलती थी। प्रस्तुत समस्याओं पर मूर्धन्य मनीषियों द्वारा गम्भीर विचार विनियम करके किन्हीं निर्णय निष्कर्षों पर पहुँचा जाता था। बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी उस अवसर पर उपस्थित होते थे और विद्वज्जनों के निर्धारणों को अपने अपने क्षेत्रों में कार्यान्वित करने का उत्तरदायित्व कन्धे पर लेकर प्रयाण करते थे। ऐसे ही बड़े सम्मेलन आयोजन बुद्धकाल में भी संघारामों के माध्यम से सम्पन्न होते थे। उनमें उन सभी देश क्षेत्रों के प्रतिनिधि सम्मिलित होते थे जिनमें बौद्ध धर्म का प्रचार पहुँच पाया था।
साधना कृत्य है। जिसे कहीं भी किसी की स्थिति में उतने समय साधारण काम-काज रोककर किया जा सकता है। समय का अनुशासन इसका महत्वपूर्ण पक्ष है। एकता, एकरूपता, एकाग्रता, लक्ष्य की एकात्मकता ही इस प्रसंग से जुड़े हुए महत्वपूर्ण तथ्य हैं जो विस्तार की दृष्टि से स्वल्प होते हुए भी चिनगारी की तरह महान परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हो सकते हैं।
साधना को महत्वपूर्ण बनाया गया है। गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षर जब एक समय में, एक साथ, एक प्रकार, एक प्रयोजन के लिए ध्वनित होंगे, तो उसमें सामूहिकता की प्राणशक्ति का आश्चर्यजनक समावेश होगा। बीस लाख व्यक्तियों की प्राण ऊर्जा जब तालबद्ध, समयबद्ध, क्रमबद्ध, अनुशासनबद्ध, विधानबद्ध होकर निस्सृत होगी तो उसके आशातीत परिणामों की अपेक्षा करने में तनिक भी अतिवाद नहीं है।
साधना हर दिन सम्पन्न होना। इस लक्ष्य की पूर्ति अगले पाँच वर्षों की अवधि में हो सकने की आशा की गयी है। इतने अधिक व्यक्तियों का एक लक्ष्य के निमित्त एक साथ चरण बड़ा सकने की बात प्रस्तुत बिखराव को देखते हुये असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य प्रतीत होता है। इतने पर भी भूतकाल की सफलताओं पर मुड़कर दृष्टिपात करने से असमंजस का निराकरण भी सहज ही हो जाता है। मिशन का बीजाँकुर देश को आजादी मिलने के दिन 15 अगस्त सन् 47 को हुआ था।
साधना अनुष्ठान है।
साधना की चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। सूर्योदय के समय हर धर्मप्रेमी को पाँच मिनट मौन मानसिक गायत्री जप करना चाहिए, साथ में सविता के प्रकाश का ध्यान। समय पूरा होते ही उसका प्रतिफल अदृश्य वातावरण के परिशोधन हेतु अन्तरिक्ष में बिखेर देने का संकल्प। संक्षेप में इतनी-सी संक्षिप्त साधना ही प्रज्ञा पुरश्चरण का वैयक्तिक साधना कृत्य है। जिसे कहीं भी किसी की स्थिति में उतने समय साधारण काम-काज रोककर किया जा सकता है।
साधना ही प्रज्ञा पुरश्चरण का वैयक्तिक साधना कृत्य है। जिसे कहीं भी किसी की स्थिति में उतने समय साधारण काम-काज रोककर किया जा सकता है। समय का अनुशासन इसका महत्वपूर्ण पक्ष है। एकता, एकरूपता, एकाग्रता, लक्ष्य की एकात्मकता ही इस प्रसंग से जुड़े हुए महत्वपूर्ण तथ्य हैं जो विस्तार की दृष्टि से स्वल्प होते हुए भी चिनगारी की तरह महान परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हो सकते हैं।
साधना सत्र सम्पन्न करने के लिए अपने खर्च से शान्ति-कुंज आया जाय और विस्तृत विचार विनिमय के आधार पर किसी निश्चय पर पहुँचा जाय।
साधना के रूप में-प्रज्ञा पुरश्चरण की भागीदारी ग्रहण करने के लिए कहा और सहमत किया जाना है। यह प्रयत्न न तो हिन्दू धर्मानुयायियों तक सीमित है और न परिणामों को उन्हीं लोगों तक रहना है। ऐसी दशा में प्रज्ञा पुरश्चरण को सार्वजनीन ही समझा जाना चाहिए। गायत्री मन्त्र के संबंध में यह रहस्य समझा और समझाया जाना चाहिए कि वह किसी सम्प्रदाय विशेष की पूजा पत्री नहीं है वरन् उसके अक्षरों में ध्वनि विज्ञान के ऐसे रहस्यों का भी समावेश है, जिससे साधक की सत्ता में उपयोगी तरंगें उत्पन्न होती है और समूचे अदृश्य जगत में विषाक्तता को निरस्त करने की सशक्त प्रक्रिया विनिर्मित होती है। साथ ही अन्तरिक्ष में देव-तत्वों के अभिवर्धन-परिपोषण का ऐसा प्रमाण बन पड़ता है जैसा कि किसान और माली फसल उद्यान के निमित्त अपनाया करते हैं।
साधना उपेक्षा के गर्त में गिर पड़ी है। यही कारण है कि जहाँ देखा जाय वहाँ छोटे-बड़े जन समारोहों में मात्र गीत प्रवचन भर की उछल-कूद होती रहती है। प्रचारात्मक, उत्तेजनात्मक प्रयोजन ही इनके सहारे पूर्ण होता है। भावनात्मक-आध्यात्मिक-अदृश्य को प्रभावित करने वाले-प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने वाले धर्मानुष्ठानों का समन्वय भी रहना चाहिए यह तथ्य विस्मृत हो जाने के कारण विभिन्न संस्थाएं अपने-अपने वार्षिकोत्सव गीत मंगल के साथ धूमधाम से सम्पन्न करती रहती है। राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक संस्थाओं के छोटे-बड़े समारोह आये दिन देखने को मिलते रहते हैं।
साधना यज्ञ और ज्ञानयज्ञ का समान समन्वय रहा तो था। प्रज्ञा अभियान द्वारा उस पुरातन परम्परा का नये रूप में जीर्णोद्धार करने का प्रयत्न किया है। गायत्री यज्ञ और युग निर्माण सम्मेलन की संयुक्त समारोह प्रक्रिया बहुत समय से चल रही है। इसका शुभारम्भ स्वरूप निर्धारण सन् 57 में गायत्री तपोभूमि मथुरा में सम्पन्न हुये सहस्र कुण्डीय गायत्री महायज्ञ से सम्पन्न हुआ था। उस अवसर पर देश के कोने-कोने से प्रायः चार लाख की संख्या में धर्म क्षेत्र की मूर्धन्य प्रतिभायें एकत्रित की गयी थी।
साधना इसीलिए सर्वोच्च मानी गई कि उनने आजीवन धर्म प्रचार की पदयात्रा में ही संलग्न रहने का व्रत लिया और निभाया।
साधना को युग परिवर्तन हेतु अनिवार्य परिशोधन का, युग शक्ति के प्रचण्ड उत्पादन हेतु प्रेरित एक विशिष्ट धर्मानुष्ठान मानकर सविता देवता के उदय काल को प्रमुख मानते हुए सभी स्थानों पर आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। विभीषिका निवारण, अनीति-उन्मूलन तथा परिस्थिति की अनुकूलन हेतु महाकाल निर्देशित यह साधना अनुष्ठान है।
साधना-पुरुषार्थ में एकजुट हो लग ही जाना चाहिए।
साधनात्मक प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न की जा रही है। इस प्रकार की दो पहियों की गाड़ी निर्धारित लक्ष्य की ओर लँगड़ाई हुई न चलेगी वरन् सरपट दौड़ेगी।
साधना (2) धर्मानुष्ठानों का उपक्रम (3) जन-मानस के परिष्कार हेतु ज्ञानयज्ञ। इस त्रिविधि समन्वय को प्रकारान्तर से त्रिवेणी संगम की उपमा दी जा सकती है। जिसका माहात्म्य बताते हुए रामायणकार ने कायाकल्प होने की बात जोर देकर कही है। कायाकल्प में कौए के कोयल और बगुले के हंस हो जाने का उल्लेख अलंकारिक है वस्तुतः उसे अशुभ के शुभ में बदल जाने की प्रक्रिया कहा जा सकता है। शरीर तो क्या बदलते हैं किन्तु मनःस्थिति के परिवर्तन से परिस्थिति में आमूलचूल परिवर्तन होना सम्भव है।
साधना में सम्मिलित करने के प्रयास से 20 लाख सदस्यों को-उनके द्वारा जुटाये गये सहयोगियों को मात्र चार छलाँगे लगानी पड़ेंगी। एक छलाँग के लिए एक वर्ष का समय माना जाय तो भी इससे चार पाँच वर्ष से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। कठिनाई मात्र इतनी भर है कि हम जब तथ्य को, प्रयोग को गंभीरतापूर्वक समझें और संपर्क क्षेत्र में उस प्रक्रिया को गले उतारने के लिए विश्वास और उत्साह भरे प्रयत्नों को शिथिल न होने दें।
साधना-पराक्रम द्वारा इस दुर्गति रूपी परिणति की सम्भावना का मिटा सकता है। परन्तु अदूरदर्शी समुदाय जिसे नरपशु-नरपामर की संगति दी जा सकती है, मात्र प्रताड़ना की ही भाषा समझता है। समझाने का, दूरदर्शिता के चयन के सत्परामर्श का उन पर कोई असर नहीं होता। इन्हें प्रकृति अथवा महाकाल रूपी दैवी अनुशासन फिर लाठी की भाषा से ही ठीक करता है। एक सज्जन एवं करुण हृदय न्यायाधीश को भी परिस्थिति विशेष में फाँसी की सजा सुनानी ही पड़ती है।
साधना करता और दिनभर समाज सेवा के कामों में निरत रहता। फलतः उस देश के सभी सरकारी कर्मचारी इसी वर्ग में अवैतनिक रूप से मिल जाते थे। परिणाम यह रहा कि उस देश की समर्थता, सम्पन्नता और शालीनता संसार भर के लिए आदर्श रही। छोटा देश होने पर भी उसकी विशिष्टता संसार भर में प्रख्यात बनीं स्वर्णकोष आश्चर्यजनक था। अपराधों का-रोगों का नाम नहीं।
साधना के भागीदार बनें ही, पर उतने भर से कर्त्तव्य की इतिश्री न समझें। पाँच अन्य सहयोगी बनाने बढ़ाने के प्रयत्न में भी अविलम्ब जुट जायें। यह प्रथम चरण उठते ही 20 लाख से बढ़कर एक करोड़ हो जायेंगे। इतना तो तत्काल एक दो महीने के भीतर ही हो सकता है। पुरश्चरण की शक्ति पाँच गुनी बढ़ जाना बहुत बड़ी बात है।
साधनात्मक उपचार है। इसमें ज्ञान-यज्ञ का पुट रहना भी आवश्यक है। जहाँ समग्र यज्ञ प्रक्रिया सम्पन्न होती हो वहाँ भी उसके प्रत्यक्ष कृत्य के साथ जुड़ी हुई प्रेरणाओं, भावनाओं को भागीदारों एवं उपस्थित लोगों को समझाया जाना चाहिए। समझाने के संबंध में मौन रहा जाय और मात्र कर्मकाण्ड या मन्त्रोच्चार की प्रक्रिया में ही लगे रहा जाय तो उसे अपूर्ण ही कहा-समझा जायेगा। शास्त्रकारों ने प्रत्येक कर्मकाण्ड की व्याख्या विवेचना करते चलने का निर्देश दिया है, जिससे उसे चिन्ह पूजा भर न माना जाय और लकीर पीटने जैसे अनगढ़ असमंजस कहने-कहाने का किसी को अवसर न मिले।
साधनात्मक प्रज्ञा पुरश्चरण और प्रत्यक्ष रचनात्मक प्रज्ञा अभियान को संयुक्त समन्वित होना चाहिए और पैर से पैर, कन्धे से कन्धा मिलाकर सहगमन करना चाहिए। चिरस्थायी एवं महत्वपूर्ण सफलता के लिए यह सुयोग-संयोग हर दृष्टि से अनिवार्य आवश्यक है।
साधना को जीवन नीति बनाया और समस्त पराक्रम उसी लक्ष्य पर जुटाया।
साधना में नियोजित करने के लिए प्रयत्नरत हो तो उसे कुछ ही छलाँगे लगानी पड़ेगी। 30 लाख से 1 करोड़। 1 करोड़ से 5 करोड़। 5 से 25। 25 से 125।
साधना विधानों का सत्परिणाम न तो व्यक्ति विशेष को मिल सकता और न उससे अदृश्य वातावरण-अदृश्य जगत पर कोई कारगर प्रभाव पड़ सकेगा। फलतः वह प्रयास एक प्रकार से निरर्थक जैसा बनकर रह जायेगा।
साधना कहते हैं। यह और कुछ नहीं अप्रकट का प्रकटीकरण मात्र है। बीज रूप में अपने इर्द-गिर्द वह समस्त वैभव बिखरा पड़ा है जिसे सृष्टा की अनेकानेक विभूतियों के रूप में समझा-समझाया जाता रहता है।
साधना उपचार यदि चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करता है तो उसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
साधना और युग शिल्पी सत्रों में सम्मिलित होने वालों की संख्या में असाधारण वृद्धि हुई है। उस व्यवस्था के कितने ही पक्ष ऐसे है जिसके लिए सुयोग्य व्यक्तियों का सहयोग चाहिए। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की गतिविधियाँ दिन-दिन बढ़ती जा रही हैं उनकी साज सम्भाल में भी नये सहयोगी अपेक्षित हो रहे हैं। साहित्य सृजन में भी अधिकों की आवश्यकता पड़ेगी। शान्ति-कुंज में पधारने वाले जिज्ञासुओं की संख्या में असाधारण वृद्धि हुई है।
साधना रूपी पराक्रम के रूप में समझा जा सकता है। समूह रक्षा हर व्यक्ति की विशेष जिम्मेदारी है। इसे टाला नहीं जा सकता।
साधनारत देखा जाता है। वे तत्काल हाथों हाथ कोई लाभ अर्जित नहीं करते वरन् सच तो यह है कि हानि उठाते हैं। वह समय देर में आता है जिसमें वे बीज की तरह गलने के उपरान्त विशाल वृक्ष की तरह फलने का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
साधना क्षेत्र के संबंध रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। अन्य धर्मों की तुलना में सिकुड़ते हुए हिन्दू धर्म की विच्छृंखलिता अधिक चिन्ताजनक है। न केवल इस समुदाय को सम्भाला सुधारा जाना चाहिए वरन् विश्व के समस्त धर्मप्रेमियों, आस्तिकों, उपासना प्रिय लोगों को यह समझाया जाना चाहिए कि उपासना में भावना का, विधान का जितना महत्व है उससे अनुशासन पालन की गरिमा किसी भी प्रकार कम नहीं। इस संदर्भ में असावधानी बरती गई तो चिन्ह-पूजा भर चलती रहेगी, जिन तीक्ष्ण परिणामों की आशा की गई है उस संबंध में निराश ही रहना पड़ेगा।
साधना से अथवा पूर्व संचित संस्कारों के कारण, दिव्य क्षमताओं के धनी इन सभी मनीषियों के कथन का सार इसी रूप में समझा जा सकता है।
साधनाएँ भी हैं पर उनका लक्ष्य प्रयोजन एवं लाभकर्ता तक ही सीमित रहता है। सर्वजनीन समाधान एवं संवर्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई है तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता हुई है तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गई है। राजतन्त्र द्वारा राजसूय यज्ञ और धर्मतन्त्र द्वारा वाजपेय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह, सम्मेलन, संवर्धन, सह प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वान मण्डली या तपस्वी परिकर एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से सम्पन्न नहीं कर सकता था उसे मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त से भली प्रकार सम्पन्न कर लिया जाता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1983-June
साधना पड़ता है वरद् साथ में व्यक्तिगत परामर्श, प्रोत्साहन का भी दबाव रहता है। प्रज्ञा साहित्य को इंजेक्शन की औषधि कहा जाय तो संपर्क परामर्श को उसे रक्त तक पहुँचाने वाली पैनी सुई मानना होगा। लाभ नियमितता से ही होता है, इस तथ्य को ध्यान में रखा जाना चाहिए। निरन्तरता ही फलवती होती है, उसे भुला नहीं दिया जाना चाहिए।
साधना, उपासना, तप, तितीक्षा की प्रक्रियाएँ अन्तःकरण में जड़ जमाये कुसंस्कारों के परिशोधन तथा सुसंस्कारों की प्रतिष्ठापना का प्रयोजन पूरा करती है। जिनका अवलंबन लेकर हर कोई न केवल मन की उपयोगिता- उपादेयता को समझने में समर्थ हो सकता है वरन् मनःशक्ति को उभरने- विकसित करने में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
साधना मार्ग के भटकावों से बचने की दृष्टि से ही नहीं उस परम शक्ति का सहयोग, सामर्थ्य एवं अनुदान प्राप्त करने की दृष्टि से भी भक्ति का सम्बल साधन के लिए आवश्यक है।
साधना मार्ग का एक सबसे बड़ा अवरोध अहम् को माना गया है। कर्मयोग- ज्ञानयोग की साधनाओं में प्रायः साधक अपने अहम् को विगलित नहीं कर पाते। सोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, अहंब्रह्मास्मि आदि की सच्ची अनुभूति विराट् से जुड़कर ही हो पाती है। उस अनुभूति में अपना शुद्र अहम्, विराट् का एक क्षुद्र घटक मात्र दिखायी पड़ता है। पर इन अनुभूतियों तक पहुँचने के लिए पूर्ण समर्पण का होना आवश्यक है, जो भक्ति योग के बिना पूरा नहीं हो पाता।
साधना में “नामापराध” का निर्धारण है। नाम तो जपा पाय पर चरित्र दोषों से लिप्त रहा जाय तो उस पर भगवान का नाम बदनाम करने का अपराध लगेगा और छद्म करने का दण्ड सहना पड़ेगा। भक्ति भावना का सत्परिणाम मिलना तो दूर- उलटा भगवान के क्रोध का भागी बनना पड़ेगा। साधनात्मक कर्मकाण्डों की फलश्रुतियों को सुनाते, समझाते समय इस तथ्य के प्रतिपादनकर्त्ताओं को उतना जानकार तो माना ही होगा कि उन्हें इस प्रयास में दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता का उच्चस्तरीय समावेश स्वयं करना एक अनिवार्य शर्त है। इसकी उपेक्षा करने पर तो शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना पड़ेगा।
साधना अनिवार्य रूप से आवश्यक है, यह एक अकाट्य तथ्य है, जिसे समझा जाना चाहिए।
साधना के सहारे सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की क्षमता को देवोपम स्तर तक उभारा उठाया जा सकता है।
साधना से सिद्धियों को अर्जित करते उसी जिम्मेदारी के साथ उसका उपयोग भी फूँक-फूँक कर करते हैं। लुटाने का पाखंड रचने वालों में से शत-प्रतिशत ढपोर शंख ही होते हैं।
साधना मार्ग के कष्टकर पथ पर अपने को असहाय महसूस करता है। उसके विचलित होने की प्रबल सम्भावना रहती है। उसे सत्ता का अवलम्बन मिल जाये- उससे अपना आपा जुड़ जाये तो वह असमंजस दूर हो जाता है जिससे भटकाव की सम्भावना रहती है।
साधना विधान के सहारे ही सम्भव होती है। उसका आलोक अन्तराल में प्रवेश करता है तो पुण्य परमार्थ की दो प्रवृत्तियाँ उभरती हैं। पुण्य अर्थात् आत्म संयम, परमार्थ अर्थात् सत्प्रवृत्ति संवर्धन में उत्साह। इन्हीं के समन्वय को देवत्व कहते हैं। महामानवों का यह कार्यक्षेत्र है।
साधना और सिद्धि के मध्य में चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता- संयम और सेवा की जीवन साधना अनिवार्य रूप से आवश्यक है, यह एक अकाट्य तथ्य है, जिसे समझा जाना चाहिए।
साधना की उनकी एक मात्र प्रणाली है। शिष्टो धर्म की मान्यता है कि देवता अदृश्य अशरीर धारी दिव्य शक्तियाँ हैं, जो सच्ची प्रार्थना का प्रत्युत्तर भी दिया करती हैं। शिष्टो धर्म का कथन है- “मैन इज कामीज चाइल्ड” अर्थात् मनुष्य देवताओं का पुत्र है। अतः मूलतः उसकी प्रकृति भी देवताओं जैसी है। गन्दगी के आवरण के कारण मनुष्य का मूल पवित्र स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता।
साधनाओं का स्वरूप और उनका सिद्धि प्रतिफल बताते समय भी आदि और अन्त का ही वर्णन किया जाता रहा है। इसकी बहुत अधिक चर्चा नहीं की गई कि हर साधक को उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श चरित्र और उदात्त व्यवहार को अपनाने की शर्त पूरी करने पर ही साधक कहलाने का अधिकार मिलता है। ओछा और घिनौना व्यक्तित्व बनाये रखकर कोई मात्र पूजा पाठ के मन्त्र-तन्त्र के सहारे उन सफलताओं को प्राप्त नहीं कर सकता जो माहात्म्य प्रतिपादन में बताई गई हैं।
साधना का स्वरूप न मानकर इन पर ‘बैन’ लगा दिया गया है ताकि लोग भ्रान्तिवश इनमें भटकने न लगें। वैदिक प्रक्रियाओं में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं। गायत्री वेदमन्त्र है। उसका नामकरण ही “गाने वाले का त्राण करने वाली” के रूप में हुआ है। फिर उसे मुँह से न बोलने, गुप्त रखने, चुप रहने, कान में कहने जैसा कथन सर्वथा उपहासास्पद है।
साधना में लगे थे।
साधना से ही तृप्त होती है। सच्चे अध्यात्मवादी को इन्हीं दो प्रयत्नों में सर्वतोभावेन निरत होना पड़ता है फलतः अजस्र मात्रा में आत्म सन्तोष मिलता है। जड़ें मजबूत एवं गहरी होने से ही वृक्ष सुविकसित होता है। आत्मा के समर्थन एवं आशीर्वाद से ही व्यक्तित्व की महानता उभरती है। फलतः साहस, उत्साह और संकल्प की कमी नहीं रहती।
साधनाएँ बहुधा असफल होती देखी जाती हैं। इसी कारण आर्ष ग्रन्थों में भक्तियोग की भूरि-भूरि महिमा प्रतिपादित की जाती रही है। साधना मार्ग के भटकावों से बचने की दृष्टि से ही नहीं उस परम शक्ति का सहयोग, सामर्थ्य एवं अनुदान प्राप्त करने की दृष्टि से भी भक्ति का सम्बल साधन के लिए आवश्यक है।
साधनाओं में प्रायः साधक अपने अहम् को विगलित नहीं कर पाते। सोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, अहंब्रह्मास्मि आदि की सच्ची अनुभूति विराट् से जुड़कर ही हो पाती है। उस अनुभूति में अपना शुद्र अहम्, विराट् का एक क्षुद्र घटक मात्र दिखायी पड़ता है। पर इन अनुभूतियों तक पहुँचने के लिए पूर्ण समर्पण का होना आवश्यक है, जो भक्ति योग के बिना पूरा नहीं हो पाता। समर्पण न होने पर सोऽहम् का तत्व दर्शन साधक के अहम् को ही उत्प्रेरित करता है।
साधना के आधार पर प्रवेश करने वाले निस्सन्देह अतीन्द्रिय क्षमताएँ अर्जित करते रहे हैं। अति मानोस का निखार होने पर व्यक्ति अति मानव बनता है। ऐसों के पास देवोपम स्तर की क्षमताएँ होनी चाहिए। होती भी हैं। पर प्रश्न यह है कि उनका प्रदर्शन कौतुक कौतूहल प्रदर्शित करने के लिए क्यों है?
साधना का लक्ष्य प्रार्थना के बिना कभी पूरा नहीं हो सकता। साधक के लिए प्रार्थना का उतना ही महत्व है जितना मनुष्य का साँस लेना। आत्मा की परमात्मा से मिलने की तीर्थयात्रा में प्रार्थना एक निरापद, पर समर्थ वाहन है।”
साधना पराक्रम द्वारा अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि में समर्थ बनाया जा सके।
साधनारत व्यक्ति उपार्जित या प्राप्त वैभव का उपयोग नहीं करता। उपार्जन कितना ही क्यों न करते, उसमें से औसत नागरिकों जैसा ही निर्वाह स्वीकार करता है, शेष को उदारता पूर्वक उस लोक-मंगल के लिए हाथों -हाथ वापस कर देता है। जिसके कन्धों पर कि सर्वजनीन सुख-शान्ति का आधार टिका हुआ है।
साधना-उपासना के क्षेत्र में भी दोनों को स्वभावतः समान अधिकार प्राप्त हैं।
साधना उपासना की सामान्य तथा कठोर अध्यात्मिक उपचार मनःशक्ति के परिशोधन एवं उसमें सन्निहित प्रचण्ड-ऊर्जा जिसे मनोबल, संकल्प बल के नाम से जाना जाता है, के लिये किये जाते थे। अभ्यास में- संस्कारों में घुल न पाने के कारण सद्विचार मानवी विकास में उतने सहायक नहीं सिद्ध हो पाते। उन्हें आचरण में उतारने की दृष्टि से पुनरावृत्ति होना आवश्यक है। प्रतीक क्रियाओं एवं माध्यमों से उनका अभ्यास किया जाता है। तप तितीक्षा से संकल्पबल मजबूत होता मनोबल उभरता तथा सद्मार्ग पर चलने का आधार सुदृढ़ बनता है।
साधना के लिये उदार आदर्शवादिता को व्यवहार में उतारे बिना और कोई मार्ग है नहीं। प्रकृति के अनुदान और विज्ञान के वरदान अब तक इतनी अधिक मात्रा में उपलब्ध हो चुके हैं कि उनके सहारे मानव समुदाय के 450 करोड़ सदस्य ही नहीं, अन्यान्य प्राणियों और वृक्ष पादपों को हरीतिमा से परिपूर्ण मात्रा में सुसम्पन्न कर सकते हैं और इस दुनिया को सुख सुविधा से ही नहीं, स्नेह सौजन्य के आदान-प्रदान से कृतकृत्य कर सकते हैं। उस स्थिति में आज की अपनी आशंका, अविश्वास और आतंक से भयभीत दुनिया कल शान्ति, समृद्धि एवं प्रगति के आनन्द उल्लास का भरपूर रसास्वादन कर सकती है। दृष्टिकोण बदलने भर की देर है। अध्यात्मवादी उत्कृष्टता को यदि नीति-निर्धारण का आधार माना जा सके तो दरिद्रता, अशिक्षा, उच्छृंखलता, रुग्णता, दुर्बलता, आशंका जैसी एक भी विपत्ति को पैर जमा सकना सम्भव न हो सकेगा।
साधना ने आपकी अनुकम्पा सम्भव की उसे छोड़कर आपकी मनुहार कर सकना मुझसे बन नहीं पड़ेगा।”
साधना इसी महती प्रयोजन की पूर्ति करती है।
साधना होता है। हर किसी के कुछ न कुछ मित्र परिचित होते हैं। उन्हें इस बहुमूल्य साहित्य को बिना कुछ खर्च किये पढ़ते रहने भर का कार्य ऐसा नहीं है जिसमें कोई विघ्न आये या संकट खड़ा हो। इसी प्रकार एक रुपया प्रतिदिन का बजट भी ऐसा नहीं है जिसे कोई भावनाशील व्यक्ति अपने अन्यान्य खर्चों में कटौती करके उसे जुटा न सके। इन दिनों अस्सी पैसे की एक कप चाय आती है।
साधना विज्ञान सभी इस मर्यादा में बँधे हैं ताकि न्याय एवं औचित्य का निर्वाह होता रहे। सत्प्रवृत्तियों को उच्चस्तरीय निर्धारणों को मान्यता मिलती रहे। उनकी प्राण प्रतिष्ठा दिन-दिन गहरी बनती चले। इसके विपरीत यदि वह समुदाय तनिक-तनिक से प्रलोभनों से मनुहारों से प्रभावित होकर तथाकथित भक्तजनों के साथ पक्षपात बरतने लगे तो समझना चाहिए औचित्य के आदर्श का अन्त होने जा रहा है। भगवान भी यदि ऐसा करेंगे, सिद्ध पुरुष भी यदि इतने ओछे सिद्ध होंगे तो फिर न्याय नीति की रक्षा कौन करेगा?
साधना विधान की निर्धारणा- मात्र व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अनुपात बढ़ाने के लिए हुई थी उसका आधार ही उलटा जा रहा है। वह बिना मूल्य चुकाये, जिस-तिस प्रकार सम्पदाएँ सफलताएँ बटोरने के लिए व्यक्ति को प्रोत्साहित करता है। जबकि इससे ठीक उलटा होना चाहिए था। अध्यात्मवादी को अपरिग्रही स्वल्प सन्तोष एवं औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाने वाला होना चाहिए था, औचित्य का पक्षधर एवं न्यायनीति का समर्थन करना चाहिए था। मनोकामना सिद्धि का तात्पर्य एक ही है- योग्यता और श्रमशीलता की मर्यादाओं को छलाँगकर- तुर्त-फुर्त- नैतिक या अनैतिक उपाय से मनचाही सुविधाएँ हस्तगत कर लेना।
साधनात्मक कर्मकाण्डों की फलश्रुतियों को सुनाते, समझाते समय इस तथ्य के प्रतिपादनकर्त्ताओं को उतना जानकार तो माना ही होगा कि उन्हें इस प्रयास में दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता का उच्चस्तरीय समावेश स्वयं करना एक अनिवार्य शर्त है। इसकी उपेक्षा करने पर तो शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना पड़ेगा। वह बेचारा यह तो भूल करता रहा कि आदि और अन्त की बात सोची, मध्यवर्ती क्रिया प्रक्रिया की उपेक्षा करके रंगीन सपने दीखने लगा और बिना पंखों के उड़ान उड़ने लगा। यह भूल वे लोग भी करते हैं जो मन्त्र जप मात्र से सम्पदाओं और विभूतियों से घर भर लेने के दिवास्वप्न देखते रहते हैं। शिर और पैर ही सब कुछ नहीं हैं, मध्यवर्ती धड़ की भी उपयोगिता और महत्ता है।
साधना पर आधारित है। कुरान के अनुसार सच्चे दिल से पुकारने पर सर्वत्र मौजूद अल्लाह इंसान की मदद के लिए प्रकट होता है- और सही मार्ग दिखाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-October
साधना की शक्ति विवेचन करते हुए शास्त्र कार ने स्पष्ट कहा है-
साधना है। जब रगड़ करते रहने पर चन्दन जैसे नीरस और शीतल काष्ट में आग उत्पन्न हो जाती है, बार-बार रस्सी को रगड़ लगने से कुएँ पर पड़े पत्थर पर रेखायें बन जाती हैं और पानी के निरन्तर प्रवाह से जब पहाड़ कट जाते हैं, तब कोई कारण नहीं कि अभ्यास करने से मन काम में रस लेने न लगे।
साधना द्वारा सरलतापूर्वक पा सकता है।
साधना है, तपस्या है। किन्तु यह सफल तभी होती है, जब विधिपूर्वक की जाय। वे पुरुषार्थ सफल नहीं हो पाते, तो निर्लक्ष्य, अव्यवस्थित, अनियमित और अस्त-व्यस्त ढंग से किये जाते हैं। अव्यवस्थित पुरुषार्थ में उत्पादन क्षमता नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति किसी काम को बिना किसी काम अथवा व्यवस्था के करने लगता है तो उस काम में शक्ति की मात्रा तो बहुत लग जाती है किन्तु फल नगण्य ही रहता है।
साधना को तपश्चर्या कहा जाता है, वह वास्तव में पुरुषार्थ का ही पर्यायवाची शब्द है। भौतिक क्षेत्र में कर्म-योग-पूर्वक किया हुआ पुरुषार्थ निश्चित रूप से तपश्चर्या ही होती है। तपश्चर्या द्वारा, ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं है जो प्राप्त नहीं की जा सकती।
साधना-निष्ठ व्यक्तियों को होती है। ऐसे महापुरुष का सान्निध्य उनके समीप्य और ध्यान का लाभ उठाव कोई प्राणवान बन सकता है।
साधनाओं द्वारा योगी, ऋषि-मुनि अपनी आत्मा में प्राण धारण करते और उससे विश्व का कल्याण करते हैं।”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-May
साधना का है। साधना का अर्थ है मन व शरीर की गति विधियों का निरीक्षण नियंत्रण एवं नये सिरे से निर्माण। यह कार्य अपेक्षाकृत कठिन तो है पर है अनिवार्य। उसकी न तो उपेक्षा की जा सकती है और उससे बच कर किसी सीधी पगडंडी को पकड़ा जा सकता है। जीवनोद्देश्य का राजमार्ग ‘साधना’ के पुल पर होकर ही जाता है।
साधना पद्धति का अनुरोध गत अंक में किया गया है और आशा की गई कि उसे अपनाने का तत्परतापूर्वक प्रयत्न किया जायेगा। साधना और उपासना की समन्वित प्रक्रिया को अपनाने वाले 24 हजार साधकों द्वारा इस युग के अभूतपूर्व महत्तम गायत्री महापुरश्चरण को पूरा किया जाना है। पुरश्चरणों में जप-संख्या की पूर्ति ही पर्याप्त नहीं होती वरन् कर्ताओं का स्तर प्रधान रहता है। उत्कृष्ट स्तर के साधक ही किसी मंत्र का समुचित प्रतिफल उत्पन्न कर सकते हैं। प्रतिदिन 24 लक्ष जप वाला महत्तम गायत्री महापुरश्चरण ऐसे ही साधकों द्वारा सम्पन्न होना है जो उपासना को ही पद्धति न मान बैठे हों वरन् साधना को भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझ कर उसके लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध हों।
साधनायें अक्सर सर्वसाधारण के उपर्युक्त नहीं होती। उन्हें कोई विरले ही श्रद्धावान और सुविधा सम्पन्न व्यक्ति कर पाते हैं। अधिकाँश को तो रोजी-रोटी और अन्यान्य समस्याओं में उलझे रह कर व्यस्त जीवन जीना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए सरल साधना पद्धति ही उपयुक्त पड़ती है। अतएव गत अंक में एक ऐसी सर्वांगपूर्ण सुनिश्चित साधना पद्धति का निर्धारण किया गया है।
साधना अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। अध्यात्म का पथ इन दोनों पहियों पर ही गतिशील होता है। जो भजन तो बहुत करता है पर चारित्रिक एवं भावनात्मक विकास की ओर से विमुख है, उसका भजन कदाचित ही कुछ प्रयोजन पूरा करे। रोटी और पानी का- दिन और रात का- जिस प्रकार जोड़ा है, वैसे ही उपासना और साना का ‘अन्योन्य’ संबंध है। एक-दूसरे पर पूर्णतया अवलंबित है।
साधना युक्त उपासना में संलग्न होना चाहिये। सक्रिय कार्यकर्ताओं को ‘ऋत्विज’ की जिम्मेदारी उठानी चाहिये। ‘महत्तम गायत्री महापुरश्चरण’ में भागीदार बनना चाहिये और नव-निर्माण के लिए प्रबुद्ध आत्माओं के कंधों पर आये हुए उत्तरदायित्वों को आगे बढ़कर स्वीकार, शिरोधार्य करना चाहिये।
साधना उसी भाव से करनी चाहिये। स्वार्थ के निकृष्ट और निम्न धरातल पर उतर कर प्रेम की अभिव्यक्ति करना एक पाप है। क्योंकि इससे प्रवंचना एवं प्रताड़ना को प्रश्रय मिलता रहता है। जिस समय मनुष्य के हृदय में प्राणी मात्र के प्रति निष्काम प्रेम का विकास हो जाता है, वह मनुष्य की स्थिति से दैवी स्थिति में जा पहुँचता है। इसी उपलब्धि के हेतु ही तो भगवान् ने गीता में स्पष्ट निर्देश किया है-
साधना पद्धति का निर्धारण किया गया है। जो हर स्तर के व्यक्ति के लिए सरल पड़े और बिना किसी विशेष अड़चन के उसे भली प्रकार पूरा किया जा सके।
साधना पद्धति ही उपयुक्त पड़ती है। अतएव गत अंक में एक ऐसी सर्वांगपूर्ण सुनिश्चित साधना पद्धति का निर्धारण किया गया है। जो हर स्तर के व्यक्ति के लिए सरल पड़े और बिना किसी विशेष अड़चन के उसे भली प्रकार पूरा किया जा सके।
साधना अनावश्यक समझते हैं। ऐसे लोगों की अन्तःभूमिका का यदि निरीक्षण, विश्लेषण किया जाय तो वह खाली-खोखली ही दिखाई देती है। लगता है, उनका श्रम निरर्थक चला गया। चन्दन वह जिसमें सुगंध आये। सोना वह जिसमें जंग न लगे।
साधनापूर्ण व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। विचारों की विशालता मनुष्य को विशाल और उनकी निकृष्टता निकृष्ट बना देती है। विचार संपत्ति से भरे-पूरे व्यक्तित्व को उन्नति करने के लिये किन्हीं अन्य उपकरणों, उपादानों और साधनों की अपेक्षा नहीं रहती। अकेले विचारों के बल पर ही वह जितनी चाहे उन्नति करता जा सकता है।
साधना’ के पुल पर होकर ही जाता है। इसे छोड़ने से आत्मिक प्रगति के पथ का अपरिहार्य गतिरोध उत्पन्न हो जाता है।
साधना का समन्वय कर सकने की स्थिति में अब अपने परिजन पहुँच चुके हैं, इसलिये उनके कंधों की मजबूती जाँच लेने के बाद यह उपयुक्त ही प्रतीत हुआ कि वह आधार भी जोड़ लेने के लिए कहा जाय जो आत्मिक प्रगति के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
साधना उससे अगला। उपासना अति सरल है। थोड़ी देर पालथी मार कर बैठना और कुछ समय भगवान का नाम स्मरण एवं पूजन वन्दन कर लेना कोई ऐसा भार नहीं है जिसे उठाया न जा सके। रुचि न हो तो फुरसत न मिलने की बात भी कही जा सकती है पर यदि तनिक भी इच्छा और रुझान हो तो दस-बीस मिनट- घण्टा, आध घण्टा बड़ी सरलता से लगाया जा सकता है। हम में अधिकाँश व्यक्ति अनेक निरर्थक कार्यों में समय बर्बाद करते रहते हैं।
साधना को भी जुड़ा रखना चाहिये। तभी उसे सन्तोषजनक लाभ मिल सकेगा। यही प्रयत्न अपना भी रहा है। उपासना को हम प्रारंभिक चरण मानते रहे हैं और उसकी पूर्ति के लिए साधना का समावेश करने के लिए पूरा-पूरा जोर देते रहे हैं। यही ऋषि प्रणीत सनातन एवं आर्ष-परम्परा है।
साधना और उपासना की समन्वित प्रक्रिया को अपनाने वाले 24 हजार साधकों द्वारा इस युग के अभूतपूर्व महत्तम गायत्री महापुरश्चरण को पूरा किया जाना है। पुरश्चरणों में जप-संख्या की पूर्ति ही पर्याप्त नहीं होती वरन् कर्ताओं का स्तर प्रधान रहता है। उत्कृष्ट स्तर के साधक ही किसी मंत्र का समुचित प्रतिफल उत्पन्न कर सकते हैं। प्रतिदिन 24 लक्ष जप वाला महत्तम गायत्री महापुरश्चरण ऐसे ही साधकों द्वारा सम्पन्न होना है जो उपासना को ही पद्धति न मान बैठे हों वरन् साधना को भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझ कर उसके लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध हों।
साधना का समावेश करने के लिए पूरा-पूरा जोर देते रहे हैं। यही ऋषि प्रणीत सनातन एवं आर्ष-परम्परा है। जो भजन-पूजन का अलंकारिक, अत्यधिक महात्म्य बता कर- उतने में ही स्वर्ग मुक्ति, ऋद्धि-सिद्ध मिल जाने की बात कहते हैं, उनका प्रतिपादन अशास्त्रीय अनार्ष एवं अवैज्ञानिक है। यही कारण है कि अधूरा भजन करने वाले खाली हाथ रहते और अन्ततः अश्रद्धालु बनते देखे जाते हैं।
साधना को भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझ कर उसके लिए अभीष्ट पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध हों।
साधना का महत्व ही क्या रह जाता? आत्म-सन्तोष के रूप में हमारा जो स्नेह और आशीर्वाद तुम्हें मिलता है, क्या उतने से तुम सन्तुष्ट नहीं रह सकते?
साधना में होना आवश्यक है। इन दोनों पंखों के आधार पर ही हम आत्मिक प्रगति के उन्मुक्त आकाश में ठीक तरह उड़ सकते हैं।
साधना का अर्थ है मन व शरीर की गति विधियों का निरीक्षण नियंत्रण एवं नये सिरे से निर्माण। यह कार्य अपेक्षाकृत कठिन तो है पर है अनिवार्य। उसकी न तो उपेक्षा की जा सकती है और उससे बच कर किसी सीधी पगडंडी को पकड़ा जा सकता है। जीवनोद्देश्य का राजमार्ग ‘साधना’ के पुल पर होकर ही जाता है। इसे छोड़ने से आत्मिक प्रगति के पथ का अपरिहार्य गतिरोध उत्पन्न हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-January
साधना में असफलता की कोई सम्भावना नहीं वह लक्ष्य तक पहुँचा देने में निश्चित रूप से समर्थ होगी। अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिये जो नितान्त आवश्यक है। उसका मार्गदर्शन दिसम्बर के अंक में तथा इस अंक के प्रथम लेख में किया गया है। भावनात्मक सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिये उस प्रक्रिया में उपाय और सुझाव प्रस्तुत किये गये हैं। उस पंच-सूत्री साधना क्रम को हमें दृढ़तापूर्वक चलाना चाहिये।
साधना मार्ग की कुछ विशेष उपलब्धियाँ जिनका वर्णन करना उचित न होगा हमें सदा बसन्त पंचमी को ही होती रही हैं। इस प्रकार यह पुण्य पर्व हमारे छोटे से जीवन का प्रकाश स्तम्भ रहा है। समस्त विश्व के लिए- चर-अचर के लिए तो वह अनादि काल से परम मंगलकार्य, उल्लास के अवतरण का प्रतीक बना ही चला आ रहा है।
साधना आरम्भ के दिन से ही चल रहा है। उसका क्रमिक विकास होता चला आया है। यह जन्म इसी प्रयोजन के लिए मिला है। जो श्वास शेष हैं वह भी इसी कार्य में समाप्त होंगी। 6॥ वर्ष पूर्व अज्ञात वास से लौटने पर तो विशेष रूप से यही काम कन्धे पर आया है।
साधनाओं की विस्तृत चर्चा दिसम्बर अंक में की जा चुकी है। उसी का साराँश इस अंक के प्रथम लेख में है। प्रातः और सायंकाल का आत्मचिंतन, सद्ज्ञान साधना, जन्मधारण की प्रेरणा का स्मरण, अविवेक से संघर्ष और उपासना में भावना का समावेश, यह जीवन साधना की पद्धति हममें से हर एक के जीवन क्रम का अंग बने इसके लिए हर सदस्य से व्यक्तिगत रूप से भली-भाँति विचार विनमय किया जाय और इस आत्मोत्कर्ष के पुनीत कार्य का उसकी रुचि को अभिवर्धन किया जाय।
साधना क्रम को हमें दृढ़तापूर्वक चलाना चाहिये। सद्गुणों के अभिवर्धन के लिये पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिये। यह ध्यान रखने की बात है कि सत्प्रवृत्तियां बढ़ाने का अभ्यास परमार्थ प्रयोजनों को अपना कर ही किया जा सकता है। केवल पढ़ने, सुनने, सोचने, विचारने भर से कल्पना लोक में विचरण तो किया जा सकता है पर व्यवहारिक जीवन में सेवा साधना के प्रत्यक्ष कार्यक्रम अपनाये बिना सद्गुणों का अभ्यास एवं अभिवर्धन हो ही नहीं सकता। इसलिये वैयक्तिक साधना क्रम अपनाने के साथ-साथ हमें पारमार्थिक सेवा कार्यक्रमों को भी अपने दैनिक-जीवन में जोड़े रहना चाहिये।
साधना है।
साधना पद्धति अति सरल है, उसमें कोई ऐसी कठिनाई नहीं है जो किसी को भारभूत प्रतीत हो, या जिसे करने में असमर्थता प्रकट करनी पड़े। अति सरल होते हुए भी वह अति प्रभावशाली है। उसे यदि श्रद्धा, तत्परता और नियमिततापूर्वक कार्यान्वित किया जाता रहे तो थोड़े ही समय में यह दिखाई पड़ने लगेगा कि अपने भीतर कितनी अधिक उत्कृष्टता का, कितनी तेजी से अभिवर्धन हो रहा है। यह अनुभूत प्रक्रिया है। अपने व्यक्तिगत जीवन में हम देर से इन्हीं प्रयोगों को चला रहे हैं।
साधना का गुरु मन्त्र है- “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत”। प्रातःकाल उठते ही कल्पना करें कि हमें आज का नया जन्म मिलेगा और उसे भावना तथा व्यवहार दोनों स्तरों का आदर्श एवं उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करेंगे। दिनभर की ऐसी दिनचर्या चारपाई पर पड़े-पड़े ही तैयार करली जाय, जिसमें एक क्षण भी समय बर्बाद करने की गुंजाइश न हो, आलस्य और प्रमाद के लिए कोई अवसर न हो, और उस दिनचर्या की पूरी सावधानी एवं पूरी कड़ाई के साथ दिन भर ठीक तरह से चलते रहने ही तत्परता बरती जाय। इसी प्रकार सवेरे ही सोच लिया जाय कि आज दिन में किस अवसर पर किस प्रकार ही दुर्भावना मन में उठने की गुंजाइश है। उस अवसर पर किन उच्च विचारों से उन दुर्भावनाओं का समाधान किया जाय, इसकी मानसिक रूपरेखा भी ली जाय।
साधना के अंतर्गत दो कार्यक्रम हैं, एक जन्म दिन मनाना, दूसरा स्वाध्याय-सम्वर्धन। नियत जन्म तिथि पर एक छोटा उत्सव आयोजन हर साधक करे और उस दिन अपने जीवन का स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग के बारे में बारंबार गम्भीर विचार किया जाय।
साधना दोनों का इसमें समन्वय है। पूजा और अर्चा यह दो साधना के पक्ष हैं। एक में भगवान के सान्निध्य का क्रम किसी निर्धारित समय पर चलाया जाता है। दूसरे में जीवन शोधन और लोकमंगल के लिये तपश्चर्या का परिचय दिया जाता है। जब तक यह उभयपक्षीय पूजा अर्चा एकत्रित नहीं होती तब तक बिजली के दोनों तार मिले बिना प्रकाश न होने की तरह अंतःकरण में अंधेरा ही बना रहता है।
साधनाएं, पंचकोशी उपासना विशिष्ट साधकों के लिये हैं। उनका मार्ग-दर्शन साधन की मनोभूमि के अनुरूप व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। पंचकोशी उपासना क्रम एक-दो वर्ष तो साधकों ने चलाया फिर उत्साह ठण्डा पड़ गया तो बहुत थोड़े साधक रह गये। अतएव ‘अखण्ड-ज्योति’ में वह साधना क्रम छापना बन्द करना पड़ा। जो साधक उस मार्ग पर चल रहे हैं उन्हें पत्रों द्वारा अगला मार्ग-दर्शन बराबर किया जा रहा है।
साधना प्रक्रिया बताई गई है।
साधना, जन्मधारण की प्रेरणा का स्मरण, अविवेक से संघर्ष और उपासना में भावना का समावेश, यह जीवन साधना की पद्धति हममें से हर एक के जीवन क्रम का अंग बने इसके लिए हर सदस्य से व्यक्तिगत रूप से भली-भाँति विचार विनमय किया जाय और इस आत्मोत्कर्ष के पुनीत कार्य का उसकी रुचि को अभिवर्धन किया जाय।
साधना कर सके और अपना तथा समस्त संसार का सच्चा हित साधन कर सके। परिस्थिति के अनुरूप कौन क्या सेवा कर सकता है इस बात को ध्यान में रखकर अनेक प्रकार के सेवा कार्यों की एक सूची बनाई गई है, जिनमें सौ तरह के सेवा कार्य हैं। उनका विस्तृत उल्लेख एक रुपया मूल्य की ‘हमारी युग-निर्माण योजना’ पुस्तक में है। उनमें से कुछ चुने हुये सूत्र इस लेख में प्रस्तुत किये जा रहे हैं ताकि सामूहिक सत्प्रयत्नों के अंतर्गत उनका समावेश करके सेवा धर्म की सार्थक साधना कर सकें-
साधनायें करने की विविध पद्धतियां प्रचलित हैं। रुद्राभिषेक आदि कितने ही धर्म कृत्य उन दिनों होते हैं। चातुर्मास में आने वालों के लिए एक सुव्यवस्थित साधना पद्धति बना दी जाती है जिसमें पर्व तथा उत्सवों का आनन्द भी सम्मिलित रहे।
साधना कर रहे हैं। जिस दिन स्नान न बन पड़े उस दिन आपत्ति धर्म के रूप में मानसिक जप करके भी काम चलाया जा सकता है। इस प्रकार यह भागीदारी हर नर-नारी- बाल-वृद्ध के लिए अति सरल बना दी गई है।
साधना पद्धति बना दी जाती है जिसमें पर्व तथा उत्सवों का आनन्द भी सम्मिलित रहे।
साधना कर सकें-
साधना और शिक्षा के लिए मथुरा आयें। हर घर से एक किशोर बालक एक वर्ष की औद्योगिक तथा जीवन-कला की शिक्षा के लिए भेजा जाय। इन शिक्षार्थियों के रूप में हमारी स्मृति जहाँ बनी रहेगी वहाँ सजीव स्मारक बने रहेंगे। एक वर्ष फेल होने जैसा जोखिम उठाकर हमें शिक्षार्थी किशोर हर घर से मिलने चाहिए।
साधना क्रम छापना बन्द करना पड़ा। जो साधक उस मार्ग पर चल रहे हैं उन्हें पत्रों द्वारा अगला मार्ग-दर्शन बराबर किया जा रहा है। सर्व साधारण के लिये सरल और स्वल्पकाल में सम्भव हो सकने वाला साधन ही चल सकता है। इसलिये दो माला 216 गायत्री मंत्र नित्य जपने की बात हर परिजन को कड़ाई के साथ निबाहनी चाहिये और जब भी अवसर हो भगवान के साथ अपनी अनन्यता एवं अभिन्नता का भावनापूर्ण ध्यान करना चाहिये। इतना नियमित बन पड़े तो भी कम सन्तोष की बात नहीं।
साधना में प्रेम भावना का समावेश यह पाँच साधन बताये गये हैं और उनके प्रयोग का स्वरूप समझाया गया है। उसी प्रकार परमार्थ प्रयोजन के लिये (1) सज्जनों का संगठन (2) सद्ज्ञान प्रसार केन्द्रों की स्थापना (3) हर व्यक्ति द्वारा युग निर्माण के लिये गायत्री मंत्र की एक माला का जप तथा सक्रिय शाखाओं द्वारा पंचकुंडी गायत्री यज्ञों का आयोजन (4) व्यवहारिक आध्यात्म का त्रिविध प्रशिक्षण। (5) रचनात्मक सेवा कार्यों का अभिवर्धन- यह पाँच कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये हैं। इन्हें अपनाना, इनके अभिवर्धन में योगदान करना एक महत्वपूर्ण परमार्थ है। देश काल पात्र की स्थिति के अनुरूप अनेक परमार्थ प्रयोजन काल में लाये जाते हैं।
साधना कार्यक्रमों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के परिष्कार के लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना सर्वोपयोगी और सर्व सुलभ है। इस प्रक्रिया को हम सभी अपनावें। निष्ठापूर्वक इसे नित्य कार्यान्वित करें। इस माध्यम से हमारी अन्तःभूमिका दिन-दिन उत्कृष्ट, पवित्र और समर्थ बनती चली जायेगी।
साधना के साथ लोक के लिए क्षमता प्राप्त करने का एक विशेष प्रशिक्षण क्रम भी जोड़ दिया गया है। रामायण एवं गीता के माध्यम से युग-निर्माण विचारधारा के अनुरूप प्रवचन करने की शिक्षा दी जाती है और प्रवचन करने का अभ्यास प्रति दिन कराया जाता है। प्रयत्न यह किया जायेगा कि चातुर्मास करके जाने वाला साधक एक कुशल वक्ता बन जाय और प्रवचनों द्वारा लोक-मंगल के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ हो सके।
साधना किसी तीर्थ स्थान में जाकर करने की प्राचीन धर्म परम्परा भी है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन यह चार महीने वर्षाऋतु के साधना एवं शिक्षण के लिए ढलती आयु में परम पुनीत माने गये हैं। गायत्री तपोभूमि में रह कर नियम साधनों के साथ-साथ सवा-सवा लक्ष के तीन अनुष्ठान हो सकते हैं। यज्ञ नित्य करने का अवसर मिलता है। (1) गुरु पूर्णिमा (2) श्रावणी (3) कृष्ण जन्माष्टमी (4) पितृ अमावस्या (5) अश्विन नवरात्रि (6) विजयदशमी (7) शरद पूर्णिमा।
साधना क्रम भी इस दिन हर एक को कार्यान्वित करने हैं। इसके लिए आवश्यक उत्साह हर परिजन को मिले, ऐसी प्रार्थना उन भगवती सरस्वती से है, जिनका इस बसन्त पंचमी को पुनीत जन्मदिन है। वीणापाणि की महाशक्ति हममें से हर एक को, एक दूसरे से बढ़-चढ़ कर त्याग बलिदान करने की स्फूर्ति, भावना और हिम्मत प्रदान करे ऐसी प्रार्थना है।
साधना प्रेमतत्व का भावनात्मक क्षेत्र में अभिवर्धन है। हम चिरकाल से ईश्वर के नाम का उच्चारण और स्वरूप का दर्शन एवं ध्यान मात्र करते रहे हैं। अब हमें उसे एक अभिन्न सहचर और अनन्य प्रेमी के रूप में देखना होगा। इस एकता और आत्मीयता से अन्तःकरण में प्रेम भावना बढ़ेगी। प्रेम ही परमेश्वर है।
साधना को, युग परिवर्तन की आधार शिला समझ कर पूरी श्रद्धा और तत्परता से सम्पन्न करता रहे। झोला पुस्तकालय, इस युग की सबसे बड़ी लोक सेवा है। ज्ञान का प्रसाद बाँटने से बढ़कर और कोई परमार्थ नहीं हो सकता। इसलिये हर कोई झिझक छोड़कर विचार-क्रान्ति के लिये, लोक-मानस निर्माण करने के लिये इस पुण्य प्रक्रिया में उत्साहपूर्ण भाग ले।
साधना हममें से हर एक को अनिवार्य रूप से करनी है कि अपने संपर्क के लोगों को विचार शुद्धि के लिए प्रयत्नपूर्वक विवश करें। युग-निर्माण योजना के अंतर्गत जिन साहित्य का सृजन किया जा रहा है वह अपने ढंग का अभिनव, अद्भुत है। यों धर्म, सदाचार, अध्यात्म आदि के नाम पर बहुत विचार और बहुत साहित्य उपलब्ध हैं, पर ‘युग-निर्माण’ की विचारणा अपने आपमें मौलिक है। उसके अंतर्गत युग की हर समस्या पर सूक्ष्म विवेचन किया गया है और समाधान इस ढंग से उपस्थित किया गया है जिसे बेजोड़ कहा जा सकता है। प्रचलित कुत्सित मान्यताओं पर पग-पग पर प्रहार किये गये हैं और नीर-क्षीर विवेक की एक स्वस्थ दृष्टि, लोक मानस को प्रदान की है।
साधना क्रम के आधार पर नवनिर्माण के पुण्य परमार्थ में सम्मिलित रहने के लिए प्रयत्न किया जाय तो हर जगह बहुत धर्म प्रेमी लोग आसानी से तैयार हो सकते हैं। 24 लक्ष जप का एक पुरश्चरण नित्य होने का संकल्प है। उसकी पूर्ति सबके सम्मिलित प्रयत्नों से ही होगी। इसलिए हर जगह- हर सक्रिय कार्यकर्ता- हर शाखा संगठन- इसके लिए प्रयत्न करे और अपनी देख-रेख में जिनका जप आरम्भ कराया हो उनके पूरे पते समेत लिस्ट मथुरा भेजें।
साधना क्रम अपनाने के साथ-साथ हमें पारमार्थिक सेवा कार्यक्रमों को भी अपने दैनिक-जीवन में जोड़े रहना चाहिये। इस अंक में-अगले लेखों में- एक ऐसी पंचसूत्री परमार्थ योजना प्रस्तुत की गई है जिससे आत्म-कल्याण और लोकमंगल के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। साथ ही नवनिर्माण का एक अत्यंत आवश्यक उत्तरदायित्व पूरा करने का उद्देश्य भी बड़ी खूबी के साथ पूरा होता है।
साधना हैं- औचित्य एवं विवेक को स्वीकार एवं कार्यान्वित करने का भावनात्मक साहस और प्रेम तत्व का अन्तःकरण में अभिवर्धन।
साधना के पक्ष हैं। एक में भगवान के सान्निध्य का क्रम किसी निर्धारित समय पर चलाया जाता है। दूसरे में जीवन शोधन और लोकमंगल के लिये तपश्चर्या का परिचय दिया जाता है। जब तक यह उभयपक्षीय पूजा अर्चा एकत्रित नहीं होती तब तक बिजली के दोनों तार मिले बिना प्रकाश न होने की तरह अंतःकरण में अंधेरा ही बना रहता है। इसलिये अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को यह समन्वित साधना प्रक्रिया बताई गई है।
साधना क्रम गत दिसम्बर अंक में बताया जा चुका है। यह उसी का सार है। उपासना और साधना दोनों का इसमें समन्वय है। पूजा और अर्चा यह दो साधना के पक्ष हैं। एक में भगवान के सान्निध्य का क्रम किसी निर्धारित समय पर चलाया जाता है।
साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम की चतुर्विधि तपश्चर्या चातुर्मास से जो कर सकें उन्हें सौभाग्यवान कहा जाना चाहिये। ऐसे सौभाग्यवानों का प्रशिक्षण करने का अवसर हमें तीन वर्ष मिलेगा यह हमारा भी एक सौभाग्य ही होगा।
साधना सर्वोपयोगी और सर्व सुलभ है। इस प्रक्रिया को हम सभी अपनावें। निष्ठापूर्वक इसे नित्य कार्यान्वित करें। इस माध्यम से हमारी अन्तःभूमिका दिन-दिन उत्कृष्ट, पवित्र और समर्थ बनती चली जायेगी। इस उपलब्धि द्वारा हम आत्मा और परमात्मा की सच्ची सेवा कर सकेंगे।
साधना एवं शिक्षण के लिए ढलती आयु में परम पुनीत माने गये हैं। गायत्री तपोभूमि में रह कर नियम साधनों के साथ-साथ सवा-सवा लक्ष के तीन अनुष्ठान हो सकते हैं। यज्ञ नित्य करने का अवसर मिलता है। (1) गुरु पूर्णिमा (2) श्रावणी (3) कृष्ण जन्माष्टमी (4) पितृ अमावस्या (5) अश्विन नवरात्रि (6) विजयदशमी (7) शरद पूर्णिमा। यह सात पर्व इस बीच में आते हैं जिन्हें शास्त्रोक्त विधि से मनाने का अनुपम अवसर मिलता है।
साधना के प्रत्यक्ष कार्यक्रम अपनाये बिना सद्गुणों का अभ्यास एवं अभिवर्धन हो ही नहीं सकता। इसलिये वैयक्तिक साधना क्रम अपनाने के साथ-साथ हमें पारमार्थिक सेवा कार्यक्रमों को भी अपने दैनिक-जीवन में जोड़े रहना चाहिये। इस अंक में-अगले लेखों में- एक ऐसी पंचसूत्री परमार्थ योजना प्रस्तुत की गई है जिससे आत्म-कल्याण और लोकमंगल के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। साथ ही नवनिर्माण का एक अत्यंत आवश्यक उत्तरदायित्व पूरा करने का उद्देश्य भी बड़ी खूबी के साथ पूरा होता है।
साधना की पद्धति हममें से हर एक के जीवन क्रम का अंग बने इसके लिए हर सदस्य से व्यक्तिगत रूप से भली-भाँति विचार विनमय किया जाय और इस आत्मोत्कर्ष के पुनीत कार्य का उसकी रुचि को अभिवर्धन किया जाय।
साधना का व्रत लेकर आगे आयें कुछ कठिन है। इस प्रयोजन में इतने अधिक व्यक्ति इतनी जल्दी इकट्ठे नहीं हो सकते। फिर भी निराशा जैसी कोई बात नहीं। यह धरती वीर विहीन नहीं हुई है। ऊँचे स्तर के लोग भी यहीं हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-February
साधना का सत्परिणाम न मिले ऐसा कदापि सम्भव नहीं। जो चाहे परीक्षा करके देख ले। एक वर्ष के लिए यह परीक्षा हममें से प्रत्येक को आरम्भ कर देनी चाहिए और यदि लाभ हो तो आगे भी जारी रखना चाहिए।
साधना के प्रधान अंग परमार्थ को अपनाना पड़ेगा। परमार्थ का, परम स्वार्थ का स्वरूप- आत्म-निर्माण है। जिससे लोक-मंगल के लिए सेवा धर्म अपनाना अपनी परोपकार परायण सेवा प्रवृत्ति का परिचय देना नितान्त आवश्यक है। जिसकी आत्मा में विश्व मानव की सेवा करने, इस संसार को अधिक सुन्दर सुव्यवस्थित एवं सुखी बनाने की भावनायें उठती रहती हैं और इस मार्ग चलने की प्रबल प्रेरणा करती है- वस्तुतः सच्चा परमार्थी और ईश्वर भक्त वही है। उसी का नाम-जप सार्थक कहा जा सकता है।
साधना छोड़कर लौकिकता की आराधना करना सत्य को छोड़कर उसकी छाया पकड़ने की तरह अबुद्धिमत्तापूर्ण है।
साधना ही है। उसी के आधार पर आत्मा को परमात्मा, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने का अवसर मिलता है।
साधना और परमार्थ प्रवृत्ति के अभिवर्धन से ही पूर्ण हो सकता है। जो संकीर्ण स्वार्थों तक सीमाबद्ध रह कर लोक मंगल के लिए कुछ भी योगदान नहीं कर सकते, उन्हें जागृत आत्मा नहीं कहा जा सकता। सोचते रहने, पढ़ते रहने, सुनते रहने से कुछ भला नहीं हो सकता। प्रयोजन तो काम करने से सिद्ध होता है। नव-निर्माण का उत्तरदायित्व आज युग पुरुष ने जागृत, प्रकाशवान एवं प्रबुद्ध आत्माओं के कंधे डाला है, उचित यही है कि हम उसे आगे बढ़कर हँसी-खुशी स्वीकार करें और निर्धारित दिशा में भावना एवं तत्परता के साथ अग्रसर हों।
साधना की ओर कदम बढ़ाने चाहिए। ‘उपासना में भावना का समावेश’ पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। परमेश्वर को अपना जीवन सहचर साथी, सभी मान कर उससे अनन्त प्रेम करना उसकी सत्ता में अपनी सत्ता-उसकी इच्छा में अपनी इच्छा समर्पित करना, प्रेम का सच्चा स्वरूप है। परमात्मा से केवल प्रकाश और साहस माँगा जाय, उसे अपनी प्रेम की सच्चाई प्रकट करने का प्रमाण सेवा और पवित्रता की प्रवृत्ति बढ़ा कर दिया जाय। साँसारिक पदार्थ न माँगे जाय न उसके लिए रोया गिड़गिड़ाया जाय।
साधना के लिए- सच्ची श्रद्धा और तत्परता के साथ हम पूरा-पूरा प्रयत्न करें। इसकी पूर्णाहुति होली के दिन प्रेम मिलन- गायत्री यज्ञ तथा युग-निर्माण कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न की जाय। 40 दिन में यों सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान होता है। यह 40 दिन यदि आत्म-कल्याण और लोक-मंगल की प्रस्तुत प्रक्रिया को सफल बनाने में लगाये जा सकें तो समझना चाहिये, एक अतिशय उच्च कोटि का धर्मानुष्ठान सम्पन्न हो गया। इसे सम्पन्न करने का हम अपने प्रत्येक परिजन से- अन्तःकरण की पूरी गहराई के साथ आग्रहपूर्वक अनुरोध करते हैं और आशा करते हैं जो किया जायेगा उसका विवरण भी हमें यथासमय प्राप्त होगा।
साधना में ऐसी कोई कठिनाई नहीं है। थोड़ा सजग रहकर ज्ञान का उपार्जन पवित्रतापूर्वक किया जा सकता है। अनैतिक एवं अनुचित विचार-संस्कार से थोड़ा सतर्क रहकर विशुद्ध एवं कल्याणकारी ज्ञान का अर्जन किया ही जा सकता है।
साधना की चिरकालीन तपश्चर्या से ही प्राप्त होता है। पूजा पाठ की औपचारिक पद्धतियाँ उस दिशा में सहायक तो हैं पर लक्ष्य तक ही पहुँचा सकतीं। अपूर्णता से पूर्णता की ओर तुच्छता से महानता की ओर प्रगति का एक माध्यम जीवन-साधना ही है। उसी के आधार पर आत्मा को परमात्मा, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने का अवसर मिलता है।
साधनाओं में सफलता का रहस्य उनके अन्तःकरण की श्रद्धा ही रही है। उनके गुरुओं ने तो केवल उनकी परख की है। यदि इस तरह की श्रद्धा आज भी लोगों में आ जाए और लोग पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छाओं पर चलने को कटिबद्ध हो जायें तो विश्वशाँति, चिर-सन्तोष और अनन्त समृद्धि की परिस्थितियाँ बनते देर न लगे। उसके द्वारा सत्य का उदय, प्राकट्य और प्राप्ति तो अवश्यम्भावी ही हो जाता है। इसी बात को शास्त्रों में संक्षेप में इस प्रकार कहा गया है-
साधना और विद्योत्तमा की वेदना सफल एवं सार्थक बना दी।
साधना की है और इसी मार्ग पर चलते हुए जीवनोद्देश्य प्राप्त करने में सफलता पाई है। हमें भी यही मार्ग अपनाना होगा। अन्यथा आध्यात्मिक प्रगति- महानता की उपलब्धि एक दिन स्वप्न बनी रहेगी। जिस पवित्रता के आधार पर ईश्वर को प्रसन्न और आकर्षित किया जा सकता है, वह एकमात्र जीवन साधना की चिरकालीन तपश्चर्या से ही प्राप्त होता है। पूजा पाठ की औपचारिक पद्धतियाँ उस दिशा में सहायक तो हैं पर लक्ष्य तक ही पहुँचा सकतीं।
साधना है, सुख-शाँति और सन्तोष के रूप में जिसका फल तुरन्त ही मिलता रहता है। परोपकार से उत्पन्न सन्तोष की तुलना स्वार्थजन्य सुख से कदापि नहीं की जा सकती। जहाँ पहला सुख मिथ्या और प्रवंचनापूर्ण होता है वहाँ दूसरा सत्य और कल्याणकारी होता है। जीवन में सत्य और उच्चकोटि के सुख को पाने के लिए परोपकार धर्म का पालन करना निताँत आवश्यक है। मनुष्य अपनी ही सुख-सुविधा और वृद्धि-समृद्धि की ही बात न सोचता रहे वरन् उसे दूसरों को भी सुखी तथा संकटरहित बनाने का प्रयत्न भी करते रहना चाहिये।
साधना की स्थिरता के लिए तप भी आवश्यक था, युग और परिस्थितियाँ बदल जाने पर आज भी आवश्यक है। परमात्मा सत्य है उसके गुण और स्वभाव अपरिवर्तनशील हैं इसी तरह वहाँ तक पहुँचने का मार्ग और माध्यम भी अपरिवर्तित ही है। उसे आज भी पाया और अनुभव किया जा सकता है, पर उस स्थिति की परिपक्वता के बीच में जो साधनायें, परिवर्तन, हलचल, कठिनाईयाँ और दूरभिसन्धियाँ आती हैं उनमें लक्ष्य प्राप्ति की भावना की स्थिरता के लिए श्रद्धा आवश्यक है।
साधना ही ऐसी साधना है, सुख-शाँति और सन्तोष के रूप में जिसका फल तुरन्त ही मिलता रहता है। परोपकार से उत्पन्न सन्तोष की तुलना स्वार्थजन्य सुख से कदापि नहीं की जा सकती। जहाँ पहला सुख मिथ्या और प्रवंचनापूर्ण होता है वहाँ दूसरा सत्य और कल्याणकारी होता है। जीवन में सत्य और उच्चकोटि के सुख को पाने के लिए परोपकार धर्म का पालन करना निताँत आवश्यक है। मनुष्य अपनी ही सुख-सुविधा और वृद्धि-समृद्धि की ही बात न सोचता रहे वरन् उसे दूसरों को भी सुखी तथा संकटरहित बनाने का प्रयत्न भी करते रहना चाहिये।
साधना भी इसी दिन से आरम्भ होगी। इसलिए व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए और सामूहिक रूप से समस्त परिवार के लिए यह एक प्रेरणापूर्ण प्रकाश पर्व है। इसे उत्साहपूर्वक मनाये जाने में हमारी आन्तरिक अभिव्यञ्जना की अभिव्यक्ति ही होती है। इस सम्बन्ध में जहाँ जितना उत्साह देखने को मिले वहाँ उतनी ही निष्ठा आँकी जा सकती है। इस संदर्भ में बरती जाने वाली उपेक्षा को हमारे प्रति- हमारे मिशन के प्रति उपेक्षा कहा जाय तो उसे अनुचित नहीं कहा जायेगा।
साधना के बिना सेवा, धर्म का व्रत पालन किये बिना मनुष्य जन्म की सार्थकता एवं सफलता नहीं मानी जा सकती। इसलिए हर अध्यात्मवादी को अपने शारीरिक एवं साँसारिक स्वार्थों को सीमित रख कर आत्मिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए अधिकाधिक ध्यान देते चलने का क्रम बढ़ाना पड़ता है। यदि हम में कटु वास्तविकता और कठोर सचाई स्वीकार करने का साहस हो तो यही मानना पड़ेगा कि आत्म-कल्याण के लिए उदारता एवं लोक-सेवा में परायण होने की रीति-नीति अपनाई जाय। इसी में आत्म-कल्याण, लोक-कल्याण एवं ईश्वर की सच्ची प्रसन्नता का रहस्य सन्निहित है।
साधना, उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है। ऐसी असफलतायें ही जीवन लक्ष्य में बाधक हैं।
साधना में उपरोक्त कार्यक्रम आज की स्थिति में सर्वोच्च है।
साधना का अविच्छिन्न अंग बनाना पड़ेगा। उत्कृष्ट आदर्श और दिव्य जीवन के निर्माण का यही एक मात्र राजमार्ग है। हर महामानव ने यही जीवन साधना की है और इसी मार्ग पर चलते हुए जीवनोद्देश्य प्राप्त करने में सफलता पाई है। हमें भी यही मार्ग अपनाना होगा। अन्यथा आध्यात्मिक प्रगति- महानता की उपलब्धि एक दिन स्वप्न बनी रहेगी।
साधना तथा शिक्षा के लिए मथुरा भेजना चाहिये। जो जन-नेतृत्व, जन-जागरण की योग्यता प्राप्त करने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण उपासना क्रम भी इस तीर्थ स्थान पर रहकर पूरा करलें।
साधना प्रारम्भ कर दी। इनके चले जाने पर पुनः परिस्थितियाँ ऐसी बनीं जिससे लोगों ने उन उदारमना महात्मा की आवश्यकता अनुभव की, तब लोगों को अपनी भूल का पता चला। वे महात्माजी को साथ तो न ला सके पर उनके प्रति श्रद्धा का भाव कुछ ऐसा बना कि उन्हीं में से कई लोग उस वृत्ति वाले बने और उन्होंने सहानुभूति की आवश्यकता को अनुभव किया। सन्त को इसका पता चला तो वे बहुत प्रसन्न हुये और सेवा-भावना की उनकी आस्था और भी दृढ़ हो गई।
साधनाओं को फल दूरगत होता है। किन्तु परोपकार की साधना ही ऐसी साधना है, सुख-शाँति और सन्तोष के रूप में जिसका फल तुरन्त ही मिलता रहता है। परोपकार से उत्पन्न सन्तोष की तुलना स्वार्थजन्य सुख से कदापि नहीं की जा सकती। जहाँ पहला सुख मिथ्या और प्रवंचनापूर्ण होता है वहाँ दूसरा सत्य और कल्याणकारी होता है। जीवन में सत्य और उच्चकोटि के सुख को पाने के लिए परोपकार धर्म का पालन करना निताँत आवश्यक है।
साधनायें, परिवर्तन, हलचल, कठिनाईयाँ और दूरभिसन्धियाँ आती हैं उनमें लक्ष्य प्राप्ति की भावना की स्थिरता के लिए श्रद्धा आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-November
साधना के जो सर्वमान्य नियम दिये गये हैं, उनके सिवाय अध्यात्म-विद्या के ज्ञाताओं ने, इस मार्ग में शीघ्र प्रगति करके कुछ बहुत महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त कर लेने की जो विधियाँ अथवा योग-शाखायें निकाली हैं, उनमें ‘कुण्डलिनी-योग’ का विशेष स्थान है। इससे शरीर में एक ऐसी शक्ति का आविर्भाव होता है, जिससे मनुष्य की चैतन्यता बहुत अधिक बढ़ जाती है और वह जब चाहे तब स्थूल-संसार के बजाय सूक्ष्म-जगत की स्थिति का अनुभव कर सकता है और एक संकीर्ण क्षेत्र में रहने के बजाय विशाल-विश्व की गतिविधि को देखने लगता है। ‘हठ-योग प्रदीपिका’ में कुण्डलिनी शक्ति’ के महत्व का वर्णन करते हुए कहा है-
साधना के यह दोनों लाभ गायत्री उपासना से मिलते हैं, यह निश्चित हैं यहाँ तो केवल यह बताना था कि मनुष्य की तरह भी प्राण, पंच-भौतिक प्रकृति और मनोमय क्रियाशीलता तीनों ही अंग सूर्यदेव में विद्यमान हैं, हम उनको आत्मा के रूप में ‘गायत्री’ के रूप में ध्यान और धारण करते हैं, चाहें तो उनकी कल्पना एक विराट पुरुष के रूप में भी कर सकते हैं, पर निश्चित है कि जिस तरह मनुष्य का एक छोटा-सा ‘अहंभाव’ है, सूर्य का भी वैसा अहंभाव सम्भव है। और जस तरह हम किसी तेजस्वी महात्मा के वरदान द्वारा प्राण प्राप्त कर आरोग्य-लाभ, पुत्र-लाभ, धन-लाभ, बुद्धिलाभ आदि प्राप्त कर सकते हैं, इन प्राण पुरुष गायत्री के तत्व देवता- सविता से और अधिक विश्वासपूर्वक ऐसे आशीर्वाद और स्नेह प्राप्त कर सकते हैं, शर्त इतनी भर है कि यदि हम उनको अपनी प्रगाढ़ श्रद्धा और निष्ठा से उसी तरह प्रभावित कर सकें, जिस तरह पुत्र अपने पिता को प्रसन्न करके स्नेह के साथ उनकी अन्य भौतिक वस्तुओं का भी अधिकार पा लेता है।
साधनाओं का प्रकरण है, जिनके आरम्भिक अभ्यास में कई तरह के नाद सुनाई देने का वर्णन है। पहले यह ध्वनियां तीव्र होती हैं, फिर धीमी होती जाती हैं, यह ध्वनियाँ झींगुर, झरना, भ्रमर, वीणा, वंशी, घुंघरू आदि की तरह सुनाई देती हैं। उपनिषदकार का मत है कि जिस तरह भ्रमर को फूलों में रस मिलता है, नाद-योग के साधक को चित्तवृत्तियाँ उसी प्रकार उस मधुर संगीत का आनन्द लेती और विषय वासनाओं को भूल जाती हैं। जब शब्दों के साथ मिला हुआ नाद अक्षर-ब्रह्म में लीन हो जाता है, तो शब्द नहीं सुनाई देते वरन् एक अनिवर्चनीय आनन्द की अनुभूति होती है।
साधना का आश्रय नहीं ले रहे हैं तो उसका शुभारंभ शरीर क्षेत्र से करिये। अपना आहार-विहार, रहन-सहन, शयन-जागरण, श्रम, संयम, ब्रह्मचर्य आदि का पूरा-पूरा ध्यान रखिये। अपनी दिनचर्या तथा जीवन-गति अधिकाधिक प्रकृति के अनुकूल बनाइये। आरोग्य और जीवन अवधि को दीर्घ तथा सुनिश्चित करिये। रोगों और व्याधियों की संभावना से मुक्त एवं निश्चिंत बनिये और तब इस प्रकार, शरीर गति पर पूरा नियंत्रण करने के बाद मन का परिष्कार करिये।
साधना समुचित रूप से विकास की और बढ़ रही है या नहीं, तो उसे यह देखना होगा कि उसके हृदय में प्रेम भावना की वृद्धि हो रही है या नहीं। पूजा पाठ तो वह बहुत करता है, किन्तु उसकी भावना उसी प्रकार नीरस और कठोर बनी हुई है तो उसे समझ लेना चाहिये कि उसकी साधना निष्फल जा रही है। विकास की दिशा में वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रहा है। और यदि वह यह अनुभव करता है कि उसके हृदय में आत्मीयता, उदारता और प्रेम की भावना जाग रही है, तो उसे विश्वस्त रूप से अपने पथ पर चलते जाना चाहिये। उसकी साधना सफलता की ओर जा रही होगी।
साधना का निष्कलंक रूप बना रहे और उससे मानव-जाति की भलाई होती रहे।
साधना में इस अनिवार्य क्रम का व्यतिक्रम करने वाले साधकों को न केवल असफल ही होना पड़ता है, बल्कि बहुत बार तो वे अस्त-व्यस्त मनोदशा वाले हो जाते हैं।
साधना है, जो जीवन को बड़े से बड़े अंधकार से निकाल कर प्रकाश की ओर ले जाती है। माँगलिक विषयों तथा आत्मा और परमात्मा में अपने विश्वास तत्व को सुस्थिर बनाकर उसकी गरिमा तथा महिमा की वृद्धि करनी चाहिये।
साधना में जुट पड़ते हैं। ‘‘साधना द्वारा आत्म-बल प्राप्त कर जीवन लक्ष की ओर अग्रसर हो सकने की स्थिति में पहुंच सकना भी संभव है, जब प्रारंभिक भूमिका के रूप में बाह्य-जीवन को संतुलित, व्यवस्थित एवं शुद्ध बनाया जाय।’’ इस नियम की ओर जरा भी ध्यान नहीं देते।
साधना सच्ची है तो उसका परिणाम प्रेम के रूप में ही मिलना चाहिये। सच्चे साधक का हृदय प्रेम की धारा से परिप्लावित हो जाता है। वह प्राणि-मात्र में अपनी आत्मा के दर्शन करने लगता है। आत्मीयता और उदारता प्रेम का ही तो रूप होता है। आत्मीयता का भाव मिलते ही संसार का दुःख-सुख साधक को अपना दुःख-सुख मालूम होने लगता है।
साधना को हम सभी मानसिक तनावों के निराकरण की अचूक औषधि भी कहते हैं। संगीत के अभ्यास और श्रवणकाल दोनों में मन को विश्रान्ति ही नहीं, आत्म-प्रसाद भी प्राप्त होता है।
साधना को निष्फल बनाती चली जा रही है। हम आध्यात्मिक साधना करते, पूरे समय प्रयत्न भी करते, परिश्रम एवं प्रसार से भी मुंह नहीं मोड़ते, तब भी देखते यही हैं जहां के तहां पड़े हुये हैं, जरा भी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
साधना सफलता की ओर जा रही होगी।
साधना का सार प्रेम अथवा भक्ति को ही माना गया है, बाह्य आडम्बर को नहीं।
साधना का मन्तव्य ईश्वरीय प्रेम प्राप्त करना ही माना गया है। यदि साधना सच्ची है तो उसका परिणाम प्रेम के रूप में ही मिलना चाहिये। सच्चे साधक का हृदय प्रेम की धारा से परिप्लावित हो जाता है। वह प्राणि-मात्र में अपनी आत्मा के दर्शन करने लगता है। आत्मीयता और उदारता प्रेम का ही तो रूप होता है।
साधना को किसी अनुभवी शिक्षक की देख-रेख में किया जाय। इससे भी अधिक आवश्यकता यह है कि साधक के आचार-विचार और उद्देश्य पूर्णतः शुद्ध हों।
साधना करते, पूरे समय प्रयत्न भी करते, परिश्रम एवं प्रसार से भी मुंह नहीं मोड़ते, तब भी देखते यही हैं जहां के तहां पड़े हुये हैं, जरा भी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।
साधना की ओर अग्रसर होइये। तभी सफलता की आशा की जा सकती है, अन्यथा नहीं। जो निश्चित क्रम व्यवस्था को बिगाड़ कर छलांग लगाने का प्रयत्न किया करते हैं, वे बहुधा असफल ही होते हैं। ऐसे उतावले अथवा अक्रमिक व्यक्ति अव्यस्थित साधना के फलस्वरूप बहुत बार अपना व्यावहारिक जीवन भी बिगाड़ लेते हैं, अध्यात्मिक उन्नति की तो बात ही क्या? अस्तु क्रमपूर्वक सावधानी से आत्मा की ओर बढ़िये।
साधना के क्रम में यश, वैभव, पूजा-प्रतिष्ठा की कामना का सन्निवेश कर दिया जाय तो वह आध्यात्मिक क्रम घोर भौतिकवाद बन जायेगा। भौतिकवाद अथवा अध्यात्मवाद अलग-अलग दो वाद नहीं हैं, बल्कि एक ही जीवन में जोड़े दो दृष्टि अथवा विचार कोणों की संज्ञायें मात्र हैं।
साधना में रत है और उसके फल का अधिकारी भी।
साधना का जो क्रम रखा गया है, वह इस प्रकार है- नेति, धौति, वस्ति, न्यौली, बज्रोली, कपाल-भाति प्रथम षट्-कर्म और तदुपरांत षट्-चक्र वेधन और कुंडलिनी जागरण आदि का क्रम आता है। स्पष्टतया पूर्व के षट्-कर्म बाह्य-जीवन के परिशोधन के लिये हैं और बाद की साधना मानसिक श्रेणी की है। योग साधना में इस अनिवार्य क्रम का व्यतिक्रम करने वाले साधकों को न केवल असफल ही होना पड़ता है, बल्कि बहुत बार तो वे अस्त-व्यस्त मनोदशा वाले हो जाते हैं।
साधना का प्रारंभ शरीर क्षेत्र में ही करना होगा।
साधना में प्रवृत्त हो जाते हैं और सोचते हैं कि आत्म-विकास हो जाने पर शरीर और मन का सुधार तो आप ही आप हो जायेगा। यह विश्वास गलता तथा भ्रमपूर्ण है। आत्म-विकास का क्रम शरीर, मन और तत्पश्चात आत्मा है। न कि आत्मा, मन और तन। उल्टे मार्ग चलकर आज तक क्या कोई लक्ष्य पर पहुंच सका है?
साधना द्वारा आत्म-बल प्राप्त कर जीवन लक्ष की ओर अग्रसर हो सकने की स्थिति में पहुंच सकना भी संभव है, जब प्रारंभिक भूमिका के रूप में बाह्य-जीवन को संतुलित, व्यवस्थित एवं शुद्ध बनाया जाय।’’ इस नियम की ओर जरा भी ध्यान नहीं देते।
साधना है और ब्रह्म प्राप्ति उसकी सिद्धि। नाद्-बिन्दूपनिषद के 42 से 45 मंत्रों में बताया गया है कि भ्रमर जिस प्रकार फूलों का रस ग्रहण करता हुआ, फूलों की गन्ध की अपेक्षा नहीं करता, उसी तरह नाद में रुचि लेने वाला चित्त विषय-वासना में दुर्गन्ध की इच्छा नहीं करता। सर्प नाद को सुनकर मस्त हो जाता है, उसी प्रकार नाद में आसक्त हुआ चित्त सभी तरह की चपलतायें भूल जाता है। संसार की चपलताओं से वियुक्त मन की एकाग्रता बढ़ती है और विषय-वासनाओं से अरुचि होने लगती है। यदि मन को हिरन और तरंग की संज्ञा दें तो यह नाद उस हिरन को बाँधने और पकड़ने वाला जाला और तरंग को साधने वाला तट ही माना जायेगा।
साधना छोड़कर कठिनतर आत्मिक साधना में प्रवृत्त हो जाते हैं और सोचते हैं कि आत्म-विकास हो जाने पर शरीर और मन का सुधार तो आप ही आप हो जायेगा। यह विश्वास गलता तथा भ्रमपूर्ण है। आत्म-विकास का क्रम शरीर, मन और तत्पश्चात आत्मा है। न कि आत्मा, मन और तन। उल्टे मार्ग चलकर आज तक क्या कोई लक्ष्य पर पहुंच सका है?
साधना का यह एक बड़ा भारी आध्यात्मिक लाभ है।
साधना के फलस्वरूप बहुत बार अपना व्यावहारिक जीवन भी बिगाड़ लेते हैं, अध्यात्मिक उन्नति की तो बात ही क्या? अस्तु क्रमपूर्वक सावधानी से आत्मा की ओर बढ़िये। आप अवश्य सफल होंगे, सिद्धि प्राप्त करेंगे।
साधना का सामान्य तथा सरल मार्ग यही है कि अपने साधारण जीवन क्रम में उस उत्कृष्ट दृष्टिकोण को जोड़ लिया जाय जो भौतिकवाद को अध्यात्मवाद बना दे। ऐसा करने से संसार क्रम में न तो बाधा पड़ेगी और अध्यात्म की भी आराधना होती चलेगी।
साधना करनी चाहिये। जप-तप, पूजा-पाठ, योग-अनुष्ठान द्वारा अपनी आत्मा में प्रेम भाव का विकास करते हुए, उसकी सच्चाई के प्रमाण में सेवा पूर्ण त्याग का लाभ प्राणि-मात्र के देते हुए परमात्मा को प्रसन्न करते रहना चाहिये। धीरे-धीरे वह समय आ जायेगा, जब परमात्मा प्रसन्न होगा और साधक को अपनी करुणामयी, आनंदमयी और कल्याणमयी गोद में स्थान देगा। जीवन की सारी साधन सफल हो जायेगी और उसके सारे मूल्य एक साथ मिल जायेंगे।
साधना का लक्षण यही है कि साधक के अन्तःकरण में प्रेम की सुधारा प्रवाहित होती चले। उसे दूसरों का दुःख सुख अपना जैसा अनुभव हो और प्राणि मात्र में अपनी आत्मा और अपनी आत्मा में प्राणि मात्र की आत्मा का दर्शन करे। जिस दिन साधक इस सार्वभौमिक प्रेम की अनुभूति करने लगेगा, उसी दिन से वह परमात्म मिलन की परिधि में प्रवेश कर जायेगा।
साधनायें और तात्विक ज्ञान से आशा है, इन रहस्यों का बहुत कुछ यथार्थ जानकारी मनुष्य को मिल सकेगी।
साधना के लिये आवश्यक प्रबल जिज्ञासा, सत्यनिष्ठा और तपश्चर्या का भाव देखकर यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या (कुंडलिनी जागरण) सिखाई, जिससे नचिकेता ने अमरत्व की शक्ति पाई।
साधना बन जायेगी।
साधनाओं का आधार भी कुण्डली ही है, जब गुरु की कृपा से सोयी हुई कुण्डली जागती है, तब सम्पूर्ण पद्य (षट्चक्र) और ग्रन्थियाँ खुल जाते हैं। और उसी समय प्राण की शून्य पदवी (सुषुम्ना), राजपथ (सड़क) के समान हो जाती है, चित्त विषयों से रहित हो जाता है और मृत्यु का भय मिट जाता है।”
साधना मानसिक श्रेणी की है। योग साधना में इस अनिवार्य क्रम का व्यतिक्रम करने वाले साधकों को न केवल असफल ही होना पड़ता है, बल्कि बहुत बार तो वे अस्त-व्यस्त मनोदशा वाले हो जाते हैं।
साधना द्वारा अपनी आत्मा में प्रेम का स्फुरण कर लिया है, वह योगी है। उसका प्रेम योग न केवल संसार के दुख-दर्दों से ही अपने साधक को मुक्त रखेगा बल्कि उसे उस गति का भी अधिकारी बना देगा जो योगियों की निश्चित एवं नैसर्गिक उपलब्धि है।
साधना निष्फल जा रही है। विकास की दिशा में वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रहा है। और यदि वह यह अनुभव करता है कि उसके हृदय में आत्मीयता, उदारता और प्रेम की भावना जाग रही है, तो उसे विश्वस्त रूप से अपने पथ पर चलते जाना चाहिये। उसकी साधना सफलता की ओर जा रही होगी।
साधना के अनुरूप न सुधारा जायेगा, तब तक ईश्वर दर्शन, आत्म-साक्षात्कार, समाधि, कुंडलिनी-जागरण आदि की सिद्धि मूलक बात सोचना व्यर्थ होगा। योग-क्षेम के अध्येता अच्छी तरह जानते हैं कि योग का प्रतिपादन करने वाले आचार्यों ने योग के जो सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं, उनमें क्रमिक विकास के नियमों को प्रधानता दी है। उदाहरण के लिये पातंजलि और हठयोग ले लीजिये। यह दोनों योग बड़े शक्तिशाली और उच्च-कोटि के हैं। महर्षि पातंजलि ने योग के जो आठ अंग प्रतिपादित किये हैं, उनका क्रम इस प्रकार रखा है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम और फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-March
साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान भण्डार को अनुभव की तुला पर तोल कर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान करने के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया। जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी हैं और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे। ज्ञानोपकार से बढ़ कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
साधना ही हमारा जीवन लक्ष्य हो सकता है, होना चाहिये।
साधना के हैं। इनमें गायत्री तपोभूमि में रह कर कई अनुष्ठान किये जा सकते हैं। इसी अवधि में गोवर्धन परिक्रमा, ब्रज परिक्रमा, झूलों के मेले, जन्माष्टमी उत्सव, बलदेव-जयन्ती, रामलीला, विजय-दशमी आदि ब्रज के प्रसिद्ध एवं मनोरंजक उत्सव आयोजन होते हैं, जिन्हें देखने लाखों व्यक्ति देश भर से आते हैं। आमतौर से सभी व्यवसाय वर्षा में हल्के रहते हैं। जिन्हें घर में थोड़ा अवकाश हो, जिनकी छुट्टियाँ बाकी हों वे चार महीने के लिए मथुरा आने का प्रयत्न करें।
साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान करने के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया। जिसके लिए वे तब भी पूजित रहे, आज भी हैं और आगे भी पूजनीय बने रहेंगे। ज्ञानोपकार से बढ़ कर संसार का कोई अन्य परोपकार है ही नहीं।
साधना द्वारा प्रबुद्ध कीजिये और समाज में अपना वह महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कीजिये, जो कहीं न कहीं पहले से ही सुरक्षित रक्खा है। आज आप जिस विषय-वासना की कीचड़ में पड़े हैं, जिस भोग-विलास अथवा दिखावे का जीवन अपनाये हुये हैं, उसे त्यागिये और अपने अनुरूप उच्च विचारधारा-उदात्त कार्यशैली और उन्नत जीवन-लक्ष्य चुनिये। केवल इन्द्रिय सुख में भूले हुये आप अपने बहुमूल्य जीवन को कौड़ी मोल लुटा रहे हैं।
साधना भी एक दिन आत्मा को प्रेमस्वरूप बना देती है।
साधना ही सिखाई होती, केवल वही साधन खोज कर दिए होते जिनसे शारीरिक भोगों की ही सुविधा हो सकी होती तो शायद मनुष्य अब तक मानव-पशु की अवस्था में ही होता। न तो उसे आत्मा का ज्ञान हो पाता और न ईश्वर का परिचय। शरीर ही उसकी आत्मा होती और शरीर ही परमात्मा जिसकी तृप्ति करते रहना ही उसकी पूजा होती। वह आज की तरह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को क्रम-क्रम से प्राप्त कर सकने का मार्ग न पा पाता। आज की सुन्दर सभ्यता आनन्ददायी संस्कृति और कल्याणकारी धर्म, जिसके कारण हम मनुष्य संसार के सर्वश्रेष्ठ प्राणी बने हैं उन ऋषि मुनियों का वह उपकार ही है जिसको उन्होंने ज्ञान-दान के रूप में हम पर किया है।
साधना विधान के प्रयोग का है, दूसरा वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के माध्यम से उपकरणों एवं यंत्रों के माध्यम से लाभान्वित होने का है।
साधनाओं से सम्पन्न करते थे। इसलिये उनकी पद्धति मंत्र-योग कहलाती थी। दक्षिण और वाममार्ग में सात्विक और तामस का अन्तर रहने के कारण उन्हें तंत्र-विद्या और मंत्र-विद्या का अलग-अलग नाम दिया गया है। जहाँ तक परिणामों का सम्बन्ध है दोनों के प्रतिफल लगभग समान हैं। जो भौतिक लाभ मंत्र-योगी उठा सकता है, वही चमत्कार उत्पन्न कर सकना तंत्र-योगी के लिए भी सम्भव है।
साधना में जरा भी कठिनाई नहीं है। आत्म-जिज्ञासु व्यक्ति संसार में रमता हुआ भी उसकी अंधेरी वीथियों में नहीं भटकने पाता। उसकी वह जिज्ञासा उसके साथ रह कर प्रकाश का काम करती है। सांसारिकता कर्तव्यों के बाद वह उसको उसी प्रकाश मार्ग पर लौटा लाती है, जिसका अनुसरण इस वेद वाक्य को चरितार्थ कर देता है-
साधना तथा धर्म प्रचारक का प्रशिक्षण ज्येष्ठ का दूसरा शिविर समाप्त होते ही आरम्भ हो जायेगा। इन प्रशिक्षणों में सम्मिलित होने वाले सज्जन दिनांक 8 जून से आरम्भ होने वाले दूसरे शिविर का भी लाभ उठा सकें, इस दृष्टि से उन्हें दिनाँक 7 जून को ही मथुरा आ जाना चाहिये।
साधना को करने के लिये उसे सर्वशक्ति सम्पन्न यह मानव शरीर साधन के रूप में अनुग्रह किया गया है। और अधिकार नहीं, स्वतन्त्रता दी गई है कि वह जिस प्रकार चाहे इसका उपयोग कर सके। उसने शरीर का किस प्रकार उपयोग किया है इसका लेखा-जोखा तो इसके बाद लिया जायेगा। बीच में न उसे टोका जायेगा और न रोका जायेगा। हाँ, उसे सद्परामर्श देने के लिये बुद्धि-विवेक रूप में एक हित-चिन्तक अथवा मंत्री अवश्य दे दिया है, जिसका परामर्श मानने के लिये भी वह स्वतन्त्र है।
साधना द्वारा स्वतः ज्ञान का भण्डार एकत्र किया था। योंही वे कुछ थोड़ी-सी पुस्तकें पढ़ कर ही ज्ञानी नहीं बन बैठे थे। उन्होंने जीवन का अधिकाँश भाग अध्ययन, मनन और चिन्तन में लगाया था। संयम और साधना द्वारा अपना विवेक परिपक्व किया था और अपने ज्ञान भण्डार को अनुभव की तुला पर तोल कर प्रामाणिक बना लिया था और तब इतनी साधना करने के बाद वे समाज को ज्ञान-दान करने के योग्य हो पाये थे। उन्होंने उस ज्ञान के बल पर मानवता के प्रति सर्वश्रेष्ठ उपकार किया।
साधना करते ही रहना चाहिये। जिस प्रकार बूँद-बूँद का संचय एक दिन घट भर देता है, जन्म-जन्म का प्रयत्न किसी जन्म से परमात्मा की प्राप्ति करा देता है, उसी प्रकार की थोड़ी-थोड़ी साधना भी एक दिन आत्मा को प्रेमस्वरूप बना देती है।
साधना से ही सम्भव होता है। उसे पंच-मुखी भी कहते हैं- चित्रों में सावित्री के पाँच मुख भी चित्रित किये जाते हैं। इस बहुमुखी अलंकार का तात्पर्य सावित्री की शक्ति से पाँच कोषों के जागरण की सम्भावना व्यक्त करना ही है।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
साधनाओं वाली-बताया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-September
साधना द्वारा मानसिक एकाग्रता प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
साधना के बाद इस मानव-जीवन में आकर परमात्मा की सत्ता का ज्ञान पा लिया है और यह भी जान लिया है कि हम उसी परमात्मा के एक अंश हैं तो इससे बड़ी मूर्खता और क्या हो सकती है कि हम अपने उस सत्य स्वरूप को पाने का प्रयत्न न कर पुनः असंख्यों अधम योनियों में भटकने के लिये वापस चले जायें। उसे पागल के सिवाय और क्या कहा जा सकता है जो जिन कक्षाओं को उत्तीर्ण कर चुका है उन्हीं में वापस जाने की मति पैदा करे। उच्च पद से निम्न पद पर पतित हो जाने से बढ़कर जीवन की असफलता और क्या हो सकती है? पर यदि हम परमात्मा को पाने के लिये उपासना के उपाय में नहीं लगते तो निश्चय ही जीवन की इस असफलता की आशंका बनी हुई है।
साधना करनी पड़ेगी।
साधना का बहुत-सा रहस्य निर्भर है। सारे के सारे महापुरुष उच्च और गम्भीर विचार वाले होते रहे हैं। इसलिये उनमें चंचलता अथवा विश्रृंखला का दोष देखने को नहीं मिलता, गम्भीर विचारों की गहराई स्वयं ही मनुष्य को अपने में डुबाए रहती है। मनुष्य ज्यों-ज्यों विचारों की गहराई में डूबता जाता है स्वभावतः वह अधिकाधिक एकाग्र और एकनिष्ठ बनता जाता है। उसकी सारी बाह्य चंचलता, वाचालता और विविधता नष्ट हो जाती है।
साधना और तपस्या क्यों न की जाए यदि हृदय में प्राणिमात्र के लिये दया नहीं है तो उसका कोई लाभ न होगा। उन सारी क्रियाओं से धर्म का उद्देश्य पूरा न होगा। इसके अतिरिक्त यदि हृदय में दया का निवास है, संवेदना, सहानुभूति और पर पीड़ा का अनुभाव है तो वह मनुष्य कोई भी धार्मिक क्रिया न करता हुआ भी पूरा धर्मात्मा है। जो धर्मात्मा है संसार में उसकी पूजा कौन न करेगा?
साधना करते ही रहना चाहिए। मनुष्य का एकाग्र मन उसकी उन्नति का एक मात्र आधार माना गया है। जो मनुष्य अपने मन को एकाग्र कर लेता है, वह किसी भी कार्य में उसकी सारी शक्तियों का एक साथ प्रयोग कर सकता है। जिस प्रकार एक आतशी शीशा सूर्य की किरणों को एकाग्र कर किसी को जला देने की शक्ति संपादित कर लेता है उसी प्रकार एकाग्र मन अपनी एकत्र शक्तियों द्वारा कोई भी प्रयोजन सिद्ध कर सकता है।
साधना और सत्कर्मों द्वारा उस परमात्मा को पाने का प्रयत्न प्रारम्भ नहीं कर देते तो निश्चय ही हमको न जाने कौन-सी आदि योनि में चौरासी लाख की यात्रा पूरी करने के लिये जाना होगा और न जाने उसे पूरा करने में कितने युगों तक अधमता की यातना सहना पड़े। हाँ यदि हम अपने इस जीवन में परमात्मा को प्राप्त करने का उपाय शुरू कर दें तो यदि इस जीवन में उसको न भी पा सकें तो भी यह क्रम आगे भी चलता रहेगा और अपना प्रयत्न आगे बढ़ाने के लिये हमें पुनः मनुष्य योनि ही प्राप्त होगी। इस प्रकार एक नहीं अनेक जन्मों के प्रयत्न से हम एक दिन परमपिता परमात्मा को प्राप्त कर ही लेंगे। किन्तु यदि प्रारम्भ न किया गया तो लक्ष्य ही प्राप्ति सर्वदा असम्भव बनी रहेगी।
साधना-
साधना रत मेरे साधक,
धरो न उस पर ध्यान कि जो निष्क्रिय जन कहते हैं।
सहो वार पर वार मगर तन्मयता भंग न हो,
उड़ जायेंगे बात-बवण्डर, सुख सौगात नहीं!
झंझावात रहेंगे हरदम ऐसी बात नहीं!
साधना के विभिन्न प्रकार परिचय, और स्वरूप, ध्यान, तप, तितीक्षा, विचारातीत स्थिति, समाधि, कुंडलिनी, इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, नाड़ी-संस्थान, षट्चक्र, राज-योग, हठ-योग, लय-योग, मन्त्र योग, प्राण-योग आदि योगों का विवरण एवं संकेत आदि।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-December
साधना को आगे बढ़ाता है। अवधि पूरी होने पर नियति उसका एक शरीर तो ले सकती है, किन्तु साधना पूरी करने के लिये उसका नया शरीर धारण करना वर्जित नहीं कर सकती। साधना के लिये एक ही जीवात्मा की यह शरीर परम्परा अमरता का ही तो लक्षण है। उपरान्त जब उसकी प्रेम साधना अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है, तब तो प्रेमी जीवन-मरण की पुनरावृत्ति से ही मुक्त हो जाता है और मोक्ष नामक उस पद को प्राप्त कर लेता है, जो न के अमर ही होता है, बल्कि अक्षय शाश्वत होता है।
साधना द्वारा यह पथ प्रशस्त करना होगा, जिसके आधार पर कि पिण्ड के- दक्षिणी ध्रुव- मूलाधार के शक्ति-पुँज को शरीर और मन की अगणित दिव्य शक्तियों के अभिवर्धन में प्रयुक्त करके मानवीय महत्ता को देवोमय स्तर के उच्च-शिखर तक पहुँचाया जा सके।
साधना। (124) कर्म-योग की रीति-नीति। (125) भक्ति-योग का वास्तविक स्वरूप। (126) प्रेम ही परमेश्वर है। (127) उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता।
साधना सामान्यतः की जा सकती है और न सर्व-साधारण इसे सुरक्षापूर्वक कर सकते हैं। इसीलिये समाज के शुभेच्दु ऋषि-मुनियों ने अनुभव और साधना के आधार पर यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि मनुष्य को भौतिक वितृष्णाओं से दूर रहकर सन्तोषपूर्वक जीवन निर्वाह की शर्तें पूरी करते हुए, इस प्रकार जीवन-यापन करना चाहिये, जिससे संसार भी निभाता चले और आत्मा की भी रक्षा होती चले। इसी सिद्धान्त को ‘थोड़ा पर उत्कृष्ट’ के कतिपय शब्दों में भी व्यक्त किया जा सकता है।
साधना करने की आवश्यकता होती है।
साधना, उपासना में संलग्न होने के पीछे प्रायः स्वर्ग पाने की ही कामना छिपी रहती है। यद्यपि सकाम उपासना को अधिक श्रेष्ठ नहीं माना गया है, तथापि यदि वह कामना साँसारिक पदार्थों के आगे की वस्तुओं को पाने से सम्बन्धित है तो उसको किसी हद तक स्वीकार कर लिया जाता है।
साधनायें तथा मनोबल, आत्म-बल एवं संकल्पजन्य-सिद्धियों का केन्द्र-बिन्दु इसी ड़ड़ड़ड़ पर है।
साधना भी समुद्र-मंथन का दूसरा कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, पर उसका प्रथम सोपान तो इन्द्रिय निग्रह पर ही अवलम्बित है।
साधना कर रहा है, यही कहा, माना और समझा जायेगा।
साधनाओं के आधार पर ही अतीन्द्रिय और मनश्चेतना से परे किसी ऐसे तत्व का अस्तित्व स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया है, जो सर्व-दृष्टा, शाश्वत, मुक्त और स्वेच्छा से भ्रमण और स्वरूप ग्रहण करने वाला है, जो साक्षी चेतन और अपनी इच्छा से विकसित होने वाला है। इस विश्वास की पुष्टि और शोध के लिये ही ‘लीग फार स्प्रिचुअल डिस्कवरी’ की स्थापना हुई है। यह संगठन अनेक घटनाओं के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहा है कि मनश्चेतना से परे भी कोई चेतन तत्व इस सृष्टि में विद्यमान है, शरीर धारियों का केन्द्र और मूल भी वही है।
साधना। (130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें। (132) सफलता आत्मविश्वासी को मिलती है। (133) जो करें मन लगाकर करें।
साधना पूरी करने के लिये उसका नया शरीर धारण करना वर्जित नहीं कर सकती। साधना के लिये एक ही जीवात्मा की यह शरीर परम्परा अमरता का ही तो लक्षण है। उपरान्त जब उसकी प्रेम साधना अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है, तब तो प्रेमी जीवन-मरण की पुनरावृत्ति से ही मुक्त हो जाता है और मोक्ष नामक उस पद को प्राप्त कर लेता है, जो न के अमर ही होता है, बल्कि अक्षय शाश्वत होता है।
साधना में काम-वासना का निग्रह समुद्र-मंथन की भूमिका प्रस्तुत करता है। यों आगे चलकर आत्म-प्राण और महा-प्राण को इड़ा पिंगला के द्वारा सुषुम्ना तक पहुँचाने की साधना भी समुद्र-मंथन का दूसरा कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, पर उसका प्रथम सोपान तो इन्द्रिय निग्रह पर ही अवलम्बित है।
साधनाओं में यह तत्वज्ञान संजोये ही रहते हैं कि उन्हें ब्रह्मचर्य पूर्वक रहना चाहिये, ताकि पिण्ड की- देह की- मूलाधार क्रिया शक्ति कुण्डलिनी का अपव्यय न हो और वह बहिर्मुखी होकर अस्त-व्यस्त बनने, उच्छृंखल होने की अपेक्षा लौटकर ऊर्ध्वगामी दिशा पकड़ती हुई ब्रह्मरंध्र अवस्थित महासर्प के साथ तादात्म्य होकर परमानन्द- ब्रह्मानन्द का लक्ष्य प्राप्त कर सके।
साधना के लिये एक ही जीवात्मा की यह शरीर परम्परा अमरता का ही तो लक्षण है। उपरान्त जब उसकी प्रेम साधना अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है, तब तो प्रेमी जीवन-मरण की पुनरावृत्ति से ही मुक्त हो जाता है और मोक्ष नामक उस पद को प्राप्त कर लेता है, जो न के अमर ही होता है, बल्कि अक्षय शाश्वत होता है।
साधना के आधार पर यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि मनुष्य को भौतिक वितृष्णाओं से दूर रहकर सन्तोषपूर्वक जीवन निर्वाह की शर्तें पूरी करते हुए, इस प्रकार जीवन-यापन करना चाहिये, जिससे संसार भी निभाता चले और आत्मा की भी रक्षा होती चले। इसी सिद्धान्त को ‘थोड़ा पर उत्कृष्ट’ के कतिपय शब्दों में भी व्यक्त किया जा सकता है।
साधनाओं में इन्द्रिय संयम को- ब्रह्मचर्य को बहुत महत्व दिया गया है।
साधना एक दुःसाध्य काम है। न तो यह साधना सामान्यतः की जा सकती है और न सर्व-साधारण इसे सुरक्षापूर्वक कर सकते हैं। इसीलिये समाज के शुभेच्दु ऋषि-मुनियों ने अनुभव और साधना के आधार पर यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि मनुष्य को भौतिक वितृष्णाओं से दूर रहकर सन्तोषपूर्वक जीवन निर्वाह की शर्तें पूरी करते हुए, इस प्रकार जीवन-यापन करना चाहिये, जिससे संसार भी निभाता चले और आत्मा की भी रक्षा होती चले। इसी सिद्धान्त को ‘थोड़ा पर उत्कृष्ट’ के कतिपय शब्दों में भी व्यक्त किया जा सकता है।
साधना अपनी पूर्णता को प्राप्त होती है, तब तो प्रेमी जीवन-मरण की पुनरावृत्ति से ही मुक्त हो जाता है और मोक्ष नामक उस पद को प्राप्त कर लेता है, जो न के अमर ही होता है, बल्कि अक्षय शाश्वत होता है।
साधनाओं में भी रासायनिक तत्वों के आधार पर मनश्चेतना के प्रसार और उसके द्वारा विलक्षण अनुभूतियों और दूरवर्ती ज्ञान को प्राप्त कर लिया जाता है। एलन गिसबर्ग ने भी उसी की पुष्टि की है और उनका विश्वास है कि जीव-चेतना का अन्त मन है, उसके आगे न कोई सूक्ष्म सत्ता है और न कोई अति मानस ज्ञान। पर अब पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने ही इन ताँत्रिक साधनाओं के आधार पर ही अतीन्द्रिय और मनश्चेतना से परे किसी ऐसे तत्व का अस्तित्व स्वीकार करना प्रारम्भ कर दिया है, जो सर्व-दृष्टा, शाश्वत, मुक्त और स्वेच्छा से भ्रमण और स्वरूप ग्रहण करने वाला है, जो साक्षी चेतन और अपनी इच्छा से विकसित होने वाला है। इस विश्वास की पुष्टि और शोध के लिये ही ‘लीग फार स्प्रिचुअल डिस्कवरी’ की स्थापना हुई है। यह संगठन अनेक घटनाओं के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न कर रहा है कि मनश्चेतना से परे भी कोई चेतन तत्व इस सृष्टि में विद्यमान है, शरीर धारियों का केन्द्र और मूल भी वही है।
साधनायें प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि स्तर की हैं। उनके अनेक प्रयोग और प्रयोजन हैं। उनकी चर्चा भी यथा अवसर करेंगे। इन पंक्तियों में तो कुण्डलिनी शक्ति का आरंभिक परिचय कराना और उसका प्रथम सोपान प्रस्तुत करना ही अभीष्ट है। अस्तु यहाँ इतना समझना और समझाना पर्याप्त है कि हम कुण्डलिनी के स्थूल स्वरूप की महत्ता समझें और यह अनुमान लगावें कि यदि उसे अन्तर्मुखी बनाकर प्रसुप्त दिव्य शक्तियों के जागरण में विधिवत् प्रयुक्त किया जा सके, तो अद्भुत एवं अनुपम लाभ उपलब्ध किये जा सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-April
साधना का प्रयोजन पूरा होता है। जिस प्रकार उपासना को पूजन, जप और ध्यान इन तीनों भागों में बाँटा जा सकता है, उसी प्रकार आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण साधना के अविच्छिन्न अंग हैं। भगवान के स्मरण पर जितना ध्यान देना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यकता जीवन शोधन की भी है। आदर्शवादी, उत्कृष्ट जीवन आस्तिकता का सबसे प्रमुख प्रमाण है। ऐसे भक्त जो अपने आचरण की शुद्धता लेकर ईश्वर के सन्मुख उपस्थित होते हैं, अपने प्रभु को प्रसन्न एवं द्रवित करने में निःसंदेह समर्थ होते हैं।
साधना के लिए अति उपयुक्त हैं। जिस प्रकार दिन और रात्रि के मिलन अवसर को संध्याकाल कहते हैं और प्रातः साँय के संध्याकाल में उपासना करना महत्वपूर्ण मानते हैं, उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन की यह ऋतु संध्या 9-9 दिन के लिए- नवरात्रि के रूप में- वर्ष में दो-बार आया करती हैं। शरीर और मन के विकारों का निष्कासन- परिशोधन इस अवसर पर बड़ी आसानी से हो सकता है। जिस प्रकार बीज बोने की एक विशेष अवधि आती है और चतुर किसान उन दिनों सतर्कतापूर्वक अपने खेतों में बीज बो देते हैं, उसी प्रकार इन नवरात्रियों में भी कुछ तपश्चर्या की जा सके तो उसके अधिक फलवती होने की संभावना रहती है। स्त्रियों को महीने में जिस प्रकार ऋतुकाल आता है, ‘उसी प्रकार नवरात्रियाँ प्रकृति की भी ऋतुकाल है।
साधना का दूसरा चरण अपने भीतर सद्गुणों का, उत्कृष्टताओं, योग्यताओं और क्षमताओं का विकसित करना है। असत्य, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, नशा आदि दुर्गुणों को छोड़ देना ऐसा ही है, जैसे किसी पौधे की जड़ को काटने में लगी हुई दीमक को हटा देना। इससे एक कठिनाई तो दूर हुई पर पौधे के विकास का पथ प्रशस्त कहाँ हुआ? उसके लिए खाद-पानी की उपयुक्त आवश्यकतायें भी पूरी करनी होंगी। अन्यथा बेचारा पौधा बढ़ेगा कैसे?
साधना की सफलता के लिए उचित एवं आवश्यक है।
साधना में हर किसी को निष्ठा हो। इस प्रक्रिया के अंतर्गत ही महत्तम गायत्री महापुरश्चरण की भागीदारी भी सम्मिलित है। एक माला अपने लिए, एक विश्व-कल्याण के लिए करने से सहज ही उस महापुरश्चरण का भागीदार बना जा सकता है। अपने परिवार के- संपर्क के लोगों को भी इस साधना क्रम में सम्मिलित होने की प्रेरणा देनी चाहिये।
साधना पद्धति है। हम चाहते हैं कि परिवार का हर सदस्य इसे अपनाये। दैनिक उपासना के लिए हर कोई थोड़ा समय लगाये। दैनिक साधना में हर किसी को निष्ठा हो। इस प्रक्रिया के अंतर्गत ही महत्तम गायत्री महापुरश्चरण की भागीदारी भी सम्मिलित है।
साधना को समग्र बनाती है। इसलिए अपने आध्यात्मिक क्रिया-कलापों में इनका जुड़ा रहना आवश्यक है।
साधना जो निष्ठापूर्वक अविचल भाव से चला सकेंगे, वे आगे की उच्च साधनाओं के अधिकारी माने जायेंगे, उन्हें हमारे संचित ज्ञान और अनुभव का ही नहीं अनुदान एवं सहयोग का भी लाभ मिलेगा। हम जहाँ कहीं भी रहेंगे उन्हें आवश्यक प्रकाश प्रदान करेंगे और इसके लिये शक्ति भर प्रयत्न करेंगे कि वे अध्यात्म की उच्च भूमिका में प्रवेश करने का आनन्द लाभ करें। ऊंची उपासनाओं के विधान बता देने से किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। पंच-कोषों का अनावरण, षट्चक्र वेधन, कुंडलिनी जागरण आदि की क्रिया-प्रक्रियायें विस्तारपूर्वक बताई, समझाई जा सकती हैं, पर इतने मात्र से किसी को कोई लाभ न होगा। उस मार्ग पर चलने के लिए शक्ति प्राप्त करना यह सबसे बड़ा काम है।
साधना का भी समन्वय होना चाहिए, तभी वह अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करने में समर्थ हो सकती है। जितना ध्यान पूजा पद्धति पर दिया जाता है, उससे भी अधिक भावना तथा साधना पर दिया जाना चाहिए। तीनों का सम्मिश्रण जहाँ भी होगा वहाँ सफलता निश्चित रूप से मिलेगी।
साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिये। जीवन को पवित्र और परिष्कृत संयत और सुसंतुलित उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्च स्तरीय बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है।
साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष जोड़ा है, उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित है। एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिये दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है।
साधना बंद या स्थगित रखूँगा तो उसकी सूचना अपने ऋत्विज को तथा मथुरा केन्द्र को दे दूँगा।’
साधना का अतिशय प्रभावशाली परिणाम प्रस्तुत होगा।
साधना के प्रथम चरण में अपने शरीर और मन पर- कार्य और विचारों पर बारीकी से तीखी नजर रख कर यह देखना होता है कि मनुष्यता के गौरव को गिराने वाले- पशु-स्तर के- कुसंस्कार अपने में कितने समाये हुए हैं? गुण, कर्म, स्वभाव में किन पशु प्रवृत्तियों का समावेश है? उन्हें धीरे-धीरे, एक-एक करके छोड़ने का संकल्प करना चाहिये। अपने कुसंस्कारों से लड़ना चाहिये। उनकी हानियों पर विचार करना चाहिये।
साधना प्रयोगों के आधार पर प्राप्त करते हैं- इसके मूल में उनकी श्रद्धा की शक्ति ही सन्निहित होती है। साधक अपने ही नाम रूप साधना करके- अपने ही जैसा एक ‘छाया पुरुष’ निर्मित और सिद्ध कर लेते हैं। यह मनुष्य आकृति का देव बड़े-बड़े अनोखे काम करता है।
साधना अंक’ इसीलिये प्रस्तुत किया गया है। इसमें एक सुव्यवस्थित सरल साधना पद्धति है। हम चाहते हैं कि परिवार का हर सदस्य इसे अपनाये। दैनिक उपासना के लिए हर कोई थोड़ा समय लगाये। दैनिक साधना में हर किसी को निष्ठा हो।
साधना को करना चाहिये। समय कितना लगाना है यह अपनी सुविधा एवं परिस्थिति पर निर्भर है। पर जितना भी समय लगाना हो उसे तीन भागों में विभक्त कर लेना चाहिये। एक तिहाई में स्थूल शरीर, एक तिहाई में सूक्ष्म शरीर और एक तिहाई में कारण शरीर में ज्योति का अवतरण करना चाहिये। अनुमान से या घड़ी की सहायता से यह समय निर्धारित करना चाहिये।
साधना रहित उपासना विडम्बना मात्र बन कर रह जाती है। किन्तु यदि साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है- जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय- तो बिना उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
साधना का उद्देश्य आत्मा पर चढ़े मल आवरण और विक्षोभों के कषाय-कल्मषों को हटा कर आन्तरिक स्तर को शुद्ध करना है। जिस प्रकार अग्नि में पड़ कर सोना निर्मल बन जाता है, उसी प्रकार ‘ज्योति अवतरण’ का प्रभाव हर साधक पर यह पड़ेगा ही कि उसके दोष, दुर्गुण जलने लगेंगे और वह अपेक्षाकृत अधिक पवित्र एवं उज्ज्वल बनता चला जायेगा। अग्नि के समीप बैठने से जैसे गर्मी आती है, प्रकाश की समीपता में रहने वाली वस्तुयें भी प्रकाशवान हो जाती हैं, उसी प्रकार इस ‘ज्योति अवतरण’ साधना में साधक का अन्तःकरण क्रमशः अधिकाधिक पवित्र एवं प्रकाशवान बनता चला जाता है।
साधना सीमित नहीं रहती वरन् वस्तुतः वह विश्व के लिये, लोक-मंगल के लिये बड़े-से-बड़ा अनुदान देकर अपनी गणना बड़े से बड़े भक्तों में कराने का आत्म-संतोष उपलब्ध करता है। उसका व्यवहार अपने जीवन परिवार एवं समाज के प्रति इतना सज्जनतापूर्ण हो जाता है कि प्रतिक्रिया उसे दैवी वरदान की तरह चारों ओर से पुष्प वर्षा करती हुई परिलक्षित होती है। स्वर्ग सुख यही तो है। अहंता और मनता, वासना और तृष्णा के बन्धनों से मुक्त जीव को मरने पर मुक्ति मिलने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती है वह जीवित रहते हुए भी जीवन-मुक्त होता है।
साधना क्रम में सम्मिलित होने की प्रेरणा देनी चाहिये।
साधना पूरा होने पर चाहें तो उसी दिन अपनी साधनापूर्ण कर सकते हैं अथवा सुविधानुसार एक दिन आगे बढ़ा कर दशमी को दसवें दिन भी अनुष्ठान की पूर्णाहुति रखी जा सकती है। यदि कोई सामूहिक उत्सव आयोजन उस अवसर पर कुछ बड़े रूप में बन पड़े तब तो नवमी और दशमी दो दिन की बात बहुत ही उत्तम है।
साधना के अनिवार्य अंग हैं। आहार बिहार का संयम किये बिना- ब्रह्मचर्य, व्यायाम, स्वच्छता, विश्राम, सात्विक आहार का ध्यान रखे बिना शारीरिक स्वस्थता को स्थिर नहीं रखा जा सकता है, इसलिए इन बातों पर पूरा ध्यान देना चाहिये। आलस्य को सबसे बड़ा शत्रु मानना चाहिये। समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग करना चाहिये। बेकार कभी भी नहीं बैठना चाहिये।
साधना का क्रम सारे दिन हर समय चलने का है। पर उसका प्रारंभ, शुभारंभ एक चिन्तन पद्धति के साथ किया जाना चाहिये। इस पद्धति के तीन अंग हैं- (1) जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग को समझना और उसके अनुरूप गतिविधियों का निर्माण करना, (2) ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ सूत्र के अनुसार जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिये दिन भर की शारीरिक कार्य पद्धति एवं मानसिक विचार पद्धति का निर्धारण करना। (3) रात को सोते समय मृत्यु के समय आवश्यक वैराग्य का अनुभव करना। इन तीन चिन्तन क्रम में से दो प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिये।
साधना के लिये रात्रि का समय ही अधिक उपयुक्त है। यों उसे दिन में भी सुविधानुसार समय पर किया जा सकता है पर रात्रि की नीरवता में जितनी अच्छी तरह इसका सत्परिणाम मिलता है, उतना दिन में नहीं।
साधना-क्रम मौजूद है। उन्हें अपनी मनोभूमि और परिस्थिति के अनुसार मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिये। इस अंक में तो न्यूनतम कार्यक्रम ही प्रस्तुत किया जा रहा है।
साधना का जो जितना समन्वय कर लेगा, उसका श्रम उतना ही सार्थक होगा। यह एक सुनिश्चित तथ्य है और उसकी उपेक्षा किसी भी विवेकवान अध्यात्मवादी को नहीं करना चाहिये।
साधनापूर्ण कर सकते हैं अथवा सुविधानुसार एक दिन आगे बढ़ा कर दशमी को दसवें दिन भी अनुष्ठान की पूर्णाहुति रखी जा सकती है। यदि कोई सामूहिक उत्सव आयोजन उस अवसर पर कुछ बड़े रूप में बन पड़े तब तो नवमी और दशमी दो दिन की बात बहुत ही उत्तम है।
साधना की आवश्यकता पूरी नहीं कर सकती। यदि कर सकी तो हर भजन करने वाला, उत्कृष्ट चरित्र वाला पाया जाता। पर ऐसा होता कहाँ है? इससे स्पष्ट है कि हमें साधना के लिए पृथक से प्रयत्न करना होगा। जीवन शोधन और जीवन विकास की साधना पद्धति को उतना ही- उससे भी अधिक महत्व देना होगा- जितना कि उपासना को देना है।
साधना से मनुष्य इस सर्वव्यापी आत्मत्व की वास्तविकता को बहुत कुछ अनुभव कर सकता है और उससे निश्चय ही इहलोक व परलोक में दैवी महानता का अधिकारी बन सकता है।
साधना भी पूजा प्रक्रिया का प्रयोजन पूरा कर देती है। उपचार एवं कर्मकाँड का अपना महत्व है। किन्तु कर्म में उसे सम्मिलित रहना ही चाहिए, पर निरीक्षण यह भी करते रहना चाहिये कि समीपता की भावनात्मक अनुभूति हो रही है या नहीं? इस अनुभूति पर ही उपासना का मूल प्रयोजन सिद्ध होना निर्भर है।
साधना-क्रम कई व्यक्ति पूछते तो हैं पर जो करना चाहिये वह कर नहीं पाते। ऐसे लोगों को उच्चस्तरीय साधनाओं के सूक्ष्म मर्म बताना न बताना, कुछ महत्व नहीं रखता।
साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
साधना का यही आधार भी है। निम्न स्तर की प्राथमिकता उपासना में ईश्वर से साँसारिक लाभ अथवा आत्मिक अनुदान माँगे जाते हैं, पर जैसे-जैसे स्तर ऊंचा होता जाता है, साधक माँगने की तुच्छता छोड़ समर्पण की महानता अपनाने के लिए व्याकुल होता है। ध्यान अथवा भावना तक ही उसकी साधना सीमित नहीं रहती वरन् वस्तुतः वह विश्व के लिये, लोक-मंगल के लिये बड़े-से-बड़ा अनुदान देकर अपनी गणना बड़े से बड़े भक्तों में कराने का आत्म-संतोष उपलब्ध करता है। उसका व्यवहार अपने जीवन परिवार एवं समाज के प्रति इतना सज्जनतापूर्ण हो जाता है कि प्रतिक्रिया उसे दैवी वरदान की तरह चारों ओर से पुष्प वर्षा करती हुई परिलक्षित होती है। स्वर्ग सुख यही तो है।
साधनाओं का निष्फल होना लिखा है। इसलिये यदि अन्य देवता को इष्ट माना जाय और उसकी प्रतिमा स्थापित की जाय तो भी गायत्री का चित्र प्रत्येक दशा में साथ रहना ही चाहिये।
साधना कहा जा सकता है।
साधना है। उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरंत सुधारा- जहाँ विकार पाया कि तुरंत उसकी चिकित्सा की- जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है।
साधना है। जिस प्रकार सीमा रक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और घातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ती है। इसी तत्परता को साधना कहा जा सकता है।
साधना-जीवन शुद्धि- जिसमें आत्म-शोधन और परमार्थ दोनों ही सन्निहित है, उपासना की सफलता का पथ-प्रशस्त करती है। जमीन अच्छी हो तो बीज उगने में सरलता होती है। भूमि बहुत दाम की खरीदी जाती है। बहुत परिश्रम उसको उर्वर बनाने में लगता है। खाद, पानी, जुताई, मेंड़बन्दी आदि की भारी व्यवस्था बना कर उस जमीन को जब उर्वर बना लिया जाता है, तब कोई भी फसल उसमें कोई उगाई जा सकती है।
साधना में विवेक का समावेश करना होता है। भावना, उपासना का और विवेकशीलता साधना को समग्र बनाती है। इसलिए अपने आध्यात्मिक क्रिया-कलापों में इनका जुड़ा रहना आवश्यक है।
साधना पत्रिका बन जायेगी। नीति-धर्म, सदाचार का प्रसार कार्य ‘युग-निर्मा-पत्रिका’ करेगी। ‘अखण्ड-ज्योति’ अध्यात्म-तत्व ज्ञान का समग्र स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए संलग्न होगी।
साधना के साथ चलता हुआ उपासना क्रम आशाजनक परिणाम प्रस्तुत करता है, उससे जीवनोद्देश्य की प्राप्ति में भारी सफलता मिलती है। इसलिए तत्त्वदर्शी आत्म-वेत्ताओं ने उपासना को जीवन का एक अनिवार्य नित्य धर्म माना है। जो इस संदर्भ में उपेक्षा बरतते हैं, आलस्य, प्रमाद करते हैं, उनकी कटु-भर्त्सना शास्त्रकारों ने की है।
साधना करनी चाहिए। इससे स्थूल शरीर में कर्मयोग का समावेश इस क्षेत्र में होगा और देवत्व के जागरण की एक महती आवश्यकता को पूरा करने का सरल मार्ग उपलब्ध होगा।
साधना उस झंझट में नहीं पड़ती।
साधना भी करे। इसके लिये भी एक क्रम विधान है, उसे अगले लेखों में प्रस्तुत किया जा रहा है।
साधना करने के पक्ष में है। हमारा अटूट विश्वास है कि यदि सर्वांगपूर्ण उपासना थोड़ी भी की जाय तो वह आशाजनक परिणाम उत्पन्न करेगी। उसके विपरीत एकाँकी पूजा पद्धति तक सीमित रहा गया तो किसी महत्वपूर्ण परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। उपासना में भावना और साधना का जो जितना समन्वय कर लेगा, उसका श्रम उतना ही सार्थक होगा। यह एक सुनिश्चित तथ्य है और उसकी उपेक्षा किसी भी विवेकवान अध्यात्मवादी को नहीं करना चाहिये।
साधना में संलग्न साधकों के लिये दो-दो घंटे के दो ऐसे समय भी नियुक्त हैं, जिनमें किन्हीं महान दिव्य शक्तियों द्वारा अपना शक्ति प्रवाह भी जोड़ दिया जाता है और उस समय ध्यान करने में विशेष आनन्द आता है और विशेष प्रभाव पड़ता है। यह समय रात्रि को 8 से 10 बजे और प्रातः 3 से 5 बजे का है। इन दोनों अवसरों में से तब जिसे सुविधा हो तब वह अपनी सुविधा के अनुरूप समय निर्धारित कर सकते हैं।
साधना एक विशिष्ट उपासना पद्धति है। इसका अनुपम लाभ लेने से किसी को भी नहीं चूकना चाहिये। प्रस्तुत ध्यान साधना के लिये रात्रि का समय ही अधिक उपयुक्त है। यों उसे दिन में भी सुविधानुसार समय पर किया जा सकता है पर रात्रि की नीरवता में जितनी अच्छी तरह इसका सत्परिणाम मिलता है, उतना दिन में नहीं।
साधना के लिए पृथक से प्रयत्न करना होगा। जीवन शोधन और जीवन विकास की साधना पद्धति को उतना ही- उससे भी अधिक महत्व देना होगा- जितना कि उपासना को देना है। साधना रहित उपासना विडम्बना मात्र बन कर रह जाती है। किन्तु यदि साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है- जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय- तो बिना उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
साधना क्रम ‘अखण्ड-ज्योति’ में प्रकाशित करना आरंभ किया था और उसे तीन वर्ष छापा भी। पर देखा यह गया कि जिन्होंने आरंभ में बहुत उत्साह दिखाया था, उसमें से बहुत थोड़े ही अन्त तक ठहर सके। शेष एक-दो मंजिल चल कर ही लड़खड़ा गये। ऐसी दशा में उसका लगातार प्रकाशन व्यर्थ था। जो थोड़े से साधक अभी भी उस मार्ग पर चल रहे हैं, उनका मार्गदर्शन समीप बैठ कर वार्तालाप द्वारा अथवा पत्र-व्यवहार द्वारा किया जा रहा है।
साधनाओं के क्रम प्रस्तुत किए जा सकते हैं। ऐसे लोग ‘पंचकोशी गायत्री उपासना’ में संलग्न हैं। उनका ठीक तरह मार्गदर्शन किया जा रहा है।
साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।
साधना पद्धति को उतना ही- उससे भी अधिक महत्व देना होगा- जितना कि उपासना को देना है। साधना रहित उपासना विडम्बना मात्र बन कर रह जाती है। किन्तु यदि साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है- जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय- तो बिना उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
साधना के लिये उपासना की भाँति ही आधे घंटे या कम-से-कम 15 मिनट का समय प्रतिदिन प्रातःकाल निकालना चाहिये। यह सोकर उठते ही चारपाई पर बैठ कर भी पूरा किया जा सकता है। अथवा नित्य-कर्म, पूजा आदि से निवृत्त होकर फिर थोड़ी देर से इस चिन्तन क्रम को पूरा करना चाहिये। अपने कार्यक्रम से ही सबेरे ही इसको भी किसी स्थान पर फिट कर लेना चाहिये। पूजा में ही आगे-पीछे इसे भी मिला सकते हैं।
साधना, (2) नित्य पूजन-आत्म-शुद्धि के पाँच विधान- सप्तविधि उपचार अर्चन और एक माला एवं एक चालीसा पाठ आत्मकल्याण के लिए- एक माला सत्संकल्प पाठ युग-निर्माण के लिये करने का प्रकार बताया गया है। मालाओं की संख्या कम भले ही हो पर जप के साथ ध्यान अवश्य जुड़े होने चाहिये। आत्म-कल्याण वाली माला के साथ माता की गोदी में क्रीड़ा-कल्लोल करने और पय-पान करने का और विश्व-कल्याण वाली माला के साथ दीपक पर पतंगे की तरह विश्व-मानव के लिए आतम-समर्पण करने का ध्यान बताया गया है।
साधना प्रस्तुत करेगी। कितना जप करने से, कितने दिन में, ईश्वर की कितनी कृपा मिल सकती है? इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व यह भी जानना होगा कि साधक की श्रद्धा में कितनी प्रखरता है? यदि अश्रद्धा और अविश्वास से, उदास मन से बेगार भुगतने की तरह कुछ पूजा-पाठ किया जा रहा है तो उसका परिणाम भी लंगड़े-लूले जैसा होगा। बहुत दिन में थोड़ा-सा लाभ दिखाई देगा।
साधना के सत्परिणामों की एक विशाल श्रृंखला है। अगणित साधक, अगणित प्रकार के सत्परिणाम साधना प्रयोगों के आधार पर प्राप्त करते हैं- इसके मूल में उनकी श्रद्धा की शक्ति ही सन्निहित होती है। साधक अपने ही नाम रूप साधना करके- अपने ही जैसा एक ‘छाया पुरुष’ निर्मित और सिद्ध कर लेते हैं। यह मनुष्य आकृति का देव बड़े-बड़े अनोखे काम करता है।
साधनात्मक प्रवृत्तियां ही चेतन मानव-प्राणी की चेतना को परिवर्तित और परिष्कृत करने में समर्थ होती हैं। जानने वाले जानते हैं कि इनका प्रभाव परिणाम आशातीत एवं आश्चर्यजनक ही हुआ है।
साधना का स्वतंत्र अस्तित्व हैं। एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायेगी यह सोचना उचित नहीं। लाखों साधु-बाबा, पंडा-पुजारी भजन ध्यान में नित्य घण्टों समय लगाते हैं पर उनका प्रायः जीवन घृणित एवं निकृष्ट स्तर का बना रहता है।
साधना का निर्धारित क्रम अपनाये रहूँगा। यदि साधना बंद या स्थगित रखूँगा तो उसकी सूचना अपने ऋत्विज को तथा मथुरा केन्द्र को दे दूँगा।’
साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरंत सुधारा- जहाँ विकार पाया कि तुरंत उसकी चिकित्सा की- जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है।
साधना को करे कितनी देर किस प्रकार बैठ कर करे यह निर्धारण करना साधक का अपना काम है। अपनी परिस्थितियों के अनुसार उसे अपनी व्यवस्था स्वयं ही बनानी चाहिये। पर जो क्रम या समय निर्धारित किया जाय, उसे उसी क्रम से चलाना चाहिये। समय और स्थिति का एक ही क्रम चलना किसी भी साधना की सफलता के लिए उचित एवं आवश्यक है।
साधना में गायत्री माता के प्रति प्रेम भावना का विकास करना पड़ता है फिर उसका सर्वांग सुन्दर स्वरूप भी प्रस्तुत है। सर्वांग सुन्दर प्रेम को अधिष्ठात्री गायत्री माता का चिन्तन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीड़ा कल्लोल करता रहता है। अतएव मन को रोकने, वश में करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक आवश्यकता भी इस साधना के माध्यम से पूरी हो जाती है।
साधना भूमि निर्माण और उपासना बीज बोना है। बीज बोना थोड़े समय में, थोड़े खर्च में पूरा हो जाता है। इसी प्रकार उपासना घंटे, आधे घंटे करने से काम चल जाता है पर साधना में चौबीसों घंटे निरत रहना पड़ता है। हर घड़ी यह ध्यान रखना पड़ता है कि किसी भी समय कोई अनुचित विचार या कार्य अपने से न बन पावे। अधिक पुरुषार्थ इसी में करना होना है।
साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है। अपने हर विचार और हर कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है। जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरंत सुधारा- जहाँ विकार पाया कि तुरंत उसकी चिकित्सा की- जहाँ पाप देखा कि तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है। जिस प्रकार सीमा रक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और घातों का पता लगाने और जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है, वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर हमें सतर्क और तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ती है।
साधना भी आत्मिक प्रगति का अनिवार्य अंक है। जीवन-शोधन और परमार्थ प्रक्रिया का समन्वय करने से साधना का प्रयोजन पूरा होता है। जिस प्रकार उपासना को पूजन, जप और ध्यान इन तीनों भागों में बाँटा जा सकता है, उसी प्रकार आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण साधना के अविच्छिन्न अंग हैं। भगवान के स्मरण पर जितना ध्यान देना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यकता जीवन शोधन की भी है। आदर्शवादी, उत्कृष्ट जीवन आस्तिकता का सबसे प्रमुख प्रमाण है।
साधनाओं के सूक्ष्म मर्म बताना न बताना, कुछ महत्व नहीं रखता।
साधना 24 सहस्र गायत्री अनुष्ठान के साथ सम्पन्न करनी चाहिये। गायत्री परम सतोगुणी- शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का- आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्म-कल्याण का मार्ग है। हमें यही साधन इन दिनों करना चाहिये। यों कई लोग तमोगुणी रक्त-माँस से सराबोर वध संहार करने वाले देवी देवताओं की भी पूजा उपासना करते हैं।
साधना का आवश्यक समावेश है। व्यस्त रहने वाले या शरीर के दुर्बल लोगों के लिए भी यह कठिन नहीं है। सरल होते हुए भी यह अपनी सजीवता एवं सर्वांगपूर्णता के कारण इतनी प्रभावपूर्ण है कि इसका प्रत्यक्ष लाभ हर कोई अनुभव कर सकता है और प्राप्त अनुभवों के आधार पर यह प्रतिपादन साहसपूर्वक कर सकता है कि कभी किसी की उपासना निष्फल नहीं जाती। वह भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में निःसंदेह आश्चर्यजनक रीति से सफल होती है।
साधना में चौबीसों घंटे निरत रहना पड़ता है। हर घड़ी यह ध्यान रखना पड़ता है कि किसी भी समय कोई अनुचित विचार या कार्य अपने से न बन पावे। अधिक पुरुषार्थ इसी में करना होना है। उपासना में भावना का और साधना में विवेक का समावेश करना होता है। भावना, उपासना का और विवेकशीलता साधना को समग्र बनाती है।
साधना के अविच्छिन्न अंग हैं। भगवान के स्मरण पर जितना ध्यान देना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यकता जीवन शोधन की भी है। आदर्शवादी, उत्कृष्ट जीवन आस्तिकता का सबसे प्रमुख प्रमाण है। ऐसे भक्त जो अपने आचरण की शुद्धता लेकर ईश्वर के सन्मुख उपस्थित होते हैं, अपने प्रभु को प्रसन्न एवं द्रवित करने में निःसंदेह समर्थ होते हैं।
साधना को सर्वांगपूर्ण बना लिया है- जीवन को उत्कृष्ट बना लिया जाय- तो बिना उपासना के भी अध्यात्म प्रयोजन की पूर्ति हो सकती है।
साधना करके- अपने ही जैसा एक ‘छाया पुरुष’ निर्मित और सिद्ध कर लेते हैं। यह मनुष्य आकृति का देव बड़े-बड़े अनोखे काम करता है।
साधना का अवलंबन ग्रहण करना चाहिए।
-स्वामी कृष्णानन्द
साधना पर दिया जाना चाहिए। तीनों का सम्मिश्रण जहाँ भी होगा वहाँ सफलता निश्चित रूप से मिलेगी।
साधना’ कहलाता है। हमें ईश्वर की उपासना और जीवन को साधना, उत्कृष्ट भावनाओं के साथ करनी चाहिये। तभी जीवनोद्देश्य की प्राप्ति संभव हो सकेगी।
साधना में साधक का अन्तःकरण क्रमशः अधिकाधिक पवित्र एवं प्रकाशवान बनता चला जाता है।
साधना भी अन्योन्याश्रित है। एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा, इसलिये दोनों को साथ लेकर अध्यात्म मार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है।
साधना। इन दोनों के लिए यदि स्थिर मति और प्रगाढ़ निष्ठा के साथ प्रयत्न किया जाय तो निस्संदेह आत्मिक प्रगति भी इसी तरह मिल सकती है, जैसी कि भौतिक प्रगति।
साधना का भी है। हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिये। जीवन को पवित्र और परिष्कृत संयत और सुसंतुलित उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्च स्तरीय बनाने के लिये निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये। इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है। उपासना पूजा को निर्धारित समय का क्रिया-कलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीस घण्टे चलानी पड़ती है।
साधना इस प्रकार करनी चाहिये-
साधनाओं के अधिकारी माने जायेंगे, उन्हें हमारे संचित ज्ञान और अनुभव का ही नहीं अनुदान एवं सहयोग का भी लाभ मिलेगा। हम जहाँ कहीं भी रहेंगे उन्हें आवश्यक प्रकाश प्रदान करेंगे और इसके लिये शक्ति भर प्रयत्न करेंगे कि वे अध्यात्म की उच्च भूमिका में प्रवेश करने का आनन्द लाभ करें। ऊंची उपासनाओं के विधान बता देने से किसी का कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। पंच-कोषों का अनावरण, षट्चक्र वेधन, कुंडलिनी जागरण आदि की क्रिया-प्रक्रियायें विस्तारपूर्वक बताई, समझाई जा सकती हैं, पर इतने मात्र से किसी को कोई लाभ न होगा। उस मार्ग पर चलने के लिए शक्ति प्राप्त करना यह सबसे बड़ा काम है।
साधना, उत्कृष्ट भावनाओं के साथ करनी चाहिये। तभी जीवनोद्देश्य की प्राप्ति संभव हो सकेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-June
साधना में ही पूर्ण शाँति प्राप्त कर सकता है।” पारिवारिक जीवन की यह परिभाषा, निस्सन्देह बड़ी ही उचित एवं समीचीन है। गहराई से विचार करने से इसकी यथार्थता प्रकट हो जाती है।
साधना द्वारा जाना जा सकता है। अपने भीतर के इस तथ्य को जानने की जिज्ञासा जाग गई तो बाह्य जागृति का रंग सोने में सुहागे जैसा निखर उठेगा। परिवर्तन आत्मा की आकाँक्षा है उसे मूर्तरूप धारण करना चाहिये पर वह आत्मगत ही रहे।
साधना कर सके करे। जितना भी आत्म-लाभ हो सके प्राप्त करे, मोक्ष के लिये जितनी भी कामना कर सके करे। केवल यही एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ पर मनुष्य अपनी कामना की बाग ढीली कर जितनी दूर तक दौड़ सके दौड़े क्योंकि उस दिशा में प्रकाश और सुख-शांति के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रतिकूल सम्भावना नहीं होती।
साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना-विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50
साधना जितने अधिक प्रखर, सशक्त और उपयुक्त होंगे, वह उद्देश्य उसी अनुपात से अपनी पूर्णता के साथ प्राप्त होगा। मलीन साधनों से मलीन और उज्ज्वल साधनों से उज्ज्वल लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
साधना। (124) कर्म-योग की रीति-नीति। (125) भक्ति-योग का वास्तविक स्वरूप। (126) प्रेम ही परमेश्वर है। (127) उपासना जीवन की अनिवार्य आवश्यकता।
साधना। डडडड बच्चों की शिक्षा-दीक्षा और ब्याह-शादी के लिए बचायेगी। पुरुष परिवार को उन्नत और बच्चों को योग्य बनाने के लिए अधिक-से-अधिक कमायेगा और पत्नी उसमें से अधिक-से-अधिक बचाने का प्रयत्न करेगी।
साधना कर सकता है और कब आत्मा का चिन्तन कर सकता है? रोगी रहने वाला मनुष्य किसी लौकिक और पारलौकिक प्रगति के लिए एक प्रकार से असमर्थ ही बन जाता है।
साधना, उपासना, जीवन-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाजोत्थान का कार्य बिना किसी पथ-प्रदर्शन के भी कर सकते हैं। इन पुस्तकों से सैकड़ों हजारों लोगों ने लाभ उठाया है- अन्धकार में प्रकाश पाया है।
साधनाएं कर सकने में सफल रहा करते थे। यदि हम शरीर के विषय में आत्म-संयम, नियमितता और युक्ताहार, बिहार का आध्यात्मिक दृष्टिकोण व्यवहार में लाते रहें तो शारीरिक समस्याओं का एक साथ समाधान हो जाय।
साधना विधान 0.20
साधना। (130) आत्मा की पुकार अनसुनी न करें। (131) हम सशक्त और साहसी बनें। (132) सफलता आत्मविश्वासी को मिलती है। (133) जो करें मन लगाकर करें।
साधनाओं के नष्ट अथवा निःसार हो जाने से सारे उद्देश्य अपूर्ण ही रह जाते हैं। इसी प्रकार यदि परिवार रूपी साधन को निर्बल, निकम्मा अथवा अयोग्य बना लिया जाये तो उसके द्वारा प्राप्त होने वाला आत्म-विकास का लक्ष्य जहाँ का तहाँ पड़ा रह जाये और यह संस्था अथवा इसका उपयोग कुछ भी न रह जाये। जिस उद्देश्य के साधना जितने अधिक प्रखर, सशक्त और उपयुक्त होंगे, वह उद्देश्य उसी अनुपात से अपनी पूर्णता के साथ प्राप्त होगा। मलीन साधनों से मलीन और उज्ज्वल साधनों से उज्ज्वल लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
साधना सम्भव है। समस्याओं के रहते और उनकी हठपूर्वक उपेक्षा करने से जो परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, वे आत्मिक साधना में अवश्य अवरोध बन कर खड़ी होगी। साँसारिक समस्याओं की भी अपनी एक सत्ता होती है। जिसकी अवज्ञा कर सकना असम्भव नहीं तो सरल भी नहीं है।
साधनात्मक-
साधना विषयक विधान। जपयोग, प्राणयोग, शब्द-योग, नाद-योग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र-वेधन की साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3.50
साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3.50
साधनात्मक उपलब्धियाँ हैं, उनका प्रकाश जन-साधारण तक पहुँचाने की यह विचार-प्रक्रिया हमारे जीवन का विशिष्ट अंग रही है। इस संस्थान ने व्यक्ति और समाज को नव-निर्माण की प्रेरणा देने वाला अलभ्य साहित्य प्रकाशित किया। वेद उपनिषद् दर्शन आदि आर्ष साहित्य तो लिखा ही है, अन्य छोटी-छोटी पुस्तकें भी लिखी हैं, जिन्हें पढ़ कर लोग आध्यात्मिक साधना, उपासना, जीवन-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाजोत्थान का कार्य बिना किसी पथ-प्रदर्शन के भी कर सकते हैं। इन पुस्तकों से सैकड़ों हजारों लोगों ने लाभ उठाया है- अन्धकार में प्रकाश पाया है।
साधना की आवश्यकता है वह दुःखी अवस्था में नहीं की जा सकती। साँसारिक समस्याओं के समाधान के साथ ही आत्मिक साधना सम्भव है। समस्याओं के रहते और उनकी हठपूर्वक उपेक्षा करने से जो परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, वे आत्मिक साधना में अवश्य अवरोध बन कर खड़ी होगी। साँसारिक समस्याओं की भी अपनी एक सत्ता होती है। जिसकी अवज्ञा कर सकना असम्भव नहीं तो सरल भी नहीं है।
साधना में अवश्य अवरोध बन कर खड़ी होगी। साँसारिक समस्याओं की भी अपनी एक सत्ता होती है। जिसकी अवज्ञा कर सकना असम्भव नहीं तो सरल भी नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-July
साधना उपक्रम में भागीदार बनें।
साधना में जिसकी आवश्यकता है। मनुष्य की आत्मा की उसका सबसे सच्चा मित्र और पथ-दर्शक है। उसी की प्रेरणा से मनुष्य सन्मार्ग, पवित्र प्रवृत्तियों और दिव्य गुणों की ओर अग्रसर होता है। अपनी आत्मा में विश्वास करिये और उसे अपने में अधिष्ठित वह परमात्मा ही समझिये जिसके लिए कहा गया है-
साधना के लिए पुनरपि आत्मा की ओर ही परिवृत होना होगा, क्योंकि आत्मा ही उन सब शक्तियों और साहसों का केन्द्र है, उक्त साधना में जिसकी आवश्यकता है। मनुष्य की आत्मा की उसका सबसे सच्चा मित्र और पथ-दर्शक है। उसी की प्रेरणा से मनुष्य सन्मार्ग, पवित्र प्रवृत्तियों और दिव्य गुणों की ओर अग्रसर होता है। अपनी आत्मा में विश्वास करिये और उसे अपने में अधिष्ठित वह परमात्मा ही समझिये जिसके लिए कहा गया है-
साधना सफल नहीं हो सकती। प्रेम की व्याकुलता ही परमात्मा से मिलाने में समर्थ है। इसके बिना सारे तप कठोर तितिक्षा के सिवा और कुछ नहीं होते।
साधना में लगना होगा। निश्चय ही यह एक साधना है, तप है, किन्तु ऐसा तप नहीं है, जो मनुष्य के लिए दुष्कर हो। इस तप की साधना के लिए पुनरपि आत्मा की ओर ही परिवृत होना होगा, क्योंकि आत्मा ही उन सब शक्तियों और साहसों का केन्द्र है, उक्त साधना में जिसकी आवश्यकता है। मनुष्य की आत्मा की उसका सबसे सच्चा मित्र और पथ-दर्शक है। उसी की प्रेरणा से मनुष्य सन्मार्ग, पवित्र प्रवृत्तियों और दिव्य गुणों की ओर अग्रसर होता है।
साधना है, तप है, किन्तु ऐसा तप नहीं है, जो मनुष्य के लिए दुष्कर हो। इस तप की साधना के लिए पुनरपि आत्मा की ओर ही परिवृत होना होगा, क्योंकि आत्मा ही उन सब शक्तियों और साहसों का केन्द्र है, उक्त साधना में जिसकी आवश्यकता है। मनुष्य की आत्मा की उसका सबसे सच्चा मित्र और पथ-दर्शक है। उसी की प्रेरणा से मनुष्य सन्मार्ग, पवित्र प्रवृत्तियों और दिव्य गुणों की ओर अग्रसर होता है। अपनी आत्मा में विश्वास करिये और उसे अपने में अधिष्ठित वह परमात्मा ही समझिये जिसके लिए कहा गया है-
साधना करने के लिए यहाँ आने के लिए जब भी अवसर मिलता है, निष्ठावान लोग यहाँ आने का अवसर निकालते रहते हैं।
साधना से नहीं।
साधना, फिर वह कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सत्य के बिना सफल नहीं हो सकती। सत्य सारे साधनों की आधार-शिला है। एक सत्य का आधार ले लेने के बाद यह अनिवार्य नहीं रह जाता कि आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने के लिये अन्य बहुत से साधन भी किए जाएं। सत्य की महिमा वर्णन करते हुए शास्त्रकारों ने उसे सर्वोपरि साधन बतलाया है, एक सत्य का आधार ही व्यक्ति को संसार सागर से पार कर देता है। महाभारत के उद्योग पर्व में आया है-
साधना पद्धति को अपनाने का प्रयत्न किया जाय।
साधना से मुक्ति का मिलना निश्चित है। जिस भक्त को परमात्मा से सच्चा प्यार होता है, वह भक्त भी परमात्मा को प्यारा होता है। उपनिषद् का यह वाक्य ‘रसो वै सः’ इसी एक बात की पुष्टि करता है- ‘‘परमात्मा प्रेम रूप है’ इसका स्पष्ट तात्पर्य यही है कि जिसने प्रेम की सिद्धि कर ली है, उसने मानो परमात्मा की प्राप्ति कर ली है अथवा जहाँ प्रेमपूर्ण परिस्थितियाँ होंगी, वहाँ परमात्मा का वास माना जायेगा। परमात्मा की प्राप्ति आनन्द का हेतु होता है।
साधना माना गया है। जिन दो के बीच प्रेम नहीं होता वे परस्पर कभी नहीं मिल पाते।
साधना, उपासक तथा योग आदि भी बतलाया गया है। किन्तु यह उपाय भी तभी सफल होते हैं जब इनमें भी प्रेम की प्रधानता होती है। यह प्रेम श्रद्धा, भक्ति, आस्था, विश्वास आदि किसी रूप में भी हो सकता है। श्रद्धा अथवा प्रेम से रहित कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती। प्रेम की व्याकुलता ही परमात्मा से मिलाने में समर्थ है।
साधना अपने आस-पास से प्रारम्भ कर जीव मात्र को लेते हुए निखिल ब्रह्मांड तक विस्तृत की जा सकती है, और प्रेम ही परमात्म है इस तथ्य वाक्यांश को अपने इसी जीवन में चरितार्थ कर मुक्ति और मोक्ष का लाभ उठाया जा सकता है।
साधना करनी ही चाहिये। यह साधना अपने आस-पास से प्रारम्भ कर जीव मात्र को लेते हुए निखिल ब्रह्मांड तक विस्तृत की जा सकती है, और प्रेम ही परमात्म है इस तथ्य वाक्यांश को अपने इसी जीवन में चरितार्थ कर मुक्ति और मोक्ष का लाभ उठाया जा सकता है।
साधना और लम्बी अवधि के बाद होता है। इस बीच जीव अपने प्रेम की कसौटी की अभिव्यक्ति कहाँ करे? किस माध्यम से अपनी इस आनंददायक वेदना को सहन करे? इसका एक ही उपाय है। परमात्मा के अंश जीव-मात्र से प्रेम किया जाय।
साधना करने के लिए यहाँ दौड़े आते हैं। विशेष अवसरों पर होते रहने वाले शिविरों के इसके अतिरिक्त लाभ भी हैं। इन दिनों दोनों समय डेढ़-डेढ़ घण्टे के दो प्रवचन गायत्री महाशक्ति का रहस्य, विवेचन, दर्शन, तत्वज्ञान, अभ्यास, कर्मकाण्ड, अनुभव आदि समझाने के लिए उस व्यक्ति के होते रहते हैं, जो इस मार्ग पर काफी दूरी तक सारे जीवन भर चलता रहा है और जिसने ज्ञान एवं अभ्यास की दृष्टि से कुछ कहने लायक मर्म एकत्रित किये हैं। यह प्रशिक्षण अनुपम हैं। शिविरों में आने वाले इस अलभ्य लाभ से भी लाभान्वित होते हैं।
साधना क्रम सर्व साधारण के लिए सरल है। साथ ही अति महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली है। इसमें सम्मिलित रहने से हम अपना भी और समस्त समाज एवं विश्व का भी कल्याण कर सकेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1968-August
साधना का, धर्म का सबसे निरापद मार्ग है। इसी विवेचना के आधार पर इन्होंने अवसर पाते ही अपना जीवन परोपकार में लगा दिया और ऐसे ही सत्पुरुष क्षण-क्षण अपना जीवन परोपकार में ही लगाये चलते हैं। परोपकार से बढ़ कर और निरापद दूसरा कोई धर्म नहीं है।
साधना करनी ही होगी। और कहा जा सकता है असाधारण के पास इतनी शक्ति एवं समय कहाँ कि वह अपना मनोमालिन्य दूर करने के लिये साधन संलग्न हो सके। उसके पास परिवार और परिस्थितियों-जन्य इतनी समस्यायें होती हैं कि उनका हल खोजते-खोजते ही सारा जीवन निकल जाता है। इस प्रकार का कथन निराशा एवं निष्क्रिय भावना की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। प्रसन्नता प्राप्त करने के लिये, साधना करने के लिये अलग से शक्ति अथवा समय की आवश्यकता नहीं है।
साधना में सफल हो सकेगा ऐसा नहीं माना जा सकता। जिसका मन निरोग, निर्विकार और निर्मल होगा उसका मन न केवल प्रसन्न ही रहेगा बल्कि प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा आदि की सद्भावनाओं से भरा रहेगा। जिसे गुणों की यह सम्पत्ति प्राप्त हो जाये उसे श्रेष्ठता की ओर बढ़ने से कौन रोक सकता है?
साधना + श्रम-साधना = तप। ज्ञान और श्रम दोनों का व्यक्तित्व अपने आप में अपरिपूर्ण है इसलिये बौद्धिक वाणी को श्रमशील होना चाहिए और श्रमिक को स्वाध्यायशील भी। इस बात को वेद में यों व्यक्त किया है-
साधना पद्धतियों के बारे में जो विधान हों उनका भी संग्रह किया जाय। चमत्कारों, सिद्धियों एवं अलौकिक संदर्भों को इकट्ठा किया जाय। चमत्कारों, सिद्धियों एवं ऐसे अलौकिक संदर्भों को इकट्ठा किया जाय जिनसे आत्मा की स्थिति और शक्ति का परिचय मिलता है। पुस्तकों के अतिरिक्त ऐसे विषय पत्र-पत्रिकाओं में भी ढूंढ़े जा सकते हैं।
साधना के समान ही आत्म-तत्व को प्रसन्न और परिपुष्ट करती है।
साधना, विश्वासों की कोई भी खोज, सद्गुणों के अभ्यास का कोई भी प्रयत्न यह सब उन्हीं स्रोतों से उत्पन्न होते हैं, जिनका नाम धर्म है।
साधना के बीच में व्यवधान भी खड़ा कर सकता है।
साधना में सहायक हो सकें।
साधना = तप। ज्ञान और श्रम दोनों का व्यक्तित्व अपने आप में अपरिपूर्ण है इसलिये बौद्धिक वाणी को श्रमशील होना चाहिए और श्रमिक को स्वाध्यायशील भी। इस बात को वेद में यों व्यक्त किया है-
साधना करने के लिये अलग से शक्ति अथवा समय की आवश्यकता नहीं है। उसका अभ्यास तो नित्य प्रति के कामों एवं व्यवहारों से ही किया जा सकता है।
साधना पूरी हो और बीच में भी समाप्त हो सकता है। जीवन का रहना और न रहना सदा संदिग्ध बना रहता है। शरीर से जहाँ पुण्य कर्म बनते हैं वहाँ कभी प्रमादवश इससे कोई त्रुटि भी हो सकती है। यही साधन साधना के बीच में व्यवधान भी खड़ा कर सकता है।
साधना नष्ट कर दी होती?”
साधना द्वारा उपार्जित किया जाता है। इन गुणों की सिद्धि के लिए बहुत कुछ छोड़ना और बहुत कुछ ग्रहण करना पड़ता है। उन परिस्थितियों में रहना अथवा वैसी परिस्थितियाँ बनानी पड़ती हैं जो इनकी साधना में सहायक हो सकें।
साधना से निकाल कर कुछ सीमित समय ही तो किसी जिज्ञासु को दे सकते हैं। और उतने सीमित अथवा यदा-कदा समय से कुछ काम बनता नहीं। ज्ञान प्राप्ति के लिये तो निरन्तर नित्य सत्संग की आवश्यकता होती है, जो सहज रूप से सम्भव नहीं। तथापि लोग महात्माओं को खोजते और उनके सत्संग का लाभ उठाते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-September
साधना का दूसरा चरण यह है कि प्रत्येक कर्म स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं ईश्वर प्रेम के लिए किया जाना चाहिए। जब तक कर्म में उच्चतम उद्देश्य एवं महान् आदर्श का समावेश नहीं होगा, तब तक उसका कर्मयोग बनना सम्भव नहीं। यदि हम विचारशीलों की तरह सोचें, तो यही पता चलेगा कि हम जो भी करते हैं वह ईश्वर को सौंपें, शरीर को निर्वाह एवं श्रम देने के लिए। ईश्वर प्रदत्त मन को सुसंस्कृत बनाए रहने के लिए। ईश्वर के सौंपे परिवार उद्यान को कर्त्तव्यनिष्ठ माली की तरह सींचने-संभालने के लिए।
साधना का आधार है। इसी के द्वारा उच्च लक्ष्यों के लिए प्रखर तरंगें पैदा होती हैं। और उच्च स्तरीय चेतना को ग्रहण-धारण करने की सामर्थ्य विकसित होती है। जो सही मायने में योग साधना के अभिलाषी हैं, उन्हें अपनी साधना का प्रारम्भ अन्नमयकोश के परिष्कार से आज और अभी प्रारम्भ कर देना चाहिए। तभी वह भविष्य में प्राणमयकोश की साधना के लिए अपने कदम बढ़ा सकेंगे।
साधना के अभिलाषी हैं, उन्हें अपनी साधना का प्रारम्भ अन्नमयकोश के परिष्कार से आज और अभी प्रारम्भ कर देना चाहिए। तभी वह भविष्य में प्राणमयकोश की साधना के लिए अपने कदम बढ़ा सकेंगे।
साधना में आहार-विहार से जुड़े नियमों का पालन आवश्यक है, अन्यथा साधना की सफलता संदिग्ध ही रह जाती है। और इसके वर्णित लाभों से वंचित ही रहना पड़ता है। योग साधना में अवतरित होने वाले दिव्य शक्ति प्रवाह से ठीक-ठीक लाभान्वित होने का सुयोग भी तभी बन पड़ता है, जब मनोभूमि इसके अनुरूप संवेदनशील एवं संस्कारवान बनाई जाय। इस संदर्भ में आहार-विहार का निर्धारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
साधना क्रम की शुरुआती सफलता भर है। अपने सद्गुरु के सन्देश और आदेश भी इसी साधना से जाने-सुने और समझे जाते हैं। संक्षेप में आज्ञा चक्र की साधना के परिणाम अनुभूति के विषय हैं। इन्हें लिख पाना- एक लेख तो क्या एक महाग्रन्थ में भी सम्भव नहीं है। परन्तु यहाँ यह कह देना निहायत अनिवार्य है- कि आज्ञा चक्र के साधक के लिए समूचा जीवन तपोमय होना चाहिए।
साधना से मन स्थूल शरीर की सहायता के बगैर बहुत अच्छी तरह से काम कर सकता है। आज्ञा चक्र का लोक-तपलोक है। यही वह आधार है, जहाँ अपूर्णताओं के अवशेषों का शुद्धिकरण होता है एवं कर्म का क्षय होता है। आज्ञा चक्र की साधना के साथ ही साधक अपने छठे शरीर, जिसे ब्रह्मशरीर कहते हैं, में प्रवेश करता है। ऐसी दशा में वह हमेशा ब्रह्म के साथ एकाकार अवस्था में रहता है और अनेकानेक शक्तियों का स्वामी होता है।
साधना करने वाले साधक योगी की श्रेणी में आ जाते हैं। इसके पहले वे मूलाधार, स्वाधिष्ठान अथवा मणिपुर किसी भी स्तर पर रहे हों, मात्र योगाभ्यासी ही कहे जा सकते हैं। अनाहत की साधना करने पर साधक योगी बन जाता है। क्योंकि तब उसकी चेतना पूर्णतया योगमय हो जाती है। ऐसी स्थिति में उसके निर्णय बाह्य जगत् या विश्वास अथवा कर्म प्रारब्ध पर आधारित न होकर पूर्णतया आत्मविश्वास एवं अपनी चेतना शक्ति पर आधारित होते हैं।
साधना के तत्त्वदर्शन के अनुरूप हो। योग का बहिरंग स्वरूप इन व्यायामों, कर्मकाण्डों के रूप में सामने आना आपत्तिजनक नहीं है। किन्तु है यह योग का कलेवर ही, यह तथ्य सदा ही स्मरण रखा एवं कराया जाना चाहिए। योग का प्राण- वह तत्त्वदर्शन ही है, जिसकी चर्चा उपरोक्त पंक्तियों में की गयी है। संयम, परिशोधन और जागरण के इन सूत्रों को त्रिपदा गायत्री के तीन चरण भी कहा जा सकता है।
साधना करने वाले साधक की चेतना का स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह अपने प्रारब्ध के सहारे नहीं, बल्कि अपनी इच्छानुसार जीवन यापन करने में सक्षम हो जाता है।
साधना के लिए आवश्यक साधना क्रम में शरीर अपनी असमर्थता प्रकट करके साथ देने से कतराने न लगे। अन्नमय कोश के शुद्ध व पुष्ट होने पर ही व्यक्ति साँसारिक उतार-चढ़ावों के बीच अपनी शरीर यात्रा को सन्तुलित क्रम से चलाता हुआ, अपने आत्मिक लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से आगे बढ़ सकता है।
साधना में निहित है। इतना ही नहीं इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना योग की अनिवार्यता को स्वीकार कर ही किया जा सकता है।
साधना से मिलने वाली रसानुभूति कुछ इस कदर होती है कि कर्मयोगी अपनी श्रम निष्ठ और भगवत्प्रेम को ही अपनी आत्मतुष्टि का आधार मान लेता है। उसे किसी के मुख से प्रशंसा का प्रमाण पत्र पाने की जरूरत नहीं रहती। किसी के द्वारा की जाने वाली अकारण निन्दा उसे उद्विग्न नहीं कर पाती। उसका अपना अन्तःकरण ही उसके सन्तोष के लिए पर्याप्त आधार बना रहता है। इसी प्रकार उसे अभीष्ट परिणाम की उतावली नहीं होती।
साधना का रहस्य बताने वाले सद्गुरु तो बस सच्चे शिष्य को मिला करते हैं।
साधना विधि के रूप में स्वाध्याय, सत्संग, मनन और चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से सभी परिचित हैं। इससे अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। लेकिन इन सबसे कहीं अधिक सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ उपाय है- ध्यान। मनोमयकोश के परिष्कार की यह सर्वोत्तम साधना विधि है। ध्यानमग्न होकर हम अपने ईष्ट के साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं।
साधना की सफलता एवं प्रगति के लिए अनुकूल वातावरण का होना अनिवार्य है। विरले आत्मबल सम्पन्न मनस्वी ही वातावरण के विपरीत प्रभाव को निरस्त करते हुए उसे तोड़-मरोड़ कर बदल पाने में सफल होते हैं, अन्यथा सामान्य जन इसके प्रवाह में ढलने, गलने व बहने के लिए विवश पाए जाते हैं।
साधना की दृष्टि से आहार शुद्ध-सुपाच्य व सात्विक होना चाहिए। साथ ही इसे उचित मात्रा में ग्रहण किया जाए। अन्यथा अत्यधिक मात्रा में लिया गया सात्विक आहार भी आलस, निद्रा व तन्द्रा को ही न्यौता देता है। इस संदर्भ में योगाचार्यों का यह नियम अनुकरणीय है कि आमाशय को भोजन से आधा भरें, इसके चौथे भाग को जल से भरें और शेष चौथे को हवा के आने जाने के लिए खाली रखें। अन्यथा मिताहार के अभाव में घेरण्ड संहिता (16) के अनुसार योग रोग नाशक नहीं अपितु भयंकर रोगों का उत्पादक बन जाता है-
साधना के दौरान वाणी का न्यूनतम एवं आवश्यक उपयोग ही किया जाय व व्यवहार को भी संयत रखा जाय। निंदा, चुगली एवं वाद-विवाद से सर्वथा बचना चाहिए। जहाँ ऐसे प्रसंग चल रहे हों वहाँ से उठकर अन्यत्र चले जाना ही उचित है। अवाँछनीय दृश्य एवं प्रसंगों से स्वयं को सर्वथा दूर ही रखना चाहिए है। आहार की तरह विहार में भी अधिकाधिक सात्विकता एवं पवित्रता का समावेश किया जाना चाहिए।
साधना निहित है। इस खोज के लिए हमें स्थूल से सूक्ष्म में उतरना ही होता है। जैसे-जैसे खोज तीव्र होती है, आत्म जिज्ञासा परिपक्व होती है, सूक्ष्म शरीर भी परिष्कृत, प्रखर एवं पवित्र होता चला जाता है। बात अनुभव की है। यह नहीं कि कोई पूछता रहे मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ तो कुछ वैसा उत्तर आ जाए, जैसे परीक्षा की कापियों में उत्तर आ जाते हैं।
साधना में शाकाहार को अत्यन्त सहायक माना गया है।
साधना के लिए अपने कदम बढ़ा सकेंगे।
साधना मार्ग के अधिकाँश अवरोध मन की रज व तम वृत्ति से पैदा होते हैं। मन की रजोगुणी व तमोगुणी स्थिति इनकी उर्वर भूमि सिद्ध होती है।
साधना नियमित एवं प्रगाढ़ हो, तो मात्र छः महीने में ही अपनी सफलता के संकेत देने लगती है। इस शीघ्र सफलता का एक कारण यह भी है कि आज्ञा चक्र- गुरु चक्र है। गुरु तत्त्व की अनुभूति जितनी सघन यहाँ हो पाती है, उतनी और कहीं सम्भव नहीं।
साधना छोड़ बैठते हैं। परन्तु जो गुरु की प्रत्येक चोट को सहते हैं गुरुभक्ति में निरत रहते हैं, उन्हें सफलता मिलना सुनिश्चित है। यहाँ यह बलपूर्वक एवं पूरे विश्वासपूर्वक कहा जा रहा है कि अनाहत चक्र के जागरण के लिए अनाहत कमल पर सद्गुरु की दिव्य मूर्ति के ध्यान से बढ़कर अन्य कोई श्रेष्ठ साधना नहीं है।
साधना में प्रखरता तब आती है जब नियमित दिनचर्या के साथ देह की समस्त क्रियाएँ भगवान् को समर्पित करने के लिए की जायँ। अन्नमयकोश की योग साधना करने वाले साधक को देह से ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसे भगवान् को समर्पित करने में मन डाँवाडोल हो। यदि समूचे जीवन क्रम में इस नियम का समावेश हो सका तो अन्नमय कोश की पवित्रता एवं प्रखरता देखते ही बनेगी। उपरोक्त पंक्तियों में कही गयी बातें इसलिए नहीं कही जा रही हैं कि इन पर प्रयोग किए जाएँ। और इनसे प्राप्त निष्कर्षों की सच्चाई से शान्तिकुञ्ज के संचालकों को अवगत कराया जाय।
साधना द्वारा इसे दिव्यता से ओतप्रोत कर दिया था। वही वातावरण की दिव्य प्रखरता कैदी पर हावी हो रही थी। इसी वातावरण के प्रभाव से प्राचीन ऋषियों के आश्रमों में शेर व गाय एक घाट पर पानी पीते थे। इस युग में भी महर्षि रमण के आश्रम में ऐसा ही दृश्य दिखाई पड़ता था। जब हिंसक जीव पालतू पशुओं की भाँति महर्षि व उनके पास आने वाले दर्शनार्थियों के साथ घूमते थे।
साधनाभ्यास निम्न है-
साधना से स्वयं ही बनाना पड़ता है। किसी के अनुग्रह से यह कार्य जादू की छड़ी घुमाने जैसी किसी क्रिया-प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता। मनोमय कोश के ध्यान योग से दिव्य लोक के परिष्कृत वातावरण का सृजन स्वयं ही करना पड़ता है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तरह स्वयं विधाता बनने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं।
साधना है। इस साधना में सबसे प्रथम और सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान आलस्य और प्रमाद को निरस्त करना है। इसके लिए यह जरूरी है कि समय को बहुमूल्य व बेशकीमती समझा जाय। और एक-एक क्षण का पूरा सदुपयोग करने के लिए श्रम संलग्न रहा जाय। प्रातःकाल उठते ही-अथवा रात्रि को सोते समय अगले दिन किए जाने वाले कर्त्तव्य-कर्मों को ध्यान में रखते हुए दिनचर्या बना ली जाय और जब तक कोई अनिवार्य कारण न आ जाए, तब तक उस दिनचर्या को ईश्वर की आराधना मानकर पूर्ण मनोयोग पूर्वक पूरा किया जाय।
साधना पर निर्भर करती हैं।
साधना का केन्द्रीय तत्त्व योग ही है। हालाँकि इतना जरूर है कि तन्त्र में मुक्ति के स्वरूप में तथा कैवल्य के स्वरूप में थोड़ा भेद है। तान्त्रिक साधना के प्रवर्तक मुक्ति में शिव-शक्ति अथवा विष्णु-शक्ति आदि के नित्य मिलन एवं आनन्द रूपता को स्वीकार करते हैं। योग का स्वरूप कहीं भी किसी भी तरह वर्णित हो, परन्तु प्रायः ये सभी पातंजल-योग से ही निःसृत होते हैं।
साधना इस द्वैत भाव को सर्वथा विलीन-विसर्जित कर देती है। साधना के इस क्रम में एक मजेदार बात यह भी है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में आज्ञाचक्र अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय होता है। इसलिए वे अधिक सूक्ष्म, संवेदनशील और ग्रहणशील होती है। यही कारण है कि महिलाओं में पूर्वाभास की क्षमता पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है।
साधना के प्रति जिज्ञासा अंकुरित हुई। इस जिज्ञासा के साथ ही उसने सद्गुरु की खोज शुरू की। अपनी इस खोज में वह भटकता हुआ एक पेड़ के पास पहुँचा। वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि एक फकीरनुमा व्यक्ति वहाँ बैठा हुआ ईश्वर स्मरण कर रहा है। जिज्ञासु युवक ने उससे निवेदन किया, बाबा! आप फकीर हैं, साधना के जानकार हैं।
साधना की यह स्थिति शोधन काल कहलाती है। यदि महान् साधकों, योगियों की जीवनी पढ़ी जाय तो पला चलता है कि साधना के इस स्तर को पार करते समय उन्हें बहुत अधिक अशान्ति व मोह-माया का सामना करना पड़ा था।
साधना के लिए साधक को अपने प्रयास में दृढ़ प्रतिज्ञ तथा लगनशील होना आवश्यक है। मणिपुर चक्र की साधना के क्रम में प्रायः योग सम्प्रदायों एवं शास्त्रों में स्वर योग की चर्चा की जाती है। स्वर योग को श्वास-विज्ञान या प्राणायाम की प्रक्रिया भी कहा जा सकता है। प्राणायाम की इस प्रक्रिया से प्राण एवं अपान के संयोग से मणिपुर चक्र का जागरण आसानी से हो जाता है। परन्तु इस साधना क्रम के लिए प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अनिवार्य है।
साधनाओं को अपने जीवन की प्रयोगशाला में ‘दशकों’ की साधना से खरा प्रमाणित किया। साथ ही उन्होंने उनकी युगानुकूल वैज्ञानिक व्याख्या भी प्रस्तुत की है। अपने साधनामय जीवन के महाप्रयोग का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया- मानवीय जीवन के सभी प्रश्नों का सार्थक हल योग साधना में निहित है। इतना ही नहीं इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना योग की अनिवार्यता को स्वीकार कर ही किया जा सकता है।
साधना का त्याग नहीं ईष्ट प्रेम या सद्गुरु भक्ति का शिवत्व है। इस अवस्था में सद्गुरु ही शिव के रूप में आकर कुसंस्कारों के महाविषय का त्रास मिटाते हैं। और देववृत्तियों को अभयदान देते हैं।
साधना से सम्बन्धित जितनी पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है, उतना पहले कभी नहीं था। योग सूत्रों पर प्रवचन करने और सुनने वाले भी कम नहीं हैं। फिर भी अँधियारा है। साधना के दीए किसी ओर भी जलते दिखाई नहीं देते। आखिर ये दीए जले भी तो कैसे?
साधना के कुछ सूत्र बताइए, ताकि मैं भी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जान सकूँ, आपकी तरह से चमत्कारी बन सकूँ, साथ ही ईश्वर लाभ भी कर सकूँ।
साधना के लिए यही क्षेत्र भाया था। गुरु वशिष्ठ के निर्देशानुसार श्रीराम ने देवप्रयाग, लक्ष्मण ने लक्ष्मण झुला, शत्रुघ्न ने मुनि की रेती व भरत ने ऋषिकेश को अपनी साधना स्थली चुना तथा वशिष्ठ जी स्वयं वशिष्ठ गुफा में स्थिर हुए थे।
साधना का अर्थ है पाशविक प्रवृत्तियों का नियंत्रण एवं उन्मूलन एवं देववृत्तियों का विकास।
साधना के पश्चात् ही मनोमय कोश के परिष्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना पथ पर अग्रसर रह सकता है। यहीं उसे वह सारी सामर्थ्य मिलती है, जिसके आधार पर आज्ञा चक्र की सिद्धि मिल सके।
साधना के तत्त्वदर्शन का तृतीय सूत्र है। इस अवस्था में जीवन के सभी प्रश्नों का अपने आप ही समाधान हो जाता है। सभी समस्याओं का समाधान होने के कारण इस अवस्था को समाधि भी कहते हैं। योग की ओर झुकाव रखने वाले बहुतेरे लोग समाधि को कोई क्रिया समझ बैठते हैं और जिस किसी भी तरह करने के लिए परेशान होते हैं। पर वास्तव में समाधि चित्त और उसकी वृत्तियों के परिशोधन का स्वाभाविक परिणाम है।
साधना छोड़ बैठते हैं। पर यह उनकी भूल है। इस महाविष के शमन का उपाय ध्यान साधना का त्याग नहीं ईष्ट प्रेम या सद्गुरु भक्ति का शिवत्व है। इस अवस्था में सद्गुरु ही शिव के रूप में आकर कुसंस्कारों के महाविषय का त्रास मिटाते हैं। और देववृत्तियों को अभयदान देते हैं।
साधना के क्रम में अनेकों दिव्य साधनाएँ उभरती हैं, उन्हें धारण करना, उनके स्पन्दनों को सहन करके अपना सन्तुलन बनाए रखना बहुत आवश्यक है। ये सारी बातें परिष्कृत, जाग्रत् एवं सुविकसित क्षमता सम्पन्न अन्नमयकोश से ही सम्भव हैं।
साधना करना कदापि सम्भव नहीं।
साधना विधियाँ अनेक हैं। उन सबका अपना-अपना महत्त्व भी है। जिससे न इन्कार किया जा सकता है और न नकारा जा सकता है। पर यहाँ अनाहत चक्र की साधना की उस विधि को स्पष्ट करने का मन है, जो पूर्वोक्त सभी विधियों की अपेक्षा सहज, सरल, सुगम एवं निरापद है। इस विधि को अपनाने वाले साधक सर्वथा अभय होकर अनाहत चक्र और उससे सम्बन्धित मनोमय शरीर की उपलब्धियों से लाभान्वित हो सकते हैं।
साधना समस्त योग साधना का आधार है। इसी के द्वारा उच्च लक्ष्यों के लिए प्रखर तरंगें पैदा होती हैं। और उच्च स्तरीय चेतना को ग्रहण-धारण करने की सामर्थ्य विकसित होती है। जो सही मायने में योग साधना के अभिलाषी हैं, उन्हें अपनी साधना का प्रारम्भ अन्नमयकोश के परिष्कार से आज और अभी प्रारम्भ कर देना चाहिए। तभी वह भविष्य में प्राणमयकोश की साधना के लिए अपने कदम बढ़ा सकेंगे।
साधना के सूत्र नहीं मिला करते। यदि ऐसा सम्भव हो पाता तो आज चहुँ ओर अनगिन योगी गण विचरण कर रहे होते। क्योंकि इन दिनों योग साधना से सम्बन्धित जितनी पुस्तकों का प्रकाशन हो रहा है, उतना पहले कभी नहीं था। योग सूत्रों पर प्रवचन करने और सुनने वाले भी कम नहीं हैं। फिर भी अँधियारा है।
साधना की दुरुहताओं को बार-बार समझाते हैं। बाजिश्रवा के पुत्र नचिकेता की योग जिज्ञासा देख, यमाचार्य ने उन्हें बार-बार समझाया-
साधना में अपना उचित सहयोग नहीं दे पाता। योग साधना के क्रम में अनेकों दिव्य साधनाएँ उभरती हैं, उन्हें धारण करना, उनके स्पन्दनों को सहन करके अपना सन्तुलन बनाए रखना बहुत आवश्यक है। ये सारी बातें परिष्कृत, जाग्रत् एवं सुविकसित क्षमता सम्पन्न अन्नमयकोश से ही सम्भव हैं।
साधना से जाने-सुने और समझे जाते हैं। संक्षेप में आज्ञा चक्र की साधना के परिणाम अनुभूति के विषय हैं। इन्हें लिख पाना- एक लेख तो क्या एक महाग्रन्थ में भी सम्भव नहीं है। परन्तु यहाँ यह कह देना निहायत अनिवार्य है- कि आज्ञा चक्र के साधक के लिए समूचा जीवन तपोमय होना चाहिए। अन्यथा सारी उपलब्धियाँ, अनुभूतियाँ कपूर की भाँति उड़ जाती हैं।
साधना के बारे में कुछ यूँ कहा है-
साधना के उच्चस्तर पर पहुँचकर इसी चाभी को ढूंढ़ना पड़ता है। और ताले को खोलने की जुगत बिठानी पड़ती है। जो इसे कर सका, उसे फिर यह नहीं कहना पड़ेगा कि हमारा जीवन निरानन्द और नीरस है। आनन्दमय कोश में समाया खजाना हाथ में लगते ही दुःख और दुर्भाग्य हजारों-हजार कोस दूर भाग खड़े होते हैं।
साधना की प्रगाढ़ता के अनुसार अनुदिन तीव्र से तीव्रतर होता चला जाता है। इस पथ पर चलने वाले साधक किसी से कहीं भी कमतर नहीं। क्योंकि इनकी साधना घण्टे-दो-घण्टे नहीं बल्कि अनवरत चलती है। इसके साथ ही अनवरत कर्मबन्धन ढीले पड़ते जाते हैं। जन्म-जन्मान्तर के कर्मों का स्वाभाविक क्षय होता जाता है।
साधना का रहस्य क्या है? तो उन्होंने उत्तर में मात्र एक शब्द कहा- ध्यान। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे बोले ध्यान कल्पवृक्ष है। इसकी सुखद छाँव में जो कोई बैठता है, उसकी सभी कामनाएँ अपने आप ही पूरी हो जाती हैं। इतना ही नहीं वह कामनाओं के सभी रूपों से ऊपर उठकर आप्तकाम हो जाता है।
साधनामय जीवन के महाप्रयोग का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया- मानवीय जीवन के सभी प्रश्नों का सार्थक हल योग साधना में निहित है। इतना ही नहीं इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना योग की अनिवार्यता को स्वीकार कर ही किया जा सकता है।
साधना जो करना चाहते हैं, उनके लिए एक ही सन्देश है, कि आप अपने भीतर, हाँ अपने ही भीतर महासूर्य को छिपाए चल रहे हो। जरा पूछो अपने से यह महाप्रश्न- मैं कौन हूँ? जरा खोलो भीतर की गाँठ, जरा भीतर की गठरी खोलो, जरा भीतर की गगरी फोड़ो, किरणें ही किरणें बरस जाएँगी। उन किरणों की वर्षा में स्वच्छ हो जाएँगी इन्द्रियाँ, पवित्र हो जाएगा सूक्ष्मशरीर, तृप्त हो जाएँगे प्राण, हो जाएगा परिचय अपने एक-पन से।
साधना की गहनता से ओतप्रोत कर देते थे। यहाँ आकर जीवन की दशा एवं दिशा पर गंभीर चिन्तन-मनन के लिए प्रेरित होता था। यहाँ रह रहे तपस्वी एवं ज्ञानी पुरोहितों-आचार्यों के मार्गदर्शन में जीवन की गुत्थियों का समाधान मिलता था और भावी जीवन की रीति-नीति का निर्धारण होता था, इस तरह उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन को गढ़ने व सँवारने के संकल्प एवं आत्मबल के साथ व्यक्ति तीर्थ से प्रस्थान करता था। साँस्कृतिक गौरव गरिमा का पुरातन अध्याय वस्तुतः इस वातावरण के प्रभाव की ही गाथा है।
साधना तभी पनपी, जब उनका रोम-रोम पुकार उठा- ‘शिष्यस्तेऽहं शाधि माँ त्वा प्रपन्नं’। हे जगद्गुरु! मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे बोध कराओ, मैं आपकी शरण में हूँ। प्राणों की इस पुकार पर ही जगद्गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके सद्गुरु हुए। और फिर तो एक-एक करके योग के सभी रहस्य उनके अंतर्हृदय में खुलते चले गए।
साधना में मूलाधार चक्र के जागरण का बहुत अधिक महत्त्व है।
साधना के लिए पहली और अनिवार्य जरूरत है- शिष्यत्व की। शिष्यत्व- गहन आत्म क्रान्ति है। शिष्यत्व पनपेगा तो सद्गुरु मिले बिना न रहेंगे। आज के युग में योग विद्या बाल कौतुक बन कर रह गयी है। जगह-जगह सीखने और सिखाने वालों की भीड़ लगी है।
साधना पद्धतियों के अलावा भारतीय षड्दर्शनों में भी योग की पुण्य परम्परा को महत्त्वपूर्ण माना गया है। न्यायदर्शन के अनुसार षोडश-पदार्थों द्वारा सम्पूर्ण बाह्यांतर का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेना ही तत्त्वज्ञान है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार छः पदार्थों द्वारा तत्त्व निर्धारण होता है। इन दोनों ही दर्शनों में आत्मा एवं परमात्मा के अस्तित्व, प्रमाण एवं लक्षण सिद्धि के अनन्तर न केवल आत्म प्रत्यक्ष हेतु, अपितु अतीन्द्रिय जड़ पदार्थों के स्वरूप साक्षात्कार हेतु योग की आवश्यकता स्वीकार की गई है। यही नहीं योग की साधना के लिए इन दोनों ही दर्शनों- न्याय (4/2/42) एवं वैशेषिक (8/1/12-14) में प्रेरित-प्रोत्साहित भी किया गया है।
साधना की कतिपय परम्पराओं में मणिपुर के नीचे के चक्रों के बारे में चर्चा तक नहीं की गयी है। क्योंकि उनके अनुसार ये चक्र पशु जीवन के उच्च स्तरों से सम्बन्धित हैं। जबकि मणिपुर तथा उसके बाद के चक्र उच्च मानवीय स्तर से सम्बन्धित हैं। योग साधना की इन परम्पराओं में इस सत्य का स्पष्ट उल्लेख है कि यदि जाग्रत् चेतना मणिपुर चक्र तक आ सकी तभी जागृति को सुनिश्चित माना जाना चाहिए। इन सभी दृष्टियों से मणिपुर चक्र की साधना का विशेष महत्त्व है।
साधनाएँ हैं, एक ध्यान की एकाग्रता, मेडीटेशन, दूसरी स्वसंकेतन हिप्नोटिम। बस सारा योग इतने में ही समाप्त हुआ समझा जाता है। विदेशों में भारतीयों द्वारा चलाए जाने वाले योग-केन्द्र इसी परिधि में चक्कर काटते हैं। क्रिया-कलाप एवं शिक्षा-विधि में, कहने समझाने के ढंग में थोड़ा-बहुत अन्तर हो सकता है। पर तथ्य इसी सीमा में भ्रमण करते रहते हैं।
साधना का विशेष महत्त्व है।
साधना के लिए समर्पित रही। वसन्त पंचमी 1926 ई. से गायत्री जयंती 1990 ई. तक उनके जीवन का हर वर्ष, हर माह, हर दिन और हर क्षण योग में बीता।
साधना सत्र, कल्प साधना, प्रज्ञायोग जैसे कितने ही सामूहिक साधनात्मक प्रयोग सम्पन्न हुए। तीर्थ के दिव्य वातावरण एवं प्रखर मार्गदर्शन का लाभ ले रहे सौभाग्यशाली साधकों ने यहाँ अपने जीवन का कायाकल्प होते देखा। शान्तिकुञ्ज रूपी कल्पवृक्ष की छत्रछाया में न केवल उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो रही थीं, बल्कि वे एक नया मनोबल एवं आत्मबल सम्पादित कर रहे थे। साधना सत्रों का यह क्रम आगे एक माह व नौ दिवसीय सत्रों के रूप में जारी रहा व आज भी अनवरत रूप से चल रहा है जिसमें बढ़ते हुए साधकों की संख्या यहाँ के वातावरण के प्रति बढ़ती श्रद्धा एवं तप-साधना के प्रति बढ़ती निष्ठ, दोनों को ही प्रमाणित कर रही है।
साधना के परिणाम अनुभूति के विषय हैं। इन्हें लिख पाना- एक लेख तो क्या एक महाग्रन्थ में भी सम्भव नहीं है। परन्तु यहाँ यह कह देना निहायत अनिवार्य है- कि आज्ञा चक्र के साधक के लिए समूचा जीवन तपोमय होना चाहिए। अन्यथा सारी उपलब्धियाँ, अनुभूतियाँ कपूर की भाँति उड़ जाती हैं। तपोनिष्ठ जीवन ही आज्ञाचक्र की ध्यान साधना और उसकी सिद्धि का आधार है।
साधना प्रक्रिया का विस्तार नहीं किया जा रहा।
साधना की दृष्टि से एक आदर्श क्षेत्र रही है। रामायण काल में महर्षि वशिष्ठ सहित श्रीरामचन्द्र जी एवं उनके भाइयों को साधना के लिए यही क्षेत्र भाया था। गुरु वशिष्ठ के निर्देशानुसार श्रीराम ने देवप्रयाग, लक्ष्मण ने लक्ष्मण झुला, शत्रुघ्न ने मुनि की रेती व भरत ने ऋषिकेश को अपनी साधना स्थली चुना तथा वशिष्ठ जी स्वयं वशिष्ठ गुफा में स्थिर हुए थे।
साधना विज्ञान उतना ही सुस्पष्ट होगा। मनोमय कोश की साधना का प्रारम्भ मानसिक क्षेत्र की धुलाई-सफाई से होता है। लेकिन बाद में इसका विस्तार उसे समुन्नत, सुसज्जित एवं सुसंस्कृत बनाने तक जा पहुँचता है। अतीन्द्रिय शक्तियों का विकास एवं दिव्य क्षमताओं का उभार भी इसी क्रम में होता है।
साधना और उसकी सिद्धि का आधार है। मन-वचन और कर्म से तप, यही आज्ञा चक्र की सफलता का मूल मंत्र है।
साधना प्रदत्त। काम वासना प्राकृतिक है। लेकिन जब योग साधक मूलाधार चक्र के जागरण में सफल होता है तो उस अवस्था में कामवासना तिरोहित हो जाती है। और उसके स्थान पर ब्रह्मचर्य फलित होता है। वास्तव में यह कामवासना का रूपांतरण है।
साधना में कहीं भी कोई, किसी भी तरह के निषेधात्मक भाव नहीं होते। इसमें तो सब कुछ विधायी और विधेयात्मक है। ब्रह्मचर्य में एक ही भाव निहित है- ब्रह्म के चिन्तन एवं ब्रह्म में रमण का।
साधना असम्भव है।
साधना-विधानों का भी उसमें स्थान रहना चाहिए, परन्तु इस सत्य को विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए कि यह योग का कलेवर है, उसका प्राण नहीं। प्राण तो उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देने वाले उपनिषद् प्रतिपादित उस योग-दर्शन में है जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मविद्या कहा जाता था। इसके आधार पर व्यक्ति अपनी सत्ता का समष्टि में समर्पण करता था। आत्मा को परमात्मा के स्तर तक पहुँचाना, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, अणु को विभु, लघु को महान् बनाना जिसका लक्ष्य था। चिन्तन की अंतरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन का पर आच्छादित होती हैं।
साधना के जिज्ञासुओं ने किसी न किसी तरह सुनी ही रखी होगी। परन्तु प्रायः परिचय इसके स्थूल स्वरूप से हो पाता है। आमतौर पर ब्रह्मचर्य का अर्थ काम के दमन से लिया जाता है, जो किसी भी तरह ठीक नहीं है। इस पवित्र साधना में कहीं भी कोई, किसी भी तरह के निषेधात्मक भाव नहीं होते। इसमें तो सब कुछ विधायी और विधेयात्मक है।
साधना से और अधिक प्रखर बनाया जा सकता है।
साधना और सिद्धि के पल आते हैं।
साधना विधि गुरुभक्ति है। अपने हृदय कमल में सद्गुरु की दिव्य मूर्ति का ध्यान करने से अनाहत की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं। ध्यान का यह अभ्यास प्रातः अथवा सायं कभी भी किया जा सकता है। परन्तु इसे जब भी किया जाय नियमित एवं निर्धारित समय पर लगातार लम्बे समय तक किया जाय। इस साधना क्रम में जो सबसे अनिवार्य तत्त्व है वह यह है कि सद्गुरु के प्रति भक्ति मात्र ध्यान के क्षणों में ही नहीं बल्कि अहर्निश पनपनी एवं उफननी चाहिए।
साधना के दौरान जैव विद्यत्त् (बायो इलेक्ट्रिसिटी) पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन इलेक्ट्रो फिजियोलॉजी चेम्बर में किया जाता है। इसमें जी.एस.आर. (गाल्बोनिक स्किन रेजिस्टेन्स) बायोफीडबैक द्वारा ध्यान के अंतर्गत त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता का मापन किया जाता है। इ.एम. जी. (इलेक्ट्रोमायोग्राम) शिथिलीकरण के दौरान माँसपेशियों के तनाव का मापन करता है। ई.ई.जी. (इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफ) द्वारा ध्यान के क्षणों में मस्तिष्क से उत्सर्जित होने वाले विद्युत् तरंगों की जाँच की जाती है, अल्फा ई.ई.जी. विशेष रूप से अल्फा तरंगों को स्कैन करता है, जो कि ध्यान की प्रशान्तावस्था की द्योतक होती है।
साधना का महत्त्वपूर्ण उपकरण माने। देह भगवान् का दिव्य मंदिर है- इस सत्य को दैनन्दिन जीवन में अनुभव किया जाय। जिनके जीवन में यह अनुभूति आएगी, वही अन्नमयकोश की योग साधना के अधिकारी हैं। दूसरों के लिए तो यह एक बौद्धिक पहेली भर है।
साधनात्मक प्रयोग सम्पन्न हुए। तीर्थ के दिव्य वातावरण एवं प्रखर मार्गदर्शन का लाभ ले रहे सौभाग्यशाली साधकों ने यहाँ अपने जीवन का कायाकल्प होते देखा। शान्तिकुञ्ज रूपी कल्पवृक्ष की छत्रछाया में न केवल उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो रही थीं, बल्कि वे एक नया मनोबल एवं आत्मबल सम्पादित कर रहे थे। साधना सत्रों का यह क्रम आगे एक माह व नौ दिवसीय सत्रों के रूप में जारी रहा व आज भी अनवरत रूप से चल रहा है जिसमें बढ़ते हुए साधकों की संख्या यहाँ के वातावरण के प्रति बढ़ती श्रद्धा एवं तप-साधना के प्रति बढ़ती निष्ठ, दोनों को ही प्रमाणित कर रही है।
साधना के क्रम में प्रायः योग सम्प्रदायों एवं शास्त्रों में स्वर योग की चर्चा की जाती है। स्वर योग को श्वास-विज्ञान या प्राणायाम की प्रक्रिया भी कहा जा सकता है। प्राणायाम की इस प्रक्रिया से प्राण एवं अपान के संयोग से मणिपुर चक्र का जागरण आसानी से हो जाता है। परन्तु इस साधना क्रम के लिए प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अनिवार्य है। इसीलिए इन पंक्तियों में इस साधना प्रक्रिया का विस्तार नहीं किया जा रहा।
साधना किया करते थे और गंगा जी यहाँ सात धाराओं में बहती थी। इनमें एक धारा शान्तिकुञ्ज क्षेत्र से होकर प्रवाहित होती थी, जिसके प्रमाण अभी भी थोड़ी सी खुदाई करने पर प्रकट होने लगते हैं।
साधना इसी दुःखद दुर्भाग्य को समाप्त करने के लिए है। इस साधना के बल पर उस ताले को खोला जा सकता है, जिसमें उल्लास का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है। यह कार्य ईश्वर और जीव के मिलन की विधि-व्यवस्था बनाकर, रीति-नीति अपनाकर ही सम्भव हो सकता है। पंचकोशों की साधना के उच्चस्तर पर पहुँचकर इसी चाभी को ढूंढ़ना पड़ता है। और ताले को खोलने की जुगत बिठानी पड़ती है।
साधना का मार्ग तरह-तरह की कठिनाइयों से भरा हुआ है। पग-पग पर इसमें साधक को विविध प्रकार के अवरोधों का सामना करना पड़ता है। पथ की विषमता के कारण ही इसे छुरे की धार के समान दुर्गम बताया गया है। आश्चर्य नहीं कि साधक इसमें कई बार गिरता है, किन्तु अपने ध्येय के प्रति समर्पित साधक हर बार उठकर अधिकाधिक उत्साह, वीरता एवं प्रसन्नता के साथ आगे बढ़ता है। यदि साधक अपने लक्ष्य के प्रति एकनिष्ठ है व साथ ही समर्थ गुरु का संरक्षण प्राप्त है तो प्रत्येक अवरोध उसकी सफलता की सीढ़ी बनता जाता है।
साधना के दौरान आसन व ध्यान साधना के हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। हृदय सम्बन्धी प्रयोग ई.सी.जी. (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) तथा टी.एम.टी (ट्रेडमिल टेस्टिंग) उपकरणों द्वारा किए जाते हैं।
साधना का एक सूक्ष्म पक्ष भी है। दरअसल आत्मिक प्रगति के क्रम में स्थूल शरीर में अनेकों दिव्य संवेदनाओं का संचार होता है। असंस्कारित अन्नमयकोश इसमें बाधक बनता है। अथवा उच्चस्तरीय साधना में अपना उचित सहयोग नहीं दे पाता। योग साधना के क्रम में अनेकों दिव्य साधनाएँ उभरती हैं, उन्हें धारण करना, उनके स्पन्दनों को सहन करके अपना सन्तुलन बनाए रखना बहुत आवश्यक है।
साधना पद्धति में अपने-अपने ढंग से किया गया है। योग के विभिन्न सम्प्रदाय, समुदाय एवं मार्ग इसी में अपने चरम बिन्दु को खोजते हैं। कुछ ने इसे निर्वाण कहा, जबकि अन्य ने समाधि, कैवल्य, ब्रह्म साक्षात्कार आदि अनेक नामों, संज्ञाओं से बताने-समझाने की कोशिश की है। यदि विभिन्न रहस्यात्मक तथा योग परम्पराओं एवं शास्त्रों का अध्ययन किया जाय तो सहस्रार के बारे में बहुत सारे वर्णन मिलते हैं। परन्तु इन सभी का अध्ययन एक अलग ढंग से, चेतना के एक भिन्न स्तर से किया जाना चाहिए, तभी उसके सार को समझा जा सकता है।
साधना के लिए हमें इसी भाव को प्रगाढ़ करने की जरूरत है। ध्यान के नियमित अभ्यास के समय यदि यह भावानुभूति गहन हो सके कि मूलाधार में सोयी शक्ति क्रमिक रूप से ऊपर उठ रही है, और रेतस् ओजस् में रूपांतरित हो रहा है- तो मूलाधार का जागरण सम्भव है। अन्त में यह समझ लेना चाहिए कि जब तक साधक मूलाधार चक्र का जागरण नहीं कर लेता और जब तक भौतिक शरीर पर कामवासना को ब्रह्मचर्य में रूपांतरित अथवा परिवर्जित नहीं कर लेता, तब तक दूसरे चक्र यानि की स्वाधिष्ठान चक्र या भाव शरीर के साथ साधना करना कदापि सम्भव नहीं।
साधना अभ्यास को यदि नियमित रूप से एक वर्ष भी किया जा सके, तो अनाहत चक्र के जागरण के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस चक्र के जागरण से साधक औरों के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाता है। उसमें अतीन्द्रिय दृष्टि, अतीन्द्रिय श्रवण या मनोगतिज क्षमता उत्पन्न हो जाती है। वह लोगों को अपने अथाह प्रेम से जीत सकता है। उसमें दूसरों के विचारों और अनुभवों के प्रति प्रखर संवेदनशीलता जाग जाती है।
साधना, प्रज्ञायोग जैसे कितने ही सामूहिक साधनात्मक प्रयोग सम्पन्न हुए। तीर्थ के दिव्य वातावरण एवं प्रखर मार्गदर्शन का लाभ ले रहे सौभाग्यशाली साधकों ने यहाँ अपने जीवन का कायाकल्प होते देखा। शान्तिकुञ्ज रूपी कल्पवृक्ष की छत्रछाया में न केवल उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो रही थीं, बल्कि वे एक नया मनोबल एवं आत्मबल सम्पादित कर रहे थे। साधना सत्रों का यह क्रम आगे एक माह व नौ दिवसीय सत्रों के रूप में जारी रहा व आज भी अनवरत रूप से चल रहा है जिसमें बढ़ते हुए साधकों की संख्या यहाँ के वातावरण के प्रति बढ़ती श्रद्धा एवं तप-साधना के प्रति बढ़ती निष्ठ, दोनों को ही प्रमाणित कर रही है।
साधना का परिणाम है। जिसके फलस्वरूप सन्देह का रूपांतर श्रद्धा में होता है। और विचार-विवेक में रूपांतरित हो जाता है।
साधना की पुण्य परम्परा को जीवन्तता दी।
साधना जैसा ही श्रेयस्कर होगा।
साधनाओं में हठयोग की कठिन प्रक्रियाओं की चर्चा सुनने को मिलती है। इससे होने वाले लाभ निश्चित रूप से है, पर तनिक सी असावधानी होने पर हानियाँ इतनी अधिक हैं कि साधक का समूचा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। फिर उसे बचा पाना किसी के लिए सम्भव नहीं होता। इसलिए ऐसी जटिल प्रक्रियाओं को न अपनाना ही श्रेष्ठ व श्रेयस्कर है।
साधना के जानकार हैं। मुझे योग साधना के कुछ सूत्र बताइए, ताकि मैं भी अपनी छिपी हुई शक्तियों को जान सकूँ, आपकी तरह से चमत्कारी बन सकूँ, साथ ही ईश्वर लाभ भी कर सकूँ।
साधना के प्रति बढ़ती निष्ठ, दोनों को ही प्रमाणित कर रही है।
साधना की पुण्य परम्परा सम्मानित हुई है। यहाँ योग में निर्देशित पाँच यम ही मुख्य साधन हैं। जिन्हें अणुव्रत कहा गया है। भगवान् महावीर स्वयं सिद्ध योगी थे। इतना ही नहीं कतिपय जैन ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर योग सूत्रों से शब्दशः साम्य है।
साधना के अंतर्गत आसन, प्राणायाम, मंत्र जप, ध्यान, यज्ञ, उपवास, चांद्रायण व्रत जैसी क्रियाओं का अभ्यास कराया जाता है।
साधना का विशेषकर आहार-विहार एवं वनौषधियों का प्रभाव, हेमेटोलॉजी एवं बायोकेमिस्ट्री चेम्बर में किया जाता है। हिमेटोलॉजी कक्ष में रक्त से जुड़े हीमोग्लोबिन, डब्ल्यू वी.सी, आर.बी.सी. तथा ल्यू विभिन्न ल्यूकोसाइट काउण्ट, ई.एस.आर. आदि परीक्षण किये जाते हैं। बायोकेमिस्ट्री परीक्षणों के अंतर्गत रक्त शर्करा, कोलेस्ट्रॉल, ट्राइग्लिसराइड, यूरिया, यूरिक एसिड, क्रिएटिनीन, विल्रुबीन, एस.जी.ओ.टी., एस.जी.पी.टी., कैल्शियम, प्रोटीन व एल्केलाइन फोस्फेटस् आदि जैव रसायनों का परीक्षण किया जाता है।
साधना के रहस्य नहीं जाने जा सकते। हाँ लोक प्रचलन में योग के नाम पर जो बाजीगरी सीखी और सिखायी जा रही है- उसे अवश्य जाना और पाया जा सकता है। ‘सद्गुरु की शरण सद्गुरु की कृपा ही योग साधना के रहस्यों की कुञ्जी है।’ यह तथ्य त्रिकाल सत्य है। इसे कोई कभी मेट और मिटा नहीं सकता।
साधना का अंग बन जाते हैं।
साधना की इसी अवस्था में उनके दर्शन मिलते हैं। ध्यान योग से प्राप्त दिव्य नेत्रों से उनका पूजन-अभिवादन किया जाता है। निराकार के साधकों को साधना की इसी भावदशा में ज्योतिपुञ्ज के दर्शन होते हैं। उनमें अनेकानेक दिव्य एवं स्वर्गीय संवेदनाएँ इसी समय प्रकट होती हैं।
साधना 2. स्वास्थ्य 3. शिक्षा एवं 4. स्वावलम्बन होंगे। ये बिन्दु ही मनुष्य की यथार्थ प्रगति एवं विकास का आधार है।
साधना का उद्देश्य सूक्ष्म प्रकृति में हेर-फेर करना था, जिससे कि युग परिवर्तन की संभावनाएँ साकार हो सके। आध्यात्मिक साधना के इतिहास में इस तरह का पुरुषार्थ इससे पूर्व केवल ब्रह्मऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। जब वे नई सृष्टि के निर्माण के लिए संकल्पित हुए थे। इतिहास को दोहराता हुआ नूतन प्रयोग परम पूज्य गुरुदेव द्वारा पुनः उसी भूमि में सम्पन्न हुआ। इसी के बाद पूज्यवर ने 21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य की उद्घोष किया था भावी प्रज्ञायुग की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।
साधना ही मूलाधार को जाग्रत् करती है। और इसी से योग का आधार दृढ़ होता है।
साधना करनी है, उसे विश्राम के नाम पर निठल्लेपन की प्रवृत्ति या आलसीपन से दूर रहना ही पड़ेगा। कर्मयोग साधना की दृष्टि से नियमित दिनचर्या का बनना और उस पर कठोरतापूर्वक आरुढ़ रहना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। कर्मयोग का इसे व्यावहारिक और सर्वप्रथम कदम कहा जा सकता है। निठल्लापन जड़ता का-तामसिकता का चिह्न है। इसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य माना जाना चाहिए।
साधना की योजना बनाकर अपने इर्द-गिर्द ऐसा दिव्य वातावरण बनाना है, जिसके संपर्क में अन्तरात्मा को दिव्य अनुभूतियों का रस मिलने लगे। होता यह है कि संसार की अवाँछनीय गतिविधियाँ ही अपने चारों ओर बिखरी दिखती हैं। जन समूह वासना, विलासिता, तृष्णा, अहंता को जीवन में सर्वोपरि स्थान देता है। वातावरण की इस विषाक्तता का प्रभाव मन पर पड़े बिना नहीं रहता और वह अनजाने ही इस प्रवाह में सम्मोहित की तरह बिना आगा-पीछा सोचे बहने लगता है।
साधना के लिए उपयुक्त सभी विशेषताओं से युक्त वातावरण यहाँ उपलब्ध है। और युग तीर्थ के रूप में यह नैष्ठिक साधकों को साधना के लिए भाव-भरा आवाहन एवं स्नेह निमंत्रण दे रहा है।
साधना संस्कार भी इस भूमि से जुड़े हुए हैं। महाराजा भर्तृहरि आजीवन इस वातावरण की कामना करते रहे, जो उनकी अमरकृति वैराग्य शतक में कुछ इस तरह मुखरित हुई-
साधनाओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन साइकोमैट्री चैम्बर में किया जाता है। इसके अंतर्गत आहार-विहार, तप-तितिक्षा, प्रायश्चित आदि का मनोविकारों के उपचार व व्यक्ति के समग्र विकास पर प्रभाव देखा जाता है। इसके अंतर्गत अब तक मिरर ट्रेसिंग, रिएक्शन टाइम टेस्ट, मेमोरी टेस्ट, आत्म प्रत्यय परीक्षण, स्टेडिनेस टेस्ट, मूलर लायर इल्यूजन टेस्ट आदि परीक्षण होते रहे हैं। जो प्रमुखतः सीखने की प्रक्रिया व क्षमता (लर्निंग प्रोसेस), निर्णय क्षमता, स्मरण शक्ति, बुद्धिलब्धि (आई. क्यू.), माँसपेशियों पर मस्तिष्कीय नियंत्रण, दृष्टिभ्रम आदि मानसिक घटकों का अध्ययन करते थे।
साधना सत्रों में आए साधकों के बीच किया जाता है। प्रारम्भिक शारीरिक एवं मानसिक जाँच-पड़ताल के बाद इन्हें आहार-विहार, आयुर्वेदीय वनौषधि एवं साधना सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है। योग साधना के अंतर्गत आसन, प्राणायाम, मंत्र जप, ध्यान, यज्ञ, उपवास, चांद्रायण व्रत जैसी क्रियाओं का अभ्यास कराया जाता है।
साधना के द्वारा ही योगी आरोग्य के साथ शरीर संस्थान पर अद्भुत अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। इच्छानुसार शरीर को गर्म या ठण्डा रखना, ऋतुओं के प्रभाव से अप्रभावित रहना, शरीर की ऊर्जा पूर्ति के लिए आहार पर आश्रित न रहकर सीधे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त कर लेना, दीर्घ जीवन, शरीर में वृद्धावस्था के चिह्न न उभरना आदि सभी उपलब्धियाँ अन्नमय कोश की योग साधना पर निर्भर करती हैं।
साधनाओं का प्रभाव देखा जाता है। इसी वर्ष इस संदर्भ में ध्यान एवं यज्ञ के प्रयोग हुए हैं, जिनके परिणाम वैज्ञानिक समुदाय को चमत्कृत करने वाले रहे। प्रयोग के तहत यज्ञ ऊर्जा, वनौषधि, एवं मंत्र शक्ति के आधार पर अग्निहोत्र, यज्ञोपैथी के रूप में मनोविकारों की एक सफल चिकित्सा पद्धति के रूप में उभर कर आई है व इस पर व्यापक अनुसंधान कार्य अभी चल रहा है। इसी तरह अन्य यौगिक क्रियाओं के परिणाम उत्साहवर्धक रहे हैं।
साधना नादयोग है। योगशास्त्रों में विशुद्धि और मूलाधार स्पन्दनों के दो आधार भूत केन्द्र माने गए हैं। नादयोग की प्रक्रिया में चेतना के ऊर्ध्वीकरण का सम्बन्ध संगीत के स्वरों से है। प्रत्येक स्वर का संबंध किसी एक चक्र विशेष की चेतना के स्पन्दन स्तर से सम्बन्धित होता है। बहुधा वे स्वर जो मंत्र, भजन तथा कीर्तन के माध्यम से उच्चारित किए जाते हैं, विभिन्न चक्रों के जागरण के समर्थ माध्यम हैं।
साधना से लेकर योग साधना तक के किसी भी क्षेत्र में उच्च स्तरीय कक्षा में पहुँचने के लिए अपने अन्नमयकोश को तदनुरूप ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य एवं सक्षम स्थिति में लाना होता है। यही प्रक्रिया अन्नमयकोश की योग साधना है।
साधना की है, वे इनकी वास्तविकताओं से भली-भाँति परिचित हैं।
साधना स्थली चुना तथा वशिष्ठ जी स्वयं वशिष्ठ गुफा में स्थिर हुए थे।
साधनात्मक कर्मकाण्ड के लिए भी स्थान है, पर उसकी मूल प्रवृत्ति चिंतन के स्वरूप को ऊँचा उठाना है। अपनी सत्ता और दिशा को परिष्कृत करना है। पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण का परिमार्जन करना है। वस्तुतः योग एक दर्शन है। सर्वत्र आत्म-सत्ता की अनुभूति से विश्व मानव की, विश्व परिवार की भावना विकसित होती है।
साधना के हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। हृदय सम्बन्धी प्रयोग ई.सी.जी. (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) तथा टी.एम.टी (ट्रेडमिल टेस्टिंग) उपकरणों द्वारा किए जाते हैं।
साधना से एक ऐसी स्थिति प्रकट होती है, जिससे जीवन में अनेकों विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभूतियाँ आती हैं। इससे साधक के ज्ञान में वृद्धि होती है। जीवन कष्टप्रद न रहकर आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। दरअसल ऐसी स्थिति में योग साधक जीवन को सहज रूप में स्वीकार लेता है। एवं वह सभी तरह के द्वन्द्वों से मुक्त रहकर जीवन की घटनाओं के प्रति अनासक्त रहता है।
साधना के पथिकों द्वारा अपनाए जाने वाले सम्बन्धी कठोर नियम समझे जा सकते हैं। पुरातन काल में पिप्पलाद ऋषि केवल पीपल के फल खाकर निर्वाह करते थे। औदुम्बर ऋषि केवल गूलर खाकर शरीर निर्वाह करते थे। मौदगल ऋषि का आहार केवल मूँग था। परम पूज्य गुरुदेव ने 24 वर्षीय पुरश्चरण जौ की रोटी एवं छाछ के सहारे पूरा किया था।
साधना के बल पर उस ताले को खोला जा सकता है, जिसमें उल्लास का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है। यह कार्य ईश्वर और जीव के मिलन की विधि-व्यवस्था बनाकर, रीति-नीति अपनाकर ही सम्भव हो सकता है। पंचकोशों की साधना के उच्चस्तर पर पहुँचकर इसी चाभी को ढूंढ़ना पड़ता है। और ताले को खोलने की जुगत बिठानी पड़ती है। जो इसे कर सका, उसे फिर यह नहीं कहना पड़ेगा कि हमारा जीवन निरानन्द और नीरस है।
साधना शीघ्र ही परम सिद्धि में परिणत हो जाती है, ऐसा अनेकों महायोगियों के अनुभव हैं। इन अनुभवों का साक्षात्कार कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया के माध्यम से भी किया जा सकता है।
साधना पीछे वर्णित सभी चक्रों की साधनाओं से सर्वथा परे है। इस स्तर पर योग साधक को इस तथ्य का पूरा ज्ञान रहता है कि यद्यपि भाग्य है, फिर भी इसे पूर्णतया बदला जा सकता है। यह अन्तरिक्ष में कुछ फेंकने की भाँति है। यदि किसी पदार्थ को इस गति से फेंका जाय कि वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाय, तो फिर इसे पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति वापस नहीं खींच पाएगी। ठीक इसी भाँति अनाहत चक्र की साधना करने वाले साधक की चेतना का स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह अपने प्रारब्ध के सहारे नहीं, बल्कि अपनी इच्छानुसार जीवन यापन करने में सक्षम हो जाता है।
साधना के इस क्रम में एक मजेदार बात यह भी है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में आज्ञाचक्र अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय होता है। इसलिए वे अधिक सूक्ष्म, संवेदनशील और ग्रहणशील होती है। यही कारण है कि महिलाओं में पूर्वाभास की क्षमता पुरुषों की तुलना में ज्यादा होती है।
साधना का चरम बिन्दु यही है।
साधना, इसका परिशोधन व जागरण कैसे करें? यह प्रश्न प्रत्येक जिज्ञासु और साधक का होगा। इसके उत्तर में यहाँ हमें इतना ही कहना है कि प्राचीन योगशास्त्रों एवं साधना सम्प्रदायों में इस चक्र की साधना विधियाँ अनेक हैं। उन सबका अपना-अपना महत्त्व भी है। जिससे न इन्कार किया जा सकता है और न नकारा जा सकता है।
साधना स्थूल, सूक्ष्म से परे कारण शरीर की साधना है। उसे न तो कर्म की चाहत है, और न ही ज्ञानप्राप्ति की आकाँक्षा। वह तो आठों याम बस अपने प्रभु का दीवाना है। अपना सब कुछ देकर भी ‘दे दूँ कुछ और अभी’ के लिए फिक्रमन्द है। भक्त प्रेम की शुद्धतम एवं उच्चतम अवस्था में जीवन जीता है।
साधना का स्वरूप ईश्वर और जीव के मिलन की व्यवस्था है। आमतौर पर हम ईश्वर के नाम भर से परिचित हैं। जब-तब उसका नाम ले भी लेते हैं। इस क्रम में दो-चार माला का जप या फिर लम्बे-चौड़े अनुष्ठान-उपवास भी किये जाते हैं। पर इन सबके पीछे मकसद यह नहीं होता है कि स्वयं को पूर्णतया भगवान् को दे डालें।
साधना के लिए एक आदर्श स्थली बनाता है। एक ओर शिवालिक पर्वत शृंखला तो दूसरी ओर गढ़वाल हिमालय इसे अपने सुरम्य आँचल में समेटे हुए हैं। हरियाली के सघन आच्छादन के साथ गंगा का सान्निध्य इसे सहज ही उपलब्ध है। कभी सप्तऋषि गण इसी क्षेत्र में तप-साधना किया करते थे और गंगा जी यहाँ सात धाराओं में बहती थी। इनमें एक धारा शान्तिकुञ्ज क्षेत्र से होकर प्रवाहित होती थी, जिसके प्रमाण अभी भी थोड़ी सी खुदाई करने पर प्रकट होने लगते हैं।
साधना चाहे किसी भी ढंग से की जाय, जब तक दैहिक आसक्ति से छुटकारा नहीं होता, मन समाहित नहीं हो पाता। और मन के समाहित हुए बिना शुद्धात्मतत्त्व का स्फुरण सम्भव नहीं है। जिस किसी भी प्रकार मन समाहित हो, वही अवस्था समाधि है, योग है। यही कारण है कि ईश्वर प्राप्ति हेतु जितने भी कर्म गीता में बतलाए गए हैं उन सभी को योग नाम से अभिहित किया गया है।
साधना के अभाव में साँसारिक भोगों में ही जीवन की ऊर्जा क्षय हो जाती है। जबकि साधना द्वारा यदि इस चक्र को शुद्ध एवं जाग्रत् कर लिया जाय तो शरीर व्याधि रहित एवं कान्तिमय हो जाता है। साथ ही योगी की चेतना पुनः निम्न स्तरों पर वापस नहीं आती।
साधना की दृष्टि से नियमित दिनचर्या का बनना और उस पर कठोरतापूर्वक आरुढ़ रहना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य है। कर्मयोग का इसे व्यावहारिक और सर्वप्रथम कदम कहा जा सकता है। निठल्लापन जड़ता का-तामसिकता का चिह्न है। इसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य माना जाना चाहिए। शरीर की क्रिया शक्ति और मस्तिष्क की प्रखरता को नष्ट करने में आलस्य-प्रमाद से बढ़कर और कोई शत्रु नहीं।
साधना है। क्योंकि ज्ञानयोग में लीन साधक को सबसे पहला अहसास यही होता है कि पल-पल नष्ट होने वाला, हर घड़ी मृत्यु की ओर बढ़ने वाला स्थूल शरीर मेरा परिचय कभी नहीं हो सकता। यही अनुभूति ज्ञान योगी को नाशवान स्थूल से ऊपर उठाकर अविनाशी सूक्ष्म की ओर ले जाती है।
साधना करके साधक अपनी आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों जैसे- काम, क्रोध, लालच, लोभ आदि से तुरन्त मुक्त हो जाता है।
साधना का उद्देश्य मन की निम्नगामी प्रवृत्ति को उर्ध्वगामी दिशा देना है। इसमें साधनात्मक पुरुषार्थ की अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है, किन्तु यदि इसमें उचित वातावरण का पुट भी लग जाय, तो कार्य सरल हो जाता है। अन्यथा वातावरण की विषमता में मन को साधना कितना दुष्कर कार्य बन जाता है, इसे सामान्य जीवन क्रम में ही अनुभव किया जा सकता है। शहर का कोलाहल, गंदगी एवं भीड़ भरा वातावरण स्वस्थ व्यक्ति तक को अर्ध पागल जैसी स्थिति में ला देता है। अस्पताल एवं मरघट के वातावरण में जीवन की नश्वरता एवं सत्य का बोध कितनी सहजता से होता है इसे हर कोई जानता है।
साधना के तत्त्वदर्शन की आन्तरिक उमंगें यदि जग पड़े तो बहिरंग जीवन स्वतः ही योगमय हो जाता है। क्योंकि आन्तरिक भाव दशा से ही दिशा निर्धारण और परिस्थिति का निर्माण होता है। अन्तश्चेतना का यह मर्मस्थल संयमित-परिशोधित बने, तभी आत्म चेतना के जागरण की पुण्य घड़ी आती है। और योग साधना के तत्त्वदर्शन का लक्ष्य पूरा होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर्मयोग प्रथम चरण है।
साधना विधि है। ध्यानमग्न होकर हम अपने ईष्ट के साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं।
साधना तो उनके लिए है- जो अपना समग्र समर्पण भगवान् के चरणों में करने के लिए आतुर-आकुल रहते हैं। आनन्दमय कोश की साधना का यही स्वरूप है। यह जहाँ भी अपने वास्तविक रूप में सम्पन्न होगी, वहाँ निश्चित रूप से आनन्दमय कोश का अमृत कलश छलक रहा होगा। स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी होंगी। उल्लास बिखरा पड़ा होगा, सन्तोष की सुखद वायु बह रही होगी।
साधना अत्यन्त कठिन एवं दुष्कर है। किन्तु साधक यदि विवेकवान व वैराग्य सम्पन्न है, तो यह उतनी ही सुगम एवं सरल भी है। साधना के इस तल पर सभी अवशेष कर्म तथा नकारात्मक संस्कारों का निष्कासन प्रारम्भ हो जाता है। इस समय क्रोध, भय, यौन विकृतियाँ तथा दूसरी तरह की कामनाएँ, वासनाएँ उफनने-उमगने लगती हैं। सभी प्रकार की तामसिक वृत्तियों, तंद्रा, अकर्मण्यता तथा निराशा आदि के बवण्डर इसी दौरान पनपते हैं।
साधना के दौरान शरीर में होने वाले सूक्ष्म जैव रासायनिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। कार्डियालॉजी चेम्बर में हृदय की गति, लय तथा विद्युत् तरंगों का मापन कर साधक की स्वस्थ व अस्वस्थ स्थिति का पता लगाया जाता है। तथा साधना के दौरान आसन व ध्यान साधना के हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। हृदय सम्बन्धी प्रयोग ई.सी.जी. (इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम) तथा टी.एम.टी (ट्रेडमिल टेस्टिंग) उपकरणों द्वारा किए जाते हैं।
साधना नहीं है। बाकी जो कुछ- जहाँ कहीं भी वर्णित है, वह बस शब्दाडम्बर मात्र है। यदि उसमें कोई सार है भी तो भी उसका प्रायोगिक मूल्य बहुत ही न्यून और अल्प है। जबकि सद्गुरु की कृपा के अवतरण को धारण व ग्रहण करने से यह महासाधना शीघ्र ही परम सिद्धि में परिणत हो जाती है, ऐसा अनेकों महायोगियों के अनुभव हैं। इन अनुभवों का साक्षात्कार कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया के माध्यम से भी किया जा सकता है।
साधनात्मक कर्मकाण्डों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। पर तभी जब उनका उद्देश्य योग साधना के तत्त्वदर्शन के अनुरूप हो। योग का बहिरंग स्वरूप इन व्यायामों, कर्मकाण्डों के रूप में सामने आना आपत्तिजनक नहीं है। किन्तु है यह योग का कलेवर ही, यह तथ्य सदा ही स्मरण रखा एवं कराया जाना चाहिए। योग का प्राण- वह तत्त्वदर्शन ही है, जिसकी चर्चा उपरोक्त पंक्तियों में की गयी है।
साधना के क्रम में दिव्य लोक की शक्तियों से संपर्क-सान्निध्य एक सामान्य सी बात बन जाती है। परन्तु यह तो इस साधना क्रम की शुरुआती सफलता भर है। अपने सद्गुरु के सन्देश और आदेश भी इसी साधना से जाने-सुने और समझे जाते हैं। संक्षेप में आज्ञा चक्र की साधना के परिणाम अनुभूति के विषय हैं। इन्हें लिख पाना- एक लेख तो क्या एक महाग्रन्थ में भी सम्भव नहीं है।
साधना सम्भव है। और तभी इसकी उपलब्धियाँ साधक के जीवन का अनुभव बनती हैं।
साधनास्थली के रूप में किया। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से यह भी देख लिया था कि यह भूमि गायत्री महामंत्र के मंत्र द्रष्ट ऋषि विश्वामित्र की तपस्थली रह चुकी है। जब 1971 में पूज्यवर हिमालय प्रवास में थे तो परम वन्दनीया माताजी 24 कन्याओं के साथ 24 लाख के 24 पुरश्चरण द्वारा इस भूमि के प्रसुप्त संस्कारों को जाग्रत् कर रही थीं। गुरुदेव के हिमालय से आगमन के साथ ही यहाँ विशिष्ट साधना शिविरों का सिलसिला शुरू हुआ। एक दशक के अन्तराल में यहाँ प्राण प्रत्यावर्तन, वानप्रस्थ शिविर, ब्रह्मवर्चस साधना सत्र, कल्प साधना, प्रज्ञायोग जैसे कितने ही सामूहिक साधनात्मक प्रयोग सम्पन्न हुए।
साधना के अंतर्गत जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए अन्नमय कोश के परिष्कार को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। शास्त्रों में इसके अनेक लाभों एवं सिद्धियों का उल्लेख मिलता है। अन्नमय कोश की योग साधना के द्वारा ही योगी आरोग्य के साथ शरीर संस्थान पर अद्भुत अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। इच्छानुसार शरीर को गर्म या ठण्डा रखना, ऋतुओं के प्रभाव से अप्रभावित रहना, शरीर की ऊर्जा पूर्ति के लिए आहार पर आश्रित न रहकर सीधे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त कर लेना, दीर्घ जीवन, शरीर में वृद्धावस्था के चिह्न न उभरना आदि सभी उपलब्धियाँ अन्नमय कोश की योग साधना पर निर्भर करती हैं।
साधना के इस क्रम में अपने ईष्ट देव-देवी का भी ध्यान किया जा सकता है। इन सबके बावजूद आज्ञाचक्र की सिद्धि के लिए जो सबसे प्रभावी एवं शीघ्र फलदायी उपाय है, वह है- उगते हुए सूर्य मण्डल के मध्य परम पूज्य गुरुदेव का ध्यान। यदि यह ध्यान साधना नियमित एवं प्रगाढ़ हो, तो मात्र छः महीने में ही अपनी सफलता के संकेत देने लगती है। इस शीघ्र सफलता का एक कारण यह भी है कि आज्ञा चक्र- गुरु चक्र है। गुरु तत्त्व की अनुभूति जितनी सघन यहाँ हो पाती है, उतनी और कहीं सम्भव नहीं।
साधना करते हुए भृगु ने एक-एक कोश का परिष्कार करते हुए विज्ञान को प्राप्त किया।
साधना में यही सत्य निहित है। और उसकी पूर्ण उपलब्धि ही जीवन में सन्तोष लाती है। इस सन्तोष की प्रगाढ़ता ही योग के आधार को प्रगाढ़ एवं पुष्ट करती है।.
साधना का सार कुण्डलिनी शक्ति का जागरण ही है।
साधना की दृष्टि से शुद्ध एवं सात्विक आहार की उपयोगिता समझी जा सकती है। यहाँ गीता के 16 वें अध्याय में आहार सम्बन्धी किया गया सूक्ष्म विश्लेषण विचारणीय है। आहार को गीताकार ने सात्विक, राजसिक एवं तामसिक तीन भागों में बाँटा गया है। बासी, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, जूठा, अपवित्र व भारी भोजन तामसिक प्रकृति के अंतर्गत आता है। यह भोजन मन को स्थूल बनाता है व शरीर में आलस, तन्द्रा व नींद को लाता है।
साधना के दौरान इसकी निग्रह, शुचिता एवं पवित्रता अनिवार्य है। ब्रह्मचर्य व्रत के द्वारा इसी कार्य को सिद्ध किया जाता है। इसमें शारीरिक चेष्टाओं की ही तरह कामुक चिंतन पर भी अंकुश लगाना पड़ता है। विपरीत लिंग के प्रति सतत् पवित्र भाव का आरोपण किया जाता है व ऐसे साहित्य, संग व वातावरण से दूर ही रहा जाता है, जिनसे कि निम्नवृत्तियाँ भड़क न उठे।
साधना का सरलतम उपाय है- गायत्री महामंत्र का नियमित जप। यह एक बहुत शक्तिशाली, सरल एवं निरापद मार्ग है। परन्तु इसमें अपेक्षाकृत समय तथा धैर्य की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार किसी शान्त झील में कंकड़ फेंकने पर उसमें तरंगें उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार मंत्र को बार-बार दोहराने से मन रूपी समुद्र में तरंगें उत्पन्न होती हैं। लाखों-करोड़ों बार गायत्री मंत्र के जप से अस्तित्व का कोना-कोना झंकृत हो जाता है।
साधना का रहस्य तो उसी को मिलेगा, जो उन्हें सद्गुरु के रूप में पहचान सकेगा। यह पहचान ही उसके जीवन में योग साधना के सूत्रों और उनमें समाए, रहस्यों को उजागर उद्घाटित करेगी। यह उद्घाटन सही और समुचित रीति से हो, इसके लिए उपयुक्त वातावरण की भी आवश्यकता है।
साधना को दुष्कर बनाती हैं। उदासी, अवसाद, शंका, सन्देह, भय आदि मार्ग की अन्य बड़ी बाधाएँ हैं।
साधना के तत्त्वदर्शन का अभ्यास करने पर भक्तियोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना करो। योग साधना करते हुए भृगु ने एक-एक कोश का परिष्कार करते हुए विज्ञान को प्राप्त किया।
साधना प्रस्फुटित होती है।
साधना बन पड़ती है। इसी से वे चमत्कारी परिणाम मिलते हैं, जिनका प्राणविद्या के अंतर्गत वर्णन किया गया है। प्राणविद्या की इस साधना के पश्चात् ही मनोमय कोश के परिष्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना पद्धति में जिसका सम्बन्ध व्यक्ति की उच्च चेतना के जागरण से है, आनन्द की अवर्णनीय अनुभूति हेतु अपने अलग-अलग प्रतीक हैं।
साधना के लिए चुनाव करके, हाथ-मुँह धोकर सुविधापूर्वक साधना में बैठना चाहिए। अधिक देर बैठने में दिक्कत हो तो इसे लेट कर भी किया जा सकता है।
साधना के तत्त्वदर्शन का प्रथम सूत्र है- संयम। संयम का अर्थ प्रायः दमन से लिया जाता है। जो अपनी इच्छाओं, कामनाओं को जितना अधिक दबा सके, कुचल सके, वह उतना ही अधिक संयमी है। लोक प्रचलित इस मान्यता के विरुद्ध संयम का वास्तविक अर्थ है- जीवन की शक्तियों की बर्बादी को रोकना। जीवन ऊर्जा के क्षरण व अपव्यय पर प्रतिबन्ध लगाना।
साधनात्मक पुरुषार्थ ने इसके वातावरण की दिव्यता को और प्रखर किया है। इसी के अंतर्गत करोड़ों गायत्री मंत्र का जप सम्पन्न हुआ है व लाखों युग साधक नवसृजन के लिए संकल्पित हुए हैं।
साधना शिविरों का सिलसिला शुरू हुआ। एक दशक के अन्तराल में यहाँ प्राण प्रत्यावर्तन, वानप्रस्थ शिविर, ब्रह्मवर्चस साधना सत्र, कल्प साधना, प्रज्ञायोग जैसे कितने ही सामूहिक साधनात्मक प्रयोग सम्पन्न हुए। तीर्थ के दिव्य वातावरण एवं प्रखर मार्गदर्शन का लाभ ले रहे सौभाग्यशाली साधकों ने यहाँ अपने जीवन का कायाकल्प होते देखा। शान्तिकुञ्ज रूपी कल्पवृक्ष की छत्रछाया में न केवल उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो रही थीं, बल्कि वे एक नया मनोबल एवं आत्मबल सम्पादित कर रहे थे। साधना सत्रों का यह क्रम आगे एक माह व नौ दिवसीय सत्रों के रूप में जारी रहा व आज भी अनवरत रूप से चल रहा है जिसमें बढ़ते हुए साधकों की संख्या यहाँ के वातावरण के प्रति बढ़ती श्रद्धा एवं तप-साधना के प्रति बढ़ती निष्ठ, दोनों को ही प्रमाणित कर रही है।
साधना की ओर हो।
साधना का प्रारम्भ अन्नमयकोश के परिष्कार से आज और अभी प्रारम्भ कर देना चाहिए। तभी वह भविष्य में प्राणमयकोश की साधना के लिए अपने कदम बढ़ा सकेंगे।
साधना चाहिए। जी हाँ, योग साधना, जो इक्कीसवीं सदी में प्रत्येक मानव का अनिवार्य कर्त्तव्य बन गयी है। यही वह औषधि है, जिसके द्वारा समय की समस्त व्याधियों का निदान सम्भव है।
साधनात्मक पुरुषार्थ की अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है, किन्तु यदि इसमें उचित वातावरण का पुट भी लग जाय, तो कार्य सरल हो जाता है। अन्यथा वातावरण की विषमता में मन को साधना कितना दुष्कर कार्य बन जाता है, इसे सामान्य जीवन क्रम में ही अनुभव किया जा सकता है। शहर का कोलाहल, गंदगी एवं भीड़ भरा वातावरण स्वस्थ व्यक्ति तक को अर्ध पागल जैसी स्थिति में ला देता है। अस्पताल एवं मरघट के वातावरण में जीवन की नश्वरता एवं सत्य का बोध कितनी सहजता से होता है इसे हर कोई जानता है। इसी तरह राग-रंग भरे भड़काऊ वातावरण में मन के निग्रह की दुष्वारिता समझी जा सकती है।
साधना के प्रवर्तक मुक्ति में शिव-शक्ति अथवा विष्णु-शक्ति आदि के नित्य मिलन एवं आनन्द रूपता को स्वीकार करते हैं। योग का स्वरूप कहीं भी किसी भी तरह वर्णित हो, परन्तु प्रायः ये सभी पातंजल-योग से ही निःसृत होते हैं।
साधना के तत्त्वदर्शन को जानकर ही मनुष्य स्वयं को पा सकता है। इसी के द्वारा उसे खोई हुई शान्ति मिल सकती है। योग साधना का नियमित अभ्यास मनुष्य को स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रतिभा, विद्या, हंसी, खुशी के ढेरों वरदान दे सकती है। शास्त्र वचन है- योगी के लिए कुछ असम्भव नहीं। तो आइए इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को साकार करने के लिए योग साधना के तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करें।
साधना समस्त सिद्धियों का सुपरिणाम है। यदि इसके स्वरूप को बहुत कुछ जानना ही हो, तो फिर इतना ही कहेंगे कि ऐसे जिज्ञासु योग साधक को सतत् गुरु कृपा का आवाहन करना चाहिए। योगिराज श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय के शिष्य स्वामी प्रणवानन्द ने इस उपलब्धि को इसी तरह से पाया था। उन्होंने वर्षों की साधना की, भारी तप किया। इस सबके बावजूद जब वह सहस्रार का भेदन व जागरण में सफल नहीं हुए, तो उन्होंने योगिराज लाहिड़ी महाशय से निवेदन किया।
साधना की बौद्ध परम्परा में इस चक्र को समूची साधना का आधार माना गया है। बौद्ध साधकों में प्रचलित महामंत्र ‘ॐ मणिपद्मेहुँ’ प्रकारान्तर से इस चक्र के जागरण की ही साधना है।
साधना के दीए किसी ओर भी जलते दिखाई नहीं देते। आखिर ये दीए जले भी तो कैसे? इसके लिए पहली जरूरत है- मिट्टी के उस दीए को, जो गुरुभक्ति के स्नेह से लबालब भरा है। जिसके प्राण बाती की तरह जलने की आतुर प्रतीक्षा में है।
साधना की सतत् उपेक्षा के कारण पनपी आधुनिक युग की विकृत जीवन शैली के कारण रोगों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। इनमें मनोकायिक एवं मानसिक रोगों की अप्रत्याशित वृद्धि स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट का कारण बनी हुई है। इनकी जटिल एवं सूक्ष्म प्रकृति के कारण आधुनिक चिकित्सा विज्ञान इनके सामने असहायपन की स्थिति में पड़ा हुआ है। इस स्थिति में चिकित्सा विज्ञानियों का योग पद्धति की ओर मुड़ना स्वाभाविक ही है। योग अपनी समग्र एवं सूक्ष्म दृष्टि के कारण समग्र स्वास्थ्य का आश्वासन दे रहा है और इस दिशा में जो अनुसंधान अन्वेषण हुए हैं व हो रहे हैं, वे भी उत्साहवर्द्धक निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
साधना को निम्न बिन्दुओं में समझा जा सकता है-
साधना की तीव्रता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। इन प्रक्रियाओं को जीवन में आत्मसात करके यदि प्रातः काल तीन घण्टे गायत्री महामंत्र की साधना की जाय तो कुण्डलिनी शक्ति के जागरण के संकेत साधक को मिलने लगते हैं। लगातार छः वर्षों की इस साधना के साथ ही योग साधक पर जाग्रत् कुण्डलिनी का अमृत बरसता है। जिसके परिणाम स्वरूप जीवन में विशेषताओं और विभूतियों की सम्पदा अनायास ही अंकुरित और पल्लवित होने लगती है। जिसके सतत् अभिवर्द्धन के लिए समर्थ सद्गुरु का संरक्षण अनिवार्य है।
साधना की जाय तो कुण्डलिनी शक्ति के जागरण के संकेत साधक को मिलने लगते हैं। लगातार छः वर्षों की इस साधना के साथ ही योग साधक पर जाग्रत् कुण्डलिनी का अमृत बरसता है। जिसके परिणाम स्वरूप जीवन में विशेषताओं और विभूतियों की सम्पदा अनायास ही अंकुरित और पल्लवित होने लगती है। जिसके सतत् अभिवर्द्धन के लिए समर्थ सद्गुरु का संरक्षण अनिवार्य है।
साधना के लिए इन दोनों ही दर्शनों- न्याय (4/2/42) एवं वैशेषिक (8/1/12-14) में प्रेरित-प्रोत्साहित भी किया गया है। इनमें न केवल यह कहा गया है कि समाधि के विशेष अभ्यास से तत्त्वज्ञान होता है, बल्कि यह भी बताया गया है कि मुक्त योगियों को समाधि के बिना भी अतीन्द्रिय द्रव्यों का साक्षात्कार होता है।
साधना का आधार माना गया है। बौद्ध साधकों में प्रचलित महामंत्र ‘ॐ मणिपद्मेहुँ’ प्रकारान्तर से इस चक्र के जागरण की ही साधना है।
साधनाएँ उभरती हैं, उन्हें धारण करना, उनके स्पन्दनों को सहन करके अपना सन्तुलन बनाए रखना बहुत आवश्यक है। ये सारी बातें परिष्कृत, जाग्रत् एवं सुविकसित क्षमता सम्पन्न अन्नमयकोश से ही सम्भव हैं।
साधना में लगे हुए शिष्य समुदाय के लिए उनका एक ही आश्वासन है- ‘न में भक्तः प्रणश्यति’ मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता।
साधना बिना किसी विघ्न-बाधा के पूरी हो जाती है। और यदि साधक में इस ज्ञान का अभाव है तो उसके लिए स्वाधिष्ठान चक्र एक अभेद्य लोहे की दीवार की तरह से होता है, जिसे किसी भी जन्म में कोई भी पार नहीं कर सकता। ‘सद्गुरु कृपा ही केवलं’ यही स्वाधिष्ठान चक्र की साधना का मूलमंत्र है। जिसकी सहायता से साधक को इससे आगे मणिपुर चक्र की साधना का अवसर मिलता है।
साधना घण्टे-दो-घण्टे नहीं बल्कि अनवरत चलती है। इसके साथ ही अनवरत कर्मबन्धन ढीले पड़ते जाते हैं। जन्म-जन्मान्तर के कर्मों का स्वाभाविक क्षय होता जाता है। कर्मों का भार घटने से चिन्तन में ज्ञान का स्वाभाविक प्रकाश उत्पन्न होता है। जिसे ज्ञानयोग की साधना से और अधिक प्रखर बनाया जा सकता है।
साधना है। और यह वैराग्य बौद्धिक नहीं वास्तविक एवं आन्तरिक होना चाहिए। योग साधक के मन में यह भाव होना चाहिए कि जीवन के सुखों का कोई अन्त नहीं। इच्छाओं को क्या कोई कभी पूरा कर सका है? भला कामनाओं, वासनाओं की अग्नि को विषय भोगों के घृत से आज तक कौन बुझा पाया है?
साधना का यही स्वरूप है। यह जहाँ भी अपने वास्तविक रूप में सम्पन्न होगी, वहाँ निश्चित रूप से आनन्दमय कोश का अमृत कलश छलक रहा होगा। स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी होंगी। उल्लास बिखरा पड़ा होगा, सन्तोष की सुखद वायु बह रही होगी।
साधना क्रम के लिए प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अनिवार्य है। इसीलिए इन पंक्तियों में इस साधना प्रक्रिया का विस्तार नहीं किया जा रहा।
साधनाओं से सर्वथा परे है। इस स्तर पर योग साधक को इस तथ्य का पूरा ज्ञान रहता है कि यद्यपि भाग्य है, फिर भी इसे पूर्णतया बदला जा सकता है। यह अन्तरिक्ष में कुछ फेंकने की भाँति है। यदि किसी पदार्थ को इस गति से फेंका जाय कि वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकल जाय, तो फिर इसे पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति वापस नहीं खींच पाएगी। ठीक इसी भाँति अनाहत चक्र की साधना करने वाले साधक की चेतना का स्तर इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह अपने प्रारब्ध के सहारे नहीं, बल्कि अपनी इच्छानुसार जीवन यापन करने में सक्षम हो जाता है।
साधनात्मक प्रयोग से अनुभव कर सकता है। योगीराज श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय के एक शिष्य ने उनसे पूछा- गुरुदेव योग साधना का रहस्य क्या है? तो उन्होंने उत्तर में मात्र एक शब्द कहा- ध्यान। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे बोले ध्यान कल्पवृक्ष है। इसकी सुखद छाँव में जो कोई बैठता है, उसकी सभी कामनाएँ अपने आप ही पूरी हो जाती हैं।
साधना दरअसल सूक्ष्म शरीर की साधना है। क्योंकि ज्ञानयोग में लीन साधक को सबसे पहला अहसास यही होता है कि पल-पल नष्ट होने वाला, हर घड़ी मृत्यु की ओर बढ़ने वाला स्थूल शरीर मेरा परिचय कभी नहीं हो सकता। यही अनुभूति ज्ञान योगी को नाशवान स्थूल से ऊपर उठाकर अविनाशी सूक्ष्म की ओर ले जाती है।
साधना की इसी भावदशा में ज्योतिपुञ्ज के दर्शन होते हैं। उनमें अनेकानेक दिव्य एवं स्वर्गीय संवेदनाएँ इसी समय प्रकट होती हैं।
साधना में बैठना चाहिए। अधिक देर बैठने में दिक्कत हो तो इसे लेट कर भी किया जा सकता है।
साधना तक के किसी भी क्षेत्र में उच्च स्तरीय कक्षा में पहुँचने के लिए अपने अन्नमयकोश को तदनुरूप ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य एवं सक्षम स्थिति में लाना होता है। यही प्रक्रिया अन्नमयकोश की योग साधना है।
साधना से प्राण ऊर्जा मणिपुर द्वार पुनः मस्तिष्क में वापस भेज दी जाती है। इस चक्र की साधना के अभाव में साँसारिक भोगों में ही जीवन की ऊर्जा क्षय हो जाती है। जबकि साधना द्वारा यदि इस चक्र को शुद्ध एवं जाग्रत् कर लिया जाय तो शरीर व्याधि रहित एवं कान्तिमय हो जाता है। साथ ही योगी की चेतना पुनः निम्न स्तरों पर वापस नहीं आती।
साधना क्रम में जो सबसे अनिवार्य तत्त्व है वह यह है कि सद्गुरु के प्रति भक्ति मात्र ध्यान के क्षणों में ही नहीं बल्कि अहर्निश पनपनी एवं उफननी चाहिए।
साधना यथार्थ में विवेक और वैराग्य की साधना है। और यह वैराग्य बौद्धिक नहीं वास्तविक एवं आन्तरिक होना चाहिए। योग साधक के मन में यह भाव होना चाहिए कि जीवन के सुखों का कोई अन्त नहीं। इच्छाओं को क्या कोई कभी पूरा कर सका है? भला कामनाओं, वासनाओं की अग्नि को विषय भोगों के घृत से आज तक कौन बुझा पाया है?
साधना के तत्त्वदर्शन का लक्ष्य पूरा होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर्मयोग प्रथम चरण है।
साधना के अवरोधों का निवारण-निराकरण कर सकता है। इस शिव ग्रन्थि का भेदन होते ही सारी अलौकिक शक्तियों-सिद्धियों से लगाव अपने आप ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद तो जीवन का हर पल-सृष्टि की हर घटना भगवत् लीला के रूप में अनुभव होने लगती है। इस अनुभूति की प्रगाढ़ता और इससे एकात्मता के लिए साधक को सहस्रदल कमल- सहस्रार में प्रवेश करना पड़ता है।
साधना की, भारी तप किया। इस सबके बावजूद जब वह सहस्रार का भेदन व जागरण में सफल नहीं हुए, तो उन्होंने योगिराज लाहिड़ी महाशय से निवेदन किया। गुरुकृपा स्वरूप उन्हें वह सब मिल गया, जो चेतना के विकास का चरम व परम लक्ष्य है।
साधना में दीक्षा देने का अधिकार केवल सद्गुरु को है। वही तुम्हारी सभी कामनाओं को तृप्त कर सकते हैं। मैं तो बस इतना कर सकता हूँ कि यदि तुम चाहो तो, तुम्हारे सद्गुरु की पहचान बता सकता हूँ। फकीर की इन बातों से युवक को भारी राहत मिली। उसने कहा- चलो यही सही, आप पहचान बताएँ।
साधना के लिए भाव-भरा आवाहन एवं स्नेह निमंत्रण दे रहा है।
साधना की सफलता संदिग्ध ही रह जाती है। और इसके वर्णित लाभों से वंचित ही रहना पड़ता है। योग साधना में अवतरित होने वाले दिव्य शक्ति प्रवाह से ठीक-ठीक लाभान्वित होने का सुयोग भी तभी बन पड़ता है, जब मनोभूमि इसके अनुरूप संवेदनशील एवं संस्कारवान बनाई जाय। इस संदर्भ में आहार-विहार का निर्धारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
साधना द्वारा यदि इस चक्र को शुद्ध एवं जाग्रत् कर लिया जाय तो शरीर व्याधि रहित एवं कान्तिमय हो जाता है। साथ ही योगी की चेतना पुनः निम्न स्तरों पर वापस नहीं आती।
साधना सम्प्रदायों में इस चक्र की साधना विधियाँ अनेक हैं। उन सबका अपना-अपना महत्त्व भी है। जिससे न इन्कार किया जा सकता है और न नकारा जा सकता है। पर यहाँ अनाहत चक्र की साधना की उस विधि को स्पष्ट करने का मन है, जो पूर्वोक्त सभी विधियों की अपेक्षा सहज, सरल, सुगम एवं निरापद है। इस विधि को अपनाने वाले साधक सर्वथा अभय होकर अनाहत चक्र और उससे सम्बन्धित मनोमय शरीर की उपलब्धियों से लाभान्वित हो सकते हैं।
साधना कर रहे हैं। हिमालय का कण-कण इनके तपःतेज से आवेशित है। इसके दिव्य प्रभाव के कारण ही व्यक्ति इसके आँचल में प्रवेश करते ही उच्चभाव भूमिका में विचरण करने लगता है। हिमालय की गोद में रहने वाले पहाड़ी लोगों की सरलता एवं सच्चरित्रता को इसी के प्रभाव की परिणति मान सकते हैं।
साधना योग साधकों के लिए तो महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है ही, साथ ही यह उनके लिए भी उपयोगी है, जो जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की अनुभूति के लिए उत्सुक हैं।
साधना के अनुभवों से परिचित हैं, उन्हें मालूम होगा कि मानव के जन्म-मरण की समस्या का प्रगाढ़ सम्बन्ध यहीं से है। इस चक्र की साधना करते समय यद्यपि कामनाओं और वासनाओं के संकट अनेक हैं, फिर भी गुरुकृपा, संकल्प शक्ति, आध्यात्मिक मार्ग में लगनशीलता, जीवन लक्ष्य के प्रति समर्पण व आत्मशोधन की प्रक्रिया एवं इसकी अनुभूतियों को ठीक से समझ कर साधक इस चक्र की साधना में उत्तीर्ण हो सकता है।
साधना की उस मनोभूमि की जो इसके सूक्ष्म स्पन्दनों को ग्रहण कर सके। इस ग्रहणशीलता को और अधिक बढ़ाने के लिए आहार-विहार का समुचित निर्धारण भी अभीष्ट है।
साधना के दौरान खान-पान का असंयम, ब्रह्मचर्य का अभाव, साधना पथ पर संदेह, अस्त-व्यस्त दिनचर्या आदि प्राथमिक बाधाएँ हैं, जिनके कारण व्यक्ति आलस्य-प्रमाद एवं हताशा-निराशा के झूले में झूलता रहता है।
साधना के अधिकारी हैं। दूसरों के लिए तो यह एक बौद्धिक पहेली भर है।
साधना के सूत्र कहाँ खोजें? इन सवालों का उत्तर एक ही है- ‘सद्गुरु की शरण’। पोथी और किताबें पढ़ने से योग का रहस्य नहीं प्रकट होता। प्रवचन करने और सुनने से साधना के सूत्र नहीं मिला करते। यदि ऐसा सम्भव हो पाता तो आज चहुँ ओर अनगिन योगी गण विचरण कर रहे होते।
साधना सम्पन्न करते हैं। जप और ध्यान के नियमित अभ्यास के साथ यदि श्रद्धा की गहनता को जोड़ा जा सके तो मणिपुर चक्र का परिशोधन व जागरण बड़ी ही सहजता से हो जाता है। कुछ विशेष करने के अभ्यासियों को भले ही इस कथन पर विश्वास न हो रहा है, पर यह एक तथ्य है।
साधना से इस आत्मघाती प्रक्रिया पर रोक लगायी जा सकती है। इस योग साधना से प्राण ऊर्जा मणिपुर द्वार पुनः मस्तिष्क में वापस भेज दी जाती है। इस चक्र की साधना के अभाव में साँसारिक भोगों में ही जीवन की ऊर्जा क्षय हो जाती है। जबकि साधना द्वारा यदि इस चक्र को शुद्ध एवं जाग्रत् कर लिया जाय तो शरीर व्याधि रहित एवं कान्तिमय हो जाता है। साथ ही योगी की चेतना पुनः निम्न स्तरों पर वापस नहीं आती।
साधना में सहयोगी बन जाता है। श्रेष्ठ चित्रकार जब किसी चित्र की कल्पना करता है तो उसके शरीर की हर इकाई उसके स्पन्दनों से प्रभावित होती है। शरीर की हलचल में उस कल्पना के स्पन्दन समाविष्ट हो जाते हैं तथा निर्जीव तूलिका सामान्य रंगों से जीवन्त चित्र का निर्माण कर देती है। यही स्थिति कला और ज्ञान के अन्य साधकों की भी है।
साधना कैसे हो? इसकी सिद्धि किस तरह की जाय? तो इन सवालों का जवाब एक ही है कि इसकी साधना समस्त सिद्धियों का सुपरिणाम है। यदि इसके स्वरूप को बहुत कुछ जानना ही हो, तो फिर इतना ही कहेंगे कि ऐसे जिज्ञासु योग साधक को सतत् गुरु कृपा का आवाहन करना चाहिए। योगिराज श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय के शिष्य स्वामी प्रणवानन्द ने इस उपलब्धि को इसी तरह से पाया था।
साधना करते हुए अपनी पात्रता विकसित करो। चिन्तन से ज्ञानयोगी बनो, चरित्र से भक्तियोगी और व्यवहार से कर्मयोगी। फिर तुम पर भी वैसी ही अनुभूतियों एवं उपलब्धियों की वर्षा होगी, जैसे कि मुझ पर हुई है। उनके इस अनुशासन को मानकर योग साधना में लगे हुए शिष्य समुदाय के लिए उनका एक ही आश्वासन है- ‘न में भक्तः प्रणश्यति’ मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता।
साधना के उपरान्त प्राप्त हो जाती है। इसके बाद हृदय-स्थान में अंगूठे के बराबर शुभ्र-श्वेत ज्योति स्वरूप प्राण शक्ति का ध्यान करना चाहिए- भावना यह रहे- मैं शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य अविनाशी आत्मा हूँ।
साधनारत होता है, तो यह ब्रह्म ग्रन्थि ढीली होने लगती है। जैसे-जैसे साधक में शक्ति का जागरण होता जाता है, वैसे-वैसे मूल केन्द्र से चेतना मुक्त होने लगती है।
साधना के रहस्यों की कुञ्जी है।’ यह तथ्य त्रिकाल सत्य है। इसे कोई कभी मेट और मिटा नहीं सकता।
साधना में आवश्यकता यह है कि गायत्री महामंत्र का जप मानसिक स्तर पर भावनात्मक प्रगाढ़ता के साथ मन्द गति से किया जाना चाहिए। ऐसे ढंग से मंत्र का जप करने से कुण्डलिनी जागरण बिना किसी परेशानी के सही ढंग से हो जाता है। साधना के इस क्रम में उपासना के समय के अतिरिक्त भी श्वास के साथ हर पल गायत्री महामंत्र के जप में साधक को संलग्न रहना चाहिए।
साधना है।
साधना प्रारम्भ हो जाती है।
साधना के द्वारा हम ऐसी मनःस्थिति विनिर्मित करें जो परिस्थितियों को दिव्य बनाने में सहायक सिद्ध हो सके। ऐसा दिव्य लोक कहीं है नहीं, उसे अपनी साधना से स्वयं ही बनाना पड़ता है। किसी के अनुग्रह से यह कार्य जादू की छड़ी घुमाने जैसी किसी क्रिया-प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता। मनोमय कोश के ध्यान योग से दिव्य लोक के परिष्कृत वातावरण का सृजन स्वयं ही करना पड़ता है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तरह स्वयं विधाता बनने के अलावा अन्य कोई उपाय नहीं।
साधना में उत्तीर्ण हो सकता है।
साधना किस तरह करें? इन सभी प्रश्नों के उत्तर में हम यहाँ सरल, निरापद उपायों की चर्चा करेंगे। सामान्य क्रम में प्रचलित साधनाओं में हठयोग की कठिन प्रक्रियाओं की चर्चा सुनने को मिलती है। इससे होने वाले लाभ निश्चित रूप से है, पर तनिक सी असावधानी होने पर हानियाँ इतनी अधिक हैं कि साधक का समूचा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। फिर उसे बचा पाना किसी के लिए सम्भव नहीं होता।
साधना सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है। योग साधना के अंतर्गत आसन, प्राणायाम, मंत्र जप, ध्यान, यज्ञ, उपवास, चांद्रायण व्रत जैसी क्रियाओं का अभ्यास कराया जाता है।
साधना के लिए व्यावहारिक तौर पर क्या करें? इस महाप्रश्न के उत्तर में पहला तथ्य यही है कि हम अपनी देह को भोग का साधन नहीं योग साधना का महत्त्वपूर्ण उपकरण माने। देह भगवान् का दिव्य मंदिर है- इस सत्य को दैनन्दिन जीवन में अनुभव किया जाय। जिनके जीवन में यह अनुभूति आएगी, वही अन्नमयकोश की योग साधना के अधिकारी हैं। दूसरों के लिए तो यह एक बौद्धिक पहेली भर है।
साधना में अवतरित होने वाले दिव्य शक्ति प्रवाह से ठीक-ठीक लाभान्वित होने का सुयोग भी तभी बन पड़ता है, जब मनोभूमि इसके अनुरूप संवेदनशील एवं संस्कारवान बनाई जाय। इस संदर्भ में आहार-विहार का निर्धारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
साधना पद्धतियों में किसी न किसी रूप में इसकी चर्चा की गयी है। इसे शिव की आँख भी कहा जाता है, क्योंकि शिव को ध्यान का सार माना गया है, जिसका आज्ञा चक्र से सीधा सम्बन्ध है। कतिपय योगशास्त्रों में इसका वर्णन दिव्य चक्षु या ज्ञान चक्र के रूप में भी मिलता है। क्योंकि इसके द्वारा योग साधक को छिपे हुए अस्तित्त्व की प्रकृति का पता चलता है।
साधना का विशिष्ट प्रयोग यहीं सम्पन्न हुआ था। 1984 से 87 तक तीन वर्ष तक चली इस साधना का उद्देश्य सूक्ष्म प्रकृति में हेर-फेर करना था, जिससे कि युग परिवर्तन की संभावनाएँ साकार हो सके। आध्यात्मिक साधना के इतिहास में इस तरह का पुरुषार्थ इससे पूर्व केवल ब्रह्मऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। जब वे नई सृष्टि के निर्माण के लिए संकल्पित हुए थे। इतिहास को दोहराता हुआ नूतन प्रयोग परम पूज्य गुरुदेव द्वारा पुनः उसी भूमि में सम्पन्न हुआ।
साधना की थी। जिनमें समाधि को उन्होंने मोक्ष के लिए सर्वोत्कृष्ट उपयोगी साधन माना। काम, क्रोध, भय, निद्रा एवं श्वास आदि का निरोध करके ध्यानावस्थित होना साँख्य-योग का साधन है। और भगवान् बुद्ध ने यही किया था।
साधना के साथ ही योग साधक पर जाग्रत् कुण्डलिनी का अमृत बरसता है। जिसके परिणाम स्वरूप जीवन में विशेषताओं और विभूतियों की सम्पदा अनायास ही अंकुरित और पल्लवित होने लगती है। जिसके सतत् अभिवर्द्धन के लिए समर्थ सद्गुरु का संरक्षण अनिवार्य है।
साधना सत्रों का यह क्रम आगे एक माह व नौ दिवसीय सत्रों के रूप में जारी रहा व आज भी अनवरत रूप से चल रहा है जिसमें बढ़ते हुए साधकों की संख्या यहाँ के वातावरण के प्रति बढ़ती श्रद्धा एवं तप-साधना के प्रति बढ़ती निष्ठ, दोनों को ही प्रमाणित कर रही है।
साधना करने पर साधक योगी बन जाता है। क्योंकि तब उसकी चेतना पूर्णतया योगमय हो जाती है। ऐसी स्थिति में उसके निर्णय बाह्य जगत् या विश्वास अथवा कर्म प्रारब्ध पर आधारित न होकर पूर्णतया आत्मविश्वास एवं अपनी चेतना शक्ति पर आधारित होते हैं।
साधना में अतिवादी जीवन पद्धति भी एक बड़ी बाधा है। अति भोजन या अति तप के अंतर्गत शरीर को अतिशय सताना, अति वार्तालाप या अति मौन, लोगों के साथ अति मिलना या अति आत्मकेन्द्रित हो जाना, ये सभी योग मार्ग के व्यवधान हैं।
साधना के प्रारम्भ में इसकी स्थिति और स्थान जो जानना बहुत कठिन है। इसीलिए भ्रूमध्य में उसके क्षेत्र विशेष पर ध्यान किया जाता है। जहाँ यह कह देना भी आवश्यक है कि आज्ञा चक्र और पीनियल ग्रन्थि दोनों एक ही हैं। जबकि पीयूषिका ग्रन्थि सहस्रार है। पीनियल और पीयूषिका ग्रन्थियों की ही भाँति आज्ञाचक्र एवं सहस्रार में नजदीकी सम्बन्ध है।
साधना की प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म होती है कि सद्गुरु की चेतना साधक के अहंकार को कब, कैसे और किन तरीकों से समाप्त करती है- पता ही नहीं चलता। इसी कारण प्रायः लोग बीच में ही घबराकर साधना छोड़ बैठते हैं। परन्तु जो गुरु की प्रत्येक चोट को सहते हैं गुरुभक्ति में निरत रहते हैं, उन्हें सफलता मिलना सुनिश्चित है। यहाँ यह बलपूर्वक एवं पूरे विश्वासपूर्वक कहा जा रहा है कि अनाहत चक्र के जागरण के लिए अनाहत कमल पर सद्गुरु की दिव्य मूर्ति के ध्यान से बढ़कर अन्य कोई श्रेष्ठ साधना नहीं है।
साधना क्रम में शरीर अपनी असमर्थता प्रकट करके साथ देने से कतराने न लगे। अन्नमय कोश के शुद्ध व पुष्ट होने पर ही व्यक्ति साँसारिक उतार-चढ़ावों के बीच अपनी शरीर यात्रा को सन्तुलित क्रम से चलाता हुआ, अपने आत्मिक लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से आगे बढ़ सकता है।
साधना द्वारा संस्कारित होते थे।
साधना से ही उजड़ी हुई इन्सानी दुनिया फिर से बस सकती है।
साधना पथ पर संदेह, अस्त-व्यस्त दिनचर्या आदि प्राथमिक बाधाएँ हैं, जिनके कारण व्यक्ति आलस्य-प्रमाद एवं हताशा-निराशा के झूले में झूलता रहता है।
साधना के प्रति जिज्ञासा पूरी करेंगे? सबसे गहन और अनिवार्य सवाल यह है कि क्या हमारे अन्दर सच्चे शिष्यत्व ने जन्म ले लिया है? क्या हमारे पास वे आँखें हैं जो उन्हें देख और पहचान सकें? अपने अन्दर इन प्रश्नों का समाधान खोजे बगैर सद्गुरु की कृपा नहीं मिल सकती है। और सद्गुरु की कृपा के बिना योग साधना के रहस्य नहीं जाने जा सकते।
साधना से खरा प्रमाणित किया। साथ ही उन्होंने उनकी युगानुकूल वैज्ञानिक व्याख्या भी प्रस्तुत की है। अपने साधनामय जीवन के महाप्रयोग का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया- मानवीय जीवन के सभी प्रश्नों का सार्थक हल योग साधना में निहित है। इतना ही नहीं इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना योग की अनिवार्यता को स्वीकार कर ही किया जा सकता है।
साधना पद्धति उसके विरह में है।
साधना के इस स्तर को पार करते समय उन्हें बहुत अधिक अशान्ति व मोह-माया का सामना करना पड़ा था।
साधना का अवसर मिलता है।
साधना कितना दुष्कर कार्य बन जाता है, इसे सामान्य जीवन क्रम में ही अनुभव किया जा सकता है। शहर का कोलाहल, गंदगी एवं भीड़ भरा वातावरण स्वस्थ व्यक्ति तक को अर्ध पागल जैसी स्थिति में ला देता है। अस्पताल एवं मरघट के वातावरण में जीवन की नश्वरता एवं सत्य का बोध कितनी सहजता से होता है इसे हर कोई जानता है। इसी तरह राग-रंग भरे भड़काऊ वातावरण में मन के निग्रह की दुष्वारिता समझी जा सकती है।
साधना की सफलता बहुत हद तक आहार के उचित निर्धारण पर निर्भर करती है। इसी तरह डॉ. वेलेन्टाइन ‘ट्राँजीशन टू वेजीटेरिएनिज्म’ में सात्विक सुपाच्य एवं पोषक तत्त्वों से भरे शाकाहारी आहार को शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक स्थिरता एवं स्वास्थ्य के लिए आवश्यक मानते हैं।
साधनाएँ प्रकट व जीवन्त हुई हैं। पन्द्रह वर्ष की आयु में अपने मार्गदर्शक से प्रथम मिलन के पश्चात् महाप्रयाण दिवस तक उनकी प्रत्येक श्वास योग साधना के लिए समर्पित रही। वसन्त पंचमी 1926 ई. से गायत्री जयंती 1990 ई. तक उनके जीवन का हर वर्ष, हर माह, हर दिन और हर क्षण योग में बीता।
साधना प्रारम्भ होती है। ज्ञानयोग की साधना दरअसल सूक्ष्म शरीर की साधना है। क्योंकि ज्ञानयोग में लीन साधक को सबसे पहला अहसास यही होता है कि पल-पल नष्ट होने वाला, हर घड़ी मृत्यु की ओर बढ़ने वाला स्थूल शरीर मेरा परिचय कभी नहीं हो सकता। यही अनुभूति ज्ञान योगी को नाशवान स्थूल से ऊपर उठाकर अविनाशी सूक्ष्म की ओर ले जाती है।
साधना के इस तल पर सभी अवशेष कर्म तथा नकारात्मक संस्कारों का निष्कासन प्रारम्भ हो जाता है। इस समय क्रोध, भय, यौन विकृतियाँ तथा दूसरी तरह की कामनाएँ, वासनाएँ उफनने-उमगने लगती हैं। सभी प्रकार की तामसिक वृत्तियों, तंद्रा, अकर्मण्यता तथा निराशा आदि के बवण्डर इसी दौरान पनपते हैं। इस समय हमेशा ही सोते रहने की इच्छा जोर मारती है। साधना की यह स्थिति शोधन काल कहलाती है।
साधना की उस विधि को स्पष्ट करने का मन है, जो पूर्वोक्त सभी विधियों की अपेक्षा सहज, सरल, सुगम एवं निरापद है। इस विधि को अपनाने वाले साधक सर्वथा अभय होकर अनाहत चक्र और उससे सम्बन्धित मनोमय शरीर की उपलब्धियों से लाभान्वित हो सकते हैं।
साधना की इन परम्पराओं में इस सत्य का स्पष्ट उल्लेख है कि यदि जाग्रत् चेतना मणिपुर चक्र तक आ सकी तभी जागृति को सुनिश्चित माना जाना चाहिए। इन सभी दृष्टियों से मणिपुर चक्र की साधना का विशेष महत्त्व है।
साधना करने वालों के जीवन में अहंकार का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इस साधना की प्रक्रिया इतनी सूक्ष्म होती है कि सद्गुरु की चेतना साधक के अहंकार को कब, कैसे और किन तरीकों से समाप्त करती है- पता ही नहीं चलता। इसी कारण प्रायः लोग बीच में ही घबराकर साधना छोड़ बैठते हैं। परन्तु जो गुरु की प्रत्येक चोट को सहते हैं गुरुभक्ति में निरत रहते हैं, उन्हें सफलता मिलना सुनिश्चित है। यहाँ यह बलपूर्वक एवं पूरे विश्वासपूर्वक कहा जा रहा है कि अनाहत चक्र के जागरण के लिए अनाहत कमल पर सद्गुरु की दिव्य मूर्ति के ध्यान से बढ़कर अन्य कोई श्रेष्ठ साधना नहीं है।
साधना शक्ति के परिणाम स्वरूप शरीर में प्राण प्रवाह पूर्ण रूपेण पुनर्संगठित होता है। जिससे मणिपुर चक्र की शक्तियाँ जाग्रत् एवं विकसित होने लगती हैं।
साधना का कथा-विस्तार बहुत है। इसे यदि एक पंक्ति में कहा जाय तो यही होगा कि- नरक की ज्वालाओं से उबर कर स्वर्ग के नन्दनकानन में प्रवेश। इस पंक्ति की सच्चाई को कोई भी ध्यान योग के साधनात्मक प्रयोग से अनुभव कर सकता है। योगीराज श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय के एक शिष्य ने उनसे पूछा- गुरुदेव योग साधना का रहस्य क्या है? तो उन्होंने उत्तर में मात्र एक शब्द कहा- ध्यान।
साधना है। उसे न तो कर्म की चाहत है, और न ही ज्ञानप्राप्ति की आकाँक्षा। वह तो आठों याम बस अपने प्रभु का दीवाना है। अपना सब कुछ देकर भी ‘दे दूँ कुछ और अभी’ के लिए फिक्रमन्द है। भक्त प्रेम की शुद्धतम एवं उच्चतम अवस्था में जीवन जीता है।
साधना और उसके फल का गुह्य वर्णन है। ज्ञानयोगी की अनिवार्य पहचान है- शुद्ध इन्द्रिय वाला। जिसने गहन आत्म जिज्ञासा से अपनी कल्पना, चिन्तन एवं चित्त वृत्तियों को परिशोधित कर लिया है, वही शुद्ध इन्द्रिय वाला हो सकता है। जो ज्ञानयोग को बौद्धिक क्रिया-कलापों से जोड़ते हैं, उनके लिए इस उपलब्धि को पाना सम्भव नहीं। क्योंकि ज्ञानयोगी के लिए महर्षि अष्टवक्र एक अन्य स्थान पर ‘गलित धीः’ शब्द का प्रयोग करते हैं।
साधना का अधिकाँश समय इसी वातावरण के सान्निध्य में बिताया था। गोरखनाथ सम्प्रदाय के साधना संस्कार भी इस भूमि से जुड़े हुए हैं। महाराजा भर्तृहरि आजीवन इस वातावरण की कामना करते रहे, जो उनकी अमरकृति वैराग्य शतक में कुछ इस तरह मुखरित हुई-
साधना का प्रारम्भ मानसिक क्षेत्र की धुलाई-सफाई से होता है। लेकिन बाद में इसका विस्तार उसे समुन्नत, सुसज्जित एवं सुसंस्कृत बनाने तक जा पहुँचता है। अतीन्द्रिय शक्तियों का विकास एवं दिव्य क्षमताओं का उभार भी इसी क्रम में होता है।
साधना से लोक-लोकान्तर के द्वार खुलते हैं। आज्ञाचक्र की इस साधना के क्रम में दिव्य लोक की शक्तियों से संपर्क-सान्निध्य एक सामान्य सी बात बन जाती है। परन्तु यह तो इस साधना क्रम की शुरुआती सफलता भर है। अपने सद्गुरु के सन्देश और आदेश भी इसी साधना से जाने-सुने और समझे जाते हैं। संक्षेप में आज्ञा चक्र की साधना के परिणाम अनुभूति के विषय हैं।
साधना करते समय यद्यपि कामनाओं और वासनाओं के संकट अनेक हैं, फिर भी गुरुकृपा, संकल्प शक्ति, आध्यात्मिक मार्ग में लगनशीलता, जीवन लक्ष्य के प्रति समर्पण व आत्मशोधन की प्रक्रिया एवं इसकी अनुभूतियों को ठीक से समझ कर साधक इस चक्र की साधना में उत्तीर्ण हो सकता है।
साधना, जो इक्कीसवीं सदी में प्रत्येक मानव का अनिवार्य कर्त्तव्य बन गयी है। यही वह औषधि है, जिसके द्वारा समय की समस्त व्याधियों का निदान सम्भव है।
साधना के इस क्रम में उपासना के समय के अतिरिक्त भी श्वास के साथ हर पल गायत्री महामंत्र के जप में साधक को संलग्न रहना चाहिए।
साधना का प्रभाव मात्र शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य तक सीमाबद्ध नहीं किया गया है। इसमें वे चेष्टाएं एवं प्रक्रियाएँ भी शामिल हैं, जिससे कि आन्तरिक जीवन का कायाकल्प हो सके। साथ ही व्यक्ति की इन्द्रिय चेतना, अतीन्द्रिय स्तर का स्पर्श पा सके। इस विषय में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के निदेशक अपनी व्यस्ततम दिनचर्या एवं देश-विदेश के अनेकानेक कार्यक्रमों के बावजूद शोध कार्य का मार्गदर्शन करते हैं। उनकी प्रभा ने अन्य विद्वानों-विशेषज्ञों को भी इस कार्य के लिए प्रभावित एवं आकर्षित किया है।
साधना का नियमित अभ्यास मनुष्य को स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रतिभा, विद्या, हंसी, खुशी के ढेरों वरदान दे सकती है। शास्त्र वचन है- योगी के लिए कुछ असम्भव नहीं। तो आइए इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना को साकार करने के लिए योग साधना के तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करें।
साधना को और अधिक तीव्र एवं प्रखर बनाने के लिए गायत्री महामंत्र के जप के साथ तप के अनुबन्धों का होना आवश्यक है। ध्यान रहे कि तपस्या शुद्धिकरण की एक क्रिया है। उसे ठण्डे पानी अथवा कड़ी धूप में खड़े रहने जैसी अन्य हरकतें मानकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। तपस्या का निहितार्थ- संस्कारों एवं वासनाओं का समूल क्षय है। इसके रहस्य को परम पूज्य गुरुदेव ने गायत्री महाविज्ञान के प्रथम खण्ड में विस्तार से बताया है।
साधना का मूलमंत्र है। जिसकी सहायता से साधक को इससे आगे मणिपुर चक्र की साधना का अवसर मिलता है।
साधना को आत्मानुभूति योग भी कहा गया है। आत्मविद्या के सभी जिज्ञासु यह जानते हैं कि आत्मा अविनाशी है- परमात्मा का सनातन अंश है। परन्तु इस सामान्य जानकारी का एक लघु कण भी उनकी अनुभूति में नहीं होता। शरीर के लाभ के लिए आत्मा के लाभों की उपेक्षा प्रतिक्षण होती रहती है। दीनता, लालसा, तृष्णा हर घड़ी घेरे खड़ी रहती है।
साधना के लिए प्रवृत्त हुए थे। इसी तरह अपनी दिग्विजय यात्रा के दौरान आदि शंकराचार्य को यह वातावरण भाया था।
साधना की परम्परा को उत्कृष्टता एवं उत्कर्ष प्रदान किया।
साधना के साथ ही साधक अपने छठे शरीर, जिसे ब्रह्मशरीर कहते हैं, में प्रवेश करता है। ऐसी दशा में वह हमेशा ब्रह्म के साथ एकाकार अवस्था में रहता है और अनेकानेक शक्तियों का स्वामी होता है।
साधना के इतिहास में इस तरह का पुरुषार्थ इससे पूर्व केवल ब्रह्मऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। जब वे नई सृष्टि के निर्माण के लिए संकल्पित हुए थे। इतिहास को दोहराता हुआ नूतन प्रयोग परम पूज्य गुरुदेव द्वारा पुनः उसी भूमि में सम्पन्न हुआ। इसी के बाद पूज्यवर ने 21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य की उद्घोष किया था भावी प्रज्ञायुग की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।
साधना के सूत्रों और उनमें समाए, रहस्यों को उजागर उद्घाटित करेगी। यह उद्घाटन सही और समुचित रीति से हो, इसके लिए उपयुक्त वातावरण की भी आवश्यकता है।
साधना का अर्थ है-मानव चेतना में आदर्शोन्मुखी चिन्तन एवं प्रवृत्तियों के विकास सम्बन्धी प्रयोग एवं शिक्षण। 2. स्वास्थ्य के अंतर्गत मनुष्य के शारीरिक, मानसिक स्वस्थ जीवन के लिए आयुर्वेद सहित अन्य वैकल्पिक चिकित्सा विधियों पर गहन शोध, शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था जुटायी जाएगी। 3. शिक्षा के अंतर्गत मानव जीवन के सभी आयामों को दैवी जीवन के अनुरूप प्रशिक्षित करने वाले दार्शनिक, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक पाठ्यक्रमों को लागू किया जाएगा। 4. स्वावलम्बन के अंतर्गत उन पाठ्यक्रमों एवं योजनाओं को क्रियान्वित किया जाएगा जो ‘बहुजन हिताय एवं बहुजन सुखाय’ की नीति का पालन करते हुए युवा पीढ़ी को मूल्यनिष्ठ, स्वावलम्बी एवं सुखी बना सके, साथ ही पर्यावरण के अनुकूल हों।
साधना के तत्त्वदर्शन को हृदयंगम करें।
साधना में सबसे प्रथम और सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान आलस्य और प्रमाद को निरस्त करना है। इसके लिए यह जरूरी है कि समय को बहुमूल्य व बेशकीमती समझा जाय। और एक-एक क्षण का पूरा सदुपयोग करने के लिए श्रम संलग्न रहा जाय। प्रातःकाल उठते ही-अथवा रात्रि को सोते समय अगले दिन किए जाने वाले कर्त्तव्य-कर्मों को ध्यान में रखते हुए दिनचर्या बना ली जाय और जब तक कोई अनिवार्य कारण न आ जाए, तब तक उस दिनचर्या को ईश्वर की आराधना मानकर पूर्ण मनोयोग पूर्वक पूरा किया जाय। इस क्रम में विश्राम का अवकाश भी रखा जा सकता है, पर उसके लिए ढेर सारा समय गंवाने की जरूरत नहीं है।
साधना करने वाले योग साधक को चेतना के अनन्त स्तर का ज्ञान होता है। इस स्तर पर चेतना का विस्तार अनन्त होता है। जो सुन्दरता, सत्य तथा पवित्रता से परिपूर्ण होता है। इस मानसदर्शन के साथ ही साधक की सभी पूर्व धारणाएँ अपने आप ही बदल जाती हैं। व्यक्तिगत द्वेष-मनोग्रंथियां तथा प्रवृत्तियाँ सभी समाप्त हो जाती हैं।
साधना के इस पुण्य प्रवाह को भगवान् श्रीरामकृष्ण परमहंस एवं उनके शिष्य समुदाय में अग्रणी स्वामी विवेकानन्द, महर्षि दयानन्द तथा महर्षि अरविन्द जैसे देवमानवों ने प्रवाहमान् किया है। बीसवीं सदी के मध्य पूर्व से सन् 1990 तक महायोगी परम पूज्य गुरुदेव की उपस्थिति ने योग साधना की परम्परा को उत्कृष्टता एवं उत्कर्ष प्रदान किया।
साधना करने वाले साधक को देह से ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिसे भगवान् को समर्पित करने में मन डाँवाडोल हो। यदि समूचे जीवन क्रम में इस नियम का समावेश हो सका तो अन्नमय कोश की पवित्रता एवं प्रखरता देखते ही बनेगी। उपरोक्त पंक्तियों में कही गयी बातें इसलिए नहीं कही जा रही हैं कि इन पर प्रयोग किए जाएँ। और इनसे प्राप्त निष्कर्षों की सच्चाई से शान्तिकुञ्ज के संचालकों को अवगत कराया जाय।
साधना के विकास के लिए इन सिद्धियों के माया जाल में नहीं पड़ते। क्योंकि इन सिद्धियों का थोड़ा सा भी आध्यात्मिक मूल्य नहीं है।
साधना से ही स्वयं को सही ढंग से जाना जा सकता है। और जब हम स्वयं को जान पाएँगे, तभी यह अनुभूति होगी कि हमारे लिए क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी? हर युग के सन्तों, भक्तों एवं महापुरुषों ने अपने-अपने युग में इन्सान को इसके लिए चेताने की कोशिश की हैं। पर कभी उन्हें सुना गया, तो कभी अनसुना किया गया। पर अब बात कुछ और है।
साधना- ध्यान है। भ्रूमध्य में ज्योति अथवा उगते हुए सूर्य का ध्यान करने से आज्ञा चक्र स्फुरित और जाग्रत् होने लगता है। ध्यान साधना के इस क्रम में अपने ईष्ट देव-देवी का भी ध्यान किया जा सकता है। इन सबके बावजूद आज्ञाचक्र की सिद्धि के लिए जो सबसे प्रभावी एवं शीघ्र फलदायी उपाय है, वह है- उगते हुए सूर्य मण्डल के मध्य परम पूज्य गुरुदेव का ध्यान। यदि यह ध्यान साधना नियमित एवं प्रगाढ़ हो, तो मात्र छः महीने में ही अपनी सफलता के संकेत देने लगती है।
साधना के दौरान विविध रूपों में विघ्न-बाधाएँ बनकर उपस्थित होती हैं।
साधना की दृष्टि से स्वाधिष्ठान चक्र को व्यक्ति के अस्तित्व का आधार माना गया है। मस्तिष्क में इसका प्रतिरूप अचेतन मन है। जो संस्कारों का भरा-पूरा भण्डार है। अध्यात्मवेत्ताओं का मानना है कि प्रत्येक कर्म, पिछला जीवन, पिछले अनुभव, अचेतन में संगृहीत रहते हैं। इन सभी का प्रतीक स्वाधिष्ठान चक्र ही है।
साधना नहीं है।
साधनात्मक प्रयोगों के निष्कर्ष स्वरूप उन्होंने बताया कि व्यष्टि का समष्टि से संयोग हुए बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती। वैयक्तिक चेतना के विराट् विश्व में विस्तीर्ण सत्-चित्-आनन्दमय चेतना में मिलने पर ही मनुष्य की अतृप्ति व अशान्ति का स्थायी अन्त हो सकता है। मानव जीवन का लक्ष्य भी यही है। इसे पाने के लिए निर्दिष्ट समस्त पद्धतियाँ योग का ही अंग हैं। क्योंकि योग का अर्थ ही है व्यष्टि का समष्टि से तादात्म्य, लघु का विभु, अणु का महत् और जीवात्मा का परमात्मा से पूरी तरह जुड़ जाना, सदा-सदा के लिए एक हो जाना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-July
साधना की गुप्त धारा’ में लिखते हैं कि इस जगत् में अज्ञान के आवरण में आच्छन्न होकर मोहनिद्रा में निद्रित हैं। इससे जागना ही वास्तविक जाग्रति है, शक्ति का अनावरण है, विभूतियों का उद्भव और ऐश्वर्य का प्रकटीकरण है। हम लोग व्यवहार भूमि में जिसे जाग्रत् अवस्था समझते हैं, वह भी वास्तव में जाग्रत् नहीं है। चेतना की तीन स्थितियाँ जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति भी प्रकाराँतर से नींद के ही भेद मात्र हैं। इनको त्यागना ही ईश्वरप्राप्ति है।
साधना का उपाय कर्मयोग के रूप में वर्णित है। निष्काम कर्म ही स्व की सिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। कर्मयोग का समस्त मर्म निष्काम कर्म पर ही निर्भर करता है। आसक्ति एवं फलरहित कर्म शरीर की तपस्या है। शरीर जब भगवत् आराधना करेगा, तो उसे निष्काम कर्म का पथ अनुसरण करना पड़ेगा।
साधना ही है। इसलिए इसे सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा गया है। इस कर्म से अंतःकरण शुद्ध एवं पवित्र होता है। इसमें प्रसिद्धि, यश, मान-सम्मान की कोई इच्छा नहीं होती । इसमें अपने मनोरथों, इच्छाओं, लालसाओं या अभिरुचियों का कोई आग्रह नहीं होता।
साधना अपने विधि-विधान में संपूर्ण एवं समग्र है।
साधना, महाप्रयाण के बाद सूक्ष्म व कारण सत्ता से सक्रिय उनका अस्तित्व, उनके द्वारा ब्राह्मीचेतना से एकाकार होकर किया गया अकर्म है, जिसका महत्त्व सर्वाधिक है। जिसे हम नहीं जानते, जिसे हमने नहीं देखा, अकर्म की स्थिति में किए गए उस कर्म के एक पल में किए गए कार्यों से इतिहास बदल जाता है।
साधना करने के लिए किसी कर्म को उसका क्षेत्र बनाया जा सकता है। जिस भाव और चेतना से कोई कर्म किया जाता है वही उसे उसका स्वरूप प्रदान करता है। कर्म स्वयं में कुछ विशेष नहीं होता। उसमें निहित भाव ही उसे विशेषता प्रदान करता है। भाव विशेष से कामनारहित या मुक्त कर्म भी संभव है।
साधना का तेजस्वी जीवन बिताते थे। तपोवेष्ठित होने से उनका शरीर स्वर्ण जैसा दैदीप्यमान् होता था। संसार की कठिनाइयों से संघर्ष करने की उनमें शक्ति होती थी। वार्त्तालाप, विवेचन, विश्लेषण और विचार-विनिमय के द्वारा उनमें गंभीर चिंतन की प्रवृत्ति जागती थी। साधना-स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी।
साधना है।
साधना कर रहा है, वह जो कर्म कर रहा है, वह अकर्म है और इस अकर्म में बड़ी शक्ति छिपी पड़ी है।” यदि हम इतिहास के पृष्ठ पलटें तो पाते हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों भूमिका निभाने वाले दो ही संत हैं, महापुरुष हैं, श्री अरविंद एवं पं. श्रीराम शर्मा आचार्य। दोनों ने ही प्रारंभिक जीवन में युवावस्था में एक क्राँतिकारी के रूप में सक्रिय भूमिका निभाकर इस महासंग्रामरूपी महायज्ञ में आहुतियाँ दीं एवं दोनों ने ही जीवन का उत्तरकाल आध्यात्मिक तप-वातावरण को प्रचंड ऊर्जा से ओतप्रोत करने की प्रक्रिया संपन्न करने में लगाया। जीवन के अंतिम वर्षों में श्री अरविंद भी काफी समय एकाकी-अंतर्मुखी साधना में लीन रहते थे। परमपूज्य गुरुदेव का जीवन भी गवाह है कि अंतिम बीस वर्ष के सूक्ष्मीकरण के 1984 से आरंभ होकर 1990 में समाप्त हुए छह वर्ष एकाँत साधना हेतु ही नियोजित थे।
साधना समाधि तक पहुँचा देती है। इस प्रकार गायत्री के प्रथम चरण की साधना हमें अंतर्मुखी बना देती है। इसके प्रयोग से संसार में व्यवहार सहज एवं आनंदमय हो जाएगा।
साधना और उसकी परिणति’ शीर्षक से एक लेख में वे लिखते हैं, “अपने मार्गदर्शक के प्रति हमारी प्रेम साधना को यदि साँसारिक रिश्तों से तोला जाए, तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अनन्य पतिप्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है। उनकी इच्छा अपनी इच्छा।” (पृष्ठ 62, अप्रैल 1969) “परमात्मा का प्रेम अपने विकसित रूप में एक कदम आगे बढ़ते हुए गुरुभक्ति के रूप में फलित हो सका। हमने अपने मार्गदर्शक पर उतनी ही निष्ठा आरोपित की, जितनी परमेश्वर पर की जा सकती है।
साधना का भी उल्लेख मिलता है। विषाद अथवा दुःख ही मानव मन को भुवः अवस्था में अर्थात् दुःख-निवारण के लिए गहरी भाव अवस्था में प्रवेश कराता है। वस्तुतः दुःख ही सच्चा सहायक एवं सहयोगी है। यही चिरस्थायी साथी हे। सुख तो बिजली की चमक के समान आता है और चला जाता है।
साधना निष्फल नहीं जाती।
साधना कर ली तो विदेह हो गए। क्रूसारोहण के समय में भी वे मुसकराते रहे। माँडव्य ऋषि भी शूली पर चढ़ाए गए, परंतु वे तनिक भी नहीं घबराए। तपस्या के बाद ही यह स्थिति प्राप्त होती है। तप द्वार अंतःकरण निर्मल एवं पवित्र हो जाता है।
साधना करते व कराते रहे, संगठन खड़ा करते रहे। परंतु उनके इस कर्म में छिपे अकर्म एवं अकर्म दिखाई देने वाले पुरुषार्थ में निहित कर्म में वह सत्य छिपा पड़ा है, जिसने ‘युगनिर्माण योजना’ को मूर्त रूप दिया, एक विराट् तंत्र खड़ा कर दिया।
साधना का आध्यात्मिक फल आँतरिक मनोभाव पर निर्भर करता है। इसके लिए महत्त्वपूर्ण तथ्य है कर्म में प्रयुक्त पूजा का भाव। यदि कोई कर्म के साथ-साथ भगवान् को स्मरण कर सके एवं कर्म को सहारा देने वाली व इसे संपादित करने वाली शक्ति को अनुभव कर सके, तो वह कर्म की साधना से मिलने वाले आध्यात्मिक परिणाम को द्विगुणित कर देती है। प्रेम एवं भक्ति कर्म की मूल प्रेरक शक्ति है। अतः कर्म की साधना को आनंदपूर्वक करते जाना चाहिए।
साधना ही इस हेतु एकमात्र उपाय है। भोग वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर एवं अंतःकरण को पवित्र एवं निर्मल बनाकर ही प्रकृति से विजय प्राप्त की जा सकती है।
साधना का समग्र उद्देश्य और गुरुकृपा का संपूर्ण लक्ष्य साक्षात्कार कहते हैं। साधारण से असाधारण एवं क्षुद्र से महान् बनने की यही प्रक्रिया है।
साधना बन जाता है, उससे मुक्ति प्रवाहित होने लगती है। निष्काम कर्म, कर्म की साधना ही है। इसलिए इसे सर्वश्रेष्ठ कर्म कहा गया है। इस कर्म से अंतःकरण शुद्ध एवं पवित्र होता है। इसमें प्रसिद्धि, यश, मान-सम्मान की कोई इच्छा नहीं होती ।
साधना से बुद्धि निर्मल होती है एवं भगवान् की ओर प्रेरित होती है।
साधनाप्रसूत उपदेशों से विद्ध है। उपदेश उसने हृदयंगम कर लिए हैं।”
साधना-स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान-पुँज ही नहीं, शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा नहीं होती थी। जब वे अधिकार नहीं कर्त्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे।
साधना प्रसंग एवं संस्कृति का प्रकरण अधूरा रह जाता है। गुरु-शिष्य परंपरा ही आदिकाल से ज्ञान-संपदा का संरक्षण कर उसे श्रुति के रूप में क्रमबद्ध करती आई है। भारत को जगद्गुरु की उपमा इस कारण ही दी जाती रही है कि उसने विश्व-मानवता का न केवल मार्गदर्शन किया, अपितु ब्राह्मणत्व के आदर्शों को जीवन में उतार कर औरों के लिए वह प्रेरणा स्रोत बना। गुरु व शिष्य के परस्पर महान् संबंधों एवं समर्पण भाव द्वारा अपने अहंकार को गलाकर ज्ञान-प्राप्ति की महत्ता का विवरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर मिलता है।
साधना में आनंद तब आता है, जब दिव्य शक्ति का सक्रिय भाव में अवतरण होता है। जिस कर्म को करने के लिए मनुष्य की आत्मा स्वीकृति प्रदान करे, वही उसके लिए सर्वोत्तम है। कर्म की यह साधना अपने विधि-विधान में संपूर्ण एवं समग्र है।
साधना क्षेत्र में ऊँचाइयों को प्राप्त होंगे। गुरु जो कहे बिना कोई विकल्प प्रस्तुत किए, बिना कोई तर्क किए उसे करना ही साधना है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं, सपनेहुँ सुलभ न तेहिं।
साधना आगे बढ़ती चलेगी, वैसे-ही-वैसे मन अपने आप स्थिर होता चलेगा। जप के समय मस्तिष्क के मध्य भाग में अँगूठे के बराबर दीपक की लौ के समान पीतवर्ण गायत्री तेज का ध्यान किया करें। इससे आपका चित्त शाँति और एकाग्रता की ओर अग्रसर होगा।
साधना अपने आनंदस्वरूप में स्वयं स्थित होने की है। यही साधना समाधि तक पहुँचा देती है। इस प्रकार गायत्री के प्रथम चरण की साधना हमें अंतर्मुखी बना देती है। इसके प्रयोग से संसार में व्यवहार सहज एवं आनंदमय हो जाएगा।
साधना के उपराँत ही वे विद्या में पारंगत हो सके। वह अपनी मूँछ में प्लास्टिक की क्लिपों के द्वारा जलती मोमबत्ती रखकर तबले की थाप पर शास्त्रीय नृत्य कराते हैं। जापान, चीन, कोरिया आदि देशों के दूरदर्शन केंद्र इन पर वृत्तचित्र भी बना चुके हैं। इस मूँछ नृत्य के लिए उन्होंने अपने सारे दाँत भी उखड़वा दिए हैं।
साधना कर्मयोगी की साधना है।
साधना में लीन रहते थे। परमपूज्य गुरुदेव का जीवन भी गवाह है कि अंतिम बीस वर्ष के सूक्ष्मीकरण के 1984 से आरंभ होकर 1990 में समाप्त हुए छह वर्ष एकाँत साधना हेतु ही नियोजित थे। इसके अतिरिक्त भी वे एक-एक वर्ष के लिए तीन बार प्रत्यक्ष एवं एक बार परोक्ष हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में एकाकी तप में रत रहे।
साधना को यदि साँसारिक रिश्तों से तोला जाए, तो उसकी उपमा पतिव्रता स्त्री के अनन्य पतिप्रेम से दी जा सकती है। उनकी प्रसन्नता अपनी प्रसन्नता है। उनकी इच्छा अपनी इच्छा।” (पृष्ठ 62, अप्रैल 1969) “परमात्मा का प्रेम अपने विकसित रूप में एक कदम आगे बढ़ते हुए गुरुभक्ति के रूप में फलित हो सका। हमने अपने मार्गदर्शक पर उतनी ही निष्ठा आरोपित की, जितनी परमेश्वर पर की जा सकती है।
साधना-पद्धतियों का सफल प्रयोग भी हुआ है। सदा से गुरुजनों ने इन्हें अपने जीवन में प्रयोग किया है तथा सफलता पाने पर सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लेबोरेट्री की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
साधना द्वारा अपनी आँतरिक भूमि शुद्ध करते रहना। यह दो कार्य आपको पूरे करने हैं। तीसरा कार्य आपको पूर्णता प्राप्त कराना हमारे जिम्मे है। आप अपना काम करते रहें। समय पर हम अपना काम कर देंगे।
साधना है। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं, सपनेहुँ सुलभ न तेहिं।
साधना संपन्न करना।
साधना को आनंदपूर्वक करते जाना चाहिए। हालांकि इस साधना में आनंद तब आता है, जब दिव्य शक्ति का सक्रिय भाव में अवतरण होता है। जिस कर्म को करने के लिए मनुष्य की आत्मा स्वीकृति प्रदान करे, वही उसके लिए सर्वोत्तम है। कर्म की यह साधना अपने विधि-विधान में संपूर्ण एवं समग्र है।
साधना के समर्पण का मर्म अपने में समाए लोकशिक्षण करने में समर्थ ग्रंथ हैं। इनकी एक-एक पंक्ति देखने योग्य है। 8/4/54 को श्री रामचरण सिंह बिजनौर को लिखे एक पत्र में वे कहते हैं,
साधनाकाल में यह अनुशासन उन्हें कूट-कूटकर सिखाया गया था।
साधना से मिलने वाले आध्यात्मिक परिणाम को द्विगुणित कर देती है। प्रेम एवं भक्ति कर्म की मूल प्रेरक शक्ति है। अतः कर्म की साधना को आनंदपूर्वक करते जाना चाहिए। हालांकि इस साधना में आनंद तब आता है, जब दिव्य शक्ति का सक्रिय भाव में अवतरण होता है। जिस कर्म को करने के लिए मनुष्य की आत्मा स्वीकृति प्रदान करे, वही उसके लिए सर्वोत्तम है।
साधना वाले परिजनों के लिए ज्ञातव्य
साधना हेतु ही नियोजित थे। इसके अतिरिक्त भी वे एक-एक वर्ष के लिए तीन बार प्रत्यक्ष एवं एक बार परोक्ष हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में एकाकी तप में रत रहे।
साधना हमें अंतर्मुखी बना देती है। इसके प्रयोग से संसार में व्यवहार सहज एवं आनंदमय हो जाएगा।
साधना, शिक्षा, स्वावलंबन तथा स्वास्थ्य जैसी विधाओं पर कोई ठोस कार्य हो, इनके शिक्षण-प्रशिक्षण का तंत्र बने व यहाँ से प्रशिक्षित लोकसेवी विश्वभर में फैल जाएँ, तो पुनः इस देश को विश्व का अग्रणी बनने में देर नहीं लगेगी।
साधना, जिसमें हमारी दूनी रुचि रही है और दूना श्रम करते रहे हैं, कम ही लोगों की जानकारी में हैं।” (पृष्ठ 57,58)
साधना कैसे संभव हो सकती है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-August
साधना आँदोलन को गति दे रहे हैं एवं प्रत्येक को इस अभियान से जुड़कर परिष्कृत व्यक्तित्वसंपन्न इक्कीसवीं सदी की जिम्मेदारी सँभालने योग्य महामानव बनने का आमंत्रण दे रहे हैं। सभी क्रियाप्रधान कार्यक्रम इसी साधना की धुरी पर चलते रहे हैं, इस वर्ष से गति पकड़कर 2011-2012 तक परमपूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी के वर्ष तक और तीव्रता से चलते रहेंगे।
साधना वर्ष की और है, वह है इस मिशन की सहसंस्थापिका, सहसंरक्षिका माता भगवती देवी के जन्म की भी हीरक जयंती होना। उन्होंने भी 1926 की आश्विर कृष्ण चतुर्थी (बीस सितंबर) को जन्म लिया था एवं 28 वर्ष बाद ही उनकी सत्ता अपनी आराध्य सत्ता से एकाकार हो सजल श्रद्धा रूप से जुड़कर युग्म का निर्माण कर चुकी थी। प्रखर प्रज्ञा के प्रतीक पूज्य गुरुवर एवं सजल श्रद्धा की प्रतीक शक्तिस्वरूपा माता जी को ही वह विराट् संगठन खड़ा करना था, जो आज एक वटवृक्ष के रूप में पुष्पित-पल्लवित होता लाखों-करोड़ों की आशाओं के केंद्रबिंदु के रूप में देखा जा रहा है।
साधना है, जिसका विवरण गायत्री महाविज्ञान भाग दो में आया है। इसमें कोई विशिष्ट नियम-उपनियम नहीं है। इसे गायत्री जयंती या गुरुपूर्णिमा से आरंभ कर दिया गया है। अब तक न किया गया हो तो अब कभी भी, किसी भी पूर्णिमा या एकादशी से आरंभ कर सकते हैं। इसमें माह की दोनों एकादशियों में चौबीस माला अतिरिक्त करनी है।
साधनाक्रम को चलते हुए 85 वर्ष पूरे हो गए। वर्ष 51-52 में रजत जयंती वर्ष 86-88 में स्वर्ण जयंती वर्ष मनाए गए एवं इस वर्ष हीरक जयंती (2001-2002) मनाई जा रही है। सभी जानते है। सभी जानते हैं कि अखण्ड दीपक के प्रज्वलन तथा अपनी गुरुसत्ता से वसंत पर्व 1926 की पावन वेला में हुए साक्षात्कार से साधना प्रधान इस गायत्री पर्व का शुभारंभ माना जाता है। यह एक महान् पुरुषार्थ है, जो करोड़ों साधकों ने अपनी आराध्य सत्ता के पदचिह्नों पर चलकर पूरा किया है।
साधना हर कोई कर सकता है व नियमपूर्वक निभा सकता है।
साधना विज्ञान में सुनिश्चित विधि-विधान और अभ्यास बताए गए हैं, पर ऐसे कठिन अभ्यास न तो सब के मनोनुकूल होते हैं, न हर एक का सहज रुझान इस ओर होता है। ऐसी स्थिति में क्या मनुष्य को लंबे समय तक पिछड़ी और अविकसित दशा में पड़ा रहने के लिए छोड़ दिया जाए?
साधना-सेवा का समन्वित कार्य करते है।
साधना प्रशिक्षण सत्र भी विभिन्न शक्तिपीठों पर आयोजित किए जा रहे हैं। ये वर्षभर चलते रहेंगे। जहाँ साधना प्रशिक्षण हो चुके, ऐसे शक्तिपीठ वर्षभर अपने यहाँ जीवन-साधना का विधिवत् प्रशिक्षण देते रहेंगे। उस तरह यदि 2000 शक्तिपीठों में यह क्रम चल पड़ा, तो यह वर्ष एक कीर्तिमान स्थापित करेगा। इसके साथ ही शाँतिकुँज में भी आश्विन नवरात्रि 2002 से चैन नवरात्रि 2002 तक (26 अक्टूबर से 13 अप्रैल) की अवधि में विशेष पाँच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के सत्र चलाए जाएँगे।
साधना का क्रम बना रहे हैं। साधना आँदोलन को गति दे रहे हैं एवं प्रत्येक को इस अभियान से जुड़कर परिष्कृत व्यक्तित्वसंपन्न इक्कीसवीं सदी की जिम्मेदारी सँभालने योग्य महामानव बनने का आमंत्रण दे रहे हैं। सभी क्रियाप्रधान कार्यक्रम इसी साधना की धुरी पर चलते रहे हैं, इस वर्ष से गति पकड़कर 2011-2012 तक परमपूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी के वर्ष तक और तीव्रता से चलते रहेंगे।
साधना पंजीयन भी करा लें। साथ में जिस किसी के भी सदस्य हैं, पत्रिका मंडल, ‘स’ समूह, शक्तिपीठ अवश्य लिख भेजें। पते के ऊपर ‘संगठन प्रकोष्ठ साधना आँदोलन’ लिखें।
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष मना लिया जाए। (पृष्ठ 82) आगे वे लिखते हैं, ‘समय आने पर हमारे उत्तराधिकारी हीरक जयंती एवं शताब्दी भी मनाएँगे, पर तब हम दोनों की सूक्ष्म व कारण सत्ता ही सक्रिय होगी।’
साधना, जीवन-साधना का रूप लेकर विभिन्न रूपों में, विभिन्न समूहों में साप्ताहिक, पाक्षिक जिस भी रूप में अन्याय संगठनों, पंथों-संप्रदायों में संपन्न हो सके, इसका प्रयास किया जाना चाहिए। हमने 3 सितंबर 1999 को पीड़ा निवारण दिवस के रूप में एक सामूहिक प्रयोग किया, वह सफल रहा । फिर वह 20 फरवरी 2000 को दुहराया गा तथा पुनः 3 सितंबर को भी संपन्न किया गया। हर वर्ष तो यह क्रम चलता रहेगा, पर सबके लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना यदि प्रति सप्ताह में बीस-तीस के समूह में होती रहे व उसके क्रियापक्ष पर भी विचार-विनिमय का क्रम चलता रहे, तो पारस्परिक सौहार्द्र बढ़ेगा। गायत्री अभियान सारे भारत व विश्व में फैल जाएगा।
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष के बारे में विस्तार से इसलिए पाठकों को बताया गया, ताकि वे पच्चीस वर्ष पूर्व की मिशन की स्थिति को, आँदोलन की तीव्रता को और गुरुसत्ता की टीस को समझ सकें। अब यह हीरक जयंती वर्ष इस वर्ष की अभियान साधना से तीव्र वेग लेकर आरंभ हुआ है। सभी आँदोलनों-रचनात्मक कार्यक्रमों की धुरी परमपूज्य गुरुदेव वे साधना को ही बताया है । व्यक्तित्व का परिष्कार करने, मनःस्थिति को उदात्त बनाने एवं इक्कीसवीं सदी की महती जिम्मेदारियाँ सँभालने के लिए हर कार्यकर्ता को एक श्रेष्ठ साधक बनना होगा। अभियान साधना के विषय में विस्तार से विगत दो अंकों में विवेचन किया गया है।
साधना-आराधना के तत्व भी जोड़कर सच्चे धर्मावलंबी बने।
साधना-अभ्यास के रूप में परिपुष्ट होने लगता है। यह क्रम तब तक जारी रहता है, जब तक क्रिया पूरी न हो जाए अर्थात् आज्ञाचक्र के जागरण तक यह प्रयास-यात्रा चलती रहती है
साधना करें। समर्थ का भिक्षा माँगना उचित नहीँ।’
साधना आँदोलन ने सारे भारत व विश्व में गति पकड़ी है। अभियान साधना उस गति को और नए आयाम देगी। साथ ही पाँच दिवसीय साधना प्रशिक्षण सत्र भी विभिन्न शक्तिपीठों पर आयोजित किए जा रहे हैं। ये वर्षभर चलते रहेंगे। जहाँ साधना प्रशिक्षण हो चुके, ऐसे शक्तिपीठ वर्षभर अपने यहाँ जीवन-साधना का विधिवत् प्रशिक्षण देते रहेंगे।
साधना एक आँदोलन बने
साधना सत्र सारे भारत में स्थान-स्थान पर आयोजित किया जाना। ऐसे प्रशिक्षण लेने वाले साधकों को अनुसाधक कहा गया । शाँतिकुँज में जो प्रतिबंध थे, वे क्षीण कर दिए गए एवं सभी को मौका दिया गया, ताकि इस महत्वपूर्ण आँदोलनों में केंद्रीय प्रतिनिधियों द्वारा संचालित शिक्षण सत्रों में सभी भाग ले सकें। ऐसा हुआ, वर्षभर चला और ढेरों व्यक्ति नए जुड़े, जो आज मिशन की कमान सँभाले अपने क्षेत्र में दिखाई देते हैं। इस साधना वर्ष में इस प्रशिक्षण शृंखला से प्रतिदिन चौबीस करोड़ गायत्री जप संपन्न करने की प्रक्रिया चल पड़ी।
साधना से हम इसे उच्चस्तरीय आयामों की ओर प्रेरित करें।
साधना गति पकड़े
साधना एवं एक कोई भी सेवा प्रधान आँदोलन स्वाध्याय के साथ हाथ में लेने को कहा गया है, ताकि कार्यकर्ताओं का समग्र विकास हो सके।
साधना वर्ष जो 5 फरवरी 1986 से आरंभ होकर 24 जनवरी 1988 तक चला, कई विशेषताएँ अपने में लिए था। इसमें एक लाख नैष्ठिक साधकों को उपयुक्त मार्गदर्शन द्वारा एक अभियान के रूप में शक्तिधाराओं के प्रवाह से जोड़ा गया। साधना तो प्रतिदिन 85 मिनट की ही थी, साथ ही प्रातः 25 मिनट आत्मबोध चिंतन की व रात्रि सोते समय 15 मिनट तत्व-बोध-मनन की साधना भी सम्मिलित थी। इस साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान।
साधना वर्ष में इस प्रशिक्षण शृंखला से प्रतिदिन चौबीस करोड़ गायत्री जप संपन्न करने की प्रक्रिया चल पड़ी। यह क्रम सितंबर तक चला। सितंबर 1986 में पूज्यवर ने लिखा, ‘भौतिक संपत्ति द्वारा मिलने वाले सुविधा-साधनों से सभी परिचित हैं। अस्तु, उसके उपार्जन में सहज ही सबकी रुचि रहती है। कदाचित् ऐसा ही परिचय आत्मिक विभूतियों से भी रहा होता और उनके द्वारा मिलने वाले सत्परिणामों को समझा गया होता, तो प्रतीत होता कि इस प्रयोजन के लिए किया गया श्रम कितना अधिक उपयोगी है।
साधना और सिद्धि का समन्वय भी ऐसा ही एक अकाट्य सिद्धांत है। उसकी सचाई समझने का मौका इस स्वर्ण जयंती साधना के सदस्यों को अवश्य मिला है, मिलेगा, ऐसी आशा करने में कोई अतिवाद नहीं है।’ (पृष्ठ 62)
साधना के सदस्यों को अवश्य मिला है, मिलेगा, ऐसी आशा करने में कोई अतिवाद नहीं है।’ (पृष्ठ 62)
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष का चिरस्थाई स्मारक कहा जा सकेगा। ‘(पृष्ठ 65) आज जो भी कुछ विस्तार गायत्री नगर का परिजन देख रहे हैं, वह उसी नए शाँतिकुँज के संकल्प की ही परिणति है।
साधना के साधकों के लिए
साधना के अभाव में वे कुछ अर्जित नहीं कर पाते, अतः दुर्बुद्धि हावी हो जाती है, वह कर्म कराने लगती है, जो कभी सोचा भी नहीं था। कर्म की गति बड़ी गहन है। कर्म फल विधाता का बड़ा अकाट्य सिद्धांत है।
साधना-आराधना का सुखद परिणाम निकला।
साधना आँदोलन’ लिखें।
साधना विज्ञान के आचार्यों ने पूर्व के इन अभ्यासों की पहचान मस्तक पर एक उथले-छोटे गड्ढे के रूप में बताई है। यदि कोई व्यक्ति अपने भ्रू-मध्य वाले भाग को उँगली से टटोलकर देखे, तो इसका स्पष्ट अनुभव होगा। गड्ढे के दोनों और दो उभार पड़ेंगे। यदि इसे दर्पण में देख जाए, तो वह एक अर्द्धचंद्राकार उभार के रूप में दृष्टिगोचर होगा।
साधना भी सम्मिलित थी। इस साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई।
साधना वर्ष की झलकियाँ
साधना शृंखला चली और ढेरों साधक जुड़े। यह श्रम किस निमित्त किया गया, यह उपर्युक्त पंक्तियों में गुरुसत्ता ने समझाया। इसी वर्ष उन्होंने साधकों के सामूहिक सम्मेलन भी रखे एवं दो दिवसीय आयोजनों द्वारा पूरा भारत साधनामय बना दिया गया। साथ ही अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर 1986 में दस-दस दिवसीय साधना सत्रों में विशिष्ट साधकों को आमंत्रित किया गया। स्थान की कमी को गुरुवर ने अनुभव किया।
साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई। इनके साथ-साथ सभी से दोनों नवरात्रियाँ संपन्न करने हेतु आग्रह किया।
साधनाक्रम कब से आरंभ किया है, कब तक चलाएँगे, किन-किन को साथ लेकर चल रहे हैं, व्यक्तिगत या सामूहिक किस स्तर पर कर रहे हैं, यह पत्राचार शाँतिकुँज हरिद्वार के पते पर कर लें। अपना साधना पंजीयन भी करा लें। साथ में जिस किसी के भी सदस्य हैं, पत्रिका मंडल, ‘स’ समूह, शक्तिपीठ अवश्य लिख भेजें। पते के ऊपर ‘संगठन प्रकोष्ठ साधना आँदोलन’ लिखें।
साधनामय बना दिया गया। साथ ही अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर 1986 में दस-दस दिवसीय साधना सत्रों में विशिष्ट साधकों को आमंत्रित किया गया। स्थान की कमी को गुरुवर ने अनुभव किया। वे लिखते हैं, ‘अब एक नया शाँतिकुँज बनाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। वर्तमान इमारत को नारी प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित करना पड़ेगा और पुरुष शिविरार्थियों के लिए दूसरे आश्रम का निर्माण होगा।
साधना का विधिवत् प्रशिक्षण देते रहेंगे। उस तरह यदि 2000 शक्तिपीठों में यह क्रम चल पड़ा, तो यह वर्ष एक कीर्तिमान स्थापित करेगा। इसके साथ ही शाँतिकुँज में भी आश्विन नवरात्रि 2002 से चैन नवरात्रि 2002 तक (26 अक्टूबर से 13 अप्रैल) की अवधि में विशेष पाँच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के सत्र चलाए जाएँगे। प्रयास किया जा रहा है कि सीमित साधकों को एकाँत, चिंतन,विशिष्ट साधना एवं पूज्यवर के साहित्य तथा कैसेट्स द्वारा उनके अमृत वचनों का सान्निध्य मिले, ऐसी कुछ व्यवस्था बने। विशिष्ट कक्ष बन चुके हैं, पर सामान्य आने-जाने वाले ही इतने हैं कि अभी अक्टूबर तक इनकी संख्या कम होने का प्रश्न नहीं उठता ।
साधना से तीव्र वेग लेकर आरंभ हुआ है। सभी आँदोलनों-रचनात्मक कार्यक्रमों की धुरी परमपूज्य गुरुदेव वे साधना को ही बताया है । व्यक्तित्व का परिष्कार करने, मनःस्थिति को उदात्त बनाने एवं इक्कीसवीं सदी की महती जिम्मेदारियाँ सँभालने के लिए हर कार्यकर्ता को एक श्रेष्ठ साधक बनना होगा। अभियान साधना के विषय में विस्तार से विगत दो अंकों में विवेचन किया गया है। यह एक वर्ष में पाँच लाख गायत्री जप की साधना है, जिसका विवरण गायत्री महाविज्ञान भाग दो में आया है।
साधना के साथ राष्ट्रीय जागरण का अलख भी जगा रही थी। इस युग की भारतीय पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य था-देशवासियों को सचेत करना, उनके स्वदेशी संस्कार को जाग्रत् करना, स्वराज्य का महत्व उद्घाटित करना और देशवासियों को कूपमंडूकता से उबारकर ज्ञान की निजी संपदा तथा युगचेतना से जोड़ना। ‘वंदे मातरम’ के संपादक तथा स्वदेशी आँदोलन काल के भारतीय नायक श्री अरविंद की धारण थी कि भारत की दुर्बलता का प्रधान कारण चिंतन शक्ति का ह्रास है, ज्ञान की भूमि में अज्ञान का विस्तार है। इस अनेकमुखी अज्ञान को दूर करने की जातीय प्रेरणा से उस काल की पत्रकारिता अनुप्राणित थी।
साधना प्रधान इस गायत्री पर्व का शुभारंभ माना जाता है। यह एक महान् पुरुषार्थ है, जो करोड़ों साधकों ने अपनी आराध्य सत्ता के पदचिह्नों पर चलकर पूरा किया है। जनवरी 1986 में जब परमपूज्य गुरुदेव ने स्वर्ण जयंती वर्ष की विशेष साधना आरंभ कराई, तो इसमें सम्मिलित होने के लिए सभी ‘अखण्ड ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ में पूज्यवर लिखते हैं, ‘हीरक जयंती का समय आने तक हम नए शरीर से कहीं और भी अधिक महत्वपूर्ण नई भूमिका संपादित कर रहे होंगे।
साधना का रूप लेकर विभिन्न रूपों में, विभिन्न समूहों में साप्ताहिक, पाक्षिक जिस भी रूप में अन्याय संगठनों, पंथों-संप्रदायों में संपन्न हो सके, इसका प्रयास किया जाना चाहिए। हमने 3 सितंबर 1999 को पीड़ा निवारण दिवस के रूप में एक सामूहिक प्रयोग किया, वह सफल रहा । फिर वह 20 फरवरी 2000 को दुहराया गा तथा पुनः 3 सितंबर को भी संपन्न किया गया। हर वर्ष तो यह क्रम चलता रहेगा, पर सबके लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना यदि प्रति सप्ताह में बीस-तीस के समूह में होती रहे व उसके क्रियापक्ष पर भी विचार-विनिमय का क्रम चलता रहे, तो पारस्परिक सौहार्द्र बढ़ेगा। गायत्री अभियान सारे भारत व विश्व में फैल जाएगा।
साधना तभी कारगर होती है, जब व्यावहारिक सेवापक्ष उससे जुड़ा हो। साधना जब तक समष्टि पर, कार्यक्षेत्र में आरोपित नहीं होती वह साधक को मात्र अंतः के परिष्कार -उत्थान से आगे जीवन-मुक्ति, उदार परमार्थ वृति का अभ्यास नहीं सिखा पाती। इसीलिए सातों आँदोलनों में से एक साधना एवं एक कोई भी सेवा प्रधान आँदोलन स्वाध्याय के साथ हाथ में लेने को कहा गया है, ताकि कार्यकर्ताओं का समग्र विकास हो सके।
साधना और आराधना, व्यक्तित्व परिष्कार और सेवाधर्म के प्रयोगों से भरी है हमारी यह हीरक जयंती एवं उसकी आगामी डेढ़ वर्ष की हमारी क्रियापद्धति। यह अवधि हम सबके लिए कठोर आत्मनिरीक्षण की है। अपने क्रियाकलाप को कठोर समीक्षापूर्वक हम सभी परखें और जहाँ जो छिद्र दिखाई पड़ें, उन्हें साहसपूर्वक रोकने के लिए जुट जाएँ। लोकसेवा हमारा व्रत बने, जनकल्याण के लिए किए गए प्रयत्नों में जीवन की सार्थकता अनुभव करें। बड़ा आदम नहीं, महामानव बनने में हमारी आकाँक्षा-अभिलाषा केंद्रित हो सके, तो श्रावणी महापर्व की वेला में हीरक जयंती वर्ष के इस मोड़ पर हम अपनी गुरुसत्ता को सही मायने में आश्वासन दे पाएँगे कि उनके बताए मार्ग पर ‘मानव में देवत्व लाने धरती पर स्वर्ग उतारने’ हेतु सक्षम युगसैनिक अब पूरी तरह तैयार हैं।
साधना संपन्न कराई। इनके साथ-साथ सभी से दोनों नवरात्रियाँ संपन्न करने हेतु आग्रह किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि यदि न्यूनतम एक हजार भी व्यक्ति निकल आते हैं, तो इस साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में चौबीस सौ करोड़ का जप संपन्न होगा। यह हुआ और बड़ी सफलता के साथ पूरा हुआ।
साधना आरंभ कराई, तो इसमें सम्मिलित होने के लिए सभी ‘अखण्ड ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों को आमंत्रित किया। इस माह की ‘अखण्ड ज्योति’ की ‘अपनों से अपनी बात’ में पूज्यवर लिखते हैं, ‘हीरक जयंती का समय आने तक हम नए शरीर से कहीं और भी अधिक महत्वपूर्ण नई भूमिका संपादित कर रहे होंगे। अस्तु उसकी प्रतीक्षा व्यर्थ है। सोचा गया कि क्यों न अगले वर्ष को साधना स्वर्ण जयंती वर्ष मना लिया जाए।
साधना प्रशिक्षण हेतु मंडलियों का गठन एवं उनके चार-चार दिवसीय साधना सत्र सारे भारत में स्थान-स्थान पर आयोजित किया जाना। ऐसे प्रशिक्षण लेने वाले साधकों को अनुसाधक कहा गया । शाँतिकुँज में जो प्रतिबंध थे, वे क्षीण कर दिए गए एवं सभी को मौका दिया गया, ताकि इस महत्वपूर्ण आँदोलनों में केंद्रीय प्रतिनिधियों द्वारा संचालित शिक्षण सत्रों में सभी भाग ले सकें। ऐसा हुआ, वर्षभर चला और ढेरों व्यक्ति नए जुड़े, जो आज मिशन की कमान सँभाले अपने क्षेत्र में दिखाई देते हैं। इस साधना वर्ष में इस प्रशिक्षण शृंखला से प्रतिदिन चौबीस करोड़ गायत्री जप संपन्न करने की प्रक्रिया चल पड़ी।
साधना जब तक समष्टि पर, कार्यक्षेत्र में आरोपित नहीं होती वह साधक को मात्र अंतः के परिष्कार -उत्थान से आगे जीवन-मुक्ति, उदार परमार्थ वृति का अभ्यास नहीं सिखा पाती। इसीलिए सातों आँदोलनों में से एक साधना एवं एक कोई भी सेवा प्रधान आँदोलन स्वाध्याय के साथ हाथ में लेने को कहा गया है, ताकि कार्यकर्ताओं का समग्र विकास हो सके।
साधना का मूल यह मन ही है।
साधना की धुरी पर चलते रहे हैं, इस वर्ष से गति पकड़कर 2011-2012 तक परमपूज्य गुरुदेव की जन्म शताब्दी के वर्ष तक और तीव्रता से चलते रहेंगे।
साधना उस गति को और नए आयाम देगी। साथ ही पाँच दिवसीय साधना प्रशिक्षण सत्र भी विभिन्न शक्तिपीठों पर आयोजित किए जा रहे हैं। ये वर्षभर चलते रहेंगे। जहाँ साधना प्रशिक्षण हो चुके, ऐसे शक्तिपीठ वर्षभर अपने यहाँ जीवन-साधना का विधिवत् प्रशिक्षण देते रहेंगे। उस तरह यदि 2000 शक्तिपीठों में यह क्रम चल पड़ा, तो यह वर्ष एक कीर्तिमान स्थापित करेगा।
साधना के विषय में विस्तार से विगत दो अंकों में विवेचन किया गया है। यह एक वर्ष में पाँच लाख गायत्री जप की साधना है, जिसका विवरण गायत्री महाविज्ञान भाग दो में आया है। इसमें कोई विशिष्ट नियम-उपनियम नहीं है। इसे गायत्री जयंती या गुरुपूर्णिमा से आरंभ कर दिया गया है। अब तक न किया गया हो तो अब कभी भी, किसी भी पूर्णिमा या एकादशी से आरंभ कर सकते हैं।
साधना सत्रों में विशिष्ट साधकों को आमंत्रित किया गया। स्थान की कमी को गुरुवर ने अनुभव किया। वे लिखते हैं, ‘अब एक नया शाँतिकुँज बनाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। वर्तमान इमारत को नारी प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित करना पड़ेगा और पुरुष शिविरार्थियों के लिए दूसरे आश्रम का निर्माण होगा। इस निर्माण को साधना स्वर्ण जयंती वर्ष का चिरस्थाई स्मारक कहा जा सकेगा।
साधना एवं पूज्यवर के साहित्य तथा कैसेट्स द्वारा उनके अमृत वचनों का सान्निध्य मिले, ऐसी कुछ व्यवस्था बने। विशिष्ट कक्ष बन चुके हैं, पर सामान्य आने-जाने वाले ही इतने हैं कि अभी अक्टूबर तक इनकी संख्या कम होने का प्रश्न नहीं उठता । इसीलिए यह क्रम इन कक्षों में 82 साधकों से व यदि कक्ष को दो में विभाजित करना संभव हो सका, तो 244 साधकों से शुरुआत संभवतः हो सकेगी।
साधनावर्ष की एक और विशेषता है, युगचेतना के अभ्युदय की हीरक जयंती भी इस वर्ष होना। श्री अरविंद ने जिसे भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का वर्ष कहा था, वह भी 1926 ही था। अब वह भागवत् चेतना पूर्णतः सक्रिय हो भागवत मुहूर्त में प्रवेश कर चुकी है एवं अवतरण की, प्रज्ञावतरण के प्रकटीकरण की वेला आ चुकी है। इस उपलक्ष्य में युगचेतना की प्रतीत लाल मशाल के चित्र की घर-घर स्थापना का आँदोलन चलाया जा रहा है। तीसरी विशेषता इस हीरक जयंती के विशिष्ट साधना वर्ष की और है, वह है इस मिशन की सहसंस्थापिका, सहसंरक्षिका माता भगवती देवी के जन्म की भी हीरक जयंती होना।
साधना धुरी बने रचनात्मक आँदोलनों की
साधना तो प्रतिदिन 85 मिनट की ही थी, साथ ही प्रातः 25 मिनट आत्मबोध चिंतन की व रात्रि सोते समय 15 मिनट तत्व-बोध-मनन की साधना भी सम्मिलित थी। इस साधना में प्रत्येक साधक द्वारा प्रतिदिन 600 गायत्री मंत्र जपने का प्रावधान रखा गया था। उपासना क्रम को छह भागों में विभाजित किया गया था, आत्मशोधन के लिए षट्कर्म, प्रतीक पूजा उपचार, सोऽहम्, प्राणयोग, गायत्री जप और ध्यान, खेचरी मुद्रा तथा सूर्यार्घ्य दान। प्रत्येक का महत्व विस्तार से सात पृष्ठ के संपादकीय द्वारा समझाया गया था। एक लाख साधकों द्वारा पूज्यवर ने प्रतिदिन छह करोड़ प्रतिदिन की साधना संपन्न कराई।
साधना को ही बताया है । व्यक्तित्व का परिष्कार करने, मनःस्थिति को उदात्त बनाने एवं इक्कीसवीं सदी की महती जिम्मेदारियाँ सँभालने के लिए हर कार्यकर्ता को एक श्रेष्ठ साधक बनना होगा। अभियान साधना के विषय में विस्तार से विगत दो अंकों में विवेचन किया गया है। यह एक वर्ष में पाँच लाख गायत्री जप की साधना है, जिसका विवरण गायत्री महाविज्ञान भाग दो में आया है। इसमें कोई विशिष्ट नियम-उपनियम नहीं है।
साधनाओं की खोज की गई, ताकि इनका अवलंबन लेकर मानवीय चेतना को विकसित करने हेतु विचारों के उच्चतम प्रवाह को धारण किया जा सके। विचारों की अपनी बहुमूल्य संपदा के कारण ही विश्व मानव की सर्वतोमुखी प्रगति में भारत ने सदा से अजस्र अनुदान दिए हैं।
साधना प्रशिक्षण हो चुके, ऐसे शक्तिपीठ वर्षभर अपने यहाँ जीवन-साधना का विधिवत् प्रशिक्षण देते रहेंगे। उस तरह यदि 2000 शक्तिपीठों में यह क्रम चल पड़ा, तो यह वर्ष एक कीर्तिमान स्थापित करेगा। इसके साथ ही शाँतिकुँज में भी आश्विन नवरात्रि 2002 से चैन नवरात्रि 2002 तक (26 अक्टूबर से 13 अप्रैल) की अवधि में विशेष पाँच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के सत्र चलाए जाएँगे। प्रयास किया जा रहा है कि सीमित साधकों को एकाँत, चिंतन,विशिष्ट साधना एवं पूज्यवर के साहित्य तथा कैसेट्स द्वारा उनके अमृत वचनों का सान्निध्य मिले, ऐसी कुछ व्यवस्था बने। विशिष्ट कक्ष बन चुके हैं, पर सामान्य आने-जाने वाले ही इतने हैं कि अभी अक्टूबर तक इनकी संख्या कम होने का प्रश्न नहीं उठता ।
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष में चौबीस सौ करोड़ का जप संपन्न होगा। यह हुआ और बड़ी सफलता के साथ पूरा हुआ।
साधना विशेषाँक ‘ होगा। अधिक-से-अधिक पाठकों तक इसे पहुँचाने का प्रयास करें।
साधनारत रहने लगे।
साधना आँदोलन के अतिरिक्त ये हैं- (1) शिक्षा आँदोलन (2) स्वास्थ्य आँदोलन (3) स्वावलंबन (4) पर्यावरण जागरण-हरीतिमा संवर्द्धन (5) नारी जागरण (6) कुरीति उन्मूलन, व्यसन मुक्ति आँदोलन। साधना तभी कारगर होती है, जब व्यावहारिक सेवापक्ष उससे जुड़ा हो। साधना जब तक समष्टि पर, कार्यक्षेत्र में आरोपित नहीं होती वह साधक को मात्र अंतः के परिष्कार -उत्थान से आगे जीवन-मुक्ति, उदार परमार्थ वृति का अभ्यास नहीं सिखा पाती। इसीलिए सातों आँदोलनों में से एक साधना एवं एक कोई भी सेवा प्रधान आँदोलन स्वाध्याय के साथ हाथ में लेने को कहा गया है, ताकि कार्यकर्ताओं का समग्र विकास हो सके।
साधना के साधक ध्यान दें
साधना मार्ग पर कुछ दिनों तुम्हें लगा रहना पड़ेगा। तभी कुछ सत्य परिणाम होने की आशा है।
साधना मान रखा था। प्रभु का कार्य मानकर उसे करते थे। उसी के प्रभाव से उनके चमड़ा भिगोने की कठोती में गंगा फट पड़ी थीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-November
साधनाएं प्रकाशित होने लगीं। एक बहुत बड़ा वर्ग इसे पढ़कर मिशन से जुड़ा व आगे चलकर इस समर्थ तंत्र का मेरुदंड बना। गायत्री महाविज्ञान व आगे चलकर उनकी साधनामय जीवन गाथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ (माय लाइफः इट्स लिगेसी एंड मेसेज) को पढ़कर तो कई प्रतिभावान-विभूतिवान जुड़ते चले गए।
साधना पद्धति में यही बात स्थान-स्थान पर दिखाई देती है। इसी का एक विकसित रूप अब इस हीरक जयंती वर्ष की विशिष्ट साधना सत्र शृंखला में दिखाई देता है। श्री अरविंद के अतिमानस के महावतरण की वेला से हम गुजर रहे हैं। उसे चाहे हम महाप्रज्ञा कह लें या अतिमानस, बात एक ही है। इसके लिए एक नहीं अनेक सुपात्र चाहिए, जो विश्व-वसुधा को वर्तमान विडंबनाओं से उबार सकें।
साधना के, एकाँतसेवन से शौनकिया जी द्वारा गुरुसत्ता को दिए गए आश्वासन का हवाला देते हुए लिख रहे हैं कि गुरुदेव चिंता न करें, उनके शिष्य माताजी का ध्यान रखेंगे। कितनी सरलता के साथ उच्चस्तरीय सत्ता ने अपने शिष्य के मातृसत्ता संबंधी आश्वासन का जवाब दिया है। स्वयं जगज्जननी को किसी प्रकार के किसी संरक्षण की क्या आवश्यकता? वे लिखते हैं कि कभी-कभी माताजी से पूछताछ कर लिया करें। यही परिजनों की आत्मीयता पारिवारिकता का भाव तो हमारी गुरुसत्ता को औरों से अलग एवं संगठन के निराले स्वरूप को स्थापित करता है।
साधना।
साधना, कृच्छ्र चाँद्रायण, हविष्यान्न द्वारा अन्नमय कोश का परिष्कार ऐसे कई प्रयोग कराए। युग के अनुरूप जो व्यक्तियों के शरीर-मन आज ढल गए हैं, उनमें सबसे सरल पद्धति क्या हो सकती है, इससे लेकर कठिनतम का सतत विकास पूज्यवर की साधना-प्रणालियों में पाया जाता है। ध्यान को पूज्यवर ने बड़ा सुगम एवं सभी के लिए करने योग्य बना दिया है। ध्यान हेतु बिन्दुयोग, दीपक की लौ या उगते सूर्य की ज्योति अवधारणा की साधना, विधेयात्मक चिंतन में तल्लीन होकर ध्यान रंगों का इष्ट का ध्यान इस संबंध में जो विज्ञानसम्मत प्रस्तुति पूज्यवर ने दी, वह बिरले ही कहीं एक स्थान पर देखने को मिलती है। ध्यानयोग, लययोग एवं नादयोग की योगत्रयी को उन्होंने शाँतिकुँज आश्रम ही नहीं, सभी केन्द्रों व शक्तिपीठों का एक अनिवार्य रुटीन बना दिया।
साधना जो कर सकें, अंतर्मुखी होने का मन हो या अभ्यास हो, वे ही इनमें आएं। 2. स्थान सीमित है। बिना पूरी जाँच-पड़ताल के तथा पूर्व अनुमति के कोई भी न आएं। निश्चित दिन स्थान खाली करदें 3. निर्धारित पुस्तकों का ही स्वाध्याय कर सकेंगे। समाचार पत्रों की दुनिया से पाँच दिन कटकर रहना होगा।
साधना के अनुयाज क्रम में जनवरी 1987 का अखण्ड ज्योति अंक ‘कुँडलिनी जागरण अंक’ (विश्वराष्ट्र कुँडलिनी) के रूप में तथा फरवरी 1987 का अंक इक्कीसवीं सदी विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। फरवरी के इस अंक में विचारपरक पूर्वार्द्ध में पूज्यवर ने ‘हम विनाश की कगार पर खड़े हैं’ ‘सर्वनाश का एक ही कारण दुर्मति’ जैसे लेख लिखे तो उत्तरार्द्ध में जो क्रियापरक था, ‘विनाश की विभीषिकाओं का अंत होकर रहेगा’ ‘विश्वशाँति में भारत की भूमिका तथा परिवर्तन की अदृश्य किन्तु अद्भुत प्रक्रिया’ जैसे लेख लिखे। यह पूरा अंक आज घट रही घटनाओं का दस्तावेज है।
साधना में जब सफलता न मिली, तो महर्षि उद्दालक ने सोचा, असफल होकर जीना क्याें? निराहार रहकर मृत्यु का वरण करना चाहिए। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर मरण साधना आरंभ कर दी। जिस वटवृक्ष के नीचे महर्षि का अनशन व्रत चल रहा था, उसके कोटर में वीरुध नामक एक बूढ़ा तोता रहता था। उसने ऋषि को संतप्त दृष्टि से देखा और सजल नेत्रों से कहा, ‘वाचालता क्षमा करें, तो एक बात पूछूँ?
साधना बढ़ा रहे हैं, उसके लिए कृतज्ञ हैं। आशा है आपका ऐसा ही प्रेमभाव-आत्मभाव आगे भी बना रहेगा।’
साधना के विषय में किए थे, प्रकाशित करते रहे। मंत्र विज्ञान-शब्द शक्ति उनकी विशेष अभिरुचि का विषय रहा। वे एक स्थान पर लिखते हैं- ‘मंत्र शास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामाँत्रिकों से हमारे संपर्क हैं और साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अंत-प्रत्यंतरों को हम इतना अधिक जानते हैं, जितना वर्तमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं में से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकाँगी पढ़ा-लिखा होता है, पर हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और अति गहराई के साथ ढूँढ़ा समझा है।
साधना विज्ञान में गहराई, उनकी गायत्री मंत्र में अगाध श्रद्धा एवं निज के जीवन का जिया गया यथार्थ परिलक्षित होता है। वास्तव में हम देखें तो विभिन्न व्यक्तियों ने एक या दो साधना पद्धतियाँ हाथ में लीं व उनमें भी अधिक गहराई तक न जाकर साधकों को उथला ज्ञान भर दे पाए। परमपूज्य गुरुदेव ने साधना विज्ञान के हर पक्ष को न केवल गहराई तक पढ़ा, बल्कि सबसे समक्ष उसकी क्रियापद्धति रखी एवं उसका एक-एक विस्तार खोलकर सामने रख दिया। इसी दृष्टि से प्रत्यावर्तन पर आधारित यह अंतःऊर्जा जागरण सत्र का क्रम और भी निराला बन जाता है।
साधनात्मक पुरुषार्थ अनिवार्य
साधनारूपी सद्ज्ञान और यज्ञ आँदोलनरूपी सत्कर्म ही इसकी मूल धुरी में रहे हैं। 1962 के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय प्रवास से लौटकर सभी से पंचकोषी साधना कराई। बाकायदा पत्राचार से नियमित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह क्रम चलता रहा एवं फिर ‘अखण्ड ज्योति’ में विज्ञानसम्मत प्रतिपादनों के साथ साधनाएं प्रकाशित होने लगीं। एक बहुत बड़ा वर्ग इसे पढ़कर मिशन से जुड़ा व आगे चलकर इस समर्थ तंत्र का मेरुदंड बना। गायत्री महाविज्ञान व आगे चलकर उनकी साधनामय जीवन गाथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ (माय लाइफः इट्स लिगेसी एंड मेसेज) को पढ़कर तो कई प्रतिभावान-विभूतिवान जुड़ते चले गए।
साधना सत्र शृंखला में दिखाई देता है। श्री अरविंद के अतिमानस के महावतरण की वेला से हम गुजर रहे हैं। उसे चाहे हम महाप्रज्ञा कह लें या अतिमानस, बात एक ही है। इसके लिए एक नहीं अनेक सुपात्र चाहिए, जो विश्व-वसुधा को वर्तमान विडंबनाओं से उबार सकें। कुँठारहित, ग्रंथिमुक्त व्यक्तित्व जन्में, प्रतिभाशाली साधक स्तर के व्यक्ति समाज में बढ़ें, इसके लिए उच्चस्तरीय साधना अनिवार्य थी एवं वह सही समय पर आरंभ कर दी गई है।
साधना पद्धतियाँ हाथ में लीं व उनमें भी अधिक गहराई तक न जाकर साधकों को उथला ज्ञान भर दे पाए। परमपूज्य गुरुदेव ने साधना विज्ञान के हर पक्ष को न केवल गहराई तक पढ़ा, बल्कि सबसे समक्ष उसकी क्रियापद्धति रखी एवं उसका एक-एक विस्तार खोलकर सामने रख दिया। इसी दृष्टि से प्रत्यावर्तन पर आधारित यह अंतःऊर्जा जागरण सत्र का क्रम और भी निराला बन जाता है।
साधनाएं प्रस्तुत समय के लिए
साधना सत्रों’ की विशिष्टताओं को समझ सकते हैं। यह भी जान सकते हैं कि अंतर्मन की गहराई में भावपूर्वक जप किए जाने से कितनी प्रखरता आती है एवं मनोबल बढ़ता है। चिरस्थायी शाँति एवं अंतःउल्लास की अनुभूति तो साथ होती ही है।
साधना के लिए संकल्पित हो उठे। सभी के मनों में एक साथ- ‘तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु’ के संकल्प स्वर गूँज उठे।
साधना से उन्होंने मानव चेतना पर किए जाने वाले अपने प्रयोगों-अनुसन्धानों की नींव रखी। पन्द्रह वर्ष की आयु से लेकर 80 वर्ष की आयु के अन्तिम पल तक उनका समूचा जीवन मानव चेतना के अध्ययन-अनुसन्धानों में बीता। अपने एक लेख में उन्होंने इस जीवन सत्य को अभिव्यक्त भी किया है। इस सम्बन्ध में उनके शब्द हैं- ‘हमारा जीवन रूढ़ियों और विडम्बनाओं की धुरी पर नहीं घूमा है। उससे अति महत्त्वपूर्ण प्रयोगों, परीक्षणों और अनुभवों का अच्छा-खासा भण्डार जमा हो गया है।
साधना के रूप में करती रहना। जितना छप जाए, वह तो एक अतिरिक्त लाभ की बात है।’
साधना (द्वितीय चरण)।
साधनात्मक प्रयोगों की एक कार्यशाला रहा है। गायत्री तपोभूमि, मथुरा में भी उन्होंने कल्प साधना, कृच्छ्र चाँद्रायण, हविष्यान्न द्वारा अन्नमय कोश का परिष्कार ऐसे कई प्रयोग कराए। युग के अनुरूप जो व्यक्तियों के शरीर-मन आज ढल गए हैं, उनमें सबसे सरल पद्धति क्या हो सकती है, इससे लेकर कठिनतम का सतत विकास पूज्यवर की साधना-प्रणालियों में पाया जाता है। ध्यान को पूज्यवर ने बड़ा सुगम एवं सभी के लिए करने योग्य बना दिया है। ध्यान हेतु बिन्दुयोग, दीपक की लौ या उगते सूर्य की ज्योति अवधारणा की साधना, विधेयात्मक चिंतन में तल्लीन होकर ध्यान रंगों का इष्ट का ध्यान इस संबंध में जो विज्ञानसम्मत प्रस्तुति पूज्यवर ने दी, वह बिरले ही कहीं एक स्थान पर देखने को मिलती है।
साधनात्मक पुरुषार्थ को और प्रखर करने का है। इसी उद्देश्य से चेतना जगत् से आए प्रवाह ने अभियान साधना को इस वर्ष गुरुपूर्णिमा से आगामी कम से-कम एक या डेढ़ वर्ष तक चलाए जाने हेतु परिजनों को प्रेरित किया। लाखों परिजन उसमें एकजुट हो लग पड़े। अब प्रस्तुत समय हेतु कुछ विशिष्ट मंत्रजप एवं आहुतियों का भी अनुरोध किया गया है, जिनके बारे में विगत अंक में तथा प्रज्ञा अभियान पाक्षिक (1 व 15 अक्टूबर) में विस्तार से दिया गया है। साराँश यही है कि अपनी नियमित जप संख्या के साथ-साथ परिजन का एक माला अतिरिक्त शिव गायत्री मंत्र की तथा एक गायत्री मंत्र के साथ ‘क्लीं’ बीज मंत्र लगाकर करने का क्रम बना लें।
साधना रही है। नवसृजन के लिए भी पूज्यवर ने आधार साधना को ही बनाया। 1926 से आरंभ हुए इस संगठन के इतिहास को जब हम 1971 तक गहराई तक परखकर देखते हैं, तो यही पाते हैं कि गायत्री साधनारूपी सद्ज्ञान और यज्ञ आँदोलनरूपी सत्कर्म ही इसकी मूल धुरी में रहे हैं। 1962 के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय प्रवास से लौटकर सभी से पंचकोषी साधना कराई। बाकायदा पत्राचार से नियमित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह क्रम चलता रहा एवं फिर ‘अखण्ड ज्योति’ में विज्ञानसम्मत प्रतिपादनों के साथ साधनाएं प्रकाशित होने लगीं।
साधना कराई। बाकायदा पत्राचार से नियमित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह क्रम चलता रहा एवं फिर ‘अखण्ड ज्योति’ में विज्ञानसम्मत प्रतिपादनों के साथ साधनाएं प्रकाशित होने लगीं। एक बहुत बड़ा वर्ग इसे पढ़कर मिशन से जुड़ा व आगे चलकर इस समर्थ तंत्र का मेरुदंड बना। गायत्री महाविज्ञान व आगे चलकर उनकी साधनामय जीवन गाथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ (माय लाइफः इट्स लिगेसी एंड मेसेज) को पढ़कर तो कई प्रतिभावान-विभूतिवान जुड़ते चले गए।
साधना (प्रथम चरण)।
साधना पद्धतियों के सूक्ष्म अंत-प्रत्यंतरों को हम इतना अधिक जानते हैं, जितना वर्तमान पीढ़ी के मंत्र ज्ञाताओं में से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकाँगी पढ़ा-लिखा होता है, पर हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और अति गहराई के साथ ढूँढ़ा समझा है।’ (अखण्ड ज्योति वर्ष 30 मई अंक पृष्ठ 60) इस शोध के निष्कर्ष रूप में वे बताते हैं कि ‘यदि लेखक को हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपात होने के दोष से मुक्त किया जा सके तो उसे यह कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि गायत्री मंत्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है। आगम और निगम का समस्त भारतीय अध्यात्म इसी पृष्ठभूमि पर खड़ा है। मंत्र और तंत्र की अगणित शाखा-प्रशाखाएं इसी का विस्तार परिवार है।
साधना, ध्यान, भाषा प्रशिक्षण, बाल संस्कारशालाएं आयुर्वेद एवं वैकल्पिक चिकित्सा तथा भारतीय चिकित्सा का सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण जैसे कार्य चलेंगे। इसमें लगभग दस बड़े कक्ष हैं एवं विधिवत शिक्षण आरंभ हो गया है। इसी तरह न्यूजर्सी (अमेरिका) की फ्रैंकलिन नगरी में भी छह एकड़ का एक प्लाँट वाजपेय यज्ञ के अनुयाज के रूप में ऐसा ही चेतना केन्द्र बनाने के लिए खरीद लिया गया है। शिकागो के परिजन भी स्थान देख चुके हैं। एक वर्ष के अंदर ये दोनों केन्द्र बन जाएंगे।
साधना उन्हें करनी है। इससे उनकी प्रतिभा परिष्कृत होगी। आज के साहित्यकार लिखते बाद में हैं, पहले छपने की चिंता करते हैं। पूज्यवर ने निरंतर अपने सक्षम हाथों से कई अनगढ़ों को गढ़ा। जो लिखना नहीं जानते थे, उन्हें लिखना सिखाया।
साधना को ही बनाया। 1926 से आरंभ हुए इस संगठन के इतिहास को जब हम 1971 तक गहराई तक परखकर देखते हैं, तो यही पाते हैं कि गायत्री साधनारूपी सद्ज्ञान और यज्ञ आँदोलनरूपी सत्कर्म ही इसकी मूल धुरी में रहे हैं। 1962 के बाद परमपूज्य गुरुदेव ने हिमालय प्रवास से लौटकर सभी से पंचकोषी साधना कराई। बाकायदा पत्राचार से नियमित अखण्ड ज्योति के माध्यम से यह क्रम चलता रहा एवं फिर ‘अखण्ड ज्योति’ में विज्ञानसम्मत प्रतिपादनों के साथ साधनाएं प्रकाशित होने लगीं। एक बहुत बड़ा वर्ग इसे पढ़कर मिशन से जुड़ा व आगे चलकर इस समर्थ तंत्र का मेरुदंड बना।
साधना एवं प्रयोग परीक्षणों के आधार पर ही यज्ञ को भावी युग की सफलतम चिकित्सा पद्धति के रूप में घोषित किया था। और इस सर्वांगपूर्ण चिकित्सा को ‘यज्ञोपैथी’ का नाम दिया था। तथा ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान को इसके विविध रहस्यों को अनावृत करने का दायित्व सौंपा था। इसी कड़ी में पिछले दिनों शोध संस्थान के निदेशक के निर्देशन में हुआ यह प्रयोग स्वयं में अनूठा एवं अद्भुत था।
साधनात्मक अभ्यासों द्वारा अपनी आत्मशक्ति के परिष्कृतीकरण एवं ऊर्जा के जागरण का प्रयास। इन अभ्यासों को समझने के लिए एक निर्देशिका भी सभी को उपलब्ध कराई गई है। ये सभी अभ्यास, निर्देशिका तथा साउंड सिस्टम द्वारा दिए जाने वाले निर्देशों के माध्यम से कक्ष में ही संपन्न होंगे।
साधना, विधेयात्मक चिंतन में तल्लीन होकर ध्यान रंगों का इष्ट का ध्यान इस संबंध में जो विज्ञानसम्मत प्रस्तुति पूज्यवर ने दी, वह बिरले ही कहीं एक स्थान पर देखने को मिलती है। ध्यानयोग, लययोग एवं नादयोग की योगत्रयी को उन्होंने शाँतिकुँज आश्रम ही नहीं, सभी केन्द्रों व शक्तिपीठों का एक अनिवार्य रुटीन बना दिया। प्रज्ञायोग तो उनकी मानव मात्र के लिए एक बहुमूल्य देन है।
साधना ने उसे ट्रेकिंग, रॉक क्लाइंविंग, स्विफट क्रासिंग जैसी पर्वतारोहण की प्राथमिक क्रियाओं में निष्णात कर दिया। आज वह पर्वतारोहण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त किये है। वह 10,000 फुट ऊँची टोगलू चोटी चढ़ चुकी है, टाइगर हिल अभियान में भाग ले चुकी है, 14,500 फुट ऊँची जोंगरी चोटी की चढ़ाई कर चुकी है। इसकी उपलब्धियों को देखते हुए ब्रिटेन में गाइड के अन्तर्राष्ट्रीय केंप में उसे आमंत्रित किया गया, जिसमें 120 देशों के 600 गाइड प्रतिनिधि आए थे। गावा इनमें एकमात्र विकलाँग प्रतिनिधि थी।
साधनात्मक जो विशेष उपक्रम हैं, वे इस प्रकार हैं-
साधना में मानव की समस्याओं पर गहराई से विचार किया है। और समाधान के लिए वे मानव चेतना के गहनतम प्रदेशों में प्रविष्ट हुए। अपने शोध निष्कर्षों में उन्होंने बताया- ‘एक ध्रुव सत्य है, जो कि सत्य से छिपा हुआ है। जहाँ सूर्य अपने अश्वों को विमुक्त करता है। वह जो एक तम है, उसकी दशशत (सहस्र) किरणें एक साथ एकत्रित हुई।
साधना द्वारा प्रखर बनाया जा सके, उन्हें आत्मिक अनुदान लेने योग्य बनाया जा सके तो वे एक महत्त्वपूर्ण दायित्व युगनिर्माण के इस महायज्ञ में निभा सकेंगे।
साधना एवं भगवान् की उपासना है।
साधना, संयम, स्वाध्याय ओर सेवा यही जीवन के मूल मंत्र हैं। इन्द्रिय समेत मन को बुद्धि और आत्मा के नियंत्रण में रखकर ही गृहस्थ जीवन में सुख पाया जा सकता है। महर्षि के इस प्रबोध के बावजूद शौर्यायणी गार्ग्य अभी तक अशान्त थे। उसने ऋषिप्रवर के सम्मुख अपनी जिज्ञासा प्रकट की-
साधना की परम ज्योति से ज्योतित हो। और हमारा प्रत्येक आचरण कर्म और आदर्श से मण्डित हों तो न केवल जीवन प्रकाश से पूर्ण होगा बल्कि हम लक्ष्मी की वैभव -विभूति, उसकी श्री-सम्पदा से भी लाभान्वित होंगे।
साधना एवं तदुपराँत विश्राँति, योगनिद्रा।
साधना आरंभ कर दी। जिस वटवृक्ष के नीचे महर्षि का अनशन व्रत चल रहा था, उसके कोटर में वीरुध नामक एक बूढ़ा तोता रहता था। उसने ऋषि को संतप्त दृष्टि से देखा और सजल नेत्रों से कहा, ‘वाचालता क्षमा करें, तो एक बात पूछूँ?’ उद्दालक ने आँखें खोलीं और तोते से बोले, ‘कहो क्या कहना है?’ वीरुध बोला, ‘शरीर तो मरणधर्मा है ही, उसकी मृत्यु-योजना करने में क्या पुरुषार्थ हुआ?
साधनाओं के मानव चिन्तन एवं चेतना पर होने वाले प्रभावों का शोध अध्ययन चल रहा है। इनके निष्कर्ष शीघ्र ही शोध ग्रन्थों एवं रिसर्च बुलेटिनों में प्रकाशित होने जा रहे हैं। देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ देव संस्कृति नाम की शोध पत्रिका का प्रकाशन शीघ्र ही होने वाला है। इनके माध्यम से यह निष्कर्ष अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित एवं प्रसारित किए जाएँगे। इनसे न केवल इस दिशा में चल रहे वैज्ञानिक अनुसंधानों को एक नई दिशा मिलेगी।
साधना पूरी कर ली है। मैंने पाया है कि तुम वेद-शास्त्रों का परिशीलन भली भाँति कर चुके हो। फिर भी यदि तुम्हें किसी विषय में कोई सन्देह रह गया हो, तो निःसंकोच मुझसे प्रश्न कर सकते हो।
साधनामय जीवन गाथा ‘हमारी वसीयत और विरासत’ (माय लाइफः इट्स लिगेसी एंड मेसेज) को पढ़कर तो कई प्रतिभावान-विभूतिवान जुड़ते चले गए।
साधना से पुनः नव प्राण दिए। सत्य यही है कि मानव चेतना सम्बन्धी वैदिक निष्कर्षों को इस युग में प्रचारित करने का जितना श्रेय महर्षि दयानन्द को है, उतना और किसी को नहीं।
साधना विज्ञान के हर पक्ष को न केवल गहराई तक पढ़ा, बल्कि सबसे समक्ष उसकी क्रियापद्धति रखी एवं उसका एक-एक विस्तार खोलकर सामने रख दिया। इसी दृष्टि से प्रत्यावर्तन पर आधारित यह अंतःऊर्जा जागरण सत्र का क्रम और भी निराला बन जाता है।
साधनात्मक उपचार कराए गए, साथ ही पूज्यवर की सूक्ष्मीकरण साधना के अनुयाज क्रम में जनवरी 1987 का अखण्ड ज्योति अंक ‘कुँडलिनी जागरण अंक’ (विश्वराष्ट्र कुँडलिनी) के रूप में तथा फरवरी 1987 का अंक इक्कीसवीं सदी विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। फरवरी के इस अंक में विचारपरक पूर्वार्द्ध में पूज्यवर ने ‘हम विनाश की कगार पर खड़े हैं’ ‘सर्वनाश का एक ही कारण दुर्मति’ जैसे लेख लिखे तो उत्तरार्द्ध में जो क्रियापरक था, ‘विनाश की विभीषिकाओं का अंत होकर रहेगा’ ‘विश्वशाँति में भारत की भूमिका तथा परिवर्तन की अदृश्य किन्तु अद्भुत प्रक्रिया’ जैसे लेख लिखे। यह पूरा अंक आज घट रही घटनाओं का दस्तावेज है।
साधना को इस वर्ष गुरुपूर्णिमा से आगामी कम से-कम एक या डेढ़ वर्ष तक चलाए जाने हेतु परिजनों को प्रेरित किया। लाखों परिजन उसमें एकजुट हो लग पड़े। अब प्रस्तुत समय हेतु कुछ विशिष्ट मंत्रजप एवं आहुतियों का भी अनुरोध किया गया है, जिनके बारे में विगत अंक में तथा प्रज्ञा अभियान पाक्षिक (1 व 15 अक्टूबर) में विस्तार से दिया गया है। साराँश यही है कि अपनी नियमित जप संख्या के साथ-साथ परिजन का एक माला अतिरिक्त शिव गायत्री मंत्र की तथा एक गायत्री मंत्र के साथ ‘क्लीं’ बीज मंत्र लगाकर करने का क्रम बना लें।
साधना अनिवार्य थी एवं वह सही समय पर आरंभ कर दी गई है।
साधना के माध्यम से अपने अंदर अनंत काल से दबी एवं प्रसुप्त पड़ी दिव्य क्षमताओं को क्यों नहीं जाग्रत किया जा सकता?
साधना (तृतीय चरण)।
साधना सत्र में शामिल नहीं किया जाएगा। 9. साधक अपनी अनुभूतियाँ लिख सकेंगे। सत्र समापन पर कोई परामर्श या जिज्ञासा-समाधान भी पा सकेंगे।
साधना का परिणाम है, जिसे उन्होंने पन्द्रह वर्ष की अल्पायु में प्रारम्भ कर दिया था। चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण की चौबीस वर्षीय तप साधना से उन्होंने मानव चेतना पर किए जाने वाले अपने प्रयोगों-अनुसन्धानों की नींव रखी। पन्द्रह वर्ष की आयु से लेकर 80 वर्ष की आयु के अन्तिम पल तक उनका समूचा जीवन मानव चेतना के अध्ययन-अनुसन्धानों में बीता। अपने एक लेख में उन्होंने इस जीवन सत्य को अभिव्यक्त भी किया है। इस सम्बन्ध में उनके शब्द हैं- ‘हमारा जीवन रूढ़ियों और विडम्बनाओं की धुरी पर नहीं घूमा है।
साधना के लगभग अट्ठाइस वर्षों बाद वैसा ही सुयोग पुनः आया है, जब प्रखर तप द्वारा स्वयं की धुलाई-रंगाई करने का अवसर सभी के समक्ष आया है। हीरक जयंती वर्ष जो युगचेतना के अभ्युदय की पिचहत्तरवीं वर्षगाँठ के रूप में सारे भारत व विश्व में मनाया जा रहा है, सभी धारकों के लिए एक अनुदान के रूप में तैंतीस पाँच दिवसीय सत्रों की यह शृंखला लेकर आया है। 26 अक्टूबर 2001 नवरात्रि समापन के आरंभ हुई यह शृंखला निरंतर चैत्र नवरात्रि 2002 तक चलती हुई 10 अप्रैल को समाप्त होगी। इसके पश्चात चैत्र नवरात्रि आरंभ हो जाएगी, जिसके विशिष्ट सत्र में सभी भागीदारी कर सकेंगे।
साधना-प्रणालियों में पाया जाता है। ध्यान को पूज्यवर ने बड़ा सुगम एवं सभी के लिए करने योग्य बना दिया है। ध्यान हेतु बिन्दुयोग, दीपक की लौ या उगते सूर्य की ज्योति अवधारणा की साधना, विधेयात्मक चिंतन में तल्लीन होकर ध्यान रंगों का इष्ट का ध्यान इस संबंध में जो विज्ञानसम्मत प्रस्तुति पूज्यवर ने दी, वह बिरले ही कहीं एक स्थान पर देखने को मिलती है। ध्यानयोग, लययोग एवं नादयोग की योगत्रयी को उन्होंने शाँतिकुँज आश्रम ही नहीं, सभी केन्द्रों व शक्तिपीठों का एक अनिवार्य रुटीन बना दिया। प्रज्ञायोग तो उनकी मानव मात्र के लिए एक बहुमूल्य देन है।
साधना माना और उसके लिए अपना आभार आत्मीयता की अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट किया। यही तो महापुरुषों की, गुरुजनों की लीला है। इनकी दो पंक्तियों में उनकी महानता कूट-कूटकर भरी दिखाई पड़ती है।
साधनात्मक उपक्रम हो, चाहे 1980 में ‘जुपिटर इफेक्ट’ (वृहस्पति प्रभाव) के कारण आई प्राकृतिक विपदाओं की शृंखला, चाहे वह सौर कलंकों की बाढ़ हो एवं प्रकृतिगत विक्षोभों की शृंखला, पूज्यवर ने आध्यात्मिक पुरुषार्थों ही सर्वोपरि बताया। एक बीस वर्षीय महापुरश्चरण 1980 से 2000 तक चला। उसी को तीव्र वेग देकर 1981 से 2000 की अवधि में युगसंधि महापुरश्चरण नाम दिया गया एवं 2400 करोड़ प्रतिवर्ष गायत्री जप के माध्यम से वह संपन्न हुआ- महापूर्णाहुति गतवर्ष इसी माह की गई। संकट अभी टला नहीं है। यदि यह सब महापुरुषार्थ न चल रहा होता तो कुछ-का-कुछ हो गया होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-January
साधना से उपजी, पनपी एवं निखरी थी। महावीर हनुमान् उनके आदर्श एवं आराध्य थे। राम नाम उनका सर्वस्व था। वह कहीं भी, किसी भी स्थिति में हों, प्रत्येक श्वास के साथ उनका नाम-जप चलता रहता। वह कहा करते थे कि उपासना हो तो महावीर हनुमान् जैसी।
साधना करना जरूरी है। उनकी कृपा मिल गई, तो फिर कुछ भी नहीं चाहिए।”
साधना के क्षेत्र में यह तीव्र आवेग मात्र है। जब भावनाओं का ज्वार उठता है, तो मूलाधार चक्र सक्रिय हो जाता है अथवा किसी और नाड़ी में ऊर्जा प्रवाह दौड़ने लगता है।
साधना के क्षेत्र में हताशा, उदासी, खिन्न भाव और अंत में अरुचि ही हाथ लगेगी। बुद्धि का प्रयोग करने पर बहुत हुआ, तो ईश्वर के प्रति कुछ विचित्र और हास्यास्पद लगने वाली धारणाएँ बन जाएँगी, वे धारणाएँ बनती-बिगड़ती रहेंगी। आती-जाती रहने वाली छायाओं की तरह वे कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकेंगी। एक दिन साधन-भजन छोड़कर आप भगवान् की खिल्ली उड़ाते देखे जाएँगे।
साधना सीखी थी। उसी का अभ्यास करते आँतरिक स्थिति के बारे में किसी को विशेष जानकारी नहीं है।
साधनाओं में कुँडलिनी, चक्रवेधन आदि का विधान है। गृहस्थ योग एवं कर्मयोग के पथिकों को उस मार्ग पर नहीं चलना पड़ता और वे राजा जनक की तरह आवश्यक कार्य करते हुए भी उच्च आध्यात्मिक मनोभूमि में पहुँचकर लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं। जिन साधनाओं की आप चर्चा किया करते हैं, वह आपकी शारीरिक एवं साँसारिक स्थिति के लिए अनुकूल नहीं है। आप अन्य सरल साधनाओं के द्वारा ही लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे। शबरी, निषाद, रैदास आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे।
साधना का ही हिस्सा है। दोहरा लाभ यह है कि प्रशंसा द्वारा हम अपने आप में भी इन गुणों का विकास करने लगते हैं। दूसरों के प्रति स्नेह-सद्भाव से भर उठते हैं। कम-से-कम परनिंदा और उसके कारण उत्पन्न होने वाले कलुष से तो बच ही जाते हैं। अपरिग्रह के शुद्ध अर्थों में यह नियम सद्गुणों का प्रवाह अविरल करने में सहायक है।
साधना विज्ञान की आवश्यकता कहा जा सकता है। तथ्यों के निरूपण की यह अपनी शैली है। ऊर्जा का विराट् कुँड, सर्प, विद्युत, चक्र, नाड़ियाँ, सोई हुई सर्पिणी की फुफकार, अपनी पूँछ को मुँह में दबा और खुला रखकर मूलाधार चक्र पर लिपटी सर्पिणी, सुमेरु शिखर, अलग-अलग चक्रों की पंखुड़ियाँ, उनकी संख्या, विशिष्ट अक्षर, बीज शक्ति आदि पारिभाषिक पदों को उनके शब्दों से नहीं समझाया जा सकता। इन चक्रों के विवेचन में जाने से पहले कुँडलिनी महाशक्ति के सामान्य परिचय को ध्यान में रख लेना चाहिए।
साधना के मार्ग पर बढ़ता जा रहा था। इसी प्रवाह में दिन बीते, महीने बीते और चार वर्षों की लंबी अवधि भी अतीत की गहन गुफा में विलीन हो गई। पता ही नहीं चला कि समय इतनी शीघ्रता से कैसे भागता चला गया।
साधना में महत् सत्ता के साथ साझेदारी पात्रता का विकास किए बिना संभव है भी नहीं। आगर (मालवा, म.प्र.) के श्री नंदकिशोर शर्मा को 17-4-63 को लिखे एक पत्र पर दृष्टि डालें। “हमारे आत्मस्वरूप,
साधना ऐसी हो, जैसी हनुमान् ने की। आराधना के मूर्तिमान् स्वरूप भला मेरे आराध्य हनुमान् के सिवा और कौन होगा। महावीर हनुमान् की यह उक्ति “राम काजु कीन्हें बिनु मोहिं कहाँ विश्राम” ही उनका आदर्श वाक्य था। सचमुच ही वह कभी विश्राम नहीं करते थे। सदा-सर्वदा अनथक भाव से आत्मकल्याण एवं लोककल्याण में रित रहते।
साधना में उच्चस्तरीय सोपानों से जुड़ने के संकल्प लिए हैं। सब मिलाकर महापूर्णाहुति वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है।
साधना अभियान में जुट गए। मार्गदर्शन की फिर भी आवश्यकता थी। उन्हें दूसरा पत्र 8-12-1951 को लिखा गया।
साधना को और अधिक प्रखर बनाना (2) नारी जाग्रति आँदोलन द्वारा परिवार निर्माण की प्रक्रिया को गतिशील बनाना (3) ग्रामतीर्थ योजना द्वारा समाज निर्माण में भागीदारी करना। सभी जानते हैं कि ग्रामतीर्थ से अर्थ है व्यसन मुक्त, स्वच्छ, संस्कारी, स्वस्थ, शिक्षित, सहकारी, स्वावलंबी ग्राम। सातों आँदोलनों में से जो-जो परिजन जो भी कुछ अतिरिक्त कर रहे हैं, वे करते रहें, पर साथ ही ये तीनों अनिवार्य क्रम में जोड़ लें। ध्यान रखें कि बिना साधनात्मक-आध्यात्मिक आधार के कोई भी सामाजिक, बौद्धिक आँदोलन सफल नहीं होता। आस्तिकता विस्तार एवं जीवन-साधना का दैनंदिन प्रखरतम अभ्यास ही वह धुरी है, जिस पर संगठन, क्राँति या आँदोलन की सफलता निर्भर है।
साधना प्रयोग चलेगा। यह विगत वर्ष भेजे गए ऑडियो कैसेट्स द्वारा संपन्न होगा। पूर्वाह्न 8 से 11.30 तक पर्वपूजन, पूज्य गुरुदेव का जन्म दिवस-गुरु पूजन, सरस्वती पूजन, यज्ञ आदि का क्रम, साथ ही विद्यालयों में सरस्वती पूजन के साथ विद्यावरण के संकल्प संपन्न हों। शाम 7 8.30 तक सायंकालीन कार्यक्रम सामूहिक प्रार्थना प्रयोग के रूप में सभी स्थानों पर मनाए जाएँ, किंतु इससे पूर्व शाम 5 से 6.30 की अवधि में एक प्रचार आमंत्रण यात्रा सभी स्थानों पर निकाली जाए। यह आयोजन भव्य-खर्चीला भले न हो, प्रभावी अवश्य हो।
साधना ही वह पूँजी है, जिससे जन-जन को जोड़कर परमपूज्य गुरुदेव ने इतनी बड़ी संस्था खड़ी कर दी। जिस मिशन की जड़ें तप की पूँजी से सिंचित होती रही हों, उसके तो और भी विस्तृत होने, सारे विश्व में छा जाने के विषय में किसी को कोई शंका भी नहीं होना चाहिए। परमपूज्य गुरुदेव के पन्नों से ज्ञात होता है कि कैसे छोटी-छोटी आशंकाओं का समाधान कर, सतत प्रेरणा देते रहे एवं छोटी-छोटी भ्राँतियों का निवारण कर उन्होंने जीवन-साधना के पथ पर लाखों व्यक्तियों को अग्रगामी बना दिया। पत्रों के महासागर में से कुछ पत्र पाठक-परिजनों के लिए यहाँ हम बानगी रूप में दे रहे हैं।
साधना संबंधी मार्गदर्शन की बात सोचें, तो मन में कुँडलिनी योग, हठयोग आदि के विषय में जिज्ञासा आने लगती है। हर कोई चाहता है कि उसकी कुँडली वैसी ही जग जाए, जैसी कि कभी नरेंद्रनाथ की रामकृष्ण परमहंस ने जगाई थी। परंतु पूज्यवर का बड़ा स्पष्ट चिंतन इस विषय में है। वे 21-2-54 को श्री रामदास (कानपुर) को लिखते हैं।
साधना में भागीदारी के संकल्प में ढेरों व्यक्तियों ने अपनी जीवन-साधना को और अधिक प्रखर करने, स्वयं को युगनायक के स्तर पर निखारने, अपनी साधना में उच्चस्तरीय सोपानों से जुड़ने के संकल्प लिए हैं। सब मिलाकर महापूर्णाहुति वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है।
साधना के पथ पर लाखों व्यक्तियों को अग्रगामी बना दिया। पत्रों के महासागर में से कुछ पत्र पाठक-परिजनों के लिए यहाँ हम बानगी रूप में दे रहे हैं।
साधनात्मक-आध्यात्मिक आधार के कोई भी सामाजिक, बौद्धिक आँदोलन सफल नहीं होता। आस्तिकता विस्तार एवं जीवन-साधना का दैनंदिन प्रखरतम अभ्यास ही वह धुरी है, जिस पर संगठन, क्राँति या आँदोलन की सफलता निर्भर है।
साधना का अर्थ कतिपय मानसिक-शारीरिक अभ्यास ही था। अध्यात्म क्षेत्र को इन अभ्यासों तक ही सीमित मान लें तो उसका विस्तार बीस प्रतिशत ही रह जाता है। बाकी अस्सी प्रतिशत स्वरूप नकारना पड़ता है। यह स्वरूप स्थूल साधनाओं के अभ्यासों के बाद अंतर्जगत् में उतरने के साथ शुरू होता है। अस्सी प्रतिशत इस भाग को रहस्य और गुह्य लोक भी कह सकते हैं।
साधना की जो विधियाँ बताई थीं, वह पूरी श्रद्धा से उन्हें नियमित किया करता था। वह तप कर रहा था, साधना के मार्ग पर बढ़ता जा रहा था। इसी प्रवाह में दिन बीते, महीने बीते और चार वर्षों की लंबी अवधि भी अतीत की गहन गुफा में विलीन हो गई। पता ही नहीं चला कि समय इतनी शीघ्रता से कैसे भागता चला गया।
साधना के रूप में अपनाना है, तो एक प्रस्थान बिंदु नियत करना पड़ेगा। अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि व्रतों की तरह अपरिग्रह का अभ्यास भी एक छोटे-से नियम से शुरू किया जा सकता है। नियम यह है कि प्रतिदिन कुछ-न-कुछ दान करते रहा जाए। विद्या-विभूति से सेवा करने, दूसरों के कष्ट दूर करने में अपनी प्रतिभा का अंश लगाने या कर्त्तव्य में उत्कृष्ट भाव का समावेश करने के अभ्यास आगे के हैं। अपरिग्रह का आदर्श धन-संपत्ति के मोह से मुक्त होने के लिए निश्चित किया गया है, तो दान का आरंभ भी धन से ही करना चाहिए।
साधना को और अधिक प्रखर करने, स्वयं को युगनायक के स्तर पर निखारने, अपनी साधना में उच्चस्तरीय सोपानों से जुड़ने के संकल्प लिए हैं। सब मिलाकर महापूर्णाहुति वर्ष उपलब्धियों से भरा रहा है।
साधना करते हैं, तो विवाह के बंधन में क्यों बँधें, हमारा क्या होगा, ऐसी कई आशंकाएँ किसी के भी मन में आ सकती हैं। श्री देवव्रत प्रसाद श्रीवास्तव जी (मुजफ्फरपुर), जो उन दिनों जी.जी.बी. कॉलेज में पढ़ रहे थे, के मन में भी कुछ ऐसी ही बातें थीं। उन्हें उत्तर मिला-
साधनाओं के उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हों, पर आप गृहस्थ योग की भूमिका को ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति को प्राप्त कर लेंगे। आप इस संबंध में पूर्ण निश्चिंत रहें और सब सोचना-विचारना हमारे ऊपर छोड़ दें।
साधना सानंद संपन्न हुई, यह बड़े आनंद की बात है। तप ही मनुष्य जीवन की सच्ची संपत्ति है। उस मार्ग पर चलते रहने से आपको आशाजनक शाँति मिलेगी।”
साधना एवं लोकसेवा का उपक्रम प्रारंभ किया। यह क्रम काफी समय तक लगातार चलता रहा। एक दिन बाबा लक्कड़ भारती ने कहा, मैं कल सबेरे जीवित समाधि लूँगा और दूसरे दिन असंख्य जनों के बीच वह पद्मासन लगाकर बैठ गए। अपनी महासमाधि के कुछ पलों पूर्व वह सबको संबोधित कर कहने लगे, अपने देश से ये अँग्रेज तो जाएँगे ही। इन अंग्रेजों के जाने के बाद भी देश में भारी उथल-पुथल रहेगी, पर सारी उथल-पुथल और संकटों की आग में तपकर देश का उज्ज्वल भविष्य उभरेगा।
साधना में निखार आता रहे, वही ध्यान सर्वाधिक सफल है, यह निष्कर्ष पूज्यवर के लिखे पत्रों से मिलता है। हमने अपने अध्यात्म को हौआ बना लिया है अथवा उसका बड़ा ही जटिल विकृत स्वरूप हमारे मन में है। अध्यात्म जीवन जीने की कला सिखाता है। अगर मर्म समझ में आ जाए तो व्यक्तित्व का परिष्कार, गुणों में अभिवृद्धि एवं दृष्टिकोण पर छाए कुहासे मिटने की प्रक्रिया संपन्न होने लगती है। यही वह कुँजी है, जो हमें अपनी गुरुसत्ता के चिंतन से जोड़कर हमारी आध्यात्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करती है।
साधनाओं के द्वारा ही लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे। शबरी, निषाद, रैदास आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हों, पर आप गृहस्थ योग की भूमिका को ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति को प्राप्त कर लेंगे।
साधना विज्ञान का मर्म समझाने वालों के लिए तो यहाँ तक कहा गया है कि वे रोगी और धूर्त गुरुओं की निंदा से भी बचें। उनके अनुसार कोई भी गुरु ढोंगी अथवा झूठा नहीं होता है, क्योंकि प्रत्येक गुरु का आध्यात्मिक उत्थान में योगदान होता है। वह योगदान कितना ही तुच्छ क्यों न हो। यह निर्देश आत्मिक विकास की उच्च कक्षा में पहुँच रह साधकों के लिए है।
साधना का दैनंदिन प्रखरतम अभ्यास ही वह धुरी है, जिस पर संगठन, क्राँति या आँदोलन की सफलता निर्भर है।
साधना क्षेत्र में उतरना हो तो बौद्धिक ऊहापोह को एक तरफ छोड़ दिया जाता है, भावनाएँ ही नियोजित की जाती हैं।
साधना संबंधी प्रारंभिक से उच्चतम स्थिति का मार्गदर्शन है। तरह-तरह के चोंचले खड़े करने के बजाय मन तल्लीन-तन्मय हो जीवन-साधना में निखार आता रहे, वही ध्यान सर्वाधिक सफल है, यह निष्कर्ष पूज्यवर के लिखे पत्रों से मिलता है। हमने अपने अध्यात्म को हौआ बना लिया है अथवा उसका बड़ा ही जटिल विकृत स्वरूप हमारे मन में है। अध्यात्म जीवन जीने की कला सिखाता है। अगर मर्म समझ में आ जाए तो व्यक्तित्व का परिष्कार, गुणों में अभिवृद्धि एवं दृष्टिकोण पर छाए कुहासे मिटने की प्रक्रिया संपन्न होने लगती है।
साधनाओं के अभ्यासों के बाद अंतर्जगत् में उतरने के साथ शुरू होता है। अस्सी प्रतिशत इस भाग को रहस्य और गुह्य लोक भी कह सकते हैं। कुँडलिनी भी इसी लोक से संबंधित है। उन संत महापुरुष के अनुसार रहस्य या गुह्य विद्या जैसी कोई चीज होती ही नहीं है। अगर इस तरह का दावा किया जाता है, तो वह पाखंड और अविद्या के सिवा कुछ नहीं है।
साधना की। माता-पिता-गुरु और संत की आराधना-उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की। वे कहते थे पत्नी के प्रेम ने उन्हें लौकिक दुःखों और अपेक्षाओं से मुक्त कर दिया।
साधनाओं की आप चर्चा किया करते हैं, वह आपकी शारीरिक एवं साँसारिक स्थिति के लिए अनुकूल नहीं है। आप अन्य सरल साधनाओं के द्वारा ही लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे। शबरी, निषाद, रैदास आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-February
साधना की जाती है, वहाँ कुछ अतिरिक्त ऊर्जा भी बहने लगती है, यह सभी साधकों के सम्मिलित प्रयत्नों के कारण है। सब को जोड़−मिलाकर कूती गई मात्रा से ज्यादा ही हो जाता है। उदाहरण के लिए, किसी खाली पात्र में सौ लोग आधा−आधा लीटर दूध डालें, तो वह संचय पचास लीटर से ज्यादा ही होगा। कारण कि सभी लोग ठीक आधा लीटर तो नहीं डालते, दो−चार चम्मच ज्यादा भी हो सकता है। पचास लोगों का वह अतिरिक्त योगदान वास्तविक जोड़ से ज्यादा ही बैठता है।
साधनारत होते हैं, जबकि विषयी लोग इसी समय अधिक गहरी नींद का मजा ले रहे होते हैं। इन दिनों ब्रह्ममुहूर्त है। असुरताभरी तमसाच्छन्न निशा का अब अंत होने जा रहा है और उसके स्थान पर ज्योतिर्मय प्रभात के उदय की संभावनाएँ उग जाती हैं। यह संधिकाल प्रभात की ऊषा लेकर आया है। मंदिरों में शंख−निनाद हो रहा है कि सजग आत्माएँ जगें और अपने पुनीत धर्म−कर्त्तव्यों में संलग्न हों।
साधनाप्रधान एवं सातों आँदोलनों पर नए नारे, नए गीत बनाए जा रहे हैं। इस वर्ष यही नूतन उल्लास भरा क्रम सब ओर एक जैसा चले। सभी प्राणवान् परिजनों से अपेक्षा रहेगी कि हीरक जयंती वर्ष उसी उत्साह के साथ साल भर संपन्न होगा, जैसा कि ऊपर बताया गया है। बहुविधि कार्यक्रम हैं, ढेरों कार्य होना है। हमें तो बस अपने अंदर के उत्साह को जिंदा बनाए रख लगे रहना है।
साधना भक्तों की आदर्श है। उन्होंने अनायास आए अवतारी रूप या दृश्य को पहचानने से मना कर दिया। कहा कि जब तक वह हृदय में नहीं प्रकट होंगे, अतिथि ईश्वर को स्वीकार नहीं करेंगे। कौन जाने, कोई आसुरी माया हो।
साधना में प्रयत्नों की तीव्रता के अनुसार अपने भीतर बैठी परमात्म चेतना स्वयं को व्यक्त करती है। वह साधक को उसकी स्थिति के अनुसार लाभ पहुँचाती और लौकिक जीवन को कम−से−कम छेड़ती हैं।
साधना में प्रचंड वेग से प्रवृत्त करने वाली परंपराओं में सामूहिक तप का निषेध किया गया है। जप, भजन, सत्संग, पाठ आदि मृदु और पुकारपरक साधनाओं में सामूहिकता को थोड़ा महत्त्व दिया गया है, क्योंकि उससे अतिरिक्त बल मिलता है, लेकिन कुँडलिनी जागरण, चक्रवेधन, भावगती दीक्षा और तंत्र की सकाम−निष्काम हर तरह की साधनाएँ अकेले ही करने की व्यवस्था है। ये साधनाएँ समूह में की जातीं तो विलक्षण परिणाम निकलते।
साधना−विधियों के लिए प्रयास किए। प्रयास आँदोलन स्तर के भी थे। उन्हें पर्याप्त सफलता मिली है। लाखों लोग ध्यान और साधना में प्रवृत्त हुए हैं। भजन−पूजन−प्रार्थना और भक्ति का प्रचार करने वाले आँदोलन भी छिड़े, लेकिन उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली।
साधना में प्रवृत्त हुए हैं। भजन−पूजन−प्रार्थना और भक्ति का प्रचार करने वाले आँदोलन भी छिड़े, लेकिन उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली। भारतीय धर्म−परंपरा में इन दोनों मार्गों का समावेश है। ‘प्रार्थना’ और ‘साधना’ दोनों विधियों पर पर्याप्त अनुभव और विज्ञान यहाँ की परंपरा के पास है। इसलिए विश्व−समाज उसकी ओर आशाभरी दृष्टि से देख भी रहा है।
साधनाओं में गुरु की भूमिका मार्गदर्शक और सहायक की रहती है। वह जरूरी और उचित समझें तो शिष्य पर शक्तिपात कर सकता है लेकिन आमतौर पर इसकी मनाही है। साधक को निजी प्रयत्नों से ही आगे बढ़ने देने का निर्देश है।
साधना ही है।”
साधनाओं में सामूहिकता को थोड़ा महत्त्व दिया गया है, क्योंकि उससे अतिरिक्त बल मिलता है, लेकिन कुँडलिनी जागरण, चक्रवेधन, भावगती दीक्षा और तंत्र की सकाम−निष्काम हर तरह की साधनाएँ अकेले ही करने की व्यवस्था है। ये साधनाएँ समूह में की जातीं तो विलक्षण परिणाम निकलते।
साधना के सूत्र विगत वर्षों में अपने जीवन में अंगीकार किए एवं एक नए अध्याय में सप्त आँदोलनों की सक्रियता के माध्यम से प्रवेश किया है। जैसा कि पिछले अंक में भी बताया गया एवं प्रज्ञा अभियान ‘पक्षिक’ के पृष्ठों पर स्पष्ट किया जाता रहा है कि जीवन−साधना की धुरी पर ही ये सारे आँदोलन गतिशील हो रहे हैं। वसंत पर्व से आरंभ हुआ यह हीरक जयंती वर्ष कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है। यह परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक, जो अब शाँतिकुँज में स्थित है, के 75वें, वर्ष में प्रवेश वाला वर्ष है। इसी की साक्षी में परमपूज्य गुरुदेव व शक्तिस्वरूपा माताजी के सभी महत्त्वपूर्ण निर्धारण हुए, जिनने इस मिशनरूपी वटवृक्ष को इस समुन्नत स्थिति में पहुँचाया है।
साधना के संबंध में कहा गया है कि वह पहले पात्रता विकसित करती है, फिर परमात्मा को प्रकट करती है। योग की भाषा में इसे ऊर्जा का आरोहण कहते हैं। भक्ति या प्रार्थना में भगवान् का अनुग्रह बरसता है, तो उसे ‘अवतरण’ कहा गया है। तत्त्व रूप में आरोहण या अवतरण में कोई अंतर नहीं हैं। दोनों स्थितियों में भगवान् की चेतना ही प्रकट होती है, लेकिन आरोहण को अवतरण की तुलना में ज्यादा सहज, स्वाभाविक और काम्य बताया गया है।
साधनाओं में सामूहिकता का निषेध एक−दूसरे से प्रभावित नहीं होने देने की सावधानी के तौर पर भी है। जहाँ सामूहिक साधना की जाती है, वहाँ कुछ अतिरिक्त ऊर्जा भी बहने लगती है, यह सभी साधकों के सम्मिलित प्रयत्नों के कारण है। सब को जोड़−मिलाकर कूती गई मात्रा से ज्यादा ही हो जाता है। उदाहरण के लिए, किसी खाली पात्र में सौ लोग आधा−आधा लीटर दूध डालें, तो वह संचय पचास लीटर से ज्यादा ही होगा। कारण कि सभी लोग ठीक आधा लीटर तो नहीं डालते, दो−चार चम्मच ज्यादा भी हो सकता है।
साधना अभियान का सचित्र विवरण प्रस्तुत किए गए हैं। नए−पुराने हर परिजन के लिए प्रायः 224 पृष्ठों का यह ग्रंथ संग्रहणीय है। पच्चीस रुपये में यह उपलब्ध है। डाक खरच अतिरिक्त है।
साधना सत्रों की श्रृंखला का निर्धारण किया गया है। हमारे 75 वर्ष के परिपक्व वयोवृद्ध इस संगठन के प्राणवान् वरिष्ठ कहे जाने वाले प्रज्ञापुत्रों से यह अनुरोध किया जा रहा है कि अब इस वर्ष वे अखण्ड दीपक के सान्निध्य में एक अनुष्ठान से युक्त विशिष्ट सत्र प्रतिवर्ष करते रहने का क्रम बना लें। ये प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के एकान्त साधना सत्र होंगे। इनमें साधक को एक ही कोठरी में 24 घंटे रहना होगा, मौत सहित तप के सारे उपक्रम पूरे करने होंगे, मात्र गुरुदेव को ही सुनना व पढ़ना होगा। प्रारंभिक दौर में अभी 36 कमरों में 36 साधकों के लिए 1 मार्च से 5 मार्च, 7 मार्च से 11 मार्च, 13 मार्च से 17 मार्च इस प्रकार तीन ही सत्र रखे गए हैं।
साधनाओं में भी इसी तरह की अराजकता का खतरा रहता है। इसलिए वह पुरुषार्थ स्वयं और अकेले करने को श्रेयस्कर बताया गया है।
साधना की धुरी पर ही ये सारे आँदोलन गतिशील हो रहे हैं। वसंत पर्व से आरंभ हुआ यह हीरक जयंती वर्ष कई अर्थों में महत्त्वपूर्ण है। यह परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 1926 में प्रज्वलित अखण्ड दीपक, जो अब शाँतिकुँज में स्थित है, के 75वें, वर्ष में प्रवेश वाला वर्ष है। इसी की साक्षी में परमपूज्य गुरुदेव व शक्तिस्वरूपा माताजी के सभी महत्त्वपूर्ण निर्धारण हुए, जिनने इस मिशनरूपी वटवृक्ष को इस समुन्नत स्थिति में पहुँचाया है। परमपूज्य गुरुदेव ने उसे एक अखण्ड अग्रि−अखण्ड यज्ञ की संज्ञा दी थी।
साधना और सृजनधर्मी पुरुषार्थ को और अधिक प्रखर बनाने की समझदारी, तत्परता एवं कौशल दिखा पाएँगे। 75 वर्ष किसी भी मिशन−संगठन के लिए प्रौढ़ता की चरमावस्था
साधना सभी आँदोलनों की धुरी में है, उसे सभी के साथ गूँथ दिया गया है। इनकी तिथियों के लिए परिजन पत्राचार कर लें।
साधना सत्र एवं एक माह के युगशिल्पी सत्र यथावत् चलते रहेंगे।
साधनात्मक, सामाजिक उलझन−ऊहापोह में गुरुसत्ता की भागीदारी रहती थी। क्या पत्र लेखन की विधा भी एक संगठन खड़ा कर सकती है? यह प्रश्न जब भावी शोधकर्त्ताओं−अन्वेषकों के समक्ष आएगा, तो निश्चित ही वे पूज्यवर के पत्रों को उस कसौटी पर खरा पाएँगे।
साधना की त्रिवेणी थीं। निवेदिता का मंत्र था, सर्वधर्म समानता, गरीबी−गुलामी से मुक्ति और मानव एवं देशसेवा के लिए सर्वस्व समर्पण। यह मंत्र उन्हें उनके गुरु युगद्रष्टा स्वामी विवेकानंद से मिला था। चिर संन्यासिनी निवेदिता का नाम था मार्गरेट नोबुल। वह आयरलैंड निवासी थीं और भारत को अपना कर्मभूमि मानती थीं।
साधना में दैवी विभीषिकाओं के निवारण हेतु अतिरिक्त जप तो करें ही, सबके, उज्ज्वल भविष्य की सद्भावपूर्वक प्रार्थना भी साथ जोड़े। वरुण गायत्री मंत्र से यदि दैनिक या साप्ताहिक अग्निहोत्र, बलिवैश्व आदि आहुतियाँ समर्पित की जा सकें, तो इसके सकारात्मक परिणाम
साधना के प्रति गहरी रुचि जाग रही है। पिछले बीस वर्षों में विभिन्न संगठनों ने कुँडलिनी, ध्यान, चक्रवेधन और योग आदि आरोहणपरक साधना−विधियों के लिए प्रयास किए। प्रयास आँदोलन स्तर के भी थे। उन्हें पर्याप्त सफलता मिली है। लाखों लोग ध्यान और साधना में प्रवृत्त हुए हैं।
साधना’ दोनों विधियों पर पर्याप्त अनुभव और विज्ञान यहाँ की परंपरा के पास है। इसलिए विश्व−समाज उसकी ओर आशाभरी दृष्टि से देख भी रहा है।
साधनाप्रधान प्रयोग
साधना और स्थिति के अनुसार ही अर्जन किया होता है। अपने पुरुषार्थ से प्राप्त उपलब्धि पर गर्व और संतोष होता है। उसे सहेजने की चिंता की जाती है।
साधना सत्र होंगे। इनमें साधक को एक ही कोठरी में 24 घंटे रहना होगा, मौत सहित तप के सारे उपक्रम पूरे करने होंगे, मात्र गुरुदेव को ही सुनना व पढ़ना होगा। प्रारंभिक दौर में अभी 36 कमरों में 36 साधकों के लिए 1 मार्च से 5 मार्च, 7 मार्च से 11 मार्च, 13 मार्च से 17 मार्च इस प्रकार तीन ही सत्र रखे गए हैं। इसके बाद 23 मार्च से नवरात्रि सत्र होने के कारण अलग से इन्हें चला पाना संभव नहीं होगा। बाद में ये आश्विन नवरात्रि से चैत्र नवरात्रि की छह माह की अवधि में 2001-2002 में अनवरत चलते रहेंगे।
साधनाप्रधान चल सकता है एवं 21 से 25 आँदोलनप्रधान। यह तो मात्र नमूने के लिए लिखा गया है। तिथियाँ संगठन प्रकोष्ठ से चचौ कर तय की जा सकती हैं।
साधना की कसौटी पर खरे उतरेंगे। जीवन−साधना चौबीस घंटे की होती है। हर क्षण भगवत्चेतनामय, हर क्षण विधेयात्मक चिंतन से ओत−प्रोत तथा सतयुगी उल्लास भरे आनंद में सराबोर रहे, ऐसी अपेक्षा हमारी गुरुसत्ता की प्रत्येक परिजन से इस वर्ष विशेष में है। हम मात्र उत्साह में औपचारिकता न बरतकर रह जाएँ, गहरे उतरें व गुरुसत्ता के चिंतन−प्रवाह में निरंतर गोते लगाते रहने का अभ्यास करें, यह अपेक्षा स्वाध्यायक्रम में हम से की जा रही हैं।
साधना सत्र द्वारा युवा शक्ति के चरित्र निर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है, वहीं युग शिल्पी सत्रों के अंतर्गत लोकसेवा के कार्य में अपनी प्रतिभा एवं शक्ति के नियोजन का प्रशिक्षण दिया जाता है। युग के इस अभूतपूर्व सृजन आँदोलन में सुशिक्षित युवा वर्ग बुद्ध के युवा भिक्षु−भिक्षुणियों, रामकृष्ण मिशन के युवा संन्यासी परिव्राजकों, गाँधी के युवा सत्याग्रहियों एवं सुभाष−भगत सिंह की परंपरा में त्याग−बलिदान के उच्चस्तरीय आदर्श प्रस्तुत कर रहा है। जाति−वर्ग, धर्म−संप्रदाय, भाषा−प्राँत आदि भेद−भावों से परे यह आँदोलन सुसंस्कृत मानव एवं सभ्य समाज के नव निर्माण के लिए संकल्पित है। इसकी रचनात्मक गतिविधियों के अंतर्गत सप्तक्राँतियों का बिगुल बज चुका है, जिसके अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण, नशा निवारण, कुरीति उन्मूलन एवं नारी जागरण जैसे कार्य हाथ में लिए गए हैं। भोगवादी संस्कृति के नागपाश में जक्रही युवा शक्ति व राजनीति के चक्रव्यूह में उलझी छात्र शक्ति इस अभियान में अपनी ऊर्जा का नियोजन कर समाज निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्य में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा सकती है।
साधना पर बल दिया। इन आधुनिक संतों के कारण वैचारिक स्वतंत्रता, निर्भीकता, मानवता एवं विश्वकल्याण जैसे नैतिक गुणों को ग्रहण करने की प्रेरणा मिली।
साधना के लिए तैयार हो सके, अपने आपको भागवत् चेतना के अतिमानसी रूप का वाहन बना सकें तो पृथ्वी पर चमत्कार घटित होगा। तब हजारों−लाखों लोग पूर्णता को प्राप्त कर सकेंगे। गिने−चुने साधकों में होने वाला अवतरण, उन्हें बिजलीघर की तरह बना देगा, जहाँ से लोगों तक विद्युत् धारा पहुँचती रहे। गिने−चुने साधकों में भागवत् चेतना का अवतरण उन्हें प्रकाश स्तंभ की तरह खड़ा कर देने जैसा है। मुक्त आत्माओं के उस आलोक को देख हजारों लोगों को प्रेरणा मिल सकती है और वे भी पूर्णता को प्राप्त कर सकते हैं।
साधना का पुरुषार्थ करते हुए इस तक पहुँचे हैं। तब उससे ज्यादा घनिष्ठ हो सकेंगे। प्रह्लाद और ध्रुव की साधना भक्तों की आदर्श है। उन्होंने अनायास आए अवतारी रूप या दृश्य को पहचानने से मना कर दिया। कहा कि जब तक वह हृदय में नहीं प्रकट होंगे, अतिथि ईश्वर को स्वीकार नहीं करेंगे।
साधनाएँ समूह में की जातीं तो विलक्षण परिणाम निकलते।
साधना चौबीस घंटे की होती है। हर क्षण भगवत्चेतनामय, हर क्षण विधेयात्मक चिंतन से ओत−प्रोत तथा सतयुगी उल्लास भरे आनंद में सराबोर रहे, ऐसी अपेक्षा हमारी गुरुसत्ता की प्रत्येक परिजन से इस वर्ष विशेष में है। हम मात्र उत्साह में औपचारिकता न बरतकर रह जाएँ, गहरे उतरें व गुरुसत्ता के चिंतन−प्रवाह में निरंतर गोते लगाते रहने का अभ्यास करें, यह अपेक्षा स्वाध्यायक्रम में हम से की जा रही हैं।
साधनाएँ अकेले ही करने की व्यवस्था है। ये साधनाएँ समूह में की जातीं तो विलक्षण परिणाम निकलते।
साधना कहते हैं। जिन उपायों से परमात्मा का अनुग्रह बरसता है, दरअसल वह उपाय कम और मौन पुकार ज्यादा है। इसे प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना सुनकर भगवान् दौड़े आते हैं। उनकी कृपा बरसने लगती है।
साधना सत्र का प्रारूप
साधना पर जोर देने वाले धर्मों में उदारता, सहिष्णुता और युक्तिसंगतता के लिए पर्याप्त स्थान मिला है। क्योंकि उन धर्म परंपराओं में अपनी साधना और स्थिति के अनुसार ही अर्जन किया होता है। अपने पुरुषार्थ से प्राप्त उपलब्धि पर गर्व और संतोष होता है। उसे सहेजने की चिंता की जाती है।
साधना के बाद समाधान गोष्ठी, वीडियो संदेश, प्रज्ञा पुराण आदि का क्रम चलेगा। अपराह्न की गोष्ठी के बाद प्रतिदिन 3.30 पर सामूहिक श्रमदान तथा 5 बजे आरती होगी, जिसमें सभी भाग लेंगे। पाँचवे दिन प्रातःकाल के विदाई संदेश के बाद सभी अपने−अपने स्थानों के लिए रवाना हो सकेंगे। इस प्रकार प्रायः पाँच दिन में वे परिजन जो दूरी के कारण, छुट्टी न मिल पाने के कारण अथवा कई अन्य झंझटों में उलझे रहने के कारण शाँतिकुँज नहीं आ पाते, उसी प्राणप्रवाह से अभिपूरित हो सकेंगे, जो सुयोग गायत्री तीर्थ में आने पर मिलता। यदि उत्साह उभरा, तो प्रत्येक शक्तिपीठ एक जाग्रत् प्राणवान् केंद्र बनकर एक−डेढ़ वर्ष में प्रशिक्षण की प्रक्रिया संपन्न कर रहे होंगे।
साधनात्मक महापुरुषार्थ संपन्न हो गया और हम सबके लिए एक वातावरण बनाया गया। 1989 से लेकर वसंत पर्व 2001 तक चले इस विशिष्ट अभियान के फलितार्थ क्या होंगे, इसे परमपूज्य की लेखनी से जानने का प्रयास करें, तो अच्छा रहेगा। यह उपर्युक्त चिंतन अगस्त 1969 विशेषाँक के पृष्ठ 17 से उद्धृत हैं। “हम सुषुप्ति की स्थिति में पड़ी हुई राष्ट्र चेतना को कुँभकरणी निद्रा से जगाने का प्रयास करेंगे। विश्वास है कि अगले दिनों राष्ट्र जगेगा और अँगड़ाई लेता हुआ उठ खड़ा होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-May
साधना में केंद्र के कार्यकर्त्ताओं ने देखा।
साधना एक आँदोलन के रूप में जन-जन तक पहुँच जाए। इस आंदोलन की सफलता ही अन्य बड़े परिवर्तनों का, अन्य आँदोलनों की सफलता का आधार बनाएगी। हमारी उपासना पद्धति कुछ भी क्यों न हो, हमारे इष्ट भिन्न-भिन्न क्यों न हों, साधना तो जीवन देवता की है। एक कल्पवृक्ष के रूप में विकसित हो सकने वाले जीवन की है। इसीलिए इस आँदोलन में भागीदारी हर वर्ग की है, हर जाति, पंथ, मत, संप्रदाय, वर्ग, लिंग के भावनाशील की है।
साधना में लीन ऋषियों ने वेद-उपनिषद्, दर्शन, पुराणों की ज्ञान गंगा बहाई। इसी दौर में मानवीय सभ्यता ने विकास का जो स्वर्ण युग देखा, वह प्रकृति के साथ मनुष्य के गहन सामंजस्य, सहयोग एवं सद्भाव की कहानी है। वैदिक ऋषि न केवल वेदमंत्रों के द्रष्टा थे, बल्कि वे कुशल वैज्ञानिक भी थे। प्रकृति-पर्यावरण के सूक्ष्म रहस्यों को जानने के लिए वे जितने उत्सुक थे, उतने ही पर्यावरण के संरक्षण के विषय में भी सजग थे। वेदों के सूक्तों में इस विषय के लिए विशेष स्थान मिला है।
साधना कर लक्ष्य है। यह ज्ञान स्वरूप चैतन्य को अज्ञान से मुक्त कर देने पर प्राप्त होता है।
साधना की प्रथम अवस्था में कर्म निष्कामपूर्वक करना चाहिए। अगली अवस्था में कर्तव्य कर्म भी भगवद् अर्पित हो जाता है। इसी स्थिति में भक्ति भावना उदय होती हैं। अंत में कर्मयोगी स्वयं को कर्ता भी नहीं मानता और वह कर्तव्य की भावना से रहित हो जाता है। कर्मयोग से लौकिक एवं अलौकिक दोनों कर्मों का उत्थान होता है।
साधनाएँ एक ही लक्ष्य उस अनंत सौंदर्य-आनंदस्वरूप-तत्त्वरूप परमात्मा की ओर ले जाने वाली पगडंडियाँ ही तो हैं।
साधना से आरंभ होना है एवं पराकाष्ठा तक पहुँचने पर ज्ञान की प्राप्ति होने तक चलता चला जाता है।
साधना और उससे प्राप्त होने वाली आध्यात्मिक विकास की पूर्णता का नाम ही योग है। महान योगी श्री अरविंद ने योग समन्वय में स्पष्ट किया है कि परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना तथा इसे प्राप्त करना, यही सब योगों का स्वरूप है।
साधना को आँदोलन के रूप में सारे समाज में संव्याप्त होते ही परिष्कृत प्रतिभावनाओं की, संकल्पित विभूतिवानों की संख्या बढ़ने लगेगी। ऐसे प्राणवान् ही वह कार्य कर पाएंगे, जिसे विभिन्न आँदोलनों के रूप में बताया गया है। ये आँदोलन कोई नए नहीं है। पहले भी इनकी चर्चा होती रही हैं एवं अनेकानेक सामाजिक संगठन, शासकीय विभाग भी इन्हीं कार्यों में लगे हैं। वे सफल इस कारण नहीं होते कि उनकी धुरी अध्यात्म, नैतिकता या साधना नहीं, मात्र बौद्धिक प्रतिपादन होते हैं।
साधना विश्व-संकट का समाधान है भारी,
विघ्नों में भी विजयी होगी इससे ही मानवता सारी
साधना का लक्ष्य शरीर और प्राण पर विजय प्राप्त करना है।
साधना है। यद्यपि यह योग कठिन एवं दुर्गम है, परंतु भगवत्कृपा से यह भी सहज, सरल एवं सुगम हो जाता है। महर्षि रमण के अनुसार ‘हृदय गुह्य’ में केवल मात्र ब्रह्मा ही है। यह साक्षात आत्मस्वरूप में प्रकाशित होता है। रमण महर्षि कहते हैं उसी की खोज एवं उस में विलय ही महायोग है।
साधना। साधना एक आँदोलन के रूप में जन-जन तक पहुँच जाए। इस आंदोलन की सफलता ही अन्य बड़े परिवर्तनों का, अन्य आँदोलनों की सफलता का आधार बनाएगी। हमारी उपासना पद्धति कुछ भी क्यों न हो, हमारे इष्ट भिन्न-भिन्न क्यों न हों, साधना तो जीवन देवता की है। एक कल्पवृक्ष के रूप में विकसित हो सकने वाले जीवन की है।
साधना परंपरा में आगे बढ़ने के लिए शक्ति और प्रेरणा देता है। यहाँ गीता-रामायण आदि ग्रंथों का परामर्श कुछ विशेष कारणों से दिया गया है। गिनाए गए शास्त्रों को दो वर्गों में रख सकते हैं। एक तत्वदर्शनप्रधान और दूसरे कथानकप्रधान। गीता, उपनिषद् सूत्र आदि शास्त्र तात्विक है।
साधना के लिए सबसे अच्छा प्रातःकाल का ही है। दूसरे कामों के लिए भी प्रातःकाल का ही हैं, यानी कि चौबीस घंटों में जो सबसे अच्छा समय हैं, वह प्रातःकाल का ही हैं। प्रातःकाल के समय को आप जिस भी काम में लगा देंगे, उसी काम में आपको बड़ी प्रसन्नता मिलेगी और सफलता भी मिलेगी।
साधना में उस निष्काम साधक की कहानी भी प्रकाश में आ पाई। घटना महाराणा प्रताप के जीवनकाल की है। जब वह मुगल सेनाओं से अपने देश की रक्षार्थ संघर्ष करते हुए स्वातंत्र्य की यज्ञवेदी पर अपने सर्वस्व का होम कर जंगलों और पहाड़ियों में छिपकर कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे और भविष्य के अपने ध्येय की पूर्ति के प्रति चिंतित थे।
साधना अवतरित हुई व उनने बता दिया कि सभी धर्म-मत सत्य हैं, अनंत मत-अनंत पथ हैं। इसीलिए तो श्री रामकृष्ण के संबंध में भाव-विभोर होकर स्वामी विवेकानंद कह उठते हैं, "उनका जीवन एक असाधारण प्रकाश स्तंभ है, जिसके तीव्र प्रकाश से लोग हिंदू धर्म के समाज अंग और आशय को समझ सकेंगे। ऋषि और अवतार जिस यथार्थ शिक्षा को देना चाहते थे, वह उसे अपने जीवन से दे गए हैं। शास्त्र-मतवाद मात्र हैं, परंतु वह थे उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति। यह व्यक्ति इक्यावन वर्षों के जीवन से पाँच हजार वर्षों का जातीय-आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करके भावी वंशधरों के लिए अपने को दृष्टाँत रूप बना गए है।
साधना के सार्वभौम सूत्रों को अपनाकर वे न केवल युग निर्माण की प्रक्रिया को गति देंगे, एक नए विश्व, देव संस्कृति प्रधान राष्ट्र के नेतृत्व वाले ग्लोबल ग्राम के रूप में देखे जाने वाले मानव-समुदाय की भवितव्यता रच रहे होंगे। निश्चित ही यह सब कुछ अपने अंदर उस गहरे स्तर की संवेदना विकसित किए, जीवन जीने की कला में सुगढ़ता लाए तथा सद्बुद्धि को अंगीकार किए बिना संभव नहीं है। इसीलिए बार-बार इस साधना आँदोलन की धुरी जाग्रत् संवेदना, व्यक्तित्व परिष्कार एवं गायत्री महाशक्ति को ही मानकर आगे चलने को कहा जा रहा है।
साधनात्मक भागीदारी हुई। अखण्ड जपप्रधान साधनात्मक आयोजन हुए, रजवंदन से लेकर ग्रामतीर्थ की प्रदक्षिणा-आश्वमेधिक पुरुषार्थ से लेकर संस्कार-महोत्सवों का गरिमापूर्ण आयोजन तथा दो विराटतम स्तर की महापूर्णाहुतियाँ संपन्न हुईं। एक 1995 में आँवलखेड़ा में तो दूसरी भारत की आध्यात्मिक राजधानी कुँभनगरी हरिद्वार में 2 के अंत में। अब अनुयाज की बारी है।
साधना के क्षेत्र में जो भी पुरुषार्थ किया जाता है, उसका उद्देश्य अपने आपको ऊपर उठाना है। संत महात्माओं की प्रेरणा के अनुसार यह कार्य परमात्मा को पाना अथवा अपने क्षुद्र अहं को विराट चेतना में घुला मिला देना है। अपनी स्थिति की निरंतर समीक्षा की जाती रहे, तभी पता चलता है कि प्रगति हो रही अथवा नहीं? निश्चित और सुदृढ़ प्रगति अनायास नहीं हो जाती, न ही वह क्षण भर में घट जाने वाला चमत्कार है। अहंकार धीरे धीरे ही पोषण पाते हैं, आज जो ग्रहों किया जा रहा है।
साधना आँदोलन की धुरी जाग्रत् संवेदना, व्यक्तित्व परिष्कार एवं गायत्री महाशक्ति को ही मानकर आगे चलने को कहा जा रहा है।
साधना जितनी तीव्रतम होगी, उसमें जितना संकल्प भरा प्राण होगा, उतना ही वह आने वाले समय की कई गुना बड़ी महत्व वाली जिम्मेदारियाँ निबाहने को तैयार हो जाएगा। एक राजपुत्र से तपस्वी भगीरथ बनकर वह कार्य हो पाया था, जिसे गंगावतरण कहते हैं। गंगा यों ही धरती पर नहीं आई। पुण्यतोया सुरसरि हिमालय क्षेत्र में भगवान् महाकाल की जटाओं से निस्सृत होकर निकलीं, तो उसके पीछे भगीरथ का तप था। आज भी आर्यावर्त उसे भागीरथी कह उस तप का सम्मान करता है।
साधना चिंतन से आरंभ होती है। महायोग का जो साध्य है वही साधना है। यद्यपि यह योग कठिन एवं दुर्गम है, परंतु भगवत्कृपा से यह भी सहज, सरल एवं सुगम हो जाता है। महर्षि रमण के अनुसार ‘हृदय गुह्य’ में केवल मात्र ब्रह्मा ही है। यह साक्षात आत्मस्वरूप में प्रकाशित होता है।
साधना नहीं, मात्र बौद्धिक प्रतिपादन होते हैं। बौद्धिक आँदोलन स्थाई नहीं होते। सामाजिक क्राँतियाँ तभी चिरस्थाई परिणाम वाली होती हैं, जब उनका आधार अध्यात्मिक हो, व्यक्ति का संवेदनामूलक विकास हो, साधना उनकी रग-रग में हो। ऐसा नहीं है तभी तो एन.जी.ओ. (नॉन गवर्नमेंट आर्गेनाइजेशन्स स्वैच्छिक संगठनों) के कुकुरमुत्तों की तरह सारे समाज में फैले जाल को देखकर भी किसी के मन में आस नहीं जगती, उत्साह की किरण नहीं फूटती। उलटे अधिकांश एन.जी.ओ. से जुड़े भ्रष्ट तंत्र को देखकर जुगुप्सा होने लगती है और सरकार का तो कहना ही क्या?
साधनाप्रधान महाप्रज्ञा करोड़ों भावनाशीलों द्वारा याज रूप में 1989 से 2-21 की वसंत तक संपन्न किया गया। इस सहस्राब्दी ही नहीं, युग के इतिहास में यह एक मील का पत्थर बन गया है, जिसमें देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत करोड़ों व्यक्तियों की साधनात्मक भागीदारी हुई। अखण्ड जपप्रधान साधनात्मक आयोजन हुए, रजवंदन से लेकर ग्रामतीर्थ की प्रदक्षिणा-आश्वमेधिक पुरुषार्थ से लेकर संस्कार-महोत्सवों का गरिमापूर्ण आयोजन तथा दो विराटतम स्तर की महापूर्णाहुतियाँ संपन्न हुईं। एक 1995 में आँवलखेड़ा में तो दूसरी भारत की आध्यात्मिक राजधानी कुँभनगरी हरिद्वार में 2 के अंत में। अब अनुयाज की बारी है।
साधना, योगनिद्रा का उच्चस्तरीय प्रयोग होता रहा है। उसका छोटा रूप आधुनिक सम्मोहन विज्ञान है। इलेक्ट्रोडों द्वारा प्रसुप्त को जगाने के लिए जो झटके दिए जाते हैं, वह प्रयोजन ध्यान धारणा के सहारे प्रसुप्त संस्थानों को पुनर्जीवित करके भलीप्रकार पूरा हो सकता है। प्राणायाम में ऑक्सीजन उपचार के सुविस्तृत विज्ञान का समावेश है। इन उपचारों के सहयोग सामान्य मनुष्य का अनेक दृष्टियों से असामान्य बन सकना संभव है।
साधना-प्रणालियों का मूल गायत्री बताकर सभी को उसके मर्म को जीवन में उतारने को कहा, वह चाहे किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो। सभी पहुँचते विभिन्न मार्गों से एक ही केंद्रबिंदु की ओर हैं, यही निष्कर्ष पूज्यवर के जीवन-दर्शन के अमृत-मंथन से निकलता है। कभी वैदिक युग में ऋषियों के मुख से "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" निकला था, किंतु द्वापर में "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" की घोषणा के बाद इस उदार महावाक्य को उन्नीसवीं में जीने के लिए ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस को एवं बीसवीं शताब्दी में श्रीराम शर्मा आचार्य जी को आना पड़ा।
साधना के लिए अगर आप प्रातःकाल का समय निकाल पाएँ, तो बहुत अच्छा। कदाचित् प्रातःकाल का समय निकालना आपके लिए संभव न हो तो आप ऐसा करें कि और कोई समय एक साथ मनोयोगपूर्वक काम करने हेतु आप निकाल ले। जब कभी आप यह देख पाएँ कि एक आधा घंटा या पंद्रह मिनट का समय ऐसा निकलता है, जिसमें आप शांतचित्त है। इसमें मन के लिए शांतचित्त होना जरूरी है। भागदौड़ में, रास्ता चलते, चलते-फिरते कहीं भी जप कर लेंगे, नहीं, ऐसा मत कीजिए।
साधना की इस वर्ष विशेष में और प्रखर बना लें। जिसकी जीवन साधना जितनी तीव्रतम होगी, उसमें जितना संकल्प भरा प्राण होगा, उतना ही वह आने वाले समय की कई गुना बड़ी महत्व वाली जिम्मेदारियाँ निबाहने को तैयार हो जाएगा। एक राजपुत्र से तपस्वी भगीरथ बनकर वह कार्य हो पाया था, जिसे गंगावतरण कहते हैं। गंगा यों ही धरती पर नहीं आई। पुण्यतोया सुरसरि हिमालय क्षेत्र में भगवान् महाकाल की जटाओं से निस्सृत होकर निकलीं, तो उसके पीछे भगीरथ का तप था।
साधना में लग गया।
साधना-प्रणालियों का अवलंबन कर सिद्धि के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचकर दिखाया, वहीं पूज्यवर ने भगवत् प्राप्ति के सभी मार्ग हमारे समक्ष खोलकर रख दिए। उनने विभिन्न प्रकार की साधना-प्रणालियों का मूल गायत्री बताकर सभी को उसके मर्म को जीवन में उतारने को कहा, वह चाहे किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो। सभी पहुँचते विभिन्न मार्गों से एक ही केंद्रबिंदु की ओर हैं, यही निष्कर्ष पूज्यवर के जीवन-दर्शन के अमृत-मंथन से निकलता है। कभी वैदिक युग में ऋषियों के मुख से "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" निकला था, किंतु द्वापर में "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" की घोषणा के बाद इस उदार महावाक्य को उन्नीसवीं में जीने के लिए ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस को एवं बीसवीं शताब्दी में श्रीराम शर्मा आचार्य जी को आना पड़ा।
साधना, षड्दर्शन-ज्ञान, कर्म, भक्ति, योग साधन, तंत्र आदि के मार्गों के प्रचलन के कारण विगत चार-साढ़े चार हजार वर्षों में एक कठिन परिस्थिति उत्पन्न हुई। अनेक धर्म-मतों के अनुयायी राजशक्ति की सहायता से अपने-अपने धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए परस्पर संघर्षरत हुए। "मेरा धर्म सत्य है" इस भाव से बहुत कुछ रक्त इस धरती पर बहा है। ऐसे में ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस की जीवन-साधना अवतरित हुई व उनने बता दिया कि सभी धर्म-मत सत्य हैं, अनंत मत-अनंत पथ हैं। इसीलिए तो श्री रामकृष्ण के संबंध में भाव-विभोर होकर स्वामी विवेकानंद कह उठते हैं, "उनका जीवन एक असाधारण प्रकाश स्तंभ है, जिसके तीव्र प्रकाश से लोग हिंदू धर्म के समाज अंग और आशय को समझ सकेंगे।
साधना का चमत्कार है।
साधना ही है, प्रतिभा परिष्कार ही है। शांतिकुंज के तत्वावधान में बनकर खड़े हो रहे देव संस्कृति विश्वविद्यालय की विधाएं (फैकल्टी) उपर्युक्त सातों उपक्रम होंगे। फिर नालंदा तक्षशिला की परंपरा पुनर्जीवित होती देखी जा सकेंगी। पुनः भारत का स्वर्णयुग लौटेगा एवं हमारा देश जगद्गुरु कहलाएगा। किसी को भी इसमें संदेह नहीं करना चाहिए।
साधना केंद्रित आँदोलन का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। नारी जागरण मूलतः एक आध्यात्मिक आँदोलन हैं, सामाजिक नहीं। राष्ट्र की आधी जनशक्ति को जगाकर उसके स्थूल सौंदर्य नहीं, मूल संवेदना प्रधान स्वरूप का जागरण शक्तिपूजा करने वाले इस देश का गौरव पुनः लौटाएगा। सारे विश्व में नारी का भिन्न-भिन्न रूपों में शोषण हो रहा है। यह रुकेगा तब, जब नारी स्वयं आगे आएगी।
साधना उपासना का प्रभाव हो रहा है या नहीं, इस सही दिशा में बढ़ रहे हैं या नहीं अथवा यथास्थिति ही बनी हुई है? यह जानने का उपाय समीक्षा के सिवा कोई नहीं हो सकता। साधना के क्षेत्र में जो भी पुरुषार्थ किया जाता है, उसका उद्देश्य अपने आपको ऊपर उठाना है। संत महात्माओं की प्रेरणा के अनुसार यह कार्य परमात्मा को पाना अथवा अपने क्षुद्र अहं को विराट चेतना में घुला मिला देना है। अपनी स्थिति की निरंतर समीक्षा की जाती रहे, तभी पता चलता है कि प्रगति हो रही अथवा नहीं?
साधना कर लें और तीव्रता या मंद अभ्यास के अनुसार उसका प्रभाव देखने के लिए देर तक बैठे रहे, तो जीवनभर साधना करते हुए भी प्रगति नहीं होगी।
साधनात्मक आयोजन हुए, रजवंदन से लेकर ग्रामतीर्थ की प्रदक्षिणा-आश्वमेधिक पुरुषार्थ से लेकर संस्कार-महोत्सवों का गरिमापूर्ण आयोजन तथा दो विराटतम स्तर की महापूर्णाहुतियाँ संपन्न हुईं। एक 1995 में आँवलखेड़ा में तो दूसरी भारत की आध्यात्मिक राजधानी कुँभनगरी हरिद्वार में 2 के अंत में। अब अनुयाज की बारी है।
साधना एवं उनकी यथाविधि सम्यक् साधना और उससे प्राप्त होने वाली आध्यात्मिक विकास की पूर्णता का नाम ही योग है। महान योगी श्री अरविंद ने योग समन्वय में स्पष्ट किया है कि परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना तथा इसे प्राप्त करना, यही सब योगों का स्वरूप है।
साधना संहिता पालन में हुई चूकों का पकड़ना और दोबारा उन्हें न होने देने का संकल्प करना चाहिए। समीक्षा के बाद आज का जीवन पूरा हुआ। जीवन यज्ञ में एक दिवस आहुति दी गई। अगले दिन और उत्कृष्ट आहुति प्रस्तुत करेंगे। यद्यपि ध्यान रखें कि साधन संहिता का उल्लंघन हुआ तो प्रायश्चित भी किया जाए।
साधनात्मक स्थूल उपचार किए जाते हैं। भीतरी पवित्रता का उद्देश्य यदि पूरा न हुआ तो बाह्य कर्मकांडों का कुछ विशेष लाभ नहीं मिल पाता।
साधना तो जीवन देवता की है। एक कल्पवृक्ष के रूप में विकसित हो सकने वाले जीवन की है। इसीलिए इस आँदोलन में भागीदारी हर वर्ग की है, हर जाति, पंथ, मत, संप्रदाय, वर्ग, लिंग के भावनाशील की है। उपासना-साधना के सार्वभौम सूत्रों को अपनाकर वे न केवल युग निर्माण की प्रक्रिया को गति देंगे, एक नए विश्व, देव संस्कृति प्रधान राष्ट्र के नेतृत्व वाले ग्लोबल ग्राम के रूप में देखे जाने वाले मानव-समुदाय की भवितव्यता रच रहे होंगे। निश्चित ही यह सब कुछ अपने अंदर उस गहरे स्तर की संवेदना विकसित किए, जीवन जीने की कला में सुगढ़ता लाए तथा सद्बुद्धि को अंगीकार किए बिना संभव नहीं है।
साधना उनकी रग-रग में हो। ऐसा नहीं है तभी तो एन.जी.ओ. (नॉन गवर्नमेंट आर्गेनाइजेशन्स स्वैच्छिक संगठनों) के कुकुरमुत्तों की तरह सारे समाज में फैले जाल को देखकर भी किसी के मन में आस नहीं जगती, उत्साह की किरण नहीं फूटती। उलटे अधिकांश एन.जी.ओ. से जुड़े भ्रष्ट तंत्र को देखकर जुगुप्सा होने लगती है और सरकार का तो कहना ही क्या? तहलका डाट-काम के पर्दाफाश से बेनकाब हमारा भ्रष्ट राजतंत्र क्या किसी को दे सकता है, कैसे राष्ट्र की, हम सबकी रक्षा कर सकता है, यह प्रश्न चिह्न हम सबके समक्ष खड़ा है।
साधना करते हुए भी प्रगति नहीं होगी।
साधनात्मक आधार पर ही आएगी। साक्षरता का कार्य वर्षों से चल रहा है, पर राष्ट्र अभी तक साक्षर नहीं हो पाया। कामकाजी विद्यालयों की योजना से लेकर जीवनमूल्यों को स्थापित करने वाली नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम के अंग-अंग में पिरोकर नई शिक्षण पद्धति का जनम गायत्री परिवार देगा। ऐसे क्राँतिकारी शिक्षक तैयार करेगा जो श्री श्रीराम चंद्र जी की तरह से ढेरों गाँधी तैयार कर सकें। स्वास्थ्य के क्षेत्र में यदि कोई आमूलचूल परिवर्तन होना है, तो वह अपने देश की परिस्थितियों के अनुरूप आयुर्वेद की समग्र चिकित्सा, ‘होलिस्टीक मेडीसीन’ वाली पद्धति के विकास से ही संभव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-March
साधना द्वारा मेघनाद को वह बल प्रदान किया था कि उसके आगे देवता भी नहीं टिक सकते थे। ऐसे अपराजेय योद्धा को मारने वाले महारथी लक्ष्मण को भी यह सौभाग्य उनकी महान् पतिव्रता उर्मिला ने ही प्रदान किया था। उर्मिला भारतीय नारी के गौरवमय इतिहास का चंद्रमा, जिसने चौदह वर्ष तक अपने पति की अनुपस्थिति में पलक ऊपर उठाकर किसी पुरुष के दर्शन भी नहीं किए थे। उसने राज्य-भोग, आभूषण और स्वादयुक्त भोजनों का केवल इसलिए परित्याग कर दिया था, क्योंकि उसके पति वनवासी थे। ऐसी निष्ठाएँ भारतीय समाज को वह शक्ति प्रदान करती रही हैं, जिनकी यश-गाथाएँ आज भी विश्व-इतिहास के अंतरिक्ष में सूर्य की भाँति देदीप्यमान हैं।
साधना में लीन हैं। यह आश्रम मानसरोवर और कैलाश से भी आगे स्थित है, जिसे स्थूल दृष्टि से देखा जाना संभव नहीं है। मात्र दिव्यदृष्टिसंपन्न कृपापात्र व्यक्ति ही इसका दर्शन कर सकते हैं। मीलों लंबा यह दिव्य क्षेत्र स्वयं में अद्वितीय है। यह ऋतु काल एवं वायुमंडल जैसे भौतिक कारकों से सर्वथा मुक्त है।
साधना का अभ्यास प्रखर बनाएँ। समाज के हर वर्ग, संप्रदाय को लोगों को उनकी श्रद्धा के अनुरूप उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना हेतु प्रेरित करें। स्थान-स्थान पर सामूहिक साधना सत्रों का समय-समय पर आयोजन करें।
साधना सत्रों का समय-समय पर आयोजन करें।
साधना, इसमें प्रकृति से कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है। खाद्य सामग्री, वस्तु, बहुमूल्य हीरे, जवाहरात आदि शून्य से प्राप्त कर मनोवाँछित सफलता एवं संपन्नता पाई जा सकती है। (12) सूर्य विज्ञान, इसके माध्यम से एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ में रूपांतरित किया जा सकता है।
साधना की अवस्था ये समझने के लिए ही है कि जब हम प्रस्थान बिंदु से जगत् की ओर यात्रा करते हैं, तो वह लौकिक हो जाता है और अपने भीतर मुड़ते हैं, तो आत्मिक हो जाती है।
साधना सत्र (1 से 17 मार्च 2001 तथा आश्विन नवरात्रि 2001 से चैत्र नवरात्रि 2002 तक) चलाए जाने की घोषणा विगत अंक में की गई थी। यह सत्र प्राण-प्रत्यावर्तन स्तर के होंगे। एक कक्ष में एक ही साधक रहेगा। पूर्ण एकाँत एवं मौन साधना के साथ निर्धारित जप, प्राणयोग, ध्यानयोग आदि की साधनाओं में रत रहना होगा। टेपरिकॉर्डर से ध्वनि प्रसारण यंत्र द्वारा प्रत्येक कमरे में गुरुदेव के विचार पहुँचाएँगे।
साधना सत्रों का आधार बन जाएगा।
साधना का पक्ष। साधना के साथ क्रमशः सिद्धियों का प्रस्फुटन भी शुरू हो जाता है, किंतु जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति में इनकी चकाचौंध को बाधस्वरूप मानकर हमेशा इनसे बचने का ही निर्देश रहता है। साधना की परिपक्व अवस्था में सिद्धपुरुषों और योगियों के लिए सिद्धियाँ कौतुक का विषय नहीं रहतीं, बल्कि अनुचर बनकर रह जाती हैं, जिनका उपयोग मात्र लोककल्याण के हित ही किया जाता है, जो भी हो, सिद्धियों का अस्तित्व अध्यात्म विज्ञान की असीम समर्थता को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है।
साधना तथा महापूर्णाहुति के पाँच चरणों ने जिन व्यक्तित्वों को, देवमानवों को जन्म दिया है, उन्हें सप्त आँदोलनों में नियोजित होने के लिए तुरंत प्रेरित किया जा रहा है। व्यावहारिक प्रशिक्षण उनका क्षेत्रीय स्तर पर भी चलेगा व केंद्र में भी, किंतु न्यूनतम तो किन्हीं सूत्रों से शुरुआत हो ही सकती है। ऐसे सूत्र यहाँ दिए जा रहे हैं।
साधनारत हैं। कुछ योगी तो सैकड़ों वर्षों से यहाँ ध्यानस्थ हैं। केवल योगी, साधु और संन्यासी ही नहीं, अपितु संन्यासिनियों और योगिनियाँ भी इस कालापग्राम में विचरण करती हुई दिखाई देती हैं। यहाँ पर किसी प्रकार का छल, कपट, द्वेष, व्यभिचार आदि नहीं है, बल्कि साधना के क्षेत्र में उन्नत, प्रकृति के अज्ञात रहस्यों की खोज में सभी अपने आप में निमग्न हैं।
साधना सत्र एवं एक कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सत्र चला सकें। ये सत्र पाँच-पाँच दिन के होंगे। क्षेत्रीय स्तर पर विभूतियों के मंथन के क्रम में ढेरों नए व्यक्ति जुड़े हैं। ये सभी शाँतिकुँज तो आ नहीं सकते। दूसरे संख्या इतनी बड़ी है कि इस कार्य में बिना पीठों की भागीदारी हुए एक बड़ी संख्या को साधक बनाना, प्रशिक्षित समयदानी बनाना संभव नहीं है।
साधना करनी चाहिए कि संसारभर में जो कुछ है ईश्वर का है। मैं तो वस्तुओं या प्राणियों का उपयोग उनकी इच्छानुसार किया करूंगा।
साधना से जोड़ने के लिए योजनाबद्ध प्रयास करने की बात सतत कही जाती रही है। विगत सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ में सबने इसे गंभीरतापूर्वक समझा भी व अपनाने हेतु स्वयं को तत्पर भी किया है।
साधना आँदोलन को गति देने के लिए ये सत्र प्रतिमाह चलेंगे, संचालन केंद्रीय तंत्र का होगा। इसके अतिरिक्त एक कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सत्र भी चलाने हेतु उन्हें कहा जा रहा है। अभी जनवरी माह में वसंत पर्व तक 60 शक्तिपीठों पर एक-एक दिन के सत्र चलाकर एक प्रयोग किया गया, जो बड़ा सफल रहा। प्रथम दृष्टि में जो बड़े समर्थ-महत्त्वपूर्ण पीठ दिखे, वहीं पर ये आयोजन किए गए। अब इनकी संख्या अधिक होगी।
साधना’ पुस्तिका को इस आँदोलन के लिए माध्यम बनाएँ।
साधना कर लेंगे आप। आपकी जीभ के ऊपर अंकुश, खान-पान के ऊपर अंकुश, उठने-बैठने के ऊपर अंकुश, हजार अंकुश लगाने पड़ेंगे। नहीं गुरुजी! हम तो व्याख्यान देंगे। बेटे, हमें नहीं कराना व्याख्यान। अगर हमारी शर्तें पूरी कर सकता है, तो तेरे व्याख्यान का स्वागत है।
साधना केंद्र वे कहे जाएँगे, जहाँ मंदिर के साथ गायत्री उपासना सिखाने, संस्कार कराने तथा युगसाहित्य जन-जन को उपलब्ध कराने जैसी गतिविधियाँ नियमित रूप से चलती हैं। नवरात्रियों में कभी-कभी वहाँ साधनाएँ भी संपन्न होती हैं एवं वर्ष में कुछ दिन यज्ञ होता रहता है।
साधना बताई गई है।
साधना इसीलिए तो इस समय की विशेष साधना बताई गई है।
साधना के क्षेत्र में उन्नत, प्रकृति के अज्ञात रहस्यों की खोज में सभी अपने आप में निमग्न हैं।
साधना की परिपक्व अवस्था में सिद्धपुरुषों और योगियों के लिए सिद्धियाँ कौतुक का विषय नहीं रहतीं, बल्कि अनुचर बनकर रह जाती हैं, जिनका उपयोग मात्र लोककल्याण के हित ही किया जाता है, जो भी हो, सिद्धियों का अस्तित्व अध्यात्म विज्ञान की असीम समर्थता को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है।
साधनाओं से प्रत्यक्ष हुआ, उसे वह अपनी दलीलों के साथ सामने रखते और जो शास्त्री जी कहते उसे समझने, समझकर पचाने-आत्मसात् करने का प्रयत्न करते।
साधना (25-3 से 2-4-01) हेतु सामूहिक आयोजन अवश्य कर लें। इससे भावी साधना सत्रों का आधार बन जाएगा।
साधना के क्षेत्र में गहरे उतरने की बात हो अथवा जीवन-संग्राम में पग-पग पर आने वाली बाधाओं से जूझने की, हम जब हमारी गुरुसत्ता के पत्रों के माध्यम से उनके जीवन-दर्शन को पढ़ने की कोशिश करते हैं, तो उनका वह पहलू नजर आता है, जो कभी किसी को सद्गुरु के रूप में परामर्श देता था, कभी लताड़ भी लगाता था तथा कभी मित्रवत् सलाह भी देता था। लक्ष्य एक ही होता था कि पत्र पाने वाला अपनी जिज्ञासा का सही समाधान पाए एवं इधर-उधर भटके नहीं। साथ ही उसका मनोबल भी बढ़े एवं दुगुने उत्साह के साथ वह कार्य में लग जाए। इस बार इस स्तंभ के लिए कुछ ऐसे पत्रों का चयन हमने किया है, जो 1944 से 1970 के बीच लिखे गए। देखें कितना महत्त्वपूर्ण शिक्षण देते हैं, हमें ये पत्र।
साधना का रूप ले। श्री अरविंद के अनुसार “सारा जीवन ही योग है।” हर श्वास को साधनामय बनाएँ।
साधना के साथ क्रमशः सिद्धियों का प्रस्फुटन भी शुरू हो जाता है, किंतु जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति में इनकी चकाचौंध को बाधस्वरूप मानकर हमेशा इनसे बचने का ही निर्देश रहता है। साधना की परिपक्व अवस्था में सिद्धपुरुषों और योगियों के लिए सिद्धियाँ कौतुक का विषय नहीं रहतीं, बल्कि अनुचर बनकर रह जाती हैं, जिनका उपयोग मात्र लोककल्याण के हित ही किया जाता है, जो भी हो, सिद्धियों का अस्तित्व अध्यात्म विज्ञान की असीम समर्थता को स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है।
साधना करें। षट्कर्म एवं ज पके साथ ध्यान का क्रम नियमित रखें। ध्यान के लिए परमपूज्य गुरुदेव की पुस्तक ‘उपासना के दो चरण जप और ध्यान’ देखी जा सकती है।
साधनाएँ भी संपन्न होती हैं एवं वर्ष में कुछ दिन यज्ञ होता रहता है।
साधना संकल्पों के साथ जीवन-साधना का रूप ले। श्री अरविंद के अनुसार “सारा जीवन ही योग है।” हर श्वास को साधनामय बनाएँ।
साधना सामूहिक स्तर पर तथा कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण के लिए इनके पास समुचित स्थान व संसाधन हों।
साधनामय बनाएँ।
साधना आँदोलन
साधना के साथ निर्धारित जप, प्राणयोग, ध्यानयोग आदि की साधनाओं में रत रहना होगा। टेपरिकॉर्डर से ध्वनि प्रसारण यंत्र द्वारा प्रत्येक कमरे में गुरुदेव के विचार पहुँचाएँगे। पढ़ने हेतु भी साहित्य निर्धारित विचारों को लिए मिलेगा। मात्र यज्ञ एवं अखण्ड दीप-दर्शन के लिए 24 घंटे में एक बार बाहर निकलेंगे, वह भी पूर्णतः मौन की स्थिति में। 1 से 5 मार्च, 7 से 11 मार्च, 13 से 17 मार्च के तीन सत्र इस अंक के पहुँचने तक चल रहे होंगे।
साधनाओं में रत रहना होगा। टेपरिकॉर्डर से ध्वनि प्रसारण यंत्र द्वारा प्रत्येक कमरे में गुरुदेव के विचार पहुँचाएँगे। पढ़ने हेतु भी साहित्य निर्धारित विचारों को लिए मिलेगा। मात्र यज्ञ एवं अखण्ड दीप-दर्शन के लिए 24 घंटे में एक बार बाहर निकलेंगे, वह भी पूर्णतः मौन की स्थिति में। 1 से 5 मार्च, 7 से 11 मार्च, 13 से 17 मार्च के तीन सत्र इस अंक के पहुँचने तक चल रहे होंगे।
साधना की यह केंद्रीय स्थली रही है। ऋग्वेद काल में यह अपने पूरे वेग से प्रवाहित होती थी। आर्य लोग इसके किनारे रहते थे व इसके विविध अनुदान-वरदानों से अभिभूत होकर इसका स्तुतिगान करते थे। ऋग्वेद में इसकी स्तुति श्रेष्ठ माँ व श्रेष्ठ नदी के रूप में की गई है। (ऋग्. 2-41/16)।
साधना सत्र चलाए जाएँगे। साधना आँदोलन को गति देने के लिए ये सत्र प्रतिमाह चलेंगे, संचालन केंद्रीय तंत्र का होगा। इसके अतिरिक्त एक कार्यकर्त्ता प्रशिक्षण सत्र भी चलाने हेतु उन्हें कहा जा रहा है। अभी जनवरी माह में वसंत पर्व तक 60 शक्तिपीठों पर एक-एक दिन के सत्र चलाकर एक प्रयोग किया गया, जो बड़ा सफल रहा। प्रथम दृष्टि में जो बड़े समर्थ-महत्त्वपूर्ण पीठ दिखे, वहीं पर ये आयोजन किए गए।
साधनाओं के माध्यम से इसकी रश्मियों को घनीभूत करके व नेत्रों के माध्यम से पदार्थ पर उनका प्रभाव डालकर मनोवाँछित पदार्थ में इसे रूपांतरित किया जा सकता है।
साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण संरक्षण, नारी-जागरण, व्यसन-मुक्ति एवं कुरीति-उन्मूलन आँदोलन इन सात खंडों में रचनात्मक क्रिया–कलापों को बाँटा गया है। यही हमारे शीघ्र आरंभ होने जा रहे देव-संस्कृति विश्वविद्यालय की विधाएँ भी हैं। विभूतियों के सुनियोजन की बात इन विधाओं के संदर्भ में ही विगत एक वर्ष से सतत की जा रही है। अब क्षेत्रीय स्तर पर इन सातों आँदोलनों से जुड़े परिजनों को संगठित करने की बात आती है, तभी वह प्रक्रिया वहाँ सुव्यवस्था से संचालित की जा सकेगी एवं सफलता उनके कदम चूमेगी।
साधना सत्र सतत चलते रहते हैं। वे तथा एक माह के युगशिल्पी सत्र यथावत् चलेंगे। मात्र ग्रीष्म ऋतु में 15 मई से 30 जून तक 5-5 दिन के तीर्थसेवन सत्र चलेंगे, जो कि हर वर्ष चलते हैं। इस अवधि में नौ दिवसीय सत्र नहीं चलेंगे। इनके अतिरिक्त अब इस वसंत से एक-एक माह के (पूर्व में पंद्रह दिन के) परिव्राजक सत्रों का क्रम भी आरंभ हो गया है।
साधना पर प्रकाश डालते हैं। सैकड़ों मुद्राओं से उपलब्ध रहस्यमयी सिंधु लिपि का संस्कृत से संबंध पाया गया है।
साधना एवं उस आधार पर विनिर्मित संगठन की धुरी पर ही अगले दिनों हमारे सारे क्रिया−कलाप चलेंगे। जैसा कि सभी जानते हैं, परमपूज्य गुरुदेव जीवनभर कहते रहे, लिखते रहे कि यह गायत्री परिवार ईश्वरीय योजना को प्रत्यक्ष जगत् में लागू करने के लिए दैवी संकल्प के साथ बनाया गया संगठन है। विभिन्न शाखाओं-मंडलों में बँटे परिवार को सक्रिय-संगठित समूह (स-3) बनाने तथा उनके संचालन हेतु समर्थ समयदानी-सहयोगी समूह (स-4) गठित करने की बात विगत डेढ़ वर्ष से सतत समझाई जाती रही है। इसमें स-4 वाला वर्ग वह है, जो प्राणवान् है, पुरोहित-प्रशिक्षक स्तर का है। इन समयदानियों के माध्यम से जन-जन को युग-साधना से जोड़ने के लिए योजनाबद्ध प्रयास करने की बात सतत कही जाती रही है।
साधना का प्रभाव अद्भुत होता है। आत्मा का दिव्य आलोक अलौकिक होता है, जिसे केवल उन जैसे ही पा सकते हैं।’ ऐसा उन्हें देखने-जानने वाले हिंदू विद्वान् कहते थे। रुहानियत भी एक अजीब शय है। इसके रंग में रँगा शख्स तो बस अशरफ-उल-मखलूकात के लिए ही जिंदा रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-April
साधना, पुण्य एवं संकल्प प्रगाढ़ और प्रबल हो तो सचेतन व जाग्रत अवस्था में भी दिव्य दर्शन संभव है। मनुष्य जिस मनःस्थिति में रहता है, उसी के अनुरूप से आभास मिलते हैं। शरीर एवं मन को सात्विकता का आगार बनाकर साधना द्वारा अनेकों अलौकिक अनुभूतियों से साक्षात्कार किया जा सकता है।
साधना में सम्मिलित कर लिया। देवताओं ने उन्हें अपना धनाधीश लोकपाल बनाया और वे अलकापुरी में राज करने लगे।
साधना है।
साधना में मन भी नहीं लगता था। ऐसे में स्पष्ट मार्गदर्शन मिलते हैं। आश्वासन मिलते ही साधना सफलता की ओर अग्रगामी होने लगती है।
साधनाओं में साधकों को कई प्रकार की बाधाएँ आती है। कभी-कभी मन परेशान हो जाता है। ऐसे में सभी साधक अपनी मनोव्यथा पूज्यवर को लिख बैठते हैं। तब उनके उत्तर हम सबके लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं। 12-1-61 को राठ के श्री रामस्वरूप चाचोदिया जी को लिखा पत्र इस संबंध में प्रस्तुत है।
साधना करने पर भी इन अनुभूतियों से एकाकार हुआ जा सकता है। यह पूर्वाभास जाग्रत अवस्था में भी प्राप्त हो सकता है। यदि साधना, पुण्य एवं संकल्प प्रगाढ़ और प्रबल हो तो सचेतन व जाग्रत अवस्था में भी दिव्य दर्शन संभव है। मनुष्य जिस मनःस्थिति में रहता है, उसी के अनुरूप से आभास मिलते हैं। शरीर एवं मन को सात्विकता का आगार बनाकर साधना द्वारा अनेकों अलौकिक अनुभूतियों से साक्षात्कार किया जा सकता है।
साधना के अतिरिक्त अनिष्ट निवारण हेतु, विशिष्ट पुरुषार्थ हेतु कहा जा रहा है। वरुण गायत्री एवं पृथ्वी गायत्री के मंत्रों से यज्ञों में आहुतियाँ देने को कहा जा रहा है। सामान्य यज्ञ जो हो रहे हैं, उन्हीं में इन्हें जोड़ लेने से भावी विपत्तियाँ कम हो सकती हैं। श्रम प्रधान कार्यक्रमों में सभी से पुनर्निर्माण के कार्यों में भागीदारी, जलागम क्षेत्रों में श्रमदान, पानी की खेती स्थान-स्थान पर करने, कुएँ व तालाबों को गहरा करने हेतु सामूहिक पुरुषार्थ का आह्वान किया गया है। दुर्भिक्ष इससे कम में नहीं टलेगा एवं एक बार जलस्तर ऊँचा उठने लगे, हरीतिमा का कवच बनने लगे, तो अन्य विपत्तियाँ भी टलेंगी।
साधना करनी चाहिए। प्रातःकाल जब आप उठा करें, तो एक नए जीवन का अनुभव किया कीजिए कि रात को सोने का अर्थ हैं, ‘पिछले जन्म की स्मृति और उस दिन की मौत’ सबेरे उठने का अर्थ हैं, ‘नया जन्म’। ‘जब आँख खुली तब नया जन्म’ आप यह अनुभव कर लिया करें, तो मजा आ जाए। आप हर दिन सबेरे यह अनुभव किया कीजिए कि हमारा नया जन्म हो गया। अब नए जन्म में क्या करना चाहिए?
साधना से शुद्ध हुआ आत्मा जब अपनी मूल स्थिति को पहुँचता है तो वह स्वयं ही आनंदमय हो जाता है।”
साधनाप्रधान, श्रमप्रधान तीन उपायों की चर्चा की गई थी। साधनप्रधान में सभी से सप्ताह में न्यूनतम एक बार का भोजन न लेने, उसकी राशि बचाने का अनुग्रह किया गया था। यह भी आँकड़ा दिया गया था कि यदि यह दुगनी हो सके, तो इस निधि से सरकार के समानाँतर एक तंत्र खड़ा कर न जाने कितना बड़ा आधार बन सकता है। मात्र आत्मसंयम की, राशि को बचाने की एवं व्यवस्थित रूप में केंद्र के परामर्श से उसके नियोजन की आवश्यकता है। यदि मात्र ‘अखण्ड ज्योति’ व अन्य सहयोगी पत्रिका के पाठक भी पचास रुपया प्रति सदस्य एकत्र करें, तो पाँच करोड़ की राशि एक माह में एकत्र कर सकते हैं।
साधना कर रहे थे। उन्हीं दिनों गुरुगोविंद सिंह की वैरागी से मुलाकात हुई। उन्होंने एकाँतसेवन को आपत्तिकाल में हानिकारक बताते हुए कहा, “बंधु! जब देश, धर्म, संस्कृति की मर्यादाएँ नष्ट हो रही हैं और हम गुलामी का जीवन बिता रहे हैं, आतताइयों के अत्याचार हम पर हो रहे हैं, तब तक यह भजन-पूजन, ध्यान-समाधि आदि किस काम के हैं?” गुरुगोविंद सिंह की युक्तियुक्त वाणी सुनकर बंदा वैरागी उनके अनुयायी हो गए और गुरु की तरह उनने भी आजीवन देश को स्वतंत्र कराने, अधर्मियों को नष्ट करने और संस्कृति की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। इसी उद्देश्य के लिए बंदा वैरागी आजीवन प्रयत्नशील रहे।
साधना महापुरुषार्थ को गति देने एवं जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन समिति केंद्र शांतिकुंज के मार्गदर्शन में बनाने हेतु परिजनों से कहा गया है। फरवरी 12 के अंक में साधनप्रधान, साधनाप्रधान, श्रमप्रधान तीन उपायों की चर्चा की गई थी। साधनप्रधान में सभी से सप्ताह में न्यूनतम एक बार का भोजन न लेने, उसकी राशि बचाने का अनुग्रह किया गया था। यह भी आँकड़ा दिया गया था कि यदि यह दुगनी हो सके, तो इस निधि से सरकार के समानाँतर एक तंत्र खड़ा कर न जाने कितना बड़ा आधार बन सकता है। मात्र आत्मसंयम की, राशि को बचाने की एवं व्यवस्थित रूप में केंद्र के परामर्श से उसके नियोजन की आवश्यकता है।
साधना करना आसान हैं, परंतु उस समय अत्यधिक आवेश के कारण वैरागी होने का, घर से भागकर कहीं निर्जन में तप करने का मन करता है, तब यह मार्गदर्शन कितना युगानुकूल है कि कहीं गृही से वैरागी होने की बात न सोच बैठना। पहले गृहस्थ के उत्तरदायित्वों को पूरा करना, कर्म बंधनों को शिथिल करना और चिंता मत करना, हम तुम्हारे साथ है, तुम्हारी अंतरात्मा को धीरे-धीरे पका रहे हैं। बस जितना बताया है उस पर चलो।
साधना द्वारा अनेकों अलौकिक अनुभूतियों से साक्षात्कार किया जा सकता है।
साधना स्वास्थ्य शिक्षा स्वावलंबन पर्यावरण नारी जागरण, व्यसन मुक्ति, कुरीति उन्मूलन इन सातों आंदोलनों से संबंधित प्रदर्शनियों, प्रशिक्षण एवं इनसे जुड़ी विभूतियों को जगाने हेतु संकल्पित कराने हेतु विशिष्ट दीपयज्ञों का क्रम बन सकता है। प्रदर्शनियों का निर्माण केंद्र में किया जा रहा है। प्रशिक्षण के क्रम में जीवन साधना आँदोलन को गति देने के लिए शक्तिपीठों पर सत्रों का क्रम 2 मार्च से आरंभ हो चुका है। विशिष्ट विधाओं के प्रशिक्षण भी इसी क्रम में आगे चलते रहेंगे। नगर, मुहल्ले, गाँवों के स्तर पर इन आँदोलनों के दीपयज्ञों में संकल्प कराए जा सकते हैं एवं सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं।
साधना आँदोलन को गति देने के लिए शक्तिपीठों पर सत्रों का क्रम 2 मार्च से आरंभ हो चुका है। विशिष्ट विधाओं के प्रशिक्षण भी इसी क्रम में आगे चलते रहेंगे। नगर, मुहल्ले, गाँवों के स्तर पर इन आँदोलनों के दीपयज्ञों में संकल्प कराए जा सकते हैं एवं सुनिश्चित लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं। आँदोलन को गति देने के लिए समयदान-श्रमदान-साधनदान एवं विभूतिदान के संकल्प भी कराए जा सकते हैं।
साधना मूलतः ब्रह्म के रूप में इस सचराचर जगत् में परिव्याप्त मानकर सर्वोच्च सनातन होने में अपनी आस्था को व्यक्त करती है, वही एक सूक्ष्म धारणा राम तथा ॐ की तात्विक एकता की ओर भी सूक्ष्म संकेत करती है।
साधना पथ का मार्गदर्शन मानव मात्र के लिए कर सकने में वे सफल हुए। ऐसे सौभाग्यशाली बिरले ही होते हैं।
साधना ठीक गतिपूर्वक चल रही है। आपका व्यावहारिक जीवन जिस स्थिति में हो, उसी के अनुरूप मनोदशा रहे, इसका हम प्रयत्न करते हैं। अधिक उत्साह एवं आवेश उत्पन्न हो जाए, तो आपको बाह्य जीवन में उलट-पलट करनी पड़ेगी। इसलिए हम यह प्रयत्न करते रहते हैं कि शांत तरीकों से चुपचाप आपका अंतरात्मा पकता रहे और व्यावहारिक जीवन में कोई उलट-पुलट न आने पाए। अन्यथा आप गृही से विरागी हो सकते हैं।
साधना शोक के लिए करने के लिये शेष नहीं है।
साधना से शुद्ध हुई आत्मा जब अपनी मूल निर्वात में पहुंचती है तो वह स्वयं तो वह स्वयं ही आनंद हो जाता है।
साधना करते रहे। फिर राजा स्वयं बाहर आकर उन्हें अंदर ले गए। सारे ऐश्वर्य भोगों-सुविधाओं से भरे प्रमदवन में उनके ठहरने की व्यवस्था कर दी गई। चारों ओर ऐश्वर्य-ही-ऐश्वर्य, भोग-ही-भोग, सुबह से शाम तक सुँदर नर्तकियाँ तरह-तरह के व्यंजन लेकर खड़ी रहती थीं। लेकिन जनक के उस महल में विराजे शुकदेव जी की त्रिकाल संध्या चलती रही।
साधना शेष थी। उसे पूरा करने तथा कुछ प्रारब्ध भोगने को शेष थे, इन्हें भोगने को यह जन्म लेना पड़ा। अब उस पूर्व लक्ष्य की ओर ही अधिक ध्यान देना चाहिए। साँसारिक माया में फिर पैर फंस जाए, तो पीछे वह उद्देश्य नष्ट हो जाएगा और चौरासी के चक्र में फिर लाखों वर्ष घूमना पड़ेगा। इस झंझट से सावधान करने के लिए हम अक्सर तुम्हारी सूक्ष्म चेतना को स्पर्श करने जाया करते हैं।
साधना को प्रखर बनाने का वर्ष है। परमवंदनीया माताजी के 75 वर्ष पूरे होने के कारण यह नारी जागृति-नारी शक्ति को नेतृत्व प्रदान करने वाला वर्ष है। भागवत् चेतना के धरती पर अवतरण का 75वाँ वर्ष होने के कारण यह सभी में विधेयात्मक उल्लास भरने का वर्ष है। इसके लिए पोर्स्टस, बैनर्स, पर्चे वितरण करना चाहिए स्थान-स्थान पर उन्हें लगाना चाहिए तथा रैली आदि एवं छोटे कार्यक्रमों द्वारा उन्हें जन-जन के मनों में बिठाने का प्रयास किया जाना चाहिए। प्रज्ञा अभियान ‘पाक्षिक’ के पृष्ठ पाँच पर ऐसे बैनर्स-परिपत्रों के प्रारूप दिए गए हैं।
साधना ठीक शांतिपूर्वक चल रही है। आप का व्यवहारिक जीवन निर्वात में हो उसी के अनुरूप आदेश रहे उसका हम प्रकट करते हैं। आवश्यक उत्तम एवं आवेश उत्तक हो जाये तो आपको बाह्य जीवन में उलट पलट करनी पड़ेगी। इसलिए हम पर प्रसन्न करते रहते हैं कि षाना तरीकों से चुपचाप आपका अंतःकरण एकता रहे और व्यवहारिक जीवन में कोई से उलट पलट न आने वाले। आपका आप नहीं में निराशी हो सकते हैं।
साधना सफलता की ओर अग्रगामी होने लगती है।
साधना ही आ जाती है। तप को शरीर, वाणी और मन के खंडों में बाँटते हुए उन्होंने कहा है, “देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा यह शरीर सम्बन्धी तप कहा जाता है। जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा सत्साहित्य के अध्ययन, पाठ और मंत्रजप का अभ्यास है, वह वाणी सम्बन्धी तप है। मन की प्रसन्नता, शाँतभाव, मौन रहकर आत्मचिंतन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अंतःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता को धन सम्बन्धी तप कहते हैं।” (गीता 17/14-16)
साधना के माध्यम से अभीप्सा रहती है। मन उसे पाने को लालायित हो उठता है। लगता है कि गुरुसत्ता अभी उन साधना सूत्रों को हमें बता नहीं रही है। बारंबार आग्रह करने पर पूज्यवर का उत्तर इस प्रकार होता था। 12/2/54 को श्री धर्मपाल सिंह जी (चाँदपुर बिजनौर) को लिखा पत्र इस संबंध में द्रष्टव्य है।
साधना अभियान में सभी से अपनी साधना के अतिरिक्त अनिष्ट निवारण हेतु, विशिष्ट पुरुषार्थ हेतु कहा जा रहा है। वरुण गायत्री एवं पृथ्वी गायत्री के मंत्रों से यज्ञों में आहुतियाँ देने को कहा जा रहा है। सामान्य यज्ञ जो हो रहे हैं, उन्हीं में इन्हें जोड़ लेने से भावी विपत्तियाँ कम हो सकती हैं। श्रम प्रधान कार्यक्रमों में सभी से पुनर्निर्माण के कार्यों में भागीदारी, जलागम क्षेत्रों में श्रमदान, पानी की खेती स्थान-स्थान पर करने, कुएँ व तालाबों को गहरा करने हेतु सामूहिक पुरुषार्थ का आह्वान किया गया है। दुर्भिक्ष इससे कम में नहीं टलेगा एवं एक बार जलस्तर ऊँचा उठने लगे, हरीतिमा का कवच बनने लगे, तो अन्य विपत्तियाँ भी टलेंगी।
साधना के पथ में एकमात्र पथ प्रदर्शक गुरुसत्ता ही है। वे कदम-कदम पर साथ चलकर मार्गदर्शन करते हैं। अंधेरी गलियों को प्रकाशवान् बनाते हैं। इसी प्रकार एक साधक को 28-11-1951 को लिखा एक पत्र यहाँ पठनीय हैं।
साधना की आग में गरम कर आकार दे देता है। उसका तमस दूर करता है। (यहाँ गुरु का द्रष्टाँत लोहार (थूरमा) और शिष्य का तमस भरे लोहे से दिया गया है।) दूसरी पंक्ति में गुरु को सुनार कहा गया हैं, जो सोने के समान शिष्य को साधना की आग में गरम कर शुद्ध करता है और ज्ञान-कसौटी पर घिसकर उसकी शुद्धता प्रमाणित करता है।”
साधना के अनुरूप समर्थ-सक्षम बनाने के लिए है।
साधना-उपासना के लिए, संध्यावंदन के लिए समय नहीं मिलता।
साधना सूत्रों को हमें बता नहीं रही है। बारंबार आग्रह करने पर पूज्यवर का उत्तर इस प्रकार होता था। 12/2/54 को श्री धर्मपाल सिंह जी (चाँदपुर बिजनौर) को लिखा पत्र इस संबंध में द्रष्टव्य है।
साधना करें। वृत्तियों से अपना मुँह मोड़ें।
साधना की आग में गरम कर शुद्ध करता है और ज्ञान-कसौटी पर घिसकर उसकी शुद्धता प्रमाणित करता है।”
साधना संबंधी व्यावहारिक मार्गदर्शन कितना गहरा हैं, यह यहाँ देखा जा सकता है। अक्सर होता यह है कि अति उत्साह में व्यक्ति कुछ ज्यादा ही करने की सोचता है। बहिरंग जीवन अस्त-व्यस्त होने लगता है। परिवार में सभी गड़बड़ाने लगते हैं। साधारण सद्गृहस्थ बने रहकर साधना करना आसान हैं, परंतु उस समय अत्यधिक आवेश के कारण वैरागी होने का, घर से भागकर कहीं निर्जन में तप करने का मन करता है, तब यह मार्गदर्शन कितना युगानुकूल है कि कहीं गृही से वैरागी होने की बात न सोच बैठना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-June
साधनाक्रम चलता रहे। साधकों को समझाया जाता है कि उनका लक्ष्य मिल जाए, तो भी संध्या गायत्री का त्याग नहीं करें। अनुग्रह मानने और धन्यवाद देने के भाव से ही सही, यह क्रम चलता रहे। यह निर्देश किसी भी स्थिति में व्यतिरेक नहीं आने देने के लिए है।
साधना जो बारह वर्ष तक चली है एवं जिसके अनुयाज रूप में यह बारह वर्षीय वेला ख्क् से ख्क्ख् तक की हम सब के लिए आई हैं, अपने सभी परिणाम इसी अवधि में दिखाएगी। अदृश्य वातावरण में भरे भौतिक एवं चेतनात्मक प्रदूषणों से निपटने के बाद अब उसे नवसृजन का कार्य भी करना हैं। निमित्त हम सभी को बनना है। प्रतिभाओं का अभ्युदय होना है एवं देवसंस्कृति का विस्तार विश्वभर में इन्हीं दिनों होता हैं। अवतरण की वेला में भगवान् एक नहीं, अनेकों प्रबुद्ध आत्माओं के रूप में एक साथ अवतरित होता है।
साधना के प्रतिफल भी विशेष ही मिलेंगे। संख्या का हिसाब इस प्रकार हैं-
साधना को निश्चित ही पूरा किया जा सकता हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
साधनाक्रम आरंभ किया जा सकता है। गायत्री जयंती से यदि आरंभ न हो सके, तो इसे आगामी मास में आरंभ कर इसी माह में एक वर्ष बाद समाप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। बीच-बीच में जो भी साधना संबंध अनुभूतियाँ हों, उन्हें लिखते चलें, एक डायरी लेखन का क्रम बनाते चलें। नित्य दैनंदिन कार्य करते हुए भी इस सुनिश्चित लक्ष्य वाली साधना को निश्चित ही पूरा किया जा सकता हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
साधना कैसी हो, किस तरह हम उसे गति दें, इस संबंध में परिपूर्ण मार्गदर्शन है। ब्रह्म कुँडलिनी का मार्ग क्या हैं, कैसे आगे बढ़ा जाए? यह पूज्यवर की लेखनी से ही विस्तृत मार्गदर्शन हम आगे प्रस्तुत करते रहेंगे। अभी तक हम गुरुदेव के लिखे पत्रों की ही बात करते रहे हैं, किंतु गुरुदेव स्वयं इसी उपर्युक्त पत्र के आरंभ में अपने भक्तों के पत्रों के बारे में क्या कहते हैं, यह पढ़कर इस लेख को विराम देंगे।
साधना प्रखर हो तो ही हम श्रेयाधिकारी बन सकेंगे, वह तथ्य निश्चित मानना चाहिए। हम श्रेष्ठ गायत्री साधक बनें, अपने इष्ट (जो भी हमारा हो) उससे यही प्रार्थना करें कि बुद्धि के अकाल का प्रकोप, दैवी प्रकोपों की इस वेला में कहीं हम पर न आ सवार हो, हम सद्बुद्धि को धारण किए उस महायात्रा पर अनवरत चलते रहें, जिस राह पर वह अनोखा बाजीगर हमें अनायास ही खड़ा कर गया है।
साधना है। गुरुवर की चौबीस लक्ष की महापुरश्चरण साधना ने वह आधार खड़ा किया कि आज चारों और गायत्री महाविद्या के विस्तार की बात गूँजती सुनाई देती है। हमारा बारह वर्षीय महापुरश्चरण पुरुषार्थ सन् ख् में ‘सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ’ के साथ संपन्न हुआ। कइयों के मन में असमंजस है कि अब इसके बाद क्या। क्या साधना मात्र इतनी ही अवधि के लिए थी ?
साधना के रूप में भी समझाया गया है।
साधना-क्षेत्र में अति अनिवार्य है। जल्दबाजी, आतुरता से असमंजस पैदा होता है एवं फिर यही आशंका क्रमशः अश्रद्धा में या चिह्न−पूजा में बदल जाती है। हर व्यक्ति सफलता देखना भी चाहता है। यह आश्वासन पूज्यवर की पाती में साकार उतरता है।
साधना कुछ ही समय में फलरूप में परिणत होने लगती।”
साधना को भी इस वर्ष गति देने का मन है। गायत्री महाविज्ञान भाग-ख् के अंतिम पृष्ठों में इसका विस्तार से वर्णन है। यहाँ संक्षेप में इसकी क्रियापद्धति दी जा रही है, जो गायत्री जयंती क् जून ख्क् से आरंभ की जा सकती है। यह साधनाक्रम छिटपुट रूप में पूज्यवर द्वारा मथुरा से एवं हरिद्वार से पहले भी आरंभ किया गया था। आज सूर्य पर बढ़ते कलंकों-विक्षोभों एवं धरती पर संभावित ध्वंस की घुमड़ती घटाओं को देखकर इस एक वर्ष की साधना को यदि गायत्री परिवार के पच्चीस प्रतिशत कार्यकर्त्ता भी मन लगाकर कर सकें, तो इससे महाविनाश से जूझने की सामर्थ्य भी मिलेगी एवं सूक्ष्मजगत् में कार्य कर रही ऋषि सत्ताओं के शक्ति संवाहक-दूत श्रेष्ठ साधकों के रूप में मिल सकेंगे।
साधना एक प्रकार से लक्ष्यवेधन की साधना है। विशिष्ट किसी प्रकार के और मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है। मात्र शांतिकुंज संरक्षण हेतु पत्र भेजकर अपना साधनाक्रम आरंभ किया जा सकता है। गायत्री जयंती से यदि आरंभ न हो सके, तो इसे आगामी मास में आरंभ कर इसी माह में एक वर्ष बाद समाप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। बीच-बीच में जो भी साधना संबंध अनुभूतियाँ हों, उन्हें लिखते चलें, एक डायरी लेखन का क्रम बनाते चलें।
साधना के फलस्वरूप साधक की मनोवृत्ति में शोधन होता है तथा पंचकोशों के जागरण की पृष्ठभूमि तैयार हो जाती है।
साधना को एक अनिवार्यता बताने वाले आचार्य श्री ने जन-जन के हृदय स्थल को स्पर्श ही नहीं किया वरन् अपने विचारों से गजब का एक क्राँतिकारी आँदोलन खड़ा कर दिया। यह अपने समय का विचार क्राँति अभियान बना, जो साधना की पृष्ठभूमि पर टिका था।
साधना की पृष्ठभूमि पर टिका था।
साधनाएँ काफी क्लिष्ट हैं। तुम्हारे लिए ब्रह्म कुँडलिनी का मार्ग उचित है। हम ऐसे सीधे मार्ग पर आपको लिए चल रहे हैं, जो तनिक भी कठिनाई या झंझट का सामना किए बिना परम लक्ष्य तक पहुँचा दें। आपकी यात्रा अत्यंत संतोषजनक रीति से आगे बढ़ रही है। आपको अपनी यात्रा ढीली मालूम पड़ती है और अधिक कष्टसाध्य तथा तीव्र उपासना करने की इच्छा होती हैं, यह आपकी प्रगति का प्रधान लक्षण है।
साधना है। विशिष्ट किसी प्रकार के और मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है। मात्र शांतिकुंज संरक्षण हेतु पत्र भेजकर अपना साधनाक्रम आरंभ किया जा सकता है। गायत्री जयंती से यदि आरंभ न हो सके, तो इसे आगामी मास में आरंभ कर इसी माह में एक वर्ष बाद समाप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। बीच-बीच में जो भी साधना संबंध अनुभूतियाँ हों, उन्हें लिखते चलें, एक डायरी लेखन का क्रम बनाते चलें।
साधना की नियमितता में चूक आध्यात्मिक अपराध है। अगर प्रमाद से वह हो जाए, तो प्रायश्चित भी किया जाना चाहिए। महात्मा गाँधी का यह प्रसंग बहुतों ने सुना होगा कि साबरमती आश्रम में किसी बैठक में बहुत व्यस्त होने के कारण वे संध्या समय की प्रार्थना नहीं कर पाए थे। प्रार्थना के संबंध में वे इतने नियमित और दृढ़ थे कि उसका समय हो जाता, कोई काम कितना ही महत्वपूर्ण हो, उसे छोड़कर भजन साधन में लगते। उस दिन चूक हो गई और गाँधी जी को ध्यान आया कि नियमित प्रार्थना नहीं हो सकी हैं, तो उन्होंने ग्लानि अनुभव की।
साधना सत्र लगाए जा रहे हैं। प्रयास करें कि अभियान साधना में भाग लेने वाले परिजन यहाँ अथवा अपने पास के शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों पर वर्ष में न्यूनतम एक सत्र तो संपन्न कर लें। यहाँ तो स्थान सीमित हैं, पर सभी से पत्राचार किया जा सके, तो कुछ की व्यवस्था तो जाँच-पड़ताल कर बनाई जा सकती है। गायत्री जयंती पर्व से आरंभ की जाने वाली यह अभियान साधना सभी के लिए मंगलमय पथ प्रशस्त करें, ऐसी माँ से प्रार्थना है
साधना उपासना के क्षेत्र में इसी तरह की तत्परता और निष्ठा होनी चाहिए।
साधना एक आंदोलन बन जाए। हमारे व्यक्तित्व को भी वह आँदोलित कर दे एवं इसी की धुरी पर सारे समाज में नवनिर्माण की गतिविधियाँ संचालित हो पड़े। यह सब तभी हो पाएगा जब हमारे परिजन, विराट् गायत्री परिवार के घटक, पूज्यवर के-गुरुसत्ता के अंग-अवयव अपनी साधना से कदापि पीछे न हटकर और भी सक्रिय हों। श्रेष्ठ साधक ही युगनिर्माण का भागीरथी लक्ष्य पूरा करने में सहायक सिद्ध होंगे।
साधना-उपचारों के उपकरणों द्वारा सिद्ध होगी।
साधना का, आध्यात्मिक का जो प्रशिक्षण दिया जा रहा है, उसका उद्देश्य क्या हैं ? उसका प्रयोग क्या हैं ? उसके सिद्धाँत बताने के साथ यह भी बतलाने का प्रयास करेंगे कि यहाँ पर जो क्रियाएँ हमने सिखाई हैं, उसमें आप कैसे सफल और पारंगत हो सकते हैं, ? इसमें आपको क्या-क्या करना होगा ? यह विषम समझाना आज से हमारा उद्देश्य है।
साधनाएँ संपन्न कराई, वानप्रस्थ का पुनरुज्जीवन किया एवं हरिद्वार में ब्रह्मवर्चस् षोध्पा संस्थान सहित प्रायः ढाई हजार गायत्री तीर्थों, शक्तिपीठों की स्थापना की। अस्सी वर्ष की आयु तक खिले ब्रह्मकमल की एक-एक पंखुड़ी एक महत्वपूर्ण स्थापना का इतिहास लिए, क्राँतिधर्मी साहित्य के निर्माण एवं इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के उद्घोष के साथ क्−− तक सुवासित रह गायत्री जयंती ख् जून के दिन स्थूल रूप में दृष्टि के वर्ष के लिए लिखे गए विचारों का सशक्त जखीरा उनकी पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं वाङ्मय के रूप में जीवंत है, सूक्ष्म व कारण सत्ता से सक्रिय है एवं आज लाखों नहीं, करोड़ों के मर्म को स्पर्श करता दिखाई देता है।
साधना से दूर और जीवन के प्रति विधायक दृष्टिकोण नहीं रखने वालों के जीवन में यह स्थितियाँ देखी ही जाती है।
साधना के अगले लक्षण ऋषिसत्ताओं की उसी चिंता और अनुग्रह के प्रसाद हैं। अंतिम नियम ईश्वर प्रणिधान में इस तथ्य को गहराई से अपने भीतर धारण में इस तथ्य को गहराई से अनुभव करने का आधार बनता है। भारतीय धर्म परंपरा के अनुयायियों के लिए दो अभ्यास सुगम कराए गए हैं। एक प्रातः -साँय दोनों समय संध्यावंदन और गायत्री मंत्र का जप करना। दूसरे कम से कम आधार घंटा ध्यान रखना।
साधना करो और सिद्धियाँ लेकर प्रसन्नता भरे दिन बिताओ। ब्रह्मविद्या तो छुरे की धार है, उसे पाने के लिए अपने मनोरथों से लड़ना पड़ता है और सोने की तरह अपने को तपाना पड़ता है, वह तुम कैसे कर सकोगे? नचिकेता का आग्रह नहीं, संकल्प था। उसे हर कीमत पर उपलब्ध करने का प्रण दुहराया। यमाचार्य उसे पाँच अग्नियों में तपाते गए और एक-एक करके ब्रह्मविद्या का एक-एक सोपान पार कराते गए।
साधना संबंध अनुभूतियाँ हों, उन्हें लिखते चलें, एक डायरी लेखन का क्रम बनाते चलें। नित्य दैनंदिन कार्य करते हुए भी इस सुनिश्चित लक्ष्य वाली साधना को निश्चित ही पूरा किया जा सकता हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।
साधना का, पुरुष से पुरुषोत्तम बनने का छिपा पड़ा है। धैर्य साधना-क्षेत्र में अति अनिवार्य है। जल्दबाजी, आतुरता से असमंजस पैदा होता है एवं फिर यही आशंका क्रमशः अश्रद्धा में या चिह्न−पूजा में बदल जाती है। हर व्यक्ति सफलता देखना भी चाहता है। यह आश्वासन पूज्यवर की पाती में साकार उतरता है।
साधना का इसमें कोई स्थान नहीं ?
साधनाओं में सफलता का रहस्य उनके अंतःकरण की श्रद्धा ही रही है। उनके गुरुओं ने तो केवल उसकी परख की थी। यदि इस तरह की श्रद्धा आज भी लोगों में आ जाए व पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छाओं पर चलने को कटिबद्ध हो जाएँ, तो विश्व शाँति चिर संतोष और अनंत समृद्धि की परिस्थितियाँ बनते देर न लगे।
साधना का पत्राचार-मार्गदर्शन इससे चलने लगा। ढेरों व्यक्ति साधना के क्रम में इससे जुड़ें।
साधना के कुछ नियम है। ये बड़े कड़े भी नहीं हैं और वर्षभर अपनी दैनंदिन क्रियाओं के साथ भी निभाए जा सकते हैं। ये नियम इस प्रकार है-(क्) माह की दोनों एकादशियों को चौबीस माला जपनी चाहिए। साधारण दिनों में प्रतिदिन क् मालाएँ जपनी चाहिए। बिना गिनती की चिंता किए क् मालाएँ एक घंटे में तथा चौबीस मालाएँ ढाई घंटों में पूरी करने की, पूर्णतः भावविह्वल होकर जप करने की बात सोचनी चाहिए।
साधना सभी के लिए मंगलमय पथ प्रशस्त करें, ऐसी माँ से प्रार्थना है
साधना से इन अल्फा तरंगों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि देखी गई है। शोधकर्ता ब्राउन, स्टीवार्ट एवं ब्लोगेट ने ईईजी पर ग्यारह ध्यान करने वाले व ग्यारह ध्यान न करने वाले व्यक्तियों पर अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि ग्यारह में से क् साधकों की ध्यानावस्था में अधिकाँश समय अल्फा तरंगें निकल रही थी। जबकि ध्यान न करने वालों में से मात्र तीन में ही ये तरंगें हल्की सी दिख रही थी।
साधनाक्रम छिटपुट रूप में पूज्यवर द्वारा मथुरा से एवं हरिद्वार से पहले भी आरंभ किया गया था। आज सूर्य पर बढ़ते कलंकों-विक्षोभों एवं धरती पर संभावित ध्वंस की घुमड़ती घटाओं को देखकर इस एक वर्ष की साधना को यदि गायत्री परिवार के पच्चीस प्रतिशत कार्यकर्त्ता भी मन लगाकर कर सकें, तो इससे महाविनाश से जूझने की सामर्थ्य भी मिलेगी एवं सूक्ष्मजगत् में कार्य कर रही ऋषि सत्ताओं के शक्ति संवाहक-दूत श्रेष्ठ साधकों के रूप में मिल सकेंगे।
साधना, त्रिकाल संध्या से लेकर अमृतवाणी-मातृवाणी का आनंद भी लिया जा सकेगा। परमवंदनीया माताजी के भोजनालय में बने सात्विक आहार से अपना परिशोधन-पुनर्निर्माण हो सकेगा। आश्विन नवरात्रि से यह शृंखला आरंभ होनी है, जो चैत्र नवरात्रि ख्ख् तक अनवरत चलती रहेगी। हमें परमपूज्य गुरुदेव की अप्रैल क्−− में लिखी महाप्रयाण से कुछ पूर्व की वेला की पंक्तियाँ याद आ जाती है "नवसृजन के आधार, उपकरण, औजार या साधन यहाँ वह समुदाय है, जिस शांतिकुंज के महागरुड़ ने अंडे बच्चों की तरह अपने डैनों के नीचे छिपा कर रखा हैं। उनको समर्थ एवं परिपुष्ट बनाने की प्रक्रिया इसी तंत्र के अंतर्गत चलती रहेगी।
साधनात्मक मार्गदर्शन हेतु लगातार ‘पंचकोशीय जागरण’ साधना का पत्राचार-मार्गदर्शन इससे चलने लगा। ढेरों व्यक्ति साधना के क्रम में इससे जुड़ें।
साधना से रक्त में लेक्टेट की मात्रा में स्पष्ट घटोत्तरी होती है। यह दर फ्फ् प्रतिशत तक कम हो जाती है। रक्त में लेक्टेट की सघनता उद्विग्नता, उच्च रक्त चाप को सूचित करती है। कमी होने से व्यक्ति के अंदर उत्साह उमंग और स्फूर्ति की, नवीन चेतना की लहरें हिलोरें मारने लगती है। इस अवस्था में श्वसन गति सामान्य विश्रामावस्था से लगभग आधी हो जाती है।
साधना के क्रम में इससे जुड़ें।
साधना मात्र इतनी ही अवधि के लिए थी ? क्या इस वर्ष कुछ और इस संदर्भ में नहीं किया जाना हैं ? अब आगामी वर्षों की रीति-नीति क्या सामाजिक आँदोलनों की सुधारात्मक-रचनात्मक कार्यक्रमों की धुरी पर बनेगी ? तो क्या साधना का इसमें कोई स्थान नहीं ?
साधना छूट जाए, तो प्रायश्चित की एक अतिरिक्त मास के साथ अगले दिन उसे कर लिया जाए।
साधना में भाग लेने वाले परिजन यहाँ अथवा अपने पास के शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों पर वर्ष में न्यूनतम एक सत्र तो संपन्न कर लें। यहाँ तो स्थान सीमित हैं, पर सभी से पत्राचार किया जा सके, तो कुछ की व्यवस्था तो जाँच-पड़ताल कर बनाई जा सकती है। गायत्री जयंती पर्व से आरंभ की जाने वाली यह अभियान साधना सभी के लिए मंगलमय पथ प्रशस्त करें, ऐसी माँ से प्रार्थना है
साधना यही है। आँतरिक स्तर पाकर एक स्थिति में पहुँच जाने के बाद कई साधकों के लिए संध्यावंदन के उपचार आवश्यक नहीं रह जाते। लेकिन उस स्थिति में भी उन्हें करते रहने के निर्देशन दिए गए है। सिद्ध हो जाने पर भी साधनाक्रम चलता रहे। साधकों को समझाया जाता है कि उनका लक्ष्य मिल जाए, तो भी संध्या गायत्री का त्याग नहीं करें।
साधनाएँ बरगद के वृक्ष की तरह धीरे-धीरे बढ़ती हैं, पर वे होती टिकाऊ हैं। आपका साधन वृक्ष सुचारु रूप से बढ़ रहा है। उस पर मनोलय आदि की सफलता के फल भी यथासमय अवश्य लगेंगे। इन कार्यों से प्रगति धीरे-धीरे होती हैं और कुछ विलंब भी लगता है। आपकी साधना कुछ ही समय में फलरूप में परिणत होने लगती।
साधना में भागीदारी करें इस वर्ष शांतिकुंज में आश्विन नवरात्रि ख्क् से चैत्र नवरात्रि ख्ख् तक की अवधि में विशिष्ट प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के पाँच-पाँच दिवसीय साधना सत्र लगाए जा रहे हैं। प्रयास करें कि अभियान साधना में भाग लेने वाले परिजन यहाँ अथवा अपने पास के शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों पर वर्ष में न्यूनतम एक सत्र तो संपन्न कर लें। यहाँ तो स्थान सीमित हैं, पर सभी से पत्राचार किया जा सके, तो कुछ की व्यवस्था तो जाँच-पड़ताल कर बनाई जा सकती है। गायत्री जयंती पर्व से आरंभ की जाने वाली यह अभियान साधना सभी के लिए मंगलमय पथ प्रशस्त करें, ऐसी माँ से प्रार्थना है
साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य स्वावलंबन चारों विधाओं के पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में सहयोग दे सकें। चूँकि विभिन्न भाषाओं का भी शिक्षण चलेगा, सभी भारतीय व विदुषी भाषाओं के विद्वानों-अनुवादकों का योगदान भी अपेक्षित है।
साधना-उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है।
साधनाओं में अल्फा स्थिति उत्पन्न करने के लिए साधकों को यम नियम से लेकर ध्यान धारणा के विविध यौगिक उपक्रमों का आश्रय लेना पड़ता है। कषाय- कल्मषों के परिशोधनों के पश्चात ही अल्फा तरंगों में अतिशय वृद्धि होती है। जिसे स्वभाव, आदतों व व्यवहार में उत्कृष्टता के समावेश के रूप में स्पष्ट देखा जाता है। ध्यान द्वारा प्रतिक्रिया समय (त्मंबजपवद ज्पउम) में जो तीव्रता देखी जाती है, वह बढ़ी हुई सतर्कता तथा मन व शरीर के सुधरे हुए सामंजस्य व घटी हुई जड़ता की सूचक है। श्रवण क्षमताओं में विकास की दर ध्यान के प्रभाव से आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है।
साधना ने वह आधार खड़ा किया कि आज चारों और गायत्री महाविद्या के विस्तार की बात गूँजती सुनाई देती है। हमारा बारह वर्षीय महापुरश्चरण पुरुषार्थ सन् ख् में ‘सृजन संकल्प विभूति महायज्ञ’ के साथ संपन्न हुआ। कइयों के मन में असमंजस है कि अब इसके बाद क्या। क्या साधना मात्र इतनी ही अवधि के लिए थी ? क्या इस वर्ष कुछ और इस संदर्भ में नहीं किया जाना हैं ?
साधना के प्रखरतम पुरुषार्थ का समय है। इस अवधि में उन्होंने युगतीर्थ शांतिकुंज की स्थापना की। इसकी बागडोर परमवंदनीया माताजी के हाथ में सौंपी। स्वयं उच्चस्तरीय व्यक्तियों के निर्माण में लग गए। उनसे प्राण प्रत्यावर्तन साधनाएँ संपन्न कराई, वानप्रस्थ का पुनरुज्जीवन किया एवं हरिद्वार में ब्रह्मवर्चस् षोध्पा संस्थान सहित प्रायः ढाई हजार गायत्री तीर्थों, शक्तिपीठों की स्थापना की।
साधनाएँ एक ही लक्ष्य-आनंद स्वरूप तत्त्वरूप परमात्मा की ओर ही ले जाती हैं। प्रत्येक को अपने आह्वान की तीव्रता के अनुपात में अपने कार्य-क्षेत्र में सफलता मिलती है। यह तभी हो पाता है, जब मनुष्य आसक्ति, भय और क्रोध को त्यागकर स्थिर मन से परमात्मा के अनंत सौंदर्य की उपासना करे। "ये यथा माँ प्रपद्यन्ते" श्लोक की विस्तृत व्याख्या विगत अंक में की गई। इसकी पुष्टि हेतु ठाकुर श्रीरामकृष्ण देव एवं परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के माध्यम से व्याख्या की गई।
साधना को बरगद के वृक्ष की तरह बढ़ने की उपमा देकर मानो गागर में सागर समाहित कर दिया गया है। गीता के पुरुषोत्तम योग में योगेश्वर श्रीकृष्ण को समझाने में बीस श्लोकों का प्रयोग करना पड़ा, किंतु यहाँ यदि देखें तो इन चार-पाँच पंक्तियों में सारा-का-सारा मर्म अध्यात्म साधना का, पुरुष से पुरुषोत्तम बनने का छिपा पड़ा है। धैर्य साधना-क्षेत्र में अति अनिवार्य है। जल्दबाजी, आतुरता से असमंजस पैदा होता है एवं फिर यही आशंका क्रमशः अश्रद्धा में या चिह्न−पूजा में बदल जाती है। हर व्यक्ति सफलता देखना भी चाहता है।
साधना सत्र के रूप में आ रहा है। अभी त्त्ख् कमरों की ही व्यवस्था हो पाई है, जिनमें चौबीस घंटे एकाँत में गुरुचेतना के सान्निध्य में रहा जा सकेगा। त्रिपदा ख् नाम से बने इन कमरों में टेपरिकॉर्डर द्वारा ध्यान-साधना, त्रिकाल संध्या से लेकर अमृतवाणी-मातृवाणी का आनंद भी लिया जा सकेगा। परमवंदनीया माताजी के भोजनालय में बने सात्विक आहार से अपना परिशोधन-पुनर्निर्माण हो सकेगा। आश्विन नवरात्रि से यह शृंखला आरंभ होनी है, जो चैत्र नवरात्रि ख्ख् तक अनवरत चलती रहेगी।
साधना को, जिसमें एक वर्ष में पाँच लाख गायत्री मंत्र का जप विधिवत पूरा किया जाता हैं, किसी भी शुक्लपक्ष की एकादशी से आरंभ किया जा सकता है। परंतु इसके लिए शुभारंभ कर श्रेष्ठतम समय गायत्री महाशक्ति के अवतरण की शुक्लपक्ष की दशमी के अगले दिन से माना गया है। यही मुहूर्त सबसे उत्तम है। जिस एकादशी से यह अनुष्ठान क्रम आरंभ हो, उसी एकादशी को अगले वर्ष पूर्ण हो, इसका ध्यान रखा जाए। इस वर्ष यह मुहूर्त ख् जून ख्क् (गायत्री जयंती के अगले दिन) से आरंभ होकर आगामी वर्ष की गायत्री जयंती के अगले दिन तक के लिए है।
साधना को यदि गायत्री परिवार के पच्चीस प्रतिशत कार्यकर्त्ता भी मन लगाकर कर सकें, तो इससे महाविनाश से जूझने की सामर्थ्य भी मिलेगी एवं सूक्ष्मजगत् में कार्य कर रही ऋषि सत्ताओं के शक्ति संवाहक-दूत श्रेष्ठ साधकों के रूप में मिल सकेंगे।
साधना इसी निमित्त नियोजित होती रही। ब्राह्मण वह जिसका चिंतन ऐसा हो जो ऊपर बताया गया। ब्राह्मण वह जो ब्रह्म में विचरण करे, जो कर्मों के बंधन से ऊपर चले।
साधनाओं में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है।
साधना, आत्मिक प्रगति संबंधी मार्गदर्शन समय-समय पर मिल सके। हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि ऐसी गुरुसत्ता हम सभी के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती चली गई। गुरुदेव द्वारा अपने शिष्यों को लिखे पत्र इसी कारण हम प्रतिमाह परिजनों-पाठकों को पढ़वाते हैं, ताकि वे गुरुसत्ता के सूक्ष्म व कारण रूप से आज भी वही शिक्षण ले सके, जो सभी कतिपय साधकों ने स्थूल शरीर द्वारा अपनी उंगलियों से लिखी गई उनकी पाती से लिया था।
साधना धन्य है। मेरे पास अपने की प्रथम कसौटी तो आप ही हैं। इसलिए जब लोग मेरी उपासना करते हैं, तब मैं आपकी किया करता हूँ। घाट का पत्थर गद्दा हो उठा और दुगने उत्साह से लोगों का मैल धोने लगा।
साधना को और प्रखर बनाएँ। जितना बन सके, इस अभियान साधना में भागीदारी करें इस वर्ष शांतिकुंज में आश्विन नवरात्रि ख्क् से चैत्र नवरात्रि ख्ख् तक की अवधि में विशिष्ट प्राण प्रत्यावर्तन स्तर के पाँच-पाँच दिवसीय साधना सत्र लगाए जा रहे हैं। प्रयास करें कि अभियान साधना में भाग लेने वाले परिजन यहाँ अथवा अपने पास के शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों पर वर्ष में न्यूनतम एक सत्र तो संपन्न कर लें। यहाँ तो स्थान सीमित हैं, पर सभी से पत्राचार किया जा सके, तो कुछ की व्यवस्था तो जाँच-पड़ताल कर बनाई जा सकती है। गायत्री जयंती पर्व से आरंभ की जाने वाली यह अभियान साधना सभी के लिए मंगलमय पथ प्रशस्त करें, ऐसी माँ से प्रार्थना है
साधना उपासना इस आध्यात्मिक दर्प से छुटकारा दिलाती है। वह इस विनम्र बोध में ले जाती है कि ईश्वर हैं, उसकी सत्ता कण-कण में व्याप्त है। इस कार्य कलेवर में उसी की एक चिंगारी व्यक्त हुई है। वह अब भी उसी महाज्वाला का अंश है और बुझ जाएगी तब भी उसी ज्योति में लीन हो जाएंगी अपना क्षुद्र अहं मात्र एक भ्राँति है। ईश्वर ही नियंता, व्यापक और अस्तित्वज्ञान है।
साधना आँदोलन जो जन-जन द्वारा विभिन्न संप्रदायों-मतों के लोगों में क्रियान्वित होना है, के साथ-साथ गायत्री अभियान साधना को भी इस वर्ष गति देने का मन है। गायत्री महाविज्ञान भाग-ख् के अंतिम पृष्ठों में इसका विस्तार से वर्णन है। यहाँ संक्षेप में इसकी क्रियापद्धति दी जा रही है, जो गायत्री जयंती क् जून ख्क् से आरंभ की जा सकती है। यह साधनाक्रम छिटपुट रूप में पूज्यवर द्वारा मथुरा से एवं हरिद्वार से पहले भी आरंभ किया गया था। आज सूर्य पर बढ़ते कलंकों-विक्षोभों एवं धरती पर संभावित ध्वंस की घुमड़ती घटाओं को देखकर इस एक वर्ष की साधना को यदि गायत्री परिवार के पच्चीस प्रतिशत कार्यकर्त्ता भी मन लगाकर कर सकें, तो इससे महाविनाश से जूझने की सामर्थ्य भी मिलेगी एवं सूक्ष्मजगत् में कार्य कर रही ऋषि सत्ताओं के शक्ति संवाहक-दूत श्रेष्ठ साधकों के रूप में मिल सकेंगे।
साधना से कदापि पीछे न हटकर और भी सक्रिय हों। श्रेष्ठ साधक ही युगनिर्माण का भागीरथी लक्ष्य पूरा करने में सहायक सिद्ध होंगे।
साधना पंचमुखी गायत्री माता का एक नैष्ठिक अनुष्ठान है, जो पाँच लाख गायत्री मंत्र ज पके माध्यम से एक वर्ष में पूरा होता है। एक वर्ष की तपश्चर्या साधक के व्यक्तित्व को निखार देती है। साधक को प्राणशक्ति से भर देती है। इससे उसका आत्मबल बढ़ता है एवं साधक अपने अंदर-बाहर चारों ओर एक दैवी शक्ति की उपस्थिति की अनुभूति करता है।,
साधना में खपा दिया था, पर क्−भ् में उनके महाप्रयाण के बाद उनके विचारों ने जो तीव्र गति पकड़ी, वह आग भी उनके साहित्य के विस्तार में देखी जा सकती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-December
साधना भी है। विशिष्ट अमडडडड तो इस युगपरिवर्तन की महान प्रक्रिया में अपना विशिष्ट तप नियोजित करेंगी ही, पर सर्वसाधारण भी जुड़ जाए, तो न केवल युगधर्म का निर्वाह होगा, वे अनुदानों के लाभार्थी भी बनेंगे। संयुक्त देवशक्ति द्वारा दैवी दुर्गा के अवतरण का एक अभिनव प्रयोग चल रहा है और हम सबको उसमें भागीदारी करनी चाहिए।
साधना युगपरिवर्तन-सतयुग की वापसी हेतु सुरक्षित रखी हुई है। उस ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ के ब्याज से ही मिशन की इतनी बड़ी-बड़ी योजनाएं पूरी हुई हैं। साथ में देव कन्याओं द्वारा 1971-72 में संपन्न इतना बड़ा तप का कोष परमवंदनीया माताजी की पचास वर्ष की तप−साधना भी है। विशिष्ट अमडडडड तो इस युगपरिवर्तन की महान प्रक्रिया में अपना विशिष्ट तप नियोजित करेंगी ही, पर सर्वसाधारण भी जुड़ जाए, तो न केवल युगधर्म का निर्वाह होगा, वे अनुदानों के लाभार्थी भी बनेंगे। संयुक्त देवशक्ति द्वारा दैवी दुर्गा के अवतरण का एक अभिनव प्रयोग चल रहा है और हम सबको उसमें भागीदारी करनी चाहिए।
साधना-लोक आराधना का रूप देकर एक विराट संगठन गायत्री परिवार खड़ा कर दिया एवं उनकी जिनकी उपासना को एक विराट रूप दे दिया।
साधना आँदोलन एक विशेष उद्देश्य के साथ आरंभ किया गया है। यह मात्र उपासना तक सीमित न रह जीवन साधना बन जाए, हर श्वास में योगसाधना, संयम तपश्चर्या का समावेश हो जाए, तो वातावरण निश्चित ही बदलेगा।
साधना से ही मिला था। च्यवनऋषि जब तप में निरत हुए तो वे सुकन्या जैसी पत्नी एवं अश्विनीकुमार जैसे चिकित्सक पा सके और जराजीर्ण शरीर का कायाकल्प करके खोए यौवन को पुनः प्राप्त कर सकने में सफल हुए।
साधना भी यज्ञकर्म समाधि ही थी। अपना सब कुछ श्रद्धापूर्वक उस परब्रह्म में उड़ेल कर उन्होंने जो साधना की, वह ब्रह्मकर्म था, ब्रह्मकर्म-समाधि थी। उसी ब्रह्म को अर्पित थी। ‘अखण्ड ज्योति’ में वे एक स्थान पर लिखते हैं, ‘मनुष्य जिसे प्यार करता है, उसके उत्कर्ष एवं सुख के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार रहता है। अपने शरीर, मन, अंतःकरण एवं भौतिक साधनों का अधिकाधिक भाग समाज और संस्कृति की सेवा में लगाने से रुका ही नहीं जाता।
साधना तो अपनी गुरु सत्ता को भाव भरा समर्पण करने से ही पूर्ण होती है समर्पण की गहनता हमें श्रद्धेय गुरुवर की तपचेतना एवं उनके द्वारा सम्पन्न किए जा रहे युग प्रत्यावर्तन का परिचय अपने आप ही दे देगी।
साधना’ से अपने को जोड़ लिया। इसके साथ-साथ सभी परिजनों ने स्वयंसेवी स्तर पर ‘रक्तदान’ में भाग लिया। न्यूयार्क, न्यूजर्सी, मेरीलैंड तथा शिकागो के कार्यकर्ताओं ने इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। सभी के स्थान-स्थान पर शाँति दीपयज्ञों का संचालन भी किया।
साधना अभियान की तत्परता और व्यापकता भी होनी चाहिए।
साधना पथो-पन्थों के अनुयायी अपनी साधना में इन भावों को समावेशित कर युग चेतना के भागीदार एवं सहचर बन सकते हैं। देवत्व के पक्षधर, विश्व मानवता का कल्याण चाहने वालों को इसमें बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभानी चाहिए। विचारशीलों एवं जाग्रत् आत्माओं का कर्त्तव्य है कि वे इसके लिए स्वयं तो आगे आएँ ही, अपने साथी-सहचरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। जिन्हें युग देवता भगवान् महाकाल की चमत्कारी सामर्थ्य पर भरोसा है- उन्हें इस विशेष साधना-अनुष्ठान की परिणति एवं परिणाम के बारे में भी आश्वस्त रहना चाहिए। आज हो रहे विश्व मन्थन के परिणाम स्वरूप नवयुग आएगा और निश्चित ही आएगा।
साधना के भागीदारों को अपनी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति के अनुसार कुछ व्रतबन्ध अवश्य अपनाने चाहिए। उदाहरण के लिए स्थूल शरीर का शोधन- उपवास अथवा अस्वाद व्रत से आसानी से होता है। इसे अपनी स्थिति के अनुसार सप्ताह में एक दिन हो सके तो रविवार या गुरुवार को अपनाया जा सकता है। इसी तरह सूक्ष्म शरीर के परिशोधन के लिए नियमित रूप से स्वाध्याय का सहारा लिया जाना चाहिए। कारण शरीर की साधना तो अपनी गुरु सत्ता को भाव भरा समर्पण करने से ही पूर्ण होती है समर्पण की गहनता हमें श्रद्धेय गुरुवर की तपचेतना एवं उनके द्वारा सम्पन्न किए जा रहे युग प्रत्यावर्तन का परिचय अपने आप ही दे देगी।
साधना करनी होती है। आहार की व्यवस्था भी सभी की इन्हीं कक्षों में है। नवनिर्मित त्रिपदा-2 (पातंजलि भवन) में स्थान प्रायः साठ शिविरार्थियों के लिए सुरक्षित रखे गए हैं। चौबीस घंटे में मात्र एक बार साधकगण एक साथ कल्क सेवन कर अखण्ड दीपक को प्रणाम करने तथा उनके लिए सुरक्षित यज्ञशाला में यज्ञ संपन्न करने हेतु निकलते हैं। सभी इन साधना सत्रों का पूरा लाभ उठा रहे हैं एवं सत्र पूरा होने पर हो रहे समीक्षा गोष्ठियों में अपने सुखद अनुभवों अनुभूतियों की चर्चा भी कर रहें हैं।
साधनात्मक निर्धारण किए गए हैं।
साधना से कम नहीं है।
साधना की, वह ब्रह्मकर्म था, ब्रह्मकर्म-समाधि थी। उसी ब्रह्म को अर्पित थी। ‘अखण्ड ज्योति’ में वे एक स्थान पर लिखते हैं, ‘मनुष्य जिसे प्यार करता है, उसके उत्कर्ष एवं सुख के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग और बलिदान करने को तैयार रहता है। अपने शरीर, मन, अंतःकरण एवं भौतिक साधनों का अधिकाधिक भाग समाज और संस्कृति की सेवा में लगाने से रुका ही नहीं जाता। जितना भी कुछ पास दीखता है, उसे अपने प्रिय आदर्शों के लिए लुटा डालने की ऐसी हूक उठती है कि कोई भी साँसारिक प्रलोभन उसे रोक सकने में समर्थ नहीं होता।
साधनात्मक पुरुषार्थ किए जाते रहे हैं। इन दिनों जो भीषण संघर्ष की स्थिति उभरी है, उसके पीछे अविवेकी, संवेदनहीनों, महत्वाकांक्षियों का बढ़ता दुस्साहस तथा विवेकवानों, सद्भावना संपन्नों में उनके प्रतिरोध के लिए संकल्प और सत्साहस का अभाव ही मूल कारण रहे हैं। इसलिए वर्तमान विभीषिकाओं के समाधान के लिए निम्नानुसार साधनात्मक निर्धारण किए गए हैं।
साधना के अभ्यासी करते पाए जाते हैं। इसका नाम इसी कारण ध्यान मुद्रा रखा गया है।
साधना-पुरुषार्थ की जानकारी देते हुए अधिक-से-अधिक भाई-बहनों को इसमें भागीदार बनने के लिए भावभरा आमंत्रण दिया जाए। अपने परिवार के कुशल वक्ताओं के साथ विभिन्न विचारधाराओं के प्रगतिशील प्रतिपादकों से से संक्षेप में समर्थनपरक अपीलें कराई जाएं। अंत में कुछ मिनट मौन प्रार्थना के साथ शाँतिपाठ और शाँति अभिसिंचन करके समापन किया जाए।
साधना इसके अतिरिक्त सभी परिजन कर रहे हैं।
साधना करते समय छह मास तक सर्वत्र कृष्ण का दर्शन करते थे। काली मंदिर में पूजा करते समय सब कुछ चैतन्यमय देखते थे, चिन्मय अर्घा, चिन्मय मंदिर, चिन्मयी देवी।’
साधना विगत गायत्री जयंती से आरंभ हुई थी। इसे करने वालों की बड़ी संख्या शाँतिकुँज में भी है एवं क्षेत्र में तो यह संख्या लाखों में चली जाती है। अब इसे 2002 की समाप्ति गीताजयंती 15 दिसंबर तक आगे बढ़ा दिया गया है। नियमित गायत्री साधना इसके अतिरिक्त सभी परिजन कर रहे हैं।
साधना का परिणाम है।
साधना के साथ रुद्र गायत्री मंत्र की एक माला असुरता के संहार के लिए करें। इस विशेष जप में रुद्र गायत्री महामंत्र के साथ क्लीं बीज का संपुट लगाएँ। यह संपुटित रुद्र गायत्री मंत्र है- “ॐ क्लीं क्लीं क्लीं पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं क्लीं ॐ।” इस संपुटित महामंत्र के जप के साथ यह गहन भावना रखें कि हम प्रज्ञावतार परम पूज्य गुरुदेव की तप साधना में विशिष्ट भागीदार हैं।
साधना-अनुष्ठान की परिणति एवं परिणाम के बारे में भी आश्वस्त रहना चाहिए। आज हो रहे विश्व मन्थन के परिणाम स्वरूप नवयुग आएगा और निश्चित ही आएगा। इक्कीसवीं सदी- उज्ज्वल भविष्य का अभिप्राय एवं पर्याय बनकर रहेगी।
साधनात्मक प्रयोग करते हुए, इसके अनुरूप सामाजिक वातावरण बनाने के लिए भी प्रयास किए जाएं। जगह-जगह अनिष्ट निवारक के लिए सामूहिक प्रार्थना सभाएं भी की जा सकती है। पूर्व निर्धारित तिथि एवं समय पर प्रारंभ में एक घंटे या अधिक समय का सामूहिक जप रखा जाए, जो लोग गायत्री मंत्र का निर्धारित अन्य मंत्र न जानते हों या उन्हें करने में कोई झिझक हो, वे जनकल्याण के भाव से मौन बैठकर अपने विश्वास के अनुसार भावभरी प्रार्थना भर करते रहें। बाद में जन सद्भाव एवं अनीति-अत्याचार के विरुद्ध संकल्प जगाने वाले युगगायन किए जाएं। वर्तमान संकट के निवारण के लिए दुर्बुद्धि त्याग, अनीति के प्रतिरोध सद्बुद्धि के जागरण और सद्भावना के विस्तार की आवश्यकता समझाई जाए।
साधना भी कर रहे हैं,जो 26 अक्टूबर से निरंतर चल रही है एवं आगामी नवरात्रि तक चलती रहेगी। इसके अतिरिक्त दो हजार से अधिक साधक नौ-नौ दिन के अपने अनुष्ठान यहाँ आकर करते हैं। एक वर्ष के लिए आरंभ हुई अभियान साधना विगत गायत्री जयंती से आरंभ हुई थी। इसे करने वालों की बड़ी संख्या शाँतिकुँज में भी है एवं क्षेत्र में तो यह संख्या लाखों में चली जाती है। अब इसे 2002 की समाप्ति गीताजयंती 15 दिसंबर तक आगे बढ़ा दिया गया है।
साधना अनुष्ठान का दूसरा चरण रुद्र गायत्री महामंत्र से दी आहुतियों के रूप में है। इन आहुतियों की संख्या अपने समय एवं सामर्थ्य के अनुसार पाँच या ग्यारह हो सकती है। रुद्र गायत्री के साथ पाँच या ग्यारह की संख्याएँ विशेष शुभ योग देती हैं। क्योंकि शास्त्रानुसार भगवान् रुद्र पंचमुखी हैं और उनके रूप ग्यारह हैं। तभी शास्त्रकारों ने एकादश रुद्रों की चर्चा की है।
साधना की उच्चतम स्थिति तक पहुँचो। ऐसे व्यक्ति के अंतस् में सतत ज्ञानाग्नि जलती रहती है (ज्ञज्ञ्क्नाग्निदग्धकर्माणं 4/19)। ज्ञान किस बात का, इस बात का कि मैं व भगवान एक हैं। वह ज्ञान जिसमें हम भगवत् चेतना के स्फुल्लिंग हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य ब्राह्मी स्थिति में पहुँच जाता है।
साधना के लिए परोपकाररत रहना ही श्रेष्ठ है।’
साधना और उसकी परिणति’ मई 1961 अखण्ड ज्योति)।
साधना वर्ष के एक बड़े महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं हम सभी। सारे विश्व में महायुद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। विश्व एक महात्रासदी से गुजर रहा है। जो भी परिस्थितियाँ पैदा हुई हैं, अप्रत्याशित नहीं है, पर निश्चित ही यह संकट टलेगा, नवसृजन की संभावनाएं , साकार होंगी एवं वर्तमान विभीषिका का समापन होगा। समय कुछ अधिक लग सकता है, परिस्थितियाँ आगामी कुछ माह में और जटिल हो सकती हैं, पर यह जो अवधि 2002 के मध्य तक के कुछ दिनों तक की हैं, बड़ा विशेष स्थान रखती है युगपरिवर्तन की प्रक्रिया में।
साधना के संस्कारों से अनुप्राणित है। नित्य इस सीमित साठ एकड़ के परिकर में जितना गायत्री जप संपन्न होता है, उसकी संख्या करोड़ों में जाती है। पाषाण परिकर हिमालय देवात्मा है, क्योंकि उसकी कंदराओं में रहकर अगणित तपस्वी ऋषियों ने अपनी प्रचंड तपऊर्जा का समावेश किया एवं अभी भी कर रहे हैं। उसी की छाया में, वादियों में प्रवेश द्वार पर स्थित हरिद्वार की इस पावन तपोभूमि में निरंतर कुछ साधक मौन एकाकी तप−साधना भी कर रहे हैं,जो 26 अक्टूबर से निरंतर चल रही है एवं आगामी नवरात्रि तक चलती रहेगी। इसके अतिरिक्त दो हजार से अधिक साधक नौ-नौ दिन के अपने अनुष्ठान यहाँ आकर करते हैं।
साधना में विशिष्ट भागीदार हैं। और हमारी तप ऊर्जा उनकी तपश्चेतना के साथ एक होकर आतंकवादी असुरता का संहार और विश्व कल्याण कर रही है। इस महाप्रयोग को करते समय हमारी गहन आस्था यह भी रहे कि हम और हमारे सभी परिजन परम पूज्य गुरुदेव के तप-तेज से सुरक्षित हैं। भगवान् सूर्य की रश्मियाँ शक्ति किरणें बनकर हमें अजस्र ऊर्जा अनुदान दे रही हैं।
साधना के पलों में श्रेष्ठी सुयश सोचते कि आत्मा को निर्बन्ध कहा गया है। आत्मा को परमात्मा कहा गया है। शास्त्रकारों ने ‘अयमात्मा ब्रह्म’ की घोषणा की है। यह सब सच है तो फिर जीव संसार में भला क्यूँ अटका रहता है। आखिर यह सब क्यों, कैसे व किस अनुराग से है।
साधना को करने वाले ध्यान रखें कि जिस-तिस तरह जप संख्या पूरी कर लेने का नाम साधना नहीं है। जप संख्या तो ज्यों-त्यों करके कोई भी खाली समय में पूरा कर सकता है। पर विलासी एवं अस्त-व्यस्त दिनचर्या अपनाने वाला व्यक्ति उतनी भर चिह्न पूजा से कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। साथ में तपश्चर्या के कठोर विधान भी जुड़ने चाहिए, जो स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण तीनों ही शरीरों को तपाते एवं हर दृष्टि में समर्थ बनाते हैं। संचित कषाय-कल्मष भी तप साधना में बहुत बड़े व्यवधान होते हैं।
साधनाओं में भटकते रहो, तपस्या करके सूखते रहो, पाठ, भजन, कीर्तन करके घर-संसार में शोर मचाते रहो। पर जब तक यह गुत्थी नहीं सुलझती कि आत्मा और परमात्मा एक है, तब तक सब कुछ सारहीन, बेकार बना रहता है। श्रेष्ठी सुयश की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। वह शान्ति की खोज में, आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध ढूंढ़ने में हैरान परेशान थे। पर जैसा कि उन्होंने एक दिन पढ़ा था-
साधना एवं आश्चर्यजनक सिद्धियाँ यदा-कदा यथार्थ परिचय दे जाती थी। पर अभी इन पलों में वह श्रेष्ठी सुयश को सम्बोधित करते हुए कहने लगे- सेठ जी! एक बार एक ऊंटवाला अपने सौ ऊंटों का काफिला लेकर घूम रहा था। जगह-जगह ठहरता जाता और चलता जाता। ऊंटों का पेट भी इस प्रकार जंगल में भर जाता था।
साधना, संयम तपश्चर्या का समावेश हो जाए, तो वातावरण निश्चित ही बदलेगा।
साधना में इन भावों को समावेशित कर युग चेतना के भागीदार एवं सहचर बन सकते हैं। देवत्व के पक्षधर, विश्व मानवता का कल्याण चाहने वालों को इसमें बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभानी चाहिए। विचारशीलों एवं जाग्रत् आत्माओं का कर्त्तव्य है कि वे इसके लिए स्वयं तो आगे आएँ ही, अपने साथी-सहचरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। जिन्हें युग देवता भगवान् महाकाल की चमत्कारी सामर्थ्य पर भरोसा है- उन्हें इस विशेष साधना-अनुष्ठान की परिणति एवं परिणाम के बारे में भी आश्वस्त रहना चाहिए। आज हो रहे विश्व मन्थन के परिणाम स्वरूप नवयुग आएगा और निश्चित ही आएगा।
साधना में भाव और उद्देश्य मुख्य है- क्रिया विधि नहीं। सो अन्य धर्मों को मानने वाले, अन्य साधना पथो-पन्थों के अनुयायी अपनी साधना में इन भावों को समावेशित कर युग चेतना के भागीदार एवं सहचर बन सकते हैं। देवत्व के पक्षधर, विश्व मानवता का कल्याण चाहने वालों को इसमें बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी निभानी चाहिए। विचारशीलों एवं जाग्रत् आत्माओं का कर्त्तव्य है कि वे इसके लिए स्वयं तो आगे आएँ ही, अपने साथी-सहचरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। जिन्हें युग देवता भगवान् महाकाल की चमत्कारी सामर्थ्य पर भरोसा है- उन्हें इस विशेष साधना-अनुष्ठान की परिणति एवं परिणाम के बारे में भी आश्वस्त रहना चाहिए।
साधना नहीं है। जप संख्या तो ज्यों-त्यों करके कोई भी खाली समय में पूरा कर सकता है। पर विलासी एवं अस्त-व्यस्त दिनचर्या अपनाने वाला व्यक्ति उतनी भर चिह्न पूजा से कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। साथ में तपश्चर्या के कठोर विधान भी जुड़ने चाहिए, जो स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण तीनों ही शरीरों को तपाते एवं हर दृष्टि में समर्थ बनाते हैं। संचित कषाय-कल्मष भी तप साधना में बहुत बड़े व्यवधान होते हैं।
साधना सत्रों का पूरा लाभ उठा रहे हैं एवं सत्र पूरा होने पर हो रहे समीक्षा गोष्ठियों में अपने सुखद अनुभवों अनुभूतियों की चर्चा भी कर रहें हैं। यह क्रम 10 अप्रैल नवरात्रि तक चलता रहेगा। फरवरी माह में वसंत पर्व 17/2/2002 को होने के कारण एक शिविर स्थगित करना पड़ा है। 15 फरवरी प्रातः समापन के बाद अब 16, 17, 18, 19 का अवकाश रहेगा। अगले सत्र 20, 21, 22, 23, 24 तथा 25, 26, 27, 28 मार्च की तारीखों में होंगे।
साधना की बात सोचे, उसे ब्रह्मज्ञानी कौन कहेगा? निष्ठुर पाषाण से कम उन्हें दूसरी उपमा क्या दी जाए, यह सोचने के बाद कदाचित ही कोई दूसरा शब्द मिल सकें।’ (अखण्ड ज्योति, अप्रैल 1982, क्या काफिला बिछुड़ ही जाएगा)।
साधना सुप्रसिद्ध है। ऋषिश्रेष्ठ विश्वामित्र जिनने नवयुग की कल्पना की, नूतन सृष्टि की रचना की एवं गायत्री मंत्र के ऋषि कहलाए, कठोर तप से ही ब्रह्मर्षि बन पाए। सप्तर्षियों की तपःस्थली शाँतिकुँज भी मूल रूप में उन्हीं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि है।
साधना किसी महाभारत से कम नहीं है। उसमें क्षण-क्षण में मनोभूमि में आने वाली बुराइयों और दुष्प्रवृत्तियों से लोहा लेना और उन्हें परास्त करना पड़ता है। इसके लिए स्वयं को एक सतर्क सैनिक की भूमिका निभानी पड़ती है और कुविचारों के, दुर्भावनाओं के आते ही उन्हें धर दबोचना पड़ता है, ताकि उनकी मलिनता पटल पर हावी न होने पाए।
साधना बन जाए, हर श्वास में योगसाधना, संयम तपश्चर्या का समावेश हो जाए, तो वातावरण निश्चित ही बदलेगा।
साधना में प्रवृत्त होने की तैयारी करने लगे।
साधना में बहुत बड़े व्यवधान होते हैं। उनका निवारण एवं निराकरण भी इसी भट्टी में प्रवेश करने से बन पड़ता है। ऋषि-मुनियों की जिस प्रखरता की चर्चा शास्त्रों में होती है, वह उनकी विद्वता के कारण नहीं, गहन तप साधना का परिणाम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2001-October
साधना संकल्प कराया जाना है। 8 से 8.30 जप, सूर्यार्घ्य तथा 8.30 से 9.00 निष्कासन तप अंतः की भावभूमिका में संपन्न होना है। 9 से 9.30 सोऽहम् साधना के बाद शेष क्रम यथावत् रहेगा। दूसरे, तीसरे व चौथे दिन निर्धारित क्रम वही रहेगा, जो ऊपर दिया गया। पाँचवें दिन प्रातः 8 से 10 समापन गोष्ठी आत्मप्रेरित संकल्पों का क्रम होगा।
साधना हेतु किया जा रहा पुरुषार्थ उसी लगन से भरा होना चाहिए, जैसा कि मनुष्य धन जोड़ने या करोड़पति बनने के लिए करता है। पैसा कमाकर करोड़पति बनने वाले तो दिवास्वप्न ही देखते हैं, पर सही राह पर वही चल रहा है, जो अंतर्जगत् का पुरुषार्थ कर रहा है। ज्ञान की निधि हमारे चिरसंचित
साधनाकाल में जो साधक इस सत्य तत्त्व पर पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित हो जाता है, उसकी वाणी साधारण नहीं रह जाती, वह फलदायी हो जाती है। ऐसा व्यक्ति जो कुछ भी सोचता, विचारता या बोलता है, वह फलिता होने लगता है अर्थात् वह वाक्सिद्ध हो जाता है। इसी की ओर संकेत करते हुए पातंजल योगसूत्र कहता है, ‘सत्यप्रतिष्ठायाँ क्रियाफलाश्रयत्वम्।’ (2/36) अर्थात् सत्य की प्रतिष्ठा होने पर वाणी और विचारों में क्रियाफलदान की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।
साधनामय था। कुछ माह यह क्रम चलने के बाद सौभाग्यशाली एक हजार प्राणवान साधकों को प्राण अनुदान वितरण करने के बाद अन्य अनेक प्रकार के सत्र यहाँ चलने लगे, भवन का विस्तार होता चला गया एवं आज की इस स्थिति में आ पाया, जहाँ हम शाँतिकुँज का एक विराट् विस्तार देखते हैं।
साधना सत्र, 1 से 29 की अवधि में चलने वाले एक मास के युगशिल्पी कार्यकर्त्ता सत्र, परिव्राजक सत्र, रचनात्मक प्रशिक्षण सत्र, विशिष्ट व्यक्तित्व परिष्कार सत्र यथावत् चलते रहेंगे, इसलिए स्थान वृद्धि की कोई गुँजाइश नहीं है। यही क्रम 2002 की आश्विन नवरात्रि के बाद 16 अक्टूबर से आरंभ कर 2003 की 31 मार्च तक चलाएँगे। इसमें भी तैंतीस या बत्तीस (6 फरवरी 2003 की बसंत पंचमी के कारण) सत्र ही हो पाएँगे। यह शृंखला आगामी चार वर्ष तक चलती रहेगी एवं दस हजार से अधिक प्राणवान कार्यकर्त्ताओं को प्राणवान−ऊर्जावान बनाती रहेगी। संभव है तब स्थान और अधिक बढ़ जाए, संख्या बढ़ाई भी जा सकती है।
साधना में लीन नहीं होने दे रहा हैं।”
साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था। आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया को प्रथम दिन महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, जिसे पूज्यवर स्वयं व्यक्तिगत परामर्श के लिए मिले 15 मिनट के समय में संपन्न करते थे। बीच में दर्पण−साधना के दौरान भावभरे गीत टेपरिकॉर्डर से साधकों को सुनाए जाते थे तथा इन्हें सुनकर वे हलके ही नहीं होते, आत्मबोध की साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था।
साधना कर रहे थे, किंतु उनका मन नहीं सध पा रहा था। इस युवक को वापस आया हुआ देखकर वह फूले नहीं समाए। बोले, “आओ भाई! मेरी जटिल पहेली का क्या समाधान लेकर आए हो? मैं उसे जानने के लिए व्याकुल हूँ।”
साधना में भागीदार हुआ जाए तो यह समझदारी भरा कदम होगा।
साधना के लिए कोई छायादार स्थान चुनना चाहिए, ताकि धूप की प्रचंडता या गरमी की उग्रता उसमें बाधक न बने।
साधना पथ से दूर हटते हुए अंततः उससे विलग हो जाता है। योगमार्ग से वह विलगाव ही योगभ्रष्टता है। इसी कारण से ऐसे साधक योगभ्रष्ट कहलाते हैं। शांडिल्योपनिषद् में अस्तेय को परिभाषित करते हुए कहा गया है,
साधना में बीच में विराम लेकर परमपूज्य गुरुदेव फरवरी 1972 में एकाएक कुछ दिनों के लिए शांतिकुंज हरिद्वार वापस लौटे एवं परिजनों ने अप्रैल 1972 की ‘अखण्ड ज्योति’ के संपादकीय में पढ़ा ‘गुरुदेव क्यों आए? क्यों चले गए?’ तब उन्हें विदित हुआ कि हमारी गुरुसत्ता की यह साधना और उसके लीला उपक्रम के पीछे छिपे गूढ़ रहस्य क्या हैं! परमवंदनीया माताजी की वेदना पूज्यवर से देखी नहीं गई। बिना तार के, संदेश के परावाणी से भेजी पाती उन तक पहुँची एवं उनके हृदयावरोध के कष्ट के दौरान वे शाँतिकुँज कुछ दिनों के लिए आ गए। कई विषयों पर उन्होंने परमवंदनीया माताजी से चर्चा की, जो अपने आराध्य के आते ही स्वस्थ हो गई थी।
साधना द्वारा ही संभव होता है।
साधना से भरा पड़ा है।
साधना का आनंद आश्रम में उठा सकते हैं।
साधना निताँत मौन एकाकी साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई। उपासनापद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था।
साधना अंतः ऊर्जा जागरण के पाँच−पाँच दिवसीय सत्रों के रूप में आरंभ की जा रही है। कुल उपलब्ध कक्ष 70 हैं, जिन्हें इस साधना के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। प्रत्येक में एक साधक अकेले रह सकेंगे। इनमें स्पीकर लगाए गए हैं। प्रज्ञापेय, सात्विक आहार आदि की व्यवस्था भी प्रत्येक के कक्ष में ही की जा रही है।
साधनाओं के लिए नवरात्रि से बढ़कर और कोई अवसर नहीं हो सकता। यदि इसके साथ युग संधि का दुर्लभ सुयोग भी जुड़ा हो तो इसका महत्त्व शतगुणित हो जाता है। इसलिए नवरात्रि के इस पुण्य पर्व को हाथ से न जाने दिया जाए व समूची तैयारी के साथ इसकी आत्म शोधन एवं आत्मोत्कर्ष साधना में भागीदार हुआ जाए तो यह समझदारी भरा कदम होगा।
साधना के दौरान भावभरे गीत टेपरिकॉर्डर से साधकों को सुनाए जाते थे तथा इन्हें सुनकर वे हलके ही नहीं होते, आत्मबोध की साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था। इस समग्र दस सूत्री साधनापद्धति से भरा शिक्षण यद्यपि कुछ साधक (तीस से चालीस अधिकतम) पूरे शाँतिकुँज में रहकर करते रहे, पर जिनने भी इसमें भागीदारी की, वे आज तक अपना सौभाग्य सराहते हैं, उन दिनों की याद करते हैं। उन दिनों शाँतिकुँज छोटा था, पर्यटकों को आने की सख्त मनाही थी एवं कमरे भी गिने−चुने थे। सारा वातावरण साधनामय था।
साधना की सत्र−शृंखला का विस्तृत विवरण छपा तथा जून 1973 का पूरा अंक प्राण−प्रत्यावर्तन−साधना विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। यह साधना निताँत मौन एकाकी साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई। उपासनापद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया।
साधना उपक्रम है यह
साधना के लिए है। 15.15 से 16.00 प्रज्ञापेय का अवकाश है, जो कक्ष में ही उपलब्ध होगा।
साधना द्वारा कुछ परिवर्तन हो रहे हैं, प्रगति हो रही है, इस निमित्त भगवान् श्रीकृष्ण अपने शिष्य से श्लोक 11 में कहते हैं कि “जिस समय इस देह में तथा अंतःकरण और इंद्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है।” (श्लोक 11 अध्याय 14)। सत्त्वगुण से ज्ञान प्रात होता है एवं फल के रूप में सुख, परमशाँति एवं वैराग्य आदि की प्राप्ति होती है (16, 17 श्लोक)। योगसाधक निश्चित ही सतोगुण की कक्षा में उच्च स्थिति पर विराजमान होते हैं, ऐसा योगेश्वर का मानना है। भगवान् कहते हैं कि इन गुणों से परे जाकर गुणातीत भी बना जा सकता है, पर उसके लिए कर्त्तापन का अभिमान त्यागकर स्वयं को सच्चिदानंदघन परमात्मा में स्थापित करना होता है।
साधना की सफलता की कुँजी है। इसी अध्याय में भगवान् ध्यानस्थ होने की विधि भी बताते हैं। वे कहते हैं कि “बाहर के विषय−भोगों का चिंतन न करते हुए उन्हें बाहर ही रख (मन में न आने देकर) नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके, जिसकी इंद्रियाँ, मन व बुद्धि जीत ली गई हैं, ऐसा मोक्ष की इच्छा रखने वाला योगी इच्छा, भय और क्रोध से रहित होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है अर्थात् मुक्त हो जाता है (श्लोक 27, 28 अध्याय 5)। यह एक प्रकार से ध्यान की विधि भी है, अंतः त्राटक की क्रियापद्धति भी तथा अंतर्गुहा में प्रवेश करने का मार्गदर्शन भी। इससे सुँदर योग का शिक्षण और क्या हो सकता है।
साधना में 24 हजार मंत्र जप वाले लघु अनुष्ठान के नियमों का पालन करना होता है। इसमें 27 माला नियमित जपनी पड़ती है जो सामान्य गति के अनुरूप 3 घण्टे में पूरी हो जाती है। इस अवधि में उपवास के नियम का पालन कड़ाई से किया जाए तो अच्छा है अन्यथा ब्रह्मचर्य रहने वाला अनिवार्य नियम टूट सकता है। उपवास कई स्तर का हो सकता है। फल द्वारा, शाकाहार, खिचड़ी, दलिया आदि।
साधनावधि तक समाचार पत्र, अन्य कोई साहित्य उपलब्ध नहीं होगा। भोजन, गंगाजल एवं प्रज्ञापेय साधना कक्षा में ही दोनों समय पहुँचा दिए जाएँगे। भोजन में हविष्यान्न की एक रोटी, औषधियों की चटनी एवं साधक की इच्छानुसार चावल या दलिया की सब्जी मिश्रित खिचड़ी दी जाएगी। अन्य कोई पदार्थ सेवन नहीं कर सकेंगे। जप की संख्या पर कोई प्रतिबंध न होगा।
साधना तथा 9.30 से 10.00 नादयोग साधना का क्रम है। निर्देश कक्ष में ही मिलेंगे।
साधना संक्राति को भलीभाँति पार कर सिद्धि−लाभ कर सकें। पातंजल योगसूत्र इस विषय में लिखता है, ‘संतोषादनुत्तम−सुखलाभः। (2/42) अर्थात् संतोष की पूर्ण उपलब्धि होने पर अनुपम सुख प्राप्त होता है।
साधना के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है। प्रत्येक में एक साधक अकेले रह सकेंगे। इनमें स्पीकर लगाए गए हैं। प्रज्ञापेय, सात्विक आहार आदि की व्यवस्था भी प्रत्येक के कक्ष में ही की जा रही है। कुल 72 कक्षों की (जिनमें शौच−स्नान आदि की सुविधा अलग से कमरों के साथ ही है।
साधना को, इस हीरक जयंती वर्ष में चल रहे साधना आँदोलन को तथा शाँतिकुँज के इतिहास के एक मील के पत्थर को आज अट्ठाइस वर्ष बाद पुनः समझ सकें, आज की आवश्यकता से अवगत हो सकें कि वैसी ही इसी स्तर की पुनरावृत्ति की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है। मई 1973 की अखण्ड ज्योति में प्राण−प्रत्यावर्तन साधना की सत्र−शृंखला का विस्तृत विवरण छपा तथा जून 1973 का पूरा अंक प्राण−प्रत्यावर्तन−साधना विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। यह साधना निताँत मौन एकाकी साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई।
साधनाप्रधान प्रसंग आए हैं। पहले ही श्लोक में श्री भगवान् कहते हैं कि यह शरीर एक ‘क्षेत्र’ है, खेत है, इसको जा जानता है वह क्षेत्रज्ञ तथा इसके तत्त्वज्ञान को जानने वाले को ज्ञानी कहते हैं। (श्लोक 1, अध्याय 13)। आगे भगवान् ज्ञान की परिभाषा देते हैं तथा परब्रह्म की व्याख्या करते हैं (ज्योतिषामपि तज्जयोतिः)। क्षेत्र−क्षेत्रज्ञ विभाग योग की यह व्याख्या प्रकृति, परब्रह्म व उससे एकत्व की परिणति पर केंद्रित है।
साधनामय वातावरण दिया जाएगा। दो कक्ष केयर टेकर्स, समस्याएँ आने पर संदेशवाहक के रूप में वरिष्ठ बंधुओं तक चिट्ठी पहुँचाने एवं साहित्य, पूजन सामग्री आदि के लिए सुरक्षित रखे गए हैं।
साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। बड़े आदमी बनने की फसल चली गई। अब अमीरी को बड़प्पन के रूप में देखना बेकार है। अब समय महानता की गौरवगरिमा बढ़ने का आ गया है। इसे कार्यरूप में परिणत कैसे किया जाए, उसी का मार्गदर्शन युग−साधना करती है।
साधनापरायण होकर एवं अंदर श्रद्धा विकसित कर ही व्यक्ति ऐसे ज्ञान को प्राप्त होता है, जो उसे शाँति एवं भगवद्सत्ता से एकाकार कराती है (श्लोक 59)। कर्मयोग में ज्ञान एवं ज्ञानयोग में कर्म का निराला समन्वय इन श्लोकों में हुआ है।
साधना की उच्चतर अवस्थाओं को प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के लिए यह आरंभिक अभ्यास अतीव उपयोगी साबित हो सकता है, इसमें रत्ती भर भी संदेह की गुंजाइश नहीं।
साधना कर रहा हूँ, पर अब तक मन सध नहीं पाया है। इससे मैं बहुत विकल हूँ। महर्षि आर्जव से तुम कोई समाधान अवश्य पूछना और मुझे बताना।
साधना में संलग्न हैं। हमें तभी बुलाना चाहिए जब कोई विशेष कारण हो। साधारण प्रचार के लिए हमारा दुर्बल स्वास्थ्य सर्वथा अनुपयुक्त है।”
साधना का क्रम है। निर्देश कक्ष में ही मिलेंगे।
साधनाओं में, दो समय के 30-30 मिनट के प्रवचन में तथा 30-30 मिनट के इसी विषय पर मनन−चिंतन में लगेंगे। औसत दो घंटे स्वाध्याय−मनन−चिंतन हेतु होंगे। साधक अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लिख सकेंगे। बाद में इस आधार पर परामर्श एवं जिज्ञासा−समाधान भी पत्र द्वारा प्राप्त कर सकेंगे। समापन पर वे युगधर्म के परिपालन के क्रम में अपने अंदर उभरे संकल्प भी लिखकर देंगे।
साधना आँदोलन को गतिशील करने के लिए उसी स्तर की क्रियाप्रणाली अपनाने हेतु विशिष्ट ‘अंतः ऊर्जा जागरण सत्रों’ की एक शृंखला 26 अक्टूबर 2001 नवरात्रि समापन के अगले दिन से आरंभ की जा रही है। ये शिविर पाँच दिवसीय होंगे एवं लक्ष्य एक ही होगा कि इसमें भागीदारी करने वाले प्राणवान−विभूतिवान बनकर समाज के लिए उपयोगी बन सकें, नवयुग की वेला में सच्चे साधक बनकर नेतृत्व कर सकें। सही अर्थों में अगले दिनों वे ही मार्गदर्शक कहलाएँगे, लोग उनकी ही सुनेंगे, जो सबसे पहले साधक होंगे। इसी उद्देश्य से प्राण−प्रत्यावर्तन स्तर की यह साधना अंतः ऊर्जा जागरण के पाँच−पाँच दिवसीय सत्रों के रूप में आरंभ की जा रही है। कुल उपलब्ध कक्ष 70 हैं, जिन्हें इस साधना के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है।
साधना का नियमित क्रम, शाँतिकुँज, गायत्री तपोभूमि मथुरा में किए गए सत्र (सभी का स्मृति के अनुसार विवरण), अपने स्तर पर किए गए अनुष्ठान, समयदान एवं अंशदान का क्रम तथा समयदान के अंतर्गत किए गए उल्लेखनीय सप्त आँदोलनपरक या अन्य कोई सेवाकार्यों का विवरण लिख भेजें। साथ ही एक वर्तमान समय का पासपोर्ट साइज का फोटो भी भेजें। अनुमति मिलने पर ही आएँ।
साधना आँदोलन को तथा शाँतिकुँज के इतिहास के एक मील के पत्थर को आज अट्ठाइस वर्ष बाद पुनः समझ सकें, आज की आवश्यकता से अवगत हो सकें कि वैसी ही इसी स्तर की पुनरावृत्ति की आवश्यकता क्यों आ पड़ी है। मई 1973 की अखण्ड ज्योति में प्राण−प्रत्यावर्तन साधना की सत्र−शृंखला का विस्तृत विवरण छपा तथा जून 1973 का पूरा अंक प्राण−प्रत्यावर्तन−साधना विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। यह साधना निताँत मौन एकाकी साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई।
साधना होगी। 18.15 से 19.00 भोजन के लिए सुरक्षित है। 19.00 से 19.30 सहज लयबद्ध श्वास−प्रश्वास का क्रम होगा।
साधनात्मक अभ्यास इसमें रखे गए हैं। यहाँ साधकों को प्रायश्चित कर्म अपनी ही भाव−भूमिका में करना है। साक्षी सूक्ष्म रूप में विराजमान गुरुसत्ता को बनाना है। अपनी पापकर्मों का लेखा−जोखा प्राण प्रत्यावर्तन की तरह लिखकर नहीं देना है। परमपूज्य गुरुदेव एवं परमवंदनीया माताजी स्तर की दिव्य शक्तिमान सत्ता ही उन्हें झेल पाती थी।
साधना व स्वावलंबन प्रशिक्षण भी चलेंगे। अभी आस−पास के प्रायः दो सौ गाँवों को जोड़ने के लिए 27 से 30 नवंबर 2001 की तारीखों में एक विराट् 108 कुँडी गायत्री महायज्ञ यहाँ आयोजित किया जा रहा है। विस्तृत जानकारी दिल्ली कार्यालय 0116917361 दूरभाष या संगठन प्रकोष्ठ शाँतिकुँज से लें।
साधना प्रारंभ होने से समापन तक साधकों को मौन, एकाँत सेवन करते हुए अंतर्मुखी रहना होगा। मात्र अखण्ड दीपक−दर्शन एवं यज्ञ के समय वे कक्ष के बाहर निकल सकेंगे। साधना−स्वाध्याय हेतु निर्धारित पुस्तकें ही दी जाएँगी। शेष समय अंतः चेतना की गहराइयों में उतरने एवं अंतर्मुखी गहन चिंतन−मनन हेतु लगाना होगा। पढ़ने के लिए पूरी साधनावधि तक समाचार पत्र, अन्य कोई साहित्य उपलब्ध नहीं होगा।
साधना के अनुकूल गुण समूह पैदा होते हैं, जिससे योगाभ्यासी को आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
साधना (निर्देशों द्वारा) संपन्न होकर साधकों को योगनिद्रा एवं विश्राम में चले जाना है।
साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई। उपासनापद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था।
साधना कक्ष खाली कर देंगे। इसी दिन अगले सत्र के साधक आएँगे, अतः स्वच्छ स्थिति में छोड़ेंगे।
साधना पथ का यही महा अवरोध है। जो इस अवरोध को पार नहीं करते, सत्य के मार्ग पर उनकी कोई गति नहीं होती।
साधना ही जन्म एवं जीवन का एकमात्र समाधान है।
साधनापद्धति से भरा शिक्षण यद्यपि कुछ साधक (तीस से चालीस अधिकतम) पूरे शाँतिकुँज में रहकर करते रहे, पर जिनने भी इसमें भागीदारी की, वे आज तक अपना सौभाग्य सराहते हैं, उन दिनों की याद करते हैं। उन दिनों शाँतिकुँज छोटा था, पर्यटकों को आने की सख्त मनाही थी एवं कमरे भी गिने−चुने थे। सारा वातावरण साधनामय था। कुछ माह यह क्रम चलने के बाद सौभाग्यशाली एक हजार प्राणवान साधकों को प्राण अनुदान वितरण करने के बाद अन्य अनेक प्रकार के सत्र यहाँ चलने लगे, भवन का विस्तार होता चला गया एवं आज की इस स्थिति में आ पाया, जहाँ हम शाँतिकुँज का एक विराट् विस्तार देखते हैं।
साधना, जीवन का प्रधान लक्ष्य होते हुए भी गौण बनी रहती है। इस प्रकार साधक शनैः−शनैः साधना पथ से दूर हटते हुए अंततः उससे विलग हो जाता है। योगमार्ग से वह विलगाव ही योगभ्रष्टता है। इसी कारण से ऐसे साधक योगभ्रष्ट कहलाते हैं। शांडिल्योपनिषद् में अस्तेय को परिभाषित करते हुए कहा गया है,
साधना कैसेट द्वारा होती है 4.15 से 5.15 नित्य कर्म, व्यायाम, शिथिलीकरण निर्देशानुसार हलके वाद्य संगीत के साथ संपन्न होगा।
साधना मार्ग पर सफलतापूर्वक बढ़ना चाहते हैं, उनके लिए संपूर्ण अहिंसा व्रत का अनुपालन करना ही अभीष्ट होना चाहिए। इससे उनमें एक विशिष्ट सिद्धि आ जाती है। पातंजल योगसूत्र में लिखा है,
साधना और उसके लीला उपक्रम के पीछे छिपे गूढ़ रहस्य क्या हैं! परमवंदनीया माताजी की वेदना पूज्यवर से देखी नहीं गई। बिना तार के, संदेश के परावाणी से भेजी पाती उन तक पहुँची एवं उनके हृदयावरोध के कष्ट के दौरान वे शाँतिकुँज कुछ दिनों के लिए आ गए। कई विषयों पर उन्होंने परमवंदनीया माताजी से चर्चा की, जो अपने आराध्य के आते ही स्वस्थ हो गई थी। परिजनों को जिज्ञासा थी, क्योंकि पूज्यवर पुनः वापस चले भी गए थे कि क्या−क्या निर्देश वे दे गए हैं। इसी को दृष्टिगत रख मई 1972 का पूरा अंक इसी को समर्पित हो प्रकाशित हुआ कि इस संक्षिप्त−सी अवधि में क्या−क्या निर्धारण हुआ।
साधना विशेषाँक में प्रथम कड़ी में गीता में योग की चर्चा कहाँ−कहाँ किस−किस रूप में हुई है, इसका विवरण दिया गया था। इसमें हमने गीता के प्रथम चार अध्यायों की ही चर्चा की थी। अब चौथे अध्याय के कुछ शेष प्रसंगों से लेकर अठारहवें अध्याय तक ‘गीता में योग‘ की चर्चा इस कड़ी में। आगामी माह से युगगीता—27 के साथ अगस्त 2001 के अंक के बाद प्रवाह को पाठकगण पढ़ सकेंगे।
साधना अनुष्ठान संपन्न किए जाते थे।
साधनात्मक पुरुषार्थ, हमारे आत्मोत्कर्ष की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। अवतरित शक्ति का एक अंश उस ज्ञान को सक्रियता में बदल सकता है जो शक्ति के अभाव में भारी बोझ बना रहता है। इस शक्ति का एक अंश उस भात्ति के लिए ईंधन का काम कर सकता है जो शक्ति के अभाव में कोरी भावुकता बनकर रह जाती है। इस शक्ति का एक अंश उस श्रद्धा को निष्ठा में बदलकर इसकी सार्थकता सिद्ध कर सकता है जो शक्ति के अभाव में कुँठित होकर दम तोड़ती रहती है।
साधना क्षेत्र में मार्गदर्शन लेने के लिए वे निरंतर पत्र डालते एवं आश्चर्यजनक ढंग से उन्हें हर पत्र का जवाब भी मिलता। ऐसा ही पत्र एक अनाम साधक को 11/8/1850 का लिखा यहाँ हम दे रहे हैं।
साधना क्षेत्र में हमारे सहचर होने के कारण आप अब इतने घनिष्ठ आत्मीय हो गए हैं कि जब आपका पत्र आता है, तो मिलने के समान प्रसन्नता होती है। आप तपस्या की पूँजी एकत्रित करने में उतनी ही तत्परता एवं उत्साहशीलता रखें जितनी कि लोभी लोग धन जोड़ने में रखते हैं। समय ही बतायेगा कि करोड़पति बनने का स्वप्न देखने वाले सही रहा पर हैं या आप। पिछले जन्मों के शुभ संस्कारों का भंडार आपके पास इतना अधिक एकत्रित है कि आप अपना उत्साह और प्रयत्न इसी प्रकार जारी रखें, तो विश्वासपूर्वक यह कहा जा सकता है कि आप इसी जन्म में जीवन−लक्ष्य तक पहुँच जाएँगे। आवश्यकता केवल दृढ़ता की है।
साधना की परम्परा के निदेशक हैं।
साधनाओं का विकास हुआ पत्रकारिता का दायरा भी बहुआयामी होता गया। इसका विविध आयामी स्वरूप झलकने लगा। इसके पश्चात् पत्रकारिता इन रूपों में आने लगी- अनुसंधानात्मक पत्रकारिता आर्थिक, ग्रामीण, व्याख्यात्मक, विकास, संदर्भ, संसदीय, खेल वृत्तांत, रेडियो, टेलीविजन, फोटो, सर्वोदय पत्रकारिता। हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास को झाँकने पर स्पष्ट होता है कि यह मुख्य रूप से तीन कालखण्डों में विभक्त हुई हैं-
साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई। उपासनापद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था। आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया को प्रथम दिन महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, जिसे पूज्यवर स्वयं व्यक्तिगत परामर्श के लिए मिले 15 मिनट के समय में संपन्न करते थे।
साधना−स्वाध्याय हेतु निर्धारित पुस्तकें ही दी जाएँगी। शेष समय अंतः चेतना की गहराइयों में उतरने एवं अंतर्मुखी गहन चिंतन−मनन हेतु लगाना होगा। पढ़ने के लिए पूरी साधनावधि तक समाचार पत्र, अन्य कोई साहित्य उपलब्ध नहीं होगा। भोजन, गंगाजल एवं प्रज्ञापेय साधना कक्षा में ही दोनों समय पहुँचा दिए जाएँगे। भोजन में हविष्यान्न की एक रोटी, औषधियों की चटनी एवं साधक की इच्छानुसार चावल या दलिया की सब्जी मिश्रित खिचड़ी दी जाएगी।
साधना के बाद शेष क्रम यथावत् रहेगा। दूसरे, तीसरे व चौथे दिन निर्धारित क्रम वही रहेगा, जो ऊपर दिया गया। पाँचवें दिन प्रातः 8 से 10 समापन गोष्ठी आत्मप्रेरित संकल्पों का क्रम होगा। 10 से भोजन के बाद 12 से 1.00 के क्रम में परमवंदनीया माताजी के कक्ष में श्रद्धेय शैल जीजी से मिलेंगे। अपराह्न 1.30 पर साधना कक्ष खाली कर देंगे।
साधना कक्षा में ही दोनों समय पहुँचा दिए जाएँगे। भोजन में हविष्यान्न की एक रोटी, औषधियों की चटनी एवं साधक की इच्छानुसार चावल या दलिया की सब्जी मिश्रित खिचड़ी दी जाएगी। अन्य कोई पदार्थ सेवन नहीं कर सकेंगे। जप की संख्या पर कोई प्रतिबंध न होगा। संख्या की जगह सामूहिक ध्यान सहित उसकी गहराई और बढ़ाने, भावविह्वल होकर जप करने पर अधिक जोर दिया जाएगा।
साधना की आदि परम्परा गायत्री उपासना की ही रही है। नवरात्रि के पावन पर्व पर प्राचीन काल में गायत्री उपासना का ही एकमात्र प्रसंग मिलता है। विभिन्नताएँ मध्यकाल के अंधेरे युग की उपज हैं। जिसमें शक्ति-देवियों के नाम पर अनेकों रूप सामने आए। फिर भी प्रधानता गायत्री की ही रही है।
साधना में भागीदारी करना चाहेंगे। हम 26 अक्टूबर से आरंभ कर 10 अप्रैल 2002 तक मात्र तैंतीस सत्र 5-5 दिन के चला पाएँगे। इस बीच 17 फरवरी 2002 के वसंत पर्व के कारण संभव है एक शिविर स्थगित भी करना पड़े। किंतु नियमित रूप से नवंबर, दिसंबर (2001), जनवरी, फरवरी, मार्च (2002) में 1 से 5, 3 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25, 26, से 30 की अवधि में दो ही सत्र हो पाएँगे। चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल से आरंभ हो जाएगी।
साधना में सफल नहीं हो पाया, तो फिर भविष्य का क्या होगा। यह सोचकर आपने सवा लाख रुपये मूल्य का एक हीरा अपने पास छुपा लिया था। वह हीरा ही आपके मन को व्यग्र कर रहा है तथा साधना में लीन नहीं होने दे रहा हैं।”
साधना है। यदि आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो उसे विशुद्ध योग−साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। बड़े आदमी बनने की फसल चली गई। अब अमीरी को बड़प्पन के रूप में देखना बेकार है। अब समय महानता की गौरवगरिमा बढ़ने का आ गया है।
साधना निर्देश पुस्तिका पढ़ेंगे, पंजीयन कराएँगे एवं अपने निर्धारित कक्ष में पहुँच जाएँगे। साधना प्रारंभ होने से समापन तक साधकों को मौन, एकाँत सेवन करते हुए अंतर्मुखी रहना होगा। मात्र अखण्ड दीपक−दर्शन एवं यज्ञ के समय वे कक्ष के बाहर निकल सकेंगे। साधना−स्वाध्याय हेतु निर्धारित पुस्तकें ही दी जाएँगी। शेष समय अंतः चेतना की गहराइयों में उतरने एवं अंतर्मुखी गहन चिंतन−मनन हेतु लगाना होगा।
साधना पथ के पथिकों के लिए अस्तेय की महत्ता कम नहीं, अपितु सर्वाधिक है। देखा गया है कि अनेक बार अनेक साधक सिर्फ इसलिए मार्ग−च्युत हो जाते हैं कि उनका मन निरंकुश होता है। वह किसी वस्तु के प्रति कई बार इस कदर पागल हो उठता है कि उसकी प्राप्ति ही उसके लिए सर्वप्रमुख बन जाती है, जबकि साधना, जीवन का प्रधान लक्ष्य होते हुए भी गौण बनी रहती है। इस प्रकार साधक शनैः−शनैः साधना पथ से दूर हटते हुए अंततः उससे विलग हो जाता है। योगमार्ग से वह विलगाव ही योगभ्रष्टता है।
साधना विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ। यह साधना निताँत मौन एकाकी साधना थी। चार दिनों में प्रतिदिन छह घंटे की साधना सभी से कराई गई। साधक अंतर्मुखी हो सकें, इसके लिए उन्हें छोटी कोठरियाँ सुलभ कराई गई। उपासनापद्धति में शिथिलीकरण मुद्रा, उन्मनी मुद्रा, खेचरी मुद्रा, गायत्री जप, सोऽहम् साधना, बिंदुयोग, लययोग, तत्त्वबोध, नादयोग, दो बार के दस साधनाक्रमों का समावेश किया गया।
साधनाक्रमों का समावेश किया गया। अंतः करण की भावभूमिका को उच्चस्तरीय बना देना ही इसका प्रधान लक्ष्य था। आत्मशोधन की प्रायश्चित प्रक्रिया को प्रथम दिन महत्वपूर्ण स्थान दिया गया, जिसे पूज्यवर स्वयं व्यक्तिगत परामर्श के लिए मिले 15 मिनट के समय में संपन्न करते थे। बीच में दर्पण−साधना के दौरान भावभरे गीत टेपरिकॉर्डर से साधकों को सुनाए जाते थे तथा इन्हें सुनकर वे हलके ही नहीं होते, आत्मबोध की साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था।
साधना संकल्प प्रातः 5 से 6.30 कराया जाएगा, ताकि रात्रि देर से आने वाले भी भागीदारी कर सकें। जो पूर्व संध्या को आ जाएँगे, वे आवश्यक सामग्री प्राप्त करेंगे, साधना निर्देश पुस्तिका पढ़ेंगे, पंजीयन कराएँगे एवं अपने निर्धारित कक्ष में पहुँच जाएँगे। साधना प्रारंभ होने से समापन तक साधकों को मौन, एकाँत सेवन करते हुए अंतर्मुखी रहना होगा। मात्र अखण्ड दीपक−दर्शन एवं यज्ञ के समय वे कक्ष के बाहर निकल सकेंगे। साधना−स्वाध्याय हेतु निर्धारित पुस्तकें ही दी जाएँगी।
साधना, 14.45 से 15.15 नादयोग की द्वितीय चरण की साधना के लिए है। 15.15 से 16.00 प्रज्ञापेय का अवकाश है, जो कक्ष में ही उपलब्ध होगा।
साधना समाप्ति के बाद कुछ ही घंटों में स्थान खाली कर देना होगा, ताकि वह अगले सत्र के साधकों को उपलब्ध कराया जा सके। रुकना अनिवार्य हो तो पूर्व अनुमति लेकर आश्रम में कहीं और स्थान प्राप्त कर सकेंगे। वे अपने साथ किसी ऐसे साथी को भी नहीं लाएँगे, जिसे अलग न ठहराया जा सके या उसकी देखभाल की चिंता अलग न ठहराया जा सके या उसकी देखभाल की चिंता करनी पड़े। गंभीर व्याधि से पीड़ित कोई परिजन आवेदन न भेजें। जो साधक निर्धारित अनुशासन न निभा सकें, अकेले अपने कार्य स्वयं न कर सकें तथा एक कक्ष में अकेले न रह सकें, वे आवेदन न करें।
साधना भी कर पाते थे। एक घंटे का प्रवचन दो खंडों में सुनाया जाता था। इस समग्र दस सूत्री साधनापद्धति से भरा शिक्षण यद्यपि कुछ साधक (तीस से चालीस अधिकतम) पूरे शाँतिकुँज में रहकर करते रहे, पर जिनने भी इसमें भागीदारी की, वे आज तक अपना सौभाग्य सराहते हैं, उन दिनों की याद करते हैं। उन दिनों शाँतिकुँज छोटा था, पर्यटकों को आने की सख्त मनाही थी एवं कमरे भी गिने−चुने थे। सारा वातावरण साधनामय था।
साधना करती है। प्रत्यावर्तन की पात्रता और पृष्ठभूमि यही है।” (पृष्ठ 63-64)
साधना को आलोकित करेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-April
साधना का व्रत लिया है। यह सभी निष्ठावान उपासक भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य हैं। आत्म बल की वृद्धि, आँतरिक पवित्रता की स्थापना, प्रभु शरणागति, बड़े ही महत्वपूर्ण तत्व हैं। इन्हें उपासना के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। पर ये आवश्यक हैं।
साधना में संलग्न हैं। गत मास चार सामूहिक हवन हुए। साप्ताहिक सत्संग का बड़ा उत्साह रहता है। - बिलासी राम लोहिया
साधना करता है तो इसका कारण यह है कि उसे यह जान पड़ता है कि इनके द्वारा सुख मिल सकेगा। यदि वह साँसारिक सफलता अथवा यश के लिए प्रयत्न करता है तो इसीलिए कि वह समझता है कि इसके द्वारा सुख उपलब्ध हो सकता है। साराँश यह है कि मनुष्य जितने भी उद्यम और उद्योग करता है उनका अंतिम लक्ष्य सुख की प्राप्ति ही होता है।
साधना मेरी जारी।
साधना में से कान पकड़ कर उठाने और लोक सेवा में जुड़ा देने का कार्य उसी महाशक्ति ने किया। जिस पर भी वह प्रसन्न होती है उसे निश्चित रूप से यही प्रेरणा देती है। क्योंकि आत्मशक्ति, पुण्य संचय, विश्वहित, सुख शाँति, स्वर्ग मुक्ति, समृद्धि सम्पत्ति, शक्ति सफलता, कीर्ति प्रतिष्ठ के सभी लाभ परमार्थ परायणता में सन्निहित हैं। स्वार्थी के लिए लाभ बहुत स्वल्प है, जितना श्रम किया उसकी मजदूरी मात्र का वह अधिकारी है। अनेकों का हित साधन करने से तो अपने आप ही वह साधना अनेक गुनी फल दायक हो जाती है।
साधना का, एक आवश्यक अंग मानते हैं और उसके लिए भी निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं।
साधना इन दिनों होती है उसे अपने निज के लिए संग्रह न करके उसका पुण्य फल प्रायः नित्य ही गायत्री परिवार के आवश्यक ग्रस्त लोगों को बाँट देते हैं, जिससे वे अपनी कठिनाइयों को पार कर सकें। अपने को बिल्कुल खाली हाथ-पुण्य फल से भी खाली रहने और निरंतर धर्म भावनाओं का प्रसार करने में संलग्न रहने का आदेश हुआ है। बिना राई रत्ती विचार संकोच किये हमारी गतिविधि उसी प्रकार चल रही है जिस प्रकार नन्हा सा बालक उधर ही चल देता है जिधर उसकी माता उसे उँगली पकड़कर चलाती है। हम देखते हैं कि हमारी ही जैसी दो प्रेरणाएँ अन्य अनेकों उन लोगों की आत्माओं में भी हो रही हैं जो सचमुच माता के अधिक समीप पहुँच चुके हैं। उन अभागे दुराग्रहियों को माता की कृपा से बहुत दूर ही मानना चाहिए जो अपनी माला जपने में तो लगे रहते हैं पर दूसरों को धर्म प्रेरणा देने से जी चुराते हैं।
साधना की प्रगति एवं गतिविधियों पर निरंतर बारीकी से ध्यान रखा है। इस लम्बे समय के गंभीर अनुभव का एक मात्र निष्कर्ष एक ही है कि माता किसी साधक की व्यक्तिगत पूजा उपासना से जितनी प्रसन्न होती है उससे अनेकों गुनी प्रसन्नता उसे साधक की परमार्थ परायणता से होती है। इसी के लिए वह अपने सच्चे कृपा पात्रों को प्रेरणा भी करती है और प्रत्यक्ष आदेश देती है। नारद शंकराचार्य, दयानंद, विवेकानंद आदि को एकाँत साधना में से कान पकड़ कर उठाने और लोक सेवा में जुड़ा देने का कार्य उसी महाशक्ति ने किया। जिस पर भी वह प्रसन्न होती है उसे निश्चित रूप से यही प्रेरणा देती है।
साधना अनेक गुनी फल दायक हो जाती है। माता अपने सच्चे साधक को यही सच्चा मार्ग दिखाती है।
साधना में संलग्न हैं। चैत्र की नवरात्रि में श्री राम प्रकाश जी पलतानी के यहाँ हवन कुण्डों में 24 हजार आहुतियों का हवन निश्चय हुआ है। -श्रीराम पाण्डेय
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-September
साधना अनेक व्यक्तियों के साथ पूरी की है। घर में रहकर सफेद कपड़े पहनते हुए भी कोई व्यक्ति जिस प्रकार सच्चे संत का जीवन व्यतीत कर सकता है डॉक्टर साहब इस बात के एक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, वे स्वयं तो नैष्ठिक गायत्री उपासक हैं ही उन्होंने अपने प्रयत्न से उस क्षेत्र में दूर-दूर तक अनेकों गायत्री उपासक बनाये हैं। गायत्री तपोभूमि के सभी प्रवृत्तियों में डॉक्टर साहब सदा अग्रणी रहते हैं।
साधना का संरक्षण तथा त्रुटियों का दोष परिमार्जन होता रह सकता है।
साधना के लिए वैसी ही महत्वपूर्ण हैं जैसे प्रतिदिन दिन और रात्रि के मिलन की प्रातः सायं संध्या वेला उपयुक्त होती है। इस वर्ष यह नवरात्रियाँ आश्विन सुदी 1 से लेकर 9 तदनुसार तारीख 24 सितम्बर मंगलवार से आरम्भ होकर तारीख 2 अक्टूबर बुधवार को पूर्ण होती है। इन दिनों 24 हजार जप का अनुष्ठान करने के लिये प्रतिदिन 26 मालायें करनी पड़ती हैं जिसमें लगभग ढाई तीन घण्टे लगते हैं। यदि प्रातःकाल एक बार में इतना समय न मिले तो प्रातः सायं दोनों समय में पूरा किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-January
साधना धारण करें, क्योंकि बुद्धिमतापूर्वक आत्म-संयम से ही शक्ति सम्पन्न होकर आनन्द और शान्ति के परमधाम की प्राप्ति की जा सकती है।
साधनाएं अधूरी रहेंगी। इसलिए इस वर्ष व्यक्तिगत-एकाँकी नहीं, गायत्री परिवार के सदस्यों को सामूहिक साधनाओं पर ही बल देना चाहिए। सन् 57 के लिए निर्धारित अष्टसूत्री संकल्प जिसमें नित्य 24 लक्ष गायत्री जप, 24 हजार गायत्री चालीसा पाठ, 24 हजार मंत्र लेखन, 24 हजार आहुतियाँ मुख्य हैं, पूरा करने के लिए सामुदायिक आयोजनों की व्यवस्था पर अधिक जोर देना चाहिए। गायत्री परिवार की शाखाएं बनाकर वह कार्य संगठित रूप से सरलतापूर्वक हो सकता है। गायत्री उपासकों की मनोदिशा इस वर्ष यही संगठित साधन करने में लगानी चाहिए।
साधना एवं उपदेश आदि लोक कल्याण की प्रवृत्तियों में बाधा उपस्थित होती थी। वे शरीर को, जब भी आवश्यकता हुई, मधुकरी-वृत्ति से इधर-उधर से कुछ गृहस्थों के यहाँ जाकर थोड़ा-थोड़ा आहार वस्त्रादि लेकर अपना काम चला लेते थे। गृहस्थ भी अहोभाग्य समझकर बड़े चाव तथा भाव से उन्हें देते थे और इसमें वस्तु का साफल्य मानते थे। अर्थात् उक्त भिक्षावृत्ति दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होती थी। पर वह तब तक ही आदर्श रही या रह सकती है जब तक भिक्षु आवश्यकता से अधिक संग्रह की ओर न झुके।
साधना के इन क्षणों में अच्छी भावनाओं की ओर उन्मुख रहो। उस तर्कपूर्ण महिला की बुद्धि में पहले यह बात घुसी ही नहीं और उसने इस कार्य को केवल उपहास और व्यंग के साथ टाल दिया, किन्तु जब उसका मन इस कलह-पीड़ा से अतिशय उत्पीड़ित हो उठा और वह इसके निवारण के कुछ निमित्त कुछ भी करने को तत्पर हुई, तो उसने वृद्धा के आग्रह और आदेश पर मौन-व्रत धारण किया। कुछ दिनों तक उसने नित्य घंटे भर मौन रक्खा और फिर वृद्धा के पास जाकर कहा- ‘बूढ़ी माँ! मुझे इन दिनों केवल एक ही बात बार-बार परेशान करती रही कि मैं एक बार अपनी बहिन को सन्तुष्ट करने का और प्रयास करूं, किंतु मुझे तो यह विश्वास है कि मेरा फिर बहिन के पास जाना केवल निरर्थक ही नहीं आत्म-सम्मान के विरुद्ध भी होगा।’ वृद्धा स्त्री ने साँत्वना के स्वर में कहा- यदि तुम्हारे मौन का यही आदेश है तो तुम फिर एक बार वहाँ तक अवश्य जाओ-शायद तुम्हें महान परिवर्तन दिखायी पड़े।’ यह आदेश युवती को ठीक नहीं जान पड़ा।
साधना करने से दो प्रमुख समस्याएँ हल हो जाती हैं। एक तो व्यक्तिगत विकास के लिए बहुत बड़ा साधन हाथ लग जाता है और दूसरे समाज की सेवा करने की परम क्षमता प्राप्त हो जाती है।
साधनाओं पर ही बल देना चाहिए। सन् 57 के लिए निर्धारित अष्टसूत्री संकल्प जिसमें नित्य 24 लक्ष गायत्री जप, 24 हजार गायत्री चालीसा पाठ, 24 हजार मंत्र लेखन, 24 हजार आहुतियाँ मुख्य हैं, पूरा करने के लिए सामुदायिक आयोजनों की व्यवस्था पर अधिक जोर देना चाहिए। गायत्री परिवार की शाखाएं बनाकर वह कार्य संगठित रूप से सरलतापूर्वक हो सकता है। गायत्री उपासकों की मनोदिशा इस वर्ष यही संगठित साधन करने में लगानी चाहिए।
साधनाएं हैं, जिनसे भगवती शक्ति को प्रसन्न करके उनसे इच्छित वरदान प्राप्त किया जा सकता है। आपने अपना जो भी जीवनोद्देश्य बनाया है उसे पूरा करने में जी-जान से जुट जाइए। सोते-जागते उसी के सम्बन्ध में सोच विचार करते रहिए और आगे का मार्ग तलाश करते रहिए। परिश्रम! परिश्रम!! घोर परिश्रम!!! आपकी आदत में शामिल होना चाहिए। स्मरण रखिये अपना कोई भी मनोरथ क्यों न हो, वह शक्ति द्वारा ही पूर्ण हो सकता है।
साधना करने का गुप्त संकेत छिपा हुआ है। हिन्दू धर्म में शक्ति का बड़ा महत्व है। कमजोर व्यक्ति को मुक्ति नहीं मिलती। जब तक साधक शक्तिवान न बने, तब तक उसकी मुक्ति नहीं हो सकती। शक्तिवान का ही संसार में आदर होता है।
साधना आरम्भ करो और साधना के इन क्षणों में अच्छी भावनाओं की ओर उन्मुख रहो। उस तर्कपूर्ण महिला की बुद्धि में पहले यह बात घुसी ही नहीं और उसने इस कार्य को केवल उपहास और व्यंग के साथ टाल दिया, किन्तु जब उसका मन इस कलह-पीड़ा से अतिशय उत्पीड़ित हो उठा और वह इसके निवारण के कुछ निमित्त कुछ भी करने को तत्पर हुई, तो उसने वृद्धा के आग्रह और आदेश पर मौन-व्रत धारण किया। कुछ दिनों तक उसने नित्य घंटे भर मौन रक्खा और फिर वृद्धा के पास जाकर कहा- ‘बूढ़ी माँ! मुझे इन दिनों केवल एक ही बात बार-बार परेशान करती रही कि मैं एक बार अपनी बहिन को सन्तुष्ट करने का और प्रयास करूं, किंतु मुझे तो यह विश्वास है कि मेरा फिर बहिन के पास जाना केवल निरर्थक ही नहीं आत्म-सम्मान के विरुद्ध भी होगा।’ वृद्धा स्त्री ने साँत्वना के स्वर में कहा- यदि तुम्हारे मौन का यही आदेश है तो तुम फिर एक बार वहाँ तक अवश्य जाओ-शायद तुम्हें महान परिवर्तन दिखायी पड़े।’ यह आदेश युवती को ठीक नहीं जान पड़ा।
साधना एवं धर्म सेवा के पुनीत कार्य में लगाना चाहती है। इनके संबंध में अभी कुछ निर्णय नहीं किया गया है, पर ऐसा सोचा जा रहा है कि- श्रीमती भगवती देवी (माता जी) की संरक्षता में ऐसा महिला विद्यालय पुरुषों के स्थान से भिन्न व्यवस्था में रहें। महिलाओं और पुरुषों का कार्य क्षेत्र तथा शिक्षण पूर्णतया पृथक है, इसलिए पृथक व्यवस्था समुचित रूप से बन सकी तो इस दिशा में कदम बढ़ाया जायेगा। जिस प्रकार तपोभूमि में प्रायः सभी विद्यार्थियों एवं साधकों की भोजन-वस्त्र व्यवस्था निःशुल्क रहती है, उसी प्रकार इन महिला धर्म सेविकाओं को भी रखने का विचार है। जो महिलाएँ इस प्रकार की शिक्षा के लिए इच्छुक हों अपने नाम नोट करा दें ताकि समय आने पर उन्हें प्राथमिकता दी जा सके।
साधना में तल्लीन हैं, तो आपको न तो अन्धविश्वास ही पथ-भ्रष्ट कर सकेंगे और न आप राजनीति अथवा धर्म के क्षेत्रों में झूठी नेतागीरी के बहकावे में आयेंगे। आपको ज्ञानरूपी सत्य की खोज करते-करते अपने सच्चे कर्त्तव्य का भान हो जायेगा और आप इसकी पूर्ति में लग जायेंगे। यदि आप चाहते हैं कि स्वार्थांध पुरोहितों, मुल्लाओं या पादरियों से बचें, यदि आप शोषण पर आधारित योजनाओं के चंगुल में फंसने से बचना चाहते हैं तो राजनीति और धर्म के विषयों में खुली आँख से काम लें। खुली आँख की ज्योति आपको तभी प्राप्त होगी जब मस्तिष्क भली-भाँति पुष्ट एवं परिपक्व होगा। क्या ऐसी कल्याणमयी ज्योति की उपलब्धि के अभिलाषी आप नहीं हैं?
साधना से होती आई है। अकर्मण्य और निर्बल मन वाला व्यक्ति आत्मोद्धार नहीं कर सकता। तात्पर्य यह है कि ‘लौकिक और पारलौकिक सब प्रकार के दुःख द्वन्द्वों से छुटकारा पाने के लिए शक्ति की ही उपासना करनी पड़ेगी।’
साधना एवं तपश्चर्या में साधकों का मन न लगेगा। बहुधा साधनाएं अधूरी रहेंगी। इसलिए इस वर्ष व्यक्तिगत-एकाँकी नहीं, गायत्री परिवार के सदस्यों को सामूहिक साधनाओं पर ही बल देना चाहिए। सन् 57 के लिए निर्धारित अष्टसूत्री संकल्प जिसमें नित्य 24 लक्ष गायत्री जप, 24 हजार गायत्री चालीसा पाठ, 24 हजार मंत्र लेखन, 24 हजार आहुतियाँ मुख्य हैं, पूरा करने के लिए सामुदायिक आयोजनों की व्यवस्था पर अधिक जोर देना चाहिए। गायत्री परिवार की शाखाएं बनाकर वह कार्य संगठित रूप से सरलतापूर्वक हो सकता है।
साधना
साधना के द्वारा शक्ति का विचार करने के लिए शक्ति के समुचित सदुपयोग की सिद्धि के लिए ही मन्दिरों में, तीर्थस्थानों में, शक्ति-पीठों में, वनों-उपवनों में समयानुसार जाने की प्रक्रिया हमारे देश में चली आ रही है। ऐसे पावन-स्थानों में अपने अन्तः क्षेत्रों के भीतर की सुप्त-शक्ति सहज प्रयास से ही जागृत हो जाती है।
साधना और सभ्यता के साथ संस्कृत का नित्य अविच्छेद्य और प्राणगत सम्बन्ध है। “संस्कृत भाषा भारतीय प्राण की शब्दमयी मूर्ति है।” अतः एक श्रेणी विशेष तक संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य हो। विभिन्न भौतिक और आध्यात्मिक शास्त्रों के अतिरिक्त व्यवहारोपयोगी विषयों का सन्निवेश पाठ्यक्रम में अवश्य ही रहे। संसार के साथ अपनी गति रखने के लिए, विचारों को समझने के लिए विदेशी भाषा का ज्ञान भी आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-February
साधना में प्रवृत्त होकर अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कर कृत-कृत्य हो सकता है। अतः ऐसे अनुपम शरीर के हित के लिए आहार-विहार में संयम करना अनिवार्य है। किन्तु, असावधानी के कारण प्राणी हित की दृष्टि को त्याग कर सुख की दृष्टि अपनाता है, अर्थात् आहार-विहार में विलासी तथा असंयमी हो जाता है। इसका परिणाम बड़ा ही भयंकर तथा दुःखद सिद्ध होता है; क्योंकि अहितकर चेष्टाओं में प्रवृत्त होना जीवन का अनादर है, प्रकृति का विरोध है और पौरुषेय विधान का उल्लंघन है। इतना ही नहीं, प्राणी सुख-दुःख के पाश में आबद्ध होकर अपने को दीन-हीन बना लेता है और साधन-युक्त जीवन से वंचित हो जाता है, जो वास्तव में पशुता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-March
साधना से उनको खुद को ही सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलती पर इस प्रचार कार्य ने तो असंख्य प्राणियों को सन्मार्ग से लगाकर सम्पूर्ण विश्व में सुख-शाँति की स्थापना में भारी योग दिया। सत्पुरुष निष्ठुर एवं स्वार्थी नहीं, दयालु और परोपकारी होते हैं वे स्वर्ग मुक्ति की भी परवाह न करके अनेक दुखी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए करुण भाव से जनसेवा के सर्वश्रेष्ठ मार्ग-धर्म प्रचार को अपना लेते हैं।
साधनाओं को घटा करके अपना अधिकाँश समय धर्म प्रचार में लगाया। उनका यह कार्य एकाँत सेवी साधना की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि एकाकी साधना से उनको खुद को ही सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलती पर इस प्रचार कार्य ने तो असंख्य प्राणियों को सन्मार्ग से लगाकर सम्पूर्ण विश्व में सुख-शाँति की स्थापना में भारी योग दिया। सत्पुरुष निष्ठुर एवं स्वार्थी नहीं, दयालु और परोपकारी होते हैं वे स्वर्ग मुक्ति की भी परवाह न करके अनेक दुखी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए करुण भाव से जनसेवा के सर्वश्रेष्ठ मार्ग-धर्म प्रचार को अपना लेते हैं।
साधना है-
साधना है- उसके साथ समस्त विश्व का ही नहीं- साधक का साँसारिक और आध्यात्मिक लाभ भी जुड़ा हुआ है। फिर भी उतनी दूर तक देखना कोई नहीं चाहता। सब को पास की चीज दिखाई देती है, तुरन्त लाभ देखते हैं। ऐसी स्थिति में साधारण जनता की उपेक्षा पर कुछ भी खेद करना उचित नहीं। यह समय का प्रभाव है।
साधना अनुष्ठान आदि करते हैं। यह वर्ष अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण नवरात्रियों में और भी अधिक सामूहिक उपासना की जानी चाहिए।
साधनाओं में लग जाते थे। पर जब कभी परिस्थिति बदली या बिगड़ी है तब-तब सच्चे आध्यात्म प्रेमी सत्पुरुषों ने धर्म को अपने कंधे का सहारा दिया है और उसे लड़खड़ा कर गिर पड़ने से बचाया है। देवर्षि नारद ने तो अपने जीवन की एकमात्र साधन-परिव्रज्या करते हुए निरंतर धर्म प्रचार करते रहना ही बनाया था। शंकराचार्य, दयानंद, नानक, कबीर, मीरा, बुद्ध, महावीर, गाँधी, विनोबा आदि के अगणित उदाहरण ऐसे हैं जिनमें एकांत सेवी, केवल अपना ही भला करने वाली साधनाओं को घटा करके अपना अधिकाँश समय धर्म प्रचार में लगाया। उनका यह कार्य एकाँत सेवी साधना की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि एकाकी साधना से उनको खुद को ही सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलती पर इस प्रचार कार्य ने तो असंख्य प्राणियों को सन्मार्ग से लगाकर सम्पूर्ण विश्व में सुख-शाँति की स्थापना में भारी योग दिया।
साधनात्मक उपयोग।
साधना की सूचना आदि मथुरा दे देंगे तो उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा संरक्षण यहाँ होता रहेगा
साधना की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि एकाकी साधना से उनको खुद को ही सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलती पर इस प्रचार कार्य ने तो असंख्य प्राणियों को सन्मार्ग से लगाकर सम्पूर्ण विश्व में सुख-शाँति की स्थापना में भारी योग दिया। सत्पुरुष निष्ठुर एवं स्वार्थी नहीं, दयालु और परोपकारी होते हैं वे स्वर्ग मुक्ति की भी परवाह न करके अनेक दुखी आत्माओं को सुखी बनाने के लिए करुण भाव से जनसेवा के सर्वश्रेष्ठ मार्ग-धर्म प्रचार को अपना लेते हैं।
साधना
साधना करें, जिससे कि हमारे देश में सच्चा राम राज्य आ जाये। हम आज नाम तो राम का लेते हैं और काम हराम का करते हैं। आज हमारा शत्रुघ्न, भरत के अनुशासन में नहीं चलता। आज हमारा लक्ष्मण, राम को भूल गया है। इसलिए कहीं पर भी सीता के दर्शन नहीं होते।
साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा संरक्षण यहाँ होता रहेगा
साधना की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। इसलिए जहाँ बन पड़े वहाँ सामूहिक आयोजनों का पूरा प्रयत्न किया जाय। रामायण पाठ, गीता पाठ आदि के कोई कार्यक्रम साथ-साथ चलते हों तो वह भी उत्तम है। रामायण पाठ वाली संस्थाओं का जहाँ सहयोग प्राप्त होता हो वहाँ गायत्री तथा रामायण का मिला−जुला कार्यक्रम भी बनाया जा सकता है। अपनी स्थानीय स्थिति के अनुसार शाखाओं को अपने यहाँ इस प्रकार के आयोजन के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-August
साधना की है और उसके चमत्कारी परिणाम भी देखे हैं। आपके प्रयत्न से उस क्षेत्र में कई बड़े यज्ञ हुए हैं तथा गायत्री सदस्यों की संख्या बढ़ी है।
साधना द्वारा ही रह सकती हैं और बढ़ सकती हैं। चलने की शक्ति चलने से और दौड़ने से बढ़ सकती है। अगर तुम किसी बात में उन्नति करना चाहते हो तो बार-बार उसका अभ्यास करना होगा। यदि सुँदर अक्षर लिखना चाहते हो तो बार-बार लिखना होगा। यदि तुम एक महीने तक पूरी तरह बोलना बंद कर दो तो बाद में तुमको बोलने में भी कठिनाई जान पड़ेगी।
साधना से अधिक प्रारंभ कर दिया। इसके ठीक 3 माह उपराँत अचानक ही एक डॉक्टर महोदय ग्राम में पहुँचे। उन्होंने तुरंत ही माता जी की आँखों का आपरेशन किया। वेद माता की कृपा से दो दिन में ही दोनों नेत्र ठीक हो गये। मैं उन डॉक्टर महोदय को वेद माता का ही भेजा हुआ विशेष दूत मानती हूँ।
साधना में व्यतिरेक नहीं पड़ सकता।
साधना क्षेत्र में बहुत विद्वान, ज्ञानी, तार्किक, धनी मानी होना आवश्यक नहीं। श्रद्धा और विश्वास ही वह वस्तुएं हैं जिनके आधार पर भौतिक एवं लौकिक दृष्टि से सामान्य दीखने वाला व्यक्ति भी असामान्य आत्मिक उन्नति कर सकता है। जहाँ सच्ची श्रद्धा समुचित मात्रा में मौजूद है वहाँ गृहस्थ जीवन आत्म कल्याण के पथ जरा भी बाधक नहीं होता। यदि निष्ठ का अभाव हो विरक्त का वेष धारण किये हुए घंटों पूजापाठ करने वाला व्यक्ति भी कुछ लाभ नहीं उठा सकता।
साधनाएं की हैं और उससे कई विशिष्ट शक्तियाँ भी प्राप्त की हैं। इन शक्तियों का सदुपयोग वे जनकल्याण के लिए ही कर रहे हैं। साधना मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए वैसी ही सुदृढ़ मनोभूमि की आवश्यकता होती है जैसी प्रोफेसर साहब की है।
साधना मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए वैसी ही सुदृढ़ मनोभूमि की आवश्यकता होती है जैसी प्रोफेसर साहब की है।
साधना अनुभवों से अनेकों व्यक्तियों की आध्यात्मिक सेवाएं की हैं। अखण्ड ज्योति से प्रकाशित गायत्री संबंधी पुस्तकों का सार लेकर आपने कई पुस्तकें गुजराती भाषा में छापी हैं और गायत्री परिवार के बहुत से सदस्य बनाने का सफल प्रयत्न किया है।
साधना में जितनी निष्ठ है उतनी ही लगन गायत्री प्रचार में भी है। दो बार तपोभूमि में आकर उन्होंने असाधारण एवं अत्यधिक कठिन साधनाएं की हैं और उससे कई विशिष्ट शक्तियाँ भी प्राप्त की हैं। इन शक्तियों का सदुपयोग वे जनकल्याण के लिए ही कर रहे हैं। साधना मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए वैसी ही सुदृढ़ मनोभूमि की आवश्यकता होती है जैसी प्रोफेसर साहब की है।
साधना-यही हमारी उन्नति के सूत्र हैं। जब मन गलत राह से हटकर सन्मार्ग पर आरुढ़ हो जाता है, तभी आध्यात्मिक सिद्धियाँ मिलनी प्रारम्भ हो जाती हैं। वेदों में ऐसे अनेक अमूल्य ज्ञान-कण बिखरे पड़े हैं, जिनमें गलत राह से हटाकर मन को कल्याणकारी मार्ग पर चलने के लिए प्रार्थनाएं की गयी हैं-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-June
साधनाओं की रचना की है। यह अवश्य है कि जिस देश में, जिस काल में ये महापुरुष हुए हैं उसी समय और स्थान की परिस्थिति के अनुसार उन्होंने उपदेश दिये हैं। पर यदि आप सब धर्मों की विवेचना करके उनका तुलनात्मक अध्ययन करें तो स्पष्ट मालूम हो जायगा कि सबके भीतर सार वस्तु एक ही है। पर अज्ञानी अथवा अहंकारी मनुष्य अक्सर सार वस्तुओं के ऊपर अप्रधान या दिखावटी वस्तुओं को प्रधानता देने लगते हैं और इसी से विभिन्न धर्मों में लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं।
साधना करनी होगी। उस साधना के भिन्न-भिन्न पथ, धर्म या आधार के रूप में प्रकटित हुए। बहिर्मुख वृत्ति को छोड़कर अन्तर की शोध की गई। उत्पादन तो वहाँ भी हुआ पर विभिन्न प्रकार का। भौतिक पदार्थों का उत्पादन नहीं, आत्मिक और गुणों और शक्तियों का उत्पादन हुआ।
साधना धीरे-धीरे निष्काम रूपिणी होती जा रही है। प्रारंभ में आध्यात्मिक यात्रा की ओर अग्रसर होने या बढ़ते रहने का मार्ग- सम्बल कामना ही थी अतः तिथि क्रम का ध्यान न रखते हुए मैं कामना को ही प्रधानता देकर निम्नलिखित उपशीर्षकों में उनसे आपकी भेंट कराऊँगा।
साधना संभव नहीं। आवश्यकताओं की पूर्ति में फंसा हुआ मन चंचल बना हुआ रहता है, एक आवश्यकता की पूर्ति हुई तो दूसरी की इच्छा और प्रकटित हुई। उसी की अधेड़ बुन में लगे रहने से अन्तरात्मा की शोध हो नहीं सकती।
साधना तथा भारतीय संस्कृति सेवा पथ पर कदम से कदम मिला कर चलती रहती है। परम निस्वार्थ, बालकों की तरह निष्कपट, नैष्ठिक गायत्री उपासिका, अखंड ब्रह्मचारिणी, परमार्थ में दिन रात एक करने वाली वह प्रेमवती प्राचीन युग की ऋषिकाओं का स्मरण दिलाती है। उसके दर्शन मात्र से मनुष्य का मस्तक श्रद्धा से सहज ही नत हो जाता है।
साधना एक उच्च कक्षा है। जो व्यक्ति परिमार्जित दृष्टिकोण के एवं विश्वासी हैं जिन्हें माता के सर्वशक्तिमान होने पर विश्वास ही नहीं वरन् जो जगत की क्षणभंगुरता को भी उसके सही रूप में जानते हैं जो ईश्वर के नाम पर साँसारिक कष्टों को साहस से ही नहीं अपितु निर्लिप्त भाव से सह लेते हैं वह श्रद्धा के पात्र निष्काम साधना से ही दैवी आत्मानुभूति अनुभव कर वास्तविक सुख के अधिकारी हैं। ऐसे लोगों को तो सकाम साधना एक परिहास मात्र लग सकती है। पर मेरी सबसे करबद्ध प्रार्थना है कि जिस कौतूहल से वह अपने छोटे से शिशु को ‘अ’ ‘ब’ सीखते देख उल्लसित होते हैं और उन की छोटी सी जानकारी को भी पीठ थपथपा कर बड़ा बताते हुए आगे बढ़ाते हुए उच्चकोटि की कक्षाओं आदि तक पहुँचा देते हैं, वैसे ही इन छोटे कक्षा वाले सकाम प्रवृत्ति के प्रारम्भिक विद्यार्थियों आध्यात्म विद्या, गायत्री महामंत्र की ओर रुचि उत्पन्न करने में सहायक हों।
साधना का दीप ले जो, कर गया साकार सपने॥
साधना से ही दैवी आत्मानुभूति अनुभव कर वास्तविक सुख के अधिकारी हैं। ऐसे लोगों को तो सकाम साधना एक परिहास मात्र लग सकती है। पर मेरी सबसे करबद्ध प्रार्थना है कि जिस कौतूहल से वह अपने छोटे से शिशु को ‘अ’ ‘ब’ सीखते देख उल्लसित होते हैं और उन की छोटी सी जानकारी को भी पीठ थपथपा कर बड़ा बताते हुए आगे बढ़ाते हुए उच्चकोटि की कक्षाओं आदि तक पहुँचा देते हैं, वैसे ही इन छोटे कक्षा वाले सकाम प्रवृत्ति के प्रारम्भिक विद्यार्थियों आध्यात्म विद्या, गायत्री महामंत्र की ओर रुचि उत्पन्न करने में सहायक हों।
साधना एक परिहास मात्र लग सकती है। पर मेरी सबसे करबद्ध प्रार्थना है कि जिस कौतूहल से वह अपने छोटे से शिशु को ‘अ’ ‘ब’ सीखते देख उल्लसित होते हैं और उन की छोटी सी जानकारी को भी पीठ थपथपा कर बड़ा बताते हुए आगे बढ़ाते हुए उच्चकोटि की कक्षाओं आदि तक पहुँचा देते हैं, वैसे ही इन छोटे कक्षा वाले सकाम प्रवृत्ति के प्रारम्भिक विद्यार्थियों आध्यात्म विद्या, गायत्री महामंत्र की ओर रुचि उत्पन्न करने में सहायक हों।
साधना के भिन्न-भिन्न पथ, धर्म या आधार के रूप में प्रकटित हुए। बहिर्मुख वृत्ति को छोड़कर अन्तर की शोध की गई। उत्पादन तो वहाँ भी हुआ पर विभिन्न प्रकार का। भौतिक पदार्थों का उत्पादन नहीं, आत्मिक और गुणों और शक्तियों का उत्पादन हुआ। आवश्यकताएं सीमित होनी ही थी क्योंकि बिखरी हुई शक्ति को एकाग्र किये बिना साधना संभव नहीं।
साधना की सरलता और आडम्बरहीनता भी घर कर गई। निश्चय कर लिया चलो करेंगे ही। घर आकर आचार्य जी की विधि से और उन्हीं द्वारा मुफ्त दी हुई चन्दन की माला पर जाप करना प्रारम्भ कर दिया। दो-एक महीने बाद से ही स्पष्ट प्रभाव दीख पड़ने लगा। मैं उसी क्रम से जाप भी आगे बढ़ाने लगा।
साधना बहुत कुछ मेरी देखा देखी या मेरे अनुरोध से प्रारंभ की ऐसे व्यक्ति भी बहुधा मेरी ही भाँति पहले भौतिक कष्टों को दूर करने के लालच से ही इस ओर बढ़े। प्रायः उनकी कामनापूर्ति हो ही गई और स्वतः उनकी साधना धीरे-धीरे निष्काम रूपिणी होती जा रही है। प्रारंभ में आध्यात्मिक यात्रा की ओर अग्रसर होने या बढ़ते रहने का मार्ग- सम्बल कामना ही थी अतः तिथि क्रम का ध्यान न रखते हुए मैं कामना को ही प्रधानता देकर निम्नलिखित उपशीर्षकों में उनसे आपकी भेंट कराऊँगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-July
साधना चाहिये।
साधना के अतिरिक्त मानवता, संस्कृति, धर्म, नैतिकता एवं समाज सुधार के कार्यक्रमों में किया जायेगा। देवताओं के आगे पशुबलि, दहेज, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, बहु-विवाह, नशेबाजी, जुआ, मृतभोज, पर्दाप्रथा आदि सामाजिक बुराइयों को दूर करने और शिक्षा, सहयोग, सफाई, धर्मचर्चा आदि की सत्प्रवृत्ति को बढ़ाने के लिए रचनात्मक कार्य हाथ में लिया जायेगा। ऐसे व्रतधारी सक्रिय सदस्यों की संख्या हर शाखा में अधिक से अधिक होनी चाहिए जो नित्य नियमित रूप से कुछ समय लोक सेवा के लिए दिया करें। यह व्रतधारी सदस्य ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के प्रधान स्तम्भ माने जायेंगे क्योंकि उनके श्रमदान के ऊपर ही सद्-विचारों के प्रचार का आधार रहेगा। यह व्रतधारी सदस्य हर रविवार को व्रत रखेंगे और उपवास में बचाया हुआ अन्न सद्ज्ञान प्रसार के लिए व्यय किया करेंगे।
साधनात्मक जीवन व्यतीत करने के इच्छुक हैं। ऐसे लोगों को भोजन, वस्त्र आदि की निर्वाह व्यवस्था तपोभूमि करेगी। चालीस वर्ष से अधिक आयु के लोग ही इस दृष्टि से उपयुक्त होते हैं ऐसा अनुभव किया गया।
साधना के फल से तत्वज्ञानी जिस वस्तु की इच्छा करते हैं उसे ही प्राप्त करते हैं और जिसकी इच्छा नहीं करते उसका त्याग कर सकते हैं। इस प्रकार वे बिना कष्ट, भय और उद्वेग के जीवन व्यतीत करते हैं। यही तत्वज्ञानियों का काम है। अब आप प्रश्न कर सकते हैं कि यह कार्य किस उपाय से सिद्ध किया जा सकता है।
साधना प्रारम्भ कर दी। कुछ समय उपराँत ही आशातीत सफलता प्राप्त हुई अर्थात् अस्थायी नौकरी मिल गयी। मैं नियमित साधना करता ही रहा। इसके फलस्वरूप मेरी नौकरी स्थायी हो गयी। इसके अतिरिक्त मेरी धर्म पत्नी को कोई संतान नहीं होती थी।
साधना करता ही रहा। इसके फलस्वरूप मेरी नौकरी स्थायी हो गयी। इसके अतिरिक्त मेरी धर्म पत्नी को कोई संतान नहीं होती थी। मेरी यह भी कामना पूरी हो गयी। ऐसी वात्सल्यमयी माता का मैं सदैव ही कृतज्ञ रहूँगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-October
साधना तथा तपस्या पूर्ण धर्मानुष्ठानों के आयोजन का मोर्चा सर्वथा सूना पड़ा है। यह मोर्चा यदि इसी प्रकार सूना पड़ा रहा तो अन्य सब मोर्चों पर लगी हुई भारी जन शक्ति और सम्पदा निरर्थक सिद्ध होगी। भेद की बात है कि जिस आध्यात्मिक मोर्चे की गतिविधि पर वास्तविक सुख शाँति निर्भर है उसकी ओर सामान्य जनता की अभिरुचि नहीं, और जो तथाकथित धर्मध्वजी लोग हैं वे अपना अपना सम्प्रदाय चलाने, अखाड़ा जमाने, पैर पुजाने, चेला मूढ़ने के गोरख धन्धे में लगे हुए हैं। उन्हें इतनी फुर्सत नहीं कि इस आड़े समय में जन कल्याण के लिए कुछ त्याग करने, कष्ट सहने और जनता का धर्म नेतृत्व करने के कठिन कार्य को अपने कंधे पर लेने की तत्परता दिखावें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-November
साधना-फल प्रदान किया।”
साधना में 240 घंटे अखण्ड ज्योति जलाई गई, 34000 जप 24000 आहुतियाँ, 2400 मंत्र लेखन, 1000 गायत्री चालीसा पाठ, 500 गायत्री पुस्तक वितरण किया गया। पूर्णाहुति बड़े समारोह तथा विधिपूर्वक सम्पन्न हुई।
साधना के अनन्तर नवमी को सुव्यवस्थित रूप से हवन किया गया। चालीसा और रामचरित मानस का अखण्ड पारायण किया गया। श्रीराम आसरे सिंह जी (इब्राहिमपुर) से विशेष सहयोग मिला।
साधना में इन तीनों इंद्रियों को वश में करके ही मन को अन्तर्मुखी बनाया जा सकता है। मन की शान्ति के लिए शम और दम जरूरी है। इन्द्रियाँ यदि प्रबल हों तो अच्छे-अच्छे साधकों के मन भी इस तरह उड़ा ले जाती हैं जैसे तूफान नाव को उड़ा ले जाता है। सब इन्द्रियों का भड़काने वाला मन है। इन्द्रियों और मन के द्वारा माया भी अपना मोह-जाल फैलाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1957-December
साधना चाहता है उसका कर्म बिना गुजारा ही नहीं। जिसे समत्व प्राप्त हो गया है, वह शान्त दिखलाई देता है। तात्पर्य उसके विचार मात्र में कर्म का बल आ जाता है। जब मनुष्य इन्द्रिय के विषयों में या कर्म में आसक्त न हो और मन की सारी तरंगों को छोड़ दे तब कहना चाहिये कि उसने योग साधा है अथवा वह योगारुढ़ हुआ है।
साधना-पथ पर अग्रसर हुआ तो उस वितरणकर्ता दानी का पुण्य-हजार मनुष्यों को लड्डू, कचौड़ी खिलाने की अपेक्षा निश्चित रूप से कहीं अधिक हो गया।
साधना में लगाने की बात सामने आती है तो उस संकल्प से पीछे हटते हैं। यह कूड़ा-करकट धीरे-धीरे निकलता जा रहा है। नैष्ठिक साधकों की, आध्यात्म-प्रेमियों की सेवा-शृंखला के द्वारा ही ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान जैसे महान कार्यों की पूर्ति में कुछ योग मिलने की आशा भी की जा सकती है।
साधना, जप, तप, धर्म एवं आध्यात्म की शक्ति एवं उपयोगिता पर विश्वास करते हैं उनके लिए इस समय की सर्वोत्तम साधना यही हो सकती है कि अन्तरिक्ष में फैले हुए विषाक्त आसुरी वातावरण को शान्त करने एवं दिव्य विचारधारा को फैलाने के लिए धर्म-प्रसार की साधना में लग जावें। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में साधना और लोक शिक्षा दोनों ही कार्य-क्रम सन्निहित हैं। इस साधना में स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही एक साथ सधते हैं। इस श्रेय पथ पर अनेक व्यक्तियों को लगाते हुए सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अनुष्ठानात्मक प्रक्रिया से संसार की जड़-चेतन आत्माओं पर छाई हुई विपत्ति घटती है, इस परमार्थ से असंख्यों का अन्धकारमय भविष्य प्रकाशवान बनता है। ऐसे शुभ कार्य में संलग्न होना इतना बड़ा परमार्थ है कि उसका कर्त्ता भारी पुण्य फल का अधिकारी हो जाता है।
साधना में स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही एक साथ सधते हैं। इस श्रेय पथ पर अनेक व्यक्तियों को लगाते हुए सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अनुष्ठानात्मक प्रक्रिया से संसार की जड़-चेतन आत्माओं पर छाई हुई विपत्ति घटती है, इस परमार्थ से असंख्यों का अन्धकारमय भविष्य प्रकाशवान बनता है। ऐसे शुभ कार्य में संलग्न होना इतना बड़ा परमार्थ है कि उसका कर्त्ता भारी पुण्य फल का अधिकारी हो जाता है। यह पुण्य फल किसी भी बड़े से बड़े, व्यक्तिगत लाभ के लिए किये गये जप-तप से रत्ती भर भी कम नहीं बैठता। इस प्रकार केवल व्यक्तिगत भौतिक या आध्यात्मिक लाभ के लिए की हुई साधना की अपेक्षा इस सामूहिक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में स्व-पर कल्याण का दूना लाभ है।
साधना यही हो सकती है कि अन्तरिक्ष में फैले हुए विषाक्त आसुरी वातावरण को शान्त करने एवं दिव्य विचारधारा को फैलाने के लिए धर्म-प्रसार की साधना में लग जावें। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में साधना और लोक शिक्षा दोनों ही कार्य-क्रम सन्निहित हैं। इस साधना में स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही एक साथ सधते हैं। इस श्रेय पथ पर अनेक व्यक्तियों को लगाते हुए सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अनुष्ठानात्मक प्रक्रिया से संसार की जड़-चेतन आत्माओं पर छाई हुई विपत्ति घटती है, इस परमार्थ से असंख्यों का अन्धकारमय भविष्य प्रकाशवान बनता है। ऐसे शुभ कार्य में संलग्न होना इतना बड़ा परमार्थ है कि उसका कर्त्ता भारी पुण्य फल का अधिकारी हो जाता है।
साधना की अपेक्षा इस सामूहिक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में स्व-पर कल्याण का दूना लाभ है। वातावरण की प्रतिकूलता से जहाँ व्यक्तिगत साधनाओं की सफलता संदिग्ध है वहाँ विश्वशान्ति की सामूहिक साधनाओं की सफलता भी सुनिश्चित है।
साधना की उपेक्षा करने लगें।
साधना करके ऐसी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं जिससे वे स्वयं भी दूसरों के जीवन पर प्रभाव डाल सकते हैं और इन अदृश्य आत्माओं द्वारा भी कार्य करा सकते हैं। भारतीय योगियों के लिये तो यह बात साधारण मानी गयी थी और हमको इस सम्बन्ध में अपने ऋषि-मुनियों के इतने अधिक उदाहरण मिलते हैं कि उन सबको एकाएक असत्य बतला देना अथवा सब पर अविश्वास कर सकना कठिन होता है। ऐसे साधक प्रायः ध्यान की अवस्था में अथवा निद्रा की अवस्था में सूक्ष्म-शरीर द्वारा ऐसे कार्यों को सम्पन्न किया करते हैं। उस समय वे अन्य लोकों में ऐसे विचरण करते हैं और वहाँ के निवासियों से बात-चीत और व्यवहार करते हैं मानो वहीं के स्थायी रहने वाले हों। उस समय वे पृथ्वी पर रहने वाले किसी भी जागृत व्यक्ति पर इच्छानुसार प्रभाव डाल सकते हैं और उसे प्रेरणाएं दे सकते हैं।
साधना के अनुभवों” में भी पाठकों को ऐसे अनेक उदाहरण मिल सकते हैं, जिनको सिवाय दैवी सहायता के और कुछ नहीं कह सकते।
साधना रत मनुष्य अभीष्ट उद्देश्य प्राप्त नहीं कर सकते। धन, सन्तान आदि बढ़ाने का जिन्हें लोभ है, या जो ऐसे ही लौकिक लाभों के लिए जप-तप करते हैं वे भी भूलते हैं कि यदि आगामी विकट समय अपनी घनघोर घटाओं के साथ बरस पड़ा तो संचित धन-सम्पत्ति धूलि-मिट्टी से भी गई बीती व्यर्थ की चीज बन जायेगी। दूसरे आगामी युग समता का आ रहा है। रोटी कपड़ा और जीवन की आवश्यक वस्तुओं के उपभोग के अतिरिक्त व्यक्तिगत धन-संग्रह की कोई गुँजाइश न रहेगी। ऐसी दशा में धन बढ़ाने के लिए यह मूल्यवान क्षण बर्बाद करना बेकार ही है।
साधना में लग जावें। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में साधना और लोक शिक्षा दोनों ही कार्य-क्रम सन्निहित हैं। इस साधना में स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही एक साथ सधते हैं। इस श्रेय पथ पर अनेक व्यक्तियों को लगाते हुए सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अनुष्ठानात्मक प्रक्रिया से संसार की जड़-चेतन आत्माओं पर छाई हुई विपत्ति घटती है, इस परमार्थ से असंख्यों का अन्धकारमय भविष्य प्रकाशवान बनता है। ऐसे शुभ कार्य में संलग्न होना इतना बड़ा परमार्थ है कि उसका कर्त्ता भारी पुण्य फल का अधिकारी हो जाता है।
साधना गायत्री चालीसा वितरण था। यह बहुत ही अच्छा उपाय था कि केवल मात्र 6 रु. में 240 गायत्री चालीसा प्राप्त करके धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों में वितरण किये जाएं और यदि वे लोग निरन्तर पाठ करना दूर केवल एक बार ही पढ़कर फेंक दें और 240 पाठ कर लें तो भी वितरणकर्ता को 240 पाठ का एक अनुष्ठान कराने का पुण्य फल प्राप्त होता। यदि कहीं उन चालीसा प्राप्त करने वालों में से आधे-चौथाई भी नियमित पाठ करने लगें तो उस पुण्य का एक भाग उन्हें निरन्तर प्राप्त होता रहे। शुभ और अशुभ कार्य के लिए प्रेरणा देकर किसी को भले-बुरे मार्ग पर चला देने से उस प्रेरणा देने वाले को, उस कर्म पथिक के पुण्य-पाप का दसवां भाग प्राप्त होता है। शिष्य के, यजमान के पुण्य-पाप का दसवां अंश पुरोहित या यजमान को प्राप्त होता है, क्योंकि अन्तःकरण जो किसी कार्य का मूल हेतु है, जहाँ से आती है वस्तुतः श्रेय उसी का है।
साधनाओं की सफलता भी सुनिश्चित है।
साधनापूर्ण रहा है, पर गत पाँच वर्षों से तो यह दोनों स्त्री-पुरुष गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी एक दूसरे को माता-पिता जैसी दृष्टि से ही देखते हैं। आचार्यजी माता भगवतीदेवी को माताजी कहते हैं और माताजी की दृष्टि में आचार्यजी पिताजी हैं। आपस में जिनके इतने उच्च भाव हैं, वे दूसरे नर-नारियों के प्रति अत्यन्त उत्कृष्ट भावना ही रख सकते हैं। ऐसे दैवी जीवन में वैसे पतन की कोई संभावना नहीं है, जैसी सामान्य लोगों में होती है। असुरता इन्हीं दो छेदों में प्रवेश करके किसी ऋषि को तपविहीन करती है।
साधना और लोक शिक्षा दोनों ही कार्य-क्रम सन्निहित हैं। इस साधना में स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही एक साथ सधते हैं। इस श्रेय पथ पर अनेक व्यक्तियों को लगाते हुए सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अनुष्ठानात्मक प्रक्रिया से संसार की जड़-चेतन आत्माओं पर छाई हुई विपत्ति घटती है, इस परमार्थ से असंख्यों का अन्धकारमय भविष्य प्रकाशवान बनता है। ऐसे शुभ कार्य में संलग्न होना इतना बड़ा परमार्थ है कि उसका कर्त्ता भारी पुण्य फल का अधिकारी हो जाता है। यह पुण्य फल किसी भी बड़े से बड़े, व्यक्तिगत लाभ के लिए किये गये जप-तप से रत्ती भर भी कम नहीं बैठता।
साधनाओं की सफलता संदिग्ध है वहाँ विश्वशान्ति की सामूहिक साधनाओं की सफलता भी सुनिश्चित है।
साधना और उपासना सच्चे मन से होगी तो हमारा हर तरह से कल्याण ही होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-October
साधना अर्पित जीवन, साधक, सृजक विधाता।
तप के धनी, ज्ञान के सागर, चिंतन के उद्गाता॥
साधना उपचार-ध्यान धारणा आदि के विभिन्न प्रयोगों द्वारा इस सामर्थ्य को बढ़ या-विकसित किया जा सकता है।
साधना से भी उन्हें शान्ति न मिली। महत्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था।
साधना-निष्काम कर्म ही भावना ही है। कठोर साधनों की अपेक्षा यह मार्ग अधिक सरल है जिसे गीता में “निष्काम कर्म योग” के नाम से प्रतिपादित किया गया है। कर्तव्य भावना का ज्ञान और मनोरथ के परित्याग से परमात्मा की स्थिति का बोध हो जाता है और मनुष्य जन्म मरण के भव बन्धन से मुक्ति पा लेता है। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसके लिए निष्काम-कर्म से बढ़कर और कोई दूसरा उपाय श्रेष्ठ नहीं है।
साधना करने को कहा गया। नम्रता का अभ्यास करने में देर लगते देखकर नये सेनापति की नियुक्ति आवश्यक हो गई।
साधना में इतनी तत्परता व मनोयोग से निरत रहते हैं कि उन्हें बाह्य दुनिया की उतनी परख नहीं रहती जितनी कि अपनी आन्तरिक आकाँक्षा को पूर्ण करने की। तन्मय बने रहने से बाह्य व्यवधानों एवं आकर्षणों का प्रभाव भी उतना नहीं पड़ता। एक निश्चित दिशा में अपने चिन्तन एवं क्रिया-कलाप को लगाये रखने पर भटकाव की भी गुँजाइश नहीं रहती। मनोनुकूलता श्रेष्ठ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक सिद्ध होती है।
साधना में फिर पहले की ही भाँति लग गये हैं। विश्व की विषम परिस्थिति का सन्तुलन बिठाने के लिए इससे कम ऊर्जा में काम चलने वाला भी नहीं है।
साधना स्वाद जन से हो जाती है और मनोबल अभिवर्धन की आधी यात्रा पूरी हो जाती है। संकल्प और साहस के अभिवर्धन में उपरोक्त तीनों ही क्षेत्र में मिल-जुलकर काम करते हैं। यह ऊर्ध्व लोक की यात्रा है। इसे चेतना का ऊर्ध्वगमन कह सकते हैं।
साधना कहलाता है और परमात्मा तक पहुँचाता है।
साधनाओं द्वारा इस क्षेत्र का जागरण, उन्नयन सम्भव हो सके तो सामान्य व्यक्ति का देव पुरुष होना सम्भव है।
साधना में उन दिनों लीन थे। उन्हें उद्विग्न करने के लिए संगम नामक एक दुष्ट पीछे पड़ा हुआ था। आये दिन वह उन्हें क्षुब्ध करने के लिए कुछ न कुछ कुचक्र रचता रहता।
साधनाएँ नहीं कर सकते थे उनने इस प्रयोजन को जादूगरी या इन्द्रजाल से लोगों को हिप्नोटिज्म स्तर के प्रयोगों द्वारा अपने की विलक्षणता सिद्ध करने का प्रयास किया। अब भी वह शैली फल-फूल रही है और भोले भावुकों को भूत-प्रेत देवी-देवताओं के नाम पर भ्रम-जंजाल में फंसाया और उनके समय तथा धन को बर्बाद कराया जा रहा है।
साधना बन पड़ती है, जिसमें वासना के लिए ही नहीं, तृष्णा के लिए भी कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। फिर अहन्ता की, वाहवाही लूटने की, दूसरों पर छाप छोड़ने, किसी को नीचा दिखाने की गुँजाइश कैसे हो सकती है। माँसाहार, मद्यपान जैसे आत्मा पर कलुष कषाय चढ़ायें वाले व्यवहारों की भी गुँजाइश नहीं है। ऐसे लोगों को आध्यात्मिक वातावरण में रहना पड़ता है। उन्हें मदारी, नट, बाजीगर एवं अविश्वासी तार्किकों के बीच में निर्वाह कर सकना कठिन होता है।
साधना द्वारा मनोबल बढ़ाया जाता है और शरीरगत जीवनी शरीर शक्ति को आरोग्य एवं दीर्घ जीवन प्रदान करने वाली रखा जाता है। मनोनिग्रह की आधी साधना स्वाद जन से हो जाती है और मनोबल अभिवर्धन की आधी यात्रा पूरी हो जाती है। संकल्प और साहस के अभिवर्धन में उपरोक्त तीनों ही क्षेत्र में मिल-जुलकर काम करते हैं। यह ऊर्ध्व लोक की यात्रा है। इसे चेतना का ऊर्ध्वगमन कह सकते हैं।
साधना को प्रायः डेढ़ वर्ष हो चला। इस बीच उनकी ढलती आयु और प्रचण्ड तपश्चर्या को देखते हुए प्रत्यक्ष स्वास्थ्य बहुत अधिक नहीं लड़खड़ाया है। चेतना शरीर तो और भी अधिक बलिष्ठ समर्थ एवं तेजस्वी हो गया है। उनकी संरक्षक शक्ति का प्रताप देखते हुए हम सब को किसी चिन्ता की आवश्यकता नहीं। वे अनवरत क्रम से अपने मार्ग पर चल रहे हैं।
साधना में निरत रहे।
साधना परायण हुए और योगीराज बने, महर्षि कहलाये। अपने तपोबल से उन्होंने सूक्ष्म वातावरण गरम किया और एक से एक बढ़ी-चढ़ी देश भक्त प्रतिभाओं के अम्बार लगा दिये। इन दिनों जितने महामानव एक साथ एक से एक ऊँचे स्तर के उभरे वैसा इतिहास के अन्य सोपानों में नहीं देखा गया। अरुणाचलम् के महर्षि रमण की तपश्चर्या का समूचे लोक मानस पर क्या प्रभाव पड़ा होगा। इसका अनुमान उनके समीपवर्ती क्षेत्र की प्रतिक्रियाओं को देखकर लगाया जा सकता है।
साधना में तत्पर हो उसी को पूरा करना मनुष्य का कर्तव्य है। अपनी परिस्थितियों से बहुत अधिक की कामना करना ही मनुष्य की दुःखद स्थिति का कारण है। अनियन्त्रित मनोरथ का त्याग करना ही अपने पूर्व-प्रारब्ध के लिए सन्तोष करने का अच्छा उपाय है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि आगे के लिए अधिक सुन्दर परिस्थितियाँ प्राप्त करने की चेष्टा न करें। श्रेय की इच्छा करने वाले मनुष्य को न तो निष्क्रिय रहना चाहिए और न ही विविध कामनायें करनी चाहिए।
साधनावस्था से होकर आगे बढ़ना ही स्वाभाविक नियम है। अकुलाहट, तीव्रता या चित्त में विकार आना मनोरथ पूरा न होने का लक्षण है।
साधना में पातंजली, कथा साहित्य में व्यास, दर्शन में कपिल कणाद का जो योगदान रहा उसकी तुलना सूर्य-चन्द्र के अनुदानों से की जाती रहती है।
साधना की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन और न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है। इस आत्म निरीक्षण का एक और भी पहलू है कि जो विशिष्टताएँ-आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक हैं, उनका यदि विकास नहीं हुआ है तो उसकी आवश्यकता अनुभव करते हुए आत्मोत्कर्ष का प्रयास सम्भव हो सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-January
साधना सत्रों में सम्मिलित होकर जो लौटे हैं उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति में असाधारण अन्तर हुआ है। काया-कल्प शब्द में कुछ जादुई गन्ध आती थी और भ्रम होता था कि जब कुछ दिनों बाद लौटेंगे तो च्यवन ऋषि की तरह बूढ़े से जवान हो जायेंगे। अब उस भ्रामक शब्द को हटा देना उचित समझा गया है ताकि वस्तुस्थिति को समझने में सुगमता हो।
साधना मार्ग के दो बड़े विघ्न हैं, यदि धैर्य और विश्वास जम सके तो आत्मिक प्रगति में देर नहीं लगती।
साधना में संलग्न हुए तब उन्हें अकेली माताजी को उनकी आध्यात्मिक सहचर को उनसे भेंट करते रहने की सहमति मिली। गाँधी जी ने 32 वर्ष की आयु में कस्तूरबा को माँ कहना आरम्भ किया और आजीवन दोनों के बीच वही माँ पुत्र का रिश्ता स्थिर रहा।
साधना सत्र चलते रहे हैं। उनमें सम्मिलित होने का परिजनों का उत्साह असाधारण रहा और उन्हें जो सफलता मिली वह भी देखने ही योग्य रही। इतने कम समय में, इतने सरल साधन से इतना अधिक प्रतिफल उत्पन्न हो सकता है इसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। पर गम्भीरता पूर्वक किसी काम को हाथ में लिया जाना और तत्परता पूर्वक उसे सम्पन्न किया जाना यह बताता है कि सामान्य साधनों से, सामान्य परिस्थितियों में भी उच्चस्तरीय सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दोनों सत्रों की कुछेक वर्षों की सफलता को देखते हुए आँका जा सकता है।
साधना लम्बे समय तक करनी पड़ती है। पर चेतना परिकर की मूर्खता तो देखिये। समय से पहले ही बिना मूल्य चुकाये ही पूरा समुदाय ऐसी कल्पना कर रहा है मानो यह सब बहुत ही सरल है। उड़ाने उड़ने भर से सारा प्रयोजन पूरा हो जायेगा। खुशियाँ इसी बात की मनाई जा रही हैं और यह भुला दिया जा है कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए जितनी कठिन मंजिल पार करनी पड़ती है।
साधनाओं द्वारा इस सारे समुदाय को सक्रिय बना कर अतीन्द्रिय क्षमताओं का धनी एवं विलक्षण आनन्द की अनुभूति कर सकने में समर्थ योगी बना जा सकता है।
साधना के बलबूते कतिपय योगी महामानवों में विकसित होती देखी जाती है। इस मान्यता के अनुसार चिकित्सा तो इस प्राण-प्रवाह की एक प्रतिक्रिया भर है। यह होती वस्तुतः एक उच्चस्तरीय प्रक्रिया है जिसमें दैवी क्षमता सम्पन्न सिद्ध साधक सुपात्रों को अपनी ऊर्जा से लाभान्वित करते हैं। विशुद्धतः आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए उपलब्ध इस ऊर्जा समुच्चय की एक प्रतिक्रिया पदार्थपरक बहिर्मुखी भी हो सकती है किन्तु वही सब कुछ नहीं है।
साधना पूरी हुई और सिद्धि मिल गयी।
साधना ही समझना चाहिए।
साधना उपचार के निर्धारण की व्यवस्था की गयी है।
साधना का परिश्रम किया पर मन रूपी मूर्ख बैल उसका प्रतिफल पाने के लिए पहले तैयार होकर आ गया और साथ-साथ ही कुसंस्कारी चित्त (कौआ) ताली बजाने लगा। प्रसन्नता प्रकट करने लगा अथवा ताल में ताल देकर समर्थन करने लगा। (गदहा) अहंकार चुनरी ओढ़ कर नाचने लगा। बिना परिश्रम किए ही बड़े खाने को मिलेंगे तो साथियों के साथ मजा उड़ाने में कितना आनन्द आयेगा। इतने में भैंसे की भी बन आई।
साधनाओं में विभिन्न व्रत नियमों का समावेश है। कुछ नियम थोड़े समय के लिए पालन किये जाते हैं। कुछ को सदा के लिए अपना लिया जाता है। जैन धर्म के साधु साध्वी कठोर नियमों का व्रतधारण करते हैं और उन्हें आजीवन निबाहते हैं। हिमालय कन्दराओं में निवास करना, कन्दमूल फल के आहार पर गुजारा करना, भूमि पर सोना जैसे नियम कितने ही साधु पालन करते हैं।
साधना करना जो करेगा उसका प्रतिफल मिलेगा ही। कबीर अपनी पत्नी लोई को संबोधित करते हुए कहते हैं उनकी चेतना गगन में अचेत होकर फिरती है। डहकाये अर्थात् डगमगाती हुई। जो बड़े बन गये उन्हें खाने के लिए बैल थाली और रकाबी लेकर आ पहुँचा। चेतना ने साधना का परिश्रम किया पर मन रूपी मूर्ख बैल उसका प्रतिफल पाने के लिए पहले तैयार होकर आ गया और साथ-साथ ही कुसंस्कारी चित्त (कौआ) ताली बजाने लगा।
साधना का नाम है। कभी न ठण्डा पड़ने वाला उत्साह ही हमें लक्ष्य तक पहुँचाता है। पानी को भाव बनाने के लिए 212 डिग्री फारनेहाइट तक गर्म करना आवश्यक है। इससे पहले पानी कभी वाष्पीभूत नहीं होता। 200 डिग्री तक गर्म किया जायेगा, 211.9 डिग्री तक-पानी भाप नहीं बनेगा।
साधना किस प्रकार? तप और योग द्वारा। साधक बनना याने अपने को प्रतिष्ठित व्रतशील घोषित करके जिसके सम्मान की रक्षा होनी ही चाहिए। यह तत्त्वदर्शन जिसके समझ में आ जाए उसका जीवन सार्थक जो जाता है।
साधना करनी पड़ती है।
साधना को आध्यात्मिक काय विज्ञान कहा गया है। उसमें नर के लिए नारी और नारी के लिए नर शक्ति केन्द्र एवं शक्ति स्त्रोत बनते हैं। पत्नी भाव का मातृभाव में बदलते ही यौनाचार अवयव प्राण संचार उद्गम बन जाते हैं। माता की जननेन्द्रिय से अपनी काया उपजती है और धरती के समान पवित्र है। स्तन दूध पिलाते हैं।
साधना कुण्डलिनी जागरण की विधि, व्यवस्था, शिव शक्ति का संगम यहीं बन पड़ता है। मानव के भाव पक्ष को उभारने एवं उसे महामानव-अतिमानव बनाने का पुरुषार्थ यहीं सम्पन्न होता है। भक्ति और शक्ति के समन्वय का प्रतीक आनन्दमय कोश बहुत कुछ रहस्यों को अपने अन्दर समाए हुए है। पंचकोशी साधना के अंतर्गत आने वाले ये पांचों ही कोश पूर्णतः विज्ञान सम्मत हैं एवं इन्हें प्रयोगों की कसौटी पर कसा भी जा सकता है। (क्रमशः)
साधना सिद्धि के निकट पहुँच गई। रात्रि को गणेश जी ने दर्शन दिये। कहा तुम्हारी साधना सफल हो गई। देवाधि देव शिवजी बहुत प्रसन्न हैं। उन्होंने मुझे भेजा है और पूछा है जो अभीष्ट हो वरदान माँगें।
साधना करने लगे, उसमें रस आने लगे समझना चाहिए कि वह साधक हो गया। जो साधक है वही सिद्ध है। ईश्वर के संपर्क में आने पर उसके गुण भी अनायास ही आ जाते हैं। अग्नि के साथ ईंधन का संपर्क सुदृढ़ हो जाने पर जो गुण आ गये हैं वही ईंधन में भी पैदा हो जाते हैं। ईश्वर सिद्धियों का भण्डार है उसके साथ संपर्क साधने वाला साधक सिद्ध ही होकर रहता है।
साधना के अनेकानेक उपाय उपचार हैं। उनमें एक धर्म पत्नी को मान्यता है। धर्म शब्द इसीलिए जोड़ा गया है कि यदि वह मात्र पत्नी होती तो नर मादा के मध्यवर्ती चलने वाले लोकाचार में कोई सोचने विचारने की आवश्यकता न पड़ती।
साधना का सत्परिणाम है। यह वाणियाँ मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार शुद्ध होने से ही निखरती हैं। व्यक्तित्व जितना मजा हुआ होगा। साधना द्वारा कषाय-कल्मषों का जितना अधिक निराकरण हो चुका होगा, उतनी ही यह वाणियाँ तेजस्वी होती चली जाएंगी।
साधना निरत रहने के साथ ही व्यक्ति अपने आपको साधक अनुभव करता है और कहता भी है। यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है। प्रकट या अप्रकट घोषणा करने के उपरान्त व्यक्ति को अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रहता है कि हमने अपने बारे में जो घोषणा की है उसे निभाया भी जाय। उसे तोड़ने पर अप्रतिष्ठा होगी। मनुष्य का सम्मान बहुमूल्य है।
साधना की जाती है उसे तीन देववाणियों को प्रखर करने की साधना ही समझना चाहिए।
साधना थोड़े ही की है। मैं तो अंतःकरण पर चढ़े कषाय-कल्मष धो रहा था और इस योग्य बनने जा रहा था कि स्वच्छ आत्मा में परमात्मा के दर्शन कर सकूँ? सो वह स्थिति जब आ जायेगी समझूँगा वरदान मिल गया।
साधना है। अपनी आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक उत्साह ही उस साधना का नाम है। कभी न ठण्डा पड़ने वाला उत्साह ही हमें लक्ष्य तक पहुँचाता है। पानी को भाव बनाने के लिए 212 डिग्री फारनेहाइट तक गर्म करना आवश्यक है। इससे पहले पानी कभी वाष्पीभूत नहीं होता।
साधना करने के लिए तैयार हो गया।
साधना द्वारा कषाय-कल्मषों का जितना अधिक निराकरण हो चुका होगा, उतनी ही यह वाणियाँ तेजस्वी होती चली जाएंगी।
साधनाओं को भी अपनाकर अपूर्णता दूर करो और समग्र प्रतिफल प्राप्त करो।”
साधना का प्रथम चरण यही है। उसमें दृष्टिकोण को ब्रह्मचारी समान बनाना पड़ता है। राम-कृष्ण परमहंस जब आध्यात्मिक साधना की परिपक्वावस्था में थे, तब उन्होंने माता शारदामणि से विवाह किया है। पाण्डुचेरी के अरविन्द घोष जब मौन एकान्त साधना में संलग्न हुए तब उन्हें अकेली माताजी को उनकी आध्यात्मिक सहचर को उनसे भेंट करते रहने की सहमति मिली। गाँधी जी ने 32 वर्ष की आयु में कस्तूरबा को माँ कहना आरम्भ किया और आजीवन दोनों के बीच वही माँ पुत्र का रिश्ता स्थिर रहा।
साधना के अंतर्गत आने वाले ये पांचों ही कोश पूर्णतः विज्ञान सम्मत हैं एवं इन्हें प्रयोगों की कसौटी पर कसा भी जा सकता है। (क्रमशः)
साधना ठीक वैसी ही सध जाती है जैसी कि प्रतिमा पूजन के माध्यम से देवाराधना की, योग की अनेकानेक शाखा प्रशाखाओं में एक अति महत्वपूर्ण गृहस्थ योग भी है। परिवार तो समूह साधना- सृष्टि में सुसंस्कारी श्रेष्ठतम नागरिकों के निर्माण का कारखाना- विद्यालय जैसा चलाना है ही। इसके अतिरिक्त दाम्पत्य जीवन में प्रणय परिचर्या को श्रद्धा, भक्ति, आत्मीयता, समर्पण, स्नेह, जैसे उत्कृष्ट आधारों की ओर मोड़ देना, एक ऐसा प्रयास है जिसमें ईश्वर भक्ति की प्रक्रिया की पूर्ति होती है। पत्नी के लिए पति को परमेश्वर माना गया है और पति के लिए पत्नी को जगदम्बा सदृश मानने के लिए शास्त्र वचन है। नारी तत्व को नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमो नमः॥ की मान्यता दी गई है।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त कटता है। तुम अपने लिए न सही, लोकहित के लिए ही सही। कुछ तो माँग ही लो। हमें देते हुए प्रसन्नता होगी।
साधना युक्त प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों की संख्या 12 हजार के ऊपर है। और जिनने अपने को इस संस्था का अंग मानकर जीवनदानी की तरह स्थायी निवास का स्थिर संकल्प किया है उनकी संख्या समय लगभग 200 है। इसी मण्डली का चमत्कार है कि भारत भूमि का कोना-कोना आलोकमय बनाया गया है। 74 देशों में जागृति केन्द्र विनिर्मित हुए हैं। प्रचारकों की 25 जीप मण्डलियाँ निरन्तर परिभ्रमण पर रहती हैं और नव-सृजन की ऐसी योजनाएँ हाथ में ली गई हैं जिनका परिचय मात्र पाने से आशा भरे नेत्र चमकते हैं और उज्ज्वल भविष्य की झाँकी मिलती है।
साधना का मर्म है।
साधना के आधार पर- पूर्व संग्रहित संस्कारों से तथा दिव्य अनुदानों से इनकी स्थिति ऊँची-नीची होती रहती है। इन्हीं का विस्तार अगले पृष्ठों पर किया गया है।
साधना करने से है और बाड़ा अर्थात् क्षेत्र। बाड़े बड़े पकाना अर्थात् भगवान की परिधि में साधना करना जो करेगा उसका प्रतिफल मिलेगा ही। कबीर अपनी पत्नी लोई को संबोधित करते हुए कहते हैं उनकी चेतना गगन में अचेत होकर फिरती है। डहकाये अर्थात् डगमगाती हुई। जो बड़े बन गये उन्हें खाने के लिए बैल थाली और रकाबी लेकर आ पहुँचा।
साधना सफल हो गई। देवाधि देव शिवजी बहुत प्रसन्न हैं। उन्होंने मुझे भेजा है और पूछा है जो अभीष्ट हो वरदान माँगें।
साधना का अवलम्बन लेकर सूक्ष्म प्रयोगों द्वारा उनमें हलचल उत्पन्न की जाती है तो इसके परिणाम तो और भी अद्भुत एवं रहस्यमय होंगे। अभी तक जितना भी कुछ वैज्ञानिक इस सम्बन्ध में जान पाए हैं, वह जानकारी अध्यात्म को विज्ञान सम्मत बनाने के पक्षधर विद्वज्जनों को उत्साहित करने में सफल रही है।
साधना- सृष्टि में सुसंस्कारी श्रेष्ठतम नागरिकों के निर्माण का कारखाना- विद्यालय जैसा चलाना है ही। इसके अतिरिक्त दाम्पत्य जीवन में प्रणय परिचर्या को श्रद्धा, भक्ति, आत्मीयता, समर्पण, स्नेह, जैसे उत्कृष्ट आधारों की ओर मोड़ देना, एक ऐसा प्रयास है जिसमें ईश्वर भक्ति की प्रक्रिया की पूर्ति होती है। पत्नी के लिए पति को परमेश्वर माना गया है और पति के लिए पत्नी को जगदम्बा सदृश मानने के लिए शास्त्र वचन है। नारी तत्व को नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमो नमः॥ की मान्यता दी गई है। सीता, पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा आदि के रूप, सौंदर्य आदि को देवी चित्रों में देखकर श्रद्धा, सम्वेदना ही बढ़ाई जाती है।
साधना प्रायश्चित्त एवं तप साधन का विधान चलता है और इस योगाभ्यास के साथ ही स्वाध्याय सत्संग का समावेश रहता है। हिमालय का तट गंगा का किनारा, सप्त ऋषियों की भूमि, गंगाजल पान अपनी स्थिति विशेष के लिए सर्वतोमुखी प्रगति के लिए परामर्श, प्राण शक्ति से भरा-पूरा वातावरण, इतनी सारी सुविधायें अन्यत्र कदाचित् ही मिल सकें। जो काय चिकित्सा करते हैं उन्हें मानसोपचार का ज्ञान नहीं। जो मन का शोधन जानते हैं उनमें चेतना के अन्तःकरण केन्द्र को समझाने या सुधारने की क्षमता नहीं है। यह त्रिविधि संयोग गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम की तरह मात्र शान्तिकुँज में ही उपलब्ध है।
साधनाओं के अवलम्बन से वाँछित परिवर्तन सम्भव कैसे हो जाता है, इसका समाधान चिकित्सा विज्ञानियों के पास नहीं है। वस्तुतः दशाब्दियों पूर्व डा क्रु कशैन्क ने इन हारमोन ग्रन्थियों को “जादुई ग्रन्थियां” कहा था, वह मिथ्या नहीं था।
साधना और साधक इन तीनों की संगति है। तीनों के समन्वय से एक पूरी बात बनती है।
साधना का स्वरूप समझने की आवश्यकता है। जो साधना करने लगे, उसमें रस आने लगे समझना चाहिए कि वह साधक हो गया। जो साधक है वही सिद्ध है। ईश्वर के संपर्क में आने पर उसके गुण भी अनायास ही आ जाते हैं। अग्नि के साथ ईंधन का संपर्क सुदृढ़ हो जाने पर जो गुण आ गये हैं वही ईंधन में भी पैदा हो जाते हैं।
साधना का वास्तविक अर्थ योग साधना है। योग का अर्थ है भोग से विरत्ति। चिन्तन को एक ओर से खींच कर दूसरी ओर नियोजित करने का नाम योग है। इसमें आंखें मूँद कर अंतर्मुखी होना पड़ता है और जो भीतर है, उसके कल्याण की साधना करनी पड़ती है।
साधना की परिपक्वावस्था में थे, तब उन्होंने माता शारदामणि से विवाह किया है। पाण्डुचेरी के अरविन्द घोष जब मौन एकान्त साधना में संलग्न हुए तब उन्हें अकेली माताजी को उनकी आध्यात्मिक सहचर को उनसे भेंट करते रहने की सहमति मिली। गाँधी जी ने 32 वर्ष की आयु में कस्तूरबा को माँ कहना आरम्भ किया और आजीवन दोनों के बीच वही माँ पुत्र का रिश्ता स्थिर रहा।
साधना द्वारा सम्भव है। ऐसा योगवेत्ताओं का मत है।
साधना में साध्य एक ही है- ईश्वर प्राप्ति। इसी को मोक्ष कहना हो तो भी कुछ हर्ज नहीं। इसे प्राप्त करते ही साधक अज्ञान, अभाव और अशक्ति जन्म समस्त दुःख दरिद्रों से छूट जाता है। सच्चिदानन्द के साथ एकीभूत हो जाता है। अपनी और ईश्वर की स्थिति में भिन्नता नहीं रहती।
साधना विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को इनमें गागर में सागर की तरह भर दिया है। पहेलियों के रूप में इनकी गम्भीरता को समझा जा सके और कौतूहल के साथ इन्हें चिरकाल तक स्मरण भी रखा जा सके यह कबीर का प्रमुख प्रयोजन मालूम पड़ता है। यहाँ ऐसी ही तीन उलटवाँसियाँ और दी जा रही हैं।
साधनाएँ इसी बीच करते रहने का निर्धारण किया जाता है। इस प्रकार शरीर, मस्तिष्क और अन्तःकरण के तीनों ही क्षेत्रों पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ने वाली समग्र चिकित्सा पद्धति का क्रम साथ-साथ चलता रहता है। अधिकाँश रोग आपस में गुँथे होते हैं और उनकी जड़ें न केवल शरीर में वरन् मन और अन्तःकरण में भी जमी होती हैं, स्थूल शरीर-सूक्ष्म शरीर-कारण शरीर में से एक भी रुग्ण होता है तो शेष दो अन्य शरीरों को भी आधि-व्याधियों से ग्रसित होने की स्थिति बना देता है। इसलिए समग्र चिकित्सा वही है जो तीनों की ही सफाई करे और गुँथे हुए जाले की जड़ें उखाड़ दे।
साधना के लिए दो कार्य करने होते हैं एक योग दूसरा तप। योग का अर्थ है अपने दृष्टिकोण की उत्कृष्टता को साथ जोड़ देना। तप का अर्थ है ललक लिप्साओं की अवाँछनीय आदतों को बलपूर्वक खींच-घसीटकर सीधे रास्ते पर लाना।
साधनाओं के माध्यम से इन्हें विकसित कर आकस्मिक प्रगति की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।
साधना है। योग का अर्थ है भोग से विरत्ति। चिन्तन को एक ओर से खींच कर दूसरी ओर नियोजित करने का नाम योग है। इसमें आंखें मूँद कर अंतर्मुखी होना पड़ता है और जो भीतर है, उसके कल्याण की साधना करनी पड़ती है।
साधना को ऊँचे स्तर तक-लम्बे समय तक निबाहा जा सके। यह शरीराभ्यास की लिप्साओं से सम्बन्धित पड़ी हुई आदतों को धीरे-धीरे अथवा एक ही झटके में समाप्त किया जा सके। शरीर के साथ सख्ती बरतना-मन के ऊपर कठोर अंकुश लगाना, तपश्चर्या का उद्देश्य है। यह योग का पूरक है। मन में शुभ चिन्तन और व्यवहार में कठोर संयम की दोनों ही व्यवस्था बना लेने से मन की उच्छृंखलता काबू में आती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-March
साधना है यही परमार्थ एवं पुरुषार्थ है।
साधना द्वारा मानव भी जगा एवं विकसित कर सकता है। यह चमत्कार या कोई सिद्धि नहीं, एक सहज प्राप्त हो सकने वाली विभूति है जो पुरुषार्थ द्वारा निश्चित ही सुलभ हो सकती है, ऐसा मत ऋषियों का ही नहीं, आधुनिक वैज्ञानिकों का भी है।
साधना के झंझट में क्यों पड़ें।
साधना करने वाले ऋद्धि−सिद्धियों के अनुपात से अपनी सफलता असफलता आँकते रहे हैं। हमें इसके लिए अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करना पड़ा पर जो बाहर जाता है वह भरपूर मात्रा में मिल गया।
साधना विज्ञान के विद्यार्थी प्रायः करते रहते हैं। यह तृतीय नेत्र अन्य जीवन जन्तुओं में भी काम करते देखा जाता है।
साधना शक्ति की सामर्थ्य से परिचित हो सकें।
साधना ही प्रधान है।
साधना के उपक्रम के साथ−साथ प्रजनन जैसी अतीव कठोर तपश्चर्या चल रही है। यह प्रतिनिधि अथवा वंशज हमसे किसी प्रकार दुर्बल न होंगे। वरन् सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण संसार में फैले हुए प्रतिभावानों को झकझोर कर नवसृजन योजना में उसी प्रकार बलपूर्वक संलग्न करेंगे जैसा कि हमारे मार्गदर्शक ने हमें किया है।
साधना के साथ ही तिरोहित हो गये हैं।
साधना द्वारा इसे जागृत करने का प्रयत्न साधना विज्ञान के विद्यार्थी प्रायः करते रहते हैं। यह तृतीय नेत्र अन्य जीवन जन्तुओं में भी काम करते देखा जाता है।
साधनाओं को विभाजित किया जा सकता है। इनमें तपश्चर्या प्रत्यक्ष है और योगाभ्यास परोक्ष। तप शरीर प्रधान है और योग मन से संबंधित। इनके प्रतिफल दो हैं। एक सिद्धि, दूसरा ऋद्धि।
साधनाएँ लम्बे समय तक करनी पड़ती हैं। यह सभी बातें ऐसी हैं जिन्हें एक−दूसरे को सामने रखकर समीक्षा की जाय तो भारी भ्रम उत्पन्न होता है कि इन ईश्वरों में से किसका कथन निर्देशन सही माना जाय किसका गलत। जब सभी धर्म एक ईश्वर की मान्यता करते हैं तो उनके इलहामों, मंतव्यों और स्वरूप में इतना अन्तर क्यों होना चाहिए। इस विभिन्नता और विचित्रता के रहते किसे मान्य ठहराया जाय किसे अमान्य। किसे अपनाया जाय और किसे गलत कहा जाय।
साधना भी यही है। उच्चस्तरीय शक्ति का उत्पादन और अभिवर्धन इसी आधार पर सम्भव होता है। यह आध्यात्मिक पराक्रम एवं पुरुषार्थ प्रत्येक आत्मवान् के लिए अनिवार्य है। गीताकार का एक ही लक्ष्य है− महाभारत के निमित्त संग्राम। राम ने विश्वामित्र यज्ञ रक्षा से लेकर खर−दूषण वध और लंका दमन तक की प्रक्रिया में अपनी अधिकाँश सामर्थ्य नियोजित रखी।
साधना का दूसरा नाम ‘समर’ है। भगवान के जितने भी अवतार हुए हैं। सभी ने अधर्म के विरुद्ध संघर्ष किया और कराया है। योगी, तपस्वियों महामानवों की जीवनचर्या में भी संघर्ष अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। इसे वे धर्मयुद्ध कहते हैं।
साधनाओं द्वारा मनचाही मात्रा में प्राप्त करने की सामर्थ्य रखता है। इस प्रचण्ड प्राण ऊर्जा के सुनियोजन की चमत्कारी फलश्रुतियाँ हैं। प्रश्न मात्र क्रमबद्ध सदुपयोग का है।
साधना पराक्रम से यह सब असम्भव भी नहीं है।
साधना एवं कष्ट सहिष्णुता का परिचय देना पड़ता है। सफलता अपनी मूल्य माँगती है। जो कठिनाइयों से जूझने और अभीष्ट प्रयोजन के लिए अनवरत श्रम करते हैं वे ही अपने क्षेत्र के तपस्वी हैं। तपस्वी की भगवान सहायता करते हैं और उसे सफलता का श्रेय प्रदान करते हैं।
साधना और सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों की उस क्षेत्र में उपस्थित क्या मिल-जुलकर दोनों पक्षों को अपनी हठवादिता छोड़ने के लिए विवश नहीं कर सकते? उत्तर अन्तरिक्ष में से उभरा कि ‘कर सकते हैं’ −और उन्हें करना चाहिए।
साधना द्वारा परिष्कृत किया गया हो, आत्मा की वाणी इसी को कहते हैं। यह देश और धर्म की सीमाओं को उल्लंघन करके सर्वत्र एक जैसी ही उद्भासित होती है। इसमें बुद्धि की अवज्ञा नहीं की जा रही है वरन् यह कहा जा रहा है कि उसे श्रद्धा और सदाशयता का पुट लगा−लगाकर पवित्रता बनाया जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-April
साधना में, स्वतन्त्रता आन्दोलन में स्वयं सेवक रूपी सेवा में इस विशिष्ट प्रयोग से कोई विघ्न न पड़ेगा।
साधनाऐं भिन्न होंगी, क्षमताऐं बढ़ी-बढ़ी होंगी। विशिष्ट व्यक्तियों से संपर्क रहेगा। बड़े काम इसी प्रकार हो सकेंगे।”
साधना के साथ जुड़े हुए कार्यक्रम भी बदल लिये हैं। अब सब कुछ परिवर्तन हो गया तो दृष्टिगोचर कैसे हो? फिर सत्पात्र साधकों का अभाव हो जाने के कारण वे कुपात्रों को दर्शन देने या उन पर की हुई अनुकम्पा में अपनी शक्ति गँवाना भी नहीं चाहते। ऐसी दशा में अन्य लोग जो तलाश करते हैं वह मिलना सम्भव नहीं। किसी के लिए भी सम्भव नहीं।
साधना विधि तो ठीक तरह समझ में आ गई और जिस प्रकार कुंती ने अपने शरीर में से देव सन्तानें जन्मी थीं ठीक उसी प्रकार अपनी काया में विद्यमान पाँच कोशों, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोशों को पाँच वीर भद्रों के रूप में विकसित करना पड़ेगा, इसकी साधना विधि भी समझ में आ गई। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाय, तब तक वर्तमान स्थूल शरीर को उनके घोंसले की तरह बनाये रहने का भी आदेश है और अपनी दृश्य स्थूल जिम्मेदारियाँ दूसरों को हस्तांतरित करने की दृष्टि से अभी शान्तिकुँज ही रहने का निर्देश है।
साधना जुटाना जितना आवश्यक है, उतना ही यह भी है कि जो किया जाना है, उसे ऊँचे मन और पूरे परिश्रम के साथ सम्पन्न किया जाय।
साधना और आराधना में - “साधना” ही प्रमुख है। उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना - पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय पुण्य परमार्थ ही देखता है।
साधना विधान भी उनका निर्देश मिलते ही आरम्भ की दिया।
साधना के तत्वज्ञान के विस्तार का, परशुराम परम्परा में अनीति उन्मूलन हेतु जन-मानस के परिष्कार के वातावरण निर्माण का तथा भागीरथ परम्परा में ज्ञान गंगा को जन-जन तक पहुँचाने का दायित्व सौंपा गया। चरक परम्परा में वनौषधि पुनर्जीवन एवं वैज्ञानिक अनुसन्धान, याज्ञवल्क्य परम्परा में यज्ञ से मनोविकारों के शमन द्वारा समग्र चिकित्सा पद्धति का निर्धारण, जगदग्नि परम्परा में साधना आरण्यक का निर्माण एवं संस्कारों का बीजारोपण, नारद परम्परा में सत्परामर्श- परिव्रज्या के माध्यम से धर्म चेतना का विस्तार, आर्य भट्ट परम्परा में ज्योतिर्विज्ञान का नूतन अनुसन्धान, वशिष्ठ परम्परा में धर्मतंत्र के माध्यम से राजतन्त्र का मार्गदर्शन, शंकराचार्य परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण का, पिप्पलाद परम्परा में आहार-कल्प के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य संवर्धन एवं सूत-शौनिक परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञापरिजनों द्वारा लोक-शिक्षण की रूप रेखा के सूत्र हमें बताये गये। अथर्ववेदीय विज्ञान परम्परा में कणाद ऋषि प्रणीत वैज्ञानिक अनुसन्धान पद्धति के आधार पर ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की रूपरेखा बनी।
साधना के सूक्ष्म संस्कार यहाँ सघन हैं। महाप्रज्ञा को युग शक्ति का रूप देने, उनकी चौबीस मूर्तियों की स्थापना कर सारे राष्ट्र एवं विश्व में आद्यशक्ति का वसुधैव कुटुम्बकम् एवं सद्बुद्धि की प्रेरणा वाला संदेश यहीं से उद्घोषित हुआ। अनेकों साधकों ने यहाँ गायत्री अनुष्ठान किए हैं एवं आत्मिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त की है। शब्द शक्ति एवं सावित्री विधा पर वैज्ञानिक अनुसंधान विश्वमित्र परम्परा का ही पुनर्जीवन है।
साधना क्रम आरम्भ कर दो। एक साल पूरा हो जाय तब अपने घर लौट जाना। हम तुम्हारी देखभाल नियमित रूप से करते रहेंगे।”
साधना थी। साथ ही जन-संपर्क का कार्य भी करना था ताकि भावी कार्य क्षेत्र को दृष्टिगत रखते हुए हमारी संगठन क्षमता विकसित हो। तीसरा महत्वपूर्ण दायित्व था स्वतन्त्रता संग्राम में एक स्वयंसेवी सैनिक की भूमिका निभाना। देखा जाय तो सभी दायित्व शैली एवं स्वरूप की दृष्टि से परस्पर विरोधी थे। किन्तु साधना एवं स्वाध्याय की प्रगति में इनमें से कोई बाधक नहीं बने।
साधना विधि भी समझ में आ गई। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाय, तब तक वर्तमान स्थूल शरीर को उनके घोंसले की तरह बनाये रहने का भी आदेश है और अपनी दृश्य स्थूल जिम्मेदारियाँ दूसरों को हस्तांतरित करने की दृष्टि से अभी शान्तिकुँज ही रहने का निर्देश है।
साधना के ही चमत्कारी वरदान थे।
साधना के नाते हमने जान-बूझकर, हृदय पर पत्थर रखकर परिजनों व अपने बीच एक रहस्य भरा पर्दा डाल लिया है। हमारा लौकिक-दृश्य रूप जिन्होंने देखा है, वे भली-भाँति समझते हैं कि एकाकी, अपने परिजनों से स्थूल दृष्टि से दूर रहकर हमें कैसा लगता होगा? हम भी मनुष्य हैं, हमारी भी भाव सम्वेदनाएँ हैं, दिल हमारा भी धड़कता है। परन्तु मानव होने से बड़ा धर्म वह है जो हमें अपने गुरुदेव ने सौंपा है।
साधना बताई। वह भी ठीक समय पर पूरी हुई। इस बीच में बैटरी चार्ज कराने के लिए- परीक्षा देने के लाए बार-बार हिमालय आने का आदेश मिला। साथ ही हर यात्रा में एक-एक वर्ष या उससे कम दुर्गम हिमालय में ही रहने के निर्देश भी। वह क्रम भी ठीक प्रकार चला और परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर नया उत्तरदायित्व भी कन्धे पर लदा।
साधना सीखने का कोई अवसर न मिला। जाने के दिन समीप आने पर बहुत बेचैनी रहने लगी। एक दिन हिम्मत बाँधकर गाँधी जी के सेक्रेटरी महादेव भाई देसाईं के दफ्तर में गया और संकोच पर नियन्त्रण करके आने का उद्देश्य कह सुनाया। देसाईं जी हँसे और बोले- ‘‘भाई! हम तो करामाती योगी है नहीं। गाँधी जी हो सकते हैं।
साधना किये भी यहाँ वैसा ही आनन्द आता है मानो यह समय तप साधना में बीता। शान्तिकुंज गायत्री तीर्थ की विशेषता यहाँ सतत् दिव्य अनुभूति होने की है। यह संस्कारित सिद्ध पीठ है क्योंकि यहाँ सूक्ष्म शरीरधारी वे सभी ऋषि क्रिया-कलापों के रूप में विद्यमान हैं, जिनका वर्णन यहाँ किया गया।
साधनाएं भी स्थूल शरीर वालों की अपेक्षा भिन्न हैं।”
साधना के रूप में निर्धारित किया गया।
साधना नहीं तो भोजन नहीं। इस सिद्धान्त को अपनाया। वह आज तक ठीक चला है और विश्वास है कि जीवन के अन्तिम दिन तक यह निश्चित रूप से निभेगा।
साधना सत्र उन कुछ प्रमुख आयोजनों में से हैं, जो हमने सहस्र एवं शतकुण्डी यज्ञ के बाद मथुरा में मार्गदर्शक के निर्देशानुसार सम्पन्न किए। गायत्री तपोभूमि में आने वाले परिजनों से जो हमें प्यार मिला, परस्पर आत्मीयता की भावना जो विकसित हुईं, उसी ने एक विशाल गायत्री परिवार को जन्म दिया। यह वही गायत्री परिवार है जिसका हर सदस्य हमें पिता के रूप में- उँगली पकड़ कर चलाने वाले मार्गदर्शक के रूप में, घर-परिवार-मन की समस्याओं को सुलझाने वाले चिकित्सक के रूप में देखता आया है।
साधना क्षेत्र में एक बार उत्तीर्ण हो जाने पर पिसे को पीसना भर रह जाता है। मार्ग देखा-भाला था। दिनचर्या बनी बनाई थी। गोमुख से साथ मिल जाना और तपोवन तक सह जा पहुँचना यही क्रम पुनः चला। उनका सूक्ष्म शरीर कहाँ रहता है, क्या करता है यह हमने कभी नहीं पूछा।
साधना सीखने आये थे।” मैंने हाँ कह दिया। दूसरा प्रश्न पूछा गया- ‘‘वैसा कुछ सिखाया गया या नहीं?” मैंने तीन महीने का कार्य विवरण संक्षेप में सुना दिया। वे बोले- यही है गाँधी बनने की विद्या, जो तुम सीखते रहे?
साधना का कितना चमत्कारी प्रतिफल होता है। यह तुम्हारे कार्यक्रम का प्रथम चरण है। अपना कर्त्तव्य पालन करते रहना। यह मत सोचना कि हमारी शक्ति नगण्य है। तुम्हारी कम सही।
साधना में बीता। शान्तिकुंज गायत्री तीर्थ की विशेषता यहाँ सतत् दिव्य अनुभूति होने की है। यह संस्कारित सिद्ध पीठ है क्योंकि यहाँ सूक्ष्म शरीरधारी वे सभी ऋषि क्रिया-कलापों के रूप में विद्यमान हैं, जिनका वर्णन यहाँ किया गया।
साधना आरण्यक का निर्माण एवं संस्कारों का बीजारोपण, नारद परम्परा में सत्परामर्श- परिव्रज्या के माध्यम से धर्म चेतना का विस्तार, आर्य भट्ट परम्परा में ज्योतिर्विज्ञान का नूतन अनुसन्धान, वशिष्ठ परम्परा में धर्मतंत्र के माध्यम से राजतन्त्र का मार्गदर्शन, शंकराचार्य परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण का, पिप्पलाद परम्परा में आहार-कल्प के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य संवर्धन एवं सूत-शौनिक परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञापरिजनों द्वारा लोक-शिक्षण की रूप रेखा के सूत्र हमें बताये गये। अथर्ववेदीय विज्ञान परम्परा में कणाद ऋषि प्रणीत वैज्ञानिक अनुसन्धान पद्धति के आधार पर ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की रूपरेखा बनी।
साधना सिद्धि की बात पूछी। उनने दो करामात दिखाई। एक नदी के जल पर चलने की दूसरी आसमान में दूर तक उड़ने की।
साधना चल रही है, उसके माध्यम से जो अदृश्य महाबली उत्पन्न किये जा रहे हैं, वे चुपके-चुपके असंख्य अंतःकरणों में घुसेंगे, उनकी अनीति को छुड़ाकर मानेंगे और ऐसे मणि-माणिक्य छोड़कर आवेंगे जिससे वे स्वयं धन्य बना सकें और ‘‘समय परिवर्तन’’ जो अभी कठिन दिखता है, कल सरल बना सकें
साधना शिविर, स्वास्थ्य संवर्धन हेतु कायाकल्प सत्र एवं संगठन विस्तार हेतु परामर्श एवं जीवन साधना सत्र उन कुछ प्रमुख आयोजनों में से हैं, जो हमने सहस्र एवं शतकुण्डी यज्ञ के बाद मथुरा में मार्गदर्शक के निर्देशानुसार सम्पन्न किए। गायत्री तपोभूमि में आने वाले परिजनों से जो हमें प्यार मिला, परस्पर आत्मीयता की भावना जो विकसित हुईं, उसी ने एक विशाल गायत्री परिवार को जन्म दिया। यह वही गायत्री परिवार है जिसका हर सदस्य हमें पिता के रूप में- उँगली पकड़ कर चलाने वाले मार्गदर्शक के रूप में, घर-परिवार-मन की समस्याओं को सुलझाने वाले चिकित्सक के रूप में देखता आया है।
साधना काल की अवधि में, दिन-रात सोते-जागते, पर हितार्थाय कार्यरत रहते, अपनी जिम्मेदारी निबाहते हुए सतत् अपने समीप हमारी-आदर्शों की समुच्चय परम सत्ता के प्रतिनिधि की उपस्थिति एवं संरक्षण का अनुभव करना चाहिए। दर्शन न मिले इसलिए निराश नहीं होना चाहिए।
साधना करते हैं तो मनःक्षेत्र में अनायास ही दिव्य भावनाऐं उठती रहती हैं। कभी किसी उलझन को सुलझाना अपनी सामान्य बुद्धि के लिए सम्भव नहीं होता, तो इस अखण्ड-ज्योति की प्रकाश किरणें अनायास ही उस उलझन को सुलझा देती हैं।
साधना का-पवित्रता का सर्वोत्तम उपहार है। हमें भी इसी प्रकार का श्रेय उपहार देने की भूमिका बनी और हम कृतकृत्य हो गये। हमें सुदूर भविष्य की झाँकी अभी से दिखाई पड़ती है, इसी कारण हमें यह लिख सकने में संकोच रंचमात्र भी नहीं होता।
साधनाओं में संलग्न रहते ही थे। इसी कार्य को तुम्हें अब पूरा करना है।”
साधना के विभिन्न अनुशासनों योगत्रयी, कायाकल्प एवं आसन-प्राणायाम के माध्यम से इस मार्ग पर चलने वाले जिज्ञासु साधकों की बहुमूल्य यन्त्र उपकरणों से शारीरिक-मानसिक परीक्षा सुयोग्य चिकित्सकों से कराने के उपरान्त साधना लाभ दिया जाता है एवं भावी जीवन सम्बन्धी दिशाधारा प्रदान की जाती है।
साधना में निरत रहे थे एवं तीनों ही में समाज के नवनिर्माण की महती भूमिका निभानी पड़ी थी। उन सामने उपस्थिति देवात्मा के मार्गदर्शन तीनों ही जन्मों में मिलते रहे थे। इसलिए उस समय तक जो अपरिचित जैसा कुछ लगता था वह दूर हो गया। एक नया भाव जगा घनिष्ठ आत्मीयता का। उनकी महानता अनुकम्पा और साथ ही अपनी कृतज्ञता का।
साधना करने के निर्मित बहुधा शान्तिकुंज बुलाते रहते हैं। इस क्षेत्र की अपनी विशेषता है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, प्राण चेतना से भरा-पूरा वातावरण एवं दिव्य संरक्षण यहाँ उपलब्ध है। इसमें थोड़े समय भी निवास करने वाले अपने में काया कल्प जैसा परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं। उन्हें लगता है कि वस्तुतः किसी जाग्रत तीर्थ में निवास करके अभिनव चेतना उपलब्ध करके वे वापस लौट रहे हैं।
साधना एवं स्वाध्याय की प्रगति में इनमें से कोई बाधक नहीं बने। जबकि इस बीच हमें दो बार हिमालय भी जाना पड़ा। अपितु सभी साथ-साथ सहज ही ऐसे सम्पन्न होते चले गये कि हमें स्वयं इनके क्रियान्वयन पर अब आश्चर्य होता है। इसका श्रेय उस दैवी मार्गदर्शक सत्ता को जाता है जिसने हमारे जीवन की बागडोर प्रारम्भ से ही अपने हाथों में ले ली थी एवं सतत् संरक्षण का आश्वासन दिया था।
साधना” ही प्रमुख है। उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना - पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय पुण्य परमार्थ ही देखता है।
साधना करने का निर्देश दिया जाता है। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय पर इस प्रकार शोध करने वाली विश्व की यह पहली एवं स्वयं में अनुपम प्रयोगशाला है।
साधना लाभ दिया जाता है एवं भावी जीवन सम्बन्धी दिशाधारा प्रदान की जाती है।
साधना का चमत्कार है।
साधना। दिन में परमार्थ प्रयोजन की आराधना। सम्भव हुआ तो जौ की रोटी। न सम्भव हुआ तो परोसे गए सामान में से जो सात्विक हो उसका चयन। यह दोनों क्रम साथ-साथ चलते रहे।
साधना में विघ्न पड़ता है। दूसरे यह कि अन्यत्र जाने पर शरीर निर्वाह में असुविधा होती है। इसलिए उनने स्थूल शरीरों का परित्याग कर दिया है और सूक्ष्म शरीर धारण करके रहते हैं। जो किसी को दृष्टिगोचर भी न हो और उसके लिए निर्वाह साधनों की आवश्यकता भी न पड़े। इस कारण उन सभी ने शरीर ही नहीं स्थान भी बदल लिये हैं।
साधना तपश्चर्या करके दुर्लभ विभूतियां यहीं अर्जित की थीं। उस उपार्जन का लाभ मनुष्य जाति को, विशेषतया आर्यावर्त क्षेत्र को निरन्तर मिलता रहा है। प्रसिद्ध है कि उधर के ऊबड़-खाबड़ नदी नालों को सुव्यवस्थित करके देवताओं ने भागीरथ के तत्वावधान में गंगा को स्वर्ग से नीचे उतारा था और जल के अभाव में पिछड़ा हुआ क्षेत्र हरीतिमा से भरपूर स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी आर्यावर्त बन गया था।
साधना आरण्यक में नित्य गायत्री उपासकों द्वारा नियमित अनुष्ठान, इन सब बातों से ऐसा दिव्य वातावरण यहाँ विनिर्मित होता है जैसा मलयागिरि में चन्दन वृक्षों की मनभावन सुगन्ध का। बिना साधना किये भी यहाँ वैसा ही आनन्द आता है मानो यह समय तप साधना में बीता। शान्तिकुंज गायत्री तीर्थ की विशेषता यहाँ सतत् दिव्य अनुभूति होने की है। यह संस्कारित सिद्ध पीठ है क्योंकि यहाँ सूक्ष्म शरीरधारी वे सभी ऋषि क्रिया-कलापों के रूप में विद्यमान हैं, जिनका वर्णन यहाँ किया गया।
साधना करनी पड़ी। जो कुछ चमत्कार हाथ लगे हैं, उसी के प्रतिफल हैं। उपासना तो समय काटने का एक व्यवसाय बन गया।
साधना की एवं सृजनात्मक क्रान्ति का मोर्चा सम्भाला। जो व्यक्ति तत्कालीन समाज के निर्माण में बाधक अनीति में लिप्त थे, उनकी वृत्तियों का उन्होंने उन्मूलन किया। दुष्ट और भ्रष्ट जनमानस के प्रवाह को उलट कर सीधा करने का पुरुषार्थ उन्होंने निभाया। इसी आधार पर उन्हें भगवान शिव से “परशु” (फरसा) प्राप्त हुआ। उत्तरार्ध में उन्होंने फरसा फेंककर फावड़ा थामा एवं स्थूल दृष्टि से वृक्षारोपण तथा सूक्ष्मतः रचनात्मक सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण किया।
साधना के लिए अधिक उपयुक्त हैं इसका कारण हमने उसमें दिया है। एकान्त में सूनेपन का जो भय लगता है, उसमें चिन्तन की दुर्बलता ही कारण है। मन मजबूत हो तो साथियों की तलाश क्यों करनी पड़े? उनके न मिलने पर एकाकीपन का डर क्यों लगे। जंगली पशु पक्षी अकेले रहते हैं।
साधना का शुभारम्भ किया था उसी दिन घृत दीप की अखण्ड-ज्योति भी स्थापित की। उसकी जिम्मेदारी हमारी धर्मपत्नी ने सम्भाली, जिन्हें हम भी माता जी के नाम से पुकारते हैं। छोटे बच्चे की तरह उस पर हर घड़ी ध्यान रखे जाने की आवश्यकता पड़ती थी। अन्यथा वह बच्चे की तरह मचल सकता था, बुझ सकता था। वह अखण्ड दीपक इतने लम्बे समय से बिना किसी व्यवधान के अब तक नियमित जलता रहा है।
साधना है। जिस प्रकार नट शरीर को साधकर अनेक प्रकार के कौतूहलों का अभ्यास कर लेते हैं, लगभग उसी प्रकार का वह अभ्यास है जिसमें नितान्त एकाकी रहना पड़ता है। पत्तियों और कन्दों के सहारे निर्वाह करना पड़ता है और हिंसक जीव-जन्तुओं के बीच रहते हुए अपने प्राण बचाना पड़ता है।
साधना, प्रायश्चित, संस्कार आदि कराने एवं प्रौढ़ों के वानप्रस्थ शिक्षण की यहाँ समुचित व्यवस्था थी। प्रखर व्यक्तित्वों को उत्पादन, वानप्रस्थ- परिव्रज्या हेतु लोकसेवियों का शिक्षण, गुरुकुल में बालकों को नैतिक शिक्षण तथा युग शिल्पी विद्यालय में समाज निर्माण की विधा का समग्र शिक्षण इस ऋषि परम्परा को आगे बढ़ाने हेतु शाँतिकुँज द्वारा संचालित ऐसे ही क्रिया-कलाप हैं।
साधना की शक्ति से सम्बन्ध है। इसमें समय आने पर तुम्हारी सहायता के लिए सुपात्र मनीषी जुटेंगे जो तुम्हारा छोड़ा काम पूरा करेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-September
साधनाओं और सिद्धान्तों को प्रकट न किया जाता था। श्रद्धावान् विद्यार्थी ही ज्ञान का, आत्म-दर्शन का महान लाभ प्राप्त करते थे।
साधना का प्रकरण हुआ। शारीरिक योगाभ्यास के बालबोध-आरम्भिक अभ्यास पर पहले ही कुछ प्रकाश डाला जा चुका है। वे शरीर से होने वाले व्यायामों की तरह हैं और उनका लाभ भी उतना ही सीमित है। जीवनचर्या और मनोभूमि को कसने की भी उनमें उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती। स्कूली बच्चों की तरह उनकी पढ़ाई कोई भी कर सकता है।
साधना विधान अपनाना आवश्यक होगा?
साधना समझा और उतने भर से ही सन्तोष किया जाता हो, तब तक यही समझना चाहिए कि अभी मन बाल-क्रीड़ाओं में रम भर रहा है।
साधना को दी जानी चाहिए।
साधना एवं चिकित्सा दोनों ही क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत हो सकती हैं। हिमालय जितना विशाल है, उतना ही रहस्यमय भी है। अभी इसमें और गहरी पैठ लगाने की आवश्यकता है।
साधनाओं का झंझट उठाना पड़े और आशा के अनुरूप फल भी मिले। ताड़ने वाले इस बाल-बुद्धि को समझ लेते हैं और उसी के अनुरूप एक सुगम-सा पाठ्यक्रम बना देते हैं। उनमें ‘आसन’ और ‘मेडीटेशन’ यही दो मुख्य हैं। आसन हल्के-फुल्के अंग संचालन जैसे एवं मेडीटेशन आंखें बन्द करके कोई कल्पना करते रहना। इससे भी आगे कदम बढ़ाना हुआ तो लम्बी सांसें खींचने का प्राणायाम और जोड़ लिया गया।
साधना है।
साधना स्थल नहीं रहा।
साधनाएँ चलती रहें पर प्रमुखता इसी आत्म बोध की साधना को दी जानी चाहिए।
साधना की परिणति रूप हुआ था। केदारनाथ से दिखाई देने वाले ऊँचे पर्वत श्रृंग को कैलाश नाम से सभी पहाड़ी लोग पुकारते हैं। उनका तात्पर्य यहाँ समग्र अगम्य दुर्गम हिमालय से होता है। आध्यात्मिक मान्यतानुसार शिवलिंग ही कैलाश व नन्दन वन के समीपस्थ झील ही मानसरोवर है। तिब्बत वाले कैलाश की संगति इतिहास व स्थलों से कुछ मिलती नहीं।
साधना जो जुड़ी रहती थी।
साधना द्वारा भी इस प्रस्तुत पड़े केन्द्र को जगाया एवं वे समस्त अनुभूतियां होती रह सहती हैं जो स्वप्नों के माध्यम से कुछ तो अनायास ही हो गयीं।
साधना का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है इसी कारण इस क्षेत्र की तीर्थयात्रा का प्रचलन आदि काल से है।
साधना के अनुरूप ऋद्धि-सिद्धियों से भरा-पूरा सत्परिणाम भी प्राप्त करते हैं।
साधना के प्रति दिमाग भी साफ करें।
साधना से। संचित कमाई को अच्छे प्रयोजन में कभी-कभी खर्च करने पर काम तो सफल होता ही है आत्मिक शान्ति भी प्राप्त होती है। ठीक वैसे ही मौन रहकर वाणी को नियन्त्रित किया जा सकता है। विद्वानों ने शान्ति को ‘जीवन का हीरा’ जिसे कभी नष्ट नहीं होने देना चाहिए तथा वाणी से अभिव्यक्त एक-एक शब्द को मोती की संज्ञा दी है। हमें उसी रूप में इसे खर्च करना चाहिए।
साधना करने, सत्संग का लाभ उठाने एवं वहाँ के संचालकों से वर्तमान समस्याओं के समाधान और भविष्य को उज्ज्वल बनाने की योजना निश्चित करने की सुविधा मिलती थी। ऐसे आश्रमों में नदी, पर्वतों की प्राकृतिक दृश्यावली के साथ-साथ ऐतिहासिक किन्हीं प्रेरणाप्रद घटनाओं की स्मृतियाँ भी जुड़ी रहती थीं। तीर्थयात्रा पैदल करने का विधान है। वाहनों का उपयोग आवश्यक सामान लादने भर के लिए किया जा सकता है। आजकल जिस प्रकार लोग रेल मोटरों में दौड़ते हैं वैसा तीर्थ विधान शास्त्रों में कहीं नहीं है।
साधना के विशेषज्ञों के हाथ आ गए। तान्त्रिक मत में तीर्थयात्रा साधना का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है इसी कारण इस क्षेत्र की तीर्थयात्रा का प्रचलन आदि काल से है।
साधना से शरीर का माँस मज्जा वाला स्थूल भाग तो घट जाता है पर नये प्रकार की ऊर्जा का उत्पादन होता है, जिसे योगाग्नि कहते हैं। इसे शक्ति-पुँज कह सकते हैं। दधीचि की हड्डियों में यही विशेषता थी जिस के कारण उनके द्वारा बना वज्र, वृत्रासुर जैसे दुर्धर्ष दानव का हनन कर सकने में समर्थ हुआ।
साधना का उद्देश्य है। जो इस सही मार्ग पर चलते हैं वे अध्यात्म साधना के अनुरूप ऋद्धि-सिद्धियों से भरा-पूरा सत्परिणाम भी प्राप्त करते हैं।
साधना में शरीर और आत्मा दोनों की सत्ता अनुभव करते हुए उनके स्तर के अनुरूप महत्व देने, तद्नुसार जीवनक्रम का निर्धारण करने वाला विवेक जागृत होता है।
साधना है। वातावरण में सत् कम है और असत् बहुत। अर्थ कम है अनर्थ बहुत। इसलिए यह सतर्कता बरतनी पड़ती है कि अशुभ का अनावश्यक आच्छादन अपने शुभ को आच्छादित न करले। इस सतर्कता का नाम ही साधना है।
साधना की चरम परिणति है। एकाकी, मौन बने रहकर बड़ी से बड़ी सृजनात्मक कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया जा सकता है तथा अपार आनन्द की अनुभूति की जा सकती है। वाणी में तेज एवं ओज, शान्ति बनाये रखने पर ही आता है और यह सम्भव है मात्र मौन साधना से। संचित कमाई को अच्छे प्रयोजन में कभी-कभी खर्च करने पर काम तो सफल होता ही है आत्मिक शान्ति भी प्राप्त होती है। ठीक वैसे ही मौन रहकर वाणी को नियन्त्रित किया जा सकता है।
साधना इसी का नाम है। इसमें अपने आपको साधा जाता है। ईश्वर को लुभाने या उसके सम्मुख चित्र-विचित्र क्रिया कृत्य करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। परब्रह्म इस निखिल ब्रह्मांड के सुचारु रूप से संचालन में निमग्न है। उसे किसी भक्त पर पुष्प वर्षा करने- दौलत के थैले भेजने या वरदान अनुदान देने की न तो आवश्यकता अनुभव होती है और न ही इच्छा उठती है।
साधना की। किशोर अवस्था तक वह केवल पढ़ता रहा इसके बाद उसने पढ़ाने का धन्धा अपना लिया। वह छात्रों को पढ़ाता और बदले में उनसे अपने काम की पुस्तकें पढ़वा कर अपने ज्ञान की वृद्धि करता। यह पढ़ने और पढ़ाने का क्रम उसने आजीवन जारी रखा ओर जापान ही नहीं समस्त संसार के अद्भुत स्मरण शक्ति सम्पन्न विद्वानों की अग्रिम पंक्ति में अपना नाम लिखाया। वह एक बार जो सुन लेता उसे कभी भूलता न था।
साधना परिपक्व और फलवती हो चली।
साधना तपश्चर्या करते हुए यह अनुभूति सहज ही की जा सकती है। जहाँ थियोसाफी मान्यतानुसार इसे योगियों की पार्लियामेण्ट कहा गया है। वहाँ श्रीमद् भागवत के बारहवें एवं दसवें स्कन्द में हिमालय में दिव्य पुरुषों के निवास होने की बात विशिष्ट माहात्म्य सहित लिखी है।
साधना जितनी सरल है, बन्धन रहित है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी है। “सोऽहम्” का अर्थ है- ‘‘मैं वह हूं” “ॐ” अर्थात् ‘आत्मा’। ‘वह’ अर्थात् परमात्मा। यह आत्मा और परमात्मा का समन्वय है। शरीर और प्राण का भी।
साधना है। इसे किसी भी स्थिति में-किसी भी समय किया जा सकता है। जब भी अवकाश हो, जितना भी हो, उतनी ही देर उस अभ्यास क्रम को चलाया जा सकता है। यों शुद्ध शरीर, शान्त मन और एकान्त स्थान और कोलाहल रहित वातावरण में कोई भी साधना करने पर उसका प्रतिफल अधिक श्रेयस्कर होता है, अधिक सफल रहता है।
साधना का। इसके साथ ही सौम्य आरण्यक साधनाएँ भी इस क्षेत्र में होती थीं।
साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त होता है।
साधना उसी के लिए की जाती है। शक्ति के अभाव में दुर्बलता ओर दुर्गति होने की चर्चा इस प्रकार आती है-
साधना स्थली रहने के बाद वे मध्यकाल में वामाचारी तन्त्र साधना के विशेषज्ञों के हाथ आ गए। तान्त्रिक मत में तीर्थयात्रा साधना का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है इसी कारण इस क्षेत्र की तीर्थयात्रा का प्रचलन आदि काल से है।
साधना रह गई है अधूरी।
अभी तो खुला द्वार केवल प्रगति का,
अभी लक्ष्य में शेष है और दूरी।
बिना लक्ष्य की प्राप्ति के जो न लौटे,
मैं ऐसी प्रखर शक्ति के व्यक्ति दूँगा।
साधना करने पर उसका प्रतिफल अधिक श्रेयस्कर होता है, अधिक सफल रहता है।
साधनाएँ भी इस क्षेत्र में होती थीं।
साधनाओं में मौन का अपना विशेष महत्व है क्योंकि उसके सहारे अंतर्मुखी बनने का अवसर मिलता है। निरर्थक चर्चा में जो शक्ति का अपव्यय होता है उससे बचने की स्थिति सहज ही बन जाती है।
साधना में इतना निमग्न हो जाता है कि उसे परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना तो दूर उस सम्बन्ध में सोचते तक नहीं बन पड़ता। इस प्रकार के संग्रहित वैभव का स्वयं तो उपभोग कर नहीं सकते। उसका लाभ उत्तराधिकारी उठाते हैं और मुफ्त में मिले बिना परिश्रम से कमाये धन को आँख मूँदकर खर्च करते हैं। फलतः बदले में उनके गले दुष्प्रवृत्तियाँ बंधती हैं और व्यक्तित्व का विकास रुकता है।
साधनाओं का भी पीठ रहा है। विशेषतः बगुला मुखी शक्ति साधना का। इसके साथ ही सौम्य आरण्यक साधनाएँ भी इस क्षेत्र में होती थीं।
साधना काल में मौन का विशेष महत्व बताया गया है। मौन रहकर ही आत्मोन्मुख होकर आत्मदर्शन-ईश्वर दर्शन सम्भव है। श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न करने के लिए मौन रहकर शक्ति अर्जित करना परम आवश्यक है। व्यर्थ की बकवाद बहस से अपनी शक्ति नष्ट करने की अपेक्षा उसे संचित कर विशेष प्रयोजन सिद्ध किये जा सकते हैं।
साधना मात्र कर्मकाण्ड नहीं रही वरन् उसका प्रभाव अन्तराल की गहराई तक पहुँचने और ज्योतिर्मय होने लगा।
साधना को सरल बना देती है, सुख रूप कर देती है।
साधना करने का अपना अलग आनन्द है। फिर भी अभी इस क्षेत्र की जनसाधारण में चार धामों के अतिरिक्त जानकारी का अभाव ही है।
साधना को उच्चस्तरीय महत्व दिया गया है। इसके अतिरिक्त भी अन्य साधनाएँ चलती रहें पर प्रमुखता इसी आत्म बोध की साधना को दी जानी चाहिए।
साधना का ओर-छोर मिल पाता हो। पहाड़ की चोटियों पर बने मठ गुरु गोरखनाथ के पन्थ के हैं और देवियों के मठ कुछ विचित्रता लिए हुए हैं। लगता यह है कि प्रारम्भ में सात्विक साधना स्थली रहने के बाद वे मध्यकाल में वामाचारी तन्त्र साधना के विशेषज्ञों के हाथ आ गए। तान्त्रिक मत में तीर्थयात्रा साधना का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है इसी कारण इस क्षेत्र की तीर्थयात्रा का प्रचलन आदि काल से है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-August
साधना में निरत हो गईं। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के समन्वय परमार्थ को अपना जीवन सहचर बना लिया। विवाह की चर्चा सदा के लिए बन्द हो गई।
साधना का यह एक सुनिश्चित अंग है।
साधना का प्रताप देखिये, दोनों शत्रुता छोड़कर मित्रता साधते हैं।
साधना में-जनमानस के परिष्कार में-सत्प्रवृत्ति संवर्धन में किया जायेगा। ऐसा न होगा कि पूजा के समय भाव तरंगें उठाकर उसी मनोविनोद को जहाँ का तहाँ समाप्त कर दिया जाय। भगवत् भक्ति की सार्थकता उसके इस विराट् विश्व को अधिकाधिक हरा-भरा फला-फूला बनाने में है।
साधना रख लिया जाय। इन कौतूहलों में नवधा भक्ति के नाम पर प्रतिमा पूजन भी हो सकता है और कथा कीर्तन भी।
साधना में अन्य देवी देवताओं या आत्माओं को सिद्ध करने की अपेक्षा अपने ही छाया पुरुष को सिद्ध कर लेना अधिक सरल है। भले ही उसकी सामर्थ्य प्रत्यक्ष शरीर के अनुरूप प्रकृति की सीमा में या स्वल्प ही क्यों न हो।
साधनाओं की संरचना हुई है। क्रिया के सहारे व्यक्तित्व को समुन्नत करने की पद्धति ही दिव्य मिलन का-योग का प्रयोजन पूरा करती है।
साधना इसी योग परिकर का एक छोटा प्रयोग है जिसे कोई चाहे तो सरलता पूर्वक विकसित कर सकता है और उसके सहज उपलब्ध सहयोग का लाभ उठा सकता है।
साधना करते हुए ही सम्भव है। फिर भी बाल-बोध की दृष्टि से उस मनुष्य द्वारा उच्चारित शब्दों में ‘ॐ’ कार ही कह सकते हैं। ‘ॐ’ कार का अधिक सरल उच्चारण ‘ऊ+उ+म्’ के संयोग से बनता है। पर यह पृथक कारण भी समग्र स्थिति का परिचय नहीं देता इसलिए उसे शब्द के साथ ही रूप में भी चित्रित किया गया है। यही है- ‘‘ॐ”।
साधनारत जीवन में एकदम उलट जाते हैं। दृश्य जगत अदृश्य जगत में समा जाता है। यह संसार हाथी है, आत्मा जब जागृत होती है तो उसमें सारा संसार विलीन हो जाता है। पर्वत जैसा दिखने वाला माया मोह बिना प्रयास के ही, बिना हवा के ही गायब हो जाता है।
साधना बलवती होती है उन्हें ऋषि, देवता, अवतार आदि नामों से पुकारते हैं। वे लोक कल्याण के लिए स्वाध्याय सामग्री विनिर्मित करते हैं और सामयिक समस्याओं के समाधान के सत्संग का ऐसा भाण्डागार विनिर्मित करते हैं जिसमें से अमृत जल भर कर विज्ञजन लोकमानस को परिष्कृत करने में जुट पड़ते हैं। इस आधार पर वे स्वयं दौड़ धूप करने की अपेक्षा दिशा निर्धारण एवं योजना निर्माण की दृष्टि से लोक सेवा की तुलना में कहीं अधिक काम कर गुजरते हैं।
साधना द्वारा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाल लेती है फलतः व्यक्तित्व परिष्कृत स्तर का बनता है और मनुष्य कलेवर में देवत्व की आभा झलकती है। इसके विपरीत यदि तमोगुणी असुरता अन्तराल की गहराई तक चली जाय तो प्रवृत्ति एवं आकाँक्षा अनुपयुक्त कामों में रस लेती है और फिर तद्नुकूल प्रवृत्तियों का प्रवाह बहने लगता है।
साधना होगा। यह मुनादी पीटने की दृष्टि से तो शायद किसी कदर सफल भी हो जाय, पर जहाँ तक चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप से काया-कल्प जैसा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, वहाँ यह संख्या नगण्य न सही अपर्याप्त अवश्य है। हमारा मन था कि जीवन का अंतिम अध्याय पूरा करते-करते हम एक करोड़ हनुमान, अंगद न सही पर रीछ वानर तो मोर्चे पर खड़े कर सकेंगे पर वैसा बना नहीं। अन्य संगठनों की दृष्टि से तुलनात्मक रूप से 20 लाख समर्थक सदस्य होना बड़ी बात हो सकती है। पर काम जितना करने को पड़ा है और समय जितना विषम है, उसे देखते हुये साथियों की संख्या निश्चित रूप से अपर्याप्त है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-November
साधनाओं में निरत रहने वाले कठोर तप-तितिक्षा के अभ्यासी साधु संन्यासी तथा योगी भी नग्न शरीर में भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाये रहते हैं। पूर्ण नग्न शरीर रखना असभ्य आचरण माना जाता है। इस मान्यता के पीछे प्रमुख कारण सामाजिक मर्यादाएँ हैं, पर आत्मिक कारण यह है कि शरीर को नग्न रखने वाला अपनी, शक्ति तरंगें बड़ी मात्रा में बाहर बिखेरता रहेगा, साथ ही दूसरों के भले−बुरे प्रबल भावों से अपने को बचा भी न सकेगा। धूप का तीव्र प्रभाव नग्न शरीर पड़ता है। इसी प्रकार दूसरों का चुम्बकत्व भी निर्वस्त्र लोगों को अधिक प्रभावित कर सकता है।
साधना।
साधना के विभिन्न स्वरूपों को अपना कर निश्चित ही बढ़ाया जा सकता है। सुपात्र योगी यही कर अपनी सामर्थ्य बढ़ाते हैं।
साधना है।
साधनाएं आत्मसत्ता को परमात्म सत्ता से जोड़ने, उस स्तर पर पहुँचाने में समर्थ है। इनके लिए सामान्य साधना क्रम से ऊपर उठकर कुछ विशिष्ट साधना प्रक्रियायें अपनानी पड़ती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उनका अलग−अलग विधान है, इसलिए उनका सार्वजनिक प्रकाशन करना न आवश्यक हैं और न उचित।
साधना तो करना चाहते हैं, पर प्रातःकाल सूर्योदय के समय का निर्वाह नहीं कर पाते। जिन लोगों की नौकरी रात में ड्यूटी देने की है, ऐसे लोगों की कमी नहीं। वे काम पर से लौटते ही सो जाते हैं और नींद पूरी करके देर में उठते हैं।
साधना का उद्देश्य किसी के सामने गिड़गिड़ाना, झोली पसारना या नाक रगड़ना नहीं है। दीनता न आत्मा को शोभनीय है न परमात्मा को प्रिय। परमात्मा न खुशामद का भूखा है और न है उसे प्रशंसा की आवश्यकता। उसकी महानता अपने आप में अपनी प्रशंसा है। मनुष्यों की वाणी न उसमें कुछ वृद्धि कर सकती है और न कमी।
साधना का प्राण है। जो कार्य जप से नहीं हो पाता वह माध्यम से पूरा हो जाता है।
साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है जो बताये हुए अनुपान और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं, इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते। फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है।
साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है, पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ−बूझ भी भौंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया श्रम भी सार्थक न रहेगा।
साधना प्रक्रियायें अपनानी पड़ती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उनका अलग−अलग विधान है, इसलिए उनका सार्वजनिक प्रकाशन करना न आवश्यक हैं और न उचित।
साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है, पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा।
साधना उपासना के माहात्म्य तथा विधान भी बहुतेरे। किन्तु इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वे अभीष्ट अनुग्रह करेंगे ही। इच्छित वरदान देंगे ही। यह भी हो सकता है कि निराशा हाथ लगे। मान्यता को आघात पहुँचे और परिश्रम निरर्थक चला जाय।
साधना पथ के पथिकों का उत्तरदायित्व भगवान् वहन करते हैं और सफलता का पथ पुरुषार्थ एवं निष्ठा के अनुरूप निरन्तर प्रशस्त होता चला जाता है। प्रथम चरण में ही चौदह रत्न नहीं निकल आये वरन् उसके लिए देर तक निष्ठापूर्वक मन्थन की प्रक्रिया जारी रखनी पड़ी। आध्यात्मिक साधनाओं में उतावली करने वाले अधीर व्यक्ति सफल नहीं होते, उसका लाभ तो धैर्यवान और श्रद्धा को मजबूती के साथ पकड़े रहकर विश्वासपूर्वक निर्दिष्ट मार्ग पर अवसर होते रहने वाले साधक नैष्ठिक साधक ही उठा पाते हैं।
साधना में संलग्न हुए तो उसे सफल बनाने में प्रजापति ब्रह्मा ने कूर्म बनकर उसका बोझ अपने ऊपर उठा लिया। प्रयत्न असफल न हो जाय−सुमेरु नीचे न धँसक जाय−इस आशंका को निरस्त करने के लिए कूर्म भगवान् ने अवतार लिया और अपनी पीठ पर पर्वत जैसा भार उठा लिया। साधना पथ के पथिकों का उत्तरदायित्व भगवान् वहन करते हैं और सफलता का पथ पुरुषार्थ एवं निष्ठा के अनुरूप निरन्तर प्रशस्त होता चला जाता है। प्रथम चरण में ही चौदह रत्न नहीं निकल आये वरन् उसके लिए देर तक निष्ठापूर्वक मन्थन की प्रक्रिया जारी रखनी पड़ी। आध्यात्मिक साधनाओं में उतावली करने वाले अधीर व्यक्ति सफल नहीं होते, उसका लाभ तो धैर्यवान और श्रद्धा को मजबूती के साथ पकड़े रहकर विश्वासपूर्वक निर्दिष्ट मार्ग पर अवसर होते रहने वाले साधक नैष्ठिक साधक ही उठा पाते हैं।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं। आत्मदेव की सत्ता सबके भीतर समान रूप से विद्यमान रहते हुए भी उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए भी निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को ऊँचे स्तर का बनाने के लिए आत्मसुधार और आत्मविकास का आश्रय लेना पड़ता है। यही है सुनिश्चित फलदायिनी आत्मदेव की साधना।
साधना विधान विद्यमान है। ऐसे प्रयासों के लिए वही उर्वर भूमि रही है। अस्तु भारत भ्रमण के उपरान्त उनने यहीं बस जाने का निर्णय किया। मद्रास के समीप अडवार नामक स्थान में सोसाइटी का प्रधान कार्यालय बना और वाराणसी में उसकी भारतीय शाखा का मुख्यालय। यों संस्था का विस्तार संसार के 60 देशों में है और उनके अनेक नगरों में उनकी शाखा प्रशाखाएँ हैं।
साधना के प्रथम चरण का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं, दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझेगा और उनमें सतर्कतापूर्वक वितरण हो जायेगा, पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश, पर उल्टा अर्थ कर दिया गया पाप कर्मों के प्रतिफल का नाश। कदाचित ऐसी उलटवांसी सही होती तो फिर इस संसार में पाप को ही पुण्य और कर्त्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हजार तरकीबें हैं। उन्हें अपना कर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वंद्व निश्चिन्त रह सकते हैं।
साधना अनुभूति तथा निष्ठा भी।
साधना का यह तीसरा प्रसंग है जिसमें मनोयोग का भी समावेश है। यों इसकी गणना विहार में भी हो सकती है।
साधना ही अपनी महिमा और महत्ता है। उसे गंगा जल से कम नहीं अधिक ही महत्व दिया जा सकता है पर साथ ही साथ यह भी समझ लेना चाहिए कि वह सर्व समर्थ नहीं है। गंगा जल से बनी हुई मदिरा अथवा गंगा जल में पकाया हुआ माँस सर्व समर्थ नहीं गिने जायेंगे। शौचालय में प्रयुक्त होने के उपरान्त का गंगाजल भरा पात्र देव प्रतिमा पर चढ़ाने योग्य न रहेगा। गंगाजल की शास्त्र प्रतिपादित महत्ता यथावत् बनी रहे इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि उसके संग्रह उपकरण एवं स्थान ही पवित्रता भी अक्षुण्ण बनी रहे।
साधना की आवश्यकता न पड़ेगी। कर्म को त्याग कर कल्पना लोक में विचरने से कुछ काम न चलेगा। सत्कर्मों में निरत रहकर श्वेत बिंदुओं के साथ−साथ आनन्द के मणि−मुक्तकों का संचय किया जा सकेगा। प्रभु को भेंट करने योग्य यही सर्वोत्तम हार−उपहार है जो सत्प्रयासों में बहने वाले श्वेत सीकरों से गूँथा गया है।
साधना पद्धति का प्रयोजन अपने भीतर के देव अंशों को विकसित और परिपुष्ट बनाना है। कैलाश पर्वत पर सर्पों का यज्ञोपवीत धारण करके विराजमान शिव और क्षीर सागर में शेषनाग पर सोये हुए विष्णु का बीजांश हमारे मस्तिष्क मध्य केन्द्र−ब्रह्मरन्ध्र में यथावत् विद्यमान है। इस स्थान को ‘सहस्रार’ कहते हैं। महाकाली− अग्नि जिह्वा चामुण्डा का बीजांश जननेन्द्रिय गह्वर−‘मूलाधार’ −में विद्यमान है। इन दो शक्तियों के असम्बद्ध बने रहने पर केवल उनकी उपस्थिति का आभास मात्र ही होता है, पर जब उन दोनों का संगम समागम हो जाता है तो अजस्र शक्ति की एक ऐसी धारा प्रवाहित हो उठती है जिसे अनुपम या अद्भुत ही कहा जा सकता है।
साधना का प्रथम चरण है शरीर का संशोधन। इसमें आहार और विहार में पिछले अभ्यासों को छोड़कर नवीन अवधारणाएँ कार्यान्वित करनी होती हैं। आहार के सम्बन्ध में हमारे अभ्यास स्वाद प्रधान होते हैं और ठूँस−ठूंसकर खाने को भी। यह दोनों ही व्यवहार आहार को तामसिक बना देते हैं। स्वाद वही उपयुक्त है जो पदार्थ में प्रकृति समाविष्ट होते हैं।
साधनाओं में उतावली करने वाले अधीर व्यक्ति सफल नहीं होते, उसका लाभ तो धैर्यवान और श्रद्धा को मजबूती के साथ पकड़े रहकर विश्वासपूर्वक निर्दिष्ट मार्ग पर अवसर होते रहने वाले साधक नैष्ठिक साधक ही उठा पाते हैं।
साधना का लाभ लेना है तो हर समय उच्च आदर्शों को ध्यान में रखकर जीवन चलाना होता है। मेरे पतिदेव ईश्वर आस्था और पुरुषार्थ के बल पर अनजान स्थानों पर लोकहित के लिए चले जाते हैं और सफल होते हैं। हम अपनी ईश्वर निष्ठा और पुरुषार्थ की परीक्षा और पुष्टि का प्रयास ऐसे ही अवसरों पर तो कर सकती हैं।’’
साधना द्वारा साधक की अन्तर्निहित बीच रूप शक्ति जागृत होकर ऊर्ध्वगामी बनती है। यह साधनाएं आत्मसत्ता को परमात्म सत्ता से जोड़ने, उस स्तर पर पहुँचाने में समर्थ है। इनके लिए सामान्य साधना क्रम से ऊपर उठकर कुछ विशिष्ट साधना प्रक्रियायें अपनानी पड़ती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उनका अलग−अलग विधान है, इसलिए उनका सार्वजनिक प्रकाशन करना न आवश्यक हैं और न उचित।
साधना क्रम से ऊपर उठकर कुछ विशिष्ट साधना प्रक्रियायें अपनानी पड़ती हैं। प्रत्येक व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उनका अलग−अलग विधान है, इसलिए उनका सार्वजनिक प्रकाशन करना न आवश्यक हैं और न उचित।
साधना भी चल पड़ती है। कुछ दिनों में तो वह बिना शिक्षितों के भी मौखिक रूप मे कंठस्थ हो जाता है।
साधना शास्त्रों ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि अपने ही भीतर विद्यमान इस महती क्षमता का ज्ञान प्राप्त किया जाय और उससे संपर्क साधने का प्रयत्न किया जाय। कुण्डलिनी परिचय के कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं−
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-June
साधना निश्चित समय निश्चित स्थान एवं एक निर्धारित विधि द्वारा किए जाने पर चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती है। साधना में प्रयोग किए जाने वाले पात्र एवं स्थान भी तप की ऊर्जा से असाधारण रूप से प्रभावित होते हैं। ऐसे ही स्थान तीर्थ, सिद्धपीठ, शक्ति पीठ बनते हैं। साधना में प्रयुक्त होने वाले पूजा पात्र माला आदि भी मंत्र शक्ति से अभिपूरित होते हैं तथा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते हैं।
साधना में साधक को हर कदम फूँक-फूँक कर धरना होता है और मात्र उचित ही अंगीकृत करना होता है। अनुचित चाहे कितना ही आकर्षक क्यों न हो, उससे कितना ही लाभ क्यों न दिख पड़ता हो, पर उसे विषवत् त्यागना होता है। ‘सोहम्’ साधना को अजपा जप या अजपा गायत्री कहा जाता है। इसे जीवात्मा अनायास ही अहिर्निशि जपता रहता है। श्वास-प्रश्वास द्वारा।
साधना में प्रयोग किए जाने वाले पात्र एवं स्थान भी तप की ऊर्जा से असाधारण रूप से प्रभावित होते हैं। ऐसे ही स्थान तीर्थ, सिद्धपीठ, शक्ति पीठ बनते हैं। साधना में प्रयुक्त होने वाले पूजा पात्र माला आदि भी मंत्र शक्ति से अभिपूरित होते हैं तथा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते हैं।
साधना के लिए चरण बढ़ाया जाय तो जब जब सूक्ष्म शरीर परिपक्व हो जाय। इनमें एक-एक महीना भी लगाया जा सकता है। इसके बाद फिर इनकी पुनरावृत्ति आरम्भ कर देनी है। निराकार साधना का क्रम जिनने अपनाया है उन्हें वह आजीवन चलाना है। इसी प्रकार बनता है कि उलट-पुलट कर एक महीना तीनों शरीरों में ऊर्जा प्रकाश की, सविता की स्थापना का क्रम चलाते रहा जाय।
साधना है। साकार प्रतिमाएं सभी कल्पित होती हैं। राम रहीम के जैसे चित्र बनाये गये, जैसी प्रतिमाएं गढ़ी गई हैं वे मनुष्य की अपनी कल्पना भर हैं। तथ्य से अवगत होने पर मन उस अवास्तविक के प्रति जमता नहीं और वास्तविकता खोजना ही वास्तविक उपासना है। सर्वव्यापी निराकार के अतिरिक्त वह किसी और के प्रति हो ही नहीं सकती।
साधना तथा सिद्धि की प्रखरता के आधार पर तानसेन को परास्त कर प्रतिशोध लेने का विचार किया। वीणा और वाद्य यन्त्र लेकर देवी सरस्वती के सम्मुख बैठा बैजू अहर्निश संगीत साधना में लगा रहने लगा।
साधना ऐसी है जिसे मत-मतान्तरों से ऊपर सार्वभौम अथवा सर्वजनीन कहा जा सकता है।
साधना का निश्चय किया और अपनी साधना तथा सिद्धि की प्रखरता के आधार पर तानसेन को परास्त कर प्रतिशोध लेने का विचार किया। वीणा और वाद्य यन्त्र लेकर देवी सरस्वती के सम्मुख बैठा बैजू अहर्निश संगीत साधना में लगा रहने लगा।
साधना में यह तीनों ही क्रियाएं होती रहती हैं और ‘शब्दब्रह्म’ की साधना भी। साँस लेने समय ‘सो’। रोकते समय (अ-इ) अर्ध आधार और छोड़ते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है उसे कुछ समय के अभ्यास से अनुभव में प्रत्यक्ष उतरने लगते हैं।
साधना में निरत रहने वाले वर्तमान उदाहरण यही बताते हैं।
साधना के सही स्वरूप को- हृदयंगम किया।
साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए क्या करना पड़ता है और कैसा बनना पड़ता है।
साधना करने वालों को दो मोर्चे फतह करने की प्रमुखता देनी होती है। जीभ का चटोरापन काबू में आ गया तो समझना चाहिए कि प्रथम चरण सही रूप से उठ गया। इसके साथ ही संयम युग्म में दूसरा चरण कामेन्द्रिय पर अनुशासन स्थापित करने का है। दोनों ने यदि शालीनता अपना ली हो तो समझना चाहिए कि मनोनिग्रह का प्रत्यक्ष, आरम्भिक और कठिन भाग पूरा हो गया। अब तृष्णा और अहन्ता पर अंकुश लगाना ही कठिन न रहेगा।
साधना से शरीर-क्रिया-विज्ञान पर पड़ने वाले सम्भावित प्रभावों की खोज का कार्य “न्यूरोफिजियॉलाजिस्ट” गणों ने किया है। अमेरिका, इंग्लैण्ड, पश्चिमी जर्मनी में ही नहीं अपितु भारत के विभिन्न संस्थानों में भी इस प्रकार व्यापक कार्य हो रहा है। त्रिवेन्द्रम, बैंगलौर, मद्रास व दिल्ली के चिकित्सा संस्थानों ने इस विद्या पर अनुसंधान हेतु विशेष केन्द्र खोले हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भी दिल्ली में डा. छिन्ना एवं डा. बलदेव सिंह ने आज से 9 वर्ष पूर्व यह कार्य प्रायोगिक स्तर पर किया था। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मननशील एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताऐं विकसित होती हैं।
साधना बताई। समर्थ नित्य दो हजार सूर्य नमस्कार और गायत्री का मानसिक जप करते थे। हनुमानजी के प्रति उनकी सहज श्रद्धा थी। वे हनुमान की तरह ही राम-काज करना चाहते थे। वही किया भी।
साधना हो जाती है। ध्यान से मन का बिखराव दूर होता है और प्रकृति को एक केन्द्र पर केन्द्रित करने से उससे एक विशेष मानसिक शक्ति उत्पन्न होती है। उससे जिस भी प्रयोजन के लिए- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाय उसी में जागृति-स्फुरणा उत्पन्न होती है। मस्तिष्कीय प्रसुप्त क्षमताओं को- षट्चक्रों को- तीन ग्रन्थियों को- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाय वही सजग हो उठता है और उसके अंतर्गत जिन सिद्धियों का समावेश है उनमें तेजस्विता आती है।
साधना एक अच्छा श्वास व्यायाम है इसके अतिरिक्त वह उपासना तो है ही।
साधना स्वयमेव चल पड़ती है।
साधना अथवा यज्ञ में काम आने वाले विभिन्न पात्रों का प्रयोग मात्र उसी प्रयोजन तक सीमित रखा जाय। कल्प सूत्रों की मर्यादा है कि निर्धारित कर्मकाण्ड समाप्त हो जाने पर उसका बचा हुआ द्रव्य, यातयाम, निर्वीय हो जाता है। कारण यह है कि उन पदार्थों को जिस उद्देश्य से अभिमंत्रित किया गया था वे उस उद्देश्य से भिन्न प्रयोजन के उपयुक्त नहीं है। यही कारण है कि विभिन्न कर्मकाण्डों के उपरान्त बचे द्रव्य आदि को नदी आदि में प्रवाहित कर देने का विधान है।
साधना उपासना के प्रति बचपन से ही बड़ी लगन थी। पर गाँव में आजीविका के स्त्रोत उपयुक्त नहीं थे। उनके बड़े भाई कलकत्ता रहते थे। उनने छोटे भाई को भी वहीं बुला लिया और कुछ बड़े होने पर दक्षिणेश्वर मन्दिर की पूजा-अर्चा का कार्य उन्हीं के जिम्मे आ गया।
साधना के लिए निर्धारित है। सूर्य किरणें स्थूल शरीर में प्रवेश करके उसमें ओजस भर देती हैं। आरोग्य बलिष्ठता तथा दीर्घजीवन का लाभ बरसाती हैं। इन्द्रियों में जो विषय विकार हैं, उन्हें जला देती हैं। दुष्कर्म करने में, दुर्व्यसनों में लिप्त होने की जो बुरी आदतें थीं वे इस सविता के प्रकाश से जलभुन कर नष्ट हो जाती हैं।
साधना में प्रयुक्त होने वाले पूजा पात्र माला आदि भी मंत्र शक्ति से अभिपूरित होते हैं तथा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते हैं।
साधना। इसे हंसयोग भी कहा गया है। यह अनायास ही सधता रहता है, किंतु लोग इसे भूले रहते हैं। इसे स्मृति पटल पर जागृत कर लिया जाय और अभ्यास में उतार लिया जाय तो बिना किसी अतिरिक्त कर्मकाण्ड के यह साधना स्वयमेव चल पड़ती है।
साधना में लगा रहने लगा।
साधना को अजपा जप या अजपा गायत्री कहा जाता है। इसे जीवात्मा अनायास ही अहिर्निशि जपता रहता है। श्वास-प्रश्वास द्वारा। किन्तु वह ध्यान एवं भाव के अभाव में प्रसुप्त स्तर की रहती है और उनका कोई प्रतिफल नहीं मिलता जिस भूमि पर भ्रमण कर रहे हैं उसके नीचे भले ही बहुमूल्य खजाना दबा पड़ा हो, पर जानकारी के अभाव में उसे न तो निकालने का प्रयत्न बन पड़ता है और न सदुपयोग की योजना के अभाव को कोई लाभ मिलता है।
साधना में प्रयुक्त होने वाले पात्रों का उपयोग अन्य किसी कार्य के लिए न किया जाय। इससे उनकी पवित्रता एवं शक्ति बनी रहती है। यह विधान भी है कि उपासना, साधना अथवा यज्ञ में काम आने वाले विभिन्न पात्रों का प्रयोग मात्र उसी प्रयोजन तक सीमित रखा जाय। कल्प सूत्रों की मर्यादा है कि निर्धारित कर्मकाण्ड समाप्त हो जाने पर उसका बचा हुआ द्रव्य, यातयाम, निर्वीय हो जाता है। कारण यह है कि उन पदार्थों को जिस उद्देश्य से अभिमंत्रित किया गया था वे उस उद्देश्य से भिन्न प्रयोजन के उपयुक्त नहीं है।
साधना में भक्त और भगवान दोनों मिलकर एकत्व का अनुभव करते हैं। जिस प्रकार नमक या शकर पानी में घुलकर एक रूप हो जाता है यह समर्पण भाव अद्वैत है।
साधना भी। साँस लेने समय ‘सो’। रोकते समय (अ-इ) अर्ध आधार और छोड़ते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है उसे कुछ समय के अभ्यास से अनुभव में प्रत्यक्ष उतरने लगते हैं।
साधनाएं की जाती हैं।
साधना और संयम के नाम मात्र से घबराया है॥
साधना में उपयुक्त माना जाता है, पर इस हंसयोग में उन सबका अनिवार्य प्रतिबन्ध नहीं है।
साधना को हंसयोग कहते हैं। इसमें शब्दों को उलटकर सोहम् का हंस तो बना ही है। साथ ही भगवान के 24 अवतारों में एक अवतार हंस भी है जिसका रहस्य ही नीर क्षीर विवेक। कहते हैं कि दूध और पानी मिलाकर सामने रखने पर हंस उसमें से पानी का अंश छोड़ देता है और मात्र दूध ही ग्रहण करता है। इस उदाहरण में साधक के लिए प्रेरणा है कि मात्र औचित्य को ही ग्रहण करें।
साधना को पूरी तन्मयता एवं विधि-विधान के साथ लम्बे समय तक किया फलस्वरूप गायत्री के मंत्र दृष्टा बने। विशिष्ट साधना निश्चित समय निश्चित स्थान एवं एक निर्धारित विधि द्वारा किए जाने पर चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती है। साधना में प्रयोग किए जाने वाले पात्र एवं स्थान भी तप की ऊर्जा से असाधारण रूप से प्रभावित होते हैं। ऐसे ही स्थान तीर्थ, सिद्धपीठ, शक्ति पीठ बनते हैं। साधना में प्रयुक्त होने वाले पूजा पात्र माला आदि भी मंत्र शक्ति से अभिपूरित होते हैं तथा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते हैं।
साधना के लिए किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। न समय का न स्थान का। स्नान जैसा भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी अवकाश हो, सुविधा हो, भाग दौड़ का काम न हो, मस्तिष्क चिन्ताओं से खाली हो। तभी इसे आरम्भ कर सकते हैं।
साधनारत रहकर अपने दृष्टिकोण को मानवी गरिमा के अनुरूप विकसित कर ले।
साधना के प्रतिफल दीन दुःखियों में वितरित करती रहें, उन्होंने आजीवन अपने पति का आदेश पालन किया। उन्हें वे औरों की तरह बाबा कहती थीं। सभी भक्तजन उन्हें साक्षात् देवी की प्रतिमा मानते थे। उनका व्यक्ति त्व भी ऐसा ही था।
साधना का क्रम जिनने अपनाया है उन्हें वह आजीवन चलाना है। इसी प्रकार बनता है कि उलट-पुलट कर एक महीना तीनों शरीरों में ऊर्जा प्रकाश की, सविता की स्थापना का क्रम चलाते रहा जाय।
साधना बन जाती है। श्वास-प्रश्वास के साथ एक सूक्ष्म ध्वनि होती है, वह सहज ही सुनने में नहीं आती। ध्यान एकाग्र करने पर कुछ समय में तीन शब्द उभरने लगते हैं। साँस खींचते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है। थोड़े अभ्यास से ही कुछ दिनों में इन ध्वनियों की अनुभूति होने लगती है।
साधना काल में यह अनुशासन उन्हें कूट-कूट कर सिखाया गया था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-December
साधना के लिए सावित्री विज्ञान का अध्यवसाय आरम्भ करने के लिए कुशल मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। रोगी की स्थिति देखकर जिस प्रकार चिकित्सक को उपचार का निर्धारण और परिवर्तन करना पड़ता है, उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र में परिशोधन और उत्कर्ष का प्रयोजन सिद्ध करने में उपयुक्त स्तर के मार्ग दर्शक की आवश्यकता पड़ती है। (क्रमशः)
साधना के सम्बन्ध में भी है। वह हर किसी के लिए एक जैसी नहीं हो सकती। जिसे आहार समय तक का अभ्यास नहीं, जो समय का अनुशासन का पाल नहीं सकता उसे सुलभ और हलकी−फुलकी साधना ही बताई जाती है। जिसमें लाभ भले ही अधिक न मिले पर हानि का खतरा तो नहीं। इसके विपरीत जिनने प्रारम्भिक साधना की कई कक्षाएँ उत्तीर्ण कर ली हैं उनके लिए अगले क्लास की बड़ी किताबें लानी पड़ती हैं।
साधना के उपलक्ष्य में श्रेय देने की परम्परा चली है। इसके साथ ही यह आशा भी की गई है कि वे वही कार्य करेंगे जो उनके पूर्ववर्ती करते रहे हैं। कर्त्तव्य से इन्कार करने पर तो अधिकार भी छिन जाता है। स्वर्णकार को आभूषण बनाने की कला आनी चाहिए और उसकी दुकान में यही सब सरंजाम रहना चाहिए। पर ऐसा कुछ न हो स्वर्णकार हजामत बनाने का धन्धा करने लगे तो फिर वर्ग में उसकी गणना कैसे होगी और आवश्यकता पड़ने पर उसे उस कार्य के लिए कौन पुकारेगा कौन उसके घर जाएगा।
साधना की। जबकि एक बार एक शिक्षक ने यहाँ तक कह दिया कि तुम्हारा स्वर संगीत के योग्य है ही नहीं। तुम्हारा स्वर लड़खड़ाता है पर निरन्तर अभ्यास और साधना से कारूसो ने संगीत−साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाईं और यह प्रामाणिक कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।
साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाईं और यह प्रामाणिक कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।
साधना पथ अपनाना चाहिए, जिस पर चलते हुए सुविधापूर्वक लक्ष तक पहुँचा जा सके।
साधना के सार संक्षेप के रूप में एक वर्ष तक लगातार जारी रहेगी]
साधना और पंचकोश
[यह धारावाहिक लेखमाला गुरुदेव की 2 वर्ष की एकान्त साधना के सार संक्षेप के रूप में एक वर्ष तक लगातार जारी रहेगी]
साधना का विशेष महत्व है। उसमें मन की भाग-दौड़ को किसी एक केन्द्र पर केन्द्रित करना पड़ता है। चिन्तन की भगदड़ को पकड़कर एक खूँटे से बाँधना पड़ता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के अभ्यासों में भी मन रुकता है और एकाग्रता की स्थिति बढ़ती जाती है।
साधना को ‘हंसयोग’ भी कहा गया है। चौबीस अवतारों में एक हंशावतार भी है। पक्षियों में सबसे पवित्र और उत्कृष्ट हंस माना जाता है। हंसयोग की साधना में सोहम् प्राणायाम से जीवात्मा में वे सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं जो हंस में पाई जाती हैं। नीर, क्षीर विवेक के कारण−सरोवर में से मुक्ता ढूँढ़ निकालने के कारण हंस की प्रशंसा है।
साधनाएँ यहाँ तो अपने सर्वसुलभ रूप में दी गयी हैं एवं सभी सुविधानुसार नियमित, समय निकालकर करनी होती हैं। फिर भी यह सन्देहास्पद रह जाता है कि कौन व्यक्ति किस स्तर की, कितनी देर किस क्रम से साधना करें। इससे ऊँचे स्तर की साधना के सोपान तो अत्यन्त रहस्यमय हैं। उनके लिए साधक की मनःस्थिति और परिस्थिति की जाँच पड़ताल करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य कोई अनुभवी एवं इस क्षेत्र का प्रवीण पारंगत व्यक्ति ही कर सकता है।
साधना का ही दूसरा नाम है।
साधना के सोपान तो अत्यन्त रहस्यमय हैं। उनके लिए साधक की मनःस्थिति और परिस्थिति की जाँच पड़ताल करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य कोई अनुभवी एवं इस क्षेत्र का प्रवीण पारंगत व्यक्ति ही कर सकता है। इसलिए अन्य साधनाओं की भाँति पंचकोशी गायत्री साधना के लिए सावित्री विज्ञान का अध्यवसाय आरम्भ करने के लिए कुशल मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। रोगी की स्थिति देखकर जिस प्रकार चिकित्सक को उपचार का निर्धारण और परिवर्तन करना पड़ता है, उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र में परिशोधन और उत्कर्ष का प्रयोजन सिद्ध करने में उपयुक्त स्तर के मार्ग दर्शक की आवश्यकता पड़ती है।
साधना से सम्बन्धित प्राण प्रकरण ही है। इसको पंचप्राण, सावित्री के पंचमुख कहते हैं। कुण्डलिनी जागरण रहस्य भी इसी प्राणाग्नि विद्या से संबंधित है।
साधना करने वाले योगी ही जहाँ−तहाँ मिलेंगे। ऋषियों की तलाश करने के लिए उन्हें वहाँ जाना पड़ेगा जहाँ सर्वसाधारण की पहुँच नहीं होती। वे स्थान हिमालय की कन्दराएँ हैं। उपयुक्त वातावरण उन्हें उसी क्षेत्र में मिलता है। शीत की प्रधानता से उनकी लक्ष्य यात्रा सरल पड़ती है और कौतुक प्रिय लोगों के आवागमन में उनके कार्य में विक्षेप भी नहीं पड़ता।
साधना में आत्म-बोध का पुट है। नादयोग से ईश्वर का वाणी, पुकार, निर्देशन को सुनने का अवसर मिलता है। शरीर और आत्मा की विभिन्नता अनुभव करते हुए आत्मा के लिए क्या किया जाना चाहिए इस पर ध्यानस्थ होकर विचार करना होता है। तब संसार के पीछे दौड़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती। वरन् अपने को जागरूक प्रहरी मानकर दूसरों की सुरक्षा के लिए सतर्क करने वाला मार्गदर्शन करना पड़ता है।
साधना वस्तुतः किसी देवी देवता या भगवान की मनुहार उपहार में बदले फुसलाकर मनमर्जी की चीजें पकड़ लेने की जादूगरी नहीं है। अधिकाँश लोग इसी विभ्रम में जहाँ तक भटकते और चित्र विचित्र पूजा पत्री के विधान करते हों तो भी हमें भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं। हमें शास्त्रकारों, आप्तजनों और अनुभवी पथ प्रदर्शकों का सार संक्षेप इसी रूप में अपनाना चाहिए कि साधना का पूरा नाम है जीवन साधना। जो इसके बहिरंग और अन्तरंग पक्षों को परिष्कृत कर लेते हैं, वे ही इस असली साधना के बदले यथार्थवादी सिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना के बदले यथार्थवादी सिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना करना एक उत्कृष्ट योगाभ्यास है। दीपक-राग, मेघ-राग जैसे स्वर ब्रह्म के नगण्य से स्थूल प्रकृति से सम्बन्धित चमत्कार है। सूक्ष्म प्रकृति को तरंगित ओर उत्तेजित करने में उसकी धाराएँ बदलने में भी संगीत का प्रभाव स्वल्प दृष्टिगोचर नहीं होगा। अन्य योगों की साधना का अवलम्बन लेकर जिस प्रकार उच्चकोटि की सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं, उसी प्रकार स्वर−योग की साधना से भी उच्च अध्यात्म की भूमिका में प्रवेश करके दिव्य विभूतियों को करतलगत किया जा सकता है, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के अन्तराल में नाद−ब्रह्म का गुञ्जन संव्याप्त, उसकी प्रतिध्वनि से पिण्ड की अन्तःस्थिति भी गूँजती रहती है। संगीत की स्वर−साधना इस अव्यक्त गुञ्जन को व्यक्त बनाती है मुखर करती है।
साधना से बढ़कर अन्य कोई अच्छा माध्यम नहीं, यही कारण रहा है कि देव संस्कृति की उपासना पद्धतियों से लेकर कर्मकाण्ड तक में सर्वत्र “स्वर” संयोजन अनिवार्य रहा है। मन्त्र भी वस्तुतः छन्द ही हैं। वेदों की प्रत्येक ऋचा का कोई ऋषि, कोई देवता तो होता ही है उसका कोई न कोई छन्द जैसे युष्टटुप, अनुष्टुप, गायत्री आदि भी होते हैं। इसका अर्थ ही होता है कि उस मन्त्र के उच्चारण की ताल, लय और गतियाँ भी निर्धारित हैं। अमुक फ्रीकोंसी पर बजाने से ही अमुक स्टेशन बोलेगा उसी तरह अमुक गति, लय और ताल के उच्चारण से ही मन्त्र सिद्धि होगी−यह उसका विज्ञान है।
साधनाएँ बताई यह उसका ही परिणाम था।
साधनाएँ बताई या कराई जा सकती हैं। इसका उत्तर ‘न’ में देना पड़ेगा। लम्बी तीर्थयात्रा में युवाओं के लिए लम्बी डगें भरते हुए जल्दी−जल्दी मार्ग तय कर सकना सरल है। पर यदि साथ में कोई बालक या वृद्ध हो तो उसकी क्षमता को देखते हुए सवारी का प्रबन्ध करना होगा अन्यथा एक जैसी गति अपनाने में बेचारे दुर्बलों का कचूमर निकल जाएगा।
साधना करनी पड़ती है। इन्द्रिय निग्रह की कड़ाई करनी पड़ती है। शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य पालन करना पड़ता है। बहिर्मुखी प्रवृत्तियों को अन्तर्मुखी करना पड़ता है। प्राणायामों में से अपनी स्थिति के अनुरूप किसी प्राणायाम को चुनना होता है।
साधनाओं की आवश्यकता पड़ती है। एकाग्रता साधन के लिए त्राटक साधना का विशेष महत्व है। उसमें मन की भाग-दौड़ को किसी एक केन्द्र पर केन्द्रित करना पड़ता है। चिन्तन की भगदड़ को पकड़कर एक खूँटे से बाँधना पड़ता है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के अभ्यासों में भी मन रुकता है और एकाग्रता की स्थिति बढ़ती जाती है।
साधना कम से कम लोक श्रद्धा की अजस्र वर्षा तो करेगी ही।
साधना में आत्मशोधन प्रधान है। आत्म-सत्ता पर चढ़े जन्म−जन्मान्तरों के कुसंस्कारों का− जब संपर्क से मिलने वाले दोष दुर्गुणों का निराकरण किया जाता है। मानवी गरिमा के अनुरूप जिस समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी की आवश्यकता पड़ती है उन्हें अर्जित किया जाता है। बुद्धि में दूरदर्शी विवेकशीलता−महाप्रज्ञा का−समावेश होता है। डडडड सब विशेषताओं के कारण मनुष्य इसी जीवन में देवोपम स्थिति को प्राप्त करता है।
साधना में पंचकोशों के अनावरण का विधान है। कुण्डलिनी जागरण में षट् चक्रों का वेधन करना होता है एवं कोश साधना में पाँच कोशों का। चक्रों और कोशों में राई रत्ती भर का अन्तर है। कुण्डलिनी जागरण, प्रचण्ड ज्वालमाल का प्रज्वलन है और पंचकोशी साधना में आवरणों को हटाते हुए शक्ति स्रोत तक पहुँचने का विधि−विधान। आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में छः और पाँच का मतभेद इसी प्रकरण से होता है।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं।
साधना से शरीरगत अलौकिक शक्तियों को प्रसुप्ति से ऊँचा उठाकर जागृति में लाया जाता है और यह जागरण इतना महत्वपूर्ण सिद्ध होता है कि उसके सहारे दृश्य जगत को अनुकूल बनाया जा सके। इन उपलब्धियों को सिद्धियाँ कहते हैं। सौर मण्डल की समस्त क्षमताएँ सूक्ष्म रूप से परमाणु में विद्यमान है। परमाणु की गतिविधियाँ और क्षमताएँ संक्षिप्त रूप में वही होती हैं जो परमाणु में पाई जाती हैं। ब्रह्माण्ड का समस्त समीकरण पिण्ड में विद्यमान है।
साधना ही बताई जाती है। जिसमें लाभ भले ही अधिक न मिले पर हानि का खतरा तो नहीं। इसके विपरीत जिनने प्रारम्भिक साधना की कई कक्षाएँ उत्तीर्ण कर ली हैं उनके लिए अगले क्लास की बड़ी किताबें लानी पड़ती हैं। स्कूल भर की सभी कक्षाओं में छात्रों के स्तर का ध्यान न रखते हुए एक ही पुस्तक पढ़ाई जाने लगे तो इस व्यवस्था को−उपहासास्पद ही कहा जाएगा। अखाड़ों के उस्ताद अपने शागिर्दों को मौसम के अनुसार कसरतों में परिवर्तन करते रहते हैं।
साधना करने और किन्हीं सिद्ध पुरुषों को ढूँढ़ निकालने का नहीं है। उस स्तर का अपने को बनाये बिना किसी सच्चे सिद्ध पुरुष को ढूँढ़ पाना भी कठिन है। उनका अनुग्रह और सहयोग पाना तो बहुत आगे की बात है।
साधना का पूरा नाम है जीवन साधना। जो इसके बहिरंग और अन्तरंग पक्षों को परिष्कृत कर लेते हैं, वे ही इस असली साधना के बदले यथार्थवादी सिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना नहीं की आदर्श एवं संयम को महत्व नहीं दिया वे कुकर्मों से धन या दर्प का लाभ भले ही उठालें, अन्य क्षेत्रों में उन्हें घाटा त्रास एवं तिरस्कार ही सहना पड़ता है।
साधना के सम्बन्ध में भी है। उसे साधक की इच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता। छोटे बच्चे जब बाजार जाते हैं तो हर चमकदार वस्तु को देखते ही पाने के लिए मचलते हैं। भले ही वह उनके काम की तनिक भी न हो। इसी प्रकार हो सकता है कि कोई मनचला साधक किसी भी देखे सुने कौतूहल के अनुरूप अपनी उत्सुकता बताने लगे और उसका तरीका सीखने के लिए मचलने लगे।
साधना से ही अर्जित किया जा सकता है। सिद्धियों का यह एक बड़ा पक्ष है।
साधना करने वालों को इस निरीक्षण परीक्षण में होकर सर्वप्रथम गुजरना पड़ता है। उनकी शारीरिक स्थिति को बहुमूल्य यन्त्र उपकरणों में इस प्रकार जाँचा जा सकता है मानो उसे किसी भयंकर रोग से मुक्ति दिलाने का कार्य परिपूर्ण उत्तरदायित्व के साथ होने जा रहा है। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक पर्यवेक्षण के लिए इतने प्रकार के उपकरणों में उसकी आन्तरिक स्थिति जाँची जाती है मानो उसे पुरातन काल की ‘काया−कल्प’ जैसी स्थिति के लिए तैयार किया जा रहा है। इस प्रयोजन के लिए शरीर शास्त्र और चिकित्सा शास्त्र के पोस्ट ग्रेजुएट बहुमूल्य ऐसे यन्त्र उपकरणों का प्रयोग यहाँ करते हैं जिनका आविष्कार अभी कुछ ही दिन पूर्व कंप्यूटर आदि के आने के बाद हुआ है।
साधना इस अव्यक्त गुञ्जन को व्यक्त बनाती है मुखर करती है। गान यदि उच्चस्तर का हो तो अन्तरात्मा की भाव सत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानन्द की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।
साधना की कई कक्षाएँ उत्तीर्ण कर ली हैं उनके लिए अगले क्लास की बड़ी किताबें लानी पड़ती हैं। स्कूल भर की सभी कक्षाओं में छात्रों के स्तर का ध्यान न रखते हुए एक ही पुस्तक पढ़ाई जाने लगे तो इस व्यवस्था को−उपहासास्पद ही कहा जाएगा। अखाड़ों के उस्ताद अपने शागिर्दों को मौसम के अनुसार कसरतों में परिवर्तन करते रहते हैं। इस प्रकार के परिवर्तन या भेदभाव को अनुचित नहीं कहा जा सकता। साधक तो बालकों की तरह हठ करके एम. ए. की सुन्दर जिल्द वाली पुस्तक पढ़ने का भी आग्रह कर सकते हैं।
साधनाओं की भाँति पंचकोशी गायत्री साधना के लिए सावित्री विज्ञान का अध्यवसाय आरम्भ करने के लिए कुशल मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। रोगी की स्थिति देखकर जिस प्रकार चिकित्सक को उपचार का निर्धारण और परिवर्तन करना पड़ता है, उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र में परिशोधन और उत्कर्ष का प्रयोजन सिद्ध करने में उपयुक्त स्तर के मार्ग दर्शक की आवश्यकता पड़ती है। (क्रमशः)
साधना। इसमें नादयोग का भी समावेश हो जाता है साँस खींचते समय सो और निकालते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है। इसका श्रवण कर्णेंद्रिय की सूक्ष्म तन्मात्रा के सहारे ही होता है। इस शब्द विन्यास में जब मन लगने लगता है तो न केवल मन की एकाग्रता प्रगाढ़ होती है वरन् आत्मा और परमात्मा के मिलन की सरस अनुभूति भी होने लगती है। ‘सोहम्’ साधना को ‘हंसयोग’ भी कहा गया है।
साधना से कारूसो ने संगीत−साधना में अभूतपूर्व सिद्धियाँ पाईं और यह प्रामाणिक कर दिया कि संगीत का सम्बन्ध स्वर से नहीं हृदय और भावनाओं से है। कोई भी मनुष्य अपने हृदय को जागृत कर परमात्मा के इस वरदान से विभूषित हो सकता है।
साधना करनी पड़ती है। आसनों में इस प्रयोजन के लिए शवासन या शिथिलीकरण मुद्रा का अधिक महत्व है।
साधनारत महामानव या तो कविताएँ रचते रहे हैं, या फिर छन्द−स्वरों में भगवान के गुणानुवाद गाते रहे हैं। महर्षि नारद से लेकर सूर, तुलसी, मीरा, कबीर तक की वही परम्परा क्रमबद्ध श्रृंखला के रूप में चली आई है।
साधना में पाँच कोशों का। चक्रों और कोशों में राई रत्ती भर का अन्तर है। कुण्डलिनी जागरण, प्रचण्ड ज्वालमाल का प्रज्वलन है और पंचकोशी साधना में आवरणों को हटाते हुए शक्ति स्रोत तक पहुँचने का विधि−विधान। आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में छः और पाँच का मतभेद इसी प्रकरण से होता है। कुण्डलिनी का उद्भव मूलाधार से होता है।
साधना की एक निश्चित सीमा होती है उसके बाद की साधना समाज और विश्व के हित साधन तथा लोक मंगल में जुटने की होती है। ऋषियों ने गृहस्थ में रहकर साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिए अन्त तक लगे रहे।
साधना ही अपना वास्तविक हित साधन है।
साधना से मुक्ति का मिलना निश्चित है। जिस भक्त को परमात्मा से सच्चा प्यार होता है, वह भक्त भी परमात्मा को प्यारा होता है। उपनिषद् का यह वाक्य ‘रसो वै सः’ इसी एक बात की पुष्टि करता है−परमात्मा प्रेम रूप है, इसका स्पष्ट तात्पर्य यही है कि जिसने प्रेम की सिद्धि कर ली है, उसने मानो परमात्मा की प्राप्ति कर ली है अथवा जहाँ प्रेमपूर्ण परिस्थितियाँ होंगी वहाँ परमात्मा का बास माना जायेगा। परमात्मा की प्राप्ति ही आनन्द का हेतु होता है।
साधना करता है। इन्द्रिय संयम से स्वास्थ्य और सन्तुलन बना रहता है। मानसिक संयम से उद्धत आकाँक्षाओं पर अंकुश लगता है फलतः शान्ति और सन्तोष दोनों ही बने रहते हैं। इस नीति को अपनाने से शरीर का ही नहीं आत्मा का भी हित साधन होता है। उसे आन्तरिक प्रफुल्लता रहती है और वह उद्देश्य सधता है जिसके लिए बहुमूल्य मानव शरीर धारण करने का सुयोग मिला है।
साधना है−समर्पण की।
साधना समाज और विश्व के हित साधन तथा लोक मंगल में जुटने की होती है। ऋषियों ने गृहस्थ में रहकर साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिए अन्त तक लगे रहे।
साधना जिसने कर ली, समझना चाहिए उसने अभाव, दारिद्रय और पिछड़ेपन से आत्यंतिक छुटकारा प्राप्त कर लिया। असंयमी कितना ही पूर्व संचित संप्रदायों का धनी हो, उसका वर्तमान उपार्जन कितना ही बढ़ा−चढ़ा क्यों न हो क्रमशः खोखला ही बनता चला जायेगा। अनाज को घुन और कपड़ों को दीमक जैसे छोटे कीड़े निगल जाते हैं। अदृश्य विषाणु शरीर में घुस पड़ते हैं तो अच्छी खासी काया को जर्जर बनाते और प्राण हरण का कारण बनते हैं। असंयम की गणना उस आग, तेजाब से की गई है जो जहाँ भी ठहरेंगे उसे जलाने−गलाने के उपरान्त ही चैन लेंगे।
साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिए अन्त तक लगे रहे।
साधनाओं से भी कठिनाई से मिलती है, वह स्वर योग के साधक को अनायास ही मिल जाती है।
साधना में आवरणों को हटाते हुए शक्ति स्रोत तक पहुँचने का विधि−विधान। आज्ञाचक्र के सम्बन्ध में छः और पाँच का मतभेद इसी प्रकरण से होता है। कुण्डलिनी का उद्भव मूलाधार से होता है। वह इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना मार्ग से होती हुई सहस्रार मस्तिष्क मध्य तक समाप्त हो जाती हैं। इस मेरुदण्ड मार्ग में पाँच चक्र ही पड़ते हैं।
साधना करें। इससे ऊँचे स्तर की साधना के सोपान तो अत्यन्त रहस्यमय हैं। उनके लिए साधक की मनःस्थिति और परिस्थिति की जाँच पड़ताल करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य कोई अनुभवी एवं इस क्षेत्र का प्रवीण पारंगत व्यक्ति ही कर सकता है। इसलिए अन्य साधनाओं की भाँति पंचकोशी गायत्री साधना के लिए सावित्री विज्ञान का अध्यवसाय आरम्भ करने के लिए कुशल मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है।
साधना का अवलम्बन लेकर जिस प्रकार उच्चकोटि की सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं, उसी प्रकार स्वर−योग की साधना से भी उच्च अध्यात्म की भूमिका में प्रवेश करके दिव्य विभूतियों को करतलगत किया जा सकता है, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के अन्तराल में नाद−ब्रह्म का गुञ्जन संव्याप्त, उसकी प्रतिध्वनि से पिण्ड की अन्तःस्थिति भी गूँजती रहती है। संगीत की स्वर−साधना इस अव्यक्त गुञ्जन को व्यक्त बनाती है मुखर करती है। गान यदि उच्चस्तर का हो तो अन्तरात्मा की भाव सत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानन्द की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।
साधना से भी उच्च अध्यात्म की भूमिका में प्रवेश करके दिव्य विभूतियों को करतलगत किया जा सकता है, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड के अन्तराल में नाद−ब्रह्म का गुञ्जन संव्याप्त, उसकी प्रतिध्वनि से पिण्ड की अन्तःस्थिति भी गूँजती रहती है। संगीत की स्वर−साधना इस अव्यक्त गुञ्जन को व्यक्त बनाती है मुखर करती है। गान यदि उच्चस्तर का हो तो अन्तरात्मा की भाव सत्ता को तरंगित करके ब्रह्मानन्द की आत्मानन्द की रसानुभूति करा सकता है।
साधना। जो इसके बहिरंग और अन्तरंग पक्षों को परिष्कृत कर लेते हैं, वे ही इस असली साधना के बदले यथार्थवादी सिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना में सोहम् प्राणायाम से जीवात्मा में वे सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं जो हंस में पाई जाती हैं। नीर, क्षीर विवेक के कारण−सरोवर में से मुक्ता ढूँढ़ निकालने के कारण हंस की प्रशंसा है। ऐसी ही विभूतियों को उपलब्ध करने में सोहम् साधना की प्राणायाम भी मदद करता है।
साधना की प्राणायाम भी मदद करता है।
साधना है। उस माध्यम को अपनाकर अपना और दूसरों का कल्याण किया जा सकता है सेवा बिना उदारता और त्याग के बन नहीं पड़ती। इनका अभ्यास ही आत्मा को उच्च स्थिति तक पहुँचाता है। तालाब में घुसे बिना तैरना नहीं आता, परमार्थ−प्रयोजनों में संलग्न हुए बिना यह सम्भव नहीं कि जिन सत्प्रवृत्तियों का गुणानुवाद स्वाध्याय एवं सत्संग में पढ़ा गया है। उनको व्यवहार में भी उतारा जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-July
साधनाएँ सधती हैं। इसलिए उनकी विशेष चर्चा इन पंक्तियों में नहीं की गई हैं और स्वादेन्द्रिय तथा कामेन्द्रिय के नियन्त्रण को इन्द्रिय निग्रह मान लिया गया है। मन के संयम का प्रारम्भिक एवं प्रत्यक्ष प्रयोजन इतने भर से सध जाता है।
साधना सरल है। चटोरा व्यक्ति जिह्वा को अनियन्त्रित करने के उपरान्त कामुकता का भी शिकार होता है। उसके मन में कामुक अनियंत्रण घूमता रहता है, जो समयानुसार फलित होकर ब्रह्मचर्य भंग एवं व्यभिचार जन्य क्रिया−कलापों तक जा पहुँचता है।
साधना या प्रक्रिया के आधार पर सम्भव हुआ इस ओर अधिक ऊहापोह नहीं हुआ है। परामनोविज्ञान इस अन्तर के संबंध में मौन है। उसे विलक्षणताओं से संबंध माना जाता है। इन्द्रिय जन्य सामान्य क्रिया-कलाप का व्यतिक्रम करके जो अतीन्द्रिय क्षमताएँ यदा-कदा—जहाँ-तहाँ दिख पड़ती हैं, उन्हीं के संबंध में यह टोह ली जाती है कि वह घटना क्रम वास्तविक हैं या अवास्तविक।
साधना का प्रथम चरण आहार संयम से आरम्भ होता है। व्रतों की व्याख्या करते हुए अस्वाद को प्रथम व्रत बताया गया है। गाँधी जी ने सप्त महाव्रतों की गणना करते हुए अस्वाद को प्रथम व्रत बताया है। इसमें आहार संयम ही नहीं इन्द्रिय निग्रह का भी समावेश है। जो स्वादेन्द्रिय पर काबू कर लेगा उसके लिए ब्रह्मचर्य व्रत की साधना सरल है।
साधना की आन्तरिक प्यास को पूरी करके कृत-कृत्य बनाता है।
साधना उतनी नहीं थी, उन्हें गुरु पक्ष से जो असाध्य अनुदान मिले उनके कारण वे इतना कुछ कर सके जितना एकाकी पुरुषार्थ से कदाचित् वे न कर पाते।
साधना की वह कसौटी है जिसमें तपकर जीवन विशुद्ध बनता है और ब्रह्म में मिलन की स्थिति प्राप्त करता है। जीव और परमात्मा के बीच जो तादात्म्य है वह अपने शुद्ध रूप में प्रेम द्वारा ही प्रकट होता है। प्रेम न होता तो इस पृथ्वी पर लोगों को आध्यात्मिक तत्वों की अनुभूति भी न होती। यह स्थिति प्रारम्भ में आत्मस्वरूप की प्राप्ति के लिये विकलता, विरह के रूप में प्रकट होती है पर जिन्हें स्वाभाविक रूप में वह स्थिति प्राप्त न हो और वे ईश्वर को प्राप्त करना अपने जीवन का उद्देश्य मान गये हों तो उन्हें भी प्रेम का अभ्यास करना पड़ता है। तप, त्याग और सुख की इच्छाओं का दमन कर अन्तःकरण की प्रेम-प्रवृत्ति को जागृत करना पड़ता है।
साधनाएँ भी सम्भव होती हैं। नासिका के गन्ध बोध रहने से उपयुक्त वातावरण का ज्ञान होता है और प्राणायाम जैसी साधनाएँ सधती हैं। इसलिए उनकी विशेष चर्चा इन पंक्तियों में नहीं की गई हैं और स्वादेन्द्रिय तथा कामेन्द्रिय के नियन्त्रण को इन्द्रिय निग्रह मान लिया गया है। मन के संयम का प्रारम्भिक एवं प्रत्यक्ष प्रयोजन इतने भर से सध जाता है।
साधना करनी चाहिए। कोई भी देख सकता है कि उदासी के रहते चेहरा कितना कुरूप दिखता है और अक्षमता का कितना विज्ञापन करता है। इसके विपरीत खिले फूल सा चेहरा कितना सुन्दर लगता है और कितनी तितलियाँ, मधु-मक्खियों को अपनी आश्रय पाने के लिए आमन्त्रित करता है।
साधना करने के प्रतिफल हैं। जिसने इतनी मंजिल पार कर ली उसकी “परापश्य” परा प्रज्ञा जागृत होती है और परमात्मा को देख सकने वाला तीसरा नेत्र- ज्ञानचक्षु खुलता है। फलस्वरूप वह दिख पड़ता है जिसकी ओर से विषम परायणों की आंखें बन्द रहती हैं।
साधना सेवा का समन्वित क्रम चलाते थे।
साधना से दूर रहते हैं, असंयमी जीवन जीते हैं। काम, क्रोध, लोभ−मोह, मद−मत्सर के भूत−प्रेम साथ लिए फिरते हैं। मात्र नाम उच्चारण अथवा कर्म काण्डों के क्रिया-कलाप से, पूजा-पत्री के उपहार उपचार भेंट करने से परमात्मा को प्राप्त करने के स्वप्न देखते रहते हैं, उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। हमें पहले वर्णमाला पढ़नी चाहिए। बीजगणित, रेखागणित का कार्य बाद में हाथ में लेना चाहिए।
साधना के बिना—उदारता और सज्जनता विकसित करना आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जप तप इसी पृष्ठभूमि पर उगते और फलते−फूलते हैं। मात्र कर्मकाण्डों के सहारे दिशा निर्धारण और स्वाध्याय सत्संग से उपयुक्त मार्ग−दर्शन होता है। जिस कल्प वृक्ष पर गौरव और वर्चस्व के फूल खिलते और फल लगते हैं वह आत्मशोधन के खाद और परमार्थ परायण का पानी पाकर ही ऊँचा उठता और किसी को छाया में बिठा कर अभीष्ट अनुदानों से निहाल करता है।
साधना सभी देशों के भक्तों एवं साधकों में देखी जाती है। उपनिषद् में भगवान को “मधुब्रह्म” कहा है यह उसका विशुद्ध प्रेममय स्वरूप ही है। परमात्मा प्रेम द्वारा ही मधुर होता है—‘मधुक्षरन्तितद्ब्रह्म’, जिससे मधु अर्थात् प्रेम प्रकीर्ण होता है वही ब्रह्म है। अपने इसी रूप में वे भक्त के लिये, आराधक के लिये पुत्र, धन आत्मीय स्वजन—इन सबसे बढ़कर प्रियतम हो जाते हैं।
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा में निरत रहने का अनुशासन है, वहाँ एक अनुबन्ध यह भी है कि वन क्षेत्र में रहा जाय। आरण्यक ही उस उच्चस्तरीय जीवनचर्या के लिए उपयुक्त स्थान हो सकते हैं। घिचपिच बसे, कोलाहल भरे नगरों और गन्दे गली−कूचों में ऐसा वातावरण होता है जिसमें आध्यात्मिकता पनपती नहीं। उस घुटन भरी विषाक्तता में उच्चस्तरीय भावनाएँ पनपने नहीं पाती और किया हुआ स्वाध्याय तथा सुना हुआ सत्संग निरर्थक चला जाता है। वातावरण की श्रेष्ठता कई कारणों पर अवलम्बित है।
साधना मार्ग पर चलने वाले भगवद् भक्तों को साधु और ब्राह्मणों की तरह अपरिग्रही बनना पड़ता है। औसत भारतीय स्तर का जीवन यापन करने के लिए जितने साधनों की नितान्त आवश्यकता है उतने न्याय और श्रम के उपार्जन से उपार्जित करने के पश्चात अपना शेष समय आत्म-शोधन के आवश्यक कार्यों में लगाना चाहिए। ईश्वर की सच्ची पूजा उसके विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने में है इसके लिए भी श्रम और साधन चाहिए। इसकी पूर्ति कर सकना उन्हीं के लिए सम्भव है जो निजी निर्वाह स्वल्प साधनों में करलें। जिसे निरर्थक का बोझ लादने की तृष्णा से छुटकारा मिलेगा वही ऊँचा उठ सकेगा।
साधना भी इसी को कहा जाता है। पुरातन काल के तत्त्वदर्शी अपनी काया में सन्निहित उन सूक्ष्म केन्द्रों को समझते थे साथ ही उन्हें प्रखर बनाने की विद्या का प्रयोग करके न केवल अपने को असामान्य बनाते थे वरन् अन्यान्यों को भी इस कौशल से लाभान्वित करते थे। यह गुह्य विद्या है तो भी यथार्थ और प्रचण्ड। जिनमें श्रद्धा हो वे अनुभवी प्रवीण पारंगतों के मार्गदर्शन में यह प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं और अभ्यास की परिणतियों से लाभान्वित हो सकते हैं। पिण्ड में ब्रह्माण्ड का समग्र ढाँचा विद्यमान है।
साधना के कोई गुप्त रहस्य हैं? क्या बीमारियों से निपटने की कोई चमत्कारी रसायनें हैं? इसका उत्तर नहीं में ही दिया जा सकता है। कारण कि इसमें यदि कहीं रहस्यवाद का समावेश होता तो शिक्षा से हजारों मील दूर रहने वाले प्राणी उन्हें किससे, क्यों कर सीखते और उस जटिल प्रणाली से अपरिचित रहने की स्थिति में ऋतु प्रकोपों को सहते हुए आहार तक का सुप्रबंध न होने की स्थिति में निरोग कैसे रह पाते?
साधना क्षेत्र में सर्वप्रथम पढ़ाया जाता है। पूजा−पाठ, जप, तप, देव−दर्शन, नदी सरोवर स्नान आदि की शिक्षा इसके बाद की है। संयम प्रथम, उपासना पश्चात्। संयम के बाद उपासना न ही उदारता का दूसरा चरण आता है। न्यूनतम में निर्वाह।
साधना के रूप में अनिवार्यतः अपनाया करते हैं। उन्हें किसी भी तरह तपस्वी योगी नहीं कहा जा सकता।
साधना कर सकते हैं।
साधना भले ही साठ वर्ष पूरे कर चुका हो, पर वस्तुतः वे इस प्रकार के गणित से बहुत ऊपर हैं। आत्माएँ न जन्मती हैं, न बढ़ती हैं और न मरती हैं। जो अजर अमर है उसकी किस पैमाने से नाप−तौल की जाय। वे भगवान बुद्ध के शब्दों में अनेक बार दुहराते रहे हैं कि जब तक एक भी प्राणी बँधन में बँधा है तब तक हमें स्वर्ग या मुक्ति में नहीं जाना। जब सभी पार हो चुके, मल्लाह के डाँड़ तभी रुकेंगे।
साधना का केन्द्र घोषित किया। लोग बड़ी श्रद्धा से आते एवं यहाँ उपासना कर प्राण शक्ति लेकर जाते हैं।
साधना में निरत हो गये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-May
साधना किये भी किन्हीं कृपालु आत्माओं के सहयोग से मिल जाते हैं।
साधना की अवगत होती हैं।
साधना के अंतर्गत आ जाता है।
साधना की वर्णमाला आरम्भ की जानी चाहिए। आत्मनिग्रह का शुभारम्भ इन्द्रिय दमन से आरम्भ होता है। इन्द्रियों में स्वादेंद्रिय प्रथम एवं प्रमुख है। उसके निग्रह में भूख से कम खाने का स्वल्पाहार का विधान तो है ही। सुपाच्य और मिलावटी स्वादों से रहित भी उसे होना चाहिए।
साधना के सम्बन्ध में प्रत्येक विचारशील परिजन को दृष्टि से सोचना चाहिए। दर्शन करने या कराने में अनुग्रह होने की बात सोचना बाल विनोद के अतिरिक्त वस्तुतः और कुछ है नहीं। उनको देखने के स्थान पर उनकी कही पर चलना कहीं अधिक महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी है, इसे परिजन इन दिनों अनुभव करते रह सकते हैं।
साधना की दृष्टि से सर्वप्रथम आहार ही ध्यान देने योग्य है। व्रत उपवास गृहस्थों तक के लिए सरल पड़ते हैं। हिन्दू धर्म में उन्हीं का महत्व और माहात्म्य अधिक माना गया है। संख्या की दृष्टि से उन्हीं का बाहुल्य है। कोई महीना ऐसा नहीं जिसमें कई-कई व्रत पर्व न पड़ते हों और उनमें उपवास का विधान न हो।
साधना के कारण हर किसी का मिलना-जुलना-भेंट परामर्श करना सम्भव नहीं रहा। पर इससे मनोविनोद में-नेत्र रंजन में-समय क्षेप में कमी आने के अतिरिक्त और कोई कमी नहीं हुई। इससे किसी की कुछ हानि नहीं हुई, न आगे होनी है। निकटवर्ती-साथी संगी लाभदायक होते हों दूर रहने वाले व्यर्थ सिद्ध होते हों, ऐसी भी कोई बात नहीं है। जुएं, खटमल, वस्त्र और बिस्तरों में चिपके रहते हैं।
साधना। अर्थात् आत्मशोधन। इसके लिए लोभ, मोह और अहंकार के भव बंधनों को शिथिल करना होगा। यही तीन हैं जो महिषासुर भस्मासुर, और वृत्तासुर की तरह मनुष्य को ईश्वर की प्रदत्त दिव्य सम्पदाओं को निगलते रहते हैं। इन्हीं की खुमारी में मनुष्य लालची, संग्रही बनता है।
साधना का लक्ष्य इसी को माना है और कहा है जब ॐकार ध्वनि स्पष्ट हो जाती है तो मन उसी में लय हो जाता है और समाधि जैसी स्थिति बन जाती है। यह सब नाद ब्रह्म के भेद हैं। शब्द योग की परिधि में स्वाध्याय और समस्त गद्य-पद्य रूप में होने वाली प्रक्रियाऐं सम्मिलित होती हैं।
साधना कर लेते हैं वे मृतात्माओं से उपयोगी वार्त्तालाप कर सकते हैं और ऐसे परामर्श एवं सहयोग प्राप्त कर सकते हैं जो आकस्मिक होते हैं और चमत्कारी कहे जाते हैं। कभी-कभी ऐसे सुयोग बिना साधना किये भी किन्हीं कृपालु आत्माओं के सहयोग से मिल जाते हैं।
साधना और आराधना के त्रिविध अवलम्बनों के साथ आगे बढ़ा और ऊंचा उठा है। उसने इसी मूल्य पर परोक्ष दैवी अनुकम्पा और प्रत्यक्ष सम्पदा प्राप्त की है। अनुयायियों के लिए भी यही राजमार्ग है। वे आंधी, तिरछी मनुहार के सहारे विभूतिवान बनने की आशा न करें। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के लिए इस राजमार्ग को छोड़कर कोई ‘‘शॉट कट’’ नहीं है।
साधना का भागीदार बनने का गौरव मिल सकता है।
साधना द्वारा उपलब्ध ब्रह्म परायणता के द्वारा क्या प्रयोजन सिद्ध करे। उस उपलब्धि को किस निमित्त लगायें? इसका उत्तर है- ‘ब्रह्म यज्ञ’ ब्रह्मयज्ञ अर्थात्- ज्ञानयज्ञ।
साधना उसी अनुपात से सहज ही सधती जाएगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1985-February
साधना सिद्ध कर ली थी। सूर्य किरणों को कानवेक्स लेन्स पर एकत्रित कर लिया जाय तो एक दो इंच की धूप से देखते−देखते अग्नि प्रकट हो जाती है। तनिक−सी भाप को एक नली में केन्द्रित कर लिया जाय तो रेल का शक्तिशाली इंजन द्रुतगति से दौड़ने लगता है। बन्दूक की नली में थोड़ी−सी बारूद अवरुद्ध कर लेने पर शीशे की गोली पिघल जाती है और निशाने को आरपार करती है। एकत्रीकरण के ऐसे चमत्कार हम आये दिन देखते हैं।
साधनाओं के मार्गदर्शक अपने शिष्यों को कहते हैं कि अपनाये हुए मार्ग पर जन्म-जन्मान्तरों तक आरूढ़ रहना चाहिए। एक जन्म में लक्ष्य पूरा न हो सके तो बिना उदास हुए उसे अगले जन्म में पूरा करने का संकल्प सुनिश्चित रखना चाहिए। जिनका मनोबल इतना प्रबल होता है ऐसे ही साधक सिद्ध पुरुष बनते हैं।
साधना क्षेत्र के विद्यार्थियों को सर्वप्रथम इन्द्रिय जप का अभ्यास करना चाहिए। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं और उनके अपने−अपने रस हैं। सामान्य स्तर के व्यक्ति इन्हीं में लटकते रहते हैं पीछे तृष्णा, अहन्ता की कल्पनाशील अभिलाषा जागृत होती और मनुष्य को कठपुतली की तरह नचाती है।
साधना ऐसी ही है जो इन रसस्रावों से संबंधित है। डोपामीन, एसिटील कोलीन, गाबा, सिरोटोनिन, एन्डार्फिन्सएनकेफेलीन्स के रूप में विद्यमान ये स्नायु रसायन एकाग्रता, प्रसन्नता, भावप्रवणता, आनंदानुभूति, जागृति, स्फूर्ति, स्मरण शक्ति, मेधा इत्यादि विशेषताओं से संबंधित हैं। ध्यान योग की उच्चस्तरीय साधनाएं सीधे इनके रसस्राव को प्रभावित करती व साधक में उपरोक्त विशेषताओं को उभारती हैं। विभिन्न मुद्रा, बंध, आहार−विहार के नियमों व नियम ध्यानयोग की साधना में सहायक भूमिका निभाते हैं। अतीन्द्रिय सामर्थ्यों में विचार संप्रेषण, दूर श्रवण, दूर−दर्शन, पदार्थ हस्तान्तरण आदि अनेकों आती हैं पर इनका सुनियोजित उपयोग अध्यात्म क्षेत्र के जो साधक करते हैं वे चमत्कारी प्रदर्शनों में स्वयं को उलझाते नहीं।
साधना में लगे रहे। सफलता का अपना महत्व है पर साधना पथ पर अन्त तक आरूढ़ रहना यह भी कम महत्व की बात नहीं है। उससे मनुष्य की गरिमा घटती नहीं है।
साधना के लिए एक मोटी अवधि बारह वर्ष की निर्धारित की गई है। जिनमें इतने समय का धैर्य और उत्साह होता है वे देर सबेर में−सिद्ध पुरुष सफल मानव होकर रहते हैं।
साधनाएं सीधे इनके रसस्राव को प्रभावित करती व साधक में उपरोक्त विशेषताओं को उभारती हैं। विभिन्न मुद्रा, बंध, आहार−विहार के नियमों व नियम ध्यानयोग की साधना में सहायक भूमिका निभाते हैं। अतीन्द्रिय सामर्थ्यों में विचार संप्रेषण, दूर श्रवण, दूर−दर्शन, पदार्थ हस्तान्तरण आदि अनेकों आती हैं पर इनका सुनियोजित उपयोग अध्यात्म क्षेत्र के जो साधक करते हैं वे चमत्कारी प्रदर्शनों में स्वयं को उलझाते नहीं। वे इनको लौकिक प्रयोजनों में नष्ट भी नहीं करते। स्नायुकोशों की जागृति के फलस्वरूप जो भी प्रतिक्रियाएं होती हैं वे उससे भली−भाँति अवगत होते हैं एवं इस उपलब्धि का प्रयोग लोकोपयोगी प्रयोजन हेतु ही होने देते हैं।
साधना में लीन थे। पास ही मैदान में एक ग्वाला अपने बैल चरा रहा था। उसे किसी आवश्यक कार्य से गाँव में जाना था। उसने सोचा पास में बाबा बैठे हैं, यह बीच−बीच में बैल देख लिया करेंगे तब तक मैं घर से लौट ही आऊँगा।
साधना कही जाती है। और साधना यदि सच्ची हो तो वह सिद्धि के लक्ष्य तक पहुँच कर रहती है। साधना के लिए एक मोटी अवधि बारह वर्ष की निर्धारित की गई है। जिनमें इतने समय का धैर्य और उत्साह होता है वे देर सबेर में−सिद्ध पुरुष सफल मानव होकर रहते हैं।
साधना का सुविस्तृत प्रकरण है। उसमें मूलाधार चक्र और सहस्रार चक्र को शक्ति केन्द्र माना गया है और दोनों को प्रखर प्रचण्ड बनाकर परस्पर सहयोग की स्थिति तक पहुँचा देना परम सिद्धि का आधार माना गया है। मूलाधार चक्र जननेन्द्रिय मूल में है और सहस्रार मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरन्ध्र में। यही दोनों केन्द्र उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव है। वे हेय प्रयोजन में अपनी शक्ति गंवाते रहते हैं।
साधना हेतु अभीष्ट सक्षमता प्रदान करती है। बहिरंग की दृष्टि से कितना ही सुन्दर, आकर्षक कोई क्यों न हो, जब तक उसके अन्तरंग में सक्रिय−रक्त में घुले हारमोन्स का स्तर नहीं, बदला जाता, वह भावनात्मक एवं आत्मिक दृष्टि से अपरिपक्व ही रहेगा। शारीरिक अंगों की असामान्यता जो होगी, वह अलग से विद्यमान रहेगी।
साधना इत्यादि द्वारा इस सामर्थ्य में अभिवृद्धि की जा सकती है। साधक के रोम−रोम से इसे फूटते देखा जा सकता है। वाणी के माध्यम से यही जैव विद्युत सक्रिय होती एवं व्यक्तियों तथा वातावरण को प्रभावित करती है।
साधना साधक के लिए विपत्ति खड़ी करती है। उन हानि को न केवल व्यक्ति विशेष सहन करता है वरन् परिवार का सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। दूसरों के बीच निंदा होती है। अपनी, साधना की, गुरु की, सभी की निन्दा होती है।
साधना बारह वर्ष में पूरी होती है और तब इस योग्य बनती है कि अभीष्ट सफलता के दर्शन हो सकें। यह बात अध्यात्मिक साधनाओं के लिए ही नहीं साँसारिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए समान रूप से सही है। कलाकार, संगीतकार, गायक, वादक, बनने के लिए जो महीने पन्द्रह दिन का समय पर्याप्त समझते हैं वे भूल करते हैं। साधक को कई मंजिलें पार करनी पड़ती हैं। उसमें सबसे पहली कठिनाई है।
साधना कराइये, तप कराइये जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।”
साधना यदि सच्ची हो तो वह सिद्धि के लक्ष्य तक पहुँच कर रहती है। साधना के लिए एक मोटी अवधि बारह वर्ष की निर्धारित की गई है। जिनमें इतने समय का धैर्य और उत्साह होता है वे देर सबेर में−सिद्ध पुरुष सफल मानव होकर रहते हैं।
साधना का एकाकी बाजीगर स्तर के खेल तमाशे में नष्ट करके स्वयं छूँछ बन जाते हैं। संचित भण्डार समाप्त हो जाने पर करामात दिखाने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है।
साधना अभीष्ट है उन्हें मन देवता की मनुहार करनी पड़ती है। वही गुरुओं का गुरु है। बाहर वालों के दिये हुए उपदेश इस कान सुनकर उस कान निकल जाते हैं। पर यदि किसी तथ्य को हृदयंगम कर ले तो वह पत्थर की लकीर बन जाते हैं।
साधना क्रम सुविस्तृत है, पर उसका सार संक्षेप इतने में ही समझना चाहिए कि आध्यात्मिक काम विज्ञान के सिद्धान्तों का समग्र परिपालन किया जाय। नर नारी साथ−साथ तो रहें, स्नेह और सहयोग भी करें, पर उसमें कामुकता के विष का प्रवेश न होने दें। बाँध में नदी का पानी रोक देने पर पानी का इतना एकत्रीकरण हो जाता है कि उसमें से अनेकों नहर निकल सकें और सुविस्तृत भूमि खण्डों को हरा−भरा फूला फला बनाया जा सके। पानी न रोका जाय तो वह बहता और घटता रहेगा और अन्त में गहरे समुद्र मैं गिरकर ऐसा खारा पानी बन जायेगा जो पीने के भी काम न आ सके।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं, जिनमें निर्धारित विधि विधान में तनिक भी भूल नहीं होनी चाहिए। भूल करने पर साधक को क्षति उठानी पड़ सकती है। कई बार तो वह क्षति इतनी बड़ी होती है कि प्राण संकट जैसा व्यवधान सामने आ खड़ा होता है उनको साधने के लिए कठोर अनुशासन के निर्वाह की साहसिकता चाहिए। विधि−विधान पर अटूट श्रद्धा और तन्मयता चाहिए। बीच में मन उचट जाने, श्रद्धा डगमगा जाने में साधना खण्डित हो जाने का डर रहता है।
साधना पथ पर अन्त तक आरूढ़ रहना यह भी कम महत्व की बात नहीं है। उससे मनुष्य की गरिमा घटती नहीं है।
साधना में ब्रह्मचर्य का बहुत महत्व बताया गया है उसे तेजस् का भण्डार कहा गया है। मनोबल उसी पर निर्भर रहता है। ओजस् तेजस् और वर्चस् जन्य विभूतियों का तादात्म्य ब्रह्मचर्य के साथ रहता है। यदि वह क्षीण होता रहे तो मनुष्य आत्मबल गँवा देगा। सामान्य बुद्धिबल तक घट जाता है फिर प्रज्ञा और मेधा का तो कहना ही क्या है?
साधना−उपादानों के माध्यम से इस अविज्ञात शक्ति समुच्चय से खींचती है।
साधना करने वालों के शरीर एवं मन जिस अन्न जल से जिस संपर्क संसर्ग में जिस ढाँचे में ढल गये हैं उसका एक बार नये सिरे से काया−कल्प करना पड़ेगा। छुरी चाकू मामूली लोहे में भी ढल जाते हैं पर तोपें ढालने के लिए उनमें अष्ट धातुओं का संमिश्रण प्रयुक्त करना पड़ता है। अन्यथा इतनी अधिक और इतनी तेज बारूद का धमाका होने से निशाना सही स्थान पर लगना तो दूर, वह तोप ही टुकड़े−टुकड़े हो जायेगी। आज की स्थिति के अनुरूप अध्यात्म शक्ति का उद्भव और प्रकटीकरण करने के लिए परोक्ष जगत में क्रियाशील तपःपूत आत्माओं को काया−कल्प स्तर का प्रयोग करना पड़ रहा है। एक नहीं अनेकों उच्चस्तरीय आत्माएँ उस प्रयोग में लगी हैं जिससे आत्मिकी की परिष्कृति से चमत्कारी नवयुग का आगमन सम्भव हो सके।
साधनाओं में अनेकों दृष्टि से साम्य है। इन सभी में स्थूल चेतना को सूक्ष्म बनाया एवं ध्यान योग के माध्यम से उसका सुनियोजन किया जाता है। माध्यम कुछ भी हो, लक्ष्य एक ही है− अन्तः की प्रसुप्त सामर्थ्य का उभार−जागरण−उन्नयन। यह कैसे सम्भव हो पाता है, इसे सूक्ष्म संरचना के परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। यह विवरण गुह्य है, रहस्यमय है एवं रोचक भी।
साधना खण्डित हो जाने का डर रहता है। खण्डित साधना साधक के लिए विपत्ति खड़ी करती है। उन हानि को न केवल व्यक्ति विशेष सहन करता है वरन् परिवार का सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। दूसरों के बीच निंदा होती है। अपनी, साधना की, गुरु की, सभी की निन्दा होती है।
साधना का उपक्रम बनाया गया था। अतएव उसका स्वरूप कुछ भिन्न था लेकिन आज की परिस्थितियाँ, आवश्यकता और वातावरण का प्रवाह ही भिन्न नहीं है वरन साधना करने वालों के शरीर एवं मन जिस अन्न जल से जिस संपर्क संसर्ग में जिस ढाँचे में ढल गये हैं उसका एक बार नये सिरे से काया−कल्प करना पड़ेगा। छुरी चाकू मामूली लोहे में भी ढल जाते हैं पर तोपें ढालने के लिए उनमें अष्ट धातुओं का संमिश्रण प्रयुक्त करना पड़ता है। अन्यथा इतनी अधिक और इतनी तेज बारूद का धमाका होने से निशाना सही स्थान पर लगना तो दूर, वह तोप ही टुकड़े−टुकड़े हो जायेगी। आज की स्थिति के अनुरूप अध्यात्म शक्ति का उद्भव और प्रकटीकरण करने के लिए परोक्ष जगत में क्रियाशील तपःपूत आत्माओं को काया−कल्प स्तर का प्रयोग करना पड़ रहा है।
साधना में सहायक भूमिका निभाते हैं। अतीन्द्रिय सामर्थ्यों में विचार संप्रेषण, दूर श्रवण, दूर−दर्शन, पदार्थ हस्तान्तरण आदि अनेकों आती हैं पर इनका सुनियोजित उपयोग अध्यात्म क्षेत्र के जो साधक करते हैं वे चमत्कारी प्रदर्शनों में स्वयं को उलझाते नहीं। वे इनको लौकिक प्रयोजनों में नष्ट भी नहीं करते। स्नायुकोशों की जागृति के फलस्वरूप जो भी प्रतिक्रियाएं होती हैं वे उससे भली−भाँति अवगत होते हैं एवं इस उपलब्धि का प्रयोग लोकोपयोगी प्रयोजन हेतु ही होने देते हैं। चेतना के चतुर्थ आयाम की यह वह स्थिति है जिसमें विभूतियाँ अनायास ही हस्तगत हो जाती हैं।
साधना कर डाल।’’ उनका तात्पर्य था, ‘‘गायत्री महामन्त्र का एक वर्ष में एक महापुरश्चरण करते हुए चौबीस वर्षों में चौबीस महापुरश्चरण सम्पन्न करना।’’ विधि−विधान उनने संक्षेप में बता दिया। यह अवधि जौ की रोटी और छाछ पर बिताने की आज्ञा दी ताकि इन्द्रिय संयम से लेकर अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम तक की समस्त मनोनिग्रह प्रक्रियाएँ सम्पन्न हो सकें और तत्वज्ञान धारण कर सकने की पात्रता परिपक्व हो सके। उनका संकेत था− ‘‘इतना कर सका तो आगे का मार्ग बताने हम स्वयं अबकी भाँति फिर आएंगे।
साधना करनी पड़ती है। यह भक्त सन्तों का, सन्त सज्जनों का मार्ग है। इस आधार पर जो शक्ति प्राप्त होती है। वह आत्म−कल्याण तथा जन−कल्याण दोनों ही प्रयोजनों के काम आती है। गाँधी, तिलक, सुभाष, नेहरू, पटेल, विनोबा आदि की साधनाएं ऐसी ही थीं।
साधना की, गुरु की, सभी की निन्दा होती है।
साधनाओं के सम्बन्ध में उन्हें गुह्य रखने का ही अनुशासन है। सत्पात्र साधक मिले तो ही उन्हें सिखाये जाने का निर्देशन है।
साधना के अनुभव अभी तक सर्वसाधारण को विदित नहीं हैं। उनके सम्बन्ध में कहा जाता रहा है कि वे हमारे जीवित रहते प्रकाशित न होंगे। सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया ऐसी है उसे अदृश्य होना समझा जा सकता है। इसलिए उन अनुभवों में से कुछ को प्रकाशित करने में हर्ज नहीं समझा गया।
साधनाएं हारमोन्स को सीधे प्रभावित कर उच्चस्तरीय साधना हेतु अभीष्ट सक्षमता प्रदान करती है। बहिरंग की दृष्टि से कितना ही सुन्दर, आकर्षक कोई क्यों न हो, जब तक उसके अन्तरंग में सक्रिय−रक्त में घुले हारमोन्स का स्तर नहीं, बदला जाता, वह भावनात्मक एवं आत्मिक दृष्टि से अपरिपक्व ही रहेगा। शारीरिक अंगों की असामान्यता जो होगी, वह अलग से विद्यमान रहेगी।
साधना में ही निरत रहते हैं। इसी एक प्रयोजन के लिए वे विभिन्न विधि−विधान अपनाते हैं। जिसे जितनी सफलता मिल जाती है वह उसी स्तर का चमत्कारी सिद्ध पुरुष बन जाता है। ऋद्धि−सिद्धियों का उद्गम और कार्यक्षेत्र मानोलोक में ही सीमित और विस्तृत है। यह उक्ति अक्षरशः सत्य है कि जिसने मन जीता उसने संसार को जीत लिया।
साधनाएं ऐसी ही थीं। उन्हें भी एक प्रकार के योग साधक ही कह सकते हैं। यह मार्ग सबके लिये खुला है। इसकी शिक्षा किसी भी श्रेष्ठ सज्जन के परामर्श से किसी को भी उपलब्ध हो सकती है। स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन मनन से भी यह शालीनता का मार्ग किसी को भी सहज सुलभ हो सकता है।
साधना से जी चुराते हैं उन्हें असफल रहना पड़ता है। भले ही वे उसका दोष किन्हीं व्यक्तियों, परिस्थितियों, ग्रह नक्षत्रों को लगाते रहें।
साधना समग्र हुई मानी जाती है।
साधना कब तक चलेगी। कहाँ चलेगी? किस रूप में चलेगी? इसका स्वरूप और उद्देश्य सीध उन्हीं से सम्बन्धित है। इसलिए उसका प्रकटीकरण अब एकाकी उन्हीं तक सीमित रहेगा।
साधनारत देखते हैं पर स्थूल शरीर से अन्य उपयुक्त व्यक्तियों के माध्यम से ऐसे कृत्य करते कराते रहते हैं जो संसार के हित साधन में महत्वपूर्ण सहायता करें।
साधना उपक्रमों के सहारे तो इस सामर्थ्य को और भी अधिक विकसित कर परिष्कृत रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
साधनाओं के लिए ही नहीं साँसारिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए समान रूप से सही है। कलाकार, संगीतकार, गायक, वादक, बनने के लिए जो महीने पन्द्रह दिन का समय पर्याप्त समझते हैं वे भूल करते हैं। साधक को कई मंजिलें पार करनी पड़ती हैं। उसमें सबसे पहली कठिनाई है। चित्त की ऊब से निपटना।
साधना के अनुभव
साधनाएँ चल रही हैं उसका परिणाम निष्फल न होगा। गुरुदेव की इन दिनों इसी विशेष प्रयोजन के लिए चल रही है।
साधना समग्र निष्ठा के साथ आरम्भ कर दी। कुटुम्बियों−सम्बन्धियों ने इसी प्रयोजन में 8 घण्टे नित्य बिताने की 24 वर्ष लम्बी प्रतिज्ञा की बात सुनी तो सभी खिन्न हुए। अपने−अपने ढंग से समझाते रहे। जौ पर निर्वाह इतने लम्बे समय तक शरीर को क्षति पहुँचाएगा। विद्या पढ़ना रुक गया तो भविष्य में क्या बनेगा।
साधनाओं में आत्मश्लाघा प्रदर्शित करने के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं सधता। अस्तु प्रज्ञावान साधक खेल-खिड़वाड़ों में अपना समय नष्ट नहीं करते एकाग्रता सम्पादन का उद्देश्य पहले पूरा करते हैं।
साधना से सम्भव हो पाता है। निदिध्यासन, ध्यान धारणा, प्रत्याहार, समाधि की अवस्था में ये केन्द्र जाग्रत होते एवं सूक्ष्म “माइजेन” कणों एवं न्यूट्रीनो कणों के माध्यम से व्यष्टि चेतना का समष्टि चेतना से संपर्क स्थापित कर देते हैं। चेतना की सर्वोच्च स्थिति आनन्दमय कोश के जागरण की स्थिति में आती है। मस्तिष्क नहीं, मन में संव्याप्त चेतना के ऊर्ध्वीकरण का यह सोपान जब पूरा हो जाता है, पंचकोशी साधना समग्र हुई मानी जाती है।
साधना का स्तर जैसे−जैसे सूक्ष्म प्रखर होता जाता है, सीढ़ियाँ उतनी ही ऊँची साधक चढ़ता चला जाता है। विज्ञानमय कोश जागरण की साधना ऐसी ही है जो इन रसस्रावों से संबंधित है। डोपामीन, एसिटील कोलीन, गाबा, सिरोटोनिन, एन्डार्फिन्सएनकेफेलीन्स के रूप में विद्यमान ये स्नायु रसायन एकाग्रता, प्रसन्नता, भावप्रवणता, आनंदानुभूति, जागृति, स्फूर्ति, स्मरण शक्ति, मेधा इत्यादि विशेषताओं से संबंधित हैं। ध्यान योग की उच्चस्तरीय साधनाएं सीधे इनके रसस्राव को प्रभावित करती व साधक में उपरोक्त विशेषताओं को उभारती हैं। विभिन्न मुद्रा, बंध, आहार−विहार के नियमों व नियम ध्यानयोग की साधना में सहायक भूमिका निभाते हैं।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं। उनके लिए मनोबल को असाधारण स्थिति तक पहुँचाने के लिए असाधारण स्तर की ऐसी साधनाएँ करनी पड़ती हैं, जिनमें निर्धारित विधि विधान में तनिक भी भूल नहीं होनी चाहिए। भूल करने पर साधक को क्षति उठानी पड़ सकती है। कई बार तो वह क्षति इतनी बड़ी होती है कि प्राण संकट जैसा व्यवधान सामने आ खड़ा होता है उनको साधने के लिए कठोर अनुशासन के निर्वाह की साहसिकता चाहिए। विधि−विधान पर अटूट श्रद्धा और तन्मयता चाहिए।
साधना प्रक्रिया द्वारा शरीर स्थिति प्राण प्रवाह को जागृत एवं प्रचण्ड बना सकना संभव है। यह विद्युत ऊर्जा सामान्यतः चमक, ताजगी, उत्साह, स्फूर्ति के रूप में क्रियाशील देखी जा सकती है। प्रतिरोधी सामर्थ्य का मूल आधार यही जीवनी शक्ति है। एवं सोऽहम् की हंस योग साधना इत्यादि द्वारा इस सामर्थ्य में अभिवृद्धि की जा सकती है। साधक के रोम−रोम से इसे फूटते देखा जा सकता है।
साधना की अनिवार्य आवश्यकता मानी है। कहा गया है कि साधक को सिद्धि मिली है। जो सिद्धि चाहते हैं पर साधना से जी चुराते हैं उन्हें असफल रहना पड़ता है। भले ही वे उसका दोष किन्हीं व्यक्तियों, परिस्थितियों, ग्रह नक्षत्रों को लगाते रहें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-August
साधना है। साधना, मानव जीवन की प्रत्येक गुत्थी को सुलझाने वाली, प्रत्येक कठिनाई को समाधान करने वाली मानी जाती है। यह मान्यता असत्य नहीं है। आत्मा पर छाये हुए मल विक्षेपों को जो साधना हटा सकती है वह सुख शांति की प्रगति और उन्नति के द्वारा भी खिल सकती है। आत्म निर्माण की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था ही साधना के नाम से पुकारी जाती है।
साधना विज्ञान का ही एक अभिन्न अंग है।
साधना द्वारा संस्कृति के आधार पर उस पर संस्कार डाले जाते हैं। तभी वह संस्कृत एवं सभ्य कहलाने का अधिकारी बनता है। इसी प्रयत्न से उसकी प्रसुप्ति स्थिति में पड़ी हुई महान् विशेषताएँ विकसित होती हैं।
साधना एवं साधन ही प्रधान कारण है। यदि उनकी ओर उपेक्षा रखी जाय तो असंस्कृत स्थिति ही बनी रहेगी। जिनकी मनोभूमि का सावधानी पूर्वक निर्माण नहीं हुआ है, वे अपने प्रयत्नों से किसी भौतिक सफलताओं में सफल भले ही हो गये हों, आन्तरिक दृष्टि से हीन दशा में ही पड़े रहेंगे और यह हीनता उन्हें कभी भी महान् पुरुष की, सभ्य नागरिक की, श्रेष्ठ मानव की स्थिति में न पहुँचने देगी। यह अभाव मानव जीवन का सबसे बड़ा अभाव है।
साधना कार्य में लगा हुआ समय किसी भी प्रकार कम उपयोगी-कम लाभदायक नहीं है। प्राचीन काल में प्रत्येक नर-नारी की, बाल वृद्ध की दिनचर्या में साधना के लिए अनिवार्य रूप से स्थान रहता था। फलस्वरूप उन्हें आत्म निर्माण का महान् लाभ प्राप्त होता था और उसके फलस्वरूप भौतिक उन्नति एवं सुविधाओं का द्वार सहज ही प्रशस्त रहता था और वे लोक और परलोक दोनों को ही सफल बनाते हुए मानव जीवन के अलभ्य अवसर का पूरा सत्परिणाम प्राप्त कर लेते थे। आज साधना पथ का परित्याग करके हम आध्यात्मिक उन्नति से वंचित हो रहे हैं, साथ ही आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण भौतिक जीवन की कठिनाइयों और असफलताएँ भी बढ़ती जाती हैं।
साधना, भौतिक दृष्टि से, लौकिक उन्नति और सुख सुविधा की दृष्टि से बहुत उपयोगी है। इस पथ पर चलने वाला पथिक दिन-दिन इस संसार में अधिकाधिक आनंद दायक परिस्थितियाँ उपलब्ध करता जाता है। उसकी प्रगति के द्वार तेजी से खुलते जाते हैं। पारलौकिक दृष्टि से तो यह आत्म शुद्धि की साधना महान् पुरुषार्थ ही है। जीवन लक्ष की पूर्ति इसी में है।
साधना के दो भेद हैं (1) भावात्मक (2) क्रियात्मक। स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन यह चार कार्य भावात्मक साधना के अंतर्गत आते हैं। इनसे विचारों की, दृष्टिकोण की भावना की शुद्धि होती है। क्रियात्मक साधना से संस्कारों का संशोधन एवं पोषण होता है। जो अशुभ संस्कार मनोभूमि में गहराई से जमे हैं उन्हें उखाड़ने का कार्य क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।
साधना के अंतर्गत यह बात भी आती है, पर उसका क्षेत्र इतना ही नहीं-इससे कहीं अधिक विस्तृत है। भौतिक और आध्यात्मिक ही है।
साधना हटा सकती है वह सुख शांति की प्रगति और उन्नति के द्वारा भी खिल सकती है। आत्म निर्माण की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था ही साधना के नाम से पुकारी जाती है। आत्म निर्माण कार्य किसी विशाल कार्यालय या कारखाने के निर्माण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस महान् कार्य को सम्पन्न करने वाली पद्धति साधना की महानता स्वल्प नहीं महान् ही है।
साधना महान् पुरुषार्थ ही है। जीवन लक्ष की पूर्ति इसी में है। मुक्ति और स्वर्गं का एक मात्र मार्ग भी यही है।
साधना मार्ग की अनेकों बाधाएँ तथा कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं और आत्मिक प्रगति में बड़ी सुविधा रहती है। शरीर शोधन के लिए कल्प चिकित्सा करने वालों को पहले वमन, विरेचन, स्वेद आदि के द्वारा भीतर भरे हुए मलों का निष्कासन करना पड़ता है और तब कोष्ठ शुद्धि होने पर औषधि सेवन का विधान चलता है। इसी प्रकार आन्तरिक दुखों का परिशोधन करने के लिए विविध तपश्चर्याएँ करनी पड़ती हैं। किस व्यक्ति के लिए कैसी तपश्चर्या अनुकूल पड़ेगी, किस दुरित का समाधान करने के लिए किस तपश्चर्या का विधान है यह भी विज्ञ मार्ग दर्शकों के परामर्श से निश्चय किया जा सकता है।
साधना द्वारा ही संभव होता है।
साधना का उद्देश्य शरीर और मन में भरे हुए कुसंस्कारों का परिमार्जन करना है। जिस प्रकार स्वर्ण की अशुद्धता अग्नि में तपाने से नष्ट होती हैं उसी प्रकार आत्मा पर चढ़े हुए मल विक्षेप भी तपश्चर्या की अग्नि में जल जाते हैं। पापों का प्रायश्चित्त भी कष्ट साध्य तपों द्वारा ही होता है। चांद्रायण, कृच्छ चांद्रायण आदि कठोर व्रत उपवास इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं। एक महीने तक एक-एक आस प्रतिदिन घटाने बढ़ाने के क्रम से आहार लेना और पंचतत्व (गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर) ग्रहण करना चांद्रायण व्रत का एक अंग है।
साधना का अपना अलग ही विज्ञान है जिसमें अमुक संस्कार में संस्कारित वस्तुओं की सहायता से, विभीषिका युक्त तपश्चर्या का माध्यम अपना कर प्रकृति की किन्हीं शक्तियों का माध्यम अपना कर प्रकृति की किन्हीं शक्तियों को यशस्वी किया जाता है। शव साधन, यक्षिणी विजय, अधिकार प्रयोजन, पक्का मकर, भैरवी चक्र, अघोर कृत्य आदि कितने ही ऐसे साधन वाम मार्गी तन्त्र ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं। उस मार्ग के साधक गुरु परम्परा से प्राप्त गुप्त विधानों की गोपनीयता नष्ट नहीं होने देते और उन्हें केवल परीक्षित शिष्यों को ही बताते हैं। तन्त्र साधना भौतिक लाभों एवं चमत्कारों की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है पर आत्म कल्याण की दृष्टि से उसका कुछ भी उपयोग नहीं है। वरन् उलटी बाधक सिद्ध होती है।
साधना ही अभीष्ट है। दिन काटने की हीन स्थिति से आगे बढ़कर किसी ने यदि भली या बुरी दिशा में कुछ प्रगति की है तो उसे उस दिशा में साधना अवश्य करनी पड़ी है। साधना ही वह कल्पवृक्ष है जिसकी छाया में मनुष्य के विविध मनोरथ पूरे होते हैं।
साधना, सोऽहम् तत्त्व, अजपा गायत्री प्रभृति अनेकों चमत्कारी एवं दिव्य शक्ति सम्पन्न साधन प्राण विद्या से ही संबंधित हैं।
साधना के नाम से पुकारी जाती है। आत्म निर्माण कार्य किसी विशाल कार्यालय या कारखाने के निर्माण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस महान् कार्य को सम्पन्न करने वाली पद्धति साधना की महानता स्वल्प नहीं महान् ही है।
साधना शास्त्र का अधिकांश भाग गृहस्थ नर-नारियों के लिए ही है। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, गुरु व्यवस्था, शरीर रक्षा आदि कार्यों के लिए नियमित समय लगाया जाता है उसी प्रकार यदि एक दो घंटे भी साधना कार्य के लिए दृढ़ निश्चय के साथ नियम कर लिये जाय तो उतने में ही बहुत प्रगति हो सकती है। आत्मिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और आत्म बल की अभिवृद्धि साधना पर ही निर्भर है।
साधनाएँ सरल हैं। उन्हें गृहस्थ जीवन-यापन करते हुए कोई भी व्यक्ति आसानी से कर सकता है। मन मर्जी से बिना विधि-विधान के करने पर उनका अभीष्ट लाभ नहीं मिलता किन्तु यदि सही मार्ग दर्शन उपलब्ध हो जाए तो उनसे बड़ा लाभ होता है। भौतिक जीवन की अनेक समस्याएँ सुलझती हैं और पारलौकिक, अध्यात्मिक जीवन की सुख शांति का द्वारा खुलना आरंभ हो जाता है। संन्यासी और विरक्तों के लिए योगाभ्यास की कुछ विशेष साधनाएँ भी हैं पर साधना शास्त्र का अधिकांश भाग गृहस्थ नर-नारियों के लिए ही है।
साधनाएँ भी अनेक प्रकार की है। भक्तियोग, ध्यान साधना का ही एक अंग है। अमुक देवताओं या अवतारों की मूर्तियों की पूजा तथा उनकी छवि का स्मरण करते हुए ईश्वरीय प्रेम का जागरण करना ध्यान योग का ही एक विशेष विधान है। निराकार उपासक ज्योति का धारा प्रवाह चिंतन करते हैं। नाद योग भी इसी के अंतर्गत आता है।
साधना के लिए घर या व्यवसाय छोड़ने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। गृहस्थ योग अपने आप में एक सर्वांग पूर्ण योग है। उसे यदि साधनात्मक दृष्टि से ग्रहण किया जाय तो पूर्णता प्राप्ति के लिए वह भी एक सर्वांगीण सुंदर साधन हो सकता है। कितनी ही साधनाएँ तो ऐसी हैं जो हर किसी के लिए सुगम और सुविधाजनक है। जैसे सूर्य नमस्कार एवं आसनों की सरल व्यायाम पद्धति बूढ़े से लेकर बच्चे तक सभी के उपयोग की हैं।
साधनात्मक दृष्टि से ग्रहण किया जाय तो पूर्णता प्राप्ति के लिए वह भी एक सर्वांगीण सुंदर साधन हो सकता है। कितनी ही साधनाएँ तो ऐसी हैं जो हर किसी के लिए सुगम और सुविधाजनक है। जैसे सूर्य नमस्कार एवं आसनों की सरल व्यायाम पद्धति बूढ़े से लेकर बच्चे तक सभी के उपयोग की हैं। उनसे शरीर की ही नहीं मनोबल की भी पुष्टि होती है। गर्भिणी और दुर्बल प्रकृति की महिलाएँ भी कुछ आसनों से अपनी स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों को स्वयं हल कर सकती हैं।
साधना अवश्य करनी पड़ी है। साधना ही वह कल्पवृक्ष है जिसकी छाया में मनुष्य के विविध मनोरथ पूरे होते हैं।
साधना की आवश्यकता एवं उपयोगिता का महत्व हमारी दृष्टि में और भी अधिक बढ़ा है। अभी फिलहाल मथुरा से बाहर चले जाने का हमारा कार्यक्रम नहीं है।
साधना कहा जाता है। इसे ही संस्कृति भी कहते हैं। ऐसा मनुष्य भी एक पशु ही है, उसमें भी सब पाशविक दुर्गुण मौजूद हैं पर साधना द्वारा संस्कृति के आधार पर उस पर संस्कार डाले जाते हैं। तभी वह संस्कृत एवं सभ्य कहलाने का अधिकारी बनता है। इसी प्रयत्न से उसकी प्रसुप्ति स्थिति में पड़ी हुई महान् विशेषताएँ विकसित होती हैं।
साधनाओं का मूल उद्देश्य आत्म निर्माण है। जीवन की सारी समस्याओं का उलझना-सुलझना बहुत कुछ मनुष्य की आन्तरिक स्थिति पर निर्भर रहता है। यों कभी-कभी कठिन प्रारब्ध भोग भी मार्ग में विघ्न बाधा बनकर अड़ जाते हैं और हटते-हटते बहुत परेशान कर लेते हैं, पर आमतौर से जीवन की गति विधि व्यक्ति की अपनी निजी मनोभूमि पर आधारित रहती है।
साधना को हाई स्कूल और ध्यान को कालेज मानना पड़ेगा। प्राणायामों के अनेक भेद हैं। आठ इनमें से प्रधान हैं। 84 प्राणायामों का परिचय, साधना ग्रन्थों में मिलता है। शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने में, मनोबल बढ़ाने में, चित्त की चंचलता रोकने में, विकार वृत्तियों पर नियंत्रण करने में, प्राणायामों का विशेष महत्व है।
साधना के अंतर्गत आते हैं। इनसे विचारों की, दृष्टिकोण की भावना की शुद्धि होती है। क्रियात्मक साधना से संस्कारों का संशोधन एवं पोषण होता है। जो अशुभ संस्कार मनोभूमि में गहराई से जमे हैं उन्हें उखाड़ने का कार्य क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है। शुभ संस्कारों का बीजारोपण तथा उनका परिपोषण भी क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।
साधना पथ के पथिकों के लिए प्रवचनों की उतनी आवश्यकता नहीं होती जितनी परमार्थ की। इसलिए आने वालों को परामर्श के लिए उचित समय मिल सके इस दृष्टि से यह उचित समझा गया है कि यहाँ अधिक भीड़ इकट्ठी न होने दी जाय और उतने ही लोग आवें जिनके साथ खुले मन से विचार विनिमय का अवसर रहे। जिन्हें कभी तपोभूमि पधारना हो वे अपने आने की पूर्व सूचना देकर एवं स्वीकृति प्राप्त करके ही आवें। इसी से सीमित संख्या वाली बात निभ सकेगी।
साधना का ही मार्ग अपना पड़ेगा। जीवन लक्षण की सफलता अभीष्ट हो तो साधना आवश्यक है, अनिवार्य है, यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा।
साधना नितांत आवश्यक है।
साधना कार्य के लिए दृढ़ निश्चय के साथ नियम कर लिये जाय तो उतने में ही बहुत प्रगति हो सकती है। आत्मिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और आत्म बल की अभिवृद्धि साधना पर ही निर्भर है।
साधना से ही नहीं, नियत कर्तव्य कर्म निष्ठा पूर्व करते रहने से भी आध्यात्मिक लक्ष’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।
साधना जीवन का सर्वश्रेष्ठ, सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाता था। जब तक यहाँ प्रक्रिया भारतवर्ष में चलती रही यह प्रत्येक क्षेत्र में महानता का, उत्कृष्टता का, समृद्धि और सफलता का बोल बाला रहा। अब उस दिशा में जितनी ही उपेक्षा होती है, उतनी ही अशान्ति और अव्यवस्था बढ़ती जा रही है। प्राचीन गौरव की तुलना में हम दिन दिन नीचे उतर रहे हैं।
साधना का एक अंग है पर वही सब कुछ नहीं हैं। दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा कर अपने अंदर की असुरता को समाप्त करने और सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण करके अन्तः भूमिका में देवताओं जैसे स्वर्गं सोपान की स्थापना करने का वैज्ञानिक प्रयास ही साधना का वास्तविक उद्देश्य है। ऐसी ही साधना प्राचीनकाल में होती थी आज भी आत्म निर्माण की दृष्टि से, वैयक्तिक ओर सामूहिक सुख-शान्ति की दृष्टि से ऐसी ही साधना की आवश्यकता है। साधना के साथ ही हर क्षेत्र की सफलता जुड़ी हुई है। आत्म निर्माण की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी हमें साधना का ही मार्ग अपना पड़ेगा।
साधना के अनेक भेद सन्निहित हैं। तंत्र साधना का अपना अलग ही विज्ञान है जिसमें अमुक संस्कार में संस्कारित वस्तुओं की सहायता से, विभीषिका युक्त तपश्चर्या का माध्यम अपना कर प्रकृति की किन्हीं शक्तियों का माध्यम अपना कर प्रकृति की किन्हीं शक्तियों को यशस्वी किया जाता है। शव साधन, यक्षिणी विजय, अधिकार प्रयोजन, पक्का मकर, भैरवी चक्र, अघोर कृत्य आदि कितने ही ऐसे साधन वाम मार्गी तन्त्र ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं। उस मार्ग के साधक गुरु परम्परा से प्राप्त गुप्त विधानों की गोपनीयता नष्ट नहीं होने देते और उन्हें केवल परीक्षित शिष्यों को ही बताते हैं। तन्त्र साधना भौतिक लाभों एवं चमत्कारों की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है पर आत्म कल्याण की दृष्टि से उसका कुछ भी उपयोग नहीं है।
साधना पथ पर अग्रसर साधक को भी अपने क्रमिक विकास के अनुरूप समय-समय पर अपने साधन विधान में हेर-फेर करना आवश्यक होता है। रोग के लक्षणों में हेर फेर होने और बीमारी घटने-बढ़ने पर कुशल वैद्य चिकित्सा, व्यवस्था, परिचर्या एवं पथ्य में परिवर्तन करते हैं। इसी प्रकार अन्तः स्थिति के उतार चढ़ाव के अनुसार साधन विधानों में भी हेर फेर की अपेक्षा रहती है। अनुभवी और विश्वासी मार्गदर्शक की सहायता से ही इस प्रकार का परिवर्तन ठीक प्रकार बन पड़ता है।
साधनाओं में संलग्न होना है। इसीलिए अपनी अपूर्णता दूर होगी और इसी से देश, जाति, समाज एवं विश्व की सच्ची सेवा भी बन पड़ेगी।
साधना प्राचीनकाल में होती थी आज भी आत्म निर्माण की दृष्टि से, वैयक्तिक ओर सामूहिक सुख-शान्ति की दृष्टि से ऐसी ही साधना की आवश्यकता है। साधना के साथ ही हर क्षेत्र की सफलता जुड़ी हुई है। आत्म निर्माण की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी हमें साधना का ही मार्ग अपना पड़ेगा। जीवन लक्षण की सफलता अभीष्ट हो तो साधना आवश्यक है, अनिवार्य है, यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा।
साधना का अर्थ केवल भजन-पूजन समझा जाता है और किसी देवी देवता से कुछ सिद्धि वरदान प्राप्त करना या परलोक में मुक्ति का अधिकारी बनना उसका उद्देश्य माना जाता है। साधना के अंतर्गत यह बात भी आती है, पर उसका क्षेत्र इतना ही नहीं-इससे कहीं अधिक विस्तृत है। भौतिक और आध्यात्मिक ही है।
साधना गोपनीय रखने की परम्परा भी है। जितना अंश सर्व साधारण के लिए उपयोगी था वह छप चुका है। कोई और भी बात बताने योग्य होगी तो आगे छप जाएगी। अब तो इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि हम स्वस्थ और सानन्द लौटे हैं और साधना की आवश्यकता एवं उपयोगिता का महत्व हमारी दृष्टि में और भी अधिक बढ़ा है। अभी फिलहाल मथुरा से बाहर चले जाने का हमारा कार्यक्रम नहीं है।
साधनाएँ करने के लिए घर छोड़कर किन्हीं पवित्र वातावरण के स्थानों में रहने की आवश्यकता हो सकती है। जीवन के अंतिम भाग में वानप्रस्थ जैसा विरक्त जीवन भी इस दृष्टि से उपयोग हो सकता है पर साधारण साधना के लिए घर या व्यवसाय छोड़ने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। गृहस्थ योग अपने आप में एक सर्वांग पूर्ण योग है। उसे यदि साधनात्मक दृष्टि से ग्रहण किया जाय तो पूर्णता प्राप्ति के लिए वह भी एक सर्वांगीण सुंदर साधन हो सकता है। कितनी ही साधनाएँ तो ऐसी हैं जो हर किसी के लिए सुगम और सुविधाजनक है।
साधना उनसे कराई जाती थी। वर्णाश्रम धर्म, षोडश संस्कार, व्रत, पर्व, त्यौहार, तीर्थ, कथा, कीर्तन, अनुष्ठान, तप, संयम आदि की पृष्ठ भूमि, व्यक्ति की मनोभूमि को उच्च स्तर की ओर अग्रसर करती ही हैं।
साधनाएँ भी हैं पर साधना शास्त्र का अधिकांश भाग गृहस्थ नर-नारियों के लिए ही है। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, गुरु व्यवस्था, शरीर रक्षा आदि कार्यों के लिए नियमित समय लगाया जाता है उसी प्रकार यदि एक दो घंटे भी साधना कार्य के लिए दृढ़ निश्चय के साथ नियम कर लिये जाय तो उतने में ही बहुत प्रगति हो सकती है। आत्मिक स्वास्थ्य की सुरक्षा और आत्म बल की अभिवृद्धि साधना पर ही निर्भर है।
साधना का वास्तविक उद्देश्य है। ऐसी ही साधना प्राचीनकाल में होती थी आज भी आत्म निर्माण की दृष्टि से, वैयक्तिक ओर सामूहिक सुख-शान्ति की दृष्टि से ऐसी ही साधना की आवश्यकता है। साधना के साथ ही हर क्षेत्र की सफलता जुड़ी हुई है। आत्म निर्माण की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी हमें साधना का ही मार्ग अपना पड़ेगा। जीवन लक्षण की सफलता अभीष्ट हो तो साधना आवश्यक है, अनिवार्य है, यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा।
साधना एवं साधन ही हैं। व्यक्ति गीली मिट्टी के समान है निश्चय ही वह साधनों के आधार पर, साधनाओं के आधार पर ढाला जाता है, ढलता है।
साधना के संबंध में कुछ प्रकाश पिछले पृष्ठों में डाला जा चुका है। क्रियात्मक साधना के अनेक उपक्रम हैं जिनका उपयोग साधक की निष्ठा अभिरुचि एवं परिस्थिति के अनुरूप किया जाता है।
साधना पथ के पथिकों का मार्ग दर्शन कार्य ही प्रधान रूप से करेगी। सदस्य उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा करें। सदस्यों और तपोभूमि के बीच के संबंध सूत्र का प्रधान माध्यम यह पत्रिका ही है। जो इसे नहीं पढ़ते वे उस मार्ग दर्शन से वंचित ही रहेंगे जो उपासकों को मिलना आवश्यक है। लेख भी अब उसमें विशिष्ट उद्देश्य के ही रहेंगे।
साधना के लिए अनिवार्य रूप से स्थान रहता था। फलस्वरूप उन्हें आत्म निर्माण का महान् लाभ प्राप्त होता था और उसके फलस्वरूप भौतिक उन्नति एवं सुविधाओं का द्वार सहज ही प्रशस्त रहता था और वे लोक और परलोक दोनों को ही सफल बनाते हुए मानव जीवन के अलभ्य अवसर का पूरा सत्परिणाम प्राप्त कर लेते थे। आज साधना पथ का परित्याग करके हम आध्यात्मिक उन्नति से वंचित हो रहे हैं, साथ ही आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण भौतिक जीवन की कठिनाइयों और असफलताएँ भी बढ़ती जाती हैं।
साधना पर ही निर्भर है।
साधना, मानव जीवन की प्रत्येक गुत्थी को सुलझाने वाली, प्रत्येक कठिनाई को समाधान करने वाली मानी जाती है। यह मान्यता असत्य नहीं है। आत्मा पर छाये हुए मल विक्षेपों को जो साधना हटा सकती है वह सुख शांति की प्रगति और उन्नति के द्वारा भी खिल सकती है। आत्म निर्माण की वैज्ञानिक विधि व्यवस्था ही साधना के नाम से पुकारी जाती है। आत्म निर्माण कार्य किसी विशाल कार्यालय या कारखाने के निर्माण से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।
साधना के ही अंग हैं। जीवन समस्याओं को सुलझाने में सहायक सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना हर विचारशील धर्मप्रेमी व्यक्ति का एक दैनिक नित्यकर्म होना चाहिए। आज किन्हीं पौराणिक कथा ग्रन्थों या आज हजारों लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति के अनुरूप मार्ग दर्शन करने वाले संस्कृत ग्रन्थों का बार-बार पढ़ना ही स्वाध्याय माना जाता है। यह मान्यता अस्वाभाविक है। आज हमें ऐसी पुस्तकों के स्वाध्याय की आवश्यकता है जो वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक हो सकें।
साधना तथा ध्यान योग द्वारा मनोबल की दो कक्षाएँ आती हैं। जप को प्राथमिक पाठशाला मानें तो प्राण साधना को हाई स्कूल और ध्यान को कालेज मानना पड़ेगा। प्राणायामों के अनेक भेद हैं। आठ इनमें से प्रधान हैं। 84 प्राणायामों का परिचय, साधना ग्रन्थों में मिलता है।
साधना करते हैं और स्थिर चित्त एवं उत्साह के साथ दीर्घकाल तक उसी ओर लगे रहे तो एक दिन अच्छे खिलाड़ी-अच्छे पहलवान, अच्छे नट और सुंदर सुडौल निरोग दीर्घायु बनने में सफल होते हैं। शिक्षा की दृष्टि से उन्नति करने के इच्छुक शिक्षालयों में प्रविष्ट होते हैं, शिक्षकों का मार्ग दर्शन ध्यान पूर्वक ग्रहण करते हैं। पाठ्यक्रम को हृदयंगम करने के लिए दिन रात पढ़ते हैं, इस प्रकार प्रयत्न करते करते वे एक दिन विद्वान् बन जाते हैं। आर्थिक क्षेत्र में प्रगति करने वाले व्यापार आदि के साधन जुटाते हैं, उनकी बारीकियों को समझने के लिए आवश्यक शिक्षण प्राप्त करते हैं, ग्राहकों को आकर्षित करने की व्यवस्था सीखते हैं। भारी दौड़ धूप करते हैं, प्रतिस्पर्धा में टिके रहने की कुशलता बरतते हैं, अपव्यय को रोकते हैं तब कहीं इस अर्थ साधना से धनवान् बनने की सिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना की महानता स्वल्प नहीं महान् ही है।
साधनाओं में परिवर्तन करते रहना चाहिए। जिस प्रकार कक्षाएँ उत्तीर्ण करता हुआ छात्र, अगली कक्षा में अपने पाठ्यक्रम को बदलता है उसी प्रकार साधना पथ पर अग्रसर साधक को भी अपने क्रमिक विकास के अनुरूप समय-समय पर अपने साधन विधान में हेर-फेर करना आवश्यक होता है। रोग के लक्षणों में हेर फेर होने और बीमारी घटने-बढ़ने पर कुशल वैद्य चिकित्सा, व्यवस्था, परिचर्या एवं पथ्य में परिवर्तन करते हैं। इसी प्रकार अन्तः स्थिति के उतार चढ़ाव के अनुसार साधन विधानों में भी हेर फेर की अपेक्षा रहती है। अनुभवी और विश्वासी मार्गदर्शक की सहायता से ही इस प्रकार का परिवर्तन ठीक प्रकार बन पड़ता है।
साधना ही वह कल्पवृक्ष है जिसकी छाया में मनुष्य के विविध मनोरथ पूरे होते हैं।
साधना का उद्देश्य है-मनोभूमि का परिष्कार। आत्मा के गुह्य गह्वर में बहुत कुछ ही नहीं सब कुछ भी भरा हुआ है। परमात्मा की सारी सत्ता एवं शक्ति उसके पुत्र आत्मा को स्वभावतः प्राप्त है। मनुष्य ही ईश्वर का उत्तराधिकारी युवराज है। उसकी संभावनाएँ महान् हैं।
साधना द्वारा ही संभव होता है। शुभ संस्कारों का बीजारोपण तथा उनका परिपोषण भी क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।
साधना का ही एक अंग है। अमुक देवताओं या अवतारों की मूर्तियों की पूजा तथा उनकी छवि का स्मरण करते हुए ईश्वरीय प्रेम का जागरण करना ध्यान योग का ही एक विशेष विधान है। निराकार उपासक ज्योति का धारा प्रवाह चिंतन करते हैं। नाद योग भी इसी के अंतर्गत आता है। सूक्ष्म जगत में जो नाना प्रकार की ध्वनियाँ होती रहती हैं उन्हें एकाग्रता पूर्वक सुनना और उनके आधार पर अदृश्य क्षेत्र में हो रही हलचलों का पता लगाना नाद योग का काम है।
साधना के नाम पर आज देवी देवताओं की पूजा पाठ का कर्मकाण्ड शेष रह गया है। यह अपूर्ण है। देवान् भी आत्म साधना का एक अंग है पर वही सब कुछ नहीं हैं। दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा कर अपने अंदर की असुरता को समाप्त करने और सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण करके अन्तः भूमिका में देवताओं जैसे स्वर्गं सोपान की स्थापना करने का वैज्ञानिक प्रयास ही साधना का वास्तविक उद्देश्य है। ऐसी ही साधना प्राचीनकाल में होती थी आज भी आत्म निर्माण की दृष्टि से, वैयक्तिक ओर सामूहिक सुख-शान्ति की दृष्टि से ऐसी ही साधना की आवश्यकता है।
साधना का कार्य अत्यन्त ही उपयोगी एवं आवश्यक है। शुष्क उपदेशों के द्वारा तो यह कार्य बनने वाला नहीं है। इसके लिए साधना का मार्ग उसी प्रकार अपनाना पड़ेगा जिस प्रकार धन, स्वास्थ्य, विद्या, यश आदि की प्राप्ति के लिए सुनिश्चित प्रयास करना पड़ता है।
साधना से हमारे अन्तःप्रदेश का ऐसा शोधन ,परिष्कार एवं अभिवर्धन होता है जिसके फलस्वरूप सर्वतोमुखी उन्नति का स्वर्गं द्वार खुले और जो विघ्न बाधाएँ प्रगति का मार्ग रोकते हैं उन्हें हटाया जा सकें? पिछले पृष्ठों पर लौकिक समस्याओं के सुलझाने में साधना किस प्रकार सहायक होती है इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाला गया है।
साधनाएँ भी प्राप्त कर रहे हैं और सफलताएँ भी प्राप्त कर रहे हैं इससे एक क्षण के लिए लगता है कि बुद्धिमत्ता की मात्रा इन दिनों काफी बढ़ी है। पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की ओर जन साधारण की ओर उपेक्षा देखकर दूसरे ही क्षण ऐसा लगता है मानों दूर दर्शिता का, सूक्ष्म दृष्टि का दिवाला ही निकल गया हो। मनुष्य का वास्तविक विकास उसके सद्गुणों, उच्च विचारों, श्रेष्ठ विचारों और सुदृढ़ आदर्शों पर निर्भर रहता है। यदि यह निर्माण न हुआ तो धन, पद, स्वास्थ्य, योग्यता आदि की दृष्टि से कोई व्यक्ति कितना ही बढ़ा चढ़ा क्यों न दिखे अपने आपमें सदा असंतुष्ट रहेगा और उसके संपर्क में आने वाले लोक खिन्न एवं क्रुद्ध ही रहेंगे। दुर्गुणी दुर्भावना युक्त, दुश्चरित्र, आदर्शहीन, स्वार्थी, अशिष्ट, अहंकारी, बुरी आदतों में ग्रसित, दुर्व्यसनों आलसी, प्रमादी लोग अपनी भौतिक योग्यताओं आधार पर बाहर से सफल भले ही दिखें वस्तुतः वे नितान्त असफल ही होती हैं।
साधना करनी पड़ती थी। आत्म निर्माण की यह साधना जीवन का सर्वश्रेष्ठ, सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाता था। जब तक यहाँ प्रक्रिया भारतवर्ष में चलती रही यह प्रत्येक क्षेत्र में महानता का, उत्कृष्टता का, समृद्धि और सफलता का बोल बाला रहा। अब उस दिशा में जितनी ही उपेक्षा होती है, उतनी ही अशान्ति और अव्यवस्था बढ़ती जा रही है। प्राचीन गौरव की तुलना में हम दिन दिन नीचे उतर रहे हैं।
साधना का विवरण तथा (8) इन दिनों जा साधना क्रम चल रहा हो उसका परिचय लिख कर भेजें। इस विवरण के आधार पर ही उनका नाम सूची में सम्मिलित किया जाएगा।
साधनाएँ तो ऐसी हैं जो हर किसी के लिए सुगम और सुविधाजनक है। जैसे सूर्य नमस्कार एवं आसनों की सरल व्यायाम पद्धति बूढ़े से लेकर बच्चे तक सभी के उपयोग की हैं। उनसे शरीर की ही नहीं मनोबल की भी पुष्टि होती है। गर्भिणी और दुर्बल प्रकृति की महिलाएँ भी कुछ आसनों से अपनी स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों को स्वयं हल कर सकती हैं। कितने ही रोग आसन और प्राणायामों के, बन्ध और मुद्राओं के सरल साधनों से दूर हो सकते हैं।
साधना द्वारा ही सम्पन्न होता है। कमाऊ और सन्देहास्पद कार्यों में ही नहीं चोरी, डकैती, जेबकट, ठगी जैसी बुराइयों में भी मंदिर बनने के लिए उन कार्यों का अनुभव एवं शिक्षण प्राप्त करना होता है, उनके लिए भी साधना ही अभीष्ट है। दिन काटने की हीन स्थिति से आगे बढ़कर किसी ने यदि भली या बुरी दिशा में कुछ प्रगति की है तो उसे उस दिशा में साधना अवश्य करनी पड़ी है। साधना ही वह कल्पवृक्ष है जिसकी छाया में मनुष्य के विविध मनोरथ पूरे होते हैं।
साधना के अनेक उपक्रम हैं जिनका उपयोग साधक की निष्ठा अभिरुचि एवं परिस्थिति के अनुरूप किया जाता है।
साधना करनी पड़ती थी। आत्म निर्माण के लिए साधना करनी पड़ती थी। आत्म निर्माण की यह साधना जीवन का सर्वश्रेष्ठ, सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाता था। जब तक यहाँ प्रक्रिया भारतवर्ष में चलती रही यह प्रत्येक क्षेत्र में महानता का, उत्कृष्टता का, समृद्धि और सफलता का बोल बाला रहा। अब उस दिशा में जितनी ही उपेक्षा होती है, उतनी ही अशान्ति और अव्यवस्था बढ़ती जा रही है।
साधना आवश्यक है, अनिवार्य है, यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा।
साधना’ कहते हैं। व्यक्ति के निर्माण की विद्या को साधना कहा जाता है। इसे ही संस्कृति भी कहते हैं। ऐसा मनुष्य भी एक पशु ही है, उसमें भी सब पाशविक दुर्गुण मौजूद हैं पर साधना द्वारा संस्कृति के आधार पर उस पर संस्कार डाले जाते हैं। तभी वह संस्कृत एवं सभ्य कहलाने का अधिकारी बनता है।
साधना।
साधना तक ही सीमित हैं और कौन ऐसे हैं जो दूसरों को प्रेरणा देन, सामूहिक व्यवस्था में भाग लेने एवं धर्म सेवा में अभिरुचि लेते हैं। ऐसी सेवा भावी साधकों को सक्रिय सदस्या माना जाएगा।
साधना कम से कम छः महीने नियमित रूप से चल चुके और उत्साह क्षणिक बुद्धि मात्र न रहकर निष्ठा में परिणित होता दिखाई दे। ऐसे ही नैष्ठिक उपासकों का मार्ग दर्शन यहाँ से किया जा सकेगा।
साधना की।’
साधना का मार्ग ही अपनाना पड़ता है। ढालने और ढलने की प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है। शारीरिक दृष्टि से उन्नति करने के इच्छुक व्यायाम की साधना करते हैं और स्थिर चित्त एवं उत्साह के साथ दीर्घकाल तक उसी ओर लगे रहे तो एक दिन अच्छे खिलाड़ी-अच्छे पहलवान, अच्छे नट और सुंदर सुडौल निरोग दीर्घायु बनने में सफल होते हैं। शिक्षा की दृष्टि से उन्नति करने के इच्छुक शिक्षालयों में प्रविष्ट होते हैं, शिक्षकों का मार्ग दर्शन ध्यान पूर्वक ग्रहण करते हैं। पाठ्यक्रम को हृदयंगम करने के लिए दिन रात पढ़ते हैं, इस प्रकार प्रयत्न करते करते वे एक दिन विद्वान् बन जाते हैं।
साधना क्रम चल रहा हो उसका परिचय लिख कर भेजें। इस विवरण के आधार पर ही उनका नाम सूची में सम्मिलित किया जाएगा।
साधना की उपयोगिता महान् है। उसकी उपेक्षा करना न तो बुद्धिमत्ता है और न दूरदर्शिता। यदि थोड़ी गंभीरता से सोचा जाए तो यह सहज ही जाना जा सकता है कि जीवन के महान् अवसर से समुचित लाभ उठाने के लिए साधना नितांत आवश्यक है।
साधना भी ध्यान की एकाग्रता से ही संभव है। देव दर्शन, ईश्वर प्रणिधान, आत्म साक्षात्कार, समाधि आदि की उच्च आध्यात्मिक सफलताएँ भी ध्यान योग के विधि विधानों से ही सम्बन्धित हैं।
साधना से धनवान् बनने की सिद्धि प्राप्त करते हैं।
साधना और साधनों से ही उसे उत्पन्न करना पड़ता है। प्राचीन काल में इस ओर अत्यधिक ध्यान दिया जाता था। उस समय यह भली भाँति समझा जाता था कि सद्गुणों और उच्च आदर्शों की मनोभूमि बने बिना कोई व्यक्ति न तो अपने आपमें सुखी रह सकता है और न समाज की सुव्यवस्था में कोई योग दे सकता है, इसलिए सबसे पहले सबसे आवश्यक कार्य यह समझा जाता था कि व्यक्ति को आन्तरिक दृष्टि से सुसंस्कृत बनाया जाय, उसकी मनोभूमि को श्रेष्ठ संस्कारों में संस्कारित किया जाए। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए आस्तिकता और धार्मिकता के दो माध्यम प्रयुक्त किये जाते थे। भारत के प्रत्येक नागरिक को धार्मिक एवं आस्तिक बनने के लिए साधना करनी पड़ती थी।
साधना में सर्वप्रथम स्थान है। इसे अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। धर्म शास्त्रों में ऐसी व्यवस्था मिलती है कि भोजन से पूर्व कम से कम एक माला गायत्री का जप प्रत्येक धर्मप्रेमी को करना चाहिए। जो इसकी उपेक्षा करें उन्हें शूद्र कहकर तिरस्कृत किया गया है। प्राचीनकाल में सम्भवतः नित्य गायत्री जप की उपेक्षा करने वाले लोग शूद्र रहकर तिरस्कृत किये गये होंगे ओर पीछे उनकी स्वतंत्र जाति ही बन गई होगी।
साधनायें निष्ठा पूर्वक चल रहा हो, उन सदस्यों की सूची बनाकर भेज दें, तथा साथ ही यह भी लिख दें कि उनमें से कौन साधक अपनी निज की साधना तक ही सीमित हैं और कौन ऐसे हैं जो दूसरों को प्रेरणा देन, सामूहिक व्यवस्था में भाग लेने एवं धर्म सेवा में अभिरुचि लेते हैं। ऐसी सेवा भावी साधकों को सक्रिय सदस्या माना जाएगा।
साधना के अनुभव अनेक स्वजनों से पूछे हैं। वे सर्व साधारण के समक्ष प्रकट करने के नहीं है। साधना गोपनीय रखने की परम्परा भी है। जितना अंश सर्व साधारण के लिए उपयोगी था वह छप चुका है। कोई और भी बात बताने योग्य होगी तो आगे छप जाएगी।
साधना का मार्ग उसी प्रकार अपनाना पड़ेगा जिस प्रकार धन, स्वास्थ्य, विद्या, यश आदि की प्राप्ति के लिए सुनिश्चित प्रयास करना पड़ता है।
साधना के साथ ही हर क्षेत्र की सफलता जुड़ी हुई है। आत्म निर्माण की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी हमें साधना का ही मार्ग अपना पड़ेगा। जीवन लक्षण की सफलता अभीष्ट हो तो साधना आवश्यक है, अनिवार्य है, यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा।
साधना पथ का परित्याग करके हम आध्यात्मिक उन्नति से वंचित हो रहे हैं, साथ ही आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण भौतिक जीवन की कठिनाइयों और असफलताएँ भी बढ़ती जाती हैं।
साधना नहीं की, जिसके मन में केवल पाशविक संस्कार ही भरे पड़े हैं उसके लिए परमात्मा की पुनीत वृत्ति यह दुनियाँ-दुर्गन्धि भरे जलते हुए श्मशान के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हो सकता है ऐसे लोगों को पूर्व पुण्यों से, चतुरता और पुरुषार्थ से भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त हुआ हो, पर क्या इतने मात्र से सुख-शान्ति प्राप्त हो सकती है? भौतिक सम्पदाएँ केवल झंझट बढ़ा सकती हैं, जिम्मेदारियों और चिन्ताओं के बोझ से लाद सकती हैं, थकान और झुँझलाहट दे सकती हैं पर शांति और संतोष में इनसे कण भर भी वृद्धि न होगा। आन्तरिक स्थिति का, मनोभूमि का परिष्कार ही एक मात्र वह उपाय है जिससे बाहर की हर वस्तु और हर परिस्थिति अनुकूल बन सकती है। बेशक, इस दुनिया में ऊबड़ खाबड़ भी बहुत है पर जिसने अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित और सुसंस्कृत बना लिया है।
साधना विधानों के आधार पर आकर्षित करके अपने में धारण करना तथा अपने को प्राण शक्ति सम्पन्न बनाना भी प्राणायाम विद्या का ही कार्य है। षट्चक्रों का सेवन, कुण्डलिनी जागरण, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की सिद्धि, स्वर योग तत्त्व साधना, सोऽहम् तत्त्व, अजपा गायत्री प्रभृति अनेकों चमत्कारी एवं दिव्य शक्ति सम्पन्न साधन प्राण विद्या से ही संबंधित हैं।
साधनाओं के आधार पर ढाला जाता है, ढलता है।
साधना, मनोभूमि तथा परिस्थितियों की सूचना प्रत्येक छमाही पर मथुरा भेजी चाहिए। चैत्र सुदी 15 तथा आश्विनी सुदी 15 इसके लिए नियत है। अब मासिक रिपोर्ट भेजने की आवश्यकता नहीं रही।
साधना से संस्कारों का संशोधन एवं पोषण होता है। जो अशुभ संस्कार मनोभूमि में गहराई से जमे हैं उन्हें उखाड़ने का कार्य क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है। शुभ संस्कारों का बीजारोपण तथा उनका परिपोषण भी क्रियात्मक साधना द्वारा ही संभव होता है।
साधना किस प्रकार सहायक होती है इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाला गया है।
साधना भौतिक लाभों एवं चमत्कारों की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है पर आत्म कल्याण की दृष्टि से उसका कुछ भी उपयोग नहीं है। वरन् उलटी बाधक सिद्ध होती है।
साधना एवं साधनों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार गुण, स्वभाव आदत, चरित्र, आचरण, आदर्श, विश्वास, भावना, दृष्टिकोण आदि मानसिक विशेषताओं के निर्माण में भी साधना एवं साधन ही प्रधान कारण है। यदि उनकी ओर उपेक्षा रखी जाय तो असंस्कृत स्थिति ही बनी रहेगी। जिनकी मनोभूमि का सावधानी पूर्वक निर्माण नहीं हुआ है, वे अपने प्रयत्नों से किसी भौतिक सफलताओं में सफल भले ही हो गये हों, आन्तरिक दृष्टि से हीन दशा में ही पड़े रहेंगे और यह हीनता उन्हें कभी भी महान् पुरुष की, सभ्य नागरिक की, श्रेष्ठ मानव की स्थिति में न पहुँचने देगी। यह अभाव मानव जीवन का सबसे बड़ा अभाव है।
साधना ग्रन्थों में मिलता है। शारीरिक स्वास्थ्य सुधारने में, मनोबल बढ़ाने में, चित्त की चंचलता रोकने में, विकार वृत्तियों पर नियंत्रण करने में, प्राणायामों का विशेष महत्व है। अखिल विश्व में व्याप्त सूक्ष्म प्राण तत्त्व को अमुक साधना विधानों के आधार पर आकर्षित करके अपने में धारण करना तथा अपने को प्राण शक्ति सम्पन्न बनाना भी प्राणायाम विद्या का ही कार्य है। षट्चक्रों का सेवन, कुण्डलिनी जागरण, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की सिद्धि, स्वर योग तत्त्व साधना, सोऽहम् तत्त्व, अजपा गायत्री प्रभृति अनेकों चमत्कारी एवं दिव्य शक्ति सम्पन्न साधन प्राण विद्या से ही संबंधित हैं।
साधना की आवश्यकता है। साधना के साथ ही हर क्षेत्र की सफलता जुड़ी हुई है। आत्म निर्माण की सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति के लिए भी हमें साधना का ही मार्ग अपना पड़ेगा। जीवन लक्षण की सफलता अभीष्ट हो तो साधना आवश्यक है, अनिवार्य है, यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-June
साधना, मानव जीवन का परम लक्ष्य अपने दृष्टिकोण को खंड-खंडता विभिन्नता, संकीर्णता से हटाकर सर्वत्र उस विश्वात्मा, परमात्मा की विराट सत्ता का दर्शन और उसकी अनुभूति प्राप्त करना मनुष्य के लिए यही सत्य और सनातन राजमार्ग है। जब जाति, गुण, कर्म, स्वभाव संस्कार आदि समाप्त हो जाते है। मानव मात्र में आत्म-दृष्टि से देखने पर सर्वत्र उस विश्वात्मा की प्रतिष्ठापना के दर्शन होते है। इतना ही नहीं प्राणी मात्र वृक्ष, वनस्पतियाँ, जड़ चैतन्य में उसी परम शक्ति का क्रिया कलाप दिखाई देता है और तभी अनिर्वचनीय आनन्द की प्राप्ति होगी उसी क्षण समस्त पाप, ताप, अभ्यास जनित संस्कार आचरणों का अन्त हो जाएगा और “अमृत यद्विभाति” अमृत रूप में जो सब में प्रकाशित है उसी अमृत में आत्मा का प्रवेश होगा। फिर सर्वत्र अनन्त आनन्द रूपी अमृत के ही दर्शन होंगे।
साधना है और उसी के बल पर मैं जो कुछ बन सका हूँ सो आप की जानकारी में है ही।
साधना का चरम लक्ष्य क्या है? उपनिषद् के निम्न वाक्य से स्पष्ट होता है :-
साधना का अन्तिम लक्ष्य बतलाया है, पर पूर्ण योग के साधक को इस लक्ष्य को भी त्याग देना होगा। साधक को बिना किसी भी भली बुरी अभिलाषा के केवल भगवान के रूप और उसकी लीला का ही ध्यान करना होगा इसी से वह सच्चे आनन्द का अधिकारी बन सकता है।
साधना का लक्ष है। आत्मा द्वारा विश्वात्मा में प्रवेश करना ही आध्यात्मिक साधना की कसौटी है।
साधना करके इस बालक को प्राप्त किया है? यह सूर्य के समान की तेजस्वी होगा। माता की बात सच निकली, लोकमान्य तिलक की प्रतिभा और महानता सचमुच सूर्य जैसी ही प्रकाशवान थी।
साधना में जो संतोष उसे मिलता है उसी से वह संतुष्ट रहने लगता है। साधक का सात्विक-अहंकार जिसे श्रेयस्कर बतलाता है उसी को वह ग्रहण करता है और दूसरी तरफ निगाह उठाकर भी नहीं देखता।
साधना के द्वारा योगीजन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं। नाम रूप सुविधानुसार कोई भी माना जाय पर वस्तुतः वह सविता देवता ही सब का उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है। देखिए :-
साधना पूर्ण नहीं हो सकती। इसलिये योगों को पूर्णता प्राप्त करने के निमित्त उसका भी परित्याग करना होगा। सब धर्मों में मुक्ति, निर्वाण आदि को साधना का अन्तिम लक्ष्य बतलाया है, पर पूर्ण योग के साधक को इस लक्ष्य को भी त्याग देना होगा। साधक को बिना किसी भी भली बुरी अभिलाषा के केवल भगवान के रूप और उसकी लीला का ही ध्यान करना होगा इसी से वह सच्चे आनन्द का अधिकारी बन सकता है।
साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुए उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है :-
साधना की कसौटी है।
साधना के उपयुक्त एकान्त स्थान में होंगे वही उन्हें तलाश कराना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-January
साधना है। प्रेम साधना के पथ पर अग्रसर होकर अपने सारे भेद भावों, विकारों को निकालकर सब से प्रेम करना शुरू कीजिये। उस परमपिता परमात्मा से प्रेम कीजिए। उसके बताए हुए विश्व से, मानव जाति से, पशु-पक्षियों से सब से प्रेम कीजिए। प्रेम से ही जीवन को सराबोर कीजिए।
साधना भी कुछ कम कठिन नहीं है। बिरले ही इसकी अन्तिम मञ्जिल तक पहुँचते हैं। प्रेमोपासना के कुछ नियम अवश्य हैं जिन्हें पूरा किये बिना उद्देश्य में सफलता नहीं मिलती हैं ?
साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए त्याग को जीवन में अपनाना आवश्यक है। ज्यों-ज्यों त्याग वृत्ति बढ़ेगी प्रेम का पौधा भी उसी क्रम में बढ़ता जायेगा और सम पर जब फलित और पुष्पित होगा तो सारा वातावरण उसकी मधुर गंध से महक उठेगा, जहाँ मनुष्य को अपार शक्ति, आनन्द, सन्तोष, प्रसन्नता प्राप्त होगी।
साधना के पथ पर अग्रसर होकर अपने सारे भेद भावों, विकारों को निकालकर सब से प्रेम करना शुरू कीजिये। उस परमपिता परमात्मा से प्रेम कीजिए। उसके बताए हुए विश्व से, मानव जाति से, पशु-पक्षियों से सब से प्रेम कीजिए। प्रेम से ही जीवन को सराबोर कीजिए। अनन्त जीवन धार की एक कड़ी रूप में ही यह हमारा भौतिक जीवन हे।
साधना के साधक प्रेम की साधना को ही अपनाते हैं और इसी से अन्त में प्रेम के इस अनन्त सागर में विलीन होकर स्वयं प्रेम स्वरूप बन जोत हैं जैसे एक पानी की बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र बन जाती है। फिर वहाँ प्रेम का साम्राज्य होता है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।
साधना की सुदीर्घ मंजिल प्राप्त होती है। प्रेमी सभी परिस्थितियों का सहर्ष स्वागत करता है। जिससे भी प्रेम का नाता जोड़ लिया है उसके लिये सब कुछ सहन करना, अपने प्रेम सम्बन्ध को ही प्रमुख मान अन्य परिस्थितिजन्य झंझावातों से, कठिनाइयों से विचलित न होना, उन्हें सहर्ष सहन करना ही सच्चे प्रेम के लिए अभीष्ट है।
साधना करनी होगी।
साधना ही जीवन साधना है। प्रेम साधना के पथ पर अग्रसर होकर अपने सारे भेद भावों, विकारों को निकालकर सब से प्रेम करना शुरू कीजिये। उस परमपिता परमात्मा से प्रेम कीजिए। उसके बताए हुए विश्व से, मानव जाति से, पशु-पक्षियों से सब से प्रेम कीजिए। प्रेम से ही जीवन को सराबोर कीजिए।
साधना को ही अपनाते हैं और इसी से अन्त में प्रेम के इस अनन्त सागर में विलीन होकर स्वयं प्रेम स्वरूप बन जोत हैं जैसे एक पानी की बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र बन जाती है। फिर वहाँ प्रेम का साम्राज्य होता है इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-July
साधना से इस विज्ञान को प्रत्यक्ष किया जाता है। गायत्री की साधना से इस प्राण को ही जगाया जाता है। जिसने अपने सोते हुये प्राण को जगा लिया उसके लिये चारों ओर जागृति ही जागृति हैं, सब दिशाओं में प्रकाश ही प्रकाश है। सोता वही है जिसका प्राण सोता हैं, जिसकी प्राण शक्ति जग गई इस संसार में उसे ही जागृत माना जाता है। उसी के सामने इस विश्व का वह रहस्य प्रकट होता है जो सर्व साधारण के लिये छिपा हुआ ही है।
साधना का महत्व भली प्रकार समझा जाता था। प्रत्येक ऋषि इस ओर दत्त चित्त रहता था। वह जानते थे कि यदि तप के अभाव में हमारी आत्मा दुर्बल रही तो प्रवचन मात्र से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। आज के उपदेशक जिस प्रकार अपनी चतुरता, योजना, दौड़-धूप संगठन शक्ति या भाषण शैली पर विश्वास करके उन्हीं के सहारे सब कुछ कर लेने की बातें सोचते हैं और स्वतः विलासी जीवन बिताते हुये जनता को अन्धी भेड़ों की तरह चाहे जिधर हाँक ले जाने की बात सोचता हैं। प्राचीन काल में कोई उस तरह नहीं सोचता था।
साधना रत रहे। एक दिन उन्हें लगा कि उन्हें शिष्य प्राप्त होने वाले हैं। एक वर्ष वे शिष्यों की प्रतीक्षा करते रहे। अन्त में उन्हें ब्रहाँनंद, शिवानन्द और विवेकानन्द जैसे थोड़े से प्रतिभा सम्पन्न शिष्य घर बैठे प्राप्त हुये और उन्हीं के सहारे उनकी आत्मा ने संसार को हिन्दू संस्कृति का महान् संदेश दिया। स्वामी विवेकानंद का धर्म प्रचार कार्य प्रसिद्ध है पर उससे पहले उनने भी रामकृष्ण परमहंस के बताये अनुसार कई वर्ष तपश्चर्या करके आत्मा को तपाया था।
साधना की ओर कदम बढ़ाया और 40 साल तक वे उसी में संलग्न रहे। 65 वर्ष की आयु में उनने धर्मोपदेश और इस्लाम की स्थापना का कार्य आरंभ किया। यहूदी धर्म के संस्थापक यहोवा और पारसी धर्म के देवदूत जरदुश्त की दीर्घकालीन कठोर तपश्चर्याएँ प्रसिद्ध है।
साधना में संलग्न रहे। 41 वर्ष की आयु में उनने अपने अन्दर परिपक्वता अनुभव की तो दूसरों को शिक्षा देने के कार्य में हाथ लगाया। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग तप में और एक चौथाई भाग धर्मोपदेश में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेश उतने नहीं दिये जितने आज के मामूली उपदेशक दे लेते हैं। फिर भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई जनता उनकी शिक्षाओं पर आस्था रखती है।
साधना की जाती है उससे वे सहस्र दल वाले देवतत्व जागृत होते और साधक पर शान्ति का वरदान बरसाते है।
साधना का पूरा विवरण छः-छः महीने बाद भेजा करेंगे। चैत्र सुदी 15 तथा आश्विन सुदी 15 को यह छमाही रिपोर्ट मथुरा भेजनी चाहिए। मासिक रिपोर्ट न भेजी जाय।
साधनात्मक है। भाषणों के लिए कही जाना हमारे लिए शक्स न होगा। इसके लिए कोई आग्रह न किया जाय।
साधना को ही है। गायत्री शब्द का अर्थ ही-प्राण का उत्कर्ष करने वाली प्रक्रिया है।
साधना भी की थी।
साधना के अतिरिक्त दूसरों को धर्म प्रेरणा देते रहने का उत्तरदायित्व भी निभाएँगे। इस समय जहाँ शाखाएँ सजीव हैं वे अपने सदस्यों से उनकी वर्तमान भावनाओं और गतिविधियों का पता लगावें और तदनुसार उपासकों और सक्रिय सदस्यों के पूरे पते समेत सूची भेज दे। इसी सूची के आधार पर शाखाओं के तथा सदस्यों के नये रजिस्टर बनाये जावेंगे।
साधनात्मक वातावरण रहेगा। साधना की दृष्टि से ही लोग यहाँ आया करेंगे। आत्म निर्माण की व्यवहारिक शिक्षा व्यवस्था का भी प्रबन्ध रहेगा।
साधना से इस प्राण को ही जगाया जाता है। जिसने अपने सोते हुये प्राण को जगा लिया उसके लिये चारों ओर जागृति ही जागृति हैं, सब दिशाओं में प्रकाश ही प्रकाश है। सोता वही है जिसका प्राण सोता हैं, जिसकी प्राण शक्ति जग गई इस संसार में उसे ही जागृत माना जाता है। उसी के सामने इस विश्व का वह रहस्य प्रकट होता है जो सर्व साधारण के लिये छिपा हुआ ही है।
साधना की जाती है। वह ब्रह्म विद्या ही है। जप अनुष्ठान और पुरश्चरणों के द्वारा मनोभूमि को शुद्ध किया जाता है। जिस प्रकार किसान अपनी कृषि भूमि को हल चलाकर जोतता है और उसे इसे योग्य बनाता है कि बीज भली प्रकार उगे वैसे ही आत्म कल्याण का पथिक भी अपनी मनोभूमि को माला रूपी हल के आधार पर कुसंस्कारों से परिमार्जित करके इस योग्य बनाता है कि उसमें उपासना के बीज भली प्रकार उग सकें। प्राण ही वह बीज है जो आगे चलकर साधक के सामने शक्ति एवं सिद्धि के रूप में प्रकट होता है।
साधना की दृष्टि से ही लोग यहाँ आया करेंगे। आत्म निर्माण की व्यवहारिक शिक्षा व्यवस्था का भी प्रबन्ध रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-October
साधना जितनी ही प्रबल होगी उतने ही मनोबल से-आत्मबल से हम सम्पन्न जायेंगे।
साधना-पंचमुखी गायत्री की उपासना-आवश्यक होती हैं−
साधनाएँ (5) नारियों की गायत्री उपासना (6) गायत्री की विशिष्ट साधनाएँ (7) गायत्री गीता (8) सचित्र गायत्री (9) गायत्री परिवार का लक्ष (10) गायत्री यज्ञ का महत्व
साधना का पहिया निर्जीव यंत्र की तरह घूमता तो रहेगा पर उसमें कुछ चमत्कार उत्पन्न न होगा। प्राण को मनोबल नहीं, आत्मबल का प्रतीक मानना चाहिए। हमारी प्राण-साधना जितनी ही प्रबल होगी उतने ही मनोबल से-आत्मबल से हम सम्पन्न जायेंगे।
साधना का कार्यक्रम जब तक ठीक प्रकार न चलने लगे तब तक भोजन में से नमक छोड़ देने या बाल न बनाने जैसी कोई प्रतिज्ञा हम भी ले सकते हैं और तब क्रम यथावत् एक महीने चलने लगे तो उस व्रत को पूर्ण मानकर समाप्त कर सकते हैं। पर नित्य कर्म को तो सदा के लिए ही भोजन या शयन के साथ जोड़ रखना चाहिए। ताकि वह सदैव नियमित रूप से ठीक प्रकार चलता रहे। मनोमयकोश का विकास मनोबल के साथ सुसम्बद्ध हैं। संकल्प साधना के आधार पर उसे बढ़ाया जाना चाहिए।
साधना क्रम बिना कोई विशेष अतिरिक्त समय खर्च कराये तथा बिना कोई विशेष कष्ट दिये एक-दो घण्टा समय ही नित्य लगाते रहने से बड़ी आसानी से चलता रह सकता है। यों यह साधारण सी साधना है पर इसका अन्त और परिणाम असाधारण है। यह आरंभिक कदम है। प्रगति पथ पर बढ़ते रहे तो यही कदम हमें लक्ष तक पहुँचा देंगे और हम वह सब कुछ प्राप्त कर सकेंगे जिसमें इस सुरदुर्लभ मानव-जीवन की सार्थकता सन्निहित है।
साधनाएँ (7) गायत्री गीता (8) सचित्र गायत्री (9) गायत्री परिवार का लक्ष (10) गायत्री यज्ञ का महत्व
साधना के अतिरिक्त नियमित अध्ययन भी करना होगा। संस्कृत का सामान्य ज्ञान कराया जाएगा और नित्य के शिक्षा क्लास में क्रमशः गीता, रामायण, योगवाशिष्ठ, उपनिषद्, योग दर्शन एवं चारों वेदों का सार भाग पढ़ाया जाया करेगा। विचार विनिमय, सत्संग, शंका समाधान एवं प्रश्नोत्तर की विधि से साधकों के अध्यात्म ज्ञान में निरन्तर वृद्धि की जाती रहेगी।
साधनात्मक आध्यात्मिक कार्यक्रमों को भी उपयोगी और आवश्यक नित्य कर्म मानकर ही हमें इस दिशा में कोई कदम उठाना चाहिए। मनोबल की कमी के खतरे के कारण कार्यक्रम टूट न जाय इस खतरे को ध्यान में रखते हुए पहले से ही उसे किसी नित्य कर्म के साथ नत्थी कर देना चाहिए। जैसे जब तक साधना न कर लेंगे तब तक भोजन न करेंगे या सोयेंगे नहीं। भोजन या सोने में थोड़ा विलम्ब हो जाय तो उससे कोई विपत्ति नहीं आती। मान लीजिए आज बहुत व्यस्तता रही और साधना के लिए समय न मिल सका तो फिर भोजन को ही साधना से अधिक महत्व क्यों दिया जाय?
साधना का आरम्भ साकार उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासना की दो कक्षाएँ है। आरम्भिक बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है वही विद्यार्थी कालान्तर में कागज, स्याही और फाउन्टेन पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर तो है पर इसमें कोई विरोध नहीं है जो लोग निराकार और साकार का झगड़ा उत्पन्न करते हैं वे ऐसे ही है जैसे पट्टी खड़िया और कागज स्याही को एक दूसरे का विरोधी बताने वाले। जब तक मन स्थिर न हो तब तक साकार उपासना करना उचित है।
साधना इस वर्ष बताई गई है। सप्ताह में एक दिन बिना नमक और बिना शक्कर का भोजन करना किसी के लिए भी कष्टकर नहीं हो सकता।
साधना के बिना नहीं चल सकता। इस तत्त्व का संग्रह किये बिना उनका मनोबल दुर्बल रहेगा। संकल्प बीच में ही टूट जायेंगे और लक्ष की ओर चलते हुए थोड़ी ही दूर पर पैर लड़खड़ाने लगेंगे। साधना का पहिया निर्जीव यंत्र की तरह घूमता तो रहेगा पर उसमें कुछ चमत्कार उत्पन्न न होगा। प्राण को मनोबल नहीं, आत्मबल का प्रतीक मानना चाहिए।
साधना कार्यक्रम में प्रथम वर्ष ही सम्मिलित करना हैं। अन्य पाप
साधना की दिनचर्या
साधना क्रम दश वर्ष तक चलेगा। अगले वर्ष की साधना का पाठ्यक्रम बताने के लिए हर साल अक्टूबर मास में इसी प्रकार अखण्ड ज्योति का एक छोटा साधना अंक निकलता रहेगा।
साधना को विश्वकल्याणार्थ, समर्पण कर दें। (3) कुयोग के दिनों में भी 9 दिन का एक आयोजन इसी प्रकार से किया जाय। माघ वदी 11 गुरु बार आरम्भ करके माघ सुदी वसंत ता॰ 9 फरवरी को इसे पूर्ण किया जाय। इस अवसर पर भी आश्विन नवरात्रियों की भाँति ही सामूहिक धर्मानुष्ठान किये जाय । व्यक्ति गत साधना भी इन दोनों अवसरों पर कुछ विशेष की जाय।
साधना में हमें प्रकृत होना ही चाहिए जिससे आगे का मार्ग प्रशस्त हो। पति पत्नी में, सास बहू में, पिता पुत्र में, भाई-भाई में, मित्र-मित्र में, मालिक नौकर में जो संघर्ष देखा जाता है उसके मूल में कृतघ्नता की वृत्ति ही प्रधान रूप में काम कर रही होती है। एक दूसरे के अगणित उपकारों को भूल जाते हैं और किसी तुच्छ-सी बुराई को भूल जाते हैं और किसी तुच्छ-सी बुराई को याद रखकर उसे ही महत्व देते रहते हैं । फलस्वरूप इन पुण्य संबंधों शत्रुता और दुर्भावना का विष पनपते लगता हैं। यदि सोचने का तरीका सज्जनता पूर्ण हो एक दूसरे के उपकारों को ही महत्व दें, छोटी-मोटी बुराई को मानवीय दुर्बलता की एक छोटी-सी घटना मानकर उसकी उपेक्षा करें तो यह प्रेम सम्बन्ध अटूट रह सकते हैं।
साधना आरम्भ की हो वे अपने निश्चय की सूचना मथुरा दे दें। उनके मार्ग को सरल बनाने के लिए सूक्ष्म सहयोग यहाँ से मिलता रहेगा।
साधना 11-स्त्रियों का गायत्री अधिकार 12-शिक्षाएं 14-गोपनीय गायत्री तंत्र 15-गायत्री यज्ञ का महत्व 16-यज्ञ और भारतीय संस्कृति 17-गायत्री हवन पद्धति 18-सामूहिक यज्ञ योजना 19-गायत्री के जगमगाते हीरे 20-गायत्री उपासना 21-अनादि गुरुमंत्र गायत्री 22 गायत्री से योग साधना 23-सचित्र गायत्री 24- गायत्री सहस्रनाम 25-मनुष्य जीवन की सार्थकता 26-विश्वव्यापी संकट का गायत्री से समाधान।
साधना भी इन दोनों अवसरों पर कुछ विशेष की जाय।
साधनाएँ हैं। तीन बन्ध,सात मुद्रायें एवं नौ प्राणायाम प्रमुख माने गये हैं। वैसे बंधों की संख्या 40, मुद्राओं की संख्या 64 और प्राणायामों की संख्या 54, योग ग्रन्थों में उपलब्ध होती हैं। उनमें से आज की परिस्थितियों में सभी तो आवश्यक नहीं हैं, पर उनमें से जो अधिक सरल, हानि रहित एवं उपयोगी हैं उन्हें अगले दश वर्ष में बताया जाता रहेगा। हठ योग के कई प्राणायाम ऐसे भी हैं जो अधिक शक्तिशाली तो है पर उनमें थोड़ी भूल होने से खतरा भी बहुत हैं।
साधना अधूरी ही है। साधना के साथ भावना का समावेश आवश्यक है। भगवान के लिए किया हुआ सच्चा प्रेम, निरन्तर व्यापक होता जाता है। इष्टदेव के प्रति किया हुआ प्रेम ध्यान या कल्पना क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता।
साधना का मार्ग ही नहीं बताता वरन् आवश्यक शक्ति भी प्रदान करता हैं जिसके बल पर वह आत्मोन्नति के कठिन मार्ग पर सफलता पूर्वक अग्रसर हो सके। जिन्हें इस प्रकार की सहायता से वंचित रहना पड़ा उनमें से कोई विरले ही साधक सफलता प्राप्त कर सके अन्यथा आधार दृढ़ होते हुए भी उन्हें बीच में ही लड़खड़ा जाना पड़ा।
साधना क्रम को दश भागों में विभाजित किया गया हैं। इन्हें दश कक्षाएँ मानना चाहिए। एक वर्ष में एक कक्षा पूर्ण करने की आशा की गई हैं, पर धीमे चलने वाले साधकों को इससे अधिक समय भी लग सकता हैं। जिस प्रकार एक कक्षा उत्तीर्ण करके दूसरी में प्रवेश करने पर पुरानी पाठ्य पुस्तकें बदल जाती हैं और नये पाठ्यक्रम का अभ्यास करना होता हैं उसी प्रकार सफल साधकों को प्रतिवर्ष अगला साधना क्रम अपनाना होगा। दस वर्ष तक यदि कोई व्यक्ति इसे अपनाये रह सके तो यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैं कि वह व्यक्ति बाहर से साधारण गृहस्थ जीवन में रहने वाला, सामान्य व्यवसाय करने वाला, औसत दर्जे का भले ही दिखाई दे, पर आन्तरिक दृष्टि से वह निश्चित रूप से महामानव होगा।
साधना को सोने से पूर्व पूरा किया जा सकता हैं। प्रतिज्ञा तोड़ने का दंड यदि भोजन न करना और न सोना निश्चित कर लिया जाय तो फिर आलस्य और बहानेबाज़ी की दाल न गलेगी। उन्हें परास्त होना पड़ता और संकल्प-बल दिन-दिन पुष्ट होता जाएगा ।
साधना न कर लेंगे तब तक भोजन न करेंगे या सोयेंगे नहीं। भोजन या सोने में थोड़ा विलम्ब हो जाय तो उससे कोई विपत्ति नहीं आती। मान लीजिए आज बहुत व्यस्तता रही और साधना के लिए समय न मिल सका तो फिर भोजन को ही साधना से अधिक महत्व क्यों दिया जाय? उसे भी क्यों न स्थगित रखा जाए? दिन भर व्यस्त रहे तो रात को सोने के घंटों में आधा घंटे की कमी करके साधना को सोने से पूर्व पूरा किया जा सकता हैं।
साधना का अवलम्बन करने का अपना एक सुनिश्चित मिशन इस लम्बे समय से चल रहा है। प्रसन्नता की जाता है कि परिवार के अगणित सदस्यों ने इससे समुचित लाभ भी उठाया हैं।
साधनायें न बन पड़े तो इनमें से कुछ को भी अपनाया जा सकता हैं। उतने अंश से भी लाभ ही होने वाला हैं।
साधना काल में बालक के समान शुद्ध एवं निश्छल रहने लगे तो प्रगति तीव्र गति से होती है। भजन में मन लगता है और यह निर्मल स्थिति व्यवहारिक जीवन में भी बढ़ती जाती है।
साधनाएँ उपयोगी दिखें तो उनकी महत्ता को परखने के लिए परीक्षा की तरह एक वर्ष के लिए इन्हें अपनाकर देखें। यदि पाँचों साधनायें न बन पड़े तो इनमें से कुछ को भी अपनाया जा सकता हैं। उतने अंश से भी लाभ ही होने वाला हैं।
साधना के लिए ही दुनियाँ भर की बहानेबाज़ी प्रस्तुत कर दी जाय, इसमें क्या तुक हैं। जो कार्य आवश्यक और उपयोगी जँचता है उसे मनुष्य प्राथमिकता देता हैं और उसके लिए न फ रता का बहाना करना पड़ता हैं और न समय का अभाव रहता हैं। साधनात्मक आध्यात्मिक कार्यक्रमों को भी उपयोगी और आवश्यक नित्य कर्म मानकर ही हमें इस दिशा में कोई कदम उठाना चाहिए। मनोबल की कमी के खतरे के कारण कार्यक्रम टूट न जाय इस खतरे को ध्यान में रखते हुए पहले से ही उसे किसी नित्य कर्म के साथ नत्थी कर देना चाहिए। जैसे जब तक साधना न कर लेंगे तब तक भोजन न करेंगे या सोयेंगे नहीं।
साधना आरम्भ करें और साथ ही धीरे-धीरे यह प्रयत्न भी करते रहें कि परिवार के अन्य सदस्य भी इस प्रक्रिया को अपनावें। छोटे बच्चों पर जोर देकर ऐसी आदत सिखाई जा सकती हैं। वे भूलें तो रोज स्मरण कराया जा सकता हैं। थोड़े दिनों में उन्हें आदत पड़ जाएगी । आरम्भ में कुछ दिन परिवार के अन्य लोग इसे एक मखौल समझ सकते हैं, कुछ दिन उपहास भी हो सकता हैं, पर यदि अपनी निष्ठा स्थिर रही तो हँसी उड़ाने वाले लोग अन्ततः प्रशंसक ही बनेंगे और कुछ दिन में प्रभावित होकर स्वयं की अनुकरण करने लगेंगे।
साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। जप के समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही सम्भव है, इसलिए विज्ञ, उपासक जप के साथ ध्यान किया करते हैं। नाम के साथ रूप की संगति मिलाया करते हैं।
साधना का सहारा लेकर भी पूर्णता का लक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इस अंक में प्रस्तुत साधना इसी प्रकार की है।
साधना के साथ भावना का समावेश आवश्यक है। भगवान के लिए किया हुआ सच्चा प्रेम, निरन्तर व्यापक होता जाता है। इष्टदेव के प्रति किया हुआ प्रेम ध्यान या कल्पना क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान की संतान के प्रति-समस्त प्राणधारी के प्रति भी विकसित होता है।
साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामंत्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट बहुत ही उपयोगी स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
साधना के अभाव में अन्य साधना अधूरी ही है। साधना के साथ भावना का समावेश आवश्यक है। भगवान के लिए किया हुआ सच्चा प्रेम, निरन्तर व्यापक होता जाता है। इष्टदेव के प्रति किया हुआ प्रेम ध्यान या कल्पना क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता।
साधना क्रम में आत्म शिक्षण की महत्त्वपूर्ण स्थिति हैं। अन्नमय कोश की शुद्धि के साथ साथ मनोमय कोश का भी उत्कर्ष करना हैं उसके लिए मनोमय कोश का भी उत्कर्ष करना हैं। उसके लिए मन में से भौतिकवादी विचार धारा कम करने और आध्यात्मिक भावनाएँ भरने का ही एक मात्र उपाय बताया गया हैं। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग दो प्रमुख आधार हैं। उपरोक्त योजना के अनुसार हम अपने लिए इस आवश्यकता की पूर्ति करें और दूसरों के लिए उच्च कोटि की सेवा के रूप में भी इसे अपनाये।
साधना से हमारी अनुदारता, संकीर्णता, निष्ठुरता, निर्दयता, स्वार्थपरता पर अंकुश लगता हैं। दूसरों के सुख दुःख परिलक्षित होने लगते हैं। दूसरों के सुख-दुःख परिलक्षित होने लगते हैं। भावनाओं में ही भगवान का निवास होता हैं। जिसकी भावनाएँ जितनी ही निष्ठुर हैं वह उतना ही पतित हैं और जिस का हृदय जितना कोमल, स्नेहपूर्ण एवं उदार हैं उसे उतना ही उच्च भूमिका में अवस्थित एवं भगवान के निकट पहुँचा हुआ माना जाता हैं।
साधना में अपना लक्ष एवं दृष्टिकोण भौतिकवादी ही न रखकर आध्यात्मिक बनाने का प्रयत्न करना पड़ता है। इस मोड़ को देने के लिए तपश्चर्या आवश्यक मानी गई है। तप का अर्थ है इन्द्रिय संयम के लिए कष्ट सहना। इस उद्देश्य के लिए अस्वाद व्रत को साधना इस वर्ष बताई गई है। सप्ताह में एक दिन बिना नमक और बिना शक्कर का भोजन करना किसी के लिए भी कष्टकर नहीं हो सकता।
साधना का प्रारंभिक कदम ‘इन्द्रिय निग्रह’ हैं । यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं पर उनमें दो ही प्रधान हैं। (1) स्वादेन्द्रिय (2) कामेन्द्रिय । इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान हैं, उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती हैं। जीभ का स्वाद जिसने जीता वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा।
साधना किसी समय चांद्रायण आदि व्रतों के उपयुक्त भी हमारी मनोभूमि को बना सकती हैं, जिसके आधार पर इस जन्म के किये हुए सब पापों का प्रायश्चित्त करके अगले जन्म के लिए कोई बुरा प्रारब्ध योग शेष न रहने देने का भी महान् पुरुषार्थ कर सकते हैं। इस जन्म में हमें पिछले प्रारब्ध भुगतने पड़ रहे हैं। पिछले सब प्रारब्ध इस जन्म में भुगत जावे इसी हिसाब से यह जन्म मिलता हैं। यदि हम पिछले प्रारब्ध भुगत लें और अगले जन्म के लिए नये प्रारब्ध बनने न दें तो सब बन्धनों से सहज ही छुटकारा मिल सकता हैं। अस्वाद व्रत को आरम्भ करके परिपुष्ट हुई मनोभूमि कभी इस योग्य भी हो सकती हैं कि कष्टसाध्य प्रायश्चितों के द्वारा इस जन्म क प्रारब्धों को भी इसी जन्म में भुगत लेने का साहस उत्पन्न हो जावे।
साधना भी एकांगी नहीं सर्वांगीण हैं। शरीर का कोई एक ही अंग पुष्ट हो और बाकी सब दुर्बल हो तो इससे अच्छे स्वास्थ्य काक प्रयोजन सिद्ध न होगा। कोई मनुष्य केवल घी ही खाये और अन्न, शाक आदि को त्याग दे तो घी पौष्टिक और प्रशंसनीय होते हुए भी स्वास्थ्य को स्थिर न रख सकेगा। भजन यदि अकेला ही रहे, स्वाध्याय सत्संग का खाद पानी न मिले तो वह भजन का बीज भी फलने-फलने की स्थिति तक न पहुँच सकेगा। इसलिए हमारे दैनिक जीवन में स्वाध्याय और सत्संग के लिए किसी न किसी रूप में नियमित अवसर होना ही चाहिए।
साधना ही उपयुक्त है। अगली ध्यान कक्षाओं को पार करते हुए मनोमय की प्रेम-समाधि जैसी स्थिति आ पहुँचती है और उसमें आत्म-साक्षात्कार का अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है।
साधना में लगाने के इच्छुक हैं, उनके लिये गायत्री तपोभूमि में निवास के लिये हवादार स्वच्छ कमरे, नल, बिजली की सुविधा स्वाध्याय के लिये हजारों आध्यात्मिक पुस्तकों एवं सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं का सर्वांगपूर्ण पुस्तकालय, अस्वस्थ होने पर आश्रम के चिकित्सालय में औषधि की व्यवस्था, पुष्प पल्लवों से हरा-भरा नयनाभिराम प्रांगण, परमार्थ प्रेमी सत्पुरुषों का सान्निध्य आदि सभी बातें ऐसी है जिनसे अस्थिर मन भी स्थिरता एवं शान्ति लाभकर सकता है। अपने हाथ से भोजन बनाने के सभी साधन यहाँ मौजूद है। 10-15 रुपये मासिक में यहाँ की सस्ती परिस्थितियों में किफायत से चलने वाले अपनी गुजर कर सकते हैं।
साधना आत्म-शिक्षण की हैं। उसके अभाव में सारे धर्म-कृत्य एक रूढ़ि मात्र रह जाते हैं और उनका फल आशा की अपेक्षा बहुत ही स्वल्प मात्रा में उपलब्ध होता हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य हैं कि मनुष्य जिस प्रकार के विचारों में डूबा रहता हैं उसी ढाँचे में उसकी चेतना ढलने लगती हैं। यदि विचारधारा पलट जाय तो मनुष्य की जीवन-दिशा भी पलट जाती हैं । कोई भी सत्कर्म या दुष्कर्म शरीर द्वारा अनायास ही नहीं बन पड़ता, वरन् उस प्रकार के विचार बहुत पहले से मस्तिष्क में घूमते रहते हैं और जब वे पूर्णतः परिपुष्ट हो जाते हैं तभी वह स्थिति आती हैं जिसमें कोई भला बुरा काम बन पड़े।
साधनाएँ की थी। भगवान के 24 अवतार हुए हैं उनने भी अपनी उपासना में गायत्री की प्रमुखता रखी है। बाल्मीकि रामायण साक्षी हैं कि भगवान राम गायत्री की उपासना करते थे। श्रीमद्भागवत से स्पष्ट है कि श्रीकृष्णचन्द्र की उपासना का आधार गायत्री था। यज्ञोपवीत धारण के समय प्रत्येक द्विज को गुरु मन्त्र के रूप में केवल गायत्री की ही दीक्षा देने का धर्मग्रन्थों में विधान हैं।
साधना का आश्रय लेते हैं। अनेक व्रत उपवास, संयम नियम, त्याग, तप, तितीक्षा इसी उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं। सदा ऐश आराम और सुख सुविधा की जिन्दगी काटते रहने से श्रेय की ओर अभिमुख होने और प्रेय को त्यागने की इच्छा ही नहीं होती। इसलिए कल्याण के अभिलाषी साधकों के लिए कुछ न कुछ ऐसी साधनाएँ करना अभीष्ट होता हैं जिससे सुख की आसक्ति घटे और तप में प्रवृत्ति बढ़े। इस दिशा में जितनी ही प्रगति होती जाती हैं उतना ही आत्मिक स्तर ऊँचा होता जाता हैं।
साधना की दूसरी भूमिका तब प्रारम्भ होती है जब मन की भाग-दौड़ बन्द हो जाती है और चित्त जप के साथ ध्यान में संलग्न रहने लगता है। इस स्थिति को प्राप्त कर लेने पर चित्त को एक सीमित केन्द्र पर एकाग्र करने की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है। उपरोक्त ध्यान के स्थान पर दूसरी भूमिका में साधक सूर्य मंडल के प्रकाश तेज में गायत्री माता के सुन्दर मुख में झाँकी करता है। उसे समस्त विश्व में केवल मात्र एक पीतवर्ण सूर्य ही दीखता है और उसके मध्य में गायत्री माता का मुख हँसता मुस्कराता हुआ दृष्टिगोचर होता है। साधक भावना-पूर्वक उस मुख मंडल को ध्यानावस्था में देखता है उसे माता के अधरों से, नेत्रों से, कपोलों की रेखाओं से, एक अत्यन्त मधुर स्नेह, वात्सल्य, आश्वासन, सान्त्वना एवं आत्मीयता की झाँकी होती है।
साधना विषयक 26 पुस्तकें।
साधना का दूसरा कार्यक्रम हैं।
साधना के आधार पर उसे बढ़ाया जाना चाहिए। हमें प्राणायाम के साथ-साथ संकल्प भी सक्रिय रखना है। इसी प्रकार हमारा मानसिक स्तर परिपुष्ट एवं विकसित होगा।
साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर स्वाध्याय को अपने है
साधना में ही सम्मिलित कर लिया गया हैं। कहा गया है कि-मनन और चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं। इन्हीं के आधार, पर लोग स्वर्ग और मुक्ति की आशा करते हैं।
साधना का उद्देश्य अपनी प्रेम भावना का बढ़ाना अपने चारों ओर प्रेम पूर्ण वातावरण उत्पन्न करना है। इसके लिये गायत्री जप करते हुये अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में और गायत्री माता को अपनी सगी जननी मानकर उसके साथ क्रीड़ा करने, स्नेह पाने की ध्यान धारण बहुत ही उपयुक्त हैं। इससे भजन में मन ही नहीं लगता वरन् लगता वरन् प्रेम का मुरझाया हुआ अंकुर भी अंकुरित, पल्लवित और विकसित होकर चारों ओर अपनी दिव्य सुगन्धि से परम आनन्दमय वातावरण उत्पन्न कर देता है । मानव-जीवन में यदि कोई रस है, यदि कोई सार है तो वह प्रेम ही है। इसे ही परमात्मा भी कहा जाता है।
साधना सुव्यवस्थित रूप से आरम्भ करनी चाहिए और जीवन भर क्रमिक विकास करते हुए सब बराबर प्रयत्नशील रहना चाहिए जब तक कि आत्मा पूर्ण रूप से निर्मल होकर परमात्मा स्वरूप न बन जाय। जीवन का लक्ष भी यही हैं। लक्ष की दिशा में कदम बढ़ाने से ही तो मंजिल पर होगी। उचित यही हैं कि हम प्रगति की इस अनिवार्य आवश्यकता को भली प्रकार समझें और उसकी पूर्ति के लिए मजबूती के साथ कदम बढ़ायें ।निश्चय ही हमारे गुण, कर्म स्वभाव में अनेकों बुराइयाँ भरी हुई हैं।
साधना को आरम्भ करने वाला अपने आपको भारतीय संस्कृति का एक प्रामाणिक अनुयायी मान सकता है। क्योंकि कृतज्ञता की धर्म-धारणा का एक स्पष्ट कदम उसने आगे बढ़ाया है। अपना आदर्श उपस्थित करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है। सबसे पहले हमें स्वयं यही यह व्रत धारण करना चाहिए और आजीवन उसे निबाहना चाहिए। इस निष्ठा का प्रभाव दूसरों पर भी पड़ेगा और समाज में एक श्रेष्ठ परम्परा चल पड़ेगी।
साधना क्रम अपनाना होगा। दस वर्ष तक यदि कोई व्यक्ति इसे अपनाये रह सके तो यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैं कि वह व्यक्ति बाहर से साधारण गृहस्थ जीवन में रहने वाला, सामान्य व्यवसाय करने वाला, औसत दर्जे का भले ही दिखाई दे, पर आन्तरिक दृष्टि से वह निश्चित रूप से महामानव होगा। अपनी आत्मा में स्वर्गीय शान्ति अनुभव करेगा और अपने समीपवर्ती लोगों के अपनी विशेषताओं से पुलकित, प्रफुलित किये रहेगा जीवन लक्ष प्राप्त करने में भी उसे कुछ विशेष बाधा न रह जाएगी।।
साधना का लक्ष हैं। जप के बाद अगली भूमिका में प्रत्येक साधक को प्रवेश करना पड़ता हैं तब उसके लिए यह पंचकोशी साधना-पंचमुखी गायत्री की उपासना-आवश्यक होती हैं−
साधना कहते हैं । कितने ही चित्रों में गायत्री को पाँच मुख वाली दिखाया गया है। गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ के तृतीय भाग में इन पाँच मुखों की विस्तृत विवेचना की जा चुकी हैं। आत्मा पर चढ़े हुए पाँच आवरण ही गायत्री के पाँच मुख हैं। जैसे शरीर पर बनियान, कुर्ता, जाकेट, कोट और ओवरकोट एक के ऊपर एक पहन लेते हैं वैसे ही आत्मा की पाँच आवरण धारण किये हुए हैं, जिन्हें (1) अन्नमय कोश (2) मनोमय कोश (3) प्राणमय कोश (4) विज्ञानमय कोश (5) आनन्दमय कोश, कहते हैं।
साधना 23-सचित्र गायत्री 24- गायत्री सहस्रनाम 25-मनुष्य जीवन की सार्थकता 26-विश्वव्यापी संकट का गायत्री से समाधान।
साधना करें। व्यवहारिक मार्ग दर्शन, शान्तिमय वातावरण निवास की सब प्रकार की सुविधा, स्वास्थ्यकर जलवायु आदि कारणों से यहाँ रह कर गायत्री साधना करना अन्य स्थानों की अपेक्षा निश्चित रूप में अधिक फलप्रद हो सकता है।
साधना में ध्यान की सीमा सीमित हो गई। पहली भूमिका में माता-पुत्र दोनों का क्रीड़ा विनोद काफी विस्तृत था। मन को भागने-दौड़ने के लिये उस ध्यान में बहुत बड़ा क्षेत्र पड़ा था। दूसरी भूमिका में वह संकुचित हो गया । सूर्य मंडल के मध्य माता की भाव पूर्ण मुखाकृति पहले ध्यान की अपेक्षा काफी सीमित है।
साधना में मन से कुविचारों को हटा कर उनका स्थान सद्विचारों को दिलाना पड़ना है। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग दो ही उपाय हैं। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग दो ही उपाय हैं। इसके लिए एक घण्टा या आधा घण्टा समय नियत कर लिया जाना चाहिए । जीवन को समुन्नत बनाने की प्रेरणा देने एवं उनका उपाय बताने वाला साहित्य ही स्वाध्याय क लिए चुना जाय।
साधना का प्रधान अंग माना गया है। भक्ति का अर्थ है-प्रेम भगवान प्रेम के वश में रहते है-प्रेम । भगवान प्रेम के वश में रहते हैं। गोपबालाऐं प्रेम की रस्सी से ही बाँधकर उन्हें अपने आँगन में नचाती थीं। मीरा ने इसी प्रेम की नौकरी देकर अपने साँवरिया को चाकर रखा था।
साधना अंक निकलता रहेगा।
साधना जिसकी जो रही है उसे इन चार महीनों के लिए कम से कम सवाई कर दें। एक चौथाई और बढ़ा दें और इस चार मास की साधना को विश्वकल्याणार्थ, समर्पण कर दें। (3) कुयोग के दिनों में भी 9 दिन का एक आयोजन इसी प्रकार से किया जाय। माघ वदी 11 गुरु बार आरम्भ करके माघ सुदी वसंत ता॰ 9 फरवरी को इसे पूर्ण किया जाय। इस अवसर पर भी आश्विन नवरात्रियों की भाँति ही सामूहिक धर्मानुष्ठान किये जाय ।
साधना
साधना पथ का पहला चरण तप ही हैं। अन्नमय कोश की-शरीर-भाव की आसक्ति घटाने का प्राथमिक उपाय तप ही हैं। संचित कुसंस्कार तप की अग्नि में तपाये बिना जल नहीं सकते। इसलिए किसी न किसी रूप में आध्यात्म मार्ग के पथिक को ‘तप’ को अपने कार्य-क्रम में स्थान देना ही पड़ता हैं। हमें भी उसके लिए कटिबद्ध होना ही होगा।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रंथों की एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई हैं। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना है जिसे जप के समय नहीं वरन् कोई अतिरिक्त समय निकाल कर करना चाहिए। जप, योग-साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। जप के समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही सम्भव है, इसलिए विज्ञ, उपासक जप के साथ ध्यान किया करते हैं।
साधनाएँ की जाती हैं। 84 आसनों की तरह प्राणायाम भी 84 प्रकार के हैं। उनके उद्देश्य, प्रयोग, लाभ तथा उपयोग भी भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। उन सबका वर्णन इस लेख में करना अभीष्ट नहीं हैं। वह सब तो समयानुसार होगा।
साधना है पर इसका अन्त और परिणाम असाधारण है। यह आरंभिक कदम है। प्रगति पथ पर बढ़ते रहे तो यही कदम हमें लक्ष तक पहुँचा देंगे और हम वह सब कुछ प्राप्त कर सकेंगे जिसमें इस सुरदुर्लभ मानव-जीवन की सार्थकता सन्निहित है।
साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही होती हैं।
साधना में लगाये रहने से ऋद्धि-सिद्धियों के अधिकारी बन सकते है और प्रकृति के अगणित रहस्यों को जानकर सूक्ष्म जगत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकते है। गृहस्थों के लिए उतना संभव नहीं, वे थोड़ा समय और हलका सा श्रम ही इसमें लगा सकते है। फलस्वरूप चमत्कारी सिद्धियाँ से तो उन्हें वंचित रहना पड़ा है पर आत्म कल्याण का मार्ग योगीजन की भाँति ही खुला रहता है और वे उस साधारण श्रम की साधना का सहारा लेकर भी पूर्णता का लक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इस अंक में प्रस्तुत साधना इसी प्रकार की है।
साधना में भावना का परिष्कार प्रधान तत्त्व है। कृतघ्नता के घृणित पातक से अपनी मनोभूमि को इस वर्ष उबारे तो यह एक बहुत बड़ी बात होगी। अगले वर्षों में एक-एक करके भी इन प्रमुख पातकों को हटाया जाता रहा तो दश वर्ष में हमारी मनोभूमि पूर्ण पवित्र बन जायेगी । रात को सोते समय दिन भर के उपकारियों का स्मरण करना और प्रातःकाल चारपाई पर से उठते ही लोगों के अब तक के प्रमुख उपकारों का स्मरण करना और उन सब के लिए मन ही मन हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हुए अभिवन्दन करना हमारा नित्य कर्म होना चाहिए। गुरुजनों के नित्य चरण स्पर्श करना भारतीय संस्कृति का एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण अंग है।
साधना करना अन्य स्थानों की अपेक्षा निश्चित रूप में अधिक फलप्रद हो सकता है।
साधना कहते हैं। यही तपश्चर्या भी हैं। यदि प्रयत्न पूर्वक मन को साध लिया गया तो वह वश में हुआ मन देवता के समान प्रतिज्ञ कर देने वाला बन जाता हैं। ऐसा सुसंयत मन जिसके पास हैं उसे इस संसार में किसी वस्तु की कमी नहीं रहती, उसे विश्वविजयी ही माना जाता हैं।
साधनाएँ उपयोगी हो सकती हैं जिनमें कोई भूल होने पर भी किसी प्रकार की हानि की संभावना न हो, किन्तु लाभ समुचित मात्रा में प्राप्त होता रहे। ऐसे चुने हुए प्राणायामों में से ही यह उपरोक्त प्राणाकर्षण प्रक्रिया हैं। इससे प्राण तत्त्व की मात्रा साधक में बढ़ेगी और वह शरीर एवं मन दोनों ही क्षेत्रों में अधिक वीर, बलिष्ठ, पराक्रमी एवं तेजस्वी बनेगा।
साधना के पाँचों अंगों की साधना जो न कर सके वे कुछ कम अंग लेकर आरम्भ कर सकते हैं। जिनने इस दश वर्षीय योजना के अंतर्गत पंचकोशी साधना आरम्भ की हो वे अपने निश्चय की सूचना मथुरा दे दें। उनके मार्ग को सरल बनाने के लिए सूक्ष्म सहयोग यहाँ से मिलता रहेगा।
साधना के लिए प्रथम वर्ष की प्राण प्रक्रिया का ही उल्लेख करना है। इसे बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी रोगी-निरोग नर-नारी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसमें किसी को किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं हैं । सबको लाभ ही होगा।
साधना में मन न लगे, चित्त कहीं का मारा कहीं भागा फिरे तो उसमें यह आनन्द नहीं आता जो आना चाहिए। इस कठिनाई का उपाय सोचने से पूर्व विचार करना होगा कि मन क्यों भागता है? भागकर कहाँ जाता है? हमें जानना चाहिए कि प्रेम का गुलाम है। जहाँ भी जिस वस्तु में प्रेम मिलेगा वही मन उसी प्रकार दौड़ जाय जैसे फल पर भौंरा जा पहुँचता है।
साधना वसूल हो जाती हैं। वैज्ञानिक अन्वेषणकर्ता सारी जिंदगी प्रकृति के किन्हीं सूक्ष्म रहस्यों का एकाग्र भाव से एकान्त शोध कार्य में लगने पर कई आविष्कार होता हैं तो उसका लाभ सारे संसार को मिलता है। नेता, लोक-सेवक बलिदान, त्यागी, तपस्वी अपने आपको विश्व मानव के हित में होम देते हैं तब उस त्याग का लाभ सारे जगत को मिलता हैं। बीज अपनी हस्ती को गलाकर विशाल वृक्ष के रूप में परिणत होता हैं। नींव में पड़े हुए पत्थरों की छाती पर विशाल भवनों का निर्माण हुआ हैं।
साधना के चमत्कार 9- गायत्री से ब्रह्म साक्षात्कार 10-गायत्री की सुलभ साधना 11-स्त्रियों का गायत्री अधिकार 12-शिक्षाएं 14-गोपनीय गायत्री तंत्र 15-गायत्री यज्ञ का महत्व 16-यज्ञ और भारतीय संस्कृति 17-गायत्री हवन पद्धति 18-सामूहिक यज्ञ योजना 19-गायत्री के जगमगाते हीरे 20-गायत्री उपासना 21-अनादि गुरुमंत्र गायत्री 22 गायत्री से योग साधना 23-सचित्र गायत्री 24- गायत्री सहस्रनाम 25-मनुष्य जीवन की सार्थकता 26-विश्वव्यापी संकट का गायत्री से समाधान।
साधना से अधिक महत्व क्यों दिया जाय? उसे भी क्यों न स्थगित रखा जाए? दिन भर व्यस्त रहे तो रात को सोने के घंटों में आधा घंटे की कमी करके साधना को सोने से पूर्व पूरा किया जा सकता हैं। प्रतिज्ञा तोड़ने का दंड यदि भोजन न करना और न सोना निश्चित कर लिया जाय तो फिर आलस्य और बहानेबाज़ी की दाल न गलेगी। उन्हें परास्त होना पड़ता और संकल्प-बल दिन-दिन पुष्ट होता जाएगा ।
साधना की यही परम्परा योग शास्त्र में अपना स्थायी स्थायित्व अनन्त काल से बनाये हुए है।
साधना जो न कर सके वे कुछ कम अंग लेकर आरम्भ कर सकते हैं। जिनने इस दश वर्षीय योजना के अंतर्गत पंचकोशी साधना आरम्भ की हो वे अपने निश्चय की सूचना मथुरा दे दें। उनके मार्ग को सरल बनाने के लिए सूक्ष्म सहयोग यहाँ से मिलता रहेगा।
साधना का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं प्रधान अंग हैं । उसके लिए भी नियत समय पर स्वस्थ चित्त होकर शान्तिमय स्थान पर बैठना चाहिए और धीरे-धीरे समझ-समझकर एक-एक पेराग्राफ पढ़ना चाहिये । हो सके तो उस पेराग्राफ को एकबार और दुहरा लिया जाय तब फिर दूसरा पेराग्राफ पढ़ना आरंभ किया जाय। लाल पेन्सिल पास में रखी जाय। जो विचार महत्त्वपूर्ण जचें उन पर निशान लगा लेने चाहिए।
साधना भी घर में रह कर ही बन सकेगी और तब जीवन लक्ष प्राप्त कर सकना कुछ भी कठिन न होगा। अन्नमय-कोश को शुद्ध करने एवं जीतने के लिए अन्न की शुद्धि आवश्यक है। इस संबंध में धीरे 2 अभ्यास डालते हुए अन्न शुद्धि की उस महान् प्रक्रिया को भी पूर्ण किया जा सकेगा जिस पर मन की शुद्धि निर्भर है। अभी पहला कदम तो हमें साप्ताहिक अस्वाद व्रत के सरल आधार पर ही उठाना चाहिए।
साधना है। आत्मिक स्तर को सभी दिशाओं से विकसित करने के लिये यह सर्वतोमुखी पंचसूत्री साधना पिछले पृष्ठों पर प्रस्तुत की गई है। यह शास्त्रोक्त है। तैत्तरीयोपनिषद् की तृतीय बल्ली (भृगु बल्ली) में पिता वरुण और पुत्र भृगु के संवाद रूप में इसका विवेचन हुआ है। पुत्र भृगु ब्रह्म को जानने की इच्छा करता है पिता वरण उसे तप करने का आदेश देते हैं।
साधना का अंग
साधना में श्रद्धापूर्वक लग जाय। इस मार्ग पर चलते हुए लोक और परलोक दोनों बनते हैं। पारलौकिक शान्ति तो मिलती ही हैं लौकिक सुखों का अभाव भी नहीं रहता। आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास का मार्ग-दर्शन अखण्ड-ज्योति अपने जीवन के गत 23 वर्षों से सतत करती रही हैं। सद्विचारों को अपनाने, सद्-भावनाओं को विकसित करने और उपासनात्मक साधना का अवलम्बन करने का अपना एक सुनिश्चित मिशन इस लम्बे समय से चल रहा है।
साधना के लिए समय न मिल सका तो फिर भोजन को ही साधना से अधिक महत्व क्यों दिया जाय? उसे भी क्यों न स्थगित रखा जाए? दिन भर व्यस्त रहे तो रात को सोने के घंटों में आधा घंटे की कमी करके साधना को सोने से पूर्व पूरा किया जा सकता हैं। प्रतिज्ञा तोड़ने का दंड यदि भोजन न करना और न सोना निश्चित कर लिया जाय तो फिर आलस्य और बहानेबाज़ी की दाल न गलेगी। उन्हें परास्त होना पड़ता और संकल्प-बल दिन-दिन पुष्ट होता जाएगा ।
साधनाएँ करना अभीष्ट होता हैं जिससे सुख की आसक्ति घटे और तप में प्रवृत्ति बढ़े। इस दिशा में जितनी ही प्रगति होती जाती हैं उतना ही आत्मिक स्तर ऊँचा होता जाता हैं।
साधना है। इस साधना से हमारी अनुदारता, संकीर्णता, निष्ठुरता, निर्दयता, स्वार्थपरता पर अंकुश लगता हैं। दूसरों के सुख दुःख परिलक्षित होने लगते हैं। दूसरों के सुख-दुःख परिलक्षित होने लगते हैं। भावनाओं में ही भगवान का निवास होता हैं।
साधना का पाठ्यक्रम बताने के लिए हर साल अक्टूबर मास में इसी प्रकार अखण्ड ज्योति का एक छोटा साधना अंक निकलता रहेगा।
साधना वनवासी योगियों के लिए भी संभव है और गृहस्थ कार्य में व्यस्त लोगों के लिए भी सरल है। योगी लोग अपनी विशेष परिस्थितियों में पूरा समय इसी साधना में लगाये रहने से ऋद्धि-सिद्धियों के अधिकारी बन सकते है और प्रकृति के अगणित रहस्यों को जानकर सूक्ष्म जगत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकते है। गृहस्थों के लिए उतना संभव नहीं, वे थोड़ा समय और हलका सा श्रम ही इसमें लगा सकते है। फलस्वरूप चमत्कारी सिद्धियाँ से तो उन्हें वंचित रहना पड़ा है पर आत्म कल्याण का मार्ग योगीजन की भाँति ही खुला रहता है और वे उस साधारण श्रम की साधना का सहारा लेकर भी पूर्णता का लक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इस अंक में प्रस्तुत साधना इसी प्रकार की है।
साधना को अधिक सरलता पूर्वक सफल बना सकें। इस भूमि पर पूर्वकाल में कितने ही ऋषियों ने तप किया है, यह स्थान अनेक युगों से तपोभूमि रहा है। उस पूर्व विशेषता को पुनः सजीव करने के लिये इस भूमि पर 108 कुण्डों का यज्ञ किया जाय, अखंड अग्नि एवं नित्य यज्ञ की व्यवस्था की गई, 240 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मन्त्रों की स्थापना की गई एवं 2400 तीर्थों का जल-रत्न स्थापित किया गया। नवरात्रियों तथा नित्य नैमित्तिक जपो के निरन्तर होते रहने से गायत्री उपासना के लिये यह भूमि एक प्रकार से सिद्ध पीठ ही हैं। जिन्हें जय कभी, जितने दिन के लिए भी अवकाश मिले यहाँ रहकर अपनी साधना करें।
साधना का श्रीगणेश करें। प्रस्तुत अंक में उसी का प्रारम्भिक विधान हैं। यह सर्व साधारण के लिए बाल, वृद्ध-नर-नारी गृही, विरागी, सभी के लिए अति सरल और सर्वथा हानि रहित है। एक दो घंटा समय लगा सकने वाला कोई भी व्यक्ति इसे बड़ी सरलता पूर्वक अपना सकता हैं। इस मार्ग पर अग्रसर होते हुए सामान्य स्थिति का व्यक्ति भी अन्ततः उस स्थिति को पहुँच जाएगा जहाँ से आत्मसाक्षात्कार की स्थिति बिलकुल निकट आ जाती हैं।
साधनाएँ
साधना में लगावेंगे तो फिर उसे उतना ही आवश्यक मान लेना चाहिए जितना कि शौच, स्नान, भोजन, नींद आदि नित्य कर्मों को आवश्यक माना जाता हैं कोई भी कठिनाई क्यों न आवें, कितना ही आलस क्यों न घेरे हम उपरोक्त नित्य कर्मों को कर ही लेते हैं, उनके लिए समय निकल ही
साधना भी आवश्यक हैं। दृढ़ निश्चय और धैर्य के अभाव में हमारे कितने ही कार्य आज आरंभ होते और कल समाप्त हो जाते हैं,। जोश में आकर कोई काम आरंभ किया, जब तक जोश रहा तब तक बड़े उत्साह से वह काम किया गया, पर कुछ दिन में वह आवेश समाप्त हुआ तो मानसिक आलस्य ने आ घेरा और किसी छोटे-मोटे कारण के बहाने वह कार्य भी समाप्त हो गया। बहुधा लोग ऐसी ही बाल क्रीड़ाऐं करते रहते हैं। अध्यात्म मार्ग से तत्काल प्रत्यक्ष लाभ दिखाई नहीं पड़ता उसके सत्परिणाम तो देर में प्राप्त होने वाले तथा दूरवर्ती हैं।
साधना के लिए प्राणाकर्षण प्राणात्मक की प्रक्रिया इस वर्ष के लिए है। पाँच प्राणायामों में 15-20 मिनट समय लगता है। प्रातः काल इसे आत्मिक व्यायाम के रूप में नियमित रूप से करना चाहिए। मनोबल, संकल्प शक्ति एवं आत्म तेज बढ़ाने के लिए यह सरल प्राणायाम बहुत प्रभावशाली सिद्धि होता है। प्राण संचार एवं क्रमिक शक्तिपात का लाभ प्राप्त करना हर किसी के लिए संभव नहीं क्योंकि उसमें किसी अत्यन्त प्राणवान् व्यक्ति के अनुग्रह सहयोग एवं दान की आवश्यकता पड़ती है।
साधना आरंभ करें। आगे क्रमशः इसका विकास करते हुए अन्य इन्द्रियों को तथा मन का वशवर्ती बनावें। यह संयम-साधना किसी समय चांद्रायण आदि व्रतों के उपयुक्त भी हमारी मनोभूमि को बना सकती हैं, जिसके आधार पर इस जन्म के किये हुए सब पापों का प्रायश्चित्त करके अगले जन्म के लिए कोई बुरा प्रारब्ध योग शेष न रहने देने का भी महान् पुरुषार्थ कर सकते हैं। इस जन्म में हमें पिछले प्रारब्ध भुगतने पड़ रहे हैं। पिछले सब प्रारब्ध इस जन्म में भुगत जावे इसी हिसाब से यह जन्म मिलता हैं।
साधना इसी प्रकार की है।
साधना पिछले पृष्ठों पर प्रस्तुत की गई है। यह शास्त्रोक्त है। तैत्तरीयोपनिषद् की तृतीय बल्ली (भृगु बल्ली) में पिता वरुण और पुत्र भृगु के संवाद रूप में इसका विवेचन हुआ है। पुत्र भृगु ब्रह्म को जानने की इच्छा करता है पिता वरण उसे तप करने का आदेश देते हैं। जब तप करने से उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-November
साधना बनी और इसी के आधार पर रन्तिदेव ने जीवन लक्ष प्राप्त किया। दान स्वयं एक महान् तप है।
साधना उसके लिये हानिकारक सिद्ध होगा। तब योग को दुर्बल हृदय लोग नहीं कर सकते क्योंकि भयजनक स्थिति आने पर उसका अनिष्ट हो सकता है। गायत्री योग सनातन हैं।
साधना में आहार शुद्ध को प्रधान माध्यम बनाया था। राजा जनक अपने खेत में स्वयं हल जोत कर अपने भोजन के लायक अन्न स्वयं उपजाते थे। हल जोतते समय ही तो उन्हें सीताजी प्राप्त हुई थी।
साधनाएँ करके जीवन लक्ष की पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते। इस प्रकार अनादि काल से भारतीय धर्मानुयायी इस उपासना के आधार पर अपना आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास करते हुए आत्म साक्षात्कार की ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करते रहे।
साधना बहुत ही तीव्रता से फलित होगी। आज की स्थिति में सब के लिए इस सीमा तक व्यवस्था कर सकना सम्भव नहीं है पर जितना कुछ बन पड़े उतना अधिकाधिक सावधानी हमें इस दिशा में रखनी ही चाहिए। अस्वाद व्रत का साप्ताहिक व्रत लेने के बाद अब हमारी विचार धारा का प्रवाह इसी दिशा में चलना चाहिए।
साधना का ही सर्वोपरि स्थान रहा। साधारण गृहस्थ उसे नित्यकर्म के रूप में अपनाये रहते और वानप्रस्थ संन्यासी एवं विशेष स्थिति के व्यक्ति इसकी विशेष साधनाएँ करके जीवन लक्ष की पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते। इस प्रकार अनादि काल से भारतीय धर्मानुयायी इस उपासना के आधार पर अपना आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास करते हुए आत्म साक्षात्कार की ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करते रहे।
साधना करते हुए अन्त में समाधि स्थिति प्राप्त होती है। कर्म योग की अन्तिम अवस्था स्थिति प्रज्ञा हैं। ध्यान योग का साधन अन्त में परमहंस गति पर जा पहुँचता है। नाद योग का साधक अनहद नाद में अपने आप को लय कर लेता हैं। तन्त्र का अन्तिम लक्ष महासिद्ध पद तक पहुँचना हैं।
साधना का उद्देश्य है। इस मार्ग पर जितनी प्रगति होती जाती हैं आत्मा अपनी महान् महत्ता को प्रकट करता चला गया है। आत्मानन्द और ब्रह्मानन्द की मधुरता का आस्वादन करते हुए उसका अन्तः प्रदेश निरन्तर आनन्द मग्न रहता है। साथ ही उसका बाह्य जीवन भी इतना मधुर बन जाता हैं कि सब ओर से उसे सहयोग सराहना एवं सम्मान की स्थिति दृष्टिगोचर होने लगती है। आत्मा के भंडार में बहुत सब कुछ है।
साधना में संलग्न रहते थे।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करते हुए आहार की शुद्धि पर अत्यधिक ध्यान देना पड़ता है। चौका चूल्हे की छूत की प्रथा आज भी अपने भौंड़े रूप में प्रचलित है। उसका वर्तमान स्वरूप तो जाति पाति पर आधारित होकर उपहासास्पद एवं रूढ़ि मात्र ही रह गया है। कुसंस्कारी और सुसंस्कारी व्यक्ति तो हर जाति में हो सकते हैं। जिस आधार को लेकर वह प्रथा आरंभ हुई थी वह आधार अभी भी यथावत् बना हुआ है।
साधना है।यह साधन सरल होते हुए भी अत्यन्त महान है। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अब समय आ गया है कि हम आगे बढे़ और मानव जीवन का समुचित लाभ उठाने के लिए आत्मिक सफलताओं के लिए भी कुछ करें। पंच सूत्री साधना क्रम इसी दिशा में उठाया हुआ एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
साधना क्रम इसी दिशा में उठाया हुआ एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
साधनाश्रम की स्थापना की गई है। इसके लिए एक बड़ी जमीन तथा बगीचा खरीदा गया है। आश्रम का उद्घाटन ता0 19 अक्टूबर को आचार्य जी द्वारा हुआ जिसमें उस क्षेत्र के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित थे। 24 करोड़ जप तथा 24 लाख आहुतियों के संकल्प की पूर्ति के साथ आगामी 7, 8, 9 फरवरी 62 को 108 कुण्डों का यज्ञ इस आश्रम में होगा। पत्र व्यवहार का पता यह है-श्री शंभूसिंह कौशिक, साधनाश्रम (कोटा सिटी स्टेशन के पास) पो बोरखेड़ा (कोटा राजस्थान)
साधना एवं ज्ञान प्रसार के लिये एक सुन्द आश्रम बनाने की योजना कार्यान्वित होन जा रही है। भूमि प्राप्त हो गई है। इस नवरात्रि में वहाँ एक साधना शिविर भी सम्पन्न हुआ।
साधना है। प्राचीनकाल में आत्मकल्याण पथ के श्रेयार्थी पथिक इस ओर पूरा-पूरा ध्यान रखते थे। खेतों में काटते समय गिरे हुए कण बीनकर उस अन्न से जीवन यापन करने वाले कणादि ऋषि, पीपल के फलों पर निर्वाह करने वाले “पिप्पलाद ऋषि” ने अपनी साधना में आहार शुद्ध को प्रधान माध्यम बनाया था। राजा जनक अपने खेत में स्वयं हल जोत कर अपने भोजन के लायक अन्न स्वयं उपजाते थे। हल जोतते समय ही तो उन्हें सीताजी प्राप्त हुई थी।
साधनाश्रम (कोटा सिटी स्टेशन के पास) पो बोरखेड़ा (कोटा राजस्थान)
साधना में षट् चक्रों का वेधन करते हुए कुण्डलिनी जागरण की अन्तिम स्थिति प्राप्त होती हैं। राजयोग में यम नियम आदि अष्ट सूत्री साधना करते हुए अन्त में समाधि स्थिति प्राप्त होती है। कर्म योग की अन्तिम अवस्था स्थिति प्रज्ञा हैं। ध्यान योग का साधन अन्त में परमहंस गति पर जा पहुँचता है। नाद योग का साधक अनहद नाद में अपने आप को लय कर लेता हैं।
साधना भी उस विकार का कहाँ तक शमन करेगी?
साधना करते करते वही स्थिति प्राप्त होती हैं। भक्ति योग में इष्ट देव के दर्शन मिलते हैं। प्राण योग का साधक ब्रह्मभाव में प्रवेश करके सहस्रार कमल का मधुपान करता हैं। इस प्रकार विभिन्न मार्गों पर चलते हुए साधक अन्तिम लक्ष तक पहुँचते हैं। इनमें कोई मार्ग कठिन, कोई सरल हैं पर रुचि भिन्नता एवं मार्ग में आने वाले नाना प्रकार के अनुभवों में जिसकी जैसी रुचि हैं वह उसी प्रकार के साधना मार्ग को अपना लेता हे गुरु परंपरा से ही कई साधना पद्धतियाँ चलती रहती हैं।
साधनाओं में इच्छाशक्ति का ही हाथ था। बड़े-बड़े संग्राम में विजयश्री प्राप्त कराने का श्रेय भी इच्छाशक्ति को ही रहा हैं। बड़े बड़े हत्याकांडों में जो वीभत्सता उत्पन्न हुई वह सब इच्छाशक्ति के कारण ही हुई। आप इसे कार्य में लगावेंगे, वह उसी में लग जायेगी। उसी को पूर्ण करने का प्रयत्न करेगी।
साधना क्रम हैं। नित्यकर्म की दैनिक उपासना के रूप में जप हवन पर्याप्त है। यह प्रत्येक हिन्दू का अनिवार्य धर्म कर्तव्य है। शास्त्रों में लिखा हैं कि जो नित्य गायत्री जप नहीं करता वह चाण्डाल के समान है तात्पर्य यह है कि दैनिक उपासना का अमल तथ्य तो अपनी बुद्धि को कुमार्ग पर जाने से बचाये रहने और संसारी कुसंस्कारों के जो मैल नित्य ही मन पर जमते हैं उन्हें माँजने के लिए आवश्यक ही हैं। इसमें अपनी स्वाभाविक स्थिति के बने रहने, पतन के गर्त में गिरने से बचे रहने का ही लाभ है।
साधना शिविर भी सम्पन्न हुआ।
साधना “वह बहुत प्रसन्न हुआ कि तोते ने अच्छी शिक्षा सीखती। फिर वह खटीक के यहाँ गया जहाँ बकरे कटते थे और माँस बिकता था ,तो वहाँ पहुँचा हुअमा तोता कह रहा था। “घर पटकना-काटना “यह बुरी बात तोते को बोलना सुनकर उसे दुःख हुआ। तब एक समझदार व्यक्ति ने कहा इसमें इन तोतों का कोई दोष नहीं। यह तो संगति का फल है।
साधना पद्धतियाँ चलती रहती हैं।
साधना मार्ग को अपना लेता हे गुरु परंपरा से ही कई साधना पद्धतियाँ चलती रहती हैं।
साधना के विभिन्न मार्ग हैं और उनका विकास क्रम एक दूसरे से मिलता जुलता होने पर भी पृथक् हैं। इस योग की साधना में षट् चक्रों का वेधन करते हुए कुण्डलिनी जागरण की अन्तिम स्थिति प्राप्त होती हैं। राजयोग में यम नियम आदि अष्ट सूत्री साधना करते हुए अन्त में समाधि स्थिति प्राप्त होती है। कर्म योग की अन्तिम अवस्था स्थिति प्रज्ञा हैं। ध्यान योग का साधन अन्त में परमहंस गति पर जा पहुँचता है।
साधना का माध्यम गायत्री ही रही हैं। सभी अवतारों का उपास्य यही महामन्त्र रहा हैं। महाभारत के बाद जब तक इस देश ने अज्ञ अन्धकार के युग में प्रवेश नहीं किया था तब तक एक सर्वमान्य सर्वोपयोगी, सर्वांगपूर्ण उपासना के रूप में गायत्री साधना का ही सर्वोपरि स्थान रहा। साधारण गृहस्थ उसे नित्यकर्म के रूप में अपनाये रहते और वानप्रस्थ संन्यासी एवं विशेष स्थिति के व्यक्ति इसकी विशेष साधनाएँ करके जीवन लक्ष की पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते। इस प्रकार अनादि काल से भारतीय धर्मानुयायी इस उपासना के आधार पर अपना आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास करते हुए आत्म साक्षात्कार की ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करते रहे।
साधना क्रम इस वर्ष के लिए प्रस्तुत किया गया है। शरीर का निर्माण अन्न से होता है। जो हम खाते हैं उसी से रक्त माँस आदि सात धातुएँ बनती हैं। यह प्रक्रिया यहीं तक समाप्त नहीं वरन् हमारे चेतना क्षेत्र तक चली जाती है। रस, रक्त, माँस मज्जा, अस्थि, भेद, वीर्य इस सात स्थूल धातुओं के बनने के बाद इसी संदर्भ में ओज नामक सूक्ष्म तत्त्व बनता है और उसके बाद उसी से मन बुद्धि, चित्त अहंकार का अन्तः- करण चतुष्टव बनता है।
साधना क्रम से आरम्भ होती हैं।
साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ो!
साधना के द्वार से,
साधना में लगे तो उसके मूल आधार को सुधारना पड़ेगा, आहार शुद्धि पर ध्यान देना पड़ेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-April
साधना नहीं करनी पड़ती है।
साधनाएँ करते हुए भी देर तक विश्वात्मा, ब्रह्म की झलक नहीं पाते।
साधना पूरी हो सकना सम्भव है। चाहे साँसारिक लक्ष्य हो और चाहें आध्यात्मिक सफलता के लिये मध्यम मार्ग का अनुसरण करना उचित है।
साधना का पथ भी ठीक इसी प्रकार है। जिस प्रकार पूजा, उपासना, साधना, स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है दूसरी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए से निवेदित करना पड़ता है। जब साँसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है तो उस समग्र-अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा पतंगा अपने आपको सम्पूर्ण भाव से दीपक को अर्पण कर देता है और तभी वह लौ में मिल जाता है? अपने प्रियतम के मिलन के लिए उसे समग्र भाव से अपने आपको अर्पण करना पड़ता है।
साधना के पथ पर दृढ़ता रखकर बढ़ने वाले अनेकों साधक मिला जायेंगे जो कठोरतम चेष्टाएँ जारी रखते है किन्तु अपने आपका समर्पण करने वाले साधक बहुत ही कम दिखाई देते है। यह ही ब्रह्म साक्षात्कार के पथ का रहस्य है। अक्सर मनुष्य उस प्रियतम, परमात्मा के मिलन पथ में भी कृपणता करता है और अपने आपको स्वयं के हाथों में ही रखना चाहता है। दूसरों के-उस विराट के हाथों में नहीं देना चाहता? कठोर साधनाओं और व्रत पालन में वह प्राण पण चेष्टा जारी रखता है अपनी साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।
साधना की थी, वे अन्धकार में क्षण भर के लिए प्रकाश करने वाली चिनगारी की तरह चमक कर बुझ गए। किन्तु जिन विद्वानों ने अपने को भगवदार्पण कर ईश्वरीय सत्ता से गुप्त दैवी बल ग्रहण कर साहित्य निर्माण किया उनमें गुप्त रूप से ऐसी महान् शक्ति का आविर्भाव हुआ कि वह ग्रन्थ युग-युग होने पर आज भी सर्वत्र पूजनीय, प्रेरक और जनता के गले का हार बने हुए हैं।
साधनाएँ मन को साधने के लिए ही हैं। भगवान के लिए क्या साधना करनी? वह तो पहले से ही प्राप्त हैं, रोम-रोम में रमा हैं, अनन्त वात्सल्य और असीम करुणा की वर्षा करता हुआ अपना वरद् हस्त पहले से ही हमारे शिर पर रखे हुए है, उसे प्राप्त करने में क्या कठिनाई है। कठिनाई तो मन के कुसंस्कारों की ही है जो आत्मा और परमात्मा के बीच में चट्टान बन कर अड़ा हुआ है। यदि यह कृपा करके अपनी अड़ से पीछे हट जाय तो बस अध्यात्म की सारी सिद्धि करतलगत ही है।
साधना की सफलता का मार्ग
साधना के द्वारा-तपस्या के द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जाता है। विद्या पढ़ने, धन कमाने, बलवान बनने, सुसंस्कृत होने के लिए हर किसी को कष्टसाध्य उपायों का अवलम्बन करना होता है, जो इससे बचना चाहते है वे अपनी पात्रता को सिद्ध नहीं कर पाते और उन दिव्य उपहारों से वंचित रह जाते है जो केवल पराक्रमी विजेताओं के लिए ही सुरक्षित रखे रहते हैं।
साधना, स्वाध्याय आदि से अपने ज्ञान को विशुद्ध एवं शक्ति को सचेष्ट रखना पड़ता है दूसरी ओर सम्पूर्ण भाव से अपने आपको ईश्वर की इच्छा पर उसी के लिए से निवेदित करना पड़ता है। जब साँसारिक तुच्छ लाभों के लिए कुछ न कुछ उत्सर्ग करना पड़ता है तो उस समग्र-अखण्ड, विश्वात्मा, ब्रह्म के साक्षात्कार के लिए अपने आपको सम्पूर्ण रूपेण निवेदन करना ही पड़ेगा पतंगा अपने आपको सम्पूर्ण भाव से दीपक को अर्पण कर देता है और तभी वह लौ में मिल जाता है? अपने प्रियतम के मिलन के लिए उसे समग्र भाव से अपने आपको अर्पण करना पड़ता है।
साधना कि सिद्धि नहीं मिलती है। एक परीक्षा में सफल होने के लिए विद्यार्थी को कितना श्रम करना पड़ता है। एक मोती को समुद्र तल से निकालने के लिए किस प्रकार जान को हथेली पर रखकर समुद्र की गहराई में उतरना पड़ता है, किसी मंजिल तक पहुँचने में राही को कितना श्रम करना पड़ता है। साध्य तक पहुँचने के लिए साधना आवश्यक है। उसी प्रकार ब्रह्म साक्षात्कार के लिए पूज, उपासना, दैनिक कृत्य भी अनिवार्य है।
साधना पूजा, आदि का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर को प्राप्त करना ही नहीं है वरन अपने आपको उनके लिए समर्पित करने के लिए भी है। दिन प्रतिदिन भक्ति द्वारा, पूजा उपासना सेवादि द्वारा अपने आपको उस ब्रह्म में बाधा हीन रूप से व्याप्त कर देना ही उपासना आदि का सच्चा रूप है और ऐसी ही पूजा से प्रभु को प्राप्त करने की चिर इच्छापूर्ण होती हैं।
साधना उपासना करते हुए भी लक्ष्य की प्राप्ति क्यों नहीं होती? समस्त जीवन चला जाता है, इतना ही नहीं अनेकों जन्म इसमें लग जाते है फिर भी उस परब्रह्म की अनुभूति प्राप्त नहीं होती? अशान्तियों और उद्वेगों से छुटकारा भी नहीं मिलता। इस असफलता का कारण क्या है यह प्रश्न विचारणीय है।
साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।
साधनाओं और व्रत पालन में वह प्राण पण चेष्टा जारी रखता है अपनी साधना का हिसाब लगाकर एक विशेष अभिमान पूर्ण आनन्द के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का मूल्यांकन करता है।
साधना तो महर्षि पतंजलि के शब्दों में “चित्त वृत्तियों का निरोध “मात्र” ही है। योग साधना का सारा कर्मकाण्ड और विधि विधान चित्त निरोध के लिए ही है। ध्यान की तन्मयता से ही भगवान के दर्शन होते हैं। विषय विकारों की ओर से, माया मोह की ओर से चित्त का हटा लेना ही मोक्ष है। मूर्तिपूजा, कीर्तन, भजन पूजन का उद्देश्य भी मन की एकाग्रता ही है।
साधना करनी? वह तो पहले से ही प्राप्त हैं, रोम-रोम में रमा हैं, अनन्त वात्सल्य और असीम करुणा की वर्षा करता हुआ अपना वरद् हस्त पहले से ही हमारे शिर पर रखे हुए है, उसे प्राप्त करने में क्या कठिनाई है। कठिनाई तो मन के कुसंस्कारों की ही है जो आत्मा और परमात्मा के बीच में चट्टान बन कर अड़ा हुआ है। यदि यह कृपा करके अपनी अड़ से पीछे हट जाय तो बस अध्यात्म की सारी सिद्धि करतलगत ही है। मोक्ष और ब्रह्म निर्वाण प्राप्त हुआ हो रखा है।
साधना करनी होगी। अकिंचन भाव से परमात्मा सत्ता को सर्वत्र स्वीकार करते हुए भेद, विविधता ऊंच-नीच की दृष्टि का त्याग करना होगा।
साधना के दो अंग हैं- चेष्टा और दूसरा त्याग। किसी की प्राप्ति के लिए चेष्टा करनी पड़ती है साथ ही उसके लिए त्याग भी? नदी अपनी सम्पूर्ण चेष्टा से विराट सागर की ओर धावमान होती है उसमें एकरस एक्य की प्राप्ति के लिए। किन्तु उसकी चेष्टा में वह सम्पूर्ण भाव भी परिलक्षित होता है जिसमें वह अपने आप को पद-पद पर विराट के लिए निवेदन करती हुई आगे बढ़ती है। अपनी वर्तमान स्थिति को उसी के लिए क्षण-क्षण में उत्सर्ग करती हैं।
साधना कब तक पूरी होगी? पक्ष कब तक प्राप्त होगा? सफलता कब तक मिलेगी? ऐसे-ऐसे विचार उठ रहे थे। विचारों की उलझन भी कैसे विचित्र है, जब उनका जंजाल उमड़ पड़ता है तो शान्ति की नाव डगमगाने लगती है।
साधना में ही व्यतीत करने लगे।
साधना का आनन्द लूटने का अवसर देने के लिए ही उसने अपने को पर्दे में छिपा लिया है और झाँक-झाँक कर देखता रहता है कि मेरा भक्त, भक्ति के आनन्द में सरोवर हो पा रहा है या नहीं? जब वह उस रस में निमग्न हो जाता है तो भगवान भी आकर उसके साथ रास नृत्य करने लगता है। सिद्धि वह है जब भक्त कहता है-मुझे सिद्धि नहीं भक्ति चाहिए। मुझे मिलन की नहीं विरह की अभिलाषा हैं। मुझे सफलता में नहीं कर्म में आनन्द है।
साधना के बल पर उस विश्वात्मा के साथ व्यापार नहीं कर सकता। उस अनन्त अखण्ड, सर्वव्यापक को नहीं जान सकता और न उसकी अनुभूति हो प्राप्त कर सकता हैं इनके साथ-साथ उसे अपने आपको सम्पूर्ण भाव से उसके लिए निवेदित, उत्सर्ग करना ही पड़ेगा। बिना इसके सिद्धि प्राप्त नहीं होगी और तभी प्रभु मिलन का पथ सहज सुगम और लघु बन जायेगा। उसकी दिव्य अनुभूति, हमारे हृदय में उसी तरह आलोकित हो उठेगी जैसे प्रातः होते ही सूर्य की प्रकाश किरणों से विश्व भुवन प्रकाशित हो उठता है। उसके लिए तब कोई कठिन साधना नहीं करनी पड़ती है।
साधना का अंग बतलाया था और धीरे-धीरे एक नकटा-सम्प्रदाय की स्थापना ही कर दी थी! उन्होंने हँसने हुये स्वामी जी से कहा कि क्या आप चाहते है कि मैं भी ऐसा ही कोई नकटा-सम्प्रदाय स्थापित कर जाऊँ? पर जब इसके बाद भी स्वामी जी उनसे सार्वजनिक जीवन में भाग लेने का आग्रह करते रहे तो उन्होंने गम्भीरता पूर्वक कहा-तुम्हारी क्या ऐसी धारण है कि केवल स्थूल शरीर द्वारा ही दूसरों की सहायता की जा सकती है? क्या शरीर के क्रियाशील हुए बिना केवल मन से दूसरे लोगों की सहायता नहीं की जा सकती?”
साधना आवश्यक है। उसी प्रकार ब्रह्म साक्षात्कार के लिए पूज, उपासना, दैनिक कृत्य भी अनिवार्य है। इस प्राथमिक सोपान पर चलकर ही आगे बढ़ना सम्भव है।
साधना के आरम्भिक अंग ही माने जाते हैं।” तब उन्होंने कहा-क्या प्रत्येक कर्म अपने कल्याण की दृष्टि से ही किया जाता है? ज्ञानी मनुष्य भी बहुत से साधारण कृत्य दूसरों को उपदेश देने और उन्हें धर्म-मार्ग पर स्थिर रखने के उद्देश्य से किया करते है।”
साधना करता है। इसमें जितनी ही सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से आत्मा का प्रेम प्रकाश प्राणि मात्र के ऊपर फैलना आरंभ हो जाता है। उसे सब कोई अपने प्रेमी ही दीखते है, प्रेमी ही नहीं-आत्मीय भी लगते है, फिर उसे सब कुछ अपना ही, अपने में ओत-प्रोत ही दीखने लगता है। यही अद्वैत भाव है वेदान्त सिद्धान्त में आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि के आधार पर इसी आत्मीयता और एकता का शिक्षण किया गया हैं, मुक्ति का यही उपाय है। तुच्छता के संकीर्णता के, अनुदारता के, वासना और तृष्णा के, लोभ और मोह के, बन्धन जितने ही शिथिल होते जायेंगे उतनी ही मुक्ति समीप आती जायेगी द्वैत में ही बन्धन और अद्वैत में ही मुक्ति है प्रेम को परमात्मा कहा गया है- रसो वै सः।
साधना करते रहना ब्रह्म प्राप्ति के लिए आवश्यक ही नहीं प्रथम शर्त भी है। बिना साधना कि सिद्धि नहीं मिलती है। एक परीक्षा में सफल होने के लिए विद्यार्थी को कितना श्रम करना पड़ता है। एक मोती को समुद्र तल से निकालने के लिए किस प्रकार जान को हथेली पर रखकर समुद्र की गहराई में उतरना पड़ता है, किसी मंजिल तक पहुँचने में राही को कितना श्रम करना पड़ता है। साध्य तक पहुँचने के लिए साधना आवश्यक है।
साधना का सारा कर्मकाण्ड और विधि विधान चित्त निरोध के लिए ही है। ध्यान की तन्मयता से ही भगवान के दर्शन होते हैं। विषय विकारों की ओर से, माया मोह की ओर से चित्त का हटा लेना ही मोक्ष है। मूर्तिपूजा, कीर्तन, भजन पूजन का उद्देश्य भी मन की एकाग्रता ही है। सारी साधनाएँ मन को साधने के लिए ही हैं।
साधना हमारे देश में प्राचीन काल में चली आयी है। गीता में भगवान ने आत्म-शुद्धि का अनुष्ठान निम्न शब्दों में किया है -
साधना कर रही हूँ। जल की प्रत्येक लहर से टकरा कर मेरे शरीर के कुछ कण टूटते हैं और वे रजकण बनकर समुद्र की और बह जाते हैं। इस तरह मिलन का बूँद-बूँद स्वाद ले रही हूँ, तिल तिल अपने को घिस रही हूँ। इस प्रकार प्रेमी के प्रति आत्मदान का आनंद कितने अधिक दिन तक लेने का रस ले रही हूँ। यदि उतावले अन्य पत्थरों की तरह बीच जलधारा में पड़कर लुढ़कने लगती तो संभवतः कब की में लक्ष तक पहुँच जाती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-May
साधना है। उस तीसरी भूमिका में आत्म साक्षात्कार, ब्रह्म निर्वाण, सच्चिदानन्द सुख प्राप्त होता है। समाधि अथवा निर्विकल्प मुक्ति भी उसी स्थिति के परिपाक होने पर प्राप्त होती है। प्राण लोक में प्रवेश करके इसकी स्थिति और शक्ति सके लाभान्वित होना तो प्राण प्रक्रिया द्वारा संभव है पर भूलोक से पूर्ण बन्धनमुक्त होकर ब्रह्मलोक का अधिकारी बनना ध्यान धारण की साधना से ही संभव है। जीवन मुक्त आत्मायें प्राण लोक में विचरण करती है पर उनकी मूल स्थिति ब्रह्मलोक में ही होती हैं।
साधनाओं तथा अन्नमय कोष, आनन्दमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन ! म03)
साधना के कार्य में सदैव व्याघात आते रहेंगे, इसलिये कुछ ही महीने बाद वे मद्रास के निकट पाण्डिचेरी में चले गये, जो कि फ्रांस के आधीन एक छोटा सा नगर है। वहाँ उन्होंने अपने योगाश्रम की स्थापना की, जो कुछ वर्षों में इतना प्रसिद्ध हो गया कि भारत ही नहीं, विदेशों के अध्यात्म जिज्ञासु भी वहाँ शिक्षा प्राप्त करने के लिये आने लगे। फ्राँस के सुप्रसिद्ध दार्शनिक पॉल रिचर्ड ने पाण्डिचेरी आकर उनके कार्य में सहयोग देना आरम्भ किया और भारतीय संस्कृति तथा अध्यात्म विद्या के प्रचार के लिये ‘आर्य’ नाम का मासिक-पत्र अरविन्द के सम्पादकत्व में प्रकाशित कराया। पाल रिचर्ड की पत्नी मीरा रिचर्ड ने आश्रम की व्यवस्था का भार ग्रहण किया और आज तक वे ही ‘माताजी’ के नाम से उसका संचालन कर रही हैं।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरू के समान पथ प्रदर्शन करता है ।इस विषय की सभी जिज्ञासाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना द्वारा किया। भारत में स्वराज्य-आन्दोलन आरम्भ होने पर उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ पत्र द्वारा शिक्षित जनता में अपने मर्म स्पर्शी लेखों द्वारा अपूर्व चेतना और जागृति उत्पन्न कर दी थी। नवयुवकों पर उनके लेखों से जादू का सा प्रभाव होता था और दल के दल युवक राजनीतिक आन्दोलन में कूदकर अपने प्राणों की आहुति देने को प्रस्तुत हो गये। उनके इस अलौकिक प्रभाव को देखकर अंग्रेजी सरकार भयभीत हो गई और शीघ्र ही अवसर मिलने पर उसने उनको षड्यंत्र केस में फँसाकर जेल में बन्द कर दिया। श्री अरविन्द ने इस घटना का उपयोग भी आध्यात्मिक शक्ति के उच्च धरातल पर पहुँचने के लिये किया।
साधना से ही संभव है। जीवन मुक्त आत्मायें प्राण लोक में विचरण करती है पर उनकी मूल स्थिति ब्रह्मलोक में ही होती हैं। उस तीसरी सर्वोच्च भूमिका का प्राप्त करने के लिए अर्थ चिन्तन और जप की पहली तथा प्राण प्रक्रिया की दूसरी भूमिका में प्रवेश करना पड़ता है। प्रस्तुत लेख में प्राण प्रक्रिया की ही चर्चा की जा रही है। ध्यान धारण का विवेचन भी समयानुसार किया जावेगा।
साधना के उपात्मक अनेक सकाम निष्काम विधान है, साधक की श्रद्धा के अनुरूप उनके परिणाम भी उपलब्ध होते है। ऐसे विधि विधानों का वर्णन गायत्री महाविज्ञान में विस्तारपूर्वक किया गया है। वह प्रथम कक्षा की प्रक्रिया है।
साधना करते रहे ओर अपने अनुयायियों का भी उसी प्रकार मूक भाव से विश्वहित करने का आदेश देते रहे । अन्त में भारत को स्वराज्य प्राप्त होने नर 15 अगस्त जिसमें अपने कार्यक्रम का परिचय देते हुये बतलाया था-
साधना जिस स्थान पर हो रही है या होती रही है वहाँ की भूमि में कुछ दिव्य विशेषता होनी ही चाहिए। इस पुण्य भूमि में भगवान् बुद्ध को बड़ी शान्ति मिलती है।
साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों को विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुधार ढ़ड़ से प्रतिपादन मूल्य 2”‘)
साधना ,से अधिकाधिक लोग को परिचित कराने तथा इस महामन्त्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता , का विचार करने के लिये यह सेट बहुत ही उपयोगी है प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
साधना अर्थ का चिन्तन एवं जप है। इस महामंत्र के 24 अक्षरों में ईश्वर के उत्तम गुणों का चिन्तन करते हुए उन्हें अपने अन्तः करण में धारण करने एवं बुद्धि को कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग में लगाने का विधान है। इस चिन्तन के करने से मनोभूमि में दिव्य सद्गुणों का और अभिनव विवेक का जागरण होता है। साथ ही यह भी विश्वास जमता है कि इस जीवन में सबसे बहुमूल्य वरदान सद्बुद्धि है। यही सबसे बड़ी सम्पदा है उसे प्राप्त करने के लिए हमें प्राण पण से प्रयत्नशील होना चाहिए।
साधनाएँ आती हैं जिससे जीवन का अल्प प्राण विश्व व्यापी महाप्राण से संबंधित होकर एक महान शक्ति से ऐक्य का लाभ प्राप्त करता है। जीव एक सीमित दायरे में घिरा हुआ है, उसके हिस्से में साधारणतः थोड़ा सा प्राण आया है, उसी की शक्ति से वह जीवित रहता है और अपनी अभीष्ट आकाँक्षाओं की पूर्ति के साधन जुटाता है। जिसमें जितना प्राण है उसी के आधार पर उसकी प्रगति होती है और उतनी ही सीमित सफलता उपलब्ध होती है। पर जब उसका संबंध जैसे जैसे जितना जितना महाप्राण के साथ होने लगता है तो वह सीमितता भी विस्तृत एवं विकसित होने लगती है।
साधना में प्रवृत्ति निर्देशिका की गई है। सच्ची ब्रह्म जिज्ञासा का लक्षण ऋषि ने यही माना है कि इसमें लक्ष्य प्राप्ति के लिए कष्ट उठाने-तप करने की क्षमता है या नहीं। यदि यह क्षमता न हो तो उसे अनधिकारी ही माना जाना निश्चित है। अनधिकारी लोग ब्रह्म की चर्चा भले ही करते रहें पर उसे प्राप्त नहीं कर सकते। इस तथ्य का उद्घोषणा उपनिषद् कर्ता ने इस प्रकार किया है :-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-December
साधना सर् प्रािम करने का आदेश दिया हैं। स्वाध्याय और सत्संग को आत्मकल्याण का सर्वोपरि मार्ग बताया है। ज्ञान की महत्ता के सम्बन्ध में शास्त्र का अभिमत देखिये-
साधना में ही मनुष्य का सच्चा स्वार्थ सन्निहित है।
साधना में जिनकी अभिरुचि हो वे उसके लिये पत्र-व्यवहार करें
साधना क्रम को पूरे या अधूरे रूप में अपना कर हमें आत्मिक प्रगति की ओर सक्रिय कदम बढ़ाना ही चाहिए। जितना आत्मबल बढ़ेगा उतनी ही आन्तरिक शान्ति बढ़ेगी और जन सेवा की शक्ति भी उतनी ही बढ़ेगी । साथ लोक सेवा को भी उपेक्षा नहीं करनी है। केवल भजन या आत्म-निर्माण तक ही सीमित हो जाने और अपने चारों ओर से आँख बन्द कर लेने से काम नहीं चल सकता। सबको साथ लेकर ही सच्ची प्रगति संभव है।
साधना न भी करते रहे हो तो अब अक्टूबर अंक में बतलाये हुए साधन-क्रम का अपना लें। आप श्रम करें हम आवश्यक प्रेरणा देंगे। दोनों के सहयोग से कुछ परिणाम अवश्य निकलेगा। आप आप की अपेक्षा कल निश्चित रूप से ऊँचे उठे होंगे।
साधना की पूँजी रही है तो उससे स्वजनों की सुख शान्ति बढ़ाने के लिए कुछ उठा नहीं रखा है। रोते हुए बच्चों को हँसने के उपकरण प्रस्तुत करते हुए किसी भी माता-पिता को जिस प्रकार सन्तोष होता है उसी प्रकार अखण्ड-ज्योति की आत्मा भी आज अपने प्रयत्नों पर प्रसन्नता अनुभव करती है।
साधना क्रम में संलग्न गृहस्थों को भले ही न मिल सकें पर आत्मकल्याण के लक्ष्य को वे भी उसी प्रकार प्राप्त कर सकेंगे जिस प्रकार त्यागी और बैरागी प्राप्त करते है।
साधना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। तम की दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा केवल इस एक ही उपाय से हो सकता है। सच्ची शान्ति और प्रगति का मार्ग भी यही है।
साधनायें निकाली है। धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति-भाँति के उपायों का सहारा लेते रहते है, निकसे उनको अपनी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है। पर आत्मिक शांति, प्राप्त करने, साँसारिक तापों के छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही हे कि मनुष्य भिन्न-भिन्न कामनाओं का मोह त्याग कर सच्चे-हृदय से परमात्मा का आश्रय ले और शुद्ध भाव से उसकी स्तुति और प्रार्थना करे। हमें स्मरण रखना चाहिये कि सब प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला भी वास्तव में भगवान ही है। इसलिये अगर हम उसकी कृपा प्राप्त करके आत्मिक शांति प्राप्त कर लेंगे तो हमारी अन्य उचित कामनायें और आवश्यकतायें अपने आप में पूरी हो जायेंगी।
साधना को अखण्ड-ज्योति के अगणित पाठकों ने अपनाया है। पर हमें इतने से ही सन्तोष नहीं है। उसे प्रत्येक पाठक अपनाये, एक भी ऐसा न बचे जो उसकी उपेक्षा करे, तब हमें सन्तोष होगा। अनेक जन्मों में प्रयत्नों से हम सब आज इस स्तर पर पहुँच सके है कि आध्यात्मिकता के रुके विषयों में रुचि लें और उस दिशा में अभिमुख हों। अरबों नर तन धारियों में से इस स्थिति तक पहुँचने का सुअवसर कितनी स्वल्प आत्माओं को मिलता है?
साधना को किसी-न-किसी रूप में अपनावें और अपनी आध्यात्मिक सेवा करने का जीवन के इस अन्तिम अध्याय में हमें एक और अवसर प्रदान करें।
साधना में अग्रसर होकर वह अपने चारों ओर परमात्म-शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और यह समझने लगता है कि संसार जो कुछ हो रहा है वह उस प्रभु की प्रेरणा और इच्छा का भी फल है तब वह जो कुछ करता है उसका अन्तिम परिणाम जीव के लिये शुभ ही होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशान्ति दूर होने लगती है और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु से व्यथित, श्रान्ति, क्लान्त व्यक्ति को शीतल और शान्तिदायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गई। मनुष्यों ने अपनी भिन्न-भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिये तरह-तरह की साधनायें निकाली है। धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति-भाँति के उपायों का सहारा लेते रहते है, निकसे उनको अपनी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है। पर आत्मिक शांति, प्राप्त करने, साँसारिक तापों के छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही हे कि मनुष्य भिन्न-भिन्न कामनाओं का मोह त्याग कर सच्चे-हृदय से परमात्मा का आश्रय ले और शुद्ध भाव से उसकी स्तुति और प्रार्थना करे। हमें स्मरण रखना चाहिये कि सब प्रकार की कामनाओं को पूरा करने वाला भी वास्तव में भगवान ही है।
साधना में (1) रविवार को अस्वाद व्रत (2) मनन और चिन्तन के साथ नित्य स्वाध्याय (3)प्राणाकर्षण प्राणायाम (4) सोकर उठते ही अपने उपकारियों का मानसिक अभिवन्दन, पृथ्वी पर पैर धरते ही धरती माता को प्रणाम, माता, पिता, पति, गुरुजनों के चरणस्पर्श, उनके अभाव में चरणों की प्रतिमूर्ति को नमन एवं रात को सोते समय दिन भर के उपकारियों का स्मरण (5) जप के साथ अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में मानते हुए माता की गोदी में खेलने एवं उसका स्तन पान का ध्यान यह सब कार्य न तो अधिक समय साध्य है ओर न श्रमसाध्य। थोड़ी सी इच्छा, श्रद्धा और निष्ठा हो तो इनके लिए अवकाश भी हर किसी से सकते है। गायत्री, उपासना जिनकी अब तक बिलकुल नहीं चलती, वे इस आधार पर थोड़ी-सी से ही आरम्भ कर सकते है। जिनकी चलती है वे ध्यान के द्वारा उसे और परि-पुष्ट कर सकते है।
साधना के लिए आत्म उद्धार के मार्ग पर बढ़ने के लिए संन्यास लेते हैं वे भारी भूल करते हैं। यह कार्य तो उन्हें पारिवारिक जीवन में रहते हुए करने का है। जब पूर्ण परिपक्व स्थिति प्राप्त हो जावे, अपने में किसी प्रकार की कोई कच्चा या त्रुटि दिखाई न पड़े और अन्तरात्मा यह स्वीकार करे कि हमें अब अपने लिए कुछ करना शेष नहीं रहा है, धर्म, प्रवचन एवं ज्ञानदान के योग्य पूर्ण परिपक्वता प्राप्त हो चुकी है तो ऐसे व्यक्ति संन्यास ग्रहण करके परिव्राजक बन सकते हैं। परिव्राजक बनने के लिए आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त कर चुकने के अतिरिक्त दो साँसारिक प्रतिबन्ध भी हैं। एक यह कि स्वास्थ्य भ्रमण के योग्य हो।
साधना तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त साँसारिक विषयों और आसपास की बातों को भूलकर प्रभु के ध्यान में निमग्न हो जाय। जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता से अपने इष्टदेव की उपासना करता है, तभी वह आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह देवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता हैं इसी तथ्य को समझाने के लिये इस मन्त्र में बतलाया गया है जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिषेक (परमात्मा की उपासना) करता है तब उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते है और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।
साधना में जो ऋद्धि-सिद्ध प्राप्त कर लेता है वे इस पंच-सूची साधना क्रम में संलग्न गृहस्थों को भले ही न मिल सकें पर आत्मकल्याण के लक्ष्य को वे भी उसी प्रकार प्राप्त कर सकेंगे जिस प्रकार त्यागी और बैरागी प्राप्त करते है।
साधनात्मक प्रेरणा देने तक ही सीमित हो जायेगा? नहीं, बात ऐसी नहीं है। चारों का महत्व कभी कम नहीं माना जा सकता। आत्म-निर्माण के लिए, युग-निर्माण के लिए, सद्विचारों का अधिकाधिक प्रसार होना अत्यन्त आवश्यक है। कुविचारों के विस्तार ने आज मानव प्राणी को कुकर्म करने के लिए-कुमार्ग पर चलने के लिए विवश कर दिया है और मानव सभ्यता को सर्वनाश के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।
साधना करने के लिए अपरिपक्व मन बुद्धि के लोगों का भगवा कपड़ा पहन कर संन्यासी हो जाना और अपनी अपूर्णताओं से वेष को कलंकित करते फिरना, संन्यास धर्म के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार है। ऐसे व्यक्ति अपराधियों की श्रेणी में रखने योग्य हैं। ईश्वर प्राप्ति तो उन्हें होनी ही कहाँ है?
साधना और भावना ऊँची होते हुए भी वेष देखकर तो पहले लोग नाक भौं ही चढ़ाते हैं पीछे अधिक व्यक्तिगत परिचय होने पर भले ही कोई सम्मान करे। अब भिक्षा भी कोई ससम्मान प्राप्त नहीं कर सकता और न ऐसा सात्विक अन्न ही उपलब्ध है जिसे भिक्षा में लेकर खाने वाले की बुद्धि सात्विक बनी रहे। जंगल वन भी कट गये, जहाँ कंदमूल फल पैदा होते थे तथा जहाँ गायें पाल कर दूध भी उपलब्ध हो सकता था। अब तो वे ही जंगल किसी प्रकार बच रहे हैं जो सब प्रकार साधनहीन हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए इन बातों की भी अब खैर नहीं ।
साधना पूरे या अधूरे रूप में जिनमें आरम्भ की हो वे उसकी सूचना दे देंगे तो उनके मार्ग-दर्शन का विशेष रूप से ध्यान रखा जायेगा। शक्ति ड़ड़ड़ड़ साधना में जिनकी अभिरुचि हो वे उसके लिये पत्र-व्यवहार करें
साधनाओं में तितिक्षा का महत्व इसीलिए रखा गया है।
साधना में दो घण्टे से अधिक समय न लगा सकेंगे। आगामी दश वर्षों में इस बात का ध्यान रखकर ही पाठ्यक्रम बनेंगे और उन्हें निबाहना हर गृहस्थ के लिये सुगम ही होगा। गृह त्यागी योगी यती अपनी एकान्त साधना में जो ऋद्धि-सिद्ध प्राप्त कर लेता है वे इस पंच-सूची साधना क्रम में संलग्न गृहस्थों को भले ही न मिल सकें पर आत्मकल्याण के लक्ष्य को वे भी उसी प्रकार प्राप्त कर सकेंगे जिस प्रकार त्यागी और बैरागी प्राप्त करते है।
साधना करने चले गये। भगवान ने उनके धैर्य की परीक्षा लेने के लिए एक हजार वर्ष बाद फिर आकाशवाणी की कि तेरी साधना में अभी कमी है इसलिए एक हजार वर्ष और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस प्रकार तीन बार वह अवधि टली। तो भी राजा अधीर नहीं हुआ उस अवधि को साधारण मानता रहा। अन्त में भगवान ने उसके धैर्य को परिपक्व परख कर दर्शन दिये।
साधना बताया है।
साधना’ है। साधना को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। तम की दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा केवल इस एक ही उपाय से हो सकता है। सच्ची शान्ति और प्रगति का मार्ग भी यही है।
साधना के लिये एक आवश्यकीय शर्त यह है कि वह सच्चे भाव से चित्त लगाकर की जाय। आज कल जिस प्रकार बहुसंख्यक ‘धार्मिक’ कहलाने वाले व्यक्ति दुनिया को दिखाने के लिये अथवा एक रस्म पूरा करने के लिये मंदिर में जाकर दर्शन कर लेते है और नियम को पूरा कर लेने के लिए एकाध माला भी जप लेते है, उससे किसी बड़े सुफल की आशा नहीं की जा सकती। उपासना और साधना तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त साँसारिक विषयों और आसपास की बातों को भूलकर प्रभु के ध्यान में निमग्न हो जाय। जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता से अपने इष्टदेव की उपासना करता है, तभी वह आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह देवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता हैं इसी तथ्य को समझाने के लिये इस मन्त्र में बतलाया गया है जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिषेक (परमात्मा की उपासना) करता है तब उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते है और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ मेह की तरह बरसती जान पड़ती है।
साधना, तपस्या और उपासना करने के उदाहरण मिलते है। यह सत्य है कि स्त्री का प्रधान कार्य-क्षेत्र घर-गृहस्थी ही मानी गई है। गृहस्थ आश्रम के पश्चात् पत्नी भी पति के साथ वानप्रस्थ आश्रम में रह कर ईश्वरोपासना करती थी और उसके संन्यासी हो जाने पर वह भी उसी प्रकार का त्यागमय जीवन व्यतीत करती थी। इस प्रकार धार्मिक दृष्टि से इस देश की स्त्रियों का दर्जा कभी हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझा गया।
साधना सम्बन्धी-
साधना करती थी। वह भजन के साथ-साथ ऋषियों की कुछ सेवा भी करना चाहती थी पर ऋषि उसे अछूत कह कर उसकी सेवा भी स्वीकार न करते थे। निदान शबरी ने ऋषियों के रास्तों को झाड़ बुहार कर साफ करने और ईंधन इकट्ठा करके आश्रमों के आगे जमा कर देने की सेवा करना यह सोचकर आरम्भ कर दिया कि इसमें तो उन्हें आपत्ति होगी ही नहीं। किन्तु यह भी अभिमानी ब्राह्मणों को बुरा लगा। वे उसे पकड़कर मातंग ऋषि के आश्रम ले गये।
साधना का विधान सब के लिए नहीं है, उसकी उपयोगिता केवल संलग्न साधकों के लिए ही है। इसलिए उसका विधान उन्हें ही बता दिया जाता है जो उसकी आकांक्षा व्यक्त करते है।
साधना के क्षेत्र में पुरुषों के समान स्त्रियों का भी पूर्ण अधिकार माना गया है। वैदिक-काल से ही यहाँ स्त्रियों के सब प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों ओर क्रिया काण्डों में प्रमुख रूप से भाग लेने; शास्त्रों के अध्ययन और मनन में संलग्न रहने, ऊँची से ऊँची साधना, तपस्या और उपासना करने के उदाहरण मिलते है। यह सत्य है कि स्त्री का प्रधान कार्य-क्षेत्र घर-गृहस्थी ही मानी गई है। गृहस्थ आश्रम के पश्चात् पत्नी भी पति के साथ वानप्रस्थ आश्रम में रह कर ईश्वरोपासना करती थी और उसके संन्यासी हो जाने पर वह भी उसी प्रकार का त्यागमय जीवन व्यतीत करती थी। इस प्रकार धार्मिक दृष्टि से इस देश की स्त्रियों का दर्जा कभी हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझा गया।
साधना में अभी कमी है इसलिए एक हजार वर्ष और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इस प्रकार तीन बार वह अवधि टली। तो भी राजा अधीर नहीं हुआ उस अवधि को साधारण मानता रहा। अन्त में भगवान ने उसके धैर्य को परिपक्व परख कर दर्शन दिये।
साधना संबंधी पत्रोत्तर के लिये जवाबी पत्र भेजना चाहिये और अपना पूरा पता स्पष्ट अक्षरों में लिखना चाहिये।
साधनावस्था के सामान्य कार्यक्रम परिवार के सान्निध्य में-ब्रह्मचर्य गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रमों में रहते हुए पूरे किये जाते हैं। आन्तरिक दोषों के समाधान के लिए यही स्थिति उचित भी है, क्योंकि साँसारिक जीवन में ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के अवसर आते हैं। उनसे लड़ना और निपटना इन्हीं परिस्थितियों में रहकर संभव है। तैरना उसी को आयेगा जो जल में घुसेगा । बेशक उसमें डुबकी लगने का खतरा भी है, पर तैरना सीखना हो तो यह जोखिम भी उठानी ही पड़ेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-September
साधना की सुनिश्चितता के आधार पर सफल एवं सत्परिणाम दायिनी बना लेता है। आलसी और अनाड़ी माली वैसा ही खेत, वैसी ही पौधा वैसी ही उपकरण होते हुए भी अपनी पौधे को निष्प्राण बना देता है। देवताओं के लिए सभी समान है। सभी प्रिय है। पर वे किसी पर कृपा किसी पर उपेक्षा करते देखे जाते है तो इसके मूल में साधक की आत्मिक स्थिति ही काम करती है।
साधना में सफलता प्राप्त कर लेता वह उल्टा इस शिकारी को ही बाँध लेता है॥ 3॥ पहले कुंडलिनी शक्ति रूप हाँडी नीचे (नाभिकमल) में सुप्त अवस्था में पड़ी थी, पर जब वह जागृत होकर चैतन्य हो गई तो ऊपर चढ़ती गई। पहले मन रूपी मछली को माया रूपी बगला खाता रहता था, जब मन अपने स्वरूप को समझ कर सावधान हो गया तो वह उल्टा माया को ही निगलने लग गया॥4॥ आरम्भ में मिथ्या जगत रूपी आकाश क्षणिक आनन्द की वर्षा करता था, पर जब (परब्रह्म का) ज्ञान हृदय रूपी धरती पर जागृत हुआ तो भूमि तो वर्षा करने लगी और आत्मा स्पर्श करने लगा, इस प्रकार यह जल ऊपर की तरफ चढ़ने लगा। इसका आशय यह कि पहले माया का प्रभाव अधोगामी था पर कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने से साधना उध्र्वगामी होने लग गई॥5॥ मत्स्येन्द्रनाथ नाथ का पुत्र (शिष्य) गोरखनाथ कहता है कि अब में ममता माया-मोह को त्याग कर अवधूत हो गया हूँ ॥6॥”
साधना-मार्गों की तरह शरीर को अनावश्यक कष्ट देने, दिखावटी तपस्या करने के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था-
साधना की एक ऐसी स्पष्ट विधि बतलाई जिससे साधारण जन भी आत्मोन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं।
साधना क्रम यदि कोई श्रद्धा आर निष्ठा पूर्वक अपनाये रहता है तो वह पूर्णता के निकट ही जो पहुँचेगा।
साधना द्वारा उनका जागरण किया जाता है। वैज्ञानिक एक छोटे से अणु की छिपी शक्ति का जब ठीक उपयोग कर लेने में समर्थ हो जाते हैं तो विनाश कारी, एटम बम बनकर तैयार हो जाता है। मनुष्य यों एक परमाणु के समान ही तुच्छ प्रतीत होता है पर साधना के द्वारा जब उसकी प्रसुप्त शक्तियों का जागरण किया जाता है तो वह अत्यंत शक्तिशाली और महान् बन जाता है। स्वयं ही वह सुसम्पन्न नहीं होता वर और भी अनेकों को सुसम्पन्न बना देने की क्षमता उसमें प्रस्फुटित हो जाती है। कुण्डलिनी जागरण, ब्रह्म समाधि आदि ऐसे ही अवस्थाएँ है जिनमें सामान्य शरीर रहते हुए भी जीवन वस्तुतः अत्यन्त उच्च भूमिका में जा पहुँचता है और प्रकृति के सूक्ष्म रहस्यों का इसी प्रकार साक्षात्कार करता है जैसे हम सामान्य वस्तुओं को चर्म चक्षुओं से देखते है।
साधना करने की थी, वे अपने लौटने का स्वल्प सा ही आश्वासन हमें देकर गये थे और अधिक संभावना अपने न लौटने की ही बनाकर गये थे। पर उनकी मार्ग दर्शक शक्ति ने भी दस वर्ष तक और भी कुछ महत्त्वपूर्ण सेवाएँ उन्हें सौंप दी है और तब तक मथुरा रहकर ही शेष साधना करने का आदेश दिया है। तदनुसार उन्हें अब इधर ही रहना है यह समाचार हम सबके लिए बड़ा प्रसन्नता की है कि उनके प्रत्यक्ष सान्निध्य के लाभ से वंचित न रहना पड़ेगा।
साधना विज्ञान से संलग्न अनेकों साधक अपने में कुछ विशेष प्रकार की सूक्ष्म शक्ति संग्रह करने में समर्थ होते है और उसका लाभ स्वयं उठाते अथवा दूसरों को देते रहते है। यह प्रत्यक्ष तथ्य है। प्राचीन काल में ऐसे अगणित साधक सर्वत्र दृष्टि गोचर होते थे। यह ऋषियों का देश ही था। यह अध्यात्म विद्या का गौरव सभी को विदित था और सभी उसके साथ अपने को किसी न किसी रूप में संबद्ध रखने का प्रयत्न करते थे।
साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक पर यह साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक का संकल्प दुर्बल हो श्रद्धा और विश्वास ढीले हो, चित्त अस्थिर एवं अधीर रहे तो विधि विधान सही होते हुए भी वैसा परिणाम न मिलेगा जैसा मिलना चाहिए। अदृश्य जगत में जो महान् देव शक्तियाँ अवस्थित है उनको अपनी ओर आकर्षित कर सकना निश्चित रूप से अपनी आत्मिक स्थिति पर निर्भर है। जो लोग साधना रत रहते है पर अपनी मनोदशा को परिष्कृत नहीं करते वे उन लाभों से वंचित रह जाते है जो दूसरे अन्य साधक उसी मार्ग पर चलते हुए बहुत कुछ प्राप्त कर लेते है।
साधना जिसकी चल रही है उसे इन चार महीनों के लिए कम से कम सवाई कर दे। एक चौथाई और बढ़ादे और इस चार मास की साधना को विश्वकल्याणार्थ, समर्पण कर दें।
साधना को पूरा करने तक उसमें संलग्न रहेंगे। आशा यह की जाती है कि प्रस्तुत दश वर्षीय साधना क्रम यदि कोई श्रद्धा आर निष्ठा पूर्वक अपनाये रहता है तो वह पूर्णता के निकट ही जो पहुँचेगा।
साधना एकांगी रहा, भजन को ही उनने सब कुछ माना और आत्म निरीक्षण, आत्म चिन्तन, आत्म शोधन, आत्म परिष्कार आत्म दर्शन एवं आत्म कल्याण के महा कार्य को हाथ में ही नहीं लिया। ऐसी अव्यवस्थित साधना के परिणामों से वैसी ही आशा की जा सकती है जैसी कि आज दृष्टिगोचर हो रही है।
साधना मार्ग में अग्रसर होते रहने पर अंग में साधक “निष्पत्ति” अवस्था में पहुँच जाता है, जिससे उसकी समदृष्टि की जाती है, राग द्वेष का अन्त हो जाता है, साँसारिक माया-मोह सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और वह काल से भी छूट कर जीवनमुक्त हो जाता है-
साधना की विविधता, अनेकता के लिए झगड़ा करते है, वे नासमझ है। वास्तव में योग्यता एवं परिस्थिति की विषमता के कारण कोई समग्र मार्ग वो अपना लेता है, कोई दुर्गम से जान को तैयार हो जाता है। इससे पहुँचने में देर सवेर, आगे पीछे हो सकता है, पर मार्ग सही है, लक्ष्य ठीक है और गति हो रही है तो पहुँच अवश्य जावेगा। यही बात लौकिक एवं लोकोत्तर कार्यरूप आत्मोन्नति के लिये समान रूप से लागू होती है। वैसे आत्मोन्नति के साधन अनेक हो सकते है, पर मुझे जितना विशेष रूप से अनुभव हुआ है उन्हीं साधन लक्ष्यों पर प्रस्तुत लेख में विचार किया जा रहा है वे है।
साधना जप तप मात्र की ही नहीं कहते वरन स्वाध्याय और सत्संग भी उसके प्रधान अंग है। अखंड ज्योति को स्मृति रूप से पढ़ना इस अंग की एक अनिवार्य आवश्यकता है। जिन लोगों की आचार्यजी के प्रति व उनके मिशन के प्रति कुछ भी आस्था है उन्हें ड़ड़ड़़ड़ उस आस्था का परिचय अखंड ज्योति नियमित रूप से पढ़ते रहकर देना चाहिए।
साधना किन्हीं देवी देवताओं की भी की जाती है। कुछ यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र भी ऐसे है जो किन्हीं कर्मकाण्डों एवं अनुष्ठानों के साथ सिद्ध किये जाते है। इस प्रकार की सभी साधनाएँ साधक की आत्मिक स्थिति के अनुसार ही सफल होती है। श्रद्धा और विश्वास, साहस और धैर्य, एकाग्रता और स्थिरता, दृढ़ता और संकल्प ही वे तत्व है जिनके आधार पर यह साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक पर यह साधनाएँ सफल होती है।
साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त कर के एक व्यक्ति बड़ी कठिनाई से अपना ही उद्धार करने में समर्थ होता है, पर दूसरों का उद्धार करने की सामर्थ्य महापुरुषों में ही होती है। नदी या समुद्र में तैरते हुये लकड़ी के बड़े लट्ठे का आश्रय लेकर कितने ही मनुष्य किनारे लग जाते है, पर जल में बहने वाली छोटी डाली पर एक कौआ भी बैठ जाय तो डूब जाता है। इसी प्रकार अवतार या महापुरुषों का आश्रय लेकर कितने ही मनुष्य संसार सागर के पार पहुँच जाते है, पर भजन साधन करने वाले स्वयं ही बड़ा उद्योग करके मुक्ति तक पहुँचते है।
साधना की उपेक्षा करके कोई व्यक्ति उन लाभों से वंचित न रहे जो मानव जीवन की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक है।
साधना के द्वारा जब उसकी प्रसुप्त शक्तियों का जागरण किया जाता है तो वह अत्यंत शक्तिशाली और महान् बन जाता है। स्वयं ही वह सुसम्पन्न नहीं होता वर और भी अनेकों को सुसम्पन्न बना देने की क्षमता उसमें प्रस्फुटित हो जाती है। कुण्डलिनी जागरण, ब्रह्म समाधि आदि ऐसे ही अवस्थाएँ है जिनमें सामान्य शरीर रहते हुए भी जीवन वस्तुतः अत्यन्त उच्च भूमिका में जा पहुँचता है और प्रकृति के सूक्ष्म रहस्यों का इसी प्रकार साक्षात्कार करता है जैसे हम सामान्य वस्तुओं को चर्म चक्षुओं से देखते है। ऐसे सिद्ध पुरुष अपने आत्मिक प्रभाव का उपयोग करके किन्हीं परिस्थितियों को बदल भी सकते है। व्यक्तियों और वस्तुओं में भी उनके द्वारा परिवर्तन होता जाता है।
साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक का संकल्प दुर्बल हो श्रद्धा और विश्वास ढीले हो, चित्त अस्थिर एवं अधीर रहे तो विधि विधान सही होते हुए भी वैसा परिणाम न मिलेगा जैसा मिलना चाहिए। अदृश्य जगत में जो महान् देव शक्तियाँ अवस्थित है उनको अपनी ओर आकर्षित कर सकना निश्चित रूप से अपनी आत्मिक स्थिति पर निर्भर है। जो लोग साधना रत रहते है पर अपनी मनोदशा को परिष्कृत नहीं करते वे उन लाभों से वंचित रह जाते है जो दूसरे अन्य साधक उसी मार्ग पर चलते हुए बहुत कुछ प्राप्त कर लेते है।
साधना करनी चाहिए, इसका सविस्तार शिक्षण अक्टूबर अंक में होगा। प्रतिवर्ष इसी महीने आगामी वर्ष की शिक्षा कक्षा बदली जाया करेगी। जिनने गत वर्ष के शिक्षण को सफलता पूर्वक पूर्ण किया है व आग की साधना को पूरा करने तक उसमें संलग्न रहेंगे। आशा यह की जाती है कि प्रस्तुत दश वर्षीय साधना क्रम यदि कोई श्रद्धा आर निष्ठा पूर्वक अपनाये रहता है तो वह पूर्णता के निकट ही जो पहुँचेगा।
साधनाएँ साधक की आत्मिक स्थिति के अनुसार ही सफल होती है। श्रद्धा और विश्वास, साहस और धैर्य, एकाग्रता और स्थिरता, दृढ़ता और संकल्प ही वे तत्व है जिनके आधार पर यह साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक पर यह साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक का संकल्प दुर्बल हो श्रद्धा और विश्वास ढीले हो, चित्त अस्थिर एवं अधीर रहे तो विधि विधान सही होते हुए भी वैसा परिणाम न मिलेगा जैसा मिलना चाहिए। अदृश्य जगत में जो महान् देव शक्तियाँ अवस्थित है उनको अपनी ओर आकर्षित कर सकना निश्चित रूप से अपनी आत्मिक स्थिति पर निर्भर है।
साधना के परिणामों से वैसी ही आशा की जा सकती है जैसी कि आज दृष्टिगोचर हो रही है।
साधना और स्वाध्याय की अनिवार्यता पर धर्म शास्त्रों में अत्यधिक जोर दिया गया है क्योंकि आन्तरिक स्थिति की स्वस्थता के लिए यह दोनों ही बातें आवश्यक है। आन्तरिक स्वास्थ्य के बिना बाह्य जीवन नितान्त असफल एवं संतापयुक्त ही रहता है चाहे उसमें भौतिक सम्पदाएँ कितनी ही अधिक क्यों न हो।
साधना तो सभी के लिए अनिवार्य थी जो उसकी उपेक्षा करता था उसे पतित माना जाता था। इसी अपराध के अपराधी समाज बहिष्कार का दण्ड पाते थे और शूद्र, अन्त्यज,चाण्डाल आदि नामों से पुकारे जाते थे।
साधना को विश्वकल्याणार्थ, समर्पण कर दें।
साधनाएँ करके असाधारण और अलौकिक आत्मबल सम्पादन करते थे और अपने लोक परलोक को शानदार बनाते थे। पर इतना आत्मबल तो सभी के लिए आवश्यक समझा जाता था जिससे वह सुखी सन्तुष्ट और शान्ति पूर्ण जीवन यापन कर सकें। साधना और स्वाध्याय की अनिवार्यता पर धर्म शास्त्रों में अत्यधिक जोर दिया गया है क्योंकि आन्तरिक स्थिति की स्वस्थता के लिए यह दोनों ही बातें आवश्यक है। आन्तरिक स्वास्थ्य के बिना बाह्य जीवन नितान्त असफल एवं संतापयुक्त ही रहता है चाहे उसमें भौतिक सम्पदाएँ कितनी ही अधिक क्यों न हो।
साधना रत रहते है पर अपनी मनोदशा को परिष्कृत नहीं करते वे उन लाभों से वंचित रह जाते है जो दूसरे अन्य साधक उसी मार्ग पर चलते हुए बहुत कुछ प्राप्त कर लेते है।
साधना की प्रक्रिया देखने में घाटे का काम, समय की बर्बादी भले ही लगे पर वस्तुतः वह वैसी बात नहीं है। उसमें बहुत कुछ तथ्य है, बहुत कुछ सार है।
साधनाओं से विमुख हममें से अधिकांश लोग चाण्डाल अन्त्यज कहे जाने के ही अधिकारी है।
साधना करनी पड़ती है। अपना चेहरा कुरूप हो तो फोटो भी कुरूप ही खिंचेगा माता पिता का स्वभाव अव्यवस्थित हो तो उनके बालक कैसे सज्जन और सद्भावी होंगे? बच्चों को पौष्टिक भोजन कराके सद्भावी होंगे? बच्चों को पौष्टिक भोजन कराके उन्हें स्वस्थ और कपड़े जेवर आदि से सजा कर सुन्दर बनाया जा सकता है पर उनके स्वभाव में श्रेष्ठता तो तभी आयेगी जब माता पिता अपनी श्रेष्ठता का प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उन पर डाले।
साधना को जानना आवश्यक होता है पर केवल जान लेने से ही काम नहीं चलेगा। हमें कलकत्ते जाना है, उसका मार्ग भी मालूम हो गया, पर जब तक उस मार्ग पर चलेंगे नहीं, हम कलकत्ता नहीं पहुँच सकते। उसी प्रकार आत्मा के सच्चिदानन्द स्वरूप का ज्ञान एवं स्वरूप प्रति के साधन जानकर उनको अपनाने व आचरति करने की परमावश्यकता है।
साधना करने का आदेश दिया है। तदनुसार उन्हें अब इधर ही रहना है यह समाचार हम सबके लिए बड़ा प्रसन्नता की है कि उनके प्रत्यक्ष सान्निध्य के लाभ से वंचित न रहना पड़ेगा।
साधना की उपेक्षा करने से दंड स्वरूप हुआ था। यह कभी नहीं सोचा गया था कि आगे चलकर यह वशं परम्परा ही चल पड़ेगी। आज तो आत्म कल्याण की आध्यात्मिक साधनाओं से विमुख हममें से अधिकांश लोग चाण्डाल अन्त्यज कहे जाने के ही अधिकारी है।
साधना द्वारा उसका आवरण अलग कर दिया तो उलटी स्थिति हो गई । तब भैंस को बाँध रखने वाला खोला (खूँटा) तो अपार्थिव आनन्द रूपी दूध देने लगा और माया रूपी भैंस ज्ञान की दासी बनकर उस दूध को बिलोने लगी जिसके द्वारा ब्रह्मानन्द रूपी मक्खन प्राप्त हुआ। माया सास है और मानवीय इच्छा बहु है। यही इच्छा माया का पालन करती है (अर्थात् उसे पालने में झुलाती है)॥ 2॥ मनुष्य के काया रूपी खेत में साधन रूपी खेती की जाती है और परिवक हो जाती है तब वह अहंकार को खा जाती है (नष्ट कर देती है)। इसी प्रकार काम-क्रोध रूपी पारधी (शिकारी) पहले मन शिकार करता रहता है अर्थात् उससे इच्छानुसार अनुचित कार्य कराता है।
साधना) है -
साधना भी इन दोनों अवसरों पर कुछ विशेष की जाय।
साधना से नारी महान् दिव्य शक्ति उपलब्ध कर सकती है।
साधना करने वालों को जीवन के सर्वांगीण विकास का लाभ भी मिलना ही चाहिए।
साधना उध्र्वगामी होने लग गई॥5॥ मत्स्येन्द्रनाथ नाथ का पुत्र (शिष्य) गोरखनाथ कहता है कि अब में ममता माया-मोह को त्याग कर अवधूत हो गया हूँ ॥6॥”
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-March
साधना करने की आवश्यकता होती हैं। पर यदि आहार का अभाव हो जाय तो यह भजन और ध्यान दो- चार दिन भी नहीं हो सकता ।। इसी तथ्य को समझ कर कोई अनुभवी कह गया है- ''मुखे भजन न होय गुपाला, यह ले लो अपनी कण्ठी माला।''
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1961-February
साधना भी सीखो साधक!
साधना की आत्म-प्रेरणा असन नहीं हो सकती। निष्ठा ने कहा- जो शक्ति इस मार्ग पर खींच लाई है वह गलत मार्ग-दर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा जीव अकेला आता है, अकेला जाता है, अकेला ही अपनी शरीर रूपी कोठरी में बैठा रहता है, क्या इस निर्धारित एकान्त विधान में उसे कुछ असुखकर प्रतीत होता है? सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है, वायु अकेला बहता है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है?
साधना का पथ अपनाना है तो तुम्हें भी यही आदर्श अपनाना होगा जब विषयम को पाने के लिए तुम्हारी आत्मा भी गंगा की धारा की तरह द्रघगामी होगी तो कहाँ भीड़ में आकर्षण लगेगा और कहाँ सूनेपन में भय लगेगा? गङ्गा तट पर निवास करना है तो गङ्गा की प्रेम साधना भी सीखो साधक!
साधना के कारण उसे शीघ्र ही आश्चर्यजनक सफलता मिली और किसी घटिया धातु को सोने के रूप में बदल देना उसके लिए साधारण सी बात हो गई। मानवीय देह को अमर बनाने के प्रयत्न में भी वह बहुत कुछ सफल हुआ। उसकी इन महान् वैज्ञानिक खोजों का प्रमाण उसके बनाये “रसोद्वार तन्त्र” नामक ग्रन्थ में मिलता है, जिसे आज भी आयुर्वेद जगत् में अद्वितीय माना जाता है। पर परिस्थितियों वश नागार्जुन को अपने कार्य को पूर्ण करने का अवसर नहीं मिल सका और दस वर्ष तक ढाँक का राज्याधिकारी रहने के बाद ही उसका अंत हो गया।
साधना करके चेतना के उच्च स्तर पर आरुढ होने से ज्ञानयोग का अभ्यास करके अपने को परमात्मा-स्वरूप अनुभव कर लेने से मनुष्य योग की चमत्कारी सिद्धियों का स्वामी बन सकता है, उसी प्रकार शक्तिशाली जड़ी-बूटियों और औषधियों का प्रयोग करके भी इस कार्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
साधना द्वारा इस योग्य बना लिया कि वह सब प्रकार के परिक्षणों के भले-बुरे प्रभाव को निःशंक होकर सहन कर सके। उसने अपनी दैहिक स्थिति को इतना सुदृढ़ बना लिया कि न तो उस पर किसी प्रकार शस्त्र आदि का प्रभाव पड़ सकता था और न किसी प्रकार के विष आदि से उसको हानि पहुँचाई जा सकती थी। उसकी सहनशक्ति चरम सीमा तक पहुँच गई थी और वह निरन्तर अपने मक्ष्य की तरफ अग्रसर होता जाता था।
साधना करने वाली इस गंगा को देखते नहीं, प्रियतम के प्रेम में तल्लीन होकर उससे मिलने के लिए कितनी तल्लीनता और आतुरता से चली जा रही है। रास्ते के विघ्न उसे कहाँ रोक पाते हैं? अन्धकार और अकेलेपन को वह कहाँ देखती हैं? लक्ष की यात्रा से एक क्षण के लिए भी उसका मन कहाँ विरत होता है? यह साधना का पथ अपनाना है तो तुम्हें भी यही आदर्श अपनाना होगा जब विषयम को पाने के लिए तुम्हारी आत्मा भी गंगा की धारा की तरह द्रघगामी होगी तो कहाँ भीड़ में आकर्षण लगेगा और कहाँ सूनेपन में भय लगेगा?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-December
साधना में संलग्न रहते थे व जनमानस को दिशा देने वाले महत्वपूर्ण सूत्रों की खोज यही करते थे आज भी अपनी साँस्कृतिक धरोहर के रूप में भार के 70 प्रतिशत गाँवों में वृक्षों की पूजा होती है। इनमें पीपल,बरगद , तुलसी, विल्व, आँवला आम आदि प्रमुख है।
साधना भी कहीं होती है। क्या ? इतनी कीमती चीजें आप इतनी सस्ती कीमत पर खरीदने की कोशिश करेंगे? ऐसा मत कीजिए। वास्तविकता के नजदीक आइये।
साधनाओं के बारे में हमने हमें ये बता54 दीजिए,ख् इसका मंत्र बताइये, उसका तंत्र बताइये। हमने अपनी मर्जी खतम कर दी ओर उनसे कहा-हुकुम कीजिए। उन्होंने जो कुछ भी कहा हम बिना सोचे-समझे, आँखें मूँदकर उस रास्ते पर चलते रहे। हमें विश्वास था कि हमको रास्ता दिखाने वाली सत्ता हमसे सही और समर्थ है। आज हम कहाँ से आपके लिए भी यही रास्ता है।
साधना के क्षेत्र में हम जितना ही नये विचारों को मन में रखना ओर फिर अपने ढंग से सोचना शुरू करेंगे उतना ही हमारी बुद्धि का विकास होगा।
साधनाओं को जब हम देखते हैं तो एक मुख्य तपस्विनी पार्वतीजी तप करती रहती है। कितने ही वर्ष वे हवा पर रही, पत्ते खाकर रही, पानी पीकर रही। कभी तपस्वियों की ऐसी साधनाएं होती थी कभी ज्ञान की साधनाएं होती रही। सूत ओर शौनक से ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्रों में जाकर कथा-प्रसंग करते थे वहां अनेकानेक भक्तजन आते थे और कथा श्रवण करते थे, सत्संग की बाते करते थे। कभी शिक्षण का सिलसिला तो ब्राह्मणो के आरण्यक स्थापित हुए और उनके जाकर के लोग ज्ञानर्जित करने लगें साधनाएं उस समय की अजीबिी।
साधनाएं समयानुकूल ओर पात्रता के अनुकूल हुआ करती थी। एक -सी साधनाएं कभी नहीं रही । बहुत पुराने जमाने की साधनाओं को जब हम देखते हैं तो एक मुख्य तपस्विनी पार्वतीजी तप करती रहती है। कितने ही वर्ष वे हवा पर रही, पत्ते खाकर रही, पानी पीकर रही। कभी तपस्वियों की ऐसी साधनाएं होती थी कभी ज्ञान की साधनाएं होती रही।
साधना की अपेक्षा लाखों गुनी श्रेयस्कर सिद्ध हुई ऐसी ही दूसरों की बात है ।
साधना उसकी अनिवार्यता, स्वयं गिरकर भी दूसरों को सहारा देना इस भूमि की विशिष्टता रही है। हम भले ही हानि सह ले पर दूसरों को लाभान्वित करना हमारा स्वभाव है। सामाजिकता के प्रति हम सजग है और उच्च नैतिक मूल्यों की स्थापना हम सबका लक्ष्य है?
साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधनाएं होती थी कभी ज्ञान की साधनाएं होती रही। सूत ओर शौनक से ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्रों में जाकर कथा-प्रसंग करते थे वहां अनेकानेक भक्तजन आते थे और कथा श्रवण करते थे, सत्संग की बाते करते थे। कभी शिक्षण का सिलसिला तो ब्राह्मणो के आरण्यक स्थापित हुए और उनके जाकर के लोग ज्ञानर्जित करने लगें साधनाएं उस समय की अजीबिी। हजारों तरह की साधनाएं प्रचलित थी जिनमें ताँत्रिक साधनाओं से लेकर सकाम साधनाएं तक होती थी लेकिन शागिर्द के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधना के इच्छुक व्यक्ति को उनका विशाल कार्यक्षेत्र यहाँ तैयार कर दिया गया हैं उसका आधार भारतीय धर्म एवं संस्कृति के अनुरूप तथा युग की पुकार से ओत-प्रोत रहने के कारण जनता ने उसे सहारा ही नहीं स्वीकार भी किया है राजनैतिक वर्चस्व प्राप्त करने के लिए लालायित लोग भी यदि लोक-मंगल की सेवासाधना सामाजिक स्तर पर करने लगें तो देश का कितना बड़ा उपकार हो और उन उमंगों का भी सदुपयोग हो जो राजनीति में इधर-उधर धक्के खाती हुई भ्रमित, कलुषित एवं अस्त-व्यस्त होती रहती हैं यदि लोकसेवी रहकर जनता की सच्ची श्रद्धा अर्जित कर ली जाय तो राजनेता बनने में भी कुछ कठिनाई नहीं रहती । यों ही उछल-कूद अथवा आपराधिक प्रवृत्ति के आधार पर यादि और स्थिरता के बदले अपयश ही गले पड़ता है विवेक एवं सद्बुद्धि का तकाजा यह है कि अपने समय की माँग को समझ स्वीकार करे ओर “धियो यो नः प्रचोदयात्”
साधना ‘ (द्वितीय खण्ड ) में की है प्रसंग एक उच्चस्तरीय साधक का है। जो साधना के दौरान एक भिन्न ‘टाइम-जोन- में विचरण करने लगता था। पर यह बात नहीं कि इस मध्य उसे अपना स्थूल अस्तित्व विस्मित हो जाता है उसे इसकी भिज्ञता बराबर बनी रहते और बीच-बीच में उसी परीक्षा भी करता रहता । वर्णन इस प्रकार है-
साधना में महत्ता की व छोटी-सी बात समझकर कभी किसी की भी उपेक्षा न करने की।
साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधना करो तथा युग की आवश्यकता के अनुरूप सन्तान समाज को देने का उत्तरदायित्व पूरा करो।
साधना बताइये, हमको बीजमंत्र बताइये। तत पूछिये, हमने तो ऐसा नहीं पूछा है। अपने जीवन की साधनाओं के बारे में हमने हमें ये बता54 दीजिए,ख् इसका मंत्र बताइये, उसका तंत्र बताइये। हमने अपनी मर्जी खतम कर दी ओर उनसे कहा-हुकुम कीजिए। उन्होंने जो कुछ भी कहा हम बिना सोचे-समझे, आँखें मूँदकर उस रास्ते पर चलते रहे।
साधनाएं तक होती थी लेकिन शागिर्द के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधनाएं उस समय की अजीबिी। हजारों तरह की साधनाएं प्रचलित थी जिनमें ताँत्रिक साधनाओं से लेकर सकाम साधनाएं तक होती थी लेकिन शागिर्द के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधना मनुष्यों द्वारा की गयी साधना की अपेक्षा लाखों गुनी श्रेयस्कर सिद्ध हुई ऐसी ही दूसरों की बात है ।
साधना में लगाया है? इसलिए, ताकि आप भगवान के ऊपर अहसान करने में सर्ता हो सकें कि आपका अहसान भगवान कभी नहीं भूलें। भगवान अहसान लेते नहीं, हनुमान को उन्होंने अपने राज कुटुम्ब का सदस्य बना लिया। आपने राम पंचायतन के चित्र देखे हैं न ? उसमें पांच तो वे चार भार्ठ ओर सीताजी हैं, पाँच तो वे चार भार्ठ ओर सीताजी हैं, पाँच नाम से पंचायतन हो जाता है, लेकिन आपने हर चित्र में हनुमानजी को शामिल देखा होगा।
साधना नहीं की । भगवान ने हुकुम दिया-सीता को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूँढ़ लाये, अंगूठी दे आये और माँ की निशानी लाकर दी ओर कहा देखिये हम पता लगा लाये। बस काम नम्बर एक पूरा हो गया। दूसरा अध्याय साधना का शुरू-अब चलें राक्षसों से लड़ने के लिए, युद्ध की तैयारी करें-साधन जुटाएँ हनुमानजी अपने मोहल्ले में गये और सारे रीछ-बन्दरों से बोल चलिए, हम तो भगवान के काम के लिए जा ही रहे है, आप सब भी चलिए। हनुमान जी ने ऐसा उत्साह भरा कि सब के बस उनके साथ चल दिये, उनमें नल-नील जैसे अच्छे-खासे इंजीनियर भी थे, जो बड़ी इमारत भी बना सकते थे।
साधना है। हनुमानजी ने स्वीकार कर लिया कोई आग्रह नहीं किया कि कोई जप, तप, ध्यान बताइये। यह आग्रह तो उन लोगों का रहता है जो कुछ पुरुषार्थ नहीं कर सकते, जिन्हें मेहनत से काई लगाव नहीं है,
साधना सरल भी और निरायद भी।
साधनाओं में विशेष -कर गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में स्वर्णित सविता अर्थात् प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य की प्रकाश रश्मियों की ध्यान धारणा का विशेष महत्व हैं ओजस्, तेजस् एवं वर्चस अर्जित करने के लिए गायत्री उपासकों में से जिन्होंने भी इस दिशा में निष्ठापूर्वक ईमानदारी से कदम बढ़ाया है उनने बौद्धिक एवं आध्यात्मिक दोनों की क्षेत्रों में आशातीत सफलताएं अर्जित की है प्रकाश-साधना हर वर्ग एवं हर आयु के नर-नारी सुगमतापूर्वक कर सकते हैं। और मनोवांछित उपलब्धि हस्तगत कर सकते हैं सविता की स्वर्णिम प्रकाश-साधना सरल भी और निरायद भी।
साधनाएं प्रचलित थी जिनमें ताँत्रिक साधनाओं से लेकर सकाम साधनाएं तक होती थी लेकिन शागिर्द के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधना हजार वर्ष की गुलामी से अपना सब कुछ खो बैठने वाले समाज में संव्याप्त नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर किया जाना सबसे बड़ा काम है और उसे राजनीति द्वारा नहीं, सामाजिक सत्प्रवृत्तियों द्वारा ही पूरा किया जा सकता है जिन गाँधी जी को दुहाई देकर राजनीतिज्ञ लोग अपने क्षूद्र स्वार्थों को पूरा करने में संलिप्त हैं उन्हीं राष्ट्रपिता की भावनाएँ थी कि राष्ट्रीय स्वाधीनता के पश्चात् राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े कार्यकर्ता और सर्वाधिक प्राचीन राजनीतिक संस्था समाज सेवा के क्षेत्र में उतरे।
साधना के लिए जब वह आसन पर बैठता, तो थोड़ी ही देर में अत्यन्त स्निग्ध और उज्ज्वल प्रकाश पुँज से वह घिर जाता और इसके साथ ही उसे ऐसा प्रतीत होने लगता जैसे वह किसी अपरिचित स्थान में पहुंचकर एक नूतन एवं अज्ञात मार्ग में धवल चाँदनी में चल रही हों। ज्योत्सना खूब तीव्र और प्रखर थी। पर वह सूर्य किरणों की तरह ऊष्मा युक्त एवं कष्टकारक नहीं थी। उसमें चांदनी से भी अधिक शीतलता और उज्ज्वलता थी, इतनी कि सब कुछ दूर-दूर तक स्पष्ट रूप से देखा जा सके और पुस्तक भी आसानी से पढ़ी जा सके।
साधना विज्ञान में इसके लिए अनेकानेक उपाय सुझाये गये इन उपायों को अपनाया जा सके, तो आज भी व्यक्ति अचेतन मस्तिष्क के उन रहस्यमय केन्द्रों को जगाने और उभारने में सफलता हस्तगत कर सकता है जिसके जाग्रत होने पर क्षुद्र से महान और नर से नारायण में बदल जानें की बात कही गई हैं।
साधना हर वर्ग एवं हर आयु के नर-नारी सुगमतापूर्वक कर सकते हैं। और मनोवांछित उपलब्धि हस्तगत कर सकते हैं सविता की स्वर्णिम प्रकाश-साधना सरल भी और निरायद भी।
साधना के आसन से उठकर यहां इस अविज्ञात स्थान में आ गया है? यह प्रश्न उठते ही उसके आसन को टटोल कर देख, मालूम पड़ा कि वह थिवत् अपने स्थान और आसन पर विराजमान है। वह सम्पूर्ण रूप से चैतन्य है। यह समाधि अवस्था भी नहीं है उस दिन की यात्रा यही समाप्त हो गई।
साधना के दौरान साधक उसी प्रकाश लोक में पहुंच गया। सामने शुभ्र स्फटिक निर्मित वह भव्य भवन था। भवन इतना आकर्षक था कि वह उसे लिपिबद्ध करना चाहता था। इस हेतु आज पहले से ही अपने पार्श्व में कागज, कलम लेकर बैठा था। भवन पर एक विहंगम दृष्टि डाली और उसका वर्णन कागज में संजोने के लिए कलम उठायी।
साधना के दौरान उस नये आयाम में हुए उसमें से सम्पूर्ण का वर्णन करना न तो यहां अभीष्ट है न आवश्यक । उद्देश्य मात्र यहां इतना बनाना है कि इस स्थूल जगत की तरह कितने ही सूक्ष्म लोक है जो सब भौतिक संसार से एकदम स्थूल शरीर से कहा जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
साधनाओं से लेकर सकाम साधनाएं तक होती थी लेकिन शागिर्द के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधनाएं होती रही। सूत ओर शौनक से ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्रों में जाकर कथा-प्रसंग करते थे वहां अनेकानेक भक्तजन आते थे और कथा श्रवण करते थे, सत्संग की बाते करते थे। कभी शिक्षण का सिलसिला तो ब्राह्मणो के आरण्यक स्थापित हुए और उनके जाकर के लोग ज्ञानर्जित करने लगें साधनाएं उस समय की अजीबिी। हजारों तरह की साधनाएं प्रचलित थी जिनमें ताँत्रिक साधनाओं से लेकर सकाम साधनाएं तक होती थी लेकिन शागिर्द के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों और ऋषियोँ का काम था । ऋषि समय की जानकारी प्राप्त करने वाले द्रष्टा होते थे वे जो साधनाएं बताते थे लोग उन्हें अपनाना अपना सौभाग्य मानते थे और सफलता भी प्राप्त करते थे।
साधना किया करता था। साधना के लिए जब वह आसन पर बैठता, तो थोड़ी ही देर में अत्यन्त स्निग्ध और उज्ज्वल प्रकाश पुँज से वह घिर जाता और इसके साथ ही उसे ऐसा प्रतीत होने लगता जैसे वह किसी अपरिचित स्थान में पहुंचकर एक नूतन एवं अज्ञात मार्ग में धवल चाँदनी में चल रही हों। ज्योत्सना खूब तीव्र और प्रखर थी। पर वह सूर्य किरणों की तरह ऊष्मा युक्त एवं कष्टकारक नहीं थी। उसमें चांदनी से भी अधिक शीतलता और उज्ज्वलता थी, इतनी कि सब कुछ दूर-दूर तक स्पष्ट रूप से देखा जा सके और पुस्तक भी आसानी से पढ़ी जा सके।
साधना की? कोई अनुष्ठान , जप, तप , किये होंगे या ध्यान-धारणा की थी। कुछ भी नहीं किया था, सुग्रीव के साथ एक गुफा में छिपे बैठे थे। जब भगवान राम से मुलाकात हो गयी, मिलता-जुलना हुआ तो कहने लगे-मैं आपकी शरण में आ गया हूँ, मुझे आज्ञा बताइये आज्ञा बता दी कि सीताजी को खोज कर लाइये कोई अनुष्ठान, जन, तप अथवा रामायण, गीता, नारायण मंत्र का पाठ नहीं बताया। भगवान राम ने कहा- इस समय आपके साथी आपत्ति में है, सीताजी आपत्ति में है, अधर्म के बादल छाये है, उन्हें दूर करना पड़ेगा।
साधना का निष्कर्ष है चूंकि यह सृष्टि असीम है विचार असीम है अतः किसी भी एक विचार को पूर्ण नहीं माना जा सकता । इसी मूल तत्व को ध्यान में रखकर भारतीय संस्कृति दृष्टिकोण को संकुचित न कर विभिन्न विचारों को प्रकट करने वाली हैं जो भी श्रेष्ठ है उसे आत्मसात् करने वाली है इसी कारणवश यहां की साँस्कृतिक सम्पदा ने प्रत्येक विचारशील को आकर्षित एवं प्रभावित किया है फिर चाहे वह किसी भी देश का क्यों न हो। फ्रेंच मनीषी एन्ववेति दू यू पेरो द्वारा अनुवादित उपनिषदों ने जर्मन दार्शनिक शेंलिग और शोपेनहाँवर का भी ध्यान आकृष्ट किया । जिसने इसकी प्रशंसा में कहा-”यह मानव की उच्चतम बुद्धि का प्राकट्य है और उसने इस औषनिषदिक वाक्य को ग्रहण किया-’ब्रह्मविद् बह्मोव भवति’- अर्थात् ब्रह्म को जान लेने वाला ब्रह्म की हो जाता है वर्ष 1789 में सर विलियम जोम्स ने कालिदास की अमरकृति , अभिज्ञान शाकुन्तलम् का अंग्रेजी अनुवाद किया जिसको इतनी लोकप्रियता मिला कि बीस वर्षों से कम अवधि में इसके पाँच अँग्रेजी संस्करण निकल गए। 1891 में विरुवयात्री एवं क्रान्तिकारी विचारक जार्ज फाँर्स्टर द्वारा इसका जर्मन रूपांतरण हुआ।
साधना करते रहे। अपनी मर्जी की साधना की? नहीं, अपनी मर्जी की साधना नहीं की । भगवान ने हुकुम दिया-सीता को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूँढ़ लाये, अंगूठी दे आये और माँ की निशानी लाकर दी ओर कहा देखिये हम पता लगा लाये। बस काम नम्बर एक पूरा हो गया।
साधना करने वाले की लिए अपनी ग्रहण शक्ति को एकांगी नहीं बनाना चाहिए। अपने आपको किसी एक ही विचारधारा में कैद नहीं कर लेना चाहिए । जो ऐसी भूल कर बैठते हैं उनकी बुद्धि भी एकाँगी बन जाती है। वह नाना दिशाओं में विकसित नहीं हो पाती इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध विचारक बेकने ने ठीक ही कहा है-” ईश्वर ने बुद्धि की कोई सीमा निश्चित नहीं की है ।
साधना महाभारत की है और अर्जुन उसी में लग गये ।तब भगवान की बनायी साधना मनुष्यों द्वारा की गयी साधना की अपेक्षा लाखों गुनी श्रेयस्कर सिद्ध हुई ऐसी ही दूसरों की बात है ।
साधना की? नहीं, अपनी मर्जी की साधना नहीं की । भगवान ने हुकुम दिया-सीता को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूंढ़ लाइये और वे सीताजी को ढूँढ़ लाये, अंगूठी दे आये और माँ की निशानी लाकर दी ओर कहा देखिये हम पता लगा लाये। बस काम नम्बर एक पूरा हो गया। दूसरा अध्याय साधना का शुरू-अब चलें राक्षसों से लड़ने के लिए, युद्ध की तैयारी करें-साधन जुटाएँ हनुमानजी अपने मोहल्ले में गये और सारे रीछ-बन्दरों से बोल चलिए, हम तो भगवान के काम के लिए जा ही रहे है, आप सब भी चलिए।
साधना करते हैं।
साधना सम्बन्धी मार्गदर्शन दिया था। यह सारा विवरण 1984 की जून-जुलाई तथा 1985 की अप्रैल माह की पत्रिका तथा बाद में हमारी वसीयत ओर विरासत’ में प्रकाशित है। तब से अब तक यही अखण्ड दीपक जल रहा है 1926 से 1941-42 तक यह आंवलखेड़ा व आगरा रहा तथा बाद में 1971 तक ‘अखण्ड ज्योति संस्थान’ मथुरा में । मथुरा में यह कक्ष वैसा ही बनाए रखा गया है एवं घीयामंडी में सभी उसके दर्शन कर सकते हैं। 1971 की 20 जून से यह अखण्ड दीपक परमवंदनीया माताजी एवं परमपूज्य गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्रत्यक्ष रूप से उनकी उपस्थिति में व बाद में उनके परीक्षा संरक्षण में सतत् शांतिकुंज सप्तसरोवर हरिद्वार में जल रहा है, जहां नित्य नियमित रूप से इसको दर्शन प्रणाम करने हेतु हजारों व्यक्ति आते हैं।
साधना और तपश्चर्या के लाभों को सारे संसार को बांटा है। उस अनुदान का लाभ समूचा विश्व उठा भी रहा है। किन्तु हम स्वयं उस प्राचीन गौरव को भुला बैठे। उच्च आदर्शों से च्युत होकर अपनी सारी भौतिक संपदाएं एवं आध्यात्मिक विभूतियां खोकर रख दी। युग संधि की संक्रमण वेला में आज समय उन्हें फिर से जाग्रत करने का संदेश दे रहा है।
साधना से लोकमानस में गहरा सम्मान और स्थान बना लें जो इसके लिए साहस कर सकते हैं, लोक श्रद्धा एवं यशास्विता उन्हीं के गले पड़ती है और वे ही सच्चे लोकनायक कहलाने के अधिकारी बनते हैं।
साधना के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में प्रथम बार 1937 की वसंत पंचमी से हस्तनिर्मित कागज पर हाथ से चलने वाली मशीनों से निकलने के प्यास द्वारा आरम्भ की गयी थी। 1 अंक निकलने के बाद से अनौपचारिक रूपों से पत्रों द्वारा 200 पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास आगरा से चलता रहा है बाद में फ्रीगंज आगरा से नियमित प्रकाशन वसंतपर्व 1940 के प्रथम अंक से हुआ तो 20 जनवरी को प्रकाशित हुआ । यही प्रामाणिक रूप में उपलब्ध प्रथम अंक है। तक से सतत् प्रकाशित है तो रहा हैं 200 पत्रिका प्रतिमाह से छोटे कलेवर में आरंभ हुआ यह ज्योति-पुज आज बड़ा रूप लेकर बड़े आकर्षक फॉरमेट में भारत व विश्व के कोने-कोने में पहुँचता है तीनों वर्ष स्वयं में ऐतिहासिक व प्रामाणिक हैं पर वास्तविक प्रकाशन कब से है इसे परिजन उपरोक्त मार्गदर्शन से समझ सकते हैं।
साधनाएं कभी नहीं रही । बहुत पुराने जमाने की साधनाओं को जब हम देखते हैं तो एक मुख्य तपस्विनी पार्वतीजी तप करती रहती है। कितने ही वर्ष वे हवा पर रही, पत्ते खाकर रही, पानी पीकर रही। कभी तपस्वियों की ऐसी साधनाएं होती थी कभी ज्ञान की साधनाएं होती रही। सूत ओर शौनक से ऋषि नैमिषारण्य क्षेत्रों में जाकर कथा-प्रसंग करते थे वहां अनेकानेक भक्तजन आते थे और कथा श्रवण करते थे, सत्संग की बाते करते थे।
साधना के दौरान एक भिन्न ‘टाइम-जोन- में विचरण करने लगता था। पर यह बात नहीं कि इस मध्य उसे अपना स्थूल अस्तित्व विस्मित हो जाता है उसे इसकी भिज्ञता बराबर बनी रहते और बीच-बीच में उसी परीक्षा भी करता रहता । वर्णन इस प्रकार है-
साधना सामाजिक स्तर पर करने लगें तो देश का कितना बड़ा उपकार हो और उन उमंगों का भी सदुपयोग हो जो राजनीति में इधर-उधर धक्के खाती हुई भ्रमित, कलुषित एवं अस्त-व्यस्त होती रहती हैं यदि लोकसेवी रहकर जनता की सच्ची श्रद्धा अर्जित कर ली जाय तो राजनेता बनने में भी कुछ कठिनाई नहीं रहती । यों ही उछल-कूद अथवा आपराधिक प्रवृत्ति के आधार पर यादि और स्थिरता के बदले अपयश ही गले पड़ता है विवेक एवं सद्बुद्धि का तकाजा यह है कि अपने समय की माँग को समझ स्वीकार करे ओर “धियो यो नः प्रचोदयात्”
साधना में स्वर्णित सविता अर्थात् प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य की प्रकाश रश्मियों की ध्यान धारणा का विशेष महत्व हैं ओजस्, तेजस् एवं वर्चस अर्जित करने के लिए गायत्री उपासकों में से जिन्होंने भी इस दिशा में निष्ठापूर्वक ईमानदारी से कदम बढ़ाया है उनने बौद्धिक एवं आध्यात्मिक दोनों की क्षेत्रों में आशातीत सफलताएं अर्जित की है प्रकाश-साधना हर वर्ग एवं हर आयु के नर-नारी सुगमतापूर्वक कर सकते हैं। और मनोवांछित उपलब्धि हस्तगत कर सकते हैं सविता की स्वर्णिम प्रकाश-साधना सरल भी और निरायद भी।
साधना पद्धतियों के मूल में भी पूज्यवर द्वारा 50 वर्ष की अवधि में लिखा गया वह चिन्तन प्रवाह है, जो समय-समय पर परिजनों तक पहुँचता रहा है वह सदैव सामयिक रहा है, रहेगा। संपादन मण्डल द्वारा जी सामयिक संदर्भ दिये जाते हैं वे भी उनके द्वारा दिए गए मार्गदर्शन के अंतर्गत ही लिखे जाते हैं, एक मिलीमीटर भी इधर-उधर नहीं हटकर विगत की व सबकी पत्रिका के प्रवाह में देखकर यह अन्तर नहीं बता सकता कि यह गुरुसत्ता की लेखनी से लिखे गए हैं या नहीं।
साधना का शुरू-अब चलें राक्षसों से लड़ने के लिए, युद्ध की तैयारी करें-साधन जुटाएँ हनुमानजी अपने मोहल्ले में गये और सारे रीछ-बन्दरों से बोल चलिए, हम तो भगवान के काम के लिए जा ही रहे है, आप सब भी चलिए। हनुमान जी ने ऐसा उत्साह भरा कि सब के बस उनके साथ चल दिये, उनमें नल-नील जैसे अच्छे-खासे इंजीनियर भी थे, जो बड़ी इमारत भी बना सकते थे। ये सब अपने आप आये थे? कोई अपने लगा, हनुमानजी लाये थे सबको। हनुमान जी ने लड़ाई के सारे साधन जुटाये और राक्षसों को तबाह करने के लिए पेड़ तक उखाड़े जब लक्ष्मणजी मूर्छित हो गये और सुषेण वैद्य ने बूटी बतायी तो पूरा पहाड़ ही उखाड़ ले आये।
साधना और विचारों के अर्चना साधना के क्षेत्र में हम जितना ही नये विचारों को मन में रखना ओर फिर अपने ढंग से सोचना शुरू करेंगे उतना ही हमारी बुद्धि का विकास होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-May
साधना द्वारा साधक के मनः क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मन्त्र की भाव प्रक्रिया को चुंबकत्व से परिपूर्ण कर देती हैं।
साधना का सिद्ध पुरुष ही बना लिया।
साधना के भी चार चरण हैं- बीजाक्षर, शक्ति संचय की तप साधना, भौतिक क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियाँ तथा अंतिम हैं-ऋद्धियाँ।
साधना का मूल आधार मनःशक्ति, संकल्प-बल, एकाग्रता और निर्धारित प्रयोजन से संबंधित श्रद्धा के साथ तत्परता बरतना है। शारीरिक योग के लिए अपनी माँसपेशियों और नस-नाड़ियों पर एकाग्रतापूर्वक अधिकार करना पड़ता है। इससे वे फौलाद जैसी कठोर हो जाती हैं और आक्रमण सहने तथा करने में अपराजेय सिद्ध होती हैं। इसी आभार पर मनःशक्ति को केन्द्रित एवं समर्थ बना कर इस योग्य भी बनाया जाता है कि उससे दूसरे के मनः संस्थान को करारी टक्कर दी जा सके। यह टक्कर भले या बुरे किस प्रयोजन के लिए दी गई और उससे दूसरे का क्या हित - अनहित हुआ-यह प्रयोक्ता के उद्देश्य पर निर्भर है ; किन्तु इतना हर हाल में निश्चित ही रहता है कि योग-साधना के बल पर शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र में शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र में चमत्कारिक क्षमता उत्पन्न की जा सकती है।
साधना बताया हैं। आहार के संयम से आरोग्य और दीर्घ जीवन दोनों मिलते हैं। मौन धारण का अभ्यास समस्त तपों में उच्च कोटि का है। एकाग्रता और एकात्मा की दोनों ही साधनाएँ मौन धारण से बनी है जिससे जिव्हा की यह दोनों साधनाएँ करली समझना चाहिए, कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया। जिसका इन्द्रिय संयम पूर्ण हो गया वह सच्चे अर्थों में तपस्वी है।
साधना के लिए बैठना तक सम्भव नहीं रह जाता। इसीलिए, शास्त्रकारों ने कहा हैं, ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् वास्तव में शरीर ही पहला धर्म साधन का आधार है। यौगिक क्रियाओं से लेकर परमार्थ उपकार और लोक-मंगल के कार्यों तक में शरीर का ही उपयोग करना पड़ता है।
साधना है। यह कोश की शुद्धि का सबसे प्रधान एवं सबसे महत्वपूर्ण साधन है कि मस्तिष्क में अधिक से अधिक समय तक श्रेष्ठ विचारधारा प्रवाहित होती रहे। अतः इस साधना के इच्छुकों को अपनी रीति-नीति को परिमार्जित करना होगा। हीन श्रेणी के जिन विचारों ने मनोभूमि पर अधिकार कर रखा है, मनन द्वारा उसकी सफाई करनी होगी। व्यक्ति के खुले तथा गोपनीय जीवन में झाँक करने वाला मनन दोषों को हटाने व श्रेष्ठताओं को बढ़ाने का प्रमुख प्रेरणा स्रोत है।
साधनायें निर्धारित हैं। उन्हें गायत्री हिमगिरि से निस्सृत गंगा-यमुना के रूप में समझा जा सकता है।
साधना एवं तप-पुरुषार्थ से अर्जित दिव्य-दृष्टि सम्पन्न शरीरधारी साधक स्वयं को सूक्ष्म रूप में बदल कर अथवा स्थूल स्थिति में इन आयामोँ के रहस्यमय संसार का दिग्दर्शन कर सकते हैं। इस संसार में अपने कर्मों के अनुरूप सूक्ष्म-आत्मायें फल पाती हैं और उसी आधार पर एक निश्चित अवधि तक उसमें उन्हें रहना पड़ता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य हैं।
साधना से उत्पन्न शब्द-शक्ति का प्रचण्ड प्रवाह जैसी अनेकों रहस्यमयी मंत्राराधन की विशेषताएँ मन्त्र को जाग्रत करती हैं और निष्ठावान साधकों को सिद्ध-माँत्रिक के स्तर पर पहुँचा देती हैं।
साधनाएँ मौन धारण से बनी है जिससे जिव्हा की यह दोनों साधनाएँ करली समझना चाहिए, कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया। जिसका इन्द्रिय संयम पूर्ण हो गया वह सच्चे अर्थों में तपस्वी है। तपस्वी की वाणी अमोध होती है। वह शब्द बेध-बोलता है। बैखरी वाणी रोकने पर मध्यमा परा और पश्यन्ती वाणियाँ भी वशवर्ती हो जाती है।
साधना थी, जिसके प्रमाण जापान आदि देशों में भी पिछले दिनों तक पाये जाते रहे हैं।
साधना को नट-विद्या नहीं, वरन् विशुद्ध योगाभ्यास ही समझा जाना चाहिए। जापान की ‘जुजुत्सु’ विद्या संसार भर में प्रसिद्ध थी। इसके आधार पर कोई मनुष्य अपने से कहीं अधिक बलवान प्रतिद्वंद्वी को बात-की-बात में धराशायी कर सकता था। इसकी पुष्टि करने वाली न केवल दन्त कथाएं ही वहाँ प्रसिद्ध थीं, वरन् जापानी उसमें निष्णात भी होते थे।
साधनाएँ की जाती हैं, आत्मिक विकास के लिए, जितने भी उपक्रम करने पड़ते हैं वे शरीर के द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। अस्वस्थ शरीर से साधना के लिए बैठना तक सम्भव नहीं रह जाता। इसीलिए, शास्त्रकारों ने कहा हैं, ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ अर्थात् वास्तव में शरीर ही पहला धर्म साधन का आधार है। यौगिक क्रियाओं से लेकर परमार्थ उपकार और लोक-मंगल के कार्यों तक में शरीर का ही उपयोग करना पड़ता है।
साधना में प्रयुक्त होने पर उपकरणों को सफलता में सहायक रहने योग्य बनाते हैं।
साधना की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य इसी जीवन में देवताओं जैसा अन्तराल प्राप्त न कर सके और सामान्य परिस्थितियों एवं सीमित साधनों के सहारे ही देव-सुलभ वातावरण में रहने का आनन्द न ले सकें।
साधना में लग गये। अपने लिए नहीं, साठ हजार सगर पुत्रों के लिए। इस तप साधना में तो भागीरथ को किंचित भी स्वार्थ नहीं था, अतः उनके निःस्वार्थ परमार्थ प्रयोजन को देख कर स्वर्ग में रह रही गंगा का हृदय पसीजा। ऐसे निःस्वार्थ और परमार्थ परायण प्रबल संकल्पी का पुरुषार्थ देखकर वह धरती पर आ गयी पर उन्हें धारण कौन करे ? उसके लिए पात्रता चाहिए।
साधना ‘जेन’ सीखी और उसी के बल पर वह चमत्कारी योद्धा बन गया।
साधनायें करते हैं। दोनों पक्षों के लिए 24-24 साधनायें निर्धारित हैं। उन्हें गायत्री हिमगिरि से निस्सृत गंगा-यमुना के रूप में समझा जा सकता है।
साधना का वर्णन विस्तारपूर्वक किया करता था।
साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएँ बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
साधना कष्ट साध्य तितीक्षा के द्वारा मन्त्र की गुहा शक्ति के करतल गत हो जाने का भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मनः क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मन्त्र की भाव प्रक्रिया को चुंबकत्व से परिपूर्ण कर देती हैं।
साधना पक्ष को ही उभार देना आवश्यक है। अलौकिक पक्ष उभारने से लोग उसके प्रति श्रद्धा तो व्यक्त करते हैं, पर उनका अनुसरण करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। व्यावहारिक पक्ष उभारने से लोग वैसा ही बनने और वैसा ही करने की बात सोचते हैं तथा सही अर्थों में लाभ होने लगता है। अतः जन-साधारण में प्रेरणा भरते समय इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
साधना, भौतिक क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियाँ तथा अंतिम हैं-ऋद्धियाँ।
साधना के बल पर शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र में शारीरिक एवं मानसिक क्षेत्र में चमत्कारिक क्षमता उत्पन्न की जा सकती है।
साधना में तो भागीरथ को किंचित भी स्वार्थ नहीं था, अतः उनके निःस्वार्थ परमार्थ प्रयोजन को देख कर स्वर्ग में रह रही गंगा का हृदय पसीजा। ऐसे निःस्वार्थ और परमार्थ परायण प्रबल संकल्पी का पुरुषार्थ देखकर वह धरती पर आ गयी पर उन्हें धारण कौन करे ? उसके लिए पात्रता चाहिए। इस कठिनाई को भगवान शंकर ने हल कर दिया और उनकी जटाओं में गंगा का अवतरण हुआ। सगर पुत्रों का उद्धार हुआ।
साधना की और विश्व-निर्माण तथा उसके संचालन करने में उपयुक्त सक्षमता, ज्ञान, विज्ञान और अनुभव प्राप्त किया, उसी का नाम गायत्री है। इसी शक्ति के बल पर आदि से वर्तमान पर्यन्त सृजन और अभिवर्धन की यही प्रक्रिया चलती चली आ रही है। उस शक्ति को दूसरे शब्दों में आत्मबल भी कहा जाता रहा है। गायत्री-महामंत्र की साधना का सर्वोपरि सत्परिणाम है भी आत्मबल और वह जिसमें जितनी अधिक मात्रा में विद्यमान होगा, वह गायत्री महाशक्ति का श्रेष्ठ उपासक माना जायेगा। गायत्री-महामंत्र से वे संभावनायें कैसे साकार हो सकती है, और क्या प्रक्रिया पद्धति है इसकी साधना की -इसका स्पष्ट और विस्तृत विवेचन तो गायत्री महाविज्ञान में ही पढ़ा जा सकता है।
साधना, जो तब से लेकर अब तक किसी न किसी रूप में उस क्षेत्र में जीवित ही बनी हुई हैं।
साधना रही है। यही कारण है कि पंचायत प्रणाली में भी ‘पंच परमेश्वर’ यानि कि आमराय द्वारा निर्णय-प्रक्रिया पर जोर दिया गया है। ‘सदा सवंगत सर्वहित’ ही पंचायत का बीज मंत्र है। यही वह प्रक्रिया है जिसकी शुरुआत आज भले छोटी दिखे, परन्तु अपने विस्तार में यह धरती पर स्वर्ग के अवतरण का दृश्य उपस्थित करेगी। वर्तमान में किए गए पंचायत राज की कोशिशें इक्कीसवीं सदी में अपना ऐसा कुछ विकसित रूप उपस्थित करेगी, जब गाँव से राष्ट्र तक के प्रशासकों का निर्वाचन प्रजातन्त्र जन के द्वारा किया जायगा।
साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही, विधि-व्यवस्था रहती है। मन्त्रों की शब्द चरना का गठन तत्वदर्शी मनीषी तथा दिव्यदृष्टा मनीषियोँ ने इस प्रकार किया है कि उनका जपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप-साधनों एवं कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है। लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मन्त्राराधन वस्तुतः शब्द-शक्ति का विस्फोट ही है।
साधना और विचार और स्वर के साथ सिद्ध करना होता है। इसके लिए प्रवीण पारंगत का संरक्षण चाहिए।
साधना, गुरु के संरक्षण, अटूट श्रद्धा-यह सभी बातें जिस साधना में जुड़ जाती है, उसकी सफलता असंदिग्ध होती है जो ऐसे ही उलटे-सीधे अक्षर दुहराते रहते हैं। पुस्तक में लिखे हुए शब्दों को याद कर लेना मन्त्र नहीं है। उन्हें अक्षरों की पंक्ति कहना चाहिए। उसे याद कर लेना कविता याद कर लेने के सम्मान है। ऐसे मन्त्र का प्रयोग कौतूहल मनोरंजन के समान है।
साधना-विज्ञान का अभिमत है कि देव बनकर ही देवाराधना करना चाहिए। शरीर और मन का परिमार्जन करने के लिए मन्त्र जप आरम्भ करने से पूर्व कई तरह के कर्मकाण्ड-विधि-विधान करने होते हैं इनमें से बहुत से अपने में देव-भाव की स्थापना के लिये होते हैं । यह प्रयोग साधना में प्रयुक्त होने पर उपकरणों को सफलता में सहायक रहने योग्य बनाते हैं।
साधना के इच्छुकों को अपनी रीति-नीति को परिमार्जित करना होगा। हीन श्रेणी के जिन विचारों ने मनोभूमि पर अधिकार कर रखा है, मनन द्वारा उसकी सफाई करनी होगी। व्यक्ति के खुले तथा गोपनीय जीवन में झाँक करने वाला मनन दोषों को हटाने व श्रेष्ठताओं को बढ़ाने का प्रमुख प्रेरणा स्रोत है। उसमें विलक्षण ऊर्जा व क्षमता है। यदि साधक निष्पक्ष भाव से और ईमानदारीपूर्वक मनन द्वारा यह खोजने और स्वीकार करने का साहस कर सके कि अमुक कार्य को करने का उसका असली उद्देश्य क्या था ?
साधना की -इसका स्पष्ट और विस्तृत विवेचन तो गायत्री महाविज्ञान में ही पढ़ा जा सकता है। यहाँ कहने का प्रयोजन इतना भर है कि गायत्री का सम्बल पकड़ कर उस शक्ति को सहज ही अर्जित किया जा सकता है।
साधना कही जाती है।
साधनाएँ करली समझना चाहिए, कि उसका इन्द्रिय संयम समग्र हो गया। जिसका इन्द्रिय संयम पूर्ण हो गया वह सच्चे अर्थों में तपस्वी है। तपस्वी की वाणी अमोध होती है। वह शब्द बेध-बोलता है। बैखरी वाणी रोकने पर मध्यमा परा और पश्यन्ती वाणियाँ भी वशवर्ती हो जाती है।
साधना का बहुत सम्मान है। वह भारत की योगविद्या का ही एक अंग है। ईसा की पांचवीं शताब्दी में भारतीय बौद्ध-भिक्षु चीन गये। उनके नेता का नाम था - धरुम। यह नाम धर्म शब्द का अपभ्रंश ही हो सकता है।
साधना जारी रखी। कई वर्ष बाद वापस लौटा, तो उसकी जटाएँ और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। लोगों ने उसे पागल समझा, पर इससे क्या वह धुन का धनी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता ही रहा और आखिर उसने अपने को जेन साधना का सिद्ध पुरुष ही बना लिया।
साधनारत मनुष्य अपनी संकल्प - शक्ति और उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय - शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना ओर इस विशाल ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए शक्तिशाली चेतन-तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना यह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म-साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएँ बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
साधना मानवीय जीवन को चमत्कारों की चलती-फिरती पिटारी बना डालती है। असम्भव दिखने वाले काम सहज सम्भव हो जाते हैं।
साधना में जुड़ जाती है, उसकी सफलता असंदिग्ध होती है जो ऐसे ही उलटे-सीधे अक्षर दुहराते रहते हैं। पुस्तक में लिखे हुए शब्दों को याद कर लेना मन्त्र नहीं है। उन्हें अक्षरों की पंक्ति कहना चाहिए। उसे याद कर लेना कविता याद कर लेने के सम्मान है। ऐसे मन्त्र का प्रयोग कौतूहल मनोरंजन के समान है।
साधना ठीक प्रकार से की जा सके तो उस रहस्यमयी शक्ति का प्रचुर परिणाम में उत्पादन किया जा सकता है जो मनुष्य के भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों को आश्चर्यजनक सफलताओं से भर सकती हैं। मन्त्र-शक्ति में चमत्कारों का प्रधान आधार है-शब्द। शब्द-शक्ति का स्फोट । इसके साथ ही साधक की शारीरिक , मानसिक और भावनात्मक स्थिति की पृष्ठभूमि जुड़ी हुई है। इन सब के समन्वय से ही वह प्रभाव उत्पन्न होता है जिसे
साधनाएँ भी। साधनारत मनुष्य अपनी संकल्प - शक्ति और उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय - शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना ओर इस विशाल ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए शक्तिशाली चेतन-तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना यह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म-साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएँ बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
साधना पराक्रम द्वारा मात्र अपनी इच्छा-शक्ति के बल पर सूक्ष्म-लोकों में भ्रमण कर इन महान आत्माओं से संपर्क स्थापित कर सकता है। समय-समय पर जो विकट समस्याओं मानवी पुरुषार्थ से सुलझाती दिखाई देती हैं, अथवा अदृश्य अनुदान पृथ्वीवासियों को मिलते हैं, उनके मूल में सृष्टा की यही विधि-व्यवस्था काम करती है। अनास्था इसे संयोग कहती है पर आस्थावानों को दैवी-सत्ता की अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञ होने एवं परोक्ष के प्रति अपना श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने का तथ्य भरा आधार उपलब्ध होता है।
साधना विवरण में जिन विशिष्ट अर्थों में इनका प्रयोग किया है वही हमारे लिए ग्रहण करने योग्य है। उनके बताये अर्थ ही हमें जानना चाहिए, उन अर्थों में ही इन तीन शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
साधना का सर्वोपरि सत्परिणाम है भी आत्मबल और वह जिसमें जितनी अधिक मात्रा में विद्यमान होगा, वह गायत्री महाशक्ति का श्रेष्ठ उपासक माना जायेगा। गायत्री-महामंत्र से वे संभावनायें कैसे साकार हो सकती है, और क्या प्रक्रिया पद्धति है इसकी साधना की -इसका स्पष्ट और विस्तृत विवेचन तो गायत्री महाविज्ञान में ही पढ़ा जा सकता है। यहाँ कहने का प्रयोजन इतना भर है कि गायत्री का सम्बल पकड़ कर उस शक्ति को सहज ही अर्जित किया जा सकता है।
साधना को वर्तमान युग की प्रधान तपश्चर्या माना गया है। क्योंकि जब तक ये प्रवृत्तियां सफलतापूर्वक चलेंगी नहीं, ज्ञान -गंगा के अवतरण का प्रयोजन पूरा नहीं होगा। गायत्री जयंती के इस पावन पर्व पर हममें से प्रत्येक को भागीरथ और शंकर भगवान की भूमिका निभाते हुए ज्ञानगंगा के अवतरण के लिए कटिबद्ध होने का व्रत लेना चाहिए।
साधना की भट्टी में तपा कर खरे सोने की तरह बनाया जाता है। योग में ब्रह्माण्डीय चेतना की अजस्रता के साथ अपने आपको जोड़ा जाता है। ब्रह्म-चेतना, विश्व-चेतना, आत्मिक और भौतिक शक्तियों का भंडारण निवास हैं । योग द्वारा उसी के साथ जुड़ा पाता है। तप के द्वारा उसे उपयुक्त ढाँचे में ढाला जाता है।
साधनाओं में एक ‘जेन’ साधना थी, जिसके प्रमाण जापान आदि देशों में भी पिछले दिनों तक पाये जाते रहे हैं।
साधना में कुशल महाभिक्षु फना कोशी से दीक्षा ली और उन्हीं के पास रह कर यह विद्या सीखने लगा। उस प्रयोजन के लिए उसने पर्वतों की निर्जन गुफाओं में डेरा डाला और बर्फ से ढकी कन्दराओं में वनस्पतियाँ खाकर साधना जारी रखी। कई वर्ष बाद वापस लौटा, तो उसकी जटाएँ और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। लोगों ने उसे पागल समझा, पर इससे क्या वह धुन का धनी अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता ही रहा और आखिर उसने अपने को जेन साधना का सिद्ध पुरुष ही बना लिया।
साधना भूतकाल में भी बहुत प्रख्यात और सम्मानित रही है। बौद्ध धर्मानुयायी सन्त इसे अपने शिष्यों को बताते सिखाते रहे थे। इस आधार पर मनुष्य केवल आध्यात्मिक ही नहीं, वरन् भौतिक - शक्तियाँ भी प्राप्त कर सकता है। जेन-साधना को नट-विद्या नहीं, वरन् विशुद्ध योगाभ्यास ही समझा जाना चाहिए। जापान की ‘जुजुत्सु’ विद्या संसार भर में प्रसिद्ध थी।
साधनात्मक जीवन को प्रस्तुत करते हुए अध्यात्म प्रेमियों को उस पथ का अनुकरण करने की प्रेरणा दी जा सकती है। वहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य है कि चमत्कार से किसी को कोई मार्गदर्शन नहीं मिलता। प्रायः परमपूज्य गुरुदेव की चर्चा आते ही परिजन उनके चमत्कारी पक्ष की उभारने-कहने के जोश में आ जाते हैं और समझते हैं कि इन चमत्कारी बातों से जनता जल्दी प्रभावित होगी। यद्यपि परमपूज्य गुरुदेव-परम वंदनीया माताजी के प्रति उनका अपना श्रद्धा-विश्वास एक अलग पक्ष है, पर जनता के सामने इसे कैसे प्रस्तुत किया जाय, यह अलग ही बात है। इसलिए उनके चमत्कारी पक्ष का कहीं थोड़ा बहुत संकेत मात्र आवश्यक है।
साधना की श्रेष्ठतम सामग्री है। इसका स्वाध्याय व मनन परिजन नित्य किया करें। चाहें तो उसका एक ही पद चुन लें। उसके संदर्भ में गम्भीरतापूर्वक विचार किया करें कि इस पद में लक्ष्य क्या है और हम कैसा जीवन जी रहे हैं, यह हमारे ही विकास का प्रश्न है। अतः अपनी जीवन शैली में कौन सा परिवर्तन किस प्रकार से करना हमारे लिए सम्भव है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-September
साधनाएँ सभी नारी हृदय के भाव विकास के समक्ष फीकी है। श्री राधाजी में नारी हृदय के भावविकास का चरमोत्कर्ष है। वह प्रेम स्वरूपा है और प्रभु प्रेम के मोल बिकते हैं। तभी तो उन्होंने अपने प्रेम के मोल से निखिल ब्रह्माण्ड नायक को खरीद लिया। उनके भागवत् प्रेम के प्रतीक इस तुलसीदल को पाकर मैं भी धन्य हो गया।
साधनात्मक उपचार किए जाते हैं, उसे वह जन्मजात प्राप्त है। अपना यौवन निचोड़कर शिशु को पिलाने वाली, शिशु की एक मुसकान पर बलिहारी हो जाने वाली, अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाली माँ भावनात्मक विशेषताओं का भला किन शब्दों में वर्णन किया जाय ? नारी हर तरह का त्याग-बलिदान करने में बेमिसाल है। भाव सम्पदा की दृष्टि से तो पुरुष नारी से सैकड़ों मील पीछे छूट जाता है। ये सभी तथ्य एक स्वर से यही स्पष्ट करते हैं, नारी तरह से पुरुष से श्रेष्ठ है।
साधना तथा प्रतिभा से प्रभावित होकर देवराज इन्द्र उसे माँगने के लिए पुलोमा के द्वार पर पहुँचे। वहीं ऋषि कन्या शची आगे चलकर इन्द्राणी बनी। मनु ने जब वाजपेय यज्ञ किया तो कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया जो उसे महायज्ञ का पौरोहित्य सम्हाल सके। उस स्थिति में मनु ने अपनी पुत्री और उस काल की महान मनीषी इला को यज्ञाचार्य नियुक्ति कर उस अनुष्ठान को सम्पन्न कराया।
साधना के लिए आपने भारत के नवयुवकों को प्रोत्साहित किया, वह सफल हो गयी । तुम अपने हृदय को निर्बल बनाओगी, तो हम किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकेंगे ?तुम्हारे आशीर्वाद से ही तो माँ देव संस्कृति की उज्ज्वल किरणों से सारा देश आलोकित हो उठा है ।”
साधना के लिए उनकी सहधर्मिणी बनी। साँसारिक सुखेच्छा के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। राजकुमारी सुकन्या ने अन्धे और अति वृद्ध च्यवन महर्षि से केवल इसलिए विवाह किया था कि वह उनकी तपस्या एवं शोध के लिए आवश्यक साधन जुटा सके। उपयुक्त सेवा सहायता कर सके। राजा अश्वपति की प्राणप्रिय पुत्री विदुषी एवं अति रूपवती पुत्री राजकुमारी सावित्री ने एक वनवासी और निर्धन युवक सत्यवान से मात्र इसलिए विवाह किया कि वह उसके वनौषधि शोध कार्य में सहायक होकर लोक मंगल के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सके।
साधना, पति का स्नेह-अभिसिंचन जैसा वह करती है, सृष्टि का कोई अन्य प्राणी शायद की करता है। माँ के रूप में तो वह भावनाओं की साकार प्रतिमा ही है। इतना त्याग ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त कोई और नहीं कर सकता। उसके इस अनुग्रह का आभार व्यक्त करने के लिए भारतीय संस्कृति ने उसे परमेश्वरी का स्थान दिया और परमात्मा के नारी रूप माता गायत्री की उपासना प्रचलित की। यह सर्वव्यापक और विश्व उपासना के रूप में सम्मानित हुई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-February
साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा।देश का ऋषि वर्ग उस वर्ग की देन है। जो पुरुषार्थी इस साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि यह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गयी है।अब भी यदा कदा यत्र तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सूने जाते हैं।
साधनात्मक पुनर्गठन व परिवार के पारस्परिक एकीकरण एवं शाँतिकुँज की चेतना के घर घर विस्तार के निमित्त नियोजन होना है। आइए, हम आप सभी इसे उत्साह, उमंग के साथ मनाये एवं महाकाल के श्रीचरणों में ऐसा कुछ अर्पित करने का संकल्प ले जिससे जो होने जा रहा है, वह भवितव्यता है, उसमें हमारा महत्वपूर्ण योगदान हो, हम श्रेयार्थी बन सके।
साधना कर पाते हैं और आलौकिक शक्तियों को प्राप्त करते हैं यह साधना न सामान्य है और न कोई सर्वसाधारण के वश की। तथापि असंभव भी नहीं हैं एक समय था, जब भारत वर्ष में अध्यात्म की इस साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा।देश का ऋषि वर्ग उस वर्ग की देन है। जो पुरुषार्थी इस साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि यह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गयी है।
साधना सर्वत्र अनिवार्य है। कारण कि इसमें संकल्प शक्ति जागृत एवं नियंत्रित होती है, साथ ही शब्द विज्ञान का ऐसा सुन्दर सुयोग भी जुड़ता है जो साधक की प्रसुप्त किन्तु अति अद्भुत शक्तियों को जागृत कर उसे आत्मबल सम्पन्न बनाता है और वाह्य जगत को प्रभावित करने की रहस्यमयी हलचलों का सृजन करता है।
साधनात्मक आधार सशक्त रहा तो प्रचारात्मक स्तर पर किये गये विगत पाँच वर्षों के सफल पुरुषार्थ को एक नयी गति मिलेगी एवं सुव्यवस्थित सुस्पष्ट आंकड़ों में सिमट जाने वाला यह युग निर्माण मिशन अपनी उन छह महाक्राँतियों को सम्पन्न कर सकेगा, जिनकी घोषणा आँवलखेड़ा कार्यक्रम में की गयी थी। आश्वमेधिक प्रयोगों ने सारे देश व विश्व में एक विलक्षण ऊर्जा भरा आभा मण्डल युक्त वातावरण विनिर्मित किया है। किंतु यह अपूर्ण है, यदि इस रजत जयन्ती वर्ष में अनुयाज का कार्य सक्रिय रूप से सम्पन्न न हुआ तो सही प्रामाणिक कार्यकर्त्ता एवं खोटे मात्र महत्वाकांक्षा प्रदर्शन की दृष्टि से जुड़े व्यक्तियों के परख हो कर छँटाई न हो पाई, प्रत्येक स्थान पर व्यक्ति व्यक्ति में मन मिलाकर एकता स्थापित न हो पाई एवं हमारी श्रद्धा समर्पण को एक रचनात्मक मोड़ न मिल पाया।
साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।
साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि यह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गयी है।अब भी यदा कदा यत्र तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सूने जाते हैं। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है । वैसे योग का स्वाँग दिखाकर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रंगे सियार तो बहुत देखे है।
साधना जैसे दैनिक कृत्यों की पूर्ति तो शास्त्र परम्परा के अनुसार करते ही है। पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह अवधि अंतर्जगत की गुत्थियों को सुलझाने के लिए किये जाने वाले संयम के लिए होता है। इस क्रिया रहित प्रक्रिया को आध्यात्मिक कल्प के मेरुदण्ड आधार केन्द्र कहा जा सकता है। चिंतन मनन के इन दो साधनों को तपश्चर्या अनुसंधान की पृष्ठ भूमि माना जा सकता है। प्रायश्चित के विभिन्न पक्ष भी इस पूर्वार्ध में सन्निहित है।
साधना भी करते थे। ब्रह्मवर्चस में भी सेवा, स्वाध्याय, साधना एवं तपश्चर्या वाले तीनों अंशों का समन्वित साधन चलेंगे।ऐसी तपश्चर्या कराना चाहते हैं। तपश्चर्या में सबसे पहले यह काम करना पड़ता है -महाभारत की लड़ाई लड़नी पड़ती है। अर्जुन को श्रीकृष्ण बार बार यही कहते थे कि “ततो युद्धाय युज्यस्व “ किंतु अर्जुन बार बार बहाने बनाता रहा और कहता रहा कि मैं नहीं लड़ूँगा।
साधना, आराधना का त्रिवेणी संगम अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहना चाहिए। औसत देश वासियों का निर्वाह स्तर अपनाये । परिवार को छोटा रखे उसे सुसंस्कारी, स्वावलंबी बनाये। बड़प्पन की लिप्सा छोड़े। महानता का लक्ष्य अपनाये।
साधना अथवा थोड़े से कर्म काण्ड द्वारा पूरी कर लेने की आशा करने वाले बाल बुद्धि के व्यक्ति ही माने जायेंगे। यह उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधना शीघ्र पूरी नहीं की जा सकती है। स्तर के अनुरूप ही पर्याप्त समय, धैर्य, पुरुषार्थ एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति धीरे धीरे अपने वाह्य जीवन के परिष्कार से प्रारम्भ होती है।
साधना के विकास के साथ साथ इस प्रवृत्ति का विकास हुआ है। यात्राओं की सफलता के लिए प्रचुर भौगोलिक ज्ञान स्थान विषय के रीति रिवाज, रहन-सहन, योग्य विश्राम स्थलों की जानकारियाँ पूर्व में ही उपलब्ध हो जाने के कारण यह यात्राएँ अब सब तरह की आत्म देह हो गयी है।
साधना के भी कुछ व्यक्तियों में यह सामर्थ्य विकसित होती हुई देखी व पायी गयी है। इससे जहाँ उसके पुनर्जन्म के विकसित स्वरूप का पता चलता है वही साथ ही मनुष्य के भीतर सन्निहित दिव्य चेतना का भी प्रमाण मिलता है।
साधना का उद्देश्य व्यक्ति को मात्र निरोग, दीर्घायु बनाना ही साधक के व्यक्तित्व को आमूलचूल बदल देता है। संयम अकेला काफी नहीं। कुसंस्कार घटने के साथ आँतरिक प्रखरता न बढ़े तो योगाभ्यास व साधनाएँ वे प्रायोजन पूरे नहीं कर पाते, जिनके लिए उनका विधान किया जाता रहा है। एकान्त सेवन, अंतर्मुखी चिंतन, आहार नियमन तथा दिव्य औषधि के साथ की गयी तप योग साधनाएँ किस प्रकार व्यक्ति का स्वरूप बदल देती है, उसे नया जीवन देती है, इसे देखकर कोई भी आश्चर्य चकित हो सकता है। कोई कारण नहीं है कि च्यवन, ययाति की तरह आज भी व्यक्ति समुदाय का कायाकल्प नहीं किया जा सका।
साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है कि आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिए वमन, विरेचन, स्नेहन, स्वेदन, नस्व यह पाँच कर्म शरीर शोधन के लिए हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार - ऋषि, छंद, देवता, बीज और तत्व है। जो इन सब साधनों को जुटाकर मंत्र साधना कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर रहती है।
साधना का उद्देश्य क्या है ?इसके माध्यम से हमें जाना कहाँ है- और प्राप्त करना क्या है ?स्थूल रूप से पंच तत्वों एवं तीन गुणों के रूप में मंत्रों की प्रवृत्ति मिलती रहती है और उस तत्व के अनुरूप पूजा उपकरण इकट्ठे करके तत्व साधना की जाती है।
साधना की उपेक्षा और विधि विधान को सब कुछ मान बैठने की भूल है और यह भूल सुधार ली जाय और साधना के राज मार्ग पर चलने की सर्वांग पूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया कलापों की।
साधना जितनी फलदायी है, उतनी ही एक ही जड़ी बूटी से, दिव्य वनौषधि से अपने अंतरंग में नव जीवन देने वाली कल्प चिकित्सा भी महत्वपूर्ण है। इतनी अधिक महत्वपूर्ण व अद्भुत कि उसके बिना कल्प क्रिया का उद्देश्य ही पूरा नहीं होता । काय साधनों से आरोग्य लाभ मिलता है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है। परन्तु तपश्चर्या से ऊर्जा व संयम जन्य मनोबल के सामर्थ्य की दिव्य औषधि का सेवन क्रम का भी जब जीवनचर्या में समावेश हो जाता है तो योग साधनाओं के वे सभी लाभ मिलने लगते हैं जिनकी चर्चा गृह विज्ञान के पृष्ठों में की जाती है।
साधना संभव होती है। मनुष्य के पास थोड़ी सी शक्तियाँ है और छोटा सा जीवन, उसे अलौकिक प्रयोजन में लगा दया जाय तो यह निश्चय स्वयं ही करना पड़ेगा। अपने स्वार्थों के लिए हर कोई प्रयत्न करता है। लोकसेवी अपनी शक्तियों का नियोजन जन सेवा के लिए परमार्थ कार्यों के लिए करते हैं अतः उसे अपनी आवश्यकताओं और सुविधाओं के लिए दूसरों से भिन्न दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और अपना जीवन स्तर आवश्यकताओं और साधनों के उपयोग की रीति नीति भिन्न रखनी चाहिए।
साधना की प्रथम पीढ़ी बताई गयी है।
साधनाओं के भव्य योग परक क्रिया प्रयोगों के साथ इसे सेवन किया जाता है तो आत्मिक उत्कर्ष में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। ब्राह्मी को कुछ विशिष्ट औषधियों की भावना देकर कल्प बनाने से विशिष्ट लाभ मिलता है। एक माह तक ब्राह्मी का निरंतर सेवन आयु, बल तो बढ़ाता ही है, वर्ण को सुन्दर, वाणी को मधुर तथा वृद्धि को तीव्र करता है।काया कल्प के लिए मात्रा को बढ़ाकर वर्ष भर अनुपान सेवन का शास्त्रों में विधान है। काया कल्प प्रक्रिया में ब्राह्मी का कल्प अभिमंत्रित पुष्पों के रस की भावना के साथ साधकों के लिए कहा जाता है ।
साधनाएँ वे प्रायोजन पूरे नहीं कर पाते, जिनके लिए उनका विधान किया जाता रहा है। एकान्त सेवन, अंतर्मुखी चिंतन, आहार नियमन तथा दिव्य औषधि के साथ की गयी तप योग साधनाएँ किस प्रकार व्यक्ति का स्वरूप बदल देती है, उसे नया जीवन देती है, इसे देखकर कोई भी आश्चर्य चकित हो सकता है। कोई कारण नहीं है कि च्यवन, ययाति की तरह आज भी व्यक्ति समुदाय का कायाकल्प नहीं किया जा सका। यह पूर्णतः वैज्ञानिक परीक्षित एक अध्यात्म उपचार प्रक्रिया है, इसे साधक साधना विधि में अनुभव कर सकता है।
साधना कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर रहती है।
साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय या दो पृथक पृथक सुविधा के समय और शान्त एकान्त स्थान में, सुसंतुलित चित्त में यह दोनों ध्यान, चिंतन किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनको लगेगी उतनी ही अंतर्ज्योति प्रखर होती चली जायेगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर जिन दिव्य सम्पदाओं की करतलगत होती चली जायेगी।
साधना के लक्ष्य एवं साधन विधान की यथार्थता एवं सफलता के बारे में मन सुनिश्चित और संयम सहित रहना चाहिए। इसके लिए सतत् प्रयत्न करते रहने और तत्काल फल प्राप्ति के लिए उतावली न करने का धैर्य भी आवश्यक है।
साधना का माध्यम बनाये। ऐसी दशा में विधि विधान भी अपनी अपनी परम्पराओं के अनुसार अपनाना होगा। यों यह मार्ग भी देर सवेर में लक्ष्य तक पहुँचा ही देगा और अश्रद्धा, संदेश एवं आशंका के वातावरण में किये गये उपयुक्त मंत्र की अपेक्षा अधिक अच्छा रहेगा। पर यह काम चलाऊ समझौता है, तथ्य नहीं। यदि लेखक को हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपात होने के द्वेष से मुक्त किया जा सके, तो उसे यह कहने में कोई संकोच न होगा कि गायत्री मंत्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है।
साधना है। जिसे पंचकोशी साधना या कुंडलिनी कहते हैं। इसमें योगाभ्यास भी कराये और दोपहर को ब्रह्मज्ञान का प्रशिक्षण जिसे हम आत्मज्ञान कहते हैं। यह भी ढाई घण्टे प्रशिक्षण है। इसमें ब्रह्मविद्या के ईश्वर, जीवन प्रकृति से लेकर विज्ञान के बारे में ऋषियों ने जो कहा है उनकी बाते बतायेंगे।
साधना ‘ । इसका अर्थ है दैवी। विशिष्टताओं के साथ व्यक्तित्व को जोड़ देना । गुण, कर्म, स्वभाव में चिंतन और चरित्र उत्कृष्टता, आदर्शवादिता का समावेश करना । आत्मशोधन और आत्म परिष्कार की उस उभयपक्षीय प्रक्रिया को गलाई, ढलाई, धुलाई रंगाई भी करते हैं ।
साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश। आराधना अर्थात् लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रम दान, अंशदान । यह तीनों ही साथ -साथ चलने चाहिए।
साधना करने लगे। कालांतर में वही महात्मा रूपकला के नाम से प्रसिद्ध हुए।
साधना की सफलता के लिए उपयुक्त मनो भूमि बनेगी। इस प्रकार का शारीरिक और मानसिक निर्माण आध्यात्मिक जगत की कुँजी समझी जानी चाहिए। साधक की सफलता का तीन चौथाई श्रेय इसी तथ्य पर निर्भर है कि विधि विधान का तो एक चौथाई ही को महत्व दिया जा सकता है। इन दिनों साधक पथ के पथिकों जो असफलता और जन्य निराशा ही हाथ लगती है। और उसका एक बहुत बड़ा कारण जीवन साधना की उपेक्षा और विधि विधान को सब कुछ मान बैठने की भूल है और यह भूल सुधार ली जाय और साधना के राज मार्ग पर चलने की सर्वांग पूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया कलापों की।
साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि यह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गयी है।अब भी यदा कदा यत्र तत्र इस साधना के सिद्ध पुरुष देखे सूने जाते हैं। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है । वैसे योग का स्वाँग दिखाकर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रंगे सियार तो बहुत देखे है। किन्तु उच्चस्तरीय अध्यात्म विद्या की पूर्वोक्त वैज्ञानिक पद्धति से सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने वाले सच्चे योगी के बराबर ही नहीं है।
साधना करते हुए उसके विनियोग भाग को भी जानना समझना और अपनाना आवश्यक है।
साधना करनी पड़ेगी। अपनी कमियों को खोजना और दूर करना, कमजोरियों को हटाना तथा सत्प्रवृत्तियों को अपने स्वभाव का अंग बनाना होगा। व्यक्तित्व की दृष्टि से लोकसेवी को अपना विकास इतना प्रखर और उच्च करना चाहिए कि उसकी वाणी से अधिक उसके कर्म प्रेरक बनें।
साधना उपक्रम उच्चस्तरीय विशिष्ट भाव योग की साधनाएँ एक प्रकार से आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक उपचार उद्देश्य लेकर ही निर्धारित की जा रही है।
साधना का फल है कुछ दिनों पूजा पाठ करने अथवा जीवन भर यों ही कार्यक्रम के अंतर्गत पूजा करते रहने पर भी ऋषियों वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। उस स्तर की साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती हैं वह सर्व समान लोगों के लिए संभव नहीं उन्हें ताप संध्या आत्म अध्ययन में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिए। उनके साधारण पूजा पाठ का जो कि जीवन का एक अनिवार्य अंग होना ही चाहिए। अपनी तरह लाभ मिलता रहेगा। थोड़ी सी साधारण पूजा उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋषि सिद्ध पाने की लालसा रखते हैं वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लाकर बहुत अधिक लाभ उठाना जानते हैं।
साधना के भाव पक्ष के तीन चरण है। भजन, मनन, और चिंतन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल, वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाये तो जीवन यात्रा न चल सकेगी।
साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देश और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो। गुरु का यह कर्तव्य भी हो जाता है कि शिष्य ने केवल पथ प्रदर्शन करे वरन् उसे अपनी शक्ति का एक अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भील बनाये। अस्तु ऋषि का आश्रय मंत्र साधना की प्रथम पीढ़ी बताई गयी है।
साधना न सामान्य है और न कोई सर्वसाधारण के वश की। तथापि असंभव भी नहीं हैं एक समय था, जब भारत वर्ष में अध्यात्म की इस साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा।देश का ऋषि वर्ग उस वर्ग की देन है। जो पुरुषार्थी इस साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये। यद्यपि आज इस साधना के सर्वथा उपयुक्त न तो साधन है और न समय, तथापि यह परम्परा पूरी तरह से उठ नहीं गयी है।
साधना का तीसरा चरण है -चिंतन। चिंतन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का आदर्शवादिता और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसंतुलित निर्धारण। इसके लिए प्रात’काल उठते ही “ हर दिन नया जन्म और हर रात नयी मौत” का तथ्य सामने रखकर आज ही समय परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए।एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु निद्रा की गोद में जाता है।
साधना ही संभव है। इस सत्र से शुरू किये बिना काम भी नहीं चल सकता। वाह्य जीवन की यथा स्थिति में छोड़कर आत्मिक स्तर पर पहुँचा सकना भी तो संभव नहीं है। अस्तु हमें उस अध्यात्म को लेकर ही चलना होगा, जिसे जीवन जीने की कला कहा जाता है।
साधना के अन्य माध्यम भी है पर मंत्र साधना सर्वत्र अनिवार्य है। कारण कि इसमें संकल्प शक्ति जागृत एवं नियंत्रित होती है, साथ ही शब्द विज्ञान का ऐसा सुन्दर सुयोग भी जुड़ता है जो साधक की प्रसुप्त किन्तु अति अद्भुत शक्तियों को जागृत कर उसे आत्मबल सम्पन्न बनाता है और वाह्य जगत को प्रभावित करने की रहस्यमयी हलचलों का सृजन करता है।
साधना और तपश्चर्या के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मविद्या में इसी ‘चित्त शक्ति’ के विकास पर जोर दिया गया है और कहा गया है कि मनुष्य के सन्निहित प्रकट और अप्रकट रहस्यमय शक्ति संसाधनों को जागृत करके मनुष्य देवस्तर की विशेषताओं से सम्पन्न हो सकता है। भौतिक जगत के विकास प्रयोजन में बिजली का जो उपयोग है उससे कही अधिक उपयोगिता व्यक्तित्व के समग्र विकास में मानवी विद्युत की है। उसका स्वरूप आधार और उपयोग जानने के लिए हमेँ विशेष उत्साह पूर्वक प्रयत्न करने चाहिए।
साधना पथ प्रशस्त होता है। हम सब को इसी सरल और साध्य अध्यात्म को को लेकर क्रम क्रम से आगे बढ़ना चाहिए। सहसा आदि से अंत पर कूद जाने का प्रयत्न करना एक ऐसी असफलता को आमंत्रित करता है, जिससे न तो ठीक से जीवन जिया जा सकता है और न उच्चस्तरीय साधना को सामान्य बनाया जा सकता है।
साधना काल में जागरुकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।
साधना काल एवं उसके उपरान्त होता है। लगता है कुछ आन्तरिक और महत्वपूर्ण शक्ति कहाँ से मिलती है और वह अपेक्षाकृत अधिक आत्मबल सम्पन्न बना है। हर्ष संतोष और प्रकाश के रूप में मंत्र की उपलब्धि को सहज ही परखा जा सकता है। कहना न होगा कि इसका मन अपने तक ही सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव वाह्य जगत पर भी पड़ता है।
साधना की जाती है।
साधना के सिद्ध पुरुष देखे सूने जाते हैं। किन्तु इनकी संख्या बहुत विरल है । वैसे योग का स्वाँग दिखाकर और सिद्धों का वेश बनाकर पैसा कमाने वाले रंगे सियार तो बहुत देखे है। किन्तु उच्चस्तरीय अध्यात्म विद्या की पूर्वोक्त वैज्ञानिक पद्धति से सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने वाले सच्चे योगी के बराबर ही नहीं है। जिन्होंने साहसिक तपस्या के बल पर आत्मा की सूक्ष्म शक्तियों को जागृत कर प्रयोग योग्य बना लिया है, वे संसार के मोह जाल से दूर प्रायः अप्रत्यक्ष ही रहा करते हैं।
साधना में प्रवृत्त होने के लिए उपयुक्त छंद की लय निर्धारण करले।
साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त ओर स्थान एकान्त होना चाहिए । आंखें बंद करके आराम से कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि -” शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकलकर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उघाड़े गये अवयवों की तरह उलटना पलटना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह खोलकर देखना चाहिए।
साधनाएँ एक प्रकार से आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक उपचार उद्देश्य लेकर ही निर्धारित की जा रही है।
साधना के मध्य से आ गये थे। बाद में वे गुरुसत्ता के आदेश पर ऋषियों की इस तपःस्थली में ऋषि परम्परा का बीज रोपण कर उसे पुष्पित पल्लवित करने का संकल्प लेकर जून 1972 में यही शाँतिकुँज अपने अंतिम चरण में आ गये थे एवं आगे की गतिविधियों का ताना बाना बुनना उनने आरम्भ कर दिया था। इस वसंत के बाद अब यह 25वाँ वसंत पूरा होने जा रहा है, अपनी रजत जयन्ती इस वर्ष मना रहा है, जिसमें प्रमुख लक्ष्य है देव परिवार का पुनर्गठन -आगामी छः वर्षों के लिए विराट व्यापक तैयारी एवं छावनी के रूप में इस केन्द्र भूमि को परिपक्व बनाना।
साधना के राज मार्ग पर चलने की सर्वांग पूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया कलापों की।
साधना विधि में अनुभव कर सकता है।
साधना बन जायेगी। पिता-माता, भाई-बहन आदि का भरा पूरा कुटुम्ब किसी भावना शील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इन थोड़े से व्यक्तियों की सुव्यवस्था बन जाना एक छोटे से राज्य का आगे स्पष्ट छपा नहीं था ।
साधना करने से पूर्व संकल्प पढ़े जाते हैं उनमें यह प्रतिज्ञा रहती है कि साधना का उद्देश्य क्या है ?इसके माध्यम से हमें जाना कहाँ है- और प्राप्त करना क्या है ?स्थूल रूप से पंच तत्वों एवं तीन गुणों के रूप में मंत्रों की प्रवृत्ति मिलती रहती है और उस तत्व के अनुरूप पूजा उपकरण इकट्ठे करके तत्व साधना की जाती है।
साधना कर नूतन सृष्टि के निर्माण का कार्य सम्पन्न किया था। इन सब से उस शाँतिकुँज का महत्व जन जन को बताने का मन है, जिसकी रजत जयन्ती इस वर्ष के वसंत पर्व से 1997 के वसंत पर्व तक बड़े धूम धाम उल्लास व नये संकल्पों के साथ मनाने का एवं अधिकाधिक व्यक्तियों को इस गंगोत्री के साथ जोड़ने का संकल्प इस वर्ष लिया जा रहा है।
साधना करने से देवीय वरदान भी मिलते हैं और ऋषि सिद्ध की भी प्राप्ति होती है किंतु वह उच्चस्तरीय सूक्ष्म साधना का फल है कुछ दिनों पूजा पाठ करने अथवा जीवन भर यों ही कार्यक्रम के अंतर्गत पूजा करते रहने पर भी ऋषियों वाला ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। उस स्तर की साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती हैं वह सर्व समान लोगों के लिए संभव नहीं उन्हें ताप संध्या आत्म अध्ययन में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिए। उनके साधारण पूजा पाठ का जो कि जीवन का एक अनिवार्य अंग होना ही चाहिए। अपनी तरह लाभ मिलता रहेगा। थोड़ी सी साधारण पूजा उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋषि सिद्ध पाने की लालसा रखते हैं वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लाकर बहुत अधिक लाभ उठाना जानते हैं।
साधनाओं के वे सभी लाभ मिलने लगते हैं जिनकी चर्चा गृह विज्ञान के पृष्ठों में की जाती है।
साधना की पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
साधना द्वारा संयमशीलता का अभ्यास कराया जाता है। यह विग्रह प्रक्रिया है। निरोध के बाद सुनियोजन हेतु अनिवार्य है की पदार्थ की कारण शक्ति द्वारा आँतरिक उपाय अंग अवयवों की चिकित्सा का क्रम बिठाया जाय। उपवास युक्त तितिक्षा में एक आहार को ग्रहण की गई साधना जितनी फलदायी है, उतनी ही एक ही जड़ी बूटी से, दिव्य वनौषधि से अपने अंतरंग में नव जीवन देने वाली कल्प चिकित्सा भी महत्वपूर्ण है। इतनी अधिक महत्वपूर्ण व अद्भुत कि उसके बिना कल्प क्रिया का उद्देश्य ही पूरा नहीं होता ।
साधनारत दृष्टि से हर कार्यकर्त्ता को इतना सम्पन्न बना देना कि वे आने वाले 5 वर्षों में होने वाले अप्रत्याशित विश्वव्यापी परिवर्तनों के लिए स्वयं। को तैयार कर सके । इसके लिए महाकाल का घोंसला शाँतिकुँज जहाँ परम पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीय माता जी की शक्ति घनीभूत रूप से विद्यमान है । साधनात्मक आधार सशक्त रहा तो प्रचारात्मक स्तर पर किये गये विगत पाँच वर्षों के सफल पुरुषार्थ को एक नयी गति मिलेगी एवं सुव्यवस्थित सुस्पष्ट आंकड़ों में सिमट जाने वाला यह युग निर्माण मिशन अपनी उन छह महाक्राँतियों को सम्पन्न कर सकेगा, जिनकी घोषणा आँवलखेड़ा कार्यक्रम में की गयी थी। आश्वमेधिक प्रयोगों ने सारे देश व विश्व में एक विलक्षण ऊर्जा भरा आभा मण्डल युक्त वातावरण विनिर्मित किया है।
साधना, अर्थात् जीवन साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश। आराधना अर्थात् लोकमंगल की सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में उदार सहयोग, श्रम दान, अंशदान । यह तीनों ही साथ -साथ चलने चाहिए।
साधना को सामान्य बनाया जा सकता है।
साधना या कुंडलिनी कहते हैं। इसमें योगाभ्यास भी कराये और दोपहर को ब्रह्मज्ञान का प्रशिक्षण जिसे हम आत्मज्ञान कहते हैं। यह भी ढाई घण्टे प्रशिक्षण है। इसमें ब्रह्मविद्या के ईश्वर, जीवन प्रकृति से लेकर विज्ञान के बारे में ऋषियों ने जो कहा है उनकी बाते बतायेंगे। शाम को लोकमंगल के लिए लोक शिक्षण करेंगे कि आज की परिस्थिति में हमें क्या करना चाहिए ?
साधना एवं तपश्चर्या वाले तीनों अंशों का समन्वित साधन चलेंगे।ऐसी तपश्चर्या कराना चाहते हैं। तपश्चर्या में सबसे पहले यह काम करना पड़ता है -महाभारत की लड़ाई लड़नी पड़ती है। अर्जुन को श्रीकृष्ण बार बार यही कहते थे कि “ततो युद्धाय युज्यस्व “ किंतु अर्जुन बार बार बहाने बनाता रहा और कहता रहा कि मैं नहीं लड़ूँगा। पीछे भगवान के बार बार समझाने पर उसने कहा-” करिष्ये वचनं तव” अर्थात् आपकी आज्ञा मानूँगा।
साधना, उपवास, जप, स्वाध्याय, सत्संग, कुटि प्रवेश, एकाँत और अंतर्मुखी साधना जैसे दैनिक कृत्यों की पूर्ति तो शास्त्र परम्परा के अनुसार करते ही है। पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह अवधि अंतर्जगत की गुत्थियों को सुलझाने के लिए किये जाने वाले संयम के लिए होता है। इस क्रिया रहित प्रक्रिया को आध्यात्मिक कल्प के मेरुदण्ड आधार केन्द्र कहा जा सकता है। चिंतन मनन के इन दो साधनों को तपश्चर्या अनुसंधान की पृष्ठ भूमि माना जा सकता है। प्रायश्चित के विभिन्न पक्ष भी इस पूर्वार्ध में सन्निहित है।
साधना की सफलता के लिए साधक का उपयुक्त व्यक्तित्व निर्माण करना एक ऐसा कार्य है जिस पर जितना अधिक ध्यान दिया जाय उतना ही उत्तम है। शरीर के क्रिया कलाप ऐसे हो, जिनसे इन्द्रिय शक्ति कलुषित एवं विकृत न होती हो । इस दृष्टि से इन्द्रिय निग्रह, संयम और सदाचार पर अत्यधिक जोर दिया जाना चाहिए। साथ ही भावनाओं की उत्कृष्टता मंत्र शक्ति में प्राण झोंक देती है इस बात का भी ध्यान रखा जाय। साधना के लक्ष्य एवं साधन विधान की यथार्थता एवं सफलता के बारे में मन सुनिश्चित और संयम सहित रहना चाहिए।
साधना के लिए सादगी जिन कारणों से आवश्यक है वे कारण भी पूरे नहीं हो सकेंगे- जैसे सादगी के कारण जन साधारण में अपनत्व की भावना जागती है। कहना नहीं होगा कि लोग लोकसेवी के साथ साथ परिवार के संपर्क में भी आयेंगे, परिवार के संपर्क में आने के बाद ठाठ बाट और वैभव विलास ही दिखाई देगा तो लोकसेवी की निष्ठा पर लोगों को संदेह होने लगेगा और वे लोक सेवी के रहन सहन को नाटकीय समझने लगेंगे। यह भी हो सकता है कि वे सोचे अपने अपने परिवार के लिए तो इन्होंने सारे साधन जुटा लिये है और हमें सादगी से रहने का संदेश दे रहे है।
साधनाएँ किस प्रकार व्यक्ति का स्वरूप बदल देती है, उसे नया जीवन देती है, इसे देखकर कोई भी आश्चर्य चकित हो सकता है। कोई कारण नहीं है कि च्यवन, ययाति की तरह आज भी व्यक्ति समुदाय का कायाकल्प नहीं किया जा सका। यह पूर्णतः वैज्ञानिक परीक्षित एक अध्यात्म उपचार प्रक्रिया है, इसे साधक साधना विधि में अनुभव कर सकता है।
साधना करें तो उसे आहार, वस्त्र, रहन-सहन, माला, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि में किस प्रकार का चयन करना चाहिए। तत्व निर्धारण में इसी बात का ध्यान रखा जाता है।
साधना के माध्यम से सफलता प्राप्त की जा सकती है। एक शोधकर्त्ता के लिए यह विषय छोड़ा गया है कि वे इस संबंध में आगे प्रयोग शृंखला को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं ? एक अच्छा विचारक स्वर विज्ञान का ज्ञाता होना चाहिए, ऐसा हमारे आयुर्वेद के विद्वान लिख ये है सही भी है। जिस वेद का साम का भान का नाद न हो उसके अंतः में संवेदना के अंकुर कैसे फूटेंगे एवं यह अन्याय औषधि के साथ संगीत को न जोड़ पाया तो उसकी चिकित्सा अधूरी रहेगी। सर्वांग पूर्ण चिकित्सा हेतु सामगान सामवेद का ज्ञान हर चिकित्सक को दिया जाना चाहिए, यह युग ऋषि की मान्यता है एवं इस संबंध में जागृति फैलाने का काम हम सबका है।
साधना की प्रबल प्रेरणा उन्हें अपनी ओर वेग पूर्वक आकर्षित किया करती थी। भगवान दत्तात्रेय के धवल कीर्ति दिशाओं में व्याप्त थी। मन ही मन वे उन योगी राज को अपना गुरु वरण कर चुके थे और उनकी एक मात्र इच्छा थी, एक बार चर्म चक्षुओं से उन श्रीचरण के दर्शन हो।
साधना, उन शक्तियों के प्रबोधन की प्रक्रिया है जो मनुष्य के अंतःकरण में बीच रूप में सन्निहित आत्मिक अध्ययन के उस क्षेत्र में एक से एक बढ़कर सिद्धियाँ एवं स्मृतियाँ भारी पड़ जाती है किंतु उनकी प्राप्ति तभी संभव है जब मन में वृद्धि, चित्त, अहंकार, से निर्मित अंतःकरण पाँचों कोशों 6 चक्रों मस्तिष्कीय ब्रह्म रन्ध्र में अव्यवस्थित, कमल हृदय स्थिति सूर्य चक्र नाभि की ब्रह्म ग्रंथि और मूलाधार वासनीय कुंडलिनी आदि के शक्ति संस्थान और कोश केन्द्रों के प्रबुद्ध प्रयुक्त ओर अनुकूलता पूर्वक निर्धारित दिशा में सक्रिय बनाया जा सकता है यह बड़ी गहन सूक्ष्म और साध्य तपस्या है।जन्म जन्म से तैयारी किये हुए किये हुए कोई बिरले ही वह साधना कर पाते हैं और आलौकिक शक्तियों को प्राप्त करते हैं यह साधना न सामान्य है और न कोई सर्वसाधारण के वश की। तथापि असंभव भी नहीं हैं एक समय था, जब भारत वर्ष में अध्यात्म की इस साधना पद्धति का पर्याप्त प्रचलन रहा।देश का ऋषि वर्ग उस वर्ग की देन है। जो पुरुषार्थी इस साधना को पूरा करते गये, वे ऋषियों की श्रेणी में आते गये।
साधना और अध्ययन में किसी प्रकार का व्यवधान उपस्थिति न हो इसलिए किराये के एक अलग मकान की उनके लिए व्यवस्था कर दी गयी। वे उसी में एकाँकी रहते थे। एक दिन अध्ययन कर रहे थे कि सामने की दीवार से एक चीवरधारी देव पुरुष मूर्तिमान होते दिखाई पड़े। पहले तो उन्होंने इसे नेत्रों का भ्रम समझा पर बार बार आँखों मलने पर वह धीर गम्भीर प्रतिमा उनके सम्मुख बनी ही रही, तो उन्हें कुछ भय हुआ और डर कर भागकर बाहर खड़े हुए । कुछ क्षण पश्चात जब उन्हें अपनी मूर्खता का भाव हुआ तो वह कमरे में प्रविष्ट हुए, किंतु तब तक वह मूर्ति तिरोहित हो चुकी थी।
साधना के उद्देश्य सो अपने आध्यात्मिक कायाकल्प के रूप में प्रयुक्त करते थे। आँवला, पलाश, हरीतकी, पीपल, शिलाजीत, ब्राह्मी, गिलोय, त्रिफला, गोक्षुर, भल्लातक, सुवर्ण के रूप में दिव्य वनौषधियों कमोध्यम से कल्प के युग ऋषि द्वारा निर्देशित विधान माना जाय एवं न्यूनाधिक रूप में हर साधक इनका सेवन करता रहे, यही उपेक्षा ऋषि युग्म की रही है।
साधना द्वारा, जो कि एक सुनिश्चित मार्ग है। दूसरा कई बार बिना किसी योगसाधना के भी कुछ व्यक्तियों में यह सामर्थ्य विकसित होती हुई देखी व पायी गयी है। इससे जहाँ उसके पुनर्जन्म के विकसित स्वरूप का पता चलता है वही साथ ही मनुष्य के भीतर सन्निहित दिव्य चेतना का भी प्रमाण मिलता है।
साधना की प्रक्रियाओं के सम्पुट शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के रूप में, दीर्घायुष्य तथा संकल्प शक्ति के ऐसे अनुदान मिलते हैं जो आत्मिक प्रगति के लिए इच्छुक साधक को सामान्य से असामान्य स्थिति तक पहुँचा देते हैं।औषधि कल्प को शरीर स्वास्थ्य तक सीमित कर गौण नहीं बना देना चाहिए। पंचकर्म आदि के माध्यम से शोधन का शरीर चिकित्सा का शास्त्रोक्त विधान चिर पुरातन काल से निर्देशित चला आया है।
साधना के क्षेत्र में गतिरोध उत्पन्न करना होगा। अभी तो सरल प्रतिपादन तो यही है कि श्रद्धानुरूप मंत्र और परम्परानुसार विधि विधान अपना लिया जाय। यह तरीका भी बुरा नहीं है। प्रगति धीमी भले ही रहे पर प्रगति लक्ष्य की ही ओर रहेगी।
साधना एवं आराधना के तीन आधार चाहिए। उपासना अर्थात् ईश्वर की इच्छा को प्रमुखता, उसके अनुशासन के प्रति अटूट श्रद्धा, घनिष्ठता के लिए निर्धारित उपासना प्रक्रिया में भाव भरी नियमितता । साधना, अर्थात् जीवन साधना । संचित कुसंस्कारों एवं अवांछनीय आदतों मान्यताओं का उन्मूलन । गुण, कर्म, स्वभाव, चिंतन, चरित्र में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश।
साधना के द्वारा योगी अपने को तल्लीन करते हैं। एकाग्र मनःस्थिति को विद्याध्ययन से लेकर जीवन के किसी क्षेत्र में लगाकर चमत्कारी सफलतायें अर्जित की जा सकती है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति पूर्ण न होगा कि इससे मनुष्य की क्रिया शक्ति बढ़ती है और आत्मिक आनन्द की अनुभूति होती है। वेद के प्रणेता ऋषि महाऋषियों ने इस तत्व की अनुभूति बहुत पहले ही कर ली थी, तभी तो उन्होंने शोध निष्कर्षों में कहा “अभिस्वरन्तिबहवो मनीषिणों राजा नमस्य भुवनस्यर्निसते । “ ऋ॰ 1.57.13 अर्थात् - “ अनेक मनीषी विश्व के महाराजाधिकार भगवान को इंगित कर संगीत मय स्वर लगाते हैं और उसी के द्वारा उन्हें प्राप्त करते हैं।
साधना शीघ्र पूरी नहीं की जा सकती है। स्तर के अनुरूप ही पर्याप्त समय, धैर्य, पुरुषार्थ एवं शक्ति की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति धीरे धीरे अपने वाह्य जीवन के परिष्कार से प्रारम्भ होती है।
साधनाओं के लिए किसी संध्या वदन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बंधन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासना के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात मनन साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त ओर स्थान एकान्त होना चाहिए ।
साधना के लिए भजन, मनन, चिंतन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए। गायत्री महामंत्र के उपासनात्मक कर्म काण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही संभव होती है और इसी संयोग के फलस्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्य वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया जाता रहा है।
साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है।मंत्रों की एक यति सबके लिए उचित नहीं। व्यक्ति को स्थिति और अपनी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का-लय का -निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने के लिए उपयुक्त छंद की लय निर्धारण करले।
साधना के लिए पहुँचे । इस नियम का - कि पहले वाह्य जीवन में व्यवहारिक अध्यात्म का समावेश करके उसे सुख शाँतिमय बनाया जाय। इस प्रसंग में जो भी पुण्य परमार्थ अथवा पूजा उपासना उपेक्षित हो उसे करते रहा जाय । लौकिक जीवन में सुविकसित एवं सुसंस्कृति बना देने के बाद ही आत्मिक अथवा आलौकिक जीवन में प्रवेश किया जाय।
साधना के सर्वथा उपयुक्त संस्कारवान देव भूमि समझ लेने के उपरान्त ही इसे सृजन सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए उपयुक्त समझा गया है और उसे एक छावनी के रूप में विकसित करने का निश्चय किया गया है। अन्यत्र स्थानों में व्यापक परिश्रम से भी जो सत्परिणाम उपलब्ध होने असंभव थे, वे यहाँ अल्प प्रयास में संभव होंगे क्योंकि यहाँ के वातावरण में चिरकाल के आच्छादित ऋषियों के विचारों के संकल्प का लाभ साधकों को मिलेगा। यह बात जग जाहिर है कि शाँतिकुँज आज यहाँ स्थित है उसके नीचे गंगा की सात धाराओं में से एक बहती थी पर अभी भी उसके चिन्ह थोड़ा खुदाई करके देखे जा सकते हैं। यही स्थान कभी ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि था, जहाँ उनने विश्वामित्र पद प्राप्त करने के बाद कठोर गायत्री साधना कर नूतन सृष्टि के निर्माण का कार्य सम्पन्न किया था। इन सब से उस शाँतिकुँज का महत्व जन जन को बताने का मन है, जिसकी रजत जयन्ती इस वर्ष के वसंत पर्व से 1997 के वसंत पर्व तक बड़े धूम धाम उल्लास व नये संकल्पों के साथ मनाने का एवं अधिकाधिक व्यक्तियों को इस गंगोत्री के साथ जोड़ने का संकल्प इस वर्ष लिया जा रहा है।
साधना कुछ भिन्न प्रकार की होती हैं वह सर्व समान लोगों के लिए संभव नहीं उन्हें ताप संध्या आत्म अध्ययन में न पड़कर अपने आवश्यक कर्तव्यों में ही आध्यात्मिक निष्ठा रखकर जीवन को आगे बढ़ाते रहना चाहिए। उनके साधारण पूजा पाठ का जो कि जीवन का एक अनिवार्य अंग होना ही चाहिए। अपनी तरह लाभ मिलता रहेगा। थोड़ी सी साधारण पूजा उपासना करके जो जीवन में अलौकिक ऋषि सिद्ध पाने की लालसा रखते हैं वे किसी जुआरी की तरह नगण्य सा धन लाकर बहुत अधिक लाभ उठाना जानते हैं। बिना श्रम के मालामाल होना जानते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-November
साधना प्रारम्भ होती है चित्त को शुद्ध करने के लिए, शान्ति एवं सुख की प्राप्ति के लिए यह कहना अधिक उपयुक्त होगा। किन्तु मेरी स्वच्छता की साधना ने मेरे चित्त को अत्यंत मलीन बना दिया था। मुझ जैसा अशान्त एवं दुःखी व्यक्ति मिलना कठिन था।
साधना से भी उन्हें शान्ति न मिला। महत्वाकाँक्षाओं का उन्माद उन पर तब भी चढ़ा रहता था। उदास बाहुबलि को उनकी बहिन ने देखा तो असफलता का कारण ताड़ लिया। उसने आते ही कहा- ‘हाथी की पालकी से नीचे उतरो और समझदारों की तरह जमीन पर चलो।”
साधना-सम्पन्नताओं से घिरे रहने के बावजूद विक्रमसिंह को अपना गुरुकुल भूला ना था। जहाँ उन्होंने शिक्षा के साथ श्रमनिष्ठा भी अर्जित की थी। सायं-प्रातः के अध्ययन के अतिरिक्त, गौओं की सेवा, यज्ञ के लिए समिधा लाने जैसे कार्य वहाँ उन्हें करने पड़ते थे। अपने गुरुकुल वास में उन्होंने यही पाया कि बौद्धिक श्रम से शारीरिक श्रम के मूल्य को कम नहीं आँका जा सकता। यही कारण था कि इतने बड़े साम्राज्य के अधीश्वर बनने के बावजूद वे उसे भूले नहीं।
साधना या उपासना की एक भिन्न विधि निकाल कर एक पृथक सम्प्रदाय स्थापित कर देते हैं। उनका एक नवीन मन्दिर या मठ बन जाता है। इस प्रकार के सैकड़ों-हजारों नये-नये मत और धार्मिक फिर्के जंगली एवं पिछड़े कहे जाने वाले प्रदेशों में ही नहीं, वरन्- योरोप, अफ्रीका, अमेरिका, एशिया के सभ्य एवं सुसंस्कृत देशों में भी पाये जाते हैं। ऐसी कोई पूजा-पद्धति नहीं है। जिसका आविष्कार और प्रचलन संसार में कहीं-न-कहीं न हो चुका हो।
साधनाओं के दौरान जब शरीर में जलन एवं दूसरे प्रकार की शिकायतें बढ़ती हैं, तो सुयोग्य मार्गदर्शक उनके शमन के लिए सुगंधित फूलों की माला पहनने, सुवासित चन्दन की लेप लगाने एवं खुशबूदार अगरबत्ती द्वारा कमरे के वातावरण को सुरभित बनाये रखने की सलाह देते हैं। इससे काय कष्ट में काफी आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त अन्य कितनी ही प्रकार की शिकायतें इस प्रक्रिया से दूर की जाती हैं। इसकी इसी विशिष्टता के कारण अब इस चिकित्सा उपचार के रूप में अपना लिया गया है। उपचार विज्ञान की यह नवीन प्रणाली-’एरोमा थैरेपी’ के नाम से प्रसिद्ध है।
साधना करते, फिर लौट आते। प्रकृति प्रेमी वहाँ जाकर निवास और साधना करते, फिर लौट आते। प्रकृतिप्रेमी वहाँ के चित्ताकर्षक सौंदर्य के कारण उस ओर की यात्रा करते और सप्ताह-दो-सप्ताह के पर्यटन के बाद वापिस आ जाते; किंतु 50 के दशक में एक तीसरे प्रकार के अभियान की शुरुआत हुई। जो हिमालय अब तक अपनी दिव्यता और सुन्दरता के कारण साधकों एवं सैलानियों को आकर्षित करता था, वही अब अपनी सर्वोच्चता के लिए पर्वतारोहियों के आकर्षण का केन्द्र बना। दुनिया की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट यहीं है।
साधना की सफलता मिल नहीं सकेगी। बाहुबलि ने वैसा ही किया और वे देखत-देखते बहुत सिद्ध पुरुष हो गये।
साधना करते, फिर लौट आते। प्रकृतिप्रेमी वहाँ के चित्ताकर्षक सौंदर्य के कारण उस ओर की यात्रा करते और सप्ताह-दो-सप्ताह के पर्यटन के बाद वापिस आ जाते; किंतु 50 के दशक में एक तीसरे प्रकार के अभियान की शुरुआत हुई। जो हिमालय अब तक अपनी दिव्यता और सुन्दरता के कारण साधकों एवं सैलानियों को आकर्षित करता था, वही अब अपनी सर्वोच्चता के लिए पर्वतारोहियों के आकर्षण का केन्द्र बना। दुनिया की सबसे ऊँची चोटी एवरेस्ट यहीं है। कुछ साहसी किस्म के पर्वतारोही उस पर चढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर सके।
साधना में हृदय घबड़ाता हो, सेवा के प्रति अभिरुचि बढ़ने लगे, उत्साह का उफान आ जाय, तो इसे दिव्य जागरण कहना चाहिए। यह इस बात के प्रतीक हैं कि अन्तराल का प्रसुप्त वैभव अपनी मूर्च्छना तोड़ रहा है और अगले ही दिनों वह अपनी सम्पूर्ण समर्थता एवं प्रखर प्रकाश के साथ प्रकट और प्रत्यक्ष होने वाला है।
साधना ने मेरे चित्त को अत्यंत मलीन बना दिया था। मुझ जैसा अशान्त एवं दुःखी व्यक्ति मिलना कठिन था।
साधना समझते हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि जिस प्रकार एक स़ी अपने पति से प्रेम करके उसमें तन्मय हो जाती है, उसी प्रकार ईश्वर में भी तन्मयता प्राप्त कर ली जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-April
साधना का सार तत्व अहंकार का समूल नाश है और आज वह उसी को बचाने की चेष्टा कर रहे हैं। सन्तों के मध्य उन दिनों गोरखवाणी का बहुत प्रचलन था। गोराजी अपनी धुन में गा उठे-
साधना की संचार प्रक्रिया द्वारा प्राण चेतना से स्वं को अभिपूरित करने के लिए निम्न प्रक्रिया अपनानी पड़ती है-
साधना की सफलता भी साधक की प्राणशक्ति पर ही निर्भर करती है।
साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद बताये गये हैं। सर्वोपरि भाव-ब्रह्मभाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं। इसके उपरान्त ऊँची श्रेणी के योगियों और भक्तों का ध्यान भाव आता है, जिसमें भक्त अथवा योगी अपने सूक्ष्म एवं कारण शरीर के विभिन्न चक्रों, पंचकोश आदि में अपने इष्टदेव का ध्यान करता है और प्रसुप्त पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति को जाग्रत करता है।
साधना केन्द्र के रूप में परिवर्तित कर दिया। तब से लेकर अब तक यह केन्द्र सर्वसाधारण का श्रद्धा-बिन्दु बना हुआ है।
साधना के चार भेद बताये गये हैं। सर्वोपरि भाव-ब्रह्मभाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं। इसके उपरान्त ऊँची श्रेणी के योगियों और भक्तों का ध्यान भाव आता है, जिसमें भक्त अथवा योगी अपने सूक्ष्म एवं कारण शरीर के विभिन्न चक्रों, पंचकोश आदि में अपने इष्टदेव का ध्यान करता है और प्रसुप्त पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति को जाग्रत करता है। इससे नीचे का भाव वह है जिसमें केवल जप, प्रार्थना और स्तुति आदि से सम्बन्ध रहता है।
साधना से असाधारण लाभ उठा सकते हैं। साधकों के लिए तो अपनी प्राण चेतना को विकसित करने में इससे और भी अधिक सुविधा होती है और लक्ष्य की प्राप्ति अधिक सफल एवं सुनिश्चित बन जाती है। ‘शक्ति साधना की संचार प्रक्रिया द्वारा प्राण चेतना से स्वं को अभिपूरित करने के लिए निम्न प्रक्रिया अपनानी पड़ती है-
साधना में प्रगति के इच्छुक लोगों को आध्यात्मिक पुरुषों के अधिकाधिक संपर्क में रहने का निर्देश किया है। यदि इस विज्ञान को समझा जा सके, तो दैनिक जीवन में भी लोग कितने ही दुःख कष्टों से बच कर सुख-सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
साधना का अर्थ है अपने आपको साधना, अपने गुण, कर्म स्वभाव को चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को परिष्कृत कर उच्चस्तरीय बनाना। सिद्धि का अर्थ है-शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति। साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिए जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभीप्सा, ज्ञान तथा विकास के भेद से साधना में भेद होता है। अधिकारी साधक की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है।
साधना करता है उसे ईश्वरीय अनुदानों की प्राप्ति होती है। वस्तुतः शक्ति का ही खेल है यह सारा। साधना और अभ्यास पर्यायवाची शब्द हैं। साधना का अर्थ है अपने आपको साधना, अपने गुण, कर्म स्वभाव को चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को परिष्कृत कर उच्चस्तरीय बनाना। सिद्धि का अर्थ है-शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति।
साधना मार्ग के पथिकों को विशेषकर इस दिशा में जागरुकता बरतने की आवश्यकता है। यह तर्क भी ठीक नहीं कि अच्छे स्वभाव के लोगों के कपड़े पहनने में हर्ज नहीं। किसी को भी किसी की आन्तरिक भाव-भूमि ज्ञात नहीं। क्या पता, जो व्यक्ति बाह्य आचरण से श्रेष्ठ प्रतीत होता हो, उसके मन में बुरे भाव नहीं हों अथवा कोई गुप्त रोग नहीं हो। इसलिए दूसरों के कपड़े पहनना भी एक प्रकार से अनजाने और अनचाहे ही उसके विचारों से प्रभावित होना ही कहा जायेगा।
साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिए जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभीप्सा, ज्ञान तथा विकास के भेद से साधना में भेद होता है। अधिकारी साधक की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद बताये गये हैं। सर्वोपरि भाव-ब्रह्मभाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है।
साधना उपक्रम में निखिल आकाश में संव्याप्त गायत्री महाशक्ति के महाप्राण को भावना तथा श्वास क्रिया के सम्मिश्रित प्रयोग द्वारा खींचना और अपने अन्दर धारण करना होता है। यह प्रक्रिया जितनी सरल है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी। इस विधा का गहन अवगाहन करके मनुष्य देवतुल्य सामर्थ्यवान बन सकता है। शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में यह साधना बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकती है। साधारण गृहस्थों से लेकर कार्यव्यस्त व्यक्ति तक इस साधना से असाधारण लाभ उठा सकते हैं।
साधना को ध्यान में रखते हुए भी स्वास्थ्य-रक्षा के सम्बन्ध में समुचित सतर्कता बरती जानी चाहिए और इसके लिए जो अकाट्य नियम हैं उनका महत्व समझना और दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए।
साधना करने वाले साधकों के लिए एक विशिष्ट आशीर्वाद का प्रेरणा प्रवाह हम लोगों को उपलब्ध है जिसे ‘शक्ति अनुदान की संचार साधना’ कहते हैं। इस साधना उपक्रम में निखिल आकाश में संव्याप्त गायत्री महाशक्ति के महाप्राण को भावना तथा श्वास क्रिया के सम्मिश्रित प्रयोग द्वारा खींचना और अपने अन्दर धारण करना होता है। यह प्रक्रिया जितनी सरल है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी। इस विधा का गहन अवगाहन करके मनुष्य देवतुल्य सामर्थ्यवान बन सकता है। शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में यह साधना बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकती है।
साधना विज्ञान में बल दिया गया है।
साधना और अभ्यास पर्यायवाची शब्द हैं। साधना का अर्थ है अपने आपको साधना, अपने गुण, कर्म स्वभाव को चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को परिष्कृत कर उच्चस्तरीय बनाना। सिद्धि का अर्थ है-शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति। साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिए जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभीप्सा, ज्ञान तथा विकास के भेद से साधना में भेद होता है।
साधना में भेद होता है। अधिकारी साधक की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद बताये गये हैं। सर्वोपरि भाव-ब्रह्मभाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं।
साधना और सिद्धान्त’ में लिखते हैं कि मनुष्य शरीर के एक-एक कण में इतनी शक्ति भरी हुई है कि उससे एक स्वतन्त्र सृष्टि का सृजन हो जाय। यदि इस प्रक्रिया में कोई बाधा उपस्थित न हो, तो वे कण अवसर पाकर अपने पूर्व रूप की भूमिका में एक स्वतन्त्र अव्यक्ति व्यक्ति की रचना करने लगते हैं। एक कण का एक अव्यक्ति स्वरूप बन सकता है। वे कहते हैं कि कोई मृत व्यक्ति, चाहे वह अन्यत्र जन्म ले चुका हो, फिर भी उसके पिछले कण यदि जाग्रत होने की स्थिति में आ जाय, तो वे प्रकट और प्रत्यक्ष हो सकते हैं। प्रेत, पिशाच, बेताल अक्सर किसी भूतपूर्व व्यक्ति के थोड़े से विद्युत परमाणुओं की एक स्वतन्त्र सृष्टि होती है।
साधना के विस्मयकारी परिणाम अश्वमेध सम्पन्न होने की अवधि के पाँच दिनों में दिखाई पड़े। इन सत्ताईस अश्वमेधों में छः करोड़ से अधिक नर-नारी-बच्चे अपना धन, श्रम व समय लगाकर, अपना काम छोड़ कर आए। भीड़ में होने वाली कष्ट कठिनाइयों को बिना खीजे सहते रहे। अपने लिए प्रतिबन्धित की गई गायत्री को और यज्ञ को मुक्त रूप में देखा तो भाव विभोर हो उठे। परिजनों और मिशन के प्रति कृतज्ञता से भर गए।
साधना करेंगे, वे आशातीत सत्परिणाम प्राप्त करेंगे। निरुत्साही और निराश व्यक्ति भी, जिनकी नस-नाड़ियाँ शिथिल हो गयी हैं, आँखें जरा सा काम करने पर थक जाती है, थोड़ी सी कठिनाई में जिनका दिल धड़कने या बैठने लगता है, चिन्ता और आशंका से जिनका चित्त आतंकित रहता है, जो स्वं को आत्म बल से रहित मानते हों, वे भी इस शक्ति साधना से अपने अन्दर जादू चमत्कार जैसा परिवर्तन अनुभव करने लगेंगे। उन्हें अनुभव होगा कि कोई अतिरिक्त शक्ति उनके शरीर में प्रवेश कर गयी है और उसकी सहायता से आत्मा विश्वास एवं आत्म बल दूना हो गया है। काम में मन लगने और आशावादी रहने का एक विशेष परिवर्तन अनुभव होने लगेगा। साधकों को शक्ति संचार के साथ ही अपने में अनेकों उच्च कोटि की अध्यात्म भावनाएं प्रविष्ट एवं प्रतिष्ठित होती दिखाई देंगी और वे उस मार्ग पर चल पड़ेंगे जिसके लिये महाकाल ने पुकार लगाई।
साधना की संचार प्रक्रिया को नित्य प्रातः सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पूर्व से लेकर आधे घण्टे बाद तक के समय में करना चाहिए। आरम्भ पाँच-प्राणायामों से किया जाय अर्थात् उपरोक्त क्रिया पाँच बार दोहराई जाय। इसके बाद हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक वर्ष में आधा घण्टा तक पहुँचा देनी चाहिए।
साधना बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकती है। साधारण गृहस्थों से लेकर कार्यव्यस्त व्यक्ति तक इस साधना से असाधारण लाभ उठा सकते हैं। साधकों के लिए तो अपनी प्राण चेतना को विकसित करने में इससे और भी अधिक सुविधा होती है और लक्ष्य की प्राप्ति अधिक सफल एवं सुनिश्चित बन जाती है। ‘शक्ति साधना की संचार प्रक्रिया द्वारा प्राण चेतना से स्वं को अभिपूरित करने के लिए निम्न प्रक्रिया अपनानी पड़ती है-
साधना की है उसके परिणाम यही तक सीमित न रह जायं। जो उपलब्धियां परिजनों ने भारत में तथा विदेशों में हस्तगत की हैं और मिशन को सौंपी हैं वे समय की गर्द में दब कर लुप्त न हो जाएँ। वे विकसित हों तथा स्थायी स्वरूप धारण करें। इस विकास व स्थायित्व से निश्चय ही मिशन का भी आकार बढ़ेगा, स्तर ऊँचा उठेगा, अगली छलाँग के लिए अच्छी स्थिति बनेगी।यही आज की अनिवार्य आवश्यकता है प्राथमिक आवश्यकता है।
साधना नहीं की थी, पर यह अनुमान उन्हें दैवी अनुग्रह की तरह जन्मजात रूप में मिले थे। वे किसी के पूछने पर कभी-कभी ही उत्तर देते थे, परन्तु जब अपनी मस्ती में आ जाते थे तो कथन के प्रवाह के को रोक नहीं पाते थे और इस प्रकार कहते चले जाते थे कि तात्पर्य समझने पर उनका मित्र परिकर ही उन्हें पागल समझने और कहने लगता था।
साधना से अपने अन्दर जादू चमत्कार जैसा परिवर्तन अनुभव करने लगेंगे। उन्हें अनुभव होगा कि कोई अतिरिक्त शक्ति उनके शरीर में प्रवेश कर गयी है और उसकी सहायता से आत्मा विश्वास एवं आत्म बल दूना हो गया है। काम में मन लगने और आशावादी रहने का एक विशेष परिवर्तन अनुभव होने लगेगा। साधकों को शक्ति संचार के साथ ही अपने में अनेकों उच्च कोटि की अध्यात्म भावनाएं प्रविष्ट एवं प्रतिष्ठित होती दिखाई देंगी और वे उस मार्ग पर चल पड़ेंगे जिसके लिये महाकाल ने पुकार लगाई।
साधना भी नियमित रूप से चलती रहे।
साधना से उत्पन्न सत्परिणामों को स्थायी बना सकता है। इसीलिए अनुयाज अब हम सबकी प्रथम आवश्यकता है।
साधना, अपने गुण, कर्म स्वभाव को चिन्तन, चरित्र, व्यवहार को परिष्कृत कर उच्चस्तरीय बनाना। सिद्धि का अर्थ है-शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति। साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिए जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, अभीप्सा, ज्ञान तथा विकास के भेद से साधना में भेद होता है। अधिकारी साधक की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है।
साधना विज्ञान के आचार्यों ने इसी कारण से साधना में प्रगति के इच्छुक लोगों को आध्यात्मिक पुरुषों के अधिकाधिक संपर्क में रहने का निर्देश किया है। यदि इस विज्ञान को समझा जा सके, तो दैनिक जीवन में भी लोग कितने ही दुःख कष्टों से बच कर सुख-सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
साधना’ कहते हैं। इस साधना उपक्रम में निखिल आकाश में संव्याप्त गायत्री महाशक्ति के महाप्राण को भावना तथा श्वास क्रिया के सम्मिश्रित प्रयोग द्वारा खींचना और अपने अन्दर धारण करना होता है। यह प्रक्रिया जितनी सरल है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी। इस विधा का गहन अवगाहन करके मनुष्य देवतुल्य सामर्थ्यवान बन सकता है। शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में यह साधना बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकती है।
साधना करते हुए इन्द्रियों को वश में करते हैं, उनपर आद्यशक्ति गायत्री की अवश्य कृपा होती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-October
साधनात्मक उपचारों द्वारा उस केन्द्र को सक्रिय आगे बढ़ती है वैसे-वैसे एक दिव्य जागरण आरम्भ होता है और वह ज्योति प्रकाश-बिन्दु के रूप में त्रिकुटी में प्रकट होता है। अन्तिम अवस्था में यही प्रकाश कलल विस्तृत होकर सम्पूर्ण सहस्रार को प्रकाशित कर देता है। यही व्याप्ति अथवा ब्रह्म प्रकाश है।
साधना सत्रों से बढ़कर अधिक उपयोगी एवं अधिक सरल व्यवस्था अन्य कदाचित् ही करना बन पड़े। महान साँस्कृतिक परम्पराओं का पुनर्जीवन और सृजन के अभीष्ट आत्म-ऊर्जा का अभिवर्द्धन तथा जन-जीवन में उत्कृष्टता के समावेश का जैसा स्वर्ण सुयोग साधना सत्रों में मिल सकता है, उसकी तुलना का उपयोग-उपचार कदाचित ही कहीं खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञानयज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता है जो प्रज्ञावतार के युगांतरीय चेतना को जनमानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक है।
साधना से उसके शरीर पर दिव्य कान्ति झिलमिला रही थी। ज्ञानार्जन से मुख की दीप्ति प्रखर हो चुकी थी।
साधना के श्रद्धा, बाँझ ही बनी रहती है।
साधना क्षेत्र में नये संकल्पों का बीजारोपण एवं विकास हुआ है। प्रत्येक नैष्ठिक साधकों को न केवल नवरात्रि अनुष्ठान साधना स्वयं करनी है वरन् जनकल्याण निमित्त अभी से लगना है तथा पुरानों को प्रोत्साहन तथा नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि 13 से 21 अक्टूबर का आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद बन सके, इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न करने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता है।
साधना सत्र के रूप में नियोजित करने और सफल बनाने पर आरंभ से ही बहुत जोर दिया जाता रहा है। इसमें उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। उपासना से आत्मकल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही है। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ-वानर, कृष्णकाल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि महान प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सज्जनों की सहकारिता सम्पादित किये बिना और कोई चारा नहीं।
साधना की। एक वर्ष पूरा होते-होते विश्वजित् अपने पाँच सौ साथियों के साथ रोगमुक्त हो गए। उनके शरीर दिव्य कान्ति से झिलमिला उठे। चित्रलेखा का आनन्द गगन चूमने लगा। विश्वजित् ने कहा-एक दिन तुमने मेरा अतीत जानना चाहा था, उसका उत्तर देना का समय आ गया है।
साधना से सिद्धि’ के अपने अन्तिम पड़ाव पर पहुँचता है।
साधना के द्वारा सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा।
साधना स्वयं करनी है वरन् जनकल्याण निमित्त अभी से लगना है तथा पुरानों को प्रोत्साहन तथा नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि 13 से 21 अक्टूबर का आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद बन सके, इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न करने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता है।
साधना में अन्तिम स्थिति प्रकाश-अवतरण की मानी गई है। इस दशा में साधक का अन्तर-बाह्य ज्योतिर्वान होकर उसकी सम्पूर्ण सत्ता इससे ओत-प्रोत हो जाती है। यही ब्रह्मज्योति है। ब्रह्म-दर्शन इसे ही कहा गया है।
साधना का अधिक महात्म्य बताया है और इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसर पर न बन पड़े सही पर नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म उन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाममार्गी साधक अभीष्ट मंत्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
साधना का रहस्य छिपा प्रतीत हुआ। वास्तव में जिस प्रकार माचिस की तीली में आग छिपी होती है और जब तक उसे रगड़ा न जाय, वह अग्नि अप्रकट स्तर की बनी रहती है, ठीक उसी प्रकार मानवी मस्तिष्क में पीनियल ग्रन्थि की भूमिका प्रकाश केन्द्र के रूप में है। सामान्य स्थिति और साधारण व्यक्ति में वह केन्द्र प्रसुप्त पड़ा रहता है, इसलिए यदि कोई ऐसा व्यक्ति आँख बन्द कर उस दिव्य प्रकाश को देखना चाहे, तो इसमें वह सफल नहीं हो पाता है। इसके लिए साधनात्मक उपचारों द्वारा उस केन्द्र को सक्रिय आगे बढ़ती है वैसे-वैसे एक दिव्य जागरण आरम्भ होता है और वह ज्योति प्रकाश-बिन्दु के रूप में त्रिकुटी में प्रकट होता है। अन्तिम अवस्था में यही प्रकाश कलल विस्तृत होकर सम्पूर्ण सहस्रार को प्रकाशित कर देता है।
साधना में प्रकाश को माध्यम बनाया जाता है। दीपक ज्योति के स्थूल प्रकाश द्वारा पीनियल में समाहित व्याप्ति प्रकाश पर बार-बार आघात किया जाता है। इस आघात के फलस्वरूप उत्पन्न रगड़ से वहाँ एक प्रकार की स्फुरणा उत्पन्न होती है। यह स्फुरणा ही अदृश्य प्रकाश को दृश्य में परिवर्तित करना आरम्भ करती है। अपनी चरमावस्था में यह ज्योति इतनी उज्ज्वल, शीतल और स्पष्ट होती है कि आँख बन्द होते ही वह सामने साकार हो उठती है।
साधना के साथ अविच्छिन्न रूप से संबंधित है।
साधना उन्हें दुर्धर्ष बनने की शक्ति देती है।
साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। उपासना से आत्मकल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही है। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ-वानर, कृष्णकाल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि महान प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सज्जनों की सहकारिता सम्पादित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था।
साधना में उपरोक्त बातों पर यदि ध्यान रखा गया, तो साधक की सफलता सुनिश्चित है। वह ब्रह्म-ज्योति दर्शन के साथ-साथ अनेक ऐसी विभूतियों का भी स्वामी बन जाता है जो साधारण अवस्था में असम्भव है।
साधना में विभूतियों का जागरण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। साधक दिव्य दृष्टि सम्पन्न तो बनता ही है, इसके अतिरिक्त भी अन्य कितनी ही सिद्धियाँ करतलगत होती हैं। इस दिव्य दृष्टि क्षमता के बारे में आचार्यों का मत है कि ऐसा उस व्याप्ति प्रकाश के कारण ही सम्भव हो पाता है, जो मस्तिष्क से निःसृत होता है। जब किसी के जीवन के बारे में कुछ विशेष जानना होता है, तो इच्छा मात्र से यह प्रकाश-किरण सामने वाले व्यक्ति के भीतर प्रवेश करती और उसके मन में क्या कुछ पक रहा है। यह उद्घाटित करती है।
साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही है। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ-वानर, कृष्णकाल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि महान प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सज्जनों की सहकारिता सम्पादित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीता को जन्म देकर और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने का आधारभूत कारण बना था।
साधना की प्रशंसा कर रहे थे। सबको विश्वास हो चुका था, सचमुच मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। विपरीत परिस्थितियाँ नवनिर्माण में बाधक नहीं, बल्कि उनसे जीवट एवं संघर्षवृत्ति का ही जागरण होता है।
साधना की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए कहा है कि- “सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई।” सात्विक श्रद्धा ही सुन्दर गाय है। यह गाय “जप, तप, व्रत, यम, नियम, अपारा” यानि, यम, नियम, जप , तप आदि चारा ही खाती है। यह चारा हरा हो, उसमें जीवन हो प्राण हो। जीवंत संवेदनाएँ ही इन्हें प्राणवान बनाती रही हैं।
साधना से वह अवगत थे।
साधना द्वारा जिससे अपने मल विकारों को नष्ट कर लिया है तथा अंतःकरण को पवित्र, निष्कलुष बना लिया है, वह व्यक्ति अपने चारों आर विस्तीर्ण प्रकृति को देखकर ही धर्म और अध्यात्म का तत्व ज्ञान सीख सकता है।”
साधना एक अत्यावश्यक पुण्य परम्परा के रूप में सदा-सर्वदा से अपनाई जाती रही है। सर्दी और गर्मी दो ही प्रधान ऋतुएँ हैं, उनका मिलन एक प्रकार से वैसा ही संधिकाल है जैसा कि रात्रि के अंत्र और दिन के प्रारंभ में प्रभातकाल के रूप में उपस्थित होता है। सन्धियाँ सदा मार्मिक होती हैं। शरीर में अस्थिपंजर से बने हुए जोड़ों को भी संधियाँ कहते हैं। इन्हीं के यथावत रहने पर काया की विभिन्न क्रिया-प्रक्रियाएँ गतिशील रहती हैं।
साधना के पश्चात् वह ज्योति विस्तृत होते-होते सम्पूर्ण जीवन सत्ता में परिव्याप्त हो जाती है। सहस्रार उस दिव्य तेज से प्रतिभासित हो उठता है। इसी स्थिति में आत्मसत्ता का ब्रह्मसत्ता से मिलन-संयोग होता है। आत्मबोध, तत्वबोध का यह त्रिविध सम्पादन साथ-साथ सम्पन्न होकर साधक को उसके अन्तिम लक्ष्य पर प्रतिष्ठित कर देता है।
साधना प्रयोजनों के लिए यह समय विशेष रूप से उपयुक्त माना गया है। जिस प्रकार प्रभात काल की उपासना अधिक फलवती होती है और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों संध्याओं के समतुल्य माना गया है।
साधना का विशेष महत्व बताया गया है, कारण कि उस दौरान वृक्ष और साधक दोनों के मध्य एक विशिष्ट स्तर का तारतम्य जुड़ जाता है, जो उसकी प्रगति में सहायक सिद्ध होता है। ज्ञातव्य है कि वृक्षों में सेरोटिनिन से मिलता-जुलता एक रस-स्राव मेलाटोनिन पाया जाता है। यह हारमोन केले, पीपल और बरगद जैसे पेड़ों में सर्वाधिक परिमाण में पाया जाता है। कदाचित् इसीलिए इनका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व इतना अधिक बताया गया है। धर्मकृत्यों में, शादी-विवाहों में केले के तने और पत्तों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।
साधनात्मक उपचारों के माध्यम से जब इच्छानुसार नियंत्रण होता है, तो साधक की इच्छाओं, आकाँक्षाओं , आस्थाओं और भावनाओं में उदात्तता स्फुट झलकने लगती है। यहीं पर सामान्य व्यक्तियों और एक यथार्थ साधक में अन्तर स्पष्ट होता है और यह भी प्रकट होता है कि स्थूल अवयवों की भूमिका सिर्फ शरीर-क्रिया के संचालन तक ही सीमित नहीं है, वरन् उससे भी आगे व्यक्तित्व को गढ़ने-ढालने में उनका उच्चस्तरीय योगदान होता है। इसी क्रम में ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग प्रशस्त करता हुआ साधक ‘साधना से सिद्धि’ के अपने अन्तिम पड़ाव पर पहुँचता है।
साधना पद्धति के कारण भी महत्वपूर्ण माना गया है। नैष्ठिक साधकों के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान साधना एक अत्यावश्यक पुण्य परम्परा के रूप में सदा-सर्वदा से अपनाई जाती रही है। सर्दी और गर्मी दो ही प्रधान ऋतुएँ हैं, उनका मिलन एक प्रकार से वैसा ही संधिकाल है जैसा कि रात्रि के अंत्र और दिन के प्रारंभ में प्रभातकाल के रूप में उपस्थित होता है। सन्धियाँ सदा मार्मिक होती हैं। शरीर में अस्थिपंजर से बने हुए जोड़ों को भी संधियाँ कहते हैं।
साधना करो। रविवार के व्रत के साथ उन्होंने चौबीस लाख मंत्रों के गायत्री जप का विधान समझा दिया और कहा कि इसी एक वर्षीय साधना के द्वारा सब कुछ परिवर्तित हो जाएगा।
साधना, चौबीस हजार जप का लघु अनुष्ठान के साथ सम्पन्न करनी चाहिए। यदि जप प्रातः पूरा नहीं हो सकता है तो सायंकाल उसे पूरा कर लेना चाहिए। उपासना क्षेत्र में नर-नारी को एक समान अधिकार है। ईश्वर के लिए पुत्र-पुत्री दोनों समान हैं।
साधनात्मक पृष्ठभूमि को दर्शाता है, अन्यथा वर्षों के अभ्यास के बाद भी कइयों को इसमें निराशा ही हाथ लगती है।
साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म उन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाममार्गी साधक अभीष्ट मंत्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
साधना सत्रों में मिल सकता है, उसकी तुलना का उपयोग-उपचार कदाचित ही कहीं खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञानयज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता है जो प्रज्ञावतार के युगांतरीय चेतना को जनमानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-August
साधनात्मक दिनचर्या अपनाई जाय । इसकी छाया में रहकर साधना परायण जीवन जीने वालों की झोली मनचाहे अनुदानों -वरदानों से भरपूर हुए बिना नहीं रहती ।
साधना के दिनों में पूज्य गुरुदेव ने मिलने-जुलने का क्रम एकदम बन्द कर दिया। बाहर से आने-जाने वाले ही नहीं शाँतिकुँज में रहने वाले कार्यकर्त्ता भी उनसे इन दिनों नहीं मिल सकते थे। उनके साधनामय जीवन की एक-मात्र सहयोगिनी वन्दनीया माताजी उनके पास रहती थीं। लेखन सम्बन्धी कार्यों में सहयोग के लिए दिन में कुछ समय इस पत्रिका के वर्तमान सम्पादक का भी उनके पास रहना होता था। उन दिनों उनकी दिनचर्या हर-हमेशा की अपेक्षा कुछ अधिक ही अनुशासित हो गयी थी।
साधना का प्रथम सोपान (4) 6.30 से 7 बजे जलपान (5) 7 से 7.30 तक वस्त्र धोना, सफाई, व्यायाम ( 6 ) 7.30 से 10 साधना का द्वितीय सोपान (7) 10 से 10.30 भोजन (8) 10.30 से 1.30 विश्राम, स्वाध्याय, मनन, चिन्तन (9) 1.30 से 2.30 प्रवचन (10) 2.30 से 3 जलपान (11) 3 से 5 साधना का तृतीय सोपान (12) 5 से 5.30 शौच आदि (13 ) 5.30 से 6 में भोजन (14 ) 6 से 7 टहलना (15) 7 से 8 भाव संगीत (15) 8 से 4 तक शयन ।
साधना पद्धति का निष्ठापूर्वक अनुसरण करेंगे। साधना के लिए इन साधकों को नाव से गंगा की जलधारा पार करके दिनभर टापुओं में रहने और शाम को पुनः वापस ब्रह्मवर्चस लाने की विधि-व्यवस्था भी सोची गयी थी।
साधना-सम्प्रदायों में अपने-अपने ढंग की साधना प्रचलित हैं। अपने शोध प्रयास किसी देश या सम्प्रदाय की सीमा बन्धन में बँधे हुए नहीं हैं। इसलिए अपनी शोध का क्षेत्र विश्वव्यापी साधनाओं की क्रिया-प्रतिक्रिया का परीक्षण ही होगा। भारतीय योग साधनाओं की 84 शाखाएँ है॥ 84 योगासन ही नहीं 84 योग भी हैं। इनके जो महात्म्य बताए गए हैं उनमें से कितनी अंश अभी भी सही सिद्ध होता है यह देखना है।
साधनाक्रम को सामान्य शौच,स्नान, भोजन, विराम के अतिरिक्त छह घण्टे रखा गया था । शारीरिक श्रम आठ घण्टा, मानसिक श्रम सात घण्टा और आध्यात्मिक श्रम छह घण्टे की सन्तुलित मर्यादा निर्धारित है, उसकी के अनुरूप इस अवधि का निर्धारण किया गया था यों मध्याह्नकालीन एक घण्टे का प्रवचन और सायंकाल एक घण्टे का संगीत भी जोड़ लिया जाय तो यह अवधि आठ घण्टे भी गिनी जा सकती है । हर साधक को प्रतिदिन पन्द्रह मिनट व्यक्तिगत परामर्श के लिए एकान्त अवसर मिलता सौ उसे सवा आठ घण्टे भी गिना जा सकता है । शेष समय स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के लिए था ।
साधना के इस पचासवें वर्ष में पूज्य गुरुदेव के शिष्य वत्सल अन्तःकरण में एक नया संकल्प उभरा-अब तक की अर्जित तप सम्पदा का सामूहिक वितरण। यूँ उनका जीवनक्रम अर्जन एवं वितरण का सतत् प्रवाह रहा है। पर अभी तक वितरण की प्रणाली प्रायः वैयक्तिक ही रही थी। अनेक लोग समय-समय पर उनके सान्निध्य में आकर अपनी कष्ट-कठिनाइयों, पीड़ा-परेशानियों से मुक्ति पाते रहे थे। कइयों ने उनसे आध्यात्मिक उपलब्धियों के अनुदान, वरदान भी पाए थे, पर यह था प्रायः वैयक्तिक ही ।
साधना में जाने से कुछ पहले तक परम पू. गुरुदेव शाँतिकुँज से पैदल चलकर यहाँ स्वयं आते थे। यह सिलसिला प्रायः प्रतिदिन का था। यहाँ का भवन निर्माण, 14 मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा, पुस्तकालय की स्थापना एवं प्रयोगशाला के स्वरूप का निर्धारण सब कुछ उन्हीं की देख-रेख में हुआ। शोध संस्थान के स्वरूप का विकास हो जाने के बाद, यहाँ आकर शोधकर्मियों का मार्गदर्शन भी स्वयं ही करते थे। आज जहाँ लाइब्रेरी है वहीं ये शोध गोष्ठियाँ हुआ करती थी।
साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय-महायज्ञों राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों के रूप में की जाने लगी। इन महायज्ञों की घोषणा पूज्यवर ने अपनी विशेष साधना में विराम के अवसर पर की।
साधना अपना साकार रूप ले रही थी । गायत्री और गंगा के इस अवतरण दिवस पर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का उद्घाटन हो रहा था। इस अवसर पर गायत्री परिवार के सदस्यों के अलावा देश के अनन्त विख्यात मनीषी भी आए हुए थे। आगन्तुकों में उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल श्री जी.डी. तपासे भी थे। शोध संस्थान के कार्य की रूपरेखा ने उन्हें मोह लिया था।
साधनाओं की 84 शाखाएँ है॥ 84 योगासन ही नहीं 84 योग भी हैं। इनके जो महात्म्य बताए गए हैं उनमें से कितनी अंश अभी भी सही सिद्ध होता है यह देखना है। प्रयत्नों के असफल होने का कारण क्या है? क्या उन विधानों में परिस्थितियों के अनुरूप यत्किंचित् हेर-फेर हो सकता है ? साधक की शारीरिक, मानसिक स्थिति के अनुरूप क्या शास्त्रीय विधानों में कुछ न्यूनाधिकता हो सकती है ?
साधना का द्वितीय सोपान (7) 10 से 10.30 भोजन (8) 10.30 से 1.30 विश्राम, स्वाध्याय, मनन, चिन्तन (9) 1.30 से 2.30 प्रवचन (10) 2.30 से 3 जलपान (11) 3 से 5 साधना का तृतीय सोपान (12) 5 से 5.30 शौच आदि (13 ) 5.30 से 6 में भोजन (14 ) 6 से 7 टहलना (15) 7 से 8 भाव संगीत (15) 8 से 4 तक शयन ।
साधना के बाद अगले दिन आए हुए परिजनों ने यज्ञ सम्पन्न किया।
साधनाओं के लिए और 30 मिनट गायत्री जप के लिए निर्धारित किए गए थे। औसतन इस अवधि में 600 मंत्र जपे जाने से कुल संख्या 6 करोड़ होती है। वर्ष में यह संख्या 6 करोड़ होती है। वर्ष में यह संख्या 360फ्6=2160 करोड़ हो जाती है। इन्हीं साधकों में से जिन्हें सुविधा हो उनसे चैत्र और आश्विन नवरात्रिय जप 240 करोड़ हो जाता है।
साधना की जो दीपशिखा प्रज्ज्वलित हुई थी, उसने 1976 में अपने पचास वर्ष पूरे कर लिए। इन पचास वर्षों में पूज्यवर का जीवन अनेक अलौकिक अनुभूतियों से गुजरा था। अखण्ड दीपक के आलोक में अनगिनत प्रेरणाएँ उनके अर्न्तगगन में उतरी थीं। इन पचास सालों में न सिर्फ दीपशिखा अखण्डित रही, बल्कि साधना का क्रम भी अखण्डित रहा। आँवलखेड़ा की छोटी-सी कोठरी में प्रज्वलित किया गया दीपक, अपने मथुरा निवास की अवधि पुरी करके अब तक शाँतिकुँज में प्रतिष्ठित हो चुका था।
साधना सत्र जैसे अनगिन सत्रों से अब तक यहाँ साधक लाभान्वित होते रहे हैं।
साधना से अनुप्राणित इन निर्माणों के माध्यम से एक प्रेरणा स्थली, एक तीर्थ चेतना का परिचय मिलता है ।
साधना सभी सिद्धियों का आधार है ।
साधना एक ही है जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की विचार क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए। इस चरण को पूरा करने के बाद ही रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कार्य हो सकता है। उद्योग, शिल्प,चिकित्सालय, मन्दिर, धर्मशाला, प्याऊ सदावर्त आदि कितने ही लोकोपयोगी कार्य हो सकते हैं पर वानप्रस्थ को एक ही लक्ष्य सामने रखना चाहिए विचारक्रान्ति, बौद्धिक परिष्कार, भावनात्मक नवनिर्माण इसी से संबद्ध सेवा कार्य हाथ में लिए जाएँ।
साधना, आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।
साधना सत्र शाँतिकुँज में संचालित होते रहे और ब्रह्मवर्चस साधना आरण्यक ने प्रयोगशाला का रूप ले लिया। यद्यपि इसकी शोध का स्वरूप प्रचलित अनुसंधान-अन्वेषण की पद्धतियों से अलग था। इस प्रयोगशाला में किए जाने वाले प्रयोग अपनी तरह के अनूठे हैं।
साधना उपक्रम में उत्कृष्ट भावनाओं का सघन समावेश प्रत्यावर्तन साधना की अपनी खासियत थी । यही कारण है कि इन दिनों हर साधक को प्रायः मौन रहना पड़ता । उसे गुरुदेव के अतिरिक्त किसी अन्य से बातचीत करने की मनाही थी । साधकों को घर-गृहस्थी और काम -धन्धों की चिन्ता करने से मन को मुक्त रखने तथा अनावश्यक चर्चाएँ तथा हलचलें न करने के लिए कहा जाता । ताकि आत्मचिंतन आत्म -सुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्म-विकास की दृष्टि से बनाया गया कार्यक्रम सुचारु रूप से चल सकें ।
साधना, बिंदु योग, आत्माराधना, तत्वबोध, नाद योग के दस साधना क्रमों का समावेश था । इसके अतिरिक्त आत्मशोधन की प्रक्रिया ही अमूल्य थी, जिसे साधक गुरुदेव के सान्निध्य में पूरा करते । यह प्रक्रिया विगत जीवन के पापों का स्मरण करने और बताने प्रायश्चित करने ओर भविष्य में पुनः उन भूलों को न दुहराने का निश्चय करने के रूप में सम्पन्न होते । यह प्रत्यावर्तन का प्रथम और आवश्यक चरण था । पहले दिन जब साधक पू.गुरुदेव से मिलने जाते, तो वह उनसे अकेले में अपनी सभी ग्रन्थियों को खोलने की बात कहते ।
साधना के लिए अनिवार्य थे । एक घण्टा मध्याह्न बौद्धिक प्रवचन द्वारा आत्मबोध की शिक्षा दी जाती और सायंकाल एक घण्टा भाव गीतों द्वारा अन्तःकरण में उच्चस्तरीय उत्कृष्टता को उमगाया जाता था । छह घण्टे साधना, 2 घण्टे प्रशिक्षण इस प्रकार आठ घण्टे का नियमित और अनुशासित कार्यक्रम इन सत्रों में रहता । दिनचर्या इतनी सुगठित कि फौजी अनुशासन का पालन करने वाले ही उसमें फिट बैठे । अस्तव्यस्तता के आदी लोग इसमें रुक नहीं सकते थे ।
साधना काल 4 दिन अथवा 96 घण्टे का ही रखा गया था ।
साधना युग परिवर्तन की गतिविधियों का आधार बनी । प्रत्यावर्तित जीवन सांसारिक आसक्ति से छूटकर लोकसेवी वानप्रस्थ में बदलता चला गया ।
साधना मण्डल में सम्मिलित होने वाले हर साधक ने अपना लाभ भी अनेक गुना बढ़ा लिया और छाये हुए अन्धकार का निवारण कर सकने वाला प्रकाश उत्पन्न करने में अपनी विशिष्ट भूमिका भी निभा सके।
साधना, भावी कार्यक्रम, परिजनों की उसमें भागीदारी के बारे में बताया। सूक्ष्मीकरण साधना के बाद यह पूज्यवर का प्रथम प्रवचन था। द्वितीय एवं अन्तिम प्रवचन इसी वर्श गुरु पूर्णिमा को हुआ। अपने इस प्रवचन में उन्होंने कहा-”युग निर्माण हमने करके रख दिया है। तुम लोगों को सिर्फ श्रेय लेना है।
साधना, तीसरा परिजनों की विशिष्ट सहृदयता, आत्मीयता, ममता का विस्तार ॥ इसी में उन्होंने आगे लिखा - “ रामकृष्ण परमहंस, योगिराज अरविंद, महर्षि रमण की अनुपम साधनाओं ने भारत का भाग्य परिवर्तन करके रख दिया । अगले दिनों भारत को जिसे अभी भाग्य परिवर्तन का निर्माण का अधिकार मात्र मिला है, हर क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करना है । इसके लिए सूक्ष्म वातावरण को गरम कर सकने वाले महामानवों की आवश्यकता पड़ेगी । यह कार्य स्वतंत्रता संग्राम से भी अधिक भारी होगा । पूज्यवर ने लिखा कि हमें उपरोक्त तीन तपस्वियों की बुझी पड़ी परम्परा को फिर से जीवित करना है ताकि सूक्ष्म जगत गरम हो सके, उत्कृष्ट स्तर के महामानव पुनः अवतरित हो सकें ।
साधना नहीं के बराबर दिखायी देती है । यदि इन लुप्त विद्याओं को खोज निकाला जाय तो भौतिक विज्ञान को परास्त कर पुनः अध्यात्म विज्ञान की महत्ता प्रतिस्थापित की जा सकेगी और लोकमानस के प्रवाह को उस स्थिति की ओर मोड़ा जा सकेगा जिसकी हम अपेक्षा करते हैं । ब्रह्मवर्चस की स्थापना का मूलभूत आधार प. पूज्य गुरुदेव के मानस में आठ वर्ष पूर्व ही बन चुका था । गंगा की गोद,हिमालय की छाया एकान्त में स्थित स्थान जो उच्च आध्यात्मिक शोधों के लिए सही सिद्ध हो, वह शाँतिकुँज के अंग के रूप में ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान 1969 में जन्म ले चुका था ।
साधना के लिए जो तीन सोपान निर्धारित किए गए थे, उनमें 10 सूत्री क्रियाकलापों का समावेश था जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है -
साधना पद्धति बन गयी थी। इस साधना यज्ञ की पूर्णाहुति सूर्यार्घ के रूप में इस भाव के साथ सम्पन्न करने का निर्देश था, जैसे अग्निहोत्र की पूर्णाहुति घृत की धार वसोधारा चढ़ाते हुए की जाती है।
साधनाएँ थी सोऽहम् प्राण योग, विशेष ध्यान के साथ गायत्री जप एवं खेचरी मुद्रा।
साधना वर्ष घोषित करते हुए कहा- ‘स्वर्ण जयन्ती वर्ष, साधना वर्ष होगा। इसमें एक लाख निष्ठावानों को साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है।
साधनाक्रम इस वर्ष के बसन्त पर्व या दिन 5 फरवरी सन् 76 गुरुवार से शुरू किया गया। इसकी अवधि प्रतिदिन 45 मिनट की निर्धारित की गई। ये 45 मिनट की सूर्योदय के पूर्व के 45 मिनट थे। समय की नियमितता अनिवार्य थी। उसके लिए सभी से अनुरोध किया था कि सूर्योदय का समय प्रायः हर महीने बदलता रहता है।
साधनाएँ होती रहीं उसमें शाँतिकुँज की भूमिका एक तपः स्थली की थी। यह सिर्फ संस्कारित दिव्य साधना स्थली भर थी पर, अब जबकि पूज्यवर एवं माताजी सूक्ष्म शरीरधारी हो गए- यह शाँतिकुँज उनका स्थूल शरीर बन चुका है। इसके द्वारा वहीं भूमिका सम्पादित होनी है जो कभी गुरुदेव-माताजी का यह निर्माण अब स्वयं निर्माता बन गया है। इस तथ्य को बनाने हुए पूज्यवर के शब्द हैं- “ अभी हम लोगों के शरीर शाँतिकुँज में रहते हैं। पीछे भी हम इस परिसर के कण-कण में समाए हुए रहेंगे इसकी अनुभूति निवासियों और आम...... का समान रूप से होती रहेगी।
साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है। कुछ अन्य लोग भी ऐसे हो सकते हैं।
साधना में विराम के अवसर पर की।
साधना सत्र, चांद्रायण शिविर, संजीवनी, साधना, जीवन साधना सत्र जैसे अनगिन सत्रों से अब तक यहाँ साधक लाभान्वित होते रहे हैं।
साधनाओं ने भारत का भाग्य परिवर्तन करके रख दिया । अगले दिनों भारत को जिसे अभी भाग्य परिवर्तन का निर्माण का अधिकार मात्र मिला है, हर क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व करना है । इसके लिए सूक्ष्म वातावरण को गरम कर सकने वाले महामानवों की आवश्यकता पड़ेगी । यह कार्य स्वतंत्रता संग्राम से भी अधिक भारी होगा । पूज्यवर ने लिखा कि हमें उपरोक्त तीन तपस्वियों की बुझी पड़ी परम्परा को फिर से जीवित करना है ताकि सूक्ष्म जगत गरम हो सके, उत्कृष्ट स्तर के महामानव पुनः अवतरित हो सकें ।
साधनाओं का सम्मान है किन्तु वाममार्गी साधनाओं को हेय वर्ग की ठहरा दिया गया है। जबकि वह भी विशिष्ट शक्तियों को उपलब्ध करने का सुनिश्चित विज्ञान है। अनैतिक आचरण वालों के उस क्षेत्र में घुस पड़ने से बदनामी छाई है अन्यथा उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए नीति-मर्यादाओं का उल्लंघन करना पड़े। तन्त्र को नए सिरे से खोज करने का आवश्यकता है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म जैसे प्रयोग भारतीय तंत्रशास्त्र के प्रारम्भिक अध्याय हैं।
साधना के परिणाम अगले समय में वर्षा एवं बसन्त जैसे ही देखे जा सकेंगे।”
साधनाक्रम में 15 मिनट अन्य साधनाओं के लिए और 30 मिनट गायत्री जप के लिए निर्धारित किए गए थे। औसतन इस अवधि में 600 मंत्र जपे जाने से कुल संख्या 6 करोड़ होती है। वर्ष में यह संख्या 6 करोड़ होती है। वर्ष में यह संख्या 360फ्6=2160 करोड़ हो जाती है। इन्हीं साधकों में से जिन्हें सुविधा हो उनसे चैत्र और आश्विन नवरात्रिय जप 240 करोड़ हो जाता है।
साधना प्रचलित हैं। अपने शोध प्रयास किसी देश या सम्प्रदाय की सीमा बन्धन में बँधे हुए नहीं हैं। इसलिए अपनी शोध का क्षेत्र विश्वव्यापी साधनाओं की क्रिया-प्रतिक्रिया का परीक्षण ही होगा। भारतीय योग साधनाओं की 84 शाखाएँ है॥ 84 योगासन ही नहीं 84 योग भी हैं। इनके जो महात्म्य बताए गए हैं उनमें से कितनी अंश अभी भी सही सिद्ध होता है यह देखना है।
साधना का सम्बल भी।”
साधनाक्रम की संघशक्ति से जुड़ी हुई साधना अब तक कभी कदाचित् ही हुई हो। एक दिन में 6 करोड़ गायत्री जप होने का अर्थ है 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों का प्रतिदिन सम्पन्न होना।
साधना एवं प्रशिक्षण दोनों का समावेश है। ध्यान-साधना के प्रभावी प्रयोग के साथ इसमें गायत्री महामंत्र के विलक्षण प्रयोग बताए जाते हैं। जिन दिनों राम-रावण युद्ध अपनी चरम सीमा पर था। रावण अपनी विनाशकारी शक्तियों के प्रयोग में जी-जान से लगा हुआ था। उन्हीं दिनों महर्षि अगस्त्य एवं महर्षि विश्वामित्र के आश्रम की गतिविधियाँ भी पूरे जोर-शोर पर थी।
साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती हैं आज्ञाचक्र में ज्योति अवतरण बिन्दुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्म सम्बन्ध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं। तीसरे सोपान में आत्मबोध और तत्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष है। लययोग से आनन्दमय कोश -बिन्दुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमय कोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमय कोश की जागृति होती है।
साधनाओं के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ना पड़ेगा। उन्हें तुम लोग इतना बताना- अब शाँतिकुँज ही गुरुजी का स्थूल शरीर है, यहाँ की प्रत्येक गतिविधि एवं क्रियाकलाप में उन्हीं का स्पर्श है। शरीर के रक्त प्रवाह एवं प्राण प्रवाह की तरह गुरुजी -माताजी का तप प्राण यहाँ बिखरा हुआ हैं। इसे अपनी हर साँस में धारण करो। हरपल-हरक्षण इसी भाव में रहो कि यहाँ की तप-ऊर्जा रोम-रोम से, साँस-साँस से अन्दर प्रवेश कर रही है।
साधनाओं का क्रम आता था । जिनका स्वरूप कुछ इस प्रकार था -
साधनाक्रम का है। उसके सभी उतार-चढ़ावों का हमें ज्ञान है। अस्तु, उसी को सन् 76 के साधना वर्ष के लिए निर्धारित किया है। हम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में मार्गदर्शन और सहयोग करेंगे,साथ ही हमारी बागडोर सँभालने वाली शक्ति के द्वारा इस मण्डली पर विशेष प्रकाश-प्रेरणा मिलने का लाभ मिलता रहेगा। यह सब सूक्ष्म व्यवस्था बन जाने पर ही इस संघ साधना का उपक्रम किया गया है।
साधना परायण जीवन जीने वालों की झोली मनचाहे अनुदानों -वरदानों से भरपूर हुए बिना नहीं रहती ।
साधना करने के छोटे-से विधान को ही ले लें उसमें छाया पुरुष सिद्धि की समस्त सम्भावनाएँ विद्यमान है । अपने ही स्तर का एक नया सूक्ष्म व्यक्तित्व उत्पन्न कर लेना छाया पुरुष कहलाता है। पाँच कोशों में पाँच छाया पुरुष तक सिद्ध कर लेने की गुँजाइश हैं वे विश्वस्त सेवक का कार्य करने में निरन्तर जुटे रह सकते हैं । प्राणयोग के सहारे प्राण चिकित्सा से कठिन रोगों को सरलतापूर्वक दूर करने में सफलता मिल सकती है । ये सभी पाँच योग जिस सूत्र में गूंथे गए थे वह मंत्रयोग हैं गायत्री महामंत्र की साधना सभी सिद्धियों का आधार है ।
साधनाएँ जुड़ी गुँथी है। इन्हें पाँच कोषों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना भी कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम् साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती हैं आज्ञाचक्र में ज्योति अवतरण बिन्दुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्म सम्बन्ध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं।
साधना में तल्लीन थे । उनकी यह आत्मतल्लीनता यह सिद्ध कर रही थी कि मोक्ष का प्रयत्न अधम योनि में भी निषिद्ध नहीं है । यदि कोई सच्चे मन से निम्न योनि में भी धर्म-कर्त्तव्यों का पालन करता है तो वह उस योनि को भी धन्य बनाकर स्वयं भी धन्य बन जाता है और यदि मनुष्य जैसी श्रेष्ठ योनि पाकर भी अधम कार्य करता है तो न केवल मनुष्यता को कलंकित करता है, बल्कि स्वयं भी अधम बन जाता है । लेकिन वह तो अधम योनि में रहते हुए भी आन्तरिक देवत्व से भरे−पूरे थे और इसी कारण उनके मर्मस्थल को इस करुण क्रन्दन ने बाँध दिया ।
साधनाक्रम में जो सबसे विशेष बात थी। उसका उल्लेख करते हुए उनके शब्द हैं- “ हमारा स्वयं का अनुभव इसी साधनाक्रम का है। उसके सभी उतार-चढ़ावों का हमें ज्ञान है। अस्तु, उसी को सन् 76 के साधना वर्ष के लिए निर्धारित किया है। हम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में मार्गदर्शन और सहयोग करेंगे,साथ ही हमारी बागडोर सँभालने वाली शक्ति के द्वारा इस मण्डली पर विशेष प्रकाश-प्रेरणा मिलने का लाभ मिलता रहेगा।
साधना की घोषणा कर दी। इसके पीछे निहित उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा-” सूक्ष्मीकरण का अपना नया कदम लोकमंगल और उच्च उद्देश्य की पूर्ति के लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण है। समय की विपन्नता दिन-दिन बढ़ती जा रही हैं, इसमें सन्देह नहीं। दृश्यमान और अदृश्य क्षेत्रों में सर्वनाशी विभीषिकाएँ जिस क्रम से गहरा रही हैं, उसे देखते हुए कभी भी ऐसा अनिष्ट हो सकता है जिसके कारण पृथ्वी को ऐसे चूरे में बदलना पड़े जैसा कि मंगल और बृहस्पति के बीच निरन्तर एक अन्धड़ की तरह घूमता रहता है। अणु-आयुधों की, रासायनिक शस्त्रों की, घातक किरणों की संख्या एवं विचित्रता इतनी बढ़ गयी है कि उनके द्वारा बिना आमने-सामने का युद्ध छिड़े भी ऐसा हो सकता है कि रात को अच्छे-खासे सोये हुए आदमी मृतक या अर्द्धमृतक जैसी स्थिति में मिलें।
साधना पूर्ण हुई। शाँतिकुँज के लिए इन पिछले चौबीस वर्षों का प्रत्येक वर्ष उसके संस्थापक के चौबीस पुरश्चरणों वाले, चौबीस वर्षों का अन्तिम अध्याय था, इसी के साथ तरुण तपस्वी शाँतिकुँज ने अपने पच्चीसवें वर्ष रजत जयन्ती वर्ष में प्रवेश किया।
साधना की इन विलक्षण परिणतियों के आधार पर ही उन्होंने घोषित किया-सघन तमिस्रा चिरस्थाई लगती हो, वे अपने ढंग से सोचे, पर हमारा दिव्य दर्शन उज्ज्वल भविष्य की झाँकी करता है। इस पुण्य-प्रयास में सृजन की पक्षधर देवशक्तियां प्राण-पण से जुट गयी हैं। इसी सृजन प्रयास के अकिंचन घटक के रूप में हमें भी कुछ कारगर अनुदान प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है। इस सुयोग, सौभाग्य पर हमें अतीव सन्तोश है और असाधारण आनन्द।”
साधना के बाद 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ आरम्भ हुआ, जो 11-30 तक चलता रहा। साथ-साथ आज जहाँ देवात्मा हिमालय बन रहा है उसी भूमि में अखण्ड गायत्री जप एवं संस्कारों का क्रम नियमित चलता रहा। इसी के साथ प्रवचन सभागार में वन्दनीया माताजी द्वारा दीक्षा दी गई इस कार्यक्रम में प्रतिदिन 50 हजार से अधिक परिजन उपस्थित रहते थे।
साधनाएँ डेढ़ घण्टे में करने के उपरान्त एक घण्टे के अवकाश के बाद प्रभातकालीन मध्याह्न के पूर्व भाग में की जाने वाली साधनाओं का क्रम आता था । जिनका स्वरूप कुछ इस प्रकार था -
साधना वर्ष के लिए निर्धारित किया है। हम प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में मार्गदर्शन और सहयोग करेंगे,साथ ही हमारी बागडोर सँभालने वाली शक्ति के द्वारा इस मण्डली पर विशेष प्रकाश-प्रेरणा मिलने का लाभ मिलता रहेगा। यह सब सूक्ष्म व्यवस्था बन जाने पर ही इस संघ साधना का उपक्रम किया गया है।
साधना का प्रत्येक कदम इसी दिशा में उठना चाहिए। सर्वोत्तम स्तर के वानप्रस्थी-परिव्राजक स्तर की जीवनचर्या अपनाते हैं। वे आश्रम बनाकर नहीं बैठते वरन् जहाँ भी सत्प्रवृत्तियों के अंकुर उगे हुए हैं उन्हें सींचने के लिए यंत्र-तत्र भ्रमण करते हैं। मध्यम स्तर के वानप्रस्थी वे हैं जिनके लिए अपने घर-परिवार के बीच रहते हुए अपने समीपवर्ती क्षेत्र में काम करना अधिक सुविधाजनक पड़ता है। इसमें वे परिवार को मार्गदर्शन, परामर्श, नियन्त्रण और सहयोग का लाभ भी यथासम्भव देते रहते हैं।
साधना सत्रों की शृंखला चल रही थी।
साधनाक्रम में एक ही ॐ का प्रयोग करना था। अर्थात् ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। यही जाप का सर्वमान्य मंत्र था।
साधना के इस द्वितीय सोपान के पूरा होने के बाद अगले तृतीय सोपान की बारी आती है।
साधनात्मक पुरुषार्थ के देशव्यापी परिणाम भी अनुभव किए गए। उन दिनों समूचा राष्ट्र इमरजेन्सी की कैद में जकड़ा हुआ था शासकों की, स्वार्थपरता की रीति-नीति ने सारे देश को कारागार में बदल दिया था। उन्हीं दिनों क्षेत्र से आए एक परेशान कार्यकर्त्ता ने अपनी विपत्ति गुरुदेव को सुनायी तो उनका जवाब था-” तुम्हें जो बताया गया है उसे करते रहो- स्थिति परिवर्तित होगी, वर्तमान शासकों को सबक मिलेगा। तुम लोगों की साधना का लाभ सारे देश को मिलेगा। “ हुआ भी कुछ ऐसा ही-1977 में सारे देश ने राहत की साँस ली।
साधना परायण हाथों का ही उपयोग होता । इस क्रम को वंदनीया माताजी के साथ पुरश्चरण में संलग्न कन्याएँ ही सम्पन्न करती । ब्रह्मचर्य से रहने वाले शरीर ही इस आहार का स्पर्श करते । इससे पूर्व उसे और भी सुसंस्कारी बनाने के लिए आध्यात्मिक उपचारों से सम्पन्न किया जाता । उस पर निरीक्षण दृष्टिपात उन आंखों का रहता, जिन्होंने प्रत्यावर्तन सत्र शृंखला का आधार खड़ा किया था ।
साधना में जुट जायँ। दिनचर्या का ऐसा निर्धारण होना चाहिए जिसमें स्वाध्याय और योग साधन तपश्चर्या के लिए भी समुचित स्थान रहे और शेष समय सेवाकार्यों में लगा रहे। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की महानतम आवश्यकता और विश्व मानव की सेवा-साधना एक ही है जनमानस का भावनात्मक नवनिर्माण। इसके लिए ज्ञान यज्ञ की विचार क्रान्ति शृंखला इन दिनों चल रही है। इस केन्द्र पर ही प्रत्येक विचारशील का ध्यान केन्द्रित होना चाहिए।
साधना पद्धति का क्रम कुछ इस प्रकार था-
साधना का एक और आश्चर्यकारी परिणाम हुआ-ब्रह्मांड के आनंदमय कोष का जागरण। ब्रह्मांड के प्रथम कोष अन्नमय कोष के रूप में वनस्पतियों में चेतना होते हुए भी हलचल नहीं होती। प्राणियों में चेतना है, हलचल भी। प्राणविद्युत का स्थूल नियोजन भर पाने वाले इन जीवों को ब्रह्मांड का प्राणमय कोष माना गया। मानसिक क्षमता सम्पन्न मनुष्य ब्रह्मांड का मनोमय कोष है।
साधना के बाद यह पूज्यवर का प्रथम प्रवचन था। द्वितीय एवं अन्तिम प्रवचन इसी वर्श गुरु पूर्णिमा को हुआ। अपने इस प्रवचन में उन्होंने कहा-”युग निर्माण हमने करके रख दिया है। तुम लोगों को सिर्फ श्रेय लेना है। इस कथन के साथ ही उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का सार बताते हुए कहा- करिष्ये वचनं तव, जब वीरवर अर्जुन ने भगवान कृष्ण से वाक्य कहा तो पार्थ सारथी के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी।
साधना के बीजाँकुरों का प्रस्फुटन और एक सजीव पौध-शाला निर्माण के लिए प्रयुक्त था । जहाँ शेष दो काम भी साथ चल सके । हमारे प्राचीन अध्यात्म की ज्ञान-विज्ञान परम्परा का पुनर्जीवन, अध्यात्म विज्ञान की शोध साधना जैसा भगीरथ कर गये, सम्भवतः ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के माध्यम से शाँतिकुँज में विराजमान ऋषि सत्ता के मार्गदर्शन में होना था । आत्मा की अनंत शक्ति का प्रयोग करके प्राचीनकाल में लोग अपने आँतरिक और भौतिक प्रगति का पथ जिस प्रकार प्रशस्त करते थे और रीति-नीति में आध्यात्मिक आदर्शों का समावेश रहने से सर्वत्र सुख-शांति का साम्राज्य था, उस विलुप्त अध्यात्म को पुनर्जीवित करने का कार्य जीवन के इस अंतिम अध्याय में ब्रह्मवर्चस द्वारा सम्पन्न होना था । इसीलिए शाँतिकुँज की स्थापना अभीष्ट समझी गयी ।
साधना जैसा भगीरथ कर गये, सम्भवतः ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के माध्यम से शाँतिकुँज में विराजमान ऋषि सत्ता के मार्गदर्शन में होना था । आत्मा की अनंत शक्ति का प्रयोग करके प्राचीनकाल में लोग अपने आँतरिक और भौतिक प्रगति का पथ जिस प्रकार प्रशस्त करते थे और रीति-नीति में आध्यात्मिक आदर्शों का समावेश रहने से सर्वत्र सुख-शांति का साम्राज्य था, उस विलुप्त अध्यात्म को पुनर्जीवित करने का कार्य जीवन के इस अंतिम अध्याय में ब्रह्मवर्चस द्वारा सम्पन्न होना था । इसीलिए शाँतिकुँज की स्थापना अभीष्ट समझी गयी । ‘मानव में देवत्व और धरती पर स्वर्ग का अवतरण ‘ यही दो सतयुगी समाज का मूलभूत आधार बनेंगी । प. पू. गुरुदेव का यह चिंतन शाँतिकुँज से ही क्रियान्वित होना था ।
साधनाओं को हेय वर्ग की ठहरा दिया गया है। जबकि वह भी विशिष्ट शक्तियों को उपलब्ध करने का सुनिश्चित विज्ञान है। अनैतिक आचरण वालों के उस क्षेत्र में घुस पड़ने से बदनामी छाई है अन्यथा उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए नीति-मर्यादाओं का उल्लंघन करना पड़े। तन्त्र को नए सिरे से खोज करने का आवश्यकता है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म जैसे प्रयोग भारतीय तंत्रशास्त्र के प्रारम्भिक अध्याय हैं।
साधना के समय शांतिकुंज में एक-मासीय और नौ दिवसीय साधना सत्रों का क्रम अनवरत चलता रहा। सूक्ष्मीकरण साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय-महायज्ञों राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों के रूप में की जाने लगी। इन महायज्ञों की घोषणा पूज्यवर ने अपनी विशेष साधना में विराम के अवसर पर की।
साधना पद्धति समग्र जीवन साधना के रूप में एक लाख साधकों द्वारा निष्ठापूर्वक अपनायी गई। नैष्ठिक साधकों में से प्रायः सभी ने वैयक्तिक एवं सामाजिक स्तर पर अनेक सफलताएँ अर्जित कीं, अनगिनत दोषों से छुटकारा पाया। सबसे भारी लाभ तो आत्मिक उत्कर्ष का रहा, जो उन्हें अपनी मार्गदर्शक सत्ता एवं हिमालय से आती शक्तिधाराओं से जुड़ने, एकात्म होने से मिला। गूँगे के गुड़ की भाँति इस स्वाद को आज भी अनेक रसासिक्त होकर अनुभव करते हैं।
साधना-आरम्भ के पन्द्रह मिनटों में श्वास के साथ ‘सो’ की तथा श्वास बाहर निकालते समय ‘हम’ के ध्यान की भावना करना । उसके उपरान्त श्वास के रूप में महाप्राण का शरीर के रोम-रोम प्रवेश और ‘हम’ के रूप में निकृष्ट स्तर की अहंता का बहिष्कार ।
साधना, 2 घण्टे प्रशिक्षण इस प्रकार आठ घण्टे का नियमित और अनुशासित कार्यक्रम इन सत्रों में रहता । दिनचर्या इतनी सुगठित कि फौजी अनुशासन का पालन करने वाले ही उसमें फिट बैठे । अस्तव्यस्तता के आदी लोग इसमें रुक नहीं सकते थे । साधना वाले चार दिनों में प्रत्येक साधक को शाँतिकुँज की समी-मर्यादा में रहना पड़ता । इस परिसर से बाहर निकलने की कतई छूट नहीं थी ।
साधना वाले चार दिनों में प्रत्येक साधक को शाँतिकुँज की समी-मर्यादा में रहना पड़ता । इस परिसर से बाहर निकलने की कतई छूट नहीं थी । सीताजी की सुरक्षा के लिए जिस प्रकार लक्ष्मण रेखा खींची गई थी, लगभग वैसी ही शाँतिकुँज की सीमाएँ प्रतिबन्ध रेखा बन जाती ।
साधनाक्रम की मध्यवर्ती मुख्य प्रक्रिया थी उसके आदि में सोऽहं प्राणयोग का बीज और अन्त में खेचरी मुद्रा का सम्पुट लगा हुआ था। इन चारों के मिलने से यह एक पूर्ण साधना पद्धति बन गयी थी। इस साधना यज्ञ की पूर्णाहुति सूर्यार्घ के रूप में इस भाव के साथ सम्पन्न करने का निर्देश था, जैसे अग्निहोत्र की पूर्णाहुति घृत की धार वसोधारा चढ़ाते हुए की जाती है।
साधना विज्ञान क्षेत्र में पिछले दिनों मान्यता नहीं दी है। फलतः नास्तिकवाद का पक्ष सबल हुआ है और अनास्थावादी आचरणों ने जोर पकड़ा है। नया अनुसंधान तंत्र ऐसा खड़ा होना चाहिए जो प्रत्यक्षवाद के प्रत्येक अनास्थावादी प्रतिपादन को चुनौती दे सके और उस क्षेत्र में छाई हुई भ्रान्तियों को परास्त कर सके। आज इन प्रतिद्वन्द्वी प्रयत्नों की इतनी आवश्यकता है जिसे मानवी भविष्य को बनाने, बिगाड़ने की दृष्टि से सर्वोपरि महत्व की मानी जा सकती है।
साधना वर्ष घोषित करते हुए कहा- “ स्वर्ण जयन्ती वर्ष, साधना वर्ष होगा। इसमें एक लाख निष्ठावानों को साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है।
साधना भी कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम् साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती हैं आज्ञाचक्र में ज्योति अवतरण बिन्दुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्म सम्बन्ध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं। तीसरे सोपान में आत्मबोध और तत्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष है।
साधना में बैठना अनिवार्य था। बैठने से पूर्व स्नान और धुले वस्त्रों को पहनने जैसी बातों पर भी ध्यान देना आवश्यक था।
साधना सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम् साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती हैं आज्ञाचक्र में ज्योति अवतरण बिन्दुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्म सम्बन्ध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं। तीसरे सोपान में आत्मबोध और तत्वबोध की साधना ऋजुयोग के दो पक्ष है। लययोग से आनन्दमय कोश -बिन्दुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमय कोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमय कोश की जागृति होती है।
साधना का उपक्रम किया गया है।
साधनाओं की क्रिया-प्रतिक्रिया का परीक्षण ही होगा। भारतीय योग साधनाओं की 84 शाखाएँ है॥ 84 योगासन ही नहीं 84 योग भी हैं। इनके जो महात्म्य बताए गए हैं उनमें से कितनी अंश अभी भी सही सिद्ध होता है यह देखना है। प्रयत्नों के असफल होने का कारण क्या है? क्या उन विधानों में परिस्थितियों के अनुरूप यत्किंचित् हेर-फेर हो सकता है ?
साधना का क्रम भी अखण्डित रहा। आँवलखेड़ा की छोटी-सी कोठरी में प्रज्वलित किया गया दीपक, अपने मथुरा निवास की अवधि पुरी करके अब तक शाँतिकुँज में प्रतिष्ठित हो चुका था। इस बीच वन्दनीया माता जी के भी 24 महापुरश्चरण इसी के आलोक के समक्ष सम्पन्न हो चुके थे।
साधना सत्रों जिनने भी भागीदारी ली वे आज भी उन चार दिनों की स्मृतियों, अलौकिक अनुभूतियों को अभी तक भूले नहीं हैं । प्रायः सभी का सर्वमान्य अनुभव यही है कि इन दिनों चौबीसों घण्टे पूरे शरीर में विद्युत प्रवाह-सा दौड़ता रहता था । ऐसा लगता था -मानो गुरुदेव अस्तित्व में नए प्राण का संचार कर रहे है। प्राणों के इस प्रवाह को जिसने भी धारण किया वे अविच्छिन्न रूप से सदा सर्वदा के लिए उनके अपने हो गए । यही नहीं अपने में ऐसे साहस, मनोबल, प्राण, बल अनुभव करने लगे कि युग निर्माण मिशन की बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी को आसानी से उठाते चले गए ।
साधना आरण्यक के रूप में प्रस्तुत हुआ था। योजना यह बनी थी-कि ब्रह्मवर्चस में साधकगण रहेंगे। पू. गुरुदेव के द्वारा बतायी गई एक सुनिश्चित साधना पद्धति का निष्ठापूर्वक अनुसरण करेंगे। साधना के लिए इन साधकों को नाव से गंगा की जलधारा पार करके दिनभर टापुओं में रहने और शाम को पुनः वापस ब्रह्मवर्चस लाने की विधि-व्यवस्था भी सोची गयी थी।
साधना विज्ञान के अंतर्गत कितनी ही शाखा-प्रशाखाएं हैं। संसार के अन्यान्य साधना-सम्प्रदायों में अपने-अपने ढंग की साधना प्रचलित हैं। अपने शोध प्रयास किसी देश या सम्प्रदाय की सीमा बन्धन में बँधे हुए नहीं हैं। इसलिए अपनी शोध का क्षेत्र विश्वव्यापी साधनाओं की क्रिया-प्रतिक्रिया का परीक्षण ही होगा। भारतीय योग साधनाओं की 84 शाखाएँ है॥ 84 योगासन ही नहीं 84 योग भी हैं।
साधना, जीवन साधना सत्र जैसे अनगिन सत्रों से अब तक यहाँ साधक लाभान्वित होते रहे हैं।
साधना और लोकसेवा इन दोहरे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चलाए गए इन सत्रों की अवधि एक मास थी । आज जहाँ गायत्री मंदिर है, उसके ठीक सामने उन दिनों टिनशेड हुआ करता था । इसी टिन शेड में वर्ष 1974 की बसन्त पंचमी के अवसर पर वानप्रस्थ कक्षाओं का शुभारम्भ करते हुए पू. गुरुदेव ने कहा था -” प्राचीनकाल के संन्यास को भी अब वानप्रस्थ में ही विलीन होना पड़ेगा । उस वेष में अवाँछनीय व्यक्ति इतने अधिक घुस पड़े है कि संचित प्रतिष्ठा को समाप्त प्राय करके रख दिया । फिर इन दिनों संन्यास के साथ अकर्मण्यता, मुफ्तखोरी, से सेवा धर्म से विमुखता और आडम्बर अंधविश्वासों की विस्तार विडम्बना ने स्थिति सर्वथा बदल दी है ।
साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है। कुछ अन्य लोग भी ऐसे हो सकते हैं जो पत्रिका के नियमित सदस्य नहीं हैं।
साधनाक्रम इस वर्ष के बसन्त पर्व यानि 5 फरवरी सन् 76 गुरुवर से शुरू किया गया। इसकी अवधि प्रतिदिन 45 मिनट की निर्धारित की गई। ये 45 मिनट सूर्योदय के पूर्व के 45 मिनट थे। समय की नियमितता अनिवार्य थी। उसके लिए सभी से अनुरोध किया गया था कि सूर्योदय का समय प्रायः हर महीने बदलता रहता है।
साधनाक्रम में पाँच योग साधनाएँ जुड़ी गुँथी है। इन्हें पाँच कोषों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना भी कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना सोपान लययोग है। दूसरे सोपान में सोऽहम् साधना प्राणयोग के अंतर्गत आती हैं आज्ञाचक्र में ज्योति अवतरण बिन्दुयोग है। नादयोग के दो प्रयोग ब्रह्म सम्बन्ध और मनोनिग्रह का प्रयोजन दो बार में पूरा करते हैं।
साधना के बाद उनका यहाँ आना तो नहीं हुआ पर वहीं अपने निवास पर गोष्ठी, चर्चा परामर्श द्वारा क्रिया -कलापों को संचालित करते रहते थे।उनके महाप्रयाण के बाद यह दायित्व अखण्ड ज्योति के सम्पादक के कन्धों पर आ पड़ा है। जिसे उनके सान्निध्य में ब्रह्मवर्चस की स्थापना के समय से ही रहने, प्रशिक्षण पाने का सुयोग प्राप्त हुआ है। आज इस स्थापना को 17 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन सत्रह वर्षों में लगातार प्रयोग-परीक्षणों का क्रम अबाध गति से चलता रहा है।
साधना और तप ने एक विवेकानंद और समकक्ष तेरह से अधिक गुरुभाई तैयार कर आध्यात्मिक ऊर्जा की दृष्टि से एक विशिष्ट निर्माण कर दिखाया । इसी तरह पाण्डिचेरी स्थित अरविंद आश्रम तथा सम्प्रति बन रहे ओरोविल देखने पर वहाँ एक जाग्रत चेतना का आभास मिलता है । महापुरुषों की तप साधना से अनुप्राणित इन निर्माणों के माध्यम से एक प्रेरणा स्थली, एक तीर्थ चेतना का परिचय मिलता है ।
साधना के क्रम को सुचारु रूप से चलाया जाय।
साधना की अपनी खासियत थी । यही कारण है कि इन दिनों हर साधक को प्रायः मौन रहना पड़ता । उसे गुरुदेव के अतिरिक्त किसी अन्य से बातचीत करने की मनाही थी । साधकों को घर-गृहस्थी और काम -धन्धों की चिन्ता करने से मन को मुक्त रखने तथा अनावश्यक चर्चाएँ तथा हलचलें न करने के लिए कहा जाता । ताकि आत्मचिंतन आत्म -सुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्म-विकास की दृष्टि से बनाया गया कार्यक्रम सुचारु रूप से चल सकें ।
साधना सत्र, कल्पसाधना सत्र, चांद्रायण शिविर, संजीवनी, साधना, जीवन साधना सत्र जैसे अनगिन सत्रों से अब तक यहाँ साधक लाभान्वित होते रहे हैं।
साधनाक्रम में पाँच योगों का अद्भुत रीति से समायोजन किया गया था ।(1) लययोग (2) बिन्दुयोग (3) प्राणयोग (4) ऋजुयोग (5) नादयोग । इस एक ही साधनाक्रम में पाँच योग साधनाएँ जुड़ी गुँथी है। इन्हें पाँच कोषों के अनावरण का प्रयोजन पूरा करने वाली पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना भी कह सकते हैं। प्रातः खेचरी मुद्रा वाला प्रथम साधना सोपान लययोग है।
साधना की भी पृष्ठभूमि तैयार की, जिसे युग सन्धि महापुरश्चरण नाम दिया गया। जो अपनी परिणति उज्ज्वल भविष्य के रूप में करने जा रही है।
साधना का तृतीय सोपान (12) 5 से 5.30 शौच आदि (13 ) 5.30 से 6 में भोजन (14 ) 6 से 7 टहलना (15) 7 से 8 भाव संगीत (15) 8 से 4 तक शयन ।
साधना यज्ञ की पूर्णाहुति सूर्यार्घ के रूप में इस भाव के साथ सम्पन्न करने का निर्देश था, जैसे अग्निहोत्र की पूर्णाहुति घृत की धार वसोधारा चढ़ाते हुए की जाती है।
साधना आरण्यक ने प्रयोगशाला का रूप ले लिया। यद्यपि इसकी शोध का स्वरूप प्रचलित अनुसंधान-अन्वेषण की पद्धतियों से अलग था। इस प्रयोगशाला में किए जाने वाले प्रयोग अपनी तरह के अनूठे हैं।
साधना के समय खोजे। उन्हीं के शब्दों में-
साधना इसके अतिरिक्त थी जो प्रातःकाल तीन बजे से आरंभ हो जाती थी । प्रातः उठकर वे अखण्ड दीपक के सामने भजन कर रही बालिका को देखकर आती, अपना दैनंदिन कार्य समाप्त कर स्वयं भी जप में बैठ जाती थी । आरती होने तक सब बच्चों को नहला-धुलाकर तैयार करके वे उन्हें धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनने का प्रशिक्षण दे रही थी । बीच-बीच में मनोरंजन हेतु कुछ ऐसी मनोरंजक अंताक्षरियों, खेल-चर्चाओं अथवा बच्चों द्वारा खेले जाने वाले खेलों का समावेश उनका मन बहलाने के लिए करती । इस बीच गायत्री मंदिर, जो शाँतिकुँज का सबसे पहला मंदिर है जहाँ पर अखण्ड दीपक स्थित है, में जन निरंतर चलता रहता था ।
साधना के दिनों में एक और महान प्रयोग सम्पन्न हुआ- विश्व कुण्डलिनी का जागरण- यह जागरण पुरातन काल में विश्वामित्र के द्वारा सम्पन्न हुआ था, उस बार भी विश्व-वसुधा का कायाकल्प हुआ था इस बार भी वैसा ही होने जा रहा है। इसके प्रभाव और परिणामों को बताते हुए उन्होंने जनवरी 1987 की अखण्ड ज्योति में लिखा-महाप्रज्ञा की जो इन तीन वर्षों में कुण्डलिनी जाग्रत हुई है, उसकी ऊर्जा का उदय प्रथम इस देश में होगा। पीछे क्रमशः वह समस्त विश्व में फैलता जाएगा। उसके प्रभाव से होता हुआ परिवर्तन विभिन्न क्षेत्रों में, विभिन्न रूपों में दृष्टिगोचर होगा। यह सम्भावना नहीं, सुनिश्चितता है।
साधना के रूप में एक लाख साधकों द्वारा निष्ठापूर्वक अपनायी गई। नैष्ठिक साधकों में से प्रायः सभी ने वैयक्तिक एवं सामाजिक स्तर पर अनेक सफलताएँ अर्जित कीं, अनगिनत दोषों से छुटकारा पाया। सबसे भारी लाभ तो आत्मिक उत्कर्ष का रहा, जो उन्हें अपनी मार्गदर्शक सत्ता एवं हिमालय से आती शक्तिधाराओं से जुड़ने, एकात्म होने से मिला। गूँगे के गुड़ की भाँति इस स्वाद को आज भी अनेक रसासिक्त होकर अनुभव करते हैं।
साधना का सुयोग, समर्थ सत्ता का भावपूर्ण स्पर्श, युग-सन्धि की वर्तमान क्षणों के लिए प्रभावी कार्य-नीति का प्रशिक्षण एक साथ प्राप्त हो सकेंगे। ऊर्जा अनुदान के इन सत्रों में आने के इच्छुक व्यक्तियों को पूर्व सूचना भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। असमय और अस्त-व्यस्त मनः स्थिति लेकर आने पर प्रभावी प्रशिक्षण एवं साधनात्मक मनोवृत्ति का निर्माण दोनों ही नहीं बन पड़ते हैं। इसलिए हम अस्त-व्यस्तता का जितना दूर किया जाये उतना ही अच्छा। परिजन इन सत्रों को रजत जयन्ती वर्ष का विशिष्ट अनुदान मानें ।
साधना के लिए इन साधकों को नाव से गंगा की जलधारा पार करके दिनभर टापुओं में रहने और शाम को पुनः वापस ब्रह्मवर्चस लाने की विधि-व्यवस्था भी सोची गयी थी।
साधना सत्रों का क्रम अनवरत चलता रहा। सूक्ष्मीकरण साधना की पूर्णाहुति देशव्यापी 108 कुण्डीय-महायज्ञों राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों के रूप में की जाने लगी। इन महायज्ञों की घोषणा पूज्यवर ने अपनी विशेष साधना में विराम के अवसर पर की।
साधना के विषय में निरंतर ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा है, उसका ही नाम शाँतिकुँज है। यहाँ आकर मैं बार-बार स्फूर्ति एवं चेतना से ओत-प्रोत हो जाता हूँ। यहाँ मुझे व्यक्ति और उसके कर्तव्य का बोध हाता है। मानवीय हितों पर किया जा रहा यहाँ का श्रेष्ठ कार्य विश्व इतिहास में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा। मैं जीवन को कृतार्थ समझूँगा यदि पूज्यवर के मार्गदर्शन के अनुसार कुछ कर सकूँगा।
साधना भी जानते थे।
साधना में जो बीज गया, वानप्रस्थ सत्रों में उसी का अंकुरण होने लगा । यह चिर प्राचीन परम्परा का नवोन्मेष था । इसी के बलबूते भारत किसी समय उन्नति के शिखर पर था । यह पुण्यभूमि स्वर्गादपि गरीयसी मानी जाती थी । समस्त विश्व पर उसका चक्रवर्ती साँस्कृतिक शासन था ।
साधना के प्रभावी प्रयोग के साथ इसमें गायत्री महामंत्र के विलक्षण प्रयोग बताए जाते हैं। जिन दिनों राम-रावण युद्ध अपनी चरम सीमा पर था। रावण अपनी विनाशकारी शक्तियों के प्रयोग में जी-जान से लगा हुआ था। उन्हीं दिनों महर्षि अगस्त्य एवं महर्षि विश्वामित्र के आश्रम की गतिविधियाँ भी पूरे जोर-शोर पर थी। ये दोनों ऋषि अपनी विलक्षण तपशक्ति से रीछ-वानरों का प्रतिपल ऊर्जा अनुदान बाँट रहे थे।
साधना अनुदान के वितरण ममत्व भरे मार्गदर्शन एवं कौशल प्रशिक्षण का क्रम चलता रहेगा।
साधनाक्रम पर मन एकाग्र रखा जा सकें ।
साधना में भागीदारी चिंतन, मनन, स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना यह त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था, जो तीन दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वन्दनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। उन्होंने पू. गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के प्रसार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया है। इसके पश्चात् वन्दनीया माताजी का सारगर्भित प्रवचन हुआ। जिसमें उन्होंने उपासना, साधना, आराधना के मर्म को पूज्यवर के जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझाया।
साधनाक्रम में, इन साधना सत्रों जिनने भी भागीदारी ली वे आज भी उन चार दिनों की स्मृतियों, अलौकिक अनुभूतियों को अभी तक भूले नहीं हैं । प्रायः सभी का सर्वमान्य अनुभव यही है कि इन दिनों चौबीसों घण्टे पूरे शरीर में विद्युत प्रवाह-सा दौड़ता रहता था । ऐसा लगता था -मानो गुरुदेव अस्तित्व में नए प्राण का संचार कर रहे है। प्राणों के इस प्रवाह को जिसने भी धारण किया वे अविच्छिन्न रूप से सदा सर्वदा के लिए उनके अपने हो गए । यही नहीं अपने में ऐसे साहस, मनोबल, प्राण, बल अनुभव करने लगे कि युग निर्माण मिशन की बड़ी से बड़ी जिम्मेदारी को आसानी से उठाते चले गए ।
साधना से ब्रह्मांड के विज्ञानमय कोष को जाग्रत किया। जिसके जागरण से बौद्धिक क्षमताओं से सम्पन्न मानव देव मानव बनने लायक हो सकेगा। गुरुदेव ने महर्षि के अधूरे कार्य को पूरा करते हुए इन्हीं दिनों ब्रह्मांड के आनन्दमय कोष का जागरण मनुष्य में दैवी भावनाओं-सम्वेदनाओं की सृष्टि करने वाला होगा।
साधना सत्रों को वर्तमान रजत जयन्ती वर्ष में आयोजित करने का क्रम चलाया है। अपने प्रयोजन एवं प्रक्रिया के अनुरूप इनका नाम भी ऊर्जा अनुदान सत्र रखा गया है। युग सन्धि के इन क्षणों में असुरता अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है। उसे भी महाकाल की सुनिश्चित विधान का पता है पर जिसका अस्तित्व ही समूल नष्ट होने वाला हो, वह भला अपना अन्तिम जार लगाने में क्यों कोर-कसर उठा रखेगा। आसुरी शक्तियों के भी यही हाल है।
साधनात्मक मनोवृत्ति का निर्माण दोनों ही नहीं बन पड़ते हैं। इसलिए हम अस्त-व्यस्तता का जितना दूर किया जाये उतना ही अच्छा। परिजन इन सत्रों को रजत जयन्ती वर्ष का विशिष्ट अनुदान मानें । इनका स्वरूप भले उतना कठोर व बनाया गया हो, पर इनसे होने वाले लाभों को चमत्कारी और आश्चर्यचकित करने वाला ही कहा जाएगा। समर्थ शक्ति उद्गम से ऊर्जा का अनुदान पाने वाले आत्मकल्याण और लोककल्याण के लिए कुछ ऐसा कर सकेंगे जो युगों तक भुलाया न जा सके।
साधना का अनिवार्य अंग था। इसके लिए पाँच मिनट पर्याप्त माने गए थे। इस प्रक्रिया के लिए जीभ का उलट कर तालू से लगाएँ। ध्यान करें ब्रह्मलोक में, मस्तिष्क में भरा पड़ा है। जीवसत्ता की प्रतीक जिह्वा को ब्रह्मसत्ता के प्रतिनिधि तालू से स्पर्श कराया जा रहा है।
साधना ऋजुयोग के दो पक्ष है। लययोग से आनन्दमय कोश -बिन्दुयोग से अन्नमयकोश, प्राणयोग से प्राणमय कोश, नादयोग से मनोमयकोश और ऋजुयोग से विज्ञानमय कोश की जागृति होती है।
साधना एवं विशिष्ट लेखनी के साथ ऊपर एक छोटी खुली छत के साथ बना दिया गया एवं जब तक गुरुदेव आये तब तक ऊपर रहने, उस स्थान को तप -ऊर्जा से अनुप्राणित करने हेतु देवी का स्वरूप समझे जाने वाली 24 बालिकाओं को रहने की व्यवस्था यहीं पर बना दी गई । यहीं पर रहकर प. पूज्य गुरुदेव को न केवल देव कन्याओं का वरन् प्राप्त ऊर्जा सम्पन्न कार्यकर्त्ताओं का प्राण प्रत्यावर्तन एवं महत्वपूर्ण शिक्षण सम्पन्न करना था ।
साधना वर्ष होगा। इसमें एक लाख निष्ठावानों को साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग देने का निश्चय किया है। यह संख्या देखने भर में बड़ी है पर वस्तुतः अपने लिए बहुत छोटी है। लगभग इतने ही अखण्ड ज्योति पत्रिका के नियमित सदस्य हैं। उन्हें तथा उनके परिवार वालों को सहज ही इसमें उत्सुकता हो सकती है।
साधना क्रमों का समावेश था । इसके अतिरिक्त आत्मशोधन की प्रक्रिया ही अमूल्य थी, जिसे साधक गुरुदेव के सान्निध्य में पूरा करते । यह प्रक्रिया विगत जीवन के पापों का स्मरण करने और बताने प्रायश्चित करने ओर भविष्य में पुनः उन भूलों को न दुहराने का निश्चय करने के रूप में सम्पन्न होते । यह प्रत्यावर्तन का प्रथम और आवश्यक चरण था । पहले दिन जब साधक पू.गुरुदेव से मिलने जाते, तो वह उनसे अकेले में अपनी सभी ग्रन्थियों को खोलने की बात कहते ।
साधना अब तक कभी कदाचित् ही हुई हो। एक दिन में 6 करोड़ गायत्री जप होने का अर्थ है 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों का प्रतिदिन सम्पन्न होना।
साधना की आवश्यकता है उसकी का मार्गदर्शन प्राप्त कर वे जून 72 में लौटेंगे एवं प्रत्यावर्तन का क्रम आरम्भ करेंगे । गुरुदेव द्वारा मिले संकेतों से प्रतीत होता है कि वे आत्मबल संग्रह करने और आत्म -कल्याण के साथ लोकमंगल के इच्छुक व्यक्तियों की संख्या गिनती के अनुपात में नहीं, गुणों के अनुपात में बढ़ाना चाहते थे । इसी कार्य के लिए समस्त ऋषि परम्पराओं का बीजारोपण शाँतिकुँज में करके नवनिर्माण की पृष्ठभूमि विनिर्मित करना चाहते थे । ऋषि परम्परा, जो कभी सतयुग की मूल आधार थी, का क्रियान्वयन कैसे हो, इसके लिये वे शाँतिकुँज को एक प्रखर ऊर्जा सम्पन्न गायत्री तीर्थ का रूप देना चाहते थे यह सारी रूपरेखा व वन्द. माताजी एवं उनके सहायकों के साथ फरवरी 72 के प्रथम सप्ताह में संक्षिप्त प्रवास के दौरान बन गई । प. पूज्य गुरुदेव घोषणा कर गये कि शाँतिकुँज अंततः शक्ति केन्द्र के रूप में परिणित होगा ।
साधनामय जीवन की एक-मात्र सहयोगिनी वन्दनीया माताजी उनके पास रहती थीं। लेखन सम्बन्धी कार्यों में सहयोग के लिए दिन में कुछ समय इस पत्रिका के वर्तमान सम्पादक का भी उनके पास रहना होता था। उन दिनों उनकी दिनचर्या हर-हमेशा की अपेक्षा कुछ अधिक ही अनुशासित हो गयी थी। दिन की स्थूल गतिविधियों में लेख नहीं दिखाई देता था। भोजन का क्रम प्रायः न के बराबर ही था।
साधना चल रही थी । विश्वामित्र की तपस्थली में फिर से एक बार नए प्राणों का संचार हो रहा था । उसमें नई ऊर्जा भरी जा रही थी । इसी बीच गुरुदेव हिमालय से वापस आ गए । इस बार भी वह देवात्मा हिमालय से तप-प्राण बटोर कर लौटे थे ।
साधना स्थली भर थी पर, अब जबकि पूज्यवर एवं माताजी सूक्ष्म शरीरधारी हो गए- यह शाँतिकुँज उनका स्थूल शरीर बन चुका है। इसके द्वारा वहीं भूमिका सम्पादित होनी है जो कभी गुरुदेव-माताजी का यह निर्माण अब स्वयं निर्माता बन गया है। इस तथ्य को बनाने हुए पूज्यवर के शब्द हैं- “ अभी हम लोगों के शरीर शाँतिकुँज में रहते हैं। पीछे भी हम इस परिसर के कण-कण में समाए हुए रहेंगे इसकी अनुभूति निवासियों और आम...... का समान रूप से होती रहेगी। आगे कि दिनों में शाँतिकुँज ही हमारा स्थूल शरीर होगा।
साधना के साथ जुड़ा हुआ गंगावतरण कह सकते हैं। अभी वह कल्पना के गर्भ में है। इन दिनों उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली सम्भावना और प्रतिक्रिया का सुखद अनुमान ही लगाया जा सकता है पर भविष्य में जब व मूर्तरूप में सामने होगी तो प्रतीत होगा कि मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के संदर्भ में जो कहा और किया जा रहा है वह अनर्गल नहीं है।
साधना के वे भागीदार जो
साधना ही नहीं जुड़ी, अपितु परोक्ष रूप से हिमालय वासी ऋषि सत्ताओं द्वारा निरंतर किए जाने वाले तप की ऊर्जा का भी समावेश है।
साधना करने वाले साधकों पर निरंतर प्रयोग करने के बाद उन्हें श्रेष्ठ समर्पित साधक के रूप में, जिन्हें वास्तव में ज्ञान अनुभूतियाँ हुई, हजारों की संख्या में तैयार कर कार्यक्षेत्र में भेजने एवं जन-जन के लिए सुलभ बनाने का कार्य कर दिखाया । शोध वही सफल होती है जो धरातल तक कार्य करने वाले व्यक्ति -व्यक्ति तक पहुँचे । व्यक्ति का भावनात्मक कायाकल्प करके दिखा दे, परिवार में संस्कारों को इस तरह गूँथ दे कि वे उनके दैनंदिन जीवन का अंग बन जाएं। यही हुआ और 80 हजार से अधिक प्रयोग -परीक्षण के उपराँत इन ऊर्जा अनुदानों को पाने के लिए शाँतिकुँज आते हैं एवं परीक्षण कराते हैं, अनुदान पाते हैं,लाभान्वित होकर जाते हैं । यही युग ऋषि चाहते थे ।
साधना का लाभ सारे देश को मिलेगा। “ हुआ भी कुछ ऐसा ही-1977 में सारे देश ने राहत की साँस ली। हवाएँ मुक्त हुई फिजाएँ बदली हालाँकि जिन्हें अवसर दिया गया था वे अपनी कुप्रवृत्तियों के कारण उसे बरकरार न रख सके। परन्तु इस बीच जिन्हें सबक सिखाया गया था वे अपनी भूल सुधार चुके थे। साधना के इस सामूहिक पराक्रम ने उस विशेष सामूहिक साधना की भी पृष्ठभूमि तैयार की, जिसे युग सन्धि महापुरश्चरण नाम दिया गया।
साधना के इस सामूहिक पराक्रम ने उस विशेष सामूहिक साधना की भी पृष्ठभूमि तैयार की, जिसे युग सन्धि महापुरश्चरण नाम दिया गया। जो अपनी परिणति उज्ज्वल भविष्य के रूप में करने जा रही है।
साधना कक्ष भी इन दिनों विशेष बन गया था। इसे स्पष्ट करते हुए उनके शब्द हैं-”जिस आवास-स्थली में, कोठरी में रहा जा रहा है, जहाँ तक एक दो का ही प्रवेश वाँछित समझा गया है, उसे अभिमंत्रित-कीलित किया गया है। इसमें जो प्रयोग चल रहे हैं वे अद्भुत हैं। कुछ ऐसे हैं, जो रात्रि को करने पड़ते हैं। कुछ दिन में करने के हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-March
साधना के निमित्त जो सोचा या सुना, समझा जाय उसे व्यक्तित्व की पवित्रता, प्रखरता बढ़ाने के रूप में कार्यान्वित किया जाना चाहिये ।इन निमित्त जन मानस के परिष्कार की प्रज्ञा विस्तार साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है। इस साधना के निमित्त जो सोचा या सुना, समझा जाय उसे व्यक्तित्व की पवित्रता, प्रखरता बढ़ाने के रूप में कार्यान्वित किया जाना चाहिये। इन निमित्त जन मानस के परिष्कार की प्रज्ञा विस्तार साधना का महत्व सर्वोपरि है।
साधना का परम पुरुषार्थ करना होता है। चिन्तन एवं स्वभाव में उत्कृष्टता भर लेने को सुसंस्कारिता कहते हैं और व्यवहार में, आदतों में शालीनता के समावेश का सभ्यता कहा जाता है। सभ्यता और सुसंस्कारिता का समन्वय ही व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाता है। व्यक्तित्व संपन्न ही देव मानव कहे जाते हैं। वे स्वर्गीय वातावरण में रहते और दूसरों के लिये स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।
साधना का उच्चस्तर जो नम्रता, ईमानदारी, परिश्रमशीलता, जिज्ञासा एवं शारीरिक मानसिक स्फूर्ति के रूप में दिखाई देता हो।
साधना करने वाले साधक। अपेक्षित उच्चस्तरीय मार्गदर्शन के अभाव में आत्मघाती प्रयोग करने की अपेक्षा बल सम्वर्धन की-आस्था सम्वर्धन की एवं स्वयं के आध्यात्मिक कायाकल्प की अति सौम्य चौबीस हजार मंत्र जप वाली नौ दिन की अनुष्ठान साधना कर लेना ही ठीक है।
साधना द्वारा आत्मबल का संचय इन नौ दिनों में बड़ी सरलता से हो सकता है। ऋग्वेद के अदिति सूक्त में शक्ति का मातृभाव वाला स्वरूप देखा जाता है, जबकि ऊषा सूक्त में कुमारी भाव, सूर्यादेवी सूक्त में कुमारी भाव, देवी सूक्त एवं वाक्सूक्त में शुद्ध शक्तिभाव के चिन्ह मिलते हैं। ऋग्वेद में भी पृथ्वी की स्तुति गायी गयी है एवं उन्हें पिता द्यौ के साथ वर्णित किया गया है। “समुद्र वसने देवि पर्व स्तन मण्डले। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्श क्षमस्वमे” अर्थात् समुद्र ही जिनके वस्त्र हों, पर्वत जिनके स्तन हों, ऐसी विष्णु पत्नी पृथ्वी देवी को पैर से स्पर्श करने की त्रुटि हेतु मैं क्षमा चाहता हूँ।
साधना से ही संभव हो सकता है। इसके बल पर दिव्य चेतना प्रकट हुआ करती है जो बुद्धि से परे की स्थिति है। यही प्रज्ञा है।
साधनाओं द्वारा हो अथवा पूर्व जन्मों के संस्कारों के परिणाम स्वरूप, जब व्यक्ति का आत्मिक स्तर उठ जाता है कि उसका मन आत्मा की सनिनधि में पहुँच जाय, तो वह इस स्तर की अनुभूतियाँ स्वप्नों के माध्यम से प्राप्त करता है। उपचेतन मन ऐसे स्वप्न संकेत ही पकड़ता है जिनसे किसी का भला होता हो अथवा अपना पवित्र साध्य भी पवित्र साधनों से सधता हो। स्वप्नों के माध्यम से आज तक न तो किसी को अनीति अपनाने अथवा अवाँछनीय लाभ उठाने के संकेत मिले हैं अथवा न किसी को पहुँ की ही प्रेरणा मिली है। ऐसे उदाहरण अवश्य मिलते हैं जिनमें व्यक्ति के अपने सौभाग्य उदय में आ रहे अवरोधों को हटाने की प्रेरणा मिली हो।
साधना को इसीलिए महत्व दिया गया है। शारीरिक-मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए, गन्दगी की सफाई के लिए उपवास का अपना अलग महत्व है।
साधना नहीं सम्पन्न हो सकेगी।
साधना के परिणाम भी सामाजिक सुव्यवस्थित और व्यक्तिगत आत्म सन्तोष एवं आनन्द के रूप में प्राप्त होते हैं। वह अनुभूति आन्तरिक है- लेकिन जिनकी दृष्टि बाहरी परिणामों पर ही टिकी रहती है वे सेवा को घाटे का सौदा समझते हैं।
साधना कर लेना ही ठीक है।
साधना विधानों में वह सारी विशेषताएं भर दी हैं जो कि आज की परिस्थितियों के अनुसार अभीष्ट हैं।
साधना को इसलिए महत्व दिया जाता रहा है।
साधना माना जायेगा।
साधना ही होगी। हार व्यक्ति वैचारिक दृष्टि से अपने को स्वतंत्र अनुभव करेगा। लोगों की आक्रामक एवं अपराधी प्रवृत्तियों को देखते हुए तृतीय विश्व युद्ध तो इस सदी के अंतिम वर्षों में हो जाना चाहिए, पर दूसरी ओर परमार्थ परायण शक्तियों की सक्रियता होने लगेंगी, साथ ही लोगों की अभिरुचियों में विशिष्ट प्रकार का परिवर्तन भी आयेगा। वे शहरों के आकर्षक एवं अप्राकृतिक जीवन की ओर भागने की अपेक्षा गाँव के सादगी भरे जीवन को ही अधिक पसंद करेंगे, फलस्वरूप जगगी। यू. एस. नेवल औब्जरवेटरी के विशेषज्ञ डा. गैर्नोट विंकलर का भी कहना है कि इन दिनों पृथ्वी की परिभ्रमण गति के समय में बड़ा भारी अंतर आया है, जिसे देखकर यह कहा जा सकता है कि इस सदी के अंत तक कुछ विशिष्ट प्रकार का परिवर्तन होना सुनिश्चित है।
साधना के लिए उपासना की तरह ही आत्म चिन्तन के लिए न्यूनतम पन्द्रह मिनट का समय निश्चित रहना चाहिए। आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार आत्म निर्माण और आत्म-परिष्कार के सम्बन्ध में अपनी जाँच पड़ताल कड़ाई के साथ करनी चाहिए। मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन निर्वाह में कहाँ त्रुटि रही रही है। अशोभनीय, व्यर्थ, निरर्थक और अनर्थमूलक चिंतन और व्यवहार कब किस प्रकार बन पड़ता है और उन आदतों को कैसे सुधारा जाना चाहिए। इस ऊहापोह में आत्म-समीक्षा और आत्म-सुधार की प्रक्रिया बन पड़ती है।
साधना कर सका वह सुनिश्चित रूप से कृत-कृत्य होकर रहा है।
साधना ही नवरात्रि हेतु सर्वश्रेष्ठ बतायी है। गायत्री परम सतोगुणी,शरीर के लिए भी व आत्मा के लिए भी दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्म कल्याण का मार्ग है। गायत्री साधकों को यही साधना इन नौ दिनों में करनी चाहिए। असमंजस मन में हो सकता है कि नवरात्रि को दुर्गा उपासना से जोड़ कर रखा गया है, फिर गायत्री अनुष्ठान वस्तुतः दुर्गा महाकाली भी गायत्री महाशक्ति का एक रूप है।
साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है। इस साधना के फलस्वरूप मिलने वाली सिद्धियाँ हाथों-हाथ मिलती हैं उसके लिये तनिक भी ठहरना नहीं पड़ता।
साधनाएँ विशेष रूप से इन्हीं दिनों सम्पन्न की जाती हैं। मध्यकाल में तंत्र प्रयोजनों की बहुत मान्यता थी इसलिए दैवी आराधना के विभिन्न उपचारों के लिए इन्हीं दिनों वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से विशेष क्रिया-कृत्य किये जाते थे। अब वह समय नहीं रहा, न ही सौम्य स्तर की तंत्र साधना करने वाले साधक। अपेक्षित उच्चस्तरीय मार्गदर्शन के अभाव में आत्मघाती प्रयोग करने की अपेक्षा बल सम्वर्धन की-आस्था सम्वर्धन की एवं स्वयं के आध्यात्मिक कायाकल्प की अति सौम्य चौबीस हजार मंत्र जप वाली नौ दिन की अनुष्ठान साधना कर लेना ही ठीक है।
साधना-स्वाध्याय-संयम-सेवा, यही है आत्मोत्कर्ष के चार चरण। इनमें एक भी ऐसा नहीं है, जिसे छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा किया जा सके। अस्तु मनन और चिन्तन द्वारा इन्हें किस प्रकार कितनी मात्रा में अपनी दिनचर्या में सम्मिलित रखा गया, इस पर अति गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना चाहिए। यदि इससे भावी जीवन की कोई परिष्कृत रूपरेखा बन सकी और उसे व्यवहार में उतारने का साहस जग सका तो समझना चाहिए कि उतने ही परिमाण में गायत्री माता का प्रसाद तत्काल मिल गया। यह सुनिश्चित मानना चाहिए कि श्रेष्ठता भरी गतिविधियाँ अपनाते हुए ही भगवान की शरण में पहुँच सकना और उनका अनुग्रह प्राप्त करना सम्भव हो सकता है।
साधना द्वारा आत्मबल उपार्जन हेतु न्यूनतम पाँच चौबीस चौबीस हजार के अथवा दो या तीन सवा लक्ष के गायत्री अनुष्ठान करने की प्रेरणा दी है। उसका शुभारम्भ यदि अभी तक न हुआ हो तो इस नवरात्रि से आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। यह नवरात्रि सभी के लिए उज्ज्वल सम्भावनाएँ लेकर आए, यही शांतिकुंज परिवार की मंगल कामनाएँ हैं।
साधना क्षेत्र में आत्मिक प्रगति की कितनी मंजिल पार कर ली गयी है, इसका पता भी स्वप्नों से लगाया जा सकता है। पुराणों और आर्ष ग्रन्थों में इस प्रकार के कई स्वप्नों का उल्लेख आता है, जिनसे यह पता चलता है कि साधना क्षेत्र में हमारी प्रगति किस गति से हो रही है। स्वप्नों के संकेत यदि समझना सम्भव हो सके, तो न केवल आत्मिक स्थिति का स्तर मालूम किया जा सकता है, वरन् उसके माध्यम से सूक्ष्म को समझ पाना तथा उसके साथ ताल-मेल बिठाना भी सम्भव हो सकता है। प्रश्नोपनिषद् में महर्षि ने निद्रा को इसीलिए यज्ञ कहा है कि उस अवस्था में चेतना के अन्तर्मुख होने की सम्भावना अधिक रहती है और शरीर के सोते रहने पर भी मन न केवल सूक्ष्म जगत का ज्ञान प्राप्त कर सकता है बल्कि आत्मा को अलौकिक सान्निध्य भी पा सकता है। अन्यथा निद्रा आलस्य प्रमाद की तामसिक वृत्ति भी हो सकती है।
साधना का अभ्यास करते और लोगों से भी कराते थे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि एक अपरिचित व्यक्ति उन्हें अपने पीछे-पीछे आने का संकेत कर रहा है। वे उसके पीछे-पीछे चल पड़े और कंसासनगर में पहुँच गए। फिर वह व्यक्ति उन्हें ऐसे स्थान पर ले गया जो उनके लिए अपरिचित था। वहाँ उसने चार्ल्स के हाथ में एक समाचार पत्र दिया, जिसका पहला अक्षर ‘सू’ ही वे पढ़ पाए थे कि एक के बाद एक अनेक समाचार पत्र उनके हाथों में आते गए।
साधना के दो प्रमुख सूत्र हैं। समय और साधनों का मात्र सदुद्देश्य के लिये उपयोग करना। जीवन की अवधि ईश्वर प्रदत्त है और साधन सम्पदा मनुष्य अर्जित। उच्चस्तरीय दूरदर्शिता की एक ही कसौटी है कि कौन इन दिनों का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सका। कमाना संयोगवश भी हो जाता है पर खर्च में तो बुद्धिमत्ता की अग्नि परीक्षा से गुजरना ही पड़ता है।
साधना एवं संकल्पित अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि की प्रत्येक अहोरात्रि बड़ी महत्वपूर्ण मानी जाती है और उन प्रत्येक क्षणों को साधक अपनी चेतना को परिष्कृत-परिशोधित करने-उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ाने में लगाता है।
साधना का अपने कमरों में आत्मदेव की साधना, चिन्तन, मनन का क्रम चलेगा। इसी अवधि में नौ दिनों में से कुछ दिन वे ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान भी परीक्षण हेतु जायेंगे। शाम को आरती के पश्चात् नादयोग साधना के बाद परमपूज्य गुरुदेव का विशेष वीडियो संदेश प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर वे श्रवण कर रात्रि की संध्या-शमन से पूर्व शिथिलीकरण योग निद्रा में प्रवेश कर रात्रि भर होने वाले विशिष्ट प्राण संचार हेतु स्वयं को तैयार करेंगे।
साधना के फलस्वरूप मिलने वाली सिद्धियाँ हाथों-हाथ मिलती हैं उसके लिये तनिक भी ठहरना नहीं पड़ता।
साधना सत्र, जो चैत्र नवरात्रि के रूप में 20 से 28 मार्च तक चलेगा, के बाद एक अप्रैल से नौ दिवसीय शक्ति अनुदान सत्रों की एक शृंखला चले, जिसमें भाग लेने से कोई भी अपने को वंचित न रखें ये विशिष्ट सत्र-नौ-नौ दिन के होंगे, एवं एक अप्रैल से 19 मई तक (कुल 18 सत्र) तक इस प्रकार इस वर्ष का चैत्र नवरात्रि सत्र मिलाकर ये कुल चौबीस सत्र हो जाते हैं। यदि प्रत्येक में एक हजार साधक भी भाग लेते हैं तो नैष्ठिक स्तर के प्राणवान चौबीस हजार साधक जो विशिष्ट आत्मबल सम्पन्न होंगे इस अवधि में नवयुग के अवतरण हेतु तैयार हो सकेंगे। मध्य में पड़ने वाली 20 मई से 30 जून की अवधि पाँच दिवसीय संस्कार-परामर्श सत्र हेतु रखी गयी है। यह सुविधा उन सामान्य लोगों के लिए बनायी गयी है जो अभी तक युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित हो नहीं पाए अथवा अवकाश अधिक न होने से मात्र थोड़ा ही समय निकाल पाते हैं। इस अवधि में परामर्श मात्र ही दिया जा सकेगा किन्तु कुछ विशिष्ट तप−साधना नहीं सम्पन्न हो सकेगी।
साधना का पुरस्कार उसे तत्वज्ञान और प्री भक्ति के रूप में प्राप्त हुआ।
साधना एक संकल्पित साधना है। इसमें ऋषियों ने उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा किया है कि जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में सत्ताईस माला प्रतिदिन करते हुए चौबीस हजार गायत्री महामंत्र का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। श्रेयपथ के पथिकों के लिए ऋषिगणों ने चौबीस सहस्र जप की संकल्पित साधना ही नवरात्रि हेतु सर्वश्रेष्ठ बतायी है। गायत्री परम सतोगुणी,शरीर के लिए भी व आत्मा के लिए भी दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है।
साधना से स्वास्थ्य की नींव तक हिल जाती हैं एवं असाध्य बीमारियाँ तक इस नवरात्रि अनुष्ठान से दूर होती देखी गयी हैं।
साधना मार्ग में आने वाले विघ्न-बाधाओं से उनकी रक्षा हो जाती है। इसमें दिवस विशेष के अधिपति देव उनकी सहायता करते हैं। उदाहरण के लिए सोमवार के स्वामी शंकर बताये गये हैं। परिधान का रंग इसमें मटमैला होना चाहिए। मंगलवार के दिन लाल?
साधना है। आकर्षक आभूषण और महत्वपूर्ण उपकरण बनाने वाली भट्टियों में अनगढ़ को गलाने और उपयोगी ढालने का क्रम चलता है। ऐसा ही आँतरिक कायाकल्प करने का प्रचण्ड पुरुषार्थ मनुष्य को भी करना पड़ता है। इसी को जीवन साधना कहते हैं। ईश्वर उपासना व जीवन साधना परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हैं।
साधना के असाधारण लाभों को समझ नहीं पाते और उसके लिए आगे आने में, सहयोग देने में झिझकते हैं। जब कोई साहसी लोकसेवी उस क्षेत्र में पहल करता है, प्रसन्नतापूर्वक अकेला ही आगे बढ़ता जाता है तो लोगों का भ्रम दूर होता है। सेवा-साधना के लाभ सबको दिखने लगते हैं और लोकसेवी को सम्मान से लेकर सहयोग समर्थन तक दिया जाने लगता है।
साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है। इस साधना के निमित्त जो सोचा या सुना, समझा जाय उसे व्यक्तित्व की पवित्रता, प्रखरता बढ़ाने के रूप में कार्यान्वित किया जाना चाहिये। इन निमित्त जन मानस के परिष्कार की प्रज्ञा विस्तार साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है।
साधनाएँ विशेष रूप से सफल होती हैं। तदनुसार ही चैत्र और आश्विन के शुक्लपक्ष आरम्भ होते ही नौ-नौ दिन के नवरात्रि पर्व मनाए जाते हैं।
साधना का यह आरंभिक चरण है।
साधना-उपासना द्वारा अपनी मलीनताओं तथा विकृतियों का
साधनाएँ इसी प्रकार की होती हैं। इनसे चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं जो किन्हीं अवसर विशेषों के लिए प्रयुक्त की जा सकती है। सर्वसाधारण के लिए जो राजमार्ग युगऋषि ने बताया है उसमें आत्मकल्याण, ईश्वर प्राप्ति और लोकमंगल की सभी सम्भावनाएँ विद्यमान है। आजीविका उपार्जन तथा सामान्य गृहस्थ जीवन यापन करते हुए इस साधना क्रम को अपनाया जा सकता है और श्रेय पथ पर गतिशील रहा जा सकता है। संधिकाल में सूक्ष्म जगत में चल रहे प्राण प्रवाह को विशेष रूप से आकर्षित कर अपने अन्दर के आत्मबल को विशिष्ट उछाल दे देने हेतु पूज्य गुरुदेव ने इन साधना विधानों में वह सारी विशेषताएं भर दी हैं जो कि आज की परिस्थितियों के अनुसार अभीष्ट हैं।
साधना परायण को स्वाध्याय, संयम और सेवा की आवश्यकता अनुभव की जानी चाहिए और उसकी व्यवस्था भी आहार, वस्त्र, विश्राम की तरह ही बननी चाहिये। अब ऐसा सत्संग सम्भव नहीं इसलिये अब वह कार्य प्रेस की वर्तमान सुविधा और श्रेष्ठजनों की दुर्लभता में सत्साहित्य से ही चलाना होता है, संयम को तपश्चर्या कहते हैं। आत्म-अनुशासन भी वही है। इन्द्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम, के चार अनुशासन अपने ऊपर स्थापित किये जायँ तो अपव्यय और अस्तव्यस्तता में नष्ट होने वाली शक्तियां बचायी जा सकती हैं। इन चार छेदों के बन्द कर देने पर ईश्वर प्रदत्त विभूतियों की असाधारण बचत हो सकती है और उस बचत को सत्प्रयोजनों में नियोजित करने वाला कोई भी व्यक्ति, किसी भी दिशा में आश्चर्यजनक प्रगति करने में समर्थ हो सकता है।
साधना कहलाती है। रात्रि का अर्थ ही है-घोर निबिड़ अन्धकार। जो मनुष्य इन नौ द्वारों से-नौ इन्द्रियों के विषयों से जागरुक रहता है, उनमें लिप्त नहीं होता और ओजस् तेजस् और वर्चस् को गँवाता है, वस्तुतः उसे बढ़ाता ही है।
साधना के लाभ सबको दिखने लगते हैं और लोकसेवी को सम्मान से लेकर सहयोग समर्थन तक दिया जाने लगता है।
साधना परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हैं। दोनों के समन्वय से ही परम लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव होती है। रंगाई के पूर्व कपड़ों को धोना आवश्यक है। अकेला बाण ही लक्ष्य नहीं बेधता उसके पीछे तनी हुई कमान का बल भी रहना चाहिए। उगता तो बीज ही है पर उसके लिये उपयुक्त भूमि भी तो चाहिए।
साधना, चिन्तन, मनन का क्रम चलेगा। इसी अवधि में नौ दिनों में से कुछ दिन वे ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान भी परीक्षण हेतु जायेंगे। शाम को आरती के पश्चात् नादयोग साधना के बाद परमपूज्य गुरुदेव का विशेष वीडियो संदेश प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर वे श्रवण कर रात्रि की संध्या-शमन से पूर्व शिथिलीकरण योग निद्रा में प्रवेश कर रात्रि भर होने वाले विशिष्ट प्राण संचार हेतु स्वयं को तैयार करेंगे।
साधना इन नौ दिनों में करनी चाहिए। असमंजस मन में हो सकता है कि नवरात्रि को दुर्गा उपासना से जोड़ कर रखा गया है, फिर गायत्री अनुष्ठान वस्तुतः दुर्गा महाकाली भी गायत्री महाशक्ति का एक रूप है। दुर्गा कहते हैं-दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को नष्ट करने वाली महाशक्ति को। नौ रूपों में माँ दुर्गा की उपासना इसलिए की जाती है कि वह हमारी इन्द्रिय चेतना में समाहित दुर्गुणों को नष्ट कर दे। मनुष्य की पापमयी वृत्तियाँ ही महिषासुर हैं।
साधना क्रम को अपनाया जा सकता है और श्रेय पथ पर गतिशील रहा जा सकता है। संधिकाल में सूक्ष्म जगत में चल रहे प्राण प्रवाह को विशेष रूप से आकर्षित कर अपने अन्दर के आत्मबल को विशिष्ट उछाल दे देने हेतु पूज्य गुरुदेव ने इन साधना विधानों में वह सारी विशेषताएं भर दी हैं जो कि आज की परिस्थितियों के अनुसार अभीष्ट हैं।
साधना के निमित्त जो सोचा या सुना, समझा जाय उसे व्यक्तित्व की पवित्रता, प्रखरता बढ़ाने के रूप में कार्यान्वित किया जाना चाहिये। इन निमित्त जन मानस के परिष्कार की प्रज्ञा विस्तार साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है। इस साधना के फलस्वरूप मिलने वाली सिद्धियाँ हाथों-हाथ मिलती हैं उसके लिये तनिक भी ठहरना नहीं पड़ता।
साधना की जा सकती है। इस साधना के फलस्वरूप मिलने वाली सिद्धियाँ हाथों-हाथ मिलती हैं उसके लिये तनिक भी ठहरना नहीं पड़ता।
साधना का सम्पन्न कर पायेंगे, अतः अभी से इसकी तैयारी कर लें, रोगी, वयोवृद्ध, जीर्ण−शीर्ण स्थिति वाले व्यक्ति इन सत्रों में भाग नहीं ले पायेंगे। आयेंगे तो पहले ही दिन वापस लौटना होगा। विशिष्टों को विशिष्ट उपहार युगदेवता का मिले ताकि वे कुछ विशेष कर दिखाने हेतु शिविरों की व्यवस्था बनायी गयी है। इस सम्बन्ध में अभी से शांतिकुंज हरिद्वार पत्र व्यवहार कर लें।
साधना का यही स्वरूप है। देवों की उपासना का प्रतिफल संदिग्ध हो सकता है किन्तु जीवन देवता की साधना का पुण्यफल तो हाथों-हाथ मिलता है। व्यक्तित्व का निर्माण इतनी बड़ी सम्पदा है कि उसके बदले इस संसार के बाजार में से कुछ भी खरीदा जा सकता है। जीवन को कल्पवृक्ष, पारस अमृत कहा गया है जो उसकी साधना कर सका वह सुनिश्चित रूप से कृत-कृत्य होकर रहा है।
साधना की प्रमुखता दी गई। मन्त्र विज्ञान का समूचा आधार ही ध्वनि शक्ति के विभिन्न उपयोगों, उपचारों, निर्धारणों पर ही ठहरा हुआ है। मंत्रों की संरचना में भाषा विज्ञान और व्याकरण अनुबन्धों का उतना ध्यान नहीं रखा गया है जितना कि अक्षरों के पारस्परिक गुँथन क्रम के आधार पर उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रकार के स्तर एवं प्रभाव का। गायत्री मन्त्र की प्रमुखता न उसके अर्थ पर निर्भर है और न व्याकरण शास्त्र की दृष्टि से उसकी परख की गई है। उसके उच्चारण क्रम में में ही वह विशेषता है जिसके आधार पर अन्तराल के प्रसुप्त चक्रों उपत्यिकाओं में जगाने का उद्देश्य पूरा होता है।
साधना वर्तमान परिस्थितियों में एक ही है, जन-जन के मन-मन तक महाप्रज्ञा का आलोक पहुँचाने में संलग्न रहना। व्यक्ति और समाज की सामयिक समस्याओं का समाधान एवं सर्वतोमुखी प्रगति से भरे-पूरे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण इसी आधार पर सम्भव है। हर जाग्रत आत्मा को विचार करना होगा कि वह युग की पुकार का समय की चुनौती का किस प्रकार उत्तर दें और समय दान की बढ़ी-चढ़ी श्रद्धाँजलि किस प्रकार युग देवता की झोली में रखें। साधना, स्वाध्याय संयम के आधार पर जो श्रेष्ठता अर्जित की जाय उसे प्रज्ञायुग के अवतरण में लगाने के लिये भगीरथ जैसा साहस उभरना चाहिये। अपने समय में प्रज्ञायोग ही सबसे बड़ा योग जप एवं तप, साधना माना जायेगा।
साधना, ध्यान, अभ्यास और आत्मिक साधनाओं द्वारा हो अथवा पूर्व जन्मों के संस्कारों के परिणाम स्वरूप, जब व्यक्ति का आत्मिक स्तर उठ जाता है कि उसका मन आत्मा की सनिनधि में पहुँच जाय, तो वह इस स्तर की अनुभूतियाँ स्वप्नों के माध्यम से प्राप्त करता है। उपचेतन मन ऐसे स्वप्न संकेत ही पकड़ता है जिनसे किसी का भला होता हो अथवा अपना पवित्र साध्य भी पवित्र साधनों से सधता हो। स्वप्नों के माध्यम से आज तक न तो किसी को अनीति अपनाने अथवा अवाँछनीय लाभ उठाने के संकेत मिले हैं अथवा न किसी को पहुँ की ही प्रेरणा मिली है। ऐसे उदाहरण अवश्य मिलते हैं जिनमें व्यक्ति के अपने सौभाग्य उदय में आ रहे अवरोधों को हटाने की प्रेरणा मिली हो।
साधना है। इसमें ऋषियों ने उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा किया है कि जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में सत्ताईस माला प्रतिदिन करते हुए चौबीस हजार गायत्री महामंत्र का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। श्रेयपथ के पथिकों के लिए ऋषिगणों ने चौबीस सहस्र जप की संकल्पित साधना ही नवरात्रि हेतु सर्वश्रेष्ठ बतायी है। गायत्री परम सतोगुणी,शरीर के लिए भी व आत्मा के लिए भी दिव्य तत्वों का आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है।
साधना का प्रचार करे। संयोग की बात, एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आकर इस कार्य को संगठन बद्ध प्रचार करने का प्रस्ताव रखा इसके बाद चार्ल्स फिल्मोर कंसास शहर चले गए। वहाँ के लोगों ने जिस स्थान पर संस्था का कार्यालय खोलने की बात कही, वह स्थान यूँ तो चार्ल्स के लिए अपरिचित था, परन्तु उन्होंने पाया कि स्वप्न में जिस स्थान को उन्होंने देखा था, यह वही स्थान है। उसी स्थान पर सोसाइटी ऑफ सायलेन्ट यूनिटी नामक संस्था की स्थापना की। संस्था की ओर से जो समाचार पत्र निकाला गया, उसका प्रथम अक्षर ‘यू’ ही था और अखबार का नाम ‘यूनिटी’ रखा गया।
साधना पद्धति का अवलम्बन लेना पड़ता है वह दो वर्गों के लिए अलग-अलग है। पहली विशिष्ट लोगों की, विशिष्ट प्रयोजन के लिए विनिर्मित विशिष्ट प्रक्रिया। दूसरी सर्व साधारण के लिए सहज सुगम सौम्य पद्धति। विशिष्ट प्रक्रिया योगी, यति, एकान्तवासी, साँसारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त असाधारण मनोबल सम्पन्न, कठोर तपश्चर्या के लिए समुद्यत लोगों के लिए है। षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण, तंत्र योग, प्राणयोग आदि साधनाएँ इसी प्रकार की होती हैं।
साधना सत्र चले। इस में भाग लेने वाले परिजन आज भी उस ऊर्जा प्रवाह से अनुप्राणित हैं एवं अनुभव करते हैं कि आध्यात्मिक कायाकल्प जैसा कुछ विशिष्ट प्रयोग इन दिनों भी चले ताकि इस विशिष्ट वर्ष में कुछ विशेष कर दिखाने का साहस सँजोकर वे अगली कक्षा में बढ़ सकें।
साधनात्मक ऊर्जा भण्डार को नयी शक्ति से ओत-प्रोत कर लेने के लिए तैयार कर लेना चाहिए। समय रहते तो आगत को पहचान लें, उन्हें समझदार कहते हैं। ऐसे ही समझदारों में प्रज्ञा परिजनों की गिनती होती है। अखण्ड-ज्योति पाठकों से इसी स्तर की समझदारी अपनायी जाने की अपेक्षा रखी जाती है।
साधना, कुमारी पूजन, कुण्डलिनी जागरण चक्रवेधन आदि की साधनाएँ विशेष रूप से इन्हीं दिनों सम्पन्न की जाती हैं। मध्यकाल में तंत्र प्रयोजनों की बहुत मान्यता थी इसलिए दैवी आराधना के विभिन्न उपचारों के लिए इन्हीं दिनों वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से विशेष क्रिया-कृत्य किये जाते थे। अब वह समय नहीं रहा, न ही सौम्य स्तर की तंत्र साधना करने वाले साधक। अपेक्षित उच्चस्तरीय मार्गदर्शन के अभाव में आत्मघाती प्रयोग करने की अपेक्षा बल सम्वर्धन की-आस्था सम्वर्धन की एवं स्वयं के आध्यात्मिक कायाकल्प की अति सौम्य चौबीस हजार मंत्र जप वाली नौ दिन की अनुष्ठान साधना कर लेना ही ठीक है।
साधना कहते हैं। धातुएँ जमीन में मिट्टी मिली हुई निकलती है। उन्हें आग में गलाकर शोधा जाता है तभी वे काम में आने योग्य बनती हैं। खदान से हीरा अनगढ़ निकलता है। उसे तराशा खरादा घिसा जाता है, इसके बाद ही उसका मूल्य निखरता है।
साधना, स्वाध्याय संयम के आधार पर जो श्रेष्ठता अर्जित की जाय उसे प्रज्ञायुग के अवतरण में लगाने के लिये भगीरथ जैसा साहस उभरना चाहिये। अपने समय में प्रज्ञायोग ही सबसे बड़ा योग जप एवं तप, साधना माना जायेगा।
साधना के उच्च सोपान पर आरुढ़ होने पर वे यह जान गये थे कि अब आगे के आदमी का विकास मन और बुद्धि के बस की बात नहीं है, वरन् यह विकास इन धरातलों से ऊपर उठकर ही संभव है। अतः उनने अतिमानस का अनुसंधान किया। आज विज्ञान वेत्ता भी यह मानने लगे हैं कि मात्र बुद्धि के बल पर इस विश्व ब्रह्माण्ड का रहस्य जाना समझा नहीं जा सकता और न ही इससे मानवी गुत्थियों का समाधान ही निकाला जा सकता है।
साधना में दिनचर्या बनाकर चलना और बजट बनाकर खर्च करना यह दोनों शर्तें निताँत आवश्यक हैं। उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जीवन क्रम के साथ जुड़े हुए कर्त्तव्य, उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए ढेरों समय लगाना पड़ता है और साधन जुटाने में पैसा खर्च होता है। समय और वैभव के अपव्ययी सुरसा के मुँह जैसी लिप्साओं की पूर्ति तक में असफल रहते हैं। दिनचर्या और बजट बनाये बिना सदुद्देश्य के लिए कुछ बचता ही नहीं। हर प्रगति समय और साधन माँगती है।
साधना क्षेत्र में हमारी प्रगति किस गति से हो रही है। स्वप्नों के संकेत यदि समझना सम्भव हो सके, तो न केवल आत्मिक स्थिति का स्तर मालूम किया जा सकता है, वरन् उसके माध्यम से सूक्ष्म को समझ पाना तथा उसके साथ ताल-मेल बिठाना भी सम्भव हो सकता है। प्रश्नोपनिषद् में महर्षि ने निद्रा को इसीलिए यज्ञ कहा है कि उस अवस्था में चेतना के अन्तर्मुख होने की सम्भावना अधिक रहती है और शरीर के सोते रहने पर भी मन न केवल सूक्ष्म जगत का ज्ञान प्राप्त कर सकता है बल्कि आत्मा को अलौकिक सान्निध्य भी पा सकता है। अन्यथा निद्रा आलस्य प्रमाद की तामसिक वृत्ति भी हो सकती है।
साधना की जा सकती है। इस साधना के निमित्त जो सोचा या सुना, समझा जाय उसे व्यक्तित्व की पवित्रता, प्रखरता बढ़ाने के रूप में कार्यान्वित किया जाना चाहिये। इन निमित्त जन मानस के परिष्कार की प्रज्ञा विस्तार साधना का महत्व सर्वोपरि है। उसमें भावना पूर्वक संलग्न रहकर जीवन साधना की जा सकती है। इस साधना के फलस्वरूप मिलने वाली सिद्धियाँ हाथों-हाथ मिलती हैं उसके लिये तनिक भी ठहरना नहीं पड़ता।
साधनाओं के अनुदान का क्रम ऊर्जा संचार के रूप में यहाँ से जाने के बाद भी इस विधि-विधान को करते रहने से चलता रहेगा। इस क्रम में कभी कोई व्यवधान नहीं आएगा। अन्दर के क्रिस्टल को निखारने-अपने सोये देवता को जगाने के लिए बैटरी चार्ज करने के लिए ही आहार-विहार में आमूलचूल परिवर्तन के लिये यह विधान रखा गया है।
साधनात्मक स्तर पर कुछ विशेष न कर पाने के कारण इन फौलादी तलवारों पर जंग लग गयी है, ऐसा प्रतीत होता है। नव निर्माण का कार्य जिन्हें करना है, वे ही यदि प्रमाद की स्थिति में होंगे अथवा प्रचारात्मक विराट स्तर के भीड़ भरे आयोजनों के बाद उस ऊर्जा का उपयुक्त नियोजन न कर प्रसुप्त स्थिति में जाते दिखाई पड़ेंगे तो इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है। इसी महत्ता को समझते हुए सभी परिजनों से यही अपेक्षा की जा रही है कि इस रजत जयंती वर्ष की सौभाग्य भरी वेला में जब शांतिकुंज अपने पच्चीस वर्ष पूरे करने जा रहा है, जहाँ गुरुसत्ता की विशिष्ट तप ऊर्जा संग्रहित है, आकर विशिष्ट ऊर्जा अनुदान सत्रों में भाग लेकर अपनी बैटरी चार्ज कराके जायेंगे ताकि आगामी पाँच-छह वर्षों की प्रतिकूलताओं से जूझने हेतु पर्याप्त आत्मबल का संग्रह वे कर सकें।
साधना के बाद परमपूज्य गुरुदेव का विशेष वीडियो संदेश प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर वे श्रवण कर रात्रि की संध्या-शमन से पूर्व शिथिलीकरण योग निद्रा में प्रवेश कर रात्रि भर होने वाले विशिष्ट प्राण संचार हेतु स्वयं को तैयार करेंगे।
साधना के माध्यम से साधारणतया काफी दिनों में सिद्ध कर पाते हैं, वह इन 9 दिनों की अवधि में बड़ी आसानी से सध जाता है, इसी कारण चैत्र-आश्विन इन दोनों ही नवरात्रियों को विशेष महत्व दिया जाता रहा है।शक्ति की मातृभाव से उपासना दुर्गा शक्ति की पूजा आराधना तथा विशिष्ट अनुष्ठान परक साधना द्वारा आत्मबल का संचय इन नौ दिनों में बड़ी सरलता से हो सकता है। ऋग्वेद के अदिति सूक्त में शक्ति का मातृभाव वाला स्वरूप देखा जाता है, जबकि ऊषा सूक्त में कुमारी भाव, सूर्यादेवी सूक्त में कुमारी भाव, देवी सूक्त एवं वाक्सूक्त में शुद्ध शक्तिभाव के चिन्ह मिलते हैं। ऋग्वेद में भी पृथ्वी की स्तुति गायी गयी है एवं उन्हें पिता द्यौ के साथ वर्णित किया गया है। “समुद्र वसने देवि पर्व स्तन मण्डले।
साधना को अधिकाधिक स्थान देना पड़ता है। इसके बिना मनुष्य संकीर्ण, स्वार्थपरता की, कृपणता निष्ठुर की परिधि में ही जकड़ा रहता है और अवरुद्ध कीचड़ की तरह सड़ता रहता है। कमाने के लिये पूँजी लगानी पड़ती है। उगने के लिए गलना पड़ता है सेवा धर्म अपना कर अर्जित किये गये पुण्य परमार्थ द्वारा ही महानता उपलब्ध होती है। आत्म संतोष?
साधना करते हैं। तो महाराज जी, गायत्री माता वह है जो थैली में रुपये वाली नहीं है। मित्रों, आपको यह जानना चाहिए कि वस्तुतः गायत्री किसका नाम है ? गायत्री है श्रद्धा का नाम-प्रज्ञा का नाम। हम इसी प्रज्ञा की स्थापना करेंगे और जन-जन से कहेंगे कि आप प्रज्ञा के सामने मस्तक झुकाइये, विवेकशीलता के सामने मस्तक झुकाइये।
साधना उपासना द्वारा अपनी चेतना का परिष्कार मलीनताओं का निवारण तथा आत्म शोधन के द्वारा अपने व्यक्तित्व का परिपाक करना पड़ता है। जिस समय चेतना पूर्णतया निर्मल शुद्ध हो जाती है, उस आत्म सत्ता में
साधना के माध्यम से सविता देवता के प्रकाश के पापनाशक तेज के व्यक्ति सत्ता में समाहित होने का भाव होगा। परमपूज्य गुरुदेव के निर्देश वे सुनते रहेंगे एवं इस आधे घण्टे की अवधि में विशिष्ट प्राण संचार का क्रम चलेगा। तत्पश्चात् दिव्य औषधि कल्क सेवन अखण्ड दीपक व गुरुसत्ता की पादुकाओं को नमन का क्रम चलेगा। प्रयोग विशिष्ट प्राणायाम-मुद्राएँ बन्ध व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों के अनुरूप सम्पन्न होने के बाद सभी चौबीस कुण्डी यज्ञशाला में हवन करेंगे। तत्पश्चात् ज्ञानयोग प्रक्रिया के अंतर्गत विशेष संदेश वरिष्ठ प्रतिनिधियों के माध्यम से श्रवण करेंगे।
साधना पद्धति में चान्द्रायण साधना को इसीलिए महत्व दिया गया है। शारीरिक-मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए, गन्दगी की सफाई के लिए उपवास का अपना अलग महत्व है।
साधना कहते हैं। ईश्वर उपासना व जीवन साधना परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध हैं। दोनों के समन्वय से ही परम लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव होती है। रंगाई के पूर्व कपड़ों को धोना आवश्यक है। अकेला बाण ही लक्ष्य नहीं बेधता उसके पीछे तनी हुई कमान का बल भी रहना चाहिए।
साधना का पुण्यफल तो हाथों-हाथ मिलता है। व्यक्तित्व का निर्माण इतनी बड़ी सम्पदा है कि उसके बदले इस संसार के बाजार में से कुछ भी खरीदा जा सकता है। जीवन को कल्पवृक्ष, पारस अमृत कहा गया है जो उसकी साधना कर सका वह सुनिश्चित रूप से कृत-कृत्य होकर रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-July
साधना के द्वारा योगी-जन इसे ही प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं। नाम, रूप, सुविधा के अनुसार कोई भी माना जाय पर वस्तुतः वह सविता देवता ही सब का उपास्य है। उसी को प्राप्त करने के लिये प्रत्येक साधक को प्रयत्नशील होना पड़ता है।
साधना के विधि-विधानों, क्रियाओं एवं उनकी परिणतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन धर्मग्रन्थों, योग-शास्त्रों में मिलता है पर मात्र उन्हें पढ़कर साधना आरम्भ कर देना संकट से खाली नहीं है। शास्त्रों धर्मग्रन्थों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र को सम्बन्धित विषयों की पुस्तकों की पड़ती है। सर्वविदित है कि एकाकी पुस्तकें किसी भी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं, तो फिर साधना जैसे अवात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते हैं ? कहना न होगा मार्ग-दर्शन का गुरुवर दायित्व समर्थगुरु ही सँभाल सकता है।
साधना वस्तुतः मस्तिष्कीय क्षेत्र में घुसे मनोविकारों को, दुष्प्रवृत्तियों को निरस्त करने के लिए लड़ा जाने वाला महाभारत है। जो इसमें सफल होते हैं वे ही सच्चे अर्थों में जीवन का आनन्द उठाते हुए आत्मोत्कर्ष का परम लाभ प्राप्त करते हैं।
साधना का यही स्वरूप वरेण्य है। यह क्रमिक प्रगति के पथ पर चलते-चलते व्यक्ति को महामानव बना देता है।
साधना की है और उपासना-साधना करने के साथ-साथ में अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिये वहाँ के वातावरण का लाभ उठाया है, वहाँ जो ऋषि रहते हैं, उनके परामर्श से आप रास्ता भी तलाश करते हैं और उस तलाश में एक रास्ता यह भी है कि आपने अब तक जो गलतियाँ की है उनका प्रायश्चित कैसे हो ? भरपाई कैसे हो ? आप उसके लिये क्या करे ? मित्रों इसके लिये आप अपने गुण, कर्म और स्वभाव में शालीनता का समावेश करें, इस निमित्त ऐसी कौन-सी गतिविधियाँ अपनायेंगे, जो आपके संस्कारों के रूप में परिणित हो सकें ? जप नहीं नहीं, जप से संस्कार नहीं बनते, रामायण पाठ से भी संस्कार थोड़े ही बन जायेंगे।
साधनाओं पर ही अवलंबित है। वे उपाय, उपचार अन्य प्रकार भी हो सकते हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उसे मनोमयकोश की साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
साधना के विभिन्न उपक्रम हैं, जबकि पाताललोक-अधोलोक मूलाधार में अवस्थित कुण्डलिनी में स्पन्दन पैदा करने के लिए तन्त्र स्पन्दन पैदा करने के लिए तन्त्र साधना के अनेकों उपक्रम शास्त्रों में वर्णित हैं। ये दोनोँ मिलकर आत्मिकी की विधा को पूर्ण बनाते हैं। एक शिव हैं एवं दूसरी शक्ति दोनों मिल कर सम्पूर्ण बनते हैं।
साधना में चार महीने हवा के झोंके की तरह झट-पट व्यतीत हो गए। डकैत - डकैती का माल लेकर इन ऋषियों - मुनियों के निवास स्थान के आगे से होकर गुजरते जरूर थे, परन्तु तप का प्रकाश उनके हृदयों को स्पर्श करता, उससे पहले ही वे वायु वेग सरपट आगे निकल जाते हैं।
साधनाएँ विभूतियों को करतलगत कराती हैं।
साधना को पूर्ण करते हुए जिस स्थिति में प्रविष्ट हुये उसका उल्लेख महाभारत में इस प्रकार मिलता है -
साधना आरम्भ कर देना संकट से खाली नहीं है। शास्त्रों धर्मग्रन्थों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र को सम्बन्धित विषयों की पुस्तकों की पड़ती है। सर्वविदित है कि एकाकी पुस्तकें किसी भी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं, तो फिर साधना जैसे अवात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते हैं ? कहना न होगा मार्ग-दर्शन का गुरुवर दायित्व समर्थगुरु ही सँभाल सकता है।
साधना सध पाती है, न तन्त्र साधना ही सम्भव हो पाती हैं। योगी अपने प्रचण्ड आत्मबल के सहारे इस दीवार को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं इसी प्रकार तान्त्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं जो उन्हें अभीष्ट होता है।
साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
साधना के प्रति उनका सम्मान बचपन में ही दिखाई देने लगा, जब वे अपने सहपाठियों को, छोटे बच्चों को अमराइयों में बिठाकर स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कारिता अपनाने वाली आत्मविद्या का शिक्षण दिया करते थे। छटपटाहट के कारण हिमालय की ओर भाग निकलने व पकड़े जाने पर उन्होंने संबंधियों को बताया कि हिमालय की उनका घर है एवं वहीं वे जा रहे थे। किसे मालुम था कि हिमालय की ऋषि चेतनाओं का समुच्चय बनकर आयी यह सत्ता वस्तुतः अगले दिनों अपना घर वहीं बनाएगी। जाति-पाँति का कोई भेद नहीं। जातिगत मूढ़ता भरी मान्यता से ग्रसित तत्कालीन भारत के ग्रामीण परिसर में एक अछूत वृद्ध महिला की, जिसे कुष्ठ रोग हो गया था, उसी के टोले में जाकर सेवा कर उन्होंने घरवालों का विरोध तो मोल ले लिया पर अपना व्रत नहीं छोड़ा।
साधना के अनेकों उपक्रम शास्त्रों में वर्णित हैं। ये दोनोँ मिलकर आत्मिकी की विधा को पूर्ण बनाते हैं। एक शिव हैं एवं दूसरी शक्ति दोनों मिल कर सम्पूर्ण बनते हैं।
साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
साधना में आन्तरिक पुरुषार्थ करना पड़ता है। सर्वप्रथम स्वयं पर विजय प्राप्त करनी पड़ती है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का विश्लेषण कर लेना सबसे अधिक कठिन कार्य है। उनके परिमार्जन एवं विकास के लिए साधन-उपचार ढूँढ़ लेना तो और भी कठिन पड़ता है। उंगली पर गिने जाने वाले विरले ही होते हैं, जो एकाकी अपने बलबूते स्वयं का निरीक्षण, परीक्षण कर लेने एवं आवश्यक सुधार आदि के उपक्रम में सफल हो जाते हैं।
साधना के संचित संस्कार एवं अनुभव ही सूक्ष्म रूप से प्रेरणा देते एवं मार्गदर्शन की भूमिका निभाते हैं, पर अपवाद तो अपवाद ही हैं, वे जनसामान्य के अनुकरण के विषय नहीं हो सकते। इन अपवादों का अन्धानुकरण करने से तो असफलता ही हाथ लगती और साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधनापीठ बन गयी। 2400 तीर्थों के जल व रज की स्थापना वहाँ की गयी, 2400 करोड़ गायत्री मंत्र लेखन वहाँ स्थापित हुआ, अखण्ड अग्नि हिमालय के अति पवित्र स्थान से लाकर स्थापित की गयी जो अभी तक वहाँ यज्ञशाला में जल रही है। 1941 से 1971 तक समय परमपूज्य गुरुदेव का गायत्री तपोभूमि - अखण्ड ज्योति संस्थान में सक्रिय रहने का समय है। 1956 में नरमेध यज्ञ, 1958 में सहस्रकुंडी यज्ञ करके लाखों गायत्री साधकों को एकत्र कर उनने गायत्री परिवार का बीजारोपण कर दिया। कार्तिक पूर्णिमा 1958 में आयोजित इस कार्यक्रम में दस लाख व्यक्तियों ने भाग लिया, इन्हीं के माध्यम से देश भर में प्रगतिशील गायत्री परिवार की दस हजार से अधिक शाखाएँ स्थापित हो गयी।
साधना ही सम्भव हो पाती हैं। योगी अपने प्रचण्ड आत्मबल के सहारे इस दीवार को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं इसी प्रकार तान्त्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं जो उन्हें अभीष्ट होता है।
साधना, मंत्र, चिकित्सा व यज्ञोपैथी एक विज्ञान सम्मत विधा है। गायत्री नगर क्रमशः ण्क तीर्थ , संजीवनी विद्या के प्रशिक्षण की एकेडेमी का रूप लेता चला गया एवं यहाँ 9-9 दिन के साधना प्रधान, एक-एक माह के कार्यकर्त्ता निमार्ण हेतु युग शिल्पी सत्र सम्पन्न होने लगे।
साधना करने के साथ-साथ में अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिये वहाँ के वातावरण का लाभ उठाया है, वहाँ जो ऋषि रहते हैं, उनके परामर्श से आप रास्ता भी तलाश करते हैं और उस तलाश में एक रास्ता यह भी है कि आपने अब तक जो गलतियाँ की है उनका प्रायश्चित कैसे हो ? भरपाई कैसे हो ? आप उसके लिये क्या करे ? मित्रों इसके लिये आप अपने गुण, कर्म और स्वभाव में शालीनता का समावेश करें, इस निमित्त ऐसी कौन-सी गतिविधियाँ अपनायेंगे, जो आपके संस्कारों के रूप में परिणित हो सकें ? जप नहीं नहीं, जप से संस्कार नहीं बनते, रामायण पाठ से भी संस्कार थोड़े ही बन जायेंगे।
साधना-अभ्यास रूप में संगतिकरण करके ही व्यक्ति विद्याविद् बनता है। इससे कम में किसी विशेषज्ञ के अन्तःकरण में संचित अनुभवजन्य विद्या को प्राप्त करना संभव नहीं है। इतना करके ही कोई व्यक्ति दान रूप में विद्या का विस्तार करके उसे सार्थक बना सकता है।
साधना के बल पर सत्य की गंगोत्री उनका आयाम बनी थी। उनका चिन्तन लयबद्ध संगीत है, जो उनके अपने अनुभव पर आधारित है। वे परम प्रज्ञा को उपलब्ध सन्त थे। उनके बोधमय स्वरों में प्राच्य एवं पाश्चात्य चिन्तन की गंगा एवं यमुना का पवित्र संगम है, जिसमें सरस्वती सी मौलिकता गुप्त होते हुए भी प्रकट है।
साधना क्षेत्र में भी यहीं सिद्धान्त लागू होता है। भौतिक क्षेत्र की तुलना में आध्यात्मिक क्षेत्र कहीं अधिक अविज्ञात है और उतना ही रहस्यमय भी। भौतिक जगत एवं सम्बन्धित वस्तुएँ तो प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती हैं, पर अध्यात्म का क्षेत्र तो पूर्णतया परोक्ष है। प्रत्यक्ष की तुलना परोक्ष में भटकाव की अधिक गुंजाइश रहती है। इस भटकाव की सम्भावना इसलिए भी अधिक रहती है कि साधना में आन्तरिक पुरुषार्थ करना पड़ता है।
साधना क्षेत्र में अपने एकाकी पुरुषार्थ के सहारे बढ़ चलने और मंजिल तक पहुँच जाने में सफल होते हैं। उनकी सफलताओं में भी जन्म-जन्मान्तरों की साधना के संचित संस्कार एवं अनुभव ही सूक्ष्म रूप से प्रेरणा देते एवं मार्गदर्शन की भूमिका निभाते हैं, पर अपवाद तो अपवाद ही हैं, वे जनसामान्य के अनुकरण के विषय नहीं हो सकते। इन अपवादों का अन्धानुकरण करने से तो असफलता ही हाथ लगती और साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधना करनी पड़ती है। तीर्थ वे थोड़े ही हैं कि जहाँ खिलौना देखा, पैसा फेंक दिया बस, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ धक्के खाते फिरे और जहाँ-तहाँ दान-पुण्य के बहाने जेब कटाते फिरे यह सब तो भाई साहब अज्ञानियों का जंजाल है। आप इस जंजाल से दूर रहकर के तीर्थयात्रा की गहराई जानने की कोशिश कीजिए। तीर्थयात्रा की गहराई यह है कि आप उतने समय, जितने समय तीर्थ सेवन करें, उतने समय के लिये अपने आपका परिशोधन करें। भूतकाल के गड्ढे भरने की कोशिश करें।
साधना की तरह करते रहने पर भी हो सकता है।
साधना क्षेत्र में प्रचण्ड पुरुषार्थी बुद्ध कभी-कभी प्रकट होते हैं, जो बिना किसी की सहायता के ही आत्मज्योति को जला लेने में सफल हो जाते हैं। लगन एवं भक्ति भावना के धनी रामकृष्ण परमहंस जैसे साधक का अवतरण कभी-कभी होता है, जिनका अन्तःप्रकाश स्वतः उनकी साधना का मार्गदर्शन करता है। आत्म-तत्व का, अपने एकाकी पुरुषार्थ द्वारा साक्षात्कार कर लेने वाले संकल्प के धनी रामतीर्थ, रामदास तो कभी-कभी ही प्रकट होते हैं, अन्यथा साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
साधना से बहुत प्रसन्न हुए। इन्द्र उसके सम्मुख प्रकट हुए और घर माँगने के लिए कहा।
साधना प्रधान, एक-एक माह के कार्यकर्त्ता निमार्ण हेतु युग शिल्पी सत्र सम्पन्न होने लगे।
साधना के बिना, कषाय-कल्मषों को हटाए बिना ये चमत्कारी विभूतियाँ हस्तगत होती नहीं। ये कुछ प्रारम्भिक शर्तें हैं, जिन्हें पूरी किए बिना न योग साधना सध पाती है, न तन्त्र साधना ही सम्भव हो पाती हैं। योगी अपने प्रचण्ड आत्मबल के सहारे इस दीवार को गिराकर देव अनुग्रह प्राप्त करने के अधिकारी बन पाते हैं इसी प्रकार तान्त्रिक भी अपनी कठोर तितीक्षा द्वारा उस श्रेय को प्राप्त करते हैं जो उन्हें अभीष्ट होता है।
साधना मानी जाती है। यह विचारों के सामान्यतः निम्न प्रवाह को उत्कृष्टता की ओर मोड़ देती है। इस स्थिति में जप ध्यान भी श्रेष्ठ स्तर के बन पड़ते हैं। अतः आश्वमेधिक अनुयाज में इसे जप से पहले सम्पन्न करने की अनुशंसा की गई है। प्रतिदिन आधा से एक घण्टा इन श्रेष्ठ प्रक्रियाओं में लगाना चाहिए, किन्तु ज पके पूर्व दस मिनट का समय ही पर्याप्त है।
साधना पूरी की थी, जहाँ से गायत्री परिवार का बीज डाला गया था। तपोभूमि में विभिन्न शिविरों का आयोजन किया जाता रहा, पूज्यवर स्वयं छोटे-बड़े सम्मेलनों युवा योजनाओं के द्वारा विचार-क्रान्ति की पृष्ठभूमि बनाते रहे पूरे देश में 1970-71 में पाँच 1008 कुण्डी यज्ञ आयोजित कर स्थायी रूप से विदाई लेते हुए एक विराट सम्मेलन (जून 1971) में परिजनों को विशेष कार्यभार सौंप परम वंदनीया माताजी को शांतिकुंज हरिद्वार में अखण्ड दीप के समक्ष तप हेतु छोड़कर स्वयं हिमालय चले गए। एक वर्ष बाद वे गुरुसत्ता का संदेश लेकर लौटे, परम्परा का बीजारोपण , प्राण प्रत्यावर्तन हेतु विशिष्ट सत्र, प्रवासी परिजनों के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन जैसे कार्य उनने शांतिकुंज में संपन्न किए।
साधना में विघ्न डालेगा। छाया किस पर पड़ी, कौन कितना लाभान्वित हुआ, इसका पता न चलना ही मेरे जैसे विनसों के लिए श्रेयस्कर है।
साधना कर मिलना- जुलना कम कर दिया तथा क्रमशः क्रियाकलाप परम वंदनीया माता जी को सौंप दिए। राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों व विराट दीप यज्ञों के रूप में नूतन विधा को जन-जन को सौंपकर राष्ट्र देवता की कुण्डलिनी जगाने हेतु उनने अपने स्थूल शरीर छोड़ने व सूक्ष्म में समाने, की विराट से विराटतम होने की घोषणा कर गायत्री जयंती, 2 जून 1990 को महाप्रमाण किया। सारी शक्ति वे परम वंदनीया माताजी को दे गए व अपने व माताजी के बाद संघ शक्ति की प्रतीक लाल मशाल को ही इष्ट आराध्य मानने का आदेश देकर ब्रह्मबीज से विकसित ब्रह्मकमल की सुवास को, देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के रूप में आरंभ करने का माताजी की निर्देश दे गए।
साधना की जाती है। उनकी प्रखरता मनुष्य को तेजस्वी, मनस्वी एवं ओजस्वी बनाती है। अध्यात्म क्षेत्र की साधनाएँ विभूतियों को करतलगत कराती हैं।
साधना से सिद्धि एवं दर्शन- विज्ञान के तर्क, तथ्य, प्रमाण के आधार पर प्रस्तुतीकरण तक। इसके लिए एक विराट् ग्रन्थागार बना व एक सुसज्जित प्रयोगशाला, वनौषधि उद्यान भी लगाया गया तथा जड़ी - बूटी , यज्ञ विज्ञान तथा मंत्रशक्ति पर प्रयोग हेतु साधकों पर परीक्षण प्रचुर परिमाण में किये गए। निष्कर्षों ने प्रमाणित किया कि ध्यान साधना, मंत्र, चिकित्सा व यज्ञोपैथी एक विज्ञान सम्मत विधा है। गायत्री नगर क्रमशः ण्क तीर्थ , संजीवनी विद्या के प्रशिक्षण की एकेडेमी का रूप लेता चला गया एवं यहाँ 9-9 दिन के साधना प्रधान, एक-एक माह के कार्यकर्त्ता निमार्ण हेतु युग शिल्पी सत्र सम्पन्न होने लगे।
साधना शिविर में बुड्ढे से जवान बनने के लिये नहीं , बल्कि अपने अन्तरंग परिष्कार के लिये आये हैं। इसलिए जितना भी समय है, आप इसको स्वाध्याय में लगाइये, आत्मचिंतन में लगाइये , पूजा में लगाइये , मनन में लगाइये, पूजा में लगाइये , उपासना में लगाइये, और अच्छे लोगों के संपर्क में लगाइये, अच्छी बातों के सोचने में लगाइये , गंगा के किनारे जा करके रहिये। पूरा का पूरा समय आपका ऐसा हो जिसमें कहीं अवाँछनीयता के लिये जगह न हो। आपका चिन्तन ऐसा हो, जिसमें अवाँछनीयता के लिये कोई गुँजाइश न हो। बस, यह एक तीर्थ हमने बनाया है।
साधना करके ही उसे पाया जा सकता है।
साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधना का मार्गदर्शन करता है। आत्म-तत्व का, अपने एकाकी पुरुषार्थ द्वारा साक्षात्कार कर लेने वाले संकल्प के धनी रामतीर्थ, रामदास तो कभी-कभी ही प्रकट होते हैं, अन्यथा साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
साधना के निमित्त बनाये गये थे। बुद्ध ने बहुत सारे संघाराम बनाये थे , विहार बनाये थे। उसमें लोकसेवा के लिये इच्छुक लोगों की शिक्षाओं का निवास करने का प्रबंध था। यह आरण्यक कहलाते थे। आरण्यक कहिये या बुद्ध-विहार कहिये, नाम और शब्दों से क्या फर्क पड़ता है।
साधना की आधी मंजिल पूरी हो गयी तथा उत्तरोत्तर गति से आगे बढ़ने का एक सशक्त आधार-अवलम्बन मिल गया।
साधना जैसे अवात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते हैं ? कहना न होगा मार्ग-दर्शन का गुरुवर दायित्व समर्थगुरु ही सँभाल सकता है।
साधना में भी संलग्न हो जायँ। यह भी आपका बढ़िया वाला प्रायश्चित है। यदि ऐसा आप करें, तब मैं बराबर यह कहूँगा कि आपने तीर्थयात्रा का मर्म समझ लिया और उसे करने के लिये कदम बढ़ा लिया, दो काम तो यह कीजिये।
साधना के माध्यम से दैवी संपर्क स्थापित कर कुण्डलिनी केन्द्र को जगाने व प्रकृति करते हैं इस प्रकार शरीर की दोनों ही सूक्ष्म परतें अदृश्य शरीर की दोनों ही सूक्ष्म परतें अदृश्य रूप में ब्रह्म एवं प्रकृति से घनिष्ठता स्थापित कर वाँछित अनुदान अपने लिये प्राप्त करने, अन्तः को बलिष्ठ बनाकर अन्यान्यों को लाभान्वित करते देखा जा सकता है। योग एवं तन्त्र के समूचे विज्ञान को इस रूप में भली-भाँति समझकर ही साधना उपक्रमों को आरम्भ किया जाना चाहिए। तंत्र के टोने-टोटके वाले स्वरूप से बचकर उसके मर्म को समझा जाना चाहिए। गलती यही होती रही है कि उसका प्रदर्शन- परक दुरुपयोग अधिक हुआ है।
साधना कराने वाले, मार्गदर्शन करने वाले, परामर्श देने वाले ऋषि-तीर्थ और आरण्यक कहीं भी दिखाई नहीं पड़ते। इसलिये आपको एक काम और भी करना है, जहाँ तीर्थयात्रा करनी हो, वहाँ तीर्थों की स्थापना करने में भी योगदान देना चाहिए। तीर्थों की मरी हुई परम्परा को पुनर्जीवित भी करना चाहिए ? कोई आदमी आये और तलाश करे कि कैसे होते हैं तीर्थ तो आप दिखा तो सकें। आज तीर्थों के स्थान पर सब जगह बड़े-बड़े विशालकाय मंदिर बने हुये हैं और लोग उनके माध्यम से अपना पेट भरते रहते हैं, झगड़ा करते रहते हैं।
साधना उपक्रमों को आरम्भ किया जाना चाहिए। तंत्र के टोने-टोटके वाले स्वरूप से बचकर उसके मर्म को समझा जाना चाहिए। गलती यही होती रही है कि उसका प्रदर्शन- परक दुरुपयोग अधिक हुआ है।
साधना अथवा समाज सेवा की आराधना में से कोई भी मार्ग ऐसा हो सकता है, जिसे अपनाता हुआ मनुष्य आत्मिक विकास के सोपानों पर क्रमशः आगे बढ़ता चला जाए। जो भी क्रिया-कृत्य अपनी अन्तःप्रेरणा को साधना उपादानों द्वारा सशक्त बनाने के लिए किये जाते हैं, वे ही सच्चे कर्मकाण्ड हैं एवं आध्यात्मिक विकासवाद की प्रक्रिया में उन्हें ऋषि मनीषियों ने गरिमापूर्ण स्थान भी दिया है।
साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
साधना अनुशासन तो मन के प्रशिक्षण, परिशोधन एवं अग्रगमन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन गतिशील यन्त्रों को कौन कितनी कुशलतापूर्वक संचालित कर पाता है, इसी पर उसका आध्यात्मिक विकास निर्भर है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-June
साधना को, समय को ये प्रपंच मानते रहे, वही अनेकों को सुविधा पहुंचाने और ऋण चुकाने के कारण परमार्थ गिना गया।
साधना करती हैं?” कर्तव्य साधना।” देव शर्मा भी ताँत्रिक साधना छोड़ अपनी माँ की सेवा करने चल पड़ा।
साधना आपको कराई जा रही है, इसमें भी अत्र को, आहार को कम करना पड़ता है, भोजन पर नियन्त्रण रखना पड़ता है, वही आपको करनी पड़ी । दोनों में एक ही बात है, इसलिए आपको यह प्रायश्चित करने के साथ में तितिक्षा करने के साथ-साथ में अब एक नया काम शुरू कर देना चाहिए-पापों का प्रायश्चित समयदान देकर।
साधना शिविर में आये हैं, वह वास्तव में एक महीने के तीर्थसेवन सत्र जैसा है। इसे तीर्थसत्र भी कह सकते हैं। तीर्थों में ऐसी ही परम्परा होती थी। अभी भी ऐसा होता है। प्रयाग में माघ के महीने में इससे ही मिलते-जुलते शिविर होते हैं, सत्र होते हैं, जैसे कि आप यहाँ रहकर कर रहे हैं।
साधना करके शक्ति पाने घर से निकल पड़ा। देव शर्मा नामक इस युवक ने अपनी ताँत्रिक सिद्धियों के बल से अपना चीवर लेकर उड़ते दो कौओं को भस्म होते देख वह अभिमान से भर उठा।
साधनाओं में उपयुक्त हो सकता है, विशेषतया कुण्डलिनी जागरण में।
साधनाएँ आत्मसत्ता को परमात्मा सत्ता से जोड़ने उस स्तर तक पहुँचाने में समर्थ है।
साधना में आत्म परिष्कार, आत्म परिशोधन की प्रक्रिया उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है जैसा कि आपको पूजा, उपासना, जप और योग करने के लिए बताया गया है। यह बहुत ही मूल्यवान है, इसलिए आप इस ओर भी ध्यान रखें और ऐसी जिन्दगी प्राप्त करें जिस पर संतोष ही नहीं गर्व और गौरव भी अनुभव किया जा सके। बस आज की आज समाप्त ।
साधनात्मक निर्देश दिए थे। श्री दिविनद जिन दिनों बड़ौदा में रह रहे थे उन दिनों का एक अनुभव बताते हुए उन्होंने लिखा है कि एक बार जब वे अपनी गाड़ी में कैप रोड से शहर की ओर जा रहे थे जब आमबाग के पास उन्हें लगा कि जैसे कोई दुर्घटना होने को हो। उस समय उन्होंने स्पष्ट देखा कि दुर्घटना को बचाने की बात मन में आते ही एक ज्योति पुरुष ऐसे प्रकट हुआ, मानो वह वहाँ पहले से विद्यमान हों और उसने एक क्षण में ही स्थिति को अपने हाथ में लेकर सम्हाल लिया। श्री माँ को बचपन से ही इस प्रकार दिव्य आत्माओं द्वारा सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता था। भारत सरकार के नेशनल बुक ट्रस्ट जीवन चरित के श्री माँ प्रकरण में इस प्रकार की घटनाओं का विवरण देते हुए लिखा गया है, “वे (श्री माँ) जब छोटी-सी बालिका थी, तब उन्हें बराबर भान होता रहता था कि उनके पीछे कोई अति मानवी शक्ति है, जो जब-तक उनके शरीर में प्रवेश कर जाती है और तब वे बड़े-बड़े अलौकिक कार्य किया करती है।
साधना के अंतर्गत , मानवी सत्ता के अंतर्गत विशिष्ट शक्ति स्रोतों अद्भुत व्यक्तित्वों का विकास किया जाता है। अपने अन्दर बीज रूप में सन्निहित महाशक्ति को जाग्रत करके, इसके अधोगाती प्रवाह को रोककर बलपूर्वक ऊर्ध्वगति बनाया जाता है उच्चस्तरीय ये साधनाएँ आत्मसत्ता को परमात्मा सत्ता से जोड़ने उस स्तर तक पहुँचाने में समर्थ है।
साधना स्तर कहाँ रहा? फिर तो वह उन वेतनभोगी कर्मचारियों जैसा काम ही काम करते हैं और उस काम के सफल-असफल होने से अपना कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ते। सफलता-असफलता होने से अपना कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ते। सफलता-असफलता की चिन्ता तो लोकसेवी को भी नहीं करनी चाहिए लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि सेवा के साथ अपना मनोयोग भी न जोड़ा जाय। मनोयोग इसी का नाम है कि आप अपने कार्य में कितनी दिलचस्पी ले रहे हैं।
साधना की जाय तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य जीवन में देवताओं जैसा अन्त प्राप्त न कर सके, कोई कारण नहीं कि वह सामान्य परिस्थितियों और सीमित साधनों के सहारे भी स्वर्गीय वातावरण में कोई रहने का आनन्द न ले सके।
साधना छोड़ अपनी माँ की सेवा करने चल पड़ा।
साधना कीजिए, तपस्या कीजिए, उपासना कीजिए और ऐसे वातावरण और सत्संग में रहिए, जिससे कि आप पिछले वाले घिनौने भूतकाल को छोड़ करके उज्ज्वल भविष्य में प्रवेश करने में समर्थ हो सकें। यह कार्य वातावरण से ताल्लुक रखता है, यह कार्य उसकी सामग्री से ताल्लुक रखता है, यहाँ यह कार्य प्राणदायक प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। यहाँ यह कार्य प्राणदायक प्रक्रिया से ताल्लुक रखता है। तीर्थों में पहले सारी बातों की सुविधाएँ होती थीं। इसलिए लोग तीर्थों में जाते थे और वहीं निवास करते थे अनुष्ठान तो अपने घर रहकर भी किया जा सकता है, पर अच्छे वातावरण में रह करके अनुष्ठान करना एक बात है और घिनौने वातावरण में रह करके अनुष्ठान करना एक बात है और घिनौने वातावरण में, घिसे-पिटे वातावरण में, कामवासना के वातावरण में, लोभ और मोह के वातावरण में, लोभ और मोह के वातावरण में रहकर कर लें तो वह एक चिह्न-पूजा जैसी प्रक्रिया होगी।
साधना है। उसके प्रयोग में अपना समूचा व्यक्तित्व साधना और अनुभवी मार्गदर्शक का सहारा लेना पड़ता है।
साधना में लगाए। संसार के अन्य भूमिका की ओर बढ़ाया, निश्चित रूप से तपस्वी थे। पैगम्बर मुहम्मद ने पच्चीसवें वर्ष में साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। महात्मा ईसा के जीवन के छत्तीस वर्ष तपश्चर्या में लगे। यहूदी जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।
साधनाओं के अतिरिक्त ध्यान -धारणा का सर्वोपरि स्थान हैं हर मस्तिष्क की संरचना भाव चित्र उभारने ध्यान में अभीष्ट दृश्य देखने की नहीं होती। अस्तु, उनके लिए ध्यान को केन्द्रित करने के लिए दृश्य प्रतीकों का, बिन्दु योग का अभ्यास नहीं कराया जाता। मूल उद्देश्य विचार प्रवाह के बिखराव को रोक एक समिति प्रयोजन में केन्द्रित होने का अभ्यास कराया जाता है यह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से हो सकता है। कर्णेन्द्रिय के माध्यम से नादयोग, नासिका द्वारा गन्धयोग , जिह्वा द्वारा रसनायोग , त्वचा द्वारा स्पर्शयोग की अनेकों विधि-विधान हैं जिनमें सूक्ष्म नेत्रों द्वारा दृश्यों को देखा जाता है। आरम्भ के साधकों के लिए यह अधिक उपयुक्त है कि एक श्रेष्ठ विचारधारा के प्रवाह में बहने के लिए रास्ता बना दिया जाय।
साधना की जाती है। अंतःकरण को ब्रह्म मनः संस्थान को विष्णु और कायकलेवर को रुद्र की उपमा दी गयी है। यही तीनों व्यक्तिगत त्रिदेव है जिनके वरदान-अभिशाप पर उत्थान पतन की सारी संभावनायें अवलंबित हैं अध्यात्मवेत्ता अंतःकरण को कही अधिक महत्व देते हैं और उसे मनःसंस्थान से कही अधिक उच्चस्तरीय मानते हैं। कार्य कौशल से लोक व्यवहार बनता है। बुद्धि वैभव से उपयुक्त निर्णय होते हैं, किंतु अंतःकरण तो समूचे व्यक्तित्व का ही अधिष्ठाता है उसकी परिष्कृत स्थिति ही सामान्य स्थिति के मनुष्य को महामानव , अतिमानव, कृष्,ि देवात्मा, देवदूत स्तर तक पहुँचाने में समर्थ होती हैं अपने ही भीतर विद्यमान इस देवलोक का माहात्म्य ऋषि -मनीषी सदा से ही बताते और उसकी अनुकंपा उपलब्ध करके जीवन लाभ लेने वाले विभिन्न प्रतिपादनों द्वारा समझाते रहे हैं ।
साधना के साथ ही साथ चित्त की एकाग्रता, स्थिरता, दृढ़ता और मानसिक गुणों का विकास होता है।
साधना एवं संध्याकालीन को करनी पड़ती हैं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में प्रत्येक साधकों का विभिन्न पर प्रयोग किया जाता है। ध्यान के पूर्व एवं बाद में कितना अन्तर आया, मानवी काया पर क्या प्रभाव पड़ा? इसके लिए मल्टीचैनेल पालीग्राफ (इलेक्ट्रो एनसेथ्फलोग्राम) , बायोफीडबैक (टेम्परेचर पल्स ई॰ ई॰ जी0 जी0 एस0 आर0) आदि मशीनों से साधकों को गुजरना पड़ता है। रक्त के श्वेत कणों एवं विविध हारमोन्स एन्जाइम जीवनी शक्ति बढ़ाने वाले द्रव्यों तथा फेफड़ों की रक्त शोधन प्रक्रिया पर आहार शुद्धि योगासन, ध्यान-धारणा का प्रभाव रेखांकित किया जाता है। ध्यान-साधना के अंतर्गत , मानवी सत्ता के अंतर्गत विशिष्ट शक्ति स्रोतों अद्भुत व्यक्तित्वों का विकास किया जाता है।
साधना चाहिए और अलख जगाना चाहिए। इसके अलावा तीर्थयात्रा में और भी कई बातें बतायी गई हैं। आप उस समय एकाँत में रहकर अपने प्रायश्चित की साधनाएँ कीजिए, उपासनाएँ कीजिए, आत्म-परिष्कार के लिए पृष्ठ-भूमि बनाइए।
साधना वस्तुतः साधना है। उसके प्रयोग में अपना समूचा व्यक्तित्व साधना और अनुभवी मार्गदर्शक का सहारा लेना पड़ता है।
साधनाओं का सूजन हुआ है। अंतःकरण ही मनुष्य का भाग्य विधाता है इस क्षेत्र को उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं आस्थाओं आकाँक्षाओं से अनुप्राणित करने पर ही व्यक्ति और समाज को वर्तमान से उबारा और उज्ज्वल भविष्य के निकट पहुँचाया जा सकता है।
साधना कहा जाता रहा है। बहिरंग प्रेम पारिवारिक और सामाजिक जीवन में उगाया-बढ़ाया जाता है तो ईश्वर भक्ति अर्थात् अंतःकरण के विकास के लिए अध्यात्म परक साधना उपचारों का सहारा लिया जाता है।
साधना में, काय-कलेवर में बीज रूप से समाहित असंख्य शक्तियों के उद्भव एवं उपयोग का द्वार खुलता है। कुण्डलिनी शरीरगत ऊर्जा है, जिसके सहारे भौतिक जगत की अनेक शक्तियों को आकर्षित करके समर्थ, शक्तिवान बना जा सकता है पंचकोश अनावरण में चेतना शक्ति हैं आत्म सत्ता को पंचकोशों के और काय सत्ता को कुण्डलिनी के माध्यम से प्रखर बनाया जा सकता है इस उभयपक्षीय प्रयोजन की सिद्धि में अन्य साधनाओं के अतिरिक्त ध्यान -धारणा का सर्वोपरि स्थान हैं हर मस्तिष्क की संरचना भाव चित्र उभारने ध्यान में अभीष्ट दृश्य देखने की नहीं होती। अस्तु, उनके लिए ध्यान को केन्द्रित करने के लिए दृश्य प्रतीकों का, बिन्दु योग का अभ्यास नहीं कराया जाता। मूल उद्देश्य विचार प्रवाह के बिखराव को रोक एक समिति प्रयोजन में केन्द्रित होने का अभ्यास कराया जाता है यह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से हो सकता है। कर्णेन्द्रिय के माध्यम से नादयोग, नासिका द्वारा गन्धयोग , जिह्वा द्वारा रसनायोग , त्वचा द्वारा स्पर्शयोग की अनेकों विधि-विधान हैं जिनमें सूक्ष्म नेत्रों द्वारा दृश्यों को देखा जाता है।
साधना का नाम अध्यात्म है। चेतना को किस प्रकार मल आवरण, विक्षेपों से बचाया जाय? किस प्रकार उसे प्रगतिपथ पर अग्रसर होने का अवसर दिया जाय?
साधना। विधानों में अन्तर करना पड़ता है। हर रोगी को एक बीमारी में एक ही दवा नहीं दी जा सकती। यद्यपि कैमिस्टों से पूछ कर यह जरूर जाना जा सकता है कि किस नाम की दवा किस रोग में प्रयुक्त होती हैं किन्तु उस आधार पर बिना चिकित्सक से परामर्श किये सेवन करने लगना खतरनाक है। चिकित्सक देखता है कि किस रोग के साथ क्या लक्षण मिले हुए हैं?
साधना सत्र के दौरान शान्तिकुँज परिसर में दिया गया उद्बोधन-मई 1972)
साधनाओं और तपश्चर्या का आविष्कार किया और परामर्श दिया है। कि अंतःकरण की भाव संवेदना को -उत्कृष्टता को जगाया-बढ़ाया जाय, कारण की गहराई में ही विद्यमान हैं। नगर से नारायण बनने का उद्गम स्थल यही है। ऋद्धि सिद्धियों के भंडार इसी की तिजोरी में बंद है। इसे ही विकसित करने का प्रयत्न किया जान चाहिए।
साधना।” देव शर्मा भी ताँत्रिक साधना छोड़ अपनी माँ की सेवा करने चल पड़ा।
साधना के समय उसके लिए विशेष प्रयास किया जाता है कि सामान्य समय में भी उथले साँस लेने की आदत को बदला जाय और उसके स्थान पर गहरे साँस लेने का अभ्यास सदा के लिए डाला जाय इससे स्वास्थ्य संवर्द्धन और दीर्घ जीवन की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं।
साधना और अनुभवी मार्गदर्शक का सहारा लेना पड़ता है।
साधना जगत में प्राणायाम की महत्ता एक स्वर से स्वीकार की गयी है। शारीरिक और मानसिक आरोग्य की दृष्टि से उसे अतीव उपयोगी बताया गया है।
साधनाएँ कीजिए, उपासनाएँ कीजिए, आत्म-परिष्कार के लिए पृष्ठ-भूमि बनाइए।
साधना की उपयोगिता, आवश्यकता से कोई इन्कार नहीं करता, वे अपना काम करते हैं। और करना चाहिए। इतने पर भी यह असमंजस अपने स्थान पर यथावत् ही बना रहता है कि मनुष्य की अपनी निजी विशेषता एक सुनिश्चित तथ्य जैसी बनकर भारी चट्टान की तरह अड़ी बैठी रहती है और बहुत हिलाने-डुलाने, उठाने-हटाने का प्रयत्न करने पर भी उत्साहवर्धक बाधा ही बनी बैठी रहती है। देखा गया कि शारीरिक और मानसिक विकास में मनुष्य की निजी विशेषता का असाधारण महत्व है। सुधार प्रयत्नों से उस पर सीमित प्रभाव ही होता है।
साधना सत्रों में त्रिकाल ध्यान-धारण का क्रम सम्पन्न होता है। प्रातःकाल उगते सूर्य का ध्यान-प्रज्ञायोग, दोपहर कालीन दीपक की ज्योति पर ध्यान-ज्योति अवधारण ध्यान-साधना एवं संध्याकालीन को करनी पड़ती हैं ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में प्रत्येक साधकों का विभिन्न पर प्रयोग किया जाता है। ध्यान के पूर्व एवं बाद में कितना अन्तर आया, मानवी काया पर क्या प्रभाव पड़ा? इसके लिए मल्टीचैनेल पालीग्राफ (इलेक्ट्रो एनसेथ्फलोग्राम) , बायोफीडबैक (टेम्परेचर पल्स ई॰ ई॰ जी0 जी0 एस0 आर0) आदि मशीनों से साधकों को गुजरना पड़ता है। रक्त के श्वेत कणों एवं विविध हारमोन्स एन्जाइम जीवनी शक्ति बढ़ाने वाले द्रव्यों तथा फेफड़ों की रक्त शोधन प्रक्रिया पर आहार शुद्धि योगासन, ध्यान-धारणा का प्रभाव रेखांकित किया जाता है।
साधना है। उत्कृष्ट जीवन जीने की आकांक्षा, अपनी थोड़ी या अधिक क्षमता पर विश्वास तथा धर्म जैसे गुणों के साथ नियमित अभ्यास करने से जीवन की अनेक प्रकार की समस्याओं का सफल समाधान खोजने में तथा व्यक्तित्व के विकास में यह साधना बहुत सहायक है। स्वाध्याय, मनन-चिन्तन को मन्त्र जप के समान महत्व देते हुए आश्वमेधिक अनुयाज में इसीलिए प्रथम स्थान दिया गया है।
साधनाएँ प्रसिद्ध हैं। स्वयं परमपूज्य गुरुदेव के जीवन को तप का पर्याय कहना अतिशयोक्ति न होगी।
साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। महात्मा ईसा के जीवन के छत्तीस वर्ष तपश्चर्या में लगे। यहूदी जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप साधनाएँ प्रसिद्ध हैं। स्वयं परमपूज्य गुरुदेव के जीवन को तप का पर्याय कहना अतिशयोक्ति न होगी।
साधना बहुत सहायक है। स्वाध्याय, मनन-चिन्तन को मन्त्र जप के समान महत्व देते हुए आश्वमेधिक अनुयाज में इसीलिए प्रथम स्थान दिया गया है।
साधनाओं में भी पड़ती है। अपनी स्थिति का भली प्रकार पर्यवेक्षण जिसने किया हो और उपचार कृत्य उस मार्गदर्शक का परामर्श योग साधनाओं में उपयुक्त हो सकता है, विशेषतया कुण्डलिनी जागरण में।
साधना उपचारों का सहारा लिया जाता है।
साधना करके अपने कौशल में पारंगत होती हैं।
साधना शास्त्र में गिनाये गये हैं यह कथन यथार्थ हैं चेतना की सामर्थ्य अनन्त है उससे लाभान्वित होने में एक ही बाधा है कि मनोनिग्रह की कला हस्तगत नहीं होती । जिसने इस कौशल में प्रवीणता प्राप्त कर ली, समझना चाहिए कि उसने अनेकों देव-दानव वशवर्ती कर लिए। पंचकोशों की ध्यान-धारणा से अपनी ही चेतना के पाँच प्राण, अपनी की काया के पंचतत्व इतने प्रखर परिष्कृत हो जाते हैं कि उन्हें दस दिक्पालों , दस दिग्गजों की उपमा दी जा सके। गायत्री माता की पंचमुखी प्रतिमाओं में अलंकारिक रूप से इन्हीं अंतर्जगत के पाँच देवों की शक्तियों सन्निहित होने के संकेत हैं कुण्डलिनी जागरण की ध्यान साधना में, काय-कलेवर में बीज रूप से समाहित असंख्य शक्तियों के उद्भव एवं उपयोग का द्वार खुलता है। कुण्डलिनी शरीरगत ऊर्जा है, जिसके सहारे भौतिक जगत की अनेक शक्तियों को आकर्षित करके समर्थ, शक्तिवान बना जा सकता है पंचकोश अनावरण में चेतना शक्ति हैं आत्म सत्ता को पंचकोशों के और काय सत्ता को कुण्डलिनी के माध्यम से प्रखर बनाया जा सकता है इस उभयपक्षीय प्रयोजन की सिद्धि में अन्य साधनाओं के अतिरिक्त ध्यान -धारणा का सर्वोपरि स्थान हैं हर मस्तिष्क की संरचना भाव चित्र उभारने ध्यान में अभीष्ट दृश्य देखने की नहीं होती।
साधना की। पैंतालीस वर्ष की आयु में उनका व्यक्तित्व लोकनायक के रूप में उभरा। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन-चौथाई भाग तप में और एक-चौथाई भाग जन-नेतृत्व में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेशों की बौछार उतनी नहीं की, जितने आज के सामान्य उपदेशक कर लेते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई से अधिक जनता उनके मार्गदर्शन पर आस्था रखती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1996-January
साधना का परिणाम सामान्य समय में की गई वर्षों की साधना के बराबर होती है।
साधना स्तर पर करने में भूल हो जाती है। भूले स्वभावगत हों या परिस्थितियों के कारण, लोक सेवी को अपने साधना पथ से दूर हटाती है।
साधना भी इस साधन के माध्यम से पूरी हो सकती है।
साधनात्मक प्रतिक्रियाओं को पूरा करते थे और फिर यथाक्रम वापस लौटते थे। वैदिक काल से चलती आ रही इस परम्परा को किन्हीं अंशों में आज भी देखा जा सकता है। इस पुण्य परम्परा को यत्किंचित् व्यतिरेक खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी के समय आया था। उसने अपनी कट्टर धर्मान्धता और क्रूर स्वभाव के वशीभूत होकर साधकों तपस्वी, तीर्थ यात्रियों के साथ बर्बरता का व्यवहार करना शुरू किया। चारों ओर भय और दहशत का वातावरण फैल गया।
साधना मानवी चेतना के आलौकिक एवं चिर स्थाई परिवर्तन करती है।
साधना रविवार को एक घण्टा जप के रूप में एवं गुरुवार को शाम सात से साढ़े सात उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में सभी स्थानों पर घरों, शाखा कार्यालयों-प्रज्ञा मण्डलों-शक्तिपीठों स्वाध्याय मण्डलों में सम्पन्न हो सकती है।
साधना आरण्यक था। उनके सान्निध्य में माघ महीने में भारतवर्ष के आध्यात्मिक जिज्ञासु साधक एकत्र होते थे। तीर्थराज प्रयाग में इस मास का कल्पवास करते थे, चांद्रायण तप के साथ मधुविद्या की साधना करते थे।
साधना की भाव भरी तत्परता, उत्कृष्ट जीवन एवं उदार व्यवहार में अनवरत प्रगति ( 3) सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त अनुकरणीय अंश दान। आज जिनकी जो स्थिति है उसकी तुलना में कुछ करने, कुछ बड़े एवं आदर्शवादी साहसिक कदम उठाने का निश्चय करना ही गुरु दक्षिणा का प्रारूप है। कौन क्या करेगा ? इसका निर्धारण उसे स्वयं ही करना चाहिए और जो सोचा हो उसे गुरु दक्षिणा के रूप में संकल्प पूर्वक घोषित करना चाहिए।
साधना की दृष्टि में इस तत्व को यों समझना होगा कि अन्न आदि रस की उत्पत्ति का मतलब है अन्नमय कोश की पुष्टि- यह प्रथम प्रकार का मधुरस है। द्वितीय प्रकार के मधुरस अर्थात् अमृत से प्राण शक्ति बढ़ती है तथा प्राणमय कोश की इस प्रकार की सक्रियता से यश वृद्धि होती है, यह द्वितीय अमृत की उपलब्धि है। इन्द्रियों का अधिपति मन है। अतः उनकी उत्पत्ति का मतलब हैं, मनोमय कास की सिद्धि - यह तृतीय अमृत की उपलब्धि है। वार्य की पुष्टि विज्ञानमय कोश का आधार है जो इसे पा लेता है वह चतुर्थ अमृत को प्राप्त करता है।
साधना एवं मकर संक्राँति का पर्व फिर से जीवंत एवं जागृत हों उठा। चारों ओर उनके प्रति जन श्रद्धा उमड़ पड़ी। श्रद्धा के विभोर जन चेतना ने उन्हें आदि नाथ भगवान शिव के अवतार के रूप में स्वीकारा और इस पुण्य पर्व पर साधुओं को खिचड़ी का दान देने एवं खिचड़ी खाने की प्रथा जल पड़ी। जिसे आज भी मकर संक्राँति के पर्व पर देखा जा सकता है। इस दिन जन श्रद्धा उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित महाऋषि गोरखनाथ के मंदिर में खिचड़ी के दान के रूप में साकार देखा जा सकता है।
साधना के आधार पर उनने वह झाँकी भारत एवं विश्वभर के परिजनों को दिखायी जिसने संस्कारों से लेकर चौबीस गायत्री महाशक्तियों के तत्वज्ञान को उन्हें बड़ी सुगमता से समझा दिया। सरकण्डों से बना भव्य मन्दिर एवं विराजमान गुरुदेव-माताजी सभी के लिए एक आश्चर्य का विषय बने हुए थे। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के क्रियाकलापों- आँकड़ों-उपकरणों, विज्ञान अध्यात्म समन्वय सम्बन्धी प्रयोगों तथा एक सौ आठ दुर्लभ वनौषधियों का जीवन दर्शन आगन्तुक सभी विशिष्ट अभ्यागतों सहित परिजनों ने किया। यह प्रस्तुतीकरण पहली बार किया गया था व अपने आप में अनूठा था।
साधना या तपश्चर्या कहते हैं। दूसरे है न्यूनतम में निर्विवाद के उपरान्त बची हुई श्रम, क्षमता, बुद्धि, सम्पदा और साधन सामग्री को सत्प्रवृत्ति, संवर्धन के लिए नियोजित करने की ललक लगन व निष्ठा भरी तत्परता। अंतःकरण के स्तर को उदात्त बनाने के लिए इससे कम में काम नहीं चल सकता। इतना बन पड़े तो फिर अन्य उपचारों की आवश्यकता शोभा -सज्जा जितनी भर रह जाती है।
साधना अनिवार्य मानी गयी है और कहा गया है कि प्रातःकाल दैनिक क्रिया कृत्यों से निवृत्त होकर एक बार महा यज्ञ की उपासना नित्य ही करनी चाहिए। संभव हो सके तो शाम को भी करनी चाहिए। शाम को एक माला आत्मकल्याण की करने से भी काम चल सकता है। आत्म शुद्धि पाँच संध्या विधान और सप्त विधि पूजा सायंकाल को ही करनी चाहिए। घर के अन्य लोगों को भी, स्त्री बच्चों को भी यह प्रेरणा देनी चाहिए कि वे पूजा स्थलों के समीप बैठकर कम से कम एक माला गायत्री मंत्र की सभी कर लिया करें।
साधनाओं के लिए करते हैं। यह परम्परा रामायण काल एवं महाभारत काल तक अबाध रूप से प्रचलित रही। रामायण काल में तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भारद्वाज के आश्रम एवं साधना आरण्यक था। उनके सान्निध्य में माघ महीने में भारतवर्ष के आध्यात्मिक जिज्ञासु साधक एकत्र होते थे। तीर्थराज प्रयाग में इस मास का कल्पवास करते थे, चांद्रायण तप के साथ मधुविद्या की साधना करते थे।
साधना गायत्री माता के प्रति प्रेम भावना का विकास करना पड़ता है फिर उसका सर्वांग सुन्दर स्वरूप भी प्रस्तुत हैं। सर्वांग सुन्दर -प्रेम की अधिष्ठात्री गायत्री माता के चिंतन करने से मन उसी परिधि में घूमता रहता है। उसी क्षेत्र में क्रीडा कलोल करता है। अतएव मन को रोकने, वश में आवश्यकता करने की एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक साधना भी इस साधन के माध्यम से पूरी हो सकती है।
साधना का एक अंग है। अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापक एक ही रथ के दो पहिये होते हैं। दोनों का क्रम चक्र ठीक चलने से सृष्टि संतुलन ठीक रहता है इसलिए धर्म की रक्षा के लिए उपाय पर निर्भर न रह कर दोनों ही अवलंबन करना चाहिए। परशुराम की धर्म संघर्ष वृति अनुचित तनिक भी नहीं। उसमें यदि अंत तक औचित्य ही भरा पड़ा हैं।
साधनात्मक रूप में मनायें। इस वर्ष न्यूनतम एक कार्यकर्त्ता सम्मेलन जो विशुद्धतः संगठनात्मक आधार लिये हो सामूहिक आधार पर 8-10 जिलों या बीस लाख की आबादी के परिकर को लक्ष्य रखकर मनालें। इस सम्बन्ध में मात्र हीरक बनने योग्य डेढ़ सौ-दो सौ कार्यकर्त्ताओं को ही आमन्त्रित करें व आयोजन का स्वरूप सादगी प्रधान हो। सम्मेलन कब, कैसे आयोजित करें व आयोजन का स्वरूप सादगी प्रधान हो। सम्मेलन कब, कैसे आयोजित हों, इस सम्बन्ध में शाँतिकुँज संगठन प्रकोष्ठ से जानकारी ले लें एवं ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक पत्रिका का द्वितीय पृष्ठ नियमित रूप से पढ़ते रहें।
साधना भी सम्पन्न की जाती रहे। सामूहिक साधना रविवार को एक घण्टा जप के रूप में एवं गुरुवार को शाम सात से साढ़े सात उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में सभी स्थानों पर घरों, शाखा कार्यालयों-प्रज्ञा मण्डलों-शक्तिपीठों स्वाध्याय मण्डलों में सम्पन्न हो सकती है।
साधना सूर्य के अमृत तत्व का संदोहन। जिसके लिए उपयुक्त तो पूरा माघ मास ही हैं, परन्तु वे क्षण तो महत्वपूर्ण है जिन क्षणों में सूर्य मकर राशि पर संक्रमण करता है। दिव्य दर्शियों के अनुसार इन क्षणों में तन्मयता एवं तल्लीनता पूर्व की गई साधना मानवी चेतना के आलौकिक एवं चिर स्थाई परिवर्तन करती है।
साधना सफल होती थी। यदि सच्चे मन से उच्चस्तरीय दृष्टिकोण लेकर सेवा धर्म अपनाया जाय, तो उसका परिणाम लोकमंगल से अधिक आत्मोत्कर्ष के रूप में उपलब्ध हो ता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रज्ञा परिजनों को युगशिल्पी की भूमिका निभाने के लिए अग्रसर होते समय इस बात को गिरह बाँध कर रखना है कि उन्हें अपने स्तर के व्यक्तित्व की दृष्टि से सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ऊँचा उठकर रहना है।
साधना इस अमृत का द्वार खोलती हैं। उदय कालीन स्वर्णिम सविता का ध्यान करते हुए महायज्ञ गायत्री का जप उसके दिव्य भावों का चिंतन सविता के अमृत का रसानुभूति कराने वाला सिद्ध होगा, इसे सुनिश्चित मानना चाहिए। इस अवसर पर सभी माननीय पुरुषों का श्रद्धार्चन भी किया जाय जिन्होंने इस पुण्य परम्परा को जागृत और जीवंत रखा। इस पुण्य पर्व को यदि यथा रीति मनाया जाय, तो हम सब भी उसी अमृत की उपलब्धि कर सकेंगे जिसे महर्षि प्रवाहण ने प्राप्त किया था।
साधना के बराबर होती है।
साधना ही मधुविद्या का सार तत्व है। छान्दोग्य उपनिषद् में वर्णित इस विद्या में सविता के अमृत तत्व की सर्वांगीण विवेचना है। स्थान स्थान पर वर्णित उपासना की रहस्य रश्मियाँ एकत्रित होकर यहाँ प्रकाशित है। इस उपनिषद् के तृतीय अध्याय के प्रथम खण्ड में सविता की उस अमृत साधना को मनोरम ढंग से समझाया गया है। इसके अनुसार आदित्य देवताओं का मधु है-
साधना को मनोरम ढंग से समझाया गया है। इसके अनुसार आदित्य देवताओं का मधु है-
साधना के बदले कमाया हुआ कैलाश पर्वत जितना पुण्य (2) अंतरंग और बहिरंग की कठोर तितीक्षाओं द्वारा अर्जित मान सरोवर जैसी तपश्चर्या ( 3) अजस्र आत्मीयता से हृदयाकाश में लबालब भरी हुई भक्ति भावना करुणाई आत्मीयता। इन तीनों वैभव का अधिकाँश उपयोग वे दीक्षा प्राप्त आत्मीय जनों को सुखी समुन्नत बनाने के लिए करते हैं। इस अनुदान से असंख्यों का कायाकल्प जैसी परिवर्तित मनःस्थिति और परिस्थिति का सर्वोत्तम लाभ हुआ है। यह मेघ वर्षा भूतकाल में किस प्रकार बरसी और कितनों ने कितना लाभ उठाया यह सर्व विदित है। भविष्य में वे बादल और भी सघन होते जा रहें है और घनघोर घटाटोप वर्षा की तैयारी में संलग्न है।
साधना पथ से दूर हटाती है।
साधना क्षेत्र के सहयोगी बनते हैं, किन्तु आज बहुतूल्य ऐसे व्यक्तियों का है जो मायावी कालनेमी की भूमिका निभाते अच्छे भले आदमी का पथ भ्रष्ट कर देते हैं। हर समाज सेवी संस्था को ऐसे कालनेमी से बचना पड़ता है। रावण के भाई कालनेमी का अपने काले कारनामों के कारण पुराण कथनों में बहुत स्थानों पर वर्णन आया है। वह त्रेता में आया था, पर काल से बँधा नहीं था। दुर्बुद्धि देने का काम वह हर युग में करता आया है।
साधना में ऐसा कुछ नहीं, जिसके लिए शरीर निर्वाह एवं पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने में कोई बाधा पड़ती हो। मात्र लोभ और मोह का मद्यपों जैसा अतिपाद ही एक मात्र अवरोध है जो वस्तुतः तिनके जैसा हल्का होते हुए भी पर्वत जैसा भारी बनकर दिग्भ्रांतों के मनः क्षेत्र पर भूत पिशाच की तरह चढ़ बैठता है और भली चंगी परिस्थिति होते हुए भी नारकीय उत्पीड़कों की तरह निरंतर संत्रस्त करता रहता है।
साधना के रूप में ही हाथ में लेना है। एक विराट आयोजन सम्पन्न करने के बाद थकान आना स्वाभाविक है किन्तु वह शारीरिक ही होती है एवं सामयिक भी। यदि यह थकान शिथिलता के रूप में आने लगे तो समझ लेना चाहिए कि यह आसुरी उमंग है एवं लोक-मंगल के कार्य में लगे व्यक्ति के लिए अत्यन्त घातक है। वसन्त जागते रहने और कर्मशील बने रहने का संदेश लेकर आया है एवं हमें उसी रूप में उसे ग्रहण करना चाहिए।
साधनात्मक ऊर्जा संवर्धन हेतु पुरश्चरण का क्रम चले एवं सामूहिक साधना भी सम्पन्न की जाती रहे। सामूहिक साधना रविवार को एक घण्टा जप के रूप में एवं गुरुवार को शाम सात से साढ़े सात उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में सभी स्थानों पर घरों, शाखा कार्यालयों-प्रज्ञा मण्डलों-शक्तिपीठों स्वाध्याय मण्डलों में सम्पन्न हो सकती है।
साधना विज्ञान के मर्मज्ञों एवं दिव्य द्रष्टा ऋषियों के अनुसार शिशिर ऋतु में माद्यमास का महत्व सबसे अधिक है। इसी कारण वैदिक काल में इस महीने का उपयोग प्रायः सभी लोग आध्यात्मिक साधनाओं के लिए करते हैं। यह परम्परा रामायण काल एवं महाभारत काल तक अबाध रूप से प्रचलित रही। रामायण काल में तीर्थराज प्रयाग में महर्षि भारद्वाज के आश्रम एवं साधना आरण्यक था। उनके सान्निध्य में माघ महीने में भारतवर्ष के आध्यात्मिक जिज्ञासु साधक एकत्र होते थे।
साधना तपश्चर्या द्वारा अपने ही भीतर की भावनात्मक चेतना को जागृत कर लिया जाये तो मनुष्य सूर्य चेतना की तरह सर्वसमर्थ और शक्तिशाली हो सकता है। ) सामान्य एवं सुप्त अवस्था की चेतना शक्ति सूर्य की चेतना के समान ही दृष्टिगोचर नहीं होती पर वह शक्ति है असंदिग्ध।
साधना करते थे।
साधनावस्था की पहली सीढ़ी पर भी पाँव नहीं रखा है। यह शरीर का मोह है। संन्यासी वही खड़े हो गये।
साधनाओं से प्रखर हुई उनकी आत्म चेतना की हुँकार सुनकर दलित और दमित व्यक्तियों ने अपने में एक नयी शक्ति का अनुभव किया। जाति पात वंश का भेद भुलाकर लोग उनके नेतृत्व में खिलजी के आतंक का सामना करने के लिए उठ खड़े हुए। इन्हीं तिरस्कृत समझे जाने वाले लोगों में से उन्होंने गहनीनाथ एवं चरपटनाथ जैसे महान व्यक्तित्व गढ़े।
साधना प्रधान, संस्कार प्रधान, परिवार, संस्था की धुरी पर ही ये क्रांतियां सम्पन्न हो सकेंगी। इसके लिए जो भी सम्भव हो किया जाना चाहिए।
साधना के अनन्तर इसी दिन पंचम अमृत को उपलब्ध करा दिया था। वेदवेत्ता मनीषियों के अनुसार शिशिर ऋतु में वातावरण में सविता के अमृत तत्व की प्रधानता रहती है। शाक, फल, वनस्पतियाँ इस अवधि के अमृत तत्व को अपने में सर्वाधिक आकर्षित करती और पुष्टिकर बनाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-January
साधना में अपना सर्वस्व समर्पण कर देता है, उसी प्रकार अपने मन में द्वेष की भावना न रखकर पति को अपना आराध्य मानकर अपना भला और बुरा सब कुछ सौंप दे। यदि पति कुमार्गगामी हो, तो प्रेम प्रशंसा और युक्ति द्वारा उसका परिष्कार करे। कुमर्गढायन एक मानसिक रोग है। अशिक्षा, अंधकार और मूढ़ता की निशानी है। इस रोग के उपचार के लिए समझाने, तर्क, बुद्धि तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से कुमार्ग की हीनता प्रदर्शित करने की आवश्यकता है।
साधना में,
साधना विघ्न-बाधाओं में साथ देने वाली जीवन-संगनी के रूप में देखता है।
साधना के मार्ग पर अग्रसर होती हैं।
साधना का आश्रय है। वहाँ जीवन की धर्म, अर्थ और काम की साधना की जाती है। पति-पत्नी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, सहायक हैं, मित्र हैं। दोनों का कार्य एक दूसरे के गुणों की अभिवृद्धि करना है, क्षुद्रताओं का उन्मूलन करना है और परस्पर एक अभिन्नता बनाये रखना है। इसके लिए प्रत्येक को संयम, सहनशीलता एवं स्वार्थ त्याग अपने अंदर विकसित करना चाहिए।
साधना भूमि है जिसमें मनुष्य को निज कर्त्तव्यों तथा अधिकारों, उत्तरदायित्व एवं आनन्द का ज्ञान होता है। मनुष्य को इस भूतल पर जो सच्चा और अकृत्रिम सौम्य और दुःख से मुक्त सुख प्राप्त हो सकता है वह कुटुम्ब का सुख ही है।
साधना करते हैं और योग के फल को प्राप्त करते हैं। अपने निजी सीमित स्वार्थ की दृष्टि को विस्तृत करके जब मनुष्य उसे स्त्री, पुत्र, पौत्र, परिजन आदि को फैलाता है, तब वह अहंभाव का विस्तार द्रुतगति से होने लगता है। फिर ग्राम, देश, विश्व से बढ़कर वसुधैव कुटुम्बकम की उसकी दृष्टि हो जाती है और सब कुछ अपना आत्मा का परमात्मा का दीखने लगता है, यही जीवन मुक्ति है।
साधना और तपस्या के द्वारा परम शान्ति और त्यागमयी बनाई जा सकती है। विनाश की अपेक्षा वृत्तियों का सही मार्गों में बहाव, स्वार्थ और लालसा से निकल कर प्रेम और त्याग के मार्गों में उनका प्रवाह हमारे लिए विशेष महत्व रखता है।
साधना को लेकर सदा व्यस्त रहता है, वह है “प्रवृत्ति को निवृत्ति के पथ पर परिचालित करना।” हमारे यहाँ वासना की प्रवृत्ति को माना है, किंतु साथ ही साथ उसने इस प्रवृत्ति के परिष्कार, उन्नति करण और अन्ततः निवृत्ति में परिणत करना यह फल माना है। वैवाहिक जीवन हमारे जीवन की एक स्टेज है, जो भावी जीवन के निर्माण में सहायक है। हम सदा से यह मानते आये हैं कि असंस्कृत और उच्छृंखल प्रवृत्ति साधना और तपस्या के द्वारा परम शान्ति और त्यागमयी बनाई जा सकती है। विनाश की अपेक्षा वृत्तियों का सही मार्गों में बहाव, स्वार्थ और लालसा से निकल कर प्रेम और त्याग के मार्गों में उनका प्रवाह हमारे लिए विशेष महत्व रखता है।
साधना का मधुर रहस्य जानने के लिए हम हिमालय की उस तुषार मंडित शिला पर चलें, जहाँ हिमालय की किशोरी पार्वती तपश्चर्या में निमग्न है। यही भारतीय गृहस्थाश्रम के मंगलमय स्वरूप का प्रथम दर्शन है। गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने से पूर्व रमणी को तपोमयी साधना में प्रवृत्त होना पड़ता है, क्योंकि जिस मंगलमय उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह अपने पवित्र सुँदर जीवन को
साधना से सम्पन्न अधीश्वर बनाया है। जीवन का सुख इस विद्याबल पर ही बहुत हदतक निर्भर है। ज्ञान प्राप्ति के कुछ उपाय ये है -
साधना की जाती है। पति-पत्नी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, सहायक हैं, मित्र हैं। दोनों का कार्य एक दूसरे के गुणों की अभिवृद्धि करना है, क्षुद्रताओं का उन्मूलन करना है और परस्पर एक अभिन्नता बनाये रखना है। इसके लिए प्रत्येक को संयम, सहनशीलता एवं स्वार्थ त्याग अपने अंदर विकसित करना चाहिए।
साधना द्वारा जनसेवा के कार्य हैं। यह सेवा शरीर, मन या शुभ विचारों के द्वारा हो सकती है। विश्व कल्याण के लिए जीने वाले व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी देवता है। वह अपनी बुद्धि एवं ज्ञान का विश्वहित के लिए बलिदान करता है। ज्ञान चर्चा द्वारा वह दूसरों का मन भी उच्च विषयों की ओर फेरता है।
साधना में ही पूर्ण शान्ति प्राप्त कर सकता है।
साधना में प्रवृत्त होना पड़ता है, क्योंकि जिस मंगलमय उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह अपने पवित्र सुँदर जीवन को
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-August
साधनाओं में गायत्री से बड़ी साधना दूसरी नहीं। महात्मा, तपस्वी और सिद्ध पुरुषों के चरणों में बैठकर उनका मन्तव्य भी यही पाया है कि गृही और विरागी दोनों ही प्रकार के योगी गायत्री द्वारा जो शान्ति पाते हैं, वह अन्य मार्ग से नहीं। अनेकों साधारण साधकों को छुटपुट साधनाओं से जो आत्मिक और साँसारिक लाभ प्राप्त करते अपनी आंखों से देखा है, उससे भी यही निष्कर्ष निकला है कि गायत्री सर्व शक्तिमान है। वह वस्तुतः भूलोक की कामधेनु है। दार्शनिकों, धर्मज्ञों और तत्व दर्शियों का मत है कि गायत्री के अक्षरों में छिपी हुई शिक्षाएं इतनी सर्वांगपूर्ण हैं कि उनके आधार पर संसार की समस्त उलझी हुई समस्याओं को सुलझाया जा सकता है।
साधनाएं करके आत्मकल्याण की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जायगा। केन्द्रीय तीर्थ मथुरा में भी स्थापित करने के लिए जितना कुछ प्रयत्न बन पड़ेगा, किया जायगा। आशा है कि माता की कृपा से वह भी पूरा हो जायगा और इस महान् तत्व ज्ञान की वास्तविक शोध करने वालों के लिए एक उत्तम तपोभूमि उपलब्ध होगी।
साधनाएं- सर्व साधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ।
साधनाओं की अनेक विधियाँ।
साधनाओं से जो आत्मिक और साँसारिक लाभ प्राप्त करते अपनी आंखों से देखा है, उससे भी यही निष्कर्ष निकला है कि गायत्री सर्व शक्तिमान है। वह वस्तुतः भूलोक की कामधेनु है। दार्शनिकों, धर्मज्ञों और तत्व दर्शियों का मत है कि गायत्री के अक्षरों में छिपी हुई शिक्षाएं इतनी सर्वांगपूर्ण हैं कि उनके आधार पर संसार की समस्त उलझी हुई समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त हमें व्यक्तिगत रूप से जो अनुभव हुए हैं, उनने हमारी श्रद्धा को असंख्य गुनी बढ़ा दिया है। अब हमारा सुनिश्चित विश्वास है कि गायत्री साधना करने वाले व्यक्ति का श्रम और समय कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता, उसे आशा जनक सत्परिणाम प्राप्त होकर रहते हैं।
साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
साधना के लिए हमारे पास बहुत ही थोड़ा समय रहता है, हम साँसारिक उलझनों में ही फंसे रहते हैं। एक दिन काल का नगाड़ा बज उठता है और हमें इस संसार से पराधीन अवस्था में विदा होना पड़ता है। विदाई के समय हम नाना प्रकार के विचारों में पड़ कर पश्चाताप करते हैं, पर “अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत” वाली कहावत के अनुसार हमारा रोना बेकार साबित होता है। इसी बात को स्पष्ट करने एवं ठीक तरह से समझने के लिए मैं एक लघु कथा सन्मुख प्रस्तुत करता हूँ। पाठक उस कहानी के द्वारा अपने कर्तव्यों को पहचान सकेंगे।
साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन
साधना और तपश्चर्याओं द्वारा उन गुप्त आत्मिक शक्तियों का विकास किया जाय, जो मनुष्य को महान बनाती हैं, अनेक सिद्धियों का द्वार खोलती हैं और परमात्मा के समीप ले पहुँचती है।
साधना को यदि समर्थ लोग अपना लें तो आज की आवश्यकता पूरी हो जाय और विदेशों से एक दाना भी अन्न न मँगाना पड़े।
साधना में लगे हुए बहुत से व्यक्तियों में होता है किंतु एकाग्रता धारण करने मात्र से ही कोई व्यक्ति परम दार्शनिक नहीं हो जाता। उसमें पक्षपात-हीनता का होना भी अत्यन्त आवश्यक होता है। जो व्यक्ति किसी विषय के एक ही पहलू को देखता है और दूसरे पक्ष की विशेषताओं की ओर से आँख बन्द कर लेता है उसमें देर तक किसी विषय पर चिंतन करने की योग्यता होने पर भी हम उसे दार्शनिक न कहेंगे क्योंकि पक्षपातपूर्ण होने के कारण वह वस्तु सत् के दर्शन न कर सकेगा। अतएव निष्पक्ष होना दार्शनिक का दूसरा गुण है। दार्शनिक के इस दूसरे गुण पक्षपातहीनता का दूसरा भाव यह है कि दार्शनिक में मानसिक स्वतन्त्रता होनी चाहिए अर्थात् वह किसी का पिछलग्गू न हो और उसमें किसी भी मत अथवा आचार्य के विचारों पर आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करने की क्षमता हो।
साधना का प्रवेश सूक्ष्म शरीर के उस भाग तक हो जाता है, जहाँ भाग्य को फेरने वाली कुँजी छिपी रहती है।
साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन
साधनाओं का साधन जिज्ञासु लोग कर सकें। साथ ही इस केन्द्र पर विद्यालय, चिकित्सालय, पुस्तकालय आदि सेवा संस्थाएं भी रहें। इस केन्द्रीय तीर्थ में एक गायत्री मन्दिर भी हो।
साधना कहते हैं।
साधना दूसरी नहीं। महात्मा, तपस्वी और सिद्ध पुरुषों के चरणों में बैठकर उनका मन्तव्य भी यही पाया है कि गृही और विरागी दोनों ही प्रकार के योगी गायत्री द्वारा जो शान्ति पाते हैं, वह अन्य मार्ग से नहीं। अनेकों साधारण साधकों को छुटपुट साधनाओं से जो आत्मिक और साँसारिक लाभ प्राप्त करते अपनी आंखों से देखा है, उससे भी यही निष्कर्ष निकला है कि गायत्री सर्व शक्तिमान है। वह वस्तुतः भूलोक की कामधेनु है। दार्शनिकों, धर्मज्ञों और तत्व दर्शियों का मत है कि गायत्री के अक्षरों में छिपी हुई शिक्षाएं इतनी सर्वांगपूर्ण हैं कि उनके आधार पर संसार की समस्त उलझी हुई समस्याओं को सुलझाया जा सकता है।
साधना का साधक बन गया, उगा नव प्रेमाँकुर है।
साधना करने वाले व्यक्ति का श्रम और समय कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता, उसे आशा जनक सत्परिणाम प्राप्त होकर रहते हैं।
साधना के फलस्वरूप सूक्ष्म शरीर के कुछ गुप्त कोषों, चक्रों, गुच्छकों, ग्रंथियों का विकास होता है, जिसके कारण दिव्य शक्तियों का बढ़ना अपने आप शुरू हो जाता है। बुद्धि की तीव्रता, शरीर की स्वस्थता, सत्पुरुषों की मित्रता, व्यवसायिक सफलता, कीर्ति, प्रतिष्ठा, पारिवारिक सुख-शान्ति, सुसन्तति, व्याधियों से निवृत्ति, शत्रुता का निवारण सरीखे अनेकों लाभ अनायास ही मिलने लगते हैं। कारण यह है कि आत्मबल बढ़ने से, दिव्य शक्तियाँ विकसित होने से, गुण, कर्म, स्वभाव में आशाजनक परिवर्तन हो जाने से, अनेक ज्ञात एवं अज्ञात बाधाएं हट जाती हैं और ऐसे सूक्ष्म तत्व अपने में बढ़ जाते हैं, जो दिन 2 उन्नति की ओर ले जाते हैं।
साधना मनुष्य के स्वभाव में सात्विक परिवर्तन करती है, सद्गुण बढ़ाती है, फलस्वरूप मानसिक अस्वस्थता नष्ट होकर मनोबल बढ़ता है और उसके द्वारा अनेकों लाभ प्राप्त होते रहते हैं।
साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-July
साधना से सत्परिणाम मिले हों तथा किन्हीं अन्य गायत्री साधकों के उत्साह वर्धक वृत्तान्त मालूम हों तो उन्हें लिख भेजने की कृपा करें ताकि बढ़िया कागज पर छपी रंगीन जिल्द की उन सुन्दर नई पुस्तकों उन अनुभवों को भी छापा जा सके। अभी निम्न पुस्तकें छपेगी-
साधना की, लाभ के अतिरिक्त हानि नहीं हुई।
साधना के विषय में नितान्त अनभिज्ञ था। परन्तु अखण्ड ज्योति में प्रकाशित गायत्री सम्बन्धी लेखों को पढ़कर हृदय में आकाँक्षा जोर पकड़ती गई कि हमें भी गायत्री-साधना अवश्य करनी चाहिए। एक ओर बात जिसने हमारी गायत्री-साधना को नियमित तथा सफलीभूत बनाया-इस साधना का और साधनाओं की अपेक्षा आडम्बर रहित होना था। विवेचना करने पर यही प्रतीत हुआ कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना की है उनने ‘गायत्री’ को आधार रखा है। सम्पूर्ण आध्यात्मिक तत्वों की चाबी गायत्री है। इसके बिना आत्म सिद्धि का ताला खुल नहीं सकता। कितने ही ऋषि-मुनि राम, कृष्ण, शंकर, विष्णु, ब्रह्मा, दुर्गा, सूर्य आदि को इष्ट मानकर उन्हें प्रसन्न करके शक्ति प्राप्त करने के लिए योग साधना करते रहे हैं कितनों ने निराकार ब्रह्म की उपासना की है। परन्तु हर एक को ‘गायत्री’ का प्रथम आश्रय अवश्य लेना पड़ा है।
साधना से होता है, अन्य साधनों से नहीं होता यह मेरा विश्वास है।
साधना को जो लोग किसी के मुँह से कुछ बातें सुनकर अपना लेते हैं वे अधूरी जानकारी के कारण एक तो ठीक प्रकार साधन नहीं कर पाने, दूसरे पूरी बातें मालूम न होने से उनके मन में संकल्प-विकल्प की धूप छाँह रहती है। जिसके कारण कई बार बीच में ही उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। ले भागे का ज्ञान बादल बरसने के समान अस्थायी है और गायत्री साहित्य के स्वाध्याय द्वारा मन में स्थिर ज्ञान और सुदृढ़ संस्कार जमाना ऐसा है जैसा निरन्तर बहने वाला निर्झर प्रवाह।
साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना अत्यंत निर्बल होती है। जो लोग रत्ती भर श्रम का लाख मन फल पाने का अमर्यादित लोभ करते हैं और प्रबल कर्म भोगों को एक माला फेर कर ही हटाना चाहते है उनको निराशा ही होती है। फिर भी जितना शुभ प्रयत्न वे कर लेते हैं वे किसी न किसी रूप में उनके लिए सहायक ही होता है। अपने को असफल समझने वाले गायत्री साधकों का प्रयत्न भी कभी व्यर्थ नहीं जाता, मनोकामना पूर्ण न होने पर भी किसी न किसी प्रकार सत्परिणाम अवश्य मिल जाता है।
साधनाओं की अपेक्षा माता को कम प्रिय होगी? मेरा अन्तःकरण कहता है कि - नहीं
साधना का हमें हो चुका है। हमारे एक मित्र के दस वर्षीय पुत्र का दिमाग कुछ खराब था और इस दिमागी खराबी के कारण एक दिन वह बगैर किसी को कुछ बताए घर से कहीं निकल गया। हमारे मित्र ने काफी ढूँढ़ा परन्तु कहीं पता नहीं चला। इस प्रकार एकमात्र पुत्र के खो जाने से मित्र महोदय बहुत चिन्तित और दुःखी रहने लगे। एक दिन उनका इस बाबत जिकर मुझसे आया, मैंने उन्हें वेद माता गायत्री की शरण में जाने को कहा और उन्हें गायत्री मन्त्र याद कर दिन में तीन समय उसका जाप करने को कहा।
साधना से लाभ हुआ। झिझकते हुए उन भद्र पुरुषों से पूछा कि क्या मैं भी गायत्री द्वारा लाभ उठा सकता हूँ? उनने मेरा परिचय पूछने के बाद उपासना के लिए प्रोत्साहन दिया और सारी विधि बता दी। दूसरे दिन से ही मैं साधना करने लगा। मेरा मन घर जाने को कर रहा था घर लौट आया।
साधना करना चाहते हैं पर ऐसी सुविधा प्राप्त करने से बहुधा साधकों को वंचित ही रहना पड़ता। कारण यह है कि अखण्ड ज्योति का प्रेस, दफ्तर एवं आचार्य जी का परिवार जिस छोटे से भाड़े के मकान में रहता है उसमें इतनी गुँजाइश नहीं है कि साधकों का भी रहना उसमें हो सके धर्मशालाओं की भीड़ और तीन दिन से अधिक न ठहरने का प्रतिबंध साधकों के लिए सुविधाजनक नहीं होता। बाहर से पहुँचने वाला व्यक्ति भोजन व्यय तो स्वयं कर सकता है पर साधना काल में ठहरने की व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकता। निराश होकर उसे लौटना पड़ता है। इस कठिनाई के कारण पचासों व्यक्ति गायत्री तप करके आत्म कल्याण के महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित रह जाते हैं।
साधना को नियमित तथा सफलीभूत बनाया-इस साधना का और साधनाओं की अपेक्षा आडम्बर रहित होना था। विवेचना करने पर यही प्रतीत हुआ कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना करके लाभ उठा सकते हैं। गायत्री सर्व शक्तिमान है उसकी शरण में जाने वाला साधक सब प्रकार की सफलता प्राप्त करता है। उसे किसी बात की कमी नहीं रहती।
साधना ही एक महान लाभ प्रतीत होने लगी। अब मैं पूर्ण निष्काम भाव से उपासना करता हूँ और उसका वह प्रतिफल पाता हूँ जो बड़ी से बड़ी कमाना पूर्ण होने की अपेक्षा अधिक सरस है। सकाम उपासना अन्ततः निष्काम मातृ श्रद्धा में बदल जाती है। ऐसा मैंने व्यक्तियों के उदाहरणों से देखा है। परन्तु यह ध्यान रखने की बात है कि प्रारम्भ में छोटी से छोटी ही कामना करनी चाहिए।
साधना में सिद्ध थे। वह कई बार आश्चर्यजनक कार्य लोक समूह के सामने भी करके दिखा देते थे। जैसे खाली बोतल को झट किसी द्रव्य से भरकर दिखा देना व लोगों को वह द्रव्य पिला भी देना।
साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना के फलस्वरूप मेरे स्वभाव में आकाश-पाताल का अन्तर हुआ है। जो बुराइयाँ पहले मुझ में थीं, वे अब धीरे-धीरे करके सब समाप्त हो गई हैं और ऐसे नये गुणों का आविर्भाव हुआ है जिनसे मुझे स्वयं हार्दिक प्रसन्नता है और मेरे शुभ चिन्तक उन्हें देखकर फूले नहीं समाते।
साधना ऐसी वैज्ञानिक पद्धतियाँ है जिनके द्वारा अन्तः चेतना में पात्रता उत्पन्न की जाती है, साधक जैसे-जैसे आन्तरिक बल एकत्रित करता जाता है वैसे ही वैसे उसके उस सूक्ष्म चुम्बक शक्ति का विकास होता है जो महामाया को अपनी ओर खींचती है, कृपा प्राप्त करती है और उसके अक्षय भण्डार से उपयुक्त वस्तुओं को उपलब्ध करती है दयालु माता है वह अपने पुत्रों को बहुत देने को तत्पर रहती है पर देती उन्हें ही है जो पात्र होते हैं अनधिकारी लोग बड़ी बड़ी लालसायें और कामनाएं करते हैं पर अपनी पात्रता बढ़ाने के लिए समुचित प्रयत्न नहीं करते। ऐसी दशा में वे बड़े-बड़े मनोरथ पूरे नहीं हो पाते जो साधना के तप में खरे उतरने वाले साधकों को ही उपलब्ध हो सकते हैं।
साधना का और साधनाओं की अपेक्षा आडम्बर रहित होना था। विवेचना करने पर यही प्रतीत हुआ कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना का बन्धन ऊपर लेना पड़ता है, हवन, दान पुण्य आदि में कुछ खर्च भी बढ़ता है, यह सब तात्कालिक हानियाँ ही है। व्रत, उपवास, तीर्थ यात्रा, संयम नियम आदि का झंझट और मित्र मंडली में उपहास यह सब बातें भी हानि में गिनी जा सकती हैं। भविष्य में इससे कोई लाभ होगा या नहीं इसका भी निश्चय नहीं, इस सब कारणों से कोई विरले ही आध्यात्मिकता के मार्ग को अपनाते हैं। जो अपनाते हैं वे सरल सा कार्यक्रम पूरा करते हैं रोज 2 का झंझट नहीं रहता। कथा प्रवचन सुनने या कीर्तन की सम्मिलित स्वर लहरी में सहयोग देने का कार्य भी सुगम है।
साधनाएं सफल नहीं होती साथ ही ताँत्रिक, कौल अवधूत, कापालिक, अधीर आदि के वाम मार्ग में जिस शक्ति की आवश्यकता पड़ती है उसका मूल उद्गम भी गायत्री ही है बिना गायत्री के जिन सावर मन्त्रों को लोग सिद्ध करते हैं वे क्षणिक चमत्कार दिखा कर शक्ति हीन हो जाते हैं जिनके मूल में ठोस शक्ति होगी वही सफलता देर तक ठहरेगी और कठिन कार्यों को भी पूरा करेगी। गायत्री से रहित मंत्र चिरस्थायी और तीव्र शक्ति सम्पन्न नहीं होते, उनके लिए किया गया श्रम बहुत कम लाभ दे पाता है।
साधना करे तो वह अपना ध्येय शीघ्र प्राप्त कर लेगा। यह पंक्तियाँ में किसी पढ़े सुने आधार पर नहीं कहता वरन् अपनी गायत्री उपासना में अनुभव के आधार पर उपलब्ध हुए सुदृढ़ विश्वास को प्रकट कर रहा हूँ।
साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना करने के लिए चल देता हूँ। रास्ते में कब्रिस्तान, ऊंचे-ऊंचे टीले, झाड़ी, साँप, बिच्छू, जंगली जानवर आदि अनेक भय के कारण हैं पर मैं उस भयानक निर्जन मार्ग पर पूर्ण निर्भयता के साथ चला जाता हूँ।
साधना केवल अपने तक ही सीमित रखने की वस्तु नहीं है। उसे दूसरों को भी देना चाहिए। जो लोग केवल अपने ही मतलब में चौकस है और दूसरे बन्धुओं को सन्मार्ग पर प्रेरित करने के लिए प्रयत्न नहीं करते, वे स्वार्थी माता को उतने प्रिय नहीं हो सकते जितने कि अपनी परवाह कम करके दूसरों की सेवा में ध्यान देन वाले साधक प्रिय हैं।
साधना का अंग है। जैसे जप और ध्यान करना आवश्यक है वैसे ही गायत्री साहित्य का नित्य स्वाध्याय करना भी प्रत्येक गायत्री साधक का नित्य कर्म होना चाहिए। इस आवश्यक कर्तव्य की उपेक्षा करके जो लोग केवल जप ही किया करते हैं उनकी अधूरी साधना एकाँगी होने से निर्बल रहती है।
साधना द्वारा अपनी योग्यता और क्षमता को इतना परिपुष्ट कर लें कि विकराल दांतों वाली असुरता से सफलतापूर्वक संघर्ष किया जा सके। हर युद्ध का एक झंडा, एक उद्देश्य, एक लक्ष्य होता है। इस दैवी महाभारत की, परम पुनीत सात्विकता की, प्रतीक ध्वजा गायत्री है। विश्व मानव के अन्तः प्रदेश पर दैवी शक्ति का चक्रवर्ती शासन स्थापित करना इसका लक्ष्य है। तीर, तलवार, के हथियार नहीं इस युद्ध के सैनिकों को आत्मबल, उज्ज्वल चरित्र, तपश्चर्या त्याग, संयम और ईश्वर विश्वास के अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होना पड़ेगा।
साधना करते रहे हैं कितनों ने निराकार ब्रह्म की उपासना की है। परन्तु हर एक को ‘गायत्री’ का प्रथम आश्रय अवश्य लेना पड़ा है। बिना गायत्री के कोई भी तप या साधन सफल नहीं हो सकता।
साधना से आध्यात्मिक लाभ।
साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना और आवश्यक है। नया जन्म लेकर उस कमी को पूरा करना संदिग्ध था। कौन जाने अगले जन्म में वे प्राप्त होती या न होती। इसलिए वर्तमान सुयोग से लाभ उठाकर जीवन लक्ष्य तक पहुँच जाना ही श्रेयकर था।
साधना को अपनाये हुए लगभग एक वर्ष हुआ है कि मेरे जीवन का कायाकल्प ही हो गया। सद्बुद्धि का आश्चर्यजनक विकास हुआ। नशेबाजी वेश्यागमन आदि की सभी बुराइयाँ छूट गई। पिताजी तथा विमाता से मेरी पूर्ण सद्भावना है, फल स्वरूप उनका वात्सल्य भी पर्याप्त मात्रा में मिल रहा है। राजसिक, तामसिक आहार छोड़कर सात्विक आहार अपना लेने से स्वास्थ्य में सुधार हुआ है।
साधना गृह में पदार्पण कर रही हैं। समय 2 पर जो माता की कृपा का परिचय प्राप्त होता रहता है उससे मेरी श्रद्धा निरन्तर बढ़ रही है।
साधना पथ पर चलकर कष्टों से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
साधना से मुझे वस्तुतः कोई प्रेम न था। अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिए गायत्री की परीक्षा कर देखने की इच्छा हुई।
साधना ने हमारे समस्त घर में शान्ति स्थापित कर दी है।
साधना के तप में खरे उतरने वाले साधकों को ही उपलब्ध हो सकते हैं।
साधना में तल्लीन रहते हैं। नेत्रों से उन्हें नहीं दीखता, पर दिव्य नेत्र इतने प्रदीप्त हैं कि उन्हें मनुष्य के छिपे हुए अन्तस्तल को देखने में देर नहीं लगती। रात्रि के 10 बजे से लेकर दिन के 12 बजे तक 24 घंटों उनका मौन रहता है 10 घंटे के लिए उनकी वाणी खुलती है, तब उससे अमृतमय परमार्थिक प्रवचन की निसृत होते हैं।
साधना से बिना इच्छा किये अद्भुत लाभ प्राप्त हुये हैं। उनमें से थोड़े से का वर्णन इस प्रकार का है (क) कई बार या अन्य किसी प्रिय व्यक्ति के रोग ग्रसित होने पर मन में ज्ञान प्राप्त हुआ कि इस रोग का अमुक उपचार किया जावे तो लाभ होगा अन्य था अमुक प्रकार की व्याधि उत्पत्र होगी। इन संकेतों से तदनुसार ही फल मिला (ख) तीन वर्ष पूर्व मैं एक ऐसे कार्य में प्रवृत्त हुआ था जो मेरी बुद्धि, शक्ति , पराक्रम से बाहर था। उस कार्य में जहाँ त्रुटि होती तो स्वयं एक अव्यक्त शक्ति साथ ही साथ बताती जाती कि यहाँ यह त्रुटि हुई है सुधार लो, तो उसी त्रुटि को अन्य प्रकार से जाँच करने पर वह त्रुटि विदित हो जाती व सुधार ली जाती। इस प्रकार वह कार्य भी अलौकिक रीति से पूर्ण हो गया।
साधना के सत्परिणाम।
साधना के करने के फलस्वरूप मेरे स्वभाव एवं आचरण में आश्चर्यजनक परिवर्तन स्वयमेव हो गया है। कलह आदि की बात दूर रही प्रत्येक संपर्क में आने वाले व्यक्ति के लिए हृदय में खुद ब खुद प्रेम, सहानुभूति, उदारता और सेवा के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। एक प्रकार का ऐसा प्रभाव संपर्क में आने वाले व्यक्ति पर पड़ता है उसके आचरण से भी प्रेम, सहानुभूति, उदारता और सेवा के भाव टपकने लगते हैं हमारे घर में नीचे ऊपर लगभग आठ परिवार और रहते हैं। और उन सब में जरा-जरा सी बात पर प्रतिदिन समय कुसमय लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौज होती रहती थी। परन्तु अब यह बहुत हद तक बन्द हो गई है।
साधना काल में दो बार मेरे प्राण अपनी यात्रा पूरी करने को तैयार हुए हैं, पर किसी गुप्त शक्ति द्वारा वापिस लौटा लिए गये हैं। मैं अपना प्राण ब्रह्म रंध्र में होकर ले जाना चाहता हूँ ताकि जीव ऊर्ध्व गति को प्राप्त हो, पर वह स्थिति प्राप्त नहीं हो पाई है, इसलिए शेष कमी को पूरी करने के लिए प्राण धारण किये रहना उचित प्रतीत होता है और इस पूर्ति तक के लिए मेरे गुप्त सहायक बार-बार मेरी यात्रा को रोक भी देते हैं।
साधना करे या न करे केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
साधना एकाँगी होने से निर्बल रहती है।
साधना काल में ठहरने की व्यवस्था स्वयं नहीं कर सकता। निराश होकर उसे लौटना पड़ता है। इस कठिनाई के कारण पचासों व्यक्ति गायत्री तप करके आत्म कल्याण के महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित रह जाते हैं।
साधना और तपश्चर्या करते थे। गीता में भगवान ने स्वयं कहा है- “गायत्री छंद सामहम्” अर्थात्- गायत्री मैं ही हूँ। भगवान की उपासना के लिए गायत्री से बड़ा और कोई मंत्र नहीं हो सकता।
साधना के बीच अचानक दिसम्बर के अन्त और जनवरी के आरम्भिक सप्ताहों में एक अद्भुत घटना घटी। शरीर यकायक दुर्बल हो गया। हाथ पाँचों की उंगलियों से ठंडी फुहार निकलना आरम्भ हो गई। देह में शिथिलता आ गई और कुछ दिव्य अलौकिकता का अनुभव होने लगा। शरीर, इन्द्रिय मन, बुद्धि में एक विशेष प्रकार की चेतनता का प्रकाश मिलता था।
साधना गायत्री से बढ़कर और कोई नहीं है।
साधना करने लगा। मेरा मन घर जाने को कर रहा था घर लौट आया। अब मेरे स्वभाव में और विचारों में भारी हेर फेर हो रहा था। खेती करने की इच्छा हुई। अपने खानदान वालों से पश्चाताप और क्षमा याचना के साथ।
साधना में रुचि बढ़ी। समय के कुचक्र से हम दोनों बिछुड़ गये उनकी बदली दूसरी जगह हो गई मेरी बदली दूसरी जगह।
साधना का फल अब जग का कल्याण!
साधनाओं की अपेक्षा आडम्बर रहित होना था। विवेचना करने पर यही प्रतीत हुआ कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना करने से साधकों को निश्चित पदार्थ ही मिलता है न कि दुष्प्राप्य वस्तु।
साधना में तत्काल कोई लाभ नहीं होता, बल्कि समय खर्च करना पड़ता है। नीरस कर्म काण्ड की नियमित साधना का बन्धन ऊपर लेना पड़ता है, हवन, दान पुण्य आदि में कुछ खर्च भी बढ़ता है, यह सब तात्कालिक हानियाँ ही है। व्रत, उपवास, तीर्थ यात्रा, संयम नियम आदि का झंझट और मित्र मंडली में उपहास यह सब बातें भी हानि में गिनी जा सकती हैं। भविष्य में इससे कोई लाभ होगा या नहीं इसका भी निश्चय नहीं, इस सब कारणों से कोई विरले ही आध्यात्मिकता के मार्ग को अपनाते हैं। जो अपनाते हैं वे सरल सा कार्यक्रम पूरा करते हैं रोज 2 का झंझट नहीं रहता।
साधना कर रहा हूँ इसके द्वारा मुझे पूर्ण सहायता मिल रही है। मेरे एक मित्र को गायत्री मंत्र के सवा लक्ष के अनुष्ठान से पुत्र रत्न का लाभ हुआ और एक दूसरे मित्र ने गायत्री माता की शरण में जाने से मृत्यु के मुख से अपने पुत्र को बचा लिया।
साधना से थोड़े काल में हुई जिनका वर्णन संक्षेप से नीचे दिया जावेगा।
साधना है और यह मनुष्य को अलौकिक गुणों से युक्त बना देती है।
साधना का शैशव है। मगर मुझे इतने में ही अनेकों लाभ हुए हैं। मन की चंचलता कम होकर विषयों में अरुचि उत्पन्न हो रही है। दैनिक जीवन आये दिन ऐसे अनुभव होते हैं कि अनेक बातें प्रतिकूल होते हुए भी अनुकूल हो जाती हैं। मुझे विश्वास है कि जैसे-जैसे मेरी श्रद्धा बढ़ेगी वैसे-वैसे कल्याण का मार्ग अधिक प्रशस्त होता जायगा।
साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा माता को कम प्रिय होगी? मेरा अन्तःकरण कहता है कि - नहीं
साधना है।
साधना से उनको वचन सिद्धि प्राप्त हो गई थी तभी तो वीदावत का परिवार इनके आशीर्वाद से करीब बीस लाख के सम्पत्ति का मालिक है।
साधना में लगे रहते हैं। यह शिक्षा और भावना गायत्री माता ने मेरे हृदय में प्रेरित की है।
साधना के लिए उत्साह बढ़े।
साधना से भी अन्तः भूमि में आशाजनक शक्ति संचार होता हुआ अनुभव होगा। जो सज्जन स्वयं उपासना में प्रवृत्त हैं वे दूसरों को इस मार्ग में प्रवृत्त करें। गायत्री का अधिकाधिक लोगों में प्रसार करना एक ऐसा आध्यात्मिक पुण्य है जिसकी तुलना में अन्य सभी पुण्य हल्के बैठते हैं।
साधना की तपोभूमि हो। उन्हें सफल गृहस्थ-योगी कहा जा सकता है। प्रातःकाल तीन बजे उठकर गायत्री का जप करने लग जाना उनका नित्य नियम था। वे अक्सर कहा करते थे कि गायत्री पर श्रद्धा करने वाले मनुष्य की पवित्र आत्मा हो जाती है, और उसके सब कार्य यज्ञमय होते हैं। मैं इस छोटे से परिवार को ईश्वर की अमानत समझ कर वैसी ही उच्च भावना से सेवारत रहता हूँ जैसे कि योगी अपनी साधना में लगे रहते हैं।
साधना अवश्य करनी चाहिए। एक ओर बात जिसने हमारी गायत्री-साधना को नियमित तथा सफलीभूत बनाया-इस साधना का और साधनाओं की अपेक्षा आडम्बर रहित होना था। विवेचना करने पर यही प्रतीत हुआ कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा धार्मिक बन्धन एवं नियमों से मुक्त तथा आडम्बर से रहित है और इस कारण सहज ही यह साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए स्वयं स्वाध्याय करना और दूसरों को परमार्थ पथ पर लगाने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना यह दोनों ही कार्य पूरे हो सके इसके लिए अपने साधक बन्धुओं के सामने मैं एक कार्यक्रम उपस्थित करता हूँ, वह यह कि हममें से हर एक के घर में छोटा ‘गायत्री पुस्तकालय’ हो। अखण्ड ज्योति ने अब तक 12 पुस्तकें छापी हैं। इन सभी को लेकर एक छोटा पुस्तकालय बना लिया जाय। ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका पुस्तकालय में आती रहे और भी पुस्तकें गायत्री सम्बन्धी कहीं से मिले या भविष्य में अखण्ड ज्योति से छपे तो उन्हें भी समय-समय पर इस पुस्तकालय में बढ़ाते रहा जाय।
साधना करता रहा तो किसी भी सिद्धि की प्राप्ति मुझे इतनी मात्रा में नहीं हुई जितनी कि इसके साधना से थोड़े काल में हुई जिनका वर्णन संक्षेप से नीचे दिया जावेगा।
साधना, सुख का देती है तू जन को दान!
साधना काल में एक बार मुझे एक बार अर्ध निद्रित अवस्था में माता का साक्षात्कार भी हुआ वे मौलवी साड़ी पहने अत्यंत दिव्य स्वरूप थीं, हाथ में कुछ लिए हुए मुझे दर्शन दिया। मैं उनसे नत मस्तक दर्शन होकर कुछ प्रश्न कर रहा था। जिसे सुनकर काकाजी ने मुझे जगा दिया। जगाने पर मुझे बहुत अफसोस हुआ न जाने माता क्या कह रही थी मैं उसे सुन न पाया।
साधना से पूर्व अन्य प्रणालियों से साधना करता रहा तो किसी भी सिद्धि की प्राप्ति मुझे इतनी मात्रा में नहीं हुई जितनी कि इसके साधना से थोड़े काल में हुई जिनका वर्णन संक्षेप से नीचे दिया जावेगा।
साधना द्वारा अमुक लाभ उठाये हैं। मेरा मन भी ललचाया। तात्कालिक लाभ सभी को इष्ट है, मुझे भी इसी की आवश्यकता थी। अपना लाभ या स्वार्थ जिस तरह से भी पूरा होता है यही मार्ग ठीक है चाहे वह गायत्री उपासना हो, चाहे व्यापार, चाहे नौकरी, चाहे और कुछ साधना से मुझे वस्तुतः कोई प्रेम न था। अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिए गायत्री की परीक्षा कर देखने की इच्छा हुई।
साधना मनुष्य के दैनिक जीवन का अंग बन सकती है। इन बातों से प्रेरित होकर गायत्री साधना आरम्भ कर दी और वास्तव में इस साधना को करते हुए कभी भी अपने दैनिक कार्यक्रम में किसी प्रकार की कठिनाई अथवा अड़चन अनुभव नहीं हुई।
साधना किया करते हैं और दोपहर में नित्य प्रति हवन करते हैं तथा एक बार ही भोजन करते हैं। उनके चेहरे पर एक अनोखा तेज है। वाणी में मधुरता है, संस्कृत का उदाहरण तो उनका इतना शुद्ध है कि प्रशंसा से बाहर है उनका घर धन-+धान्य से परिपूर्ण है और सभी प्रकार से सुख शान्ति है। उस कुटी पर उनके गुरु बाल ब्रह्मचारी हैं। उन्होंने हमारे पिता के कहने पर कि इसको विद्या नहीं आती है मुझे मंत्र दिया था और कहा था कि उसके जप मात्र से बुद्धि तीव्र हो जायेगी।
साधना करना भी बड़ा अच्छा रहता है। इससे परीक्षार्थी को पिछला पढ़ा हुआ आसानी से याद हो जाता है और परीक्षा काल में चित्त शान्त रहने से प्रश्न पत्रों का तात्पर्य भली प्रकार समझने की सुविधा होती है। अक्सर विद्यार्थी लोग परीक्षा काल में उतावली, घबराहट और भय के कारण अपने मानसिक संतुलन को डाँवाडोल कर लेते है। फलस्वरूप अच्छी तैयारी होते हुए भी वैसे उत्तर नहीं लिख पाते जैसे कि लिखे जाने चाहिए। फेल होने का बहुधा यही कारण होता है।
साधना सर्वशक्ति मान साधना है और यह मनुष्य को अलौकिक गुणों से युक्त बना देती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-February
साधना अपने आप होती चलती है। यह ईश्वर का स्वयं घोषित सबसे छोटा नाम है। साथ ही गायत्री गीता में बताया हैं कि वह ईश्वर न्यायकारो, प्रभु, समदर्शी, अविनाशी, चैतन्य, आनंदस्वरूप, नियमरुप, निराकार एवं विश्व आत्मा हैं। इन नामों में जो महत्वपूर्ण तत्व ज्ञान छिपा हुआ है उसे जान कर उस को आचरण रूप से लाकर हमें ॐ की उपासना करनी चाहिए।
साधनाओं में लग जाइये, तभी आप परमानन्द की प्राप्ति कर सकेंगे। ताश, सिनेमा और धूम्रपान में व्यर्थ समय को बिताने से क्या आपको असली शाँति मिल सकती है? इस साँसारिक जीवन में इन्द्रियलोलुपता और विषय-वासना के क्षणिक सुख में भटकते रहने से क्या, आपस के लड़ाई झगड़े में या व्यर्थ के बकवास में क्या आपको सच्चा आनन्द मिल सकता है?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-May
साधनाएँ (3) गायत्री का वैज्ञानिक आधार (4) अनादि गुरु मन्त्र गायत्री है इनके अतिरिक्त (1) गायत्री के चौदह रत्न प्रथम भाग (2) गायत्री के चौदह रत्न द्वितीय भाग (3) विपत्ति निवारिणी गायत्री , यह तीन पुस्तकें अलग है इनकी पाठ्य सामग्री तीन बड़े ग्रन्थों से अलग है । जिन्होंने गायत्री महाविज्ञान के तीनों भाग मँगा लिये हैं। उन्हें भी इन पिछली तीन पुस्तकों को मँगाना चाहिए। छोटी 5+3 इन आठों पुस्तकों का मूल्य आना है ।
साधना मेरी नहीं,
साधना हूँ॥
साधना। (12) गृहस्थ योग। (13) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार। (14) विचार संचालन विद्या। (15) सुखी वृद्धावस्था।
साधना मेरी नहीं, मैं ही तुम्हारी साधना हूँ॥
साधना हूँ।
साधना। (8) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। (9) आन्तरिक उल्लास का विकास। (10) आगे बढ़ने की तैयारी। (11) आध्यात्म धर्म का अवलम्बन।
साधनाएं। (18) योग के नाम पर मायाचार। (19) जादूगरी या छल। (20) सम्मोहन विज्ञान।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-September
साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
साधना पथ पर अग्रसर हो रहे हैं और माता के चरणों में अपना मस्तक झुका रहे हैं। गायत्री प्रचार और गायत्री उपासकों का एक सूत्र में आबद्ध होना भी इसी आध्यात्मिक सूर्योदय की करुण किरणें हैं। आइए इन किरणों का समुचित आदर करें।
साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन
साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन
साधनाएं- सर्व साधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ।
साधना से उत्पन्न होता है। जब तक मन निरवलम्ब नहीं हो जाता, पुरुषार्थी को स्वरूप का ज्ञान नहीं होता पर मन का सहज स्वभाव आत्मा से इतर वस्तु पर अवलम्बित होकर रहता है। उसे अपनी इस आदत से मुक्त करने में जितना प्रयास करना पड़ता है, वह कल्पनातीत है।
साधना, परमार्थ आत्म निमार्ण की ओर किन्हीं विरलों का ही ध्यान जाता है। इसलिए आमतौर से धर्म प्रचारक अपने प्रयत्न के परिणामों के सम्बन्ध में प्रायः निराश ही रहते हैं।
साधनाओं की अनेक विधियाँ।
साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-April
साधना से अहश्य वस्तुओं का देखना
साधनाएं, 21-त्राटक द्वारा मैस्मरेजम की वेधक दृष्टि प्राप्त करना, 22- रूप तन्मात्रा की साधना से अहश्य वस्तुओं का देखना
साधना निष्फल नहीं जाती। सद्बुद्धि के रूप में, सद्गुणों के रूप में, आत्मबल के रूप में एवं दैवी सहायता के रूप में किसी न किसी प्रकार उसका सत्परिणाम अवश्य प्राप्त होता है।
साधना में प्रवृत्ति क्यों हुई? (2) अन्य साधनाओं की अपेक्षा आप गायत्री को महत्व क्यों देते हैं? (3) आपको इस साधना द्वारा अपने गुण, कर्म, स्वभावों में क्या अन्तर हुआ प्रतीत होता है। (4) क्या आपको किसी कष्ट का निवारण या सौभाग्य का उदय गायत्री द्वारा हुआ? यदि हुआ तो इस बात का क्या प्रमाण है कि उसका कारण गायत्री ही है (5) आपकी गायत्री साधना किस विधि से होती है।
साधना, 28-इड़ा पिंगला और सुषुम्ना की कार्य प्रणाली, 29- स्वर विद्या के रहस्य, 30-ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थियों के खोलने का मार्ग, 31-प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश, का विस्तृत परिचय और साधन। 32-सहज समाधि, 33-अनहदनोद और सुरत योग, 34- पक्षी करण विद्या, 35- तुरीयावस्था की स्थिति 36-गायत्री का भयंकर तन्त्र प्रहार, 37-मन्त्र दीक्षा का उद्देश्य, 38-अग्निदीक्षा का प्रयोजन, 39-ब्रह्म दीक्षा का रहस्य, 40-गायत्री मअरी 41-गायत्री का मन्त्रार्थ आदि अनेक आध्यात्मिक विषयों की विवेचना, वैज्ञानिक, प्रामाणिक और अनुभव पूर्ण आधार पर की गई है साथ ही साधना विधि ऐसी अच्छी तरह लिखी गई है जिसे पढ़कर सारी बातें भली प्रकार समझने आ जाती है।
साधना द्वारा अभ्यास करने का प्रयत्न नहीं किया है। किसी धार्मिक सिद्धान्त में अपनी सम्मति दे देना, प्रातः और रात्रि को थोड़ी देर आंखें बन्द कर लेना, अपने आपको, अन्तर वासी और साक्षी को धोखा देने के लिये आध्यात्मिक दिनचर्या के पालन करने का थोड़ा-सा प्रयत्न करना, और बेपरवाही के साथ अन्यमनस्कता से कुछ सद्गुणों का संग्रह कर लेना और अपने धर्म गुरु के उपदेशों का पालन करने का हल्का सा प्रयत्न कर लेना ही पर्याप्त नहीं होगा। इस प्रकार की मनोवृत्ति को बिल्कुल छोड़ देना होगा। साधक को शास्त्रों की आज्ञा और अपने गुरु के उपदेशों का अक्षरशः पालन करना चाहिए। मन के साथ नर्मी बिल्कुल नहीं बरतनी चाहिये।
साधना के आधार पर मनुष्य को जो विशेषताएँ एवं योग्यताएँ प्राप्त होती हैं उनके कारण उसकी जीवन यात्रा तेजी से आनन्द एवं कल्याण की ओर बढ़ती है।
साधना नहीं की है। वे केवल बुद्धि की उन्नति में ही लग रहे हैं। कितने खेद की बात है।
साधना विधि ऐसी अच्छी तरह लिखी गई है जिसे पढ़कर सारी बातें भली प्रकार समझने आ जाती है।
साधना द्वारा अपने गुण, कर्म, स्वभावों में क्या अन्तर हुआ प्रतीत होता है। (4) क्या आपको किसी कष्ट का निवारण या सौभाग्य का उदय गायत्री द्वारा हुआ? यदि हुआ तो इस बात का क्या प्रमाण है कि उसका कारण गायत्री ही है (5) आपकी गायत्री साधना किस विधि से होती है। (6) अन्य गायत्री उपासकों के अनुभवों एवं सफलताओं के सम्बन्ध में जो आपको जानकारी हो उसे लिखें (7) गायत्री के सम्बन्ध में भ्रमों का निवारण आदि।
साधना की। वे कैसा स्वराज्य चाहते थे इसका उत्तर एक शब्द में “रामराज्य” है। रामराज्य हो उनका स्वराज्य था। केवल विदेशी शासकों को हटा कर देशी नौकरशाहों के हाथ में सत्ता चली जाय तो इतने मात्र से देश को भला नहीं हो सकता। जनता को ऐसे ही राज्य की आवश्यकता है।
साधना के गुप्त रहस्य इस ग्रन्थ में भली प्रकार समझा दिये गये हैं। योग विद्या पर इतनों सर्वांग पूर्ण और प्रामाणिक पुस्तक अन्यत्र मिलना कठिन है। हजारों योग ग्रन्थों, एवं सिद्ध पुस्तकों के अनुभवों का निचोड़ इनमें भरा हुआ है। पुस्तक में दिये हुए विषयों का संक्षित परिचय नीचे जा रहा है, इससे पाठक पुस्तक की उपयोगिता को आसानी से समझ सकते हैं
साधना कहते हैं।
साधनाओं की अपेक्षा आप गायत्री को महत्व क्यों देते हैं? (3) आपको इस साधना द्वारा अपने गुण, कर्म, स्वभावों में क्या अन्तर हुआ प्रतीत होता है। (4) क्या आपको किसी कष्ट का निवारण या सौभाग्य का उदय गायत्री द्वारा हुआ? यदि हुआ तो इस बात का क्या प्रमाण है कि उसका कारण गायत्री ही है (5) आपकी गायत्री साधना किस विधि से होती है। (6) अन्य गायत्री उपासकों के अनुभवों एवं सफलताओं के सम्बन्ध में जो आपको जानकारी हो उसे लिखें (7) गायत्री के सम्बन्ध में भ्रमों का निवारण आदि।
साधना किस विधि से होती है। (6) अन्य गायत्री उपासकों के अनुभवों एवं सफलताओं के सम्बन्ध में जो आपको जानकारी हो उसे लिखें (7) गायत्री के सम्बन्ध में भ्रमों का निवारण आदि।
साधनाएं (5-6) गायत्री के 14 रत्न (प्र॰भा॰।=), (7) अनादि गुरु मंत्र गायत्री (8) विपत्ति निवारण गायत्री।=), (9) सर्व शक्तिवान गायत्री =)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-June
साधना एवं लोक सेवा द्वारा यश प्राप्त करने की आकाँक्षा आत्मा, की भूख है। इसे प्राप्त करने से आन्तरिक सन्तोष प्राप्त होता है। और अन्तरात्मा में उत्साह, आनन्द एवं उल्लास की अभिवृद्धि होती है। इस प्रोत्साहन से, सफलता से मनोबल बढ़ता है। और आगे अधिक उत्साह से, ऐसे पुण्य कार्य, सतोगुणी आचरण करने की इच्छा होती है जो अपना लोक परलोक सुधारने, पुण्य संचय करने के लिए आवश्यक है।
साधना का यहीं से श्रीगणेश होता है। और यहीं से प्रकाश की किरणें मानस पर उतरना या दिखाई देना प्रारम्भ हो जाती हैं।
साधना।
साधना करने की आवश्यकता होती है।
साधना रथ के दो पहिए होते हैं। 1-आत्मा कल्याण के लिए तप कराना और 2-दूसरों के कल्याण के लिए प्रचार करना। गायत्री जयन्ती के इस पुण्य अवसर पर दोनों ही प्रकार जयन्ती के इस पुण्य अवसर पर दोनों ही प्रकार का श्रद्धांजलियां माता के चरणों पर समर्पित की जानी चाहिए।
साधना से अपने भीतर छिपे हुए अनेकों गुप्त शक्ति केन्द्र खुल जाते हैं और अन्तस्तल में सात्विकता की निर्झरिणी बहने लगती है। विश्व व्यापी अपनी प्रबल चुम्बक शक्ति से खींचकर अन्तः प्रदेश में जमा कर देने की अद्भुत शक्ति गायत्री में मौजूद है। इन सब कारणों से कुबुद्धि का शमन करने में गायत्री अचूक रामबाण मंत्री की तरह प्रभावशाली सिद्ध होता है। इस शमन के साथ-साथ अनेकों दुःखों की समाप्ति हो जाना भी पूर्णतया निश्चित है। गायत्री देवी प्रकाश की वह अखंड ज्योति है जिसके कारण कुबुद्धि का अशानान्धकार दूर होता है और अपनी वही स्वाभाविक स्थिति प्राप्त हो जाती है जिसको लेकर आत्मा इस पुरायमयी धरती माता की परम शान्तिदायक गोदी में किलोल करने आया है।
साधना का नाम भक्ति है। इसी भक्ति से नशे में झूमकर ऋषि को आत्मा पुकार उठती है- ‘अहं ब्रह्म’
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-December
साधनाओं के भी प्राणमय कोष को सुव्यवस्थित कर सकता है। प्राण शक्ति का विकास कर सकता है।
साधना में ही ज्ञान और शान्ति है।
साधना करना अपनी अलग अकेली साधना की अपेक्षा अनेक गुना उत्तम है। लंकाध्वंस के लिए वानरों को और गोवर्धन उठाने में ग्वाल बालों को जो श्रेय प्राप्त हुआ था, वह इस महान यज्ञ के ऋत्विजों को भी प्राप्त होगा। यों साधारण रीति से भी जो लोग श्रद्धापूर्वक माता का आँचल पकड़ते है उन्हें आशाजनक परिणाम प्राप्त होता है। हमें अपने दीर्घ कालीन अनुभव के आधार पर यह सुनिश्चित विश्वास है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। परन्तु इस यज्ञ में सम्मिलित होकर साधना करने के सत् परिणाम की आशा तो बहुत अधिक की जा सकती है।
साधना की अपेक्षा कुछ अधिक जप और तप करना चाहिए।
साधना में, जिसकी प्राप्ति के लिए सृष्टि के आरम्भ से मनुष्य लगा हुआ है, जिसके लिए उसने समाज की रचना की और सभ्यता का विकास किया और खान में, अज्ञान में प्रतिक्षण जिस आनन्द की खोज और यात्रा जारी है, उसे हम पाते क्यों नहीं हैं? उसका आज इतना अभाव क्यों हो रहा है? गृह-गृह में कलह क्यों है? स्त्रियाँ पुरुषों को दोष देती हैं, और पुरुष स्त्रियों को ताना देते हैं। युवक बूढ़ों को कोसते हैं, और बूढ़ों का कहना है कि यह सारी आफत युवकों की लाई हुई है।
साधना किसी जाति विशेष के लिए नहीं होगी। जितनी जातियाँ हैं, उन सब की मुक्ति और शुभ कामना ही हमारी चिन्ता का मुख्य उद्देश्य होगा।
साधना के कहीं भी किसी को सिद्धि नहीं मिली है।
साधना से मिलनी सम्भव नहीं है। इस सम्मिलित तपश्चर्या से संसार का भी लाभ होगा और अपना भी। लोक कल्याण के लिए किया हुआ पुण्य परमार्थ अपने लिए भी कल्याणकारक ही होता है। तप का धन ही मनुष्य जीवन का वास्तविक धन है। इसे संचित करना धन जमा करने से अधिक बुद्धिमानी की बात है।
साधना पूरी की जा सकती है और हमारा उधार पीछे चुकाया जा सकता है।
साधना करने के सत् परिणाम की आशा तो बहुत अधिक की जा सकती है।
साधना की अपेक्षा अनेक गुना उत्तम है। लंकाध्वंस के लिए वानरों को और गोवर्धन उठाने में ग्वाल बालों को जो श्रेय प्राप्त हुआ था, वह इस महान यज्ञ के ऋत्विजों को भी प्राप्त होगा। यों साधारण रीति से भी जो लोग श्रद्धापूर्वक माता का आँचल पकड़ते है उन्हें आशाजनक परिणाम प्राप्त होता है। हमें अपने दीर्घ कालीन अनुभव के आधार पर यह सुनिश्चित विश्वास है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। परन्तु इस यज्ञ में सम्मिलित होकर साधना करने के सत् परिणाम की आशा तो बहुत अधिक की जा सकती है।
साधना आवश्यक होती है, उसी प्रकार नानाविधि पाप तापों से आस देने वाली इस घनघोर अन्धकारमयी निशा का परिवर्तन करके शान्तिदायक, सतोगुणी उषा के स्वागत में यह यज्ञ किया जा रहा है। इसमें सम्मिलित होना हर एक जागृत आत्मा का पवित्र कर्त्तव्य है।
साधना है जिसको अपना कर हर कोई मनुष्य बिना यौगिक साधनाओं के भी प्राणमय कोष को सुव्यवस्थित कर सकता है। प्राण शक्ति का विकास कर सकता है।
साधनाओं द्वारा भी प्राण शक्ति का विकास होता है। परन्तु जीवन में उपरोक्त चार सद्गुणों को अधिकाधिक मात्रा में सम्मिलित करते चलना भी एक ऐसी व्यवहारिक एवं सर्वसुलभ साधना है जिसको अपना कर हर कोई मनुष्य बिना यौगिक साधनाओं के भी प्राणमय कोष को सुव्यवस्थित कर सकता है। प्राण शक्ति का विकास कर सकता है।
साधना करनी होगी। बिना इस साधना के कहीं भी किसी को सिद्धि नहीं मिली है।
साधना निष्फल नहीं जाती। परन्तु इस यज्ञ में सम्मिलित होकर साधना करने के सत् परिणाम की आशा तो बहुत अधिक की जा सकती है।
साधना करनी पड़ती है। क्योंकि इसी शक्ति ने जीव के साथ ईश्वर के व्यवधान की सृष्टि करके दरवाजा बन्द कर रखा है।
साधना किसी एक आदमी पर निर्भर नहीं है, एक आदमी के सिद्धि प्रवाह में बहने से तो प्राचीन युग के समान जाति का जीवन मिट्टी में मिल जायेगा। सब के जीवन का समान रूप से उन्नायक होना चाहिए।
साधना प्रारम्भ करके इस यज्ञ में सम्मिलित हो सकते है।
साधनावस्था में साधक को सहनशील रहना चाहिए, सिद्धावस्था में केवल शक्ति की ही साधना करनी पड़ती है। क्योंकि इसी शक्ति ने जीव के साथ ईश्वर के व्यवधान की सृष्टि करके दरवाजा बन्द कर रखा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-March
साधनात्मक गति विधि पर ही निर्भर है।
साधना।
साधना द्वारा हुआ है।
साधनाएँ, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुण्डलिनी जागरण आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू0 3॥) रु॰
साधना को अपनाये बिना कोई भी व्यक्ति आत्म-कल्याण की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। वस्तुओं की अपेक्षा गुण का मूल्य एवं सम्मान जब समझ में आने लगे तब समझना चाहिए कि यह आत्मवाद का प्रकटीकरण हो रहा है।
साधनामय होना चाहिए क्योंकि मानव जन्म की सफलता, साधनात्मक गति विधि पर ही निर्भर है।
साधना एवं समाधान पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर दिया है। दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप बीस वर्षों में लिखी गई इन सुन्दर, सस्ती, अनुभवपूर्ण एवं सच्चा पथ-प्रदर्शन करने वाले गुरु जैसी पुस्तकों की एक-एक प्रति हर गायत्री प्रेमी के पास होना आवश्यक है।
साधना’ करनी पड़ी है सब ओर से चित्त हटाकर लक्ष्य में तन्मय हो जाना, लक्ष्य का ही ध्यान रखना और अटूट धैर्य एवं दृढ़ता के साथ उसी कार्य में लगे रहना और कठिनाइयाँ आने पर भी चित्त में उदास न होना साधक का प्रधान चिन्ह है। साधना ही सफलता की जननी है। जो भी सफल हुआ है साधना द्वारा हुआ है।
साधना ही सफलता की जननी है। जो भी सफल हुआ है साधना द्वारा हुआ है।
साधनाओं की अनेक विधियाँ। मू॰1)
साधनाएं- सर्वसाधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ। मू॰1)
साधना के सिद्ध पुरुषों में होती है। इस भारत भूमि में प्राचीन काल में अनेक योग शक्ति सम्पन्न महापुरुष थे अब भी ऐसे कितने आत्मशक्ति सम्पन्न महापुरुषों का साक्षात्कार किसी-किसी को हो जाता है।
साधना होती है और अन्त में संन्यास आश्रम में पूर्णतः त्याग को स्थान दिया गया है। अतः आसक्ति रहित सेवा करना एवं त्यागमय जीवन का आदर्श कभी नहीं भूलना चाहिए। शान्ति का एकमात्र उपाय-विवेक पूर्वक त्याग ही है।
साधना के आवश्यक नियम गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन, उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएँ, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुण्डलिनी जागरण आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू0 3॥) रु॰
साधना एक महत्वपूर्ण विद्या है। जैसे बिजली का विज्ञान जाने बिना कोई आदमी बिजली उत्पन्न करने की मशीन चलाने लग जाय तो यह एक खतरनाक बात होगी। डाक्टरी पढ़े बिना जो आदमी आपरेशन करने लग जाय वह कोई अच्छा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकता। इसी प्रकार गायत्री महाविद्या को भली प्रकार जानने के बाद ही साधना करनी चाहिए।
साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शाप मोचन, उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएँ, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुण्डलिनी जागरण आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू0 3॥) रु॰
साधना करनी चाहिए।
साधनायें।
साधनात्मक दृष्टि और कार्य पद्धति होनी चाहिए। हमारा जीवन साधनामय होना चाहिए क्योंकि मानव जन्म की सफलता, साधनात्मक गति विधि पर ही निर्भर है।
साधना’ कहते हैं।
साधना है। इस साधना को अपनाये बिना कोई भी व्यक्ति आत्म-कल्याण की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। वस्तुओं की अपेक्षा गुण का मूल्य एवं सम्मान जब समझ में आने लगे तब समझना चाहिए कि यह आत्मवाद का प्रकटीकरण हो रहा है।
साधना यही है कि अपने को तथा दूसरों को नाना प्रकार के दुख देने वाले जो तीन महाअसुर हैं, उन अज्ञान, अशक्ति और अभाव को दूर करने के लिए द्विजत्व का व्रत लें। द्विजत्व का तात्पर्य है-ज्ञान, बल और सम्पत्ति का अभिवर्धन। यह अपने लिए ही नहीं वरन् सभी के लिए बढ़ाने योग्य है। कोई व्यक्ति, राष्ट्र या समाज इन तीनों के द्वारा ही सुखी हो सकता है, जहाँ इन तीनों की जितनी मात्रा होगी वहाँ उसी अनुपात से कष्ट और दुख कम उपस्थित रहेंगे।
साधना विधियाँ इतनी विस्तृत एवं विशद हैं कि उन्हें चिट्ठी पत्री की दस बीस लाइनों में किसी का समझना या समझाना असम्भव है। इसलिए गायत्री विद्या का अत्यन्त आवश्यक विज्ञान, विधान, साधना एवं समाधान पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर दिया है। दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप बीस वर्षों में लिखी गई इन सुन्दर, सस्ती, अनुभवपूर्ण एवं सच्चा पथ-प्रदर्शन करने वाले गुरु जैसी पुस्तकों की एक-एक प्रति हर गायत्री प्रेमी के पास होना आवश्यक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-November
साधना करेंगे उनके उत्साह को बढ़ाने और अन्यों को प्रेरणा देने के लिए उन साधकों के नाम अखण्ड-ज्योति में छापेंगे।’ परन्तु जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनसे प्रकट है कि इस वर्ष नवरात्रि में जिन सज्जनों ने गायत्री के तप किये हैं उनकी संख्या इतनी अधिक है कि पूरी अखंड ज्योति में चार मास तक केवल नाम ही छापे जावें तो भी वह नाम पूरे नहीं हो सकते। इसलिए उन सब लोगों को हार्दिक अभिनन्दन करके ही सन्तोष कर लिया है। जिन सज्जनों के अन्य अनेकों साथी साधक प्रस्तुत किये उनके लिए हमारा विशेष रूप से अभिवादन है।
साधना में अग्रसर होना मानव विकास है। गलतियों का अभिप्राय यह है कि यह सही मार्ग से जरा हट गये थे अब उस सही मार्ग का मर्म पहिचान कर पुनः शुद्ध मार्ग पर आ रहे हैं। जो गलती अनजाने में हो जाती है। उस पर आपका वश नहीं है, किन्तु जो आप जान बूझ कर करते है। उसके बारे में आप अवश्य दंडनीय है।
साधना आचार्य जी ने की है, यह कहा जा सकता है कि इस युग में और किसी ने नहीं की है। इन बातों पर विचार करते हुए मेरा हृदय बहुधा उल्लासित और उत्साहित होता रहता कि भारत भूमि में ऐसी आत्माओं का अभी अभाव नहीं है जो हमारे सर्वोपरि एवं प्राचीनतम तत्वज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिये, प्रकाश में लाने के लिए, ऊँचा उठाने के लिए भागीरथ प्रयत्न कर रही है।
साधना करते आते हैं पर उन्हें कुछ चिन्ह दिखाई नहीं देता। परन्तु यह एक आश्चर्य ही है कि गायत्री की विधिपूर्वक व्यवस्थित साधना करने वाले साधकों में कोई विरले ही ऐसे होंगे जो यह अनुभव करते हों कि कोई दिव्य शक्ति उनके साथ नहीं चल रही है एवं कोई दिव्य ज्योति उनके भीतर नहीं जल रही है। गत जुलाई मास के गायत्री अंक में कुछ ऐसे अनुभव अखण्ड ज्योति में छपे थे। इन नवरात्रियों में तो ऐसे चमत्कारी अनुभव अत्यन्त विशाल परिणाम में हुए हैं। उनमें से जो छापने योग्य समझे जायेंगे सन् 52 की जुलाई के गायत्री अंक में छपेंगे।
साधना करने वाले साधकों में कोई विरले ही ऐसे होंगे जो यह अनुभव करते हों कि कोई दिव्य शक्ति उनके साथ नहीं चल रही है एवं कोई दिव्य ज्योति उनके भीतर नहीं जल रही है। गत जुलाई मास के गायत्री अंक में कुछ ऐसे अनुभव अखण्ड ज्योति में छपे थे। इन नवरात्रियों में तो ऐसे चमत्कारी अनुभव अत्यन्त विशाल परिणाम में हुए हैं। उनमें से जो छापने योग्य समझे जायेंगे सन् 52 की जुलाई के गायत्री अंक में छपेंगे। अधिकाँश साधकों ने माता की समीपता एवं प्रसन्नता के प्रत्यक्ष अनुभव किये हैं।
साधना की जाए।” मूर्तिवत् होकर विजयादशमी को अपनी नवरात्रि उपासना की पूर्णाहुति करते हुए यह संकल्प कर दिया गया। परन्तु अब मन में नाना प्रकार के संकल्प विकल्प उठ रहे हैं। आज के युग में लोगों की मनोवृत्ति जैसी हो रही है। उसमें एक स्थान पर दस पाँच आदमी भी धार्मिक विचारों के मिलने कठिन हैं।
साधना की सीढ़ी आवश्यक है।
साधनाएं एवं समस्त ज्ञान विद्वानों के बीज छिपे पड़े हैं। जप के अतिरिक्त इस महाशक्ति का मानव जीवन में क्या महत्व है, इस विस्तृत तत्व ज्ञान की जितनी वैज्ञानिक खोज और प्रयोगात्मक साधना आचार्य जी ने की है, यह कहा जा सकता है कि इस युग में और किसी ने नहीं की है। इन बातों पर विचार करते हुए मेरा हृदय बहुधा उल्लासित और उत्साहित होता रहता कि भारत भूमि में ऐसी आत्माओं का अभी अभाव नहीं है जो हमारे सर्वोपरि एवं प्राचीनतम तत्वज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिये, प्रकाश में लाने के लिए, ऊँचा उठाने के लिए भागीरथ प्रयत्न कर रही है।
साधना, तपश्चर्या और सात्विकता की एक लहर प्रवाहित कर दी। गत आश्विन मास की नवरात्रियों में हमने एक साधारण अपील की थी कि” इस पुराण पर्व पर 24 हजार के लघु अनुष्ठान तपश्चर्या पूर्वक किये जाये।” वर्तमान काल की स्थिति को देखते हुए हमारा अनुमान था कि-’बहुत थोड़े लोग इस ओर ध्यान देंगे जो लोग साधना करेंगे उनके उत्साह को बढ़ाने और अन्यों को प्रेरणा देने के लिए उन साधकों के नाम अखण्ड-ज्योति में छापेंगे।’ परन्तु जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनसे प्रकट है कि इस वर्ष नवरात्रि में जिन सज्जनों ने गायत्री के तप किये हैं उनकी संख्या इतनी अधिक है कि पूरी अखंड ज्योति में चार मास तक केवल नाम ही छापे जावें तो भी वह नाम पूरे नहीं हो सकते। इसलिए उन सब लोगों को हार्दिक अभिनन्दन करके ही सन्तोष कर लिया है।
साधना आवश्यक होती है, उसी प्रकार नाना विधि पाप तपों से त्रास देने वाली इस घन घोर अन्धकारमयी निशा का परिवर्तन करके, शान्तिदायक सतोगुणी ऊषा के स्वागत में यह यज्ञ किया जा रहा है। इसमें सम्मिलित होना, सहयोग देना, हर एक जागृत आत्मा का पवित्र कर्तव्य है।
साधना का पवित्र स्थान रहेगा। उसमें ठहरने पर मल, मूत्र, थूक, झूठन आदि की अपवित्रता फैलाना उचित नहीं इसलिए उसके समीप ही साधकों के ठहरने के लिए अलग से छोटे छोटे कुटीर होने चाहिए। ऐसे कुटीर लगभग पाँच पाँच सौ की लागत में बन सकते हैं। अपने नाम से, अपने स्मारक स्वरूप एक एक कुटीर तो बहुत साधारण स्थिति के व्यक्ति भी बनवा सकते हैं। उनमें ठहरने वालों के पुण्य का श्रेय उस बनाने वाले को भी मिलेगा।
साधना करना चाहते हैं पर ठहरने की कोई व्यवस्था न होने से उन्हें मन मार कर वापिस लौटना पड़ता है। अखंड ज्योति प्रेस और आचार्य जी का निवास एक छोटे से घर में है, उसमें अन्य व्यक्यों को ठहरने की गुंजाइश नहीं। धर्मशाला वाले तीन दिन से अधिक ठहरने नहीं देते। मकान किराये पर मिलना सरकार की आज्ञा पर ही निर्भर है। इन कारणों से दसियों साधक हर महीने निराश होकर वापिस लौटते रहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1951-October
साधना। 14-शिखा और सूत्र की विवेचना। 15-दैवी संप जायें। 16-कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। 17-सौभाग्य बढ़ाने की कला।
साधना-युक्त हो सक्रियात्मक विचार ही उत्तम जीवन निर्माण करते हैं।
साधनाएं। 18-योग के नाम पर प्रायाचार। 19-जादूगरी या छल। 20-सम्मोहन विज्ञान।
साधना के फल स्वरूप ही सतोगुण का विकास होता है। सतोगुण की वृद्धि ही परम अर्थ कल्याण का हेतु है। सात्त्विकता जितनी बढ़ती जाएगी उतना ही प्राणी अपने लक्ष्य (मुक्ति) के निकट होता जाएगा। इसके विपरीत रजोगुण की अधिकता से मनुष्य भोग और लोभ के कुचक्र में फँस जाता है और तमोगुणी तो तीव्र गति से पतन के गर्त में गिरने लगता है।
साधनाओं की शिक्षा। मूल्य 3/-
साधनाऐं की जाती हैं वे अन्य समयों की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। मन्त्र सिद्धि के लिए यह अतीब शुभ अवसर है।
साधना भूमि है। इसे कर्मक्षेत्र कहना अधिक उपयुक्त होगा। जिस जिस व्यक्ति ने जैसे जैसे कर्म किये, वैसे ही फल उसे प्राप्त हुए। बिना कार्य क्षेत्र में उतरे केवल सोचने-विचारने मात्र से न किसी को कुछ प्राप्त हुआ है, न होने की संभावना ही है।
साधना समाप्त होगी।
साधना के लिए यह नवरात्रि का पुण्य पर्व बड़ा ही शुभ मुहूर्त हैं। उस समय के थोड़ा सा साधन भी अन्य समय के विशेष साधन से अधिक सफल होता है। अखण्ड जोति के पाठक इसे अवसर पर गायत्री का न्युनाधिक साधन करें, इस प्ररेणा के साथ इस अंक को अवश्यक आदेशों के साथ नियत समय से कुछ पूर्व ही भेजा जा रहा है।
साधनाऐं। 4. वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री। 5. गायत्री के 14 रत्न प्रथम भाग। 6. गायत्री के 14 रत्न द्वितिय भाग। 7. अनादि गुरु मन्त्र गायत्री।
साधना। 8-प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। 9-उल्लास 10-आगे बढ़ने की तैयारी। 11-अध्यात्म धर्म का अवलम्बन। 12-ब्रह्म विद्या का रहस्य।
साधना, स्वाध्याय, सत्संग, सेवा, दान, और प्रभु शरणागति की ओर अग्रसर होता है।
साधनाऐं - मूल्य 3/-
साधना। 12-ग्रहस्य योग। 13-प्रार्थना के चमत्कार। 14-विचार संचालन विद्या। 15-सुखी वृद्धावस्था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-July
साधना विधियों की बहुलता और गोपनीयता की इस अराजकता के दिनों किसी सहज जिज्ञासु के लिए यह निर्णय करना कठिन पड़ता है कि इन तथाकथित गुरुजनों द्वारा बताई जाने वाली अनेकानेक उपासना विधियों में से किसे अपनाये, किसे छोडे़ । भ्रान्तियों, शंकाओं, सन्देहों और अनिश्चित दिशा धारा की मनःस्थिति साधक की निष्ठा में सबसे बड़ी बाधा है। इसके रहते किसी का अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचना कठिन है।
साधना 240 करोड बनाये रहने का व्रत लिया गया है। यह महापुरश्ररण सामूहिक अध्यात्म उपचारों के इतिहास में अनुपम और अद्भुत है। उस प्रयोग के सत्परिणाम भी दूरगामी होंगे । इतने पर भी यह मानना ही होगा कि यह सीमित लोगों द्वारा वातावरण अनुकूलन जैसे विशिष्ट प्रयोजन को लेकर किया गया उपचार है। इससे सद्भाव सम्पन्न साधारण जनों को लाभ नहीं मिल सकेगा।
साधना में “धान मुद्रा” बनाने का नियम हैं उस का पालन इस विशिष्ट ध्यान धारणा में तो अनिवार्य रुप से किया जाना चाहिए । ध्यानमुद्रा के पाँच अनुशासन हैं- (1) स्थिर शरीर (2) शान्त चित (3) कमर सीधी (4) हाथ गोदी में (5) आँखे बन्द । शरीर और मन की स्थिति इस स्तर की बना लेने के उपरान्त ही ध्यान योग की साधना सधती है।
साधना में रहनें वालों का उच्चस्तरीय अनुदान है। इस आधार पर वे अपनी नैष्ठिकता बनाये रहकर आत्मबल सम्पादित करेंगे और आत्म-कल्याग का लाभ अर्जित करेंगे ।
साधना क्रम बदलते हैं फलतः अपने श्रम को निरर्थक करते हुए संकल्प शक्ति को दुर्बल करते रहते हैं। अच्छा हो निर्धारण के समय शान्ति-कुँज हरिद्वार से परामर्श कर लिया जाय। जो इसकी आवश्कता समझे वे हर वर्ष गायत्री जयन्ती या बसन्त पर्व पर वर्ष में एकबार अपनी प्रगति का लेखा-जोखा भी भेज दिया करें । स्मरण रहे इस सर्न्दभ में परामर्श या उत्तर प्राप्त करने के लिए जबावी पत्र भेजना अनिवार्य रुप से आवश्यक है।
साधना त्याग एवं बलिदा वे समक्ष भगवान सूर्य भी नत-मस्तक हो उठे। उनकी आँखो में स्नेह की अश्रुधारा बहने लगी । प्यार से दीपक पर हाथ थपथपाते हुए उन्होंने कहा कि, “तुमने अपनी सतत साधना से प्रमाणित कर दिया कि प्रकाश कभी पराजित नहीं हा सकता । महान तुम हो । तुम्हारा त्याग अनुकरणीय होगा ।
साधनाओं का उपक्रम इस प्रकार है । ध्यान अवधि में इन्हीं भावनाओं में निमग्न रहा जाय क्रम पहले से ही याद कर लिया जाय ।
साधना से प्रमाणित कर दिया कि प्रकाश कभी पराजित नहीं हा सकता । महान तुम हो । तुम्हारा त्याग अनुकरणीय होगा । तुम्हारी महानता के समक्ष मैं नत-मस्तक हूँ। मेरा प्रणाम्-अभिनन्दन स्वीकार करो।
साधना पद्धति को जाना जा सकता हैं कोई सन्देह हो तो हरिद्वार मथुरा के केन्द्र उनका निराकरण समाधान करने के लिए विद्यमान हैं। ऐसी दशा में साधना से सिद्धि प्राप्त करने के मार्ग में जो प्रथम अवरोध ‘सही मार्ग-दर्शन ‘ न मिलने का-सही अध्यापक अध्यापन न मिलने का था , उसका समाधान मिल गया ही समझा जा सकता है।
साधना क्रम पूरा किया जाययेगा । किसी कारणवश बन नहीं पडा तो उसे छोड़ नहीं दिया जाना चाहिए, वरन् अगले दिनो साधन बढा कर उसे पूरा किया जाना चाहिए यह नैष्ठिक अनुशासन हैं । इसी को व्रत कहते है। व्रत के बिना साधना में शक्ति उत्पन्न ही नहीं होती । प्रत्यंचा खींचे बिना वाण की प्रखरता कहाँ दृष्टिगोचर होती है ?
साधनात्मक पुरुषार्थ से कम नहीं वरन् अधिक ही महत्व दिया जा सकता है। साधना दीर्घकालीन तपश्चर्या के आधार पर फलित होती है किन्तु अनुदानों का लाभ तत्काल मिलता है । युग सन्धि की इस पुण्य बेला में उच्च सत्ता ने सत्पात्रों का दिव्य प्रयोजनों के लिए अनुदान वितरण का क्षेत्र और भी अधिक बढ़ा दिया है। अब तक वह नैष्ठिकों के लिए था । अब उसे जागृतों के लिए उपलब्ध किया जा रहा है।
साधना भगवान के निकटतम सालोक्य, सामीप्य, और सामुजय स्थित तक पहुँचा देती है। भगवान की अनुकम्पा बरसती तो सभी पर है, पर उसे अन्तरंग में आकर्षित एवं धारण करने वाले ही ग्रहण कर पाते है।
साधना उच्च उद्देश्यों के निमित है उन्हें पात्रता के अनुरुप दिव्य अनुदानों को प्राप्त करते रहने में कभी कोई बाधा नहीं पड़ती । शुी प्रसंगो पर देवताओं द्वारा पुष्प वृष्टि होने के उल्लेख कथा, पुराणों में आते रहते हैं। इस अलंकारिक वर्णन में इसी तथ्य को उजागर किया गया है कि सत्प्रयोजनों में दिव्य सत्ता की सहानुभूति ही नहीं, अनुकम्पा और सहायता भी मिलती है। यदि ऐसा न रहा होता तो विपन्न परिस्थितियों में जन्मे और असंख्य अवरोधों से घिरे रहने पर महापुरुषों को उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त कर सकना किस तरह सम्भव हो सका होता ?
साधना सधती है।
साधना की जाती हैं । तपों के सहारे अन्धकार में भटकने की व्यथा से मुक्ति मिलती है और माया की ग्रन्थि खुलती है। आज्ञाचक्र को दिव्य दर्शन का केन्द्र संस्थान माना गया है। शिव और दुर्गा की छवियों में तीन नेत्र हैं। दो सामान्य तीसरा भृकुटि स्थान पर दिव्य नेत्र ।
साधनाक्रम अपनाया जा सकता है, पर जा अपनायाजाय उसे जल्दी-जल्दी बदला न जाय । उतावले लोग चंचल मनःस्थिति में बार-बार अपना साधना क्रम बदलते हैं फलतः अपने श्रम को निरर्थक करते हुए संकल्प शक्ति को दुर्बल करते रहते हैं। अच्छा हो निर्धारण के समय शान्ति-कुँज हरिद्वार से परामर्श कर लिया जाय। जो इसकी आवश्कता समझे वे हर वर्ष गायत्री जयन्ती या बसन्त पर्व पर वर्ष में एकबार अपनी प्रगति का लेखा-जोखा भी भेज दिया करें । स्मरण रहे इस सर्न्दभ में परामर्श या उत्तर प्राप्त करने के लिए जबावी पत्र भेजना अनिवार्य रुप से आवश्यक है।
साधना चाहिए ।
साधना मार्ग पर अग्रसर होते हुए साधक में जब आध्यात्मिक तत्वों की वृद्धि होने लगती है तो उन तत्वों का स्थान नियुक्त होने से पूर्व संचित का निष्कासन आवश्यक हो जाता है । उन संस्कारों के निष्कासन की प्रतिक्रिया स्वरुप जो विक्षोभ उत्पन्न होता है , जो कि स्वाभाविक ही है उसे स्वप्नावस्था में भयन्कर , अस्वाभाविक , अनिष्ट एवं उपद्रवकारी रुप में देखा जाना स्वाभाविक ही है। दूसरी श्रेणी के स्वप्न वे होते हैं, जिनसे इस बात का पता चलता है कि साधक के भीतर सात्विकता की वृद्धि हो रही है सात्विक कार्यों को करने या किसी अन्य के द्वारा इस तरह के कार्य होते दिखाई देने वाले स्वप्न ऐसा ही परिचय देते है ।
साधना और सिद्धि का पर्यवेक्षण करते हुए भी प्रतिपादन की प्रामणिकता का पता लगा सकते हैं। सन्देह निवारण की दृष्टि से यह साक्षी काफी वजनदार है।
साधना में वैसा प्रतिबन्ध नहीं है। वहाँ बैठने की सुविधा को ही प्रधानता देनी चाहिए ।
साधना करनी पड़ती है।
साधना करते हुए आत्म-सन्तोष एवं ईश्वरीय अनुग्रह के भागी बन सके ? इसका उपाय युग प्रवाह के सूत्र-संचालकों को यह सूझा है कि सत्पात्रों को अतिरिक्त प्राणचेतना का अनुदान दिया जाय और उन्हे बाहर से सामान्य रहते हुए भी भीतर से असामान्य बनाया जाय। शक्ति और प्रगति का मूलभूत आधार अन्तरंग से ही रहता है इसे सभी विज्ञ-जन भली-भाँति जानते है।
साधना के लिए । जहाँ जैसी आवश्यकता और सुविधा समझी जाय वहाँ वैसा प्रबन्ध किया जाय । चूँकि दिन घटते-बढते रहते हैं और सर्दी-गर्मी के बीच-घड़ी घण्टों के समय की स्थिति में काफी अन्तर पड़ जाता है, इसलिए समय का निर्धारण सूर्योदय एवं सूर्यास्त के अनुरुप ही करते रहना चाहिए इसमें घण्टे-मिनटों का अन्तर प्रायः हर महीने या हर सप्ताह करते रहने की आवश्यकता पडे़गी।
साधना में निष्ठा का समावेश करने का प्रयत्न सदा से किया है अब युग सन्धि की बेला में वे उस प्रयास को और भी अधिक तत्परता के साध सम्पन्न करने जा रहे हैं। इन दिनों जागृत आत्माओं के कन्धों पर जो विशिष्ट उत्तर-दायित्व आये है उनका निर्वाह कर सकने में नैष्ठिक साधना अपनाने पर बहुत जोर दिया जा रहा हैं । जो इस दिशा में जितनें शोर्य पराक्रम कर सकेंगे वे उतने ही बडे़ पुरुषार्थी कहे जायेंगे और आत्मिक प्रगति के सुनिश्चित परिणाम उत्पन्न करने वाले विविधि अवलम्बनों में से एक अति महत्वपूर्ण पक्ष की पूर्ति करेगे।
साधना में तो हाथ-पैर धोकर बैठ जाना ही पर्याप्त है। आसन बिछा कर बैठा जाय। खुली जमीन पर न बैठें। ऊपर से आने वाली बिजल शरीर में प्रवेश करने के उपरान्त धरती में न उतर जाय-इसके लिए अवरोध आसन बिछाया जाना आवश्यक है। कुशा, चटाई, जूट, ऊन का हो तो और भी उत्तम है, अन्यथा कपडे़ का आसन भी काम दे सकता है।
साधना दीर्घकालीन तपश्चर्या के आधार पर फलित होती है किन्तु अनुदानों का लाभ तत्काल मिलता है । युग सन्धि की इस पुण्य बेला में उच्च सत्ता ने सत्पात्रों का दिव्य प्रयोजनों के लिए अनुदान वितरण का क्षेत्र और भी अधिक बढ़ा दिया है। अब तक वह नैष्ठिकों के लिए था । अब उसे जागृतों के लिए उपलब्ध किया जा रहा है।
साधना करनी पड़ती हैं बिखराव को एकत्रित कर देने पर क्षमता कितनी अधिक बढ़ जाती है, इसे सभी जानते हैं। छोटे से अतिसी शीशे पर फैली हुई सूर्स किरणे जब एक बिन्दु पर जमा होती है तो देखते-देखते आग जलने लगती है। भाप को एक छिद्र में होकर निकालने पर उस शक्ति से रेल का ईन्जन चलने लगता है। थोड़ी-सी बारुद बन्दूक की पतली नली में होकर गुजरती है तो निशाने को पार करती चली जाती है। मानसिक बिखराव जब किसी लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित होता है तो अर्जुन के मत्स्य बेध जैसी चमत्कारी सफलता मिलती है।
साधनात्मक पुरुषार्थ में (1) उपासना का नियमित और निश्चित होना (2) व्यक्तित्व में पवित्रता एवं प्रखरता का समावेश बढ़ना । (3) तपश्चया्र की संयम एवं सेवा शर्तो की पूरा किया जाना-यह तीन चरण हैं। साधक इन्ही के सहारे इतना सशक्त बनता है कि अन्तराल से सिद्धियों का उभार-संगम से सम्मान, सहयोग और अदृश्य जगत की देवी अनुग्रह की विद्युत वर्षा होने लगे । इस वर्ष की नैष्ठिक उपासना में सप्ताह में एक दिन अस्वाद ब्रह्मचर्य एवं मौन की संयम साधना पर जोर दिया गया है। साथ ही नव सृजन के लिए अंशदान की उदारता बरतने में निष्ठावान रहना चाहिए इनहें तपश्चर्या की नीति अपनाने का अंगुलि निर्देश समझा जाना चाहिए इन्हें मात्र कृत्य की तरह पूरा भर नहीं कर लिया जाना चाहिए , वरन् उन्हें तपस्वी जीवन के आधार भूत सिद्धान्त समझा जाना चाहिए और निरन्तर यह प्रयत्न चलना चाहिए कि यह आदर्श व्यक्तित्व के अंग बनकर दबे देवत्व को उभारने का चमत्कार दिख सके ।
साधना में भी दोनों के साथ होने से अन्तः विद्युत का एक उपयोगी सर्किल बनता हैं । ध्यान मुद्रा में यह स्थिति अतीब उपयोगी मानी गई है।
साधना में शक्ति उत्पन्न ही नहीं होती । प्रत्यंचा खींचे बिना वाण की प्रखरता कहाँ दृष्टिगोचर होती है ?
साधना के इतने बड़े क्षेत्र में इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक लाख साधकों का लक्ष्य रखा गया है और उतने भर लोगों से ही युग पुरश्चरण की दैनिक साधना 240 करोड बनाये रहने का व्रत लिया गया है। यह महापुरश्ररण सामूहिक अध्यात्म उपचारों के इतिहास में अनुपम और अद्भुत है। उस प्रयोग के सत्परिणाम भी दूरगामी होंगे । इतने पर भी यह मानना ही होगा कि यह सीमित लोगों द्वारा वातावरण अनुकूलन जैसे विशिष्ट प्रयोजन को लेकर किया गया उपचार है। इससे सद्भाव सम्पन्न साधारण जनों को लाभ नहीं मिल सकेगा।
साधना इसी प्रकार सम्भव होती है । मन्त्र जप में , ध्यान तन्मयता में चित्त के भीतर उच्च स्तरीय सकल्प जागृत रखे जाते हैं । यदि इन प्रयागों को सही उद्देश्य समझकर सही रीति से कार्यान्वित किया जाय तो उसके आशाजनक परिणाम सामने आना सुनिश्चित है । भारतीय तत्व वेत्ताओं ने इसीलिए योगनिद्रा एवं समाधि के स्तर सामान्य असामान्य सभी तरह के साधकों की मनोभूमि को ध्यान में रखते हुए बनाये हैं। इनमें सचेतन को तन्द्रित करने और अर्न्तमन को प्रशिक्षित करने के तीनों ही उद्देश्य पूरे होते है ।
साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है । स्वपनावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और न ही स्वसंकेत देने तथा अपने बलबूते पर अपने को इच्छित दिशा में मोड़ पाना सम्भव है । इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाओं में कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास आवश्यक समझा गया है । इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तन्द्राग्रस्त हो ही जाते हैं, पर चित्त में संकल्प जीवन्त रख जा सकते है । इन संकल्पो से अचेतन मन को प्रशिक्षित किया जाता हे ।
साधना के क्षेत्र में भी उच्चस्तरीय पुरुषार्थ चाहिए साधक की उपासना में साधन श्रद्धा और जीवन प्रक्रिया में उत्कषृता का अधिकाधिक समनवय करना चाहिए । भजन-पूजन बेगार भुगतने की तरह क्रिया-कृत्य बन कर ही नहीं चलते रहना चाहिए वरन् उसमें सघन निष्ठा का समावेश होना चाहिए । इन दिनों युग पुरश्चरण का जो महान संकल्प चल चडा है उसमें संख्या और समय स्वल्प है, पर निष्ठा का स्तर बढ़ाने पर पूरा जोर दिया गया है। कहा गया है कि उसकी नियमितता और आवश्यकता भोजन, शयन से कम नहीं वरन् अधिक ही अनुभव की जानी और वत्र लिया जाना चाहिए कि भोजन या शयन से पूर्व निर्धारित साधना क्रम पूरा किया जाययेगा । किसी कारणवश बन नहीं पडा तो उसे छोड़ नहीं दिया जाना चाहिए, वरन् अगले दिनो साधन बढा कर उसे पूरा किया जाना चाहिए यह नैष्ठिक अनुशासन हैं ।
साधना में सिद्धि का उपलब्ध होना ही उसके सही होने की सबसे बड़ी साक्षी है। प्राचीन काल के उदाहरणो पर जिन्हें सन्देह हो वे गायत्री युग लाने वाले सूत्र संचालक की निजी साधना और सिद्धि का पर्यवेक्षण करते हुए भी प्रतिपादन की प्रामणिकता का पता लगा सकते हैं। सन्देह निवारण की दृष्टि से यह साक्षी काफी वजनदार है।
साधना पद्धतियाँ नहीं गढ़ते । अपनी मनमर्जी के नये-नये मन्त्र और विधान नहीं उगाते, पर इस सम्बन्ध में हिन्दू समाज को दुर्भाग्यग्रस्त ही कहना चाहिए कि हर धूर्त गुरुनामधारी ने अपनी डेढ़ ईट की अलग मसजिद खडी की और ढाई चावल की खिचडी पकाई है। आठ कनीजिया नौ चूल्हे की कहावत व्यावहारिकतः कितनी सच हे यह कहना कठिन है। पर उपासना के क्षेत्र में हर गुरु नामधारी ने अपना एक विशेष सम्प्रदाय शास्त्रों , आप्त वचनों एवं परम्पराओं की पूरी अवहेलना करते हुए गढ़ लिया है। पर्यवेक्षण में उसे हारना न पड़े इसलिए यसह तुर्रा लगा दिया है कि जो विधि बताई गई है उसे प्रकट न किया जाय जब कि समस्त संसार में विज्ञ-जन अपने प्रतिपादनों की प्रामाणिकता एवं विशिष्टता सिद्ध करने के लिए उन्हें साहसपूर्वक तर्क एवं प्रमाणें सहित प्रस्तुत करते हैं तब अपने यहाँ किसी को न कहने का प्रतिबन्ध लगाया जाता है।
साधना अज्ञानग्रस्त लोगों जैसी भ्रम धारणाओं पर निर्धारित नहीं होती। वह ईश्वर अनुकम्पा, बहुमूल्य उपलब्धियाँ पाने के लिए पूरी कीमत चुकाने पर विश्वास करता है और उसके लिए महामानवों जैसी स्थिति प्राप्त करने की प्रेरणा उपासना उपक्रमों के माध्यम से प्राप्त करता है ।
साधना पद्धति में गायत्री के अवलम्बन से बढ़ कर दूसरा मार्ग हो नहीं सकता इसे, भारतीय धमनियायाी क्रमशः अधिक अच्छी तरह समझते और अनुभव करते जा रहे है। उसके लिए उपयुक्त विधान क्या होना चाहिए, उसकी समुन्द्र मंथन जैसी लम्बी अनुसन्धान प्रक्रिया का जो निर्ष्कष नवनीत निकला है वह सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत है। गायत्री महाविज्ञान ये छोटी पुस्तिकाओं में उसे सरलतापूर्वक देखा,समझा जा सकता है । अब तो उनका प्रचलन भी इतना हो गया कि किसी नैष्ठिक साधक से पूछ कर निभ्रन्ति साधना पद्धति को जाना जा सकता हैं कोई सन्देह हो तो हरिद्वार मथुरा के केन्द्र उनका निराकरण समाधान करने के लिए विद्यमान हैं। ऐसी दशा में साधना से सिद्धि प्राप्त करने के मार्ग में जो प्रथम अवरोध ‘सही मार्ग-दर्शन ‘ न मिलने का-सही अध्यापक अध्यापन न मिलने का था , उसका समाधान मिल गया ही समझा जा सकता है।
साधना पद्धति सही और सुनिश्चित होनी चाहिए । दुर्भाग्य से इन दिनों भारतीय आध्यात्मिकता के क्षेत्र में इन दिनों आराजकता का साम्राज्य है। अन्य धर्मा में सुनिश्चित साधन पद्धतियाँ अपना प्रगति क्रम जारी रखते है। मुसलमानों में मौलवी और ईसाइयों में पादरी अपना-अपना नया मजहव नहीं चलाते । अपनी-अपनी नई साधना पद्धतियाँ नहीं गढ़ते ।
साधना की-सुधार ,उपक्रम के लिए ही है । रोगी न रहे ता डाक्टर की क्या उपयोगिता । परमार्थ परायण, पुरुषार्थ को प्रखर करने का सुअवसर पाने के लिए ही सम्भव है समीपवर्ती क्षेत्र में विकृति उत्पन्न हुई हो ऐसा भी तो सोच सकता है ।
साधना पर जोर दिया गया है। साथ ही नव सृजन के लिए अंशदान की उदारता बरतने में निष्ठावान रहना चाहिए इनहें तपश्चर्या की नीति अपनाने का अंगुलि निर्देश समझा जाना चाहिए इन्हें मात्र कृत्य की तरह पूरा भर नहीं कर लिया जाना चाहिए , वरन् उन्हें तपस्वी जीवन के आधार भूत सिद्धान्त समझा जाना चाहिए और निरन्तर यह प्रयत्न चलना चाहिए कि यह आदर्श व्यक्तित्व के अंग बनकर दबे देवत्व को उभारने का चमत्कार दिख सके ।
साधना की भाषा में इन्हें क्रमशः कुण्डलिनी ज्योति धारा एवं रसानुभूति के नाम से जाना जाता है। इन तीनों के ग्रहण केन्द्र क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहते हैं । समर्थता,प्रतिभा एवं वरिष्ठता यह इन तीनों क्षेत्रों की सिद्धियाँ हैं। इन्हीं हुण्डियों को बाजार में भुना कर मनचाही परिस्थितियों एवं सफलताओं को उपलब्ध किया जा सकता है। सिद्ध पुरुष अध्यात्म क्षेत्र की विभूतियों एवं क्षमताओं से सम्पन्न व्यक्ति को ही कहते है।
साधना को जो बाजीगरी भर मानते हैं और देवताओं की छुट-पुट उपहार मनुहार से बरगलाये जा सकने जैसे मूर्ख मानते है वे भारी भूल करते हैं। तत्वतः आत्मिक क्षेत्र का पुरुषार्थ उपासना पद्धति और जीवन प्रक्रिया से उच्चस्तरीय निष्ठा का समावेश करते चलना ही है।
साधना के प्रति सच्चे अर्थो में जो निष्ठावान हैं, उन्हे सिद्ध पुरुषों के उच्चस्तरीय अनुदान मिलते हैं और वे स्वल्प पुरुषार्थ में भी उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त कर सकने में सफल होते है। विवेकानन्द को परमहंस का, शिवाजी को समर्थ का, चन्द्रगुप्त को चाणक्य का , बिनावा को गाँधी का अनुदान मिला और वे मूलतः अंिकचन होते हुए भी अन्ततः महान बन सकने में सफल हुए । हनुमान, अंगद और नल-नील को चमत्कारी उपलब्ध्याँ उनकी अपनी उपार्जित नहीं थीं वे अनुदान में मिली थी। कुन्ती पुत्र पाण्डव जो पराक्रम दिखा सके वह उनका निज का नहीं देव प्रदत्त था । गंगा लाये तो भागीरथ ही थे , पर उस सफलता में उन्हें शिवजी का अनुदान कम नहीं मिला था ।
साधना उपचार की सामान्य क्रियाओं से लेकर कठोर असामान्य तपश्चर्याओं तक का अवलम्बन लेना पड़ता है ?
साधना अपनाने पर बहुत जोर दिया जा रहा हैं । जो इस दिशा में जितनें शोर्य पराक्रम कर सकेंगे वे उतने ही बडे़ पुरुषार्थी कहे जायेंगे और आत्मिक प्रगति के सुनिश्चित परिणाम उत्पन्न करने वाले विविधि अवलम्बनों में से एक अति महत्वपूर्ण पक्ष की पूर्ति करेगे।
साधना पद्धति में सन्निहित है। सूर्य की सत्ता का मूल्यान्कन करते हुए तत्वदर्शियों ने ठीक ही कहा है- “त्वम्मानो जगतश्चक्षु.” हे सूर्य आप ही इस संसार के नेत्र हैं। “त्वम् आत्मा सर्व देहिनाम्” आप ही सब प्राणियों की आत्मा हैं। “त्वम् योनिः सर्व भूतानाम्” आप ही सब प्राणियों की काया हैं। “त्वमा चारः क्रियावताम” आप ही पुरुषार्थियों के आचरण हैं।
साधना की चरम परिणित ‘समाधि’ और कुछ नहीं तत्मयता की ही उच्चस्तरीय परिणिति है। उस क्षेत्र में आकर्षक चर्चा होती रहती है। इसे एकाग्रता का माहात्मय वर्णन ही समझा जाना चाहिए ।
साधना से सिद्धि प्राप्त करने के मार्ग में जो प्रथम अवरोध ‘सही मार्ग-दर्शन ‘ न मिलने का-सही अध्यापक अध्यापन न मिलने का था , उसका समाधान मिल गया ही समझा जा सकता है।
साधनाओं में कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास आवश्यक समझा गया है । इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तन्द्राग्रस्त हो ही जाते हैं, पर चित्त में संकल्प जीवन्त रख जा सकते है । इन संकल्पो से अचेतन मन को प्रशिक्षित किया जाता हे । अतीन्द्रिय स्वप्न व्यक्ति चेतना और विराट् चेतना के बीच कोई सेतु होने का परिचायक है और सिद्ध करते हैं कि स्वप्नों के माध्यम से भी आत्म-परिष्कार सम्भव है , लेकिन उसके लिए योगनिद्रा जैसी स्थिति प्राप्त करना आवश्यक है । आत्म-परिष्कार की प्रधान योगसाधना इसी प्रकार सम्भव होती है ।
साधना में चेतन मन के उत्पातों को रोकने के लिए शिथिलता , शून्यावस्था , समाधि , शवासन आदि को बहुत महत्व दिया जाता है । इन्हें योगनिद्रा कहते है । स्नायु संस्थान पर से तनाव दबाव हटाकर यदि श्राँत, विश्राँत , और सौम्य मनःस्थिति प्राप्त की जा सके तो उसे जागृत निद्रा समतुल्य माना जा सकता है । स्मरणीय है ध्यान धारणा की सीढ़ियाँ पार करते हुए समाधि तक पहुँचना साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है । स्वपनावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और न ही स्वसंकेत देने तथा अपने बलबूते पर अपने को इच्छित दिशा में मोड़ पाना सम्भव है ।
साधना की सहज पूर्ति कर सकने वाले अनुदान कह सकते हैं। सर्त्कम, सद्ज्ञान और सद्भाव ही वे उपलब्धियाँ हैं जिनके सहारे मनुष्य को महामानव, ऋषि और अवतार अग्रदूत बनने का अवसर मिलता है। इनमें से जिसे अपने लिए जिस स्तर की आवश्यकता अनुभव होती हो वह उन्हें इन दिनो बिना किसी अड़चन के उपयुक्त मात्रा में उपलब्ध कर सकता है। प्रमाद वितरण चल रहा हो तो उससे राहगीर भी लाभ उठा लेते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-March
साधना में संलग्न रह सकते है।
साधना, मन्त्र विज्ञान, तपश्चर्या ब्रह्मविद्या की स्थूल गतिविधियाँ वस्तुतः अन्तरिक्ष को ही प्रभावित करती है और उसी महान भाण्डागार से अपने उपयोग की सम्पदाएँ उपलब्ध करती है। अध्यात्म और उसे प्रधानतया अन्तरिक्ष से सम्बन्धित माना जाना चाहिए।
साधना सम्भव हो सके तो निश्चित ही मनुष्यों को विशेष लाभ प्राप्त होगा। निश्चय ही इतना बड़ी सभ्यता के अधिकारी धरती जैसी दरिद्रा और उस पर रहने वाले पतित पीड़ित लोगों पर आक्रमण करने और यहाँ से लूट ले जाने के लिए इतनी कष्टसाध्य करने और यहाँ से लूट ले जाने के लिए इतनी कष्टसाध्य यात्राएँ नहीं कर सकते। उनका उद्देश्य इस लोक के प्राणियों को अपनी उपलब्धियों से लाभान्वित करना ही हो सकता है। भारत के ऋषि, मुनि समस्त संसार में ज्ञान और विज्ञान का वितरण करने के सदुद्देश्य से परिभ्रमण करते रहे है। इससे कम सदुद्देश्य इन अर्न्तग्रही महामानवों का भी नहीं हो सकता।
साधना के रुप में भी सभी परिजनों को घर बैठे उपलब्ध होती रहेगी। सूर्योदय से पूर्व एक घन्टा से लेकर सूर्योदय तक के एक घन्टे में कभी भी दस बीस मिनट एकाग्र बैठने और निर्धारित धारण करने से यह लाभ सरलता पूर्व क पाया जा सकता है। यह एक विशेष टानिक है जो हर जागृत को उसके स्तर का नव जीवन-प्रदान करेगा। यह उपक्रम आरम्भ तो अभी से हो गया है , पर उसका विधिवत् ओर सर्वजनीय उद्घाटन गायत्री जयन्ती से होगा।
साधना का आरम्भ अन्तराल में किया जाता है, पर उस आरम्भ को प्रतिफल तक पहुँचने के लिए अन्तरिक्षीय शक्तियों का ही सहयोग लेना पड़ता हे।
साधना स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा प्राणवान आत्माएँ आकाश में ऐसे प्रचण्ड प्रवाह छोडती थी जिसमें जन मानस को अनायास ही बहते रहने और श्रेष्ठ चिन्तन का उसके फलस्वरुप उस उत्पादित उच्च चरित्र का लाभ मिलता था। अन्तरिक्ष उच्चस्तरीय विचार सम्पदा से भरा रहता था। इसमें अध्यात्म क्षेत्र के मूर्धन्य मनीषी सदा प्रयत्नरत रहते थे।
साधना को नियोजन तो होना ही चाहिए, पर उतने से ही इतना बड़ा कार्य सम्पन्न हो नहीं सकेगा। परिवर्तन की अधिकाँश प्रक्रिया सूक्ष्म जगत में सम्पन्न होगी। प्रत्यक्ष में तो उसकी प्रतिक्रिया भर दृष्टिगोचर होगी। प्रत्यक्ष में तो उसकी प्रतिक्रिया भर दृष्टिगोचर होगी। इस प्रयोजन के लिए जागृत आत्माओं की तत्परता और विभूतियों की सहायता को जहाँ आमन्त्रित किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-January
साधना करने में जुट गए।
साधना पर्यायवत् है। छान्दीग्य उपनिषद् में सनत्कुमारजी नारद से कहते है।
साधना से संस्कृति विकसित होती तथा जीवन्त रहती है। इस साधना की इकाई है-परिवार। परिवार ही शरीर, वाणी और अन्तः करण की सामूहिक संस्कार-साधना के आधारभूत घटक है। उनमें विकसित संस्कृति ही सामाजिक-संस्कृति का रुप निर्धारित करती है। अतः साँस्कृतिक-विकास के लिए पारिवारिक-सुव्यवस्था अत्यावश्यक है।
साधना, चिन्तन-परिष्कार, विचार-संयम आवश्यक है। शब्द की सहायता के बिना विचार नहीं होता। अतः विचार-साधना और वाक्-साधना पर्यायवत् है। छान्दीग्य उपनिषद् में सनत्कुमारजी नारद से कहते है।
साधना के क्षेत्र में बल-बुद्धि इसी भूमि पर प्राप्त की जा सकती है। यदि इस लोक को हटकर अन्यान्तर-लोक में कोई र्स्वग है भी सही, जो संदिग्ध है, पर यदि इस मान भी ले तो उसे प्राप्त करने में वही लो समथ्र हो पाते जो इस जीवन वह स्थिति नहीं प्राप्त की जा सकी तो मरने के बाद, जब मनुष्य की अंधिकाँश शक्तियों और सामर्थ्य नष्ट हो जाती है तो किसी बलबूते पर उसे र्स्वग को प्राप्त किया जा सकता है?
साधना तीन परिणामों के रुप में सामने आती है-सामूहिक सद्भाव, सामूहिक-सद्विचार एवं सामूहिक सर्त्कम या सदाचार। इस प्रकार संस्कृति की साधना-जीवन की साधना है।
साधना में विध्न पड़ेगा। महर्षि भारद्वाज को भी जनसर्म्पक में कम ही रुचि थी।
साधना और उपासना के युग्म को अन्योन्याश्रित-एक दूसरे का पूरक माना गया है।
साधना है।
साधना में लगे रहने पर यवक्रित का शरीर कृश हो गया। देह में केवल हडिडयों के उभार ही दिखाई देने लगे। फिर भी इष्ट सिद्धि नहीं हुई तो उन्होंने निश्चय किया कि वे और अधिक कठोर तितिक्षा पर करेंगे। इस निश्चय के लिए उन्होंने एक यज्ञ में अपने रक्त से उसमें आहुतियाँ देंगे।
साधना-जीवन की साधना है।
साधना तभी बनेगी जब अधिकधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से, एक निष्ठ होकर समष्टि शक्ति उत्पन्न करने की दृष्टि से उसे सम्पन्न करें।
साधना का अवलम्बन। उपासना कृत्यों की तरह है इसकी भी गरिमा है। साधना और उपासना के युग्म को अन्योन्याश्रित-एक दूसरे का पूरक माना गया है।
साधना का सही रुप है।
साधनात्मक आधार उसी प्रकार उसके व्यावहारिक आधार भी तीन व्यक्ति-निर्माण एवं समाज-निर्माण तीन स्तरों पर सम्पन्न संस्कृति की यह त्रिविध-साधना तीन परिणामों के रुप में सामने आती है-सामूहिक सद्भाव, सामूहिक-सद्विचार एवं सामूहिक सर्त्कम या सदाचार। इस प्रकार संस्कृति की साधना-जीवन की साधना है।
साधना के साथ-साथ वेद वेदाँतो के पठन पाठन और अध्ययन मनन द्वारा अपनी ज्ञान संपदा भी बढ़ाई थी। लोग विभिन्न जिज्ञासुओं के समाधान तथा ज्ञान प्राप्ति की आशा से रैम्य आश्रम में आया करते थे।
साधना का आधार बनता है तब जगत की प्रेरक और सर्जन शक्ति का परिचय प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रकारों ने सत्य को ही जीवन का सहज दर्शन माना है महर्षि विश्वामित्र ने कहा है -”सत्येनार्क प्रतपति सत्ये तिष्ठति मेदिनी। सत्य व्यक्ति परोधर्मः स्वर्गे सत्ये प्रतिष्ठितः॥ अर्थात सत्य से ही सूर्य तप रहा है, सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य सबसे बड़ा धर्म है और सत्य पर ही र्स्वग प्रतिष्ठित है।”
साधना देखते हुए भी सामूहिक सम्भव महान आत्म-शक्ति का उद्भव करते है। इसकी विशेषता नियत समय का परिपालन आवश्यक है। घड़ी की सहायता से ही यह सम्भव हो सकता हैं। यों इसे किया तो आगे-पीछे भी जा सकता है, पर तब उसका लाभ व्यक्तिगत ही रह जायगा। यह विश्व-शान्ति की सामूहिक साधना तभी बनेगी जब अधिकधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से, एक निष्ठ होकर समष्टि शक्ति उत्पन्न करने की दृष्टि से उसे सम्पन्न करें।
साधना के आधारभूत घटक है। उनमें विकसित संस्कृति ही सामाजिक-संस्कृति का रुप निर्धारित करती है। अतः साँस्कृतिक-विकास के लिए पारिवारिक-सुव्यवस्था अत्यावश्यक है।
साधना सत्र 15 जनवरी से 23 जनवरी तक है। उसमें अनुष्ठान करने वाले आगन्तुक स्वीकृतियाँ प्राप्त कर रहे हैं।
साधना यों हो तो एकाकी भी सकती है और कुछ न कुछ परमार्थ-व्यक्गित-सर्म्पक के सीमित क्षेत्र में भी किया जा सकता है।, पर दूरगामी और विशालकाय सत्परिणामों की दृष्टि से इस क्षेत्र में भी समविन्त प्रयास ही कारगर होते है। एक तिनके से रस्सा नहीं बनता और न एक फूल का हार गूँथा जाता है। लड़ तो एक सैनिक भी हो सकता है, पर बड़ा मोर्चा फतह करने के लिए उसे सैन्य-दल का अनुशासित-सदस्य बनकर ही काम करना होता है बूँदे मिलकर जलाशय बनती है। सीकों का समूह बुहारी है और धागों का समन्वय।
साधना द्वारा उसे ब्रह्मसत्ता के साथ संम्बद्ध करने का प्रयास किया जाय तो आत्म चेतना को जागृत करते हुए वह सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है, जिसमें ब्रह्मसत्ता ओत प्रोत है। किसी सूखे जलाशय को नदी से संबद्ध कर देने पर जिस प्रकार वह जल से परिपूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार जीवसत्ता भी ब्रह्मसत्ता के समान समर्थवान बन सकती है।
साधना के उपक्रम में जो भी अपनाया जाय। मध्यवर्ति ध्रुव-तत्व यही है।
साधनाओं द्वारा उसमें पारगंत हुआ जा सकता है किन्तु व्यक्तित्व में यदि इतना सशक्त आत्म-तेज, आत्म-बल, प्राण-शक्ति, ब्रह्मवर्चस् विकसित किया जा सके तो लोगों को अपने व्यक्तित्व के जादू से सम्मोहित कर अनायास ही उन्हे उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की ओर अग्रसर किया जा सकता है।
साधना उपासना भी करते है। इस पृथ्वी से अलग ही अन्यान्तर लोक में र्स्वग जैसै किसी स्थान का अस्तित्व है, अथवा नहीं, यह विवाद का विषय है। पर उसे प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य के आगे बढ़ने की आकाँक्षा को द्योतक है जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।
साधना। गहरे साँस खींचते हुए उसके साथ हिमालय के प्रेषित विशेष प्राण प्रवाह को खींचना और अपने कण-कण में उसे धारण करना।
साधना का क्रम नियमित रुप से जारी रखा जाय। हर पूर्णिमा को मासिक यज्ञ हो। सभी जागृत आत्माएँ अपने साथियों समेत सम्मिलित हों। बसन्त पर्व, गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा को अखण्ड जप किया जाय। समाप्ति पर यज्ञ।
साधना ही वाणी-साधना का सही रुप है।
साधना से सम्भव नहीं। इसलिए विचार् साधना, ज्ञान-साधना ही वाणी-साधना का सही रुप है।
साधना की इकाई है-परिवार। परिवार ही शरीर, वाणी और अन्तः करण की सामूहिक संस्कार-साधना के आधारभूत घटक है। उनमें विकसित संस्कृति ही सामाजिक-संस्कृति का रुप निर्धारित करती है। अतः साँस्कृतिक-विकास के लिए पारिवारिक-सुव्यवस्था अत्यावश्यक है।
साधना
साधना की पृष्ठभूमि तो अभी से बना दी गई है, पर उसमें सफल हो सकने योग्य अधिकारी विनिर्मित करने का ठोस कार्य सम्भवतः द्वितीय पंच वर्षीय योजना से ही व्यापक रुप से बन सकेगा। अभी तो उसके लिए अधिकारी साधक उत्पन्न करने के लिए प्राथमिक प्रयत्न ही चल सकेंगे।
साधना बनाया जाय या पतन के प्रयोजन में प्रवृत्त रखा जाय, यह निर्धारण चित्त-तल में जीम आस्थाएँ करती है। सम्पूर्ण-जीवन का दिशाधारा का निर्धारण चित्त में सव्याप्त संस्कार जगत ही करता है। वाणी उसी के संकेत पर नाचती है। शरीर उसी के संकेत पर चलता है। व्यक्तित्व को मूल वे आस्थाएँ ही है, जो चित्त में छायी रहती है।
साधना। साँस भीतर खींचना। इडा मार्ग से मूलाधार तक प्राण का ले जाना। प्राण और कुण्डलिनी का मन्थन। उत्पन्न ऊर्जा का सुषुम्ना मार्ग से ब्रह्मरंध्र तक लाना और वहाँ से अनन्त अन्तरिक्ष में नियति सन्तुलन के लिए बखेर देना।
साधना से अनेकों प्रकार की सिद्धियों तथा दिव्यशक्तियों के प्राप्त होने का उल्लेख आता हैं। अतीत और अनागत का ज्ञान, सभी प्राणियों की भाषा समझने, पूर्वजन्म के बारे में जानने, दूसरों के मन की बात समझ जाने की क्षमता, अन्तध्यानि, आत्मबल दूरदर्शन, सर्वज्ञान, भूख प्यास होने का उल्लेख योग सूत्र में मिलता है। योगसूत्र के विभुतिपाद से 36 वे सूत्र में जिन छह सिद्धियों का उल्लेख किया गया है वे इस प्रकार हैं-
साधना गुरुमुख होकर ही की जाती है।
साधना, ज्ञान-साधना ही वाणी-साधना का सही रुप है।
साधना के चमत्कारी लाभ मिलते नहीं यह सर्वविदित है इसलिए ब्रह्म वर्चस साधना की पृष्ठभूमि तो अभी से बना दी गई है, पर उसमें सफल हो सकने योग्य अधिकारी विनिर्मित करने का ठोस कार्य सम्भवतः द्वितीय पंच वर्षीय योजना से ही व्यापक रुप से बन सकेगा। अभी तो उसके लिए अधिकारी साधक उत्पन्न करने के लिए प्राथमिक प्रयत्न ही चल सकेंगे।
साधना का स्तर भी इसी प्रकार ऊँचा उठेगा जैसी कि रचनात्मक प्रवृत्तियों के संबंध में प्रथम योजना की तुलना में द्वितीय का कार्यक्रम भारी और ऊँचा हैं। प्रथम स्तर को साधन सम्पन्न कर लेने वाले साधक पंचकोशों का अनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण की वह शिक्षा प्राप्त करेंगे जो युग शिल्पियों को आवश्यक शक्ति एवं सामर्थ्य प्रदान कर सके। पात्रता विकसित हुए बिना साधना के चमत्कारी लाभ मिलते नहीं यह सर्वविदित है इसलिए ब्रह्म वर्चस साधना की पृष्ठभूमि तो अभी से बना दी गई है, पर उसमें सफल हो सकने योग्य अधिकारी विनिर्मित करने का ठोस कार्य सम्भवतः द्वितीय पंच वर्षीय योजना से ही व्यापक रुप से बन सकेगा। अभी तो उसके लिए अधिकारी साधक उत्पन्न करने के लिए प्राथमिक प्रयत्न ही चल सकेंगे।
साधना में संलग्न की श्रेष्ठता की अभिवृद्धि भी होती है। सेवा-धर्म अपनाने से स्वार्थ और परमार्थ दोनों की पूर्ति होती है। आत्म-सन्तोष, लोक-श्रद्धा जन-सहयोग एवं देवी-अनुग्रह के चारों ही लाभ सेवा-धर्म अपनाने वाले ही हाथों-हाथ मिलने लगते है। सेवा-साधना यों हो तो एकाकी भी सकती है और कुछ न कुछ परमार्थ-व्यक्गित-सर्म्पक के सीमित क्षेत्र में भी किया जा सकता है।, पर दूरगामी और विशालकाय सत्परिणामों की दृष्टि से इस क्षेत्र में भी समविन्त प्रयास ही कारगर होते है।
साधना और वाक्-साधना पर्यायवत् है। छान्दीग्य उपनिषद् में सनत्कुमारजी नारद से कहते है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-October
साधना सत्रों के रुप में विकसित और व्यापक बना सकने में अनुत्साह के अतिरिक्त और कोई भी कठिनाई नहीं हैं जो हँसते-हँसातें हल न की जा सकं।
साधना के प्रति श्रद्धा निष्ठा में भावना का समावेश कर लोक मंगल के लिए समयदान तथा अंशदान प्रस्तुत करने हेतु प्रत्येक परिजन को उत्साह पूर्वक आगे आना चाहिए।
साधना सत्रों में मिल सकता हैं। उसकी तुलना का उपाय उपचार कदाचित ही कोई खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञान यज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता हैं जो प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना को जन-मानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक हैं। इस अवसर पर ऐसे संगठित प्रयासों के लिए उपयुक्त वातावरण भी रहता हैं जिससे साधकों को भी व्रतशील जीवन जीने के अतिरिक्त सृजन प्रयोजनों में सहयोग देने के लिए भी तत्पर किया जा सकें।
साधना उपासना का भी नियमित उपक्रम बन नहीं पड़ रहा है। इस समुदाय के लिए एक अति सरल पंचसूत्री कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया है और उसको अपनाने के लिए नवरात्रि पर्व को ही शुभारम्भ के मुहूर्त के रुप में मनाने के लिए अनुरोध किया गया है।
साधनाक्रम पूरा करने के साथ-साथ एकान्त में शान्त चित्त से अन्तमुर्खी होने का अवसर भी ढूँढ़ना चाहिए और यह भी सोचना चाहिए कि वर्तमान जीवनचर्या में आदर्शवादित्ता का कितना समन्वय किस प्रकार हो सकता है ? सोचने में ईमानदारी और तथ्यान्वेषी दृष्टि का समोवश हो सके तो हर किसी को अपने वर्तमान ढर्रे में यह गुजायंश दिखाई पड़ेगी कि वह प्रस्तुत समय और साधनों में से अपव्यय अंश काटने और उसे पुण्य प्रयाजनों में लगा सकने की इतनी गुजायंश निकाल सकता है जिसे संतोषजनक ही नहीं उत्साहवर्धक भी कहा जा सके। अब तक जो बन नहीं पड़ा हैं उसका कारण कोई भौतिक अवरोध नहीं वरन् चिंतन में कृपणता का समावेश भर रहा है। यदि उस अभ्यस्त ढर्रे में थोड़ा सा परिवर्तन किया जा सके तो सहज ही उस दिशा में कुद कदम उठने लगेंगे जिससे युग-धर्म का निर्वाह होने लगे। नवरात्रि साधना की सफलता का अनुमान ऐस निष्कर्षो से ही निकलता है, जिससे अभ्यस्त ढर्रे में पुण्य प्रयोजनों के समावेश का रास्ता निकले।
साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मगंल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।
साधनासत्रों के संयुक्त स्व रुप जैसें होंगे।
साधना बनकर उफनती उछलती दृष्टिगोचर होती है।
साधना पर्द के नौ दिनों में स्थानीय प्रज्ञा संस्थान बनने का कुछ न कुछ प्रबन्ध अवश्य हो जायेगा। इस आकाँक्षा से अनुप्राणित प्रज्ञापुत्र इस छोटी स्थापना में असफल रहें यह तो हो ही नहीं सकता।
साधना, शिक्षा, व्यवसाय आदि किसी में भी सफलता नहीं मिलती फिर उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?
साधना का खादपानी लागाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। साधना का संगम महा-मानवों जैसी उदात्त जीवनचर्या एवं लोक मगंल के निमित्त किये गये त्याग बलिदान के समन्वय से बनता है। जो केवल भजन-पूजन भर को सब कुछ मान लेते हैं वे कमान वाले तीर को घूमाते तो फिरते हैं पर वे उससे लक्ष्य बेध का प्रयोजन पूरा नहीं कर पाते।
साधना में अभ्यास करना पड़ता है। भक्तिभावना का परिपोषण पूजा उपचारों के कर्मकाण्ड़ों से ही होता है। जिस प्रकार भावना और उद्देश्य के अभाव में पूजा कृत्य भी लकीर पीटने जैसे रह जाते हैं उसी प्रकार भावनाएं भी निरर्थक निष्फल बनी रहती है और कल्पना की उड़ानें तो उडती है पर क्रिया में परिणत होने का साहस नहीं जुटा पाती। थोथे ब्रह्मज्ञानी और ओछे कर्मकाँडी दोनों ही उपहासास्पद बनते और परिणाम की दृष्टि से निरशअसफल पाये जाते हैं। जब तक ज्ञान और कर्म का समन्वय न हो तब तक किसी महत्वपूण सत्परिणाम की आशा नहीं की जा सकती।
साधना पर्व पर विश्ष रुप से प्रयुक्त करने और अनुबन्ध से अपनी जीवनचर्या को जोड़े रहने का वास्तविक उद्देश्य यह है कि थोड़े दिन बन्धन में बँधकर की गई साधना पीछे सामान्य दिनचर्या में उतरे और स्वभाव व्यवहार का अंग बनकर रहें। पूजा अर्चा की उपासना और उसके साथ सम्मिलित रहने वाले आदर्शवादी अनुबन्धों को साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधना करने लगें और साथ ही अपने परिवारों में धार्मिक वातावरण बनाने के लिए प्रयास आरंभ करें, जो परिवार निर्माण अभियान के अर्न्तगत बताया जाता रहा है। इस प्राकर वे वरिष्ठ स्तर के न होते हुए भी अपनी व्यक्तिगत उपासना का शुभारम्भ कर सकेंगे और निजी परिवार में सृजनात्मक वृत्तियों का सूत्र संचालन करते हुए वही प्रक्रिया आरम्भ कर सकेंगे जो बड़े रुप शाखा संगठन एवं प्रज्ञापीठों के माध्यम से किया जाना है।
साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधना नहीं है। ऐसे व्यक्ति नित्य नियम तिजनी थोड़ी उपासना कर लेने से भी उच्चस्तरीय परिणाम प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। विवेकानन्द, गाँधी, विनाबा आदि के उदाहरण ऐसे ही हैं जिनमें सेवा साधना ही प्रधान है। पूजा अर्चा तो वे थोड़ी सी ही करते रहे हैं सो भी एकान्तिकनहीं सामूहिक। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी आरम्भिक दिनों में ही तपश्चर्या अपनाई थी उसके उपरान्त वे धर्म चक्र प्रवृत्तियों को विश्वव्रुपी बनाने, उसके लिए परिव्राजक प्रशिक्षित करने तथा साधन जुटाने, में ही निरत रहे।
साधना प्रयोजनों के लिए यह समय विशेष रुप से उपयुक्त माना गया है। जिस प्रकार प्रभात काल की उपासना अधिक फलवती होती और संध्या के नाम से पुकारी जाती है। उसी प्रकार नवरात्रियों का समय भी दोनों सन्ध्याओं के समतुल्य माना गया है।
साधना की मनःस्थिति बनाने में बाधा उत्पन्न होती हैं। मृगचर्म, व्याघ्रचर्म, अपनी मौत मरने वालों से प्राप्त होते थे तब पवित्र रहे होंगे। आज तो कहीं भी वैसा चमड़ा उपलब्ध नहीं होता। अतएव प्राचीन काल में मृगचर्म, व्याघ्रचर्म आदि के आसनों को जो मान्यता मिली थी आज की परिस्थिति में वह पूर्णतया समाप्त हो जाती हैं। चर्म त्याग की चिन्ह पूजा तो ऐसे भी हो सकती हैं कि नौ दिन रबड़ की चप्पल पहन कर काट लिये जाएँ, पर नवरात्रि उपासना तत्वज्ञान में सन्निहित संकेत सभी ऐसे हैं जिन्हें साधना अवधि में प्रयुक्त करने के बहाने अभ्यास में उतारा जाए और उसका निर्वाह भविष्य में भी यथासम्भव करते रहा जाए।
साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता हैं। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हे वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता। इस सच्व्चाई को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही श्रेयस्कर रहेगा।
साधना का सुयोग बना सकते हैं।
साधना की सफलता का अनुमान ऐस निष्कर्षो से ही निकलता है, जिससे अभ्यस्त ढर्रे में पुण्य प्रयोजनों के समावेश का रास्ता निकले।
साधना करने के रुप में चलता रह सकता है।
साधनाएं करने के लिए आरण्यकों का आश्रय लेना पड़ता है। किन्तु साथ ही वानप्रस्थों के लिए आवश्यक परिवाज्रक प्रक्रिया अपना कर लोकमंगल में भी निरत रहना पड़ता है। जो मात्र जप आदि के उपचारों को ही पर्याप्त मानकर पूजा-पाठ भर में अपने को केन्द्रित कर लेते है, जन कल्याण में श्रम, समय लगाने की आवश्यकता नहीं समझते वे न तो भक्ति का तत्वज्ञान समझते हैं और न भगवान की प्रकृति प्रसन्नता को। ऋषि परम्परा में भजन का जितना स्थान है उससे कहीं अधिक लोकव्यवस्था को सुनियोजित रखने के लिए अधिक परिश्रम करने का। व्यास जैसे साहित्यकार, नागार्जुन जैसे रसायन शास्त्री चरक सुश्रुत जैसे चिकित्सक, वशिष्ठ और चाणक्य जैसे राज निर्देशक लोक मंगल में निरत देखे जा सकते है।
साधना का व्रत लेते ही इसी जीवन में देवत्व का सहज प्रकटीकरण होने लगता है। अलग-अलग सद्गुणों के लिए अलग-अलग उपाय अपनाने की आवश्यकता नही। सत्प्रवृत्ति संवर्धन की सेवा साधना अपने आप में परिपूर्ण योग साधना एवं तपश्चर्या हैं। उस मार्ग पर कदम बढ़ाते ही मील के पत्थरों की तरह वे देवी अनुग्रह मिलते चले जाते हैं। जिनके सहारे विभूतियों एवं समृद्धियों की अपेक्षा की जाती हैं।
साधना में अहर्निशि निरत है, उसे जीवन्त रखने के लिए शरीर यात्रा के साधन तो देने ही होंगे इस उत्तर दायित्व का निर्वाह ही ‘ब्रह्मभोज है। प्राचीन काल में ऐसे लोक सेवी ब्रह्म परायण सर्वत्र उपलब्ध थे। उनके चरण इन बहाने अपने घर में पड़ें। हाथ से खिलाने का कभी तो सौभाग्य मिले। इस भावना से ओत-प्रोत भावुक साधकों को ब्रह्मपरायणों को अपने घर बुलाने का भी आग्रह रहता था।
साधना उपक्रमों में पुण्य परमार्थो को जोड़ रखने की बात उपयोगी भी है और आवश्यक भी है अन्यथा लोग साधन दान के लिए तैयार ही न होते। मात्र फालतू समय में थोड़ा सा पूजा पाठ करके निवृत हो जाते। चन्द्रायन व्रत की पूर्णाहुति पर गोदाम का विधान है। उसी प्रकार अन्यान्य सभी साधनात्मक उपक्रमों में वियोजित हुए श्रमदान समय दान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता बताई गई है इससे कृपणता को उदारता में विकसित करने के लिए दबाब पड़ता है। साथ ही लोक मंगल की सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण का सुयोग भी बनता है।
साधना को प्रखर बनाने और साधक की निष्ठा परिपक्व करने के लिए अनुष्ठानों में जो अनुबन्ध रखे गये हैं। उन्हें व्रत कहते है। नवरात्रि में उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, चर्मत्याग, स्वयंसेवा जैसे कुछ नियम पालन की परम्परा इसी दृष्टि से शास्त्रकारों ने बनाई है कि उपासना में अधिक प्रखरता का वह समावेश हो सकें जो सुविधा, सरलता के वातावरण में उपलब्ध नहीं होता।
साधना करनी पड़ती है।
साधना में संलग्न साधकों के लिए इन दिनों हिमालय के धुवकेंद्र में विशिष्ठ अनुदान उपहार उतर रहे हैं। वे उस लाभ को अनायास ही उपलब्ध कर रहे हैं जिन्हं प्रातः और साँयकला ग्रहण करने का स्वर्णित सुअवसर निष्ठावानों को मिल रहा हैं। नवसृजन अभियान का जन समाज को मिल रहा है। नवसृजन अभियान का जन समाज को, भावपीढ़ी को जो लाभ मिलेगा उससे कहीं अधिक लाभान्वित प्रज्ञापुत्रों का वह समुदाय होगा, जिसमे नैष्ठिक भागीदार प्रमुख है।
साधना की चमत्कारी परिणिति का लाभ ले सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता।
साधना को भी सम्मिलित करना और उसके लिए साहस जुटाना आवश्यक समझा जाता है। जो इनमें से एक के लिए अपनाते और दूसरे को छोड़ते हैं वे एक पंख के सहारे उड़ने का प्रयास करने वाले पक्षी की तरह निराश ही रहते हैं। एक पहिये की गाड़ी कहाँ चल पाती है ? एक पैर के लम्बी यात्रा कर सकने में सफलता कहाँ मिलती है ? लंगड़े व्यक्ति भी लकड़ी का सहारा लेकर ही खड़े होते और आगे चलने में समर्थ हो पाते हैं।
साधना का अधिक माहात्म्य बताया है और इस बात पर जोर दिया है कि अन्य अवसरों पर न बन पड़े सही पर नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म इन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाम मार्गी साधक अभीष्ट मन्त्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते रहते हैं।
साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। प्रातः काल सामूहिक जप, हवन-पूजन का औ सायं काल संगीत प्रवचन के ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था रहती हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं।
साधना को अनुष्ठान कहते हैं। उसके साथ तपश्चयाओं का अनुशासन जुड़ जाने से उनकी संज्ञा पुरश्चरण हो जाती है अनुष्ठान पुरश्चरण हलके भारी स्तर के भी होते हैं।
साधना बन गयी है। जागृतों को दूसरों को जगाने का ठीक यही समय है। इन दिनों नव जागरण के अग्रदूत बनकर बादलों की तरह हर खेत पर बरसने के लिए निकल पड़ने की आवश्यकता है। पवन जन-जन तक पहुँचता और प्रत्येक को प्रचुर परिणाम में जीवन तत्व प्रदान करता है। पवन पुत्र की तरह प्रज्ञापुत्र का भी कर्तव्य है कि ‘राम काज कीन्हे बिना” विश्राम ने लेने का निश्चय करें और देवर्षि नारद की तरह जन-जन से सर्म्पक साधने और युग प्रयोजन से परिचित सहमत करने के लिए अथक परिश्रम करता रहे।
साधना में निरत प्रज्ञापुत्रों में से प्रत्येक को जन सर्म्पक के लिए समयदान करने के निमित्त अनुरोध आग्रह किया गया है। यह जन सर्म्पक युगान्तरीय चेतना से जन जन को परिचित एवं प्रभावित करने के लिए हैं
साधना के रुप में वर्ष की दोनों नवरात्रियों में उन्हें 24 हजार के गायत्री अनुष्ठान भी करने होते हैं। उस समय वे नहीं कर सकते तो आगे पीछे हटकर भी उसकी पूर्ति करनी होती हैं। यह अनिवार्यता इस लिए रखी गई है कि इन नौ दिनों के साधना सत्रों में वे सभी प्रयोजन पूरे होते हैं जो जन मानस के परिष्कार एवं सत्प्रंवृति सर्म्वधन की उभयपक्षीय युग चेतना के अग्रगणी बनाने के लिए नितान्त आवश्यक हैं।
साधना की पूर्ति होने का स्मरण बनायें रखें।
साधनारत हो रहें हैं।
साधना समय, स्थान, स्नान आदि के अनुबन्धों से तो मुक्त रखी गई है, पर निष्ठा को जीवन्त बनाये रहने के लिए इतना अनुशासन तो उसमें भी रखा गया हैं कि खाने या सोने से पूव उसे कर ही लिया जाय। इतनी नियमितता बनी रहने से भी उस निष्ठा का परिपोषण होता रहेगा जो उपसनात्मक कर्मकाण्डों में जीवन प्राण मानी जाती है। अस्त-व्यस्त रखने पर तो स्वास्थ्य, साधना, शिक्षा, व्यवसाय आदि किसी में भी सफलता नहीं मिलती फिर उपासना को ही उस स्थिति में फलवती होने का अवसर कैसे मिल सकता है ?
साधना के साधकों का दूसरा लक्ष्य वातावरण का अनुकूलन ही हैं। यों आत्मकल्याण और लोकमंगल दोनों एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रुप से जुड़े हुए हैं। वे परस्पर पूरक बनकर ही दो पहियों की तरह संयुक्त प्रयास से प्रगति की आकाँक्षा को प्रत्यक्ष उपलब्धि में परिणत करते हैं। फिर भी वर्गीकरण की दृष्टि से समझने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें यों भी कह दिया जाता है। यों एक के बिना दूसरे की पूर्ति हो सकना किसी प्रकार भी संभव नहीं है।
साधना से सिद्धि मिलने का सिद्धान्त सुनिश्चित है। सिद्धि का तात्पयै जादुई चमत्कार दिखा कर किसी को अचम्भे में डालना नहीं वरन् यह है कि अपनी प्रबल मनस्विता और पुरुषार्थ परायणता के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक हर कीमत पर पहुँच कर ही रहा जाए। युग शिली यदि यह अनुभव करते हैं कि महाकाल ने इन दिनों उनके लिए युग सृजन की साधना ही सर्वोपरि सहत्व की समक्षी और निर्धारित की है तो फिर उन्हें अंगद, हनुमान, अर्जून, विवेकानन्द, रामतर्थ, गोविन्दसिंह, समर्थरामदास चाणक्य, बुद्ध, महावीर, गाँधी विनाबा आदि के चरणचिन्हों पर चलते हुए युग धर्म के निर्वाह में एक निष्ठ भाव से लग जाना चाहिए। इसके लिए प्रवचन कला इतनी प्रभावी नहीं हो सकती जितनी कि अपना आदर्शवादी उदाहरण प्रस्तुत कर सकने की साहसिकता। इन दिनों इसी उभार की अत्यधिक आवश्यकता हैं।
साधना की है उनकी श्रद्धा को जीवन्त रखने के लिए दक्षिण की परम्परा है। यज्ञ ब्रह्मभोज को इसी लिए अनुष्ठान के साथ जोड़ा गया है कि कहीं चतुर लोग माला घुमाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री न करलें। वे सत्प्रयोजनों के लिए उदार अनुदान प्रस्तुत करने पर ही साधना की पूर्ति होने का स्मरण बनायें रखें।
साधना का अत्यधिक महत्व माना गया है। इसमें पूजा अर्चा की निर्धारित विधि व्यवस्था का अपना महत्व हैं और ऋतु सन्धि के अवसर पर इस बेला की समयपरक विशेषता है। इतने पर भी इस रहस्य को भली प्रकार हृदयंगम किया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी रहने वाली सिद्धियों की दृष्टि से इन अनुष्ठानों का मर्म उस अवसर पर पालन किये जाने वाले अनुबन्ध, अनुशासनों के साथ जुड़ा हुआ है। वे नियम सामान्य व्यवहार में कुछ कठिन तो पड़ते है, पर ऐसे नहीं है जिन्हें सच्ची इच्छा के रहते व्यस्त समझे जाने वाले व्यक्ति भी पालन न कर सकें। समझे जाने योग्य तयि यह है कि इन अनुशासनों का इन दिनों अभ्यास करने के उपरान्त जीवन दर्शन में स्थायी रुप से सम्मिलित करने की जो प्रेरणा है उसी को अपनाने पर प्रगति एवं सिऋि का समस्त आधार केन्द्रीभूत हैं।
साधना को अपनाने के लिए प्रज्ञा युग के प्रत्येक व्यक्ति को कहने एवं सहमत करने का प्रयत्न चलते रहना चाहिए। प्रज्ञा पुत्रों का सर्म्पक जिनसे भी उन्हें आत्मिक पुरुषार्थ और प्रकारान्तर से वातावरण अनुकूलन में योगदान के लिए तथ्य समझाते हुए अनुरोध किया जाय तो कोई कारण नहीं कि इस पाँच मिनट जितने सरलतम पुरुषार्थ को अपनाने पर इनकार ही सहमत होंगे। कितनों से ही कहने पर कुछ तो अवश्य ही सहमत होंगे। जिनके अन्तराल में सुसंस्कारिता अवश्य ही सहमत होंगे। उन्हें इस आधार पर उपलब्ध होने वाली युग चेतना से लाभान्वित होने का सहज ही उत्साह उभरेगा।
साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
साधना के लिए अपने समय, प्रभाव, प्रतिभा एवं साधनों का योगदान उल्लेखनीय स्तर पर नियमित रुप से, सतत करते चले आ रहे हैं। ऐसे प्रज्ञा पुत्र यदि युग सन्धि की नैष्ठिक साधना को शर्ते पूरी नहीं कर पा रहें हैं वे भी इन सत्रों का लाभ लें।
साधना में संलग्न रहकर युग धर्म का निर्वाह किया जाये यह कार्य समयदान से ही हो सकता है।
साधना की सूचना मिलने पर उसके संरक्षण एवं दोष परिमार्जन की व्यवस्था शान्ति कुन्ज हरिद्वार में कर दी जायेगी। उत्तर के लिए जबाबी पत्र भेंजें।
साधना एक अत्यावश्यक पुण्ड परम्परा के रुप में सदा सर्वदा से अपनाई जाती रही हैं।
साधना की ओर साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
साधना का चमत्कार था जो इष्टदेव का ध्यान पूजन करने तक सीमित नहीं रहती वरन् उसकी इच्छा को अपनी इच्छा का समर्पण करके अपने साधनों को उसी की पूर्ति में खपा देती है। राम पंचायतन में अन्य सदस्य वस्त्राभूषण पहने सम्मानित स्थान पर बैठे दृष्टिगोचर होते हैं पर पवन पुत्र के शरीर पर लज्जावस्त्र की तरह लँगोटी मात्र है और उनने अपना स्थान सबसे नीचे चीरणों के समीप बैठने का बनाया है।
साधना में सम्मिलित होने वाले तथा प्रज्ञा अभियान में रुचि लेने वालों का समर्थन करने से आगे बढ़ाने की योजना बननी चाहिए। यह कार्य ज्ञान घटों और धर्मघटों की स्थापना से ही हो सकता है। प्रज्ञा संस्थानों में से प्रत्येक को कार्यकर्ता निर्वाह का घर-घर युग आलोक पहुँचानें का प्रबंध करना होगा। जम्न दिवसोत्सव की सुव्यवस्था में भी एक नियमित एवं नियुक्त कार्यकर्ता की आवश्यकता पड़ेगी। भले ही वह प्रज्ञा मन्दिरों की दुर्बल स्थिति में आधे समय का ही क्यों न रखा जाए।
साधना के साध “नैष्टिक” कहलाते है। निष्ठा से उत्पन्न ऊर्जा ही आत्मकल्याण और लोकनिर्माण के उीय पक्षीय प्रयोजन पूरी कर पाती है। युग सृजन में यह मानवी निष्ठा ही दिव्य ऊर्जा के रुप में परिणित होगी। व्यष्टि में देवत्व के उदय और समष्टि में स्वर्गीय वातावरण की आशा अपेक्षा इसी आधार पर की गई कि निष्ठावानों का समुदाय सृजन शिल्पियों के रुप में भागीरथ, हनुमान, अर्जुन जैसे पराक्रम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होंगे और समय की आवश्यकता पूरी करेंगे।
साधना अनुष्ठान का संकल्प सर्वत्र एक ही होगा कि साधकों को महामानवों जैसी मनोभूमि एवं शूरवीरों जैसी उदात्त साहिसिकता का वरदान मिलें। इस अनुष्ठान के फलस्वरुप ऐसा वातावरण बने जिससे युग प्रवार को उलटना संभव हो सकें। अवाध्नयीता को निरस्त और सदाशयता को समर्थ बनाने में देवमानवों का पुरुषार्थ ही निर्णायक होता हैं। यह उथला-हलका पड़ा तो गाड़ी रुक जाती है किन्तु यदि उसमें आवेश जैसा पराक्रम सम्मिलित हो गया तो समझना चाहिए कि लक्ष्य वेध में अब कहीं कोई अड़चन शेष नहीं रह गई। इस दृष्टि से इस बार नवरात्रि साधना के साधकों का दूसरा लक्ष्य वातावरण का अनुकूलन ही हैं।
साधना अपने आप में परिपूर्ण योग साधना एवं तपश्चर्या हैं। उस मार्ग पर कदम बढ़ाते ही मील के पत्थरों की तरह वे देवी अनुग्रह मिलते चले जाते हैं। जिनके सहारे विभूतियों एवं समृद्धियों की अपेक्षा की जाती हैं।
साधना से वंचित न रहें। साधना की सूचना मिलने पर उसके संरक्षण एवं दोष परिमार्जन की व्यवस्था शान्ति कुन्ज हरिद्वार में कर दी जायेगी। उत्तर के लिए जबाबी पत्र भेंजें।
साधना क्षेत्र में नये संकल्प लेकर अग्रसर हुआ है। उसमें से प्रत्येक को न केवल नवरात्रि की अनुष्ठान साधना स्वयं करनी है वरन् जन समपर्क साधनों में अभी से लगना हैं तथा पुरानों को प्रोत्साहित और नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद वन सकें इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न कर सकने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता हैं।
साधना की वह श्रखला है, जिसका अवलम्बन हर श्रंयाधिकारी को अपनाना पड़ता हैं।
साधनात्मक उपक्रमों में वियोजित हुए श्रमदान समय दान के अतिरिक्त साधनदान की भी आवश्यकता बताई गई है इससे कृपणता को उदारता में विकसित करने के लिए दबाब पड़ता है। साथ ही लोक मंगल की सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण का सुयोग भी बनता है। इसलिए तत्वदर्शियों ने प्रत्येक धर्मानुष्ठान के साथ दान पुण्य क व्यवस्था रखी है और उसमें उदार साहसिकता अपनाने पर जोर दिया है।
साधना पर्व जैसी सामान्य नहीं वरन् आसाधारण स्तर की हैं। उनमें युगसंधि के बीजारोपण वर्ष की विशेष प्रयोजन भी जुड़ गया है। अमावश्या, पूर्णिमा को यों सदा ही पर्व माना जाता है। और शुभ कर्मों के लिए उनहं विशेष अवसर या उपयुक्त मुहूर्त माना जाता है। किन्तु जब उनके साथ कुछ विशिष्टता जुड़ जाती है तो स्थिति और भी उच्चस्तरीय हो जाती हैं।
साधना एवं तपश्चर्या हैं। उस मार्ग पर कदम बढ़ाते ही मील के पत्थरों की तरह वे देवी अनुग्रह मिलते चले जाते हैं। जिनके सहारे विभूतियों एवं समृद्धियों की अपेक्षा की जाती हैं।
साधना स्वयं करनी है वरन् जन समपर्क साधनों में अभी से लगना हैं तथा पुरानों को प्रोत्साहित और नये भावनाशीलों को तथ्यों से परिचित कराने का प्रयास भी करना है। इस बार के नवरात्रि आयोजन पिछले दिनों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी एवं प्रेरणाप्रद वन सकें इसके लिए समग्र तत्परता उत्पन्न कर सकने वाली भाव श्रद्धा को उभारने, उछालने की आवश्यकता हैं।
साधना को समर्थ बनाने के लिए सेवा परायणता की आवयकता है। भगवत् उपासना-आत्म साधना और लोक सेवा को गंगा यमुना सरस्वती माना गया है। और उनके त्रिवेणी संगम को तीर्थराज कहकर कायाकल्प जैसा पुण्य फलदायक बताया गया है।
साधनाओं-तपश्चर्याओं का निर्धारण सत्राो में किया जायेगा।
साधना सत्र आयोजन के रुप में नियोजित करने और सफल बनाने पर आरम्भ से ही बहुत जोर दिया जाता रहा हैं। इसमें उपासना और साधना के उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। प्रातः काल सामूहिक जप, हवन-पूजन का औ सायं काल संगीत प्रवचन के ज्ञान यज्ञ की व्यवस्था रहती हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी।
साधना का सुयोग बिठाने का प्रयत्न तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकाँश कौलकर्म इन्हीं दिनों सम्पन्न होते हैं। वाम मार्गी साधक अभीष्ट मन्त्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते रहते हैं।
साधना की सिद्धि इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि उसे कितनी गहन निष्ठा के साथ अपनाया गया। यों जब तब, ज्यों-त्यों करके कुछ न कुछ भजन-पूजन करते रहने में भी हर्ज नहीं, उतने से भी रुचि बदलती है और प्रवाह बनता है, पर इस तथ्य को भुलाया नहीं जाना चाहिए कि वाण की बेधक शक्ति इस बातपर निर्भर रहती हैं कि धनुष्य की प्रत्यंचा को कितना खींचा जा सका और लक्ष्य बेध में कितने एकाग्र मनोयोग का उपयोग किया गया। आत्मिक सफलताओं का रहस्य एक ही है कि ‘निष्ठा’ का महत्व कितना समझा गया और उसे कितनी गम्भीरतापूर्वक अपनाया गया। कर्मकाण्ड तो उपचार भर है। चमत्कार तो निष्ठा की प्रखरता एवंपरिपक्वता ही दिखाती है।
साधना के अतिरिक्त सामान्य जनों को गायत्री उपासना में प्रवृत्त कने का उत्तरदायित्व भी युग साधकों को सौंपा गया है। सामान्य उपासक एकदम तो युग पुरश्चरण जैसी निष्ठ प्रधान साधनाओं में संलग्न नहीं हो सकते। उन्हं क्रमशः ही नैष्ठिक उपासना की ओर अग्रसर किया जा सकता हैं। अस्तु, आरम्भ में जिन्हें अभ्यास नहीं है और जो नये-नये ही गायत्री उपसना में संलग्न हो रहे है उनके लिए ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत किया गया है जिन्हे वे एकाकी प्रयासों से अस्तु किन्हीं भी परिस्थितियों में करते रह सकते हैं।
साधना प्रखरता बनाने के लिए अनिवार्य समझा जाना चाहिए। निष्ठा का जितना ही समावेश हो सकेगा, नैष्ठिक उपासकों द्वारा चलायें जाने वाले युग सन्धि महापुरश्चरण के सत्परिणाम उसी अनुपात में फलित होंगे।
साधना अवधि में प्रयुक्त करने के बहाने अभ्यास में उतारा जाए और उसका निर्वाह भविष्य में भी यथासम्भव करते रहा जाए। ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की अध्यात्म मान्यता का प्राणि वध से उपलब्ध साधनों का उपयोग करने से बढ़ती नहीं वरन् घटती और बुझती ही चली जाती हैं। अस्तु नवरात्रि में चर्मत्याग की लकीर पीट लेने से ही नहीं प्राणियों के प्रति करुणा बरतने, यहाँ तक कि अत्यधिक भार से लदे घायल पशुओं के श्रम का उपयोग करते समय भी उसी करुणा को अपना कर कुछ निर्णय करना होगा। प्रकारान्तर से नवरात्रि में चर्मत्या के पीछे अहिसाँ वृत्ति के विकास का तत्वज्ञान जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए।
साधना के अनुदानों का संक्षिप्त पर स्पष्ट विवरण अवश्य दें।
साधना के लिए सरलता पूर्वक निकाले जा सकते है। तीस दिन के उपर्जन में से एक दिन की आजीविका इस कार्य के लिए लगाई जा सके, तो इससे किसी पर भी अर्थ संकट नहीं आने वाला है। थोड़ी सी बचत कर लेने पर उस एक दिन की कमाई की पूति हो सकती है। जो समय नहीं दे सकते, व उतने साधन देकर दूसरों का समय खरीद सकते हैं। इस सर्न्दभ में प्रत्येक युग साधक को गम्भीरता पूर्वक सोचना चाहिए और समय की माँग को देखते हुए अधिकतम उदारता का परिचय देना चाहिए।
साधना की पूर्णाहुति होती है। पूर्णाहुति की विशेष परम्परा में दो बातें अनिवार्य रुप से सम्मिलित हैं-एस यज्ञ दूसरा ब्रह्मभोज। इनके न करने पर मात्र जप भर करने की प्रक्रिया को अनुष्ठान संज्ञा नहीं मिल सकती। अधूरे-उपक्रम का प्रतिफल भी अधूरा ही रहता है। अस्तु जहाँ भी अनुष्ठानों का व्यक्तिगत एवं सामूहित आयोजन होता हैं वहा इन दोनों की व्यवस्था किसी न किसी रुप में की ही जाती है, चाहे वह संक्षेप में छोटे स्तर की ही क्यों न हो।
साधना पद्धति के कारण भी महत्व पूर्ण माना गया हैं। नैष्ठिक साधकों के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान साधना एक अत्यावश्यक पुण्ड परम्परा के रुप में सदा सर्वदा से अपनाई जाती रही हैं।
साधना मेकं अधिक और पूजा अर्चा में कम लगता रहा होगा।
साधना को शर्ते पूरी नहीं कर पा रहें हैं वे भी इन सत्रों का लाभ लें।
साधना का सज्जनता और उदारता का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। उपासनात्मक उपचारों में दान-पुण्य की प्रक्रिया इसीलिए सम्मिलित रखी गई है कि दोनों के मिलने से ज्ञान और कर्म का-भावना और तत्परता का समावेश रहने से अभीष्ट परिणाम उपलब्ध हो सकें।
साधना में श्रम समय अथवा साधनों के योगदान को त्रीव सक्रियता ही वह व्यायामहै जो इन दिव्य अनुदानों को पचाकर साधक को आत्मबल-ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न बना सकती हैं इसीलिए यह शर्त अनिवार्य हैं।
साधनाओं की विशेष व्यवस्थ की जाती है ताकि बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं। और 24 हजार वाली संख्या को घआ कर 10 हजार तक हलका कर दिया गा है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तार्त्पय मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है। यह किसी के लिए भी भारी नहीं पड़ना चाहिए।
साधना ही सर्वोपरि सहत्व की समक्षी और निर्धारित की है तो फिर उन्हें अंगद, हनुमान, अर्जून, विवेकानन्द, रामतर्थ, गोविन्दसिंह, समर्थरामदास चाणक्य, बुद्ध, महावीर, गाँधी विनाबा आदि के चरणचिन्हों पर चलते हुए युग धर्म के निर्वाह में एक निष्ठ भाव से लग जाना चाहिए। इसके लिए प्रवचन कला इतनी प्रभावी नहीं हो सकती जितनी कि अपना आदर्शवादी उदाहरण प्रस्तुत कर सकने की साहसिकता। इन दिनों इसी उभार की अत्यधिक आवश्यकता हैं।
साधना ही प्रधान है। पूजा अर्चा तो वे थोड़ी सी ही करते रहे हैं सो भी एकान्तिकनहीं सामूहिक। भगवान बुद्ध और महावीर ने भी आरम्भिक दिनों में ही तपश्चर्या अपनाई थी उसके उपरान्त वे धर्म चक्र प्रवृत्तियों को विश्वव्रुपी बनाने, उसके लिए परिव्राजक प्रशिक्षित करने तथा साधन जुटाने, में ही निरत रहे। गुरु गोविन्दसिंह, समर्थ रामदा, चाणक्य, आदि की गणना भी ऐसे ही कर्मयोगियो में की जाती है। जिनने भजन कम और परमार्थ अधिक किया हैं।
साधना की प्रगति भी सदा उसी के सहारे सम्पन्न होती रही हैं। भविष्य निर्माण में सज्जनों की संगठित सृजन चेतना की ही प्रमुख भूमिका होगी। राम काल के रीछ बानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गाँधी के सत्याग्रही इसी तथ्य को प्रामाणित करते हैं कि महान दित किये बिना और कोई चारा नहीं। देवताओं की संयुक्त शक्ति दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीमा को जन्म देने और दानवी विभीषिकाओं को निरस्त करने में आधारभूत कारण बना था।
साधना सत्रों से बढ़द्यकर अधिक उपयोगी एवं अधिक सरल व्यवस्था अन्य कदाचित ही कोई बन पड़े। महान साँस्कृतिक परम्पराओं का पुनर्जीवन नव सृजन के अभीष्ट आत्म-ऊर्जा का अभिवर्धन तथा जन जीवन में उत्कृष्टता के समावेश का जैसा र्स्वण सुयोग इन साधना सत्रों में मिल सकता हैं। उसकी तुलना का उपाय उपचार कदाचित ही कोई खोजा जा सके। रात्रि के ज्ञान यज्ञ में वह सब कुछ कहा जा सकता हैं जो प्रज्ञावतार की युगान्तरीय चेतना को जन-मानस में प्रतिष्ठापित करने के लिए आवश्यक हैं। इस अवसर पर ऐसे संगठित प्रयासों के लिए उपयुक्त वातावरण भी रहता हैं जिससे साधकों को भी व्रतशील जीवन जीने के अतिरिक्त सृजन प्रयोजनों में सहयोग देने के लिए भी तत्पर किया जा सकें।
साधना का भी अनुशासन जुड़ा है। इसके अतिरिक्त सामूहिक रुप में मासिक यज्ञ करने की व्यवस्था उन्हें बनाये रखनी होती है। सामान्यतया चलने वाले यही अनुबन्ध है जिनका परिचालन करते हुए युग सन्धि महापुरश्चरण की भागीदारी को गतिशील रखा जाता है।
साधना की बात सोंचे। इन अभ्यासो के लिए भी कई प्रकार की सरल साधनाओं की विशेष व्यवस्थ की जाती है ताकि बोझ लगने और मन उचटने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। मन्त्र लेखन गायत्री चालीसा पाठ, पंचाक्षरी जप आदि की सरल व्यवस्थाएँ उसी आधार पर बनी हैं। और 24 हजार वाली संख्या को घआ कर 10 हजार तक हलका कर दिया गा है। नौ दिन में दस हजार जप करने का तार्त्पय मात्र हर रोज एक घण्टा समय लगाना भर होता है।
साधना न रहकर आपत्ति धर्म जैसी युग साधना बन गयी है। जागृतों को दूसरों को जगाने का ठीक यही समय है। इन दिनों नव जागरण के अग्रदूत बनकर बादलों की तरह हर खेत पर बरसने के लिए निकल पड़ने की आवश्यकता है। पवन जन-जन तक पहुँचता और प्रत्येक को प्रचुर परिणाम में जीवन तत्व प्रदान करता है। पवन पुत्र की तरह प्रज्ञापुत्र का भी कर्तव्य है कि ‘राम काज कीन्हे बिना” विश्राम ने लेने का निश्चय करें और देवर्षि नारद की तरह जन-जन से सर्म्पक साधने और युग प्रयोजन से परिचित सहमत करने के लिए अथक परिश्रम करता रहे।
साधना करने पर भी कोई रोक नहीं है, पर प्रयत्न यही किया जाता हैं कि सामूहिक उपासना का उपक्रम बने और उसे एक उत्साह आयोजन का स्वरुप मिले। ऐसी व्यवस्था बनाने में उत्साही लोगों को स्वयं आगे रहने, थोड़ी दौड़ धूप करने साधन जुटानें एवं जन-सर्म्पक साधकर उत्साह दिलाने जैसे प्रयत्न करने होते हैं। ऐसा कुछ कर पाने वाले उत्साही जहाँ एक दो भी हों वहाँ नवरात्रि आयोजन की व्यवस्था सहज ही बन जाती हैं। वह न तो मँहगी है और न कठिन कष्ट साध्य। जो इसके लिए आगे बढ़कर साहस दिखाते है उन्हं अनुभव से इस निर्ष्कष पर पहूँचना होता है कि भारत जैसे धर्म प्रकृति वाले देश में नवरात्रि आयोजनों को साधना सत्रों के रुप में विकसित और व्यापक बना सकने में अनुत्साह के अतिरिक्त और कोई भी कठिनाई नहीं हैं जो हँसते-हँसातें हल न की जा सकं।
साधना पीछे सामान्य दिनचर्या में उतरे और स्वभाव व्यवहार का अंग बनकर रहें। पूजा अर्चा की उपासना और उसके साथ सम्मिलित रहने वाले आदर्शवादी अनुबन्धों को साधना कहते हैं। उपासना को बीज और साधना को खाद, पानी की उपमा दी जाती है ओर कहा जाता है कि फसल का फलित होना इस समन्वय पर ही निर्भर है।
साधना में नियोजित कर सकने का अवसर प्राप्त करते है। जागृत आत्माएँ-युग शिल्पी, सजृन-सैनिक, देवमानव, प्रज्ञापुत्र आदि नामों से समय-समय पर इसी समुदाय का उल्लेख होता रहता है। उज्जवल श्विष्य की आँशाओ के केन्द्र विन्दु दन्ही को माना गया है। शेष तो मोह मदिरा पीकर उन्मादियों अथवा अर्धमतृको की तरह मनुष्य जीवन को मखौल बनाते हुए दिन गुजारते है। प्रतिभाओं की कमी नही।
साधना सत्रों में वे सभी प्रयोजन पूरे होते हैं जो जन मानस के परिष्कार एवं सत्प्रंवृति सर्म्वधन की उभयपक्षीय युग चेतना के अग्रगणी बनाने के लिए नितान्त आवश्यक हैं।
साधना में निरत रहकर सुसंस्कारिता परिपक्व करनी होती है। एकाँगी अभिरुचि रखने वाले पूजा परायणों की असफलता का एक मात्र कारण यही होता है कि वे परमार्थ परायणता में रुचि नहीं लेते और लोकूँगल को अपनी संचित संकीर्णता के कारण स्वार्थ सिद्धि के लिए आवश्यक न मानकर उसमं निरत बने रहते है। यदि यह अपूर्णता बाधक न रहे तो काँने, लँगड़े जैसी कुरुपता और अर्धांग पक्षाघात से पीड़ितों जैसी असमर्थताजन्य असफलता का सामना क्यों करना पड़े ? उपासना का दूसरा पक्ष है- साधना। एक पख् से पक्षी नहीं उड़ता, इसी प्रकार लोक-कल्याण के लिए तत्पर हुए बिना किसी को भी आत्मकल्याण का लाभ मिल नहीं सकता।
साधना प्रक्रिया तक सीमित रहने की बात है। बीजारोपण वर्ष के उपयुक्त युग साधकों जैसी मनःस्थिति जिन साधकों की बन रही है वे इस पर्व बेला को ऐतिहासिक बनाने की अपनी योजना बना रहे हैं। आत्म सत्ता में देवत्व का आवेश भर देने ओर संपर्क क्षेत्र को आलोकमय बनाने की उमंग जिस प्रकार समुद्री तूफान की तरह उभर रही हैं उसे देखते हुए लगता हैं महाकाल का प्रेरणा प्रवाह युग परिवर्तन की परिस्थितियं उत्पन्न करके ही रहेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-November
साधना के रुप में उपलब्ध किया जा सकता है। महापुरश्चरण के भागीदार उसे ग्रहण कर भी रहे हैं। (1) प्राण संचार, कुण्डलिनी जागरण, स्थूल शरीर के लिए, (2) दिव्य दृष्टि-तृतीय नेत्र उन्मूलन, सूक्ष्म शरीर के लिए (3) अमृता प्राप्ति, अन्तःकरण स्फुरण, कारण शरीर के लिए। इस प्रवाह की तीन धाराएं हैं जिन्हें वरिष्ठ साधक इन दिनों संकल्प श्रद्धा के साथ अपना रहे हैं और समुचित लाभ ले रहे हैं।
साधनात्मक उपायों से सर्म्बधन करके बढ़ा भी सकता है। शरीर और मन दोनों प्राण पर अवलम्बित हैं। प्राण शक्ति के द्वारा रोगों की चिकित्सा के सम्बन्ध में योग व तंत्र ग्रन्थों में बहुत वर्णन मिलता है।
साधना (2) स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा इन चार उपचारों को आत्मोर्त्कष के आधार भूत अवलम्बन माना गया है। इन्हें किसी न किसी रुप में अपनी जीवनचर्या में स्थान देने और परिवार को भी विस्तृत शरीर मान कर उसमें भी वे हलचलें उत्पन्न की जानी चाहिए, यह हर स्थिति के व्यक्ति के लिए नितान्त सरल है।
साधना का यही लक्ष्य है। आत्मिक प्रगति एवं सामाजिक उन्नति का यही आधार है।
साधना भी सम्भव नहीं। ऐसी दशा में समस्याओं के समाधान और उपयोगी मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए ‘स्वाध्याय’ ही एकमात्र अवलम्बन है। उगे आत्मा की भूख बुझाने के लिए अन्न की तरह ही अनिवार्य माना जाय और इसके लिए न्यूनतम आधा घण्टा समय निकाला जाय। भले ही वह काम-काज के बीच थोड़ी सुविधा मिलने के समय ही क्यों न किया जाय।
साधना, चक्र ओर ग्रन्थियाँ जगायें। इतने वैभवशाली हो, क्यों कंगले हों? निहाल हो जायें॥
साधना के उपाय सूझते और प्रबल होते चलते।
साधना अपनाई जाय।
साधना सीमित है उन्हें प्रज्ञा परिजन और जिन्हें समयदान, अंशदान की दृष्टि से अधिक पुरुषार्थ करने का सुयोग बन पड़ा रहा है, उन्हें ‘प्रज्ञा पुत्र’ की संज्ञा दी गई है। वैसे हैं तो वरिष्ठ दोनों ही अपने। कनिष्ठों को समर्पित बनकर देव स्तर में प्रवेश करने का आग्रह किया गया है।
साधना-कृत्य मात्र एक कौतूहल बनकर रह जाते हैं। अमुक महापुरुष ने अमुक प्रक्रिया अपनायी। उनकी मनःस्थिति एवं उस समय की सामाजिक परिस्थितियाँ क्या थी? इस बात पर ध्यान न देकर उनके कृत्यों का स्थूल अनुकरण करने का ही प्रायः प्रयास किया जाता है। जब कि अनुकरण उन सनातन सिद्धाँतों का करना चाहिए जिनको अपना कर वे महानता की ओर बढ़ सके थे।
साधना करने पर उसे किसी भी कामना की पूर्ति हो सकती है। इच्छित फल देने के सन्दर्भ में कल्प-वृक्ष को ही प्रमुखता दी जाती है। किंवदन्ती है कि उसकी छत्र छाया में बैठने का जिसे भी अवसर मिलता है वह अभीष्ट वरदान पाता है और मनोरथों को पूर्ण करने का आनन्द लेता है। कल्प-वृक्ष की मान्यता कल्पना की उड़ान हो सकती है किन्तु जीवन की महत्ता समझने वालों को इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं लगती कि मानवी सत्ता में सन्निहित विशिष्टताएं असीम हैं।
साधना सम्भव हो सकता है।
साधना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धि हो सके।
साधनाएं है इनमें मन्त्र जप से लेकर ध्यान, धारणा, आसन, प्राणायम, नाड़ीशोधन प्रक्रिया आदि वैज्ञानिकों द्वारा मन्यता प्रापत वापोधीडंबक के व्यायाम इस कार्य में विशष लाभकारी सिद्ध हुए हैं। योगाभ्यास के अंतर्गत इसे क्रियायोग की संज्ञा दी जाती है। वैज्ञानिक वेनक्वेट ने क्रियायोग के प्रयोग से यह सिद्ध कर दिखाया है कि इसके सतत अभ्यास से दोनों मस्तिष्कों का समान विकास होता है जिससे मानसिक संतुलन बढ़ता है व असमान्य मनःस्थिति नियंत्रित होती है। ध्यान, धारणा व क्रियायोग के सतत् अभ्यास से एक समय ऐसा भी आता है जब कि मनुष्की अन्तर्प्रज्ञा जागृत होती है और बिना कसी प्रकार के अध्ययन के ही नाना प्रकार के गूढ़ रहस्यों का विवेचन सम्भव होता है तथा प्रकृति की अनेक रहस्यमयी जानकारियाँ उसके करतलगत हो जाती हैं। भारतीय ऋषि व योगी इसके अनुपम उदाहरण हैं।
साधना से आत्म-परिष्कार तथा ईश्वरीय सानिनध्य में पहुँच सकना सम्भव होता है। किन्तु साधना एक निश्चित क्रिया-कृत्यों से जुड़ी न होकर श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए होती है। स्थूल परिवेश तो सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। दुराग्रह पुरानी प्रणाली को अपनाने का बना रहा तो यह साधना न होकर अविवेक का परिचायक होगा।
साधना में उपलब्ध होने वाली प्रसन्नता के आधार पर सहज ही पूर्ण होती रही।
साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुझे कठोर परिश्रम नहीं करना होगा। मैं तुझे सभी विद्याओं का दान देने आयी हूँ।”
साधना का लक्ष्य इसी दूरी एवं समय को समाप्त करता है।
साधना तथा लोकमंगल में प्रवृत्ति का परिचय देते हुए ही सम्मिलित होने के लिए आवेदन-पत्र भेजने को कहा गया है। गरिष्ट, पौष्टिक पदार्थ बिना श्रम साधना के नहीं पचते। इसी प्रकार दिव्य अनुदान भी बिना परमार्थ साधना के आत्मसात नहीं हो पाते। बिना आत्मसात हुए पाना न पाना सर्व निरर्थक है। इसीलिए स्वीकृतियाँ देख समझकर ही दी जायेंगी।
साधना इन दिनों एक ही है - विचार क्राँति। समस्त समस्याओं का यह एक ही हल है। प्रज्ञा अभियान या प्रज्ञावतार का भी यही प्रयोजन है कि अवाँछनीयता पक्षधर प्रचलित विचार प्रवाह को उलट कर उस स्थान पर उत्कृष्ट आदर्शवादिता की नये सिरे से स्थापना की जाय। विवेक युक्त दूरदर्शिता का निर्धारण एक ही है कि इन दिनों समस्त साधनों को झोंक कर जन-मानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सर्म्वधन की सेवा साधना अपनाई जाय।
साधना ने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
साधना एवं तपश्चर्या का हंटर ही काम देता है। अन्यथा वे छेड़खानी करने वाले पर ही उलट कर हमला करती है। महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्तियों के निरोध को ‘योग’ कहा है। योग का अभिप्राय चित्त-वृत्तियों पर नियंत्रण करना है। इस साधना पथ को राजयोग या अष्टाँग योग के नाम से सम्बोधित किया जाता है।
साधनात्मक मार्ग दर्शन एवं सामयिक अनुदान की व्यवस्था वस्तुस्थिति को समझते हुए की जा सके। यह थोड़ा समय भी एक वर्ष की विशिष्ट साधना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण सिद्धि हो सके।
साधनाक्रम पूरा करना होगा। साधकों की स्थिति देखकर उनके लिए कुछ विशेष साधनाओं तपश्चर्याच का निर्धारण भी किया जा सकता है। शक्ति संचार की तीनों ध्यान धारणाओं का अभ्यास स्वयं गुरुदेव करायेंगे।
साधनाओं तपश्चर्याच का निर्धारण भी किया जा सकता है। शक्ति संचार की तीनों ध्यान धारणाओं का अभ्यास स्वयं गुरुदेव करायेंगे।
साधना में सलग्न रहने वोल ही आगे बढ़ते और ऊंचा उठते हैं।
साधना में सम्मिलित किया जा सकता है। रुझान, श्रम, विचार ओर धन की चारों सम्पदाओं पर ऐसा अनुशासन बिठाना चाहिए कि इनके अपव्यय को जितना बचाया जा सकना सम्भव हो बचाया जाय।
साधना के आत्मसात नहीं हो पाते। बिना आत्मसात हुए पाना न पाना सर्व निरर्थक है। इसीलिए स्वीकृतियाँ देख समझकर ही दी जायेंगी।
साधना’ अपनाये रहने का निश्चय किया है। अस्त-व्यस्त ओर अस्थिर मति के तो हर क्षेत्र में असफल रहते हैं। उनके लिए यह न्यूनतम साधना अति सरल होते हुए भी कठिन पड़ेगी और निभ न सकेगी। इसीसे कहा गया है कि ‘निष्ठा’ बन सके तो ही आत्म-कल्याण और लोकमंगल के उभयपक्षीय साधनों को न्यूनाधिक मात्रा में साधना सम्भव हो सकता है।
साधना पथ को राजयोग या अष्टाँग योग के नाम से सम्बोधित किया जाता है। इसका उद्देश्य मन को सही रुप से समझ कर उसकी अपार शक्ति को नियंत्रित करके सदुपयोग करने का है।
साधनाओं के लिए शीत ऋतु ही सर्वोत्तम मानी गई है। इन सत्रों को पिछले प्राण प्रत्यावर्तन एवं चान्द्रायण सत्र का सार संक्षेप तथा पंचाँग विद्या का नया समावेश सम्मिलित समझा जाना चाहिए।
साधना के नहीं पचते। इसी प्रकार दिव्य अनुदान भी बिना परमार्थ साधना के आत्मसात नहीं हो पाते। बिना आत्मसात हुए पाना न पाना सर्व निरर्थक है। इसीलिए स्वीकृतियाँ देख समझकर ही दी जायेंगी।
साधना का अंग है। लोक-कल्याण साधना के साथ अनिवार्य रुप से जुड़ा है। यह तभी बन पड़ता है जब समाज की स्थिति को देखते हुए सुलभ, सहज जीवन-क्रम अपनाया जाय। साधना का यही लक्ष्य है। आत्मिक प्रगति एवं सामाजिक उन्नति का यही आधार है।
साधना के लिए कुछेक व्यक्तियों को बुलाया था। ब्रह्म वर्चस् की पंचाग्नि विद्या का यह तीसरा दौर है। यों उसको समग्र लाभ उठाने के लिए अधिक दिन उपयुक्त वातावरण में रहकर साधना करने की आवश्यकता पड़ती है, पर उसको साधक की स्थिति को देखते हुए सीमित मार्ग-दर्शन एवं आवश्यक अनुदान स्वल्प समय में भी दिया जा सकता है। शीत ऋतु में पाँच-पाँच दिन के सत्र इसी प्रयोजन के लिए लगाये गये हैं और उनके प्रज्ञापुत्रों तथा प्रज्ञा परिजनों को सम्मिलित होने के लिए बुलाया गया है। हरिद्वार में शीत ऋतु में हानि होने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए।
साधना न होकर अविवेक का परिचायक होगा।
साधना में लगाना चाहिए। इन दिनों पच्चीस पैसा जितने स्वल्प मूल्य की खोलते प्राण से भरी पूरी निताँत सस्ती पुस्तिकाएं भी युग साहित्य के रुप में छप रही है। दस पैसा से तीन रुपया मासिक होता है इतने से 12 पुस्तिकाएं खरीदी जा सकती है। इन्हें घर, परिवार के सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने का प्रबंध किया जाना चाहिए। दोनों पत्रिकाएं इसके अतिरिक्त खरीदी जा सकें तो इतना साहित्य घर, परिवार में स्वाध्याय की परम्परा को प्रखर बना सकता है।
साधनात्मक मार्गदर्शन एवं सहयोग भी प्राणवानों के सान्निध्य में रहकर विनिमय एवं आदान-प्रदान के माध्यम से अधिक प्रामाणिक रुप में मिल पाता है।
साधना में तन्मय रहते। एक बार आधी रात में उनके दीपक का प्रकाश धुँधला पड़ गया। कई दिनों के निरन्तर अध्ययन-मनन से सन्त भी थके हुए थे। उन्होंने ग्रन्थ बन्द किया और लेट गये।
साधना -
साधना एक निश्चित क्रिया-कृत्यों से जुड़ी न होकर श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए होती है। स्थूल परिवेश तो सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। दुराग्रह पुरानी प्रणाली को अपनाने का बना रहा तो यह साधना न होकर अविवेक का परिचायक होगा।
साधना प्रणालियों द्वारा भूतकाल की घटनाओं को साक्षात्कार करते हैं। इष्ट के रुप में राम, कृष्ण, हनुमान, बुद्ध, इसामसीह, चैतन्य, रामकृष्ण के दर्शन करने में यही तथ्य निहित है। वे भूतकाल में चेतन प्रक्रिया द्वारा पहुँचकर अदृश्य जगत में विद्यमान इन महापुरुषों के साक्षात्कार कर लेते हैं।
साधना के साथ अनिवार्य रुप से जुड़ा है। यह तभी बन पड़ता है जब समाज की स्थिति को देखते हुए सुलभ, सहज जीवन-क्रम अपनाया जाय। साधना का यही लक्ष्य है। आत्मिक प्रगति एवं सामाजिक उन्नति का यही आधार है।
साधना और परमार्थ प्रयोजनों का मार्ग सुख सुविधाओं से भरा नहीं है। उसमें अपेक्षाकृत अधिक श्रम करना पड़ता हे और सुख सुविधाओं में भी कटौती करनी पड़ती है। लेकिन उस आदर्श को अपनाने से ऐसा कोई संकट उत्पन्न नहीं होता कि मनुष्य के लिए वह सहन करना भी दुष्कर हो जाय।
साधना से अन्तःशक्तियाँ विकसित तभी होती है जब उसके साथ उदात्तत भावना का समावेश हो? भावनाओं एवं श्रेष्ठ लक्ष्य के अभाव में तो साधना-कृत्य मात्र एक कौतूहल बनकर रह जाते हैं। अमुक महापुरुष ने अमुक प्रक्रिया अपनायी। उनकी मनःस्थिति एवं उस समय की सामाजिक परिस्थितियाँ क्या थी? इस बात पर ध्यान न देकर उनके कृत्यों का स्थूल अनुकरण करने का ही प्रायः प्रयास किया जाता है।
साधना कहा जा सकता है। अब तक की अभ्यस्त आदतों को रोकने और उन्हें शालीनता के ढाँचे में नये सिरे से ढालने, अनुपयुक्त को घटाने और उचित को बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा जाय। आत्मचिन्तन, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास के तथ्यों पर विचार करते रहने से संयम साधना के उपाय सूझते और प्रबल होते चलते।
साधना। तपश्चर्या की आग में कुसंस्कारों की गलाया जाता है और योग साधनों से उसे उपयुक्त ढाँचे में ढाला जाता है। कुसंस्कारिता से छुटकारा पाने और सुसंस्कारी व्यक्तित्व निर्मित करने के लिए योगसाधन का जितना महत्त्व है उतना और किसी उपाय, उपचार का नहीं है।
साधना होता है जो इस आकाँक्षा को पूर्ण कराने के लिए उपयुक्त सिद्ध हो सके।
साधना के नाम पर यह विचारशीलता पर लगा दोष है।
साधना अति सरल होते हुए भी कठिन पड़ेगी और निभ न सकेगी। इसीसे कहा गया है कि ‘निष्ठा’ बन सके तो ही आत्म-कल्याण और लोकमंगल के उभयपक्षीय साधनों को न्यूनाधिक मात्रा में साधना सम्भव हो सकता है।
साधना में जुटकर विद्या का सच्चा अधिकारी बनुँ।
साधना का विषय है। उसकी खोज जारी रखी जाय। हठवादी न बना जाय। इसी मार्ग पर चलते हुए विग्रहों से बचना और तथ्य तथा सत्य तक पहुँच सकता सम्भव हो सकता है।
साधना करने की आवश्यकता पड़ती है, पर उसको साधक की स्थिति को देखते हुए सीमित मार्ग-दर्शन एवं आवश्यक अनुदान स्वल्प समय में भी दिया जा सकता है। शीत ऋतु में पाँच-पाँच दिन के सत्र इसी प्रयोजन के लिए लगाये गये हैं और उनके प्रज्ञापुत्रों तथा प्रज्ञा परिजनों को सम्मिलित होने के लिए बुलाया गया है। हरिद्वार में शीत ऋतु में हानि होने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए। वैसा कुछ होने वाला नहीं है। विशिष्ट साधनाओं के लिए शीत ऋतु ही सर्वोत्तम मानी गई है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-June
साधनाओं के रुप में व्यक्ति की रहस्यमयी क्षमताओं को शुद्ध, प्रखर, तथा विकसित बनाने की तकनीक विकसित कर ली थी। उन उपलब्धियों को अब तक चाहे जो कुछ कहा जाता रहा हो परन्तु ज्ञात इतिहास के आधुनिक युग में भी ऐसी असंख्याओं घटनायें घटी है जो मनुष्य की अलौकिक अभौतिक सामर्थ्य को प्रमाणित करती है।
साधना द्वारा प्रत्यक्ष की जा सकती है। योग साधना का मूल उद्देश्य ही चित्त वृत्तियों का निरोध है। कहा भी गया है-
साधनाओं के द्वारा सचेतन बुद्धि संस्थान में लगी हुई चिन्तन और संकल्प की क्षमता को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी अद्भुत और अनुपम दिव्यताएँ जागृत होना आरम्भ कर देती है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त करता चलता है उसे उतना ही समर्थ और सिद्ध पुरुष कहा जाता है। उसे उतना ही समर्थ और सिद्ध पुरुष कहा जाता है। इन प्रयोगों को यदि व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से किया जा सके तो निस्संदेह मनुष्य साधारण न रह कर असाधारण बन जाता है।
साधना में इसके लिए ध्यान को सर्वोत्कृष्ट माध्यम बताया गया है। ध्यान के द्वारा योगीजन अपनी एकाग्रता को बढ़ाते हुए चित्त को जागृत अवस्था में ही संकल्प पूर्वक लय कर देते है। इस स्थिति को समाधि कहा गया है और यह स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रत्याहार, धारणा ध्यान आदि भूमिकाएँ पार करनी पड़ती है। इन साधनाओं के द्वारा सचेतन बुद्धि संस्थान में लगी हुई चिन्तन और संकल्प की क्षमता को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी अद्भुत और अनुपम दिव्यताएँ जागृत होना आरम्भ कर देती है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त करता चलता है उसे उतना ही समर्थ और सिद्ध पुरुष कहा जाता है।
साधना सामग्री लेने में असमर्थ ही रहा है।
साधना या बौद्धिक विकास के प्रयत्नों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती। उसमें मानसिक उर्त्कष, विद्याध्ययन कलाकौशल आदि के विकास और संवर्धन की पूरी छूट है। प्रतिबन्ध केवल इस बात का है कि मनः क्षेत्र को उत्तेजित, विक्षुब्ध एवं अंशात न होने दिया जाय। अनाशक्ति, स्थित प्रज्ञा आदि पर योगशास्त्रों में बहुत जोर दिया गया है। इनका तार्त्पय इतना ही है कि अनुकुल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ सदैव आती जाती रहती है।
साधना द्वारा व्यक्तिकी सीमित चेतना को विराट की असीम चेतना के साथ उसी प्रकार सम्बन्धित कर दिया जाता है जिस प्रकार किसी रेडियों के यन्त्र आकाश में तैरने वाली ध्वनि तरंगों से संबंधित होते है।
साधना में एकाग्रता को बढ़ाना होता है और मन में उठने वाले विभिन्न संकल्पों को रोककर उसे एक केन्द्र पर स्थिर रखने का प्रयत्न करना पड़ता है। योग साधना में इसके लिए ध्यान को सर्वोत्कृष्ट माध्यम बताया गया है। ध्यान के द्वारा योगीजन अपनी एकाग्रता को बढ़ाते हुए चित्त को जागृत अवस्था में ही संकल्प पूर्वक लय कर देते है। इस स्थिति को समाधि कहा गया है और यह स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रत्याहार, धारणा ध्यान आदि भूमिकाएँ पार करनी पड़ती है। इन साधनाओं के द्वारा सचेतन बुद्धि संस्थान में लगी हुई चिन्तन और संकल्प की क्षमता को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी अद्भुत और अनुपम दिव्यताएँ जागृत होना आरम्भ कर देती है।
साधनाओं और सूक्ष्म की सामर्थ्य को कोरी गप्प तथा मनगढ़न्त मानने वाले सरजौन वुडरफ भारत में आकर कुछ ऐसी अनुभूतियों से गुजरे कि उन्हें अपनी मान्यता को तिलाँजलि देनी पड़ी। ब्रिटिश काल में सरजौन वुडरफ कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ मजिस्टे्रट थे। उन्होंने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि एक बार वे ताजमहल के संगमरमरी फर्श पर बैठे थे, साथ में भारतीय मित्र भी थें बातों में किसी प्रसंग वश संकल्पशक्ति की चर्चा चल पड़ी। सरजौन वुडरफ के भारतीय मित्र ने संकल्पशक्ति की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए कहा- इतना तो मैं भी कर सकता हूँ कि सामने जो लोग बैठे है उनमे से जिसे आप कहे उसे उठा दूँ और वापस आप कहें जहाँ बिठा दूँ।” वुडरफ ने उन व्यक्तियों में से एक को चुन लिया और यह भी बता दिया कि उसे किस स्थान पर बिठाना है।
साधना विद्यार्जन, ज्ञान साधना या बौद्धिक विकास के प्रयत्नों पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती। उसमें मानसिक उर्त्कष, विद्याध्ययन कलाकौशल आदि के विकास और संवर्धन की पूरी छूट है। प्रतिबन्ध केवल इस बात का है कि मनः क्षेत्र को उत्तेजित, विक्षुब्ध एवं अंशात न होने दिया जाय। अनाशक्ति, स्थित प्रज्ञा आदि पर योगशास्त्रों में बहुत जोर दिया गया है। इनका तार्त्पय इतना ही है कि अनुकुल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ सदैव आती जाती रहती है।
साधनाओं के माध्यम से चेतन मस्तिष्क को शिथिल निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाने में भी सफलता प्राप्त कर ली थी। यह सफलता आज भी प्राप्त की जा सकती है, जो अनेक चमत्कारों की जननी है। दूरदर्शन, दूरश्रवण, विचार प्रेषण, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्ष आदि कितनी ही ऐसी विशेषताएँ प्राप्त की जा सकती है, जो साधारणतय मनुष्यों में नहीं होती।
साधना होगा। मनुष्य जीवन में सन्निहित गहन सरसता की अनुभूति तथा विलक्षण जानकारियोँ की उपलब्ध इसी मार्ग को अपनाने से सम्भव हो सकती है।
साधना द्वारा उन शक्ति केन्द्रों को, चक्रों को, ग्रन्थियों और मातृकाओं को ही जागृत किया जता है तथा अलौकिक सिद्धि सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है। योगसाधना द्वारा व्यक्तिकी सीमित चेतना को विराट की असीम चेतना के साथ उसी प्रकार सम्बन्धित कर दिया जाता है जिस प्रकार किसी रेडियों के यन्त्र आकाश में तैरने वाली ध्वनि तरंगों से संबंधित होते है।
साधना का मूल उद्देश्य ही चित्त वृत्तियों का निरोध है। कहा भी गया है-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-December
साधना-विधान, आत्तम-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग सें प्रतिपादन। मूल्य-7)50 सजिल्द।
साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ।
साधना में लगे भिक्षु संघ का परिजन हूँ ।’
साधना से समुचित लाभ उठानेके इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभव गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजुद है।
साधना का वह उपक्रम भी जुटाया जाना चाहिए जो व्यक्तित्व को विकसित करने के साथ-साथ सिद्धियों का सुयोग भी प्रस्तुत करता है ।
साधना विधान के जो माहात्म्य प्रतिफल कहे गये है वे तभी सच सिद्ध होते है जब साधक की मनोभूमि में उत्कृष्ट चिन्तन की उर्वरता और आदर्श चरित्र की नमी विद्यमान हो । मात्र कर्म काण्ड ही सब कुछ नहीं है । पूजा से ही देवता प्रसन्न नहीं होते । इस समस्त विधि-व्यवस्था की उपयोगिता तभी है जब साधक को अपने व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाना आता हो । कुशल किसान वह है जो बीजारोपण के साथ-साथ पौधे के उगने एवं फलने के लिए अभीश्ट आवश्कताओं को भी समझता और उन्हें जुटाने का प्रयत्न करता है ।
साधना ने उनके कण्ठ को और भी सुरीला बना दिया । उनकी संगीत प्रतिभा निखरी और उन्होंने अपने मूल देश में जहाँ-तहाँ संगीत कार्यक्रम आयोजित किये ।
साधना एक कृषि कर्म एवं उदात्त आरोपण है उसे फलित करने के लिए उपासना क्रम ही पर्याप्त नहीं वरन जीवन साधना का वह उपक्रम भी जुटाया जाना चाहिए जो व्यक्तित्व को विकसित करने के साथ-साथ सिद्धियों का सुयोग भी प्रस्तुत करता है ।
साधनायें तथा अन्नमय कोष, मनोमय कोष को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिर्ग्दशन मू-7)50 सजिल्द।
साधना के माध्यम से विकसित करते है, वह कई बार कुछ व्यक्तियों में अनायास ही उत्पन्न हो जाती है । अनेक लोगों में वह जन्म-जात रुप से पाई जाती है । इस क्षमता का विकास करके मनुष्य सीमित परिधि के बन्धनों को काट कर असीम के साथ अपने सम्बन्ध सूत्र जोड़ सकता है और अपनी ज्ञान परिधि को उतना ही विस्तृत बना सकता है समय-समय पर इस प्रकार के जो प्रमाण मिलते रहते है उनसे इस सम्भावना को और भी बल मिलता है कि आत्मविश्वास का प्रयत्न मनुष्य को कहीं से कहीं पहुँचाने में समर्थ है ।
साधना मू. 60 पैसे।
साधना से इसे योग्य बनाया है कि वे युग शिल्पी अग्रिम पंक्ति में खड़े हो सकें । अवाँछनीयता, उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति सर्म्बधन का तूफानी प्रबाह उत्पन्न करने ओर विनाश को सृजन में बदलने की जो युग चेतना इन दिनों उभर रही है उसे ‘अखण्ड-ज्योंति’ की देन समझा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी ।
साधनाआदि का भी समावेश रखा गया।
साधना ऐसी ही सम्भावनाओं का पथ-प्रशस्त करती है
साधना। 4. गायत्री का शक्तिस्त्रो-सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पंचविधी दैनिक साधना।
साधना को बीज समझा और उसकी परिणिति को सिद्धि कहा जा सकता है । इस प्रक्रिया को-बीज के वृक्ष बनने-से उपमा दी जा सकती है । बीज का सक्षम होना ही पर्याप्त नहीं, उसके लिए उपयुक्त भूमि, खाद, सिंचाई और रखवाली की भी जरुरत पड़ती है । यह साधन न मिलें तो बोने वाले की आकाँक्षा एवं बीज को समर्थता का उपयुक्त प्रतिफल उपलब्ध न हो सकेगा ।
साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरुप।
साधना की । महाकाल ने उन्हें प्रचंड परशु दिया जो अजेय और अमोघ था । एक ओर थी सशस्त्र सेनाएँ, दूसरी ओर परशुधर परशुराम । परशु का अर्थ है प्रबल प्रचार, समर्थ ज्ञानयप्ज्ञ । सहस्त्रबाहु की निरंकुश फ्रूरताओं के आधार-ज्ञाता को विश्लेषित कर उन्हें तार-तार कर डालने हजार बार उनका सिर उतार लेने की आवश्यकता पड़ती है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-February
साधना प्रचेता से जो आध्यात्मिक शक्ति संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। इसलिये साधना में रत रहते हुए भी वे उन्नति के नाम पर यथा स्थान ही ठहरे रहते थे । होना तो यह चाहिए था कि अपनी इस अप्रगति का कारण खोजते और उसको दूर करते, लेकिन वे स्वयम् पर ही इस अप्रगति से क्रूद्ध रहा करते थे । अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से उनका स्वभाव खराब हो गया था और वे जरा-जरा सी बात पर उत्त्जित हो उठते थे ।
साधना का उद्देश्य प्रचलित एकाँगी कर्म-काण्डों से पूरा हो सकता है । यही कारण है कि मात्र शरीर श्रम और वस्तु समुच्चय के आधार पर योग के नाम की जो लकीर भर पीटी जाती रही है उसके उत्साहवर्धक सत्परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं । उसके लिए तो पदार्थ की आहार की कारण शक्ति को भी समझना और उपयोग में लाना पड़ेगा ।
साधनात्मक प्रयासों को सर्वोच्च माना गया है । उद्योग, व्यवसाय, शिल्पकला, साहित्य, शोध आदि के प्रयास निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं पर आत्मा और परमात्मा के मध्य प्रभावी विनियोग स्थापित करने के प्रयोगों को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता रहा है । ऊर्ध्वमूल अधः शाखा वाले अश्वास्थ का यही रहस्य है जिसे देखने जानने वाले समझते और मानते थे तथा न देखने वाले अमान्य ठहराते हैं ।
साधना पुरुषार्थ द्वारा किये गये अनुभवों के आधार पर ऋषियों ने मृत्यु को भी एक सामान्य घटना के रुप में प्रतिपादित किया है । डरने, अनजान काल्पनिक पीड़ा से घबड़ाने जैसी बातें मृत्यु की अवधि अथवा उसके बाद नहीं होती । मृत्योपरान्त जीवन के अस्तित्व को अपनी योग साधनाओं के माध्यम से देखकर आत्मा के अजर-अमर होने की घोषणा की । इस तथ्य की पुष्टि अब परामनोविज्ञान की नवीन शोधों द्वारा हो रही है ।
साधना शक्ति पूँजी के रुप में जुड़ी हुई है । उसी पूँजी में सफलता के वर्तमान शिखर छुए जा सके हैं । इसलिए वर्तमान जीवन में किये गये प्रयासों की असफलता के बारे में सोच-सोचकर निराश होने का कोई कारण नहीं है कि किये जा रहे प्रयत्न र्व्यथ जा रहे हैं । किसान बीज बोता है तो बोते समय तो यही लगता है कि बीज र्व्यथ मिट्टी में जा रहे हैं, पर जब वे फसल के रुप में उग आते हैं तो प्रतीत होगा कि बोये गये बीज र्व्यथ नहीं गये वरन् उनका निश्चित परिणाम प्राप्त हुआ है । इसी प्रकार प्रगति और उर्त्कष की दिशा में किये गये कोई भी प्रयास र्व्यथ नहीं जाते ।
साधना का फल निश्चित रुप से मिलेगा, आज न मिल पाये तो कल मिलेगा, पर मिलेगा वह निश्चित है ।
साधना के दोनों रुप हो सकते हैं-अभिवर्धन भी और उन्मूलन भी । कुशल माली अपने बगीचे को सुरम्य बनाने के लिए उसमें कुछ आरोपण करता है कुछ उखाड़-पछाड़ कुछ काट-छाँट । आरोपण की तरह यह उन्मूलन भी एक महत्वपूर्ण विद्या है । सहयोग का सहोदर ही संघर्ष है । आवश्कतानुसार दीपक और जल कलश की तरह उन दोनों ही शीत-ताप पुण्यों का प्र्रयोग करना पड़ता है ।
साधना से अभीष्ट की उपलब्धि सम्भव है ।
साधना के बाद जाकर कहीं बुद्ध बन सके । ऋषि-मुनियों के सम्बन्ध में तो पूर्व जन्मों में अगणित बार असफल होने का विवरण मिलता है । सन्त ज्ञानेश्वर, तुलसीदास, शंकराचार्य, कबीर, मीरा, सूरदास, चन्द्रगुप्त चाणक्य, पाणिनी आदि के बारे में भी ऐसी कई गाथाएँ प्रचलित हैं, जिनके अनुसार उन्हें पिछले जन्मों में विफलता का मुँह देखने को मिली थी । आत्मिक उर्त्कष के क्षेत्र में तो अनेक जन्मों में सिद्धि प्राप्त होने का उल्लेख शास्त्र ग्रन्थों में कई स्थानों पर मिलता है । एक जन्म में असफल हो जाने के बाद साधक की क्या स्थिति होती है यह दर्शाते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-
साधनाओं के माध्यम से देखकर आत्मा के अजर-अमर होने की घोषणा की । इस तथ्य की पुष्टि अब परामनोविज्ञान की नवीन शोधों द्वारा हो रही है ।
साधना भली-प्रकार होती रह सकती है। इसमें अपनी भाव भूमिका योग्यता बढ़ने और सेवा का आनन्द मिलता रह सकता है ।
साधना रुपी बीज को सिंचित, पुष्पित, पल्लवित करने में परोक्ष किन्तु प्रमुख योगदान इन दोनों का ही है । खाद और पानी के बिना तो अच्छे किस्म के बीज भी अंकुरित नहीं हो पाते । किसी प्रकार अंकुरित हो भी जाये तो भी उनके बढ़ने, फूलने-फलने की सम्भावना बनी रहती । इसी प्रकार श्रद्धा- विश्वास का अवलम्बन न हो तो प्रभावशाली उपासना प्रणाली भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती । समस्त आध्यात्मिक उपचार इन्हीं दो का अवलम्बन पाकर सफल होते हैं ।
साधना में रत रहते हुए भी वे उन्नति के नाम पर यथा स्थान ही ठहरे रहते थे । होना तो यह चाहिए था कि अपनी इस अप्रगति का कारण खोजते और उसको दूर करते, लेकिन वे स्वयम् पर ही इस अप्रगति से क्रूद्ध रहा करते थे । अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से उनका स्वभाव खराब हो गया था और वे जरा-जरा सी बात पर उत्त्जित हो उठते थे ।
साधना एवं कर्त्तव्य परायणता के अभ्यास का क्रम जारी रखा जाय तो व्यामोह की उतनी जटिलता उत्पन्न नहीं होने पावेगी । जिसमें मरण की घड़ी असह्य वेदना उत्पन्न करें । स्वागत और विदाई के अपने-अपने खट्टे मिट्ठे स्वाद हैं, जो आये दिन इच्छा या अनिच्छा से चखने पड़ते हैं । सम्पत्ति साधनों के प्रति बैंक के खजान्ची जैसी और प्रियजनों के प्रति हर्षोत्सव में एकत्रित होने वाले मित्रों जैसी दृष्टि रखी जा सके तो विदाई में व्यथा नहीं, नवीनता भार की अनुभूति होगी ।
साधना में सफलता और सिद्धि प्राप्त कर ली गई है ।
साधना (2) स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा इन चार तथ्यों का समन्वय ही सच्चे अर्थो में जीवनोद्देश्य की पूर्ति कर सकता है । प्रस्तुत देव-नगर में बसने वालों को शारीरिक नित्यकर्मो के अतिरिक्त इन्हीं चार कार्यक्रमों में निरत रहना पड़ेगा । व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक स्थिति के अनुरुप उनके कार्यक्रम बना दिये जायेंगे ।
साधना उपक्रम का एकमात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है । आत्मा की पवित्रतम और उदारतम स्थिति का नाम ही परमात्मा है । लोभ, मोह के बन्धनों को काटकर आदर्श और कर्त्तव्य के अपनाने का नाम ही मुक्ति है । र्स्वग न तो स्थान है और न परिस्थिति । वह विशुद्ध रुप से परिष्कृत दृष्टिकोण ही है जिसे अपनाने वाला देव संज्ञा में गिना जाने लगता है और अति आनवी आनन्द का रसास्वादन करता है।
साधना से समान रुप से निरत रहना होगा । आलस्य और प्रमाद बरतने, अनुशासन न माने की छूट किसी को भी न मिल सकेगी ।
साधनात्मक प्रयोगों में यत्िकचित ही सफलता मिलती है, जबकि आत्मबल का अभिवर्धन ही मनुष्य की सबसे बड़ी सफलता है और वही सबसे मूल्यवान सम्पदा भी । यदि यह पूँजी अभीष्ट मात्रा में विद्यमान हो तो मनुष्य लौकिक दृष्टि से और आत्मिक दृष्टि से, सर्वप्रकारेण सफल हो सकता है । उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह स्वयं अपना आत्मिक उर्त्कष करने के साथ-साथ सिद्ध पुरुषों की तरह अपनी नाव में बिठाकर असंख्यों को पारकर सकता है। इस सर्न्दभ में आहार-शुद्धि की, उसकी सतोगुणी कारण शक्ति की उपयोगिता असंदिग्ध ही नहीं उपयोग अनिवार्य भी है। मनुस्मृति में साधकों के लिए भक्ष्य-अभक्ष्य आहार की लम्बी सूची बताई गई है और कहा गया है कि आत्मिक प्रगति के इच्छुकों को अभक्ष्य आहार अनजाने में भी नहीं करना चाहिए ।
साधना और संस्कारों की पूँजी से उच्च स्थिति में पहुँचा माना जाता है । कुछ ऐसे उदाहरण सामने भी आये हैं, जिनमें ख्याति प्राप्त व्यक्तियों ने अपनी पूर्व जन्म की स्मृतियाँ बताई और वे पूरी तरह सही निकलीं । इस आधार पर यह दावे के साथ कहा जाने लगा कि महान व्यक्तियों की महान् उपलब्धियाँ अथवा जन्मजात प्रतिभाएँ एक ही जीवन की देन नहीं होतीं और न ही प्रकृति या परमात्मा का पक्षपातपूर्ण अनुदान ।
साधना रुपी गाड़ी के यही दो पहिये हैं जिनके सहारे वह गतिशील होती तथा अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचती है । इनके बिना साधना पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता । आध्यात्मिक सफलताओं में साधना उपचारों को महत्व दिया जा सकता है किन्तु गहराई में जाने पर पता चलता है कि साधना रुपी बीज को सिंचित, पुष्पित, पल्लवित करने में परोक्ष किन्तु प्रमुख योगदान इन दोनों का ही है । खाद और पानी के बिना तो अच्छे किस्म के बीज भी अंकुरित नहीं हो पाते । किसी प्रकार अंकुरित हो भी जाये तो भी उनके बढ़ने, फूलने-फलने की सम्भावना बनी रहती ।
साधना में भावनाओं का महत्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भाव सूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है ।
साधना द्वारा उसी प्रेरणा को हृदयंगम किया जाता है । आस्तिकता और धार्मिकता का समस्त कलेवर इसी प्रयोजन के निर्मित्त खड़ा किया गया है । ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध व्यक्ति के भाव संस्थान से है । उत्कृष्टता की भाव भूमिका में ही ईश्वर की दिव्य चेतना का अवतरण सम्भव हो सकता है । साधना उपक्रम का एकमात्र उद्देश्य अन्तः भूमिका का परिष्कार ही है ।
साधना द्वारा दिव्य श्रवण की क्षमता प्राप्त होती है । साधना से पात्रता बढ़ती है । और तद्नुसार प्रकृति का रहस्य मय भण्डार साधक को करतल गत होता है । इन्हीं उपलब्धियों में सूक्ष्म ध्वनियों को सुन सकने की सफलता का अपना स्थान और महत्व है ।
साधना से काम के परिष्कार से जीवन समाविष्ट होती है। काम की ही परिणति महात्वाकाँक्षाओं के रुप् में होती है। जब मनुष्य उस दिशा मेंप्रयास करता हैतो वही पुरुषार्थ एवं साहसिकता केरुप् में देखा जाता है। काम जयी ऋषि तपस्वियों की भाँति जार्जबनार्ड शा भी अन्दर से बाहरतक उल्लास एवं पुरुषार्थ के सजीव रुपथे । उन्हें वववाह के लिए कभी अवकाश नहीं मिला ।
साधनाओं में आहार की कारण शक्ति को विकसित करके उसके उपयोग का विधान है । इस सम्बन्ध में उपेक्षा बरती जाने पर आत्मबल सर्म्वधन के लिए किये जा रहे साधनात्मक प्रयोगों में यत्िकचित ही सफलता मिलती है, जबकि आत्मबल का अभिवर्धन ही मनुष्य की सबसे बड़ी सफलता है और वही सबसे मूल्यवान सम्पदा भी । यदि यह पूँजी अभीष्ट मात्रा में विद्यमान हो तो मनुष्य लौकिक दृष्टि से और आत्मिक दृष्टि से, सर्वप्रकारेण सफल हो सकता है । उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह स्वयं अपना आत्मिक उर्त्कष करने के साथ-साथ सिद्ध पुरुषों की तरह अपनी नाव में बिठाकर असंख्यों को पारकर सकता है। इस सर्न्दभ में आहार-शुद्धि की, उसकी सतोगुणी कारण शक्ति की उपयोगिता असंदिग्ध ही नहीं उपयोग अनिवार्य भी है।
साधना उन्हें तत्पर तथा सक्षम बनाना एवं कार्य क्षेत्र में उतर सकने की सामर्थ्य से सुसम्पन्न करना ही इन दिनों मिशन की परोक्ष गतिविधियों को मूर्धन्य प्रयास है। प्रत्यक्ष कार्यक्रम तो पूर्ववत् हैं । व्यक्ति, परिवार और समाज के नव निर्माण की जो रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही हैं । उनमें हेर-फेर कुछ नहीं करना है। मात्र उनका स्तर एवं विस्तार ही बढ़ना है ।
साधनाओं का ही परिपाक परिणाम होती है । बहुधा ऐसे व्यक्ति पिछले जन्म में इस दिशा में अविराम श्रम करते हुए हार-थक कर असफल हुए हैं और इस जन्म में उन्हें पिछले जन्मों की साधना का सत्परिणाम प्राप्त हुआ है । जिस प्रकार बुरे कर्मो का फल इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में मिलता है, उसी प्रकार अच्छे कार्यो का परिणाम कार्यो का परिणाम भी निश्चित है वह भी इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में निश्चित रुप से मिलता है ।
साधना और उपासना का प्रतिफल आत्म विस्तार के रुप में ही उपलब्ध होता है संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धनों को तोड़ के फेंक देने और विराट् के साथ अपनी आत्मीयता जोड़ लेने का ही नाम मुक्ति है । र्स्वग के दो पक्ष हैं उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व । जिसके अन्तःकरण में इन दोनों की प्रतिष्ठापना हो गई, समझाना चाहिए उसने मनुष्य शरीर में रहते हुए ही ‘देवयोनि’ प्राप्त कर ली ।
साधना के विभिन्न उच्च स्तरीय पक्ष सामने रखे । संवेदन क्षमता को ऊर्ध्वमुखी बनाना ही इसका उद्देश्य था। अभी तक संयम का जो स्वरुप माना जाता रहा है, वह एकाँगी है । अर्थात् शक्तियों के प्रवाह को रोकना । नदियों को पानी बाँध बनाकर रोक तो लिया जाय पर सिंचाई एव विद्युत उत्पादन का काम लिया न जाय तो उसकी परिणिति विनाश में ही होगी ।
साधना मार्ग के पथिकों के लिए इस बात को निर्देश दिया गया है कि सात्विक आहार ही अपनाया जाय और उसकी सात्विकता को भी भावनाओं का सम्पुट देकर आत्मिक चेतना में अधिक सहायता दे सकने योग्य बनाया जाय । भगवान का भोगप्रसाद, यज्ञाग्नि में पकाया गया चरुद्रव्य इसी प्रकार के पदार्थ हैं जिनकी स्थूल विशेषता न दिखाई देने पर भी उनकी सूक्ष्म सामर्थ्य बहुत अधिक होती है ।
साधनाएँ प्रायः इन्हीं दो केन्द्रों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है ।
साधना है। युग चेतना से परिचित और प्रभावित करना है। इतना ही नहीं सर्म्पकै प्रशिक्षण और अनुरोध को इतना प्रभावी बनाना है जिसके दबाव में लोग अपनी आदतों, इच्छाओं और गतिविधियों में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने के लिए हिम्मत ही नहीं तत्पर भर हो सकें । यह कार्य कहने सुनने में सरल प्रतीत हो सकता है । पर वस्तुतः उतना कठिन और जटिल है ।
साधना उपचारों को महत्व दिया जा सकता है किन्तु गहराई में जाने पर पता चलता है कि साधना रुपी बीज को सिंचित, पुष्पित, पल्लवित करने में परोक्ष किन्तु प्रमुख योगदान इन दोनों का ही है । खाद और पानी के बिना तो अच्छे किस्म के बीज भी अंकुरित नहीं हो पाते । किसी प्रकार अंकुरित हो भी जाये तो भी उनके बढ़ने, फूलने-फलने की सम्भावना बनी रहती । इसी प्रकार श्रद्धा- विश्वास का अवलम्बन न हो तो प्रभावशाली उपासना प्रणाली भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती । समस्त आध्यात्मिक उपचार इन्हीं दो का अवलम्बन पाकर सफल होते हैं ।
साधना पथ पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सकता । आध्यात्मिक सफलताओं में साधना उपचारों को महत्व दिया जा सकता है किन्तु गहराई में जाने पर पता चलता है कि साधना रुपी बीज को सिंचित, पुष्पित, पल्लवित करने में परोक्ष किन्तु प्रमुख योगदान इन दोनों का ही है । खाद और पानी के बिना तो अच्छे किस्म के बीज भी अंकुरित नहीं हो पाते । किसी प्रकार अंकुरित हो भी जाये तो भी उनके बढ़ने, फूलने-फलने की सम्भावना बनी रहती । इसी प्रकार श्रद्धा- विश्वास का अवलम्बन न हो तो प्रभावशाली उपासना प्रणाली भी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती ।
साधना का सत्परिणाम प्राप्त हुआ है । जिस प्रकार बुरे कर्मो का फल इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में मिलता है, उसी प्रकार अच्छे कार्यो का परिणाम कार्यो का परिणाम भी निश्चित है वह भी इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में निश्चित रुप से मिलता है ।
साधना का उपक्रम ऐसा सुनियोजित रहेगा, जिसमें अव्यवस्था की असुरता को जीवन क्रम में प्रवेश पाने के लिये गुँजायश ही न रहे । अपने हाथ भोजन बनाने की सुविधा भी है और सामूहिक भोजनालय की व्यवस्था भी । दैनिक जीवन की अन्य आवश्यकतायें पूरी करने वाले सभी साधन गायत्री नगर में मौजूद हैं ।
साधना से पात्रता बढ़ती है । और तद्नुसार प्रकृति का रहस्य मय भण्डार साधक को करतल गत होता है । इन्हीं उपलब्धियों में सूक्ष्म ध्वनियों को सुन सकने की सफलता का अपना स्थान और महत्व है ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-August
साधना नहीं अथक पुरुषार्थ, लगन एवं प्रामाणिकता बनते है। देखा जाय तो विश्व के सभी मूर्धन्य सम्पन्न सामान्य स्थिति से उठ कर असामान्य तक जा पहुँचे। साधन एवं परिस्थितियाँ तो प्रतिकूल ही थी, पर अपनी श्रमनिष्ठा एवं मनोयोग के सहारे सफलता के शिखर पर जा चढ़ें। वे यदि परिस्थितियों का रोना रोते रहते तो अन्य व्यक्तियों के समान ही हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते और सम्पन्न बनने की कल्पना में मन बहलाते रहते।
साधना की जीवन नीति बनाकर चलना होगा। अनैतिकवाद और अध्यात्मवाद के दृष्टिकोण का यह अन्तर हर क्षेत्र में समझा जा सकता है। प्रत्यक्ष कितना ही प्रभावी क्यों न हो, आत्यन्तिक समाधान परोक्ष के आधार पर ही निकलता है।
साधनाएँ तो साधनजन्य होती है, पर भक्ति उससे सर्वथा मुक्त। उनको भोजन कराना अर्थात् आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन और आत्म-निर्माण की प्रवृत्ति का विकास ही वह अवलम्बन है जिससे आत्म साक्षात्कार या ब्रम्हा प्राप्ति की साधना सिद्ध हो पाती है अर्थात् इस विनाशशील जगत के प्रपंचों से छूट कर मनुष्य सत्य को प्राप्त और धारण करता हैं। स्नातक सन्तुष्ट हुए और अपने पर्णकुटीरों को चल पडे़।
साधना के विपक्ष और किसी अन्य पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने और न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है। संदिग्ध, शंकाशंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती क्योंकि अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित रहता है। यदि यह आधार ही न रहा, मूल तथ्य का अभाव बना रहा तो फिर कर्मकाण्डों की कितनी ही लकीर पीटी जाती रहे उससे कुछ बात बनने वाली नहीं है।
साधना ही रही है जो कालान्तर में सशक्त विचारों के रुप में विश्व के सामने प्रस्तुत हुईं भौतिक विज्ञान के मूर्धन्य वैज्ञानिक हक्सले हाइजन वर्ग, वटरवर्थ, परमाणु उर्जा के विशेषज्ञ भाभा ने महत्वपूर्ण शोधें पचास वर्ष की आयु के पूर्व ही पूरी की है। नये जीन का निर्माण करने वाले जीवविज्ञानी डाँ. हरगोविन्द खुराना, इन्सुलिन के आविष्कार बेन्टिग एण्ड बेस्ट, कैंसर पर महत्वपूर्ण शोध करने वाले के. यामा गीवा, फर्स्ट एड के जन्मदाता जे. स्मार्ट की उपलब्धियों की अवधि आयु का यह मध्य काल ही रहा है। ‘हयूमन एनाटामी’ के आविष्कारक हेनरी गे्र ने तो मात्र 25 वर्ष से 31 वर्ष के मध्य में वह कार्य किया जिस पर समस्त एलोपैकिक चिकित्सा विज्ञान आधारित हैं
साधना का मार्ग कष्टसाध्य मालूम पड़ता हैं। इस चिन्तन के फलस्वरुप कोई बड़ा कदम उठाते नहीं बनता। त्याग, बलिदान से भरे लोकसेवा के कार्य में प्रत्यक्ष और तुरन्त का लाभ मिलते देखकर अधिकाँश व्यक्तियों का युवाकाल यों ही पेट और प्रजनन जैसे सामान्य प्रयोजनों को पूरा करने में चला जाता हैं जबकि अधिक महत्वपूर्ण कार्यो के लिए साहस भरे कदम उठाने की यही आयु होती है। यो तो श्रेष्ठ लोक-कल्याण के कार्यों के लिए आयु का कोई बन्धन, नहीं है। न ही यहाँ इसका प्रतिपादन किया जा रहा है, वरन् जीवन का वास्तविक सत्यों का उद्घाटन किया जा रहा है जो सैद्धान्तिक कम व्याहारिक अधिक हैं
साधना के निमित्त लोक-मंगल रत जीवन जीना चाहिए। इस महान मर्यादा को न्यनाधिक मात्रा में उन्हें तो पालन करना ही चाहिए जिनमे पारिवारिक और आर्थिक उत्तरदायित्व हलके हो गये है। इसी प्रकार प्राचीन मर्यादाओं के अनुसार उपार्जन का दशवाँ अर्थ अंश परमार्थ के लिए निकालने की बात न बन पड़े तो महीने में एक दिन की आजीविका का अंशदान निर्धारण रहना चाहिए। युग अभियान में रुचि लेने वालों का इस अपनी जीवनचर्या में इस उदार प्रयोजन को स्थान देने और उसका नित्य नियम की तरह पालन करेन की आवश्यकता अनुभव करने पर जोर दिया गया है। न्यूनतम एक घन्टा समय और दस पैसा अनुदान निरन्तर प्रस्तुत करते रहने की शर्त इसी लिए लगाई गई है कि यह देव संस्कार हर किसी के स्वभाव का अंग बन सके।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करके आत्मिक प्रगति और उसके आधार पर मिलने वाली उपलब्धियों को श्रद्धा तत्व की गरिमा समझनी चाहिए तथा आप्त वचनों के सहारे, तक्र और तथ्यों का आश्रय लेकर अपने आदर्शों तथा साधनों पर विश्वास भरी निष्ठा परिपक्व करनी चाहिए।
साधना और स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्मज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुणवान या ज्ञानवान होकर ही नहीं निकलत थे वरन् वे शक्ति पुत्र बनकर भी गुरु फल से साँसारिक जीवन में प्रवेश करते थे। फलस्वरुप उन्हे भौतिक सुखों की न तो इतनी स्पर्धा रहती थी और न ही वे अधिकार प्राप्त करने के लिए लालायित रहते थे। तब के स्नातक गुरुकुल से स्नातक होकर विदा के समय प्रतिज्ञा करते थे “मैं पृथ्वी पुत्र हूँ। भूमि मेरी माता है।
साधना करने लगे।
साधना की भारतीय परम्परा रही है जो इसी तथ्य की पुष्टि करती है कि उस अवसर सूर्य एवं चन्द्रमा से निस्सृत होने वाले हानिकारक विकिरणों से सुरक्षा की जा सके। कब किस ग्रह की क्या स्थिति है? उनके आपसी गठबन्धन की स्थिति का पृथ्वी पर-मुनष्य जाति पर क्या प्रभाव पडे़गा इसे जानने के लिए आधुनिक वेधशाला का योगदान आवश्यक है। हर क्षण उनकी चाल में होने वाले परिवर्तनों का सही अध्ययन तभी किया जा सकता हैं।
साधना में उत्साह से इन पूर्व सचित संस्कारों का जागरण होता है-शास्त्रीय भाषा में इसे पिछले जन्म के अक्लिष्ट कर्मो और ज्ञान के संस्कारों का जागृत होना कहते है। पूर्व के अक्लिष्ट कर्मों और संस्कारों का जागरण होने से साधन में चित्त एकाग्र चित्त में ही ऋतम्भरा प्रज्ञा का अवतरण होता है, जिसके प्रसाद स्वरुप निर्विकल्प समाधि प्राप्त होती है।
साधनाएँ सूक्ष्ये वातावरण को परिष्कृत करने में असाधारण प्रभावकारी सिद्ध हुई। स्वामी रामतीर्थ युवावस्था में ही अध्यात्म पथ पर उन्मुख हुए। वैदिक धर्म का प्रचार न केवल भारत में वरण अन्य देशों में भी करके अपनी युवा शक्ति को सार्थक किया। भारत ही नहीं विदेशी अध्यात्मवेत्ताओं के महत्वपूर्ण कार्य की अवधि यौवन काल ही रही है। सेन्टपाल, आगस्टाइल, कन्फ्यूशियस, अरस्तू, सुकातल ने धर्म एवं दर्शन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य आयु के मध्य काल में किए।
साधना, उपचार प्रणाली समर्थ सिद्ध होगी।
साधना सिद्ध हो पाती है अर्थात् इस विनाशशील जगत के प्रपंचों से छूट कर मनुष्य सत्य को प्राप्त और धारण करता हैं। स्नातक सन्तुष्ट हुए और अपने पर्णकुटीरों को चल पडे़।
साधना विज्ञान में उतना नहीं है जितना श्रद्धा, विश्वास का। सघन श्रद्धा के रहते अटपटे विधि-विधान भी चमत्कारी परिणाम उपस्थित कर सकते है जबकि अविश्वासी संदिग्ध मनःस्थिति में परिपूर्ण सावधानी बरतते हुए किए गए कर्मकाण्ड भी निष्प्राण होकर रह जाते है तथा उनका परिणाम निराशाजनक ही रहता है। अस्तु साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक साधक को श्रद्धातत्व की परिपक्वता का आधार खड़ा करना आवश्यक समझना चाहिए।
साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि श्रद्धा-विश्वास की महाशक्ति का उपयोग आत्मिक प्रगति की उद्देश्य पूर्ति में किया जा सके क्योंकि श्रद्धा से ही व्यक्तित्व का निर्माण और निर्धारण होता है। उसी आधार पर अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन होता तथा सफलता के उच्च स्तर पर पहुँच पाना सम्भव होता है। श्रद्धा ही आत्मा का सब से विश्वस्त और घनिष्ठ सचिव है। उसी के सहारे आत्मिक प्रगति से लेकर सिद्धि चमत्कार के वरदान पाने और आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त दिव्य उपहार प्राप्त होते हैं।
साधना में थाँ कभी कोई चर्चा बदल कर अपनाई गई नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने और न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है। संदिग्ध, शंकाशंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती क्योंकि अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित रहता है। यदि यह आधार ही न रहा, मूल तथ्य का अभाव बना रहा तो फिर कर्मकाण्डों की कितनी ही लकीर पीटी जाती रहे उससे कुछ बात बनने वाली नहीं है।
साधना जिस प्रकार छोड़नी पड़ी थी उसी प्रकार यह भी न छोड़नी पडे़ और इसमें भी वैसा कोई दोष न हो जैसा कि पहले वाली साधना में थाँ कभी कोई चर्चा बदल कर अपनाई गई नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने और न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है। संदिग्ध, शंकाशंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती क्योंकि अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित रहता है। यदि यह आधार ही न रहा, मूल तथ्य का अभाव बना रहा तो फिर कर्मकाण्डों की कितनी ही लकीर पीटी जाती रहे उससे कुछ बात बनने वाली नहीं है।
साधना से बढ़कर लाभदायक उद्योग इस संसार में और कोई है ही नहीं। इसे अपनाने पर स्वार्थ और परमार्थ की उभयपक्षीय पूर्ति सहज ही होती रहती है।
साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक साधक को श्रद्धातत्व की परिपक्वता का आधार खड़ा करना आवश्यक समझना चाहिए।
साधना। लोकसेवा-जनकल्याण इसे अपनाने का एक ही उपया है-स्वार्थ को परमार्थ के निमित्त विसर्जित करना। इस दुस्साहस को जो जिनी मात्रा में क्रियान्वित कर पाता हे वह उसी अनुपात से अपने को बुद्धिमान एवं भाग्यवान अनुभव करता है। परिणामों को धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर सकने वाले अपने अनुभव एक स्वर से यही सुनाते रहे है कि समष्टि की सेवा साधना से बढ़कर लाभदायक उद्योग इस संसार में और कोई है ही नहीं। इसे अपनाने पर स्वार्थ और परमार्थ की उभयपक्षीय पूर्ति सहज ही होती रहती है।
साधना लगाते रहते है। फिर इसमें तो निर्धनों को भी कठिनाई नहीं हो सकती। व्यस्तता का बहाना करके समय दान और तंगी की आड लेकर अंशदान न दे सकने का तक्र तो दिया जा सकता है, पर औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। न बहानेबाजी को सच्चाई बताने का प्रयास सफल हो सकता है। तथ्य में ‘अरुचि’ भी काम कर रही होती है।
साधना पद्धति और एक ही गुरु के-मार्गदर्शन का अवलम्बन लेने पर भी विभिन्न साधकों की आत्मिक प्रगति अलग-अलग गति से होती हैं कोई तेजी से आत्मिक विकास की सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है तो कोई मंथरगति से आगे बढ़ता हैं इसका क्या कारण है? मनीषियों ने इसका उत्तर एक ही वाक्य में दते हुए कहा है कि ‘अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा की शक्ति ही सर्वोपरि है। जिस प्रकार शक्ति के आधार पर भौतिक हलचलें और गतिविधियाँ सम्पन्न होती तथा अभीष्ट उपलब्धियाँ हस्तगत होती है, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में श्रद्धा ही अपनी सघनता या विरलता के आधार पर चमत्कार प्रस्तुत करती हैं श्रद्धा विहीन उपचार सर्वथा निष्प्राण रहते है और उनमें किया गया श्रम भी प्रायः निरर्थक चला जाता हैं
साधना आरम्भ कर दी। कुछ ही देर बाद किसी दुसरे ने उस विधान में दोष बता दिया और किसी नेय प्रयोग के माहात्म्य सुना दिये तो इतने भर से मन सशंकित हो गया और पिछला मार्ग छोड़ कर नया मार्ग अपना लिया। इस परिवर्तन के बीच यह नई आशंका बनी रहती है कि पिछली साधना जिस प्रकार छोड़नी पड़ी थी उसी प्रकार यह भी न छोड़नी पडे़ और इसमें भी वैसा कोई दोष न हो जैसा कि पहले वाली साधना में थाँ कभी कोई चर्चा बदल कर अपनाई गई नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने और न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है। संदिग्ध, शंकाशंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल पाती क्योंकि अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित रहता है। यदि यह आधार ही न रहा, मूल तथ्य का अभाव बना रहा तो फिर कर्मकाण्डों की कितनी ही लकीर पीटी जाती रहे उससे कुछ बात बनने वाली नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-September
साधना उन समस्त सफलताओं समेत उपस्थित होती है, जिन्हें ऋद्धि-सिद्धियों के आकर्षक एवं अलंकारिक नामों से जाना जाता है ।
साधना है।
साधना समर कहा गया है।
साधना कर पाते हैं कि चिन्तन को नियत प्रयोजन के लिए तत्पर कर सकने- उसे बिखरने न देने में समर्थ रह सकें। इतनी सिद्धी जिसे प्राप्त हो सके वह अपने विषय में गहराई तक उतर सकता है। उथले मन से सोचने पर आधी-अधूरी बातें ही हाथ लगती हैं।, पर तन्मयतापूर्वक सोचने से मस्तिष्कीय शक्तियाँ केन्द्रीभूत होने के कारण प्रखर बन जाती हैं और ऐसे आधार ढूँढ़ निकालती हैं। जिन्हें सूझ-बूझ, दूरदर्शिता एवं विशेषता सम्पन्न कहा जा सके।
साधना प्रस्तुत करते रहने वालों का एक बड़ा वर्ग कार्य संलग्न रहता है तो उसे कर्म कौशल ही कहा जाएगा। कार्य संलग्न लोगों का निर्वाह तथा क्रिया-कलापों में खर्च होने वाली राशि का प्रबन्ध सभी को करना पड़ता है। सरकार टैक्स लगाती है। कारखाने मुनाफे लेते हैं। संस्थाएँ शेयर बेचती या चन्दा वसूल करती हैं।
साधना सिद्धी का कलेवर ओढ़े जहाँ-तहाँ दिखाई पड़ती है। कर्मकाण्डों के खर्चीले ढकोसले भी धनीमानी लोगों को आगे करके जब तब खड़े किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त वैसा कहीं कुछ हीं दीखता जिसमें धर्म को, आत्मा को जीवन्त स्थिति में देखा, जाना जा सके ।
साधना-अक्षय॥
साधना।सदाचार की दिनचर्या ही, ईश्वर का परिधान हटायें॥
साधना है उनका उपयोग सामयिक आवश्यकता की पूर्ति में सम्भव हो सका होता। पर यह कार्य वर्तमान परिस्थितियों में लगभग असम्भव जैसा है। निहित स्वार्थो का शिकंजा इतना कसा हुआ है किसमें से साधनों का छुटकारा दिला सकना कठिन है। इसमें धर्म व्यवसायियों की समर्थता नहीं, वरन् सम्बन्धित जन-समुदाय की भावनात्मक दुर्बलता भी बहुत बड़ा निमित्त कारण हैं। पिछड़ी हुई परिस्थितियों में धर्म बिड़म्बनाओं को ही धार्मिकता का स्थान मिल गया है और मूढ़गति को पूर्वाग्रहों के साथ जकड़े रहना ही रुचता है।
साधना आवश्यक है। यह प्रक्रिया पुरुषार्थ-साध्य है। इसीलिए उसे साधना समर कहा गया है।
साधना किस की ? उत्तर एक ही है-आत्म सत्त की। अपने को परिष्कृत करने पर ही कोई पदार्थों और परिस्थितियों का लाभ उठा सकता है। कुशल माली ही उद्यान को सुरभ्य बनाता और यशस्वी होता है। जीवन-परिष्कार के लिए की गई साधना उन समस्त सफलताओं समेत उपस्थित होती है, जिन्हें ऋद्धि-सिद्धियों के आकर्षक एवं अलंकारिक नामों से जाना जाता है ।
साधना को सरल बना देती है।
साधना सम्पन्न आत्मवेत्ता तो ऐसे सफल प्रयोग करते ही रहते हैं। कभी-कभी सामान्य स्तर के लोगों में भी वह क्षमता उभरी हुई पाई जाती है कि वे व्यक्ति स्तर की विशेषताओं और अनैतिक आचरण वाली प्रकृति को समझ सके और अपराधों तथा अपराधियों की रोकथाम में समुचित सहायता कर सके।
साधनाओं का अवलम्बन आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। प्रस्तुत संकट को निरस्त करने के लिए इस सशक्त उपचार का आयअध्यापक स्तर कर लिया जाना चाहिए।
साधना एवंज न-जन के बूँद-बूँद अंशदान सहायता के सहारे तनकर खड़े हो रहे हैं। इन छोटे प्रयासों के पीछे महान् सम्भावनाओं को गतिशील होते और उज्जवल भविष्य की सम्भावनाओं को सार्थक बनते, देखने वाले स्वपनदर्शी नहीं यथार्थवादी ही समझे जायेंगे।
साधनाप्रणाली ही आत्म-शुद्धि की सामर्थ्य प्रदान करती है। यह सामर्थ्य उपार्जित करना और दोषों, दुष्प्रवृतियों को समाप्त कर शुद्ध विवेक को जागृत रखना ही परम पुरुषार्थ है।
साधना सफल नहीं होती। शास्त्राकारों ने सामान्य जीवनं क्रम में माता, पिता और गुरु को देव माना है तथा जीवन भर उनकी अर्भ्यथना करते रहने का निर्देश दिया है। परन्तु ऊपर जिस गुरुवाद की चर्चा की गई है वह भिन्न बात है और इसे गुरुवाद ही कहा जा सकता है।
साधना किसकी ? सह समझने में प्रायः भूल होती रहती है। जिस देवता की आराधना से अभीष्ट की उपलब्धि होती है वह जीवन के अतिरिक्त दूसरा और कोई नहीं हो सकता।
साधना भी कहा जा सकता है।
साधना से सिद्धी का सिद्धान्त सर्वविदित है। पर साधना किसकी ? सह समझने में प्रायः भूल होती रहती है। जिस देवता की आराधना से अभीष्ट की उपलब्धि होती है वह जीवन के अतिरिक्त दूसरा और कोई नहीं हो सकता।
साधनात्मक जीवन अपना कर ही प्राप्त किया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-April
साधना, स्वाध्याय, संयन, सेवा के चारों विद्यान अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करते हैं। यही रीति-नीति उन्हें अपनानी होगी जो गायत्री नगर में निवास करते हुऐ उसका वातावरण बनाने तथा उससे स्वयं लाभन्वित होने के महत्व को समझे होगें।
साधना, 2. स्वाध्याय, 3. संयम और 4. सेवा। इन चारों को एक चार पाई के चार पाये एक कमरे के चार कौने एक धरातल की चार दिशाएँ एक धर्म के चार आश्रम, एक संस्कृति के चार वर्ण कहना चाहिए, इन्हीं चार पुरुषार्थों के परिणाम धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के रुप में फलित होते है। इन्हीं चारों को मन, बुद्धि, चित्त अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय में बोया उगाया जाता है।
साधना आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों पहियों के प्रगति पथ पर सवार होगी और द्रुत गति से आगे बढ़ेगी। वे अध्ययन और अध्यापन के अनेक प्रकार है। लेखन, पत्र व्यवहार, प्रचार, जनसर्म्पक प्रवचन आदि क्रिया-कलापों को इस अध्यापन कार्य के अर्न्तगत ही गिना गया है। शारीरिक श्रम के रुप में की गई अन्यों को प्ररेणा देने वाली गतिविधियाँ भी इस समग्र अध्यापन के अर्न्तगत ही आती है। इन बहुमुखी प्रयोजनों को गायत्री नगर में बसने वाले अपनी सुनियोजित दिनचर्या के आधार पर सतुलित रुप से सम्पन्न करते रहेंगे।
साधना है।
साधना पद्धति के समावेश का नियमित अवसर मिलेगा जिन्हे वे अब तक सिद्धान्त रुप से ही समझते रहे है पर व्यवहार में ने उतार सके।
साधना साथ-साथ करने में रुचि रखतें हों, जिन्हें सच्चा स्वार्थ साधने और सच्चा परमार्थ करने में उत्साह हो। बड़ी कक्षाओं के छात्रों में से कितने ही ऐसे भी हाते हैं जो छोटी-कक्षाओं के छात्रो के छात्रो का पढ़ाने की व्यवस्था बनाकर अपना काम चलाते हैं। गायत्री नगर में बसने वाले अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठने के लिए-अपने स्तर की प्रगति करगें। साधना, स्वाध्याय, समय और सेवा की चतुविधि आत्मोर्त्कष प्रक्रिया हर श्रेयार्थी के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक हैं। मात्र भजन अधूरा है।
साधना जीवन चर्या को। जीवन चर्या अर्थात् चिन्तन और क्रिया कलाप की सुनियोजित दिशा धारा। आमतौर से लोग अनढंग, उच्छ खल, अव्यवस्थित और अस्तव्यस्त जीवन जीते है। बन्दरों की तरह मचकते और कुत्तों की तरह भटकते हुए मन योग और श्रम समय की बर्बादी होती रहती है। कुसंस्कार मनुष्य को जहाँ तहाँ घसटते फिरते है।
साधना का मार्ग दर्शन ही नहीं अवसर भी मिलेगा।
साधना पर जिनने ध्यान नहीं दिया और मात्र भजन करते रहे उन्हें खाली हाथ रहना पड़ा है। साधना समग्र होनी चाहिए। एकाँगी अवलम्बन से उसकी सफलता सम्भवन न हो सकेगी।
साधना आरण्यकों में चलती थी। यों गुरुकुलों और आरण्यकों के कोर्स को प्राइवेट पढकर गैस पैपरों के सहारे अथवा पत्राचार विद्यालय में भर्ती होकर भी पूरा किया जा सकता है। ट्यूटर निर्धारित पाठ्यक्रम का अभ्यास करा सकते है। और सरलतापूर्वक उत्तीर्ण होने का अवसर मिल सकता है। इतने पर भी छात्रों को वह लाभ नहीं मिल सकता जो उन शिक्षण संस्थओं के साथ जुड़े हुए विशिष्ट वातावरण में सन्निहित रहता था।
साधना पद्धति के सहारे साधकों को सिद्ध पुरुष, महामानव बनने का सौभाग्य उपलब्ध होता है। गायत्री नगर में बसने वालों की जीवनचर्या में उस साधना पद्धति के समावेश का नियमित अवसर मिलेगा जिन्हे वे अब तक सिद्धान्त रुप से ही समझते रहे है पर व्यवहार में ने उतार सके।
साधना करने में आपत्ति न होवें अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गायत्री नगर निवास में समुचित सन्तोष प सकेंगे। यो पूर्ण तो एक भगवान है। अपूर्णता के कुछ अंश तो हर व्यक्ति और हर स्थान में कुछ न कुछ पाये ही जायेंगे।
साधना क्रम चल सकता है। अटपटी परिस्थितियों में न मन लगता है और न ही सुनिश्चित क्रम चलता है। जिन्हें उसके एि उचित श्रम साधना करने में आपत्ति न होवें अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गायत्री नगर निवास में समुचित सन्तोष प सकेंगे। यो पूर्ण तो एक भगवान है। अपूर्णता के कुछ अंश तो हर व्यक्ति और हर स्थान में कुछ न कुछ पाये ही जायेंगे।
साधना पद्धति अपनानी पड़ती है। यही है मनोनिग्रह-आत्मविजय- स्वनिर्माण। इसी के साथ ऋद्धियों और सिद्धियों का भौतिक और आत्मिक सफलताओं का श्रेय साधन जुड़ा हुआ है।
साधना है। इसमें आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास की चतुर्विधि प्रक्रिया साथ लेकर चलना पड़ता है। इसी साधना पद्धति के सहारे साधकों को सिद्ध पुरुष, महामानव बनने का सौभाग्य उपलब्ध होता है। गायत्री नगर में बसने वालों की जीवनचर्या में उस साधना पद्धति के समावेश का नियमित अवसर मिलेगा जिन्हे वे अब तक सिद्धान्त रुप से ही समझते रहे है पर व्यवहार में ने उतार सके।
साधना करते हुए आत्मोर्त्कष के चरम लक्ष्य तक पहुँचे। साथ ही दस प्रयोजन की पूर्ति भी करें जो जागृत आत्माओं को सृजन शिल्पियों के रुप में अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर करनी है।
साधना से दक्षता प्राप्त कर ली और अन्वेषक परीक्षकों की उपस्थिति में ऐसी क्रियाएँ कर दिखाई जो सामान्य शरीर धारी के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकती।
साधना है। उपासना इसी प्रखरता को जागृत करने के लिए की जाती है। यदि वह तथ्य को समझते हुए की गई है और भजन-पूजन के साथ साथ ही अपनी दिशाधारा मोड़ने और रीति-नीति सुधारने का प्रयत्न भी जरी रखा गया है तो उसका प्रतिफल निश्चित रुप से होना चाहिए। ईश्वर के अतिरिक्त अनुदान सन्त, सुधारक एवं शहीद की गरिमा रुप में मिलते हैं। महामानव, ऋषि, देवतात्मा बनने के उपरान्त मनुष्य अन्ततः परमात्मा के पद तक जा पहुँचता है।
साधना एवं शिक्षण के बहुमुखी प्रशिक्षण सत्र यहाँ चलते। जो अधिक समय ठहरना चाहेंगे उनके लिए वैसी सुविध भी रहेगी। युग सृजन बड़ा काम है। उसकी जटिलताओं को देखते हुऐ तदनुरुप प्रशिक्षण नित्तन्त आवश्यक हैं। डाक्टर, इन्जीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, कलाकार आदि को अपने विषय में परागत होने के लिए कई-कई वर्ष का प्रशिक्षण एव अनुभव प्राप्त करना पड़ता है तो कोई करण नहीं कि युग सृजन के समुद्र मन्थन जैसे महान् कार्य को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक अनुभव एवं अभ्यास की आवश्यकता न पड़े।
साधना बलती है। किन्तु गायत्री नगर में बसने वाले साधकों को अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरुप साधना का मार्ग दर्शन ही नहीं अवसर भी मिलेगा।
साधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मात्र भजन का एकाँगी उपक्रम चेतना को परिष्कृत एवं समु़त्रत करने का, उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। मार्गदर्शन, प्रचलन और वातावरण की अनुकुलता में ही उच्चस्तरीय साधना क्रम चल सकता है। अटपटी परिस्थितियों में न मन लगता है और न ही सुनिश्चित क्रम चलता है। जिन्हें उसके एि उचित श्रम साधना करने में आपत्ति न होवें अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए गायत्री नगर निवास में समुचित सन्तोष प सकेंगे।
साधना के सम्बन्ध में भी है। आरम्भ में जप, ध्यान की सामान्य उपचार प्रक्रिया की बाल कक्षा की तरह सभी कर सकते है। पर इसके बाद छात्रों की रुचि एवं स्थिति के अनुरुप अध्ययन क्रम बदला जाता है।
साधना है। व्यवहार में सभ्यता का स्वभाव में सुसंस्कारिता का अधिकाधिक समादेश करते जाना ही आत्म साधना है। इसमें आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास की चतुर्विधि प्रक्रिया साथ लेकर चलना पड़ता है। इसी साधना पद्धति के सहारे साधकों को सिद्ध पुरुष, महामानव बनने का सौभाग्य उपलब्ध होता है। गायत्री नगर में बसने वालों की जीवनचर्या में उस साधना पद्धति के समावेश का नियमित अवसर मिलेगा जिन्हे वे अब तक सिद्धान्त रुप से ही समझते रहे है पर व्यवहार में ने उतार सके।
साधना की तरह अपनाने के लिए तत्पर किया जाता है। यह दूसरे आश्रमों की पद्धति है जहाँ रोटी तोड़ने और माला घुमाने से काम चल जाता है। गायत्री नगर के निवासियों का उद्देश्य देव जीवन की प्राप्ति है। देवता उन्हें कहते हैं जो निरन्तर देने की ही बात सोचते और उसी पुण्य प्रयोजन में निरत रखते है। दे-सो देवता।
साधना, स्वाध्याय, समय और सेवा की चतुविधि आत्मोर्त्कष प्रक्रिया हर श्रेयार्थी के लिए अनिवार्य रुप से आवश्यक हैं। मात्र भजन अधूरा है। किसान को भूमि, बीज, सिचाई और रखवाली की चारों व्यवस्थाओं पर समान रुप से ध्यान देना और प्रबन्ध करना पड़ता है। इसी प्रकार श्रवार्थी साधना, स्वाध्याय, संयन, सेवा के चारों विद्यान अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करते हैं। यही रीति-नीति उन्हें अपनानी होगी जो गायत्री नगर में निवास करते हुऐ उसका वातावरण बनाने तथा उससे स्वयं लाभन्वित होने के महत्व को समझे होगें।
साधना पद्धति के मार्ग में आने वाली अड़चनों के साथ लोहा लेने के शौर्य साहस को कहते है। भीतर और बाहर से अनेकानेक प्रतिकूलताएँ और असफलताएँ ही परिलक्षित होती है। इन हलके भारी प्रहारों के साथ ताल-मेल बिठाने बचने और परास्त करने की रीति-नीति को सयम कहते है।
साधना, स्वाध्याय संयम और सेवा के चारों तत्व समन्वित रखने होंगे। आत्मोर्त्कष की सच्ची साधना इसी प्रकार सम्भव होती है। मात्र भजन का एकाँगी उपक्रम चेतना को परिष्कृत एवं समु़त्रत करने का, उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। मार्गदर्शन, प्रचलन और वातावरण की अनुकुलता में ही उच्चस्तरीय साधना क्रम चल सकता है। अटपटी परिस्थितियों में न मन लगता है और न ही सुनिश्चित क्रम चलता है।
साधना क्रम अलग से बताया और कराया जायेगा। अल्पकाल में सामान्य दिनचर्या, नियम मर्यादा, विधि-व्यवस्था एक रहते हुए भी हर रोगी का उपचार एवं निर्धारण अलग-अलग रहता है। यही नीति उपासना के क्षेत्र में भी अपनानी पड़ती है। गायत्री नगर के सूक्ष्म दर्शी मार्ग दर्शक साधकों का आन्तरिक विश्लेषण करने पर यह पता लगाते है कि उसके लिए क्या उपचार सरल एवं उपयुक्त पड़ेगा। कहते है कि सही निदान हो जाने से चिकित्सा का उद्देश्य पूरा हो जाता है।
साधना के अन्तर को और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता है। उपासना पूजा पद्धति को कहते है और साधना जीवन चर्या को। जीवन चर्या अर्थात् चिन्तन और क्रिया कलाप की सुनियोजित दिशा धारा। आमतौर से लोग अनढंग, उच्छ खल, अव्यवस्थित और अस्तव्यस्त जीवन जीते है। बन्दरों की तरह मचकते और कुत्तों की तरह भटकते हुए मन योग और श्रम समय की बर्बादी होती रहती है।
साधना आदि के नाम से जानी जाने वाली क्रिया-प्रक्रियाओं का उद्वेश्य एक ही है-साध्क के अन्तरंग और वहिरंग की उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालना। जो उपासना इस प्रयोजन को जिस सीमा तक पूरा कर रही होगी, उसके चमत्कार भी उसी अनुपात से उपलब्ध हो रहे होगे। इस लोक मान्यता को उपहासारुपद भ्रान्ति ही मानना चहिए कि मनुहार और उपहार के भूखे देवताओं की छुट-पुट, टन्ट-घन्ट से फुसलाया और उन्हें हर कामनामनाओं को पूरी करने के लिए मनाया जा सकता है।
साधना, स्वाध्याय, सयम के अतिरिक्त चौथा चरण सेवा है। यह चारों ही ऐसे है जिन्हें एक साथ लेकर चलना पड़ता है। इसमें से एक भी ऐसा नहीं जिस अकेले के सहारे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सके। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसे छोड़ने पर आत्मिक प्रगति का रथ एक इंच भी आगे बढ सके। यह चारों ही अपरिहार्य है।
साधना समग्र होनी चाहिए। एकाँगी अवलम्बन से उसकी सफलता सम्भवन न हो सकेगी।
साधना पद्धति एक होते हुए भी हर साधक को अपने स्तर का विशिष्ट साधना क्रम अलग से बताया और कराया जायेगा। अल्पकाल में सामान्य दिनचर्या, नियम मर्यादा, विधि-व्यवस्था एक रहते हुए भी हर रोगी का उपचार एवं निर्धारण अलग-अलग रहता है। यही नीति उपासना के क्षेत्र में भी अपनानी पड़ती है। गायत्री नगर के सूक्ष्म दर्शी मार्ग दर्शक साधकों का आन्तरिक विश्लेषण करने पर यह पता लगाते है कि उसके लिए क्या उपचार सरल एवं उपयुक्त पड़ेगा। कहते है कि सही निदान हो जाने से चिकित्सा का उद्देश्य पूरा हो जाता है।
साधना में संलग्न रह कर ही उपार्जित करली। गायत्राी नगर में इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जाता है कि कोई ऐसा न रहे जो अपने ही निजी गोरख धन्धो में उलझा दिन काटता रहे और परमार्थ प्रयोजनों में अरुचि दिखाये।
साधना को प्राथमिक महत्व दिया और अनिवार्य माना या है। गायत्री उपासना गौ-दुग्ध की तरह परिपूर्ण आहार है। किसे, किस स्तर की-किस प्रकार गायत्री उपासना करनी चाहिए इस का निर्धारण व्यक्ति विशेष के स्तर का देख परख कर किया जायेगा। संजीवनी बूटी भी अनुगन भेद से दी जाती है। उसकी मात्रा तथा सेवन विधि में अन्तर रहता हे।
साधना भी। इस कला का विकास कर लेने वाला व्यक्ति हर तरह की परिस्थिति में एक कलाकार की भाँति हंसता-हंसाता जीवन व्यतीत करता है। अपने दायित्वों को ठीक प्रकार पूरा करने में ही प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभवन करता है। नाटक के दृश्योंके समान जीवन को रंगमंच मानकर चलने पर व्यक्ति प्रतिकूलताओं अथवा अनुकूलताओं में अपना सन्तुलन बनाये रखते, उनसे अप्रभावित रहते है। ऐसे ही व्यक्ति सफल होते प्रगति करते देखे जाते है।
साधना में सेवा संलग्नता में अधिक रस आने लगे उनके लिए अधिक अवसर भी उपलब्ध हो सकता है किन्तु चार घन्टे तो इसके लिए अनिवार्य ही रखे गये है। इससे छूट्टी रुग्णता जैसे अरिहार्य कारणों से मिल सकती है। स्वार्थ वर्ग में साध, स्वाध्याय, संयम ये तीन प्रयोजन आते है। परमार्थ में एक ही निर्धारण है, सेवा। एक होते हुए भी वह इतना महत्वपूर्ण है कि अन्य तीनों की आवश्यकता पूरी कर सके।
साधना का साधक ही प्रसन्न रहता और प्रगति करता है। एक खिलाड़ी की भाँति “हार-जीत” की परवाह न करते हुए निर्लिप्त बना रहता है। उसकी प्रसन्नता-अप्रसन्नता, सुख-साधनों पर, सफलता-असफलता पर नहीं टिकी होती। इस कला से अपरिचित बने रहने वाला व्यक्ति पग पग पर आवेशग्रस्त होता रहता है। अनगढ एवं असन्तुलित मन छोटी-मोटी प्रतिकूलताओं को सहन कर पाने में भी अपने को असमर्थ पाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1980-May
साधना में अनन्त के साथ सम्बन्ध जोड़ा और और अदृश्य अनुदानों को लक्ष्य बनाया जाता है। प्रत्यक्ष अनुदानों की तुलना में परोक्ष वरदान कितने अधिक समर्थ होते हैं इसे सभी जानते है।
साधना की सिद्धि आदि नामों से अतंकारिक वर्णन किया जाता है।
साधना के चमत्कारों की आधारशिला तो उत्कृष्ट द्रष्ट्रिकोण और आदर्श चरित्र पर ही रखी गई है। ब्राह्मणतत्व में उज्जवल चरित्र और साधुता में परमार्थ परायणता की अवधारणा है। जो व्यक्तित्व को जितना परिष्कृत करता जायेगा उसके नगण्य से पूजा उपचार, भी आर्श्चयजनक चमत्कारों का आधार बनते जायेगे। उत्कृष्ट जीवन ही ईश्वरीय अनुदानों का ऋद्धि-सिद्धियों का आधारभूत कारण है, उसे जितना ज्यादा समझा जा सके उतना ही उतम है।
साधना सहित। (2) गुरुवार को अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य एवं दो घन्टे का मौन। (3) महीने में एक बार अग्नि-होत्र। (4) आश्विन, चैत्र की नवरात्रियों में अनुष्ठान (5) दस अन्य व्यक्तियों को साधना रत बनाये रहना। इन नियमों का पालन करने वाले ही नैष्ठिक माने जायेगे ऐसी साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है।
साधना भी। दोनो की सचाई और गहराई उनके प्रखर जीवनदर्शन में प्रकट परिलक्षित होती थी, वे निर्वाह भी करते थे, कुटुम्ब भी सम्भालते थे साथ ही परमार्थ प्रयोजनों के लिए इतना कुछ करते थे, जिसके सहारे उन का व्यक्तित्व देवोपम स्तर की भूमिकाएँ निभाने में सफल रह सके।
साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।
साधना तक उपचार तो शरीर और साधनों के सहारे ही किये जाते है किन्तु साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाता है कि जो मिलना है वह अन्तरिक्ष से बरसेगा और धरती पर उगेगा। दैवी अनुग्रह, साधना की सिद्धि, ईश्वरीय अनुकम्पा आदि के समस्त प्रतिपादन तथ्यतः अन्तरिक्ष के ही अनुदान हैं।
साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासकों द्वारा सम्पन्न होता रहेगा। देश को दस साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासक होने पर देश भर में एक लाख नैष्ठिक उपासक होते हैं। इनके द्वारा हर प्रान्त में 24 करोड़ जप होने का उपक्रम चलेगा और कुछ मिलाकर 240 करोड़ जप नित्य पूरा होता रहेगा।
साधना के क्षेत्र में गहरा उतरता जाता है उसे एक से एक रहस्मय गुत्थियों का पता लगता है और अनुभव होता है कि प्रत्यक्षतः जगत जैसा प्रतीत होता है, वैसा तो वास्तव में कुछ भी नहीं है बल्कि सब कुछ रहस्यपूर्ण है। यह बात और है कि भीड़ की सम्भावनाओं के समान पदार्थ के स्थूल नियमों का पता लगाकर विज्ञान उससे रुत्किचिंत लाभ उठाने की स्थिति में पहुँच गया है। परन्तु सचाई कुछ और ही है इन स्थूल नियमों से लाभ उठाने के कारण यह भ्रम हो सकता है कि विज्ञान ने शायद सत्य को जान लिया हो। पर वैसा है नहीं। मोटी बातें जो दिखाई देती है उनका थोड़ा-सा परिचय भी पर्याप्त लाभ दे सकता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनकी वास्तविकता जान ली गई।
साधना रत बनाये रहना। इन नियमों का पालन करने वाले ही नैष्ठिक माने जायेगे ऐसी साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। इसी स्तर के नैष्ठिक साधकों की युग साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है।
साधना की सिद्धि, ईश्वरीय अनुकम्पा आदि के समस्त प्रतिपादन तथ्यतः अन्तरिक्ष के ही अनुदान हैं।
साधना करन की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्माकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
साधना की उर्वरभूमि पर ही उगता और फेलता है। इस तथ्य को जिनने भी जाना है उनने लिप्साओं पर अंकुश लगाया आर परमार्थ पथ पर चल पड़ने का साहस दिखाया है। कल्पना-जल्पना करते रहने में तो आत्म प्रवंचना ही बन पड़ती है। मन मोदक खाते रहने से पेट भरता है ?
साधना ही व्यक्ति और विश्व के लिये प्रभावी परिणाम प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। इसी स्तर के नैष्ठिक साधकों की युग साधना में प्रस्तुत पुरश्चरण सम्पन्न होगा और उपयुक्त परिवर्तन के दूरगामी परिणाम उत्पन्न करेगा। शौकिया अस्त-व्यस्त उपासना तो मात्र सुरुचि उत्पन्न करने भर का थोड़ा-सा प्रयोजन पूरा करती है अस्तु जिसे आत्म-शक्ति का बिन्दु संचय युग शक्ति बनने जा रहा है, उसको प्रचुर परिणाम में उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत युग पुरश्चरण का अभूत पूर्व आयोजन किया गया है और इसके लिये एक लाख नैष्ठिक साधक नया संकल्प देकर इन्हीं दिनों बनाये जा रहे है। यह देखने में छोटा किन्तु परिणाम में अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसे सम्पन्न करने में सहायता करने की अपेक्षा सभी जागृत आत्माओं से की गई है।
साधना की आस्था एवं प्रेरणा उभारने के निमित विनमित हुआ है। भगवान खुशामद और रिश्वत की पकड़ से बहुत ऊँचा है। उपासना तो उत्कृष्टता के रुप में विघमान अन्तःचेतना की जाती है। भ्रमग्रसित एक जंजाल से निकल कर दूसरे में फँसते है। आत्मकल्याण के निमित जीवन साधना करन की आवश्यकता वे भी नहीं समझते और जिस तिस मंत्र-तंत्र का सहारा लेकर आत्माकल्याण और ईश्वरीय अनुग्रह का दिवा स्वप्न देखते है।
साधना खण्डों में बाँटा गया है। हर खण्ड में दस हजार नैष्ठिक उपासक होने पर देश भर में एक लाख नैष्ठिक उपासक होते हैं। इनके द्वारा हर प्रान्त में 24 करोड़ जप होने का उपक्रम चलेगा और कुछ मिलाकर 240 करोड़ जप नित्य पूरा होता रहेगा। यह सकल्प प्रस्तुत गायत्री जयन्ती 13 जनू 90 से आरम्भ होकर आगामी बोस वर्ष तक चलेगा। युग सन्धि की यही मध्य बेला है।
साधनात्मक उपचार ही वह तीव्र गति से चलने वाले राकेट हैं जो वस्तुओं के प्रचण्ड़ आकर्षण शक्ति से साधक को परे ले जाते तथा चेतना की गहराइयों में प्रविष्ट कराते हैं।
साधना में श्रद्धा रखने वालों के सर्वप्रथम दरवाजा खट-खटाएँ। नैष्ठिक उपासना की आवश्यक जानिकारी देने वाली 20 पैसे वाली पुस्तिका अधिक संख्या में गायत्री तपोभूमि से मँगालें और उसे पढ़ाने सुनाने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न से नैष्ठिक उपासकों की संख्या बढ़ने में प्रयत्न की तुलना में सफलता ही अधिक मिलेगी। अनतरिक्ष में प्रवाहित युगान्तरीय चेतना इस सफलता में विशेष रुप से सहायक सिद्ध होगी। साथ ही छोटे प्रज्ञामन्दों की स्थापना केलिये भी श्रद्धालुओं के संयुक्त प्रयास को प्रोत्साहित किया जाये, तो हर क्षेत्र में इन्हीं में इन्ही दिनों अनेकों प्रज्ञामन्दिर बन सकेंगे और उनका अनुकरण अन्य गाँवों में भी चल पडे़गा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-March
साधनात्मक पुरुषार्थ से ग्रीष्म ऋतु पैदा कर लें तो बिवाई फटने जैसी वर्तमान दुर्दशा से छुटकारा प्राप्त करने में तनिक भी विलम्ब न लगे।
साधना द्वारा खोलना चाहिए।
साधना के बीच काम स्खलन इसी खींच-तान का प्रमाण है। भगवान बुद्ध के चित्रों में ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में अनेक अप्सरायें उनके समीप नृत्य, परिहास करती दिखाई जाती हैं। इसके पीछे यही संकेत है। आत्म विद्युत सम्पन्न पति पत्नी अति उच्च कोटि की सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं। भगवान कृष्ण ने रुक्मिणी सहित तीव्र तप बद्रीनारायण में करने के उपरान्त एक ही पुत्र पैदा किया था-प्रद्युम्न जो कृष्ण के समान ही रूप, गुण आदि विशेषताओं से सम्पन्न था।
साधना विज्ञान के आधार पर यदि उसका सदुपयोग सीखा जाय और अभीष्ट प्रयोजन के लिए उसे नियोजित करने का क्रिया-कलाप समझा जाय, तो अपने निज के इस सम्पत्ति कोष से मनुष्य सर्वांगीण समृद्धि से सुसम्पन्न हो सकता है। सफल जीवन जी सकता है।
साधना कहते हैं। इसमें असफलता का कभी कोई कारण उत्पन्न नहीं हो सकता, किसी वृद्ध बीमार को सड़क पर असहाय पड़ा देखा और उसकी सेवा सहायता में उदारता बरती। अपने लिए संतोष और उल्लास के लिए इतना सा कर्तव्य पालन पर्याप्त है। लोक-मंगल की चल रही प्रवृत्तियों में जुट पड़े उसमें अपना जितना अनुदान बन पड़ा लगा दिया इतने भर से अपना अन्तःकरण पुलकित हो जायगा। यदि उस वृद्ध बीमार से बदला चुकाने की या लोक-सेवा में यश मिलने की कामना रहेगी तो वे दोनों ही प्रयोजन न तो कुछ सन्तोष प्रदान करेंगे न उल्लास।
साधना की सुनिश्चित दिशा तो वही है जिसका उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में किया गया है।
साधना इसी प्रयोजन को पूरा करती है। उस माध्यम से उत्पन्न आन्तरिक ऊष्मा उस सिकुड़न को दूर करती है जो उस प्राणाग्नि के लग-भग बुझ जाने के कारण उत्पन्न हुई है। शीत से हर चीज सिकुड़ती है। गर्मी से फैलती। तपश्चर्या की अग्नि अन्तरंग के प्रत्येक अवयव और शक्ति निर्झर को यथा स्थान यथावत् बनाये रहती है।
साधना, देवी संकेतों के समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप और भावनात्मक आदान-प्रदान करने में समर्थ हो सकती है। साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थानों को विकसित करना-अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही तो योग साधना का-आत्म साधना का उद्देश्य है।
साधना से भी संभव हो सकता है। कुण्डलिनी साधना इसी प्रयोजन को पूरा करती है। उस माध्यम से उत्पन्न आन्तरिक ऊष्मा उस सिकुड़न को दूर करती है जो उस प्राणाग्नि के लग-भग बुझ जाने के कारण उत्पन्न हुई है। शीत से हर चीज सिकुड़ती है। गर्मी से फैलती।
साधनात्मक प्रकरण की यही सूचना और उपलब्धि है। इस बीच आपत्तिग्रस्तों की सहायता करने की, स्वजनों के अवरुद्ध प्रगति पथ को प्रशस्त करने की, हम लोगों की परम्परागत कार्यपद्धति भी यथावत चलती रही है। उसे बन्द कर सकना न अपनी प्रकृति के अनुकूल है न परिस्थिति के। अस्तु उसे चलना भी था और चला भी। इन दिनों कुछ ऐसा असन्तुलन बना कि खर्च अधिक आमदनी कम वाले लोग जिस तरह संकट में फँसते हैं उसी तरह की अड़चन अपने सामने भी आ गई और मुझे वह संकट अस्वस्थता के रूप में सताने लगा।
साधना को विकसित होने देने में क्या कम था जो हम उनसे और अधिक अपेक्षा करें? कुआँ खोदने के लिए गेंती, फावड़े प्रयुक्त होते हैं। पानी तो कुँए में से निकालना है, यदि फावड़े में से पानी नहीं निकलता तो उस जड़ माध्यम पर क्यों खीजा जाय?
साधना विधान है। कानों के बाहरी छेद बन्द कर देने पर उनमें स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब ईश्वर से चल रहे ध्वनि कम्पनों को उस नीरवता में सुन समझ सकना सरल हो जाता है। नाद योग की अभ्यासी आरम्भ में कई प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ कानों के छेद बन्द करके मानसिक एकाग्रता के आधार पर सुनते हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग, वीणा, नफीरी, नूपुर जैसी आवाजें होती हैं और बादल गरजने, झरना झरने, आग जलने झींगुर बोलने जैसी क्रमबद्ध ध्वनियाँ भी सुनाई पड़ती हैं।
साधना को असफलता का मुँह देखना पड़ेगा। इसलिए वस्तु स्थिति आरम्भ से ही समझ लेनी चाहिए। मूर्ति-पूजा में पाषाण प्रतिमा से कुछ भी प्रत्यक्ष लाभ न दीखते हुए भी जिस श्रद्धा के साथ भक्ति भावना की जाती है, लोगों को भी -मित्र कुटुम्बियों को भी उसी स्तर का मानकर न मात्र अपने आन्तरिक विकास के लिए प्रेम प्रवृत्ति के आत्म-वर्द्धन का अभ्यास करने के लिए-किसी को प्रेमास्पद चुनना चाहिए। और बदले की अपेक्षा से आरम्भ से ही विरत रहना चाहिए। इस प्रकार भले ही सीमित प्रेम-प्रदर्शित हो सके पर वह सही होगा।
साधना और प्रेम प्रवृत्ति भी सन्तोष दायक परिणाम उत्पन्न नहीं करती।
साधना की ऊष्मा से उष्ण किया जा सके तो निश्चय ही वे अपने मूल स्थान पर आ सकते हैं और वही स्थिति पुनः उत्पन्न हो सकती है जो उस चिर अतीत काल में थी उसे देव युग-स्वर्ण युग-प्रकाश युग या सतयुग के नाम से पुकारते हैं। समस्त विश्व का युग परिवर्तन बड़ी शक्तियों के द्वारा ही सम्भव हो सकता है पर विश्व में आवश्यक हेर-फेर लाया जाना व्यक्तिगत साधना से भी संभव हो सकता है। कुण्डलिनी साधना इसी प्रयोजन को पूरा करती है। उस माध्यम से उत्पन्न आन्तरिक ऊष्मा उस सिकुड़न को दूर करती है जो उस प्राणाग्नि के लग-भग बुझ जाने के कारण उत्पन्न हुई है। शीत से हर चीज सिकुड़ती है।
साधना करनी पड़ती है पर यदि उखाड़ना हो तो कुछ घण्टे की काट-छाँट ही पर्याप्त है। धार्मिकता को कल्याणकारी वृक्ष बौने-उगाने और बढ़ाने में लाखों वर्ष लगे हैं। अनास्था का प्रतिपादन करके उसे उखाड़ देना कुछ बहुत कठिन नहीं है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि उसे दुबारा लगाया जाना सम्भव न होगा। विश्वासी को अविश्वासी बनाने के उपरान्त फिर दुबारा उसी स्थान पर लौटा कर ले आना कठिन है।
साधनाकाल में रह रहे साधक अपना चरण स्पर्श किसी को नहीं करने देते, वे आशीर्वाद रूप से किसी के सिर पर हाथ भी नहीं रखते। इससे उनकी स्वल्प शक्ति का एक अंश दूसरों के पास चले जाने और अपने लिए घाटा पड़ने वाली आशंका ही सन्निहित है।
साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थानों को विकसित करना-अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही तो योग साधना का-आत्म साधना का उद्देश्य है।
साधनाओं द्वारा उन्हीं को स्वयं समर्थ बनाया जाता है और अपनी पात्रता एवं तपस्या के अनुरूप उन्हीं से लाभ पाया जाता है जिसे ‘अलौकिक’ चमत्कारी, देव प्रदत्त, वरदान के रूप में आश्चर्य के साथ सुना और देखा जाता है।
साधना बनाया जाना चाहिए। धर्म और ईश्वर के नाम पर खर्च होने वाला प्रत्येक पैसा और समय का प्रत्येक क्षण इसी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाना चाहिए।
साधना जितने दिन के लिये आवश्यक थी वह अवधि पूरी हो गई। अब वे समन्वयात्मक प्रक्रिया चलायेंगे। अपनी तपश्चर्या यथावत जारी रखेंगे और शाँतिकुँज के माध्यम से प्रत्यक्ष परामर्श प्रकाश भी प्रदान करेंगे। पर वह प्रक्रिया मेरे माध्यम से ही चलेगी। जन संपर्क बढ़ाने का उनका तनिक भी मन नहीं है।
साधनाओं में अधिकतर का उद्देश्य तितीक्षा ही है। कष्ट की स्थिति आने पर भी मन को असन्तुलित न होने देने का अभ्यास ही तप साधना का मूलभूत प्रयोजन है। व्रत, उपवास, माघ स्नान, धूनी तपना, मौन, कठोर आसन, रात्रि जागरण आदि के पीछे इस अभ्यास की परिपक्वता ही प्रयोजन है जिसके द्वारा कठिन समय आने पर हिम्मत न हारने का मनोबल यथा स्थान बना रहे।
साधना भी इधर ही लगती रही। अभी भी उस संदर्भ में काफी उलझनें शेष हैं सो कुछ महीने अपनी साधना प्रक्रिया उसी से जुड़ी रहेगी। इस प्रकार की सामयिक परिस्थितियाँ सामने आने पर उन्हें भी प्राथमिकता देनी पड़ती है। बाकी साधना की सुनिश्चित दिशा तो वही है जिसका उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में किया गया है।
साधना का मूलभूत प्रयोजन है। व्रत, उपवास, माघ स्नान, धूनी तपना, मौन, कठोर आसन, रात्रि जागरण आदि के पीछे इस अभ्यास की परिपक्वता ही प्रयोजन है जिसके द्वारा कठिन समय आने पर हिम्मत न हारने का मनोबल यथा स्थान बना रहे।
साधना का प्रयोजन इन ध्रुव केन्द्रों को यथा स्थान व्यवस्थित करना और उनकी अस्तव्यस्तता को दूर करना भी है।
साधना का उद्देश्य है।
साधना का-आत्म साधना का उद्देश्य है।
साधना, धर्मानुष्ठान, कथा कीर्तन, स्वाध्याय, सत्संग, दान, पुण्य आदि का जो जितना कुछ भी धर्म कलेवर खड़ा है; इस सबके पीछे एक ही उद्देश्य है मनुष्य व्यक्तिवादी पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाये और समाजनिष्ठा के परमार्थ मार्ग को अपनाकर उदार एवं लोकसेवी प्रक्रिया अपनाये। इस मूल प्रयोजन की ओर मनुष्य को अग्रगामी बनाने के लिए अनेक कथा पुराण बनाये गये-धर्म शास्त्र रचे गये, साधन विधान बनाये गये-स्वर्ग-नरक के भय प्रलोभन प्रस्तुत किये गये। अदृश्य जगत के, लोक-लोकान्तरों के, देव-दानवों के प्रतिपादन किये गये। मत-मतान्तरों के बीच इन प्रतिपादनों में भारी अन्तर पाया जाता है पर मूल प्रयोजन सबका एक है-मनुष्य की पशु प्रवृत्ति को व्यक्तिवादी स्वार्थपरता को समाजनिष्ठ परमार्थ को धर्म धारणा में विकसित करना।
साधना की ऊष्मा को बुझा देता है तो उनकी सिकुड़न सब कुछ कुरूप और विकृत बना देती है। जाड़े के दिनों में पैर की बिवाई फट जाती और उनमें दर्द होता है। चलने में अड़चन पड़ती है और पैर कुरूप दीखते हैं। गर्मी की ऋतु आने पर यह शिकायत अपने आप दूर हो जाती है। हमारी वर्तमान स्थिति को फटी हुई ‘बिवाई’ कहा जा सकता है।
साधना का महत्व बताते हुए कहा है-
साधना प्रक्रिया उसी से जुड़ी रहेगी। इस प्रकार की सामयिक परिस्थितियाँ सामने आने पर उन्हें भी प्राथमिकता देनी पड़ती है। बाकी साधना की सुनिश्चित दिशा तो वही है जिसका उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में किया गया है।
साधना के फलस्वरूप प्राप्त किये वरदान और कुछ नहीं विराट विश्व की अन्तरंग शक्तियों में से कुछ का इच्छानुकूल उपयोग कर सकने की क्षमता ही समझी जानी चाहिए इसी प्रकार शाप वरदान दे सकने की क्षमता को अपनी व्यक्तिगत इकाई को इतना प्रबल बना लेना ही समझना चाहिए जिससे मनुष्यों या पदार्थों को अपनी संकल्प शक्ति के प्रहार से अभीष्ट दिशा में मुड़ने के लिए विवश किया जा सके। देवताओं का अस्तित्व इस विराट विश्व में उनकी विशालता के अनुरूप व्यापक भी हो सकता है। पर हमसे देवताओं के जिस अंश का प्रत्यक्ष और सीधा सम्बन्ध है वह अंश अपने भीतर ही ‘शक्ति बीजों’ के रूप में विद्यमान रहता है। साधना का प्रयोजन इन्हीं शक्ति बीजों को जागृत और समर्थ बनाना है। समष्टिगत देवताओं का आशीर्वाद, वायु, वर्षा, धूप, शीत, दुर्भिक्ष, सुर्भिक्ष आदि के रूप में समग्र रूप से बरसता है और उससे सबको समान लाभ मिलता है।
साधना से इस सिद्धि को उपलब्ध करने वाले अपने ज्ञान भण्डार को असाधारण रूप से बढ़ा सकते हैं और उस स्थिति से विशेष लाभ उठा सकते हैं।
साधना क्रम में ही चले जाते हैं। दो चार घण्टे ही उन्होंने लोक मंगल के प्रयोजनों के लिये रखे हैं सो उसका उपयोग हम लोग भी करेंगे। जनसंपर्क एक प्रकार से सम्भव ही न होगा।
साधनाएं करते रहें। यह अपना काम है कि मनोबल ऊँचा रखें, हिम्मत न हारें, निराशा को पास न फटकने दें और एक रास्ता बन्द होने पर दूसरा रास्ता खोजें, खोलें और यदि मानसिक दुर्बलता से बचा रहा जाय तो शरीर हारी, बीमारियों से लड़ते-झगड़ते लम्बी जिन्दगी जी सकता है और अवरोधों से दिल्लगी मजाक करते हुए सफल और समर्थ जीवन की दिशा में बढ़ता रह सकता है।
साधना का प्रयोजन इन्हीं शक्ति बीजों को जागृत और समर्थ बनाना है। समष्टिगत देवताओं का आशीर्वाद, वायु, वर्षा, धूप, शीत, दुर्भिक्ष, सुर्भिक्ष आदि के रूप में समग्र रूप से बरसता है और उससे सबको समान लाभ मिलता है। व्यक्तिगत वरदान आशीर्वाद देने वाले देवता अपने शरीर में ही विद्यमान रहते हैं। विविध-विधि साधनाओं द्वारा उन्हीं को स्वयं समर्थ बनाया जाता है और अपनी पात्रता एवं तपस्या के अनुरूप उन्हीं से लाभ पाया जाता है जिसे ‘अलौकिक’ चमत्कारी, देव प्रदत्त, वरदान के रूप में आश्चर्य के साथ सुना और देखा जाता है।
साधना के द्वारा जिनने जो वरदान पाये थे उनके इतिहास, पुराण विस्तारपूर्वक हम पढ़ते सुनते हैं। इन दिनों वैसी उपलब्धियाँ प्रत्यक्ष न होने से वे बातें कपोल कल्पना जैसी लगती हैं पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। यदि ठीक विधि से-ठीक उपकरणों द्वारा उस विज्ञान को कार्यान्वित किया जाय तो पूर्व काल की कपोल कल्पना समझी जाने वाली बातों को आज भी प्रत्यक्ष किया जाना सम्भव है।
साधना और तपश्चर्या वस्तुतः इसी अति महत्वपूर्ण विज्ञान का नाम है। प्राचीन काल में तप साधना के द्वारा जिनने जो वरदान पाये थे उनके इतिहास, पुराण विस्तारपूर्वक हम पढ़ते सुनते हैं। इन दिनों वैसी उपलब्धियाँ प्रत्यक्ष न होने से वे बातें कपोल कल्पना जैसी लगती हैं पर वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। यदि ठीक विधि से-ठीक उपकरणों द्वारा उस विज्ञान को कार्यान्वित किया जाय तो पूर्व काल की कपोल कल्पना समझी जाने वाली बातों को आज भी प्रत्यक्ष किया जाना सम्भव है।
साधना का महत्वपूर्ण प्रकरण है। रेडियो, टेलीफोन तो निर्धारित स्थान से निर्धारित स्थान पर ही सन्देश पहुँचाते हैं उन्हें विशेष यन्त्रों द्वारा ही प्रेषित किया जाता है और विशेष यन्त्र ही सुनते हैं। कर्ण पिशाचिनी विद्या से कहीं पर भी हो रहे शब्द प्रवाह को सुना जा सकता है। स्थूल शब्दों के अतिरिक्त अन्य घटनाक्रमों की हलचलें विद्युत के रूप में अन्तरिक्ष में विद्यमान रहती हैं, उन किरणों को प्रकाश रूप में देखा जा सकता है और शब्द रूप में सुना जा सकता है। ताँत्रिक साधना से इस सिद्धि को उपलब्ध करने वाले अपने ज्ञान भण्डार को असाधारण रूप से बढ़ा सकते हैं और उस स्थिति से विशेष लाभ उठा सकते हैं।
साधना की अनिवार्य आवश्यकता है। रूखा, नीरस, एकाकी स्वार्थी मनुष्य कितना ही वैभव सम्पन्न क्यों न हो अध्यात्म की दृष्टि से उसे नर-पशु ही कहा जायगा। जो किसी का नहीं, जिसका कोई नहीं। ऐसा मनुष्य कुछ भी अनर्थ कर सकता है। उसे अपने आप से डर लगेगा और अपनी जलन में जीवित मृतक की तरह झुलसेगा।
साधना में लीन थे। पास ही मैदान में एक ग्वाला अपने बैल चरा रहा था। उसे किसी आवश्यक कार्य से गाँव में जाना था। उसने सोचा पास में बाबा बैठे हैं, यह बीच-बीच में बैल देख लिया करेंगे तब तक मैं घर से लौट ही आऊँगा।
साधना के उपरोक्त तीन प्रयोजन ही प्रधान थे। आत्म शुद्धि की बात तो एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करने भर के लिये वे कहते भर थे। वस्तुतः इस प्रयोजन को वे चिरकाल पूर्व ही पूरा कर चुके हैं।
साधना से यही पथ-प्रशस्त होता है। इसलिये उसकी सफल साधना का महत्व बताते हुए कहा है-
साधना लक्ष्य इसी बिन्दु पर केन्द्रित किया और शान्तिकुँज की साधना भी इधर ही लगती रही। अभी भी उस संदर्भ में काफी उलझनें शेष हैं सो कुछ महीने अपनी साधना प्रक्रिया उसी से जुड़ी रहेगी। इस प्रकार की सामयिक परिस्थितियाँ सामने आने पर उन्हें भी प्राथमिकता देनी पड़ती है। बाकी साधना की सुनिश्चित दिशा तो वही है जिसका उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में किया गया है।
साधना स्थान का पता लगाने या मिलने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये। ऐसे प्रयत्नकर्ताओं के असफल होने पर हमें, उन्हें तथा गुरुदेव को कष्ट ही हो सकता है। इसीलिये जब तक उनका नया निर्देश न हो-जब तक वे किसी को स्वयं ही न बुलायें, तब तक उनसे मिलने के लिये किसी को भी चेष्टा न करनी चाहिये। “दिव्य अनुभूतियाँ” स्तम्भ भी उनके आदेशानुसार अब अखण्ड-ज्योति में नहीं छपेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-December
साधना करनी पड़ती है। साधना शारीरिक बलवर्धन के लिए भी होती है और मस्तिष्क को विकसित करने के लिए भी। व्यायाम, अध्ययन आदि को शरीर एवं मन की साधना कह सकते हैं। यदि इनका अवलम्बन न लिया जाय तो वे दोनों अविकसित पड़े रहेंगे। भगवान ने अनेक क्षमताओं से सम्पन्न शरीर और अनेक सम्भावनाओं से युक्त मन हमें दिया है पर यदि उन्हें व्यवस्थित एवं समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न न किया जाय तो वे अवाँछनीय दिशा में चलकर विकृत, भ्रष्ट एवं अधःपतित भी हो सकते हैं।
साधना तपस्या से कई विशेष व्यक्ति असाधारण शक्ति प्राप्त करते हैं पर पीटर की अनायास ही उपजी सहज अतीन्द्रिय चमत्कारिता कोई अविज्ञात कारण अपने गर्भ में छिपाये बैठी है।
साधनायें तथा अन्नमयकोष, मनोमयकोष, प्राणमयकोष को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3 रु. 50
साधना के रूप में विवेचना करते हुए समग्र आत्म विद्या का कलेवर खड़ा किया है।
साधना से मनुष्य की आन्तरिक क्षमता बढ़ सकती है और वह अपने को एक ऐसी प्रचण्ड इकाई के रूप में विकसित कर सकता है जो संसार के अजस्र वैभव में से इच्छानुसार बहुत कुछ अधिग्रहण कर सके। यह क्षमता कई बार प्रकृति प्रदत्त भी होती है और कई बार जन्म-जन्मान्तरों के संग्रहीत संस्कारों के कारण अनायास ही विकसित हो पड़ती है। पर इतना द्वार हर किसी के लिए खुला हुआ है वह चाहे तो अपनी मानव सत्ता के साथ जुड़ी हुई चमत्कारी विशेषताओं को चाहे जितनी ऊँचाई तक विकसित कर सकता है यहाँ तक कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समतुल्य भी बन सकता है।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना की। उस शक्ति का साक्षात्कार किया और वैसी ही सामर्थ्य से सम्पन्न हो गये जैसी कि इस महाशक्ति के महात्म्य में बताई गई है। मन्त्र साधना वाणी का तप है। स्थूल की सूक्ष्म में परिणति है। अंतर्दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश करना है।
साधना तप ही लौटकर सिद्धि भाण्डागार के रूप में परिलक्षित होता है।
साधना वाणी का तप है। स्थूल की सूक्ष्म में परिणति है। अंतर्दर्शन के क्षेत्र में प्रवेश करना है। कुँए में घड़ा फाँसना और खींचना तप है। जल भरा हुआ घड़ा फाँसना और खींचना तप है।
साधना शारीरिक बलवर्धन के लिए भी होती है और मस्तिष्क को विकसित करने के लिए भी। व्यायाम, अध्ययन आदि को शरीर एवं मन की साधना कह सकते हैं। यदि इनका अवलम्बन न लिया जाय तो वे दोनों अविकसित पड़े रहेंगे। भगवान ने अनेक क्षमताओं से सम्पन्न शरीर और अनेक सम्भावनाओं से युक्त मन हमें दिया है पर यदि उन्हें व्यवस्थित एवं समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न न किया जाय तो वे अवाँछनीय दिशा में चलकर विकृत, भ्रष्ट एवं अधःपतित भी हो सकते हैं। रोग शोक से घिरे सकते हैं।
साधना, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष विधि विधानों के साथ की थी और उससे उन्होंने अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त किये। दशरथ जी का पुत्रेष्टि यज्ञ वशिष्ठ जी पूरा न करा सके तब शृंगी ऋषि ने उसे सम्पन्न कराया, यह शृंगी ऋषि की आयातयामता शक्ति ही थी।
साधना कह सकते हैं। यदि इनका अवलम्बन न लिया जाय तो वे दोनों अविकसित पड़े रहेंगे। भगवान ने अनेक क्षमताओं से सम्पन्न शरीर और अनेक सम्भावनाओं से युक्त मन हमें दिया है पर यदि उन्हें व्यवस्थित एवं समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न न किया जाय तो वे अवाँछनीय दिशा में चलकर विकृत, भ्रष्ट एवं अधःपतित भी हो सकते हैं। रोग शोक से घिरे सकते हैं। इसी प्रकार अन्तःकरण को उसकी ऊर्जा-परावाक् को परिष्कृत न किया जाय तो वह अधोगामी ही असुरता ग्रस्त हो सकती है।
साधना। 4. गायत्री का शक्ति स्त्रोत- सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पञ्चविधि दैनिक साधना।
साधना, द्वितीय अध्याय में सत्साहित्य निर्माण, तीसरे में संगठन आन्दोलन का क्रम चला है। उनके इस क्रिया-कलाप ने लाखों को प्रभावित और प्रेरित किया है। इन दिनों युग -निर्माण आन्दोलन का जो स्वरूप, विस्तार एवं प्रतिफल है उसे इन्हीं तीन चरणों की प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। अब चतुर्थ अध्याय में यह कार्य क्षेत्र बढ़कर विश्वव्यापी बना है- गुरुदेव की वर्तमान विश्वयात्रा इसी प्रयोजन के लिए है। प्रतिभाओं को जगाने और मोड़ने की ओर उनका भावी पुरुषार्थ हो रहा है।
साधना से पूरा होता है। मन्त्र विज्ञान का यही प्रयोजन है। उससे परावाक् के मर्मस्थल का स्पर्श किया जाता है और परिष्कार का साधन जुटाया जाता है।
साधना संतप्त वाक् को परमार्थ प्रयोजन में लगाया जाय तो सच्चे अर्थों में उसे ब्रह्मयज्ञ कहना चाहिए। ब्रह्म अग्नि में ब्रह्म हवि देने की चर्चा गीता में इस संदर्भ में की गई है। ऐसे ब्रह्म यज्ञ से सुख शान्ति भर पर्जन्य बरसते हैं। चरु यज्ञों द्वारा भौतिक प्रयोजन पूरे होते हैं- भौतिक समृद्धि के मेघ भी बरसते हैं पर श्रुति ने जिस पर्जन्य वर्षा की और संकेत किया है उसे विश्व शान्ति और लोक कल्याण की उपलब्धियों के रूप में ही देखा समझा जाना चाहिए।
साधना विषयक विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्-चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमयकोष, मनोमयकोष, प्राणमयकोष को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिग्दर्शन। मूल्य 3 रु. 50
साधनात्मक
साधना। 9. कर्म योग की रीति-नीति। 10. भक्ति योग का वास्तविक स्वरूप। 11. मनुष्य में देवत्व। 12. अपूर्णता की ओर 13. मरने से डरना क्या।
साधना के समस्त कलेवर को इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। पिछले दिनों कुछ कर्मकाण्डों- परम्पराओं एवं पूजा विधानों का पूरा कर लेना भर धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता समझी जाती रही है। युग-निर्माण योजना ने बताया है कि चरित्र गठन का नाम धर्म और अपनी क्षमताओं को लोक मंगल के लिये समर्पित करने की पृष्ठभूमि का नाम अध्यात्म है। भावनाओं को कल्पना लोक में नहीं उड़ते रहना चाहिए वरन् उन्हें अपने तथा समाज के समग्र निर्माण में संलग्न होना चाहिए। यही उनका वास्तविक प्रयोजन है भी।
साधना में लगती है तब वह शक्ति रूप होती है। शक्ति भी ऐसी जिसकी परिधि में वह सब कुछ आ जाता है जिसे अद्भुत एवं महान कह सकते हैं।
साधना में अग्नि का उपचार सम्बद्ध किया जाता है। यज्ञशालाओं में अखण्ड अग्नि, जप में अखंड दीपक तथा अनुष्ठान की पूर्ति पर अनुपातिक यज्ञ करने का विधान है। विभिन्न पर्वों तथा धर्मानुष्ठानों के अवसर पर अग्निहोत्र की आवश्यकता इसीलिए है कि उस संदर्भ में प्रयुक्त होने वाली मंत्रशक्ति अपना समुचित चमत्कार दिखा सके।
साधना। 17. तमसो मा ज्योतिर्गमय। 18. प्रेम ही परमेश्वर है। 19. अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाय। 20. ईश्वर और उसकी अनुभूति।
साधना अनेक व्यक्तियों को तथा पदार्थों को परमाणु जीवाणुओं को प्रभावित करती है तो वह बहुलीकरण शक्ति ही काम कर रही होती है।
साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ।
साधना का सहारा लेकर मनुष्य चाहे तो इतना ऊँचा उठ सकता है जहाँ पहुँचने पर उसे सिद्ध पुरुष एवं देवात्मा कहा जा सके।
साधना- नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। (मू. 20 पैसे) 4. गायत्री चालीसा (मू. 10 पैसे) 5. दैनिक आरती (मू. 5 पैसे) 6. युग निर्माण का सत्संकल्प (मू. 5 पैसे)
साधना के कार्य सम्पन्न करते रहते हैं। उनकी प्रतिभा, बुद्धि, सामर्थ्य, सम्पदा सब कुछ शाखा-प्रशाखा फोड़ती हैं। प्रवाल कीड़ों की यह विशेषता भी सज्जनों में पाई जाती है कि वे संकटों के सागर में डूबे रहते हुए भी अपना मस्तिष्क विक्षुब्ध न होने दें।
साधना और सिद्धि का यही अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। मन्त्र साध्य को मन्त्र साध्य मनाने की इस अनूठी प्रक्रिया का रहस्य जो जानते हैं वे भौतिक उपकरणों के -साधनों को मान्त्रिक प्रक्रिया द्वारा जो पाया जाना सम्भव है, उसे माँत्रिक साधना पद्धति से प्राप्त कर लेते हैं। उनका साधना तप ही लौटकर सिद्धि भाण्डागार के रूप में परिलक्षित होता है।
साधना। 37. सद्गृहस्थ की साधना। 38. नशेबाजी की दूषित दुष्प्रवृत्ति। 39. जागृति गान। 4. नेक बनें नेक की राह चलें 41. क्या खायें?
साधना। 38. नशेबाजी की दूषित दुष्प्रवृत्ति। 39. जागृति गान। 4. नेक बनें नेक की राह चलें 41. क्या खायें? क्यों खायें?
साधना। 51. अन्धविश्वास को उखाड़ फेंकिये। 52. आस्तिकता मानव-जीवन की अनिवार्य आवश्यकता। 53. शौर्य और साहस के प्रसंग। 54. हम बदलें तो दुनिया बदले।
साधना तपश्चर्या 2. मिशन को विश्वव्यापी बनाने के लिए विभूतियों की दिशा मोड़ना 3. प्राण प्रत्यावर्तन द्वारा एक सहस्र प्राणवान् युग निर्माता तैयार करना 4. नारी जागरण के विशेष प्रयास 5. विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का विशेष प्रयास। इन पाँचों को एक से एक बढ़कर विश्वमानव को दिया गया अनुदान माना जायगा। वर्तमान ढाई मास की विश्वयात्रा को इसी संदर्भ में उठाया गया प्रथम चरण माना जायगा। वे संत पर्व तक वापिस लौट आवेंगे और इन्हीं कार्यों में संलग्न रहेंगे।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना। 9. गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप।
साधना का ऐसा अवसर भी मिलता है जिसके कारण असाधारण आत्म सन्तोष का वरदान भी अनन्त काल तक मिलता रहेगा। जन स्तर पर पूँजी इकट्ठी करने के लिए सरकारी समितियाँ लिमिटेड कम्पनियाँ बनाई जा सकती हैं उनमें बचत पूँजी लगाने के लिए हर भावनाशील व्यक्ति को अपनी संग्रहीत पूँजी लगाने के लिए कहा जा सकता है। अनावश्यक जमीन जायदाद जेवर जमा पूँजी बचत फण्ड आदि के रूप में कितना ही पैसा ऐसा पड़ा रहता है जिसकी साधारणतया कोई विशेष उपयोगिता नहीं होती पर यदि वह उपरोक्त आवश्यकता पूरी करने वाले अर्थ संस्थानों में लग जाये तो उससे आम के आम गुठलियों के दाम वाली कहावत पूरी हो सकती है। पूँजी तो सुरक्षित रहती है साथ ही कुछ लाभ ब्याज भी कमाती है। इसके अतिरिक्त युग की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता पूरी करने का जो श्रेय मिलता है उसे तो हर दृष्टि से भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य ही कहा जायगा।
साधना होगी और सत्परिणाम प्रत्यक्ष परिलक्षित होगा।
साधना पद्धति से प्राप्त कर लेते हैं। उनका साधना तप ही लौटकर सिद्धि भाण्डागार के रूप में परिलक्षित होता है।
साधना। 14. धन्योगृहस्थाश्रमः 15. गृहस्थाश्रम एक कर्त्तव्य धर्म। 16. गृहस्थ ही नहीं सद्गृहस्थ बनें। 17. दाम्पत्य जीवन में स्वर्ग का अवतरण। 18. सुखी और सफल दाम्पत्य जीवन।
साधना का प्रयोजन मनुष्य को ऐसी ही समग्र सम्पन्नता से लाभान्वित करता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-May
साधना विधियाँ उस समय के मानव शरीरों की स्थिति के अनुरूप थीं परिवर्तन के साथ साधन क्रम भी बदलेंगे। यदि हेरफेर न किया जाय तो प्राचीन काल में सफल होने वाली साधनाएँ अब सर्वथा निरर्थक और निष्फल सिद्ध होती रहेंगी।
साधना चल पड़ी और बराबर निर्बाध गति से चल रही है, उससे उत्पन्न शक्ति अंश निरन्तर परिवार की भौतिक एवं आत्मिक सहायता के लिये वितरित किया जाता रहता है।
साधनात्मक प्रयोजन में लगे रहे। यह अवधि उन्हें विश्व के भविष्य की विशेषतया भारतीय राष्ट्र की स्थिति को अन्धकार में धकेल सकने वाली काली घटाओं को हटाने में जूझते रहना पड़ा। बँगला देश की स्थिति उन महीनों में अत्यन्त नाजुक दौर से गुजरती रही है। चीन और अमेरिका ने प्रत्यक्ष से भी अधिक परोक्ष रूप में ऐसी दुरभि सन्धि युक्त योजना बनाई हुई थी जो यदि सफल हो जाती तो भारत की स्थिति दयनीय हुए बिना न रहती और पाकिस्तान की दुष्टता अबकी अपेक्षा हजार गुनी बढ़ जाती। भारत हारता तो उसकी प्रतिक्रिया समस्त संसार में प्रगतिशील शक्तियों के विरुद्ध ही पड़ती।
साधना का स्वरूप होगा- एकान्त सेवन-एकाकी निवास-मौन-मस्तिष्क विचार रहित-शरीर क्रिया रहित। शल्य क्रिया के समय रोगी को निःचेष्ट रहना पड़ता है। उसे हिलने डुलने नहीं दिया जाता। यह प्रत्यावर्तन साधना क्रम भी लगभग उसी स्तर का होगा। दुर्बल रोगी के शरीर में जिस प्रकार नस में ग्लूकोस या नया रक्त प्रवेश करके उसे सामर्थ्य प्रदान की जाती है उसी प्रकार का यह साधना उपचार भी होगा।
साधनात्मक गति विधियाँ अपनाने का प्रभाव परिणाम भी इन्हीं सत्प्रवृत्तियों का विकास होना चाहिए अन्यथा वह जप भजन भी एक चिह्न पूजा बनकर रह जायगा और उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
साधना-पथ और आत्म-उज्ज्वलता के द्वार उसी तरह से खुले हैं, जिस तरह से साधु, साध्वियों के लिये। वह अपनी आत्मा को साधना पथ में लगाकर कर्मफल को भस्मीभूत कर दे। -आचार्य श्रीतुलसी
साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।
साधना की आमदनी और खर्च का यही लेखा-जोखा है जो उन्होंने मुझे बताया।
साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्य-मार्ग का दिग्दर्शन। मू0 3)50
साधना का थोड़ा-सा गंगाजल इस गन्दे नाले में गिरकर अपनी महत्ता खो बैठता है- नाले को शुद्ध कर सकना सम्भव नहीं होता। बेशक तीव्र गंगा प्रवाह में थोड़ी-सी गन्दगी भी शुद्धता में परिणत हो जाती है। पर साथ ही यह भी सच है कि सड़ांद भरी गन्दी गटर को थोड़ा-सा गंगा जल शुद्ध कर सकने में असमर्थ असफल रहेगा।
साधना को आधार भूत मानना चाहिए और उपासना को उसकी सुसज्जा। बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।
साधना पथ में लगाकर कर्मफल को भस्मीभूत कर दे। -आचार्य श्रीतुलसी
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना में कुमारी पूजा का अद्भुत महात्म्य वर्णित है। आज की परिस्थिति में तो उनका स्थान साधु ब्राह्मण से भी आगे है। क्योंकि वे तो अब केवल वेश और वश मात्र भर रह गये हैं, तात्विक महानता वे लोग लगभग गँवा ही बैठे। कुमारी कन्याओं में वे देवतत्व जन्म जात होते हैं। यों नर की तुलना में आत्मिक दृष्टि से नारी सदा ही आगे होती है पर कन्याओं में उनका भोला शैशव, सहज ब्रह्मचर्य जैसे कारणों से उनकी गरिमा और भी अधिक बढ़ जाती है।
साधना की पृष्ठ-भूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।
साधना की ओर इंगित करने वाला गहन तत्वज्ञान सन्निहित है। उसे यदि न समझा जाए और मात्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान लिया जाए तो यही कहना पड़ेगा कि यथार्थता को भुला कर विडम्बना की उलझन में पैर फंसा दिया गया।
साधना में संलग्न थे। देवराज इन्द्र उनके पास गये और पूछा-किस प्रयोजन के लिए आपका तप है भगवन्, मुझे आज्ञा दीजिये कि आपका अभीष्ट प्रस्तुत करूं। कौत्स ने कहा-देव, केवल आत्म-शुद्धि के लिए तप कर रहा हूँ। यह आन्तरिक अशुद्धि ही अभावों और कामनाओं से जीव को संतप्त करती है।
साधना के इच्छुक व्यक्तियों को उसका विशाल कार्य क्षेत्र तैयार किया हुआ है। उसका आधार भारतीय धर्म और संस्कृति के अनुरूप तथा युग की पुकार से ओत-प्रोत रहने के कारण जनता ने उसे सराहा ही नहीं स्वीकार भी किया है। राजनैतिक वर्चस्व प्राप्त करने के लिये लालायित लोग यदि लोक मंगल की सेवा साधना, सामाजिक स्तर पर करने लगें तो देश का कितना बड़ा उपकार हो और उन उमंगों का भी सदुपयोग हो जो राजनीति में इधर-उधर धक्के खाती हुई भ्रमित एवं अस्त-व्यस्त होती रहती है। यदि लोक सेवा में निरत रहकर जनता की सच्ची श्रद्धा अर्जित कर ली जाय तो राजनेता बनने में भी कुछ कठिनाई नहीं रहती। पर यों ही उछल कूद के आधार पर यदि राजनेता बन भी जाया जाय तो उसमें स्थिरता कहाँ रहती है?
साधना का रंग पवित्र अन्तःकरण ही बढ़ सकने वाली बात को ध्यान में रखते हुए भी यह किया जाना नितान्त आवश्यक है। यह भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए कि तप साधना का प्रयोजन जहाँ आत्म-शक्ति का विकास करना है वहाँ पापों का प्रायश्चित भी है। इसे अलग रख कर केवल पूजा उपासना भर से किसी बड़ी आत्मिक सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मूल्य 20 पैसे।
साधना की थी। देवप्रयाग में भगवान राम, लक्ष्मण झूला में लक्ष्मण जी, ऋषिकेश में भरत और मुनि की रेती में शत्रुघन के तप कुटीर थे। यह क्षेत्र गुरु देव को अधिक भाया। जीवन का अंतिम समय हिमालय पिता और गंगा माता की गोदी में खेलते हुए एकान्त तप साधना का आनन्द लेते हुए प्राचीन आश्रम व्यवस्था का पालन भी किया जा सकेगा और अपनी आकाँक्षा भी पूर्ण होगी। इस विचार को उनके मार्ग दर्शक का समर्थन भी मिला और उन्होंने यह स्थान चुन लिया।
साधना की और अपने को इस योग्य बनाया कि कोई समर्थ देवदूत उसे प्रसन्नता पूर्वक अपना सके।
साधना’ की उपेक्षा। गुण-कर्म स्वभाव का परिष्कार साधना का मूलभूत उद्देश्य है। उसका स्वरूप है आत्म-बोध, आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास। यही आत्म देव का सच्चा पंचोपचार पूजन है। जो उसे कर सकता है उसी की पूजा उपासना सफल होती है।
साधना। हजार वर्ष की गुलामी से अपना सब कुछ खो बैठने वाले समाज में संव्याप्त नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर किया जाना सबसे बड़ा काम है और उसे राजनीति द्वारा नहीं—सामाजिक सत्प्रवृत्तियों द्वारा ही पूरा किया जा सकता है।
साधना क्रम भी लगभग उसी स्तर का होगा। दुर्बल रोगी के शरीर में जिस प्रकार नस में ग्लूकोस या नया रक्त प्रवेश करके उसे सामर्थ्य प्रदान की जाती है उसी प्रकार का यह साधना उपचार भी होगा।
साधना से मेल खाती है। कुमारिकाएं आत्म-कल्याण की दृष्टि से भी इस प्रकार के अनुष्ठानों का आश्रय लेकर बहुत आगे बढ़ सकती हैं। मरियम और कुन्ती ने देवताओं को अपनी गोदी में खिलाने तक के लिये आह्वान कर लिया था। इस प्रयोजन में जो कन्या जितना समय लगा सके उतना लगा सकेगी, हर दृष्टि से वह उसके उज्ज्वल भविष्य के लिये एक संचित पूँजी ही सिद्ध होगी। इस दृष्टि से तपस्विनी कन्याएं आत्म-कल्याण और लोक-मंगल के दोनों प्रयोजन पूरा करती हैं।
साधना और नैष्ठिक उपासना सराहनीय है पर उसका जितना प्रतिफल हो सकता था उससे सहस्रों गुना अनुदान प्रत्यावर्तन के रूप में मिला है यह भी सर्वथा सत्य है।
साधना में विघ्न उत्पन्न न होने देने के विचार से अवतरित हुई भगवती गंगा सात भागों में विभक्त हो गई थी। पुराणों में इस तथ्य का जगह-जगह वर्णन है। हरिद्वार-हिमालय का द्वार है, यहाँ से आगे उत्तराखण्ड आरम्भ हो जाता है। भगवान् राम ने इसी क्षेत्र में अपने भाइयों समेत वृद्धावस्था में तप साधना की थी। देवप्रयाग में भगवान राम, लक्ष्मण झूला में लक्ष्मण जी, ऋषिकेश में भरत और मुनि की रेती में शत्रुघन के तप कुटीर थे।
साधना की नाव खेते हैं और सत्य के परम लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।
साधना का निर्धारण भी जुड़ा हुआ होगा।
साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा। मैले कपड़े पर रंग चढ़ाने की सूझ-बूझ भी भोंड़ी ही मानी जायेगी इस प्रकार का किया हुआ श्रम भी सार्थक न रहेगा।
साधना का समुचित लाभ न मिल सकेगा। अस्तु इसी अवधि में आत्म लाभ के लिये आने वाले आगंतुकों से उनके इस जन्म की भूलें सुनकर तदनुरूप प्रायश्चित भी बता दिया जायेगा। जीवन-मुक्ति के लिए यह नितान्त आवश्यक है। क्योंकि पिछले जन्मों के कर्म इस जन्म में प्रारब्ध बन कर भुगतने पड़े और जन्म लेना पड़ा। यदि इस जन्म के पाप यथावत बने रहे उनका प्रायश्चित निराकरण न हुआ तो अगले जन्म के लिए वे प्रारब्ध बन जायेंगे।
साधना पार्वती की—मनु पुत्री इला की साधना से मेल खाती है। कुमारिकाएं आत्म-कल्याण की दृष्टि से भी इस प्रकार के अनुष्ठानों का आश्रय लेकर बहुत आगे बढ़ सकती हैं। मरियम और कुन्ती ने देवताओं को अपनी गोदी में खिलाने तक के लिये आह्वान कर लिया था। इस प्रयोजन में जो कन्या जितना समय लगा सके उतना लगा सकेगी, हर दृष्टि से वह उसके उज्ज्वल भविष्य के लिये एक संचित पूँजी ही सिद्ध होगी। इस दृष्टि से तपस्विनी कन्याएं आत्म-कल्याण और लोक-मंगल के दोनों प्रयोजन पूरा करती हैं।
साधना उपचार भी होगा।
साधना उपासना तपश्चर्या एवं आवश्यकता समझते हुए इसी में सर्वतोभावेन संलग्न होंगी। साथ ही सामान्य स्तर के व्यक्तियों में इतना विवेक तो अनायास ही जागृत होगा कि वे अन्धकार और प्रकाश का अन्तर समझ सकें। अनुचित के लिए दुराग्रह छोड़ कर न्याय और विवेक के आधार पर प्रतिपादित उचित को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार उभय पक्षीय सुयोग संयोग उस प्रयोजन को अग्रगामी बनाता चला जायेगा जो युग परिवर्तन का मूल भूत आधार है।
साधनाएँ अब सर्वथा निरर्थक और निष्फल सिद्ध होती रहेंगी।
साधना के प्रथम चरण का परिपालन करते हुए दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम समझेगा और उनसे सतर्कता पूर्वक विरत हो जायेगा, पाप नष्ट होने का अर्थ है पाप-कर्म करने की प्रवृत्ति का नाश, पर उल्टा अर्थ कर दिया गया पाप-कर्मों के प्रतिफल का नाश। कदाचित ऐसी उलटबांसी सही होती तो फिर इस संसार में पाप को ही पुण्य और कर्तव्य माना जाने लगता। फिर कोई भी पाप से न डरता। राजदण्ड से बचने की हजार तरकीबें हैं। उन्हें अपना कर अनाचारी लोग सहज ही निर्द्वन्द्व निश्चिन्त रह सकते हैं दैव दण्ड ही एक मात्र बंधन था सो इन धर्मध्वजियों ने उड़ा दिया।
साधना क्रम कब चलेगा कितने लोग एक साथ उसमें भाग ले सकेंगे अभी इसकी स्पष्ट रूप रेखा उनने नहीं बताई। इस विषय का स्पष्टीकरण अभी अनुपलब्ध है। संभवतः वह छपेगा भी नहीं। व्यक्तिगत सूचनाओं का आदान-प्रदान ही उस साधना संदर्भ का माध्यम रहेगा।
साधना के लिए तो हर पल उपयुक्त है। गृहस्थ के लिए भी साधना-पथ और आत्म-उज्ज्वलता के द्वार उसी तरह से खुले हैं, जिस तरह से साधु, साध्वियों के लिये। वह अपनी आत्मा को साधना पथ में लगाकर कर्मफल को भस्मीभूत कर दे। -आचार्य श्रीतुलसी
साधना के द्वारा संग्रहीत हो जाया करेगा तब उसके वितरण के निमित्त ही आया करेंगे। यह परिस्थितियों पर निर्भर है कि कुछ संचित संग्रहीत होता है या नहीं जिसे युग-निर्माण परिवार के सदस्यों को प्रदान किया जा सके- पिछले सात मास उपरोक्त दो तीन प्रयोजनों में लग गये। (1) बँगलादेश से सम्बन्धित विभीषिका (2) बसन्त पर्व (3) मेरी बीमारी। जो कमाया था वह खर्च हो गया अब शान्ति कुञ्ज रहने का कुछ तुक नहीं रहा। समय ही बतायेगा कि आगे भी कोई ऐसी ही विश्व विभीषिका तो उत्पन्न नहीं हो जाती है और उससे जूझने में ही तो नहीं जुटना पड़ता है।
साधना में किसी के शरीर को भूखा नहीं रखा जायेगा। जो मुझसे बन पड़ेगा अपने हाथों बनाकर खिलाया करूंगी। पर आत्मिक क्षुधा जागृत ही रखनी चाहिए। आत्म-कल्याण की उत्कृष्ट अभिलाषा न हो तो कुछ काम बनने वाला नहीं है। नचिकेता जैसी पेट की नहीं आत्मिक क्षुधा लेकर जो आयेंगे वे उपरोक्त साधना से तृप्त होकर जायेंगे।
साधना का उद्देश्य ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं आत्म शोधन है। जो आत्म शोधन कर सका उस पर ईश्वर अनायास ही अनुग्रह करेगा। उससे वञ्चित तो वे लोग रहते हैं जो अपनी निकृष्टता यथावत् बनाये रहना चाहते हैं और लोभ-मोह की पूर्ति के लिए अपने पुरुषार्थ को जगाने की अपेक्षा ईश्वर को फुसलाने का जाल बिछाते हैं। तपश्चर्या का अर्थ है- जीवन क्रम परिष्कार, पिछले दिनों किये गये दुष्कर्मों का प्रायश्चित। इस स्तर की प्रखर साधना कर सकना जिनसे बन पड़े उन्हें सच्चे अर्थों में सौभाग्यवान मानना चाहिए।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना तथा-कथित ब्राह्मणों की तुलना में कम नहीं वरन् अधिक ही फलप्रद बैठती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर शान्ति-कुञ्ज में संकल्पित 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरण 24 की संख्या में अखण्ड दीपक पर अखण्ड जप के रूप में सम्पन्न करने का जो निश्चय किया गया उसके लिए कन्याएं ही उपयुक्त माध्यम चुनी गईं। तदनुसार गत वर्ष से वह साधना चल पड़ी और बराबर निर्बाध गति से चल रही है, उससे उत्पन्न शक्ति अंश निरन्तर परिवार की भौतिक एवं आत्मिक सहायता के लिये वितरित किया जाता रहता है।
साधना का प्रयोजन जहाँ आत्म-शक्ति का विकास करना है वहाँ पापों का प्रायश्चित भी है। इसे अलग रख कर केवल पूजा उपासना भर से किसी बड़ी आत्मिक सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
साधना करनी है उन्हें तीन दिन उस मिट्टी की तरह बने रहना होगा जिस पर पानी बरसता रहता है और वह उसे पीकर गीली होती रहती है। एक दो दिन हरिद्वार ऋषिकेश आदि घूमने फिरने को मिलें और तीन दिन साधना रत रहना पड़े तो वे पाँच दिन पर्याप्त होंगे। बालक नचिकेता आचार्य यम के दरवाजे पर तीन दिन भूखा पड़ा रहा था और पंचाग्नि विद्यायें सीखकर आया था। इस साधना में किसी के शरीर को भूखा नहीं रखा जायेगा। जो मुझसे बन पड़ेगा अपने हाथों बनाकर खिलाया करूंगी।
साधना के क्षेत्र में प्रगति करने के लिये भी यह सहयोग नितान्त आवश्यक है। राम और लक्ष्मण का युग्म ही लंका विजय में समर्थ हुआ है। महाभारत की सफलता कृष्ण और अर्जुन के मिलन ने सम्भव की थी। छात्र कितना ही परिश्रम करे बिना शिक्षक के मौखिक या लिखित ज्ञान दान के बिना उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकने में समर्थ नहीं होता। कला, शिल्प, विज्ञान, चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण विषयों के विद्यार्थी मात्र मौखिक ही नहीं क्रियात्मक व्यावहारिक शिक्षा भी प्राप्त करते हैं।
साधना कर सकना जिनसे बन पड़े उन्हें सच्चे अर्थों में सौभाग्यवान मानना चाहिए।
साधना से आरम्भ होती है। तपश्चर्या का प्रयोजन मनोभूमि पर छाये हुए कुसंस्कारों का निराकरण है। एक बार समझ लेना चाहिए कि साधना ‘सर्फ’ पाउडर है और उपासना ‘टिनोपाल’ कपड़े को जर्क-वर्क धुला हुआ बनाना हो तो दोनों का उपयोग करना चाहिए। कपड़े को ‘सर्फ’ में धोकर मल रहित करना चाहिए और तदनन्तर ‘टिनापोल’ की नीली झलक देनी चाहिए। यह भूल नहीं करनी चाहिए कि धोने में बहुत झंझट समझ कर उसे उपेक्षित विस्मृत कर दिया जाय और मात्र टिनोपाल के छींटे लगाकर चमचमाते वस्त्र पहनने की आशा रखी जाय।
साधना न करे, धर्म-क्रिया न करे तो वह उसकी निरी मूर्खता है। आत्म-विकास और साधना के लिए तो हर पल उपयुक्त है। गृहस्थ के लिए भी साधना-पथ और आत्म-उज्ज्वलता के द्वार उसी तरह से खुले हैं, जिस तरह से साधु, साध्वियों के लिये। वह अपनी आत्मा को साधना पथ में लगाकर कर्मफल को भस्मीभूत कर दे। -आचार्य श्रीतुलसी
साधना का प्रयोजन ईश्वर का स्तवन उसकी खुशामद करना या पूजा की रिश्वत देकर फुसलाना नहीं वरन्- उन कुत्साओं और कुण्ठाओं की जञ्जीरों को काट डालना है जो जीव और ईश्वर के मिलने में एक मात्रा बाधा बनकर अड़ी खड़ी हैं।
साधना को धुलाई। दोनों अन्योन्याश्रित हैं। इनमें प्रधान और गौण का वर्गीकरण करना हो तो साधना को प्रधान और उपासना को गौण मानना पड़ेगा। धुला वस्त्र बिना रंगे भी अपनी गरिमा बनाये रह सकता है पर मैला वस्त्र रंग को बर्बाद करेगा और रंगरेज को बदनाम। स्वयं तो उपहासास्पद बना ही रहेगा।
साधना की कष्टकर प्रक्रिया से आरम्भ होता है। लम्बी दूर तक उस मार्ग पर चलने के बाद ही देव पुरुष आनन्द उल्लास प्राप्त करते हैं। ऐसी दशा में तात्कालिक लाभ को प्रधानता देने वाले-अदूरदर्शी लोग कुमार्गगामिता के सहारे तुरन्त लाभान्वित होने की रीति-नीति अपनाते हैं, पर उन्हें यह खुटका बना रहता है कि कभी न कभी इन कुकर्मों का कष्टकारक प्रतिफल भोगना पड़ेगा।
साधना 8-गायत्री की विशेष साधना 9-गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10-गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11-गायत्री की सिद्धियाँ 12-गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13-स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14-गायत्री और यज्ञोपवीत 15-गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना की गरिमा गगनचुम्बी है। विविध-विधि उपासनायें चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों की चर्चा काल्पनिक नहीं है, पर वह सारा आकर्षक विवरण, कथा सार आकाश कुसुम ही बना रहेगा जब तक साधना की पृष्ठ-भूमि को अनिवार्य मान कर न चला जाएगा।
साधना अभीष्ट है पर विवेकानन्द बनना सरल है। समुद्र बनना कठिन है पर उसका पानी लेकर आकाश में बादल की तरह उड़ने लगना सरल है। समर्थगुरु रामदास बनने के लिये जन्म की गति कठिन और तलवार की धार पर चलने जैसी साधना करने का साहस सामान्य व्यक्तियों के पास नहीं होता शिवाजी के रूप में एक नगण्य से व्यक्तित्व वाले बालक को विकसित हो जाना भी सरल है। पारसमणि बनना कठिन है पर लोहे पर उसे छूकर सोना बन जाना सरल है। चाणक्य जैसी अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व कर सकने वाली सत्ता बन सकना हर किसी का काम नहीं।
साधना में निरत रहेंगे। हर दिन एक सीमित समय ही संपर्क के लिए निर्धारित रहेगा। उतने में भी कई व्यक्ति मिलने होंगे। सम्भवतः हर व्यक्ति के हिस्से में अधिक से अधिक आधा घण्टा ही आवेगा। इतने से ही हर किसी को सन्तोष करना होगा।
साधना का मूलभूत उद्देश्य है। उसका स्वरूप है आत्म-बोध, आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण, आत्म-विकास। यही आत्म देव का सच्चा पंचोपचार पूजन है। जो उसे कर सकता है उसी की पूजा उपासना सफल होती है। निराकार निर्विकार परमेश्वर की साकार प्रतिमा उपासना को व्यावहारिक रूप देने के लिए बनाई जाती है।
साधना विषयक विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय-कोष, मनोमय, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्य-मार्ग का दिग्दर्शन। मू0 3)50
साधना का प्रथम चरण ही पूरा नहीं किया गया तो उपासना का दूसरा चरण कैसे उठेगा। जब पहली मंजिल ही बन कर तैयार नहीं हुई तो भवन की दूसरी मंजिल बनाने की योजना कैसे पूर्ण होगी।
साधना भी कह सकते हैं।
साधना से तृप्त होकर जायेंगे।
साधनायें-तपश्चर्याएं अनेक हैं। उन्हें कार्यान्वित एवं फलित करने की सम्भावना तभी रहेगी जब प्रारम्भिक उपासना क्रम ठीक से चलने जमने लगे। एक दम उछल कर चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण, समाधि, ईश्वर दर्शन जैसे प्रसंगों के लिए लालायित होना मञ्जिल पार करने का राजमार्ग है। यदि ऐसा न होता तो स्वयं गुरु देव को क्यों पैंतालीस वर्ष पापड़ बेलने पड़ते और अब इस वृद्धावस्था में भी क्यों अपने को इस तरह धुनते। कोई जादू ही तुर्त-फुर्त चमत्कार दिखा सकता है, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि वह जल्दबाजी का जादू अस्थिर होता है।
साधना का श्रेष्ठ किन्तु सरल रूप क्या हो सकता है इसकी चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। उस दिशा में एक-एक कदम हर किसी को उठाना चाहिये और ‘इन दोनों गति विधियों को अपने जीवन क्रम में अविच्छिन्न रूप से सम्मिलित कर लेना चाहिए।
साधना बन्दूक। अच्छी बन्दूक होने पर ही कारतूस का चमत्कार देखा जा सकता है। बन्दूक रहित अकेला कारतूस तो थोड़ी आवाज करके फट ही सकता है उससे सिंह व्याघ्र का शिकार नहीं किया जा सकता। अनैतिक गतिविधियाँ और अवाँछनीय विचारणायें यदि भरी रहें तो कोई साधक आत्मिक प्रगति का वास्तविक और चिरस्थायी लाभ न ले सकेगा। किसी प्रकार कुछ मिल भी जाय तो उससे जादूगरी जैसा चमत्कार दिखा कर थोड़े दिन यश लिप्सा पूरी की जा सकती है।
साधना ही है।
साधना संदर्भ का माध्यम रहेगा।
साधना, सामाजिक स्तर पर करने लगें तो देश का कितना बड़ा उपकार हो और उन उमंगों का भी सदुपयोग हो जो राजनीति में इधर-उधर धक्के खाती हुई भ्रमित एवं अस्त-व्यस्त होती रहती है। यदि लोक सेवा में निरत रहकर जनता की सच्ची श्रद्धा अर्जित कर ली जाय तो राजनेता बनने में भी कुछ कठिनाई नहीं रहती। पर यों ही उछल कूद के आधार पर यदि राजनेता बन भी जाया जाय तो उसमें स्थिरता कहाँ रहती है?
साधना तो क्या कहना चाहिए- दिव्य संपर्क में लगायेंगे। वहाँ से जो मिलेगा उसे वितरण करने के लिये इस केन्द्र पर आयेंगे। कोई श्रमिक परदेश में मजूरी करता है। महीने में जो कमाता है उसे डाकखाने में जाकर घर वालों के लिये मनीआर्डर कर देता है। शान्ति कुञ्ज गुरुदेव का डाकखाना है।
साधना से लोक मानस में अपने लिए गहरा सम्मान और स्थान बना लें। जो इसके लिए साहस कर सकते हैं, लोक श्रद्धा और यशस्विता उन्हीं के गले पड़ती है और वे ही सच्चे नेता कहलाने के अधिकारी बनते हैं।
साधना 4-गायत्री शक्ति का स्रोत-सविता देवता 5-गायत्री और उसकी प्राण-प्रक्रिया 6-गायत्री पंचमुखी और एकमुखी 7-गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना 8-गायत्री की विशेष साधना 9-गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10-गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11-गायत्री की सिद्धियाँ 12-गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13-स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14-गायत्री और यज्ञोपवीत 15-गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना क्रम को इसी स्तर का शोध कार्य समझा जाना चाहिए। समय, मन और शरीर की शक्तियों को उपरोक्त प्रयोजनों में लगाये रहने की दृष्टि से ही वे प्रिय परिजनों से पृथक रहने का साहस कर सके हैं। यों इस वियोग का कष्ट उन्हें भी कम नहीं है पर उत्तरदायित्व को देखते हुए परिजनों की तरह उन्हें भी मन मसोस कर अपने निर्धारित कर्त्तव्य में संलग्न रहने को विवश रहना पड़ता है।
साधना का आनन्द लेते हुए प्राचीन आश्रम व्यवस्था का पालन भी किया जा सकेगा और अपनी आकाँक्षा भी पूर्ण होगी। इस विचार को उनके मार्ग दर्शक का समर्थन भी मिला और उन्होंने यह स्थान चुन लिया।
साधना व्यक्तिगत आत्मिक प्रखरता उत्पन्न करने के लिए थी, इसलिए वह छः घण्टे क्रम से धीरे-धीरे 24 वर्ष तक उन्हीं के द्वारा चलती रही। पर मेरी अनुष्ठान शृंखला का उद्देश्य दूसरा था। विशाल युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की भौतिक एवं आत्मिक सहायताएं उपलब्ध करना, उसके लिए आवश्यक शक्ति और साधन जुटाना लक्ष्य था। उसमें बढ़े हुए खर्च को देखते हुए अधिक मात्रा में उत्पादन की आवश्यकता पड़ी इसलिए उस अनुष्ठान शृंखला को अखण्ड जप के रूप में परिणत करना पड़ा। इस प्रकार वह चौबीस वर्ष वाली साधना छह वर्ष में सम्पन्न करने की बात निश्चित हुई।
साधना में ही निरत थे पर अब तो उस क्रम का स्तर असंख्य गुना बढ़ गया है। अस्तु उनका एक-एक क्षण विश्व मानव की बहुमूल्य निधि है। उसमें भावावेश के कारण व्यतिरेक उत्पन्न करना समस्त संसार को उस लाभ से वंचित करना है जिस पर कि मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य की संभावनायें निर्भर हैं।
साधना, कन्या शिक्षण, शक्ति प्रत्यावर्तन तो मात्र पाँच वर्ष ही आगे और चलना है। उसके बाद शान्ति कुञ्ज को शक्ति केन्द्र के रूप में ही परिणत कर दिया जायगा। लगा कि गुरु देव इसी दिशा में सोच रहे हैं। कहना न होगा कि उनके संकल्प न तो अवास्तविक होते हैं और न अधूरे रहते हैं।
साधना क्षेत्र में मिल सकते हैं। सम्भव है अगले दिनों उन्हें अपने तप अंश का कुछ प्रत्यावर्तन जीवन्त आत्माओं में करना पड़े इस बीज बोने का ठीक परिणाम निकले। इसके लिये यह आवश्यक है भूमि जोतने और उसमें नमी रखने का प्रयास पहले से ही चलता रहा हो। जो भूमि न जोती गई है-न जिसमें खाद पानी की मात्रा है उसमें बहुमूल्य बीज या पौधे का आरोपण भी निरर्थक चला जायगा। इसलिए आवश्यक है कि इस दिशा में प्रगति की सच्चे मन से आकाँक्षा करने वाले अपने नित्य कर्म में उपासना की प्रक्रिया को सम्मिलित कर लें।
साधना का लाभ देंगे, उसी के साथ प्रायश्चित द्वारा आत्म शोधन की तप साधना का निर्धारण भी जुड़ा हुआ होगा।
साधना क्रम अभी भी गायत्री मन्त्र ही है क्योंकि इससे बढ़कर समर्थ माध्यम उन्हें दूसरा दीखता नहीं। फिर वे दूसरों को अपनी रुचि पर चलने में भी बाधक नहीं बनते और कहते हैं कि यदि भावना की मात्रा अभीष्ट मात्रा में जुड़ी रहे तो कोई भी विधि व्यवस्था मानसिक परिष्कार में सहायक हो सकती है।
साधना में नियोजित करना चाहिये। न्यूनतम समय एक घण्टा और न्यूनतम राशि - ही इस कार्य के लिए अनिवार्य मानी गई है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि 8 घण्टे सोने 8 घण्टे आजीविका उपार्जन और 4 घण्टा फुटकर कामों में खर्च करने के उपरान्त 4 घण्टा प्रतिदिन लोक मंगल के लिए लगाये जायें और महीने में एक एक दिन की आमदनी नव निर्माण के लिए लगाने के उदारता दिखाई जाय।
साधना रत रहना पड़े तो वे पाँच दिन पर्याप्त होंगे। बालक नचिकेता आचार्य यम के दरवाजे पर तीन दिन भूखा पड़ा रहा था और पंचाग्नि विद्यायें सीखकर आया था। इस साधना में किसी के शरीर को भूखा नहीं रखा जायेगा। जो मुझसे बन पड़ेगा अपने हाथों बनाकर खिलाया करूंगी। पर आत्मिक क्षुधा जागृत ही रखनी चाहिए।
साधना 9-गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10-गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11-गायत्री की सिद्धियाँ 12-गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13-स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14-गायत्री और यज्ञोपवीत 15-गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना विधि की गरिमा इन पंक्तियों में कम नहीं की जा रही है और न उनका महात्म्य मिथ्या बताया जा रहा है। कहा केवल यह जा रहा है कि आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में जीवन साधना को आधार भूत मानना चाहिए और उपासना को उसकी सुसज्जा। बाल्यकाल पूरा करने के बाद ही यौवन आता है और साधना की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होने से ही उपासना की द्वितीय कक्षा में प्रवेश मिलता है।
साधना करने का साहस सामान्य व्यक्तियों के पास नहीं होता शिवाजी के रूप में एक नगण्य से व्यक्तित्व वाले बालक को विकसित हो जाना भी सरल है। पारसमणि बनना कठिन है पर लोहे पर उसे छूकर सोना बन जाना सरल है। चाणक्य जैसी अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व कर सकने वाली सत्ता बन सकना हर किसी का काम नहीं। पर एक दासी पुत्र का दिग्विजयी सम्राट बनकर सफल होना सरल है। बुद्ध जैसी प्रतिभाएं कभी-कभी ही-ईश्वरीय इच्छानुसार अवतरित होती हैं पर उनकी छाया से अशोक, आनन्द, अंगुलिमाल, आवकाली आदि असंख्य व्यक्ति लघुता की परिधि लांघते हुए महत्ता का वरण कर सकते हैं।
साधना इस दृष्टि से अति उपयोगी सिद्ध होती है। प्रातःकाल उठते ही यह अनुभव करना कि अब से लेकर सोते समय तक के लिए ही आज का नया जन्म मिला है। इसके एक-एक क्षण का सदुपयोग करना है। इस आधार पर दिन भर की पूरी दिनचर्या निर्धारित कर ली जाय। समय जैसी बहुमूल्य सम्पदा का एक कण भी बर्बाद होने की उसमें गुंजाइश न रहे।
साधना प्रक्रिया के साथ एक और भी अति महत्वपूर्ण प्रकरण जुड़ा हुआ है। वह है- इस जीवन में जानबूझ कर हुए पापों का प्रायश्चित पूर्व जन्मों के संग्रहीत पाप जो प्रारब्ध बन चुके उन्हें सरलता पूर्वक भोगा जा सके ऐसा मार्ग निकाला जायेगा और इस जन्म में बन पड़े दुष्कृत्यों का प्रायश्चित द्वारा निराकरण किया जायेगा।
साधना’ है। साधना का प्रयोजन ईश्वर का स्तवन उसकी खुशामद करना या पूजा की रिश्वत देकर फुसलाना नहीं वरन्- उन कुत्साओं और कुण्ठाओं की जञ्जीरों को काट डालना है जो जीव और ईश्वर के मिलने में एक मात्रा बाधा बनकर अड़ी खड़ी हैं।
साधना का स्वरूप समय-समय पर निर्धारित करना पड़ता है। प्राचीन काल की साधना विधियाँ उस समय के मानव शरीरों की स्थिति के अनुरूप थीं परिवर्तन के साथ साधन क्रम भी बदलेंगे। यदि हेरफेर न किया जाय तो प्राचीन काल में सफल होने वाली साधनाएँ अब सर्वथा निरर्थक और निष्फल सिद्ध होती रहेंगी।
साधना ‘सर्फ’ पाउडर है और उपासना ‘टिनोपाल’ कपड़े को जर्क-वर्क धुला हुआ बनाना हो तो दोनों का उपयोग करना चाहिए। कपड़े को ‘सर्फ’ में धोकर मल रहित करना चाहिए और तदनन्तर ‘टिनापोल’ की नीली झलक देनी चाहिए। यह भूल नहीं करनी चाहिए कि धोने में बहुत झंझट समझ कर उसे उपेक्षित विस्मृत कर दिया जाय और मात्र टिनोपाल के छींटे लगाकर चमचमाते वस्त्र पहनने की आशा रखी जाय।
साधना के लिए निवास। साधना का स्वरूप होगा- एकान्त सेवन-एकाकी निवास-मौन-मस्तिष्क विचार रहित-शरीर क्रिया रहित। शल्य क्रिया के समय रोगी को निःचेष्ट रहना पड़ता है। उसे हिलने डुलने नहीं दिया जाता। यह प्रत्यावर्तन साधना क्रम भी लगभग उसी स्तर का होगा।
साधना छह वर्ष में सम्पन्न करने की बात निश्चित हुई। अखण्ड दीपक अपना 46 वर्ष पूर्व से ही जलता चला आ रहा है। उसे भी कम से कम हम लोग अपने जीवन काल में तो जलने ही देना चाहते हैं। देखने में यह बाहरी प्रकाश देने वाला लगता है पर हम लोगों ने कितना अन्तः प्रकाश इसके माध्यम से पाया है, यह लिखा या बताया नहीं जा सकता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-November
साधना के अतिरिक्त महत्वपूर्ण शिक्षा भी प्राप्त करती हैं। यह प्रक्रिया क्रमशः बढ़ती चली जायगी। तीन-तीन महीने गृहस्थ महिलाएं भी गृहस्थ संचालन की शिक्षा प्राप्त करेंगी। कन्याओं का विद्यालय और भी अधिक व्यवस्थित हो जायगा। जिनके ऊपर गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ हैं, जिन्हें लोभ और मोह के बन्धन पाश से मुक्ति मिल चुकी है ऐसी जीवन्त महिलाओं को अपना जीवन महिला जागरण के लिए समर्पित करने को कहा जा रहा है, आशा है ऐसी ज्योतिर्मयी आत्माएं यहाँ इकट्ठी होती चली जायेंगी और विश्व व्यापी महिला आन्दोलन की शाखा प्रशाखाओं का संचालन करेंगी।
साधना स्वर के माध्यम से करनी चाहिए।
साधना नहीं समझना चाहिए वरन् अन्तःकरण की शुद्धि से उसको ‘अन्योन्याश्रय’ मानना चाहिए।
साधना का प्रयोजन अपने भीतर की महानता को विकसित करना ही है। बाहर व्यापक क्षेत्र में भी देव शक्तियाँ विद्यमान हैं पर उनके लिए समष्टि विश्व की देखभाल का विस्तृत कार्य क्षेत्र नियत रहता है। व्यक्ति की भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया उत्पन्न करने- सफलता और वरदान देने का कार्य उनके वे अंश ही पूरा करते हैं जो बीज रूप में हर व्यक्ति के भीतर विद्यमान हैं। सूर्य का अंश आँख में मौजूद है। यदि आंखें सही हों तो ही विराट् सूर्य के प्रकाश से लाभ उठाया जा सकता है।
साधना के लिये पात्र का चयन करते हुए यह देख लेना चाहिए कि उस व्यक्तित्व में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता का कितना पुट है। आत्मा को आनन्द से विभोर रखने वाला और ऊंचा उठाने वाला प्रेम तत्व ऐसे ही वातावरण में पनपता और पल्लवित होता है।
साधना की नितान्त आवश्यकता है।
साधना करके ही वह शक्ति प्राप्त की थी कि अपनी गोदी में देवताओं को खिलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकी। पार्वती के तप का ही प्रभाव था कि उनकी गोदी में समस्त देवताओं में पूजा अग्रणी गणेश का परिपोषण हो सका। महान आत्माएं उत्कृष्ट वातावरण में ही जन्म लेती हैं। ऐसा भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक वातावरण किसी व्यक्तित्व में घुला हुआ हो इसके लिए तप साधना की नितान्त आवश्यकता है।
साधना में सम्मिलित होने वाली तपस्विनी कन्याओं को ऐसा ही सौभाग्य मिले तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए। युग नेतृत्व के लिए जीवन मुक्त आत्माओं के अवतरण के लिए इस प्रकार की पृष्ठभूमि बनाई जानी आवश्यक भी है। शान्ति-कुञ्ज का अखण्ड दीपक पर चलने वाला महा पुरश्चरण जहाँ युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की कितनी ही कठिनाईयों को हल करने की शक्ति उत्पन्न कर रहा है, वहाँ कन्याओं की शिक्षा के अतिरिक्त उनमें उत्कृष्ट स्तर की क्षमता भी उत्पन्न कर रहा है। इस प्रयोजन के पीछे भी असाधारण दूरदर्शिता पूर्ण उद्देश्य छिपा पड़ा है।
साधनाएं उठती हैं। उन्हें पूरा करने के लिये अखाद्य खाता है, अगम्य गमन (अनुचित काम सेवन) करता है। अनियमितता और अस्त-व्यस्तता बरतता है, दुष्ट संग करता है और मस्तिष्क में बुरे विचार भरे रहता है।
साधना मार्ग का प्रथम प्रयास है। मात्र वाणी का संयम करने से भी उसे वाक् रूप में परिणत नहीं किया जा सकता। मौन, सत्य, मधुर वचन, सप्रयोजन, सन्तुलित एवं स्वल्प सम्भाषण, जिह्वा साधना के आवश्यक बाह्योपचार हैं। अन्तः उपचार अन्तःकरण में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का समन्वय करना ही है। प्याज, मूली, शराब, हींग, आदि खाने पर मुख से वैसी ही गन्ध आती है।
साधना इसलिए भी कराई जा रही है कि अगले दिनों अवतरित होने वाली- महान आत्माओं का तेज वे अपने गर्भ में धारण कर सकें। अञ्जनी, कौशल्या, देवकी, यशोदा, कुन्ती, मदालसा, द्रौपदी आदि महान महिलाओं ने पूर्व जन्मों में तप साधना करके ही वह शक्ति प्राप्त की थी कि अपनी गोदी में देवताओं को खिलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकी। पार्वती के तप का ही प्रभाव था कि उनकी गोदी में समस्त देवताओं में पूजा अग्रणी गणेश का परिपोषण हो सका। महान आत्माएं उत्कृष्ट वातावरण में ही जन्म लेती हैं। ऐसा भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक वातावरण किसी व्यक्तित्व में घुला हुआ हो इसके लिए तप साधना की नितान्त आवश्यकता है।
साधना को मात्र शब्द साधना नहीं समझना चाहिए वरन् अन्तःकरण की शुद्धि से उसको ‘अन्योन्याश्रय’ मानना चाहिए।
साधना पद्धति का प्रयोजन अपने भीतर के देव अंशों को विकसित और परिपुष्टि बनाना है। कैलाश पर्वत पर सर्पों का यज्ञोपवीत धारण करके विराजमान शिव और क्षीर सागर में शेष नाग पर सोये हुए विष्णु का बीजाँश हमारे मस्तिष्क मध्य केन्द्र-ब्रह्मरंध्र में यथावत् विद्यमान है। इस स्थान को ‘सहस्रार’ कहते हैं। महाकाली-अग्नि जिह्वा चामुण्डा का बीजाँश जननेन्द्रिय गह्वर-’मूलाधार’ में विद्यमान है। इन दो शक्तियों के असम्बन्ध बने रहने पर केवल उनकी उपस्थिति का आभास मात्र ही होता है पर जब उन दोनों का संगम समागम हो जाता है तो अजस्र शक्ति की एक ऐसी धारा प्रवाहित हो उठती है जिसे अनुपम या अद्भुत ही कहा जा सकता है।
साधनाओं की सफलता के लिए तो सबसे प्रथम यही प्रयोग करना चाहिए। कपड़े को रंगने से पहले उसे धोना पड़ता है। ईश्वरीय रंग में आत्मा को रंगने से पूर्व प्रायश्चित्य रूपी भट्टी पर पहले उसके कषाय-कल्मषों को ही स्वच्छ किया जाना चाहिए।
साधना की ही पूँजी थी जिसके बल पर एक व्यक्ति के प्रयास से सर्वथा असम्भव दिखने वाला क्रिया विस्तार सम्भव हो सका। 15 वर्ष की आयु से लेकर 60 वर्ष की आयु तक 45 वर्षों में जो कार्य उनने किया है; उसकी अपेक्षा अगले 5 वर्षों में सौ गुना काम उनके माध्यम से सम्पन्न होना है। इसके लिए आत्मबल की जितनी पूँजी अपेक्षित है उसका अंश उनकी मार्गदर्शक सत्ता अनुदान में देगी और एक अंश उन्हें स्वयं अपनी तप साधना से पूरा करना पड़ेगा। उसके लिए उपयुक्त स्थान और वातावरण भी उनने चुन लिया है। वह सर्वथा अज्ञात और कष्ट साध्य होते हुए भी अभीष्ट प्रयोजन के लिए सर्वथा उपयुक्त है।
साधना सफल होती है।
साधना अन्तरंग क्षेत्र में ही करनी पड़ती है और उसकी सफलता जब मेघ मालाओं की तरह बरसती है तो अगणित दिव्य विभूतियाँ स्वयमेव प्रस्फुटित और पल्लवित होती हैं। अन्तरंग में कहाँ क्या है इसका वर्णन देखिए-
साधना के क्रम (4) मिशन का सूत्र संचालन तथा प्राण प्रत्यावर्तन अनुदान, (5) नारी जागरण के लिए शान्ति-कुञ्ज का समग्र निर्माण निर्धारण। इन्हें वे इस थोड़ी अवधि में पूरा कर सकेंगे इस बात पर उन्हें अविश्वास न होगा जो आत्मबल की गरिमा समझते हैं। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के पाँच आवरण जागृत होने पर पाँच स्वतन्त्र व्यक्तियों जितना काम कर सकते हैं। स्पष्टतः गुरुदेव ने इन पाँचों को समर्थ सक्रिय बनाकर पिछले दिनों आश्चर्यजनक कार्य किया है। उन्हें अधिक समर्थ बनाकर वे अधिक कार्य भी कर सकेंगे और उपरोक्त पाँच वर्षीय योजना को पूरा कर लेंगे इसमें किसी को सन्देह नहीं करना चाहिए।
साधना के आवश्यक बाह्योपचार हैं। अन्तः उपचार अन्तःकरण में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का समन्वय करना ही है। प्याज, मूली, शराब, हींग, आदि खाने पर मुख से वैसी ही गन्ध आती है। अन्तःकरण में असन्तुलन भरा हो तो जिह्वा की रोक-बाँध में चूक होती ही रहेगी। वस्तुस्थिति उभर कर जिह्वा के माध्यम से प्रकट होती ही रहेगी।
साधना का विधान अधिक महत्वपूर्ण माना है। यों देव मन्दिरों में तथा लोक-लोकान्तरों में भी देव शक्तियाँ संव्याप्त हैं, पर जितनी समीप और जितनी सजीव अपने अन्तरंग में हैं-उतनी अन्यत्र नहीं। जितनी सुविधापूर्वक उन्हें अपने भीतर पाया जा सकता है-उतनी सरलता और सफलता अन्यत्र नहीं मिल सकती। कुण्डलिनी विद्या की साधना अन्तरंग क्षेत्र में ही करनी पड़ती है और उसकी सफलता जब मेघ मालाओं की तरह बरसती है तो अगणित दिव्य विभूतियाँ स्वयमेव प्रस्फुटित और पल्लवित होती हैं। अन्तरंग में कहाँ क्या है इसका वर्णन देखिए-
साधना से पूरा करना पड़ेगा। उसके लिए उपयुक्त स्थान और वातावरण भी उनने चुन लिया है। वह सर्वथा अज्ञात और कष्ट साध्य होते हुए भी अभीष्ट प्रयोजन के लिए सर्वथा उपयुक्त है। वे समय-समय पर वहाँ आते-जाते रहने के क्रम अगले पाँच वर्षों तक जारी रखेंगे। कितना समय, कब, कहाँ लगेगा इसका विवरण अनिश्चित और अप्रकाशित ही रहेगा।
साधना बन जाते हैं। इसका प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है। यह विहार क्रम जिसे सात्विक मिला है उसका मन न कुमार्गगामी होगा न उच्छृंखल। वह उद्धत आचरण नहीं करता। जानता है मेरा अस्तित्व सेवा करना है।
साधना में समुचित तैयारी करते रहते हैं। तर्क और प्रमाण दोनों ही आधारों को इतनी मात्रा में संग्रह कर लिया है कि बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद को उसके आधार पर एक सीमा तक सन्तुष्ट किया जा सके।
साधना के बाद बचे हुए समय में वे शान्ति-कुञ्ज के अपने डाक बँगले में ठहरा करेंगे और उन्हीं दिनों प्रत्यावर्तन सत्र में थोड़े-थोड़े व्यक्तियों को बुलाया करेंगे। यह सत्र भी कब, कितने दिन चलेंगे उसका कुछ पूर्व निश्चय नहीं। समयानुसार ही सूचना देकर बुलाया जाया करेगा।
साधना को ‘जप’ कहते हैं।
साधना से शान्ति-कुञ्ज में यदा-कदा आकर युग निर्माण आन्दोलन का परोक्ष सूत्र संचालन-प्राण प्रत्यावर्तन के सघन अनुदान-नारी जागरण का अभिनव सूत्रपात, विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का भागीरथ प्रयास यह पाँचों ही कार्य उन्हें पाँच वर्ष तक चलाने हैं। उनकी निज की पञ्चवर्षीय योजना का यह निर्धारण विगत बसन्त पंचमी पर स्पष्ट रूप से हो चुका है और वे उसी दिन से मार्ग-दर्शक शक्ति के इशारे पर अपने कार्यक्रम में तत्पर हो गये हैं।
साधना करते हैं ।
साधना करनी चाहिए।
साधना की सफलता को पावस का आगमन कह सकते हैं। मनुष्य शरीर एक विशाल उर्वर भूखण्ड कहा जा सकता है। इसमें एक से एक बहुमूल्य बीज दबे पड़े हैं। वर्षा न होने तक उनका अस्तित्व छिपा पड़ा था पर जैसे ही पानी बरसा कि वे सभी प्रकट होकर अपनी शोभा सुषमा दिखाने लगते हैं। साधारणतया जिन विशेषताओं और विभूतियों का किसी को भान भी नहीं होता वे इस पावस में अनायास ही अंकुरित और पल्लवित होने लगते हैं।
साधना करली जाय तो यह काया ही समस्त तीर्थों का संगम बन सकती है और तीर्थ-यात्रा का जो माहात्म्य बताया है वह अनायास ही मिल सकता है। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना की तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम की उपमा दी है और पुण्य फल अनन्त बताया है।
साधना में इसे ‘शव आसन’ कहते हैं। बौद्ध सम्प्रदाय में यह क्रिया “अनापान स्रति” के नाम से प्रख्यात है।
साधना की थी उसी को यहाँ अखण्ड क्रम में छह वर्षों में पूरा कर दिया जायगा। इन दिनों इस प्रयोजन के लिए यहाँ 20 कन्याएं रहती हैं और तप साधना के अतिरिक्त महत्वपूर्ण शिक्षा भी प्राप्त करती हैं। यह प्रक्रिया क्रमशः बढ़ती चली जायगी। तीन-तीन महीने गृहस्थ महिलाएं भी गृहस्थ संचालन की शिक्षा प्राप्त करेंगी। कन्याओं का विद्यालय और भी अधिक व्यवस्थित हो जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-July
साधना भावात्मक आकाँक्षा भले ही पूरी करे उससे वैज्ञानिक लाभों का प्रयोजन पूरा न होगा।
साधना विज्ञानियों ने इस प्रकार किया है—
साधना इन शिथिल सम्बन्धों को पुनः प्रतिष्ठापित करने की सुनिश्चित पद्धति है। मन्त्र साधन उसका कर्म पक्ष है। यों आत्म ज्ञान भी कम महत्व का नहीं, उसकी भी अपनी गरिमा है। फिर भी वह पूर्ण नहीं। कोई व्यक्ति विद्वान, ज्ञानी, दार्शनिक, शास्त्रज्ञ, वेदान्ती होने भर से आत्मबल सम्पन्न नहीं हो सकता।
साधना माना जायगा। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अपूर्ण रह जायगी। ज्ञान कर्म के समन्वय से ही उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। ज्ञान के बिना कर्म और कर्म के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा।
साधना निश्चित रूप से याचना नहीं है। वह विशुद्ध रूप से आत्म-परिष्कार जीवन-शोधन और पात्रता के विकास की सुनियोजित प्रक्रिया है। तपश्चर्या की आग में हम अपने कलुष-कषायों को जलाते हैं कर्मफल की व्यवस्था सृष्टि का कठोर और अपरिवर्तनीय नियम है। उसे यदि ईश्वर बदलने लगे तो फिर उसे अपनी सारी क्रम व्यवस्था ही बदलनी पड़ेगी। सच्चा न्यायाधीश अपने बेटे को भी अपराध का दंड देकर न्याय की रक्षा करता है।
साधना से लक्ष्य प्राप्त होना तो दूर उलटा अनिष्ट उत्पन्न हो सकता है।
साधना इस प्रकार आत्मा के उभय पक्षी लिंगों का समन्वय सम्मिश्रण ही है। इसकी जब जागृति होती है तो रोम-रोम में अन्तः क्षेत्र के प्रत्येक प्रसुप्त केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द, उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस समन्वय केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द, उल्लास का प्रवाह बहने लगता है। इस समन्वय केन्द्र—काम बीज का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
साधना सम्भव ही न होगी। आहार-विहार के प्रतिबन्ध-व्रत, संयम का विधान व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए ही है। स्वच्छ दर्पण में ही मुँह साफ दीखता है, साफ कपड़े पर ही ठीक से रंग चढ़ता है। यदि जीवन क्रम दुष्ट और दुराचारी बना रहे तो फिर मन्त्र साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
साधना इस प्रयोजन को पूरा
कर सकेगी उसी से ईश्वर प्राप्ति का सरल प्रयोजन सुगमता पूर्वक पूरा हो
जायगा।
साधना का उद्देश्य किसी के सामने गिड़गिड़ाना - झोली पसारना या नाक रगड़ना नहीं है। दीनता न आत्मा को शोभनीय है न परमात्मा को प्रिय। परमात्मा न खुशामद का भूखा है और न है उसे प्रशंसा की आवश्यकता। उसकी महानता अपने आप में अपनी प्रशंसा है। मनुष्यों की वाणी न उसमें कुछ वृद्धि कर सकती है और न कमी।
साधना, योग प्रक्रिया का मात्र प्रयोजन इतना है कि नशे की
खुमारी और निद्रा की मूर्छना को हटा दिया जाय। जो साधना इस प्रयोजन को पूरा
कर सकेगी उसी से ईश्वर प्राप्ति का सरल प्रयोजन सुगमता पूर्वक पूरा हो
जायगा।
साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है और वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। शिवजी द्वारा तृतीय नेत्र तत्व विवेक द्वारा स्थूल काम सेवन को भस्म करना—उसके सूक्ष्म शरीर को अजर-अमर बनाना इसी तथ्य का आलंकारिक वर्णन है कि शारीरिक काम सेवन से विरत होने की और आत्म रति में संलग्न होने की प्रेरणा है। काम दहन के पश्चात् उसकी पत्नी रति की प्रार्थना पर शिवजी ने काम को अशरीरी रूप से जीवित रहने का वरदान दिया था और रति को विधवा नहीं होने दिया था उसे आत्म रति बना दिया था। वासनात्मक अग्नि का आह्य-डडडडडड अग्नि-कालाग्नि के रूप में परिणत होने का प्रयोजन भी यही है—
साधना अपनानी चाहिये।
साधना की दार्शनिक एवं व्यावहारिक रीति-नीति अपनानी चाहिये।
साधना की जाती है। इसी संदर्भ में शास्त्रों में साधना विज्ञान का जहाँ उल्लेख किया है वहाँ काम क्रीड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः यह आध्यात्मिक काम कला की ही चर्चा है। योनि-लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि शब्दों में उसी अन्तःशक्ति के जागरण की विधि-व्यवस्था सन्निहित है—
साधना के लिये करना ही चाहिये। होना तो इससे भी बढ़कर चाहिये पर बढ़े हुए काम इस स्तर के तो हों कि कुटुम्ब के एक सदस्य जितना समय, स्नेह और साधन तो उस पर लगता ही रहे। यह आग्रह यों हर सदस्य के लिये चिरकाल से किये जाते रहे हैं पर अब वह समय आ ही पहुँचा जिसमें अग्रगामी दल की उस रीति-नीति को अपनाने के लिये विवश किया जाय। गुरु देव को उसी प्रकार विवश किया गया और उनने बिना आगा-पीछा सोचे-बिना बहाने बाजी किये अपने मार्ग दर्शक के संकेतों पर चलना आरम्भ कर दिया। प्रत्यावर्तन की पृष्ठभूमि यही है।
साधना की सफलता चाहने वाले साधकों को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति को श्रद्धा सिक्त ही बनाना पड़ता है।
साधना का उद्देश्य इसी महान प्रयोजन की पूर्ति करना है। इसी को शिव शक्ति का संयोग एवं आत्मा से परमात्मा का मिलन कहते हैं। इस संयोग का वर्णन साधना क्षेत्र में इस प्रकार किया गया है।
साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए काय कष्ट सहा जाता है। युग साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। अस्तु उसकी परमार्थ परायण विशेषता न केवल साधक के लिए कल्याण कारी होती है वरन् समस्त विश्व की ही साधना करती है। इस विशेषता के कारण उसका स्तर भी ऊँचा होना चाहिए।
साधना की अपेक्षा कहीं अधिक उच्चस्तर का माना जा सकता है। प्रचलित योग साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए काय कष्ट सहा जाता है। युग साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। अस्तु उसकी परमार्थ परायण विशेषता न केवल साधक के लिए कल्याण कारी होती है वरन् समस्त विश्व की ही साधना करती है। इस विशेषता के कारण उसका स्तर भी ऊँचा होना चाहिए।
साधना करती है। इस विशेषता के कारण उसका स्तर भी ऊँचा होना चाहिए।
साधना करनी पड़ती है। इस तप साधना के वरदान स्वरूप ही उसे अन्न, धन से सुसम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी सारा मनोयोग समेट कर पाठ्य पुस्तकों में तन्मय हो जाता है। दस वर्ष तक उसी लक्ष्यवेध में एकाग्र रहता है, तब कहीं स्नातक बनने का सम्मान और उस आधार पर उच्च पद प्राप्त करता है। फल और फलों से लदा बगीचा देखने में माली लम्बी अवधि तक अपने प्रयास में जुटा रहता है।
साधना के ही उपयुक्त हो सकती है जिसमें लोक मंगल जुड़ा हुआ हो। युग निर्माण योजना की गतिविधियों को दूसरे शब्दों में आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण की संमिश्रित युग साधना कह सकते हैं इसे जिस भी कसौटी पर कसा जाय उच्च स्तरीय आत्म कल्याण की ऐसी साधना ही ठहरायी जायगी जिसमें विश्व कल्याण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
साधना भी यन्त्र साधना की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। यन्त्रों के सिद्धान्त, निर्माण, संचालन, सुधार में दक्षता प्रस्तुत करना ही यन्त्र विद्या का आधार है। यह प्रक्रिया ठीक रहे तो यन्त्रों की क्षमता से समुचित लाभ उठाया जा सकता है। पर यदि इन प्रकरणों में त्रुटि रहे तो मशीनें समय और धन की बर्बादी ही करती हैं। ठीक इसी प्रकार मन्त्र साधना के सभी प्रयोग, प्रकरण सही हों तो उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अधूरा और अस्त-व्यस्त साधना क्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
साधना करती है। प्रत्यावर्तन की पात्रता और पृष्ठभूमि यही है। चिन्तन और जीवन क्रम का स्वरूप जिस आधार पर बदला जा सके वही युग साधना हो सकती है। जिस कर्म-काण्ड में पूजा पत्री का तो लम्बा-चौड़ा समावेश हो पर आन्तरिक स्तर तनिक भी ऊँचा न उठे—आत्म परिष्कार और लोक-कल्याण के लिये उमंग न उठे उसे विडम्बना मात्र ही कहना चाहिये। ऐसे जाल जंजाल में ईश्वर को फँसाकर उसे पकड़ सकना किसी के लिये भी सम्भव न हो सकेगा।
साधना जिसकी पृष्ठभूमि पर गायत्री महापुरश्चरणों का बीजारोपण कल्पवृक्ष की तरह उगा और फला-फूला। वही राजमार्ग सबके लिए है। भौतिक स्वार्थपरता की सड़ी कीचड़ में आकण्ठ मग्न लोग सिर पर चन्दन और गले में रुद्राक्ष धारण करके यदि आत्मिक प्रकाश का स्वप्न देखते हों तो यह उनकी मृग तृष्णा मात्र ही सिद्ध होगी।
साधना अभी से विकसित करनी आरम्भ कर देनी चाहिये। अपने परिवार के सदस्यों में एक व्यक्ति युग-निर्माण अभियान को गिन लेना चाहिए घर में पाँच सदस्य हों तो छटा गुरु देव को उनके मिशन को जोड़ लेना चाहिये। अपने परिवार के एक सदस्य के लिये जितना समय, मनोयोग, स्नेह, चिन्तन, धन खर्च किया जाता है कम से कम उतना तो युग साधना के लिये करना ही चाहिये। होना तो इससे भी बढ़कर चाहिये पर बढ़े हुए काम इस स्तर के तो हों कि कुटुम्ब के एक सदस्य जितना समय, स्नेह और साधन तो उस पर लगता ही रहे। यह आग्रह यों हर सदस्य के लिये चिरकाल से किये जाते रहे हैं पर अब वह समय आ ही पहुँचा जिसमें अग्रगामी दल की उस रीति-नीति को अपनाने के लिये विवश किया जाय।
साधनाएं हेय ही ठहराई जायेंगी वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी साधना के ही उपयुक्त हो सकती है जिसमें लोक मंगल जुड़ा हुआ हो। युग निर्माण योजना की गतिविधियों को दूसरे शब्दों में आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण की संमिश्रित युग साधना कह सकते हैं इसे जिस भी कसौटी पर कसा जाय उच्च स्तरीय आत्म कल्याण की ऐसी साधना ही ठहरायी जायगी जिसमें विश्व कल्याण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
साधना का प्राण कह सकते हैं।
साधना में अपनी तत्परता बढ़ा देनी चाहिये ताकि समय पर वे अपनी बढ़ी हुई पात्रता के आधार पर अधिक महत्वपूर्ण अनुदान प्राप्त कर सकें। जिन्होंने अपने नाम नोट नहीं कराये हैं उन्हें भी मानव जीवन की सार्थकता जैसा कुछ लाभ प्राप्त करने के लिये इसी दिशा में अपने कदम बढ़ाने चाहियें। समझ में भले ही न आवे पर यह अनुपम और अभूतपूर्व अवसर है- जो यह समय ऐसे ही आलस उपेक्षा में निकाल देंगे पीछे पश्चाताप करते रहने के अतिरिक्त उनके हाथ और कुछ न लगेगा।
साधना हमारा दृष्टिकोण परिष्कृत कर देती है और अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है जिससे अपने स्वस्थ, लक्ष्य और कर्तव्य को समझ सकें। साधना वह शक्ति प्रदान करती है जिससे आत्मबल विकसित हो और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना साहस उपलब्ध कराती है जिसके आधार पर प्रलोभनों और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़ता पूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न-बाधा का कष्ट-कठिनाई का धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके।
साधना कह सकते हैं इसे जिस भी कसौटी पर कसा जाय उच्च स्तरीय आत्म कल्याण की ऐसी साधना ही ठहरायी जायगी जिसमें विश्व कल्याण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
साधना विज्ञान का जहाँ उल्लेख किया है वहाँ काम क्रीड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः यह आध्यात्मिक काम कला की ही चर्चा है। योनि-लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि शब्दों में उसी अन्तःशक्ति के जागरण की विधि-व्यवस्था सन्निहित है—
साधना के बिना तत्व दर्शन के बिना ज्ञान निर्जीव निष्प्राण रहेगा। तत्व दर्शन के बिना तपस्या और तप साधना के बिना तत्व दर्शन समग्र अध्यात्म का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकते।
साधना सर्वथा सुगम है उसमें कोई ऐसी कठिनाई नहीं
है जिसके लिए भारी दौड़-धूप करने और सरंजाम जुटाने की जरूरत पड़े।
तपश्चर्या, योगसाधना, योग प्रक्रिया का मात्र प्रयोजन इतना है कि नशे की
खुमारी और निद्रा की मूर्छना को हटा दिया जाय। जो साधना इस प्रयोजन को पूरा
कर सकेगी उसी से ईश्वर प्राप्ति का सरल प्रयोजन सुगमता पूर्वक पूरा हो
जायगा।
साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
साधना को कर सका- बहिर्मुखी
दृष्टि को अन्तर्मुखी बना सका- भीतर के आकर्षण प्रलोभन और बाहर के उपहास
प्रतिरोध का जो सामना कर सका- इस उत्कृष्टता पर आरुढ़ योद्धा की सर्वत्र
विजय है। जिसने अपने को जीत लिया समझना चाहिए उसने ईश्वर को जीत लिया यह
सरलतम है और कठिनतम भी।
साधना ईश्वर नहीं मिल सकता।
साधना का तो मूल आधार ही वह है। स्व संकेतों द्वारा - आत्म सम्मोहन की प्रक्रिया अपनाकर समाधि स्थिति उत्पन्न की जा सकती है। इस प्रयोग में भी लगभग वही स्थिति पैदा हो जाती है जो ‘हिम समाधि ‘ द्वारा उत्पन्न की जायगी। समाधि स्थिति में शरीर के जीवाणुओं को विश्राम मिल जाता है और अचेतन मन की निरन्तर काम करते रहने की थकान दूर होती है। जिस प्रकार रात को सो लेने पर सवेरे ताजा मस्तिष्क और स्फूर्तिवान शरीर नये उत्साह से काम करता है ठीक उसी प्रकार समाधि अवस्था में शारीरिक और मानसिक विश्राम की व्यवस्था बन जाती है और उससे जगने के बाद नया स्फूर्तिवान शरीर एवं मन लेकर एक प्रकार से नया जीवन ही आरंभ किया जाता है।
साधना एक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मबल बढ़ाया जाता है और देवपक्ष की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्मपरिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाभी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रक्त भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है।
साधना निरत रह कर विभूतियों के अधिकारी बनें। इस संदर्भ में मन्त्र साधना का आश्रय लेना एक प्रकार से अनिवार्य ही है।
साधना हो सकती है। जिस कर्म-काण्ड में पूजा पत्री का तो लम्बा-चौड़ा समावेश हो पर आन्तरिक स्तर तनिक भी ऊँचा न उठे—आत्म परिष्कार और लोक-कल्याण के लिये उमंग न उठे उसे विडम्बना मात्र ही कहना चाहिये। ऐसे जाल जंजाल में ईश्वर को फँसाकर उसे पकड़ सकना किसी के लिये भी सम्भव न हो सकेगा। गुरु देव इसी निष्कर्ष पर पहुँचे और अपनी अनुभूतियों का ही सार निष्कर्ष परिजनों को बताते रहे। प्रत्यावर्तन और कुछ नहीं उसी मार्ग पर दूसरों को चलाने की पुनरावृत्ति है जिस पर वे स्वयं चले हैं, जो इस दिशा में चलने जितना साहस कर सकें, उन्हें उतनी ही प्रगति एवं उपलब्धि की आशा करनी चाहिये।
साधना है। यदि आध्यात्मिक दृष्टि कोण से देखा जाय तो उसे विशुद्ध योग साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। और भी अधिक गंभीरता से देखा जाय तो उसे सामान्य उपासना साधना की अपेक्षा कहीं अधिक उच्चस्तर का माना जा सकता है। प्रचलित योग साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए काय कष्ट सहा जाता है। युग साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है।
साधना में सविकल्प और निर्विकल्प समाधि के नाम पर प्रतिपादित की गई है। जो कार्य वैज्ञानिक तापमान घटाकर यान्त्रिक पद्धति से करना चाहते हैं वह प्रयोजन समाधि अवस्था में बिना किसी झंझट के पूरा हो जाता है। संकल्प बल की सामर्थ्य संसार में अद्भुत है। मनोबल की तुलना यन्त्र बल नहीं कर सकता। विशेषतया अपने शरीर के सम्बंध में - अपने संकल्प के प्रभाव का आश्चर्य जनक परिणाम तो असंदिग्ध ही है।
साधना विज्ञान की क्रिया-पद्धति यही सिखाती है उस
अविज्ञात को कैसे जाना जाय और उस अनुपलब्ध को कैसे प्राप्त किया जाय जो
हमें दिव्य सम्पदाओं से सुसम्पन्न बना सकता है। बाहर भटकने की अपेक्षा यदि
हम अपने भीतर ही तलाश करें तो विभूतियों भरा ‘आपा’ हमें वह सब कुछ प्रदान
कर सकता है जिसकी हमें आवश्यकता है और उन सब समस्याओं को हल कर सकता है
जिनके कारण हम उद्विग्न हैं।
साधना ही ठहरायी जायगी जिसमें विश्व कल्याण भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
साधनात्मक कर्मकाण्ड अपनाने की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। विश्व चेतना के साथ व्यक्ति चेतना को जोड़ने का यही मार्ग है। मन्त्र साधन इसी राज मार्ग की तरह समझा जाना चाहिए।
साधना का यह लाभ भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
साधना यदि सच्ची हो तो उसके फलस्वरूप साधक को तुरन्त प्राप्त होते हैं।
साधना का स्वरूप क्या हो, इसकी एक झाँकी मई अंक में प्रस्तुत है उसमें उन्हीं आधारों की चर्चा है जिन्हें अपना कर गुरु देव इस स्थान तक पहुँचे। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे ध्यान पूर्वक पढ़ा और गम्भीरता पूर्वक अपनाया है। साधना क्षेत्र में जिन्हें उतरना है उन्हें युग साधना अपनानी चाहिये।
साधना वह शक्ति प्रदान करती है जिससे आत्मबल विकसित हो और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना साहस उपलब्ध कराती है जिसके आधार पर प्रलोभनों और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़ता पूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न-बाधा का कष्ट-कठिनाई का धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके।
साधना के सभी प्रयोग, प्रकरण सही हों तो उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अधूरा और अस्त-व्यस्त साधना क्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
साधना उपासना का उपार्जित पुण्य फल खर्च हो जाता था। प्रत्यावर्तन के लिए जिस उच्चकोटि की शक्ति की आवश्यकता पड़ती है उसे प्राप्त करने में उग्र तपश्चर्या करनी पड़ती है। वह उन दिनों सम्भव नहीं थी, फिर दाता और गृहीता का अन्तरंग मर्म स्थल जिस प्रकार एकाग्र होना चाहिए वह उन दिनों न गुरु देव के लिए सम्भव था न दूसरे साधकों के लिए। स्थान की अनुपयुक्तता जैसे कितने ही अभाव ऐसे थे जिनसे वह प्रयोजन उन दिनों पूरे नहीं हो सकते थे। अस्तु कभी उस तरह का प्रयास भी नहीं किया गया।
साधनात्मक विधि विज्ञान का अपना महत्व है पर यह तथ्य ध्यान रखने योग्य है कि श्रद्धा को आत्मिक उपलब्धियों का ‘प्राण’ ही माना जायेगा। प्राण रहित शरीर को कितना ही सँजोया सँभाला जाय उससे कुछ काम न बनेगा। भावना रहित मनोभूमि मरुस्थल के समान है जहाँ सफलता की हरी-भरी खेती लहलहाने का स्वप्न कदाचित ही सफल होता है। अस्तु साधना की सफलता चाहने वाले साधकों को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति को श्रद्धा सिक्त ही बनाना पड़ता है।
साधना की प्रतिक्रिया साधक को अपने पापों का प्रायश्चित्य करने का शौर्य प्रदान करती है और भविष्य में निर्मल जीवन जीने का साहस। यह सत्परिणाम हैं जो साधना यदि सच्ची हो तो उसके फलस्वरूप साधक को तुरन्त प्राप्त होते हैं।
साधना के बिना तत्व दर्शन समग्र अध्यात्म का प्रयोजन पूरा नहीं कर सकते।
साधना क्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
साधना का ही परिणाम था। भगवान को —देवताओं को—सिद्ध पुरुषों को न कोई प्रिय है—न अप्रिय। न उन्हें किसी के साथ पक्षपात होता है न द्वेष न वे प्रशंसा से प्रसन्न होते हैं न निन्दा से अप्रसन्न। उनका स्तर बहुत ऊँचा होता है। उनकी आँखें बहुत पैनी होती हैं।
साधना दो माध्यम हैं। आस्था के अंतर्गत नीति, धर्म, दर्शन, आत्म-ज्ञान, ब्रह्म एवं सूक्ष्म जगत का वर्णन विवेचन आता है। शास्त्रों में उसी का वर्णन है। आत्मबोध, लोक व्यवहार, चिन्तन परिष्कार को अध्यात्म ‘निष्ठा’ पक्ष में लिया जायगा। संयम, नियम, व्रत, तप, साधन प्रभृति क्रियाकलापों को साधना माना जायगा।
साधना के अनुसार पाश्चात्य देशों में रोग निवारण से लेकर अपरोक्षानुभूति तक के प्रयोग सफलता पूर्वक सम्पन्न किये जा रहे हैं। योग साधना का तो मूल आधार ही वह है। स्व संकेतों द्वारा - आत्म सम्मोहन की प्रक्रिया अपनाकर समाधि स्थिति उत्पन्न की जा सकती है। इस प्रयोग में भी लगभग वही स्थिति पैदा हो जाती है जो ‘हिम समाधि ‘ द्वारा उत्पन्न की जायगी। समाधि स्थिति में शरीर के जीवाणुओं को विश्राम मिल जाता है और अचेतन मन की निरन्तर काम करते रहने की थकान दूर होती है।
साधना असफल होती है। तपस्वी का विजय ध्वज इसी शिखर पर गढ़ा हुआ है कि वह
अज्ञानान्धकार में भटकने वाली भेड़ों का अन्धानुकरण छोड़कर स्वतन्त्र
चिन्तन और स्वतन्त्र कर्तृत्व अपनाने में समर्थ हुआ या नहीं। अपना रास्ता
आप बनाने की तपस्या- अपनी राह पर आप चलने की साधना को कर सका- बहिर्मुखी
दृष्टि को अन्तर्मुखी बना सका- भीतर के आकर्षण प्रलोभन और बाहर के उपहास
प्रतिरोध का जो सामना कर सका- इस उत्कृष्टता पर आरुढ़ योद्धा की सर्वत्र
विजय है। जिसने अपने को जीत लिया समझना चाहिए उसने ईश्वर को जीत लिया यह
सरलतम है और कठिनतम भी।
साधना क्षेत्र में जिन्हें उतरना है उन्हें युग साधना अपनानी चाहिये।
साधना में सन्निहित ‘काम कला’ में भारी अन्तर है। मानवीय अन्तराल में उभय लिंग विद्यमान हैं। हर व्यक्ति अपने आप में आधा नर और आधा नारी है। अर्धनारी नटेश्वर भगवान् शंकर को चित्रित किया गया है। कृष्ण और राधा का भी ऐसा ही एक समन्वित रूप चित्रों में दृष्टि गोचर होता है।
साधना का उद्देश्य है। नाली के प्रवाह में कोई रोड़ा आ जाय तो पानी इधर-उधर फैलेगा और नाली सूखी पड़ी रहेगी। यही बात हमारे जीवन प्रवाह में भी दृष्टिगोचर होती है। अन्न, जल पर जीवित रहने वाला शरीर तो अपना आहार प्राप्त करके गतिशील बना रहता है पर अन्तःचेतना की खुराक न मिलने से वह दिन-दिन दुर्बल एवं मरणासन्न होती चली जाती है। यही है हम सबकी आन्तरिक दयनीय दुर्दशा का कारण।
साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं, तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता। ईश्वर से भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है इतना अधिक कि उससे अपने को, अपने संसार को और अपने परमेश्वर को संतुष्ट किया जा सके।
साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। अस्तु उसकी परमार्थ परायण विशेषता न केवल साधक के लिए कल्याण कारी होती है वरन् समस्त विश्व की ही साधना करती है। इस विशेषता के कारण उसका स्तर भी ऊँचा होना चाहिए।
साधना की योगाग्नि में अपनी रक्त सम्पदा को प्रचण्ड विद्युत
शक्ति सम्पन्न बना लेते हैं और इस हाड़ माँस के शरीर से प्रचण्ड विद्युत
शक्ति संवाहक यन्त्र का प्रयोजन पूरा करते हैं। हमारे रक्त सागर में अपार
सम्पदाएं दबी पड़ी हैं। साधना विज्ञान की क्रिया-पद्धति यही सिखाती है उस
अविज्ञात को कैसे जाना जाय और उस अनुपलब्ध को कैसे प्राप्त किया जाय जो
हमें दिव्य सम्पदाओं से सुसम्पन्न बना सकता है। बाहर भटकने की अपेक्षा यदि
हम अपने भीतर ही तलाश करें तो विभूतियों भरा ‘आपा’ हमें वह सब कुछ प्रदान
कर सकता है जिसकी हमें आवश्यकता है और उन सब समस्याओं को हल कर सकता है
जिनके कारण हम उद्विग्न हैं।
साधना की तरह ही एक विशुद्ध विज्ञान है। यन्त्रों के सिद्धान्त, निर्माण, संचालन, सुधार में दक्षता प्रस्तुत करना ही यन्त्र विद्या का आधार है। यह प्रक्रिया ठीक रहे तो यन्त्रों की क्षमता से समुचित लाभ उठाया जा सकता है। पर यदि इन प्रकरणों में त्रुटि रहे तो मशीनें समय और धन की बर्बादी ही करती हैं। ठीक इसी प्रकार मन्त्र साधना के सभी प्रयोग, प्रकरण सही हों तो उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा अधूरा और अस्त-व्यस्त साधना क्रम अपनाने पर निराशा और उपहास का ही भाजन बनना पड़ता है।
साधना एवं तपश्चर्या ही कहा जा सकता है। और भी अधिक गंभीरता से देखा जाय तो उसे सामान्य उपासना साधना की अपेक्षा कहीं अधिक उच्चस्तर का माना जा सकता है। प्रचलित योग साधनाओं का लक्ष्य व्यक्ति विशेष की स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि जैसी सफलताएं प्राप्त करना रहता है और आत्म प्रयोजन के लिए काय कष्ट सहा जाता है। युग साधना में आपा भुलाया जाता है और विश्व कल्याण को लक्ष्य रखा जाता है। अस्तु उसकी परमार्थ परायण विशेषता न केवल साधक के लिए कल्याण कारी होती है वरन् समस्त विश्व की ही साधना करती है।
साधना साहस उपलब्ध कराती है जिसके आधार पर प्रलोभनों और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़ता पूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न-बाधा का कष्ट-कठिनाई का धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके।
साधना के वरदान स्वरूप ही उसे अन्न, धन से सुसम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी सारा मनोयोग समेट कर पाठ्य पुस्तकों में तन्मय हो जाता है। दस वर्ष तक उसी लक्ष्यवेध में एकाग्र रहता है, तब कहीं स्नातक बनने का सम्मान और उस आधार पर उच्च पद प्राप्त करता है। फल और फलों से लदा बगीचा देखने में माली लम्बी अवधि तक अपने प्रयास में जुटा रहता है। वरदान प्राप्त करने वाले सौभाग्यशाली लम्बी अवधि तक तप करते हैं।
साधना क्षेत्र में इस प्रकार किया गया है।
साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं, तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता। ईश्वर से भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है इतना अधिक कि उससे अपने को, अपने संसार को और अपने परमेश्वर को संतुष्ट किया जा सके।
साधना का प्रयोजन अपने अज्ञान और अविवेक का निराकरण करना है अपनी कामनाओं का परिशोधन और निराकरण करना है अपने कर्तृत्व में देवता का समावेश करना और कुत्साओं, कुण्ठाओं को जड़-मूल से उखाड़ फेंकना है। साधना एक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके अनुसार आत्मबल बढ़ाया जाता है और देवपक्ष की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्मपरिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाभी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रक्त भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है।
साधना मानसिक परिष्कार के लिए और आसन प्राणायाम का अभ्यास शारीरिक सुव्यवस्था के लिए है। यदि इन आरम्भिक चरणों को पूरा न किया जाय तो फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्च स्तरीय साधना सम्भव ही न होगी। आहार-विहार के प्रतिबन्ध-व्रत, संयम का विधान व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए ही है। स्वच्छ दर्पण में ही मुँह साफ दीखता है, साफ कपड़े पर ही ठीक से रंग चढ़ता है। यदि जीवन क्रम दुष्ट और दुराचारी बना रहे तो फिर मन्त्र साधना का कर्मकाण्ड कितना ही विधि विधान युक्त क्यों न हो उसका अभीष्ट परिणाम निकलेगा नहीं।
साधना ‘काम कला’ कही जाती है। इसी को कुण्डलिनी जागरण की भूमिका कह सकते हैं। शारीरिक काम सेवन—इसी आध्यात्मिक संयोग प्रयास की छाया है।
साधनाएं करते थे। पर आज की स्थिति सर्वथा भिन्न है। यह आपत्ति काल है। अनाचार और अज्ञान ने तूफान भूकम्प जैसी स्थिति पैदा कर रखी है। दुर्बुद्धि महामारी की तरह फैल पड़ी है; ऐसे विषम समय में व्यक्ति वादी साधनाएं हेय ही ठहराई जायेंगी वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी साधना के ही उपयुक्त हो सकती है जिसमें लोक मंगल जुड़ा हुआ हो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-January
साधनाओं के माध्यम से चेतन मस्तिष्क को शिथिल निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाने की सफलता प्राप्त की। यह सफलता की अनेक चमत्कारी सिद्धियों की जननी है। दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, विचार-प्रेरणा, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्ष आदि कितनी ही ऐसी विशेषतायें प्राप्त की जा सकती हैं जो साधारणतया मनुष्यों में होती नहीं।
साधनाओं के उपयुक्त नहीं रहा।
साधनायें हिमालय में अधिक सफल होती हैं। फिर भी उसमें शीत के द्वारा शरीर को जमा देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संकल्प बल और प्राण शक्ति की सहायता से भीतरी अवयवों को बन्द या मन्द कर दिया जाता है। फलतः श्वास-प्रश्वास रक्ताभिषरण, पाचन-क्रिया, मल विसर्जन आदि सारे आन्तरिक क्रिया-कलाप बन्द हो जाते हैं। मस्तिष्क की बौद्धिक क्षमता अचेतन केन्द्र में लय हो जाती है।
साधना का अवलम्बन करना ही समन्वयात्मक प्रवृत्ति के साधकों के लिए उपयुक्त हैं।
साधना मानी जायेगी। हमारा ध्यान इस दिशा में जितना अधिक और जितनी जल्दी जा सके उतना ही उत्तम है।
साधना का उद्देश्य मानसिक चेतनाओं का जागरण और कुण्डलिनी साधना का प्रयोजन पदार्थगत सक्रियताओं का अभिवर्धन है। दोनों एक दूसरे की पूरक है। समर्थ शरीर और समर्थ मस्तिष्क परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें गाड़ी के दो पहिये कहना चाहिये। एक के बिना दूसरा निरर्थक रहता है।
साधना की सिद्धि इसी केन्द्र में तीव्रगति से होती है। यह तथ्य कैलाश पहाड़ पर लागू नहीं हो सकते।
साधना के द्वारा हम वह अतिरिक्त शक्ति जागृत और उपार्जित करते हैं जिससे सामान्यतया सर्वसाधारण को वंचित ही रहना पड़ता है। संक्षेप में गायत्री साधना का उद्देश्य मानसिक चेतनाओं का जागरण और कुण्डलिनी साधना का प्रयोजन पदार्थगत सक्रियताओं का अभिवर्धन है। दोनों एक दूसरे की पूरक है। समर्थ शरीर और समर्थ मस्तिष्क परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें गाड़ी के दो पहिये कहना चाहिये।
साधना में एकाग्रता के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। मन में उठने वाले विभिन्न संकल्पों को रोककर उसे एक केन्द्र पर स्थिर रहने के लिए साधना सिखानी पड़ती है। बहुमुखी चिन्तन की अपेक्षा एक सीमित परिधि में चिन्तन है तो अस्त-व्यस्तता में बिखरती रहने वाली चेतना केन्द्रित होने लगती है। छोटे से आतिशी शीशे पर पड़ने वाली सूर्य किरणें जब एक बिन्दु पर एकत्रित करली जाती हैं तो वहाँ आग जला सकने वाला ताप उत्पन्न हो जाता है। विचारों का एकत्रीकरण भी ऐसी ही मानसिक क्षमता उत्पन्न करता है।
साधनाओं के लिये जहाँ साधक का मनोबल आवश्यक होता है वहाँ उसकी शारीरिक क्षमताओं का भी प्रौढ़ एवं परिपुष्ट होना भी आवश्यक है आग के पास ठण्डे जल के अन्दर, तेज हवा के प्रवाह में अथवा जमीन के अन्दर गढ़कर शरीर एक निश्चित बर्दास्त की सीमा तक ही स्थिर रह सकता है फिर यदि शक्तियाँ शरीर के अन्दर जागृत हो रही हों-और उन्हें सीखने के लिये शरीर के सूक्ष्म कोश तैयार न हों तो वह महत्वपूर्ण शक्तियाँ अपने लिये ही घातक बन जाती हैं इसीलिये रोगी शरीर के लिये योग साधनायें निषिद्ध हैं। साधना के क्रम में यही अड़चन श्री रम्पा के सम्मुख भी आई। उनके साधना गुरु ने स्पष्ट कह दिया कि अब आपका शरीर उच्च स्तरीय योग साधनाओं के उपयुक्त नहीं रहा।
साधनाओं के द्वारा, सचेतन बुद्धि संस्थान की चिन्तन और संकल्प क्षमता को शिथिल करके वहाँ लगे हुए तेजस् को जब अचेतन के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसकी वे दिव्यताएं जो अद्भुत और अनुपम हैं सजग और सक्षम होना शुरू कर देती हैं। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त करता चलता है उसे उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है।
साधना सदा हिमालय में होती रही है। प्राचीन काल में सप्त ऋषियों की तथा अन्यान्य तपस्वियों की तपश्चर्यायें वहीं होती थी। योगेश्वर शिव का स्थान हिमाच्छादित कैलाश है। देवताओं का निवास सुमेरु पर्वत पर बताया गया है यह सुमेरु गंगोत्री, गोमुखी से 200 मील आगे है। देव उद्यान-नन्दन वन-गंगा के उद्गम गौमुख से थोड़ा ही आगे है।
साधना, उपासना की जाती है।
साधना के पथ में सहस्रार निर्दिष्ट चक्र एवं आद्यशक्ति के ऊर्ध्व या उच्चस्तर में गौरी या ज्ञान-शक्ति, संहार या लय तत्व है। यहीं वेदमाता गायत्री का स्वरूप तथा स्थान रहस्य है।”
साधना से योगी चित्त को स्थिर कर आत्मभाव में लीन हो जाता है। भवबन्धन से छूट जाता है। समग्र शक्तियों से सम्पन्न होता है। स्वच्छन्द विचरता है और उसकी वाणी विमल हो जाती ॥46॥
साधनात्मक प्रक्रिया का संबंध है इस क्षेत्र में भक्त को बड़ा और भगवान को छोटा माना जायगा क्योंकि अक्सर भक्त के संकेतों पर भगवान को चलते देखा गया है।
साधना गुरु ने स्पष्ट कह दिया कि अब आपका शरीर उच्च स्तरीय योग साधनाओं के उपयुक्त नहीं रहा।
साधनाओं का उल्लेख करते हुये लिखा है कि यदि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में केवल सत्य बोलने का प्रण कर ले, गुरु में इतनी निष्ठा जम जाये कि वह अपना शरीर माँगे तो वह भी देते हुये हिचक न आये तो ऐसे व्यक्तियों की कुण्डलिनी शक्ति का अनायास जागरण हो जाता है। शक्ति संस्थान के जागरण के इन कारणों में अत्यधिक यातना से पीड़ित होना भी शामिल है सम्भवतः अध्यात्मवादी इसी कारण केवल दुःख की कामना करते हैं क्योंकि उससे आत्मा को ब्रह्म से जोड़ने वाली शक्ति रेखा का आचरण सम्भव हो जाता है। इस युवक के साथ प्रत्यक्षतः कुछ ऐसा ही हुआ। उसकी सुषुम्ना नाड़ी प्रायः दिनभर चलती रहती जिससे उसमें आध्यात्मिक विचारों की एक न टूटने वाली धारा बहने लगी। और इसी सतत् आध्यात्मिकता ने उसमें कठिन योग साधनाओं का साहस पैदा कर दिया।
साधना भक्ति और मुक्ति दोनों प्रयोजनों को पूरा करती है। इसीलिए साधना विज्ञान के तत्ववेत्ता एकाँगी सांत्वना की अपूर्णता को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन करते रहे हैं। वही यहाँ भी किया जा रहा है।
साधना के उपयुक्त व्यक्तित्व तैयार हो गया और उसका अभीष्ट परिणाम निश्चित रूप से होकर रहेगा।
साधना सिखानी पड़ती है। बहुमुखी चिन्तन की अपेक्षा एक सीमित परिधि में चिन्तन है तो अस्त-व्यस्तता में बिखरती रहने वाली चेतना केन्द्रित होने लगती है। छोटे से आतिशी शीशे पर पड़ने वाली सूर्य किरणें जब एक बिन्दु पर एकत्रित करली जाती हैं तो वहाँ आग जला सकने वाला ताप उत्पन्न हो जाता है। विचारों का एकत्रीकरण भी ऐसी ही मानसिक क्षमता उत्पन्न करता है। एकाग्रता एक अद्भुत मानसिक समर्थता है।
साधनायें प्रारम्भ की तभी से उसके संबंध में की गई भविष्यवाणियाँ सच होने लगीं। यह युवक और कोई नहीं सुप्रसिद्ध योगी और अतीन्द्रिय दृष्टा श्री टू जडे लोबसाँग रम्पा हैं जो इन दिनों मान्ट्रियल में निवास करते हैं और जहाँ उनके अनुयायियों की संख्या हजारों तक है।
साधना की उपयोगिता बताई, सिखाई जाने लगे तो इसे विरोधाभास की दृष्टि से नहीं वरन् पूरक प्रक्रिया का समारम्भ ही समझना चाहिए।
साधना के उपयुक्त व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। उसे बढ़िया बन्दूक कह सकते हैं। शब्द शास्त्र के अनुरूप तत्व ज्ञानियों द्वारा सृजन किया हुआ अनुभूत मन्त्र बढ़िया कारतूस है। इसे यदि मन्त्र साधक विश्वास और तत्परता के साथ प्रयोग कर सके तो असफलता का कोई कारण नहीं। मन्त्र शक्ति-यन्त्र शक्ति की तरह ही सुनिश्चित विज्ञान के आधार पर विनिर्मित है उसका ठीक तरह प्रयोग किया जा सके तो असफलता का कोई कारण नहीं है।
साधनाओं में निमग्न रहते हैं। उपयोगिता दोनों की है। महत्ता किसी की भी कम नहीं (पर उनका एकाँगीपन उचित नहीं) दोनों का जोड़ा और मिलाया जाना चाहिए। यह शिव पार्वती विवाह की गणेश जैसा भावनात्मक वरदान और कार्तिकेय जैसे पदार्थात्मक अनुदानों की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है।
साधना करने से वह अन्तर्ज्योति विकसित
साधना की दृष्टि से यह विशुद्ध-चक्र है और महाशक्ति के मध्य स्तर में, पीनोन्नत पयोधर में, वैष्णवी या क्रिया-शक्ति पालन या सृष्टि तत्व है। ‘स्वःकार’ सुरलोक या स्वर्ग तत्व। साधना के पथ में सहस्रार निर्दिष्ट चक्र एवं आद्यशक्ति के ऊर्ध्व या उच्चस्तर में गौरी या ज्ञान-शक्ति, संहार या लय तत्व है। यहीं वेदमाता गायत्री का स्वरूप तथा स्थान रहस्य है।”
साधना के यही दो मर्म स्थल हैं। इन्हें ही कायपिण्ड के दो ध्रुव कहते हैं। यों विद्युत-शक्ति एक ही है पर उसे दो भागों में विभाजित किया गया है एक धन (पाजेटिव) दूसरे ऋण (नेगेटिव) मानवीय चेतना की धन विद्युत ज्ञान केन्द्र मस्तिष्क के मध्य में केन्द्रित है-इस स्थल को अध्यात्म की भाषा में ‘सहस्रार’ कहते हैं। दूसरी ऋण विद्युतकाय केन्द्र जननेन्द्रिय मूल में है - जिसे ‘मूलाधार’ कहते हैं। इन दो केन्द्रों में से ज्ञान केन्द्र को गायत्री का और काम केन्द्र को कुण्डलिनी का उद्गम केन्द्र कहा गया है।
साधना हमें दृष्टि की प्रखरता और व्यापकता का अनुपम उपहार दे सकती है। यह उपहार न केवल वर्तमान का ही परिचय प्राप्त करने में समर्थ है वरन् चिर अतीत में जो घटित हो चुका और निकट भविष्य में जो होने जा रहा है उसका पूर्वाभास भी जाना जा सकता है।
साधना समाधि तक के अगणित प्रयोग किये जाते रहते हैं। इस व्यावहारिक क्षेत्र को गायत्री उपासना-परा प्रकृति की साधना ही कहना चाहिए।
साधना द्वारा कोई चाहे तो इस नेत्र को विकसित कर सकता है और चर्म चक्षुओं की परिधि से बहुत आगे की परिस्थितियों एवं घटनाओं को भली प्रकार देख सकने में समर्थ हो सकता है।
साधनाओं में विरोधाभास नहीं माना जाना चाहिए और प्रकारान्तर में यही समझना चाहिए कि साधना-क्रम में दोनों का समन्वय होने से भौतिक और आत्मिक दोनों ही सफलताओं का पथ प्रशस्त होता है। यह समन्वयात्मक साधना भक्ति और मुक्ति दोनों प्रयोजनों को पूरा करती है। इसीलिए साधना विज्ञान के तत्ववेत्ता एकाँगी सांत्वना की अपूर्णता को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन करते रहे हैं। वही यहाँ भी किया जा रहा है।
साधनायें क्यों न की जायें किन्तु पुत्तूलाल पासी ठहरा अनपढ़-अशिक्षित ग्रामीण उसमें इतना विवेक कहाँ से आये जबकि आज के इतने बुद्धिमान लोग ही शरीर की क्रियाओं आवश्यकताओं से भिन्न अतिवाहिक क्रियाओं, आवश्यकताओं की स्पष्ट अनुभूति करते हैं फिर भी न तो आत्म-सत्ता को मानते ही हैं न उसे प्राप्त करने का प्रयत्न ही करते हैं जो जानते और मानते भी हैं वह आत्म-विश्वास और आत्म-निर्माण के झूठे और परम्परावादी कोरे कर्म-काण्ड से हटकर योग साधनाओं की वैज्ञानिक प्रक्रियायें अपनाने का साहस भी तो नहीं कर पाते तब फिर पुत्तूलाल को ही दोष क्यों दिया जाये। वह हमेशा बच्चे की पुरानी स्मृतियों को टालता ही रहा।
साधनाओं की वैज्ञानिक प्रक्रियायें अपनाने का साहस भी तो नहीं कर पाते तब फिर पुत्तूलाल को ही दोष क्यों दिया जाये। वह हमेशा बच्चे की पुरानी स्मृतियों को टालता ही रहा।
साधना की उपयोगिता मानते रहे हैं और उसी का प्रयोग अपने लिए करते हुए दूसरों का मार्गदर्शन करते रहे हैं। वैदिक योग साधना के साथ-साथ तान्त्रिक प्रयोगों को भी महत्व दिया है। गायत्री साधना को प्रमुखता देते हुए भी कुण्डलिनी जागरण की उपयोगिता को माना है। यही कारण है कि प्रथम पाठ पढ़ाने के बाद अब दूसरे पाठ की भी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। इसे प्रकारान्तर न समझा जाय - इसमें विरोधाभास न ढूँढ़ा जाय।
साधना का मूल सिद्धान्त ‘चित्त वृत्तियों का निरोध’ है। इसका तात्पर्य है मस्तिष्कीय अतिशय सक्रियता को नियन्त्रित करके चेतनात्मक शक्ति के अपव्यय को बचा लेना और उस बचे हुए प्राण-प्रवाह को अचेतन के विकसित करने में नियोजित कर देना। निःसंदेह यह एक पूर्ण विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है। इसके लाभ अलौकिक उपलब्धियों के रूप में देखे जा सकते हैं। समाधि स्थिति तक पहुँचा हुआ व्यक्ति त्रिकालदर्शी और विश्व की जड़−चेतन सत्ता को प्रभावित कर सकने में समर्थ बन जाय तो इसमें कुछ भी अचम्भे की बात नहीं है।
साधना क्षेत्र में भी यह उभयपक्षी क्रिया-कलाप अनादि काल से चला आ रहा है।
साधना तक सीमित रह जाते हैं और हठयोगी, कर्मकाण्डी-तप साधनाओं में निमग्न रहते हैं। उपयोगिता दोनों की है। महत्ता किसी की भी कम नहीं (पर उनका एकाँगीपन उचित नहीं) दोनों का जोड़ा और मिलाया जाना चाहिए। यह शिव पार्वती विवाह की गणेश जैसा भावनात्मक वरदान और कार्तिकेय जैसे पदार्थात्मक अनुदानों की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है।
साधना’ है। साधना के द्वारा हम वह अतिरिक्त शक्ति जागृत और उपार्जित करते हैं जिससे सामान्यतया सर्वसाधारण को वंचित ही रहना पड़ता है। संक्षेप में गायत्री साधना का उद्देश्य मानसिक चेतनाओं का जागरण और कुण्डलिनी साधना का प्रयोजन पदार्थगत सक्रियताओं का अभिवर्धन है। दोनों एक दूसरे की पूरक है। समर्थ शरीर और समर्थ मस्तिष्क परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं।
साधना को प्रमुखता देते हुए भी कुण्डलिनी जागरण की उपयोगिता को माना है। यही कारण है कि प्रथम पाठ पढ़ाने के बाद अब दूसरे पाठ की भी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। इसे प्रकारान्तर न समझा जाय - इसमें विरोधाभास न ढूँढ़ा जाय। यह इकलौती सन्तान के बड़े होने पर उसका जोड़ा मिलाने-विवाह करने का प्रयत्न मात्र है। यों गायत्री के देवता सविता को विष्णु या शिव मानते हैं और उनकी पत्नी अग्नि-लक्ष्मी काली को कुण्डलिनी का प्रतीक माना गया है इस प्रकार यह सुगम युग्म - एक प्रकार से नर नारी का - शिव पार्वती का विवाह ही हुआ।
साधना के मार्ग में वह मूलाधार चक्र है। फिर जगन्माता के निम्नतर ब्राह्मी या इच्छाशक्ति-महायोनि-पीठ में सृष्टि-तत्व है। ‘भुवः’ भुवर्लोक या अन्तरिक्ष-तत्व। साधना की दृष्टि से यह विशुद्ध-चक्र है और महाशक्ति के मध्य स्तर में, पीनोन्नत पयोधर में, वैष्णवी या क्रिया-शक्ति पालन या सृष्टि तत्व है। ‘स्वःकार’ सुरलोक या स्वर्ग तत्व।
साधना द्वारा प्रत्यक्ष किया जाता रहा है। अब भी उनके प्रत्यक्ष और प्रमाणित किये जाने की पूरी गुंजाइश है।
साधना में निरत होना चाहिए। आदर्शों के अभिवर्धन में ही प्रेम की सार्थकता है। ऐसी मैत्री तो प्रेम तत्व को कलंकित ही कर सकती है जो पतन के गर्त से प्रेमी को न निकाल सके और न स्वयं ही उससे निकल सके। सघन मित्रता एवं सद्भाव रखते हुए प्रेमी की अवाँछनीयता को स्वीकार करने और उसमें सहयोग देने से इनकार किया जा सकता है और यदि इतने भर से मित्रता टूटती हो तो उस कच्चे आधार पर टिकी हुई मानकर टूटने का खतरा भी उठाया जा सकता है। आदर्श तो प्रेम का प्राण है यदि आदर्श ही चला गया तो प्रेम की सड़ी हुई लाश को छाती से बाँधे फिरने से क्या लाभ?
साधना इसी प्रयोजन को पूरा करती है। वह विद्या विलास या बौद्धिक विकास पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती। मानसिक उत्कर्ष, विद्याध्ययन, कला-कौशल और व्यवस्थापक शिक्षा की उसमें पूरी छूट है। प्रतिबन्ध केवल इस बात का है कि मनः क्षेत्र को उत्तेजित, विक्षुब्ध एवं अशान्त न होने दिया जाय। गीता, योगवशिष्ठ तथा दूसरे अध्यात्म ग्रन्थों में शम, दम, तितीक्षा आदि का उपदेश दिया है।
साधनाओं, सिद्धि चमत्कारों का गढ़ माना जाता है। तिब्बत के ज्योतिषी और योगी विश्व विख्यात हैं। यह युवक जब बच्चा ही था अनेक ज्योतिषियों ने उसके बारे में घोषणा की कि वह लामा-अवतार है, एक दिन प्रसिद्ध योगी बनेगा और पश्चिम में जाकर वहाँ की छिन्न-भिन्न धार्मिक आस्थाओं को नया जीवन देगा और उन्हें पूर्वीय दर्शन की ओर मोड़ने में समर्थ होगा। तिब्बत लौटने पर जब उसने शक्ति जागरण की कठिन साधनायें प्रारम्भ की तभी से उसके संबंध में की गई भविष्यवाणियाँ सच होने लगीं। यह युवक और कोई नहीं सुप्रसिद्ध योगी और अतीन्द्रिय दृष्टा श्री टू जडे लोबसाँग रम्पा हैं जो इन दिनों मान्ट्रियल में निवास करते हैं और जहाँ उनके अनुयायियों की संख्या हजारों तक है।
साधना भी यदि उसमें जुड़ी रहे तो फिर उसे सोना और सुगन्ध की उपमा दी जा सकेगी।
साधना का प्रयोजन पदार्थगत सक्रियताओं का अभिवर्धन है। दोनों एक दूसरे की पूरक है। समर्थ शरीर और समर्थ मस्तिष्क परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें गाड़ी के दो पहिये कहना चाहिये। एक के बिना दूसरा निरर्थक रहता है।
साधना क्षेत्र में इन दिनों यही भूल होती रही है। ज्ञान मार्गी - राजयोगी - भक्ति परक साधना तक सीमित रह जाते हैं और हठयोगी, कर्मकाण्डी-तप साधनाओं में निमग्न रहते हैं। उपयोगिता दोनों की है। महत्ता किसी की भी कम नहीं (पर उनका एकाँगीपन उचित नहीं) दोनों का जोड़ा और मिलाया जाना चाहिए। यह शिव पार्वती विवाह की गणेश जैसा भावनात्मक वरदान और कार्तिकेय जैसे पदार्थात्मक अनुदानों की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है।
साधना-क्रम में दोनों का समन्वय होने से भौतिक और आत्मिक दोनों ही सफलताओं का पथ प्रशस्त होता है। यह समन्वयात्मक साधना भक्ति और मुक्ति दोनों प्रयोजनों को पूरा करती है। इसीलिए साधना विज्ञान के तत्ववेत्ता एकाँगी सांत्वना की अपूर्णता को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन करते रहे हैं। वही यहाँ भी किया जा रहा है।
साधना के क्रम में यही अड़चन श्री रम्पा के सम्मुख भी आई। उनके साधना गुरु ने स्पष्ट कह दिया कि अब आपका शरीर उच्च स्तरीय योग साधनाओं के उपयुक्त नहीं रहा।
साधना के साथ-साथ तान्त्रिक प्रयोगों को भी महत्व दिया है। गायत्री साधना को प्रमुखता देते हुए भी कुण्डलिनी जागरण की उपयोगिता को माना है। यही कारण है कि प्रथम पाठ पढ़ाने के बाद अब दूसरे पाठ की भी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। इसे प्रकारान्तर न समझा जाय - इसमें विरोधाभास न ढूँढ़ा जाय। यह इकलौती सन्तान के बड़े होने पर उसका जोड़ा मिलाने-विवाह करने का प्रयत्न मात्र है।
साधनाओं का साहस पैदा कर दिया।
साधना का शिक्षण प्रारम्भ कराने के उपरान्त यदि कुण्डलिनी साधना की उपयोगिता बताई, सिखाई जाने लगे तो इसे विरोधाभास की दृष्टि से नहीं वरन् पूरक प्रक्रिया का समारम्भ ही समझना चाहिए।
साधना का जितना महत्व है उतना एकाँगी का-असम्बद्ध का नहीं। प्रायः साधना क्षेत्र में इन दिनों यही भूल होती रही है। ज्ञान मार्गी - राजयोगी - भक्ति परक साधना तक सीमित रह जाते हैं और हठयोगी, कर्मकाण्डी-तप साधनाओं में निमग्न रहते हैं। उपयोगिता दोनों की है। महत्ता किसी की भी कम नहीं (पर उनका एकाँगीपन उचित नहीं) दोनों का जोड़ा और मिलाया जाना चाहिए।
साधना के अंतर्गत षट्चक्र वेधन प्रक्रिया मुख्य है। यही इस साधना का प्रधान आधार है। गायत्री शक्ति भी वही प्रयोजन पूरा करती है। इस प्रकार मूलतः वे दोनों एक ही छड़ के दो सिरों की तरह अभिन्न ही हैं। षट्चक्र जागरण में कुण्डलिनी शक्ति को गायत्री का सहकार प्राप्त हो जाता है।
साधना करनी चाहिए।
साधना का प्रधान आधार है। गायत्री शक्ति भी वही प्रयोजन पूरा करती है। इस प्रकार मूलतः वे दोनों एक ही छड़ के दो सिरों की तरह अभिन्न ही हैं। षट्चक्र जागरण में कुण्डलिनी शक्ति को गायत्री का सहकार प्राप्त हो जाता है।
साधना चेतनात्मक रहस्यों का, दिव्य विभूतियों का अनुदान प्रस्तुत करती है और कुण्डलिनी भौतिक सिद्धियों के लिए आवश्यक पथ-प्रशस्त करती है। एकाँगी प्रगति अपर्याप्त है। उत्कर्ष उभय पक्षीय होना चाहिए। इसलिए प्रथम गायत्री साधना का शिक्षण प्रारम्भ कराने के उपरान्त यदि कुण्डलिनी साधना की उपयोगिता बताई, सिखाई जाने लगे तो इसे विरोधाभास की दृष्टि से नहीं वरन् पूरक प्रक्रिया का समारम्भ ही समझना चाहिए।
साधना करने वालों को दीर्घकाल में भी मिल सकने कठिन हैं।
साधना ही कहना चाहिए।
साधना विज्ञान के तत्ववेत्ता एकाँगी सांत्वना की अपूर्णता को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन करते रहे हैं। वही यहाँ भी किया जा रहा है।
साधना का एक महत्वपूर्ण अंग छूट गया। ऐसी दशा में सफलता भी संदिग्ध रहेगी।
साधना से दूनी सिद्धि होती है। धर्म, अर्थ, काम तीनों ही प्राप्त होते हैं। वह हेम कूट पर्वत का सरोवर सर्पों का बनाया हुआ है। ज्योतिर्मयी प्रज्ञा वहीं उत्पन्न होती है।
साधना, तपश्चर्या की अपनी शक्ति है। हिमालय-चेतना उद्गम का हृदय-ध्रुव-होने से इन प्रयोगों प्रयोजनों के लिए अति उपयोगी है। यह आध्यात्मिक प्रयोग हुआ। साधारणतया सामान्य जीवन में भी शीत की उपयोगिता समझी और स्वीकारी जानी चाहिए। अमीर लोग ग्रीष्म ऋतु में काश्मीर आदि शीत प्रधान स्थान में चले जाते हैं और स्वास्थ्य लाभ करते हैं।
साधनायें निषिद्ध हैं। साधना के क्रम में यही अड़चन श्री रम्पा के सम्मुख भी आई। उनके साधना गुरु ने स्पष्ट कह दिया कि अब आपका शरीर उच्च स्तरीय योग साधनाओं के उपयुक्त नहीं रहा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-October
साधना में नाद, बिन्दु, कला की साधनाएं इन अविज्ञात शक्ति प्रवाहों को समझना और उनके साथ अपना संबंध स्थापित करना ही है। शंख, घन्टा, सीटी, नफीरी, झींगुर, निर्झर, मेघ गर्जन आदि के शब्द नाद साधना में सुने जाते हैं। यह मात्र चित्त वृत्तियों को एकाग्र करने के लिए ही नहीं वरन् इसलिये भी है कि लोक लोकान्तरों में ग्रह−नक्षत्रों, आकाश गंगाओं एवं देव संस्थानों में जो अनुदान सूर्य की भाँति ही बरसाये जाते रहते हैं उन्हें ग्रहण कर सकना और उनका लाभान्वित हो सकना संभव हो सके। कुण्डलिनी साधक को यह प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती हैं, फलतः वह दैवी वरदानों की तरह अपने में बहुत कुछ अनुपम और अद्भुत तत्व समाविष्ट हुआ अनुभव करता है।
साधना का उद्देश्य किसी देवता से मनमानी मुराद पूरी करने के लिए ठाना गया दुराग्रह नहीं वरन् आत्म शोधन और आत्म परिष्कार के लिए तितीक्षा द्वारा प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न करना है। स्मरण रखा जाय महान उपलब्धियाँ कहीं बाहर से प्राप्त नहीं होती वरन् भीतर से ही उभरती हैं। कुत्साएं और कुण्ठाएं ही अन्तः वैभव को दबाये पड़ी रहती हैं, इन पत्थरों को हटाने के लिये जो साहसिक कदम उठाने पड़ते हैं उन्हीं का नाम योगाभ्यास, तपश्चर्या, व्रत, अनुष्ठान, साधन प्रक्रिया आदि हैं। इन क्रियाकलापों द्वारा जितना आत्म शोधन होता चले समझना चाहिए साधना उतनी ही सफल हो रही है। आत्म परिष्कार का ही दूसरा नाम देव अनुग्रह अथवा सिद्धि वैभव है।
साधना की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। जो इस मूल्य को चुका सकते हैं वे ही शक्तियों और सिद्धियों से सम्पन्न होते हैं।
साधना को ‘स्पर्शास्पर्श योग‘ कहते हैं, इसका क्षेत्र अति व्यापक विस्तृत और प्रभावोत्पादक माना गया है।
साधनाएं इन अविज्ञात शक्ति प्रवाहों को समझना और उनके साथ अपना संबंध स्थापित करना ही है। शंख, घन्टा, सीटी, नफीरी, झींगुर, निर्झर, मेघ गर्जन आदि के शब्द नाद साधना में सुने जाते हैं। यह मात्र चित्त वृत्तियों को एकाग्र करने के लिए ही नहीं वरन् इसलिये भी है कि लोक लोकान्तरों में ग्रह−नक्षत्रों, आकाश गंगाओं एवं देव संस्थानों में जो अनुदान सूर्य की भाँति ही बरसाये जाते रहते हैं उन्हें ग्रहण कर सकना और उनका लाभान्वित हो सकना संभव हो सके। कुण्डलिनी साधक को यह प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती हैं, फलतः वह दैवी वरदानों की तरह अपने में बहुत कुछ अनुपम और अद्भुत तत्व समाविष्ट हुआ अनुभव करता है।
साधना का एक उत्कृष्ट माध्यम है। भक्त इष्टदेव की प्रतिमा पर अपनी श्रद्धा भक्ति का आरोपण करता ही चला जाता है। वह यह नहीं देखता कि प्रतिमा ने प्रत्युत्तर दिया या नहीं। मूर्ति सदा मौन ही रहती है कभी बदले में प्रेम प्रदर्शित नहीं करती तो भक्त के मन पर उसकी कोई बुरी प्रतिक्रिया नहीं होती। वह अपने प्रेम पक्ष को अपने में पूर्ण मानता है और विश्वास करता है कि प्रतिमा का कोई प्रत्युत्तर न मिलने पर भी उसकी साधना की प्रगति में कोई अन्तर-आने वाला नहीं है।
साधना, उपासना के विधि विधानों का अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत सुविस्तृत उल्लेख है। निराकार साधना में अपने कण-कण को नील वर्ण प्रभा ज्योति से ज्योतिर्मय देखने का अभ्यास किया जाता है। आकाश में आत्म सत्ता तनिक सी नील आभा लिये हुए सूर्य के समान प्रकाशवान है और उसकी दिव्य एवं प्रखर किरणें शरीर के रोम-रोम में प्रवेश करके, बलिष्ठता बढ़ा रही हैं- मन में प्रवेश करके मनस्विता को प्रखर कर रही हैं। अन्तरात्मा के भाव संस्थान (हृदय) में प्रवेश करके आत्मशक्ति को ज्वलन्त बना रही हैं। अपना सबकुछ ज्योतिर्मय हो रहा है।
साधना में अपने शरीर का चित्र ही देव स्थान पर प्रतिष्ठापित किया जाता है। उसी का पूजन, वन्दन और साधन करते हैं। ताँत्रिक विधान के अनुसार ‘छाया पुरुष’ की सिद्धि में अपने ही सूक्ष्म शरीर की सत्ता को प्रखर बनाया जाता है और वह उस साधना क्रम के कारण इतनी सत्तावान हो जाती है कि एक सामर्थ्यवान् अदृश्य मित्र की तरह अभीष्ट सहायता करते रहने के लिये प्रस्तुत रहे। छाया पुरुष के द्वारा दूरवर्ती समाचार मालूम करना-वस्तुएं मँगाना-काम में सहायता करना जैसे प्रयोजन सिद्ध किये जाते हैं। विक्रमादित्य के पास पाँच वीर बेताल बताये जाते हैं, अलादीन के चिराग के साथ सहायक जिन्नों’ के सहयोग की किम्वदंती प्रचलित है।
साधना के लिए तत्पर हों तो वह सब कुछ निश्चित रूप से मिल सकता है जिसकी शान्ति और प्रगति के लिए आनन्द और उल्लास के लिए वास्तविक आवश्यकता है।
साधना पद्धति द्वारा कुण्डलिनी अग्नि को ठीक उसी प्रकार प्रदीप्त करते हैं जैसे लुहार अपनी आग की भट्टी को धोंकनी की हवा से तेज करता है। नासिक छिद्रों से प्राणतत्व को अनन्त आकाश से आकर्षित करके सूर्य तत्व द्वारा प्रेरित चुम्बकीय प्रवाह को तीव्र बनाया जाता है।
साधना का विशेष स्थान है। कुण्डलिनी साधना में नाद, बिन्दु, कला की साधनाएं इन अविज्ञात शक्ति प्रवाहों को समझना और उनके साथ अपना संबंध स्थापित करना ही है। शंख, घन्टा, सीटी, नफीरी, झींगुर, निर्झर, मेघ गर्जन आदि के शब्द नाद साधना में सुने जाते हैं। यह मात्र चित्त वृत्तियों को एकाग्र करने के लिए ही नहीं वरन् इसलिये भी है कि लोक लोकान्तरों में ग्रह−नक्षत्रों, आकाश गंगाओं एवं देव संस्थानों में जो अनुदान सूर्य की भाँति ही बरसाये जाते रहते हैं उन्हें ग्रहण कर सकना और उनका लाभान्वित हो सकना संभव हो सके। कुण्डलिनी साधक को यह प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती हैं, फलतः वह दैवी वरदानों की तरह अपने में बहुत कुछ अनुपम और अद्भुत तत्व समाविष्ट हुआ अनुभव करता है।
साधनाओं में अधिक सफलता भी इन्हीं दिनों पाते हैं। हम अपनी पृथ्वी काम कला को सूर्य- तेज कला के साथ जब भी जोड़ सकें तभी यह प्रकाश प्रवाह में तीव्रता आने वाली स्थिति पैदा हो सकती है और उसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत जीवन में आश्चर्यजनक परिणाम लेकर प्रस्तुत हो सकती है। इतना ही नहीं व्यापक वातावरण को भी उससे प्रभावित किया जा सकता है।
साधना से ऐसी चुम्बकीय आँधियाँ सूक्ष्म जगत में उठाई जा सकती हैं और आकाशस्थ ग्रह नक्षत्रों को ही नहीं, दिव्य सत्ता केन्द्रों, देवताओं को भी उससे प्रभावित किया जा सकता है। इस जगत को प्रभावित करने वाले चेतना केन्द्र सविता को तपस्वी लोग हिलाजुला सकते हैं। ध्रुव प्रकाश में प्रखर तीव्रता मार्च और सितम्बर में (चैत्र और आश्विन की नव रात्रि के दिनों में) अत्याधिक होती है। इसका कारण पृथ्वी का अक्ष- सूर्य के साथ उचित कोण पर होता है। बीज बोने का वही समय अधिक प्रभावी होता है।
साधना से जब हमारे दोनों ध्रुव शक्ति प्रवाह से भरने लगते हैं तो सूर्योदय जैसी हलचल उत्पन्न होती है और न केवल स्थूल शरीर के वरन् सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के भी दृश्य और अदृश्य अंग अवयव अपनी सक्रियता प्रदर्शित करने लगते हैं। साधक को अनुभव होता है मानो वह केंचुली छोड़कर स्फूर्ति, या सर्प की तरह नव चेतना का अपने में अनुभव कर रहा है।
साधना एवं असुविधाएं स्वीकार करना है। इस संदर्भ में शास्त्रकारों ने चान्द्रायण, कृच्छ चान्द्रायण, महाव्रत, शिर मुण्डन, सप्तासि व्रत, तप्तयान गव्योच्छेदन, शान्तापन, महाशान्तापन, कष्ट मौन, महा मौन, उर्ध्ववाहु, अधोपाद, रात्रि जागरण, परिभ्रमण आदि कितनी ही कष्ट साध्य तप तितीक्षाओं का उल्लेख किया है और विधि विधान बताया है। बाल, वृद्ध, रुग्ण एवं गर्भ धारण जैसी विशेष परिस्थितियों में उपरोक्त दण्ड विधानों की कठोरता को सरल बनाने के भी अपवाद रखे गये हैं। इनका विस्तृत विवेचन प्रायश्चित्य परक ग्रन्थों में बताया गया है। इन तपश्चर्याओं का आधार यह है कि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक कष्ट सहकर वैसी ही दण्ड प्रताड़ना का अनुभव करे जैसी अपराधियों को न्यायालयों द्वारा दी जाती है।
साधना की सफलता में प्रधान बाधा बनकर खड़े रहते हैं। अस्तु आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सच्चे मन से तत्पर मनुष्य को प्रथम चरण इस जन्म के पाप कर्मों का परिशोधन करने वाले प्रायश्चित के रूप में उठाना पड़ता है।
साधना में सुने जाते हैं। यह मात्र चित्त वृत्तियों को एकाग्र करने के लिए ही नहीं वरन् इसलिये भी है कि लोक लोकान्तरों में ग्रह−नक्षत्रों, आकाश गंगाओं एवं देव संस्थानों में जो अनुदान सूर्य की भाँति ही बरसाये जाते रहते हैं उन्हें ग्रहण कर सकना और उनका लाभान्वित हो सकना संभव हो सके। कुण्डलिनी साधक को यह प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती हैं, फलतः वह दैवी वरदानों की तरह अपने में बहुत कुछ अनुपम और अद्भुत तत्व समाविष्ट हुआ अनुभव करता है।
साधना द्वारा उसमें सक्रियता उत्पन्न करता है। वरदान आशीर्वाद देने की चमत्कार दिखाने की हर देवता में उतनी ही शक्ति रहती है जितनी कि उस उपासक की आस्था और निष्ठा में परिपक्वता रहती है। एक ही देवता एक साधक के लिये प्रचण्ड शक्तिशाली सिद्ध होता है और वही दूसरे के लिये बिल्कुल निर्जीव बनकर रह जाता है। इस अंतर का एकमात्र कारण साधनकर्त्ता की मनः स्थिति ही है। इस तथ्य को अध्यात्म विद्या के महामनीषियों ने कभी छिपाया नहीं है उन्होंने बराबर कहा है- जिसकी जैसी भावना होगी उसे वैसी ही सिद्धि मिलेगी।
साधना विज्ञान में तत्वा-त्वचा साधना को ‘स्पर्शास्पर्श योग‘ कहते हैं, इसका क्षेत्र अति व्यापक विस्तृत और प्रभावोत्पादक माना गया है।
साधना में अपने कण-कण को नील वर्ण प्रभा ज्योति से ज्योतिर्मय देखने का अभ्यास किया जाता है। आकाश में आत्म सत्ता तनिक सी नील आभा लिये हुए सूर्य के समान प्रकाशवान है और उसकी दिव्य एवं प्रखर किरणें शरीर के रोम-रोम में प्रवेश करके, बलिष्ठता बढ़ा रही हैं- मन में प्रवेश करके मनस्विता को प्रखर कर रही हैं। अन्तरात्मा के भाव संस्थान (हृदय) में प्रवेश करके आत्मशक्ति को ज्वलन्त बना रही हैं। अपना सबकुछ ज्योतिर्मय हो रहा है। प्रकाश से सागर में जल मत्स्य की तरह स्वच्छन्द विचरण किया जा रहा है।
साधना को वे ही असफल बनाने वाले प्रधान कारण बने रहते हैं। जिस प्रकार गलित कुष्ठ का रोगी बहुमूल्य औषधियाँ खाने पर भी मुक्त नहीं हो पाता उसी प्रकार संचित पाप कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न हुए कुसंस्कार साधना की सफलता में प्रधान बाधा बनकर खड़े रहते हैं। अस्तु आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सच्चे मन से तत्पर मनुष्य को प्रथम चरण इस जन्म के पाप कर्मों का परिशोधन करने वाले प्रायश्चित के रूप में उठाना पड़ता है।
साधना का तत्व ज्ञान।
साधना करेगा वह किसी व्यक्ति या देवता तक अपने भाव विस्तार को सीमाबद्ध नहीं कर सकता। चन्दन वृक्ष से उद्भूत गन्ध की तरह प्रेम भावना निरन्तर विस्तृत होती रहती है और उसका रसास्वादन करने का उस क्षेत्र के प्रत्येक प्राणधारी को अवसर मिलता है। प्रेम का विस्तार सहृदयता, सज्जनता, सहानुभूति, उदारता, करुणा, सेवा और आत्मीयता की सद्भावनाओं में विस्तृत होता चला जाता है। प्रेमी की सहज प्रवृत्ति यह होती है कि दूसरों के दुखों को बाँट लेने के लिए अपने सुखों को वितरित करने के लिए आतुरता एवं अनुकूलता अनुभव करे।
साधना के अवसर पर अनेक प्रकार के विघ्न बनकर वे ही बाधक बनते हैं। सन्मार्ग पर चलने की उत्कट इच्छा होते हुए भी उस आकाँक्षा को सफल न होने देने वाली परिस्थितियों के पीछे इन्हीं कुसंस्कारों का हाथ रहता है। अश्रद्धा और अरुचि के रूप में साधना को वे ही असफल बनाने वाले प्रधान कारण बने रहते हैं। जिस प्रकार गलित कुष्ठ का रोगी बहुमूल्य औषधियाँ खाने पर भी मुक्त नहीं हो पाता उसी प्रकार संचित पाप कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न हुए कुसंस्कार साधना की सफलता में प्रधान बाधा बनकर खड़े रहते हैं। अस्तु आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सच्चे मन से तत्पर मनुष्य को प्रथम चरण इस जन्म के पाप कर्मों का परिशोधन करने वाले प्रायश्चित के रूप में उठाना पड़ता है।
साधना नील झलक युक्त प्रकाश को ही ध्यान चेतना में प्रतिष्ठापित किया जाता है। दीपक पर त्राटक करते समय उन पर नील आवरण चढ़ा लेते हैं ताकि प्रत्यक्ष प्रकाश भी उसी आभा युक्त दिखाई पड़े।
साधना के षटचक्रों की तरह त्वचा की छह परतें हैं (1) स्ट्रेटम कोर्नियम-सबसे ऊपर की (2) स्ट्रेटम ल्यूसीडम-पारदर्शी (3) स्ट्रेटम-ग्रेन्यू लोसम- मूर्छित (4) स्ट्रेटम एस्यूलीटम-अपेक्षाकृत मोटी परत (5) स्ट्रेटम वेसेल-क्षति पूरक (6) कोरियम या डर्मिस सहायक। हाथ पैरों के पोरुवे हथेली तलवे आदि पर जहाँ तहाँ जो मोटी गद्दी सी पाई जाती है उसे पेपिली-कहते हैं।
साधना के द्वारा उपलब्ध विभूतियों की महत्ता प्रतिपादित करता है धर्म-शास्त्रों में तपश्चर्या का महात्म्य ही विभिन्न प्रकारों और प्रकरणों में गाया गया है।
साधना ही अध्यात्म तत्व ज्ञान का केन्द्र बिन्दु है। जिस प्रकार भौतिक सुखों को अज्ञानवश बाहर खोजा जाता है उसी प्रकार आत्मिक विभूतियों के लिए मूढ़ मति हमें वाह्य जगत के देवताओं, गुरुओं, तीर्थों, कर्मकाण्डों में भटकाती है। यदि हम अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति को अंतर्मुखी बना लें- देवाधि देव आत्म देव की साधना के लिए तत्पर हों तो वह सब कुछ निश्चित रूप से मिल सकता है जिसकी शान्ति और प्रगति के लिए आनन्द और उल्लास के लिए वास्तविक आवश्यकता है।
साधनाओं का मार्ग ही ऐसा है जो शरीर और मन को प्रभावित कर के हारमोनों को ही नहीं और भी कितने ही महत्वपूर्ण आधारों में हेर फेर करके मनुष्य को सामान्य से असामान्य बना सकता है।
साधनाओं द्वारा यदि त्वचा की संवेदनशीलता बढ़ाली जाय तो अन्य इन्द्रियों की शक्ति बचाकर त्वचा से ही काम चलाया जा सकता है। वह बची हुई अन्य इन्द्रियों की शक्ति अन्य उपयोगी कार्यों में खर्च हो सकती है। जिनकी कोई इन्द्रिय नष्ट हो गई है वे अभ्यास करके त्वचा से ही उस प्रयोजन को पूरा कर सकते हैं। नेत्रों का काम त्वचा कर सकने में समर्थ है। इस सम्बन्ध में रूस में लगातार कई उदाहरण सामने आये हैं और वहाँ इस सम्बन्ध में काफी खोज भी हो रही है।
साधना तपस्या आदि के नाम से पुकारते हैं।
साधना शास्त्र में आत्मदेव के महात्म्य विस्तार एवं साधन विधान पर विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। शरीर और मन के किन-किन अंग प्रत्यंगों में कौन-कौन देवता, नदी, पर्वत, सागर, लोक, तत्व, तीर्थ शक्तिपीठ आदि विद्यमान हैं इसकी चर्चा भली प्रकार की गई है और बताया गया है कि जो बहिरंग में मौजूद है, अस्तु काय कलेवर को तुच्छ नहीं समझा जाना चाहिए वरन् उसमें श्रेष्ठतम सत्ता की झाँकी की जानी चाहिए। भौतिक संपदा का अहंकार तो हेय है पर आत्मदेव का गौरव हर किसी को अनुभव करना चाहिये और आत्मगौरव की रक्षा करने वाली- आत्मगरिमा को ज्योतिर्मय करने वाली रीति-नीति अपनानी चाहिए।
साधना की। किशोर अवस्था तक वह केवल पढ़ता रहा इसके बाद उसने पढ़ाने का कार्य अपना लिया। वह छात्रों को पढ़ाता और पढ़ाने के बदले में उनसे अपने काम की पुस्तकें पढ़वाकर अपने ज्ञान की वृद्धि करता। यह पढ़ने और पढ़ाने का क्रम उसने आजीवन जारी रखा और जापान ही नहीं समस्त संसार के अद्भुत स्मरण शक्ति सम्पन्न विद्वानों, की अग्रिम पंक्ति में अपना नाम लिखाया। वह एकबार जो सुन लेता उसे कभी भूलता न था।
साधना के लिए दर्पण का उपयोग किया जाता है। बड़ा दर्पण सामने रखकर उसमें अपना आधा या सम्पूर्ण शरीर ध्यानपूर्वक देखते हैं और उसे परिष्कृत स्तर का देव मानकर उसका पञ्चोपचार पूजन, ध्यान, वन्दन, स्तवन करते हैं। साथ ही यह आस्था जमाते हैं कि इस कार्य कलेवर में निवास करने वाली ‘दिव्य ज्योति’ यदि आत्म भाव की भूमिका में जागृत हो उठे तो निश्चित रूप से देव सत्ता सम्पन्न हो सकती है। विश्व वन्द्य महामानवों की पंक्ति में बैठने का उसे अवसर मिल सकता है। मल आवरण विक्षेपों के कषाय कल्मषों से उसे मुक्ति मिलने ही वाली है, उसका परिष्कार परिशोधन अब सम्पन्न होने ही वाला है।
साधना का कष्ट उन उपलब्धियों की तुलना में नगण्य ही होता है। बीज का तप वृक्ष के रूप में परिणत होता है। मनुष्य का तप उसे नर से नारायण-पुरुष से पुरुषोत्तम-आत्मा से परमात्मा बना देता है।
साधना क्रम के कारण इतनी सत्तावान हो जाती है कि एक सामर्थ्यवान् अदृश्य मित्र की तरह अभीष्ट सहायता करते रहने के लिये प्रस्तुत रहे। छाया पुरुष के द्वारा दूरवर्ती समाचार मालूम करना-वस्तुएं मँगाना-काम में सहायता करना जैसे प्रयोजन सिद्ध किये जाते हैं। विक्रमादित्य के पास पाँच वीर बेताल बताये जाते हैं, अलादीन के चिराग के साथ सहायक जिन्नों’ के सहयोग की किम्वदंती प्रचलित है। इस स्तर के कार्य छाया पुरुष कर सकता है। मनुष्य काया में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञान मय कोश, आनन्दमय कोश, यह पाँच कोश आवरण हैं इन पाँचों को ही स्वतन्त्र चेतनाओं के रूप में विकसित किया जा सकता है।
साधना उपासना करने से पूर्व सबसे प्रथम कदम इस जन्म से बन पड़े पाप कर्मों का प्रायश्चित किया जाना चाहिए। यों कुविचार भी हानि कारक हैं और कालान्तर में वे भी परिपक्व होकर दुर्गति के कारण बनते हैं पर कुकर्म तो प्रत्यक्ष है, उनके तत्काल संस्कार बनते हैं और उनका ऐसा भला बुरा कर्मफल विनिर्मित होता है जिसे भुगते बिना और कोई मार्ग नहीं। कर्म की गति अति गहन है। श्रवण कुमार को तीन मारने के फलस्वरूप दशरथ को पुत्र विछोह का शाप लगा था और उन्हें राम वनवास के अवसर पर बिलख बिलखकर प्राण त्यागने पड़े थे। बालि को छिपकर बाण मारने का कर्मफल राम को कृष्णावतार के समय भुगतना पड़ा था और बालि ने बहेलिया बनकर कृष्ण के पैर में तीर मारकर उन्हें मृत्यु मुख में पहुँचाया था।
साधना द्वारा अपनी पात्रता सिद्ध कर सके। समुद्र में अनादि काल से अगणित रत्न भरे पड़े हैं पर उन्हें प्राप्त करने के लिये गहरे में गोता लगाने का साहस करना पड़ता है। जब समुद्र मंथन किया गया तो उसमें से 14 रत्न निकले, यदि वह कठोर पुरुषार्थ न किया गया होता तो उन रत्नों के प्राप्त होने की आशा कैसे की जा सकती थी। देवताओं ने गौरवशाली पद तप साधना से ही प्राप्त किये हैं। इसके बिना वे भी अन्य प्राणियों की तरह मात्र जीवधारी ही बने रह सकते थे।
साधना में शब्द साधना का विशेष स्थान है। कुण्डलिनी साधना में नाद, बिन्दु, कला की साधनाएं इन अविज्ञात शक्ति प्रवाहों को समझना और उनके साथ अपना संबंध स्थापित करना ही है। शंख, घन्टा, सीटी, नफीरी, झींगुर, निर्झर, मेघ गर्जन आदि के शब्द नाद साधना में सुने जाते हैं। यह मात्र चित्त वृत्तियों को एकाग्र करने के लिए ही नहीं वरन् इसलिये भी है कि लोक लोकान्तरों में ग्रह−नक्षत्रों, आकाश गंगाओं एवं देव संस्थानों में जो अनुदान सूर्य की भाँति ही बरसाये जाते रहते हैं उन्हें ग्रहण कर सकना और उनका लाभान्वित हो सकना संभव हो सके। कुण्डलिनी साधक को यह प्रक्रियाएं अपनानी पड़ती हैं, फलतः वह दैवी वरदानों की तरह अपने में बहुत कुछ अनुपम और अद्भुत तत्व समाविष्ट हुआ अनुभव करता है।
साधना की ओर मुड़े ताकि वह समस्त विभूतियाँ अनायास ही उपलब्ध कर सके।
साधना से ही प्राप्त किये हैं। इसके बिना वे भी अन्य प्राणियों की तरह मात्र जीवधारी ही बने रह सकते थे। जो तप की कष्ट साध्य प्रक्रिया को देखकर डरा, या घबराया उसके लिए विभूतियों ने अपना द्वार बन्द ही कर दिया है। सहज ही सब कुछ प्राप्त करने का स्वप्न देखते रखने वाले व्यक्ति खाली हाथ ही रहते हैं।
साधना ही कहना चाहिए।
साधना द्वारा मिलता है। वस्तुतः उसे अपने लिये अपना अनुदान ही समझा जाना चाहिए।
साधना उतनी ही सफल हो रही है। आत्म परिष्कार का ही दूसरा नाम देव अनुग्रह अथवा सिद्धि वैभव है। नर कीट को देव मानव में परिणत करने का सारा श्रेय इस आत्म सुधार प्रक्रिया को ही मिलना चाहिए। अध्यात्म क्षेत्र की समस्त सिद्धियाँ और विभूतियाँ उसी केंद्रबिंदु के ईद-गिर्द चक्कर काटती हैं।
साधना में यह तथ्य और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है।
साधना दी गई होगी तो ही वह फलित होगा। किसी ने कितना कष्ट सहकर कुछ उपार्जन किया है, उसे हम मुफ्त में प्राप्त करते हैं तो इसमें अपने ऊपर ऋण भार ही बढ़ेगा। प्रकृति के नियम उस ऋण को वापिस कराने के लिए बाध्य करेंगे। इस जन्म में नहीं तो अगले में वह कर्ज वापिस करना पड़ेगा। काम रुका न होने पर भी जो लोग उधार कर्ज लेकर गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं, उन्हें हेय दृष्टि से ही देखा जाता है।
साधना और समाज सेवा उनके जीवन के अंग बन गये। बाहुबली नहीं चाहता था कि उसका अग्रज भरत राजसिंहासन पर इसलिए आसीन हो कि वह उम्र में बड़ा है। उम्र के साथ-साथ योग्यता में भी बड़ा होना चाहिए।
साधना की प्रगति में कोई अन्तर-आने वाला नहीं है। मीरा के “गिरधर गोपाल” एकांगी थे। पाषाण प्रतिमा में से जीवन्त कृष्ण का सृजन मीरा की एकांगी श्रद्धा ने ही सम्पन्न कर लिया था। एकलव्य की साधना में यह तथ्य और भी अधिक स्पष्ट हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-April
साधना के पथ पर थोड़ा-थोड़ा प्राप्त न करते रहें, तो इस दीर्घ अराजकता के अवकाश में साधना ही सिद्धि के स्थान पर अधिकार जमा लेगी, शुचिता को ही अन्तिम प्राप्ति समझ लेंगे और अनुष्ठान ही देवता बन जायगा।
साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजती, उड़ती और विलीन होती दिखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिह्न माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।
साधना रत होंगे तो उन चमत्कारों को प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा जो भूतकाल में प्रत्यक्ष प्रचलन के रूप में विद्यमान थे पर अब उन्हें केवल दन्त कथा माना जाता है।
साधना बताने के लिए उसे बुलाया।
साधना द्वारा उपलब्ध की जा सकती है क्योंकि वस्तुतः शरीरगत ध्रुवों का ज्यों का त्यों लेखा-जोखा ही कुण्डलिनी विज्ञान में सन्निहित है।
साधना-सुविधा ने नहीं हृदय परिवर्तन ने ही सम्भव किया।
साधना की सिद्धियों के अंतर्गत आता है। पूर्व काल में समुद्र पार करने के परिष्कृत साधन नहीं थे। लकड़ी के जहाज समुद्र यात्रा करते तो थे पर उनकी चाल धीमी होती थी। समुद्री तूफानों का खतरा भी रहता था। बहुत दूर की यात्रा तो जहाज करते भी नहीं थे।
साधना के कभी भी भाव प्रवाह के दबाव से खंडित होने की आशंका बनी रहती है।
साधनारत-अकिंचन आराधिका की तरह ही यह इच्छा व्यक्त करने का साहस कर सकी।
साधना व्यवसायी लोगों द्वारा विकृत अवश्य हो गया और उससे अनास्था भी फैली; पर उससे मूल तथ्य पर कोई आँच नहीं आती। सत्य जहाँ था वहाँ का वहीं मौजूद है।
साधना है। परिवार के प्रत्येक परिजन को पूरे उत्साह के साथ इसमें भाग लेना चाहिए।
साधनाओं द्वारा संभव है। स्थूल शरीर में सूक्ष्म शरीर की सत्ता यदि प्रखर हो उठे तो उतना हलकापन देह में उत्पन्न किया जा सकता है कि वह जल पर बिना डूबे चल सके एवं आकाश में बिना गिरे उड़ सके। भौतिक विज्ञान की तरह जब आत्मिक विज्ञान की शोध होगी और उस क्षेत्र के विज्ञानी जब आत्मशक्ति उद्भव में साधना रत होंगे तो उन चमत्कारों को प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा जो भूतकाल में प्रत्यक्ष प्रचलन के रूप में विद्यमान थे पर अब उन्हें केवल दन्त कथा माना जाता है।
साधना में व्यतिरेक उत्पन्न करने जैसा रुचा जरा भी नहीं पर विवशता ने यह करा लिया। लाचार होकर ही मैंने उन्हें पुकारा कि यदि सम्भव हो तो इस घड़ी में वे कितनी प्रकार उपस्थित होने की कृपा करें। पत्नी के नाते नहीं-उनकी साधिका के नाते, अनन्य साधनारत-अकिंचन आराधिका की तरह ही यह इच्छा व्यक्त करने का साहस कर सकी।
साधना के शिक्षण का समय आवेगा तब बतायेंगे कि इस दिव्य साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजती, उड़ती और विलीन होती दिखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिह्न माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।
साधना प्रक्रिया का भावी स्वरूप और आधार अखण्ड-ज्योति के किसी अगले अंक में वर्तमान अस्वस्थता दूर होने पर ही प्रस्तुत करूंगी। इस समय तो उस प्रकरण पर थोड़ा प्रकाश डाला गया है जिसके अनुसार गुरुदेव कुछ समय के लिए यहाँ आये और चले गये।
साधना, उपासना से हजारों कोसों दूर भौतिक मायाजाल है, जिससे आत्म प्रवञ्चना के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
साधना करना-दूरदर्शी विवेकवान का काम है। हमें इस परम पुरुषार्थ के लिए साहस जुटाना ही चाहिए।
साधना ही सिद्धि के स्थान पर अधिकार जमा लेगी, शुचिता को ही अन्तिम प्राप्ति समझ लेंगे और अनुष्ठान ही देवता बन जायगा।
साधना में ईश्वर उपासना, आत्म चिन्तन, आत्मा और परमात्मा का मिलन प्रधान रूप से सम्मिलित रहना चाहिए। जप, ध्यान, पूजन वन्दन की क्रिया नियमित रूप से चलनी चाहिए, पर उसमें भावनाओं का गहरा पुट रहना चाहिए। लकीर पीटने की चिह्न पूजा अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकती। भौतिक महत्वाकाँक्षाओं से जितनी विरक्ति होगी उतनी ही आत्मिक विभूतियों के सम्पादन में अभिरुचि एवं तत्परता बढ़ेगी। इस तथ्य को भली-भाँति समझ लिया जाना चाहिए।
साधना के लिए दौड़ पड़े थे। वे हमें प्यार करते हैं-हमें उनसे प्यार करना चाहिए। हमारे प्यार का एक सच्चा स्वरूप यह हो सकता है कि उच्च स्तरीय प्रयोजनों में इन दिनों लगे हुए उनके समय में अपने मोहवश अनावश्यक व्यवधान उत्पन्न नहीं करें। वे इन दिनों जिस कार्य में लगे हुए हैं उस पर विश्व मानव के भविष्य की अति महत्वपूर्ण सम्भावनायें टिकी हुई हैं। यदि हम उसे अपने मोह के लिए प्रयुक्त करते हैं तो उसकी हानि विश्व मानव को ही भुगतनी पड़ेगी।
साधना समुद्भूत ब्रह्मवर्चस उसे जागृत, परिष्कृत और सूक्ष्म बनाकर उन रहस्यों को भी समझा जा सकता है जो भौतिक उपकरणों और लौकिक चिन्तन तक सीमित बुद्धि के लिए एक प्रकार से सदा रहस्यमय ही बने रहेंगे।
साधना शास्त्रों में पवित्र जीवन अग्नि के रूप में कुण्डलिनी शक्ति वर्णन किया गया है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को ऊष्ण एवं प्रकाशवान बना देती है वैसा ही प्रकाश कुण्डलिनी जागरण का भी होता है।
साधना करने वाले तपस्वियों के पास सिंह, व्याघ्र निर्भय आते-जाते रहते हैं। उन्हें कष्ट देना तो दूर उलटे सहायता करते हैं। सिंह, गाय का तपोवनों में जाकर एक घाट पर पानी पीना, इस बात का प्रमाण है कि उन्हें भाव शून्य न समझा जाय; अवसर मिलने पर उनकी भावुकता मनुष्य से भी आगे बढ़ सकती है। उत्तर प्रदेश आगरा जिले के खंदोली कस्बे के पास जंगलों में एक मादा भेड़िया ने मनुष्य के बच्चे को उठा लिया था पर करुणावश उसे मारा नहीं वरन् उसे दूध पिलाकर पाल लिया जब वह छः वर्ष का हो गया तब शिकारियों ने इस बालक को भेड़ियों की माँद से पकड़ा था।
साधना द्वारा ऊँचे उठ रहे हैं नीचे नहीं गिर रहे हैं। उनका प्रेम और ममत्व परिजनों के लिए ही नहीं-मानव मात्र के लिए-प्राणि मात्र के लिए जिस वेग-आवेग के साथ उमड़ता रहता है उसमें कमी नहीं आई वरन् इन दिनों वृद्धि ही हुई है। पर उस प्रेम का उपहार अनुदान प्रस्तुत करने के लिए उन्हें कुछ उपार्जन और सञ्चय भी करना चाहिए। तपश्चर्या में निरत समय इसी प्रयोजन के लिए है। यदि वह अनिवार्य जनसंपर्क को छोड़कर ऐसे ही दर्शन सत्संग के लिए लग जायें तो वे उसी स्थिति में बने रहेंगे जिसमें अपने को असहाय, अभावग्रस्त अनुभव करते हुए भी वे उग्र साधना के लिए दौड़ पड़े थे।
साधना विज्ञान का विषय है। सूर्योपासना इसी प्रयोजन को पूरा करती है, उससे आहार द्वारा स्वल्प मानसिक शक्ति के झंझट से बचकर अभीष्ट मात्रा में सूर्य से मस्तिष्कीय शक्ति प्राप्त की जा सकती है। उतना ही नहीं, ओजस्, तेज और वर्चस्व भी इतना मिल सकता है जिससे व्यक्तित्व को हर दिशा में तेजस्वी और प्रतिभावान बनाया जा सके। सूर्योपासना एक विशुद्ध विज्ञान है जिससे मानव जीवन की अगणित आवश्यकता पूरी कर सकने योग्य सशक्तता प्राप्त होती है। गायत्री मंत्र द्वारा सूर्य शक्ति का आह्वान करके हमारे पूर्वज अपने व्यक्तित्व को सर्व समर्थ बनाये रहने में सफलता प्राप्त करते रहे।
साधना कराई। शिष्यों को पंक्तिबद्ध होकर ध्यान करने के लिए बिठा दिया।
साधना के समय पालन करना आवश्यक है।
साधना ठीक स्वाभाविक और बिना व्यवधान के चलने लगती है। किन्तु यदि बिना उपभोग के बालकपन से ही इन्द्रिय भोग का निषेध रहे तो मन की स्वाभाविक प्रकृति दूसरे को उस मार्ग पर चलते हुए देखकर तीव्र हो उठती है और उस संयम साधना के कभी भी भाव प्रवाह के दबाव से खंडित होने की आशंका बनी रहती है।
साधना बहुत ही सरलता के साथ सधती हुई चली जाती है।
साधना के लिए निश्चित रहा करेंगे केवल कुछ घण्टे ही नितान्त आवश्यक परामर्श के लिए निकल सका करेंगे। यह बहुमूल्य समय दर्शन, शंका समाधान-भौतिक प्रयोजनों के लिए आशीर्वाद जैसे तुच्छ कार्यों में बर्बाद नहीं किया जायगा। प्रेरणा प्राप्ति के आत्मिक प्रयोजनों के संदर्भ में ही वह घड़ियाँ नियोजित रहेंगी। उसके लिए पहले से ही पत्र व्यवहार कर लेना चाहिए कि किसी की उत्कण्ठा यदि मिलने की है तो उसका प्रयोजन क्या है और उसे न्यूनतम कितने समय में पूरा किया जा सकता है। घण्टों स्वच्छन्द दर्शन, सत्संग, हास-परिहास-संपर्क सान्निध्य के लिए बैठे रहने की बात अब बहुत पीछे रह गई है।
साधनात्मक सफलता का द्वारा खुल जाता है।
साधना के संदर्भ में जब नादबिन्दु साधना के शिक्षण का समय आवेगा तब बतायेंगे कि इस दिव्य साधना के क्रम विस्तार में जब आज्ञा चक्र में ध्यान एकत्रित किया जाता है तो किस प्रकार रंग-बिरंगी झिलमिल उपजती, उड़ती और विलीन होती दिखती है। यह दिव्य शक्ति संस्थान के पुनर्जागरण का चिह्न माना जाता है। यह झिलमिल उत्तरी ध्रुव की तरह साधक के ब्रह्मरन्ध्र में चुम्बकीय प्रवाह की हलचल को ही प्रमाणित करती है।
साधना कर रहे थे। मन काबू में न आता था, वह निर्धारित लक्ष पर न रुक कर अन्न माँगता था। इस कठिनाई का समाधान करने के लिए वे अपने गुरु के पास पहुँचे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-February
साधना स्थल, सुदूर देहातों में एकान्त एवं अन्य प्रदेशों में बनाये गये थे। जिसमें कोलाहल रहित वातावरण में शान्त संतुलित, स्वस्थ, सुखी और सुन्दर जीवन जिया जा सके, हमारे लिए भी उसी राह को अपनाना श्रेयस्कर होगा।
साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा विकसित कर लिया जाय तो नेत्रों की बहुत आवश्यकता उनके माध्यम से भी पूरी हो सकती है। इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियों के कार्य एक सीमा तक दूसरे अंग कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये गये पौहारी बाबा प्रत्यक्षतः वायु ही ग्रहण करते थे, अन्न, जल सेवन नहीं करते थे पर शरीर के अन्य अंगों द्वारा अदृश्य जगत से सूक्ष्म आहार बराबर मिलता रहता था इसके बिना किसी के लिए भी जीवन धारण किये रहना असम्भव है।
साधना द्वारा मुक्त कर लिया गया। समाज की उच्छृंखल और उन्मुक्त प्रवृत्तियों के बीच न्याय और नियम का स्वर्ग भी इसी प्रकार बसा हुआ है उसे मुक्त करने के लिये कल्याण-साधना आवश्यक है, अनिवार्य है।
साधना तपश्चर्या से उस बीज रूप में विद्यमान दिव्य सत्ता का उत्थान होता है। गुरुदेव की गायत्री साधना से उनका समग्र अतः क्षेत्र इस प्रकार जागृत हो चुका है कि जो कुछ भी मानवी पिण्ड में विद्यमान होगा वह उन्हें उपलब्ध होकर रहेगा।
साधना व्यक्तिगत सहायता ही लोक मंगल के लिये है।
साधना ग्रन्थ पढ़े, और अनगिनत साधकों से मार्ग पूछे। जितना पूछता गया उतना ही परस्पर विरोधी बातें बताये जाने के कारण उलझता गया। बहुत तरह की साधनाएँ की पर न किसी में मन लगा और न सफलता मिली ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह सब कहीं जाल-जंजाल ही तो नहीं है।
साधना केन्द्र रहे। गंगोत्री में वे केवल पत्तियों पर रहे। खाद्य प्रबन्ध न हो सकने अथवा जो भी कारण हों उन्हें पालक, बथुआ जैसी जंगली शाक वनस्पतियों को उबाल कर उसी पर निर्वाह करना पड़ा। आरम्भ में पतले दस्त होने लगे थे। पीछे वे पत्तियाँ जैसे-तैसे हजम होने लगीं थीं।
साधना मार्ग पर मेरी रुचि 20 साल की उम्र में उत्पन्न हुई थी। आज 55 साल का हूँ। इन 35 वर्षों में सैकड़ों साधना ग्रन्थ पढ़े, और अनगिनत साधकों से मार्ग पूछे। जितना पूछता गया उतना ही परस्पर विरोधी बातें बताये जाने के कारण उलझता गया। बहुत तरह की साधनाएँ की पर न किसी में मन लगा और न सफलता मिली ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह सब कहीं जाल-जंजाल ही तो नहीं है।
साधना तुमने, अपने जीवन में साधी।
साधना आवश्यक है, अनिवार्य है।
साधनाएँ की पर न किसी में मन लगा और न सफलता मिली ऐसा प्रतीत होने लगा कि यह सब कहीं जाल-जंजाल ही तो नहीं है।
साधना से उनका समग्र अतः क्षेत्र इस प्रकार जागृत हो चुका है कि जो कुछ भी मानवी पिण्ड में विद्यमान होगा वह उन्हें उपलब्ध होकर रहेगा।
साधना का पुञ्ज, क्रान्तिकारी प्रवृत्ति इन दोनों का समन्वय गंगा जमुना के संगम जैसा लगा। मैं श्रद्धा से नत हो गया। उन्होंने मुझे गायत्री साधना के मार्ग पर लगाया।
साधना के उन्नायक, वेद पुराणों के ज्ञाता।
साधना के मार्ग पर लगाया।
साधना की। कितनी ही शंकायें और समस्यायें लेकर गया था कागज पर नोट थी। दैनिक प्रवचनों में मेरी ही शंकाओं के उत्तर होते थे। पूरा शिविर होने तक मेरे सभी प्रश्नों का उत्तर मिल गया। लगता मानो मेरा ही समाधान करने के लिये प्रवचन होते हों।
साधना द्वारा उन प्रसुप्त शक्ति स्रोतों का प्रकटीकरण किया जा सकता है। यदाकदा उन अतीन्द्रिय शक्तियों का आभास मिलता रहता है वे उदाहरण यही सिद्ध करते हैं कि मानवीय अविज्ञान सामर्थ्य की विशालता और महानता के अस्तित्व पर अविश्वास न किया जाय वरन् उन्हें ढूँढ़ने, जगाने और उपयोग में लाने के प्रयास में लगा जाय।
साधना के अंतर्गत आता है। और कहा गया है कि यह मानवी सत्ता अद्भुत एवं अलौकिक है। साधना तपश्चर्या से उस बीज रूप में विद्यमान दिव्य सत्ता का उत्थान होता है। गुरुदेव की गायत्री साधना से उनका समग्र अतः क्षेत्र इस प्रकार जागृत हो चुका है कि जो कुछ भी मानवी पिण्ड में विद्यमान होगा वह उन्हें उपलब्ध होकर रहेगा।
साधना, हमें यातना, कैसा खेल विधाता का।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-June
साधना—युगनिर्माण योजना की, आत्मनिर्माण
और समाज निर्माण की विधि-व्यवस्था अपनाकर ही की जा सकती है। युगनिर्माण
योजना की चर्चा समय-समय पर पत्रिकाओं में लेखों द्वारा और उनके प्रवचनों
द्वारा होती रही है। उनकी रूपरेखा छपी भी है, पर उनमें यह कमी है कि किस
कार्य को किस प्रकार किया जाए, इसका स्वरूप निर्धारण और व्यावहारिक
मार्गदर्शन नहीं हुआ है। अब वह कमी दूर कर दी गई है। युगनिर्माण योजना की
सांगोपांग क्रमबद्ध रूपरेखा और उसे कार्यान्वित करने की शैली को इन्हीं
दिनों पुस्तकाकार छापा गया है।
साधना के प्रकाश से असंख्यों को अपना उद्धार
करने का लाभ मिलता है। इस प्रकार यह दुहरा लाभ प्रस्तुत करने वाली
आध्यात्मिक-साधना का ही प्रयोजन पूरा करती है।
साधना के माध्यम से विकसित करते
हैं, वह कई बार कई व्यक्तियों में अनायास और जन्मजात स्तर पर भी पाई जाती
है। इस सत्ता का विकास करके मनुष्य सीमित परिधि के बंधन काटकर असीम के साथ
अपने संबंध मिला सकता है और अपनी ज्ञान-परिधि को उतनी ही विस्तृत बना सकता
है। समय-समय पर इस प्रकार के जो प्रमाण मिलते रहते हैं, उनसे उस संभावना को
और भी अधिक बल मिलता है कि आत्मविकास के प्रयत्न मनुष्य को कहीं-से-कहीं
पहुँचा सकने में समर्थ हैं।
साधना में रत रहता है, वह
सदा निराहारी ही है। जो अपने ज्ञानवंश की वृद्धि के लिए ही निष्काम भाव से
अपनी पत्नी से संबंध स्थापित करता है, वह आजन्म ब्रह्मचारी है। वह दोनों
कमलवत् निर्लिप्त स्थिति में हैं।" अब अरुंधती की जिज्ञासा पूर्णतया शांत
हो गई।
साधना का विज्ञान अपनी
ज्ञात और अज्ञात क्षमताओं के नियंत्रण और संचालन का ही विधान है। इस क्षेत्र
में आगे बढ़कर हम अपनी अपूर्णता को पूर्णता में परिणत कर सकते हैं।
साधनात्मक भाषा में योनि कंद
कहते हैं। स्थूलशरीरशास्त्र के अनुसार वहाँ सुषुम्ना नाड़ीगुच्छक भर है
,पर सूक्ष्मशरीर-रचना विज्ञान के अनुसार यहाँ एक विशेष अवयव है, जिसे
मूलाधार चक्र कहते हैं। इसके नीचे की पीठ कछुए जैसी है। इसे कूर्म कहते
हैं। इसके ऊपर एक छोटा मेरुदंड है, उसे सुमेरु कहते हैं।
साधना विज्ञान के आधार पर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकने योग्य
बनाया जा सकता है।
साधना में जहाँ व्यक्ति के निज का अंतःकरण योगियों जैसा
निर्मल होता है, वहाँ उनकी तप-साधना के प्रकाश से असंख्यों को अपना उद्धार
करने का लाभ मिलता है। इस प्रकार यह दुहरा लाभ प्रस्तुत करने वाली
आध्यात्मिक-साधना का ही प्रयोजन पूरा करती है।
साधनाएँ शीतप्रधान हिमालय में होती थीं। ठंड से हानि नहीं, लाभ होता है। खाँसी, जुकाम, निमोनिया आदि सरदी के प्रकोप नहीं, वरन भीतर भरे हुए विकारों को शीत के प्रयोग से बाहर करने का उपाय है जो उस वातावरण में थोड़े दिन रहने पर सहज ही ठीक हो जाता है। गरम रहन-सहन की आदत बदलते समय थोड़ी प्रतिक्रिया हो सकती है, पर कुछ ही दिन में यह स्पष्ट हो जाएगा कि सरदी सहने के लिए शरीर खुशी-खुशी तैयार है। नाक के भीतरी भाग सबसे कोमल हैं।
साधना वही हो सकती है, जो स्वयं उन्हें करनी पड़ी। उनकी साधना
का बाह्यस्वरूप भर देखना पर्याप्त न होगा। चौबीस लाख के चौबीस पुरश्चरणों
की जप संख्या को नहीं, महत्त्वपूर्ण उस तथ्य को मानना चाहिए जिसके अनुसार
हर मंत्रजप के साथ-साथ ऋतंभरा प्रज्ञा का प्रकाश अपने रोम-रोम में भरने और
उसी प्रकाश का अनुगमन करते हुए अपनी मानसिक और शारीरिक गतिविधियों को एक
विशेष दिशा में लगाए रहने का साहस कर दिखाया। उन दिनों की उनकी एकांत साधना
को जनकोलाहलरहित सूनेपन की विशेषता नहीं माननी चाहिए, वरन आकर्षणों-साधनों
से सर्वथा मुक्त एकाकी ब्रह्मवर्चस के महासमुद्र में विचरण करने वाले
आत्मबोध के अभ्यासरूप में ही उसे देखना चाहिए। आत्मचेतना को मनुष्यों
तक सीमित न रखकर प्रत्येक जड़-चेतन में अपनी आत्मा का प्रकाश जगमगाते हुए
देखने की दिव्य अनुभूति का इसे एक प्रयोग माना जाना चाहिए।
साधना के साथ उच्चारण करती है तो उस शब्दसमूह
को ‘मंत्र’ कहते हैं। मंत्रों की चमत्कारी शक्ति से अध्यात्म विज्ञान का
पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। जप के बिना किसी भी धर्म-संप्रदाय की कोई साधना
नहीं हो सकती। इसे आत्मशक्ति-संवर्द्धन का आधारभूत स्रोत माना गया है।
साधना-विधानों में हेर-फेर होता रहा है और उसका संदेश लेकर
तत्कालीन अग्रदूत इस पृथ्वी पर आते रहे। आज की स्थिति में व्यक्तिगत महानता
के अभिवर्द्धन और लोक-मंगल के अनुष्ठान की दृष्टि से वही प्रक्रिया
सर्वोत्तम रहेगी, जिसे मई के अंक में संक्षिप्त रूप से बताया गया है। आशा है, उसे पढ़-समझ लिया गया होगा।
साधना-रथ इन्हीं दो पहियों पर गतिशील रहा है। वे हृदय
से यही चाहते हैं कि उनका हर आत्मीय इसी मार्ग पर चलकर उन्हीं की जैसी
महानता का लाभ प्राप्त करे। छिटपुट मंत्र-तंत्र की उलट-पुलट में लंबे-चौड़े
सपने देखना छोड़कर युग-साधना के आधार पर अपनी अंतःचेतना में पात्रता का
प्रकाश उत्पन्न करे। इतना कर लेने पर वे दिव्यशक्तियाँ उसकी सहायता के लिए
दौड़ पड़ेंगी, जो आज भी बार-बार द्वार खटखटाती हैं, किंतु पात्रता का अभाव
देखकर वापिस लौट जाती हैं।
साधना अपने कर्तृत्व में सम्मिलित करनी पड़ती है,
जिसे उन्होंने शतसूत्री युगनिर्माण योजना के नाम पर अनेकों बार अनेकों ढंग
से कहा है। उस पुराने कथनोपकथन को साररूप में दुहरा देने और उसे चिरंतन
अथवा नवीनतम संदेश के रूप में परिजनों तक पहुँचा देने के लिए उन्होंने आदेश
दिया था, सो उसी का पालन करते हुए मई अंक की लेखमाला उस संदर्भ में लिख दी
गई।
साधना त्रिवेणी कहना चाहिए। निश्चित रूप
से यह एक योग-साधना और तपश्चर्या है। एकांत में प्राणायाम करना ही एकमात्र
योगाभ्यास नहीं है। गीता में कहे गए कर्मयोग का यह श्रेष्ठतम और सामयिक
स्वरूप है। इस युग-साधना में जहाँ व्यक्ति के निज का अंतःकरण योगियों जैसा
निर्मल होता है, वहाँ उनकी तप-साधना के प्रकाश से असंख्यों को अपना उद्धार
करने का लाभ मिलता है।
साधना है, जो उसे कर
सके, समझना चाहिए कि परिपूर्ण साधना और समग्र तपश्चर्या का सही रास्ता उसे
मिल गया। गुरुदेव का साधना-रथ इन्हीं दो पहियों पर गतिशील रहा है। वे हृदय
से यही चाहते हैं कि उनका हर आत्मीय इसी मार्ग पर चलकर उन्हीं की जैसी
महानता का लाभ प्राप्त करे। छिटपुट मंत्र-तंत्र की उलट-पुलट में लंबे-चौड़े
सपने देखना छोड़कर युग-साधना के आधार पर अपनी अंतःचेतना में पात्रता का
प्रकाश उत्पन्न करे। इतना कर लेने पर वे दिव्यशक्तियाँ उसकी सहायता के लिए
दौड़ पड़ेंगी, जो आज भी बार-बार द्वार खटखटाती हैं, किंतु पात्रता का अभाव
देखकर वापिस लौट जाती हैं।
साधना के साधक बनें। उसे पढ़ते-सुनते ही न रहें।
चर्चा और कल्पना का ही विषय न बनाए रहें, वरन उसे व्यावहारिक जीवन में
उतारने और कार्यरूप में परिणत करने का भी प्रयत्न करें। यही है— प्रथम चरण
वास्तविक प्रगति का, विभूतिवान बनने का, आत्मसंपदाओं से परिपूर्ण होने का
और महानता के वरण करने का। इसके लिए बड़प्पन की आकुल अभिलाषाओं से थोड़ा
मुँह मोड़ना ही चाहिए और उस विमुखता को नवनिर्माण के प्रति प्रतीति में
नियोजित करना ही चाहिए।
साधना, तपश्चर्या और योगाभ्यास का मात्र एक ही प्रयोजन है— अपने अंतःकरण में प्रसुप्त अगणित सत्प्रवृत्तियों का जागरण, सद्भावनाओं का उन्नयन, दृष्टिकोण का परिष्कार और कर्त्तृत्व में देवत्व के समावेश का अभ्यास। सिद्धियों की उत्कृष्टता इसी कटौती पर परखी जाती है। इसी से अपना भला होता है और इसी से संसार का।
साधना-अनुष्ठान नहीं है। केवल
उन दिनों ग्रहण करने के अनुकूल मनःस्थिति बनाए रखना भर पर्याप्त होगा। अपने को हर दृष्टि से
विचारों से रिक्त रखने, कुछ भी न सोचने और चाहने की मनःस्थिति बनाए रखकर
उसमें शक्तिपात के लिए द्वार खुला रहने भर के लिए आगंतुकों को कहा जाएगा।
शरीर और मन को अनिवार्य नित्य क्रिया करने के अतिरिक्त पूर्ण विश्राम करने
के लिए कहा जाएगा। इस मनःस्थिति में आदान-प्रदान सफल और संभव हो जाता है।
साधना ग्रंथों में मिलता है,
उतना ही नहीं; वरन उससे भी अधिक उपलब्धियाँ अपने भीतर भरे शक्तिभंडार के
साधना विज्ञान के आधार पर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकने योग्य
बनाया जा सकता है।
साधना तो सिंचन-पोषण भर है। वस्तुतः
जितना उनने पाया है, उसका 90 प्रतिशत भाग प्रदत्त अनुदान ही कहना चाहिए।
यदि ऐसा न होता तो लोक-मंगल की दिशा में इतना जो कार्य बन पड़ा, वह कैसे बन
पड़ा होता। सारा समय जप-तप में ही लग जाता तो फिर ईश्वरीय निर्देश और
मार्गदर्शक के आदेश को पालन करते हुए नवयुग की संभावनाओं को साकार करने में
इतनी तत्परता के साथ लगा रहना कैसे संभव होता?
साधना का ही प्रयोजन पूरा करती है।
साधना-पद्धति आज की युग-साधना है, जो उसे कर
सके, समझना चाहिए कि परिपूर्ण साधना और समग्र तपश्चर्या का सही रास्ता उसे
मिल गया। गुरुदेव का साधना-रथ इन्हीं दो पहियों पर गतिशील रहा है। वे हृदय
से यही चाहते हैं कि उनका हर आत्मीय इसी मार्ग पर चलकर उन्हीं की जैसी
महानता का लाभ प्राप्त करे। छिटपुट मंत्र-तंत्र की उलट-पुलट में लंबे-चौड़े
सपने देखना छोड़कर युग-साधना के आधार पर अपनी अंतःचेतना में पात्रता का
प्रकाश उत्पन्न करे। इतना कर लेने पर वे दिव्यशक्तियाँ उसकी सहायता के लिए
दौड़ पड़ेंगी, जो आज भी बार-बार द्वार खटखटाती हैं, किंतु पात्रता का अभाव
देखकर वापिस लौट जाती हैं।
साधना और तपश्चर्या है। एकांत में प्राणायाम करना ही एकमात्र
योगाभ्यास नहीं है। गीता में कहे गए कर्मयोग का यह श्रेष्ठतम और सामयिक
स्वरूप है। इस युग-साधना में जहाँ व्यक्ति के निज का अंतःकरण योगियों जैसा
निर्मल होता है, वहाँ उनकी तप-साधना के प्रकाश से असंख्यों को अपना उद्धार
करने का लाभ मिलता है। इस प्रकार यह दुहरा लाभ प्रस्तुत करने वाली
आध्यात्मिक-साधना का ही प्रयोजन पूरा करती है।
साधना का मार्ग अपनाकर निज की सर्वतोमुखी प्रतिभा एवं समर्थता को विकसित
किया जा सकता है और उससे आत्मकल्याण तथा विश्वकल्याण के दोनों प्रयोजन पूरे
किए जा सकते हैं।
छह चक्र प्रसिद्ध हैं। सातवाँ चक्र सहस्रार
है। इन सातों का एक समन्वय शक्तिपुंज (Logos) भी है। जिससे दृश्य सूर्य के
समान ही, किंतु अपने अलग ढंग की रश्मियाँ निकलती हैं।
साधना ग्रंथों में अलंकारिक रूप में हुआ है। उन्हें सात
लोक, सात समुद्र, सात द्वीप, सात पर्वत, सात ऋषि आदि नामों से चित्रित किया
गया है। इस चित्रण में यह संकेत है कि इन चक्रों में किन-किन स्तर के
विराट शक्ति-स्रोतों के साथ संबंध हैं। बीजरूप से कौन महान सामर्थ्य इन
चक्रों में विद्यमान है और जागृत होने पर उन चक्र-संस्थानों के माध्यम से
मनुष्य का व्यक्तित्व छोटे से कितना विराट और कितना विशाल हो सकता है।
टोकरी भर बीज से लंबा-चौड़ा खेत हरा-भरा हो सकता है।
साधना और समग्र तपश्चर्या का सही रास्ता उसे
मिल गया। गुरुदेव का साधना-रथ इन्हीं दो पहियों पर गतिशील रहा है। वे हृदय
से यही चाहते हैं कि उनका हर आत्मीय इसी मार्ग पर चलकर उन्हीं की जैसी
महानता का लाभ प्राप्त करे। छिटपुट मंत्र-तंत्र की उलट-पुलट में लंबे-चौड़े
सपने देखना छोड़कर युग-साधना के आधार पर अपनी अंतःचेतना में पात्रता का
प्रकाश उत्पन्न करे। इतना कर लेने पर वे दिव्यशक्तियाँ उसकी सहायता के लिए
दौड़ पड़ेंगी, जो आज भी बार-बार द्वार खटखटाती हैं, किंतु पात्रता का अभाव
देखकर वापिस लौट जाती हैं।
साधना में नियमित साधनारत होना ही चाहिए। अन्य परिजनों को भी आत्मविकास
की दृष्टि से या युगधर्म की पूर्ति की दृष्टि से दिव्य तत्त्वों का
अनुग्रह उनपर बरसने में जो अड़चन उपस्थित है, उसे दूर करने की दृष्टि से यह
आवश्यक है कि वे युग-साधना के साधक बनें। उसे पढ़ते-सुनते ही न रहें।
चर्चा और कल्पना का ही विषय न बनाए रहें, वरन उसे व्यावहारिक जीवन में
उतारने और कार्यरूप में परिणत करने का भी प्रयत्न करें। यही है— प्रथम चरण
वास्तविक प्रगति का, विभूतिवान बनने का, आत्मसंपदाओं से परिपूर्ण होने का
और महानता के वरण करने का।
साधना
का बाह्यस्वरूप भर देखना पर्याप्त न होगा। चौबीस लाख के चौबीस पुरश्चरणों
की जप संख्या को नहीं, महत्त्वपूर्ण उस तथ्य को मानना चाहिए जिसके अनुसार
हर मंत्रजप के साथ-साथ ऋतंभरा प्रज्ञा का प्रकाश अपने रोम-रोम में भरने और
उसी प्रकाश का अनुगमन करते हुए अपनी मानसिक और शारीरिक गतिविधियों को एक
विशेष दिशा में लगाए रहने का साहस कर दिखाया। उन दिनों की उनकी एकांत साधना
को जनकोलाहलरहित सूनेपन की विशेषता नहीं माननी चाहिए, वरन आकर्षणों-साधनों
से सर्वथा मुक्त एकाकी ब्रह्मवर्चस के महासमुद्र में विचरण करने वाले
आत्मबोध के अभ्यासरूप में ही उसे देखना चाहिए। आत्मचेतना को मनुष्यों
तक सीमित न रखकर प्रत्येक जड़-चेतन में अपनी आत्मा का प्रकाश जगमगाते हुए
देखने की दिव्य अनुभूति का इसे एक प्रयोग माना जाना चाहिए।"
साधना एक उपाय भर है। प्रार्थना, स्तुति, पूजा, जप उस कर्त्तव्य का स्मरण दिलाता है, जो हमें ईश्वरप्राप्ति के लिए करना है। आत्मपरिष्कार— लोक-मंगल, परमार्थ से युक्त मनोभूमि और क्रियापद्धति ही वह मार्ग है, जिस पर चलकर ईश्वरप्राप्ति होती है। पूजा-उपासना इस कर्त्तव्य से विमुख न होने— इसके लिए निरंतर सचेष्ट रहने की प्रेरणा करती है; इसलिए उसे भी प्रथम चरण के रूप में आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी माना गया है।
साधना की जाती है तो
यह ताले खुलते हैं। बीज बाहर लाया जाता है। शरीररूपी साढ़े तीन एकड़ के खेत
में वह बोया जाता है। यह छोटा खेत अपनी सुसंपन्नता को अत्यधिक व्यापक बना
देता है। पुराणकथा के अनुसार राजा बलि का राज्य तीनों लोकों में था।
साधना
को जनकोलाहलरहित सूनेपन की विशेषता नहीं माननी चाहिए, वरन आकर्षणों-साधनों
से सर्वथा मुक्त एकाकी ब्रह्मवर्चस के महासमुद्र में विचरण करने वाले
आत्मबोध के अभ्यासरूप में ही उसे देखना चाहिए। आत्मचेतना को मनुष्यों
तक सीमित न रखकर प्रत्येक जड़-चेतन में अपनी आत्मा का प्रकाश जगमगाते हुए
देखने की दिव्य अनुभूति का इसे एक प्रयोग माना जाना चाहिए।"
साधना ग्रंथों में इस प्रकार मिलता है—
साधना। साधन अर्थात प्रयत्न, उपकरण, क्रियाकलाप। साध्य— ईश्वर की अनुकंपा की— प्रसन्नता और सहायता की प्राप्ति। साधना एक उपाय भर है। प्रार्थना, स्तुति, पूजा, जप उस कर्त्तव्य का स्मरण दिलाता है, जो हमें ईश्वरप्राप्ति के लिए करना है।
साधना के आधार पर अपनी अंतःचेतना में पात्रता का
प्रकाश उत्पन्न करे। इतना कर लेने पर वे दिव्यशक्तियाँ उसकी सहायता के लिए
दौड़ पड़ेंगी, जो आज भी बार-बार द्वार खटखटाती हैं, किंतु पात्रता का अभाव
देखकर वापिस लौट जाती हैं।
साधनामय बनाने से ही वह
उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसी एक अड़चन ने इस प्रक्रिया को आबद्ध कर
दिया है। इस आधार पर आत्मवादी परिजन भी उसी प्रकार लाभान्वित हो सकते थे,
जिस प्रकार गुरुदेव स्वयं हुए। इस अड़चन को दूर करना ही होगा। इस
श्रमसाध्य राजमार्ग को छोड़कर कोई सीधी-सरल पगडंडी नहीं है।
साधनारत होना ही चाहिए। अन्य परिजनों को भी आत्मविकास
की दृष्टि से या युगधर्म की पूर्ति की दृष्टि से दिव्य तत्त्वों का
अनुग्रह उनपर बरसने में जो अड़चन उपस्थित है, उसे दूर करने की दृष्टि से यह
आवश्यक है कि वे युग-साधना के साधक बनें। उसे पढ़ते-सुनते ही न रहें।
चर्चा और कल्पना का ही विषय न बनाए रहें, वरन उसे व्यावहारिक जीवन में
उतारने और कार्यरूप में परिणत करने का भी प्रयत्न करें। यही है— प्रथम चरण
वास्तविक प्रगति का, विभूतिवान बनने का, आत्मसंपदाओं से परिपूर्ण होने का
और महानता के वरण करने का।
साधना में दोनों का सहयोगात्मक समन्वय समान रूप से रहने पर ही अभीष्ट
प्रयोजन सिद्ध होता है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से जिह्वा की तरह ही थोड़ा परिचय यह है—
साधना-तपश्चर्या का
निष्कर्ष दो शब्दों में निकाला जा सकता है— (1) आत्मपरिष्कार और (2)
लोक-मंगल का निरंतर प्रयास। यह साधना-पद्धति आज की युग-साधना है, जो उसे कर
सके, समझना चाहिए कि परिपूर्ण साधना और समग्र तपश्चर्या का सही रास्ता उसे
मिल गया। गुरुदेव का साधना-रथ इन्हीं दो पहियों पर गतिशील रहा है। वे हृदय
से यही चाहते हैं कि उनका हर आत्मीय इसी मार्ग पर चलकर उन्हीं की जैसी
महानता का लाभ प्राप्त करे। छिटपुट मंत्र-तंत्र की उलट-पुलट में लंबे-चौड़े
सपने देखना छोड़कर युग-साधना के आधार पर अपनी अंतःचेतना में पात्रता का
प्रकाश उत्पन्न करे।
साधना ऐसी ही
संभावनाओं के पथ-प्रशस्त करती है।
साधना-तपश्चर्या का आधार युग-परिवर्तन की संभावनाओं को प्रबल करने के लिए
सूक्ष्मजगत में असाधारण हलचल उत्पन्न करना है। नवयुग का आगमन एक सुनिश्चित
तथ्य है। इस मेहमान की आगमन-व्यवस्था करने के लिए वे स्वागत अधिकारी की तरह
अपनी भूमिका निभा रहे हैं। उनका इन दिनों महत्त्वपूर्ण उपार्जन चल रहा है।
जमा करना तो उनकी प्रवृत्ति में ही नहीं।
साधना से भी कुछ विशेष परिणाम नहीं निकलता।
साधना करते हुए अविरत कर्मयोग द्वारा आवागमन से परे निर्वाण को प्राप्त किया।
साधना
अनिवार्य रहती है वह पुष्पहार, दंडवत् प्रणाम या फल-उपहार जितनी सस्ती नहीं
है और न किसी मंत्र की कुछ मालाएँ घुमा-फिरा देने जितनी सरल हैं। मँहगी
उपलब्धियाँ सदा मँहगे मूल्य पर मिलती हैं। गुरुदेव ने स्वयं समुचित मूल्य
चुकाकर ही अपने मार्गदर्शक का— अपने परमेश्वर का— अनुग्रह खरीदा
है। दूसरों के लिए भी यही हाट खुली है। खाली हाथ ऐसे ही बहुत कुछ पा लेने
की लालसा लेकर हाट में जाने वालों को खाली हाथ ही लौटना पड़ता है।
साधना की जा सके, तो अदृश्य और
अप्रत्यक्ष विभूतियों को हम सामने खड़ी दृश्य और प्रत्यक्ष रूप से देख सकते
हैं।
साधना की जाए तो सफलता के
अंतिम शिखर पर चढ़ते-चढ़ते वहाँ पहुँचा जा सकता है, जहाँ यह कीड़े-मकोड़े
पहले से ही पहुँचे हुए हैं।
साधना जैसा कष्ट उठाकर सहन भी किया जाए तो उसके बेतरह नष्ट होने का दुःख
और भी विकट होगा। अगले दिनों हर किसी को निर्वाह भर मिलेगा और शक्ति भर
अनिवार्य रूप से काम करना पड़ेगा।
साधना की आवश्यकता पूरी करेगा। देशकाल और पात्र के
अनुरूप सदा ही साधना-विधानों में हेर-फेर होता रहा है और उसका संदेश लेकर
तत्कालीन अग्रदूत इस पृथ्वी पर आते रहे। आज की स्थिति में व्यक्तिगत महानता
के अभिवर्द्धन और लोक-मंगल के अनुष्ठान की दृष्टि से वही प्रक्रिया
सर्वोत्तम रहेगी, जिसे मई के अंक में संक्षिप्त रूप से बताया गया है। आशा है, उसे पढ़-समझ लिया गया होगा।
साधना कहते हैं। साधन की चेष्टा जुटाना— साधना। साधन अर्थात प्रयत्न, उपकरण, क्रियाकलाप। साध्य— ईश्वर की अनुकंपा की— प्रसन्नता और सहायता की प्राप्ति। साधना एक उपाय भर है।
साधना-पद्धति को नवनिर्माण की युग-साधना त्रिवेणी कहना चाहिए। निश्चित रूप
से यह एक योग-साधना और तपश्चर्या है। एकांत में प्राणायाम करना ही एकमात्र
योगाभ्यास नहीं है। गीता में कहे गए कर्मयोग का यह श्रेष्ठतम और सामयिक
स्वरूप है। इस युग-साधना में जहाँ व्यक्ति के निज का अंतःकरण योगियों जैसा
निर्मल होता है, वहाँ उनकी तप-साधना के प्रकाश से असंख्यों को अपना उद्धार
करने का लाभ मिलता है।
साधना-यज्ञ के होते हैं, जिससे कुंडलिनी विद्या के अंतर्गत
चक्रों के जागरण की प्रक्रिया द्वारा संपन्न किया जाता है—
साधना के विज्ञान
का संबंध है, जिह्वा और हृदय दोनों को एक ही रथ के दो पहिए माना गया है।
मंत्र-साधना में दोनों का सहयोगात्मक समन्वय समान रूप से रहने पर ही अभीष्ट
प्रयोजन सिद्ध होता है। शरीर विज्ञान की दृष्टि से जिह्वा की तरह ही थोड़ा परिचय यह है—
साधना
नहीं हो सकती। इसे आत्मशक्ति-संवर्द्धन का आधारभूत स्रोत माना गया है।
साधना का सहारा लेकर मनुष्य को अपने मन का परिष्कार करना चाहिए। यह एक महान
तप है। जिसने इस तप की सिद्धि कर ली, मन को मुट्ठी में कर लिया, मानो उसने संसार की समस्त सफलताओं एवं उन्नतियों की कुंजी
ही पा ली।
साधना के संवाद वृहद्बल तक भी पहुँचे। एक दिन वे स्वतः राजकुमारी के पास जाकर अपनी भूल के लिए क्षमा माँगने लगे, पर राजकुमारी ने विवाह करने से इनकार करते हुए कहा— "इस देश की कोई भी कन्या अन्याय के सम्मुख घुटने न टेके। मैं इसकी प्रेरणास्वरूप आजीवन कुमारी ही रहूँगी।"
साधना को अपनाना ही चाहिए। उस दिशा में कदम बढ़ाना ही चाहिए। कहना न
होगा कि व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण की त्रिविधि
साधना-पद्धति को नवनिर्माण की युग-साधना त्रिवेणी कहना चाहिए। निश्चित रूप
से यह एक योग-साधना और तपश्चर्या है। एकांत में प्राणायाम करना ही एकमात्र
योगाभ्यास नहीं है।
साधना और व्यक्ति का समग्र
निर्माण जैसे कठिन मार्ग पर चलना पड़ता है। चतुर लोग इस झंझट में पड़कर
अपनी विलासी और महत्त्वाकांक्षी प्रवृत्ति कैसे छोड़ सकते हैं? वे नकलीपन
का आश्रय लेते हैं। ऐसे संत-महात्मा और सिद्धयोगियों की कमी नहीं, जो हाथ
ऊपर करके आसमान में से इलायची मँगाते और भक्त और दर्शकों को खिलाते हैं। यह
जादूगरों द्वारा रुपया बनाने जैसे खेलों की भोंड़ी नकल है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-August
साधना के लक्ष्य एवं साधन विधान की यथार्थता एवं सफलता के बारे में मन सुनिश्चित और संशय रहित रहना चाहिए। इसके लिए सतत प्रयत्न करते रहने और तत्काल फल प्राप्ति के लिए उतावली न करने का धैर्य भी आवश्यक है।
साधना की निरन्तर गतिशील तप साधना का समन्वय ही वह मर्म है जिसके आधार पर गुरुदेव अध्यात्म विज्ञान की गरिमामयी यथार्थता को अपनी उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित कर सके। हर कोई जानता है कि उनका व्यक्तित्व ‘असाधारण’ है। युग-निर्माण परिवार का विशालकाय संगठन, हर दिशा से प्रगति पथ पर अग्रसर युग-परिवर्तन अभियान। एक लाख सजग आत्माओं की सृजन सेना का गठन, बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति का गगन भेदी शंखनाद, आर्ष साहित्य का सर्व सुलभ सरलीकरण, युग साहित्य के सृजन का अजस्र प्रवाह आदि लोक मंगल के लिये उनके प्रयासों को अनुपम और ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है। अपनी व्यक्तिगत तप साधना से उनने अगणित व्यक्तियों की भौतिक और आत्मिक सहायताएं की हैं उनके प्रतिफल को देखते हुए अवाक् रह जाना पड़ता है।
साधना का माध्यम बनाये। ऐसी दशा में विधि-विधान भी अपनी-अपनी परम्पराओं के अनुसार अपनाना होगा। यों यह मार्ग भी देर सवेर में लक्ष्य तक पहुँचा ही देगा और अश्रद्धा, संदेश एवं आशंका के वातावरण में किये गये उपयुक्त मन्त्र की अपेक्षा अधिक अच्छा रहेगा। पर यह काम चलाऊ समझौता है, तथ्य नहीं। यदि लेखक को हिन्दू धर्मानुयायी होने और एक मंत्र विशेष पर उसका पक्षपात होने के दोष से मुक्त किया जा सके तो उसे यह कहने में कोई संकोच न होगा कि गायत्री मन्त्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है।
साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिये उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था प्रमाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएं उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिये सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं जो उपरोक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
साधना के दिव्य दृष्टि-कोण को स्थान देने की आवश्यकता ही नहीं समझी। फलस्वरूप उस छोटे से शारीरिक श्रम का जितना स्वल्प लाभ हो सकता है था उसके अतिरिक्त और कुछ अधिक हाथ न लग सका। ईश्वर को अबोध बालक मान बैठना उपहासास्पद है। शब्द जञ्जाल में तुच्छ से उपहारों में छुट-पुट क्रिया-कृत्यों से उसे बहकाने, फुसलाने का प्रयास अपने ही अनाड़ीपन का परिचय देना है। इन दिनों अधिकाँश लोगों की ऐसी ही अधूरी बचकानी पूजा-पत्री लकीर पीटने की तरह प्रयुक्त होती रहती है।
साधना कर ली है। औषधि का लाभ उन्हें ही मिलता है जो बताये हुए अनुपात और पथ्य का भी ठीक तरह प्रयोग करते हैं। अतः पहले आत्म उपासना फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्म विद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मन्त्र और देवता के भगवान और भक्ति के पीछे पड़ जाते हैं इससे पहली आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये, उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र है उसे उतना ही मिलेगा।
साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है। मन्त्रों की एक यति सब के लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का -लय का-निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मन्त्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिये उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।
साधना विज्ञान में ‘कुमारी’ को भगवती दुर्गा का ही स्वरूप माना गया है और इसी नाम से उसकी प्रतिमा स्थापित करके पूजा विधान बनाया गया है। बाल-गोपाल को भगवान कृष्ण का सर्वोत्तम प्रतीक माना जाता है। युवावस्था के उभार उतने सात्विक नहीं रहते जितने बालकपन के होते हैं। इसलिए सतोगुणी निष्ठा वाले भक्त साधक सदा भगवान के बाल रूप को ही अपनी ध्यान प्रतिमा में स्थापित करते हैं और उसी रूप की प्रतिमा बनाते हैं।
साधना काल एवं उसके उपरान्त होता है। लगता है कि कुछ अतिरिक्त और महत्वपूर्ण शक्ति कहीं से मिलती है और वह अपेक्षा कृत अधिक आत्म बल सम्पन्न बना है। हर्ष, सन्तोष और प्रकाश के रूप में मंत्र की उपलब्धि को सहज ही परखा जा सकता है। कहना न होगा कि इसका लाभ अपने तक ही सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव बाह्य जगत पर भी पड़ता है।
साधना करनी पड़ती है। उन अफ्रीकियों का विश्वास है कि देवता उनके वशवर्ती रहते हैं उनकी सहायता से वे किसी का भी भला-बुरा कर सकती हैं। इसलिए वे उनसे डरते हैं। सम्मान देते हैं और सहायता करते हैं। वे सोचते हैं इनसे झगड़ने में वे घाटे में रहेंगे।
साधना करते हुए उसके विनियोग भाग को भी जानना समझना और अपनाना आवश्यक है।
साधना करने से पूर्व संकल्प पढ़े जाते हैं। उनमें यह प्रतिज्ञा रहती है कि इस साधना का उद्देश्य क्या है। इसके माध्यम से हमें जाना कहाँ है- और प्राप्त करना क्या है? स्थूल रूप से पंच तत्वों एवं तीन गुणों के रूप में भी मंत्रों की प्रवृत्ति मिलती रहती है और उस तत्व के अनुरूप पूजा उपकरण इकट्ठे करके भी तत्व साधना की जाती है।
साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएं उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिये सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं जो उपरोक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
साधना से उनने अगणित व्यक्तियों की भौतिक और आत्मिक सहायताएं की हैं उनके प्रतिफल को देखते हुए अवाक् रह जाना पड़ता है। गुरुदेव की निजी देवोपम जीवनचर्या का लेखा-जोखा लिया जाय तो उसे पग-पग पर अतिमानवी और चमत्कारी पाया जा सकता है। एकाकी व्यक्ति इतने बड़े सफल प्रयासों का साधन रहित स्थिति में कैसे सृजन संचालन कर सकता है यदि एक शब्द में इसका उत्तर लेना हो तो उसे अध्यात्म विज्ञान की यथार्थता का प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जा सकता है।
साधना का उद्देश्य क्या है। इसके माध्यम से हमें जाना कहाँ है- और प्राप्त करना क्या है? स्थूल रूप से पंच तत्वों एवं तीन गुणों के रूप में भी मंत्रों की प्रवृत्ति मिलती रहती है और उस तत्व के अनुरूप पूजा उपकरण इकट्ठे करके भी तत्व साधना की जाती है।
साधना में ब्रह्मचर्य का विशेष महत्व बताया गया है और उसकी आवश्यकता का स्थान-स्थान पर प्रतिपादन किया गया है। उसका कारण मात्र शरीर की एक धातु के क्षरण से होने वाली नगण्य सी क्षति को बढ़ा-चढ़ा कर तूल देना नहीं वरन् प्राण तत्व भी एक बड़ी मात्रा में सन्निहित रहता है। मुख्य हानि इसी के क्षरण की है।
साधना की प्रथम सीढ़ी बताई गई है।
साधना तक प्रक्रिया में आहर शुद्धि का अति महत्वपूर्ण स्थान है। यदि उस ओर ध्यान नहीं दिया जाय और प्राणायाम, प्रत्याहार, नेति, धोति आदि आगे के क्रिया-कलापों में उलझा जाय तो वह समय पूर्व की बात होगी। अक्षर ज्ञान सीखे बिना किसी बच्चे को ज्यामिति के कठिन प्रश्न हल करने को कहा जाय तो यह अनुपयुक्त ही होगा। आहार में मस्तिष्क और भाव स्तर को सात्विकता की दिशा में अग्रगामी बना सकने वाले तत्वों से संयुक्त न बनाया जा सके तो भूखे पेट फुटबाल खेलने जैसा उपहासास्पद होगा। आत्मिक प्रगति के लिये आहार शुद्धि पर पूरा-पूरा ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।
साधना की आग में जलाकर नष्ट कर दिया है। अपने कल्मष जल गये तो उन्होंने दूसरों के बदले के कठोर प्रायश्चित किये और उन्हें दण्ड दुष्परिणामों से बचाया। यह क्रम अभी भी जारी है और आगे भी जारी रहने वाला है।
साधना के परमार्थ प्रयोजन में लगाने के लिये बहुत कुछ प्रस्तुत रह सकेगा।
साधना विज्ञान करता है। भौतिक सिद्धियों और दिव्य विभूतियों का इतना बड़ा भण्डागार मानवीय चेतना में सन्निहित है कि उसे विकसित करते चलने पर ईश्वरीय सृजन के इस विराट ब्रह्माण्ड के भीतर जो कुछ है उस सबके उपयोग और उपभोग की सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है। इतना ही नहीं जीव समग्र ब्रह्म बन सकता है।
साधना आरम्भ करने के बाद और भी अधिक गई गुजरी स्थिति में चले गये। न तो उनमें कोई प्रत्यक्ष विशेषता देखी गई न आत्मिक महत्ता। न उन्हें सुख प्राप्त था न शान्ति। स्वास्थ्य से लेकर सम्मान तक कोई भी सम्पदा उनके पास नहीं थी और न विवेक से लेकर आत्मबल तक कोई प्रतिभा विशेषता उपलब्ध हुई। वरन् जिस स्थिति में उन्होंने वह उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाई पीछे उनकी स्थिति हर प्रकार बिगड़ती ही चली गई।
साधना का समन्वय ही वह मर्म है जिसके आधार पर गुरुदेव अध्यात्म विज्ञान की गरिमामयी यथार्थता को अपनी उपलब्धियों के आधार पर प्रमाणित कर सके। हर कोई जानता है कि उनका व्यक्तित्व ‘असाधारण’ है। युग-निर्माण परिवार का विशालकाय संगठन, हर दिशा से प्रगति पथ पर अग्रसर युग-परिवर्तन अभियान। एक लाख सजग आत्माओं की सृजन सेना का गठन, बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति का गगन भेदी शंखनाद, आर्ष साहित्य का सर्व सुलभ सरलीकरण, युग साहित्य के सृजन का अजस्र प्रवाह आदि लोक मंगल के लिये उनके प्रयासों को अनुपम और ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है। अपनी व्यक्तिगत तप साधना से उनने अगणित व्यक्तियों की भौतिक और आत्मिक सहायताएं की हैं उनके प्रतिफल को देखते हुए अवाक् रह जाना पड़ता है।
साधना की उपेक्षा और विधि-विधान को ही सब कुछ मान बैठने की भूल है यदि यह भूल सुधार ली जाय और साधना के राजमार्ग पर चलने की सर्वांगपूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया-कलापों की।
साधना के पुरुषार्थ से कुछ भौतिक लाभ भले ही मिल जायं, देवत्व का एक कण भी उसे प्राप्त न होगा। और आसुरी भूमिका पर कोई सिद्धि मिल भी जाय तो अन्ततः उसके लिये घातक ही सिद्ध होगी। असुरों की साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है मैले पर नहीं।
साधना के क्षेत्र में गतिरोध उत्पन्न करना होगा। अभी तो सरल प्रतिपादन यही है कि अपनी श्रद्धानुरूप मन्त्र और परम्परानुसार विधि-विधान अपना लिया जाय। यह तरीका भी बुरा नहीं है। प्रगति धीमी भले ही रहे पर प्रगति लक्ष्य की ही ओर होती रहेगी।
साधना की सफलता के लिए उपयुक्त मनोभूमि बनेगी। इस प्रकार का शारीरिक और मानसिक निर्माण अध्यात्मिक प्रगति की कुँजी समझी जानी चाहिए। साधक की सफलता का तीन चौथाई श्रेय इसी तथ्य पर निर्भर है। विधि-विधान को तो एक चौथाई ही महत्व दिया जा सकता है। इन दिनों साधना पथ के पथिकों को जो असफलता जन्य निराशा ही हाथ लगती है उसका एक बहुत बड़ा कारण जीवन साधना की उपेक्षा और विधि-विधान को ही सब कुछ मान बैठने की भूल है यदि यह भूल सुधार ली जाय और साधना के राजमार्ग पर चलने की सर्वांगपूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया-कलापों की।
साधना उपक्रम जिसे गुरुदेव अनन्य निष्ठा के साथ आजीवन अपनाये रहे और जो भी संपर्क में आया उसे आत्म विद्या के इसी मर्म तथ्य को समझाने में लगे रहे। कहा नहीं जा सकता कि बात कितनों के गले उत्तरी पर जिनने भी उसे गहराई से समझा और अपनाया उन्होंने अपने प्रयास के अनुरूप वही पाया जो गुरुदेव ने तथा पूर्ववर्ती आत्मवादियों ने समय-समय पर प्राप्त किया है। जो सस्ते मूल्य में अत्यधिक पाने की जुआरी मनोवृत्ति अपनाकर ईश्वर संपर्क में भी दाव लगाते रहे- प्रचलित प्रवञ्चना से ऊँचे न उठ सके उनके तनिक से तन्त्र-मन्त्र द्वारा मनोकामनाओं की पूर्ति की कौड़ी कदाचित ही पट्ट पड़ी होगी।
साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है। आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिये वमन, विरेचन, स्नेहन, नस्व यह पंच कर्म शरीर शोधन के लिये हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार-ऋषि, छंद, देवता, बीज, और तत्व हैं जो इन सब साधनों को जुटाकर मंत्र साधना कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर ही रहती है।
साधना करके अपने गणेश को परिपुष्ट बना लेगा वह विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जड़ों में पानी नहीं देगा उनके विनायक भगवान सूखे मूर्च्छित एक कोने में पड़े होंगे। लड्डू, खीर खिलाने, स्तोत्र पाठ करने पर भी वे कुछ सहायता न कर सकेंगे। बुद्धिमान और विद्वान बन सकना सम्भव न होगा। हर किसी की भुजाओं में हनुमान का निवास है।
साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा उनके बढ़े हुए सतोगुण की ही है।
साधना “एक हाथ में माला एक हाथ में भाला” का मन्त्र दिया था। गाँधी जी ने अपने शिष्यों को खादी पहनने और जेल जाने के सत्याग्रह संग्राम में लगाया था। युग के अनुरूप लोक साधनाएं बदलती रही हैं। आज के युग के अनुरूप वही युग साधनाएं हैं जिन्हें ‘युग-निर्माण योजना’ के नाम से प्रस्तुत किया गया है। इन आदर्शों के अनुरूप अपनी मनोभूमि और क्रिया-कलाप कैसे ढाला जाय इसका अधिक स्पष्ट और अधिक व्यावहारिक रूप ‘नई छपी’ हमारी ‘युग-निर्माण योजना’ में प्रस्तुत किया गया है इस प्रकाश में अपने चिंतन और क्रियाकलापों को परिष्कृत विकसित किया जाना चाहिये।
साधना के उपरान्त कन्या भोज का प्रचलन है। ब्रह्मभोज के समान ही कन्या भोज है। आज की परिस्थिति में तो कन्या का महत्व ब्राह्मण से भी अधिक है। कारण कि ब्रह्मचर्य पालन, बालसुलभ निर्मलता एवं कन्या तत्व की स्वाभाविक विशेषता के कारण वे आज के नाममात्र के ब्राह्मणों की अपेक्षा कहीं आगे हैं। इसलिए विवेकशील लोग आवश्यकता पड़ने पर ब्राह्मण भोजन की अपेक्षा कन्या भोजन को अधिक उपयुक्त मानते हैं।
साधना के राजमार्ग पर चलने की सर्वांगपूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया-कलापों की।
साधना बताई गई है। वीर्य से खींचा गया यह स्वत्व या तत्व जिसे ओजस् कहते हैं न केवल स्थूल शरीर को प्रभावित करता है वरन् ‘सूक्ष्म शरीर’ और ‘कारण शरीर’ को भी प्रभावित एवं परिपुष्ट करता है। कामोत्तेजना से रक्त का मंथन होकर रेतस् ग्रन्थियों द्वारा वीर्य का निर्माण, उसका एक नियत थैली में संचय और स्खलन के साथ उसका मूत्रेन्द्रिय द्वारा बाहर निकल जाना, इस मोटी बात को शरीर शास्त्र का सामान्य विद्यार्थी भी जानता है। पर यह जानकारी किसी-किसी को ही है कि कामवासना के विचार समस्त शरीर में फैले हुए प्राण तत्व का मंथन करते हैं और सम्भोग के समय वीर्यपात के साथ साथ ही इस प्राण प्रवाह का एक अंश भी बाहर चला जाता है। फलतः इससे व्यक्ति क्रमशः दुर्बल होता जाता है।
साधनाएं बदलती रही हैं। आज के युग के अनुरूप वही युग साधनाएं हैं जिन्हें ‘युग-निर्माण योजना’ के नाम से प्रस्तुत किया गया है। इन आदर्शों के अनुरूप अपनी मनोभूमि और क्रिया-कलाप कैसे ढाला जाय इसका अधिक स्पष्ट और अधिक व्यावहारिक रूप ‘नई छपी’ हमारी ‘युग-निर्माण योजना’ में प्रस्तुत किया गया है इस प्रकाश में अपने चिंतन और क्रियाकलापों को परिष्कृत विकसित किया जाना चाहिये। विकसित मनोभूमि ही उस अनुदान को सार्थक बना सकेगी।
साधना प्रयोगों में लगे लोगों के सम्मुख असफलता का कारण भी स्पष्ट हो गया। अब उन्हें विधि-विधानों का दोष ढूंढ़ने की अपेक्षा अपने उथलेपन की समीक्षा करनी पड़ेगी। अब निर्भ्रान्त आत्मवादियों को आत्म परिष्कार का महत्व समझना होगा और भौतिकवादी लिप्साओं की पूर्ति के लिए नहीं आत्मवादी महानता विकसित करने के लिए उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के विकास का मार्ग अपनाना पड़ेगा। सस्ते मोल में बहुमूल्य उपलब्धियों के लिए ललचाने वाले जुआरियों की भीड़ निस्सन्देह छूट जायेगी पर गहरे समुद्र में गोते लगाकर मोती समेटने वाले साहसी लोग आगे भी आयेंगे। कीमत चुकाकर बहुमूल्य उपलब्धियाँ खरीदने वाले ही सच्चे व्यापारी होते हैं।
साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार-चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो। गुरु का यह कर्तव्य भी हो जाता है कि शिष्य का न केवल पथ-प्रदर्शन करे वरन् उसे अपनी शक्ति का एक अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भी बनाये। अस्तु ऋषि का आश्रय मन्त्र साधना की प्रथम सीढ़ी बताई गई है।
साधना’ में संलग्न होना चाहिये। अध्यात्म साधनाएं युग के अनुरूप बदलती रही हैं। भगवान राम ने अपने अनुयायियों को लंका अभियान में जुटाया था। भगवान बुद्ध ने युवा नर नारियों को संन्यास देकर धर्म प्रचार के लिये विश्व भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने शिष्यों को आत्म-कल्याण की तप साधना “एक हाथ में माला एक हाथ में भाला” का मन्त्र दिया था।
साधना और उसके आधार पर मिली हुई सिद्धियों से उनका अन्ततः सर्वनाश ही उत्पन्न हुआ। अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अन्तःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा, उतनी ही उसकी उपासना सफल होगी। धुले हुए कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा उपासना का आशाजनक लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है।
साधना में प्रमुख स्थान है कि उसमें विकारों का उद्भव ने होने से सात्विकता की मात्रा अधिक रहती है। जहाँ अन्य देवियाँ विवाहित होने के कारण रजोगुणी क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी हैं वहाँ ‘कुमारी’ का ब्रह्मचर्य एवं शैशव उसकी गरिमा को सहज ही बढ़ा देता है। शक्ति उपासना क्षेत्र में कुमारी पूजन को प्राथमिकता इसीलिए दी गई है।
साधना करे तो उसे आहार, वस्त्र, रहन-सहन, माला, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि में किस प्रकार का चयन करना चाहिये। तत्व निर्धारण में इन्हीं बातों का ध्यान रखा जाता है।
साधनाएं हैं जिन्हें ‘युग-निर्माण योजना’ के नाम से प्रस्तुत किया गया है। इन आदर्शों के अनुरूप अपनी मनोभूमि और क्रिया-कलाप कैसे ढाला जाय इसका अधिक स्पष्ट और अधिक व्यावहारिक रूप ‘नई छपी’ हमारी ‘युग-निर्माण योजना’ में प्रस्तुत किया गया है इस प्रकाश में अपने चिंतन और क्रियाकलापों को परिष्कृत विकसित किया जाना चाहिये। विकसित मनोभूमि ही उस अनुदान को सार्थक बना सकेगी।
साधना का एक अंश देकर वरदान आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। भारत ही नहीं संसार भर का पुराण साहित्य ऐसी ही घटनाओं से भरा पड़ा है जिनमें चर्चा के प्रमुख पात्रों में से अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएं देव प्रदत्त थीं। ऋषियों, तपस्वियों, सन्तों के जीवन चरित्रों में अधिकाँश में ऐसे वर्णन मौजूद हैं जिनसे प्रतीत होता है कि उनमें कितनी ही अलौकिक विशेषताएं थी और उन्हें, उनने तप साधना के द्वारा देवताओं से अथवा सीधे भगवान से पाया था प्रमाणिक इतिहास में भी ऐसे अगणित प्रमाण विद्यमान हैं जिनसे साधना के फलस्वरूप अनेक व्यक्तियों ने अपने व्यक्तित्वों में ऐसी विशेषताएं उत्पन्न कीं जो सर्वसाधारण के लिये सम्भव या सुगम नहीं होतीं। अभी भी ऐसे व्यक्ति मौजूद हैं जो उपरोक्त तथ्य को अपने अद्भुत व्यक्तित्व या कर्तृत्व के द्वारा सही सिद्ध कर रहे हैं।
साधना की सफलता के लिए साधक का उपयुक्त व्यक्तित्व निर्माण करना एक ऐसा कार्य है जिस पर जितना अधिक ध्यान दिया जाय उतना ही उत्तम है। शरीर के क्रिया कलाप ऐसे हों, जिनमें इन्द्रिय शक्ति कलुषित एवं विकृत न होती हो। इस दृष्टि से इन्द्रिय निग्रह, संयम और सदाचार पर अत्यधिक जोर दिया जाना चाहिए। साथ ही भावनाओं की उत्कृष्टता मंत्र शक्ति में प्राण फूंकती है इस बात को ध्यान में रखा जाय। साधना के लक्ष्य एवं साधन विधान की यथार्थता एवं सफलता के बारे में मन सुनिश्चित और संशय रहित रहना चाहिए।
साधना विधान के अन्य माध्यम भी हैं पर मंत्र साधना सर्वत्र अनिवार्य है। कारण कि इससे संकल्प शक्ति जागृत एवं नियन्त्रित होती है, साथ ही शब्द विज्ञान का ऐसा सुन्दर सुयोग भी जुड़ता है जो साधक की प्रसुप्त किन्तु अति अद्भुत शक्तियों को जागृत कर उसे आत्मबल सम्पन्न बनाता है और बाह्य जगत को प्रभावित करने की रहस्यमयी हलचलों का सृजन करता है।
साधना काल में जागरुकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।
साधना पथ के पथिकों को जो असफलता जन्य निराशा ही हाथ लगती है उसका एक बहुत बड़ा कारण जीवन साधना की उपेक्षा और विधि-विधान को ही सब कुछ मान बैठने की भूल है यदि यह भूल सुधार ली जाय और साधना के राजमार्ग पर चलने की सर्वांगपूर्ण तैयारी की जाय तो उसकी सफलता भी उतनी ही निश्चित है जितनी सही ढंग से किये गये भौतिक विज्ञान संबंधी क्रिया-कलापों की।
साधना की जाती है।
साधना के जो पुण्य बचे हैं वे भी उन्हें समाप्त करने हैं क्योंकि स्वर्ग और ऐश्वर्य जैसे फल भुगतने के लिए फिर उन्हें बन्धन में बँधना पड़ सकता है। इसलिए उपार्जित पुण्य और तप की पूँजी भी वे जमा नहीं रखना चाहते। प्रत्यावर्तन उसी का वितरण है। जिन भाग्यवानों को इस अनुदान का थोड़ा सा भी अंश मिल सका वे निश्चित रूप से उसके लिये भाग्य की सराहना जन्म−जन्मांतरों तक करते रहेंगे।
साधना के अनुरूप दृष्टिकोण अपनाना और कर्तृत्व व्यवहार में लाना नितान्त सरल प्रतीत होगा। उन्हें किसी अड़चन अवरोध की कठिनाई प्रतीत न होगी।
साधना सर्वत्र अनिवार्य है। कारण कि इससे संकल्प शक्ति जागृत एवं नियन्त्रित होती है, साथ ही शब्द विज्ञान का ऐसा सुन्दर सुयोग भी जुड़ता है जो साधक की प्रसुप्त किन्तु अति अद्भुत शक्तियों को जागृत कर उसे आत्मबल सम्पन्न बनाता है और बाह्य जगत को प्रभावित करने की रहस्यमयी हलचलों का सृजन करता है।
साधनाएं युग के अनुरूप बदलती रही हैं। भगवान राम ने अपने अनुयायियों को लंका अभियान में जुटाया था। भगवान बुद्ध ने युवा नर नारियों को संन्यास देकर धर्म प्रचार के लिये विश्व भ्रमण का कार्यक्रम बनाया था। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने शिष्यों को आत्म-कल्याण की तप साधना “एक हाथ में माला एक हाथ में भाला” का मन्त्र दिया था। गाँधी जी ने अपने शिष्यों को खादी पहनने और जेल जाने के सत्याग्रह संग्राम में लगाया था।
साधना पूरी हुई। दुर्वासा के शाप से संत्रस्त राजा अम्बरीष की सहायता करने भगवान का चक्र सुदर्शन स्वयं दौड़ा आया था। समुद्र से टिटहरी के अण्डे वापिस दिलाने में सहायता करने के लिये भगवान अगस्त मुनि बनकर आये थे। नल और नील ने समुद्र पर पुल बाँधने का असम्भव दीखने वाला काम सम्भव कर दिया था। हनुमान को समुद्र लांघने की शक्ति भी किसी अदृश्य शक्ति से ही उपलब्ध हुई थी।
साधना द्वारा अपना मनोबल तथा आवश्यक चुम्बकीय विद्युत की मात्रा बढ़ाते थे। उनकी चिकित्सा प्रणाली में दूर से आने वाली मधुर और मादक संगीत का प्रयोग किया जाता था ताकि रोगी को मानसिक एकाग्रता और भाव सान्त्वना का लाभ मिले। अपने में शारीरिक विद्युत की मात्रा बढ़ाना और उस लौह चुम्बक के माध्यम से रुग्ण व्यक्तियों को लाभान्वित करना यही उनका चिकित्सा क्रम था। लाभान्वित रोगियों के मुँह से प्रशंसा सुनकर कष्ट पीड़ितों की संख्या दिन-दिन बढ़ने लगी और वह हर रोज सैकड़ों तक पहुँचती।
साधना के लिए भीतर से हुलास क्यों नहीं उठा-पत्थर के टुकड़ों पर सिर पटककर ईश्वर भक्ति की विडम्बना तो रचता रहा पर प्रेम के अमृत की एक बूँद भी सच्ची भक्ति के रूप में कभी नहीं उपजी। आस्तिकता का कलेवर ओढ़े फिरने वाले नास्तिक-बता तेरी इस बाल-क्रीड़ा से ईश्वरीय अनुग्रह का एक कण भी कैसे मिल सकेगा?
साधना कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर ही रहती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1972-September
साधना का मार्ग बताया है। उदारता, करुणा, आत्मीयता का विस्तार जब होता है तो स्वभावतः दूसरों का दुख अपना दुख प्रतीत होता है और दूसरों के सुख में अपने सुख की अनुभूति होती है। ऐसी मनःस्थिति में व्यापकता और उदारता की मात्रा बढ़ती चली जाती है। आत्मविस्तार के साथ अपने पराए का भेदभाव मिटता जाता है और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का आदर्श व्यवहार में अधिकाधिक प्रविष्ट होता चला जाता है। तब मनुष्य को स्वार्थी न रहकर परमार्थी बनना पड़ता है।
साधना-अर्चना है।"
साधनासंपंन लोगों से ईर्ष्या करते हैं। कई तो वैसी उपलब्धियों के लिये कुकर्म करने से भी नहीं चूकते।"
साधना पद्धतियाँ प्रचलित हैं। दोनों ही विद्याएँ अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं। तंत्र की प्रत्यक्ष शक्तियोग से अधिक है इसीलिए असुर वर्ग उसे अपनाता रहेगा। जहाँ तक शक्ति उत्पादन का संबंध है वहाँ तक तंत्र अधिक क्षमता संपंन और जल्दी परिणाम उत्पन्न करने वाला है, पर उसमें दोष एक ही है कि योग संबंधित सतोगुण का सर्वथा प्रतिकूल तमोगुण उत्पन्न होता है। पाप वृत्तियाँ भड़कती हैं और उपलब्धियों को असुर कर्मों में लगा देने का क्रम चल पड़ता है।
साधना-उपासना भी एक सीमा तक ही इस प्रयोजन में सहायक हो सकती है। स्पष्ट है कि उपासनात्मक उपचारों को ‘साधन’ कहा जाता है, साध्य नहीं। साध्य है आत्मोत्कर्ष और उसके लिए चिंतन एवं कर्त्तृत्व से प्रखर, परिष्कृति का समावेश। जीवन लक्ष्य इसी का दूसरा नाम है। स्वर्गमुक्ति इसी के प्रतिफल हैं।
साधना को भी सोमपान का नाम देते हैं।
साधना का क्रम चलाया। लोगों ने उसके कथन में यथार्थता पाई तो उन्होंने स्वर्गीय आत्माओं द्वारा निर्देशित कुछ संगीत निर्देशावलियाँ नोट कराने का अनुरोध किया। उसने यह स्वीकार कर लिया। फलतः 3000 शब्दों की एक संगीत निर्देश माला प्रकाशित हुई। नाम है उसका— "टेन कमाँडमेन्टर फारम्युजिशि येशन्स।
साधना आरंभ कर दी। रोजमेरी ब्राउन का कहना है कि उसका अशरीरी अध्यापक अन्य संगीतविज्ञानियों को साथ लेकर उसे सिखाने आता है। उनके मृतात्मा शिक्षकों में बाख, बीठों, फेंन, शोर्ये, देवुसी, लिश्ट, शूवर्ट जैसे महान संगीतकार सम्मिलित हैं, जो उसे ध्वनियाँ और तर्ज ही नहीं, सिखाते उसकी उँगलियाँ पकड़कर यह भी बताते हैं कि किस प्रकार बजाने से क्या स्वर निकलेगा। गायन की शिक्षा में भी वे अपने साथ गाने को कहते हैं। वे यह सब प्रत्यक्ष देखती हैं, पर दूसरे पास बैठे हुए लोगों को ऐसा कुछ नहीं दीखता।
साधना ऐसा अमूल्य खजाना है, जो साधक को मालामाल कर देता है।
साधना, तपस्या, तितीक्षा इसी का नाम है। अपनी आकांक्षाओं अभिरुचियों और आदतों को परिष्कृत करने के प्रयास ही आत्मसुधार या आत्मनिर्माण कहलाते हैं, साधना-समर में विजय प्राप्त वीरवर्ती ही आत्मोत्कर्ष की मंजिल पूरी करते हैं।
साधना का यही उपयुक्त अवसर है। उसने कबाड़ी के यहाँ से एक टूटा पियानो खरीदा और बिना किसी शिक्षक के संगीत-साधना आरंभ कर दी। रोजमेरी ब्राउन का कहना है कि उसका अशरीरी अध्यापक अन्य संगीतविज्ञानियों को साथ लेकर उसे सिखाने आता है। उनके मृतात्मा शिक्षकों में बाख, बीठों, फेंन, शोर्ये, देवुसी, लिश्ट, शूवर्ट जैसे महान संगीतकार सम्मिलित हैं, जो उसे ध्वनियाँ और तर्ज ही नहीं, सिखाते उसकी उँगलियाँ पकड़कर यह भी बताते हैं कि किस प्रकार बजाने से क्या स्वर निकलेगा। गायन की शिक्षा में भी वे अपने साथ गाने को कहते हैं।
साधना करनी पड़ती है, उसका क्रम अहर्निश चलता है। जागने से लेकर सोने तक का प्रत्येक क्षण इस प्रयास में लगाना पड़ता है कि चिंतन में उत्कृष्टता का और कर्त्तृत्व में आदर्शवादिता का परिपूर्ण समावेश रहे। अपनी कोई भाव तरंग उच्च गौरव से गिरी पिछड़ी न रहे, अपनी कोई हलचल ऐसी न हो जो ईश्वर के पुत्र की गरिमा के माथे पर कलंक-कालिमा लगाए। उचित-अनुचित का, श्रेय और प्रेय का निरंतर अंतर करते रहने वाली, सन्मार्ग पर अग्रसर करने वाली ऋतंभरा प्रज्ञा को जिन्होंने सर्वोपरि प्रतिष्ठा प्रदान की है वस्तुतः वे ही आत्मज्ञानी हैं। आत्मोत्कर्ष उन्हीं का हो सकता है जिन्होंने अपने सोचने और करने की समस्त हलचलों में उच्चस्तरीय तत्त्व दर्शन का समावेश कर सकने में सफलता प्राप्त की है।
साधना को इसलिए शिव-शक्ति की संयोग प्रक्रिया कहा गया है।
साधना के रूप में करती है।"
साधना को शब्द ब्रह्म की साधना के रूप में करती है।"
साधना की तत्परता पर निर्भर रहता है।
साधना तब शुरू हुई जब वे सात साल की थी। उन्होंने एक सफेद बालों वाला— "काले कोट वाला आत्मा देखा, जो आकाश से ही उतरा और उसी में गायब हो गया। उसने कहा मैं संगीतज्ञ हूँ, तुझे संगीतकार बनाऊँगा । कई वर्ष बाद उसने विख्यात पियानोवादक स्वर्गीय फ्राजलिसट का चित्र देखा। वह बिलकुल वही था, जो उसने आकाश में से उतरते और उसे आश्वासन देते हुए देखा था।
साधना विशुद्ध रूप से एक संग्राम है, जिसे लड़े बिना आगे बढ़ने का कोई उपाय नहीं।
साधना की एकाग्रता के लिए मनुष्य की अपनी सूझ-बुझ है। देवता या अवतारों के जैसे चित्र दिखाए या बताए जाते हैं, वे भी मानवीय कल्पनाएँ हैं। विभिन्न देश, धर्म के लोगों ने अपने रूप और स्वभाव वाले परमात्मा बनाए हैं; उनमें इतनी भिन्नता है कि उनमें कौन वास्तविक है यह निर्णय कर सकना शक्य नहीं।
साधनाओं द्वारा इसे विकसित कर सकते हैं। प्रेम और घनिष्ठता की स्थिति में यह आदान-प्रदान किंहीं महत्त्वपूर्ण अवसरों पर अनायास भी हो सकता है।
साधनाओं से संभव हो सकता है।
साधना में निमग्न रहती हैं। ढोंग तो किसी प्रयोजन के लिए होता है, किंतु यहाँ तो वैसा कुछ भी नहीं है। उल्टी वह तो डरती रहती है कि कहीं उसे पागल न समझ लिया जाए। मनोविज्ञानवेत्ताओं ने उसके अर्धचेतन में संगीत तथ्य के छिपे होने और उसके जागृत होने की बात चलाई पर वह भी फिट नहीं बैठी; क्योंकि उसे स्वयं की इच्छा से या वंश-परंपरा से यह शौक नहीं मिला, यह तो किन्हीं दूसरों ने उसके गले मढ़ दिया है और वे ही वलात् उसे जोते रहते हैं।
साधना-समर में विजय प्राप्त वीरवर्ती ही आत्मोत्कर्ष की मंजिल पूरी करते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-April
साधना कर्मकाण्डों से इस शक्तिस्रोत को कुरेदा, उभारा और विकसित किया जाता है। इससे साधक की भौतिक सामर्थ्य तो बढ़ती ही है, आत्मिक उत्थान का पथ भी प्रशस्त होता चला जाता है। इस मार्ग का श्रेयार्थी कर्मकाण्डों के माध्यम से ही शरीर और मन को साधने की चर्चा करते हैं।
साधना विज्ञान के क्रमिक सोपानों पर चढ़ते−चढ़ते जब थोड़ा और ऊपर बढ़ते हैं तो कुण्डलिनी योग का उच्चस्तरीय साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना विशेष के विषय में जन−मानस में बड़े व्यापक स्तर पर भ्रांतियां प्रचलित हैं। यह अपरिमित ऊर्जा केन्द्र जो मानवी काय−कलेवर के अन्तराल में सूक्ष्म रूप में अवस्थित होता है, कितना शक्तिशाली है वे विभिन्न साधना−प्रक्रियाओं माध्यम से इस योग साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।
साधनाओं के लिये एक मास के कल्प साधना सत्र–एक जून गायत्री जयन्ती से। (2) युग शिल्पियों के एक−एक मास से सृजन सत्र– एक जून गायत्री जयन्ती से (3) तीर्थयात्रा, षोडश संस्कार एवं समस्या समाधान हेतु संगम सत्र–ये 5−5 दिन के होंगे व 1 मई से आरम्भ होंगे। तीनों की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है।
साधना को अधूरा रखा, अपने इष्टदेव को इतना परिपुष्ट नहीं बनाया कि वे हमारी प्रार्थना के अनुरूप उठ खड़े हों और सुनने को तैयार हो जायें। हमने अपनी पुकार को द्रौपदी जैसा नहीं बनाया कि हमारे आर्तनाद को सुनकर कृष्ण दौड़े चले आयें और माया में भटके इस जीव का उद्धार करें।
साधना प्रसिद्ध है। स्वयं गुरु देव को जौ की रोटी छाछ पर चौबीस वर्ष रहकर चौबीस पुरश्चरण करने की बात सामने है। इसी प्रकार प्रस्तुत कल्प साधना सत्रों में साधना उपासना की प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ−साथ ही आहार कल्प का प्रावधान रखा गया है।
साधना में प्रयुक्त होती है।
साधना पद्धति से रूप में कुण्डलिनी योग की साधना बताते हैं जिससे दोनों ही प्रयोजन भौतिक व आत्मिक सधते हैं और मुक्ति का पथ प्रशस्त होता है।
साधना कर ली है। यह न करने पर तो उपासनात्मक विधि−विधानों में नष्ट किये समय व पुरुषार्थ के अभाव से साधक और भी गयी−गुजरी स्थिति में पहुँच जाता है। इसी लिये पहले आत्मोपासना और फिर देव उपासना की शिक्षा ब्रह्मविद्या के श्रेयार्थियों को दी जाती है।
साधना क्षेत्र में प्रचण्ड पुरुषार्थी बुद्ध कभी−कभी प्रकट होते हैं जो बिना किसी की सहायता के ही आत्म−ज्योति को जला लेने में सफल हो जाते हैं। लगन एवं भक्ति भावना के धनी रामकृष्ण परमहंस जैसे साधक का अवतरण कभी−कभी होता है जिनका अन्तःप्रकाश स्वतः उनके साधना का मार्गदर्शन करता है आत्म−तत्व का अपने एकाकी पुरुषार्थ द्वारा साक्षात्कार कर लेने वाले संकल्प के धनी रामतीर्थ, रामदास तो कभी−कभी ही प्रकट होते हैं, अन्यथा साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
साधना प्रयोजनों में उल्लेखनीय माना है–सिद्धासन, पद्मासन, उग्रासन, स्वस्तिकासन।
साधना प्रक्रिया द्वारा इस प्रयोजन की आपूर्ति होती है उसे प्राणायाम कहते है। प्राणायाम अर्थात् प्राण का आयाम जोड़ने की–प्राण तत्व सम्वर्धन की− ब्रह्म चेतना के महाप्राण से जुड़कर उसी के तुल्य बन जाय।
साधनाओं में यही नीति अपनानी चाहिए। साधक को अंतर्जगत में ही शरीर एवं मन को सीमाबद्ध कर गुफा प्रवेश की समाधि साधना जैसा स्तर अपनी साधनावधि में बनाकर उसे निष्ठापूर्वक निभाना चाहिए।
साधना पर तन्त्र की मोहर लगने के कारण फैली भ्रान्तियों को मिटाकर इसकी प्राथमिक जानकारी ले लेना अभीष्ट होगा।
साधना करो। इसी से तुम्हें जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होगी।” राजकुमार को अपनी भूल ज्ञात हुई। तत्वदर्शी पिताश्री की आज्ञा शिरोधार्य करके वे कर्मयोग की साधना में जुट गये।
साधना के संचित संस्कार एवं अनुभव ही सूक्ष्म रूप से प्रेरणा देते एवं मार्गदर्शन की भूमिका निभाते हैं। पर अपवाद तो अपवाद ही हैं वे जनसामान्य के अनुकरण के विषय नहीं हो सकते। इन अपवादों का अन्धानुकरण करने से तो असफलता ही हाथ लगती और साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधना की आधी मंजिल पूरी हो गयी तथा उत्तरोत्तर गति से आगे बढ़ने का एक सशक्त आधार−अवलम्बन मिल गया।
साधना क्रम निर्धारित किया जायगा।
साधना के माध्यम से सम्भव है। इस साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता पर अत्याधिक जोर दिया गया है तथा वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। भगवान शंकर द्वारा अपने तृतीय नेत्र−विवेक द्वारा स्थूल काम तत्व की भस्म कर देना और उसके सूक्ष्म शरीर को अजर−अमर बना देना। कामबीज का ज्ञानबीज में परिवर्तन का अलंकारिक वर्णन है। कुण्डलिनी साधना द्वारा उन्नयन की यह प्रक्रिया सम्पन्न कर लेना एक प्रबल आध्यात्मिक पुरुषार्थ माना जाता है।
साधना, स्वाध्याय,संयम, और सेवा के चारों उपक्रम किस प्रकार पूरे करने चाहिए। यह निर्धारण अब हर साधकों की विशेष स्थिति का पर्यवेक्षण करके पृथक पृथक ही किया जाया करेगा और उस उपक्रम का क्या प्रभाव हुआ इसकी जाँच पड़ताल ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की अनुसंधानशाला में निष्णात नृतत्व वेत्ताओं द्वारा नियमित की जाती रहेगी। जिन पापों का स्मरण हो उनके प्रायश्चित्त के सम्बन्ध में भी इन्हीं दिनों परामर्श दिया और सम्भव हो तो उसे कराया भी जायगा।
साधना का अवलम्बन लेना हर दृष्टि से हानिकारक है। उन्होंने समझाया–” तुम्हारे लिए यही उचित है कि तुम अभी प्रजा की सेवा करते हुए अपनी वृत्तियों पर नियन्त्रण करो,योग और तप के लिए इन्द्रियों पर विजय पाना आवश्यक है। इसके अभाव में अपरिपक्व मनःस्थिति का साधक कभी भी साधना मार्ग से भटक सकता है। राज्य सुखों के बीच रहते हुए मैंने दीर्घकाल तक आत्म−संयम की साधना की है। इस वय में पहुँचने पर मैंने लोकोत्तर जीवन की साधना का साधना का निर्णय लिया है।
साधना, आराधना के तत्वदर्शन को सही स्वरूप में प्रस्तुत करके ही अगले दिनों प्रज्ञायुग की सम्भावनाओं को साकार किया जा सकेगा। इस प्रज्ञायुग में श्रद्धा तत्व को मानवी अन्तराल में प्रविष्ट प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा। जो साधक जितना अधिक इस उपलब्धियों से सम्पन्न होगा, उसी अनुपात में उसे अपने दृष्टिकोण–स्वभाव–आचरण के स्तर को ऊँचा उठाने का सुवर्ण सौभाग्य प्राप्त होगा। इस सौभाग्य के सहारे ही व्यक्तित्व प्रखर बनता है व आत्मिक विभूतियों तथा भौतिक सफलताओं का पथ−प्रशस्त होता है। यह तथ्य भली−भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए कि आत्म−कल्याण का सौभाग्य वे ही प्राप्त करते हैं जो अश्रद्धा व अंधश्रद्धा दोनों से विमुख हो श्रद्धा तत्व को सच्चे अर्थों में अपने जीवन में उतारते हैं।
साधना अपने आप में पूर्ण व समग्र है। सर्वप्रथम साधकों को इस योग साधना पर तन्त्र की मोहर लगने के कारण फैली भ्रान्तियों को मिटाकर इसकी प्राथमिक जानकारी ले लेना अभीष्ट होगा।
साधनात्मक पद्धतियों में सूक्ष्म नाड़ी संस्थान के परिशोधन को प्राथमिकता दी जाती है।
साधना पद्धति में है उसका नाम है कुण्डलिनी योग। जहाँ ब्रह्मविद्या के पथ पर चलकर लक्ष्य की ओर बढ़ने वालों के प्रसुप्त के जागरण का लक्ष्य इससे सधता है, वही तन्त्र विज्ञानियों द्वारा इच्छित भौतिक प्रगति की सम्भावनाएँ भी इससे पूरी होती हैं। दोनों पक्षों के समन्वय से बनी यह उच्चस्तरीय योग साधना अपने आप में पूर्ण व समग्र है। सर्वप्रथम साधकों को इस योग साधना पर तन्त्र की मोहर लगने के कारण फैली भ्रान्तियों को मिटाकर इसकी प्राथमिक जानकारी ले लेना अभीष्ट होगा।
साधना करनी चाहिए।
साधना काम−बीज के प्रतीक मूलाधार और ज्ञान−बीज के प्रतीक सहस्रार के मिलन संयोग की दिव्य प्रक्रिया है। इस साधना में भौतिक व आत्मिक शक्तियों के स्वाभाविक पारस्परिक शिथिल सम्बन्धों को सघन बनाया जाता है। दानों के मध्य आदान−प्रदान की गति तीव्र बनायी जाती है। मेरुदण्ड रूपी महामार्ग के माध्यम से मही प्रयाण की ऊर्ध्वगमन की देवयान प्रक्रिया इसी साधना द्वारा सम्पादित की जाती है।
साधना की जाती है। साधना विज्ञान में कुण्डलिनी साधना को ही अलंकारिक रूप में कामक्रीड़ा के शब्दों में व्यक्त किया गया है। योनि, लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि प्रयुक्त किया गये शब्दों में उसी अंतःशक्ति के जागरण की विधि−व्यवस्था सन्निहित है। सम्बन्धित उल्लेख अनेकों स्थानों पर आता है–
साधना में आन्तरिक पुरुषार्थ करना पड़ता है। सर्वप्रथम स्वयं पर विजय प्राप्त करनी पड़ती है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का विश्लेषण कर लेना सबसे अधिक कठिन कार्य है। उनके परिमार्जन एवं विकास के लिए साधन−उपचार ढूँढ़ लेना तो और भी कठिन पड़ता है। उँगली पर गिने जाने वाले बिरले ही होते हैं जो एकाकी अपने बलबूते स्वयं का निरीक्षण, परीक्षण कर लेने एवं आवश्यक सुधार आदि के उपक्रम में सफल हो जाते हैं।
साधना का साधना का निर्णय लिया है। तुम्हें भी गृहस्थ जीवन में कर्मयोगी की तरह रहते हुए आत्म−परिष्कार की साधना करनी चाहिए।” ऐसा कहकर महाराज प्रियव्रत ने राजकुमार का राज्याभिषेक किया और स्वयं संन्यास धर्म का निर्वाह करने के लिए चल पड़े।
साधना बताते हैं जिससे दोनों ही प्रयोजन भौतिक व आत्मिक सधते हैं और मुक्ति का पथ प्रशस्त होता है।
साधना अवधि में चलते रहने पर जिस सर्वोपरि उपहार अनुदान की उपलब्धि होती है उसे ‘अमृत’ कहते हैं। अमृत अर्थात् आत्मबोध। आत्मबोध अर्थात् जीवन सम्पदा की उच्चस्तरीय ईश्वरीय अनुदान के रूप में मान्यता। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे बन पड़े इसी चिंतन, मन्थन और निर्धारण को ब्रह्मविद्या का सार तत्व समझना चाहिये। इसी से आध्यात्मिक काया−कल्प रूपी सिद्धि अनुदान की प्राप्ति होती है।
साधना व लौकिक पुरुषार्थ की उपेक्षा न कर सतत् लगे रहते हैं, भले ही उन्होंने उपासनात्मक कर्म−काण्डों को कभी अपनाया न हो।
साधना मार्ग से भटक सकता है। राज्य सुखों के बीच रहते हुए मैंने दीर्घकाल तक आत्म−संयम की साधना की है। इस वय में पहुँचने पर मैंने लोकोत्तर जीवन की साधना का साधना का निर्णय लिया है। तुम्हें भी गृहस्थ जीवन में कर्मयोगी की तरह रहते हुए आत्म−परिष्कार की साधना करनी चाहिए।” ऐसा कहकर महाराज प्रियव्रत ने राजकुमार का राज्याभिषेक किया और स्वयं संन्यास धर्म का निर्वाह करने के लिए चल पड़े।
साधना के प्रारम्भिक अभ्यास पूरे होना इसके अतिरिक्त लाभ हैं। जालन्धर बन्ध अर्थात् मस्तक को झुकाकर ठोड़ी को कण्ठ से लगाना व ध्यान को स्थिर करना। चित्त वृत्ति को शाँत कर मस्तिष्क को तनाव रहित व ध्यान योग्य बनाने में, विशुद्धि चक्र के जागरण में जालन्धर बन्ध सहायक होता है। इसे मुख्य रूप से प्राणायाम में कुम्भक के साथ प्रयोग करते हैं। जब तीनों बन्ध एक साथ प्रयुक्त करते हैं तो इसे महाबन्ध की स्थिति कहते हैं।
साधना−प्रक्रियाओं माध्यम से इस योग साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।
साधना विज्ञान में कुण्डलिनी साधना को ही अलंकारिक रूप में कामक्रीड़ा के शब्दों में व्यक्त किया गया है। योनि, लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि प्रयुक्त किया गये शब्दों में उसी अंतःशक्ति के जागरण की विधि−व्यवस्था सन्निहित है। सम्बन्धित उल्लेख अनेकों स्थानों पर आता है–
साधना का आश्रय लिया जाता है। मोटेतौर से विश्वास किसी बात पर तभी होता है जब उसे देखा या सुना गया हो। पंच कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से यही किया जाता है। ईश्वर दर्शन चाहे चर्मचक्षु से साकार उपासना के रूप में कल्पित किया जाय अथवा ज्ञान चक्षु के माध्यम से निराकार रूप में–उद्देश्य दोनों का एक ही है।
साधनाओं को अपने ऊपर परीक्षित किया।
साधना जहाँ लोक−व्यवहार की एक सामान्य प्रक्रिया है वहाँ आत्मिक प्रगति की सूक्ष्म साधना वह पुरुषार्थ है जिसमें साधक को अपना अन्तः का स्तर ऊँचा उठाना होता है। इन प्रयासों को ही अध्यात्म साधना कहते है। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर को बनाना होता है। चेतना की उच्चस्तरीय संवेदना को ही प्रकारान्तर से ईश्वर कहते हैं। उपासना प्रक्रिया में इसी महत् सत्ता से अपना संपर्क जोड़कर अपनी जीव सत्ता को तद्रूप बनाया जाता है।
साधना का कंटकाकीर्ण मार्ग पार करने और मंजिल तक जा पहुँचने में समर्थ हुए हैं अन्यथा अधिकाँश प्रत्यक्ष समर्थ शरीरधारी गुरु की ही सहायता, कृपा से लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो सके हैं।
साधना से इसी प्रयोजन को पूरा किया जाता है।
साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
साधना को कामकला के रूप में निरूपित किया गया है। इसका वर्णन कतिपय स्थलों पर ऐसा प्रतीत होती है मानो यह कोई काम सेवन की चर्चा की जा रही है,पर बात ऐसी नहीं है। वर्णनों में काम क्रीड़ा एवं शृंगारिकता का काव्यमय वर्णन हो किया गया है, पर क्रिश्स प्रसंग में वैसा कुछ नहीं है। तन्त्र ग्रन्थों के उलटबांसियों की तरह ‘मैथुन’ को भी तन्त्र साधना में सम्मिलित किया गया है। यह वर्णन अलंकारिक है तथा सूक्ष्म रूप से दो मूल सत्ताओं के संयोग का संकेत देता है।
साधनाएँ घर से बाहर अन्यत्र जाकर किसी तीर्थ की पवित्र भूमि में, शहरी कोलाहल से दूर,मर्यादाओं की व्रतशीलता में अपने आपको बाँध कर ही सही रीति से सम्पन्न हो पाती हैं। अन्यथा उलझे वातावरण में, अनमने मन से−उद्विग्न चित्त से, खीजते खीजते किसी प्रकार निभ कर लेने से कोई भी साधना उपक्रम सही प्रकार निभ नहीं पाता। कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनमें चिकित्सक के लिखित परामर्श और घर पर दावा भर लेते रहने से ही काम चल जाता है। परन्तु कुछ असाध्य व्याधियाँ ऐसी होती हैं कि अस्पताल में ‘इनडोर चिकित्सा’ करनी ही पड़ती है। लिये आवश्यक उपकरण, साधन तथा हर योग्यता के डॉक्टर, सर्जन, सहायक, परिचारिकाएँ हर समय उपलब्ध नहीं हो सकते।
साधना पुरुषार्थ के बलबूते−आत्मबल सम्पादन के आधार पर ही मिली, संयोगवश नहीं। भूल यह होती है कि सिद्धि बरसाने वाला पक्ष तो देखा जाता है, पर अपने को उस योग्य बना लेने की साधना की अवहेलना कर दी जाती है। यही अन्ततः निराशा का कारण बनती है। इनकी तुलना में वे कम से कम भौतिक दृष्टि से सुखी पाये जाते हैं जो श्रम−साधना व लौकिक पुरुषार्थ की उपेक्षा न कर सतत् लगे रहते हैं, भले ही उन्होंने उपासनात्मक कर्म−काण्डों को कभी अपनाया न हो।
साधनात्मक क्षेत्र में क्रियाओं से भी अधिक महत्व भावना, इच्छा और संकल्प का है। प्रायः देखा भी जाता है कि जैसे विधि−विधान साधना के पूरे करते हुए भी एक व्यक्ति चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेता है। जबकि दूसरा कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता। साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने न होने के रूप में समझा जा सकता है।
साधना रूपी पुरुषार्थ से हम ऊपर भी उठा सकते हैं। अमृत रस अर्थात्–अक्षय आनन्द। आत्मिक रसानुभूति से बढ़कर कोई और आनन्द नहीं। जीव का प्रतीक स्वरूप है प्रसुप्त पड़ी मूलाधार अवस्थित कुण्डलिनी और इसका मिलन जब परमेश्वर रूपी सहस्रार से होता है तो अद्वैत मुक्ति की स्थिति आती है। जीव वासना की तपन में जलता रहता और शरीर−मन की दिव्य सम्पदा को विनष्ट करता रहता है।
साधना के उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ पाना तथा अभीष्ट लाभ उठा सकना कठिन पड़ता है। यह सच है कि मस्तिष्क में ध्यान धारण से, नादानुसंधान, प्राण सन्दोह, बाटक आदि से प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होती है, पर उपरोक्त गड़बड़ी से सूक्ष्म अवयवों में ऊर्जा का समुचित वितरण नहीं हो पाता। यह अवरोध सूक्ष्म शरीर को बलिष्ठ बनाने के उद्देश्य से किये गये प्रयत्नों को सफल नहीं होने देता, यही कारण है कि जिस प्रकार शारीरिक परिशोधन में रक्त −संचार प्रणाली को ठीक करने पर महत्व दिया जाता है–उसी तरह आत्मविकास की साधनात्मक पद्धतियों में सूक्ष्म नाड़ी संस्थान के परिशोधन को प्राथमिकता दी जाती है।
साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण वे तलाशना होगा ताकि नित्य की साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण व शरीर की स्थिति–ये दो मिलकर आसन को सर्वांगपूर्ण बनाते हैं। आसन समग्र शरीर का होता है। कमर सीधी, आँखें अधखुली– अधबन्द-सी, शान्त चित्त, स्थिर काया यह स्थिति ध्यान के लिये उपयुक्त आसन मानी जाती है।
साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना विशेष के विषय में जन−मानस में बड़े व्यापक स्तर पर भ्रांतियां प्रचलित हैं। यह अपरिमित ऊर्जा केन्द्र जो मानवी काय−कलेवर के अन्तराल में सूक्ष्म रूप में अवस्थित होता है, कितना शक्तिशाली है वे विभिन्न साधना−प्रक्रियाओं माध्यम से इस योग साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।
साधना के क्षेत्र में भी ऐसे कितने ही तपस्वी होते हैं जो जीवन को निर्धारित परिधि में ही केंद्रीभूत रखते हैं, न शरीर को इधर उधर मचकने भटकने देते हैं एवं न मन को आवारागर्दी में भटकने देते है। उच्चस्तरीय साधनाओं में यही नीति अपनानी चाहिए। साधक को अंतर्जगत में ही शरीर एवं मन को सीमाबद्ध कर गुफा प्रवेश की समाधि साधना जैसा स्तर अपनी साधनावधि में बनाकर उसे निष्ठापूर्वक निभाना चाहिए।
साधना−पथ पर चलने वाले हर साधक को इसकी समुचित जानकारी होना चाहिये।
साधना आरम्भ करने के बाद पूर्व से भी गई−गुजरी स्थिति को प्राप्त हुए−उनके अन्तरंग व बहिरंग में कहीं भी उपासना का चमत्कार दिखाई नहीं दिया। न उन्हें सुख मिला न शान्ति। स्वास्थ्य, यश, सम्मान, वैभव किसी भी दृष्टि से उन्हें ऊँचा उठा हुआ नहीं कहा जा सका, आत्मबल वृद्धि की बात तो बहुत दूर की है। इससे स्वाभाविकतः मन में असमंजस उठता है कि ऐसा क्यों होता है? प्रक्रिया वही–फिर अवलम्बन लेने वालों में से एक को लाभ व दूसरे को हानि क्यों?
साधना का है। व्यायाम, अध्ययन, अनुभव शिल्पकला, वाणिज्य जैसे विषयों में कुशलता अर्जित कर ऐसे व्यक्ति अपना लौकिक जीवन सफल बनाते हैं, वैभव को प्राप्त होते हैं।
साधना का उद्देश्य यही है। इसी को शिव शक्ति का संयोग तथा आत्मा का परमात्मा से मिलन कहते हैं।
साधना−महापुरश्चरणों की इस प्रक्रिया में लाखों साधक अपनी संकल्प शक्ति एक साथ, एक समय विशेष में एक लक्ष्य की पूर्ति के लिये नियोजित करते हैं। अदृश्य जगत पर छाई विभीषिकाओं के निवारण व भावी विपत्तियों के परित्राण हेतु प्रज्ञा परिवार का यह ब्रह्मास्त्र युग विभीषिकाओं का तो निवारण करेगा ही, उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा भी बनायेगा। ध्यान−धारणा सम्बन्धी विवेचन मार्च अंक में विस्तार से किया गया है। उसे सभी साधक ध्यान से पढ़े व क्रियान्वित करें। प्रस्तुत अंक में साधना के अन्यान्य उच्चस्तरीय प्रयोगों की चर्चा की जा रही है जो आगे भी जारी रहेगी।
साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण व शरीर की स्थिति–ये दो मिलकर आसन को सर्वांगपूर्ण बनाते हैं। आसन समग्र शरीर का होता है। कमर सीधी, आँखें अधखुली– अधबन्द-सी, शान्त चित्त, स्थिर काया यह स्थिति ध्यान के लिये उपयुक्त आसन मानी जाती है। दोनों हाथ गोदी में हों, शरीर सुखासन की स्थिति में होते हुए भी सुस्थिर, सुव्यवस्थित हो।
साधनात्मक क्रिया−कृत्यों के साथ यही नियम लागू होता है।
साधनाओं के सम्पुट से ऊर्ध्वगमन में परिणति होती है।
साधना कहते है। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर को बनाना होता है। चेतना की उच्चस्तरीय संवेदना को ही प्रकारान्तर से ईश्वर कहते हैं। उपासना प्रक्रिया में इसी महत् सत्ता से अपना संपर्क जोड़कर अपनी जीव सत्ता को तद्रूप बनाया जाता है।
साधना आरम्भ कर देना संकट से खाली नहीं है। शास्त्रों, धर्मग्रन्थों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र को सम्बन्धित विषयों की पुस्तकों की पड़ती है। सर्वविदित है कि एकाकी पुस्तकें किसी भी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं। तो फिर साधना जैसे अविज्ञात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते है? कहना न होगा मार्गदर्शन का गुरुतर दायित्व समर्थ गुरु ही संभाल सकता है।
साधना उपासना की प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ−साथ ही आहार कल्प का प्रावधान रखा गया है।
साधना का एक अंश देकर वरदान, आशीर्वाद से लाभान्वित कर सके। मात्र भारतवर्ष नहीं− अन्यान्य धर्मों के महापुरुषों व पुराण साहित्य में वर्णित घटनाक्रमों का अवलोकन करने पर पता चलता है कि अधिकाँश की सामर्थ्य और विशेषताएँ दैवी सत्ता की कृपा के रूप में उन्हें प्राप्त हुई थी। सर्वसाधारण के लिये जो सम्भव नहीं हो पाता, वह उन्हें प्राप्त हो सका व वे साधारण स्थिति से ऊँचा उठकर महामानव, देव−पुरुष बन सकने में सफल हुए। साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि उन्हें जो सिद्धियाँ मिली−वे उनके साधना पुरुषार्थ के बलबूते−आत्मबल सम्पादन के आधार पर ही मिली, संयोगवश नहीं। भूल यह होती है कि सिद्धि बरसाने वाला पक्ष तो देखा जाता है, पर अपने को उस योग्य बना लेने की साधना की अवहेलना कर दी जाती है।
साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधना विशेष के अनुरूप अपनाकर प्रगति पथ पर क्रमिक रूप में बढ़ जाती है।
साधना में जुट गये।
साधना विज्ञान का क्रमिक रूप में अवसान ही हो जायेगा।
साधना के लिए। लकीर पीटने की भगदड़ भर मची रहती है और उसके मात्र निहित स्वार्थों द्वारा भावुक धर्म प्रेमियों की जेबें काटने तथा उलटे उस्तरे से हजामत बनाने की विडंबना देखने के अतिरिक्त और कहीं कुछ हाथ नहीं लगता।
साधनाएँ भर पृथक−पृथक रहेंगी। सामूहिक शिक्षण का स्वरूप सभी के लिए एक जैसा है। उसमें सभी को समान रूप से सम्मिलित होने का अवसर मिलेगा।
साधना में सूर्यवेधन स्तर के प्राणायाम की ही आवश्यकता पड़ती है।
साधना की जाती है।
साधना जैसा स्तर अपनी साधनावधि में बनाकर उसे निष्ठापूर्वक निभाना चाहिए।
साधना उपचार के सहयोगी उपक्रमों के रूप में ही समझा जाय। साधक के आत्म−विश्वास को बढ़ाने तथा चित्त−वृत्ति निरोध के अभ्यास में, उच्चतर आयामों में प्रवेश की गति को और भी तीव्र बनाने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
साधना सत्रों में साधना उपासना की प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ−साथ ही आहार कल्प का प्रावधान रखा गया है।
साधना क्रम के अंतर्गत नाम लिया जाता है। इस साधना विशेष के विषय में जन−मानस में बड़े व्यापक स्तर पर भ्रांतियां प्रचलित हैं। यह अपरिमित ऊर्जा केन्द्र जो मानवी काय−कलेवर के अन्तराल में सूक्ष्म रूप में अवस्थित होता है, कितना शक्तिशाली है वे विभिन्न साधना−प्रक्रियाओं माध्यम से इस योग साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।
साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता पर अत्याधिक जोर दिया गया है तथा वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। भगवान शंकर द्वारा अपने तृतीय नेत्र−विवेक द्वारा स्थूल काम तत्व की भस्म कर देना और उसके सूक्ष्म शरीर को अजर−अमर बना देना। कामबीज का ज्ञानबीज में परिवर्तन का अलंकारिक वर्णन है। कुण्डलिनी साधना द्वारा उन्नयन की यह प्रक्रिया सम्पन्न कर लेना एक प्रबल आध्यात्मिक पुरुषार्थ माना जाता है।
साधना विज्ञान के ज्ञाता करते रहे हैं।
साधना ग्रन्थों में अनेकों स्थान पर हुआ है। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि, प्राण ऊर्जा, जीवनी शक्ति अथवा कुण्डलिनी कहते हैं। अग्नि में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है जिसमें अग्नि तत्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में होते हैं। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है उसमें सजातीय तत्वों को ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है। सूर्यवेधन प्राणायाम द्वारा इड़ा−पिंगला के माध्यम से अन्तरिक्ष से खींचकर लाया गया प्राण तत्व मूलाधार में अवस्थित चिनगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता हैं तो वह भभकती है और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी सत्ता को अग्निमय बनाती हैं।
साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने न होने के रूप में समझा जा सकता है। प्रत्येक साधनात्मक क्रिया−कृत्यों के साथ यही नियम लागू होता है।
साधना प्रयोगों का मुख्य साधना उपचार के सहयोगी उपक्रमों के रूप में ही समझा जाय। साधक के आत्म−विश्वास को बढ़ाने तथा चित्त−वृत्ति निरोध के अभ्यास में, उच्चतर आयामों में प्रवेश की गति को और भी तीव्र बनाने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
साधना द्वारा उन्नयन की यह प्रक्रिया सम्पन्न कर लेना एक प्रबल आध्यात्मिक पुरुषार्थ माना जाता है।
साधना आत्म−परिष्कार का ही प्रबल पुरुषार्थ है।
साधनाओं में नियोजित करने का निश्चय कर चुके थे। वह घड़ी आयी। संन्यास दीक्षा सम्पन्न हुई। राज पुरोहित न संन्यास धर्म की गरिमा बतायी। राजकुमार आग्नीघ्र भी दीक्षा स्थली पर उपस्थित थे।
साधना विज्ञान का एक अंग है ही। दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है सूक्ष्म वातावरण परिशोधन हेतु सामूहिक ध्यान धारणा की। जिस सन्धि बेला से विश्व मानस आज गुजर रहा है, ऐसे सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता और बढ़ जाती है। ऐसे प्रयोग सम्मिलित आत्मशक्ति को उभारने के लिये किये जाते हैं। नैष्ठिकता साधना−महापुरश्चरणों की इस प्रक्रिया में लाखों साधक अपनी संकल्प शक्ति एक साथ, एक समय विशेष में एक लक्ष्य की पूर्ति के लिये नियोजित करते हैं।
साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।
साधना के वट वृक्ष की दो प्रधान शाखाएँ हैं। एक वाममार्ग, आगम या भौतिक सिद्धियों का क्षेत्र कहलाता है तो दूसरा दक्षिण मार्ग, निगम या आत्मिक ऋद्धियों की विद्या है। तन्त्र पक्ष को मानने वाले कहते हैं कि शरीर और मन में अजस्र शक्ति का भाण्डागार छिपा पड़ा है। हठयोग प्रधान तीव्र स्तर के साधना कर्मकाण्डों से इस शक्तिस्रोत को कुरेदा, उभारा और विकसित किया जाता है। इससे साधक की भौतिक सामर्थ्य तो बढ़ती ही है, आत्मिक उत्थान का पथ भी प्रशस्त होता चला जाता है।
साधना द्वारा सम्पादित की जाती है।
साधनाओं की भूल−भुलैया में कौन−सा पथ क्या है? जब कुण्डलिनी विज्ञान की विशद विवेचना की बात आती है तो का पहलू सामने आते हैं जिन पर प्रकाश पड़ना अनिवार्य है। सूक्ष्म रूप में अवस्थित इस शक्ति संस्थान का निवास, इसे जगाने की प्रक्रिया, परिणतियों–प्रतिक्रियाओं को समझ सकने योग्य विवेक−बुद्धि का विकास तथा जागरण के बाद अन्तिक लक्ष्य–कुछ ऐसे अध्याय हैं जिन पर क्रमशः विस्तृत विवेचन किया जाना है। साधकगण इसे पहले भी इस पत्रिका में पढ़ते रहे हैं, परन्तु इसके समग्र स्वरूप को बोधगम्य बनाया जा सके, यह प्रयास अब किया जा रहा है।
साधना के अन्यान्य उच्चस्तरीय प्रयोगों की चर्चा की जा रही है जो आगे भी जारी रहेगी।
साधनाओं के मूलभूत उद्देश्य अन्तर्मुखी होकर आत्मशोधन से लेकर आत्म−साक्षात्कार तक की लम्बी प्रक्रिया में तन्मयता एवं तत्परतापूर्वक जुटा जा सके।
साधनाओं का निचोड़ एक ही पद्धति में समाविष्ट है और यही उसकी विशेषता है।
साधना में निस्संकोच प्रयुक्त हो सकता है–इस सम्बन्ध में शास्त्रकारों ने कहा है–
साधना उपक्रमों के रूप में समझी जानी चाहिए। इन्हें आसन, मुद्रा, प्राणायाम के साथ ही प्रयुक्त किया जाता है। खेचरी, मुद्रा मूलतः ध्यान योग की लययोग साधना है जिसमें क्रिया का कम व भाव पक्ष का अधिक महत्व है। शक्तिचालिनी मुद्रा के अंतर्गत मल−मूत्र संस्थान को संकुचित कर बार−बार ऊपर खींचा व फिर शिथिल किया जाता है। मूल−बन्ध के साथ प्रयुक्त होने पर यह मूलाधार−शक्ति क्षेत्र को जागृत करने में सहायक की भूमिका निभाती है।
साधनावधि में बनाकर उसे निष्ठापूर्वक निभाना चाहिए।
साधना मेधा की।
साधना को सफल नहीं होने देते। न ही कष्ट कठिनाइयों से छूटने के लिये अपने प्रयासों को कारगर होने देते हैं।
साधना जैसे अविज्ञात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते है? कहना न होगा मार्गदर्शन का गुरुतर दायित्व समर्थ गुरु ही संभाल सकता है।
साधना−उपासना वह स्तर है जिसमें मनुष्य और भी ऊँचा उठकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण को परिष्कृत करता है– प्रसुप्त सामर्थ्यों को जगाता है। व्यक्ति अपनी आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाता है। इस सूक्ष्म उपासना को सम्पादित करने वाला अपना ही नहीं, अपने संपर्क क्षेत्र के अनेकानेक व्यक्तियों का हित कर जाता है।
साधना के विधि−विधानों, क्रियाओं एवं उनकी परिणतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन धर्मग्रन्थों योगशास्त्रों में मिलता है पर मात्र उन्हें पढ़कर साधना आरम्भ कर देना संकट से खाली नहीं है। शास्त्रों, धर्मग्रन्थों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि विद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्र को सम्बन्धित विषयों की पुस्तकों की पड़ती है। सर्वविदित है कि एकाकी पुस्तकें किसी भी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने में सक्षम नहीं हो सकतीं। तो फिर साधना जैसे अविज्ञात क्षेत्र का मार्गदर्शन अकेले शास्त्र कैसे कर सकते है? कहना न होगा मार्गदर्शन का गुरुतर दायित्व समर्थ गुरु ही संभाल सकता है।
साधना उपासना से ही पूरा होता है भौतिक स्तर की स्थूल साधना जहाँ लोक−व्यवहार की एक सामान्य प्रक्रिया है वहाँ आत्मिक प्रगति की सूक्ष्म साधना वह पुरुषार्थ है जिसमें साधक को अपना अन्तः का स्तर ऊँचा उठाना होता है। इन प्रयासों को ही अध्यात्म साधना कहते है। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर को बनाना होता है। चेतना की उच्चस्तरीय संवेदना को ही प्रकारान्तर से ईश्वर कहते हैं। उपासना प्रक्रिया में इसी महत् सत्ता से अपना संपर्क जोड़कर अपनी जीव सत्ता को तद्रूप बनाया जाता है।
साधना क्रम को क्रमिक अभ्यास रूप में उपयुक्त मार्गदर्शन में आरम्भ कर देना चाहिये। परन्तु प्राथमिकता उस तत्वदर्शन को देनी चाहिये जो षट्चक्र वान की पृष्ठभूमि बनाता है।
साधना सत्र–एक जून गायत्री जयन्ती से। (2) युग शिल्पियों के एक−एक मास से सृजन सत्र– एक जून गायत्री जयन्ती से (3) तीर्थयात्रा, षोडश संस्कार एवं समस्या समाधान हेतु संगम सत्र–ये 5−5 दिन के होंगे व 1 मई से आरम्भ होंगे। तीनों की विस्तृत जानकारी इस प्रकार है।
साधना में आत्मिक सफलताओं के साथ−साथ भौतिक सिद्धियाँ भी प्राप्त की जा सकती है। आठ प्रमुख सिद्धियाँ बताते हुए वे लिखते है–(1) जन्म सिद्धि–पूर्व जन्मों की स्थिति का सहज आभास, (2) शब्द ज्ञान सिद्धि–शब्दों के साथ जुड़ी भावनाओं का आभास,(3) शास्त्र सिद्धि–विस शास्त्र वचन को किस प्रकार प्रयुक्त करना–यह सूक्ष्म ज्ञान, (4) आधि दैविक ताप सहन शक्ति –दैवी प्रकोपों अथवा प्रारब्धजन्य विपदाओं को धैर्यपूर्वक सहन करना, (5) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति –काम, क्रोध, लोभ, मोहादि उद्वेगों पर कठोर नियन्त्रण, (6) आधि भौतिक ताप सहन शक्ति –सर्दी,गर्मी आदि शरीर कष्टों को शान्तिपूर्वक सह लेना व उद्विग्न न होना (7) विज्ञान शक्ति –सन्तुलित हँसमुख व्यक्तित्व–निश्छल अन्तःकरण, कर्त्तव्य निष्ठा, (8) विद्या शक्ति –अर्थात् आत्मा के स्वरूप व उद्देश्य पर विश्वास युक्त निष्ठा ईश्वर विश्वास, उदार आत्मीयता।
साधना, कोई संस्कार कराना हो तो उसका क्रिया−कृत्य तथा भोजन से निवृत्त होकर 9 से 10 बजे तक बस द्वारा चल पड़ेंगे। शाम को 4 से 5 तक लौट आवेंगे। सायंकाल नित्य कर्म भोजन कसे निवृत्त होकर रात्रि में कथा प्रवचन सुनेंगे और शान्ति पूर्वक नौ बजे तक शयन कक्ष में चले जाया करेंगे। सत्र पाँच दिन के हैं। बस तीर्थ यात्रा प्रबन्ध दो दिन का है।
साधना का निर्णय लिया है। तुम्हें भी गृहस्थ जीवन में कर्मयोगी की तरह रहते हुए आत्म−परिष्कार की साधना करनी चाहिए।” ऐसा कहकर महाराज प्रियव्रत ने राजकुमार का राज्याभिषेक किया और स्वयं संन्यास धर्म का निर्वाह करने के लिए चल पड़े।
साधना में भौतिक व आत्मिक शक्तियों के स्वाभाविक पारस्परिक शिथिल सम्बन्धों को सघन बनाया जाता है। दानों के मध्य आदान−प्रदान की गति तीव्र बनायी जाती है। मेरुदण्ड रूपी महामार्ग के माध्यम से मही प्रयाण की ऊर्ध्वगमन की देवयान प्रक्रिया इसी साधना द्वारा सम्पादित की जाती है।
साधना की बात सोचे उसे ब्रह्मज्ञानी कौन कहेगा? निष्ठुर पाषाण से कम उन्हें दूसरी उपमा क्या दी जाय, यह सोचने के बाद ही कदाचित कोई दूसरा शब्द मिल सके।
साधना स्थल की परिस्थिति एवं साधक की मनःस्थिति दोनों ही सुविधाएँ समुचित स्तर की रहने पर ही साँसारिक एवं आध्यात्मिक प्रयोजनों की पूर्णता सधती है।
साधना में सम्मिलित किया गया है। यह वर्णन अलंकारिक है तथा सूक्ष्म रूप से दो मूल सत्ताओं के संयोग का संकेत देता है। शारीरिक रति कर्म से इसका सम्बन्ध किसी प्रकार नहीं जोड़ा जा सकता हैं।
साधना वह पुरुषार्थ है जिसमें साधक को अपना अन्तः का स्तर ऊँचा उठाना होता है। इन प्रयासों को ही अध्यात्म साधना कहते है। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर को बनाना होता है। चेतना की उच्चस्तरीय संवेदना को ही प्रकारान्तर से ईश्वर कहते हैं। उपासना प्रक्रिया में इसी महत् सत्ता से अपना संपर्क जोड़कर अपनी जीव सत्ता को तद्रूप बनाया जाता है।
साधनाओं के लिये विभिन्न मुद्रा−बन्ध आदि का आश्रय लेकर सिद्धासन एवं पद्मासन को प्रयुक्त किया जाता है।
साधना का ही माध्यम माना जाता है। इस प्रकार महत्वपूर्ण साधनाओं का निचोड़ एक ही पद्धति में समाविष्ट है और यही उसकी विशेषता है।
साधना सत्रों के रूप में विकसित हुआ है। अब वे पूर्णिमा से पूर्णिमा तक नहीं वरन् अंग्रेजी महीने की पहली तारीख से तीस तक चला करेंगे। इससे तिथियों की घट बढ़ में छुट्टी लेने में, रिजर्वेशन कराने में झँझट न पड़ा करेगा। दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि पन्द्रह दिन आहार घटाने और पन्द्रह दिन बढ़ाने के स्थान पर पूरे महीने का एक ही उपवास निर्धारण कर दिया जायगा और वह पूरे महीने एक समान चलेगा। इसे कल्प चिकित्सा के समतुल्य समझा जा सकता है।
साधना क्षेत्र में पग रखने वाले हर पथिक को यह जानना ही होगा कि चिन्तन की उपयुक्त दिशाधारा ही व्यवहार में उत्कृष्ट दिशाधारा में बदलती है और इसके परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आते हैं जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
साधना को ही अलंकारिक रूप में कामक्रीड़ा के शब्दों में व्यक्त किया गया है। योनि, लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि प्रयुक्त किया गये शब्दों में उसी अंतःशक्ति के जागरण की विधि−व्यवस्था सन्निहित है। सम्बन्धित उल्लेख अनेकों स्थानों पर आता है–
साधना क्षेत्र में अपने एकाकी पुरुषार्थ के सहारे बढ़ चलने और मंजिल तक पहुँच जाने में सफल होते हैं। उनकी सफलताओं में भी जन्म−जन्मान्तरों की साधना के संचित संस्कार एवं अनुभव ही सूक्ष्म रूप से प्रेरणा देते एवं मार्गदर्शन की भूमिका निभाते हैं। पर अपवाद तो अपवाद ही हैं वे जनसामान्य के अनुकरण के विषय नहीं हो सकते। इन अपवादों का अन्धानुकरण करने से तो असफलता ही हाथ लगती और साधना क्षेत्र में भटकाव ही पल्ले पड़ता है।
साधना क्षेत्र के पुरुषार्थी तत्वज्ञानी इन्हीं शक्ति स्रोतों को प्रचण्ड बनाने व उनसे स्वयं का उत्थान तथा विश्व−कल्याण का विविध प्रयोजन पूरा करते हैं।
साधना की सफलता से घनिष्ठ सम्बन्ध है। पिप्पलाद, कणाद की आहार साधना प्रसिद्ध है। स्वयं गुरु देव को जौ की रोटी छाछ पर चौबीस वर्ष रहकर चौबीस पुरश्चरण करने की बात सामने है। इसी प्रकार प्रस्तुत कल्प साधना सत्रों में साधना उपासना की प्रक्रिया निर्धारित करने के साथ−साथ ही आहार कल्प का प्रावधान रखा गया है।
साधना ज्ञान की, इस जीवन का करो सुधार।
साधना का प्रयोजन पूरा हो जाता है व प्रसुप्त शक्तियों को उभारना सम्भव बन पड़ता है। शक्ति ग्रहण का माध्यम तो प्राणाकर्षण प्रक्रिया है जो स्थूल रूप से श्वास प्रक्रिया के माध्यम से, पाचन प्रक्रिया के माध्यम से तथा सूक्ष्म रूप से विचार तरंगों व सूक्ष्म प्राण प्रवाह के रूप में सतत् सम्पादित होती रहती हैं। शक्ति अपव्यय की जानकारी होना बहुत अनिवार्य है। मनीषी तीन मार्ग बताते हैं जहाँ से सर्वाधिक शक्ति −क्षरण होता है। प्रथम तो जीविका उपार्जन के अनेकानेक प्रयोजन जिनमें परिवार का संचालन, सुव्यवस्था, श्रम, नित्य कर्म, जन संपर्क आता है।
साधना का मार्गदर्शन करता है आत्म−तत्व का अपने एकाकी पुरुषार्थ द्वारा साक्षात्कार कर लेने वाले संकल्प के धनी रामतीर्थ, रामदास तो कभी−कभी ही प्रकट होते हैं, अन्यथा साधना के रहस्यमय एवं अविज्ञात क्षेत्र में प्रविष्ट करने वाले अधिकाँश साधकों को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं संरक्षण अभीष्ट होता है।
साधना प्रक्रिया अपनाकर हर कोई प्राण के लहलहाते महासागर में से अपनी झोली भर सकता और प्राणसम्पन्न बन सकता है।
साधना में क्रिया−कृत्यों की तुलना में भावना एवं संकल्प का महत्व अधिक है। साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है। श्वास द्वारा खींचे हुए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुंचाने का संकल्प दृढ़ता पूर्वक करना पड़ता है। यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को–प्राणाग्नि को–अपने प्रचण्ड आघातों द्वारा जगा रहा है। प्रहार के उपरान्त प्राण को सूर्य नाड़ी पिंगला द्वारा वापिस लाने तथा समूची सूक्ष्म सत्ता को प्रकाशित, आलोकित करने की भावना परिपक्व करनी पड़ती है।
साधना उपक्रम सही प्रकार निभ नहीं पाता। कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनमें चिकित्सक के लिखित परामर्श और घर पर दावा भर लेते रहने से ही काम चल जाता है। परन्तु कुछ असाध्य व्याधियाँ ऐसी होती हैं कि अस्पताल में ‘इनडोर चिकित्सा’ करनी ही पड़ती है। लिये आवश्यक उपकरण, साधन तथा हर योग्यता के डॉक्टर, सर्जन, सहायक, परिचारिकाएँ हर समय उपलब्ध नहीं हो सकते। ये सुविधाएँ मात्र अस्पतालों में ही होती हैं।
साधना कह सकते हैं। भगवान की इसमें मनुष्य रूप में, देवी−देवता विशेष के रूप में कल्पना नहीं की जाती और न ही उसके स्वागत सत्कार का प्रबन्ध ही करना होता है। कर्मकाण्ड जिस उद्देश्य से बनाये गये है वे मात्र श्रद्धा भावना को परिपक्व करने के लिये ही हैं। संग्रहित श्रद्धा को परिपुष्ट करने के लिये इस उच्चस्तरीय कक्षा में पहुँचे साधक भी नित्य कर्म में प्रतीक पूजा को छोड़ते नहीं–सतत् अपनाये रहते हैं।
साधना में आगे बढ़ा देता है, यह सोचना भी नहीं चाहिए।
साधना के पूरे करते हुए भी एक व्यक्ति चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित कर लेता है। जबकि दूसरा कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता। साधना के परिणामों में भारी अन्तर का कारण स्पष्ट है। जिसे भावना एवं संकल्प के होने न होने के रूप में समझा जा सकता है। प्रत्येक साधनात्मक क्रिया−कृत्यों के साथ यही नियम लागू होता है।
साधना के माध्यम से भौतिक क्षेत्र में प्रगति करते हम नित्य अनेकों व्यक्तियों को देखते हैं। पर यह तो अध्यात्म का पहला चरण है। इससे अन्तरात्मा के उत्थान की बात नहीं बनती। वह लक्ष्य तो सूक्ष्म साधना उपासना से ही पूरा होता है भौतिक स्तर की स्थूल साधना जहाँ लोक−व्यवहार की एक सामान्य प्रक्रिया है वहाँ आत्मिक प्रगति की सूक्ष्म साधना वह पुरुषार्थ है जिसमें साधक को अपना अन्तः का स्तर ऊँचा उठाना होता है। इन प्रयासों को ही अध्यात्म साधना कहते है।
साधना की अवहेलना कर दी जाती है। यही अन्ततः निराशा का कारण बनती है। इनकी तुलना में वे कम से कम भौतिक दृष्टि से सुखी पाये जाते हैं जो श्रम−साधना व लौकिक पुरुषार्थ की उपेक्षा न कर सतत् लगे रहते हैं, भले ही उन्होंने उपासनात्मक कर्म−काण्डों को कभी अपनाया न हो।
साधना के तत्ववेत्ता बताते हैं कि शरीर अपने आप में अद्भुत−अपरिमित शक्ति का भण्डार है। नित्य ही यह ब्राह्मी अनुदान के माध्यम से शक्ति अवशोषित करता तथा उपार्जन योग्य प्राण शक्ति को पचा व संग्रहित कर शेष वातावरण में छोड़ देता है। उसकी शक्ति जिन प्रयोजनों में अनावश्यक अपव्यय होती रहती है उसे यदि बचा लिया जाय और उसे सही दिशा में नियोजित कर दिया जाय तो साधना का प्रयोजन पूरा हो जाता है व प्रसुप्त शक्तियों को उभारना सम्भव बन पड़ता है। शक्ति ग्रहण का माध्यम तो प्राणाकर्षण प्रक्रिया है जो स्थूल रूप से श्वास प्रक्रिया के माध्यम से, पाचन प्रक्रिया के माध्यम से तथा सूक्ष्म रूप से विचार तरंगों व सूक्ष्म प्राण प्रवाह के रूप में सतत् सम्पादित होती रहती हैं। शक्ति अपव्यय की जानकारी होना बहुत अनिवार्य है।
साधना द्वारा यही प्रक्रिया सम्पादित की जाती है। जहाँ तन्त्र मार्ग कहता है कि अचेतन मन–नाड़ी संस्थान पर नियन्त्रण कर महासर्पिणी कुण्डलिनी को जगाया जाय, वहीं दक्षिण मार्ग की मान्यता है कि अचेतन मन पर नियन्त्रण तो स्थूल शक्तियों का नियमन पंच भौतिक क्रिया−कलापों का सम्पादन भर है। इससे तो मात्र साँसारिक प्रयोजन पूरे होते हैं। इससे जन्म लेने वाले चमत्कार कौतूहल भर दिखाते हैं, आत्मिक प्रगति की दिशा में सहायक नहीं होते।
साधनाओं का आश्रय लेकर सहज ही आत्मिक व भौतिक सामर्थ्यों को जगाया जा सकता है।
साधना मार्ग के लिए चट्टान की भाँति अवरोधक सिद्ध होते हैं।
साधना की सीढ़ियाँ चढ़ना सम्भव नहीं हो पाता।
साधना−उपासना उसी पुरुषार्थ का नाम है जो मनुष्य को हर जीवधारी की तुलना में अतिरिक्त रूप से अनुदान रूप में सहज प्राप्त है, जिसे सम्पादित कर स्थूल रूप में भौतिक समृद्धि तथा थोड़ा और ऊँचे उठने पर सूक्ष्म स्वरूप में आत्मिक विभूतियों को करतलगत करना सबके लिये सम्भव है। मनुष्य−मनुष्य में जो अन्तर पाया जाता है वह इन तीनों स्तरों के कारण ही होता है। कुछ तो भौतिक व आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में पिछड़े होते हैं व अन्य प्राणियों से कुछ श्रेष्ठ तो क्या गतिविधियों के क्षेत्र में उनसे भी हेय होते हैं। दूसरा स्तर स्थूल साधना का है। व्यायाम, अध्ययन, अनुभव शिल्पकला, वाणिज्य जैसे विषयों में कुशलता अर्जित कर ऐसे व्यक्ति अपना लौकिक जीवन सफल बनाते हैं, वैभव को प्राप्त होते हैं।
साधना के माध्यम से अतिमानवी शक्तियों का उन्नयन तो साधना विज्ञान का एक अंग है ही। दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है सूक्ष्म वातावरण परिशोधन हेतु सामूहिक ध्यान धारणा की। जिस सन्धि बेला से विश्व मानस आज गुजर रहा है, ऐसे सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता और बढ़ जाती है। ऐसे प्रयोग सम्मिलित आत्मशक्ति को उभारने के लिये किये जाते हैं। नैष्ठिकता साधना−महापुरश्चरणों की इस प्रक्रिया में लाखों साधक अपनी संकल्प शक्ति एक साथ, एक समय विशेष में एक लक्ष्य की पूर्ति के लिये नियोजित करते हैं।
साधना सम्बन्धी विधि−विधानों का ठीक प्रकार पालन करते हुए भी व आगे नहीं बढ़ पाते। अध्यात्म विज्ञानियों ने इसका प्रमुख कारण बताया है–नाड़ियों के प्राण−संचार व्यवस्था की विकृति। अस्तु यह आवश्यक हो जाता है कि योगाभ्यास आरम्भ करते हुए सूक्ष्म नाड़ी संस्थान के परिशोधन कास प्रयत्न किया जाय। इसकी उपेक्षा करने से साधना के उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ पाना तथा अभीष्ट लाभ उठा सकना कठिन पड़ता है। यह सच है कि मस्तिष्क में ध्यान धारण से, नादानुसंधान, प्राण सन्दोह, बाटक आदि से प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होती है, पर उपरोक्त गड़बड़ी से सूक्ष्म अवयवों में ऊर्जा का समुचित वितरण नहीं हो पाता।
साधना के अनेकानेक प्रसंगों में विज्ञान सम्मत प्रक्रिया कुण्डलिनी जागरण की है। शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान तथा सूक्ष्म अध्यात्म विद्या के महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का इसमें अद्भुत समावेश है। उच्चस्तरीय साधना−पथ पर चलने वाले हर साधक को इसकी समुचित जानकारी होना चाहिये।
साधना क्षेत्र में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। क्षेत्र की तुलना में आध्यात्मिक क्षेत्र कहीं अधिक अविज्ञात है और उतना ही रहस्यमय भी। भौतिक जगत एवं सम्बन्धित वस्तुएँ तो प्रत्यक्ष दिखायी पड़ती हैं, पर अध्यात्म का क्षेत्र तो पूर्णतया परोक्ष है। प्रत्यक्ष की तुलना परोक्ष में भटकाव की अधिक गुँजाइश रहती है। इस भटकाव की सम्भावना इसलिए भी अधिक रहती है कि साधना में आन्तरिक पुरुषार्थ करना पड़ता है।
साधना-सत्र
साधना क्रम अपनाकर उसे आध्यात्मिकता का स्वल्पकालीन रसास्वादन किया जाता है। जो कभी अधिक समय तक उपलब्ध हो सके तो व्यक्ति को कृत−कृत्य बना दे। तीर्थों के इतिहास और पुण्य का विवरण सुनने के साथ यह भी जानना चाहिए जो माहात्म्य बताये गये हैं वे प्रतिमा दर्शन या नदी स्नान के नहीं वरन् वहाँ से मिलने वाली प्रेरणाओं के हैं। इन दिनों तीर्थों में ऊँची इमारतों वाले देवालयों में सजधज कर बैठी प्रतिमाएँ भर दिखती हैं। सेनेटोरियम में रहकर स्वास्थ्य लाभ पाने की तरह तीर्थ सेवन से आत्मिक प्रगति का पथ−प्रशस्त होने जैसा उपक्रम अब खोजने पर भी किसी तीर्थ में दीख नहीं पड़ता।
साधना के फलस्वरूप अनायास भी जन्मजात प्राप्त होती है, पर विशिष्ट साधना प्रक्रिया अपनाकर हर कोई प्राण के लहलहाते महासागर में से अपनी झोली भर सकता और प्राणसम्पन्न बन सकता है।
साधना है जिसमें क्रिया का कम व भाव पक्ष का अधिक महत्व है। शक्तिचालिनी मुद्रा के अंतर्गत मल−मूत्र संस्थान को संकुचित कर बार−बार ऊपर खींचा व फिर शिथिल किया जाता है। मूल−बन्ध के साथ प्रयुक्त होने पर यह मूलाधार−शक्ति क्षेत्र को जागृत करने में सहायक की भूमिका निभाती है। चेतन, उन्मनी, विपरीत करणी आदि मुद्राओं की चर्चा प्रस्तुत विवेचन के साथ समीचीन न होगी। शिथिलीकरण मुद्रा का अभ्यास योग निद्रा–के साथ किया जाता है।
साधना सत्र चलते रहे हैं। उन्हीं का परिष्कृत रूप कल्प साधना सत्रों के रूप में विकसित हुआ है। अब वे पूर्णिमा से पूर्णिमा तक नहीं वरन् अंग्रेजी महीने की पहली तारीख से तीस तक चला करेंगे। इससे तिथियों की घट बढ़ में छुट्टी लेने में, रिजर्वेशन कराने में झँझट न पड़ा करेगा। दूसरा परिवर्तन यह हुआ है कि पन्द्रह दिन आहार घटाने और पन्द्रह दिन बढ़ाने के स्थान पर पूरे महीने का एक ही उपवास निर्धारण कर दिया जायगा और वह पूरे महीने एक समान चलेगा।
साधना की बात आती है वहाँ तो सिद्ध पीठों–संस्कारित तप स्थलियों पर समय निकाल कर जाने व संकल्पित अनुष्ठान को पूरा करने की बात सोचना चाहिए। परन्तु साधारण स्थिति के साधक को अपने ही निवास स्थान में कोलाहल रहित सुसंस्कारित वातावरण तलाशना होगा ताकि नित्य की साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण वे तलाशना होगा ताकि नित्य की साधना सम्पादित की जा सके। वातावरण व शरीर की स्थिति–ये दो मिलकर आसन को सर्वांगपूर्ण बनाते हैं। आसन समग्र शरीर का होता है।
साधना वाले, युग सृजन वाले तथा जीवनदानी तीनों ही सम्मिलित रहेंगे और उनका प्रसंग भिन्न होने पर भी लक्ष्य एक रहने के कारण प्रशिक्षण में सभी को समान रूप सम्मिलित होना होगा। साधनाएँ भर पृथक−पृथक रहेंगी। सामूहिक शिक्षण का स्वरूप सभी के लिए एक जैसा है। उसमें सभी को समान रूप से सम्मिलित होने का अवसर मिलेगा।
साधना की है। इस वय में पहुँचने पर मैंने लोकोत्तर जीवन की साधना का साधना का निर्णय लिया है। तुम्हें भी गृहस्थ जीवन में कर्मयोगी की तरह रहते हुए आत्म−परिष्कार की साधना करनी चाहिए।” ऐसा कहकर महाराज प्रियव्रत ने राजकुमार का राज्याभिषेक किया और स्वयं संन्यास धर्म का निर्वाह करने के लिए चल पड़े।
साधना में, एकाग्र तन्मयता से होने वाले शोध प्रयत्नों में तथा आध्यात्मिक क्षेत्र से उद्भूत श्रद्धाभक्ति में उसे नियोजित किया जा सकता है। कुण्डलिनी जागरण में यही प्रक्रिया अपनायी जाती तथा कामबीज का ज्ञानबीज में उन्नयन किया जाता है।
साधना करनी चाहिए।” ऐसा कहकर महाराज प्रियव्रत ने राजकुमार का राज्याभिषेक किया और स्वयं संन्यास धर्म का निर्वाह करने के लिए चल पड़े।
साधना द्वारा आत्मिक प्रगति का साधन पूरा किया जाता है। बात भी सत्य है। आत्मिक प्रगति की उपेक्षा करके अर्जित की गयी भौतिक सामर्थ्य किस काम की? आत्मा ही वह स्रोत है जहाँ से आकांक्षाएं एवं उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ जन्म लेती हैं। जब तक इस अन्तःक्षेत्र में अन्धकार छाया रहेगा आत्मोन्नति की बात बनेगी नहीं।
साधना विशेष के विषय में जन−मानस में बड़े व्यापक स्तर पर भ्रांतियां प्रचलित हैं। यह अपरिमित ऊर्जा केन्द्र जो मानवी काय−कलेवर के अन्तराल में सूक्ष्म रूप में अवस्थित होता है, कितना शक्तिशाली है वे विभिन्न साधना−प्रक्रियाओं माध्यम से इस योग साधना को संपादित कर कितनी कुछ सिद्धियाँ−विभूतियाँ हस्तगत की जा सकती हैं, इस पक्ष पर विस्तृत विवेचन करने से पूर्व इस ध्यान योग की एक प्राथमिक जानकारी ले लेना समीचीन होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-September
साधना एवं युग शिल्पी सत्रों के अतिरिक्त नये लेखन सत्र का शुभारम्भ-नव सृजन के युग शिल्पियों को परिष्कृत, परिपक्व एवं प्रवीण करने की दृष्टि से इन दिनों शान्ति कुञ्ज में कई महत्वपूर्ण शिक्षण सत्रों का उपक्रम चल रहा है। कल्प साधना सत्रों में शारीरिक मानसिक परिशोधन तथा आत्मिक परिष्कार के लिए जो आवश्यक है उसका समावेश करके प्रयत्न को समग्र बनाने का प्रयत्न किया गया है।
साधना प्रयोजनों में अग्निहोत्र के अनेकानेक प्रयोगों का उपयोग एवं उल्लेख करते रहे हैं। उपासना उपचार में दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती, अग्नि-होत्र आदि के प्रयोग होते हैं। न केवल भारतीय धर्म में वरन् संसार भर के सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। अगरबत्ती, धूपबत्ती, लोबान, धूनी जैसे उपचार मन्दिर, गिरजाघर, गुरुद्वारे, चैतन्य आदि सभी जगह प्रयुक्त होते हैं। पारसी धर्म में तो यह मान्यता और भी अधिक है।
साधना बनती है और न प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। अतएव ‘शब्द के साथ तप’ शक्ति का समावेश भी होना चाहिए। अर्थात् गायत्री उपासना में अग्निहोत्र को भी जुड़ा रहना चाहिए। होता भी यही है। अनुष्ठानों की पूर्णाहुति यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होती है।
साधना की उदारता का समावेश रहता है। अधिक देकर कम पाने या न पाने की मनोवृत्ति की भक्ति भावना कही जाती है। भगवान को प्रसन्न करने और उनसे कुछ महत्वपूर्ण पाने के लिए इससे घटिया स्तर का दृष्टिकोण तनिक भी काम नहीं आता।
साधना पुरुषार्थ से व कोई-कोई पूर्व अर्जित सुसंस्कारोंवश जल्दी जगा लेते हैं। पाश्चात्य चिकित्सा शास्त्री व शोधकर्ता इन्हें आश्चर्य से देखते हैं जबकि यह मनःसंस्थान के सूक्ष्म शक्ति केन्द्र के जागरण की प्रतिक्रिया मात्र है। मनुष्य असीम सामर्थ्यों से भरपूर है। अपने आपको पहचानने का प्रयास तो किया जाय। फिर तो असीम उपलब्धियों का क्षेत्र खुल जाता है।
साधना से-आत्मीयता विस्तार से-आनन्द उल्लास को बिखेर कर हम सब उसका प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं-यह एक शाश्वत सत्य है।
साधना सत्रों में शारीरिक मानसिक परिशोधन तथा आत्मिक परिष्कार के लिए जो आवश्यक है उसका समावेश करके प्रयत्न को समग्र बनाने का प्रयत्न किया गया है।
साधना का प्रतिफल नकद धर्म का तरह सुनिश्चित है। हेय अन्तःकरण वाले नर-पिशाच नर-पशु नारकीय, पिछड़े पतित कहे जाते हैं और प्रतिकूलता, भर्त्सना एवं खीज़ से भरे रहते हैं। उदात्त परिष्कृत दृष्टिकोण, स्वभाव, एवं क्रिया कलाप समन्वय स्वर्ग कहलाता है। उत्कृष्ट व्यक्ति त्व ही देवत्व है। संकीर्णताएँ, निकृष्टताएँ ही भव-बन्धन है जो उनसे उबर सका वह जीवन मुक्त कहलाता है।
साधना सत्र उपरोक्त तिथियों में होंगे। जो अनुष्ठान के निमित्त मात्र आना चाहें, समय रहते स्थान सुरक्षित करा लें। सीमित स्थान भर जाने पर स्वीकृति न मिल सकेगी।
साधना अग्निहोत्र के रूप में पूूर्णाहुति किये बिना सम्पन्न नहीं होती।
साधना कहते हैं। यह मनुहार, रिश्वत, याचना या गिड़गिड़ाहट नहीं आत्मशोधन की प्रक्रिया है। कच्ची धातु को शोधने पर ही उसका वास्तविक स्वरूप निखरता और उपयुक्त , आभूषण बनता है। ठीक इसी प्रकार आत्म शोधन की प्रक्रिया में जो जितना सफल होता है वह उसी स्तर का महामानव भगवद् भक्त , सिद्ध पुरुष माना जाता है। आत्मिक प्रगति का राजमार्ग आत्मशोधन ही हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-February
साधना अर्थात नियंत्रण में कर लेना— मजबूती से अपनी पकड़ में ले लेना। किसे जोड़ना, किसे जुड़ना व किसे नियंत्रण में लेना, इनके ठीक तरह न समझ पाने के अज्ञान के कारण ही इस क्षेत्र में नाना प्रकार की भ्रांतियाँ फैली हैं। इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में एक समस्या मानकर चला जाए तो चमत्कार–सिद्धियों संबंधी मान्यताओं का जो अनाधिकार प्रवेश इस क्षेत्र में गलत रूप में हो गया है, उससे स्वयं बचा व अन्यों को बचाया जा सकता है।
साधना कर ली जाए तो वह सब कुछ हस्तगत हो सकता है, जिसकी चर्चा सिद्धियों-चमत्कारों के रूप में की जाती है। पथ है तो कठिन, पर इसे पार किए बिना उच्चस्तरीय सोपानों पर पहुँचने वालों के प्रयास निष्फल ही रहेंगे।
साधना का पहला चरण पूरा हो जाता है। ध्यानयोग का उद्देश्य एक ही है—मस्तिष्कीय बिखराव को रोककर एक चिंतन बिंदु पर केंद्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त कर लेना। जिसे इस प्रयोग में सफलता मिलने लगती हैं, वह उसी अनुपात में अंतःचेतना को बेधक प्रचंडता से अभिपूरित करता चला जाता है। शब्दबेधी बाण की तरह लक्ष्यबेध कर सकना उसके लिए सरल हो जाता है।
साधना के दो चरण वैराग्य और अभ्यास का अवलंबन लेकर हर साधक आत्मिक-प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। वैराग्य के लिए मनःस्थिति के अनुरूप चिंतन के आधार क्या हों? अभ्यास किस क्रम से और किस प्रकार आरंभ किया जाए? इसका निश्चय−निर्धारण हर कोई नहीं कर सकता। मरीज स्वयं दवा का निर्धारण करने लगे तो उसे कितने ही संकटों का सामना करना पड़ सकता है।
साधना के क्रिया-क्षेत्र में परिलक्षित हो। व्यक्तिगत संपन्नता साधना की परिणति सुपात्र हैं। व्यक्तित्व का सारा आधार ही दृष्टिकोण है। अंतरंग जैसा भी कुछ है, इसी आधार पर बनता है कि अपने आंतरिक विकास के लिए क्या सोचा गया और उसकी रूपरेखा किस प्रकार बनाई गई।
साधना और उससे लाभान्वित हो सकना अशक्य बन गया है। हर क्षेत्र अपने पुरुषार्थ की उपलब्धियों पर प्रसन्न होता और गर्व करता दीखता है। एक अध्यात्म क्षेत्र ही ऐसा है, जिसमें उदासी, निराशा, असफलता का माहौल है। अविश्वास बढ़ने से प्रयत्न शिथिल हो रहे हैं और उस शून्य को भरने के लिए निहित स्वार्थों की विडंबना अनेकानेक प्रपंचों का ढकोसला सर पर लादकर सामने खड़ी हो रही है। इस स्थिति का अंत होने के लिए आवश्यक है कि आत्मिकी का वास्तविक स्वरूप और प्रयोग सामने आए।
साधनाकाल में जप−अनुष्ठान के समय एकाग्रता, तल्लीनता— ईश्वरीय गुणों से तद्रूपता का, ध्यान किया जाता है। इस समय के अतिरिक्त शेष सारा ही समय ऐसा है, जिसमें-विचार मंथन सतत किया जाना चाहिए। साधना का अर्थ ही है— अनुशासन— मजबूती से विचारों को साध लेना। यह तभी संभव है, जब मनन पल−पल चले। तभी नित्य की क्रियाओं में साधना अपना चमत्कार दिखाने लगेगी।
साधना प्रयोजनों में पवित्र नदी−सरोवरों के जल को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। कहा गया है—
साधनाओं में सहायक होता है। इंद्रियों को उत्तेजित करने वाले खट्टे, मीठे, तीक्ष्ण, राजसी और तामसी भोजन से मन में अस्थिरता और मलीनता बढ़ती है। अस्तु साधना-पथ के साधक के लिए सरस, स्निग्ध, मृदु और नीतिपूर्वक उपार्जित पवित्र आहार का सेवन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
साधना-विधानों में ध्यान की प्रक्रिया किसी न किसी रूप में अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है। उसके बिना प्रगति का एक चरण भी आगे नही बढ़ता। योगशास्त्रों में ध्यान की महिमा का गुणगान अनेकों स्थानों पर किया गया है–
साधना में एकाग्रता को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। साधनाओं में से अधिकांश का एक ही उद्देश्य है— एकाग्रता−संपादन। नादानुसंधान, चक्र−वेधन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि जितनी भी योग की शाखा−प्रशाखाएँ हैं–उन सब में एक ही प्रक्रिया है— उच्चस्तरीय चिंतनसहित एकाग्रता की साधना। राजयोग, हठयोग, भक्तियोग, लययोग की समस्त दिशा धाराएँ जिस एक स्थान पर आकर केंद्रित होती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। एकाग्रता में वृद्धि के अनुपात में ही साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान लगाते हैं।
साधनावधि में आस्था एवं विचारणा-क्षेत्र के नवनिर्माण का प्रयत्न पूरी तत्परता के साथ चलना चाहिए। शरीर तप−अनुशासन में संलग्न रहे, समय−चर्या उन्हीं अनुबंधों के शिकंजे में किसी रहे; किंतु विचार-प्रवाह को सतत भौतिक क्षेत्र से हटाकर अंतर्मुखी रहने के लिए विवश किया जाता रहे। इन दिनों भौतिक क्षेत्र की चिंता−समस्याओं से उबर ही लेना चाहिए। जो गंभीरतापूर्वक कभी विचारा ही नहीं गया, जिस उद्देश्य के लिए यह जन्म हुआ था, उस पर चिंतन ही नहीं किया गया, उसे इन दिनों सोचना चाहिए। जिस क्षेत्र में कभी बुहारी तक नहीं लगी, कभी दृष्टि ही नहीं गई, उसे इन दिनों साफ−सुथरा बनाने से लेकर सुंदर–सुसज्जित बनाने के लिए तत्परता एवं तन्मयता के साथ जुटे रहना चाहिए।
साधना-अवधि में ऐसी ही अनुभूति होनी चाहिए कि पशु का स्तर त्यागने और देवस्तर में प्रवेश करने का यह ऊषाकाल है। इन्हीं क्षणों में महान परिवर्तन की संभावना बन रही है। सघन संव्याप्त तमस का पलायन और समूचे आकाश में प्रभाव का प्रकाश वितरण सच-मुच ही एक आश्चर्य है। इतने थोड़े क्षेत्रों में इतना महान परिवर्तन देखते हुए लगता है, ऊषाकाल की प्रभातबेला कितनी अद्भुत, कितनी सशक्त एवं कितनी सौभाग्यशाली है। ठीक इसी प्रकार साधना-तपश्चर्या की भूमिका भी ऐसी ही होनी चाहिए, जिसे कर्त्ता का अभिनव भाग्योदय कहकर शेष सारे जीवन सराहा और स्मरण रखा जा सके।
साधना-पथ के पथिक को दैवी अनुग्रह की भी कमी नहीं रहने वाली पर उतने भर से ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा होने वाला नहीं है। भ्रूण एवं चूजे की तरह आवरण को तोड़कर बाहर निकलने के लिए पराक्रम तो उसका ही प्रमुख रहेगा। उस उक्ति में परिपूर्ण सच्चाई भरी हुई है, जिसमें कहा गया है कि “ईश्वर मात्र उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं।”
साधना से शरीर में उत्तम कांति उत्पन्न होती है। जठराग्नि बढ़ती है, शरीर निरोग होता है, पटुता और सर्वज्ञता बढ़ती है तथा सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त होता है।
साधना के तत्त्वज्ञान का विवेचन किया जाता है।
साधना-मार्ग पर चलने वाला पथिक यही पुरुषार्थ करता है। मस्तिष्कीय ऊर्जा को केंद्र-विशेष पर एकत्र कर वह उसे दिशा-विशेष में नियोजित करता है। ध्यान का यही प्रमुख उद्देश्य है। ईश्वर-प्राप्ति और आत्मकल्याण जैसे महत् प्रयोजनों के लिए भी तन्मयता−तत्परता की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाग्रता जिसमें तन्मयता का समावेश हो, जड़ता का नहीं, किस माध्यम से अर्जित की जाती है, उसमें इष्ट के प्रति किन भावनाओं को चिंतनक्षेत्र में उतारना होता है, इष्ट का निर्धारण किस प्रकार किया जाता है, इस पर ऋषि−मनीषियों ने विशद अनुसंधान किया है एवं आप्त वचनों के रूप में अपने निष्कर्ष जनमानस के सम्मुख रखे हैं।
साधना को सर्वोपरि पराक्रम एवं सर्वश्रेष्ठ सौभाग्य कहा गया है। स्मरण रहे यह स्व−उपार्जन है। यह प्रयास चले तो खिले फूल पर मँडराने वाले भौंरे, मधुमक्खियों, तितलियों के झुंड छाए रहते हैं। बाहरी अनुग्रहों के संबंध में भी ठीक यही बात है। जहाँ पात्रता होगी, वहाँ बाहरी सहायता की भी कमी न रहेगी।
साधना का— पूर्णता का— लक्ष्य पूरा नहीं होता है। इसके लिए समर्पण योग— भक्तियोग की साधना करनी पड़ती है।
साधना−अनुष्ठान की अवधि में साधक यदि मात्र आहार संयम एवं मुँह से जीभ हिलाकर जप की बेगार भुगते और आत्मचिंतन की उपेक्षा करे तो समझना चाहिए कि शरीरश्रम जितना लाभ मिल सकता है, उतना ही मिलेगा। मनोयोग के अभाव में उस उच्चस्तरीय प्रतिफल की आशा न की जा सकेगी जो शास्त्रकारों ने–अनुभवी सिद्धपुरुषों ने बताई है।
साधना को वह सतत् जीवन भर चलाता है। साधना कैसे की जाती है–इसकी विधि का मर्म किसान की गतिविधियों तथा मनोभूमि का पर्यवेक्षणकर भली-भाँति समझा जा सकता है।
साधना के मार्ग मे प्रगति होती और तदनुसार सफलता मिलती है। इस प्रकार न केवल शरीरशुद्धि अपितु योगी के अनुरूप हलकी काया बनाने हेतु मनोनिग्रह एवं चित्तवृत्तियों के नियंत्रण के लिए भी अन्नशुद्धि अनिवार्य है। हर मार्गदर्शक साधक को अपने आहार पर ध्यान देने का निर्देश देता है। अन्न के स्तर में जितनी सात्विकता का समावेश होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जाएगा।
साधना-सोपानों को तुरंत पाने का प्रयास करने वालों को इस एक तथ्य को समझ लेना बहुत अनिवार्य है कि अंतःकरण का परिष्कार— वृत्तियों का शोधन ही समस्त सिद्धियों का राजमार्ग है।
साधना अंतरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की की जाती है। चांद्रायणकाल में बहिर्मुखी माया-प्रपंच से अवकाश प्राप्त किया जाता है और उस अवधि में अंतर्मुखी रहकर अंतर्जगत का पर्यवेक्षण किया जाता है। इस दिशा परिवर्तन के लिए नियोजित आत्मसाधना जितनी भावपूर्ण एवं गंभीर होगी उतना ही चांद्रायण का प्रत्यक्ष वरदान उपलब्ध होगा।
साधना के अंतर्गत आता है। कथा, सत्संग, प्रवचन इसी उद्देश्य से सुने भी जाते हैं; पर ये तो मात्र निर्देश हैं, दिशा में चलने के संकेत भर हैं, जीवन की दिशा निर्धारित करने के आधार नहीं। मस्तिष्क को वांछित प्रवाह में चलने देने के लिए अवतारों के, ऋषियों के–महामानवों के विचारों व चरित्र का अवलोकन–श्रवण–स्वाध्याय के माध्यम से करके हम अपनी मनःस्थिति को उत्कृष्टतापरायण बना सकते हैं। विचार संस्थान हमेशा परिष्कृत−पवित्र−विधेयात्मक चिंतन से युक्त हो, यही लक्ष्य रहे। अपनी मानसिक हलचलों का सूक्ष्मदृष्टि से अध्ययनकर यह सतत देखा जा सकता है कि अवांछनीय प्रवाह का दमन व दिव्य चिंतन का अनुसरण कितना हो पा रहा है।
साधना की उपेक्षा करते हुए भी, अनगढ़ आदतों से, घिनौनी जीवनचर्या से लदे रहते हुए भी, जो आत्मिक प्रगति की उस क्षेत्र की विभूतियाँ अर्जित कर लेने का ‘शार्टकट’ ढूँढ़ते हैं, वे भूल करते हैं।
इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक ही सुनिश्चित राजमार्ग है— आत्म साधना का। इसे छोड़कर पगडंडियों में भटकने से थकान, खीज और निराशा के अतिरिक्त और कुछ पल्ले पड़ता नहीं है।
साधनावधि इसी प्रकार व्यतीत की जाए। इस तपश्चर्या का माहात्म्य अवर्णनीय है। सामान्यजन तो इसकी फलश्रुति चर्मचक्षुओं से स्वास्थ्य में परिवर्तन देखकर ही आश्चर्यचकित हो जाते हैं। जब साधना का, सात्विक जीवनक्रम का तथा सोद्देश्य चिंतन व दिशा-निर्धारण का इसमें समावेश हो जाता है तो अगणित विभूतियों के रूप में इसके परिणाम सामने आते हैं।
साधना के सहारे अर्जित करनी पड़ती है। यह न तो उत्तराधिकार में मिलती है और न किसी से वरदान-उपहार में उपलब्ध होती है। भोजन स्वयं ही उदरस्थ करना होता है। मल विसर्जन का कष्ट भी स्वयं ही सहना पड़ता है। कुछ कार्य ऐसे हैं, जिन्हें जन्म-मरण की तरह स्वयं ही सहन या वहन करना होता है।
साधना में वरिष्ठता–प्रमुखता दी गई है।
साधना की सफलता के लक्षण प्रकट होने लगे और बारहवाँ वर्ष पूरा होने पर इष्टदेव का साक्षात्कार हुआ। उन्हीं के अनुग्रह से वह प्रज्ञा प्रकट हुई, जिसके सहारे 'माधव−निदान' जैसा महान ग्रंथ लिखकर अपना यश अमर करने और असंख्यों का हित साधन कर सकने की उपलब्धि उन्हें मिली और जीवन का लक्ष्य पूरा कर सकने में सफल हुए।
साधना की यहीं पर आवश्यकता है। यह एक तथ्य है कि आंतरिक उत्कृष्टता के अभाव में पाई गई संपदा एक ज्वरग्रस्त रोगी को मिष्ठान भरपेट खिला देने की तरह ही भयावह सिद्ध होती है। उदात्त दृष्टिकोण के अभाव में वैभव का दुरुपयोग होता है तथा व्यसन−अहंकार की पूर्ति में संलग्न व्यक्ति अपना सर्वनाश देखते−देखते कर बैठता है।
साधना अपनाने वाले ही साधना की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़ने के पात्र बन सकते हैं, इस अकाट्य तथ्य को एक बार नहीं, बार-बार समझ लेना चाहिए।
साधना-पथ के साधक के लिए सरस, स्निग्ध, मृदु और नीतिपूर्वक उपार्जित पवित्र आहार का सेवन सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
साधना’ शब्द योग एवं साधना दो से मिलकर बना है। योग का अर्थ होता है— जुड़ना एवं साधना अर्थात नियंत्रण में कर लेना— मजबूती से अपनी पकड़ में ले लेना। किसे जोड़ना, किसे जुड़ना व किसे नियंत्रण में लेना, इनके ठीक तरह न समझ पाने के अज्ञान के कारण ही इस क्षेत्र में नाना प्रकार की भ्रांतियाँ फैली हैं। इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में एक समस्या मानकर चला जाए तो चमत्कार–सिद्धियों संबंधी मान्यताओं का जो अनाधिकार प्रवेश इस क्षेत्र में गलत रूप में हो गया है, उससे स्वयं बचा व अन्यों को बचाया जा सकता है।
साधना के लिए यह शीत प्रदेश उपयुक्त है, साथ ही जलवायु की दृष्टि से आरोग्यवर्धक भी। गंगाजल को वैज्ञानिकों ने दिव्य औषधियों का सम्मिश्रण माना है। ऐसी मान्यता है कि मात्र गंगाजल के सेवन से कितनी ही बीमारियों का उपचार अपने आप हो जाता है।
साधना में कर्त्तापन का बोध बना रहता है, जिसके कारण आत्मसत्ता और परमात्मासत्ता के बीच एकत्व स्थापित नहीं हो पाता। इस स्थिति के कारण ही अर्जुन का संशय बना हुआ था, जिसका समाधान भगवान् कृष्ण ने गीता के उपदेश में ‘समर्पण योग‘ के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा— "हे अर्जुन! मुझमें अपना मन रख, मुझे अपनी बुद्धि सौंप दे, उतने भर से तेरा कल्याण हो जाएगा।”
साधना कहते हैं। संक्षेप में आंतरिक परिष्कार का नाम ‘योग' और क्रिया−प्रक्रिया में संयम-अनुशासन का समावेश ‘तप’ कहा जाता है। इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिए कुछ न कुछ प्रत्यक्ष प्रयोगोपचार भी चलाने पड़ते हैं। योग-साधना— तपश्चर्याओं की समस्त ध्यानपरक, तितिक्षापरक क्रिया−प्रक्रिया ऐसे ही निर्धारणों से भरी पड़ी है। इतने पर भी इस तथ्य को समझ ही लेना चाहिए कि उपचारों की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि व्यक्तित्व के अदृश्य स्तर का; अंतराल का, कायाकल्प संभव हो सके।
साधना इसी के लिए करनी पड़ती है। अंतरंग जीवन में उसका अस्तित्व ‘सुसंस्कारिता’ के नाम से जाना जाता है और बहिरंग जीवन में इसी शालीनता भरे व्यवहार को ‘सभ्यता’ कहते हैं। यों इस उपलब्धि में वातावरण एवं संपर्क भी सहायक होता है, तो भी प्रमुखता अपने ही दृष्टिकोण एवं प्रयास की रहती है। सत्संग या कुसंग के प्रभाव को यहाँ झुठलाया नहीं जा रहा है; वरन् यह कहा जा रहा है कि उसकी उपयोगिता भी तभी लाभदायक होती है, जब अपने में ग्रहण करने एवं पचाने की सामर्थ्य विद्यमान हो। पाचन शक्ति जवाब दे जाए तो पौष्टिक भोजन क्या करे?
साधना में तांत्रिक अपने मनोबल की वृद्धि अन्यों के शरीरों की ऊर्जा के दोहन द्वारा भी करते हैं। कभी-कभी श्मशानों में धुँधले प्रकाश की गोलियाँ, लहरें अथवा धुँध उड़ती देखी जाती है। यह मृतक या अवशिष्ट तेजोवलय ही होता है जो शरीर के जल जाने के बाद भी सूक्ष्मरूप में वहाँ विद्यमान रहता है। श्मशान में जाने पर वहाँ रुकने की इच्छा नहीं होती, अकारण भय छाया रहता है। मन विक्षुब्ध हो उठता है।
साधना की जाए जहाँ से अभीष्ट परिमाण में आत्मिक ऊर्जा जुटाई जा सके। कहना न होगा, इस दृष्टि से हिमालय का उत्तराखंड सर्वश्रेष्ठ है।
साधना का लाभ पाता है। 'रसौ वै सः' का सही स्वरूप जान वह अंतः में छिपे यथार्थ-रस का आस्वादन करता है, जिह्वा तथा इंद्रियलिप्सा में नष्ट होने वाले रस उसे नष्ट नहीं कर पाते। आत्मक्षेत्र का पर्यवेक्षणकर उसके अंदर शरीर के प्रति करुणा जागती है, ब्रह्मचर्य के प्रति कठोर रहने की बुद्धि जागृत होती है। ये ही सद्भावनाएँ जब परायों पर आरोपित होती हैं तो सबके प्रति करुणा, सहज ममत्व जाग उठता है और व्यवहार में उतरा यह औदार्य सहकारिता–आत्मविस्तार की वृत्ति के रूप में प्रकट होता है।
साधना-क्षेत्र में तेजोवलय के रूप में जाना जाता है। यों समस्त शरीर में उसकी मात्रा होती है; पर आवाज की भाँति शरीर से निकलकर दूर क्षेत्र में जाते ही उसका प्रभाव कम हो जाता है। शरीर से निकलते समय यह विद्युतधारा अत्यंत तीव्र होती हैं, जिसके शरीर में तेजोवलय जितना अधिक प्रखर होता है वह उतना ही अधिक प्रभावशाली होता है। यह ‘वलय’ भला भी हो सकता है और बुरा भी। अपने-अपने ढंग का आकर्षण और प्रभाव दोनों में रहता है।
साधना अर्थात् एकाग्रता मिश्रित ध्यान−धारणा को ही प्राथमिकता दी गई है।
साधना जितनी भावपूर्ण एवं गंभीर होगी उतना ही चांद्रायण का प्रत्यक्ष वरदान उपलब्ध होगा।
साधना की ओर जब साधक आगे बढ़ता है तो उसे इन्हीं व्यवधानों को पार करते हुए आगे बढ़ना होता है। आत्मपरिष्कार की साधना के लिए उसे मन पर ही अंकुश लगाना होता है। चंचल वृत्तियों की ओर प्रवृत्त करने वाला भी वही तो है। उसमें संचित कुसंस्कार प्रदीप ज्वालारूपी अंतरात्मा पर कषाय-कल्मषों की तरह छाए रहते हैं। न वह स्वयं प्रकाशवान हो पाती है, न ही जीवन को प्रकाशवान करने, औरों को प्रखर−प्रेरणा दे सकने योग्य बन पाती है।
साधना ‘भक्तियोग‘ के अंतर्गत की जाती है। उच्च आदर्शों के प्रति सघननिष्ठा, भक्तिभावना कही जाती है। इसका अर्थ याचना— मनुहार या व्यक्ति−मूर्ति से प्रेम नहीं; अपितु आदर्शों के समुच्चय के रूप में−श्रद्धातत्त्व का स्वरूप लिए विद्यमान निराकार ईश्वर को अपने ही अंतः में ढूँढ़ना, पाना और उसमें अवगाहन करना है। उपासना आदि उपचार इसी के अंतर्गत आते हैं।
साधनाकाल स्वल्प ही है। उसमें से भौतिक चिंतन एवं प्रयास के लिए तनिक भी कटौती नहीं करनी चाहिए। समय तथा मनोयोग को निर्धारित प्रयोजन में ही जुटाए रहना चाहिए, उसे अन्य किसी कार्य में रत्ती भर भी अस्त-व्यस्त नहीं करना चाहिए।
साधनाओं में व्रत−उपवास का अविच्छिन्न स्थान है। इसके लिए अन्न की सात्विकता पर ध्यान देना अनिवार्य हो जाता है। ऐसा न करने से वही स्थिति होती है जो भीष्म पितामह की हुई। वे शरशैय्या पर लेटे युधिष्ठिर को धर्मोपदेश दे रहे थे कि अचानक द्रौपदी हँस पड़ी। वे बोले— ”बेटी! तू इतनी शीलवती है, फिर असमय क्यों बड़ों के समक्ष तू हँसी।
साधनात्मक शारीरिक एवं मानसिक उपचार करने पड़ते हैं। ये आवश्यक है और उपयोगी भी। आत्मनिर्माण का प्रथम चरण इन्हीं के सहारे पूरा होता है; पर इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है दैवी अनुग्रह−अनुदान प्राप्त करना। जीवात्मा में सत्चित्आनंदस्वरूप परमात्मा के अवतरण के बिना साधना का— पूर्णता का— लक्ष्य पूरा नहीं होता है। इसके लिए समर्पण योग— भक्तियोग की साधना करनी पड़ती है।
साधना कैसे की जाती है–इसकी विधि का मर्म किसान की गतिविधियों तथा मनोभूमि का पर्यवेक्षणकर भली-भाँति समझा जा सकता है।
साधना का क्षेत्र अंतर्जगत है। अपने भीतर दबे खजाने को व्यक्ति स्वयं नहीं जानता; पर खोजने−उभारने का प्रयास करने पर उसे यही काया— यही जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष दृष्टिगोचर होता है। लगता है बाहर किसी से माँगने की, दीनता दिखाने की बजाए पहले अपने भीतर ही हल चला लिया होता तो कितना ठीक रहा होता। भीतरी प्रसुप्त क्षमताओं को ही विभिन्न तत्त्वदर्शियों ने देव माना है और बाह्योपचारों के माध्यम से अंतःसंस्थान के भांडागार को करतलगत करने का विधि−विधान मात्र बताया है। वे साधक की निष्ठा को पकाते हैं, उसे अभ्यस्त बनाते हैं।
साधना−उपासना के विधि-विधान और मर्यादाओं का परिपालन करते हुए भी अभीष्ट लाभ नहीं मिल पाता। विषाक्त वातावरण का असाधारण प्रभाव पड़ता है। साथ ही परिवार-समाज के जिस परिवेश में मनुष्य रहता है, उसके संस्कार भी बने रहते हैं। फलस्वरूप मन को जबरन उन संस्कारों से मुक्त कर पाना कठिन पड़ता है। ऐसी स्थिति में–साधना का उच्चस्तरीय लाभ उठाने की दृष्टि से आवश्यक होता है कि सदा के लिए न सही, तो कुछ समय के लिए ऐसे सात्विक वातावरण में रहकर साधना की जाए जहाँ से अभीष्ट परिमाण में आत्मिक ऊर्जा जुटाई जा सके।
साधना की तप-तितिक्षा द्वारा तेजोवलय के प्रखरीकरण का उद्देश्य पूरा होता है। कहना न होगा कि इस महती उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही तप-साधना के उच्चस्तरीय प्रयोगों, उपचारों की व्यवस्था बनायी जाती है। जिससे प्रत्येक साधक साधना के उपरांत तेजोवलय की एक बहुमूल्य आध्यात्मिक पूँजी लेकर वापिस लौटता है।
साधना-तपश्चर्या की भूमिका भी ऐसी ही होनी चाहिए, जिसे कर्त्ता का अभिनव भाग्योदय कहकर शेष सारे जीवन सराहा और स्मरण रखा जा सके।
साधनाएँ करनी पड़ती है। साधना द्वारा उस प्रखरता को उभारना एक बड़ा उद्देश्य है, जो मानवीशक्ति को अभ्यस्त अपव्यय से बलपूर्वक बचाती और दबाव देकर उसे सत्प्रयोजनों में नियोजित करती है।
साधना के उच्चस्तरीय प्रयोगों, उपचारों की व्यवस्था बनायी जाती है। जिससे प्रत्येक साधक साधना के उपरांत तेजोवलय की एक बहुमूल्य आध्यात्मिक पूँजी लेकर वापिस लौटता है।
साधना की ये सब उपलब्धियाँ परिष्कृत अंतश्चेतनारूपी स्वच्छ दर्पण पर स्पष्ट दिखाई देती हैं। सब प्रकार से कल्याणकारी पथ अध्यात्म-साधना को सही रूप में समझा, बढ़ाया व अपनाया जा सके तो ये दिव्य अनुदान हर किसी के लिए पा सकना सहज-सुलभ है।
साधना के लिए उसे मन पर ही अंकुश लगाना होता है। चंचल वृत्तियों की ओर प्रवृत्त करने वाला भी वही तो है। उसमें संचित कुसंस्कार प्रदीप ज्वालारूपी अंतरात्मा पर कषाय-कल्मषों की तरह छाए रहते हैं। न वह स्वयं प्रकाशवान हो पाती है, न ही जीवन को प्रकाशवान करने, औरों को प्रखर−प्रेरणा दे सकने योग्य बन पाती है। पहले आत्मपर्यवेक्षणकर, अंतर्मुखी बनकर अपने वर्तमान क्रियाकलापों, भूत व भविष्य का सुनियोजन करना होता है, ताकि अल्पावधि के लिए मिला यह जीवन इंद्रिय उपभोगों में नष्ट न हो जाए।
साधना का निर्धारण किया, उसे अपने इस कर्मयोग का प्रतिफल सुदृढ़ आरोग्य और दीर्घ जीवन के रूप मिलता ही रहेगा।
साधना करनी पड़ती है।
साधना से कर्मों में प्रखरता आती है, ज्ञानयोग से चिंतन उत्कृष्ट होता है– तत्त्वदृष्टि विकसित होती है। भक्तियोग से अंतःकरण सुविकसित होता, पवित्र बनता और इस योग्य होता है कि परमात्मसत्ता का वहाँ अवतरण हो सके। जीवात्मा की सामर्थ्य सीमित है, परमात्मा से मिलने पर ही उसमें परिपूर्णता आती है। यह सम्मिलन समर्पण के आधार पर ही संपन्न होता है। कर्म और ज्ञानयोग की साधना में कर्त्तापन का बोध बना रहता है, जिसके कारण आत्मसत्ता और परमात्मासत्ता के बीच एकत्व स्थापित नहीं हो पाता।
साधनाओं का लक्ष्य यही है। यही वह लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति के लिए योग-साधक तत्पर हो स्वयं आगे बढ़ता है व अन्यों को आगे बढ़ाता है।
साधना कहा जाता है।
साधनाएँ करने कापालिकों के मृतकों की खोपड़ी साफ करने, उससे जल पीने जैसी अघोर-क्रियाओं के पीछे मृतकों की अवशिष्ट वलय-ऊर्जा को संग्रहित करने का सिद्धांत ही कार्यान्वित होता है। तंत्र-साधना में तांत्रिक अपने मनोबल की वृद्धि अन्यों के शरीरों की ऊर्जा के दोहन द्वारा भी करते हैं। कभी-कभी श्मशानों में धुँधले प्रकाश की गोलियाँ, लहरें अथवा धुँध उड़ती देखी जाती है। यह मृतक या अवशिष्ट तेजोवलय ही होता है जो शरीर के जल जाने के बाद भी सूक्ष्मरूप में वहाँ विद्यमान रहता है। श्मशान में जाने पर वहाँ रुकने की इच्छा नहीं होती, अकारण भय छाया रहता है।
साधनाओं का सत्परिणाम भी असाधारण होता है। उसके लिए उनका मूल्य चुकाने के लिए क्लिष्ट तप-साधनों को उपयुक्त मार्गदर्शन में अपनाते हुए ही प्रगति-पथ पर अग्रसर होना होता है।
साधना का—परिष्कार का विज्ञान है।
साधना पुरुषार्थ को सफल बनाना हर किसी के लिए संभव है।
साधना अपना चमत्कार दिखाने लगेगी। अपने क्रियाकलापों में वे सारी उपलब्धियाँ साकार होती दिखाई देने लगेंगी जिनकी चर्चा आप्त वचनों व शास्त्रों में की गयी है।
साधना की सफलता का स्वप्न देखते हैं।
साधना-पथ के हर जिज्ञासु को इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए। आहार संबंधी सतर्कता अपनाकर अपने साधना पुरुषार्थ को सफल बनाना हर किसी के लिए संभव है।
साधना के लिए गंगा की गोद, हिमालय की छाया का दिव्य लाभ साधक को मिलता है। साथ ही सबसे बड़ी बात यह है कि साधना के लिए जिस समर्थ–मार्गदर्शन और दिव्य संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है, वह सहज ही प्राप्त है। गंगा, हिमालय और समर्थ मार्गदर्शन की त्रिवेणी में स्नान करने वाले साधक ऐसी पवित्रता एवं आत्मिक समर्थता साधना के उपरांत वापिस लेकर लौटते हैं, जिससे भौतिक एवं आत्मिक-प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधनामार्ग पर चलने वाले हर जिज्ञासु साधक को संरक्षण— मार्गदर्शक की व्यवस्था भी बनाकर चलना चाहिए। वैराग्य और अभ्यास के विशाल स्वरूप की एक झाँकी मात्र कराई गई है। सोपानों पर चढ़ते−बढ़ते इनके उच्चस्तरीय आयाम भी खोले जाने हैं। इन्हें साधक क्रमशः मार्गदर्शन के रूप में प्राप्त करते रहेंगे।
साधना— तपश्चर्याओं की समस्त ध्यानपरक, तितिक्षापरक क्रिया−प्रक्रिया ऐसे ही निर्धारणों से भरी पड़ी है। इतने पर भी इस तथ्य को समझ ही लेना चाहिए कि उपचारों की आवश्यकता इसीलिए पड़ती है कि व्यक्तित्व के अदृश्य स्तर का; अंतराल का, कायाकल्प संभव हो सके। दृष्टिकोण और कार्य−प्रवाह में निकृष्टता यथावत् बनी रहे और क्रिया−प्रक्रिया के रूप में चित्र−विचित्र उपचार चलते रहें तो समझना चाहिए कि जड़ की उपेक्षा करके पत्ते धोने जैसी विडंबना चल रही है।
साधना में उच्चस्तरीय सोपानों से पूर्व आहारशुद्धि का ही व्रत लिया जाता है।
साधना कहा जा सकता है। इसके लिए दृष्टिकोण का, भावनात्मक मनोभूमि का, परिष्कार करना होता है। पाशविक चिंतन को हेय स्थिति से उलटकर सद्भावना व सत्प्रवृत्तियों में रत होना पड़ता है। समस्त अध्यात्मयोग-साधनाओं का लक्ष्य यही है। यही वह लक्ष्य है, जिसकी प्राप्ति के लिए योग-साधक तत्पर हो स्वयं आगे बढ़ता है व अन्यों को आगे बढ़ाता है।
साधना’ अपने आप में एक बड़ा व्यापक शब्द है। इसका अर्थ हुआ— "आत्मसत्ता के परिष्कार के लिए किए गए अनेकानेक पुरुषार्थ−प्रयास।” अपने को कुमार्ग से हटाकर, भली प्रकार साधकर सही दिशा में मोड़ देना व उस पथ पर तेजी से चल पड़ना, इसी शब्द की विवेचना के अंग हैं। विडंबना यह है कि आज इससे अभिप्राय जप-ध्यान, पूजा−उपचार, विभिन्न यौगिक क्रियाओं इत्यादि तक ही सीमित होकर रह गया है। जबकि ये सभी उच्चस्तरीय प्रयोजन अपने स्थान पर सही होते हुए भी एकांकी हैं— निष्फल हैं, यदि प्रारंभिक पुरुषार्थ, आत्मपर्यवेक्षण एवं आत्मविकास का नहीं हुआ तो।
साधना आत्मिक-क्षेत्र में भी होती है तथा भौतिक में भी। जैसे प्रयास किए जाते हैं, वैसी ही सफलता मिलती है।
साधना की सफलता में तो कुधान्य का, अभक्ष्य का विषवत् प्रभाव पड़ता है। मन की चंचलता इतनी तीव्र हो जाती है कि सामान्य क्रियाकलापों में एकचित्त होकर कुछ कर सकना कठिन हो जाता है। फिर साधना में जिस एकाग्रता की, मनोयोग की आवश्यकता है, वह अभक्ष्य एवं अधिकमात्रा में खाने पर मिल ही नहीं सकती।
साधना की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़ने के पात्र बन सकते हैं, इस अकाट्य तथ्य को एक बार नहीं, बार-बार समझ लेना चाहिए।
साधना का। इसे छोड़कर पगडंडियों में भटकने से थकान, खीज और निराशा के अतिरिक्त और कुछ पल्ले पड़ता नहीं है।
साधना के अंतर्गत आते हैं। स्वाध्याय, योग, सत्संग, चिंतन−मनन, इसी के अंग हैं।
साधना के लिए जिस समर्थ–मार्गदर्शन और दिव्य संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है, वह सहज ही प्राप्त है। गंगा, हिमालय और समर्थ मार्गदर्शन की त्रिवेणी में स्नान करने वाले साधक ऐसी पवित्रता एवं आत्मिक समर्थता साधना के उपरांत वापिस लेकर लौटते हैं, जिससे भौतिक एवं आत्मिक-प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना प्रयोगों में ऊनी अथवा रेशमी वस्त्रों को अधिक महत्व दिया जाता था। ऊन ऐसी होती थी जो अहिंसात्मक तरीके से प्राप्त हो जाए। वध के उपरांत भेड़ों की उतारी गई ऊन अथवा कीड़ों को उबालकर उन्हें मार डालने के उपरांत पाया जाने वाला रेशम आत्मिक-प्रगति के लिए की जाने वाली साधना के प्रयोग योग्य नहीं होते। वध के समय प्राणियों का करुण क्रंदन, निकला हुआ चीत्कार उनकी सूक्ष्म स्थिति को आसुरी प्रकृति का बना देता है। ऐसे वस्त्रों को धारण करने वाले के ऊपर भी उस विक्षोभ का प्रभाव पड़ता है।
साधना की परिणति सुपात्र हैं। व्यक्तित्व का सारा आधार ही दृष्टिकोण है। अंतरंग जैसा भी कुछ है, इसी आधार पर बनता है कि अपने आंतरिक विकास के लिए क्या सोचा गया और उसकी रूपरेखा किस प्रकार बनाई गई।
साधना को सही रूप में समझा, बढ़ाया व अपनाया जा सके तो ये दिव्य अनुदान हर किसी के लिए पा सकना सहज-सुलभ है।
साधनाओं में निरत रहने वाले कठोर तप-तितिक्षा के अभ्यासी, साधु, संन्यासी तथा योगी भी नग्न शरीर में भस्म या मिट्टी का आवरण चढ़ाए रहते हैं। पूर्ण नग्न शरीर रखना असभ्य आचरण माना जाता है। इस मान्यता के पीछे प्रमुख कारण सामाजिक मर्यादाएँ हैं, पर आत्मिक कारण यह है कि शरीर को नग्न रखने वाला अपनी शक्ति तरंगें बड़ी मात्रा में बाहर बिखेरता रहेगा, साथ ही दूसरों के भले-बुरे प्रबल भावों से अपने को बचा भी न सकेगा। धूप का तीव्र प्रभाव नग्न शरीर पर पड़ता है। इसी प्रकार दूसरों का चुंबकत्व भी निर्वस्त्र लोगों को अधिक प्रभावित कर सकता है।
साधना के क्षेत्र में दौड़ लगाने की प्रतियोगिता ही चारों ओर नजर आती है। कहीं−कहीं तो मुद्रा, बंध, नेति, धोति, वस्ति आदि बहिरंग योगपरक क्रियाओं को ही योगशिक्षा में सम्मिलित कर लिया गया है। चौथे अनिवार्य चरण पर किसी का ध्यान गया ही नहीं, जिसके बिना ये तीनों अधूरे हैं। मात्र शरीर का शोधन, अभिवर्धन व एकाग्रताजन्य स्थूल परिणतियों तक ही सीमित रह जाने वाले हैं। स्वार्थवादी संकीर्णता में उलझे कुसंस्कारी मन को उच्च आदर्शों को अपनाने की तपश्चर्या में लगा देना ही योग-साधना का प्राण है।
साधना के उत्सुकों का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। यह ध्यान-साधना क्रियाओं में सद्कर्म, चिंतन में सद्ज्ञान व अंतः में सद्भाव के रूप में परिलक्षित होने लगती है। यही वह चरम उपलब्धि है, जिस पर मानव का उत्थान एवं समाज का उत्कर्ष निर्भर है। जितनी जल्दी इन तथ्यों को हृदयंगम कर लिया जाए, श्रेयस्कर है। बाल−क्रियाओं में समय भी नष्ट किया और पाया कुछ नहीं, यह पश्चात्ताप मन में बना रहे, इससे उचित तो यही है कि योग-साधना, अध्यात्म उपचारों के मर्म, स्वरूप एवं लक्ष्य पहले अच्छी तरह समझ लिया जाए।
साधना-संप्रदायों ने किसी न किसी रूप में इसे मान्यता दी है। दीपक की ज्योति अथवा प्रभातकालीन सूर्यमंडल की आभा को ध्यान में लाया जाता है। सामान्य के अतिरिक्त भी ध्यान की कितनी ही असामान्य प्रक्रियाएँ ऐसी हैं, जिसका अभ्यास समर्थ मार्गदर्शन में अपनी-अपनी मनोभूमि के अनुरूप किया जाता हैं।
साधना में जिस एकाग्रता की, मनोयोग की आवश्यकता है, वह अभक्ष्य एवं अधिकमात्रा में खाने पर मिल ही नहीं सकती।
साधना का अर्थ हैं— जन-जन के अंतःकरण पर संकीर्णता— मोह-ममता की परत-दर-परत चढ़े आवरणों को उघाड़ना, चेतना को परिष्कृत करना। ऐसी स्थिति में व्यक्ति पूर्णरूपेण बदल जाता है। वह जैसा भी कुछ बहिरंग में दृष्टिगोचर होता है, उसमें तो नहीं, पर अंदर से वह असामान्य स्तर का महामानव बन जाता है।
साधना करने लगे। बीच−बीच में कई डरावनी, लुभावनी परीक्षा होती रहीं। उनका धैर्य और साहस सुदृढ़ बना रहा, एक वर्ष पूरा होते−होते ही भैरव प्रकट हुए और वरदान माँगने की बात कहने लगे।
साधना से न केवल आरोग्य लाभ मिलता है; वरन तपश्चर्या की ऊर्जा से स्वयं को पकाकर ऐसा भी बहुत कुछ पाया जा सकता है, जो प्रकृति की रहस्यमयी परतों में खोजा-पाया जाता है। सिद्धपुरुषों का प्रकृति पर आधिपत्य होता है। इनका आधारभूत कारण यह है कि काया में उन्हीं रहस्यों की बीजरूपी उपस्थिति को कृषिकार्य जैसे साधनों से विकसित कर लिया जाता है; फलतः काया समूची माया का प्रतिनिधित्व करने लगती है। काया और प्रकृति के बीच आदान−प्रदान होने लगता है। जिस प्रकार पृथ्वी के ध्रुवकेंद्र व्यापक ब्रह्मांड से अपनी आवश्यक सामग्री खींचते, उपयोग करते रहते है, उसी प्रकार सिद्धपुरुषों की काया न केवल ब्रह्मांडव्यापी माया से— प्रकृति से आदान−प्रदान करती है; वरन चेतनात्मक विशेषता के कारण कई बार उस पर आधिपत्य भी करने लगती है।
साधना का मार्गावलंबन भी अनिवार्य है।
साधना का अर्थ है— ”अपने को सुसंस्कृत-सभ्य बना लेना।’ अपने जीवन देव की सुव्यवस्था के लिए की गई चेष्टाएँ ही साधना कहलाती हैं।
साधना कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं, यह एक सुनिश्चित तथ्य है। कक्षाएँ उत्तीर्ण करके ही विद्यार्थी स्नातक की उपाधि पाते, उच्चपदाधिकारी बनते हैं। छलांगें भौतिक जगत में कई क्षेत्रों में लगाई जाती हैं और सफल भी होती हैं; पर आत्मिक-क्षेत्र में ऐसी सुविधा नहीं है। संचित दुष्कर्मों से विनिर्मित प्रारब्ध न केवल विपत्तियों–असफलताओं का त्रास देता है; वरन उच्चस्तरीय प्रगति के पथ पर चलने में भी अनेकों विघ्न उपस्थित करता है। रास्ते में अड़ी इन चट्टानों को हटाने−सरकाने के लिए साहसपूर्ण पराक्रम करना होता है।
साधना को अनिवार्य रूप से अपनाना चाहिए।
साधना कह देना इसी प्रकार की एक धोखाधड़ी षड्यंत्र है। अध्यात्म के सरलीकरण की यह प्रक्रिया किसी भी प्रकार उचित नहीं ठहरायी जा सकती। एक मजदूर जो दिन में 3−3 क्विंटल वजन उठाकर इधर−उधर करता है अथवा जो खेत में हल जोतता है, एक सैनिक जो अपनी कवायद करता है, उतना शरीर-शोधन कर लेता है, जितना इन क्रियाओं से संभव है; पर यह योग तो नहीं हुआ? ऐसी दशा में मात्र आसन-प्राणायाम को तिल का ताड़ बनाकर खड़ा कर देना अध्यात्म विद्या के साथ मजाक है।
साधना का आश्रय लेकर मनुष्य आत्मशोधन और आत्मपरिष्कार का दुहरा प्रयोजन एक साथ पूरा कर सकता है।
साधनाएँ तपश्चर्या के रूप में निर्धारित करनी होती हैं। तपस्वी सच्चे अर्थों में सामर्थ्यवान बनता है। उसकी ऊर्जा से प्रखरता, परिपक्वता बढ़ती हैं। तपस्वी ही शरीरगत ओजस्, मनोगत तेजस् एवं अंतःकरण वर्चस् से सुसंपन्न बनते हैं। इसी आत्मबल के सहारे ऋद्धि-सिद्धियों का द्वार खुलता हैं।
साधना के प्रयोग योग्य नहीं होते। वध के समय प्राणियों का करुण क्रंदन, निकला हुआ चीत्कार उनकी सूक्ष्म स्थिति को आसुरी प्रकृति का बना देता है। ऐसे वस्त्रों को धारण करने वाले के ऊपर भी उस विक्षोभ का प्रभाव पड़ता है। साधना में शारीरिक विद्युत के आवागमन में प्रतिरोध उत्पन्न करने की क्षमतासंपन्न होते हुए भी ऐसे वस्त्रों के धारण करने से अनेकों प्रकार की मानसिक बाधाएँ उत्पन्न होती हैं, फलतः आध्यात्मिक उन्नति का प्रयोजन पूरा नहीं होने पाता। ऊन अथवा रेशम अहिंसात्मक तरीके से प्राप्त हुआ हैं, इस बात की गारंटी हो तभी उनसे बने वस्त्र प्रयोग किए जाए, संदिग्ध स्थिति हो तो उनका प्रयोग न करना ही श्रेष्ठ है।
साधना में शारीरिक विद्युत के आवागमन में प्रतिरोध उत्पन्न करने की क्षमतासंपन्न होते हुए भी ऐसे वस्त्रों के धारण करने से अनेकों प्रकार की मानसिक बाधाएँ उत्पन्न होती हैं, फलतः आध्यात्मिक उन्नति का प्रयोजन पूरा नहीं होने पाता। ऊन अथवा रेशम अहिंसात्मक तरीके से प्राप्त हुआ हैं, इस बात की गारंटी हो तभी उनसे बने वस्त्र प्रयोग किए जाए, संदिग्ध स्थिति हो तो उनका प्रयोग न करना ही श्रेष्ठ है। ऐसी हालत में सूती वस्त्रों का उपयोग कहीं अधिक श्रेयस्कर है।
साधना दो से मिलकर बना है। योग का अर्थ होता है— जुड़ना एवं साधना अर्थात नियंत्रण में कर लेना— मजबूती से अपनी पकड़ में ले लेना। किसे जोड़ना, किसे जुड़ना व किसे नियंत्रण में लेना, इनके ठीक तरह न समझ पाने के अज्ञान के कारण ही इस क्षेत्र में नाना प्रकार की भ्रांतियाँ फैली हैं। इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में एक समस्या मानकर चला जाए तो चमत्कार–सिद्धियों संबंधी मान्यताओं का जो अनाधिकार प्रवेश इस क्षेत्र में गलत रूप में हो गया है, उससे स्वयं बचा व अन्यों को बचाया जा सकता है।
साधना का प्राण है। चूँकि यह सबसे दुष्कर कार्य है, सबसे बड़ा आत्मिक पुरुषार्थ इसी में करना होता है, इसी कारण सबसे अधिक अवहेलना भी इसी की, की जाती है। कहा जाता है कि योग विज्ञान प्रथम तीन व अन्य हठयोग की क्रियाओं तक सीमित है। चिंतन व आहार, कर्त्तव्य व व्यवहार में पूरी छूट है।
साधना कहलाती हैं।
साधना-प्रक्रिया की सफलता के लिए नितांत आवश्यक माना जाय। इस संबंध में शास्त्रमतों व वर्तमान परिस्थितियों में तालमेल बैठाकर कुछ निर्धारण कर लिए जाएँ। सप्ताह में एक दिन उपवास, नियम अवधि के लिए अस्वाद व्रत का पालन, एक समय अन्नाहार–एक समय शाकाहार, दूध−छाछ−रस−द्रव्य कल्प, दलिया या अमृताशन इत्यादि में से किसी एक को अपनाकर साधनावधि इसी प्रकार व्यतीत की जाए। इस तपश्चर्या का माहात्म्य अवर्णनीय है। सामान्यजन तो इसकी फलश्रुति चर्मचक्षुओं से स्वास्थ्य में परिवर्तन देखकर ही आश्चर्यचकित हो जाते हैं।
साधना का अर्थ ही है— अनुशासन— मजबूती से विचारों को साध लेना। यह तभी संभव है, जब मनन पल−पल चले। तभी नित्य की क्रियाओं में साधना अपना चमत्कार दिखाने लगेगी। अपने क्रियाकलापों में वे सारी उपलब्धियाँ साकार होती दिखाई देने लगेंगी जिनकी चर्चा आप्त वचनों व शास्त्रों में की गयी है।
साधना से तन्मयता जन्म लेती है और एकाग्रता उत्पन्न होने का साधक बन जाती है। वैचारिक नियोजन और भावभरी ललक का समावेश हुए बिना चिंतन उखड़ा−उखड़ा ही रहेगा। प्रगति-पथ पर आगे बढ़ने के लिए इसी कारण दोनों का समन्वय आवश्यक है।
साधना में आत्मा और परमात्मा दोनों परस्पर जुड़ते हैं; अंततः एक जैसे हो जाते हैं।
साधना उपचार की। मानसिक परिशुद्धि के पूर्व, मन के दोषों को जानना आवश्यक है। विषय-सेवन इंद्रियों का सहज स्वभाव है, पर उसमें मनोयोग होने से प्रत्येक विषयानुभूति मन पर एक आशक्तिजनक संस्कार छोड़ती है। विषय-सुख तो क्षणिक होते हैं, पर मन की विशेषता यह है कि जब उसे कोई विषय प्राप्त नहीं होता, तो वह अपने पूर्वानुभव जन्म संस्कार के कारण उसे पाने की लालसा करता है। इसे ही मनीषियों ने राग कहा है।
साधना-क्षेत्र में समर्पण का असाधारण महत्त्व बताया गया है। अपने पुरुषार्थ के बलबूते तो एक सीमा तक ही आगे बढ़ा जा सकता है। स्वयं के पुरुषार्थ के साथ−साथ बाह्य अनुदान भी आगे बढ़ने के लिए आवश्यक हैं। मनुष्य को कितनी ही ऐसी सुविधाएँ प्राप्त हैं जिनके लिए उसे कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ा है। प्रकृति ने उसे मुक्तहस्त से प्रदान किया है।
साधना कहते हैं।
साधना से ही तृप्ति होती है। पक्षी सुविस्तृत आकाश में उड़ने पर व्यापक अंतरिक्ष को अपना कार्यक्षेत्र पाता है। परमात्मा की परिधि में प्रवेश करने वाले साधक को भी सर्वत्र अपना ही आपा दिखता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की रीति−नीति अपनाने वाला दृष्टिकोण एवं कार्यक्रम ही वरण करना होता है।
साधना विज्ञान को— तत्त्व दर्शन को पुनर्जीवित किया जाए, जो चेतना की गरिमा को समझाने और उसे सदुद्देश्य में निरत करने की विद्या समझा सके। इससे कम में वर्तमान विनाश-विग्रह से बच निकलने का और कोई उपाय है नहीं। बुद्धि, संपदा और सुविधा की अभिवृद्धि के साथ−साथ उनका सदुपयोग करा सकने वाली भाव-चेतना— आत्मविद्या का पुनर्जीवन इन दिनों जितना आवश्यक है, उतना इससे पूर्व कभी भी नहीं रहा। इस दिशा में इन दिनों बरती गई उपेक्षा इतनी आत्मघाती होगी कि इसका सुधार— समाधान फिर कभी हो ही न सकेगा।
साधना का ककहरा यहीं से आरंभ किया जाए और पल−पल, पग−पग पर ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ के दर्शन को जीवन में उतारने का प्रयास किया जाए।
साधना की प्रक्रिया नर-पशु को नर-नारायण में किस प्रकार बदलती है, इसे जानने के लिए जिज्ञासु मनीषियों को आत्मिकी विद्या के गूढ़ तत्त्वदर्शन को भलीभाँति जानना चाहिए। उच्चस्तरीय साधना-सोपानों को तुरंत पाने का प्रयास करने वालों को इस एक तथ्य को समझ लेना बहुत अनिवार्य है कि अंतःकरण का परिष्कार— वृत्तियों का शोधन ही समस्त सिद्धियों का राजमार्ग है।
साधना को ‘आत्मबोध’ और सोते समय वाले चिंतन को ‘तत्वबोध’ कहा गया है। यह दोनों देखने, कहने, सुनने एवं करने में अत्यंत साधारण जैसे लगते हैं; किंतु यदि चिन्ह पूजा की तरह उनकी लकीर न पीटी जाए और गंभीरतापूर्वक उन विचारणाओं की परिणति एवं फलश्रुति पर विचार किया जाए तो प्रतीत होगा कि इस बीज का विकास विस्तार विशालकाय वटवृक्ष के रूप में होता है। चिनगारी तनिक-सी होती है; किंतु उसे ईंधन की सुविधा मिल सकें तो उसे प्रचंड दावानल बनते और योजनों लंबे वनप्रदेश उदरस्थ करते देर नहीं लगती। आँख से न दीख पड़ने वाला, बाल की नाक से भी कम विस्तार वाला शुक्राणु जब नौ महीने जितने स्वल्पकाल में एक अच्छा खाना शिशु बनकर प्रकट होता है तो कोई कारण नहीं कि उपरोक्त विचारद्वय समुचित परिपोषण पाने पर जीवन को देवत्व से लपेट लेने वाले वरदान— सौभाग्य के रूप में प्रकट-विकसित न हो सकें।
साधना की ध्यान-प्रक्रिया द्वारा प्रस्तुत किया है। योग-साधना में ध्यान का महत्त्व सर्वोपरि है। विश्व के कोने-कोने में प्रचलित अनेकानेक धर्मों के साधना-विधानों में ध्यान की प्रक्रिया किसी न किसी रूप में अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है। उसके बिना प्रगति का एक चरण भी आगे नही बढ़ता। योगशास्त्रों में ध्यान की महिमा का गुणगान अनेकों स्थानों पर किया गया है–
साधनाएँ उपवास प्रधान होती हैं। कई कड़ी होती हैं, कुछ मृदु। पूर्णिमा से पूर्णिमा तक क्रमशः घटाते हुए बढ़ाने वाला चांद्रायणक्रम इन अंकों में पहले ही विस्तार से समझाया जा चुका है। कुछ लोग मात्र जल या पेय पर उपवास करते हैं। प्राचीनकाल के मनोबल और शरीरगत क्षमता को दृष्टिगत रखकर यह कभी ठीक रहा होगा, पर अब बदली हुई परिस्थितियों में इस क्रम को सरल बनाया जा सकता है।
साधना है। लोक-मंगल का परमार्थ और उसके सहारे अपनी सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन ही आराधना है। उपासना परमात्मा की, साधना अंतरात्मा की और आराधना विश्वात्मा की की जाती है। चांद्रायणकाल में बहिर्मुखी माया-प्रपंच से अवकाश प्राप्त किया जाता है और उस अवधि में अंतर्मुखी रहकर अंतर्जगत का पर्यवेक्षण किया जाता है। इस दिशा परिवर्तन के लिए नियोजित आत्मसाधना जितनी भावपूर्ण एवं गंभीर होगी उतना ही चांद्रायण का प्रत्यक्ष वरदान उपलब्ध होगा।
साधना कालांतर में भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों के रूप में साधक पर बरसती हैं— उसे कृतकृत्य बनाती हैं। अपनी साधना का ककहरा यहीं से आरंभ किया जाए और पल−पल, पग−पग पर ‘चित्तवृत्तिनिरोध’ के दर्शन को जीवन में उतारने का प्रयास किया जाए।
साधना द्वारा जीवन को एक महान मोड़ दे सकने वाली प्रखरता से संपन्न बनाया जा सका या नहीं।
साधना को ‘व्रत’, 'तप’ एवं ‘कल्प’ के नाम से जाना जाता है। ‘व्रत’ अर्थात् संयम, अनुशासन निर्धारण एवं परिपालन। 'तप' अर्थात संचित कुसंस्कारों के संघर्ष और शालीनता के अवधारणा का अभ्यास के संघर्ष और शालीनता के अवधारणा का अभ्यास-पुरुषार्थ। 'कल्प' अर्थात पिछली हेय स्थिति को उलटकर उसके स्थान पर उत्कृष्टता का प्रतिष्ठापन। यह तीनों ही प्रयास परस्पर मिलते हैं तो ज्ञान और कर्म की गंगा-यमुना मिलने से एक नई धारा भक्तिभावना की, दिव्य जीवन की सरस्वती के रूप में उद्भूत होती हैं।
साधनाक्रम व्यावहारिक जीवन में उतारा जाए, ताकि आत्मिक-प्रगति की दिशा में अग्रसर हुआ जा सके। ‘साधना’ शब्द को भ्रम-जंजाल में न उलझाकर, मानव जन्म रूप में सहज प्राप्त इस अनुदान को न भुलाकर यदि इन तीन शरीरों की ही साधना कर ली जाए तो वह सब कुछ हस्तगत हो सकता है, जिसकी चर्चा सिद्धियों-चमत्कारों के रूप में की जाती है। पथ है तो कठिन, पर इसे पार किए बिना उच्चस्तरीय सोपानों पर पहुँचने वालों के प्रयास निष्फल ही रहेंगे।
साधना। राजयोग, हठयोग, भक्तियोग, लययोग की समस्त दिशा धाराएँ जिस एक स्थान पर आकर केंद्रित होती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। एकाग्रता में वृद्धि के अनुपात में ही साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान लगाते हैं। इसीलिए उपनिषद्कार ने नारद−सनत्कुमार जिज्ञासा-समाधान के माध्यम से कहा है— "संकल्पो वाव मनसी भूयान। चित्तं वाव संकल्पाद्भूयो।
साधना द्वारा उन्हें जगाया एवं विकसित किया जा सकता है। आत्मा के परमात्मा स्तर तक जा पहुँचने की पूरी−पूरी संभावना है। चिनगारी में दावानल बनने की सभी विशेषताएँ मौजूद रहती हैं। विशाल वृक्ष का ढाँचा बीज के भीतर सन्निहित है। नन्हें से शुक्राणु में प्राणी की आकृति एवं प्रकृति का अधिकांश स्वरूप समाहित रहता है; जो नेत्रों से दिखाई नहीं पड़ता।
साधनाओं में से अधिकांश का एक ही उद्देश्य है— एकाग्रता−संपादन। नादानुसंधान, चक्र−वेधन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि जितनी भी योग की शाखा−प्रशाखाएँ हैं–उन सब में एक ही प्रक्रिया है— उच्चस्तरीय चिंतनसहित एकाग्रता की साधना। राजयोग, हठयोग, भक्तियोग, लययोग की समस्त दिशा धाराएँ जिस एक स्थान पर आकर केंद्रित होती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। एकाग्रता में वृद्धि के अनुपात में ही साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान लगाते हैं। इसीलिए उपनिषद्कार ने नारद−सनत्कुमार जिज्ञासा-समाधान के माध्यम से कहा है— "संकल्पो वाव मनसी भूयान।
साधना आज की शोध का सबसे बड़ा महत्त्वपूर्ण विषय है। अब पुरातन जैसी न तो मनःस्थिति है, न परिस्थिति। शाश्वत सिद्धांतों को आज के परिवेश में किस प्रकार व्यावहारिक बनाया जा सकता है, यह असाधारण एवं अद्भुत कार्य है; क्योंकि विज्ञान, उद्योग, शिक्षा, विलास, प्रचलन आदि ने मिल−जुलकर जो माहौल बनाया है, उससे एक प्रकार की नई संस्कृति ने जन्म लिया है। बहुसंख्यक लोग उससे प्रभावित ही नहीं हुए, अभ्यस्त भी बन गए हैं। यह जैसी भी है, सामने है।
साधना उपचारों में ध्यान-प्रक्रिया का महत्त्व सर्वोपरि है। जप को परिशोधन और ध्यान को बीजारोपण की उपमा दी गई है। जपयोग से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा से कषाय-कल्मषों के परिशोधन का प्रयोजन पूरा होता है। यह सोने को तपाकर खरा बना देने वाली बात है। अलंकार-आभूषण बनाने के लिए जो प्रयत्न करना पड़ता है, उसकी उपमा ध्यान से की जा सकती है।
साधना क्रियाओं में सद्कर्म, चिंतन में सद्ज्ञान व अंतः में सद्भाव के रूप में परिलक्षित होने लगती है। यही वह चरम उपलब्धि है, जिस पर मानव का उत्थान एवं समाज का उत्कर्ष निर्भर है। जितनी जल्दी इन तथ्यों को हृदयंगम कर लिया जाए, श्रेयस्कर है। बाल−क्रियाओं में समय भी नष्ट किया और पाया कुछ नहीं, यह पश्चात्ताप मन में बना रहे, इससे उचित तो यही है कि योग-साधना, अध्यात्म उपचारों के मर्म, स्वरूप एवं लक्ष्य पहले अच्छी तरह समझ लिया जाए। उतना होने पर आगे बढ़ चलना, बिना किसी कठिनाई के ही संभव है।
साधना के बाद ही वे विधि−विधान आरंभ होते हैं, जिनमें सबको सहज कौतूहल रहता है।
साधना के उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगों के लिए भारत के हिमालय क्षेत्र को अद्वितीय गौरव प्राप्त है। यह क्षेत्र ऋषि, योगियों की भूमि मानी जाता रहा है। उच्च आध्यात्मिक प्रयोग इसी क्षेत्र में अनादिकाल से होते चले आ रहे है। आयुर्वेद, रसायन, विद्या, साहित्य सृजन, योगानुसंधान जैसे महत्त्वपूर्ण प्रयोग हिमालय क्षेत्र की सुविस्तृत प्रयोगशाला में समय−समय पर होते रहे हैं। सप्तऋषियों, महामनीषी, देवमानवों के कार्यक्षेत्र इसी भूमि में रहे हैं।
साधना का भवन खड़ा होता है। इसके फलित होने पर जो चमत्कार बहिरंग व अंतरंग-क्षेत्र में दिखाई पड़ते हैं वे मनोबल— आत्मबल की फलश्रुतियाँ नहीं; वरन प्रसुप्त की जागृति की चमत्कृति ही होते हैं। उन्हें पाकर मनुष्य सही अर्थों में मनुष्य बन जाता है।
साधना है।
साधना यह है, जिसमें मस्तिष्कीय गतिविधियों पर, वैचारिक प्रवाहों पर विवेक का अंकुश बिठाया जाता है। चाहे जो कुछ सोचने की छूट नहीं दी जाती। मात्र औचित्य को ही चिंतन का आधार बनाया जाता है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने, अपना चिंतन व्यापक दूरदर्शी बनाने के लिए जिन आधारों की सहायता ली जाती है वे ज्ञानयोग की साधना के अंतर्गत आते हैं। स्वाध्याय, योग, सत्संग, चिंतन−मनन, इसी के अंग हैं।
साधना की सिद्धि में प्रधान बाधा क्या है। संचित दुष्कर्म ही उस मार्ग की सफलता में प्रधान रूप से बाधक होते हैं। यदि उनके निराकरण का उपाय संभव हो सके तो अभीष्ट सफलता सहज ही मिलती चली जाएगी। यही बात संचित पुण्यकर्मों के बहुत देर में फल देने वाली व्यवस्था में जल्दी भी हो सकती है।
साधना की अवधि में माता के गर्भ में निवास कर रहे हैं और ऐसा आवश्यक पोषण प्राप्त कर रहे हैं, जिसके सहारे जन्म लेने के उपरांत समूचे जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने में समर्थ हो सके। गुरुगृह को भी माता के गर्भ सदृश्य माना गया है। साधक की इन दिनों मान्यता ऐसी ही होनी चाहिए। ऊषाकाल, रात्रि की दिखाई की विदाई और दिनमान की अगवानी करता है। साधना-अवधि में ऐसी ही अनुभूति होनी चाहिए कि पशु का स्तर त्यागने और देवस्तर में प्रवेश करने का यह ऊषाकाल है।
साधना, अध्यात्म उपचारों के मर्म, स्वरूप एवं लक्ष्य पहले अच्छी तरह समझ लिया जाए। उतना होने पर आगे बढ़ चलना, बिना किसी कठिनाई के ही संभव है। लक्ष्य यही रहे कि इस पंचतत्त्वों की कायामात्र नहीं; वरन अपने प्रसुप्त आत्मतत्त्वों को जगाना, उठाना, उभारना है।
साधना कह दिया जाता है।
साधना का उपयुक्त वाहन बन सकता है, मात्र इंद्रियाँरूपी सारथियों को संभावना पड़ता है। महामानव दुबली−पतली काया के होते हुए भी अंतः से जीवांत बने रहते हैं, यह मात्र कर्मयोग की महत्ता है। जिस भी व्यक्ति ने शरीर को मंदिर माना–लिप्साओं को शत्रुवत माना, उनसे मोर्चा लिया औषधिरूप सात्विक आहार ग्रहण किया और संतुलित श्रम-साधना का निर्धारण किया, उसे अपने इस कर्मयोग का प्रतिफल सुदृढ़ आरोग्य और दीर्घ जीवन के रूप मिलता ही रहेगा।
साधना द्वारा उस प्रखरता को उभारना एक बड़ा उद्देश्य है, जो मानवीशक्ति को अभ्यस्त अपव्यय से बलपूर्वक बचाती और दबाव देकर उसे सत्प्रयोजनों में नियोजित करती है।
साधना के नाम पर ही हुआ है कि आत्मिक पुरुषार्थ–आत्मोत्थान की इस पद्धति— क्रियाविधान को सरल–सुगम बनाने के नाम पर आत्मप्रवंचकों ने जमकर तथ्यों की अवहेलना की है व अध्यात्म विज्ञान को हानि भी पहुँचाई है। आस्था संकट का एक कारण यह भी है कि व्यक्ति उपचारों को गलत ढंग से अपनाने पर परिणाम न मिलने की शिकायत करे एवं प्रकारांतर से इन उपचारों में अपनी अनास्था व्यक्त करे।
साधनाएँ नित्यकर्म कहलाती हैं और उनमें देव प्रतिमाओं के पूजा-उपचार को भी महत्त्व दिया व माहात्म्य बताया जाता है। उच्चस्तरीय साधनाओं का सत्परिणाम भी असाधारण होता है। उसके लिए उनका मूल्य चुकाने के लिए क्लिष्ट तप-साधनों को उपयुक्त मार्गदर्शन में अपनाते हुए ही प्रगति-पथ पर अग्रसर होना होता है।
साधना में उपवास प्रमुख हैं। इस अवधि में सामान्य आहार की तुलना में आधा ही लिया जाता है। जो खाया जाए वह पूर्ण सात्विक एवं सुसंस्कारी हो, इसका ध्यान रखा जाता है। संयम को ही तप कहते हैं। सामान्य जीवन में यह तप चार प्रकार अपनाया जाता है।
साधना की ओर प्रवृत्त साधक का शरीर दूसरे अन्य लोगों की तरह ही स्वस्थ बनाए रखने के लिए आसन, प्राणायाम जैसे व्यायामों का प्रयोग जरूरी है। आहार-विहार ठीक हो— संयमित दिनचर्या हो। योगी हो अथवा साधारण लोक−जंजाल में फंसा व्यक्ति दोनों ही के लिए यह जरूरी है कि, आसन आदि तथा बलवर्धक शरीरपरक क्रियाएँ करके शरीर को सुगठित-क्रियाशील रखा जाए। यह स्वास्थ्य-रक्षा हर स्थिति में उपयोगी है, अनिवार्य है, पर गलती तब होती है जब शारीरिक अवयवों की तोड़−मरोड़, अंगों को ऐसे−वैसे घुमाना, इन्हीं को योग-साधना कह दिया जाता है।
साधना का, सात्विक जीवनक्रम का तथा सोद्देश्य चिंतन व दिशा-निर्धारण का इसमें समावेश हो जाता है तो अगणित विभूतियों के रूप में इसके परिणाम सामने आते हैं।
साधना के प्रतिफल ऐसे प्रकरण हैं, जिन्हें हम यह कहकर नहीं टाल सकते कि ये अंधविश्वास हैं। योगियों के साथ जुड़ी विभूतियाँ, ईश्वरभक्तों को प्राप्त विशिष्टताएँ मात्र संयोग नहीं हैं; पर यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि ये सिद्धियाँ ही सब कुछ नहीं हैं। बिना व्यक्ति के अंतरंग के परिष्कार के, नीतिमत्ता के विकसित हुए, वे आत्मिक विभूतियाँ न रहकर, भौतिक सिद्धियाँ भर रह जाती हैं। उनकी चमत्कृति का आकर्षण स्थूल तक ही सीमित बना रहता है।
साधना-पथ पर पुरुषार्थ साधक को स्वयं करना पड़ता है पर पथप्रदर्शक के मार्गदर्शन के बिना भटकाव की की गुंजाइश अधिक है। अस्तु-साधनामार्ग पर चलने वाले हर जिज्ञासु साधक को संरक्षण— मार्गदर्शक की व्यवस्था भी बनाकर चलना चाहिए। वैराग्य और अभ्यास के विशाल स्वरूप की एक झाँकी मात्र कराई गई है। सोपानों पर चढ़ते−बढ़ते इनके उच्चस्तरीय आयाम भी खोले जाने हैं। इन्हें साधक क्रमशः मार्गदर्शन के रूप में प्राप्त करते रहेंगे।
साधना के उपरांत वापिस लेकर लौटते हैं, जिससे भौतिक एवं आत्मिक-प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
साधना में ध्यान का महत्त्व सर्वोपरि है। विश्व के कोने-कोने में प्रचलित अनेकानेक धर्मों के साधना-विधानों में ध्यान की प्रक्रिया किसी न किसी रूप में अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है। उसके बिना प्रगति का एक चरण भी आगे नही बढ़ता। योगशास्त्रों में ध्यान की महिमा का गुणगान अनेकों स्थानों पर किया गया है–
साधना के उपरांत तेजोवलय की एक बहुमूल्य आध्यात्मिक पूँजी लेकर वापिस लौटता है।
साधना के दर्शन में भ्रांति घुस पड़ने से ही इन दिनों देवत्व के साथ संपर्क-साधना और उससे लाभान्वित हो सकना अशक्य बन गया है। हर क्षेत्र अपने पुरुषार्थ की उपलब्धियों पर प्रसन्न होता और गर्व करता दीखता है। एक अध्यात्म क्षेत्र ही ऐसा है, जिसमें उदासी, निराशा, असफलता का माहौल है। अविश्वास बढ़ने से प्रयत्न शिथिल हो रहे हैं और उस शून्य को भरने के लिए निहित स्वार्थों की विडंबना अनेकानेक प्रपंचों का ढकोसला सर पर लादकर सामने खड़ी हो रही है। इस स्थिति का अंत होने के लिए आवश्यक है कि आत्मिकी का वास्तविक स्वरूप और प्रयोग सामने आए।
साधना का उच्चस्तरीय लाभ उठाने की दृष्टि से आवश्यक होता है कि सदा के लिए न सही, तो कुछ समय के लिए ऐसे सात्विक वातावरण में रहकर साधना की जाए जहाँ से अभीष्ट परिमाण में आत्मिक ऊर्जा जुटाई जा सके। कहना न होगा, इस दृष्टि से हिमालय का उत्तराखंड सर्वश्रेष्ठ है।
साधना (2) प्रज्ञा उपासना (3) भविष्य निर्धारण की आराधना। संयम साधना में उपवास प्रमुख हैं। इस अवधि में सामान्य आहार की तुलना में आधा ही लिया जाता है। जो खाया जाए वह पूर्ण सात्विक एवं सुसंस्कारी हो, इसका ध्यान रखा जाता है। संयम को ही तप कहते हैं।
साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गए।
साधनाकाल में वृन्दावन रहकर समग्र तन्मयता के साथ गायत्री महापुरश्चरणों में संलग्न थे। उन्होंने पूर्ण विधि−विधान के साथ लगातार ग्यारह वर्षों तक अपनी साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गए।
साधना का सिद्धांत यही है। प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए आदर्शवादी त्याग−बलिदान करने की माँग पूरी करनी होती है। जीवनचर्या को सन्निहित सिद्धांतों के सहारे अधिकाधिक पवित्र प्रखर एवं परिष्कृत करने का न केवल संकल्प करना पड़ता है; वरन् उसे निष्ठापूर्वक निभाना भी होता है।
साधना’ शब्द को भ्रम-जंजाल में न उलझाकर, मानव जन्म रूप में सहज प्राप्त इस अनुदान को न भुलाकर यदि इन तीन शरीरों की ही साधना कर ली जाए तो वह सब कुछ हस्तगत हो सकता है, जिसकी चर्चा सिद्धियों-चमत्कारों के रूप में की जाती है। पथ है तो कठिन, पर इसे पार किए बिना उच्चस्तरीय सोपानों पर पहुँचने वालों के प्रयास निष्फल ही रहेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-June
साधना के उपक्रम का समावेश करना होगा। चिन्तन और व्यवहार में घुसी हुई अवाँछनीयता का निरीक्षण उठाना होगा। दूसरा पूरक का दम यह है कि जो नहीं है उसे किस प्रकार उपार्जित उपलब्ध किया जाय। यही है परिशोधन और परिष्कार की उभयपक्षीय प्रक्रिया जिसे अपनाकर लैफ्ट राइट करते हुए सर्वतो मुखी प्रगति एवं सुख−शांति के लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अध्यात्म नगद धर्म है।
साधना को व्यावहारिक जीवन की तपश्चर्या कहा गया है। तप को चमत्कारी शक्ति की फलश्रुति धर्मशास्त्री और आप्त वचनों में विस्तारपूर्वक समझाई गई है। दृष्टि पसार की−प्रगतिशील महामानवों की− रीति−नीति का पर्यवेक्षण करके यह जाना जा सकता हैं कि उन्हें अभ्युदय−लाभ का सुअवसर आसमान से टूटकर नहीं मिला है। इसके लिए उन्होंने अनगढ़ को सुगढ़, अस्त−व्यस्त को सुव्यवस्थित। पतन को उत्थान में परिणति करने का प्रचण्ड पराक्रम किया है।
साधना है। जो इसे कर सके वे धन्य हो गये। जिसने इस उत्तरदायित्व की अवहेलना की वे सौभाग्य में बदलने वाली अवाँछनीयता अपनाकर शोक−सन्तापों को सहते असन्तोष तिरस्कार की भट्टी में झुलसते, अपनी और साथियों की दुर्गति कराते, रोते−कलपते, हाथ−मलते इस दुनिया से चले गये। बुद्धिमत्ता का एक ही प्रधान चिन्ह है कि जो हस्तगत है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग कैसे किया गया? जो इतना कर लेते हैं उन्हें प्रामाणिक ठहराया जाता है और हाथों हाथों पदोन्नति का लाभ मिलता है।
साधना। समझना होगा कि मनुष्य जीवन ईश्वर का सर्वोपरि उपहार और आत्मा को पूर्णता के परम लक्ष्य तक पहुँचा सकने वाला सुयोग सौभाग्य है। उसके साथ उज्ज्वल भविष्य की समस्त सम्भावना बीज रूप से समाविष्ट है। जो उपलब्ध है उसके स्वरूप, महत्व,उद्देश्य और सदुपयोग को समझना मनुष्य का अपना अनुत्तरदायित्व है। इसी विधि व्यवस्था को जानने न अपनाने के बदले ही अनेकों अभिशाप सहने पड़ते हैं, गया−गुजरा जीवन जीना पड़ता है।
साधना से व्यवहार में शालीनता उभरती है यह दोनों तत्वतः आस्थाएँ हैं। जिन्हें भाव संस्थान और मनःसंस्थान में प्रतिष्ठित करने के उपरान्त गाड़ी आगे चलती हैं। इस स्थिति पर पहुँचने से ही आदर्शवादिता अपना चमत्कार दिखाती है।
साधना कहते हैं।धर्मशास्त्रों में इसी को पुण्य परमार्थ कहा गया है और स्वर्ग मुक्ति का—जीवन लक्ष्य की पूर्ति का−आधार−भूत कारण माना गया है। पूजा−पाठ—स्वाध्याय−सत्संग आदि कर प्रखर बनाने की भूमिका निभानी है।
साधना। छेदों से रिसने वाले जीवन तत्व को रोकना और उस उपलब्ध शक्ति स्रोतों को सृजन प्रयोजनों के लिए मोड़ना।
साधना वाले विद्वान कहलाते और उच्च पदासीन बनते हैं। व्यवसाय की साधना करने वाले धन कुबेर बनते हैं। शरीर साधने वाले बलवान पहलवान अनेकों पर हावी रहते हैं। कला साधना से गायक, अभिनेता, मूर्तिकार, चित्रकार, कवि साहित्यकार आदि यशस्वी भी बनते हैं और सम्मानित समृद्ध भी। देवताओं की साधना भी जब तब कुछ वरदान अनुदान देती रहती है।
साधना ही पड़ता है। उसी अवसर पर काम काज की अन्यान्यवार्ता करते कराते “युग परिवर्तन और उस संदर्भ में जागृत आत्माओं का राई रत्ती अनुसरण सहयोग भी सम्भव हो सकने की चर्चा भी की जा सकती है जिस प्रकार परिवार−निर्माण की प्रक्रिया भी घर के लोगों के साथ सामान्यवार्ता व्यवहार करते समय ही बिना अतिरिक्त समय लगाये—सरलतापूर्वक सम्पन्न होती रह सकती है। ठीक उसी प्रकार दैनिक संपर्क में आने वालों से भी नव सृजन के संदर्भ में कुछ न कुछ जिक्र तो करते ही रहा जा सकता है भले ही तत्काल उसका अनुकूल प्रतिफल न मिले। जो इतना प्रयास करने के लिए समर्थ हों, उनको ‘जन जागरण का अग्रदूत’ माना जायगा और उनके राई रत्ती सहयोग से ही बूँद−बूँद करके घड़ा भरा जायगा।
साधना है, जो उसके लिए अग्रसर हुआ वो निहाल हो गया। ढेले की तरह निरर्थक दीखने वाले जीवन को यदि गहराई में उतरकर कुरेदा जा सके तो उसके अन्तराल में ऐसे अगणित परमाणु खचे मिलेंगे जिनमें से एक−एक कर विस्फोट ही धरती को हिला सकता है। उपेक्षा से तो हीरा भी काँच की तरह ठुकराया जा सकता है। फिर जीवन का स्वरूप और रहस्य न समझने डडडड उसकी साधना विरत रहने पर कोई अभाव डडडड शोक संतत डडडड पतन पराभव से घिरा पड़ा रहे तो इसके लिए अन्य किसी को दोष कैसे दिया जायेगा जीवन की अवहेलना से बढ़कर पाप उस संसार में ओर कोई नहीं। अन्य पापों से कर्त्ता को तत्काल डडडड मिल ही जाता है, पर जीवन की उपेक्षा का पालक ऐसा है जिसमें उस छोर से इस छोर तक−आरम्भ से अन्त तक नरक ही नरक सड़ता देखा जा सकता है।
साधना के बाद दूसरा नम्बर स्वाध्याय का है। स्वाध्याय कथा पुराणों का नहीं, वरन् युग मनीषियों के उस प्रतिदिन का जो व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत सामयिक समस्याओं को आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत करते हैं। ऐसा साहित्य छपता तो कम है, पर ढूंढ़ने पर जहाँ−तहाँ से उसे चुना बीना जा सकता है। स्वाध्याय के प्रति प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपने परिवार में रुचि जगानी चाहिए। जो पढ़ नहीं सकते उन्हें प्रज्ञा साहित्य सुनाने की व्यवस्था बनानी चाहिए।
साधना दो, स्वयं तपकर।
लोकमंगल की सुरक्षा का बड़ा दायित्व तुम पर॥
साधना की। फलतः वह सिद्धि उनके हाथ लगी जिसे आत्मज्ञान कहते है−पोथी के बेंगनों वाला पढ़ने सुनने तक सीमित रहने वाला बुद्धि विलास नहीं वरन् वह सुनिश्चित निर्धारण जो विश्वास ही नहीं साहस से भी भरा रहता है। जिसके कारण दृष्टिकोण बदलता है और कार्यपद्धति का प्रवाह ही उलट जाता है। सामान्य राजकुमार सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बना देने का चमत्कार कैसे उत्पन्न हुआ इसका उत्तर एक शब्द में देना हो तो उसे आत्म बोध कहा जा सकता है।
साधना और परिवार निर्माण की आराधना करते हुए अन्तरंग, बहिरंग और पारिवारिक क्षेत्र को किस प्रकार समुन्नत बनाना चाहिए। इसकी विद्या सीखनी और कार्य रूप में परिणति करनी होगी। अभ्यास के कारण ही यह प्रयोग कठिन प्रतीत होता है, पर जब उस असमंजस को दूर कर नव निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश किया जायगा तो प्रतीत होगा कि जो कठिन समझा जाता रहा यहां कितना सरल है। जिस नीरस माना गया था वह कितना सरस है। जिसमें घाटा प्रतीत होता था वह कितना लाभदायक है अवाँछनीयता अपनाने में बुद्धिमानी और आदर्शों के अवलम्बन में मूर्खता समप्र जाने को लोक मान्यता की असत्यता प्रज्ञा परिजन इस दिशा में कुछ ही कदम उठाने के उपरान्त भला प्रकार सिद्ध कर सकते हैं।
साधना के माध्यम से व्यक्तित्व को पवित्र प्रखर बनाने और आत्मोत्कर्ष की आवश्यकता पूर्ण करने के सम्बन्ध में भी है। हर काम योजनाबद्ध ढंग से होता है। बिना सोचे बिना कार्य की रूपरेखा बनाये कुछ भी करते−धरते रहने वालों की परिणतियां भी ‘घुणाक्षर न्याय’ जैसी संयोग मात्र होते हैं। कार्य छोटा हो या बड़ा उसके सभी पक्षों पर विचार करने के उपरान्त कदम उठाना ही बुद्धिमानी का चिन्ह माना जाता है यही बात आत्मिक प्रगति के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
साधना का तात्पर्य उपलब्धियों के दुरुपयोग को रोककर सदुपयोग में लगाने के महाभारत में विजय प्राप्त करना है। अर्जुन को इसी में प्रवृत्त किया गया था हनुमान को यही सौंपा गया था। लंका में दुरुपयोग होने वाले वैभव जब रामराज्य में नियोजित हुआ तो सारी परिस्थितियाँ ही उलट गई। दुस्साहस को उलट कर जब परिस्थितियाँ ही उलट गई। दुस्साहस को उलट कर जब परिक्षित ने महान भरत का लक्ष्य पूरा किया जो काया −कल्प जैसा परिवर्तन दृष्टिगोचर हुआ।
साधना की भट्टी में अभिशप्त जीवन को गलाना और श्रेय सौभाग्य के ढाँचे में ढालना नितान्त सम्भव है। लोग जितना पुरुषार्थ साधन जुटाने प्रतिपक्षी को हराने में करते हैं उससे आधा भी यदि अपने आपका परिशोधन, परिमार्जन करने में कर सके तो प्रतीत होगा कि यह सबसे अधिक बुद्धिमत्ता का सबसे अधिक सम्पन्नता सफलता उपार्जन का−काम बन पड़ा। व्यक्तित्व एक प्रकार का चुम्बक है जो अपने स्तर का संपर्क समर्थन सहयोग प्रचुर परिभाषा में खींच बुलाता है। यह कठिन कार्य नहीं है। दूसरे कहना न मानें, पकड़ में न आय तो बात समझी भी जा सकती है पर यह समझ से बाहर की बात है कि अपना शरीर अपना मन, कहना न माने और अपने दृष्टिकोण, स्वभाव, रुझान, अभ्यास को बदलना सुधारना भी अपने आप से न बन पड़े।
साधना व्यापक क्षेत्र भी इसके लिए चुना जा सकता है। इसकी न्यूनतम परिधि अपने आपकी सुधार सेवा तक भी सीमित हो से सकती है। संसार को हजार मन भारी माना जाय और अपने को एक छटांक तो समझना चाहिए। अपने सुधार से भी संसार की उतनी मात्रा में सेवा हो गई जितना कि हजार मन की तुलना में एक छटांक का अनुपात है।
साधना का समन्वय ही प्रकारान्तर से आत्म−निर्माण है। अग्रगामी सूर्य प्रथम इन शाश्वत लक्ष्यों को निजी जीवन में प्रतिष्ठापित करके सर्वसाधारण को यह विश्वास दिला सकने में समर्थ होंगे कि यह प्रयोग ने केवल सरल और सरस है वरन् हाथों−हाथों सत्यपरिणाम प्रदान करने वाला भी है। व्यक्तित्व में गरिमा का संवर्धन इतना बड़ा उपार्जन है जिसकी तुलना हजार मन रत्नराशि एकत्रित करने से भी भारी सिद्ध होती है।
साधना से गायक, अभिनेता, मूर्तिकार, चित्रकार, कवि साहित्यकार आदि यशस्वी भी बनते हैं और सम्मानित समृद्ध भी। देवताओं की साधना भी जब तब कुछ वरदान अनुदान देती रहती है। इन सबसे उठकर जीवन साधना है, जो उसके लिए अग्रसर हुआ वो निहाल हो गया। ढेले की तरह निरर्थक दीखने वाले जीवन को यदि गहराई में उतरकर कुरेदा जा सके तो उसके अन्तराल में ऐसे अगणित परमाणु खचे मिलेंगे जिनमें से एक−एक कर विस्फोट ही धरती को हिला सकता है। उपेक्षा से तो हीरा भी काँच की तरह ठुकराया जा सकता है।
साधना करें। इसके दो अंग हैं—मनन और चिन्तन। इन दिनों की— विशेषतया आज की अपनी स्थिति का पर्यवेक्षण मनन हो और भूलों को सुधारने अभीष्ट को अपनाने के लिए अगले दिन का कार्यक्रम बनाना—चिन्तन। संक्षेप उसे सामयिक आत्म समीक्षा और प्रगति चेतना का ताना− बाना बुनना कहा जा सकता है। इतना करते हुए निद्रा की—प्रज्ञा की गोद में सो जाने का नित्य नियम अपनाना चाहिए।
साधना से किसान और माली फसल काटते और उद्यानों को सोना उगलने के लिए विवश करते है। विद्या की साधना वाले विद्वान कहलाते और उच्च पदासीन बनते हैं। व्यवसाय की साधना करने वाले धन कुबेर बनते हैं। शरीर साधने वाले बलवान पहलवान अनेकों पर हावी रहते हैं। कला साधना से गायक, अभिनेता, मूर्तिकार, चित्रकार, कवि साहित्यकार आदि यशस्वी भी बनते हैं और सम्मानित समृद्ध भी।
साधना भी जब तब कुछ वरदान अनुदान देती रहती है। इन सबसे उठकर जीवन साधना है, जो उसके लिए अग्रसर हुआ वो निहाल हो गया। ढेले की तरह निरर्थक दीखने वाले जीवन को यदि गहराई में उतरकर कुरेदा जा सके तो उसके अन्तराल में ऐसे अगणित परमाणु खचे मिलेंगे जिनमें से एक−एक कर विस्फोट ही धरती को हिला सकता है। उपेक्षा से तो हीरा भी काँच की तरह ठुकराया जा सकता है। फिर जीवन का स्वरूप और रहस्य न समझने डडडड उसकी साधना विरत रहने पर कोई अभाव डडडड शोक संतत डडडड पतन पराभव से घिरा पड़ा रहे तो इसके लिए अन्य किसी को दोष कैसे दिया जायेगा जीवन की अवहेलना से बढ़कर पाप उस संसार में ओर कोई नहीं।
साधना का प्रतिफल सर्वथा असंदिग्ध है। दुःख इसी बात का है कि जीवन का महत्व समझा ही नहीं पाया और उसे ऋद्धि−सिद्धियों से सुसम्पन्न स्नान की ओर ध्यान गया ही नहीं। अन्यथा स्थिति वैसी न होती, जैसी कि सामने है।
साधना के निमित्त किया गया सच्चा पराक्रम एवं तप साधन है।
साधना में भागीदार बनते जायें यह प्रयास बिना सकें, बिना खीजे, बिना निराश हुए जारी रखा ही जाना चाहिए भले ही उसकी गति मन्द ही क्यों न हो।
साधना नकद धर्म है। जो उसे अपनायेंगे, निहाल होकर रहेंगे।
साधना करने वाले धन कुबेर बनते हैं। शरीर साधने वाले बलवान पहलवान अनेकों पर हावी रहते हैं। कला साधना से गायक, अभिनेता, मूर्तिकार, चित्रकार, कवि साहित्यकार आदि यशस्वी भी बनते हैं और सम्मानित समृद्ध भी। देवताओं की साधना भी जब तब कुछ वरदान अनुदान देती रहती है। इन सबसे उठकर जीवन साधना है, जो उसके लिए अग्रसर हुआ वो निहाल हो गया।
साधना तथा परिशोधन प्रायश्चित का उपक्रम भी इसी में सम्मिलित है। तीनों को मिला देने में यह पाँच दिवसीय सत्र संगम सत्र कहे जायेंगे। इस अंक में प्रस्तुत सप्तसूत्री योजना को कार्यान्वित करने की पृष्ठभूमि बनाने—प्रेरणा देने—तथा भिन्न परिस्थितियों में इस संदर्भ को भिन्न प्रकार से शुभारम्भ किये जाने का व्यक्तिगत परामर्श इसी थोड़ी अवधि में देने का प्रयास किया जायगा। व्यस्तता तो व्यस्तता ठहरी। प्रज्ञा परिजनों को आरम्भ से ही व्यस्त’ मानकर चला गया है।
साधना का उपक्रम। इसमें अपनी अनगढ़ आदतों से जूझना पड़ता है। पतनोन्मुख चिन्तन प्रवाह को उलटना पड़ता है। लोक प्रचलन की अपेक्षा करने आत्मावलंबन के सहारे नये सिरे से नई रीति−नीति अपनाने और उसे हठपूर्वक अभ्यास में उतारने वाले संकल्प साहस को प्रखर करना पड़ता है, जो इतना कर सके उन्हें सुनिश्चित रूप से सर्वतोमुखी प्रगति का अवसर मिला है। आत्म सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह की त्रिविधि सिद्धियाँ उन्हें सुनिश्चित रूप से उपलब्ध हुई हैं।
साधना (2)स्वाध्याय (3)संयम (4)सेवा के चार चरण निर्धारित है। साधना के बाद दूसरा नम्बर स्वाध्याय का है। स्वाध्याय कथा पुराणों का नहीं, वरन् युग मनीषियों के उस प्रतिदिन का जो व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत सामयिक समस्याओं को आदर्शवादी समाधान प्रस्तुत करते हैं। ऐसा साहित्य छपता तो कम है, पर ढूंढ़ने पर जहाँ−तहाँ से उसे चुना बीना जा सकता है। स्वाध्याय के प्रति प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपने परिवार में रुचि जगानी चाहिए।
साधना कल्पवृक्ष की आराधना है। इसे किसी न किसी रूप में प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को इन्हीं दिनों आरम्भ करना चाहिए और उसके प्रतिफल का सौभाग्य सूर्योदय जैसा आनन्द लेना चाहिए।
साधना को धर्म−धारणा। उपासना से आस्था उच्चस्तरीय बनती है और साधना से व्यवहार में शालीनता उभरती है यह दोनों तत्वतः आस्थाएँ हैं। जिन्हें भाव संस्थान और मनःसंस्थान में प्रतिष्ठित करने के उपरान्त गाड़ी आगे चलती हैं। इस स्थिति पर पहुँचने से ही आदर्शवादिता अपना चमत्कार दिखाती है।
साधना पुरुषार्थ हुआ।
साधना विरत रहने पर कोई अभाव डडडड शोक संतत डडडड पतन पराभव से घिरा पड़ा रहे तो इसके लिए अन्य किसी को दोष कैसे दिया जायेगा जीवन की अवहेलना से बढ़कर पाप उस संसार में ओर कोई नहीं। अन्य पापों से कर्त्ता को तत्काल डडडड मिल ही जाता है, पर जीवन की उपेक्षा का पालक ऐसा है जिसमें उस छोर से इस छोर तक−आरम्भ से अन्त तक नरक ही नरक सड़ता देखा जा सकता है।डडडड का डडडड चिन्ह है कि जीवन के साथ जुड़ी हुई महान सम्भावनाओं को समझा जाय और उसे कषाय−कल्मषों के गर्त से उबार कर परिशोधन परिष्कार की प्रयोगशाला में भेजा जाय।
साधना का कठिन पड़ता है। अपने देश में महिलाओं की स्थिति ऐसी ही दयनीय है। उन पर घर से बाहर जाने दूसरों से वार्त्तालाप करने में प्रतिबन्ध लगे हुए हैं। बच्चों का लालन पालन और रसोईदारी चौकीदारी, घर की साज सम्भाल के झंझट भी इतने होते हैं कि देखने में बैठी ठाली प्रतीत होते हुए भी वे प्रज्ञा पुत्रों की भूमिका निभाने घर की परिधि से बाहर नहीं जा सकतीं। इस प्रकार किशोरों एवं वृद्धों की भी स्थिति ऐसी ही होती है।
साधना सत्र चले हैं। इससे आत्मोत्कर्ष के लिए आवश्यक परिशोधन परिष्कार के लिए जो आवश्यक है उसका शिक्षण नहीं अभ्यास कराया जा रहा है। (2) प्रज्ञा पुत्रों के लिए एक−एक महीने के युग−शिल्पी सत्र है। अपने क्षेत्रों को युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित करने वाले समयदानी इनमें सम्मिलित होते रहेंगे। इस अवधि में उन्हें वक्त एवं चिकित्सक बनाने की अतिरिक्त योजना सम्मिलित की गई है।
साधना में मनन और चिन्तन की निदिध्यासन को आवश्यक माना गया है। हर दिन सूर्योदय से पूर्व या सूर्यास्त के बाद—जब चित्त शान्त एकान्त हो तब अपने अन्तरंग बहिरंग स्थिति का लेखा−जोखा लेना चाहिए, और भूलों को सुधारने, कमियों को पूरा करने तथा भावी प्रगति के लिए जो कदम उठाने आवश्यक हैं उनका दूरगामी एवं सामयिक निर्धारण करना चाहिए। निर्धारण ऐसा होना चाहिए जो वर्तमान स्थिति बिना समय गँवाये कार्यान्वित हो सके।
साधना में सर्वप्रथम यह देखना होता है कि चिन्तन और व्यवहार में अवाँछनीयताओं ने कहाँ−कहाँ अपने घोंसले बना रखे हैं। इन मक्कड़ जंजालों को सफा करना ही चाहिए। भोजन बनाने से पूर्व रसोई घर की−पात्र उपकरणों की सफाई आवश्यक होती है अन्यथा गन्दगी घुस पड़ने से खाद्य सामग्री विषैली हो जायगी और पोषण के स्थान पर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-December
साधना कहा जा सकता है। साधना के अंतर्गत वे सभी प्रयास आते हैं जिनमें अन्तरंग के विशिष्ट शक्ति केन्द्रों को समझा, झकझोरा और सशक्त सक्रिय बनाया जाता है। इस दिशा में मिलने वाली सफलताएँ उच्चस्तरीय व्यक्तित्व की संरचना करती हैं। बुद्ध, गान्धी जैसे महामानव वस्तुतः व्यक्तित्व के धनी थे। प्रतिभा, और कुशलता की दृष्टि से उन्हीं अन्यान्यों की तरह सामान्य ही पाया गया है।
साधना का तीसरा चरण है—चिन्तन। चिन्तन अर्थात् शारीरिक गतिविधियों का, आदर्शवादिता का और मानसिक हलचलों का उत्कृष्टता के आधार पर सुसन्तुलित निर्धारण। इसके लिए प्रातःकाल उठते ही “हर दिन नया जन्म−हर रात नई मौत” का तथ्य सामने रखकर आज की−समय परक और भाव परक दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। एक ही दिन के लिए यह जन्म है। आज ही रात की मृत्यु, निद्रा की गोदी में जाना है इसलिए ईश्वर दत्त समय सम्पदा और भाव वैभव का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए—जीवन लाभ लेने के लिये साहसपूर्वक तत्पर होना चाहिए।
साधनाओं में निरत रहते और अपने सहचर अनुचरों को संलग्न रखते थे। सर्व साधारण को भी इसी प्रयोजन में लगाये रहते थे। मुनियों और ऋषियों के समन्वित प्रयास ही दो पहियों की भूमिका निभाते और प्रगति रथ को संयुक्त प्रयास से आगे बढ़ाते थे।
साधना−चिरसंगिनी बना रही क्रान्ति परिणीता
साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे। आत्मबल की अभिवृद्धि, उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण एवं लोक नेतृत्व के लिए आवश्यक भाषण, संगीत एवं चिकित्सा उपचार की त्रिविध विशेषताएँ भी हस्तगत हो सकेंगी।
साधना प्रधान थी। वे योग और तप की परिधि में आने वाली अनेकानेक साधनाओं में निरत रहते और अपने सहचर अनुचरों को संलग्न रखते थे। सर्व साधारण को भी इसी प्रयोजन में लगाये रहते थे। मुनियों और ऋषियों के समन्वित प्रयास ही दो पहियों की भूमिका निभाते और प्रगति रथ को संयुक्त प्रयास से आगे बढ़ाते थे।
साधना पराक्रम से उन्हें जगाकर व्यक्तित्व−दैवी क्षमता सम्पन्न भी बना जा सकता है। अध्यात्म क्षेत्र की विज्ञान को चुनौती के रूप में स्वप्न विद्या का यह क्षेत्र इतनी असीम सम्भावनाओं से भरा है जिसकी कोई परिधि सीमा नहीं।
साधना की प्रधान ध्यान विद्या है।
साधना है। इस मनःस्थिति में यदि महाप्रयाण किया जाय तो परलोक में निश्चित रूप से परम शान्ति और सद्गति ही मिलेगी।
साधना ही अभीष्ट फलदायक सिद्ध हो सकती है। इस प्रक्रिया को ‘युग साधना’ नाम देना अधिक उपयुक्त होगा।
साधना के भावपक्ष को (1) भजन (2) मनन और (3) चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हें त्रिपदा गायत्री के भावपक्ष के तीनचरण कहा जा सकता है।
साधना बन जाती है। माता−पिता, भाई−बहन आदि का भरा−पूरा कुटुम्ब किसी भावनाशील व्यक्ति के लिए अपने सद्गुणों के विकास के लिए विनिर्मित प्रयोगशाला ही सिद्ध होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए परिवार के लिये उपार्जन एवं सुविधा व्यवस्था में लगन वाला अधिकाँश समय तथा मनोयोग नियोजित किया जाय तो घर ही तपोवन बन सकता है। ऐसे लोगों को तपोवन में घर बनाने की आवश्यकता नहीं है।
साधना की एक झाँकी प्रस्तुत की जा चुकी है। उसे एक प्रकार से व्यावहारिक मार्गदर्शन ही समझा जाना चाहिए। अभीष्ट जानकारी से अवगत होने के उपरान्त उस मार्ग पर घर रहते हुए भी चला जा सकता है। जिन्हें अधिक समझना और गम्भीरतापूर्वक समझना हो उनके लिए एक−एक मास के कल्प साधना सत्र में सम्मिलित होने के लिए शान्ति कुँज हरिद्वार का सहयोग लिया जा सकता है।
साधनात्मक विधि−व्यवस्था बनाते थे।
साधना के दो विभाग कर दिये गये हैं एक साधना प्रधान दूसरा शिक्षा प्रधान। शिक्षा प्रधान में कल्प साधना की उपासनाएँ कुछ कम कर दी जायेंगी और बदले में उन्हें (1) भाषण सम्भाषण (2) संगीत अभ्यास (3) आसन प्राणायाम एवं जड़ी−बूटी विज्ञान के स्वास्थ्य सम्वर्धन की तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिलेगा साधना तो भी कुछ कल्प साधना के लिए निर्धारित क्रम के अनुरूप ही चलती रहेगी। साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे।
साधना की उपयुक्त पूर्व भूमिका समझी जानी चाहिए।
साधनाओं तपश्चर्याओं को अपनाने वाले कौतुक जैसा सरल सुगम माना जाता था वही अब पर्वत जैसा भारी प्रतीत होता है। यह एक नया संकट है जिसके कारण इन दिनों पुरातन काल को कठिन निर्धारणों को अपनाने के लिए सर्व साधारण को उत्साहित सहमत करना कठिन हो चला है।
साधना सत्र में सम्मिलित होने के लिए शान्ति कुँज हरिद्वार का सहयोग लिया जा सकता है।
साधना तो भी कुछ कल्प साधना के लिए निर्धारित क्रम के अनुरूप ही चलती रहेगी। साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे। आत्मबल की अभिवृद्धि, उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण एवं लोक नेतृत्व के लिए आवश्यक भाषण, संगीत एवं चिकित्सा उपचार की त्रिविध विशेषताएँ भी हस्तगत हो सकेंगी।
साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे। आत्मबल की अभिवृद्धि, उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण एवं लोक नेतृत्व के लिए आवश्यक भाषण, संगीत एवं चिकित्सा उपचार की त्रिविध विशेषताएँ भी हस्तगत हो सकेंगी।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना को भी चलाना चाहिए। गायत्री महामन्त्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही सम्भव होती है और इसी के परिणाम स्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्युत वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
साधना उपक्रमों के सम्बन्ध में भी लागू होता है। अब दोनों ही क्षेत्र नई खोज की अपेक्षा करते हैं।
साधना बताई जिसके अभ्यास से यह चमत्कारी परिणाम में सब देख सके हैं।
साधना सत्र शृंखला में सम्मिलित हो सकें वे और भी अधिक लाभान्वित होंगे।
साधनाओं के लिए संध्या वन्दन की तरह ब्रह्ममुहूर्त का बन्धन नहीं है। उसे सुविधानुसार नित्य उपासना के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। यही बात साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए।
साधना विधान का इस प्रकार नये सिरे से प्रस्तुतीकरण किया जाय जो तर्क, तथ्य और प्रमाण, की कसौटी पर खरा सिद्ध हो सके। साथ ही व्यवहार में उतारने की दृष्टि से भी सर्व साधारण के उपयोग में आ सकने योग्य हो। कठिन और जटिल साधनाएँ कर सकने की क्षमता जब लोगों में रही नहीं। उत्कृष्टता की दिशा में अनवरत अग्रसर करने वाला साहस, संकल्प बल एवं पराक्रम भी घटते−घटते बहुत दयनीय स्थिति में जा पहुँचा है। ऐसी दशा में पुरातन काल में जिन साधनाओं तपश्चर्याओं को अपनाने वाले कौतुक जैसा सरल सुगम माना जाता था वही अब पर्वत जैसा भारी प्रतीत होता है।
साधना प्रयासों में सुविधा रहने की बात शीत ऋतु में रहती है उतना और कहीं नहीं। यही कारण है कि तपस्वी सदा शीत प्रधान हिमालय में अपना डेरा डालते और अन्यत्र की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ प्राप्त करते हैं इन तथ्यों पर विचार करते हुए हरिद्वार में कल्पसाधना के लिए आने में शीत ऋतु का समय असुविधाजनक नहीं, सुविधा प्रधान ही सिद्ध होगा।
साधना प्रधान दूसरा शिक्षा प्रधान। शिक्षा प्रधान में कल्प साधना की उपासनाएँ कुछ कम कर दी जायेंगी और बदले में उन्हें (1) भाषण सम्भाषण (2) संगीत अभ्यास (3) आसन प्राणायाम एवं जड़ी−बूटी विज्ञान के स्वास्थ्य सम्वर्धन की तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिलेगा साधना तो भी कुछ कल्प साधना के लिए निर्धारित क्रम के अनुरूप ही चलती रहेगी। साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे।
साधनाएँ कर सकने की क्षमता जब लोगों में रही नहीं। उत्कृष्टता की दिशा में अनवरत अग्रसर करने वाला साहस, संकल्प बल एवं पराक्रम भी घटते−घटते बहुत दयनीय स्थिति में जा पहुँचा है। ऐसी दशा में पुरातन काल में जिन साधनाओं तपश्चर्याओं को अपनाने वाले कौतुक जैसा सरल सुगम माना जाता था वही अब पर्वत जैसा भारी प्रतीत होता है। यह एक नया संकट है जिसके कारण इन दिनों पुरातन काल को कठिन निर्धारणों को अपनाने के लिए सर्व साधारण को उत्साहित सहमत करना कठिन हो चला है।
साधना के लिए आने में शीत ऋतु का समय असुविधाजनक नहीं, सुविधा प्रधान ही सिद्ध होगा।
साधना सत्र ही प्रमुख है। उन्हीं को दो भागों में विभक्त कर दिया गया है एक साधना प्रधान दूसरे शिक्षा प्रधान। दस दिवसीय सत्र में साधना का ही संक्षेप है। उतनी कम अवधि में भाषण—संगीत चिकित्सा उपचार का समावेश सम्भव नहीं। जिन्हें उपरोक्त सत्रों में से जिनमें आना हो वे (1) सत्र का नाम तथा तारीखें (2) अपना पूरा नाम पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) जन्म−जाति (6) शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के सही होने सम्बन्धी स्पष्ट जानकारी (7) यहाँ का अनुशासन पूर्णरूपेण पालन करने के आश्वासन समेत आवेदन−पत्र भेजना चाहिए और स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए।
साधना की उपासनाएँ कुछ कम कर दी जायेंगी और बदले में उन्हें (1) भाषण सम्भाषण (2) संगीत अभ्यास (3) आसन प्राणायाम एवं जड़ी−बूटी विज्ञान के स्वास्थ्य सम्वर्धन की तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिलेगा साधना तो भी कुछ कल्प साधना के लिए निर्धारित क्रम के अनुरूप ही चलती रहेगी। साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे। आत्मबल की अभिवृद्धि, उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण एवं लोक नेतृत्व के लिए आवश्यक भाषण, संगीत एवं चिकित्सा उपचार की त्रिविध विशेषताएँ भी हस्तगत हो सकेंगी।
साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9.गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप।
साधना विधियाँ सरल है। एक ही समय में या अलग−अलग समय में सुविधा समय और शान्त−एकान्त स्थान में, सुसन्तुलित चित्त से यह दोनों ध्यान किये जा सकते हैं। भावनाओं की जितनी गहराई इनमें लगेगी उतनी ही अन्तर्ज्योति प्रखर होती चली जायगी और आत्मा के साथ परमात्मा का प्रणय परिणाम होने पर दिव्य सम्पदाओं की उपलब्धि होनी चाहिए, वे सहज ही करतलगत होती चली जायेगी।
साधना का ही संक्षेप है। उतनी कम अवधि में भाषण—संगीत चिकित्सा उपचार का समावेश सम्भव नहीं। जिन्हें उपरोक्त सत्रों में से जिनमें आना हो वे (1) सत्र का नाम तथा तारीखें (2) अपना पूरा नाम पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) जन्म−जाति (6) शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के सही होने सम्बन्धी स्पष्ट जानकारी (7) यहाँ का अनुशासन पूर्णरूपेण पालन करने के आश्वासन समेत आवेदन−पत्र भेजना चाहिए और स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए। मास वाले सत्र हर महीने, पहली से तीस तारीख तक चला करेंगे और दस दिवसीय 1 से 10, 11 से 20, 21 से 30 को चला करेंगे। जिसमें प्रवेश पाना हो उसके लिए आवेदन−पत्र भेजते समय साथ में यह भी लिख देना चाहिए कि यदि इच्छित सत्र में स्थान भर गया हो तो अन्य किसी सत्र में स्थान दिया जाय।
साधना प्रधान दूसरे शिक्षा प्रधान। दस दिवसीय सत्र में साधना का ही संक्षेप है। उतनी कम अवधि में भाषण—संगीत चिकित्सा उपचार का समावेश सम्भव नहीं। जिन्हें उपरोक्त सत्रों में से जिनमें आना हो वे (1) सत्र का नाम तथा तारीखें (2) अपना पूरा नाम पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) जन्म−जाति (6) शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य के सही होने सम्बन्धी स्पष्ट जानकारी (7) यहाँ का अनुशासन पूर्णरूपेण पालन करने के आश्वासन समेत आवेदन−पत्र भेजना चाहिए और स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए। मास वाले सत्र हर महीने, पहली से तीस तारीख तक चला करेंगे और दस दिवसीय 1 से 10, 11 से 20, 21 से 30 को चला करेंगे।
साधना में अपना ध्यान और पुरुषार्थ केन्द्रित किया था। निर्वाह की साधन सामग्री की अपेक्षा तो उनने भी नहीं की थी, पर इतना अवश्य ध्यान रखा था कि उचित—आवश्यकता पूर्ति के लिए जितना आवश्यक है उतना ही कमाया, जुटाया जाय। अनावश्यक संचय और उद्धत उपयोग में वैभव सुखद नहीं रहता वरन् बिना पके भोजन की तरह उलटा सिर दर्द बनता है। अकारण भार लादने में उपेक्षा दिखाने पर ही यह बन पड़ा कि अपना ध्यान और पुरुषार्थ अन्तःक्षेत्र की विभूतियाँ अर्जित करने में लगा सके व्यक्तित्व के धनी कभी अभावग्रस्त नहीं रहते, कारण वश कुछ कठिनाइयों का सामना भी करना पड़े तो वे उसका साहसपूर्वक प्रतिकार करते हैं अथवा विवशता होने पर उसे धैर्यपूर्वक हँसते−हँसते सह भी लेते हैं। यही मनोभूमि और दिशाधारा रही है अपने महान पूर्वजों की।
साधना’ नाम देना अधिक उपयुक्त होगा।
साधना, (42) गायत्री के पाँच सुख पाँच दिव्य कोश।
साधना द्वारा उत्तेजित किया जाता है तो ये चक्रवातों की तरह उछलने लगते हैं। बुद्धिमत्ता इसमें है कि उन्हें उभारने और सही प्रयोजन में लगाने की कला का ज्ञान अनुभव उपलब्ध हो।
साधना में भावपद का प्राधान्य है। इसके भी तीन चरण हैं। उच्चस्तरीय गायत्री साधना के भावपक्ष को (1) भजन (2) मनन और (3) चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हें त्रिपदा गायत्री के भावपक्ष के तीनचरण कहा जा सकता है।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना मू. 60 पैसे (द)गायत्री चालीसा मू. 10 पैसे।
साधना में−ऋषि प्रयोजन में निरत रहकर तपश्चर्या की शक्ति को सम्पन्नता की तुलना में वरिष्ठ सिद्ध करने के लिए अन्तःक्षेत्र के प्रचण्ड पुरुषार्थ अपनाने चाहिए। पेड़ का तना और कलेवर सुरम्य रहे इसके लिए वातावरण की उपयुक्तता जितनी आवश्यक मानी जाती है उसी प्रकार उसकी जड़े गहरी और सुदृढ़ समुन्नत हों इसकी साधन प्रक्रिया भी अग्रगामी रहनी चाहिए।
साधना है। इसके लिए भजन, मनन और चिन्तन की त्रिवेणी प्रवाहित की जानी चाहिए तथा उपासनात्मक कर्मकाण्ड के साथ−साथ इस भाव साधना को भी चलाना चाहिए। गायत्री महामन्त्र के उपासनात्मक कर्मकाण्ड की प्राण प्रतिष्ठा इस भाव समन्वय से ही सम्भव होती है और इसी के परिणाम स्वरूप वह सब कुछ उपलब्ध होता है जिसका महात्म्युत वर्णन विभिन्न अध्यात्म प्रसंगों में किया गया है।
साधना के लिए निर्धारित क्रम के अनुरूप ही चलती रहेगी। साधना प्रधान मंत्रों में सम्मिलित होने वालों का प्रधान विषय तो नहीं रहेगा किन्तु उन्हें भी तीन घन्टे नित्य उपरोक्त तीन कक्षाओं में सम्मिलित रहने का अवसर मिल सकेगा। इस प्रकार शिक्षा प्रधान कल्प साधना के लिए आने वाले युग शिल्पियों जितनी तो नहीं पर उससे कुछ ही कम मात्रा में उपरोक्त तीनों विषयों की काम चलाऊ जानकारी मिल जायगी। इस प्रकार अब इन एक महीने के सत्रों में सम्मिलित होने वाले दुहरा लाभ उठा सकेंगे। आत्मबल की अभिवृद्धि, उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण एवं लोक नेतृत्व के लिए आवश्यक भाषण, संगीत एवं चिकित्सा उपचार की त्रिविध विशेषताएँ भी हस्तगत हो सकेंगी।
साधना प्रयोग का खाद पानी न मिलने के कारण अपनी उर्वरता गँवा बैठी और मरुस्थल जैसा अनगढ़ और श्मशान जैसा वीभत्स बनकर रह रही है।
साधना। 4. गायत्री का शक्ति स्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एकमुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना।
साधना द्वारा संपर्क बना लिया जाय तो उसके सहारे प्रकृति के पदार्थों में हेर−फेर करने की विद्या करतलगत हो सकती है।
साधना का परिणाम है। संसार के इतिहास में ऐसे ही महामानवों की यश गाथा स्वर्णाक्षरों में चमकती है। बड़े काम करने में बड़े लोग ही समर्थ होते हैं। इस कथन में इतना और जोड़ा जाना चाहिए कि बड़े लोग व्यक्तित्व सम्पन्नों को कहते हैं। व्यक्तित्व सम्पन्न अर्थात् सदाशयता से भरी−पूरी प्रतिभा।
साधनाओं के पुरातन स्वरूप का नये परिप्रेक्ष्य में वैसा प्रभाव उत्पन्न करने की कठिनाई का रहस्य समझा जा सके। एक तो यही बाधा कम नहीं थी कि अध्यात्म विज्ञान के दर्शन और प्रयोग का सही एवं सुविस्तृत रूप उपलब्ध नहीं होता। जो मिलता है उससे समग्रता नहीं बनती। कुछ अनुमान आभास जैसा ही हस्तगत होता है। समग्र प्रक्रिया किसी भी प्रयोग की सन्तोषजनक बाल बोझ रूप में नहीं मिलती।
साधनाओं के लिए शीत ऋतु सर्वोत्तम मानी गई है। जितना अच्छी तरह ध्यान लगने से लेकर साधना प्रयासों में सुविधा रहने की बात शीत ऋतु में रहती है उतना और कहीं नहीं। यही कारण है कि तपस्वी सदा शीत प्रधान हिमालय में अपना डेरा डालते और अन्यत्र की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ प्राप्त करते हैं इन तथ्यों पर विचार करते हुए हरिद्वार में कल्पसाधना के लिए आने में शीत ऋतु का समय असुविधाजनक नहीं, सुविधा प्रधान ही सिद्ध होगा।
साधना कहते हैं। यह जड़ से उपलब्ध होने वाला अदृश्य जीवन रंग है। पेड़ की तरह मनुष्य भी प्रधानतः इसी के सहारे ऊपर उठता, अंकुरित होता और फलता −फूलता है।
साधना पर लागू होती है। उसे भजन के साथ या आगे पीछे किया जा सकता है। वातावरण शान्त और स्थान एकान्त होना चाहिए। आँखें बन्द करके आराम कुर्सी पर पड़े हुए यह सोचना चाहिए कि—”शरीर मृत अवस्था में पड़ा है और प्राण उसमें से निकल कर किसी ऊँचे स्थान पर हंस पक्षी की तरह जा बैठा। अब पड़ी हुई लाश के अंग−प्रत्यंगों को पोस्टमार्टम के समय उधाड़े गये अवयवों की तरह उलटना−पलटना चाहिए और समझना चाहिए कि कपड़ों से भरी हुई पेटी की तरह ही यह काया अपने सामयिक उपयोग के लिए मिली थी।
साधना के अंतर्गत वे सभी प्रयास आते हैं जिनमें अन्तरंग के विशिष्ट शक्ति केन्द्रों को समझा, झकझोरा और सशक्त सक्रिय बनाया जाता है। इस दिशा में मिलने वाली सफलताएँ उच्चस्तरीय व्यक्तित्व की संरचना करती हैं। बुद्ध, गान्धी जैसे महामानव वस्तुतः व्यक्तित्व के धनी थे। प्रतिभा, और कुशलता की दृष्टि से उन्हीं अन्यान्यों की तरह सामान्य ही पाया गया है। जिस प्रकार भौतिक क्षेत्र में सुडौल, कुशल एवं सम्पन्न होना प्रशंसनीय माना जाता है उसी प्रकार अध्यात्म क्षेत्र की वरिष्ठता ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी लोगों में उभरती उछलती पाई जाती है।
साधना। 9.गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति। 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ। 11. गायत्री की सिद्धियाँ 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13.स्त्रियों का गायत्री अधिकार।
साधना के भाव पक्ष के तीन चरण हैँ। (1)भजन, (2)मनन, (3)चिन्तन। इन तीनों को मिला देने से ही एक समग्र साधन प्रक्रिया का निर्माण होता है। अन्न, जल और वायु के तीनों अंग मिलकर पूर्ण आहार बनता है। इनमें से एक भी कम पड़ जाय तो जीवन यात्रा न चल सकेगी।
साधना के सभी आवश्यक सिद्धान्तों और प्रयोगों का समावेश करने का प्रयत्न किया गया है।
साधना का एक दस दिवसीय छोटा संस्करण भी आरम्भ किया गया है। उनमें एक महीने की कल्प साधना के सभी आवश्यक सिद्धान्तों और प्रयोगों का समावेश करने का प्रयत्न किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-July
साधना सोपानों पर चढ़ते हुए इस सत्य की अनुभूति की जाती है। सत्य के दिग्दर्शन के साथ ही उस महाशक्ति के सान्निध्य से मिलने वाले दिव्य अनुदानों का भी रसास्वादन किया जा सकता है। यह इतनी बड़ी उपलब्धि है जिसे प्राप्त करने के उपरान्त न कुछ जानना शेष रह जाता है और न ही कुछ पाने की कामना रह जाती है। इस एकत्व की अनुभूति ही जीवन का परम लक्ष्य है।
साधना कही जाती है। सूक्ष्म कर्णेंद्रिय के संयुक्त प्रयास से यह सम्भव होता है स्थूल कर्णेन्द्रिय को ग्रहण शक्ति तो स्वल्प और सीमित ही है।
साधना उपचारों की प्रतिक्रिया पर विवेचना भी की जा सकती है।
साधना विशेषाँकों में पहले ही प्रतिपादित किया जा चुका है—किसी उच्चस्तरीय उद्देश्य से जब तक तल्लीनता−तन्मयता न जुड़ पाये, इसे ध्यान नहीं कहा जा सकता। ऐसे निरुद्देश्य ध्यान का न तो किसी सदुद्देश्य हेतु सुनियोजन सम्भव है और न अन्तरंग में परिवर्तन ही कर सकना शक्य है। बहिरंग में जो परिवर्तन होता है उसे ही सब कुछ नहीं माना जा सकता।
साधना का नियोजन कर अपना योगदान देते रह सकते हैं। जो कुछ भी समय नहीं दे सकते हैं। जो कर रहे हैं, उनके लिए निर्वाह के साधन जुटा देना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। आशा है महाकाल का यह आमन्त्रण अनसुना उपेक्षित नहीं रहेगा।
साधना की सूक्ष्म प्रतिक्रियाएँ है। हर व्यक्ति अन्दर भगवान इन्हीं दो प्रेरणाओं को निरन्तर पेण्डुलम गति से प्रदान करते रहते हैं। साधना में परिपक्वता के दो ही चिन्ह हैं—ध्यान करते समय यह अनुभव होने लगे कि मानव जीवन जैसा अनुपम उपहार हमें उपलब्ध हुआ है। हमें छोटे−मोटे अभावों पर ध्यान न देकर समस्वरता की स्थिति में सन्तुलित जीवन जीना चाहिए। यही सच्चा आनन्द है।
साधना में परिपक्वता के दो ही चिन्ह हैं—ध्यान करते समय यह अनुभव होने लगे कि मानव जीवन जैसा अनुपम उपहार हमें उपलब्ध हुआ है। हमें छोटे−मोटे अभावों पर ध्यान न देकर समस्वरता की स्थिति में सन्तुलित जीवन जीना चाहिए। यही सच्चा आनन्द है। आनन्द अकेला नहीं आता, उल्लास भी साथ लेकर आता है। उच्चस्तरीय प्रयासों के लिये प्रचण्ड कर्मठता अपनाने हेतु अदम्य उत्साह, स्फूर्ति एवं उमंग ही उल्लास है।
साधनाओं द्वारा सम्बन्ध स्थापित कर उनसे इतना सहयोग प्राप्त किया जा सकता है जितना कि प्रत्यक्ष भौतिक पुरुषार्थ द्वारा सम्भव नहीं।
साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन के चार आधार अपनाने पड़ते हैं। एकाग्रता, मेडीटेशन, ध्यान योग के अंतर्गत यह प्रयोजन भी जुड़े रहते हैं अन्यथा मन को एक कल्पना तक देर तक रोके रहने से योगाभ्यास का वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके आधार पर आत्म−सत्ता की आत्मिकी को प्रयोगशाला के रूप में परिणित करने की सम्भावनाओं को साकार किया जाना है।
साधना विधानों की वैज्ञानिकता को प्रयोगशाला स्तर पर प्रमाणों द्वारा तथा साहित्य के विशद् विवेचन के माध्यम से तर्कों व प्रमाणों द्वारा सत्यापित करने का बीड़ा दो वर्ष पूर्व अपने हाथ में लिया। प्रज्ञा परिवार के सभी परिजनों को इस शोध संस्थान के विषय में सामान्य जानकारी है। उसका उद्देश्य जितना विशाल है उतने ही बड़े स्तर पर प्रयोग परीक्षण का एक प्रारूप बनाया गया है तथा उसका प्रारम्भिक स्तर पर श्रीगणेश कर दिया गया। अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति की जा सके, ऐसे उपकरण अभी और आना शेष है, फिर भी वर्तमान में जो भी कुछ है, कम नहीं। अभी तक की प्रगति की समीक्षा तथा साधना क्रमों के उतार−चढ़ाव का लेखा−जोखा जब करते हैं तो ज्ञात होता है कि एक ऐसा असम्भव कार्य सम्भव बनाया जा रहा है, जिसके विषय में हर व्यक्ति सामान्यतया शंका की दृष्टि ही रखता है।
साधनाएँ व्यक्ति को अंतर्मुखी बनाती हैं तथा साधक को आनन्द उल्लास का स्रोत अपने ही अन्दर खोजने, उसे उभारने व तद्जन्य सामर्थ्य से उसे अति मानवी क्षमताएँ धारण करने योग्य बनाती हैं। इन सभी साधना उपचारों में ब्रह्मरन्ध्र की साधना को महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमें खेचरी मुद्रा के भाव प्रधान प्रयोगों का प्रावधान है। हठयोग के साधक तो इस साधना को मात्र जीभ लम्बी करके उसे उलटकर तालूमूर्धा तक लगाने, जिह्वा पर विभिन्न वस्तुओं का लेपन कर इसे थन की तरह दुहने का प्रयत्न करने तक सीमित मानते हैं। अतिवादी तो जीभ के नीचे की त्वचा को काटकर उसे और अधिक पीछे मोड़ने योग्य बनाते हैं। परन्तु ध्यानयोग में इसके भाव पक्ष का ही प्राधन्य है, वही उस प्रक्रिया का प्राण भी है।
साधना ही नाच साधना कही जाती है। सूक्ष्म कर्णेंद्रिय के संयुक्त प्रयास से यह सम्भव होता है स्थूल कर्णेन्द्रिय को ग्रहण शक्ति तो स्वल्प और सीमित ही है।
साधना से आरम्भ होने वाला अध्यात्म ध्यान धारण—समाधि की स्थिति तक अपना कलेवर फैलाये हैं। ऐसे में हठयोग की कुछ क्रियाओं व ध्यान योग के छुटपुट प्रयोगों तक ही सीमित नहीं रहा जा सकता।
साधना को ही नाद योग कहा जाता है। इन सूक्ष्म शब्दों को और उनमें छिपे भावों दोनों को उसके द्वारा पकड़ा जा सकता है। उस हेतु सूक्ष्म शरीर के संयंत्र के विकसित करना होता है। सूक्ष्म जगत से अनुभूतियों के आदान प्रदान की भी अनेक विधियाँ हैं। इनमें से ध्वनियाँ और शब्दों के माध्यम से कि ये जाने वाले सूक्ष्म संपर्क को अध्यात्म विज्ञान में नादानुसंधान कहा जाता है।
साधना द्वारा जगाई जाती है। सूक्ष्म कर्णेंद्रिय के सिद्धान्त सूत्र योग दर्शन में निर्दिष्ट हैं−
साधना कर रहे तिब्बती लामाओं पर प्रयोग किए तथा अपने सूक्ष्म उपकरण से उनके ‘आँरा’ व विद्युत शक्ति के स्थान विशेष पर केन्द्रीभूत हो जाने की प्रतिक्रिया को मापा।
साधना के एक मास के अनुष्ठान सत्रों में यह किया भी गया व परिणाम भी सुखद सम्भावनाओं से भरे मिले।
साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों का अधिकारी बनता हैं।
साधना विज्ञान पर भी वही सिद्धान्त लागू होता है जो भौतिकी के विभिन्न पक्षों में प्रयुक्त होता है। साधक की आत्मिक प्रगति का क्रम क्या रहा, क्या−क्या परिवर्तन उसके अन्तरंग व बहिरंग में हुए, इसकी प्रत्यक्ष जानकारी हर बुद्धिजीवी चाहता है। उसे मात्र आप्त वचनों—शास्त्र वाक्यों पर विश्वास नहीं। अन्वेषण बुद्धि वाले हर असामान्य तथा दिन भर की कमाई—पेट भरने तक सीमित रहने वाले साधारण व्यक्ति तक को फलश्रुति पर ही विश्वास होता है एवं उसकी धारणा किसी भी तथ्य के विषय में तब ही सशक्त बन पाती है।
साधना को मात्र जीभ लम्बी करके उसे उलटकर तालूमूर्धा तक लगाने, जिह्वा पर विभिन्न वस्तुओं का लेपन कर इसे थन की तरह दुहने का प्रयत्न करने तक सीमित मानते हैं। अतिवादी तो जीभ के नीचे की त्वचा को काटकर उसे और अधिक पीछे मोड़ने योग्य बनाते हैं। परन्तु ध्यानयोग में इसके भाव पक्ष का ही प्राधन्य है, वही उस प्रक्रिया का प्राण भी है। इसमें ब्रह्मरन्ध्र को मस्तिष्क मध्य अवस्थित माना जाता है और वहाँ से सोमरस स्रवित होते रहने की कल्पना की जाती है। जीभ रूपी तन्मात्रा से इसी सोमरस का पान किया जाता है।
साधना अधिक। जिह्वा को सरलता से जितना पीछे तालु से सटाकर ले जा सके—ले जाते है व इसके उपरान्त ध्यान करते है मधु के छत्ते के समान तालु छिद्र से सोम अमृत का—सूक्ष्म रस स्राव हो रहा है यह रस जिह्वा के गहन किया जा रहा है। निवास करने वाली रस तन्मात्रा द्वारा ग्रहण किया जा रहा है। इससे अक्षय आनन्द की उत्पत्ति रोम−रोम में हो रही है। इस प्रक्रिया से होने वाली सफलताओं एवं साधक को प्राप्त अतीन्द्रिय क्षमताओं दिव्य सामर्थ्यों से शास्त्र भरे पड़े है।
साधना उपचारों की सफलता की बात ही नहीं बनती। इसी कारण जरूरी समझा गया कि हम ही इस कार्य को अपने हाथ में लें व श्रद्धा तत्व के अस्तित्व व चमत्कार युक्त परिणति को प्रामाणित करके दिखायें। चान्द्रायण साधना के एक मास के अनुष्ठान सत्रों में यह किया भी गया व परिणाम भी सुखद सम्भावनाओं से भरे मिले।
साधना को महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमें खेचरी मुद्रा के भाव प्रधान प्रयोगों का प्रावधान है। हठयोग के साधक तो इस साधना को मात्र जीभ लम्बी करके उसे उलटकर तालूमूर्धा तक लगाने, जिह्वा पर विभिन्न वस्तुओं का लेपन कर इसे थन की तरह दुहने का प्रयत्न करने तक सीमित मानते हैं। अतिवादी तो जीभ के नीचे की त्वचा को काटकर उसे और अधिक पीछे मोड़ने योग्य बनाते हैं। परन्तु ध्यानयोग में इसके भाव पक्ष का ही प्राधन्य है, वही उस प्रक्रिया का प्राण भी है। इसमें ब्रह्मरन्ध्र को मस्तिष्क मध्य अवस्थित माना जाता है और वहाँ से सोमरस स्रवित होते रहने की कल्पना की जाती है।
साधना उपचारों के विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण की। विज्ञान और अध्यात्म के इस समन्वय सहयोग की परिणति कितनी सुखद होगी, इसकी मात्र कल्पना ही अभी की जा सकती है। प्रयोगकाल की मध्यावधि में इससे अधिक क्या कहा जाय कि जो कुछ भी किया जा रहा है वे आगे के लिये जिसकी योजना बनायी गयी है—वह निश्चय ही अद्वितीय है। यह सब कैसे किया जा रहा है—उपलब्ध उपकरणों का आश्रय लेकर मंजिल पर कदम कैसे बढ़ रहे हैं? इसका विवेचन विस्तार से अगले अंकों में करेंगे।
साधना का एक अनिवार्य अंग है।
साधना से वे उसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं जिसकी चर्चा प्राणमय—विद्युतमय शरीर के रूप में लेख के प्रारम्भ में की गयी। कोई कारण नहीं कि प्रयास किये जाने पर विद्युत चुम्बकत्व, रक्त में घुले रसायनों आदि के विश्लेषण से निकट भविष्य में यह बताया न जा सके कि मानव के सूक्ष्म संस्थान के जागरण की सम्भावनाएँ भी असीम व महान हैं। न जानने व अपनी तकनीक को उस सीमा तक न पहुँचा पाने के कारण यदि जीव विज्ञानी इस विद्युत भण्डार को माप सके तो मतलब यह नहीं कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। मानवी काया की संरचना इतनी विलक्षण है कि उसके कई रहस्यों का अभी विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं। विद्युत भण्डार तक चर्चा सीमित हो जाती तो एक बात थी, पर जब हम चुम्बकत्व की सत्ता की चर्चा करते हैं तो हतप्रभ रह जाते हैं।
साधना की परिणति प्रतिक्रिया है। वस्तुतः यह भाव पक्ष ही इस साधना अधिक। जिह्वा को सरलता से जितना पीछे तालु से सटाकर ले जा सके—ले जाते है व इसके उपरान्त ध्यान करते है मधु के छत्ते के समान तालु छिद्र से सोम अमृत का—सूक्ष्म रस स्राव हो रहा है यह रस जिह्वा के गहन किया जा रहा है। निवास करने वाली रस तन्मात्रा द्वारा ग्रहण किया जा रहा है। इससे अक्षय आनन्द की उत्पत्ति रोम−रोम में हो रही है।
साधना क्रमों के उतार−चढ़ाव का लेखा−जोखा जब करते हैं तो ज्ञात होता है कि एक ऐसा असम्भव कार्य सम्भव बनाया जा रहा है, जिसके विषय में हर व्यक्ति सामान्यतया शंका की दृष्टि ही रखता है।
साधना में कई प्रकार की ध्यान धारणाएँ− प्राणायाम, बंध, मुद्रा, व्रत, उपवास, तितिक्षा आदि का अभ्यास करना पड़ता है और कराया जाता है। यह टानिक सेवन एवं चिकित्सा उपचार की तरह विशेष प्रयोग है। यह फलप्रद भी है और सहयोगी सहायक भी। इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि कुछ समय तक कुछ क्रिया−प्रक्रिया करने भर से आत्मिकी की प्रयोगशाला की तरह कार्य−सत्ता को विकसित परिष्कृत किया जा सकेगा। इसके लिये चिन्तन में उत्कृष्टता और चरित्र में आदर्शवादिता का अधिकाधिक समावेश करना होता हैं।
साधना उपचारों में ब्रह्मरन्ध्र की साधना को महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमें खेचरी मुद्रा के भाव प्रधान प्रयोगों का प्रावधान है। हठयोग के साधक तो इस साधना को मात्र जीभ लम्बी करके उसे उलटकर तालूमूर्धा तक लगाने, जिह्वा पर विभिन्न वस्तुओं का लेपन कर इसे थन की तरह दुहने का प्रयत्न करने तक सीमित मानते हैं। अतिवादी तो जीभ के नीचे की त्वचा को काटकर उसे और अधिक पीछे मोड़ने योग्य बनाते हैं। परन्तु ध्यानयोग में इसके भाव पक्ष का ही प्राधन्य है, वही उस प्रक्रिया का प्राण भी है। इसमें ब्रह्मरन्ध्र को मस्तिष्क मध्य अवस्थित माना जाता है और वहाँ से सोमरस स्रवित होते रहने की कल्पना की जाती है।
साधना में सिद्धि प्राप्त हो जाता है और शब्दों की ध्वनियों के क्रम को अलग अलग समझ सकने की विश्लेषण क्षमता आ जाती है, तब सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय विकसित समझनी चाहिए। इसे ही शब्द शक्ति सम्बन्धी संयम कहते हैं।
साधना द्वारा जगाया जा सकता है और तब अनन्त ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल, पृथ्वी के चलने की आवाज, सौर घोष, मंदाकिनियों के टक्कर के भीषण निनाद सभी कुछ किसी भी स्थान में बैठकर सुने जा सकते हैं। परन्तु ऐसा सम्भव तभी है, जब सूक्ष्म और कारण शरीर में सन्निहित श्रवण शक्ति को विकसित किया जाय।
साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ तथा पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है। इस साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों का अधिकारी बनता हैं।
साधना विधान द्वारा चेतन और जड़ दोनों से सम्बन्धित जानकारियाँ मशीनों की तुलना में अधिक अच्छी तरह प्राप्त की जा सकती हैं।
साधना से होने वाली फलश्रुतियों से सूक्ष्म अवयवों की सामर्थ्य का अनुदान तो लगाया जा सकता है, पर उन्हें आँखों से देखा नहीं जा सकता।
साधना पुरुषार्थ से इन सूक्ष्म शक्ति संस्थानों, चक्र−उपत्यिकाओं तथा ग्रन्थियों को विकसित समर्थ बनाया जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-January
साधना पर भी ध्यान देना होता है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन एवं धर्मानुष्ठानों की तरह आहार में सात्विकता एवं सदाशयता का समावेश भी आत्मिक प्रगति के अनिवार्य आधारों में सम्मिलित रखा गया है।
साधना की असाधारण उपचार पद्धति सिद्धि हो सकती है।
साधना तो अनिवार्यतः करनी पड़ी है। इससे बच निकलने का और कोई ‘शार्टकट’ है नहीं।
साधना का प्रथम सात्विक आहार से आरम्भ होता है। सात्विक का अर्थ सुपाच्य ही नहीं सुसंस्कारी भी है।
साधना इसी आपे की, की जाती है। वेदान्त में जिस देव की उपासना के गुणवान लिखे हैं– वह यही देवाधिदेव आत्मदेव है। इसके लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं। वह अपने ही भीतर बैठा–प्रस्तुत की स्थिति में है। आवश्यकता इसे जगाने भर की है।
साधना है, जिसे विज्ञान या पराक्रम कह सकते हैं, इसके अंतर्गत आस्था को उछाला और परिपुष्ट किया जाता है। मात्र ज्ञान ही पर्याप्त नहीं होता। कर्म के आधार पर उसे संस्कार, स्वभाव,अभ्यास के स्तर तक पहुँचाना होता है। साधना का प्रयोजन श्रद्धा को निष्ठा में−−निर्धारण की−−अभ्यास की−−स्थिति में पहुँचाना है। इसलिये परमहंसों, तत्व ज्ञानियों एवं जीवनमुक्तों को भी साधना का अभ्यास क्रम नियमित रूप से चलाना होता है।
साधना के विविध उपचार इसी प्रयोजन के लिए करने होते हैं ताकि मन की वृत्तियाँ परिमार्जित−परिष्कृत हो जांय।
साधना को सुसंस्कारी “आहार−चिकित्सा” कहा जा सकता है। उसमें न केवल खाद्य पदार्थों के चयन में सुपाच्य सात्विकता का ध्यान रखा जाता है, न केवल मात्रा में आधी कटौती की जाती है वरन् यह भी देखा जाता है कि वह पकाया−परोसा किन हाथों से गया है। इन उद्देश्य की पूर्ति शान्ति−कुँज में ठीक तरह होती है। वन्दनीय माता जी अपने हाथ से साधकों को उपरोक्त आहार देती हैं। प्रज्ञापेय, पंचगव्य, औषधि कल्क, चटनी, हविष्यान्न की रोटी– यह चारों ही चीजें उन्हीं के तत्वावधान में बनती है तथा उन्हीं के संरक्षण में बँटती हैं।
साधना और विश्व−कल्याण के लिए परमार्थ की आराधना–इन दोनों के मिश्रण से उस सच्ची भक्ति −भावना का उदय अनुभव होता है जिसके द्वारा आत्म−दर्शन और ईश्वर
साधना तन्त्र खड़ा किया गया हैं। इन्हीं के सहारे कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर को परिष्कृत किया जाता है।
साधना के अंतर्गत ऐसा सरंजाम जुटाया जाता है जिसमें अनास्थाओं को हटाने और देवत्व को जीतने का मूलभूत प्रयोजन पूरा हो सके। योग में निकृष्टता से पीछा छुड़ाना और उत्कृष्टता के साथ सघन सम्बन्ध जोड़ देना यह दोनों ही कदम उठाने पड़ते हैं। मात्र निकृष्टता से पीछा छूटना भर पर्याप्त नहीं, उत्कृष्टता का सम्वर्धन क्रम भी चलना चाहिए। रोग से पीछा छूटना आवश्यक तो है किन्तु पर्याप्त नहीं। चिकित्सा उपचार की ही तरह व्यायाम, पौष्टिक आहार, उपयुक्त जलवायु का प्रबन्ध भी स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए करना पड़ता है।
साधना−पुरुषार्थ इसी निमित्त नियोजित है।
साधना के सम्बन्ध में भी आत्म−शोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
साधना करने वालों में मिलने की बात शास्त्रकारों एवं आप्त जनों ने अपने प्रतिपादनों में समय−समय पर बताई है।
साधना विधानों की आवश्यकता पड़ती है। व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति और परिस्थिति को–ध्यान में रखते हुए साधनाओं का निर्धारण तो पृथक−पृथक ही होता है, पर सिद्धान्त एक ही रहता है। चिन्तन के क्षेत्र में समाविष्ट पशु−प्रवृत्तियों के पक्ष को मल्ल−युद्ध के लिए मोर्चे पर खड़ा कर दिया जाता है और योग साधना के अंतर्गत ऐसा सरंजाम जुटाया जाता है जिसमें अनास्थाओं को हटाने और देवत्व को जीतने का मूलभूत प्रयोजन पूरा हो सके। योग में निकृष्टता से पीछा छुड़ाना और उत्कृष्टता के साथ सघन सम्बन्ध जोड़ देना यह दोनों ही कदम उठाने पड़ते हैं। मात्र निकृष्टता से पीछा छूटना भर पर्याप्त नहीं, उत्कृष्टता का सम्वर्धन क्रम भी चलना चाहिए।
साधना को आत्मोत्कर्ष के प्रयासों में मूर्धन्य इसीलिए कहा गया है कि उसमें धर्मानुष्ठानों से भी अधिक आहार नियमन पर ध्यान दिया गया है। आहार निग्रह के उपरान्त मनोनिग्रह कठिन नहीं रह जाता। मन को सदाशयता की ओर मोड़ा जा सके तो दृष्टिकोण बदलते ही आत्मिक प्रगति के मार्ग में फिर कोई बड़ी बाधा शेष नहीं रहती।
साधना के चारों चरणों को अपनाते रहकर साध का अपनी पवित्रता, प्रखरता एवं प्रगति का पथ प्रशस्त करते रहेंगे।
साधना में कोई प्रकार के उपचार कृत्यों की–कर्मकाण्ड की–साधना विधानों की आवश्यकता पड़ती है। व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति और परिस्थिति को–ध्यान में रखते हुए साधनाओं का निर्धारण तो पृथक−पृथक ही होता है, पर सिद्धान्त एक ही रहता है। चिन्तन के क्षेत्र में समाविष्ट पशु−प्रवृत्तियों के पक्ष को मल्ल−युद्ध के लिए मोर्चे पर खड़ा कर दिया जाता है और योग साधना के अंतर्गत ऐसा सरंजाम जुटाया जाता है जिसमें अनास्थाओं को हटाने और देवत्व को जीतने का मूलभूत प्रयोजन पूरा हो सके। योग में निकृष्टता से पीछा छुड़ाना और उत्कृष्टता के साथ सघन सम्बन्ध जोड़ देना यह दोनों ही कदम उठाने पड़ते हैं। मात्र निकृष्टता से पीछा छूटना भर पर्याप्त नहीं, उत्कृष्टता का सम्वर्धन क्रम भी चलना चाहिए।
साधना करनी पड़ती है। योग से विचारणा पर और तप से आदतों पर नियन्त्रण प्राप्त कर सकना सम्भव होता है।
साधना उपचारों के पीछे छिपा हुआ प्रेरणा प्रवाह ही दिव्य शक्ति की प्रचण्डता से ओत−प्रोत प्राण−पुँज है। यदि उसे न समझा जाए और न हृदयंगम किया जाए तो फिर इतना ही समझना चाहिए कि मात्र क्रिया−कृत्यों तक सीमित श्रम उपचार से कोई वैसा बड़ा प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा। जैसी कि आमतौर से अपेक्षा की जाती है। किन्तु यदि कर्मकाण्डों में सन्निहित भाव निष्ठा को सच्चे अर्थों में हृदयंगम किया गया, तद्नुरूप जीवनचर्या को ढाला गया तो निश्चित रूप से अन्तःचेतना में देवत्व की उमँगें उभरेंगी और व्यक्तित्व उच्चस्तरीय बनाने के साथ−साथ अद्भुत कार्य कर सकने में समर्थ सिद्ध पुरुष भी बना देगी।
साधना और क्षति पूर्ति के लिए उदार पारमार्थिकता का प्रमाण−परिचय देना पड़ता है। इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखे रहना चाहिए।
साधना को मनःसाधना का अन्तिम चरण है। उसे सिद्धावस्था कहा जा सकता है। वस्तुतः व्यावहारिक एकाग्रता इतनी भर है कि किसी उच्चस्तरीय उद्देश्य में इतनी तन्मयता सम्पादित करली जाय कि उस परिधि से बाहर की किसी बात की ओर ध्यान ही न जाय, मन ही न चले। वैज्ञानिक, कलाकार, आदि अपने−अपने विषय का ऐसा ही एकाग्रता का अभ्यास कर लेते हैं।
साधना–अन्तरात्मा की। जीवन देवता की। जिसमें कुसंस्कारों से जूझने और सद्गुणों को अभ्यास में उतारने वाला पराक्रम। (3) आराधना– विश्वात्मा की। सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए किया–बरता गया संयम और उदार−अनुदान–यही है संक्षेप में आत्मिक प्रगति की त्रिवेणी जिसमें अवगाहन करने वाले सत्यं शिवं−सुन्दरम्–की पग−पग पर अनुभूति करते हैं।
साधना निभ सके और जायके के नाम पर अनावश्यक मात्रा पेट में न ठुँसे।
साधना के कारण बढ़ी हुई सात्विकता–सही निर्णय तक पहुँचाने में बहुत कुछ सहायक सिद्ध हो सकती है।
साधना को सिद्धि के रूप में परिणित होते देखने के इच्छुक प्रत्येक विचारशील को जहाँ निर्धारित पूजा−उपचार नियमित रूप से करने चाहिए वहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इष्ट के−लक्ष्य के−प्रति श्रद्धा का क्रमिक विकास हो रहा है या नहीं? प्राण विहीन शरीर को लाश कहते हैं और आस्था रहित पूजा उपक्रम को विडम्बना। दोनों को बाह्य स्वरूप तो सही दीखता है, पर आन्तरिक खोखलेपन के कारण उनके सहारे किसी उपलब्धि की आशा नहीं की जा सकती। मृतक के निर्जीव कायकलेवर से किसी को क्या कुछ मिल सकेगा? इसी प्रकार भाव−श्रद्धा से रहित पूजा को परिश्रम से इतना ही लाभ हो सकता है कि वह समय किसी दुष्ट कर्म में न लगाकर सत्प्रयोजन के अभ्यास में व्यतीत हुआ।
साधना मान बैठेंगे, वे किसी दिन तिल का ताड़ मान बैठने वाली अपनी भूल का निश्चय पश्चात्ताप करेंगे। (1) उपासना–परमात्मा की–अर्थात् आदर्शों के लिए आत्म समर्पण की श्रद्धा−भावना। (2) साधना–अन्तरात्मा की। जीवन देवता की। जिसमें कुसंस्कारों से जूझने और सद्गुणों को अभ्यास में उतारने वाला पराक्रम।
साधना का मूलभूत उद्देश्य है। तपश्चर्या में उपवास भी एक अंग तो है पर उतने भर से ही आत्म परिष्कार का समग्र उद्देश्य कहाँ पूरा होता है।
साधना को तपश्चर्या कहते हैं। उसके चार स्तर हैं (1) इंद्रिय संयम (2)अर्थ संयम (3) समय संयम (4) विचार संयम। अनगढ़, उच्छृंखल लोग स्वेच्छाचारियों की तरह जीवनयापन करते हैं। किन्तु जिन्हें भावना उत्कृष्टता की अवधारणा अभीष्ट है, वे चौरासी लाख योनियों के संचित कुसंस्कारों को निरस्त करने और दैवी विशेषताओं को अभ्यास में उतारने के लिए दुस्साहसों जैसे प्रबल प्रयत्न करते हैं। यही तपश्चर्या का सार संक्षेप।
साधनात्मक प्रयोग करने पड़ते हैं। ध्यान के माध्यम से एकाग्रता का अभ्यास करना होता है। एकाग्रता अर्थात् इष्ट के प्रति−उच्चस्तरीय आदर्शों के प्रति−निष्ठा उत्पन्न करने के लिए मन को प्रशिक्षित करना। योग ग्रन्थों में योग की परिभाषा “चित्त वृत्ति निरोधः” के रूप में की गई है अर्थात् चित्त की वृत्तियों को परिष्कृत, परिमार्जित कर ईश्वरीय प्रयोजनों में लगा देने का नाम योग हैं। महाचेतना से जुड़ने की प्रक्रिया में मन की प्रवृत्तियाँ−चित्त की वृत्तियाँ ही प्रधान बाधक हैं।
साधना एवं आराधना की सुगन्धित शोभा सुषमा के सहारे उल्लसित रहने और प्रमुदित करने की प्रक्रिया सहज ही सधती रहे।
साधना एवं परिवर्तन पर्व का लाभ उठाकर अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करेंगे। यही है वह क्षेत्र जिसमें प्रवेश करने और खोदने−कुरेदने के उपरान्त महामानवों को विभूतियों का हस्तगत हुआ है।
साधना उपक्रम, दिनचर्या अनुशासन आदि की निर्धारित विधि−व्यवस्था का परिपालन करते हुए साधकों को अपना चिन्तन इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए कि अन्तःक्षेत्र को परिष्कृत करने के लिए क्या सोचना चाहिए क्या बदलना चाहिए और क्या कर गुजरने के लिए साहस जुटाना चाहिए। इस निर्धारण में निश्चय ही उपवास−अनुष्ठान एवं तप−साधना के कारण बढ़ी हुई सात्विकता–सही निर्णय तक पहुँचाने में बहुत कुछ सहायक सिद्ध हो सकती है।
साधनाओं का निर्धारण तो पृथक−पृथक ही होता है, पर सिद्धान्त एक ही रहता है। चिन्तन के क्षेत्र में समाविष्ट पशु−प्रवृत्तियों के पक्ष को मल्ल−युद्ध के लिए मोर्चे पर खड़ा कर दिया जाता है और योग साधना के अंतर्गत ऐसा सरंजाम जुटाया जाता है जिसमें अनास्थाओं को हटाने और देवत्व को जीतने का मूलभूत प्रयोजन पूरा हो सके। योग में निकृष्टता से पीछा छुड़ाना और उत्कृष्टता के साथ सघन सम्बन्ध जोड़ देना यह दोनों ही कदम उठाने पड़ते हैं। मात्र निकृष्टता से पीछा छूटना भर पर्याप्त नहीं, उत्कृष्टता का सम्वर्धन क्रम भी चलना चाहिए। रोग से पीछा छूटना आवश्यक तो है किन्तु पर्याप्त नहीं।
साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए–उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए, जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग−पग पर कठिनाई उत्पन्न करते है। दीवार बीच में हो तो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय−कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।
साधना का प्रयोजन श्रद्धा को निष्ठा में−−निर्धारण की−−अभ्यास की−−स्थिति में पहुँचाना है। इसलिये परमहंसों, तत्व ज्ञानियों एवं जीवनमुक्तों को भी साधना का अभ्यास क्रम नियमित रूप से चलाना होता है।
साधनाएँ भक्ति भावनापूर्वक होती रहें।
साधना सत्रों में ऐसा सन्तुलन बिठाया गया है जिससे इस तपश्चर्या के आधारभूत सिद्धान्त, स्वरूप, उद्देश्य एवं प्रयोग की तो समुचित रक्षा होती रहे, पर उपवास क्रम को अपेक्षाकृत सरल बना दिया जाय। ऐसा शास्त्रीय विधान भी है। लघु चान्द्रायण या शिशु चान्द्रायण के नाम से ऐसे विधान भी हैं जिनके आधार पर शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से दुर्बल स्तर के लोग भी अपना सकें और उस प्रयोग से सर्वथा वंचित न रहकर, जितना बन पड़े उतना करें और जितना सम्भव है उतना लाभ उठायें।
साधना क्रम अपनाये बिना काम नहीं चलता।
साधनाकाल की छुट−पुट समस्याओं का समाधान तो सूत्र−संचालकों के परामर्श−सहयोग से सहज ही पूरा होता रह सकता है। आहार−विहार सम्बन्धी कोई असुविधा हो तो उसका हल निकलने में आवश्यक संकोच के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है। उसका अधिक महत्व भी नहीं है। महत्व इस बात का है कि भविष्य निर्धारण क्या हुआ–उसकी रूपरेखा क्या बनी अवरोधों से निपटने की सूझ बूझ किस स्तर तक उभरी–परिवर्तित दिव्य जीवन के लिए व्रतशील रहने का साहस किस सीमा तक परिपक्व हुआ? इन सारे प्रसंगों पर इन दिनों जितना अधिक मन्थन किया जायेगा, उज्ज्वल भविष्य की रूप रेखा उसी अनुपात से बनती और सुनिश्चित होती चली जायेगी।
साधना की ऊर्जा अनिवार्य रूप से जुटानी पड़ेगी। इसी प्रयोजन के लिये योग तप की उभयपक्षीय साधना करनी पड़ती है। योग से विचारणा पर और तप से आदतों पर नियन्त्रण प्राप्त कर सकना सम्भव होता है।
साधना समझना हो तो इस भ्रम−जंजाल में फँसने के उपरान्त निराश होने, गाली देने की अपेक्षा यही अच्छा है कि बिना किसी भजन−पूजन के ही काम चलाया जाए। पुरुषार्थ के आधार पर सफलता पाने में नीतिमत्ता भी है और वास्तविकता भी। छुटपुट जादुई उपचारों के उलटे उस्तरे से देवताओं की हजामत बनाने के धन्धे में हाथ डालने की अपेक्षा उसे न करना ही अधिक समझदारी की बात है।
साधना में यों सभ्यता और संस्कृति दोनों का ही समावेश रहता है। पर उसमें संस्कृति को उद्गम और सभ्यता को प्रवाह कहा गया है। संस्कृति विचारणा, मान्यता, आस्था, निष्ठा में उत्कृष्टता के समावेश को कहते हैं। इसी पृष्ठभूमि की प्रेरणा से गतिविधियों का निर्धारण सम्भव होता है। शालीनता की पक्षधर जीवनचर्या को सभ्यता कहते हैं।
साधनाओं द्वारा न केवल उस अदृश्य जगत से संपर्क साधा जा सकता है। वरन् उसमें सन्निहित विविध प्रकार की क्षमताओं तथा जीवधारियों को कल्याणकारी योजनाओ का माध्यम बनाया जा सकता है।
साधना की सफलता–असफलता का केन्द्र–बिन्दु निर्धारित है।
साधना को ही व्यावहारिक योगाभ्यास एवं तपश्चर्या माना गया है। इसका माहात्म्य आकाश−पाताल की काल्पनिक उड़ानों की तुलना में कहीं अधिक है। इस मार्ग पर चलते हुए परिष्कृत दृष्टिकोण पर आश्रित स्वर्ग और व्यापक आत्मीयता की उपलब्धि जीवन−मुक्ति का आनन्द हर घड़ी मिलता है। महामानवों में से प्रत्येक को जीवन साधना तो अनिवार्यतः करनी पड़ी है। इससे बच निकलने का और कोई ‘शार्टकट’ है नहीं।
साधना मध्यवर्ती मेरुदण्ड है। उसी के साथ उपासना, आराधना जुड़ी हुई है। पापों का प्रायश्चित मात्र उपवास भर से नहीं होता, परिशोधन के लिए जीवन साधना और क्षति पूर्ति के लिए उदार पारमार्थिकता का प्रमाण−परिचय देना पड़ता है। इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखे रहना चाहिए।
साधना का अभ्यास क्रम नियमित रूप से चलाना होता है।
साधना का समूचा प्रकरण जीवन के अन्तरंग और बहिरंग पक्षों को उत्कृष्टता सम्पन्न बनाने के लिए है। इस दिशा में जो जितना आगे बढ़ेगा उसे उसी अनुपात में वजनदार व्यक्तित्व से सुसम्पन्न होने का गौरव मिलेगा। यही है वह आन्तरिक वैभव जिसके सहारे आत्मबल के धनी अपने को महामानव स्तर का बनाते हैं और अपने संपर्क क्षेत्रों को चन्दन वृक्ष की तरह गौरवास्पद सुरक्षित बनाते हैं।
साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है।
साधना की बात सामने आती है। अभक्ष्य को अनावश्यक मात्रा में उदरस्थ करने वाला धर्मोपदेशक भले ही बन सके–धर्मात्मा बन सकना असम्भव है। इसलिए पूजा उपचार की ही तरह आहार साधना पर भी ध्यान देना होता है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, कीर्तन एवं धर्मानुष्ठानों की तरह आहार में सात्विकता एवं सदाशयता का समावेश भी आत्मिक प्रगति के अनिवार्य आधारों में सम्मिलित रखा गया है।
साधना और कुछ नहीं अचेतन का परिष्कार एवं स्व का उभार है। इस पुरुषार्थ में जिसने अपने को खपा दिया उसने आत्मोत्थान की प्रगति की दिशा में कुछ चरण आगे बढ़ाये। व्यक्तित्व का विकास इसी कटहरे से आरम्भ होता है और चलते−चलते अतिमन की स्थिति में–व्यक्ति को महामानवों की श्रेणी में पहुँचता है। साधना इसी आपे की, की जाती है। वेदान्त में जिस देव की उपासना के गुणवान लिखे हैं– वह यही देवाधिदेव आत्मदेव है।
साधना का अन्तिम चरण है। उसे सिद्धावस्था कहा जा सकता है। वस्तुतः व्यावहारिक एकाग्रता इतनी भर है कि किसी उच्चस्तरीय उद्देश्य में इतनी तन्मयता सम्पादित करली जाय कि उस परिधि से बाहर की किसी बात की ओर ध्यान ही न जाय, मन ही न चले। वैज्ञानिक, कलाकार, आदि अपने−अपने विषय का ऐसा ही एकाग्रता का अभ्यास कर लेते हैं।
साधना आरम्भ की जाती है। अपने को मर्यादा में बाँधने के लिए भगवान राम की साकार प्रतिमा को हृदय में प्रतिष्ठापित करना होता है। पूर्णता के लक्ष्य को याद रखने तथा अवधारण करने के लिए पूर्ण पुरुष भगवान कृष्ण को प्रतीक बनाया जाता है। समर्पण की साकार प्रतिमा हनुमान माने जाते हैं। दुर्गा की प्रतिमा प्रखरता की प्रतीक मानी जाती है।
साधनात्मक अनुशासन में जकड़कर अनपढ़ मनुष्य को सुगढ़, सुसंस्कृत बनाया जाता है। इसी प्रयास को सभ्यता संवर्धन कहते हैं।
साधना द्वारा विशिष्ट क्षमता अर्जित करके सूक्ष्मतम सृष्टियों में प्रविष्ट कर उनमें निवास करने वाले सूक्ष्म जीवों का स्वरूप और व्यवहार देखा जा सकता हैं।”
साधना कुछ मन बहलाव उत्पन्न कर सकती हैं। किन्तु वास्तविक लाभ उन्हें ही मिलेगा जो इस वातावरण–तप साधना एवं परिवर्तन पर्व का लाभ उठाकर अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करेंगे। यही है वह क्षेत्र जिसमें प्रवेश करने और खोदने−कुरेदने के उपरान्त महामानवों को विभूतियों का हस्तगत हुआ है।
साधना में मनोबल सम्पन्न साधकों के लिए उनकी स्थिति के अनुरूप अतिरिक्त कल्पों का भी निर्धारण किया जाता है।
साधना करनी पड़ती है उसके दो पक्ष हैं–एक क्रिया–कांड, भजन–पूजन का उपचार। दूसरा ब्रह्माण्डीय चेतना के, उत्कृष्टता देवात्मा के साथ योग एकात्म्य। उपचारों में जप, भजन, व्रत, उपवास जैसे शरीर साध्य कृत्य करने पड़ते हैं। योग भावना प्रधान है उसमें समर्पण स्तर की भाव श्रद्धा जगानी पड़ती है। भक्ति का, प्रेम का अभ्यास करना और स्वभाव बनाना पड़ता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-August
साधना द्वारा इसके उपकरणों को परिष्कृत तथा योग द्वारा जड़ को चेतनामय बनाया जाता है। परिष्कृत व जड़ चेतन समन्वय की परिणति से जा परिचित हैं वे जानते हैं कि अन्तराल में से किन विभूतियों को उभारा-विकसित किया जा सकता है। सिद्ध पुरुष इसी मार्ग पर चलकर ऋद्धि-सिद्धियाँ अर्जित करते हैं। यह अवरुद्ध मार्ग किस प्रकार खुले। षट्चक्र, सहस्रार, कुण्डलिनी, उपत्यिकाओं से सम्बन्ध किस उपाय से जुड़े, यह प्रस्तुत अनुसंधान का विषय है।
साधना, ज्ञानार्जन के तप और लोक सेवा के मार्ग को छोड़ा नहीं उन्होंने उसी अवस्था में उत्तर से दक्षिण पूर्ण से पश्चिम तक सारे भारत वर्ष में धर्म का प्रसार कर देश को एक साँस्कृतिक सूत्र में बाँधा। उनकी यह निष्ठा देखकर राजा मान्धाता ने उनको हर आवश्यक सहायता दी। 32 वर्ष की आयु में ही उन्होंने इतना काम कर दिखाया जो कोई पूरे दो जन्म में भी न कर पाता!
साधना में ध्यान का ऐसा ही प्रमुख स्थान है जैसे शरीर में मस्तिष्क तथा वृक्ष में उसकी जड़ का।
साधना विहीन हम में से कोई न रहे। प्रज्ञा योग को छोटी किन्तु सुनिश्चित साधना में थोड़ा-सा समय हर दिन लगाते रहने के लिए प्रत्येक प्रज्ञा परिजन का कहा गया है। वे नियमित रूप से उसे प्रारम्भ करे और जहाँ श्रद्धा के बीजांकुर दीखे वहाँ कार्यान्वित करायें। इस सम्बन्ध में क्या कदम उठे?
साधना से सिद्धि मिलती है।
साधना प्रयत्नों द्वारा मूर्च्छना से व्यक्ति को जगाया जा सके तो वह अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न देव मानव बन सकता है।
साधना की सहायता से संचित संस्कारों को उखाड़ने ढालने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं।
साधना में थोड़ा-सा समय हर दिन लगाते रहने के लिए प्रत्येक प्रज्ञा परिजन का कहा गया है। वे नियमित रूप से उसे प्रारम्भ करे और जहाँ श्रद्धा के बीजांकुर दीखे वहाँ कार्यान्वित करायें। इस सम्बन्ध में क्या कदम उठे?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-October
साधनाएँ भी कराते थे। साधना, व्यक्ति जीवन का
श्रद्धा समारोह है। उसके द्वारा ऐसी विशेष मनःस्थिति बनती है, जिसमें
स्वाध्याय-सत्संग को चिंतन-मनन के रूप में विकसित किया जाए और फिर किसी
भाव-भरे निष्कर्ष-निर्धारण पर स्वेच्छापूर्वक पहुँचा जा सके, साधना के
माध्यम से ऐसी संकल्पशक्ति उभरती है कि वह उत्कृष्टता का न केवल पक्ष-समर्थन करे; वरन उसे आत्मसात करने, जीवन व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक
श्रद्धासिक्त साहसिकता भी उभार सके। सूत-सौनिक की कथा-पुराणशैली की तरह
साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान
महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित
प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित
करने की आवश्यकता है।
साधना करनी पड़ती है। जहाँ स्वार्थांधता का बोलबाला हो वहाँ इन श्रद्धासिक्त सत्प्रवृत्तियों के पैर कैसे टिकें? उनका अस्तित्व समाप्त हो जाने पर जिस प्रकार सोचा जाता है, जो किया और कराया जाता है, उसकी तुलना पिशाचकृत्यों से ही की जा सकती है। जहाँ पिशाचों की भरमार हो, उसे मरघट ही कहा जाएगा । वहाँ जलने-जलाने, डरने-डराने, रोने-रुलाने के अतिरिक्त और किसी माहौल की आशा कैसे की जाए?
साधना-सामग्री का अपना महत्त्व है; पर वह है
शरीर के लिए, सुविधाएँ उसी को चाहिए। पंचतत्त्वों का बना शरीर पदार्थों पर
ही निर्वाह करता है। पदार्थों में ही मोद मनाता है। उसकी सत्ता एवं प्रकृति
अपने सजातीय को चाहती, समेटती है तो यह स्वाभाविक है। वैज्ञानिक
उपलब्धियाँ, अर्थतंत्र के आधार पर मिलनी वाली सुविधाएँ और शासन द्वारा की
जाने वाली व्यवस्थाएँ मिल-जुलकर काय-कलेवर का, सामुदायिक विकास का आधार
खड़ा करती है।
साधना तथा त्याग-बलिदान की दृष्टि से ही अपनी वरिष्ठता सिद्ध करते हैं। युगमनीषा के नाम से इसी वर्ग का उल्लेख किया जा रहा है। उन्हें युगऋषि भी कहा जा सकता है। बकवासी वाचालता की कीमत बाज़ार में कुछ भी क्यों न हो, पर जब वह आदर्शवादी लोक-शिक्षण के क्षेत्र में प्रवेश करेगा तो अपने व्यवसाय, निर्वाह, संचय, स्वभाव आदि के निजी स्वरूप का बहीखाता भी खोलकर, जनता के सामने प्रस्तुत करना पड़ेगा। इसके अभाव में नेता, अभिनेता की हैसियत प्रायः जैसी बनकर रह जाती है।
साधना की प्रखर ऊर्जा द्वारा संभव होती है। भक्ति और शक्ति के समन्वय से ही अध्यात्म की समग्रता बनती है।
साधना सत्रों के रूप में वह प्रयोग चल रहा है, जिसमें सम्मिलित होने
वाला जीवन-दर्शन बदल सके। भविष्य के लिए आदर्शवादी निर्धारण साथ लेकर वापस
लौट सके। प्राचीनकाल में मात्र तीर्थयात्रा ही नहीं होती थी, उस प्रयास का
तीर्थसेवन प्रमुख अंग था, जिसका अर्थ था तेजस्वी वातावरण में, मनस्वी-ऋषियों के संरक्षण में, साधना के साथ-साथ उत्कृष्टता को आत्मसात करना। इन
दिनों तो पर्यटकों की भगदड़ ही तीर्थयात्रा के ध्वंसावशेषों का परिचय देती
है। पुरातन निर्धारण तो लगता है तिरोहित ही हो गए।
साधना, उपचार, जप-तप, पूजा-अर्चा, कर्मकांड, तीर्थ, व्रत आदि का जितना विस्तार था, उतने में ही काम चल जाता था। तत्त्व दर्शन प्रायः ईश्वर, जीव, प्रकृति के निरूपण तक ही अपनी दौड़ लगाता था। उतने से ही भली प्रकार काम चल जाता था। निर्धारित आचार संहिता और परंपरा जिनसे निभती थी, वे अपने को धर्मात्मा मान लेते थे; पर अब वैसा नहीं रहा। अंतरिक्ष विज्ञानियों के अनुसार इस ब्रह्मांड का क्रमशः फैलाव-विस्तार हो रहा है।
साधना, यह उदारता अपनाने के लिए प्रकृति ने हर किसी को बाधित किया हैं। बात इतनी भर है कि व्यामोह की जकड़न ही सब कुछ रही या आदर्शवादी विवेकशीलता अपनाने वाली आत्मप्रेरणा से भी कुछ करते-धरते न बन पड़ा।
साधना के
माध्यम से ऐसी संकल्पशक्ति उभरती है कि वह उत्कृष्टता का न केवल पक्ष-समर्थन करे; वरन उसे आत्मसात करने, जीवन व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक
श्रद्धासिक्त साहसिकता भी उभार सके। सूत-सौनिक की कथा-पुराणशैली की तरह
साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान
महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित
प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित
करने की आवश्यकता है। यही प्रयोजन प्रकारांतर से घरेलू संस्कार-प्रक्रिया
एवं गाँव-मुहल्ले की पर्व परिपाटी के साथ भी भली प्रकार निभाना है।
जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव, विद्यारंभ, उपनयन, वानप्रस्थ आदि वैयक्तिक
संस्कारों के कर्मकांड-पद्धति में वे तत्त्व विद्यमान हैं जो उस छोटे आयोजन
को पारिवारिक ज्ञान-गोष्ठी में परिणत कर सके और वातावरण के धार्मिक होने के
कारण उपस्थित लोगों को आदर्शवादिता के पक्ष में सहमत कर सके।
साधना का समन्वय भी साथ-साथ चलना
चाहिए। यह प्रयोग शान्तिकुञ्ज की गायत्री तीर्थ के रूप में विकसित करके
कल्प-साधना सत्रों के रूप में वह प्रयोग चल रहा है, जिसमें सम्मिलित होने
वाला जीवन-दर्शन बदल सके। भविष्य के लिए आदर्शवादी निर्धारण साथ लेकर वापस
लौट सके। प्राचीनकाल में मात्र तीर्थयात्रा ही नहीं होती थी, उस प्रयास का
तीर्थसेवन प्रमुख अंग था, जिसका अर्थ था तेजस्वी वातावरण में, मनस्वी-ऋषियों के संरक्षण में, साधना के साथ-साथ उत्कृष्टता को आत्मसात करना। इन
दिनों तो पर्यटकों की भगदड़ ही तीर्थयात्रा के ध्वंसावशेषों का परिचय देती
है।
साधना से संबंधित रहस्यों की अनावरण विज्ञ पाठक देखेंगे और एक अभिनव, किंतु अतिपुरातन शक्ति-स्रोत का परिचय प्राप्त करेंगे। अगले मास की प्रतीक्षा करें।
साधना के पंचशीलों से समेटा जा सकता है। दर्शन क्षेत्र की मान्यताओं को इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए कि वे मनुष्य को अधिक सुसंस्कृत, अधिक पराक्रमी, अधिक उदार समाजनिष्ठ बनने में किस हद तक सहयोग देती हैं।
साधना सदा फलती-फूलती रही है। चरित्रवान उपदेष्टा ही जनमानस पर शासन करते, उसे सुधारते और मोड़ते-मरोड़ते देखे गए हैं। सेवा की जिनने सस्ती वाहवाही लूटने और दूसरों की आँखों में चकाचौंध करने को ही अपनाया है, निराशा उन्हीं के हाथ लगती है। जो दूसरों से कहे जाने वाले प्रसंगों को निजी जीवनचर्या की प्रयोगशाला में परखकर खरी सिद्ध करते हैं, उनके निर्धारण कभी असफल नहीं हुए। पवित्रता, प्रखरता, शालीनता और उदारता के कदम सदा से लक्ष्य तक पहुँचकर ही रुके हैं।
साधना के साथ-साथ उत्कृष्टता को आत्मसात करना। इन
दिनों तो पर्यटकों की भगदड़ ही तीर्थयात्रा के ध्वंसावशेषों का परिचय देती
है। पुरातन निर्धारण तो लगता है तिरोहित ही हो गए। प्रयत्न उसके पुनर्जीवन
का किया गया है। इस दृष्टि से शान्तिकुञ्ज की तीर्थ प्रयोगशाला और उसमें
चल रही कल्प-साधना, जीवन-साधना की विधि-व्यवस्था दृष्टव्य है।
साधना, व्यक्ति जीवन का
श्रद्धा समारोह है। उसके द्वारा ऐसी विशेष मनःस्थिति बनती है, जिसमें
स्वाध्याय-सत्संग को चिंतन-मनन के रूप में विकसित किया जाए और फिर किसी
भाव-भरे निष्कर्ष-निर्धारण पर स्वेच्छापूर्वक पहुँचा जा सके, साधना के
माध्यम से ऐसी संकल्पशक्ति उभरती है कि वह उत्कृष्टता का न केवल पक्ष-समर्थन करे; वरन उसे आत्मसात करने, जीवन व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक
श्रद्धासिक्त साहसिकता भी उभार सके। सूत-सौनिक की कथा-पुराणशैली की तरह
साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान
महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित
प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित
करने की आवश्यकता है। यही प्रयोजन प्रकारांतर से घरेलू संस्कार-प्रक्रिया
एवं गाँव-मुहल्ले की पर्व परिपाटी के साथ भी भली प्रकार निभाना है।
साधना अंक, अंतःक्षेत्र की श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठापरक भाव-संवेदना का कार्य ‘मनीषा' द्वारा संपन्न होता है। उस महान भांडागार की देव-दानव जैसी अद्भुत शक्तियों की उपलब्धि उद्भव-साधना की प्रखर ऊर्जा द्वारा संभव होती है। भक्ति और शक्ति के समन्वय से ही अध्यात्म की समग्रता बनती है।
साधना भी करते थे और योग्यता के अनुसार लोक-मंगल के कामों में भी निरत रहते थे। उन दिनों इस परंपरा ने उस क्षेत्र की सुख-शांति का भंडार बनाकर रख दिया था। प्रज्ञा अभियान के अंतर्गत एक वर्ष के संन्यास की, घर से बाहर रहकर लोक-मंगल के कार्यों में निरत रहने की परंपरा आरंभ की जा रही है। यह परिव्राजक दो-दो की टोलियों में साइकिल सवारी के साथ सुदूर देहातों में पहुँचेंगे और जन-जन को संगीत के माध्यम से अनुप्राणित करते हुए, सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए सहमत करेंगे। समय बताएगा कि लोक-मानस के परिष्कार की भूमिका निभाने में शान्तिकुञ्ज के यह प्रयत्न कितने सफल होते हैं और नवयुग की पृष्ठभूमि बनाने में कितना बड़ा योगदान करते हैं।
साधना की विधि-व्यवस्था दृष्टव्य है। साधनों के
अभाव में छोटे परीक्षण ही संभव हैं, वे ही चल भी रहे हैं। यह प्रस्तुतीकरण
इसलिए किया गया है कि युगमनीषा को इस प्रक्रिया का स्वरूप और परिणाम
समझने की सुविधा मिली। आवश्यक नहीं कि इसे इसी रूप में लिया जाए। उसमें
परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक हेर-फेर भी करने पड़ेंगे।
साधना के, लोक-व्यवहार के असंख्य पथ ऐसे हैं, जिनका अभाव शिक्षितों और अशिक्षितों में समान रूप से पाया जाता है। आदतें, विचारणाएँ, प्रथाएँ, गतिविधियाँ अवांछनीय स्तर की होने पर किस प्रकार सर्वनाश रचती और विवेकशील दूरदर्शितायुक्त होने पर किस प्रकार दैवी अनुकंपा की तरह प्रगति और समृद्धि बरसाती हैं, यह विषय मात्र स्वाध्याय का ही होना चाहिए। ऐसे पूरे या अधूरे समय के फीस, बिना फीस के विद्या या जगह-जगह पर चलने चाहिए, जिनमें आजीविका उपार्जन, स्वास्थ्य-संरक्षण एवं व्यवहार-कौशल की शिक्षा का समावेश है। प्रगतिशील देशों में सरकारी शिक्षा की परिधि सीमित और निजी प्रयासों से चलने वाली शिक्षण संस्थाएँ अपेक्षाकृत कहीं अधिक हैं। इससे वहाँ के नागरिकों को अपनी मर्जी के बिना अपनी अनुकूलता के समय में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध होती रहती है।
साधना का गहरा पुट हो। जो विचार समर्थन से आगे बढ़कर कर्मभूमि में उतरे और एक कुछ करे, जिससे समूचे संपर्क-क्षेत्र को नवजीवन मिले। ऐसा नवजीवन जिसे उपलब्ध करने वाले कृत-कृत्य होकर रहें और कृतज्ञतापूर्वक अगणित पीढ़ियों तक स्मरण, नमन, वंदन करते रहें।
साधना के साथ योग वाशिष्ठ को हृदयंगम कराने वाले तीर्थसेवन को भी समान
महत्त्व मिलता था। इन दिनों भी पुरातन सतयुग की वापसी के लिए उन चिर परीक्षित
प्रयोगों की आज की आवश्यकता एवं प्रक्रिया के साथ नए सिरे से पुनर्जीवित
करने की आवश्यकता है। यही प्रयोजन प्रकारांतर से घरेलू संस्कार-प्रक्रिया
एवं गाँव-मुहल्ले की पर्व परिपाटी के साथ भी भली प्रकार निभाना है।
जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव, विद्यारंभ, उपनयन, वानप्रस्थ आदि वैयक्तिक
संस्कारों के कर्मकांड-पद्धति में वे तत्त्व विद्यमान हैं जो उस छोटे आयोजन
को पारिवारिक ज्ञान-गोष्ठी में परिणत कर सके और वातावरण के धार्मिक होने के
कारण उपस्थित लोगों को आदर्शवादिता के पक्ष में सहमत कर सके।
साधना, जीवन-साधना की विधि-व्यवस्था दृष्टव्य है। साधनों के
अभाव में छोटे परीक्षण ही संभव हैं, वे ही चल भी रहे हैं। यह प्रस्तुतीकरण
इसलिए किया गया है कि युगमनीषा को इस प्रक्रिया का स्वरूप और परिणाम
समझने की सुविधा मिली। आवश्यक नहीं कि इसे इसी रूप में लिया जाए। उसमें
परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक हेर-फेर भी करने पड़ेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-March
साधना का विधान है। चूँकि ध्वनि सूक्ष्म है–इसलिये उसे अपने सूक्ष्म शरीर में रहने वाली सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों द्वारा–शब्द तन्मात्रा के रूप में सुना जा सकता है।
साधना की जाती है। यह तो पूर्वार्ध हुआ। इसका उत्तरार्ध है उपासना जिसमें ईश्वरीय गुणों से स्वयं को अनुप्राणित किया जाता है। यह आत्मिक पुरुषार्थ हर साधक के लिये अनिवार्य है।
साधना के लिये जाने वाले परिजन एक सप्ताह पहले आने की व्यवस्था कर सकें तो इस दुहरे लाभ को प्राप्त कर सकते हैं।
साधना का सुयोग बिठाना चाहिये। गायत्री साधना इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है एवं आज के समय की आवश्यकता को देखते हुए तो अनिवार्य भी। प्रज्ञायोग के मर्म को जानने–समझने की रुचि रखने वालों को इस वर्ष की नवरात्रि की गायत्री साधना को पिछले कई वर्ष से मनाते-देखते चले आ रहे पर्वों से अलग व विशिष्टता मानकर चलना होगा। नवरात्रि साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।
साधना विज्ञान के वटवृक्ष की जड़ों के रूप में इस विद्या को उपमा दी जा सकती है। इसका ज्ञान भी उतना ही अनिवार्य है जितना कि साधना उपचारों के विभिन्न पक्षों का। इसी लेखमाला में आगे इस सूक्ष्म संरचना को और विस्तार से समझाने का प्रयास किया जायेगा।
साधनाओं में सद्श्रद्धा का विकास के लिए की जाने वाली साधनाओं में सद्श्रद्धा का असाधारण महत्व है। इसी का उभारने एवं सुविकसित करने के लिए विविध प्रकार के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष पूजा उपचार किये जाते हैं।
साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिये संध्याकाल की नवरात्रि बेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधना पुरुषार्थ के मार्ग पर चलते हुए थे अपने आप मिलती हैं। इनका दुरुपयोग चूँकि वह नहीं करता–इसी कारण परम सत्ता भी अपनी ओर से कंजूसी नहीं करती। पर बच्चों के हाथ में वह कभी बन्दूक या विस्फोटक पदार्थ नहीं देती। यह एक शाश्वत नियम है–सदा से यही चला आ रहा है व हमेशा रहेगा भी। जिनने इस सिद्धियों का दुरुपयोग किया–यथा, भस्मासुर, रावण, हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु आदि, अन्ततः बड़ी विपत्तिग्रस्त स्थिति में जीवित रहे और उनका बुरा अन्त हुआ।
साधना हेतु चिन्तन−भाव सम्वेदनापरक −ध्यान योग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधनाओं में त्राटक प्रमुख है। इसे बिन्दुयोग भी कहा गया है। भटकाव से रोककर बाह्य एवं अंतर्दृष्टि को किसी बिन्दु विशेष अर्थात् लक्ष्य विशेष पर एकाग्र करने की साधना को बिन्दुयोग कहते हैं। त्राटक साधना में बाह्य नेत्रों एवं स्थूल साधनों–मोमबत्ती, दीपक, सूर्य आदि का प्रयोग कि या जाता है। इसलिए उसकी गणना स्थूल उपचारों में की गई है।
साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” ये सर्वसाधारण के लिये ही है। उपासना क्रम ऐसा है जिसका पालन कर सकना सर्वसुलभ हो– मन्त्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदा विधि-विधानों का दबाव न हों। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिये उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय–पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों।
साधना–एकाकी मुक्ति का नहीं अपितु समष्टिगत सुरक्षा–सबकी आत्मिक समृद्धि हेतु सामूहिक पुरुषार्थ का है। नवयुग की सुखद परिस्थितियों की सम्भावना का एकमात्र आधार यही है कि व्यक्ति का अन्तराल उत्कृष्ट बने, दृष्टिकोण में उदारता और चरित्र में शालीनता का समावेश हो। यह एक के नहीं, समग्र मानवता के परिष्कार से ही सम्भव है। आस्थाओं के दुर्भिक्ष का निवारण अन्तःक्षेत्र में उत्कृष्टता की मान्यताओं को स्थापित करके ही सम्भव है। सामूहिक उपासना का उद्देश्य अन्तःक्षेत्र में उच्चस्तरीय श्रद्धा का आरोपण, परिपोषण एवं अभिवर्धन।
साधना के साथ जुड़ा संकल्प चेतना को उच्चतम स्तर तक उछाल देने में, जीव−ब्रह्म का समन्वय संयोग करा सकने में समर्थ होता है। इतनी इस स्तर की–भाव संवेदना और किसी प्राणायाम में नहीं। इसीलिये इसे प्राणयोग नाम न देकर हंसयोग भी कहते हैं एवं इसे एक स्वतन्त्र शाखा के रूप में महत्व दिया जाता है। इसे ‘अजपा जप’ अथवा प्राण गायत्री भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि श्वास के शरीर में प्रवेश करते समय ‘सो’ जैसी और बाहर निकलते समय ‘हम’ जैसी अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि होती है।
साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” ये सर्वसाधारण के लिये ही है। उपासना क्रम ऐसा है जिसका पालन कर सकना सर्वसुलभ हो– मन्त्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदा विधि-विधानों का दबाव न हों। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिये उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय–पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों।
साधना से अन्ततः दिव्यदृष्टि खुलती और ज्योतिर्मय बनती है। यह एक ऐसी उपलब्धि है जिसके आधार पर अन्तःक्षेत्र में दबी हुई रत्न राशि को खोजा और पाया जाता है तथा देश एवं काल की स्थूल परिसीमाओं को लाँघकर अविज्ञात और अदृश्य का रहस्यमय ज्ञान प्राप्त करना सम्भव है।
साधना से करनी चाहिए।
साधना की एक सफल एवं विलक्षण परिणति है।
साधना, उपासना, प्रार्थना में महत्वपूर्ण प्रयोजन यही है कि सदाशयता की संघबद्ध होने और एक दिशाधारा में चल पड़ने की व्यवस्था बन सके। महत्व तो व्यक्तिगत उपासना का भी है और वैयक्तिक परिष्कार के लिये अलग−अलग एकान्त उपासना की आवश्यकता भी पड़ती है किन्तु सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने के लिये अध्यात्म पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। वह एकाकी तो अपने स्थान पर चले ही, उसे सामूहिक स्तर का भी बनाया जाना चाहिए।
साधना को बाह्य त्राटक तथा अन्तःत्राटक के रूप में भी निरूपित किया गया है।
साधना की जाती है, वहाँ तादात्म्य की चरम सीमा में एक और जहाँ साधक की अनुभूति मुक्त रूप में फूट पड़ती है वहीं उसे समष्टि का भी ध्यान रहता है। इसीलिये ऋषि कहते हैं–
साधना है एवं उच्चस्तरीय प्राणयोग भी इसे कहा जाता है। इस साधना को प्राणायाम प्रक्रिया एवं प्राणयोग की प्राणाकर्षण साधना से अलग व विशिष्ट माना जाना चाहिए। प्राणायाम तो मात्र श्वास−प्रश्वास का एक विशिष्ट क्रिया विधान है जिससे फेफड़ों का व्यायाम–रक्त का शोधन व जीवनी शक्ति संवर्धन ये तीन लाभ होते पाये जाते हैं। ‘डीप ब्रीदिंग‘ गहरी साँस लेना भी इसी के अंतर्गत आता है।
साधना उपचार की, अध्यात्म विज्ञान की कोई भी क्रिया प्रक्रिया उथले मन से लकीर पीटने की तरह ही किसी प्रकार धकेली-घसीटी जाती रहेगी। श्रद्धा और विश्वास के अभाव में उत्कृष्टता के पक्षधर प्रयासों के साथ तादात्म्य जुड़ सकना कठिन है। मात्र पशु-प्रवृत्तियों में वह आकर्षण है कि वे व्यक्ति को वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिये उत्तेजित करती व उससे कुकर्मी कराती रहें। आज इस चिन्तन से विरत किये जाने के लिये अध्यात्म की वैज्ञानिकता सिद्ध करने की अनिवार्यता और भी बढ़ गयी है।
साधनाओं को अपनाने वाले–आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को तो इसे एक विशिष्ट अनुदान रूप में ही मानकर अपनी तप साधना का सुयोग बिठाना चाहिये। गायत्री साधना इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है एवं आज के समय की आवश्यकता को देखते हुए तो अनिवार्य भी। प्रज्ञायोग के मर्म को जानने–समझने की रुचि रखने वालों को इस वर्ष की नवरात्रि की गायत्री साधना को पिछले कई वर्ष से मनाते-देखते चले आ रहे पर्वों से अलग व विशिष्टता मानकर चलना होगा। नवरात्रि साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।
साधना की जाती है उसमें ध्यान−धारण का महत्वपूर्ण स्थान है। अपने चिन्तन को इधर−उधर भटकने से रोक कर उत्कृष्ट प्रवाह के साथ जोड़ देना उसी प्रकार है जैसे अपने अन्दर के क्रिस्टल को ईथर में संव्याप्त तरंगों को ग्रहण करने योग्य बना लेना व आदान−प्रदान का क्रम आरम्भ कर देना। सद्भाव सम्वर्धन –श्रद्धा अभिवर्धन हेतु ध्यानयोग से श्रेष्ठ कोई साधना नहीं। सोऽहं की– हंसयोग साधना, नादयोग, त्राटक, बिन्दु, अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनायें मूलतः ध्यानपरक हैं। इन सभी में अपने चिन्तन को ध्यान प्रक्रिया द्वारा उत्कृष्टता से जोड़ने व उस महत्तत्व से प्राप्त प्राणशक्ति से प्रसुप्त को जगाने−उभारने का पुरुषार्थ किया जाता है।
साधना भी विभिन्न माध्यमों से की जाती है। बिन्दु त्राटक, दीपक त्राटक, सूर्य त्राटक आदि का अभ्यास मनःस्थिति के अनुरूप अपनाया जाता है। त्राटक की क्रिया तो सामान्य होती है, पर उसके साथ जुड़ी हुई कल्पनाओं एवं भावनाओं का अधिक महत्व होता है। उन्हें ही अधिक बलिष्ठ और परिपक्व बनाने का प्रयास किया जाता है।
साधना अपने समय पर परिपक्व एवं विकसित होकर साधक को समाधि की उच्चस्तरीय अवस्था में पहुँचाती है। शास्त्रों में अनेकों स्थानों पर उसका वर्णन आता है।
साधना को बिन्दुयोग कहते हैं। त्राटक साधना में बाह्य नेत्रों एवं स्थूल साधनों–मोमबत्ती, दीपक, सूर्य आदि का प्रयोग कि या जाता है। इसलिए उसकी गणना स्थूल उपचारों में की गई है। बिन्दुयोग में ध्यान धारणा के सहारे किसी इष्ट आकृति पर अथवा प्रकाश की ज्योति पर एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है। दोनों का अन्तर मात्र भौतिक साधनों के प्रयोग करने की आवश्यकता रहने न रहने का है।
साधना में भक्ति योग, ज्ञानयोग और कर्मयोग की त्रिविध क्रिया-प्रक्रियाओं का समन्वय हैं। गायत्री उपासना एवं ध्यान धारण को भक्ति योग, स्वाध्याय-सत्संग को स्थूल और चिन्तन-मनन को सूक्ष्म ज्ञानयोग तथा व्रतोपवास के अनुशासन को कर्मयोग कहा जाता है। इस समन्वय में तीनों शरीरों को परिष्कृत करने वाली तीन प्रकार की विधि-व्यवस्था के अंतर्गत समूचे
साधना रूपी पुरुषार्थ किया जाता है तो सफलता के अन्तिम शिखर पर चढ़ते-चढ़ते वहाँ पहुँचा जा सकता है जहाँ यह कीड़े-मकोड़े विकसित होते-होते पहले ही से पहुँच गये हैं।
साधना की दृष्टि से इन तीनों की विवेचना आवश्यक है। जब तक संरचना का ज्ञान न होगा–प्रतिक्रियाओं व परिणति की जानकारी कैसे होगी? इसी कारण साधना−विधान के विस्तार में जाने वाले साधकों को पहले ‘स्प्रिचुअल एलाँटामी’ की जानकारी करायी जाती है। साधना क्रमों का चयन इस प्रारंभिक शिक्षण के बाद ही किया जाना उचित होता है।
साधनाओं को तंत्रवेत्ता इन नवरात्रियों में ही सम्पन्न करते थे। वाममार्गी साधक अभी भी अभीष्ट इच्छापूर्ति हेतु इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते हैं। सतोगुणी साधनाओं को अपनाने वाले–आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को तो इसे एक विशिष्ट अनुदान रूप में ही मानकर अपनी तप साधना का सुयोग बिठाना चाहिये। गायत्री साधना इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है एवं आज के समय की आवश्यकता को देखते हुए तो अनिवार्य भी। प्रज्ञायोग के मर्म को जानने–समझने की रुचि रखने वालों को इस वर्ष की नवरात्रि की गायत्री साधना को पिछले कई वर्ष से मनाते-देखते चले आ रहे पर्वों से अलग व विशिष्टता मानकर चलना होगा।
साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली सिद्ध होती है।
साधना की आवश्यकता इस ‘रज’ के निविड़ बन्धनों से शरीर चेतना को मुक्त करने के लिये ही पड़ती है। तम से बना जड़ शरीर तो समय समाप्त होने पर नष्ट हो जाता है और उसे जलाकर उसके स्थूल स्वरूप की इतिश्री कर ली जाती है। चेतन आत्मा सत् का अंश है–ईश्वर का अंश होने से निर्मल है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से बनी जड़ चेतन मिश्रित जीव चेतना ही हर घड़ी अशान्त बनी रहती है। इसी के परिमार्जन परिशोधन हेतु योग साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिये संध्याकाल की नवरात्रि बेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
साधना करने लगी। प्रकृति समय तक उपासना करने के बाद जब उसे कोई विशेष उपलब्धि नहीं हुई तो वह सन्त के पास जाकर बोली देव! भगवान भी बड़ा पाती है। वह किसी-किसी को तो ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बना देता है और किसी को प्रकृति भी नहीं देता हैं। सन्त ज्ञानेश्वर मुस्कराये और बोले–”बहिन। ऐसा नहीं है।
साधना विधानों के अंतर्गत आने वाले अगणित क्रिया-कलाप जिनमें चान्द्रायण भी सम्मिलित है, एक ही उद्देश्य है–देव जीवन की दृष्टि से हेय समझी जाने वाली मान्यताओं एवं आदतों का निराकरण तथा सदाशयता को स्वभाव में सम्मिलित करने का अभ्यास। पशु-प्रवृत्तियों को देव प्रवृत्तियों में बदलने का जो पुरुषार्थ किया जाता है उसी को साधना कहते हैं।
साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना द्वारा ही सम्भव हुए हैं। जब−जब सामूहिक साधना से जनमानस विरत हुआ है तब−तब व्यक्तिवाद की प्रवृत्तियाँ पनपी व बढ़ी हैं, समाज की अवनति हुई है। समुद्र मंथन एक सामूहिक साधना ही थी जो देवों और असुरों की सम्मिलित उपासना द्वारा पूरी हो सकीं और चौदह रत्नरूपी सिद्धियों की उपलब्धि सम्भव हो सकी। रावण वानरों सहित सामूहिक साधना ही थी। श्रीकृष्ण का महारास तत्ववेत्ताओं द्वारा सामूहिक साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है।
साधना विज्ञान का सह स्वरूप लोगों की समझ में आयेगा तो वे जानेंगे कि मानवी सत्ता के इस मूल आधार को विकसित करने पर शारीरिक कायाकल्प– मानसिक प्रत्यावर्तन एवं अतिसूक्ष्म स्वर्ग और मुक्ति जैसे दिव्य वरदानों से लाभान्वित हुआ जा सकता है। व्यक्ति स्वयं को लघु से महान्, नर से नारायण एवं आत्मा से परमात्मा बना सकता है। सारे महामानव अपने इसी आस्था संस्थान को परिष्कृत समुन्नत बनाकर ऊँची स्थिति पर पहुँच पाये हैं।
साधना से जनमानस विरत हुआ है तब−तब व्यक्तिवाद की प्रवृत्तियाँ पनपी व बढ़ी हैं, समाज की अवनति हुई है। समुद्र मंथन एक सामूहिक साधना ही थी जो देवों और असुरों की सम्मिलित उपासना द्वारा पूरी हो सकीं और चौदह रत्नरूपी सिद्धियों की उपलब्धि सम्भव हो सकी। रावण वानरों सहित सामूहिक साधना ही थी। श्रीकृष्ण का महारास तत्ववेत्ताओं द्वारा सामूहिक साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया।
साधना और कोई नहीं।
साधना के लिए कमर सीधी, दोनों हाथ गोदी में तथा ध्यान मुद्रा में बैठना चाहिए। नेत्र अधखुले हों। वातावरण में घुटन, दुर्गन्ध, मक्खी, मच्छर जैसे चित्त में विक्षोभ उत्पन्न करने वाले तत्व न हों। खुले नेत्रों से दीपक अथवा मोमबत्ती की लौ को पाँच सेकेंड देखना, इसके बाद आँखें बन्द करके भूमध्य भाग में उसी प्रकाश आलोक को ज्योतिर्मय देखना। जब वह ध्यान आलोक शिथिल पड़ने लगे तो फिर नेत्र खोलकर पाँच सेकेंड प्रकाश दीप को देखना और फिर आँखें बन्द करके पूर्ववत् भ्रूमध्य भाग में प्रज्वलित ज्योति का ध्यान करने लगना।
साधना की दृष्टि से गायत्री को ही सर्वांगपूर्ण माना जाता है। त्रिपदा के रूप में इसकी तीन सिद्धियों अमृत (आनन्द-उल्लास से भरा अन्तःकरण–चिरयौवन), पारस (उत्कृष्टतावादी प्रगतिशील सत्साहस) तथा कल्पवृक्ष (परिष्कृत चिन्तन-सद्बुद्धि प्राप्त होने तथा आप्तकाम होने का सौभाग्य अनुदान) के माध्यम इसकी महिमा शास्त्रों में गायी है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की–देवताओं की–ऋषि-ऋषिकाओं का उपासना पद्धति भी गायत्री ही रही है। इस सर्वसाधारण का उपासना अनुशासन मानकर इसकी उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की गयी है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिये की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप में महत्व मिला है।
साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने हेतु क्रियायोग तथा सूक्ष्म एवं कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन−भाव सम्वेदनापरक −ध्यान योग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधनाओं की आवश्यकता पड़ती हैं।
साधना उपक्रमों का लक्ष्य एक ही हो। अन्तःकरण मर्मस्थल को स्पर्श करने वाली आस्थाओं का उन्नयन, मान्यताओं का परिष्कार–परिमार्जन, प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं का जागरण, तथा देवपुरुष–ऋषि– महामानव बनने की दिशा में चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन। इस लक्ष्य की पूर्ति में आप्त वचनों के अतिरिक्त सुनियोजित मार्गदर्शन की समय−समय पर आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये तत्वदर्शन व चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है। गुरु उस सद्गुरु से दिशा निर्देश प्राप्ति में सहायता करता है व पात्रता के अनुरूप अपनी शक्ति का एक अंश भी साधक को देता है।
साधना क्षेत्र में प्रगति करने और दिव्य ईश्वरीय अनुदानों को आकर्षित करने में साधक की आन्तरिक श्रद्धा ही प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। अस्तु मनीषियों ने श्रद्धा और विश्वास को परिपक्व करने पर अत्यधिक जोर दिया है। व्यायाम के अनेकानेक प्रयोगों से शरीर बल बढ़ता है। ज्ञान वृद्धि में शिक्षा का अवलम्बन सहायक होता है। धनी बनने के लिए उद्योग व्यवसाय अपनाने पड़ते हैं ठीक इसी प्रकार श्रद्धा और विश्वास को विकसित करने के लिए देव प्रतिमाओं–पूजा−प्रतीकों को माध्यम बनाना पड़ता है।
साधना-उपचारों के माध्यम से बढ़ाते रह सकता है। शरीर में सतत् प्रवाहित इस प्राण प्रवाह का ही कमाल है कि व्यक्ति स्वयं को समर्थ आत्मबल अनुभव करता है। मानवी अन्तराल की इस सूक्ष्म संरचना की जानकारी व कैसे इस प्रवाह को बढ़ाया जाय इनका अध्यात्म शास्त्र के ग्रन्थों में विशद रूप में विवेचन किया गया है। ओजस्, तेजस्, वर्चस् को उभारने की विधाओं का ही साधना उपक्रमों के माध्यम से ऊहापोह किया जाता है। ध्यानयोग, क्रियायोग प्राणयोग इत्यादि की साधनाओं के माध्यम से जिन उपचारों का वर्णन व साधकों का मार्गदर्शन प्रस्तुत विशेषांकों में किया जा रहा है, वे इस आध्यात्मिक कायकलेवर की क्षमता–मानवी चुम्बकत्व के सम्वर्धन से ही सम्बन्धित हैं।
साधना की सिद्धि के लिये उत्सुक साधकों के लिये इससे सुगम प्राण योग की साधना और कोई नहीं।
साधना प्रशिक्षण मार्गदर्शन के साथ-साथ उन निष्कर्षों को भी इस पत्रिका में प्रकाशित किया जाता रहेगा। निश्चित ही इससे आध्यात्मिकता के पक्षधर सभी तर्कों, तथ्यों को प्रमाणों का बल मिलेगा।
साधना को पिछले कई वर्ष से मनाते-देखते चले आ रहे पर्वों से अलग व विशिष्टता मानकर चलना होगा। नवरात्रि साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” ये सर्वसाधारण के लिये ही है। उपासना क्रम ऐसा है जिसका पालन कर सकना सर्वसुलभ हो– मन्त्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदा विधि-विधानों का दबाव न हों।
साधना विधान का महत्वपूर्ण अंग है– उपासना। विडंबना यह है कि इस सम्बन्ध में जितने भ्रम−जंजाल फैले हैं उतने साधनादि अन्यान्य विषयों में नहीं। उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता।
साधना से वंचित बने रहने से वे पकड़ में नहीं आतीं।
साधना को ही जाना माना जाता रहा है।
साधना समर को न ही जीता जा सकता। बाहरी शत्रुओं से लड़ने के लिए जितना युद्ध−कौशल चाहिए उतना ही शौर्य, साहस अपने भीतर घुसे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद–मत्सर जैसे भीतरी शत्रुओं से लड़ने और परास्त करने के लिए आवश्यक होता है। दुर्बल, मनःस्थिति के लोग अपनी भीतरी कमजोरियों को जानते हैं, उन्हें हटाना चाहते हैं, पर साहस, संकल्प के अभाव में उनसे लड़ने का पराक्रम नहीं कर पाते। फलस्वरूप आत्म−सुधार एवं आत्म−निर्माण का प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता। आन्तरिक शत्रुओं पर विजय भी प्राणशक्ति के संचय−अभिवर्धन द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।
साधना कर वापस लौटा। नदी के इस पार गुरु की झोंपड़ी थी। गुरुजी से मिलने को उत्सुक शिष्य ने नदी पार करने के लिए कदम बढ़ाये। उसका स्वागत करने आये गाँव के श्रद्धालु परिजनों ने नाव की ओर इशारा किया व बताया–”आपको उस पार ले चलते हैं। “ शिष्य बोला–”नहीं।
साधना पथ में गुरु वरण किया जाता है। गुरु वह जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलता है। कहा गया है–
साधना विज्ञान की तात्विक पृष्ठभूमि को समझने के लिये ही किये गये हैं। वस्तुतः इन सभी के पीछे तथ्य एक ही है कि समस्त साधना उपक्रमों का लक्ष्य एक ही हो। अन्तःकरण मर्मस्थल को स्पर्श करने वाली आस्थाओं का उन्नयन, मान्यताओं का परिष्कार–परिमार्जन, प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं का जागरण, तथा देवपुरुष–ऋषि– महामानव बनने की दिशा में चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन। इस लक्ष्य की पूर्ति में आप्त वचनों के अतिरिक्त सुनियोजित मार्गदर्शन की समय−समय पर आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये तत्वदर्शन व चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है।
साधना का उद्देश्य अपनी दृष्टि क्षमता में इतनी तीक्ष्णता उत्पन्न करता है कि वह दृश्य एवं अदृश्य की गहराई में उतरकर उसके अन्तराल में जो अति महत्वपूर्ण घटित हो रहा है उसे पकड़ने एवं समझने में समर्थ हो सके। मानवी विद्युत का अत्याधिक प्रवाह नेत्रों द्वारा ही होता है। उस प्रवाह को एक दिशा विशेष में नियोजित एवं लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित कर देने की प्रक्रिया को ‘वाटक’ कहा गया है।
साधना का वैसा स्वरूप नहीं रह जाता, जैसा कि शास्त्रकारों न उसका असाधारण माहात्म्य वर्णन किया है।
साधना पारायण व्यक्ति भी इस विडंबना से ग्रस्त दुःखी होते देखे जाते हैं।
साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया। महात्मा गाँधी ने भी सामूहिक प्रार्थना सभाओं का जागृति विस्तार का एक अनिवार्य अंग माना व उसे हमेशा महत्व देते रहे।
साधना नियत समय पर ध्यान धारण के रूप में नियमित रूप से प्रातः सायं की जा सकती है। इसे युग परिवर्तन के लिये समर्थ मार्गदर्शन में दैवी प्रवाक् के द्वारा युगशक्ति के प्रचण्ड उत्पादन हेतु प्रेरित की गयी विशिष्ट साधना समझा जा सकता है। इसके आधार पर ही सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण के अनुकूलन व प्रसुप्त की जागृति की अपेक्षा की जा सकती है।
साधना तत्वदर्शन को जानने की इच्छा रखने वाले हर जिज्ञासु को इस अटल तथ्य को भली-भाँति समझ लेना चाहिये कि जीवन साधना– ईश्वराधना हेतु किसी मुहूर्त्त की प्रतीक्षा नहीं की जाती। इन सिद्धान्तों को तो जितना शीघ्र जीवन में उतारा जाय उतना ही उत्तम है, परन्तु क्रमबद्ध रूप से उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ने वालों को प्रकृति समय विशेषों की महत्ता जानना जरूरी है। उन दिनों आरम्भ किये गये प्रयास संकल्पबल के सहारे शीघ्र ही गति पाते व साधक का वर्चस् बढ़ाते चले जाते हैं। कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाताओं ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशिष्ट उभारो को दृष्टिगत रख ही ऋतुओं के मिलन काल की संधिबेला को आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों को महत्ता दी है।
साधनाओं की सफलता सद्गुरु के मार्गदर्शक पर निर्भर है। इसके लिए व्यक्ति विशेष को गुरु मानने की भी आवश्यकता पड़ती है। परन्तु उसका कार्य एक ही है–व्यक्ति को सद्गुरु की पहचान करा देना–उपासना की सही दिशा दे देना तथा अध्यात्म−पथ का पथिक बना देना। यात्रा पूरी करने में हमें अपने पैरों का सहारा लेना होता है। लाठियाँ तो सहारा भर देती हैं।
साधना में पहुँचे हुए साधक को अहम् ब्रह्मास्मि का–तत्वमसि का–शिवोऽहम्–सच्चिदानंदोऽहम् का आभास ही नहीं अनुभूति भी होने लगती है। यही एकात्म भाव है जहाँ पहुँचने पर भक्त भगवान एक हो जाते हैं।
साधना को समर कहा गया है। एक ऐसा समर जिसमें स्वयं के शत्रुओं से शुद्ध करना पड़ता है। अनेक योनियों में भ्रमण करते हुए जीव जिन पशु−प्रवृत्तियों का अभ्यस्त होता है उन्हें घटाये−हटाये बिना मानवी गरिमा के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव का निर्माण नहीं हो सकता। आन्तरिक अवाँछनीयताओं को हटाकर उस स्थान पर उत्कृष्टताओं की स्थापना करने के प्रयोग को साधना कहते हैं। आन्तरिक साहसिकता के बिना इस साधना समर को न ही जीता जा सकता।
साधना उपचारों के विभिन्न पक्षों का। इसी लेखमाला में आगे इस सूक्ष्म संरचना को और विस्तार से समझाने का प्रयास किया जायेगा।
साधना का तत्वदर्शन समझा जा सके और प्रक्रिया को ठीक प्रकार अपनाया जा सके तो दिव्य दृष्टि जागरण का लाभ उठा सकना हर किसी के लिए सम्भव है।
साधना इस घर्षण प्रयोजन के लिए की जाती है। सुनसान जंगलों में कई बार भयंकर आग लगती है और विस्तृत क्षेत्र के वृक्षों को जलाकर खाक कर देती है। यह आग मनुष्यों द्वारा उत्पन्न की गयी अथवा लगायी गई नहीं होती है। वृक्षों की टहनियाँ ही तेज हवा के कारण हिलती और बारम्बार टकराती हैं। आग इसी से पैदा हो जाती है।
साधना में परिपक्वता के साथ−साथ सहज ही बढ़ने लगती है। सूक्ष्म जगत की अदृश्य घटनाओं का बोध होने लगता है। क्या हो रहा है और क्या होने वाला है, उसकी जानकारी नादयोग के साधक को मिल जाती है। इस अविज्ञात स्तर को ज्ञात स्तर पर उतारने में नादयोग की साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली सिद्ध होती है।
साधनावधि में कसकर देख सकते हैं। व्यक्तित्व का परिष्कार, अन्तराल से विभूतियों के रत्नों का निकल पड़ना व विपत्ति बाधाओं का निराकरण ये प्रत्यक्ष प्रति फलों से रूप में मिलते देखे जा सकते हैं।
साधना उपक्रमों के माध्यम से ऊहापोह किया जाता है। ध्यानयोग, क्रियायोग प्राणयोग इत्यादि की साधनाओं के माध्यम से जिन उपचारों का वर्णन व साधकों का मार्गदर्शन प्रस्तुत विशेषांकों में किया जा रहा है, वे इस आध्यात्मिक कायकलेवर की क्षमता–मानवी चुम्बकत्व के सम्वर्धन से ही सम्बन्धित हैं। यह उचित समझा गया कि साधकों को इस सूक्ष्म काय-कलेवर की भी जानकारी करायी जाय जिसे माइाक्रो–सटलर (अति सूक्ष्म) कहा जा सकता है व जिसकी विकृति से ही अदृश्य रूप में रोगों का आक्रमण तथा जिसके परिष्कार-सम्वर्धन से व्यक्तित्व में आकर्षण, ऋद्धि-सिद्धियों का प्रवेश सम्भव हो पाता है। यह सारी आध्यात्मिक संरचना पूर्णतः विज्ञान सम्मत है, सारे भौतिकीय व गणितीय प्रमाण इसकी पुष्टि भी करते हैं।
साधना जिसका वर्णन पिछले लेख में किया गया, वह प्रक्रिया है जिसमें दिव्य चेतना शक्ति के रूप में प्राण तत्व के शरीर में प्रविष्ट होने की आस्था विकसित की जाती है। यह मूलतः संकल्प शक्ति से सम्भव हो पाता है कि साधक वायु के अन्तराल में घुले प्राण तत्व को अपने अन्दर खींचता–उसे धारण करता व पचाता है। संध्या वंदनादि के समय किये जाने वाले प्राणायामों के संकल्प एवं साधक की प्राण धारणा क्षमता का ही महत्व अधिक रहता है। संकल्प रहित अथवा दुर्बल–भाव−संवेदना रहित प्राण का धारण मात्र एक व्यायाम भर बनकर रह जाता है। यदि प्राण तत्व का चेतनात्मक लाभ उठाना है तो श्वास क्रिया से भी अधिक महत्व प्राणायाम के लिये नितान्त आवश्यक संकल्प बल को दिया जाना चाहिये।
साधना इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है एवं आज के समय की आवश्यकता को देखते हुए तो अनिवार्य भी। प्रज्ञायोग के मर्म को जानने–समझने की रुचि रखने वालों को इस वर्ष की नवरात्रि की गायत्री साधना को पिछले कई वर्ष से मनाते-देखते चले आ रहे पर्वों से अलग व विशिष्टता मानकर चलना होगा। नवरात्रि साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार ही होगी–”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत प्रतिबन्धों और तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” ये सर्वसाधारण के लिये ही है।
साधना विधान है।
साधना इसी उपलब्धि के लिए की जाती है।
साधना मार्ग के विक्षोभों एवं अवरोधों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान होता है। मनुष्य की सामर्थ्य अनन्त है। वह शक्ति का पुञ्ज है। पर जब तक यह आत्मबोध न हो जाय अन्तःशक्ति के वैभव का समुचित लाभ उठा पाना साधक के लिये सम्भव नहीं हो पाता। गुरु शिष्य को अंतर्जगत का पर्यवेक्षण कराते हैं, उसकी सामर्थ्य का बोध कराते हैं।
साधना का भी एक अनिवार्य अंग माना है।
साधनाओं में ज्योति अवतरण की धारणा का और उच्चस्तरीय विशिष्ट साधनाओं में त्राटक का अभ्यास किया जाता है। त्राटक साधना भी विभिन्न माध्यमों से की जाती है। बिन्दु त्राटक, दीपक त्राटक, सूर्य त्राटक आदि का अभ्यास मनःस्थिति के अनुरूप अपनाया जाता है। त्राटक की क्रिया तो सामान्य होती है, पर उसके साथ जुड़ी हुई कल्पनाओं एवं भावनाओं का अधिक महत्व होता है। उन्हें ही अधिक बलिष्ठ और परिपक्व बनाने का प्रयास किया जाता है।
साधना परायण आत्माएँ अदृश्य प्रेरणा शक्ति से बरबस प्रेरित हो आत्मकल्याण व लोक-मंगल के क्रिया-कलापों में नियोजित हो जाती हैं। इन दिनों न केवल मानवी चेतना को प्रभावित करने वाली वरन् अनुकूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बन जाती हैं। अन्य जीवधारियों में प्रजनन की उत्तेजना इस समय ही सताती है और वे गर्भाधान की क्रिया सम्पन्न करते हैं। सूत्र–संचालन तो कोई अदृश्य सत्ता ही करती है, प्राणीमात्र कठपुतली की भूमिका निभाते हैं। इन दिनों वातावरण प्रकृति इस प्रकार का बनता है कि आत्मिक प्रगति के लिये अन्तःप्रेरणा सहज ही उठने लगती है।
साधनारत व्यक्ति अपने प्रयत्नों का समुचित प्रतिफल प्राप्त कर रहे हैं या नहीं। इस व्यवस्था की आवश्यकता न केवल आस्था क्षेत्र के प्रयत्नों की परिणति जानने के लिये करनी पड़ी है वरन् इसलिये भी कि साधक का शारीरिक, मानसिक व अन्तःकरण का स्तर जाँचा जा सके और तद्नुसार निराकरण–उपचार सुझाया जा सके।
साधनात्मक पुरुषार्थ, चिन्तन में प्रौढ़ता-प्रखरता के समावेश एवं युग देवता के सृजन प्रयोजनों में सहयोग कर हम सभी विभीषिका निवारण तथा नव सृजन में हाथ बँटा सकते हैं।
साधना विधिवत् की जा सके–उत्पन्न प्राण तत्व को धारण किया जा सके तो साधक को मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी बनने का अवसर मिलता है। यह ऐसी उपलब्धियाँ हैं जिनका अवलम्बन लेकर भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दिशाओं में आगे बढ़ना सम्भव है भौतिक क्षेत्र में भी देखा जाता है कि जिनमें प्राण का बाहुल्य होता है उनमें प्रभावोत्पादक क्षमता अधिक होती है। अपना इस आकर्षण शक्ति द्वारा वे दूसरों को प्रभावित कर लेते तथा सहयोग प्राप्त कर लेते हैं। यह प्राण शक्ति की ही विशेषता होती है कि महापुरुषों के सान्निध्य में आने बालों का चिन्तन भी उत्कृष्टता की दिशा में चलने लगता है। कितनी बार तो अप्रत्याशित परिवर्तन होते देख जाते हैं।
साधनापरक तपश्चर्या ये सभी विभाजन साधना विज्ञान की तात्विक पृष्ठभूमि को समझने के लिये ही किये गये हैं। वस्तुतः इन सभी के पीछे तथ्य एक ही है कि समस्त साधना उपक्रमों का लक्ष्य एक ही हो। अन्तःकरण मर्मस्थल को स्पर्श करने वाली आस्थाओं का उन्नयन, मान्यताओं का परिष्कार–परिमार्जन, प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं का जागरण, तथा देवपुरुष–ऋषि– महामानव बनने की दिशा में चिन्तन एवं क्रिया का सुनियोजन। इस लक्ष्य की पूर्ति में आप्त वचनों के अतिरिक्त सुनियोजित मार्गदर्शन की समय−समय पर आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये तत्वदर्शन व चिन्तन के रूप में आत्मतत्व रूपी सद्गुरु अथवा आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति काया में विद्यमान प्रत्यक्ष गुरु की सहायता ली जाती है।
साधना में प्रत्येक तन्तु एवं कोशिका को आलोकित देखा जाता है। मस्तिष्क के चार परत माने गये है–मन, बुद्धि, चित, अहंकार, इन चारों को प्रकाश पुँज बना हुआ अनुभव किया जाता है। जिस प्रकार सूर्योदय होने से अन्धकार का हर दिशा से पलायन होने लगता है उसी तरह अपनी सत्ता के प्रत्येक पक्ष को भ्रूमध्य केन्द्र से निकलने वाले प्रकाश प्रवाह से आलोकित अनुभव करने की भावना करनी पड़ती है। बिन्दुयोग की अन्तःत्राटक की साधना परिपक्व होकर जीवन सत्ता के कण−कण में प्रकाश उद्भव की संजीव अनुभूति तो कराती ही है, साथ ही उसकी प्रत्यक्ष अभिनव हलचलें शारीरिक मानसिक एवं आत्मिक धरातल में उभरती दृष्टिगोचर होती है।
साधनाओं कुसंस्कार उन्मूलन तथा सुसंस्कारिता संवर्धन–आत्मपरिष्कार के द्विविधि प्रयोजन साथ-साथ पूरे होते रह सकें। इन्हें परम्परागत धर्मानुष्ठानों से अलग ही माना जाय। इन उपचारों के पीछे ऐसे तथ्यों का समावेश है जिनका प्रतिफल उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध हो सके। ये साधना उपक्रम मूलतः आस्था परक हैं। इनमें श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा को प्रभावित करने वाली, अन्तराल को उत्कृष्टता के साथ जोड़ देने वाली क्रिया-प्रक्रिया का समावेश अत्यन्त दूरदर्शिता एवं एक तत्वान्वेषी सूक्ष्म बुद्धि के साथ किया गया है।
साधनायें मूलतः ध्यानपरक हैं। इन सभी में अपने चिन्तन को ध्यान प्रक्रिया द्वारा उत्कृष्टता से जोड़ने व उस महत्तत्व से प्राप्त प्राणशक्ति से प्रसुप्त को जगाने−उभारने का पुरुषार्थ किया जाता है। इन्हीं साधनाओं के विस्तार का स्पष्ट विवेचन अगले पृष्ठों में किया गया है
साधना परिपक्व होकर जीवन सत्ता के कण−कण में प्रकाश उद्भव की संजीव अनुभूति तो कराती ही है, साथ ही उसकी प्रत्यक्ष अभिनव हलचलें शारीरिक मानसिक एवं आत्मिक धरातल में उभरती दृष्टिगोचर होती है।
साधनाओं में त्राटक का अभ्यास किया जाता है। त्राटक साधना भी विभिन्न माध्यमों से की जाती है। बिन्दु त्राटक, दीपक त्राटक, सूर्य त्राटक आदि का अभ्यास मनःस्थिति के अनुरूप अपनाया जाता है। त्राटक की क्रिया तो सामान्य होती है, पर उसके साथ जुड़ी हुई कल्पनाओं एवं भावनाओं का अधिक महत्व होता है। उन्हें ही अधिक बलिष्ठ और परिपक्व बनाने का प्रयास किया जाता है।
साधना का चरम लक्ष्य सिद्धियाँ–चमत्कारों की प्राप्ति नहीं हैं, पर जिस प्रकार अध्यवसाय में लगे छात्र को डिग्री की उपलब्धि के साथ-साथ बुद्धि की प्रखरता का अतिरिक्त अनुदान सहज ही मिलता रहता है, उसी तरह आत्मोत्कर्ष की प्रचण्ड साधना में लगे साधकों को उन विभूतियों का भी अतिरिक्त अनुदान मिलता रहता है जिसे लोक-व्यवहार की भाषा में सिद्धि एवं चमत्कार के रूप में जाना जाता है। पर चमत्कारी होते हुए भी ये प्रकाश की छाया जैसी ही हैं। प्रकाश की ओर चलने पर छाया पीछे-पीछे अनुगमन करती हैं। अन्धकार की दिशा में बढ़ने पर छाया आगे आ जाती है, उसे पकड़ने का प्रयत्न किया तो भी पकड़ में नहीं आती। इसी प्रकार प्रकाश अर्थात् दिव्यता की ओर–श्रेष्ठता की ओर परमात्म पथ की ओर बढ़ने पर छाया अर्थात् ऋद्धि-सिद्धियों साधक के पीछे-पीछे चलने लगती हैं।
साधना में मिलने वाले संकेत सूत्र ऐसे होते हैं जिनके सहारे परमात्मा के विभिन्न शक्ति स्रोतों के साथ आदान−प्रदान कर सकना सम्भव है। जिस प्रकार टेलीग्राम, टेलीफोन, वायरलैस, टेलीविजन पद्धतियों का आश्रय लेकर हम दूरवर्ती व्यक्तियों से संपर्क साध सकते तथा परस्पर विचार विनिमय कर सकते हैं ठीक उसी तरह ईश्वर के विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ इन ध्वनियों के माध्यम से सम्बन्ध मिला सकते हैं और उस स्थिति पर पहुँच सकते हैं कि अपनी बात ईश्वर तक पहुँचा सकें और उससे आवश्यक निर्देश प्राप्त कर सकें। सिद्ध पुरुषों एवं योगियों में यह विशेषता दिखायी पड़ती है। वे ऐसे ही माध्यमों के आधार पर अपने को परमेश्वर के साथ जोड़कर अभीष्ट आदान−प्रदान का लाभ प्राप्त करते हैं।
साधना में उसी एकाग्रता सम्पादन का अभ्यास किया जाता है। विचारों के एक लक्ष्य विशेष पर केन्द्रीकरण में सफलता तभी मिलती है जब कि चेतना का मस्तिष्कीय हलचलों पर नियन्त्रण सध जाय। ध्यान एक ऐसा व्यायाम है जिसके द्वारा विचारों पर नियन्त्रण करना सम्भव होता है। इसके अनेकों उपयोग है जिनमें से एक यह है कि मन में आवेशों उपयोग है जिनमें से एक यह है कि मन में आवेशों, उत्तेजनाओं, भावुकताओं का अवाँछनीय उभार जब भी उठे तब उसे रोककर प्रवाह को दूसरी दिशा में उलट सकना सम्भव किया जाय। सामान्यतः अनगढ़ मन मनुष्य को कहीं भी घसीट ले जाता है और प्रकृति भी करा लेता है किन्तु सुसंस्कृत एवं नियन्त्रित मन अंतःकरण का निर्देश एवं अनुशासन मानता है तथा उसका निर्देश मिलते ही अपनी हलचलें निर्देशित दिशा में मोड़ लेता है।
साधना की चर्चा इसलिये का जा रही है कि समय विशेष को– संक्रान्तिकाल को देखते हुए यह आवश्यक है। सामूहिकता में जो शक्ति है उसे यदि अपने अन्तः से सब लोग मिलकर उभार सकें तो इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होने में जरा भी देर न लगे।
साधनाओं के विस्तार का स्पष्ट विवेचन अगले पृष्ठों में किया गया है
साधना ही थी जो देवों और असुरों की सम्मिलित उपासना द्वारा पूरी हो सकीं और चौदह रत्नरूपी सिद्धियों की उपलब्धि सम्भव हो सकी। रावण वानरों सहित सामूहिक साधना ही थी। श्रीकृष्ण का महारास तत्ववेत्ताओं द्वारा सामूहिक साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया। महात्मा गाँधी ने भी सामूहिक प्रार्थना सभाओं का जागृति विस्तार का एक अनिवार्य अंग माना व उसे हमेशा महत्व देते रहे।
साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने हेतु क्रियायोग तथा सूक्ष्म एवं कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन−भाव सम्वेदनापरक −ध्यान योग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना से अलग व विशिष्ट माना जाना चाहिए। प्राणायाम तो मात्र श्वास−प्रश्वास का एक विशिष्ट क्रिया विधान है जिससे फेफड़ों का व्यायाम–रक्त का शोधन व जीवनी शक्ति संवर्धन ये तीन लाभ होते पाये जाते हैं। ‘डीप ब्रीदिंग‘ गहरी साँस लेना भी इसी के अंतर्गत आता है।
साधना विशेष रूप से सहायक सिद्ध होती है। नादयोग चंचल मन के निग्रह एवं प्राणों के निरोध में उसी प्रकार सफल सिद्ध होता है जिस तरह सपेरा विषधर चपल सर्प को पकड़ने में। इस अभ्यास में चित्तवृत्ति नाद श्रवण में लीन हो जाती है। फलस्वरूप मन की चंचलता अपने आप रुक जाती है। इससे चित्त में शास्त्र भाव प्रबल होता है और वासना की मादकता से विरक्ति होती चली जाती है।
साधनाओं में सद्श्रद्धा का असाधारण महत्व है। इसी का उभारने एवं सुविकसित करने के लिए विविध प्रकार के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष पूजा उपचार किये जाते हैं।
साधना में कानों की सूक्ष्म चेतना की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। कई बार ये मन्द होती हैं और कई बार अत्यन्त प्रखर। ध्वनियों को श्रवण करने के साथ−साथ उच्चस्तरीय विचारों एवं भावनाओं का समन्वय भी उनके साथ होना चाहिए। कृष्ण की बाँसुरी सुनने की भाव भूमिका का वर्णन किया जा चुका है। बंशी के अतिरिक्त भी कई प्रकार की ध्वनियाँ साधकों को सुनाई पड़ती हैं।
साधना की शास्त्रकारों ने स्थान−स्थान पर विवेचना करते हुए प्रशस्ति की है व इसे कुण्डलिनी योग की साधना का भी एक अनिवार्य अंग माना है।
साधनादि अन्यान्य विषयों में नहीं। उपासना का दर्शन समझे बिना मात्र कर्मकाण्डों में उलझना एक प्रवंचना मात्र ही है। बहुसंख्य साधकों के साथ होता भी यही है। ऐसे व्यक्ति डींग तो बड़ी लम्बी−चौड़ी हाँकते हैं पर उपासना का कोई परिणाम उनके चिन्तन−चरित्र व्यवहार में परिलक्षित होता दीख नहीं पड़ता। लगता है या तो वह आधार गलत है जिस पर उपासना की गयी अथवा उपासना फलदायी होती ही नहीं।
साधना नहीं। सोऽहं की– हंसयोग साधना, नादयोग, त्राटक, बिन्दु, अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनायें मूलतः ध्यानपरक हैं। इन सभी में अपने चिन्तन को ध्यान प्रक्रिया द्वारा उत्कृष्टता से जोड़ने व उस महत्तत्व से प्राप्त प्राणशक्ति से प्रसुप्त को जगाने−उभारने का पुरुषार्थ किया जाता है। इन्हीं साधनाओं के विस्तार का स्पष्ट विवेचन अगले पृष्ठों में किया गया है
साधनात्मक मार्गदर्शन करते हैं वरन् अपनी शक्ति का एक अंश देकर साधक को आत्मबल से अनुग्रहीत भी करते हैं। साधना ग्रन्थों में इस गुरु−शिष्य आदान−प्रदान की प्रक्रिया व महत्ता के सम्बन्ध में काफी प्रकृति लिखा जाता है। यह सब मात्र इसलिए कि ग्रन्थों का पठन पाठन, एकाँगी तप−तितिक्षा ही नहीं−गुरु की शक्ति का अंश तथा अनुभवजन्य मार्गदर्शन अत्यन्त आवश्यक है। नहीं तो हर मोड़ पर भटकाव की सम्भावना होती है। इसके लिये भक्त को सद्गुरु का चयन करने के अतिरिक्त अपनी साधन श्रद्धा का भी आरोपण करना होता है।
साधना अभीष्ट है, पर विवेकानन्द बनना पात्रता अर्जित करना सरल है। समुद्र बनना कठिन है, परन्तु उसका जल लेकर मेघ बनकर उड़ना सरल है। पारसमणि बनना कठिन है, पर लोहे का उसे छूकर सोना बन जाना सरल है। चाणक्य जैसी प्रचण्ड सत्ता–अग्निपुँज बन सकना हर किसी का काम नाम नहीं, पर एक दासी पुत्री का चाणक्य का अनुग्रह पाकर दिग्विजयी सम्राट बनकर सफल होना सरल है। बुद्ध कभी−कभी ही ईश्वरीय विधिव्यवस्थानुसार अवतरित होते हैं, पर उनके वट वृक्ष रूपी व्यक्तित्व की छाया में अशोक, आनन्द, अंगुलिमाल, आम्बपाली आदि अगणित व्यक्ति संकीर्णता की परिधि लाँघकर महानता का वरण कर सकने में सफल हो जाते हैं।
साधना ही थी। श्रीकृष्ण का महारास तत्ववेत्ताओं द्वारा सामूहिक साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया। महात्मा गाँधी ने भी सामूहिक प्रार्थना सभाओं का जागृति विस्तार का एक अनिवार्य अंग माना व उसे हमेशा महत्व देते रहे।
साधना के प्रारम्भिक अभ्यास के रूप में साधना विज्ञान का एक अनिवार्य चरण माना जाता है।
साधना का सर्वोत्कृष्ट मन्त्र इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि साधक गायत्री मन्त्र में अकेले अपनी ही नहीं, पूरे समूह की बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना सविता देवता से करता है। ईशोपनिषद में साधक अपनी अनुभूति बताता है–”हे प्रकाश पुँज! मैं आपके परम कल्याणकारी तेजोमय स्वरूप की देख रहा हूँ। वह मैं स्वयं ही हूँ।” और तुरन्त इसके बाद कहता है–”अग्नेनय सुपथा राये अस्मान्।” अर्थात्–हे तेज पुँज! हम सबको सन्मार्ग की ओर खींच लीजिये।
साधना में बाह्य नेत्रों एवं स्थूल साधनों–मोमबत्ती, दीपक, सूर्य आदि का प्रयोग कि या जाता है। इसलिए उसकी गणना स्थूल उपचारों में की गई है। बिन्दुयोग में ध्यान धारणा के सहारे किसी इष्ट आकृति पर अथवा प्रकाश की ज्योति पर एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है। दोनों का अन्तर मात्र भौतिक साधनों के प्रयोग करने की आवश्यकता रहने न रहने का है। आरम्भिक अभ्यास बाह्य त्राटक के बिना नहीं बन पाता।
साधना का लाभ भी ले सकेंगे। नवरात्रि साधना के लिये जाने वाले परिजन एक सप्ताह पहले आने की व्यवस्था कर सकें तो इस दुहरे लाभ को प्राप्त कर सकते हैं।
साधना इसीलिए हर साधक के लिए अनिवार्य बतायी गयी है।
साधना की जायेगी। एक-सी विचार तरंगें और भाव तरंगें एक−सी चित्त वृत्तियों को जन्म देती हैं। एकाग्रता का अर्थ यही है कि मन का प्रवाह एक ही दिशाधारा में चलने लगे। चारों तरफ चित्त बिखरे नहीं। जब व्यक्ति समुदाय एक ही भावधारा को एक साथ अपनाता है तो ध्यान धारणा प्रगाढ़ होती है, उससे एकाग्रता बलवती होती है।
साधना उपक्रम मूलतः आस्था परक हैं। इनमें श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा को प्रभावित करने वाली, अन्तराल को उत्कृष्टता के साथ जोड़ देने वाली क्रिया-प्रक्रिया का समावेश अत्यन्त दूरदर्शिता एवं एक तत्वान्वेषी सूक्ष्म बुद्धि के साथ किया गया है।
साधना ग्रन्थों में इस गुरु−शिष्य आदान−प्रदान की प्रक्रिया व महत्ता के सम्बन्ध में काफी प्रकृति लिखा जाता है। यह सब मात्र इसलिए कि ग्रन्थों का पठन पाठन, एकाँगी तप−तितिक्षा ही नहीं−गुरु की शक्ति का अंश तथा अनुभवजन्य मार्गदर्शन अत्यन्त आवश्यक है। नहीं तो हर मोड़ पर भटकाव की सम्भावना होती है। इसके लिये भक्त को सद्गुरु का चयन करने के अतिरिक्त अपनी साधन श्रद्धा का भी आरोपण करना होता है।
साधना कहते हैं।
साधना विज्ञान का एक अनिवार्य चरण माना जाता है।
साधना में श्वास−प्रश्वास क्रिया को क्रमबद्ध−लयबद्ध बनाया जाता है, साँस लेने की अव्यवस्था को दूर करके उसे व्यवस्था के बन्धनों में बाँधा जाता है। सामान्यतः श्वास का आवागमन फेफड़ों में तथा अन्य अवयवों में सिकुड़ने−फैलने की हलचल उत्पन्न करता है। उसी से दिल धड़कता तथा रक्त−संचार होता है–माँसपेशियों के आकुंचन–प्रकुंचन का क्रम चलता है। जिस तरह घड़ी के पेन्डुलम का हिलना घड़ी को गतिशील रखने का कारण होता है उसी प्रकार श्वास−प्रश्वास क्रिया को एक प्रकार से समस्त शारीरिक हलचलों का उद्गम केन्द्र कहा जा सकता है। मृत्यु का मोटा ज्ञान श्वास चलना बन्द हो जाने को माना जाता है।
साधना से बढ़कर और कोई दूसरा सरल एवं सफल उपाय नहीं है। छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय के सातवें खण्ड में ध्यानयोग की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन है। ध्यान योग को उपासना की उच्च कक्षा माना गया है। नामोच्चार से बढ़कर वाक्, वाक् से बड़ा मन, मन से भी अधिक महत्वपूर्ण संकल्प से भी अधिक बलवान चित्त को कहा गया है। चित्त से भी बढ़कर सामर्थ्यवान ध्यान को बताया गया है।
साधना की अनिवार्यता ही प्रकट हुई है। समान चित्त वृत्ति तभी होगी, जब समान साधना की जायेगी। एक-सी विचार तरंगें और भाव तरंगें एक−सी चित्त वृत्तियों को जन्म देती हैं। एकाग्रता का अर्थ यही है कि मन का प्रवाह एक ही दिशाधारा में चलने लगे। चारों तरफ चित्त बिखरे नहीं।
साधना के लिए जप, पाठ, मौन जैसे कितने ही अभ्यास किये जाते हैं। ब्रह्मचर्य के परिपालन से जननेन्द्रियों को संयमित रखा जाता है। पर इन सबमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण केन्द्र है– नेत्र। कारण यह है कि जिह्वा मुँह के भीतर रहती है। जननेंद्रिय भी कटि प्रदेश में वस्त्रों से ढकी रहती है।
साधना का है। सूक्ष्म जगत से – दैवी शक्तियों से− संपर्क का आदान−प्रदान का द्वार खोलने वाला यह प्रयास उपासना−साधना के रूप में जाना जाता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
साधना पथ पर चलने वाला प्रत्येक साधक जिज्ञासु हो उठता है कि यह शक्तिपात क्या है, किस सीमा तक वैज्ञानिक है? उसकी प्रक्रिया क्या है एवं क्या प्रत्येक व्यक्ति ऐसे समर्थ व्यक्ति, महापुरुषों के अनुदान प्राप्त कर सकता है? पात्रता विकसित करने के लिये क्या करना पड़ता है? सामान्य व्यक्ति इसकी परख कैसे करें, ये ऐसे प्रश्न हैं जो साधना मार्ग और उन्मुख हर साधक जानना चाहता है।
साधना की स्थिति इसके बाद बनती है जिसमें बाह्य त्राटक की आवश्यकता नहीं रहती। कहीं-कहीं इस अन्तर के कारण त्राटक साधना को बाह्य त्राटक तथा अन्तःत्राटक के रूप में भी निरूपित किया गया है।
साधना में इसी क्षमता को प्रखर किया जाता तथा उच्च भूमिका में प्रविष्ट करके दिव्य दृष्टि जागरण का प्रयोजन पूरा किया जाता है।
साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
साधना के लिए धृत दीपक सर्वश्रेष्ठ है। पर घृत होना शुद्ध चाहिए। मिलावटी या नकली धी की अपेक्षा शुद्ध चाहिए। मिलावटी या नकली धी की अपेक्षा शुद्ध सरसों आदि का तेल प्रयोग करना अधिक उत्तम है। इनके अभाव में मोमबत्ती का भी प्रयोग किया जा सकता है।
साधना विधान का जो स्वरूप पूर्व में प्रचलित था उसके अनुसार हठयोग द्वारा स्थूल शरीर का– राजयोग से सूक्ष्म शरीर अथवा मनस् का एवं ब्रह्मयोग द्वारा अन्तःकरण का परिशोधन−परिमार्जन किया जाता था। इन्हीं का व्यावहारिक स्वरूप था–कर्म, ज्ञान एवं भक्ति योग। साधनात्मक उपक्रमों की विविधताओं का विभाजन इन्हीं तीन समूहों में करके व्यक्ति−विशेष की स्थिति के अनुसार उसे मार्गदर्शन दिया जाता था। यह पुरुषार्थ साधारण स्तर का नहीं−तप अर्जित, मनोबल की शक्ति से सुपात्र बनने वाले साधक को ही प्राप्त हो पाता था। आज तो अति सुगम बनाने के चक्कर में इस अध्यात्म विज्ञान को एक षड्यन्त्र द्वारा मात्र स्थूल तक ही सीमित कर दिया गया है।
साधना−विधान के विस्तार में जाने वाले साधकों को पहले ‘स्प्रिचुअल एलाँटामी’ की जानकारी करायी जाती है। साधना क्रमों का चयन इस प्रारंभिक शिक्षण के बाद ही किया जाना उचित होता है।
साधना से चित्त स्थिर हो जाता है और अपनी चपलताएँ भूल जाता है। वह कहीं दौड़ता भागता नहीं। विषय वासनाओं के उद्यान में मदोन्मत्त गजेन्द्र की तरह विचरण करने वाले मन के नियमन में यह नाद का अंकुश ही समर्थ हैं।
साधना क्षेत्र में इन्हीं तीनों के संयम एवं नियमन पर अधिक ध्यान दिया जाता है। जिह्वा की वाक् साधना के लिए जप, पाठ, मौन जैसे कितने ही अभ्यास किये जाते हैं। ब्रह्मचर्य के परिपालन से जननेन्द्रियों को संयमित रखा जाता है। पर इन सबमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण केन्द्र है– नेत्र। कारण यह है कि जिह्वा मुँह के भीतर रहती है।
साधना करने का साहस सामान्य व्यक्तियों के पास नहीं होता। परन्तु शिवाजी के रूप में एक नगण्य से व्यक्तित्व वाला बालक भी छत्रपति के रूप में विकसित हो सकता है। गाँधी कभी−कभी ही उत्पन्न होते हैं पर उनका अनुगमन करने वाले व्यक्ति महान राजनेता पद पाकर इतिहास में अपना नाम अमर कर जाते हैं।
साधना, तपश्चर्या और योगाभ्यास का मात्र एक ही उद्देश्य है अपने अन्तःकरण में प्रसुप्त पड़ी सत्प्रवृत्तियों का जागरण, सद्भावों का उन्नयन, सद्ज्ञान के रूप में दृष्टिकोण का अभ्यास। सिद्धियों की उत्कृष्टता इसी कसौटी पर रखी जाती है। इसी से अपना भला होता है व सारे जगत का भी।
साधना का चरम लक्ष्य है। परमात्मा अर्थात् आदर्शों का समुच्चय, जीवात्मा अर्थात् उसी का एक अंश जो भटकाव में लिप्त है, पर मार्ग नहीं खोज पा रहा। सोऽहम् की श्वास−प्रश्वास प्रक्रिया के माध्यम से ‘सो’ और ‘हम्’ की ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा है−समूचा काया−कल्प हो रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ, मोह का−वासना−तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है। उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तव्य, दूरदर्शी दृष्टिकोण एवं व्यवहार में सज्जनता–परमार्थ परायणता प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।
साधना को प्राणायाम प्रक्रिया एवं प्राणयोग की प्राणाकर्षण साधना से अलग व विशिष्ट माना जाना चाहिए। प्राणायाम तो मात्र श्वास−प्रश्वास का एक विशिष्ट क्रिया विधान है जिससे फेफड़ों का व्यायाम–रक्त का शोधन व जीवनी शक्ति संवर्धन ये तीन लाभ होते पाये जाते हैं। ‘डीप ब्रीदिंग‘ गहरी साँस लेना भी इसी के अंतर्गत आता है।
साधना विधानों का स्तर बहिरंग से अन्तरंग तक परत दर परत छूने के लिये अलग−अलग होने के कारण उनके प्रकार भी भिन्न−भिन्न हैं। पर मोटा विभाजन यही है कि स्थूल शरीर की साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने हेतु क्रियायोग तथा सूक्ष्म एवं कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन−भाव सम्वेदनापरक −ध्यान योग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना को सर्वोपरि माना जाता है। यह मूलतः ध्यानयोग की साधना है एवं उच्चस्तरीय प्राणयोग भी इसे कहा जाता है। इस साधना को प्राणायाम प्रक्रिया एवं प्राणयोग की प्राणाकर्षण साधना से अलग व विशिष्ट माना जाना चाहिए। प्राणायाम तो मात्र श्वास−प्रश्वास का एक विशिष्ट क्रिया विधान है जिससे फेफड़ों का व्यायाम–रक्त का शोधन व जीवनी शक्ति संवर्धन ये तीन लाभ होते पाये जाते हैं। ‘डीप ब्रीदिंग‘ गहरी साँस लेना भी इसी के अंतर्गत आता है।
साधना कहते हैं। आन्तरिक साहसिकता के बिना इस साधना समर को न ही जीता जा सकता। बाहरी शत्रुओं से लड़ने के लिए जितना युद्ध−कौशल चाहिए उतना ही शौर्य, साहस अपने भीतर घुसे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद–मत्सर जैसे भीतरी शत्रुओं से लड़ने और परास्त करने के लिए आवश्यक होता है। दुर्बल, मनःस्थिति के लोग अपनी भीतरी कमजोरियों को जानते हैं, उन्हें हटाना चाहते हैं, पर साहस, संकल्प के अभाव में उनसे लड़ने का पराक्रम नहीं कर पाते। फलस्वरूप आत्म−सुधार एवं आत्म−निर्माण का प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता।
साधना का क्रिया पक्ष। जिसका आरम्भ दस मिनट से किया जा सकता है तथा अभ्यास क्रम को क्रमशः एक-एक मिनट प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ाते हुए आधे घण्टे तक पहुँचाया जा सकता है। ध्यान के समय आँखें खोलकर दीपक की ज्योति को देखने का प्रयास एक-एक मिनट के अन्तर से करना चाहिए। मिनटों एवं सेकेंडों का सही-सही अनुमान बिना घड़ी के कर पाना तो ठीक-ठीक सम्भव नहीं है, पर अनुमान के आधार पर ही यह क्रम चलाना पड़ता है क्योंकि घड़ी बार-बार देखने से ध्यान की एकाग्रता भंग होती और अभीष्ट परिमाण में ध्यान का लाभ नहीं मिल पाता।
साधना, नादयोग, त्राटक, बिन्दु, अवतरण एवं चक्र भेदन इत्यादि साधनायें मूलतः ध्यानपरक हैं। इन सभी में अपने चिन्तन को ध्यान प्रक्रिया द्वारा उत्कृष्टता से जोड़ने व उस महत्तत्व से प्राप्त प्राणशक्ति से प्रसुप्त को जगाने−उभारने का पुरुषार्थ किया जाता है। इन्हीं साधनाओं के विस्तार का स्पष्ट विवेचन अगले पृष्ठों में किया गया है
साधना इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए की जाती है।
साधना द्वारा विशेष प्रकार के प्राण को खींचा और धारण किया जा सकता है।
साधना क्रमों का चयन इस प्रारंभिक शिक्षण के बाद ही किया जाना उचित होता है।
साधना द्वारा सब प्रकृति प्राप्त कर सकना सम्भव है। राजा ने भी मन्त्र और सम्बन्धित विधि-विधान पूछा और उपासना करने लगे। एक वर्ष तक वे जप करते रहे। पर उन्हें वह उपलब्धियाँ नहीं प्राप्त हो सकीं जो मन्त्री को हुई थीं। निराश होकर एक दिन मन्त्री को बुलाकर कारण पूछा।
साधनापरक तपश्चर्या दोनों ही तथ्यपूर्ण हैं। एक ज्ञानपक्ष है तो दूसरा विज्ञान पक्ष। एक को ब्रह्मवर्चस् का ब्रह्म पक्ष व दूसरे को वर्चस् पक्ष कह सकते हैं। दोनों मिलकर ही सम्पूर्ण बनते हैं। ब्रह्मवर्चस् विज्ञान की इन दोनों ही विधाओं का सारे साधना उपक्रमों में समावेश रहता है।
साधना उपचारों का लक्ष्य एक ही रहता है– इस मर्मस्थल अन्तःकरण की गहन परतों को स्पर्श कर–वहां छाये अन्धकार को मिटाना तथा उस स्थान को श्रेष्ठ समुन्नत बनाना। साधना विधानों का स्तर बहिरंग से अन्तरंग तक परत दर परत छूने के लिये अलग−अलग होने के कारण उनके प्रकार भी भिन्न−भिन्न हैं। पर मोटा विभाजन यही है कि स्थूल शरीर की साधना व उसे उच्चस्तरीय साधना उपक्रमों के योग्य समर्थ बनाने हेतु क्रियायोग तथा सूक्ष्म एवं कारण शरीर की साधना हेतु चिन्तन−भाव सम्वेदनापरक −ध्यान योग। इन्हीं दो में सारे साधना विज्ञान का ढाँचा विभाजित हो जाता है।
साधना में दुहरी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। एक−अपने भीतर के प्राण तत्व का परिमार्जन करना तथा उभारना। दूसरे चरण में चारों ओर बहते हुए प्राण सागर से प्राण तत्व को खींचना और अपने भीतर भरना पड़ता है। प्राणों के भी भेद एवं उपभेद बताये गये हैं तथा शरीर के विभिन्न कार्यों के प्राणों की अलग−अलग भूमिका होती है। आवश्यकता एवं प्रयोग के अनुरूप ही प्राणायाम की विशिष्ट प्रक्रिया अपनायी जाती है।
साधना की व सबने मिल−जुलकर अपना−अपना रक्तसंचय किया। उसे एक घड़े में बन्द करके भूमि में गाड़ दिया, जिससे सीताजी उत्पन्न हुई और उनकी भूमिका के फलस्वरूप तत्कालीन अनाचारों का निराकरण सम्भव हो सका।
साधना भावोत्कर्ष व शक्ति अवतरण की साधन प्रक्रिया है। इस साधना के साथ जुड़ा संकल्प चेतना को उच्चतम स्तर तक उछाल देने में, जीव−ब्रह्म का समन्वय संयोग करा सकने में समर्थ होता है। इतनी इस स्तर की–भाव संवेदना और किसी प्राणायाम में नहीं। इसीलिये इसे प्राणयोग नाम न देकर हंसयोग भी कहते हैं एवं इसे एक स्वतन्त्र शाखा के रूप में महत्व दिया जाता है। इसे ‘अजपा जप’ अथवा प्राण गायत्री भी कहते हैं।
साधना मार्ग और उन्मुख हर साधक जानना चाहता है।
साधना– ईश्वराधना हेतु किसी मुहूर्त्त की प्रतीक्षा नहीं की जाती। इन सिद्धान्तों को तो जितना शीघ्र जीवन में उतारा जाय उतना ही उत्तम है, परन्तु क्रमबद्ध रूप से उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ने वालों को प्रकृति समय विशेषों की महत्ता जानना जरूरी है। उन दिनों आरम्भ किये गये प्रयास संकल्पबल के सहारे शीघ्र ही गति पाते व साधक का वर्चस् बढ़ाते चले जाते हैं। कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाताओं ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशिष्ट उभारो को दृष्टिगत रख ही ऋतुओं के मिलन काल की संधिबेला को आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों को महत्ता दी है।
साधना का एक स्वरूप हो माना जाता है जिसमें वृत्तियों का सामूहिक विलय, विसर्जन समष्टि सत्ता में किया गया है। बुद्ध ने सामूहिक साधना के विशाल आयोजनों को व्यापक स्तर पर आयोजित कर लोक जागरण किया। महात्मा गाँधी ने भी सामूहिक प्रार्थना सभाओं का जागृति विस्तार का एक अनिवार्य अंग माना व उसे हमेशा महत्व देते रहे।
साधना ठीक प्रकार बन नहीं पाती। दिन में यदि करना ही हो तो कमरे में ऐसी व्यवस्था बनाना चाहिए कि कृत्रिम अन्धेरा पैदा हो जाय।
साधनात्मक उपक्रमों की विविधताओं का विभाजन इन्हीं तीन समूहों में करके व्यक्ति−विशेष की स्थिति के अनुसार उसे मार्गदर्शन दिया जाता था। यह पुरुषार्थ साधारण स्तर का नहीं−तप अर्जित, मनोबल की शक्ति से सुपात्र बनने वाले साधक को ही प्राप्त हो पाता था। आज तो अति सुगम बनाने के चक्कर में इस अध्यात्म विज्ञान को एक षड्यन्त्र द्वारा मात्र स्थूल तक ही सीमित कर दिया गया है। यह एक शाश्वत−सनातन सत्य है कि अन्तरात्मा का गहन स्तर ही व्यक्तित्व को दिशा एवं समर्थ बनाता है। अतिमहत्वपूर्ण, अतिमानव− देवपुरुष, अग्रगामी, महापुरुष कहे जाने वाले व्यक्ति अपने इसी स्तर को दिशा विशेष में परिपुष्ट कर आगे आये हैं।
साधना का शुभारम्भ श्रद्धा और विश्वास को उभारने–सुविकसित करने के रूप में करना चाहिए।
साधना के सामूहिक स्वरूप से अलग हटकर किसी अन्य स्वरूप की कल्पना भी नहीं की जाती थी। वैदिक साहित्य में समस्त स्तुतियाँ बहुवचन में है। ”आ नो भद्राः क्रनवो यन्तु विश्वतः” अर्थात्−विश्व भर से श्रेष्ठ विचार हमारे भीतर आएँ। प्रार्थना और साधना का सर्वोत्कृष्ट मन्त्र इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि साधक गायत्री मन्त्र में अकेले अपनी ही नहीं, पूरे समूह की बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना सविता देवता से करता है। ईशोपनिषद में साधक अपनी अनुभूति बताता है–”हे प्रकाश पुँज! मैं आपके परम कल्याणकारी तेजोमय स्वरूप की देख रहा हूँ।
साधना के रूप में जाना जाता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को अनगढ़ से सुगढ़ व ईश्वर का सामीप्य पाने योग्य बनाता है।
साधना क्षेत्र में कितने ही साधक उत्साह के साथ प्रविष्ट होते हैं, उपासना के विधि−विधान एवं नियमों का कड़ाई के साथ पालन करते हुए भी देखे जाते हैं, पर उनमें से प्रकृति ही ऐसे होते हैं, जो अभीष्ट परिमाण में आध्यात्मिक उपलब्धियों को करतलगत कर पाते हैं। अधिकांश तो सीमित लाभ ही उठा पाते हैं। एक ने चमत्कारी सामर्थ्य अर्जित करली जबकि दूसरा खाली हाथ रह गया, इस अन्तर के कारणों का बारीकी से अध्ययन−विश्लेषण किया जाय तो एक ही तथ्य हाथ लगेगा कि श्रद्धा की न्यूनाधिकता ही इस भारी विरोधाभास का कारण बनती है।
साधना काल में ध्यान भूमिका को निरन्तर प्रकाश की झाँकी मिलती रहे।
साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहेंगे। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
साधना समझा जा सकता है। इसके आधार पर ही सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण के अनुकूलन व प्रसुप्त की जागृति की अपेक्षा की जा सकती है।
साधनाओं के माध्यम से जिन उपचारों का वर्णन व साधकों का मार्गदर्शन प्रस्तुत विशेषांकों में किया जा रहा है, वे इस आध्यात्मिक कायकलेवर की क्षमता–मानवी चुम्बकत्व के सम्वर्धन से ही सम्बन्धित हैं। यह उचित समझा गया कि साधकों को इस सूक्ष्म काय-कलेवर की भी जानकारी करायी जाय जिसे माइाक्रो–सटलर (अति सूक्ष्म) कहा जा सकता है व जिसकी विकृति से ही अदृश्य रूप में रोगों का आक्रमण तथा जिसके परिष्कार-सम्वर्धन से व्यक्तित्व में आकर्षण, ऋद्धि-सिद्धियों का प्रवेश सम्भव हो पाता है। यह सारी आध्यात्मिक संरचना पूर्णतः विज्ञान सम्मत है, सारे भौतिकीय व गणितीय प्रमाण इसकी पुष्टि भी करते हैं।
साधना से तो जीवन को औरों के लिये काम आने लायक बनाना ज्यादा श्रेयस्कर है।
साधना क्षेत्र में प्रकाश की प्राप्ति की चर्चा जहाँ कहीं भी होगी उसका अर्थ भौतिक ताप एवं रोशनी देने वाले प्रकाश से नहीं होगा। उसका अभिप्राय अधिक गहरा है। आत्मोत्कर्ष की भूमिका आध्यात्मिक प्रकाश अर्थात् विवेकयुक्त सक्रियता अपनाने पर ही निर्भर है। भौतिक गर्मी या रोशनी से वह महान प्रयोजन नहीं पूरा हो सकता।
साधना में लगे साधकों को उन विभूतियों का भी अतिरिक्त अनुदान मिलता रहता है जिसे लोक-व्यवहार की भाषा में सिद्धि एवं चमत्कार के रूप में जाना जाता है। पर चमत्कारी होते हुए भी ये प्रकाश की छाया जैसी ही हैं। प्रकाश की ओर चलने पर छाया पीछे-पीछे अनुगमन करती हैं। अन्धकार की दिशा में बढ़ने पर छाया आगे आ जाती है, उसे पकड़ने का प्रयत्न किया तो भी पकड़ में नहीं आती। इसी प्रकार प्रकाश अर्थात् दिव्यता की ओर–श्रेष्ठता की ओर परमात्म पथ की ओर बढ़ने पर छाया अर्थात् ऋद्धि-सिद्धियों साधक के पीछे-पीछे चलने लगती हैं।
साधना आरम्भ करने के पूर्व ही इस आचार-संहिता का पाठ कर लिया जाय व नित्य इसे दुहराया जाय तो कभी कहीं भटकाव की गुँजाइश शेष न रहेगी।
साधना उपक्रमों में समावेश रहता है। ज्ञान व विज्ञान दोनों का समन्वय क्रियायोग व ध्यानयोग में है। बिना चिन्तन में भाव सम्वेदनाओं की उत्कृष्टता उभारे तप साधना के प्रयास अधूरे व एकाँगी ही बने रहेंगे। इस मूल तथ्य को सबसे पहले समझा जाना चाहिए कि उच्चस्तरीय आस्थाओं की वरीयता स्वीकार करके ही साधना पथ पर आगे बढ़ा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-May
साधना में अग्नि तत्व को ही आधारभूत कारण ठहराया गया है। इस प्रकार नाद ब्रह्मा −संगीत साधना का उद्गम स्रोत दिव्याग्नि में ही केन्द्रित माना गया है। संगीत दर्पण में इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार मिलता है :−
साधना में परस्पर कोई तालमेल नहीं दीखता। फिर भी उन विसंगतियों के बीच तत्वान्वेषी एक सुसम्बद्ध श्रृंखला की कड़ियाँ परस्पर जुड़ी हुई देख सकते हैं।
साधना तथा ऊर्जा स्रोत से सघन सम्बन्ध ये ऐसे पंचविधि लाभ इस तीर्थ सत्र शृंखला के हैं जिसके समाज निर्माण सम्बन्धी दूरगामी परिणाम परिजन अगले दिनों देखेंगे। हिमालय के साथ जुड़ी नदियाँ बहती ही रहती हैं। गायत्री तीर्थ हिमालय है, जिसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेने वाले परिवारों को उत्कृष्टता के अनुदान एक सुनिश्चित परम्परा के आधार पर मिलते रहेंगे। यह संपर्क सूत्र पाँच दिन के संपर्क से भी जुड़ जाता है। लम्बी अवधि के ये लगाए भी नहीं जा सकते थे क्योंकि लाखों परिजनों में से सभी को थोड़े−थोड़े दिन का अवसर मिल सके, इस सदृष्टि से भी उन्हें छोटा मात्र पाँच दिन जितना ही रखा जा सकता था।
साधना का मूल प्रयत्न यह है कि इस एक महीने की अवधि में अपने आप पर नियन्त्रण करने का अभ्यास कराया जाय। अनगढ़ ढर्रे के विरुद्ध विद्रोह किया जाय, संचित कुसंस्कारिता पर पूरे जोश खरोश के साथ आक्रमण किया जाय और उस खरदूषण सूर्पणखा के साम्राज्य का उखाड़ फेंकने की विजयश्री का वरण किया जाय। इतना ही नहीं उन्मूलन की रिक्तता को भी तुरन्त ही भरा जाय और उस स्थान पर उत्कृष्टता की पक्षधर सत्प्रवृत्तियों को अपनाया जाय। अपनाने का अर्थ है न केवल विश्वास में वरन् स्वभाव अभ्यास में भी उस रीति−नीति को पूरी तरह भर लिया जाय।
साधना अनुष्ठान आवश्यक है। साथ ही पाप कर्मों का प्रायश्चित्त भी। स्वाध्याय, सत्संग से गुत्थियों को सुलझाने और चिंतन−मनन के सहारे भविष्य निर्धारण का निश्चय जिसमें जुड़ा हुआ हो उसी को तीर्थसेवन कहा गया है। शास्त्रों में उसी के पुण्यफल की चर्चा है। प्रतिमा−दर्शन, जल, स्नान, और लुटेरों जैसी भगदड़ से तो तीर्थ पुण्य तो दूर, पर्यटन का मनोरंजन भी पूरा नहीं होता।
साधना की गरिमा पर विश्वास किया जा सके तो समझना चाहिए, अध्यात्म शास्त्र में जिस ‘श्रद्धातत्व’ को सर्वोपरि बताया गया है, शुभारम्भ बन पड़ा। देवता वस्तुतः भीतर से उगते हैं, बाहर तो वे खड़े भर दीखते हैं। मनःस्थिति अदृश्य आन्तरिक है और परिस्थिति दृश्यमान परिणति। विभूतियाँ अन्तः से निकलती हैं। आज तक ऐसा कभी भी नहीं हुआ कि कुपात्रता के रहते किसी दैवी शक्ति ने मात्र पूजा पत्री से प्रसन्न होकर पक्षपात किया हो और पात्रता से अधिक अनुपात में अनुग्रह उड़ेला हो।
साधना’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चान्द्रायण पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलते थे। तिथियों की घट बढ़ से सभी को असुविधा होती थी अब उसे तारीखों के हिसाब से पहली से तीस तक का किया गया है। अवधि महीने भर की ही पूर्ववत् रहेगी। चान्द्रायण में पन्द्रह दिन आहार घटाना और पन्द्रह दिन बढ़ाना पड़ता था।
साधना सत्र 1 जुलाई से आरम्भ होंगे और भविष्य में लगातार तीनों सत्र साथ−साथ चलते रहेंगे यही है अभिनव सत्र व्यवस्था जिसका निर्धारण इन्हीं दिनों किया गया है।
साधना से विशिष्ट ऊर्जा उत्पादन भी तो सम्भव नहीं हो सकता।
साधना, ब्रह्मवर्चस् साधना के नाम से आत्म−शोधन–आत्मपरिष्कार की–साधनाएँ कराई जाती रही हैं। समय−समय पर पुरश्चरण एवं परिष्कृत रूप ‘कल्प साधना’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चान्द्रायण पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलते थे। तिथियों की घट बढ़ से सभी को असुविधा होती थी अब उसे तारीखों के हिसाब से पहली से तीस तक का किया गया है। अवधि महीने भर की ही पूर्ववत् रहेगी।
साधना से ही सम्भव है।”
साधना करनी पड़ी थी। अयोध्या में समस्त सुविधाएँ होते हुए भी अभ्यस्त ढर्रे का संपर्क और वातावरण का घेरा इतना प्रबल था कि वहाँ रहकर योग, तप, क्रियात्मक प्रयोगों में कदाचित ही कुछ सफलता मिलती। वस्तुस्थिति उनने समझी तो उपयुक्त वातावरण में आत्म निर्भर साधना की पृष्ठभूमि बनाकर महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत कर सके। यही मार्ग अन्यान्यों के लिए भी है। वानप्रस्थ में घर छोड़कर वन में अर्थात् भिन्न स्तर के उपयुक्त वातावरण में रहने का पहला कदम उठाना पड़ता है।
साधनाएँ।
साधनाओं के लिए मात्र पूजा की विधि−व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं होती, वरन् उसके फलने−फूलने का अवसर देने वाला तद्नुसार वातावरण भी तलाशना पड़ता है। घर परिवार में एक अभ्यास ढर्रे का चक्र−व्यूह घिरा रहता है और उस जकड़न में ऊँचा उछलने आगे बढ़ने की सम्भावना बहुत कम रह जाती है। इसलिए सदा से उच्चस्तरीय साधन के लिए घर छोड़कर तीर्थ वातावरण के उच्चस्तरीय संपर्क में रहकर महत्वपूर्ण अभ्यास सम्पन्न करने की परम्परा है। राम को अयोध्या छोड़कर देव प्रयाग, लक्ष्मण को लक्ष्मण झूला, भरत को ऋषिकेश, शत्रुघ्न को मुनि की रेती में महाप्राण वशिष्ठ के सान्निध्य में अपनी साधना करनी पड़ी थी। अयोध्या में समस्त सुविधाएँ होते हुए भी अभ्यस्त ढर्रे का संपर्क और वातावरण का घेरा इतना प्रबल था कि वहाँ रहकर योग, तप, क्रियात्मक प्रयोगों में कदाचित ही कुछ सफलता मिलती।
साधना की पृष्ठभूमि बनाकर महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत कर सके। यही मार्ग अन्यान्यों के लिए भी है। वानप्रस्थ में घर छोड़कर वन में अर्थात् भिन्न स्तर के उपयुक्त वातावरण में रहने का पहला कदम उठाना पड़ता है। अन्यथा बाह्य कर्मकाण्ड भर चलते रहते हैं। दृष्टिकोण स्वभाव अभ्यास में काया−कल्प जैसा परिवर्तन सम्भव नहीं हो पाता।
साधनाएँ मनन क्षेत्र की अवाँछनीयता को हटाने की भूमिका निभाते हैं। लययोग, प्राणयोग से परब्रह्म के साथ एकात्म सधता है। और द्वैत से अद्वैत की ओर अन्तराल की उन्मुखता, गतिशीलता में तीव्रता उत्पन्न होती है। इस त्रिविधि, त्रिवेणी, संगम में तीर्थराज के अवगाहन का वह पुण्यफल मिलता है जिसे रामायणकार ने कौए को कोयल, बगुले को हंस बनने की उपमा दी है। प्रकारान्तर से यह आन्तरिक कायाकल्प का ही अलंकारिक संकेत है।
साधना से सिद्धि−भाग 1 (2) साधना से सिद्धि भाग 2 (आहार कल्प)।
साधना न रहने से स्त्री−बच्चों समेत आने की भी छूट रहेगी। परिभ्रमण मनोरंजन करते रहने की भी उन्हें सुविधा रहेगी। दो दिन दोपहर से शाम तक की छुट्टी देकर उन्हें हरिद्वार, कनखल, ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला आदि देखने की सुविधा मिलने से बाल−सुलभ मनोरंजन में कोई कटौती नहीं करनी होगी।
साधना में शब्द ब्रह्मा को इष्टदेव मानकर चला जाता है। इसके लिए अभीष्ट ऊर्जा कहाँ से प्राप्त होती है इस पर संस्कृत के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ संगीत दर्पण में प्रकाश डाला गया है और संगीत के मूल में− नाद ब्रह्मा की साधना में अग्नि तत्व को ही आधारभूत कारण ठहराया गया है। इस प्रकार नाद ब्रह्मा −संगीत साधना का उद्गम स्रोत दिव्याग्नि में ही केन्द्रित माना गया है। संगीत दर्पण में इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार मिलता है :−
साधना से सिद्धि भाग 2 (आहार कल्प)।
साधना के दो पक्ष हैं–एक योग, दूसरा तप। योग में अनपढ़ अन्तरंग के चिन्तन प्रवाह को उत्कृष्टता की सुगढ़ता के साथ जोड़ना पड़ता है। इसी को समर्पण, शरणागति, अद्वैत, एकत्व आदि के नाम से पुकारते हैं। इसी स्थिति को उत्पन्न करने के लिये ध्यानयोग या भक्तियोग का आश्रय लिया जाता है।
साधना का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के अन्तराल का काया कल्प करना है। दृष्टिकोण का व्यक्तित्व से सीधा सम्बन्ध है। देवतुल्य, महामानवों और हेय पतित, नर पामरों की मनःस्थिति–परिस्थिति में जो जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है। व्यक्तित्व में पिछड़ापन और अभिनन्दनीय गौरव की आश्चर्यजनक भिन्नता देखी जाती है। उसका कारण लगता तो परिस्थितियों का विपर्यय है, पर वस्तुतः वैसा कुछ है नहीं।
साधना– ये सभी विशेषताएँ उपलब्ध रहती हैं। तात्पर्य यह कि अपनी घर−गृहस्थी को उत्कृष्ट बनाने की चाह हो तो इन विशिष्टताओं का उसमें समावेश अवश्य करना चाहिए।
साधना में यथा सम्भव एकान्त सेवन का उतना अवसर दिया गया है जिसे हजम किया जा सके। एक साधक के लिए एक कुटिया। अपने हाथों अपना भोजन पकाना कुटी में ही यंत्र साधनों से अपने आसन पर बैठे हुए ही मार्गदर्शकों का भावभरा परामर्श सुनना। तृतीय नेत्र जगाने की आज्ञाचक्र उन्मीलन से सम्बन्धित त्राटक के लिए अपने कमरे में ही उपयुक्त प्रकाश की सुविधा रहना। देखने की इष्टदेव का ही एकमात्र चित्र कमरे में रहना।
साधना की अहम्यता पोषण पा रही थी। शास्त्रकारों ने लोकेषणा को सबसे सूक्ष्म और प्रबलतम शत्रु माना है जिस पर विजय पाना प्रायः कठिन पड़ता है। यही तपस्वी सुधारक के साथ हुआ। सम्मान और श्रेय प्राप्त कर सुधारक का अहंकार बढ़ता ही गया।
साधना से व्यक्तित्व को वज्र अस्थि दधिचि जैसी पवित्रता और प्रखरता से सम्पन्न किया, युगान्तरीय चेतना के अन्तरिक्ष से धरातल पर अभिवर्षण की महाकाल इच्छा की भागीरथी प्रयत्नों के सहारे शक्य सम्भव बनाने की निमित्त युग साहित्य सृजा। हनुमान की तरह के निमित्त न केवल पर्वत उखाड़ने, समुद्र छलाँग ने जैसे दुस्साहसों को अपनाया किन्तु अकेले से वह साध−सधते न देखकर अनुचरों का एक विशाल सैन्य−दल मोर्चे पर ला खड़ा किया। भले ही वह समुदाय रीछ−वानर जैसे तथाकथित छोटे लोगों का ही क्यों न ही समझा गया हो। भारतीय देवसंस्कृति को सिकुड़ते, गलते और गरिमा खोते देखकर उनकी आंखें ही सजल नहीं हुई, भुजाएँ भी फड़की हैं। विशाल भारत की संरचना में उनने अर्जन की तरह महाभारत लड़ने का आदेश भी इच्छा, अनिच्छा से स्वीकार किया है।
साधना एक महीने का युगशिल्पी प्रशिक्षण, पाँच दिन के तीर्थसेवन सत्रों का उपक्रम और भी अधिक सुव्यवस्थित रूप से चलने जा रहा है। उसके सत्रों के साथ जुड़े हुए उद्देश्यों के अतिरिक्त बड़ा और विशेष लाभ यह है कि शांतिकुंज के वातावरण में अगले दिनों पूज्य गुरु देव की प्राणऊर्जा से जो प्रखरता आने वाली है, उसकी समीपता का अतिरिक्त लाभ उठाया जा सकेगा। जलती हुई भट्टी के निकट बैठते ही, बर्फ जमने की फैक्टरी में प्रवेश करते ही गर्मी एवं सर्दी की अनुभूति तत्काल की होती है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह–गाय एक घाट पर पानी पीते थे। इन तथ्यों के पीछे वहाँ के वातावरण की विशिष्टता का ही प्रमाण मिलता है।
साधना, का भी चिकित्सा एवं मानसोपचार की तरह ही सर्वोपयोगी मानकर उन्हें विधिवत् उपयोग में लाने की आवश्यकता स्वीकार की जायेगी।
साधना क्षेत्र की प्राण ऊर्जा कहा जा सकता है।
साधना सत्र (एक जुलाई से)−−(1) साधना से सिद्धि−भाग 1 (2) साधना से सिद्धि भाग 2 (आहार कल्प)।
साधनाएँ कराई जाती रही हैं। समय−समय पर पुरश्चरण एवं परिष्कृत रूप ‘कल्प साधना’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चान्द्रायण पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलते थे। तिथियों की घट बढ़ से सभी को असुविधा होती थी अब उसे तारीखों के हिसाब से पहली से तीस तक का किया गया है। अवधि महीने भर की ही पूर्ववत् रहेगी।
साधना संगम का नया क्रम बना भी दिया गया है। एक महीने की कल्प साधना एक महीने का युगशिल्पी प्रशिक्षण, पाँच दिन के तीर्थसेवन सत्रों का उपक्रम और भी अधिक सुव्यवस्थित रूप से चलने जा रहा है। उसके सत्रों के साथ जुड़े हुए उद्देश्यों के अतिरिक्त बड़ा और विशेष लाभ यह है कि शांतिकुंज के वातावरण में अगले दिनों पूज्य गुरु देव की प्राणऊर्जा से जो प्रखरता आने वाली है, उसकी समीपता का अतिरिक्त लाभ उठाया जा सकेगा। जलती हुई भट्टी के निकट बैठते ही, बर्फ जमने की फैक्टरी में प्रवेश करते ही गर्मी एवं सर्दी की अनुभूति तत्काल की होती है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह–गाय एक घाट पर पानी पीते थे।
साधना में अन्तराल के परिशोधन, परिष्कार की कथा सम्भव अधिकाधिक सुविधा उत्पन्न की गई है। बड़ी बात यह है कि उसमें न केवल आत्मबल के सम्वर्धन का, वरन् मनोबल और शरीर शोधन के त्रिविधि प्रयोजनों का भी समुचित समावेश किया गया है। आहार कल्प और जड़ी−बूटी कल्प से शरीर शोधन का प्रयोजन बहुत कुछ सध जाता है। आसन−प्राणायाम, पुरश्चरण, तप, व्रत, तितिक्षा−प्रायश्चित्त की साधनाएँ मनन क्षेत्र की अवाँछनीयता को हटाने की भूमिका निभाते हैं। लययोग, प्राणयोग से परब्रह्म के साथ एकात्म सधता है।
साधना और भी कठोर होती चली गयी। शरीर सूख गया व उस पर कूबड़ निकल आया।
साधना में भी विद्यमान है। सच तो यह है कि यह प्रकृति के अधिक निकट और अध्यात्म उपचारों से मुक्त होने के कारण अधिक निर्दोष एवं अधिक चिरस्थाई है।
साधना के निमित्त–आसन, प्राणायाम, चक्रवेधन नादयोग, लययोग, बिन्दुयोग प्राणायाम आदि की यथोचित साधनाएँ।
साधना का उद्गम स्रोत दिव्याग्नि में ही केन्द्रित माना गया है। संगीत दर्पण में इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार मिलता है :−
साधना के नाम से आत्म−शोधन–आत्मपरिष्कार की–साधनाएँ कराई जाती रही हैं। समय−समय पर पुरश्चरण एवं परिष्कृत रूप ‘कल्प साधना’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चान्द्रायण पूर्णिमा से पूर्णिमा तक चलते थे। तिथियों की घट बढ़ से सभी को असुविधा होती थी अब उसे तारीखों के हिसाब से पहली से तीस तक का किया गया है। अवधि महीने भर की ही पूर्ववत् रहेगी।
साधना से सिद्धि के तीन सोपान बताये हैं–’मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु’। साधु−सुधारक रूपी आरम्भिक दो सोपानों पर चढ़ चुके थे। उनके तप और त्याग से–निस्पृह जीवन चर्या से हर कोई प्रभावित था। लोगों की श्रद्धा एवं सम्मान के सुमन उन पर चढ़ रहे थे। उग्र साधन के ताप में इन्द्रियों की वासना विगलित हो चुकी थी।
साधना का समन्वय ब्रह्मविद्या कहलाता है। उसे अध्यात्म विज्ञान का भाव पक्ष कह सकते हैं। दूसरा क्रिया पक्ष है। क्रिया में हलचलें होती हैं और उसके लिए साधन जुटाने पड़ते हैं। यह यज्ञ प्रक्रिया में भी सम्पन्न किया जाता है।
साधना का प्रावधान रखा गया है।
साधना के प्रयुक्त अंग हैं। इसके अतिरिक्त आयुर्वेदिक पंच कर्म स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन, नस्य। पंचतत्व चिकित्सा के मिट्टी, पानी, हवा, अग्नि, आकाश आदि के विशेष प्रयोग। जब जिसके लिए जिस प्रकार उपयुक्त समझे जायेंगे, कराये जाते रहेंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1982-November
साधनाओं का प्रयोग किया जा सकता है और उनका चमत्कारी प्रतिफल देखा जा सकता है।
साधना के रूप में सम्पन्न होता है।
साधना कहा गया है। इस अंक में उसी का स्वरूप एवं प्रतिपादन है।
साधना का ऐसा उपक्रम अपनाया गया जिसमें पगडंडियों के लालच में अपनायी गयी भूल भुलैयों को छोड़ने और सर्वतोमुखी व्यक्ति यों को सहमत किया जा सके।
साधना के साधक अपनी वर्तमान परिस्थिति एवं योग्यता में भी क्या कुछ कर सकते हैं इस नवसृजन योजना का हर पक्ष कल्प साधना के साधकों को सिखाया जाता है। इस प्रयोजन के लिए वाणी को मुखर बनाने की आवश्यकता तो अनिवार्य रूप में पड़ती है। इसके लिए समुदाय में दिए जाने वाले भाषण, व्यक्तिगत परामर्श का सम्भाषण एवं भावनाओं को लहराने वाले संगीत की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से कौन, किसे, किस मात्रा में अपना सकता है, यह व्यक्तिगत अभिरुचि का विषय है, पर इन तीनों को ही सिखाने की समुचित व्यवस्था कल्प साधना प्रशिक्षण के अंतर्गत की गई है। इन कलाओं में अभ्यस्त व्यक्ति लोकप्रिय और सम्माननीय बनता है, उपयोगी सहयोग सम्पादित करना है।
साधना जिसमें दिन भर क्या किया जाना है, इस सुर दुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग किस प्रकार होता है इस पर चिन्तन किया जाता है। आत्म-विश्लेषण व निरीक्षण की इस साधना का प्रज्ञायोग का प्राण कहा जा सकता है। (3)तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है।
साधना के साधक अपने पापकर्मों का प्रकटीकरण करते हैं। उनमें से कुछ घटनाएँ विशिष्ट होने के कारण उन्हें विशेष परामर्श दिये जाते हैं। ऐसे अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी को एक ही सुझाव दिया जाता है कि वे सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के निमित्त जितना अधिक सम्भव हो उतना समयदान, साधनदान प्रस्तुत करें और प्रायश्चित का उत्तरार्ध प्रक्रिया भी पूर्ण करें।
साधना की कार्य पद्धति उतनी कठिन या जटिल नहीं है कि घर रह कर न की जा सकती हो। किन्तु कठिनाई एक ही है कि अभ्यस्त ढर्रा, आधा ध्यान अपने में ही उलझाये रहता है जबकि कल्प साधना या किसी भी साधना के लिए मन को आगे बढ़ाने वाले प्राणवान वातावरण की आवश्यकता पड़ती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बहुत समय से यह प्रयत्न चलता रहा है कि उच्चस्तरीय साधना के निमित्त उपयुक्त वातावरण वाला तीर्थ विनिर्मित किया जाय। ‘विनिर्मित’ शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि परम्परागत तीर्थों को निहित स्वार्थों की दुरभि संधियों ने इस बुरी तरह जकड़ लिया है कि वहाँ श्रद्धा संवर्धक प्रेरणा मिलना तो दूर-आवश्यक शिक्षण और प्राणवान सान्निध्य मिलना तो दूर, उलटे अश्रद्धा उत्पन्न करने वाला विक्षोभ ही हाथ लगता है। भीड़ भाड़ की घिचपिच और पर्यटकों जैसी बात चंचलता को देखते हुए वैसा अवसर ढूँढ़ निकालना कठिन है जहाँ साधना के लिए उपयुक्त सभी आवश्यक माध्यम एक साथ उपलब्ध हो सकें।
साधना के साधकों को सिखाया जाता है। इस प्रयोजन के लिए वाणी को मुखर बनाने की आवश्यकता तो अनिवार्य रूप में पड़ती है। इसके लिए समुदाय में दिए जाने वाले भाषण, व्यक्तिगत परामर्श का सम्भाषण एवं भावनाओं को लहराने वाले संगीत की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से कौन, किसे, किस मात्रा में अपना सकता है, यह व्यक्तिगत अभिरुचि का विषय है, पर इन तीनों को ही सिखाने की समुचित व्यवस्था कल्प साधना प्रशिक्षण के अंतर्गत की गई है। इन कलाओं में अभ्यस्त व्यक्ति लोकप्रिय और सम्माननीय बनता है, उपयोगी सहयोग सम्पादित करना है।
साधना में प्रयुक्त होने वाला आहार उपचार ऐसा है जिसमें मात्र निवारण-निराकरण नहीं वरन् परिवर्तन भी जुड़ा हुआ है।
साधना में जहाँ उपचार पद्धति का सही रूप में परिपालन आवश्यक होता है, वहाँ एक आवश्यकता उपयुक्त वातावरण की भी रहती है। इसकी व्यवस्था बने बिना गाड़ी रुकी ही रहती है।
साधना ये तीन पुस्तकें इस वर्ष के उत्तरार्ध में युगान्तर चेतना द्वारा प्रकाशित हुई हैं। साधना सम्बन्धी गूढ़ विषय पर बोधगम्य एवं सरस शैली में विरचित ब्रह्मवर्चस् की यह पुस्तक माला इस अंक के संदर्भ में सबके लिए मनन योग्य है।
साधना का प्रज्ञायोग का प्राण कहा जा सकता है। (3)तत्त्वबोध की सायंकालीन साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है। उपासना के प्रथम चरण में जहाँ कृत्यों के साथ जुड़े भावनात्मक संकल्पों की प्रधान भूमिका है वहाँ आत्म-बोध-तत्व-बोध की साधना में चिन्तन-मनन का प्राधान्य है।
साधना में इन नौ का अभ्यास इन 9 के अतिरिक्त है। क्रियायोग के यह तीन प्रयोग साधक के त्रिविधि शरीरों को परिष्कृत करने की उपयोगी भूमिका सम्पन्न करते हैं। शरीरों के हिसाब से इनका वर्गीकरण करना हो तो स्कूल शरीर के निमित्त शक्ति चालिनी मुद्रा, नाड़ी शोधन प्राणायाम और नादयोग की गणना की जायगी। सूक्ष्म शरीर के निमित्त प्राणाकर्षण प्राणायाम, शिथिलीकरण मुद्रा और बिन्दुयोग को महत्व दिया जाता है। कारण शरीर में खेचरी मुद्रा, सूर्यभेदन प्राणायाम और लययोग का अभ्यास किया जाता है।
साधना कहते हैं। छाया पुरुष जैसे अभ्यास इसी के अंतर्गत आते हैं। स्थूल शरीर के साथ लययोग, सूक्ष्म के साथ बिन्दुयोग और कारण शरीर के साथ नादयोग का सीधा सम्बन्ध है। इन साधनाओं के आधार पर इन तीनों चेतना क्षेत्रों को अधिक परिष्कृत, अधिक प्रखर एवं अधिक समर्थ बनाया जा सकता है। अन्न, जल, वायु की तरह इन तीन साधनाओं को भी समान उत्कर्ष की दृष्टि से सर्व सुगम किन्तु साथ ही असाधारण रूप से प्रभावी भी माना गया है।
साधना में आत्म-विकास के इन चारों ही खण्डों की पूर्ति के लिये उपयुक्त उपकरण, वातावरण और साधनाओं का अभ्यास कराये जाने की व्यवस्था की गई है।
साधना में समाविष्ट किया गया है। जप-ध्यान-उपवास के अतिरिक्त अनुष्ठानों में दशांश या शतांश आहुतियों का भी नियम है। कल्पकाल में हुए अनुष्ठान के अनुपात से शतांश नहीं दशांश आहुतियाँ भी इस एक महीने के नित्य हवन-क्रम के साथ सम्पन्न हो जाती है।
साधना, स्वाध्याय, चिन्तन, मनन में दूसरे के साथ रहने से किसी प्रकार का विक्षेप हो प्रातःकाल की नादयोग साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है। इसलिए ही साधकों को एक कमरा दिया जाता है। भले ही वह साइज में 10&10 का ही क्यों न हो।
साधना को आन्तरिक की, बालकला वर्ग की तो कहा जा सकता है पर है वह ऐसी जिसमें ब्रह्मविद्या के शाश्वत सिद्धान्तों को अक्षुण्ण रखते हुए, समय के परिवर्तन और बुद्धिवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का भी समुचित समावेश रखा गया है।
साधना के लिए बैठते हैं। तीन फुट दूरी पर कन्धे की सीध में ऊँचाई पर एक दीप जलाकर रखते हैं। दस सेकेण्ड तक उसकी लौ को खुली आँख से देखना। फिर एक मिनट बन्द रखता। फिर दस सेकेण्ड देखने, पचास सेकेण्ड बन्द रखने का अभ्यास अनुमान से ही करना पड़ता है।
साधना करने से व्यक्ति विशेष को तो लाभ मिल सकता है। पर यदि उस आलोक को व्यापक बनाना हो तो संगठित रूप से उस प्रक्रिया को अग्रगामी बनाना होगा। आरम्भ में संगठन छोटा रहे हर्ज नहीं। पर यदि वह उद्देश्यपूर्ण और सज्जनों का समुदाय हो तो उस बीजारोपण के एक दिन विशाल वृक्ष बनने की सम्भावना सुनिश्चित ही रहेगी।
साधना के दिनों में जिस स्तर का प्रशिक्षण दिया जाता है उसका आभास चारा भागों में विभक्त पाठ्य पद्धति से भली प्रकार मिल सकता है।
साधना-तपश्चर्या-योगाभ्यास-का कोई ऐसा प्रयोग जिसके सहारे प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों को जागृत करके रहस्यमयी शक्ति यों को आत्म-निर्माण तथा विश्व निर्माण के प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सके।
साधना ही व्यक्ति की सब कुछ बन जाते हैं। अपने आपे का होश हवास खो बैठने वाले मद्यप जिस प्रकार बेतुके आचरण करते हैं प्रायः वही स्थिति मानसिक क्षेत्र में ध्वामोहग्रस्तों की होती है। इसी झुठलाने-छलावे को माया कहा जाता है। माया के बन्धन अति निविड़ माने जाते हैं।
साधना को आज्ञाचक्र का जागरण एवं तृतीय नेत्र का उन्मीलन कहा जाता है। दोनों भावों के बीच मस्तक के भृकुटि भाग में सूक्ष्म स्तर का तृतीय नेत्र है। भगवान शंकर की, देवी दुर्गा की तीन आँखें विचित्र की जाती हैं। दो आँखें सामान्य-एक भृकुटि स्थान पर दिव्य। इसे ज्ञान चक्षु भी कहते हैं।
साधना किस के लिए किस क्षेत्र में कितनी उपयोगी, अनुपयोगी सिद्ध हुई। इस प्रकार यह एक मास की तीर्थसेवन अवधि यदि ठीक प्रकार निभ सके तो भूतकाल की तुलना में भविष्य को अत्यधिक सफल समुन्नत बनाने वाली सिद्ध होती है।
साधना का क्रम एक घण्टा चलता है। 5॥ बजे सभी माताजी के पास पहुँचते हैं। अखण्ड दीपक के दर्शन, औषधि कल्पपेय की एक प्याली, प्रज्ञापेय का एक कप-इतना प्रसाद ग्रहण करने के इस कृत्य में प्रायः आधा घण्टा लग जाता है। इसके उपरान्त छः से आठ तक का साधना क्रम चलता है। इसी बीच यज्ञ में सम्मिलित होने की अपनी पारी भी निपट जाती है।
साधना और अपने ही कमरे में मार्गदर्शक का नियमित प्रवचन-उद्बोधन सुनने का लाभ भी एकान्त में, एकाग्र होने पर ही मिलता है। इसलिए ही साधकों को एक कमरा दिया जाता है। भले ही वह साइज में 10&10 का ही क्यों न हो।
साधना में संलग्न रहे तो वे अपने में आश्चर्यजनक परिवर्तन का अनुभव करेंगे। काया का रूपान्तरण तो कठिन है। उसे दुर्बलता और रुग्णता से ही एक सीमा तक उबारा जा सकता है। परिवर्तन तो सदा अन्तराल का ही होता है। इसी आधार पर क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनने का अवसर मिलता है।
साधना अपने हाथ की बात है। अपने शरीर को जिस प्रकार मनमर्जी से चलाया जा सकता है उसी प्रकार मनःक्षेत्र की विचारणाओं मान्यताओं, आकांक्षाओं और आदतों के ऊपर भी यदि डडडड पड़ा जाय तो उन्हें भी कुम्हार की तरह अनगढ़ मिट्टी की देव-प्रतिमाओं जैसे खिलौनों में बदला जा सकता है।
साधनात्मक उपक्रम का आश्रय लेना पड़ता है। इसी प्रयोजन की सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए ‘कल्पसाधना’ का निर्धारण है। समय का निमन्त्रण है कि जहाँ भी युग मनीषा उभरे वहाँ उसे युग साधना की दिशा में अगला कदम उठाने का भी प्रकाश मिले। युग साधना को ही प्रकारान्तर से कल्प साधना कहा गया है। इस अंक में उसी का स्वरूप एवं प्रतिपादन है।
साधना नादयोग की है। यह सूक्ष्म कर्णेन्द्रियों द्वारा सम्पन्न की जाती है। खुले कान तो एक सीमा तक की समीपवर्ती प्रत्यक्ष ध्वनि हो सुन पाते हैं। किन्तु सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय में अवणातीत दिव्य ध्वनियाँ सुनने को भी क्षमता है। प्रकृति का मूल शब्द है।
साधना सत्र समाप्त होने के उपरान्त भी नियमित रूप से जारी रखना चाहिए। समय का अभाव रहे तो 11 माला के स्थान पर 3 या 5 माला का नियम भी संकल्पपूर्वक चलाया जा सकता है। संकल्प पूर्वक से तात्पर्य है उसकी नियमितता का निर्वाह। इसमें अनुशासन का समावेश रहे, इसलिए निभाया जाना चाहिए। व्यस्तता में साधना का समय कम किया जा सकता है।
साधना में आहार कल्प की तरह बूटी कल्प भी कराया जाता है। इसके लिए उसे एक महीने तक 50 ग्राम नित्य कल्क पेट में पहुँचाया जाता है। कल्क से तार्त्पय है-पतली चटनी। लगभग ठण्डाई से कुछ गाड़ी सीरप स्तर की। निर्धारित बूटी का कल्क प्रातःकाल खाली पेट लिया जाता है।
साधना के साधक एक मास की अवधि में यह निश्चित करें कि उन्हें भविष्य में आदर्शवादी जीवन जीना है। जो बीत गया सो गया पर जो शेष है उसका उपयोग इस प्रकार करना है जिससे आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण के दोनों ही प्रयोजन साथ-साथ सधते रहे। जीवन सम्पदा को यदि शरीर और आत्मा की साझेदारी माना जा सके तो दोनों पक्षों को उसके उपार्जन का समान लाभ मिलना चाहिए। अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व में एक आदर्शवादिता को-प्रज्ञा अभियान का ही एक सदस्य मान लिया जाय और जिस प्रकार अन्य कुटुम्बियों के लिए समय, धन लगाया जाता है उसी प्रकार इस महान प्रयोजन के लिए उतना ही करते रहा जाय तो इस व्रत निर्वाह से हर कल्प साधक निकट भविष्य में महामानवों की पंक्ति में खड़ा दृष्टिगोचर हो सकता है। यही सच्चे अर्थ में काया-कल्प है।
साधना का उपक्रम प्रस्तुत किया जाता है।
साधना के साधकों को प्रायश्चित रूप से अति पूर्ति करने और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए नितान्त आवश्यक पुण्य परमार्थ का संचय करने की अन्तःप्रेरणा उमंगें तो उसे दिशा विहीन होकर भटकाव में नहीं पड़ने देना चाहिए और सद्ज्ञान संवर्द्धन को प्रमुखता देनी चाहिए।
साधना निद्रा से पूर्व पन्द्रह मिनट तो चलना ही चाहिए। उसमें कल्पना को चिन्ह पूजा जैसी विडम्बना नहीं यथार्थता जैसी अनुभूति रहनी चाहिए।
साधना भी है।
साधना के सहारे ही वर्जित होता है। आवे में ही कच्ची मिट्टी के बर्तन पकते हैं। सदाशयता की उमंगों को भी परिपक्व होने के लिए अन्तराल को तपाने वाले साधनात्मक उपक्रम का आश्रय लेना पड़ता है। इसी प्रयोजन की सामयिक आवश्यकता पूरी करने के लिए ‘कल्पसाधना’ का निर्धारण है। समय का निमन्त्रण है कि जहाँ भी युग मनीषा उभरे वहाँ उसे युग साधना की दिशा में अगला कदम उठाने का भी प्रकाश मिले।
साधना का उपासनापरक पूर्वार्ध समाप्त हो जाता है। चिंतनपरक उत्तरार्ध दो चरणों में आत्म बोध एवं तत्व बोध की साधना के रूप में सम्पन्न होता है।
साधना की उच्चस्तरीय सफलता मिलने की फलश्रुति कही सुनी जाती है। इन दोनों का भी गायत्री तीर्थ में एक समन्वित देवालय बनाया गया है। यह दर्शनीय है। आदि उद्गम पर भागीरथ को और अन्त समापन पर परशुराम को प्रहरी माना जाता है। उनके प्रतीक भी इस देवात्मा हिमालय कक्ष में प्रतिष्ठित हैं।
साधना भी कहा जाता है। नादयोग को ‘अनाहत ध्वनि’ भी कहते हैं। लययोग को आत्मदेव की साधना कहते हैं। छाया पुरुष जैसे अभ्यास इसी के अंतर्गत आते हैं। स्थूल शरीर के साथ लययोग, सूक्ष्म के साथ बिन्दुयोग और कारण शरीर के साथ नादयोग का सीधा सम्बन्ध है।
साधना रात्रि के समय के लिए निर्धारित है इसमें भी आत्मबोध जितना ही 15 मिनट का समय लगता है। रात्रि को सोने से पूर्व शैया पर पड़े-पड़े जीवन के अन्त का स्मरण करें। मृत्यु को अनिवार्य अतिथि मानें। उसके उपरान्त ईश्वर के दरबार में पहुँचने और जीवन सम्पदा के सदुपयोग-दुरुपयोग के सम्बन्ध में लेखा-जोखा माँगे जाने की बात सोचें। बरते हुए प्रमाद की परिणति निकृष्ट योनियों में भटकने, यन्त्रणाएँ सहने और पतन पराभव के गर्त में गिरने की यथार्थता को समझें।
साधना के साधकों को चाहिए कि इतना समय निकालने, इतना कष्ट सहने, इतना खर्च करने का जहाँ साहस दिखाया है वहाँ इतना पुरुषार्थ और भी करें कि अपने मन को पकड़-जकड़ कर, समेट-दबोच कर इसके लिए मनाये कि इन दिनों किसी दिव्य लोक में निवास करने, दिव्य ढाँचे में ढलने, भविष्य को देवोपम बनाने के लिए जिस चिन्तन की आवश्यकता है उसे तत्परतापूर्वक अपनाये । मन उचटता हो तो उसके लिए छुट्टा घूमने के अभ्यस्त किसी वन्य पशु को प्रशिक्षित करने का कौशल अपनाया जाय। विचारों को भी विचारों से काटा जाय। लोहे से लोहा कटता है, विष को विष मारता है, काँटे से काँटा निकलता है। अनगढ़ एवं अनावश्यक विचारों के अभ्यस्त मनः संस्थान को यदि उच्चस्तरीय अनुशासन में ढालना है तो वैसा ही प्रयत्न करना होगा जैसा कि बछड़े को हल में जोतने के लिए करना होता है।
साधना में संलग्न हो चुके थे। पीछे द्रौपदी समेत पाँच पाण्डव भी चले। बद्रीनाथ के निकट ही वे जिस स्थान पर बसे उसका नाम ‘पाण्डु केश्वर’ पड़ा। भगवान ने उन्हें ‘पाण्डव गीता’ यहीं सुनाई थी। वह ज्ञान भी ‘योगवशिष्ठ’ के समतुल्य ही माना जाता है।
साधना क्रम को समेटकर इसी केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित करना चाहिए। महान के साथ अपने क्षुद्र को जोड़ने के लिए योगाभ्यास का विधान है। प्रज्ञा परिजनों के लिये सर्वसुलभ एवं सर्वोत्तम योगाभ्यास ‘प्रज्ञायोग‘ की साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठापूर्वक निभाया जाय।
साधना करते हुए, पाण्डवों ने स्वर्ग प्रस्थान किया था, यह सभी को विदित है। यह उद्देश्य वे लोग ‘इन्द्रप्रस्थ’ ‘हस्तिनापुर’ रहते हुए-राज-काज चलाते हुए नहीं कर सकते थे। वातावरण व्यक्ति का तीन चौथाई मन अपने साथ अनायास ही जकड़े रहता है। अभ्यस्त ढर्रे में स्थान के साथ-स्वजन सम्बन्धियों के साथ-जुड़े हुए सम्बन्ध इतने सघन होते हैं, जिनका उल्लंघन करते हुए पार जा सकना दुस्तर समझकर यही उपाय अपनाया जाता है कि उपयुक्त वातावरण की दृष्टि से पुराने सम्बन्धों से जकड़ा हुआ स्थान बदल दिया जाता है। पाण्डवों ने भी राम बान्धवों की तरह वही किया।
साधना काल में बताई जाती है।
साधना के साधक अपना बौद्धिक कायाकल्प कर सकें ऐसी प्रशिक्षण-प्रक्रिया का सारगर्भित समावेश कल्प-साधना के अंतर्गत विवेकशीलता जगाने के रूप में किया जाता है।
साधनारत व्यस्त गृहस्थों का नव निर्माण करते थे।
साधना में ऐसे तीन योगाभ्यासों का निर्माण किया गया है सभी साधकों को समान रूप से करने पड़ते हैं। इन्हें अनिवार्य साधनाओं में गिना गया है। इनमें एक बिन्दुयोग, दूसरा नादयोग और तीसरा लययोग है। बिन्दुयोग को त्राटक साधना भी कहा जाता है। नादयोग को ‘अनाहत ध्वनि’ भी कहते हैं।
साधना आवश्यक प्रतीत हुई। गुरु वशिष्ठ ने भी उसका समर्थन किया। बात आगे बढ़ी तो प्रथम प्रश्न यही उत्पन्न हुआ कि उसे किया कहाँ जाय? यों अयोध्या में साधनों की कमी नहीं थी, उसके लिए सभी सुविधाएँ जुट सकती थीं, पर मूल प्रश्न एक ही था कि अभीष्ट वातावरण वहाँ कहाँ से आये? जन्म भूमि और कर्मभूमि के साथ मनुष्य के अनेकानेक संस्कार जड़ होते हैं।
साधनाएँ तो सभी को सामान्य परिमार्जन करने की दृष्टि से आवश्यक माना गया है। वे हर स्थिति के साधक को साथ-साथ चलाने का प्रावधान है। नादयोग, बिन्दुयोग और लययोग का अभ्यास सभी कल्प साधकों की दिनचर्या में सम्मिलित है।
साधनाएँ आरम्भिक स्तर के साधक भी सरलतापूर्वक चला सकें इसके लिए यथा सम्भव अधिकाधिक सुविधा, सरलता उत्पन्न की गई है। व्यवस्था ऐसी है जिसमें उपरोक्त तीनों योगाभ्यास साधनाएँ बिना किसी कठिनाई के आरम्भ की जा सके । वे जैसे-जैसे विकसित परिपक्व होती है वैसे-वैसे अपने सत्परिणाम भी प्रत्यक्ष करती चली जाती है।
साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त को तात्पर्य इतना ही है कि यदि अचेतन, सुपर-चेतन इगो क्षेत्र में कोई कारगर परिवर्तन करने हो तो उसके लिए योग परक ध्यान-धारणाएँ और तपपरक संयम-नियमन की तितीक्षाएँ करनी चाहिए। सत्संग से व्यवहार और स्वाध्याय से चिंतन को सुधारा जा सकता है। यह व्यवहार में आने वाली ऊपरी परत है। इससे मन− मस्तिष्क की विचारणाएँ भटकाव से उबर कर सही दिशा में चलने के लिए प्रशिक्षित की जाती हैं। इतने पर भी अन्तराल का आस्थापरक क्षेत्र तो बच ही जाता है।
साधना के साथ जुड़ती है। ॐकार जप, सोऽहम् धारणा, मन्दिरों में शंख-घड़ियाल की ध्वनि का आधार भी यही है। नारद की वीणा, शंकर का डमरू, सरस्वती का सितार अलंकार रूप में इस नादयोग के रहस्यों का ही उद्घाटन करने वाले संकेत हैं।
साधना में तीर्थ-सेवन के तत्व और भी अच्छी तरह बढ़ी-चढ़ी मात्रा में मिल जाया करेंगे।
साधना को ही प्रकारान्तर से कल्प साधना कहा गया है। इस अंक में उसी का स्वरूप एवं प्रतिपादन है।
साधना के द्विविधि लाभ भली भाँति पा सकता है। विगत की भूलों का परिमार्जन− प्रायश्चित्त तथा भावी जीवन की रूप-रेखा का कल्प-प्रक्रिया में अनुपम निर्धारण किया गया है। कल्प साधना के लिये आये साधकों से सत्र के प्रारम्भिक दिन ही अपनी व्यक्ति गत कठिनाइयों, चिन्ताओं, समस्याओं एवं आकांक्षाओं अनुभव करते रहते हैं कि उन्हें परोक्ष रूप से सूत्र-संचालकों का नित नया सन्देश परामर्श मिल रहा है।
साधना का प्रथम सोपान हैं। अनुष्ठानों में उपवास का महत्व भी ब्रह्मचर्य के ही समान माना जाता है। उपवास काल में जो आहार लिया जाता है वह फलाहार न सही-निश्चित रूप से सात्विक स्तर का तो होता ही है। पर इतना भर कर पाना भी आज के औसत आदमी को कठिन जान पड़ता है।
साधना के दिनों अपने ही इर्द-गिर्द उपलब्ध है। उसे हस्तगत करने के लिए इन दिनों अपने भावभरे प्रयास प्राणपण से चलने चाहिए और इस सुयोग-संयोग का परिपूर्ण लाभ मिलना चाहिए।
साधना सच्चे अर्थों में तीर्थ सेवन है। वातावरण, साधना, शिक्षण-विधान अनुशासन, अध्यवसाय की दृष्टि से यहाँ निवास करने वाले साधक को यही अनुभव होता है कि उसे तीर्थ परम्परा का जीवन्त दर्शन हो रहा है। सूत्र-संचालकों ने समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए इस संदर्भ में प्राणपण से प्रयास किया है। अनेक स्थूल कमियों के रहते हुए भी कोई भी सूक्ष्मदर्शी यहाँ यह अनुभव कर सकता है कि व्यवस्था को उन्हीं पद चिह्नों पर चलाया जा रहा है जिन पर देव संस्कृति के महान तीर्थों की स्थापना प्रचण्ड ऊर्जा केन्द्रों के रूप में की गयी थी। ऐसी प्रचण्ड जिसमें तपकर अनगढ़ धातुओं को गलने ढलने और बहुमूल्य बनने का अवसर मिलता था तीर्थ प्रकारान्तर से महामानव ढालने के उत्पादन केन्द्र थे जिनमें गुरुकुल बालकों का आरण्यक वानप्रस्थों का-साधनारत व्यस्त गृहस्थों का नव निर्माण करते थे।
साधना वस्तुतः तीर्थ सेवन की पुरातन परम्परा का समयानुसार सुनियोजित संस्करण है।
साधना प्रशिक्षण के अंतर्गत की गई है। इन कलाओं में अभ्यस्त व्यक्ति लोकप्रिय और सम्माननीय बनता है, उपयोगी सहयोग सम्पादित करना है। इस लाभ से तो सभी परिचित है।
साधना को चरम पराक्रम कहा गया है। साथ ही उसकी परिणति को स्वर्ग एवं मुक्ति जैसी उच्चस्तरीय विभूतियों के रूप में दर्शाया गया। प्रतिभा, प्रखरता, कुशलता, सम्पन्नता, सफलता जैसी उपलब्धियाँ तो आत्मिक प्रगति की सहेलियाँ हमजोलियाँ है जो दो शरीर एक मन की तरह साथ-साथ ही चलती हैं।
साधनाओं में गिना गया है। इनमें एक बिन्दुयोग, दूसरा नादयोग और तीसरा लययोग है। बिन्दुयोग को त्राटक साधना भी कहा जाता है। नादयोग को ‘अनाहत ध्वनि’ भी कहते हैं। लययोग को आत्मदेव की साधना कहते हैं।
साधना का प्रमुख उद्देश्य है दृष्टिकोण को सुधारना एवं व्यक्ति त्व को उभारना। सच्चा अध्यात्म अपने प्रयोक्ता को उसी दिशा में अग्रसर करता है। इसके समस्त विधि-विधानों का लक्ष्य बिन्दु यही है। जहाँ ध्यान धारणा आस्था क्षेत्र में उच्चस्तरीय प्रतिष्ठापनाओं का पथ प्रशस्त करती है वहाँ तप साधना कुसंस्कारी आदतों के खर-पतवार को उखाड़ती और उसके स्थान पर महामानवों जैसे व्यक्तित्वों का नव-निर्माण कर दिखाती है। इस महान जागरण की फलित ही स्वर्ग, मुक्ति , सिद्धि के रूप में हस्तगत होती है।
साधनात्मक पुरुषार्थ से है। पुरुषार्थ इसलिए कि उसमें अपने आपे से ही जूझना पड़ता है। बाहरी क्षेत्र के बड़े-बड़े मोर्चे जीतने वाले भी भीतरी क्षेत्र का प्रसंग सामने आने पर हथियार डालते देखे गये है। इसलिए साधना को चरम पराक्रम कहा गया है। साथ ही उसकी परिणति को स्वर्ग एवं मुक्ति जैसी उच्चस्तरीय विभूतियों के रूप में दर्शाया गया।
साधनाएँ बिना किसी कठिनाई के आरम्भ की जा सके । वे जैसे-जैसे विकसित परिपक्व होती है वैसे-वैसे अपने सत्परिणाम भी प्रत्यक्ष करती चली जाती है।
साधना तो घर-गाँव में रहते हुए सामान्य क्रिया-कलापों के साथ-साथ भी चलती रहती है किंतु उच्चस्तरीय साधनाओं में प्रयास ही सब कुछ नहीं होता। इसके लिए वातावरण भी चाहिए। अस्तु, दोनों को सुसम्पन्न नागरिकों में उपलब्ध अपने प्रस्तुत साधन छोड़ने पड़े और अभीष्ट प्राप्ति के लिए उपयुक्त स्थान ‘बद्रीनाथ’ ढूँढ़ना पड़ा। वहाँ उन लोगों ने बारह वर्ष तक मात्र जंगली बेर खाकर तप किया। तदुपरान्त ही अपने समान स्तर का एकमात्र पुत्र ‘प्रद्य म्न’ उत्पन्न कर सकने में सफल हुए।
साधना के हर साधक को उस प्रक्रिया का अभ्यास कराया जाता है जो इन दिनों इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि महत्व की हैं। सर्वविदित है कि इन दिनों आस्था संकट से जूझना ही महाविनाश की विभीषिकाओं से विश्वमानव की प्राण रक्षा करने का एकमात्र उपाय है। सर्वविदित है कि यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि लोकमानस का परिष्कार यदि बन पड़े तो इतने ही साधनों से, इन्हीं परिस्थितियों में धरती पर स्वर्ग के अवतरण का दृश्य देखा जा सकता है मनुष्य के दृष्टिकोण में संकीर्ण स्वार्थपरता, वितृष्णा, उद्धत अहंमन्यता, अनाचारी उद्दण्डता घुस पड़ने से ही प्रस्तुत उपलब्धियाँ विकास में लगने के स्थान पर विनाश कृत्य में जुट पड़ी है। इस विपन्नता को उलटकर सीधा किया जा सके तो समझना चाहिए कि समस्त समस्याओं का हल निकल आया।
साधना-विधान कल्प-साधना के दिनों पूरा करने का सुयोग सहज सम्मुख है। उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण भी यही हो सकता है। उसका कार्यान्वयन बाद की बात है। यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रह सकती है।
साधना है। उसे भावनापूर्वक अपनाया और निष्ठापूर्वक निभाया जाय।
साधना का दूसरा चरण यही है। आश्रम में दिनचर्या निर्धारित है। घड़ी की सुई की तरह नियमितता बरतने, हर काम समय पर करने में जागरूकता बरतने के लिए प्रत्येक साधक को बाधित किया जाता है। आलस्य प्रमाद के लिए कहीं कोई गुँजाइश नहीं। सैनिकों की तरह चुस्ती, मुस्तैदी और फुर्ती अपनानी पड़ती है।
साधना के लिए मन को आगे बढ़ाने वाले प्राणवान वातावरण की आवश्यकता पड़ती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बहुत समय से यह प्रयत्न चलता रहा है कि उच्चस्तरीय साधना के निमित्त उपयुक्त वातावरण वाला तीर्थ विनिर्मित किया जाय। ‘विनिर्मित’ शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि परम्परागत तीर्थों को निहित स्वार्थों की दुरभि संधियों ने इस बुरी तरह जकड़ लिया है कि वहाँ श्रद्धा संवर्धक प्रेरणा मिलना तो दूर-आवश्यक शिक्षण और प्राणवान सान्निध्य मिलना तो दूर, उलटे अश्रद्धा उत्पन्न करने वाला विक्षोभ ही हाथ लगता है। भीड़ भाड़ की घिचपिच और पर्यटकों जैसी बात चंचलता को देखते हुए वैसा अवसर ढूँढ़ निकालना कठिन है जहाँ साधना के लिए उपयुक्त सभी आवश्यक माध्यम एक साथ उपलब्ध हो सकें। ऐसी दशा में उस लुप्त परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए नये सिरे से न्यूनतम एक तीर्थ की स्थापना तो अनिवार्य रूप में आवश्यक हो ही गयी।
साधना का सशक्त उपक्रम इसी वर्ष शान्तिकुञ्ज में आरम्भ किया गया है।
साधना से सिद्धि (खण्ड 1), आन्तरिक कायाकल्प का सुनिश्चित विधान, सन्धि बेला की विशिष्ट साधना ये तीन पुस्तकें इस वर्ष के उत्तरार्ध में युगान्तर चेतना द्वारा प्रकाशित हुई हैं। साधना सम्बन्धी गूढ़ विषय पर बोधगम्य एवं सरस शैली में विरचित ब्रह्मवर्चस् की यह पुस्तक माला इस अंक के संदर्भ में सबके लिए मनन योग्य है।
साधना के साधकों को सार-सूत्रों सहित, सरल प्रतिपादन एवं सुगम शैली में हस्तगत होती है।
साधना में उन सभी तत्वों का समावेश किया गया है अन्तराल के स्तर में प्राकृत उत्कृष्टता उभरती और व्यवहार में पवित्र प्रखरता का ऐसा समावेश करती है जिसको उपलब्ध करने के उपरान्त व्यक्ति धरती से स्वर्ग में जा पहुँचने जैसा अनुभव कर सके।
साधना में आवश्यक मानी गयी है। मालवीयजी का काया-कल्प प्रयोग हिन्दू विश्वविद्यालय में बनी उनकी कोठी पर नहीं हुआ था। इसके लिये उन्हें मथुरा जिले के एक छोटे गाँव में तपसी बाबा के तपोवन में फूँस की कुटी बनाकर रहना पड़ा था।
साधना में दान और तप के सभी तत्वों का समतुलित ढंग से समावेश है, साथ ही वह सर्वथा हानि रहित भी है। जैसा कि अन्यान्य योग साधनों में प्रयत्न भ्रष्ट होने पर कई प्रकार के विग्रह उठ खड़े होते हैं वैसी स्थिति न आने पाये इसलिए उसे नितान्त उपयोगी होने के साथ-साथ सर्वथा हानि रहित होने का भी पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है।
साधना वाले आत्म-विकास को भी ध्यान में रखना पड़ता है। यह कार्य वसुधैव कुटुम्बकम् के, आत्मवत् सर्वभूतेषु के आदर्शों को व्यावहारिक जीवन में उतारने से ही सम्भव होता है। इसका एकमात्र अभ्यास लोकमंगल की जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाने से ही सम्भव होता है। अस्तु, कल्प साधना के हर साधक को उस प्रक्रिया का अभ्यास कराया जाता है जो इन दिनों इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि महत्व की हैं। सर्वविदित है कि इन दिनों आस्था संकट से जूझना ही महाविनाश की विभीषिकाओं से विश्वमानव की प्राण रक्षा करने का एकमात्र उपाय है।
साधना भी है। ऋषिकल्प बनने के लिए इससे कम तापमान की ऊर्जा में काम भी तो नहीं चलता।
साधना के निमित्त उपयुक्त वातावरण वाला तीर्थ विनिर्मित किया जाय। ‘विनिर्मित’ शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि परम्परागत तीर्थों को निहित स्वार्थों की दुरभि संधियों ने इस बुरी तरह जकड़ लिया है कि वहाँ श्रद्धा संवर्धक प्रेरणा मिलना तो दूर-आवश्यक शिक्षण और प्राणवान सान्निध्य मिलना तो दूर, उलटे अश्रद्धा उत्पन्न करने वाला विक्षोभ ही हाथ लगता है। भीड़ भाड़ की घिचपिच और पर्यटकों जैसी बात चंचलता को देखते हुए वैसा अवसर ढूँढ़ निकालना कठिन है जहाँ साधना के लिए उपयुक्त सभी आवश्यक माध्यम एक साथ उपलब्ध हो सकें। ऐसी दशा में उस लुप्त परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए नये सिरे से न्यूनतम एक तीर्थ की स्थापना तो अनिवार्य रूप में आवश्यक हो ही गयी। इसके बिना प्रगति रथ एक कदम भी आगे बढ़ता प्रतीत नहीं हो रहा था।
साधना में अपनाई जाती है। इस प्रकार आहार साधना को एक प्रकार का उपवास समझा जा सकता है एवं इसके माध्यम से आत्म-परिष्कार की सम्भावना पर भली-भाँति विश्वास किया जा सकता है।
साधना में वह आहार सेवन कराया जाता है जिसमें उसकी सूक्ष्म और कारण शक्ति भी संयुक्त रूप में सम्मिश्रित हुई हो। इस प्रकार उसे एक प्रकार का-तप साधन जैसा डडडड उपवास स्तर का-परम सात्विक एवं दिव्य औषधि जैसी विशेषताओं से युक्त करने का प्रयत्न किया जाता है। आहार की उत्कृष्टता एवं निर्माण तथा सेवन में जुड़ी हुई भावना का समावेश होने से उसका लाभ और भी अनेक गुना बढ़ जाता है।
साधना का प्रथम चरण है आहार शुद्धि। सर्वविदित है कि अन्न से क्रमशः रस, रक्त , माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य बनते-बनते अन्ततः उसी का अन्तिम परिपाक मन के रूप में होता है। मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है। नाक, कान, आँख की तरह मस्तिष्क भी एक अवयव है, भले ही वह खोपड़ी की पिटारी में बन्द ही क्यों न रहता हो। उसी के निर्धारण दृष्टिकोण कहलाते हैं।
साधना, प्रायश्चित, एकान्त वास, मनन− चिन्तन, संयम तपश्चर्या आदि से किसकी शारीरिक, मानसिक स्थिति में क्या अन्तर पड़ा। पिछले साधना सत्रों में अधिकाधिक साधक सात्विक आहार की फलश्रुति अपने जीवन क्रम में प्रत्यक्ष देखकर गये। उनकी इन्द्रिय चेतना, स्फूर्ति और मस्तिष्कीय क्षमता में असाधारण वृद्धि हुई।
साधना सत्र चल रहे हैं। इस सम्बन्ध में सभी परिजनों को कुछ अधिक जानने की इच्छा उत्सुकता स्वाभाविक है। वस्तुतः यह प्राणवान जागृत आत्माओं के लिए कायाकल्प के समतुल्य ही सुखद सद्भावनाएँ प्रस्तुत कर सकने योग्य प्रक्रिया है। समय की एक गहरी आवश्यकता की पूर्ति में इससे असाधारण योगदान मिल रहा है। इस सम्बन्ध में अधिक जानना उनके लिए भी सामयिक जानकारी की दृष्टि से आवश्यक है जो उसमें सम्मिलित होने की स्थिति में नहीं हैं।
साधना ही एकमात्र आधार है। उसे तपश्चर्या और योग के आधार पर ही गलाया ढलाया जाता है। शरीर नरम है। मन उससे कठोर, अन्तःकरण को अतिकठोर माना गया है। उस पर जन्म-जन्मान्तरों की मान्यताएँ, इच्छाएँ तथा आदतों की, भूगर्भ में पाई जाने वाली चट्टानी परतों से भी कठोर सतह जमी होती हैं।
साधनाओं को भी समान उत्कर्ष की दृष्टि से सर्व सुगम किन्तु साथ ही असाधारण रूप से प्रभावी भी माना गया है।
साधना के लिए उपयुक्त सभी आवश्यक माध्यम एक साथ उपलब्ध हो सकें। ऐसी दशा में उस लुप्त परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए नये सिरे से न्यूनतम एक तीर्थ की स्थापना तो अनिवार्य रूप में आवश्यक हो ही गयी। इसके बिना प्रगति रथ एक कदम भी आगे बढ़ता प्रतीत नहीं हो रहा था।
साधना में भी घर छोड़कर तदनुरूप स्थान चयन करने की बात पर जोर दिया जाता है।
साधना के एक मास में कराए जाते हैं। हर एक को तीन नहीं। इनमें से एक ही उसकी स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए निर्धारित किया जाता है। उसे एक महीने तक नियत समय पर नियत विधि से करते रहना होता है।
साधना के दिनों में सम्भावित अनुदान माना जाना चाहिए।
साधना की अवधि में तीन दृश्य आँखों के सामने घूमते रहने चाहिए। इनमें एक है-भवसागर में डूबना, मगरमच्छों द्वारा निगलकर उदरस्थ किए जाने से पूर्व नौका पर अवस्थित महाप्रज्ञा द्वारा उबार लिया जाना। दूसरा है-हाथ में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी, गले में लौह जंजीर की जकड़न, बढ़ने और करने में असमर्थता, दिव्य लोक से चक्र सुदर्शन का उतरना और उन बन्धनों को काटकर भव-बन्धनों से मुक्त कर देना। तीसरा है-सघन अन्धकार को छोड़कर उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य प्रकाश केन्द्र तक पहुँचने वाली सीढ़ी पर एक− एक कदम उठाते हुए ऊपर उठना, आगे बढ़ना। क्रमशः लक्ष्य बिन्दु के समीप पहुँचते जाना।
साधना या किसी भी साधना के लिए मन को आगे बढ़ाने वाले प्राणवान वातावरण की आवश्यकता पड़ती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बहुत समय से यह प्रयत्न चलता रहा है कि उच्चस्तरीय साधना के निमित्त उपयुक्त वातावरण वाला तीर्थ विनिर्मित किया जाय। ‘विनिर्मित’ शब्द का प्रयोग यहाँ इसलिए किया जा रहा है कि परम्परागत तीर्थों को निहित स्वार्थों की दुरभि संधियों ने इस बुरी तरह जकड़ लिया है कि वहाँ श्रद्धा संवर्धक प्रेरणा मिलना तो दूर-आवश्यक शिक्षण और प्राणवान सान्निध्य मिलना तो दूर, उलटे अश्रद्धा उत्पन्न करने वाला विक्षोभ ही हाथ लगता है। भीड़ भाड़ की घिचपिच और पर्यटकों जैसी बात चंचलता को देखते हुए वैसा अवसर ढूँढ़ निकालना कठिन है जहाँ साधना के लिए उपयुक्त सभी आवश्यक माध्यम एक साथ उपलब्ध हो सकें। ऐसी दशा में उस लुप्त परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए नये सिरे से न्यूनतम एक तीर्थ की स्थापना तो अनिवार्य रूप में आवश्यक हो ही गयी।
साधना में तीसरा अनिवार्य अभ्यास लययोग का है। इसमें शरीराभ्यास की आत्मसत्ता के साथ समर्पित विसर्जित करना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य अपने आपको शरीर भर मानता है और उसी की इच्छा, आवश्यकता पूरी करने में जुटा रहता है। आत्मा की उसके स्वरूप, लक्ष्य एवं उत्तरदायित्व को तो एक प्रकार से विस्मृत ही किए रहता है। यह वह भटकाव है जिसे मायापाश, भव-बन्धन आदि नामों से पुकारते हैं।
साधना के दिनों ही यह दोनों प्रकरण पूरे हो चुके होते हैं। उत्तरार्ध में उस क्षति को पूरा करना चाहता है जो अनीति आचरण के द्वारा अवांछनीय परम्पराओं के प्रचलन के रूप में फैलायी गई होती हैं। पाप-कर्मों में कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें शोषण-अत्याचार तो नहीं कह सकते, पर उनके कारण उपयोगी मर्यादाओं का उल्लंघन एवं अवांछनीयता का छूत रोगों की तरह विस्तार होता है। एक से दूसरे तक दुष्प्रभाव पहुँचता है और प्रकारान्तर से समूचे समाज को दुःखद दुष्प्रवृत्तियों के गर्त में धकेलता है। उदाहरण के लिए व्यभिचार और रिश्वत दो ऐसे पाप हैं, जिनका सहयोगपूर्वक ही आदान-प्रदान होता है।
साधना का साहस सँजोना ही पड़ता है। प्राचीनकाल में भी यही क्रम चलता रहा है और अब भी उसी मार्ग पर धीमे या तेजी से चलने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
साधना में देवत्व के साथ सघन घनिष्ठता स्थापित करने वाली उपासना-मान्यताओं में-आदतों में उत्साहवर्धक परिवर्तन करने वाली जीवन साधना-एवं लोक व्यवहार को आनन्द उल्लास से सराबोर कर देने वाली आराधना का विविध समन्वय है। इसे अन्तःकरण, व्यक्ति त्व और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश करने वाली सुनियोजित प्रक्रिया कहा जा सकता है। मान्यताओं, आकांक्षाओं, विचारणाओं और आदतों को बदलने की कल्प प्रक्रिया उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जैसी कि बुढ़ापे को जवानी में बदलने वाले काया-कल्प के बारे में लोक-मान्यता प्रचलित है। न तो बुढ़ापा अभिशाप है और न जवानी वरदान। दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही है।
साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।
साधना प्रयोगों द्वारा उसे हृदयंगम भी करना पड़ता है। इससे कम में उन विभूतियों को हस्तगत करने का और कोई मार्ग नहीं। प्रज्ञा को प्रखर परिष्कृत करने के लिए स्वाध्याय के योग्य सत्साहित्य पढ़ना या सुनना पड़ता है। मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा आदि का स्वरूप एवं प्रयोग भी तो इसके बिना बन नहीं पड़ता। इसलिए गुरु ज्ञान द्वारा उच्चस्तर की प्रेरणाएँ उपलब्ध करनी होती हैं।
साधना को एक प्रकार का उपवास समझा जा सकता है एवं इसके माध्यम से आत्म-परिष्कार की सम्भावना पर भली-भाँति विश्वास किया जा सकता है।
साधना सम्बन्धी गूढ़ विषय पर बोधगम्य एवं सरस शैली में विरचित ब्रह्मवर्चस् की यह पुस्तक माला इस अंक के संदर्भ में सबके लिए मनन योग्य है।
साधना में उपरोक्त तीनों साधनों को न केवल अनिवार्य माना गया है वरन् सरल भी बनाया गया है। दीपक और सूर्य के स्थान पर नीलाभ विद्युत दीप साधकों के हर कमरे में लगाए गए हैं। नादयोग का आरम्भिक अभ्यास करने के लिए टेप रिकार्डर के माध्यम से उपयोगी स्वर लहरियाँ सुनाई जाती हैं ताकि सूक्ष्म नाद को अधिक स्पष्ट होने का मार्ग खुले। उपयुक्त साइज का दर्पण हर कमरे में पहले से ही रखा मिलता है। तीनों साधनाएँ आरम्भिक स्तर के साधक भी सरलतापूर्वक चला सकें इसके लिए यथा सम्भव अधिकाधिक सुविधा, सरलता उत्पन्न की गई है।
साधना क्रम चलता है। इसी बीच यज्ञ में सम्मिलित होने की अपनी पारी भी निपट जाती है। इस प्रकार आठ बज जाते हैं।
साधना’ है। ‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त को तात्पर्य इतना ही है कि यदि अचेतन, सुपर-चेतन इगो क्षेत्र में कोई कारगर परिवर्तन करने हो तो उसके लिए योग परक ध्यान-धारणाएँ और तपपरक संयम-नियमन की तितीक्षाएँ करनी चाहिए। सत्संग से व्यवहार और स्वाध्याय से चिंतन को सुधारा जा सकता है। यह व्यवहार में आने वाली ऊपरी परत है। इससे मन− मस्तिष्क की विचारणाएँ भटकाव से उबर कर सही दिशा में चलने के लिए प्रशिक्षित की जाती हैं।
साधना की प्रक्रिया का निर्धारण आज की मनःस्थिति और परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए किया गया है। वह न तो इतना कठिन है। जिसे संकल्पवान् व्यक्ति भी पूरा न कर सके और न ही वह इतना सरल है कि विलासिता और अस्वच्छता के अनगढ़ ढर्रे को यथावत् बनाये रह कर मात्र कुछ पूजा उपचार करने भर से बन पड़े। पूजा, उपचारों साधना कृत्यों का महत्व तभी है जब वे श्रद्धा, विश्वास के साथ जुड़ें और संकल्पित व्रतशीलता बन कर सैन्य अनुशासन की तरह निभायें । कल्प साधना में दान और तप के सभी तत्वों का समतुलित ढंग से समावेश है, साथ ही वह सर्वथा हानि रहित भी है।
साधना में भरसक प्रयत्न किया जाता है और अनगढ़ आदतों को सुसंस्कारिता के साँचे में ढाल सकने वाले बौद्धिक प्रशिक्षण एवं व्यावहारिक अनुशासन के शिकंजे में कसा जाता है। इस प्रकार का उभयपक्षीय दबाव पड़ने से सुनियोजित जीवन जी सकने कौशल उभरता है जो इससे पूर्व उपयुक्त वातावरण न मिलने के अभाव में मात्र कथन श्रवण और श्रवण की सीमा में ही अवरुद्ध होकर रह जाता था।
साधना में समर्थ ज्ञान विस्तार को मूर्धन्य मानकर उन उपेक्षित क्षेत्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। किसी की जीवन दिशा को सामान्य से उछालकर असामान्य बना देना कितनी महान सेवा साधना है। इसको वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अंजामिल, विल्व मंगल, ध्रुव, प्रहलाद आदि से पूछनी चाहिए। ऐसी साक्षी पार्वती, अरुन्धती, मैत्रेयी, सावित्री, संघमित्रा, मीरा से लेकर अम्बपाली जैसी महिलाओं में भी मिल सकती है। इन सबको नारद, बुद्ध आदि के द्वारा मिले प्रेरणात्मक सद्ज्ञान के प्रति कृतज्ञ पाया जाएगा ।
साधना की प्रक्रिया में जहाँ संयम साधने विवेक अपनाने की शिक्षा दी जाती है वहाँ श्रद्धा उभारने वाली साधनाओं का भी समुचित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश कल्प साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।
साधना साधकों के लिए न तो आवश्यक है और न उपयोगी। उनमें से जो प्रमुख प्रभावोत्पादक, अधिक सरल एवं अधिक उपयोगी परिणाम उत्पन्न करने वाली हैं मात्र ऐसी ही तीन को लिया गया है। प्राणायामों की तरह मुद्राओं में भी तीनों का प्रयोग नहीं करना पड़ता है वरन् स्थिति के अनुरूप जो सरल हो उन्हीं को उस अवधि में कार्यान्वित कराने के लिए निश्चित किया जाता है।
साधना भी ऐसी ही कृषि है जिसमें उपज के लिये किसान जैसी कलाकारिता से कम में काम नहीं चलता।
साधना सत्रों के साधकों के लिए भाप से भोजन पकाने की एक सामूहिक प्रक्रिया विकसित की गयी है। भाप बनाने वाले दो बाँयलर लगाये जाते हैं। उनके साथ दो बड़े स्टीम चैम्बर हैं। चैम्बरों में अमृताशन पकाने के छोटे-छोटे भगोने रखने के लिए सो खाने बने हैं। प्रत्येक साधक को स्टैनलैस स्टील की भगौनी, ढक्कन, थाली, गिलास आदि सभी सामान आश्रम की ओर से मिलता है।
साधना की दिशा में अगला कदम उठाने का भी प्रकाश मिले। युग साधना को ही प्रकारान्तर से कल्प साधना कहा गया है। इस अंक में उसी का स्वरूप एवं प्रतिपादन है।
साधना सत्रों में अधिकाधिक साधक सात्विक आहार की फलश्रुति अपने जीवन क्रम में प्रत्यक्ष देखकर गये। उनकी इन्द्रिय चेतना, स्फूर्ति और मस्तिष्कीय क्षमता में असाधारण वृद्धि हुई।
साधनाओं को इन पाँच देवताओं की साधना भी कह सकते हैं। पाँच कोशों को पाँच प्रकार के रत्नों का, पंच रत्नों का भण्डार माना गया है। विभूतियाँ पाँच ही हैं। इन्हीं ऋद्धि-सिद्धियों का समावेश समझा जा सकता है। (1)संयम, (2)साहस, (3)दिव्य दृष्टि, (4)स्वर्ग, बन्धन-मुक्ति —इन पाँचों के अंतर्गत ही प्रत्यक्ष और परोक्ष जीवन की समस्त सम्पदाओं-सफलताओं का समावेश हो जाता है।
साधना जिसमें दिन भर का लेखा-जोखा लिया जाता है तथा पूरे दिन को एक पूरा जीवन मानकर मृत्यु की गोद में जाने का चिन्तन करते हुए प्राप्त के पर्यवेक्षण की एक रिहर्सल की जाती है। भावी निर्धारण व आने वाले डडडडकी अपनी दिनचर्या की भूमिका बनाते हुए साधक निद्रा की गोद में चले जाते हैं। इन लोगों का समन्वय ही ‘प्रज्ञायोग‘ है। उपासना के प्रथम चरण में जहाँ कृत्यों के साथ जुड़े भावनात्मक संकल्पों की प्रधान भूमिका है वहाँ आत्म-बोध-तत्व-बोध की साधना में चिन्तन-मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है।
साधना और मध्याह्नोत्तर 1 से 5 बजे तक चार घण्टे प्रशिक्षण का क्रम है। प्रशिक्षण में लोक-व्यवहार में शालीनता एवं कुशलता के समावेश की ऐसी शिक्षा आवश्यक समझी गई है जिससे व्यक्ति अपने गुण, कर्म, स्वभाव को पवित्र एवं प्रखर बना सके। सज्जनता की जितनी आवश्यकता है उतनी ही जागरूकता, सतर्कता की भी। भलो के साथ सहयोग की तरह अवांछनीय से आत्मरक्षा तथा कुचक्र आक्रमण को निष्फल बनाने की रणनीति को समझना, बरतना भी उतना ही आवश्यक है। ऐसी जीवन साधना सम्बन्धी रीति-नीति की एक कक्षा प्रतिदिन होती है और समझाया जाता है कि परिवार का पाठशाला, प्रयोगशाला बनाकर दुलार और सुधार का उभयपक्षीय अभ्यास किस प्रकार किया जाय?
साधना, आराधना के तीनों पक्ष इस चार घण्टे प्रतिदिन चलने वाली कक्षाओं में मात्र एक महीने सम्मिलित रहकर साधक अनुभव करता है कि उसने इतनी छोटी अवधि में जितनी उपयोगी जितनी सुनियोजित शिक्षा प्राप्त की कदाचित उतनी वह जीवन भर में उपलब्ध नहीं कर सका होगा। उच्चस्तरीय एवं सामयिक व्यवहार दर्शन की ऐसी समन्वित दिशाधारा अभी तक कहीं अन्यत्र नहीं देखी गई जैसी कि कल्प साधना के साधकों को सार-सूत्रों सहित, सरल प्रतिपादन एवं सुगम शैली में हस्तगत होती है।
साधना क्रमों में बदलती परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन निर्धारण भी होते रहते हैं। यह जाँच आखिर, मध्य और अंत में तीन बार होने से यह पता चल जाता है कि कल्प साधना किस के लिए किस क्षेत्र में कितनी उपयोगी, अनुपयोगी सिद्ध हुई। इस प्रकार यह एक मास की तीर्थसेवन अवधि यदि ठीक प्रकार निभ सके तो भूतकाल की तुलना में भविष्य को अत्यधिक सफल समुन्नत बनाने वाली सिद्ध होती है।
साधना में जहाँ पंच ज्ञानपक्षों का उपरोक्त निर्धारण है वहीं पंचधा क्रिया योगों का भी स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का समर्थ तन्त्र खड़ा करके संचित कषाय-कल्मषों का निष्कासन एवं उच्चस्तरीय आस्थाओं का प्रतिष्ठापन किया जाता है। इस प्रकार इस आरम्भिक सोपान को भी निर्धारण की दृष्टि से पूर्णता युक्त कहा जा सकता है।
साधना का महत्व माहात्म्य समझा-समझाया नहीं गया इसे मनुष्य का परले सिरे का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। विश्राम, अपव्यय, आलस्य और कुकल्पनाओं में उलझे रहने से किस प्रकार विरत हुआ जा सकता है और बर्बादी को रोकने भर से किस प्रकार सुसम्पन्न बना जा सकता है इसका न बोध है न अनुभव। इस कमी को पूरा करने के लिए कल्पसाधना में भरसक प्रयत्न किया जाता है और अनगढ़ आदतों को सुसंस्कारिता के साँचे में ढाल सकने वाले बौद्धिक प्रशिक्षण एवं व्यावहारिक अनुशासन के शिकंजे में कसा जाता है। इस प्रकार का उभयपक्षीय दबाव पड़ने से सुनियोजित जीवन जी सकने कौशल उभरता है जो इससे पूर्व उपयुक्त वातावरण न मिलने के अभाव में मात्र कथन श्रवण और श्रवण की सीमा में ही अवरुद्ध होकर रह जाता था।
साधना के दिनों की महानतम उपलब्धि। यदि इस प्रयत्न के फलस्वरूप उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण बन पड़ा तो उसका श्रेय सुअवसर सहयोग को नहीं, साधक की अपनी दूरदर्शी विवेकशीलता एवं संकल्पवान साहसिकता को ही मिलेगा।
साधना उपक्रम हर कल्प साधक को संक्षेप में ही सही जानना अनिवार्य है।
साधना परा प्रकृति और कायगत तत्व प्रपंच के साथ संगति बिठाती है और अदृश्य क्षेत्र के साथ आदान-प्रदान के नये द्वार खोलती है।
साधना से अपना आत्मबल बढ़ाए और उपलब्धियों को अभावग्रस्तों की प्यास बुझाने के लिए उन्हें सुलभ करायें। आत्मबल के अभाव में साहस नहीं उभरता। साहस के बिना परमार्थ कैसा? परमार्थ में प्रयुक्त न होने पर ज्ञान, वैभव, वर्चस्व आदि की सार्थकता कहाँ? अस्तु, जिस अन्तः प्रेरणा से मनीषा उभरती है देखा यह गया है कि उसी का दूसरा अनुदान तपस्वी जीवनचर्या के रूप में भी मिलता है।
साधना से कम स्तर के कारगर नहीं होते। पत्थर की कठोर चट्टानें काटने में हीरे की नोंक वाला वरमा ही काम आता है। पहाड़ उड़ाने हों तो डायनामाइट की सुरंगों से कम में काम नहीं चलता किले को विस्मार करने में तोप के गोले ही कारगर होते हैं। टीलों को समतल करने में बुलडोजरों का प्रयोग करना पड़ता है। हल्के-फुलके उपकरण इन बड़े प्रयोजनों के लिए आवश्यक बड़ी शक्ति के अभाव में कोई कहने लायक परिणति उत्पन्न नहीं कर पाते।
साधना को ‘कालजयी’ कहा जाता है। उस आधार पर हम इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाले सर्वविदित प्रचलन से छलाँग लगाकर दिव्य ध्वनियों के माध्यम से अपनी ज्ञान सम्पदा को न केवल अधिक प्रखर वरन् उच्चस्तरीय भी बना सकते हैं। ऋषियों को दृष्टा, त्रिकालदर्शी, सर्वज्ञ आदि की सिद्धियाँ इसी आधार पर उपलब्ध होती थी। यह चरम परिणति की चर्चा हुई। सामान्य स्तर पर भी नादयोग की आरम्भिक साधना परा प्रकृति और कायगत तत्व प्रपंच के साथ संगति बिठाती है और अदृश्य क्षेत्र के साथ आदान-प्रदान के नये द्वार खोलती है।
साधना के ये प्राथमिक उपचार अवलम्बन हैं जिनके सहारे साधक की मनोभूमि में असाधारण परिवर्तन आने की सम्भावना व्यक्त की गयी है।
साधना का परिणाम सिद्धि है। शरीर-मन-अन्तःकरण में चक्रों-ग्रन्थियों भेद-उपत्यिकाओं के रूप में दिव्य विलक्षण क्षमताएँ विद्यमान हैं, जिन्हें जगाया जा सके तो व्यक्ति अतीन्द्रिय सामर्थ्य सम्पन्न देवमानव-महामानव बन सकता है। यदि जप में मात्र क्रिया ही नहीं, ईश्वर को अपने अन्तराल में घुल जाने के लिए आग्रहपूर्वक आमन्त्रित करने को प्रधानता दी जाने लगे तो जप सार्थक हो जाता है।
साधनाएँ हैं। स्थूल को मुद्राओं से, सूक्ष्म को प्राणायाम से और कारण को योगत्रयी से परिमार्जित किया जाता है। मुद्राओं में तीनों प्रधान है-शक्ति चालिनी मुद्रा, (2) शिथिलीकरण मुद्रा, (3) खेचरी मुद्रा। प्राणायामों में तीन को प्रमुखता दी गई है—(1) नाड़ी शोधन प्राणायाम, (2) प्राणाकर्षण प्राणायाम, (3) सूर्यभेदन प्राणायाम। योगाभ्यासों में तीन प्रमुख हैं—(1) नादयोग, (2) बिन्दुयोग, (3) लययोग।
साधना ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक बताए गए हैं। उन सबका सार-संक्षेप इतना ही है कि मस्तिष्क, हृदय और प्रजनन तन्त्र में वरिष्ठता उत्पन्न करने के लिए उपरोक्त तीन मुद्राओं की साधनाओं का प्रयोग किया जा सकता है और उनका चमत्कारी प्रतिफल देखा जा सकता है।
साधना के साधकों को प्राणवान बनाने के उद्देश्य से ऐसे निर्धारण चुने गए हैं जो सर्वसुलभ हैं। जिनके प्रयोग में लाभ तो बहुत है किन्तु कोई भूल रहने पर भी हानि होने की तनिक भी आशंका नहीं है।
साधना एकाकी भी हो सकती है और टेप रिकार्डर की सहायता से सामूहिक भी।
साधना के लिए सर्वप्रथम उपयुक्त वातावरण देखना पड़ता है। कुछ रोगों का इलाज घर बैठे भी हो सकता है, पर कुछ ऐसे हैं, जिसके लिए अस्पताल में भर्ती होने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। बड़े-बड़ों को विवशता में यही करना पड़ता है। क्योंकि डाक्टर, नर्स, परीक्षा चिकित्सा तथा शल्य-क्रिया के साधन उपकरण किसी के निजी मकान में एकत्रित नहीं किये जा सकते। हर समय, हर सुविधा उपलब्ध कराने वाले, उपयुक्त जलवायु में बने अस्पताल ही गम्भीर चिकित्सा के लिए उपयुक्त पड़ते हैं।
साधना की जाती है। ध्यान मुद्रा में शाँत चित्त से बैठकर जिह्वा भाग को तालु मूर्धा से लगाया जाता है। सहलाने जैसे मन्द-मन्द स्पन्दन किये जाते हैं। इस उत्तेजना से सहस्रदल कमल की प्रसुप्त स्थिति जागृति में बदलती है। बन्द छिद्र खुलते हैं और आत्मिक अनुदान जैसा रसास्वादन जिह्वा भाग के माध्यम से अन्तःचेतना को अनुभव होता है।
साधना के सहारे बिना न सुसंस्कारित स्वभाव का अंग बनता है और न व्यक्ति त्व का उच्चस्तरीय विकास सम्भव होता है।
साधना सत्र में आत्मबोध और तत्त्वबोध के दो अभ्यास सिखाये जाते हैं आत्मबोध प्रातःकालीन अभ्यास है। प्रातःकाल बिस्तर से सोकर जागते ही बिस्तर पर ही पूर्वाभिमुख, पालथी मार कर ध्यान मुद्रा में बैठें। तीन बार लम्बे-लम्बे श्वास लें और धीरे-धीरे साँस बाहर निकाल दें। साँस इतनी गहरी लें कि वह नाभिचक्र तक भर जाये। तीन बार यह क्रिया करने के उपरान्त अँगड़ाई लें और पुनः ध्यान मुद्रा में चले जायें अपने इष्ट को सम्मुख हुआ अनुभव करें यह नया जन्म हुआ है।
साधना कहीं अधिक सस्ती पड़ेगी। उतावले लोग विषाक्त उत्तेजनाएँ चिकित्सा के नाम पर अंग-अवयवों में भरते और जादुई लाभ लेने के लिए बालकों की तरह मचलते रहते हैं। इस विडम्बना में वे पाते कम खोते अधिक है। रंग-बिरंगे चिकित्सकों के चित्र-विचित्र उपचार करते रहने पर भी आमतौर से देखा गया है कि “मर्ज बढ़ता ही गया-ज्यों-ज्यों दवा की” वाली लोकोक्ति ही चरितार्थ होती रहती है। इस कुचक्र से छूटने का एक ही उपाय है प्रकृति की ओर वापसी।
साधना’ जैसे महान प्रयोजन के लिए इससे हल्के दर्जे का वातावरण काम भी नहीं दे सकता था। इस लिये पिछले बारह वर्ष तद्नुकूल स्थापना खड़ी कर देने के उपरान्त ही प्रखरता सम्पादन की कल्प साधना का सशक्त उपक्रम इसी वर्ष शान्तिकुञ्ज में आरम्भ किया गया है।
साधना सत्रों में इसी आन्तरिक परिवर्तन की विधि-व्यवस्था बनाई गयी है। एक माह की छोटी अवधि इतने महान प्रयोजन के लिये हैं तो नगण्य और उपहासास्पद। फिर भी लोगों की व्यस्तता और उतावली को देखते हुए उतना ही छोटा कार्यक्रम बनाया गया है जिसके आरम्भिक अनुभव मिल सके और भविष्य में उस मार्ग पर चलते रहने का संकल्प भरा साहस उभर सके। बिगाड़ने में कम और बनाने में अधिक समय लगता है। इस दृष्टि से जितने समय में जीवन का स्वरूप बिगाड़ा गया है, बनाने में उससे अधिक समय लगना चाहिए।
साधना भी कह सकते हैं। अन्तमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश की पंचमुखी उच्चस्तरीय साधना भी इसी को कह सकते हैं। इनके प्रतिफलों की उपमा पाँच प्रमुख देवताओं के पाँच प्रमुख वरदानों से दी गई है। (1)ब्रह्मा, (2)विष्णु, (3)महेश, (4)गणेश, (5)दुर्गा। उपरोक्त पाँच साधनाओं को इन पाँच देवताओं की साधना भी कह सकते हैं।
साधना में प्रथम पाठ आहार बिहार में प्रकृति अनुशासन का समावेश करने और खाद्य पदार्थों को कम से कम भूनना-जलाने यथा सम्भव उनके प्राकृतिक रूप में ही उपयोग करने के रूप में अभ्यास कराया जाता है। अच्छा होता साधक फलाहार पर न सही शाकाहार पर रह लेते। पर दुर्बल संकल्प वालों के लिए ढर्रे से जूझते हुए कंपकंपी छूटते देखकर काम चलाऊ निर्धारण यही किया गया है कि कम से कम अमृताशन का व्रत तो निभाया ही जाय। यह एक महीने की प्रताड़ना नहीं है वरन् भविष्य में आहार सम्बन्धी अपनाने के लिए कराया गया प्रारम्भिक अभ्यास है। साधकों से आज्ञा की जाती है कि वे इसे बन्दी मूक की विवशता या सामयिक प्रताड़ना न समझें, वरन् भविष्य में आहार सम्बन्धी मर्यादा पालन का अभ्यास मानें और यदि वस्तुतः स्वास्थ्य का महत्व समझा गया हो तो आहार-विहार का अनुशासन शेष जीवन में नियमित रूप से निभायें।
साधनाओं का अभ्यास कराये जाने की व्यवस्था की गई है।
साधना का समय कम किया जा सकता है। स्नान आदि न बन पड़े तो जिस भी स्थिति में रहना पड़े उस स्थिति में मानसिक रूप से भी उसे किया जा सकता है। प्रधानता अनुशासन की है। अपना संकल्प अखण्ड बना रहे यही प्रयास हो, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो।
साधना के साधक यदि श्रद्धा, प्रज्ञा एवं निष्ठा का समुचित समावेश करते हुए इनकी साधना में संलग्न रहे तो वे अपने में आश्चर्यजनक परिवर्तन का अनुभव करेंगे। काया का रूपान्तरण तो कठिन है। उसे दुर्बलता और रुग्णता से ही एक सीमा तक उबारा जा सकता है। परिवर्तन तो सदा अन्तराल का ही होता है। इसी आधार पर क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनने का अवसर मिलता है।
साधना के साधकों को अपना चरम पुरुषार्थ इस केन्द्र बिन्दु पर नियोजित करना चाहिए। अपने प्रभाव क्षेत्र में इन्हें अधिकाधिक संख्या में बनाने-उन्हें सुनियोजित ढंग से चलाने एवं इस निमित्त जिन साधकों की आवश्यकता है उन्हें जुटाने के लिए भरपूर प्रयत्न करना चाहिए। इस उदार सेवा साधना को अपनाकर वे भूल का प्रायश्चित्त परिमार्जन तथा भविष्य निर्धारण के निमित्त आवश्यक पुण्य परमार्थ का उत्साहवर्धक अर्जन कर सकेंगे।
साधना है।
साधना भी कह सकते हैं। पाँच कोशों को पाँच प्रकार के रत्नों का, पंच रत्नों का भण्डार माना गया है। विभूतियाँ पाँच ही हैं। इन्हीं ऋद्धि-सिद्धियों का समावेश समझा जा सकता है। (1)संयम, (2)साहस, (3)दिव्य दृष्टि, (4)स्वर्ग, बन्धन-मुक्ति —इन पाँचों के अंतर्गत ही प्रत्यक्ष और परोक्ष जीवन की समस्त सम्पदाओं-सफलताओं का समावेश हो जाता है।
साधना’ का निर्धारण है। समय का निमन्त्रण है कि जहाँ भी युग मनीषा उभरे वहाँ उसे युग साधना की दिशा में अगला कदम उठाने का भी प्रकाश मिले। युग साधना को ही प्रकारान्तर से कल्प साधना कहा गया है। इस अंक में उसी का स्वरूप एवं प्रतिपादन है।
साधना को अपनाकर वे भूल का प्रायश्चित्त परिमार्जन तथा भविष्य निर्धारण के निमित्त आवश्यक पुण्य परमार्थ का उत्साहवर्धक अर्जन कर सकेंगे।
साधना सत्रों का जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए गठन किया गया है उसका स्वरूप और प्रतिफल क्या है? अध्यात्म विज्ञान के आधार पर ‘कल्प’ शब्द का उपयोग आन्तरिक परिवर्तन के रूप में होना चाहिए। आन्तरिक का तात्पर्य है-दृष्टिकोण परक। मान्यता, आकांक्षा, विचारणा, कल्पना के समुच्चय को अन्तःकरण या अन्तराल कहते हैं। यही है व्यक्ति त्व का आधार।
साधना द्वारा ही सम्भव है। ध्यान का अर्थ-चिन्तन प्रवाह को अवांछित दिशा से हटाकर सुनियोजित कर देना। स्थिरता नहीं लक्ष्य के साथ तल्लीनता ध्यान है। भटकाव का स्वेच्छाचार रोककर मन को नियत निर्धारित दिशा में-इष्ट की ओर लगाना होता है। इसका लाभ आत्मिक एवं भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मिलता है।
साधना के भी अपनी अस्त-व्यस्तता से मुक्ति पा सकता है। फिर आहार-कल्प प्रज्ञापेय और औषधि कल्प का उसमें त्रिवेणी संगम मिल जाने से सच्चे अर्थों में रामायण की वह उक्ति लागू होने लगती है जिसमें मंजुल फल देखिये तत्काल । काक होहिं पिक बकहुँ मराला।” की अलंकारिक उपमा देते हुए यह कहा गया है कि आकृति न बदलते हुए भी प्रकृति बदल जाने की पूरी-पूरी सम्भावना हो सकती है। कल्प साधना के ये प्राथमिक उपचार अवलम्बन हैं जिनके सहारे साधक की मनोभूमि में असाधारण परिवर्तन आने की सम्भावना व्यक्त की गयी है।
साधना भी इसी को कह सकते हैं। इनके प्रतिफलों की उपमा पाँच प्रमुख देवताओं के पाँच प्रमुख वरदानों से दी गई है। (1)ब्रह्मा, (2)विष्णु, (3)महेश, (4)गणेश, (5)दुर्गा। उपरोक्त पाँच साधनाओं को इन पाँच देवताओं की साधना भी कह सकते हैं। पाँच कोशों को पाँच प्रकार के रत्नों का, पंच रत्नों का भण्डार माना गया है।
साधना कृत्यों का महत्व तभी है जब वे श्रद्धा, विश्वास के साथ जुड़ें और संकल्पित व्रतशीलता बन कर सैन्य अनुशासन की तरह निभायें । कल्प साधना में दान और तप के सभी तत्वों का समतुलित ढंग से समावेश है, साथ ही वह सर्वथा हानि रहित भी है। जैसा कि अन्यान्य योग साधनों में प्रयत्न भ्रष्ट होने पर कई प्रकार के विग्रह उठ खड़े होते हैं वैसी स्थिति न आने पाये इसलिए उसे नितान्त उपयोगी होने के साथ-साथ सर्वथा हानि रहित होने का भी पूरा-पूरा ध्यान रखा गया है।
साधना के दिनों में यदि किसी प्रकार का चिन्तन तेजस्वी स्तर पर उभरा होगा और उससे पश्चात्ताप जैसा कुछ मरोड़ने वाला दर्द हुआ होगा तो फिर उसका समाधान एक ही हो सकता है-भविष्य का शानदार निर्धारण। मनन तभी सार्थक है जब उससे विगत के प्रमाद की भरपाई करने के लिए चौगुने, सौगुने पराक्रम की उमंगें उभरें। इस एक मास की अवधि में चिन्तन तो दो चार दिन का ही पर्याप्त हो सकता है। शेष 26 दिन एक ही योजना बनानी चाहिए कि जिन आदर्शवादी प्रेरणाओं का यहाँ माहौल है। उनका अवधारण-कार्यान्वयन कैसे सम्भव हो।
साधना के अंतर्गत विवेकशीलता जगाने के रूप में किया जाता है।
साधना के दिनों पूरा करने का सुयोग सहज सम्मुख है। उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण भी यही हो सकता है। उसका कार्यान्वयन बाद की बात है। यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रह सकती है।
साधना से पूर्ण हो जाता है। कल्प-साधना के दिनों ही यह दोनों प्रकरण पूरे हो चुके होते हैं। उत्तरार्ध में उस क्षति को पूरा करना चाहता है जो अनीति आचरण के द्वारा अवांछनीय परम्पराओं के प्रचलन के रूप में फैलायी गई होती हैं। पाप-कर्मों में कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें शोषण-अत्याचार तो नहीं कह सकते, पर उनके कारण उपयोगी मर्यादाओं का उल्लंघन एवं अवांछनीयता का छूत रोगों की तरह विस्तार होता है। एक से दूसरे तक दुष्प्रभाव पहुँचता है और प्रकारान्तर से समूचे समाज को दुःखद दुष्प्रवृत्तियों के गर्त में धकेलता है।
साधना के दिनों अधिकाधिक समय तक भावना-क्षेत्र पर आरूढ़ रहने चाहिए।
साधनाओं के आधार पर इन तीनों चेतना क्षेत्रों को अधिक परिष्कृत, अधिक प्रखर एवं अधिक समर्थ बनाया जा सकता है। अन्न, जल, वायु की तरह इन तीन साधनाओं को भी समान उत्कर्ष की दृष्टि से सर्व सुगम किन्तु साथ ही असाधारण रूप से प्रभावी भी माना गया है।
साधनाओं का भी समुचित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश रखा गया है। इन्हीं तत्वों का सुनियोजित समावेश कल्प साधना की प्रशिक्षण प्रक्रिया में किया गया है।
साधना के लिये आये साधकों से सत्र के प्रारम्भिक दिन ही अपनी व्यक्ति गत कठिनाइयों, चिन्ताओं, समस्याओं एवं आकांक्षाओं अनुभव करते रहते हैं कि उन्हें परोक्ष रूप से सूत्र-संचालकों का नित नया सन्देश परामर्श मिल रहा है।
साधना ‘प्राणायाम’ की प्रक्रिया द्वारा सधती है। विज्ञात प्राणायामों की संख्या 84 हैं। अविज्ञात इससे भी अधिक हो सकते हैं। कल्पसाधना के साधकों को प्राणवान बनाने के उद्देश्य से ऐसे निर्धारण चुने गए हैं जो सर्वसुलभ हैं। जिनके प्रयोग में लाभ तो बहुत है किन्तु कोई भूल रहने पर भी हानि होने की तनिक भी आशंका नहीं है।
साधना जैसी तपश्चर्या की योजना बनी है।
साधना सरल है। आमतौर से पालथी मारकर, कमर सीधी कर एकान्त स्थान में इस साधना के लिए बैठते हैं। तीन फुट दूरी पर कन्धे की सीध में ऊँचाई पर एक दीप जलाकर रखते हैं। दस सेकेण्ड तक उसकी लौ को खुली आँख से देखना। फिर एक मिनट बन्द रखता।
साधना कुसंस्कारी आदतों के खर-पतवार को उखाड़ती और उसके स्थान पर महामानवों जैसे व्यक्तित्वों का नव-निर्माण कर दिखाती है। इस महान जागरण की फलित ही स्वर्ग, मुक्ति , सिद्धि के रूप में हस्तगत होती है।
साधना− विधान-उज्ज्वल भविष्य का सुनिश्चित निर्धारण और उसे कार्यान्वित करने का व्रत-धारण यह तीनों प्रयोजन जहाँ पूरे होते हों, समझना चाहिए कि वह समग्र तीर्थ यात्रा विधिवत् सम्पन्न हुई और शास्त्रों का पुण्यफल का अवसर बना। कल्प-साधना वस्तुतः तीर्थ सेवन की पुरातन परम्परा का समयानुसार सुनियोजित संस्करण है।
साधना काल में यथा सम्भव ऐसे ही आहार पर रहने की विधि है। उबले शाक भी इसी श्रेणी में आते हैं।
साधना सम्बन्धी रीति-नीति की एक कक्षा प्रतिदिन होती है और समझाया जाता है कि परिवार का पाठशाला, प्रयोगशाला बनाकर दुलार और सुधार का उभयपक्षीय अभ्यास किस प्रकार किया जाय? व्यक्ति को समाज के प्रति समुचित व्यवहार कैसे करना चाहिए इसका सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रयोग करने के लिए परिवार से बढ़कर और कोई क्षेत्र नहीं हो सकता। इसमें सत्प्रवृत्तियाँ बोने और सुखद उपलब्धियाँ कमाने के लिए अपना परिवार ही एक छोटा समाज एक छोटा राष्ट्र है। आत्मीयजनों को संस्कारवान्, स्वावलम्बी कैसे बनाया जा सकता है, अपना और कुटुम्बियों का भविष्य साथ-साथ उज्ज्वल कैसे बनाया जा सकता है-इसकी समन्वित प्रक्रिया परिवार निर्माण ही है। इसका दर्शन और अभ्यास करने के लिए कल्प साधना की एक कक्षा लगती है।
साधना है। उसे अध्यात्म-चिकित्सा की श्रेणी में गिना जा सकता है। काय-चिकित्सा के लिए आयुर्वेद, तिब्बती, एलोपैथी, होमियोपैथी, नेचुरोपैथी आदि पद्धतियाँ प्रचलित हैं। मानसिक चिकित्सा के लिए सामान्यतया स्कूल, शिल्प, उद्योग, कला, कौशल आदि का अभ्यास करना पड़ता है। गुरुकुल, आरण्यकों के वातावरण में रहना पड़ता है।
साधना, शिक्षण-विधान अनुशासन, अध्यवसाय की दृष्टि से यहाँ निवास करने वाले साधक को यही अनुभव होता है कि उसे तीर्थ परम्परा का जीवन्त दर्शन हो रहा है। सूत्र-संचालकों ने समय की आवश्यकता को पूरा करने के लिए इस संदर्भ में प्राणपण से प्रयास किया है। अनेक स्थूल कमियों के रहते हुए भी कोई भी सूक्ष्मदर्शी यहाँ यह अनुभव कर सकता है कि व्यवस्था को उन्हीं पद चिह्नों पर चलाया जा रहा है जिन पर देव संस्कृति के महान तीर्थों की स्थापना प्रचण्ड ऊर्जा केन्द्रों के रूप में की गयी थी। ऐसी प्रचण्ड जिसमें तपकर अनगढ़ धातुओं को गलने ढलने और बहुमूल्य बनने का अवसर मिलता था तीर्थ प्रकारान्तर से महामानव ढालने के उत्पादन केन्द्र थे जिनमें गुरुकुल बालकों का आरण्यक वानप्रस्थों का-साधनारत व्यस्त गृहस्थों का नव निर्माण करते थे।
साधना काल में इसी प्रकार के उच्चस्तरीय विधेयक विचारों को मन में भरे रखा जाय ताकि अभ्यस्त अनगढ़ चिन्तन को निरस्त कर सकना सम्भव हो सके। संयम, अनुशासन और सृजन की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वाले विचार ही इन दिनों अपनाएँ जाएँ। शेष को विजातीय तत्व मानकर उन्हें दूर ही रखा जाय।
साधना का क्रम-विस्तार इस प्रकार है—
साधना-एवं लोक व्यवहार को आनन्द उल्लास से सराबोर कर देने वाली आराधना का विविध समन्वय है। इसे अन्तःकरण, व्यक्ति त्व और व्यवहार में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश करने वाली सुनियोजित प्रक्रिया कहा जा सकता है। मान्यताओं, आकांक्षाओं, विचारणाओं और आदतों को बदलने की कल्प प्रक्रिया उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जैसी कि बुढ़ापे को जवानी में बदलने वाले काया-कल्प के बारे में लोक-मान्यता प्रचलित है। न तो बुढ़ापा अभिशाप है और न जवानी वरदान। दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही है।
साधनाओं में प्रयास ही सब कुछ नहीं होता। इसके लिए वातावरण भी चाहिए। अस्तु, दोनों को सुसम्पन्न नागरिकों में उपलब्ध अपने प्रस्तुत साधन छोड़ने पड़े और अभीष्ट प्राप्ति के लिए उपयुक्त स्थान ‘बद्रीनाथ’ ढूँढ़ना पड़ा। वहाँ उन लोगों ने बारह वर्ष तक मात्र जंगली बेर खाकर तप किया। तदुपरान्त ही अपने समान स्तर का एकमात्र पुत्र ‘प्रद्य म्न’ उत्पन्न कर सकने में सफल हुए।
साधना के साधकों के लिये एक महीने एक अमृताशन का एक वर्ग नियत किया जाता है और पूरे महीने उसी क्रम को निबाहते रहने का निश्चय किया जाता है। रुचि, प्रकृति और स्थिति को ध्यान में रखते हुये साधक और मार्ग-दर्शक परस्पर विचार विनिमय करके यह निर्धारित कर लेते हैं कि कल्प अवधि में क्या आहार चलेगा। उसका परिणाम कितना होगा और खाने का समय क्या रहा करेगा। यह आहार भी दिन में दो बार से अधिक नहीं लिया जा सकता। सेंधा नमक, काली मिर्च, नींबू, जीरा, हल्दी, अदरक जैसे हानि रहित मसाले अपवाद स्वरूप थोड़ी मात्रा में ही इस अमृताशन में मिलाये जा सकते हैं।
साधना क्रम के मध्यवर्ती विधान के अंतर्गत आते हैं। पर इन्हें प्रज्ञायोग उपासना का प्रमुख आधार मानकर नित्य किया जाना अनिवार्य है। इनका एक ही उद्देश्य है-शरीर के जड़ और मन के अर्ध चेतन स्तरों को जो सामान्य स्थिति में अविकसित ही होते हैं, परिष्कृत बनाना, अपना आपा इतना ऊँचा उठा देना कि दिव्य सत्ता हमें आध्यात्मिक प्रगति के लिये वाँछित अनुदान कर सकें।
साधना है। इसको वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अंजामिल, विल्व मंगल, ध्रुव, प्रहलाद आदि से पूछनी चाहिए। ऐसी साक्षी पार्वती, अरुन्धती, मैत्रेयी, सावित्री, संघमित्रा, मीरा से लेकर अम्बपाली जैसी महिलाओं में भी मिल सकती है। इन सबको नारद, बुद्ध आदि के द्वारा मिले प्रेरणात्मक सद्ज्ञान के प्रति कृतज्ञ पाया जाएगा । यह प्रेरणाएँ जिस आधार पर मिलती हैं उसे सत्संग कहते हैं।
साधना की एक कक्षा लगती है।
साधना विधान की पृष्ठभूमि ही प्राण तत्व के अनुसन्धान पर बनी है। फलस्वरूप मनीषियों ने अविज्ञात-चेतन जगत से उन रहस्यों को खोज निकाला, जिन्हें सिद्धियाँ-चमत्कार कहा जाता है। इन उच्चस्तरीय प्रक्रिया के लिये जिस पात्रता की आवश्यकता है उसका अभिवर्धन करने के लिये ही प्राणशक्ति का संचय किया जाता है। अपने भीतर के चुम्बक को शक्ति शाली बनाने, ओजस्, तेजस्, वर्चस् बढ़ाने के लिये ही प्राणायाम का उपक्रम किया जाता है। श्रेष्ठतम का संचय पूरक है, शक्ति −स्फूर्ति से अनुप्राणित होना अर्न्तः कुम्भक, अवांछित को-अन्तः की मलीनताओं को निकाल फेंकना रोचक क्रिया है।
साधना नियमित रूप से की जाय। उठते समय आत्मबोध-सोते समय तत्त्वबोध । नित्यकर्म से निवृत्त होकर जप ध्यान। एकान्त सुविधा का चिन्तन-मनन में उपयोग। यही है-त्रिविधि सोपानों वाला प्रज्ञायोग।
साधना को बिन्दुयोग कहते हैं। इसी का एक नाम त्राटक साधना भी है।
साधना में मात्र कृत्य ही सब कुछ नहीं होता। उसके लिए वातावरण भी पौधे को खाद-पानी मिलने की तरह आवश्यक है। इस दृष्टि से स्थान परिवर्तन की आवश्यकता कल्प साधना में आवश्यक मानी गयी है। मालवीयजी का काया-कल्प प्रयोग हिन्दू विश्वविद्यालय में बनी उनकी कोठी पर नहीं हुआ था। इसके लिये उन्हें मथुरा जिले के एक छोटे गाँव में तपसी बाबा के तपोवन में फूँस की कुटी बनाकर रहना पड़ा था।
साधना में चिन्तन-मनन का प्राधान्य है। कल्प साधकों को इन तीनों ही उपक्रमों को समान महत्व देते हुए नियमित रूप से भावनापूर्वक सम्पन्न करने के लिये कहा जाता है। परिणति स्वरूप इनसे उन विभूतियों का प्रत्यक्ष रसास्वादन होने लगता है जो अध्यात्म मार्ग पर सही रूप से संकल्पपूर्वक चलने वालों को मिलना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-January
साधनाओं द्वारा यह विकास सहज रूप
में हो जाता है और तब व्यक्ति को अपनी इस अनंत विस्तृत आत्मचेतना का बोध
होता है, जिसे वह विस्मृत किए रहता है।
साधना-प्रकरण में भवबंधनों में जकड़ने वाली तीन ग्रंथियों को खोलने के लिए क्रियापक्ष के तीन अभ्यास भी बताए गए हैं। इनसे संबंधित क्षेत्रों का व्यायाम भी होता है और परिष्कार भी। साथ में श्रद्धा-विश्वास का समावेश रखा जाए तो उनका प्रभाव गहन अंतराल तक जा पहुँचता है।
साधनाओं के साथ संकल्पबल का समावेश होना ही चाहिए। इसके अभाव में वे क्रिया-कृत्य मात्र कौतुक-कौतूहल बनकर रह जाते हैं। कृत्य उपचारों का प्रतिफल उनके साथ जुड़ी हुई भावनाओं की सहायता निश्चित रूप से घुली रहे, अन्यथा योगाभ्यास के नाम पर किए जाने वाले कृत्य भी एक प्रकार के व्यायाम ही बनकर रह जाते हैं और उनका प्रभाव शरीर श्रम के अनुरूप ही नगण्य स्तर का होता है।
साधना अर्धनिद्रा का काम दे जाती है और थकान को घटाती है। यों चिंतामुक्ति तो सर्वथा तभी मिलती है, जब गहरी नींद आए या मौत इस संसार से उठाए।
साधना करनी होती है। जो जिस स्तर तक उस समष्टि चित्त से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, उसकी भूत-भविष्य की दर्शन क्षमता उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। इस तथ्य का प्रतिपादन हमारे प्राचीन भारतीय महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन के विभूतिपाद के 52 वें सूत्र में स्पष्ट रूप से किया है।
साधनाबलम्॥ 76॥
साधना की परिपक्वता पा लेते हैं तो उनमें दैवी चेतन शक्ति का प्रादुर्भाव होता है। श्रुति कहती है—
साधनाएँ, इन्हें जगाने व इनसे उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा करने के लिए ही की जाती हैं।
साधनाएँ आत्मपरिष्कार के लिए ही की जाती हैं, ताकि पात्रता निखरे। जीवनपात्र का इतना विकास-विस्तार हो कि सावन की घटा की तरह सदा-सर्वदा बरसने वाली प्रभूकृपा का बड़े से बड़ा भाग अपने हिस्से में आ सके।
साधना ‘वर्तमान’ की साध, धरा पर स्वर्ग अवतरण करें॥
साधनाओं के पीछे आदिकाल से लेकर अब तक असंख्य मनस्वी साधकों का साधन बल शोभित है।
साधना में निरत रहना होता है। विचारों से विचारों को काटने की प्रणाली अपनानी पड़ती है; पर इस सबके लिए बलिष्ठ मनोबल चाहिए। उसमें कमी पड़ती हो तो वस्तुओं से, वातावरण से, सहयोग से एवं क्रियाओं में सुधार कार्य को अग्रगामी बनाना पड़ता है। धार्मिक कर्मकांडों की संरचना इसी निमित्त हुई है कि उन हलचलों को प्रत्यक्ष देखते हुए आधार-अवलंबन अपनाकर साधक अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर सके। संकल्पबल में बलिष्ठता ला सके, उस प्रयोजन को पूरा कर सके, तो विचारों से विचारों की काट करने का आधार न बन पड़ने की दशा में अपनाया और लक्ष्य की दिशा में बढ़ा जा सकता है।
साधना के समन्वय के विषय में शास्त्रकारों का सत स्पष्ट है—
साधना-उपासना का विधान बनाया जाता है। वस्तुतः साधनाएँ आत्मपरिष्कार के लिए ही की जाती हैं, ताकि पात्रता निखरे। जीवनपात्र का इतना विकास-विस्तार हो कि सावन की घटा की तरह सदा-सर्वदा बरसने वाली प्रभूकृपा का बड़े से बड़ा भाग अपने हिस्से में आ सके।
साधनाओं का शरीर, मन और आत्मा तीनों पर प्रभाव पड़ता है, जबकि व्यायाम और खेलों के प्रभाव मात्र शरीरगत होते हैं।
साधना का भी अपना महत्त्व एवं विधान है।
साधनाओं का विधान है। इन्हें करते रहने से बंधनमुक्ति-प्रयोजन में सफलता-सहायता मिलती है।
साधना करनी पड़ती है। रोसीक्रुशन दर्शन के अनुसार अंतःदर्शन को विकसित करने के लिए धीरे-धीरे अभ्यास कराया जाता है। सभी मतों के अनुसार यह अभ्यास आवश्यक है। सब मनुष्य प्रयास और अभ्यास करने पर अंतःदर्शन कर सकते हैं। हमारे जीवन में अनेक बार ऐसे अवसर आते हैं, जब हम भौतिक कठिनाइयों में घिर जाते हैं और उनसे निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता।
साधनाया राजतेऽतितरं सदा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-March
साधना करनी पड़ती है। इसलिए इस योगाभ्यास में नादयोग जुड़ा हुआ माना जा सकता है।
साधनाओं में उपयुक्त हो सकता है, विशेषतया कुण्डलिनी जागरण में।
साधना क्रम भी। अन्य जपों में प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना होता है, पर यह अनायास ही बन पड़ता है। साँस के साथ स्वसंचालित रीति से यह बिना प्रत्यक्ष प्रयत्न किए हुए ही अनायास होता रहता है। यह श्वसन क्रिया सोते-जागते हर समय होती रहती है और साधना क्रम भी उसके साथ जुड़ा रहता है। इसलिए उसे बिना जप किये जप- “अजपा जाप” भी कहा जाता है।
साधनाओं में भी पड़ती है। अपनी स्थिति का भली प्रकार पर्यवेक्षण जिसने किया हो और उपचार कृत्य में निजी अनुभव अभ्यास किया हो उस मार्गदर्शक का परामर्श योग साधनाओं में उपयुक्त हो सकता है, विशेषतया कुण्डलिनी जागरण में।
साधना है।
साधना का भी अभ्यास करना पड़ता है। इसलिए यह जहाँ गायत्री का सार तत्व है वहीं सुसंचालित साधना क्रम भी। अन्य जपों में प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना होता है, पर यह अनायास ही बन पड़ता है। साँस के साथ स्वसंचालित रीति से यह बिना प्रत्यक्ष प्रयत्न किए हुए ही अनायास होता रहता है। यह श्वसन क्रिया सोते-जागते हर समय होती रहती है और साधना क्रम भी उसके साथ जुड़ा रहता है।
साधना है। उसमें “नः” शब्द बहुवचन परक आता तो है। तो भी यह “नः” (याने हम सब) शब्द निजी परिवार या निजी संपर्क क्षेत्र तक सीमित है। उस व्यक्तिगत साधना को एकान्त में, किसी शुद्ध वातावरण वाले स्थान में बैठकर करने का विधान है। निजी अनुष्ठान में सार्वजनिक सहयोग का निषेध है।
साधना मन की एकाग्रता और पवित्रता से सधती है। इस श्रीगणेश के बिना गाड़ी एक कदम नहीं चलती जो साधना उपचार में मन की भूमिका को समझ लेगा उसे मनोनिग्रह की साधना को प्राथमिकता देनी होगी। इसके बाद अन्यान्य कर्मकाण्डों में हाथ डालने की बात सोची जा सकेगी।
साधना या हंस योग कहते हैं। इसका सामान्य प्रयोग बहुत सरल है। स्थिर शरीर और शान्ति चित्त होकर श्वास के आवागमन की क्रिया आरम्भ की जाय। साँस लेते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम’ की ध्वनि श्रवण पर चित्त एकाग्र किया जाय।
साधना में उच्चस्तरीय भूमिका में प्रवेश करते हुए साधक को सोऽहम् साधना का भी अभ्यास करना पड़ता है। इसलिए यह जहाँ गायत्री का सार तत्व है वहीं सुसंचालित साधना क्रम भी। अन्य जपों में प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना होता है, पर यह अनायास ही बन पड़ता है। साँस के साथ स्वसंचालित रीति से यह बिना प्रत्यक्ष प्रयत्न किए हुए ही अनायास होता रहता है। यह श्वसन क्रिया सोते-जागते हर समय होती रहती है और साधना क्रम भी उसके साथ जुड़ा रहता है।
साधना विधानों में अन्तर करना पड़ता है। हर रोगी को एक बीमारी में एक दवा नहीं दी जा सकती। यद्यपि कैमिस्टों से पूछ कर यह जाना जरूर जा सकता है कि किस नाम की दवा किस रोग में प्रयुक्त होती है। किन्तु उस आधार पर बिना चिकित्सक से परामर्श किये सेवन करने लगना खतरनाक है। चिकित्सक देखता है कि किस रोग के साथ क्या लक्षण मिले हुए हैं।
साधना भी कहा जा सकता है। हंसयोग का प्रतिफल ‘राजहंस’ या परमहंस के रूप में प्रकट होता है। यह दोनों ही अध्यात्म क्षेत्र की उच्च स्थितियाँ हैं।
साधना का अभ्यास भी इस प्रयोग प्रयोजन के साथ जुड़ जाता है।
साधना को अतीव उच्चकोटि की बताया गया है। उसे अद्वैत ब्रह्म की उपासना और वेदान्त दर्शन का सार संक्षेप भी कह सकते हैं।
साधना को एकान्त में, किसी शुद्ध वातावरण वाले स्थान में बैठकर करने का विधान है। निजी अनुष्ठान में सार्वजनिक सहयोग का निषेध है। इसे तो अपनी सामर्थ्य भर स्वयं ही करना चाहिए। हवन प्राचीन काल में जप का दशांश होता था। अब महंगाई की परिस्थितियों को देखते हुए शतांश की संगति बिठा दी गई है।
साधनात्मक प्रयोग इसी निमित्त किए जाते हैं। तपश्चर्या की आग को चित्त भाग में ही परिमार्जित करना पड़ता है।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं। यह पक्ष, अनुभव, अभ्यास, और दबाव से ही किसी ढांचे में ढलता है और इस योग्य बनता है कि श्रेष्ठता से प्रभावित हो और अपनी दिशाधारा, रीति-नीति इस प्रकार बदले जिससे मानवी गरिमा के अनुरूप ऐसे काम बन पड़े जिसमें आत्म सम्मान और लोक सम्मान की उपयुक्त मात्रा उपलब्ध हो सके। चित्त का उत्कृष्टता का पक्षधर बनना ही वस्तुतः मनोयोग की साधना है।
साधना और अनुभवी मार्गदर्शन का सहारा लेना पड़ता है।
( क्रमशः )
साधना वस्तुतः साधना है। उसके प्रयोग में अपना समूचा व्यक्तित्व साधना और अनुभवी मार्गदर्शन का सहारा लेना पड़ता है।
( क्रमशः )
साधना करके अपने कौशल में पारंगत होते हैं।
साधना में ध्यानयोग भी जुड़ा हुआ है। श्वास के आवागमन पर चित्र एकाग्र करना पड़ता है। वह न बन पड़े तो वायु प्रवेश के साथ ‘सो’ की और निकलने साथ ‘हम्’ के श्रवण का तालमेल ही नहीं बैठता। हर साँस की गतिविधि पर ध्यान रखना पड़ता है। इतना ध्यान जम जाने के उपरान्त ही ध्वनि श्रवण का अगला कदम उठता है।
साधना को प्राथमिकता देनी होगी। इसके बाद अन्यान्य कर्मकाण्डों में हाथ डालने की बात सोची जा सकेगी।
साधना तपश्चर्या चल रही है। पर इस बार उतना ही पर्याप्त न होगा। इन दिनों तो सामूहिक संकल्प शक्ति से महिषासुर वध की कथा ही पुनरावृत्ति के रूप में दुहरानी पड़ेगी।
साधना क्रम में लोग एक भूल करते हैं कि वर्णमाला पढ़े बिना, एम.ए. की पुस्तक खरीद लाते हैं। उसे पढ़ने का हठ और पढ़ाने का आग्रह करते हैं। कई प्रकार के उपासनात्मक कर्मकाण्ड सीखने और उन्हें जल्दी-पल्दी निपटा कर तुर्त-फुर्त सिद्ध चमत्कार बटोरने की फिराक में रहते हैं। अच्छा होता कि कोई इन बाल-बुद्धि लोगों को यह समझा सकने में समर्थ हुआ होता कि हर साधना मन की एकाग्रता और पवित्रता से सधती है। इस श्रीगणेश के बिना गाड़ी एक कदम नहीं चलती जो साधना उपचार में मन की भूमिका को समझ लेगा उसे मनोनिग्रह की साधना को प्राथमिकता देनी होगी।
साधनाओं तक सीमित रहें तो समझना चाहिए कि उपार्जन तो सीखा पर उपयोग नहीं आया। कहा गया है कि- “यषा बिनु सन्त कराई।” स्पष्ट है जिसके भी हृदय में दया करुणा का भाव होगा वह स्नेह की आत्मीयता की अभिव्यक्ति किये बिना रह नहीं सकेगा। सेवा धर्म अपनाये बिना अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश या श्रेय प्राप्त करने की कुछ उपयोगिता नहीं रह जाती। स्वार्थ सिद्धि में निरत रहना संकीर्णता है क्षुद्रता भी।
साधना चाहिए कि आहार को पवित्रतम बनाया जायेगा। उसका स्तर और अनुपात मर्यादाओं के बन्धन में जकड़ कर रखा जायेगा।
साधना, तपश्चर्या, सिद्धि, जिम्मेदारी एवं भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं से सम्बन्धित है, उन्हें समय से पूर्व वर्णन न किया जाय।
साधना उपचार में मन की भूमिका को समझ लेगा उसे मनोनिग्रह की साधना को प्राथमिकता देनी होगी। इसके बाद अन्यान्य कर्मकाण्डों में हाथ डालने की बात सोची जा सकेगी।
साधना विज्ञान में हठ पूर्वक चित्त का परिशोधन करने के लिए कहा गया है। अनेक प्रकार के साधनात्मक प्रयोग इसी निमित्त किए जाते हैं। तपश्चर्या की आग को चित्त भाग में ही परिमार्जित करना पड़ता है।
साधना क्रम भी उसके साथ जुड़ा रहता है। इसलिए उसे बिना जप किये जप- “अजपा जाप” भी कहा जाता है।
साधना में उस पर दृष्टि भी जमाई जाती है, पर इससे आँखों को कोई हानि नहीं होती।
साधना है। उसके प्रयोग में अपना समूचा व्यक्तित्व साधना और अनुभवी मार्गदर्शन का सहारा लेना पड़ता है।
( क्रमशः )
साधना में आत्म बाध तत्व बोध का मिश्रित समावेश है। मैं कौन हूँ? उत्तर- ‘परमात्मा। इसे जीव और ईश्वर का मिलना, आत्म -दर्शन ब्रह्मदर्शन भी कह सकते हैं और आत्मा परमात्मा की एकता भी। यही ब्रह्मज्ञान है।
साधना का अवलम्बन लेना ही उचित है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-February
साधना से सम्बन्धित प्रचण्ड शक्ति का केन्द्र उसी भाग को समझा जाना चाहिए जो मूलाधार से लेकर सहस्रार तक मेरुदण्ड माध्यम से शक्ति पुँज बनकर अवस्थित है।
साधना के सहारे जागृत कर सकते हैं। यह बढ़ी हुई जिज्ञासा ही पिरामिडों में निवास करने वाली दिव्य आत्माओं के सम्बन्ध में अधिक, और अधिक जानने के लिए, मिस्र घसीट ले गई थी और वे पिरामिडों के सम्बन्ध में प्रचलित अनेकानेक किंवदंतियों की यथार्थता जानने के लिए अपनी जान हथेली पर रखने के लिए तुल गये थे।
साधना अक्सर श्मशानों में होती है। मुर्दों की चिताओं पर भोजन पकाते-खाते हैं। कापालिक मनुष्य के कपालों में भोजन करते, पानी पीते और मुण्ड-मालाएँ गले में लटकाये रहते हैं। अघोरी मल-मूत्र तक खा जाते हैं, ताकि अनौचित्य के प्रति घृणा भाव समाप्त हो जाये।
साधना किसी व्यक्ति विशेष को ही हानि पहुँचा सकती है। व्यापक क्षेत्र में उसका प्रयोग नहीं हो सकता। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तम्भन आदि प्रयोगों के तन्त्र विधान हैं। इनमें किसी व्यक्ति विशेष को कठिनाइयों में फँसाया जा सकता है, प्रतिशोध लिया जा सकता है, पर ऐसा कुछ नहीं है जिसमें किसी को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने या संकट से उबारने का उच्चस्तरीय प्रयोजन पूरा हो सके।
साधना में बच्चे भी तो सहयोगी बनेंगे।
साधना। जिसने थोड़ी सफलता पर अहंकार व्यक्त किया समझ लो वह मारा गया। प्रगति तो अनन्त है इसलिये उसकी साधना भी असीम ही होनी चाहिए।
साधना को प्रोत्साहन नहीं दिया गया, उसे गोपनीय रखा गया है।
साधना के साधक को करना होता है। सद्गुण ही आत्मदेवता की सर्वोत्तम शोभा सज्जा है। संयम, सदाचार, साहस, पराक्रम पुरुषार्थ जैसी उच्च भावनाओं की दृढ़ता जैसे-जैसे अन्तराल में उपस्थित रहने लगती है, वैसे ही आत्मा का सौंदर्य कमल पुष्पवत् निखरने लगता है, भले ही वह शरीर की दृष्टि से काला, कुरूप, रुग्ण या जर्जर क्यों न हो?
साधना भी असीम ही होनी चाहिए।
साधना के लिए लोभ, मोह और अहंकार का परित्याग करके राष्ट्र को जीवित और जागृत रख सकने वाले पुरोहितों के रूप में नये सिरे से प्रकट न हो सकें। दूब मरती नहीं। गर्मी में सूख जाती है किन्तु पहली वर्षा होते ही वह इतनी तेजी से उठती है कि धरातल पर मखमली फर्श बिछा देती है। क्षुद्र संकीर्णता से ऊँचे उठने वाली आत्माओं का बीज नाश नहीं हुआ है। युग चेतना की पावस आते ही वे लोक प्रचलन का कायाकल्प कर सकेंगी।
साधना से शक्ति उत्पन्न होती है- विद्युत या अग्नि जैसी। उसके द्वारा अपना ही नहीं दूसरों का भी हित-अहित किया जा सकता है। शस्त्र सुरक्षा के काम भी आते हैं और आक्रमण के काम में भी।
साधनाओं पर हुआ है वह उनकी सम्भावित परिणतियों को देखते हुए अत्यल्प है। मस्तिष्क एवं शरीर के अन्य संयंत्र अति विलक्षण हैं। मस्तिष्क के विद्युत फव्वारे के डी.सी. पोटेन्शियल नापने वाला कोई यन्त्र अभी तक कम्प्यूटर विज्ञान- साइबर्नेटिक्स में क्रान्ति करने वाला आधुनिक विज्ञान जगत नहीं बना पाया है। विधेयात्मक उच्चस्तरीय चिन्तन करते समय, तल्लीनता, एकाग्रता की स्थिति में, श्रद्धासिक्त भाव सम्वेदनाओं की चरमावस्था में मस्तिष्क की विद्युतीय स्थिति में क्या परिवर्तन होते हैं, चयापचय दर में क्या परिवर्तन होते हैं, स्नायु रसों का स्राव किस सीमा तक प्रभावित होता है, समग्र शरीर की वायोकेमीस्ट्री व बायोइलेक्ट्रीजीवी में क्या अन्तर आता है, यह जानने का प्रयास यदि किया जा सके तो ध्यान-योग सम्बन्धी अनेकानेक नये आयाम मनुष्य के हाथ लगेंगे। ध्यानयोग उच्चस्तरीय हो व अल्पावधि का ही हो तो वह हर प्रकार की सामर्थ्यवान तनाव शामक, मस्तिष्कीय सामर्थ्यों को बढ़ाने वाली औषधि का काम कर सकता है।
साधना छोड़ नहीं। अन्तिम दिनों वे महिला मित्र नामक अत्यन्त कला-पूर्ण चित्र बनाने में निमग्न थे और अपने बेटे की मेज पर रखने के लिए एक गुलदस्ता चित्रित कर रहे थे।
साधना के बिना ऋषि तो नहीं बना जा सकता। पर उनके सान्निध्य से महानता का लाभ मिल सकता है। यदि ऐसी आकांक्षा व पवित्रता अंदर विद्यमान है। ऐसी सम्पदा वे अनुग्रह पूर्वक सुपात्रों को देते भी रहते हैं।
साधना के अन्त में साधकों ने अपने को बहुत ही शान्ति की अवस्था में पाया। स्ट्रेस कम होना, तनाव घटना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
साधना-सत्र, धार्मिक समारोह, सामयिक समस्याओं के समाधानों के सम्बन्ध में कोई निर्धारण नहीं होते। बसों और रेलगाड़ियों को पर्यटकों की सवारियाँ भरने जैसी आर्थिक सुविधा भले ही मिल जाती हो। इसके स्थान पर भार वाहन का स्थान साइकिल से लेकर समीपवर्ती क्षेत्रों की प्रायः एक-एक सप्ताह की धर्म यात्राऐं बनायी जायें। तो उनकी लपेट में देश का हर कोना आ सकता है और अपने देहात में बसे अशिक्षित तथा पिछड़े हुए देश में एक सामाजिक क्राँति हो सकती है।
साधना करने और माता जैसा स्नेह-दुलार का रिश्ता बनाने के लिए कहा गया है।
साधना से दुष्प्रवृत्तियां तपाई, जलाई जा सकें ऐसा कोई भी कृत्य तप है।
साधना के साधकों की त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता में 500 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी मापी गयी। निमीलित अवस्था में साधक की त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि हो जाती है। आँखें बन्द करने पर साधना के अन्त में साधकों ने अपने को बहुत ही शान्ति की अवस्था में पाया। स्ट्रेस कम होना, तनाव घटना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
साधनाएं लम्बे समय तक करते रहने पर ऋषि कल्प लोग ही प्रचुर परिमाण में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय कर पाते हैं। पर उनके सम्पर्क में आने वाले उस प्रभाव से एक सीमित मात्रा में पात्रता के अनुरूप अनायास ही लाभ उठा लेते हैं।
साधना चाहिए।
साधना की कठिनाइयों से बचाइए। जल्दी से सिद्धियाँ दिलाइए।
साधना विज्ञान में त्वचा साधना को ‘स्पर्शा स्पर्श’ कहते हैं, इसका क्षेत्र अति व्यापक, विस्तृत और प्रभावोत्पादक माना गया है।
साधना, श्रद्धा, आत्मशोधन, लोक हित आदि का समावेश था।
साधना से समझा और बुझती हई आँखों को नये सिरे से चमकाते हुए कहा- लूसी मैं समझता हूँ कि चित्रकला के बारे में अब कुछ-कुछ समझ सकने योग्य हो चला। इसके बाद उन्होंने सदा के लिए आँखें बन्द कर ली।
साधना का अभ्यास करने पर त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता भी असाधारण रूप से बढ़ती पाई गई है। राबर्टकीथ वैलेस ने अपने अनुसंधान में बताया है कि 10 मिनट की ध्यान साधना के साधकों की त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता में 500 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी मापी गयी। निमीलित अवस्था में साधक की त्वचा की प्रतिरोधी क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि हो जाती है। आँखें बन्द करने पर साधना के अन्त में साधकों ने अपने को बहुत ही शान्ति की अवस्था में पाया। स्ट्रेस कम होना, तनाव घटना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
साधना का विधान हो ऐसा है, जिसमें साधक नीति-अनीति का बोध खो बैठता है और अपना दर्प दिखाने के लिए जिस-तिस के छोटे कारणों से आक्रोश में भर शाप देने लगता है।
साधनाएं करनी पड़ती हैं।
साधना में संलग्न होना पड़ा। इसे बिना हम या हमारे अनुयायी निजी व्यक्तित्व की दृष्टि से कितने ही परिष्कृत क्यों न हों निजी व्यक्तित्व में भले ही स्वर्ग मुक्ति या दूसरों की सीमित भलाई कर सकने वाली शक्ति क्यों न प्राप्त कर लें, विश्व कल्याण एवं युग परिवर्तन के लिए उससे बड़ी शक्ति चाहिए। वही है सविता महाकाल की महाकाली सावित्री।
साधना द्वारा कार्य रूप में परिणत होने दिया जाये। अध्यात्मवादी और सेवाभावी होना एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं।
साधना आरम्भ में दस मिनट में की जा सकती है और फिर उसे क्रमशः आधे घन्टे तक बढ़ाया जा सकता है। मन की चंचलता को देखते हुए ध्यान प्रक्रिया एवं भाव साधना को आरम्भ में थोड़े में करके पीछे उसे क्रमशः बढ़ाने की परम्परा है। वही विषय इस प्रसंग में भी निर्वाह होना चाहिए।
साधना के प्रयोग पहले साधक को अपने ऊपर करने पड़ते हैं।
साधना के साथ सद्भावना और समयदान- अंशदान का परमार्थ तो सहज ही जुड़ जाता है। इसमें तीन गुना लाभ होता है। आत्म परिष्कार का संतोष-सेवा से कृतज्ञ हुए लोगों का भाव भरा सम्मान एवं ईश्वर के सौंपे दायित्व को पूरा करने से उपलब्ध होने वाला देवी अनुग्रह इस प्रकार लक्ष्य को प्रमुखता देने वाला लौकिक और पारलौकिक दोनों ही दृष्टि से नफे में रहता है।
साधना करनी हो। प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। पर जिन्हें कोई अन्य समय उपयुक्त जंचता हो वे उसका अपना नियम बना सकते हैं।
साधना विवेकानंद में भर दी थी। समर्थ और शिवाजी के बीच में ऐसा ही हस्तांतरण हुआ था। ऐसे और भी अनेकों प्रमाण हैं।
साधना छोड़ी नहीं। फेफड़ों की खराबी बेतरह तंग करती थी और लगता था कि वे अब महा प्रयाण करने ही वाले हैं तो भी उन्होंने अपनी साधना छोड़ नहीं। अन्तिम दिनों वे महिला मित्र नामक अत्यन्त कला-पूर्ण चित्र बनाने में निमग्न थे और अपने बेटे की मेज पर रखने के लिए एक गुलदस्ता चित्रित कर रहे थे।
साधना को ‘स्पर्शा स्पर्श’ कहते हैं, इसका क्षेत्र अति व्यापक, विस्तृत और प्रभावोत्पादक माना गया है।
साधना चल रही थी एवं सम्मिलित रूप से प्रज्ञा परिजनों के जो दो सामूहिक अनुष्ठान चल रहे थे उनमें विशेष अभिवृद्धि का नया संकेत समझा जाना चाहिए। प्रतिदिन 240 करोड़ मन्त्रों का जप चल रहा है। अब 240 लाख गायत्री चालीसाओं का पाठ उस प्रक्रिया में नया अध्याय जुड़ता है। दैनिक जप में भी जिनसे अभिवृद्धि हो सके वह उन्हें करनी चाहिए। गायत्री चालीसा 100 वितरण करने वालों को उनके नाम की एक मुहर भी दी जायेगी जिसमें उल्लेख होगा कि यह किनने किसकी स्मृति में कितनी संख्या में वितरित किये हैं।
साधनाओं में गायत्री महाशक्ति को धारण करके पात्रता विकसित करने के लिए अधिक-से-अधिक पवित्र और सात्विक बनना पड़ता है। उसी प्रकार तान्त्रिकों को क्रूर कर्म करने के लिए स्वयं भी क्रूर-अनाचारी बनना पड़ता है, ताकि उस प्रयोग को करते समय मन में आत्मग्लानि न उठे। आत्मा को दबाने, दबोचने और अपवित्रता, दुस्साहसिकता से भरे-पूरे ही तन्त्र साधना के प्रयोग पहले साधक को अपने ऊपर करने पड़ते हैं।
साधना को आरम्भ में थोड़े में करके पीछे उसे क्रमशः बढ़ाने की परम्परा है। वही विषय इस प्रसंग में भी निर्वाह होना चाहिए।
साधनाओं से जाती है और शाप देने की तान्त्रिक विधानों से। दुर्वासा के बारे में प्रसिद्ध है कि वे जरा-जरा सी बात से तुनक कर चाहे जिसको शाप दे डालते थे और पीछे पछताते थे। अम्बरीष को, शकुन्तला को शाप देकर उन निर्दोषों को कष्ट में डाला और स्वयं बदनाम हुए। तान्त्रिक साधना का विधान हो ऐसा है, जिसमें साधक नीति-अनीति का बोध खो बैठता है और अपना दर्प दिखाने के लिए जिस-तिस के छोटे कारणों से आक्रोश में भर शाप देने लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-December
साधना कहा गया है। मन की कुकल्पनाएँ और इच्छाएँ इसके अंतर्गत नियन्त्रित की जाती हैं। एकाग्रता की साधना अपने विभिन्न रूपों में इसी निमित्त करते हैं। ध्यान के अनेकानेक प्रयोग प्रचलन इसी निमित्त हैं।
साधना हेतु आहार की सात्विकता आवश्यक है। उसका स्तर और अनुपात भी ऐसा रहना चाहिए जिससे आलस्य या अपच का प्रकोप न होने पाए। इसके अतिरिक्त इसी क्षेत्र में व्यायाम का महत्व माना गया है। आसनों का अभ्यास इसी निमित्त किया जाता है। बन्ध-मुद्राओं के अभ्यास भी इस प्रयोजन में मदद करते हैं।
साधनाएँ करने पर भी खाली हाथ रहते हैं पर हमने जो बोया, उसे सौ गुना बढ़ाकर काटा है। इसमें अध्यात्म की विधि व्यवस्था को सही रूप से अपनाने-भर की कमी रह जाती है। लोग पूजा पाठ का क्रिया-कृत्या तो कर लेते हैं, पर जीवन शोधन की अनिवार्य आवश्यकता की ओर ध्यान नहीं देते। यही वह भूल है जिसके कारण आत्मविज्ञान के सुनहरे प्रतिफलों से उन्हें वंचित रहना पड़ता है। हमारा जीवन एक अनुभव भरी नोट बुक के रूप में प्रस्तुत हुआ है, जिसे कोई भी दर्पण की तरह देख सकता है और यदि उस मार्ग पर चलना है तो पथ प्रदर्शिका के रूप में इस छोटी जीवनी का अनुसरण कर सकता है।
साधना में माता के रूप में साकार उपासना की आवश्यकता पड़ती है, किन्तु उच्चस्तरीय साधना के लिए प्रकाश ध्यान को ही अपनाना पड़ता है। गायत्री की उच्चभूमिका सवितामय बन जाती है। गायत्री का प्राण प्रकाश पुंज सविता देवता ही है, अस्तु समुन्नत भूमिका के साधक प्रकाश के ध्यान का ही अवलम्बन करते हैं। विभिन्न प्रसंगों में श्रुति यही कहती आयी है। ताण्ड्योपनिषद (10/5/3) कहता है- “तेजसा वे गायत्री एवं ज्योतिर्वे गायत्री छन्दसाम्” (13/7/2) यजुर्वेद कहता है- “सविता वे प्रसकानामीशे अर्थात् सबको उत्पन्न करने वाला परमेश्वर सविता है।
साधना नित्यकर्मों की कठोरता का प्रतिपालन नियमपूर्वक करना होता है। आहुति देने वाले होता- यजमान भी यज्ञ के दिनों में व्रत धारण करते ही हैं, परिपूर्ण संयम भी बरतते हैं। यज्ञ के दिनों में स्वेच्छाचार बरतने की तनिक भी गुंजाइश नहीं रहती। व्रतशील रहे बिना यज्ञ कृत्य फलप्रद नहीं होता। उसका उद्देश्य आत्मिक क्षेत्र की प्रगति है।
साधना का एक प्रयोग था। उसे देश की देवात्मा कुण्डलिनी का जागरण कह सकते हैं। यह किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए की गई साधना नहीं थी। विश्व-कल्याण एवं भारत का अभ्युदय इसका लक्ष्य था। इसे प्रचण्ड कुण्डलिनी जागरण स्तर पर करना पड़ा और भागीरथ, दधीचि जैसे कठोर अनुबन्धों का पालन करना पड़ा।
साधनाओं द्वारा संभव हो सकता है।
साधना ही सच्चे आध्यात्म का प्रयोजन पूरा करती है। वे सीमित उपासना का क्रम बनाकर शेष समय लोक साधना में लगाने लगे।
साधना में सदाचरण, सज्जनता, उदारता जैसे सद्गुण आते हैं। इनके प्रति अटूट श्रद्धा होने के पीछे आदर्श भी है, न्यायनिष्ठा भी एवं प्रामाणिकता भी। इन सद्गुणों को अपनाने से अपनी गरिमा निखरती है और दूसरों की भलाई होती है। संयम-अनुशासन भी इसी प्रकार पालने योग्य है। अपने आपको उच्छृंखल न बनने दें।
साधना का- उपचार ऐसा है जिसके सहारे व्यक्ति अनायास ही सद्गुणी और परमार्थी बनता जाता है। यह आत्मिक प्रगति की ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें आत्मशोधन के अतिरिक्त लोक कल्याण भी जुड़ा हुआ है और अपना ही नहीं, सभी का भला होता है।
साधना ही अपने बल से साधक की रक्षा करती है।
साधना करने वाले साधक को कई प्रकार की कई आकृतियों की कई रंगों की ज्योतियों के दर्शन होते हैं। यह भ्रान्तियाँ नहीं हैं वरन् सूक्ष्म लोक की विशेष धाराएँ हैं। जिस प्रकार नादयोग में कई प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं और उन सब के पीछे कुछ दिव्य संकेत संदेश होते हैं। इसी प्रकार बिन्दुयोग साधना के अंतर्गत किये जाने वाली सविता देव की प्रकाश ज्योति की ध्यान धारणा में भी कई रंगों के प्रकाशों का दर्शन होना भी दिव्य अनुभूतियों की श्रेणी में ही गिना जायगा।
साधना में लग कर अपनी कमाई के बलबूते वह प्रयोजन पूरा कर सकना कठिन पड़ेगा। इसमें लम्बा समय चला जायेगा और जो काम तत्काल किये जाने योग्य हैं, उनमें विलम्ब हो जायेगा। सरल उपाय यही था कि वे अपनी आध्यात्मिक सम्पदा हस्तान्तरित कर दें। परमहंस जब शरीर छोड़ने लगे तो पास ही बैठे विवेकानन्द के शरीर पर अपना पैर रखा उनके शरीर में बिजली कौंध गयी। चकित होकर उनने गुरु की ओर देखा।
साधना अपने विभिन्न रूपों में इसी निमित्त करते हैं। ध्यान के अनेकानेक प्रयोग प्रचलन इसी निमित्त हैं।
साधना में अन्तःकरण का उदात्तीकरण करना पड़ता है। आस्थाएँ, भावनाएँ, आकाँक्षाएँ विचारणाएँ आदर्शों के अनुरूप ढालनी पड़ती हैं। जन्म जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कार इस मार्ग में पग-पग पर बाधा पहुँचाते हैं इसलिए उनकी ओर से विमुख होने की बैरागी प्रवृत्ति अपनानी होती है और आदर्शों के समुच्चय भगवान के साथ आन्तरिक भक्ति भावना जोड़नी पड़ती है। यही योग है। इसी को अद्वैत एवं समर्पण की स्थिति कहते हैं।
साधना और आराधना त्रिवेणी की तरह अवगुँठित हुई है और जीवन, तीर्थराज संगम की तरह बना है। प्रस्तुत वर्ष संसार में फैले भ्रमों का निवारण कर सकने योग्य प्रमाण साक्षी बन कर खरे सोने की तरह प्रस्तुत हुआ है इसकी हीरक जयन्ती परिजनों ने मनाई है तो उसे प्रस्तुत जीवनशैली के प्रति आस्था का प्रकटीकरण ही कहा जा सकता है। जीवन के 75 वें वर्ष में मनाई जाने वाली हीरक जयन्ती का द्विवर्षीय कार्यक्रम था। इसलिए इस वर्ष उसका समापन किया जा रहा है तो इसमें कुछ हर्ज भी नहीं है।
साधना नहीं थी। विश्व-कल्याण एवं भारत का अभ्युदय इसका लक्ष्य था। इसे प्रचण्ड कुण्डलिनी जागरण स्तर पर करना पड़ा और भागीरथ, दधीचि जैसे कठोर अनुबन्धों का पालन करना पड़ा। तीन वर्ष सुरक्षित रूप से व्यतीत हो गये। यह आश्चर्य है, अन्यथा विश्वामित्र के त्रेता वाले यज्ञ की तरह उसमें विध्वंस व्यवधान के भी प्रयत्न होते और कई सुबाहु, मारीचि, ताड़का जैसे असुर तत्व अपने-अपने ढंग से छद्म आक्रमण करते।
साधना के अंतर्गत किये जाने वाली सविता देव की प्रकाश ज्योति की ध्यान धारणा में भी कई रंगों के प्रकाशों का दर्शन होना भी दिव्य अनुभूतियों की श्रेणी में ही गिना जायगा।
साधना कितना असामान्य प्रभाव परिणाम उपलब्ध कराती है।
साधना की प्रखरता और व्यक्तित्व की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती है।
साधना के लिए प्रकाश ध्यान को ही अपनाना पड़ता है। गायत्री की उच्चभूमिका सवितामय बन जाती है। गायत्री का प्राण प्रकाश पुंज सविता देवता ही है, अस्तु समुन्नत भूमिका के साधक प्रकाश के ध्यान का ही अवलम्बन करते हैं। विभिन्न प्रसंगों में श्रुति यही कहती आयी है। ताण्ड्योपनिषद (10/5/3) कहता है- “तेजसा वे गायत्री एवं ज्योतिर्वे गायत्री छन्दसाम्” (13/7/2) यजुर्वेद कहता है- “सविता वे प्रसकानामीशे अर्थात् सबको उत्पन्न करने वाला परमेश्वर सविता है।
साधना में लगाने लगे।
साधनाओं अध्यात्म उपचारों द्वारा प्रभावित किया जा सके तो मानव उन अगणित विभूतियों से संपन्न हो सकता है, जिन्हें हम सिद्धियों के रूप में जानते हैं।
साधना क्षेत्र का वह पक्ष आरंभ होता है जिसे युग के अनुरूप एक उपलब्धि माना जा सके और असंख्यों अध्यात्मवादी उच्चस्तरीय लाभ उठा सकें।
साधनाएं भी कीं, पर उनने कुछ ही समय में यह अनुभव कर लिया कि इस जाल जंजाल में कुछ सार नहीं। भ्रान्तियों के भटकाव और व्यवसाइयों के आडम्बर भर पर यह सारा खेल खड़ा है। उनने गहन चिन्तन, मनन और आप्त जनों के परामर्श से यह निष्कर्ष निकाला, कि जीवनचर्या में आदर्शों का समावेश और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की सेवा साधना ही सच्चे आध्यात्म का प्रयोजन पूरा करती है। वे सीमित उपासना का क्रम बनाकर शेष समय लोक साधना में लगाने लगे।
साधना का समापन। यह सावित्री साधना का एक प्रयोग था। उसे देश की देवात्मा कुण्डलिनी का जागरण कह सकते हैं। यह किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए की गई साधना नहीं थी। विश्व-कल्याण एवं भारत का अभ्युदय इसका लक्ष्य था।
साधना का व्रत लेने से संभव होती है। योग की यही तीन धाराएँ हैं, जिनका साधक को समुचित समन्वय करते हुए ही आगे बढ़ना होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-November
साधना प्राणायाम विधा का अध्यात्म मिश्रित अगला चरण है। उससे ध्यान धारणा की पूर्व भूमिका बनती है और आत्मिक प्रगति की दिशा में और अधिक चल पड़ना संभव होता है।
साधना के लिए मन को साधना पड़ता है। संयम से शक्तियों का बिखराव रुकता है और समग्र क्षमता एक केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित होती है। फलतः उस मनःस्थिति में जो भी काम हाथ में लिया जाय, सफल होकर रहता है।
साधना कर लेने पर अगणित वैज्ञानिक उपकरणों तथा अवलंबनों का समुच्चय एक ही स्थान पर मिल जाता है। अन्तराल में छिपे हुए यह शक्ति स्रोत जब गतिशील होते हैं तो मनुष्य देव मानव की सिद्ध पुरुष की- भूमिका निभाने लगता है। यह विभूतिमत्ता कहीं बाहर से नहीं आती अपितु भीतर से ही उगती है। साधना किसी देवता को फुसलाने या अनुगृहीत करके बदले में अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए नहीं की जाती। उनका उद्देश्य अन्तराल की उस तिजोरी की चाभी प्राप्त करना है जिसमें दिव्य-लोक की अनेकानेक रहस्यमयी सिद्धियों के भण्डार भरे पड़े हैं।
साधना विज्ञान द्वारा की जा सकती है। अपना पूर्व जन्म जाना जा सकता है और दूसरों के सम्बन्ध में ऐसा विवरण बताया जा सकता है जो परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरे।
साधनाएँ की जाती हैं। एकाग्रता से यह साधनाएँ सफल होती हैं अथवा इन साधनाओं के सहारे एकाग्रता की सिद्धि होती है। यह नहीं कहा जा सकता।
साधना का स्वरूप, आधार और विधान का दिग्दर्शन रहेगा। फरवरी अंक को “इक्कीसवीं सदी” अंक के रूप में निकाला जा रहा है, जिसमें उस भवितव्यता का विवरण रहेगा जो अगली शताब्दी में घटित होकर रहेगा। इसे ऐसी भविष्यवाणी का समुच्चय कहा जा सकता है, जिसके घटित होने की संभावना पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। इसके उपरान्त भी पाठ्य सामग्री से लेकर पृष्ठ संख्या और कलेवर में जो कुछ अभिवृद्धि संभव होगी, उसमें कुछ उठा न रखा जाएगा।
साधना किये कुछ व्यक्तियों में अतीन्द्रिय क्षमताएँ अनायास ही विकसित हुई देखी गयी हैं।
साधनाएँ सफल होती हैं अथवा इन साधनाओं के सहारे एकाग्रता की सिद्धि होती है। यह नहीं कहा जा सकता।
साधना को प्रमुखता देने का परिणाम यह हुआ कि प्रदूषण, विकिरण, बहुप्रजनन, अणु युद्ध जैसी विभीषिकाएँ सामान्य जीवन को राहु-केतु बनकर आतंकित कर रही हैं। अब अगले चरणों की तैयारी है। उसमें नीतिमत्ता, धर्मनिष्ठा का स्थान जब विडम्बनायें ग्रहण करेंगी तो न कहीं सत्साहित्य दृष्टिगोचर होगा, न सत्संग। न निर्दोष मनोरंजन होगा, न आदर्शवादी प्रचलन। इन परिस्थितियों में घिरी हुई मनुष्य जाति दीन-हीन और दयनीय ही बनकर रहेगी।
साधना मार्ग है। इस पर चलते हुए सचेष्ट व्यक्ति उन क्षमताओं को जगाकर हस्तगत करता है, जो सर्व साधारण को आश्चर्य चकित करती हैं। उन चमत्कारों को लोग देवी देवताओं का वरदान उपहार मानते हैं और इसे अदृश्य शक्तियों की अनुकम्पा मानते हैं किन्तु तथ्यतः वह आत्म-जागरण का ही प्रतिफल होता है। बौद्धिक तथा भावनात्मक संपदाओं का केन्द्र बिन्दु अपना अन्तःकरण ही है। साधारण स्थिति में पड़ा रहने पर वह पेट-प्रजनन और प्रदर्शन की क्षुद्रताओं को पूरा करने के प्रयत्न में ही जुटा रहता है।
साधना में ही मिल गई है कि आवश्यकता पड़ने पर हम आप में से किसी आमंत्रित करने वाले तक अपने विचारों का सम्प्रेषण कर सकें।
साधना पड़ता है। संयम से शक्तियों का बिखराव रुकता है और समग्र क्षमता एक केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित होती है। फलतः उस मनःस्थिति में जो भी काम हाथ में लिया जाय, सफल होकर रहता है।
साधना की सिद्धि तो हो जाती है, पर यदि प्राण को ऊपर से नीचे उतारना न बन पड़ा और धड़कन फिर से तेज न हो सकी तो उस मध्यवर्ती व्यवधान की अवाँछनीय प्रतिक्रिया भी हो सकती है। पक्षाघात उन्माद जैसा कोई रोग भी हो सकता है। निर्विकल्प समाधि की आवश्यकता इसलिए समझी गई है कि नियत समय तक स्थूल शरीर को निश्चेष्ट करके अचेतन मन को इष्टदेव में या किसी महान प्रयोजन में नियोजित किया जा सके। इतने भर काम के लिए इतना बड़ा झंझट मोल लेना जोखिम भरा है। यह कार्य तो प्रत्याहार, धारणा, ध्यान को परिपक्व करने से भी हो सकता है।
साधनाओं का उद्देश्य एकाग्रता को हस्तगत करना है। इसी निमित्त ध्यान, नाद और प्राणायाम की त्रिविधि साधनाएँ की जाती हैं। एकाग्रता से यह साधनाएँ सफल होती हैं अथवा इन साधनाओं के सहारे एकाग्रता की सिद्धि होती है। यह नहीं कहा जा सकता।
साधना” अंक होगा। इसमें विगत तीन वर्षों की गुरुदेव की कठोर सावित्री साधना का स्वरूप, आधार और विधान का दिग्दर्शन रहेगा। फरवरी अंक को “इक्कीसवीं सदी” अंक के रूप में निकाला जा रहा है, जिसमें उस भवितव्यता का विवरण रहेगा जो अगली शताब्दी में घटित होकर रहेगा। इसे ऐसी भविष्यवाणी का समुच्चय कहा जा सकता है, जिसके घटित होने की संभावना पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। इसके उपरान्त भी पाठ्य सामग्री से लेकर पृष्ठ संख्या और कलेवर में जो कुछ अभिवृद्धि संभव होगी, उसमें कुछ उठा न रखा जाएगा।
साधना से हो सकता है। प्रत्यक्ष में प्रकट होने से पूर्व किसी भी घटना का पूर्व रूप अदृश्य जगत में बन जाता है। यह अभ्यास अनेक पशु पक्षियों को होता है। कोई दुर्घटना घटित होने वाली होती है या ऋतु परिवर्तन होना है तो वे अपनी सूक्ष्म क्षमता से उसकी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं और बचाव के उपाय समय रहते करने लगते हैं। मौसमी गुब्बारे उड़ाकर यह जाना जाता है कि वर्षा कब और कहाँ होने वाली है।
साधना क्षेत्र में अनुदानों के और भी अनेक उदाहरण हैं।
साधनाओं के सहारे एकाग्रता की सिद्धि होती है। यह नहीं कहा जा सकता।
साधना के प्रथम चरण यम और नियम आदर्शवादी तो हैं, पर व्यवहार में साधारणजन सहज ही नहीं उतार सकते। इसलिए साम्प्रदायिक धर्म के दिन लद गए ऐसा कहा गया है। उसके स्थान पर अध्यात्म की प्रतिष्ठा होगी। अध्यात्म का एक शब्द में परिचय करना हो तो प्रामाणिकता और दूरदर्शिता उसे कह सकते हैं। भविष्य में न्याय और विवेक की प्रतिष्ठापना होगी ऐसा मानकर चला जा सकता है।
साधना किसी देवता को फुसलाने या अनुगृहीत करके बदले में अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए नहीं की जाती। उनका उद्देश्य अन्तराल की उस तिजोरी की चाभी प्राप्त करना है जिसमें दिव्य-लोक की अनेकानेक रहस्यमयी सिद्धियों के भण्डार भरे पड़े हैं।
साधनापरक हंटर के सहारे मन को मात्र सुविचारों में संलग्न होने के लिए- उपयुक्त एकाग्रता अर्जित करने के लिए- प्रयत्न करना पड़ता है। यही ध्यानयोग का स्वरूप एवं उद्देश्य है।
साधना मार्ग अपनाने पर प्रस्फुटित भी होती हैं। शरीर अपने आप में एक उच्चस्तरीय बिजली घर है। उसकी साधना कर लेने पर अगणित वैज्ञानिक उपकरणों तथा अवलंबनों का समुच्चय एक ही स्थान पर मिल जाता है। अन्तराल में छिपे हुए यह शक्ति स्रोत जब गतिशील होते हैं तो मनुष्य देव मानव की सिद्ध पुरुष की- भूमिका निभाने लगता है। यह विभूतिमत्ता कहीं बाहर से नहीं आती अपितु भीतर से ही उगती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-May
साधना है। उसे बड़े स्तर पर किया जाता है। यह कठिन कार्य है। अपनी एक सता को पाँच भागों में विभक्त करके पाँच पाण्डवों जैसा एक यूनिट खड़ा करने जैसा। इसके लिए कुन्ती जैसी लगन, श्रद्धा, हिम्मत और कष्ट सहिष्णुता चाहिए।
साधना में वे भागीदार होना चाहते हों तो उनके लिए एक सरल तरीका ढूँढ़ निकाला गया है। वह यह कि वे पाँच कोशों की साधना को अपने व्यावहारिक जीवन में- गुण, कर्म, स्वभाव की तरह सम्मिलित करने का प्रयत्न करें।
साधना है।
साधना अवधि मानी गई है।
साधना का सूर्य हाथ लग गया और प्रगति पथ पर चलने- लक्ष्य तक पहुंचने का शुभारम्भ हो गया।
साधना वस्तुतः पंचकोशों की साधना है। उसे बड़े स्तर पर किया जाता है। यह कठिन कार्य है। अपनी एक सता को पाँच भागों में विभक्त करके पाँच पाण्डवों जैसा एक यूनिट खड़ा करने जैसा। इसके लिए कुन्ती जैसी लगन, श्रद्धा, हिम्मत और कष्ट सहिष्णुता चाहिए।
साधना के लिए आहार को अधिकाधिक सात्विक और सीमित बनाया जाय ताकि अन्न के अनुरूप मन में भी सात्विकता उमंगे।
साधना और उदारता को अपने में धारण करने का प्रयत्न करें।
साधना की जाती है उसे गायत्री उपासना समझा जाय। आध्यात्मिक प्रयोजनों में स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि आदि की गणना होती है और भौतिक प्रयोजनों में रोग, शोक, उद्वेग, दरिद्व, शत्रुता, आक्रमण, अभाव जैसे कारणों की गणना होती है। इन वस्तुओं के लिए दयालु माता से प्रार्थना की जा सकती कि वे अपनी और दूसरे सम्बन्धित लोगों की बुद्धि में सुधार करके उपस्थित संकटों का निराकरण करें।
साधना से “तप” का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। तपस्वी ही उस दिव्यता को उपार्जित एवं धारण कर सकते हैं। शरीर, मन और प्राणों को तपाकर पानी को भाप- पारे को मकरध्वज बनाने वाली प्रक्रिया कठिन है। उसकी और अनधिकारी चल पड़े तो अच्छे-खासे स्वास्थ्य को भी बिगाड़ बैठते हैं। वह काया-कल्प जैसी अद्भुत और अनुभवी लोगों के संरक्षण से सफल हो सकने वाली प्रक्रिया है।
साधना की विशिष्टता श्रद्धा विश्वास के आधार पर ही फलित होती है। इस धारणा में जब शास्त्रकार और गुरुजन ही परस्पर सहमत न हो पाये और जिज्ञासु के सम्मुख अनेक सिद्धान्तों का अनेक विधानों की हाट खोल कर रखें तब यह बड़ी कठिनाई होती है कि इनमें से किनका चयन किया जाय। निश्चय ही दिग्भ्रांत स्थिति में पड़ा हो तो किसी मार्ग को अपनाना कैसे बन पड़े। सन्देह सदा यही बना रहेगा कि जो किया जा रहा है वह भटकाव तो नहीं है। इसकी तुलना में यदि अन्य मार्ग अपनाया गया होता तो क्या बुरा होता?
साधना भर से क्रमशः अधिक तेजस्वी हो सकता है।
साधना करने वाले कापालिक भी ऐसी विलक्षणताएं प्राप्त कर लेते हैं कि वे किसी को क्षति पहुँचा सकें। लाभ तो वे बेचारे क्या पहुँचा सकते हैं। हाँ किसी कुकर्म में किसी को सफलता दिलाकर उसके बदले में उपहार पा सकते हैं।
साधना कह सकते हैं। इसी प्रयोजन के लिए सुर्योदय के समय एक माला गायत्री जप विधि पूर्वक या मानसिक रूप से करने के लिए कहा गया है। 24 लाख साधक इसे कर रहे हैं और 24 करोड़ का जप प्रतिदिन हो रहा है। इसे और भी आगे बढ़ाने का प्रयत्न किया जाय तो यह संख्या और भी बढ़ सकती है और उससे अदृश्य वातावरण के परिशोधन में भारी सहायता मिल सकती है।
साधना का यह क्रिया पक्ष है। अनेक प्रसंगों, विवादों संदर्भों में उलझने और अनेकानेक क्रिया-काण्डों में से किसे चुनना- यह कार्य बड़ा कठिन है। क्योंकि शास्त्रकार अपने-अपने प्रतिपादनों पर इतना जोर देते हैं कि विश्वासी के लिए वह सर्वोत्तम प्रतीत होता है। फिर जिज्ञासु के लिए अन्य ग्रन्थों को पढ़ने की भी मनाही नहीं है। उनका अवलोकन करने पर दूसरे पक्ष सामने आते हैं।
साधना में ही गिना जायगा।
साधना कर सकते हैं।”
साधना को अपने व्यावहारिक जीवन में- गुण, कर्म, स्वभाव की तरह सम्मिलित करने का प्रयत्न करें।
साधना, पुण्य-परमार्थ जैसे विषय आते हैं। उनका तात्पर्य मिल बाँटकर खाने और हँसती-हँसाती जिन्दगी जीने से है। इसे “वसुधैव कुटुम्बकम्” सूत्र के अंतर्गत समेटा जा सकता है। कोई व्यक्ति दूसरों को सुखी समुन्नत बनाने की सचमुच ही इच्छा करें तो उसका एक ही आधार हो सकता है कि अपने आपको संयमी, मितव्ययी, अपरिग्रही और महत्वाकाँक्षाओं से रहित बनाये। स्पष्ट है कि आदर्शवादी महत्वाकाँक्षाएँ पूरी करने के लिए अपनी सुविधा एवं विलासताओं, तृष्णाओं में कमी करनी पड़ती है और औसत भारतीय स्तर का जीवनयापन करते हुए निर्वाह करना पड़ता है।
साधना अपनाने और पिण्ड रूप में ढाल सकने में समर्थ ही हुई।
साधना में अन्तर्द्वन्द्व को आमन्त्रित करना होता है। अपने गुण कर्म, स्वभाव, रीति-नीति एवं आदतों को कड़ी दृष्टि से नित्य निरीक्षण करना और जो अनुपयुक्तता भीतर घुसी हुई हो उनके विरुद्ध विद्रोह खड़ा करके कूड़े करकट की तरह बुहार फेंकना, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को हठपूर्वक स्थापना करना। कुकल्पनाओं के उठते ही उनके विरुद्ध उच्च विचारों को भिड़ा देने में विलम्ब न करना यही मनोमय कोश की साधना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-July
साधना वह है, जिसमें तप−तितिक्षा को सहना पड़ता है। जन्म-जन्मांतरों की पशु-प्रवृत्तियाँ मनुष्य जीवन के साथ भी बँधी-चिपकी चली आती हैं, वे सहज छूटती नहीं। अनगढ़ व्यक्ति नर-पशुओं-सा ही जीवन जीते हैं। उन्हें मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अंकुश अपनाते नहीं बनता। अस्तु मनःक्षेत्र में कुत्साएँ तज्जनित कुंठाएँ सदा घेरे रहती हैं और व्यक्ति को खिन्न-उद्विग्न बनाए रहती हैं।
साधना सिद्धि प्रदान किए बिना नहीं रहती।
साधनाओं के लिए व्यक्ति के स्तर के अनुरूप भिन्न-भिन्न प्रकार के विधि-विधान निर्धारित हैं। साधक की पात्रता, अभिरुचि और मनःस्थिति देखकर यह पता लगाना पड़ता है कि उसमें कितना भार वहन करने की क्षमता है। तद्नुरूप ही उसे मार्ग का चयन एवं निर्धारण करना होता है। सभी की क्षमता एवं रुझान एक जैसी नहीं होती, इसलिए उसे अपने स्थिति के अनुरूप जो उचित है वही अपनाना पड़ता है।
साधना में
करना पड़ता है। यह दूसरों को हानि पहुँचाने की तुलना में अधिक मूल्यवान और
कष्टसाध्य है। ऐसी दशा में उसका उपयोग भी दूरदृष्टि से महान प्रयोजन के लिए
ही होना चाहिए, तभी इस महाविद्या की सार्थकता एवं सफलता है।
साधना भली प्रकार बन सके। पर जो ठाली जीते हुए भी व्यस्तता का बहाना करे और औसत भारतीय स्तर की सुविधाएँ रहते हुए भी अभावग्रस्तता का रोना रोए, तो उस प्रवंचना के लिए कोई क्या करे?
साधना में ॐकार ध्वनि को प्रमुख मानते हैं। उनका कथन है कि सृष्टि के आदि में प्रकृति और पुरुष का समावेश होने पर घड़ियाल में हथौड़ा मारने पर जो थरथराहट भरी ध्वनि होती है। वही ॐकार का वास्तविक स्वरूप है। यह केंद्र अब भी उसी प्रकार चल रहा है। घड़ी के पेंडुलम में जिस पर एक छोर से दूसरे छोर पर पहुँचने से खट-खट की आवाज होती है।
साधना के सहारे अपने को निखारा जाता है। संयम ही तप है। तप ही अंतःकरण की प्रचंडता को प्रदीप्त करता है। इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम के सहारे मनुष्य उन अनाचारों से बच सकता है, जो उसकी दुर्गति के प्रधान कारण हैं, शरीर के लिए औसत नागरिक स्तर पर निर्वाह और सृजन स्तर का बड़प्पन प्राप्त कर लेना पर्याप्त होना चाहिए। इस स्तर को अपना लेने भर से कोई व्यक्ति तपस्वी हो सकता है और संचित कुसंस्कारों, कषाय-कल्मषों से छुटकारा पा सकता है।
साधना जीवन जीने की कला का नाम है। जो मानवी अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकालकर सुसंस्कृत पद्धति से जी सका, उसे सर्वोपरि कलाकार कह सकते हैं।
साधना के लिए मार्ग ही बनता है। मेले-ठेले की घिच-पिच में रास्ता चलना तक दूभर हो जाता है। एकदूसरे को धकेलते हुए ही आगे बढ़ते हैं। उस माहौल में कहीं शांत चित्त बैठना जैसा कृत्य तो बन ही नहीं पड़ता। इसलिए यह भी आवश्यक है कि अंतर्मौन का अभ्यास किया जाए।
साधना करते थे। एक दिन वन से लौटते हुए मार्ग में उन्हें एक आहत रूपवती स्त्री पड़ी दिखाई दी। कौत्स एक क्षण इसे देखने व उसकी सहायता करने को रुके; परंतु दूसरे ही क्षण वे अपने आश्रम की ओर चल दिए।
साधना एवं औचित्य-मर्यादा तक ही सीमित नहीं रह जाते, वे अनीति अपनाते, उद्धत कर्म करते, आतंक जमाते और जो भी संभव है, उसे बिना न्याय अन्याय का भेद किए कर गुजरते हैं। चर्चा का विषय बनते हैं और अपनी समर्थता का परिचय देते हैं। तथाकथित सफल मनोरथों और बड़े आदमियों में ऐसे ही लोगों की गणना होती है। सफलताओं का चमकीला सेहरा भी उनके सिर पर बँधता देखा गया है।
साधना है, उसमें नासिका से वायु खींचते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ का शब्द साँस के साथ होते रहने की धारणा की जाती है। इस सोऽहम् में भी बीजरूप में ॐकार छिपा हुआ है। वेदांत दर्शन के प्रमुख सूत्रों का विस्तार इसी आधार पर हुआ है। शिवोऽहम्–सच्चिदानंदोऽहम् का वेदांत भी ॐकार मूलक है।
साधना के समतुल्य ही ‘सोऽहम्’ साधना है, उसमें नासिका से वायु खींचते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ का शब्द साँस के साथ होते रहने की धारणा की जाती है। इस सोऽहम् में भी बीजरूप में ॐकार छिपा हुआ है। वेदांत दर्शन के प्रमुख सूत्रों का विस्तार इसी आधार पर हुआ है। शिवोऽहम्–सच्चिदानंदोऽहम् का वेदांत भी ॐकार मूलक है।
साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है, वह कम है। उन्हें सफल जीवन जीने के लिए अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिए। सो वे काॅलेज जाने लगीं और 69 साल की उम्र में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय की स्नातक बन गईं।
साधना को कर्णपिशाचिनी अथवा ‘यक्षिणी’ कहा गया है, जो पूछने पर दूर-दूर के समाचार एवं संभावित आधारों का विवरण इस प्रकार बताती है मानो कान में मुँह लगाकर सारा घटनाक्रम बता गई हो।
साधना एवं विद्या का अवगाहन होना चाहिए। इसके लिए प्राणशक्ति की
धनी प्रतिभाओं को आगे आना चाहिए।
साधना करनी चाहिए।”
साधना से विचलित कर दे, अतः मैंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आसक्ति विषय को टाल देना ही उचित समझा।" महर्षि कण्व ने कौत्स को समझाया— “वत्स! निर्धन, दरिद्र व अकर्मण्य मनुष्यों की सहायता करना ही सबसे बड़ी साधना है।”
साधना जैसी स्थिति सन् 2000 तक मानी जा सकती है। पिछले ढाई वर्षों से हम जो कर रहे हैं, वह परोक्ष ही है और इतना अधिक है कि उसे प्रत्यक्ष की तुलना में असंख्य गुना कहा जाए तो कुछ अत्युक्ति न होगी। इन गतिविधियों का एक छोटा-सा प्रसंग प्रज्ञा परिजनों की देखभाल, साज-संभाल करने के लिए है, जिसमें रत्ती भर भी कमी नहीं आने वाली है।
साधना को अमोघ-अस्त्र की तरह पाया है और कहा है कि उस आधार पर मन की चंचलता को काबू में किया जा सकता है और निग्रहित मन अपनी एकाग्र शक्ति से भौतिक एवं आत्मिक स्तर की अनेकानेक सफलताएँ प्राप्त कर सकता है।
साधना में कषाय-कल्मषों से जूझना और निरस्त करना पड़ता है। साथ ही सत्प्रवृत्तियों का उन्नयन-संवर्धन भी। संतुलन इसी प्रकार बनता है। लोक-व्यवहार में भी यह उभयपक्षीय विधि-व्यवस्था कार्यांवित की जाती है। इंजन उलटा भी चलता है और सीधा भी।
साधना होती है। इंद्रिय संयम, समय संयम, अर्थ संयम, विचार संयम इन चारों के समग्र सम्मिलन से आत्मशोधन की प्रक्रिया पूरी होती है। इसके अतिरिक्त परमार्थ सेवा कार्यों से सधता है। पिछड़ों को ऊँचा उठाने की, विपत्तिग्रस्तों को सामयिक सहायता देकर उनका दुःख हलका करना होता है। साथ ही यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि बहानेबाज जिस-तिस बहाने किसी की श्रद्धा-सद्भावना का दोहन न करें।
साधना का महत्त्व है। विशेषतया जिह्वा का अवरोध तो इसलिए करना पड़ता है कि, असत्य या अनावश्यक वचन न निकालने का अभ्यास हो जाए और वह भी उस स्तर तक पहुँच जाए कि किसी से कहे हुए वचन अपना प्रभाव छोड़ने लगें। उसे सत्परामर्श देकर उपयोगी मार्ग पर चला सकें। वक्तृता में इतनी क्षमता उत्पन्न हो जाए कि उसका प्रभाव आशाजनक पड़ने लगे। वह वाणी किस काम की, जिसका कथन कतरनी की तरह चलता रहे।
साधना की संपदा का अहिर्निश उपार्जन चलता रहता है और उसे खुले हाथों से खर्च किया जाता रहा है, जिसका लाभ उठाने से किसी को रोका नहीं गया है। प्याऊ या सदावर्त से भूखे-प्यासे एवं अस्पताल से किसी घायल को लौटाया नहीं जाता, अपने पराए का भेद नहीं जाता, किंतु साथ ही यह भी सही है कि अपनों का सुनिश्चित दायित्व पूरा करने में कभी आनाकानी नहीं की जाती। न बच्चों को भूखा-नंगा रहने दिया जाता है, न वयस्कों को कुँआरा, न वृद्धों को उपेक्षित। निजी परिवार की जिम्मेदारियाँ ऐसी हैं, जिन्हें अनिवार्य माना जाता है। बच्चों को भूखा रखकर भिखारियों को दान वितरण कोई असामान्य ही भले करते हों, पर नीति और दायित्व की मर्यादा पहले अपनों की, फिर बिरानों की देखभाल की व्यावहारिकता सुझाती है।
साधना है।”
साधना सफल नहीं होती।”
साधना सर्वसाधारण के लिए पर्याप्त है। सज्जनता अपनाए रहना, शालीनता को हाथ से न जाने देना, सहृदय एवं भाव-संवेदना से प्रेरित उदारता को स्वभाव में सम्मिलित रखना। नियमित, व्यवस्थित और आदर्शवादी जीवन जीना। यह गुण-कर्म-स्वभाव की वरिष्ठता किसी आध्यात्मिक साधना से कम नहीं। इसलिए सिद्धपुरुष न सही मानव गरिमा अक्षुण्ण रखे रहने वाले पुण्यपुरुष निश्चित रूप से बनकर रहता है।
साधना उनके लिए अच्छी है, जिन्हें बहुत बोलने की, शेखीखोरी की, गपबाजी करने, निंदा चुगली किए बिना चैन न पड़ने की आदत है। कई लोग पैरों को हिलाते, हाथों को मरोड़ते, बिना खुजली के खुजलाते रहते हैं। कुछ न कुछ किए बिना चैन नहीं पड़ता।
साधना नित्य करने से आत्मजागरण का लाभ मिल सकना सरल हो जाता है। जिसकी आत्मा जग पड़ी उसके लिए संसार देवलोक के नंदन वन से कम आनंददायक नहीं रहता।
साधनाएँ करते हैं, उनमें उन्हीं तीन अनुबंधों का समावेश होता है। कंद-मूल, फल का आहार ऋषि करते थे, पर अब वैसे बन नहीं रहे। अमृताशन-खिचड़ी, शाकाहार, छाछ जैसी वस्तुओं पर घर-गाँवों में रहने वाले तपस्वी भी निर्वाह कर सकते हैं। मौन जिह्वा पर जटिल अंकुश को नहीं कहते; वरन उसे मानते हैं जिसमें आदर्शों की कहने-सुनने की छूट किसी नियत समय पर रहे। एकांत सेवन गुफा की तरह ऐसे कमरे में भी हो सकता है जहाँ आवागमन, वार्त्तालाप या धमा-चौकड़ी का माहौल न हो।
साधना से कम नहीं। इसलिए सिद्धपुरुष न सही मानव गरिमा अक्षुण्ण रखे रहने वाले पुण्यपुरुष निश्चित रूप से बनकर रहता है। उसकी भी सद्गति ही होती है। जीवन की सार्थकता इतने भर से सध जाती है।
साधना है। इसी को पंचाग्नि विद्या कहा गया है।
साधना की।
साधना पर दिया है, उतना ही अवांछनीयता की भर्त्सना और प्रताड़ना पर भी। यह नीति अपने ऊपर भी लागू होती है, दूसरों पर भी। दुष्कर्मों के लिए प्रायश्चित का विधान है और अनाचार के दमन का भी। रामराज्य की स्थापना से पूर्व असुरता दमन की आवश्यकता पड़ी थी। विशाल और सुसंस्कृत भारत के निर्माण में प्रथम भूमिका कुरुक्षेत्र में धर्मयुद्ध लड़ना पड़ा था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-September
साधनाओं के विधान थे। इस युग में यदि औसत नागरिक स्तर का निर्वाह और छोटे से छोटा निजी परिवार रखा जा सके तो समझना चाहिए कि उन हजार व्यवधानों का हल निकल आया जो किसी सहृदय व्यक्ति को लोकमानस का परिष्कार करने के निमित्त कदम बढ़ाने में पग-पग पर अवरोध खड़े करते हैं। इतना आत्म-संयम बरतने के उपरान्त यह प्रश्न उठता है कि पुण्य परमार्थ की दृष्टि से क्या किया जाना चाहिए? विश्व संकट के दलदल में फँसे हुए जन समुदाय को उबारने के लिए क्या होना चाहिए?
साधना ही है जो तुच्छ वस्तुओं को कुछ से कुछ बना कर रख देती है।
साधना की योजना में संलग्न रहते हैं और अपना निर्वाह अपरिग्रही की तरह करते हैं। साधु, ब्राह्मण वर्ग का वह पक्ष है जो विरक्त वानप्रस्थ रहकर परिव्राजक की तरह अलख जगाता-वायु की तरह प्राण संजोता और बादलों की तरह सद्विचारों का अमृत बरसाता है। इस वर्ग को श्रेष्ठ, पूज्य और भगवान के अधिक समीप इसलिए माना गया है कि वे भगवान के परमार्थ परक प्रयोजनों में निरन्तर लगे रहते हैं, अपने स्वार्थ साधन को सर्वथा भुलाये रहते हैं।
साधना विश्व संस्कृति में नई हलचल पैदा करने के लिए प्रदान की और शिष्य ने अनुभव किया कि उनके प्राण और शरीर में गुरु ही काम कर रहा है। उनने संसार भर में रामकृष्ण मिशन मठों की स्थापना की। निजी महत्वाकाँक्षा से प्रेरित होकर विवेकानन्द नाम की एक कुटिया भी कहीं नहीं बनाई।
साधना से ही नहीं, नियत कर्त्तव्य, कर्म निष्ठापूर्वक करते रहने से भी ‘आध्यात्मिक का लक्ष्य’ पूरा हो सकता है और सिद्धियाँ मिल सकती हैं।
साधना में संलग्न रहना पड़ रहा है। संपर्क की सुविधा में कटौती हुई है। फिर भी इतना निश्चित है कि हम अपनों की पहचान भूले नहीं हैं। किसकी सहायता करनी चाहिए, किसके लिए क्या करना चाहिए, यह वात्सल्य अभी भी टूटा नहीं है। आशा की जानी चाहिए कि प्राणों में घुली यह विशेषता भविष्य में भी ज्यों की त्यों बनी रहेगी।
साधना में निरत होते हुए भी भगवान की दुहाई देकर अपनी श्रमशीलता से बचते हैं, मुफ्त का सम्मान और धन लूटते हैं, उन्हें रास्ते पर लाया जाना चाहिए और बताना चाहिए कि देश के 7 लाख गाँवों के लिए 60 लाख संत-महात्मा यदि लोक सेवी के रूप में उभरें तो नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक स्थिति में उत्साहजनक परिवर्तन कर सकते हैं।
साधना का कोई इतिहास, वे तो खेतों में खड़े हुए काग भगौओं की तरह हैं, जो दूर से देखने पर रखवाले जैसे प्रतीत होते हैं, पर निकट जाने पर प्रतीत होता है कि यह तो लकड़ी के ढाँचे पर घड़े का सिर और फटे कपड़े की पोशाक पहने हुए है। जिन्हें सच्चे अर्थों में किसी बड़े क्षेत्र का नेता बनना है, उन्हें चरित्र निष्ठा के अतिरिक्त सेवा प्रयोजनों के लिए समयदान-अंशदान की बढ़ी-चढ़ी उदारता भी दिखानी चाहिए। उपयोगी सेवा कार्यों में बिना किसी आमंत्रण के स्वयं दौड़ कर भागीदार बनना चाहिए। वस्तुतः चरित्रनिष्ठा और सेवा भावना एक दूसरे से पूरी तरह गुँथे हुए हैं। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-August
साधना में मन ही नहीं लगा।
साधना का तात्पर्य है- आत्मानुशासन। अपने ऊपर विजय प्राप्त करने वाले को सबसे बढ़कर योद्धा माना गया है। दूसरों पर आक्रमण करना सरल है। बेखबर लोगों पर हमला करना तो और भी सरल है। इसलिये आक्रमणकारियों को योद्धा कहने का औचित्य कम ही है।
साधना करनी पड़ती थी और न दैत्य दानवों वाली कठोर अघोरी तंत्र साधना। इसका ढाँचा प्रपंचों, अफवाहों किम्वदंतियों तथा षडयंत्र के रूप में बनाकर अघटित को घटित दिखाने का उपक्रम किया जाता था। कोई विशेष अनुभूति न होने पर भी किसी को षडयंत्र में सम्मिलित करके उसके मुख से अद्भुत घटित होने का बयान करवाना, अन्यों का उस पर विश्वास होना यह अपने ढंग का प्रपंच है।
साधना जिस तन्मयता से मन्दिर-मस्जिद-गिरजाघरों में भिन्न रूपों में चलती है, उसी तत्परता व लगन से वह ऑफिस-कारखानों में, दैनिक दिनचर्या के साथ भी चलती रह सकती है। आवश्यकता है सिर्फ इसमें रस लेने की, अभिरुचि अन्तः से पैदा करने की।
साधना करते हैं। जीवन को सरलतम, अपरिग्रही, तपस्वी स्तर का बनाते हैं। वे लोकेषणा को आत्म मार्ग का सबसे बड़ा व्यवधान मानकर ऐसे प्रपंच नहीं रचते जिसमें उनकी जय-जयकार बुले। यह सब तो सेवा मार्ग पर चलने वाले परमार्थ परायण महा पुरुषों के जन मंगल वाले कृत्य सामने आने पर अनायास ही होता रहता है। मजमा लगाने या विज्ञापन बाजी करने की आवश्यकता तो उन्हें पड़ती है जिनके पास उत्कृष्टता तो है नहीं, मात्र पोले ढोल को बजाते और नगाड़े जैसी धूम मचाते हैं।
साधना एवं भावी जीवन जीवन क्रम संबंधी रहस्योद्घाटन भी प्रस्तुत आत्म कथा में है। अपने ढंग की अद्भुत इस पुस्तक में सभी पाठकों के लिए आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने योग्य समुचित मार्ग दर्शन है। पुस्तक गायत्री तपोभूमि मथुरा से उपलब्ध है। मूल्य है रु. 6.50 डाक खर्च अतिरिक्त।
साधना पराक्रम द्वारा प्रसुप्त को जगाने का प्रयास किया जाय तो इतना कुछ हस्तगत हो सकता है जिसकी कि कल्पना भी नहीं की जा सकती।
साधना नहीं की थी, पर यह अनुदान उन्हें दैवी अनुग्रह की तरह जन्मजात रूप में ही मिला। वे किसी के पूछने पर कभी-कभी ही उत्तर देते थे। पर जब अपनी मौज मर्जी छूटती तो कथन के प्रवाह को रोकते न थे और इस प्रकार कहते चले जाते थे कि तात्पर्य समझने पर उनके मित्र ही उन्हें “बावला” कहने लगते थे।
साधना में निरत रहने लगे।
साधना में निरत रहना चाहती थी साथी ऐसा मिले तो मिल जुलकर दूना काम बन पड़े। इस विचार से उसने खोज जारी रखी। चर्चा सुनकर कागाव के पास पहुँची। उनकी भावना, चरित्र, निष्ठा एवं सेवा साधना देखकर मंत्र मुग्ध रह गयी। लड़की ने विवाह प्रस्ताव किया तो उत्तर मिला कि वे गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ कैसे निभा पायेंगे।
साधना में नीले प्रकाश का महत्व दिया गया है उन्हें प्रकाश के ऊपर नीला आवरण चढ़ाकर कृत्रिम रूप से पैदा किया जाता है। नेपोलियन अपनी पोशाक तथा अपने सैनिकों की वर्दी बैगनी रंग की बनवाता था। उसका विश्वास था कि दूसरों पर हावी होने की इस रंग में विशेषता है।
साधना का विषय है, वहाँ पुरुष वाचक प्रतिष्ठापना भी हुई है। पर उनका अनुपात अपेक्षाकृत कम ही है। नारियाँ अपने सामान्य जीवन क्रम में उस मार्ग पर अधिक दूर तक चल भी नहीं पातीं। गृह-व्यवस्था का संचालन ही उनके लिए एक पूरा तपोवन बन जाता है। फिर भी उनके लिए निषेध या प्रतिबंध नहीं है।
साधना। इसका ढाँचा प्रपंचों, अफवाहों किम्वदंतियों तथा षडयंत्र के रूप में बनाकर अघटित को घटित दिखाने का उपक्रम किया जाता था। कोई विशेष अनुभूति न होने पर भी किसी को षडयंत्र में सम्मिलित करके उसके मुख से अद्भुत घटित होने का बयान करवाना, अन्यों का उस पर विश्वास होना यह अपने ढंग का प्रपंच है।
साधना में लगे रहते। उनकी महानता की चर्चा धीरे-धीरे दूर-दूर तक फैलने लगी।
साधना में लग जाइये।
साधना देखकर मंत्र मुग्ध रह गयी। लड़की ने विवाह प्रस्ताव किया तो उत्तर मिला कि वे गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ कैसे निभा पायेंगे। इसके लिए सेवा कार्य में कटौती करने का उनका तनिक भी मन नहीं था।
साधना भला क्यों न पूरी होगी?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-June
साधना द्वारा सूक्ष्म शरीर को अधिक समुन्नत बनाया जा सके तो अपने को देवोपम बनते हुए ईश्वर का अनुग्रह पात्र बना जा सकता है और उसके निकटतम स्तर तक पहुँच सकता है।
साधना आता है कि नहीं। यह साधना एकाग्रता के बलबूते ही बन पड़ती है। यह बात किसी आध्यात्मिक भौतिक कोई भी कार्य क्यों न हो उसका सही रीति से सम्पन्न होते हैं यदि उसमें हवाई उड़ाने उड़ने वाला मन विघ्न उत्पन्न करे, तो उसी भी ठीक तरह सम्पन्न कर सकना सम्भव न हो सकेगा। अस्तु वैज्ञानिक, कलाकार, योगाभ्यास स्तर के कार्यों के लिए मन को निर्धारित प्रयोजन में एकाग्र रखना नितान्त आवश्यक है। यदि इतना भी न सध सकेगा तो लुहार-सुनार आदि मिस्त्री कारीगर तक अपना काम ठीक तरह न कर सकेगा।
साधना एकाग्रता के बलबूते ही बन पड़ती है। यह बात किसी आध्यात्मिक भौतिक कोई भी कार्य क्यों न हो उसका सही रीति से सम्पन्न होते हैं यदि उसमें हवाई उड़ाने उड़ने वाला मन विघ्न उत्पन्न करे, तो उसी भी ठीक तरह सम्पन्न कर सकना सम्भव न हो सकेगा। अस्तु वैज्ञानिक, कलाकार, योगाभ्यास स्तर के कार्यों के लिए मन को निर्धारित प्रयोजन में एकाग्र रखना नितान्त आवश्यक है। यदि इतना भी न सध सकेगा तो लुहार-सुनार आदि मिस्त्री कारीगर तक अपना काम ठीक तरह न कर सकेगा। चोट यथास्थान मारने की अपेक्षा अपने हाथ में मार लेगा और घायल हो जायगा।
साधना, चिन्तन, लेखन में तल्लीन रहने लगे।
साधना का सीधा सम्बन्ध अपनी ही विवेक बुद्धि से है। दिनचर्या बनाने में दूसरों का परामर्श क्या काम देगा। अपनी परिस्थितियों का अपने को ही ज्ञान रहता है। नित्य कर्मों में यत्किंचित् सहायता ही दूसरा कर सकता है, पर उन कार्यों से निपटना तो स्वयं ही पड़ता है। विद्याध्ययन, कसरत, भोजन, शयन के लिए उपयुक्त सुविधाएँ जुटाना भी अपना निज का ही काम है।
साधना।
साधना को अल्प प्राण वाले किन्तु व्रतशील लोगों को प्रदान करते और उनके माध्यम से संसार का हित साधन करते हैं। सद्भावनाओं और सत् प्रवृत्तियों को उकसाते हैं। यह सदुपयोग है। समर्थता का दुरुपयोग भी होता है। रावण और दुर्योधन का समूचा परिकर कुमार्गगामी हो गया था।
साधनात्मक कृत्यों की भी माँग करता है। इन दिनों 240 करोड़ प्रतिदिन का गायत्री जप और 240 लाख गायत्री चालीसा पाठ का भी व्यापक कार्यक्रम चलाया गया है। इनकी संख्या में और भी जितना अधिक अभिवर्धन हो सके करना एवं कराना चाहिए। यह साधना जितनी बढ़ेगी उतना ही अदृश्य वातावरण में दैवी तत्वों का अभिवर्धन होगा।
साधना के प्रवीण पारंगत मेघ मल्हार गाकर वर्षा कराते और दीपक राग गाकर बुझी हुई ज्योति जलाते रहे हैं। यह प्रत्यक्ष भी हो सकता है और अलंकारिक भी। संगीत से शुष्क नीरस मनों में सरसता बरस सकती है और बुझे हुए उत्साह में नए सिरे से स्फूर्ति की ज्योति का उभार दृष्टिगोचर हो सकता है।
साधनाओं का विधान है।
साधना विधान में गहरी चर्चा है। इस साधना के प्रवीण पारंगत मेघ मल्हार गाकर वर्षा कराते और दीपक राग गाकर बुझी हुई ज्योति जलाते रहे हैं। यह प्रत्यक्ष भी हो सकता है और अलंकारिक भी। संगीत से शुष्क नीरस मनों में सरसता बरस सकती है और बुझे हुए उत्साह में नए सिरे से स्फूर्ति की ज्योति का उभार दृष्टिगोचर हो सकता है।
साधना चली, वैराग्य भाव और पुष्ट हुआ। क्रमशः वस्तुएँ छूटने लगीं। पहले पंखा छूटा हवा स्वतः मिलती है, दीवालों से घिरे होने पर ही तो कृत्रिम वायु प्रवाह पैदा करने के लिए पंखा चाहिए। दूसरे क्रम में तकिया निरर्थक लगने लगा। सिर के नीचे अपना हाथ लगाना पर्याप्त है तो तकिया क्यों लिए फिरे?
साधनाओं से नुकीला सुई जैसा पतला बना लिया गया है। इसे इन्जेक्शन की तरह किसी ग्रन्थि में प्रवेश कराया जा सकता है और उसकी विकृतियों को खींचने और दिव्यताओं को बढ़ाने का काम लिया जा सकता है।
साधनाभ्यास इसी उद्देश्य के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य आत्मोत्कर्ष भी हो सकता है और भौतिक क्षेत्र में अपनी विशिष्टता का, विभूति-वैभव का चमत्कारी परिचय देना भी। आत्मोत्कर्ष क्षेत्र में स्वर्ग और मुक्ति का समावेश है। साँसारिक चमत्कार प्रस्तुत कर सकने की क्षमता को ऋद्धि-सिद्धि कहते हैं।
साधना और उन्हें ईसाई धर्म में दीक्षित करना था।
साधना करते थे। एक्युपंक्चर का शिक्षण तिब्बतियों व चीनी चिकित्सकों ने भारत में ही किया था।
साधना और आराधना का विज्ञान भी इन तीन व्याहृतियों के साथ जुड़ा हुआ है।
साधना जितनी बढ़ेगी उतना ही अदृश्य वातावरण में दैवी तत्वों का अभिवर्धन होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1986-April
साधना बल, पराक्रम वैभव प्राप्त करके सशक्त बनने के लिए। सावित्री को दूसरे शब्दों में जीवनी शक्ति कह सकते हैं। गायत्री को तो आत्म चेतना के परिष्कार और आत्मोत्कर्ष की दृष्टि से अनिवार्य माना ही गया है।
साधना नहीं हो सकती।
साधनाओं के माध्यम से अध्यात्म जीवन की उच्च कक्षाओं में पहुँचे योगी महापुरुष अनेक अलौकिक शक्तियाँ क्षमताएँ विकसित कर लेते हैं। परन्तु प्रकृति ने कई जीव जन्तुओं को भी ऐसी अलौकिक शक्तियाँ दी हैं- जिनके बिना उनका काम ही नहीं चल सकता था। उन शक्तियों और क्षमताओं के सम्बन्ध में जानकर तो आश्चर्य ही होता है और परमात्मा की अनन्त अनुकम्पा के सम्मुख नतमस्तक हो जाना पड़ता है।
साधना के लिए जाते हैं, वे भी शीतकाल में वह स्थान छोड़कर नीचे चले आते है। स्थूल शरीर धारी यह गतिविधि अपनाते हैं। क्योंकि उसे जीवित रखने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है, वे सहज उपलब्ध नहीं होते। यदि कोई हठ-पूर्वक वहाँ रहना ही चाहे तो उसे ढेरों सामग्री एकत्रित करनी पड़ेगी जैसी कि पर्वतारोहियों को कुलियों का काफिला समान ढोने के लिए साथ लेकर चलना पड़ता है। जो इस प्रकार की व्यवस्था करेगा, उसके लिए शरीर धारण किये रहना ही एक समस्या हो जायेगी।
साधनाएं नहीं हो सकतीं। यह एक साधारण बात है। सामान्य जन स्वास्थ्य लाभ या साधना आदि प्रयोजनों के लिए उपरोक्त व्यवस्थाएं बनाते और सुविधा के स्थान बदलते रहते हैं।
साधनाक्रम पवित्रता। यज्ञ संचालकों में ब्रह्मा, अध्वर्यु, उद्गाता, होता आदि व्यवस्थापक होते हैं। होता यजमान रूप में इन्हीं में से एक है। इस समूचे समुदाय को ब्रह्मचर्य, उपवास, स्नान, शुद्ध वस्त्र धारण, जप-ध्यान आदि के द्वारा अपने आपको यज्ञाग्नि की समीपता का अधिकारी बनना पड़ता है। एक और पक्ष यह है कि अग्नि कहाँ से लाई गई।
साधना की आवश्यकता नहीं है। पर जब मानवी पुरुषार्थ से काबू में न आने वाले संकट सामने हों, बड़े विनाश से टक्कर लेनी हो और सृजन के बड़े साधनों एवं अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता हो तो सावित्री की साधना अपनाना ही आत्म विज्ञान की दृष्टि से एकमात्र आधार है।
साधना का आधा भाग 24 लाख प्रज्ञा परिजनों की सेवा, सहायता, प्रगति एवं प्रेरणा के लिए सुरक्षित है। ताकि परिजनों के साथ एक प्रकार का सम्बन्ध विच्छेद जैसा रहने से किसी को यह अनुभव न हो कि हम असहाय हो गये, मार्गदर्शन का सिलसिला टूट गया। कठिनाइयों के समय सहारा देने वाली और अपनी नाव पर बिठाकर पार लगाने वाली शक्ति के सहयोग का सम्बल टूट गया। गायत्री परिवार का सृजन घनिष्ठ आत्मीयता और भाव भरे आदान प्रदान के आधार पर हुआ है। जो लोग इस छाया में एकत्रित हुए हैं, वे पहले जन्मों में भी साथ रहे थे और इस जन्म में भी साथ हैं।
साधना सूर्य साधना है। उसका माध्यम सावित्री मंत्र है। उसके माहात्म्य में शक्ति की प्रचण्ड धाराऐं उपलब्ध होने की बात कही गई है। भौतिक दृष्टि से सूर्य की शक्ति के 1/220 करोड़ वें भाग मात्र से जीव सत्ता का पोषण होने की बात कही जाती है।
साधना में विराम तथा भावी योजना का स्पष्टीकरण
साधना उपासना की दृष्टि अधिक उपयुक्त चुना है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं अध्यात्मवेत्ता लैडबीयर का कथन है कि आपत्तिकालीन स्थिति में उनकी सहायता 7000 मील दूर अदृश्य सहायकों ने ही की। इसका अनुमान सूक्ष्म शरीर की क्रियाशील विद्युत को देखकर लगाया जा सकता है। उसमें सूर्य तथा अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों से आने वाली ज्ञात और अविज्ञात किरणों का भरपूर समन्वय विद्यमान है।
साधना से भिन्न है। इसे तपश्चर्या एवं योग साधना का वह स्तर कहा जा सकता है जो सिद्ध पुरुषों ने की और जन साधारण को उसका असीम लाभ पहुँचाया।”
साधनाऐं भी ऐसी हैं जिनके सहारे अध्यात्मवादी उपलब्धियों का समुचित लाभ मिल सकता है। हठयोग की सभी क्रियाऐं ऐसी हैं जिसमें साधक की मनोभूमि और मार्गदर्शक की अपरिपक्वता बनी रहने पर उस प्रकार के प्रयोगों में कोई नई व्यवधान उठ खड़े होने की सम्भावना रहती है।
साधना से विकसित उल्लसित, प्रफुल्लित एवं तरंगित होती है।
साधना चल रही है। इस कड़ी अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण होने की बेला में न हम विचलित हो रहे हैं और न किसी दूसरे को ही विचलित होना चाहिए। प्रहलाद और ध्रुव जिस कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हुए थे, उसमें हमें भी असफल होते नहीं देखा जाएगा।
साधना में सविता देवता का ध्यान सर्वोत्तम माना गया है। सविता अर्थात् प्रातःकाल का उदीयमान स्वर्णिम सूर्य। यही गायत्री शक्ति का देवता भी है। छंद विनियोग में गायत्री का देवता ‘सविता’ कहा गया है। सविता की शक्ति सावित्री भी गायत्री ही है।
साधना में, सूर्य उपासना में, समय के अनुरूप तेजस् धरती पर खींच बुलाने के लिए यह प्रयत्न ऐसा ही है जैसे कि भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से जमीन पर खींच बुलाने के लिए बाधित किया था।
साधना के लिए कदम बढ़ाने वालों को अपनी क्रिया तलवार की धार पर चलने से कम समर्थ किन्तु जोखिम भरी नहीं समझनी चाहिए।
साधना काल में उसका ध्यान करने का प्रयत्न करता है पर वह भी निभता नहीं। क्योंकि मात्र छवि पर देर तक चित्त को एकाग्र नहीं रखा जा सकता। उसके साथ आत्मीयता भरी भावनाऐं भी जुड़नी चाहिए। उन्हें अपना कोई घनिष्ठ स्वजन सम्बन्धी माना जाना चाहिए। इसीलिए “पितु, मातु, सहायक, स्वामी, सखा” जैसी भावनाओं का आरोपण इष्ट छवि में आरोपित किया जाता है और उसके साथ घनिष्ठतम आत्मीयता एकता जोड़नी पड़ती है।
साधनाओं के सहारे कालान्तर में मिलती है। उन्हें प्राप्त करने की कठिनाइयों की बात सोचने पर मनुष्य निराश हो जाता है। निराशा की स्थिति में मनुष्य वह भी नहीं कर पाता जो कर सकता है। जिन्हें अत्यधिक कठिन, असम्भव स्तर का मान लिया जाय उनके लिए निराश मनःस्थिति के कारण जो प्रयास हो सकते थे, वे भी नहीं बन पड़ते।
साधना रूपी सम्पदा में इस समूचे परिकर का हक है और वह भविष्य में भी मिलता रहेगा।
साधना से साधना से विकसित उल्लसित, प्रफुल्लित एवं तरंगित होती है।
साधनात्मक पराक्रम के दैत्य मिलकर मथते हैं जिससे समुद्र मंथन से निकले बहुमूल्य रत्नों की तरह अनेकों विभूतियाँ साधक को उपलब्ध होती हैं।
साधना ने सहस्रों प्रचारकों से अधिक काम किया।
साधना या अन्य किसी कारण से बिगड़ गया है, उन सभी को गुरुदेव का चेहरा और शरीर देख, ओजस्वी वाणी सुन यह विश्वास हो गया कि वे चाहें तो सौ वर्ष जीवित रहने लायक उनका संयमी जीवन है। उनके मार्गदर्शक ने कोई विशेष मोर्चे पर भेजा या शरीर बदलने को कहा तो वह आदेश तो समर्पित और सच्चे शिष्य की तरह पूरा करेंगे ही, अन्यथा स्वास्थ्य के किसी कारण से उन्हें देह छोड़नी पड़े, ऐसी कोई और बात नहीं है। पिछले दो वर्षों में दो दाँत भर उनके और उखड़े हैं।
साधना खण्डित होने देते हैं और न उपलब्धियों का दुरुपयोग करने पर उलटा परिणाम हस्तगत होने की विपरीत स्थिति बनने देते हैं। जिनने इस दिशा में उपेक्षा बरती अपने को पवित्र और प्रखर नहीं बनाया वे मात्र क्रिया-कृत्यों में उलझे रहते हैं और जादूगरी का अनुकरण करते हुए ऐसी आशा लगाये रहते हैं कि करामातें हस्तगत करके लोगों को मूर्ख बनाने, उनसे यश और धन प्राप्त करने में सफलता प्राप्त करेंगे। ऐसे लोगों को अपयश और अनिष्ट ही हाथ लगता है। नैतिक पतन के गर्त में गिरने से उनका अन्तरात्मा भी दुर्बल होता है और वस्तु-स्थिति विदित होने पर प्रशंसक भी निन्दक, विरोधी बन जाते हैं।
साधना में आवश्यकता पड़ती है। उत्तेजित शरीर और अशांत चित्त से तो कोई भी आध्यात्मिक साधना नहीं हो सकती।
साधनाओं में से अधिकांश का मूल प्रयोजन है। इसके लिए तीन प्रयोग ही काम में लाये जाते रहे हैं और लाये जाते रहेंगे। (1) जप, (2) ध्यान, (3) प्राणायाम।
साधना काल में कुछ समय सोये तो उन्हें दस सपने दिखाई दिये। उन्होंने, एक पिशाच को उनने पछाड़ा, सफेद कोकिल देखी, रंगीन पंखों का पक्षी देखा। रत्नों की माला देखी। गायों का झुण्ड देखा। कमल सरोवर देखा।
साधनाएँ भी हैं जो अपूर्ण रहने पर भी किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाती। अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि लाभ सीमित मात्रा में मिले- समय कुछ अधिक लगे। इसके अतिरिक्त किसी प्रकार के ऐसे जोखिम की आशा नहीं हैं जिसके लिए चुनाव की गलती पर पश्चाताप करना पड़े।
साधना का वह स्तर कहा जा सकता है जो सिद्ध पुरुषों ने की और जन साधारण को उसका असीम लाभ पहुँचाया।”
साधना को कुंडलिनी का उच्चस्तरीय जागरण भी कहते हैं। जननेन्द्रिय मूल में शक्ति का और मस्तिष्क के मध्य सहस्रार ब्रह्मरन्ध्र का निवास माना गया है। यों एक सीमा तक इन दोनों का मिलन, संयोग मेरुदण्ड मार्ग से चलता रहता है और उसी के आधार पर शरीर एवं मन की रहस्यमयी क्रियाऐं चलती रहती हैं। पर इसको यदि ऊँचे स्तर पर जागृत किया जा सके तो प्रसुप्त शक्ति भण्डार उभरने और ऐसे क्रिया-कलाप करने लगते हैं जिन्हें देवोपम या दैत्योपम कहा जा सके।
साधना और कुंडलिनी जागरण की थोड़ी-सी संगति तो बैठती है। उसमें षटचक्रों का वेधन करना पड़ता है। उसमें पंचकोशों का जागरण हाता है। यह सभी शक्ति भण्डार हैं, पर इनमें भरी हुई सम्पदा भिन्न-भिन्न प्रकार की है। जागृत कुंडलिनी उतने ही क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखाती है जितने में कि साधक का निकटवर्ती संपर्क क्षेत्र होता है किन्तु सावित्री विश्वव्यापी है।
साधना को सिद्ध करना ही योग साधनाओं में से अधिकांश का मूल प्रयोजन है। इसके लिए तीन प्रयोग ही काम में लाये जाते रहे हैं और लाये जाते रहेंगे। (1) जप, (2) ध्यान, (3) प्राणायाम।
साधना में एक शक्तिपात प्रक्रिया का वर्णन है जिसके अनुसार एक समर्थ व्यक्ति अपने बल, पौरुष, तप आदि को दूसरे प्रियजन के लिए हस्तान्तरित कर सकता है। सुग्रीव अनेकों बार बालि से लड़ाई में हार चुक था पर जब राम द्वारा उसके गले में विजयमाला पहनाई तो उसकी स्थिति पहले की अपेक्षा सर्वथा बदल गई और उसने जाते ही विजयी की भूमिका सम्पन्न की। हनुमान से लेकर रीछ वानरों के समुदाय का राम के साथ पूर्व परिचय नहीं था और न लंका विजय में उनका कोई निजी स्वार्थ साधन। फिर भी वे मन्त्र मोहित की तरह उस अभिनव प्रयोजन में इस प्रकार जुटे मानो वह उनकी निजी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। यह आदर्श और पौरुष दूसरों का किया हुआ था।
साधना में एक छोटा विराम दिया। बसन्त पर्व पर कार्यकर्ता, जीवनदानी, प्रज्ञा पुत्र मिलकर प्रायः पाँच हजार का समुदाय एकत्रित हो गया था। सभी के मन में था कि प्रायः दो वर्ष से उनके दर्शन न हो सके, उनके वचन सुनने को नहीं मिले। उनकी आतुरता एवं गुरुदेव की आत्मीयता का सम्मिश्रित रूप ऐसा बना कि साधना क्रम यथावत् चलाते हुए दो घण्टे नित्य किन्हीं वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों से मिलने का आदेश मिल गया। अस्तु वे गायत्री नगर के प्रवचन मंच पर आये।
साधना अपनाना ही आत्म विज्ञान की दृष्टि से एकमात्र आधार है।
साधना क्रम यथावत् चलाते हुए दो घण्टे नित्य किन्हीं वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों से मिलने का आदेश मिल गया। अस्तु वे गायत्री नगर के प्रवचन मंच पर आये। उन्होंने अब तक की अपनी साधना की सफलता पर प्रकाश डाला। कहा- “वह जीवन के पिछले दिनों की गई साधना से भिन्न है। इसे तपश्चर्या एवं योग साधना का वह स्तर कहा जा सकता है जो सिद्ध पुरुषों ने की और जन साधारण को उसका असीम लाभ पहुँचाया।
साधना कहा गया है। जीवन की ज्ञान चेतना शब्द, रस, रूप, गन्ध, स्पर्श की पाँच तन्मात्राओं पर आधारित हैं। इन्हीं से पाँच ज्ञानेंद्रियां बनी हैं। शब्द की इनमें प्रमुखता है। बच्चा जब जन्म लेता है तो अन्य इन्द्रियाँ तो काम नहीं करती।
साधना आदि प्रयोजनों के लिए उपरोक्त व्यवस्थाएं बनाते और सुविधा के स्थान बदलते रहते हैं।
साधना में तथा उठाई हुई जिम्मेदारी को पूरा करने में असाधारण सहायता मिलेगी।
साधना करने का निर्देशन है।
साधना के फेर में जो लोग हैं, उन्हें वे अपना सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर में परिणत करके पिछलग्गू बनाएँ, इसके पीछे न कोई तर्क है, न तथ्य।
साधना की सफलता पर प्रकाश डाला। कहा- “वह जीवन के पिछले दिनों की गई साधना से भिन्न है। इसे तपश्चर्या एवं योग साधना का वह स्तर कहा जा सकता है जो सिद्ध पुरुषों ने की और जन साधारण को उसका असीम लाभ पहुँचाया।”
साधना उनकी आगे भी चलती रही है। अब तक के दो वर्षों में जो हस्तगत हुआ है, उसे अधिकाधिक मात्रा में नियोजित करना है। संसार की परिस्थितियाँ बिगड़ रही हैं। आस्था संकट की चपेट में आने से बिरले ही बचे हैं। लौकिक दृष्टि से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, विकिरण, प्रकृति प्रकोप, अदृश्य जगत का असन्तुलन, महायुद्ध की तैयारी, महामारी, बेरोजगारी, बढ़ती हुई अनीति और अपराधों की वृद्धि आदि ऐसे कारण हैं, जिनके चलते गरीब-अमीर, शिक्षित-अशिक्षित सभी को हर घड़ी आशंकाओं तथा आतंक से ग्रसित रहना पड़ रहा है।
साधना है। उसका माध्यम सावित्री मंत्र है। उसके माहात्म्य में शक्ति की प्रचण्ड धाराऐं उपलब्ध होने की बात कही गई है। भौतिक दृष्टि से सूर्य की शक्ति के 1/220 करोड़ वें भाग मात्र से जीव सत्ता का पोषण होने की बात कही जाती है।
साधना है। सूर्य हमसे बहुत दूर है। लगभग दस करोड़ मील दूर। उसका प्रभाव पृथ्वी तक उसकी किरणों द्वारा ही आता है। माध्यम वे ही हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-May
साधना, सिद्धि जैसे अनेकानेक प्रकरण इसी क्षेत्र में जन्मे हैं। राजनैतिक, सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक क्षेत्र की अनेकानेक पद्धतियाँ, प्रणालियाँ, दिशाधाराएँ यद्यपि एक दूसरे के विपरीत चलती हैं। और तालमेल न बिठा सकने वाला विलगाव रखती हैं, तो भी उन सबका अस्तित्व “ज्ञान” की खदान से ही निकल कर चित्र विचित्र रूप में सामने आया है।
साधना करूं।
साधना प्रक्रिया के प्रशिक्षण के अंतर्गत सुझाया गया है। यह आवश्यक तो है और प्रथम चरण के रूप में अनिवार्य भी। पर बात इतने से समाप्त नहीं हो जाती। इसके लिए सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों के जागरण हेतु विशिष्ट साधनाएँ भी करनी पड़ती है। श्रद्धा संवर्धन के विविध कर्मकाण्ड किए जाते हैं।
साधना की थी। वहीं से उनके वंशधर सूर्यवंशी कहलाते चले गये। शकुन्तला ने अपनी परित्यक्ता स्थिति में सूर्य साधना करके ही चक्रवर्ती भरत को जन्म दिया था। ऐसे अनेक कथानक हैं, जिनमें सूर्योपासना से तेजस्वी संतानों का वरदान मिलने का उल्लेख है। यही नहीं सूर्योपासना से अभीष्ट मनोरथों के पूरा होने का उल्लेख शास्त्रों में विस्तार से आता है।
साधना है, जिसका अवलम्बन प्रस्तुत शिक्षण में लिया जाना है।
साधना गायत्री उपासना के रूप में, सप्ताह में एक दिन यज्ञ कर्मयोग की साधना और प्रज्ञा संकीर्तन भक्तियोग की साधना के अंतर्गत जहाँ भी प्रजा परिजन हों मिलकर चलाएँ। इससे देवात्मा भारत की महाशक्ति कुण्डलिनी का जागरण सुनिश्चित होकर रहेगा।
साधनाओं का निर्धारण हो सकता है। आभूषण की सामान्य टूट-फूट को थोड़े में ठीक किया जा सकता है, पर टूट-फूट अधिक हो तो भट्ठी में गलाये बिना काम नहीं चलता। प्रायश्चित्त साधनाएँ प्राचीन काल में बहुत कठोर होती थी। इन सत्रों में उसे सुलभ तो बनाया गया है, पर पाप कर्मों का खुलासा तो करना ही पड़ता है। पिछली गाँठें खुले नहीं, बन्धन टूटें नहीं, तो साधक मुक्तावस्था का आनन्द कैसे ले सकता है?
साधना का भी यही सर्वोत्तम समय है। उपासना साधना के लिए तो यह समय सर्वोपरि है। कारण कि वातावरण में नवोदित सूर्य द्वारा प्रेरित प्राण तत्व की मात्रा का परिणाम अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है।
साधनाएँ घर पर भी की जा सकती है, परन्तु वातावरण की अनुकूलता का लाभ मिलने पर साधक का संकल्प अपनी पिछली आदतों को काबू करने में ढर्रे को बदलने में अधिक सफल हो पाता है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों की तपस्थली, दिव्य वातावरण, समर्थ संरक्षण, उपयुक्त परामर्श आदि की सुविधाएँ गायत्री तीर्थ में विशेष रूप से हैं। इसलिए जो परिजन समय निकाल सकें उन्हें किसी साधना सत्र की स्वीकृति मँगा लेनी चाहिए। अपने परिचित, संबंधियों सत्पात्रों को भी इसकी जानकारी देनी चाहिए तथा जिनमें उमंग जगे, उनके भी आवेदन भिजवाकर स्वीकृति मँगा लेनी चाहिए।
साधना उपचार और आता है, जिसे देवाधि देव-आत्मदेव की साधना कहा गया है। इसमें दर्पण के माध्यम से आत्मपरिष्कार की साधना की जाती है। दर्पण में दिख रहे अपने प्रतिबिम्ब को अपनी छाया नहीं, अपना कोई निकटवर्ती घनिष्ठ संबंधी-परिजन मानते हुए यह भाव करना चाहिए, कि इसमें विद्यमान त्रुटियों का परिमार्जन करना है। सत्प्रवृत्तियों के बीज विकसित करना है। अपना प्रतिबिम्ब गंभीरता से देखा जाय व ‘स्व’ के परिष्कार का, उसे समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाय।
साधना जैसे घिनौने कलापों में निरत रहना पड़ता है। कालिक, अघोरी भी प्रायः ऐसा ही करते हैं। इससे उनकी आत्माएँ उचित-अनुचित का भेद करने में असमर्थ हो जाती हैं। आत्म प्रताड़ना के कारण जो वैसा नहीं कर पाते, उनकी ताँत्रिक साधना भी सफल नहीं होती, ऐसा कहा जाता है। दूसरों को मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण आदि कृत्यों के द्वारा हानि पहुँचाने से पूर्व अपने आपको जघन्य कृत्यों को करते समय घृणा, जुगुप्सा न करने की स्थिति में ढालना होता है।
साधना के प्रभाव से प्राण तत्व ‘ओजस्’ मनस्तत्व ‘तेजस्’ और आत्म-तत्व वर्चस् के रूप में प्रकट होता है। नाभि कमल का क्षेत्र मूलाधार चक्र तक है। इस क्षेत्र में स्थित महाशक्ति को कुण्डलिनी भी कहा जाता है। इस शक्ति की उपलब्धि वृद्धि है। सामान्य स्थिति में यह केवल पाचन और प्रजनन का ही काम करती है।
साधनाओं का आग्रह हर किसी को नहीं करना चाहिए। सिद्ध महापुरुष ऐसे शिष्यों को स्वयं तलाशते हैं। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द स्वामी विरजानन्द ने, स्वामी दयानन्द, मछिन्द्रनाथ गोरखनाथ को स्वयं तलाश कर उच्चस्तरीय साधनाएँ कराई थीं। यह उत्तरदायित्व तो प्रवर्तक पर छोड़ना चाहिए। वह जिसे चाहेंगे उसे स्वयं ही यह कठोर साधनाएँ करायेंगे।
साधना सत्रों में आने जैसा लाभ मिलेगा।
साधनाओं के विधि विधानों और उनके माहात्म्यों का वर्णन है, वहाँ यह बात भी समझनी चाहिए कि साधक को अपनी जीवन चर्या का रूप भी वैसा ही ढाँचे में ढालना पड़ता है। यह उपचार विज्ञान का प्राण है और कर्मकाण्ड प्रयोग उसका कलेवर। प्राण रहने पर ही कलेवर का महत्व है।
साधना का प्रसंग चलने पर मानवी सत्ता के तीन पक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। जैसे केले के तने में एक के भीतर दूसरी परत होती है, ऐसे ही शरीर में क्रियातंत्र रूपी काय-कलेवर, विचारतंत्र रूपी मनःक्षेत्र एवं भावतंत्र रूपी अन्तःकरण इन तीन की सत्ता समाई हुई है। इन्हें आध्यात्मिक शब्दावली में क्रमशः स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर कहा गया है। तीनों के मिलने से ही समग्र मनुष्य बनता है। इन्हें सुविकसित बनाने के लिए जो अनुशासन अपनाना पड़ता है, उसे अध्यात्मशास्त्र, तत्वदर्शन या उपासना विज्ञान कहते हैं।
साधना का तप संपन्न किया। माता ने प्रसन्न होकर उन्हें एक पूर्ण पात्र दिया। जिसमें से अजस्र मात्रा में खाद्य सामग्री निकलने लगी। समयानुसार वर्षा हुई और दुर्भिक्ष दूर हो गया।
साधना से पूज्य गुरुदेव ने इतनी अगाध शक्ति प्राप्त की है जिससे यहाँ न आ सकने वाले प्रज्ञा परिजन भी अपने घरों पर 15 मिनट की शक्ति संचार साधना (जिसका उल्लेख अप्रैल के अखण्ड-ज्योति में किया गया है) से लाभान्वित हो सकते हैं। सूर्योदय से आधा घंटे पूर्व से आधा घंटे बाद तक के समय में 15 मिनट शक्ति संचार के लिए नियत रखें। साधकों को प्राणाकर्षण प्राणायाम के साथ हिमालय के ध्रुवकेंद्र का ध्यान करना चाहिए। प्राण प्रवाह तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा है। रोम-रोम में समा रहा है।
साधना चमत्कारी तो है, पर हर कोई उसे कर नहीं सकता। विशेषतया जिनका जीवन राजसी आदतों में ढला है, जो संयम रहित है, वे इसे करने पर भी सफल नहीं हो सकते, तुम तपश्चर्या में प्रवृत्त कैसे हो सकोगे?”
साधना के रूप में प्रकट होता है। इस दैवी उभार ही कहा जा सकता है। देवताओं के मानस एवं क्रिया-कलाप सदा सर्वदा वरदान, अनुदान, बरसाने वाले ही होते हैं। जिनका भाव क्षेत्र संवेदनशील हो चला है, वे देव मानव भी इसी आत्मीयता भरी सेवा साधना को अपनी जीवन धारा बनाते हैं। इसी आधार पर दिव्य आनन्द का लाभ प्राप्त करते हैं।
साधना अथवा किन्हीं के साथ ठहरने में स्वयं को कठिनाई या दूसरों को ऐतराज हो। प्रत्येक आवेदन अलग हो। एक आवेदन पर बहुतों के नाम लिखना पर्याप्त नहीं। प्रत्येक व्यक्ति के विवरण की समीक्षा करके, उन्हें उपयुक्त पाये जाने पर ही स्वीकृति भेजी जायेगी। घुमक्कड़ मनोभूमि के व्यक्ति जो साधना अनुशासन के प्रति गंभीर नहीं हों; वे साधना का माहौल बिगाड़ते हैं।
साधना क्रम विकसित किया है। शान्ति कुँज के साधना सत्रों में उन्हीं का प्रशिक्षण दिया जाता है, अभ्यास कराया जाता है। स्थूल शरीर के लिए जपयोग, सूक्ष्म के लिए प्राणयोग और कारण के लिए ध्यान योग का निर्धारण है। इसे अखण्ड-ज्योति के जनवरी अंक के कुण्डलिनी योग-ग्रन्थि भेदन एवं अप्रैल अंक की ‘कुण्डलिनी केन्द्र की साझेदारी’ का सुगम संस्करण समझा जा सकता है। मार्च की अपनों से अपनी बात में जिन नौ दिवसीय सत्रों की घोषणा की गयी है उनमें यही साधनाएँ सिखायी करायी जायेंगी।
साधना चलती रही। एक दिन साध्वी निर्धारित प्रव्रज्या करके लौट रही थी। मार्ग में अँधेरा हो गया। निकट के गाँव में पहुँची और रात बिताने के लिए किसी भवन में आश्रय चाहा। वहाँ कोई उसे जानता नहीं था।
साधनाएँ सिखायी करायी जायेंगी।
साधना या बचना सम्भव होता है। दूसरा मनः चक्षु कल्पना करता है। चिन्तन उसका प्रधान गुण है। मन की भाग दौड़ सर्वविदित है। वह अनेकों उचित अनुचित कल्पना जल्पना करता रहता है।
साधनाओं का पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करें।
साधना से ही खुलते हैं, और मनुष्य नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है।
साधना कहा गया है। इसमें दर्पण के माध्यम से आत्मपरिष्कार की साधना की जाती है। दर्पण में दिख रहे अपने प्रतिबिम्ब को अपनी छाया नहीं, अपना कोई निकटवर्ती घनिष्ठ संबंधी-परिजन मानते हुए यह भाव करना चाहिए, कि इसमें विद्यमान त्रुटियों का परिमार्जन करना है। सत्प्रवृत्तियों के बीज विकसित करना है। अपना प्रतिबिम्ब गंभीरता से देखा जाय व ‘स्व’ के परिष्कार का, उसे समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाय।
साधना में प्रेम की गहराई और वास्तविकता सन्निहित है।
साधनाएँ कहते हैं। तीनों शरीरों की अन्तरंग क्षमता को प्रचण्ड बनाने के लिए भिन्न प्रकार की साधना-विधियाँ हैं जिन्हें हर साधक स्तर के परिजनों के लिए इन साधना सत्रों में सुगम बनाया गया है।
साधना का पूरा अर्थ है-जीवन साधना। इस प्रयोजन के लिए जहाँ अपने गुण, कर्म, स्वभाव की देखभाल की जाती है, वहाँ साथ ही उस प्रसंग से जुड़े हुए कर्मकाण्डों का भी अभ्यास करना पड़ता है। इस प्रकार व्यक्तित्व एक विशेष ढाँचे में ढल जाता है। उसका जैसा भी चाहे भला-बुरा प्रयोग हो सकता है। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त जुड़ा हुआ है।
साधना से उनका स्थूल शरीर तो क्रमश हुआ है; पर तीनों शरीर-सुदर्शन चक्र की तरह अत्यधिक सक्रिय हो उठे हैं। उनके सूक्ष्म शरीर की प्रौढ़ता चमत्कार अगले 15 वर्षों तक लोग अपने चक्षुओं से ................ देखेंगे। कारण शरीर के प्रभाव से वे भारत ही नहीं समूचे विश्व की विचारणा आस्था को बदल कर रख देंगे।
साधना तो मनोविकारों से छुटकारा पाने के प्रयत्नों से ही पूरी हो जाती है। हल्की-फुल्की हँसती-हँसाती जिन्दगी उतने भर से ही बन जाती है। उद्वेगों महत्वाकाँक्षाओं, आक्रोशों, अवसादों की अनेक मानसिक व्याधियों से छुटकारा मिल जाता है। इसके अतिरिक्त प्रसन्न मुख रहने की आदत चेहरे का सौंदर्य अनेक गुना बढ़ा देती है, भले ही नख, शिखा की दृष्टि से बनावट कुरूप ही क्यों न हो। शरीरगत सशक्तता को ओजस् और मानसिक शक्ति को तेजस् कहते हैं।
साधना करके ही चक्रवर्ती भरत को जन्म दिया था। ऐसे अनेक कथानक हैं, जिनमें सूर्योपासना से तेजस्वी संतानों का वरदान मिलने का उल्लेख है। यही नहीं सूर्योपासना से अभीष्ट मनोरथों के पूरा होने का उल्लेख शास्त्रों में विस्तार से आता है।
साधना के माध्यम से परिष्कृत एवं सशक्त बनाया जा सकता है। मनोबल के आधार पर ही व्यक्तित्व निखरता है। प्राणवान आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति ही प्रतिभावान बनते हैं, और अपनी प्रखरता, प्रामाणिकता के आधार पर असंख्यों का कल्याणकारी नेतृत्व करते हैं।
साधनाओं का शिक्षण और अभ्यास किया जाता था। आश्रम परम्परा जीवित तो अभी भी है। पर वे केवल मूर्तिदर्शन, कथा कीर्तन, रामधुन या अधिक से अधिक योगाभ्यास कहे जाने वाले आसनों प्राणायामों तक सीमित हैं। यह योग व्यायाम निरर्थक नहीं उनकी उपयोगिता अपने स्थान पर यथावत है परन्तु योग का असली भाव तो उच्चतम से जुड़ना है। इसके लिए तप भी करने पड़ते हैं।
साधना। इस प्रयोजन के लिए जहाँ अपने गुण, कर्म, स्वभाव की देखभाल की जाती है, वहाँ साथ ही उस प्रसंग से जुड़े हुए कर्मकाण्डों का भी अभ्यास करना पड़ता है। इस प्रकार व्यक्तित्व एक विशेष ढाँचे में ढल जाता है। उसका जैसा भी चाहे भला-बुरा प्रयोग हो सकता है। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त जुड़ा हुआ है।
साधना और प्रज्ञा संकीर्तन भक्तियोग की साधना के अंतर्गत जहाँ भी प्रजा परिजन हों मिलकर चलाएँ। इससे देवात्मा भारत की महाशक्ति कुण्डलिनी का जागरण सुनिश्चित होकर रहेगा।
साधना, संयम, सेवा के आधार पर ही कमाई गई होती है। अपने को पवित्र बनाकर, अनगढ़ से सुगढ़ बनाकर मनुष्य निरोग बनता है और पुण्य की प्रखरता से बलिष्ठ बनता है। यों साधना में जप-तप भी करना पड़ता है। किन्तु सबसे बड़ी बात है आत्मशोधन, स्व का परिष्कार-परिमार्जन। यह सब जितना अधिक और गहरा बन पड़ता है, मनुष्य उतना ही गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से शक्तिशाली होता जाता है।
साधना विधान से किया जाय तो अनेक रोगों, शोकों, कष्टों से मुक्ति मिलती है। पाप निष्कासन, परिष्कार की व्यवस्था, नौ दिवसीय सत्रों की अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
साधना भी अनिवार्य साधनाओं में रहेगी। प्रातःकाल विश्व कुण्डलिनी योग का विशेष ध्यान भी कराया जायेगा। तप साधना में आश्रम अनुशासन, हविष्यान्न तथा अमृताशन का एक बार आहार, गंगाजल पान, प्रातः मौन जैसे सुगम परन्तु प्रभावशाली क्रम अपनाने होंगे। लोक मंगल के लिए किया जाने वाला सुनिश्चित पुरुषार्थ भी तप और प्रायश्चित इच्छापूर्ति का माध्यम बनेगा।
साधना क्षेत्र का एक सरल उपाय है-दर्पण का अवलम्बन। एक बड़ा-सा शीशा इसके लिए प्रयुक्त करना चाहिए। दर्पण ऐसा हो कि पालथी मार कर बैठने पर पूरा शरीर दीख सके। किन्तु दूरी अधिक न हो। ऐसे बड़े आकार का वह मिल सके तो सर्वोत्तम, अन्यथा छोटे साइज से भी काम चलाया जा सकता है।
साधना काल में उपवास का व्रत भी अपनाना पड़ता है। अपने परिश्रम की, स्व-उपार्जित कमाई ही ग्रहण करने का तपश्चर्याओं में सर्वोपरि विधान है, जिससे अन्त से जुड़े कुसंस्कार तंग न करें। आहार में जौ, तिल, चावल का विशिष्ट धान्य तथा औषधि कल्क भी इसी निमित्त शामिल किए जाते हैं। व्रत और उपवास के सभी आवश्यक सिद्धान्तों का समावेश होने के कारण अमृताशन का बहुत अधिक महत्व है। यह सुपाच्य भी होता है।
साधना करके ही लव-कुश को जन्म दिया था। राजा इक्ष्वाकु ने सूर्य साधना की थी। वहीं से उनके वंशधर सूर्यवंशी कहलाते चले गये। शकुन्तला ने अपनी परित्यक्ता स्थिति में सूर्य साधना करके ही चक्रवर्ती भरत को जन्म दिया था। ऐसे अनेक कथानक हैं, जिनमें सूर्योपासना से तेजस्वी संतानों का वरदान मिलने का उल्लेख है।
साधना के आधार पर आप सिद्ध पुरुष बने हैं, उसे मैं भी सिद्ध करना चाहता हूँ। आप मुझे भी उसकी शिक्षा दीजिये।”
साधनाओं का प्रारम्भिक अभ्यास नौ दिन तक शान्ति कुँज में कराया जाता है, जिसे अपने घरों पर रहकर भी किया जा सकता है और धीरे-धीरे लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है।
साधनाओं में कोई त्रुटि रह जाए तो वह हानिकारक हो सकती है। इसलिए कठिन साधनाओं का आग्रह हर किसी को नहीं करना चाहिए। सिद्ध महापुरुष ऐसे शिष्यों को स्वयं तलाशते हैं। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द स्वामी विरजानन्द ने, स्वामी दयानन्द, मछिन्द्रनाथ गोरखनाथ को स्वयं तलाश कर उच्चस्तरीय साधनाएँ कराई थीं। यह उत्तरदायित्व तो प्रवर्तक पर छोड़ना चाहिए।
साधना का क्रम नये उत्साह के साथ, श्रद्धा विश्वासपूर्वक अपनायें। इन साधना सत्रों में निर्धारित साधनाओं का पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करें।
साधना सत्रों में निर्धारित साधनाओं का पूरा-पूरा लाभ प्राप्त करें।
साधनाओं में रहेगी। प्रातःकाल विश्व कुण्डलिनी योग का विशेष ध्यान भी कराया जायेगा। तप साधना में आश्रम अनुशासन, हविष्यान्न तथा अमृताशन का एक बार आहार, गंगाजल पान, प्रातः मौन जैसे सुगम परन्तु प्रभावशाली क्रम अपनाने होंगे। लोक मंगल के लिए किया जाने वाला सुनिश्चित पुरुषार्थ भी तप और प्रायश्चित इच्छापूर्ति का माध्यम बनेगा।
साधनाएँ बड़ी कठिन दुरूह हैं। समय की आवश्यकता देखते हुए पूज्य गुरुदेव ने सर्वसुलभ साधना क्रम विकसित किया है। शान्ति कुँज के साधना सत्रों में उन्हीं का प्रशिक्षण दिया जाता है, अभ्यास कराया जाता है। स्थूल शरीर के लिए जपयोग, सूक्ष्म के लिए प्राणयोग और कारण के लिए ध्यान योग का निर्धारण है। इसे अखण्ड-ज्योति के जनवरी अंक के कुण्डलिनी योग-ग्रन्थि भेदन एवं अप्रैल अंक की ‘कुण्डलिनी केन्द्र की साझेदारी’ का सुगम संस्करण समझा जा सकता है।
साधना की जाती है। दर्पण में दिख रहे अपने प्रतिबिम्ब को अपनी छाया नहीं, अपना कोई निकटवर्ती घनिष्ठ संबंधी-परिजन मानते हुए यह भाव करना चाहिए, कि इसमें विद्यमान त्रुटियों का परिमार्जन करना है। सत्प्रवृत्तियों के बीज विकसित करना है। अपना प्रतिबिम्ब गंभीरता से देखा जाय व ‘स्व’ के परिष्कार का, उसे समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने का दृष्टिकोण अपनाया जाय। दर्पण में विद्यमान व्यक्ति का भूत, वर्तमान सभी विदित है।
साधना, क्रिया कलाप और अनुशासन का पालन करना पड़ता है; ताकि यहाँ प्राण ऊर्जा पूरी तरह साधक के रोम-रोम में पच जाए। यह ऊष्मा ही अगले दिनों खाद पानी की तरह अन्तरंग की शक्तियों को पुष्पित पल्लवित और फलीभूत करती है। परम पू. गुरुदेव की संकल्प शक्ति और ऊर्जा ऐसी ही स्थिति के साधक की साधना पकाने में समर्थ होती है।
साधना उपचार या योगाभ्यास कहलाती हैं। हठयोग में इन साधनाओं को समर अर्थात् युद्ध कहा गया है। इन साधनाओं में कोई त्रुटि रह जाए तो वह हानिकारक हो सकती है। इसलिए कठिन साधनाओं का आग्रह हर किसी को नहीं करना चाहिए। सिद्ध महापुरुष ऐसे शिष्यों को स्वयं तलाशते हैं।
साधना जुड़ी हुई है।
साधना के माध्यम से प्रत्यक्षतः जीवन में कायाकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
साधना क्रम नौदिन में 24000 गायत्री जप के अनुष्ठान के साथ जोड़कर रखा गया है। यह प्रति माह 1 से 9, 11 से 19 तथा 21 से 29 तक चलेंगे। गायत्री जप अनुष्ठान के साथ तीनों शरीरों से सम्बद्ध कमल चक्रों का ध्यान-योगत्रयी के रूप में जुड़ा रहेगा। प्राणाकर्षण प्राणायाम तथा आत्मदेव की साधना भी अनिवार्य साधनाओं में रहेगी। प्रातःकाल विश्व कुण्डलिनी योग का विशेष ध्यान भी कराया जायेगा।
साधनाओं को समर अर्थात् युद्ध कहा गया है। इन साधनाओं में कोई त्रुटि रह जाए तो वह हानिकारक हो सकती है। इसलिए कठिन साधनाओं का आग्रह हर किसी को नहीं करना चाहिए। सिद्ध महापुरुष ऐसे शिष्यों को स्वयं तलाशते हैं। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द स्वामी विरजानन्द ने, स्वामी दयानन्द, मछिन्द्रनाथ गोरखनाथ को स्वयं तलाश कर उच्चस्तरीय साधनाएँ कराई थीं।
साधना सत्रों में उन्हीं का प्रशिक्षण दिया जाता है, अभ्यास कराया जाता है। स्थूल शरीर के लिए जपयोग, सूक्ष्म के लिए प्राणयोग और कारण के लिए ध्यान योग का निर्धारण है। इसे अखण्ड-ज्योति के जनवरी अंक के कुण्डलिनी योग-ग्रन्थि भेदन एवं अप्रैल अंक की ‘कुण्डलिनी केन्द्र की साझेदारी’ का सुगम संस्करण समझा जा सकता है। मार्च की अपनों से अपनी बात में जिन नौ दिवसीय सत्रों की घोषणा की गयी है उनमें यही साधनाएँ सिखायी करायी जायेंगी।
साधना द्वारा इतना परिष्कृत किया जा सकता है कि साधक हर किसी को चमत्कृत कर सके, अनेकों को विशेष लाभ दे सकने का द्वारा खोल सकें, स्वयं सिद्ध पुरुषों जैसा देवोपम जीवन जी सके। यह सफलता उपासना विज्ञान के अवलम्बन से उसे श्रेष्ठ मार्गदर्शन एवं दैवी संरक्षण में किए जाने पर ही मिलती है। चेतना के उदात्तीकरण की इस प्रक्रिया हेतु, प्रारम्भ से ही उच्च स्तर की साधनाओं के लिए किसी को नहीं कहा जाना चाहिए, न किसी को वैसा दुस्साहस ही करना चाहिए। यही व्यावहारिक है। संजीवनी विद्या वाले पक्ष को जीवन में उतार कर यदि अपने को सुविकसित कर लिया जाता है तो अन्तराल की गहराई में छिपे पंचकोशों, षट्चक्रों, उपत्यिकाओं, गुच्छकों को उभारने वाली और अनेक ऋद्धि-सिद्धियों को सामने उपस्थित करने वाली विभूतियों का अर्जन संभव भी हो जाता है और सरल भी।
साधनाएँ करायेंगे।
साधना कहते हैं।
साधना-विधियाँ हैं जिन्हें हर साधक स्तर के परिजनों के लिए इन साधना सत्रों में सुगम बनाया गया है।
साधना को स्थूल शरीर शोधन का महत्वपूर्ण अंग मानकर उसे अपनाना पड़ता है।
साधना में जप-तप भी करना पड़ता है। किन्तु सबसे बड़ी बात है आत्मशोधन, स्व का परिष्कार-परिमार्जन। यह सब जितना अधिक और गहरा बन पड़ता है, मनुष्य उतना ही गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से शक्तिशाली होता जाता है। जो विभूतिवान है, वही किसी को कुछ दे भी सकता है। अन्यथा बहकाने वाले बाजीगर और ठग तो गली कूचों में रंग-बिरंगे कपड़े पहने, बड़ी जटाएँ रखे या सिर घुटाये कहीं भी जाल बिछाये चिड़िया पकड़ते देखे जा सकते हैं।
साधना के अंतर्गत जहाँ भी प्रजा परिजन हों मिलकर चलाएँ। इससे देवात्मा भारत की महाशक्ति कुण्डलिनी का जागरण सुनिश्चित होकर रहेगा।
साधनाओं को शरीर के लिए अन्न जल, वायु की तरह, अध्यात्म क्षेत्र के त्रिवेणी संगम की तरह लाभकारी कहा जा सकता है।
साधना अथवा दिव्य अनुदान दोनों ही क्रमों से उन्हें प्रभावित जागृत किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के लिए उनसे सम्बद्ध केन्द्रों, कमल चक्रों का प्रयोग करना लाभप्रद होता है। स्थूल शरीर का केन्द्र नाभि कमल, सूक्ष्म का हृदय कमल तथा कारण शरीर का केन्द्र सहस्रार कमल है। इन्हीं के जागरण में क्रमशः प्राण प्रवाह, ज्ञान प्रवाह भाव प्रवाह पैदा होते हैं, सशक्त बनते हैं।
साधना पकाने में समर्थ होती है।
साधना में आश्रम अनुशासन, हविष्यान्न तथा अमृताशन का एक बार आहार, गंगाजल पान, प्रातः मौन जैसे सुगम परन्तु प्रभावशाली क्रम अपनाने होंगे। लोक मंगल के लिए किया जाने वाला सुनिश्चित पुरुषार्थ भी तप और प्रायश्चित इच्छापूर्ति का माध्यम बनेगा।
साधना शव साधना जैसे घिनौने कलापों में निरत रहना पड़ता है। कालिक, अघोरी भी प्रायः ऐसा ही करते हैं। इससे उनकी आत्माएँ उचित-अनुचित का भेद करने में असमर्थ हो जाती हैं। आत्म प्रताड़ना के कारण जो वैसा नहीं कर पाते, उनकी ताँत्रिक साधना भी सफल नहीं होती, ऐसा कहा जाता है। दूसरों को मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण आदि कृत्यों के द्वारा हानि पहुँचाने से पूर्व अपने आपको जघन्य कृत्यों को करते समय घृणा, जुगुप्सा न करने की स्थिति में ढालना होता है।
साधना की अनिवार्य आवश्यकता है, उसी के लिए यह नौ-नौ दिनों की अभिनव सत्र श्रृंखला प्रारम्भ की गयी है। सेनापति संगठन करता है और योजनाएँ बनाता है; पर लड़ने वाले तो सैनिक ही होते हैं। वे सेनापति की योग्यता वाले न हों तो न सही; पर उसके संरक्षण में युद्ध प्रशिक्षण तो उन्हें भी लेना पड़ता है। इन पंक्तियों में ऐसे सभी मनस्वी साधकों को युग नेतृत्व के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। वे अपने अन्तरंग में विद्यमान देवाधिदेव आत्म देव को पहचानें और उसे परिपुष्ट करने के लिये इन शिविरों में शान्ति-कुँज आयें।
साधना को परखता है। वह यह नहीं देखता कि उसकी प्रतिमा को निखारने, पखारने में कितना श्रम किया गया। विधि विधान में कितना समय लगाया गया। प्रेम का अर्थ है प्रिय पात्र की आवश्यकता को पूरा करना। इसका दुहरा लाभ है, जहाँ प्रिय पात्र को अपने काम में हाथ बँटाने की प्रसन्नता होती है, वहाँ सेवाधर्मी-प्रेम पुजारी को भी कम आनन्द नहीं होता।
साधना को अपनी जीवन धारा बनाते हैं। इसी आधार पर दिव्य आनन्द का लाभ प्राप्त करते हैं।
साधना से सिद्धि का सिद्धान्त जुड़ा हुआ है। पर साथ-साथ यह शर्त भी जुड़ी हुई है कि व्यक्ति ने अपना समग्र जीवन तद्नुकूल बना लिया हो।
साधना को समस्त कामनाओं की पूर्ति हेतु समय-समय पर मनीषियों द्वारा किया जाता रहा है। इससे उनके मनोरथ भी पूरे हुए हैं, साथ ही विश्व की तात्कालीन परिस्थितियों में परिवर्तन भी आया है।
साधना की और उसका सत्परिणाम प्राप्त किया।
साधनाओं पर बहुत अधिक जोर दिया जाता था। आश्रम, आरण्यक, तीर्थ इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुए थे। जहाँ पर अन्तश्चेतना के विकास की साधनाओं का शिक्षण और अभ्यास किया जाता था। आश्रम परम्परा जीवित तो अभी भी है। पर वे केवल मूर्तिदर्शन, कथा कीर्तन, रामधुन या अधिक से अधिक योगाभ्यास कहे जाने वाले आसनों प्राणायामों तक सीमित हैं।
साधना का माहौल बिगाड़ते हैं। इसलिए सुपात्रों के लिए ही स्वीकृति माँगी जाय। स्वीकृति देने में भी सावधानी बरती जायेगी।
साधना के लिए तो यह समय सर्वोपरि है। कारण कि वातावरण में नवोदित सूर्य द्वारा प्रेरित प्राण तत्व की मात्रा का परिणाम अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है।
साधना भी सफल नहीं होती, ऐसा कहा जाता है। दूसरों को मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण आदि कृत्यों के द्वारा हानि पहुँचाने से पूर्व अपने आपको जघन्य कृत्यों को करते समय घृणा, जुगुप्सा न करने की स्थिति में ढालना होता है। यही बात दक्षिण मार्गी, सदाशयता पर, धर्मोपदेश देने वालों पर भी लागू होती है। सत्कर्म करने वालों को अपना जीवन भी साधना, संयम, स्वाध्याय, सेवा आदि का माध्यम अपना कर भीतर के देवत्व को जगाना पड़ता है। शाप-वरदान देने की सामर्थ्य के मूल में मात्र अभिचार कृत्य ही काम नहीं करते, कर्मकाण्ड ही काम नहीं दे जाते वरन् अपने जीवन का ढाँचा भी तद्नुकूल ही विनिर्मित करना पड़ता है।
साधनाएँ प्राचीन काल में बहुत कठोर होती थी। इन सत्रों में उसे सुलभ तो बनाया गया है, पर पाप कर्मों का खुलासा तो करना ही पड़ता है। पिछली गाँठें खुले नहीं, बन्धन टूटें नहीं, तो साधक मुक्तावस्था का आनन्द कैसे ले सकता है? इसके लिए साधकों को अपने जीवन में हुई भूलों को विस्तार से लिखना पड़ता है। उन्हें वंदनीय माताजी या गुरुदेव ही देखते हैं।
साधनाएँ भी करनी पड़ती है। श्रद्धा संवर्धन के विविध कर्मकाण्ड किए जाते हैं। अन्तःकरण की चिकित्सा हेतु संस्कारित औषधिकारक से लेकर प्रायश्चित इच्छापूर्ति के विभिन्न उपचार करने होते हैं।
साधना के प्रबल पुरुषार्थ से सहस्रों गुना बढ़ा सकता है। और चाहे तो पतन पराभव के गर्त्त में भी जा सकता है।
साधनाओं के लिए किसी को नहीं कहा जाना चाहिए, न किसी को वैसा दुस्साहस ही करना चाहिए। यही व्यावहारिक है। संजीवनी विद्या वाले पक्ष को जीवन में उतार कर यदि अपने को सुविकसित कर लिया जाता है तो अन्तराल की गहराई में छिपे पंचकोशों, षट्चक्रों, उपत्यिकाओं, गुच्छकों को उभारने वाली और अनेक ऋद्धि-सिद्धियों को सामने उपस्थित करने वाली विभूतियों का अर्जन संभव भी हो जाता है और सरल भी।
साधना सत्रों में सुगम बनाया गया है।
साधनाओं का उद्देश्य तीनों शरीरों में छिपी हुई दिव्य क्षमताओं को उभारना और उनका प्रभाव पूर्ण उपयोग करना होता है। व्यक्तिगत प्रचण्ड साधना अथवा दिव्य अनुदान दोनों ही क्रमों से उन्हें प्रभावित जागृत किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के लिए उनसे सम्बद्ध केन्द्रों, कमल चक्रों का प्रयोग करना लाभप्रद होता है। स्थूल शरीर का केन्द्र नाभि कमल, सूक्ष्म का हृदय कमल तथा कारण शरीर का केन्द्र सहस्रार कमल है। इन्हीं के जागरण में क्रमशः प्राण प्रवाह, ज्ञान प्रवाह भाव प्रवाह पैदा होते हैं, सशक्त बनते हैं।
साधना द्वारा अपने में शक्ति का भण्डार एकत्रित किया है, वह उसका अनुदान भी किसी को दे सकता है। जिसकी कमाई का आधार रोटी भर है, अपना खर्च ही मुश्किल से चला पाता है, वह क्या किसी को दे सकता है? लिया तो किसी से, कहीं से भी जा सकता है किन्तु दे पाना उन्हीं के लिए संभव है, जिनके पास कुछ जमा पूँजी हो। यह जमा पूँजी अध्यात्म क्षेत्र में तप साधना, संयम, सेवा के आधार पर ही कमाई गई होती है। अपने को पवित्र बनाकर, अनगढ़ से सुगढ़ बनाकर मनुष्य निरोग बनता है और पुण्य की प्रखरता से बलिष्ठ बनता है।
साधनाएँ कराई थीं। यह उत्तरदायित्व तो प्रवर्तक पर छोड़ना चाहिए। वह जिसे चाहेंगे उसे स्वयं ही यह कठोर साधनाएँ करायेंगे।
साधना सत्र की स्वीकृति मँगा लेनी चाहिए। अपने परिचित, संबंधियों सत्पात्रों को भी इसकी जानकारी देनी चाहिए तथा जिनमें उमंग जगे, उनके भी आवेदन भिजवाकर स्वीकृति मँगा लेनी चाहिए।
साधना अनुशासन के प्रति गंभीर नहीं हों; वे साधना का माहौल बिगाड़ते हैं। इसलिए सुपात्रों के लिए ही स्वीकृति माँगी जाय। स्वीकृति देने में भी सावधानी बरती जायेगी।
साधना की है, फलतः वे ऋद्धि सिद्धियाँ उसके सामने हाथ जोड़कर आ खड़ी हुई हैं, जिन्हें समृद्धि और प्रगति भी कहा जा सकता है। समृद्धि से तात्पर्य है पदार्थ पाकर सुविधा साधन। मनुष्य की क्षमता, सुविधा और प्रसन्नता इसी आधार पर बढ़ी है। प्रगति का अर्थ है चिन्तन की वह उत्कृष्टता, जिसके आधार पर उसने शास्त्र का, दर्शन का, व्यवहार का ढाँचा खड़ा किया है और अनेक दिशाओं में कल्पनाओं की उड़ानों ने उनके लिए रंगीले पंख प्राप्त किये हैं।
साधना, संयम, स्वाध्याय, सेवा आदि का माध्यम अपना कर भीतर के देवत्व को जगाना पड़ता है। शाप-वरदान देने की सामर्थ्य के मूल में मात्र अभिचार कृत्य ही काम नहीं करते, कर्मकाण्ड ही काम नहीं दे जाते वरन् अपने जीवन का ढाँचा भी तद्नुकूल ही विनिर्मित करना पड़ता है।
साधना (जिसका उल्लेख अप्रैल के अखण्ड-ज्योति में किया गया है) से लाभान्वित हो सकते हैं। सूर्योदय से आधा घंटे पूर्व से आधा घंटे बाद तक के समय में 15 मिनट शक्ति संचार के लिए नियत रखें। साधकों को प्राणाकर्षण प्राणायाम के साथ हिमालय के ध्रुवकेंद्र का ध्यान करना चाहिए। प्राण प्रवाह तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा है। रोम-रोम में समा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-March
साधना करके कई प्रसुप्त पड़े केंद्रों के सूक्ष्म प्राण को जगाया जा सकता है। मस्तिष्क के मध्य में सहस्रदल कमल है। उसे विष्णु भगवान की शेष शैया की अलंकारिक महत्ता दी गई हैं। उसी को कैलाश मान सरोवर की भी उपमा दी गयी है। उसी को कैलाश मान सरोवर की भी उपमा दी गई है।
साधना उपचारों के द्वारा इस सीमा तक विकसित किया जा सकता है कि व्यक्ति न केवल स्वयं अगणित विभूतियों का स्वामी बन सकता है, अपितु अन्य अनेकों को इस आध्यात्मिक ऊर्जा से निरोग भी कर सकता है व प्राण शक्ति सम्पन्न भी। साइकिकहीलिंग एवं शक्तिपात इसी विकसित ऊर्जा मण्डल के माध्यम से सम्पन्न होने वाली प्रक्रियाएँ हैं।
साधना में जीवन की पवित्रता प्रथम शर्त है। साधकों को अपना आहार सात्विक रखना पड़ता है। बीच बीच में उन्हें कुछ दिन उपवास करते हुए भी बिताने पड़ते हैं। ब्रह्मचर्य संबंधी मर्यादाओं का पालन भी सभी साधकों के लिए आवश्यक है। जो गृहस्थ जितने समय के लिए आश्रम में प्रवेश करते हैं उन्हें उतने समय ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना पड़ता है।
साधना पुरुषार्थ में नियोजित कर दिया। उसे सांसारिक वैभव से कोई मतलब नहीं रह गया। निराहार रहता व सतत् साधनारत रहता। धीरे-धीरे कीर्ति फैली। लोग आते, चरणों में धन-संपदा-फल पुष्प रखते, पर योगीराज ने कभी उन पर दृष्टि नहीं डाली।
साधना बन पड़े तो उसे भी किसी कदर करते रहा जाय। यह आकाँक्षा कुछ अपवादों को छोड़कर सभी प्रज्ञा परिजनों के मन में हो सकती है, या थोड़े प्रयत्न से उभारी जा सकती है। सेवा कार्यों में किसी को रुचि भले ही कम हो पर निजी व्यक्तित्व का स्तर हर कोई ऊँचा उठाना चाहता है। यह कामना इन दिनों के लेखों ने यज्ञ आयोजनों एकता सम्मेलनों ने विशेष रूप से उभारी है। मिशन के वरिष्ठ कार्यकर्ता भी इस बात के लिए आतुर हैं कि उनकी सहयोगी अधिक संख्या में बढ़े।
साधना का ही पूर्वार्द्ध समझा जा सकता है। उत्तरार्द्ध इसके उपरांत ही सध पाता है। सूक्ष्मशरीर में जिन ऋद्धि सिद्धियों के रत्न भण्डार भरे हुए बताये गए हैं, उन तक साधक की पहुँच तभी हो पाती है। जब वह अपने शरीर को साधने की प्राथमिक आवश्यकता पूरी करले। संयम साध ले।
साधना सत्रों की दस-दस दिन ले सत्रों की श्रृंखला इसी अप्रैल मास से अलग से चल पड़े।
साधना का प्राण। उसकी उपेक्षा कर देने के उपरांत जो कुछ
क्रिया-कृत्य रह जाता है, उसे प्राणरहित शरीर ही कहा जाना चाहिए।
दृष्टिगोचर तो सारा शरीर यथावत् लगता है, पर प्राण न होने के कारण उससे कोई
ऐसा पुरुषार्थ नहीं बन पड़ता जिसका कुछ उत्साहवर्धक प्रतिफल हस्तगत हो
सके।
साधनारत रह सकने की सुविधा प्रदान कर सके। लोभ, मोह और अहंकार के बंधनों को हथकड़ी बेड़ी तक की उपमा दी जाती है। इन बंधनों के पूरी तरह कसे रहने पर सूक्ष्मशरीर के लिए इतना संकट भय नहीं रहता कि वह शरीर बोध से विरत होकर अपनी स्वतंत्र सत्ता में विकसित हो सके और उन उच्चस्तरीय साधनाओं का अभ्यास कर सके, जिन से दिव्य क्षमताओं, दिव्य विभूतियों की प्राणी को उपलब्धि होती है।
साधना में जैसे-जैसे अध्यात्म परिपक्व होता जाता है वैसे-वैसे प्रकाश निकटतम आता जाता है और उसे प्रचंड ज्वाल माल की तरह विकसित करते हुए साधक अपनी काया को उसमें होम देता है। आग में पड़ा ईंधन भी अग्निवत हो जाता है। ठीक उसी प्रकार संत अपनी सत्ता को प्रकाश पुंज में विसर्जित करके पूरी तरह एकात्म स्थापित कर लेता है। इस अभ्यास में अवयवों को ज्योतिर्मय तो देखा ही जाता है, साथ ही उस ज्योति को पवित्रता और प्रखरता का प्रतीक मानकर यह धारणा भी विकसित की जाती है, कि वे दोनों सत्प्रवृत्तियाँ अपने स्वभाव का अंग बनती जा रही हैं। इस ध्यान से उठते ही साधक को अपने भीतर और बाहर पवित्रता और प्रखरता की आभा फैली अनुभव होती है।
साधना में संलिप्त रहने की शिक्षा देता है। अधिक रुचि बढ़ी तो अधिक गहरा अध्ययन किया। उपनिषद् उसे अधिक प्रिय लगे। उनमें वह तत्त्व पाया जो मनुष्य की लिप्सा, अहंता, विलासिता एवं तृष्णा पर कुठाराघात करता है। उसकी सर्जना और शिक्षा में वे तत्त्व थे जो मानवी गरिमा के सूक्ष्म संकेतों को मुखर एवं कार्यान्वित करने में कारगर रूप से अपना पक्ष प्रतिपादित करते थे।
साधनाओं में मानसिकता प्रधान है तो साधकों को यथार्थता
का पता चले और उस आधार पर राजमार्ग अपनाकर लक्ष्य तक पहुंचने में सफलता
प्राप्त करें। पर ऐसा सुयोग किन्हीं विरलों को ही हस्तगत हो पाता है।
साधना और आराधना भी कह सकते है। उपासना ही संगतिकरण है। संगतिकरण का एक अर्थ है संघबद्धता। एक है निकटतम बैठना। पूजा का अर्थ है- अपने आप को भीतर और बाहर से पवित्र करना।
साधना की दृष्टि से भी यथा सम्भव कुछ करने का मन है। ऐसे लोगों के अनुरोध बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं। इतना ही नहीं समर्थ शाखाओं ने भी यह अनुभव किया है कि जितने सहयोगी कार्यकर्ता अभी तक हैं, उतने भर से समय की बढ़ती माँग को पूरा नहीं किया जा सकेगा। उनकी संख्या बढ़नी चाहिए, ताकि नितान्त आवश्यक कार्यों को आरम्भ किया जा सके, आगे बढ़ाया जा सके। सुयोग्य साथियों की सहायता से ही महान् कार्य सम्पन्न होते रहे हैं, हो सकेंगे।
साधनाओं में इर्द-गिर्द के वातावरण को कोलाहल रहित रखा जाता है। तोकुफु मंदिर में आरती तो होती है, पर घंटे नहीं बजते। किसी प्रयोजन के लिए आने-जाने वाले इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि उनका आवागमन इतना धीमा हो कि किसी साधक की ध्यान धारणा में विघ्न न पड़े। किसी को किसी से बात करनी होती है, तो संकेत से उसे अलग बुलाकर इस प्रयोजन के लिए बने हुए विशेष कक्ष में ले जाता है और जो कुछ पूछना, बताना होता है वह उसे इतने धीमे स्वर में व्यक्त करता है कि किसी का ध्यान न बटे, घुसफुस को सुनकर मन न उचटे। बाहर की इस सतर्कता और बाह्य क्षेत्र के प्रति उपेक्षा भाव रहने से साधारण हलचलें उसके अध्यात्म प्रयोजन में कोई विशेष विघ्न उत्पन्न नहीं कर पातीं और वे अपने मन पर काबू रखकर बिना विचलित हुए आराधना पथपर आरुढ़ रहते हैं।
साधना की है। जापान के तोकुफु मंदिर में इसके उपदेष्टाओं एवं अभ्यासियों का अच्छा खासा जमघट रहता हैं। कभी-कभी तो अभ्यासियों की संख्या हजारों तक पहुँच जाती है। मौसम प्रतिकूल होने तथा व्यस्तता के दिन आने पर भी तोकुफु का प्रांगण साधकों से भरा ही रहता है।
साधना करते रहें। हम पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें। कभी मार्ग से विचलित होता देखें तो मार्गदर्शन देते रहें।”
साधनाएँ कितनी हैं? पर उसमें से कोई भी ऐसी नहीं है जा गर्हित, विकृत और प्रपंची मनोभूमि पर उग सकती हो। लालच और आदर्श की कोई संगति नहीं। लोगों पर रौब जमाने या चौंधियाने के लिए असली अध्यात्म का कोई अंश प्रयुक्त नहीं हो सकता। दूसरों को हानि पहुँचाने वाले वाममार्गी तंत्र प्रयोग, मानसिक प्रहार की आक्रामक संज्ञा में आते हैं।
साधना सत्रों की एक श्रृंखला शान्तिकुँज में नये सिरे चलाई जाय। एक महीने के युग शिल्पी सत्र अपने ढंग से अपना क्रम से चलते रहें। साथ ही इन नितान्त अभिनव जीवन साधना सत्रों की दस-दस दिन ले सत्रों की श्रृंखला इसी अप्रैल मास से अलग से चल पड़े।
साधनाएँ की थीं। समाधि अवस्था में तो शरीरगत स्पंदन अधिकतम रुक जाते हैं। ऐसी दशा में शरीर के किन्हीं अंग विशेषों को प्रभावित करने की प्रक्रिया कैसे चल सकती है? वह तो मृत मूर्च्छित जैसी स्थिति होती है।
साधना की अधिकांश अवधि ध्यान में बीतती है। इस बीच वातावरण को इतना शांत रखा जाता है कि साधकों के ध्यान में किसी प्रकार का विघ्न न पड़े। ध्यान में ज्योति के ध्यान की प्रधानता रहती है। साधक द्वारा धारणा की जाती है कि यह सर्वव्यापी प्रकाश ऊर्जा सचेतन रूप से समस्त ब्रह्मांड में संव्याप्त है और वही साधक के ध्यान आकर्षण से विशेष मात्रा में आकर्षित होकर काय कलेवर के प्रत्येक कण में संव्याप्त हो रही है। इस मान्यता को अधिकाधिक परिपक्व करने के लिए साधक नेत्र बंद करके प्रत्येक अंग का क्रमशः ध्यान करता जाता है और अनुभव करता जाता है कि उसकी काया का कोई अंग ऐसा नहीं बचा जिसमें ज्योति ऊर्जा की स्थापना परिलक्षित न होती हो इस क्रम को कई घंटे लगातार जारी रखा जाता है।
साधना का अभी भी अच्छा खासा प्रचलन है। यों अब उस क्षेत्र में भी वैज्ञानिकता के साथ नास्तिकता बढ़ी है और भौतिक सुविधा समृद्धि पर ध्यान केंद्रित हो गया है, तो भी आत्मवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उसका स्वरूप मात्र विचार दर्शन जैसा नहीं रह गया है, वरन् अभी भी सांस्कृतिक परंपराओं में सम्मिलित करके किसी न किसी रूप में जीवन व्यवहार में कार्यान्वित किया जाता हैं।
साधना सत्रों का अन्तर भली भाँति समझा जाना चाहिए। किसमें आना है? कब आना है? इसका स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए, युग शिल्पी सत्रों के प्रमुख विषय हैं। (1) सुगम संगीत (2) भाषण सम्भाषण (3) पौरोहित्य के माध्यम से लोक शिक्षण (4) जड़ी बूटी उपचार (5) सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कार्यान्वित किये जाने एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कार्यान्वित किया जाने वाले आवश्यक विधि विधान और उनके बीच आने वाले मोड़-तोड़ो का समाधान।
साधनाएँ बन पड़ती हैं। इन कठिनाइयों के रहते यह नहीं कहा जा सकता कि साधना का उपयुक्त काल तो आयुष्य की चौथी अवस्था में हैं। इसीलिए चतुर्थ आश्रम बनाया गया है, यह कहाँ तक ठीक है। यदि स्थूलशरीर ही साधना केंद्र रहा होता तो बालकपन ढलती आयु-वृद्धावस्था से घिरा हुआ जीवन निरर्थक चला जाता। मात्र तरुणाई ही इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त काल माना जाता।
साधना सत्रों का आरम्भ चैत्र नव रात्रि से हो रहा है। वह पर्व 30 मार्च से आरम्भ होकर 7 अप्रैल को समाप्त होगा। प्रथम आरम्भ यहीं से हैं। इसमें जो सम्मिलित होना चाहें, 29 मार्च की शाम तक शान्ति कुँज पहुँच जायँ। इसके उपरान्त 11 व 21 अप्रैल से तथा अगले सत्र 1, 11, व 21 तारीख को हर महीने चलते रहेंगे।
साधना में भी हाथ बटाना चाहते हैं। जिनका रुझान कुछ समय शांतिकुंज के वातावरण में रहने-निजी व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने और साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाने और अगले दिनों सेवा साधना की दृष्टि से भी यथा सम्भव कुछ करने का मन है। ऐसे लोगों के अनुरोध बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं। इतना ही नहीं समर्थ शाखाओं ने भी यह अनुभव किया है कि जितने सहयोगी कार्यकर्ता अभी तक हैं, उतने भर से समय की बढ़ती माँग को पूरा नहीं किया जा सकेगा। उनकी संख्या बढ़नी चाहिए, ताकि नितान्त आवश्यक कार्यों को आरम्भ किया जा सके, आगे बढ़ाया जा सके।
साधना चाहिए। अपने क्षेत्र में अपने घर रहकर भी कार्य किया जा सकता है। पर जिन्हें समुचित अवकाश हो वे देशव्यापी कार्यक्रमों पर भी निकल सकते हैं। जिनकी उपयोगिता समझी जायगी उन्हें शान्ति कुँज या किसी सम्बन्धित संस्था में भी स्थायी रूप से नियुक्त किया जा सकता है। पर इन कदमों को उठाने से पूर्व हर हालत में एक महीने का युग शिल्पी शिक्षण प्राप्त कर लेना आवश्यक है।
साधना परम्परा (3) तीर्थ परम्परा (4) पौरोहित्य परम्परा (5) आरण्यक परम्परा (6) आयुर्वेद परम्परा (7) ज्योतिर्विज्ञान परम्परा आदि अनेक परम्पराओं का ऐसा समन्वय मिलेगा जैसा कदाचित ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले। इस दर्शन से प्राचीन काल का समयुग अवधि का साधु ब्राह्मण वानप्रस्थ परिपाटी का प्रत्यक्ष दर्शन मिलता है और देखने वाला कृत कृत्य होकर लौटता है। अपनी यात्रा को सार्थक मान कर लौटता है।
साधना का विराट् स्वरूप प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है।
साधना केंद्र रहा होता तो बालकपन ढलती आयु-वृद्धावस्था से घिरा हुआ जीवन निरर्थक चला जाता। मात्र तरुणाई ही इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त काल माना जाता। किंतु बात ऐसी नहीं है। ध्रुव ने बालकपन में, च्यवन ने वृद्धावस्था में, आद्य शंकराचार्य ने फोड़े से ग्रसित रहते हुए रुग्णावस्था में भी कठोर साधनाएँ की थीं। समाधि अवस्था में तो शरीरगत स्पंदन अधिकतम रुक जाते हैं।
साधना का प्रथम चरण कहा गया हैं। संयम, ब्रह्मचर्य, आहार-विहार की संतुलित सात्विकता का अपनाया जाना आवश्यक है, ताकि शरीर की निरोगता और मन की सौम्यता अक्षुण्ण रहे। राजयोग के आठ सोपानों में से प्रथम यम और नियम इसी निमित्त हैं कि शारीरिक सात्विकता अपनाकर चौथाई योगाभ्यास किया जा सके। इसके बिना मन के कल्मष-कषाय न घटते हैं न मिटते हैं। साथ ही चंचलता भी उद्वेगों से भरी होती है।
साधना है। यही आत्मा और परमात्मा की पूजा तथा अभ्यर्थना है।
साधना-योगाभ्यास द्वारा अथवा अध्ययन क्षमता के माध्यम से अपने मस्तिष्क में अगणित सूचनाएँ भर एक साथ उन्हें प्रकट भी करने की सामर्थ्य भी अर्जित कर लेता हैं। वैज्ञानिक ऐसे केसेज को अपवाद करार देते हैं, जबकि परामनोवैज्ञानिक इसे अतीन्द्रिय सामर्थ्य का चमत्कार कहते हैं।
साधनाएँ भी जो आवश्यक समझी जाती हैं, बताई या कराई जाती हैं। दिनचर्या, प्रातः से सायंकाल तक की व्यस्त हैं उसमें जहाँ-तहाँ भटकने की न तो गुंजाइश है और न आज्ञा। नौ दिनों के बीच में ही दो दिन आधे-आधे दिन के लिए पर्यटन की छुट्टी दी जाती हैं जिसमें एक दिन हरिद्वार से सम्बन्धित और एक दिन में ऋषिकेश के समीपवर्ती स्थान देख लिए जाते हैं। शिविरों सत्संग प्रवचन के विषय व्यक्तित्व परिष्कार, परिवार निर्माण एवं समाजगत सद्व्यवहार का प्रचलन मुख्य विषय हैं। आध्यात्मिकता का पुट तो इन सभी प्रसंगों में आदि से अन्त तक रहता है।
साधनाओं का उपासनात्मक कर्मकाण्डों का अपना महत्व है। उनके द्वारा प्रसुप्त शक्तियों के जागरण में सहायता मिलती है। किन्तु इतने पर भी यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि साधक का व्यक्तित्व संयमी, सदाचारी और करुणा से भरा पूरा हो। यदि यह पवित्रता अर्जित करने के लिए तपस्वियों जैसा साहस न जुटाया जा सका तो समझना चाहिए के बात बनी नहीं। चट्टान पर उपवन लगाने के प्रयत्न में कोई सफलता मिलने वाली नहीं है।
साधनाओं का अभ्यास कर सके, जिन से दिव्य क्षमताओं, दिव्य विभूतियों की प्राणी को उपलब्धि होती है।
साधना पड़ा है। शिवाजी पृथ्वी पर आये, कैलाश पर्वत पर रहे। राजा हिमांचल की कन्या पर्वती के साथ उनका विवाह हुआ और उन्हीं से दो पुत्र प्राप्त हुए।
साधना का नाम है, जिसमें जीभ
को पीछे की ओर मोड़कर तालु के पिछले भाग से सटाया जाता है और फिर उसे
धीरे-धीरे सहलाया जाता है। इसके लिए जिह्वा को अधिक लंबी, अधिक कोमल बनाने
का पूर्ण अभ्यास करना पड़ता है।
साधनाएँ हैं। कुंडलिनी जागरण से लेकर ब्रह्मरंध्र, सहस्रदलकमल के प्रस्फुरण तक के सभी महान प्रयोजन सूक्ष्मशरीर में ही अवस्थित हैं। षट्चक्रों से लेकर ग्रन्थिभेदन तक की प्रक्रिया सूक्ष्मशरीर से ही संपन्न होती है। खेचरी मुद्राओं में अमृत का पान किया जाता है। यह सूक्ष्मशरीर का ही अनुदान है।
साधना उगाई, बढ़ाई और फलित करने की प्रक्रिया अग्रगामी बनाई जाती है। साधनाएँ कितनी हैं? पर उसमें से कोई भी ऐसी नहीं है जा गर्हित, विकृत और प्रपंची मनोभूमि पर उग सकती हो। लालच और आदर्श की कोई संगति नहीं। लोगों पर रौब जमाने या चौंधियाने के लिए असली अध्यात्म का कोई अंश प्रयुक्त नहीं हो सकता।
साधना करें। प्रेरणाओं की भी-पूरी प्राण ऊर्जा का एक अंश उपलब्ध करके अपने को लाभान्वित करें। उस सरसता के रसास्वादन से अपने को कृतकृत्य बनायें।
साधनाओं से भी नहीं बन पड़ता वह इस सतोगुण अन्न ब्रह्म को अपनाने भर से सहज सम्भव हो सकेगा।
साधना या संयम कहा गया है। इसमें अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को ऊँचा उभारना पड़ता है। इसी प्रक्रिया को आत्मनिरीक्षण, आत्मशोधन, आत्म निर्माण एवं आत्म-विकास के रूप में पूरा करना पड़ता है। अपनी अनगढ़ता को साध लेना ही साधना है। यही आत्मा और परमात्मा की पूजा तथा अभ्यर्थना है।
साधनाएँ बन पड़ना असंगत है। वह तो सूक्ष्मशरीर में समाहित दिव्य केंद्रों द्वारा ही बन पड़ती हैं। इसीलिए उसे शरीर के साथ गुँथा नहीं रहने देना चाहिए। उसका शरीराध्यास घटाना या मिटाना चाहिए। इसी उपाय से शरीराध्यास घटाना या मिटाना चाहिए।
साधना के विषय में भी उनके बढ़े-चढ़े माहात्म्यों की चर्चा की जाती हैं। कुंडलिनी जागरण भी ऐसा ही प्रसंग है, जिसकी उपमा ज्वालामुखी फटने से दी जाती है। इतना सब होते हुए भी साधारणतया साधना क्षेत्र के जिज्ञासुओं में यही भ्रम बना रहता हैं कि यह शक्ति केंद्र स्थूलशरीर में विद्यमान है और ध्यान, मर्दन, योगासन आदि करने से यही स्थान, अपना चमत्कारी प्रतिफल दिखाने लगते हैं।
साधना में क्रिया-कृत्यों का समावेश तो
है, पर वह मात्र उतने तक ही सीमित नहीं है। उसमें चेतना और भावना की बहुलता
है। इसलिए उसे घर परिवार के बीच रहकर भी साधा जाता है और विरक्त होने पर
उस प्रक्रिया का सध ही जाना निश्चित नहीं है। कितने ही संन्यासी एकांत
स्थानों और वन प्रदेशों में रहते हैं, पर उनमें आलस्य के अतिरिक्त और कोई
विशेषता नहीं दीखती। वेश के आधार पर सम्मान और दान दक्षिणा मिलने लगता है।
साधना का प्रयोजन है। दान और आराधना एक ही बात है। संकटग्रस्तों की सहायता एवं सत्प्रयोजनों में सहयोग दान है। ऐसे तो दान के नाम पर वंश और वेश की आड़ में कितने ही लोग ठगते खते रहते हैं और संकट ग्रस्त न होते हुए भी ऐसी मुद्रा बना लेते हैं जिससे गहराई में न जाने वालों को बहानेबाजी और वास्तविकता का अन्तर ही प्रतीत नहीं होता। इसलिए दान के नाम पर अपव्यय ही चलता रहता है, साथ ही निठल्लों को छद्म बनाने का अवसर मिलता है।
साधनारत रहता। धीरे-धीरे कीर्ति फैली। लोग आते, चरणों में धन-संपदा-फल पुष्प रखते, पर योगीराज ने कभी उन पर दृष्टि नहीं डाली। समाचार राजा के कानों तक पहुँचा। पता चला वही युवक है जो पहले उनके आदेश पर ज्ञानार्जन हेतु गया था।
साधना करते हुए धन्य बने। आत्मा की दूसरी पुकार है— '“तमसो माँ ज्योतिर्गमय'। हे सर्वशक्तिमान ! हमें अंधकार से प्रकाश की और ले चल। जो क्रम अपनाया गया है, वह अंधकार में भटकने के समान है। रात्रि की तमिस्रा में कुछ पता नहीं चलता कि किस दिशा में चल रहे हैं।
साधना में श्वास के साथ चलनेवाली आवागमन की ध्वनियों को सुनते हैं। कइयों को कान बंद कर लेने पर घंटा, शंख, मृदंग, मंजीर, गर्जन आदि के शब्द सुनाई पड़ते हैं और लगता है कि ईश्वर के सांकेतिक वचन सुन रहे हैं। उसका अर्थ समझने लगेंगे तो त्रिकालदर्शी बन जाएँगे।
साधना का प्रत्यक्ष स्वरूप है—मौन रहकर आत्मचिंतन में निरत रहना। साधना की अधिकांश अवधि ध्यान में बीतती है। इस बीच वातावरण को इतना शांत रखा जाता है कि साधकों के ध्यान में किसी प्रकार का विघ्न न पड़े। ध्यान में ज्योति के ध्यान की प्रधानता रहती है। साधक द्वारा धारणा की जाती है कि यह सर्वव्यापी प्रकाश ऊर्जा सचेतन रूप से समस्त ब्रह्मांड में संव्याप्त है और वही साधक के ध्यान आकर्षण से विशेष मात्रा में आकर्षित होकर काय कलेवर के प्रत्येक कण में संव्याप्त हो रही है।
साधना संभव नहीं। इसी प्रकार मनोबल घट जाने पर ध्यान की स्थिति अस्त−व्यस्त जैसी रहने लगती है। घुटने जकड़ जाने पर वे पूरी तरह खुलते नहीं। ऐसी दशा में विभिन्न प्रकार के आसन लगाना असंभव हो जाता है। कमर झुक जाने पर वे प्राणायाम नहीं हो सकते, जिनके लिए कमर सीधी रखने की आवश्यकता है।
साधना क्षेत्र के जिज्ञासुओं में यही भ्रम बना रहता हैं कि यह शक्ति केंद्र स्थूलशरीर में विद्यमान है और ध्यान, मर्दन, योगासन आदि करने से यही स्थान, अपना चमत्कारी प्रतिफल दिखाने लगते हैं।
साधना और शिक्षण में निरन्तर विघ्न उत्पन्न करते हैं और घुमाने ले चलने के लिए हर घड़ी दबाव देते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि इन शिविरों में जो लोग सम्मिलित होने आये हैं, उनका कोई प्रयोजन निष्फल हो जाते हैं। इसलिए उचित यही है कि साथ में झुण्ड ले चलने की बात मन में से बिल्कुल निकाल दी जाय। जिन्हें साथ लाया जाय- जिनके लिए आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति माँगी जाय, वे सभी ऐसे होने चाहिए जिनके लिए शिविर प्रधान हो जो निर्धारित विषयों की समता भी समझते हों। बुड्ढे बीमार, सड़े गले, एवं अशिक्षित स्त्री बच्चों को तीर्थ यात्रा के बहाने लेकर चलना सत्र के मूलभूत उद्देश्य को ही समाप्त करना है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा आत्मोत्कर्ष के यह चार प्रमुख सोपान हैं। इन्हें निबाहा जाय, इसका हर व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप ऐसा निर्धारण किया जाता है। जो बिना किसी कठिनाई के भविष्य में भी कार्यान्वित हो सके।
साधनाएँ संभव नहीं रहतीं। आँख में दृष्टि दोष आने पर त्राटक नहीं हो सकता। कान में बहरापन छा जाने के उपरांत नादयोग की साधना संभव नहीं। इसी प्रकार मनोबल घट जाने पर ध्यान की स्थिति अस्त−व्यस्त जैसी रहने लगती है। घुटने जकड़ जाने पर वे पूरी तरह खुलते नहीं।
साधना का उपयुक्त काल तो आयुष्य की चौथी अवस्था में हैं। इसीलिए चतुर्थ आश्रम बनाया गया है, यह कहाँ तक ठीक है। यदि स्थूलशरीर ही साधना केंद्र रहा होता तो बालकपन ढलती आयु-वृद्धावस्था से घिरा हुआ जीवन निरर्थक चला जाता। मात्र तरुणाई ही इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त काल माना जाता। किंतु बात ऐसी नहीं है।
साधना का संबंध है वहाँ तक समग्र संयम की साधना का ही पूर्वार्द्ध समझा जा सकता है। उत्तरार्द्ध इसके उपरांत ही सध पाता है। सूक्ष्मशरीर में जिन ऋद्धि सिद्धियों के रत्न भण्डार भरे हुए बताये गए हैं, उन तक साधक की पहुँच तभी हो पाती है। जब वह अपने शरीर को साधने की प्राथमिक आवश्यकता पूरी करले। संयम साध ले।
साधना की जाती है।
साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाने और अगले दिनों सेवा साधना की दृष्टि से भी यथा सम्भव कुछ करने का मन है। ऐसे लोगों के अनुरोध बड़ी संख्या में उपलब्ध हुए हैं। इतना ही नहीं समर्थ शाखाओं ने भी यह अनुभव किया है कि जितने सहयोगी कार्यकर्ता अभी तक हैं, उतने भर से समय की बढ़ती माँग को पूरा नहीं किया जा सकेगा। उनकी संख्या बढ़नी चाहिए, ताकि नितान्त आवश्यक कार्यों को आरम्भ किया जा सके, आगे बढ़ाया जा सके। सुयोग्य साथियों की सहायता से ही महान् कार्य सम्पन्न होते रहे हैं, हो सकेंगे।
साधना के प्रथम सोपान में प्रवेश करते हुए काया को बलिष्ठ और निरोग रखा जाए। इस प्रकार के नियमों का पालन, उपायों को अपनाना, साधना का प्रथम चरण कहा गया हैं। संयम, ब्रह्मचर्य, आहार-विहार की संतुलित सात्विकता का अपनाया जाना आवश्यक है, ताकि शरीर की निरोगता और मन की सौम्यता अक्षुण्ण रहे। राजयोग के आठ सोपानों में से प्रथम यम और नियम इसी निमित्त हैं कि शारीरिक सात्विकता अपनाकर चौथाई योगाभ्यास किया जा सके। इसके बिना मन के कल्मष-कषाय न घटते हैं न मिटते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-June
साधना में अनेकानेक विघ्न खड़े हो जाते हैं। इसीलिए प्रतिवादी प्रतिपक्षी संघर्षशीलता का विभिन्न अभ्यासों द्वारा ऐसा स्वभाव बनाना पड़ता है; जो किसी भी अवसर पर चूकने न पाये। प्रत्याहार अर्थात् परास्त करने का कौशल। यह व्यक्तियों का, समूहों का, परिस्थितियों का ही उलटना नहीं वरन् अवाँछनीय मनोदशाओं को भी परास्त कर देना-उनसे बच निकलना भी है। प्रत्याहार की साधनाएँ कतिपय हैं, उनके नाम रूप अनेक हैं पर उद्देश्य एक ही हैं-अनौचित्य को परास्त करना।
साधना का परिचय दे सकता है।
साधनाओं द्वारा जागृत किया। फलस्वरूप उनकी पकड़ने की शक्ति इतनी बलवान हो गई कि जिस प्रकार सारस अपनी लम्बी गर्दन पानी में डुबोकर चाहे जहाँ से मछली पकड़ लेता है, उसी प्रकार वे आकाश क्षेत्र में से नाना प्रकार की वस्तुएँ सामर्थ्य तथा शक्तियाँ पकड़ लेते थे।
साधना, पुण्य-परमार्थ। इसके लिए कड़ाई से आत्म-संयम बरतना पड़ता है। उस आधार पर की गई बचत को समय और साधनों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाना पड़ता है। गिरों को उठाने और उठतों को उठाने के लिए भी “सादा जीवन उच्च विचार” का सिद्धान्त यही है। जो सादगी से रह सकेगा, न्यूनतम में अपना निर्वाह सन्तोष कर सकेगा, उसी के लिए यह संभव है कि आदर्शवादिता को चरितार्थ कर सके।
साधना का यह सरलतम मार्ग है कि सहस्रार से लेकर मेरुदण्ड अवस्थित छहों चक्रों में होते हुए जननेन्द्रिय मूल तक के समूचे क्षेत्र में सूर्य प्रकाश के प्रवेश करने, ऊर्जा भरने का ध्यान किया जाय।
साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि, नवनिद्धि सरीखी लोकोत्तर शक्तियाँ उपलब्ध रहती थी। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है। यह निर्विवाद है।
साधना द्वारा प्राण आकर्षित किया जाता है। साँस लेते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम्’ की ध्वनि का ध्यान किया जाता है। पर इसके साथ ही श्वास-प्रश्वास की सूर्य शक्ति से ओत-प्रोत होने की भावना भी की जाती है। नाद-योग में नाद श्रवण के साथ यह मान्यता भी परिपक्व की जाती है कि वे दिव्य शब्द सूर्य लोक से उतर कर साधक तक आ रहे हैं।
साधना के संबंध में भी है। प्राण-योग के अंतर्गत प्राणाकर्षण का, प्राणायाम प्रक्रिया का सर्वसुलभ आरंभिक प्रयोग हैं। पर उसे अन्त नहीं आरम्भ समझना चाहिए और उसका अभ्यास बन पड़ने पर अपने अनुकूल प्राणायाम चुनना चाहिए। लोम-विलोम प्राणायाम सूर्य वेधन प्राणायाम तथा नाड़ी शोधन प्राणायाम आदि के अपने-अपने विधान हैं, जिनका विस्तार प्रसंग आने पर उपयुक्त मार्ग-दर्शक से समझा जा सकता है।
साधना द्वारा ब्रह्मचारी इसी विद्युत शक्ति का अधिकाधिक मात्रा में संचय कर वीर्यवान मनस्वी, तेजस्वी कहलाते हैं। जब भी कभी इसका अभाव हो जाता है, शरीर स्वस्थ-गोरा दीखते हुए भी, बहिरंग ढाँचा सुन्दर होते हुए भी मनुष्य निस्तेज, उदास, मुरझाये फूल-सा लुँजपुँज, वीर्यहीन नजर आता हैं तेजस् न होने से बाह्य सौंदर्य भी निर्जीव प्रतीत होता है। व्याधिग्रस्त होने अथवा मनोबल गिरने, मनोविकार ग्रस्त हो जाने पर व्यक्ति वस्तुतः निस्तेज हो जाता है।
साधनात्मक तरीका यह भी हो सकता है कि कुण्डलिनी जागरण की विधा अपनाई जाय। इसमें जननेन्द्रिय मूल में सन्निहित महासर्पिणी जैसी प्राण ऊर्जा को जगाया जाता है। वह ज्वाल-माल की तरह ऊँची उठकर मेरुदण्ड मार्ग से मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है। मेरुदण्ड मार्ग से गुजरते हुए उसे उस प्रवाह में विद्यमान छै चक्रों का-भँवरों का वेधन करना होता है। इन केन्द्रों की प्रसुप्त शक्ति जब जागृत होती है तो अपने निकटवर्ती पदार्थों और प्राणियों को प्रभावित करती है।
साधनाओं का महत्व है वहाँ संकल्प शक्ति का भी स्थान है। जिन्हें इच्छा उत्कंठा है, उन्हें अपना संकल्प-बल विकसित करने के लिए पुण्य परमार्थ के साधना व्रत संयम निबाहते हुए सम्पन्न करते रहना चाहिए।
साधना व्रत संयम निबाहते हुए सम्पन्न करते रहना चाहिए।
साधनात्मक प्रयोग करने पड़ते हैं। इसके लिए प्राण योग से संबंधित ऐसी साधनाएँ करनी पड़ती हैं जो अपने स्तर के अनुरूप हों। सभी भेड़ों को तो एक लाठी से हाँका जा सकता है पर ऐसा नहीं हो सकता कि सभी साधकों को एक ही साधना बताई जा सके। रोग निदान व उनकी स्थिति में भिन्नता के आधार पर उन्हें भिन्न-भिन्न औषधियाँ दी जाती हैं। भले ही वे स्वस्थता के लिए लालायित एक जैसी मनःस्थिति के क्यों न हो?
साधना का तात्पर्य है-क्षमताओं को बर्बादी से बचा लेना और संग्रहित जीवनी-शक्ति को किन्हीं महान् प्रयोजनों के लिए सुरक्षित रखना। संयम, साधना से दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु से भी बचा जा सकता है। इस आधार पर साहस और ओजस् विकसित होता है। कुरूप होते हुए भी शालीनता अपनाने वाला भारी-भरकम, विश्वस्त, प्रामाणिक एवं सुन्दर लगता है। इस प्रकार उसे नकद धर्म के रूप में व्यक्तित्व का विकास और प्रतिभा का निखार का लाभ हाथों हाथ मिलते देखा जा सकता है।
साधना सम्पादित कर सकती है? इसे सहज ही समझा जा सकता है।
साधनाओं का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका निष्कर्ष निकालने के लिए उपवास, संयम, नियम, मंत्र-शक्ति, प्राणायाम, ध्यान, आदि विषयों को भी शोध प्रक्रिया में नये सिरे से सम्मिलित किया गया है।
साधना से दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु से भी बचा जा सकता है। इस आधार पर साहस और ओजस् विकसित होता है। कुरूप होते हुए भी शालीनता अपनाने वाला भारी-भरकम, विश्वस्त, प्रामाणिक एवं सुन्दर लगता है। इस प्रकार उसे नकद धर्म के रूप में व्यक्तित्व का विकास और प्रतिभा का निखार का लाभ हाथों हाथ मिलते देखा जा सकता है।
साधनात्मक उपचारों से पूर्व यही करणीय है। राजयोग के आठ उपचारों में यम-नियम को प्रथम स्थान दिया गया है। इसके उपरान्त आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के अगले चरण उठते हैं। हठयोग में भी नाड़ी शोधन प्रथा है। चिकित्सक उपवास विवेचन आदि के द्वारा प्रथम पेट की सफाई कराते हैं, इसके बाद उपचार का क्रम चलाते हैं।
साधना को करने लगा बुद्धि तीव्र हुई। अच्छे नम्बरों से पास होने लगा। ‘आर्य गजट’ का सम्पादक बना। “अपना निज का ‘मिलाप’ पत्र निकाला। आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो गई।
साधना के आरम्भिक दश अनुशासन बन पड़े और योगाभ्यास का महत्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया। यम और नियम यों संख्या की दृष्टि से दो गिने जाते हैं पर वे वर्गीकृत होने पर दस हो जाते हैं। इसमें जीवन गरिमा की दसों दिशाओं का समावेश हो जाता है। जिससे इतना करते बन पड़े, समझना चाहिए कि उसने योग मार्ग की आधी मंजिल पार कर ली। भूमि को खाद पानी देकर जुताई-गुड़ाई के सहारे उर्वर बना लिया।
साधना के चारों आधार जीवन-चर्या के अविच्छिन्न अंग बनाये जाने चाहिए। चिन्तन और मनन की प्रक्रिया में अधिकाधिक समय लगाना चाहिए। चिन्तन का प्रयोजन होना चाहिए परिशोधन और मनन का उद्देश्य रहे-भावी गतिविधियों को सत्प्रवृत्तियों में सुनियोजित करने की उमंग भरी विचारणा रहनी चाहिए।
साधना के लिए समूची शक्ति नियोजित कर सकना संभव है। अन्यथा सामान्यजनों के लिए यही मध्यमवर्गीय प्रयास उपयुक्त है।
साधना को शरीर माध्यम से आरम्भ किया जाय। उसकी चिन्तन पद्धति, चरित्र-निष्ठा और पारस्परिक संबंधों में आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। प्रत्यक्ष जीवन में आदर्श ही अध्यात्म है। जीवनचर्या के प्रत्येक पक्ष में मानवी गरिमा से संबंधित सभी अनुबंधों का सतर्कतापूर्वक पालन किया जाय। इसके लिए परिशोधन और उत्कर्ष की उभय-पक्षीय क्रिया-प्रक्रिया अपनायी जाय।
साधना करने लगे।
साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है। यह निर्विवाद है।
साधना, आराधना का जीवनचर्या में समावेश होना आवश्यक है। पेट प्रजनन की, लोभ-मोह और अहंकार की तृप्ति के लिए हर कोई व्यस्त, उद्विग्न देखा जा सकता है। पर यह भौतिक क्षेत्र की उछल-कूद हुई। उससे शरीर भर को तात्कालिक रसास्वादन करने का अवसर मिलता है। इन उपलब्धियों से तृष्णा और भी भड़कती रहती है और अधिकाधिक की माँग इस प्रकार बढ़ती जाती है कि उसकी पूर्ति संभव ही नहीं होती।
साधनाएँ कतिपय हैं, उनके नाम रूप अनेक हैं पर उद्देश्य एक ही हैं-अनौचित्य को परास्त करना।
साधना का भी समावेश है, ताकि आत्मिक क्षेत्र की प्रसुप्त सूक्ष्म शक्तियों का जागरण भी सम्भव हो सके। यह सत्र बड़ी सफलतापूर्वक चल रहे हैं। हर सत्र में औसतन 250 शिक्षार्थी सम्मिलित होते हैं।
साधना पड़ता है।
साधना से शक्ति प्राप्त होती है। यह निर्विवाद है।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं जो अपने स्तर के अनुरूप हों। सभी भेड़ों को तो एक लाठी से हाँका जा सकता है पर ऐसा नहीं हो सकता कि सभी साधकों को एक ही साधना बताई जा सके। रोग निदान व उनकी स्थिति में भिन्नता के आधार पर उन्हें भिन्न-भिन्न औषधियाँ दी जाती हैं। भले ही वे स्वस्थता के लिए लालायित एक जैसी मनःस्थिति के क्यों न हो? यह बात साधना के संबंध में भी है।
साधना यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह से अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि संस्कार के साथ शरीर सौंप
साधना बताई जा सके। रोग निदान व उनकी स्थिति में भिन्नता के आधार पर उन्हें भिन्न-भिन्न औषधियाँ दी जाती हैं। भले ही वे स्वस्थता के लिए लालायित एक जैसी मनःस्थिति के क्यों न हो? यह बात साधना के संबंध में भी है। प्राण-योग के अंतर्गत प्राणाकर्षण का, प्राणायाम प्रक्रिया का सर्वसुलभ आरंभिक प्रयोग हैं।
साधना कुछ कठिन नहीं है।
साधना के लिए प्रयत्नशील व्यक्तियों को भी इस मोर्चे पर जूझना पड़ता है। वे अपने अन्तरंग और बहिरंग जीवन को आदर्श उत्कृष्ट बनाना चाहते हैं, किन्तु प्रचलन को देखकर साधक की ललक भी उसी दिशा में मचलने लगती हैं। यहाँ यदि अवरोध का मोर्चा कमजोर पड़ते तो हेय दुष्प्रवृत्तियां की चढ़ बनती है और साधना में अनेकानेक विघ्न खड़े हो जाते हैं। इसीलिए प्रतिवादी प्रतिपक्षी संघर्षशीलता का विभिन्न अभ्यासों द्वारा ऐसा स्वभाव बनाना पड़ता है; जो किसी भी अवसर पर चूकने न पाये। प्रत्याहार अर्थात् परास्त करने का कौशल।
साधना के लिए शांतचित्त रहना आवश्यक है। यदि अन्तराल में उद्वेग उभरते रहे, उपलब्धियों की आतुरता उफनती रहे तो वह आन्तरिक सन्तुलन समाधान बन ही न पड़ेगा जिसकी पृष्ठभूमि पर अन्तराल की प्रसुप्त शक्तियों को जगाया जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-August
साधना उपचार प्रणाली विकसित की जानी भी संभव है। बायो फीडबैक की दिशा में चल रहे प्रयोगों को यदि सही दिशा लेकर आभा मण्डल परीक्षण प्रक्रिया तथा साधना निर्देशों से सूत्रबद्ध किया जा सके तो आत्मिक प्रगति के महत्व पूर्ण सोपानों को पार किया जा सकता है हम मात्र चिकित्सा तक सीमित न रहकर यदि अन्तरंग की सामर्थ्य को विकसित करने हेतु जैव भौतिकी के क्षेत्र में हुए इन अनुसंधानों का आश्रय लें तो न केवल बहुमूल्य रत्न हस्तगत होंगे, वैज्ञानिक जगत की जिज्ञासा को भी शान्त किया जा सकेगा, क्योंकि यह उन्हीं की भाषा में, यंत्रों द्वारा सम्पन्न किए गय पूर्णतः विज्ञान सम्मत प्रयोग होंगे।
साधना जैसे आत्मोत्कर्ष के प्रयासों में निरत हुआ जाय। इसका लाभ भी था कि चेतना की प्रसुप्त क्षमता को अधिक समुन्नत बनाने का अवसर मिलता था। देवत्व की मात्रा बढ़ाकर महामानव बनने का ऋषि, मनीषी बनने का सुयोग हस्तगत होता था। जिस भूमि में देव समुदाय की अभिवृद्धि होती थी उसे, ‘स्वर्गादपि गरीयसी’, कहलाने का सुयोग मिलता था। उस समय के लिए वही चिन्तन, निर्धारण एवं क्रिया, कलाप उचित था कि सामाजिक जीवन में कोई अस्त-व्यस्तता न रहने पर आत्म-कल्याण की आत्मोत्कर्ष की बात सोची जाय।
साधना के अंतर्गत आते हैं। खुले नेत्रों से प्रकाश को देखने की अवधि न्यूनतम होनी चाहिए। एक पल झाँकी भर। इसके उपरान्त पलक बंद लेने चाहिए और उस प्रकाश पुंज की मानसिक अवधारणा करनी चाहिए। कुछ दिन के अभ्यास से सूर्य को या दीपक को खुले नेत्रों से देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती, यह ध्यान स्वाभाविक हो जाता है और अनायास ही होता रहता है।
साधना द्वारा इस काया में वाँछित परिवर्तन कर बहुत कुछ कर दिखाना मनुष्य के लिए संभव है। असीम संभावनाओं से भरे इस पिण्ड में कितना कुछ भरा पड़ा है, इसे जाना व आत्मसात किया जा सके तो भौतिकी की दिशा में अग्रसर मानव को आत्मिकी का अवलम्बन हेतु भी सहमत किया जा सकता है।
साधनाओं को इसी निमित्त नियोजित करते हैं कि उनका लगाव क्रियाशीलता और कल्पना की प्रतिक्रिया से यथा सम्भव विरत होता चले। स्वार्थ की सीमा से उछल कर परमार्थ संवेदनाओं में प्रवेश कर सके।
साधना विज्ञान के आधार पर समूची त्वचा को संवेदनशील, प्रभावशाली और चमत्कारी बनाया जा सकता है। उसका स्पर्श दूसरों को कराने से उन्हें सत्संग शक्तिपात जैसा लाभ दिया जा सकता है। महाप्रभु ईसा अपना हाथ रोगियों के शरीर तथा अंगों पर फिराते और उनके रोग निवारण किया करते थे। ऐसी विलक्षणता अन्य जैव विद्युत के धनी लोगों की त्वचा में भी पाई जाती है।
साधना एक ऐसी है, जिसे अन्तर्मुखी ध्यान की संज्ञा दी जा सकती है।
साधनारत हैं।
साधना की दृष्टि से उसे आदर्श एवं अनुकरणीय माना जा सकता है। तेजस्विता उसकी विशिष्टता है। इन्हीं सब विभूतियों को ध्यान धारणा द्वारा आकर्षित और अन्तराल में प्रतिष्ठित किया जा सके तो समझना चाहिए कि साधक की सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल गया। जिस उद्देश्य के लिए ध्यान किया जाता है उस गन्तव्य तक पहुँचने का राजमार्ग मिल गया।
साधना चाहिए जो अत्यधिक व्यस्त, स्वार्थी या निष्ठुर नहीं हैं, जिनमें सेवा साधना के बीजाँकुर हैं, जो “विद्या-ऋण” चुकाने के लिए नित्य थोड़ा समय पढ़ाने के लिए देते रह सकते हैं। तलाश करने पर अपने ही क्षेत्र में ऐसे उदार नर नारी अवश्य मिल जायेंगे जो निःशुल्क विशुद्ध सेवा भावना से इस उच्च-कोटि के पुण्य परमार्थ को करते रहने के लिए सहमत हो सकें।
साधना द्वारा स्वस्थ सुदृढ़ बनाने का प्रयत्न किया जाए, उसे सर्वांग-सुंदर और दीर्घजीवी बनने का अवसर दिया जाए। मन को ज्ञानवान, विचारवान, एकाग्र एवं दूरदर्शी विवेकवान बनाने के लिए निजी प्रयत्न किया जाए। यह अपने निजी प्रयत्न से भी किया जा सकता है। सत्संग न मिले तो संसर्ग से काम चलाया जा सकता है। तर्क और तथ्य पर आधारित विवेक जगाया और उसका आश्रय लिया जा सकता है।
साधना के बीजाँकुर हैं, जो “विद्या-ऋण” चुकाने के लिए नित्य थोड़ा समय पढ़ाने के लिए देते रह सकते हैं। तलाश करने पर अपने ही क्षेत्र में ऐसे उदार नर नारी अवश्य मिल जायेंगे जो निःशुल्क विशुद्ध सेवा भावना से इस उच्च-कोटि के पुण्य परमार्थ को करते रहने के लिए सहमत हो सकें।
साधना में सम्मिलित होकर रह रहा है। ऐसी परिशोधित वाणी शाप और वरदान देने की सामर्थ्य रखती है। उसके कथन सत्य होकर रहते हैं। मस्तिष्कीय विचार उच्चस्तरीय रहते हैं। और भावनाओं, आस्थाओं, आकाँक्षाओं का स्तर ऊँचा उठाते हैं।
साधना बन पड़े तो चटोरपन की नशेबाजी वाली लत छूट सकती है और भक्ष्य अभक्ष्य का बोध फिर से वापस लौट सकता है। इस आधार पर न केवल भोजन की मात्रा और सुव्यवस्था चल पड़ेगी वरन् बिगड़ा हुए स्वास्थ्य चल पड़ेगी वरन् बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य भी सुधर जायगा। पेट पर अनावश्यक भार न पड़े तो समझना चाहिए कि अस्वस्थता की समस्या का आधा समाधान निकल आवेगा। निरोगता और दीर्घ जीवन परस्पर मिले हुए है। जिव्हा की दूसरी साधना है-मौन।
साधना क्षेत्र में प्रगति की जाँच पड़ताल आभामण्डल मापने वाले उपकरणों द्वारा होने लगे।
साधना है-मौन। नित्य दो घण्टे सुविधा के समय पर मौन रहने की आदत डालनी चाहिए। इस व्रत के समय लगातार यह ध्यान रखना चाहिए कि अनावश्यक रूप से वाक् शक्ति का उपयोग नहीं करना चाहिए। बहुत बक-झक करने वाले को लवार समझें। उनकी बात में आत्मश्लाघा परनिंदा, चुगली आदि अनौचित्य भरे रहते हैं।
साधना में घनीभूत कर उपयोगी बनाया जाता है। हिप्नोटिज्म में इसी विद्युत शक्ति को प्रखर और वशीभूत बनाने की साधना की जाती है।
साधना है। इनको अपनाने पर भी आत्म-कल्याण का प्रयोजन पूरा हो सकता है क्योंकि सेवा सहायता भी सद्भावना के बिना नहीं हो सकती और दुष्टता से निपटने के लिए भी त्याग बलिदान की विवेक और साहस की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। इन सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन भी आत्मिक प्रगति का वैसा ही द्वार खोलता है जैसा कि सतयुग में जप, तप के माध्यम से सम्पन्न किया जाता था।
साधना पराक्रम से जब अन्तर्निहित क्षमताएँ जाग उठती हैं तो असंभव चमत्कारी कृत्य मानवी काया द्वारा संभव होते देखा जाने लगता है।
साधना है ‘सोऽहम् साधना’। इसे अजपा जाप या हंसयोग भी कहते हैं। विधान इतना भर है कि श्वास के भीतर जाते समय ‘सो’ की ध्वनि अत्यन्त धीमे स्वर में होने की भावना की जाय। एकाग्रता बटोर कर उस ध्वनि को सुनने के लिए दत्तचित्त हुआ जाय। आरम्भ में वैसी मात्र कल्पना करते रहने भर की बात बनती है।
साधना पर सवार होती हैं, इसलिए अन्य देवता संदेहास्पद भी हों, तीखी समालोचना से उनके चरित्र एवं स्वभाव में ऐसी अवाँछनीयता भी सन्निहित रहती है जो साधक पर भी श्रेष्ठताओं के साथ-साथ हावी होती चली जाती है। इस दृष्टि से सूर्य सर्वथा दोष रहित है। उसमें गुण ही गुण है। साथ ही शक्ति का भण्डार एवं आकर्षक सुन्दरता से भरा-पूरा भी उसे समझा जा सकता है।
साधना में श्वास-प्रश्वास के साथ निरन्तर चलते रहने की आदत स्वभाव का अंग बन जाती है।
साधना द्वारा बढ़ाया भी जा सकता है।
साधना निर्देशों से सूत्रबद्ध किया जा सके तो आत्मिक प्रगति के महत्व पूर्ण सोपानों को पार किया जा सकता है हम मात्र चिकित्सा तक सीमित न रहकर यदि अन्तरंग की सामर्थ्य को विकसित करने हेतु जैव भौतिकी के क्षेत्र में हुए इन अनुसंधानों का आश्रय लें तो न केवल बहुमूल्य रत्न हस्तगत होंगे, वैज्ञानिक जगत की जिज्ञासा को भी शान्त किया जा सकेगा, क्योंकि यह उन्हीं की भाषा में, यंत्रों द्वारा सम्पन्न किए गय पूर्णतः विज्ञान सम्मत प्रयोग होंगे।
साधना किसी के लिए भी कठिन है। आत्म-कल्याण के लिए व्रत पालन और पूजा उपचार का नियमित रूप से कर पाना कदाचित ही किन्हीं के लिए संभव हो सकता है। उन प्रयत्नों में पशु या पिशाच पग-पग पर अड़चन उत्पन्न करते हैं और सफलता के स्तर पर पहुँचने ही नहीं देते। वातावरण का प्रभाव एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने देता।
साधना’। इसे अजपा जाप या हंसयोग भी कहते हैं। विधान इतना भर है कि श्वास के भीतर जाते समय ‘सो’ की ध्वनि अत्यन्त धीमे स्वर में होने की भावना की जाय। एकाग्रता बटोर कर उस ध्वनि को सुनने के लिए दत्तचित्त हुआ जाय। आरम्भ में वैसी मात्र कल्पना करते रहने भर की बात बनती है।
साधना में निष्ठापूर्वक निरत रहना है।
साधना शिविर सम्पन्न कर लौटे साहू दम्पत्ति ने दो माह नियमित रूप से झोला पुस्तकालय चलाया जो सम्मान अर्जित किया उसने पूर्व संकल्प कर्त्ताओं को भी झोलों की धूल झाड़ने को विवश किया। एक साथ बड़ी संख्या में झोला पुस्तकालय चल पड़ने से यहाँ का वातावरण प्रज्ञामय हो उठा है। घर-घर यज्ञ, जन्म दिन आदि संस्कारों का प्रचलन उसी का चमत्कार माना जा रहा है।
साधना क्षेत्र में उतरने वालों को भी यही नीति अपनानी चाहिए। विशेषतया अन्तरंग क्षेत्र की साधनाओं में तो प्रयत्नरत होने के साथ क्रमिक विकास अपनाने की ही नीति अपनानी चाहिए। बड़े डग भरने की अपेक्षा छोटे कदम उठाते हुए प्रगति क्रम आरम्भ करना चाहिए। यही सरल भी है और इसी में सुविधा भी। सफलता की दिशा में इसी क्रम से बढ़ना चाहिए।
साधनाओं और तपस्या द्वारा साधक, योगीजन, अनादि काल से उन विभूतियों एवं ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी बनते रहे हैं जिन्हें अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राकाम्य, वाशित्व आदि नामों से जाना जाता है। छोटे-बड़े आकार धारण करने, अदृश्य और प्रकट होने, आकाश गमन करने, अपने कार्यक्षेत्र को प्रभावित करके इच्छित दिशा में जन मानस को मोड़ने, मरोड़ने आदि कार्य वे सहजता से सम्पन्न कर लेते हैं। इस तरह के उदाहरणों से भारतीय अध्यात्मशास्त्र के पन्ने भरे पड़े हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सूक्ष्म की सामर्थ्य को महत्व दिया जाय एवं ऐसे घटनाक्रमों को कपोल कल्पित अथवा कौतूहल न मानकर सूक्ष्म को साधने का प्रयास किया जाय। उड़ने की कला तो मक्खी-मच्छरों को भी आती है।
साधना की जाती है।
साधना करते हैं। माता का अजस्र वात्सल्य भी संतान पर इसी हेतु बरसता है। तत्व-ज्ञानी जब जीवन की गरिमा और महिमा पर विचार करते हैं तो उन्हें इसी में सार प्रतीत होता है कि द्वैत को अद्वैत में परिणत किया जाय। कामनाओं को भावनाओं में उलट दिया जाय। स्वार्थ को गलाकर परमार्थ में ढाल दिया जाय।
साधनाओं में तो प्रयत्नरत होने के साथ क्रमिक विकास अपनाने की ही नीति अपनानी चाहिए। बड़े डग भरने की अपेक्षा छोटे कदम उठाते हुए प्रगति क्रम आरम्भ करना चाहिए। यही सरल भी है और इसी में सुविधा भी। सफलता की दिशा में इसी क्रम से बढ़ना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-April
साधना करें, तो उसका अधिक प्रतिफल उपलब्ध होता है। इस्लाम धर्म में अजान देने, नमाज पढ़ने के नियत समय होते है। ईसाई धर्म में भी नियत समय पर ही प्रार्थनाएँ होती हैं। भारतीय धर्म संस्कृति में प्रातःकाल सूर्योदय के समय और सायंकाल सूर्यअस्त होने के समय के समय गायत्री मंत्र के माध्यम से जप-ध्यान करने पर बहुत जोर दिया गया है। नियत समय में अनुशासन पालने से उसका अधिक महत्त्व व सत्परिणाम माना गया है।
साधना को अपनी
सामर्थ्य भर अपनाते रहें । इंद्रिय संयम, अर्थ संयम,
साधनाओं को सर्वोपरि यह सोपान है।
साधना एवं आराधना करने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर का परिमार्जन हो सकता है। दर्शन का काम, चिंतन को दिशा देना है और साधन का स्वरूप अभीष्ट शक्तियों को अपने में उभारने की वैज्ञानिक कार्यपद्धति को अपनाना है। हम गायत्री का तत्त्व दर्शन भी समझें और उसके साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।
साधना किसकी की जाए, किस संप्रदाय एवं प्रतिपादन का आश्रय लिया जाए। यदि शंकाओं को कुतर्क कहकर एक का पल्ला पकड़ने की बात सोची जाए, तो मानवी अंतराल के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई बुद्धि और विवेकशीलता विद्रोह करती है।
साधना का प्रत्यक्ष अनुभव यहाँ संपंन हुए शतकुंडीय गायत्री महायज्ञ एवं राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में परिजनों ने किया। एक सुनिश्चित अनुमान के आधार पर यज्ञशाला व पंडाल की व्यवस्था की गई थी, पर समुद्र के उफान की तरह जन समूह जो उमड़ा तो रुका नहीं। यज्ञशाला की प्रदक्षिणा निरंतर चलती रही।
साधना
संग्रहित केंद्रीय कुंडलिनी भंडार में सभागीदार बनाने की है। इसके लिए स्नान का,
नियत स्थान का बंधन तो नही है, पर यथासंभव अधिकाधिक शुद्ध वातावरण का प्रबंध करना
चाहिए। कुछ ही दिनों में शरीर में स्फूर्ति, मन में उमंग और ब्रह्मरंध्र में भाव-संवेदना बहने लगती है। यह
निजी अनुभूति का प्रसंग है।
साधनाओं को अपने ऊपर अवतरित होता, बरसता दृष्टिगोचर होता है। निजी प्रयत्नों में उसी स्तर का सृष्टि में भरा-पूरा अनुदान बरसने का लाभ भी उन्हें मिलता है। इस प्रकार वे असाधारण नफे में रहते हैं। चैत्र की नवरात्रि के संदर्भ में तो इस उपासना का महत्त्व और बढ़ जाता है।
साधना तो अनिवार्य है ही, समय भी लगता है। जो कार्य केंद्र में तीन वर्ष में हुआ है उसे निजी रूप में करने पर सामांय साधकों को न्यूनतम पचास वर्ष तो धैर्यपूर्वक लगाना ही चाहिए। इतना समय निकलना, उपयुक्त स्थान में रहना अनुकूल मार्गदर्शन प्राप्त करते रहना कठिन है। इसलिए इस आपत्तिकाल में कुंडलिनी जागरण की व्यक्तिगत साधना कठिन तो नहीं बन पड़ेगी, पर उतना ही लाभ इस वितरण व्यवस्था के आधार पर उठाया जा सकता है, जो इसी बसंत पूर्व से आरंभ कर दी गई है। यह अनुदान लेना उन्हीं को चाहिए, जो उसका उपयोग परमार्थ में कर सकें।
साधना का प्रत्यक्ष अनुभव किया।
साधनाओं से यह अंतशक्ति जागृत होती है और प्रचंड आत्मबल के रूप में परिलक्षित होती है।
साधना कठिन तो नहीं बन पड़ेगी, पर उतना ही लाभ इस वितरण व्यवस्था के आधार पर उठाया जा सकता है, जो इसी बसंत पूर्व से आरंभ कर दी गई है। यह अनुदान लेना उन्हीं को चाहिए, जो उसका उपयोग परमार्थ में कर सकें। परमार्थी का स्वार्थ तो उसी प्रकार सधता रहता है जिस प्रकार मेंहदी पीसने वाले के हाथ लाल हो जाते हैं, इत्र का व्यवसाय करने वाले के कपड़े अनायास ही महकने लगते हैं। परमार्थी को आत्मसंतोष लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह के तीन लाभ तो सदा-सर्वदा मिलते रहते हैं और मिलते रहेंगे।
साधना कह सकते हैं। इनका जिससे जितना निर्वाह होता रहेगा, उनके लिए उतना ही कुण्डलिनी अनुदान बटोर सकना सम्भव बन पड़ेगा। समयानुसार वे उसका उन्नयन उपचार अथवा दमनात्मक प्रहार भी कर सकेंगे।
साधना करनी पड़ती है। प्रायः दस वर्ष की आयु हो जाने तक यही स्थिति रहती है। अल्पज्ञान और बड़ों का विकसित ज्ञान परस्पर ताल-मेल नहीं बिठा पाते। न शिष्टाचार आता है, न व्यावहारिक ज्ञान होता है। ऐसी दशा में बचपन के प्रायः सभी क्रियाकलाप बालविनोद जैसी स्थिति में बने रहते हैं।
साधनाओं द्वारा इन्हें जागृत करके मनुष्य त्रिकालज्ञ बन जाता है और भूत, वर्त्तमान एवं भविष्य की सब बातें जान लेता है। उसके लिए देश, काल और समय की दूरी समाप्त हो जाती है। भारतीय दर्शन के अनुसार तात्कालीन सभी ऋषि-मुनि इस स्तर को प्राप्त थे।
साधना है। मंत्र का “धी” अक्षर मनुष्य की अंतशक्ति जागृत करने की शिक्षा देता है। जीवात्मा ही परमात्मा का अंश है। बीजरूप में वे सभी शक्तियाँ विद्यमान है, जो ईश्वर में हैं। आवश्यकता उन्हें जागृत करने की है।
साधना है। गायत्री को ही ऋतंभरा प्रज्ञा या दूरदर्शिता कहते हैं। यह एक ही कसौटी ऐसी है, जो अपनी न्यायशीलता के कारण प्रस्तुत प्रतिपादनों में से जो सर्वश्रेष्ठ था, उसे अपना सकती है और अपनी नाव में बिठाकर भ्रांतियों के जंजाल में से पार निकालकर सुरक्षित तट तक पहुँचा सकती है। आत्मकल्याण और लोक-मंगल के सर्वानुमोदित तथ्यों को अपनाने में क्या छोड़ा और क्या ग्रहण किया जाना चाहिए? इसका निर्णय तुरंत कर देती है।
साधना के द्वारा अपना उदात्तीकरण करने में व्रतशील हो सकें। पानी कितना ही क्यों न बरसे पर गड्ढे, तालाब, सरोवर में उसकी गहराई-चौड़ाई के अनुसार ही जल जमा होता है। देने वाले की उदारता या संपदा बढ़ी-चढ़ी होना ही सब कुछ नहीं है। प्राप्तकर्ता में उसे पचाने की सामर्थ्य भी होनी चाहिए अंयथा अनावश्यक मात्रा में पकवान खाने पर वे पेट खराब ही करते हैं। हाथ लगी दौलत दुर्व्यसनों में चोर-ठगों में बँट जाती हैं।
साधनाक्रम नहीं बनाया गया; वरन् समस्त विश्व की अगणित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस तपश्चर्या में ऐसी विशिष्टता और उच्चस्तरीय उत्कृष्टता का समावेश किया गया है कि सुविस्तृत क्षेत्र की अगणित आवश्यकताओं को पूरा कर सके। इसे राष्ट्रगत, विश्वगत अनुपम आध्यात्मिक प्रयास कहा जा सकता है। विश्वगत अनुपम आध्यात्मिक प्रयास कहा जा सकता है। इससे पूर्व ऐसे प्रयास यदा-कदा ही हुए हैं। एक घटना विश्वमित्र की हमें स्मरण है।
साधना द्वारा जगाकर अर्जित करते हैं। कुछ में यह पूर्वजन्म के संस्कारों की फलश्रुति मानी जाती है व कुछ में संत-महामानवों के शक्तिपात की। जो भी हो, यह अद्भुत सामर्थ्य अपनी उपस्थिति जताकर मस्तिष्क की पिटारी में छिपे बहुमूल्य वैभव-भंडारण की, जो कि अविज्ञात है, एक झलक दिखाती एवं इसे अर्जित करने की प्रेरणा देती है।
साधनात्मक प्रयत्नों से ऐसा भी हो सकता हैं कि नियंत्रित मात्रा में सुनियोजित करके नियंत्रित प्रकार की विद्युत धारा उभरे और बिना स्पर्श के भी इच्छित व्यक्ति को भले या बुरे स्तर पर प्रभावित करे। यह शक्ति अपने शरीर का तो संचालन करती ही है, पर ऐसा भी हो सकता है कि बढ़ी हुई या बढ़ाई गई ऊर्जा अन्यान्यों पर भी भला या बुरा प्रभाव छोड़ सके। इसी को शाप-वरदान के नाम से जाना जाता है।
साधना
में पांच-पांच मिनट इन तीनों केंद्रों में सविता तेजस् भरते-विभाजित करते हुए
समष्टि प्राण का प्राणायम करते रहना चाहिए।
साधनाएँ चलाते हैं। इनके लिए साकार ध्यान, देवपरक भूमिका में कर सकना कठिन है। इतने पर भी यह प्रतिबंध नहीं है कि ध्यान का लाभ उठाने में अड़चन है।
साधना है और तीसरी आहुति चारों दिशाओं तथा तीनों काल में व्याप्त देवताओं की उपासना है।
साधना का बीजारोपण कुछ ही समय में सुरम्य उद्यान की तरह विकसित हुआ दिख पड़ता है।
साधना पर ही अवलंबित रहती हैं।
साधना करने का निर्देश ऋषिगणों ने इस अनुदान का भरपूर सदुपयोग करने हेतु ही किया है। सविता देवता के माहात्म्य पर आर्षग्रंथों में प्रचूर संख्या में उदाहरण मिलते हैं।
साधना की दृष्टि से अथवा चिंतन को परिष्कृत करने की दृष्टि से हम श्रेष्ठता को साथ लिए रहें और उसी का ध्यान किया करें।
साधना के संबंध में शास्त्रकार लिखते हैं —
साधना का प्रयोजन है। अपने ही काय-कलेवर की यज्ञशाला में पाँच प्राणों का जो पंचकुंडी यज्ञ निरंतर चलता रहता है, उस देवयज्ञ के प्रति जागृत होना, उसके रहस्य को समझना और उसकी प्रेरणाओं को ग्रहण करना प्रत्येक मनुष्य का पुनीत कर्त्तव्य है।
साधना-विधानों को अपनाने का भी प्रयत्न करें। इस आधार पर मस्तिष्क और अंतःकरण दोनों ही महानता के ढाँचे में ढल सकते हैं और उनके स्तर के अनुरूप ही हमारे प्रत्यक्ष व्यवहार एवं क्रियाकलाप का पहिया लुढ़क सकता है।
साधना किए चूकते नहीं।
साधना करने से विश्व-ब्रह्मांड का रहस्यमयज्ञान प्राप्त होता है। यही कुंडलिनी सिद्धि है। “
साधना का एक ही उद्देश्य है— आत्मोत्कर्ष, व्यक्तित्व का परिष्कार। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि बहिरंग या अंतरंग क्षेत्र का जो भी काम हाथ में लिया जाएगा, वह पूरा होकर रहेगा। भले ही उसमें कुछ देर लगे, पर विकसित व्यक्तित्व वालों के लिए कोई कार्य असंभव नहीं। कोई कार्य इसलिए कहा जा रहा है कि उत्कृष्ट चिंतन के रहते उच्चस्तरीय लक्ष्य ही निर्धारित होते हैं। निकृष्टता न तो उन्हें रुचती है और न उनके पास फटकती है।
साधना का संकेत है। इसे देवयज्ञ कहा गया है। चेतना-ऊर्जाएँ ही देवसत्ताएँ हैं। अतः इन चेतना-ऊर्जाओं की पंचस्तरीय सक्रियता ही पाँच आहुतियाँ हैं; जिनके संपन्न होने से देवयज्ञ संपन्न होता है।
साधनाओं पर उसका चमत्कारी प्रतिफल दृष्टिगोचर होता है। इसलिए आगम और निगम दोनों ही संप्रदायों के लोग सूर्यग्रहण के अवसर पर बिना कुछ विशेष कोई साधना किए चूकते नहीं।
साधना हो, तो शांतिकुंज को देखा टटोला जा सकता है।
साधना द्वारा इसी सोम को तीव्रता से आकर्षित किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-February
साधनाएँ ही होती हैं।
साधना। 4. गायत्री का शक्ति स्रोत सविता देवता। 5. गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया। 6. गायत्री पंचमुखी और एक मुखी। 7. गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना।
साधना के नाम से जाना गया था और पंचकोशों का अनावरण भी कहा गया था। उसके साथ जुड़े हुए अनुशासन अतीव कठोर थे। इन दिनों जहाँ भी जिनसे भी जैसी भी तपश्चर्या बन पड़ रही है इनकी तुलना में इसे किसी भी प्रकार कम नहीं माना जा सकता है। तप साधना में ऐसे कठोर इतने व्रत नियमों को कोई विरले ही साध पाते हैं। अब वह साधना पूर्ण होती है।
साधना, 36. गायत्री के पाँच मुख पाँच दिव्य कोश।
साधना बन जायगा।
साधनाएँ आरम्भ से अन्त तक युग परिवर्तन एवं जन कल्याण के निमित्त ही हो रही हैं। महापुरश्चरणों के अन्त में सहस्रकुण्डी यज्ञ भी सामूहिक ही हुआ था और इसके उपरान्त गायत्री अनुष्ठानों एवं यज्ञ आयोजनों का क्रम सामूहिक इबादतों के रूप में ही चला है। अब भी हर नव रात्रि में सामूहिक साधनाएँ ही होती हैं।
साधना का समापन भी इसे राष्ट्रेव की कुण्डलिनी जागरण तप भी कहा गया है। इस प्रकार यह त्रिपदा त्रिवेणी बनती है ओर उसकी पूर्णता में एक लाख कुण्डों में यज्ञाग्नि प्रज्वलित होनी है। युग संधि की अवधि में तो यह 24 लक्ष्य कुण्डों की प्रक्रिया बन कर सम्पन्न होगी।
साधनाएँ व्यक्तिगत ही होती है। लोग अपने लिए स्वर्ग मुक्ति ऋद्धि सिद्धि देवदर्शन वरदान मनोकामना कष्ट निवारण आदि के निमित्त ही साधनाएँ करते हैं, किन्तु अपनी साधनाएँ आरम्भ से अन्त तक युग परिवर्तन एवं जन कल्याण के निमित्त ही हो रही हैं। महापुरश्चरणों के अन्त में सहस्रकुण्डी यज्ञ भी सामूहिक ही हुआ था और इसके उपरान्त गायत्री अनुष्ठानों एवं यज्ञ आयोजनों का क्रम सामूहिक इबादतों के रूप में ही चला है। अब भी हर नव रात्रि में सामूहिक साधनाएँ ही होती हैं।
साधना के लिए अलग स्थान की तलाश न करो। अपने दायित्वों और संबंधियों के साथ ऐसा तालमेल बिठाओ जिसमें आदर्शों का गहरा पुट हो। इस प्रकार तुम्हारा व्यावहारिक जीवन ही समग्र साधना बन जायगा।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से एकचित्त लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय का सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना की एक श्रृंखला चलाई गई है। उसका प्रभाव एकाकी साधना की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। ईसाइयों के गिरजों में रविवार को मुसलमानों की मस्जिदों में शुक्रवार को नमाज की धूम रहती है। जो नित्य नियमित रूप से प्रार्थना नहीं कर सकते, वे भी उन सामूहिक आयोजनों में सरलतापूर्वक सम्मिलित होते हैं। एकाकी प्रयासों की अपेक्षा सम्मिलित कार्यक्रम की शक्ति सामर्थ्य कहीं अधिक होती है, इसे तो हर कोई जानता है।
साधना आरंभ की गई थी। उसे सावित्री साधना के नाम से जाना गया था और पंचकोशों का अनावरण भी कहा गया था। उसके साथ जुड़े हुए अनुशासन अतीव कठोर थे। इन दिनों जहाँ भी जिनसे भी जैसी भी तपश्चर्या बन पड़ रही है इनकी तुलना में इसे किसी भी प्रकार कम नहीं माना जा सकता है। तप साधना में ऐसे कठोर इतने व्रत नियमों को कोई विरले ही साध पाते हैं।
साधना। 9. गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार। 14. गायत्री और यज्ञोपवीत।
साधना मू0 1)- (द) गायत्री चालीसा मू0 20
साधना में ऐसे कठोर इतने व्रत नियमों को कोई विरले ही साध पाते हैं। अब वह साधना पूर्ण होती है। इसे भारत की देवात्मा का कुण्डलिनी जागरण कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। आमतौर से व्यक्ति विशेष अपनी निजी क्षमता उभारने के लिए कुछ कुण्डलिनी की प्रचंड साधना करते हैं। उसमें षट्चक्रों का वेधन तथा बन्ध मुद्राओं को ध्यान धारणाओं को विशेष समावेश होता है पर अपनी साधना तो भारत की देवात्मा में प्रचंड बल भरने की थी।
साधना तो भारत की देवात्मा में प्रचंड बल भरने की थी। ताकि इस स्वर्गादपि गरीयसी देवभूमि का देवत्व दावानल की तरह उबल पड़े।
साधना से एकचित्त लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय का सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना करते हैं। उसमें षट्चक्रों का वेधन तथा बन्ध मुद्राओं को ध्यान धारणाओं को विशेष समावेश होता है पर अपनी साधना तो भारत की देवात्मा में प्रचंड बल भरने की थी। ताकि इस स्वर्गादपि गरीयसी देवभूमि का देवत्व दावानल की तरह उबल पड़े।
साधना। 8. गायत्री की विशेष साधना। 9. गायत्री मंत्र की विलक्षण शक्ति 10. गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11. गायत्री की सिद्धियाँ। 12. गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप। 13. स्त्रियों का गायत्री अधिकार।
साधना में ऐसा ही ब्रह्म तेज प्राप्त होता है तो 14 पुरश्चरण पर भी कोई सिद्ध क्यों नहीं मिली। भैरव ने उन्हें 14 जन्मों के दृश्य दिखाये। उनमें बन पड़े पापों के करने में ही अब तक के अनुष्ठान खप जाने की बात बताई ओर पाप कुसंस्कार कट जाने पर अब जो साधना करेंगे उससे सिद्धि मिलेगी। माधवाचार्य को नया प्रकाश मिला वे वापस वृन्दावन लौट आये। पन्द्रहवें पुरश्चरण पर उन्हें सिद्धि मिली।
साधना रही है। इसकी पूर्णाहुति सौ-सौ कुण्डों के सौ गायत्री यज्ञों में हो रही है। सन् 1958 का यज्ञ एक हजार कुण्डों का हुआ था। यह एक लाख कुण्डों का होगा। सौ-सौ कुण्डों के सौ यज्ञों में विकेंद्रीकरण इसलिए किया गया है कि उसका अधिक व्यापक क्षेत्र में प्रभाव विस्तृत हो सके और उससे अधिकाधिक क्षेत्रों का जन समुदाय लाभान्वित हो सके।
साधना करेंगे उससे सिद्धि मिलेगी। माधवाचार्य को नया प्रकाश मिला वे वापस वृन्दावन लौट आये। पन्द्रहवें पुरश्चरण पर उन्हें सिद्धि मिली। उस उपलब्धि के सहारे उन्होंने “माधव निदान” नामक आयुर्वेद का अद्भुत ग्रन्थ बनाया और कृतकृत्य हो गये।
साधना पूर्ण होती है। इसे भारत की देवात्मा का कुण्डलिनी जागरण कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। आमतौर से व्यक्ति विशेष अपनी निजी क्षमता उभारने के लिए कुछ कुण्डलिनी की प्रचंड साधना करते हैं। उसमें षट्चक्रों का वेधन तथा बन्ध मुद्राओं को ध्यान धारणाओं को विशेष समावेश होता है पर अपनी साधना तो भारत की देवात्मा में प्रचंड बल भरने की थी। ताकि इस स्वर्गादपि गरीयसी देवभूमि का देवत्व दावानल की तरह उबल पड़े।
साधना का अभीष्ट परिणाम निश्चित रूप से होना है और वह अपने ढंग का अत्यन्त महिमामय प्रभाव उत्पन्न करेगा। भारत की देवात्मा जागेगी और वह न केवल अपने देश की समस्याओं का समाधान करेगी, वरन् समीपवर्ती दूरवर्ती अन्य क्षेत्रों पर भी उसका प्रभाव पड़े गरिमा को हस्तगत करेगा और अन्यान्य क्षेत्रों पर कल्याण के राजमार्ग पर चल सकने की क्षमता प्रदान करेगा। यह तीन वर्षीय हमारे जीवन की अन्तिम और अति कठोर साधना रही है। इसकी पूर्णाहुति सौ-सौ कुण्डों के सौ गायत्री यज्ञों में हो रही है। सन् 1958 का यज्ञ एक हजार कुण्डों का हुआ था।
साधनाएँ करते हैं, किन्तु अपनी साधनाएँ आरम्भ से अन्त तक युग परिवर्तन एवं जन कल्याण के निमित्त ही हो रही हैं। महापुरश्चरणों के अन्त में सहस्रकुण्डी यज्ञ भी सामूहिक ही हुआ था और इसके उपरान्त गायत्री अनुष्ठानों एवं यज्ञ आयोजनों का क्रम सामूहिक इबादतों के रूप में ही चला है। अब भी हर नव रात्रि में सामूहिक साधनाएँ ही होती हैं।
साधना की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। ईसाइयों के गिरजों में रविवार को मुसलमानों की मस्जिदों में शुक्रवार को नमाज की धूम रहती है। जो नित्य नियमित रूप से प्रार्थना नहीं कर सकते, वे भी उन सामूहिक आयोजनों में सरलतापूर्वक सम्मिलित होते हैं। एकाकी प्रयासों की अपेक्षा सम्मिलित कार्यक्रम की शक्ति सामर्थ्य कहीं अधिक होती है, इसे तो हर कोई जानता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-November
साधनाओं में अधिकाँश भूमिका उसी की होती है।
साधना का महत्वपूर्ण भाग है। उतने भर से ही वह महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता। अन्तरिक्ष से भी बहुत कुछ प्राप्त करना पड़ता है। धरातल पर जलाशय क्षेत्र में अनेक उपयोगी पदार्थ और तत्व पाये जाते हैं। पर इससे कहीं अधिक मात्रा उसकी है जो वायु भूत अंतरिक्ष में परिभ्रमण करता रहता है।
साधना पुरुषार्थ है।
साधना की थी। एक बार गुरु पर्व के अवसर पर विशाल स्तर पर ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया। तैयारियाँ एक सप्ताह से चल रही थीं। सभी आवश्यक सामग्री इकट्ठी की जा रही थीं। समीपवर्ती क्षेत्र में महात्मा खंडेराव जी ने एक भोज का आयोजन किया है।
साधना से जागृत अंतर्दृष्टि से इस सापेक्षिकता के भ्रमजाल को जाना एवं स्वयं को निरपेक्ष ब्रह्म में प्रतिष्ठित किया था। विज्ञान की गति भी उसी ओर है।
साधना करनी पड़ती है। धारणा करनी पड़ती है कि शरीर ही नहीं मन भी प्रसुप्त स्थिति में चला गया और केवल साक्षी दृष्टा आत्मा ही सजग है। इस स्थिति में आत्म चेतना को ही काम करना पड़ता है। शरीर और मन दोनों ही गहरे विश्राम की स्थिति में होते हैं।
साधना विज्ञान की रहस्यमयी सम्भावनाओं में यह तथ्य कुछ सुगमता से क्रियान्वित किया जा सकता है कि मनुष्य हर दृष्टि से उन्नत बन सके। सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व सम्पन्न संतति की निर्मिती ऐसे ही उपचारों से सम्भव है जो मानवी अन्तराल की गहराई में संस्कार चेतना से अन्त सत्ता को अनुप्राणित कर दें।
साधना का मूलभूत सिद्धान्त चित्त की एकाग्रता ही है। पातंजलि के योगदर्शन का प्रथम सूत्र है “योगश्चित्तवृति निरोध” अर्थात् चित्त की वृत्तियों को रोक लेना ही योग है। इस कथन का प्रथम अभिप्राय एकाग्रता साधने के लिए साधक को तत्पर करना है। दूसरा प्रयोजन यह है कि मन बहिर्मुखी आकर्षणों में लुभाता रहता है, उसे रोक कर अन्तर्मुखी किया जाए। गुण कर्म स्वभाव में समाविष्ट दुष्प्रवृत्तियों का कड़ाई के साथ अवरोध किया जाए।
साधना ही पर्याप्त नहीं होती। अपने प्रसुप्त केन्द्र का जागरण भी साधना का महत्वपूर्ण भाग है। उतने भर से ही वह महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता। अन्तरिक्ष से भी बहुत कुछ प्राप्त करना पड़ता है। धरातल पर जलाशय क्षेत्र में अनेक उपयोगी पदार्थ और तत्व पाये जाते हैं।
साधना उपचारों की शारीरिक क्रिया कलापों पर प्रभाव डालने की क्षमता जैसे विषय प्रयोग परक शृंखला में सम्मिलित होते चले जा रहे हैं। दार्शनिक अनुसंधान संबंधी प्रतिपादन तो इस पत्रिका में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। किन्तु प्रयोग निष्कर्षों हेतु वाँछित अवधि तक साधक वर्गों पर शोध प्रविधि के आधार पर अनुसंधान अनिवार्य था। अब क्रमशः ऐसी स्थिति बन रही है कि अपने अनुभव निष्कर्षों को बुलेटिन नुमा एक छोटे से प्रपत्र में अथवा इस पत्रिका के निर्धारित पृष्ठों पर समय-समय पर दी जाती रहे ताकि जनसाधारण को ब्रह्मवर्चस् के सक्रिय क्रिया-कलापों की जानकारी मिल सके।
साधनाओं से विचलित न होता तो आज वह भी बूँदों के समान, वंशालोचन, कपूर और मोती बन गया होता।
साधनाओं तक सीमित नहीं रहते, उन्हें धरातल के विभिन्न क्षेत्रों को वहाँ के विशेष व्यक्तियों को संदेश पहुँचाने पड़ते हैं। इसके लिये उनका आसन ऐसे स्थान पर होना चाहिए जो इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिए सही ओर संतुलित हो। समुद्रों में खड़े किये गये प्रकाश स्तम्भ भी ऐसी ही ऊँचाई तक उठाये जाते हैं, जहाँ से उनमें जलने वाला प्रकाश जलयानों तक पहुँचने में भली प्रकार समर्थ हो। यदि यह स्तम्भ अनुपात से नीचे या ऊँचे हों तो निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति न हो सकेगी। सिद्ध पुरुषों को प्रसारण भी करना पड़ता है और प्रकाश स्तम्भों की भूमिका भी निभानी पड़ती है।
साधनाओं में याचित सहायता भी मिलती है और अहैतुकी अनुग्रह भी। मार्गदर्शन, परामर्श भी उन्हें उच्चस्तरीय मिलता रहता है। जिस प्रकार चन्दन के निकट उगने वाले अन्य पौधे भी सुगन्धित हो जाते हैं, उसी प्रकार देवात्मा क्षेत्र में रहने वाले स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरधारी साधना द्वारा अपनी-अपनी रुचि के मनोरथ प्राप्त करते हैं।
साधना की शक्ति अपरम्पार है। सुपात्रों को वह मिलती है एवं वे प्रकृति की व्यवस्था से सामयिक तालमेल बिठाकर उसका चमत्कारी स्वरूप यदा कदा दिखला देते हैं किन्तु परब्रह्म की व्यवस्था में कभी व्यतिक्रम नहीं आने देते।
साधना से मानसोपचार प्रक्रिया से हुआ था, किन्तु अब वनौषधियों का रासायनिक विश्लेषण, उनके प्रभावों का विवेचन, संगीत की शक्ति एवं मंत्र शक्ति का शरीर, मन, वनस्पति व जीव जन्तु वर्ग पर प्रभाव, विभिन्न साधना उपचारों व जीव जंतु वर्ग पर प्रभाव, विभिन्न साधना उपचारों की शारीरिक क्रिया कलापों पर प्रभाव डालने की क्षमता जैसे विषय प्रयोग परक शृंखला में सम्मिलित होते चले जा रहे हैं। दार्शनिक अनुसंधान संबंधी प्रतिपादन तो इस पत्रिका में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। किन्तु प्रयोग निष्कर्षों हेतु वाँछित अवधि तक साधक वर्गों पर शोध प्रविधि के आधार पर अनुसंधान अनिवार्य था। अब क्रमशः ऐसी स्थिति बन रही है कि अपने अनुभव निष्कर्षों को बुलेटिन नुमा एक छोटे से प्रपत्र में अथवा इस पत्रिका के निर्धारित पृष्ठों पर समय-समय पर दी जाती रहे ताकि जनसाधारण को ब्रह्मवर्चस् के सक्रिय क्रिया-कलापों की जानकारी मिल सके।
साधना से मन्तव्य ईश्वरीय प्रेम की उपलब्धि से ही माना जाता है। यदि साधना सच्ची है तो उसका परिणाम प्रेम के रूप में ही मिलना चाहिए। सच्चे साधक का हृदय-प्रेम की धारा से अभिपूरित हो जाता है। वह प्राणिमात्र में अपनी आत्मा के दर्शन करने लगता है। आत्मीयता और उदारता प्रेम का ही तो रूप होता है।
साधनाओं की सामर्थ्य का प्रतिफल दिव्य माना है, जब कि कुण्डलिनी जागरण से अपने या दूसरों के लिए भौतिक स्तर के लाभ-हानि ही उठाये जा सकते हैं। इसके सभी प्रयोगों में ध्यानयोग नितान्त आवश्यक है। साधनाओं में अधिकाँश भूमिका उसी की होती है।
साधना की सफलता का सच्ची सफलता का अनुभव दर्शन के रूप में होने की अभिलाषा भक्तजनों के मन में रहती है।
साधना उपचारों व जीव जंतु वर्ग पर प्रभाव, विभिन्न साधना उपचारों की शारीरिक क्रिया कलापों पर प्रभाव डालने की क्षमता जैसे विषय प्रयोग परक शृंखला में सम्मिलित होते चले जा रहे हैं। दार्शनिक अनुसंधान संबंधी प्रतिपादन तो इस पत्रिका में समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं। किन्तु प्रयोग निष्कर्षों हेतु वाँछित अवधि तक साधक वर्गों पर शोध प्रविधि के आधार पर अनुसंधान अनिवार्य था। अब क्रमशः ऐसी स्थिति बन रही है कि अपने अनुभव निष्कर्षों को बुलेटिन नुमा एक छोटे से प्रपत्र में अथवा इस पत्रिका के निर्धारित पृष्ठों पर समय-समय पर दी जाती रहे ताकि जनसाधारण को ब्रह्मवर्चस् के सक्रिय क्रिया-कलापों की जानकारी मिल सके।
साधना सच्ची है तो उसका परिणाम प्रेम के रूप में ही मिलना चाहिए। सच्चे साधक का हृदय-प्रेम की धारा से अभिपूरित हो जाता है। वह प्राणिमात्र में अपनी आत्मा के दर्शन करने लगता है। आत्मीयता और उदारता प्रेम का ही तो रूप होता है। आत्मीयता का भाव मिलते ही संसार का सुख-दुःख साधक को अपना दुःख-सुख मालूम होने लगता है।
साधना में किसी इत्र, चन्दन, कपूर हींग आदि तीव्र गंध वाली वस्तु को नाक के समीप ले जाकर सूंघा जाता है और फिर उसे हटा कर कल्पना के सहारे उस गंध की उपस्थिति का अनुभव किया जाता है।
साधना द्वारा अपनी-अपनी रुचि के मनोरथ प्राप्त करते हैं।
साधनाएँ करने वाले कापालिक अपने प्रयोगों के लिए प्रायः श्मशान भूमि में डेरा डालते हैं, क्योंकि वहाँ का वातावरण और प्रेतात्माओं का जमघट उन्हें अपने लिए अधिक कारगर दीखता है। वहाँ रहकर वे सफलताएँ भी अधिक मात्रा में तथा जल्दी प्राप्त करते हैं। ठीक यही बात उच्चस्तरीय आत्मबल सम्पादन के सम्बन्ध में भी है। जिन क्षेत्रों में देव शक्तियाँ दिव्य आत्माएं सूक्ष्म रूप में बहुलता पूर्वक विचरण करती हैं, वहाँ रहकर निर्धारित साधनाओं में याचित सहायता भी मिलती है और अहैतुकी अनुग्रह भी। मार्गदर्शन, परामर्श भी उन्हें उच्चस्तरीय मिलता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-December
साधना के समय साधु पर बीट कर दी। साधु को क्रोध आया। उसने आँखें तरेर कर देखा तो चिड़िया जल गई और नीचे गिर पड़ी। इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी मात्र योगीराज ही थे।
साधना साधारणतया त्राटक के आधार पर की जाती है। प्रत्यक्ष प्रकाशमान वस्तु को देखकर उसका स्वरूप नेत्र बंद करके चिंतन करते रहने की विधा को त्राटक साधना कहा गया है। इससे धर्मचक्षुओं में आत्मतेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है।
साधना की गई है।
साधना शक्तिसंपन्न साधकों में अद्भुत क्षमताएँ आ जाती हैं। वे चाहें तो भौतिक सीमाओं, बंधनों, आघातों एवं दिक् काल की मर्यादाओं से मुक्त एवं अप्रभावित बने रह सकते है। ऐसे अनेकों संत एवं सिद्धपुरुष हुए हैं, जिन्हें अपने सुधारवादी दृष्टिकोण या आन्दोलन के कारण तत्कालीन शासकों एवं प्रशासकों के कोप का शिकार होना पड़ा; पर वे उनका कुछ भी न बिगाड़ सके।
साधनाओं द्वारा ही दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को दूर किया और अपने चरित्र को निर्मल बनाया जा सकता है। कठिन परिस्थितियों से गुजरे बिना व्यक्तित्व का विकास संभव नहीं है। जब तक आदमी विज्ञानप्रदत्त सुविधा, वासना, विलासिता द्वारा उपलब्ध अपूर्व संतोषों से घिरा रहेगा, तब तक उसकी समझ में नहीं आएगा कि उसका पतन हो रहा है।
साधना एवं लोक-मंगल की कामना से जुड़ा प्रचंड तप पुरुषार्थ ही रहा हैं। शाप और वरदान देने की शक्ति इसी आधार पर मिलती है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने नूतन सृष्टि की रचना इसी आधार पर की थी। मुनि भारद्वाज ने अपने अग्रज को मनाने, वापस जाते भरत का राजसी सत्कार अपने तपोबल के आधार पर किया था। महर्षि वशिष्ठ की कामधेनु किसी भी क्षण ऐश्वर्य-साम्राज्य खड़ा करने में सक्षम थी।
साधना करनी होती है। स्थूल और सूक्ष्मनाद इस समूचे ब्रह्मांड में संव्याप्त है। वह संभाषण में ही नहीं, घटनाओं से भी उत्पन्न होता है। भगदड़, मारपीट, धमाका, चीत्कार आदि ध्वनियाँ हैं, पर उनके सहारे यह जान लिया जाता है कि क्या घटना घटित हो रही है। आग लगने, आँधी चलने, पानी बरसने आदि की घटनाओं को अंधे भी जान लेते हैं।
साधना थी। साधु ने इस संबंध में अनेक तर्क किए तो उस अनपढ़ महिला ने इतना ही कहा कि मेरे गुरु तुलाधार वैश्य अमुक गाँव में रहते हैं। उनसे तत्त्वज्ञान पूछें। मैं तो उनके बताये हुए मार्ग पर चली आ रही हूँ।”
साधना-प्रयोजन के लिए जिव्हा माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।
साधना के उच्च सोपानों पर चढ़ते हुए अवतार स्तर तक पहुँच सकता है।
साधना के क्रिया-कृत्यों में प्रथम भूमिका शरीर की होती है, शरीर के साथ मन की भी; क्योंकि मन और शरीर दोनों ही प्रकृति विनिर्मित हैं। मन को ग्यारहवीं इंद्रिय माना गया है। उसकी ऊँची भूमिका भावात्मक है, जो रसरूप परब्रह्म को अपने चंगुल में जकड़ती है।
साधना करते हुए ऐसा साहस भरा मनोबल बढ़ाना पड़ता हैं जो अपने प्रताप से किसी भी घटक को उच्छृंखलता न बरतने दें।
साधना के बिना पूरी नहीं हो सकती। कारण कि मानव स्वयं ही संगमरमर तथा स्वयं ही मूर्तिकार भी है। अपने हाथों ही उसे अपना निर्माण करना होगा। हथौड़े की कठिन मार— कष्ट साध्य साधनाओं द्वारा ही दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को दूर किया और अपने चरित्र को निर्मल बनाया जा सकता है। कठिन परिस्थितियों से गुजरे बिना व्यक्तित्व का विकास संभव नहीं है।
साधना के द्वारा इसी काय-ऊर्जा को, संतुलित-नियंत्रित करके मस्तिष्क के ‘प्लेजर सेंटर्स’ को सरलता से उकसाया जाता है, जिससे व्यक्ति का जीवन सदा स्वस्थ एवं सुखद बना रहता है। स्पेन के सुप्रसिद्ध चिकित्सक जोस डलगाडो द्वारा किए गए परीक्षणों से पता चला है कि यदि मस्तिष्क को विद्युत द्वारा उत्तेजितकर उसकी आंतरिक ऊर्जा को सुविकसित कर लिया जाए और उसे उपयुक्त दिशाधारा दी जा सके, तो व्यक्ति के चिंतन-प्रवाह को विधेयात्मक मोड़ दिया जा सकता है, उसे परिमार्जित-परिष्कृत किया जा सकता है और व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाया जा सकता है। योग-साधनाओं द्वारा योगीजन इसी प्रक्रिया को संपन्न करते हैं। विभिन्न प्रकार के योगाभ्यासों द्वारा शरीर विद्युत को नियंत्रित-सुनियोजितकर वे न सिर्फ शरीर-मन से स्वस्थ बने रहते हैं, वरन अपनी मलीनता को हटाकर प्रखरता उभारने में भी सफल होते हैं। यह प्रखरता वस्तुतः काय-ऊर्जा के सुनियोजन से ही सफल— संभव बन पाती है।
साधना को तीन गुने कम समय में सफल होते देखा जा सकता है।
साधना से प्राप्त अंतर्दृष्टि से ही वास्तविकता और यथार्थता का ज्ञान होता है और परम सत्य से एकत्व हम पाते है। तब चतुर्दिक् पूर्ण सत्य, पूर्ण ज्ञान व पूर्ण आनंद का ही साम्राज्य संव्याप्त होता है। यथार्थता का यह बोध कोई भी वेदांत की शिक्षाओं को अपनाकर अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतारने पर कर सकता है।
साधना सत्रों में आने के लिए इन दिनों असाधारण उत्साह उमड़ा है। मिशन के सूत्रसंचालक का नित्य नियमित संदेश घर-घर पहुँचाने वाली अखण्ड ज्योति और युग निर्माण योजना, युग शक्ति, के पाठकों को उनमें प्राथमिकता दी जा रही है। गुरुदेव के वर्तमान कार्यकाल में ही एक बार प्रत्यक्ष संपर्क साधने के लिए सभी परिजन लालायित हैं। स्थान सीमित और इच्छुक अधिक होने से बारी-बारी से ही उनको आने की स्वीकृति भेजी जा रही हैं। हर माह से सत्र अनवरत रूप से जारी रहते है— दिनाँक 1 से 9 तक, 11 से 19 तक एवं 21 से 29 तक।
साधनामार्ग के पथिक को एक ही बात कहते कि भजन भले ही कम करना पर लोभ, मोह भरी अहंकार के मायाजाल से बचकर रहने का प्रयत्न करना।
साधनाओं द्वारा योगीजन इसी प्रक्रिया को संपन्न करते हैं। विभिन्न प्रकार के योगाभ्यासों द्वारा शरीर विद्युत को नियंत्रित-सुनियोजितकर वे न सिर्फ शरीर-मन से स्वस्थ बने रहते हैं, वरन अपनी मलीनता को हटाकर प्रखरता उभारने में भी सफल होते हैं। यह प्रखरता वस्तुतः काय-ऊर्जा के सुनियोजन से ही सफल— संभव बन पाती है। श्रेष्ठ, प्रखर-व्यक्तित्वसंपन्न व्यक्ति संभवतः अगले दिनों इसी आधार पर बनाए जाएँगे।
साधना कहा गया है। इससे धर्मचक्षुओं में आत्मतेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है।
साधना करता हूँ। मेरे साथ चलें तो मैं अपनी क्रिया-प्रक्रिया दिखाकर आपका समाधान कर दूँगा।”
साधना में, समष्टि की आराधना में विश्वास रखते है। इसके बदले दैवी अनुग्रह एवं असीम जनसमुदाय का सहयोग-सम्मान पाते हैं, आत्मसंतोषरूपी अनुदान पाते हैं।
साधना, जिसमें यह घर में इधर-उधर घूम रही है और मुझे बहाना बताती है। कुछ देर प्रतीक्षा करने पर योगी को क्रोध आने लगा और वे शाप देने की धमकी देने लगे।
साधना शरीर और मन के संयोग से बन पड़ने वाली क्रिया का नाम है। इस माध्यम से हम पहले प्रकृति को पकड़ते हैं, इसके बाद पुरुष को पकड़ते हैं। साधना के क्रिया-कृत्यों में प्रथम भूमिका शरीर की होती है, शरीर के साथ मन की भी; क्योंकि मन और शरीर दोनों ही प्रकृति विनिर्मित हैं। मन को ग्यारहवीं इंद्रिय माना गया है। उसकी ऊँची भूमिका भावात्मक है, जो रसरूप परब्रह्म को अपने चंगुल में जकड़ती है।
साधना चली। शंकर जी का ध्यान खिंचा और वे उन्हें दर्शन देने जा पहुँचे और वर माँगने के लिए कहा।
साधना सध जाती है। दसों इंद्रियों को अर्थात सशक्त काया-संस्था को मात्र सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करना उनका दुरुपयोग न होने देने ही इंद्रियनिग्रह है।
साधना के अवलंबन तथा सम्मोहन से जाग उठने पर ही हो सकता है। साधना से प्राप्त अंतर्दृष्टि से ही वास्तविकता और यथार्थता का ज्ञान होता है और परम सत्य से एकत्व हम पाते है। तब चतुर्दिक् पूर्ण सत्य, पूर्ण ज्ञान व पूर्ण आनंद का ही साम्राज्य संव्याप्त होता है। यथार्थता का यह बोध कोई भी वेदांत की शिक्षाओं को अपनाकर अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतारने पर कर सकता है।
साधना का ढिंढोरा पीटते दिखाई देंगे, पर इसमें अध्यात्म कहीं है नहीं।
साधना कर रही हूँ।” वस्तुतः वह अपने वृद्ध सास, ससुर की आवश्यक सेवाओं में समग्र श्रद्धा के साथ लगी थी। वही उसकी साधना थी। साधु ने इस संबंध में अनेक तर्क किए तो उस अनपढ़ महिला ने इतना ही कहा कि मेरे गुरु तुलाधार वैश्य अमुक गाँव में रहते हैं। उनसे तत्त्वज्ञान पूछें।
साधना-उपचारों की नियमितता निश्चित ही प्रतिकूल प्रभावों से रक्षा करती है।
साधना यह अपना ही काम है अथवा फिर किसी दिव्यदर्शी साधक से, गुरुजन से इसकी समीक्षा करानी चाहिए। जो उसमें अनौचित्य झलका हो, उसका निराकरण करने के लिए सन्निद्ध होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-October
साधना करने वाले साधक को जिन बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना होता है, उसमें प्रधान यह है कि मंत्रोच्चारण की ध्वनि शुद्ध हो। इसकी जाँच पड़ताल किसी अनुभवी से करा लेनी चाहिए। ईश्वर प्रार्थना के रूप में राम का नाम सीधा उल्टा, सही गलत किसी भी रूप में किया जा सकता है, पर मंत्रोच्चार में उसकी ध्वनि शुद्धता आवश्यक है। सितार के तारों का गठन और अंगुलि चालन यदि सही हो तो ही उसमें से अभीष्ट राग, रागनियाँ निकलते हैं। ओंधे किसी भी प्रकार कुछ भी बजाने लग जाय तो उसमें से बेसुरी कर्कशता ही निकलेगी।
साधना अमुक वृक्ष के नीचे की जाती है। इसके पीछे उन विशेषताओं का समावेश होना चाहिए, जिनका आज के वैज्ञानिक एण्टीना में उपयोग करने लगे है। यह एक प्रकार की बिजली की अधिक मात्रा का उन पेड़ों में होना है। हर पेड़ में यह विशेषता नहीं होती। कुछ विशेष वृक्षों में भी यही विशेषता पायी जाती है।
साधना द्वारा सिद्ध कर लिया जाय तो वे अतीन्द्रिय क्षमताओं के रूप में विकसित होती और अलौकिक अनुभूतियाँ प्रस्तुत करती है। दूरश्रवण दूरदर्शन, भविष्य ज्ञान, जन्मांतर बोध आदि का धनी बना जा सकता है। जिव्हा है तो एक पर वह दुहरा काम करती है वह देखने के लिए रसना रूप में और बोलने के लिए वाणी रूप में प्रयुक्त होती है इसे यदि मौन एवं अस्वाद के आधार पर दोनों रूपों में सिद्ध कर लिया जाय तो अन्तरंग और बहिरंग स्तर की दुहरी विभूतियों का रसास्वादन किया जा सकता है।
साधना, उपासना से पूर्व स्नान कर लेने का विधि विधान आवश्यक माना गया है। उसका तात्पर्य जिस तिस प्रकार नहाने की चिह्न पूजा कर लेना नहीं है वरन् यह है कि त्वचा को रगड़ कर लाल कर लिया जाय, ताकि उसके ऊपर किसी कारण जमी हुई परत का भली प्रकार समापन हो जाय। इस व्यवधान के हट जाने पर प्रकृति की अनेक महत्वपूर्ण शक्तियों का शरीर के साथ आदान प्रदान सम्भव हो जाता है। बदलते मौसम अपना प्रभाव त्वचा पर डालते हैं। उनके दबाव ऐसे होते हैं कि तापमान के अनुरूप कपड़े पहने बिना काम नहीं चलता।
साधना के स्वल्प प्रयास को भी अपने तूफानी झोंके में उड़ा ले जाय। इसलिए मंत्र योगी को आहार विहार की सात्विकता संयमशीलता बनाये रहने के लिए विज्ञजन दबाव या निर्देश करते रहे हैं विशेषतया आहार की सात्विकता बढ़ाने और मात्रा घटाने के के पलिए। भूख से कुछ कम और नियत समय पर सात्विक आहार करने से भी उपवास का काम चलाऊ उद्देश्य पूरा हो जाता है। इस हेतु अस्वाद व्रत बिना नमक शक्कर मिला भोजन भी प्रशंसनीय है। अमृताशन उबला हुआ खिड़की जैसे प्रस्तुतीकरण को भी अन्न की तुलना में कुछ अधिक ही रखा जाय।
साधना का यत्किंचित् प्रयास भी हर किस के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। उससे जीवनी शक्ति का भण्डार बढ़ता चला जाता है, भले ही वह सीमित प्रयास के कारण स्वल्प मात्रा में ही उपलब्ध क्यों न हो?
साधनारत व्यक्तियों के शरीर से निकलती है और अपनी एक प्रभाव परिधि का निर्माण करती है। ऐसी शक्ति का प्रकटीकरण त्वचा परिकर से होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते ही यह व्यवस्था बनी है कि किसके साथ घनिष्ठता स्थापित करनी चाहिए और किससे बचते रहना चाहिए?
साधना प्रमुख है। इन्द्रिय साधनाओं में भी दो की प्रधानता है- एक जिव्हा दूसरी ज्ञानेन्द्रिय। यही दो ऐसी है जो स्वास्थ्य पर दुहरी कुल्हाड़ी चलाती है। यदि इन दो पर अंकुश रखा तो समझना चाहिए कि आधी में से आधी मंजिल पूरी हो गई। नींव गहरी और मजबूत जम गई, अब इस पर भवन उठाने का कार्य धीरे-धीरे होता रहे तो भी हर्ज नहीं।
साधनाओं सूक्ष्म शरीरों को विशिष्ट स्थिति में बनाये रखने के लिए वह विशेष रूप से उपयुक्त है। उस क्षेत्र में सूक्ष्म शरीर इस स्थिति में बने रह सकते हैं, जो यथा अवसर आवश्यकतानुसार अपने को स्थूल शरीर में भी परिणत कर सकें और उस स्तर के लोगों के साथ विचार विनिमय कर सकें। एक दूसरे को सहयोग देकर किसी बड़ी योजना को कार्यान्वित कर सकें।
साधना द्वारा मिलने वाली अणिमा-शरीर को भार रहित कर लेना। गरिमा-भारी भरकम वजन बढ़ा लेना। लघिमा-छोटा हो जाना। प्राप्तव्य-कठिन वस्तुओं की सरलता से प्राप्ति। प्राकाम्य-इच्छापूर्ति।
साधना का प्रभाव उतना ही पड़ता है, जितना जलते तवे पर पानी की कुछ बूँदों का।
साधनाओं में सब से अधिक प्रचलित व्रत उपवास है। एकादशी, रविवार, पर्व त्यौहार, देवताओं का जन्म-जयन्ती आदि में उपवासों का विधान है। कितने ही उपवास महिलाएँ सुहाग के लिए रहती है कुछ किसी कामना से, कुछ किसी प्रतिबन्ध से। कन्यादान के दिन माता पिता के उपवास रखना पड़ता है। इसका तात्पर्य आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के अतिरिक्त यह भी है कि पेट को बीच बची में छुट्टी देते रहा जाय।
साधना का सुनिश्चित प्रतिफल हो सकता है और वह मंत्र शक्ति की सार्थकता के सम्बन्ध में स्वयं संतुष्ट रहकर दूसरों को भी अपने अनुभवों से आश्वस्त कर सकता है। किन्तु कहाँ कठिनाई यह आड़े आती है कि यह संस्कृत भाषा में विनिर्मित है, साथ ही हिन्दू परम्परा से भी जुड़ा हुआ है।
साधना की कोई सिद्धि के जुड़े होने का कोई आधार नहीं है।
साधनाओं की आवश्यकता पड़ती है। इन्हें यदा-कदा कर लेने से काम नहीं चल सकता। वरन् उनका नित्य नियम बनाना पड़ता है। यदा-कदा किये जाने वाले कृत्य स्वभाव का अंग नहीं बन पाते। संस्कार स्तर तक पहुँच सकने में असमर्थ नहीं हो पाते।
साधनाओं में इन्द्रिय साधना प्रमुख है। इन्द्रिय साधनाओं में भी दो की प्रधानता है- एक जिव्हा दूसरी ज्ञानेन्द्रिय। यही दो ऐसी है जो स्वास्थ्य पर दुहरी कुल्हाड़ी चलाती है। यदि इन दो पर अंकुश रखा तो समझना चाहिए कि आधी में से आधी मंजिल पूरी हो गई। नींव गहरी और मजबूत जम गई, अब इस पर भवन उठाने का कार्य धीरे-धीरे होता रहे तो भी हर्ज नहीं।
साधना की भट्टी में तपा कर खरे सोने की तरह बनाया जाता है। योग में ब्रह्मांडीय चेतना की अजस्रता के साथ अपने आप कार्य करने लगते हैं, सामर्थ्य से भर जाते हैं। टंकी के साथ जुड़े जाने पर नल में तब तक पानी बहता रहता है जब तक टंकी खाली नहीं हो जाती। ब्रह्मचेतना, शिव चेतना आत्मिक और भौतिक शक्तियों का भंडारण निवास है। योग द्वारा उसी के साथ जुड़ा जाता है।
साधना कराते हुए उपलब्ध कराई थी।
साधना सही थी। दूसरे दिन रात को रत्न बरसे। डाकुओं ने उन्हें बटोरा और निहाल हो गये। शर्त के अनुसार उसे छुटकारा भी दे दिया। लूटे गये वस्त्र, आभूषण भी लौटा दिये।
साधना के निमित्त अपनी भाव श्रद्धा का परिचय देने के लिए कहा ही जा सकता है।
साधना के अंतर्गत आती है। जिसका प्रारम्भ आहार शुद्धि से होता है और आगे बढ़कर चरित्र शुद्धि तक पहुँचता है। दुराचारी, अनाचारी, कुकर्मी, व्यक्ति अपने उद्धत आचरणों से इतनी प्रतिकूल प्रतिक्रिया काय कलेवर में अर्जित कर लेते हैं कि उस पर मंत्र साधना का प्रभाव उतना ही पड़ता है, जितना जलते तवे पर पानी की कुछ बूँदों का।
साधना में निरत हुए।
साधना के भी चार चरण है बीजाक्षर, शक्ति संचय की तप साधना, भौतिक क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियां तथा अंतिम है ऋद्धियां।
साधनाएँ उतनी सफल नहीं हो पाती। कारण इसमें तरह तरह के लोगों से मिलते रहने से चित्तवृत्तियाँ अस्थिर होती है।, उनमें भटकाव आता है और एकाग्रता भंग होती है। यद्यपि ऐसी परिस्थितियां नदी सरोवर के एकान्त, शाँत तट पर भी रह कर उपलब्ध की जा सकती है, किन्तु वहाँ रहकर साधक वन्य प्रदेश का एक महत्वपूर्ण लाभ-वृक्षों में रहकर लम्बे काल में भी उतनी सफल नहीं हो पाती, वैसी साधनाएँ पेड़ों के संपर्क में अपेक्षाकृत कम काल में फलीभूत होती देखी जाती है। इसका कारण वृक्षों में संव्याप्त विद्युत ही है।
साधना हैं, जिसके आधार पर प्राणमय कोश या प्राणमय शरीर का विकास, नियंत्रण और उपयोग किया जाता है। यह तथ्य अब तक भले ही श्रद्धाभूत रहे हों किन्तु अब विज्ञान उन तथ्यों को स्वीकारने लगा हैं। प्राण चेतना एक ऐसी ऊर्जा है, जिसके पूरी तरह उद्घाटन किया जा सके तो मनुष्य उन दिव्य शक्तियों का चमत्कार जैसी लगती हैं। चूँकि सामान्य व्यक्ति भी इन क्षमताओं से युक्त पाये गये हैं। यह सम्भावना कपोल कल्पित नहीं लगती कि पुरुषार्थ द्वारा इन्हें अर्जित किया जा सके।
साधना विज्ञान का प्रथम पक्ष यही से आरम्भ होता है कि शरीर को निरोग और सक्षम रखा जाय। इस निमित्त शारीरिक और मानसिक संयम की आवश्यकता पड़ती है। यदि उस ओर उपेक्षा बरती जाय तो कष्ट पीड़ित शरीर अपने आप तक को स्थिर नहीं रख पाता फिर उससे योगाभ्यास जैसे उच्च प्रयोजनों की साधना कैसे सम्भव हो?
साधना में लगाया उससे उन्हें प्रत्यक्षतः कष्ट ही सहना पड़ा पर सत्प्रवृत्तियां विकसित मिलीं असंख्यों को प्रकाश एवं सन्मार्ग मिला। अतएव उन प्रयासों को परमार्थ ही माना गया। जो उसे परमार्थ मान कर सेवा, धर्म अपनाने में प्रवृत्त हुए उनका भी आत्मकल्याण ही हुआ। अत एवं सुविधा बढ़ाने के नहीं, सद्भावना एवं सद्मार्ग का अवलम्बन करने का जिसे अवसर मिला, वह हर दृष्टि से लाभ में ही रहा, यह माना जायेगा, क्योंकि उनका उद्देश्य लोकहित एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन था।
साधना द्वारा साधित की हुई जिव्हा उपरोक्त सभी प्रयोजनों की पूर्ति करती है।
साधना जैसी स्थिति उत्पन्न करके प्राप्त किया जाता है। ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ तो जागृति के साथ जुड़ी हुई है। किन्तु सूक्ष्म इन्द्रियाँ जो सूक्ष्म शरीर से संबंधित है, चित्त के साथ जुड़ती है। अचेतन मन उसी स्थित में काम करता है जब जागृति गहरी निद्रा में विलीन हो जाती है। इसे योग निद्रा भी कहा जा सकता है।
साधना के लिए कहा जा रहा है कि प्रातः काल सूर्योदय के समय न्यूनतम दस मिनट गायत्री महामंत्र का स्नान करने पर विधिवत और वैसा न बन पड़ने पर मानसिक जप किया जाय, साथ ही प्रभातकालीन सूर्य का नेत्र बन्द करके ध्यान करते रहा जाय। भावना की जाय कि इससे बल बुद्धि और सद्भाव की त्रिविध देव अनुकम्पा का लाभ उसे मिल रहा है।
साधना करें। इसका निर्धारण अपनी मन-मर्जी से नहीं कर लेना चाहिए और न पुस्तकीय उल्लेखों को आत्यंतिक प्रमाणभूत मानना चाहिए। चिकित्सा शास्त्र के अनेकों ग्रंथ औषधि निर्माण का विधान एवं सेवन का उपचार बताने वाले है। इस पर भी रोगी की विशेष स्थित को जाँचकर तद्नुरूप औषधि का निर्धारण करने में अनुभवी चिकित्सक की सलाह लेनी पड़ती है। यदि ऐसा न किया जाय तो कोई भी रोगी बाजार से पुस्तक या दवा खरीद कर अपना इलाज आप करने लगे।
साधना पुरुषार्थ के बलबूते उन्होंने “इडियट” से “जीनियस” बनकर दिखा दिया। यह विशेषता मनुष्य के साथ ही है कि वह जो चाहे, वह बन सकता है। न केवल यह स्वतंत्रता विधाता ने उसे दी है, वरन् ऐसे साधन, अवसर, परिस्थितियाँ भी दी है जिनका समुचित सदुपयोग-सुनियोजन कर वह क्या से क्या बन सकता है।
साधना करने से उपलब्ध होता है
साधना निर्धारित है। उन्हें गायत्री हिमगिरि में से निःसृत गंगा यमुना के रूप में समझा जा सकता है।
साधना जुड़ी हुई हो। सुखा ईंधन ही प्रज्वलित होता है, अन्यथा गीलापन रहने से धुँआ ही आता रहता है। जीवन साधना के लिए उपासना का आश्रय लिया जाय या उपासना को सही तरीके से कर सकने के लिए जीवन क्रम में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समन्वय किया जाये। ईश्वर भजन से पाप नाश होते हैं। इसका तात्पर्य इतना ही है कि ईश्वर की सता को दृष्टि से रखने वाला दुष्कर्म नहीं कर सकता।
साधना विधान के हर पक्ष को भली भाँति समझा हो। ऐसे मार्गदर्शकों के अभाव में साधक के सामने यह कठिनाई आती है कि वह स्थूल शरीर के परिमार्जन हेतु मंत्र साधना का उपयोग किस प्रकार करे? द्विविधा से किस प्रकार मुक्ति पाये? सरल और सीधे मार्ग पर किस प्रकार चल सकें?
साधना में कोई व्यवधान नहीं आया। जार्ज बर्नार्डशा को सबसे बड़ा सम्मान नोबुल पुरस्कार सत्तर वर्ष की आयु में जाकर मिला। इकहत्तर वर्ष की आयु में माक्रट्वेन ने अपनी दो सबसे ख्याति प्राप्त रचनाएँ “इव्सडायर” एवं डालर तीस हजार बिक्वेस्ट” रची थी। इस शृंखला में पण्डित दामोदर सातवलेकर जी का नाम भी लिया जा सकता है। जो शताधिक जिए व पिचहत्तर वर्ष की आयु के बाद जिनने आर्ष ग्रन्थों का भाष्य आरम्भ किया।
साधना विधान में स्नान को अति महत्व दिया गया है। साधना, उपासना से पूर्व स्नान कर लेने का विधि विधान आवश्यक माना गया है। उसका तात्पर्य जिस तिस प्रकार नहाने की चिह्न पूजा कर लेना नहीं है वरन् यह है कि त्वचा को रगड़ कर लाल कर लिया जाय, ताकि उसके ऊपर किसी कारण जमी हुई परत का भली प्रकार समापन हो जाय। इस व्यवधान के हट जाने पर प्रकृति की अनेक महत्वपूर्ण शक्तियों का शरीर के साथ आदान प्रदान सम्भव हो जाता है। बदलते मौसम अपना प्रभाव त्वचा पर डालते हैं।
साधना से प्रभावित होकर देवता जागा। दोनों साधकों का मनोरथ पूछा। जानने पर वह खिलखिला कर हँस पड़ा। बोला- तुमसे पहचानने में भूल हुई। मेरा ना विवेक है।
साधना करने के लिए उपयुक्त साह और संकल्प बन ही संचित हो पाता है। ऐसी दशा में साधना परक सफलता कैसे मिल?
साधना, भौतिक क्षेत्र की चमत्कारी सिद्धियां तथा अंतिम है ऋद्धियां।
साधना की और अपने गुरु से यह विद्या सीख ली कि नियत नक्षत्र आने पर आकाश से रत्नवर्षा कराई जा सके और विपुल धन सहज ही प्राप्त किया जा सके। सफलता मिलने के बाद वह ठाट-बाट से रहने लगा।
साधना किस प्रकार करें? यह एक विशेष निर्धारण है। इसके लिए परीक्षक एवं निर्धारक ऐसा होना चाहिए जो व्यक्तित्व का सही वर्गीकरण करने एवं साधना विधान में प्रयोग प्रतिक्रिया से भली भाँति परिचित हो। ऐसे निष्णात अनुभवियों का इन दिनों एक प्रकार से अभाव ही देखा जाता है। अनपढ़ आडम्बर ही अध्यात्म क्षेत्र पर विडम्बनाओं के सहारे हावी है।
साधना मार्ग पर चलने वालों के लिए विघ्न ही सिद्ध होता है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए आहार ही सिद्ध होता है। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए आहार शुद्धि के सम्बन्ध में सर्वप्रथम ध्यान दिया जाना चाहिए।
साधनाएँ करते हैं। दोनों पक्षों के लिए 24-24 साधना निर्धारित है। उन्हें गायत्री हिमगिरि में से निःसृत गंगा यमुना के रूप में समझा जा सकता है।
साधना परिकर का अवलम्बन जितना साधक के लिए हितकर है उतना ही सामूहिक सन्तुलन के लिए प्रभावशाली सिद्ध होता है।
साधना कैसे सम्भव हो?
साधना का प्राण कहा गया है। उसके अभाव में संदेह छाया रहता है और उपयुक्त परिणति की संभावना बड़ी मात्रा में नष्ट हो जाती है। विश्वास अपने आप में एक शक्ति है। उसके आधार पर सिद्ध पुरुषों द्वारा दी हुई “भस्म” भी जादू जैसा प्रभाव दिखती देखी गई है। जिजीविषा के प्रबल रहने पर मरणासन्न व्यक्ति भी मौत को परास्त करते देखे गये हैं।
साधना से सिद्धि के सिद्धान्त को प्रत्यक्ष चरितार्थ कर दिखाता है।
साधना का अभ्यास थोड़ा लाभ दे सकेगा यह सच है। जितना गुड डाला जाय उतना ही मीठा होता है। जितना दाम खर्चा जाय उतना ही सामान मिलता है। जितना बीच बोया जाय उसी अनुपात से फसल काटने और उतना ही कोठा भरने का अवसर मिलता है। मौन मात्र दो घण्टे रोज साधा जाय या सप्ताह में मात्र दो घण्टे का क्रम रखा जाय तो उतना प्रयास भी निरर्थक नहीं जाता है।
साधनात्मक भाषा में ‘योनि कन्द’ कहते हैं। स्थूल शरीर शास्त्र-एनाटॉमी के अनुसार वहाँ सुषुम्ना नाडी गुच्छक भर है, पर सूक्ष्म शरीर रचना विज्ञान के अनुसार यहाँ एक विशेषज्ञ अवयव है जिसे मूलाधार चक्र करते हैं। इसके नीचे की पीठ कछुए जैसे है इसे कूर्म कहते हैं। इसके ऊपर एक छोटा मेरुदण्ड है उसे सुमेरु कहते हैं। इसके चारों ओर साढ़े तीन फेरे लगाये हुए एक शक्ति सूत्र विद्यमान है, जिसे ‘कुण्डलिनी’ कहते हैं।
साधना के लिए उपासना का आश्रय लिया जाय या उपासना को सही तरीके से कर सकने के लिए जीवन क्रम में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समन्वय किया जाये। ईश्वर भजन से पाप नाश होते हैं। इसका तात्पर्य इतना ही है कि ईश्वर की सता को दृष्टि से रखने वाला दुष्कर्म नहीं कर सकता। यह नहीं है कि जीभ से नाम रटंत चलती रहे और क्रिया पद्धति में छल, पाखण्ड अहंकार एवं अनाचार भरा रहे। पवित्रता और प्रखरता का अभ्यास, अनुशासन अपने में भरे लेने का अर्थ ही ईश्वर भक्ति है।
साधना विधान में प्रयोग प्रतिक्रिया से भली भाँति परिचित हो। ऐसे निष्णात अनुभवियों का इन दिनों एक प्रकार से अभाव ही देखा जाता है। अनपढ़ आडम्बर ही अध्यात्म क्षेत्र पर विडम्बनाओं के सहारे हावी है। उन्हीं का छल प्रपंच भावुकजनों की भाव श्रद्धा का दहन करता रहता है बाहुल्य इसी समुदाय का है। उन्हीं का गुरु दम्भ जहाँ-तहाँ अधिकार जमाये बैठा है और चित्र-विचित्र विडम्बनाएँ रचना रहता है।
साधना परक सफलता कैसे मिल?
साधना वस्तुतः योगाभ्यास का प्रथम चरण है। चान्द्रायण-कृच्छ चान्द्रायण आदि व्रत इसी निमित्त कराये जाते हैं। अनुष्ठानों में उपवास करने फलाहार पर रहने का ही विधान है।
साधनाओं में भी दो की प्रधानता है- एक जिव्हा दूसरी ज्ञानेन्द्रिय। यही दो ऐसी है जो स्वास्थ्य पर दुहरी कुल्हाड़ी चलाती है। यदि इन दो पर अंकुश रखा तो समझना चाहिए कि आधी में से आधी मंजिल पूरी हो गई। नींव गहरी और मजबूत जम गई, अब इस पर भवन उठाने का कार्य धीरे-धीरे होता रहे तो भी हर्ज नहीं। नींव का कच्चा रहना ही वह जोखिम है, जिसके कारण भव्य और बहुमूल्य भवन भी गहरा कर नीचे गिर सकता है।
साधना विधान अपनाने पर भी असफल रहते देखे गये हैं। उनकी विद्रूप मानसिकता एवं उच्छृंखलता क्रियाशीलता यदि रुके नहीं तो मलीनता की मात्रा एवं इतनी अधिक संचित होती जाती है, जो साधना के स्वल्प प्रयास को भी अपने तूफानी झोंके में उड़ा ले जाय। इसलिए मंत्र योगी को आहार विहार की सात्विकता संयमशीलता बनाये रहने के लिए विज्ञजन दबाव या निर्देश करते रहे हैं विशेषतया आहार की सात्विकता बढ़ाने और मात्रा घटाने के के पलिए। भूख से कुछ कम और नियत समय पर सात्विक आहार करने से भी उपवास का काम चलाऊ उद्देश्य पूरा हो जाता है। इस हेतु अस्वाद व्रत बिना नमक शक्कर मिला भोजन भी प्रशंसनीय है।
साधना का उपयोग किस प्रकार करे? द्विविधा से किस प्रकार मुक्ति पाये? सरल और सीधे मार्ग पर किस प्रकार चल सकें?
साधना करने लगे। मनोरथ, जगाकर भर पूरा सहायता पाने और जल्दी सिद्धि पाने का था।
साधना करते थे।
साधना प्रयोगों द्वारा बढ़ाकर ऊँची स्थिति में पहुँचायी गयी होती है।
साधनाएँ पेड़ों के संपर्क में अपेक्षाकृत कम काल में फलीभूत होती देखी जाती है। इसका कारण वृक्षों में संव्याप्त विद्युत ही है।
साधना में भी इन्हें संयुक्त रूप से प्रभावित करने का विधान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-January
साधना का मार्ग उपक्रम विधि विधान तद्नुसार बदला गया। अर्जुन हनुमान जैसों को भी साँसारिक विग्रहों का शमन करना पड़ा उन्हें भी अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत भौतिकी शाखा सावित्री कुण्डलिनी साधना का पथ अपनाना पड़ा। हमारी अपनी साधना भी इन्हीं उद्देश्यों हेतु नियोजित हुई एवं सही मार्ग अपनाने पर प्रतिफल भी वैसे मिले।
साधना में सोमरस पान की प्रक्रिया पूरी की जाती है। जिस तिपाही पर रुद्राभिषेक का जल घट रखा जाता है, वह इड़ा पिंगला सुषुम्ना इन तीन नाड़ियों का प्रतीक है। रुद्राभिषेक को कुण्डलिनी साधना का एक दृश्य प्रतीक माना गया है। इस वर्णन में अलंकारिक माध्यम से इस तथ्य का प्रतिपादन है कि कुण्डलिनी के अधिपति शिव प्रत्यक्ष और समर्थ परमेश्वर है। उनके निवास स्थान कैलाश पर्वत और मान सरोवर की तरह पवित्र समझे जाँय, उन्हें नर नारी की घृणित जननेन्द्रिय मात्र न मान लिया जाय।
साधना का प्रारम्भिक स्वरूप जो मानसपटल पर अस्पष्ट हो तो इस दिशा में किये गये प्रयास निरर्थक ही जाते हैं।
साधना उसे सिद्ध बना देती है।
साधनाओं को विशेष कर तंत्र से जुड़ी साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने का निषेध किया है। इस संदर्भ में मार्गदर्शक द्वारा साधक की पात्रता को परखकर तद्नुसार साधना बताना आवश्यक समझा गया है। साधना क्षेत्र में पात्रता ही नहीं, साधक की आवश्यकता और परिस्थिति भी जाँचनी पड़ती है। इसके बाद ही निदान के आधार पर उपचार का तरीका रोगी व चिकित्सक दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।
साधना की सहस्रार चक्र पर असाधारण प्रतिक्रिया होती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के दिव्य संस्थान अपनी मूर्छना छोड़ कर सक्रिय बनते है। और वह देखने सुनने जानने लगते है। जो साधारण स्थिति में असम्भव ही लगता है। अन्तरिक्ष की असंख्यों हलचलों को ध्वनियों एवं प्रकाश किरणों को हमारी भौंड़ी इन्द्रिय क्षमता देख समझा नहीं पाती।
साधना भी निष्फल बनकर रह जाती है। संभवत ऐसे ही अनेक कारणों को ध्यान में रखते हुए शास्त्रकारों ने उच्चस्तरीय साधनाओं को विशेष कर तंत्र से जुड़ी साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने का निषेध किया है। इस संदर्भ में मार्गदर्शक द्वारा साधक की पात्रता को परखकर तद्नुसार साधना बताना आवश्यक समझा गया है। साधना क्षेत्र में पात्रता ही नहीं, साधक की आवश्यकता और परिस्थिति भी जाँचनी पड़ती है। इसके बाद ही निदान के आधार पर उपचार का तरीका रोगी व चिकित्सक दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।
साधना पराक्रम से मोर्चा लिया था।
साधना क्षेत्र में पात्रता ही नहीं, साधक की आवश्यकता और परिस्थिति भी जाँचनी पड़ती है। इसके बाद ही निदान के आधार पर उपचार का तरीका रोगी व चिकित्सक दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।
साधना और संभालना पड़ा है। सावित्री साधना से एक कदम आगे बढ़कर कुण्डलिनी को आड़े वक्त में जगाना पड़ा। इसी को दूसरे शब्दों में महाकाली, महाचण्डी या महादुर्गा कहा जाता है। यह आवश्यक जान पड़ा कि जिस शक्ति का सुनियोजन जिन व्यक्तियों द्वारा किया जाना है।, उन्हें इस विद्या की समुचित जानकारी दी जाय।
साधना आरम्भ कर देना बारूद के ढेर के साथ खिलवाड़ करने के समान है गलत उपयोग से कर्ता की ऐसी हानि भी हो सकती है जिसकी क्षतिपूर्ति न हो सके। नौसिखियों और असावधानों के लिए तो ज्ञानयोग भक्तियोग कर्मयोग प्रज्ञायोग आदि सरल जीवन साधनाओं से भी काम चल सकता है। वे इतना ही कर ले तो बहुत है।
साधना नहीं की है। फिर भी उनमें चमत्कारी क्षमता मौजूद है। तो उपरोक्त प्रसंगों में से कुछ न कुछ विलक्षण उनके साथ अवश्य घटित हुआ होता है। बिना कारण किसी में चमत्कारी क्षमताओं का उद्भव होना सम्भव नहीं।
साधना द्वारा सम्पन्न होने जा रही है जिसे विश्व कुण्डलिनी जागरण नाम दिया गया है और जिसे विगत तीन वर्षों में कठिन तपश्चर्या के माध्यम से पूरा किया गया है।
साधना उपचारों द्वारा सम्भव हो सके तो शारीरिक बलिष्ठता और मानसिक प्रतिभा असाधारण रूप से बढ़ाई जा सकती है। शौर्य पराक्रम साहस जैसे गुण और स्फूर्ति तत्परता तन्मयता सुभबुभक्त का स्तर इतना असामान्य हो सकता है। कि उसके माध्यम से किये गए क्रिया कलाप बहुमुखी सफलताएं अपनी ओर खीचते घसीटते चले जाते है।
साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना का प्रथम चरण आत्मशोधन का है। उसके उपरान्त तो सिद्ध पुरुषों के अनुदान उन्हें सहज ही उपलब्ध होने लगते है।, जिनके सहारे आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों ही साधन सध सकते हैं। पानी जब भाप बन जाता है तो उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की ओस या बादल बनकर कहीं भी बरस पड़ने की क्षमता उन योगीजनों को हस्तगत हो जाती है जो भटकावों में नहीं भटकते किन्हीं अनुभवी मार्ग दर्शकों के संरक्षण में निष्कंटक पथ पर चलते हैं और स्वयं धन्य बनते हुए अन्य अनेकों को धन्य बनाते हैं। कुण्डलिनी साधना में फलश्रुतियाँ इसी तथ्य पर आधारित हैं।
साधना प्रसिद्ध है।
साधना का समन्वय नहीं होता। खाद पानी और रखवाली के बिना बोया हुआ बीज विशालकाय वृक्ष कैसे बने? यह तथ्य कुण्डलिनी साधना प्रकरण पर पूरी तरह लागू होता है।
साधना का मात्र भौतिक ही नहीं आत्मिक लाभ उठाने के लिए सदा गायत्री साधना का अवलम्बन लेकर शुरुआत की जाती है। यही है कुण्डलिनी साधना का प्रारम्भिक स्वरूप जो मानसपटल पर अस्पष्ट हो तो इस दिशा में किये गये प्रयास निरर्थक ही जाते हैं।
साधना में प्रयुक्त पँचकोशों में अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोशों की गणना की जाती है।
साधनाएँ इसीलिए सफल नहीं होतीं क्योंकि उनमें आत्मसंयम, चरित्र का प्रखरीकरण और व्यवहार में उदार, सेवा-साधना का समन्वय नहीं होता। खाद पानी और रखवाली के बिना बोया हुआ बीज विशालकाय वृक्ष कैसे बने? यह तथ्य कुण्डलिनी साधना प्रकरण पर पूरी तरह लागू होता है।
साधना जुड़ती है तभी फलीभूत होती है। ऐसी उपलब्धि शाश्वत होती है। एवं दूरगामी दृष्टि से सदैव जन साधारण के लिए हितकारी भी। दैत्यों की सफलता जो प्रारंभ में दिखाई देती है, हथेली पर सरसों जमा देने की बाजीगरों की तरह ही मायावी सिद्ध होती है। शुक्राचार्य कुण्डलिनी विद्या के निष्णात् रहे हैं।
साधना भी इन्हीं उद्देश्यों हेतु नियोजित हुई एवं सही मार्ग अपनाने पर प्रतिफल भी वैसे मिले।
साधना है। इन्हें दैनिक सामान्य क्रिया कलापों में समन्वित रखकर भी अपने मन संस्थान के बिखराव को बचाया जा सकता है। इतना भर कर लेने से अध्यात्म धाराओं के प्रभाव का ग्रहण करने की पात्रता विकसित की जा सकती है। पर इतने भर से काम नहीं चलता। प्रेरक शक्ति को किसी अन्य पर प्रयोग करने के लिए विशेष स्तर की सामर्थ्य अर्जित करनी पड़ती है।
साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना बल से सूक्ष्म अदृश्य देव शक्तियों के आकर्षण द्वारा बिना किसी प्रकार के शरीर संपर्क के गर्भाधान और प्रतिभाशाली पुत्र जन्म की अनेक घटनाएं भारतीय पुराणों में देखी जा सकती है।
साधना का पथ अपनाना पड़ा। हमारी अपनी साधना भी इन्हीं उद्देश्यों हेतु नियोजित हुई एवं सही मार्ग अपनाने पर प्रतिफल भी वैसे मिले।
साधना तथा फिर देवात्म भारत की कुण्डलिनी जागरण के अभ्यास हेतु नियोजित किया है ताकि लुप्तप्राय किन्तु अत्यन्त सशक्त विद्या का सर्वथा लोप न होने पाए। उसकी टूटी हुई कड़ियाँ जुड़ कर अपने समग्र रूप में बनी रह सकें।
साधना से अपने और पराये सामान्य स्तर के संकट निपटाये जा सकते हैं और औचित्य की सीमा के अंतर्गत वैभव सामर्थ्य को भी बढ़ाया जा सकता है।
साधना से ही भौतिक पुरुषार्थ सम्पन्न किये थे। वे किये गये परमार्थ प्रयोजनों के लिए ही थे पर साधना का मार्ग उपक्रम विधि विधान तद्नुसार बदला गया। अर्जुन हनुमान जैसों को भी साँसारिक विग्रहों का शमन करना पड़ा उन्हें भी अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत भौतिकी शाखा सावित्री कुण्डलिनी साधना का पथ अपनाना पड़ा। हमारी अपनी साधना भी इन्हीं उद्देश्यों हेतु नियोजित हुई एवं सही मार्ग अपनाने पर प्रतिफल भी वैसे मिले।
साधनात्मक कष्ट तो है पर उसका प्रतिफल इतना शानदार है जिसकी तुलना अब तक के पराक्रमों से नहीं की जा सकती है। वे एक नया अध्याय ही जोड़ेंगे।
साधना में प्रयुक्त पँचकोशों में अन्नमय प्राणमय की साधना में प्रयुक्त पँचकोशों में अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोशों की गणना की जाती है।
साधना कराने का अनुभव एवं अभ्यास कष्ट साध्य एवं तलवार की धार पर चलने के समान दुरूह होने के कारण अब लोगों ने एक प्रकार से छोड़ ही रखा है। बिना अनुभवी शिक्षक के कोई इंजीनियर कलाकार नहीं बन सकता हैं इसी प्रकार जब कुण्डलिनी साधना के प्रवीण पारंगत ही नहीं रहे तो शिक्षार्थी कहाँ से मिलें?
साधना पुरुषार्थ गायत्री साधना की फल श्रुतियाँ है। कुण्डलिनी जागरण से शरीरगत प्राण ऊर्जा की प्रसुप्ति उपक्रम सावित्री साधना के अंतर्गत आता है। बिजली के ऋण व धन दोनों ही धाराएँ होती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। गायत्री व सावित्री के समन्वय से ही साधना की समग्र आवश्यकता पूरी होती है।
साधना के लिए प्रेरित किया था। श्री “मा” किसी अदृश्य सत्ता की प्रेरणा से ही उनके पास पांडिचेरी आई थी। सुकरात हमेशा कहते थे कि उनमें एक डेमन रहता है जो उनसे सब काम मनचाहा कराता है। अपने सब कार्यों का श्रेय वे उस डेमन को हो देते थे।
साधना के प्रवीण पारंगत ही नहीं रहे तो शिक्षार्थी कहाँ से मिलें?
साधना द्वारा ब्रह्माण्ड व्यापी बनाया जाता है। तो वह असंख्यों की मनःस्थिति को उलट-पुलटकर कुछ का कुछ बना देती है। वह युग बदल सकती है, विश्वामित्र की तरह एक नई सृष्टि रच सकती है। इतिहास बताता है कि मनुष्यों के जीन्स-गुण सूत्र तक इस प्राण विद्युत के प्रहार से बदले जा सकते हैं। पुलस्त्य ऋषि के समस्त पोते रावण परिवार के दैत्य हो गए थे।
साधनाएँ हैं। जिन्हें किसी भी माध्यम से विकसित किया जा सकता है अपने आप को बिखराव से बचाकर एकाग्र तन्मय कर लेना मन क्षेत्र की साधना है। इन्हें दैनिक सामान्य क्रिया कलापों में समन्वित रखकर भी अपने मन संस्थान के बिखराव को बचाया जा सकता है। इतना भर कर लेने से अध्यात्म धाराओं के प्रभाव का ग्रहण करने की पात्रता विकसित की जा सकती है। पर इतने भर से काम नहीं चलता।
साधना प्रकरण पर पूरी तरह लागू होता है।
साधनाएँ सभी कलात्मक हैं। वे भावना की पृष्ठभूमि पर उगती और फलती फूलती है। इसलिए दृष्टिकोण का भाव संस्थान का संयम परिष्कार करना होता है। साथ ही चिन्तन और चरित्र को भी परिमार्जित करना होता है। यह प्रारम्भिक शर्त है जिसे पूरा किया जाना चाहिए।
साधना करने की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु यदि किसी ने वह शक्ति अर्जित एकत्रित कर ली हो तो उसके कुछ अंश का लाभ किसी को देने में अड़चन नहीं है। पैसा कमाने में बुद्धि भी लड़ानी पड़ती है। और मेहनत भी करनी होती है। पर यदि उस पैसे को उधार या दान देना हो तो बड़ी से बड़ी संपत्ति कुछ ही देर में खप जायगी।
साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने से वह सर्व साधारण के लिए चर्चा का विषय बनती है। यही कारण है कि इन्हें गुह्य विद्या मानकर इन पर बहुधा पर्दा ही डाला जाता रहा है। जब तक कुतर्कों का सिलसिला चलता है, अहंकारी लोग अपनी मीनमेख निकालते गलतियाँ और सुधार सुझाते हैं। ऐसी दशा में साधना का मूलभूत आधार श्रद्धा ही डगमगाने लगती है और शंकित मन स्थिति में उत्तम साधना भी निष्फल बनकर रह जाती है। संभवत ऐसे ही अनेक कारणों को ध्यान में रखते हुए शास्त्रकारों ने उच्चस्तरीय साधनाओं को विशेष कर तंत्र से जुड़ी साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने का निषेध किया है।
साधना प्रयोजन में प्रकारान्तर में इसी को कुण्डलिनी शक्ति कहते है। इसी के जागरण से सारे प्रयोजन पूरे माने जाते हैं। जिनके लिए शक्ति उपार्जन की सामर्थ्य हस्तगत की जाती है। शास्त्रोक्त प्रतिपादनों पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि कहीं कहीं सावित्री व कुण्डलिनी को एक माना गया है। वह कहीं कहीं इन्हें अलग मानते हुए इनकी साधना पद्धति व उद्देश्य भिन्न भिन्न बताये गये हैं।
साधना द्वारा जागृत और द्रुतगामी बना दिया जाता है। तो स्थिति में भारी अन्तर पड़ जाता है।
साधना से एक कदम आगे बढ़कर कुण्डलिनी को आड़े वक्त में जगाना पड़ा। इसी को दूसरे शब्दों में महाकाली, महाचण्डी या महादुर्गा कहा जाता है। यह आवश्यक जान पड़ा कि जिस शक्ति का सुनियोजन जिन व्यक्तियों द्वारा किया जाना है।, उन्हें इस विद्या की समुचित जानकारी दी जाय। पिछले दिनों कुण्डलिनी विज्ञान का काफी अन्वेषण पर्यवेक्षण प्रयोग परीक्षण अध्ययन अवगाहन चलता रहा है।
साधना स्तर के प्रयत्न करने पड़ते हैं, यदि उन्हें न किया जाय तो वे सदा सर्वदा प्रसुप्त ही पड़े रहते हैं और नर पशु से अधिक बड़े स्तर का और कुछ कर सकना उसके लिए सम्भव नहीं होता। इसलिए अध्यात्म क्षेत्र में प्रवीण पारंगत बनने के लिए हर किसी को साधनारत होने की आवश्यकता पड़ती है। कायविज्ञान का सूक्ष्म पर्यवेक्षण करने पर पाते हैं कि यह सभी विभूतियाँ मनुष्य के भीतर ही है। उनकी दिव्य क्षमताओं को कार्यान्वित कर सिद्धियों को हस्तगत भी किया जा सकता है। सूक्ष्मकाया में अवस्थित षट्चक्र प्रसिद्ध है।
साधना में अंतर होते हुए भी उन्हें एक दूसरे के समतुल्य समझा जा सकता है।
साधना तपश्चर्या सघन श्रद्धा एवं प्रबल इच्छा शक्ति के सहारे धारण की जाय तो साधक को निराश न होना पड़ेगा।
साधनारत होने की आवश्यकता पड़ती है। कायविज्ञान का सूक्ष्म पर्यवेक्षण करने पर पाते हैं कि यह सभी विभूतियाँ मनुष्य के भीतर ही है। उनकी दिव्य क्षमताओं को कार्यान्वित कर सिद्धियों को हस्तगत भी किया जा सकता है। सूक्ष्मकाया में अवस्थित षट्चक्र प्रसिद्ध है। (1)मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपूर (4) अनाहत (5) विशुद्धि (6) आज्ञाचक्र।
साधनारत होते हैं तो उपरोक्त 14 रत्नों को
साधना के माध्यम से सम्पन्न हुआ है।
साधना के प्रयोगों का शिक्षण दिया पर उसका नियोजन सदैव श्रेष्ठता के संवर्धन हेतु परहितार्थाय ही होता रहा। जिन आत्मवेत्ताओं के सामने भौतिक समस्याएँ थीं, उन्हें प्रारंभिक शिक्षण के उपरान्त सावित्री साधना का अवलम्बन लेने के लिए कहा गया। दधिचि भागीरथ लोमश श्रृंगी विश्वमित्र आदि ने सावित्री साधना से ही भौतिक पुरुषार्थ सम्पन्न किये थे। वे किये गये परमार्थ प्रयोजनों के लिए ही थे पर साधना का मार्ग उपक्रम विधि विधान तद्नुसार बदला गया। अर्जुन हनुमान जैसों को भी साँसारिक विग्रहों का शमन करना पड़ा उन्हें भी अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत भौतिकी शाखा सावित्री कुण्डलिनी साधना का पथ अपनाना पड़ा।
साधना को सार्थक बनाती है।
साधनाओं में प्रावधान रखा गया है। इन उपचारों द्वारा कुण्डलिनी साधना में प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाना पड़ता है। अनयथ वह अधोगामी होकर धातुओं का अनावश्यक क्षरण कर साधक को अल्पायु में ही वृद्ध सदृश अशक्त बना सकता है।
साधना की महिमा गाई जाती है और आन्तरिक उत्कर्ष का महत्व समझने वाले की गति उस दिशा में बढ़ती है।
साधना उन्हें करनी पड़ती है। जो किसी को कुछ देना चाहते है। अध्यात्म क्षेत्र में यह सिद्धांत आदिकाल से चला आया है।
साधना से अनुप्राणित ऋषि दधिचि की हड्डियों से बने वज्र से ही उसे मारा जा सका था। प्राणवान वातावरण में साधना द्वारा जागता प्रचण्ड जैव विद्युत गर्भस्थ शिशुओं में विलक्षण प्रतिभाएँ जागृत कर देती है। इसी आधार पर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव कुश महर्षि कण्व के आश्रम में भरत महर्षि जमदग्नि के आश्रम में वत्सराज उदयन आदि अद्भुत प्रतिभा लेकर जन्मे विकसित हुए।
साधनाएँ और उपलब्धियाँ इन्हीं दुर्दिनों में व्यक्ति विशेष की निजी कामनाओं की पूर्ति में नियोजित होकर रहने लगी। आज सिद्ध पुरुषों के क्षेत्र में मनोकामनाओं की पूर्ति ही संकीर्ण स्वार्थपरता के रूप में कार्यान्वित होती हुई देखी जाती हैं। पर यह नहीं सोचना चाहिए कि यही सब कुछ है। परमार्थ और लोक मंगल भी अपवाद रूप में अभी भी जीवित हैं और वे अपने सनातन अस्तित्व का परिचय अभी भी देते रहते हैं।
साधना है। सावित्री व कुण्डलिनी साधना में अंतर होते हुए भी उन्हें एक दूसरे के समतुल्य समझा जा सकता है।
साधना को कितने समय करना चाहिए? इसका सब के लिए एक जैसा निर्धारण नहीं हो सकता यह मनोभूमि के ऊपर निर्भर है। जिसके व्यक्तित्व में आत्मवादी गुणों का पहले से ही समावेश हो चुका है वह थोड़े ही समय में थोड़े ही श्रम में उत्साहवर्धक लाभ प्राप्त कर सकता है। किन्तु जिन सत्प्रवृत्तियों आधार पर यह उपार्जन किया जाता है उन्हीं में वह खर्च भी होता रहता है। गिरों को उठाने में दुखों को घटाने में डूबतों को उबारने में चढ़ते को चढ़ाने में इस शक्ति का समापन होता रहता है।
साधना द्वारा मथा जा सकता है। सही अर्थों में इसमें शरीर ही दैत्य है, और मन ही देव है। दोनों मिलकर जब तप योग की शाखा-प्रशाखाओं का अवलम्बन लेते हुए साधनारत होते हैं तो उपरोक्त 14 रत्नों को
साधना विधान और कर्मकाण्ड प्राण शरीर का अधिकतम उपयोग करते हुए सम्पन्न होते है। इस प्राण शरीर को दिव्य चक्षुओं से देखा जा सकता है। कुछ वर्ष पूर्व थियोसोफीस्ट पत्रिका में एक लेख एनोटॉमी ऑफ तत्राज नाम से विषय छपा था।
साधना में सफलता का असाधारण सुयोग मिलता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मांडीय चेतन और बहम चेतना के दो क्षेत्र और भी रह जाते है। उन्हें सशक्त करने में आत्म विद्युत की तरंगें बड़े काम आ सकती है।
साधना पुरुषार्थ से पा लेते है।
साधना की
साधना नहीं की है। इसका कारण तलाश करने पर पता चलता है। कि या तो उनने पहिले जन्मों में कोई कठिन साधना की है। और मिला उसका प्रभाव अभी तक बना हुआ है। इसके अतिरिक्त ऐसा भी हो सकता है।
साधना काल के आरम्भिक दिनों में ऐसे ही जोखिम का सामना करना पड़ता है। उसकी चमत्कृति साधारण मंद पवन की तरह नहीं चलती वरन् आँधी तूफान के वेग से दौड़ती है। हवा चक्रवातों और पानी के भँवरों जैसी उसकी गति होती है।
साधना प्रसंगों का विवरण आता है, तो यह मानना चाहिए कि यह शब्द अलंकारिक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। चेतनसत्ता कुटुम्ब परिवार मनुष्यों जैसा थोड़े ही होता है? अग्नि तत्व की दो विशेषताओं गर्मी ताप एवं प्रकाश रोशनी को कोई चाहे तो दो पत्नी का नाम दे सकता है। यह शब्द अरुचिकर लगे तो पुत्रियाँ कह सकते हैं। ऐसे शास्त्रों में हुआ भी है।
साधना का उपक्रम अपनाया जाता है तो दोनों विधि विधान का एक सम्मिश्रित स्वरूप हो जाता है। व फलितार्थ भी तद्नुसार बदल जाते हैं। प्रस्तुत साधना का स्वरूप कुछ ऐसा ही है। इसलिए क्रमिक सोपानों में गायत्री व कुण्डलिनी के सिद्धान्त व प्रयोग पक्ष की चर्चा की गई है।
साधना सफल हुई। उन्होंने अपना कार्य आरम्भ किया ही था कि देवगण समानान्तर संसार बनाने से उत्पन्न कठिनाई को समझते हुए उस निश्चय का त्याग करने की प्रार्थना करने लगे उस अनुरोध में सफल हुए भी।
साधना ओमर गैरीसन की तंत्र योन योग उखिल हाँस की कमेण्टी आँन हठयोग प्रदीपिका फिलीप राखेन की तांत्रिक कला जान ब्राइट की चेतना की सीमान्त हैस रिग्जीमर की भारतीय धर्म के उपाख्यान और प्रतीक एवं सर जॉन वुडरफ की सपेण्टाइन पॉवर में कुण्डलिनी योग के संदर्भ में आधुनिक मनोविज्ञान परामनोविज्ञान एवं साधना शास्त्र के ऊपर विस्तृत प्रकाश डाला है। एवं बताया है। कि यह विद्या ऐसे सुनिश्चित तथ्यों पर आधारित है। कि उसको प्रयोग में लाने वाले लाभान्वित हुए बिना रह ही नहीं सकते
साधनाओं से भी काम चल सकता है। वे इतना ही कर ले तो बहुत है।
साधना उपार्जित सामर्थ्य से अन्य अनेक एवं यहाँ तक कि वातावरण को भी बदला सारे परिकर में मंथन कर आमूल–चूल परिवर्तन किया जा सकता है। यह सत्य है। अन्य दानों की तरह शक्ति दान भी होता है। आत्मशक्ति वाले किसी समर्थ से अपने लिए शक्ति का अनुदान माँगकर उसे उचित कार्यों में खर्च कर सकते हैं, इसका सृष्टि के नियमों में वैसा ही प्रावधान है जैसा कि बैंकों से ब्याज लिया जाता है। जिस प्रकार धनी व्यक्ति अपना धन सम्पदा का एक अंश दान करते रहते हैं उसी प्रकार योगी समष्टिगत कठिनाई आने पर सारी वसुधा के हित हेतु अपना उपार्जन दूसरे सत्पात्रों को भी दान करते रहते हैं।
साधना कुछ विशेष कारगर नहीं होती। सरकस के पशु शिक्षक उन्हीं को भरती करते हैं। जिनमें निजी चतुरता या सूझबूझ होती है। साधनाएँ सभी कलात्मक हैं। वे भावना की पृष्ठभूमि पर उगती और फलती फूलती है।
साधनाएं की जाती है। यह कार्य स्व उपार्जन की विधि अपनाने पर समय साध्य और कष्ट साध्य है। किन्तु यदि स्थूल शरीर की भांति सूक्ष्म शरीर एवं कारण शरीर के अंग प्रत्यांगों को जागृत करने में किसी की सहायता मिल सके तो लम्बी साधना करने की अपेक्षा स्वल्प साधना से ही वे लाभ मिल सकते है। जिन्हें सामान्य नहीं समझा जा सकता।
साधना पद्धति व उद्देश्य भिन्न भिन्न बताये गये हैं। फिर भी एक तथ्य अपनी जगह अटल है कि काया की सूक्ष्म संरचना व उस तंत्र को जगाने का विधि विधान सदैव शाश्वत चिरन्तन रहेगा। अन्तर वहाँ वहाँ होता है जब उनसे प्राप्त शक्ति सामर्थ्य को प्रयोजन विशेष हेतु नियोजित किया जाता है।
साधना में ध्वनि का खेचरी मुद्रा में सोमरस पान के रसास्वादन का अनुभव किया जाता है। चक्रवेधन कुण्डलिनी उतान, ग्रन्थि वेध जैसे ध्यान प्रधान अभ्यास भी अन्तरंग योग में ही गिने जाते हैं क्योंकि उन में चिन्तन को ही दिशा देनी पड़ती है। प्रत्यक्ष में क्रियायोग जैसी शारीरिक हलचलों की आवश्यकता नहीं पड़ती।
साधना में अपनी निज की कोई विशेष शक्ति नहीं है। उसकी प्रमुखता एक ही है कि वह सोई हुई शक्ति को जागती है। जिसमें निज की क्षमता नहीं है या न्यून है उसके लिए साधारण साधना कुछ विशेष कारगर नहीं होती। सरकस के पशु शिक्षक उन्हीं को भरती करते हैं। जिनमें निजी चतुरता या सूझबूझ होती है।
साधना द्वारा जागता प्रचण्ड जैव विद्युत गर्भस्थ शिशुओं में विलक्षण प्रतिभाएँ जागृत कर देती है। इसी आधार पर महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में लव कुश महर्षि कण्व के आश्रम में भरत महर्षि जमदग्नि के आश्रम में वत्सराज उदयन आदि अद्भुत प्रतिभा लेकर जन्मे विकसित हुए।
साधना में फलश्रुतियाँ इसी तथ्य पर आधारित हैं। सिद्धियों रहस्यमयी विभूतियों का विवेचन कौतूहल भर जगाने के स्थान पर उस दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दे सके तो ही उस प्रचण्ड पुरुषार्थ की सार्थकता है।
साधनात्मक विधि-व्यवस्था से यही प्रभाव उत्पन्न होता है। आतिशी शीशे पर बिखरी हुई सूर्य किरणें जब एक बिन्दु पर एकत्रित की जाती हैं तो उतने भर से अग्नि की ऊर्जा दृश्यमान होने लगती है। तपश्चर्या का-साधना का प्रतिफल ऐसा ही होता है।
साधना नाम दिया गया है। जिस मार्ग दर्शक ने गायत्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना की पृष्ठभूमि भी होना अभीष्ट है एवं जहाँ तक प्रयोग का सम्बन्ध है वह निष्णातों के हाथ में ही रहे।
साधना के अंतर्गत आता है। बिजली के ऋण व धन दोनों ही धाराएँ होती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। गायत्री व सावित्री के समन्वय से ही साधना की समग्र आवश्यकता पूरी होती है। सावित्री साधना का मात्र भौतिक ही नहीं आत्मिक लाभ उठाने के लिए सदा गायत्री साधना का अवलम्बन लेकर शुरुआत की जाती है।
साधना प्रयोजनों हेतु इतनी सावधानी से की जानी इसीलिए आवश्यक है कि उसे दिशा में लोगों का आकर्षण कम नहीं। गुह्य विज्ञान होने के नाते एक आवरण उस पर पड़ा है। कुण्डलिनी विज्ञान का सिद्धांत स्वरूप व व्यवहार समझने की बात उचित भी है, आवश्यक भी क्योंकि जब ऐसी विधाओं का लोप होने लगता है तो सूत्र संकेतों की कड़ी मिल जाने पर बुद्धिमान व्यक्ति तो श्रृंखला को अपनी सूझ बूझ के आधार पर सुलझा लेते हैं। यदि कुछ भी अता पता न हो तो सिरे से अन्वेषण आविष्कार निश्चित ही कष्टसाध्य समयसाध्य है। अस्तु विज्ञान की महत्वपूर्ण धाराओं की जानकारी होने से हर्ज नहीं।
साधना के बल से 400 वर्ष से अधिक हो चुकी थी। बाद में उन्होंने ज्ञानेश्वर जी के परामर्श पर समाधि ली। हमारे सूक्ष्म शरीर धारी गुरुदेव जो दुर्गम हिमालय में रहते हैं आयु के बंधनों से परे हैं।
साधना की समग्र आवश्यकता पूरी होती है। सावित्री साधना का मात्र भौतिक ही नहीं आत्मिक लाभ उठाने के लिए सदा गायत्री साधना का अवलम्बन लेकर शुरुआत की जाती है। यही है कुण्डलिनी साधना का प्रारम्भिक स्वरूप जो मानसपटल पर अस्पष्ट हो तो इस दिशा में किये गये प्रयास निरर्थक ही जाते हैं।
साधना पराक्रम से अप्रत्याशित को भी कर दिखाने चेतना पर नियंत्रण स्थापित कर सकने की मानवी सामर्थ्य का रहस्योद्घाटन करता है।
साधना का उच्चस्तरीय प्रयोग साथ जुड़ा होने से नया वातावरण बनाने के निमित्त काम भी आती है। षट्चक्र वेधन के साथ जब पंच कोशों के जागरण की प्रक्रिया भी सम्पन्न होती है तो अनेक प्रकार के सृजन प्रयोजनों में उनका उपयोग होता है। मकान बनाने हेतु ईंट, चूना लोहा, लकड़ी व श्रमिक की जरूरत पड़ती है। भोजन बनाने में ईंधन, आग बर्तन खाद्यपदार्थ और पकाने वाले की जरूरत पड़ती है। पंचरत्न प्रसिद्ध हैं।
साधना का मूलभूत आधार श्रद्धा ही डगमगाने लगती है और शंकित मन स्थिति में उत्तम साधना भी निष्फल बनकर रह जाती है। संभवत ऐसे ही अनेक कारणों को ध्यान में रखते हुए शास्त्रकारों ने उच्चस्तरीय साधनाओं को विशेष कर तंत्र से जुड़ी साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने का निषेध किया है। इस संदर्भ में मार्गदर्शक द्वारा साधक की पात्रता को परखकर तद्नुसार साधना बताना आवश्यक समझा गया है। साधना क्षेत्र में पात्रता ही नहीं, साधक की आवश्यकता और परिस्थिति भी जाँचनी पड़ती है। इसके बाद ही निदान के आधार पर उपचार का तरीका रोगी व चिकित्सक दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।
साधना करने की अपेक्षा स्वल्प साधना से ही वे लाभ मिल सकते है। जिन्हें सामान्य नहीं समझा जा सकता।
साधना सावित्री साधना के समन्वित रूप में होता है तो उसका प्रभाव क्षेत्र अति विस्तृत हो जाता है। समस्त विश्व के सम्मुख जितनी विकट समस्याएँ अभी सामने हैं वे पहले कभी देखने में नहीं आई। अणु आयुधों का विस्तार नक्षत्र युद्ध की आसन्न विभीषिका चारों ओर संव्याप्त वैचारिक एवं पर्यावरण प्रदूषण प्रकृति का असंतुलन एवं मारक रोगों की भरमार अपराध आतंक की काली साया देखते हुए लगता है कि यह प्रयोग अब विशाल व्यापक स्तर पर करना ही अभीष्ट है। इन पर विजय पाने वाले योद्धाओं सृजन शक्तियों के प्रजनन में साधनात्मक कष्ट तो है पर उसका प्रतिफल इतना शानदार है जिसकी तुलना अब तक के पराक्रमों से नहीं की जा सकती है। वे एक नया अध्याय ही जोड़ेंगे।
साधना उपादानों के माध्यम से व्यक्ति विशेष की ही कुण्डलिनी जागृत होती है और वह अपने मनोबल, प्राणबल के सहारे कुछ ऐसे काम कर पाता है जो शरीरबल या शास्त्र उपकरणों के सहारे सरलतापूर्वक कर नहीं पाता। मानवी गाया में सन्निहित ऐसे अगणित बीज सूत्र है जो विकसित हो सकने की स्थिति में मनुष्य को असाधारण बना देते हैं। उसकी गणना सिद्धपुरुष, महामानव, तेजपुँज एवं शाप-वरदान के अधिष्ठाता के रूप में की जाने लगती है। वह ऐसे पराक्रम करने लगता है, जिनकी आशा किन्हीं देव दानवों से ही की जाती है। सृजन और विघटन के दोनों ही क्षेत्रों में वह ऐसा कुछ करने लगता है, जिसे अद्भुत, आश्चर्यजनक अलौकिक कहा जान लगे।
साधना से ही वे लाभ मिल सकते है। जिन्हें सामान्य नहीं समझा जा सकता।
साधना का स्वरूप माना जा सकता है।
साधना का स्वरूप कुछ ऐसा ही है। इसलिए क्रमिक सोपानों में गायत्री व कुण्डलिनी के सिद्धान्त व प्रयोग पक्ष की चर्चा की गई है।
साधनाएँ करना आवश्यक है।
साधनाओं को चर्चा का विषय बनाने का निषेध किया है। इस संदर्भ में मार्गदर्शक द्वारा साधक की पात्रता को परखकर तद्नुसार साधना बताना आवश्यक समझा गया है। साधना क्षेत्र में पात्रता ही नहीं, साधक की आवश्यकता और परिस्थिति भी जाँचनी पड़ती है। इसके बाद ही निदान के आधार पर उपचार का तरीका रोगी व चिकित्सक दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।
साधना के समन्वित रूप में होता है तो उसका प्रभाव क्षेत्र अति विस्तृत हो जाता है। समस्त विश्व के सम्मुख जितनी विकट समस्याएँ अभी सामने हैं वे पहले कभी देखने में नहीं आई। अणु आयुधों का विस्तार नक्षत्र युद्ध की आसन्न विभीषिका चारों ओर संव्याप्त वैचारिक एवं पर्यावरण प्रदूषण प्रकृति का असंतुलन एवं मारक रोगों की भरमार अपराध आतंक की काली साया देखते हुए लगता है कि यह प्रयोग अब विशाल व्यापक स्तर पर करना ही अभीष्ट है। इन पर विजय पाने वाले योद्धाओं सृजन शक्तियों के प्रजनन में साधनात्मक कष्ट तो है पर उसका प्रतिफल इतना शानदार है जिसकी तुलना अब तक के पराक्रमों से नहीं की जा सकती है। वे एक नया अध्याय ही जोड़ेंगे।
साधना पंच कोशों के जागरण की कुण्डलिनी जागरण की साधना है इसी को सूक्ष्मीकरण एवं वेदान्त की पंचीकरण साधना नाम दिया गया है। जिस मार्ग दर्शक ने गायत्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना से काम चल जाता है। यह प्रयोग साधनाओं द्वारा तो हो तो ही सकता है। पर यह भी सम्भव है कि तन्मयता के आधार पर किए जाने वाले दैनिक कार्यों में तनिक अधिक अभिरुचि और जिम्मेदारी का समावेश किया जाय तो मन का बिखराव सिमट कर एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत होने लगेगा। सरकस वाले कला का अभिनेता हिसाब रखने वाले मुनीम खिलाड़ी बाजीगर मदारी आदि का सारा क्रिया कलाप एकाग्रता के आधार पर ही चलता है। यदि वे ध्यान बटा दे।
साधना की है। और मिला उसका प्रभाव अभी तक बना हुआ है। इसके अतिरिक्त ऐसा भी हो सकता है। कि किसी सामर्थ्यवान का अनुग्रह अनुदान मिला है। इसके अतिरिक्त एक कारण यह भी हैं कि एकाग्रता इस स्तर की विकसित हो कि उसके सहारे अतीन्द्रिय क्षमताएं काम करने लगे अथवा ऐसे कल्पना चित्र उभरने लगे जो यथार्थता के समतुल्य है।
साधना का अवलंबन लिया गया। मुखर और मिलनसार जीवन छोड़कर एकान्तवास की रीति नीति अपनाना सरल कार्य नहीं था। सावित्री साधना पंच कोशों के जागरण की कुण्डलिनी जागरण की साधना है इसी को सूक्ष्मीकरण एवं वेदान्त की पंचीकरण साधना नाम दिया गया है। जिस मार्ग दर्शक ने गायत्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना का विधि विधान समझ कर निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने की सफलता को प्राप्त किया जा सके। यही कारण है। कि ऋग्वेद में ऋषि कहते है। प्राणाग्नि मेरे जीवन में ऊषा बनकर प्रगटो, अज्ञान का अन्धकार दूर करो ऐसा बल प्रदान करो जिससे देव शक्तियाँ खिंची चली आएँ।
साधना है।
साधना इसी को जीवन्त जागृत स्तर तक पहुँचाने के लिए की जाती है।
साधना का अवलम्बन लिया जाय पर प्राप्त सिद्धियों विभूतियों को परहित हेतु ही नियोजित किया जाय।
साधना तंत्र मार्ग वाममार्ग के अंतर्गत आती है। जब सावित्री गायत्री व कुण्डलिनी का समन्वय हो जाता है तो योगमार्ग दखिण मार्ग का प्राधान्य हो जाता है।
साधनाकाल के इस प्रचलन की अश्लील कल्पना करने वाले पुरुष शिशन और नारी योनि के साथ संगति बिठाते हुए “संभाग से समाधि” की चर्चा करते है। यह कथन सही नहीं, बड़ा बेतुका भद्दा एवं दिशाहीन करने वाला है। वस्तुतः हृदय मस्तक जैसे पवित्र इन स्थानों तक अनाचार की अतिवाद की गन्दगी नहीं पहुँचनी चाहिए। कि इन्हें अधिकाधिक पवित्र रखते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। और ऊर्ध्वरेता बनना चाहिए।
साधना की फल श्रुतियाँ है। कुण्डलिनी जागरण से शरीरगत प्राण ऊर्जा की प्रसुप्ति उपक्रम सावित्री साधना के अंतर्गत आता है। बिजली के ऋण व धन दोनों ही धाराएँ होती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। गायत्री व सावित्री के समन्वय से ही साधना की समग्र आवश्यकता पूरी होती है।
साधना का अवलम्बन लेने के लिए कहा गया। दधिचि भागीरथ लोमश श्रृंगी विश्वमित्र आदि ने सावित्री साधना से ही भौतिक पुरुषार्थ सम्पन्न किये थे। वे किये गये परमार्थ प्रयोजनों के लिए ही थे पर साधना का मार्ग उपक्रम विधि विधान तद्नुसार बदला गया। अर्जुन हनुमान जैसों को भी साँसारिक विग्रहों का शमन करना पड़ा उन्हें भी अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत भौतिकी शाखा सावित्री कुण्डलिनी साधना का पथ अपनाना पड़ा। हमारी अपनी साधना भी इन्हीं उद्देश्यों हेतु नियोजित हुई एवं सही मार्ग अपनाने पर प्रतिफल भी वैसे मिले।
साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना के उतार चढावों को सरलता पूर्वक समझा जा सके और साधना का विधि विधान समझ कर निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने की सफलता को प्राप्त किया जा सके। यही कारण है। कि ऋग्वेद में ऋषि कहते है। प्राणाग्नि मेरे जीवन में ऊषा बनकर प्रगटो, अज्ञान का अन्धकार दूर करो ऐसा बल प्रदान करो जिससे देव शक्तियाँ खिंची चली आएँ।
साधना का एक दृश्य प्रतीक माना गया है। इस वर्णन में अलंकारिक माध्यम से इस तथ्य का प्रतिपादन है कि कुण्डलिनी के अधिपति शिव प्रत्यक्ष और समर्थ परमेश्वर है। उनके निवास स्थान कैलाश पर्वत और मान सरोवर की तरह पवित्र समझे जाँय, उन्हें नर नारी की घृणित जननेन्द्रिय मात्र न मान लिया जाय। वरन् उनकी पवित्रता और महत्ता के प्रति उच्च भाव रखते हुए उनके सदुपयोग शक्ति के सुनियोजन की आराधना में तत्पर रहा जाय। साहस और कलाकारिता के पुरुषार्थ और लालित्य के कर्म और भावना के इन केन्द्रों को प्रजनन मात्र से निरस्त न बना दिया जाय वरन् नर नारी की जननेन्द्रियों के निकटस्थ मूलाधार चप्र की शिव शक्ति को उच्च आदर्शों के लिए प्रयुक्त किया जाय।
साधना का अवलम्बन लेकर शुरुआत की जाती है। यही है कुण्डलिनी साधना का प्रारम्भिक स्वरूप जो मानसपटल पर अस्पष्ट हो तो इस दिशा में किये गये प्रयास निरर्थक ही जाते हैं।
साधनाओं द्वारा तो हो तो ही सकता है। पर यह भी सम्भव है कि तन्मयता के आधार पर किए जाने वाले दैनिक कार्यों में तनिक अधिक अभिरुचि और जिम्मेदारी का समावेश किया जाय तो मन का बिखराव सिमट कर एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत होने लगेगा। सरकस वाले कला का अभिनेता हिसाब रखने वाले मुनीम खिलाड़ी बाजीगर मदारी आदि का सारा क्रिया कलाप एकाग्रता के आधार पर ही चलता है। यदि वे ध्यान बटा दे। करे कुछ साँचे कुछ देखे कही सुने कही तो उनका मानसिक बिखराव सारा खेल बिगाड़ देता है।
साधना है इसी को सूक्ष्मीकरण एवं वेदान्त की पंचीकरण साधना नाम दिया गया है। जिस मार्ग दर्शक ने गायत्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना में प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाना पड़ता है। अनयथ वह अधोगामी होकर धातुओं का अनावश्यक क्षरण कर साधक को अल्पायु में ही वृद्ध सदृश अशक्त बना सकता है।
साधना चली है, उसे विश्व का अथवा राष्ट्र का कुण्डलिनी जागरण कह सकते हैं। अग्नि को तेजस् उसके निकट क्षेत्र में अधिक होता है। उसके उपरान्त जैसे-जैसे दूरी बढ़ती है वैसे ही उसकी ऊष्मा कम होती जाती है। इसी प्रकार हिमालय की पुरातन ऋषि-ऊर्जा का पुनर्जागरण हरिद्वार के सप्तधारा क्षेत्र में नियोजित हुआ है। उसका प्रभाव राष्ट्र में समीपता की दृष्टि से अधिक और जल्दी दृष्टिगोचर होगा।
साधना का प्रतिफल ऐसा ही होता है।
साधना हेतु निमित्त प्रारम्भ में किसी एक को ही बनना पड़ा हो, पर है सबकी बराबर की भागीदारी। यह शक्ति जागरण युग परिवर्तन भी संभव कर सकता है।
साधना शास्त्र के ऊपर विस्तृत प्रकाश डाला है। एवं बताया है। कि यह विद्या ऐसे सुनिश्चित तथ्यों पर आधारित है। कि उसको प्रयोग में लाने वाले लाभान्वित हुए बिना रह ही नहीं सकते
साधना में स्वयं को मस्तिष्कीय क्षेत्र की परिधि तक सीमित रखना होता है। सहस्रार कमल ब्रह्मरंध्र और खोपड़ी में भरा द्रव्य अपने ढंग की उठक पटक से जागृत हो जाता है। भीतरी पक्ष की देखभाल ब्रह्मरंध्र करता है और बाहरी का तृतीयनेत्र आज्ञाचक्र। किन्तु जब सावित्री व कुण्डलिनी की सम्मिलित साधना का उपक्रम अपनाया जाता है तो दोनों विधि विधान का एक सम्मिश्रित स्वरूप हो जाता है। व फलितार्थ भी तद्नुसार बदल जाते हैं।
साधना से प्राप्त अतीन्द्रिय सामर्थ्य के प्रामाणिक उदाहरण भारतीय धर्म इतिहास में अच्छी खासी संख्या में देखने का मिलते है।
साधना की चरम अवस्था को प्राप्त कर अगणित विभूतियों के स्वामी बने एक बार की बात है। महात्मा तैलंग स्वामी नेपाल के जंगलों में तप कर रहे थे। नेपाल नरेश सेनापति सहित शिकार को निकले। उनके प्रहार से बचकर एक व्याघ्र भागा। सेनापति ने पीछा किया।
साधना व कुण्डलिनी जागरण का सम्मिलित प्रयोग होता है तो चमत्कारी परिणाम मिलते हैं बिजली कुछ ही सेकेंडों में अपना काम कर दिखाती है। विद्युत शवदाहा गुहों में यह कृत्य सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है जब कि अग्नि पर दाल चावल पकाने तक में देर लगती है। अध्यात्मिक दिव्यता को क्षति भी न पहुँचे एवं सुपात्र साधक अपने गन्तव्य को भी शीघ्र पा ले उसके लिए यही विधि श्रेयस्कर है। विशुद्ध कुण्डलिनी साधना तंत्र मार्ग वाममार्ग के अंतर्गत आती है। जब सावित्री गायत्री व कुण्डलिनी का समन्वय हो जाता है तो योगमार्ग दखिण मार्ग का प्राधान्य हो जाता है।
साधना सावित्री साधना का अवलंबन लिया गया। मुखर और मिलनसार जीवन छोड़कर एकान्तवास की रीति नीति अपनाना सरल कार्य नहीं था। सावित्री साधना पंच कोशों के जागरण की कुण्डलिनी जागरण की साधना है इसी को सूक्ष्मीकरण एवं वेदान्त की पंचीकरण साधना नाम दिया गया है। जिस मार्ग दर्शक ने गायत्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना में हमें प्रवृत्त किया उसी ने सावित्री साधना का विधान बताया ताकि हमारे माध्यम से अन्य अनेक प्रसुप्त देवमानवों का शक्ति जागरण हो वे वास्तविक स्वरूप को पहचानें ओर आत्मिक प्रगति के माध्यम से समष्टिगत हित साधन कर सकें।
साधना बताना आवश्यक समझा गया है। साधना क्षेत्र में पात्रता ही नहीं, साधक की आवश्यकता और परिस्थिति भी जाँचनी पड़ती है। इसके बाद ही निदान के आधार पर उपचार का तरीका रोगी व चिकित्सक दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।
साधनाओं का थोड़ा-सा सौम्य भाग ही प्रत्यक्ष उपचारों में देखने में आता है। शेष को गोपनीय रखा गया है। ताकि किसी कुपात्र के हाथों यह प्रयोग लग जाने पर वह उनके माध्यम से अनर्थ न करने पाए। जिस बारूदी सुरंग से पहाड़ की चटाने तोड़कर सुविधाजनक रास्ता बनाया जा सकता है। उसी से किसी विद्यालय या अस्पताल मल्टी स्टोरिड बिल्डिंग को गिराया भी जा सकता है।
साधना का प्रसंग चलता है। सावित्री उपासना गायत्री का ही भौतिक पक्ष है। भौतिक प्रयोजनों के लिए शक्ति चाहिए। शक्ति ऊर्जा के सहारे विकसित होती है। कार्य कलेवर में अवस्थित पंचतत्व पंचप्राण ईंधन का काम दे जाते है।
साधना द्वारा जगाई हई कुण्डलिनी बिजली के समान तड़पती और चमकती है। उससे जो सोया है। सो जागता है। जो जगता है। वह दौड़ने लगता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-September
साधना क्षेत्र में अपनाये जाते हैं। अग्निहोत्र में भी सूर्य शक्ति की प्रमुखता है। इसके अतिरिक्त ध्यान-धारणा को तो उस आधारभूत अवलम्बन के रूप में अपनाया ही जाता है।
साधना सम्पन्न समर्थ कहा जाता है।
साधनाएं अनेकानेक है पर उनमें से एक भी ऐसी नहीं जो पुरातन अनर्गल अभ्यासों का उन्मूलन किये बिना सध सकती हो इस उन्मूलन में जितनी शक्ति लगने की आवश्यकता पड़ती है उसका संचय करने के लिए उपवास करने और मनोबल बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है इस हेतु आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुकों को सबसे प्रथम आहार नियमन करना पड़ता है।
साधना से सिद्धि शत प्रतिशत सही है। श्रम-शीलता के सहारे मात्र सम्पदा अर्जित की जा सकती है सो भी येन केन प्रकारेण आगे चलाने के लिए अपना रास्ता बना लेती है। किंतु अध्यात्मिक सम्पदा के सम्बन्ध में यह बात नहीं हैं वह स्थिर ही नहीं रहती है, बैंक ब्याज की तरह बढ़ती भी रहती हैं। पल्लवित वृक्षों की टहनियों की तरह फलती फूलती भी रहती है। बाँटने पर विद्या की तरह उसकी अभिवृद्धि होती, परिपक्वता बढ़ती देखी जाती है।
साधना के रूप में दिया है।
साधना परिपक्व होती है। इसका चिन्ह यह है कि बिना आँख खोले ही इष्ट देव के भाव दर्शन होने लगें। प्रतीति हो चले कि अन्तःक्षेत्र में ध्येय का दिव्य अवतरण आरम्भ हो गया। मस्तिष्क मध्य में एक हल्का छोटा सौम्य सूर्य उदय हुआ। उसकी किरणें नीचे की दिशा में समस्त काय कलेवर में फैली और ऊपर के आकाश क्षेत्र में उनने उभर कर गगन मण्डल के साथ संपर्क जोड़ा।
साधना की चमत्कारी परिणतियाँ हैं। ये पाँचों एक ही समय में अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप काम करती देखी जा सकती हैं।
साधना जगत की त्रिविध विशिष्टताएँ समझा जा सकता है। मंत्र विज्ञान में शब्द शक्ति का प्रयोग है। मंत्र के अक्षरों का अनवरत जप करते रहने से उनका एक चक्र बन जाता है और उनकी सुदर्शन चक्र जैसी गति विद्युतीय चमत्कारों में परिणत होती है। मंत्र शब्द बैश्वी भी बाण की तरह काम करते हैं। अभीष्ट लक्ष्य को बेधते हैं।
साधना और योगाभ्यास से संचित दुर्बुद्धि और अवाँछनीयता का परिमार्जन करना पड़ता है इसके लिए आन्तरिक क्षेत्र में महाभारत स्तर का साधना समर जीतना पड़ता है अन्यथा उठने वाले शुभ संकल्प भी टिक नहीं पाते और हवा के प्रवाह में उड़ जाने वाले बादलों की तरह तिरोहित हो जाते हैं।
साधना वर्ष प्रारंभ होता है इसके लिए जो कार्यक्रम निर्धारित किया गया है, उसे व्यक्ति निर्माण एवं परिवार निर्माण की सम्मिलित योजना कहा जा सकता है। गत वर्ष के आयोजन सामूहिक थे इसलिये उनमें बड़ी संख्या को उपस्थिति के प्रयत्न किये गये। चालू वर्ष के छोटे आयोजनों को परिवार गोष्ठियाँ कहना चाहिए। इनकी प्रत्यक्ष रूप रेखा नितान्त सरल है, उनमें समय, साधन, व्यवस्था आदि की दृष्टि से नितान्त सरलता रखी गयी है, ताकि इस माध्यम से व्यापक जनसंपर्क जन जागरण लोक शिक्षण पूरा हो सके। परिवार निर्माण की महती आवश्यकता को पूरा किया जा सकें।
साधना की श्वास-प्रश्वास क्रिया तो होती है, पर ध्यान सोऽहम् की सूक्ष्म ध्वनि पर ही केन्द्रित रहता है। भक्तियोग में इष्ट देव दर्शन का पूरा प्रकरण ध्यान पर ही आश्रित है। ध्यान की परिपक्वता जी सब समग्र हो जाती है तो निर्धारित इष्टदेव के प्रत्यक्षवत् दर्शन होने लगते हैं। हृदय गुफा में अंगुष्ठ मात्र ज्योति का आभास भी इस प्रकार दीखने लगता है मानो उसका साक्षात्कार ही हो रहा हो। इष्ट देव भी अपनी धारणा या भावना के अनुरूप आकार प्रकार धारण करके प्रकट होते हैं।
साधनाओं का आश्रय लेना पड़ता है। ब्रह्म स्थिति प्राप्त करने के लिए मौन, एकाग्र, एकान्त में बन पड़ने वाली ‘खेचरी साधना’ अपने प्रयोजन के लिए अद्वितीय है।
साधना करना चाहिए।
साधना में आत्मसत्ता को द्विगुणित हुई देखा जाता है। पंच मुखी गायत्री की पंचकोशीय साधना में अपने में ही पाँच-पाँच स्वतंत्र इकाइयां विकसित हो जाती हैं। यह उच्चस्तरीय गायत्री साधना की चमत्कारी परिणतियाँ हैं। ये पाँचों एक ही समय में अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप काम करती देखी जा सकती हैं।
साधना का अध्यात्मिक प्रसंग है।
साधना’ अपने प्रयोजन के लिए अद्वितीय है।
साधना के आधार पर शरीर में उत्साह और मन में उल्लास भरता है। उसकी दिशा धारा उत्कृष्ट आदर्शवादिता की ओर होती है। इसी को उर्ध्व गमन कहते हैं। ब्रह्मलोक की महायात्रा भी यही है।
साधना की सम्प्रदाय मेद से अनेकों विधि परंपरायें प्रचलित हैं। इनमें ध्यान-धारणा की सार्वभौम एवं सर्वानुमोदित स्थान मिला हुआ है। इसे आत्मवादी विशेष आकाँक्षा सँजोकर श्रद्धा विश्वास के साथ अपनाते और उसका भावना के अनुरूप प्रतिफल भी प्राप्त करते हैं। इतना ही नहीं अनीश्वरवादी भी मानसिक संतुलन बिठाने और एकाग्रताजन्य विशिष्टता प्राप्त करने के लिए ध्यान उपचार को प्रयोग में लाते हैं।
साधना के लिए प्राणायाम और ध्यान का आश्रय लेना पड़ता है। प्राणायामों का अपना संसार और अपना विस्तार हैं पर उनमें से गायत्री मार्ग अपनाने वाले के लिए 24 ही छाँटे हुए अलग हैं। महामंत्र के 24 अक्षर भी हैं। इसी अनुपात में 24 प्राणायामों का भी निर्धारण हुआ है।
साधना में अपने में ही पाँच-पाँच स्वतंत्र इकाइयां विकसित हो जाती हैं। यह उच्चस्तरीय गायत्री साधना की चमत्कारी परिणतियाँ हैं। ये पाँचों एक ही समय में अपनी-अपनी क्षमता के अनुरूप काम करती देखी जा सकती हैं।
साधना का ही व्यवहार होना चाहिए जो वह आसानी से पचा सकता है वैसा शाकाहार ही उसे देना चाहिए। यह न सोचना चाहिए कि अधिक पैसा खर्च करके बनाये जाने वाले मिष्ठान्न या पकवान ही अनिष्टता प्रदान कर सकते हैं जब हाथी तक शाकाहार के सहारे अपनी बलिष्ठता बनाये रह सकता है तो यह सोचना व्यर्थ है कि मनुष्य की आवश्यकता उससे पूरी नहीं होती उसे स्वादिष्ट उस स्वादिष्ट मिष्ठान्न, पकवान और मिर्च मसाले वाले पकवान ही खाने चाहिए। इस प्रयोग में उसे घाटा ही उठाना पड़ता है। गरिष्ठ पदार्थ देर से पचते हैं। सड़न उत्पन्न करते हैं।
साधना क्षेत्र में सबसे बड़ी आवश्यकता मनोबल बढ़ाने की होती है। मनोबल ही संकल्प, साहस, शौर्य, पराक्रम के रूप में जाना जाता है उसी की बहुलता से आत्म संयम और मनोनिग्रह की व्यवस्था बन पाती है। यदि मनोबल क्षीण हो तो उच्चस्तरीय पुरुषार्थों का बन पड़ना या निभ सकना संभव नहीं। तप साधना और योगाभ्यास से संचित दुर्बुद्धि और अवाँछनीयता का परिमार्जन करना पड़ता है इसके लिए आन्तरिक क्षेत्र में महाभारत स्तर का साधना समर जीतना पड़ता है अन्यथा उठने वाले शुभ संकल्प भी टिक नहीं पाते और हवा के प्रवाह में उड़ जाने वाले बादलों की तरह तिरोहित हो जाते हैं।
साधना समर जीतना पड़ता है अन्यथा उठने वाले शुभ संकल्प भी टिक नहीं पाते और हवा के प्रवाह में उड़ जाने वाले बादलों की तरह तिरोहित हो जाते हैं।
साधना करके अपने मन, शरीर के विद्युतीय क्षेत्र को इस स्तर का बना लेते हैं कि चाहें तो किसी का प्राण हरण भी कर सकें। असुर समुदाय में तंत्र विधि को ही अपनाया जाता रहा है। दैत्यों के क्रिया-कलाप प्रायः आक्रामक रहे हैं। इसके लिए वे अपने साधारण शरीर में बेधक और मारक क्षमता का उत्पादन तंत्र साधना से ही करते रहे हैं। उन्हें कुण्डलिनी शक्ति भण्डार से अभीष्ट प्रयोजनों के लिए उतना आधार मिलता है, जितना कि समय-समय पर प्रयोजन विशेष के लिए आवश्यकता पड़ती रहती है।
साधना के विभिन्न उपक्रमों को अपनाकर उन्हें जागृत करके मनुष्य अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न बन सकता है। भूत, भविष्य की बातें जान लेने की सामर्थ्य हस्तगत कर सकता है। उसके लिए तब देश, काल एवं समय की दूरी का सीमा बन्धन समाप्त हो जाता है। प्राचीन काल के भारतीय, ऋषि-मनीषी इसी स्तर को प्राप्त करने के पुरुषार्थ में संलग्न रहते थे।
साधना से ही करते रहे हैं। उन्हें कुण्डलिनी शक्ति भण्डार से अभीष्ट प्रयोजनों के लिए उतना आधार मिलता है, जितना कि समय-समय पर प्रयोजन विशेष के लिए आवश्यकता पड़ती रहती है।
साधना और उनकी अनुकम्पा अर्जित करना सरल नहीं है। पर अदृश्य क्षेत्र में जिन सूक्ष्म सत्ताओं का स्वच्छन्द निवास है अनेक साथ आत्मिक मार्ग पर चलते हुए सरलता के साथ जुड़ सकते हैं। उनका परामर्श, सहयोग विपुल परिमाण में प्राप्त किया जा सकता है, जिस प्रकार याचक को सम्पन्न दानशीलों की तलाश रहती है उसी प्रकार हर क्षेत्र के सुसम्पन्न अपने मित्र साथी तलाशते रहते हैं। उत्तराधिकारी की खोज सभी को रहती हैं पाने की तरह देने का भी आनन्द होता है। इसे माता संतान के पति-पत्नी के सम्बन्धों का विश्लेषण करते हुए सहज ही जाना जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1987-July
साधनाओं के संबंध में सोचा जाता है और माना जाता है कि अमुक साधनाएँ करने से अमुक प्रतिफल प्राप्त हो जाता है, पर इस प्रकार का गणित फैलाने वालों से एक भूल रह जाती है कि वे यह नहीं सोचते कि साधना के अतिरिक्त और कुछ करना आवश्यक होता है क्या? समझा जाना चाहिए कि पहलवानी के शौकीनों को पौष्टिक खुराक बढ़ानी पड़ती है, ब्रह्मचर्य से ररना पड़ता है, थके अंगों को चैतन्य करने के लिए मालिश कराने जैसे उपचारों का आश्रय लेना पड़ता है। यदि यह सब न किया जाए तो मात्र दंड पेलने-बैठक करने भर से दंगल पछाड़ने की स्थिति प्राप्त कर लेना संभव नहीं। कई बार तो दुर्बलकाय व्यक्ति उस दबाव को असाधारण रूप से बढ़ा लेने पर व्यायाम का अतिरिक्त दबाव सहन नहीं कर पाते। उलटे शरीर में जोड़ों में दर्द उत्पन्न कर लेने जैसे संकटों में फँस जाते हैं।
साधना का भी उपयुक्त लाभ न मिल सकेगा।"
साधनाएँ भी साहस, संकल्प और संवेदना का अवलंबन लेकर आगे बढ़ती और तीनों शरीरों को प्रभावित करती हैं।
साधनाओं के लिए वह समय इसी कारण सर्वोतम माना जाता है। यों अध्ययन, व्यायाम, आदि के लिए भी उस समय की अधिक अपयुक्तता है।
साधना कठिन पड़ती है। बाहर के शब्द रुक जाने पर भी भीतर शरीरगत हलचलों भी शब्द बनकर कानों के पर्दे से टकराने लगती हैं। रक्त-संचार, श्वास-प्रश्वास की क्रियाएँ रेलगाड़ी की धड़धड़ाहट या झरना-झरने, बादल गरजने जैसे आवाजें बन जाती हैं। वे होतीं तो समीपवर्ती क्षेत्र की ही हैं।, पर साधक अनुमान लगाने लगता है कि वह सूक्ष्मजगत के संकेत हैं।
साधना, शब्दशक्ति का उन्नयन, साधना द्वारा प्रसुप्त शक्तियों का जागरण। मंत्र कुछ शब्दों को रटते रहने भर से नहीं सध जाता। उसके लिए वे सभी प्रयास करने पड़ते हैं, जो साधक की पात्रता को विकसित-परिष्कृत करें। उपजाऊ भूमि में ही अनाज की हरी-भरी फसल लहलहाती है। बीज का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, उसकी सर्वांगपूर्णता में कोई खोट भले ही न हो, पर अकेले उतने भर से काम नहीं चल जाता है।
साधना का प्रतिफल परिजनों ने हर जगह अनुभवी किया। प्रारंभ में तो विश्वास नहीं होता था कि कार्यक्रम ऐतिहासिक भी बन सकते हैं; पर जब शुरुआत हुई तो जनसमूह का ताँता; जैसे लगता देखा गया, मानो किसी अदृश्य सत्ता ने घर-घर जाकर आमंत्रण दिया हो। सभी स्थानों के कार्यक्रम आशातीत सफलताओं के साथ संपन्न हुए।
साधनाएँ करने से अमुक प्रतिफल प्राप्त हो जाता है, पर इस प्रकार का गणित फैलाने वालों से एक भूल रह जाती है कि वे यह नहीं सोचते कि साधना के अतिरिक्त और कुछ करना आवश्यक होता है क्या? समझा जाना चाहिए कि पहलवानी के शौकीनों को पौष्टिक खुराक बढ़ानी पड़ती है, ब्रह्मचर्य से ररना पड़ता है, थके अंगों को चैतन्य करने के लिए मालिश कराने जैसे उपचारों का आश्रय लेना पड़ता है। यदि यह सब न किया जाए तो मात्र दंड पेलने-बैठक करने भर से दंगल पछाड़ने की स्थिति प्राप्त कर लेना संभव नहीं। कई बार तो दुर्बलकाय व्यक्ति उस दबाव को असाधारण रूप से बढ़ा लेने पर व्यायाम का अतिरिक्त दबाव सहन नहीं कर पाते। उलटे शरीर में जोड़ों में दर्द उत्पन्न कर लेने जैसे संकटों में फँस जाते हैं।
साधना परमात्मा की ध्यान-आराधना ही है। इससे अपनी आत्मा में परमात्मा का सूक्ष्म दिव्य तत्त्व झलकने लगता है और अपूर्व शक्ति की अनुभूति होती है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रार्थना से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग आत्मबलसंपन्न व्यक्ति कर सकते हैं। निश्चयपूर्वक की गई प्रार्थना कभी असफल नहीं हो सकती।
साधनाओं के अतिरिक्त आहार, मेवे, ऐसे वनस्पतियों को भी सम्मिलित करते हैं, जो शारीरिक-मानसिक ही नहीं आध्यात्मिक-क्षेत्र को भी संभालने-सुधारने में समर्थ होती है। उच्चस्तरीय महाप्राण का संग्रह-संकलन करने में दिव्यौषधियों के सेवन की असाधारण भूमिका होती है। इस प्रयोग का लाभ सहज-सुलभ रीति से ही उठाया जा सकता है। महर्षि पिप्पलाद पीपलवृक्ष के फल ही खाकर निर्वाह करते थे। अन्यान्य ऋषि-तपस्वियों ने अपना आहार आँवला, बिल्व आदि को ही बनाया था।
साधना विज्ञान के अनेकानेक भेद और उपभेद बन जाते हैं। इनमें से जिन्हें अपनी अभिरुचि के अनुरूप अपनाना होता है, वे उसका प्रयोग करते रहते हैं। देश, भाषा, परंपरा आदि भेदों के कारण तत्त्व दर्शन अनेक भागों में विभक्त हो गया है, पर इसे एकदूसरे के प्रतिकूल मानना भूल होगी। एक ही नगर में पहुँचने के लिए विभिन्न दिशाओं के सभी अलग-अलग मार्ग अपनाते हैं। इतने पर भी वे सभी उस एक ही लक्ष्य तक पहुँच ही जाते हैं।
साधना करते हुए दूर श्रवण की अतींद्रिय क्षमता भी कठिनाई से थोड़ी मात्रा में जगती है। फिर ब्रह्मम चेतना से संबंध जुड़ना, अनाहत नाद से संपर्क स्थापित करना कठिन हो जाता है। उसमें किन्हीं विरलों को ही अभीष्ट सफलता मिलती है। एकाग्रता का लाभ ही एक सीमा तक मिल पाता है।
साधना अति सरल है। श्वास खींचते समय ‘सो’ की ओर निकालते समय हेम् की धारणा करनी पड़ती है। कुछ दिन के अभ्यास से यह भावना अपेक्षाकृत अधिक सरल होती चली जाती है और अभीष्टशब्द स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ने लगते हैं। इसके अतिरिक्त ब्रह्मांड के प्रतीक प्रतिनिधि इस कायपिंड में जो शक्ति-संस्थान विद्यमान है, उनकी प्रसुप्ति दूर करके जागृति का उद्देश्य भी पूरा होता है। नादबरह्म और शब्दब्रह्म दोनों की ही साधना सध जाती है।
साधना, वफादारी और स्वामिभक्ति को देखते हुए उसके साथ अत्यधिक घनिष्ठतम भाव रखना स्वाभाविक है। इस शरीर को जो कोई मान-सहयोग देता है, वह भी प्रिय लगने लगता है।
साधना द्वारा विशेष प्रकार की शक्ति उत्पन्न करके शब्दों के साथ संपुटित करना होता है। अभिमंत्रित किया गया पदार्थ ही हविष्य कहलाता है। उसे यज्ञाग्नि में यजन करके सशक्त ऊर्जा के रूप में परिणत किया जाता है। इस ऊर्जा का व्यक्ति पर, वातावरण पर, लक्ष्य पर प्रहार किया जाता है। यज्ञाग्नि भी चूल्हे में जलने वाली अग्नि से भिन्न होती है।
साधना के अतिरिक्त और कुछ करना आवश्यक होता है क्या? समझा जाना चाहिए कि पहलवानी के शौकीनों को पौष्टिक खुराक बढ़ानी पड़ती है, ब्रह्मचर्य से ररना पड़ता है, थके अंगों को चैतन्य करने के लिए मालिश कराने जैसे उपचारों का आश्रय लेना पड़ता है। यदि यह सब न किया जाए तो मात्र दंड पेलने-बैठक करने भर से दंगल पछाड़ने की स्थिति प्राप्त कर लेना संभव नहीं। कई बार तो दुर्बलकाय व्यक्ति उस दबाव को असाधारण रूप से बढ़ा लेने पर व्यायाम का अतिरिक्त दबाव सहन नहीं कर पाते। उलटे शरीर में जोड़ों में दर्द उत्पन्न कर लेने जैसे संकटों में फँस जाते हैं।
साधना में नादयोग वाले सभी उद्देश्य पूरे हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त प्राणवायु पर सवारी गाँठ कर शरीर में अवस्थित सभी दिव्य केंद्रों तक पहुँचना और वहाँ से गोताखोरों की तरह बहुमूल्य मोती निकालना भी सरल होता है। 'सोऽहम्' साधना अति सरल है। श्वास खींचते समय ‘सो’ की ओर निकालते समय हेम् की धारणा करनी पड़ती है। कुछ दिन के अभ्यास से यह भावना अपेक्षाकृत अधिक सरल होती चली जाती है और अभीष्टशब्द स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ने लगते हैं।
साधना-क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।
साधना के माध्यम से नादयोग भी सध जाता है और इससे भी आगे शब्दब्रह्म के साथ संबंध जोड़ने का प्रयोजन भी पूरा हो सकता है।
साधनाएँ ठीक प्रकार बन पड़ेंगी इसकी आशा कैसे की जाए? चित्तवृत्ति निरोध किए बिना मनोनिग्रह किए बिना साधना कर पाना शक्य नहीं है।
साधना करने लगे।
साधनात्मक उपचार दोनों की ही अपनी जगह अनिवार्यता एवं महत्ता है।
साधना बन पड़ने पर भी, उसके चमत्कारी परिणाम होते हैं। इसकी विपरीत श्रद्धा के अभाव में उपासनात्मक कर्मकांड ढेरों समय लगाकर करते रहने पर भी कोई कहने लायक प्रतिफल नहीं प्राप्त होता है।
साधनाएँ तो है, पर उन्हें बताने-अपनाने से पूर्व अपनी स्थिति क पर्यवेक्षण करना चाहिए और विकास-परिष्कार के लिए जो मध्यवर्ती अनुबंध पालना होता है, उसकी तैयारी करनी चाहिए।
साधना, जिसके मिले हुयेए का ऋण चुकता है और आगे के लिए बहुमूल्य अनुदानों का द्वार खुलता है।"
साधनाएँ अनेकों प्रकार की हैं। परंपरा भेद से उनका उपयोग-उपचार अनेक विधि-विधानों के रूप में किया जाता हैं। इस प्रकार साधना विज्ञान के अनेकानेक भेद और उपभेद बन जाते हैं। इनमें से जिन्हें अपनी अभिरुचि के अनुरूप अपनाना होता है, वे उसका प्रयोग करते रहते हैं। देश, भाषा, परंपरा आदि भेदों के कारण तत्त्व दर्शन अनेक भागों में विभक्त हो गया है, पर इसे एकदूसरे के प्रतिकूल मानना भूल होगी।
साधना, उपचारों से ही स्थूलसूक्ष्म एवं कारणशरीरों को समर्थ सुव्यवस्थित बनाया जा सकता है। इनकी भी उपयोगिता है, पर यह संभव नहीं कि व्यावहारिक जीवन गया-गुजरा बना रहे और पूजा-उपचारों की सहायता भर से संपन्न उत्कर्ष के लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।
साधना-क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में विवेचन करें, तो पाते हैं कि इंद्रियातीत अनाहत बिंदु रूप में— शब्दब्रह्म-नादब्रह्म के रूप में शास्त्रकारों ने इसकी महिमा को बड़ी गंभीरता से प्रस्तुत किया है। उनका यह विवेचन, पूर्णतः विज्ञानसम्मत भी है। शब्दब्रह्म अर्थात गद्य उच्चारण, नादब्रह्म अर्थात संगीत के रूप में तालबध्द वादन-गायन। मंत्र विज्ञान इसी क्षेत्र से उद्भूत विधा है, जिसका अवलम्बन लेकर आत्मिक प्रगति का पथ-प्रशस्त किया जाता है। यही शक्ति, शाप व वरदान के रूप में परिलक्षित होती देखी जा सकती है।
साधना कर पाना शक्य नहीं है।
साधना-क्षेत्र है। इतना ही मन बना लेना उपयुक्त नहीं कि किन्हीं विशेष साधना, उपचारों से ही स्थूलसूक्ष्म एवं कारणशरीरों को समर्थ सुव्यवस्थित बनाया जा सकता है। इनकी भी उपयोगिता है, पर यह संभव नहीं कि व्यावहारिक जीवन गया-गुजरा बना रहे और पूजा-उपचारों की सहायता भर से संपन्न उत्कर्ष के लक्ष्य तक पहुँचा जा सके।
साधना का मूलभूत प्रयोजन यही है। कांटों में भटकने और सस्ते दाम में बहुमूल्य उपलब्धियां झटकने की फिराक में रहने वालों को ही असफलताजन्य निराशा का सामना करना पड़ता है।
साधना-शिविर एवं युगशिल्पी शिविर स्थगित रहेंगे।
साधना करनी पड़ती है। प्राणाकर्षण का अर्थ है— ब्रह्मांडव्यापी महाप्राण में से खींचकर अपनी पात्रता को फुला-फैलाकर उसमें अभीष्ट वैभव को संचित-संकलित करना। इसी क्रिया विज्ञान को प्राणायाम भी कहते हैं।
साधना खुली जगह में करनी चाहिए। शुध्दता जितनी अधिक रह सके, उतना उत्तम । आसन बिछाकर पुर्वाभिमुख बैठना चाहिए। समय सूर्योदय से एक घंटा पहले से लेकर एक घंटा बाद तक का रखा जा सकता है। मेरुदंड सीधा रहे।
साधनात्मक प्रयोग किए जाने की आवश्यकता है। शरीर-रक्षा के लिए आहार-विहार की व्यवस्था अनिवार्य है, पर इतने भर से कोई विद्वान वैज्ञानिक या इंजीनियर-डॉक्टर नहीं बन जाता। इसके लिए विशेष अध्ययन-अभ्यास करना होता है। आहार-विहार की विधि-व्यवस्था एवं विशिष्ट शिक्षा दोनों का सुयोग-संयोग आध्यात्मिक प्रगति हेतु अभीष्ट है। अकेली ईटों से दीवार नहीं खड़ी हो जाती; उन्हें परस्पर जोड़ने के लिए चूना, सीमेन्ट, लोहा आदि भी चाहिए।
साधना अपेक्षाकृत सरल भी है। कानों में बाहर के शब्दों का प्रवेश रोकने के लिए जिस प्रकार अवरोध लगाने पड़ते हैं, उस प्रकार की आवश्यकता नासिका मार्ग में नहीं पड़ती। शब्द के आवागमन से उसका कोई सीधा संबंध नहीं हैं। श्वास को गहरी खींचना और पूरी तरह उसे बाहर निकालने का उपक्रम श्वास विज्ञान की दृष्टि से भी शरीर के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। फेफड़ों को पूरी हवा मिलने से वे सुदृढ़ होते हैं।
साधना। मालूम नहीं इस कार्यक्रम के बीच में उन्हें जप-भजन का समय कभी मिलता भी था या नहीं, उनके साथी सहधर्मी अंगद, नल, नील, जामवन्त आदि इसी प्रकार निरंतर कार्यरत रहे हैं। लंका विजय के उपरांत यह सभी मंडली रामराज्य की स्थापना, सतयुग की वापसी में जुट गई और उसी में खप गई।
साधना सध जाती है।
साधना, दृष्टिकोण को परिष्कृत करने के लिए यौगिक तत्त्वज्ञान और जो पास में है, उसे अनेक गुना बनाने के लिए साधनों को परमार्थ के खेत में बो कर सौ गुनी फसल उगाना, यही है— "भक्तजनों की साधना, जिसके मिले हुयेए का ऋण चुकता है और आगे के लिए बहुमूल्य अनुदानों का द्वार खुलता है।"
साधना-सत्रों में सम्मिलित होने के लिए परिजनों में होड़ जैसी लग गई है। मिशन की गतिविधियों के व्यापक विस्तार के लिए अपूर्व उत्साह स्थान-स्थान पर दिखलाई पड़ रहा है। कार्यक्रमों की ऐसी सफलताओं को देखते हुए लगता है, वह दिन दूर नहीं, जब महाकाल का ‘मनुष्य में देवतत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण’ का उद्घोष पूरा होकर रहेगा।
साधना के साधक को कदम बढ़ाने से पूर्व ही अवगत रहना चाहिए और उनसे बचने का, उन्हें निरस्त करते रहने का प्रयास शुभारंभ करने से पूर्व ही कर लेना चाहिए। ध्याता को प्रसन्नचित, पुलकित मन और श्रद्धा-विश्वास की भावना से सराबोर होना चाहिए। मन को उच्छृंखल उड़ाने उड़ने से पूरी तरह रोकना चाहिए। मनोनिग्रह ध्यान-धारणा की सफलता का एक अविच्छिन्न अंग है, यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। इसे हर साधन को भली-भाँति हृदयंगम कर ही साधना-क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।
साधना द्वारा प्रसुप्त शक्तियों का जागरण। मंत्र कुछ शब्दों को रटते रहने भर से नहीं सध जाता। उसके लिए वे सभी प्रयास करने पड़ते हैं, जो साधक की पात्रता को विकसित-परिष्कृत करें। उपजाऊ भूमि में ही अनाज की हरी-भरी फसल लहलहाती है। बीज का कितना ही महत्त्व क्यों न हो, उसकी सर्वांगपूर्णता में कोई खोट भले ही न हो, पर अकेले उतने भर से काम नहीं चल जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-February
साधना में, देशोद्धार, समाज सेवा के पवित्र कार्यों में लग कर काम वासना की शक्ति का सदुपयोग करें।
साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
साधना द्वारा आत्मबल का विकास 2- गायत्री शिक्षाओं द्वारा व्यावहारिक जीवन की सुव्यवस्था। इन दोनों ही पक्षों पर गायत्री प्रेमियों को पूरा ध्यान देना चाहिये। क्योंकि साँसारिक जीवन को सुख शान्तिमय बनाने के लिए जो आदर्श, सिद्धान्त एवं दृष्टिकोण आवश्यक है, उनको छोड़ दिया जाय तो केवल साधना से आत्मबल बढ़ाते रहना ही पर्याप्त न होगा। इसी प्रकार यदि गायत्री शिक्षाओं को अपनाकर साँसारिक जीवन क्रम तो ठीक कर लिया जाय पर ब्रह्म तेज में आत्मबल में अभिवृद्धि न की जाय तो भावी जीवन के लिए समुचित संस्कार जमा न हो सकेंगे।
साधना से आत्मबल बढ़ाते रहना ही पर्याप्त न होगा। इसी प्रकार यदि गायत्री शिक्षाओं को अपनाकर साँसारिक जीवन क्रम तो ठीक कर लिया जाय पर ब्रह्म तेज में आत्मबल में अभिवृद्धि न की जाय तो भावी जीवन के लिए समुचित संस्कार जमा न हो सकेंगे।
साधनाएँ- सर्व साधारण के उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
साधना पक्ष का महत्वपूर्ण अंग है। साथ ही ऋत्विजों का तथा प्रत्येक गायत्री प्रेमी का यह भी कर्त्तव्य है कि गायत्री माता की शिक्षा एवं नीति के अनुसार अपने जीवन की व्यवस्था बनावें जिससे अपने तथा अपने साथियों की सुख शान्ति में अभिवृद्धि हो।
साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
साधना सबसे बड़ी, सबसे महत्वपूर्ण विद्या है। क्योंकि उसके द्वारा उन वस्तुओं की प्राप्ति होती है जो मनुष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक, सबसे अधिक उपयोगी है। जिस उपाय से जितने बड़े लाभ की प्राप्ति होती है वह उतना ही बड़ा लाभ समझा जाता है। अन्य अनेक साँसारिक चतुरताओं, शक्ति सत्ताओं द्वारा जो लाभ प्राप्त किये जाते हैं वे भौतिक और क्षणिक होते हैं। उनके द्वारा केवल साँसारिक वस्तुएं किसी हद तक प्राप्त की जाती हैं किन्तु योग के द्वारा जो वस्तुएं प्राप्त की जाती हैं वे अधिक ऊँची श्रेणी की होती हैं, उनमें अधिक स्थायित्व होता है उनके द्वारा मनुष्य को सुख भी अधिक ऊँची श्रेणी का, अधिक ऊँची मात्रा में प्राप्त होता है, इसलिए योग को सर्वश्रेष्ठ विद्या माना गया है।
साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-June
साधना प्रत्येक युग के अनुकूल है। गायत्री के 24 अक्षरों के उच्चारण से 24 मर्म स्थानों में छिपे हुए 24 ग्रन्थि चक्र स्वयमेव जाग्रत होने आरम्भ हो जाते हैं जब कि अन्य विधानों से उनमें थोड़े से शक्तिचक्रों का भी जागृत होना कठिन होता है।
साधना का यत्किंचित् विचार करें तो अनुचित न होगा।
साधनाओं की उपयोगिता, संभावना एवं सफलता में भारी बाधा उत्पन्न हो गई है, किन्तु गायत्री साधना प्रत्येक युग के अनुकूल है। गायत्री के 24 अक्षरों के उच्चारण से 24 मर्म स्थानों में छिपे हुए 24 ग्रन्थि चक्र स्वयमेव जाग्रत होने आरम्भ हो जाते हैं जब कि अन्य विधानों से उनमें थोड़े से शक्तिचक्रों का भी जागृत होना कठिन होता है।
साधना करनी पड़ती थी। इसीलिए उन दोनों में राजा रंक का भेद-भाव मिटकर इतना घनिष्ठ प्रेम हो गया था कि वह अनन्त काल तक संसार के लिए एक आदर्श बन गया। इस प्रकार जब हम शतरूपा-जैसी महारानी और पारवती-जैसी राजकन्या को तप की साधना करते देखते हैं तब हमें आश्रम-जीवन का महत्व सहज ही समझ में आ जाता है। रघु और भर्तृहरि जैसे राजाओं को जब हम अपना सर्वस्व लुटाकर मिट्टी के बर्तनों का व्यवहार करते देखते हैं तो हमारे हृदय में उनके प्रति घृणा नहीं होती बल्कि महान आदर का भाव उत्पन्न होता है। क्योंकि उन्होंने शक्तिशाली सम्राट होते हुए भी स्वावलंबन का पाठ पढ़ा और उसे अपने जीवन में उतारा।
साधना निष्फल चली जाय, अन्य योगों की भाँति उलटे अनिष्ट का तो किसी प्रकार कोई खतरा है ही नहीं। फिर इसके द्वारा जो लाभ होते हैं वह केवल भौतिक या केवल आध्यात्मिक ही नहीं वरन् दोनों क्षेत्रों में समान लाभ होते हैं। साधक के साँसारिक जीवन को सुखी बनाता है और आत्म-शान्ति की भी निश्चित रूप से उपलब्धि होती है।
साधना से निर्बंध कर देना कठिन है परन्तु गायत्री योग की तपस्या कठिनाई नहीं पड़ती, परन्तु तप के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उसमें मन का निरोध, इन्द्रियों का संयम, कष्ट सहिष्णुता, तितीक्षा, त्याग, शम, दम, व्रत, उपवास, जप, धारणा, ध्यान, प्रत्याहार आदि अनेकों ऐसे कार्यों को अपनाना पड़ता है जो अमीर गरीब सभी को समान रूप से कष्ट साध्य होते हैं और वे करने पर यह सब कार्य एक साथ, एक समय में और एक समान गति से होते चलते हैं। पंच भूतों से मुक्ति का महान कार्य पंचमुखी गायत्री द्वारा ही होता है।
साधना, श्रद्धा, आत्मशक्ति का एक स्थान में एक प्रचंड, ब्रह्म तेज प्रज्ज्वलित रहेगा और उस स्थान पर बैठने मात्र से किसी भी अशान्त व्यक्ति को शान्ति मिल सकती है। इस आध्यात्मिक शक्ति संस्थान में प्रत्येक गायत्री उपासक को अपना भाग देना चाहिए।
साधना शक्ति का अभाव है। हाँ किसान, मजदूर आदि वर्ग के लोग जो रोज परिश्रम कर अपने अपने ढंग से मानव समाज की सेवा में लगे रहते हैं, वे न केवल अधिक सुखी और सच्चे हैं, पर इन्हीं के कारण यह संसार अब भी आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। परन्तु जो लोग शारीरिक परिश्रम न करके केवल अधिकार, धन और चातुर्य के बल पर अपना जीवन निर्वाह करना चाहते हैं, उन्हीं के कारण सारे संसार में हाहाकार मचा हुआ है।
साधना करने से एक- एक देह का, एक एक कोष एक- एक प्राण का, एक- एक चक्र का क्रमशः जागरण होता है। स्थूल देह, सूक्ष्म देह, कारण देह यह तीनों देहें त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों में साथ-साथ शुद्ध होती चलती हैं। इडा,पिंगला और सुषुम्ना का त्रिकोण साथ-साथ घूमता है। सत,रज,तम का समान सन्तुलन बनता है। ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि की खुलने की व्यवस्था एक साथ बनने लगती है।
साधना करते देखते हैं तब हमें आश्रम-जीवन का महत्व सहज ही समझ में आ जाता है। रघु और भर्तृहरि जैसे राजाओं को जब हम अपना सर्वस्व लुटाकर मिट्टी के बर्तनों का व्यवहार करते देखते हैं तो हमारे हृदय में उनके प्रति घृणा नहीं होती बल्कि महान आदर का भाव उत्पन्न होता है। क्योंकि उन्होंने शक्तिशाली सम्राट होते हुए भी स्वावलंबन का पाठ पढ़ा और उसे अपने जीवन में उतारा।
साधना’ का प्रश्न उपस्थित होता है। संसार के सभी सन्तों ने चाहे वे हिंदु हों अथवा बौद्ध, सिक्ख हों या ईसाई, पारसी हों या मुसलमान-एक स्वर से साधना पर जो विशेष जोर दिया है, वह इसलिए नहीं कि वे इन बड़ी-बड़ी बातों का प्रचार करके अपने को पूजावें, बल्कि उनका उद्देश्य यह रहता है कि मानव-शरीर की अवहेलना तथा उपासना के कारण उसके वास्तविक स्वरूप का जो अपमान होता है, उससे उसकी रक्षा हो।
साधना पर जो विशेष जोर दिया है, वह इसलिए नहीं कि वे इन बड़ी-बड़ी बातों का प्रचार करके अपने को पूजावें, बल्कि उनका उद्देश्य यह रहता है कि मानव-शरीर की अवहेलना तथा उपासना के कारण उसके वास्तविक स्वरूप का जो अपमान होता है, उससे उसकी रक्षा हो।
साधना द्वारा ऐसी संतुलित तपस्या होती है कि इन सभी महान् आध्यात्मिक केन्द्र बिन्दुओं का सरलतापूर्वक परिपाक होता चलता है। युग परिवर्तन के कारण वर्तमान काल की तात्विक सूक्ष्म स्थिति में जो हेर फेर हो गया है उसके कारण अन्य अनेक साधनाओं की उपयोगिता, संभावना एवं सफलता में भारी बाधा उत्पन्न हो गई है, किन्तु गायत्री साधना प्रत्येक युग के अनुकूल है। गायत्री के 24 अक्षरों के उच्चारण से 24 मर्म स्थानों में छिपे हुए 24 ग्रन्थि चक्र स्वयमेव जाग्रत होने आरम्भ हो जाते हैं जब कि अन्य विधानों से उनमें थोड़े से शक्तिचक्रों का भी जागृत होना कठिन होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-January
साधना करनी हो, सम्मिलित होना हो उन्हें पूर्ण तत्परतापूर्वक ही सम्मिलित होना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-November
साधना अर्थात् एकाग्रता से होता है, हृदय के प्रभावित हो जाने से बौद्धिक परिवर्तन सरलता से हो जाता है। हृदय का परिवर्तन अपनी सद्भावना के दर्शाने से होता है। इसके लिए अधिक बकवास करने की भी आवश्यकता नहीं होती। किसी को दो-चार शब्दों से भी प्रभावित करके उसके हृदय को परिवर्तन कर सकते हैं। आवश्यकता यह है कि हम उसके प्रति वास्तविक सद्भावना रखें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-May
साधना, प्रयत्न, पुरुषार्थ के कारण लोगों को तरह-तरह की शक्तियाँ, योग्यताएं, सामर्थ्य एवं सम्पदाएं प्राप्त होती हैं। विद्यार्थी, व्यापारी, किसान, मजदूर, शिल्पी, संगीतज्ञ, चिकित्सक, नेता, साधु आदि सभी वर्गों के लोग अपने अपने कार्य क्षेत्र में, हमको अपने उद्देश्य के लिए, अपने अपने ढंग से तप करते हैं, जिसका तप जितना अधिक होता है उसे उसी हिसाब से सफलता एवं सम्पन्नता मिलती चलती है। इतिहास बताता है कि पुरुषार्थ प्रधान जातियाँ आगे बढ़ीं और ऊँची उठीं इसके विपरीत आलसी, विलासी, भीरु, अकर्मण्य लोग व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से विनाश के गर्त में चले गये। जो वृक्ष ऋतु प्रभावों को सहते हैं वे ही दीर्घजीवी होते हैं और जिनकी सहनशक्ति निर्बल होती है वे थोड़ी सी सर्दी गर्मी में ही नष्ट हो जाते हैं, इसी प्रकार तपस्वी मनुष्य ही सफल होते देखे गये हैं।
साधनाओं का प्रकाशन न तो उपयोगी है और न आवश्यक।
साधना है। अपने जीवन में हम जो कुछ कर रहे हैं, वह सब भगवान के लिये ही कर रहे हैं, बस ऐसा ज्ञान रख कर या ऐसा समझकर ही कर्म करना चाहिये। कुछ-न-कुछ करना ही चाहिये, ऐसा समझकर जो कुछ सामने आवे उसी में लग जाय, यह कोई उचित बात नहीं है। हमें कर्म करना चाहिये, किन्तु अपनी अन्तरात्मा की पूर्ण आज्ञा से, यों ही नहीं। भीतर से हमें जिस काम करने के लिये जैसी प्रेरणा हों, उसी के अनुसार कर्म करने के लिये हमें तत्पर होना चाहिए।
साधना ही उत्कर्ष को प्राप्त हुई और न व्यावहारिक जीवन में ही हमने उन्नति प्राप्ति की, जिस दिन से संसार को अविद्या समझकर हम उसकी उपेक्षा करने लगे, और सामाजिक निष्क्रियता को ही धार्मिक जीवन का सर्वोत्कृष्ट लक्षण समझने लगे, जिस दिन से पार्थिव ज्ञान को अविद्या मान कर उसे हेय समझने लगे और इस अभिव्यक्त संसार से अपने को भिन्न समझकर पारमार्थिक विद्या को ही एकमात्र विद्या समझने लगे, उस दिन से हमारा समाज, हमारा धार्मिक जीवन धन- तमसावृत हो गया, उस दिन से हमारी दुर्गति प्रारम्भ हुई और उस दिन से हम समाजनीति और राजनीति से अलग होने लगे। उसी दिन यह निश्चय हो गया कि हमारा देश पराधीन हो जायगा और धार्मिक जीवन में भी हम अधःपतित हो जायेंगे।
साधना का प्रधान अंग होना चाहिये। जिसने इस ओर पग उठाया है, उसने जीवन में एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। सबके प्रति सद्भाव, मित्रभाव, प्रेम, सहानुभूति, सेवा, सहायता की मनोवृत्ति आन्तरिक शान्ति प्रदान करने वाली अवस्था है। मैली भावना के अभ्यास से मानव दिन रात अमित सुख का अनुभव करता है, रात्रि में मीठी नींद सोता है; बुरे स्वप्न नहीं देखता, सबका प्रिय हो जाता है; अमानव दुष्टों का भी प्रिय होता है, देवता उसकी रक्षा करते हैं; अग्नि, विष या हथियार तक से उसे हानि नहीं पहुँचती, शीघ्र ही उसे समाधि लग जाती है, उसका आकार सदा प्रसन्न रहता है। बिना किसी अंतर्द्वंद्व के मृत्यु को प्राप्त होता है।
साधना को ही महत्व नहीं दिया गया है। इस तत्व को भूलने से ही आज हम अन्धकार में पड़े हैं। इसका संकेत यजुर्वेद में भी दे दिया गया है। ईशोपनिषद् इसी यजुर्वेद का एक अध्याय है। ईशोपनिषद् के नवें श्लोक में इसी बात का संकेत है—
साधना के ज्ञान की तीन अवस्थाएँ हैं। पहली अवस्था है आत्मज्ञान की, दूसरी ब्रह्मज्ञान की और तीसरी है भगवद्ज्ञान की। आत्मज्ञान होने पर यह प्रतीत होने लगता है कि, मैं सब में स्थित हूँ और सब मुझ में स्थित हैं, इसके बाद जब ब्रह्मज्ञान हो जाता है,उस समय यह प्राप्त हो उठता है कि, सब एक है, किसी में भेद नहीं है—और सृष्टि की सारी वस्तुएँ ही ब्रह्म हैं, सबके अन्त में जब भगवद्ज्ञान हो जाता है, तब यह प्रत्यक्ष दिखायी पड़ने लग जाता है कि, ब्रह्म ही भगवान् हैं, भगवान् सब प्राणियों में हर समय विराजमान रहा करते हैं। उस समय एक विश्व-ज्ञान से साधक परिपूर्ण हो जाता है—संसार में उसे फिर कुछ भी भेद दिखायी नहीं पड़ता। सारा जगत् ही इस समय उसे भगवान्मय दीखने लग जाता है।
साधना को छोड़कर केवल पारलौकिक साधना को ही महत्व नहीं दिया गया है। इस तत्व को भूलने से ही आज हम अन्धकार में पड़े हैं। इसका संकेत यजुर्वेद में भी दे दिया गया है। ईशोपनिषद् इसी यजुर्वेद का एक अध्याय है। ईशोपनिषद् के नवें श्लोक में इसी बात का संकेत है—
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-December
साधना का उद्देश्य इसी इच्छा शक्ति को ही प्राप्त करना है। प्राणायाम विधि की इस प्रकार शारीरिक विद्या की सहायता से व्याख्या की जा सकती है, प्राणायाम द्वारा शरीर में एक प्रकार की गति उत्पन्न की जा सकती है, श्वास-प्रश्वास यन्त्र के ऊपर अत्यधिक विस्तार करके शरीर में वर्तमान चक्रों को भी वश में लाने के लिये सहायता मिलती है।
साधना एवं तपश्चर्या के प्रति फलस्वरूप यह गायत्री तीर्थ बनने जा रहा है यह आध्यात्मिक जगत के लिए एक शुभ सन्देश है। गायत्री संस्था के सदस्यों के लिए तो यह विशेष प्रसन्नता की बात है कि उनने, उनकी सम्मिलित भावना ने, एक ऐसा केन्द्र स्थान विनिर्मित किया है जो असंख्यों आत्माओं को शान्ति देने में समर्थ हो सकेगा। जहाँ इसकी शीतल छाया से हजारों वर्षों तक असंख्य लोगों को सत्परिणाम प्राप्त होंगे वहाँ इस संस्था के सदस्य भी लाभ से वंचित न रहेंगे।
साधना तथा तपश्चर्या पर अधिक ध्यान दें।
साधना है जिसके द्वारा सर्वत्र पर आत्मा का अनुभव करने की चेतना जागृत हो जाती है। यही विश्व मानव की पूजा है, इसे ही विराट रूप दर्शन कहते है। रामायण में भगवान राम ने अपने जन्म काल में कौशल्या को विराट रूप दिखाया है। एक बार भोजन करते समय भी राम ने माता को विराट रूप दिखाया था। उत्तर काण्ड में काकभुशुंडि जी के सम्बन्ध में वर्णन है कि वे भगवान् के मुख में चले गये तो उन्होंने वहाँ सारे ब्रह्माण्डों को देखा।
साधना हो सकती है इस तथ्य को हमें भली प्रकार समझ लेना है।
साधना करेंगे जिससे आत्मशुद्धि एवं लोक सेवा की दिशा में हमारी और अधिक प्रगति हो। इस 24 दिनों का जो विशेष कार्यक्रम है वह सार्वजनिक न होगा।
साधना की औषधि लेने की अध्यात्म ग्रन्थ सम्मति देते हैं। जिस प्रकार अधिक मैला कपड़ा बार-बार साबुन लगाने से अधिक अधिक स्वच्छ और निर्मल होता जाता है। इसी प्रकार अधिक अधिक जप से मन पवित्र और स्वच्छ होता रहता है। जब वह बिलकुल शुद्ध हो जाता है तो पवित्र और साफ अन्तः करण में प्रभु की लीला का रहस्य प्रगट होने लगता है जिसको अनुभूति कहते हैं यह अनुभव राग द्वेष की बीमारी को दूर करने में बड़ी सहायता करते हैं।
साधनाएँ करे पर यदि वह अपने काम में हमेशा पीछे रहे तो उसे कभी मानसिक शान्ति प्राप्त न होगी, और उसका चित्त प्रसन्न न रहेगा। चित्त प्रसन्न न रहने से मनुष्य की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती अतएव कार्यों का अधूरा रहना, अकृतकार्यता मनुष्य के लिए शान्ति प्राप्त करने में सदा बाधक बनी रहेगी। अतएव इस विचार से भी शान्ति चाहने वाले व्यक्ति को अपने ऊपर आए हुए कार्य-भार को प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक सम्भालना चाहिए।
साधना सम्बन्धी परिचय के साथ पत्र लिख कर स्वीकृति प्राप्त कर लें। संख्या पूरी हो जाने के पश्चात् किसी को स्वीकृति न मिल सकेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-September
साधना न करने पर भी दूसरे जिज्ञासु व साधक तो उस साधना से लाभ उठावें। इसी अन्तः प्रेरणा से यहाँ उन साधु महात्मा से इस सम्बन्ध में जो बातचीत हुई नीचे उद्धृत की जाती हैं।
साधना अच्छे रूप से की जाय तो बाकी के गुण भी स्वयं भी विकसित होते रहेंगे व दोष क्रमशः क्षीण होते चले जायेंगे। ‘एक ही साधे सब सधे’ आप जैन हैं अहिंसा जैन धर्म का प्रधान उपदेश है उसी की ठीक से साधना करिये। जीवन में प्रतिक्षण होने वाली हिंसा भावना व कार्य को टटोलकर उसे दूर हटाइये और विश्व प्रेम, प्राणी मात्र के साथ आत्मीय भाव की अभिवृद्धि, अहिंसा तत्व, भावों की निर्मलता करते रहिये, आप इस एक ही गुण की साधना में जीवन लगा देंगे तो आपकी आत्मा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जायगी। आगे का रास्ता स्वयं दिखाई देने लगेगा। एक गुण की प्रकर्षता से अन्य गुण भी खींचे हुए चले आयेंगे अन्यथा बहुत से साधन बतलाने पर भी उसे जीवन में नहीं उतारेंगे तो कोई लाभ नहीं होने वाला है।
साधना शुरू करें। उस दिन व्रत उपवास किया जाय और दृढ़ निश्चय किया जाय कि आज किसी भी प्रकार का तनिक भी झूठ नहीं बोलूँगा। उसी निश्चय को ध्यान में रखते हुए सचेत रहकर व्यवहार करिये।
साधना ठीक से हो रही है अनुभव हो जाय तो फिर दो दिन और बढ़ाइये। वह भी ठीक से निभ जाय तो महीने में छः दिन कर दीजिये। फिर तो सत्य आपका स्वभाव ही बन जायगा। झूठ अपने आप भाग जायगा। कमजोरियाँ नष्ट हो जायेंगी।
साधना समाप्त कर सकते हैं या आगामी गायत्री जयन्ती तक चालू रख सकते हैं।
साधना। 14-शिखा और सूत्र की विवेचना। 15-दैवी संपदाएं। 16-कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। 17-सौभाग्य बढ़ाने की कला।
साधना करने से इसका प्रभाव स्वयं विदित होगा व आगे का मार्ग चित्तशुद्धि व निर्मलता बढ़ने से स्वयं दीखने लगेगा।
साधना कीजिए। इससे भूमिका यानी चित्त शुद्धि हो जायगी व वृत्त उपवास के द्वारा शरीर शुद्धि हो जायगी फिर रास्ता स्वयं सूझ पड़ेगा। इस पर भी आगे का मार्ग जानना हो तो इसकी साधना कर लेने के बाद मेरे से पत्र व्यवहार करिये या स्वयं मिलियेगा। मैंने पीछे की बात पहले ही पूछ लेने की उत्सुकता दिखाई तो आपने पुनः पहली बात को दुहराया और सत्य की साधना पर ही जोर दिया। पीछे की बात पीछे ही होगी।
साधना में जीवन लगा देंगे तो आपकी आत्मा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जायगी। आगे का रास्ता स्वयं दिखाई देने लगेगा। एक गुण की प्रकर्षता से अन्य गुण भी खींचे हुए चले आयेंगे अन्यथा बहुत से साधन बतलाने पर भी उसे जीवन में नहीं उतारेंगे तो कोई लाभ नहीं होने वाला है। ऐसी ही भावना के कुछ शब्द कह कर वे अपने कार्य में लग गये। विचार करने पर उन्होंने इन थोड़े से शब्दों में ही बहुत बड़ी बात कह दी प्रतीत हुई कि उसके लिए अपनी तैयारी कहाँ?
साधना नहीं करता। अन्यथा किसी भी एक धर्म की साधना अच्छे रूप से की जाय तो बाकी के गुण भी स्वयं भी विकसित होते रहेंगे व दोष क्रमशः क्षीण होते चले जायेंगे। ‘एक ही साधे सब सधे’ आप जैन हैं अहिंसा जैन धर्म का प्रधान उपदेश है उसी की ठीक से साधना करिये। जीवन में प्रतिक्षण होने वाली हिंसा भावना व कार्य को टटोलकर उसे दूर हटाइये और विश्व प्रेम, प्राणी मात्र के साथ आत्मीय भाव की अभिवृद्धि, अहिंसा तत्व, भावों की निर्मलता करते रहिये, आप इस एक ही गुण की साधना में जीवन लगा देंगे तो आपकी आत्मा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जायगी। आगे का रास्ता स्वयं दिखाई देने लगेगा।
साधना जीवन को ऊंचा उठाती है परमेश्वर बनाती है। अन्त में महात्मा गाँधी के सत्य सम्बन्धी विचार गाँधी विचार दोहन से उद्धृत किये जाते हैं जिनसे सत्य महत्व-सत्य क्या है? संक्षेप में विदित हो जाता है।
साधना से लाभ उठावें। इसी अन्तः प्रेरणा से यहाँ उन साधु महात्मा से इस सम्बन्ध में जो बातचीत हुई नीचे उद्धृत की जाती हैं।
साधना कर लेने के बाद मेरे से पत्र व्यवहार करिये या स्वयं मिलियेगा। मैंने पीछे की बात पहले ही पूछ लेने की उत्सुकता दिखाई तो आपने पुनः पहली बात को दुहराया और सत्य की साधना पर ही जोर दिया। पीछे की बात पीछे ही होगी।
साधना। 12-गृहस्थ योग। 13-प्रार्थना के चमत्कार। 14-विचार संचालन विद्या। 15-सुखी वृद्धावस्था।
साधना की समाप्ति ता. 29 सोमवार को करनी चाहिए। उस दिन हवन, ब्राह्मण भोजन तथा यथाशक्ति दान पुण्य करना चाहिए। जो लोग स्वयं हवन न कर सकें उनका हवन मथुरा हो सकता है जो जितने पैसे भेजेंगे उतने की सामग्री और घी लेकर यहाँ उनकी ओर से हवन कर दिया जायगा। हवन की दक्षिणा किसी से कुछ नहीं ली जाती। ब्राह्मण भोजन के स्थान पर सस्ता गायत्री साहित्य सत्पात्रों को वितरण किया जा सकता है।
साधना पर ही जोर दिया। पीछे की बात पीछे ही होगी।
साधना में आवश्यकता होती है। इन सद्गुणों को पैदा करके बढ़ाना होगा। तभी सफलता हो सकती है। मार्ग में जो-जो कठिनाइयाँ आ जाती हैं उन्हें देखिये। इसलिये आध्यात्मिक मार्ग कठिन है।
साधनाएं। 18-योग के नाम पर मायाचार। 19-जादूगरी या छल। 20-सम्मोहन विज्ञान।
साधना का भी विशेष महत्व है। जैसे स्त्री के ऋतुमती होने पर गर्भाधान सफल होने की संभावना अधिक रहती है वैसे ही नवरात्रि की गायत्री उपासना भी अधिक फलवती होती है।
साधना करने का अवकाश नहीं मिलता वे 24 मंत्र प्रातःकाल आँख खुलते ही और 24 मंत्र रात को सोते समय मौन मानसिक रूप में मन ही मन जप लिया करें। जप के समय ध्यान भी करते जाना चाहिए। जिन्हें पूरा मंत्र याद नहीं वे पंचाक्षरी गायत्री (ॐ भूर्भुवः स्वः) की उपासना आरम्भ कर दें।
साधना करिये। जीवन में प्रतिक्षण होने वाली हिंसा भावना व कार्य को टटोलकर उसे दूर हटाइये और विश्व प्रेम, प्राणी मात्र के साथ आत्मीय भाव की अभिवृद्धि, अहिंसा तत्व, भावों की निर्मलता करते रहिये, आप इस एक ही गुण की साधना में जीवन लगा देंगे तो आपकी आत्मा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जायगी। आगे का रास्ता स्वयं दिखाई देने लगेगा। एक गुण की प्रकर्षता से अन्य गुण भी खींचे हुए चले आयेंगे अन्यथा बहुत से साधन बतलाने पर भी उसे जीवन में नहीं उतारेंगे तो कोई लाभ नहीं होने वाला है। ऐसी ही भावना के कुछ शब्द कह कर वे अपने कार्य में लग गये।
साधना में जो विघ्न बाधा आवे, धैर्य से सहिये, विचलित न होइये।
साधना से संतुष्ट न रहें वरन् अपने निकटवर्ती लोगों, मित्रों, सम्बन्धियों, परिचितों को भी इसी मार्ग पर लगाने के लिए सदैव प्रयत्न करते रहा करें। गायत्री प्रचार एक उच्च कोटि का पुण्य परमार्थ है।
साधना व आत्मानुभव प्राप्ति का उपाय पूछने पर आपने कहा था कि मनुष्य आत्मानुभव तथा आत्मसाक्षात्कार इसीलिए नहीं कर पाता कि वह जितनी बातें करता है वैसी साधना नहीं करता। अन्यथा किसी भी एक धर्म की साधना अच्छे रूप से की जाय तो बाकी के गुण भी स्वयं भी विकसित होते रहेंगे व दोष क्रमशः क्षीण होते चले जायेंगे। ‘एक ही साधे सब सधे’ आप जैन हैं अहिंसा जैन धर्म का प्रधान उपदेश है उसी की ठीक से साधना करिये। जीवन में प्रतिक्षण होने वाली हिंसा भावना व कार्य को टटोलकर उसे दूर हटाइये और विश्व प्रेम, प्राणी मात्र के साथ आत्मीय भाव की अभिवृद्धि, अहिंसा तत्व, भावों की निर्मलता करते रहिये, आप इस एक ही गुण की साधना में जीवन लगा देंगे तो आपकी आत्मा उत्तरोत्तर आगे बढ़ती जायगी। आगे का रास्ता स्वयं दिखाई देने लगेगा।
साधना करने की विधि इस प्रकार बतलाई कि पहले महीने में दो दिन किसी पर्व तिथि को ही इसकी साधना शुरू करें। उस दिन व्रत उपवास किया जाय और दृढ़ निश्चय किया जाय कि आज किसी भी प्रकार का तनिक भी झूठ नहीं बोलूँगा। उसी निश्चय को ध्यान में रखते हुए सचेत रहकर व्यवहार करिये।
साधना का संरक्षण और त्रुटियों का दोष परिमार्जन हम करते रहेंगे।
साधना युक्त जीवन ही राष्ट्र निर्माण करता है। कर्म-योग ही श्रेष्ठ धर्म है।
साधना। 8-प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। 9-उल्लास का विकास। 10-आगे बढ़ने की तैयारी। 11-अध्यात्म धर्म का अवलम्बन।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-August
साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
साधना के लिये आते हैं, उनको यह प्राणायाम अवश्य करना पड़ता है।
साधना को सफल समझें। इस प्रकार अधिकाँश प्रचंड साधक भी अपने को असफल समझने लगते हैं तो साधारण साधकों की निराशा के बारे में तो कोई आश्चर्य की बात है ही नहीं।
साधनाएँ- सर्व साधारण के उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
साधना से ‘ईश्वर’ तत्व पर अधिकार हो जाता था और लोग सहज ही आकाश में उड़ना, लोक-लोकाँतरों की यात्रा, दूर दृष्टि, दूर श्रवण दूरस्थ लोगों से बातचीत, आदि सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते थे। आकाश का गुण शब्द है। उस समय शब्द ही एक प्रचण्ड शक्ति था। मन्त्र बल से बड़े-बड़े काम होते थे। विमान, अस्त्र, शस्त्र, वर्षा, अग्निकाण्ड, शाप, वरदान जीवन दान, मृत्यु आदि बातें शब्द की (मन्त्र) की शक्ति से सुगमता पूर्वक होती रहती थी।
साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
साधना से प्राप्त कर लेता था वे आज के लिए असम्भव हैं। जो बातें आज बड़ी भारी सिद्धियाँ मालूम होती हैं वे किसी समय साधारण और सरल थीं। अणिमा, लघिमा, महिमा, आदि ऋद्धि-सिद्धियाँ आकाश तत्व प्रधान युग में मामूली सी बातें थीं, आज वे बातें अत्यन्त उच्च कोटि के तपस्वियों के लिए भी कठिन हैं। युग परिवर्तन के साँसारिक प्रभाव का हेर-फेर होना प्रकृति के नियमों के ऊपर निर्भर हैं। युग प्रभाव तो परिवर्तन शील है पर सत्य में कभी परिवर्तन नहीं होता।
साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-October
साधना में से कट कर मिलेगा और यदि उसके पास तप की इतनी पूँजी नहीं है तो उसे पेशगी उतना पुण्य फल उन शिष्यों को देना पड़ेगा और उसकी पूर्ति के लिए उसे हजारों जन्मों तक पिसना पड़ेगा। स्पष्ट है कि ऐसा करने में हमारा कोई लाभ नहीं। हम लोकहित के लिए, दूसरों को कल्याण मार्ग पर ले जाने की पुण्य भावना से प्रेरित होकर ही दूसरों को कोई साधना संबन्धी सलाह देते हैं इसमें हमारा कोई आर्थिक या भौतिक स्वार्थ नहीं होता फिर हम क्यों किसी का गलत पथ-प्रदर्शन करेंगे? और क्यों अकारण अपनी हजारों जन्मों की तपश्चर्या को नष्ट करेंगे?
साधना है। संसार और उसकी यथार्थता ही कर्मयोगी का कार्यक्षेत्र है। फल के प्रति उदासीन रहकर कर्म के प्रति जागरुक होकर ही मनुष्य क्रमशः मन पर विजय पाता है और परमात्मा से अपना संबन्ध सुदृढ़ करता है। कर्म योग की प्रेरणा किसी कर्मयोगी के जीवन को आदर्श मानकर ही प्राप्त होती है। अपने कर्त्तव्य के प्रति तल्लीनता तथा विषय जन्य भावनाओं के प्रति निरासक्ति ही कर्म योग की पहली सीढ़ी है।
साधनाएँ- सर्व साधारण के उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
साधना का अधिकारी हर कोई नहीं हो सकता। सविता ने-परमात्मा ने अपनी सत शक्ति से ब्राह्मण को बनाया और उसको सावित्री से घेर दिया। जिसमें सत् तत्व विशेष है, जो ब्रह्म परायण है वह व्यक्ति ब्राह्मण है, ऐसे व्यक्ति ईश्वरीय दिव्य भावों से, दिव्य शक्तियों से घिरे रहते हैं, उन्हें ही श्री, प्रतिष्ठा और ज्ञान की प्राप्ति होती है, वे ही उनका सदुपयोग करके लाभान्वित होते हैं, अन्यों को इन तीनों का अधिकार नहीं है। यदि बलात्, अनधिकृत रूप से कोई इन्हें प्राप्त कर लेता है तो उसके लिए यह वस्तुएँ विपत्ति रूप बन जाती हैं।
साधना के बल पर वह साधक तो उस गलत साधना से भी अभीष्ट फल प्राप्त कर लेगा पर उसको जो फल मिलेगा वह उस पथ-प्रदर्शक की साधना में से कट कर मिलेगा और यदि उसके पास तप की इतनी पूँजी नहीं है तो उसे पेशगी उतना पुण्य फल उन शिष्यों को देना पड़ेगा और उसकी पूर्ति के लिए उसे हजारों जन्मों तक पिसना पड़ेगा। स्पष्ट है कि ऐसा करने में हमारा कोई लाभ नहीं। हम लोकहित के लिए, दूसरों को कल्याण मार्ग पर ले जाने की पुण्य भावना से प्रेरित होकर ही दूसरों को कोई साधना संबन्धी सलाह देते हैं इसमें हमारा कोई आर्थिक या भौतिक स्वार्थ नहीं होता फिर हम क्यों किसी का गलत पथ-प्रदर्शन करेंगे? और क्यों अकारण अपनी हजारों जन्मों की तपश्चर्या को नष्ट करेंगे?
साधना, योग एवं अध्यात्म के क्षेत्र में बिल्कुल अनजान हो। ऐसी दशा में उसे अपनी मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए और उसे यह भी जानना चाहिए कि सभी आध्यात्मिक रहस्य पुस्तकों में लिखे हुए नहीं हैं। पुस्तकों से बाहर भी बहुत कुछ मौजूद है।
साधना की अत्यन्त ही गुप्त, रहस्य पूर्ण, चमत्कारी साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
साधना से भी अभीष्ट फल प्राप्त कर लेगा पर उसको जो फल मिलेगा वह उस पथ-प्रदर्शक की साधना में से कट कर मिलेगा और यदि उसके पास तप की इतनी पूँजी नहीं है तो उसे पेशगी उतना पुण्य फल उन शिष्यों को देना पड़ेगा और उसकी पूर्ति के लिए उसे हजारों जन्मों तक पिसना पड़ेगा। स्पष्ट है कि ऐसा करने में हमारा कोई लाभ नहीं। हम लोकहित के लिए, दूसरों को कल्याण मार्ग पर ले जाने की पुण्य भावना से प्रेरित होकर ही दूसरों को कोई साधना संबन्धी सलाह देते हैं इसमें हमारा कोई आर्थिक या भौतिक स्वार्थ नहीं होता फिर हम क्यों किसी का गलत पथ-प्रदर्शन करेंगे? और क्यों अकारण अपनी हजारों जन्मों की तपश्चर्या को नष्ट करेंगे?
साधना में एक महत्वपूर्ण कार्य समझा जाता है।
साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामन्त्र की सिद्धि, गायत्री संध्या, गायत्री हवन, नवदुर्गाओं की गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
साधना का, आध्यात्मिकता का विषय तपस्वियों और साधना से सम्बन्ध रखता है। जिन व्यक्तियों की इस क्षेत्र में गति है, अनुभव है उन्हीं को कुछ कहना या बोलना चाहिए। यों साहित्य के अंतर्गत सभी बातें आती हैं। पुस्तकों में बहुत कुछ लिखा है पर केवल पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर हर व्यक्ति को हर विषय में बोलने का अधिकार नहीं होता। शास्त्री लोग व्याकरण की, साहित्य की बारीकियों को आसानी से समझ सकते हैं, उस विषय में वे प्रामाणिक भी हो सकते हैं।
साधना से सम्बन्ध रखता है। जिन व्यक्तियों की इस क्षेत्र में गति है, अनुभव है उन्हीं को कुछ कहना या बोलना चाहिए। यों साहित्य के अंतर्गत सभी बातें आती हैं। पुस्तकों में बहुत कुछ लिखा है पर केवल पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर हर व्यक्ति को हर विषय में बोलने का अधिकार नहीं होता। शास्त्री लोग व्याकरण की, साहित्य की बारीकियों को आसानी से समझ सकते हैं, उस विषय में वे प्रामाणिक भी हो सकते हैं।
साधना है और एक ऐसा उपाय है जिसके द्वारा हम अपने साधारण मानसिक क्लेशों एवं जीवन की अन्यान्य कठिनाइयों का बहुत सुविधापूर्वक निराकरण कर सकते हैं। हमारे अन्दर मृग में कस्तूरी के समान रहने वाली जीवात्मा एक ओर मन की चंचल चित्त वृत्तियों द्वारा अपनी ओर खींची जाती है और दूसरी ओर परमात्मा उसे अपनी ओर बुलाता है। इन्हीं दानों रज्जुओं से बंधकर निरन्तर काल के झूले में झूलने वाली जीवात्मा चिरकाल तक कर्म-कलापों में रत रहती है। यह जानते हुए भी कि जीवात्मा दोनों को एक साथ नहीं पा सकती और एक को खोकर ही दूसरे को पा सकना संभव है वह दोनों की ही खींचतान की द्विविधा में पड़ी रहती है। इसी द्विविधा द्वारा उत्पन्न संघर्षों का संकलन समाज और समाजों का सम्पादन विश्व कहलाता है।
साधना संबन्धी सलाह देते हैं इसमें हमारा कोई आर्थिक या भौतिक स्वार्थ नहीं होता फिर हम क्यों किसी का गलत पथ-प्रदर्शन करेंगे? और क्यों अकारण अपनी हजारों जन्मों की तपश्चर्या को नष्ट करेंगे?
साधना पथ पर किसी का पथ-प्रदर्शन करते हुए हम जानते हैं कि हमारी जिम्मेदारी कितनी महान है। किसी को गलत सलाह दी जाय तो अपनी श्रद्धा, गुरु भक्ति, सच्चाई और साधना के बल पर वह साधक तो उस गलत साधना से भी अभीष्ट फल प्राप्त कर लेगा पर उसको जो फल मिलेगा वह उस पथ-प्रदर्शक की साधना में से कट कर मिलेगा और यदि उसके पास तप की इतनी पूँजी नहीं है तो उसे पेशगी उतना पुण्य फल उन शिष्यों को देना पड़ेगा और उसकी पूर्ति के लिए उसे हजारों जन्मों तक पिसना पड़ेगा। स्पष्ट है कि ऐसा करने में हमारा कोई लाभ नहीं। हम लोकहित के लिए, दूसरों को कल्याण मार्ग पर ले जाने की पुण्य भावना से प्रेरित होकर ही दूसरों को कोई साधना संबन्धी सलाह देते हैं इसमें हमारा कोई आर्थिक या भौतिक स्वार्थ नहीं होता फिर हम क्यों किसी का गलत पथ-प्रदर्शन करेंगे? और क्यों अकारण अपनी हजारों जन्मों की तपश्चर्या को नष्ट करेंगे?
साधनाओं की अनेक विधियों की संक्षिप्त शिक्षा।
साधना के उपरान्त धीरे-धीरे बुद्धि की स्थिति ऊँची हो जाती है तब वह ऋतम्भरा प्रज्ञा कहलाती है। उस दशा में वह स्वार्थ और परमार्थ दोनों पक्षों को छोड़ देती है केवल दैवी प्रेरणा एवं ईश्वरीय आज्ञा ही उसका आधार रह जाता है परमहंस और जीवन मुक्त आत्माएँ उसी दिव्य प्रेरणा के आधार पर काम करती हैं।
साधनाओं की सविस्तार शिक्षा दी गई है। इसे पढ़ कर योग विद्या की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-July
साधना करने को तैयार थे। गायत्री उपासना के लिये प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गये। मैंने उन्हें सारा विधि विधान समझा दिया। वे 40 दिन की साधना में लग गये। इस साधना को भंग करने के लिए वैमत ने ऐसे ऐसे उपद्रव खड़े किये कि यह लगता था कि यह इस साधना को पूरा न होने देगी, बीच में ही खंडित करके मानेगी।
साधना करके कुछ लाभ और चमत्कार तो अधिक मिल सकते हैं पर वह मार्ग खतरे का भी बहुत है। ताँत्रिकी साधना में जो भयंकर प्राण घातक दृश्य दिखाई पड़ते हैं उनमें हिम्मत बाँधे रहना और प्रलोभन तथा आकर्षण के समय विचलित न होना साधारण काम नहीं है। थोड़ी सी भी चूक होने पर इस मार्ग के पथिक के प्राणों पर बन आती है। इसलिए तन्त्र की अपेक्षा योग मार्ग ही सरल और उत्तम है, उन्नति धीरे-धीरे होती है पर जो होती है उसमें पूर्ण निर्भयता है और लाभ भी असंदिग्ध है।
साधना को भंग करने के लिए वैमत ने ऐसे ऐसे उपद्रव खड़े किये कि यह लगता था कि यह इस साधना को पूरा न होने देगी, बीच में ही खंडित करके मानेगी। पर साधना किसी प्रकार चलती ही रही।
साधना साधारण सी थी उसका फल असाधारण हुआ। बहन के यहाँ से तार आया कि “पेट ठीक हो गया। आपरेशन की आवश्यकता नहीं रही।” इस समाचार से भारी सन्तोष हुआ। इतने में खबर आई कि भाभी जी भी ठीक हैं और अस्पताल से छुट्टी होने वाली है।
साधना पद्धति की प्रशंसा में बहुत कुछ कहते हैं पर जब यह परखा जाता है कि इन सज्जन ने इस साधना विधि को अपना कर क्या लाभ उठाया तो बड़ी निराशा होती है। इस उलझन को सुलझाने के लिए मेरी तार्किक बुद्धि अपने अभ्यास के अनुसार परीक्षा और खोज में तत्परता पूर्वक लगी रही।
साधना करने में सही पथ प्रदर्शन ढूँढ़ने और प्राप्त करने में ही बहुत भारी शक्ति व्यय करनी पड़ती है पर गायत्री उपासना में वह सब अनायास ही प्राप्त हो जाती है। यही कारण है कि इस मार्ग के पथिक, अन्य मार्गों की अपेक्षा अधिक शीघ्र निर्धारित लक्ष तक पहुँच जाते हैं।
साधना में लगा हुआ हूँ और देखता हूँ कि उसके कारण आत्मा की दिन-दिन उन्नति हो रही है। अनेक दोष दुर्गुण छूट गये हैं और उनके स्थान पर नये सद्गुणों का विकास हुआ है।
साधना से मुमुक्षुओं को मोक्ष मिलेगा, श्री कामियों को श्री का युद्धेच्छुओं को विजय तथा व्याधि ग्रस्तों को निरोगता प्राप्त होगी।
साधना मार्ग पर चलने वाले लोगों से परामर्श किये और यह देखा कि इस साधना के प्रयोग से किस व्यक्ति को क्या उपलब्ध हुआ है? यों कहने को कई लोग अपनी प्रिय साधना पद्धति की प्रशंसा में बहुत कुछ कहते हैं पर जब यह परखा जाता है कि इन सज्जन ने इस साधना विधि को अपना कर क्या लाभ उठाया तो बड़ी निराशा होती है। इस उलझन को सुलझाने के लिए मेरी तार्किक बुद्धि अपने अभ्यास के अनुसार परीक्षा और खोज में तत्परता पूर्वक लगी रही।
साधना समर में विजय प्राप्त करना तलवार की धार पर चलने के समान कठिन है। इस मार्ग का ठीक पथ प्रदर्शन प्राप्त न हो तो भयंकर परिणाम होने की आशंका रहती है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि इन गुप्त रहस्यों का पथ प्रदर्शन, गायत्री उपासक के लिये बहुत सरलता से उपलब्ध हो जाता है।
साधना प्रारम्भ कर दी जहाँ पर पहले 13 वर्ष तक की थी। एक वर्ष के बाद उन्हें गायत्री का साक्षात्कार हुआ और उन्हें वाणी सिद्ध हो गई। भगवती से उन्होंने प्रार्थना की कि मैं ऐसा एक ग्रन्थ रचना चाहता हूँ जिससे संसार की बहुत भलाई हो और मेरा यश रहे। उनकी इच्छा पूर्ण हुई। साधारण शिक्षा होते हुए भी उन्होंने माधव निदान जैसे ग्रन्थ की रचना कर डाली।
साधना से इतना लाभ उठाते हैं तो नाना जी की तपस्या को देखते हुए उनका इतना प्रताप उचित ही था।
साधना कर रहे थे तब छत के पीछे भाग में से आवाज आई की “मैं प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो सो मुझ से माँग ले।”
साधना को पूरा न होने देगी, बीच में ही खंडित करके मानेगी। पर साधना किसी प्रकार चलती ही रही।
साधना स्थान से कुछ दूर एक काले रंग की भयंकर प्रेतात्मा घबराई हुई दशा में घूमते देखी। और भी अनुभव उस अनुष्ठान काल में हुए जिससे यह प्रकट होता था कि गायत्री उपासना का भारी असर उस बैमत (प्रेतात्मा) पर हो रहा था।
साधना एवं संसार में धार्मिक प्रवृत्तियों का प्रसार करते रहने में ही जीवन व्यतीत किया जाय। तदनुसार मैं एक पुरोहित एवं धर्म प्रचारक की भाँति इस प्रदेश के लोगों की धार्मिक प्रवृत्तियों को जागृत करने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहता हूँ। इस सुन्दर सेवा पथ पर चलने का सौभाग्य मुझे माता की कृपा में ही मिला है। अपने आज के विचार और कार्यों पर जब विहंगावलोकन करता हूँ तो प्रतीत होता है कि माता मुझे श्रेय मार्ग की ओर तेजी से घसीटे लिए जा रही है।
साधना को उसी रीति से करते हुए भी कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे लोग खिन्न होते हैं और साधना के प्रति अश्रद्धा भी प्रकट करते हैं। वे बहुत शीघ्र तात्कालिक सफलता असफलता के आधार पर अपना निर्णय दे देते हैं परन्तु उन सूक्ष्म बातों के अन्तर पर दृष्टिपात नहीं करते जो इन सफलता और असफलता की तह में काम करती हैं।
साधना सफल हुई। जब वे साधना कर रहे थे तब छत के पीछे भाग में से आवाज आई की “मैं प्रसन्न हूँ, जो माँगना हो सो मुझ से माँग ले।”
साधना, भावना, श्रद्धा एवं तपश्चर्या का सम्मिलित केन्द्र गायत्री की सूक्ष्म चैतन्यता से इतना ओत-प्रोत हो सकता है वहाँ उपस्थित होने वाला मनुष्य उस महाशक्ति की सत्ता को इस स्थान पर प्रत्यक्ष अनुभव करे। ऐसे स्थान पर बैठने मात्र से लोगों की सद्बुद्धि बढ़ सकती है, और उस स्थान में की हुई साधना भी अपना विशिष्ठ परिणाम उपस्थित कर सकती है।
साधना विधि को अपना कर क्या लाभ उठाया तो बड़ी निराशा होती है। इस उलझन को सुलझाने के लिए मेरी तार्किक बुद्धि अपने अभ्यास के अनुसार परीक्षा और खोज में तत्परता पूर्वक लगी रही।
साधनाओं में लगाते थे। ‘साधना द्वारा जुआ जीता जा सकता है।’ इस मान्यता ने मुझे इस मार्ग की ओर आकर्षित किया और मैं पिताजी की अपेक्षा किसी अधिक ऊंची साधना की तलाश में रहने लगा।
साधना की तलाश में रहने लगा।
साधना पथ की तलाश में अनेक तीर्थों और क्षेत्रों में भ्रमण करता रहा। उत्तराखण्ड का हिमालय प्रदेश भी मैंने छाना और कितने ही महात्माओं के लँगोट धोये पर अभीष्ट शान्ति न मिली। जिसने जो बताया वही किया अनेक प्रकार के साधन, अभ्यास, जप, प्राणायाम, पाठ आदि करता रहा पर कहीं से भी आत्मा में प्रकाश का दर्शन न हुआ।
साधना से मुझे असाधारण लाभ हुए हैं। कुमार्ग से, कुविचारों से स्वभावतः घृणा हुई और उस मार्ग पर चलने के भीतर से ही ऐसा उत्साह पैदा हुआ जिसके लिए अनेक साधन और सत्संग भी बहुधा सफल नहीं होते। ब्राह्मण का कर्तव्य है उसके जीवन की गतिविधि क्या होनी चाहिए इन शिक्षाओं को अन्तःकरण में बैठी हुई कोई शक्ति मुझे हर घड़ी सिखाती रहती, यह शक्ति और कोई नहीं गायत्री माता ही थी। मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि यदि छोटी ही आयु से किसी बालक को गायत्री का उपासक बना दिया जाय तो वह सहज ही अनेक प्रकार के दुर्गुणों से बचता हुआ सन्मार्ग का पथिक बन सकता है।
साधना में लग गये। इस साधना को भंग करने के लिए वैमत ने ऐसे ऐसे उपद्रव खड़े किये कि यह लगता था कि यह इस साधना को पूरा न होने देगी, बीच में ही खंडित करके मानेगी। पर साधना किसी प्रकार चलती ही रही।
साधना प्रारम्भ करने से पूर्व की स्थिति और वर्तमान स्थिति की तुलना करने पर यह साफ दिखाई देता है कि मेरे जीवन में इस उपासना ने अन्तर एवं परिवर्तन उपस्थित कर दिया है।
साधना लग गई, अभी एक वर्ष और ऐसी ही साधना करो तो तुम्हारे पूर्व जन्मों के सब दुष्कृत नष्ट हो जायेंगे और जब तुम्हारी आत्मा पूर्ण निष्पाप हो जायेगी तब तुम्हें गायत्री का ब्रह्म तेज प्राप्त होगा। वृन्दावन जाकर फिर एक वर्ष साधना करने पर तुम्हें सिद्धि मिलेगी। इतना कहकर भैरव अन्तर्ध्यान हो गये।
साधना कर रहा था द्वार पर कोई स्त्री घूमती हुई मालूम पड़ी। जब बहुत देर हो गई और वह स्त्री वहीं घूमती रही तो मैं झोंपड़ी से बाहर निकला, चन्द्रमा अस्त होने को था। चाँदनी में अत्यन्त ही सुन्दर 19-20 वर्ष की एक युवती दिखाई दी। मैंने पूछा तू कौन है ? यहाँ क्यों आई है?
साधना प्रारम्भ की। साधना प्रारम्भ करने से पूर्व की स्थिति और वर्तमान स्थिति की तुलना करने पर यह साफ दिखाई देता है कि मेरे जीवन में इस उपासना ने अन्तर एवं परिवर्तन उपस्थित कर दिया है।
साधना के भक्त थे। वे एक बढ़े चढ़े जुआरी थे। अपनी साधना के बल पर वे जुआ जीतते थे और बहुत कुछ कमाते थे। छोटी आयु में जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब वे अपने प्रयोजन के लिए मुझे भी उन साधनाओं में लगाते थे। ‘साधना द्वारा जुआ जीता जा सकता है।
साधना में जो भयंकर प्राण घातक दृश्य दिखाई पड़ते हैं उनमें हिम्मत बाँधे रहना और प्रलोभन तथा आकर्षण के समय विचलित न होना साधारण काम नहीं है। थोड़ी सी भी चूक होने पर इस मार्ग के पथिक के प्राणों पर बन आती है। इसलिए तन्त्र की अपेक्षा योग मार्ग ही सरल और उत्तम है, उन्नति धीरे-धीरे होती है पर जो होती है उसमें पूर्ण निर्भयता है और लाभ भी असंदिग्ध है।
साधना का मार्ग पकड़ा। इसके लिए विभिन्न साधना पद्धतियों को परखा। योग विद्या के ग्रन्थों को देखा, साधना मार्ग पर चलने वाले लोगों से परामर्श किये और यह देखा कि इस साधना के प्रयोग से किस व्यक्ति को क्या उपलब्ध हुआ है? यों कहने को कई लोग अपनी प्रिय साधना पद्धति की प्रशंसा में बहुत कुछ कहते हैं पर जब यह परखा जाता है कि इन सज्जन ने इस साधना विधि को अपना कर क्या लाभ उठाया तो बड़ी निराशा होती है। इस उलझन को सुलझाने के लिए मेरी तार्किक बुद्धि अपने अभ्यास के अनुसार परीक्षा और खोज में तत्परता पूर्वक लगी रही।
साधना पद्धतियों को परखा। योग विद्या के ग्रन्थों को देखा, साधना मार्ग पर चलने वाले लोगों से परामर्श किये और यह देखा कि इस साधना के प्रयोग से किस व्यक्ति को क्या उपलब्ध हुआ है? यों कहने को कई लोग अपनी प्रिय साधना पद्धति की प्रशंसा में बहुत कुछ कहते हैं पर जब यह परखा जाता है कि इन सज्जन ने इस साधना विधि को अपना कर क्या लाभ उठाया तो बड़ी निराशा होती है। इस उलझन को सुलझाने के लिए मेरी तार्किक बुद्धि अपने अभ्यास के अनुसार परीक्षा और खोज में तत्परता पूर्वक लगी रही।
साधना के बल पर वे जुआ जीतते थे और बहुत कुछ कमाते थे। छोटी आयु में जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब वे अपने प्रयोजन के लिए मुझे भी उन साधनाओं में लगाते थे। ‘साधना द्वारा जुआ जीता जा सकता है।’ इस मान्यता ने मुझे इस मार्ग की ओर आकर्षित किया और मैं पिताजी की अपेक्षा किसी अधिक ऊंची साधना की तलाश में रहने लगा।
साधना के प्रति अश्रद्धा भी प्रकट करते हैं। वे बहुत शीघ्र तात्कालिक सफलता असफलता के आधार पर अपना निर्णय दे देते हैं परन्तु उन सूक्ष्म बातों के अन्तर पर दृष्टिपात नहीं करते जो इन सफलता और असफलता की तह में काम करती हैं।
साधना क्यों निष्फल गई और उनकी सिद्धि प्राप्त करने का क्या मार्ग है।
साधना का सबसे पहला प्रभाव यह हुआ कि मन में जो नाना प्रकार की चिर संचित वासनाएँ और दुर्भावनाएँ छिपी पड़ी थीं और जो मुझे समय-समय पर परेशान करती थीं, उनका शमन हो गया। चित्त में शान्ति, स्थिरता और सात्विकता दिन-दिन बढ़ने लगी। मेरा शरीर बहुधा अस्वस्थ रहा करता था वह भी बिना किसी दवा दारु के अपने आप स्वस्थ हो गया।
साधना से तुरन्त लाभ चाहते हैं उन्हें माधवाचार्य की आरंभिक असफलता की भाँति निराश होना पड़ता है। परन्तु जो लोग धैर्यपूर्वक इस महाशक्ति की आराधना करते रहते हैं अन्त में उन्हें उसका मधुर फल अवश्य प्राप्त होता है।
साधना के अन्त में परीक्षा होती है, तरह-तरह के लोभ,आकर्षण ,भय और उपद्रव सामने आते हैं, साधक उनसे बचा रहे तब ही उसकी तपस्या पूर्ण हो सकती है।”
साधना में प्रवृत्त होने के लिए आग्रहपूर्वक प्रेरणा देना। उनकी यह आसक्ति वस्तुतः अनासक्ति साधना की ही एक पद्धति है। ऐसे महात्माओं से भारत भूमि को फिर प्राचीन युग उपस्थित करने की आशा की जा सकती है।
साधना की ही एक पद्धति है। ऐसे महात्माओं से भारत भूमि को फिर प्राचीन युग उपस्थित करने की आशा की जा सकती है।
साधना काल में संलग्न थे तब दो राजपुत्र उनकी शरण में पहुँचे। उनका राज्य छिन गया था और मारे-मारे फिर रहे थे, स्वामी जी का आशीर्वाद प्राप्त करके उन्होंने अपना खोया हुआ राज्य फिर प्राप्त कर लिया और जीवन भर स्वामी जी की शिक्षाओं एवं आदर्शों पर ही राज्य चलाते रहे। जिस प्रकार समर्थ गुरु रामदास जी महाराज का अप्रत्यक्ष प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी ने आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए राज्य स्थापना की थी वैसे ही स्वामी विद्यारण्य जी की कृपा और प्रेरणा से यह दो राजपुत्र विजय नगर राज्य की स्थापना में समर्थ हुए।
साधनाओं की उलट पलट करनी पड़ी। पर ऐसा मार्ग न मिला जो प्रीति और प्रतीति दोनों ही उत्पन्न करता, बुद्धि और अनुभव की कसौटी पर खरा उतरता। बहुत सा समय इस ढूँढ़ खोज एवं प्रयोगों में लग गया।
साधना में ब्रह्मचर्य का प्रधान प्रतिबन्ध है। जिसके कारण वासना के प्रति घृणा की स्वाभाविक वृति पैदा होती है। गायत्री के 28 अक्षरों की शिक्षाओं में भी नारी के प्रति पूज्य एवं पवित्र बुद्धि रखने के आदेश हैं। गायत्री शब्द स्त्री लिंग है, ज्ञान विज्ञान का, आध्यात्मिकता का मूल स्त्रोत नारी को मान लेने से नर के मन में आज की संकीर्णता नहीं रह सकती वरन् उसकी भावना में जब इस महा मन्त्र के प्रताप से थोड़ा भी परिवर्तन होगा तो वह नारी जाति को वासना विकार, अविश्वास और हीनता की दृष्टि से नहीं वरन् उसे पवित्रता, महानता एवं दैवी तत्वों के प्रतिनिधि के रूप में देखेगा। वह दृष्टिकोण ही एक महान सामाजिक क्रान्ति का आधार हो सकता है और इस आधार पर विकसित हुआ नारी समाज ही मानव जीवन की अपूर्णताओं को पूर्ण कर सकता है।
साधना के फलस्वरूप नाना जी में बहुत ब्रह्मतेज पैदा हो गया था जो उनके चेहरे पर निरंतर चमकता रहता था। उन्हें सताने या छेड़ने की किसी की हिम्मत न होती थी जो ऐसा दुस्साहस करता था उसे उसका समुचित परिणाम भी मिल जाता था।
साधना द्वारा जुआ जीता जा सकता है।’ इस मान्यता ने मुझे इस मार्ग की ओर आकर्षित किया और मैं पिताजी की अपेक्षा किसी अधिक ऊंची साधना की तलाश में रहने लगा।
साधना से थोड़े समय में ही मुझे 3 लाभ प्राप्त हो गये। (1) मेरी बुद्धि पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र हो गई। स्कूल में सबसे अधिक नम्बर लाता और प्रथम श्रेणी के विद्यार्थियों में गिना जाता, (2) गायत्री मन्त्र से जल अभिमन्त्रित करके किसी रोगी को दे दिया जाय तो वह जल्दी ही अच्छा हो जाता है इसलिए कितने ही रोगी रोज मेरे पास आने लगे, (3) कभी कभी अनायास ही ऐसी भविष्यवाणी कर देता जो पूर्ण सत्य निकलती। कई बार तो ऐसी आश्चर्यजनक बातें बताई जिनके भविष्य में घटित होने की किसी को भी पूर्व कल्पना न थी।
साधना छोड़कर उनने भी गायत्री उपासना को अपना लिया और वे शेष जीवन उसी को अपनाये रहे जिससे उनके स्वभाव में बड़े ही उत्तम सतोगुणी परिवर्तन हुए और शान्ति पूर्ण सद्गति के अधिकारी बने।
साधना के द्वारा थोड़े ही समय में मेरी परिस्थिति में एक प्रकार से पूर्ण परिवर्तन हो गया है। जिस नासूर रोग से पीछा छुड़ाना असम्भव समझता था, उसे परास्त करने में मुझे विजय मिली। जिस तंगदस्ती के कारण एक एक पैसा कठिन था वह दूर हुई और अपना निजी और अपना निजी औषधालय चलाकर धन और धर्म उपार्जित करता रहा हूँ। जहाँ घर वालों तक ने अपने पास रखने से इनकार दिया था वहाँ एक अपरिचित सज्जन दुबे जी और उनकी धर्मपत्नी की मेरे ऊपर इतनी आत्मीयता है कि घर से बहुत दूर निकल जाने पर भी यह परदेश मुझे घर सरीखा लगता है।
साधना भी अपना विशिष्ठ परिणाम उपस्थित कर सकती है।
साधना पूजा में निष्ठा रखने वाले कुछ ऐसे सज्जनों के पूरे पते आप हमें भी लिख भेजें जो आपसे दूर रहते हों या जिन तक आपकी पहुँच न हो सकती हो। उन पतों पर हम यहाँ से इस “मन्त्र लेखन यज्ञ”में सम्मिलित होने के लिए प्रेरणा पत्र भेजेंगे। अपने निकटवर्ती लोगों के उन सज्जनों के पते भेजने की जरूरत नहीं है जिन तक आप स्वयं पहुँच सकते हैं।
साधना की उपयोगिता वैसे ही रहेगी जैसी अनादि काल से असंख्य प्रयोगों के बाद महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है। जिन्हें लाभ नहीं हुआ है उन्हें व्यायाम को कोसने से काम न चलेगा, उन्हें वे कारण ढूँढ़ निकालने होंगे जो असफलता के कारण हैं। वे सब कारण यदि दूर न हो सकते हों तो उस अच्छे व्यायाम से यदि उन्नति कुछ कम होती हो तो उससे भी सन्तोष करके धीरे धीरे अधिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।
साधना करो तो तुम्हारे पूर्व जन्मों के सब दुष्कृत नष्ट हो जायेंगे और जब तुम्हारी आत्मा पूर्ण निष्पाप हो जायेगी तब तुम्हें गायत्री का ब्रह्म तेज प्राप्त होगा। वृन्दावन जाकर फिर एक वर्ष साधना करने पर तुम्हें सिद्धि मिलेगी। इतना कहकर भैरव अन्तर्ध्यान हो गये।
साधना करने पर तुम्हें सिद्धि मिलेगी। इतना कहकर भैरव अन्तर्ध्यान हो गये।
साधना की। उसके एक पुत्र हुआ जो अब बड़ा ही होनहार और सुन्दर दिखाई पड़ता है। एक रागी का 6 मास का पुराना आधाशीशी का सिर दर्द दूर हो गया। नगरिया गाँव का एक लड़का जो वर्ष में तीन महीने भी स्कूल नहीं गया था और उसके पास होने की कोई आशा न थी गायत्री जप करने से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। इस प्रकार छोटे मोटे लाभ अनेक लोग उठाते रहते हैं।
साधना की अग्नि द्वारा मनोभूमि में ऐसे वैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं जिनके कारण उसके पूर्व रूप में अभीष्ट परिवर्तन किया जाना संभव है।
साधना को तथा वृन्दावन को छोड़कर काशी चले गये।
साधना ही उपयोगी होती है। ताँत्रोक्त मार्ग से साधना करके कुछ लाभ और चमत्कार तो अधिक मिल सकते हैं पर वह मार्ग खतरे का भी बहुत है। ताँत्रिकी साधना में जो भयंकर प्राण घातक दृश्य दिखाई पड़ते हैं उनमें हिम्मत बाँधे रहना और प्रलोभन तथा आकर्षण के समय विचलित न होना साधारण काम नहीं है। थोड़ी सी भी चूक होने पर इस मार्ग के पथिक के प्राणों पर बन आती है। इसलिए तन्त्र की अपेक्षा योग मार्ग ही सरल और उत्तम है, उन्नति धीरे-धीरे होती है पर जो होती है उसमें पूर्ण निर्भयता है और लाभ भी असंदिग्ध है।
साधना का मुझे यह दिखाई पड़ता है कि गायत्री उपासक के विचार और कार्यों में दिन दिन सात्विकता एवं सेवा का सम्पुट बढ़ता जाता है। उसकी बुराइयाँ अपने आप घटती हैं और सन्मार्ग की ओर चलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति पैदा हो जाती है।
साधना किसी प्रकार चलती ही रही।
साधनाओं का बहिष्कार किया गया। कापालिका, अघोरी, बैतालिक आदि को समाज से बहिष्कृत करके अछूत घोषित किया गया। ऋद्धि सिद्धियों के चमत्कार न दिखाने की प्रतिज्ञा और शपथ लेने पर ही कोई गुरु अपने को योग विद्या सिखावे यह नियम बनाये गये। कहने का तात्पर्य यह है कि हर प्रकार से भौतिक विज्ञान की अनावश्यक उन्नति को रोका गया। ऋषि जानते हैं कि मनुष्य जाति की सामूहिक मनोदशा बालकों के समान है यह बच्चे बारूद से खेलेंगे तो जल मरने के अतिरिक्त और किसी परिणाम पर न पहुँचेंगे।
साधना के प्रयोग से किस व्यक्ति को क्या उपलब्ध हुआ है? यों कहने को कई लोग अपनी प्रिय साधना पद्धति की प्रशंसा में बहुत कुछ कहते हैं पर जब यह परखा जाता है कि इन सज्जन ने इस साधना विधि को अपना कर क्या लाभ उठाया तो बड़ी निराशा होती है। इस उलझन को सुलझाने के लिए मेरी तार्किक बुद्धि अपने अभ्यास के अनुसार परीक्षा और खोज में तत्परता पूर्वक लगी रही।
साधना के लिए विशेष प्रवृत्ति उत्पन्न हुई। काफी अरसे से मैं गायत्री साधना में लगा हुआ हूँ और देखता हूँ कि उसके कारण आत्मा की दिन-दिन उन्नति हो रही है। अनेक दोष दुर्गुण छूट गये हैं और उनके स्थान पर नये सद्गुणों का विकास हुआ है।
साधना, तपस्या, व्रत, आराधना, उपासना की वैज्ञानिक पद्धति से ही हम अपनी मनोभूमि को निम्नस्तर से उठाकर उच्च भूमिका में परिवर्तन कर सकते हैं। जैसे अग्नि संस्कार से संसार के स्थूल पदार्थों में भारी हेर-फेर हो जाता है वैसे ही साधना की अग्नि द्वारा मनोभूमि में ऐसे वैज्ञानिक परिवर्तन होते हैं जिनके कारण उसके पूर्व रूप में अभीष्ट परिवर्तन किया जाना संभव है।
साधनाएं करते हैं और उनसे यथासंभव लाभ भी उठाते हैं परन्तु अध्यात्म विज्ञान के सूक्ष्म दर्शी ऋषियों की सहायता के बिना कोई तप अधिक फल दायक नहीं हो सकता, इसलिए भारतीय पद्धति में इस महामन्त्र को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। इतिहास पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि यहाँ इसी महा-विज्ञान के आधार पर आत्म कल्याण के महान अभिमान किये जाते हैं। प्रायः सभी ऋषियों ने इस राज मार्ग को अपनाया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-April
साधना के विरोधी हैं, कोई निराकार उपासक, साकार साधना से नाक- भौं चढ़ाते हैं, यह कट्टरता अवाँछनीय है। दोनों ही साधना पद्धतियाँ उपयोगी एवं आवश्यक हैं। अपनी मनोभूमि, स्थिति, अधिकार, रुचि, कक्षा, सुविधा आदि के आधार पर साधकों को अपने लिये साकार या निराकार साधना चुन लेनी चाहिये, किन्हीं के लिये दोनों का मिश्रित रूप भी उपयोगी होता है।
साधना से नाक- भौं चढ़ाते हैं, यह कट्टरता अवाँछनीय है। दोनों ही साधना पद्धतियाँ उपयोगी एवं आवश्यक हैं। अपनी मनोभूमि, स्थिति, अधिकार, रुचि, कक्षा, सुविधा आदि के आधार पर साधकों को अपने लिये साकार या निराकार साधना चुन लेनी चाहिये, किन्हीं के लिये दोनों का मिश्रित रूप भी उपयोगी होता है।
साधना क्षेत्र के जिज्ञासुओं तक को भ्रम में डाल देता है। कोई साकार पूजक निराकार साधना के विरोधी हैं, कोई निराकार उपासक, साकार साधना से नाक- भौं चढ़ाते हैं, यह कट्टरता अवाँछनीय है। दोनों ही साधना पद्धतियाँ उपयोगी एवं आवश्यक हैं। अपनी मनोभूमि, स्थिति, अधिकार, रुचि, कक्षा, सुविधा आदि के आधार पर साधकों को अपने लिये साकार या निराकार साधना चुन लेनी चाहिये, किन्हीं के लिये दोनों का मिश्रित रूप भी उपयोगी होता है।
साधना चुन लेनी चाहिये, किन्हीं के लिये दोनों का मिश्रित रूप भी उपयोगी होता है।
साधना पद्धतियाँ उपयोगी एवं आवश्यक हैं। अपनी मनोभूमि, स्थिति, अधिकार, रुचि, कक्षा, सुविधा आदि के आधार पर साधकों को अपने लिये साकार या निराकार साधना चुन लेनी चाहिये, किन्हीं के लिये दोनों का मिश्रित रूप भी उपयोगी होता है।
साधना चुन लें।
साधना के मनोवैज्ञानिक एवं सूक्ष्म नियमों के आधार पर बनी हुई साकार उपासना से उसका कोई गम्भीर विरोध नहीं समझना चाहिए। क्योंकि बुतपरस्ती से घोर द्वेष करने वाले मुसलमान भी मजार, ताजिया, दुलदुल, कावे का पत्थर आदि के माध्यम से किसी न किसी प्रकार उसे करते हैं। धर्म से दूर रहने वाले आज के राजनीतिक नेता भी झण्डा वन्दन, महात्मा गाँधी की समाधि पर माथा टेकना आदि क्रियाएँ करते हैं।
साधनाओं को देने वाली होने के कारण सब की आदरणीय हो। हे गौओं! तुम इस स्थान पर आओ तुम्हारा जो अपेक्षित फल धारकत्व है सो मुझ अनुष्ठान करने वाले में तुम्हारी कृपा से हो, तुम्हारे प्रसाद से मैं अभीष्ट फल का धारण करने वाला हूँ।’
साधना करते-करते कई मास व्यतीत हो गये। मन पर संयम तथा अन्तःवृत्तियों पर शासन करने लगे। एक दिन क्या देखते हैं कि उनके आश्रम में दो सौ गज दूर पर बकरियों का एक झुण्ड हरी घास चर रहा है। इतने में एक सिंह ने आक्रमण किया और एक बकरी को ले गया। सब बकरियाँ यत्र-तत्र भाग गई केवल मिमियाता हुआ एक बच्चा छूट गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1952-March
साधना है। इसमें परीक्षित हो जाने पर आत्म भावना का विश्वव्यापी विस्तार करना सुगम होता है।
साधना। 14-शिखा और सूत्र की विवेचना। 15-दैवी संपदाएं। 16-कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान। 17-सौभाग्य बढ़ाने की कला।
साधना ही है। उसका निरंतर चिंतन करना पड़ेगा; प्रत्येक बोध में उसी का अनुभव करना होगा। क्या तुम जानते हो कि इन्द्रियों के द्वारा यह मन जो असंख्य खेल खेलता है; वह क्या अपनी शक्ति से खेलता है जितने भी बोध के विषय हैं उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जिसका विकास उस माँ के पदनिक्षेप के बिना हो सकता हो। क्या तुमने कभी इस बात पर विचार किया है? मन जो इन्द्रियों के द्वारा दौड़ता फिरता है, इसके प्रत्येक वेग से जो कल्पना या चिन्ता रहती है वह उस माँ के चरण-कमलों से प्रस्फुटित रहती है।
साधना द्वारा आत्मबल बढ़ाना यह दोनों ही कार्य आवश्यक हैं। इनमें पहला कार्य सर्व प्रथम होना चाहिए, दूसरा कार्य उसके पीछे है।
साधना न कर सकते हों वे सुविधा के समय मौन मानसिक जप कर सकते हैं थोड़ी सी साधना भी श्रद्धा बढ़ाती है और परीक्षा के लिए की हुई थोड़ा उपासना भी सन्तोषप्रद परिणाम उत्पन्न करती है।
साधना की समाप्ति होगी। उस दिन हवन करना चाहिए। ब्राह्मण या कन्याओं को भोजन, प्रसाद वितरण गायत्री साहित्य का दान आदि दक्षिणाओं के साथ अनुष्ठान को समाप्त कर देना चाहिए।
साधना किस हद तक परिपक्व हो चुकी है। जो लोग अविवाहित रह कर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं उनकी निष्ठा किस हद तक परिपक्व हो चुकी है इसका ठीक प्रकार पता नहीं चलता, वे प्रलोभन के समय फिसल सकते हैं। परन्तु जो प्रलोभन से नित्य संघर्ष करते हैं उन्हें पता रहता है कि वे कितने संयमशील हो चुके हैं। साधन सामने रहते हुए जो त्याग कर सकता है उसी का त्याग परीक्षित है। अभाव को त्याग मान कर सन्तोष कर लेना, एक कच्चा आधार ही रहता है।
साधना करने का अब और क्या आयोजन कर रहे हो भाई? वही तो तुम्हारी सब कुछ है, वही तो तुम्हारे भीतर बाहर है, वही अस्थि-माँसमय शरीर है, वही तो तुम्हारे प्राण-मन-बुद्धि है, वही तो तुम्हारा प्रिय अन्तरतर है, अरे वही तो तुम्हारा आत्मा है। उसकी भेंट भी क्या चढ़ाओगे? वह न हो तो तुम्हारी जबान ही नहीं खुले। जो कुछ है सो तो उसी का है, किसकी चीज किसे दोगे?
साधना की अपेक्षा कुछ न कुछ अधिक साधना करनी चाहिए।
साधना सम्बन्धी चमत्कारी अनुभव गुप्त रखें जाते हैं परन्तु सार्वजनिक हित, नये पथिकों का पथ-प्रदर्शन एवं माता की महिमा पुण्य प्रसार होने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति के विशेषाँक में इस प्रकार के लेखों का प्रकाशन होने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। जैसे कुपात्रों के सन्मुख उन्हें गुप्त रखना आवश्यक है वैसे ही सत्पात्रों के सन्मुख उन्हें प्रकट करना भी आवश्यक है। इसलिए गायत्री साधना के उत्साहपूर्वक अनुभवों को छिपाने की अपेक्षा प्रकाशित करना ही श्रेयस्कर समझ कर विशेषाँक के लिए अनुभव माँगे जा रहे हैं।
साधना पुनीत अमरण!
साधना। 12-गृहस्थ योग। 13-प्रार्थना के चमत्कार। 14-विचार संचालन विद्या। 15-सुखी वृद्धावस्था।
साधना अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसलिए इस वर्ष संध्या की ऋतु बेला में साधारण साधना की अपेक्षा कुछ न कुछ अधिक साधना करनी चाहिए।
साधना। 8-प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। 9-उल्लास का विकास। 10-आगे बढ़ने की तैयारी। 11-अध्यात्म धर्म का अवलम्बन।
साधना भी श्रद्धा बढ़ाती है और परीक्षा के लिए की हुई थोड़ा उपासना भी सन्तोषप्रद परिणाम उत्पन्न करती है।
साधना करनी चाहिए।
साधनाएं। 18-योग के नाम पर मायाचार। 19-जादूगरी या छल। 20-सम्मोहन विज्ञान।
साधना से मातृ स्नेह का आदर कर माता की यथार्थ पूजा करो।
साधना के उत्साहपूर्वक अनुभवों को छिपाने की अपेक्षा प्रकाशित करना ही श्रेयस्कर समझ कर विशेषाँक के लिए अनुभव माँगे जा रहे हैं।
साधना है इसके अतिरिक्त और सब तो गुड़ियों के खेल हैं। इसी साधना से मातृ स्नेह का आदर कर माता की यथार्थ पूजा करो।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-January
साधना के पथ पर आगे बढ़िये, तुच्छ स्वार्थों, आकर्षणों, लेन-देन के लिए प्रेम शब्द का दुरुपयोग और उसको कलंकित मत कीजिए। उन्मुक्त भाव से प्रेम कीजिए समस्त मानव जाति से, प्राणी मात्र से, समस्त वसुधा से। प्रेम में गरीब, अमीर, ऊँचा-नीचा, मेरा-तेरा, भाषावाद, प्रान्तीयता, जाति-पाँति आदि का कोई स्थान नहीं है। इन संकीर्ण बन्धनों को तोड़ कर जब आप प्रेम पथ पर अग्रसर होंगे तभी उस दिव्य प्रेम स्वरूप का पुण्य साक्षात्कार सम्भव हो सकेगा। ज्योतिर्मयी आत्मा के पुण्य प्रकाश में प्रेम का अवलम्बन कीजिए और जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर हूजिए।
साधना को इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। उसमें शरीर, मन और आत्मा के तीनों क्षेत्रों को नियंत्रित करके एक विशेष दिशा में प्रयत्नपूर्वक चलाना पड़ता है। यह पुरुषार्थ ही कालान्तर में फलित होकर दैवी अनुग्रह या वरदान के रूप में वापस लौटता है। जो केवल मनौती मानते हैं, देवता की आकस्मिक, अहैतुकी कृपा की आशा लगाये बैठे रहते हैं ऐसे कुपात्रों को दैवी अनुग्रह से भी वंचित रहना पड़ता है। पात्र कुपात्र का अन्तर तो देवता भी करते हैं।
साधना का दूसरा नियम है। हम किसी से सुबह प्रेम करें और शाम को न करें, यह धोखा है। मन्दिर में आँसू बहाने वाला प्रेम यदि दुःखी, क्लान्त भाइयों को देखकर द्रवित न हो तो वह प्रेम नहीं ढोंग है। दूसरों का खून करने वाला व्यक्ति अपने घर के सदस्यों से प्रेम करे तो वह प्रेम नहीं स्वार्थ है, भोग है। दूसरों के बच्चों से कटु व्यवहार करने वाले माँ बाप अपने बच्चों से प्रेम नहीं कर सकते।
साधनाओं में बिताते थे। महर्षि दुर्वासा, कणाद, पिप्पलाद आदि इसी आदर्श के प्रतिष्ठापक थे। किन्तु हम श्रम के इस महत्व को भूल गये और इसी कारण आलस्य, अकर्मण्यता से हमारा पतन हुआ।
साधना और परिश्रम ही तप के पुण्य-नाम से पुकारे जाते हैं। किन्तु तप के साथ ही त्याग का शब्द भी जुड़ा हुआ है। जो तप त्याग के लिए किया जाता है वही तप है। तप के लिए करना, तप नहीं कहा जा सकता। उससे शारीरिक और मानसिक विकारों का प्रादुर्भाव होता है।
साधना तप के बिना पूरी नहीं होती। अपने जीवन का तुम कुछ भी ध्येय बनाओ किन्तु उसके लिए तुम्हें गहरी साधना, निरन्तर परिश्रम का तप करना पड़ेगा।
साधना सम्भव नहीं हो सकती।
साधनाओं में लीन ऋषि मुनि भी वन के कन्दमूल फल, अथवा खेत में बिखरे पड़े रहने वाले दानों से जीवन निर्वाह करके अपना सम्पूर्ण समय लोक कल्याणार्थ आध्यात्मिक साधनाओं में बिताते थे। महर्षि दुर्वासा, कणाद, पिप्पलाद आदि इसी आदर्श के प्रतिष्ठापक थे। किन्तु हम श्रम के इस महत्व को भूल गये और इसी कारण आलस्य, अकर्मण्यता से हमारा पतन हुआ।
साधना से अतिरिक्त जपते रहना चाहिए। सामूहिक आयोजनों एवं सत्संगों में पाँच मिनट मौन रहकर राष्ट्र रक्षा के लिए ईश्वर प्रार्थना की जाया करे। सामूहिक यज्ञ अनुष्ठान भी हों पर उनमें मितव्ययिता का पूरा ध्यान रखा जाय। हर महीने को 20 तारीख को रक्षा दिवस मनाया जाया करे। उस दिन सामूहिक आयोजनों के द्वारा जनता की कर्तव्य भावनाएं जागृत की जाया करें और सामूहिक प्रार्थना का भी कार्यक्रम रहा करे।
साधना की अन्तिम सिद्धि तक पहुँच जाता है। असफलताओं में जो स्थिर रहे वही प्रेम जीवित रहता है।
साधना, निरन्तर परिश्रम का तप करना पड़ेगा।
साधना के ज्वलन्त उदाहरण हैं। उनके हृदयों से प्रेम की भागीरथी निरन्तर बहती रही, जिसमें प्राणीमात्र ने अपने आपको कृतार्थ किया। वहाँ कोई भेद भाव नहीं था। इस तरह जिसके हृदय में प्रेम का अखण्ड दीप जलता रहे, वस्तुतः वही सच्चा प्रेमी है। महर्षि रमण मनुष्यों से ही नहीं प्राणीमात्र से प्रेम करते थे।
साधना से होता है और साधना तप के बिना पूरी नहीं होती। अपने जीवन का तुम कुछ भी ध्येय बनाओ किन्तु उसके लिए तुम्हें गहरी साधना, निरन्तर परिश्रम का तप करना पड़ेगा।
साधना, सरकारी नौकरी का कर्तव्य पालन सभी अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं यदि इन्हें समष्टि की भावना से पूरे पूरे प्रयास के साथ अनन्य भाव से किया जाय। इन सभी कार्यों से आत्म परितोष के उद्देश्य की पूर्ति होती है।
साधना की, सारा शरीर कृश हो गया किन्तु उन्हें आत्म शक्ति नहीं मिली। किन्तु जब उन्होंने ग्रामीण लड़की से खीर खाई और फिर मध्यम मार्ग का अनुसरण किया, लोक कल्याण के लिए उन्होंने अपने तपस्वी, एकाकी जीवन का त्याग किया तब उन्हें आत्म-तोष प्राप्त हुआ। उन्होंने तप और त्याग दोनों को ही लोक कल्याण के लिए किया। जब तक उन्हें अपने तप और त्याग का अभिमान रहा उन्हें आत्म शान्ति नहीं मिली। महाराजा शिखिध्वज ने अपना राजपाट छोड़ कर तप के लिए जंगल की शरण ली और कष्टों का वरण किया फिर भी उन्हें शान्ति नहीं मिली।
साधना की है।
साधना से धरती पर परम सत्य, सौंदर्य शिव के सन्देश सुनाना आदि सभी माध्यमों में लग कर मनुष्य त्याग आत्मोत्सर्ग की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। छोटे से लेकर बड़े से बड़ा कार्य सभी सृष्टि के लिए अपना अपना महत्व रखते हैं। मेहतर का सफाई करना किसान मजदूर का श्रम, पूँजीपति का औद्योगिक कार्य, बुद्धिजीवी की विचार साधना, सरकारी नौकरी का कर्तव्य पालन सभी अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं यदि इन्हें समष्टि की भावना से पूरे पूरे प्रयास के साथ अनन्य भाव से किया जाय। इन सभी कार्यों से आत्म परितोष के उद्देश्य की पूर्ति होती है।
साधना करना ही तप कहलाता है। दूसरे लोगों के हितार्थ, दूसरों की सेवा के लिए अपने शरीर पर कष्ट सहना, समष्टि के लाभ की चिन्ता रख कर कोई भी दृढ़ प्रयत्न करना तप है। किन्तु शरीर को व्यर्थ कष्ट देकर आत्म कल्याण और दूसरों का हित चाहने वाले इस अमूल्य साधन को क्षीण करते हैं और वह तप नहीं कहला सकता। केवल शरीर के भरण-पोषण, आराम सुख के लिए ही सदैव प्रयत्न करना भी तप नहीं। मजदूर, व्यापारी, अन्य पेशेवर लोग क्या कम श्रम करते हैं?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-February
साधना और भावना का अवलम्बन करना आवश्यक होता है। वहाँ यह भी अनिवार्य है कि जीवन की गतिविधियाँ पृथकतावादी नहीं वरन् एकतावादी हों। आध्यात्म और अनात्मा, पुण्य और पाप, धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित का निर्णय इसी आधार पर होता है कि उसके मूल में एकता की ओर बढ़ने न बढ़ने की कितनी भावना सन्निहित है। नीति, धर्म और आचार शास्त्र का समस्त विधि विधान इस एक तथ्य को ध्यान में रखकर ही रचा गया है।
साधना के दो प्रयाग—
साधना का रूप धारण करके आत्मकल्याण के लक्ष्य को पूर्ण करने में समर्थ हो जाता है।
साधना बना हुआ था। गुरु ने यही तो आदेश उन्हें दिया था।
साधना में सम्मिलित हो गये और तीनों का सम्मिलित प्रयत्न कुछ ही दिनों में आशाजनक रीति से सफल हुआ। देवताओं को प्रसन्न करके कुबेर धनाधीश और लोकपाल बन गये। और अलकापुरी में राज करने लगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-August
साधना कहलायेगी। उसका फल मनुष्य को महापुरुष बनने के रूप में ही दृष्टि गोचर होगा। जमीन जोतने मात्र से किसी किसान को भरी पूरी फसल नहीं मिल सकती। उसे बीज बोने, सींचने, निराने, रखाने, काटने आदि की झंझट की क्रियाएं भी करनी पड़ती है तब कहीं उसके कोठे अन्न से भरते है। इसी प्रकार गायत्री उपासना में जप-अनुष्ठान के अतिरिक्त आत्म निर्माण का कार्य भी करना होता है।
साधना से कम महत्वपूर्ण नहीं होता। वास्तविक अध्यात्म का स्वरूप यही है और इसी को जीवन में धारण करने वाला व्यक्ति अपना कल्याण करने के साथ दूसरे अनेकों को प्रकाश प्रदान करके उन्हें भी ऊंचा उठाने में सहायक बनता है।
साधना के रूप में चल रही है। योजना में सर्व साधारण के लिये सामान्य उपासना क्रम बतलाया गया है। इसे कार्यक्रम का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिये। विशेष उपासना की विधि ‘गायत्री महा विज्ञान’ में मौजूद है और उसकी शिक्षा भी अधिकार भेद से दी जा रही है। शेष आत्मशोधन और सेवा कार्यों से अधिकाँश कार्यक्रम सम्बन्धित हैं।
साधना से हमारा जीवन सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत भी बनता जाता है। पर यह तभी संभव होता है जब हम जड़-विज्ञान तथा स्वार्थपूर्ण दिखावटी आस्तिकता से बचकर सच्चे स्वरूप में ईश्वर की उपासना करेंगे। युग-निर्माण योजना मानव-मात्र के हृदय में सच्ची आस्तिकता उत्पन्न करके उनका हित साधन करने के लिये ही चलाई गई है।
साधना कहलाती है। साधना से हमारा जीवन सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत भी बनता जाता है। पर यह तभी संभव होता है जब हम जड़-विज्ञान तथा स्वार्थपूर्ण दिखावटी आस्तिकता से बचकर सच्चे स्वरूप में ईश्वर की उपासना करेंगे। युग-निर्माण योजना मानव-मात्र के हृदय में सच्ची आस्तिकता उत्पन्न करके उनका हित साधन करने के लिये ही चलाई गई है।
साधना का पूर्वार्ध है। उसकी पूर्णता आत्म-शोधन करने वाली सद्बुद्धि का व्यवहारिक जीवन में व्यवहारिक प्रयोग करने से ही संभव होता है। ऐसी उपासना जिसमें भगवान् का स्मरण करने के साथ-साथ आन्तरिक दोष दुर्गुणों का शमन एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयत्न भी चल रहा हो निश्चय ही सर्वांगपूर्ण साधना कहलायेगी। उसका फल मनुष्य को महापुरुष बनने के रूप में ही दृष्टि गोचर होगा। जमीन जोतने मात्र से किसी किसान को भरी पूरी फसल नहीं मिल सकती।
साधना, श्रम-संयम के तुम्हीं दिव्य अवतार हो!!
साधना किसी न किसी रूप से प्रारम्भ कर दी है। साथ ही सबने यह आश्वासन दिया है कि अपने कुटुम्बी, सम्बन्धी और मित्रों को उपासना मार्ग में लगाने का शक्तिभर प्रयत्न करेंगे। स्त्रियों की उपासना पर अधिक जोर दिया गया था, ताकि नई पीढ़ी को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। इस सुझाव का प्रायः सभी ने स्वागत किया है और तदनुसार प्रयत्न भी आरम्भ कर दिया है। जैसा कि आश्वासन मिला है यदि ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों की धर्मपत्नियाँ निष्ठापूर्वक गायत्री-उपासना में सम्मिलित हो सकीं तो इसमें सन्देह नहीं कि अगली पीढ़ी के लिए सहस्रों महापुरुष और महा नारियाँ भारतमाता का गौरव बढ़ाने वाले पैदा हो सकेंगे।
साधनाओं तक पहुँच जाता है और अन्त में परमहंसों के समान संसार से पूर्णतः निर्लिप्त होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उस समय उसे सभी ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं और लोग उसे साक्षात भगवान स्वरूप ही मानने लगते हैं। पर यह भगवान केवल बाहरी नहीं अन्तःकरण की होनी चाहिये। परमात्मा मनुष्य के मन और अन्तर की भावनाओं को देखता है। उसकी दृष्टि में महत्व इस बात का है कि मनुष्य धार्मिक सिद्धान्तों पर कहाँ तक सचाई के साथ आचरण करता है।
साधना कर रहा हूँ। इसके लिए हठपूर्वक उनका निरोध करना आवश्यक है। स्वादिष्ट व्यंजनों का आहार मेरी स्वादेन्द्रिय को विचलित करने वाला, बाधक सिद्ध होता सो मैंने यही उचित समझा कि अपने से अधिक सत्पात्र उस अपरिग्रही भिक्षु को दे दूँ।
साधना का समन्वय होने पर मनुष्य अनेक विभूतियों का अधिकारी बन जाता है। इस सुनिश्चित तथ्य पर किसी को संदेह की गुँजाइश नहीं हो सकती। मेरा भी संदेह उस दिन के प्रवचन को भूलकर भली प्रकार दूर हो गया।
साधना का अनिवार्य अंग माना जाता है कि मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट और आदर्श बनावे। जीवन के हर क्षेत्र में आध्यात्मवाद का समावेश करे ऐसी जिन्दगी जिये जैसे कि मानव शरीर-धारी को जीनी चाहिए। पूजा को औषधि और जीवन विकास की परम्पराओं को पथ्य, परिचर्या माना गया है। औषधि तभी लाभ करेगी जब परहेज भी ठीक रखा जाय। चिकित्सक के बतलाये सारे नियमों का उल्लंघन करते रहने पर भी यदि कोई आशा करे कि औषधि सेवन मात्र से बीमारी दूर हो जाय तो यह उसकी गलती ही मानी जायगी।
साधना आत्म शोधन के रूप में प्रस्तुत की हैं इसी प्रकार जीवन यज्ञ का प्रखर स्वरूप धर्म अपनाने के रूप में सामने रखा है। युग-निर्माण योजना में यही सब कुछ भरा हुआ है कि जिसके माध्यम से जन मानस का स्तर भरा हुआ हैं जिसके माध्यम से जन मानस का स्तर ऊँचा उठे और एक व्यक्ति दूसरों को ऊँचा उठाने एवं आगे बढ़ाने में प्रसन्नता अनुभव करे।
साधना है। भगवान को घट-घटवासी और न्यायकारी मान कर पापों से हर घड़ी बचते रहना ही सच्ची भक्ति है। प्राणी मात्र के हित की दृष्टि से उदारता, सेवा सहानुभूति, मधुरता का व्यवहार करना ही परमार्थ का सार है। सच्चाई, ईमानदारी, सज्जनता, सौजन्य आदि गुणों के बिना कोई मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। जो अपने समय, धन, श्रम, बुद्धि को अन्य लोगों की सेवा में जितना अधिक लगाता है वस्तुतः वह उतना ही बड़ा महात्मा माना जा सकता है।
साधना के दो पहिये होने से ही आत्मिक उन्नति का रथ अग्रसर होता है और वही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। उन्हीं के द्वारा साधक सिद्धियों और विभूतियों का अधिकारी बनता है। हमने उपासना के साथ-साथ सेवा धर्म और आत्मशोधन को भी समान महत्व दिया है। त्रिपदा गायत्री का एक पाद सेवन करने से नहीं वरन् तीनों पादों की समुचित उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
साधना कहना चाहिए। उपासना और साधना के दो पहिये होने से ही आत्मिक उन्नति का रथ अग्रसर होता है और वही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। उन्हीं के द्वारा साधक सिद्धियों और विभूतियों का अधिकारी बनता है। हमने उपासना के साथ-साथ सेवा धर्म और आत्मशोधन को भी समान महत्व दिया है। त्रिपदा गायत्री का एक पाद सेवन करने से नहीं वरन् तीनों पादों की समुचित उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
साधना निरर्थक ही बनी रहती है। भ्रष्ट चरित्र वाला व्यक्ति कितना भी जप, ध्यान क्यों न करे वह सब निष्फल है। अन्तःकरण का स्तर ऊँचा हो, हृदय में ईश्वर-भक्ति के अंकुर मौजूद हों तो साधारण उपासना द्वारा भी केवट, शबरी, विदुर गोपी द्रौपदी, नरसी, नाई की तरह परमात्मशक्ति की कृपा उपलब्ध की जा सकती है।
साधना के माध्यम से अपने अन्नमयकोश, मनोमयकोश, प्राणमयकोश विज्ञानमयकोश, आनन्दमयकोश का परिष्कार करते हुये आत्म-साक्षात्कार की स्थिति तक पहुँचने का प्रण किया है। जो लोग अभी नये-नये ही इस परिवार में सम्मिलित हुए हैं, उन्होंने गुरुपूर्णिमा से अपनी साधना किसी न किसी रूप से प्रारम्भ कर दी है। साथ ही सबने यह आश्वासन दिया है कि अपने कुटुम्बी, सम्बन्धी और मित्रों को उपासना मार्ग में लगाने का शक्तिभर प्रयत्न करेंगे। स्त्रियों की उपासना पर अधिक जोर दिया गया था, ताकि नई पीढ़ी को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। इस सुझाव का प्रायः सभी ने स्वागत किया है और तदनुसार प्रयत्न भी आरम्भ कर दिया है।
साधना करो सफल,
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-June
साधना की भावना रखेगा वह अपने हित और कल्याण की बात भी सोचेगा। जो इस प्रकार सोचने लगा उसे जीवन की बहुमूल्य सम्पत्ति का एक क्षण बर्बाद होता हुआ भी सहन न होगा। उसे आलस्य को छोड़ने और श्रमशीलता अपनाने के लिए तत्पर होना ही होगा।
साधना के दो अंग हैं (1) उपासना (भावना। उपासना का तात्पर्य पूजा की प्रक्रिया, विधि व्यवस्था से है। गायत्री उपासना का कर्म-काण्ड इसी श्रेणी में आता है। जप, उपवास, अस्वाद व्रत, अनुष्ठान, पुरश्चरण, अग्निहोत्र, आदि क्रियाएं उपासना कही जा सकती हैं। यह हैं तो महत्वपूर्ण पर सर्वांगपूर्ण नहीं हैं।
साधना-क्रम माना जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें व्यवहार में लाने पर सत्य और धर्म का ही अवलम्बन करना पड़ेगा, विवेक और कर्तव्य को ही प्रमुखता देनी पड़ेगी। स्वार्थ और लोभ का, वासना और तृष्णा का दमन किये बिना इनमें से एक भी कार्य नहीं किया जा सकता। प्रस्तुत योजना में से किसी का भी, किसी भी अंश में आचरण किया जायगा तो उससे जीवन शोधन की प्रक्रिया स्पष्ट ही पूर्ण होगी और लोक सेवा तो प्रत्यक्ष ही बन पड़ेगी। इस प्रकार जीवन-विकास का लक्ष्य दिन-दिन प्रशस्त होता जायगा। सेवा-धर्म के अपनाये बिना किसी का शरीर, किसी का जीवन, किसी का धन, किसी का ज्ञान सार्थक नहीं हो सकता।
साधना क्रम प्रस्तुत किया जा रहा है। जिनने उसे आरंभ किया है उनने आशाजनक प्रगति की है। जो अभी तक उसे आरंभ नहीं कर सके हैं उन्हें उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।
साधना करते हुए अपना और दूसरे अनेकों का कल्याण करें। इसलिए जन्म नहीं मिला है कि इन्द्रियों की प्रसन्नता और मोह, लोभ, मद-मत्सर की पूर्ति में निरन्तर व्यस्त रहने के अतिरिक्त और कुछ सूझ ही न पड़े। आजीविका का उपार्जन आवश्यक है पर इतना नहीं कि उसके अतिरिक्त और किसी काम के लिए अवकाश ही न मिले।
साधना का ही एक अंग माना जाय और कुछ समय इसके लिए नियत रखा जाय। कुविचारों को शमन करने के लिए नित्य सद् विचारों का सत्संग करना आवश्यक है। व्यक्ति का सत्संग तो कठिन पड़ता है पर साहित्य के माध्यम से संसार भर के जीवित या मृतक सत्पुरुषों के साथ सत्संग किया जा सकता है। यह जीवन का महत्वपूर्ण लाभ है, इससे किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए। जो पढ़े-लिखे नहीं हैं उन्हें दूसरों से सत्साहित्य पढ़ाकर सुनने की व्यवस्था करनी चाहिए।
साधना-मय, संयमी और मर्यादित जीवन बिताने की कला हर व्यक्ति को सिखाई जाय ताकि उसके लिए प्रगतिशील हो सकना संभव हो सके।
साधना विधि बनाई जा रही हैं उसमें जीवन शोधन का पर्याप्त अंश है। युग-निर्माण कार्यक्रम लोक-सेवा वाले अंश की पूर्ति करता है। इस प्रकार यह त्रिविधि कार्यक्रम एक सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिक कार्यक्रम की पूर्ति कर देता है।
साधना को भी समर ही कहते हैं। इसमें हर साधक को तीन मोर्चों पर लड़ना पड़ता है। उपासनाओं के साथ-साथ जीवन शोधन और लोक-सेवा के लिए इसे निरन्तर कर्मरत रहना पड़ता है। आरम्भ में बल लाठी घुमाना सिखाया जा सकता है, पर फौजी सैनिक को आखिर बन्दूक और संगीन चलाना भी जानना ही पड़ेगा। लाठी घुमाने मात्र की शिक्षा के साथ उसकी पूर्णता सम्पन्न नहीं हो सकती।
साधना की बहुत उपयोगिता है। गत दो वर्षों से अक्टूबर मास की अखण्ड ज्योति में एक-एक वर्ष का साधना क्रम प्रस्तुत किया जा रहा है। जिनने उसे आरंभ किया है उनने आशाजनक प्रगति की है। जो अभी तक उसे आरंभ नहीं कर सके हैं उन्हें उसके लिए प्रयत्न करना चाहिए।
साधना
साधना में ही संलग्न होते थे, पर यह सब हो तभी पाता था जब वे प्रयत्नपूर्वक अपना भावनास्तर उच्च आदर्शों के आधार पर ढालने के लिए आध्यात्मिक जीवन दर्शन को गहराई तक हृदयंगम कर लेते थे।
साधनामय बनाने की आवश्यकता आज भी उतनी ही है जितनी सृष्टि के आरम्भ में थी। साधना के दो अंग हैं (1) उपासना (भावना। उपासना का तात्पर्य पूजा की प्रक्रिया, विधि व्यवस्था से है। गायत्री उपासना का कर्म-काण्ड इसी श्रेणी में आता है। जप, उपवास, अस्वाद व्रत, अनुष्ठान, पुरश्चरण, अग्निहोत्र, आदि क्रियाएं उपासना कही जा सकती हैं।
साधना की ऊंची जिम्मेदारी
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-April
साधना से ही विनिर्मित होते हैं। हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के 16 संस्कार तो समारोह-पूर्वक किये जाते हैं और नित्य नैमित्तिक उपासना, स्वाध्याय, व्रत, पर्व, अनुष्ठान, कथा, कीर्तन, सत्संग, देव दर्शन, हवन, तीर्थयात्रा, श्राद्ध आदि के द्वारा यह प्रयत्न निरन्तर होते हैं कि व्यक्ति को सुसंस्कारी बनाने की प्रक्रिया बन्द न होने पावे, उसका क्रम किसी न किसी प्रकार चलता ही रहे।
साधना के उपरान्त व्यक्ति जब तृष्णा-वासना और पुत्रेषणा वित्तेषणा, लोकेषणा से रहित हो जाय।
साधना की सहायता से ही अपने मधुर स्वभाव, श्रम, पुरुषार्थ, उत्साह, सूझबूझ और अध्यवसाय के द्वारा भारी उन्नति कर लेते हैं, किन्तु कितने ही ऐसे भी होते हैं जो भरपूर, साधन सुविधाओं के होते हुए भी आलस्य, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, लापरवाही फिजूल खर्ची जैसे दोषों के कारण निरन्तर हानि उठाते चलते हैं और अन्त में दिवालिया हो जाते हैं। आज साधनों को बहुत महत्व दिया जाता है पर भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि साधनों का लाभ केवल उन्हें ही मिलेगा जिनमें आवश्यक मात्रा में सद्गुण रहे होंगे। बुरे लोग भी जो कुछ उन्नति कर पाते हैं उसमें भी अधिकाँश श्रेय उन अच्छाइयों का रहता है जो बुरे लोगों में भी एक सीमा तक रही होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1963-September
साधनाओं को पूरी तत्परता और निष्ठा के साथ कार्यान्वित करते ही रहना चाहिए।
साधनाओं की भाँति ही मनुष्य कर्मयोग की साधना से पूर्णता प्राप्त कर सकता है।
साधना इन पाँच चक्रों को जागृत करती है और फिर योगाभ्यास का अन्तिम लक्ष्य “कुण्डलिनी जागरण” के लिए नितान्त सरल हो जाता है।
साधना के नाम से विख्यात है। साधारण प्राथमिक उपासना में एक मुखी और द्विभुजी गायत्री का ध्यान किया जाता है। सद्बुद्धि एक मुख है और जप, ध्यान-नाम रूप-उसकी दो भुजाएँ हैं। ज्ञान की प्रतीक, सद्भावनाओं की प्रेरक श्रद्धामयी गायत्री को हिन्दू-धर्म के प्रत्येक सदस्य का एकमात्र उपासना माध्यम माना गया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के सभी आस्थावान धर्मज्ञ गायत्री उपासना के माध्यम से साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
साधना के साधकों को मनोमय कोश की शुद्धि के लिए गत वर्षों में यह बताया गया है कि वे नित्य प्रति स्वाध्याय किया करें। विचारशील लोगों का सत्संग अब सुलभ नहीं रहा। जो निठल्ले लोग चेला मूँड़ने के लिए सत्संग के नाम पर अंट-संट बकते रहते हैं, उसे सुनने से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। इसलिए जीवन की समस्याओं का व्यावहारिक हल सुझाने वाले सत्साहित्य को श्रद्धा और भावनापूर्वक एकाग्र चित्त से पढ़ना ही आज की स्थिति में सत्संग की आवश्यकता को भी पूरा करता है। संसार के श्रेष्ठ महापुरुष अपने विचार और अनुभव सुनाने के लिए पुस्तकों के माध्यम से हमारे लिये हर घड़ी प्रस्तुत रहते हैं।
साधना क्रम को अपना सको तो ही मेरे गुरुकुल में प्रवेश करने की बात सोचो।
साधना में रही हुई त्रुटियों का संरक्षण और दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
साधना को संग्राम कहा गया है। इसमें षडरिपुओं के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए घनघोर युद्ध करना पड़ता है। गीता में कृष्ण ने धनुर्धर अर्जुन को जिस महाभारत में प्रवृत्त किया है वह वस्तुतः आन्तरिक शत्रुओं से लड़ने का ही प्रशिक्षण है। अपनी दुर्बलता से लड़ पड़ने का प्रबल पुरुषार्थ किये बिना जीवन मुक्ति की विजय वैजयन्ती धारण कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं होता।
साधना में लगता हुआ मोक्ष-मार्ग पर चल देता है।
साधना के लिए नहीं कहा था और न भाव भक्ति में विह्वल हो निज सुधि विसार कर परमात्मा को पुकारने के लिए ही कहा।
साधना आदि छोटे बड़े कार्यों में से अपनी रुचि के अनुसार निर्णय कर उसमें दत्त-चित्त होकर लग जाना चिन्ता, मानसिक विकार, उद्विग्नता आदि से बचने का सरल उपाय है । जो लोग अपने कार्यों में दत्तचित्त होकर नहीं लगे रहते बहुधा चिन्तायें उन्हें ही सताती हैं। जो व्यक्ति दृढ़ता के साथ अपने आपको काम में लगा सकता है वही विकारों से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकता है। कर्मशील व्यक्ति भूत भविष्य की उधेड़बुन में उलझा नहीं रहता, वरन् वर्तमान को महत्व देता है और अपने काम में लगा रहता है।
साधना क्रम में (1) दो समय से अधिक बार भोजन न करना (2) साप्ताहिक उपवास और उसके बचे हुए अन्न से घरेलू ज्ञान मंदिर पुस्तकालय की अभिवृद्धि करना यह दो नये विधान सम्मिलित किये गये हैं। भोजन में वस्तुओं की संख्या का कम रहना और अस्वाद व्रत की पिछली परम्पराएँ तो साथ चलती रहेंगी ही, आहार के सम्बन्ध में अगले वर्षों में अपनी सात्विक कमाई का आहार, पकाने वाले का सात्विक स्वभावयुक्त, संस्कारवान होना आदि बातें बढ़ाई जायेंगी। अभी तो जो बताया गया है उसे ही अभ्यास में लाना और कार्य रूप में परिणत करना पर्याप्त है।
साधना का मार्ग सर्वथा निर्दोष है। इसमें लगातार भूलें होते रहने पर भी खतरे की रत्ती भर संभावना नहीं है। हानि इतनी ही हो सकती है कि अनियमितता करने वाले को लाभ कम मिले।
साधना में प्रत्यक्ष विघ्न है।
साधना की दृष्टि से करता रहा हूँ। युग-निमार्ण योजना ने मुझे एक नई दृष्टि दी है और यह प्रेरणा मिली है कि वाणी की उस महती शक्ति का उपयोग सद्भावनाओं के विकास का दृष्टिकोण रखकर ही करना उचित है।
साधना एक प्रकार का योगाभ्यास है। घर-गृहस्थी में रहते हुए, साधारण काम काज करते हुए, योगी और तपस्वियों की तरह आन्तरिक स्तर को उच्च भूमिका में विकसित करने के लिए श्रद्धावान साधक इस मार्ग को अपनाते हैं। इस विशेष उपासना क्रम को “पंचकोशी गायत्री साधना” इसलिए कहते हैं कि इसमें आत्मा के ऊपर वस्त्रों की तरह चढ़े हुए पाँच कोशों का अनावरण करना पड़ता है। प्रत्येक कोश की अपनी-अपनी विशेषता है उसके अनावरण एवं जागरण से आत्म-शक्ति की विशिष्ट अभिवृद्धि होती है और साधक साधारण मनुष्य न रह कर अनेक दृष्टियों से असाधारण बनने लगता है।
साधना करनी चाहिए। अन्त में 240 आहुतियों का हवन, कन्या भोजन, गायत्री चालीसा, गायत्री चित्र आदि का प्रसाद स्वरूप वितरण करते हुए पूर्णाहुति करनी चाहिए। जो साधक अपने अनुष्ठान की सूचना मथुरा देंगे उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का संरक्षण और दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
साधना” इसलिए कहते हैं कि इसमें आत्मा के ऊपर वस्त्रों की तरह चढ़े हुए पाँच कोशों का अनावरण करना पड़ता है। प्रत्येक कोश की अपनी-अपनी विशेषता है उसके अनावरण एवं जागरण से आत्म-शक्ति की विशिष्ट अभिवृद्धि होती है और साधक साधारण मनुष्य न रह कर अनेक दृष्टियों से असाधारण बनने लगता है।
साधना नहीं हो सकती। और इसके अभाव में पुरुष को देवत्व से वंचित रहना पड़ेगा। नारी कामधेनु है। जब उसे हम मातृ बुद्धि से देखते हैं तो वह हमें देवत्व प्रदान करती है, पर जब उसे वासना, सम्पत्ति, दासी की दृष्टि से देखा जाता है तो वह हमारे लिए अभिशाप बन जाती है।
साधना का उल्लेख इस स्तंभ के अंतर्गत भविष्य में नियमित रूप से किया जाता रहेगा।)
साधना का क्रम कैसे ठीक चलेगा? शरीर घोड़ा है मन सवार। सवार की इच्छानुसार ही तो घोड़े को चलना पड़ता है। अन्नमय कोश के परिशोधन के लिए मनोनिग्रह की भी नितान्त आवश्यकता मानी गई है।
साधना कठिनाइयों में होकर निकलने पर ही पूर्ण होती हैं। कठिनाइयों में ही जीवन दर्शन की परीक्षा होती है।
साधना, से यत्नों से बचाया जाता है, तब कहीं जाकर वह गृहस्थाश्रम और पारिवारिक जीवन को प्रकाश पूर्ण और आनन्दमय बना पाता है।
साधना
साधना में प्रवेश करने वाले योद्धा को सर्वप्रथम शिक्षण स्वादेन्द्रिय से लड़ने और आहार शुद्धि की सुव्यवस्था बनाने का ही है उसकी उपेक्षा करने से आगे का मार्ग अवरुद्ध ही पड़ा रहेगा, यह बात हर उच्चस्तरीय साधक को कान खोलकर सुन लेनी चाहिए और सुन समझकर गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि आहार को सात्विक बनाये बिना किसी भी प्रकार काम चलने वाला नहीं है। जो साधक मिष्ठान, पकवान और माल-मलाई विपुल परिमाण में चरते रहते हैं उन्हें वासनाएँ ऐसे ही पथ पर भ्रष्ट कर देती हैं जैसे मुर्गे की गर्दन को बिल्ली मरोड़ कर रख देती है। ऐसे साधकों को पग-पग पर आलस, प्रमाद सताता है और वासना तृष्णा की मृग मरीचिका उन्हें निरन्तर भ्रमाती, भटकाती रहती हैं।
साधना करते हुए प्रत्येक साधक को यही लक्ष्य ध्यान में रखना है कि मन हर घड़ी सत् चिन्तन करें। कुविचारों के अशुभ चिंतन के विरुद्ध तो निरन्तर संघर्ष ही जारी रखना चाहिए।
साधनाओं से प्राप्त होने वाले सूक्ष्म रहस्यों से यह सब प्रयोगात्मक रूप में सिद्ध भी होते आये हैं।
साधना जारी रखे। जीवन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान मनुष्य कैसे करता है इसका प्रभाव उसके साथ-साथ समाज और वातावरण पर भी काफी पड़ता है। जो मनुष्य कठिनाइयों का खुले दिल से स्वागत करता है, उनके साथ खेलता है वह स्वयं तो उससे मिलने वाले लाभ प्राप्त करता ही है किन्तु दूसरों के लिए भी प्रेरणा और आदर्श बन जाता है। एक कायर सैनिक को रण से भागता देखकर कई सैनिक भाग निकलते हैं। इसके विपरीत एक योद्धा जो अपने कर्तव्य को सामने रखकर कठिनाइयों में भी लड़ता है, उसे देखकर अन्य सैनिक भी प्रेरणा और उत्साह प्राप्त कर लड़ते रहते हैं।
साधना करने वालों को अपने सम्बन्धी स्वजनों की मनोभूमि भी परिष्कृत करनी चाहिए ताकि उनकी दुर्बलताएँ अपनी मानसिक प्रगति में बाधक न बनें।
साधना से पूर्णता प्राप्त कर सकता है।
साधना है। जो प्रेम के लिए- परमार्थ के लिए अपने आपको घुला देता है वही आत्म विकास की उच्च स्थिति प्राप्त करता है।
साधना में प्रवृत्त हैं वे इन दोनों नियमों को आचरण में ला रहे होंगे। जिनने इसमें ढील रखी हो उन्हें अब इन नियमों पर अधिक सावधानी और दृढ़ता के साथ आचरण करना आरंभ कर देना चाहिए। व्रत को पालन करने में ही कल्याण है। कभी करना कभी न करना यह शिथिलता संकल्पशक्ति को दुर्बल बनाती है और साहस घटता है। अतएव उचित यही है कि जो कुछ करना हो उसके संबंध में देर तक विचार किया जाय और जब भली प्रकार सोच समझ कर कोई निश्चय कर लिया जाय तो फिर दृढ़तापूर्वक उसे निभाया जाय।
साधना के लिए निकालते हुए प्रायः दस वर्षों में पूरा कर लेता है जब कि हठयोग या तंत्र-योग के मार्ग पर चलते हुए सारा जीवन लगाना पड़ता है और कोई थोड़ी-सी भी असावधानी होने पर प्राणघातक परिणाम भी निकल सकता है पर गायत्री उपासना के माध्यम से पंचकोशी साधना का मार्ग सर्वथा निर्दोष है। इसमें लगातार भूलें होते रहने पर भी खतरे की रत्ती भर संभावना नहीं है। हानि इतनी ही हो सकती है कि अनियमितता करने वाले को लाभ कम मिले।
साधना के साधकों को विशेष व्रत लेना चाहिए।
साधना में मेरे जीवन का अधिकाँश समय लगा है। शास्त्रीय विधि से संगीत की शिक्षा प्राप्त करके ‘संगीतालंकार’ की उपाधि प्राप्त की है। पर अब तक यह विषय कला की साधना की दृष्टि से करता रहा हूँ। युग-निमार्ण योजना ने मुझे एक नई दृष्टि दी है और यह प्रेरणा मिली है कि वाणी की उस महती शक्ति का उपयोग सद्भावनाओं के विकास का दृष्टिकोण रखकर ही करना उचित है।
साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
साधना, आचरण, सरलता से किए जा सकते हैं। महाभारत का युद्ध शुरू होने को था, दोनों सेनायें आमने-सामने खड़ी थी। बीच में खड़े मोहग्रस्त विक्षिप्त मन अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कहीं कन्दराओं में एकान्त में बैठकर तत्वज्ञान की साधना के लिए नहीं कहा था और न भाव भक्ति में विह्वल हो निज सुधि विसार कर परमात्मा को पुकारने के लिए ही कहा।
साधना करने से पाँच चक्र जागृत होते हैं। इसके अनन्तर छठवाँ चक्र कुण्डलिनी चक्र ही होता है। यह लक्ष्य का अन्तिम स्थल है। पाँच कोशों के, पाँच द्वार के खुल जाने के बाद यह छठवाँ लक्ष्य स्थान सामने आ उपस्थित होता है और फिर उसे साधारण प्राण प्रक्रिया से ही जागृत किया जा सकता है। कभी-कभी कोई कोई तेजस्वी सिद्ध पुरुष अपनी शक्तिपात करके किन्हीं साधकों की कुण्डलिनी जागृत कर देते हैं, पर वे सब होते वे ही हैं जिन्होंने इस जन्म में अथवा पूर्व जन्म में पाँचों को जागृत कर लिया होता है।
साधना मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति आहार पर उतना ध्यान नहीं देते जितना कि देना चाहिए। फलस्वरूप तमोगुणी और रजोगुणी प्रकृति की वस्तुएँ खाते रहने पर मन का मूल स्वभाव भी वैसा ही बन जाता है। स्वाध्याय-सत्संग में उस पर नियन्त्रण तो रहता है, पर जब कभी भीतर से कामना एवं वासना का प्रबल वेग उठता है तो उस बाह्य नियंत्रण को तोड़-फोड़ कर मनुष्य को दुष्कर्म में प्रवृत्त कर देता है। दुष्प्रवृत्तियाँ रुक नहीं पाती।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-September
साधना, चिन्तन, श्रवण, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण मायिक है। सतोगुणी माया, एवं चित् शक्ति के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है क्यों कि यह खुला रहस्य है कि, शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती, आदि के रूप में गायत्री की ही पूजा की जाती है।
साधना। (12) गृहस्थ योग। (13) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार। (14) विचार संचालन विद्या। (15) सुखी वृद्धावस्था।
साधनाओं में लग जाइये, तभी आप परमानन्द की प्राप्ति कर सकेंगे। ताश, सिनेमा और धूम्रपान में व्यर्थ समय बिताने से क्या आपको असली शान्ति मिल सकती हैं? इस साँसारिक जीवन में इन्द्रिय लोलुपता और विषय-वासना के क्षणिक सुख में भटके रहने से क्या आपको सच्चे सुख का अनुभव हो सकता है? आपस के लड़ाई झगड़े में या व्यर्थ की बकवास में क्या आपको सच्चा आनन्द मिल सकता है?
साधना परम उपयोगी है। विश्व नारी के रूप में भगवान की मातृभाव से परम पुण्य भावनाओं के साथ आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दिशा में जितनी सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से अन्य इन्द्रियों का निग्रह मन का निरोध एवं अनेक मनोविकारों का शमन अपने आप होता जाता है मातृ भक्त के हृदय में दुर्वासनाएं अधिक देर नहीं ठहर सकतीं।
साधना की भाँति जीव ईश्वर का सम्मिलन कराने में समर्थ हो जाते हैं।
साधना। (8) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान। (9) आन्तरिक उल्लास का विकास। (10) आगे बढ़ने की तैयारी। (11) आध्यात्म धर्म का अवलम्बन।
साधना को क्या जाने॥
साधनाएं। (18) योग के नाम पर मायाचार। (19) जादूगरी या छल। (20) सम्मोहन विज्ञान।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-June
साधना है। इससे साधित वाक्शक्ति मंत्रवत् बलशाली बन जाती है। साधक के प्रत्येक वाक्य में अनुभव एवं कर्म साधना की शक्ति का परिचय मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में मौन का बड़ा महत्व है। जैन तीर्थंकर अपनी साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं।
साधना का प्रारंभ
साधनायें तोल लीजिये। जब तक आपने उपरोक्त क्षेत्रों में मन लगा कर दीर्घकालीन अभ्यास नहीं किया है, उच्चतम ज्ञान और बुद्धि की एकाग्रता से उस विषय को अपना नहीं बना लिया है, तब तक इस क्षेत्र में पदार्पण करना नितान्त मूर्खता है। जिसकी जिस क्षेत्र में जितनी अधिक साधनायें हैं, जिसने जितना अधिक अभ्यास किया है और जिसके पास जितना अधिक ज्ञान है वह उतना ही सफलता से नेतृत्व कर सकता है। क्षेत्र का चुनाव आपकी शिक्षा एवं रुचि का व्यक्तिगत प्रश्न है। इसे बड़ी सतर्कता से हल करना चाहिये।
साधनामयी।
साधना की महानता को देखते हुए इतना समय कुछ अधिक नहीं है। इस तपस्या के लिये जिनके मन में उत्साह है उन्हें इस शुभ आरम्भ को कर ही देना चाहिये। आगे चल कर माता अपने आप सम्भाल लेती है। यह निश्चित है कि शुभ आरंभ का परिणाम शुभ ही होता है।
साधनायें हैं, जिसने जितना अधिक अभ्यास किया है और जिसके पास जितना अधिक ज्ञान है वह उतना ही सफलता से नेतृत्व कर सकता है। क्षेत्र का चुनाव आपकी शिक्षा एवं रुचि का व्यक्तिगत प्रश्न है। इसे बड़ी सतर्कता से हल करना चाहिये।
साधना अपना फल दिखाये बिना नहीं रहती। “अभियान” एक ऐसी तपस्या है जो साधक को गायत्री शक्ति से भर देती है और फलस्वरूप वह अपने अन्दर बाहर तथा चारों ओर एक देवी वातावरण का अनुमान करता है।
साधना पुस्तक में बता चुके हैं।
साधना छूट जाने पर उसकी पूर्ति अगले दिन की जा सकती है।
साधना द्वारा अपने तत्वों को शक्ति में परिणित कर लेता है और शक्तिपुँज बनकर प्रत्यक्ष या परोक्ष में ऐसे कार्य करता है जो सर्वसाधारण के लिए संभव नहीं होते।
साधना की शक्ति का परिचय मिलता है। इसीलिए भारतीय संस्कृति में मौन का बड़ा महत्व है। जैन तीर्थंकर अपनी साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं। इसी से उनकी वाणी में शक्ति निहित रहती है।
साधना अवस्था में प्रायः मौनावलम्बन करते हैं। इसी से उनकी वाणी में शक्ति निहित रहती है।
साधना खंडित न होने देने, उसका संकल्प पूरा करने के लिये अखण्ड ज्योति से भी समुचित उत्साह, पथप्रदर्शन तथा सहयोग मिल जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-November
साधना के बीज जमते हैं और जीवन मुक्ति एवं परमानंद की कल्याणकारिणी फसल उपजती है।
साधना कराने का ही प्रयत्न है।
साधना करते समय साधक अनेक बार गिर पड़ने पर कहीं अन्त में सिद्धि लाभ करता है।
साधना शीघ्र सफल होती है। इस प्रकार योग्यता प्राप्त करने के लिए सत्संग, धर्मग्रंथ और भक्त चरित्र का अभ्यास, गुरु ज्ञान का पालन तथा माता-पिता आदि गुरुजनों की तथा भक्तों की सेवा पूजा करना बहुत आवश्यक है।
साधना में प्रगति द्विगुणित वेग से होती है। पात्रता तेजी से बढ़ती है फलस्वरूप आत्मकल्याण के आनन्दमय लक्ष्य को प्राप्त करना सुलभ हो जाता है। हमारी साधना उभयपक्षीय चलनी चाहिए। जप, व्रत, उपवास, ध्यान, पूजा, अर्चना, वन्दना हम नित्य श्रद्धा और भक्ति पूर्वक करें, साथ ही अपनी उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, त्याग, परमार्थ एवं देवत्व के पोषण की भावना को समुन्नत करने के लिए भी कुछ न कुछ अवश्य करते रहें।
साधना बताकर आध्यात्मिक असंतुलन उत्पन्न कर देने का परिणाम किसी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता।
साधना का स्तर ऊंचा उठाया जाता है। कुपात्रों को अति ऊँचे स्तर की साधना बताकर आध्यात्मिक असंतुलन उत्पन्न कर देने का परिणाम किसी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता।
साधना उभयपक्षीय चलनी चाहिए। जप, व्रत, उपवास, ध्यान, पूजा, अर्चना, वन्दना हम नित्य श्रद्धा और भक्ति पूर्वक करें, साथ ही अपनी उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, त्याग, परमार्थ एवं देवत्व के पोषण की भावना को समुन्नत करने के लिए भी कुछ न कुछ अवश्य करते रहें।
साधना इन दोनों पहियों को साथ-साथ बराबर रखने में धैर्य और सावधानी से काम लेते रहे हैं। जितनी पात्रता बढ़े उतनी ही साधना का स्तर ऊंचा उठाया जाता है। कुपात्रों को अति ऊँचे स्तर की साधना बताकर आध्यात्मिक असंतुलन उत्पन्न कर देने का परिणाम किसी के लिए भी अच्छा नहीं हो सकता।
साधनाओं का आध्यात्मिक व्यायाम करने के साथ साधक अपनी मनोभूमि को उपजाऊ बनाने के लिए देवत्व के पोषण के लिए उदारता एवं परमार्थ का अभ्यास डालने के लिए कुछ क्रियात्मक कार्य भी करता चले, इस कार्य प्रणाली को अपनाने से साधना में प्रगति द्विगुणित वेग से होती है। पात्रता तेजी से बढ़ती है फलस्वरूप आत्मकल्याण के आनन्दमय लक्ष्य को प्राप्त करना सुलभ हो जाता है। हमारी साधना उभयपक्षीय चलनी चाहिए। जप, व्रत, उपवास, ध्यान, पूजा, अर्चना, वन्दना हम नित्य श्रद्धा और भक्ति पूर्वक करें, साथ ही अपनी उदारता, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, त्याग, परमार्थ एवं देवत्व के पोषण की भावना को समुन्नत करने के लिए भी कुछ न कुछ अवश्य करते रहें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-August
साधना में तीव्रता लाती है। सबसे पहले आकाँक्षा को जन्म देती है। फिर श्रवण कराती है फिर मनन करने के लिए मजबूर कर देती है और निदिध्यासन द्वारा आत्मा के एकत्व का बोध और साक्षात्कार दोनों ही हो जाते हैं। यही आत्मानुभूति की अवस्था है। यहाँ पहुँच कर साधक अनेक रूपों, आकृतियों और शक्तियों वाली एक ही आत्मा के दर्शन करता है।
साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना का तत्वज्ञान (15) गायत्री साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना का उपदेश दिया है। वे कहते हैं-
साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना का लक्ष्य है, यही स्वरूप प्राप्ति कहलाती है।
साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना के लिए, आत्मसाक्षात्कार के लिए, ऋद्धि सिद्धियों की प्राप्ति के लिए गायत्री एक श्रेष्ठतम माध्यम है। इन सभी विषयों पर संक्षेप में किन्तु अत्यन्त ही सार गर्भित प्रकाश इस पुस्तक में डाला गया है।
साधना से सिद्धियाँ (9) गायत्री साधना से लक्ष्मी, उन्नति तथा सफलता की प्राप्ति (10) गायत्री से दुर्लभ आपत्तियों का निवारण (11) स्त्रियाँ भी साधना से लाभान्वित हो सकती हैं। (12)गायत्री शाप मोचन और उत्कीलन का रहस्य (13) गायत्री और यज्ञोपवीत का घनिष्ठ संबंध (14) गायत्री की निष्काम और सकाम साधना का तत्वज्ञान (15) गायत्री साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना तथा भाव इतने प्रबल और उच्च हों कि हमारे भीतर दूसरों के अहित का भाव लेश मात्रा भी न होने पावे और उनके हित तथा सेवा का कार्य कर सकें इसी में हमारा हित तथा लाभ है।
साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधनाएं (4) वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री (5) गायत्री के चौदह रत्न दूसरा भाग। मूल्य हर एक का छह-छह आना है। गायत्री विद्या की संक्षिप्त जानकारी कम मूल्य में प्राप्त करने के लिए यह पुस्तकें बड़ी उपयोगी हैं।
साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना से दिव्य लाभ (7) महापुरुषों की गायत्री भक्ति (8) गायत्री साधना से सिद्धियाँ (9) गायत्री साधना से लक्ष्मी, उन्नति तथा सफलता की प्राप्ति (10) गायत्री से दुर्लभ आपत्तियों का निवारण (11) स्त्रियाँ भी साधना से लाभान्वित हो सकती हैं। (12)गायत्री शाप मोचन और उत्कीलन का रहस्य (13) गायत्री और यज्ञोपवीत का घनिष्ठ संबंध (14) गायत्री की निष्काम और सकाम साधना का तत्वज्ञान (15) गायत्री साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना का काम उतने ही अच्छे ढंग से चल रहा है।
साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना से लक्ष्मी, उन्नति तथा सफलता की प्राप्ति (10) गायत्री से दुर्लभ आपत्तियों का निवारण (11) स्त्रियाँ भी साधना से लाभान्वित हो सकती हैं। (12)गायत्री शाप मोचन और उत्कीलन का रहस्य (13) गायत्री और यज्ञोपवीत का घनिष्ठ संबंध (14) गायत्री की निष्काम और सकाम साधना का तत्वज्ञान (15) गायत्री साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना हो जायेगी।
साधना से लाभान्वित हो सकती हैं। (12)गायत्री शाप मोचन और उत्कीलन का रहस्य (13) गायत्री और यज्ञोपवीत का घनिष्ठ संबंध (14) गायत्री की निष्काम और सकाम साधना का तत्वज्ञान (15) गायत्री साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
साधना से गुप्त शक्ति कोषों का जागरण (4) गायत्री भूलोक की कामधेनु है (5) गायत्री और ब्रह्म एक ही हैं (6) गायत्री साधना से दिव्य लाभ (7) महापुरुषों की गायत्री भक्ति (8) गायत्री साधना से सिद्धियाँ (9) गायत्री साधना से लक्ष्मी, उन्नति तथा सफलता की प्राप्ति (10) गायत्री से दुर्लभ आपत्तियों का निवारण (11) स्त्रियाँ भी साधना से लाभान्वित हो सकती हैं। (12)गायत्री शाप मोचन और उत्कीलन का रहस्य (13) गायत्री और यज्ञोपवीत का घनिष्ठ संबंध (14) गायत्री की निष्काम और सकाम साधना का तत्वज्ञान (15) गायत्री साधना में अनिष्ट का कोई भय नहीं (16) साधना के आवश्यक नियम (17) अकेली गायत्री द्वारा समय संध्या वन्दन (18) पाप नाशक और शक्तिवर्धक गायत्री तप। (19) गायत्री उपासना से समस्त पातकों से मुक्ति (20) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (21) गायत्री की नव दुर्गा साधना (22) विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न साधनाएं (23) गायत्री का अर्थ (24) गायत्री से साक्षात्कार और वार्तालाप (25) गायत्री साधना से चमत्कारी सिद्धियाँ (26) गायत्री की वाम मार्गी साधनाएं (28)गायत्री द्वारा कुण्डलिनी जागरण। आदि आदि।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-March
साधनाएं प्रकाशित करना जनसाधारण के हित में अनुपयुक्त है, इसलिए इस लेख को अधिक न बढ़ाकर यहीं समाप्त किया जाता है।
साधना में दत्तचित्त हो जाता है तब उन कष्टों की ओर से उसका मन ऊपर उठ जाने के कारण कष्टों का उसे अनुभव नहीं होता। सिद्धि की आरंभिक अवस्था का श्री गणेश यहीं से होता है। इसलिए भक्ति योग की साधना का आरंभ तभी से समझना चाहिए जब से उसमें कष्ट सहिष्णुता बढ़ती जावे। लक्ष्य की ओर मन लग जाने से वासनायें भी अपना घर नहीं बना पातीं इसलिए आरंभ से ही मनुष्य की निवृत्ति दुर्वासनाओं से होने लगती हैं। दुर्वासनाओं की निवृत्ति शान्ति का सृजन करती हैं उधर कष्ट सहिष्णुता शान्ति का दृढ़ करती है।
साधनाएं बड़ी खतरे से भरी हुई होती हैं। निर्जन, श्मशान आदि भयंकर प्रदेशों में ऐसी रोमाँचकारी विधि-व्यवस्था का प्रयोग करना पड़ता है जिससे साधारण मनुष्य का कलेजा दहल जाता है। उस समय में ऐसे-ऐसे घोर अनुभव होते हैं जिनमें डर जाने पर बीमार पड़ जाने, पागल हो जाने या मृत्यु के मुख में चले जाने की आशंका रहती है। ऐसी साधनाएं हर कोई नहीं कर सकता। कोई कर ले तो सिद्धि मिलने पर उन अदृश्य शक्तियों को साथ रखने की जो कष्टसाध्य शर्तें होती हैं उनका पालन नहीं कर सकता।
साधना में उतनी ही सरलता आती है और सिद्धि में उतनी ही दृढ़ता आती है।
साधना से?
साधना है।
साधना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। और उस समय वह साधक उन पदार्थों की परतन्त्रता में नहीं आता क्योंकि तब वह उन सबके उत्पादक भगवान को प्राप्त कर लेने या आत्मसात् हो जाने के कारण वह उनका सृष्टा तथा उपभोक्ता दोनों ही हो जाता है।
साधना आरम्भ होती है। इसलिए गुरु भक्ति का यह रूप ग्रहण कर लेती है। परन्तु जैसा कि बताया गया है यह गुरुभक्ति अन्य विश्वास के रूप में भी होती पाई गई है। भक्ति के लिए जहाँ यात्रा पात्र या योग्य अयोग्य की पहचान या भावना रहती है वहाँ अन्धविश्वास नहीं पनपता। अयोग्य की भक्ति सिर्फ इसलिए करने से कि यह हमारे कुल में चली आई है, अन्धविश्वास होने के कारण बड़ा दुखद होती है।
साधना की जाती है, उसमें होती है। इसलिए अंधविश्वास अयोग्य के साथ सम्बंध स्थापित कर पतन के मार्ग पर ही अग्रसर होते हैं। पर ज्ञानी जीवन भर अपने विश्वास को लेकर योग्य पात्र के साथ जब संबंध स्थापित करता है तब निरंतर प्रगति करता जाता है।
साधना द्वारा सूक्ष्म जगत में विचरण करने वाली अनेक चेतना ग्रन्थियों में से किसी विशेष प्रकार की ग्रन्थि को अपने लिए जागृत, चैतन्य, क्रियाशील एवं अनुचरी बनाया जा सकता है। देखा गया है कि कई ताँत्रिकों को मसान, पिशाच, भैरव, छाया पुरुष, सेबड़ा, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कर्ण पिशाचिनी, त्रिपुर, सुन्दी, कालरात्रि, दुर्गा आदि की सिद्धि होती है। जैसे कोई सेवक प्रत्यक्ष शरीर से किसी के यहाँ नौकर रहता है और मालिक की आज्ञानुसार काम करता है वैसे ही यह शक्तियाँ अप्रत्यक्ष शरीर से उस तंत्र-सिद्ध पुरुष के वश में होकर सदा उसके समीप उपस्थित रहती है और जो आज्ञा दी जाती है उसको वे अपनी सामर्थ्यानुसार पूरा करती हैं। इस रीति से कई बार ऐसे-ऐसे अद्भुत काम किये जाते हैं कि उनके कारण आश्चर्य से दंग होना पड़ता है।
साधना, वाममार्ग आदि नामों से पुकारते हैं।
साधनाएं हर कोई नहीं कर सकता। कोई कर ले तो सिद्धि मिलने पर उन अदृश्य शक्तियों को साथ रखने की जो कष्टसाध्य शर्तें होती हैं उनका पालन नहीं कर सकता। यही कारण है कि इस मार्ग में चलने का कोई विरले ही साहस करते हैं, जो साहस करते हैं उनमें से कोई विरले ही सफल होते हैं, जो सफल होते हैं उनमें से कोई विरले ही अन्तकाल तक उनसे समुचित लाभ उठा पाते हैं।
साधना का आरंभ तभी से समझना चाहिए जब से उसमें कष्ट सहिष्णुता बढ़ती जावे। लक्ष्य की ओर मन लग जाने से वासनायें भी अपना घर नहीं बना पातीं इसलिए आरंभ से ही मनुष्य की निवृत्ति दुर्वासनाओं से होने लगती हैं। दुर्वासनाओं की निवृत्ति शान्ति का सृजन करती हैं उधर कष्ट सहिष्णुता शान्ति का दृढ़ करती है। योग का लक्ष्य या पूर्ण शाँति है वह मिलना आरम्भ हो जाता है। इसलिए साधना को सिद्धि का तुरंत ही अनुभव मिलने से दृढ़ता उत्पन्न होती है और मनुष्य अन्त तक अपनी साधना पर दृढ़ रहता है।
साधना की जावे जब तक मनुष्य को सिद्धि नहीं मिल जाती तब तक उसे कष्ट सहने पड़ते हैं। पर साधक जब ज्ञानपूर्वक भक्तियोग की साधना में दत्तचित्त हो जाता है तब उन कष्टों की ओर से उसका मन ऊपर उठ जाने के कारण कष्टों का उसे अनुभव नहीं होता। सिद्धि की आरंभिक अवस्था का श्री गणेश यहीं से होता है। इसलिए भक्ति योग की साधना का आरंभ तभी से समझना चाहिए जब से उसमें कष्ट सहिष्णुता बढ़ती जावे। लक्ष्य की ओर मन लग जाने से वासनायें भी अपना घर नहीं बना पातीं इसलिए आरंभ से ही मनुष्य की निवृत्ति दुर्वासनाओं से होने लगती हैं।
साधना विधानों के द्वारा अपने योग्य ग्रन्थियों को पकड़कर उनमें प्राण डाला जाता है। जब वह प्राणधान हो जाती हैं तब उसका सीधा आक्रमण साधक पर होता है, यदि साधक अपनी आत्मिक बलिष्ठता द्वारा उस आक्रमण को सह गया, उससे परास्त न हुआ तो प्रतिद्दत होकर वह ग्रन्थि उसके वशवर्ती हो जाती है और चौबीस घंटे के साथी आज्ञाकारी सेवक की तरह काम करती है। ऐसी साधनाएं बड़ी खतरे से भरी हुई होती हैं। निर्जन, श्मशान आदि भयंकर प्रदेशों में ऐसी रोमाँचकारी विधि-व्यवस्था का प्रयोग करना पड़ता है जिससे साधारण मनुष्य का कलेजा दहल जाता है। उस समय में ऐसे-ऐसे घोर अनुभव होते हैं जिनमें डर जाने पर बीमार पड़ जाने, पागल हो जाने या मृत्यु के मुख में चले जाने की आशंका रहती है।
साधना है। इस श्रेय मार्ग पर चलने वाला सत् का महत्व समझ जाता वह सद्विचारों को अपनाता है, जिससे सुदूर और सत्कार्यों में उसकी प्रवृत्ति होती है और धीरे-धीरे वह सत्पुरुष बनता हुआ सन्मार्ग चलता हुआ जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
साधना भविष्य में सविस्तार कभी लिखेंगे क्योंकि वह सर्वहितकारी, सर्वसुलभ और सर्व मंगलमय है। परमाणुपथी तन्त्र प्रधान, वाममार्गी सावित्री विद्या का विषय गोपनीय है। उसका परिचय मात्र इन पंक्तियों में करा दिया है। इस संबंध की गुप्त बातों पर अधिक प्रकाश डालना और तत्संबंधी साधनाएं प्रकाशित करना जनसाधारण के हित में अनुपयुक्त है, इसलिए इस लेख को अधिक न बढ़ाकर यहीं समाप्त किया जाता है।
साधना आरंभ करता है। कल्याणकारी लक्ष्य को अपना इष्ट बनाकर उसमें प्रियत्व का रस घोल देना भक्ति की यही साधना है।
साधना करते रहे, जनता ने रामराज्य के लिए अभित बलिदान करके स्वराज प्राप्त किया। हमारे शासकों में उचित है कि वे राम का आदर्श अपनावें रामराज्य के आदर्श उपस्थित करें।
साधना आरम्भ होते ही साधक के अन्त में प्रवेश करना तथा स्थित होना आरम्भ कर देते हैं। लेकिन जहाँ भक्ति तो होती है परन्तु या तो साधक के अनुकूल जिसकी भक्ति की जाती है उसमें गुण या शक्ति नहीं होती तो उसके अंदर उन गुण और शक्तियों का ही प्रवेश होना आरम्भ होता है जो कि जिसकी साधना की जाती है, उसमें होती है। इसलिए अंधविश्वास अयोग्य के साथ सम्बंध स्थापित कर पतन के मार्ग पर ही अग्रसर होते हैं। पर ज्ञानी जीवन भर अपने विश्वास को लेकर योग्य पात्र के साथ जब संबंध स्थापित करता है तब निरंतर प्रगति करता जाता है।
साधना पर दृढ़ रहता है।
साधना की किन्हीं विधियों को बताने का हमारा कोई इरादा नहीं है क्योंकि उन गुप्त रहस्यों को जनसाधारण के लिए अनधिकारियों के लिए प्रकाशित कर देने का अर्थ है- बालकों ने क्रीड़ा-स्थल में बारूद बिखेर देना, जिसमें वे बेचारे क्रीड़ा कौतुक करने के उपलक्ष में सर्वनाश का उपहार प्राप्त करें। यह परम्परा तो अधिकार और अधिकारी के आधार पर एक-दूसरे को सिखाने की रही है। हमें स्वयं इस मार्ग पर प्राण घातक खतरों में होकर गुजरने का कड़वा अनुभव है, फिर भोले-भाले पाठकों को कोई खतरा उपस्थित कर देने के लिए उस शिक्षण-विधि को लिख मारने की भूल हम कैसे कर सकते हैं? इन पंक्तियों में तो हमारा इरादा केवल यह बताने का है कि प्रकृति की परमाणुमयी सावित्री शक्ति पर भी आत्मिक विद्युत शक्ति द्वारा भूतकाल में अधिकार प्राप्त किया जा चुका है और आगे भी प्राप्त किया जा सकता है।
साधना का अंतिम लक्ष्य है। इसीलिए अन्य सभी योगों की अपेक्षा इस ज्ञान-भक्ति योग की प्रशंसा की गई है और इसे मानव के लिए कल्याणकारी माना गया है।
साधना करते-करते वह स्वयं भगवान बन जाये तो उसे जीवनोपयोगी साधन सामग्री की अलग साधना करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। और उस समय वह साधक उन पदार्थों की परतन्त्रता में नहीं आता क्योंकि तब वह उन सबके उत्पादक भगवान को प्राप्त कर लेने या आत्मसात् हो जाने के कारण वह उनका सृष्टा तथा उपभोक्ता दोनों ही हो जाता है।
साधना को सिद्धि का तुरंत ही अनुभव मिलने से दृढ़ता उत्पन्न होती है और मनुष्य अन्त तक अपनी साधना पर दृढ़ रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-July
साधना करके अनेक व्यक्तियों ने भिन्न वरदान पाये थे। इसका अर्थ है उन लोगों ने साधना द्वारा अपनी अन्तः चेतना को इस योग्य बनाया था कि ईश्वर की अभीष्ट शक्ति को वे पकड़ सके और उससे लाभ उठा सके । गायत्री साधना एक वैज्ञानिक पद्धति है इसके द्वारा ईश्वर की ह्रीं, श्रीं, क्लीं विज्ञान, वैभव और बल की सम्मिलित शक्ति को पकड़ कर, खींच कर अपने में धारण कर सकते हैं और उसके आधार पर जीवन में अनेक मानसिक एवं साँसारिक आनन्दों का उपभोग कर सकते हैं।
साधना।
साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमतापूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह विधि भी बताई गई है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। (मूल्य 2)
साधनाएं स्थूल दृष्टि से देखने में सामान्य क्रिया मालूम होती हैं इनके द्वारा किसी प्रकार कोई लाभ मिल सकता है, साधारणतः यह बात समझ में नहीं आती पर अवश्यम्भावी परिणामों को देखकर यह मानना पड़ता है कि इसमें कोई तथ्य अवश्य है। गायत्री के चौबीस अक्षरों का गुँथन इस प्रकार से हुआ है कि उनके उच्चारण से जिह्वा, मुख, कंठ, तालु की ऐसी नाड़ियों का क्रमबद्ध संचालन होता है जिनके कारण शरीर के विभिन्न भागों में अवस्थित योगिक लघु चक्र जागृत होते हैं। जैसे कुँडलिनी जागरण के लिए षट् चक्रों को जागृत करके दिव्य शक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं वैसे ही गायत्री के उच्चारण मात्रा से यह लघु ग्रंथियां जागृत होकर आशाजनक परिणाम उपस्थित करती हैं। “गायत्री महाविज्ञान” पुस्तक के प्रथम भाग में चित्र देकर सविस्तार यह बताया जा चुका है कि शरीर के किस-किस भाग में कौन-कौन सी गुप्त ग्रंथियाँ हैं और गायत्री के किन-किन अक्षरों के उच्चारण से उनमें कौन-कौन ग्रंथि जागृत होती है और उस ग्रंथि चक्र के जागरण से हमें कौन-कौन सी शारीरिक एवं मानसिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। उस सब का वर्णन यहाँ नहीं किया जा सकता पर इतना बताया जा सकता है कि गायत्री के चौबीसों अक्षर बड़े ही रहस्यपूर्ण ढंग से ऋषियों ने गूँथे हैं।
साधना द्वारा अपने आपको रेडियो यंत्र बना लिया है। जिस दैवी शक्ति को प्राप्त करना है उसी की विशेष साधना करना मानो रेडियो की सुई उस नंबर पर लगा देना है। इस प्रक्रिया द्वारा ईश्वर के महाशक्ति सागर में से, विपुल वैभव में से, हम अपनी आवश्यक शक्तियाँ एवं सम्पदाएं प्राप्त कर सकते हैं। प्रभु के अक्षय भंडार में किसी वस्तु की कमी नहीं है। ईश्वर के अमर युवराज-मनुष्य को अपने पिता की प्रत्येक वस्तु पर पूरा पूरा अधिकार है।
साधना करना मानो रेडियो की सुई उस नंबर पर लगा देना है। इस प्रक्रिया द्वारा ईश्वर के महाशक्ति सागर में से, विपुल वैभव में से, हम अपनी आवश्यक शक्तियाँ एवं सम्पदाएं प्राप्त कर सकते हैं। प्रभु के अक्षय भंडार में किसी वस्तु की कमी नहीं है। ईश्वर के अमर युवराज-मनुष्य को अपने पिता की प्रत्येक वस्तु पर पूरा पूरा अधिकार है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम अपनी पात्रता सिद्ध करें अपने प्रयत्न, श्रम, अध्यवसाय और साधना द्वारा यह साबित कर दें कि हम अभीष्ट वस्तुओं के अधिकारी हैं तो कोई कारण नहीं कि हमें सन्तोष जनक सुख शान्ति प्राप्त न हो।
साधना की है। विचार विद्या के ज्ञाता यह बात सहज ही समझ सकते हैं कि इतने अधिक मनस्वी पुरुषों का इतने अधिक काल तक, इतना अधिक मनोबल रहा है वह गायत्री मंत्र अपनी ज्ञानपूर्ण संचित पूँजी के कारण भी कितना अधिक प्रभावशाली हो गया होगा। विचार कभी नष्ट नहीं होते उनके बादल आकाश में मँडराते रहते हैं, वे विचारों की प्रचुरता देखते हैं वहीं स्वयं भी बरस पड़ते हैं। इसी से भले और बुरे विचारों को अदृश्य रूप से बल मिलता रहता है। नये गायत्री साधक पर पूर्वकाल के गायत्री साधकों के विचार बादल बरसते हैं और वह शीघ्र ही सफलता की ओर अग्रसर होने लगता है।
साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। (मूल्य 2)
साधना एक वैज्ञानिक पद्धति है इसके द्वारा ईश्वर की ह्रीं, श्रीं, क्लीं विज्ञान, वैभव और बल की सम्मिलित शक्ति को पकड़ कर, खींच कर अपने में धारण कर सकते हैं और उसके आधार पर जीवन में अनेक मानसिक एवं साँसारिक आनन्दों का उपभोग कर सकते हैं।
साधना की ओर ध्यान देना। यही सफलता का रहस्य है। हम लोगों में सबसे बड़ा दोष यही है कि हम लोग लक्ष्य की ही ओर ध्यान देते हैं और साधन की, कार्यप्रणाली की, ब्यौरे की बातों को भूल जाते हैं। और इसीलिये इसका परिणाम यह होता है कि यदि हम अपने लक्ष्य पर एक बार पहुँच भी गये, यदि हमको एक बार सफलता मिल भी गयी तो भी हमारी वह सफलता स्थायी नहीं होती और हम शीघ्र ही फिसल जाते हैं। हमें सबसे पहले यह बात ध्यान में बैठा लेनी चाहिये कि हमारी कार्यप्रणाली की शुद्धता और अशुद्धता पर ही कार्य का फलाफल निर्भर करता है।
साधनाओं का पथ-प्रदर्शन किया गया है। (मूल्य 2)
साधना द्वारा अन्तस्तल को पिघला दिया जाय तो वह शक्ति आत्मसात हो सकती है। इसी विधि व्यवस्था को, क्रिया को आध्यात्मिक भाषा में “साधना” कहते हैं।
साधना द्वारा अपनी अन्तः चेतना को इस योग्य बनाया था कि ईश्वर की अभीष्ट शक्ति को वे पकड़ सके और उससे लाभ उठा सके । गायत्री साधना एक वैज्ञानिक पद्धति है इसके द्वारा ईश्वर की ह्रीं, श्रीं, क्लीं विज्ञान, वैभव और बल की सम्मिलित शक्ति को पकड़ कर, खींच कर अपने में धारण कर सकते हैं और उसके आधार पर जीवन में अनेक मानसिक एवं साँसारिक आनन्दों का उपभोग कर सकते हैं।
साधनायें।
साधना ठोस अध्यात्मिक महाविद्या की वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। उसका श्रद्धा और विश्वासपूर्वक परीक्षण किया जाये तो परिणाम सदा ही आशाजनक होता है।
साधना” कहते हैं।
साधना ऐसी ही वैज्ञानिक पद्धतियाँ हैं जिनका आविष्कार हमारे पूजनीय पूर्वजों ने युगों तक घोर अध्यवसाय करने के उपरान्त किया था।
साधना हो सकती है। प्रणव योग, विश्वयोग, ध्यान योग, सूर्ययोग, प्राणयोग, दिव्ययोग, विभुयोग, विज्ञान योग, लययोग, नादयोग, षट्चक्रयोग, ग्रन्थियोग इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमतापूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह विधि भी बताई गई है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। (मूल्य 2)
साधना द्वारा यह साबित कर दें कि हम अभीष्ट वस्तुओं के अधिकारी हैं तो कोई कारण नहीं कि हमें सन्तोष जनक सुख शान्ति प्राप्त न हो।
साधना द्वारा आत्मिक बल की वृद्धि कर लेने वाला मनुष्य अनायास ही दुखों से छुटकारा पाकर सुख शान्ति की ओर अग्रसर होता रहता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-October
साधना है।
साधना के आवश्यक नियम, गायत्री महामंत्र की सिद्धि, गायत्री साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शापमोचन, उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋषि सिद्धियों का योग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएं, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुंडलिनी जागरण, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू. 3॥)
साधना निष्फल नहीं जाती। हमें व्यक्तिगत रूप से अपनी निष्ठामयी दीर्घकालीन गायत्री तपश्चर्या में जिन जिन दिव्य चमत्कारों का दिग्दर्शन हुआ है उन्हें गोपनीय रखना ही उचित समझ कर प्रकट नहीं किया जा रहा है। अपने निजी अनुभव के आधार पर हमारी सुनिश्चित धारणा एवं अटूट श्रद्धा है कि मानव प्राणी का परमहित गायत्री का आश्रय लेने में सुरक्षित है।
साधनाएं, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुंडलिनी जागरण, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू. 3॥)
साधनाओं की अनेक विधियाँ।
साधना एवं समाधान पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर दिया है। दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप बीस वर्षों में लिखी गई सुन्दर, सस्ती, अनुभव पूर्ण एवं सच्चा पथ प्रदर्शन करने वाले गुरु जैसी पुस्तकों की एक एक प्रति हर गायत्री प्रेमी के पास होना आवश्यक है।
साधना एक महत्वपूर्ण विद्या है। जैसे बिजली का विज्ञान जाने बिना कोई आदमी बिजली उत्पन्न करने की मशीन चलाने लग जाय तो यह एक खतरनाक बात होगी। डाक्टरी पढ़े बिना जो आदमी आपरेशन करने लग जाय वह कोई अच्छा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकता। इसी प्रकार गायत्रीमहाविद्या को भली प्रकार जानने के बाद ही साधना करनी चाहिए।
साधना एक महत्वपूर्ण विद्या है। अन्य विज्ञानों के भाँति इसके भी दो भाग हैं (1) सिद्धान्त (2) क्रिया। इनमें से केवल एक भाग को ही अपनाने से कोई व्यक्ति पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। गायत्री की उपासना करने का जितना महत्व है, उतना ही उसकी समस्त जानकारी को प्राप्त करना भी आवश्यक है। अधूरी शिक्षा के आधार पर की हुई क्रिया में अनेकों शंकाएं, भ्रान्तियाँ , त्रुटियाँ, भूलें रह जाती हैं जो कई बार बड़ी अनिष्टकर साबित होती हैं।
साधना, गायत्री से पापों का प्रायश्चित, गायत्री साधकों के अनुभव, गायत्री द्वारा स्वर्ग एवं मुक्ति की प्राप्ति, गायत्री का अधिकार, शापमोचन, उत्कीलन, नित्य उपासना, ध्यान, गायत्री प्राणायाम, अनुष्ठान, पुरश्चरण, ऋषि सिद्धियों का योग, अनेक कठिन प्रयोजनों में गायत्री के अनेक प्रयोग, माता का साक्षात्कार, स्त्रियोपयोगी साधनाएं, गायत्री तप, गायत्री का अर्थ, कुंडलिनी जागरण, आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन है। मू. 3॥)
साधना को चालू रखा जा सकता है। एक वर्ष तक नियमित रूप से माता से संबंध बनाये रखा जाय तो साधक की मनोभूमि इतनी परिमार्जित हो जाती है कि उसमें दैवी तत्वों की स्थापना समुचित रूप से हो सकती है।
साधना करते हैं, विशेषता शिव है या अशिव, सुन्दर है या असुन्दर, इसकी हमें परवाह नहीं है।
साधना विधियाँ इतनी विस्तृत एवं विशद हैं कि उन्हें चिट्ठी-पत्री की दस-बीस लाइनों में किसी को समझना या समझाना असंभव है। इसलिए गायत्री विद्या का अत्यन्त आवश्यक विज्ञान, विधान, साधना एवं समाधान पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर दिया है। दो हजार आर्ष ग्रन्थों के निचोड़ स्वरूप बीस वर्षों में लिखी गई सुन्दर, सस्ती, अनुभव पूर्ण एवं सच्चा पथ प्रदर्शन करने वाले गुरु जैसी पुस्तकों की एक एक प्रति हर गायत्री प्रेमी के पास होना आवश्यक है।
साधना में उनका जितना समय खर्च हुआ, उतने मूल्य का प्रतिफल आत्मिक एवं साँसारिक शक्ति के रूप में उन्हें मिला या नहीं ? हमारा विश्वास है कि यह बेजोखिम का परीक्षण हर किसी को संतोष एवं उत्साह प्रदान करने वाला ही सिद्ध होगा।
साधना करनी चाहिए।
साधना के लिए बैठे। गायत्री के चित्र को शीशे में मढ़वा कर उसका धूप, दीप, चंदन, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प आदि माँगलिक द्रव्यों से पूजन करके जप आरंभ कर देना चाहिए। जिनके पास चित्र न हो या पूजन सामग्री उपलब्ध न हो सके, वे नेत्र बन्द करके ध्यान द्वारा मानसिक पूजा कर सकते हैं। जल से भरा पात्र पास में रखा रहे। आचमन करके तब जप किया जाए।
साधना को बिना किसी कठिनाई के पूरा कर सकते हैं।
साधनाएं - सर्व साधारण के लिए उपयोगी गायत्री साधनाओं की अनेक विधियाँ।
साधना के उपरान्त भी अपनी उपासना जारी रखी जा सके तो बड़ा ही उत्तम है। वर्ष में 3 नवदुर्गाओं के छोटे अनुष्ठान तथा प्रतिदिन 11 मालाएं जपते रहने से एक वर्ष में पाँच लाख का ‘अभियान’ नामक जप-यज्ञ पूरा हो जाता है। प्रतिदिन दो मालाएं नियम पूर्वक जपते रहने से वर्ष में सवालक्ष का एक पूर्ण अनुष्ठान हो जाता है। इतना भी न बन पड़े तो प्रातः सोकर उठते समय रात को सोते समय गायत्री का मानसिक जप और ध्यान करके नियमित साधना को चालू रखा जा सकता है। एक वर्ष तक नियमित रूप से माता से संबंध बनाये रखा जाय तो साधक की मनोभूमि इतनी परिमार्जित हो जाती है कि उसमें दैवी तत्वों की स्थापना समुचित रूप से हो सकती है।
साधना करता था। अब यातायात का समन्वय सारी दुनिया से हो गया है, सारी दुनिया का एक बाजार बन गया है इसलिये मानवता का समन्वय हमें सारी दुनिया के साथ करना है। अगर समन्वय रूप इस अद्वैत को हम न पा सकें तो हमें मौत ले जायगी।
साधना जारी रखना एक उत्तम शुभारंभ होगा। इसे करने का साहस एवं उत्साह अपने में उत्पन्न करना हमारे लिये एक परम कल्याणकारी दिव्य आयोजन सिद्ध हो सकता है। अखण्ड ज्योति अपने पाठकों को इस आयोजन के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहती है।
साधना के लिए भी कुछ विशेष अवसर बड़े महत्वपूर्ण होते हैं, यह अवधि नवदुर्गाओं की है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-February
साधना हो सकती है। प्रणव योग, विश्वयोग, ध्यानयोग, सूर्ययोग, प्राणयोग, दिव्ययोग, विभुयोग, विज्ञान योग, लययोग, नादयोग, षट्चक्रयोग, ग्रन्थियोग। इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना-विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमता पूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। (मूल्य 2)
साधना करनी पड़ती है, क्योंकि बिना इसके अपना जीवन सहचर के साथ पूर्णतया घुल-मिल जाना नहीं बनता। अतएव विवाह में आत्म-विलीनीकरण परमावश्यक है और यह आत्म विलीनीकरण- देह-भाव का यह उद्देश्य-पशुत्व को दबाने और देवत्व को जगाने का एक साधन है। अतएव विवाह पशुत्व से देवत्व की और बढ़ाने का एक मार्ग है।
साधना का मौका नहीं मिला, वे हमेशा डाल डाल और पात पात पर डोलते रहे परन्तु सफलता देवी के वे दर्शन नहीं कर सके।
साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। (मूल्य 2)
साधना।
साधना, संन्यास, ध्यान, संध्या, नमाज, कथा, कीर्तन, दान, पुण्य, पूजा, अर्चना, भोग, प्रसाद आदि अनेक विधि-विधानों कर्मकाण्डों द्वारा परमात्मा की उपासना की जाती है। इन सबका एक मात्र रहस्य यह है कि मनुष्य प्रभु की सत्ता को अपने समीप देखे, उसका ध्यान रखे, मनोभूमि में उसे प्राथमिकता दे, और अपने चारों ओर ईश्वर की समीपता देखते हुए उचित विचारधारा और कार्यप्रणाली को ही अपनाए। ईश्वर को निकटतम उपस्थित देखने वाला व्यक्ति स्वभावतः सन्मार्गगामी होगा। उसका मन और शरीर उचित गतिविधि को ही अपनाता है। फलस्वरूप सत्कर्मों का फल इतना शान्ति दायक, इतना सन्तोषजनक, इतना कल्याणकारक होता है कि उसे ईश्वरीय वरदान से कम किसी भी प्रकार नहीं कह सकते ।
साधना-विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमता पूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। (मूल्य 2)
साधना कराने के लिए वे भी भिक्षाटन करते हैं। इसमें लेने वाले का लाभ नहीं देने वाले का ही लाभ प्रधान है। आज के भिक्षाजीवियों की दुरावस्था का भयंकर चित्र खींचते हुए तो दुख होता है पर प्राचीन काल में दान धर्म का उदय आत्म कल्याण के प्रधान साधन के रूप में ही हुआ था।
साधना है।
साधनाओं का पथ प्रदर्शन किया गया है। (मूल्य 2)
साधना में अपने को खपा देता है। तब सारे प्रलोभन उसके लिए बेकार हो जाते हैं। संसार तो उसके लिए प्रयोग-शाला रहती है जहाँ वह अपने “स्व-“में प्रतिष्ठित रहता है और उसके तंत्र के आगे किसी को कुछ नहीं समझता ।
साधना करनी पड़ती है क्योंकि बिना इसके अपने जीवन सहचर के साथ पूर्णतया घुल मिल जाना नहीं बनता। अतएव विवाह में आत्म विलीनीकरण परमावश्यक है और यह आत्म विलीनीकरण-देह-भाव का यह उच्छेद-पशुत्व को दबाने और देवत्व को जगाने का एक साधन है। अतएव विवाह पशुत्व से देवत्व की और बढ़ने का एक मार्ग है।
साधनायें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-April
साधना करते रहते हैं। परमात्मा उन्हीं को मिलता है।
साधना से मिलता है। यह परमात्मा हमारे ही अन्दर है, जो संयमी है और जिनके दोष दूर हो गये हैं। वे ही उसका दर्शन कर सकते हैं।
साधना में ही लय हो॥
साधना की परिपक्वावस्था में अहंभाव रह ही नहीं जाता इन्हें साध्य की उपलब्धि हो जाती है और ये सिद्ध पुरुष हो जाते हैं। आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से दूसरी श्रेणी के लोग जहाँ साधन-काल में हैं वहाँ इस तीसरी श्रेणी के महापुरुष सिद्धाँत काल में हैं।
साधना।
साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या- गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं। मूल्य 2 रु 0/
साधना हो सकती है। प्रणव योग, विश्वयोग, ध्यान योग, सूर्ययोग, प्रणवयोग, दिव्ययोग, विभुयोग, विज्ञान योग, लययोग, नाद योग, षट्चक्रयोग, ग्रन्थियोग इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। मूल्य 2 रु 0/
साधना अग्रसर एवं फलवती नहीं होगी।
साधना के लिए परमावश्यक कार्य है।
साधना में पूर्णतया निरत रहते हैं वहाँ इस तीसरी श्रेणी के लोगों को साधना की परिपक्वावस्था में अहंभाव रह ही नहीं जाता इन्हें साध्य की उपलब्धि हो जाती है और ये सिद्ध पुरुष हो जाते हैं। आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से दूसरी श्रेणी के लोग जहाँ साधन-काल में हैं वहाँ इस तीसरी श्रेणी के महापुरुष सिद्धाँत काल में हैं।
साधना से अष्ट सिद्धि, नवनिद्धि और सात शुभ गतियों की प्राप्ति होती है। यह 24 महान लाभ गायत्री के अंतर्गत हैं।
साधना का आरम्भ सर्वसंग परिसंग परित्याग से ही करते हैं। आसक्ति का परिहार पदार्थों-द्रव्यों के स्वरूप को ज्ञान एवं परिणामों के द्वारा होता है। इनका मूलमन्त्र है “एगोहूँ नत्थि में कोह नाह मनस्स कस्सवि”-मैं किसी का नहीं-मेरी आत्मा अकेली है।” मनुष्य जरा सा विचार करे तो इस अकेलेपन का सहज अनुभव हो जाता है। जन्म-ग्रहण के समय आत्मा अकेली ही उत्पन्न होती है सत्य के समय भी सारे पदार्थों को छोड़कर वह अकेली ही परलोक जाती है।
साधनाओं का पथ प्रदर्शन किया गया है। मूल्य 2 रु 0/
साधना अत्यन्त कष्ट साध्य और समय साध्य हैं पर ऐसे कई गुरु होते हैं जो शिष्य के सिर पर हाथ रखकर कुँडलिनी शक्ति को जागृत करा देते हैं। वे अपनी शक्ति के द्वारा षट्चक्रों का, सूक्ष्म ग्रन्थियों का तथा कुँडलिनी का जागरण हो जाता है। ऐसे जागरणों में तत्काल तो पूर्ण सफलता प्रतीत हो जाती पर यदि शिष्य की मनोभूमि बलवान एवं स्थिर हुई तो ही वह सफलता टिकती है, अन्यथा वह धीरे-धीरे अल्प काल में ही समाप्त हो जाती है। जो, हो गुरु की शक्ति अपना चमत्कार तो दिखा ही देती है।
साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है। मूल्य 2 रु 0/
साधनावस्था में मनुष्य भीष्म के समान ही डरता रहता है और उसे विशेष सतर्क रहना पड़ता है किन्तु सिद्धान्त- काल में अभ्यास में प्रतिष्ठित हो जाने पर वह इस तरह के प्रासक्ति सम्बन्धी भय और संशयों से पूर्णतया विमुक्त हो जाता है, उसकी विचारधारा संतुलित होती है।
साधना में प्रवृत्त होता है। यही वह परिपुष्ट एवं सबसे अधिक प्रसन्नता का काल है, जिसके लिए मनुष्य का प्रारम्भिक संघर्ष चलता रहा था। इसी में जीवन का सर्वोच्च ज्ञान मिलता है।
साधनायें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-December
साधनाएं कर ज्ञान लाभ करना नहीं हुआ था। नारद में भी शुकदेव के जैसा ब्रह्मज्ञान था। किन्तु वह भक्ति लेकर था। लोकशिक्षा के लिए प्रहलाद कभी ‘सोऽहं’ भाव में रहते, फिर कभी दास भाव में और कभी सन्तान भाव में रहते थे। हनुमान की भी वैसी अवस्था थी।
साधना ही सफल हो सकती है।
साधना में मन लगता है न विश्वास होता है और न वे तदनुकूल आचरण कर पाते हैं। आयुर्वेद पढ़ना हो तो आरम्भ में हिन्दी और संस्कृत का ज्ञान होना आवश्यक है। अशिक्षित व्यक्ति आयुर्वेद कालेज में नाम लिखाने जाएं तो प्रिंसिपल को यही कहना पड़ेगा कि आपको प्रविष्ट नहीं किया जा सकता।
साधना में गृहस्थ होने का अधिक महत्व है।
साधना ही वास्तव में कर्मयोग की साधना है।
साधना है जिनसे लोग श्रद्धालु होते हैं, संसृति का निर्माण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास स्वभाव-निर्माण, चरित्र-निर्माण, सुखी जीवन-निर्माण के लिए विस्तृत कार्य क्षेत्र काम करने के लिए खाली पड़ा है।
साधना द्वारा देवी शक्तियों को प्राप्त करें। अनाधिकारी व्यक्ति किसी प्रकार उसे प्राप्त भी कर लें तो उसका दुरुपयोग ही करेंगे इसलिए शास्त्रकारों ने प्रतिज्ञा हीन, व्रत हीन, यज्ञोपवीत हीन व्यक्तियों को शूद्र संज्ञा देकर गायत्री का अनाधिकारी ठहरा दिया है। यह प्रतिबन्ध सर्वथा उचित एवं दूरदर्शितापूर्ण ही हैं।
साधनाएं कर उन्होंने ज्ञान लाभ किया था। शुकदेव थे ज्ञान की मूर्ति। शुकदेव का साधनाएं कर ज्ञान लाभ करना नहीं हुआ था। नारद में भी शुकदेव के जैसा ब्रह्मज्ञान था। किन्तु वह भक्ति लेकर था।
साधना निम्नलिखित बातों से सम्भव है :-
साधना है।
साधना करते हैं। घर में रहो चाहे घर छोड़ दो, संसार के कल्याण के लिए कर्म अवश्य करते रहना चाहिये। भगवान के लिये कर्म, लोक कल्याण के लिए कर्म, यह ध्येय रखना और इस पर चलना कर्मयोगी का यही साधन है।
साधना शीघ्र सफल होती है। इस प्रकार योग्यता प्राप्त करने के लिये सत्संग, धर्मग्रन्थ, और भक्त चरित्र का अभ्यास, गुरु आशा का पालन तथा माता-पिता आदि गुरुजनों की तथा भक्तों की सेवा-पूजा करना बहुत आवश्यक है।
साधनाओं द्वारा अलौकिक लाभ प्राप्त कराने वाली शिक्षा, नियमित लेख माला के रूप में हर अंक में छपेगी। ‘हिन्दू धर्म की वैज्ञानिकता’ पर भी एक बड़ी ही खोजपूर्ण लेख माला चलेगी। इस प्रकार अखण्ड-ज्योति, पाठकों की ज्ञान वृद्धि में महत्वपूर्ण अभिवृद्धि करेगी। ढाई रुपया जैसी तुच्छ चीज के लिये पाठकों को इस अमूल्य लाभ से वंचित न रहना चाहिये।
साधनाएं कर ईश्वर का लाभ कर सकते हैं। वे (निर्विकल्प) समाधि से फिर लौटते नहीं हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-January
साधना कीजिये। आर्थिक सफलता आपकी होगी। सब विद्याओं में शिरोमणि वह विद्या है जो हमें कुत्सित और निकृष्ट विचारों से मन को साफ करना सिखाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1950-May
साधना की है और इन सभी ने आशातीत लाभ उठाया है। समस्त ऋषि-मुनि एक स्वर से गायत्री की महिमा गान करते हैं, समस्त धर्म शास्त्रों में गायत्री की गुणगरिमा भरी पड़ी है। अनेक साधकों को जो लाभ हुए हैं उनका संक्षिप्त सा वर्णन “गायत्री ही कामधेनु है।” पुस्तक में किया जा चुका है। हमारा अपना दीर्घ कालीन अनुभव इस संबंध में है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि-गायत्री ही भूलोक की कामधेनु है।
साधना की ओर प्रवृत्ति है वे चाहे ब्राह्मण हों या अब्राह्मण ऐसे ब्रह्मदान के अधिकारी है। (1) गायत्री ही कामधेनु है (2) वेद−शास्त्रों का निचोड़ गायत्री (3) गायत्री की सर्वसुलभ साधनाएं, यह छह-छह आने मूल्य की हमारी सस्ती पुस्तकें इस प्रकार के दान के लिए बहुत ही उपयुक्त है। गायत्री के 24 अक्षर एवं 14 पद हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार 24 या कम से कम 14 पुस्तकें सत्पात्रों का दान करने से अनुष्ठान के अन्त में ब्रह्मदान का उद्देश्य भली प्रकार पूरी हो जाता है। किसी के शरीर को भोजन करा देने की अपेक्षा उसको कल्याण के आनन्द मय मार्ग पर ले जाने वाला ज्ञान-दान देना अधिक महत्व पूर्ण है।
साधना के लिए उपयुक्त अवसर हैं वैसे ही जेष्ठ सुदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक 24 हजार जप पूरे कर लेने चाहिए और गायत्री जयन्ती-गंगादशहरा-के दिन पूर्णाहुति का हवन एवं ब्रह्मदान करना चाहिए।
साधना के लिए कुश के या खजूर बेत आदि वनस्पतियों से बने आसन पर बैठना चाहिए। मुख प्रातःकाल पूर्व को, सायंकाल 2 घन्टे सूर्योदय से पूर्व और शाम को सूर्यास्त के 1 घन्टे पश्चात् इन तीन घन्टों को छोड़ कर रात्रि के अन्य भागों में गायत्री जप नहीं करना चाहिए। पालथी मार कर बैठें रीढ़ की हड्डी सीधी रहे। खुली हवा का एकान्त स्थान ढूँढ़ना चाहिए। यदि बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो तो कपड़े से माला को ढक लेना चाहिए या गौमुखी में हाथ डाल लेना चाहिए।
साधना माँ बनने पर ही पूरी होती है। अपनी कुक्षि से सन्तान का प्रभाव तो संसार को सन्तान स्वरूप मानने के लिए तथा उसकी सेवा में खपा देने के लिए केवल एक व्यावहारिक स्कूल का काम देता है। निःस्वार्थ सेवा की व्यावहारिक शिक्षा भी उसे उसी समय मिलती है। माँ की पुकार सुनकर जिस प्रकार नारी का हृदय उमड़ उठता है और फिर लाख रोकने पर भी स्थिर नहीं रहता। उसी प्रकार नारी का शिक्षित हृदय जिस समय समस्त विश्व की अपनी सन्तान मानकर उसके लिए उमड़ पड़े उसी समय समझना चाहिए कि उसकी शिक्षा पूरी हुई।
साधना करने की भी आवश्यकता है। यह विशेष रूप से किया गया आत्मबल का संचय, विशेष संचित पूँजी की तरह जमा रहता है और किसी विशेष अवसर पर दैवी वरदान की तरह बड़ी महत्व पूर्ण सहायता देता है।
साधनाएं, यह छह-छह आने मूल्य की हमारी सस्ती पुस्तकें इस प्रकार के दान के लिए बहुत ही उपयुक्त है। गायत्री के 24 अक्षर एवं 14 पद हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार 24 या कम से कम 14 पुस्तकें सत्पात्रों का दान करने से अनुष्ठान के अन्त में ब्रह्मदान का उद्देश्य भली प्रकार पूरी हो जाता है। किसी के शरीर को भोजन करा देने की अपेक्षा उसको कल्याण के आनन्द मय मार्ग पर ले जाने वाला ज्ञान-दान देना अधिक महत्व पूर्ण है।
साधना का सबसे बड़ा विघ्न क्रोध नाम का महाराक्षस ही है।
साधना प्रायः निष्फल रहती है।
साधना की महत्वपूर्ण प्रक्रिया का निर्माण किया है। इस साधना द्वारा कुछ ऐसी सुप्त शक्ति ग्रंथियाँ जागृत हो जाती हैं जिनके चुम्बकत्व द्वारा ईश्वरीय महाशक्ति भण्डार से मंगलमयी गायत्री शक्ति प्रचर मात्रा में साधक के पास एकत्रित हो जाती है। इस शक्ति द्वारा वह अनेकों प्रकार के भौतिक और आत्मिक लाभ प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।
साधना दूसरी नहीं हैं। जिन्हें श्रद्धा न हो वे परीक्षा के तौर पर एक छोटा अनुष्ठान करके देखें। इससे उन्हें सन्तोष जनक परिणाम की प्राप्ति होगी।
साधना करनी चाहिए। अनियंत्रित, मनमानी, अविधिपूर्वक की हुई ऊटपटाँग साधना प्रायः निष्फल रहती है।
साधना, पूजा, उपासना, यज्ञ, तप आदि का प्रयोजन यह होता है कि व्यक्तिगत या सामूहिक प्रयत्नों द्वारा उन ईश्वरीय शक्तियों को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त किया जाय जो मनुष्य के लिए हितकर, लाभदायक एवं आनन्दप्रद हैं।
साधना के बारे में फिर कभी लिखेंगे इस अंक में सबसे छोटे 24 हजार के साधन के संबंध में लिख रहे हैं।
साधना पर बैठ जाना कुछ कठिन नहीं हैं। 7 बजे जप पूरा हो जाता है। जिन्हें प्रातःकाल जल्दी ही कोई काम करना हो वे 1 घन्टे सवेरे 1 घन्टा शाम को अपना समय विभाजित कर सकते हैं।
साधना निष्फल नहीं जाती। प्रारब्ध वश प्रधान कामना पूरा न हो तो भी अनेकों अन्य प्रकारों से आपत्तियों की निवृत्ति और सम्पत्तियों की प्राप्ति होती है। इन्हीं सब आत्मिक और भौतिक लाभों के कारण गायत्री को माता की उपमा दी जाती है मातृभाव से गायत्री की पूजा की जाती है।
साधना आरंभ करने से पूर्व किसी सुयोग्य गायत्री उपासक को पथ प्रदर्शक आचार्य नियुक्त कर लेना चाहिए। उसके संरक्षण पथ प्रदर्शन के साधन करना उचित होता है। गायत्री को माता, आचार्य को पिता, मानकर आत्मोन्नति के व्रत का प्रतीक यज्ञोपवीत कंधे पर धारण करके साधना करनी चाहिए। अनियंत्रित, मनमानी, अविधिपूर्वक की हुई ऊटपटाँग साधना प्रायः निष्फल रहती है।
साधना द्वारा कुछ ऐसी सुप्त शक्ति ग्रंथियाँ जागृत हो जाती हैं जिनके चुम्बकत्व द्वारा ईश्वरीय महाशक्ति भण्डार से मंगलमयी गायत्री शक्ति प्रचर मात्रा में साधक के पास एकत्रित हो जाती है। इस शक्ति द्वारा वह अनेकों प्रकार के भौतिक और आत्मिक लाभ प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-June
साधना के प्रमाण-पत्र भेजे जायेंगे और वहाँ गायत्री तपोभूमि की एक शाखा मान ली जायगी।
साधनारत नहीं देखा था। कहने को तो प्रयाग में लाखों ही “साधू” आते हैं, तपस्या भर करते हैं। परन्तु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ऐसे ही नामधारी साधुओं ने धर्म में ढोंग को आश्रय देकर, नास्तिकता की विचारधारा को फैलाने में सहायता की है।
साधना को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए अद्वितीय क्षेत्र है। साधकों के लिए यहाँ समुचित सुविधा रहती है। जो लोग घर से निवृत्त होकर साधन रत जीवन व्यतीत करना चाहते हैं,उनके लिए असाधारण शान्तिदायक स्थान है।
साधना करने कि लिए कटिबद्ध हो गये हैं। कितने ही साधक और कार्यकर्ता अब इस क्षेत्र में शम्भूसिंहजी से भी आगे बढ़ चले हैं, इन सब के मिलजुल कर परम निष्ठा और श्रद्धा से परिपूर्ण अत्यन्त प्रेम भावना के साथ कार्य करने का फल है कि उस क्षेत्र में सराहनीय आध्यात्मिक वातावरण तैयार हो रहा है। इन साधकों और कार्यकर्त्ताओं का विस्तृत परिचय चित्रों समेत किसी अगले अंक में प्रस्तुत करेंगे।
साधनाएं, (7) स्त्रियों को गायत्री अधिकार।
साधना के साथ-साथ अन्य असंख्य आत्माओं को प्रकाश देने के लिए युग पुरुषों की भाँति कुछ कार्य करने के लिए कटिबद्ध हो रहे हैं। यों तो अपनी-अपनी शक्ति, सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार सभी साधक गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश व्यापक क्षेत्र में फैलाने के लिए कुछ न कुछ कर ही रहे हैं, पर इन दिनों राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में जो असाधारण उत्साह दृष्टिगोचर हो रहा है, उससे धर्म की अभिवृद्धि और अधर्म के नाश का कार्य तीव्र गति से होता दीखता है।
साधना की सरस भूमि है।
साधना की दिशा में कदम ही कोई बिरला उठाता है पर जो उठाते हैं, वे भी बड़े संकीर्ण दायरे तक सीमित रह जाते हैं। अन्य परिश्रमों की भाँति इस श्रम का फल भी उन्हें मिलता ही हैं, पर वह शाश्वत सत्य उन्हें नहीं मिल पाता, जो संसारी संकीर्ण दृष्टि रखने वालों को नहीं-परमार्थ बुद्धि, विश्व-सेवा, जनहित और सर्वात्मा परमात्मा के प्रति अपना अपनत्व समर्पण कर देने वालों को होता है। गीता में ऐसी ही दृष्टि रखकर ईश्वर-उपासना करने वालों को सच्चा भक्त , योगी, ज्ञानी, संन्यासी कहा गया है और बताया गया है कि ब्रह्म निर्माण, शाश्वत शान्ति, परम समाधि एवं जीवन मुक्ति का अक्षय पुण्य ऐसी ही आध्यात्मिक स्थिति वालों को मिलना सम्भव है।
साधना और तपश्चर्या
साधना से आती है यह प्रसन्नता प्रतिकूल परिस्थितियों से नष्ट नहीं होती। प्रौढ़ लोगों की प्रसन्नता ही वास्तविक प्रसन्नता है; क्योंकि वह स्थायी रहती है। इस प्रसन्नता को हम सभी लाभकर सकते हैं। इसके लिये हमें आध्यात्मिक शक्ति बढ़ानी पड़ेगी।
साधना, तपश्चर्या, पुरश्चरण आदि करने में अनुभवी संरक्षण तथा सिद्ध भूमि की विशेषता का लाभ भी मिलता है। यह स्थान आत्म-बल की साधना को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए अद्वितीय क्षेत्र है। साधकों के लिए यहाँ समुचित सुविधा रहती है। जो लोग घर से निवृत्त होकर साधन रत जीवन व्यतीत करना चाहते हैं,उनके लिए असाधारण शान्तिदायक स्थान है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-April
साधना, तप और संयम का अपूर्व उदाहरण है। जैन धर्म के अनुसार संसार में जीव के अनादि काल से परिभ्रमण करते रहने का कारण उसके कर्म ही हैं। आत्मा के साथ कर्म का बन्धन मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, मन, वचन, कायारूप भोग्य और प्रमाद से होता है। कर्मों के आने के मार्ग को आश्रव कहा जाता है। कर्म बंध को रोकने को संवर या संयम कहते हैं।
साधना यज्ञ द्वारा ही हो सकती है। वेद कहता है:—
साधना करें, जिससे कि तू हमारा और हम तेरे बन जायं। अतः जो भक्त प्रभु को अपना बनाना चाहता है; उसे वेद के कथनानुसार अपने जीवन को यज्ञमय बनाकर प्रभु का बन जाना होगा। वेद न तो प्रभु का नाम ही “यज्ञसाध” रखा है, अर्थात् साधना यज्ञ द्वारा ही हो सकती है। वेद कहता है:—
साधना में इस पर बड़ा जोर दिया गया हैं। क्योंकि असंयत व विवेक रहित स्वच्छंद जीवन ही मनुष्य के पतन का एक मात्र कारण है।
साधना में दत्तचित्त हो जाना चाहिये। संख्या पूरी करने की हड़बड़ी छोड़कर प्रेम और एकाग्रता को अपनाना चाहिये। कम से कम दोनों काल (प्रातः सायं) में तीन घंटा समय निकाल कर 26 माला प्रति दिन नियमित समय पर जपना चाहिए। 10 माला जपने में साधारणतया एक घंटे का समय लगता है। इस भाँति 24000 का लघु अनुष्ठान पूरा करना चाहिये।
साधना के नियम साधारण ही हैं। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धतापूर्वक प्रातःकालीन उपासना पूर्व मुख एवं सन्ध्या काल की पश्चिम मुख होकर करनी चाहिये। जप के समय घी का दीप या कम से कम धूपबत्ती जलती रहे। जल का पात्र निकट में रहे। नित्य सन्ध्या कर लेने के उपरान्त गायत्री माता और गुरु का पूजन करके जप प्रारम्भ कर देना चाहिये।
साधना द्वारा ही उसकी स्तुतिः प्रार्थना और उपासना करो।
साधना में लगेगा, वह कदापि निष्फल न होगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-May
साधना को पूर्ण कर चुके हैं अग्नि देव तथा जनता जनार्दन के सामने आचार्य जी से आशीर्वाद प्राप्त करके अपने जीवन को गायत्री की शिक्षा के अनुसार व्यतीत करने की मौन घोषणा कर रहे हैं।
साधनात्मक 2-शिक्षात्मक। साधनात्मक कार्य से जप, जप, यज्ञ आदि आध्यात्मिक प्रक्रियाएं रहेंगी। शिक्षात्मक कार्यों में वाणी से लेखनी से, दृश्यों से या अन्य प्रकार से जन मानस की दिशा मोड़ने का कार्य किया जाएगा, इसे प्रचारात्मक या रचनात्मक कार्य कह सकते हैं। हमें तथा आपको कंधे कंधा मिलाकर कार्य करना है। इन दोनों ही कार्यों की पूर्णता के लिये इस छोटे से जीवन का अधिकाँश भाग खपा देने का व्रत लेकर हम लोग परमार्थ का पुण्य साधन और जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बनाने का स्वार्थ साधन भी कर सकेंगे।
साधना का सच्चा स्वरूप है उसके अर्थ का चिन्तन तथा मनन करना, और जीवन को उसके अनुसार बनाना।
साधनात्मक और शिक्षात्मक मार्गों द्वारा विश्व मानव की सेवा करने के लिये आपकी अन्तरात्मा को तीव्र संवेदना के साथ आह्वान करते हैं। क्योंकि इतने विशाल पैमाने पर कार्य करने के लिए, आप जैसी मनस्वी आत्माओं की बड़ी संख्या में आवश्यकता है।
साधनात्मक एवं शिक्षात्मक कार्यक्रमों में तत्परता प्रकट करेंगे उन्हें ‘व्रतधारी” माना जायगा। पिछले अंकों में कर्मयोगी व्रतधारी तथा आत्मदानी की तीन श्रेणियाँ बनाई गई थीं। पूर्णाहुति के अवसर पर आने वाले सज्जनों से भी तीन प्रकार के फार्म भराये गये थे, वह योजना रद्द करके अब सब के लिये एक ही श्रेणी व्रतधारी रखी गई है। क्योंकि भावना तीनों की एक है। परिस्थितियों के कारण ही समय देने में थोड़ी न्यूनाधिकता करनी पड़ती है।
साधना करूंगा, इन्द्रियों पर काबू रखूँगा, व्यसन और व्यभिचार, से बचूँगा।
साधनात्मक कार्यक्रम में 108 यज्ञों का एक संकल्प पूर्णाहुति के समय पर मथुरा में किया था। उसकी आवश्यकता जन मानस में धार्मिक एवं सात्विक प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करने की दृष्टि से अत्याधिक है। उस सामूहिक संकल्प की पूर्णाहुति गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ सुदी 15 ता॰जुलाई 56 के दिन करने का) निश्चय किया गया है। इस संकल्प को पूर्ण करने के लिये हमारे प्रत्येक परिजन को लग जाना चाहिये। जहाँ-जहाँ गायत्री महायज्ञ के भागीदार या संरक्षक हैं वहाँ-वहाँ छोटे या बड़े रूप में एक यज्ञ गुरुपूर्णिमा के दिन उस क्षेत्र में अवश्य होना चाहिये।
साधना में यह बात कैसे घटेगी? इस में तो प्रत्येक साधक ने एक निश्चित समय में अपने अपने संकल्प के अनुसार गायत्री मंत्र का जाप किया है और उस जाप को पूर्ण करके यहाँ पूर्णाहुति देने आया है।
साधना में रता थे। उन्होंने पूछा कि “यज्ञ के बाद ये याज्ञिक लोग कुछ आर्थिक लाभ (दान पुण्य आदि प्राप्त करने के रूप में) प्राप्त करेंगे!” तो उन्हें बताया गया कि ये लोग कर्मकाँडी पंडित, चौबे अथवा पंडे नहीं हैं। न ये वैसे “साधु बाबा” हैं जो लकड़ी के ढेर में आग लगाकर तपने का ढोंग करके सीधे साधे देहातियों को लूटते—ठगते हैं। दूसरी ओर इनमें से अधिकाँश, गृहस्थ हैं जो कि सैकड़ों रुपये मार्ग व्यय, भाड़ा आदि वहन करके अपनी पूरी वर्ष की तपस्या को पूर्ण करने आये हैं। ढोंग या पाखंड की न इन्हें आवश्यकता है और न गायत्री तपोभूमि को।
साधना का अभिप्राय आपने केवल मन्त्रों का जाप करना ही समझा है तो आपने गायत्री साधना के वास्तविक स्वरूप को समझा ही नहीं। गायत्री साधना का सच्चा स्वरूप है उसके अर्थ का चिन्तन तथा मनन करना, और जीवन को उसके अनुसार बनाना।
साधना के वास्तविक स्वरूप को समझा ही नहीं। गायत्री साधना का सच्चा स्वरूप है उसके अर्थ का चिन्तन तथा मनन करना, और जीवन को उसके अनुसार बनाना।
साधनात्मक कार्य से जप, जप, यज्ञ आदि आध्यात्मिक प्रक्रियाएं रहेंगी। शिक्षात्मक कार्यों में वाणी से लेखनी से, दृश्यों से या अन्य प्रकार से जन मानस की दिशा मोड़ने का कार्य किया जाएगा, इसे प्रचारात्मक या रचनात्मक कार्य कह सकते हैं। हमें तथा आपको कंधे कंधा मिलाकर कार्य करना है। इन दोनों ही कार्यों की पूर्णता के लिये इस छोटे से जीवन का अधिकाँश भाग खपा देने का व्रत लेकर हम लोग परमार्थ का पुण्य साधन और जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बनाने का स्वार्थ साधन भी कर सकेंगे। इन दोनों ही प्रकार के साधनात्मक और शिक्षात्मक मार्गों द्वारा विश्व मानव की सेवा करने के लिये आपकी अन्तरात्मा को तीव्र संवेदना के साथ आह्वान करते हैं।
साधना में संलग्न रहते थे। आजकल हम वैसे ब्राह्मण नहीं रहे। यही कारण है कि हम सदैव ब्रह्मभोजों के निमंत्रण को अस्वीकार करते रहे, क्योंकि हमारे पास धन-धान्य था और हम उसकी वृद्धि के लिए प्रयत्नशील भी रहते थे। ब्रह्मतेज तथा धनतेज दोनों एक साथ नहीं रह सकते। सरस्वती तथा लक्ष्मी का विरोध एक प्रसिद्ध बात है।
साधना में लगने के लिए गायत्री तपोभूमि सादर आमन्त्रित करती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-March
साधना और अपने सेवा क्षेत्र के यजमानों की विविध विधि साँस्कृतिक सेवा करने में संलग्न रहते थे। यजमान भी समय 2 पर श्रद्धापूर्वक दान दक्षिण देकर उनके जीवन निर्वाह की व्यवस्था करते थे। गान्धीजी प्रत्येक ग्राम में एक ‘ग्रामसेवक” द्वारा रचनात्मक कार्य किए जाने पर जोर देते थे। लगभग वैसी ही साँस्कृतिक योजना के आधार पर प्राचीनकाल में हमारे दूरदर्शी पूर्वजों ने यजमान और पुरोहित की परम पुनीत परम्परा प्रचलित की थी।
साधना एवं अनुभव है।
साधना का अभिप्राय मानव की आसुरी प्रकृति का संस्कार एवं उसे दैवी प्रकाश के योग्य बनाना है। जब आन्तरिक संस्कार हो जाता है, तब आत्मज्ञान एवं ब्रह्मानन्द अन्तःकरण से स्वतः प्रकाशित होते हैं। इस आन्तरिक शुद्धि के अभाव में आत्म-साक्षात्कार के समस्त प्रयत्न उसी प्रकार निष्फल होते हैं। बिना आन्तरिक शुद्धि के यह प्रयत्न ऐसा ही है, जैसे लंगर पड़ी हुई नाव को खेने का प्रयत्न। ऐसी परिस्थिति में प्रगति असंभव है।
साधना से प्राप्त होती थी।
साधना अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है। सच्ची साधना द्वारा ही मनुष्य मुक्ति एवं ब्रह्मानन्द लाभ कर सकता है। मानव प्रकृति मल, विक्षेप, एवं आसुरी तत्त्व से युक्त है। साधना का अभिप्राय मानव की आसुरी प्रकृति का संस्कार एवं उसे दैवी प्रकाश के योग्य बनाना है। जब आन्तरिक संस्कार हो जाता है, तब आत्मज्ञान एवं ब्रह्मानन्द अन्तःकरण से स्वतः प्रकाशित होते हैं।
साधना द्वारा ही मनुष्य मुक्ति एवं ब्रह्मानन्द लाभ कर सकता है। मानव प्रकृति मल, विक्षेप, एवं आसुरी तत्त्व से युक्त है। साधना का अभिप्राय मानव की आसुरी प्रकृति का संस्कार एवं उसे दैवी प्रकाश के योग्य बनाना है। जब आन्तरिक संस्कार हो जाता है, तब आत्मज्ञान एवं ब्रह्मानन्द अन्तःकरण से स्वतः प्रकाशित होते हैं। इस आन्तरिक शुद्धि के अभाव में आत्म-साक्षात्कार के समस्त प्रयत्न उसी प्रकार निष्फल होते हैं।
साधना-सुषमा के संवाद, सृष्टि के श्रेयष्कर पन्थान॥ 2 ॥
साधना ही इसके निवारण के उपाय हैं। इसलिये हमें थोड़ी देर के लिये भी अपने में दुष्ट भावना को नहीं आने देना चाहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-August
साधना ओर सेवा का यह अद्भुत समन्वय जीवन को सफल बनाने के लिए परम मंगलमय हैं। जिनको अवसर तथा सुविधा हो वे यहाँ रहकर अपने समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करने के लिए तपोभूमि में अधिक से अधिक समय निवास करने का सौभाग्य प्राप्त करें। शिक्षा के नियम
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-February
साधना का प्रारम्भ विचार से ही होता है। संसार अनन्त है। उसमें अनेकों प्रकार की विचार करने की सामग्री विद्यमान है। किसी भी एक विषय को ले लीजिये यदि हम उस पर विचार करना प्रारम्भ करेंगे तो हमें उसमें नित्य ही कोई न कोई नवीन बात मिलती ही रहेगी। इसी से तो संसार की उपमा दिये जाने के लिए तत्वज्ञों को समुद्र से अधिक उपयुक्त कोई दूसरी वस्तु दिखाई ही नहीं पड़ी।
साधना का मूल मन्त्र ही विचार है। भगवान् ने हमारे मस्तिष्क को ऐसा बनाया है कि हम उससे विचार की तरंगें उत्पन्न करने के साथ ही साथ दूसरों के द्वारा भेजी गई विचार की तरंगों को भी ग्रहण कर सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य साधारणतया विचार की तरंगें क्षण-क्षण में अपने मस्तिष्क से दौड़ता रहता है; लेकिन दूसरों के द्वारा भेजी हुई विचार तरंगों को हर एक व्यक्ति साधारणतया ग्रहण नहीं कर सकता। कारण कि साधारण मनुष्यों का मस्तिष्क इस कोटि तक विकसित नहीं रहता। मस्तिष्क को इस कोटि तक विकसित करना एकमात्र अभ्यास से ही संभव हो सकता है।
साधना करनी होगी”- रैदास गिड़गिड़ाए—प्रभो! मैं अत्यन्त नीच हूँ मेरे लिए क्या यह कभी सम्भव है।” रामानन्दजी ने करुणा भरी दृष्टि से रैदास की ओर देखा। अनन्तर अपने कर-कंज से रैदास का सिर स्पर्श कर स्नेहसिक्त वाणी में कहा—“देखो रैदास, बाहर का मार्ग साफ करने से कुछ काम चलने वाला नहीं है। धर्म का मार्ग आज जितना संकट का है, उतना पहले नहीं था। विघ्नरूपी कूड़ा-करकट जो कि अनेक प्रकार का है, उस पर जम गया है।
साधना है। परिस्थिति वश- भरत को राम का राज चलाने के लिए एक ट्रस्टी का काम करना पड़ा था, पर भरत का मन कभी भी राज में लिप्त न हुआ, वरन् शरीर से उस काम का चलाते हुए भी मन को सदा भगवान के चरणों में लगाये रखा। ठीक यही स्थिति आत्मदानी की होगी। अपने पदार्थों को, सम्पत्ति को, सम्बन्धियों को अपना न मानकर केवल उनकी सेवा के लिए नियुक्त एक जिम्मेदार माली के समान अपनी स्थिति अनुभव करते रहना, यह गीता में बताया हुआ अनासक्त कर्मयोग है। संकल्पपूर्वक ‘आत्मदान’ की घोषणा समारोह-पूर्वक करने से अनासक्त कर्मयोगी की मनोभूमि की सृष्टि होती है और ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करना अधिक सरल हो जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-November
साधना का प्रारम्भ श्रद्धा से ही करें।
साधना में कम ही लोग लग पाते हैं। मानव सामाजिक प्राणी है, समाज के और मानव-जाति के प्रति उसका कर्त्तव्य है। तभी तो गीताँजलि के अमर गायक रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने कहा था- ओ मन्दिर के एकान्त कोने में बैठकर पूजा करने वाले, उठ, हाथ की माला का जाप छोड़ दे और वहाँ चल, जहाँ किसान हल जोत रहा है और पसीने से लथपथ मजदूर पत्थर फोड़ रहा है।
साधना का नहीं, मानव के स्वार्थ का उपादान बना हुआ है। आदर्श जीवन की बात इससे आज बड़ी अटपटी लगती है। लोग हँसकर कहते हैं कि हमारा आदर्श तो पैसा है जिसके बिना इस आज की दुनिया में जीना ही सम्भव नहीं है। बात सही है। जहाँ प्रेम का स्थान पैसा ले लेता है, वहाँ जीना सम्भव हो कैसे सकता है?
साधना करने की अपेक्षा नवरात्रि में सब लोग अपने अपने यहाँ ही आयोजन करें इस प्रेरणा से अब की बार सर्वत्र बड़े पैमाने पर और अधिक उत्साह से नवरात्रि के सामूहिक आयोजन हुए। एक ने दूसरे का उत्साह बढ़ाया और पुराने तथा नये साधकों ने ब्रह्मचर्य, उपवास, नियम, संयमों के साथ 24 हजार के अनुष्ठान किये। अधिकाँश स्थानों पर ऐसा हुआ कि लोग अलग-2 अपनी-2 कोठरियों में इकट्ठे होने की अपेक्षा किसी एक स्थान पर जमा होकर साथ साथ पूजन, जप अनुष्ठान करते रहे और अन्त में हवन भी सब ही किया। अलग अलग रहने की, अलग अलग काम करने की अपेक्षा साथ साथ सामूहिकता, सहकारिता, सामाजिकता की भावना सब दृष्टियों से प्रशंसनीय है। प्राचीन काल में त्यौहार, पर्व तीर्थ सत्संग, कथा, हवन आदि के आधारों पर एक समय अधिक इकट्ठे होकर धार्मिक कृत्य करने की प्रथा को अधिक महत्व दिया जाता था।
साधना सदा की भाँति बड़े आनन्द से सम्पन्न हुई। यों साधकों की यही इच्छा रहती है कि तपोभूमि के परम पवित्र वातावरण में ही नवरात्रि उपासना करें। पर इससे यह हानि होती है कि प्रभावशाली उपासकों के मथुरा चले आने से उनके स्थानों पर कोई सामूहिक कार्यक्रम नहीं हो पाता। अतएव इस बार जहाँ कोई और साधक नहीं है, गायत्री परिवारों का संगठन नहीं है वहाँ के साधकों को ही मथुरा आने की स्वीकृति दी गई और जहाँ अन्य उपासक भी हैं वहाँ के लोगों को यह प्रेरणा की गई कि वे अपने यहाँ ही जप हवन प्रवचन सामूहिक आयोजन करें। आगे भी नवरात्रि के संबंध में यही नीति रहेगी।
साधना से प्रत्यक्ष रूप से शाँति प्राप्त हो मैं उसी का समर्थक हूँ।
साधना में ईश्वर का पुट दिया गया तो समस्त विश्व गर्त में चला जायगा। इसकी सिद्धि में उनके पास भी पर्याप्त तर्क एवं ऐतिहासिक-प्रमाण हैं।
साधना की श्रद्धा भरी लीक ही बन जाती है। इस दृष्टि से आरंभिक साधकों में गायत्री चालीसा का अधिकाधिक प्रचार होना चाहिए उसके समय-समय पर सामूहिक जप, पाठ कीर्तन भी हों। गायत्री चालीसा का मूल्य –) है। पर प्रचारार्थ वितरण करने के उद्देश्य से मँगाने वाली शाखाओं को यदि वे कम से कम पाँच सौ मँगालें तो लागत में भी घाटा सहकर उन्हें 2 रु. सै. अर्थात् 540 दस रुपये में दिये जावेंगे। इसका रेल भाड़ा जो करीब 1-1॥ रुपया लगेगा मँगाने वालों को ही देना होगा।
साधनाओं और आयोजनों का उत्साहवर्धक विवरण छपना उचित प्रतीत होता है पर उनका दो-दो चार-चार लाइनों में भी परिचय कराया जाय तो पूरी एक अखंड ज्योति ही उससे भर जायेगी। इसलिए उन शुभ प्रयत्न कर्ताओं को हार्दिक धन्यवाद देते हुए सर्व शक्तिमान माता से साधकों की भावनाओं को और अधिक विकसित करने के लिए प्रार्थना करते हैं।
साधना और उपासना के क्षेत्र के कर्मवीर अब गायत्री माता की प्रेरणा “धियोयोनः” में “नः” – “हम सब” के तत्वज्ञान को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं और एकान्त सेवी अलगाव की प्रकृति को बदल कर सहयोग की प्रेम गंगा का अवतरण कर रहे हैं।
साधनाओं का प्रारम्भ होता है! यदि हम सफलता चाहते हैं तो अपनी साधना का प्रारम्भ श्रद्धा से ही करें।
साधना की जाय।
साधनाऐं की ऐसी सूचना हजारों की है। इन सामूहिक एवं व्यक्तिगत साधनाओं और आयोजनों का उत्साहवर्धक विवरण छपना उचित प्रतीत होता है पर उनका दो-दो चार-चार लाइनों में भी परिचय कराया जाय तो पूरी एक अखंड ज्योति ही उससे भर जायेगी। इसलिए उन शुभ प्रयत्न कर्ताओं को हार्दिक धन्यवाद देते हुए सर्व शक्तिमान माता से साधकों की भावनाओं को और अधिक विकसित करने के लिए प्रार्थना करते हैं।
साधनाऐं हुई हैं उनका उल्लेख न करते हुए जहाँ सामूहिक अनुष्ठान और यज्ञ हुए हैं उन स्थानों के नाम तारीख 20 तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नीचे दे रहे हैं:—
साधनाओं के लिए सर्वोत्तम समय है। इस आश्विन की नवरात्रि में गायत्री परिवार द्वारा सर्वत्र बड़े उत्साह से सामूहिक साधनाऐं की गईं। “तपोभूमि आकर साधना करने की अपेक्षा नवरात्रि में सब लोग अपने अपने यहाँ ही आयोजन करें इस प्रेरणा से अब की बार सर्वत्र बड़े पैमाने पर और अधिक उत्साह से नवरात्रि के सामूहिक आयोजन हुए। एक ने दूसरे का उत्साह बढ़ाया और पुराने तथा नये साधकों ने ब्रह्मचर्य, उपवास, नियम, संयमों के साथ 24 हजार के अनुष्ठान किये। अधिकाँश स्थानों पर ऐसा हुआ कि लोग अलग-2 अपनी-2 कोठरियों में इकट्ठे होने की अपेक्षा किसी एक स्थान पर जमा होकर साथ साथ पूजन, जप अनुष्ठान करते रहे और अन्त में हवन भी सब ही किया।
साधना में सफलता प्राप्त कर संसार में शुद्धि के स्रोत चिरस्थायी बनाये रखने में सफल हो सके हैं।
साधनाऐं की गईं। “तपोभूमि आकर साधना करने की अपेक्षा नवरात्रि में सब लोग अपने अपने यहाँ ही आयोजन करें इस प्रेरणा से अब की बार सर्वत्र बड़े पैमाने पर और अधिक उत्साह से नवरात्रि के सामूहिक आयोजन हुए। एक ने दूसरे का उत्साह बढ़ाया और पुराने तथा नये साधकों ने ब्रह्मचर्य, उपवास, नियम, संयमों के साथ 24 हजार के अनुष्ठान किये। अधिकाँश स्थानों पर ऐसा हुआ कि लोग अलग-2 अपनी-2 कोठरियों में इकट्ठे होने की अपेक्षा किसी एक स्थान पर जमा होकर साथ साथ पूजन, जप अनुष्ठान करते रहे और अन्त में हवन भी सब ही किया। अलग अलग रहने की, अलग अलग काम करने की अपेक्षा साथ साथ सामूहिकता, सहकारिता, सामाजिकता की भावना सब दृष्टियों से प्रशंसनीय है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-January
साधनारत होंगे—उनका दशाँश पुण्य, इन पुस्तकालयों की स्थापना का प्रयत्न करने वालों को सदैव मिलता रहेगा। क्योंकि शुभ-अशुभ कार्यों में प्रेरणा करने वाले को भी दशाँश पाप पुण्य का भाग मिलता है। इन पुस्तकों से कुछ थोड़ा सा लाभ बचता है वह गायत्री तपोभूमि का खर्च चलने में ही काम आता है। इस प्रकार इन पुस्तकालयों की स्थापना एक प्रकार से गायत्री महायज्ञ की आर्थिक सहायता करना भी है। इस प्रकार सद्ज्ञान प्रसार और तपोभूमि की सहायता का दुहरा पुण्य इस पुनीत प्रयत्न में छिपा हुआ है।
साधना द्वारा, पुरुषार्थियों को अधिदैविक रूप से राज नेतृत्व-शक्ति और कीर्ति प्रदान करता है (3) योगाभ्यासी, आध्यात्म हवन करने वाले को इन्द्रिय निष्ठा मन का, निरोध का, ब्रह्म का, साक्षात्कार मिलता है।
साधनादि प्राप्त होते हैं। यज्ञ के इन्हीं मूल रूपों से भारत के पूज्य ऋषिगणों ने पञ्च महायज्ञ निरूपित कर सबों को यज्ञशिष्ट भोग कर निष्पाप और भगवद् प्राप्ति के योग्य बनने का निर्देश दिया था वे ये हैं:-
साधना पूरी की है वे चाहें तो 1250 गायत्री पुस्तकालय स्थापित करने—जिसका महत्व इतने ही गायत्री देवालय बनवाने से किसी भी प्रकार कम नहीं है—का कार्य भी आसानी से पूरा कर सकते हैं। अधिकाँश गायत्री उपासकों के पास पहले से ही गायत्री साहित्य की बहुत-सी पुस्तकें मौजूद हैं जो कम हों उन्हें अब मंगा कर अपना गायत्री पुस्तकालय पूरा कर सकते हैं। जहाँ ऐसी स्थिति हो कि एक व्यक्ति सब पुस्तकें न मँगा सके वहाँ चार पाँच व्यक्ति मिलकर उन्हें मंगा सकते हैं और मिलजुल कर एक पुस्तकालय चला सकते हैं। जहाँ पूरे पैसों का अभी प्रबन्ध न हो सके वहाँ से आधे पैसे अभी भेज देने पर शेष आधे पैसे की उधार पुस्तकें भी भेजी जा सकती हैं। यह शेष पैसा पूर्णाहुति के समय आने जाने वाले किसी व्यक्ति के हाथों भेजा जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-July
साधना करने वाले, किसी आसुरी मोह-ममता के बन्धन में न पड़ें, हमारा यजन (यज्ञ क्रिया) किसी दुष्ट भाव से नहीं हो, हमारा आहार राजसी और तामसी न हो, कदाचित कभी हो भी तो हे यज्ञ! उसे तू हमारे लिए विष रहित बना देना। हम तुम्हारी वेदी में, जो कि सदा ही सुख देने वाली है, बैठकर गार्हपत्य अग्नि में स्वाहा पूर्वक हवन करें। हमें यश और ऐश्वर्य देने वाली वाणी और विद्या की प्राप्ति हो, इसीलिए स्वाहा पूर्वक हम आहुति देते हैं। उक्त यश और ऐश्वर्य को धारण करने वाली वाणी के अनुकूल ही सदा-सर्वदा हमारा आचरण हो, इसीलिए हम आहुति देते हैं।
साधना से मनुष्य जहाँ अपने शत्रुओं का दमन करने में समर्थ होता है वहाँ वह मदान्ध होते भी देखा गया है। सर्वत्र विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति अहं रहित कम ही पाये जाते हैं। इसीलिये शक्तिशाली अधिकतर पतनोन्मुख हो जाते हैं।
साधनायें।=)
साधना में समुचित प्रगति एवं सफलता की संभावना तभी रहती है जब उसकी विधिवत् दीक्षा ली गई है। ‘राम’ यह दो अक्षर का मंत्र सर्व विदित हैं, फिर भी कबीर को इसे सफल बनाने के लिए इस ‘राम’ मंत्र को श्री स्वामी रामानंद जी से गुरु दीक्षा के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता पड़ी थी।
साधना अवश्य है।
साधना को पूर्ण करने के लिये स्त्री से शरीर स्पर्श न कराने का नियम बना लेते हैं, पर साधारण गृहस्थ जीवन में यह नियम नहीं चल सकता। सभी व्यक्ति अपनी माता के चरण छूते हैं। उनके लिये नारी जाति के अंतर्गत आने वाली माता के शरीर स्पर्श का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। बहिनें अपने भाइयों से भुजा पसार कर प्रेम पूर्वक मिलती-जुलती है। बहुएं अपने सास-ससुर दोनों के चरण स्पर्श करती हैं।
साधना —)।
साधनाओं में तन्मय होकर अपनी आत्मा में अखंड प्रकाश का अनुभव करना चाहें, उनका तपोभूमि स्वागत करेगी उनके भोजन आदि की सुविधा भी यहाँ मौजूद है।
साधना निरन्तर चलती रहती है। यह अविराम-गतिशीलता ही उसकी नित्यता और विकासशीलता है, पर भारतीय संस्कृति जितनी महान् और व्यापक है उसकी समाज-व्यवस्था उतनी ही निम्न और संकीर्ण है। हमारी संस्कृति में प्रवाहमान वेगशीलता अब भी है पर समाज व्यवस्था की चट्टान से उसका वेग शतशः रुद्ध है। क्या कभी उसके इस अवरोध का अवरोध सम्भव है?
साधना में यह विशेष साधना अवश्य है।
साधनाओं को संभालने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले सकें इस योजना के लिए आवश्यक हैं, जो महिलायें तथा पुरुष इन अखंड साधनाओं में तन्मय होकर अपनी आत्मा में अखंड प्रकाश का अनुभव करना चाहें, उनका तपोभूमि स्वागत करेगी उनके भोजन आदि की सुविधा भी यहाँ मौजूद है।
साधना और चिंतन की उपज है, मानवता को एक करने की अधिक से अधिक क्षमता उसमें है पर उसके प्रकाश में जब हम समाज का दलित-गलित रूप देखते हैं तो ऐसा लगता है कि कभी इस राष्ट्र के लोक-जीवन में सामूहिक चेतना जग ही नहीं सकती, उसका विगत एक हजार वर्ष का इतिहास पराजय और आपसी घृणा का इतिहास है। वह ऐसी अचल जातों का ढेर है जिनमें न जीवन है और न ही गति। आशा-निराशावाद, हिंसा-अहिंसा और प्रवृत्ति-निवृत्ति की विचारधाराओं से इस साँस्कृतिक पतन का उतना सम्बन्ध नहीं जितना कि सदोष वर्णमूलक समाज व्यवस्था से। इसमें वह विष है जो साझेदारी के भाव को मार देता है और सामूहिक चेतना को कुण्ठित कर देता है। ऊँच-नीच की भावना से एक दूसरे के प्रति घृणा होने लगती है और फिर जातियों में द्वेष की परम्परा चल पड़ती है, जड़-समाज व्यवस्था में ऐहिक दुःख और विषमता से खीज कर, काल्पनिक सुख की खोज में परलोकवाद और मुक्ति की ओर झुकाव स्वाभाविक हो उठता है, मध्ययुग में हमने चारों ओर से अपने को समेट लिया और कछुआ धर्म ही जीवन का आधार बना लिया।
साधनाओं को सफलीभूत करने का सर्वोपरि साधन है।
साधना वैसी सफल नहीं होती जैसी होनी चाहिए और जिन्हें ऐसे संयोग, सुअवसर मिल जाते हैं, उनकी सफलता का मार्ग सरल हो जाता है। वशिष्ठ और विश्वामित्र का शाप लगने और उसका उत्कीलन करने पर मंत्र सिद्ध होने की आख्यायिका का यही अलंकारिक रहस्य है। अन्यथा चारों वेदों की जननी को भला कोई क्यों शाप देगा और शाप देने की हिम्मत भी करेगा तो इतनी प्रचंड शक्ति के समीप जाते जाते उस शाप की वही दुर्गति हो जायगी जो प्रचण्ड दावानल के निकट जाने पर एक तुच्छ तिनके की होती है।
साधना।=)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-September
साधना का विवरण तथा आत्मिक उन्नति-अवनति का परिचय अपनी मातृ-संस्था गायत्री तपोभूमि, मथुरा के लिए भेजता रहूँगा।
साधना का मुख्य अंग है। और इस प्रकार के निर्मोही व्यक्ति जन-धन के बीच में रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन बिता सकते हैं और बिता रहे हैं। पाँडिचेरी का आश्रम नामक स्थान इसी तरह का जीवन ढाल रहा है। यहाँ अबाध गति से साधक वृन्द कर्म में लगे हुए उन्नति की ओर अग्रसर हैं। और यह श्री माताजी तथा श्री अरविन्द जैसे महान् योगी की कृपा का फल होगा जब समस्त संसार एक बार फिर से उच्चातिउच्च आध्यात्मिक जीवन में आकर भगवान् का संपर्क प्राप्त करेगा।
साधना अर्थात् एकाग्रता से होता है। हृदय के प्रभावित हो जाने से बौद्धिक परिवर्तन सरलता से हो जाते हैं। हृदय का परिवर्तन अपनी सच्ची सद्भावना को दर्शाने से होता है। इसके लिये अधिक बकवाद करने की भी आवश्यकता नहीं। हम किसी व्यक्ति को दो-चार शब्द कह कर भी उसके हृदय का परिवर्तन कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-October
साधना से, जिस कर्मानुष्ठान से अथवा जिसकी आराधना से अपने आप में आत्मा रूप परमात्मा का बोध हो उसी का आश्रय लेना चाहिये तथा उसी की ओर देखना चाहिये।
साधना के समय चित्त में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। नवरात्रि में लकड़ी, रबड़, कपड़े आदि के जूते चप्पल पहने जा सकते हैं। हजामत इन दिनों बनानी हो तो अपने हाथ से ही बनानी चाहिए। अपने शरीर के लिए दूसरों से सेवा जहाँ तक कम ली जा सके वहाँ तक उत्तम है।
साधना में त्रुटियाँ रह जाने का भी भय रहता है। इन दोनों कठिनाइयों को पार करने के लिए नवरात्रि अनुष्ठान साधना करने वालों को अपनी साधना की नवरात्रि में कुछ पूर्व ही हमें सूचना दे देनी चाहिए ताकि उन दिनों उनके अनुष्ठानों का संरक्षण तथा दोष परिमार्जन यहाँ होता रहे। अनुष्ठान सानंद पूर्ण होने की सूचना भी देनी चाहिए। इस प्रकार नवरात्रि के आदि और अन्त में गायत्री परिवार के अनुष्ठान कर्ता अपनी सूचना अवश्य देदें।
साधना करने से उनकी सफलता की संभावना अधिक रहती है। घर गृहस्थी के अनेक कार्यों में मन लगा रहने के कारण प्रायः मनोयोग पूर्वक साधना नहीं हो पाती। इसलिये जिनकी परिस्थिति अनुकूल हैं उनके लिये तपोभूमि में आकर नवरात्रि की उपासना करना तीर्थयात्रा, समुचित पथ डडडडड न, परामर्श, सिद्धपीठ एवं अनुकूल वातावरण का डडडडड व आदि अनेक कारणों से यहाँ अधिक सुविधा रहती है। ठहरने, भोजन आदि की यहाँ समुचित व्यवस्था रहती ही है।
साधनाओं से बहुधा आसुरी तत्व विज्न फैलाते हैं तथा साधना में त्रुटियाँ रह जाने का भी भय रहता है। इन दोनों कठिनाइयों को पार करने के लिए नवरात्रि अनुष्ठान साधना करने वालों को अपनी साधना की नवरात्रि में कुछ पूर्व ही हमें सूचना दे देनी चाहिए ताकि उन दिनों उनके अनुष्ठानों का संरक्षण तथा दोष परिमार्जन यहाँ होता रहे। अनुष्ठान सानंद पूर्ण होने की सूचना भी देनी चाहिए। इस प्रकार नवरात्रि के आदि और अन्त में गायत्री परिवार के अनुष्ठान कर्ता अपनी सूचना अवश्य देदें।
साधना करें। घर की अपेक्षा ऐसे सिद्धपीठ स्थानों में साधना करने से उनकी सफलता की संभावना अधिक रहती है। घर गृहस्थी के अनेक कार्यों में मन लगा रहने के कारण प्रायः मनोयोग पूर्वक साधना नहीं हो पाती। इसलिये जिनकी परिस्थिति अनुकूल हैं उनके लिये तपोभूमि में आकर नवरात्रि की उपासना करना तीर्थयात्रा, समुचित पथ डडडडड न, परामर्श, सिद्धपीठ एवं अनुकूल वातावरण का डडडडड व आदि अनेक कारणों से यहाँ अधिक सुविधा रहती है। ठहरने, भोजन आदि की यहाँ समुचित व्यवस्था रहती ही है।
साधना है। गीता के दिव्य विचारों को मन में जमाओ। उपनिषद् और योग वशिष्ठ के उन्नत विचारों का ध्यान करो। आत्मा में अन्दर ही अन्दर बहस करो, ध्यान करो, विचार करो, तर्क करो। साँसारिक विचार, घृणा, द्वेष, प्रतिशोध, क्रोध काम आदि भावनाएँ तत्काल नष्ट हो जायेंगी।
साधना की नवरात्रि में कुछ पूर्व ही हमें सूचना दे देनी चाहिए ताकि उन दिनों उनके अनुष्ठानों का संरक्षण तथा दोष परिमार्जन यहाँ होता रहे। अनुष्ठान सानंद पूर्ण होने की सूचना भी देनी चाहिए। इस प्रकार नवरात्रि के आदि और अन्त में गायत्री परिवार के अनुष्ठान कर्ता अपनी सूचना अवश्य देदें।
साधना एवं सूक्ष्म जगत को शुद्ध करके संसार के ऊपर छाई हुई संकट की घटाओं को शान्त करने की महान सेवा के रूप में गायत्री उपासना की व्यापक प्रक्रिया आज अतीक आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए अधिकाधिक परिमाण में गायत्री उपासना तथा यज्ञ आयोजनों का महत्वपूर्ण कार्यक्रम गायत्री तपोभूमि द्वारा चलाया जा रहा है। प्रसन्नता की बात है कि उसकी उपयोगिता विचारवान धर्म प्रेमी आत्माओं ने समझी है और वे उसमें उत्साहपूर्वक योग दे रही हैं। विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद विभिन्न स्थानों में सामूहिक यज्ञों की एक लहर चल पड़ी है। गत गुरु पूर्णिमा पर 108 यज्ञों में 24 लक्ष से कहीं अधिक आहुतियाँ हो चुकी हैं।
साधना एवं तपश्चर्या करनी चाहिए। 9 दिन में 24 हजार का अनुष्ठान कुछ बहुत कठिन नहीं है। प्रतिदिन 27 माला के हिसाब से 9 दिन में अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है। इसके लिए 3 घंटा प्रतिदिन समय लगता है, जो जल्दी 4 बजे उठकर 7 बजे तक पूरा हो सकता है। जिन्हें एक साल इतना समय लगाने में असुविधा हो वे प्रातः सायं दोनों समय मिलाकर इसे पूरा कर सकते हैं।
साधना है।
साधना– अपना तप बनालें। ऐसी निर्माण-शिक्षा विद्यार्थी को अपने जीवन-निर्माण में बड़ी सहायक होगी।
साधना नहीं हो पाती। इसलिये जिनकी परिस्थिति अनुकूल हैं उनके लिये तपोभूमि में आकर नवरात्रि की उपासना करना तीर्थयात्रा, समुचित पथ डडडडड न, परामर्श, सिद्धपीठ एवं अनुकूल वातावरण का डडडडड व आदि अनेक कारणों से यहाँ अधिक सुविधा रहती है। ठहरने, भोजन आदि की यहाँ समुचित व्यवस्था रहती ही है।
साधना का एक मात्र सत्य लक्ष्य है।
साधना के समान फलप्रद होती है।
साधना करने वालों को अपनी साधना की नवरात्रि में कुछ पूर्व ही हमें सूचना दे देनी चाहिए ताकि उन दिनों उनके अनुष्ठानों का संरक्षण तथा दोष परिमार्जन यहाँ होता रहे। अनुष्ठान सानंद पूर्ण होने की सूचना भी देनी चाहिए। इस प्रकार नवरात्रि के आदि और अन्त में गायत्री परिवार के अनुष्ठान कर्ता अपनी सूचना अवश्य देदें।
साधना, मधुर पारिवारिक जीवन के उत्तरदायित्व का निर्वाह, आदर्श सामाजिक जीवन, विश्वकल्याण की विराट भावना यह सब क्या है? यह है जगत में सत्य तत्व का दर्शन करके उसमें अपनी तद्रूपता का समावेश करना और उसमें रमे हुए महान आध्यात्म रस- आनन्द या ब्रह्मानन्द का ध्यान करना। और यह सब संसार की उपेक्षा या घृणा से सम्भव नहीं है।
साधना में तत्पर रहते थे। हमारे आज के विश्वविद्यालयों के आश्रमों की शिक्षा पद्धति ही अपनानी चाहिए। आज के आचार्य को केवल शिक्षा ही नहीं देनी है, उसे यह भी देखना है कि उसका विद्यार्थी उसका शिष्य संयमी, साहसी और गौरवशाली बनता है या नहीं? इसी प्रकार आज के विद्यार्थी को अपनी कक्षा में केवल उपस्थित ही नहीं रहना है, केवल परीक्षा ही नहीं पास करनी है, धरने-हड़तालें ही नहीं करनी हैं; बल्कि उसे जीवन निर्माण की शिक्षा में पारंगत होना है, आत्मोन्नति की कला सीखना है और अपने में जिज्ञासा की प्रवृत्ति जाग्रत करनी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1956-December
साधना में वृद्धि करने के लिये हम गायत्री परिवार के वर्तमान कार्यकर्ताओं पर जोर नहीं देते क्योंकि इस वर्ष अन्तरिक्ष में जो विक्षोभ व्याप्त है, उसके कारण किसी का भी मन पूरी तरह एकाग्र नहीं हो सकता। किसी को भी साक्षात्कार एवं सिद्धि जैसी सफलता इस वर्ष मिलना दुर्लभ है। अदृश्य प्रकृति में कई बार ऐसे हेतु एवं तत्व प्रबल होते हैं जो साधना को किसी ऊँची सफलता तक नहीं पहुँचने देते। इस वर्ष ऐसी ही स्थिति है। इस वर्ष तो अदृश्य कोलाहल का प्रत्युत्तर अधिक तम जन शक्ति को इस कार्य में जुटा कर ही देना है।
साधना की है। रावण को मारने के लिये एक घड़ा रक्त की जरूरत थी, वह एक दो ऋषियों के शरीर से भी निकाला जा सकता था पर उससे वह परिणाम न होता जो हजारों ऋषियों की एक एक बूंद इकट्ठा करके रक्त का घड़ा भरने और उसे भूमि में गाड़ने पर असुर निकन्दनी सीताजी के अवतरण होने का हुआ। आज भी ठीक वही स्थिति है। आज अधिक साधना नहीं अधिक साधक चाहिये। इस वर्ष हम सब अपनी व्यक्तिगत साधना में भले ही कमी कर लें, पर अधिक साधक बनाने की पुनीत प्रक्रिया में पूर्ण तत्परता से जुटें और इस कार्य में लगाये हुये समय को जप से भी अधिक ऊँची साधना मानें।
साधना में सफलता के साथ साथ सारे सद्गुण मनुष्य में आने लगते हैं। शान्ति, पूर्णता, एकाग्रता, निश्चलता, समत्व, धृति, श्रद्धा, इत्यादि सारे गुण उसमें अपना आवास बनाते हैं। चमत्कारों की क्षमता के द्वारा मनुष्य योगी नहीं बनता, वरन् इन सद्गुणों की अभिवृद्धि से ही सच्चा योगी बनता है। जो मनुष्य एक भी सद्गुण में प्रतिष्ठित है, उसके पास अन्य सद्गुण दौड़ कर चले आते हैं।
साधना में भले ही कमी कर लें, पर अधिक साधक बनाने की पुनीत प्रक्रिया में पूर्ण तत्परता से जुटें और इस कार्य में लगाये हुये समय को जप से भी अधिक ऊँची साधना मानें। इस साधना का नये उपासक उत्पन्न करने के लिये घर-घर घूमने का फेरी का फल किसी भी बड़े अनुष्ठान से, तीर्थयात्रा से, परिक्रमा से कम नहीं मानना चाहिये।
साधना में सफलता को प्राप्त कर रहा है। बहुत लोग साधु रूप में दृष्टिगत होने के लिये बहुत ही उदासपूर्ण मुखाकृति बनाये दिखते हैं। यह उनका भ्रम है जो मन सुख की रश्मियों से ओत-प्रोत हैं उसी में सत्व का संचार है। सात्विक मन ही योग की गंभीर साधनाओं में सफलता पूर्वक प्रवृत्त हो सकता है, अतः सुन्दर सद्गुण का उपार्जन करिए आत्मा आनन्द है; सदा आनन्द में ही संस्थित रहिये।
साधना मार्गों में भी बाह्य विभेद नहीं है। ये विभेद व्यक्ति- व्यक्ति की मानसिक विभिन्नता के कारण ही हैं। योगों की इन बाह्य विभिन्नताओं के आधार पर आध्यात्मिक अनुभवों की भी बाह्य विभिन्नता पाई जाती है। परन्तु इस बात पर ध्यान देना अनिवार्य है कि योग की वास्तविक प्रगति सर्वांगीण-प्रगति ही है। किसी एक योग-विशेष में उन्नति होने का अर्थ है योगों में समान रूप से उन्नति को प्राप्त करना, अतः यद्यपि बाह्य अनुभवों की अभिव्यक्ति में विभिन्नतायें रहती हैं।
साधना नहीं अधिक साधक चाहिये। इस वर्ष हम सब अपनी व्यक्तिगत साधना में भले ही कमी कर लें, पर अधिक साधक बनाने की पुनीत प्रक्रिया में पूर्ण तत्परता से जुटें और इस कार्य में लगाये हुये समय को जप से भी अधिक ऊँची साधना मानें। इस साधना का नये उपासक उत्पन्न करने के लिये घर-घर घूमने का फेरी का फल किसी भी बड़े अनुष्ठान से, तीर्थयात्रा से, परिक्रमा से कम नहीं मानना चाहिये।
साधनायें भी योग हैं जो इन लक्ष्यों की ओर (यथार्थतः लक्ष्य तो एक ही है परन्तु उसे विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने पर विभिन्न प्रकार से हैं) हमें प्रवृत्त करती हैं।
साधना के लिये हमें शिरो भाग के विभिन्न अंग चाहिये। गज का मस्तक उसका अर्थ स्थल होता है। इसी कारण सर पर नन्हें से अंकुश से हाथी वश में आ जाता है। इससे हमें यह संकेत लेना चाहिये कि सिद्धि की कामना रखने वाले व्यक्ति को अपना मस्तक व्यर्थ के वितण्डा वादों और संघर्षों से बचाये रखना चाहिये। हाथी की आंखें छोटी होती हैं, इससे हमें यह शिक्षा लेनी चाहिये कि हमें हर एक चीज सूक्ष्म दृष्टि से देखना चाहिये।
साधना के साथ-साथ मुदिता भी उत्तरोत्तर बढ़नी चाहिये। यह स्वस्थ मनस्, तथा शुद्ध हृदय का परिचायक है। यह चित्त-प्रसाद है अथवा मन की शान्ति का बोधक। जब तक हृदय शुद्ध नहीं होता मन के विकार क्षीण नहीं होते, विक्षिप्तता दूर नहीं होती तब तक मनुष्य मुदिता की प्राप्ति नहीं कर सकता। मुदिता एक निश्चित लक्षण है जिससे हम जान सकते हैं कि साधक अपनी साधना में सफलता को प्राप्त कर रहा है।
साधना विश्व के खतरे के लिए खुला आमंत्रण है। उनकी यह विचारधारा मिथ्या और क्षणभंगुर है। दुर्बलों की आहें उन्हें भस्म कर देंगी, क्योंकि पतितपावन तो कोई और है। जिसके करोड़ों ही पैर हैं। यदि ऐसा न हो तो मनुष्य अहंकार वश अपना ही संहार कर डाले।
साधना अनवरत रूप से चलती रहे। ऐसी उसकी आकाँक्षा है।
साधना एवं धर्मोत्थान सम्बन्धी चर्चायें करते हैं।
साधनादि में भी ये मन्दिर सीढ़ी का काम दे सकते हैं। क्योंकि-
साधना का नये उपासक उत्पन्न करने के लिये घर-घर घूमने का फेरी का फल किसी भी बड़े अनुष्ठान से, तीर्थयात्रा से, परिक्रमा से कम नहीं मानना चाहिये।
साधना ही मोक्ष-पद के पाने में सहायता देती है दुःख को दूर करने के लिए कर्म प्रधान सामग्री है, कर्म के प्रताप से ही त्रिविधताप को मूल-जड़ से नष्ट किया जा सकता है। वर्तमान में जो कर्म किया जाता है उसके साथ भविष्य के फल का निर्दिष्ट और विशेष संबन्ध है, कोई भी बात अकस्मात या अकारण नहीं होती। सबका कुछ न कुछ कारण होता है, जो नियमित रूप से संघटित होता है। एक बीज बोने पर वह अंकुरित होकर एक अंकुर उत्पन्न करता है। उसमें पत्ते लगते हैं, फूल लगते हैं और फिर फल लगते हैं, फल से फिर बीज उत्पन्न होता है और वह बीज से फिर पहिले के समान अंकुर-पत्ते, फूल तथा बीज उत्पन्न होते हैं।
साधना करो!!
साधना को किसी ऊँची सफलता तक नहीं पहुँचने देते। इस वर्ष ऐसी ही स्थिति है। इस वर्ष तो अदृश्य कोलाहल का प्रत्युत्तर अधिक तम जन शक्ति को इस कार्य में जुटा कर ही देना है। डाकुओं के बड़े समूह से दो चार बलवान व्यक्ति बहुत देर लड़कर भी इतनी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते, जितनी सौ-दो-सौ व्यक्ति यदि दस-पाँच मिनट कोलाहल मात्र मचा दें, तो डाकुओं को भगाने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, आज वैसा ही करने की आवश्यकता पड़ गई है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में जप की अधिक संख्या की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी अनेकों की प्राणशक्ति युक्त थोड़ी-थोड़ी साधना की है।
साधना के अतिरिक्त सदस्यों पर जिस बात के लिये अधिक जोर देना है वह है—साप्ताहिक सत्संग में उपस्थित होना। इससे सामूहिकता की शक्ति, परस्पर प्रेम भावना, संगठन एवं अधिक कार्य करने की प्रेरणा में आशा जनक सफलता मिलती हैं। यदि यह एकत्रित होने वाले लोग थोड़ा थोड़ा भी सहयोग करें, तो साप्ताहिक हवन का खर्च बड़ी आसानी से चलता रह सकता है। यह साप्ताहिक सत्संग बारी बारी सभी सदस्यों के घर किये जायें तो पास पड़ौस के लोगों के वहाँ इकट्ठे होते रहने से घर-घर में गायत्री माता का, यज्ञ पिता का, भारतीय संस्कृति का संदेश पहुँचाने का कार्य अति सरल हो सकता है।
साधना में भी जो थोड़ा समय लगा सकते हैं वे अ. भा. गायत्री परिवार के छपे हुए संकल्प पत्र भर कर सदस्य बन सकते हैं। सबसे पहला काम जो हम लोगों को करने का है वह यह है, कि अपने घर-परिवार में, स्वजन संबंधियों में, परिचितों में धार्मिक प्रकृति के नर-नारियों का नाम नोट कर और उनके पास जा जाकर सारी स्थिति समझाने और सदस्य बनने के लिये प्रयत्न करें। यह प्रयत्न रोज ही चलता रहे और एक सदस्य बनाने की भी रोज सफलता प्राप्त की जाती रहे तो एक महीने में तीस नहीं तो दस-बीस सदस्य, कोई भी उत्साही कार्यकर्ता बना सकता है। इस प्रकार हम सब जुट पड़ें, तो सवा लाख गायत्री उपासक-गायत्री परिवार के सदस्य बनाने का कार्य कुछ ही महीनों में पूरा हो सकता है। पर यह प्रयत्न इस वर्ष जारी ही रहना चाहिए।
साधना मानें। इस साधना का नये उपासक उत्पन्न करने के लिये घर-घर घूमने का फेरी का फल किसी भी बड़े अनुष्ठान से, तीर्थयात्रा से, परिक्रमा से कम नहीं मानना चाहिये।
साधनात्मक सहस्र चण्डी। इन तीनों संकल्पों के संमिश्रित एक लक्ष चण्डी महा अनुष्ठान की व्यवस्था।
साधनाओं में सफलता पूर्वक प्रवृत्त हो सकता है, अतः सुन्दर सद्गुण का उपार्जन करिए आत्मा आनन्द है; सदा आनन्द में ही संस्थित रहिये।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-January
साधनाएँ तो घर पर भी की जा सकती हैं, प्रवचन अखण्ड-ज्योति में छापे जा सकते हैं। वैसे जो कहा बताया जा चुका है, उसके अतिरिक्त कोई नई बात है भी नहीं, पर जिस उद्देश्य के लिए शान्ति-कुंज ने परिजनों को आमन्त्रित किया है उसमें विशिष्ठ एक सूक्ष्म आदान-प्रदान की बात मुख्य है जिसके लिए सान्निध्य आवश्यक हो जाता है। गर्मी पाने के लिए आग के समीप बैठना पड़ता है। प्राणों का आदान-प्रदान भी सान्निध्य की अपेक्षा करता है।
साधना सिखाई जाती थी, उसका पूरा समावेश है। जपयोग, विन्दुयोग, लययोग, प्राणयोग, ब्रह्मयोग की सरल किन्तु आलोक भरी उस साधना को जोड़ दिया गया है जिसका लाभ पिछले वर्ष हजारों निष्ठावान साधक उठा चुके हैं और हजारों के आवेदन-पत्र पड़े हुए हैं। दूसरा आधार इस दस दिवसीय शिक्षा का यह है कि जीवन जीने की कला, संजीवनी विद्या के सभी महत्वपूर्ण पक्ष समझा दिये जायें और यह तथ्य हृदयंगम कराया जाय कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं कर्तव्य में क्या परिवर्तन करके सामने पड़ी जटिल समस्याओं को सुलझाया जाना और समृद्धियों, विभूतियों से भरी प्रगति को प्राप्त कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है। निरर्थक बने हुए इसी जीवन को सार्थक कैसे बनाया जा सकता है। कहना न होगा कि व्यावहारिक अध्यात्म का नाम ही संजीवनी विद्या रहा है।
साधना की पराकाष्ठा ही प्रभु दर्शन है।
साधना से वंचित करके पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने में भारी व्यवधान प्रस्तुत किया।
साधना का समन्वय न होना। यह असंबद्धता उन्हीं में पाई जाती है जो अपनी दिनचर्या को व्यस्त एवं व्यवस्थित रखने का प्रयत्न नहीं करते। जब जैसे जी आया जब वैसे समय गुजार दिया- जब जैसा भाया वैसा कर लिया की बेढंगी आदत जिसके पीछे लग गई वह कितना ही सुयोग्य क्यों न हो हर क्षेत्र में असफल रहेगा और दुर्भाग्य का रोना रोयेगा। समय और मन का समन्वय और नियमित क्रम निर्धारण की बात कहने-सुनने में तुच्छ जैसी लगती है, पर व्यवहार में लाने पर प्रतीत होगा कि यह ऐसा योगसाधन है जिसके फलस्वरूप पग-पग पर चमत्कारी वरदान उपलब्ध होते हैं।
साधना सत्र 20 फरवरी से 12 मई तक चलेंगे। इसके बाद वह शृंखला 1 जुलाई से आरंभ होगी। इसमें तीन शिक्षाएँ जुड़ी हुई हैं। पाँच-पाँच दिन के प्रत्यावर्तन सत्रों में जो अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश जागृत करने की पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना सिखाई जाती थी, उसका पूरा समावेश है। जपयोग, विन्दुयोग, लययोग, प्राणयोग, ब्रह्मयोग की सरल किन्तु आलोक भरी उस साधना को जोड़ दिया गया है जिसका लाभ पिछले वर्ष हजारों निष्ठावान साधक उठा चुके हैं और हजारों के आवेदन-पत्र पड़े हुए हैं।
साधना को जोड़ दिया गया है जिसका लाभ पिछले वर्ष हजारों निष्ठावान साधक उठा चुके हैं और हजारों के आवेदन-पत्र पड़े हुए हैं। दूसरा आधार इस दस दिवसीय शिक्षा का यह है कि जीवन जीने की कला, संजीवनी विद्या के सभी महत्वपूर्ण पक्ष समझा दिये जायें और यह तथ्य हृदयंगम कराया जाय कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं कर्तव्य में क्या परिवर्तन करके सामने पड़ी जटिल समस्याओं को सुलझाया जाना और समृद्धियों, विभूतियों से भरी प्रगति को प्राप्त कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है। निरर्थक बने हुए इसी जीवन को सार्थक कैसे बनाया जा सकता है। कहना न होगा कि व्यावहारिक अध्यात्म का नाम ही संजीवनी विद्या रहा है। इसे अपनाकर हम हलका-फुलका और हँसी-खुशी का समुन्नत जीवन जी सकते हैं।
साधना सत्र ही चलेंगे यह मानकर दस दिन का अवकाश निकालने और उसमें सम्मिलित होने के आवेदन पत्र नये सिरे से भेजें।
साधना सत्र का है- संभाषण कला का अभ्यास। निजी जीवन में प्रभावशाली वार्तालाप का क्रम जनसाधारण के सामने विचार विनिमय के सिद्धांत-गोष्ठियों और सभाओं में प्रवचन करने की क्षमता का विकास। आमतौर से लोग संकोच वश उन विचारों को दूसरों के सामने व्यक्त नहीं कर पाते जिन्हें कहना आवश्यक भी है और उपयोगी भी। इस संकोचशीलता को हटाने और निर्भीक अभिव्यक्ति का अभ्यास भी इस दस दिवसीय साधना का एक अंग है।
साधना का एक अंग है।
साधना करके प्राप्त की गई हों। हर हालत में विशिष्ठ परिस्थितियाँ तो उपलब्ध होनी ही चाहिए।
साधना सत्रों में भाषण कला का आकर्षण समावेश है, ठीक उसी प्रकार अध्यापन सत्रों को दूसरे शब्दों में लेखन सत्र भी कह सकते हैं। आवश्यक नहीं कि स्कूलों के अध्यापक ही इसमें भाग लें अन्य व्यक्ति भी जिनका शिक्षा के सुधार ओर प्रसार में अभिरुचि है इसमें भाग ले सकते हैं पर उनकी निजी शिक्षा बहुत कम नहीं होनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-June
साधना की महती आवश्यकता होती है। कर्म कैसा भी हो अन्ततोगत्वा वह कर्म ही कहा जायेगा। सैनिक, व्यापारी लेखक, उपदेशक, श्रमिक, मजदूर सभी अपने-अपने स्थान पर कर्मशील हैं।
साधना’ है जिससे शक्तियों के स्त्रोत खुलते हैं। यही शक्ति स्त्रोत सिद्धियाँ बनकर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता और यश के वरदान प्राप्त करते हैं।
साधना को दैनिक जीवन का एक अविच्छिन्न अंग बना लेना चाहिए। पेट और परिवार के लिए 23 घण्टे लगाये जा सकते हैं तो क्या देश, धर्म, समाज, संस्कृति के लिए एक घण्टा प्रतिदिन देना भी सम्भव नहीं हो सकता? यदि चाह होगी तो राह जरूर निकल आवेगी। कितने ही लोग भजन-पूजन की विडम्बना में घंटों गुजारते रहते हैं फिर क्या हम विवेकशील लोगों के लिए यह सम्भव नहीं कि उतना समय जन-मानस का नव-निर्माण करने के लिए लगाते रहने का संकल्प कर सकें। सच पूछा जाय तो इससे बढ़कर ईश्वर की सच्ची उपासना और दूसरी तरह हो ही नहीं सकती।
साधना में लगे रहे जब तक कि उन्हें निर्वाण प्राप्त नहीं हो गया।
साधना समर में उतरे थे वह जवाब देने लगा और हम भ्रम से स्वयं को निकालने के लिए उठने लगे बुद्ध। घर वापस लौटने की तैयारी करने लगे।
साधना विज्ञान विनिर्मित किया था। अब भौतिक विज्ञानी भी हर दिशा से निराश होकर सूर्य देवता की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं। विश्व की ऊर्जा समस्या का कोई अन्य समाधान आधार नहीं।
साधना के आधार पर उस दिव्य चेतना को विकसित करने में बहुत बड़ी सीमा तक सफल हुए थे। पिछले दिनों आलस्यवश वे क्षमताएं गँवा दी गई। उनके स्थान पर बाजीगरी को ठग विद्या को प्रश्रय मिल गया। तथाकथित चमत्कार धूर्त
लोगों द्वारा भूखों को भ्रमग्रस्त करके स्वार्थ साधन के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे। उससे योग विज्ञान के प्रति लोगों की अश्रद्धा बढ़ती गई।
साधनायें और कठोर व्रत उपवास। भोजन की मात्रा घटाते-घटाते एकदम निराहार रहने लगे, वस्त्र इतने कम हो गये कि दिशायें ही वस्त्र बन गयीं फिर भी प्रात्वव्य दूर ही रहा। तो लगा कि मन को शान्ति ही मृगतृष्णा है। संसार आसार तो है ही परन्तु सत्य भी यही है। जिस धैर्य का सम्बल पकड़ कर वे साधना समर में उतरे थे वह जवाब देने लगा और हम भ्रम से स्वयं को निकालने के लिए उठने लगे बुद्ध।
साधना है। इससे बढ़कर पूजा, भजन, जप, तप, ज्ञान, ध्यान और दूसरा नहीं हो सकता कि आदर्शवादिता को जीवित रखने के लिए हम अपनी सारी शक्तियों को झोंक दें। यह आपत्ति काल है नास्तिकवादी अनास्था अपने प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न कलेवरों में पूरे जोर-शोर से मैदान में डटी हुई है। उसकी आक्रामक व्यूह रचना यदि सफल हो गई तो समझना चाहिए कि वे सारे आधार ही नष्ट हो जायेंगे, जिनके सहारे आत्म-कल्याण की, आत्म-ज्ञान की बात सोची जा सकती है।
साधना ही महान लक्ष्यों को प्राप्त करने का अभियान, अनुष्ठान है। जिसे कोई भी सम्पन्न कर विजेता बन सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-October
साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी −योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
साधना के द्वारा आत्मबल को बढ़ा लिया जाय तो हम आज से हजारों वर्ष पहले घटित घटनाओं को भी यथार्थ रूप में आकाश मण्डल में सुन या देख सकते हैं। विज्ञान से तो अब यह सिद्ध ही हो चुका है कि जो भी ध्वनियाँ निसृत होती हैं वे कभी भी नष्ट नहीं होतीं।
साधना में इसी स्थान में प्रकाश ज्योति की धारणा को महत्व दिया जाता है। क्षीरसागर में सोये शेषशायी विष्णु की ओर मानसरोवर स्थित कैलाश पर विराजमान शिव की कल्पना इस आज्ञाचक्र के रहस्योद्घाटन के रूप में ही की गई है। ग्रेमैटर—मस्तिष्कीय मज्जा क्षेत्र—क्षीर सागर या मानसरोवर कहा गया है। इसी के मध्य में से पिट्यूटरी ग्रन्थि का चेतन पक्ष आज्ञाचक्र अवस्थित है।
साधना विधान उपयुक्त रहेगा यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। यह व्यक्ति की मनः स्थिति और परिस्थिति पर निर्भर है उसमें भिन्नताएँ रह सकती हैं। अपने परिवार में गायत्री मंत्र के जप और प्रकाश ज्योति के ध्यान की परम्परा चल रही हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य कोई साधना सफल हो ही नहीं सकती। श्रद्धा और निष्ठा का समन्वय किसी भी प्रकार एवं विधान को सफलता के स्तर तक पहुँचा सकता है।
साधना का है। यदि अपनी स्थिति के अनुसार कुछ समय इस प्रयोजन के लिए नियत रखें तो क्रमशः एकाग्रता की शक्ति बढ़ती जायगी और उसे प्रगति के किसी भी क्षेत्र में प्रयुक्त करके उत्साह वर्धक लाभ प्राप्त किया जा सकेगा।
साधना व्यायामों के सहारे पूरे किये हैं या दैनिक सामान्य कार्यों को ही दत्त चित्त होकर करते रहने से इस विशेषता का विकास कर लिया है, यह अलग बात है;पर इतना निश्चित है कि एकाग्रता का अभ्यास किये बिना कोई प्रतिभाशाली मस्तिष्क भी महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ नहीं हो सकता। क्या आध्यात्मिक क्या भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा विकसित करने के लिए एकाग्रता का आश्रय लेना नितान्त आवश्यक है। अस्त−व्यस्त, चंचल और बिखरी हुई मनः स्थिति के व्यक्ति न किसी बात पर गहराई से विचार कर सकते हैं—न प्रयासों के बीच आने वाले उतार−चढ़ावों के पक्ष−विपक्ष को समझ सकते हैं। तन्मय होकर अभीष्ट प्रयोजन में जुट जाने की विशेषता भी उनमें नहीं होती अस्तु कोई कहने लायक सफलता भी किसी क्षेत्र में उनके पल्ले नहीं पड़ती।
साधना के साधकों को वैसा सम्भव नहीं होता।
साधना का विस्तृत विवरण मिलता है। यह छाया पुरुष क्या है? जीवित मनुष्य का एक सशक्त प्रतिबिम्ब। जिसे साधन प्रयोगों द्वारा अपने वशवर्ती बनाया जाता है और वह किसी भिन्न सत्ता वाले अदृश्य व्यक्ति की तरह आज्ञानुसार काम करता है। इसकी क्षमता साधनकर्त्ता की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।
साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना ही होगी यदि हम जागने से लेकर सोने तक के प्रत्येक कार्य को ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए अपना श्रद्धा−सिक्त उपहार मानें और उसे लाभ−हानि के तराजू पर न तोल कर अपनी मानसिक एवं शारीरिक स्तर की समीक्षा करते हुए परखें। यदि कोई कार्य पूरी जिम्मेदारी और सद्भावना के साथ करने पर भी असफल रहता है तो इसके कर्त्ता को तनिक भी खिन्न होने की आवश्यकता नहीं। उसने अपना कर्तव्य पूरी तरह निबाहा इतना भर होना किसी के लिए गर्व और गौरव की बात है, भले ही उसे सफलता न मिले।
साधना सफल हो ही नहीं सकती। श्रद्धा और निष्ठा का समन्वय किसी भी प्रकार एवं विधान को सफलता के स्तर तक पहुँचा सकता है।
साधना तान्त्रिक उपासना के क्षेत्र में बहुत समय से प्रचलित है। छाया लोक की चर्चा बहुत समय से कही सुनी जाती रही है अब यह सम्भावना प्रामाणिक स्तर पर स्वीकार की जा रही है कि एक दिव्यलोक हमारे साथ−साथ ही रह रहा है; उसमें ने केवल पदार्थ ही भरा है वरन् प्राणी भी निवास कर रहे हैं। वे प्राणी देव दानवों की कल्पना से मिलते−जुलते हो सकते हैं और जीवाणुओं, विषाणुओं जैसे भी। हम मनुष्यों से वे समर्थ अपरिचित उदासीन भी हो सकते हैं और सम्बद्ध सहचर बनकर हमारी परिस्थितियों के निर्माण में भारी योगदान करते हुए भी पाये जा सकते हैं। कहा नहीं जा सकता कि इस अविज्ञात संसार में भरा हुआ जड़ चेतन हमारे लिए संपर्क बढ़ाने योग्य है या अयोग्य।
साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मू. 40 पैसे।
साधना समझा जाना चाहिए। यही अपनी सदा से शिक्षा रही है। लोक−मंगल के अनेकानेक प्रयोजनों में भावनात्मक परिष्कार को−ज्ञान यज्ञ को—आदर्शवादी दृष्टिकोण को जन−जन के अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करना हम सर्वोपरि और सर्वप्रथम मानते रहे हैं और परिजनों से अनुरोध करते रहे हैं कि वे अपनी सेवा भावना को इस क्षेत्र में अधिकाधिक प्रयुक्त करते रहें।
साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
साधना में चिन्तन के बिखराव को एकत्रित करने का अवसर मिलता है। इष्ट देव के वाहन, आयुध, अलंकार, उपकरण आदि की विविधता यह मन को एक सीमित क्षेत्र में चाहे जितनी दौड़ लगाते रहने का अवसर देती है। भाव निष्ठा जुड़ी होने से वह लाभ और भी अधिक बढ़ा−चढ़ा बन जाता है। उसके सत्परिणाम कई प्रकार की चमत्कारी अतीन्द्रिय सिद्धियों के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
साधना है। यदि यह प्रयत्न न किया जाय तो पशु संस्कार बने रहेंगे और मनुष्य ऐसे कृत्य करता रहेगा जो उसकी संस्कृति के लिए कलंक पूर्ण है।
साधना में ‘छाया पुरुष’ साधना का विस्तृत विवरण मिलता है। यह छाया पुरुष क्या है? जीवित मनुष्य का एक सशक्त प्रतिबिम्ब। जिसे साधन प्रयोगों द्वारा अपने वशवर्ती बनाया जाता है और वह किसी भिन्न सत्ता वाले अदृश्य व्यक्ति की तरह आज्ञानुसार काम करता है। इसकी क्षमता साधनकर्त्ता की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।
साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना द्वारा प्रेरक क्षमता अर्जित कर ली है तो किसी दूसरे को प्रेरित कर लाभ पहुँचाया जा सकता है।
साधना को ध्यान योग कहते हैं। इसके दो भाग हैं। एक वह जो आमतौर से पूजा प्रयोजनों में काम आता है। किसी देवी देवता के चित्र को आँखों से देखने और फिर नेत्र बन्द करके सुदूर आकाश में अथवा मस्तिष्क के मध्य में प्रतिष्ठित देखना। ऐसे देव चित्रों के साथ तेजोवलय जुड़ा हुआ होने की भावना की जाती है।
साधना 4− गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5−गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया 6−गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी 7−गायत्री की पञ्चमुखी दैनिक साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना के लिए जितना समय निर्धारित किया है उसे उन खण्डों के विभाजित क्रम के अनुसार काम में लाया जाय। स्वास्थ्य संवर्धन के प्रश्न पर विचार करना हो तो बिगड़ने के कारण, सुधार के लिए परिवर्तन—परिवर्तन के साधन आदि वर्गों में उसे बाँटा जा सकता है और निर्धारित क्रम से उन बातों पर विचार करते हुए, चिन्तन की शृंखला की जा सकती है।
साधना में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह चार अंग विशुद्ध रूप से एकाग्रता की प्रगति के चार चरण हैं। भाव, चिन्तन और कर्तृत्व की तीन धाराएँ, जहाँ समन्वित होती हैं वहाँ मनुष्य तीर की तरह सनसनाता हुआ निकलता है और किसी भी लक्ष्य को बेध कर रख देता है। वैज्ञानिकों से लेकर तत्व दर्शियों तक की उपलब्धियों में मात्र एकाग्रता के अनुदान उपहार हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-December
साधना की स्वर्ण जयन्ती का इस अंक को विशेष उपहार माना जाना चाहिए और उसे अलभ्य सामग्री की तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
साधना क्षेत्र युग निर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है। जन-मानस के सर्वतोमुखी भावनात्मक नव निर्माण का लक्ष्य आधी दूर है पर उस दिशा में जिस उत्साह के साथ चरण बढ़ रहे हैं, उन्हें देखते हुए किसी समय जो असंभव समझा जाता था, वह अब सम्भव प्रतीत होने लगा है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण-कभी ‘दिवा-स्वप्न’ कहा गया था, पर अब दूरदर्शी लोग यथार्थता के निकट आकर देखते हैं तो कहते हैं-कठिन होते हुए भी यह असम्भव नहीं है। कल यह सुनने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए कि कभी जो कठिन समझा जाता था वह सरल बनकर सामने आ गया।
साधनाओं का विज्ञान तथा स्वरूप समझाने वाला होगा जो सही रीति से अपनाये जाने पर व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बना सकने में पूरी तरह समर्थ है। अखण्ड-ज्योति पाठकों में से जो इन्हें करना चाहेंगे उन्हें विशेष रूप से मार्ग दर्शन एवं सहयोग भी मिलेगा। यह साधना विज्ञान पचास वर्ष की साधना का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है। साधना की स्वर्ण जयन्ती का इस अंक को विशेष उपहार माना जाना चाहिए और उसे अलभ्य सामग्री की तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
साधना विज्ञान पचास वर्ष की साधना का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है। साधना की स्वर्ण जयन्ती का इस अंक को विशेष उपहार माना जाना चाहिए और उसे अलभ्य सामग्री की तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
साधना एवं उपासना का विज्ञान समझाने वाली प्रक्रिया आरम्भ होगी। उपासना में क्या त्रुटियाँ रहने से उनका घोषित प्रतिफल मिल नहीं पाता? क्या सतर्कता बरतने से हमारी साधना सिद्धि रूप में परिणत हो सकती है ? यह सभी तथ्य अगले वर्ष, तर्क, प्रमाण, अनुभव एवं विज्ञान सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किये जाते रहेंगे।
साधना, उपासना के धर्मकृत्यों का सुविस्तृत विधि-विधान विनिर्मित किया है। इन्हें अपनाकर मनुष्य दिव्यसत्ता को अपने भीतर-बाहर विद्यमान देखता है और कुमार्ग से विरत रहकर सुमार्ग पर चलने का अधिक उत्साह के साथ प्रयत्न करता है। ईश्वर विश्वास के फलस्वरूप पशु प्रवृत्तियों के नियन्त्रण में भारी सहायता मिलती है और व्यक्ति तथा समाज का स्तर सन्तुलित बनाये रहने का प्रयोजन बहुत अंशों तक पूरा होता है। नास्तिकता अपनाकर विश्व-शान्ति का मानवी उत्कृष्टता का आधार ही डगमगाने लगेगा, इसलिए तत्वदर्शियों ने आध्यात्मिक अनास्था की - नास्तिकता की कठोर शब्दों में भर्त्सना की है।
साधना सिद्धि रूप में परिणत हो सकती है ? यह सभी तथ्य अगले वर्ष, तर्क, प्रमाण, अनुभव एवं विज्ञान सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किये जाते रहेंगे।
साधना शास्त्र इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ने, खदेड़ने की पृष्ठभूमि विनिर्मित करने के लिए खड़ा किया गया है। इनसे छुटकारा पाने पर देवत्व द्रुतगति से उभरता है और अपनी स्वतन्त्र सत्ता का उल्लास भरा अनुभव होता है।
साधनात्मक प्रयास सूक्ष्म से परिपुष्ट होते-होते स्थूल में विकसित होता चला आया है। इस प्रकार अपनी गतिविधियाँ 38 वर्ष पूर्व नहीं 50 वर्ष पहले अवतरित हुई मानी जानी चाहिए। पत्रिका का प्रकाशन एवं संगठनात्मक हलचलें तो वृक्ष के पुष्प पल्लव हैं। उसके बीजारोपण को यदि महत्व दिया जाय तो फिर यही कहना होगा कि इस अभिनव चेतना का अवतरण अब से 50 वर्ष पूर्व हुआ और आधी शताब्दी से चल रही यह मात्रा अनवरत गति से अनेक पड़ावों पर ठहरते, सुस्ताते-यहाँ तक आ पहुँची जहाँ आज हम हैं। पीछे मुँह कर इस लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करते हैं तो श्रम की सार्थकता और सफलता पर सन्तोष की साँप लेने को जी करता है-यों अभी आगे की यात्रा की शेष दूरी भी कुछ कम नहीं है।
साधना का संकल्प किया गया था। अखण्ड-घृत दीप की स्थापना भी उसी दिन हुई और वह साधनात्मक प्रयास सूक्ष्म से परिपुष्ट होते-होते स्थूल में विकसित होता चला आया है। इस प्रकार अपनी गतिविधियाँ 38 वर्ष पूर्व नहीं 50 वर्ष पहले अवतरित हुई मानी जानी चाहिए। पत्रिका का प्रकाशन एवं संगठनात्मक हलचलें तो वृक्ष के पुष्प पल्लव हैं। उसके बीजारोपण को यदि महत्व दिया जाय तो फिर यही कहना होगा कि इस अभिनव चेतना का अवतरण अब से 50 वर्ष पूर्व हुआ और आधी शताब्दी से चल रही यह मात्रा अनवरत गति से अनेक पड़ावों पर ठहरते, सुस्ताते-यहाँ तक आ पहुँची जहाँ आज हम हैं।
साधना का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है। साधना की स्वर्ण जयन्ती का इस अंक को विशेष उपहार माना जाना चाहिए और उसे अलभ्य सामग्री की तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-March
साधना में शक्ति का उद्भव होता है। पर यदि यह उपार्जन काल में अथवा उत्पन्न होने के पश्चात सुरक्षित न रखा गया तो वह देखते-देखते बारूद की तरह जलकर भस्म हो जाती है। खुली बोतल में रखी हुई स्प्रिट उड़ जाती है इसी प्रकार असुरक्षित रखी हुई शक्तियां ही निरर्थक चली जाती है।
साधना की प्रखरता कहते हैं। जब दोनों का सघन मिलन होता है तो आत्म-विभोर स्थिति को समाधि कहा जाता है। आवश्यक नहीं कि उस स्थिति में योगनिद्रा अथवा मूर्छा ही आवे। ज्ञान साधना में स्थिति प्रज्ञ की - कर्म साधना में अनासक्त कर्त्तव्य परायण की - भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की - स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्मज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है।
साधना जब साधक का सर्वप्रिय विषय बन जाय - उसमें निरत रहने को स्वयमेव मन चले- उन क्षणों को घटाने की नहीं बढ़ाने की ललक रहे - उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिये कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है। आरम्भ में यह स्थिति बलपूर्वक उत्पन्न करनी पड़ती है। कल्पना और संकल्प शक्ति का उपयोग करके वैसी मानसिक स्थिति नकली रूप में बनानी पड़ती है। थोड़े समय में वह स्थिति स्वाभाविक बन जाती है। बलपूर्वक मारधाड़ और धड़पकड़ द्वारा बलात्कार पूर्वक उच्चस्तरीय मनःस्थिति बनाने के काल को ही साधना काल कहते हैं जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिये कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।
साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की - स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्मज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं। परमात्मा का क्षेत्र व्यापक है और आत्मा का सीमित।
साधना काल में प्रयोग किया जाता है अनेक विधि निषेध एवं वस्तु प्रयोग इसी दृष्टि से बने हैं। किस मंत्र की सिद्धि के लिए किन पदार्थों से हवन किया जाय। आहार में क्या वस्तुएं प्रयुक्त की जाय। पूजा के उपकरणों में किस स्तर को प्रधानता दी जाय। आदि की विधियाँ- परसंचालित शक्ति को स्वसंचालित शक्ति का साथ देने के लिए उभारने के लिए है।
साधना कर सकने में समर्थ हो सकें।
साधना में अनासक्त कर्त्तव्य परायण की - भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की - स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्मज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं। परमात्मा का क्षेत्र व्यापक है और आत्मा का सीमित।
साधना की विडम्बना रचते हैं और हथेली पर सरसों न जमे तो तरह - तरह के लाँछन लगाते हैं।
साधना निष्फल चली जाती है। श्रद्धा अपने आप में एक शक्ति है। पैट्रोल, भाप, बिजली की तरह उसकी भी अपनी सामर्थ्य है। श्रद्धालु साधक पूर्णरूपेण सफल होकर रहते हैं जबकि शंकाशीलों को खाली हाथ रहना पड़ता है। विश्राम में पग-पग पर देखा जा सकता है कि आध्यात्मिक प्रगति एवं सफलता के लिए तो उसे प्राण ही कहना चाहिए।
साधना ग्रन्थों में वनस्पतियों के अनेकानेक विधि-विधान शास्त्रकारों ने बताये हैं। माला किस वृक्ष के फल, मूल या मध्य भाग की बनी हो- आसन, कुशा खजूर आदि किस का बना हो-कमण्डल, नारियल, लौकी आदि किस के फल से बना हो, बालों को धोने में-शरीर पर लेपन में- किस मिट्टी या किस वनस्पति का उपयोग किया जाय। हवन सामग्री में किस प्रयोजन के लिए किन वनस्पतियों का और किन समिधाओं का किस प्रकार प्रयोग किया जाय यह सारे विधान वस्तुतः साधक की आहार प्रक्रिया में ही सम्मिलित
साधना में संलग्न होकर मनुष्य अतीन्द्रिय शक्तियों से सम्पन्न होता है - अति मानव की भूमिका में प्रवेश करता है और हर दृष्टि से असाधारण बन जाता है।
साधना में स्थिति प्रज्ञ की - कर्म साधना में अनासक्त कर्त्तव्य परायण की - भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की - स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्मज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं। परमात्मा का क्षेत्र व्यापक है और आत्मा का सीमित।
साधना कौन करेगा। युग सैनिकों की भूमिका तो वे ही निभा सकते हैं जिनके शरीर में कड़क मौजूद है। जो शरीर और मन से समर्थ हैं। इस तरह भी भावनाशील एवं प्रबुद्ध जन-शक्ति की अधिक से अधिक मात्रा में आवश्यकता है। सड़े-गले, अध-पगले, हरामखोर और दुर्व्यसनी तो साधु-बाबाओं के अखाड़ों में वैसे ही बहुत भरे पड़े हैं युग देवता को तो वह प्रखर जन-शक्ति चाहिए जो अपना बोझ किसी पन न डाले वरन् दूसरों
साधना के अभीष्ट उपयुक्त वातावरण - आवश्यक साधन एवं अनुभूत मार्ग दर्शन प्रस्तुत रहता था। अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति को लोग वहाँ जाते थे और सफल मनोरथ होकर आते थे। आज तीर्थों की दुर्दशा सर्वविदित है। यह उस मूल प्रयोजन से सर्वथा भिन्न है जिनके लिए इनकी रचना की गई थी।
साधना इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए है। साधन समर में यदि आत्म-तत्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी संपदाएं प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्त काम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधन काल दैवी आसुरी संघर्षों की तुमुल युद्ध की - अवधि है। इसमें पूरे कौशल चातुर्य एवं साहस का प्रयोग करना पड़ता है।
साधना पीठ के रूप में बने विकसित हुए थे। वहाँ अमुक साधना के अभीष्ट उपयुक्त वातावरण - आवश्यक साधन एवं अनुभूत मार्ग दर्शन प्रस्तुत रहता था। अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति को लोग वहाँ जाते थे और सफल मनोरथ होकर आते थे। आज तीर्थों की दुर्दशा सर्वविदित है। यह उस मूल प्रयोजन से सर्वथा भिन्न है जिनके लिए इनकी रचना की गई थी।
साधना चल पड़ती है। तीसरी का उद्देश्य है कि सामाजिक क्रिया-कलापों एवं मर्यादाओं का सुव्यवस्थित निर्वाह। व्यक्ति और समाज के बीच टकराव को निरस्त करते हुए सघन सहयोग का निर्वाह। यह तीनों ही धाराएं मिलकर जिस तीर्थराज संगम का निर्माण करती हैं उसी को आदर्शवादी दर्शन कहते हैं। यह दार्शनिकता जिस देश, समाज के उच्च स्तर पर टिकी रहेगी वह हर दृष्टि से समुन्नत , विकसित दिखाई देगा।
साधना कर ली उसे सफल जीवन के अनेकानेक वरदान पा सकने योग्य सत्पात्र साधक कहा जा सकता है। ऐसे लोग कदाचित् ही असफल रहते देखे गये हैं।
साधना का ही एक अंग हैं । किस वृक्ष की लकड़ियों से, किन उपकरणों से, किन व्यक्तियों के सहयोग से वह आहार बन गया है और किस मनःस्थिति में उसे खाया गया है यह प्रक्रिया साधक के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। अभक्ष्य एवं निकृष्ट स्तर का निकृष्ट वातावरण में-निकृष्ट व्यक्तियों द्वारा पकाया परोसा भोजन साधक के सारे श्रम को निरर्थक बनाकर रख देता है। इसलिए उपासना काल में आहार पर सर्व प्रथम ध्यान देना पड़ता है।बिहार भी इसी कोटि में आता है-बिहार का तात्पर्य समग्र दिनचर्या से है उसे सात्विक रहना चाहिए।
साधना काल कहते हैं जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिये कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।
साधना क्षेत्र के छात्रों को यह नियम बरतने का शारीरिक और मानसिक कहा गया है। यदि इन दोनों बड़े छेदों में होकर मानवी विद्युत नष्ट होती रहे तो फिर मन्त्र रूपी इंजन को चलाने के लिए तेल, कोयला, ईंधन - कहाँ से आवेगा। मात्र शब्दोच्चारण का नाम ही तो मन्त्र साधना नहीं है।
साधना कर सकते हैं।
साधना की श्रद्धा, उपासना विज्ञान पर इतनी गहरी होनी चाहिए कि उसमें संशय की -अविश्वास की कहीं कोई गुँजाइश न रहे। परीक्षा बुद्धि कौतूहल एवं शंकालु मन लेकर की गई साधना निष्फल चली जाती है। श्रद्धा अपने आप में एक शक्ति है। पैट्रोल, भाप, बिजली की तरह उसकी भी अपनी सामर्थ्य है। श्रद्धालु साधक पूर्णरूपेण सफल होकर रहते हैं जबकि शंकाशीलों को खाली हाथ रहना पड़ता है।
साधना नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-September
साधना योगशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके लाभों का विस्तार, अणमादि अगणित ऋद्धि-सिद्धियों के रुप में किया गया है और ब्रह्मतेजस् के रुप में उसकी आध्यात्मिक उपलब्धियों की चर्चा की गई है प्राणायाम इस दिशा में प्रथम सोपान है। दुर्बल विकृत प्राण को बहिष्कृत कर उसके स्थान पर महाप्राण की स्थापना करना इस साधना का लक्ष्य है। संध्या-वन्दन जैसे नित्यकर्मों का उसे अनिवार्य आधार इसलिए बनाया गया है कि इस प्रकार प्रारम्भिक परिचय तथा अभ्यास करते हुए क्रमशः आगे बढ़ा जाय और प्राणवान् बनते हुए जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने की दिशा में अनवरत रुप से गतिशील रहा जाय।
साधना सत्र होंगे। अक्टूबर पूरा हो गया। नवम्बर में कुछ सीटें बाकी हैं। इनके पूरे होते ही सन् 75 की भर्ती पूरी हो जायगी। इसके उपरान्त सन् 76 में जनवरी, फरवरी, मार्च में दस-दस दिन के हिसाब से मात्र नौ सत्र होंगे।
साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना सत्र, जीव साधना सत्र, (5) फरवरी 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-76 कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (7) अप्रैल 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, योग तप साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व का छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय से अनुगमन किया जायगा। ऐसी ही गुरु भक्ति को ईश्वर भक्ति के तुल्य ठहराया गया है। वास्तविकता भी ऐसी ही है।
साधना सत्र, (2) नवम्बर 75-कन्या प्रशिक्षण, महिला सत्र, जीवन साधना (3) दिसम्बर 75-कन्या प्रशिक्षण, महिला सत्र, योग तप साधना सत्र (4) जनवरी 76-कन्या सत्र, लोक साधना सत्र, जीव साधना सत्र, (5) फरवरी 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-76 कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (7) अप्रैल 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, योग तप साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना में जप, तप, ध्यान, प्राणायाम, बंध, मुद्रा आदि का प्रयोग करना पड़ता है। इसके राजयोग, हव्योग, लययोग, प्राणयोग, ऋतुयोग, ज्ञानयोग भक्तियोग, कर्मयोग, तत्वयोग आदि 84 योगों के आधार पर अनेकानेक व्यापक क्रम बताये गये हैं। साधक उन्हें अपनी परम्परा एवं पात्रता के अनुसार अपनाते हैं। इन सब साधनाओं में ज्ञान और कर्म से सम्मिश्रित तत्वयो की साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनि का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्य पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
साधना सत्र
साधना मनुष्य की दयालु, उदार, सज्जन, सहृदय, संयमी एवं शालीन बनाती है। उसे दूसरों को दुखी देखकर उसकी स्थिति में अपने को रखकर व्यथित होने की ‘सहानुभूति’ का अभ्यास होता है। तदनुसार औरों का दुख बँटाने की, सेवा परायणता की आकाँक्षा सदा उठती रहती हैं। विभिन्न प्रकार के परमार्थ इसी स्थिति में बन पड़ते हैं। ऐसे व्यक्तियों की आत्म भावना सुविस्तृत होते-होते अतीव व्यापक बन जाती है।
साधना सत्र नहीं होगा। सीटें पूरी हो जाने पर नौ महीने बाद 77 के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। पाँच-पाँच दिन के प्रत्यावर्तन सत्रों में जो लोग आ चुके हैं उन्हें इन सत्रों में प्राथमिकता दी जायगी। वस्ततः जीवन साधना सत्रों को प्रत्यावर्तन सत्रों का उत्तरार्ध ही कहना चाहिए। दोनों को मिला देने से ही एक पूरा प्रशिक्षण बनता है।
साधना सत्र, (5) फरवरी 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-76 कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (7) अप्रैल 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, योग तप साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधनाओं में ज्ञान और कर्म से सम्मिश्रित तत्वयो की साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनि का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्य पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
साधना सत्रों को प्रत्यावर्तन सत्रों का उत्तरार्ध ही कहना चाहिए। दोनों को मिला देने से ही एक पूरा प्रशिक्षण बनता है।
साधना इन्हीं सिद्धियों का प्राप्त कर सकना सम्भव बनाती हैं।
साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधनात्मक तपश्चर्याओं की आग में तपना पड़ता है। इन त्रिविधि पुण्य-प्रक्रियाओं से संस्कारित छात्र दीप्तिमान र्स्वण की तरह तपे हुए निकलते थे। वे आत्म-कल्याण का जीवन लाभ लेते थे और असंख्यों को अपनी नाव में बिठा कर भव-सागर पार कराते थे।
साधना से जो उपलब्धि हो सकती है उतनी शान्ति-कुञ्ज के दिव्य वातावरण एवं प्रखर संरक्षण में एक माह रहकर मिल सकेगी। योगाभ्यास एवं तप साधना में जिन्हें रुचि हो उनके लिए यह सत्र एक प्रकार से अलभ्य अवसर है।
साधना कहते हैं।
साधनाएँ पात्रता के अनुरुप साथ-साथ चलेंगी। गंगा स्नान, गंगाजल पान इन सत्रों में अनिवार्य रहेगा।
साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्म तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्मानि की उपमा दी गई हैं। सत्पवृत्तियों को उभार सकना-सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना-सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व का छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय से अनुगमन किया जायगा।
साधना करके अपनी प्रतिभा विकसित करते ओर उसका लाभ समस्त समाज को देते। पर समय की आवश्यकता ने दूसरी माँग की और अधिक लोगों का अधिक लाभ देने की नीति अपनानी पड़ी। इसे आपत्ति धर्म कहा जा सकता है। सम्भव है आगे चलकर इस आरण्यक का स्वरुप वही बन जाय कि थोड़े से परखे हुए छात्र यहाँ रहे और दीर्घकालीन एकान्त साधना करके विशिष्ठ आत्म-बल प्राप्त करें और उस सम्पदा को डडडड दिशाओं में बिखेर कर विश्व में चिरस्थायी सुख-शान्ति की भूमिका सम्पादित करें। पर अभी तो आज की आवश्यकता ही प्रधान है।
साधना (3) दिसम्बर 75-कन्या प्रशिक्षण, महिला सत्र, योग तप साधना सत्र (4) जनवरी 76-कन्या सत्र, लोक साधना सत्र, जीव साधना सत्र, (5) फरवरी 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-76 कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (7) अप्रैल 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, योग तप साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना करके विशिष्ठ आत्म-बल प्राप्त करें और उस सम्पदा को डडडड दिशाओं में बिखेर कर विश्व में चिरस्थायी सुख-शान्ति की भूमिका सम्पादित करें। पर अभी तो आज की आवश्यकता ही प्रधान है। संस्कृति की सीता को, लंका बन्दीगृह से छुड़ाने के लिए योगयता की दृष्टि से पिछड़े रीछ, वानरों को स्वल्पकालीन शिक्षा देकर युद्ध के मोर्चे भेजना है। इन दिनों शान्ति-कुञ्ज की गतिविधियाँ ऋत मूक पर्वत बन रही योजनाओं और तैयारियों के में ही समझी जा सकती है। अपने छोटे बानर परिष्कृत को लंका की ओर ले चलने के आतुर हैं।
साधना में जिन्हें रुचि हो उनके लिए यह सत्र एक प्रकार से अलभ्य अवसर है।
साधना सत्र, (6) मार्च-76 कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (7) अप्रैल 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, योग तप साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना सत्र, (7) अप्रैल 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, योग तप साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना एवं तपश्चर्या अभ्यास।
साधना सत्र (4) जनवरी 76-कन्या सत्र, लोक साधना सत्र, जीव साधना सत्र, (5) फरवरी 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-76 कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (7) अप्रैल 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, योग तप साधना सत्र, (8) मई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायाण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र। डडडड सत्र जुलाइ्र से आरम्भ होकर फिर एक साल डडडड। लोक सेवा सत्र दिसम्बर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसम्बर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायगी। अभी अगले 10 महीनों की ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनि का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्य पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
साधना का लक्ष्य है। संध्या-वन्दन जैसे नित्यकर्मों का उसे अनिवार्य आधार इसलिए बनाया गया है कि इस प्रकार प्रारम्भिक परिचय तथा अभ्यास करते हुए क्रमशः आगे बढ़ा जाय और प्राणवान् बनते हुए जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने की दिशा में अनवरत रुप से गतिशील रहा जाय।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-November
साधना के विधान है यह दैत्य न तो देव होते हैं और न दानव। वे उसके शरीर के साथ जुड़े हुए तेजोवलय के आधार पर बनी हुई प्रतिमूर्ति होती है जो विविध प्रकार के क्रिया कलाप तो सम्पन्न नहीं कर सकती पर एक ही स्तर के कार्य ठीक तरह पूरे करती रहती। मरघटों में तान्त्रिक साधना करने का प्रयोजन ऐसे ही किसी चेतना उच्छिष्ट को वशवर्ती बना लेता होता है जो शरीर त्याग देने पर भी किसी विशेष कारण से उद्विग्न स्थिति में जीवन यापन करता है। प्रेत योनि विक्षोभ की स्थिति है। उसमें समूची आत्मा का अथवा उसके एक अंश की विक्षुब्ध स्थिति का परिचय मिलता है।
साधना है। जीवन-साधना ही वस्तुतः योग, तप, धर्म और अध्यात्म का केन्द्रबिंदु है। जीवन परिष्कार और आत्म साक्षात्कार में शब्दों का ही अन्तर है। उच्च स्तरीय रीति-नीति अपनाकर ही आत्मा की गति परमात्मा के समीप पहुँचने के लिए तीव्र हो सकती है।
साधना एवं तपश्चर्या अपनाने की आस्तिक परम्परा सदा से चली आ रही थी। इसे भी तथाकथित भक्ति भावना ने उखाड़ फेंका। जब गंगा स्नान, तीर्थ दर्शन जैसे सुलभ कर्मकाण्ड पाप के दण्ड प्रतिफल से छुटकारा दिला सकते हैं तो फिर पाप की खुली छूट का द्वार खुल गया। शासन और समाज की आँखों में धूल झोंकने की प्रवीणता लोगों ने पहले ही प्राप्त कर ली थी। एक ईश्वरीय नियन्त्रण की कठोर कर्मफल की मान्यता ही चरित्रनिष्ठा को बनाये रह सकती थी।
साधना इसी प्राप्ति के लिए की जाती है। जिसे जितनी मात्रा में यह दिव्य वरदान मिलता जाता है, वह अन्तरंग विभूतियों और बहिरंग सम्पत्तियों से उसी अनुपात में सुसम्पन्न बनता जाता है। ऋद्धि और सिद्धि उन्हीं आत्मिक और भौतिक सफलताओं का नाम है। एक को दुर्भाग्यग्रस्त और दूसरे को सौभाग्यशाली हम देखते हैं तो शारीरिक संरचना एवं ईश्वरीय अनुग्रह में कोई भेदभाव उसका कारण नहीं होता; इन उपलब्धियों में तो लगभग सभी लोग समान हैं। मनुष्य-मनुष्य के बीच पाये जाने वाले अन्तर में उनकी मनःस्थिति ही मुख्य कारण होती है।
साधना हमें आत्म देव का साक्षात्कार कराती है और उनके अजब अनुग्रह से चमत्कारी अनुदान से भरा पूरा बना देती है। सिद्धि इस को कहते हैं।
साधना सही हो तो तथ्य पूर्ण लक्ष्य के प्राप्त होने की सुनिश्चित सम्भावना है। जीवन की समूची विधि व्यवस्था को उच्चस्तरीय बनाने वाली जीवन साधना हमें आत्म देव का साक्षात्कार कराती है और उनके अजब अनुग्रह से चमत्कारी अनुदान से भरा पूरा बना देती है। सिद्धि इस को कहते हैं।
साधना कहते हैं। साधना सही हो तो तथ्य पूर्ण लक्ष्य के प्राप्त होने की सुनिश्चित सम्भावना है। जीवन की समूची विधि व्यवस्था को उच्चस्तरीय बनाने वाली जीवन साधना हमें आत्म देव का साक्षात्कार कराती है और उनके अजब अनुग्रह से चमत्कारी अनुदान से भरा पूरा बना देती है। सिद्धि इस को कहते हैं।
साधना की आवश्यकता न पड़ेगी। कर्म को त्याग कर कल्पना लोक में विचारने से कुछ काम न चलेगा। सत्कर्मों में निरत रहकर श्वेद बिन्दुओं के साथ साथ आनन्द के मणिमुक्तकों का संचय किया जा सकेगा। प्रभु को भेंट करने योग्य ही सर्वोत्तम हार उपहार है जो सत्प्रयासों में बहने वाले श्वेद सीकरों से गूँथा गया है।
साधना में उच्छ्रिष्ट भैरव छाया पुरुष आदि की साधना के विधान है यह दैत्य न तो देव होते हैं और न दानव। वे उसके शरीर के साथ जुड़े हुए तेजोवलय के आधार पर बनी हुई प्रतिमूर्ति होती है जो विविध प्रकार के क्रिया कलाप तो सम्पन्न नहीं कर सकती पर एक ही स्तर के कार्य ठीक तरह पूरे करती रहती। मरघटों में तान्त्रिक साधना करने का प्रयोजन ऐसे ही किसी चेतना उच्छिष्ट को वशवर्ती बना लेता होता है जो शरीर त्याग देने पर भी किसी विशेष कारण से उद्विग्न स्थिति में जीवन यापन करता है। प्रेत योनि विक्षोभ की स्थिति है। उसमें समूची आत्मा का अथवा उसके एक अंश की विक्षुब्ध स्थिति का परिचय मिलता है।
साधना करनी पड़ी है। पल्लवित वृक्ष का इतिहास वहाँ से आरम्भ होता है जहाँ एक बीज ने अपने अस्तित्व की बाजी लगाई थी। चिरन्तन एकाग्र अध्यवसाय के बिना कौन विज्ञ विद्वान बन सका है। सफल लोगों से पूछा जा सकता है कि उनने कितनी ठोकरें खाई और कितनी असफलताएं गले उतारी।
साधना ही वस्तुतः योग, तप, धर्म और अध्यात्म का केन्द्रबिंदु है। जीवन परिष्कार और आत्म साक्षात्कार में शब्दों का ही अन्तर है। उच्च स्तरीय रीति-नीति अपनाकर ही आत्मा की गति परमात्मा के समीप पहुँचने के लिए तीव्र हो सकती है।
साधना करने का प्रयोजन ऐसे ही किसी चेतना उच्छिष्ट को वशवर्ती बना लेता होता है जो शरीर त्याग देने पर भी किसी विशेष कारण से उद्विग्न स्थिति में जीवन यापन करता है। प्रेत योनि विक्षोभ की स्थिति है। उसमें समूची आत्मा का अथवा उसके एक अंश की विक्षुब्ध स्थिति का परिचय मिलता है।
साधना करके यह स्नेह ओर सम्मान भरा अनायास ही प्राप्त कर लेती है।
साधना उपासना के खाद, पानी से निरन्तर सींचते हुए सर्वतोमुखी कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।
साधना आदि सत्कर्मों से दूर रहकर अनीति की रीति अपनाये रहना ही ठीक है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-May
साधना सम्भव है।
साधनारत मनुष्य अपनी संकल्प शक्ति और उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना और इस विशाल ब्रह्मांड में बिखरे हुए शक्ति शाली चेतन तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना वह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएं बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
साधना को कोई भी पक्ष मुक्ति युक्त क्यों न हो किसी भी पक्ष में स्वभाव की विकृति के लिए कोई स्थान नहीं है। क्रोध और आवेशपूर्वक जो कुछ भी कहा जायगा वह सब धर्म होते हुए भी अधर्म बन जायगा।
साधनाएं भी। साधनारत मनुष्य अपनी संकल्प शक्ति और उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना और इस विशाल ब्रह्मांड में बिखरे हुए शक्ति शाली चेतन तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना वह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएं बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
साधना विज्ञान के अंतर्गत विस्तृत वर्णन किया गया है वस्तुतः वह अपने भीतर मस्तिष्कीय क्षेत्र में सन्निहित दिव्य शक्तियाँ हैं जिन्हें अनुकूल बनाकर वे सभी लाभ वरदान प्राप्त किये जा सकते हैं जो देव अनुग्रह से मिलने वाली ऋद्धि−सिद्धियों के रूप में कहे समझे जाते हैं।
साधना में अनवरत रूप से संलग्न रहने की आवश्यकता है। भूत और वर्तमान की तुलना करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान के बिना उज्ज्वल भविष्य का और कोई मार्ग नहीं।
साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएं बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-August
साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
साधना सत्र होंगे। अक्टूबर पूरा हो गया। नवम्बर में कुछ सीटें बाकी हैं। इनके पूरे होते ही सन् 75 की भर्ती पूरी हो जायगी। इसके उपरान्त सन् 76 में जनवरी, फरवरी, मार्च में दस-दस दिन के हिसाब से मात्र नौ सत्र होंगे।
साधना सत्र, (5) फरवरी 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-कन्या सत्र, (8) मई 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र।
साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायेगी। अभी अगले 10 महीनों का ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
साधना सत्र, (6) मार्च-कन्या सत्र, (8) मई 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र।
साधना करके अपनी प्रतिभा विकसित करते और उसका लाभ समस्त समाज को देते। पर समय की आवश्यकता ने दूसरी माँग की और अधिक लोगों को अधिक लाभ देने की नीति अपनानी पड़ी। इसे आपत्ति धर्म कहा जा सकता है। सम्भव है आगे चलकर इस आरण्यक का स्वरूप वही बन जाय कि थोड़े से परखे हुए छात्र यहाँ रहे और दीर्घकालीन एकान्त साधना करके विशिष्ठ आत्म-बल प्राप्त करें और उस सम्पदा को दसों दिशाओं में बिखेर कर विश्व में चिरस्थायी सुख-शान्ति की भूमिका सम्पादित करें। पर अभी तो आज की आवश्यकता ही प्रधान है।
साधनात्मक तपश्चर्याओं की आग में तपना पड़ता है। इन त्रिविध पुण्य-प्रक्रियाओं से संस्कारित छात्र दीप्तिमान स्वर्ण को तरह तपे हुए निकलते थे। वे आत्म-कल्याण का जीवन लाभ लेते थे और असंख्यों को अपनी नाव में बिठा कर भव-सागर पार कराते थे।
साधनाओं में ज्ञान और कर्म से सम्मिश्रित तत्वयोग की साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
साधना एवं तपश्चर्या का अभ्यास।
साधना सत्रों को प्रत्यावर्तन सत्रों का उत्तरार्ध ही कहना चाहिए। दोनों को मिला देने से ही एक पूरा प्रशिक्षण बनता है।
साधना करके विशिष्ठ आत्म-बल प्राप्त करें और उस सम्पदा को दसों दिशाओं में बिखेर कर विश्व में चिरस्थायी सुख-शान्ति की भूमिका सम्पादित करें। पर अभी तो आज की आवश्यकता ही प्रधान है। संस्कृति की सीता को, लंका के बन्दीगृह से छुड़ाने के लिए योग्यता की दृष्टि से पिछड़े हुए रीछ, वानरों को स्वल्पकालीन शिक्षा देकर युद्ध के मोर्चे पर भेजना है। इन दिनों शान्ति-कुंज की गतिविधियाँ ऋष्यमूक पर्वत पर बन रही योजनाओं और तैयारियों के रूप में ही समझी जा सकती है। अपने छोटे वानर परिवार को लंका की ओर ले चलने के लिए आतुर है।
साधना सत्र-
साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्मा तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्माग्नि की उपमा दी गई है। सत्प्रवृत्तियों को उभार सकना- सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना- सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व पर छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय के अनुगमन किया जायगा।
साधना करते हैं।
साधनाएं पात्रता के अनुरूप साथ-साथ चलेंगी। गंगा स्नान, गंगाजल पान इस सत्रों में अनिवार्य रहेगा।
साधना से जो उपलब्धि हो सकती है उतनी शान्ति-कुंज के दिव्य वातावरण एवं प्रखर संरक्षण में एक माह रहकर मिल सकेगी। योगाभ्यास एवं तप साधना में जिन्हें रुचि हो उनके लिए यह सत्र एक प्रकार से अलभ्य अवसर है।
साधना (4) जनवरी 73-कन्या सत्र, लोक साधना सत्र, जीवन साधना सत्र, (5) फरवरी 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-कन्या सत्र, (8) मई 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र।
साधना योगशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके लाभों का विस्तार, अणिमादि अगणित ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में किया गया है और ब्रह्मतेजस् के रूप में उसकी आध्यात्मिक उपलब्धियों की चर्चा की गई है प्राणायाम इस दिशा में प्रथम सोपान है। दुर्बल विकृत प्राण को बहिष्कृत कर उसके स्थान पर महाप्राण की स्थापना करना इस साधना का लक्ष्य है। संध्या वन्दन जैसे नित्यकर्मों का उसे अनिवार्य आधार इसलिए बनाया गया है कि इस प्रकार प्रारम्भिक परिचय तथा अभ्यास करते हुए क्रमशः आगे बड़ा जाय और प्राणवान बनते हुए जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने की दिशा में अनवरत रूप से गतिशील रहा जाय।
साधना का लक्ष्य है। संध्या वन्दन जैसे नित्यकर्मों का उसे अनिवार्य आधार इसलिए बनाया गया है कि इस प्रकार प्रारम्भिक परिचय तथा अभ्यास करते हुए क्रमशः आगे बड़ा जाय और प्राणवान बनते हुए जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने की दिशा में अनवरत रूप से गतिशील रहा जाय।
साधना में जिन्हें रुचि हो उनके लिए यह सत्र एक प्रकार से अलभ्य अवसर है।
साधना मनुष्य को दयालु, उदार, सज्जन, सहृदय, संयमों एवं शालीन बनाता है। उसे दूसरों को दुखी देखकर उसकी स्थिति में अपने को रखकर व्यथित होने की ‘सहानुभूति’ का अभ्यास होता है। तदनुसार औरों का दुख बँटाने की, सेवा परायणता की आकांक्षा सदा उठती रहती है। विभिन्न प्रकार के परमार्थ इसी स्थिति में बन पड़ते हैं। ऐसे व्यक्तियों की आत्म भावना सुविस्तृत होते-होते अतीव व्यापक बन जाती है।
साधना सत्र नहीं होगा। सीटें पूरी हो जाने पर नौ महीने बाद 77 के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। पांच-पांच दिन के प्रत्यावर्तन सत्रों में जो लोग आ चुके हैं उन्हें इन सत्रों में प्राथमिकता दी जायगी। वस्तुतः जीवन साधना सत्रों को प्रत्यावर्तन सत्रों का उत्तरार्ध ही कहना चाहिए। दोनों को मिला देने से ही एक पूरा प्रशिक्षण बनता है।
साधना सत्र, जीवन साधना सत्र, (5) फरवरी 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-कन्या सत्र, (8) मई 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र।
साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व पर छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय के अनुगमन किया जायगा। ऐसी ही गुरु भक्ति को ईश्वर भक्ति के तुल्य ठहराया गया है। वास्तविकता भी ऐसी ही है।
साधना इन्हीं सिद्धियों का प्राप्त कर सकना सम्भव बनाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-February
साधना में बहुत हद तक सफल रहा है। इसके 38 वर्ष निरर्थक नहीं गये।
साधना अभीष्ट है। हमारी आस्थाएँ विचारणाएँ गतिविधियाँ तीनों ही उस स्तर तक परिष्कृत होनी चाहिए जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादिता के नाम से कहा समझा जा सकता है। साधना व्यक्तित्व के अन्तरंग और बहिरंग स्वरूप में काया-कल्प उपस्थित करती है। दुनिया वाले जिस तरह सोचते और जिस राह पर चलते हैं। उससे अध्यात्मवादी की दिशा इतनी भिन्न होती है कि गीतकार को योगी और भोगी लोगों में दिन रात जितना अन्तर बताना पड़ा।
साधनाएं हैं। एक ध्यान की एकाग्रता मेडीटेशन - दूसरी स्वसंकेतन हिप्नोटिज्म। बस सारा योग इतने में ही समाप्त हुआ समझा जाना चाहिए। विदेशों में भारतीयों द्वारा चलाये जाने वाले योग सेन्टर इसी परिधि में चक्कर काटते हैं। क्रिया-कलाप और शिक्षा विधि में - कहने, समझाने के ढंग में थोड़ा अन्तर रहता है, पर तथ्य इसी सीमा में भ्रमण करता रहता है।
साधनात्मक कर्मकाण्ड के लिए भी स्थान है, पर उसकी मूल प्रवृत्ति चिन्तन के स्वरूप को - ऊँचा उठाना है। अपनी सता और दिशा को परिष्कृत करना है। पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण का परिमार्जन करना है। वस्तुतः योग एक दर्शन है। सर्वत्र आत्म-सत्ता की अनुभूति से विश्व मानव की - विश्व परिवार की भावना विकसित होती है और स्नेह-सौजन्य का उभार आता है।
साधना सरस्वती का आराधन था॥
साधना में लोकहित के लिए कर्म करते हुए स्वयं को फलासक्ति के मोह का पूर्ण परित्याग करना पड़ता है। अनासक्ति को साधन और उसे ही साध्य मानकर समस्त कर्तव्य किये जाते हैं। यही कारण है कि महात्मा गाँधी कहा करते थे - ‘हमें भगवान की प्राप्ति नहीं करनी है, बल्कि भगवान बनना है। जब तक मनुष्य भगवान नहीं बन जाता तब तक शान्ति नहीं प्राप्त होती।”
साधना होती। इस युग की इसे एक महानतम दैन कहा जा सकता था, पर यह हो सब तभी सकता था जब हमारा दृष्टिकोण लोकरंजन नहीं लोकमंगल रहा होता। सस्ती और नकली चीजें अबोध बालकों के हाथों बेचकर अधिक पैसे कमाने वाले गली-कूचे में फिरने वाले फेरी वाले से अधिक ऊँची स्थिति हमारी होती। आज का बालक - मस्तिष्क सस्ती - जल्दी निपटने वाली और चमत्कारी चीजें चाहता है। योग के बारे में भी उसकी शिशु मान्यताएं इसी स्तर की हैं।
साधना-विधानों को भी उसमें स्थान रहने की गुंजाइश है। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि यह योग कलेवर है - उसका प्राण नहीं। प्राण तो उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देने वाले उपनिषद् प्रतिपादित उस अध्यात्म दर्शन में है जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मविद्या कहा जाता था - जिसके आधार पर व्यक्ति अपनी सता का समष्टि में - समर्पण करता था। आत्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाना - नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, अणु को विभु - लघु को महान बनाना जिसका लक्ष्य था। चिन्तन स्तर की अन्तरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन पर आच्छादित होती हैं।
साधना अधिक अच्छी तरह बन पड़ती है। जिम्मेदारी अधिक सतर्कतापूर्वक निभ जाती है। मोह न हो तो सम्भव है एक दूसरे के साथ सहयोग और सद्भाव उतना न बरते जितना बरता जाना चाहिए। यही है लोभ और मोह का उपयुक्त प्रयोजन। औचित्य की सीमा में यह दोनों ही प्रवृत्तियां अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं।
साधना व्यक्तित्व के अन्तरंग और बहिरंग स्वरूप में काया-कल्प उपस्थित करती है। दुनिया वाले जिस तरह सोचते और जिस राह पर चलते हैं। उससे अध्यात्मवादी की दिशा इतनी भिन्न होती है कि गीतकार को योगी और भोगी लोगों में दिन रात जितना अन्तर बताना पड़ा। गीता में एक जगह आता है जब दुनिया सोती है तब योगी जगता है। जब दुनिया जगती है तब योगी सोता है।
साधना से ही सम्भव हो सकता है। अस्तु उसे जीवन काल में परिपूर्ण तत्परता के साथ ही करते रहना उचित है।
साधना के सफल नहीं हो सकती। आध्यात्मिक प्रगति के लिए सत्य का अवलम्बन करने पर अन्य साधनों की आवश्यकता नहीं रहती। ईमानदारी, सहिष्णुता, उदारता, भयहीनता आदि गुण सत्य के सहचर हैं। सत्य-पथ का पथिक न कभी अशान्त होता है, न शोक करता है, न सन्ताप करता है। यह सब असत्य-परायणों के लिए ही निश्चित हैं।
साधना पूर्ण अनासक्ति की प्राप्ति से ही सम्भव है। ज्ञानयोग से वैराग्य रूपी वैचारिक अनासक्ति, भक्तियोग से भावनात्मक अनासक्ति और कर्मचोग से विषय विकारों सम्बन्धी अनासक्ति प्राप्त होती है।
साधना कितनी ही ऊँची क्यों न हो, बिना सत्य-साधना के सफल नहीं हो सकती। आध्यात्मिक प्रगति के लिए सत्य का अवलम्बन करने पर अन्य साधनों की आवश्यकता नहीं रहती। ईमानदारी, सहिष्णुता, उदारता, भयहीनता आदि गुण सत्य के सहचर हैं। सत्य-पथ का पथिक न कभी अशान्त होता है, न शोक करता है, न सन्ताप करता है। यह सब असत्य-परायणों के लिए ही निश्चित हैं।
साधना पथ पर आरुढ़ कर्मठ तपस्वी को और कुछ मिले या न मिले, मान- बड़ाई की वर्षा होने लगती है। यही सबसे बड़ा बाधा, विघ्न या खतरा है। आने वाली शेष आपत्तियों का यही मूलाधार बन जाती है। कंचन कामिनी के त्यागी को भी मान-बड़ाई का आकर्षण पतन के गर्त में धकेल सकता है। इसकी भूल-भुलैया में जो पड़ा, उसी फिर खैर नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-July
साधना का आश्रय लिया जाता था। अब भौतिक विज्ञान द्वारा यह प्रयास हो रहे है कि शरीर और मन को वस्तुओं के द्वारा प्रभावित करके वह स्थिति पैदा की जाय जिससे प्रबुद्ध मस्तिष्क को सुषुप्त अवस्था में पहुँचाकर फिर अचेतन मन से वे काम लिये जाय तो योगाभ्यास द्वारा लिये जाते रहे हैं। इस संदर्भ में अब हिप्नोटिज्म स्तर के प्रयोग अब पुराने पड़ते जाते हैं। उसमें यो शरीरगत मानवी विद्युत को संकल्प बल द्वारा दूसरे शरीर में धकेला जाता था इसलिए उसे अर्धभौतिक एवं अर्ध आध्यात्मिक माना जाता था।
साधना में निरत होने के लिए कटिबद्ध होकर पारिवारिक दायित्वों से निवृत्त हो गये। प्रव्रज्या ग्रहण कर वे वनगिरी में जा रहने लगे। पवित्र आचरण, आत्म-संयम, संतोष और करुणा भरे तेजस्वी व्यक्तित्व ने वहाँ निवास करने वाले व्यक्तियों को अप्रतिम रूप से प्रभावित किया। उनका स्वयं का अन्तरंग और बहिरंग तो निखर कर सामने आया ही था किन्तु भी असाधारण रूप से परिवर्तित होने लगा। वनगिरी के निवासियों में शाँतिरस की धारा बहने लगी।
साधनाओं के माध्यम से अपने अंतरंग को निखारना पड़ा। उन सभी पूर्व जन्मों का विवरण जातक कथाओं के नाम से उपलब्ध है। त्याग, प्रेम, करुणार्द्र और सत्यनिष्ठा के उच्च स्तर पर वे किस गरिमा के साथ पहुँच चुके थे, इसका उत्कृष्ट उदाहरण व्याघ्री जातक प्रसंग में आता है।
साधना में उनकी अच्छी गति हुई थी। वंश परम्परा के अनुरूप सभी विद्याओं में पारंगतता प्राप्त कर जब वे आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए तो लगा कि इस पद पर रहते हुए लोक-मंगल के लिए पर्याप्त और अभीष्ट श्रम नहीं कर पा रहा हूँ। यद्यपि उनकी कीर्ति और ख्याति देशकाल की सीमाओं को पार कर दिक् देशान्तर में व्याप्त हो रही थी, परन्तु इससे उन्हें संतोष नहीं हो रहा था।
साधना के साथ-साथ अपने शिष्यों व शील, संयम सजगता और साक्षित्व के मार्ग पर अग्रसर करने लगे। एक समय व अपने शिष्यों के साथ विहार कर रहे थे कि मार्ग में किसी गुफा के अंदर से बाघ का आर्तनाद सुनाई पड़ा। करुणार्द्र बोधिसत्व उसी दिशा में बढ़ चले और उनका अनुगमन करते हुए शिष्यगण भी जाकर देखा तो एक युवती बाघिन जो कुछ समय पूर्व प्रसव से गुजरी थी, प्रसव पीड़ा से पीड़ित और शिथिल हुई क्षुधार्त होकर कराह रही थी।
साधना के लिए लगाया गया समय पवित्र एवं पुण्य फलदायक है। उसमें आत्म कल्याण, लोक-मंगल और भगवत् प्रसन्नता के तीनों ही तथ्य मिले हैं। इसलिए यह त्रिवेणी सर्वोत्कृष्ट परमार्थ प्रयोजनों में प्राथमिकता पाने योग्य है। इसके लिए एक घण्टा समय लगाना किसी को भारी नहीं पड़ना चाहिए। इसे समय का अपव्यय नहीं माना जाना चाहिए।
साधना को भी सम्मिलित कर लें। उसे व्यक्तिगत कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों में गिनलें। किसी पर अहसान समझ कर नहीं वरन् अनिवार्य कर्तव्य के रूप में स्वीकार करे। इसके लिए 24 घण्टे में से न्यूनतम एक घण्टा लगाना आरम्भ कर दें।
साधना के लिए शीत प्रधान हिमालय जैसे पर्वतों को अपना निवास स्थान बनाते थे और ध्यान समाधि द्वारा प्रबुद्ध चेतना को निद्रित करके अन्तः चेतना की गहराई में उतरते थे। अब ध्यान द्वारा समाधि का तो नहीं केवल शीत का उपयोग करके समाधि स्थिति उत्पन्न करने का गुर ढूंढ़ निकाला गया है। अत्यधिक शीत में शरीर के अंग-प्रत्यंगों को विश्राम मिलता है मस्तिष्क को भी। अस्तु आयु का आगे बढ़ना रुक जाता है। शीत समाधि में जो जिस समय उतारा गया था वह आयु की दृष्टि से जहाँ का तहाँ बना रहता है।
साधनाएँ मस्तिष्क की बहुमुखी हलचलों को रोककर न केवल केन्द्रीभूत करता है वरन् मन क्षेत्र ने शान्ति शिथिलता और निष्क्रियता का वातावरण भी उत्पन्न करती है। ध्यान का अर्थ मात्र एकाग्रता नहीं है-वरन् मस्तिष्क के महत्वपूर्ण केन्द्रों को प्रशान्त वातावरण का लाभ देकर उन्हें सजग एवं परिपुष्ट बनाना भी है। इन्हीं केंद्रों से चमत्कारी अतीन्द्रिय उपलब्धियाँ उत्पन्न होती है।
साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है वह कम हैं उन्हें सफल जीवन जीने के लिये अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिये। सो वे कालेज जाने लगी और 69 साल की उम्र में कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय की स्नातिका बन गई। इसके बाद उन्होंने हालीवुड का दरवाजा खटखटाया।
साधना कराई जाती है। इस सबका मतलब विचारों के उत्पादन अथवा प्रवाह का रोक देना नहीं है। वैसा तो हो भी नहीं सकता। मानवी मस्तिष्क की संरचना ही ऐसी है जिसके कारण हर घड़ी अगणित विचार तरंग उठते रहने का क्रम चलता ही रहेगा और उसे किसी भी प्रकार रोका न जा सकेगा। एकाग्रता अथवा मनोनिग्रह का मतलब यही है कि अस्त-व्यस्त ढंग से सोचने की बुरी आदत को क्रमबद्ध एवं सुसंस्कृत बनाया जाय।
साधना का क्रम सारे दिन हर समय चलने का हैं। पर उसका प्रारम्भ, शुभारम्भ एक चिन्तन पद्धति के साथ किया जाना चाहिए। इस पद्धति के तीन अंग हैं- (1) जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग को समझना और उसके अनुरूप गतिविधियों का निर्माण करना, (2 “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत” सूत्र के अनुसार जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिए दिन भर की शारीरिक कार्य पद्धति एवं मानसिक विचार पद्धति का निर्धारण करना। (3 रात को सोते समय मृत्यु के समय आवश्यक वैराग्य का अनुभव करना। इन तीन चिन्तन क्रम में से दो को प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1975-April
साधनाएं वस्तुतः चेतनात्मक क्षेत्र के शैशव को प्रौढ़ावस्था तक पहुँचाने की एक वैज्ञानिक पद्धति है, जिसे फलित होने में समय लगता है। उसकी धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा किये बिना गुजारा नहीं।
साधना सत्रों की शृंखला 3 जुलाई तक चलेगी। कुछ समय बन्द रहने के उपरान्त अक्टूबर में उसके तीन सत्र फिर होंगे।
साधना एवं तपश्चर्या के कठोर प्रयत्नों से इन्हें पाया जगाया है उनकी बात समझ में आती हैं पर जिनने ऐसा कुछ नहीं किया फिर भी अद्भुत शक्तियाँ सम्पन्न पाया जाता है तो असमंजस उत्पन्न होता है कि जो बात सर्वसाधारण में नहीं है वहीं एक अन्य सामान्य व्यक्ति में कैसे उत्पन्न हो गई।
साधना नहीं की है। यह उनके पूर्व जन्मों के प्रयासों का प्रतिफल है। ऐसे कितने ही अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न विवरण उपलब्ध हैं जिनमें इस जन्म की कोई विशेष साधनाएँ न होते हुए भी उनके अन्दर आश्चर्यजनक विशेषताएँ पाई गई।
साधना से युग परिवर्तन धर्मचक्र को तेजी से घुमा सकें। उन्हें तैयार करने में वानप्रस्थ परम्परा को अधिकाधिक प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। अस्तु शान्ति कुञ्ज की वानप्रस्थ शिक्षण प्रक्रिया को स्थाई बनाया जा रहा है और उसमें थोड़े उत्साहवर्धक हेर-फेर किये गये है।
साधना आदि नहीं की है। वह भोला व्यक्ति अतीन्द्रिय शक्ति के सिद्धान्तों के बारे में भी अधिक कुछ बता नहीं सकता। केवल जो कुछ वह है उसे प्रकट करने में बिना संकोच अपने को प्रस्तुत करता रहता है।
साधनाएँ न होते हुए भी उनके अन्दर आश्चर्यजनक विशेषताएँ पाई गई।
साधनाएँ भी वटवृक्ष की तरह अपने क्रम से बढ़ती और परिपक्व होती हैं। बड़े कार्यों में बड़ा समय लगना, बड़ा पुरुषार्थ करना और बड़ा धैर्य रखना भी आवश्यक होता है। उतावले लोग हथेली पर सरसों जमाने के लिए आतुर रहते हैं और तुर्त−फुर्त अपनी मन चाही उपलब्धि प्राप्त करने में अधीर बने रहते हैं। इस बाल अधीरता से काम कुछ नहीं बनता। जिस कार्य के लिए जितना समय लगना चाहिए वह तो लगेगा ही।
साधना के महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश रहने से इन सत्रों की उपयोगिता और अधिक बढ़ गई है।
साधनाओं की सर्वोत्तम परिणति का नाम संस्कृति है।” यह परिभाषा में संस्कृत मानव जाति की उच्चतम उपलब्धियों एवं विचारधाराओं का समवेत रूप है। किसी देश की संस्कृति का प्राण वहाँ की धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-September
साधना के दिनों में किये गये मनन और चिन्तन का स्थाई प्रभाव हमारे अंतःकरण पर पड़ता है। अंतःकरण की पवित्रता पर ही हमारी सुख शान्ति निर्भर करती है।
साधना के साथ अनुष्ठान के विशेष नियम लागू नहीं होते। जो लोग सामूहिक साधना करने के लिए तैयार हो जायें, उन्हें अनुष्ठान के विशेष नियमों की जानकारी करवा देनी चाहिए। साधकों का धोती या दुपट्टा कोई एक वस्त्र पीला अवश्य होना चाहिए।
साधना करने के लिए तैयार हो जायें, उन्हें अनुष्ठान के विशेष नियमों की जानकारी करवा देनी चाहिए। साधकों का धोती या दुपट्टा कोई एक वस्त्र पीला अवश्य होना चाहिए।
साधना का अधिकाँश भाग प्रातःकाल ही पूरा करना चाहिए। समय के अभाव व अन्य कारणों से सायंकाल को भी किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य पालन, भूमिशयन, बाल न कटवाना (दाढ़ी के बाल अपने हाथ से बनाये जा सकते हैं), चर्म के जूतों का त्याग आदि के नियमों का, जहाँ तक सम्भव हो, पालन करना चाहिए। आचार, विचार और व्यवहार को पवित्र रखना चाहिए। उत्तम धार्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय करना और मनन चिन्तन द्वारा उनकी शिक्षाओं को अपने जीवन का एक अंग बना लेना चाहिए।
साधना के लिए किये गये कठोर परिश्रम से विद्या प्रकाश, ज्ञान विज्ञान आदि की रक्षा कर, उनके अनुभवों से लाभ उठाकर उस विद्या भण्डार में अपना भी कुछ भाग डालें। मनुष्य अपने पूर्वजों की भाँति विद्या प्रकाश को अपने नवीन अनुसंधान के आधार पर और भी बढ़ावें तथा अन्धकार जन्य तत्वों से रक्षा करें।
साधना में रत, देश और समाज के कल्याण के लिए अथक परिश्रम, आदि मनुष्य जीवन में नवीन उत्साह, स्वास्थ्य, उच्च भावनायें शक्ति आदि को बनाये रखते हैं। साथ ही ब्रह्मचर्य का पालन भी जीवन शक्ति को नष्ट होने से बचाकर बढ़ाने में सहायक होता है। वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य का आत्म संबंध विस्तृत होकर अखण्ड देश प्रेम, समाज सेवा, राष्ट्रभक्ति आदि से मनुष्य में आत्मबल साहस, सहनशीलता, समानता, उदारता, शक्ति पुरुषार्थ की निर्झरिणी बहती रहती है जो उसकी उम्र को बढ़ाती है। यही कारण था कि महात्मा गाँधी कहते थे “मैं 125 वर्ष तक जिन्दा रहूँगा।”
साधना करता हुआ उलझन रहित कर्म का अवलंबन कर। मनुष्य बन और जनसेवक लोगों को पैदा कर।”
साधनाओं द्वारा अनुष्ठान करने का विधान बनाया गया है। यह समय गायत्री साधना के लिए सब से अधिक उपयुक्त है। आश्विन की नवरात्रि 3 अक्टूबर को आरम्भ होकर 11 अक्टूबर को समाप्त होगी। इन नौ दिनों में उपवास रखकर चौबीस हजार गायत्री मन्त्रों के जाप का या दो सौ चालीस गायत्री चालीसा पाठ या 2400 गायत्री मन्त्र लेखन का अनुष्ठान करना चाहिए। नौ दिन में अनुष्ठान पूर्ण करने के लिए नित्य प्रति 27 माला गायत्री जप, या 27 गायत्री चालीसा पाठ या 267 गायत्री मन्त्र लेखन करने चाहिए।
साधना एवं विद्या प्रकाश वृद्धि, उलझन भरे कार्यों से दूर रहकर अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य का सदुपयोग अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में करना योग्य उत्तराधिकारी तैयार करना उनकी जीवनधारा के मूल आधार थे। यही कारण था कि उन्होंने जीवन में पूर्णता प्राप्त की संसार के लिए अमूल्य ज्ञान भंडार का दान किया और जीवन में महान् कार्यों का संपादन किया। आज भी प्रत्येक व्यक्ति वेद भगवान के आदेशानुसार उक्त तथ्यों के आधार पर जीवन का सदुपयोग करे तो वही स्थिति प्राप्त हो सकती है इसमें तनिक भी सन्देह एवं शंका की बात नहीं है।
साधना ही मनुष्य बनने की उच्च मंजिल तक पहुँचाती है। मानव जीवन हमें इसीलिए प्राप्त होता कि इस अमूल्य अवसर का लाभ उठाकर पूर्ण मनुष्य बन जाय। इस प्रकार की पूर्णता प्राप्त कर लेना ही जीवन लक्ष्य कहलाता है। इसीलिए वेद भगवान आदेश करते हैं “मनुर्भवः” मनुष्य बन।
साधना की आवश्यकता है। जीवन में प्रकाश का अवलंबन करने के लिए मुख्यता दो बातों की आवश्यकता है। (1) जीवन में अंधकारमय तत्वों को पहचानना, सूक्ष्म निरीक्षण करना और उन्हें छोड़ना। (2) प्रकाश की ओर अग्रसर होना।
साधना के लिए सब से अधिक उपयुक्त है। आश्विन की नवरात्रि 3 अक्टूबर को आरम्भ होकर 11 अक्टूबर को समाप्त होगी। इन नौ दिनों में उपवास रखकर चौबीस हजार गायत्री मन्त्रों के जाप का या दो सौ चालीस गायत्री चालीसा पाठ या 2400 गायत्री मन्त्र लेखन का अनुष्ठान करना चाहिए। नौ दिन में अनुष्ठान पूर्ण करने के लिए नित्य प्रति 27 माला गायत्री जप, या 27 गायत्री चालीसा पाठ या 267 गायत्री मन्त्र लेखन करने चाहिए।
साधना के साथ उपवास के लिए (1) एक समय बिना नमक का अन्नाहार, (2) एक समय फलाहार, (3) दो समय दूध और फल, (4) एक समय आहार और एक समय फल दूध, (5) केवल दूध का आहार इसमें से जैसी सुविधा हो अपनी सामर्थ्यानुकूल उपवास करना चाहिए। साधना का अधिकाँश भाग प्रातःकाल ही पूरा करना चाहिए। समय के अभाव व अन्य कारणों से सायंकाल को भी किया जा सकता है। इनके अतिरिक्त ब्रह्मचर्य पालन, भूमिशयन, बाल न कटवाना (दाढ़ी के बाल अपने हाथ से बनाये जा सकते हैं), चर्म के जूतों का त्याग आदि के नियमों का, जहाँ तक सम्भव हो, पालन करना चाहिए। आचार, विचार और व्यवहार को पवित्र रखना चाहिए।
साधना एवं चिन्तन रूपी असीम पुरुषार्थ के फलस्वरूप विद्या भण्डार की रक्षा करता रहे। और उसमें स्वयं भी नवीन अनुसंधान करके अपना कुछ भाग डालता रहे। हमारे देश में वेद पुराण, मीमाँसा, स्मृति, दर्शन, शास्त्र आदि के रूप में विद्या विस्तार वेद भगवान के उक्त आदेश का परिणाम है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-November
साधना है, वह उत्तराधिकार मेरे कंधे पर आता है तो उसे भी आचार्य जी के आशीर्वाद और पाठकों के सद्भाव पर विश्वास करते हुए मुझे किसी प्रकार शिरोधार्य करना ही हैं।
साधना, बैरी को दण्ड, शास्त्राभ्यास, गमन, पशु विक्रय; ईंट, पत्थर, काठ तथा रत्नादि का घिसना और छीलना, संगीत अभ्यास, यन्त्र-तन्त्र बनाना, हाथी घोड़ा तथा रथ आदि की सवारी सीखना, व्यायाम, षट्कर्म साधन, भूतादि साधन, औषध सेवन, लिपि लेखन, दान क्रय-विक्रय, युद्ध, भोग, राजदर्शन आदि।
साधना के योग्य बनाते थे। इस प्रकार उनको ऐसी मंत्रशक्ति प्राप्त हो जाती थी जिससे वे अनेक आश्चर्यजनक कार्यों को सिद्ध कर दिखाते थे।
साधना में रत है वही उसकी सबसे अच्छी और नित्य की इच्छा है। मनुष्य की इच्छा उससे तब तक गुप्त रहती है जब तक उसकी सार्थकता उसके लिए एक रहस्य बनी रहती है। “किस चीज से मेरा पेट भरेगा या किससे मेरी कीर्ति होगी” यह बताना कोई कठिन नहीं है किन्तु “किस में पूर्ण होऊँगा” “मैं कौन हूँ, मेरे भीतर जो प्रकाश चेष्टा है उसका क्या परिणाम है, उसका उद्देश्य क्या है” इस बात को कौन स्पष्ट रूप से जानता है तथा अब तक कितने व्यक्तियों ने जान पाया है।
साधनाओं से बहुत कुछ सम्बन्धित रहता है। इस उपासना में लगा हुआ कन्याओं का समय उनके भावी जीवन के लिए एक दैवी वरदान सिद्ध हो सकता है।
साधना और शोध कार्यों के लिए बाहर जाने के पूर्व उस कार्य का भी शुभारंभ कराना चाहते हैं। इसी योजना के आधार पर गायत्री तपोभूमि की भाँति उनने अखण्डज्योति कार्यालय का आगामी कार्यक्रम निर्धारित कर दिया है जिसकी कुछ चर्चा गत अंक में की जा चुकी हैं।
साधना बतलाई गई है, उसमें मुद्रा साधन बड़े महत्व का और श्रेष्ठ है। मुद्रा में आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि योग की सभी क्रियाओं का समावेश होता है। मुद्रा की साधना द्वारा मनुष्य शारीरिक और मानसिक शक्तियों की वृद्धि करके अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है।
साधना क्षेत्र में एक आश्चर्य ही माना जायगा। इसी जनवरी से वह लेख माला चल पड़ेगी एवं आचार्य जी के सुविज्ञ सहचरों के लेख अखण्ड ज्योति में आने लगेंगे तो मेरा सम्पादन कार्य-भार बहुत कुछ सरल हो जायगा।
साधना और शोध को पूर्ण करने के लिए मथुरा से बाहर जाने वाले हैं। कितना समय लौटने में लगेगा इसके बारे में उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया। वह समय अभी अनिश्चित हैं। उनके कन्धों पर यों अनेकों उत्तरदायित्व हैं पर मथुरा में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले उनके दो ही कार्यक्रम हैं। 1. गायत्री तपोभूमि 2. अखण्डज्योति कार्यालय।
साधना को निरन्तर जारी रखना चाहिए। जब तक परिव्राजक का ज्ञान परिपूर्ण रूप से नहीं होता तो वह दूसरों में ज्ञान प्रकाश भली प्रकार पैदा नहीं कर सकता। ज्ञान प्राप्ति और बुद्धि बल के विकास के लिए जीवन भर विद्याध्ययन और साधना अत्यावश्यक है। अपने कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए भी उक्त दोनों क्रम योग्यता वृद्धि के लिए चलते रहने चाहिए।
साधना अत्यावश्यक है। अपने कर्तव्य धर्म का पालन करते हुए भी उक्त दोनों क्रम योग्यता वृद्धि के लिए चलते रहने चाहिए।
साधना में विघ्न पड़ने लगा। तब वे तिब्बत की तरफ चले गये। वहाँ मान सरोवर के तट पर रह कर उन्होंने बहुत समय तक योगाभ्यास किया। जब उनको सिद्धि प्राप्त हो गई तो वे वहाँ से चल कर मोक्ष-धाम काशी नगरी में पधारे। कुछ समय तक तो वे दशाश्वमघ घाट पर योगाश्रम बनवा कर वहीं रहने लग गये।
साधना द्वारा मनुष्य शारीरिक और मानसिक शक्तियों की वृद्धि करके अपने आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है।
साधनाओं और कठोर तपस्याओं का विधान नहीं है, वरन् वह मनुष्य के भोग की तरफ झुके हुये मन को उसी मार्ग पर चलाते हुये धीरे धीरे त्याग की ओर प्रवृत्त करता है। इस दृष्टि से तंत्र को एक ऐसा साधन माना गया कि जिसका आश्रय लेकर साधारण श्रेणी के व्यक्ति भी आध्यात्मिक मार्ग में अग्रसर हो सकते हैं। यह सत्य है कि बीच के काल में तंत्र का रूप बहुत विकृत हो गया और इसका उपयोग अधिकाँश में मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि जैसे जघन्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिये किया जाने लगा, पर तंत्र का शुद्ध रूप ऐसा नहीं है। उसका मुख्य उद्देश्य एक एक सीढ़ी पर चढ़ कर आत्मोन्नति के शिखर पर पहुँचना ही है।
साधनाएं, सीखीं और आसन प्राणायाम, नेति, धौति, नौलि, बगोली, ध्यान, धारणा करते करते समाधि तक का साधन विधिपूर्वक करने लगीं। इसके सिवाय उनको स्वरोदय का भी अच्छा अभ्यास हो गया। प्रारम्भिक अवस्था में लाख की बनी पाँच रंग की पाँच गोलियाँ अपने पास रखती थीं और उन पर पंचत्व की धारणा किया करती थीं। फिर उनको छाया पुरुष की सिद्धि हो गई थी। वे सदैव नासिकाग्र पर दृष्टि रखती थीं, केवल 3, 4 घंटे के करीब ही भूमि पर बिस्तर बिछा कर सोती थीं और 24 घंटे में एक बार अल्प भोजन करती थीं।
साधना, सेवाकार्य आदि तपश्चर्याओं में तपा-तपा कर शुद्ध बना लेना आवश्यक है। क्योंकि जो स्वयं हुआ नहीं हैं वह दूसरे को क्या तपा सकता हैं? उसका स्वयं का जीवन व्यवहार आदि आदर्शपूर्ण नहीं है वह दूसरे को कैसे प्रभावित कर सकता है और अपनी छाप छोड़ सकता है। यह ध्रुव सत्य है कि कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति के शब्द जो ही दूसरे पर प्रभाव डालते हैं। हमारे ऋषि महर्षि आदि कर्तव्य निष्ठ थे।
साधनाओं का कोई प्रयोजन नहीं, पतिव्रत ही उनके लिये सबसे बड़ा और प्रभावशाली साधन है। ऐसी दशा में स्त्रियाँ योग जैसे साधनों में तभी प्रवृत्त होती हैं जब या तो ये आजन्म ब्रह्मचारिणी रहें या फिर आरम्भिक जीवन में ही वैधव्य की अवस्था को प्राप्त हो जायें। नीचे एक ऐसी ही योगिनी का परिचय दिया जाता है। जो हठयोग की समाधि अवस्था तक पहुँच गई थी और जिसने अध्यात्म मार्ग में उल्लेखनीय प्रगति करके दिखाई थी। यह विवरण उन्हीं के परिवार के एक विद्वान श्री हरिनारायण जी पुरोहित ने प्रकाशित कराया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-October
साधना का स्वरूप समझने में भी उनको भ्रम हो जाता है। वे इन्द्रियों की तृप्ति को ही सुख समझ बैठते हैं। इसलिए सदैव उसी के लिए प्रयत्न करते रहते हैं। पर जैसा हम जानते हैं इन्द्रियों के अभावों की पूर्ति कभी संभव नहीं होती। पहले तो किसी अभाव की एक बार पूर्ति हो जाने पर थोड़ी बहुत समय पश्चात फिर उसी अभाव का अनुभव होने लगता है, और दूसरे एक अभाव की पूर्ति हो जाने पर दूसरा अभाव उत्पन्न हो जाता है।
साधनाश्रम तथा धर्मप्रचार का केन्द्र भारत के अत्यन्त महत्वपूर्ण धर्मस्थानों में से एक है। (2) ऋषियों के आश्रमों में रहने वाली अखंड अग्नियाँ जो कभी न बुझें और जिनका पूजन नित्य यज्ञ द्वारा होता रहे, देश भर में अब दो चार स्थानों पर ही रह गई है। ऐसी अग्नियों का असाधारण आध्यात्मिक महत्व है, पर वह परम्परा लुप्त हो चली है। ऐसी अखण्ड अग्नि की स्थापना तपोभूमि में हो चुकी और उसका सदा जलते रहने का व्यवस्था क्रम बन गया। (3) अ.भा. गायत्री परिवार की शाखाएं 2400 से अधिक हो गई हैं।
साधना का साराँश यही बतलाया है। उनका मत संक्षेप में इस प्रकार है-
साधना का आशय क्या है और विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसको सत्य समझा जाय?
साधना का मुख्य उद्देश्य ‘सुख’ की प्राप्ति है फिर वह चाहे छोटे दर्ज का हो या बड़े दर्जे का।
साधना को श्रेष्ठ मानते हैं दूसरे शरीर की साधना को। एक त्याग को महत्व देते हैं दूसरे संग्रह को।
साधना को। एक त्याग को महत्व देते हैं दूसरे संग्रह को।
साधना क्षेत्र में लौटना है। अखण्ड-ज्योति का यह सम्पादन परिवर्तन भी इसी योजना का एक अंग है।
साधनाओं में से किसको सत्य समझा जाय?
साधना को उद्देश्य बतला चुके हैं। इन सबका स्वरूप यही बतलाया गया है कि मनुष्य को संसार में जो तरह-तरह के अभाव और कष्ट सहन करने पड़ते हैं, वहाँ उनका कोई भय नहीं रहता। वहाँ मनुष्य हर तरह के सुख, आनन्द उपभोग करता है, रोग, शोक, शारीरिक कष्ट, बुढ़ापा, निर्बलता आदि की वहाँ कभी संभावना नहीं होती। अधिकाँश सम्प्रदाय परलोक ही नहीं इस लोक में भी साधना द्वारा अभावों की निवृत्ति और सुखों की वृद्धि का विश्वास दिलाते हैं।
साधना है। इसमें संदेह नहीं कि साधनाएँ अनेकों प्रकार की होती हैं और उनमें से कई साधनाएं दूसरी साधनाओं से विपरीत जान पड़ती हैं। हमारे हिन्दू धर्म में ही एक समुदाय ईश्वर के निराकार रूप का ध्यान करता है तो दूसरा उसको साकार मानकर मंदिरों में उसकी पूजा और सामूहिक आरती करता है। इसी प्रकार किसी ने अहिंसा और प्रत्येक प्राणी पर दया करने को मुक्ति का साधन माना है तो दूसरा भैंसे, बकरे आदि का बलिदान करने को स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बतलाता है। इन बातों को देखकर एक साधारण मनुष्य के मन में स्वभावतः यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वास्तव साधना का आशय क्या है और विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसको सत्य समझा जाय?
साधनाओं से विपरीत जान पड़ती हैं। हमारे हिन्दू धर्म में ही एक समुदाय ईश्वर के निराकार रूप का ध्यान करता है तो दूसरा उसको साकार मानकर मंदिरों में उसकी पूजा और सामूहिक आरती करता है। इसी प्रकार किसी ने अहिंसा और प्रत्येक प्राणी पर दया करने को मुक्ति का साधन माना है तो दूसरा भैंसे, बकरे आदि का बलिदान करने को स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बतलाता है। इन बातों को देखकर एक साधारण मनुष्य के मन में स्वभावतः यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वास्तव साधना का आशय क्या है और विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसको सत्य समझा जाय?
साधना का यह प्रचंड स्त्रोत सूखने न पाये जिसके आधार पर गायत्री परिवार की सारी गतिविधियों की सफलता निर्भर है।’ चूँकि परिवार काफी बड़ा हो गया है, उसकी योजनाएं भी बहुत बड़ी हैं, उनको पूरा करने में तपोभूमि निवासी आत्मदानी तथा देशभर में फैले हुए व्रतधारी तथा उपासकगण संलग्न है। पर उनकी उस शारीरिक एवं मानसिक प्रक्रिया के पीछे एक सूक्ष्म शक्ति संपन्न आध्यात्मिक प्रेरणा की भी आवश्यकता है जिसके आधार पर युग निर्माण के कार्यक्रमों में आवश्यक निष्ठा एवं तत्परता सब लोगों में बनी रहे। आचार्य जी अगले वर्ष में जिस साधना में लगेंगे वे बहुत ऊँचे स्तर की है। पर मुझे उन्होंने यह सौंपा है कि गायत्री परिवार की प्रवृत्तियों में समुचित अध्यात्म तत्व सन्निहित रहे इसके लिए मैं भी एक विशेष साधना क्रम में लग जाऊँ।
साधनार्थ, तीर्थ, व्रत, नियम, योग, निष्काम कर्म आदि अनेक साधन बतलाये हैं। पर जन्म-जन्म के कुसंस्कारों से जब मनुष्य का मन मलीन रहता है, तो उसके कुप्रभाव से इन साधनों में मन नहीं लगता। इसलिए इसका उपाय महात्माओं ने नाम-जप बतलाया है। भगवान के किसी नाम या प्रणव का जप निरंतर करता रहे और निष्काम भाव से अर्थात् फलेच्छा रहित होकर तीर्थ, व्रत, यज्ञ आदि शुभ कार्य करे तो इससे मनु शुद्ध होता है, और फिर मोक्ष के चार साधन विवेक, वैराग्य, षट् सम्पत्ति और मुमुक्षु भाव की क्रमशः प्राप्ति होती है।”
साधना लेकर जो आत्मदानी तपोभूमि पर आये हैं उनकी गतवर्षों में कार्य तत्परता की अगाध भावना को देखते हुए ऐसा लगता है कि आचार्य जी के संकल्प ही शरीर धारण करके आत्मदानियों के रूप में अवतरित हुए हैं। उन्हें उनका मानस पुत्र-धर्मपुत्र कहा जा सकता है। देशव्यापी धर्म जागृति के जो सपने उनने जीवन भर देखे हैं उनके यह मानस पुत्र पूरा करके रहेंगे ऐसा निश्चित दीखता है। गायत्री परिवारों का संगठन, उपासकों एवं धर्मव्रतियों की अभिवृद्धि, सद्ज्ञान का विस्तार, लोक शिक्षण, सत् साहित्य निर्माण, नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का विस्तार आदि कार्यों से वे चिपट गए हैं मानो इन्हें पूरा करने के लिए उनने जन्मधारण किया हो। ऐसी उच्च मनोभूमि का सम्पन्न आत्मदानियों का मिलना आचार्य जी का सप्त सूत्री योजना का भविष्य उज्ज्वल है।
साधना की विभिन्न प्रणालियाँ बतलाई हैं पर ‘साध्य’ उद्देश्य के विषय में किसी को विशेष मतभेद नहीं है। प्राचीनकाल के सभी सम्प्रदाय ईश्वर-मुक्ति सान्निध्य निर्वाण, बैकुंठ, स्वर्ग, “वहिदत”, “हविन” आदि को साधना को उद्देश्य बतला चुके हैं। इन सबका स्वरूप यही बतलाया गया है कि मनुष्य को संसार में जो तरह-तरह के अभाव और कष्ट सहन करने पड़ते हैं, वहाँ उनका कोई भय नहीं रहता। वहाँ मनुष्य हर तरह के सुख, आनन्द उपभोग करता है, रोग, शोक, शारीरिक कष्ट, बुढ़ापा, निर्बलता आदि की वहाँ कभी संभावना नहीं होती। अधिकाँश सम्प्रदाय परलोक ही नहीं इस लोक में भी साधना द्वारा अभावों की निवृत्ति और सुखों की वृद्धि का विश्वास दिलाते हैं।
साधना का व्यवहारिक क्षेत्र दाम्पत्य जीवन है। जो इसमें असफल रहे, उसकी साधना अधूरी ही मानी जाती है। यह दोनों के लिए परीक्षा का क्षेत्र है। इसमें तरह तरह के दुख कलह, कठिनाइयाँ आती हैं। एक दूसरे के लिए त्याग के अवसर आते हैं, कभी-कभी प्रतिकूल व्यवहार हो जाता है।
साधना द्वारा अभावों की निवृत्ति और सुखों की वृद्धि का विश्वास दिलाते हैं।
साधनामय जीवन है। सच्चे अर्थों में उनका अन्तः विश्लेषण किया जाय तो वे और कुछ पीछे-साधक पहले हैं। यही उनका सब से प्रिय कार्य रहा है, इसी में उनका मन रमता एवं रचता है। 24-24 लक्ष के 24 गायत्री पुरश्चरण उनने पूरे कर लिये थे तो उनने उसकी पूर्णाहुति स्वरूप कुछ धर्म-प्रचार कार्य करने का संकल्प किया था। उसमें उन्हें सात वर्ष लगाने थे।
साधना में लगेंगे वे बहुत ऊँचे स्तर की है। पर मुझे उन्होंने यह सौंपा है कि गायत्री परिवार की प्रवृत्तियों में समुचित अध्यात्म तत्व सन्निहित रहे इसके लिए मैं भी एक विशेष साधना क्रम में लग जाऊँ।’
साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं। इसलिए अगले एक वर्ष में सप्त सूची संकल्प का शेष भाग पूरा करने के साथ साथ वे अपनी वर्तमान सीधी जिम्मेदारियों को दूसरों के हाथों सौंप देने में लगे हुए हैं। अखण्ड ज्योति का यह सम्पादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है।
साधनात्मक कार्य क्षेत्र में प्रवेश करेंगे। उनकी योजनाएं आध्यात्मिक आधार पर होती हैं, उनके पीछे कुछ दिव्य संदेश रहते हैं इसलिए उनमें हेर-फेर करने अनुरोध करने को भी अपनी हिम्मत नहीं होती। वैयक्तिक जीवन में कुछ मानसिक तथा बाहरी कठिनाइयाँ उनके सान्निध्य के अभाव में दुखी करती हैं, करेंगी, पर इसके लिए मैं उनको महान लक्ष्य से विचलित नहीं करना चाहती। मैं अब तक कभी उनके मार्ग में बाधक बनी भी नहीं-और न आगे बनना चाहती हूँ। वे जो उचित समझते हैं निश्चय ही उसके पीछे औचित्य ही परिपूर्ण होता है।
साधना क्रम में लग जाऊँ।’
साधनाएं दूसरी साधनाओं से विपरीत जान पड़ती हैं। हमारे हिन्दू धर्म में ही एक समुदाय ईश्वर के निराकार रूप का ध्यान करता है तो दूसरा उसको साकार मानकर मंदिरों में उसकी पूजा और सामूहिक आरती करता है। इसी प्रकार किसी ने अहिंसा और प्रत्येक प्राणी पर दया करने को मुक्ति का साधन माना है तो दूसरा भैंसे, बकरे आदि का बलिदान करने को स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बतलाता है। इन बातों को देखकर एक साधारण मनुष्य के मन में स्वभावतः यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वास्तव साधना का आशय क्या है और विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसको सत्य समझा जाय?
साधना अधूरी ही मानी जाती है। यह दोनों के लिए परीक्षा का क्षेत्र है। इसमें तरह तरह के दुख कलह, कठिनाइयाँ आती हैं। एक दूसरे के लिए त्याग के अवसर आते हैं, कभी-कभी प्रतिकूल व्यवहार हो जाता है। इन में सहन शीलता धैर्य, त्याग, क्षमा आदि गुणों को प्रकट करने वाला ही उत्तम साधक माना जाता है।
साधना प्रणव का जप ही बतलाया है। इसके संबंध में लिखा है।
साधनाएँ अनेकों प्रकार की होती हैं और उनमें से कई साधनाएं दूसरी साधनाओं से विपरीत जान पड़ती हैं। हमारे हिन्दू धर्म में ही एक समुदाय ईश्वर के निराकार रूप का ध्यान करता है तो दूसरा उसको साकार मानकर मंदिरों में उसकी पूजा और सामूहिक आरती करता है। इसी प्रकार किसी ने अहिंसा और प्रत्येक प्राणी पर दया करने को मुक्ति का साधन माना है तो दूसरा भैंसे, बकरे आदि का बलिदान करने को स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग बतलाता है। इन बातों को देखकर एक साधारण मनुष्य के मन में स्वभावतः यह प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वास्तव साधना का आशय क्या है और विभिन्न प्रकार की साधनाओं में से किसको सत्य समझा जाय?
साधना में लगेंगे। पूरी बात तो अभी उनने स्पष्ट नहीं की है, पर मालूम होता है किन्हीं विशेष स्थानों पर किन्हीं विशेष आत्माओं के सान्निध्य में मथुरा से बहुत दूर रहने की उनकी योजना है। वे राष्ट्र के लिए एक विशेष व्यक्ति का आविर्भाव करने के लिए कुछ विशेष साधनात्मक कार्यक्रम बना रहे हैं। इसलिए अगले एक वर्ष में सप्त सूची संकल्प का शेष भाग पूरा करने के साथ साथ वे अपनी वर्तमान सीधी जिम्मेदारियों को दूसरों के हाथों सौंप देने में लगे हुए हैं। अखण्ड ज्योति का यह सम्पादकीय परिवर्तन भी उसी का एक पूर्व भाग माना जा सकता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-July
साधनावस्था में उसकी आवश्यकता होती है। इसके लिये मन्थाख्य कर्म किया जाता है, जिससे धन प्राप्त होता है। उस कर्म में ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि “हे अग्नि स्वरूप देव भगवन्, सब देवता विपरीत होकर मेरी सफलताओं को नष्ट कर देते हैं। मैं उनकी तृप्ति के लिये आहुति देता हूँ”। किसी अच्छे मुहूर्त में केवल दुग्ध पर रहकर कुशकण्डिका करे तथा औषधियों और फलों से हवन करे।
साधना के इच्छुक सभी व्यक्तियों को यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि को साधन करके आगे की मंजिलों की तरफ अग्रसर होना पड़ता है। परन्तु जिस व्यक्ति में कोई महात्मा शक्तिपात कर देते हैं वे इन सब क्रियाओं को बिना किसी के सिखाये स्वयमेव ठीक-ठीक ढंग से करने लगते हैं और दस-पाँच दिन में ही दक्षता प्राप्त कर लेते हैं। इसी प्रकार जो लोग वर्षों तक जप करके किसी मंत्र को सिद्ध नहीं कर सकते थे, वे शक्तिपात के बाद अनायास उसमें सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए आध्यात्मिक उन्नति के लिए सद्गुरु द्वारा शक्तिपात का बड़ा महत्व है। पर ऐसा सुयोग्य अधिकारी शिष्य को ही मिलता है।
साधना और सेवा के दोनों ही तार आवश्यक हैं। एक के अभाव में प्रगति रुक जायगी। केवल साधना करने वाले व्यक्ति अपनी स्वार्थपरता के कारण ईश्वर की दृष्टि में ओछे और खुदगर्ज जाँचेंगे। ऐसे लोग चाहे कितनी ही मिन्नतें करें, कितना ही गिड़गिड़ायें, स्तोत्र प्रार्थना करें उस अन्तर्यामी की दृष्टि में भिक्षुक और स्वार्थी ही जाँचेंगे, उन्हें कभी भी प्रभु का सच्चा प्यार प्राप्त नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो केवल सेवा कार्यक्रमों में लगे हैं, उनकी आत्मा में यदि ईश्वरीय श्रद्धा नहीं है तो उनके सेवा में साँसारिकता ही प्रधान रहेगी।
साधना करते हैं साथ ही सद्ज्ञान का सदावर्त भी बाँटते हैं। दया उनकी अन्तरात्मा में से छलकती है फलस्वरूप वे दान करने के लिए विवश हो जाते हैं। दानों में ज्ञान दान सब से श्रेष्ठ माना गया है। इस महादान का संयोजन-ब्राह्मण-इसी दृष्टि से लोक पूज्य माना जाता है। ब्राह्मणत्व का अनिवार्य कर्तव्य ज्ञान दान है।
साधनावस्था में स्वभावतः उनको अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती थीं। यह बात सत्य है कि जो वास्तविक मुमुक्ष योगी होते थे, वे इन सिद्धियों की तरफ ध्यान नहीं देते थे और उनका प्रयोग भी कदाचित् ही करते थे। वे इन सिद्धियों के फेर में पड़ना और उनको अधिक विकसित करना मुक्ति -मार्ग में बाधा स्वरूप मानते थे और जहाँ तक संभव होता था उन्हें किसी पर प्रकट नहीं होने देते थे।
साधना करने वाले व्यक्ति अपनी स्वार्थपरता के कारण ईश्वर की दृष्टि में ओछे और खुदगर्ज जाँचेंगे। ऐसे लोग चाहे कितनी ही मिन्नतें करें, कितना ही गिड़गिड़ायें, स्तोत्र प्रार्थना करें उस अन्तर्यामी की दृष्टि में भिक्षुक और स्वार्थी ही जाँचेंगे, उन्हें कभी भी प्रभु का सच्चा प्यार प्राप्त नहीं हो सकता। इसी प्रकार जो केवल सेवा कार्यक्रमों में लगे हैं, उनकी आत्मा में यदि ईश्वरीय श्रद्धा नहीं है तो उनके सेवा में साँसारिकता ही प्रधान रहेगी। आजकल जिस प्रकार अनेकों राजनैतिक पार्टियों एवं सामाजिक संस्थाओं के कार्य कर्त्ताओं तथा नेताओं में जो स्वार्थ संघर्ष देखा जाता है, उससे स्पष्ट है कि उनकी सेवा केवल बाह्य स्तर पर अवलंबित है, यदि उन्होंने आध्यात्मिक एवं धार्मिक स्तर पर यह सेवा लक्ष अपनाया होता तो यह खेदजनक बातें उनके चरित्र में दृष्टिगोचर न होतीं, जिनके कारण उनका सारा सेवा कार्य एक प्रकार से व्यर्थ ही सिद्ध हो रहा है।
साधना करके इस शक्ति को विशेष रूप से विकसित भी किया हो। कहा तो यहाँ तक जाता है कि उन्होंने भारतवर्ष में आकर योग की शिक्षा प्राप्त की थी। कुछ भी हो बाइबिल के अनुसार उन्होंने केवल हाथ से छूकर कितने ही लोगों का कोढ़ रोग दूर कर दिया, जन्मान्धों को दृष्टि प्रदान की, पाँच जौ की रोटियों से पाँच हजार व्यक्तियों को भोजन कराया और कई मृत व्यक्तियों को पुनर्जीवन प्रदान किया। ईसा के समकालीन एक एपोलिनियस नामक योगी थे। उन्होंने भारतवर्ष आकर सद्गुरु से योग शिक्षा प्राप्त की थी।
साधना और सेवा का समन्वय होना आवश्यक है। साधना से सेवा का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। इन दोनों में से एक को छोड़ दिया जाय तो लक्ष की ओर प्रगति नहीं हो सकती। बिजली की धारा बहाने के लिए दो तारों की आवश्यकता होती है, यदि टूट जाय तो वह विद्युत प्रवाह रुक जायगा। ईश्वरीय कृपा की विद्युत धारा अन्तःकरण में अवतीर्ण करने के लिए साधना और सेवा के दोनों ही तार आवश्यक हैं।
साधना के फलस्वरूप कई व्यक्तियों के जीवन स्थाई रूप से परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रणाली के अनुसार प्रभु की प्रार्थना के स्वरूप और महत्त्व का विवेचन करते हुये एक विद्वान ने लिखा है—
साधना को छोड़ ही नहीं देते वरन् उसे व्यर्थ बताकर कुपित भी होते हैं।
साधना करता है (सर्व सत्त्व सुखे हितः)।
साधना से सेवा का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। इन दोनों में से एक को छोड़ दिया जाय तो लक्ष की ओर प्रगति नहीं हो सकती। बिजली की धारा बहाने के लिए दो तारों की आवश्यकता होती है, यदि टूट जाय तो वह विद्युत प्रवाह रुक जायगा। ईश्वरीय कृपा की विद्युत धारा अन्तःकरण में अवतीर्ण करने के लिए साधना और सेवा के दोनों ही तार आवश्यक हैं। एक के अभाव में प्रगति रुक जायगी।
साधना में प्रेरणा देने का यह अत्यन्त ही सरल एवं प्रभावशाली मार्ग है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-May
साधना में कैसे सहायक होती है? आध्यात्मिक जीवन का आशय क्या है? हमको जो सानुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त हो गई है उसी के बीच सदैव “सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्” स्वरूप की अनुभूति होना ही सच्चा आध्यात्मिक जीवन है। जिसको ऐसा अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त होता है वही वास्तव में संत, योगी, आध्यात्मिक पुरुष है।
साधना तपश्चर्या एवं विद्याध्ययन के अतिरिक्त उनका समय इस धर्म-सेवा के परमार्थ में ही लगता था। इस सनातन, ब्राह्मण परम्परा को हम पुनः आरंभ कर रहे हैं। प्रत्येक व्रतधारी के द्वार पर इन चार अंकों द्वारा प्रति सप्ताह हम पहुँचेंगे और सात दिन के योग्य धर्मोपदेश की विचार सामग्री हम देंगे। दैनिक आधा घंटा तक स्वाध्याय से हमारी बात सुनने का समय हर परिजन को निकालना चाहिए। जो हमें अपना स्नेह भाजन मानते हैं, हमारे प्रति सद्भाव रखते हैं, उन्हें यह साहित्य नियमित रूप से पढ़ने का दैनिक पूजन, भजन की भाँति ही कार्यक्रम बना लेना चाहिए।
साधनाओं द्वारा उपलब्ध अपनी आत्म-शक्ति से संसार के विभिन्न पदार्थों का अन्वेषण एवं विश्लेषण करके उनकी कारण-शक्ति का पता लगाया था और उसके द्वारा मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक हेर-फेर करने की प्रक्रिया बनाई थी। वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में जड़ी-बूटियों, के रासायनिक पदार्थों के, खंड-खंड करके उनके सूक्ष्म गुणों का पता लगाया जाता है और उनका किस रोग के निवारण में या किस कार्य में किस प्रकार क्या उपयोग हो सकता है, यह पता लगाया जाता है। यह विश्लेषण कार्य रसायनशाला में लगे कुछ उपकरणों के आधार पर या अन्य परीक्षणों द्वारा जान किये जाते हैं। पर उनकी कारण-शक्ति का पता लगाने के बारे में कोई वैज्ञानिक उपकरण नहीं बन सके हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र भौतिक शक्ति तक ही सीमित है, इसलिए उसके द्वारा कारण-क्षेत्र की खोज कर सकना कठिन भी है।
साधना करनी चाहिये। हमारे देश में इस समय वैश्यत्व और क्षत्रियत्व का भाव परिस्फुटित हो उठा है, पर अभी ब्राह्मणत्व का परिस्फुरण नहीं हुआ है। अब जो इस त्रुटि को दूर करके ज्ञान की प्रतिष्ठा द्वारा ब्राह्मणत्व का विकास करेगा वही देश का मार्ग प्रदर्शक बन सकेगा।
साधना विधान भली प्रकार समझाया गया है तथा शेष में गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षरों, प्रणव तथा व्याहृति की शिक्षाओं का वर्णन एक-एक पुस्तक में किया गया है। प्रत्येक पुस्तक ग्लेज बढ़िया कागज पर छपी हुई तिरंगे कवर से सुसज्जित है।
साधना के चमत्कार
साधना अपूर्ण ही रहती है। शक्ति ही सब कुछ कराती है, शक्ति ही विचार उत्पन्न करती है, शक्ति के स्पर्श से ही मशीन हिलती डुलती है, ऐसा भाव बहुत श्रेष्ठ होने पर भी, पूर्ण योगी के लिये अपर्याप्त है, उसे इससे और आगे बढ़ना है। हमारे यहाँ भाव अथवा शक्ति की कमी नहीं है। देश में सर्वत्र भक्ति में पागल हुये व्यक्ति मिल सकते हैं, पर भक्ति के साथ ज्ञान का होना भी परमावश्यक है। यह सत्य है कि भक्ति होने से भगवान का कार्य करने में शक्ति का अभाव न रहेगा, पर इसके द्वारा ज्ञान का विकास नहीं हो सकता।
साधना के लिये परमावश्यक है। वर्तमान विज्ञान कहता है कि अपनी परिस्थिति के साथ जो जीवन मिलजुल जाता है उसके लिये आगे विकास की कोई संभावना नहीं रहती। इसके विपरीत जो जीवन परिस्थिति से असंतुष्ट है, उसे स्वीकार नहीं करता है, वही विकसित हो सकता है।
साधना
साधना, संयम, तपश्चर्या रूपी प्रयत्न या पुरुषार्थ करना पड़ता है। अतः पुरुषार्थ की प्रधानता एवं महत्ता को स्वीकार कर उन्नति पथ पर अग्रसर होना मानव की विशेषता है। आज की तदवीर कल की तकदीर है। कल की जैसी तकदीर का निर्माण करना है वैसी तदवीर इसी क्षण से प्रारम्भ कर देना चाहिए।
साधना—उपयोग अत्यावश्यक है। हमारा मन इतना सतेज होना चाहिये कि हम किसी भी कोने में से आते हुये विचार प्रवाह को जान सकें। हमारा हृदय इतना शुद्ध होना चाहिये कि भावों की सूक्ष्मतर लहरों का प्रत्युत्तर दे सकें और हमारी स्थूल इन्द्रियाँ इतनी सुसंस्कृत होनी चाहिये कि स्थूल जगह के सूक्ष्म आन्दोलनों को भी ग्रहण कर सकें। इसका आशय यही है कि हमारी स्थूल और सूक्ष्म शक्ति यों का विकास उच्चतम होना विवेक की साधना के लिये परमावश्यक है। वर्तमान विज्ञान कहता है कि अपनी परिस्थिति के साथ जो जीवन मिलजुल जाता है उसके लिये आगे विकास की कोई संभावना नहीं रहती।
साधना एवं पुरुषार्थपूर्ण प्रयत्नों से जी चुराकर बैठे रहने से सफलता कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती है।
साधना में बाधा नहीं करनी चाहिए। धीरे-धीरे प्रयत्न के साथ इनको हटाना चाहिए। अचानक ये बुराइयाँ एवं विघ्न कभी भी समाप्त नहीं होते। “शनै शनैरुरमेद बुद्ध्याधृति गृहीतया” गीता के इस सिद्धान्त से इन सभी की जड़ों को काटना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-June
साधना भी प्रायः अपर्याप्त हो जाती है। कुछ थोड़े से भाग्यशाली व्यक्ति ही जीवन भर साधना कर के सफल हो पाते हैं और इसीलिये विश्व के इतिहास में इनी गिनी ही ऐसी मृत्युएं हैं जिनकी सराहना सदियों की चर्चा का विषय बन जाती है। हमारा इतिहास तो ऐसे उदाहरणों का ही इतिहास है। राजस्थान का जौहर, जब कि राजपूतों के युद्ध में चले जाने पर उनके घर की नारियाँ विजय की ओर से निराश हो जाने पर जलती ज्वाला में कूद पड़ती थीं, मृत्यु का एक ऐसा अद्वितीय उदाहरण है जिसकी जोड़ का विश्व के इतिहास में कोई वृत्तान्त नहीं है। हमारे पड़ोसी देश जापान ने प्रागैतिहासिक काल में युद्ध के समय खाई पाटने के लिये अपने सहस्रों नवयुवकों को स्वेच्छा से उस खाई में जीवित डालकर विश्व को अपनी वीरता एवं त्याग से चमत्कृत कर दिया था।
साधना यह हमारे मन और शरीर को पवित्र बनाने वाले माध्यम हैं। इन दोनों माध्यमों को जीवन के अन्य आवश्यक एवं दैनिक कार्यों से जोड़ने के लिए व्यवहारिक कदम उठाना ही व्रत धारण है। व्रतधारी का उद्देश्यपूर्ण विचारों को कार्यान्वित करने के लिए अग्रसर होना, यह सक्रियता प्रत्यक्ष परिणाम उपस्थित करेगी। धर्म भावना से ओत-प्रोत व्रतधारी जब अपनी श्रद्धा को क्रियान्वित करेगा तो उसके द्वारा वही सब होगा जो संसार की महान विभूतियाँ कहलाने वाले महापुरुषों के द्वारा होता रहा है। हमारे व्रतधारी परिजनों में से अगले ही दिनों इतिहास को उज्ज्वल करने वाली विभूतियाँ सामने आवें और युग निर्माण की महत्व पूर्ण भूमिका प्रस्तुत करें तो इसमें किसी को आश्चर्य न होना चाहिये।
साधना का व्रत लेने में उन लोगों को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए जो इन दोनों बातों की महत्ता स्वीकार करते हैं और उन्हें कार्य रूप में परिणत करना चाहते हैं। आत्म निर्माण का जो कार्यक्रम व्रतधारी के लिए निर्धारित किया गया है वह कुछ भी कठिन नहीं है। उपासना, आत्म चिन्तन, स्वाध्याय, गुण कर्म स्वभाव का लेखा जोखा यह चारों काम व्यवहारिक दृष्टि से भी बहुत सरल हैं। इन्हें कौन नहीं कर सकता है? अब तक भी हम लोग अस्त व्यस्त रूप से इन कार्यों को करते ही रहे हैं।
साधना नहीं करते; बल्कि सब कुछ नारायणी शक्ति ही स्वयं करती है। उन्हीं के हाथ में साधना का सम्पूर्ण भार समर्पण करके स्थिर रहना चाहिये। भगवान अपने आप ही साधना करते हैं। उनकी दिव्य शक्ति ऊपर का केन्द्र स्वयं ही खोल देती है। वैसे तो सब कुछ हमारे ही द्वारा किया जाता है, पर ऊपर से वही देना आरम्भ करते हैं।
साधना का लक्ष्य होना चाहिये। अनेक बार देखा जाता है कि अन्धे होने पर स्पर्श शक्ति आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है। परन्तु क्या इस प्रकार से शक्ति एक स्थान से चुरा कर दूसरे स्थान पर उपचय (अति-संग्रह) करने से उसे शक्ति की सार्थकता कहा जा सकता है? जहाँ उसका नाश हुआ है क्या वहाँ का विचार नहीं करना चाहिये? जहाँ से शक्ति को नष्ट किया गया क्या उस त्रुटि का दुष्परिणाम हमको भोगना नहीं पड़ेगा?
साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए सर्वप्रथम ब्राह्ममुहूर्त के महत्व को समझना आवश्यक है। उस समय का शाँत एवं प्राकृतिक वातावरण आध्यात्मिक चिंतन के लिए बहुत ही अनुकूल है। प्रत्येक आध्यात्मिक जिज्ञासु को सूर्योदय से दो घंटे पूर्व उठना आवश्यक है। महान पुरुषों के जीवन चरित्रों को देखा जाय तो ज्ञात होगा कि उनकी दिनचर्या सूर्योदय के दो तीन घंटे पूर्व से आरम्भ होती है।
साधना का सम्पूर्ण भार समर्पण करके स्थिर रहना चाहिये। भगवान अपने आप ही साधना करते हैं। उनकी दिव्य शक्ति ऊपर का केन्द्र स्वयं ही खोल देती है। वैसे तो सब कुछ हमारे ही द्वारा किया जाता है, पर ऊपर से वही देना आरम्भ करते हैं। आत्म समर्पण किये हुये योगी को भगवान विज्ञानमय जगत की नवीन ज्योति ही प्रदान कर देते हैं।
साधना का स्थान ग्रहण नहीं कर सकतीं जिसका कि अवलम्बन लेकर हमारे ऋषि−मुनियों, देव अवतारों, से लेकर सामान्य नागरिकों को महानता प्राप्त करने की शक्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती रही है।
साधना करनी होगी, तभी हमारा कल्याण होगा। भगवान को केवल अपनी किसी विकृति (त्रुटि) को उपयोगी बना कर, उनको लेकर बहुत-बहुत जोश दिखाने को हम मंगलमय नहीं मान सकते। हो सकता है कि उसमें कहीं सत्य छिपा हो। पर जो शक्तिमान है वह तो उसके द्वारा किसी प्रकार अपना काम चला सकता है, किन्तु उनके दल-में जो अन्य साधारण शक्ति के व्यक्ति आकर जमा होते हैं उनका कुछ ठौर ठिकाना नहीं। उनका आलाप क्रमशः प्रलाप हो उठता है, एवं वे उत्तेजना और उन्माद के पथ पर अपघात (अकाल मृत्यु) को प्राप्त होते हैं।
साधना पथ पर चलते हुये साधक को विषयों के दल-दल से बचना चाहिये। इस बड़े भारी विघ्न के कारण साधक की समग्र शक्तियों का क्षय होने लगता है और पतन की ओर गिरने लगता है। अपने पवित्र लक्ष्य की ओर प्रगति करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन भी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। इसके साथ-साथ स्वयं को पवित्र एवं परमार्थ कार्यों में लगाये रहना चाहिए। इससे चित्त भी विषयों की ओर नहीं दौड़ता और मानव-जीवन का सदुपयोग भी होता है।
साधना का सारा ढाँचा खड़ा किया गया था। पर आज तो वह ढाँचा भी लड़खड़ा गया है। आस्तिकता और पूजा का अर्थ आज आत्म-चिन्तन, अपने दोष को ढूँढ़ना और उन से छुटकारा पाने के लिए परमात्मा से आत्म-बल माँगना नहीं रहा। अब तो लोग ईश्वर या देवी देवताओं की मनौती या पूजा इसलिए करते हैं कि उन्हें अमुक भौतिक लाभ मिल जाय। देवी-देवता प्रसन्न होकर उनकी उचित अनुचित तृष्णाओं को पूरा कर दें।
साधना कर के सफल हो पाते हैं और इसीलिये विश्व के इतिहास में इनी गिनी ही ऐसी मृत्युएं हैं जिनकी सराहना सदियों की चर्चा का विषय बन जाती है। हमारा इतिहास तो ऐसे उदाहरणों का ही इतिहास है। राजस्थान का जौहर, जब कि राजपूतों के युद्ध में चले जाने पर उनके घर की नारियाँ विजय की ओर से निराश हो जाने पर जलती ज्वाला में कूद पड़ती थीं, मृत्यु का एक ऐसा अद्वितीय उदाहरण है जिसकी जोड़ का विश्व के इतिहास में कोई वृत्तान्त नहीं है। हमारे पड़ोसी देश जापान ने प्रागैतिहासिक काल में युद्ध के समय खाई पाटने के लिये अपने सहस्रों नवयुवकों को स्वेच्छा से उस खाई में जीवित डालकर विश्व को अपनी वीरता एवं त्याग से चमत्कृत कर दिया था। उसको अभी विश्व भूल भी न पाया था कि इस द्वितीय महायुद्ध में पुनः वहाँ के नवयुवक एवं नवयुवतियों ने अपने अद्वितीय बलिदान का उदाहरण उपस्थित किया।
साधना करनी होगी, जीवन को उसी तरह संयत एवं नियमित करना होगा जिस तरह पहलवान अपने शरीर बल की वृद्धि के लिए करता है। जबकि स्वास्थ्य जैसी भौतिक एवं तुच्छ शक्ति के लिये इस प्रकार के अनेक अभ्यास, साधन, आदि की आवश्यकता होती है तो उस महान् एवं सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न होने के लिए प्रचुर मात्रा में अभ्यास एवं साधना आदि करनी ही होगी। साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए सर्वप्रथम ब्राह्ममुहूर्त के महत्व को समझना आवश्यक है। उस समय का शाँत एवं प्राकृतिक वातावरण आध्यात्मिक चिंतन के लिए बहुत ही अनुकूल है। प्रत्येक आध्यात्मिक जिज्ञासु को सूर्योदय से दो घंटे पूर्व उठना आवश्यक है।
साधना में यह बहुत सहायक है।
साधना दो।
साधना में एक सुन्दर क्रम-धारा देखी जाती है। पहले वैदिक युग था, उस समय ऋषि लोग आध्यात्मिक और अलौकिक अनुभव-योग द्वारा ऊपरी सत्य में प्रवेश करते थे। वह युग बड़ा ही महत्वपूर्ण था। उस समय लोग देव लोक में जाते थे और देवताओं को भी जीवन-दान देते थे। उस समय के लोग आन्तरिक अनुभवी थे।
साधना करने का भी ध्यान रखना है और आत्म कल्याण को भी अपना स्वार्थ एवं लाभ उसी तरह मानना है जैसे व्यापार, आहार, स्नान, शयन आदि को आवश्यक मानते हैं। यह निष्ठा मनःक्षेत्र में जमते ही हमारे जीवन क्रम में आश्चर्य जनक परिवर्तन दिखाई पड़ने लगता है। व्रत धारण की महिमा प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगती है। तब यह पता चलता है कि व्रत धारण यों कहने और सुनने में बहुत हलकी सी बात थी, पर उसके पीछे कितना ठोस आधार मौजूद था।
साधना, दान, पुण्य, सेवा परमार्थ की इच्छा और कल्पना कई लोग करते हैं पर यदि उस इच्छा के पीछे प्रेरणा प्रोत्साहन बना रहा तो ही उसका कार्य रूप बनता है अन्यथा वह मनोरथ केवल कल्पना मात्र रह कर समाप्त हो जाते हैं।
साधना एवं अभ्यास की आवश्यकता है। अभ्यास के अभाव में न वासनाओं पर नियंत्रण हो सकता है, न तत्त्व ज्ञान की प्राप्ति हो सकती और बहिर्मुखी वृत्ति अंतर्मुख हो सकती है इन सबके लिए अभ्यास एवं ज्ञान सहित वैराग्य की धारणा परमावश्यक है। योगविज्ञान में भी इनकी ही प्रधानता है।
साधना का विचार छोड़कर समाज सेवा का मार्ग अपनाया। विवेकानंदजी से श्री रामकृष्ण परमहंस ने यही कहा “कि ब्रह्मानन्द की कुँजी मेरे पास है समाज सेवा एवं धर्म प्रसार के लिए तैयार हो जाओ” इसी एक आज्ञा से नरेन्द्रदेव विवेकानन्द बन गये और भारतीय धर्म को जागृत किया। इसी तरह शंकराचार्य, गौतमबुद्ध, ईसा, राम, व कृष्ण, आदि-आदि महापुरुषों ने समाज-सेवा से संसार को कल्याण की ओर मोड़ने में जीवन भर लगा दिया। इसके लिये उन्होंने कितना तप किया। राणाप्रताप, शिवाजी गुरु गोविंद सिंह आदि ने भी यही मार्ग अपनाया।
साधना करते हैं। उनकी दिव्य शक्ति ऊपर का केन्द्र स्वयं ही खोल देती है। वैसे तो सब कुछ हमारे ही द्वारा किया जाता है, पर ऊपर से वही देना आरम्भ करते हैं। आत्म समर्पण किये हुये योगी को भगवान विज्ञानमय जगत की नवीन ज्योति ही प्रदान कर देते हैं। उस प्रकृति के सारे गुणों का असली स्वरूप प्रकट हो जाता है।
साधना आदि करनी ही होगी। साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए सर्वप्रथम ब्राह्ममुहूर्त के महत्व को समझना आवश्यक है। उस समय का शाँत एवं प्राकृतिक वातावरण आध्यात्मिक चिंतन के लिए बहुत ही अनुकूल है। प्रत्येक आध्यात्मिक जिज्ञासु को सूर्योदय से दो घंटे पूर्व उठना आवश्यक है। महान पुरुषों के जीवन चरित्रों को देखा जाय तो ज्ञात होगा कि उनकी दिनचर्या सूर्योदय के दो तीन घंटे पूर्व से आरम्भ होती है।
साधना करते रहते हैं।
साधना दो प्रकार की होती है—एक अपने लिये तपस्या करना और दूसरी साधना। इन्हीं को “कर्म योग“ और “ज्ञान योग“ के नाम से पुकार सकते हैं। ज्ञान-योग का स्वरूप साधारणतः यह है कि हम सब से अलग होकर यह निरीक्षण करते रहें कि मन के भीतर कैसी-कैसी आकाँक्षाएँ, प्रभाव और विचार उमड़ रहे हैं और शान्त हो रहे हैं। हमें उदासीन भाव से यह देखना चाहिये कि किस वस्तु से हानि पहुँच रही है। आरम्भ में तो इन वस्तुओं के साथ स्वयं भी मिलना पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उन पर दृष्टि ही नहीं पड़ती।
साधना। इन्हीं को “कर्म योग“ और “ज्ञान योग“ के नाम से पुकार सकते हैं। ज्ञान-योग का स्वरूप साधारणतः यह है कि हम सब से अलग होकर यह निरीक्षण करते रहें कि मन के भीतर कैसी-कैसी आकाँक्षाएँ, प्रभाव और विचार उमड़ रहे हैं और शान्त हो रहे हैं। हमें उदासीन भाव से यह देखना चाहिये कि किस वस्तु से हानि पहुँच रही है। आरम्भ में तो इन वस्तुओं के साथ स्वयं भी मिलना पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उन पर दृष्टि ही नहीं पड़ती।
साधना से जप तप से लोक सेवा को रत्ती भर भी कम महत्व नहीं दिया है। उनके जीवन क्रम पर गंभीर दृष्टि डालते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वे जितना समय जप तप में लगाते थे, उससे कई गुना समय जन कल्याण की सेवा मय प्रवृत्तियों में भी लगाते थे। सेवा विहीन भजन निश्चय ही अपूर्ण है। अपूर्ण प्रयत्न का फल भी अपूर्ण ही रह जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-February
साधना, कल्याणी दुर्गा की उपासना, महिमामयी माँ की आराधना के रूप में हमारी संस्कृति में आदिकाल से प्रतिष्ठित है। अनेकानेक कथाएँ इस शक्ति-उपासना के उद्गम को आच्छादित किए हुए हैं। एक कथा के अनुसार उग्रदेव रुद्र की पत्नी रुद्राणी को आद्या शक्ति माना गया। पिता द्वारा किये जाने वाले यज्ञ में अपने पति रुद्र का अपमान न सह सकने के कारण क्रुद्ध रुद्राणी ने आत्मदाह कर लिया। इस समाचार को सुनते ही रुद्र प्रलयकारी रूप धारण कर शक्ति के शव को उठाकर त्रैलोक में घूमने लगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-January
साधना इसके लिये सर्वश्रेष्ठ विधान है।
साधना के संबंध में कुछ ऐसे संकेत देना चाहते हैं जिनसे साधना की सफलता में सहायता प्राप्त हो सकती है।
साधना में नियमितता
साधना करने के बाद भी निराशा का भाव प्रकट करते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लिये हम इस लेख में गायत्री साधना के संबंध में कुछ ऐसे संकेत देना चाहते हैं जिनसे साधना की सफलता में सहायता प्राप्त हो सकती है।
साधना के लिये आसन पर बैठ जाना चाहिये तथा संकल्पित माला पूरी करके उठना चाहिये। किसी विशेष कारणवश बीच में उठना पड़े, तो प्रायश्चित की माला अलग फेरना आवश्यक है। कम या अधिक संख्या में अनियमित समय पर जप करने से उसकी उत्तमता नष्ट हो जाती है और वह शीघ्र अपना प्रभाव प्रकट नहीं कर पाता।
साधना कर रहे हैं, उसके द्वारा रचित सभी गायत्री ग्रंथों का पढ़ना व उन पर मनन करना भी नितान्त आवश्यक है। उन्हें संकल्प कर लेना चाहिये कि बिना जप किये भोजन नहीं करेंगे और स्वाध्याय किये बिना शयन नहीं करेंगे। इन ग्रंथों की बातों पर चलते-फिरते उठते-बैठते विचार करना चाहिये और उनको जीवन के व्यावहारिक कार्यों में प्रयोग करने का अभ्यास करना चाहिये।
साधना की सफलता का अनुभव होने लगेगा।
साधना द्वारा ही प्राप्त होता है।
साधना कर रहे हैं।
साधना की सफलता में सहायता प्राप्त हो सकती है।
साधना में नियमितता का ध्यान रखना है। प्रातः सूर्योदय से पहले निश्चित समय पर अपनी साधना के लिये आसन पर बैठ जाना चाहिये तथा संकल्पित माला पूरी करके उठना चाहिये। किसी विशेष कारणवश बीच में उठना पड़े, तो प्रायश्चित की माला अलग फेरना आवश्यक है। कम या अधिक संख्या में अनियमित समय पर जप करने से उसकी उत्तमता नष्ट हो जाती है और वह शीघ्र अपना प्रभाव प्रकट नहीं कर पाता।
साधना में तप यही है कि गायत्री माता की प्रतिष्ठा जन-जन के मन में स्थापित करने के लिये अपने तन, मन और धन का कुछ अंश नियमित रूप से लगाना। इस युग-निर्माण की योजना में योग देने के लिये, इस परिवार के संगठन को मजबूत करने के लिए जो जितनी अधिक निन्दा, विरोध को सहन कर रहा है, सर्दी-गर्मी, बरसात की प्रतिकूलताओं का ध्यान न करके गायत्री प्रचार के कार्य में श्रम कर रहा है वही तपस्वी वेदमाता का सपूत श्रवण कुमार कहला सकता है।
साधना करने से हमारे सूक्ष्म शरीर और अन्तःकरण पर जो मल विक्षेप के आवरण जमे होते हैं वे दूर होकर आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है। आत्मा के शुद्ध स्वरूप द्वारा ही सब प्रकार की समृद्धियाँ और सम्पत्तियाँ प्राप्त हो सकती हैं। दर्पण की तरह आत्मा को शुद्ध बनाने से उसके सब प्रकार के मल दूर हो जाते हैं, और मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल, प्रकाशवान बनकर परमेश्वर की समस्त शक्तियों, समस्त गुणों, सर्व सामर्थ्यों, सब सिद्धियों से परिपूर्ण हो जाता है।
साधना के साथ दान अथवा त्याग का अभाव होता है। प्रकृति का नियम है कि प्राणी के ग्रहण करने के बाद त्याग भी करना चाहिये, अन्यथा उसकी शक्तियाँ मन्द पड़ी रहेंगी। इसलिये गायत्री साधना में सफलता प्राप्त करने के लिये अपने भीतर पाई जाने वाली त्रुटियों, व्यसनों का निरन्तर त्याग करते रहना चाहिये। यह कार्य यदि नित्य प्रति न हो सके तो साप्ताहिक सत्संग, सामूहिक हवन, तीर्थयात्रा, महापुरुषों और महात्माओं से भेंट होने के अवसर पर तो करना ही चाहिये। ऐसा त्याग करने से तुरन्त उस त्याग के बदले का गुण प्राप्त होता रहेगा।
साधना और दान
साधना से उठते ही अपने जप से गायत्री माता के महत्व को बढ़ाने तथा उसकी प्रतिष्ठा को अन्य लोगों के मनःक्षेत्र तक पहुँचाने के कार्यक्रम में सहयोग देने के निमित्त कम से कम 1 नया पैसा एक अलग डिब्बे में रख देना चाहिये। इसी प्रकार माताएं भी भोजन पकाने से पूर्व कम से कम एक मुट्ठी आटा और जरा सी घी गायत्री प्रचार के कार्य के लिये निकाल कर रख दें। घर के बालकों के हाथ खर्च में भी इसके लिये कभी-कभी एकाध पैसा दान कराके उन्हें दान का महत्व समझाया जा सकता है। घर में एकत्रित इस फण्ड का उपयोग गायत्री चालीसा, माला, चित्र आदि बाँटने अथवा गायत्री ज्ञान-मन्दिर की घर में स्थापना करने के लिये किया जा सकता है।
साधना के दिव्य गुण प्राप्त नहीं हो सकते। इस त्याग का कुछ अभ्यास भौतिक सम्पत्ति के दान से भी होता है। साधक को साधना से उठते ही अपने जप से गायत्री माता के महत्व को बढ़ाने तथा उसकी प्रतिष्ठा को अन्य लोगों के मनःक्षेत्र तक पहुँचाने के कार्यक्रम में सहयोग देने के निमित्त कम से कम 1 नया पैसा एक अलग डिब्बे में रख देना चाहिये। इसी प्रकार माताएं भी भोजन पकाने से पूर्व कम से कम एक मुट्ठी आटा और जरा सी घी गायत्री प्रचार के कार्य के लिये निकाल कर रख दें। घर के बालकों के हाथ खर्च में भी इसके लिये कभी-कभी एकाध पैसा दान कराके उन्हें दान का महत्व समझाया जा सकता है।
साधना में तप
साधना में सफलता प्राप्त करने के लिये अपने भीतर पाई जाने वाली त्रुटियों, व्यसनों का निरन्तर त्याग करते रहना चाहिये। यह कार्य यदि नित्य प्रति न हो सके तो साप्ताहिक सत्संग, सामूहिक हवन, तीर्थयात्रा, महापुरुषों और महात्माओं से भेंट होने के अवसर पर तो करना ही चाहिये। ऐसा त्याग करने से तुरन्त उस त्याग के बदले का गुण प्राप्त होता रहेगा। जैसे बिना पैसे के बाजार के समान नहीं मिलता वैसे ही बिना व्यसनों और दोषों के त्याग किये साधना के दिव्य गुण प्राप्त नहीं हो सकते। इस त्याग का कुछ अभ्यास भौतिक सम्पत्ति के दान से भी होता है।
साधना करेगा तो वह सफलता का अनुभव अवश्य करता रहेगा। इसके साथ-साथ उसके व्यक्तिगत उद्देश्य तो स्वयं पूरे होते रहेंगे। व्यायाम करने का मुख्य उद्देश्य शरीर को मजबूत बनाना होता है, फिर स्फूर्ति, पाचन शक्ति, चेहरे पर तेज आदि बातें तो साथ-साथ स्वतः उत्पन्न हो जाती हैं।
साधना करते हैं और कहते हैं कि इसे किसी को बताया नहीं जा सकता। ऐसे मनुष्य न तो अपनी और न किसी दूसरे की भलाई कर सकते हैं। क्योंकि ऐसा करने से उनमें दूसरों की ईर्ष्या का भाव उत्पन्न होता है और ईर्ष्या होने से मंत्र-सिद्धि का गौरव अपने आप समाप्त हो जाता है। यह सत्य है कि मंत्र अनधिकारी को नहीं दिया जा सकता, पर यदि किसी को अधिकारी समझ कर भी यदि रागद्वेष के कारण मंत्र न सिखाया जाय, तो वह मंत्र उस साधना करने वाले के पास से भी चला जाता है। मंत्र की साधना करने वाला और मंत्र को सीखने वाला दोनों उदारचित्त और अपार श्रद्धा वाले होने चाहियें।
साधना द्वारा उन सब विद्याओं को प्राप्त करके अपने प्राचीन गौरव की पुनर्स्थापना कर सकते हैं।
साधना करने वाला और मंत्र को सीखने वाला दोनों उदारचित्त और अपार श्रद्धा वाले होने चाहियें। व्यक्तिगत रूप से जप करते हुए भी उनको समष्टि के हित का ध्यान रखना चाहिये तभी वे संसार के साथ अपना ही भला कर सकते हैं।
साधना करने वाले होते हैं और न शिष्य को उसकी विधिवत शिक्षा देकर उसे साधन-मार्ग में अग्रसर कराने का प्रयत्न करते हैं। यही कारण है कि बहुत समय से लोग गुरु मंत्र का महत्व और उससे लाभ उठाने की विधि को भूल गये हैं। अगर गुरु सच्चे और ज्ञानी हों तो वे इस मंत्र की शिक्षा देकर अपने अनुयाइयों का अपार हित कर सकते हैं। इस विषय में गुरु का महत्व बतलाते हुए अहमदाबाद के ‘प्रज्ञान-मन्दिर’ के संचालक महात्मा सदाशिव जी के निम्न विचार पाठकों को विशेष उपयोगी प्रतीत होंगे।
साधना आरम्भ करते ही साधक के मनः क्षेत्र में एक ऐसी अद्भुत हलचल मचाने लगती है कि उसके अन्तःकरण में जमे हुए बुरे विचारों, स्वभावों और भावनाओं की जड़ें उखड़ने लगती है। जहाँ गायत्री रूपी प्रकाश पहुँचा जाता है वहाँ दुर्विचार रूपी अन्धकार का रहना सम्भव नहीं होता। गायत्री सतोगुणी शक्ति है, वह साधक को तमोगुण व रजोगुण से ऊंचा उठाकर सतोगुण की ओर ले जाती है। गायत्री हमारे मन व बुद्धि को पवित्र करती है, आसुरी विचारों व कार्यों से करती है, झूठ, छल, कपट, दम्भ, बेईमानी, घुस, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष आदी राक्षसी वृत्तियों से मुक्त करके सत्य, प्रेम, न्याय, दया, सहानुभूति, ईमानदारी, नम्रता आदी दैवी गुणों के दर्शन कराती है क्योंकि गायत्री साधक के मन में निरन्तर यह विचार उठते रहते है कि उसे कौनसा कार्य करना चाहिए और कौनसा नहीं। वह उचित अनुचित व न्याय अन्याय पर पूरी तरह से विचार करके ही कोई कार्य करता है।
साधना और स्वाध्याय
साधना में नियमित जप के साथ नियमित स्वाध्याय, त्याग और तप करने वाला व्यक्ति गायत्री माता से वह शक्ति प्राप्त कर लेता है जिसके द्वारा कठिन से कठिन कार्य भी सिद्ध किया जा सकता है। उपासकगण अगर इन नियमों का पालन करते हुए साधना करेंगे तो कुछ ही समय में उनको साधना की सफलता का अनुभव होने लगेगा।
साधना करने से निराशा का प्रश्न ही नहीं उठ सकता। यह उद्देश्य यही है कि साधक में इस प्रकार का आत्म-भाव और तप व्याप्त हो कि वह अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों को भी गायत्री उपासक बना सकें। हमें संतोष है कि हमारा यह लक्ष्य अधिकाँश में पूरा हो रहा है और जिस घर या मोहल्ले में एक व्यक्ति उपासना करने लगता है तो कुछ समय में उसकी पत्नी, बच्चा, भाई, बन्धु, पड़ोसी भी क्रमशः इस ओर आकर्षित होते जाते हैं। जिस प्रकार कोई पेड़ समय आने पर फल देने लगता है उसी प्रकार गायत्री उपासना में हार्दिक अनुराग उत्पन्न हो जाने से उसके संसर्ग से अन्य उपासक भी स्वतः तैयार होने लगते हैं। इसलिये जो व्यक्ति इस उद्देश्य को सामने रखकर साधना करेगा तो वह सफलता का अनुभव अवश्य करता रहेगा।
साधना में उपरोक्त बातों का पालन करने के साथ-साथ यदि तप का योग और कर दिया जाय तो उसमें चार चाँद लग गये ऐसा समझना चाहिए। तप का सही अर्थ है दूसरों के लिये कष्ट सहन करना। गायत्री साधना में तप यही है कि गायत्री माता की प्रतिष्ठा जन-जन के मन में स्थापित करने के लिये अपने तन, मन और धन का कुछ अंश नियमित रूप से लगाना। इस युग-निर्माण की योजना में योग देने के लिये, इस परिवार के संगठन को मजबूत करने के लिए जो जितनी अधिक निन्दा, विरोध को सहन कर रहा है, सर्दी-गर्मी, बरसात की प्रतिकूलताओं का ध्यान न करके गायत्री प्रचार के कार्य में श्रम कर रहा है वही तपस्वी वेदमाता का सपूत श्रवण कुमार कहला सकता है।
साधना करने वाले के पास से भी चला जाता है। मंत्र की साधना करने वाला और मंत्र को सीखने वाला दोनों उदारचित्त और अपार श्रद्धा वाले होने चाहियें। व्यक्तिगत रूप से जप करते हुए भी उनको समष्टि के हित का ध्यान रखना चाहिये तभी वे संसार के साथ अपना ही भला कर सकते हैं।
साधना को सामूहिक रूप से करता है उसके लिए परमार्थ का मार्ग विशेष सुविधाजनक बन जाता है। इसलिए जहाँ आप उपर्युक्त नियमों का पालन करें वहाँ सर्वप्रथम सामूहिकता के भाव को भी अपनावें। किसी व्यक्तिगत उद्देश्य को पूरा करने के लिये कोई खास अनुष्ठान करने से तो स्वार्थ का भाव स्पष्टता सामने रहता है और उस दशा में आत्मोन्नति की अधिक आशा रखना कठिन ही है। उस समय तो जैसी हमारी श्रद्धा, विश्वास तन्मयता होगी वैसा ही फल हम पायेंगे। पर जब हम जप, अनुष्ठान, हवन आदि को सामूहिक रूप से सबके साथ बैठ कर करते हैं, तब हमें अपने विशेष लाभ का ख्याल छोड़ देना पड़ता है और सब के बराबर फल को ही हम प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लेते हैं।
साधना में केवल जप व पारायण करते हुये भी यदि साधक में कोई विशेषता दृष्टिगोचर नहीं होती तो उसका कारण साधना के साथ दान अथवा त्याग का अभाव होता है। प्रकृति का नियम है कि प्राणी के ग्रहण करने के बाद त्याग भी करना चाहिये, अन्यथा उसकी शक्तियाँ मन्द पड़ी रहेंगी। इसलिये गायत्री साधना में सफलता प्राप्त करने के लिये अपने भीतर पाई जाने वाली त्रुटियों, व्यसनों का निरन्तर त्याग करते रहना चाहिये। यह कार्य यदि नित्य प्रति न हो सके तो साप्ताहिक सत्संग, सामूहिक हवन, तीर्थयात्रा, महापुरुषों और महात्माओं से भेंट होने के अवसर पर तो करना ही चाहिये। ऐसा त्याग करने से तुरन्त उस त्याग के बदले का गुण प्राप्त होता रहेगा।
साधना का प्रभाव सीधे अन्तःकरण पर पड़ता है, इसलिए तमोगुण व रजोगुण के कम होने से, विचारों में पवित्रता व दृढ़ता आने से मानसिक निर्बलताओं का ताना बाना टूट-फूट जाता है। मनोबल से सम्पन्न गायत्री साधक कभी भी अपने मार्ग से विचलित नहीं हो सकता। काँचन और कामिनी उसे डिगा नहीं सकते। पराये धन को वह धूल बराबर समझता है। नारी मात्रा को पवित्र दृष्टि से देखता है।
साधना का फल शीघ्र और प्रभाव युक्त होता है, पर जिसका हृदय अपने इष्टदेव में पूर्णतः तल्लीन हो गया है वह किसी समय और कहीं भी प्रार्थना कर सकता है जैसा कि स्वयं विष्णु भगवान ने नारद से कहा था-
साधना कर रहे हैं उसके महत्व और विशेषताओं को जानने के लिये नियमित रूप से थोड़ा समय स्वाध्याय में भी लगाते रहें। जिस पथ-प्रदर्शक के निरीक्षण में वे साधना कर रहे हैं, उसके द्वारा रचित सभी गायत्री ग्रंथों का पढ़ना व उन पर मनन करना भी नितान्त आवश्यक है। उन्हें संकल्प कर लेना चाहिये कि बिना जप किये भोजन नहीं करेंगे और स्वाध्याय किये बिना शयन नहीं करेंगे। इन ग्रंथों की बातों पर चलते-फिरते उठते-बैठते विचार करना चाहिये और उनको जीवन के व्यावहारिक कार्यों में प्रयोग करने का अभ्यास करना चाहिये।
साधना का कोई उद्देश्य अवश्य होना चाहिये। गायत्री परिवार ने अपने सदस्यों के लिये एक ऐसा उद्देश्य निश्चित किया है जिसे दृष्टिगोचर रख कर साधना करने से निराशा का प्रश्न ही नहीं उठ सकता। यह उद्देश्य यही है कि साधक में इस प्रकार का आत्म-भाव और तप व्याप्त हो कि वह अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों को भी गायत्री उपासक बना सकें। हमें संतोष है कि हमारा यह लक्ष्य अधिकाँश में पूरा हो रहा है और जिस घर या मोहल्ले में एक व्यक्ति उपासना करने लगता है तो कुछ समय में उसकी पत्नी, बच्चा, भाई, बन्धु, पड़ोसी भी क्रमशः इस ओर आकर्षित होते जाते हैं। जिस प्रकार कोई पेड़ समय आने पर फल देने लगता है उसी प्रकार गायत्री उपासना में हार्दिक अनुराग उत्पन्न हो जाने से उसके संसर्ग से अन्य उपासक भी स्वतः तैयार होने लगते हैं।
साधना करेंगे तो कुछ ही समय में उनको साधना की सफलता का अनुभव होने लगेगा।
साधना का उद्देश्य
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-April
साधना का लक्ष्य ही बदल जाता है।
साधना के रहस्य को अंतर में पहचानो॥
साधना के सम्बन्ध में है। साधक जिस साधन का उपयोग अपने जीवन के उत्थान तथा उस को दिव्यतम बनाने के लिये करता है, वही अहंकार तथा इन्द्रियों का कौतुक बन जाता है। यह जाल ऐसा है, जिसको क्षत-विक्षत करना अत्यन्त दुरूह है। यहाँ तक कि साधक की सालों की साधना का विकास रुक जाता है। उदाहरण के लिए देखिए, कोई साधक मधुर राग तथा संगीत प्रियता के कारण अपनी साधना के लिए कीर्तन चुनता है।
साधना की प्रारम्भिक अवस्था में विकास के निमित्त कुछ अंशों तक तितिक्षा अनिवार्य है। मन गीता का उदाहरण भी देगा कि भगवान् ने तामसिक तप की निन्दा की है। उन्होंने शरीर, वाणी तथा मन के सात्विक-संयम की प्रशंसा की है। अतः सावधानी से विचार स्थिर करना चाहिए।
साधना में विघ्न पड़ जायगा। इसलिये यदि सबसे ऊँची स्थिति के समीप पहुँचकर भी हम बिल्कुल नगण्य-उपेक्षित अवस्था में बने रहें तो इससे हमको साधन करने में विशेष सुविधा ही प्राप्त होगी। सबका साराँश यही है कि ध्यान-योग द्वारा ही मनुष्य मनोमय शरीर का अतिक्रम करके विज्ञानमय में पहुँच कर समाधि-साधन का अधिकारी बन सकता है।
साधना का इच्छुक जिस समय मनोमय शरीर में अवस्थान करता हुआ ‘सोहं’ का ध्यान करता है, उस पर विचार करने लगता है, तो वह मनोमय शरीर को अतिक्रम करके विज्ञानमय शरीर में पहुँच जाता है। किसी विशेष पदार्थ का साक्षात्कार करने के निमित्त हम बहुत अधिक प्रयत्न करें, तो भी साक्षात्कार हो जाने पर उसके प्रति एक प्रकार का स्वाभाविक वैराग्य हो जाता है। इसीलिये मनोमय शरीर से अग्रसर होकर विज्ञानमय शरीर में पहुँच जाने पर भी उसके प्रति स्वाभाविक वैराग्य हो जाने से साधक पुनः मनोमय शरीर में ही वापस लौट आता है। इसलिये हमको सूक्ष्म ध्यान द्वारा बार-बार अपने ध्येय स्वरूप का ध्यान करने और वहाँ पर दृढ़ रूप से अधिष्ठित होने का प्रयत्न करना पड़ता है। इसके लिए “सोहं” शब्द का ध्यान—विचार आवश्यक है।
साधना से बढ़ा।
साधना का विकास रुक जाता है। उदाहरण के लिए देखिए, कोई साधक मधुर राग तथा संगीत प्रियता के कारण अपनी साधना के लिए कीर्तन चुनता है। कला के प्रशंसक तो मिल ही जाते है। अतः प्रत्येक अवसर पर उसको निमन्त्रण आने लगता है। सत्संगियों को उससे प्रेम भी होने लगता है।
साधना के लिए कीर्तन चुनता है। कला के प्रशंसक तो मिल ही जाते है। अतः प्रत्येक अवसर पर उसको निमन्त्रण आने लगता है। सत्संगियों को उससे प्रेम भी होने लगता है। अब मन अपना जाल बिछाता है।
साधना में पर्याप्त रूप से अवसर हो जाता है। उस समय मन उसकी सहायता करने लगता है। जब तक यह अवस्था न आवे तब तक हमें अत्यन्त सावधान रहना चाहिये और उसकी कपट-क्रियाओं से सचेत रहना चाहिये। न जाने किस समय वह विद्रोह कर दे। यह अत्यन्त कूटनीतिज्ञ और वाममार्गी है।
साधना मोक्ष के स्थान पर बन्धन का कारण बन जाती है।
साधना -धर्म प्रसार
साधना दुमुखी हो जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि साधक जाल में पूरी तरह फँस जाता है और उसकी साधना मोक्ष के स्थान पर बन्धन का कारण बन जाती है।
साधना तथा निवृत्ति मार्ग पर चलने वाले साधक को यह परामर्श नहीं दिया जा सकता। अवश्यमेव नहीं। साधकों को इस बात पर ध्यान रखना चाहिए कि साधक के लिए दंशन तो दूर रहा फुफकार की भी आज्ञा नहीं है, क्योंकि फुफकारना शीघ्र ही उसके स्वभाव का अंग हो जायगा और समय-असमय तुम हर वस्तु पर, हर बात के लिये हर एक फुफकार छोड़ने लगोगे। इस फुफकार में सब प्रकार की उद्दंडता-प्रचण्ड तर्क वितर्क, चुभते व्यंग्य, कठोर उत्तर, चिल्लाहट तथा कटु शब्द भी सम्मिलित हो जायेंगे। अन्त में शारीरिक-हिंसा तथा मारपीट, प्रत्येक प्रकार की अमानुषिक निर्दयता फुफकार की ही श्रेणी में रख दी जायगी और इससे आध्यात्मिकता का सर्वनाश हो जायगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-March
साधना में भेद होता है। अधिकारी पुरुष की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद माने गये हैं। सर्वोपरी भाव ब्रह्म-भाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं।
साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद माने गये हैं। सर्वोपरी भाव ब्रह्म-भाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं। इसके उपरान्त ऊँची श्रेणी के योगियों और भक्तों का ध्यान भाव आता है, जिसमें भक्त अथवा योगी अपने शरीर के भिन्न-भिन्न चक्रों में अपने इष्टदेव का ध्यान करता है।
साधना है। इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है वह रात्रि जो आत्मानन्द प्रदान करने वाली है और जिसका शिव से विशेष सम्बन्ध है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में यह विशेषता सर्वाधिक पाई जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उस दिन चन्द्रमा सूर्य के निकट होता है। इस कारण उसी समय जीवरूपी चन्द्रमा का परमात्मा रूपी सूर्य के साथ भी योग होता है।
साधना से जीवात्मा का शीघ्र विकास होता है।
साधना के चार भेद माने गये हैं। सर्वोपरी भाव ब्रह्म-भाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है। इसे अद्वैत भाव कहते हैं। इसके उपरान्त ऊँची श्रेणी के योगियों और भक्तों का ध्यान भाव आता है, जिसमें भक्त अथवा योगी अपने शरीर के भिन्न-भिन्न चक्रों में अपने इष्टदेव का ध्यान करता है। इससे नीचे का भाव है जिसमें केवल जप, प्रार्थना और स्तुति आदि से सम्बन्ध रहता है।
साधना करता, संतत नव-जीवन भरता॥
साधना और अभ्यास पर्यायवाची शब्द है। सिद्धि का अर्थ है शक्ति अथवा पूर्णता की प्राप्ति। साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिये जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, ज्ञान तथा विकास के भेद-से साधना में भेद होता है। अधिकारी पुरुष की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है।
साधना ही शिव की साधना है। इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है वह रात्रि जो आत्मानन्द प्रदान करने वाली है और जिसका शिव से विशेष सम्बन्ध है। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में यह विशेषता सर्वाधिक पाई जाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उस दिन चन्द्रमा सूर्य के निकट होता है। इस कारण उसी समय जीवरूपी चन्द्रमा का परमात्मा रूपी सूर्य के साथ भी योग होता है।
साधना का क्रम तब तक चलते रहना चाहिये जब तक साधक सिद्ध न हो जाय। साधक की योग्यता, स्वभाव, रुचि, ज्ञान तथा विकास के भेद-से साधना में भेद होता है। अधिकारी पुरुष की प्रकृति के अनुसार ही साधना में अन्तर पड़ता है। इस प्रकार साधना के चार भेद माने गये हैं। सर्वोपरी भाव ब्रह्म-भाव है जिसमें साधक भावना करता है कि सब कुछ ब्रह्म ही है और जीवात्मा परमात्मा से अभिन्न है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-December
साधना में संलग्न होंगे, साथ ही गंभीर आध्यात्मिक अनुभवों एवं साधना मार्ग के महत्वपूर्ण मर्मों को अधिकारी परिजनों के सामने उपस्थित करेंगे। गत छह वर्षों से संस्था संचालन में उनकी अधिकाँश शक्ति लगती रही इसलिए अध्यात्म विज्ञान के मर्म प्रसंगों को उपस्थित कर सकना उनके लिए संभव न हो सका। अब चूँकि उनका सारा समय ही अध्यात्म साधना में लगेगा इसलिए जून के बाद से योग और आध्यात्म के दक्षिण मार्गों और वाममार्गी साधना के, योग और तंत्र के उन पहलुओं पर स्वयं प्रकाश डालेंगे जो अब तक अज्ञात एवं रहस्यमय ही बने हुए हैं। ऐसे विषयों में केवल अधिकारी लोगों को ही अभिरुचि हो सकती है, इसलिए अगले वर्ष से अखण्ड ज्योति के ग्राहक केवल अधिकारी लोग ही रह जावेंगे।
साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
साधना अभी पूर्ण नहीं हुई। अभी वह और भी तीव्र तत्परतापूर्वक जारी रहेगी और जिस ज्ञान गंगा की अभी फुहारें ही ऊपर से उत्तर सकी हैं उसे अन्ततः देवभूमि में अवतीर्ण होने तक यह महाअभियान जारी रहना ही है।
साधना में सबसे पहले दीक्षा ही लेनी चाहिये। दीक्षा का अर्थ यह है कि यह मनुष्य को दिव्य ज्ञान प्रदान कर उसके समस्त पाप पुँज का नाश कर देती है।, इसी कारण ऋषि-मुनियों ने इसका नामकरण दीक्षा किया। ब्रह्मचर्य आदि प्रत्येक आश्रम के व्यक्ति के लिये दीक्षा ग्रहण करना आवश्यक है। इस संसार में सब कुछ दीक्षा मूलक है, बिना दीक्षा के जगत का कोई भी सुसम्पन्न नहीं हो सकता।
साधना का अभ्यास हो गया और कुछ ही वर्षों में संस्कृत भाषा में भी पंडित हो गये।
साधना का माध्यम बनाकर उचित ही किया है। युग निर्माण के सामाजिक कार्यक्रमों को अब गायत्री पत्रिका पूरा करेगी। साधना और तपस्या का मार्ग दर्शन अखण्ड ज्योति के जिम्मे छोड़ दिया गया है। आगे से उसमें इसी साधना के तत्वाधान पर आध्यात्मिक लेख रहा करेंगे। वह साधकों के आध्यात्मिक पथ के पथिकों के काम की चीज ही रह जायेगी।
साधना मार्ग के महत्वपूर्ण मर्मों को अधिकारी परिजनों के सामने उपस्थित करेंगे। गत छह वर्षों से संस्था संचालन में उनकी अधिकाँश शक्ति लगती रही इसलिए अध्यात्म विज्ञान के मर्म प्रसंगों को उपस्थित कर सकना उनके लिए संभव न हो सका। अब चूँकि उनका सारा समय ही अध्यात्म साधना में लगेगा इसलिए जून के बाद से योग और आध्यात्म के दक्षिण मार्गों और वाममार्गी साधना के, योग और तंत्र के उन पहलुओं पर स्वयं प्रकाश डालेंगे जो अब तक अज्ञात एवं रहस्यमय ही बने हुए हैं। ऐसे विषयों में केवल अधिकारी लोगों को ही अभिरुचि हो सकती है, इसलिए अगले वर्ष से अखण्ड ज्योति के ग्राहक केवल अधिकारी लोग ही रह जावेंगे।
साधना के तत्वाधान पर आध्यात्मिक लेख रहा करेंगे। वह साधकों के आध्यात्मिक पथ के पथिकों के काम की चीज ही रह जायेगी। जो लोग केवल मनोरंजन के लिये उसे मंगा लेते हैं और मनोविनोद का चटपटा मसाला न मिलने पर कभी आर्थिक स्थिति खराब, होने का कभी पढ़ने की फुरसत न मिलने का, बहाना बनाकर किसी साल मंगाने किसी साल बन्द करने की उथल-पुथल करते रहते हैं उनमें पत्रिका न मंगाने का स्थायी रूप से बन्द कर देने का आदेश किया गया है। यहाँ से हर महीने पत्रिका दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास भेजी जाती है। फिर भी कई बार बीच में अंक गायब होता हैं।
साधना, और उससे समाज को उन्नत एवं स्वस्थ बनाने का परम पुनीत कर्तव्य एवं महान जिम्मेदारी ब्राह्मण पर ही है। किसी भी समाज एवं राष्ट्र का तथा ब्राह्मण का पहला सम्बन्ध होता है। वेद भगवान भी कहते हैं “हरातत् सिच्यते राष्ट्र ब्राह्मणो यत्र जीयते” जिस देश का ब्राह्मण हारता है वह देश खोखला हो जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि राष्ट्र की जागृति, प्रगतिशीलता एवं महानता उसके ब्राह्मणों पर आधारित होती है। ब्राह्मण राष्ट्र निर्माता होता है, मानव हृदयों में जागरण का संगीत सुनाता है, समाज का कर्णधार होता है।
साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र-वेधन की साधनाएं तथा असंयमडडडडड कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष, विज्ञानमय-कोष, आनंदमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन। मू0 3॥)
साधना की गूढ़ विधियाँ बतलाई जिनसे इस विद्या में इनको अच्छा ज्ञान हो गया। तीन वर्ष बाद ये फिर आश्रम में आ गये और एक गुफा खुदवा कर उसी में भजन करने लगे। अपने आहार के सम्बन्ध में भी वे बड़े कड़े नियमों का पालन करते थे। वैसे वे पाक-विद्या में बहुत निपुण थे और आराध्य देव रामचन्द्र जी की मूर्ति को भोग लगाने के लिये उत्तमोत्तम पदार्थ नित्य तैयार करते थे। इस भोग को वे अपने परिचित और दीन−दुःखियों को बाँट देते थे।
साधनाएं तथा असंयमडडडडड कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष, विज्ञानमय-कोष, आनंदमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन। मू0 3॥)
साधना के, योग और तंत्र के उन पहलुओं पर स्वयं प्रकाश डालेंगे जो अब तक अज्ञात एवं रहस्यमय ही बने हुए हैं। ऐसे विषयों में केवल अधिकारी लोगों को ही अभिरुचि हो सकती है, इसलिए अगले वर्ष से अखण्ड ज्योति के ग्राहक केवल अधिकारी लोग ही रह जावेंगे।
साधना है, तपश्चर्या है।
साधना में जो आपका अभीष्ट है उसकी चिन्ता सदैव करते रहिये। अथवा अभ्यास करने के लिए प्रतिमास कोई अच्छा विचार चुन लीजिये। जैसे “मैं आत्मा हूँ और मैं शरीर से भिन्न हूँ।” इसका सदा ध्यान अथवा चिन्तन करने से आपको धीरे-धीरे अपनी आत्मा और शरीर का भिन्नत्व स्पष्ट प्रतीत होने लगेगा। इस प्रकार अच्छे कल्याणकारी विचारों का चिन्तन करने से बुरे विचारों का आना सर्वथा बन्द हो जायगा और आपको अपना जीवन आनन्दपूर्ण जान पड़ने लगेगा।
साधना का फल यह हुआ कि उनकी आन्तरिक शक्तियाँ पूर्णरूप से विकसित हो गई और वे प्रतिदिन ऐसे कार्य करते रहते थे जिनको लोग चमत्कार ही मानते थे।
साधना से महर्षि पद प्राप्त करते हुये, अनंत सुख को प्राप्त हुये। महर्षि जमदग्नि सहस्रबाहु अर्जुन द्वारा कामधेनु गऊ छीनी जाना व आश्रम भ्रष्ट करने से परशुरामजी की सोई हुयी क्षत्र शक्ति जाग्रत हो गई और प्रतिक्षाबद्ध होकर उन्हें 21 बार पृथिवी को क्षत्रियों से रहित करके ब्राह्मण को पृथिवी का दान दिया। राजा विश्वामित्र व ब्रह्मतेज के समक्ष क्षात्र शक्ति देय प्रतीत हुई अतः राज पाट छोड़ कर ब्रह्मत्व प्राप्ति के लिए कठोर तप करके ब्रह्मत्व प्राप्त किया। जामवन्त के कहने पर हनुमानजी की सोई हुई शक्तियाँ जाग गईं और समुद्र पार करना उन्हें सहज सुलभ हो गया।
साधना से योग की विलक्षण सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। यद्यपि अपने को आस्तिक मानने से आप परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं, पर तर्क-युक्त बात ऐसे योग में काम नहीं देती। अपना अस्तित्व आप जिस प्रकार बिना किसी प्रमाण के मानते हैं, इसी प्रकार बिना किसी प्रमाण का ख्याल किये सर्व मंगलमय परमात्मा पर पूरा विश्वास रखने का प्रयत्न और अभ्यास करना चाहिए। जो लोग बुद्धि योग में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं उनको ऐसी ही तर्क रहित श्रद्धा उत्पन्न करनी चाहिए तभी आपको परमात्मा विषयक सच्चा आनन्द प्राप्त हो सकेगा।
साधना का उद्देश्य है। इसलिए यह सोचना उचित न होगा कि उनके जाने से हम में से किसी की व्यक्तिगत आत्मिक स्थिति या सामूहिक कार्यक्रमों में कोई कमी आवेगी। उनकी तपस्या का बल पाकर तो इस सब में वृद्धि ही होने वाली है।
साधना, तपश्चर्या, खोज आदि। ये जीवन पर्यन्त चलते रहना आवश्यक है।
साधना कर रहे थे, जब उन्हें लोक सेवा के लिए-धर्म प्रसार के लिए आह्वान किया गया तो सोते सिंह की तरह उठकर खड़े हो गये और युग निर्माण की पुनीत प्रक्रिया में जूझ मरने की संघ के साथ प्राणपण से जुटे है। नैतिक और साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का युग निर्माणकारी कार्यक्रम देश भर में चल रहा है उसका बौद्धिक आत्मिक रूप तो आँखों से नहीं देखा जा सकता पर गायत्री यज्ञ आन्दोलन के रूप में लाखों नर-नारी जिस कार्यक्रम को उल्लासपूर्वक अग्रसर करते दिखाई पड़ते हैं उससे यह सहज ही अनुमान हो जाता है कि यह महा अभियान वाह्य प्रक्रियाओं तक ही समिति नहीं है। इसकी गहरी जड़ें के जनसाधारण के अन्तः प्रदेश में भी गहराई तक प्रवेश कर रही है। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की पशुता को मानवता में परिणत करने का यह पुण्य आयोजन आशाजनक रीति से सफल हो रहा है, आगे इसकी सफलता के लिए हम सब और भी बड़ी आशाएं कर सकते हैं।
साधना के निमित्त आगामी गायत्री जयन्ती ज्येष्ठ सुदी 10 के बाद चले जावेंगे। अभी उनको इस कार्य में एक वर्ष लगने की बात कही है पर वह अवधि पूर्ण निश्चित नहीं है। और भी अधिक समय लग सकता है। देश भर में धर्म भावनाओं का विस्तार करके सच्ची विश्व शान्ति का जो आयोजन गायत्री परिवार द्वारा चल रहा है। इसमें समुचित बल बनाये रखना उनकी इस तप साधना का उद्देश्य है।
साधना पक्ष के पथिकों के मार्ग दर्शन करने के लिए निकलेगी। इसी लक्ष के आधार पर व्यक्ति का तथा विश्व का सच्चा कल्याण सन्निहित भी है।
साधना और तपस्या का मार्ग दर्शन अखण्ड ज्योति के जिम्मे छोड़ दिया गया है। आगे से उसमें इसी साधना के तत्वाधान पर आध्यात्मिक लेख रहा करेंगे। वह साधकों के आध्यात्मिक पथ के पथिकों के काम की चीज ही रह जायेगी। जो लोग केवल मनोरंजन के लिये उसे मंगा लेते हैं और मनोविनोद का चटपटा मसाला न मिलने पर कभी आर्थिक स्थिति खराब, होने का कभी पढ़ने की फुरसत न मिलने का, बहाना बनाकर किसी साल मंगाने किसी साल बन्द करने की उथल-पुथल करते रहते हैं उनमें पत्रिका न मंगाने का स्थायी रूप से बन्द कर देने का आदेश किया गया है। यहाँ से हर महीने पत्रिका दो बार जाँच कर सब ग्राहकों के पास भेजी जाती है।
साधना में बिता देते। प्रातःकाल होने के पहले फिर आश्रम में लौट कर नित्य-कर्म में लग जाते।
साधना में लगेगा इसलिए जून के बाद से योग और आध्यात्म के दक्षिण मार्गों और वाममार्गी साधना के, योग और तंत्र के उन पहलुओं पर स्वयं प्रकाश डालेंगे जो अब तक अज्ञात एवं रहस्यमय ही बने हुए हैं। ऐसे विषयों में केवल अधिकारी लोगों को ही अभिरुचि हो सकती है, इसलिए अगले वर्ष से अखण्ड ज्योति के ग्राहक केवल अधिकारी लोग ही रह जावेंगे।
साधना विधान आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1959-August
साधना सामग्री जुट सके, इसी में सन्तोष करे तो उसके लिए इस संसार में मानसिक उलझनों जैसी कोई समस्या शेष नहीं रह जाती। यदि मन प्रसन्न रहे, उद्वेगों से छुटकारा प्राप्त कर सके तो जीवनयापन बहुत ही सरल, सुविधाजनक एवं शान्तिपूर्ण हो सकता है।
साधना करेगा जिससे वह उपरोक्त शिक्षाओं को भली प्रकार समझ कर व्यवहार में ला सके। इस पुराने संकल्प की स्मृति पुनः एक वर्ष के पश्चात् श्रावणी के दिन दिलाई जाती है जो इस बार श्रावण सुदी पूर्णिमा मंगलवार 18 अगस्त 59 को होगी।
साधना, उपासना करके मनुष्य बड़ी से बड़ी उन्नति को प्राप्त कर सकता है—परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है। यह शरीर ही इन्द्रियों के स्वामी (आत्मा) का निवास स्थान है और इसमें निवास करता हुआ वह ऐसे सुकर्म रूपी उत्तम अन्नों की खेती कर सकता है जिससे यह जीवन सुख शाँति से भरपूर हो जाय। यदि मनुष्य इस वेदोपदेश का पालन करेगा। मानव देह को झूठे भोगों में लिप्त न करके, उसके द्वारा उत्तम कार्य करने का ध्यान रखेगा तो अवश्य ही उसका जीवन उच्च स्थिति को प्राप्त होता जायगा और वह साँसारिक पाप-ताप से पृथक रह कर लोक और परलोक में सुख सुयश का भागी बन सकेगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-December
साधना का यह धंधा छोड़ो तुम ।
साधना में श्रद्धा और भक्ति का समावेश आवश्यक है। उसके बिना विश्वास परिपक्व नहीं होता है और विश्वास के बिना मनोबल या आत्म-बल का प्रकटीकरण नहीं होता। शारीरिक बल वर्धन के लिए व्यायाम आवश्यक है और व्यायाम के लिए-गेंद, डम्बल मुद्गर आदि उपकरण चाहिए।
साधना समाप्त कर लूँगी तक भिक्षा दूँगी तब तक आप खड़े रहिये। देवशर्मा का क्रोध सीमा पार गया। तड़प कर बोले-दुष्टा ! साधना कर रही है या परिहास-जानती नहीं इस अवहेलना का क्या परिणाम हो सकता है।
साधना एकाँगी नहीं सग्र-समन्वित और उभयपक्षीय होनी चाहिए सफलता का योग तभी बनता है। श्री आद्य शंकराचार्य का वेदान्त परक ज्ञान योग प्रख्यात है। पर उतने भर से भी काम कहाँ चला ? शक्ति की आवश्यकता उन्हें भी रही, सो कुण्डलिनी जागरण की शक्ति प्रक्रिया उन्हें भी अपनानी पड़ी। समग्र अध्यात्म का स्वरूप समन्वयात्मक ही है।
साधना को भी समर कहा गया है। दुर्गा सप्तशती में महिषासुर मधु कैटभ और शुम्भ निशुम्भ के रूप में स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर में घुसे बैठे असुरों को आत्म शक्ति द्वारा निरस्त करने की शिक्षा है। इस प्रकार संघर्ष आत्मिक प्रगति का भी प्रमुख आधार है। भौतिक जीवन का तो कहना ही क्या ? यहाँ प्रगति तो दूर अपने अस्तित्व को बनाये रह सकना भी बिना संघर्ष सम्भव नहीं।
साधना की यही विशेषता है। उसमें दोनों तत्वों का आवश्यक समन्वय है।
साधना विद्या में इसी तथ्य का पूरी तरह समावेश हुआ है। इसलिए उसकी सरलता, यथार्थता ओर सफलता भी असंदिग्ध होती है। कुण्डलिनी साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों में असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।
साधना अखण्ड दीपक पर उसी दिन आरम्भ की थी। इतना ही नहीं वे हर वसन्त पंचमी पर एक अभिनव दिव्य प्रकाश प्राप्त करते रहे और इस आधार पर अगले एक वर्ष का कार्यक्रम निर्धारित करते रहे। एक-एक कदम हर वसन्त पंचमी को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इतनी लम्बी यात्रा की और लक्ष्य के समीप तक पहुँचे।
साधना के वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा शरीरगत अपरा प्रकृति की प्रचंड शक्तियों का उद्भव किया जा सकता है। इसी को योगियों के दिव्य कर्तृत्व के रूप में देखा जा सकता है। अलौकिकताएं सिद्धियाँ चमत्कार एवं असाधारण क्रिया कृत्यों की जो क्षमता साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती है उसे शरीरगत अपरा प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और उस निर्झर का मूल उद्गम-जननेन्द्रिय मूल-कुण्ड कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।
साधनायें की वैसा साहस किसी में न हो और वह सिद्धियों का स्वामित्व तथा ब्रह्म को प्राप्त करना चाहता हो तो उसे क्या करना चाहिए वह सरल उपाय आप हमें बताने की कृपा करें। लोक कल्याण की इच्छा रखने वाले भगवान शंकर ने बताया-
साधना” महात्मन् ! म् अपने पति, अपने बच्चे, अपने परिवार, समाज और देश के प्रति कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूँ। उसी की सिद्धि है यह। देवशर्मा का सिर लज्जा से नीचे झुक गया। भीख नहीं ली उन्होंने -चुपचाप जिस घर को छोड़कर आये थे चल पड़े उसी ओर छोड़ी हुई कर्त्तव्य की साधना पूरी करने।
साधना ग्रन्थों में इसकी चर्चा इस प्रकार मिलती है।
साधना विज्ञान सम्मत प्रक्रिया का ही दिग्दर्शन है। दश देवियों के चित्रों में विपरीत रति के उल्लेख है। उस समागम में शिव को नीचे और शक्ति को ऊपर बताया जाता है। जागृत अवस्था में कुण्डलिनी की समर्थता और प्रमुखता का जीवन के हर क्षेत्र में छा जाना-यह इस चित्रण का संकेत है। वृहज्जावालोपनिषद् में इसकी चर्चा इस प्रकार है-
साधनात्मक और भावनात्मक विश्लेषण गत दो अंकों में ‘सौंदर्य लहरी’ के कुछ श्लोकों के रूप में सामने आ चुका है। साधना एकाँगी नहीं सग्र-समन्वित और उभयपक्षीय होनी चाहिए सफलता का योग तभी बनता है। श्री आद्य शंकराचार्य का वेदान्त परक ज्ञान योग प्रख्यात है। पर उतने भर से भी काम कहाँ चला ? शक्ति की आवश्यकता उन्हें भी रही, सो कुण्डलिनी जागरण की शक्ति प्रक्रिया उन्हें भी अपनानी पड़ी।
साधना विज्ञान का प्रयोजन व्यक्ति को इन्हीं लाभों से लाभान्वित करता है।
साधना इसी से पूरी होती है। अपनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाना और नाक रगड़ना, भला यह भी कोई भक्ति हैं। लोभ और मोह की पूर्ति के लिए दाँत निपोरना भला यह भी कोई प्रार्थना हैं ? इस प्रकार की भक्ति को वेश्यावृत्ति ही कहा जा सकता है। भौतिक स्वार्थ के लिये किए गए क्रिया-कलापों को ईश्वर के दरबार में भक्ति संज्ञा में नहीं गिना जा सकता।
साधना कर रही है या परिहास-जानती नहीं इस अवहेलना का क्या परिणाम हो सकता है।
साधना-अनुष्ठान चल पड़ा और दूसरे लोगों को इस बात की कानों-कान खबर न हुई।
साधना के अनेक स्वरूप, साधन और मार्ग हो सकते हैं। पर उन्हें बाह्य प्रतीकों का अन्तर ही समझना चाहिए। समस्त साधनाओं का उद्देश्य वही है जो कुण्डलिनी में देखा जाता है। शरीर को ऋतु प्रभाव से बचाना वस्त्र धारण का उद्देश्य है। संसार में विभिन्न डिजाइनों के आकार प्रकार के कपड़े इसी प्रयोजन के लिए बनाये और सिये जाते हैं।
साधना से प्राणस प्रयोग द्वारा, प्रज्वलित अग्नि के समाज इस कुण्डलिनी शक्ति को जागृत किया जाता है। वह हृदयाकाश में सर्प की गति से बिजली जैसी चमकती है।
साधना पूरी करने।
साधना द्वारा इन्हीं दो अप्रत्यक्ष शरीरों को परिपुष्ट बनाया जाता है। यह अन्तर शरीर यदि बलवान हो तो बाह्य शरीर में तेज, शौर्य, प्रकाश, बल और ज्ञान की आभा सहज ही प्रस्फुटित दीखती है। उत्साह और उल्लास भी सूक्ष्म शरीर की निरोगता का ही परिणाम है।
साधनाओं को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उनमें बाह्य भिन्नता दीखने पड़ने पर भी मूल प्रयोजन में कुछ विशेष अन्तर नहीं है। भारतीय अध्यात्म विद्या में इस विज्ञान को बिना अधिक लाग लपेट के सीधे साधे यथावत् मूल स्वरूप से प्रस्तुत कर दिया गया है। इससे समझने में सुविधा होती है और मंजिल को पार करना-लक्ष्य तक पहुँचना अपेक्षाकृत अधिक सरल हो जाता है। कुण्डलिनी साधना की यही विशेषता है।
साधना विज्ञान की समन्वयात्मक साधना विद्या में इसी तथ्य का पूरी तरह समावेश हुआ है। इसलिए उसकी सरलता, यथार्थता ओर सफलता भी असंदिग्ध होती है। कुण्डलिनी साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों में असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।
साधना स्वयं हो जायगी भु-कल्याणी॥
साधना में विभिन्न प्राणायाम साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को व्रज्वलित का ईंधन बनाकर इस वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है तब यह फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरुदण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचता है। शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहचार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है। ऐसे व्यक्ति के लिये ही भगवान् शिव ने अपने समान सिद्ध और पूर्ण योगी बताया है।
साधनायें न करने पर भी जो लोग वीर्य को अखंड रख लेते हैं वे अपने अन्दर शक्ति का अक्षय भंडार अनुभव करते हैं और कुछ भी कर सकने की क्षमता रखते है। प्रज्ञावान् आत्मायें उसके लिए गर्भ धारण के समय से ही सचेष्ट रहती हैं और वीर्य को अधोमुखी नहीं होने देकर उसे ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रयत्न करती रहती है। सामाजिक कर्तव्यों के पालन द्वारा भी ऐसा सम्भव है पर उसके लिए आज की पारिवारिक परिस्थितियों से लेकर शिक्षा पद्धति तक में परिवर्तन करना पड़ेगा। वीर्य सृष्टि का मूल उपादान है उसकी सामर्थ्य को समझा जाना चाहिए, उसकी रक्षा की जानी चाहिये तथा ऊर्ध्वरेता के लाभों से लाभान्वित होकर मनुष्य जीवन की यथार्थता को समझना और पाना चाहिये। जो अपने वीर्य की रक्षा कर लेते हैं एक बूँद बरबाद नहीं होने देते वे कोई भी इच्छा करे कभी अधूरी नहीं रह सकती भले ही उसे लोग योग सिद्धि समझें पर है यह सब सिद्धु विन्दु का ही चमत्कार।
साधनाओं का उद्देश्य वही है जो कुण्डलिनी में देखा जाता है। शरीर को ऋतु प्रभाव से बचाना वस्त्र धारण का उद्देश्य है। संसार में विभिन्न डिजाइनों के आकार प्रकार के कपड़े इसी प्रयोजन के लिए बनाये और सिये जाते हैं। विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित अनेक अध्यात्मिक मान्यताओं और साधनाओं को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उनमें बाह्य भिन्नता दीखने पड़ने पर भी मूल प्रयोजन में कुछ विशेष अन्तर नहीं है।
साधना करती हैं जिससे बिना देखे ही कौए के जलाने और माँ को असहाय छोड़ आने की घटना जान गई।
साधना द्वारा इसी शरीर को समर्थ बनाया जाता है। ऋषियों और सिद्धियों का स्त्रोत इस सूक्ष्म शरीर को माना जाता है।
साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती है उसे शरीरगत अपरा प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और उस निर्झर का मूल उद्गम-जननेन्द्रिय मूल-कुण्ड कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।
साधना से व्यक्तित्व की प्रखरता और कर्तृत्व की विशिष्टता के दोनों ही प्रयोजन पूरे होते हैं। अन्तरंग और बहिरंग दोनों में असाधारण उत्कर्ष एवं उल्लास का पथ प्रशस्त होता है।
साधना का स्वरूप समझने में सुविधा हो सकती है। व्यक्तिगत जीवन में-मनुष्य कलेवर में-परा प्रकृति के-चेतन प्रवाह का केन्द्र स्थान मस्तिष्क के मध्य अवस्थित ब्रह्मरंध्र--सहस्रार कमल है। इसी को कैलाशवासी शिव या शेषशायी विष्णु एवं कालाग्नि कहते हैं। दूसरा केन्द्र जननेन्द्रिय के मूल गह्वर में है। उसे अपरा प्रकृति का केन्द्र कहना चाहिए।
साधना कर रही हूँ साधना समाप्त कर लूँगी तक भिक्षा दूँगी तब तक आप खड़े रहिये। देवशर्मा का क्रोध सीमा पार गया। तड़प कर बोले-दुष्टा ! साधना कर रही है या परिहास-जानती नहीं इस अवहेलना का क्या परिणाम हो सकता है।
साधना और उपासना इन सब में तो सत्य ही आधार है सो मैं आपको नहीं जाने दे सकता।
साधना द्वारा एक अंश जब व्यक्तिगत जीवन में उपलब्ध कर लिया जाता है तो प्रगति की अनेक सम्भावना अप्रत्याशित रूप में सामने आ उपस्थित होती है-इसी अनुभव के आधार पर साधना विज्ञान के अनुभवी मनीषियों ने कुण्डलिनी जागरण की चर्चा करते हुए लिखा है-
साधना विज्ञान के अनुभवी मनीषियों ने कुण्डलिनी जागरण की चर्चा करते हुए लिखा है-
साधनाओं द्वारा सूर्य चक्र की ऊष्मा को व्रज्वलित का ईंधन बनाकर इस वीर्य को पकाया जाता है और उसे सूक्ष्म शक्ति का रूप दिया जाता है तब यह फिर उसकी प्रवृत्ति ऊर्ध्वगामी होकर मेरुदण्ड से ऊपर चढ़ने लगती है साधक उसे क्रमशः अन्य चक्रों में ले जाता हुआ फिर से ललाट में पहुँचता है। शक्ति बीज का मस्तिष्क में पहुँच जाना और सहचार चक्र की अनुभूति कर लेना ही ब्रह्म निर्वाण है। ऐसे व्यक्ति के लिये ही भगवान् शिव ने अपने समान सिद्ध और पूर्ण योगी बताया है।
साधना जगत् की एक अद्भुत उपलब्धि है। इन दिनों की उनकी तपश्चर्या भी इसी शोध पर केन्द्रित है। यह प्रशिक्षण साधकों को कुछ अद्भुत उपलब्ध करा सकता है सो यह लेखमाला भी चलती ही रहनी है। विज्ञान और अध्यात्म का जो अद्भुत समन्वय अखण्ड-ज्योति ने प्रस्तुत किया है उससे विश्व भर के बुद्धिजीवी वर्ग में हलचल उत्पन्न हो गई और नास्तिकता का प्रवाह उस अद्भुत प्रतिपादन के कारण उलटकर आस्तिकता की ओर बहने लगा है। लोग इस सम्बन्ध में और भी अधिक पढ़ना-जानना चाहते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-March
साधना कहें और अन्तरंग ......... उल्लसित एवं परिष्कृत करने की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया समझे तो यह सब प्रकार उचित ही होगा। जन मानस को उल्लसित करने की दृष्टि से संगीत की उपयोगिता असंदिग्ध है। काण्ठ का माधुर्य और गायक का भाव प्राकट्य वाद्य यन्त्रों की सहायता से एक ऐसी .......... उत्पन्न करता है जो सुनने वालों के कान को बेधती हुई-मस्तिष्क को छेदती हुई अन्तःकरण के मर्मस्थल को जा टकराती है। गायन का जो भी प्रयोजन है वह जन मानस को अपनी ओर बरबस खींचता है। पिछले दिन स्वर साधना का प्रधान लक्ष्य जन मानस में कामुकता, इन्द्रिय लिप्सा और कुत्सा को भड़काना रहा है।
साधना की उत्कृष्ट भावना जाग चुकी हो। ऐसे व्यक्तियों का प्रशिक्षण तुरन्त किया जाना है ताकि अगले ही दिनों उनका उपयोग किया जा सके।
साधना में लगे रहते थे तथापि लोगों के मन और मस्तिष्क की बातें जान लेने, आशीर्वाद से किसी का भला कर देने, भविष्य जान लेने आदि की अतींद्रिय क्षमताओं का उनमें पूर्ण जागरण हो चुका था। योगानन्द उनके शिष्य हो गये। योग के प्रति उनमें कौतूहल का भाव तो रहता था पर प्रारम्भिक अवस्था होने के कारण वे कठिन साधनाओं में प्रवेश का साहस नहीं कर सकते थे।
साधना, मुक्ति बुद्धि यह सभी स्त्रीलिंग है। यदि नारी नरक की खान है और स्त्री लिंग, इस शब्दों के साथ जुड़ी हुई विभूतियों को बहिष्कृत किया जाना चाहिए। अच्छा है अध्यात्मवाद के नाम पर भौंड़ा भ्रम जंजाल अपने और दूसरों को दिग्भ्रान्ति करने की अपेक्षा उसे समेट कर अजायब घर की कोठरी में बन्द कर दिया जाये।
साधनायें न किया करते।
साधना का प्रधान लक्ष्य जन मानस में कामुकता, इन्द्रिय लिप्सा और कुत्सा को भड़काना रहा है। राज परिवारों के चाटुकार गवैये बजैये धन की लालसा और दुर्बुद्धियों द्वारा मिलने वाली प्रशंसा के लिए लालायित होकर कठपुतली की तरह नाचते रहे है। कवियों ने अपने अन्न दाताओं की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए वैसी ही कविता रची जैसी कि बुद्धि विकृति भरी सत्ता ने चाही। इन दिनों गायन और वाद्य का प्रयोजन नारी की पवित्रता को पददलित करके उसे वेश्या उपयोगिता रूप में नियोजित करना और उसके प्रति वासना भरी लिप्सा दृष्टि से सोचने के लिए जन मानस तैयार करना भर शेष रह गया है। हम कहीं भी जायें लैला मजनू के अफसाने ही सुनने को मिलेंगे।
साधना की महत्ता धूलि में मिल गई है और संगीत वह मात्र गवैये बजैये नचकैयों का धंधा मात्र बन कर रह गया है। प्राचीनकाल में ऐसी स्थिति से चिढ़कर एक बार औरंगजेब ने अपने राज्य का समस्त वाद्य यन्त्रों को इकट्ठे करके जनाजा निकाला था और उन्हें जलवा दिया था तथा गवैये बजैये अपने राज्य से बाहर निकाल दिये थे खोज ऐसा भी कर सकती है। अनाचार खीज उत्पन्न करेगा ही। भगवान राम अपने राज्य में इन कला कोढ़ियों की अभिवृद्धि की आशंका से चिन्तित थे। बाल्मीकि रामायण के अनुसार भरत जी जब चित्रकूट पर भगवान राम से मिलने गये तब उन्होंने भरत से राज्य के कुशल समाचार जानने के लिए अन्य प्रश्न पूछते हुए यह भी पूछा कि कहीं आपने राज्य में गवैये, नचकैये तो बढ़ नहीं गये हैं ?
साधना लोक मंगल और जन मानस के परिष्कार का लक्ष्य सामने रख कर किये जाने का क्रम चल पड़े।
साधनाओं सम्बन्धी परामर्श वाले पत्र माताजी के नाम घीया मण्डी के पते पर भेजे जाने चाहिये अन्य मिशन सम्बन्धी पत्र व्यवस्थापक गायत्री तपोभूमि के पते पर भेजना ठीक रहता है।
साधना का जो लाभ मिलने वाला है वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक होगा और समय की एक भारी आवश्यकता उससे पूरी हो सकनी सम्भव होगी। समय ही बतायेगा कि हमारा भावी जीवन विश्व मंगल की दृष्टि से कितना उपयोगी सिद्ध हुआ और ढलती एवं निरर्थक समझे जाने वाले बुढ़ापे की आयु का भी कितना महत्वपूर्ण सदुपयोग सम्भव हो गया।
साधनाओं में प्रवेश का साहस नहीं कर सकते थे।
साधना ही उसके रूप हैं। यह देखने को तब मिला जब अलकनन्दा में बाढ़ आई हुई थी, गढ़वाल जिले के श्रीनगर ग्राम में बाढ़ से बचने के लिये 20-22 व्यक्ति एक बड़े पेड़ पर चढ़ गये। रात तक पानी सिमट गया तो वे नीचे उतरने लगे। लेकिन नीचे एक ............... विषधर खड़ा था और वह किसी को उतरने नहीं देता था। कोई मारने को करता तो उधर दौड़ कर भगा देता।
साधना का विशेष शिक्षण प्राप्त करते रहने का एक विशेष लाभ और मिलने लगेगा।
साधना से जो शक्ति उत्पन्न होनी चाहिए आज उसका सर्वथा अभाव ही दीखता है लगता है वे रहस्य लुप्त हो गये। यदि होते तो सामर्थ्य सम्पन्न ऐसे आत्मवेत्ता जरूर मिलते जो मानव समाज के अन्धकार में उलझे हुए भविष्य को उज्ज्वल बनाने में-विषम परिस्थितियों को सरल बनाने में कुछ आशाजनक योगदान दे सकें। राजनैतिक क्षेत्रों में कुछ तो उलटा-पुलटा हो रहा है पर आध्यात्मिक क्षेत्र में शून्यता छाई हुई है। दम्भ और प्रवंचना का ही बोल बाला है। आत्म-बल की सामर्थ्य जो संसार की समस्त सामर्थ्यों से बढ़-चढ़ कर मानी जाती रही है यदि हमारे पास होती तो व्यक्ति और समाज को वर्तमान दुर्दशा से निकालने में उसका प्रयोग अवश्य सम्भव हो सका होता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-April
साधना का सहारा लेना पड़ेगा अपनी चेतना को इतना सूक्ष्म बनाना पड़ेगा कि आवश्यकता पड़े तो वह काल ब्रह्मांड तथा गति रहित परमाणु की नाभि सत्ता में ध्यानस्थ व केन्द्रित हो सके। उसी अवस्था पर पहुँचने से आत्मा की परमात्मा को स्पष्ट अनुभूति होती है। नियामक शक्तियों के जानने का और कोई उपाय नहीं है। शरीर में वह सारी क्षमतायें एकाकार हैं चाहें तो इस यन्त्र का उपयोग कर परमाणु की सत्ता से ब्रह्म तक को प्राप्ति इसी में कर लें।
साधना करो।’
साधना है। दुर्भाग्य से हम इन दिनों बनावट, विडम्बना, भ्रान्ति, दुर्बुद्धि से भरे युग में रह रहे हैं। अज्ञान भरे अन्धकार युग ने कुछ ऐसा कृत्रिम वातावरण बना रखा है जिससे बरसात की काली घटाओं में छिपे हुए सूर्य की तरह सत्य की एक प्रकार से छिपा सा ही दिया। छल और कृत्रिमता का दूसरा नाम ही सभ्यता पड़ गया है, जो जितनी कृत्रिमता बरता सकता है वह उतना ही बड़ा सभ्य और कलाकार माना जाता है। पिछली शताब्दियों और सहस्राब्दियों से असत्य एवं कृत्रिमता की आराधना में मानवीय मस्तिष्क संलग्न रहे हैं और अब वह उपार्जन इतना विशालकाय, इतना सघन और प्रचलित हो गया है कि आमतौर से उसे ही सत्य माना जाने लगा है।
साधनाओं की हर कठिनाई झेलने में समर्थ है इसीलिये हम उसे पंचाग्नि विद्या सिखा रहे हैं। आर्यावर्त की पीढ़ियाँ कायर और कमजोर न हो जायें और यह आत्म विद्या लुप्त न हो जाये इस दृष्टि से भी नचिकेता को यह साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा-अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान् हैं, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है, इसी से उसे हर पौष्टिक आहार मिलते हैं मनोमय कोश के नियन्त्रण के लिये ‘प्राणायाम” कोश का यह परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
साधना की बात जमती थी कर्म का ढर्रा भी चलता रह सकता था, पर योग साधना तपश्चर्या सो भी निविड़ एकाकी वातावरण में हमारे उपयुक्त न थी। 60 वर्ष का जन संपर्क और लोक मंगल के क्रिया कलाप चलाते रहने वाला ढर्रा अब इतना आप-पास में आ गया है और अनुकूल पड़ने लगा है कि उसे छोड़ते बदलते अब काफी अड़चन मालूम पड़ती है। शरीर भी ढीला हो चला और वह तपश्चर्या की कठोर परिस्थितियों से अकचकाता है। इतना सब होते हुए भी हम रुक न सकेंगे जाने की विवशता को टाला न जा सकेगा। 20 जून को हम निश्चित रूप से चले जायेंगे।
साधना समझ से की जाती है आवेश से नहीं।
साधना थी जिसे इन पति पत्नी ने सत्तर वर्ष की आयु तक सम्पूर्ण अन्तः कारण से निबाहा। हबेर्ट लिखते हैं- हम दोनों ने जीवन में काम-भावना या यौन आकर्षण को कभी भी महत्त्व नहीं दिया। जिस तरह दो प्रेमी रहते हैं विवाह के बाद से हम दोनों ठीक वैसी ही रहे और इस संसार में आने का भरपूर आनन्द लेते रहे। मेरी दृष्टि में प्रेम से बड़ी निधि व सम्पत्ति इस संसार में दूसरी नहीं, हम दोनों की एक ही इच्छा थी कि हम एक ही दिन मरें (ऐसा ही हुआ भी) और जब भी कभी संसार में आयें कभी एक दूसरे से अलग न हों।
साधना का प्रयोग करना चाहिए।
साधना को अधिक महत्व देने की प्रेरणा ही हमने सर्वे साधारण को दी है। फिर अगले दिनों हमें जो कदम उठाने पड़ रहे हैं, हिमालय में अज्ञात एकान्त साधना के लिए जाना पड़ रहा है- उससे किसी को ऐसा लग सकता है कि अपनी पिछले मान्यताओं और शिक्षाओं के विपरीत हम आचरण करने जा रहे है। नव-निर्वाण के महान् अभियान की गतिशीलता में हमारा कर्तव्य इतना घुल मिल गया है कि लोगों को यह लग सकता है कि यह व्यक्तित्व एवं मार्ग-दर्शन हट जाने से मिशन को क्षति पहुँचेगी और शिथिलता आ जायगी। ऐसी दशा में नव निर्माण की अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति को हमारा यह महा प्रयाण दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण लग सकता है। और अधिक जोर देकर कहा जा सकता है कि यह विचार हम छोड़ दें और जिस तरह अब तक काम करते रहे उसी तरह आगे भी करते रहें।
साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा से सिसक उठता पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने का समर कितना कष्ट साध्य है अतएव वे नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित न हुए।
साधना तपश्चर्या सो भी निविड़ एकाकी वातावरण में हमारे उपयुक्त न थी। 60 वर्ष का जन संपर्क और लोक मंगल के क्रिया कलाप चलाते रहने वाला ढर्रा अब इतना आप-पास में आ गया है और अनुकूल पड़ने लगा है कि उसे छोड़ते बदलते अब काफी अड़चन मालूम पड़ती है। शरीर भी ढीला हो चला और वह तपश्चर्या की कठोर परिस्थितियों से अकचकाता है। इतना सब होते हुए भी हम रुक न सकेंगे जाने की विवशता को टाला न जा सकेगा। 20 जून को हम निश्चित रूप से चले जायेंगे।
साधना, किया जिसने पुरुषार्थ, वैभव तो उसे मिलना ही था पर जो पड़ा रहा पाप-पंक में दूसरों को कष्ट देकर अहंकार की आत्म-प्रवंचना में वह दीन-दरिद्र रह गया तो इसमें भगवान् का क्या दोष?
साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा से सिसक उठता पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने का समर कितना कष्ट साध्य है अतएव वे नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित न हुए।
साधनायें करनी पड़ीं। उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा रही साधना की कठोरता को देखकर गुरुमाता का हृदय करुणा से सिसक उठता पर यमाचार्य जानते थे कि आत्मा की ग्रन्थियाँ तोड़कर उसे प्रकट करने का समर कितना कष्ट साध्य है अतएव वे नचिकेता को तपाने में तनिक भी विचलित न हुए।
साधनाओं में नियोजित करे तभी आत्मा का पुनरुद्धार हो सकता है तात! किसी की कृपा हो सकती है तो इतनी ही कि वह मार्ग-दर्शन करदे। अन्ततः प्रायश्चित और आत्म-कल्याण का पता तो स्वयं ही करना पड़ता है।
साधना के लिए जाना पड़ रहा है- उससे किसी को ऐसा लग सकता है कि अपनी पिछले मान्यताओं और शिक्षाओं के विपरीत हम आचरण करने जा रहे है। नव-निर्वाण के महान् अभियान की गतिशीलता में हमारा कर्तव्य इतना घुल मिल गया है कि लोगों को यह लग सकता है कि यह व्यक्तित्व एवं मार्ग-दर्शन हट जाने से मिशन को क्षति पहुँचेगी और शिथिलता आ जायगी। ऐसी दशा में नव निर्माण की अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति को हमारा यह महा प्रयाण दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण लग सकता है। और अधिक जोर देकर कहा जा सकता है कि यह विचार हम छोड़ दें और जिस तरह अब तक काम करते रहे उसी तरह आगे भी करते रहें।
साधना को ‘समर’ कहते हैं युद्ध में तो अपना प्राण भी संकट में पड़ सकता कोई आवश्यक नहीं कि विजय ही उपलब्ध हो। अभी तो न चकेता का अन्न संस्कार ही कराया गया है। ब्रह्म विराट् है, अत्यन्त पवित्र है, अग्नि रूप है। शरीर समर्थ न होगा तो नचिकेता उसे धारणा कैसे करेगा। छोटी सी लकड़ी दस मन बोझ नहीं उठा सकती टूट जाती है पर तपाई दबाई और पिटी हुई उतनी बड़ी लोहे की छड़ पचास मन भार उठा लेती है।
साधना कराना श्रेयस्कर ही है। माना कि उसका आहार कम हो गया है पर प्राण स्वयं ही आहार है। आत्मा-अग्नि रूप है, प्राण और प्रकाशवान् हैं, वह प्राणायाम से पुष्ट होती है, इसी से उसे हर पौष्टिक आहार मिलते हैं मनोमय कोश के नियन्त्रण के लिये ‘प्राणायाम” कोश का यह परिष्कार आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।
साधना करो।’ साधक को क्रोध तो आया परन्तु उसके मन में किसी न किस प्रकार आत्मा के दर्शन की तीव्र लगन थी अतएव गुरु की आज्ञा समझ कर चला गया।
साधना कर सकता है।
साधना द्वारा उस अविरल प्रवाह को पहचान नहीं लेता तब तक वह इस प्रकार मरता और नये शरीर धारण करता रहता है।
साधनाओं में लगाया पाँचों कोशों का अनावरण करते हुए उसने आत्म-साक्षात्कार किया और लौकिक बन्धनों से मुक्ति पाई।
साधना विशेषाँक” में पं. भगवान्दास जी अवस्थी ने इसका वर्णन किया है। फ्राँस की मैडम लेंग ने विभिन्न राग गाकर देवी मेरी और जीसस क्राइस्ट के चित्र बनाकर दिखाये। और भारतीय मन्त्र शास्त्र के इस सिद्धान्त की पुष्टि की कि प्रकृति के हर स्थूल अणु को मानसिक एकाग्रता और ध्वनि के द्वारा किसी भी क्रम में सजाकर कैसा भी आग, पानी आकाश, धरती, प्रकाश, पहाड़, नदी, पक्षी, जीव-जन्तुओं का रूप दिया जा सकता है।
साधना है। ऐसी साधना समझ से की जाती है आवेश से नहीं।
साधना ही करनी पड़ी तो कहेंगे यह अपने वर्तमान ढाँचे को बदलने जोड़ने और नष्ट किये बिना सम्भव नहीं। सो हे, गुरुदेव, आदि हमें ऐसी ही नीरस तपश्चर्या करनी है और रूखी मनोभूमि बनानी है तो वर्तमान आस्तित्व को पूरी तरह चूर-चूर करके फिर कोई नई चीज उससे बनाइये। तब वह लिवर शायद उस तरह की शुष्क साधना कर सके। इस वतरण का तो रोम-रोम स्नेह ममता से सराबोर हो है, उसे सर्वथा उल्टा किया गया तो फिर टूट या बिखर जायगा। न अपने काम का रहेगा न किसी दूसरे का।
साधना कर सके। इस वतरण का तो रोम-रोम स्नेह ममता से सराबोर हो है, उसे सर्वथा उल्टा किया गया तो फिर टूट या बिखर जायगा। न अपने काम का रहेगा न किसी दूसरे का। सारा समर्पण स्वीकार करने वाला इस हमारी दुर्बलता को जानता है और विश्वास है कि अपनी सहज सहृदयता इस गधे पर इतना वजन न लादेगा जिससे उसकी कमर टूट जाय। स्नेहसिक्तता हमसे छिनी तो रहेंगे तो उसी मार्ग पर।
साधनायें नहीं कर सकेगा पर जब उन्होंने देखा कि शिष्य मानता नहीं तो उन्होंने एक वर्ष तक एकान्त में गायत्री मन्त्र का निष्काम जाप करके अन्तिम दिन आने का आदेश दिया। शिष्य ने वही किया। वर्ष पूरा होने के दिन आचार्य ने झाडू देने वाली मेहतरानी से कहा कि अमुक शिष्य आवे तब उस पर झाडू से धुल उड़ा देना। मेहतरानी ने वैसा ही किया। साधक क्रोध में उसे मारने दौड़ा पर वह भाग गई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-October
साधना या तपश्चर्या इसी को कहते हैं। साधना का बाह्य स्वरूप देखने पर ऐसा भ्रम होता है कि किसी बाहरी शक्ति से कुछ याचना की जा रही है और अभीष्ट वस्तु देने के लिए किसी बाहरी सत्ता के लिए नाक रगड़ने, गिड़गिड़ाने, लुभाने जैसी कुछ उथली बचकानी रीति-नीति अपनाई जा रही है। किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं। आत्म-सत्ता इतनी समर्थ है कि उसे थोड़ा-सा कुरेदने और थोड़ा-सा ईंधन डालने भर से चिनगारी को ज्वाला बनने में कोई कठिनाई पड़ने वाली नहीं है।
साधना में निरत रहीं वैसा ही प्रयास वे मरने के उपरान्त भी करती रहती हैं। शरीर न रहने पर भी आत्मा का स्तर एवं रुझान मरणोत्तर जीवन में भी प्रायः वैसा ही बना रहता है।
साधना विधान का प्राथमिक ढाँचा इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सृजा गया है कि उस उपचार से अन्तःचेतना के अभ्यासों को बदलने, सुधारने एवं ढालने की प्रक्रिया चल पड़े। वस्तुतः यही परम पुरुषार्थ हैं। उपेक्षा के गर्त में गिराये हुए अचेतन का यदि सही मूल्याँकन किया जा सके और उसे मानवी गरिमा के अनुरूप आदतें अपनाने के लिए सहमत किया जा सके तो समझना चाहिए कि सर्वतोमुखी प्रगति के द्वार खुल गये। एक ऐसा समर्थ साथी मिल गया जिसकी सहायता से आसमान तक ऊँचा उठ सकना सम्भव हो सके। परिष्कृत अचेतन को यदि अंगद-हनुमान की, नल-नील की, भीम-अर्जुन की उपमा दी जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
साधना का अंग बन जाती है तो उसमें होने वाली रसानुभूति की तुलना में काम सेवन तुच्छ और हेय जान पड़ता है।
साधनाओं के संबंध में भी यही बात है।
साधनाओं का अन्तर है। वैदिक देव साधनाओं में मूल व्यतिरेक का दुष्परिणाम अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि जितने सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए उससे कम मिले या विलम्ब लगे। उलटकर हानि होने की तो किसी भी प्रकार आशंका नहीं की जा सकती।
साधना का बाह्य स्वरूप देखने पर ऐसा भ्रम होता है कि किसी बाहरी शक्ति से कुछ याचना की जा रही है और अभीष्ट वस्तु देने के लिए किसी बाहरी सत्ता के लिए नाक रगड़ने, गिड़गिड़ाने, लुभाने जैसी कुछ उथली बचकानी रीति-नीति अपनाई जा रही है। किन्तु वस्तुतः वैसा है नहीं। आत्म-सत्ता इतनी समर्थ है कि उसे थोड़ा-सा कुरेदने और थोड़ा-सा ईंधन डालने भर से चिनगारी को ज्वाला बनने में कोई कठिनाई पड़ने वाली नहीं है।
साधना में आजीवन निरत प. विष्णु दिगम्बर अपने पीछे सुयोग्य संगीत साधक छोड़ जाने के लिए प्रयत्नशील रहे। इस प्रयत्न की सफलता सन्तोषजनक नहीं दीख रही थी। इस पर उनके एक मित्र ने व्यंगपूर्वक पूछा - ‘इतनी मेहनत करके आखिर आपने कितने ‘तानसेन’ पैदा कर लिये ?’
साधनाओं में शरीरगत, मनोगत विशिष्ट शक्तियों को उभारने वाली उत्तेजनाएँ उत्पन्न की जाती हैं और उस उफान का बिना नैतिक अनैतिक विचार किये मनचाहे उपचारों में प्रयोग किया जाता है। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि तंत्र प्रयोग के सभी प्रहार लक्ष्य आसुरी अनैतिक है। उस स्तर की शक्यों का उपार्जन सृष्टा के कठिन एवं दुरूह कारण हैं साथ ही उस क्षेत्र में प्रवेश करना भी खतरे से खाली नहीं रखा है।
साधनाओं में मूल व्यतिरेक का दुष्परिणाम अधिक से अधिक इतना ही हो सकता है कि जितने सत्परिणाम की आशा की जानी चाहिए उससे कम मिले या विलम्ब लगे। उलटकर हानि होने की तो किसी भी प्रकार आशंका नहीं की जा सकती।
साधना द्वारा उस दिव्य चेतना को विकसित करने में एक बड़ी सीमा तक सफल हुए थे। इन दिनों चूँकि क्षमताओं को जागृत करने की वह विद्या लुप्त हो गई है इसलिए इन्हें बाजीगरी, हाथ की सफाई, जादुई करतब और मनोरंजन चमत्कार के समतुल्य माना जाने लगा। कुछ धूर्त लोगों ने मूर्खों को भ्रमग्रस्त करने और उन्हें ठगने के लिए, स्वार्थ साधन के लिए तथाकथित चमत्कार प्रस्तुत किए और लोगों में योग विज्ञान के प्रति अश्रद्धा बढ़ने लगी। इसे अवैज्ञानिक और ‘सूडोसाइन्स’ का फतवा देने वालों की आज सर्वत्र भरमार है। परन्तु इस संबंध में अब जो तथ्य सामने आते जा रहे है।
साधना विज्ञान में मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान और उनकी विलक्षणताओं के प्रकटीकरण की अनुभूत विधि-व्यवस्थाओं का परिपूर्ण समावेश है।
साधना में प्राण-विद्युत के दोनों सिरों को मिला दिया जाता है। इस मिलन का चमत्कार वैसा ही होता है, जिस प्रकार नर-नारी के मिलन से एक नये उत्साह का, नये उत्तरदायित्व का और नये परिवार का आरम्भ होता है। कुण्डलिनी जागरण में मूर्छना की समाप्ति और चेतना की अभिवृद्धि ही नहीं, दो शक्ति ध्रुवों की मिलन प्रक्रिया भी सम्मिलित है।
साधना द्वारा ‘काम’ का रूपांतरण होता है। रूपांतरण का अर्थ है सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उल्लास का समावेश हो जाना।
साधना उपासना के क्षेत्र पर आक्रमण बोल दिया। इतना ही नहीं उसे भी बेतरह अपने चंगुल में फँसा लिया। दैनिक उपासना जैसे नित्य कर्मों के सम्बन्ध में भी यह शंका की जाने लगी कि कहीं भूल होने पर अनर्थ न होने लगे और इष्टदेव उस भूल से रुष्ट होकर उलटे आक्रमण पर न उतर आयें।
साधना उपासना की भक्ति माता भी ऐसी ही हैं। उसका आश्रय लेने पर कष्ट घटते हैं, बढ़ते नहीं।
साधना के आधार पर अर्जित की जाती है।
साधना का प्राण जन-जन की अकथ पीड़ा घनेरी।
साधनाओं में भावनाओं का नहीं क्रियाओं का महत्व माना जाता है। उनमें चरित्र को नहीं दुस्साहस के रूप में विकसित किये जाने वाले मनोबल मात्र का चमत्कार है। मशीनों में भावना नहीं क्रिया होती है। इस क्रिया शक्ति को ही जड़ पदार्थों में सन्निहित कार्यरत पाया जाता है। ताँत्रिक साधनाओं में शरीरगत, मनोगत विशिष्ट शक्तियों को उभारने वाली उत्तेजनाएँ उत्पन्न की जाती हैं और उस उफान का बिना नैतिक अनैतिक विचार किये मनचाहे उपचारों में प्रयोग किया जाता है।
साधनाएँ अचेतन को किसी बड़ी छलाँग लगाने के लिए तत्पर करती है। यह व्यक्तित्व विकसित करने की प्रक्रिया है। जिसकी परिणति प्रतिभाओं, विशिष्टताओं, सफलताओं, सम्पन्नताओं के रूप में हस्तगत होती हैं। इसे लौकिक जीवन को ऋद्धि-सिद्धियों से भरा-पूरा बनाने वाला क्षेत्र कह सकते हैं।
साधना है आज मेरी।
साधना का प्राण जन-जन की अकथ पीड़ा घनेरी।
साधना मार्ग के संबंध में फैली हुई यह भ्रान्ति निरर्थक है कि यह प्रक्रिया देवी-देवताओं को चंगुल में फँसाकर उनसे चमत्कारी सिद्धि -वरदान झटक लेने के लिए प्रयुक्त की जाती है। वस्तुतः उस माध्यम से अचेतन और उच्च चेतन की रहस्यमय परतों को परिष्कृत समुन्नत किया जाता है। इसी क्षेत्र में अगणित अतीन्द्रिय क्षमताएँ और व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बना देने वाली विभूतियाँ छिपी पड़ी है। उनका जागरण उन्नयन होने से मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक समुन्नत सुसंस्कृत बनता है और देवोपम बनने की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होता है। साधना विज्ञान में मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान और उनकी विलक्षणताओं के प्रकटीकरण की अनुभूत विधि-व्यवस्थाओं का परिपूर्ण समावेश है।
साधना है आज मेरी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-August
साधना, तपश्चर्या करते थे उसका फल बालकों को मिठाई बाँटने में खर्च करने का आनन्द लेते रहते थे। फलस्वरूप उनके इर्द-गिर्द बालकों की भारी भीड़ लगी रहती थी। बालकों से मतलब भौतिक प्रगति के लिए लालायित और उलझनों से उद्विग्न उन व्यक्तियों से है जो अपने पुरुषार्थ से अपनी गुत्थी सुलझा सकने में समर्थ नहीं हो पा रहे थे और किसी दूसरे की समर्थ सहायता की अपेक्षा करते थे। आत्मिक दृष्टि से प्रौढ़ व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से अपनी मंजिल आप पूरी करते हैं और प्रारब्ध की जटिलता को साहस और धैर्य पूर्वक सहन करते हैं। बालकों की मनःस्थिति उससे भिन्न होती है।
साधना और तप सब आज हो भंग हो जायेगा।
साधनाओं द्वारा नियन्त्रित कर लिया जाये तो सूर्य की उत्तरायण अवस्था में जबकि पृथ्वी का उत्तरी, ध्रुव सक्रिय होता है वहाँ से जाने वाली एक तीव्र-विद्युतीय-चुंबक रेखा द्वारा उसे ऊर्ध्व लोकों में बहाया जा सकता है। उत्तरी ध्रुव से खगोल के किन्हीं विशेष ग्रह वा ज्योति पिण्डों का सम्बन्ध होता है इस बात से अब विज्ञान भी सहमत है। यह कथा वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित असंदिग्ध सत्व है इस बात की पुष्टि के लिए दि ग्रीलियर-न्यूयार्क टोरोंटो द्वारा प्रकाशित पुस्तक दि बुक ऑफ पापुलर साइंस का 7 वाँ भाग पढ़ना चाहिए। इस पुस्तक में चुम्बकीय क्षेत्र और सूर्य के आग्नेय कारणों द्वारा ध्रुवों में एक ध्रुव-प्रभा के निर्माण का रोमाँचकारी वर्णन दिया हुआ है। इन ध्रुव प्रभाओं (अरोरल-लाइट) के बारे में आज तक विज्ञान जितना जान सका है वहां कौषतकि ब्राह्मणोपनिषद् के महान् ज्ञान की पुष्टि करता है।
साधना में मन को इतना एकाग्र कर ले कि मन के एक बिन्दु पर इष्ट का कोई रूप ज्यों उतार दे तो भले ही वह चित्र, देवी देवता या काल्पनिक ही क्यों न हो मन में वह सामर्थ्य हैं कि वह शरीर रक्त, प्राण, बुद्धि और प्रज्ञा शक्तियों को ठीक उसी तरह का बना देता है जिस प्रकार का इष्ट होता है।
साधना का लाभ कोई भी बिना हिचक उठा सकता है, सो उठाया भी गया। अभावों, संकटों, उलझनों, अवरोधों से निबटने में सहायता प्राप्त करने के लिये अनेकों उनके पास आये। सो न कोई खाली हाथ गया न निराश। जटिल प्रारब्धों को पूर्णतया समाप्त कर देना तो एक मात्र ईश्वर के हाथ में ही हो सकता है। मनुष्य तो अपनी सामर्थ्य भर दूसरों की सहायता ही कर सकता है।
साधना तो सभी करें पर ब्रह्मचर्य गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थ के चरण पूरे करते हुए ही मुक्ति की ओर बढ़ा जाये। जो शक्ति प्रारम्भिक अवस्था की साधनाओं में मनोनिग्रह में खर्च होती है वह परिपक्व अवस्था में नहीं, उस समय इन्द्रियाँ भी अशक्त हो उठती है इसलिये मुक्ति के लिये वही उपयुक्त समय होता है।
साधनाओं की-योगाभ्यास की कठिन प्रक्रियाओं को पार कर भारतीय तत्वदर्शियों ने जो खोजें की है पाश्चात्य विज्ञान उधर ही बढ़ रहा है प्रस्तुत लेख में पाश्चात्य विज्ञान द्वारा प्रमाणित मानव जीवन के विद्युत चुम्बकीय स्वरूप का विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे पाठकों को जीवन-शक्ति, प्राणतत्व की कल्पना का एक नया रूप मिलेगा।
साधनायें कर रही हैं।”
साधना की शक्ति, अपना ज्ञान देकर उसे आत्म- दर्शन की-स्थिति तक पहुँचाया। सिद्धावस्था प्राप्त उत्पलवर्णा ने धर्मोद्धार के कार्य में तथागत का हाथ बंटाया और कुँठा ग्रस्त भारतीय समाज को ऊँचा उठाने का महान् यज्ञ अर्जित किया।
साधना का प्रतिफल समझा ला सकेगा और उस मार्ग को अपनाने के लिये सर्व साधारण में उत्साह उत्पन्न किया जा सकेगा। कहना न होगा कि गुरुदेव की उपासना पद्धति में जप, तप का जितना स्थान था उससे हजार गुना महत्व वे जीवन साधना को देते थे और अपनी आत्मिक उपलब्धियों का श्रेय वे आन्तरिक काषाय कल्मषों के उन्मूलन और वाह्य जीवन की आदर्शवादिता को देते थे। उन्होंने जब भी कहा-यही कहा-मेरी उपासना को फलित करने का श्रेय उस जीवन साधना को ही दिया जाना चाहिये जिसमें अंतरंग की निर्मलता और बहिरंग की उत्कृष्टता को अविच्छिन्न रूप से जोड़ता संजोया जाता रहा। ऐसा अध्यात्म यदि सर्व साधारण की रुचि का विषय बन जाय और लोग उसे अपनाने में गुरुदेव जैसी सर्वतोमुखी प्रगति अनुभव करने लगें तो निस्सन्देह उत्कृष्टता की जीवन साधना अपनाने का आकर्षण असंख्यों को होगा और फलस्वरूप महान् व्यक्तित्वों के उपवन चारों ओर लहलहाने लगें। उस दृष्टि से अब जब कि गुरुदेव चले गये यह अनुभव करा ही दूँ कि उनके सहयोगी जिनने अपनी जीवन यात्रा में प्रकाश पाया, भौतिक एवं आन्तरिक कठिनाइयों से छूटे तथा प्रगति पथ पर चल सकने योग्य अनुदान उपलब्ध किया उनके अनुभवों का एक संकलन प्रकाशित करने की व्यवस्था जुटाने में हर्ज नहीं है।
साधना व समाज सेवा को महत्व दिया तुम्हारा यह आदर्श युगों-युगों तक भारतीय नारी और उसके पुत्रों को अंतर्वर्ती जीवन की प्रेरणायें और प्रकाश देता रहेगा।
साधना द्वारा सीधे सच्चे मार्ग पर लाने का प्रयास करूं।
साधनायें करें और स्वर्ग तथा मुक्ति का अधिकार प्राप्त करें। पूर्णा, धीरा उपशया, मुक्ता, तिष्या तथा भद्रा आदि ने तो प्रव्रज्यायें ग्रहण भी कर ली अब वे योग-साधनायें कर रही हैं।”
साधनायें सम्बन्धी परामर्श वाले पत्र माताजी के नाम निम्न पते पर भेजे जाने चाहिए।
साधना मानकर उसने अपने कर्तव्यों का पालन किया वृद्धावस्था आने पर उसने प्रव्रज्या ग्रहण की और दीर्घकालीन तप के बाद भी जो लाभ अन्य भिक्षु-भिक्षुणियाँ नहीं ले पाई थी वह उन्होंने थोड़े ही समय में प्राप्त कर लिया।
साधना को देते थे और अपनी आत्मिक उपलब्धियों का श्रेय वे आन्तरिक काषाय कल्मषों के उन्मूलन और वाह्य जीवन की आदर्शवादिता को देते थे। उन्होंने जब भी कहा-यही कहा-मेरी उपासना को फलित करने का श्रेय उस जीवन साधना को ही दिया जाना चाहिये जिसमें अंतरंग की निर्मलता और बहिरंग की उत्कृष्टता को अविच्छिन्न रूप से जोड़ता संजोया जाता रहा। ऐसा अध्यात्म यदि सर्व साधारण की रुचि का विषय बन जाय और लोग उसे अपनाने में गुरुदेव जैसी सर्वतोमुखी प्रगति अनुभव करने लगें तो निस्सन्देह उत्कृष्टता की जीवन साधना अपनाने का आकर्षण असंख्यों को होगा और फलस्वरूप महान् व्यक्तित्वों के उपवन चारों ओर लहलहाने लगें। उस दृष्टि से अब जब कि गुरुदेव चले गये यह अनुभव करा ही दूँ कि उनके सहयोगी जिनने अपनी जीवन यात्रा में प्रकाश पाया, भौतिक एवं आन्तरिक कठिनाइयों से छूटे तथा प्रगति पथ पर चल सकने योग्य अनुदान उपलब्ध किया उनके अनुभवों का एक संकलन प्रकाशित करने की व्यवस्था जुटाने में हर्ज नहीं है। गुरुदेव होते तो वे अप्रसन्न होते और रोकते जैसा कि वे अब तक इस विचार को सदा निरुत्साहित करते रहे।
साधनायें किसी भी भौतिक विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण हैं और जीवन से सम्बन्धित समस्त जिज्ञासाओं और समस्याओं का वही सर्वश्रेष्ठ विकल्प है।
साधना के प्रताप की सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा होने लगी।
साधनाओं में मनोनिग्रह में खर्च होती है वह परिपक्व अवस्था में नहीं, उस समय इन्द्रियाँ भी अशक्त हो उठती है इसलिये मुक्ति के लिये वही उपयुक्त समय होता है।
साधना में लगाया इससे उन्हें गोपायन जैसी ही सामर्थ्य प्राप्त हुई। पौरोहित्य की शक्तियों का विकास हो जाने पर राजा असमाति नतमस्तक हुये और उन्होंने पुनः सुबन्धु को लेकर अपना राज पुरोहित नियुक्त किया।
साधना की समर्थता और सार्थकता क्या है और उसे प्राप्त करने के लिये साधक को किस प्रकार की गतिविधियाँ अपनानी होती हैं। इस प्रकाशवान से यदि गुरुदेव के चरण चिन्हों पर चलते हुए महामानव बनने की प्रेरणा कुछेक व्यक्तियों को भी मिल सके तो यह उपलब्धि निस्सन्देह एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना होगी। इन दिनों इस संदर्भ में जितना अधिक विचार किया है उतना ही यह लगा है कि उसमें अनुसूचित कुछ भी नहीं-उचित ही उचित है कि गुरुदेव के संपर्क में आने वालों की उत्साहवर्धक अनुभूतियों-भौतिक एवं आत्मिक उपलब्धियों का संग्रह करने एवं प्रकाशित करने के लिये कदम बढ़ाया जाय। अस्तु यह कार्य हाथ में लिया ही जा रहा है। इस प्रकार के प्रसंग चित्रों सहित मेरे पास हरिद्वार के पते पर भेजे जा सकते हैं।
साधना संलग्न ब्रह्मवेत्ता समझा जाता रहा और लोग यह समझते रहे कि उनकी तप साधना का लाभ कोई भी बिना हिचक उठा सकता है, सो उठाया भी गया। अभावों, संकटों, उलझनों, अवरोधों से निबटने में सहायता प्राप्त करने के लिये अनेकों उनके पास आये। सो न कोई खाली हाथ गया न निराश। जटिल प्रारब्धों को पूर्णतया समाप्त कर देना तो एक मात्र ईश्वर के हाथ में ही हो सकता है। मनुष्य तो अपनी सामर्थ्य भर दूसरों की सहायता ही कर सकता है।
साधना के इन दो पक्षों के आधार पर ही वे गरुड़ की तरह ऊँचे आकाश में उड़ चलने में सफल हो सके। विश्लेषण करने वाले देखते हैं उनकी अधिकतम उपासना 6 घण्टे नित्य थी इतने असंख्य अभाव ग्रस्तों का साहित्य सम्भव हो सके। दूसरे उनसे भी अधिक कर्मकाण्डी एवं जप-तप करने वाले मौजूद हैं पर उनकी उपलब्धियाँ नगण्य ही रहती है फिर गुरुदेव के लिये इतना उपार्जन कैसे सम्भव हुआ? इस पर उनकी अति निकटवर्ती एवं निम्र अनुगामिनी होने के नाते इतना ही कह सकती हूँ कि उनने निर्मलता और उदारता की प्रवृत्तियों को विकसित करने में अत्यधिक ध्यान दिया और पुरुषार्थ किया। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो सम्भवतः उनके 24 वर्षों के 24 गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो से होते जितने कि देखे और पाये गये।
साधना अपनाने का आकर्षण असंख्यों को होगा और फलस्वरूप महान् व्यक्तित्वों के उपवन चारों ओर लहलहाने लगें। उस दृष्टि से अब जब कि गुरुदेव चले गये यह अनुभव करा ही दूँ कि उनके सहयोगी जिनने अपनी जीवन यात्रा में प्रकाश पाया, भौतिक एवं आन्तरिक कठिनाइयों से छूटे तथा प्रगति पथ पर चल सकने योग्य अनुदान उपलब्ध किया उनके अनुभवों का एक संकलन प्रकाशित करने की व्यवस्था जुटाने में हर्ज नहीं है। गुरुदेव होते तो वे अप्रसन्न होते और रोकते जैसा कि वे अब तक इस विचार को सदा निरुत्साहित करते रहे। पर अब जबकि उनकी प्रशंसा निन्दा का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है और इस परिधि से वे बहुत आगे निकल गये तो उसमें हर्ज नहीं दीखता कि वे प्रसंग इस उद्देश्य से प्रकाशित कर दिये जाय कि आत्म-साधना की समर्थता और सार्थकता क्या है और उसे प्राप्त करने के लिये साधक को किस प्रकार की गतिविधियाँ अपनानी होती हैं। इस प्रकाशवान से यदि गुरुदेव के चरण चिन्हों पर चलते हुए महामानव बनने की प्रेरणा कुछेक व्यक्तियों को भी मिल सके तो यह उपलब्धि निस्सन्देह एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक घटना होगी।
साधना से बहुत प्रभावित हैं वे कई बार वेलुवन में उनके दर्शन कर चुके हैं। मैंने उन्हें देव माता से कई बार गम्भीर एकान्त-वार्ता करते देखा है और यह भी सुना है कि गौतमी चाहती है कि राज घरानों की कन्यायें आगे आयें और धर्म को जीवन की मूल आवश्यकता प्रदर्शित करने का नेतृत्व करें। कहीं उनका संकेत आपकी ओर तो नहीं है।
साधना की दो विपरीत स्थायें है। मूर्ति महर्षि के मन को झाँक रही थी। कुश तृणा अपने हाथ में लिया और उसका हलका प्रहर उँगलियों पर किया। यह क्या? महर्षि चौंके-उँगलियों से भस्म गिर रही है, उन्हें अपने इष्ट का ध्यान हो अभिमान का दर्प चूर-चूर हो गया।
साधना को ही दिया जाना चाहिये जिसमें अंतरंग की निर्मलता और बहिरंग की उत्कृष्टता को अविच्छिन्न रूप से जोड़ता संजोया जाता रहा। ऐसा अध्यात्म यदि सर्व साधारण की रुचि का विषय बन जाय और लोग उसे अपनाने में गुरुदेव जैसी सर्वतोमुखी प्रगति अनुभव करने लगें तो निस्सन्देह उत्कृष्टता की जीवन साधना अपनाने का आकर्षण असंख्यों को होगा और फलस्वरूप महान् व्यक्तित्वों के उपवन चारों ओर लहलहाने लगें। उस दृष्टि से अब जब कि गुरुदेव चले गये यह अनुभव करा ही दूँ कि उनके सहयोगी जिनने अपनी जीवन यात्रा में प्रकाश पाया, भौतिक एवं आन्तरिक कठिनाइयों से छूटे तथा प्रगति पथ पर चल सकने योग्य अनुदान उपलब्ध किया उनके अनुभवों का एक संकलन प्रकाशित करने की व्यवस्था जुटाने में हर्ज नहीं है। गुरुदेव होते तो वे अप्रसन्न होते और रोकते जैसा कि वे अब तक इस विचार को सदा निरुत्साहित करते रहे। पर अब जबकि उनकी प्रशंसा निन्दा का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है और इस परिधि से वे बहुत आगे निकल गये तो उसमें हर्ज नहीं दीखता कि वे प्रसंग इस उद्देश्य से प्रकाशित कर दिये जाय कि आत्म-साधना की समर्थता और सार्थकता क्या है और उसे प्राप्त करने के लिये साधक को किस प्रकार की गतिविधियाँ अपनानी होती हैं।
साधना काल में शिष्य गुरु का ध्यान करा है, साकार और सगुण उपासक भगवान् राम, भगवान् कृष्णा, नृसिंह, परशुराम, हनुमान, भैरव आदि की उपासना करते समय उनके रूप का ध्यान करते हुए जप और नाम संकीर्तन करते हैं देखने में समय गंवाने जैसी इस क्रिया में भी वैज्ञानिकता हो सकती है केवल मात्र ध्यान और स्मरण से जिसका ध्यान किया जा रहा है उसकी समस्त क्षमताओं का अपने अन्दर विकास किया जा सकता है किन्तु वैज्ञानिकों द्वारा पूर्ण परीक्षित निम्न उदाहरण यह बताता है कि ध्यान एक पूर्ण विज्ञान सम्मत विधान हैं जो सामान्य पंक्ति में भी इच्छित असामान्य गुणों और शक्तियों का विकास कर सकता है।
साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त करें एक व्यक्ति बड़ी कठिनाई से अपना ही उद्धार करने में समर्थ होता है, नहीं या समुद्र में लकड़ी के बड़े लट्ठे का आश्रय लेकर अनेकों मनुष्य किनारे लग जाते हैं, पर जल में बहने वाली छोटी डाली पर एक कौआ भी बैठ जाय तो डूब जाता है। इसी प्रकार अवतार या महापुरुषों का आश्रय लेकर कितने ही मनुष्य संसार-सागर के पर पहुँच जाते हैं, पर भजन साधन करने वाले स्वयं ही बड़ा उद्योग करके मुक्ति तक पहुँचते हैं।
साधना के प्रथम चरण-नृत्य-योग के प्रारम्भिक प्रयोग-बुझे हुये दीपक जल उठे, मरकत माणियों से जटित स्फटिक स्तम्भों पर खचित वाराँगनायें भी नृत्य करने लगी, सम्मोहित-मयूर और कस्तूरी मृग कांतर के स्वच्छन्द विचारणा त्याग त्याग कर नगर की ओर दौड़ पड़े जहाँ महर्षि का नृत्य-समारोह चल रहा था वहाँ जा जाकर भाव-विभोर हो उनके गति-निस्पंद का आनन्द, पीयूष पान करने लगे, प्रकृति के समस्त नियमों का उल्लंघन कर मेघ मालायें नगर में झुक-झुक जाने लगी, ऐसा लगता था सात स्वरों में सम्मोहित होकर सारी वसुधा ही नृत्य कर उठेगी-रस-सिद्ध महर्षि मंकणा की साधना के प्रताप की सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा होने लगी।
साधनाओं द्वारा ऊर्ध्वमुखी प्रक्षालित कर लिया जाता है तो सुषुम्ना प्रवाह के अन्दर के आग्नेय कर उत्तेजित और क्रियाशील हो उठते हैं, जिससे सहस्रार के जागरण की क्रिया सम्पन्न होती है। यह अवस्था ईश्वरीय दिव्य शक्तियों से संपर्क और अनुभूति एवं बौद्धिक एवं आत्मिक प्रतिभा के विकास की होती है साथ ही ऊर्ध्वमुखी लोकों की प्राप्ति का साधन भी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-September
साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
साधना विधान के द्वारा ही लोग घर बैठे हिमालय में साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
साधना पुरुषार्थ द्वारा उनका जागरण सम्भव है। स्थूल काया तो खाने, पीने, सोने, श्रम करने एवं मस्तिष्क सोचने-विचारने लौकिक गुत्थियों को सुलझाने जितना सामान्य प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। शरीर के भीतर विद्यमान सूक्ष्म एवं कारण शरीर की क्षमताएँ स्थूल शरीर एवं मस्तिष्क की तुलना में कई गुनी अधिक है। उसमें एक से बढ़कर एक आश्चर्यजनक सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। उनका जागरण यदि सम्भव हो सके तो स्थूल उपचार द्वारा दूसरों को राहत पहुँचाना ही नहीं, अदृश्य की जानकारियाँ भूत एवं भविष्य का ज्ञान जैसी कितनी ही चमत्कारी शक्तियाँ करतलगत की जा सकती हैं।
साधना सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। भले ही वे इससे पूर्व दस वर्षों में कई सत्रों में सम्मिलित हो चुके हों।
साधनाओं से हरा मन,हारते पग को समय की चेतना के नव चरण दो।दो न आँसू की दुहाई, साधनों के सुमन दो॥
साधनाएं कराई जानी है। सभी परामर्श किये जाने हैं। फिर स्थान, समय और माँग का तालमेल कैसे बैठे 400 एक बार में करने से दस दस दिन वालों सत्रों में हर महीने मात्र 1200 साधन शाँतिकुँज पहुंच सकेंगे एक वर्ष प्रायः पन्द्रह हजार। एक लाख वरिष्ठ परिजन अभी शेष है, उनके लिए प्रायः सात वर्ष चाहिए। फिर जिस तेजी से नये बढ़ रहे हैं उसे देखते हुये तो 14 वर्ष भी प्रस्तुत परिजनों के लिए कम पड़ेंगे।
साधनाओं द्वारा इन शक्तियों को प्राप्त कर सकने का मार्ग हर किसी के लिए खुला पड़ा है।
साधना करने वालों और सूत्र संचालकों के मध्य चलता है।
साधना धन्य मेरे पास आने की प्रथम कसौटी तो आप ही है। इसलिये जब लोग मेरी उपासना करते हैं। तब मैं आपकी क्रिया करता हूँ।
साधना सत्रों में स्थान न मिले, वे न तो निराश हों और न प्रतीक्षा करें । उन्हें पत्राचार विद्यालय के माध्यम से घर बैठे अपनी साधना और शिक्षा की प्रकारान्तर से वैसी ही व्यवस्था बना लेनी चाहिए जैसी कि शाँतिकुँज में पहुंचने पर संभव थी।
साधना पुरुषार्थ का ही प्रतिफल होती हैं। जिन्हें करतल गत कर असम्भव काम भी पूरे किए जा सकते हैं।
साधना द्वारा अर्जित शक्ति की जीवन में विकसित होने देने के लिए आवश्यक खाद पानी और संरक्षण भी देंगे। इसे अब तक के साधन क्रम का सर्वश्रेष्ठ अध्याय मानना चाहिए। अच्छी तरह निर्वाह कर लेने पर इस पत्राचार साधना विधान के द्वारा ही लोग घर बैठे हिमालय में साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
साधना के दो मार्ग है एक दक्षिण दूसरा वाम। दक्षिण मार्ग में पंचकोशों का अनावरण करना होता है और वाम मार्ग में षटचक्रों का जागरण। षट्चक्र वेधन में प्रयुक्त होने वाली प्राण प्रक्रिया को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। सरल उनके लिए जो उस मार्ग पर चलने का साहस जुटाते हैं। कठिन उनके लिए जो कौतूहल भर से रस लेते हैं।
साधना के बड़ी संख्या में आवेदन आये हैं। वे सभी साधनों के बड़ी संख्या में आवेदन आये हैं। वे सभी ऐसे है, उन्हें बिना हिचक स्वीकृति मिलनी चाहिए। किंतु प्रत्यक्ष कठिनाई यह है कि शाँतिकुँज में स्थान एकान्त नितान्त आवश्यक है, उतना देने पर पूरे 4000 से ऊपर के आवेदन आ चुके। वरिष्ठ प्रज्ञापरिजन एक लाख के ऊपर हैं।
साधनात्मक निर्धारण उसी प्रकार किये जायेंगे जैसे कि मूर्धन्य चिकित्सक रोगी की पिछली और अब की प्रत्येक परिस्थितियोँ का गंभीरतापूर्वक निदान करने के उपरांत चिकित्सा का निर्धारण करते हैं।
साधना की कठिन प्रक्रिया अपनाने का सुदृढ़ निश्चय और अविचल संकल्प नहीं करते।
साधना सम्बन्धी रहा करेगा। इस प्रकार दस बार में दोनोँ प्रकार में मिलाकर 20 पाठ्यक्रम पत्रक पहुँच जायेंगे।
साधना भी कहा जा सकता है। जिस भी काम को हाथ में लिया जाय उसे मेहनत पूर्वक, पूरा मनोयोग लगाकर काम में रस लेते हुए जब सम्पादित किया जाने लगेगा तो जो परिणाम निकलेंगे उन्हें चमत्कारों की सत्ता दी जा सकती है।
साधना में उन विशिष्ट तत्वों का समावेश करें जो इन्हीं दिनों नितान्त आवश्यक है। इन पंक्तियों द्वारा इस स्तर के सभी वरिष्ठ परिजनों से इसी का अनुरोध किया जा रहा है।
साधना और शिक्षा की प्रकारान्तर से वैसी ही व्यवस्था बना लेनी चाहिए जैसी कि शाँतिकुँज में पहुंचने पर संभव थी।
साधना किस प्रकार चलाये इसके निर्धारण सभी के लिए एक जैसे नहीं होंगे वरन् हर व्यक्ति की मन स्थिति, परिस्थिति, परम्परा एवं पूर्व प्रगति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग होंगे। किसे, किस प्रयोजन के लिए किस स्तर की आत्मशक्ति चाहिए, कौन कितना कर सकने में समर्थ है, इन सब बातों का तालमेल बिठाकर ही साधन विधि का पृथक-पृथक निर्धारण किया जायेगा।
साधनाक्रम एवं परामर्श निर्देशन का सिलसिला चल पड़ेगा। इस संदर्भ में अन्य किसी प्रकार की फीस या खर्च तो नहीं देना पड़ेगा, किन्तु हर पत्र के साथ पचास पैसे के टिकट या उतने ही टिकट वाला लिफाफा भेजते रहना आवश्यक हैं। पाठ्यक्रम, परामर्श, उत्तर स्टेशनरी आदि का सारा खर्च तो संस्था वहन करना होगा। पाठ्यक्रम एवं उत्तर भारी हो जाने के कारण उन पर पैंतीस पैसे न लगाकर पचास पैसे लग जाते हैं।
साधना के सहारे अभीष्ट आत्मबल अर्जित करने और प्रशिक्षण द्वारा सामयिक प्रेरणा एवं प्रज्ञा उभारने की आवश्यकता को इसलिये रोके नहीं रखा जा सकता है कि शाँतिकुँज के स्थान सीमित है। युग की माँग तो यथा समय पूरी होनी ही चाहिएं। कठिनाई आती है तो दूसरा मार्ग खोज जाये।
साधनायें सिखाएंगे अपितु उनकी पुर्वजन्मों की गाठों को खोलने, अपना प्राण देने और साधना द्वारा अर्जित शक्ति की जीवन में विकसित होने देने के लिए आवश्यक खाद पानी और संरक्षण भी देंगे। इसे अब तक के साधन क्रम का सर्वश्रेष्ठ अध्याय मानना चाहिए। अच्छी तरह निर्वाह कर लेने पर इस पत्राचार साधना विधान के द्वारा ही लोग घर बैठे हिमालय में साधना करने वाले योगियों जैसे आत्मबोध का उपहार प्राप्त कर सकेंगे।
साधनाओं के सुमन दो।रात से मत तिलमिलाओ, प्रात की हंसती किरण दो॥
साधना सत्रों की नई शृंखला चलाई गई है और महापुरश्चरण के नैष्ठिक भागीदारों-प्राण दीक्षा ले चुके भावनाशीलों-प्रज्ञापुत्रों-समयदानियों एवं वरिष्ठ परिजनों को कहा गया है कि वे इन नये निर्धारण के साधना सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। भले ही वे इससे पूर्व दस वर्षों में कई सत्रों में सम्मिलित हो चुके हों।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-May
साधनायें सात्विक आहार-बिहार तथा मनोवृत्ति वाले लोगों को योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिये। अन्यथा लाभ होने के बजाय हानि अधिक होती है । इसलिये इन साधनाओं के अभ्यास के पूर्व यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि वे अभी साधना की कठिनाई (कठिनाई केवल मन के आकर्षण, इच्छाओं को मारने की होती है ) को झेल सकेंगे या नहीं । दुर्बल मन वालों को यह नहीं सिखायी जाती । साधना एक प्रकार का समर (युद्ध) है; उसे मनस्वी, सशक्त और तेजस्वी व्यक्ति जीतते हैं।
साधना भी त्राटक ही है। उसमें बिना आँख बन्द किए दोनों भौहों के बीच ध्यान किया जाता है । यह ध्यान प्रारम्भ में किसी मूर्ति या चित्र के रूप में करते हुये प्रकाश की लौ के रूप में किया जाता है । भ्रूमध्य स्थित आज्ञा चक्र या तीसरे नेत्र का उन्मीलनइस साधना की सिद्धि है । इससे योगी में आश्चर्यजनक क्षमतायें उत्पन्न होती हैं।
साधना एक प्रकार का समर (युद्ध) है; उसे मनस्वी, सशक्त और तेजस्वी व्यक्ति जीतते हैं। जिनमें इस तरह का संकल्प बल हो, केवल उन्हें ही इसका अभ्यास करना चाहिये ।
साधना की सिद्धि है । इससे योगी में आश्चर्यजनक क्षमतायें उत्पन्न होती हैं। दूसरों के मन की बातें जान लेना, दूर की वस्तुओं, घटनाओं का ज्ञान, दूरवर्ती आकाश में हो रही सूक्ष्म हलचलों का ज्ञान और स्वप्नावस्था में दिव्य-दृश्य तथा भविष्य में होनी वाली घटनाओं का पूर्वाभास सब इसी साधना के सत्परिणाम हैं। पर यह साधनायें सात्विक आहार-बिहार तथा मनोवृत्ति वाले लोगों को योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिये। अन्यथा लाभ होने के बजाय हानि अधिक होती है ।
साधना पूरी होनी है । उससे हमारा न तो कोई अनुरोध है, न आग्रह, न इनकार, न संशोधन। छाया तो काया के पीछे ही चलती है चाहे सरल मार्ग पर चलना पड़े या ऊबड़ - खाबड़ पर। सो हम चलते ही आये हैं, चलेंगे भी। जब आदेश का पालन भर अपना धर्म रह गया तो फिर पूछ-ताछ की जरूरत भी क्या पड़े ?
साधना तपश्चर्या का जो क्रम भूतकाल में अपनाया जाता रहा है, वह आज की परिस्थितियों से मेल नहीं खाता। अब वे प्रयोग-प्रयोजन एवं साधन-क्रम सफल नहीं हो सकते, जो प्राचीनकाल की परिस्थितियों में तो उपयुक्त थे, पर आज उन्हें निष्फल और निरर्थक ही कहा जा सकता है। आत्मबल बढ़ाने के लिये आत्म-साधना का अवलम्बन आवश्यक है। पर युग साधन का प्रस्तुतीकरण न होने से उस मार्ग के पथिकों को बहुत श्रम करने पर भी कुछ हाथ नहीं लग रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि आज की परिस्थितियों में सफल सिद्ध हो सकने वाली साधन पद्धति को खोज निकाला जाय।
साधना क्रम वहीं चलेगा। उनके साथ रहने के लिए एक परिश्रमी, सेवाभावी, पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्त, निरोग साक्षर महिला की आवश्यकता पड़ेगी। निर्वाह व्यय माताजी उठायेंगी। जो महिला अपने को इसके लिए उपयुक्त समझें वे माताजी से अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर पत्र व्यवहार कर लें।
साधनाओं का प्रचार किया था । भारतवासी धीरे-धीरे इस महान् विज्ञान को भूलते जा रहे हैं जब कि तिब्बत में अनेक लामा अभी भी इन साधनाओं और गुह्य आत्मविद्या के ज्ञाता है ; डॉ. लोवसांग रम्पा जैसे लामा योगविद्या ज्ञाताओं की ख्याति अमेरिका और इंग्लैंड तक में हुई है ।
साधना, खुद ही पूरी कर दी।
साधना का एक विद्वान् लामा इतना शक्तिशाली हो सकता है तो कोई भारतीय योगी कितना शक्तिशाली होता होगा सहज ही सोचा जा सकता है ।
साधना के सत्परिणाम हैं। पर यह साधनायें सात्विक आहार-बिहार तथा मनोवृत्ति वाले लोगों को योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिये। अन्यथा लाभ होने के बजाय हानि अधिक होती है । इसलिये इन साधनाओं के अभ्यास के पूर्व यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि वे अभी साधना की कठिनाई (कठिनाई केवल मन के आकर्षण, इच्छाओं को मारने की होती है ) को झेल सकेंगे या नहीं । दुर्बल मन वालों को यह नहीं सिखायी जाती ।
साधनाओं में मन को ही सूक्ष्म प्रखर और प्रकाश पूर्ण बनाया जाता है जिससे वह शरीर के अंग-प्रत्यंग का भेदन कर वहाँ की सूक्ष्म गतिविधियों का पता पा सके । शरीर में ब्रह्मांड का अस्तित्व इसी विज्ञान के द्वारा जाना जा सका है । इन योग साधनाओं की वैज्ञानिक जाँच की जा सके तो मनुष्य जाति उन सूक्ष्म सत्यों से भी लाभान्वित हो सकती है, जिन्हें देववाद कहकर या भावनावाद कहकर ठुकरा दिया जाता है पर उनका महत्व इतना अधिक है कि मनुष्य का सारे का सारा जीवन ही इन्हीं के सहारे संचालित होता है ।
साधनाओं द्वारा उससे भी अधिक आगे बढ़कर किस तरह प्राप्त कर लिया । डॉ. स्टाकर्ड लिखते हैं कि आन्तरिक स्राव वाली ग्रन्थियाँ एक महान् शासक के रूप में गर्भधारण से लेकर मृत्यु तक स्त्रियों पुरुषों तथा समस्त रीढ़ की हड्डी वाले जीवों तक का नियन्त्रण करती है। “फिजियोलॉजी” तथा सोशलॉजी की मान्यतायें भी अब “अन्तराकाश” के अस्तित्व और उसके प्रचण्ड प्रभाव को स्वीकार करने लगे हैं। “ग्लैण्ड्स ऑफ डेस्टिनी” के लेखक डॉ. ईबो गैकी काव ने तो यहाँ तक मान लिया है कि अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (इन्डोक्राइन ग्लैण्ड्स) पर नियन्त्रण रखने वाले लोगों ने ही इतिहास पर अधिकार रखा है और जमाने को कहाँ से कहाँ बदल दिया है । नैपोलियन बोनापार्ट का उदाहरण देते हुये उन्होंने लिखा है कि यदि वाटरलू के युद्ध के समय नैपोलियन बोनापार्ट की “पिचुट्री ग्लैण्ड” (पीयूष ग्रन्थि) में खराबी नहीं आ जाती तो वह हारता नहीं।
साधना का अभ्यास कर रहे थे । उन्होंने कई प्रभावशाली व्यक्तियों को ध्यान की एकाग्रता द्वारा अच्छा करके स्वस्थ किया था। अतएव उन्हें लोग एक सन्त के रूप में प्रतिष्ठा देते थे; पर उन्हें ऐसा कोई ख्याल नहीं आया था कि “प्रार्थना और ध्यान साधना का प्रसार करना चाहिये । एक दिन कुछ लोग स्वयं ही उनके पास आये और उक्त योजना उनके सामने रखी वहीं पर ‘मौन मिलन समाज’ (सोसायटी आफ साइलेंट यूनिटी) नामक संस्था का श्रीगणेश किया गया । उसके लिये कार्यालय खोलने की बात आई तो कंसास शहर चुना गया ।
साधना के साथ-साथ चलते रहेंगे। संगठन का मार्गदर्शन मथुरा से होगा।
साधना का प्रसार करना चाहिये । एक दिन कुछ लोग स्वयं ही उनके पास आये और उक्त योजना उनके सामने रखी वहीं पर ‘मौन मिलन समाज’ (सोसायटी आफ साइलेंट यूनिटी) नामक संस्था का श्रीगणेश किया गया । उसके लिये कार्यालय खोलने की बात आई तो कंसास शहर चुना गया । वही स्थान जो फिलमोर ने स्वप्न में देखा था । अखबार निकाला गया, उसका नाम”यू” से बनने वाला दी-”यूनिटी” रखा गया।
साधनायें इन देव-शक्तियों के विकास का ही वैज्ञानिक उपक्रम है । आने वाले दिनों में जबकि अंतःस्रावी ग्रन्थियों के पदार्थ (मैटर) की खोज होगी और उसकी तुलना ग्रहों के पदार्थ से की जायेगी तो लोग आश्चर्य करेंगे कि मनुष्य शरीर में आकाश तत्व किस विलक्षणता के साथ उपस्थित है और कितने आश्चर्यजनक ढंग से मनुष्य को अपनी इच्छा से बाँधें हुए है ।
साधनाओं द्वारा इस का यथार्थ ज्ञान और अनुभूति कोई भी मनुष्य प्राप्त सकता है।
साधनाओं और गुह्य आत्मविद्या के ज्ञाता है ; डॉ. लोवसांग रम्पा जैसे लामा योगविद्या ज्ञाताओं की ख्याति अमेरिका और इंग्लैंड तक में हुई है ।
साधनायें करा कर मुझे खाई से अन्दर लाया था । लामा ने बताया यह व्यक्ति तो सात वर्ष से मृत है। इसे कई वर्ष तक इसी तरह रख सकते हैं। इसी बीच डॉ. कैनन मन में जो भी बात आई, लामा अपने आप बता देता था। उसका उत्तर भी दे देता था ।
साधनाओं से मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण इतने स्वच्छ हो जाते हैं
कि ईश्वरीय प्रेरणाओं और दूर भविष्य की अनजानी घटनाओं के दृश्य चलचित्र की
भाँति उतरते चले आते हैं। श्री शास्त्री जी इस बात को स्वीकार करते थे, पर
वे इस तरह का अहंकार अपने लिये व्यक्त नहीं करना चाहते थे। श्री शास्त्री
जी ने सन् 1945 और 1950 के मध्य भारतवर्ष को स्वतन्त्र होने की भविष्यवाणी
की थी, वह सच हुई। उन्होंने दस वर्ष पूर्व ही गान्धीजी की मृत्यु की भविष्यवाणी की थी, वह भी सच निकली थी। उन्होंने बताया था, सन् 1970 में अमरीका का कोई मनुष्य चन्द्रमा की परिक्रमा करेगा।
साधनायें ढूंढ़ी गई है जो पाश्चात्य-विज्ञान से भी अधिक विस्मय से भरी हुई है।
अणिमा - जिसमें जीव-चेतना अणु के समान बनकर कण - कण की खोज कर लाती है, महिमा - जिसमें मनुष्य पर्वत समान विशाल और शक्तिशाली हो जाता है, गरिमा शरीर को बहुत भारी और लघिमा हलका कर लेने को कहते हैं । प्राप्ति लाखों मील दूर की वस्तु के स्पर्श आदि प्राप्ति की सिद्धि है तो प्राकाम्य कोई भी कामनायें तत्काल पूर्ति कराने वाली सिद्धि है।
शरीर के भीतर अदृश्य चक्रों, उपत्यिकाओं, कुँडलिनी और मन पर अधिकार कर इच्छानुसार प्रयोग कर सकने की सामर्थ्य प्रदान करने वाला ईशत्व सिद्धि तथा परिस्थितियों और शक्तिशाली पदार्थों को भी वश में रखने की वाशित्व सिद्धि भी भारतीय योग विद्या के चमत्कार हैं।
मन को कण्ठ में संयम करने से अदृश्य राग रागनियों का सुनना, नाभि में संयम करने से भूख न लगना जैसी संयम और सूर्य-वेध, नाड़ी-शोधन, उज्जायी, भ्रामरी आदि प्राणायाम भी भारतीय योग-विद्या की विद्यायें है ; तो वस्ति, धौति, नौलि, नेति, वज्रोली और कपालभाति क्रियायें भी भारतीय योगी जानते हैं।
साधना की कठिनाई (कठिनाई केवल मन के आकर्षण, इच्छाओं को मारने की होती है ) को झेल सकेंगे या नहीं । दुर्बल मन वालों को यह नहीं सिखायी जाती । साधना एक प्रकार का समर (युद्ध) है; उसे मनस्वी, सशक्त और तेजस्वी व्यक्ति जीतते हैं। जिनमें इस तरह का संकल्प बल हो, केवल उन्हें ही इसका अभ्यास करना चाहिये ।
साधना करनी पड़ती है। और प्राण को परिपुष्ट करने वाली सत्प्रवृत्तियों से भरा-पूरा व्यक्तित्व बनाना पड़ता है। वस्तुतः सुयोग्य सन्तानोत्पादन भी एक साधन है जिसके लिये संयमी ही नहीं मनस्वी भी बनना पड़ता है।
साधना कुछ ऐसा अनुदान विश्व मानव के सम्मुख प्रस्तुत करेगी जो उसके भाग्य और भविष्य की दिशा ही मोड़ दे। सगर के साठ हजार पूत्रों को नरक की आग में जलने से बचाने के लिए गंगा का अवतरण सम्भव करने वाले भागीरथ की तरह ज्वलंत मानवीय समस्याओं का सृजनात्मक और ध्वंसात्मक हल प्रस्तुत करने के लिए हमें बहुत कुछ करना है। युग-संताप को बुझा सकने वाली ज्ञान-गंगा का अवतरण करने के लिये हमें उन्हीं पदचिह्नों का अनुगमन करना है जिन पर महाभाग भगीरथ ने प्रयाण किया था। हमारी भावी तपश्चर्या का मूल प्रयोजन यही है।
साधनाओं की वैज्ञानिक जाँच की जा सके तो मनुष्य जाति उन सूक्ष्म सत्यों से भी लाभान्वित हो सकती है, जिन्हें देववाद कहकर या भावनावाद कहकर ठुकरा दिया जाता है पर उनका महत्व इतना अधिक है कि मनुष्य का सारे का सारा जीवन ही इन्हीं के सहारे संचालित होता है ।
साधना करते हैं । श्वेत पत्थर, शालिग्राम या स्फटिक पत्थर को आँखों की सीध, उतनी ही ऊँचाई तथा 2 फीट की दूरी पर रखकर टकटकी लगाकर जितनी देर संभव हो, स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा जाता है । आँखें थक न जायें ; तब तक जब यह अभ्यास करना चाहिये । पत्थर पर दृष्टि स्थिर होने के बाद घी का दीपक जलाकर उसकी लौ पर दृष्टि स्थिर की जाती है। जब ज्योति शिखा पर दृष्टि स्थिर हो जाए हो जाये, तब यही प्रयोग ठुड्डी को कंठ कूप (गले में जो गड्ढा सा बनता है) में लगाकर अपनी नाक के अग्रभाग पर करना चाहिये ।
साधनात्मक उपलब्धियों से सर्वसाधारण को अवगत कराते रहने का माध्यम और
साधना के रूप में यदि काम-सेवन करते भी हैं तो इसका प्रयोजन एक अद्भुत प्रतिभा को जन्म देना होता हैै, जो आवश्यकतानुसार एक या दो शरीरों में पैदा की जा सकती है। यह उच्चस्तरीय शिशु जन्म है। ऐसा काम-सेवन अभिशाप न होकर वरदान भी हो सकता है। विष को भी यदि संशोधन करके भेषज बना दिया जाय तो वह विघातक न रह कर संजीवन बूटी बन सकता है। काम-प्रक्रिया को विष बनाकर अपने मरण का साज न संजोयें बल्कि उसे अमृत बनाकर दो व्यक्तित्वों के असाधारण उत्कर्ष एवं विश्व-कल्याण में कर सकने में समर्थ एवं प्राण प्रयोजन सिद्ध करें।
साधना किस स्तर के व्यक्ति के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकती है। यह आज का नया शोध कार्य है। प्राचीन काल में जो शारीरिक, मानसिक, भौतिक एवं तात्त्विक परिस्थितियाँ थीं वे अब बदल गईं। साधना तपश्चर्या का जो क्रम भूतकाल में अपनाया जाता रहा है, वह आज की परिस्थितियों से मेल नहीं खाता। अब वे प्रयोग-प्रयोजन एवं साधन-क्रम सफल नहीं हो सकते, जो प्राचीनकाल की परिस्थितियों में तो उपयुक्त थे, पर आज उन्हें निष्फल और निरर्थक ही कहा जा सकता है।
साधना की शोध तथा
साधनायें विकसित की हैं। प्लाज्मा की शक्ति से ही अनुमान किया जा सकता है कि आत्म-शक्ति के सूक्ष्म या प्रकाशीय विकास द्वारा मनुष्य कितना समर्थ व शक्तिशाली बन सकता है । जबकि आज का विज्ञान केवल जड़ की व्याख्या और उसी के याँत्रिक नियंत्रण में लगा है। यही अविद्या है । अविद्या को हटाकर विद्या की प्राप्ति कर सकें तो शास्त्रकार के कथन के अनुसार अंगुष्ठ मात्र प्राणी सूर्य जैसा विराट् बन सकता है ।
साधना का ही अंग माना है। उन्होंने लिखा है कि साधक लामा लोग सूर्योदय के एक घण्टा पहले से सूर्योदय तक यह साधना करते हैं । श्वेत पत्थर, शालिग्राम या स्फटिक पत्थर को आँखों की सीध, उतनी ही ऊँचाई तथा 2 फीट की दूरी पर रखकर टकटकी लगाकर जितनी देर संभव हो, स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा जाता है । आँखें थक न जायें ; तब तक जब यह अभ्यास करना चाहिये । पत्थर पर दृष्टि स्थिर होने के बाद घी का दीपक जलाकर उसकी लौ पर दृष्टि स्थिर की जाती है।
साधनाओं के अभ्यास के पूर्व यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि वे अभी साधना की कठिनाई (कठिनाई केवल मन के आकर्षण, इच्छाओं को मारने की होती है ) को झेल सकेंगे या नहीं । दुर्बल मन वालों को यह नहीं सिखायी जाती । साधना एक प्रकार का समर (युद्ध) है; उसे मनस्वी, सशक्त और तेजस्वी व्यक्ति जीतते हैं। जिनमें इस तरह का संकल्प बल हो, केवल उन्हें ही इसका अभ्यास करना चाहिये ।
साधना करनी चाहिये, समर्थता बढ़ानी चाहिये। प्रकृति का एक पन्ना।
साधनाशील व्यक्ति होकर भी ऐसे अन्धश्रद्धालु नहीं थे कि मन में आये हुये
किसी भी संकल्प-विकल्प को पागलों की भांति स्वीकार कर लेते। ईश्वर उपासना,
योग और साधनाओं से मन, बुद्धि, चित्त और अन्तःकरण इतने स्वच्छ हो जाते हैं
कि ईश्वरीय प्रेरणाओं और दूर भविष्य की अनजानी घटनाओं के दृश्य चलचित्र की
भाँति उतरते चले आते हैं। श्री शास्त्री जी इस बात को स्वीकार करते थे, पर
वे इस तरह का अहंकार अपने लिये व्यक्त नहीं करना चाहते थे। श्री शास्त्री
जी ने सन् 1945 और 1950 के मध्य भारतवर्ष को स्वतन्त्र होने की भविष्यवाणी
की थी, वह सच हुई। उन्होंने दस वर्ष पूर्व ही गान्धीजी की मृत्यु की भविष्यवाणी की थी, वह भी सच निकली थी।
साधना का अवलम्बन आवश्यक है। पर युग साधन का प्रस्तुतीकरण न होने से उस मार्ग के पथिकों को बहुत श्रम करने पर भी कुछ हाथ नहीं लग रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि आज की परिस्थितियों में सफल सिद्ध हो सकने वाली साधन पद्धति को खोज निकाला जाय। इसके लिये वैज्ञानिक प्रयोग करने पड़ेंगे। गत 60 वर्षों के व्यवस्थित जीवन-क्रम ने अपनी काया और चेतना को इस योग्य बना दिया है कि उसे प्रयोगशाला के रूप में उपयोग किया जा सके।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-July
साधनापरक मनोविज्ञान ही दे सकता है।
साधना द्वारा अपना मनोबल और आत्म बल विकसित कर लेते हैं वह अनेक गुणों और संस्कारों से युक्त सुन्दर बनी रह पाते हैं और जिनकी इंद्रियों के प्रति लालसा जागृत बनी रहती है वे उन उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए पुनः कोई शरीर धारण करते हैं। यह पटाक्षेप तनातन काल तक चलते रहते हैं।
साधना हो जायेगी।
साधनाओं द्वारा मन चाही मात्रा में प्राप्त भी कर सकता है।
साधनाओं में घुला कर सिद्धि पाई है सब में ही अद्वैत आत्मा के दर्शन करते हैं आन, फिर क्या मैं आत्मा नहीं हूँ जो आन मेरी आकांक्षाओं की उपेक्षा करते है-एक मनमोहन दृष्टि इतना कहते कहते एक बार ऊपर उठी और महायोगी विरुपाक्ष के दाडिम से दमकते आनन पर टिककर एक क्षण में ही झुक गई।
साधना, तप के नयन बन गये सावन,
मानवता के चीत्कार पर, अमृत-सिन्धु लुटाने वाले,
साधनायें भी विकसित की है जिनसे अपने प्राण शरीर को नियन्त्रित व स्थूल पदार्थों तथा स्थूल शरीर का इच्छानुसार उपभोग भी किया जा सके । परकाया-प्रवेश ( अपने शरीर से प्राण निकाल कर किसी शव में प्रवेश करके उसे जिन्दा कर देना ) तथा दूर की वस्तुओं को भी गुप्त रूप से उठा जाना आदि प्राण पर नियन्त्रण की ही सिद्धियां । योग उपनिषदों में उसकी विस्तृत व्याख्याएं है। योगवशिष्ठ 6।1।
साधनायें ही आधार रह जाती है। उनके द्वारा मनुष्य शरीर की शक्तियों, विज्ञान और ईश्वरीय देन का सही उपयोग हो सकता है।
साधना की शक्ति भी नहीं रही। जीवन भर अज्ञान में अनेक पाप किये उनका पश्चाताप राजा को दलने लगा तो वह महामुनि रैक्य के पास पहुँचे और बोले भगवन् मैं धर्म चित्त हुआ राजा आज जीव भाव से आपके समक्ष उपस्थित हुआ हूँ।
साधनाओं का विकास किया गया है जिनसे जीव चेतना अपने चिर जागृत , प्रखर और कारण शरीर में अवस्थित हो जाती है ऐसे योगी को निद्रा की भी आवश्यकता नहीं रहती गीता में भगवान् कृष्ण ने महान् योगाभ्यासी अर्जुन को निद्राजित बताया है अर्थात् आत्म चेतना में प्रविष्ट व्यक्ति सोये या न सोये उससे उनके शरीर ,मन और जीवन पर कोई दबाव नहीं आता ।
साधनायें भी। वे कठिन भले ही हों किन्तु भारतीय आध्यात्म और आस्तिकता कह परख का उससे बढ़िया न तो उपाय है न कोई दूसरा विज्ञान ।
साधनायें-तथाकथित बुद्धिवादियों के लिये अन्ध विश्वास है।और समय की बर्बादी तो डॉ॰ मेस्मर के मैस्मरेजम और डॉ॰ क्लैरीगटन की “इविल आई” को क्या कहा जायेगा? जिन्होंने अपनी अन आध्यात्मिक साधनात्मक सिद्धांतों की शोध के आधार पर न केवल विज्ञान को चमत्कृत कर दिखाया वरन् यह भी सिद्ध कर दिया कि ध्यान अपने आप में प्रकाश,विद्युत और चुम्बक से भी शक्तिशाली विज्ञान है। डॉ॰चार्ल्स बाइडिन ने कई प्रयोग और प्रदर्शन करके ध्यान की एकाग्रता की सामर्थ्य को प्रमाणित किया था।वे एकान्त अंधेरे में बैठकर हजारों मील दूर हो कही घटनाओं के चित्रण अक्षर -ब अक्षर ऐसे का दिया काते थे जैसे टेलीविजन और बेतार का तार काम कंता हसंइतवने पर भी लाँ ध्यान के महत्व को नहीं मानें तो उनका अन्ध विश्वास; न कि धर्म और दर्शन का।
साधनाओं द्वारा अपना सहस्रार जगाया करते हैं।
साधनात्मक सिद्धांतों की शोध के आधार पर न केवल विज्ञान को चमत्कृत कर दिखाया वरन् यह भी सिद्ध कर दिया कि ध्यान अपने आप में प्रकाश,विद्युत और चुम्बक से भी शक्तिशाली विज्ञान है। डॉ॰चार्ल्स बाइडिन ने कई प्रयोग और प्रदर्शन करके ध्यान की एकाग्रता की सामर्थ्य को प्रमाणित किया था।वे एकान्त अंधेरे में बैठकर हजारों मील दूर हो कही घटनाओं के चित्रण अक्षर -ब अक्षर ऐसे का दिया काते थे जैसे टेलीविजन और बेतार का तार काम कंता हसंइतवने पर भी लाँ ध्यान के महत्व को नहीं मानें तो उनका अन्ध विश्वास; न कि धर्म और दर्शन का।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-November
साधना की चर्चा का केंद्र बना हुआ था। बौद्ध स्तूप ही क्यों, राज्य के कोने-कोने तक कुंडलकेशा के पांडित्य और सारिपुत्र की साधना की ख्याति फैल रही है। प्रतिदिन हजारों जिज्ञासु कुंडलकेशा के पास आते और धार्मिक समाधान प्राप्त करते, जबकि सारिपुत्र आत्मशोध के लिए नितांत एकाकी जीवनयापन को ही महत्त्व दे रहे थे।
साधनाओं द्वारा उसे प्रखर बनाया जा सके तो बरसात को रोकना तो क्या, सूर्य जैसी महाशक्ति की ऊर्जा का हस्तान्तरण कर सारे सौर मंडल का मन्थर और युग परिवर्तन तक किया जा सकता है। थोड़े से भूभाग की तो बात ही क्या है।
साधनाओं और
स्वाध्याय द्वारा अपनी इस क्षमता का और भी अधिक विकास किया। उन्होंने
ज्योतिर्विज्ञान पढ़ा, दर्शन पढ़ा और संसार की परिस्थितियों का ज्ञान
प्राप्त किया और इस तरह उनकी प्रतिभा और भी चमकती चली गई। वे उस युग के
मूर्धन्य ज्योतिषी और अतीन्द्रिय दृष्टा माने जाने लगे।
साधना-उपासना का कोई परिणाम न निकलता हो, सो बात नहीं है। प्रश्न पात्रता का है। अधिकारी के पास उपयुक्त साधन अनायास ही खिंचते चले आते हैं। फूल के पास कितनी मधुमक्खी और भौंरे बिना बुलाए ही मंडराने लगते हैं। चुम्बक अपने समीपवर्ती लोह-कणों को सहज ही खींच लेता है।
साधनाएँही भारतीय तत्त्व दर्शन के ठोस प्रमाण हैं, छुट-पुट घटनाएँ तो मात्र अतीन्द्रिय सत्य के अस्तित्व का प्रतिपादन भर कर सकती है।
साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा उन्हें उठाया जा सकता है। पाने लायक जो कुछ इस संसार में है, उसे आत्मदेव को जगाकर सहज ही पाया जा सकता है। गुरुदेव कहते थे पाँच ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति को समझना और उनका सदुपयोग कर सकना ऐसा प्रयोग है, जिसके द्वारा अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश, विज्ञानमय कोशों को जगाया जा सकता है और उनके सहारे समर्थ सिद्ध पुरुष जैसा लाभ उठाया जा सकता है। वे यह भी कहते थे कि मन बुद्धि चित्त अहंकार और प्राण की पंचधा सूक्ष्म काया स्थूल शरीर से भी असंख्य गुनी सामर्थ्यवान है।
साधना करने वाले सच्चे साधक को लोक-परलोक में आनन्द-उल्लास भरा रखने वाली परम गति को प्राप्त करे।
साधना को प्रतिपादित करते हैं।
साधना-पद्धति को जितना मैंने देखा-समझा, इतना अवसर शायद ही और किसी को मिला हो। 24 वर्ष तक हर वर्ष 24 लक्ष का गायत्री महापुरश्चरण वे करते रहे। सर्वसाधारण को इस संदर्भ में इतनी भर जानकारी है कि प्रतिदिन छः घंटा बैठकर वे 11 माला प्रति घंटा के हिसाब से 66 माला का गायत्री जप करते थे। परम सात्विक पाँच मुट्ठी आहार पर निर्भर रहते तथा अनुष्ठानकाल में प्रयुक्त होने वाले बंधन प्रतिबंधों का कठोरता से पालन करते थे। वस्तुतः यह तो उनकी स्थूल और दृश्य साधना थी।
साधना में कुंडलिनी शक्ति को प्रमुख माना जाता रहा है। इसे कामकला या काम-बीज भी कहते हैं। प्रजनन प्रयोजन में भी यह कला प्रयुक्त होती है और उसका जननेन्द्रिय के गुह्य क्रियाकलापों से भी संबंध है, इसलिये उसे गोपनीय गिन लिया जाता है और उसकी चर्चा अश्लील मानी जाती है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। अश्लील कोई अवयव या कोई क्रियाकलाप नहीं। प्रजनन को अपने यहाँ एक धर्म कृत्य माना गया है।
साधनाकाल में ५ मुट्ठी जौ का आटा और ५ पाव छाछ दैनिक आहार पर निर्वाह करते रहे, इसके पश्चात भी न उन्होंने स्वाद को आगे आने दिया न अनीति उपार्जित अभक्ष के लिए मुँह खोला। क्षुधा बुझाने के लिए औषधिरूपी अन्न के अतिरिक्त स्वाद के सम्बन्ध में कभी सोचा तक नहीं। वाणी से असत्य बोलने और छल करने की आवश्यकता ही कभी नहीं पड़ी। न किसी को कुमार्ग पर चलाया न किसी का जी दुखाया। ऐसी निष्पाप और निर्मल जिह्वा पर सरस्वती ही विराजमान रह सकती थीं सो रही थीं, उनके आशीर्वाद निष्फल नहीं गये न कभी परामर्श टाले गये।
साधनाओं द्वारा ही सम्भव है जो मन की स्थूलसत्ता का अतीन्द्रियसत्ता से मेल कराकर ऐसे रहस्यों को एक सामान्य बात बनाकर अलौकिकसत्ता की अनुभूति का मार्ग प्रशस्त कर देती हैं। यह साधनाएँही भारतीय तत्त्व दर्शन के ठोस प्रमाण हैं, छुट-पुट घटनाएँ तो मात्र अतीन्द्रिय सत्य के अस्तित्व का प्रतिपादन भर कर सकती है।
साधना-अपूर्णता को चुनौती दी थी और शास्त्रार्थ के लिए ललकारा था।
साधना के माध्यम से आत्मदेव को सजग बनाकर गुरुदेव ने क्या पाया, इसकी अविज्ञात उपलब्धियाँ इतनी अधिक और इतनी अद्भुत हैं कि उनपर सहसा किसी को विश्वास नहीं हो सकता। अस्तु जिन्हें आज प्रमाणित न किया जा सके, उनपर अभी पर्दा पड़ा रहना ही उचित है। समय आने पर वे आज के अविज्ञात तथ्य कल विज्ञात और प्रमाणित होंगे तब यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाएगी कि इस संसार का—इस मानव का सर्वोपरि पुरुषार्थ एवं साफल्य आत्मसाधना के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। अभी तो उन सर्वविदित विशेषताओं को दुहरा देना ही पर्याप्त होगा जो सिद्धियों की दृष्टि से आकर्षक ही नहीं अद्भुत भी हैं।
साधना में खोता ही खोता है, पाता कुछ नहीं,
हम स्वप्न खोते हैं, तब सत्य पाते हैं।
साधना-उपासना पर निर्भर नहीं है। जिसके आचरण पवित्र न हों, वह योग-साधना में सफल नहीं हो सकता। आत्मा की प्रगति और परमात्मा की उपलब्धि के लिए सत्यनिष्ठ और तपस्वी जीवन जीना पड़ता है। आत्मा ज्ञानस्वरुप, सत्य, शिव और सुन्दर है। उसे प्राप्त करके मनुष्य सबकुछ प्राप्त कर लेता है, पर इस लाभ को हर कोई प्राप्त नहीं कर सकता।
साधना में सफल नहीं हो सकता। आत्मा की प्रगति और परमात्मा की उपलब्धि के लिए सत्यनिष्ठ और तपस्वी जीवन जीना पड़ता है। आत्मा ज्ञानस्वरुप, सत्य, शिव और सुन्दर है। उसे प्राप्त करके मनुष्य सबकुछ प्राप्त कर लेता है, पर इस लाभ को हर कोई प्राप्त नहीं कर सकता। आत्मसाक्षात्कार के अधिकारी वे हैं, जिन्होंने मन और इन्द्रियों को जीत लिया।
साधना में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, आनन्दमय कोश, विज्ञानमय कोश जागरण, अनावरण की विधि-व्यवस्था है। इसका कर्मकांड और विधि- विधान तो समयानुसार गुरुदेव स्वयं ही बता देंगे पर उनकी अतिनिकिटवर्ती सहचरी होने के कारण मैं इतना ही कह सकती हूँ कि अपनी पाँचों इन्द्रियों और पांचों मनः संस्थानों का परिष्कार करने में उन्होंने अथक परिश्रम किया था और निरन्तर यह प्रयत्न किया था कि इन दसों देवताओं को विनाश के मार्ग पर एक इंच भी न गिरने दिया जाए, वरन् उन्हें पवित्रता और प्रखरता के पथ पर ही अग्रसर रखा जाए। इस प्रकार अन्तरंग की देव शक्तियों को परिमार्जित कर उन्होंने देवता, मंत्र और गुरु का अनुग्रह प्राप्त किया और उन पाँच शक्तिकोशों को जागृत करने में सफल हो गए, जिन्हें अनेक अद्भुत ऋद्धि सिद्धियों का केन्द्र माना जाता है।
साधना में असफल रहकर उपहासास्पद बन जाते हैं।
साधना ने अब अधिकांश या तो आडंबर का रूप ले लिया है या अनभिज्ञता का, पर मलाया में आज भी मंत्रशक्ति का सर्वत्र बोल-बाला है। सार्वजनिक समारोह तथा राजकाज तक में मंत्रशक्ति का सहयोग लिया जाता है।
साधना है। निरर्थक सुनने और सुनाने में जिसे अरुचि रहती है, जो दूसरों की व्यथा वेदना खोजने और सत्परामर्श सुनने को आतुर रहते हैं, वे कान धन्य हैं। उन्हें अमृतकलश कहना चाहिए, इन्हीं से छन-छनकर मस्तिष्क में देवत्व का संचय होता है और आनन्द, उल्लास से अन्तःकरण भरने लगता है। आनंदमय कोश को जागृत करने के लिए नादयोग प्रभृत साधनाएँ करनी पड़ती हैं, पर उनकी परिपुष्टि जिस भूमिका पर होती है, वह कर्णेंद्रिय का सदुपयोग ही है।
साधना करनी पड़ी। और इसके लिए योगाभ्यास के—प्रत्याहार,धारणा, ध्यान, समाधि के प्रयोग ही पर्याप्त नहीं रहे, वरन् उन्हें पंच-तत्वों की प्रवृत्ति का संचार और नियंत्रित कर्तीृ अपराविद्या का अवलम्बन लेकर शरीर और मन को भी समर्थ बनाना पड़ा। इस प्रयोजन के अपराविद्या की साधना में कुंडलिनी शक्ति को प्रमुख माना जाता रहा है। इसे कामकला या काम-बीज भी कहते हैं। प्रजनन प्रयोजन में भी यह कला प्रयुक्त होती है और उसका जननेन्द्रिय के गुह्य क्रियाकलापों से भी संबंध है, इसलिये उसे गोपनीय गिन लिया जाता है और उसकी चर्चा अश्लील मानी जाती है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं।
साधना में उतावली से विरत होकर जो धैर्यवान व्यक्ति दृढ़तापूर्वक धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, वे अवश्य सफल होते हैं। इसके विपरित जो व्यक्ति छलांग लगाकर जल्दी ही जीवनलक्ष्य प्राप्त करने की उतावली करते हैं, वे बहुधा अपनी साधना में असफल रहकर उपहासास्पद बन जाते हैं।
साधना से चमत्कारी आत्मिक प्रगति का अवसर मिल जाता है। यदि यह तथ्य सच हो तो भी उसके मूल में व्यक्ति की पात्रता वाली शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती है। गुरुदेव ने उसी गायत्री मंत्र की उपासना की, जिसे संध्यावंदन के समय आमतौर से सभी धर्मप्रेमी हिंदू जपा करते हैं। उनका भी इष्ट वही सविता देवता था जिसे उपासना करने वाले सामान्य तथा नित्य ही जल चढ़ाते और प्रणाम करते हैं। समर्थगुरु उन्हें मिले पर ऐसे सिद्ध पुरुषों से यह पृथ्वी रहित नहीं है।
साधना है नहीं, पास मेरे सखे,
हैं नहीं, भक्ति या शक्ति या भावना।
किन्तु पाता रहूँ यह कृपा की किरण,
पल रही आत्मा में यही कामना॥
साधना से आपने क्या पाया ?" उन्होंने उत्तर दिया—"खोया
बहुत,पाया कुछ नहीं।" जिज्ञासु ने आश्चर्य से पूछा—"ऐसा क्यों ?" ज्ञानी ने
कहा—जो पाने लायक था, वह तो पहले से ही प्राप्त था। जो खोने लायक विषय,
विकार और अज्ञान, अन्धकार के अनात्मतत्त्व भीतर घुस पड़े थे, उन्हें साधना
से निकाला भर है।
साधना के अनुभवों की हलकी-सी झाँकी सौंदर्यलहरी में प्रस्तुत की है। शक्ति के बिना शिव की प्राप्ति नहीं हो सकती। उपनिषद्कार के अनुसार यह आत्मा बलहीनों को प्राप्त नहीं होती। दुर्बलता के रहते ब्रह्म तक पहुँच सकने की क्षमता कहाँ से आ सकती है। इस दृष्टि से ब्रह्मविद्या के सहारे ब्रह्मवेत्ता बनने और ब्रह्मतत्व को प्राप्त करने के प्रयत्न में भगवान् शंकराचार्य को शक्ति-साधना करनी पड़ी।
साधना के पथ पर चलने वाले पथिक यह समझ सकें कि अपने अन्तरंग में भरी हुई क्षमता का श्रेष्ठतम लाभ कैसे उठाया जा सकता है। कामबीज का भोंड़ा लाभ तो पशु-पक्षी, कीट-पतंग सभी उठाते हैं। पर यदि उसका विशिष्ठ उपयोग संभव हो सके, तो उससे असंख्य गुनी आनन्द, उल्लास भरी उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। कुण्डलिनी जागरण से जहाँ ब्रह्मानंद की हिलोरें अन्तःकरण को विभोर करती हैं वहाँ उनमें यह क्षमता भी है कि शारीरिक आनंद को न केवल उत्साहवर्धक बना सकें, वरन् उपयोगी भी बना सकें। ऐसे हास-विलास शरीरों की जितनी क्षति करते हैं, उससे अनेक गुनी उपलब्धियाँ भी लाकर रख देते हैं।
साधना ना करे तो उसका हृदय भी अपवित्र होने लगता है।
साधना से सहृदय, सज्जन, सद्गुणी और सरस बनकर एक प्रकार से अपना आंतरिक कायाकल्प ही कर डालता है। सिद्धियाँ और सफलताएँ— ऋद्धि और सिद्धियाँ उसके पीछे ऐसे ही भागती हैं, जैसे कुलटा नारियाँ किसी रूप, सौंदर्य सम्पन्न आकर्षक स्वभाव वाले कामुक युवक के पीछे बिना बुलाए ही फिरने लगती हैं।
साधना करते थे। इन तत्वों को वे आत्मदेवता में ही समाविष्ट मानते थे। कहते थे निकट तपोवन अपना अन्तःकरण ही है, यहीं एक ब्रह्मचेतना में तादात्म्य स्थापित करने का जो प्रयत्न किया जाता है वही सच्ची साधना है। विश्वव्यापी देवसत्ता का प्रतिनिधित्व अपनी अन्तःचेतना करती है सो उसे ही मना लिया जाए, उठा लिया जाए, तो फिर इस संसार की कोई ऐसी वस्तु शेष नहीं रह जाती जो प्राप्त न की जा सके। ईश्वर के राजकुमार मनुष्य के लिए अपने पिता की हर संपदा का अधिकार सहज ही प्राप्त है।
साधना समाप्त कर ली जाए?
साधना की जब प्राप्ति होती है तो इस स्तर का आनन्द भी साधक को
सहज ही मिलने लगता है।
साधनाओं द्वारा अपनी बौद्धिक सक्षमता और सूक्ष्मता इतनी अधिक बढ़ा सकता है कि वह न केवल ऊपर जैसी विलक्षण क्षमताओं और सिद्धियों का सहज ही स्वामी बन सकता है, वरन् वह हर किसी के मन की बात जान सकता है।
भूत और भविष्य को इस प्रकार जान सकता है मानो वह वर्तमान में आँखों के सम्मुख घटित हो रहा हो। इस प्रकार की मेधा और प्रज्ञा के लिए आर्षग्रन्थों में स्थान-स्थान पर परमात्मा से प्रार्थना की गई है-
साधना के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। अभी तो उन सर्वविदित विशेषताओं को दुहरा देना ही पर्याप्त होगा जो सिद्धियों की दृष्टि से आकर्षक ही नहीं अद्भुत भी हैं।
साधनाओं-प्रक्रियाओं पर आधारित है, मात्र अक्षर अभ्यास पर नहीं।
साधना इन क्रियाकलापों तक ही सीमित नहीं थी, वरन् काया के कर्मकाण्डात्मक क्रियाकलापों से बहुत आगे बढ़कर मन और प्राण की सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर की परिधि प्रवेश कर गई थी।
साधना थी। जितना देखा जा सके मोटे तौर से उतना ही तो समझा जा सकता है। उनका बाह्य-उपासना में इतना ही दीखता था, सो समझने वाले उतना ही समझ सकते थे। पर वस्तुतः उनकी साधना इन क्रियाकलापों तक ही सीमित नहीं थी, वरन् काया के कर्मकाण्डात्मक क्रियाकलापों से बहुत आगे बढ़कर मन और प्राण की सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर की परिधि प्रवेश कर गई थी।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं, पर उनकी परिपुष्टि जिस भूमिका पर होती है, वह कर्णेंद्रिय का सदुपयोग ही है।
साधना-पद्धति को कम, ब्रह्मरेतस् निष्ठा को अधिक दिया करते थे। पाँच-तत्त्वों के प्रकाश को प्रस्फुटित करने वाली पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ वस्तुतः पाँच देवियाँ हैं, जो उन्हें व्यभिचारिणी वेश्या के कुपथ पर नहीं धकेलता, उन्हें मातृवत् श्रद्धा के साथ संपूजित करता है। उसके पास सिद्धियों की कमी नहीं रहती।
साधनात्मक अनुभूतियों को पहेली-बुझौअल के रूप में प्रस्तुत किया है।उनके दो अटपटे पद्य नीचे देखिए —
साधना से उत्पन्न अनुभूतियाँ कितनी कोमल, कितनी सरस, कितनी मधुर, कितनी रमणीय, कितनी कमनीय और कितनी मोद-प्रमोद भरी होती हैं, इसकी झाँकी उपनिषद्कार तत्त्वज्ञानी ने इस प्रकार कराई है।
साधना करते हुए परमार्थपरायण बने। ऐसे व्यक्ति ही संसार को स्थिर रखे हुए हैं।
साधना करने वाला इन सूर्य-चन्द्ररूपी दो स्तनों वाली प्रकृति-तरुणी को भी अपने इशारे पर नचा सकता है।
साधना में सन्निहित हैं, जिन्हें अधिकारी पात्र ही पाते और आनन्द लाभ प्राप्त करते हैं।
साधनात्मक ग्रन्थों में सुन्दरी, युवती, कामिनी के रूप में चित्रित किया है। और उसके विविध क्रियाकलापों को यौवन अंगों के साथ तुलना करते हुए श्रृंगार रस की काव्य शैली का अनुकरण किया है-यथा—
साधना है। विश्वव्यापी देवसत्ता का प्रतिनिधित्व अपनी अन्तःचेतना करती है सो उसे ही मना लिया जाए, उठा लिया जाए, तो फिर इस संसार की कोई ऐसी वस्तु शेष नहीं रह जाती जो प्राप्त न की जा सके। ईश्वर के राजकुमार मनुष्य के लिए अपने पिता की हर संपदा का अधिकार सहज ही प्राप्त है। पात्रता के उपयोग के प्रयोजन की उत्कृष्टता सिद्ध करके कोई भी विभूतियों के भंडार में से कुछ भी प्राप्त कर सकता है। ऐसा उनका विश्वास था, ऐसा ही कहते मानते रहते थे।
साधना के प्रभाव से उपलब्ध होती है।
साधना से उत्पन्न आकर्षण प्राण- प्रवाह (काम) के प्रभाव से अनेक सत्प्रवृत्तियाँ और सफलताएँ आकर्षित होने लगती हैं।
जैसे खिले हुए फूल पर तितलियाँ और मधुमक्खियाँ मंडराती हैं वैसे ही उस साधक को विभूतियों का दुलार और सहयोग अनायास ही सब ओर से प्राप्त होता है। यह प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है और परिस्थितियाँ उसके इशारे पर नाचती, बदलती, सँभलती रहती हैं।
साधना की रक्षा के लिए उन्होंने अहंकार को मारने का निश्चय किया और उस दिन से उन्होंने कुंडलकेशा द्वारा पूछे गए हर प्रश्न का उत्तर मौन में देना प्रारंभ कर दिया।
साधनायें विकसित कर डालीं, जो मस्तिष्क के ज्ञानतन्तुओं को इतना सजग कर देती हैं कि किसी के भी मन की, अन्तःकरण की भावलहरियों को आकाश के माध्यम से ही पकड़ा जा सके, भले ही कोई मुँह से कुछ बताए या नहीं।
साधना व्यष्टि से बढ़कर समष्टि में संव्याप्त हो जाती है, और उस पदार्थ या व्यक्ति के न रहने पर भी अवरुद्ध नहीं होती। अपने शरीर में भरे हुए अशुभ और अवांछनीय तत्त्वों को जब हम सहन कर लेते हैं तो दूसरों के दोष देखकर ही क्यों अपनी प्रेम-साधना समाप्त कर ली जाए?
साधना से मनुष्य में वे सद्गुण विकसित होते हैं, जिनके कारण दूसरे सभी लोग उससे प्रभावित एवं आकर्षित होते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण हो जाने पर मनुष्य स्वभावतः सम्मान और श्रद्धा का केन्द्र बन जाता है, यही व्यक्ति का मोहिनी रूप है। इस सफलता को पाने के साथ-साथ आत्मवेत्ता स्वयं किसी पर मोहित नहीं होता। न व्यक्ति न पदार्थ दोनों में उसे आकर्षण नहीं होता। वह तो अपनी आत्मा पर ही मोहित रहता है, इसलिए उसका प्यार कर्त्तव्य एवं आदर्श की परिधि में सीमाबद्ध हो जाता है।
साधना
से निकाला भर है। इस तरह साधक—साधना में खोता ही खोता है, पाता कुछ नहीं,
हम स्वप्न खोते हैं, तब सत्य पाते हैं।
साधना की ख्याति फैल रही है। प्रतिदिन हजारों जिज्ञासु कुंडलकेशा के पास आते और धार्मिक समाधान प्राप्त करते, जबकि सारिपुत्र आत्मशोध के लिए नितांत एकाकी जीवनयापन को ही महत्त्व दे रहे थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-June
साधनाओं में रत है और एक हम हैं जो सारा धर्म-कर्म ही छोड़ बैठे विवशता को क्या कहा जाये।
साधना को न बन्द करते हुये भी अपनी सन्तान पर प्यार रखना नहीं भूलता। स्वयं भी रोता रहता है पर नाराज होकर सृष्टि को नष्ट कर डालने की बात उसके मन में कभी आई नहीं।
साधना है जगत के मिथ्यात्व को अनुभव करना, चिन्तन करना। भावनाओं में इतना उभार पैदा कर लेना कि न अहंभाव रहे, न मृत्यु, न मान-अपमान, शोक-वियोग का विकार। सम्पूर्ण कालों में व्याप्त आत्मा ही आत्मा दिखाई। मैं अजर हूँ, अमर हूँ, अक्षय, अविनाशी परम प्रकाश हूँ इस धारणा की पूर्ण पुष्टि वैराग्य कहा जाता है। साँसारिकता का मोह नष्ट हो जाये वही वैराग्य है।
साधनाओं का अभ्यास करें।
साधना में लगाना पड़ता था। संन्यास दीक्षा के बाद तो वह सब कुछ त्याग कर अपने आप को उस तरह अनुभव करता था जैसे मकड़ी अपने बने बनाये जाले को स्वयं खाकर संतोष अनुभव करती है। तक जिसके पीछे बेटे होते थे वह उनकी आवश्यकता की सम्पत्ति उन्हें देकर शेष लोक-कल्याण में लगा कर घर छोड़ देते थे और आत्म-कल्याण की साधना में जुट जाते थे।
साधना का अभ्यास किया था वे ताकतवर कार को एक हाथ से रोक लेते थे, हाथी छाती पर चढ़ा लेते थे। लोहे की सांकलें तोड़ डालते थे वह सब इसी शक्ति के चमत्कार थे।
साधना के अभ्यास से भूख से निवृत्ति पाली थी, उसे जीवन भर खाने की आवश्यकता नहीं पड़ी थी। विज्ञान भी यह मानता है कि अन्न का पोषण तत्व आकाश से आता है कोई सूक्ष्म विधि खोजली जाये तो उस तत्व को हवा से ही खींचा और शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है।
साधना का प्रारम्भ को भी प्राणाकर्षण प्राणायाम की यथेष्ट मात्रा एकत्र कर लेने के बाद सर्व प्रथम “लोम विलोम सूर्य भेदन प्राणायाम” का ही अभ्यास करना पड़ता है। पातंजलि कृत योग दर्शन में बताया है-नाभिचक्रे काय व्यूह ज्ञानम्-- नाभि चक्र में चित्त वृत्तियों को स्थिर करने से नाड़ी आदि शरीरस्थ स्थूल पदार्थों का ज्ञान होता है। पाश्चात्य देशों में अब लोग इसे सोलर फ्लैक्सस के नाम से जानने भी लगे है किन्तु उनका ज्ञान अभी नहीं के बराबर है।
साधना से देव कृपा प्राप्त कर लेने पर उसका उपयोग परमार्थ में न करके स्वार्थ में करने वाला अथवा उसके प्रभाव से दूसरों को भयभीत या आतंकित करने वाला देवताओं से छल नहीं करता बल्कि उन दिव्य शक्तियों के साथ विश्वासघात करता है। ऐसा विश्वासघात किसी मूल्य पर भो क्षमा नहीं किया जाता है। वह दिन रात आत्म-जन्य ताप से तो जलता ही रहता है साथ ही रौरव जैसे नरक में उसके लिए स्थान की व्यवस्था होती रहती है। ऐसे मिथ्यावादी लोगों का सुख-शान्ति के लिए तरसते रहना स्वाभाविक ही है। अस्तु जीवन में सुख-शान्ति पाने के लिए मनुष्य को चाहिए कि वह सच्चा और सरल जीवन अपनायें।
साधना में जुट जाते थे।
साधना में इन तत्वों का समावेश किया और मंजिल की एक सन्तोष जनक लम्बाई पार कर चुके। अपने हर अनुयायी से इस अवसर पर यही अनुरोध कर सकते हैं कि जितना अधिक सम्भव हो इसी मार्ग पर कदम बढ़ायें जिस पर हम चलते रहे है। महामानव बनने के लिए जिन त्याग बलिदानोँ का मूल्य चुकाना पड़ता है आत्म परिष्कार का जो प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी की चर्चा यहाँ कर रहे है।
साधनायें करें, तो उसके विराट तात्विक स्वरूप को पाकर हम धन्य भी हो सकते हैं जिसके लिए मनुष्य जैसा शरीर जीव को प्रदान किया गया है।
साधनाओं द्वारा आत्मा को बोधगम्य बनाने वाले भारतीय योगियों ने ऐसे प्रमाण प्रत्यक्ष प्रदर्शनों द्वारा प्रस्तुत किये हैं जिनसे पता चलता है कि आत्मा अज्ञान वश शरीर के व्यापार में आसक्त पड़ा रहे यह अलग बात है पर वह है स्वशासी, अपने नियन्त्रण में आप। एकबार सुप्रसिद्ध योगी देशबन्धु की इस मान्यता को कुछ डॉक्टरों ने अमान्य किया फलस्वरूप बम्बई मेडिकल यूनियन की और से श्री देशबन्धु का प्रदर्शन कराया गया उसे देखने के लिये बम्बई मेडिकल कॉलेज के छात्र स्टाफ तथा अन्य विशिष्ट नागरिक भी एकत्र हुये। डॉ0 बसन्त जी रैले उनके शरीर परीक्षण के लिये नियुक्त किये गये । श्री देशबन्धु से कहा गया यदि आप मानते हैं कि चेतना के शरीर से भिन्न किया जा सकता है तो आप दाहिने हाथ की नाड़ी-क्रिया को शून्य करके दिखाइये ?
साधनायें कर सकें उनके लिये शास्त्रकार कहता है- “विष्णोरद्भुत कर्मणाः” वह अत्यन्त अद्भुत कम करता है-उसकी सत्ता को उसकी विलक्षण रचना द्वारा जानों और उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
साधनाओं के महा पण्डित और योगी थे। ऐसे चमत्कार योग शास्त्र में आत्म-कल्याण के लिये बाधक माने जाते हैं पर मैं अपने गुरु के आदर्श से यह प्रदर्शन इसलिये करता हूं कि लोग यह माने कि संसार में जो स्थूल है, दिखाई देता है वह सत्य नहीं। डॉक्टर सालोमन का कथन है कि प्रकृति ने हर वस्तु के लिए मौसम प्रदान किया है-- उस मौसम में ही वृक्ष उस तरह के परमाणु आकर्षित कर पाते हैं जो फल विशेष में, फूल विशेष में पाये जाते हैं, यह प्रकृति का नियम है योग शास्त्र की मान्यता भिन्न है वह डॉक्टर सालोमन की बात मानने को तैयार नहीं। भारतीय अध्यात्म विद्या संसार को परिपूर्ण मानती है। हर समय हर वस्तु विद्यमान है, सम्भव है एक समय एक स्थान पर एक तरह के परमाणु अधिकों दूसरे कम पर यह भी निश्चित है कि उसी समय दूसरी तरह के परमाणु कहीं दूसरी जगह अधिकार मात्रा में उपस्थित होंगे उन्हें आत्म-शक्ति द्वारा आकर्षित कर पदार्थ का रूप प्रदान करने कि शक्ति आत्मा में संयम में है।
साधना का परिचय मुझे एक तिब्बती योगी ने दिया था जो स्वयं भारतीय योग साधनाओं के महा पण्डित और योगी थे। ऐसे चमत्कार योग शास्त्र में आत्म-कल्याण के लिये बाधक माने जाते हैं पर मैं अपने गुरु के आदर्श से यह प्रदर्शन इसलिये करता हूं कि लोग यह माने कि संसार में जो स्थूल है, दिखाई देता है वह सत्य नहीं। डॉक्टर सालोमन का कथन है कि प्रकृति ने हर वस्तु के लिए मौसम प्रदान किया है-- उस मौसम में ही वृक्ष उस तरह के परमाणु आकर्षित कर पाते हैं जो फल विशेष में, फूल विशेष में पाये जाते हैं, यह प्रकृति का नियम है योग शास्त्र की मान्यता भिन्न है वह डॉक्टर सालोमन की बात मानने को तैयार नहीं। भारतीय अध्यात्म विद्या संसार को परिपूर्ण मानती है। हर समय हर वस्तु विद्यमान है, सम्भव है एक समय एक स्थान पर एक तरह के परमाणु अधिकों दूसरे कम पर यह भी निश्चित है कि उसी समय दूसरी तरह के परमाणु कहीं दूसरी जगह अधिकार मात्रा में उपस्थित होंगे उन्हें आत्म-शक्ति द्वारा आकर्षित कर पदार्थ का रूप प्रदान करने कि शक्ति आत्मा में संयम में है।
साधनाओं का अभ्यास करने से उसके विज्ञानमय स्वरूप की झाँकी होती है किन्तु नहीं है मनोबल इतना सशक्त जिनका कि वे कठिन साधनायें कर सकें उनके लिये शास्त्रकार कहता है- “विष्णोरद्भुत कर्मणाः” वह अत्यन्त अद्भुत कम करता है-उसकी सत्ता को उसकी विलक्षण रचना द्वारा जानों और उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करो।
साधनायें करने के उपरान्त ब्रह्मविद्या उपनिषद् के मंत्रदृष्टा ने क्रमशः शरीर मन की स्थूल शक्तियों का वेधन करते हुये मूल चेतना के प्राप्त किया। ब्राह्मी भूत हुये ऋषि ने ब्रह्म के स्वरूप का विश्लेषण करते हुए लिखा है-
साधना चुना इसी जरिये मानवता की सेवा चाहता हूं। प्राणि मात्र के साथ मेरी आत्मा घुल जाना चाहती है, और शत्रु दोनों को एक भाव से देखता हुआ मैं किसी से घृणा या राग करता मुझे लोग घृणा से देखेंगे तो भी मैं उनसे प्यार ही करूंगा। जाति की सेवा से ही मुझे मुक्ति मिलेगी ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।
साधनाओं से नाड़ी शोधन क्रिया होती है शुद्ध हुई सुषुम्ना में मन का प्रवाहित होना ही दिव्य स्वप्न दिखाता है उस समय एक विराट क्षेत्र में हमारी चेतना तैर रही होती है इसीलिये दिव्य आकृतियाँ, ग्रह नक्षत्र, पर्वत नदी, हरे-भरे स्थान दिखाई देते हैं। हमारे संस्कारों में अनेक जन्मों की स्मृतियाँ होने के कारण मन की चंचलता रेडियो की खड़खड़ाहट की तरह तब भी रहती है पर इन अनुभूतियों का लाभ कठिन परिस्थितियों में भी निरन्तर आत्म-विकास की और उन्मुख रहने में लिया जा सकता है।
साधनाओं द्वारा अपने मन को सूक्ष्म पवित्र और नियंत्रित कर सकें तो वेद के अनुसार संसार के किसी भी क्षेत्र में होने वाली गतिविधि को संजय की दिव्य दृष्टि की तरह देख सकते हैं।
साधनाओं द्वारा ही समुपलब्ध होता है।
साधना का स्वरूप ही क्या बन पड़ेगा ? जिनके पास गुजारे भर के लिए पैतृक सम्पत्ति मौजूद है, उनके लिये यही उचित है कि आगे के लिये उपार्जन बिलकुल बन्द कर दें और सारा समय परमार्थ के लिये लगायें। प्रयत्न यह भी होना चाहिए कि सुयोग्य स्त्री-पुरुषों में से एक कमाये घर खर्च चलाये और दूसरे को लोक-मंगल में प्रवृत्त होने की छूट दे दे संयुक्त परिवारों में से एक व्यक्ति विश्व सेवा के लिये निकाला जाय और उसका खर्च परिवार वहन करें। जिनके पास संग्रहित पूँजी नहीं है। रोज कमाते रोज खाते हैं उन्हें भी परिवार का एक अतिरिक्त सदस्य बेटा ‘लोक-मंगल’को मान लेना चाहिए और उसके लिए जितना श्रम समय और धन अन्य परिवारियों पर खर्च होता है उतना तो करना ही चाहिए।
साधनाओं से सम्भव है पर कई बार आकस्मिक घटना भी आत्म-चेतना के प्रथक अस्तित्व का बोध करा देती है। जम्मू में शिक्षा विभाग के एक मध्यम श्रेणी कर्मचारी श्री गोपी कृष्ण ने किसी पुस्तक में पढ़ा-मस्तिष्क के मध्य ज्योतिर्लिंग का ध्यान करने से परमात्मा की अनुभूति होती हैं। एक दिन वे इसी तरह ध्यान कर रहे थे। जिज्ञासा की प्रखरता में बड़ी प्रबल शक्ति है। मन की चंचलता के कारण ध्यान का जो लाभ कुछ लोग वर्षों अभ्यास के बाद भी नहीं ले पाते, वह उनकी तीव्र जिज्ञासा ने क्षण भर में प्रदान कर दिया उन्हें सहस्रार की स्पष्ट अनुभूति अकस्मात् हो गई।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-February
साधना सहज हो जाती है। कबीर कहते है- मेरा चलना ही प्रभु की परिक्रमा है, मेरा कुछ भी करना सेवा ही है, मेरा सोना ही दण्डवत् है, जो कुछ बोलता हूँ वही जय है और खुली आंखों से जो कुछ देखता हूँ वही प्रभु का सुन्दर रूप है। इससे एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि हमें अपने भक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों से कभी विमुख नहीं होना चाहिये और नित्य जीवन की समस्त क्रियाओं में उसी विराट् विभु की लीला का, विराट् विश्व की सेवा का रस प्राप्त करना चाहिये।
साधना से कम है ? उसे साधना का पवित्र पद देने के लिए उसके साथ लोकहित का भाव जोड़ दिया जाए, तो वही उसके लिए आध्यात्मिक धर्म बन जाएगा। व्यापारी के धृति-साध्य कर्म को यदि अनुचित मुनाफा कमाने के दूषण से मुक्त कर दिया जाये तो वही ‘स्व’ में ‘पर’ की साधना का पुनीत कर्म बन जायेगा। तात्पर्य यह है कि साधना कोई ऊपर से ओढ़ी जाने वाली, अपने और दूसरे को सम्बोधित करने वाली रामनामी चादर न बने, तो उसकी सहजता जीवन में व्यवहार्य हो सकेगी। यही उसके लिये सच्ची साधना होगी।
साधनात्मक अनुभूतियों और उस मंजिल पर चलते हुए समक्ष आये उतार चढावों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि यदि किसी को आत्मिक प्रगति की दिशा में चलने का प्रयत्न करना हो- और वर्तमान परिस्थितियों में रहने वालो के लिए यह कैसे संभव हो सकता है ? इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ढूंढ़ना हो तो उसे हमारी जीवन यात्रा बहुत मार्ग-दर्शन कर सकती है। वस्तुतः हमने एक प्रयोगात्मक जीवन जिया है। आध्यात्मिक आदर्शों का व्यावहारिक जीवन में तालमेल बिठाते हुए आन्तरिक प्रगति के पथ पर कैसे चला जा सकता है- और उसमें बिना भटके कैसे सफलता पाई जा सकती है, हम इसी तथ्य की खोज करते रहे हैं ओर उसी के प्रयोग में अपनी चिन्तन प्रक्रिया और शारीरिक गतिविधि केन्द्रित करते रहे हैं। हमारे मार्गदर्शक का इस दिशा में पूरा-पूरा सहयोग रहा है सो अनावश्यक जाल-जंजालों में उलझे बिना सीधे रास्ते पर सही दिशा में चलते रहने की सरलता उपलब्ध होती रही है।
साधना का पक्ष भी बन गया।
साधना शब्द अर्थ से परे है। अर्थ उसमें तब आता है जब कोई लक्ष्य, क्रिया प्रकट होती है। एक आध्यात्मिक सन्त की क्रिया भी साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यात्री की क्रियायें भी साधना है। एक माँ अपने बेटो के लिये, परिवार के लिए रसोई बनाती है- यह भी साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।
साधना को सिद्धि का रूप तभी प्राप्त होता है, जब वह साधना सहज हो जाती है। कबीर कहते है- मेरा चलना ही प्रभु की परिक्रमा है, मेरा कुछ भी करना सेवा ही है, मेरा सोना ही दण्डवत् है, जो कुछ बोलता हूँ वही जय है और खुली आंखों से जो कुछ देखता हूँ वही प्रभु का सुन्दर रूप है। इससे एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि हमें अपने भक्तिगत, पारिवारिक एवं सामाजिक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों से कभी विमुख नहीं होना चाहिये और नित्य जीवन की समस्त क्रियाओं में उसी विराट् विभु की लीला का, विराट् विश्व की सेवा का रस प्राप्त करना चाहिये।
साधनाओं के मूल में यही अल्पमोली बाते हैं जिनसे हमें मुक्त होना है, अपने को सहज साधक बनाना है।
साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।
साधना एक धार्मिक या आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसकी विभिन्न धर्म-संप्रदायों में अलग-अलग मान्यतायें है। हिन्दू धर्म में यम, नियम, आसन और प्राणायाम को बहिरंग तथा प्रत्याहार, छारगा, ध्यान और समाधि को अन्तरंग साधना-सोपान के रूप में स्वीकार किया गया है। जैनागमों में अनशन, अनोदरता, (आहार सम्बन्धी नियम) भिक्षाचर्या, वृत्ति संकोच, रस-परित्याग, काय-क्लेश और निर्विकारता को बहिरंग साधना की तथा प्रायश्चित , विनय, सेवा-परिचर्या, स्वाध्याय, ध्यान एवं कार्योत्सर्ग को अन्तरंग अर्थात् तप संज्ञा दी गई है। बौद्ध धर्म में स्वपीड़न और परपीड़न विरहित तप को श्रेष्ठ माना गया है।
साधना आंतरिक पवित्रता, विशुद्ध प्रेम भावना, स्वार्थ त्याग आदि सद्गुणों के पोषण और विकास से होगी। जिस दिन इस सहज प्रक्रिया से सहज जीवन विकसित होगा, उस दिन संसार का दूसरा रूप ही होगा। आवश्यकता है, साधना के नाम पर पलने वाले भ्रमों में न उलझकर व्यक्ति जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति को साधनामय बनावे फिर देखे उसका समाज और संसार पर क्या सुखद परिणाम होता है।
साधनायें है जो हम सबेरे उठने से लेकर रात को सोने तक और निद्रा में भी करते हैं।
साधना का सबसे बड़ा सम्बल हमारा कर्मरत और समाजगत आचरण है। समाज से छिटक कर विशेष परिवेश को धारण करने से हम अपनी कल्पना की मुक्ति भले ही प्राप्त कर ले, पर इससे हमारा तथा समाज का कोई वास्तविक लाभ नहीं होगा। बारह वर्ष तक साधना करके कोई व्यक्ति पानी पर चलने का अभ्यास करके चमत्कारी कहला सकता है, पर उसकी सिद्धि का कुल मूल्य रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में केवल चार पैसा है, क्योंकि चार पैसे खर्च करके नौका में बैठकर कोई भी नदी पार कर सकता है। हमारी बहुत सारी साधनाओं के मूल में यही अल्पमोली बाते हैं जिनसे हमें मुक्त होना है, अपने को सहज साधक बनाना है।
साधना वह होती है, जहाँ ईमानदारी और प्रामाणिकता मूर्त बन जाती है। ऐसी साधना आंतरिक पवित्रता, विशुद्ध प्रेम भावना, स्वार्थ त्याग आदि सद्गुणों के पोषण और विकास से होगी। जिस दिन इस सहज प्रक्रिया से सहज जीवन विकसित होगा, उस दिन संसार का दूसरा रूप ही होगा। आवश्यकता है, साधना के नाम पर पलने वाले भ्रमों में न उलझकर व्यक्ति जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति को साधनामय बनावे फिर देखे उसका समाज और संसार पर क्या सुखद परिणाम होता है।
साधना का दर्शन है। उन्होंने सारा जीवन-दर्शन ही क्राँतिकारी ढंग से प्रस्तुत किया है। नित्य जीवन की सहज क्रियाओं को लेकर महात्मा कबीर ने यह व्यक्त करने का प्रयास किया है कि मनुष्य जीवन की सही दिशा और सच्ची साधना क्या है।
साधना है।
साधना करनी पड़ती है। प्रेम, उदारता, सेवा भावना आदि गुणों के लिए भी निरन्तर साधना करनी पड़ती है। व्यापार -व्यवसाय में भी ऐसी सैकड़ों बाते हैं जिनमें साधना की आवश्यकता होती है।
साधना की जो हल की मूठ पकड़े किसान, मशीन का पहिया घुमाते श्रमिक, प्रयोगशाला में प्रयोगरत वैज्ञानिक, व्यापारी -व्यवसायी एवं कलम घिसते कर्मचारी की परस्पर भिन्न परिस्थितियों में अध्यात्म की दीप-शिखा प्रज्ज्वलित कर सके। आज साधना की ही नहीं, अध्यात्म तक की नई व्यवस्था के साथ उपस्थित होना है।
साधना काल की तपश्चर्या अवधि में भी पत्नियाँ उनके साथ रही। इससे उनके कार्य में बाधा रत्ती भर नहीं पहुँची वरन् सहायता ही मिली। प्राचीन काल में जब विवेक पूर्ण अध्यात्म जीवित था तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि आत्मिक प्रगति में नारी के कारण कोई बाधा उत्पन्न होगी।
साधना करनी पड़ती है अर्थात् एकाग्रतापूर्वक अभ्यास करना पड़ता है। परस्पर-व्यवहार को सभ्य या समाज मान्य बनाने के लिए बचपन से ही संस्कारों की साधना करनी पड़ती है। प्रेम, उदारता, सेवा भावना आदि गुणों के लिए भी निरन्तर साधना करनी पड़ती है। व्यापार -व्यवसाय में भी ऐसी सैकड़ों बाते हैं जिनमें साधना की आवश्यकता होती है।
साधना करे। अगणित धाराओं में प्रयुक्त कर अपनी प्रतिभा का परिचय दे। गायक विकारोत्तेजना और शृंगाररस को कुछ दिन तक विश्राम कर लेने दे। गायन का अर्थ ही पिछले दिनों कामेन्द्रिय रहा है। राज्य दरबारों से लेकर मनचले आवारा हिप्पियों तक उसी को माँगा जाता रहा है।
साधना या तप कोई जड़ प्रक्रिया नहीं है, जिसको नियमोपनियम के शिकंजे में कस दिया जाय। यह एक गत्यात्मक प्रक्रिया है, जिसका अनुगमन बदलती हुई परिस्थितियों के साथ व्यावहारिक धरातल पर होना आवश्यक है।
साधना बन सकती थी अखण्ड दीपक संजोये रखना कठिन था। अखण्ड दीपक स्थापित करने वालो में से अनेकों के जलते बुझते रहते हैं, वे नाम मात्र के ही अखण्ड है। अपनी ज्योति अखण्ड बनी रही इसका कारण बाह्य सतर्कता नहीं अंतर्निष्ठा ही समझी जानी चाहिए जिसे अक्षुण्ण रखने में हमारी धर्म पत्नी ने असाधारण योगदान दिया है।
साधना’ और अध्यात्म घिसे पिटे खोटे सिक्के की तरह कही अपना चलन ही न गवा बैठे।
साधनाओं को छोड़ बैठे। विकासवाद का सिद्धान्त मूल रूप से मनुष्य शरीर का रचना काल ढूंढ़ने और यह शरीर कैसे बना इस रहस्य को जानने के लिए प्रकाश में आया पर उसे जिस रूप में प्रस्तुत किया गया उससे मनुष्य और कला मनुष्य और उसके साथ अनिवार्य रूप से जुड़े मनोविज्ञान का सम्बन्ध टूट गया। एक कोषीय जीवों से जटिल कोशों वाले शरीर की रचना का विकास दरअसल जीवात्मा के पतन का ही उल्टा खड़ा किया हुआ ढाँचा है। संसार में जीवों की संख्या इतनी अधिक है कि उनको एक क्रम में सजाकर यह सिद्ध करना कि मनुष्य शरीर अमीबा जैसे एक कोषीय जीव का विकसित रूप है कोई कठिन काम नहीं है पर विकासवाद का सिद्धान्त आखिर मनुष्य के साथ जुड़े हुए मनोविज्ञान को कहाँ संतुष्ट कर पाता है उसका खड़ा किया हुआ अपना ही ढाँचा अब बेबुनियाद सिद्ध हो रहा है।
साधना’ शब्द अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखता। हमने उसमें अपना अर्थ आरोपित कर दिया है, यह अलग बात है। लेकिन शुद्ध रूप में साधना शब्द अर्थ से परे है। अर्थ उसमें तब आता है जब कोई लक्ष्य, क्रिया प्रकट होती है। एक आध्यात्मिक सन्त की क्रिया भी साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यात्री की क्रियायें भी साधना है।
साधना करनी पड़ती है। व्यापार -व्यवसाय में भी ऐसी सैकड़ों बाते हैं जिनमें साधना की आवश्यकता होती है।
साधना पथ पर निष्ठापूर्वक अग्रसर हो पाता है। यह समाचार 16 अगस्त में बम्बई के अधिकांश समाचार पत्रों में छपा था ? 24 जुलाई 1966 के धर्मयुग अंक में सभी फोटो देकर इस घटना को विस्तार से छापा गया था।
साधना-सोपान के रूप में स्वीकार किया गया है। जैनागमों में अनशन, अनोदरता, (आहार सम्बन्धी नियम) भिक्षाचर्या, वृत्ति संकोच, रस-परित्याग, काय-क्लेश और निर्विकारता को बहिरंग साधना की तथा प्रायश्चित , विनय, सेवा-परिचर्या, स्वाध्याय, ध्यान एवं कार्योत्सर्ग को अन्तरंग अर्थात् तप संज्ञा दी गई है। बौद्ध धर्म में स्वपीड़न और परपीड़न विरहित तप को श्रेष्ठ माना गया है।
साधना है। एक माँ अपने बेटो के लिये, परिवार के लिए रसोई बनाती है- यह भी साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।
साधना ने विश्व मानव की इस पीड़ा की अपनी पीड़ा बना दिया लगने लगा- मानो अपने ही हाथ पांवों को कोई ऐंठ, मरोड़ और जला रहा हो। “सबमें अपनी आत्मा पिरोया हुआ है और सब अपनी आत्मा में पिरोये हुए है” गीता का यज्ञ ज्ञान जहाँ तक पढ़ने सुनने से सम्बन्धित रहे वहाँ तक कुछ हर्ज नहीं, पर जब वह अनुभूति की भूमिका में उतरे और अन्तःकरण में प्रवेश प्राप्त करे तो स्थिति दूसरी ही हो जाती है। अपने अंग अवयवों का कष्ट अपने को जैसा व्यथित बेचैन करता है- अपने स्त्री, पुत्रों की पीड़ा जैसे अपना चित्त विचलित करती है ठीक वैसे ही आत्म-विस्तार की दिशा में बढ़ चलने पर लगता है कि विश्वव्यापी दुःख अपना ही दुःख है और व्यथित पीड़ितों की वेदना अपने को ही नोचती फटकारती है।
साधना का पवित्र पद देने के लिए उसके साथ लोकहित का भाव जोड़ दिया जाए, तो वही उसके लिए आध्यात्मिक धर्म बन जाएगा। व्यापारी के धृति-साध्य कर्म को यदि अनुचित मुनाफा कमाने के दूषण से मुक्त कर दिया जाये तो वही ‘स्व’ में ‘पर’ की साधना का पुनीत कर्म बन जायेगा। तात्पर्य यह है कि साधना कोई ऊपर से ओढ़ी जाने वाली, अपने और दूसरे को सम्बोधित करने वाली रामनामी चादर न बने, तो उसकी सहजता जीवन में व्यवहार्य हो सकेगी। यही उसके लिये सच्ची साधना होगी।
साधना परंपराओं को चलाने के लिए भी नहीं की जाती। आज भारत में तथा कथित साधकों की भरमार है फिर भी साधकों और उनके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति से ऐसा वातावरण तैयार नहीं हुआ है, जैसा कि एक साधना निष्ठ व्यक्ति के संपर्क और सहवास से होना चाहिए।
साधना की, जिसका वर्णन संत कबीरदास के एक पद में किया गया है। ‘साधो सहज समाधि भली’ इस पद म कबीर ने नाम ‘समाधि’ का लिया है, पर वह एक सम्पूर्ण जीवन साधना का दर्शन है। उन्होंने सारा जीवन-दर्शन ही क्राँतिकारी ढंग से प्रस्तुत किया है। नित्य जीवन की सहज क्रियाओं को लेकर महात्मा कबीर ने यह व्यक्त करने का प्रयास किया है कि मनुष्य जीवन की सही दिशा और सच्ची साधना क्या है।
साधना मानते हैं और उतना सा करके समझते हैं कि वे साधक बन गये। तो उन्होंने मशाल हाथ में लेकर साधना-मार्ग प्रकाशित किया। लोगों की आंखें खोलने का प्रयास किया कि हमारी वे सारी क्रियायें धर्म-क्रियायें है, साधनायें है जो हम सबेरे उठने से लेकर रात को सोने तक और निद्रा में भी करते हैं।
साधना करके कोई व्यक्ति पानी पर चलने का अभ्यास करके चमत्कारी कहला सकता है, पर उसकी सिद्धि का कुल मूल्य रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में केवल चार पैसा है, क्योंकि चार पैसे खर्च करके नौका में बैठकर कोई भी नदी पार कर सकता है। हमारी बहुत सारी साधनाओं के मूल में यही अल्पमोली बाते हैं जिनसे हमें मुक्त होना है, अपने को सहज साधक बनाना है।
साधना की आवश्यकता होती है।
साधना की तथा प्रायश्चित , विनय, सेवा-परिचर्या, स्वाध्याय, ध्यान एवं कार्योत्सर्ग को अन्तरंग अर्थात् तप संज्ञा दी गई है। बौद्ध धर्म में स्वपीड़न और परपीड़न विरहित तप को श्रेष्ठ माना गया है।
साधना अपने काय कलेवर तक ही सीमित थी। दो आंखों में पाप आया तो तीसरी विवेक की आँख खोलकर उसे डरा भगा दिया। शरीर पर कड़े प्रतिबंध लगा दिये और वैसी परिस्थितियाँ बनने की जिनमें आशंका रहती है उनकी जड़ काट दी तो दुष्ट व्यवहार असंभव हो गया। मातृवत् परदारेषु की साधना बिना अड़चन के सध गई। शरीर ने सदा हमारा साथ दिया।
साधना में बीत रहा है। उनकी हर प्रवृत्ति के पीछे सत्य का आग्रह रहा करता था। महात्मा कबीर ने अपने पद में यही बात कही है। उन्होंने जब देखा कि लोग अमुक क्रियाओं को ही साधना मानते हैं और उतना सा करके समझते हैं कि वे साधक बन गये। तो उन्होंने मशाल हाथ में लेकर साधना-मार्ग प्रकाशित किया।
साधना है और विज्ञान के क्षेत्र में अन्तरिक्ष यात्री की क्रियायें भी साधना है। एक माँ अपने बेटो के लिये, परिवार के लिए रसोई बनाती है- यह भी साधना है। इस साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।
साधना साथ-साथ मिल कर चली है। परमात्मा को हमने इसलिए पुकारा कि वह प्रकाश बनकर आत्मा में प्रवेश करे और तुच्छता को महानता में बदल दे। उसकी शरण में इसलिए पहुँचे कि उस महत्ता में अपनी क्षुद्रता विलीन हो जाये। वरदान केवल यह माँगा कि हमें वह सहृदयता और विशालता मिले जिसके अनुसार अपने में सब को और सब को अपने में अनुभव किया जा सकना संभव हो सके। 24 महा गुरुचरणों का जप, ध्यान, तप, संयम सब इसी परिधि के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं।
साधना ही तो करता है। जरूरत तो बस इतनी है कि उसके कर्म को आत्म-केन्द्रित न होने देकर लोक-मंगल के पवित्र भाव से सम्पुष्ट किया जाए, ताकि उसका वही कर्म ‘स्व’ के साथ ‘पर’ के लिए होकर उसमें भाव-शुद्धि की भावना भर दे और उसको आध्यात्मिक दीप्ति प्रदान कर दे। पसीना चुचुआते शरीर से मशीन के साथ जूझते श्रमिक का कर्म किस साधना से कम है ? उसे साधना का पवित्र पद देने के लिए उसके साथ लोकहित का भाव जोड़ दिया जाए, तो वही उसके लिए आध्यात्मिक धर्म बन जाएगा। व्यापारी के धृति-साध्य कर्म को यदि अनुचित मुनाफा कमाने के दूषण से मुक्त कर दिया जाये तो वही ‘स्व’ में ‘पर’ की साधना का पुनीत कर्म बन जायेगा।
साधना होगी।
साधना में लग गई। इसी आयु में बहुत मनोविकार प्रबल रहते हैं सो आमतौर से परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढलती आयु के व्यक्तियों ही प्रयुक्त किया जाता है।
साधना कक्ष में स्थापना भी इसी प्रक्रिया के अंतर्गत आती है। जो साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्व है इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया। पीछे तो वह प्राण प्रिय ही बन गया। 24 वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था पर यह कल्पना भी ऐसी लगती है कि हमारा प्राण ही बुझ जायेगा सो उसे आजीवन चालू रखा जायेगा। हम अज्ञातवास गये थे- अब फिर जा रहे हैं तो उसे धर्म पत्नि संजोये रखेगी।
साधना का पुनीत कर्म बन जायेगा। तात्पर्य यह है कि साधना कोई ऊपर से ओढ़ी जाने वाली, अपने और दूसरे को सम्बोधित करने वाली रामनामी चादर न बने, तो उसकी सहजता जीवन में व्यवहार्य हो सकेगी। यही उसके लिये सच्ची साधना होगी।
साधनामय बनावे फिर देखे उसका समाज और संसार पर क्या सुखद परिणाम होता है।
साधना क्या है।
साधना सिखाई, विद्याध्ययन के उपरान्त वेदवती का पाणिग्रहण भी वार्क्षी के साथ करा दिया।
साधना की दो मंजिले 24 वर्ष में पूरी हुई। मातृवत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत् आदर्शों में व्यतिक्रम प्रायः युवावस्था में ही होता है। काम और लोभ की प्रबलता के वही दिन है सो 15 वर्ष की आयु से लेकर 24 वर्षा से 40 तक पहुंचते पहुँचते वह उफान ढल गया। कामना, वासनायें, तृष्णा, महत्वाकांक्षायें प्रायः इसी आयु में आकाश पाताल के कुलावे मिलाती है। यह अवधि स्वाध्याय, मनन, चिन्तन से लेकर आत्म-संयम और जप ध्यान की साधना में लग गई।
साधना और तप की नई दीक्षा दे, तभी तो कुछ काम बने। बाकी तो थोड़ी सिद्धान्त चर्चा ही होगी।
साधना हमें बताई गई उसमें अखण्ड दीपक का महत्व है इतना बता देने पर उसकी स्थापना कर ली गई और पूरी अवधि तक उसे ठीक तरह जलाये रखा गया। पीछे तो वह प्राण प्रिय ही बन गया। 24 वर्ष बीत जाने पर उसे बुझाया जा सकता था पर यह कल्पना भी ऐसी लगती है कि हमारा प्राण ही बुझ जायेगा सो उसे आजीवन चालू रखा जायेगा। हम अज्ञातवास गये थे- अब फिर जा रहे हैं तो उसे धर्म पत्नि संजोये रखेगी। यदि एकाकी रहे होते पत्नी न होती तो और कुछ साधना बन सकती थी अखण्ड दीपक संजोये रखना कठिन था।
साधना में लग जाते । इस समय उन्होंने किसी से भी न मिलने का नियम बनाया था।
साधना की ही नहीं, अध्यात्म तक की नई व्यवस्था के साथ उपस्थित होना है।
साधना केवल धार्मिक कर्मकाण्ड सापेक्ष क्रिया मात्र नहीं है। उसको यह रूप देकर धर्माचार्यों ने मानव-मात्र को एक संकुचित दायरे में बंद कर दिया है। गृह त्यागी, विरक्त और संन्यासी महाप्राण मनीषियों के आचार आदर्श का मान बिन्दु ही स्थापित कर सकते हैं, परन्तु लोक धर्म का रूप नहीं ले सकते। आज धर्म के नाम पर नई पीढ़ी नाक- भौं सिकोड़ती है, उसका दोष किस पर है ? जो धर्म लौकिक जीवन के बदलते आश्रमों के साथ अपने को गत्यात्मक नहीं बनाये रख सकता, उसका स्थान शास्त्रों में सुरक्षित रहने योग्य है।
साधना में लग गये।
साधना में लग गया।
साधना का स्तर कितना ऊँचा था उसमें संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है। उनके एकाकी जीवन की पूरी सार संभाल “माताजी” करती रही। इस संपर्क से दोनों में आत्मिक महत्ता बढ़ी ही घटी नहीं। प्रातःस्मरणीय माताजी ने अरविन्द के संपर्क से भारी प्रकाश आया और योगिराज को यह सान्निध्य गंगा के समान पुष्प फलदायक सिद्ध हुआ। तपस्वी ऋषि सपत्नीक स्थिति में रहते थे।
साधना वेष में नहीं है। साधना क्रिया-कांडों में भी नहीं है। साधना दिखाने के लिये नहीं की जाती। साधना परंपराओं को चलाने के लिए भी नहीं की जाती। आज भारत में तथा कथित साधकों की भरमार है फिर भी साधकों और उनके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति से ऐसा वातावरण तैयार नहीं हुआ है, जैसा कि एक साधना निष्ठ व्यक्ति के संपर्क और सहवास से होना चाहिए।
साधना क्रिया-कांडों में भी नहीं है। साधना दिखाने के लिये नहीं की जाती। साधना परंपराओं को चलाने के लिए भी नहीं की जाती। आज भारत में तथा कथित साधकों की भरमार है फिर भी साधकों और उनके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति से ऐसा वातावरण तैयार नहीं हुआ है, जैसा कि एक साधना निष्ठ व्यक्ति के संपर्क और सहवास से होना चाहिए।
साधना का मूल्य यों पता नहीं चलता, लेकिन जब कभी अनसधे हाथों को चौके-चूल्हे की शरण में जाना पड़ता है, तब पता चलता है कि यह कितनी बड़ी साधना है।
साधना और आध्यात्मिक उन्नयन के हमारे प्रयासों का उपादान तो आज का दिशाहारा, अशाँत, स्थापित जीवन- मूल्यों के प्रति अनास्थावान मानव है। हम उसी को समेटे, सहेंगे। उसे साधना और तप की नई दीक्षा दे, तभी तो कुछ काम बने। बाकी तो थोड़ी सिद्धान्त चर्चा ही होगी।
साधना महल
दयालबंद- बिलासपुर (म ॰ प्र 0)
साधना के नाम पर पलने वाले भ्रमों में न उलझकर व्यक्ति जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति को साधनामय बनावे फिर देखे उसका समाज और संसार पर क्या सुखद परिणाम होता है।
साधना दिखाने के लिये नहीं की जाती। साधना परंपराओं को चलाने के लिए भी नहीं की जाती। आज भारत में तथा कथित साधकों की भरमार है फिर भी साधकों और उनके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति से ऐसा वातावरण तैयार नहीं हुआ है, जैसा कि एक साधना निष्ठ व्यक्ति के संपर्क और सहवास से होना चाहिए।
साधना कोई ऊपर से ओढ़ी जाने वाली, अपने और दूसरे को सम्बोधित करने वाली रामनामी चादर न बने, तो उसकी सहजता जीवन में व्यवहार्य हो सकेगी। यही उसके लिये सच्ची साधना होगी।
साधना का कोई एक प्रकार या एक नियम नहीं है और वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। गाँधी जी ने कहा था कि मेरा जीवन ही सत्य की साधना में बीत रहा है। उनकी हर प्रवृत्ति के पीछे सत्य का आग्रह रहा करता था। महात्मा कबीर ने अपने पद में यही बात कही है। उन्होंने जब देखा कि लोग अमुक क्रियाओं को ही साधना मानते हैं और उतना सा करके समझते हैं कि वे साधक बन गये।
साधना-मार्ग प्रकाशित किया। लोगों की आंखें खोलने का प्रयास किया कि हमारी वे सारी क्रियायें धर्म-क्रियायें है, साधनायें है जो हम सबेरे उठने से लेकर रात को सोने तक और निद्रा में भी करते हैं।
साधना करने लगा और ज्ञानार्जुन के नाम से विख्यात हुआ।
साधना और अध्यात्म का परम्परा प्राप्त रूप आधुनिक जीवन के संदर्भ में निरुपयोगी बन गया है। इनकी पुराण प्रथिम परिभाषा में आज की पीढ़ी के लिए कोई आकर्षण नहीं है। आशंका यह है कि ‘साधना’ और अध्यात्म घिसे पिटे खोटे सिक्के की तरह कही अपना चलन ही न गवा बैठे।
साधना के तीसरे चरण में प्रवेश करते हुए “आत्मवत् सर्व भूतेषु” की किरणें फूट पड़ी। मातृवत् परदारेषु और परद्रव्येषु लोष्ठवत् की साधना अपने काय कलेवर तक ही सीमित थी। दो आंखों में पाप आया तो तीसरी विवेक की आँख खोलकर उसे डरा भगा दिया। शरीर पर कड़े प्रतिबंध लगा दिये और वैसी परिस्थितियाँ बनने की जिनमें आशंका रहती है उनकी जड़ काट दी तो दुष्ट व्यवहार असंभव हो गया। मातृवत् परदारेषु की साधना बिना अड़चन के सध गई।
साधना निष्ठ व्यक्ति के संपर्क और सहवास से होना चाहिए।
साधना वह होती है, जहाँ का वातावरण आनन्द और प्रेममय बन जाता है। साधना वह होती है, जहाँ ईमानदारी और प्रामाणिकता मूर्त बन जाती है। ऐसी साधना आंतरिक पवित्रता, विशुद्ध प्रेम भावना, स्वार्थ त्याग आदि सद्गुणों के पोषण और विकास से होगी। जिस दिन इस सहज प्रक्रिया से सहज जीवन विकसित होगा, उस दिन संसार का दूसरा रूप ही होगा। आवश्यकता है, साधना के नाम पर पलने वाले भ्रमों में न उलझकर व्यक्ति जीवन की प्रत्येक प्रवृत्ति को साधनामय बनावे फिर देखे उसका समाज और संसार पर क्या सुखद परिणाम होता है।
साधना बिना अड़चन के सध गई। शरीर ने सदा हमारा साथ दिया। मन ने जब हार स्वीकार कर ली तो वह हताश होकर हरकतों से बाज आ गया। पीछे तो वह अपना पूरा मित्र और सहयोगी बन गया। स्वेच्छा से गरीबी वरण कर लेने- आवश्यकताएं घटाकर अन्तिम बिन्दु तक ले जाने और संग्रह की भावना छोड़ने से ‘परद्रव्य’ का आकर्षण चला गया।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1971-January
साधना बताइये? पीवक ने भगवान बुद्ध ने सगर्व पूछा।
साधना के साहसी लोगों को इससे प्रवेश करने लिए पदार्थ वैज्ञानिकों की तरह ही निष्ठापूर्वक प्रवेश करना चाहिए।
साधना में साधक को इन्हीं बातों का ध्यान रखना होता है। समग्र स्वास्थ्य का आधार सात्विक आहार है, इसी मूल-दर्शन को योगविज्ञान में केन्द्र बिन्दु माना गया है। साधक का आहार अनेक स्वादों का नहीं होना चाहिए। एक ही पदार्थ व एक ही स्वाद उत्तम है। गाँधी जी ने सप्त महावर्त्त लेखमाला में प्रथम व्रत अस्वाद को माना है।
साधना के क्षेत्र में भी कार्य करती है। साधनाएँ चाहे वह यम नियम प्राणायाम हों या मन्त्र जाप सोऽहम् खेचरी और मुद्रा बन्ध साधनाएँ, सबका उद्देश्य प्राणशक्ति को प्रखर बनाना है। प्रज्ज्वलित प्राण ऊर्जा ही उसी के सहारे सिद्ध योगी टेलीविजन की तरह चाहे कहीं देखते, कहीं भी सुन लेते हैं। भूत और भविष्य उनके लिए वर्तमान में निवास करते हैं।
साधना प्रकरणों में विस्तारपूर्वक हुआ है।
साधना के लिए उत्साह उत्पन्न किया जा सकता है। स्वयं पीछे रहा जाय और दूसरों से लम्बी चौड़ी आशा लगाई जाय तो उसमें सफलता कदाचित ही कभी-छोटी सी मात्रा में मिल पाती है। आदर्शवादी उत्साह उत्पन्न करने के लिए तो श्रेय साधकों को स्वयं ही आगे बढ़ना होता है और अपना उदाहरण प्रस्तुत करके उन्हें भी सहयोग देने के लिए सहमत किया जाता है।
साधना द्वारा उपार्जित प्राण पक न जायें तब तक साधक के दिन जोखिम भरे कसौटी के होते हैं उनके न पकने तक विषय, वासना और तृष्णा, अहंता के वनचरों द्वारा उदरस्था? कर लिये जाने की आशंका तो रहती ही है, कहीं कोई अनुभूमि हो तो बाल बुद्धि उसे चमकाकार अपना अहंकार जताने की भूल करके उसे गवाँ सकती है। कदाचित साधना काल में ही किसी की मृत्यु हो जाये तो लोकोत्तर जीवन में प्राण परिपाक क्रिया चलती रहती है वहीं इतर जन्मों की प्रतिभा के रूप में दिखाई देती है।
साधना की प्रवृत्ति और उपलब्धि का पर्यवेक्षण मात्र अति निकटवर्ती लोगों के लिए ही सम्भव है। जो इस स्थिति में है वे जानते हैं कि विगत 43 वर्षों में धर्मतन्त्र को पुनर्जीवित करने और जन मानस को उलटने की दिशा में कितनी उत्साहवर्धक सफलता मिलती चली गई हैं। यों, जो करने में पड़ा है उसकी तुलना में उपलब्धियों को नगण्य भी कहा जा सकता है।
साधना है। साधना के सोपान पर चढ़ते हुए ही जीवन-मृत्यु के संघात के पीछे चल रहे सृष्टि प्रवाह के सत्य को जाना एवं अनुभव किया जा सकता है।
साधनाएँ, सबका उद्देश्य प्राणशक्ति को प्रखर बनाना है। प्रज्ज्वलित प्राण ऊर्जा ही उसी के सहारे सिद्ध योगी टेलीविजन की तरह चाहे कहीं देखते, कहीं भी सुन लेते हैं। भूत और भविष्य उनके लिए वर्तमान में निवास करते हैं।
साधना आहार सम्बन्धी अपने दृष्टिकोण के परिष्कार की साधना है। साँसारिक जीवन में सफलता की बात हो या आत्मिक उत्कर्ष की, सुखी स्वस्थ जीवन दोनों के लिये जरूरी है। जो अपनी वृत्तियों का परिशोधन कर अपने जीवनक्रम में परिवर्तन कर लेता है वह अन्नमयकोश जागरण की साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है। शुद्ध सात्विक भोजन, मित आहार, प्रसन्न मन से भगवान से प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया भोजन, स्वाद विशेष में रुचि न रख बीच-बीच में अस्वाद व्रत का पालन, परिश्रम की कमाई का ही भोजन निश्चिंततः साधक की इस प्राथमिक भूमिका को सशक्त बनाते हैं।
साधना आत्मिक क्षेत्र को और तालबद्ध लयबद्ध संगीत लहरों से भौतिक क्षेत्र को प्रभावित करने और उससे लाभान्वित होने के लिए विशाल कार्य क्षेत्र विद्यमान है। साधना के साहसी लोगों को इससे प्रवेश करने लिए पदार्थ वैज्ञानिकों की तरह ही निष्ठापूर्वक प्रवेश करना चाहिए।
साधना के प्रयोग-परीक्षणों से होकर ही गुजरना होगा। वास्तविक सत्य की अनुभूति तभी सम्भव है। यह दिव्य दृष्टि एवं संवेदन क्षमता आत्म परिष्कार के फलस्वरूप भीतर से उभरती और ऊपर से बरसती है। इसी के माध्यम से उस यथार्थ को जान सकना सम्भव होता है जो इस विश्व का तात्विक स्वरूप एवं आधारभूत कारण है।
साधना के स्वरूप को बोधगम्य बनाने के लिए आहार के सभी आयामों को शरीर मन की संरचना के साथ सम्बन्धित कर प्रस्तुत किया।
साधना के लिये अन्न की महिमा को प्रधानता देते हुए ही साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहार शास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है। भूख से आरम्भ होने वाली यह प्रक्रिया आहार ग्रहण करने तथा उसे आत्मसात कर उसका निष्कासन होने तक व्यक्ति को प्रभावित करती है।
साधना में पूँजीभूत कर उपयोगी बनाई जाती है। डिप्नोटिज्म में इसी विद्युत शक्ति को प्रखर और वशीभूत बनाना होता है।
साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहार शास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है। भूख से आरम्भ होने वाली यह प्रक्रिया आहार ग्रहण करने तथा उसे आत्मसात कर उसका निष्कासन होने तक व्यक्ति को प्रभावित करती है।
साधनायें सिद्ध कर ली जाने क्यों तथागत उन्हीं को दोहराने की बात करते हैं इससे मेरा समय नष्ट होगा या नहीं ?
साधनाएँ चाहे वह यम नियम प्राणायाम हों या मन्त्र जाप सोऽहम् खेचरी और मुद्रा बन्ध साधनाएँ, सबका उद्देश्य प्राणशक्ति को प्रखर बनाना है। प्रज्ज्वलित प्राण ऊर्जा ही उसी के सहारे सिद्ध योगी टेलीविजन की तरह चाहे कहीं देखते, कहीं भी सुन लेते हैं। भूत और भविष्य उनके लिए वर्तमान में निवास करते हैं।
साधना का उल्लेख योग शास्त्र के साधना प्रकरणों में विस्तारपूर्वक हुआ है।
साधना के मार्ग में प्रगति मिलती है। मन का स्तर योगी के आहार पर निर्भर है। यह जितना सात्विक होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जाएगा। अन्नमय कोष भी साधना के लिये अन्न की महिमा को प्रधानता देते हुए ही साधनाक्रम बिठाया जाता है। आहार शास्त्री बताते हैं कि अस्सी फीसदी रोगों के कारण आहार का व्यतिक्रम है।
साधना की। अनुभूतियों के आधार पर उद्घोष किया कि “सम्पूर्ण सृष्टि में एवं सर्व समर्थ चैतन्य सत्ता कार्य कर रही है। वही सृष्टि का आदि कारण है।
साधना के सोपान पर चढ़ते हुए ही जीवन-मृत्यु के संघात के पीछे चल रहे सृष्टि प्रवाह के सत्य को जाना एवं अनुभव किया जा सकता है।
साधना में आवश्यक बताया गया है।
साधना में इतने सिद्ध हस्त हो गये कि प्रकृति के कण 2 और अणु 2 से वे प्यार करने लगे और प्यार बाँटने लगे। उसकी आत्मीयता से प्रभावित होकर वनस्पति को भी गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन लाने को मजबूर होना पड़ा।
साधना काल में ही किसी की मृत्यु हो जाये तो लोकोत्तर जीवन में प्राण परिपाक क्रिया चलती रहती है वहीं इतर जन्मों की प्रतिभा के रूप में दिखाई देती है।
साधना बता दी जायेगी।
साधना में वर्णित ‘बन्ध’ विधि में किसी प्रकार का बन्धन नहीं है जैसा कि शब्दार्थ से प्रतीत होता है। अपितु चक्रों के आयनोप्लाज्मिक क्षेत्रों को सक्रिय व विस्तृत करने की विधि है। बन्ध तीन होते हैं इनके अलग अभ्यास से विभिन्न चक्रों के आयनिक क्षेत्रों को जागृत करने में सहायता मिलती है किन्तु तीनों बन्धों का एक साथ अभ्यास करने से चौथा महाबन्ध हो जाता है जो सबसे ज्यादा प्रभावी व कारगर सिद्ध होता है।
साधना से आटोमेटिक नर्वस सिस्टम को चैतन्य नियन्त्रण में रखने तथा भाव-सम्वेदनाओं की अतिरेकता के प्रभावों से बचाये रखने में सहायता मिलती है।
साधना है। साँसारिक जीवन में सफलता की बात हो या आत्मिक उत्कर्ष की, सुखी स्वस्थ जीवन दोनों के लिये जरूरी है। जो अपनी वृत्तियों का परिशोधन कर अपने जीवनक्रम में परिवर्तन कर लेता है वह अन्नमयकोश जागरण की साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है। शुद्ध सात्विक भोजन, मित आहार, प्रसन्न मन से भगवान से प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया भोजन, स्वाद विशेष में रुचि न रख बीच-बीच में अस्वाद व्रत का पालन, परिश्रम की कमाई का ही भोजन निश्चिंततः साधक की इस प्राथमिक भूमिका को सशक्त बनाते हैं।
साधना के इस प्रथम चरण को पार कर लेता है। शुद्ध सात्विक भोजन, मित आहार, प्रसन्न मन से भगवान से प्रसाद रूप में ग्रहण किया गया भोजन, स्वाद विशेष में रुचि न रख बीच-बीच में अस्वाद व्रत का पालन, परिश्रम की कमाई का ही भोजन निश्चिंततः साधक की इस प्राथमिक भूमिका को सशक्त बनाते हैं।
साधना का अभ्यास करो। नियम समय पर अगली साधना बता दी जायेगी।
साधना को अखण्ड क्रम में जारी रखना।
साधना में प्रयुक्त होने वाले मुख्य बन्ध तीनों हैं-(1) मूलबन्ध (2) उड्डियान बन्ध (3) जालन्धर बन्ध।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-June
साधना आदि का कितना भाग होगा। मात्र लिखने वाली उंगलियां न रहे या कागज-कलम चुक जाए, तो भी कार्य रुकेगा नहीं, क्योंकि रक्त का प्रत्येक कण और मस्तिष्क का प्रत्येक अणु उसके पीछे काम कर रहा है। इतना ही नहीं, वह दैवीसत्ता भी सतत् सक्रिय है, जो आँखों से न तो देखी जा सकती है और न दिखाई जा सकती है।
साधना व जीवन को दूध व पानी की तरह घुलाकर जैसे जीवनसाधना की जा सकती है, इसे हम गायत्री जयंती के पावनपर्व के प्रसंग में गुरुसत्ता की जीवनी को देख-पढ़, आत्मसात कर अपने लिए भी एक मार्गदर्शन के रूप में पा सकते हैं। अभी तक यही धारणा चल रही है, चाहे वो बुद्ध हो अथवा पतंजलि, गोरखनाथ हो, आद्यशंकर हो अथवा महावीर- सभी यही करते रहते है की जीवन और ' साधना ' दो विरोधी ध्रुवों पर स्थित शब्द है। जो जीवन से मोह करता है, वह साधना से लाभ नहीं प्राप्त कर सकता एवं जो साधना करना चाहता हो, उसे जीवन का त्याग करना होगा। संन्यास के रूप में एक श्रेष्ठ परंपरा इसीलिए पलायन का प्रतीक बन गयी है- वैराग्य भिक्षावृत्ति का बाना पहनकर रह गया। परमपूज्य गुरुदेव ने संधिकाल इस बेला पे आस्थासंकट की चरम विभीषिका की घड़ियों में जीवन और साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।
साधना द्वारा विकसित किया जाता है। प्रकृति के रहस्यों, हलचलों, संभावनाओं, घटनाओं, को जानने एवं सूक्ष्म शब्दप्रवाहों को सुनने की क्षमता का विकास नादयोग की साधना से होता है। कर्णकुहर बंद कर लेने पर उनमें बाहरी स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में चल रहें सूक्ष्म ध्वनि कंपनों को उस नीरवता में सुन-समझ सकना सरल हो जाता है। झींगुर बोलने, बदल गरजने, शंख बजने, बंशी निनाद होने जैसे कितने ही शब्द आरम्भ में सुनाई पड़ते है और नादयोग का साधक उन ध्वनियों के सहारे यह जानने की चेष्टा करता है की सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है।
साधना के समय जब साधक यौन आकर्षण से मुक्त अनुभव करने लगता है, तो इसका यह मतलब हुआ की कुण्डलिनी शक्ति इस केंद्र से उत्थित हो चुकी है। इसके साथ ही कई प्रकार की अन्य सुखदायी संवेदनाओं का भी अनुभव होता है। जिस व्यक्ति में यह संस्थान अन्यों की तुलना में अधिक जाग्रत होता है, वह भोजन तथा भोग-विलास में आनंद की खोज करता है। मूलाधार से यह इस अर्थ में भिन्न है की मूलाधार चक्र प्रधान व्यक्ति अपनी सुरक्षा की दृष्टि से धन-संपत्ति एकत्रित करता है, जबकि स्वाधिष्ठान प्रधान व्यक्ति इन्द्रिय-सुख निमित्त इनका संग्रह करता है। अतएव जो व्यक्ति धन-साधन के प्रति अतिशय मोहग्रस्त दिखे, समझा जाना चाहिए की आध्यात्मिक प्रगति की दृष्टि से वह अत्यंत निम्न कोटि का है और चक्र संस्थान के बिलकुल निचले तल पर है।
साधना।
साधना पद्धति प्रस्तुत की, यदि यह कहा जाय, तो अत्युक्ति न होगी। उन्होंने कहा की परिवर्तन जीवनपद्धति में हो- चिंतन में हो, वेश में होना अनिवार्य नहीं। साधना से सिद्धि को उन्होंने परिष्कृत जीवन रूपी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया, प्रमाणित भी किया- स्वयं वैसा जीवन जीकर। हम ढेरों साधकों की जीवनी देखते है- परन्तु लोक उनसे क्या शिक्षण ले? क्या सभी हिमालय चले जाये, कुण्डलिनी जगाने के सम्मोहन भरे जाल में उलझकर जीवन संपदा गंवा बैठे- या मरघट में बैठकर तांत्रिक साधना करे?
साधना करनी पड़ेगी।
साधना ठीक प्रकार बन पड़ती है। यह कार्य घर के लोकव्यवहार सम्बन्धी उतार-चढ़ाव के बीच रहकर संभव नहीं हो सकता।"
साधनामय बनाने का प्रयास किया गया व जून, १९९२ में गायत्री जयंती पर एक अभूतपूर्व शपथ समारोह में भी सभी ने गुरुग्राम की माटी हाथ में लेकर उनके कार्यों में निमित्त और अधिक समय-साधन देने का संकल्प ले देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के शुभारंभ की घोषणा शक्तिस्वरूपा माताजी से सुनी। समयदान-अंशदान के बलबूते ही २७ विराट आश्वमेधिक आयोजन भारत व विश्वभर में संपन्न हुए एवं मिशन विराटतम रूप लेता चला गया।
साधना से सिद्धि को उन्होंने परिष्कृत जीवन रूपी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया, प्रमाणित भी किया- स्वयं वैसा जीवन जीकर। हम ढेरों साधकों की जीवनी देखते है- परन्तु लोक उनसे क्या शिक्षण ले? क्या सभी हिमालय चले जाये, कुण्डलिनी जगाने के सम्मोहन भरे जाल में उलझकर जीवन संपदा गंवा बैठे- या मरघट में बैठकर तांत्रिक साधना करे? नहीं, उन्होंने लोकमानस के बीच रहकर उनके जैसा जीवन जीकर बताया है की अध्यात्म सौ फीसदी व्यावहारिक है, सत्य है एवं इसे उन्होंने अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में स्वयं अपनाकर देखा व खरा पाया है।
साधना करने जा रहे हैं। अब तक हमने एक मुखी गायत्री की उपासना की है। तो आपने हमें क्यों नहीं बताया पंचमुखी गायत्री की उपासना? इसलिए की आप इसे नहीं कर सकते हैं। आपको एक मुखी गायत्री की उपासना करना ही मुश्किल है।
साधना सत्र, परिव्राजक, वानप्रस्थ सत्र, नारी-जागरण सत्रों की श्रृंखला चलती रही एवं सारे भारत में देवकन्याओं के कार्यक्रम संपन्न होकर एक विलक्षण माहौल बना। ब्रह्मवर्चस शोधसंस्थान के रूप में विज्ञान और आध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर अभिनव अनुसन्धान वाला एक सुसज्जित तंत्र बनकर खड़ा हो गया, तो सारे भारतवर्ष में शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों-प्रज्ञासंस्थानों, प्रज्ञामंडलों की स्थापना का क्रम चल पड़ा। मिशन लक्षाधिक विस्तार पता चल गया। गायत्री व यज्ञ अभियान गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँच गया।
साधना उनकी चौबीस वर्ष के चौबीस लक्ष के महापुरश्चरणों के प्रायः ३२ वर्ष बाद संपन्न हुई थी। यदि महापुरश्चरणों गुरु के आदेशों के अनुरूप जीवन को साधकों के रूप में विकसित करने हेतु थे, तो सूक्ष्मीकरण का पुरुषार्थ विश्वमानव को केंद्र बनाकर किया गया प्रचंड साधनात्मक पराक्रम था - विश्व की कुंडलिनी जागरण की दिशा में एक अभूतपूर्व प्रयोग था। उन्होंने लिखा भी की इनकी इस साधना का उद्देश्य था -' जन -जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अगणित भगीरथों का सृजन ' इसी क्रम में १९८८ की आश्विन नवरात्रि में उन्होंने युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की, जिसे बारह वर्ष तक चलना था- नवयुग के आगमन तक। आज जब हम 'साधना वर्ष ' मना रहे है - राष्ट्र के कोने - कोने में अखंड जप-प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है, उस महासाधक का पुरुषार्थ याद हो आता है, जिसने नरपामर-सी, नरपशु-सा जीवन जीने वाले हम सभी को नरमानव के रूप में रूपांतरित कर देवमानव बनने का पथ दिखा दिया।
साधना मार्ग के पथिकों को इसके प्रति सदा सावधान रहना चाहिए तथा आहार-विहार एकदम सात्विक रखना चाहिए। अश्लील साहित्य एवं फिल्म अथवा चित्रों से परहेज रखते हुए मन को स्वाध्याय एवं चिंतन में व्यस्त रखकर इस अवस्था से पर किया जा सकता है।
साधना प्रशिक्षण व वहां से हुए विकेंद्रीकरण के द्वारा संगठन ने नयी करवट ली है। सभी के साधक बनने,पूर्ण -परिपक्व प्रखर होकर जागरूक -संगठित होने की वेला है यह। आत्मशक्ति की प्रचंडता ही युगशक्ति का अवतरण करेगी,यह सुनिश्चित है,इसी तथ्य को दृष्टिगत रख केंद्रीय स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण निर्धारण किये गए है,जिन्हें तत्काल लागू किया जा रहा है। (१ ) पांच दिवसीय साधना /तीर्थसेवन प्रशिक्षण सत्रों को साधना प्रशिक्षण प्रधान बनाया जा रहा है एवं ये गुरुपूर्णिमा तक यथावत चलते रहेंगे। ३० जुलाई तक साधक -परिजन उनमें पूर्वानुमति लेकर आते रह सकते है।
साधना के दौरान नैष्ठिक कार्यकर्ताओं के लिए पूज्य गुरुदेव द्वारा एक बार नित्य पढ़ने के निर्देश के साथ लिखा गया एक विशेष पत्रक
साधना करके गायत्री को देवताओं तक सीमित न रहने देकर सर्वसाधारण के हितार्थाय जगत तक पहुँचाया। दोनों ही पर्व एक तिथि पर आने के कारण भारतीय संस्कृति की विलक्षणता भी सिद्ध होती है एवं इस पर्व को मनाने का महात्म्य भी हमें ज्ञात होता है।
साधनाएं करायी गयी। आज तक उन शिविरों में भागीदारी करने वाले साधक स्मरण रहे है- इन विशिष्ट साधनाओं का, जिनके माध्यम से उन्हें विशिष्ट उपलब्धियां हुई-गुरुवार के तेजो अनुदान मिले-आत्म-पर्यवेक्षण का अवसर मिला। उसके पश्चात् जीवन-साधना सत्र, परिव्राजक, वानप्रस्थ सत्र, नारी-जागरण सत्रों की श्रृंखला चलती रही एवं सारे भारत में देवकन्याओं के कार्यक्रम संपन्न होकर एक विलक्षण माहौल बना। ब्रह्मवर्चस शोधसंस्थान के रूप में विज्ञान और आध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर अभिनव अनुसन्धान वाला एक सुसज्जित तंत्र बनकर खड़ा हो गया, तो सारे भारतवर्ष में शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों-प्रज्ञासंस्थानों, प्रज्ञामंडलों की स्थापना का क्रम चल पड़ा। मिशन लक्षाधिक विस्तार पता चल गया।
साधना है। जैसा की पहले कहा जा चुका है, यह तल पशुता का प्रतीक-प्रतिनिधि है, अतः उसे निकल-बाहर कर अपने शुद्ध स्वरूप ('स्व') में प्रतिष्ठित होना ही इसका वास्तविक प्रयोजन है। इसमें हम कितने अंशों में सफल हुए? इसका एक ही पैमाना है की हमारे रहन-सहन में क्या भोगवाद का क्या और कितना स्थान है? हमारी वाणी और व्यवहार कैसे हैं एवं उचित-अनुचित का कितना ध्यान रखते है?
साधना, शिथिलीकरण, योगनिद्रा।
साधना के समापन के बाद विरत राष्ट्रिय एकता सम्मेलन, दीपयज्ञों के आयोजन संपन्न हुए। महाप्रयाण के पूर्व के एक वर्ष में महाकाल का क्रांतिधर्मी साहित्य युगऋषि ने लिखा, जिसे उन्होंने वाजल के बराबर गुणात्मक दृष्टि से अपने अब तक के लिखे साहित्य के समकक्ष कहा। २ जून, १९९० को गुरुसत्ता के महाप्रयाण के बाद एक विराट ऐतिहासिक श्रद्धांजलि समारोह हम सभी न मनाया। इस प्रयोजन में प्रायः पच्चीस लाख से अधिक परिजनों की भागीदारी रही। सभी संकल्पबद्ध हो गुरुवार के कार्यों को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लेकर गए।
साधना के लिये आवश्यक जिज्ञासा, सत्यनिष्ठा और तपश्चर्या का भाव देखकर यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या ( कुंडलिनी जागरण ) सिखाई, जिससे नचिकेता ने अमरत्व की शक्ति पाई।
साधना करे? नहीं, उन्होंने लोकमानस के बीच रहकर उनके जैसा जीवन जीकर बताया है की अध्यात्म सौ फीसदी व्यावहारिक है, सत्य है एवं इसे उन्होंने अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में स्वयं अपनाकर देखा व खरा पाया है।
साधना की जा सकती है, इसे हम गायत्री जयंती के पावनपर्व के प्रसंग में गुरुसत्ता की जीवनी को देख-पढ़, आत्मसात कर अपने लिए भी एक मार्गदर्शन के रूप में पा सकते हैं। अभी तक यही धारणा चल रही है, चाहे वो बुद्ध हो अथवा पतंजलि, गोरखनाथ हो, आद्यशंकर हो अथवा महावीर- सभी यही करते रहते है की जीवन और ' साधना ' दो विरोधी ध्रुवों पर स्थित शब्द है। जो जीवन से मोह करता है, वह साधना से लाभ नहीं प्राप्त कर सकता एवं जो साधना करना चाहता हो, उसे जीवन का त्याग करना होगा। संन्यास के रूप में एक श्रेष्ठ परंपरा इसीलिए पलायन का प्रतीक बन गयी है- वैराग्य भिक्षावृत्ति का बाना पहनकर रह गया। परमपूज्य गुरुदेव ने संधिकाल इस बेला पे आस्थासंकट की चरम विभीषिका की घड़ियों में जीवन और साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।
साधना से होता है। कर्णकुहर बंद कर लेने पर उनमें बाहरी स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में चल रहें सूक्ष्म ध्वनि कंपनों को उस नीरवता में सुन-समझ सकना सरल हो जाता है। झींगुर बोलने, बदल गरजने, शंख बजने, बंशी निनाद होने जैसे कितने ही शब्द आरम्भ में सुनाई पड़ते है और नादयोग का साधक उन ध्वनियों के सहारे यह जानने की चेष्टा करता है की सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है। भूत, वर्तमान और भविष्य की कितनी ही रहस्यमयी जानकारियां नादब्रह्म की साधना से अवगत होती है।
साधना के नए आयामों को उन्होंने खोला एवं इसे गुह्यवाद-रहस्यवाद के लटके-झटकों से बहार निकलकर सच्ची जीवनसाधना के रूप में प्रस्तुत किया। मिथ्या अध्यात्म-कर्मकांडी धर्म के विषय में बड़ी कड़ाई से लिखने वाले आचार्य श्री ने इस क्षेत्र की 'ओवर होलिंग' कर सच्ची साधना पद्धति प्रस्तुत की, यदि यह कहा जाय, तो अत्युक्ति न होगी। उन्होंने कहा की परिवर्तन जीवनपद्धति में हो- चिंतन में हो, वेश में होना अनिवार्य नहीं। साधना से सिद्धि को उन्होंने परिष्कृत जीवन रूपी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया, प्रमाणित भी किया- स्वयं वैसा जीवन जीकर। हम ढेरों साधकों की जीवनी देखते है- परन्तु लोक उनसे क्या शिक्षण ले?
साधना के परिप्रेक्ष्य में अपनी गुरुसत्ता के जीवनक्रम का अध्ययन करने वाले हम सभी जिज्ञासुओं को उस युग-भगीरथ का गायत्री साधक के रूप में सच्चे ब्राह्मणत्व रूपी उर्वर भूमि में ही गायत्री साधना का बीज पुष्पित-पल्लवित हो वटवृक्ष बन पता है। गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है, मूलमंत्र से जिसने अपनी शैशव अवस्था आरम्भ की थी, उसने जीवनभर जीवन-साधना की ब्राह्मण बनने की।
'ब्राह्मण' शब्द आज एक जाति का परिचायक हो गया है। ब्राह्मणवाद, मनुवाद न जाने क्या कहकर उलाहने दिये जाते है परमपूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मणत्व को सच्चा अध्यात्म नाम देते हुए कहा की हर कोई गायत्री के महामंत्र के माध्यम से जीवन-साधना द्वारा ब्राह्मणत्व अर्जित कर सकता है। उन्होंने ब्राह्मणत्व को मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान कहा।
साधना सफल हुई और अब वह आगे की भूमिका में प्रवेश कर चुका है।
साधनाओं का, जिनके माध्यम से उन्हें विशिष्ट उपलब्धियां हुई-गुरुवार के तेजो अनुदान मिले-आत्म-पर्यवेक्षण का अवसर मिला। उसके पश्चात् जीवन-साधना सत्र, परिव्राजक, वानप्रस्थ सत्र, नारी-जागरण सत्रों की श्रृंखला चलती रही एवं सारे भारत में देवकन्याओं के कार्यक्रम संपन्न होकर एक विलक्षण माहौल बना। ब्रह्मवर्चस शोधसंस्थान के रूप में विज्ञान और आध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर अभिनव अनुसन्धान वाला एक सुसज्जित तंत्र बनकर खड़ा हो गया, तो सारे भारतवर्ष में शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों-प्रज्ञासंस्थानों, प्रज्ञामंडलों की स्थापना का क्रम चल पड़ा। मिशन लक्षाधिक विस्तार पता चल गया। गायत्री व यज्ञ अभियान गाँव-गाँव, घर-घर तक पहुँच गया।
साधना केन्द्रों के माध्यम से साधना की धुरी पर संगठन का पुनर्गठन -सारी जानकारी केंद्र तक पहुंचाने का दायित्व सभी क्षेत्रीय -परिजनों को सौंपा गया है। उनके कार्य का पर्यवेक्षण करने के लिए सहयोगी समीक्षक के रूप में समयदानी कार्यकर्ताओं के दल क्षेत्रों में दौरा कर रहे है। ऐसे समयदानियों का अधिकाधिक संख्या में आह्वान किया गया है।
साधनात्मक पराक्रम था - विश्व की कुंडलिनी जागरण की दिशा में एक अभूतपूर्व प्रयोग था। उन्होंने लिखा भी की इनकी इस साधना का उद्देश्य था -' जन -जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अगणित भगीरथों का सृजन ' इसी क्रम में १९८८ की आश्विन नवरात्रि में उन्होंने युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की, जिसे बारह वर्ष तक चलना था- नवयुग के आगमन तक। आज जब हम 'साधना वर्ष ' मना रहे है - राष्ट्र के कोने - कोने में अखंड जप-प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है, उस महासाधक का पुरुषार्थ याद हो आता है, जिसने नरपामर-सी, नरपशु-सा जीवन जीने वाले हम सभी को नरमानव के रूप में रूपांतरित कर देवमानव बनने का पथ दिखा दिया।
साधना से जनचेतना को उभारने, सत्प्रवृत्तियों के उद्यान लगाने, दुष्प्रवृत्तियों के विपक्ष को उखाड़ने की श्रद्धा ही इन्हें अहर्निश काम में लगाये रखती है।'
साधना द्वारा ब्राह्मणत्व अर्जित कर सकता है। उन्होंने ब्राह्मणत्व को मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान कहा। आज जब समाज ही नहीं समग्र राजनीति जातिवाद से प्रभावित नजर आती है, तो समाधान इस वैषम्य के निवारण का एक ही है - परमपूज्य गुरुदेव के ब्राह्मणत्व प्रधान तत्वदर्शन का घर-घर विस्तार। न कोई जाति का बंधन हो, न धर्म-सम्प्रदाय का। सभी विश्वमानवता की धुरी में बांधकर यदि सच्चे ब्राह्मण बनने का प्रयास करे, समाज से कम-से-कम लेकर अधिकतम देने की प्रक्रिया सीखे सकें, आदर्श जीवन जी सके, तो सतयुग की वापसी दूर नहीं है।
साधना करना चाहता हो, उसे जीवन का त्याग करना होगा। संन्यास के रूप में एक श्रेष्ठ परंपरा इसीलिए पलायन का प्रतीक बन गयी है- वैराग्य भिक्षावृत्ति का बाना पहनकर रह गया। परमपूज्य गुरुदेव ने संधिकाल इस बेला पे आस्थासंकट की चरम विभीषिका की घड़ियों में जीवन और साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।
साधना से लाभ नहीं प्राप्त कर सकता एवं जो साधना करना चाहता हो, उसे जीवन का त्याग करना होगा। संन्यास के रूप में एक श्रेष्ठ परंपरा इसीलिए पलायन का प्रतीक बन गयी है- वैराग्य भिक्षावृत्ति का बाना पहनकर रह गया। परमपूज्य गुरुदेव ने संधिकाल इस बेला पे आस्थासंकट की चरम विभीषिका की घड़ियों में जीवन और साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।
साधना वर्ष सारे भारतवर्ष व विश्वभर में मनाया जा रहा है। सभी ओर ढाई दिवसीय साधना प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है। अपने साधना केन्द्रों के माध्यम से साधना की धुरी पर संगठन का पुनर्गठन -सारी जानकारी केंद्र तक पहुंचाने का दायित्व सभी क्षेत्रीय -परिजनों को सौंपा गया है। उनके कार्य का पर्यवेक्षण करने के लिए सहयोगी समीक्षक के रूप में समयदानी कार्यकर्ताओं के दल क्षेत्रों में दौरा कर रहे है। ऐसे समयदानियों का अधिकाधिक संख्या में आह्वान किया गया है।
साधना के रूप में प्रस्तुत किया। मिथ्या अध्यात्म-कर्मकांडी धर्म के विषय में बड़ी कड़ाई से लिखने वाले आचार्य श्री ने इस क्षेत्र की 'ओवर होलिंग' कर सच्ची साधना पद्धति प्रस्तुत की, यदि यह कहा जाय, तो अत्युक्ति न होगी। उन्होंने कहा की परिवर्तन जीवनपद्धति में हो- चिंतन में हो, वेश में होना अनिवार्य नहीं। साधना से सिद्धि को उन्होंने परिष्कृत जीवन रूपी प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष के रूप में प्रतिपादित किया, प्रमाणित भी किया- स्वयं वैसा जीवन जीकर। हम ढेरों साधकों की जीवनी देखते है- परन्तु लोक उनसे क्या शिक्षण ले?
साधना का बीज पुष्पित-पल्लवित हो वटवृक्ष बन पता है। गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है, मूलमंत्र से जिसने अपनी शैशव अवस्था आरम्भ की थी, उसने जीवनभर जीवन-साधना की ब्राह्मण बनने की।
'ब्राह्मण' शब्द आज एक जाति का परिचायक हो गया है। ब्राह्मणवाद, मनुवाद न जाने क्या कहकर उलाहने दिये जाते है परमपूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मणत्व को सच्चा अध्यात्म नाम देते हुए कहा की हर कोई गायत्री के महामंत्र के माध्यम से जीवन-साधना द्वारा ब्राह्मणत्व अर्जित कर सकता है। उन्होंने ब्राह्मणत्व को मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान कहा।
साधना /तीर्थसेवन प्रशिक्षण सत्रों को साधना प्रशिक्षण प्रधान बनाया जा रहा है एवं ये गुरुपूर्णिमा तक यथावत चलते रहेंगे। ३० जुलाई तक साधक -परिजन उनमें पूर्वानुमति लेकर आते रह सकते है। तीर्थाटन की सामान्य भीड़ जो घूमने-फिरने में विश्वास रखती है,को निरुत्साहित किया जा रहा है एवं जो महापूर्णाहुति की तैयारी के लिए स्वयं को साधक बना सके -संगठन के रूप में उभर सके,उन्हें ही आमंत्रित किया जा रहा है।
साधना चाहिए, सो ठीक है, उसका भार दिव्यसत्ता पर छोड़े। आप तो इतना ही करे की आपके श्रम-समय, गुण-कर्म-स्वभाव में कहीं भी त्रुटि न रहे। विश्राम की बात न सोचें, अहर्निश एक ही बात मन में रहे की हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते है? कितना भार उठा सकते है? स्वयं को अधिकाधिक विनम्र बनाएं, दूसरों को बड़ा माने।
साधना से अवगत होती है। नादयोग की अंतिम परिणति है- 'ॐकार ' ध्वनि का सुनाई पड़ना। उसका माध्यम से साधक दैवी संकेतों को समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप करने और भावनात्मक आदान-प्रदान करने में समर्थ हो सकता है। समाधिसुख भी इसी की देन है।
साधना प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है। अपने साधना केन्द्रों के माध्यम से साधना की धुरी पर संगठन का पुनर्गठन -सारी जानकारी केंद्र तक पहुंचाने का दायित्व सभी क्षेत्रीय -परिजनों को सौंपा गया है। उनके कार्य का पर्यवेक्षण करने के लिए सहयोगी समीक्षक के रूप में समयदानी कार्यकर्ताओं के दल क्षेत्रों में दौरा कर रहे है। ऐसे समयदानियों का अधिकाधिक संख्या में आह्वान किया गया है।
साधना के समय उसके बीजमंत्र 'वं' का जप भी अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त सिद्धासन, सिद्धयोनि आसन जैसे योगाभ्यासों से भी इसके विकास में सहायता मिलती है। स्थिति परिस्थिति एवं मनोभूमि को देखते हुए दोनों में से किसी भी अभ्यास को अपनाया जा सकता है।
साधना से, जिसे बड़े सरल बनाकर युगऋषि हमें सूत्र रूप में दे गए एवं अपना जीवन वैसा जीकर चले गए। ब्राह्मण बीज को संरक्षित कर ब्राह्मणत्व को जगा देना-सारी धरित्री को गायत्रीमय के देना ही परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।
साधना वर्ष ' मना रहे है - राष्ट्र के कोने - कोने में अखंड जप-प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है, उस महासाधक का पुरुषार्थ याद हो आता है, जिसने नरपामर-सी, नरपशु-सा जीवन जीने वाले हम सभी को नरमानव के रूप में रूपांतरित कर देवमानव बनने का पथ दिखा दिया।
साधनात्मक पुरुषार्थ है, जो मनुष्य को हाड़-मांस का पुतला न रहने देकर नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम बना देता है। जीवन का उद्देश्य भी यही है।
साधना का उद्देश्य था -' जन -जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अगणित भगीरथों का सृजन ' इसी क्रम में १९८८ की आश्विन नवरात्रि में उन्होंने युगसंधि महापुरश्चरण की घोषणा की, जिसे बारह वर्ष तक चलना था- नवयुग के आगमन तक। आज जब हम 'साधना वर्ष ' मना रहे है - राष्ट्र के कोने - कोने में अखंड जप-प्रधान आयोजन संपन्न हो रहे है, उस महासाधक का पुरुषार्थ याद हो आता है, जिसने नरपामर-सी, नरपशु-सा जीवन जीने वाले हम सभी को नरमानव के रूप में रूपांतरित कर देवमानव बनने का पथ दिखा दिया।
साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।
साधना की ब्राह्मण बनने की।
'ब्राह्मण' शब्द आज एक जाति का परिचायक हो गया है। ब्राह्मणवाद, मनुवाद न जाने क्या कहकर उलाहने दिये जाते है परमपूज्य गुरुदेव ने ब्राह्मणत्व को सच्चा अध्यात्म नाम देते हुए कहा की हर कोई गायत्री के महामंत्र के माध्यम से जीवन-साधना द्वारा ब्राह्मणत्व अर्जित कर सकता है। उन्होंने ब्राह्मणत्व को मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान कहा। आज जब समाज ही नहीं समग्र राजनीति जातिवाद से प्रभावित नजर आती है, तो समाधान इस वैषम्य के निवारण का एक ही है - परमपूज्य गुरुदेव के ब्राह्मणत्व प्रधान तत्वदर्शन का घर-घर विस्तार।
साधना में इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
साधना, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान उस समुदाय में अकिंचन थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करने में बीता था, पर जब महती शक्ति के साथ सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ लग गए, तो लंकादहन, समुद्र छलांगने और पर्वत उखाड़ने का, राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठाएँ फिरने का श्रेय उन्हीं को मिला। आप लोगों में से प्रत्येक से एक आशा और अपेक्षा है की कोई भी परिजन हनुमान से कम स्तर का न हो, अपने कर्तव्य में कोई भी अभिन्न सहचर पीछे न रहे।
साधना वर्ष 'इसी निमित्त आत्मबल उपार्जन करने हेतु सारे भारत व विदेश में मनाया जा रहा है। अभी -अभी ५ माह पूर्व ४८ स्थानों पर संपन्न साधना प्रशिक्षण व वहां से हुए विकेंद्रीकरण के द्वारा संगठन ने नयी करवट ली है। सभी के साधक बनने,पूर्ण -परिपक्व प्रखर होकर जागरूक -संगठित होने की वेला है यह। आत्मशक्ति की प्रचंडता ही युगशक्ति का अवतरण करेगी,यह सुनिश्चित है,इसी तथ्य को दृष्टिगत रख केंद्रीय स्तर पर कुछ महत्वपूर्ण निर्धारण किये गए है,जिन्हें तत्काल लागू किया जा रहा है। (१ ) पांच दिवसीय साधना /तीर्थसेवन प्रशिक्षण सत्रों को साधना प्रशिक्षण प्रधान बनाया जा रहा है एवं ये गुरुपूर्णिमा तक यथावत चलते रहेंगे।
साधना की धुरी पर संगठन का पुनर्गठन -सारी जानकारी केंद्र तक पहुंचाने का दायित्व सभी क्षेत्रीय -परिजनों को सौंपा गया है। उनके कार्य का पर्यवेक्षण करने के लिए सहयोगी समीक्षक के रूप में समयदानी कार्यकर्ताओं के दल क्षेत्रों में दौरा कर रहे है। ऐसे समयदानियों का अधिकाधिक संख्या में आह्वान किया गया है।
साधना द्वारा जगाया जाता है, तब अनंत ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल, पृथ्वी के चलने की आवाज़ और घोष, मंदाकिनियों के बहने का स्वर, उल्काओं के टक्कर के भीषण निनाद सभी कुछ किसी भी स्थान पर बैठकर सुने जा सकते है। परन्तु ऐसा तभी संभव है जब नाद योग द्वारा सूक्ष्म और कारण शरीर में सन्निहित श्रवण शक्ति को विकसित किया जाये।
साधना ' दो विरोधी ध्रुवों पर स्थित शब्द है। जो जीवन से मोह करता है, वह साधना से लाभ नहीं प्राप्त कर सकता एवं जो साधना करना चाहता हो, उसे जीवन का त्याग करना होगा। संन्यास के रूप में एक श्रेष्ठ परंपरा इसीलिए पलायन का प्रतीक बन गयी है- वैराग्य भिक्षावृत्ति का बाना पहनकर रह गया। परमपूज्य गुरुदेव ने संधिकाल इस बेला पे आस्थासंकट की चरम विभीषिका की घड़ियों में जीवन और साधना को जीवन जीने की कला के रूप में प्रतिपादित ही नहीं, प्रमाणित करके दिखा दिया।
साधना प्रशिक्षण प्रधान बनाया जा रहा है एवं ये गुरुपूर्णिमा तक यथावत चलते रहेंगे। ३० जुलाई तक साधक -परिजन उनमें पूर्वानुमति लेकर आते रह सकते है। तीर्थाटन की सामान्य भीड़ जो घूमने-फिरने में विश्वास रखती है,को निरुत्साहित किया जा रहा है एवं जो महापूर्णाहुति की तैयारी के लिए स्वयं को साधक बना सके -संगठन के रूप में उभर सके,उन्हें ही आमंत्रित किया जा रहा है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-January
साधना वर्ष विशेषांक पढ़ने को मिलेगा। इस पूरे अंक को इसी उद्देश्य विशेष के लिए तैयार किया गया है कि साधना-वर्ष किस रूप में, किस स्तर पर सभी वर्गों द्वारा मनाया जाना चाहिए।
साधना ही वह उपाय-उपचार है, जिसके द्वारा हम अन्तराल की गहराई में प्रविष्ट कर सकते है और स्थायी सुख-शाँति का स्रोत प्राप्त कर सकते है।
साधना प्रधान आयोजन संपन्न होने लगेंगे। यह ऐतिहासिक वेला में है, जिसमें मिशन ही नहीं, सारा विश्व एक विलक्षण मोड़ से गुजरेगा।
साधना है, जो चित्तवृत्तियों को बिखरने से बचाती है। चुप रहने से वाणी के साथ व्यय होने वाली मस्तिष्कीय शक्तियों की क्षति होने से बचत होती है। यह बचत आत्मचिंतन में लगा दी जाय तो शान्ति के उस स्रोत तक पहुँच हो सकती है, जो हमारी अशान्तियों को हटाकर सुखद, शीतल और स्निग्ध शान्ति का आश्वासन देती है। इस प्रकार के विश्वास के उपरान्त नवीन चैतन्यता, स्फूर्ति और जीवनीशक्ति प्राप्त होती है, जो कार्यक्षमता, सूक्ष्मदर्शिता और प्रतिभा को कई गुना बढ़ा देती है।
साधनाक्षेत्र में बड़ी उच्चस्थिति में उनने कालूराम को पाया। भाँति-भाँति की परीक्षाएँ ली। फिर दीक्षा दी एवं सभी सिद्धियाँ उन्हें दे दीं। कीनाराम के पास पहले से भी काफी सिद्धियाँ थी। उस जखीरे को उनने पहले खाली किया।
साधना।
साधना वर्ष को अपने प्रखरतम रूप में उसी प्रचण्ड भाव से हर हिस्से में, दक्षिण के भी कोने-कोने में, पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर भारत के भी चप्पे-चप्पे में मनाए जाने का संदेश ग्रहण व सम्प्रेषित किया है। ये इसी रूप में सम्पन्न होगा भी, इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है।
साधना से वे सब सिद्धियाँ मिल सकती है, जो अन्य कठिन योग-साधनाओं से मिल सकती है।
साधना को प्रत्येक के लिए अनिवार्य बताते हुए उसके भागीदारों की संख्या समापन होते-होते प्रायः चौबीस करोड़ से भी अधिक होने की बात कही थी।
साधना विशेषांक के माध्यम से जान चुके है कि किस रूप हमें साधना के विभिन्न आयामों को अपने जीवन में, परिवार-परिकर में एवं राष्ट्रीय जीवन में, समाहित कर एक श्रेष्ठ साधक बनना है। राष्ट्र को समर्थ एवं सशक्त बनाने वाली इस युगसाधना के लिए परमपूज्य गुरुदेव -श्री अरविन्द व रमण महर्षि की परम्परा में ही निरन्तर तप करते रहे एवं सभी को साधना में निरत होने की प्रेरणा सत्त देते रहे। चरित्रहीन, अराजकता एवं अधः पतन के अंधकार भरे युग में जी रहे मानव -पुरुषार्थ ही। त्याग-उत्सर्ग बलिदान की परम्पराएँ जब समाप्त हो गयी हों, भोग-विलास ही चारों ओर संव्याप्त हो-साधक परम्परा पुनः जिन्दा कर उनकी संख्या द्रुतगति से बढ़ाना ही आज का युगधर्म हैं राष्ट्रीय चरित्र का विकास इसी धुरी पर होगा एवं यही भारतवासियों के आत्मबल में वृद्धि करेगा। यह आत्मबल का विकास संयम को साधने से व योग को जीवन के हर पक्ष में उतारने पर ही संभव हैं अपने देश को जगद्गुरु इसी तपोबल की निधि के आधार पर कहा जाता था।
साधना के विभिन्न आयामों को अपने जीवन में, परिवार-परिकर में एवं राष्ट्रीय जीवन में, समाहित कर एक श्रेष्ठ साधक बनना है। राष्ट्र को समर्थ एवं सशक्त बनाने वाली इस युगसाधना के लिए परमपूज्य गुरुदेव -श्री अरविन्द व रमण महर्षि की परम्परा में ही निरन्तर तप करते रहे एवं सभी को साधना में निरत होने की प्रेरणा सत्त देते रहे। चरित्रहीन, अराजकता एवं अधः पतन के अंधकार भरे युग में जी रहे मानव -पुरुषार्थ ही। त्याग-उत्सर्ग बलिदान की परम्पराएँ जब समाप्त हो गयी हों, भोग-विलास ही चारों ओर संव्याप्त हो-साधक परम्परा पुनः जिन्दा कर उनकी संख्या द्रुतगति से बढ़ाना ही आज का युगधर्म हैं राष्ट्रीय चरित्र का विकास इसी धुरी पर होगा एवं यही भारतवासियों के आत्मबल में वृद्धि करेगा। यह आत्मबल का विकास संयम को साधने से व योग को जीवन के हर पक्ष में उतारने पर ही संभव हैं अपने देश को जगद्गुरु इसी तपोबल की निधि के आधार पर कहा जाता था।
साधना वर्ष विशेषांक में परमपूज्य गुरुदेव की भावी योजनाओं सहित यह समग्र प्रारूप होगा कि कैसे भारतभूमि को तपोभूमि बनाने का उपक्रम शाँतिकुँज के माध्यम से संचालित होने जा रहा है। अंतरिक्ष में जो परिवर्तन संभावित है- उनसे क्या- क्या हो सकता है एवं इस महान साधना से सूक्ष्मजगत का परिशोधन कैसे होगा, इस विस्तार के साथ दैवी पुरुषार्थ से सामूहिक पापों के प्रक्षालन की प्रक्रिया भी स्पष्ट की जाएगी।
साधना पराक्रम के शुरुआती दीप प्रज्ज्वलन के रूप में पिछले दिनों गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में एक अन्तर्राष्ट्रीय योगसम्मेलन भी सफलता-पूर्वक आयोजित हो कर इस उपक्रम का शानदार शुभारम्भ हो चुका है।
साधना ग्रन्थों में इसे गुरुचक्र के नाम से अभिहित किया गया है। इसका आज्ञाचक्र नाम क्रियामूलक है। आज्ञा का अर्थ ‘आदेश’ होता है। आदेश हमेशा स्वामी या नियन्ता की ओर से आता है। इस दृष्टि से यह सम्पूर्ण चक्रसंस्थान का नियंत्रणकर्ता हुआ।
साधना सफल नहीं मानी जा सकती। गायत्री अपने में परिपूर्ण योग हैं यदि महाशक्ति त्रिपदा के तीनों सूत्रों को भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग के रूप में आत्मसात् कर जीवन वैसा बना लिया जाय तो राष्ट्र का कायाकल्प बहुत दूर नहीं। इस सम्मेलन में सभी ने इस तथ्य पर जोर देते हुए साधना वर्ष को अपने प्रखरतम रूप में उसी प्रचण्ड भाव से हर हिस्से में, दक्षिण के भी कोने-कोने में, पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर भारत के भी चप्पे-चप्पे में मनाए जाने का संदेश ग्रहण व सम्प्रेषित किया है। ये इसी रूप में सम्पन्न होगा भी, इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है।
साधना कर रहे थे। वहीं कालूराम से मुलाकात हुई। साधनाक्षेत्र में बड़ी उच्चस्थिति में उनने कालूराम को पाया। भाँति-भाँति की परीक्षाएँ ली। फिर दीक्षा दी एवं सभी सिद्धियाँ उन्हें दे दीं।
साधना करने के निमित्त ही इसे बनाया गया था। परंतु आज इसी परिसर में सभी तरह की रचनात्मक, संगठनात्मक, सुधारात्मक गतिविधियाँ भी संचालित हो रही है। नयी भूमि के क्रय किये के बाद साधनाकेन्द्र इसी को बनाए रख शेष सारी गतिविधियों नए विस्तार में विकेन्द्रित किये जाने की बात सूत्र−संचालक सत्ता के सभी प्रतिनिधियों ने एकमत से स्वीकार की हैं
साधना-पुरुषार्थ सम्पन्न होगा एवं इस पूरे साधना -पराक्रम का समापन एक विराट महापूर्णाहुति के माध्यम से संपन्न होगा जिनने प्रथम महापूर्णाहुति जो आराध्य गुरुसत्ता की जन्मस्थली आँवलखेड़ा में नवम्बर 1995 में सम्पन्न हुई, देखी है, वे जानते है कि कितनी बड़ी जनशक्ति उस समय एकजुट हुई थी व उनने आगामी पाँच वर्षों में मिशन के प्रकाश को विश्वभर में फैलाने के लिए स्वयं को संकल्पित किया था। तब से मिशन ओर अधिक विस्तृत हुआ हैं व आगामी दो वर्षों में इसमें अनेकानेक वर्गों के समाविष्ट होने की संभावनाएँ है। ऐसी स्थिति में कल्पना की जा सकती है कि इस महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति जिसकी उपमा परमपूज्य गुरुदेव ने किसी और समागम से न करते हुए इस भारतभूमि के कोने-कोने से संपन्न किए जाने की बात लिखी है, कितनी विराटतम होगी। इसे निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य से भरे सतयुग की स्वागत -अगवानी वाला एक आयोजन सारे विश्वभर में माना जाएगा।
साधना के साथ यदि मनोवृत्तियों को आत्मचिन्तन में लगा दिया जाय तो आध्यात्मिक आनन्द का एक निर्झर झरने लगता है, जिसके रसास्वादन की अनुभूति भुक्तभोगी ही जानते है। अरुणाचल के महान संत महर्षि रमण के बारे में विख्यात है कि वे सदैव मौन रहते थे और मौन रहते हुए भी निकट आने वालों की शंकाओं का समाधान करते थे। उनकी सिद्धावस्था असंदिग्ध एवं अद्वितीय थी। उनके अनुसार भाषण से व्यक्तियों का बिना उनका सुधार किये कुछ घंटे मनोरंजन हो सकता है, जबकि मौन स्थायी वस्तु है तथा मानवता के लिए कल्याणकारी है। मौन एक तरह का अनन्त भाषण हैं प्राचीनकाल के ऋषि अपने शिष्यों को मौन द्वारा ही उपदेश किया करते थे।
साधनाकेन्द्र इसी को बनाए रख शेष सारी गतिविधियों नए विस्तार में विकेन्द्रित किये जाने की बात सूत्र−संचालक सत्ता के सभी प्रतिनिधियों ने एकमत से स्वीकार की हैं
साधना के लिए परमपूज्य गुरुदेव -श्री अरविन्द व रमण महर्षि की परम्परा में ही निरन्तर तप करते रहे एवं सभी को साधना में निरत होने की प्रेरणा सत्त देते रहे। चरित्रहीन, अराजकता एवं अधः पतन के अंधकार भरे युग में जी रहे मानव -पुरुषार्थ ही। त्याग-उत्सर्ग बलिदान की परम्पराएँ जब समाप्त हो गयी हों, भोग-विलास ही चारों ओर संव्याप्त हो-साधक परम्परा पुनः जिन्दा कर उनकी संख्या द्रुतगति से बढ़ाना ही आज का युगधर्म हैं राष्ट्रीय चरित्र का विकास इसी धुरी पर होगा एवं यही भारतवासियों के आत्मबल में वृद्धि करेगा। यह आत्मबल का विकास संयम को साधने से व योग को जीवन के हर पक्ष में उतारने पर ही संभव हैं अपने देश को जगद्गुरु इसी तपोबल की निधि के आधार पर कहा जाता था। जब से तप की वह निधि कम होती चली गयी- जड़ें खोखली होती चली गयीं एवं हम गुलामी के शिकार हो अंधकार युग में चले गए।
साधना-तपश्चर्या करे तो ही हम दर्शन देंगे। इतना कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
साधना वर्ष घोषित किया गया है। इस अवधि में राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में, चप्पे-चप्पे में गायत्री के अखण्ड जप के रूप में उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में विराट साधना-पुरुषार्थ सम्पन्न होगा एवं इस पूरे साधना -पराक्रम का समापन एक विराट महापूर्णाहुति के माध्यम से संपन्न होगा जिनने प्रथम महापूर्णाहुति जो आराध्य गुरुसत्ता की जन्मस्थली आँवलखेड़ा में नवम्बर 1995 में सम्पन्न हुई, देखी है, वे जानते है कि कितनी बड़ी जनशक्ति उस समय एकजुट हुई थी व उनने आगामी पाँच वर्षों में मिशन के प्रकाश को विश्वभर में फैलाने के लिए स्वयं को संकल्पित किया था। तब से मिशन ओर अधिक विस्तृत हुआ हैं व आगामी दो वर्षों में इसमें अनेकानेक वर्गों के समाविष्ट होने की संभावनाएँ है। ऐसी स्थिति में कल्पना की जा सकती है कि इस महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति जिसकी उपमा परमपूज्य गुरुदेव ने किसी और समागम से न करते हुए इस भारतभूमि के कोने-कोने से संपन्न किए जाने की बात लिखी है, कितनी विराटतम होगी। इसे निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य से भरे सतयुग की स्वागत -अगवानी वाला एक आयोजन सारे विश्वभर में माना जाएगा।
साधना प्रक्रियाओं से गुजर कर चेतना के पश्यन्ति और परा तल तक पहुँचने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी और उस प्रयोजन को उच्चस्तरीय एवं परिष्कृत कम्प्यूटरों के माध्यम से पूरा किया जा सकेगा।
साधना-वर्ष किस रूप में, किस स्तर पर सभी वर्गों द्वारा मनाया जाना चाहिए।
साधना वर्ष विशेषांक एक विलक्षण वसंत पर्व की पूर्व वेला में दैवी संदेश के रूप में लिखा गया हैं। जैसा कि बहुत से परिजन जानते हैं, आज से प्रायः तीस वर्ष पूर्व 1969 में परमपूज्य गुरुदेव ने एक ऐतिहासिक युगांतरकारी घटना के माध्यम से परिवर्तन आने की भविष्यवाणी इसी वसंत के दिन के लिए व्यक्त की थी। इस वर्ष भी वसंत पर्व 22 जनवरी को था। इस वर्ष भी यह 22 जनवरी को ही आ रहा हैं साधना वर्ष विशेषांक तो वसन्तपर्व सम्पन्न हो जाने के बाद ही सबके पास पहुँचेगा, किंतु तब तक स्थान-स्थान पर अखण्ड जप प्रधान उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के साधना प्रधान आयोजन संपन्न होने लगेंगे। यह ऐतिहासिक वेला में है, जिसमें मिशन ही नहीं, सारा विश्व एक विलक्षण मोड़ से गुजरेगा।
साधना में निरत होने की प्रेरणा सत्त देते रहे। चरित्रहीन, अराजकता एवं अधः पतन के अंधकार भरे युग में जी रहे मानव -पुरुषार्थ ही। त्याग-उत्सर्ग बलिदान की परम्पराएँ जब समाप्त हो गयी हों, भोग-विलास ही चारों ओर संव्याप्त हो-साधक परम्परा पुनः जिन्दा कर उनकी संख्या द्रुतगति से बढ़ाना ही आज का युगधर्म हैं राष्ट्रीय चरित्र का विकास इसी धुरी पर होगा एवं यही भारतवासियों के आत्मबल में वृद्धि करेगा। यह आत्मबल का विकास संयम को साधने से व योग को जीवन के हर पक्ष में उतारने पर ही संभव हैं अपने देश को जगद्गुरु इसी तपोबल की निधि के आधार पर कहा जाता था। जब से तप की वह निधि कम होती चली गयी- जड़ें खोखली होती चली गयीं एवं हम गुलामी के शिकार हो अंधकार युग में चले गए।
साधना की ओर बढ़ना चाहिए। मौनव्रत के विश्राम काल में साधक को इतना अवसर मिल जाता है। कि वह अपने पिछले अनगढ़ विचारों को आदतों को सुधार सके और भावी कार्यकाल में उसे योजनाबद्ध तरीके से नियोजित कर सके।
साधना-प्रयोजन के लिए जिह्वा के माध्यम से जो कुछ किया गया है, वह सभी निरर्थक चला जाएगा।
साधना-उपचार का उद्देश्य है।
साधना से सूक्ष्मजगत का परिशोधन कैसे होगा, इस विस्तार के साथ दैवी पुरुषार्थ से सामूहिक पापों के प्रक्षालन की प्रक्रिया भी स्पष्ट की जाएगी।
साधनाओं की सफलता-असफलता का बहुत कुछ आधार इसकी सुसंस्कारिता पर निर्भर करता है। इसे सुसंस्कृत बनाना जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ समझा जा सकता है। यदि यह बन पड़े तो जन नेतृत्व से लेकर शासन-सत्ता पर अधिकार करने, परायों को अपना बना लेने में सफलता मिलती है। यह कार्य कठिन भी है और सरल भी। कठिन इसलिए कि आदत और अभ्यास कई बार उसे अनगढ़ बना देते हैं, तब उसे काबू में लाना कठिन पड़ता है चटोरापन सवार हो तो समझना चाहिए कि स्वास्थ्य चौपट हुआ।
साधना-अभ्यासों में चक्र-जागरण के क्रम में सबसे पहले उसे जागने का विधान हैं।
साधनाओं की लम्बी प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है, तब जाकर उसमें अतीन्द्रिय ज्ञान का उदय होता है। अब जब वैसी विभूतियाँ उपकरणों के माध्यम से अभिव्यक्त होने लगें, तो इसे पदार्थसत्ता का मानवीचेतना पर आँशिक विजय ही कहनी पड़ेगी। यह विजय भाषा या वाणीतल पर भी देखी जा सकती है।
साधनाओं का आश्रय लिया और जीवन को तपोमय बनाकर कठोर तपस्या आरम्भ कर दी।
साधनाओं से मिल सकती है।
साधना वर्ष विशेषांक ‘ के रूप में
साधनावधि का प्रतिदिन थोड़ी देर तक अभ्यास करने से अपना वैराग्य और ईश्वरप्राप्ति का भाव दृढ़ होता है, यह अभ्यास कोई भी अपनी सुविधानुसार कर सकता है। जानकारी के लिये दो अभ्यास नीचे दिये जा रहे है।
साधना-उपचार समयक्षेप करने वाले कवायद भर बनकर रह जाते है। ऐश्वर्य को पा के लिए स्वयं को अनश्वर के समकक्ष साबित करना पड़ता है। इससे कम में आत्मिक विभूतियाँ न तो किसी को मिली है, न मिलने वाली है।
साधना-सत्रों के शिविरार्थी- गणों को शाँति से साधना करने के निमित्त ही इसे बनाया गया था। परंतु आज इसी परिसर में सभी तरह की रचनात्मक, संगठनात्मक, सुधारात्मक गतिविधियाँ भी संचालित हो रही है। नयी भूमि के क्रय किये के बाद साधनाकेन्द्र इसी को बनाए रख शेष सारी गतिविधियों नए विस्तार में विकेन्द्रित किये जाने की बात सूत्र−संचालक सत्ता के सभी प्रतिनिधियों ने एकमत से स्वीकार की हैं
साधना के योगस्थ होना संभव नहीं। जीवन-दर्शन जब तक योगी स्तर की नहीं बनेगा, कोई भी साधना सफल नहीं मानी जा सकती। गायत्री अपने में परिपूर्ण योग हैं यदि महाशक्ति त्रिपदा के तीनों सूत्रों को भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग के रूप में आत्मसात् कर जीवन वैसा बना लिया जाय तो राष्ट्र का कायाकल्प बहुत दूर नहीं। इस सम्मेलन में सभी ने इस तथ्य पर जोर देते हुए साधना वर्ष को अपने प्रखरतम रूप में उसी प्रचण्ड भाव से हर हिस्से में, दक्षिण के भी कोने-कोने में, पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर भारत के भी चप्पे-चप्पे में मनाए जाने का संदेश ग्रहण व सम्प्रेषित किया है। ये इसी रूप में सम्पन्न होगा भी, इसमें किसी भी प्रकार का संदेह नहीं है।
साधना। तब फिर हम क्यों झिझकें, क्यों संकोच करें, क्यों सोच-विचार में समय गँवाए, इसके लिए हमें बाहरी साधन तो चाहिए नहीं, सब कुछ अन्तःकरण की गहराइयों से ही तो निकालना है। तो दें चिन्तन को विराम और प्रारम्भ करें ‘निजत्व के निखार की अनूठी साधना।
साधना के साथ अभूतपूर्व क्राँति परिवर्तनों से भरी इस वेला में इस अंक का स्वाध्याय सभी को वह लाभ प्रदान करेगा, जिसकी कि महाकाल को अपेक्षा है। इस विशेषांक को अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने -पढ़ाने का पुण्य कितना होगा, यह लिखने की नहीं स्वयं समझने-आत्मसात् करने का प्रसंग है।
साधना-विज्ञान के आचार्यों का मत है कि आज्ञाचक्र का जो स्थान है, वहाँ इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियाँ मिलती है तथा एक प्रवाह के रूप में चेतना के सर्वोच्च केन्द्र सहस्रार तक पहुँचती है। यह मिलन त्रिवेणी संगम की तरह है। संगम की महिमा का बखान करते हुए शास्त्रों में कहा गया है। कि जो इसमें अवगाहन करते है, उनका कायाकल्प हो जाता है, वे बाहर से भले ही ज्यों-के-त्यों दीखें, उनका अन्तर्गत पूरी तरह परिवर्तित होता है।
साधना-ज्ञानयोग एवं आराधना-कर्मयोग हमारे जीवन में समाविष्ट नहीं होती, स्थिति और भी विषम ही होती चली जाएगी एवं सुख -चैन दूभर ही रहेगा। परमपूज्य गुरुदेव जो राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रत्यक्ष साक्षी रहे, इस तथ्य को जानते थे कि सदियों से गुलाम रहा यह देश जब अंकुश हटने पर उदारीकरण की हवा लगेगी तो गड़बड़ा सकता हैं इसीलिए उनने राष्ट्र को समर्थ-समृद्ध व सशक्त बनाने के लिए राष्ट्र के नागरिकों को एक श्रेष्ठ साधक के रूप में निखरने हेतु अनेकानेक उपचारों का प्रावधान किया, गायत्री को सार्वजनीन बनाया एवं यज्ञीय तत्त्वदर्शन के विश्वभर में विस्तार द्वारा सत्कर्म व पर्यावरण -संशोधन की प्रक्रिया को परिपूर्णता तक पहुँचाया। प्रस्तुत साधना महापुरश्चरण राष्ट्र के साँस्कृतिक पुनर्जागरण हेतु अनिवार्य माना जा सकता है व समय की विषमता से जूझने हेतु एक आध्यात्मिक महापुरुषार्थ भी। यह भी एक प्रसन्नता की ही बात मानी जानी चाहिए कि इस प्रखर साधना पराक्रम के शुरुआती दीप प्रज्ज्वलन के रूप में पिछले दिनों गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में एक अन्तर्राष्ट्रीय योगसम्मेलन भी सफलता-पूर्वक आयोजित हो कर इस उपक्रम का शानदार शुभारम्भ हो चुका है।
साधना अंक का जिनने स्वाध्याय किया है, उन्हें पूरक के रूप में फरवरी 99 का साधना वर्ष विशेषांक पढ़ने को मिलेगा। इस पूरे अंक को इसी उद्देश्य विशेष के लिए तैयार किया गया है कि साधना-वर्ष किस रूप में, किस स्तर पर सभी वर्गों द्वारा मनाया जाना चाहिए।
साधनाओं का अभ्यास कर सकता है।
साधनाकाल के आरंभिक दिनों से ही योगाभ्यासियों को आकर्षणों के प्रति तीव्र वैराग्य, अनासक्ति और निर्लिप्तता का परिचय देते हुए कठोर आत्मसंयम का अभ्यास करना पड़ता है।
साधनात्मक प्रक्रिया का सम्बन्ध है, इस क्षेत्र में भक्त को बड़ा ओर भगवान को छोटा माना जाएगा, क्योंकि अकसर भक्त के संकेतों पर भगवान को चलते हुए देखा गया हैं
साधनावर्ष की अनूठी संक्रान्तियों का युगानुकूल प्रस्तुतीकरण भी इस विशेषांक में होगा। निश्चित ही प्रखर प्रचण्ड तप−साधना के साथ अभूतपूर्व क्राँति परिवर्तनों से भरी इस वेला में इस अंक का स्वाध्याय सभी को वह लाभ प्रदान करेगा, जिसकी कि महाकाल को अपेक्षा है। इस विशेषांक को अधिकाधिक व्यक्तियों तक पहुँचाने -पढ़ाने का पुण्य कितना होगा, यह लिखने की नहीं स्वयं समझने-आत्मसात् करने का प्रसंग है।
साधना -पराक्रम का समापन एक विराट महापूर्णाहुति के माध्यम से संपन्न होगा जिनने प्रथम महापूर्णाहुति जो आराध्य गुरुसत्ता की जन्मस्थली आँवलखेड़ा में नवम्बर 1995 में सम्पन्न हुई, देखी है, वे जानते है कि कितनी बड़ी जनशक्ति उस समय एकजुट हुई थी व उनने आगामी पाँच वर्षों में मिशन के प्रकाश को विश्वभर में फैलाने के लिए स्वयं को संकल्पित किया था। तब से मिशन ओर अधिक विस्तृत हुआ हैं व आगामी दो वर्षों में इसमें अनेकानेक वर्गों के समाविष्ट होने की संभावनाएँ है। ऐसी स्थिति में कल्पना की जा सकती है कि इस महापुरश्चरण की महापूर्णाहुति जिसकी उपमा परमपूज्य गुरुदेव ने किसी और समागम से न करते हुए इस भारतभूमि के कोने-कोने से संपन्न किए जाने की बात लिखी है, कितनी विराटतम होगी। इसे निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य से भरे सतयुग की स्वागत -अगवानी वाला एक आयोजन सारे विश्वभर में माना जाएगा।
साधना वर्ष इस दिशा में निश्चित ही महत्वपूर्ण स्थापनाएँ करेगा। बिना साधना के योगस्थ होना संभव नहीं। जीवन-दर्शन जब तक योगी स्तर की नहीं बनेगा, कोई भी साधना सफल नहीं मानी जा सकती। गायत्री अपने में परिपूर्ण योग हैं यदि महाशक्ति त्रिपदा के तीनों सूत्रों को भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग के रूप में आत्मसात् कर जीवन वैसा बना लिया जाय तो राष्ट्र का कायाकल्प बहुत दूर नहीं। इस सम्मेलन में सभी ने इस तथ्य पर जोर देते हुए साधना वर्ष को अपने प्रखरतम रूप में उसी प्रचण्ड भाव से हर हिस्से में, दक्षिण के भी कोने-कोने में, पूर्वोत्तर व पश्चिमोत्तर भारत के भी चप्पे-चप्पे में मनाए जाने का संदेश ग्रहण व सम्प्रेषित किया है।
साधना है- निजत्व के निखार की साधना। तब फिर हम क्यों झिझकें, क्यों संकोच करें, क्यों सोच-विचार में समय गँवाए, इसके लिए हमें बाहरी साधन तो चाहिए नहीं, सब कुछ अन्तःकरण की गहराइयों से ही तो निकालना है। तो दें चिन्तन को विराम और प्रारम्भ करें ‘निजत्व के निखार की अनूठी साधना।
साधना महापुरश्चरण राष्ट्र के साँस्कृतिक पुनर्जागरण हेतु अनिवार्य माना जा सकता है व समय की विषमता से जूझने हेतु एक आध्यात्मिक महापुरुषार्थ भी। यह भी एक प्रसन्नता की ही बात मानी जानी चाहिए कि इस प्रखर साधना पराक्रम के शुरुआती दीप प्रज्ज्वलन के रूप में पिछले दिनों गायत्रीतीर्थ शाँतिकुँज हरिद्वार में एक अन्तर्राष्ट्रीय योगसम्मेलन भी सफलता-पूर्वक आयोजित हो कर इस उपक्रम का शानदार शुभारम्भ हो चुका है।
साधना वर्ष विशेषांक तो वसन्तपर्व सम्पन्न हो जाने के बाद ही सबके पास पहुँचेगा, किंतु तब तक स्थान-स्थान पर अखण्ड जप प्रधान उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के साधना प्रधान आयोजन संपन्न होने लगेंगे। यह ऐतिहासिक वेला में है, जिसमें मिशन ही नहीं, सारा विश्व एक विलक्षण मोड़ से गुजरेगा।
साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा कि उसी तुलना अब तक के किसी भी विशालतम समागत से भी न की जा सकें ‘ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा ये पंक्तियाँ आज से 10 वर्ष 4 माह पूर्व अक्टूबर, 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखी गयी थी। युगसंधि की विषम वेला में उनने इस साधना को प्रत्येक के लिए अनिवार्य बताते हुए उसके भागीदारों की संख्या समापन होते-होते प्रायः चौबीस करोड़ से भी अधिक होने की बात कही थी।
साधना ग्रन्थों में इसके पीला, हल्का भूरा तथा स्लेटी कई रंग बताये गए है। इसके बीजमंत्र ‘हं’ और ‘क्षं’ है, जो क्रमशः बायीं एवं दायीं पंखुड़ियों पर अंकित है। ये चमकीले श्वेत रंग के होते है। इनमें से एक चन्द्रमा अथवा इड़ा नाड़ी का एवं दूसरा सूर्य या पिंगला नाड़ी का प्रतीक है।
साधना प्रारम्भ की। परन्तु ससुराल में सभी स्वजनों के काल-कवलित हो जाने की वजह से उसने पीहर में पिता का आश्रय लिया। दुर्भाग्यवश यहाँ भी एक-एक करके सब चल बसे। भगवान की ऐसी लीला का भेद कर्मठीबाई नहीं समझ पायी। अन्त में सन्त हरिदास जी ने उसे समझाया कि भगवान श्रीकृष्ण अनाथों के नाथ है और निराधारों के आधार हैं।
साधना के नियोजन के रूप में एक दिव्य महापुरश्चरण सन्निकट का आश्विन नवरात्र से शाँतिकुँज में आरंभ किया गया है। नाम है ‘युगसंधि महापुरश्चरण ‘। शाँतिकुँज हरिद्वार से संचालित यह पुण्य आयोजन सारे भारत व विश्व में सन् 2000 तक चलता रहेगा, इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही उसकी पूर्णाहुति होगी, जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा कि उसी तुलना अब तक के किसी भी विशालतम समागत से भी न की जा सकें ‘ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा ये पंक्तियाँ आज से 10 वर्ष 4 माह पूर्व अक्टूबर, 1988 की अखण्ड ज्योति में लिखी गयी थी। युगसंधि की विषम वेला में उनने इस साधना को प्रत्येक के लिए अनिवार्य बताते हुए उसके भागीदारों की संख्या समापन होते-होते प्रायः चौबीस करोड़ से भी अधिक होने की बात कही थी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-September
साधना सफल हुई मानी जाती है
साधना में संलग्न रहना है, जिसे भगीरथ ने अपनाया और धरती पर स्वर्गस्थ गंगा का अवतरण संभव कर दिखाया था। महामानवों के जीवन में कहीं कोई विराम नहीं होता। वे निरंतर अनवरत गति से शरीर छूटे तक चलते ही जाते हैं। इतने पर भी लक्ष्य पूरा न होने पर जन्म-जन्मान्तरों तक उसी प्रयास में निरंतर रहने का संकल्प संजोये रहते हैं। इसी परंपरा का निर्वाह उन्हें भी करना है जिन्हें अपनी प्रतिभा निखारनी और निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में अनुकरणीय-अभिनंदनीय उपलब्धियाँ कमानी हैं।
साधना वर्ष वसंत पर्व २२ प्रायः सात माह पूरा होने को आ रहे हैं। अब महापूर्णाहुति वर्ष १० फरवरी २०००(वसंत पंचमी) से आरंभ होने जा रहा हैं। इस गुरु पर्व पर हम एक के उत्तरार्द्ध एवं दूसरे की पूर्व तैयारी के संधिस्थल पर खड़े हैं। एक ऐतिहासिक महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कैसे-क्या होने जा रही है, यह सबके लिए एक कुतूहल का विषय हो सकता है। इस संबंध में बड़ा ही स्पष्ट चिंतन एवं एक सुनिश्चित लक्ष्य पूज्यवर हमारे समक्ष रख गए हैं।
साधना वर्ष व पूर्णाहुति वर्ष की मिलन वेला में आया है एवं हमें सोचने पर विवश करता है कि इस अग्निपरीक्षा में-तप-साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर १९८८ की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है।
साधना के उग्र तपश्चर्या परक बारह वर्षीय उत्तरार्द्ध वाले एक विश्वव्यापी महाअनुष्ठान के रूप परिवर्धित हुए इस उपक्रम की घोषणा परमपूज्य गुरुदेव द्वारा आश्विन नवरात्रि १९८८ को की गई थी। अब उस महापुरश्चरण की अंतिम समापन घड़ियाँ आ पहुँची हैं। यह सारी अवधि सारी मानवजाति के लिए प्रतिकूलताएँ झेलते हुए अग्नि परीक्षा की तरह बीती हैं। इस सदी का अंतिम गुरुपूर्णिमा पर्व भी इस महापुरश्चरण के साधना वर्ष व पूर्णाहुति वर्ष की मिलन वेला में आया है एवं हमें सोचने पर विवश करता है कि इस अग्निपरीक्षा में-तप-साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं।
साधना वर्ष में संकल्पित कर लेते हैं। जिनने ४८ साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधना में सुख भी छोड़ने पड़ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी सहन करनी पड़ती है, परंतु सेवासाधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तपसाधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधना वर्ष के शुभारंभ तक ४०० को पार कर गई के द्वारा भारतीय संस्कृति के निर्धारण प्रायः चार करोड़ से अधिक सामान्यजनों तक जो गाँव-शहरों-महानगरों में रहते थे, पहुँचे। प्रखर साधना वर्ष वसंत पर्व २२ प्रायः सात माह पूरा होने को आ रहे हैं। अब महापूर्णाहुति वर्ष १० फरवरी २०००(वसंत पंचमी) से आरंभ होने जा रहा हैं। इस गुरु पर्व पर हम एक के उत्तरार्द्ध एवं दूसरे की पूर्व तैयारी के संधिस्थल पर खड़े हैं। एक ऐतिहासिक महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कैसे-क्या होने जा रही है, यह सबके लिए एक कुतूहल का विषय हो सकता है।
साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधनाएँ की। विभिन्न चरणों से गुजरते हुये इक्कीस दिन के एक उपवास अनुष्ठान के बाद उनमें स्पर्श से रोग ठीक करने की सामर्थ्य प्रकट हुई। पहली बार उन्होंने छोटे से होटल के मालिक की पौत्रि का इलाज किया। उस लड़की की दाँतों में असह्य कष्ट था। और दोनों जबड़े सुखे हुये थे।
साधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तप-साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधना वर्ष की समापन की समापन की अवधि व महापूर्णाहुति की तैयारी में संलग्न परिजनों का निश्चित ही समाधान करेगा, उनके मनोबल को ऊँचा उठायेगा। इससे पूर्व जुलाई १९६१ में लिखे पूज्यवर के लिखे एक लेख प्रतिष्ठापना होनी ही है’, (पृष्ठ ६०) के कुछ अंश उद्धत हैं।
साधना पद्धति भी है। जीवन क्रम को व्यवस्थित करने पर ध्यान देने के अलावा रेकीप्रक्रिया कुछ बाहरी उपायों का भी प्रयोग करती हैं। इन दिनों बाहरी उपायों से ही लोग ज्यादा परिचित हैं। योग के आठ अंगों में जैसे आसन, प्राणायाम और ध्यान तीन ही मुख्य हो गए हैं। यम, नियम,प्रत्याहार धारणा की विशेष चर्चा नहीं की जाती उसी तरह रेकी में पाए सिद्धान्तों और आत्म सुधार आदि की चर्चा प्रायः नहीं होती।
साधना प्रधान अनुष्ठान ने क्या वह उद्देश्य पूरा किया, जिस प्रयोजन के लिए इसे आरंभ किया गया था। अभी वह अभियान कसौटी की अवधि पूरी भी नहीं हुई है, आगामी कुछ परीक्षा की घड़ियाँ लिए डेढ़-दो वर्ष हमारे सामने हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने तब अक्टूबर १९८८ की अखण्ड ज्योति में लिखा था- यह एक लंबा संग्राम है। संभवतः प्रस्तुत परिजनों के जीवन भर चलते रहने वाला। इक्कीसवीं सदी आरंभ होने में अभी दस वर्ष से भी अधिक समय शेष है।
साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधना के साथ-साथ निरंतर मोर्चे पर लड़ते रहने वाले सैनिक के रूप में परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम ‘मत्त’ जी ने निष्कर्ष आजादी के २४ वर्ष बाद दिए, निश्चित ही उसके पीछे उनके जीवन के ४५ महत्त्वपूर्ण वर्षों कि गहन चिंतन एवं द्रष्टा स्तर की शक्ति ही थी वे लिखते हैं कि “दूसरे सैनिकों ने अपनी वर्दियाँ उतार दीं और राजमुकुट पहन लिए, पर अपने लिए आजीवन उस चिंतन-लक्ष्य की ओर चलते रहना ही धर्म बन गया है, जिसके ऊपर राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता निर्भर है। हमार विश्वास है कि बौद्धिक क्राँति की त्रिवेणी बहाए बिना तीर्थराज न बनेगा और उसमें स्नान किए बिना हमारे पाप ताप न कटेंगे। जन जागरण और लोकमानस में उत्कृष्टता आदर्शवादिता का बीजांकुर बोया जाना वस्तुतः इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभिनव प्रयोग हैं हम इसी दूरगामी परिणाम वाली प्रक्रिया को हाथ में लेकर धर्म, साहस, निश्चय और प्रबल पुरुषार्थ के सहारे आगे बढ़ रहे हैं।
साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधना हेतु ही इस विषम वेला में एक सामूहिक उसकी समापन घड़ियाँ हमारे सामने हैं। सारा मार्गदर्शन जो १९८८ से १९९० तक लिखे पूज्यवर के अमृतवचनों के माध्यम से मिलता है-वह एक ही धूरि पर घूमता है। “प्राणवान प्रतिभाओं का परिष्कार उनके माध्यम से युगपरिवर्तन रूपी दैवी प्रयोजन पूरा किया जाना।” इसके लिए उनने साधना की धुरी पर दो मोर्चे आरंभ किए जाने की बात कही थी-पहला-आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारना और एक परिकर, एक सूत्र में संबद्ध करना, साथ ही कुछ नियमित-सृजनात्मक गतिविधियों का आरंभ होना, जो सद्विचारों को सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका निभा सकें। दूसरा-अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जाना।
साधना की मनोभूमि में स्थिर हो सके। उस मन स्थिति में पहुँचने के बाद गति सहज हो जाती है। डॉ. काजिंस इस पद्धति के अध्यात्म पक्ष को स्पष्ट करते हुए स्प्रिचुअल न्यूटशन एड रेनबोडाइट में लिखते हैं- मानवीय चेतना सूक्ष्म पारदर्शी स्फटिकों से निर्मित है। ध्यान की गहन अवस्था में इन स्फटिक कणों को स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। ये स्फटिक स्थूल और तरल कणों से बने हैं जो निरंतर प्रवाहित होते रहते हैं।
साधना की धुरी पर दो मोर्चे आरंभ किए जाने की बात कही थी-पहला-आदर्शवादी सहायकों में उमंगों को उभारना और एक परिकर, एक सूत्र में संबद्ध करना, साथ ही कुछ नियमित-सृजनात्मक गतिविधियों का आरंभ होना, जो सद्विचारों को सत्कार्यों में परिणत कर सकने की भूमिका निभा सकें। दूसरा-अनीति विरोधी मोर्चा खड़ा किया जाना। उसे एक प्रयास से आरंभ कर विशाल-विकराल बनाया जाना।
साधना वर्ष में स्वयं को परिपक्वता के शिखर तक पहुँचाएँगे एवं अपने को दस से अधिक व्यक्तियों के रूप में बहुगुणित कर महापूर्णाहुति के निमित्त दो करोड़ साधकों के एक विराट जाग्रत संगठन के रूप में प्रस्तुतीकरण कर सकेंगे। ऐसे बीस लाख परिजन भी यदि हम इस प्रखर साधना वर्ष में संकल्पित कर लेते हैं। जिनने ४८ साधना केंद्रों के माध्यम से स्वयं को जोड़ा है या अगले दिनों जुड़ सकते हैं तो यह लक्ष्य हम पूरा कर सकेंगे। वस्तुतः यह साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन का वर्ष हैं एवं निश्चित ही पूज्यवर द्वारा घोषित संधिवेला की प्रखरतम अग्निपरीक्षा का भी वर्ष है।
साधना में सुख भी छोड़ने पड़ सकते हैं, कठिनाइयाँ भी सहन करनी पड़ती है, परंतु सेवा-साधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तप-साधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधना रूपी इस तप की वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत बड़ी भूमिका है, यह हमारी गुरुसत्ता हमें बारबार समझाकर चली गई। उनने कहा कि इस तपसाधना से विरत होना तमोगुणी बनने की तरह है- महाभारत से दूर भागने की तरह है। स्वधर्म से आचरण-लोकसेवा में अपनी विभूतियों का सुनियोजन, युगधर्म का परिपालन- इसी प्रसंग पर द्वितीय अध्याय पर और आगे की विवेचना अगले अंक में।
साधनात्मक पुरुषार्थ में जुटे रहना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-March
साधना की सिद्धि तथा तत्त्वज्ञान।
साधनासन्न किये हो, यदि कुछ विशेष अनुदान पाना है- ऋषियुग्म की सत्ता का विशिष्ट सूक्ष्म मार्गदर्शन पाना है, तो यह अवसर महापूर्णाहुति की पूर्व बेला में अपने आप में एक विलक्षण अनुग्रह के रूप में आया है। मार्च के अंतिम सप्ताह में 26 मार्च, 1999 से आरंभ प्रतिमास पाँच-इस प्रकार कुल पच्चीस ये सत्र 30 जुलाई तक चलेंगे। इस वर्ष 28 जुलाई की गुरुपूर्णिमा है। इसके बाद ही इस युग की महापूर्णाहुति की विशिष्ट तैयारियाँ आरंभ हो जाएँगी, जिनका विस्तार अगले अंक में परिजन पढ़ सकेंगे। आत्मशक्ति के संवर्धन एवं अपने आँतरिक जीवनक्रम को देवमानव के स्तर तक पहुँचाने हेतु अभूतपूर्व अवसर लेकर आया है यह प्रखर साधना वर्ष।
साधना में माला की आवश्यकता, ब्रह्मसंध्या।
साधना की ओर गतिशील करने के लिए दिया गया एक सत्परामर्श है। आज के बहिर्मुखी चिन्तन करने वाले मानव, भटकावों में ले जाने वाली गतिविधियों में संलग्न साधक के लिए एक मार्गदर्शन है, जो विराट गायत्री परिवार के संस्थापक -संरक्षक ने 1940 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका के जून अंक में संपादकीय के रूप में लिखा था। पढ़ें व आत्मचिन्तन करें।
साधना से सद्बुद्धि, सविता का अनुदान प्राणशक्ति के रूप में।
साधनात्मक पराक्रम द्वारा अपने को अन्तःकरण की प्रगति की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित कर देना। ऐसा मानवी पुरुषार्थ दैवी सुयोग्यों के कारण बड़ी शीघ्रता से संपन्न होने-बड़ी उमंगों के साथ कठिनाइयाँ सहते हुए भी प्रसन्न रहकर करने का कभी-कभी अवसर आता है। ऐसे अवसरों को ही अवतारी चेतना के प्रवाह के प्रकटीकरण का समय कहा गया है। जब यह पुरुषार्थ समष्टिगत पुरुषार्थ में बदल जाय तो मानना चाहिए कि यह दैवी आकांक्षा का ही प्रतिफल है कि कइयों के मनों में तप व योग को साधते हुए आँतरिक उत्कृष्टता की अभिवृद्धि करने का बढ़चढ़कर कुछ करने का ज्वार-सा आ रहा है। निष्कलंक प्रज्ञावतार के प्रकटीकरण की वेला में करोड़ों व्यक्तियों द्वारा अपनी साधना का समष्टि हेतु नियोजन, असंख्यों देवमानवों के सृजन, उनके अंदर वैसी प्रवृत्तियों के उभरने जैसी परिणति के रूप में निकलता यदि आज दृष्टिगोचर हो रहा है, तो यह अकारण नहीं है।
साधना से वह पथ-प्रशस्त होता है, जिससे मानवीकाया में सन्निहित विशेषताओं को उभारना और उपयोग में लाना संभव हो सके। कहना न होगा कि यदि निष्ठापूर्वक इसके लिए प्रयास किया जाए तो कोई भी व्यक्ति उतनी प्रगति कर सकता है, जितनी कि भूतकाल में किसी ने की है। इतना ही नहीं, भविष्य की संभावनाएँ तो भूतकाल की सफलताओं की अपेक्षा और भी अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं।
साधना वर्ष। जितना अधिक इस वेला के एक-एक क्षण का जो सुनियोजन-सदुपयोग कर पाएगा, वह उतना ही श्रेय का अधिकारी बन सकेगा। लाखों वर्षों में ऐसे अवसर विरले ही कभी आते हैं। बड़भागी होंगे वे, जो इस अवधि को आपाधापी, धींगामुश्ती, पारस्परिक-द्वन्द्व मतभेद, मतभेदों वाली नर पामर वाली स्थिति में न गंवाकर ऊँचा उठते हुए देवमानव वाली जीवन शैली को अंगीकार कर युगसाधक बन सकेंगे। जमाना उन्हें शीश नवायेगा-देवता पुष्प बरसायेंगे।
साधना की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि
साधना सम्पन्न किये जाने पर गायत्री उसे वह सब कुछ दे देती है, जो सद्बुद्धि पाने पर किसी को भी अभीष्ट होता है। गायत्री साधना एक सूक्ष्म विज्ञान-सम्मत प्रणाली है। अपने जीवन में गायत्री-साधना के सम्बन्ध में जानें-
साधना से श्री-समृद्धि
साधना है। मानव कौन है? मानव का अर्थ है- वे व्यक्ति, जिन्हें पारिवारिकता और सामाजिकता के साथ जुड़े हुए अनुबन्धों के प्रति विश्वास है-परिपालन का साहस है। जो परब्रह्म की छत्रछाया में जीकर मानवी आदर्शों को आत्मसात् करने का अवसर प्राप्त कर रहे हैं। एवं अपनी ही नहीं सारे समूह, समाज, विश्ववसुधा एवं युग के नवनिर्माण की उमंगों से जिनका अन्तःकरण हुलसता रहता है।
साधना ग्रंथों’ में इसका रंग बैंगनी बताया गया है। इसके 16 पंखुड़ियाँ हैं। यह सभी यहाँ के नाड़ी-गुच्छक से संबद्ध हैं। इस षोडश दल कमल में एक वृत्त है, जो चंद्रमा की तरह धवल है। इसे आकाशतत्त्व का प्रतीक-प्रतिनिधि माना गया है।
साधना तथा कार्यक्षेत्र।
साधना क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए संचित पापकर्मों, कषाय-कल्मषों कुसंस्कारों का परिशोधन आवश्यक है। इसके लिए धर्मशास्त्रों में प्रायश्चित के अनेक विधि-विधानों का उल्लेख है। पापों के प्रायश्चित के लिए जिन तपों का शास्त्रों में वर्णन है उनमें चांद्रायण व्रत का महत्त्व सर्वोपरि है। विभिन्न शारीरिक और मानसिक स्थिति के व्यक्तियों के लिए, विभिन्न पापों के प्रायश्चितों के लिए, आत्मबल को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने के लिए विविध प्रकार के चांद्रायण व्रतों का वर्णन मिलता है। देश, काल, पात्र के भेद से भी इस प्रकार के अंतर पाये जाते हैं।
साधना वर्ष के परिप्रेक्ष्य में एक लेख यहाँ प्रस्तुत है। यह साधना की ओर गतिशील करने के लिए दिया गया एक सत्परामर्श है। आज के बहिर्मुखी चिन्तन करने वाले मानव, भटकावों में ले जाने वाली गतिविधियों में संलग्न साधक के लिए एक मार्गदर्शन है, जो विराट गायत्री परिवार के संस्थापक -संरक्षक ने 1940 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका के जून अंक में संपादकीय के रूप में लिखा था। पढ़ें व आत्मचिन्तन करें।
साधना सिखाता हूँ, सेवा के बलबूते ही लोगों को अपना बनाया जा सकता है और सब कुछ पाया जा सकता है। युवक की समझ में अपनी भूल आ चुकी थी।
साधना-उपासना को जीवन -साधना के रूप में फलित कर निज के व्यक्तित्व परिष्कार के रूप में उसे संपन्न कर दिखाना है।
साधना करने से वह प्रस्फुटित हो जाता है। ध्यान में उसके लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते हैं और चक्र के स्थान पर उससे संबंधित मातृकाओं, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों में अचानक कंपन, रोमांच, स्फुरण, उत्तेजना, दाद, खुजली जैसे अनुभव होते हैं। यह इस बात के चिह्न हैं कि चक्र का जागरण हो रहा है। एक मास या न्यूनाधिक काल में इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने लगें, ध्यान में चक्र का रूप स्पष्ट होने लगे, तो उससे आगे बढ़कर इससे नीचे की ओर दूसरे चक्र में प्रवेश करना चाहिए।
साधनाशास्त्र के मर्मज्ञों का कथन है कि बिन्दु और विशुद्धिचक्र के मध्य एक अन्य छोटा चेतना केन्द्र है। साधना-विज्ञान में इसे ‘ललना चक्र’ कहा गया है। विशुद्धिचक्र से इसका अत्यंत निकट का संबंध है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जब अमृत बिन्दु-विसर्ग से निकलना प्रारंभ करता है, तो इसका एकत्रीकरण ललना में होता है। यह अवयव नासा-ग्रन्थी (नेजो फैरिंक्स) के पीछे तालू के ऊपरी भाग के आँतरिक गड्ढे में वहाँ स्थित है, जहाँ नासिका द्वार आकर खुलता है।
साधनात्मक पराक्रम की ओर बढ़ें-जीवनशैली में परिवर्तन लाएँ-अपने प्रयास-पुरुषार्थ के साथ विवेक जोड़ें, यदि ऐसा नहीं किया तो महामरण, सामूहिक विनाश निश्चित है।
साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना।
साधना की सफलता का विज्ञान, साकार और निराकार ध्यान।
साधना में परिणत करने का एक भागीरथी पुरुषार्थ लेकर आया है। जितने भी अवतार आए हैं- उनके आने के पूर्व से बाद तक के सारे घटनाक्रम क्रमशः प्रत्यक्ष जगत में सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर होते रहे हैं। एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है। इसी तरह परमपूज्य गुरुदेव के आँवलखेड़ा स्थित साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है। आज जिस स्थिति में विश्वव्यापी गायत्री परिवार है-उसके मूल में मनुष्य का कायाकल्प कर-उसके चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना।
साधना से वाक्–सिद्धि।
साधना-विज्ञान में इसे ‘ललना चक्र’ कहा गया है। विशुद्धिचक्र से इसका अत्यंत निकट का संबंध है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जब अमृत बिन्दु-विसर्ग से निकलना प्रारंभ करता है, तो इसका एकत्रीकरण ललना में होता है। यह अवयव नासा-ग्रन्थी (नेजो फैरिंक्स) के पीछे तालू के ऊपरी भाग के आँतरिक गड्ढे में वहाँ स्थित है, जहाँ नासिका द्वार आकर खुलता है। खेचरी मुद्रा का वास्तविक उद्देश्य इसी केन्द्र को उत्तेजित करना होता है।
साधना के लिए आगे आएँगे, वे सभी इस दिशा में किये गए प्रखर पुरुषार्थ की मर्यादा से ही अपने बढ़ेंगे। जिनमें समझदारी का अंश है, उन्हें अवश्यंभावी परिवर्तन तथा उसकी आवश्यक शर्तों पर ध्यान देते हुए आज ही अपने पुरुषार्थ की सही दिशा तय कर लेनी चाहिए।
साधना द्वारा दिव्यशक्तियों का उद्भव।
साधना के सम्बन्ध में जानें-
साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं। ये पाँच दिवसीय सत्र चार माह तक गुरुपूर्णिमा के बाद तक चलेंगे। पहले कितने भी साधनासन्न किये हो, यदि कुछ विशेष अनुदान पाना है- ऋषियुग्म की सत्ता का विशिष्ट सूक्ष्म मार्गदर्शन पाना है, तो यह अवसर महापूर्णाहुति की पूर्व बेला में अपने आप में एक विलक्षण अनुग्रह के रूप में आया है। मार्च के अंतिम सप्ताह में 26 मार्च, 1999 से आरंभ प्रतिमास पाँच-इस प्रकार कुल पच्चीस ये सत्र 30 जुलाई तक चलेंगे। इस वर्ष 28 जुलाई की गुरुपूर्णिमा है।
साधना को दृष्टिगत रख लिखी गयी है। प्रायः छह अरब लोगों की इस दुनिया का भाग्य इन आगामी कुछ वर्षों में नए सिरे से लिखें जाने की शुभ घड़ी आ गयी है। ऊपर जो विभाजन दिया गया, उसमें मात्र पेट-प्रजनन की सीमा में सीमाबद्ध-पशु प्रवृत्तियों में निरत-नितान्त स्वार्थांधता व्यक्ति वे हैं जिन्हें नर पामर की नरपशु नरकीटक की संज्ञा दी गयी है। हमें नर पामर एवं नर मानव में अंतर समझना होगा एवं अधिक से अधिक व्यक्तियों करे नर मानव की परिधि में लाकर उन्हें देवत्व की दिशा में ऊँचा उठाने हेतु सामूहिक पुरुषार्थ करना होगा। यही युग-साधना है।
साधनाएँ जानने के लिए पढ़िए-
साधना सत्र के आयोजक को भाग लेने वाले साधकों से ऊँचे दर्जे का विशिष्ट नजर आना ही नहीं, होना भी चाहिए। ऐसे साधक जो स्वयं को वरिष्ठ कहते हैं-मिशन से जिनकी साझेदारी लम्बी-नहीं तो गहरे स्तर की हो चुकी है, अपनी वैयक्तिक साधना का स्तर भी ऊँचा उठाएँ। मालाओं की संख्या बढ़ाने के रूप में नहीं-अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के रूप में प्रतिभा के उन्नयन के रूप में। जितना भी जप संपन्न हो भावपूर्वक हो-गुरुसत्ता की चेतना से एकाकार होकर संपादित किया गया हो-साथ ही उनका वैचारिक सामीप्य भी पाने हेतु स्वाध्याय का सुनियोजित नियमित क्रम चल रहा हो। साधना की धुरी पर संगठन बनने का भारी दायित्व इससे कम में नहीं उठाया जा सकता।
साधना वर्ष’ के क्रम में परिजनों द्वारा अपनायी जा रही जीवन-साधना को दृष्टिगत रख लिखी गयी है। प्रायः छह अरब लोगों की इस दुनिया का भाग्य इन आगामी कुछ वर्षों में नए सिरे से लिखें जाने की शुभ घड़ी आ गयी है। ऊपर जो विभाजन दिया गया, उसमें मात्र पेट-प्रजनन की सीमा में सीमाबद्ध-पशु प्रवृत्तियों में निरत-नितान्त स्वार्थांधता व्यक्ति वे हैं जिन्हें नर पामर की नरपशु नरकीटक की संज्ञा दी गयी है। हमें नर पामर एवं नर मानव में अंतर समझना होगा एवं अधिक से अधिक व्यक्तियों करे नर मानव की परिधि में लाकर उन्हें देवत्व की दिशा में ऊँचा उठाने हेतु सामूहिक पुरुषार्थ करना होगा। यही युग-साधना है।
साधना फलित हो साधना सत्र के आयोजक को भाग लेने वाले साधकों से ऊँचे दर्जे का विशिष्ट नजर आना ही नहीं, होना भी चाहिए। ऐसे साधक जो स्वयं को वरिष्ठ कहते हैं-मिशन से जिनकी साझेदारी लम्बी-नहीं तो गहरे स्तर की हो चुकी है, अपनी वैयक्तिक साधना का स्तर भी ऊँचा उठाएँ। मालाओं की संख्या बढ़ाने के रूप में नहीं-अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के रूप में प्रतिभा के उन्नयन के रूप में। जितना भी जप संपन्न हो भावपूर्वक हो-गुरुसत्ता की चेतना से एकाकार होकर संपादित किया गया हो-साथ ही उनका वैचारिक सामीप्य भी पाने हेतु स्वाध्याय का सुनियोजित नियमित क्रम चल रहा हो। साधना की धुरी पर संगठन बनने का भारी दायित्व इससे कम में नहीं उठाया जा सकता।
साधना और कुण्डलिनी जागरण।
साधना प्रारंभ करने से पूर्व विशुद्धिचक्र का जागरण अनिवार्य होता है।
साधनात्मक पुरुषार्थ का प्रखर वेग से सूत्रपात इस दिन हुआ है। जिस पावन दिन को प्रज्ञा परिजन-अखण्ड ज्योति के पाठक वृन्द अपने सूत्र−संचालक के अध्यात्मिक जन्मदिन के रूप में मनाते रहे हैं-उस दिन से एक साथ प्रायः चौबीस हजार से अधिक स्थानों पर युगसाधना का शुभारम्भ परोक्ष जगत की ऐसी घटना है, जिसके दूरगामी परिणाम प्रत्यक्ष जगत में परिजन आगामी कुछ दिनों-माहों में देखेंगे। यह वसंत मानवों के देवमानवों के रूप में ‘विकसित’ होने, अपनी गरिमा को पहचान अपनी साधना को जीवनसाधना के स्तर पर ले जाकर युग-साधना में परिणत करने का एक भागीरथी पुरुषार्थ लेकर आया है। जितने भी अवतार आए हैं- उनके आने के पूर्व से बाद तक के सारे घटनाक्रम क्रमशः प्रत्यक्ष जगत में सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर होते रहे हैं। एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है।
साधना पराक्रम की बात इन पंक्तियों में कही जाती रही है। इस वर्ष सारे भारत व विश्व में ढाई दिवसीय अखण्ड जप प्रधान आयोजनों की श्रृंखला चल रही है, जो न्यूनाधिक रूप में 2001 के आने तक भी चलती ही रहेगी। ऐसे आयोजन भावपूर्ण वातावरण में जितनी अधिक संख्या में होंगे-उतना ही अनिष्ट के कम होने -समष्टि का कल्याण होने की संभावनाएँ बढ़ती चली जाएँगी। नए साधक जो जुड़ रहे हैं-वे तो विगत अंक में बताए एवं मार्गदर्शक तीन पुस्तिकाओं के अनुसार अपना क्रम बनाते चलेंगे। इससे अधिक उन्हें कुछ करना है, तो वह उसी के परिमाण को बढ़ाने के रूप में, पुण्य-परमार्थ की प्रवृत्ति के समावेश के रूप में हैं।
साधना-रई आरा प्राण रूपी समुद्र को मथा जाता है, तो कितने ही प्रकार के बहुमूल्य ऐश्वर्य प्रकट होते हैं। उपयोग-भेद के आधार पर यह अमृत तुल्य अनमोल और उपयोगी हो सकते हैं और विषतुल्य घातक भी। यह तो साधक पर निर्भर है कि वह अमृत को उसी रूप में आत्मसात् कर ले, अन्यथा अमृत का विष में परिवर्तन और विष का अमृत में रूपांतरण संभव है। समुद्र-मंथन से उत्पन्न अमृत को विष्णु ने देवताओं को दे दिया था, जबकि विष शिव जी ने गले में धारण कर लिया, क्योंकि उसे कहीं फेंकना विनाश का कारण बन सकता था।
साधना-उपचारों के माध्यम से ललना चक्र से विशुद्धिचक्र तक लाने में सफल हो जाते हैं। जब ऐसा होता है, तो इसका उपयोग वहीं कर लिया जाता है। इस स्थिति में यह चिरयौवन प्रदान करने वाले अमृत की तरह बर्ताव करता है, किंतु यह तभी संभव है, जब विशुद्धिचक्र पूर्णरूपेण जाग्रत हो। उसकी सुप्तावस्था में इस दिव्यरस का वहाँ उपयोग नहीं हो पाता, इसलिए योगमार्ग के पथिकों के लिए बिंदु-विसर्ग (जहाँ से अमृत झरता है) की साधना प्रारंभ करने से पूर्व विशुद्धिचक्र का जागरण अनिवार्य होता है।
साधना के इन महत्वपूर्ण सूत्रों का विवेचन है, कृपया पढ़ें-
साधना इन दो वर्षों में करने का किन्हीं का मन है, तो उसके लिए सीमित समय नियोजित कर अपने व्यक्तित्व का स्वयं मूल्याँकन कर, जो कमियाँ है, उन्हें दूर करने, जिन विशेषताओं को बढ़ना है, उनका संवर्द्धन करने के लिए चौबीस गायत्री महाशक्तियों में से किसी की भी साधना का क्रम अपना सकते है। आधे घंटे से एक घंटे में संपन्न हो जाने वाली से साधनाएँ इन दो वर्षों में अनेकानेक शुभ परिणाम दे व्यक्तित्व का सर्वांगीण परिष्कार कर दिखाएगी, यह सुनिश्चित है। इनके बारे में विस्तार से गायत्री महाविज्ञान के दूसरे खण्ड में पढ़ा व जाना जा सकता है।
साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है। आज जिस स्थिति में विश्वव्यापी गायत्री परिवार है-उसके मूल में मनुष्य का कायाकल्प कर-उसके चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना।
साधना वर्ष की वेला में लेकर आया है कि कहीं हम सभी ने भी इस वर्ष तो होली परंपरागत रूप में जलते हुए तो नहीं देखी, खूनी फाग देखकर मौन तो नहीं बैठे रह गये, बिना मन्यु जगाएँ कहीं सोये तो नहीं रह गये? जवाब हम सभी से संस्कृति के पुरोधा ऋषिगण माँग रहे हैं।
साधना, सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन की पुण्य-परमार्थ वाली युग-साधना हेतु पाना चाहते हैं, तो रामनवमी 25 मार्च के बाद आरंभ हो रहे विशिष्ट पाँच दिवसीय व्यक्तित्व परिष्कार-युग साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं। ये पाँच दिवसीय सत्र चार माह तक गुरुपूर्णिमा के बाद तक चलेंगे। पहले कितने भी साधनासन्न किये हो, यदि कुछ विशेष अनुदान पाना है- ऋषियुग्म की सत्ता का विशिष्ट सूक्ष्म मार्गदर्शन पाना है, तो यह अवसर महापूर्णाहुति की पूर्व बेला में अपने आप में एक विलक्षण अनुग्रह के रूप में आया है। मार्च के अंतिम सप्ताह में 26 मार्च, 1999 से आरंभ प्रतिमास पाँच-इस प्रकार कुल पच्चीस ये सत्र 30 जुलाई तक चलेंगे। इस वर्ष 28 जुलाई की गुरुपूर्णिमा है।
साधना करते रहे है, अधिक-से-अधिक समय देव-संस्कृति के विस्तार हेतु जन-जन तक उसके निर्धारण करें। यदि वे आगामी दो वर्षों में प्रतिवर्ष 3 से 6 माह का समय भी केन्द्र द्वारा निर्देशित कार्यों के क्षेत्रीय स्तर पर संपादन में देते हैं, तो इसमें इन्हें जो पुण्य अर्जित होगा उसका मूल्याँकन अभी तो नहीं कुछ वर्षों बाद वे स्वयं करेंगे तो पुलकित हुए बिना न रहेंगे। यदि कुछ विशिष्ट साधना इन दो वर्षों में करने का किन्हीं का मन है, तो उसके लिए सीमित समय नियोजित कर अपने व्यक्तित्व का स्वयं मूल्याँकन कर, जो कमियाँ है, उन्हें दूर करने, जिन विशेषताओं को बढ़ना है, उनका संवर्द्धन करने के लिए चौबीस गायत्री महाशक्तियों में से किसी की भी साधना का क्रम अपना सकते है। आधे घंटे से एक घंटे में संपन्न हो जाने वाली से साधनाएँ इन दो वर्षों में अनेकानेक शुभ परिणाम दे व्यक्तित्व का सर्वांगीण परिष्कार कर दिखाएगी, यह सुनिश्चित है। इनके बारे में विस्तार से गायत्री महाविज्ञान के दूसरे खण्ड में पढ़ा व जाना जा सकता है।
साधनात्मक-उपासनात्मक धार्मिक कृत्यों का नित्य-नियम रखना चाहिए। भूमिशयन एवं ब्रह्मचर्य पालन का विधान आवश्यक है। व्रत का संकल्प लेते समय मुंडन कराने का भी शास्त्र आदेश है, साथ-ही-साथ चांद्रायण का उत्तरार्द्ध पक्ष यह है कि जो खाई खोदी गयी है अर्थात् जो दुष्कृत्य अपने से बन पड़े है, उनकी किसी-न-किसी रूप में भरपाई की जाय। व्रत की समाप्ति पर सामर्थ्यानुसार हवन-यज्ञ ब्राह्मण या कन्याभोज, ब्रह्मभोज जैसे उपक्रम भी अपनाये जा सकते हैं।
साधना कहलाती है। इससे बहिर्त्राटक व अन्तर्त्राटक की क्रियाओं द्वारा उसे साधकर पीनियल-पिट्यूटरी एक्सिस को- आज्ञाचक्र को जगाया जा सकता है। खुली आँखों से देखने का क्रम क्रमशः कम करते हुए लौ को बार-बार देखने का अभ्यास करना चाहिए, साथ में धीरे-धीरे मानसिक जप भी चलते रहना चाहिए व खींची श्वास के साथ पवित्र वायु के-ज्योतिष्मान प्रकाश के प्रवेश का भाव एवं छोड़ी हुई निश्वास के साथ मलीनता भरे विचारों के बहिर्गमन का भाव भी साथ-साथ किया जा सकता है। यह ध्यान बुद्धि-लब्ध भाव-लब्ध स्मृति बढ़ाने से लेकर अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों के द्वार खोलता है।
साधना वर्ष में सारे भारत व विश्व में अखण्ड जप के साधना-आयोजन चल रहे हैं। उन सभी में ध्यान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बिना ध्यान का जप मात्र जीभ का व्यायाम है। जप में प्राण-प्रतिष्ठा ध्यान द्वारा की जाती है। अतः ध्यान को तकनीक न मानकर भाव प्रवाह के रूप में समझते हुए करने का अभ्यास यदि इष्ट मंत्र के जप के साथ किया जाय तो वह निश्चित ही जप को प्रभावी व फलश्रुति परक बना देता है।
साधना को जीवनसाधना के स्तर पर ले जाकर युग-साधना में परिणत करने का एक भागीरथी पुरुषार्थ लेकर आया है। जितने भी अवतार आए हैं- उनके आने के पूर्व से बाद तक के सारे घटनाक्रम क्रमशः प्रत्यक्ष जगत में सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर होते रहे हैं। एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है। इसी तरह परमपूज्य गुरुदेव के आँवलखेड़ा स्थित साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है। आज जिस स्थिति में विश्वव्यापी गायत्री परिवार है-उसके मूल में मनुष्य का कायाकल्प कर-उसके चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना।
साधना का क्रम अपना सकते है। आधे घंटे से एक घंटे में संपन्न हो जाने वाली से साधनाएँ इन दो वर्षों में अनेकानेक शुभ परिणाम दे व्यक्तित्व का सर्वांगीण परिष्कार कर दिखाएगी, यह सुनिश्चित है। इनके बारे में विस्तार से गायत्री महाविज्ञान के दूसरे खण्ड में पढ़ा व जाना जा सकता है।
साधना नकद धन है, यह उधार नहीं! कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिनका परिणाम तुरंत मिलता है, लेकिन कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनका परिणाम तुरंत नहीं मिलता। विद्या पढ़ने का परिणाम शायद तुरंत ही मिल जाता है। गलत काम करने के परिणाम देर से मिलें, लेकिन अपने दोष और दुर्गुणों के परिणाम तुरंत ही मिल जाते हैं। इसी तरीके से अध्यात्म एक ऐसी प्रक्रिया का नाम है, जो मनुष्यों को तुरंत लाभ प्रदान करती है, जिसका परिणाम तुरंत मिलता है।
साधना विज्ञान में इस द्रव को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है तथा इसे चेतना के शुद्धिकरण और ऊर्ध्वीकरण में अत्यंत सहयोगी बताया गया है।
साधना का समष्टि हेतु नियोजन, असंख्यों देवमानवों के सृजन, उनके अंदर वैसी प्रवृत्तियों के उभरने जैसी परिणति के रूप में निकलता यदि आज दृष्टिगोचर हो रहा है, तो यह अकारण नहीं है। वस्तुतः यह समय ही विशिष्ट है।
साधना
साधनात्मक धरातल पर ही संपन्न हों सकती हैं। श्रेष्ठ साधक युग मनीषी ही युगपरिवर्तन को साकार कर दिखाएँगे-यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना में विशुद्धि और मूलाधार स्पन्दनों के दो आधारभूत केन्द्र माने गए हैं। नादयोग में चक्रों के माध्यम से चेतना के ऊर्ध्वीकरण का संबंध संगीत के स्वरों से है। हर एक स्वर का तादात्म्य किसी चक्र विशेष की चेतना के स्पंदन स्तर से होता है। अक्सर ये स्वर जो मंत्र, भजन तथा कीर्तन के माध्यम से उच्चरित किए जाते हैं, विभिन्न चक्रों के जागरण के शक्तिशाली आधार हैं।
साधना वर्ष की साधना साधकों की संख्या में अभिवृद्धि करने हेतु सभी को समष्टि के उत्कर्ष हेतु किये जा रहे पुरुषार्थ में नियोजित करने का महान उद्देश्य लेकर महाकाल के श्रीचरणों में समर्पित है।
साधना साधकों की संख्या में अभिवृद्धि करने हेतु सभी को समष्टि के उत्कर्ष हेतु किये जा रहे पुरुषार्थ में नियोजित करने का महान उद्देश्य लेकर महाकाल के श्रीचरणों में समर्पित है।
साधना-आयोजन चल रहे हैं। उन सभी में ध्यान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। बिना ध्यान का जप मात्र जीभ का व्यायाम है। जप में प्राण-प्रतिष्ठा ध्यान द्वारा की जाती है। अतः ध्यान को तकनीक न मानकर भाव प्रवाह के रूप में समझते हुए करने का अभ्यास यदि इष्ट मंत्र के जप के साथ किया जाय तो वह निश्चित ही जप को प्रभावी व फलश्रुति परक बना देता है।
साधनाएँ विरले ही कर पाते हैं। इतने पर भी प्रायश्चित्तपरक तपश्चर्या की महत्ता असंदिग्ध है।
साधना की धुरी पर संगठन बनने का भारी दायित्व इससे कम में नहीं उठाया जा सकता। जो भी सप्त-महाक्रान्तियाँ संपन्न होती हैं- वैचारिक धरातल पर नहीं मात्र प्रचारात्मक हलचलें मचाकर नहीं, साधनात्मक धरातल पर ही संपन्न हों सकती हैं। श्रेष्ठ साधक युग मनीषी ही युगपरिवर्तन को साकार कर दिखाएँगे-यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना ग्रंथों के अनुसार ‘कृच्छ’ और ‘मृदु’ भेद से दो प्रकार के चांद्रायण व्रत माने गये हैं। कृच्छ चांद्रायण व्रत का विधान उन लोगों के लिए है, जिनसे कोई बड़े पाप बन पड़े हैं अथवा तीव्र तपश्चर्या कर सकने की सामर्थ्य जिनमें है। प्रायः इनका उपयोग सतयुग आदि पूर्व युगों में होता था जब मनुष्य की सहनशक्ति पर्याप्त थी।
साधना’ है। मन को अमुक चिन्तन प्रवाह से हटाकर अमुक दिशा में नियोजित करने की प्रक्रिया ही ध्यान कहलाती है। शुभारंभ के रूप में भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियत-निर्धारित दिशा में लगाने के प्रयोगों का अभ्यास किया जाय तो शीघ्र सफलता मिलती है।
साधना करने की उतनी जरूरत नहीं है। उस छोटे से गायत्री मंत्र का जप करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है।
साधना।
साधना अथवा हंसयोग के रूप में बतायी गयी है, जिसमें अजपा जप भी चलता है, साथ ही खींची श्वास के साथ ‘सो’ तथा छोड़ी के साथ हम का भाव किया जाता है। ‘सो’ के साथ भगवत् चेतना का अंदर प्रवेश तथा ‘हम’ के साथ अपनी आत्मसत्ता का उसमें सराबोर होना-अपने अहं भाव को बाहर विसर्जित करना। ध्यान किसी भी पद्धति से हो, अपनी सुविधानुसार चयन कर नियमित उसे करते रहना चाहिए। अभी यहाँ ध्यान की कुछ पद्धतियाँ बतायी गयी हैं, अगले अंक में कुछ और पर प्रकाश डालकर साधकों का पथ प्रदर्शन किया जाएगा।
साधना एवं उपलब्धियाँ
साधना का गुह्य विवेचन
साधना हेतु पाना चाहते हैं, तो रामनवमी 25 मार्च के बाद आरंभ हो रहे विशिष्ट पाँच दिवसीय व्यक्तित्व परिष्कार-युग साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं। ये पाँच दिवसीय सत्र चार माह तक गुरुपूर्णिमा के बाद तक चलेंगे। पहले कितने भी साधनासन्न किये हो, यदि कुछ विशेष अनुदान पाना है- ऋषियुग्म की सत्ता का विशिष्ट सूक्ष्म मार्गदर्शन पाना है, तो यह अवसर महापूर्णाहुति की पूर्व बेला में अपने आप में एक विलक्षण अनुग्रह के रूप में आया है। मार्च के अंतिम सप्ताह में 26 मार्च, 1999 से आरंभ प्रतिमास पाँच-इस प्रकार कुल पच्चीस ये सत्र 30 जुलाई तक चलेंगे। इस वर्ष 28 जुलाई की गुरुपूर्णिमा है।
साधना के प्रत्यक्ष चमत्कार
साधनाएँ इन दो वर्षों में अनेकानेक शुभ परिणाम दे व्यक्तित्व का सर्वांगीण परिष्कार कर दिखाएगी, यह सुनिश्चित है। इनके बारे में विस्तार से गायत्री महाविज्ञान के दूसरे खण्ड में पढ़ा व जाना जा सकता है।
साधना का स्तर भी ऊँचा उठाएँ। मालाओं की संख्या बढ़ाने के रूप में नहीं-अपने व्यक्तित्व के परिष्कार के रूप में प्रतिभा के उन्नयन के रूप में। जितना भी जप संपन्न हो भावपूर्वक हो-गुरुसत्ता की चेतना से एकाकार होकर संपादित किया गया हो-साथ ही उनका वैचारिक सामीप्य भी पाने हेतु स्वाध्याय का सुनियोजित नियमित क्रम चल रहा हो। साधना की धुरी पर संगठन बनने का भारी दायित्व इससे कम में नहीं उठाया जा सकता। जो भी सप्त-महाक्रान्तियाँ संपन्न होती हैं- वैचारिक धरातल पर नहीं मात्र प्रचारात्मक हलचलें मचाकर नहीं, साधनात्मक धरातल पर ही संपन्न हों सकती हैं।
साधना के मार्ग पर चलते हुए।
साधना का शुभारम्भ परोक्ष जगत की ऐसी घटना है, जिसके दूरगामी परिणाम प्रत्यक्ष जगत में परिजन आगामी कुछ दिनों-माहों में देखेंगे। यह वसंत मानवों के देवमानवों के रूप में ‘विकसित’ होने, अपनी गरिमा को पहचान अपनी साधना को जीवनसाधना के स्तर पर ले जाकर युग-साधना में परिणत करने का एक भागीरथी पुरुषार्थ लेकर आया है। जितने भी अवतार आए हैं- उनके आने के पूर्व से बाद तक के सारे घटनाक्रम क्रमशः प्रत्यक्ष जगत में सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर होते रहे हैं। एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है। इसी तरह परमपूज्य गुरुदेव के आँवलखेड़ा स्थित साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है।
साधना का लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसके वैज्ञानिक आधा पर समझने के लिए जानें-
साधना करते रहे हैं, स्वयं दिन-रात युग निर्माण पुरुषार्थ में जुटे रहते हैं, उन्हें अपनी साधना-उपासना को जीवन -साधना के रूप में फलित कर निज के व्यक्तित्व परिष्कार के रूप में उसे संपन्न कर दिखाना है।
साधना यह दो सरल उपाय बताये गए हैं। स्वस्थ चित्त से सावधान होकर एक मास तक इस चक्र की साधना करने से वह प्रस्फुटित हो जाता है। ध्यान में उसके लक्षण अधिक स्पष्ट होने लगते हैं और चक्र के स्थान पर उससे संबंधित मातृकाओं, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों में अचानक कंपन, रोमांच, स्फुरण, उत्तेजना, दाद, खुजली जैसे अनुभव होते हैं। यह इस बात के चिह्न हैं कि चक्र का जागरण हो रहा है। एक मास या न्यूनाधिक काल में इस प्रकार के लक्षण प्रकट होने लगें, ध्यान में चक्र का रूप स्पष्ट होने लगे, तो उससे आगे बढ़कर इससे नीचे की ओर दूसरे चक्र में प्रवेश करना चाहिए।
साधना संबंधी शंका-समाधान
साधना कर सकते थे। इसलिए उन परिस्थितियों को देखते हुए उस प्रकार के कठोर विधानों का बनाया जाना स्वाभाविक ही था। आज की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। कठिन तप-साधनाएँ विरले ही कर पाते हैं। इतने पर भी प्रायश्चित्तपरक तपश्चर्या की महत्ता असंदिग्ध है।
साधना, पूर्व जन्मों का ज्ञान, इच्छा मृत्यु।
साधना के स्तर पर ले जाकर युग-साधना में परिणत करने का एक भागीरथी पुरुषार्थ लेकर आया है। जितने भी अवतार आए हैं- उनके आने के पूर्व से बाद तक के सारे घटनाक्रम क्रमशः प्रत्यक्ष जगत में सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर होते रहे हैं। एकाएक कोई चमत्कारी घटना घटी एवं तुरंत असुरता का निवारण हो-युगपरिवर्तन हो गया-ऐसा नहीं हुआ है। इसी तरह परमपूज्य गुरुदेव के आँवलखेड़ा स्थित साधना कक्ष में जल रहे अखण्ड दीपक से 1926 की वसंत पंचमी के पावन दिन उनकी सूक्ष्म शरीरधारी गुरुसत्ता का प्रकट होना-उन्हें दैवी संदेश मिलना-अखण्ड ज्योति’ पत्रिका के द्वारा उत्कृष्टता के विस्तार हेतु एक नयी क्राँतिकारी शुरुआत होना-गायत्री तपोभूमि की स्थापना के माध्यम से चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की श्रृंखला की पूर्णाहुति होना तथा 1958 में आयोजित सहस्रकुण्डीय गायत्री महायज्ञ के माध्यम से बंधन मुक्त गायत्री व यज्ञ विधा का चतुर्दिक् विस्तार हो एक विराट गायत्री परिवार बनना-प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रायः चालीस वर्षों में फैलना एक लेखा-जोखा कहा जा सकता है। आज जिस स्थिति में विश्वव्यापी गायत्री परिवार है-उसके मूल में मनुष्य का कायाकल्प कर-उसके चिंतन में क्राँतिकारी परिवर्तन कर उसे उत्कृष्टता की दिशाधारा में सोचने हेतु विवश करने वाली वह संजीवनी साधना ही रही है, जिसे आप चाहें तो गायत्री महाशक्ति कह सकते हैं अथवा विचारक्रांति अभियान अथवा यज्ञों के माध्यम से मानवमात्र का नवनिर्माण करने वाली युगांतरीय चेतना।
साधना एवं उनका अनावरण-जागरण
साधनाएँ
साधना एक सूक्ष्म विज्ञान-सम्मत प्रणाली है। अपने जीवन में गायत्री-साधना के सम्बन्ध में जानें-
साधना के रूप में फलित कर निज के व्यक्तित्व परिष्कार के रूप में उसे संपन्न कर दिखाना है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-February
साधना वर्ष के कार्यक्रमों में भागीदार होने वाले लोगों के पैरों में गति और हाथों में प्रगति के सूत्र थमाने वाले अनुदान देने का निश्चय स्वयं भगवान महाकाल का है। इस सुविधा का लाभ प्रत्येक भागीदार साधक को मिलेगा। इस प्रखर साधना वर्ष का असाधारण उपहार समझा जाना चाहिए और उससे लाभान्वित होने का परिजनों में से प्रत्येक को प्रयत्न करना चाहिए। इस आत्म श्रेय एवं दैवी प्रकाश अनुदान का दुहरा लाभ प्राप्त करने वाले अपने सौभाग्य कली सराहना पीढ़ी-दर-पीढ़ी किए बिना न रह सकेंगे।
साधना से सूक्ष्म शरीर का विकास-विस्तार
साधना शक्ति से भली प्रकार सम्पन्न कर लिया जाता था।
साधना वर्ष में भारत के प्रत्येक गाँव को एक छोटे तीर्थ के रूप में विकसित किया जाय। मातृभूमि के कण-कण में देवता का निवास है। गाँवों और झोपड़ों में भी। आवश्यकता इस बात की है कि उन पर छाया पिछड़ापन धो दिया जाए और सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना की जाए। इतने भर से वहाँ बहुत कुछ उत्साहवर्द्धक, प्रेरणाप्रद और आनन्ददायक मिल सकता है।
साधना से उठने के बाद भी उस साधक की भावदशा बड़ी विलक्षण बनी रही। अब तो जैसे गुरुकार्य ही उसके जीवन का ध्येय था।
साधना ही अपने देश के उज्ज्वल भविष्य को साकार करेगी।
साधना महान परिणाम उत्पन्न करती है, जबकि सामान्य समय में थोड़ा-सा परिणाम उत्पन्न करने के लिए भी वर्षों और जन्मों तक कठोर तप करना पड़ता है।
साधना में तप-तितिक्षा की अपनी महत्ता है। ब्रह्मवर्चस की साधना के अंतर्गत यह निश्चय आपको करना होगा कि आप अस्वाद व्रत से लेकर क्या-क्या कर सकते हैं तथा अपनी कमजोरियों से किस प्रकार लड़ सकते हैं। तपस्वी जीवन जीने के लिए आप कितनी तप-तितिक्षा कर सकते है? यह निश्चय आपको करना है। आपको यह निश्चय करना है कि इसका स्वरूप कितना बड़ा, छोटा या मध्यम हो सकता है।
साधना के डंडे के संकेत पर ऊपर उठे, प्रगति एवं समृद्धि के चक्रों को बेधती जाय। फुफकारती- फुफकारती वह राष्ट्रीय अस्तित्व की अग्नि, वह चिन्मय ऊर्जा, वह संकल्पशक्ति उज्ज्वल भविष्य के सहस्रार का भेदन कर दे और उच्चानुभूति के पीयूष को पीवे। आप सब इसके लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।
साधना से ही मिलती हैं। भगवान सीधे किसी पर अनुदानों-वरदानों की वर्षा नहीं करते। यदि वे ऐसा करें तो फिर मनुष्य बुरी तरह अकर्मण्य हो जाय। फिर पुरुषार्थ और पात्रता की कोई आवश्यकता ही न रहे और सर्वत्र भयंकर अंधेर मच जाय।
साधना वर्ष में ऐसे मणि-मुक्तकों की तलाश हो रही है, जिनका सुगठित हार युगचेतना की महाशक्ति के गले में पहनाया जा सके। ऐसे महासाधकों की तलाश युग-निमन्त्रण पहुँचाकर की जा रही है। जो जीवन्त होंगे-करवट बदलने में उठ खड़े होंगे और संकट काल में शौर्य प्रदर्शित करने वाले सेनापतियों की तरह अपने को विजय श्री वरण करने वाले महावीर के रूप में प्रस्तुत करेंगे। कृपण और कायर ही कर्तव्य की पुकार सुनकर काँपते-घबराते और किसी कोतर में अपना मुँह छिपाने की विडम्बना रचते हैं। एक दिन मरते तो वे भी हैं, पर खेद-पश्चाताप की कलंक-कालिमा सिर पर लादे हुए।
साधना की संयुक्त शक्ति ही उज्ज्वल भविष्य के अवतरण जैसे महान कार्य सम्पन्न करती है। अवतार की दार्शनिकता इसी केन्द्र में खोजी जा सकती है। देवताओं की संयुक्त दिव्य शक्ति से दुर्गावतार हुआ था। ऋषियों के रक्त-संचय से सीता का उद्भव और असुरता का दमन सम्भव हुआ था। राम के रीछ-वानर कृष्ण के ग्वाल-बाल बुद्ध के भिक्षु, गाँधी के सत्याग्रही इसी प्रकार की भूमिकाएँ सम्पन्न करते हुए असम्भव को सम्भव बनाते रहे हैं।
साधनापरायण नवजीवन का शुभारम्भ। यही वे हलचलें हैं जो इन दिनों हममें से अधिकाँश के अन्तःकरणों में उठ-उभर रही हैं। इन्हें आँखों से तो देखा नहीं जा सकता, परन्तु अन्तःकरण को विकल कर देने वाली इन हलचलों का महत्व प्रत्यक्ष घटनाक्रमों से कम नहीं अधिक ही है, क्योंकि अन्तर्जगत् की हलचल ही तो प्रकारान्तर से बाह्यजगत में घटनाओं का सृजन करती हैं।
साधना वर्ष के महाभियान को चलाया जा रहा है। धार्मिकता के भावनात्मक वातावरण में ऐसी ढूँढ़-खोज सहज ही बन भी पड़ती है। देव आरती में बच्चे तो पाई-पैसा चढ़ाकर भी मन बहला लेते हैं, पर प्रतिभाओं को तो छोटी नाली की तरह गंगा-नर्मदा जैसी दिव्य धारा में अपने को
साधना का अभिनव निर्धारण।
साधनापरायण तपस्वी जीवन का भी शिलान्यास हो। मूर्तियाँ स्थापित हों, किन्तु सद्भावनाएँ जगाने वाली प्रवृत्तियाँ भी उनके साथ जोड़ी जाएँ। विचार एवं व्यवहार से शिक्षा में पूर्णता आती है। देवालय शरीर का काम करते हैं, सद्भावनाएँ जाग्रत करने वाली प्रवृत्तियाँ उनमें प्राण का काम करती हैं। देह और प्राण के सम्मिश्रण से चैतन्यता आती है।
साधना वर्ष के आयोजन का जो महाप्रयोग इन दिनों किया जा रहा है, उसे मूलतः सूक्ष्मजगत के वातावरण के परिशोधन की प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए। जिससे परा प्रकृति को द्रवित कर मनोवाँछित प्रतिफल प्राप्त किए जा सकेंगे।
साधनापरायण होकर औरों को भी अपने ही जैसा साधक बना सकें। आचार्य शंकर न जाने कब तक अपने इन मनोभावों में खोए रहते कि इतने में ही एक तेजस्वी तरुण ने उन्हें प्रणाम करते हुए उनके ध्यान को यथार्थ की ओर आकर्षित किया। यह वही तरुण था, जिसने आचार्यश्री के भोजन एवं निवास की व्यवस्था की थी। आचार्य इसकी अध्यात्म साधना के प्रति अपूर्व श्रद्धा से आह्लादित थे। उनकी सोच थी कि राष्ट्र का युवा यदि साधना में अभिरुचि रखे- तपस्वी एवं मनीषी बने, तो फिर भारतवर्ष को विश्वगुरु बनते देर नहीं लगेगी।
साधना वर्ष के रूप में मनाने का निर्देश दिया है। विभूतियाँ साधना से ही मिलती हैं। भगवान सीधे किसी पर अनुदानों-वरदानों की वर्षा नहीं करते। यदि वे ऐसा करें तो फिर मनुष्य बुरी तरह अकर्मण्य हो जाय। फिर पुरुषार्थ और पात्रता की कोई आवश्यकता ही न रहे और सर्वत्र भयंकर अंधेर मच जाय।
साधना के प्रभाव एवं सामर्थ्य से वह प्रतिदिन हजारों योजन चला जाता था।
साधना वर्ष के आयोजन की प्रेरणा दी है। इन दिनों की जाने वाली तप-साधना का मूल्य और महत्व असाधारण है। अद्भुत ग्रहयोग में किए जाने वाले इस अनूठे पुरुषार्थ के परिणाम इक्कीसवीं सदी में सुनिश्चित तौर पर उज्ज्वल भविष्य के रूप में सामने आएँगे।
साधना वर्ष में जिस आध्यात्मिक ज्वार को लाने की कामना की गयी है, उसका आधार है- विवेक, जो आत्मज्ञान पैदा करता है। इस जीवन में आत्मज्ञान का सम्पादन न हो और परलोक में जीवन-मुक्ति का विश्वास करें, तो इसे हास्यास्पद ही माना जाएगा। आध्यात्मिक विकास मनुष्य के आत्मज्ञान और सत्प्रवृत्तियों के रूप में दिखाई देता है। इन्हीं के आधार पर देवजीवन की कल्पना व कामना की जाती है।
साधना वर्ष में सम्पन्न किया जाने वाला सामूहिक तप-पुरुषार्थ बिखराव के एकीकरण वाला विराट परिणाम उत्पन्न करने वाला है। साधकों की संकल्प-शक्ति उनकी तप-ऊर्जा का एकत्रीकरण और उसका वर्तमान विभीषिकाओं के समाधान में उपयोग, यही है वह महत्वपूर्ण आधार, जिसके कारण साधना वर्ष में की जाने वाली सामूहिक साधना से उन परिणामों की आशा की गयी है, जो प्रस्तुत विपन्नता से विश्वव्यवस्था को उबार सकें।
साधना के प्रति अपूर्व श्रद्धा से आह्लादित थे। उनकी सोच थी कि राष्ट्र का युवा यदि साधना में अभिरुचि रखे- तपस्वी एवं मनीषी बने, तो फिर भारतवर्ष को विश्वगुरु बनते देर नहीं लगेगी।
साधना-चौदह सूत्र; आत्मपरिष्कार, परब्रह्म की प्राप्ति।
साधनात्मक पुरुषार्थ में नियोजित कर ही देना चाहिए।
साधना वर्ष के समस्त क्रिया-कलापों का गम्भीर अध्ययन-पर्यवेक्षण करने पर इसे सूक्ष्मजगत के परिशोधन और जनमानस के परिष्कार का बहुमूल्य प्रयोग माना जा सकता है। गायत्री साधना का अपना एक सूक्ष्म विज्ञान है। उसके तत्त्वज्ञान और विधिविधान में ऐसे तत्व विद्यमान हैं, जो सूक्ष्मजगत के अदृश्य वातावरण में देवत्व की मात्रा बढ़ाते हैं। उससे सर्वजनीन सुख-शान्ति में अदृश्य सहायता मिलती है। इस वर्ष के साधनात्मक कार्यक्रमों एवं साथ ही जुड़े अग्निहोत्र से वायुशोधन की उपयोगिता अपने स्थान पर है, पर वास्तविकता दूसरी ही है।
साधना वर्ष है। अपने संगठन के हर स्तर पर साधनात्मक गतिविधियों को इस वर्ष विशेष रूप प्रमुखता देनी होगी। यदि हम सामूहिक तप की ओर उन्मुख और सक्रिय हो सकें तो व्यक्ति, समाज और विश्वहित में हम लोग बहुत काम कर सकते हैं। ‘मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग अवतरण’ के अभियान की अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने का अवसर सामने है। अपने देवपरिवार के निष्ठावान् सदस्यों को निम्नस्तरीय गतिविधियों से इनकार करके साहसपूर्वक तप-साधना के लिए विश्वामित्र एवं दधिचि की भाँति ऐसे कदम बढ़ाने चाहिए, जिसके लिए उनका अवतरण इन विशिष्ट घड़ियों में विशेष रूप से हुआ है।
साधना में दीक्षित करना होगा। गायत्री साधना एवं गायत्री महामंत्र के तत्त्वदर्शन से ही उन्हें अपने स्वरूप एवं शक्ति का भान होगा।
साधना के लिए प्रेरित, प्रशिक्षित, अभ्यस्त किया जाय। ध्यान यह रखा जाय कि माला की गिनती का महत्व कम है- भावविह्वल होकर उदीयमान सूर्य के तेज का ध्यान करते हुए मंत्रजाप किया जाय। इस क्रम में नियमितता रखी जाय। जो दीक्षित नहीं हैं वे सतत् जप कर सकते हैं। ध्यान चाहें तो अपने इष्ट का, गुरुसत्ता का अथवा हिमालय के शिखरों का भी कर सकते हैं।
साधना वर्ष की सबसे पहली प्राथमिकता है। समाज में सौमनस्य, आध्यात्मिक उन्नयन और सदाचार जगाने की विवेकपूर्ण प्रवृत्तियाँ किस तरह जागरूक हों? इन समस्याओं का यदि तत्काल समाधान न किया गया तो देवभूमि भारत की आध्यात्मिकता निरन्तर खोखली होती चली जाएगी और जो धर्म के बचे-खुचे अंकुर शेष हैं, उन्हें भी नष्ट होने में देर न लगेगी।
साधना की सुप्रखरता से सुसम्पन्न हों, उन्हीं को युगपरिवर्तन का नियामक कहा जा सकता है।
साधना एवं गायत्री महामंत्र के तत्त्वदर्शन से ही उन्हें अपने स्वरूप एवं शक्ति का भान होगा।
साधना तप एवं स्वाध्याय का मिला-जुला सुयोग ही है।
साधना की महाज्वाला इतनी प्रचण्ड हो कि असुरता उसमें भस्म हो जाय। इस वर्ष हमें इसके लिए अपने सर्वस्व की आहुति देनी है। तुममें से प्रत्येक को ध्यान रखना है कि वर्तमान की साधना ही अपने देश के उज्ज्वल भविष्य को साकार करेगी।
साधना वर्ष में, देश-विदेश में गायत्री परिवार के प्रायः पचास हजार से अधिक केन्द्रों पर प्रचण्ड आध्यात्मिक आन्दोलन चलाया जा रहा है। इसमें हर जाति, सम्प्रदाय, वर्ग के भावनाशील-विचारशील साधक भाग ले रहे हैं। यह भागीदारी मात्र एक वर्ष की नहीं है। इसे महापूर्णाहुति होने तक व उसके बाद न्यूनाधिक रूप में सतत् सन् 2001 के बाद भी चलते ही रहना है। तब तक चूँकि भागीदारी करने वालों की संख्या बढ़ती ही चली जायेगी, उनकी थोड़ी-सी साधना मात्र से वही शक्ति उत्पन्न होगी, जिसे इस साधना वर्ष में पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
साधना की बात दूसरी है, वह हो तो मिट्टी के द्रोणाचार्य, पत्थर के गिरिधर गोपाल और गोबर के गणेश बन सकते हैं, लेकिन यह सब तो घर पर भी हो सकता है। तीर्थ-महिमा एवं गरिमा के साथ उन स्थानों की लोकोपयोगी विशेषताएँ, तप-साधना एवं धर्मधारणा का भी समावेश रहता है।
साधना है। वैसे भी महाकाल ने इस वर्ष को प्रखर साधना वर्ष के रूप में मनाने का निर्देश दिया है। विभूतियाँ साधना से ही मिलती हैं। भगवान सीधे किसी पर अनुदानों-वरदानों की वर्षा नहीं करते। यदि वे ऐसा करें तो फिर मनुष्य बुरी तरह अकर्मण्य हो जाय।
साधना आज समाजीकरण के स्तर पर पहुँचनी चाहिए एवं असुरता को प्रश्रय देने वाली सारी वृत्तियों के विरुद्ध वातावरण बनना चाहिए। साधना का अर्थ है- अपने आप को साध लेना- रिंग मास्टर के हन्टर की तरह बार-बार उन वृत्तियों पर अंकुश लगाना जो उच्छृंखल हो समाज के संतुलन को बिगाड़ती हैं। इसी का दूसरा पक्ष है- विचारों में श्रेष्ठता का समावेश कर उनका समाज के नवनिर्माण हेतु नियोजन। व्यक्ति के स्तर पर आरंभ यह साधना समाज के विराट स्तर तक पहुँचती हुई बड़े व्यापक आंदोलन-व्यक्तिनिर्माण से समाज-निर्माण-युगनिर्माण में बदल जाती है।
साधना की धुरी पर संगठन के पुनर्गठन-गायत्री परिवार के विराटतम रूप लेने का समय है। इन दो वर्षों में युगपरिवर्तन की प्रक्रिया को जिन्हें अपने चर्मचक्षुओं से मात्र देखना ही नहीं, उसमें अपनी भूमिका भी सुनिश्चित करनी हो, उसके लिए यही सबसे उचित समय है। इसके परिणाम कितने विलक्षण होंगे, यह भागीदारी करने वाले अपने निजी जीवन में पारिवारिक परिकर में एवं समाज-क्षेत्र में स्वयं परिलक्षित कर धन्य हो सकेंगे। सारी विश्व-वसुधा पर मँडरा रहे भयंकर बचाव के लिए दैवी सुरक्षा कवच तथा संभावित सुख-सौभाग्य के लिए दैवी अनुदानों से लाभ उठाने का यह अंतिम अवसर है। इसमें निज की तो सुरक्षा है ही समूह का हित भी साथ जुड़ा है।
साधना के प्रति हमारा सहज रुझान है, उसके प्रति निष्ठा और वफादारी का परिचय हम दें।
साधनात्मक ऊर्जा के परिमाण में हो, यही अभी की, समय की सबसे बड़ी माँग है।
साधना में भावपूर्वक उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना मौन बैठकर करें।
साधना वर्ष का आयोजन राष्ट्रीय एवं मानवीय जीवन में एक आत्म-स्फूर्ति आध्यात्मिक चेतना का संचार करता है। इसमें संस्कारों के परिष्कार के लिए तप की प्रक्रियाएँ तो हैं ही, साथ ही स्वाध्याय रूपी गम्भीर प्रयोग भी हैं। अपने देवपरिवार के स्वजनों से इस सम्बन्ध में कतिपय महत्वपूर्ण अपेक्षाएँ भी की गयी है। इनमें से सर्वप्रथम यह है, परिजन-दैवी सन्देश देने वाली पत्रिका अखण्ड ज्योति एवं युगनिर्माण योजना मासिक को व्यापक बनाएँ। साधना वर्ष में कोई भी निष्ठावान् साधक ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसने अपने जैसे पाँच नये निष्ठावान् अखण्ड ज्योति के सदस्य नहीं बनाए हों।
साधनाओं से विमुखता है। विवेक या विचारशक्ति की न्यूनता के कारण ही लोग अपने मूल लक्ष्य से भटकते हैं। देवमूर्तियाँ लोगों के सद्भाव को जाग्रत करने की अलौकिक शक्ति रखती हैं, किन्तु उनके पीछे यदि किसी महान साधनापरायण व्यक्तित्व का हाथ न रहा तो केवल प्रतीक से किसी प्रकार के बचाव की संभावना न की जानी चाहिए। यही भूल यहाँ हुई है, पर अब आगे इससे सबक लेना है।
साधना परमात्मा की ध्यान-आराधना ही है।
साधना को और अधिक तीव्र एवं प्रचण्ड करो। महायोगी के ये स्वर संध्या की लालिमा के शान्त होने के साथ शनैः-शनैः शान्त होते गए। सारा वायुमण्डल एक अपूर्व मौन से भर गया।
साधनात्मक गतिविधियों को इस वर्ष विशेष रूप प्रमुखता देनी होगी। यदि हम सामूहिक तप की ओर उन्मुख और सक्रिय हो सकें तो व्यक्ति, समाज और विश्वहित में हम लोग बहुत काम कर सकते हैं। ‘मनुष्य में देवत्व और धरती पर स्वर्ग अवतरण’ के अभियान की अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने का अवसर सामने है। अपने देवपरिवार के निष्ठावान् सदस्यों को निम्नस्तरीय गतिविधियों से इनकार करके साहसपूर्वक तप-साधना के लिए विश्वामित्र एवं दधिचि की भाँति ऐसे कदम बढ़ाने चाहिए, जिसके लिए उनका अवतरण इन विशिष्ट घड़ियों में विशेष रूप से हुआ है।
साधना मात्र से वही शक्ति उत्पन्न होगी, जिसे इस साधना वर्ष में पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रस्तुत भागीदारी करने वालों के दो वर्ग हैं-(1) नैष्ठिक साधक या वरणी साधक (2) सहयोगी अथवा भागीदार साधक। जो भी इस क्रम में जुड़ रहे हैं, उनके लिए साधना का स्तर निर्धारित कर दिया गया है, जिसे उन्हें कम-से कम महापूर्णाहुति तक नियमित चलाना है। इस साधना से जुड़ने वाले और अन्यों को जोड़ने वालों को ईश्वरीय सुरक्षा कवच तथा प्रगति के अवसरों का पुण्य-लाभ अपनी साधना-भावना के अनुपात में निश्चित ही मिलना है।
साधना वर्ष में सविता देव के तेज के ध्यान के साथ सद्बुद्धि की प्रार्थना-उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ भावनापरक ध्यान इसी कारण अति महत्वपूर्ण बताया गया है।
साधना, व्यक्तित्व परिष्कार।
साधना-महापुरुषार्थ में यही तथ्य मन में विचार कर बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण को तीव्र गति दी गयी है। इससे वह विराट प्रभामण्डल बनेगा, ऐसा वातावरण बनेगा कि भारत की देवभूमि के संस्कार निश्चित ही जाग्रत होंगे एवं इसके तपोभूमि के रूप में, जाग्रततीर्थ के रूप में स्थापित हो जाने की भवितव्यता सत्य होती दिखाई पड़ने लगेगी।
साधना आयोजन में भागीदार होने वाला कोई भी खाली हाथ नहीं रहने पाएगा।
साधना वर्ष के सभी अनुबन्धों का निष्ठापूर्वक पालन करना पड़ेगा। इस साधना वर्ष के महाप्रयोग में भागीदार बनने वालों को निश्चित ही परम पूज्य गुरुदेव से अभिन्नता की दिव्य अनुभूति मिले बिना न रहेगी।
साधना वर्ष में स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, सभ्य समाज द्वारा तीन रचनात्मक क्रान्तियाँ तथा साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा रूपी चार बातों द्वारा संघर्षात्मक-सुधारात्मक क्रान्तियों में भागीदारी हर साधक को करनी चाहिए।
साधना प्रक्रिया को उन्हें अधिकाधिक व्यापक बनाना और सामूहिक रूप से करना है। देखने-सुनने में यह प्रयोग बहुत छोटा और महत्त्वहीन-सा लगता है, पर बात ऐसी नहीं है।
साधना को ही सिद्धिदात्री साधना कहा जाता है। यही सर्वोच्च उपलब्धि भी है।
साधना वर्ष में कोई भी निष्ठावान् साधक ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसने अपने जैसे पाँच नये निष्ठावान् अखण्ड ज्योति के सदस्य नहीं बनाए हों। पत्रिकाओं के पठन-पाठन के साथ युगऋषि के सम्पूर्ण वांग्मय के विस्तार का अगला चरण भी अपने परिजनों को निभाना चाहिए। सम्पूर्ण वांग्मय एवं अखण्ड ज्योति का नियमित स्वाध्याय साधना वर्ष के साधकों का अनिवार्य अनुबन्ध है, ऐसा सुनिश्चित मानना चाहिए।
साधना की धुरी पर पूरे प्रभावक्षेत्र को दृष्टिगत रख बनेगा एवं एक भी हिस्सा ऐसा न रहेगा, जहाँ यह सन्देश न पहुँच पाए। अभियान में एकरूपता तथा प्रखरता बनाए रखने के लिए साधना पद्धति को बड़ा सुगम बनाया गया है। इसमें हर स्तर के व्यक्ति सम्मिलित हो सकते हैं। नये साधक 10 मिनट की प्रार्थना से यह क्रमशः जीवन-साधना के स्तर तक पहुँच सकते हैं, जहाँ उन्हें व्यक्तित्व-परिष्कार का लक्ष्य सहज ही सिद्ध होता दृष्टिगोचर होने लगेगा। साधना के इस क्रम में हमारे देश की भाषा, क्षेत्र, शिक्षा का स्तर, जाति-संप्रदायगत विभिन्नता को देखते हुए कई स्तर बनाए गए हैं।
साधना वर्ष का यही प्रयोजन है। इसे भूतकालीन ऋषि प्रक्रिया की पुनरावृत्ति कहा जा सकता है, जिसमें आत्मसम्पदा से सम्पन्न महर्षि अपने शिष्यों को ऊँचा उठाते और आगे बढ़ाते थे। शरीर को जन्म देने वाली माता जिस प्रकार अपना उत्कृष्ट जीवन रस निचोड़ कर नगण्य से भ्रूण कमल को एक समर्थ मानव बनाती है, ठीक उसी प्रकार का उत्तरदायित्व व्यक्ति की आत्मिक प्रगति में समर्थ सद्गुरु वहन करते हैं। यह प्रक्रिया एक अनोखे जुड़ाव एवं अद्भुत अभिन्नता की रसानुभूति प्रदान करती है। साधना वर्ष में भागीदार होने
साधना हम सबको सतत् करते रहना चाहिए। प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में वरिष्ठ स्तर के सभी साधकों की 11 माला गायत्री जप अथवा प्रातः-मध्याह्न-सायं तीनों समय में न्यूनतम पंद्रह-पंद्रह मिनट की त्रिकाल संध्या करते रहने की, पूज्यवर की चेतना से सहभागिता करने का उपक्रम इस वेला में विशिष्ट शक्ति का संचार करेगा। यदि इतना संभव न बन पड़े तो प्रातः आधा घंटा व सायं आधा घण्टा जप, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना, सविता देवता या हिमालय की चेतना का ध्यान एवं पंद्रह मिनट से आधा घण्टा नियमित प्रतिदिन स्वाध्याय यह अवश्य करना चाहिए। जप व ध्यान के साथ मिलन प्राणायाम द्वारा विश्वप्राण के साथ एकात्म होने के भाव का क्रम भी रोज चलाया जा सकता है। (कृपया विस्तार हेतु ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक दिनाँक 16 जनवरी, 1999 का पृष्ठ 2 देखें)
साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।
साधना निष्फल ही चली जाएगी।
साधना से मैं स्वयं ही उस परम तत्व को जानूँगा और उसे प्राप्त करूँगा-यह संकल्प उन्होंने लिया और वे आत्मबोध को प्राप्त कर बुद्ध कहलाये तथा धर्म चक्र प्रवर्तन जैसे महान कार्य को संपन्न कर सके।
साधना का- जिसकी शक्ति के संदोहन से मानवमात्र को चिरयौवन की-देवताओं के समकक्ष अमरत्व की प्राप्ति हो सकती है।
साधना पहले की तरह और भी प्रखर-परिमार्जित रूप में संपन्न होती रहेगी। इस अवधि में वर्ष भर गुरुवार का आँशिक व्रत भी सामूहिक तप के रूप में गायत्रीतीर्थ में चलेगा, जिसमें साधक मात्र एक समय आहार लेंगे। सत्रों में भी प्रतिदिन एक समय मात्र अमृताशन का क्रम चलेगा। यह प्रक्रिया अभी तो इस वसन्त से आगामी वसन्त तक के लिए निर्धारित की गयी है, किंतु यह क्रम 2001 के वसंत 29 जनवरी तक भी चल सकता है।
साधना उच्च उद्देश्यों के निमित्त है- उन्हें पात्रता के अनुरूप दिव्य-अनुदानों को प्राप्त करते रहने में कोई बाध नहीं पड़ती। शुभ प्रसंगों पर देवताओं द्वारा पुष्पवृष्टि होने के उल्लेख कथा-पुराणों में आते रहते है॥ इस अलंकारिक वर्णन में इसी तथ्य को उजागर किया गया है कि सत्प्रयोजनों में दिव्यसत्ता की सहानुभूति ही नहीं, अनुकम्पा और सहायता भी मिलती है। यदि ऐसा न रहा होता तो विपन्न परिस्थितियों में जन्मों और असंख्य अवरोधों से घिरे रहने पर महापुरुषों को उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त कर सकना किस तरह सम्भव हो सका होता?
साधना क्षेत्र में यों होती तो व्यक्तिगत एवं एकान्तिक साधनाएँ भी हैं, पर उनका लक्ष्य, प्रयोजन एवं लाभ कर्ता तक ही सीमित रहता है। सर्वजनीन समाधान एवं संवर्द्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई है, तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गई है। राजतन्त्र द्वारा राजसूय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह-सम्मेलन सत्प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वानमण्डली, तपस्वी-परिकर एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से सम्पन्न नहीं कर सकता था, उसे मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त साधना शक्ति से भली प्रकार सम्पन्न कर लिया जाता था।
साधनात्मक कार्यक्रमों एवं साथ ही जुड़े अग्निहोत्र से वायुशोधन की उपयोगिता अपने स्थान पर है, पर वास्तविकता दूसरी ही है। वायुशोधन की अपेक्षा वातावरण का निर्माण इसका प्रमुख प्रयोजन है। गायत्री मंत्र का भावभरा जप-विश्व चेतना में पवित्रता के तत्व भरने वाले दिव्य कम्पन करता है। इसके अलावा भी इस वर्ष अपनाए जाने वाले साधना आयोजन में ऐसे-ऐसे अनेक आधारों का समन्वय है, जिनका सम्मिलित प्रभाव वातावरण में ऐसे उपयोगी तत्वों का समावेश करता है, जो अविज्ञात
रूप से विश्व कल्याण की भूमिका सम्पन्न कर सके।
साधना ही तीर्थयात्रा की आत्मा थी। उच्चस्तरीय प्रेरणा उपलब्ध एवं उत्पन्न करना ही तीर्थतत्त्व की आत्मा मानी गयी है। प्राचीनकाल में तीर्थ ऐसे ही थे और तीर्थयात्रा के निश्चित उद्देश्य एवं कार्यक्रम साथ लेकर आगे बढ़ते थे।
साधना वर्ष के रूप में मनाए जाने का निर्देश अवतरित हुआ है। भगवान महाकाल की रोमांचकारी लीलाएँ इस समूचे वर्ष में देखी जा सकेगी। इस वर्ष के हर पल में नवयुग के आगमन की पग ध्वनि तीव्र से तीव्रतर होती जाएगी।
साधना वर्ष की शुरुआत इस तरह की गयी है। इससे जो वातावरण विनिर्मित होगा, जो अन्तः क्राँति उठ खड़ी होगी, जो अन्तःकरणों में छाये अज्ञान, अंधकार व अशक्ति-अभाव को नष्ट-भ्रष्ट कर एक नयी शक्ति को उपार्जन करेगी। सृजन के पूर्व मानवीय सम्वेदनाओं का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सारे वातावरण को गायत्रीमय बनाने के अतिरिक्त और कोई उपाय अब हैं नहीं।
साधनात्मक पुरुषार्थ से नहीं की जा सकती।
साधना विज्ञान की पृष्ठभूमि।
साधना से आत्मिक प्रखरता, संकल्प-शक्ति की अभिवृद्धि।
साधना वर्ष में किए जाने वाले महापुरुषार्थ से उस पुण्य प्रक्रिया का पुनर्जीवन सम्भव होने जा रहा है। इसी सुनिश्चित सम्भावना का नाम है- उज्ज्वल भविष्य का अवतरण।
साधना-ध्यान-धारणा नादानुसंधान, अंतःत्राटक, प्राणयोग, मुद्रासिद्धि।
साधना में लीन थे। पास ही मैदान में एक ग्वाला अपने बैल चरा रहा था। उसे किसी आवश्यक कार्य से गाँव में जाना था। उसने सोचा पास में बाबा बैठे हैं, यह बीच-बीच में बैल देख लिया करेंगे, तब तक मैं घर से लौट ही आऊँगा।
साधना का मैंने किसी भी काल में परित्याग न किया हो तो आज घर पहुँचकर ही सायं संध्योपासना सम्पन्न करु।
साधना वर्ष में वर्ष भर सारे भारतवर्ष व विश्व के सत्तर देशों की प्रायः एक हजार शाखाओं में ढाई दिवसीय साधना आयोजनों की श्रृंखला चलेगी। जब सारी विश्ववसुधा का चप्पा-चप्पा साधना की शक्ति से स्पन्दित हो रहा हो तो नवयुग की गंगोत्री का पुरुषार्थ तो और भी विशिष्ट होना चाहिए, जहाँ से सारा चिन्तन-मार्गदर्शन-राष्ट्रव्यापी संगठनात्मक पुनर्गठन का सूत्र-संचालन-नियमन चल रहा हो, वहाँ तो यह प्रक्रिया और अधिक गतिशील-सक्रिय-जीवन्त नजर आनी चाहिए। इस वर्ष के शिविरों में शाँतिकुँज में आने वाले परिजनों को कुछ विशिष्ट उपलब्धि होनी चाहिए एवं यह विशिष्ट साधनात्मक ऊर्जा के परिमाण में हो, यही अभी की, समय की सबसे बड़ी माँग है।
साधना के द्वारा आप अपने विचारों को, अपने अंतरंग को अधिक शुद्ध एवं पवित्र बना सकते हैं तथा जीवन के- प्रगति के सोपान को पार कर सकते हैं। आज की बात समाप्त।॥ ( शान्तिः॥
साधना सत्र हैं। पूर्व की तरह ही अनगढ़-कुसंस्कारी बीमार, वयोवृद्धों अशक्तों एवं छोटे बच्चों को साथ लेकर आने की मनाही है। जो इस विशिष्ट श्रृंखला में भागीदारी करना चाहते हों, वे अभी से पत्राचार कर स्थान सुरक्षित करा लें।
साधना पर्व पर ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए आत्मिक पुरुषार्थ करने और श्रेय पाने वालों की ढूँढ़-खोज चल रही है। इस खोज-बीन में एक मौलिक विशेषता है। सरकारी नियुक्ति तन्त्र अपनी आवश्यकता के अनुरूप छाँट कर लेने के उपरान्त शेष को दो टूक मनाही कर देते हैं। प्रस्तुत दैवी-आमन्त्रण में ऐसा नहीं है। इसमें सर्वथा निराश किसी को भी नहीं किया जाएगा।
साधना वर्ष में किए जाने वाले दैवी पुरुषार्थ से ही सामूहिक पापों का प्रक्षालन सम्भव होगा। इस वर्ष की जाने वाली साधना के दैवी पराक्रम हेतु अपने देव परिजनों को उसी तत्परता से कटिबद्ध होना चाहिए, जैसे कि बंगला देश की गड़बड़ी, चीनी-आक्रमण पाकिस्तानी हमला, स्काईलैब आदि की विपत्तियों के निवारण हेतु सफलतापूर्वक निरत हो चुके हैं। अबकी बार आशंकाएँ बड़ी हैं, इसलिए हमारे सुरक्षा प्रयास भी बढ़े-चढ़े होने चाहिए। उसी का प्रारूप इस वसन्त पर्व पर प्रस्तुत किया गया है और उसमें परिपूर्ण सहयोग देने के लिए समस्त देवपरिजनों को आमंत्रित किया गया है।
साधनात्मक संस्कार जाग्रत करने की दृष्टि से किया जाता है। इस क्रम में यही आशा की गयी थी कि तपस्वी साधकों का सत्संग लाभ लोगों को अधिक मिले, साथ ही स्वाध्याय-आध्यात्मिक संगठन आदि का अखण्ड यज्ञ देवालयों में चलता रहे। पर व्यवहार में आज यह सब नहीं रहा। लोग आते हैं, चन्दन-अक्षत-पुष्प-पाई-पैसा आदि की सस्ती भेंट चढ़ाकर अपनी अन्धश्रद्धा व्यक्त करके चले जाते हैं। उनके जीवन में किसी प्रकार का प्रकाश उत्पन्न नहीं होता।
साधना में केवल सात्विक आहार का सेवन किया है। पूजा-उपासना के पहले, भजन के पहले हमें अपने मस्तिष्क एवं शरीर को सात्विक बनाना होगा, ताकि भगवान हमारे शरीर में उपस्थित हो सकें और हमारे मस्तिष्क में प्रेरणा दे सकें। इसके लिए हमें सात्विक आहार का सेवन करना होगा।
साधना-विज्ञान के सभी पक्षों पर विस्तार से इस खण्ड में विवेचन हुआ है।
साधना वर्ष का शुभारम्भ किया गया है। दिव्यदर्शी आसानी से समझ सकते हैं कि इससे उत्पन्न शक्ति से सामयिक परिस्थितियों से निबटा जा सकता है। इसका समय और विधान तो बहुत बड़ा नहीं है, परंतु प्रभावशीलता व्यापक है। अपने देवपरिवार के परिजन प्रारम्भ से ही साधनापरायण रहे हैं। गायत्री महामंत्र के आधार पर की जाने वाली तप-साधना उनकी रुचि एवं अभ्यास बन चुकी है।
साधनापरायण व्यक्तित्व का हाथ न रहा तो केवल प्रतीक से किसी प्रकार के बचाव की संभावना न की जानी चाहिए। यही भूल यहाँ हुई है, पर अब आगे इससे सबक लेना है।
साधना तथा आराधना में लीन रहा। यह सब मन तथा हृदय को अच्छा भी लगता रहा, परन्तु ऐसी मनःस्थिति कभी नहीं बन पायी, जैसी कि आप बनी।
साधना से जोड़ना इस समय का महानतम युगधर्म कहा जा सकता है। ऐसे विषम समय में और सभी कार्य एक तरफ रख मात्र महाकाल की इच्छानुसार ही अपनी इच्छा-आकांक्षाओं का नियोजन किया जाना चाहिए। यह समय जीवन-साधना द्वारा अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाने हेतु तो नियोजित होना ही चाहिए। अपने साथ अधिक-से-अधिक परिजनों को सुरक्षा महाकवच के नीचे लेने हेतु लगना चाहिए। युगशक्ति के प्रवाह से जुड़े रहने की योगसाधना व शक्ति प्रवाह को सार्थक उद्देश्यों में नियोजित करते रहने की तप साधना हम सबको सतत् करते रहना चाहिए।
साधना करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। साधना आयोजन में जो बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाएँगे, उनका साहस एवं उत्तरदायित्व अधिक होने के कारण उन्हें अनुदान भी इसी स्तर के मिलेंगे। किन्तु जो उतना साहस न जुटा सकेंगे, उन्हें भी पात्रता के अनुरूप हल्के स्तर के उपहार पाने का अवसर मिलेगा। वर्षा में बड़ा तालाब और सरोवर अगाध जलराशि एकत्रित कर लेते हैं, किन्तु खाली रह जाने की शिकायत छोटे गढ्ढों और पोखरों को भी नहीं रहती। उन दिनों गणना उनकी भी सौभाग्यशालियों और उपलब्ध कर्ताओं में ही होती है।
साधना के स्तर तक पहुँच सकते हैं, जहाँ उन्हें व्यक्तित्व-परिष्कार का लक्ष्य सहज ही सिद्ध होता दृष्टिगोचर होने लगेगा। साधना के इस क्रम में हमारे देश की भाषा, क्षेत्र, शिक्षा का स्तर, जाति-संप्रदायगत विभिन्नता को देखते हुए कई स्तर बनाए गए हैं। जिन्हें जो सुलभ लगे-वे उससे जुड़ सकते हैं अथवा जुड़ने हेतु प्रेरित किए जा सकते हैं। ये इस प्रकार हैं-
साधना-भावना के अनुपात में निश्चित ही मिलना है।
साधना से जुड़ने वाले और अन्यों को जोड़ने वालों को ईश्वरीय सुरक्षा कवच तथा प्रगति के अवसरों का पुण्य-लाभ अपनी साधना-भावना के अनुपात में निश्चित ही मिलना है।
साधना से ही सम्भव है।
साधना वर्ष में नैष्ठिकों को विशिष्ट स्तर के और सामान्य साधकों को सामान्य स्तर के अनुदान मिल रहे हैं। प्रयास और परिश्रम की तुलना में यह उपलब्धि भी इतनी बड़ी है, जिसे चन्दन के निकट उगे पेड़ों और पारस का स्पर्श करने वाले लौह-खण्डों को मिलने वाले अनायास सौभाग्य के समतुल्य समझा जा सकता है। सूर्य के उदय होने पर उसके प्रकाश क्षेत्र में आने वाले सभी प्राणी ओर पदार्थ गर्मी प्राप्त करते हैं। वर्षा के समय खुले में जा खड़े होने पर किसी को भी गीले होने का अवसर मिल जाता है। इसमें प्रयास स्वल्प और लाभ असाधारण हैं।
साधना का अपना एक सूक्ष्म विज्ञान है। उसके तत्त्वज्ञान और विधिविधान में ऐसे तत्व विद्यमान हैं, जो सूक्ष्मजगत के अदृश्य वातावरण में देवत्व की मात्रा बढ़ाते हैं। उससे सर्वजनीन सुख-शान्ति में अदृश्य सहायता मिलती है। इस वर्ष के साधनात्मक कार्यक्रमों एवं साथ ही जुड़े अग्निहोत्र से वायुशोधन की उपयोगिता अपने स्थान पर है, पर वास्तविकता दूसरी ही है। वायुशोधन की अपेक्षा वातावरण का निर्माण इसका प्रमुख प्रयोजन है।
साधनाएँ फलीभूत क्यों नहीं होती, निष्काम साधना।
साधना एवं सेवाभावना का स्वरूप प्रदर्शित करता है। प्रायः सभी तीर्थों में ऋषि-आश्रम रहे हैं, गुरुकुल-आरण्यक चले हैं और परमार्थ सम्बन्धी विविध-विधि कार्य होते रहे है॥ देवालयों के दर्शन एवं नदी-सरोवरों के स्नान तो लोचन लाभ लेने एवं नूतनता अवलोकन के लिए हैं। श्रद्धा और साधना की बात दूसरी है, वह हो तो मिट्टी के द्रोणाचार्य, पत्थर के गिरिधर गोपाल और गोबर के गणेश बन सकते हैं, लेकिन यह सब तो घर पर भी हो सकता है। तीर्थ-महिमा एवं गरिमा के साथ उन स्थानों की लोकोपयोगी विशेषताएँ, तप-साधना एवं धर्मधारणा का भी समावेश रहता है।
साधना, प्रायश्चित का अति महत्वपूर्ण पथ क्षतिपूर्ति।
साधना विज्ञान।
साधना रूपी महासमर आरंभ हुआ था व अंतिम दो वर्षों में उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के रूप में यह भूमि के चप्पे-चप्पे में फैलने जा रहा है।
साधना ही आगन्तुकों को पुण्य फल प्रदान करती थी।
साधना आयोजन में जो बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाएँगे, उनका साहस एवं उत्तरदायित्व अधिक होने के कारण उन्हें अनुदान भी इसी स्तर के मिलेंगे। किन्तु जो उतना साहस न जुटा सकेंगे, उन्हें भी पात्रता के अनुरूप हल्के स्तर के उपहार पाने का अवसर मिलेगा। वर्षा में बड़ा तालाब और सरोवर अगाध जलराशि एकत्रित कर लेते हैं, किन्तु खाली रह जाने की शिकायत छोटे गढ्ढों और पोखरों को भी नहीं रहती। उन दिनों गणना उनकी भी सौभाग्यशालियों और उपलब्ध कर्ताओं में ही होती है।
साधना महापुरश्चरणों की ऊर्जा का प्रतिफल ही कहा जा सकता है। जब गोवर्धन उठाया जा रहा था, तब भी श्रीकृष्ण ने सभी ग्वाल-बालों की लाठी अपनी छोटी उँगली के साथ-साथ लगवायी थी। सभी समझ रहे थे कि गोवर्धन उनकी लाठी पर टिका है, किंतु उन्हें कृष्ण-कन्हैया ने अहसास करा दिया कि यह वस्तुतः टिका भागवत् संकल्प पर ही है, वे तो मात्र श्रेय के अधिकारी बन रहे हैं। ठीक इसी तरह प्रस्तुत पुरुषार्थ में हम सबको साधक स्तर की वरीयता दिलाने हेतु, सुपात्र बनाने, श्रेय दिलाने यह भागवत् मुहूर्त आया है। युग-परिवर्तन का कार्य तो महाभारत में कौरवों को मारने की तरह भगवान श्रीकृष्ण ने पहले ही संपन्न कर दिया है- जो भी कुछ निर्माण होना है- उसके लिए विराट तप का पुण्य पूर्व से ही नियोजित है, हमें तो मात्र श्रेय भर लेना है।
साधना, आहार-शुद्धि लोक लोकांतरों की यात्रा।
साधना से दूर हो सकता है। श्रुति कहती है- ‘तेजो वै गायत्री’, फिर ताण्ड्योपनिषद् कहता है- ज्योतिर्वै गायत्री छन्दसाम् अर्थात् गायत्री एक प्रकार का तेज है, जो प्रकाश और ऊष्मा के रूप में विश्व का मूल है। सूर्य गायत्री तेज का सबसे बड़ा भण्डार है और विश्व के निर्माण में सबसे बड़ा कारण भी। शास्त्रकार यह भी कहते हैं कि म नहीं सविता है। अर्थात् जब मन और सूर्य देव का साधना के माध्यम से तादात्म्य किया जाता है, तो सूर्य की ‘भर्ग’ शक्ति मनुष्य के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो सामंजस्य स्थापित करती है।
साधना का मर्म समझाना होगा। उसे गायत्री महामंत्र की साधना में दीक्षित करना होगा। गायत्री साधना एवं गायत्री महामंत्र के तत्त्वदर्शन से ही उन्हें अपने स्वरूप एवं शक्ति का भान होगा।
साधनापथ के मार्गदर्शक ऋषियों ने अन्धकार से ज्योतिपथ पर चलने का सन्देश दिया है। भारत का समूचा अध्यात्म-दर्शन ज्ञानप्राप्ति के उपायों का प्रतिपादक है। अज्ञानी व्यक्ति को शास्त्रकारों ने अन्धे की उपमा दी है। जिस प्रकार बाह्य नेत्रों के नष्ट हो जाने से मनुष्य भौतिक जगत का स्वरूप जानने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में बौद्धिक अथवा विचार जगत की नियमित जानकारी नहीं हो पाती। बाह्यजगत के समान मनुष्य का एक आत्मिक जगत भी है, जहाँ ज्ञान के अभाव में वैसा ही अँधेरा रहता है, जैसे कि आँखों के अभाव में यह संसार।
साधना व शक्ति प्रवाह को सार्थक उद्देश्यों में नियोजित करते रहने की तप साधना हम सबको सतत् करते रहना चाहिए। प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में वरिष्ठ स्तर के सभी साधकों की 11 माला गायत्री जप अथवा प्रातः-मध्याह्न-सायं तीनों समय में न्यूनतम पंद्रह-पंद्रह मिनट की त्रिकाल संध्या करते रहने की, पूज्यवर की चेतना से सहभागिता करने का उपक्रम इस वेला में विशिष्ट शक्ति का संचार करेगा। यदि इतना संभव न बन पड़े तो प्रातः आधा घंटा व सायं आधा घण्टा जप, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना, सविता देवता या हिमालय की चेतना का ध्यान एवं पंद्रह मिनट से आधा घण्टा नियमित प्रतिदिन स्वाध्याय यह अवश्य करना चाहिए। जप व ध्यान के साथ मिलन प्राणायाम द्वारा विश्वप्राण के साथ एकात्म होने के भाव का क्रम भी रोज चलाया जा सकता है। (कृपया विस्तार हेतु ‘प्रज्ञा अभियान’ पाक्षिक दिनाँक 16 जनवरी, 1999 का पृष्ठ 2 देखें)
साधना एवं धर्मधारणा का भी समावेश रहता है।
साधना की प्रामाणिकता इस जीवन में न मिली तो इसे परमात्मा की अकृपा ही समझना चाहिए। इसके बिना जीवन में किसी तरह का कल्याण सम्भव नहीं है।
साधना में सन्निहित है। देवालय का अर्थ है- जहाँ तपस्वी देवपुरुषों का निवास हो। उनके सत्संग से ही परमात्मा के आन्तरिक कलेवर को प्राप्त करते हैं। इसी दृष्टि से देवस्थानों का महत्त्व होता है।
साधनाएँ भी हैं, पर उनका लक्ष्य, प्रयोजन एवं लाभ कर्ता तक ही सीमित रहता है। सर्वजनीन समाधान एवं संवर्द्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई है, तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गई है। राजतन्त्र द्वारा राजसूय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह-सम्मेलन सत्प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वानमण्डली, तपस्वी-परिकर एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से सम्पन्न नहीं कर सकता था, उसे मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त साधना शक्ति से भली प्रकार सम्पन्न कर लिया जाता था।
साधनापथ पर अग्रगामी बनेंगे और असंख्यों को अपने पीछे अनुगमन की प्रेरणा देंगे। इतिहास के आकाश में ऐसे ही समर्पित शिष्य उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह अनन्तकाल तक चमकते हैं। इन्हीं का निर्माण परमपूज्य गुरुदेव को इन दिनों अभीष्ट है। महाकाल ने इस महाप्रयोग के लिए उन्हीं का आह्वान किया है। युग की आत्मा ने उन्हीं को पुकारा है।
साधना से ही सम्भव है, क्योंकि आत्मसाधना ही राष्ट्रवासियों को उनका खोया चरित्र देगी, उनमें साहस एवं विश्वास का संचार करेगी। उन्हें देवत्व का गौरव वापस दिलाएगी।
साधना ब्रह्मवर्चस् की साधना, प्रज्ञायोग की साधना के द्वारा आप अपने विचारों को, अपने अंतरंग को अधिक शुद्ध एवं पवित्र बना सकते हैं तथा जीवन के- प्रगति के सोपान को पार कर सकते हैं। आज की बात समाप्त।॥ ( शान्तिः॥
साधना वर्ष में केन्द्रों के माध्यम से प्रायः चौबीस हजार से अधिक स्थानों पर एक साथ सामूहिक अखण्ड जप का वसंत पंचमी से शुभारम्भ व इसका प्रतिमाह होते चले जाने वाला संभावित विस्तार एक प्रचण्ड वातावरण बनाने वाला युगान्तरकारी प्रयास, माना जा सकता है। ऐसा प्रयास जिसकी तुलना विगत के किसी साधनात्मक पुरुषार्थ से नहीं की जा सकती।
साधना के लिए साहस कर सकने वाली प्रखरता के आधार पर ही होता है। जब तक अन्तरात्मा की धरती पर प्रखर तप-साधना के फलस्वरूप अवतरित होने वाली भगवत्कृपा सक्रिय न होगी, तब तक अन्तर्द्वन्द्व से भरी अशान्त मनः स्थिति में विक्षोभ उभरते ही रहेंगे।
साधना की भट्टी में अपने को गलाए-तपाए किसी भी तरह चैन नहीं है। यह प्रक्रिया कितनी भी कष्टकर हो, पर इसे निभाए बिना इन दिनों रहा भी तो नहीं जाता।
साधना द्वारा वह मात्र जपकर्ता को, साधक को लाभान्वित करती है, तो सामूहिक अनुष्ठानों द्वारा उससे सारा समाज, राष्ट्र एवं युग प्रभावित होता है, इस अकाट्य सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। आज सारे समाज में अचिन्त्य चिन्तन के कारण दुर्मति-जन्य दुर्गति-नैतिक पतन, लिप्साओं की होड़ एवं क्षुद्र अहंकार रूपी विष जो समा गया है, उसे धोने के लिए गायत्री रूपी सद्ज्ञान एवं यज्ञरूपी सत्कर्म के साथ संस्कारों की पावन त्रिवेणी के विस्तार की क्रान्ति खड़ी करने की आवश्यकता इसीलिए सर्वाधिक पड़ रही है कि इससे कम में आध्यात्मिक वातावरण विनिर्मित होगा नहीं। वातावरण में प्रविष्ट की गयी श्रेष्ठ आस्थाएँ ही इस देश की नहीं, अपितु समूचे विश्व को उत्कृष्टता के प्रति निष्ठावान् बनाए रख सकेंगी। वातावरण का प्रभाव सभी भली-भाँति जानते हैं। किसी को श्मशान घाट लाकर खड़ा कर दिया जाय और बताया न जाय कि यह क्या है, तो अनायास भय उसे लगने लगता है।
साधना केन्द्रों के रूप में विकसित करके ही भारत को पुनः देवभूमि का गौरव प्रदान किया जा सकता है।
साधना वर्ष को भी दैवी प्रकाश एवं अनुग्रह प्राप्त करने का एक विशिष्ट अवसर माना जा सकता है।
साधना भी है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। साधनारत का प्रयोजन ऐसे ही तपस्वियों को आगे लाना और उन्हें लोक नेतृत्व के लिए तैयार करना है।
साधना में प्रवृत्त हो ही जाना चाहिए, क्योंकि इसी के द्वारा व्यापक रूप से मनःक्षेत्र में भरी हुई वह गन्दगी साफ होगी, जिसकी सड़ाँध से विभिन्न जातियों के विषाणु उत्पन्न होते हैं और एक-से-एक भयंकर महामारियों का सृजन करते हैं। हर विषाणु मारने की अपेक्षा हर रोगी का अलग इलाज करने की योजना बनाने से पहले हमें तप-साधना के रूप में स्वच्छता का, असुरता के प्रतिरोध का व्यापक अभियान चलाना चाहिए, ताकि महामारी के उद्गम स्रोत पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सके।
साधनारत था। ब्रह्ममुहूर्त में उसकी आत्मचेतना-ब्राह्मीचेतना की ओर उन्मुख थी। परमपूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों की भक्ति के प्रभाव से उसकी समस्त भ्रान्ति नष्ट हो गयी और उसके चैतन्य में सर्वमयता स्थिर हो गई। जो बाहर हो रहा था, वह भीतर होता हुआ प्रतीत होने लगा। अहम् और इदम् के मध्य जो आच्छादन था, दूर हो गया।
साधना वर्ष में धो डालें अपनी अन्तरात्मा से समस्त आत्मप्रवंचना, ढोंग और थोथी आत्मप्रशंसा की वृत्ति को, ताकि सीधे देख सकें अपनी मार्गदर्शक गुरुसत्ता को और सुन सकें उस वाणी को जो सतत् पुकार रही है। इस वर्ष के विशिष्ट पलों में हटा दें अपनी सारी कुटिलता को जो पहले हमें परमपूज्य गुरुदेव की दृष्टि और आदर्श की ज्योति से विमुख किए हुए थी क्योंकि यह कुटिलता यदि अब भी बनी रही तो इस वर्ष की विषमताओं के प्रहारों से कोई भी बच सकेगा। यदि किसी तरह बच भी गया तो भी महाकाल का कालदण्ड उसे उसकी दुष्प्रवृत्तियों का दण्ड देकर ही रहेगा। यह महान वर्ष एक बवण्डर, एक तूफान की तरह से शक्ति के बल पर खड़ा रह सकता है, हम सबके लिए ही नहीं, समस्त मानवता के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनेगी। समस्त उनकी शक्ति से कार्य कर सकें।
साधना क्या होती है? इसका पंचमुखी गायत्री से क्या संबंध होता है?
साधना से उन परिणामों की आशा की गयी है, जो प्रस्तुत विपन्नता से विश्वव्यवस्था को उबार सकें।
साधना के साथ समयदान, अंशदान देते हुए झोला पुस्तकालय चलाने लगे। यह प्रक्रिया जहाँ भी अपनायी जाएगी, वहीं एक उपयोगी संगठन बढ़ने लगेगा और उसके प्रयास से गाँव की सर्वतोमुखी प्रगति का उपक्रम चल पड़ेगा। यही है तीर्थभावना-ग्रामतीर्थ की स्थापना।
साधना से अधिक-से-अधिक परिजनों को जोड़ने के लिए यह विशिष्ट क्रम व सत्रों का प्रावधान रखा गया है। मात्र साधक स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए ये विशिष्ट संधिवेला साधना सत्र हैं। पूर्व की तरह ही अनगढ़-कुसंस्कारी बीमार, वयोवृद्धों अशक्तों एवं छोटे बच्चों को साथ लेकर आने की मनाही है। जो इस विशिष्ट श्रृंखला में भागीदारी करना चाहते हों, वे अभी से पत्राचार कर स्थान सुरक्षित करा लें।
साधना आयोजनों की श्रृंखला चलेगी। जब सारी विश्ववसुधा का चप्पा-चप्पा साधना की शक्ति से स्पन्दित हो रहा हो तो नवयुग की गंगोत्री का पुरुषार्थ तो और भी विशिष्ट होना चाहिए, जहाँ से सारा चिन्तन-मार्गदर्शन-राष्ट्रव्यापी संगठनात्मक पुनर्गठन का सूत्र-संचालन-नियमन चल रहा हो, वहाँ तो यह प्रक्रिया और अधिक गतिशील-सक्रिय-जीवन्त नजर आनी चाहिए। इस वर्ष के शिविरों में शाँतिकुँज में आने वाले परिजनों को कुछ विशिष्ट उपलब्धि होनी चाहिए एवं यह विशिष्ट साधनात्मक ऊर्जा के परिमाण में हो, यही अभी की, समय की सबसे बड़ी माँग है।
साधना वर्ष हेतु विशिष्ट पुरुषार्थ उनके लिए बताया गया है, जिन्हें संगठनकर्ता-युगसृजेता-युगनायक जैसे गंभीर दायित्व अपने कंधों पर अगले दिनों लेने हैं। भारत में शहरों-कस्बों के मुहल्ले मिलाकर प्रायः 7 लाख गाँव हैं। यदि एक-एक सृजन सैनिक सात-सात की जिम्मेदारी ऊपर लेकर न्यूनतम दस अपने सहयोगी साधक तैयार करता है, तो पूरे भारत के चप्पे-चप्पे को गायत्रीमय-साधनासिद्धि बनाया जा सकता है। सृजन सैनिक जिनने कुछ विशिष्ट कर दिखाने का दायित्व अपने ऊपर लिया है- अब इस पुरुषार्थ को संपन्न करने हेतु तत्पर हो जाएँ तो इस प्रखर साधना वर्ष में वह सब स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा जिसे सतयुग-नवयुग की प्रथम किरण के नाम से युगऋषि ने संबोधित किया।
साधना वर्ष में वही पुरुषार्थ आत्मिक स्तर पर सम्पन्न होने जा रहा है।
साधना की सफलता का रहस्य सदाचार में निहित है।
साधना के विज्ञान को मधुविद्या कहा गया है। छान्दोग्य उपनिषद् के प्रथम खण्ड के प्रथम बारह श्लोकों में इसका विस्तृत विवरण पढ़ा जा सकता है। आज जो प्राणशक्ति का ह्रास तेजी से होता जा रहा है, उसमें यदि किसी का सहारा है, तो मात्र सविता साधना का- जिसकी शक्ति के संदोहन से मानवमात्र को चिरयौवन की-देवताओं के समकक्ष अमरत्व की प्राप्ति हो सकती है।
साधना का ज्वार ला दिया। भगवत्पाद आचार्य स्वयं भी इस पावन भूमि में खड़े होकर गदगद स्वर में कह रहे थे- यहाँ आकर मेरी झोली भर गयी। महादेवी सीता की पुण्यभूमि ने मुझे मण्डनमिश्र जैसा तेजस्वी परिव्राजक दिया है- जो अब से श्रीमतं सुरेष्वराचार्य के नाम से देश विख्यात होंगे। इनकी साधना एवं तपस्या से समूची भारतभूमि गौरवान्वित होगी। ऐसा ही हुआ।
साधना वर्ष में जो युगसाधक देवालयों को अपनी सक्रियता का केन्द्र बनाकर शिक्षा, सद्भावना और जीवन दिशा का प्रशिक्षण देने का उत्तरदायित्व वहन करें, उन्हीं से कुछ लोकोपकार की कामना की जा सकती है। देवालयों के माध्यम से चरित्र, प्रेम, मैत्री, करुणा, दया, मेधा, मनस्विता की शिक्षा देने का गुरुतर कार्य सँभलना साधना वर्ष की कसौटी भी है और इसके भागीदार साधकों की जिम्मेदारी थी। लोक-जीवन को साधनापरायण बनाना ही उनका उद्देश्य है। आध्यात्मिक भावनाओं का प्रसार और संस्कारों की प्रशस्ति का उत्तरदायित्व देवालयों का है। इन्हीं के आधार पर उनको इतना महत्वपूर्ण स्थान मिला है।
साधना वर्ष की पूर्णाहुति
साधना की। संसार के अन्य महापुरुष जिन्होंने लोगों को उच्च भूमिका की ओर बढ़ाया, निश्चित
रूप से तपस्वी साधक थे। पैगम्बर मुहम्मद ने पच्चीसवें वर्ष में साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। महात्मा ईसा के जीवन के छत्तीस वर्ष तपश्चर्या में लगे। यहूदी धर्म के यहोबा और पारसी धर्म के देवदूत जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप-साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।
साधना की एक ही सार्वभौमिक परिभाषा है, स्वयं के जीवन की समस्त खोटों को निकाल फेंकना। साथ ही अध्यात्म के उन प्रयोगों का दैनन्दिन जीवन में समावेश करना जो व्यक्तित्व की अन्तःशक्तियों को जगाते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ने बीस वर्ष की ऐसी ही तपश्चर्या के बलबूते अपने समय के मार्गदर्शन का दायित्व सँभाला। गुरु गोविन्दसिंह ने लोकमत नामक स्थान में तप-प्राण बटोरा, उसी को बिखेरकर स्वयं को युग निर्माता के रूप में प्रतिष्ठित कर सके। छत्रपति शिवाजी का व्यक्तित्व गढ़ने वाले समर्थ रामदास ने तप कौशल से स्वयं को साँचा बना डाला था।
साधनापरायण रहे हैं। गायत्री महामंत्र के आधार पर की जाने वाली तप-साधना उनकी रुचि एवं अभ्यास बन चुकी है। इसी साधना प्रक्रिया को उन्हें अधिकाधिक व्यापक बनाना और सामूहिक रूप से करना है। देखने-सुनने में यह प्रयोग बहुत छोटा और महत्त्वहीन-सा लगता है, पर बात ऐसी नहीं है।
साधना ही जीवन का सार है। देश आज पथभ्रष्ट हो रहा है। जन ही नहीं, जननेतृत्व भी भ्रष्टाचार की पाप-पंक में आकण्ठ डूब चुका है। उसे सुपथ पर लाने के लिए, पाप-पंक से उबारने के लिए प्रचण्ड आत्मबल-सम्पन्न साधकों की आवश्यकता है। तपस्वियों की प्रखर आत्मचेतना से ही राष्ट्रीय जीवन में फिर से नव-प्राण फूँके जा सकते हैं।
साधना प्रशिक्षण की अवधि में दो पुस्तिकाओं का वितरण किया गया है, जिनमें इस समग्र महासाधना अभियान की जानकारी है। आम आदमी इसमें कैसे जुड़ सकता है एवं ढाई दिवसीय आयोजनों में क्या कुछ कहा जाना है- यह सब इनमें विस्तार से दिया गया है। अभी इन्हें हिन्दी व गुजराती में प्रकाशित किया गया है। बाद में इनके सभी भाषाओं-अंग्रेजी सहित प्रमुख भारतीय व आंचलिक तथा विदेशी भाषाओं में भी प्रकाशन हो, इसके लिए उत्साहित प्रेरित किया जा रहा है। क्षेत्रीय परिजन इस कार्य को हाथ में ले इन संदर्शिकाओं को जन-जन तक पहुँचाएँ, इससे बड़ा पुण्य कर्म कोई और नहीं हो सकता।
साधना वर्ष में प्रचण्ड गति दी जानी चाहिए।
साधना की धुरी पर स्थापना हेतु एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ इस प्रकार प्रायः एक लाख संकल्पित कार्यकर्ताओं के शिक्षण के रूप में वसंत की पूर्व वेला तक संपन्न हो चुका है। प्रायः पचास से अधिक स्थानों पर यह प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ है एवं औसतन भागीदारी प्रत्येक स्थान पर दो से तीन हजार संकल्पित समयदानी साधक स्तर के नैष्ठिकों की रही है। इस प्रकार इस विराट मंथन से प्रायः एक लाख से अधिक साधक-संगठन-कर्ताओं के माध्यम से साधना वर्ष का शुभारम्भ होना युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण की एक महत्वपूर्ण घटना कही जा सकती है। एक प्रकार से यह नवयुग की गंगोत्री द्वारा संगठन के निमित्त हर नैष्ठिक कार्यकर्ता को विकेन्द्रित कर दी गयी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, जिसे उसे साधनात्मक स्तर पर अपने निजी जीवन में व आराधनात्मक स्तर पर समाज परिकर में संपन्न करना है।
साधना का वातावरण पैदा किया जा सकता है।
साधना का- तपश्चर्या का सम्बल लें। यदि ऐसा हो सके तो इसी देवपरिवार की असंख्य प्रतिभाएँ युगदेवता के चरणों में अपनी छोटी या बड़ी भावभरी आत्माहुति प्रस्तुत कर सकती हैं। महाकाल ने इसी की माँग की है। जाग्रत आत्माओं में से हर एक की असाधारण भूमिका इस संदर्भ में हो सकती है। अबकी बार का वसन्त पर्व जाग्रत आत्माओं के लिए यही संदेश लेकर आया है।
साधनासिद्धि बनाया जा सकता है। सृजन सैनिक जिनने कुछ विशिष्ट कर दिखाने का दायित्व अपने ऊपर लिया है- अब इस पुरुषार्थ को संपन्न करने हेतु तत्पर हो जाएँ तो इस प्रखर साधना वर्ष में वह सब स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा जिसे सतयुग-नवयुग की प्रथम किरण के नाम से युगऋषि ने संबोधित किया।
साधना से ही वह ऊर्जा मिलती है, जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमी बुराइयों को आकर्षक कुसंस्कारों को हटाकर अच्छाइयों के कष्टसाध्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा सके।
साधना वर्ष की अलौकिक आभा में ज्योतिर्मय आत्माएँ उभरती, झिलमिलाती दीख पड़ेंगी और अपनी उपयुक्त जगह ग्रहण करेंगी- ऐसी आशा की गई है। महाकाल का यह शंखनाद निष्फल नहीं जा सकता। इसे सुनकर मूर्च्छितों-प्रसुप्तों में भी चेतना का संचार होगा। जो सर्वथा मर चुके हैं, उनकी बात दूसरी है।
साधना का स्तर निर्धारित कर दिया गया है, जिसे उन्हें कम-से कम महापूर्णाहुति तक नियमित चलाना है। इस साधना से जुड़ने वाले और अन्यों को जोड़ने वालों को ईश्वरीय सुरक्षा कवच तथा प्रगति के अवसरों का पुण्य-लाभ अपनी साधना-भावना के अनुपात में निश्चित ही मिलना है।
साधना में स्वयं प्रवृत्त होने और अन्यों को इसके लिए प्रेरित करने की बात सोचनी चाहिए।
साधनाएँ करनी पड़ती हैं। अन्दर एटम बम की शक्ति भरी पड़ी है, जिसे आपको जगाना और नियोजित करना भर है।
साधना वर्ष के सरंजाम-आयोजन की निश्चित परिणति राष्ट्र और विश्व-मानवता का उज्ज्वल भविष्य है। वही उज्ज्वल भविष्य जिसके चित्रांकन में निरत विश्व मनीषा ने अनेकों मोहक चित्र प्रस्तुत किए हैं। आध्यात्मिक, साँस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक पहलुओं के अनुरूप प्रत्येक का अपना सौंदर्य है। अन्तर्दृष्टि के बल पर प्रकाश युगीन सामाजिक संरचना, व्यवस्था-प्रणालियों आदि का जीवन्त चित्रण कर रही कल्पना की तुलिका एक एक ठहराव-सा अनुभव कर रही है। कौन होंगे वे व्यक्ति, जिनके ऊपर भावी समाज के नेतृत्व का भार होगा?
साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। महात्मा ईसा के जीवन के छत्तीस वर्ष तपश्चर्या में लगे। यहूदी धर्म के यहोबा और पारसी धर्म के देवदूत जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप-साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।
साधना उनकी रुचि एवं अभ्यास बन चुकी है। इसी साधना प्रक्रिया को उन्हें अधिकाधिक व्यापक बनाना और सामूहिक रूप से करना है। देखने-सुनने में यह प्रयोग बहुत छोटा और महत्त्वहीन-सा लगता है, पर बात ऐसी नहीं है।
साधनात्मक आयोजनों की श्रृंखला इस वसन्त से सारे भारत व विश्व के सभी केन्द्रों से आरंभ हो गयी। इसी के विषय में साधना प्रशिक्षण हेतु प्रायः 48 स्थानों का चयन कर यह प्रक्रिया एक दिसंबर, 1998 से आरंभ की गयी थी। विराट गायत्री परिवार रूपी संगठन की साधना की धुरी पर स्थापना हेतु एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ इस प्रकार प्रायः एक लाख संकल्पित कार्यकर्ताओं के शिक्षण के रूप में वसंत की पूर्व वेला तक संपन्न हो चुका है। प्रायः पचास से अधिक स्थानों पर यह प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ है एवं औसतन भागीदारी प्रत्येक स्थान पर दो से तीन हजार संकल्पित समयदानी साधक स्तर के नैष्ठिकों की रही है। इस प्रकार इस विराट मंथन से प्रायः एक लाख से अधिक साधक-संगठन-कर्ताओं के माध्यम से साधना वर्ष का शुभारम्भ होना युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण की एक महत्वपूर्ण घटना कही जा सकती है।
साधना से सिद्धि-1
साधना वर्ष का असाधारण उपहार समझा जाना चाहिए और उससे लाभान्वित होने का परिजनों में से प्रत्येक को प्रयत्न करना चाहिए। इस आत्म श्रेय एवं दैवी प्रकाश अनुदान का दुहरा लाभ प्राप्त करने वाले अपने सौभाग्य कली सराहना पीढ़ी-दर-पीढ़ी किए बिना न रह सकेंगे।
साधना के दैवी पराक्रम हेतु अपने देव परिजनों को उसी तत्परता से कटिबद्ध होना चाहिए, जैसे कि बंगला देश की गड़बड़ी, चीनी-आक्रमण पाकिस्तानी हमला, स्काईलैब आदि की विपत्तियों के निवारण हेतु सफलतापूर्वक निरत हो चुके हैं। अबकी बार आशंकाएँ बड़ी हैं, इसलिए हमारे सुरक्षा प्रयास भी बढ़े-चढ़े होने चाहिए। उसी का प्रारूप इस वसन्त पर्व पर प्रस्तुत किया गया है और उसमें परिपूर्ण सहयोग देने के लिए समस्त देवपरिजनों को आमंत्रित किया गया है।
साधना में लगाए। योगी अरविन्द घोष, महर्षि रमण, स्वामी रामतीर्थ की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। वैष्णव आचार्यों में से रामानुज, मघ्व, निम्बार्क आदि ने जितना ज्ञान संचय किया, उतनी ही तप-साधना की। संसार के अन्य महापुरुष जिन्होंने लोगों को उच्च भूमिका की ओर बढ़ाया, निश्चित
रूप से तपस्वी साधक थे। पैगम्बर मुहम्मद ने पच्चीसवें वर्ष में साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे।
साधना वर्ष में वह सब स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा जिसे सतयुग-नवयुग की प्रथम किरण के नाम से युगऋषि ने संबोधित किया।
साधना से प्राप्त आत्मबल ही राष्ट्रीय एवं मानवीय समस्याओं का कारगर समाधान है। गोरक्ष को इस स्वयं प्रकाशित ज्ञान से प्रसन्नता हुई। इसी के साथ उनका ध्यान सहस्रार चक्र की ओर उन्मुख हुआ।
साधनारत का प्रयोजन ऐसे ही तपस्वियों को आगे लाना और उन्हें लोक नेतृत्व के लिए तैयार करना है।
साधना से सिद्धि-2
साधना का प्रमुख उद्देश्य माना गया है। जिस प्रकार आलस्यवश दीपक न जलाकर अन्धकार में पड़े रहने वाले व्यक्ति को मूर्ख कहा जाएगा, उसी प्रकार प्रमादवश अज्ञान दूर कर ज्ञान न पाने के लिए प्रयत्न करने वाले को भी मूर्ख ही कहा जाएगा। भारतवर्ष की महिमा प्रकारान्तर से तप और स्वाध्याय की ही महिमा है। यहाँ की संस्कृति सदा से अपने अनुयायियों को विवेकशील बनने का सन्देश देती रही है, मूढ़ अथवा अन्धविश्वासी बनने का नहीं।
साधना से सिद्धि प्राप्त होती है। अपनी चंचल चित्तवृत्तियों को साध लेना ही साधना है। इसमें मन का संयम और कषाय-कल्मषों से मुक्ति आवश्यक है-
साधना वर्ष के प्रयोग से पैदा हुई चेतनात्मक प्रचण्ड ऊर्जा सूक्ष्मजगत को परिष्कृत करके उसे इस योग्य बना देगी कि सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगें और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ दैवी अनुग्रह की तरह उमड़ती, उभरती चली जाएँ। साधना वर्ष के आयोजन का जो महाप्रयोग इन दिनों किया जा रहा है, उसे मूलतः सूक्ष्मजगत के वातावरण के परिशोधन की प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए। जिससे परा प्रकृति को द्रवित कर मनोवाँछित प्रतिफल प्राप्त किए जा सकेंगे।
साधना वर्ष का आमंत्रण भेजा है। प्रमादी और कुसंस्कारी इसे अनदेखी-अनसुनी करके उपेक्षा भी बरत सकते हैं, पर जिनके भीतर आदर्शों की उत्कृष्टता, दूरदर्शी विवेकशीलता विद्यमान है, वे समय चूक कर सदा पछताते रहने की भूल नहीं कर सकते।
साधना कहा जाता है। यही सर्वोच्च उपलब्धि भी है।
साधना की शक्ति से स्पन्दित हो रहा हो तो नवयुग की गंगोत्री का पुरुषार्थ तो और भी विशिष्ट होना चाहिए, जहाँ से सारा चिन्तन-मार्गदर्शन-राष्ट्रव्यापी संगठनात्मक पुनर्गठन का सूत्र-संचालन-नियमन चल रहा हो, वहाँ तो यह प्रक्रिया और अधिक गतिशील-सक्रिय-जीवन्त नजर आनी चाहिए। इस वर्ष के शिविरों में शाँतिकुँज में आने वाले परिजनों को कुछ विशिष्ट उपलब्धि होनी चाहिए एवं यह विशिष्ट साधनात्मक ऊर्जा के परिमाण में हो, यही अभी की, समय की सबसे बड़ी माँग है।
साधना में बाधक-संचित दुष्कर्म, पाप प्रायश्चित के तप-व्रत; इंद्रियाँ आत्मा की शत्रु नहीं सेवक।
साधना और सिद्धि।
साधना ही उनके लिए एकमात्र मार्ग है। शरीर बढ़ जाने पर फिर
शिशु शरीर पा सकना या छोटे कपड़े पहनकर गुजारा कर सकना सम्भव नहीं। असुरता को देर तक सहन करना और देवत्व को देर तक टकराते रहना न तो उनके लिए सम्भव है और न शोभनीय। इससे आत्मा की, परमात्मा की और युगधर्म की अवमानना ही होती रहेगी। ओछा जीवन जीते रहने पर भी चैन से रहा नहीं जा सकेगा।
साधना शक्ति के गायत्री मंत्र की प्रेरणाओं के समावेश से यह पुनः सारे विश्व का नेतृत्व करेगा, भारतभूमि, देवभूमि-तपोभूमि एक विराट तीर्थ बनेगी, इसमें रंचमात्र भी सन्देह न कर, निज को साधनात्मक पुरुषार्थ में नियोजित कर ही देना चाहिए।
साधना के अंतर्गत यह निश्चय आपको करना होगा कि आप अस्वाद व्रत से लेकर क्या-क्या कर सकते हैं तथा अपनी कमजोरियों से किस प्रकार लड़ सकते हैं। तपस्वी जीवन जीने के लिए आप कितनी तप-तितिक्षा कर सकते है? यह निश्चय आपको करना है। आपको यह निश्चय करना है कि इसका स्वरूप कितना बड़ा, छोटा या मध्यम हो सकता है। बच्चों के लिए तप-साधना क्या हो सकती है?
साधना थी।
साधना जारी रखी। कालान्तर में यह पुरुषार्थ सफल हुआ और स्वर्ग में रहने वाली गंगा पृथ्वी पर आने को सहमत हो गयीं। अपने तप से उन्होंने वह कठिन कार्य सम्भव बना दिया।
साधना वर्ष के अनुशासनों की उपयोगिता का जितना माहात्म्य कहा जाय, उतना ही कम है।
साधना के साँचे में ढला है।
साधना का, एक मूर्खता का- दूसरा दूरदर्शिता का, एक पतन का- दूसरा उत्थान का; इन दोनों में से एक का चयन करने की चुनौती इन दिनों हर जाग्रत आत्मा के सामने अपेक्षाकृत अधिक मुखर हो सामने आ खड़ी हुई है। दोनों ओर लाभ दिखते हैं और हानि भी। मन भ्रमता-भटकता रहता है। कभी एक को अपनाने की बात सोचता है, कभी दूसरे को। कभी एक को पकड़ता है, कभी दूसरे को।
साधना-उपासना की पहली सीढ़ी सात्विकता है। अतः आपको यह ध्यान रखना होगा कि आप चाहे यहाँ रहें अथवा कहीं भी रहें, आपको इसी प्रकार सात्विक अन्न-आहार का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार अगर आप करेंगे तो आपको पता चलेगा कि सात्विक आहार का भजन-पूजन पर, साधना-उपासना पर क्या प्रभाव पड़ता है। हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी एवं छाछ का सेवन किया है। इस बीच न नमक खाया है, न शक्कर।
साधना वर्ष का सन्देश देने से पूर्व मिले, उसमें अपना भोजन पका-खा लिया जाए। अपना राशन और पकाने के बर्तन साथ रहें। इसमें अपनी कमायी खाने का पुण्य मिलेगा और किसी पर आश्रित भी न रहना पड़ेगा।
साधना से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं। तुम अपने सदाचार में अडिग और अटल हो, इसलिए तुम्हें वह सब कुछ मिलेगा, जो तुम्हें अभीष्ट है। इस दिव्य सन्देश के साथ ही उस अप्सरा के देखते-देखते ब्राह्मण युवक विरुपाक्ष उटज गाँव स्थित अपने घर पहुँच गए। घर पहुँचकर उन्होंने संध्योपासना करते हुए गायत्री जप पूर्ण किया। आज उसे अनुभव हो रहा था कि गायत्री साधना की सफलता का रहस्य सदाचार में निहित है।
साधना वर्ष का शुभारम्भ होना युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण की एक महत्वपूर्ण घटना कही जा सकती है। एक प्रकार से यह नवयुग की गंगोत्री द्वारा संगठन के निमित्त हर नैष्ठिक कार्यकर्ता को विकेन्द्रित कर दी गयी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, जिसे उसे साधनात्मक स्तर पर अपने निजी जीवन में व आराधनात्मक स्तर पर समाज परिकर में संपन्न करना है।
साधना-साधक
साधना की प्रखरता को अन्य दैनिक आवश्यकताओं की ही तरह नित्यकर्म में सम्मिलित एवं संपर्क क्षेत्र में आने वाले परिजनों को भी इसके लिए प्रेरित किया जाय। (3) जीवन को इतना शानदार बनाया जाय, जिसमें आत्मसंतोष, ईश्वरीय अनुकम्पा और लोक श्रद्धा का समन्वित वरदान मिल सके।
साधना का अनुकरण।
साधना-अभ्यास-गुरु इन तीनों में से कोई नहीं था। गुरु जो हो सकता था, वह मूर्च्छित पड़ा था। उसके मुँह से एक असहाय आह-सी निकली-काश मुझे हथियार चलाना आता।
साधना हेतु उपयुक्त वातावरण, गुरु निर्देश से साधना।
साधना वर्ष की शुरुआत के साथ ही युगपरिवर्तन की, जनमानस के भावनात्मक नवनिर्माण की घड़ी और भी अधिक निकट आ पहुँची है। अरुणोदय का, ऊषा का आलोक प्राची के समीप न सही दूर दिखाई पड़ने लगा है। ऐसे अवसर पर अनिर्णय अन्तर्द्वन्द्व को मिटा देना ही उचित है। हम जहाँ भी, जिस भी स्थिति में हैं, वहीं यह निश्चय-निर्णय करें कि इस ब्रह्ममुहूर्त में आलस्य-प्रमाद के गर्त में पड़े न रहेंगे। कमर बाँधकर आगे बढ़ेंगे और कर्तव्यों की पुकार को शिरोधार्य करते हुए शूरवीरों जैसा दुस्साहस जुटाएँगे।
साधना केन्द्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, ताकि यह सर्वविदित हो सके कि आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं ब्रह्मकर्म के निर्वाह के कारण ही उनका महत्व सर्वोपरि है। इस गौरव को प्राप्त न कर सके तो देवालयों की महिमा महत्ता शून्यवत ही है।
साधना वर्ष के महाप्रयोग में भागीदार बनने वालों को निश्चित ही परम पूज्य गुरुदेव से अभिन्नता की दिव्य अनुभूति मिले बिना न रहेगी।
साधनात्मक स्तर पर अपने निजी जीवन में व आराधनात्मक स्तर पर समाज परिकर में संपन्न करना है।
साधना की महिमा बताते हुए उनकी तन्मयता अद्भुत थी। बाण गंगा कुण्ड के पास एकत्रित हुआ साधक वृन्द उनके शब्दों को महामंत्र मानकर आत्मसात् कर रहा था। वह कह रहे थे- योगियों! साधना ही जीवन का सार है। देश आज पथभ्रष्ट हो रहा है। जन ही नहीं, जननेतृत्व भी भ्रष्टाचार की पाप-पंक में आकण्ठ डूब चुका है।
साधना वर्ष के प्रतिभागियों को हर दृष्टि से सौभाग्यशाली ही माना जाएगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि जिन्हें इस स्तर की भागीदारी मिले, उनका भी कुछ दायित्व है। पात्रता विकसित करने के लिए उन्हें साधना वर्ष के सभी अनुबन्धों का निष्ठापूर्वक पालन करना पड़ेगा। इस साधना वर्ष के महाप्रयोग में भागीदार बनने वालों को निश्चित ही परम पूज्य गुरुदेव से अभिन्नता की दिव्य अनुभूति मिले बिना न रहेगी।
साधनात्मक आयोजन संपन्न कराएँगे, जो किसी निर्धारित स्थान पर सामूहिक रूप से होंगे। सामूहिक जप में बड़ी शक्ति है। इसमें समूहमन जाग्रत होता है एवं समूहमन के जागरण से प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है। इस पर विस्तार से इस अंक में प्रकाश डाला गया है।
साधना अनूठी थी। महिलाओं के सम्बन्ध में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। वे जंगल में पले थे। आहार-विहार ठीक होने के कारण उनका अन्नमय कोष परिशोधित था। मनोमय कोष पवित्र था।
साधना का, व्यावहारिक अध्यात्म का विकास न हो तो कौन कह सकता है कि आपने देवत्व के दर्शन किए, इससे तो यही समझा जाएगा कि लोगों ने समय, श्रम और धन का अपव्यय ही किया है। इस जीवन में देवत्व को प्राप्त न कर सके तो कौन जाने मृत्यु के बाद कोई पारलौकिक सुख मिलेगा भी या नहीं। कोई भी विचारवान व्यक्ति इस बात पर विश्वास कर लेगा, ऐसा समझना कठिन है।
साधना, योग और तप का तत्त्वज्ञान।
साधना ही राष्ट्रवासियों को उनका खोया चरित्र देगी, उनमें साहस एवं विश्वास का संचार करेगी। उन्हें देवत्व का गौरव वापस दिलाएगी।
साधना भूमि की दुर्दशा नहीं सह सकता। गुरु गोरक्ष बोलते जा रहे थे।
साधना प्रशिक्षण हेतु प्रायः 48 स्थानों का चयन कर यह प्रक्रिया एक दिसंबर, 1998 से आरंभ की गयी थी। विराट गायत्री परिवार रूपी संगठन की साधना की धुरी पर स्थापना हेतु एक अभूतपूर्व पुरुषार्थ इस प्रकार प्रायः एक लाख संकल्पित कार्यकर्ताओं के शिक्षण के रूप में वसंत की पूर्व वेला तक संपन्न हो चुका है। प्रायः पचास से अधिक स्थानों पर यह प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न हुआ है एवं औसतन भागीदारी प्रत्येक स्थान पर दो से तीन हजार संकल्पित समयदानी साधक स्तर के नैष्ठिकों की रही है। इस प्रकार इस विराट मंथन से प्रायः एक लाख से अधिक साधक-संगठन-कर्ताओं के माध्यम से साधना वर्ष का शुभारम्भ होना युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम चरण की एक महत्वपूर्ण घटना कही जा सकती है। एक प्रकार से यह नवयुग की गंगोत्री द्वारा संगठन के निमित्त हर नैष्ठिक कार्यकर्ता को विकेन्द्रित कर दी गयी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, जिसे उसे साधनात्मक स्तर पर अपने निजी जीवन में व आराधनात्मक स्तर पर समाज परिकर में संपन्न करना है।
साधना वर्ष का सन्देश यही है कि ग्रामे-ग्रामे गृहे-गृहे जने-जने मूर्च्छना को जाग्रति में बदला जाए। नवजागरण के इस पुण्य प्रभाव में ग्रामीण अंचल के धर्म बिन्दु को उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। मैले कपड़े धोए जा सकते हैं-टूटी वस्तुओं की मरम्मत हो सकती है, रोगी को स्वस्थ बनाया जा सकता है- तो कोई कारण नहीं कि तीर्थचेतना को निहित स्वार्थों एवं अन्ध-विश्वासों से मुक्त कराकर उसे गाँव-गाँव तक अपने पूर्व रूप में न पहुँचाया जा सके।
साधना की अति कष्टसाध्य प्रक्रिया अपनाकर अपने को ऐसी प्रचण्ड अग्नि के रूप में विकसित करता है, जिसके संपर्क में आने वाला सहज ही तत्सम बन जाय। इसके लिए उसे आत्मनिग्रह की, आत्म संवर्द्धन की अग्निपरीक्षा में होकर जन्म-जन्मान्तर तक आत्मशोधन करना पड़ता है। तब कहीं वह इस स्थिति में बनता है कि अपना बहुमूल्य संचित तप-प्राण परम निस्वार्थ भाव से अधिकारी शिष्य को प्रदान करके उसे अपनी क्षमता का गौरव उपलब्ध करा सके।
साधना के अंतरंग पक्ष, उनके दृश्य जीवन की अदृश्य अनुभूतियाँ, चमत्कारों से भरा जीवनक्रम।
साधना का मूल मंत्र है। अंधकार में भ्रम होना स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार अँधेरे में वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पाता-पास रखी हुई चीज का स्वरूप यथावत दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार अज्ञान के अँधेरे में दोष की स्थिति, विषय आदि का ठीक आभास नहीं होता। वस्तुस्थिति के ठीक ज्ञान के अभाव में कुछ-का-कुछ सूझने और होने लगता है। विचार और उससे प्रेरित कार्य के गलत हो जाने पर मनुष्य का विपत्ति, संकट अथवा भ्रम में पड़कर अपनी हानि कर लेना सहज स्वाभाविक है।
साधना को अपनाकर हम इस सर्वनाशी प्रवाह को रोक सकते हैं, जो इन दिनों विश्व-मानव का भविष्य सदा के लिए अन्धकारमय बनाने के लिए आ खड़ा हुआ है।
साधना के लिए विश्वामित्र एवं दधिचि की भाँति ऐसे कदम बढ़ाने चाहिए, जिसके लिए उनका अवतरण इन विशिष्ट घड़ियों में विशेष रूप से हुआ है।
साधना का अर्थ है- अपने आप को साध लेना- रिंग मास्टर के हन्टर की तरह बार-बार उन वृत्तियों पर अंकुश लगाना जो उच्छृंखल हो समाज के संतुलन को बिगाड़ती हैं। इसी का दूसरा पक्ष है- विचारों में श्रेष्ठता का समावेश कर उनका समाज के नवनिर्माण हेतु नियोजन। व्यक्ति के स्तर पर आरंभ यह साधना समाज के विराट स्तर तक पहुँचती हुई बड़े व्यापक आंदोलन-व्यक्तिनिर्माण से समाज-निर्माण-युगनिर्माण में बदल जाती है।
साधनात्मक पुरुषार्थ है यह।
साधना सम्पन्न प्रतिभाएँ करती रही हैं। ऐसी प्रतिभाएँ जो तप-साधना की सुप्रखरता से सुसम्पन्न हों, उन्हीं को युगपरिवर्तन का नियामक कहा जा सकता है।
साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा रूपी चार बातों द्वारा संघर्षात्मक-सुधारात्मक क्रान्तियों में भागीदारी हर साधक को करनी चाहिए।
साधना वर्ष की शुरुआत की गयी है। 22 जनवरी, 1999 से आरंभ हुआ यह उपक्रम 10 फरवरी, 2000(वसंत पंचमी) तक चलता रहेगा। इस वसन्त की ही पावन वेला में एक साथ प्रायः चौबीस हजार स्थानों से एक साथ अखण्ड गायत्री जप-उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना का शुभारम्भ होना अपने आप में एक इतनी युग परिवर्तनकारी घटना है, जिसके परिणाम आने वाले दो वर्षों में सभी परिजन अपने उन्हीं चर्मचक्षुओं से देख सकेंगे। ढाई दिवसीय अखण्ड जप प्रधान साधनात्मक आयोजनों की श्रृंखला इस वसन्त से सारे भारत व विश्व के सभी केन्द्रों से आरंभ हो गयी। इसी के विषय में साधना प्रशिक्षण हेतु प्रायः 48 स्थानों का चयन कर यह प्रक्रिया एक दिसंबर, 1998 से आरंभ की गयी थी।
साधना वर्ष का आयोजन सफल ही नहीं शानदार भी रहा। देवालयों को इस प्रखर साधना वर्ष में साधना केन्द्रों के रूप में विकसित करके ही भारत को पुनः देवभूमि का गौरव प्रदान किया जा सकता है।
साधना वर्ष का आयोजन किया गया है। यह पूर्णतया सुनिश्चित है कि वर्तमान साधना वर्ष में किए जाने वाले दैवी पुरुषार्थ से ही सामूहिक पापों का प्रक्षालन सम्भव होगा। इस वर्ष की जाने वाली साधना के दैवी पराक्रम हेतु अपने देव परिजनों को उसी तत्परता से कटिबद्ध होना चाहिए, जैसे कि बंगला देश की गड़बड़ी, चीनी-आक्रमण पाकिस्तानी हमला, स्काईलैब आदि की विपत्तियों के निवारण हेतु सफलतापूर्वक निरत हो चुके हैं। अबकी बार आशंकाएँ बड़ी हैं, इसलिए हमारे सुरक्षा प्रयास भी बढ़े-चढ़े होने चाहिए। उसी का प्रारूप इस वसन्त पर्व पर प्रस्तुत किया गया है और उसमें परिपूर्ण सहयोग देने के लिए समस्त देवपरिजनों को आमंत्रित किया गया है।
साधना वर्ष की उपाधि कुछ उसी प्रकार की है। गर्भस्थ शिशु को माता से जिस तरह का अनुदान मिलता है, उससे हल्का नहीं वरन् कुछ भारी ही यहाँ से भी मिलेगा।
साधना से प्राप्त होती है, अभ्यास से प्राप्त होती है, गुरु से सीखी जाती है। रामचन्द्र के पास साधना-अभ्यास-गुरु इन तीनों में से कोई नहीं था। गुरु जो हो सकता था, वह मूर्च्छित पड़ा था। उसके मुँह से एक असहाय आह-सी निकली-काश मुझे हथियार चलाना आता।
साधना वर्ष का आयोजन इसी प्रयोजन के लिए सम्पन्न किया जा रहा दिव्य प्रयोग है।
साधना वर्ष के सन्देश लिखती चले।
साधना पद्धति को बड़ा सुगम बनाया गया है। इसमें हर स्तर के व्यक्ति सम्मिलित हो सकते हैं। नये साधक 10 मिनट की प्रार्थना से यह क्रमशः जीवन-साधना के स्तर तक पहुँच सकते हैं, जहाँ उन्हें व्यक्तित्व-परिष्कार का लक्ष्य सहज ही सिद्ध होता दृष्टिगोचर होने लगेगा। साधना के इस क्रम में हमारे देश की भाषा, क्षेत्र, शिक्षा का स्तर, जाति-संप्रदायगत विभिन्नता को देखते हुए कई स्तर बनाए गए हैं। जिन्हें जो सुलभ लगे-वे उससे जुड़ सकते हैं अथवा जुड़ने हेतु प्रेरित किए जा सकते हैं।
साधना बनाया।
साधना रूपी घृत की नियमित रूप से पूर्ति होती रहे। यह क्रम तब से नियमित चलता रहा है। इस बीच देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के अंतर्गत साधना-पुरुषार्थ और प्रखर हुआ- एक अर्द्ध महापूर्णाहुति आँवलखेड़ा (आगरा) में सम्पन्न हुई और अब द्वितीय अंतिम महापूर्णाहुति की वेला आ पहुँची। अब तो बचे हुए समय का, विशेषकर इस प्रखर साधना वर्ष का एक-एक क्षण मूल्यवान है।
साधना-समर बनाम जीवन-संग्राम
साधनात्मक वातावरण बनाने भर की आवश्यकता है- क्राँति के बीज ऐसी पृष्ठभूमि में सहज ही पुष्पित-पल्लवित होते चलेंगे।
साधना के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी सम्भालें। आँधी में उड़ते-फिरते रहने वाले पत्तों की तरह उन्हें निष्प्रयोजन इधर-उधर भटकना नहीं है, वरन् समुद्र में खड़े हुए प्रकाश स्तम्भों के समतुल्य बनना है, जो घोर अन्धकार में स्वयं चमकते रहते हैं और अपने प्रकाश से उधर से निकलने वाले जहाजों को डूबने से बचाते हैं। इस लक्ष्य को हमें अपने जीवनक्रम में, दृष्टिकोण में सम्मिलित करना चाहिए और तदनुरूप अपने तपस्वी जीवन की गतिविधियों का निर्धारण करना चाहिए।
साधना-आराधना (वा. क्र. 2) से
साधना के माध्यम से तादात्म्य किया जाता है, तो सूर्य की ‘भर्ग’ शक्ति मनुष्य के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो सामंजस्य स्थापित करती है। असत् का निष्कासन और सुसंस्कारों का विकास करती है। यही तो युगपरिवर्तन की धुरी है। इक्कीसवीं सदी में सूर्य ही सबका आराध्य होगा-वही उज्ज्वल भविष्य का अवतरण हम सबके लिए करेगा।
साधना वर्ष का शुभारम्भ एक ऐसा अवसर है, जिसे अद्भुत-अभूतपूर्व कहा जा सकता है। शायद भविष्य में भी इसकी पुनरावृत्ति कभी न हो। इन दिनों विज्ञान ने सुविस्तृत संसार को किसी गली-मुहल्ले की तरह निकटवर्ती बना दिया है। व्यक्ति और समाज की समस्याएँ आपस में गुँथ गयी हैं। साथ मरने-साथ जीने जैसा माहौल बन गया है।
साधना का परिचय देना होगा, अन्यथा सफलता संदिग्ध बनी रहेगी।
साधना के परिणामस्वरूप अवतरित होने वाली भगवत्कृपा ही करती है। पौराणिक गाथाओं में इसी प्रसंग के अनेकों आख्यान हैं। देवासुर संग्रामों के अन्त तभी होते रहे हैं, जब भगवान की शक्ति ने किसी-न-किसी रूप में प्रकट होकर अपना-अपना चमत्कार दिखाया है। इन कथानकों में एक ही तथ्य स्पष्ट है कि श्रेय और प्रेय की खींचतान का अन्त ऋतम्भरा-प्रज्ञा दूरदर्शी विवेकशीलता, साधना के लिए साहस कर सकने वाली प्रखरता के आधार पर ही होता है। जब तक अन्तरात्मा की धरती पर प्रखर तप-साधना के फलस्वरूप अवतरित होने वाली भगवत्कृपा सक्रिय न होगी, तब तक अन्तर्द्वन्द्व से भरी अशान्त मनः स्थिति में विक्षोभ उभरते ही रहेंगे।
साधना समाज के विराट स्तर तक पहुँचती हुई बड़े व्यापक आंदोलन-व्यक्तिनिर्माण से समाज-निर्माण-युगनिर्माण में बदल जाती है।
साधना में से एक को वरण करने के लिए सुनिश्चित फैसला कर लेना चाहिए। अंतर्जगत में देवासुर संग्राम चिरकाल से चलता आ रहा है। अब कोई ऐसा दैवी-अवतरण होना चाहिए, जिससे इस अन्तर्द्वन्द्व के कारण उत्पन्न महाविनाश का अन्त हो सके। हमारे भीतर दो प्रबल तत्व बैठे हैं। एक देवता दूसरा असुर।
साधना आयोजन में ऐसे-ऐसे अनेक आधारों का समन्वय है, जिनका सम्मिलित प्रभाव वातावरण में ऐसे उपयोगी तत्वों का समावेश करता है, जो अविज्ञात
रूप से विश्व कल्याण की भूमिका सम्पन्न कर सके।
साधना के रूप में स्वच्छता का, असुरता के प्रतिरोध का व्यापक अभियान चलाना चाहिए, ताकि महामारी के उद्गम स्रोत पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सके।
साधना द्वारा उपार्जित आत्मबल सम्पदा की प्रचुर पूँजी का प्रचुर संग्रह आवश्यक है।
साधना द्वारा अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाने हेतु तो नियोजित होना ही चाहिए। अपने साथ अधिक-से-अधिक परिजनों को सुरक्षा महाकवच के नीचे लेने हेतु लगना चाहिए। युगशक्ति के प्रवाह से जुड़े रहने की योगसाधना व शक्ति प्रवाह को सार्थक उद्देश्यों में नियोजित करते रहने की तप साधना हम सबको सतत् करते रहना चाहिए। प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में वरिष्ठ स्तर के सभी साधकों की 11 माला गायत्री जप अथवा प्रातः-मध्याह्न-सायं तीनों समय में न्यूनतम पंद्रह-पंद्रह मिनट की त्रिकाल संध्या करते रहने की, पूज्यवर की चेतना से सहभागिता करने का उपक्रम इस वेला में विशिष्ट शक्ति का संचार करेगा। यदि इतना संभव न बन पड़े तो प्रातः आधा घंटा व सायं आधा घण्टा जप, उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना, सविता देवता या हिमालय की चेतना का ध्यान एवं पंद्रह मिनट से आधा घण्टा नियमित प्रतिदिन स्वाध्याय यह अवश्य करना चाहिए।
साधना।
साधना वर्ष के दिनों में एक विशिष्ट प्राण प्रवाह रेडियो प्रसारण की तरह, वर्षा-मानसून की तरह उमड़ता रहेगा। उससे लाभान्वित होने के लिए सभी जागरूकों को साधना करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। साधना आयोजन में जो बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाएँगे, उनका साहस एवं उत्तरदायित्व अधिक होने के कारण उन्हें अनुदान भी इसी स्तर के मिलेंगे। किन्तु जो उतना साहस न जुटा सकेंगे, उन्हें भी पात्रता के अनुरूप हल्के स्तर के उपहार पाने का अवसर मिलेगा। वर्षा में बड़ा तालाब और सरोवर अगाध जलराशि एकत्रित कर लेते हैं, किन्तु खाली रह जाने की शिकायत छोटे गढ्ढों और पोखरों को भी नहीं रहती।
साधना-संयम उपासना और भविष्य-निर्माण की आराधना, इन तीन पक्षों पर टिका हुआ है जागृति का विज्ञान। इसमें व्यक्तित्व को परिष्कृत कर ऊर्ध्वगमन की प्रक्रिया योग त्रयी द्वारा सम्पन्न की जा सकती है, पढ़-
साधना, आहार-विहार साधना अनूठी थी। महिलाओं के सम्बन्ध में उन्हें कुछ भी पता नहीं था। वे जंगल में पले थे। आहार-विहार ठीक होने के कारण उनका अन्नमय कोष परिशोधित था। मनोमय कोष पवित्र था।
साधनात्मक प्रयास इंद्रिय, समय, अर्थ व विचार चारों स्तर पर संयम किए जाने के माध्यम से संपादित होने चाहिए। आध्यात्मिक चिंतन ही स्वच्छ मन का जन्मदाता माना जाना चाहिए। अपने-अपने इष्ट के प्रति समर्पण भाव जब राष्ट्र देवता के प्रति समर्पण में रूपान्तरित होता है, तो ऐसा मन समष्टि के साथ मिलकर एक विराट-समूह मन का निर्माण करता है जिसमें परिवर्तन हेतु अनिवार्य क्राँतिकारी शक्ति होती है।
साधना वर्ष के आयोजन का एक पक्ष व्यक्तित्व परिष्कार, समाज-निष्ठा के प्रशिक्षण का है। चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा की गरिमा और उपयोगिता को इस साधना वर्ष के अनुबन्धों- अनुशास्त्रों में ढूँढ़ा-खोजा सीखा-समझाया जा सकता है। इस कसौटी पर कसने पर इसे ऐसा श्रद्धासिक्त उपचार कह सकते हैं, जिसके माध्यम से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व का धर्म शिक्षण सुलभ बनता है। साधना वर्ष के अनुशासनों की उपयोगिता का जितना माहात्म्य कहा जाय, उतना ही कम है।
साधना किस प्रकार की तथा किस तरह से गायत्री महामंत्र को विश्व स्तर तक प्रतिष्ठापित किया, इसके लिए आप पढ़ना चाहेंगे-
साधना का दर्शन यदि ठीक तरह से समझ में आ जाय व सही प्रयोग का अभ्यास बन जाय तो मनुष्य अनेकानेक उपलब्धियाँ सहज ही इसी जीवन में पा सकता है। कृपया पढ़े-
साधना एक विराट समूहमन का निर्माणाधीन ब्रह्माण्ड में एक नहीं लाखों मिसाइलों का काम करती है। अपने राष्ट्र ने गायत्री मंत्र की उपेक्षा करके अपना वर्चस्व खोया था एवं अब युगऋषि-अवतारी सत्ता के परम पुरुषार्थ से यह श्रेय भारत को ही मिलने जा रहा है कि सारे भारत ही नहीं, विश्वभर में इस मंत्र को चप्पे चप्पे में गूँजता-निनादित होता सुना जाएगा एवं इसी के आधार पर भारत पुनः जगद्गुरु के रूप में स्थापित होने की प्रक्रिया संपन्न करेगा। भारत चक्रवर्ती था- सारे विश्व का मार्गदर्शन करता था, अब चप्पे-चप्पे में साधना शक्ति के गायत्री मंत्र की प्रेरणाओं के समावेश से यह पुनः सारे विश्व का नेतृत्व करेगा, भारतभूमि, देवभूमि-तपोभूमि एक विराट तीर्थ बनेगी, इसमें रंचमात्र भी सन्देह न कर, निज को साधनात्मक पुरुषार्थ में नियोजित कर ही देना चाहिए।
साधना के आधार पर-दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन- यह वस्तुतः अपने आप से लड़ा जाने वाला एक समर-संग्राम है। साधक स्तर के व्यक्तित्वों का सृजन होगा तो व्यक्तिगत स्तर से लेकर-पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर संव्याप्त दुष्प्रवृत्तियाँ स्वतः समाप्त होती चली जाएँगी एवं ईमानदारी, सृजनशीलता, कर्मठता जैसी सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलेगा। साधना आज समाजीकरण के स्तर पर पहुँचनी चाहिए एवं असुरता को प्रश्रय देने वाली सारी वृत्तियों के विरुद्ध वातावरण बनना चाहिए। साधना का अर्थ है- अपने आप को साध लेना- रिंग मास्टर के हन्टर की तरह बार-बार उन वृत्तियों पर अंकुश लगाना जो उच्छृंखल हो समाज के संतुलन को बिगाड़ती हैं। इसी का दूसरा पक्ष है- विचारों में श्रेष्ठता का समावेश कर उनका समाज के नवनिर्माण हेतु नियोजन।
साधना-पुरुषार्थ और प्रखर हुआ- एक अर्द्ध महापूर्णाहुति आँवलखेड़ा (आगरा) में सम्पन्न हुई और अब द्वितीय अंतिम महापूर्णाहुति की वेला आ पहुँची। अब तो बचे हुए समय का, विशेषकर इस प्रखर साधना वर्ष का एक-एक क्षण मूल्यवान है।
साधना वर्ष में हिमालय की दिव्यशक्तियों जो अनुदान वितरण कर रही हैं, वे कई प्रकार की हैं और उनकी गरिमा का स्तर भी क्रमशः बढ़ा-चढ़ा है, जो उन्हें प्राप्त करेगा। साधना वर्ष के कार्यक्रमों में भागीदार होने वाले लोगों के पैरों में गति और हाथों में प्रगति के सूत्र थमाने वाले अनुदान देने का निश्चय स्वयं भगवान महाकाल का है। इस सुविधा का लाभ प्रत्येक भागीदार साधक को मिलेगा। इस प्रखर साधना वर्ष का असाधारण उपहार समझा जाना चाहिए और उससे लाभान्वित होने का परिजनों में से प्रत्येक को प्रयत्न करना चाहिए। इस आत्म श्रेय एवं दैवी प्रकाश अनुदान का दुहरा लाभ प्राप्त करने वाले अपने सौभाग्य कली सराहना पीढ़ी-दर-पीढ़ी किए बिना न रह सकेंगे।
साधना वर्ष में पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। प्रस्तुत भागीदारी करने वालों के दो वर्ग हैं-(1) नैष्ठिक साधक या वरणी साधक (2) सहयोगी अथवा भागीदार साधक। जो भी इस क्रम में जुड़ रहे हैं, उनके लिए साधना का स्तर निर्धारित कर दिया गया है, जिसे उन्हें कम-से कम महापूर्णाहुति तक नियमित चलाना है। इस साधना से जुड़ने वाले और अन्यों को जोड़ने वालों को ईश्वरीय सुरक्षा कवच तथा प्रगति के अवसरों का पुण्य-लाभ अपनी साधना-भावना के अनुपात में निश्चित ही मिलना है।
साधना-आराधना
साधना कराएँगे तो आपको एक भिगोना दे दिया जाएगा और कहा जाएगा कि आप यहाँ से संस्कारवान अनाज लें और अपना सात्विक आहार स्वयं तैयार करें। इसमें खिचड़ी, दलिया बनाकर खा लीजिए। पहले जमाने में संत-महात्मा इसी प्रकार भिक्षा लेकर आते थे और अपना भोजन स्वयं बनाकर खा लेते थे। आपको भी उसी प्रकार करना चाहिए। हम आपको यहाँ पर जायकेदार चीजें नहीं देंगे, वरन् हम आपका जायका खराब करेंगे, उस आदत को सुधारेंगे जिसने आपको असंयमी बना दिया है।
साधनापरायण बनाना ही उनका उद्देश्य है। आध्यात्मिक भावनाओं का प्रसार और संस्कारों की प्रशस्ति का उत्तरदायित्व देवालयों का है। इन्हीं के आधार पर उनको इतना महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इस वर्ष क्षेत्रीय स्तर पर इनको साधना केन्द्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, ताकि यह सर्वविदित हो सके कि आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं ब्रह्मकर्म के निर्वाह के कारण ही उनका महत्व सर्वोपरि है। इस गौरव को प्राप्त न कर सके तो देवालयों की महिमा महत्ता शून्यवत ही है।
साधना वर्ष में जब मानवी आध्यात्मिक पुरुषार्थ की प्रखरता चरम सीमा पर है, इस महाक्रान्ति को घटित होते सभी के द्वारा चर्मचक्षुओं से देखा जा सकेगा। परमपूज्य गुरुदेव ने नवयुग का आगमन तीन आधारों पर सुनिश्चित बताया है। वे हैं-मनुष्य के चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में आमूलचूल परिवर्तनं चिन्तन प्रक्रिया में परिवर्तन को विचार क्रान्ति, चरित्र में बदलाव को नैतिक क्राँति एवं व्यवहारी में आए हेर-फेर को सामाजिक क्रान्ति नाम उन्होंने दिया था। जब तक इन तीन मूलभूत आधारों पर समग्र परिवर्तन की बात नहीं सोची जाती- युगपरिवर्तन संभव नहीं हो सकता। हिंसा से या रैली निकालने से यह बदलाव व्यापक स्तर पर न अब तक लाया जा सका है, न कभी भविष्य में लाया जा सकेगा।
साधना में अभिरुचि रखे- तपस्वी एवं मनीषी बने, तो फिर भारतवर्ष को विश्वगुरु बनते देर नहीं लगेगी।
साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर करने के लिए ही। विश्व की भौगोलिक एवं वातावरण पर इससे कितने ही बड़े और भयंकर परिवर्तन क्यों न हों, भारतीय संस्कृति को इससे संरक्षण मिलेगा, क्योंकि ‘गायत्री’ इसके रोम-रोम में संव्याप्त है। भारतीय संस्कृति के अभ्युत्थान के मूल में उन विराट पुरुष की इच्छा ही काम कर रही है, चाहे हम वैज्ञानिक विधि-विधानों से मानें अथवा श्रद्धापूर्वक।
साधना-उपासना पर क्या प्रभाव पड़ता है। हमने चौबीस साल तक जौ की रोटी एवं छाछ का सेवन किया है। इस बीच न नमक खाया है, न शक्कर। आप पूछते हैं कि गुरुजी आपने कौन-सा बीजमंत्र लगाया है? हमने अपनी साधना में केवल सात्विक आहार का सेवन किया है।
साधना वर्ष में इस प्रचलन के लिए घोर प्रयत्न किया जाए और उस परिश्रम को ही ग्रामदेवता की पूजा माना जाए। यह तीर्थ स्थापना हुई, जिसे स्थानीय निवासी और बाहर के सेवाभावी साधक मिल-जुलकर पूरा कर सकते हैं।
साधना तथा शाम को पंद्रह मिनट (छह से सवा छह) नादयोग की साधना पहले की तरह और भी प्रखर-परिमार्जित रूप में संपन्न होती रहेगी। इस अवधि में वर्ष भर गुरुवार का आँशिक व्रत भी सामूहिक तप के रूप में गायत्रीतीर्थ में चलेगा, जिसमें साधक मात्र एक समय आहार लेंगे। सत्रों में भी प्रतिदिन एक समय मात्र अमृताशन का क्रम चलेगा। यह प्रक्रिया अभी तो इस वसन्त से आगामी वसन्त तक के लिए निर्धारित की गयी है, किंतु यह क्रम 2001 के वसंत 29 जनवरी तक भी चल सकता है।
साधना-आराधना (वा0 क्र0 - 2) से
साधना की। पैंतालीस वर्ष की आयु में उनका व्यक्तित्व लोकनायक के रूप में उभरा। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन-चौथाई भाग तप में और एक चौथाई भाग जननेतृत्व में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेशों की बौछार उतनी नहीं की, जितने आज के सामान्य उपदेशक कर लेते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक-चौथाई जनता उनके मार्गदर्शन पर आस्था रखती है।
साधना वर्ष’ में संस्कार-महोत्सवों कथा-आयोजनों के पश्चात् आरंभ किए गए साधना-महापुरुषार्थ में यही तथ्य मन में विचार कर बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण को तीव्र गति दी गयी है। इससे वह विराट प्रभामण्डल बनेगा, ऐसा वातावरण बनेगा कि भारत की देवभूमि के संस्कार निश्चित ही जाग्रत होंगे एवं इसके तपोभूमि के रूप में, जाग्रततीर्थ के रूप में स्थापित हो जाने की भवितव्यता सत्य होती दिखाई पड़ने लगेगी।
साधना वर्ष में भागीदार होने
साधना में आपको यही कराएँगे तथा आपको मजबूर करेंगे कि आप अपने आहार-विहार को ठीक करें। हम आपकी सात्विकता पर जोर देंगे। अगर आपको अमुक चीज ठीक नहीं लगेगी तो इसके लिए आपको ठोस प्रयास करना होगा तथा उसके लिए तैयार होना होगा। जब हम आपको ब्रह्मवर्चस की साधना कराएँगे तो आपको एक भिगोना दे दिया जाएगा और कहा जाएगा कि आप यहाँ से संस्कारवान अनाज लें और अपना सात्विक आहार स्वयं तैयार करें। इसमें खिचड़ी, दलिया बनाकर खा लीजिए।
साधना वर्ष का एक-एक क्षण मूल्यवान है।
साधना के चमत्कारी परिणाम, पात्रता संबंधी अनुशासन।
साधना सत्रों की श्रृंखला चलेगी
साधना एवं शिक्षण की समुचित व्यवस्था। इसे क्रमबद्ध साधना सत्र प्रक्रिया भी कह सकते हैं। (2) तीर्थ के समीपवर्ती क्षेत्र को एक मंडल बनाकर उसमें पुरोहितों का परिभ्रमण करना और उस परिधि में नियमित रूप से अध्यात्म चेतना उत्पन्न करते रहने का उत्तरदायित्व सँभालना। (3) समय-समय पर उन तीर्थों में स्वल्पकाल के लिए दूर-दूर से आते रहने की प्रेरणा देना। यह कार्य धर्म सम्मेलन के रूप में होता था।
साधनास्थल ही होते थे। उनमें प्राप्त होने वाली प्रेरणा तथा वहाँ रहकर की जाने वाली साधना ही आगन्तुकों को पुण्य फल प्रदान करती थी।
साधना-आराधना चेतना का उदात्तीकरण। आत्मशोधन, आदतों का परिशोधन, सविता की ध्यान-धारण
साधना वर्ष में असली जामा पहनाने का प्रयास कर नवयुग के अभ्युदय की बात सोचनी चाहिए। इसमें जो भी कुछ संघर्ष है- वह सारा विचारों का विचारों से ही है। ऐसे पुरुषार्थ में सदा से ही देवत्व की विजय होती रही है, अतः हमें साधनात्मक वातावरण बनाने भर की आवश्यकता है- क्राँति के बीज ऐसी पृष्ठभूमि में सहज ही पुष्पित-पल्लवित होते चलेंगे।
साधना वर्ष के माध्यम से विनिर्मित शिशु साधकों का भी परमपूज्य गुरुदेव की कारण सत्ता इसी प्रकार का ध्यान रखेगी- यह अतिरिक्त रूप से कहने की आवश्यकता नहीं है।
साधना है। इसमें मन का संयम और कषाय-कल्मषों से मुक्ति आवश्यक है-
साधना वर्ष की कसौटी भी है और इसके भागीदार साधकों की जिम्मेदारी थी। लोक-जीवन को साधनापरायण बनाना ही उनका उद्देश्य है। आध्यात्मिक भावनाओं का प्रसार और संस्कारों की प्रशस्ति का उत्तरदायित्व देवालयों का है। इन्हीं के आधार पर उनको इतना महत्वपूर्ण स्थान मिला है। इस वर्ष क्षेत्रीय स्तर पर इनको साधना केन्द्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, ताकि यह सर्वविदित हो सके कि आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं ब्रह्मकर्म के निर्वाह के कारण ही उनका महत्व सर्वोपरि है।
साधना से सिद्धि का मर्म, साधना-समर बनाम जीवन-संग्राम
साधना-आराधना के आधार पर आत्मपरिष्कार करेंगे, धार पैनी करेंगे और इतनी अंतःक्षमता अर्जित करेंगे, जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़े।
साधना वर्ष में की जाने वाली सामूहिक साधना से उन परिणामों की आशा की गयी है, जो प्रस्तुत विपन्नता से विश्वव्यवस्था को उबार सकें।
साधना वर्ष 1999 का महात्म्य आत्मसात् करने के लिए प्रतिपल तत्पर हैं। इस साधना वर्ष में धो डालें अपनी अन्तरात्मा से समस्त आत्मप्रवंचना, ढोंग और थोथी आत्मप्रशंसा की वृत्ति को, ताकि सीधे देख सकें अपनी मार्गदर्शक गुरुसत्ता को और सुन सकें उस वाणी को जो सतत् पुकार रही है। इस वर्ष के विशिष्ट पलों में हटा दें अपनी सारी कुटिलता को जो पहले हमें परमपूज्य गुरुदेव की दृष्टि और आदर्श की ज्योति से विमुख किए हुए थी क्योंकि यह कुटिलता यदि अब भी बनी रही तो इस वर्ष की विषमताओं के प्रहारों से कोई भी बच सकेगा। यदि किसी तरह बच भी गया तो भी महाकाल का कालदण्ड उसे उसकी दुष्प्रवृत्तियों का दण्ड देकर ही रहेगा। यह महान वर्ष एक बवण्डर, एक तूफान की तरह से शक्ति के बल पर खड़ा रह सकता है, हम सबके लिए ही नहीं, समस्त मानवता के लिए एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनेगी।
साधना वर्ष-अखण्ड जप प्रधान कार्यक्रमों की रूपरेखा एवं महापूर्णाहुति का प्रथम चरण आरंभ होगा। 24 दीपों की आहुति से आरंभ हुआ यह क्रम ब्लॉकों या कुछ कालोनियों के समुच्चय-टाउनशिप में 240 दीपों के यज्ञ से बढ़ता हुआ जिले या शहर स्तर पर चौबीस सौ दीपों के यज्ञ में बदलता चला जाएगा। छोटे प्रांतों में एक स्थान पर, बड़े प्रांतों में दो या तीन स्थानों पर 24000 दीपों के यज्ञ में आहुतियों के बाद महापूर्णाहुति संभवतः देवोत्थान एकादशी सन् 2000 से आरंभ होकर गीता जयंती 2000 तक चलेगी एवं यह शान्तिकुञ्ज हरिद्वार की कुंभ नगरी के प्रायः पचास मील की परिधि में सम्पन्न होगी। प्रत्येक प्रान्त की भागीदारी हेतु तिथियाँ निश्चित होंगी। विराट महायज्ञ में आहुतियाँ दे साधक लौटते जाएँगे।
साधना के सामूहिक आयोजनों के साथ-साथ गाँव-गाँव दीपयज्ञों से साधना वर्ष की पूर्णाहुति
साधना के फलस्वरूप अवतरित होने वाली भगवत्कृपा सक्रिय न होगी, तब तक अन्तर्द्वन्द्व से भरी अशान्त मनः स्थिति में विक्षोभ उभरते ही रहेंगे।
साधना द्वारा सबको सद्बुद्धि-सबको उज्ज्वल भविष्य।” इसी उद्देश्य से प्रायः पचास से अधिक स्थानों पर प्रशिक्षण क्रम पूरे भारत भर में चलाया गया है। पश्चिमोत्तर, सुदूरपूर्व व दक्षिण के जो भाग छूट गए हैं, वहाँ यह क्रम आगामी दो माह में पूरा हो जाएगा। जहाँ-जहाँ प्रशिक्षण हुए हैं- वहाँ से संगठनात्मक ढाँचा साधना की धुरी पर पूरे प्रभावक्षेत्र को दृष्टिगत रख बनेगा एवं एक भी हिस्सा ऐसा न रहेगा, जहाँ यह सन्देश न पहुँच पाए। अभियान में एकरूपता तथा प्रखरता बनाए रखने के लिए साधना पद्धति को बड़ा सुगम बनाया गया है।
साधना सम्पन्न तपस्वी आत्माओं की आदर्शवादी अन्तःचेतना में ही प्रकट और प्रखर होता है। व्यापक समाधान उसी तूफानी उभार के आधार पर संभव है। उज्ज्वल भविष्य के अवतरण का श्रेय अग्रगामी वरिष्ठ साधकों को मिले, यह स्वाभाविक है, पर वस्तुतः अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। तप-साधना की संयुक्त शक्ति ही उज्ज्वल भविष्य के अवतरण जैसे महान कार्य सम्पन्न करती है। अवतार की दार्शनिकता इसी केन्द्र में खोजी जा सकती है।
साधना एवं तपस्या से समूची भारतभूमि गौरवान्वित होगी। ऐसा ही हुआ।
साधना वर्ष में साधना केन्द्रों के रूप में विकसित करके ही भारत को पुनः देवभूमि का गौरव प्रदान किया जा सकता है।
साधना का मूल्य और महत्व असाधारण है। अद्भुत ग्रहयोग में किए जाने वाले इस अनूठे पुरुषार्थ के परिणाम इक्कीसवीं सदी में सुनिश्चित तौर पर उज्ज्वल भविष्य के रूप में सामने आएँगे।
साधना सत्र प्रक्रिया भी कह सकते हैं। (2) तीर्थ के समीपवर्ती क्षेत्र को एक मंडल बनाकर उसमें पुरोहितों का परिभ्रमण करना और उस परिधि में नियमित रूप से अध्यात्म चेतना उत्पन्न करते रहने का उत्तरदायित्व सँभालना। (3) समय-समय पर उन तीर्थों में स्वल्पकाल के लिए दूर-दूर से आते रहने की प्रेरणा देना। यह कार्य धर्म सम्मेलन के रूप में होता था।
साधना वर्ष में ऐसे महातप का निश्चय करें, जिसके आधार पर जाग्रत आत्माओं में, देवमानवों जैसी जीवन नीति निर्धारित की जा सके। यह निर्धारण ही पर्याप्त नहीं-इसे क्रियान्वित करने के लिए सत्संकल्प और उत्साह भी चाहिए। इसी उमंग भरे उभार को व्यक्तिगत जीवन की भगवान के साथ साझेदारी के रूप में माना जा सकता है।
साधना का क्रम, संयम के प्रतीक के रूप में रविवार या गुरुवार का अस्वाद व्रत अथवा एक समय भोजन तथा दान-पुण्य के रूप में धर्म घट में एक मुट्ठी अन्नदान एवं ज्ञानघट (गुल्लक) में प्रतिदिन पच्चीस पैसे ज्ञानयज्ञ के लिए अर्पित करें अथवा बच्चों से कराएँ।
साधना की महिमा-महत्ता बताने के साथ ही प्रौढ़ शिक्षा, बाल संस्कारशाला, स्वच्छता, व्यायामशाला, घरेलू शाक-वाटिका परिवार नियोजन, नशाबन्दी, वृक्षारोपण आदि सत्प्रवृत्तियों की आवश्यकता बताते हुए यह कहा जाए कि इन सत्प्रवृत्तियों को मिल−जुलकर किस प्रकार कार्यान्वित किया जा सकता है और इन प्रयत्नों का कैसे भरपूर लाभ उठाया जा सकता है।
साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान
साधना के इस क्रम में हमारे देश की भाषा, क्षेत्र, शिक्षा का स्तर, जाति-संप्रदायगत विभिन्नता को देखते हुए कई स्तर बनाए गए हैं। जिन्हें जो सुलभ लगे-वे उससे जुड़ सकते हैं अथवा जुड़ने हेतु प्रेरित किए जा सकते हैं। ये इस प्रकार हैं-
साधना अभियान की जानकारी है। आम आदमी इसमें कैसे जुड़ सकता है एवं ढाई दिवसीय आयोजनों में क्या कुछ कहा जाना है- यह सब इनमें विस्तार से दिया गया है। अभी इन्हें हिन्दी व गुजराती में प्रकाशित किया गया है। बाद में इनके सभी भाषाओं-अंग्रेजी सहित प्रमुख भारतीय व आंचलिक तथा विदेशी भाषाओं में भी प्रकाशन हो, इसके लिए उत्साहित प्रेरित किया जा रहा है। क्षेत्रीय परिजन इस कार्य को हाथ में ले इन संदर्शिकाओं को जन-जन तक पहुँचाएँ, इससे बड़ा पुण्य कर्म कोई और नहीं हो सकता।
साधना की सफलता आन्तरिक पवित्रता-प्रखरता पर निर्भर करती है। वेदमंत्रों के उच्चारण का फल केवल अंतरंग को पवित्र करने से ही मिलता है। राजा दशरथ के यहाँ जब पुत्रेष्टि यज्ञ की बात चली थी, तो गुरु वशिष्ठ ने कहा था कि हमारे सौ बच्चे हो गये हैं। अतः हमारे द्वारा मंत्र पढ़ने से कोई लाभ नहीं होगा। संयम का पालन नहीं होगा, आहार-विहार ठीक नहीं होगा, तो वेदमंत्र का कोई लाभ नहीं हो सकेगा।
साधना कराई। शिष्यों को पंक्तिबद्ध होकर ध्यान करने के लिए बिठा दिया।
साधना एवं ज्ञान प्रचार की सेवा-साधना ही तीर्थयात्रा की आत्मा थी। उच्चस्तरीय प्रेरणा उपलब्ध एवं उत्पन्न करना ही तीर्थतत्त्व की आत्मा मानी गयी है। प्राचीनकाल में तीर्थ ऐसे ही थे और तीर्थयात्रा के निश्चित उद्देश्य एवं कार्यक्रम साथ लेकर आगे बढ़ते थे।
साधना वर्ष के अनुबन्धों- अनुशास्त्रों में ढूँढ़ा-खोजा सीखा-समझाया जा सकता है। इस कसौटी पर कसने पर इसे ऐसा श्रद्धासिक्त उपचार कह सकते हैं, जिसके माध्यम से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व का धर्म शिक्षण सुलभ बनता है। साधना वर्ष के अनुशासनों की उपयोगिता का जितना माहात्म्य कहा जाय, उतना ही कम है।
साधना, प्रज्ञायोग की साधना के द्वारा आप अपने विचारों को, अपने अंतरंग को अधिक शुद्ध एवं पवित्र बना सकते हैं तथा जीवन के- प्रगति के सोपान को पार कर सकते हैं। आज की बात समाप्त।॥ ( शान्तिः॥
साधना क्या हो सकती है? ब्रह्मवर्चस् के माध्यम से हम आपको यह सब बतलाने वाले हैं कि पंचकोशी साधना क्या होती है? इसका पंचमुखी गायत्री से क्या संबंध होता है?
साधना वर्ष के साधकों का अनिवार्य अनुबन्ध है, ऐसा सुनिश्चित मानना चाहिए।
साधना-प्रणव अथवा ब्रह्मयोग, कुण्डलिनी, षट्चक्रों का जागरण, आत्मोत्कर्ष का राजमार्ग-तप-तितिक्षा
साधना के परिणामस्वरूप पूरी मानवजाति लम्बे समय तक सुख भोगेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-May
साधना वर्ष, एक जनवरी से आरम्भ हुआ १९९९ का नववर्ष, भारतीय पंचांग के अनुसार विक्रम संवत् २०५६ को चैत्र प्रतिपदा से विगत माह आरम्भ हुआ तथा साथ ही कालगणनानुसार युगाब्द ५२०१ जिसका शुभारम्भ भी इसके साथ हुआ अगली शताब्दी के रूप में भारतीय अध्यात्म के सारे विश्वभर छा जाने की प्रक्रिया हिन्दू-संस्कृति के विश्वसंस्कृति बनने के क्रियान्वयन रूप में आया है। यह स्वर मात्र भारत से उठ रहा है, यह बात भी नहीं, पाश्चात्य तत्वचिंतक व द्रष्टास्तर के मनीषी भी अब प्रायः इसी स्तर की चर्चा कर रहे है। भारत के महाशक्ति बनकर उभर कर आने-सारे विश्व के एक विराट कुटुंब के रूप में बंधकर एक संस्कृति- एक भाषा- एक व्यवस्था, एक आचारसंहिता बनने की बात अगले दिनों साकार होती दिखे तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
साधना प्रणाली में इसको मणिपद्म कहकर अभिहित किया गया है, जिसका अर्थ है- मणियों का कमल।श्
साधना- स्थूल का सूक्ष्म में परिवर्तन
साधना करनी पड़ेगी। मन की साधना के दो माध्यम है। पहला है- विवेक और दूसरा- साहस। इनके द्वारा ही हम ऋद्धि- सिद्धियों से भरते चले जाते है। अपने आहार-विहार को ठीक करने के बाद अपनी प्रगति होती चली जाती है।
साधना नहीं चाहते है, तो उपासना के क्षेत्र में आगे कैसे बढ़ेंगे? एक दिन हमने आपको आहार-विहार के बारे में बताया था, साथ ही यह भी चर्चा की थी कि समय का विभाजन करे और समय का मूल्य समझे। अगर आप अपनी जीभ को साध ले, तो चमत्कार उत्पन्न हो जायेगा। आहार-विहार के असंयम के कारण ही बीमारियों आपको घेरे रहती है। इसी के कारण अभी तक आप छोटे आदमी बने रहे।
साधना गुरु के बिना? जोधपुर नरेश आश्चर्य से कुछ सोचते हुए बोले- गोपाल! तुमने कृष्णमंदिर में संगीत सीखा, इसका मतलब हुआ कि तुम साक्षात् मुरलीमनोहर के शिष्य हो। आज से तुम हमारे राजगायक हुए, तुम्हें सभी सुविधाएँ हमारे यहाँ से मिलेंगी।
साधना में और दो वर्ष युद्ध संघर्ष में लगे थे। पाँडवों को वनवास में आरंभिक बारह वर्ष महान प्रयोजन की तैयारी में लगाने पड़े थे। युग संधि की बारह वर्षीय अवधि इसी प्रकार की रही है। ९ से आरंभ हुई यह संक्रमण की अवधि जिसके प्रायः दस वर्ष बीत चुके है जिसमें प्रज्ञावान व सत्ताधारियों को लोभ, मोह और अहंकार की महत्वाकांक्षायें एक कोने पर रखनी पड़ी है और औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करते हुए,परिवार को सुसंस्कारित, स्वावलम्बी बनाने भर की जिम्मेदारी निबाहते हुए अपने समय, श्रम,चिंतन और साधनों का अधिकांश भाग उस बीजारोपण में लगाना पड़ा है, जो अगले दिनों सतयुग की फसल के रूप में फलता-फूलता दिखाई पड़ेगा। अगली शताब्दी में ऐसा परिवर्तन कर दिखायेगा जिससे ना भूत ना भविष्यति की संज्ञा सके।
साधना ग्रंथों में ऐसा मिलता है कि बिंदु- विसर्ग स्थित चन्द्रमा से मणिपूरित में अमृत बरसता है, जो यहाँ स्थित सूर्य का आहार बन जाता है। इससे शरीर में क्षयप्रक्रिया आरम्भ होती है, जिसकी अंतिम परिणति वार्धक्य, अशक्ति, रोग तथा मरण है। इस प्रक्रिया की दिशा को कुछ योगाभ्यासों द्वारा पलटा जा सकता है और मणिपूरित में उत्पन्न ऊर्जा को मस्तिष्क में भेजा जा सकता है। ऐसी स्थिति में उसका उपयोग और उपभोग भोग जैसे तुच्छ प्रयोजनों में नहीं, योग में, आनंद और ईश्वरप्राप्ति में होता है। साधनाक्षेत्र के निष्पातों का कथन है कि जप-तप द्वारा जब इस चक्र की सम्पूर्ण शुद्धि हो जाती है, तो फिर काया व्याधिरहित और ओजपूर्ण बन जाती है।
साधना से सिद्धि मिलने में देर नहीं लगेगी। सात्विकता से सिद्धियाँ स्वतः आती है।
साधना करते हुए निर्वाण को प्राप्त हुए।
साधना के दो माध्यम है। पहला है- विवेक और दूसरा- साहस। इनके द्वारा ही हम ऋद्धि- सिद्धियों से भरते चले जाते है। अपने आहार-विहार को ठीक करने के बाद अपनी प्रगति होती चली जाती है। मनुष्य के अंतःकरण में बैठा हुआ विवेक और साहस जब जाग्रत हो जाता है, तो इन दो आधारों पर ही मनुष्य जो चाहे प्राप्त करता हुआ चला जाता है।
साधनावर्ष में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। जब सूर्य को ही ग्रहण लगता है- भरे उजाले में एवं अन्धकार में किन्तु पूर्णिमा के प्रकाश के बीच चंद्रमा को, तो यह क्षणिक है- सामयिक है एवं सृष्टिक्रम का दैनंदिन जीवन का अंग है, ऐसा आचरण हमारा होना चाहिए। मान लीजिये हम परमहंस नहीं है, ज्ञानी नहीं है, तो एक अध्यात्म में आस्था रखने वाले चिरपुरातन रीति-रिवाजों को मानने वाले कर्मकाण्डी धर्मभीरु तो है ही। तो हम अपने को गायत्री-जप अनुष्ठान-उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आगे सुखद समय के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। यही हम सभी ने, अधिकाँश परिजनों ने इस साधनावर्ष के सामान्यक्रम में किया भी तो है।
साधना-उपासना का मूल आप समझ नहीं पाए है, फिर मैं आपको कैसे समझा सकता हूँ, जब आपके दिमाग में कूड़ा भरा है। उस गन्दगी को आपके दिमाग से हम कैसे साफ कर सकते है। इसकी सफाई आपको स्वयं ही करनी होगी।
साधनाक्षेत्र के निष्पातों का कथन है कि जप-तप द्वारा जब इस चक्र की सम्पूर्ण शुद्धि हो जाती है, तो फिर काया व्याधिरहित और ओजपूर्ण बन जाती है।
साधना को देखकर राजा को शीरीं का हाथ फरहाद के हाथ में देना पड़ा।
साधनावर्ष के सामान्यक्रम में किया भी तो है। बस यह वर्ष एक अद्भुत विलक्षणताओं, दैवी आपदाओं प्रतिकूलताओं से भरा होने के कारण हमसे कुछ अतिरिक्त आध्यात्मिक पुरुषार्थ की अपेक्षा रखता है। युगसंधि महापुरश्चरण के अंतिम दो वर्ष के कारण भी इस विषम समय में हम सभी को स्वयं को श्रेष्ठ-प्रौढ़ स्टार के साधक बनाने का पुरुषार्थ निभाना चाहिए, तब तक जब तक कि उज्ज्वल भविष्य से भरा सतयुग नहीं आ जाता। हाँ यदि हम उन क्षुद्र-नासमझ जीव- जंतुओं जैसा व्यवहार कर रहे हो, जो ग्रहण की अवधि को अन्धकार मान बैठते है, तो यह आत्मसमीक्षा-अपने आत्मिक विकास हेतु कुछ कदम उठाने का समय है। यदि ऐसा न किया गया तो नियति उन्हीं नरकीटकों-नरपशुओं जैसे होनी है।
साधनाओं का भी अनाधिकारी ठहराया गया है, क्योंकि जिसका आधार ही मजबूत नहीं, वह स्वयं खड़ा कैसे रह सकता है, धार्मिक कृत्यों का भार कैसे वहाँ कर सकता है?
साधना-अभ्यासों पर विशेष बल देते है, जो सीधे उन्हें प्रभावित करते और थोड़े समय और श्रम में फलवती बनाते हो।
साधना और भक्ति के अवलंबन द्वारा मैं निर्वाण प्राप्त कर सकता हूँ। तपस्वी मुदगल मृत्युलोक में ही लोकमंगल के लिए चिर-साधना करते हुए निर्वाण को प्राप्त हुए।
साधना-उपचारों का वर्णन है, उनमें प्राणयोग के अतिरिक्त उड्डियान बंध एवं चक्र ध्यान विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त जप, तप, आसन भी कुछ हद तक मदद करते है। पर अकेले इनके द्वारा चक्रों का जागरण समयसाध्य एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया है। अतः सुयोग्य मार्गदर्शक ऐसे साधना-अभ्यासों पर विशेष बल देते है, जो सीधे उन्हें प्रभावित करते और थोड़े समय और श्रम में फलवती बनाते हो।
साधना-प्रयोग और सिद्धियाँ (१०) सेवा धर्म और उसका स्वरूप (११) बिना औषधि कायाकल्प (१२) पुनर्जन्म एक धुत्त सत्य (१३) जीव - जन्तु बोलते भी है,सोचते भी है (१४) समस्त समस्याओं का समाधान अभ्यास (१५) अध्यात्मवाद ही क्यों? (१६) धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं,पूरक (१७) मानवीय क्षमता असीम अप्रत्याशित (१८) पाँच प्राण -पाँच देव (१९) मस्तिष्क प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष (२०) आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव (२१) मनुष्य चलता -फिरता पेड़ नहीं है (२२) विज्ञान को शैतान बनने से रोके (२३) जड़ के भीतर विवेकवान चेतन (२४) सपने झूठे भी सच्चे भी (२५) पितरों को श्रद्धा दे वे शक्ति देंगे (२६) मरे तो सही,पर बुद्धिमानी के साथ (२७) बच्चे बढ़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी न मारे (२८) स्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे (२९) स्वर्ग -नरक की स्व -संचालित प्रक्रिया (३०) प्रेरणा भरे पावन प्रसंग।
साधना जैसे पक्षों का विवरण था। इस अंक में इसी क्रम को आगे बढ़ाते है। इसमें अभ्यंग (तेल मालिश), क्षौरकर्म (दाढ़ी बनाना), व्यायाम, प्रातः भ्रमण एवं स्नान से लेकर वस्त्रधारण तक की चर्चा है। किसी को लग सकता है कि उनके पीछे क्या वैज्ञानिकता हो सकती है, पर जब आयुर्वेद के मर्मज्ञ ऋषिगणों का चिंतन आर्षवचनों के परिप्रेक्ष्य में पढ़ते है तो ज्ञात होता है कि कितनी दूरदर्शिता से दिव्यद्रष्टा होने के नाते वे यह सब डेलीरूटीन (दिनचर्या) को व्यवस्थित बनाने के लिए लिख गये है।
साधना-उपासना में बहुत लगता है इसमें हमें जो आनंद आता है, उसका वर्णन हम नहीं कर सकते है। आपका भी मन लगे, इसके लिए आपको अन्न की सात्विकता अपनानी
साधना, जो मनुष्य को उत्कृष्ट बना देती है, इसी संदर्भ में, मैं बतला रहा था जो आपको अपने दिमाग में बैठा लेना चाहिए। कल हमने आपको बतलाया था कि मन को काबू में कर लेने के बाद भगवान का ध्यान कैसे करना चाहिए? गायत्री माता का ध्यान कैसे करना चाहिए? उन्हें बार-बार घूम-घूमकर देखना होगा, ताकि आपका इधर-उधर भागने वाला मन काबू में रहे तथा आप उनसे सम्बन्ध रख सके। इसके लिए आपको मन की साधना करनी पड़ेगी।
साधना का विराट रूप दे दिया। विचार क्राँति के माध्यम से आसुरी चिंतन को निरस्त करने हेतु एक व्यापक ज्ञानयज्ञ उन्होंने रचा। सबसे बड़ी बात गायत्री व यज्ञ को एक सीमित दायरे से निकलकर उसे जनसुलभ बना दिया। यह अवतारी स्तर की जगद्गुरु स्तर की चेतना ही कर सकती है। पूज्यवर कहते है -हर अवतार ने अपने समय की विकृतियों के समाधान का नेतृत्व अवश्य किया, पर उनके पीछे वस्तुतः अपार जनशक्ति थी।
साधना भी की, जिसका लाभ उन्हें मिल गया। वे ऑपरेटर के साथ-साथ विभाग के अन्य पेंडिंग कार्यों को भी पूरा करते रहे उनके विभाग के लोग उनके कार्य एवं व्यवहार से प्रसन्न रहते थे।
साधना खंड भी प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद तथा कुछ अन्य विषयों पर परम पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखा गया यह साहित्य जो लम्बे समय से उपलब्ध नहीं था, का पुनः प्रकाशन किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-July
साधना विज्ञान में कितने ही प्रकार के अभ्यास उपचार बताये गये हैं। इनमें मूलबंध, नाडीशोधन प्राणायाम चक्र का ध्यान तथा नासिकाग्र दृष्टि जिसे अगोचरी मुद्रा भी कहते हैं, प्रमुख हैं। इनका लगभग एक महीने तक अभ्यास करने से चक्र कमल प्रस्फुटित हो जाता है और साधक को वे सारे अनुभव होते है, जो चक्रों के लक्षणों में वर्णित है।
साधना के माध्यम से देने हेतु स्वयं को संकल्पित किया। स्टार टीवी एवं दूरदर्शन के द्वारा पूरे कार्यक्रम की वीडियो रिकार्डिंग भी की गयी तथा इसे अगले दिन राष्ट्रीय चैनल पर दिखाया गया। विभिन्न चैनल इस विश्वविद्यालयीन स्थापना पर एक पूरा कार्यक्रम तैयार कर रही है जो सारे भारत व विश्व में प्रसारित किया जाएगा।
साधना एवं जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य है।
साधना प्रधान श्रद्धा प्रधान केंद्र होगा एवं अकादमी स्तर की यह स्थापना मूलतः शिक्षण प्रधान होगी। विधा के अंतर्गत प्रशिक्षित संस्कृति संदेश वाहक राष्ट्र व विश्व के कोने-कोने में भेजे जायेंगे। स्वास्थ्य विधा के अंतर्गत आयुर्वेद का विज्ञानसम्मत अति आधुनिक शोध केंद्र एवं बेयर-फुटेड डॉक्टरों का प्रशिक्षण स्थल तथा शिक्षा विधा के अंतर्गत सारे राष्ट्र की शिक्षण पद्धति को नया रूप देने शिक्षकों को मूल्य आधारित संस्कार युक्त शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित किया जाना है। स्वावलंबन विधा के अंतर्गत गौ-केंद्रित अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिये प्रायः दो सौ प्रकार के ग्रामोद्योगों के प्रशिक्षण का क्रम बनाया जाएगा। प्रवासी भारतीयों, उनके बच्चों एवं भारत के कार्यकर्ताओं के बच्चों के भी प्रबंधन विधा से लेकर संस्कृति प्रधान शिक्षण यहाँ चलेंगे ऐसा उन्होंने बताया।
साधना कर लेनी चाहिए अन्यथा जब मरण सामने आ खड़ा होगा और शक्ति चुक जाएगी तो आग लगने पर कुआँ खोदने की तरह उस निरर्थक प्रयत्न से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा।
साधना अनुदान पाने का। यह पर्व उन सभी शिष्यों के लिए आत्मचिंतन का पर्व है। इस शताब्दी की अंतिम गुरुपूर्णिमा, व्यास-पूर्णिमा पर हम सभी शपथ लें कि अपनी गुरुसत्ता की जन्म शताब्दी (2010-11) तक बिना कोई विकार मन में लाए बिना किसी विराम के अपनी श्रद्धा शाँतिकुँज के प्रति-आराध्य सत्ता के प्रति तनिक भी कम न होने देंगे। न किसी की होने देंगे, उज्ज्वल भविष्य लाने को उतारू महाकाल की सत्ता हमारी गुरुदक्षिणा के बदले हमें क्या कुछ नहीं देती रही है व क्योंकर नहीं देगी, यह विश्वास तो सभी को होना ही चाहिए।
साधना में जुट गया और अंत में सफलताएँ ही हाथ लगी। अदम्य साहस, धैर्य अटूट ईश्वरविश्वास, लग्न और निष्ठा के सहारे जीवन जीने वाले हिम्मत कभी नहीं हारते।
साधना ग्रंथों में इसे कुण्डलिनी शक्ति का केन्द्र माना गया है। यही वह स्थान है, जहाँ उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों की समस्त संभावनाएँ निहित है। इसका प्रतीक एक कुँडलाकार सर्प है। जिसकी शक्ति प्रायः सुप्तावस्था में पड़ी रहती है। शक्ति संस्थान के इस मूल बिंदु से इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियाँ निकलती है, जो मेरुदंड मार्ग से आगे बढ़ते हुए आज्ञाचक्र तक पहुँचती है।
साधना; स्वास्थ्य, शिक्षा एवं स्वावलंबन इन चार विधाओं पर आधारित अकादमी के रूप में शाँति कुँज को विकसित करना चाहते थे इसी की प्रतीक स्थापना शाँतिकुँज के वर्तमान परिसर में नालंदा-तक्षशिला भवन के रूप में समाधिस्थल के सामने की गई थी। सन् 1990 में महाप्रयाण से पूर्व उन्होंने कहा था कि विद्या-विस्तार का एक विराट तंत्र अगले दिनों बनेगा और शाँतिकुँज का सन 2000 व उसके बाद कई गुना विस्तार होगा। साधना प्रशिक्षण के माध्यम से सभी धर्मों की मान्यताओं उपासना पद्धतियों, का सभी भाषाओं (भारत व विश्व की ) का प्रशिक्षण क्रम वर्तमान शिक्षण संस्थान में चलना है, इसे विस्तार से उन्होंने बताया। वर्तमान शाँतिकुँज परिसर साधना प्रधान श्रद्धा प्रधान केंद्र होगा एवं अकादमी स्तर की यह स्थापना मूलतः शिक्षण प्रधान होगी। विधा के अंतर्गत प्रशिक्षित संस्कृति संदेश वाहक राष्ट्र व विश्व के कोने-कोने में भेजे जायेंगे।
साधना से उपजी यह सभ्यता क्या देखते -देखते समाप्त हो जाएगी। मनीषा संत्रस्त हो रही थी। भूख से बिलखते शिशु, बिलबिलाते किशोर, निराहार तप का कठोर व्रत लिए युवक और तड़पते प्राण त्यागते वृद्ध वातावरण को और भी अधिक सघन वेदना से भर रहे थे। सबों के चेहरों पर मुर्दनी छायी हुई थी। मरघट की नीरवता घरों को और अधिक विकराल बना रही थी।
साधना के पीछे -अपने स्वार्थ एवं अपनी उन्नति के पीछे भाग रहा है। अपनी निज की उन्नति के पीछे। नहीं! इस तुच्छ प्रयोजन के लिए तू समाज से मुँह नहीं मोड़ सकता। तू समाज का अंग है, उसके प्रति अपने कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता। अपने दायित्वों को तिलाञ्जलि नहीं दे सकता।
साधना प्रशिक्षण के माध्यम से सभी धर्मों की मान्यताओं उपासना पद्धतियों, का सभी भाषाओं (भारत व विश्व की ) का प्रशिक्षण क्रम वर्तमान शिक्षण संस्थान में चलना है, इसे विस्तार से उन्होंने बताया। वर्तमान शाँतिकुँज परिसर साधना प्रधान श्रद्धा प्रधान केंद्र होगा एवं अकादमी स्तर की यह स्थापना मूलतः शिक्षण प्रधान होगी। विधा के अंतर्गत प्रशिक्षित संस्कृति संदेश वाहक राष्ट्र व विश्व के कोने-कोने में भेजे जायेंगे। स्वास्थ्य विधा के अंतर्गत आयुर्वेद का विज्ञानसम्मत अति आधुनिक शोध केंद्र एवं बेयर-फुटेड डॉक्टरों का प्रशिक्षण स्थल तथा शिक्षा विधा के अंतर्गत सारे राष्ट्र की शिक्षण पद्धति को नया रूप देने शिक्षकों को मूल्य आधारित संस्कार युक्त शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित किया जाना है। स्वावलंबन विधा के अंतर्गत गौ-केंद्रित अर्थव्यवस्था को गतिशील करने के लिये प्रायः दो सौ प्रकार के ग्रामोद्योगों के प्रशिक्षण का क्रम बनाया जाएगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-November
साधना के लिए अंगिरा के पास गए। वहाँ साधना में डूबे रहे और जनहिताय तीर्थयात्रा में दूर देशों तक यात्रा करते रहे, उनके मित्र उनकी संपदा की रक्षा न कर सके, चारों ने उनकी सारी संपत्ति चुरा ली। मित्र दुख थे, पर लाचार थे। सोचते थे करुणाकर आएँगे तो जीवन भर की कमाई संपदा चली जाने से कितने दुखी होंगे
साधना जारी थी। जाति से चमार कहे जाने वाले रैदास को उन्होंने अपना सद्गुरु बना लिया था। सारा विरोध इसी को लेकर था।
साधना उनकी रक्षा करेगी।
साधना।
साधनारत थे। भोजन के रूप में वे केवल वन्यफल ही लेते थे और नदी का उन्मुक्त जल। परंतु रावण के सैनिकों ने उन्हें यहाँ से बलात् निकाल बाहर किया और उनके कुटीरों को रौंद डाला।”
साधना तो नगर के सुविधाभरे जीवन में भी हो सकती थी?”
साधनात्मक-संगठनात्मक गतिविधियों में नियोजन की प्रक्रिया आरंभ होगी एवं माघ पूर्णिमा से आरंभ हुई यह प्रक्रिया प्रतिमाह पूर्णिमा के दीपयज्ञों पर संकल्पों की घोषणा के साथ क्रमशः ब्लॉक, जिला व संभाग स्तर पर संपन्न होती चली जाएगी। समापन पर संभावना है कि 48 घोषित साधनों केंद्रों एवं उपकेद्रों सहित कुल दो सौ चालीस केंद्रों पर विराट् दीपयज्ञों का आयोजन होकर, पर विराट् दीपयज्ञों का आयोजन होकर, यह चरण समाप्त हो इन सभी केंद्रों तक जिस धरातल से पहुँचा जा रहा है, उससे एक व्यापक संगठनात्मक मंथन प्रक्रिया पूरे देश में संपन्न हो सकेगी। सभी उपकेंद्रों पर केंद्रीय पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में विभिन्न प्रयोजनों में लगी-मिशन की भावी कार्ययोजना में नियोजित होने वाली राष्ट्र के नवनिर्माण की धूनी पर केंद्रित क्रिया–कलापों में संलग्न प्रतिभाओं के समयदान-साधनदान-श्रमदान की घोषणा होगी। यही प्रक्रिया चौथे चरण के प्रारंभ तक विभूति महायज्ञ के स्वरूप की चरमशिखर तक ले जाएगी।
साधना, जीवन जीने की कला के प्रशिक्षण एवं जीवन देवता की साधना-आराधना, हमारी वसीयत और विरासत जैसी ऐतिहासिक स्तर की रचनाओं के द्वारा यही प्रतिपादित किया कि हम योगस्थ हो कैसे जिएँ। स्थितप्रज्ञ बनने की दिशा में पहली सीढ़ी तो चढ़ें-सुख को भोग एवं दुख को तप बनाकर। उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं, प्रत्येक को जीवन भर इनका सामना करना पड़ता है, पर ये आते हैं हमें योगी बनाने के लिए, तपस्वी बनाने के लिए।
साधनाएँ व्यक्ति के विचारों को परिष्कृत करने के निमित्त ही तो हैं, यह बात उनने हमें घूंटी की तरह पिलाई हैं। अखण्ड ज्योति 1969 में परमपूज्य गुरुदेव ने पृष्ठ 40 पर लिखा है-मुद्दतों से हम यह भी भूल गए हैं कि विचार भी कोई तत्व है और उसका भी मानवजीवन पर कोई प्रभाव पड़ता है। इस विस्मृति का एक ही कारण है कि हम जीवननिर्माण और मनुष्य के सामने उपस्थित ज्वलंत समस्याओं के बारे में न कभी कुछ सोचते हैं, न कहते हैं, न पढ़ते-सुनते हैं। ऐसी चर्चा हमें वैसी ही निरर्थक लगती है जैसे भीलनी को रत्नराशि की कीमत एवं उपलब्धि की चर्चा। जो जिस विषय में अपरिचित है, वह भला उसमें रस ले भी कैसे सकता है।
साधना में डूबे रहे और जनहिताय तीर्थयात्रा में दूर देशों तक यात्रा करते रहे, उनके मित्र उनकी संपदा की रक्षा न कर सके, चारों ने उनकी सारी संपत्ति चुरा ली। मित्र दुख थे, पर लाचार थे। सोचते थे करुणाकर आएँगे तो जीवन भर की कमाई संपदा चली जाने से कितने दुखी होंगे
साधनामार्ग पूर्ण आत्मसंयम और अनासक्ति पर तथा धन और उसे पाने की सारी व्यक्ति और अहंकारयुक्त अभिलाषा के त्याग पर बल देते हैं। यहाँ तक कि कुछ तो धन और वैभव पर प्रतिबंध लगा देते हैं और जीवन की दरिद्रता तथा रिक्तता को ही एकमात्र आध्यात्मिक अवस्था घोषित करते हैं, किंतु यह एक भूल हैं, जो उस शक्ति को विरोधी सत्ताओं के हाथों में छोड़ देती है। यह भगवान् की शक्ति है और इसे भगवान् के लिए पुनः अर्जित करना और भागवत्-भाव से भागवत् जीवन के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।
साधनात्मक पुरुषार्थ प्रखर बनाए रखे तो यह सामूहिक पराक्रम एक ब्रह्मास्त्र संधान की तरह कार्य कर समष्टि की रक्षा करेगा। परिजनों के लिए तीन दिशाधाराएँ 1988 दिग्विजय के अंतर्गत आश्वमेधिक पराक्रमों ने संगठन को गति देने एवं युगचेतना को विश्वव्यापी बनाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब बारी तीसरे पक्ष की है।
साधना का उत्तम रूप बताते हुए श्री अरविंद ने लिखा हैं कि दरिद्रता में रहना पड़े तो रहें, अभाव की कोई भावना नहीं खटके, न ही साधक के भीतर भागवत् चेतना के क्रीड़ा-कल्लोल में कोई बाधा पड़नी चाहिए। यदि समृद्धि में रहना पड़े तो प्रसन्नतापूर्वक रहा जाए। एक क्षण के लिए भी इच्छाओं और वासनाओं के गर्त में न गिरें, धन या अपने व्यवहार की चीजों पर आसक्त न हों, विलासी न बनें। भगवान् की इच्छा और भगवत् आनंद ही साधक के लिए सब कुछ होना चाहिए।
साधना के माध्यम से स्थितप्रज्ञ बनने की कला समझा रहा है। जैसे भगवान् ने गीता में उदाहरण देकर लिखा है, उसे यदि हम ढंग से समझ सकें तो ऐसे इसे व्यावहारिक ढंग से प्रतिपादित किया जा सकता है। स्थितप्रज्ञ को इंद्रियों को मन में, मन को चित्त में, चित्त को अहं में, अहं को आत्मा में (शुद्ध अहं में ) एवं आत्मतत्व को परमात्मतत्त्व में सिकोड़ने की प्रक्रिया में निष्णात् होना चाहिए। यदि समेटने की यह प्रक्रिया जीवन का अभ्यास बन जाए तो हमारे अस्तित्व के कण-कण से परमात्मचेतना झरने लगेगी। कछुए का उदाहरण देकर गीताकार ने साधना−विज्ञान का मर्म हमारे समक्ष रख दिया है।
साधना एवं नित्य-नियमित प्रातः गायत्री का माला का जप) (ब) जीवन साधना (स) सामूहिक साधनाएँ (द) सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन (ई) दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। ]
साधनाओं में संयम-नियम का ध्यान रखना अनिवार्य है। उसी स्थिति में यंत्रों का प्रभाव ग्रहण करने योग्य पात्रता आती है। विशिष्ट साधनाओं में कुछ विशेष विधान उस यंत्र की विशिष्ट क्षमता को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।
साधना की सफलता में विश्वास एक सीमा तक ही उपयोगी है। कुछ आचार्यों के अनुसार वह साधना का तारतम्य और प्रवाह बनाए रखने मात्र के लिए जरूरी है। हो तो ठीक और नहीं हो तो भी ठीक। थोड़ा गिरते-पड़ते ही सही, मंत्र अपना प्रभाव दिखाते ही हैं। मंत्र−साधना को जो आधार सिद्धि तक पहुँचाते हैं, उनमें मुख्य है- शब्द शक्ति, जप या मंत्रों की आवर्तिता और साधक की चर्या
साधना से सिद्धि।
साधना बुद्धि को सूक्ष्मातिसूक्ष्म बना उसे सविता में प्रतिष्ठित कर देती है, साधक को स्थितप्रज्ञ बना देती है। रामकृष्ण मठ की डायरी से निकला यह उद्धरण है एवं हमें साधना के माध्यम से स्थितप्रज्ञ बनने की कला समझा रहा है। जैसे भगवान् ने गीता में उदाहरण देकर लिखा है, उसे यदि हम ढंग से समझ सकें तो ऐसे इसे व्यावहारिक ढंग से प्रतिपादित किया जा सकता है। स्थितप्रज्ञ को इंद्रियों को मन में, मन को चित्त में, चित्त को अहं में, अहं को आत्मा में (शुद्ध अहं में ) एवं आत्मतत्व को परमात्मतत्त्व में सिकोड़ने की प्रक्रिया में निष्णात् होना चाहिए। यदि समेटने की यह प्रक्रिया जीवन का अभ्यास बन जाए तो हमारे अस्तित्व के कण-कण से परमात्मचेतना झरने लगेगी।
साधना-महापुरश्चरण अभियान संबंधी पुस्तकों का एक सेट स्थापित करेंगे। मिशन की पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या बढ़ाएँगे। अखण्ड ज्योति पत्रिका अधिक-से-अधिक पाठकों तक पहुँच सके, वे इसके लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे। प्रयास यह हो कि महापूर्णाहुति वर्ष में इसकी ग्राहक संख्या दुगुनी हो जाए ताकि एक-से-दस के माध्यम से एक करोड़ व्यक्ति हिंदी व शेष एक करोड़ व्यक्ति अन्यान्य भाषाओं में गुरुसत्ता की प्राणचेतना से जुड़ सकें, यही प्रयास मिशन की अन्यान्य पत्रिकाओं के लिए भी किया जाना है। दीक्षा सेट की तरह पाँच प्रारंभिक पुस्तकों का एक नया सेट भी इन दिनों तैयार किया जा रहा है।
साधना अथवा मंत्र का अनुशासन भी कह सकते हैं गायत्री मंत्र के साधकों को अपना आहार-विहार सात्त्विक और नियमित रखना ही चाहिए। दुर्गा के उपासक थोड़े राजसी स्तर के हो सकते हैं। काली की उपासना में कतिपय क्षेत्रों में थोड़ी छूट दी गई। वह शक्ति के रौद्र पक्ष को ध्यान में रखकर ही दी गई थी। यह विडंबना ही रही कि भोगी और तामसी वृत्ति के लोगों ने उसका दुरुपयोग किया और शक्ति उपासना को ही बदनाम कर दिया।
साधना (स) सामूहिक साधनाएँ (द) सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन (ई) दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। ]
साधना और योग्यता छिपी हुई है।”
साधना में स्थित होने को कहा जाता है। सदैव सचेत रहकर साक्षी भाव में स्थित होकर मन के विकार कैसे नष्ट किए जाएँ, इसी का विवेचन यहाँ प्रस्तुत है।
साधना−विज्ञान का मर्म हमारे समक्ष रख दिया है।
साधना के द्वारा हो, इसके लिए एक घंटे का एक आयोजन शाम 5 से 6 सारे भारत में एक साथ होगा। यह निजी घरों, गायत्री परिवार की शाखाओं, प्रज्ञासंस्थानों, शक्तिपीठों पर, स्वैच्छिक संगठनों के कार्यालयों, विद्यालयों महाविद्यालयों में फैक्ट्रीज व सरकारी कार्यालयों में, दुकानों, सामाजिक या जातीय संगठनों के केंद्रीय कार्यालयों पर, कालोनियों के क्लबों सहित सभी मतों को मानने वालों उपासनागृहों पर संपन्न होगा। इसके लिए रोटरी-क्लब, लॉयन्स-क्लब, भारत विकास परिषद् जैसे सभी संगठनों के साथ मिलकर चर्चा कर उन्हें भागीदारी करने व अधिकाधिक को उससे जोड़ने के लिए सहमत किया जा रहा हैं।
साधना हो, तो अर्जुन एवं एकलव्य जैसी लक्ष्य के प्रति ऐसी एकाग्रता सँजोनी चाहिए, जिसमें कोई व्यवधान आड़े न आ सके।
साधना में निरत रख, उन्हें परमगति देने के लिए पूज्यवर ने उन्हें आश्वासन दिया व लिखा कि उनके सूक्ष्मशरीर के दर्शन की आकाँक्षा है तो वे तीन वर्ष और प्रतीक्षा करें। तीन वर्ष बाद पूज्यवर मथुरा छोड़ने वालों थे, सदा के लिए एवं हिमालय को स्पर्श कर ऊर्जा का प्रचंड स्रोत बन एक विराट्तंत्र गायत्रीतीर्थ का शुभारंभ करने जा रहे थे। संभवतः यह पत्र उसी तथ्य को इंगित करता है। पूज्यवर के पत्रों को पाठकों के समक्ष रखते हुए हमें रोमाँच हो उठता है व लगता है कि इस माध्यम से हम गुरुसत्ता के बहुआयामी अवतारी स्वरूप को जान, अपने सौभाग्य को सराह सकें, ऐसी दूरदर्शिता भरी सौभाग्य को सराह सके, ऐसी दूरदर्शिता भरी सूझबूझ हमें मिले। इस क्रम को आगे भी जारी रखेंगे।
साधनापद्धति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रणीत नए सूत्रों के समावेश से भरे लेखन का समुच्चय होगा अखण्ड ज्योति 2000 व उसके बाद के अंकों का प्रारूप।
साधना को जो आधार सिद्धि तक पहुँचाते हैं, उनमें मुख्य है- शब्द शक्ति, जप या मंत्रों की आवर्तिता और साधक की चर्या
साधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण, शाँतिकुँज हरिद्वार। गायत्रीतीर्थ से आरंभ कर सारे विश्व में विगत ग्यारह वर्षों में तीव्र वेग के साथ संपन्न हो रहा है। अपने समय का
साधना स्वाध्याय एवं सद्विचार।
साधना करने पर ही नहीं, पूरे दिन और प्रत्येक क्षण में करनी चाहिए।
साधना और परमसत्ता के अनुग्रह से मिलकर बना है। जिन दिव्य आत्माओं की चित्तभूमि में मंत्र प्रकट हुआ उन्हें ही उस मंत्र का ऋषि कहा गया। ऋषियों मंत्रद्रष्टाओं की आर्ष उक्ति इस संबंध में प्रसिद्ध है। मंत्र जिस रूप में प्रकट हुआ, शब्दों का गुँफन और उच्चारण की जो प्रक्रिया निश्चित हुई, वही ऊर्जा प्रकट करती है अन्यथा शब्दों में स्वतंत्र रूप से कोई शक्ति नहीं होती। जिस शब्द को ब्रह्म कहा गया है, वह ‘मंत्र’ स्तर का ही हो।
साधनाएँ (द) सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन (ई) दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। ]
साधना में निरत रहे। एकाकी मुक्ति पाने के स्थान पर उनने समूचे परिवार को ऋषि बनाया। उनके वंशज बाल्यखिल्य ऋषियों के नाम से प्रख्यात हुए और समूचे जंबू द्वीप को देवभूमि बनाने में सफल रहे।
साधनायुक्त तपस्वी जीवन जीने से व्यक्तित्व का विकास होता है और प्रखरता आती है। इसीलिए साधक सुविधा भरा जीवन छोड़कर तपस्वी जीवन चुनते हैं, ताकि व्यक्तित्व को छिद्रहीन बनाना। साधनों को जरूरत से ज्यादा महत्त्व मत देना। माँ से शिक्षा पाकर ही अलर्क एक सुयोग्य राजा बना।
साधनारत रहेंगे। रोगनिवारण अभियान-पोलियो उन्मूलन हेतु अपने समय व श्रम का नियोजन करने के संकल्प के साथ यह एक घंटे का क्रम समाप्त होगा। गायत्री परिजन इस माध्यम से नए वर्ग के परिजनों को-अनेकानेक स्वैच्छिक संगठनों को इस अभियान से जोड़ सकेंगे। संभावना व्यक्त की जा रही है कि प्रायः 5 से 6 करोड़ व्यक्ति इसमें एक साथ भागीदारी कर सकते हैं। यह संख्या बढ़कर दुगुनी भी हो सकती है।
साधना में लगाता है।
साधना, रात्रि की पंद्रह मिनट की नियति संतुलन साधना एवं नित्य-नियमित प्रातः गायत्री का माला का जप) (ब) जीवन साधना (स) सामूहिक साधनाएँ (द) सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन (ई) दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन। ]
साधना-आराधना, हमारी वसीयत और विरासत जैसी ऐतिहासिक स्तर की रचनाओं के द्वारा यही प्रतिपादित किया कि हम योगस्थ हो कैसे जिएँ। स्थितप्रज्ञ बनने की दिशा में पहली सीढ़ी तो चढ़ें-सुख को भोग एवं दुख को तप बनाकर। उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं, प्रत्येक को जीवन भर इनका सामना करना पड़ता है, पर ये आते हैं हमें योगी बनाने के लिए, तपस्वी बनाने के लिए।
साधना की अंततः जीत हुई।
साधना के रूप में चल रहा था, पूज्यवर ने घोषित किया कि यह अवधि विशेष है। यह भी उनने कहा कि की आश्विन नवरात्रि से दी गई थीं-
साधना में सूर्य की ध्यान−धारणा के साथ प्राण−प्रत्यावर्तन का भाव समर्पण सम्मिलित रहा है। गुरुसत्ता के निर्देशानुसार अत्यधिक व्यस्तों के लिए भी कम-से-कम दस मिनट मानसिक रूप से गायत्री जप और ध्यान, मन-ही-मन सूर्यार्घ्य दान देने का भाव तथा शांतिकुंज पहुँचकर मन-ही-मन उस उद्गम की परिक्रमा लगाने का उपक्रम संपन्न किए जाने की बात कही गई थी।
साधना का दिन है। पर्व का विधान हैं कि इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि करना चाहिए। चतुर्दशी के दिन जो लोग सूर्योदय के बाद स्नान करते है।, उनके लिए कठोर शब्द कहे गए हैं।सायंकाल दीपदान के लिए है।
साधना की परंपरा छिन्न-भिन्न होने लगी थी। बाहरी आक्रमणों ने संपन्न-वैभवशाली लोगों के लिए जीवनसंकट खड़ा कर दिया। श्री-समृद्धि की अधिष्ठात्री के आशीष उन्हीं दिनों अभिशाप समझे जाने लगे होंगे, अन्यथा धन एक शक्ति है, ऐश्वर्य “ईश्वर” की ही अभिव्यक्ति है।
साधना से सूक्ष्म वातावरण में संव्याप्त प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना।
साधना में बल उत्पन्न करने भर के लिए है। विश्वास हो कि लक्ष्य को साधकर छोड़ा गया तीर उसे वेध देगा तो धनुष की डोरी के खिंचवा में बल आएगा। निशाना ठीक से सधेगा। विश्वास हो कि आग पर रखने से रोटी पक जाएगी, तो भोजन तैयार करने की प्रक्रिया व्यवस्थित चल सकेगी। विश्वास हो कि वाहन पर बैठकर की गई यात्रा गंतव्य तक पहुँचा देगी, तो दूरी तय होने के बीच का समय बिना किसी तनाव के बीत जाएगा, अन्यथा इस बीच उठती रहने वाली चिंता मन को थकाएगी और यात्रा के बीच में हो सकने वाले छोटे-मोटे काम भी गड़बड़ा जाएँगे।
साधना का तारतम्य और प्रवाह बनाए रखने मात्र के लिए जरूरी है। हो तो ठीक और नहीं हो तो भी ठीक। थोड़ा गिरते-पड़ते ही सही, मंत्र अपना प्रभाव दिखाते ही हैं। मंत्र−साधना को जो आधार सिद्धि तक पहुँचाते हैं, उनमें मुख्य है- शब्द शक्ति, जप या मंत्रों की आवर्तिता और साधक की चर्या
साधना-अनुष्ठान जो आरंभ किया गया था, उसे पूज्यवर ने विगत तीनों अनुष्ठानों की संयुक्त शक्ति से बढ़कर बताया। इसका वर्णन करते हुए उनने कहा कि गायत्री का ब्रह्मास्त्र संधान किया जा चुका है। महाप्रज्ञा का-त्रिपदा गायत्री का स्वरूप युगशक्ति के रूप में सामने आ रहा है। फिजिसिस्ट आर्थरकेसलर के हवाले से उनने बताया कि विश्वयुद्ध की विभीषिका से जगती को गायत्री मंत्र ही बचा सकती है। श्री केसलर का मत था कि यदि पचास लाख भारतवासी भी एक साथ गायत्री मंत्र का उच्चारण करें तो इससे उद्भूत ऊर्जा आणविक विभीषिका को टाल सकती है।
साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं।” सम्राट् ने परिवारसंस्था में गुणों के समावेश एवं इस प्रकार संभव हुए विकास की महत्ता को समझा एवं अन्य नागरिकों के लिए इसे एक आचरण संहिता के रूप में अपनाने को कहा।
साधना-सार को बहुत ही सुँदर रूप में प्रस्तुत करना कठिन कार्य है, किंतु जब अमृतवाणी में आप पढ़ते हैं, तब पाते हैं-
साधनावर्ष के समापन के साथ पाँच चरणों वाली महापूर्णाहुति की वेला आ पहुँची है। परमपूज्य गुरुदेव के तत्कालीन निर्देशानुसार इस महापूर्णाहुति को सन् 2000-2001 में दो करोड़ व्रतशील साधकों द्वारा संपन्न होना है। महापूर्णाहुति को पाँच चरणों में बाँटकर निम्नानुसार संपन्न किया जाना है।
साधना से प्रचेता जो आध्यात्मिक शक्ति संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से उनका स्वभाव खराब होता गया और वे जरा-जरा-सी बात पर उत्तेजित हो उठते थे। एक बार वे एक वीथिका से गुजर रहे थे। उसी समय दूसरी ओर से कल्याणपाद नाम का एक और व्यक्ति आ गया। दोनों एक-दूसरे के सामने आ गए।
साधना करें। फिर तो युगज्योति का स्पर्श पाते ही, जीवन में अंधकार खोजने पर भी नहीं मिलेगा।
साधना में सही उच्चारण, लय और नियत चर्या का पालन किया जाए, तो निश्चित परिणाम होते हैं। इन तीनों पक्षों का निर्वाह करने के बाद किसी साधक को विश्वास हो या न हो, मंत्र का लाभ मिलेगा ही। अग्नि, ईंधन और पात्र के साथ पानी या आहार का मेल हो तो विश्वास करें न करें, भोजन पकेगा ही। फलदार वृक्ष हो, यात्री हो और तोड़ने के लिए प्रयत्न हो तो फल हस्तगत होकर रहेगा ही। विश्वास करें या न करें, नियत प्रक्रिया संपन्न कर लेने के बाद अभीष्ट कार्य सिद्ध होकर ही रहते हैं।
साधना व दीपयज्ञ को आयोजन के रूप में तीन दिसंबर, 1999 शुक्रवार को सारे भारत में एक साथ, एक समय संपन्न हो रहा है। यह प्रसंग भारत में पोलियो उन्मूलन अभियान के राष्ट्रीय कार्यक्रम की पूर्व वेला में जनचेतना के जागरण के रूप में आया हैं।इस सदी की अंतिम पोलियो वैक्सीन की खुराक 5 दिसंबर से सारे भारत में एक साथ पिलाई जाएगी। अन्यान्य संगठन भी इसमें रुचि लेकर शताब्दी के इस अंतिम धक्के के साथ पोलियो रूपी प्रतीक के माध्यम से विकलाँगता को भारत से निकाल बाहर करने हेतु संयुक्त पुरुषार्थ कर रहे है। हम उसे और बड़ा व्यापक रूप देते हुए ‘सबके लिए स्वास्थ्य सबको उज्ज्वल भविष्य सबकी सद्बुद्धि’ की प्रार्थना के साथ जोड़ रहे हैं।
साधना महापराक्रम
साधनाओं में कुछ विशेष विधान उस यंत्र की विशिष्ट क्षमता को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-October
साधनापद्धतियों के सूक्ष्म अंतर-प्रत्यांतरों को हम इतना अधिक जानते हैं जितना वर्तमान पीढ़ी के मंत्रज्ञाताओं में से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकाँगी पढ़ा-सीखा है। हमने शोध और जिज्ञासा की दृष्टि से इस विद्या को अति विस्तार और गहराई के साथ ढूँढ़ा-समझा है। इस जानकारी की भी जहाँ उपयोगिता हो वहाँ हम प्रयोग करते हैं, किंतु हमारी अपनी क्रियापद्धति अति सरल और सीधी-सादी है। यही सीधा-सा एक ॐ तीन व्याहृति ॐ , अधिक बीज-संपुट आदि की लाग-लपेट जोड़े जप-साधना में लग जाते हैं।
साधना करे या न करे, केवल गायत्री जप से भी सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है, जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता, वह निंदा का पात्र है।”
साधना नहीं कर पाए, उनके लिए भी प्रस्तुत अवसर पूर्णाहुति में शामिल होकर पुरे यज्ञकर्म में शामिल होने का अधिकार बनने का अवसर है।
साधना के साथ एक पुण्यपरमार्थ का संपुट जोड़ा है। प्रस्तुत नवरात्रि अन्य वर्षों की तरह सामान्यक्रम में नहीं आई है, यह एक विशिष्ट मुहूर्त्त में विशिष्ट अनुदानों व अपेक्षाओं के साथ आई है। यदि हम ग्यारह वर्ष के साधनात्मक पुरुषार्थ का समापन शानदार ढंग से करना चाहते हैं, तो महापूर्णाहुति वर्ष के पूर्व आई इस नवरात्रि से लेकर सन् 2001 की चैत्र नवरात्रि (26 मार्च से 2 अप्रैल) तक का डेढ़ वर्ष का एक विशेष संकल्प ले सकते हैं। वह इस रूप में हो सकता है कि हमारी साधना में और निखार आए एवं हम नए युग की नई भारी-भरकम जिम्मेदारियों को उठाने योग्य स्वयं को सुपात्र बना सकें।
साधनावर्ष में इस जप-उपचार में यही विशिष्टता जोड़ी गई है। कि हम सबके उज्ज्वल भविष्य की संभावित विभीषिकाओं से मानवमात्र की रक्षा की प्रार्थना भी इस जप-ध्यान के साथ करें। “धियो यो नः प्रचोदयात्” के साथ उसके अर्थ का ध्यान करते ही बात आ जाती है। इसमें से किसी को यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि हम जो भी कुछ संधिकाल उपचार। इसी कारण बारबार मंत्रजप के साथ उसमें प्राणप्रतिष्ठा करने, उसके अर्थ के ध्यान के साथ स्वयं का समर्पण भाव बढ़ाने की बात बराबर कही जा रही है।
साधना की सफलता में कोई संदेह किसी को नहीं होना चाहिए। हमारी इस प्रखर साधनावर्ष की उपासना में गुरुसत्ता के प्रेमभाव-समर्पण और अधिक प्रगाढ़ हो, उनके कार्यों की पूर्णता के अंजाम तक पहुँचाने की टीस बढ़ती ही चली जाए, तो मानना चाहिए कि साधना प्राणवान् होती चली जा रही है।
साधना कहा गया है। इससे भावविभोरता की स्थिति प्राप्त होती है और उपासना ऐसी सरस बन जाती है कि उसे छोड़ने को जी नहीं चाहता। “परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस लक्ष के चौबीस अनुष्ठान उपर्युक्त मनोभूमि की धुरी पर ही चले। हमें क्या कठिनाई हो सकती है, यदि हम भी इसी प्रकार अपने जप में प्राण डाल सकें व अपनी साधना के वे प्रतिफल प्राप्त कर सकें, जिनकी अपेक्षा गुरुसत्ता ने समूहमन के निर्माण से समष्टि के उपचार के रूप में की है।
साधना करना परमपूज्य गुरुदेव ने हमें सिखाया तो बार-बार कहा- योग में स्थित होकर अपने कर्म करो-भवबंधनों से आसक्ति को छोड़ो एवं समत्व का भाव मन में ले आओ। यदि हम घर पर रहकर परिवार चलाते हुए भी जीवन जीना चाहते हैं, तो यही सूत्र हमारे जीवन का मार्गदर्शक बन जाता है।
साधना है।
साधना-उपासना कि कुछ आहुतियाँ अपनी ओर से भी दी जा जानी चाहिए।
साधना कभी निष्फल नहीं जाती।
साधना के असाधारण लाभों को समझ नहीं पाते और उसके लिए आगे आने में, सहयोग देने में झिझकते हैं। जब कोई साहसी लोकसेवी उस क्षेत्र में पहल करता है, प्रसन्नतापूर्वक अकेला ही आगे बढ़ता जाता है, तो लोगों का भ्रम दूर होता है। सेवासाधना के लाभ सबको दिखने लगते हैं और लोकसेवी को सम्मान से लेकर सहयोग-समर्थन तक दिया जाने लगता है।
साधना के वे प्रतिफल प्राप्त कर सकें, जिनकी अपेक्षा गुरुसत्ता ने समूहमन के निर्माण से समष्टि के उपचार के रूप में की है।
साधना के लाभ सबको दिखने लगते हैं और लोकसेवी को सम्मान से लेकर सहयोग-समर्थन तक दिया जाने लगता है।
साधना का जोड़ा अविच्छिन्न रूप से आवश्यक है। इसमें न तो ढील की गुंजाइश है, न उपेक्षा की। शास्त्रकारों से लेकर तपोनिष्ठ ऋषियों और सफल आराधकों ने सदा इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। हमारे मार्गदर्शक ने यह बात प्रारंभ में ही कूट-कूटकर अंतरंग में बिठा दी थी कि उपासना आवश्यक है, किंतु इस क्षेत्र की सफलताओं का स्रोत भावनात्मक विकास की जीवनसाधना पर ही अवलंबित है। हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया।
साधना शक्ति की आराधना के रूप में ही की जाती है। शास्त्रों में ढेरों प्रसंग है, जिनमें शक्ति संपन्न होने के बाद मिलने वाले परिणामों का विवेचन मिलता है। महिषासुर और शुँभ-निशुँभ भी शक्ति के आराधक थे। देवसत्ताओं के संगठित बल को उन्होंने नवरात्र के ही दिनों में चुनौती दी। देवासुर संग्राम उन्हीं दिनों लड़ा गया था।
साधना पर ही अवलंबित है। हमने इस शिक्षा को गाँठ बाँध लिया।” आगे परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं- “मंत्रशास्त्र का विशाल अध्ययन और अन्वेषण हमने किया है। महामाँत्रिकों से हमारे संपर्क रहे हैं और साधनापद्धतियों के सूक्ष्म अंतर-प्रत्यांतरों को हम इतना अधिक जानते हैं जितना वर्तमान पीढ़ी के मंत्रज्ञाताओं में से शायद ही कोई जानता हो। लोगों ने एकाँगी पढ़ा-सीखा है।
साधनात्मक उपचार करेंगे और प्रार्थना करेंगे कि सारा विश्व क्षुद्र चिंतन-मानसिक एवं मनोशारीरिक व्याधियों-तनाव, मानसिक विकलाँगताओं एवं शारीरिक अपंगता से मुक्त हो।
साधना का अवसर कहा है। सर्जन शब्द बहुत कम आया है। सर्जन वस्तुतः परिणति है, उससे पहले ध्वंस आता है दोनों का मेल-परिवर्तन प्रक्रिया को सम्पूर्ण बनाता है। प्रक्रिया जिस प्रवाह से संपन्न होती है, उसका नाम शक्ति है। वह हो तो यथा अवसर उपयोग भी हो जाता है।
साधनात्मक उपचारों में नियोजित कर ले, हो सके तो उसके पूर्व या बाद भोजन ले लें। छह घंटे कि गाढ़ी योगनिद्रा पर्याप्त है, यदि दिनभर का क्रम श्रम से भरा-द्वंद्वों से मुक्त है। अभ्यास किया जाए, तो संधिकाल में थोड़ा प्राणायाम-ध्यान का क्रम ठीक से बैठ जाने से इस निद्रा को रोज का एक क्रम बनाया जा सकता है। आज हिंसा व अश्लीलता से भरे टेलीविजन नेटवर्क जो हमारे अंतर्कक्षों तक पहुंचा गया है, से दो-दो हाथ होने के बाद किसी को योगनिद्रा तो क्या आएगी, भोगनिद्रा ही आएगी। सप्ताह में एक दिन मनोरंजन का रखा जा सकता है, किन्तु अभ्यास रात्रिचर्या का इसी क्रम से किये जाना चाहिए, जैसा की ऋषिगणों का निर्देश है।
साधना में अपने आपको बदल दीजिए और लोभ एवं मोह के बंधनों में अपने आपको पीछे हटाइए।
साधना कर सकेंगे। किन्हीं के जीवन वह अवसर आ भी गया तो युगसंधि महापुरश्चरण जैसे अवसर कहा होंगे। साठ वर्ष बाद कि दुनिया सर्वथा भिन्न ही होगी।
साधनात्मक पुरुषार्थ का समापन शानदार ढंग से करना चाहते हैं, तो महापूर्णाहुति वर्ष के पूर्व आई इस नवरात्रि से लेकर सन् 2001 की चैत्र नवरात्रि (26 मार्च से 2 अप्रैल) तक का डेढ़ वर्ष का एक विशेष संकल्प ले सकते हैं। वह इस रूप में हो सकता है कि हमारी साधना में और निखार आए एवं हम नए युग की नई भारी-भरकम जिम्मेदारियों को उठाने योग्य स्वयं को सुपात्र बना सकें।
साधना चल रही थी। सत्र में शिक्षण के दौरान उन्हें प्रेरणा मिली अपने ग्राम पाठेड़ा में वसंतपर्व के अवसर पर गायत्री यज्ञ कराने की। नए-नए जुड़े थे। चिंता हो रही थी कैसे सब कुछ होगा किंतु ऐसी परिस्थितियों में दिसंबर 1984 में सूक्ष्मीकरण से स्वप्न में गुरुसत्ता ने अनुभूति कराई कि तू इस कार्य की चिंता छोड़ दे और पूर्ण लगन के साथ प्रयत्न करता चल। तेरे यज्ञ में मैं स्वयं उपस्थित रहूँगा।
साधना में लग जाते हैं।”
साधना को अधिकाधिक प्रखर बनाया है, अन्यान्य व्यक्तियों को भी साधनाक्रम में सम्मिलित कर विशुद्धतः अपनी साधना के साथ एक पुण्यपरमार्थ का संपुट जोड़ा है। प्रस्तुत नवरात्रि अन्य वर्षों की तरह सामान्यक्रम में नहीं आई है, यह एक विशिष्ट मुहूर्त्त में विशिष्ट अनुदानों व अपेक्षाओं के साथ आई है। यदि हम ग्यारह वर्ष के साधनात्मक पुरुषार्थ का समापन शानदार ढंग से करना चाहते हैं, तो महापूर्णाहुति वर्ष के पूर्व आई इस नवरात्रि से लेकर सन् 2001 की चैत्र नवरात्रि (26 मार्च से 2 अप्रैल) तक का डेढ़ वर्ष का एक विशेष संकल्प ले सकते हैं। वह इस रूप में हो सकता है कि हमारी साधना में और निखार आए एवं हम नए युग की नई भारी-भरकम जिम्मेदारियों को उठाने योग्य स्वयं को सुपात्र बना सकें।
साधनाक्रम पसंद है, उनके लिए प्रातःकाल उगते हुए अरुण वर्ण सूर्य का ध्यान करना उत्तम है। यह हर किसी धर्म-संप्रदाय के व्यक्तियों के लिए संभव है। किंतु जो साकार ध्यान करना चाहते हों, उन्हें मन को एक सीमित परिधि में भ्रमण कराने का अभ्यास डालना चाहिए। माता का चित्र सामने रहने से उनके अंग-प्रत्यंगों और आवरणों का बारीकी से मनोयोगपूर्वक निरीक्षण करते रहने की ध्यान-साधना मन को इधर-उधर न भागने देने की समस्या हल कर देती है। यह छविध्यान थोड़े अभ्यास से तस्वीर को देखे बिना भी
साधना के परिणाम भी सामाजिक सुव्यवस्था और व्यक्तिगत आत्मसंतोष एवं आनंद के रूप में प्राप्त होते हैं। वह अनुभूति आँतरिक है-लेकिन जिनकी दृष्टि बाहरी परिणामों पर ही टिकी रहती है, वे सेवा को घाटे का सौदा समझते हैं।
साधना में और निखार आए एवं हम नए युग की नई भारी-भरकम जिम्मेदारियों को उठाने योग्य स्वयं को सुपात्र बना सकें।
साधना संस्कार जगाने कि प्रतीक्षा करनी पड़ती। इस अनुदान को यही तक उपयोगी मानकर अगले चरण के लिए सन्नद्ध होना चाहिए।
साधना-उपासना के कार्यक्रमों में लोग जिस तरह उत्साह से भाग लेते है, उसकी तुलना दस- पाँच साल पूर्व होने वाले श्राँक-पाँपश् म्यूजिक कार्यक्रमों से कि जा सकती है। कथा-कीर्तन-सत्संग-प्रवचन से लेकर मंदिर या धर्मसंस्थान के छोटे-मोटे आयोजन भी लगो को प्रबल रूप में आकर्षित कर लेते है। अनुमान जो भी लगाये,उनके पीछे सूक्ष्म जगत में आये उभार ही मूल कारण दिखाई देते है। प्रतीत होता है कि महाकाल ने युग- चेतना को मथ-सा दिया है और उसमें अध्यात्म कि भूख जाग्रत हुई है। अभीप्सा का अमृत निकल रहा है।
साधना सम्प्रदायों की कोई सीमा रेखा नहीं खींची जाती। इसलिए राम लीला के साथ दुर्गा पूजा भी सम्मिलित-समन्वित हो गयी है। दोनों आयोजन साथ-साथ चलते रहते है। समन्वित रूप में विजयदशमी शक्ति और मर्यादा का प्रेरक पर्व है। नवरात्र साधना शक्ति की आराधना के रूप में ही की जाती है।
साधना कर रहे।, उपासना कर रहे हैं, तो आपको क्या करना चाहिए? आपको तीन बंधनों से मुक्ति प्राप्त करनी चाहिए। आप कोशिश कीजिए कि तीनों बंधन तोड़ दें। अगर आप चाहें तो इन तीन बंधनों को तोड़ सकते हैं।
साधना मन को इधर-उधर न भागने देने की समस्या हल कर देती है। यह छविध्यान थोड़े अभ्यास से तस्वीर को देखे बिना भी
साधना पूरी होने की तिथि एक ही है। विजयादशमी पर आसुरी आतंक के प्रतिनिधि रावण का पराभव हुआ। नवरात्र की अंतकथा के अनुसार इस दिन भगवती दुर्गा ने महिषासुर और शुँभ-निशुँभ आदि दैत्यों का संहार कर देवसत्ताओं को निष्कंटक राज्य दिया। विजयादशमी उस शक्ति की आराधना के समापन और विसर्जन का दिन है। शक्ति उपासना में नौ दिनों तक दुर्गा पूजा के बाद विसर्जन के लिए विजयादशमी या उससे पहले नवमी का दिन निर्धारित है।
साधना में स्वयं को प्रवृत्त कर उसका थोड़ा-सा भी साधन जीवन का कल्याण सुनिश्चित है। इसमें कहीं भी बीज का नाश नहीं, न उलटा फलरूप दोष ही है। यह भी बारंबार सबको समझाकर गुरुसत्ता ने करोड़ों व्यक्तियों की जीवन की दिशाधारा बदल दी। बुद्धि के सद्बुद्धि में बदलने की इस छोटी-सी चिनगारी ने एक महादावानल खड़ा कर क्राँति कर दिखाई है, इसे सहज ही समझा जा सकता है।
साधनाक्रम में सम्मिलित कर विशुद्धतः अपनी साधना के साथ एक पुण्यपरमार्थ का संपुट जोड़ा है। प्रस्तुत नवरात्रि अन्य वर्षों की तरह सामान्यक्रम में नहीं आई है, यह एक विशिष्ट मुहूर्त्त में विशिष्ट अनुदानों व अपेक्षाओं के साथ आई है। यदि हम ग्यारह वर्ष के साधनात्मक पुरुषार्थ का समापन शानदार ढंग से करना चाहते हैं, तो महापूर्णाहुति वर्ष के पूर्व आई इस नवरात्रि से लेकर सन् 2001 की चैत्र नवरात्रि (26 मार्च से 2 अप्रैल) तक का डेढ़ वर्ष का एक विशेष संकल्प ले सकते हैं। वह इस रूप में हो सकता है कि हमारी साधना में और निखार आए एवं हम नए युग की नई भारी-भरकम जिम्मेदारियों को उठाने योग्य स्वयं को सुपात्र बना सकें।
साधनाओं में भागीदारी का वैसा अवसर दोबारा नहीं मिलेगा। जो लोग अभी तक नवरात्र साधना नहीं कर पाए, उनके लिए भी प्रस्तुत अवसर पूर्णाहुति में शामिल होकर पुरे यज्ञकर्म में शामिल होने का अधिकार बनने का अवसर है।
साधना प्राणवान् होती चली जा रही है।
साधना करके तो देखो। इससे बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती है। उपर्युक्त सभी मंतव्य बताते हैं कि गायत्री उपासना के पीछे आत्मोन्नति में सहायक ठोस तत्वों का बल है। गायत्री साधना कभी निष्फल नहीं जाती।
साधना एवं पूजा करते हुए ब्रह्माँडीय ऊर्जा और चेतना से सम्बन्ध साधा जा सके। कालान्तर में इन्हें कभी शव सुरक्षित और संरक्षित रखने का सर्वोत्तम स्थल समझकर शायद ऐसा किया जाने लगा हो, लेकिन केवल शवसंरक्षण के लिए इतनी विशाल, श्रम, समय एवं व्ययसाध्य संरचनाएं खड़ी करने की बात गले नहीं उतरती। शव सिद्धाँत को तब गहरा आघात लगा, जब अन्वेषकों को पिरामिडों का महीनों खाक छानने के बाद भी उसमें न कोई ममी मिली, न उनकी शवपेटिकाएं, न धन-दौलत ही।
साधना करने वालों में कुछ प्रतिशत लोग ही होंगे जो साठ साल बाद नंदन संवत्सर में फिर साधना कर सकेंगे। किन्हीं के जीवन में वह अवसर आ भी गया तो युगसंधि महापुरश्चरण जैसे अवसर कहा होंगे। साठ वर्ष के बाद की दुनिया सर्वथा भिन्न ही होगी।
साधना के बिना चैन नहीं मिलता।
साधना समग्र सिद्धि बनती है।
साधनावर्ष की समापन वेला में बीसवीं शताब्दी की इस महत्वपूर्ण नवरात्रि के रूप में प्रस्तुत नौ दिवसीय विशिष्ट प्रसंग 10 से 18 अक्टूबर की तारीखों मं हम सबके लिए आ रहा है। अगला वर्ष इस शताब्दी का अंतिम वर्ष होगा, पर हमारे लिए अति महत्वपूर्ण महापूर्णाहुति वर्ष होगा, जिसमें हम सारे भारत व केंद्र में अपनी आहुतियाँ दे रहे होंगे। इस वर्ष सभी ने किसी-न किसी रूप में अपना साधना को अधिकाधिक प्रखर बनाया है, अन्यान्य व्यक्तियों को भी साधनाक्रम में सम्मिलित कर विशुद्धतः अपनी साधना के साथ एक पुण्यपरमार्थ का संपुट जोड़ा है। प्रस्तुत नवरात्रि अन्य वर्षों की तरह सामान्यक्रम में नहीं आई है, यह एक विशिष्ट मुहूर्त्त में विशिष्ट अनुदानों व अपेक्षाओं के साथ आई है। यदि हम ग्यारह वर्ष के साधनात्मक पुरुषार्थ का समापन शानदार ढंग से करना चाहते हैं, तो महापूर्णाहुति वर्ष के पूर्व आई इस नवरात्रि से लेकर सन् 2001 की चैत्र नवरात्रि (26 मार्च से 2 अप्रैल) तक का डेढ़ वर्ष का एक विशेष संकल्प ले सकते हैं।
साधना-परंपरा के अलावा बाजार में भी लोकप्रिय हो रहे है। म्यूजिक कम्पनियाँ उद्योग की तरह इनका उत्पादन और विज्ञापन कर रही है। टाइम्स म्यूजिक द्वारा तैयार गायत्री मन्त्र के कैसेट को साढ़े तीन लाख प्रतियाँ कुछ ही सप्ताहों में बिक गई। योग वेदाँत सेवा समिति ने हरिओम् धुन के दस लाख से ज्यादा कैसेट बेच लिए। श् म्यूजिक टुडे की मेडीटेशन कैसेट ने भी बिक्री के रिकार्ड तोड़े उसमें नाद ध्वनि और कुछ रागों का सम्मिश्रण है, जो मन को विश्राम देता है।
साधनावर्ष की उपासना में गुरुसत्ता के प्रेमभाव-समर्पण और अधिक प्रगाढ़ हो, उनके कार्यों की पूर्णता के अंजाम तक पहुँचाने की टीस बढ़ती ही चली जाए, तो मानना चाहिए कि साधना प्राणवान् होती चली जा रही है।
साधना में गति नहीं होती तैराकी सीखने के लिए मास्टर के संकेत और क्रिया देखने से काम नहीं चलता। स्वयं ही पानी में उतरना पड़ता है। जप, धुन और ध्यान के निर्देश या संगीत से भी दिशा तो ग्रहण कि जा सकती है, लेकिन वही अटक जाने से बात न उस प्रक्रिया का अभ्यास भी करना चाहिए।
साधना-उपासना में व्यतीत करने का विधान किया। ये उपविचार काम को उर्ध्वदिशा में ले जाते है। शास्त्रों ने नवरात्र कि वेला को शक्ति-साधना का अवसर कहा है। सर्जन शब्द बहुत कम आया है। सर्जन वस्तुतः परिणति है, उससे पहले ध्वंस आता है दोनों का मेल-परिवर्तन प्रक्रिया को सम्पूर्ण बनाता है।
साधना कर सकेंगे। किन्हीं के जीवन में वह अवसर आ भी गया तो युगसंधि महापुरश्चरण जैसे अवसर कहा होंगे। साठ वर्ष के बाद की दुनिया सर्वथा भिन्न ही होगी।
साधना वर्ष का है। संधि वेला संपन्न हो रही है। बीसवीं शताब्दी समापन की ओर अग्रसर है-ऐसा कह सकते है। नंदन संवत्सर का यह पर्व ज्योतिष के मन से संज्ञा के रूप में साठ वर्ष के बाद आएगा। वर्ष के मान से संवत्सर सर्जन और अर्जन की तरुण संभावनाओं से संपन्न है।
साधना के रूप में अर्जन तप करते है। वह प्रक्रिया उत्साहपूर्वक चलनी चाहिए।
साधना ओर ताप सब आज भंग हो जाएगा। आचार्यप्रवर कुछ देर तक निश्छल बैठे विचार करते रहे, फिर बोले- मन का सीधा सम्बन्ध अन्न से है- कही तुमने कुछ चुराकर तो नहीं खा लिया।
साधना करने वालों में एकाध प्रतिशत लोग साल बाद नंदन संवत्सर में फिर साधना कर सकेंगे। किन्हीं के जीवन वह अवसर आ भी गया तो युगसंधि महापुरश्चरण जैसे अवसर कहा होंगे। साठ वर्ष बाद कि दुनिया सर्वथा भिन्न ही होगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-April
साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।
साधना का क्रम निर्धारित किया गया है। राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में, चप्पे-चप्पे में आस्तिकता के संस्कारों की नर्सरी उगानी-बढ़ानी व संभावित आक्रमणों से उसकी रक्षा करनी है। गायत्री, यज्ञ एवं संस्कारों की त्रिवेणी में
साधनाओं के सत्परिणाम अनेक रूपों में साधक को मिलते हैं।
साधना का गुह्य विवेचन) से पढ़कर तदनुसार अभ्यास कर सकते हैं।
साधना ग्रंथों में इस चक्र के कई रंग अरुण, नीला, बंधुका के फूल की तरह बताये गए हैं। इसके बारह दल हैं। प्रत्येक में ‘कं’ से लेकर ‘ठं’ तक बारह अक्षर सिंदूरी वर्ण में अंकित हैं। इसका भीतरी भाग, जो प्रायः चक्र का यंत्र कहलाता है, षट्कोणीय है। गुह्य विज्ञान के अनुसार इसकी संरचना उलटे-सीधे दो त्रिकोणों के मिलन से होती है।
साधना है। दर्पण में जब भी दृश्यमान हैं वह तो मात्र हाड़-माँस का पिंड हैं, जिसे एक दिन भस्मीभूत बन जाना है। फिर इसे सजाने का इतना प्रयास क्यों? सुंदर, आकर्षक तो भीत वालों को जिन्हें विचारणा- आकांक्षाओं का केंद्र मन एवं भावसंवेदना की गंगोत्री अंतःकरण कहते हैं, बनाया जाना चाहिए उनके लिए कभी प्रयास होता नहीं इसीलिए मात्र शरीर तक मनुष्य सीमित होकर रह जाता है। कारण व सूक्ष्मशरीर के परिष्कार के लिए दर्पण- साधना श्रेष्ठतम हैं, क्योंकि यह सीधे वेदाँत के सच्चिदानंदोऽहम् की अवधारणा तक साधक को ले जाती है।
साधनारत थे। साधना से उठे, देखा देवगण खड़े हैं। आदर सम्मान किया, आसन दिया। देवतागण बोले-आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई। आप जो चाहें वरदान माँग लें।
साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान विजय है। प्रेमचन्द्र ने आगे उल्लेख किया है -एक शब्द में मैं उसे लय कहूँगा, जीवन का व्यक्तित्व का और नारीत्व का। रामकुमार वर्मा के अनुसार, माता के हृदय से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है। जननी की शक्ति संसार में सबसे महान हैं। डॉ. लक्ष्मीनारायण मिश्र ने माता शब्द में निहित भावों को इस तरह अपने शब्दों में पिरोया है-नारी शक्ति से ही पुरुष को विजयी मिलती है और फिर जहाँ माता की प्रेरणा काम करें, वहाँ असाध्य और असंभव कुछ नहीं है।
साधनावर्ष में प्रतिफल-प्रतिक्षण दृढ़ करते रहा जाना चाहिए। बड़े-बड़े आयोजनों की होड़ समाप्त होने के बाद अब साधना की धुरी पर संगठन को सशक्त बनाने, अपने आपको प्रतिकूल समय के लिए सभी मोर्चों पर तैयार करने के लिए ही यह एक वर्ष की पूरी साधना का क्रम निर्धारित किया गया है। राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में, चप्पे-चप्पे में आस्तिकता के संस्कारों की नर्सरी उगानी-बढ़ानी व संभावित आक्रमणों से उसकी रक्षा करनी है। गायत्री, यज्ञ एवं संस्कारों की त्रिवेणी में
साधना के विषय में विस्तार से बताया गया था। उसी क्रम को यहाँ आगे बढ़ाया जा रहा है।
साधना की-पुरश्चरण की शुरुआत होती है। इसलिए मृदु चाँद्रायणव्रत काल के एक महीने में सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान का एक नियमित कार्यक्रम बना लेने से ‘सोने में सुगंध’ की उक्ति चरितार्थ होती है। इससे शारीरिक कायाकल्प के साथ-साथ आँतरिक कायाकल्प का सुयोग भी बैठ जाता है। तीस दिनों में सवालक्ष गायत्री का जप-अनुष्ठान करने के लिए प्रतिदिन 42 माला जप करना पड़ता है। उसमें प्रायः चार घंटे लगते हैं।
साधनाएँ की हैं और उनका अद्भुत लाभ उठाया है। हम भी ये लाभ उठा सकते हैं यदि, समझ लें-
साधना के अतिरिक्त साहित्य, संगीत जैसी भौतिक विधाओं द्वारा भी प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकता है, तो साधक में एक नये विचार और दृष्टिकोण का प्रसव होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की चिंतनप्रणाली और कार्यशैली पूरी तरह परिवर्तित हो जाती है। साधक के लिए यह चेतना के एक नये तल में अवस्थान है।
साधना, पृथ्वी माँ को नमस्कार, ऊषापान, शौच, दंतधावन, अभ्यंग (तैल मालिश) प्रातःभ्रमण, व्यायाम, क्षौरकर्म, स्नान, वस्त्रधारण, संध्योपासना, स्वाध्याय, भोजन आदि कर्म आते हैं।
साधना द्वारा मानसिक क्रिया-व्यापार पर नियंत्रण साधता है। ध्यान का शरीरगत क्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत अध्ययन प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता एच. आर. वैलेस एवं सहकर्मियों ने किया। पाया गया कि ध्यान करने वाले व्यक्ति में न सिर्फ ध्यान के दौरान, वरन् ध्यान के बाद भी उनके चयापचय व शरीर-रसायन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आता है।
साधना करने के लिए अनेक ग्रन्थों में अनेक मार्ग बताये गए हैं। इसी प्रकार गुरु-परम्परा से चली आने वाली साधनाएँ भी विविध प्रकार की हैं। इन सभी मार्गों से उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है, सफलता मिल सकती है, पर शर्त यह है कि उसे पूर्ण विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा और उचित मार्गदर्शक के संरक्षण में किया जाए।
साधनाएँ यथा-आसन, प्राणायाम, बंध, मुद्रा व ध्यान आदि करने के कितने ही सत्परिणाम देखकर जर्मनी के कई वैज्ञानिकों ने भी गहन अनुसंधान किया है। उन्होंने पाया है कि इन प्रक्रियाओं का दैहिक ही नहीं मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है, जिसका प्रतिफल शारीरिक स्वस्थता के साथ ही मानसिक स्थिरता एवं शांति के रूप में सामने आता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘अल्फास्टेट’ की संज्ञा दी गयी है।
साधना श्रेष्ठतम हैं, क्योंकि यह सीधे वेदाँत के सच्चिदानंदोऽहम् की अवधारणा तक साधक को ले जाती है। सोऽहम् का साधना जिसमें श्वास पर नियमन किया जाता है एवं अजपा जप भी साथ चलता है, एक प्रकार के अद्वैत की ही साधना हैं इन सभी साधनाओं के सत्परिणाम अनेक रूपों में साधक को मिलते हैं।
साधना से चक्र-जागरण बड़ी सुविधापूर्वक हो सकता है और अन्य साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।
साधनाओं की चर्चा और तुलना करके उनकी आलोचना-प्रत्यालोचना करना यहाँ अभिष्ट नहीं है। इन पंक्तियों में एक ऐसी सुगम साधना पाठकों के समक्ष उपस्थित की जा रही है, जिसके द्वारा गायत्री महाशक्ति की साधना से चक्र-जागरण बड़ी सुविधापूर्वक हो सकता है और अन्य साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।
साधना न केवल दैवीविभीषिकाओं से निपटने के लिए युगऋषि द्वारा प्रस्तुत एक सामूहिक उपचार के रूप में संपन्न हो रही है, इसका एक विशिष्ट लक्ष्य है-वरिष्ठों में, जागृतात्माओं में वासंती पुलकन का संचार कर उनसे कुछ विशिष्ट, विशेषज्ञों के स्तर के कार्य संपन्न करा लेना, ताकि उज्ज्वल भविष्य से भरे इक्कीसवीं सदी (हिंदू पंचाँग के अनुसार युगाब्द बावनवी सदी) के समाज की मजबूत नींव रखी जा सके। अखंड-ज्योति परिजनों का समुदाय-प्रज्ञापरिवार युगसृजन के निमित्त जुटे अग्रगामी मूर्धन्य लोगों का एक सुसंस्कारी परिकर है। उसे युगचुनौती स्वीकार करनी ही होगी। किसी को भी यह सोचने का अवकाश नहीं होना चाहिए कि उसका वैभव कैसे बढ़े-कुटुम्ब कैसे फले-फूले, समृद्धि कैसे आए। आज न पदवीधारी बनने की आवश्यकता है, न बड़े आदमियों में, संपन्नों में गिनती किये जाने वालों की श्रेणी में आने के लिए चित्र-विचित्र उछल-कूद करने की।
साधना पाठकों के समक्ष उपस्थित की जा रही है, जिसके द्वारा गायत्री महाशक्ति की साधना से चक्र-जागरण बड़ी सुविधापूर्वक हो सकता है और अन्य साधनाओं में आने वाली असाधारण कठिनाइयों एवं खतरों से स्वतंत्र रहा जा सकता है।
साधना संभव नहीं, ऐसा साधना विज्ञान के आचार्यों का मत है।
साधनात्मक पुरुषार्थ से निर्मित कवच को बेध सकना दुर्दांतों के लिए भी संभव न हो। महत्वपूर्ण प्रगति के लिए इससे कम उत्साह और साहस से कम में काम नहीं चलता, जो विपत्ति से जूझने के लिए अपनायी जाती है बड़े काम युद्ध स्तर पर ही आरंभ किये और निपटाये जाते हैं। बात एक ही है प्रचंड आत्मशक्ति का उत्पादन ही अनौचित्य से निपटने में समर्थ हो सकेगा, यह एक सुनिश्चित तथ्य है। सत्य की तरह देवत्व भी अजेय है। ध्वंस और सृजन के द्विविध मोर्चे पर जूझती हुई यह शक्ति उस लक्ष्य तक निश्चित रूप से पहुँचकर रहेगी, जिसे ‘इक्कीसवीं सदी उज्ज्वलभविष्य’ सतयुग की वापसी” धरती पर स्वर्ग का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का उदय’ आदि नामों प्रतिपादित, निरूपित एवं प्रचारित किया गया है।
साधना की सफलता गायत्री महामंत्र के जप व विस्तार रूपी महापुरुषार्थ की परम सिद्धि-उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना के सब धर्मावलंबियों द्वारा किए जाने से होने जा रहे सत्परिणामों की सुनिश्चितता तभी है, जब हमारे हर पल के चिंतन कर्म में ईश्वरीय सत्ता के प्रति समर्पण भाव होगा। भगवान महाकाल को प्रिय यह है कि हमारा दुष्चिंतन मिटे-दुर्मतिजन्य दुर्गति से हम बचें। जो उन्हें प्रिय हो वही हम करें भी। अचिंत्य चिंतन कदापि न करें।
साधना जिसमें श्वास पर नियमन किया जाता है एवं अजपा जप भी साथ चलता है, एक प्रकार के अद्वैत की ही साधना हैं इन सभी साधनाओं के सत्परिणाम अनेक रूपों में साधक को मिलते हैं।
साधना की गहराइयों में एक अनुभूति मुखर हो उठी।ईश्वर से प्रतिध्वनि होकर आवाज आई। उसने कहा, “अहो! एक ऐसा प्रेम है जो सभी को अपने में समा लेता है॥, मृत्यु से महान है, जो सीमा नहीं जानता, जो सर्वत्र, जो मृत्यु की उपस्थित में हैं तथा केवल भावसंवेदना है। मैं वही प्रेम हूँ। वह प्रेम जो अनिवर्चनीय मधुरता है, जो सभी वेदनाओं का, सभी भावों का स्वागत करता है।
साधना से रोग जल्दी ठीक होता है।
साधना वर्ष, जिस विषम वेला में आरंभ हो एक युग-पुरुषार्थ के रूप में सारे भारत व विश्व में संपन्न हो रहा है, वह कितनी असाधारण स्तर की है, इसे समझने में किसी को भी कुछ कठिनाई नहीं होनी चाहिए। प्रस्तुत युगसाधना न केवल दैवीविभीषिकाओं से निपटने के लिए युगऋषि द्वारा प्रस्तुत एक सामूहिक उपचार के रूप में संपन्न हो रही है, इसका एक विशिष्ट लक्ष्य है-वरिष्ठों में, जागृतात्माओं में वासंती पुलकन का संचार कर उनसे कुछ विशिष्ट, विशेषज्ञों के स्तर के कार्य संपन्न करा लेना, ताकि उज्ज्वल भविष्य से भरे इक्कीसवीं सदी (हिंदू पंचाँग के अनुसार युगाब्द बावनवी सदी) के समाज की मजबूत नींव रखी जा सके। अखंड-ज्योति परिजनों का समुदाय-प्रज्ञापरिवार युगसृजन के निमित्त जुटे अग्रगामी मूर्धन्य लोगों का एक सुसंस्कारी परिकर है। उसे युगचुनौती स्वीकार करनी ही होगी। किसी को भी यह सोचने का अवकाश नहीं होना चाहिए कि उसका वैभव कैसे बढ़े-कुटुम्ब कैसे फले-फूले, समृद्धि कैसे आए।
साधना वस्तुतः आत्मबोध की साधना है। दर्पण में जब भी दृश्यमान हैं वह तो मात्र हाड़-माँस का पिंड हैं, जिसे एक दिन भस्मीभूत बन जाना है। फिर इसे सजाने का इतना प्रयास क्यों? सुंदर, आकर्षक तो भीत वालों को जिन्हें विचारणा- आकांक्षाओं का केंद्र मन एवं भावसंवेदना की गंगोत्री अंतःकरण कहते हैं, बनाया जाना चाहिए उनके लिए कभी प्रयास होता नहीं इसीलिए मात्र शरीर तक मनुष्य सीमित होकर रह जाता है। कारण व सूक्ष्मशरीर के परिष्कार के लिए दर्पण- साधना श्रेष्ठतम हैं, क्योंकि यह सीधे वेदाँत के सच्चिदानंदोऽहम् की अवधारणा तक साधक को ले जाती है।
साधना-पुरुषार्थ को ठीक उसी प्रकार प्रयास समझा जा सकता है, जिस तरह उच्च शिक्षालयों में एन-सी.सी. जैसी ट्रेनिंग इसलिए दी जाती है कि समय आने पर सुयोग्य सैनिकों की कमी न पड़े। सामाजिक गड़बड़ियों से निपटने के लिए स्काउट-गाइडों से लेकर स्वयंसेवी दलों तक के अनेक संगठन भी प्रशिक्षण प्राप्त करते और समय आने पर अपने स्तर की सराहनीय भूमिका निभाते हैं।
साधना से उठे, देखा देवगण खड़े हैं। आदर सम्मान किया, आसन दिया। देवतागण बोले-आपके लोकहितार्थ किए गए कार्यों को देखकर हमें प्रसन्नता हुई। आप जो चाहें वरदान माँग लें। संत विस्मय से बोले-सब तो है मेरे पास।
साधना-अपने आपको एक अनुशासित साधक के रूप में विकसित करना। इतना होने पर कोई भी झंझावात, कालनेमि की माया रूपी आँधी किसी मजबूत वृक्ष को हिला भी नहीं पाएँगी। साधक स्वयं बनना एवं औरों को को बनाना है। औरों को तभी साधना की प्रेरणा दे पाएँगे, जब स्वयं एक निष्ठावान साधक होंगे।
साधना शुरू की। रात्रि में आकाश मण्डल को भेदकर गायत्री देवी प्रकट हुई और बोली वत्स! मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ वर माँग। मैंने साष्टाँग प्रणाम कर कहा माँ! मैं तेरा वैराग्य ले चुका हूँ, अब कोई कामना नहीं। बस आप प्रसन्न रहे यही विनम्र प्रार्थना है ‘एवमस्तु ‘कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गयी। गायत्री की सिद्धि प्राप्त कर लेने पर काठिया बाबा को कुछ पाना बाकी न रहा वे आप्तकाम हो गये, उन्हें दूर दृष्टि प्राप्त हो गयी थी।
साधना की धुरी पर संगठन को सशक्त बनाने, अपने आपको प्रतिकूल समय के लिए सभी मोर्चों पर तैयार करने के लिए ही यह एक वर्ष की पूरी साधना का क्रम निर्धारित किया गया है। राष्ट्र ही नहीं, विश्व के कोने-कोने में, चप्पे-चप्पे में आस्तिकता के संस्कारों की नर्सरी उगानी-बढ़ानी व संभावित आक्रमणों से उसकी रक्षा करनी है। गायत्री, यज्ञ एवं संस्कारों की त्रिवेणी में
साधना एवं सोऽहम् साधना के विषय में विस्तार से बताया गया था। उसी क्रम को यहाँ आगे बढ़ाया जा रहा है।
साधना का असाधारण महत्व है।
साधना वर्ष में यही सारा ताना-बाना बुना गया है। साधना-पुरुषार्थ को ठीक उसी प्रकार प्रयास समझा जा सकता है, जिस तरह उच्च शिक्षालयों में एन-सी.सी. जैसी ट्रेनिंग इसलिए दी जाती है कि समय आने पर सुयोग्य सैनिकों की कमी न पड़े। सामाजिक गड़बड़ियों से निपटने के लिए स्काउट-गाइडों से लेकर स्वयंसेवी दलों तक के अनेक संगठन भी प्रशिक्षण प्राप्त करते और समय आने पर अपने स्तर की सराहनीय भूमिका निभाते हैं।
साधना जलते दीपक के माध्यम से की जा सकती हैं यह ध्यान मध्याह्न वेला में- युगतीर्थ में संपन्न होता हैं दीपक की ज्योति आज्ञाचक्र को एवं उसके माध्यम से सारे सूक्ष्म जगत को प्रकाशवान, ऊर्जावान बना रही है, बार-बार यह ध्यान किए जाने से अनेकानेक ऋद्धि-सिद्धियों के द्वारा खुलते चले जाते हैं हिमालय जीता-जागता चैतन्यसत्ता का पुँज हैं हिमालय से आने वाली शक्ति धाराएँ शरीर के कण-कण को ऊर्जावान व तपते मन को शाँत बना रही हैं, ऐसा ध्यान बार-बार करने से ऋषियों की चेतना से तादात्म्य होने का अवसर मिलता हैं इनके नए विचार सृष्टि के गर्भ से जन्म लेकर चिंतन पटल पर आते हैं।
साधनाएँ भी विविध प्रकार की हैं। इन सभी मार्गों से उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है, सफलता मिल सकती है, पर शर्त यह है कि उसे पूर्ण विश्वास, श्रद्धा, निष्ठा और उचित मार्गदर्शक के संरक्षण में किया जाए।
साधना से पूर्व तीस दिन तक चाँद्रायणव्रत करना पड़ता है, फिर साधना की-पुरश्चरण की शुरुआत होती है। इसलिए मृदु चाँद्रायणव्रत काल के एक महीने में सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान का एक नियमित कार्यक्रम बना लेने से ‘सोने में सुगंध’ की उक्ति चरितार्थ होती है। इससे शारीरिक कायाकल्प के साथ-साथ आँतरिक कायाकल्प का सुयोग भी बैठ जाता है। तीस दिनों में सवालक्ष गायत्री का जप-अनुष्ठान करने के लिए प्रतिदिन 42 माला जप करना पड़ता है। उसमें प्रायः चार घंटे लगते हैं।
साधना की और भी कई विधियाँ हैं जिसमें एक महत्वपूर्ण नादयोग शब्दब्रह्म की इस साधना में भाँति-भाँति के वाद्ययंत्रों, धुनों, रागों, मंत्रों के माध्यम से अपने कर्णेन्द्रियों के द्वारा मन को तन्मय-तल्लीन करने का अभ्यास किया जाता हैं सितार, वीणा, बाँसुरी की धुन पर बजे रागों के विशिष्ट प्रभाव मनः संस्थान एवं सूक्ष्म चक्र उपत्यिकाओं पर पड़ते हैं ऋषिगणों ने प्रातः से रात्रि तक एवं रात्रि से प्रातः तक प्रत्येक प्रहर के लिए विभिन्न रागों का प्रावधान रखा हैं जो राग उस वेला के लिए निर्धारित है उसका अभ्यास करने पर ध्यान न केवल लाभ देता है, तुरंत लग भी जाता हैं उच्चरित मंत्रों, घंटे, घड़ियाल की ध्वनियों, समुद्री लहरों के थपेड़ों पर भी ध्यान लगाया जा सकता है। इंद्रिय माध्यम बन जाती है चित्तवृत्तियों के निरोध की। धीरे-धीरे यह सध जाने पर मौन एकाँत में बैठने पर बाहर का शोर कम अपने अन्दर के राग रागिनियों के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं नवद्धारों की इस देह में रक्तवाही संस्थान से लेकर अन्यान्य संस्थानों में जो चौबीस घंटे क्रिया−कलाप चल रहे हैं, उनसे उत्पन्न स्वर दिव्य ध्वनियों के रूप में अंतःइंद्रियों को सुनाई देने लगते हैं क्रमशः परिमार्जन-परिष्कार होते -होते यह स्थिति आती है कि अनहदनाद भी अंदर से सुनाई देने लगता हैं, कभी मंदिर की घंटियाँ घाटियों में हो रही गुँजन, प्रणवनाद-(कार आदि से लेकर ऋषिगणों द्वारा किया गया सामगान मंत्रोच्चार भी सुनाई पड़ने लगता है। यह सूक्ष्मतम की पकड़ की सिद्धि तक पहुँचने वाला ध्यान एकाग्रता की चरम पराकाष्ठा पर सिद्ध हो पाता हैं।
साधनाओं जैसे-गायत्री महापुरश्चरण, पंचकोश अनावरण, कुँडलिनी जागरण आदि में इन्हें आरंभ करने से पूर्व कायिक-मानसिक परिशोधन का विधान है। इसमें भी साधना से पूर्व तीस दिन तक चाँद्रायणव्रत करना पड़ता है, फिर साधना की-पुरश्चरण की शुरुआत होती है। इसलिए मृदु चाँद्रायणव्रत काल के एक महीने में सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान का एक नियमित कार्यक्रम बना लेने से ‘सोने में सुगंध’ की उक्ति चरितार्थ होती है। इससे शारीरिक कायाकल्प के साथ-साथ आँतरिक कायाकल्प का सुयोग भी बैठ जाता है। तीस दिनों में सवालक्ष गायत्री का जप-अनुष्ठान करने के लिए प्रतिदिन 42 माला जप करना पड़ता है।
साधना में भाँति-भाँति के वाद्ययंत्रों, धुनों, रागों, मंत्रों के माध्यम से अपने कर्णेन्द्रियों के द्वारा मन को तन्मय-तल्लीन करने का अभ्यास किया जाता हैं सितार, वीणा, बाँसुरी की धुन पर बजे रागों के विशिष्ट प्रभाव मनः संस्थान एवं सूक्ष्म चक्र उपत्यिकाओं पर पड़ते हैं ऋषिगणों ने प्रातः से रात्रि तक एवं रात्रि से प्रातः तक प्रत्येक प्रहर के लिए विभिन्न रागों का प्रावधान रखा हैं जो राग उस वेला के लिए निर्धारित है उसका अभ्यास करने पर ध्यान न केवल लाभ देता है, तुरंत लग भी जाता हैं उच्चरित मंत्रों, घंटे, घड़ियाल की ध्वनियों, समुद्री लहरों के थपेड़ों पर भी ध्यान लगाया जा सकता है। इंद्रिय माध्यम बन जाती है चित्तवृत्तियों के निरोध की। धीरे-धीरे यह सध जाने पर मौन एकाँत में बैठने पर बाहर का शोर कम अपने अन्दर के राग रागिनियों के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं नवद्धारों की इस देह में रक्तवाही संस्थान से लेकर अन्यान्य संस्थानों में जो चौबीस घंटे क्रिया−कलाप चल रहे हैं, उनसे उत्पन्न स्वर दिव्य ध्वनियों के रूप में अंतःइंद्रियों को सुनाई देने लगते हैं क्रमशः परिमार्जन-परिष्कार होते -होते यह स्थिति आती है कि अनहदनाद भी अंदर से सुनाई देने लगता हैं, कभी मंदिर की घंटियाँ घाटियों में हो रही गुँजन, प्रणवनाद-(कार आदि से लेकर ऋषिगणों द्वारा किया गया सामगान मंत्रोच्चार भी सुनाई पड़ने लगता है। यह सूक्ष्मतम की पकड़ की सिद्धि तक पहुँचने वाला ध्यान एकाग्रता की चरम पराकाष्ठा पर सिद्ध हो पाता हैं।
साधनाएँ
साधना का आश्रय लिया जाता है। आत्मोत्कर्ष एवं अतींद्रिय क्षमताओं के विकास में योगसाधना का असाधारण महत्व है।
साधना-विज्ञान के आचार्यों का मत है कि शक्तिसंस्थान में स्थित उक्त कल्पतरु का ही ध्यान करना चाहिए। इससे साधक की कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
साधना के साथ हमें जन्म देने वाली पृथ्वी माँ को नमस्कार करना चाहिए
साधना विधान इसी जगत में प्रवेश की कुँजी हमें देता है। प्रज्ञा का जागरण होने, चेतना के महासागर में प्रवेश होने पर जो आत्मोपलब्धियाँ होती है, उनकी मात्र अनुभूतियाँ ही की जा सकती है। हम इसी स्तर पर पहुँचने का प्रयास तो करें।
साधना प्रातः जागरण के साथ ही संपन्न की जाती है। रात्रि में नींद आते ही यह दृश्यजगत समाप्त हो जाता है। मनुष्य स्वप्न-सुषुप्ति के किसी अन्य जगत में रहता है। इस जगत में पड़े हुए स्थूलशरीर से उसका संपर्क नाममात्र का कामचलाऊ भर रह जाता है। जागते ही चेतना का शरीर से सघन संपर्क बनता है, यही नये जन्म जैसी स्थिति है।
साधनाकाल के महत्वपूर्ण पाथेय हैं। यदि ये उच्चस्तरी नहीं हुए, तो साधक का पतन आवष्यींवी है। जब वह अनाहत-चक्र की अवस्था से होकर गुजरता है, तो ऐसे समय में से दृढ़ इच्छाशक्ति एवं विश्वास से भरपूर होना चाहिए तथा अपना अधिकांश समय ऐसे व्यक्तियों, पुस्तकों एवं वातावरण के संपर्क में बिताना चाहिए, जो उसके आत्मविश्वास को विकसित करने अथवा उसे मजबूत बनाने में सहायक हों। मन को इतना बलवान बनाना चाहिए कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी चट्टान की तरह अडिग रहे। इन सब कसौटियों में खरा उतरने पर ही साधक इस अवस्था को सफलतापूर्वक पार करता और आगे की प्रगति करता है।
साधना विज्ञान के आचार्यों का मत है।
साधना का क्या महत्व एवं मूल्य है? इसके क्षणिक स्पर्श एवं एक लघु अंश को ग्रहण करके ही तुम भिखारी से राजा बन सके हो। अब तुम चारों ओर धर्म की ज्योति का प्रकाश फैलाओ, ताकि इसकी आभा एवं प्रकाश से सभी के जीवन का अँधेरा दूर हो सके।”
साधना है। हमारी भौतिक महत्वाकांक्षाओं पर रोकथाम-चारों प्रकार के संयमों का परिपालन-जीवन के हर पहलू में गुरुसत्ता का अनुशासन-यही अब हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इस क्षेत्र में जितनी रुकावट आएगी-साधनों की होड़ में रोकथाम लगेगी एवं ब्राह्मणोचित जीवन जीने की रीति-नीति जीवन का अंग बन जाएगी, उतना ही हम गुरुसत्ता की दृष्टि में प्रमाणिक बनेंगे। अंतिम चरण है आराधनापरक अर्थात् हम अपनी आत्मीयता के विस्तार से समाज के कितने बड़े परिवार को अपनी कर्मशैली में बाँध पाए हैं, अपने गुरुसत्ता के लक्ष्य के साथ जोड़ सकने में सफल हो पाए हैं। अपना रौब जमाने के स्थान पर हमारी भूमिका ‘तृणादपिषुनिचेन’ तिनके की तरह विनम्र बनने की दिशा में होनी चाहिए।
साधना-विज्ञान के मर्मज्ञों का कथन है कि अनाहत-चक्र को ध्यान-साधना के अतिरिक्त साहित्य, संगीत जैसी भौतिक विधाओं द्वारा भी प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकता है, तो साधक में एक नये विचार और दृष्टिकोण का प्रसव होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की चिंतनप्रणाली और कार्यशैली पूरी तरह परिवर्तित हो जाती है। साधक के लिए यह चेतना के एक नये तल में अवस्थान है।
साधना हैं इन सभी साधनाओं के सत्परिणाम अनेक रूपों में साधक को मिलते हैं।
साधना की उच्चस्तरीय अवस्था में भावनाओं पर नियंत्रण और अंकुश न रहा, तो साधक के लिए यह अत्यंत दुखदायी और हानिकारक सिद्ध हो सकता है। यदि अनाहत स्तर पर चेतना पूर्णरूपेण विकसित हो जाए; भय, आशंका सताती रहें, तो वैसी ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनती चली जायेंगी, जैसी कि उसने कल्पना की थी। ऐसी दशा में साधक का पतन सुनिश्चित है। यदि ऐसा हुआ, तो चेतना पुनः अनाहत से स्वाधिष्ठान जैसे निम्नस्तरों की ओर वापस चली जाएगी। अनाहत जैसे उच्च केंद्रों से एक बार यदि चेतना का अधःपतन हुआ, तो दूसरी बार उसका उठना बहुत मुश्किल है।
साधना जीवनसाधना-अपने आपको एक अनुशासित साधक के रूप में विकसित करना। इतना होने पर कोई भी झंझावात, कालनेमि की माया रूपी आँधी किसी मजबूत वृक्ष को हिला भी नहीं पाएँगी। साधक स्वयं बनना एवं औरों को को बनाना है। औरों को तभी साधना की प्रेरणा दे पाएँगे, जब स्वयं एक निष्ठावान साधक होंगे।
साधना के उपयुक्त दिव्य, पवित्र स्थान, प्राणवान, जीवंत तीर्थस्थल में यह व्रत किया जाय। वह स्थान आध्यात्मिक भावनाओं एवं तपश्चर्या की प्राणऊर्जा से ओत−प्रोत व परिपूर्ण होना चाहिए, अपनी दिनचर्या उन दिनों मौन, आत्मचिंतन, मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजनक प्रभाव उत्पन्न न हो, तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यावसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ, तृष्णा, क्रोध, वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिए अच्छा यही है कि चाँद्रायण के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय।
साधना की प्रेरणा दे पाएँगे, जब स्वयं एक निष्ठावान साधक होंगे।
साधना के बाद तथा सायंकाल एक बार। बहुत से लोग मल-मूत्रों के वेगों को रोक लेते हैं, ऐसा करना शरीर के लिए बहुत हानिकारक है, इससे रोग उत्पन्न होते हैं।
साधना के पश्चात सभी साधकों को इस ध्यान के विषय में प्रेरित किया था व शक्ति−संचार हेतु इसे सर्वश्रेष्ठ बताया था। जो भी विधि हमें ठीक लगे, हम उसे ग्रहण कर अपने आपको ध्यान का अभ्यास कराएँ, तो निश्चित ही इसके परिणाम आज की विषम विभीषिकाओं से भरी परिस्थितियों में बड़े विलक्षण संभावनाओं से भरे-पूरे हमें हस्तगत होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
साधना पद्धतियों का ज्ञान और विज्ञान) एवं 10 (गायत्री साधना का गुह्य विवेचन) से पढ़कर तदनुसार अभ्यास कर सकते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-August
साधनात्मक स्तर पर लोग एकत्र होकर सामूहिक आयोजन करें तो प्रायश्चित्त स्नान, पंचगव्य सेवन, तर्पण, आदि अनेक विधान कराने में कोई अड़चन नहीं है। यदि लोकशिक्षणात्मक स्तर का सामूहिक आयोजन है तो उसकी रूपरेखा भिन्न प्रकार से बनाई जानी चाहिए। उस प्रकार के आयोजनों में स्नान आदि के प्रकरण संभव नहीं, यदि वे शामिल किए जाएँगे तो लोकशिक्षण की व्यवस्था नहीं बनेगी। व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर के आयोजनों में आवश्यक समझे तो स्नान आदि के प्रकरण जोड़े जा सकते हैं। अन्यथा उन्हें करना कोई अनिवार्य नहीं है।
साधना के अतिरिक्त एक अतिरिक्त गायत्री मंत्र की माला इस धर्मयुद्ध रखा-अनुष्ठान विभीषिका निवारण के लिए करेंगे। विश्व शाँति की सामूहिक साधना तभी बन सकेगी, जब अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से एकनिष्ठ होकर समष्टिगत शक्ति के उपार्जन की दृष्टि से उसे संपन्न करेंगे। एक अतिरिक्त माला जा कर रहे है। क्लीं बीजमंत्र के संपुट सहित जपें। ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ॐ।
साधनाओं के दौरान जब मस्तिष्क से यह झरता है, तो ऐसी दिव्य मादकता का आभास होता है, जिसे साधारण नहीं, असाधारण कहना चाहिए।
साधना प्रकारांतर से उस शक्ति के एक अंश का अनावरण और उद्घाटन ही है, जिससे यह सम्पूर्ण सृष्टि उद्भूत है। हमें इस भली-भाँति समझ लेना चाहिए।
साधना तभी बन सकेगी, जब अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से एकनिष्ठ होकर समष्टिगत शक्ति के उपार्जन की दृष्टि से उसे संपन्न करेंगे। एक अतिरिक्त माला जा कर रहे है। क्लीं बीजमंत्र के संपुट सहित जपें। ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ॐ। इस मंत्र का जप करें।
साधना के कारण अधिकारी थे, उससे भी वंचित होते चले जाते है।
साधना वर्ष की अपनी साधना के अतिरिक्त एक अतिरिक्त गायत्री मंत्र की माला इस धर्मयुद्ध रखा-अनुष्ठान विभीषिका निवारण के लिए करेंगे। विश्व शाँति की सामूहिक साधना तभी बन सकेगी, जब अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से एकनिष्ठ होकर समष्टिगत शक्ति के उपार्जन की दृष्टि से उसे संपन्न करेंगे। एक अतिरिक्त माला जा कर रहे है। क्लीं बीजमंत्र के संपुट सहित जपें। ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ॐ।
साधना कर सकने में समर्थ हो सकें। यदि उनका पालन किया समर्थ हो सकें। यदि उनका पालन किया गया और लोकेषणा से उत्पन्न विष का नियमित रूप से निष्कासन न किया गया तो वही दुर्गति होगी जो भोजन न करने तथा मल- विसर्जन में उपेक्षा बरतने पर प्राण संकट के रूप में उत्पन्न होती है। लोकसेवी को जनता सम्मान देती है, वह वस्तुतः उस सेवा धर्म की पुण्य परंपरा का सूत्र-संचालक तंत्र का सम्मान है। सत्प्रयोजनों के लिए लोक श्रद्धा बनी रहे, मात्र इसी एक प्रयोजन के लिए सम्मान के प्रकटीकरण की प्रथा चली है गलती यह होती है कि सेवा भावी उसे अपनी व्यक्तिगत योग्यता का प्रतिफल मानते है।
साधना-ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि बिंदु से एक प्रकार का रस स्राव होता है, जिसका संचयन नासा ग्रसनी के पीछे कोमल तालु के ऊपर एक छोटे से गड्ढे में होता है। यह केन्द्र ‘ललना चक्र’ कहलाता है। विशुद्धि चक्र से इसका निकट का संबंध है। दोनों के बीच पारस्परिक संबंध तभी स्थापित हो पाता है, जब विशुद्धि चक्र जाग्रत अवस्था में होता है। ऐसी दशा में ललना से स्रवित द्रव विशुद्धि चक्र द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है।
साधना पर भी ध्यान देना आरम्भ किया। दिन-रात एक करके उसने अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ायी। उसी का परिणाम था कि एक दिन व बिहार प्राँत का स्वायत्त मंत्री बना। उन्हें आज भी लोग गणेश दत्त सिंह के नाम से जानते हैं।
साधना विज्ञान में ललना को उद्दीप्त करने के कई उपाय बताए गए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण खेचरी मुद्रा है। यह कुण्डलिनी योग में अपनायी गयी खेचरी मुद्रा की तरह सरल नहीं होती, अपितु इसमें जीभ के निचले जुड़े हुए हिस्से को धीरे-धीरे अभ्यास पूर्वक आगे बढ़ाकर जिह्वा को गाय के थन की तरह दोहन करते हुए लंबा करना पड़ता है। इस क्रम में जब वह इतनी लंबी हो जाए कि जीभ की ऊपर की ओर मोड़ने और तालू से चिपकने से वह नासिका मार्ग को स्पर्श करने लगे, तो समझना चाहिए कि प्रयोजन पूरा हो गया। इस प्रक्रिया में वायुमार्ग पूरी तरह अवरुद्ध हो जाता है और बिंदु से विशुद्धि में झरने वाला द्रव संपूर्ण शरीर में फैल जाता है।
साधना भी की। देशवासियों को उनके समग्र राष्ट्रीय कर्तव्य का बोध कराया था।
साधना में सम्मिलित कर लिया देवताओं ने उन्हें अपना धनाधीश लोकपाल बनाया और वे अलकापुरी में राज करने लगें।
साधना में है। उसके समाधान के लिए हमें बड़ा काम करना है आगे खुशहाली लाने के लिए हमें प्रयास करना है। यह प्रयास भगीरथ का गंगा अवतरण एवं दधीचि की हड्डी से वज्र बनाने से कम नहीं है जो असुरता को समाप्त करने के लिए आवश्यक है। हमारा प्रयास उसी स्तर का है। इस महान कार्य को जब हम कर रहे है तो आपको हमारा सहयोगी एवं सहभागी अवश्य बनना चाहिए।
साधना परमार्थपरायणता के आधार पर मिलने वाले आत्मसंतोष को ही पर्याप्त मानने की विवेक दृष्टि रहती है, वे अनचाहा यश पाते हैं। उन्हें वह गहरा स्नेह-सद्भाव प्राप्त होता है, जिसके साथ साथियों परिचितों का विश्वास और सहयोग प्रचुर मात्रा में जुड़ा रहता है। दूरदर्शिता इसी में है कि लोकसेवी सच्चे मन से यश, पद-लोलुपता अहंता छोड़ें। विनम्रता अपनाएँ। दूसरों को आगे रख कर स्वयं पीछे रहें।
साधना के साथ-साथ ज्ञान-साधना पर भी ध्यान देना आरम्भ किया। दिन-रात एक करके उसने अपनी बौद्धिक क्षमता बढ़ायी। उसी का परिणाम था कि एक दिन व बिहार प्राँत का स्वायत्त मंत्री बना। उन्हें आज भी लोग गणेश दत्त सिंह के नाम से जानते हैं।
साधना शास्त्र के मर्मज्ञों का कथन है। कहते हैं कि गंगाजल पीने के पश्चात् उक्त महात्मा ने स्वयं को पूर्ववत् मिट्टी से ढंग देने का निर्देश दिया। जमीन के मालिक ने वैसा ही किया और निर्माण कार्य रोक दिया। प्रस्तुत घटना भारत के सिद्ध एवं महान योगी ग्रंथ में आँशिक रूप में ही वर्णित है।
साधना की सफलता मिलने में देर नहीं लगती। गायत्री महाशक्ति के सच्चे उपासक इस तथ्य से भली-भाँति परिचित है।
साधना की सिद्धि का ही एक अंग है। योगविद्या में निष्णात व्यक्ति अपनी चेतनसत्ता को स्थूलकाया से कभी भी अलग व संबद्ध कर सकते है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।
साधना, प्रखर साधना वर्ष की अपनी साधना के अतिरिक्त एक अतिरिक्त गायत्री मंत्र की माला इस धर्मयुद्ध रखा-अनुष्ठान विभीषिका निवारण के लिए करेंगे। विश्व शाँति की सामूहिक साधना तभी बन सकेगी, जब अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से एकनिष्ठ होकर समष्टिगत शक्ति के उपार्जन की दृष्टि से उसे संपन्न करेंगे। एक अतिरिक्त माला जा कर रहे है। क्लीं बीजमंत्र के संपुट सहित जपें। ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं ॐ।
साधना-विज्ञान में ललना तथा बिन्दु को पृथक् से जगाने का कोई विधान या उपचार नहीं है।
साधना की क्या उपादेयता रह जाती? फिर तो सब कुछ अत्यंत सरलतापूर्वक संपन्न हो जाता। तब कोई अंधा भी पढ़ सुनकर प्रकाश हस्तगत कर लेता, पर यह संभव है क्या? नहीं। मनुष्य ने प्रकाश के संबंध में जो कुछ खोजे की है, वह सब कुछ यदि वह अपने मस्तिष्क में भर ले, उसकी संपूर्ण भौतिकी समझ ले, उत्पत्ति संबंधी सारी प्रक्रिया जान ले, तो इस पर भी क्या उसकी आँखें प्रकाश की एक क्षीण किरण भी उपलब्ध कर सकेगी कि वह दो कदम चल सके?
साधना की स्थिति में। ध्यान के क्षेत्र में पिछले दिनों के अनुसंधानों का निष्कर्ष यह है कि नियमित रूप से इसका अभ्यास करने से जीवन की समस्याओं से पलायन करने के लिए मादक द्रव्यों के सेवन की इच्छा ही समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त शरीर और मन पर पड़ने वाले प्रभाव मादक द्रव्यों के असर से बिलकुल भिन्न है। अन्वेषणों से यह विदित हुआ है कि ध्यान की फलश्रुति व्यक्ति में सदा मानसिक एकाग्रता, बौद्धिक कुशलता तथा शारीरिक दक्षता के रूप में सामने आती है, जबकि नशीले पदार्थों से सुस्ती, आलस्य, अवसाद के साथ-साथ शरीर-मन को क्षमताओं में ह्रास और बिखराव होता है। इसके जो अनुभव है, वह इंद्रियजन्य, अस्थायी, बहिरंग तथा सतही होते है।
साधनाकाल का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण मोड़ है यह। ऐसे में दक्षिण एशिया का प्रस्तुत महायुद्ध अब मात्र छिटपुट छापामार लड़ाई तक ही सीमित नहीं रह गया हैं। इसका भावी स्वरूप एवं विश्व समुदाय पर इसके परिणाम निश्चित ही अति महत्वपूर्ण होंगे, यह भली−भाँति समझ लिया जाना चाहिए।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1999-December
साधना स्वयंभू मनु और शतरूपा जैसी, वशिष्ठ-अरुंधती स्तर की चलती रही हो, वह निश्चित रूप से उनकी सूक्ष्म व कारणसत्ता के प्रभाव से पूरा होगा, यह विश्वास किया जाना चाहिए। अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने के लिए यह अत्यंत अनिवार्य है कि अखण्ड ज्योति पत्रिका व उसके संगी-साथियों की वर्तमान संख्या में पाँच गुना वृद्धि हो। यदि एक परिजन-पाठक भी न्यूनतम पाँच व्यक्तियों को प्रेरित करें, तो इस लक्ष्य की प्राप्ति असंभव नहीं है।
साधना निश्चित ही फलवती होगी, उसके शुभ परिणाम होंगे, यह विश्वास सुदृढ़ बनाया जा सकता है।
साधना साधक के अपने इर्द-गिर्द सूक्ष्म कवच बनाती है। उसी स्तर के कंपन आकर्षित करती है। सामूहिक जप अथवा एक ही समय में विभिन्न स्थानों पर रहते हुए भी एक ही मंत्र का किया गया जप पूरे वातावरण को घेरने लगता है। वह आच्छादन पूरे वातावरण की ही रक्षा करता है, जितने क्षेत्र में जप किया जा रहा है, उतने क्षेत्र में सघन-विरल कंपन वह जगाता है। उतने परिवेश को अनुकूल मोड़ देता है और आवश्यक परिवर्तन लाता है।
साधना पूरी कर सकूँगी? स्वामी जी ने इस प्रश्न का उत्तर दिया था। कारण भी तुरंत बता दिया कि कक्षा में प्रवेश करने से पहले तुमने अपने जूते इस तरह उतारे, जैसे उन्हें फेंक रही हो। कुरसी की बाँह लगभग मरोड़ते हुए अंदाज में खींची और उस पर धमककर बैठ गईं। फिर बैठे-बैठे ही इसे मेज़ के पास घसीटते हुए से खींचा और व्यवस्थित किया।
साधना भी हजार-लाख गुना फलदायी हो रही है। उसके फल और प्रभाव को इन दिनों चल रही उथल-पुथल के रूप में देखा जाना चाहिए। कुछ दैवी आपदाएँ चिंतित भी करती हैं। उन्हें विरेचन, संवेदन जैसे चिकित्सा कार्यों के रूप में देखना चाहिए और आश्वस्त रहना चाहिए कि स्थायी प्रभाव शुभ ही होगा।
साधनाग्रंथों में योगभ्रष्टः शब्द इस्तेमाल हुआ है। योगभ्रष्टः अर्थात् योग के आत्यंतिक लक्ष्य से विमुख हो जाना, उसकी जो अंतिम सीढ़ी थी, उससे गिर जाना। एक कदम अभी भी शेष था। उसे और उठाने की जरूरत थी ताकि योग और समाधि भी छूट जाएँ। उस अंतिम चरण के लिए कबीर कहते हैं- अनहद हू मरि जाए’ अर्थात् जिसकी कोई हद नहीं, असीम-अनंत-यह अनुभव भी न रहे।
साधना में अनवरत रूप से संलग्न रहने की आवश्यकता है। भूत और वर्तमान की तुलना करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान के बिना उज्ज्वल भविष्य का और कोई मार्ग नहीं।
साधनाबल न हो, तो ऐसा परिणाम होगा जैसा खाली बंदूक का घोड़ा बार-बार चटकाकर कोई यह आशा करे कि अचूक निशाना लगेगा। इसी प्रकार जिनके पास तपोबल तो है, पर उसका काम्य प्रयोजन के लिए विधिवत् प्रयोग करना नहीं जानते, वे वैसे हैं जैसे कोई कारतूस की पोटली बाँधे फिरे और उन्हें हाथ से फेंक-फेंककर शत्रुओं की सेना का संहार करना चाहे, यह उपहासास्पद तरीके हैं।
साधनाओं में से कम-से-कम एक या एक से अधिक का तप पूरा कर चुके हों, वे गायत्री मंत्र को कार्यक्रम में प्रयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चौबीस हजार वाले या सवालक्ष वाले अनुष्ठानों की पूँजी जिनके पास हैं वे भी अपनी-अपनी पूँजी के अनुसार एक सीमा तक सफल हो सकते हैं। कुछ खास प्रयोजनों के लिए गायत्री साधना के प्रयोग की विधियाँ इस प्रकार हैं-
साधना की तरह ही रखना चाहिए।
साधना-स्वाध्याय और सामाजिक संस्कार के प्रयोग नियमित चलते रहते थे। कहना न होगा कि भारत की गौरव-गरिमा को स्थिर रखने में शुद्ध आध्यात्मिक स्तर के प्रयत्नों का योगदान विलक्षण ही था। उसे आधारभूत श्रेणी का ही मानना होगा।
साधना प्रशिक्षण केंद्रों से प्राप्त किए जा सकते हैं।
साधना और तपश्चर्या द्वारा जो आत्मबल संग्रह किया गया है, उसे जिस काम में भी खरच किया जाएगा, उसका प्रतिफल अवश्य मिलेगा। बंदूक उतनी उपयोगी सिद्ध होगी, जितने बढ़िया और अधिक कारतूस होंगे। गायत्री की प्रयोगविधि एक प्रकार की आध्यात्मिक बंदूक हैं। तपश्चर्या ओर द्वारा संग्रह की गई आत्मिक शक्तियाँ कारतूस की पेटी के समान हैं। दोनों के मिलने से ही निशाने पर मार गिराया जा सकता है।
साधना में प्रवृत्त कार्यकर्ताओं को अपनी आहार व्यवस्था सादगीपूर्ण और औसत स्तर की ही रखनी चाहिए। इससे एक तो स्वास्थ्य की सुरक्षा हो जाती है, दूसरे लोगों पर उसका प्रभाव भी पड़ता है। भोजन के संबंध में कुछ व्रत भी लिए जा सकते हैं। घर में रहते हुए तो सादा भोजन सभी करते हैं, पर लोकसेवी बाहर जनसंपर्क या सेवाकार्यों के लिए निकलता है, तो लोग सम्मान और श्रद्धा के वशीभूत होकर कई तरह की स्वादिष्ट वस्तुओं की व्यवस्था करते हैं। उनकी सद्भावना को उपेक्षित न करते हुए भी इस बात का ध्यान रखा जाए कि हमारा चटोरापन न बढ़ जाए।
साधना है, व्यवसाय नहीं। सेवा को व्यवसाय के रूप में अपनाने वालों की बात और हैं कर्मचारी, नौकर, अधिकारी वर्ग भी जनसेवक की गणना में आते हैं, पर जनसेवा के प्रति न उनमें टीस होती है, न लगन। जिन्होंने सेवा को ही अपना पाथेय चुना है, उन लोकसेवी कार्यकर्ताओं को तो सेवा का स्तर साधना की तरह ही रखना चाहिए।
साधना का, जप-तप का अपना महत्व है। उससे व्यक्ति का अपना आत्मबल सशक्त होता है। सामूहिक जप-तप समाज के आत्मतत्त्व को पुष्ट बनाता है। उसे आधार देता है, जिस पर दीन हीन दिखाई देने वाले लोग भी खड़े रह और निर्वाह कर सकते हैं।
साधनामार्ग एक जगह उपलब्ध हो गए। व्यक्ति को आत्मिक कल्याण का मार्ग ढूँढ़ने के लिए जगह-जगह भटकने की जरूरत नहीं रही।
साधना करना- यही उनके जीवन की विशेषताएँ थीं। बीच में कुछ महीनों के लिए वे हिमालय चले जाते थे और बाकी महीनों में उसके गाँव से दो मील की दूरी पर एक विशाल वटवृक्ष की छाया में बनी हुई छोटी-सी कुटिया में रहते थे। वह न जाने कितनी बार उनसे मिला था, पर आज की तरह नहीं। आज तो तीन बजे रात को जब वह अपनी जप-संख्या पूरी करने के लिए जल्दी-जल्दी माला फेर रहा था, तभी अचानक इनके दर्शन हुए और जप के बारे में कुछ बातें कहकर वह छोटी-सी चौकी पर बैठ गए। वे देवपुरुष मौन थे, उनके चरणों की ओर देखता हुआ वह भी चुप था।
साधना का स्वरूप अलग है। जब उन्हें सामूहिक स्तर पर साधा जाता है, तो परिणाम निजी प्रयत्नों की तुलना में कुछ भिन्न और विराट् स्तर के ही होते हैं। इनमें संकीर्ण दृष्टि से व्यक्ति की थोड़ी निजी हानि भी हो सकती है, कुछ लाभों से वंचित रहना पड़ सकता है। इसके विपरीत कुछ ऐसे लाभ भी मिलते हैं जो निजी स्तर पर वर्षों तक किए जाने वाले प्रयत्नों से भी नहीं मिल सकते।
साधना के प्रयासों कोई प्रभाव नहीं होगा। स्वामी रामतीर्थ का यह वचन है- “लोकसेवियों को याद रखना चाहिए कि सामाजिक कार्यकर्ता की वाणी ही नहीं उसका पूरा व्यक्तित्व ही बोलता है और वाणी की अपेक्षा उसका व्यक्तित्व सुना जाता है।” वाणी और कर्म जब मिल जाते हैं, तो व्यक्तित्व प्रखर बन जाता हैं लोकसेवी ही नहीं अन्य प्रकृति के व्यक्तियों का भी तभी प्रभाव होता है, जबकि उनके विचार और कर्म एक हों। एक वेश्या की वाणी ही सफल नहीं होती, उसके कर्म भी उसी स्तर के होते हैं। मानसिक वासना मनुष्य मन की कमजोरी है, इसलिए वह व्यभिचार की ओर आकर्षित होता है।
साधना पद्धतियाँ से लेकर परमपूज्य गुरुदेव द्वारा समय-समय पद दिए गए नवीनतम सूत्रों का समावेश लिए नए कलेवर वाली अखण्ड ज्योति को घर-घर तक पहुँचाने का पुण्यपरमार्थ जा भी करेगा, वह बारह वर्षीय युगसंधि ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान का पुण्यफल भी सहज ही प्राप्त करेगा, यह सुनिश्चित मानना चाहिए।
साधनाओं का एक प्रभाव यह भी होता है कि उनसे निर्दोष -नासमझ लोगों का हित भी सधता है। चौके में बनाया भोजन स्वयं के और परिवार के लिए ही खप जाता है। बहुत हुआ तो एकाध व्यक्ति को और खिलाया जा सकता है। लेकिन बहुत से लोग मिलकर विपुल सामग्री से भोजन तैयार करते हैं, तो वह लंगर या अन्न क्षेत्र जैसी व्यवस्था हो जाती है। दस-बीस लोगों द्वारा किया गया वह प्रयत्न सैकड़ों लोगों को तृप्त कर सकता है।
साधनापथ पर बढ़ने से पूर्व साधक की आसक्ति धन, पुत्र, पत्नी, मकान से थी। वह छोड़ी, तो दूसरे प्रकार की आसक्ति पैदा हो गई। यह आसक्ति ही संसार है। संसार जहाँ निर्मित होगा, वहीं मुसीबत पैदा होगी- ऐसा कबीर का मत है। इसलिए वे भीतर की उच्चस्तरीय आसक्ति को भी छोड़ने की सलाह देते हैं।
साधना सिखा सके- मात्र गीता प्रबंध के इस स्थितप्रज्ञ प्रकरण में ही आई है। विनोबा ने अपनी पुस्तक स्थितप्रज्ञ-दर्शन में लिखा है कि गीता के इसी श्लोक (क्रमांक 60) के भावार्थ को एक श्लोक मनु ने भी लिखा है। मनु कहते हैं-
साधनाएँ भी उसमें लगे साधकों की तुलना में कई लोगों को लाभ पहुँचाती है, उनकी आध्यात्मिक क्षुधा को तृप्त करती हैं।
साधना के अंतर्गत इन दिनों जितना सामूहिक जप किया जा रहा है, वह हजारों वर्षों से किए गए जप-प्रभाव के साथ संयुक्त होता है। प्रभाव के उस महासागर से जुड़कर महापुरश्चरण साधना भी हजार-लाख गुना फलदायी हो रही है। उसके फल और प्रभाव को इन दिनों चल रही उथल-पुथल के रूप में देखा जाना चाहिए। कुछ दैवी आपदाएँ चिंतित भी करती हैं। उन्हें विरेचन, संवेदन जैसे चिकित्सा कार्यों के रूप में देखना चाहिए और आश्वस्त रहना चाहिए कि स्थायी प्रभाव शुभ ही होगा।
साधना -उपासना करनी होती है। हजारों साधकों को उसके लिए श्रम, संकल्प और संयम जुटाना पड़ता है। जुटते रहे हैं।
साधना की, समाधि की आवश्यकता ही नहीं है। कबीर स्पष्ट कहते हैं- ‘सुन्न मरै अजपा मरै, अनहद हू मरि जाए’ - शून्य न रहे, अजपा न रहे और यहाँ तक कि अनहद भी न रहे, वह भी मर जाए। अब प्रश्न यह है कि जो है ही नहीं, वह मरेगा क्या? मरने से पूर्व तो जीवन होना चाहिए, सत्ता होनी चाहिए। अस्तु, इनकी उपलब्धि नितांत आवश्यक है।
साधना जैसे कई उदाहरण हैं वैदिक परंपरा में यज्ञभाग भी सामूहिक उपासना का ही एक प्रकार है। अश्वमेध, राजसूय, वाजपेयी जैसे विशाल यज्ञ सूक्ष्मजगत में व्याप्त ‘तेज’ और ‘ओज’ को आकर्षित करने के उपक्रम ही थे। सामूहिक प्रयत्नों से ब्रह्मतेज को अभीप्सा के साथ पुकारते हुए उसे धारण करने योग्य भावभूमि भी तैयार की जाती थी। इस क्रम करे मेध के आह्वान और खेती के लिए जमीन तैयार करने की दोनों प्रक्रियाओं का एक साथ चलना कहा जा सकता है।
साधना के निजी-एकान्तिक साधना का, जप-तप का अपना महत्व है। उससे व्यक्ति का अपना आत्मबल सशक्त होता है। सामूहिक जप-तप समाज के आत्मतत्त्व को पुष्ट बनाता है। उसे आधार देता है, जिस पर दीन हीन दिखाई देने वाले लोग भी खड़े रह और निर्वाह कर सकते हैं।
साधना विधान को व्यापक विस्तार देने में सूफी संतों ने अनर्थक प्रयत्न किए। उनके माध्यम से इस्लामी दर्शन भारतवर्ष में सातवीं -आठवीं शताब्दी में ही आ गया था, लेकिन ग्यारहवीं शताब्दी के बाद उसके नाम पर तलवारों की आँधियाँ भारत की तरफ बहीं। उन्होंने ही सूफी योगदान को अतल गहराइयों में डूबो दिया।
साधनाएँ की जाएँ उतना ही अच्छा है। पाँच प्रकार के साधक गायत्री सिद्ध समझे जाते हैं।
साधना और उससे हुए अनुभवों के निचोड़ से मंदिरों का विज्ञान निकला है। मंदिरों के शिल्प और कर्मकाण्ड पर शास्त्र लिखे गए हैं। ‘समराँगण सूत्र, ‘ ‘आलय विज्ञान’ ‘वास्तुशास्त्र’, आदि ग्रंथों में शिल्प और उसके प्रभाव की चर्चा है। उनके सार-संक्षेप की चर्चा करें तो यह कि मंदिर का स्वरूप और व्यवस्था, दोनों ही व्यक्ति को अंतर्जगत् में -उत्कर्ष की दिशा में ले जाने के लिए है।
साधना में होती है, इसके लिए एक नियम बनाकर चला जाए। जैसे रोटी के साथ एक लगावन साग ही खाएँगे या एक ही दाल खाएँगे। थाली में भोज्य पदार्थों की संख्या दो या तीन से अधिक नहीं होने देंगे। बाहर के क्षेत्रों में सेवाकार्य करने निकलने पर लोग श्रद्धा और स्नेह के वशीभूत होकर कुछ-न-कुछ चीजें बनाकर खिलाने के लिए आते हैं। यहाँ यह धर्मसंकट भी उत्पन्न होता है कि यदि उन्हें लेने से एकदम इनकार कर दिया जा, तो उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचती है और ले लिया जाए, तो व्रत टूटता है, मर्यादा भंग होती है।
साधना के प्रयोग की विधियाँ इस प्रकार हैं-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-March
साधना पड़ेगा। प्रत्येक कार्य की सिद्धि के लिए हमें संयम करना पड़ता है और संयम करना योग का एक मुख्य अंग है अतएव धर्म-पूर्ण उपायों द्वारा द्रव्योपार्जन करना अथवा अन्य किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए प्रयत्न करना भी योग है। इसलिए हमें स्थायी सफलता के लिए धर्म का साथ न छोड़ना चाहिए। ध्यान देने की बात है कि हिन्दुओं का पूर्वकाल में धर्म-शिक्षा के अनन्तर अर्थ-शास्त्र की शिक्षा देने का तरीका कितना सुन्दर था। तभी हिन्दु धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को एक के बाद एक करतलगत करता चला जाता था।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-September
साधना, आराधना के आधार पर उत्पन्न किया गया संबंध, यह दोनों ही कारण गायत्री शक्ति को ऐसी बलवान बनाते हैं जो साधकों के लिए दैवी वरदान सिद्ध होता है।
साधना भी बड़ी साधना के समान उपयोगी सिद्ध होती है।
साधना।
साधना के लिए बड़े ही उपयुक्त हैं। कष्ट निवारण, कामना पूर्ति और आत्मबल बढ़ाने में इन दिनों की उपासना बहुत ही लाभदायक सिद्ध होती है। आश्विन की नवदुर्गाएं निकट हैं। पाठक उस समय एक छोटा अनुष्ठान करके उसका लाभ देखें।
साधना के फलों का प्रधान हेतु है।
साधना करते हैं, हमें किसी फल की कामना नहीं फिर सूक्ष्म प्रकृति का, गायत्री का, आश्रय क्यों लें? ऐसे लोगों को जानना चाहिए कि निष्काम, साधना का अर्थ-भौतिक लाभ न चाह कर आत्मिक सतोगुणी लाभ चाहना है। बिना परिणाम सोचे या चाहे तो किसी कार्य में प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती, यदि कुछ किया भी जाय तो उससे समय एवं शक्ति के अपव्यय के अतिरिक्त और कुछ परिणाम नहीं निकलता। निष्काम कर्म का तात्पर्य देवी, सतोगुणी आत्मिक कामनाओं से है। ऐसी कामनाएँ भी गायत्री के प्रथम पाद में, ह्रीं तत्व में, सरस्वती भाग में आती है।
साधना द्वारा अपने मन में उस मंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा जमाते हैं, जिसके मन में जितनी गहरी श्रद्धा जमी होती है उस ताँत्रिक का मंत्र भी उतना ही काम करता है। जिस मन्त्र से श्रद्धालु ताँत्रिक चमत्कारी काम कर दिखाता है उसी मन्त्र को अश्रद्धालु साधक चाहे सौ बार करे कुछ लाभ नहीं होता। गायत्री मन्त्र के संबंध में भी यह तथ्य बहुत हद तक काम करता है। जब साधक श्रद्धा और विश्वास पूर्वक आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और आत्म संबंध दोनों की महत्ता से संयुक्त गायत्री का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्ध होती है।
साधना के द्वारा उसका अनुभव कर सकते हैं।
साधना के समान उपयोगी सिद्ध होती है।
साधना आरम्भ कर देनी चाहिए। प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर शौच स्नान से निवृत्त होकर पूर्व वर्णित नियमों को ध्यान में रखते हुए उपासना के लिए बैठना चाहिए। नौ दिन में 24 हजार जप करना है। प्रतिदिन 2667 मंत्र जपने हैं। एक माला में 108 दाने होते हैं।
साधना का अर्थ-भौतिक लाभ न चाह कर आत्मिक सतोगुणी लाभ चाहना है। बिना परिणाम सोचे या चाहे तो किसी कार्य में प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती, यदि कुछ किया भी जाय तो उससे समय एवं शक्ति के अपव्यय के अतिरिक्त और कुछ परिणाम नहीं निकलता। निष्काम कर्म का तात्पर्य देवी, सतोगुणी आत्मिक कामनाओं से है। ऐसी कामनाएँ भी गायत्री के प्रथम पाद में, ह्रीं तत्व में, सरस्वती भाग में आती है। इसलिए निष्काम भाव की उपासना भी गायत्री क्षेत्र से बाहर नहीं है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-January
साधना या एकाग्रता का अभ्यास करें, किन्तु तामसी आहार से स्वयं रोग, शोक, दुःख दैन्य वेग से बढ़ते हैं और मनुष्य का पुरुषार्थ घटता है, सौभाग्य दूर भागता है, सामर्थ्य न्यून होती है। राजसी और तामसिक पदार्थों (माँस, अत्यन्त उष्ण, कड़वा, तीक्ष्ण, गरिष्ठ, लहसुन, प्याज, अंडा, मछली, अत्यन्त तले हुए भोजन, रसहीन गला हुआ, बासी, मिठाइयों से मनुष्य प्रत्यक्ष राक्षस बन जाता है। फिर यदि इन अप्राकृतिक चीजों को खाकर कोई मनुष्य काम, क्रोध, ईर्ष्या, प्रतिहिंसा के वशीभूत हो कुकर्म कर डाले तो क्या आश्चर्य?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-February
साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमता पूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह सब इस पुस्तक में बताया गया है साथ ही गायत्री उपनिषद् भी है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है।
साधनाओं का पथ प्रदर्शन किया गया है।
साधना हो सकती है। प्रणव-योग, विश्व-योग, ध्यान-योग, सूर्य-योग, प्राण-योग, दिव्य-योग, विभु-योग, विज्ञान-योग, लय-योग, नाद-योग, षट्चक्र-योग, ग्रन्थि-योग इन बारह योगों की मीमाँसा तथा उनकी साधना विधि भली प्रकार बताई गई है। गायत्री द्वारा इन बारह योगों को सुगमता पूर्वक किस प्रकार साधा जा सकता है यह सब इस पुस्तक में बताया गया है साथ ही गायत्री उपनिषद् भी है। इस पुस्तक के द्वारा गृहस्थ व्यक्ति भी योगी बन सकता है।
साधनाएं
साधना करनी चाहिए। इससे इच्छाशक्ति बलवती होती है, ऐसे व्यक्ति का आत्मनिर्देश कभी विफल नहीं जा सकता।”
साधना
साधनाओं का वर्णन, गायत्री उपासना से होने वाले चमत्कारी लाभों की विवेचना, इस पुस्तक में बड़े विस्तार से की गई है। गायत्री संध्या, गायत्री अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ की विधियाँ भली प्रकार समझाई गई हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-November
साधना अधिक प्रगाढ़, पुष्ट और परिपक्व हो जाती है तो मस्तिष्क के मध्य भाग या हृदय स्थान पर वही गायत्री तेज स्थिर हो जाता है। यही सिद्धावस्था है। जब वह तेज बाहर आकाश से खिंचकर अपने अन्दर स्थिर हो जाता है तो ऐसी स्थिति हो जाती है जैसे अपना शरीर और गायत्री का प्राण एक ही स्थान पर सम्मिलित हो गये हों। भूत-प्रेत का आवेश शरीर में चढ़ जाने पर जैसे मनुष्य उसे प्रेतात्मा की इच्छानुसार काम करता है वैसे ही गायत्री शक्ति का आधान अपने अन्दर हो जाने से साधक के विचार कार्य, आचरण, मनोभाव रुचि, इच्छा, आकाँक्षा, पर्व ध्येय में परमार्थ प्रधान रहता है। उसके मनुष्यत्व में से पशुता घटती जाती है और देवत्व की मात्रा बढ़ती जाती है।
साधना में लगाता है।
साधना की है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-October
साधना है, इसमें कोई महत्व नहीं। संसार के चक्र में घूमते हुए इन दयनीय व्यक्तियों को छोड़ कर में अकेला मोक्ष नहीं चाहता, आपको छोड़कर कोई शरण नहीं कृपया उपाय बताइए।”
साधनाएं बनाई हैं। जो इन साधनाओं को करता हुआ भगवद्भक्ति का उपासक है वही सच्चे रास्ते पर चलने वाला भक्त है। जो केवल नाम जप, कीर्तन, आदि कर्मकाण्डों तक सीमित रहते हैं और भक्ति प्राप्ति की उपरोक्त सात साधनाओं पर ध्यान नहीं देते वे अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे इसमें भारी संदेह है।
साधना के तौर पर गायत्री का जप बताया है।
साधना है। आदि विद्वान कपिल ने साँख्य शास्त्र की रचना मनुष्य जाति को विविध दुःखों से छुड़ाने के लिए की है। प्राचीन शब्दों से पता चलता है कि कपिल अपनी मुक्तावस्था में से निर्वाण, शरीर द्वारा उक्त उपदेश की पूर्ति के लिए अवतीर्ण हुए। साँख्य दर्शन का पहला सूत्र है।
साधनाओं को करता हुआ भगवद्भक्ति का उपासक है वही सच्चे रास्ते पर चलने वाला भक्त है। जो केवल नाम जप, कीर्तन, आदि कर्मकाण्डों तक सीमित रहते हैं और भक्ति प्राप्ति की उपरोक्त सात साधनाओं पर ध्यान नहीं देते वे अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे इसमें भारी संदेह है।
साधना करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती है। यह मंत्र छोटा है पर इसकी शक्ति बड़ी भारी है।”
साधना क्षेत्र में नित्य ही देखने में आते हैं।
साधना कभी भी निष्फल नहीं जाती।
साधना करने वाले भक्तों के लिए उपरोक्त सात साधनाएं बनाई हैं। जो इन साधनाओं को करता हुआ भगवद्भक्ति का उपासक है वही सच्चे रास्ते पर चलने वाला भक्त है। जो केवल नाम जप, कीर्तन, आदि कर्मकाण्डों तक सीमित रहते हैं और भक्ति प्राप्ति की उपरोक्त सात साधनाओं पर ध्यान नहीं देते वे अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे इसमें भारी संदेह है।
साधनाओं पर ध्यान नहीं देते वे अपने उद्देश्य में सफल हो सकेंगे इसमें भारी संदेह है।
साधना पर प्रकाश डालने वाले सहस्रों श्लोक भरे पड़े हैं, इन सब का संग्रह किया जाय तो एक बड़ा भारी गायत्री पुराण ही बन सकता है।
साधना करें या न करें केवल गायत्री जप से भी सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
साधनाएं बतलायी हैं-
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-July
साधना के लिए व्यवहार करते समय इस उपदेश को लोगों को सतत् अपने सामने रखना चाहिए।
साधना
साधना से मनुष्य के परम कल्याण का भाग प्रशस्त होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-April
साधना का एक अंग ही समझे, क्योंकि साधना के लिए इसकी बहुत बड़ी आवश्यकता है। भगवान कल्याण स्वरूप है इसलिए कल्याण साधना में भगवान के कल्याण स्वरूप का स्मरण रखना ही साधक का प्रमुख लक्ष्य है। तनिक भी विचलित न होकर अक्षुण्ण सम्पूर्ण और कल्याण करने वाली श्रद्धा भगवान के ऊपर रक्खो, श्रद्धा ही त्याग का आधार है, इससे अनन्त ज्ञान की प्राप्ति अवश्य होगी, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। श्रद्धा ने ही सम्पूर्णता को प्राप्त कराने का भार ग्रहण कर रखा है, साधक को यह बात नहीं भूल जानी चाहिए।
साधना में भगवान के कल्याण स्वरूप का स्मरण रखना ही साधक का प्रमुख लक्ष्य है। तनिक भी विचलित न होकर अक्षुण्ण सम्पूर्ण और कल्याण करने वाली श्रद्धा भगवान के ऊपर रक्खो, श्रद्धा ही त्याग का आधार है, इससे अनन्त ज्ञान की प्राप्ति अवश्य होगी, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। श्रद्धा ने ही सम्पूर्णता को प्राप्त कराने का भार ग्रहण कर रखा है, साधक को यह बात नहीं भूल जानी चाहिए।
साधना के लिए इसकी बहुत बड़ी आवश्यकता है। भगवान कल्याण स्वरूप है इसलिए कल्याण साधना में भगवान के कल्याण स्वरूप का स्मरण रखना ही साधक का प्रमुख लक्ष्य है। तनिक भी विचलित न होकर अक्षुण्ण सम्पूर्ण और कल्याण करने वाली श्रद्धा भगवान के ऊपर रक्खो, श्रद्धा ही त्याग का आधार है, इससे अनन्त ज्ञान की प्राप्ति अवश्य होगी, इसमें अणुमात्र भी सन्देह नहीं है। श्रद्धा ने ही सम्पूर्णता को प्राप्त कराने का भार ग्रहण कर रखा है, साधक को यह बात नहीं भूल जानी चाहिए।
साधना का जो सिलसिला जारी होगा वह उत्तरोत्तर उन्नत ही होता जायगा। उस समय साधक को सब कुछ भगवान की इच्छानुसार ही होने देना चाहिए। अपनी किसी प्रकार की भी स्वतंत्रता, इच्छा या हठ को भी स्थान नहीं देना चाहिए। क्योंकि-”होइ है वही जो राम रचि राखा” साधक को अपनी किसी भी प्रकार की इच्छा नहीं करनी चाहिये सब भगवान के ऊपर छोड़ देना चाहिए और समझ लेना चाहिए कि भगवान की मंगलमय इच्छा ही सब घटनाओं को उत्पन्न कर रही है। भगवान में सम्पूर्ण श्रद्धा रखना चाहिए।
साधना की तैयारी में जुटते ही अविचल और निर्विकार भाव मन एवं बुद्धि का स्वभाव सिद्ध भाव हो जायगा इसके साथ ही साथ हमें आगे की तैयारी के लिए मन को विश्व मात्र के प्राणियों को रागद्वेष रहित होकर आह्लादपूर्वक हृदय से लगाने के भाव वाला हो जाना चाहिए। भगवान जिस प्रकार संसार के समस्त प्राणियों में अखण्ड भाव से विराजमान हैं, उसी प्रकार की अनुभूति के लिए हमें अपने मन को तैयार करने की आवश्यकता है, क्योंकि संसार के प्राणी होने के कारण हमारे भीतर भी भगवान अखण्ड भाव से विराजमान हैं इसलिए अपने भीतर स्थित भगवान को जहाँ हमें देखना है वहाँ समस्त संसार में भी उसका अनुभव करना है। इस तरह अपने में संसार के साथ अखण्ड संबंध की स्थापना शब्द से नहीं अनुभूति-पूर्वक करनी है। मन की इस शान्त सत्ता में सतत एक रस तल्लीन रहने का अभ्यास हो जाने पर विज्ञान का अभिव्यक्त होना आरंभ हो जाता है। परन्तु साधक को उतावला बनने की आवश्यकता नहीं है।
साधना के आरंभ में पहले अपने विचार में ज्ञान प्रवाह का अनुभव करना चाहिए। यह अनुभव ईश्वर की प्रेरणा के रूप में चित्त के भीतर करना चाहिए। यह प्रेरणात्मक ज्ञान भीतर के गुरु रूप से साधक को अपने आप ही सब कुछ दिखा सुना देगा। क्या करना चाहिए, किसमें कमी या अधूरापन है, क्या नहीं करना चाहिए से सारी बातें वह स्वयं ही कहना आरंभ कर देगा। इसी के प्रकाश के आगे का रास्ता साधक को तय करना पड़ेगा।
साधना में कठिनाई आती है वहाँ साधक को उलझन आने की भी संभावना रहती है। इसीलिए भगवान के प्रकाश को अविकृत रूप से धारण करने के लिए समता की अत्यन्त आवश्यकता है। इसके बिना भाव अधिकता के कारण मन तथा शरीर की अनेक प्रकार की विषमताओं के उत्पन्न होने का डर रहता है। भगवान की प्रस्फुटित ज्योति के लिए पूर्णोपयोगी आधार बनाये बिना उसके द्वारा शरीर और मन दोनों के ही विनष्ट होने की संभावना रहती है इसीलिए मन और बुद्धि को सम्पूर्ण रूप से कुछ दिनों तक खाली करके रखने से ही भय निर्मूल हो सकता है।
साधना के लिए उत्पन्न हुई इच्छा के साथ सत्य ज्ञान का मिलान करना होगा। जिससे सत्य ज्ञान के साथ ही साथ इच्छा की वृत्ति भी उसके अनुकूल रहे। जब दोनों एक रूप हो जायेंगे तब दोनों ही अखण्ड स्वरूप में बदल जायेंगे।
साधना के लिए मन के तैयार होते ही उसमें शान्ति आती है और बहुत बड़ी समता की स्थापना होती है। शान्ति का अर्थ अटल और अचल स्थिर भाव तथा प्रवृत्ति के सब तरह के घात प्रतिघातों से अविचल तथा निर्विकार रहने का अभ्यास। जिस प्रकार आज चंचलता मन का स्वभाव है, साधना की तैयारी में जुटते ही अविचल और निर्विकार भाव मन एवं बुद्धि का स्वभाव सिद्ध भाव हो जायगा इसके साथ ही साथ हमें आगे की तैयारी के लिए मन को विश्व मात्र के प्राणियों को रागद्वेष रहित होकर आह्लादपूर्वक हृदय से लगाने के भाव वाला हो जाना चाहिए। भगवान जिस प्रकार संसार के समस्त प्राणियों में अखण्ड भाव से विराजमान हैं, उसी प्रकार की अनुभूति के लिए हमें अपने मन को तैयार करने की आवश्यकता है, क्योंकि संसार के प्राणी होने के कारण हमारे भीतर भी भगवान अखण्ड भाव से विराजमान हैं इसलिए अपने भीतर स्थित भगवान को जहाँ हमें देखना है वहाँ समस्त संसार में भी उसका अनुभव करना है। इस तरह अपने में संसार के साथ अखण्ड संबंध की स्थापना शब्द से नहीं अनुभूति-पूर्वक करनी है।
साधना करते रहने पर भगवान स्वयं ही धीरे-धीरे सभी विघ्न, बाधाओं को दूर करके साधक को मन वाँछित स्थान पर पहुँचा देते हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-December
साधना में स्त्री पुरुष दोनों ही सम्मिलित हो सकें तो बड़ा अच्छा, एक पक्ष के द्वारा ही पूरा भार कंधे पर लिए जाने से आँशिक सफलता ही मिलती है। प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख होकर साधना पर बैठें। नेत्र बन्द करके श्वेत वस्त्राभूषण अलंकृत किशोर आयु वाली, कमल पुष्प हाथ में लिए हुए गायत्री का ध्यान करें। ‘यं’ बीज के तीन संपुट लगा कर गायत्री का जप चन्दन की माला पर करें।
साधना उपासना करने वाला कभी भी निराश नहीं लौटता।
साधना बल न हो तो ऐसा ही परिणाम होगा जैसा खाली बन्दूक का घोड़ा बार-बार चटका कर कोई यह आशा करे कि अचूक निशाना लगेगा। इसी प्रकार जिनके पास तपोबल तो है पर उसका काम्य प्रयोजन के लिए विधिवत प्रयोग करना नहीं जानते वे वैसे हैं जैसे कोई कारतूस की पोटली बाँधे फिरे और उन्हें हाथ से फेंक-फेंक कर शत्रुओं की सेना का संहार करना चाहे। यह उपहासास्पद तरीके हैं।
साधना की भी मचती लूट?
साधना के समय अपना शरीर भी बिल्कुल शिथिल और नील वस्त्र से ढ़का हुआ होना चाहिए।
साधना द्वारा संग्रह की हुई आत्मिक शक्ति कारतूसों की पेटी है। दोनों के मिलने से ही निशाने को मार गिराया जा सकता है। कोई व्यक्ति प्रयोग विधि जानता हो पर उसके पास साधना बल न हो तो ऐसा ही परिणाम होगा जैसा खाली बन्दूक का घोड़ा बार-बार चटका कर कोई यह आशा करे कि अचूक निशाना लगेगा। इसी प्रकार जिनके पास तपोबल तो है पर उसका काम्य प्रयोजन के लिए विधिवत प्रयोग करना नहीं जानते वे वैसे हैं जैसे कोई कारतूस की पोटली बाँधे फिरे और उन्हें हाथ से फेंक-फेंक कर शत्रुओं की सेना का संहार करना चाहे। यह उपहासास्पद तरीके हैं।
साधना बड़ी सहायक सिद्ध होती है। उससे ऐसी मनोभूमि तैयार हो जाती है। जो वर्तमान अर्थ चक्र से निकाल कर साधक को संतोष जनक स्थिति पर पहुँचा दे।
साधनाओं में कम से कम एक या एक से अधिक का तप पूरा कर चुके हों, गायत्री मंत्र का काम्य कर्म में प्रयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चौबीस हजार वाले या सवा लक्ष वाले अनुष्ठानों की पूँजी जिनके पास है वे भी अपनी-अपनी पूँजी के अनुसार एक सीमा तक सफल हो सकते हैं।
साधना से भी हो सकता है।
साधनाएं की जायं उतना ही अच्छा है पाँच प्रकार के साधक गायत्री सिद्ध समझे जाते हैं- 1. लगातार बारह वर्ष तक कम से कम एक माला नित्य जप किया हो 2. गायत्री की ब्रह्म संध्या को लगातार नौ वर्ष किया हो 3. ब्रह्मचर्य पूर्वक पाँच वर्ष तक एक हजार मंत्र नित्य जपे हों। 4. चौबीस लक्ष गायत्री का अनुष्ठान किया हो 5. एक वर्ष तक गायत्री तप किया हो। जो व्यक्ति इन साधनाओं में कम से कम एक या एक से अधिक का तप पूरा कर चुके हों, गायत्री मंत्र का काम्य कर्म में प्रयोग करके सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चौबीस हजार वाले या सवा लक्ष वाले अनुष्ठानों की पूँजी जिनके पास है वे भी अपनी-अपनी पूँजी के अनुसार एक सीमा तक सफल हो सकते हैं।
साधना निर्मल।
साधना के दिनों में प्रत्येक रविवार को चावल, दूध, दही आदि केवल श्वेत वस्तुओं का ही भोजन करना चाहिए।
साधना और तपश्चर्या द्वारा जो आत्मबल संग्रह किया गया है उसे जिस काम में भी खर्च किया जायेगा उसका प्रतिफल अवश्य मिलेगा। बन्दूक उतनी ही उपयोगी सिद्ध होगी, जितने बढ़िया और जितने अधिक कारतूस होंगे। गायत्री की प्रयोग विधि एक प्रकार की आध्यात्मिक बन्दूक है। तपश्चर्या और साधना द्वारा संग्रह की हुई आत्मिक शक्ति कारतूसों की पेटी है। दोनों के मिलने से ही निशाने को मार गिराया जा सकता है।
साधना से धन की वृद्धि और दरिद्रता का नाश होता है।
साधना पर बैठें। नेत्र बन्द करके श्वेत वस्त्राभूषण अलंकृत किशोर आयु वाली, कमल पुष्प हाथ में लिए हुए गायत्री का ध्यान करें। ‘यं’ बीज के तीन संपुट लगा कर गायत्री का जप चन्दन की माला पर करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-August
साधना की ओर बढ़ना चाहिए। जिस दिन फुरसत रहती हो सप्ताह में एक रोज पूरे, आधे या दिन चौथाई मौन रहना चाहिए। यदि नित्य एक दो घंटे मौन रहा जा सके तो और भी अच्छा, किन्हीं विशेष पर्वों या अवसरों पर एक दिन या कई दिन का मौन रखना चाहिए। इस प्रकार मौन की ओर प्रवृत्ति बढ़ाते चलने से आत्मिक मार्ग में रुचि बढ़ती चलती है और शाँति के पथ पर प्रगति होने लगती है।
साधना द्वारा शरीर के अंतर्गत छिपे हुए और तन्द्रित पड़े हुए केन्द्रों का जागरण करके सूक्ष्म प्रकृति के शक्ति प्रवाहों से संबंध स्थापित हो जाता है तो मनुष्य और आद्य शक्ति आपस में संबंधित हो जाते हैं, इस संबंध के कारण मनुष्य उस आद्य शक्ति के गर्भ में भरे हुए रहस्यों को समझने लगता है और अपनी इच्छानुसार उसका उपयोग करके लाभाँवित हो सकता है। चूँकि संसार में जो कुछ है वह सब उस आद्यशक्ति के भीतर है इसलिए वह संबंधित व्यक्ति भी संसार के सब पदार्थों और साधनों से अपना संबंध स्थापित कर सकता है। वर्तमान काल के वैज्ञानिक पंच तत्वों की सीमा तक सीमित स्थूल प्रकृति के साथ, उसके परमाणुओं के साथ संबंध स्थापित करने के लिए बड़ी-बड़ी कीमती मशीनों का, विद्युत, वाष्प, गैस, पेट्रोल आदि का प्रयोग करके कुछ आविष्कार करते हैं और थोड़ा सा लाभ उठाते हैं। यह तरीका बड़ा श्रम साध्य कष्ट साध्य, धर्म साध्य और समय साध्य है। उसमें खराबी, टूट-फूट और परिवर्तन की खटखट भी आए दिन लगी रहती है।
साधना कर रहे हैं। उनकी सिद्धावस्था संदेह से परे है। इस अकेली मौन साधना से वे सब सिद्धियाँ मिल सकती हैं जो अन्य योग साधनों से मिल सकती हैं।
साधना के साथ यदि मनोवृत्तियों को आत्म-चिंतन में लगा दिया जाय तो आध्यात्मिक आनन्द का एक निर्झर झरने लगता है। जिसके रसास्वादन की अनुभूति भुक्त भोगी ही जानते हैं। अरुणाचल के तपस्वी महर्षि रमण विगत 50 वर्षों से मौन की साधना कर रहे हैं। उनकी सिद्धावस्था संदेह से परे है। इस अकेली मौन साधना से वे सब सिद्धियाँ मिल सकती हैं जो अन्य योग साधनों से मिल सकती हैं।
साधना से सिद्धि मिलती है। गायत्री साधना भी अनेक सिद्धियों की जननी है।
साधना।
साधना द्वारा केवल तम तत्व से संबंध रखने वाले उपरोक्त प्रकार के भौतिक चमत्कार ही नहीं होते वरन् रज और सत् क्षेत्र के लाभ एवं आनन्द भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त किये जा सकते हैं। हानि, शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण, विरोध, आघात आदि की विपन्न परिस्थितियों में पड़कर जहाँ साधारण मनो-भूमि के मृत्यु तुल्य मानसिक कष्ट पाते हैं वहाँ आत्म शक्तियों के उपयोग की विद्या जानने वाला व्यक्ति विवेक, ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हंसते-हंसते आसानी से काट लेता है। और बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी अपने आनंद को बढ़ाने का मार्ग ढूँढ़ निकालता है। वह जीवन को इतनी, मस्ती प्रफुल्लता और मजेदारी के साथ बिताता है जैसी कि बेचारे करोड़पतियों को भी कभी नसीब नहीं हो सकती। जिसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आत्मबल के कारण ठीक बना हुआ है उसे बड़े-बड़े अमीरों से भी अधिक आनन्दमय जीवन बिताने का सौभाग्य अनायास ही प्राप्त हो जाता है।
साधना भी अनेक सिद्धियों की जननी है।
साधना है जो चित्र वृत्तियों को बिखरने से बचाती है। चुप रहने से वाणी और वाणी के साथ व्यय होने वाले मस्तिष्कीय शक्तियों की क्षति होने से बचत होती है। यह बचत आत्म-चिन्तन में लगा दी जाय तो शाँति के उस स्रोत तक पहुँच हो सकती है जो हमारी अशान्तियों को हटाकर सुखद शीतल और स्निग्ध शाँति का आस्वादन कराती है। इस प्रकार के विश्वास के उपरान्त नवीन चैतन्यता, स्फूर्ति और जीवनी शक्ति प्राप्त होती है जो कार्यक्षमता, सूक्ष्मदर्शिता और प्रतिभा को कई गुना बढ़ा देती है।
साधना करने वाले ध्यान मग्न होकर इन ध्वनियों को पकड़ते हैं और उन का सहारा पकड़ते हुए सूक्ष्म प्रकृति को भी पार करते हुए ब्रह्म सायुज्य तक जा पहुँचते हैं। यह योग साधना पथ किसी उपयुक्त अवसर पर पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जायेगा।
साधना से वे सब सिद्धियाँ मिल सकती हैं जो अन्य योग साधनों से मिल सकती हैं।
साधना द्वारा शरीर के विविध भागों में छिपे पड़े हुए शक्ति केन्द्रों को, चक्रों को, ग्रन्थियों को, मातृकाओं को, ज्योतियों को, भ्रमरों को जगाते थे और उस जागरण से जो शक्ति प्रवाह उत्पन्न होता था, उसे आद्य शक्ति के त्रिविध प्रवाहों में से जिसके साथ आवश्यकता होती थी उसके साथ संबंधित कर देते थे। जैसे किसी रेडियो स्टेशन के ट्रान्समीटर यंत्र का किसी दूसरे रेडियो स्टेशन के ध्वनिक्षेपक यंत्र से संबंध स्थापित कर दिया जाता है, दोनों की विद्युत शक्तियाँ सम श्रेणी की होने के कारण आपस में संबंधित हो जाती हैं तो उन स्टेशनों के बीच आपसी वार्तालाप का, संवादों का आदान-प्रदान का सिलसिला चल पड़ता है। इसी प्रकार साधना द्वारा शरीर के अंतर्गत छिपे हुए और तन्द्रित पड़े हुए केन्द्रों का जागरण करके सूक्ष्म प्रकृति के शक्ति प्रवाहों से संबंध स्थापित हो जाता है तो मनुष्य और आद्य शक्ति आपस में संबंधित हो जाते हैं, इस संबंध के कारण मनुष्य उस आद्य शक्ति के गर्भ में भरे हुए रहस्यों को समझने लगता है और अपनी इच्छानुसार उसका उपयोग करके लाभाँवित हो सकता है। चूँकि संसार में जो कुछ है वह सब उस आद्यशक्ति के भीतर है इसलिए वह संबंधित व्यक्ति भी संसार के सब पदार्थों और साधनों से अपना संबंध स्थापित कर सकता है। वर्तमान काल के वैज्ञानिक पंच तत्वों की सीमा तक सीमित स्थूल प्रकृति के साथ, उसके परमाणुओं के साथ संबंध स्थापित करने के लिए बड़ी-बड़ी कीमती मशीनों का, विद्युत, वाष्प, गैस, पेट्रोल आदि का प्रयोग करके कुछ आविष्कार करते हैं और थोड़ा सा लाभ उठाते हैं।
साधना पथ किसी उपयुक्त अवसर पर पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जायेगा।
साधना। साधना से सिद्धि मिलती है। गायत्री साधना भी अनेक सिद्धियों की जननी है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1949-May
साधना पूर्ण भी हो जानी चाहिए। इस संसार में सभी प्राणी अपूर्ण और दोष-युक्त हैं। उन दोषों और अपूर्णताओं के कारण ही तो उन्हें शरीर धारण करना पड़ रहा है। जिस दिन वह अपूर्णता दूर हो जायगी, उस दिन शरीर धारण करने की आवश्यकता ही न रहेगी। कोई व्यक्ति चाहे वह कितना ही बड़ा महात्मा क्यों न हो किसी न किसी अंश में अपूर्ण एवं दोषयुक्त है।
साधना की, सीधा पथ है-उस प्रभु का आधार।
साधना का अधिकारी है, उसी के अनुकूल कार्यक्रम उसके सामने रखा जाना चाहिए। बालकों का शिक्षण और अध्ययन भी इसी आधार पर होना चाहिए। रुचि के अनुकूल दिशा में शिक्षा मिलने पर बालक थोड़े ही समय में आश्चर्यजनक उन्नति कर लेता है। इसके विपरीत जो कार्यक्रम उसकी रुचि न होते हुए भी लादा जाता है वह बड़ी कठिनाई से जैसे-तैसे पार पड़ता है।
साधना उस समय सफल होती है जब वह अपने प्रेमास्पद का आधार ले अपनी प्रेम भावना को एक से ऊपर उठाकर अनेक के व्यापक स्वरूप में व्यवहृत कर पाता है। जब वह सब में सर्वत्र अपने को उनमें इस प्रकार ढाल देता है कि द्वैत का भाव नहीं रहता। संसार में विभिन्न रूप रंग होते हुये भी पावन प्रेमी रूप में कुरूप में, पुरुष में स्त्री में, पुष्पों में लताओं में, वृक्षों में कुंडों में, अपने प्रिय और केवल अपने प्रिय का ही अभेद दर्शन करता है। अंतर्जगत से लेकर बाह्य-जगत तक उसको केवल उसी का जलवा नजर आता है। विशुद्ध एकरस आनन्द का उद्रेक उसी समय होता है।
साधनाओं का भी अनधिकारी ठहराया गया है, क्योंकि जिसका आधार ही मजबूत नहीं वह स्वयं खड़ा नहीं रह सकता, जब स्वयं खड़ा नहीं रह सकता तो इन धार्मिक कृत्यों का भार-वहन किस प्रकार कर सकेगा?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-January
साधना आँदोलन मानवी व्यक्तित्व के परिष्कार का, तनाव मुक्ति का, जीवन जीने की कला के शिक्षण का आँदोलन है। यह हर विद्यालय, घर-परिवार, कार्यालयों, क्लब-कंपनियों तथा सामाजिक संगठनों में चलना चाहिए। हर व्यक्ति को हर श्वास में साधना (‘द होल लाइफ इन योगा’ श्री अरविंद ) वाले सिद्धाँत को आत्मसात् कराया जाना है। तभी यह भोगवादी तृष्णा, आत्मघाती प्रतिद्वंद्विता मिटेगी। उपभोक्ता प्रधान इस युग में हम सभी से तो अपेक्षा नहीं कर रहे कि वे गाँधी की नकल करें, पर क्या अपव्यय पर रोकथाम लक्ष्मी की आराधना एवं अपने निज नहीं पकड़ सकता।
साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं, जो 1 से 1, 11 से 11 व 29 तारीखों में वर्ष भर चलते हैं। कसी हुई दिनचर्या वाले इन सत्रों में गायत्री साधना से लेकर जीवन जीने के हर सूत्र व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण तक की प्रक्रिया का आमूलचूल शिक्षण दिया जाता है। इस अवधि में साधक चौबीस हजार का एक गायत्री अनुष्ठान भी संपन्न कर लेते हैं एवं वरिष्ठ साधकों की अनुभूति प्रधान अमृतवाणी का लाभ लेते हैं, साथ ही साधना विज्ञान के गूढ़तम सूत्रों को गुरुसता द्वारा कराए गए ध्यान द्वारा सीख कर जाते हैं। सभी के लिए पूर्वानुमति लेना आवश्यक है।
साधना के साथ प्रति मास सवा लक्ष गायत्री महामंत्र के अनुष्ठान के साथ वह पढ़ाई की लालटेन को जलाए रखता। उसे मास्टर जी के द्वारा कहा गया महर्षि अरविन्द का वचन-यदि प्रभु का संस्पर्शबद्ध हो तो सब कुछ संभव है, हमेशा याद रहता। इसलिए चने बेचने की थकान के बावजूद वह अपनी साधना एवं अध्ययन को कभी नहीं भूलता।
साधना क्रम है, पर लोग कष्टसाध्य स्थितियों में शरीर को रखकर उसे भी तप की संज्ञा देते हैं, यह कहाँ तक ठीक है।”
साधना है।
साधना को प्रखर बनाने का जिनका मन हो, वे 1-1 दिन के संजीवनी साधना सत्रों में भागीदारी कर सकते हैं, जो 1 से 1, 11 से 11 व 29 तारीखों में वर्ष भर चलते हैं। कसी हुई दिनचर्या वाले इन सत्रों में गायत्री साधना से लेकर जीवन जीने के हर सूत्र व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण तक की प्रक्रिया का आमूलचूल शिक्षण दिया जाता है। इस अवधि में साधक चौबीस हजार का एक गायत्री अनुष्ठान भी संपन्न कर लेते हैं एवं वरिष्ठ साधकों की अनुभूति प्रधान अमृतवाणी का लाभ लेते हैं, साथ ही साधना विज्ञान के गूढ़तम सूत्रों को गुरुसता द्वारा कराए गए ध्यान द्वारा सीख कर जाते हैं। सभी के लिए पूर्वानुमति लेना आवश्यक है।
साधना के सुफल की शुरुआत है। माँ अपने साधकों को लौकिक यश-ऐश्वर्य-अलौकिक शान्ति सब कुछ देकर निहाल करती है। तभी तो गायत्री साधना की परिणति बताते हुए अथर्ववेद में कहा गया है-’ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता, प्रचोदयन्ताम् पावमानी द्विजानाम् आयुः प्राणं प्रजाँ पशुँ कीर्तिम् द्रविणम् ब्रह्मवर्चसम् मह्यम् दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम्।’ मास्टर रामशरण जी उसे गायत्री की अगाध महिमा का बोध कराकर चले गए। और अनिरुद्ध इस महामंत्र के गहन चिन्तन में लीन हो गया।
साधना बड़े ही गोपन भाव से करते थे। किसी को भी उनकी इस गहन साधना का अहसास था, पर आज उन्होंने अनिरुद्ध के सामने अपनी साधना का रहस्य सविधि समझा दिया। सूर्यमंडल में स्थिति गायत्री महाशक्ति का ध्यान चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र की जप विधि उन्होंने अनिरुद्ध को कह सुनायी। साथ ही उन्होंने बताया कि बेटा अनिरुद्ध-तप के बिना जप कुछ ऐसा है जैसे गर्मी से रहित अग्नि। जप के साथ जब तक तप की प्रक्रिया का योग नहीं होता, तब तक जप का प्रभाव नहीं होता।
साधना से, सजल संवेदना विकसित करने से एवं परमात्मचेतना के धरती पर आने के आश्वासन को जीवन में निरंतर जीने से निश्चित ही धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बनेगा एवं मानव में देवत्व अवतरण होगा। साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण, नारीजागरण, कुरीति उन्मूलन, नशा निवारण जैसे प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाले कार्यक्रम भविष्य के परिवर्तन की आधारशिला रख रहे हैं। चारों ओर इनकी धूम मची हुई है। अब इस वर्ष को 2002 की वसंत से 2003 की वसंत तक ‘संगठन सशक्तीकरण वर्ष’ मनाने का निर्णय हुआ है। यदि साधना की धुरी पर चलने वाले अपने राष्ट्रव्यापी-विश्वव्यापी संगठन को सशक्त बनाया जा सका तो जो भी आँदोलन हाथ में लिए जाएँगे, वे सफलता के चरम शिखर तक पहुँचाकर रहेंगे।
साधना, तो सबके लिए एक जैसी ही हैं। फिर उन पर विवाद कैसा? सद्बुद्धि की प्रार्थना तो सभी के लिए की जा सकती है। उसे किसी धर्म विशेष से जोड़कर किसी को क्या मिलेगा? वस्तुतः साधना आँदोलन मानवी व्यक्तित्व के परिष्कार का, तनाव मुक्ति का, जीवन जीने की कला के शिक्षण का आँदोलन है।
साधना (‘द होल लाइफ इन योगा’ श्री अरविंद ) वाले सिद्धाँत को आत्मसात् कराया जाना है। तभी यह भोगवादी तृष्णा, आत्मघाती प्रतिद्वंद्विता मिटेगी। उपभोक्ता प्रधान इस युग में हम सभी से तो अपेक्षा नहीं कर रहे कि वे गाँधी की नकल करें, पर क्या अपव्यय पर रोकथाम लक्ष्मी की आराधना एवं अपने निज नहीं पकड़ सकता। यदि श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद जन-जन को बताकर उसकी लत लगाई जा सके तो श्रेष्ठ विचारों का, विधेयात्मक आस्थाओं का साम्राज्य ही छाया दिखाई पड़ेगा।
साधना की प्रखरता का आँदोलन जैसा कि हमने बार-बार लिखा हैं, हर धर्म-संप्रदाय के लिए है। हमारी उपासना-पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, पर जीवन-साधना संयम-साधना, तो सबके लिए एक जैसी ही हैं। फिर उन पर विवाद कैसा? सद्बुद्धि की प्रार्थना तो सभी के लिए की जा सकती है। उसे किसी धर्म विशेष से जोड़कर किसी को क्या मिलेगा?
साधनाएँ सम्पन्न करके प्रचण्ड आत्मबल भी अर्जित करना है। आत्मबल की धनी ऐसी तपस्वी आत्माएँ ही इन दिनों तीव्र गति से अन्तरिक्ष में उमड़-घुमड़ रही हलचलों को अपनी अन्तर्चेतना में अनुभव करेंगी। और नव वर्ष की नवीन सम्भावनाओं के साकार होने में समर्थ सहयोगी की भूमिका निभा सकेंगी।
साधना करना चाहते हैं, उनके लिए आश्विन नवरात्रि से चैत्र नवरात्रि की अवधि में चलने वाले सत्रों हेतु आमंत्रण है। इन सत्रों का नाम है अंतः ऊर्जा जागरण सत्र। इनमें प्रतिदिन दस प्रकार की साधनाएँ कराई जाती हैं। लगभग पाँच दिन मौन रहा जाता है। एक कमरे में एक ही साधक का निवास है।
साधनाएँ कराई जाती हैं। लगभग पाँच दिन मौन रहा जाता है। एक कमरे में एक ही साधक का निवास है। साधनाएँ आडियो माध्यम से संकेतों द्वारा होती हैं। बड़ी उच्चस्तरीय साधना का दमखम रखने वालों के लिए ही इनका प्रावधान है।
साधना की परिणति बताते हुए अथर्ववेद में कहा गया है-’ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता, प्रचोदयन्ताम् पावमानी द्विजानाम् आयुः प्राणं प्रजाँ पशुँ कीर्तिम् द्रविणम् ब्रह्मवर्चसम् मह्यम् दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम्।’ मास्टर रामशरण जी उसे गायत्री की अगाध महिमा का बोध कराकर चले गए। और अनिरुद्ध इस महामंत्र के गहन चिन्तन में लीन हो गया।
साधना है। जिसके द्वारा हमें उस परम सौंदर्य की झलक-झाँकी दिखाती है। अतः आत्मिक सौंदर्य के आकाँक्षी को सदैव सेवा का व्रत अपनाये रहना चाहिए। इस व्रत से हृदय इतना पवित्र एवं परिष्कृत हो जाता है कि जीव में शिव का पावन सौंदर्य बोध होने लगता है।
साधना-संप्रदाय यहाँ हैं, उतने संसार के बाकी सभी देशों को मिलाकर भी नहीं होंगे। यहाँ उन सभी विद्या धाराओं में सामंजस्य है, जो कही और मुखर हो तो उनके अधिकारी विद्वान आपस में ही टकरा जाएँ।
साधना का रहस्य सविधि समझा दिया। सूर्यमंडल में स्थिति गायत्री महाशक्ति का ध्यान चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र की जप विधि उन्होंने अनिरुद्ध को कह सुनायी। साथ ही उन्होंने बताया कि बेटा अनिरुद्ध-तप के बिना जप कुछ ऐसा है जैसे गर्मी से रहित अग्नि। जप के साथ जब तक तप की प्रक्रिया का योग नहीं होता, तब तक जप का प्रभाव नहीं होता।
साधना आँदोलन तो प्रत्येक की धुरी में समाया हुआ है ही सद्भावनाओं का साम्राज्य निश्चित ही स्थापित होगा एवं भारत पुनः जगद्गुरु बनेगा, ऐसा हम सभी का अपनी गुरुसत्ता की ही तरह दृढ़ विश्वास है।
साधना एवं अध्ययन को कभी नहीं भूलता।
साधना का क्रम बनाये रखना चाहिए। इससे अन्तःकरण पवित्र एवं शुद्ध होता है।निश्चय ही इसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ता है।
साधना से लेकर जीवन जीने के हर सूत्र व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण तक की प्रक्रिया का आमूलचूल शिक्षण दिया जाता है। इस अवधि में साधक चौबीस हजार का एक गायत्री अनुष्ठान भी संपन्न कर लेते हैं एवं वरिष्ठ साधकों की अनुभूति प्रधान अमृतवाणी का लाभ लेते हैं, साथ ही साधना विज्ञान के गूढ़तम सूत्रों को गुरुसता द्वारा कराए गए ध्यान द्वारा सीख कर जाते हैं। सभी के लिए पूर्वानुमति लेना आवश्यक है।
साधना के साथ की गयी गायत्री उपासना सारे असंभव को संभव बनाने में सक्षम एवं समर्थ है। तुम समूचे विश्वास के साथ आदि शक्ति माता गायत्री का आँचल थाम लो। माँ कृपा से तुम्हारी सारी पीड़ाएँ दूर होंगी।
साधना -आहार -जप आदि का प्रभाव देखा जा सकता है।
साधनात्मक उपचारों को बढ़ाना होगा।
साधनाएँ आडियो माध्यम से संकेतों द्वारा होती हैं। बड़ी उच्चस्तरीय साधना का दमखम रखने वालों के लिए ही इनका प्रावधान है। इनमें अनुमति सभी को नहीं मिलती । पहले विस्तृत विवरण भेजना पड़ता है। व मार्गदर्शिका का अध्ययन कर लेना होता है।
साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण, नारीजागरण, कुरीति उन्मूलन, नशा निवारण जैसे प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाले कार्यक्रम भविष्य के परिवर्तन की आधारशिला रख रहे हैं। चारों ओर इनकी धूम मची हुई है। अब इस वर्ष को 2002 की वसंत से 2003 की वसंत तक ‘संगठन सशक्तीकरण वर्ष’ मनाने का निर्णय हुआ है। यदि साधना की धुरी पर चलने वाले अपने राष्ट्रव्यापी-विश्वव्यापी संगठन को सशक्त बनाया जा सका तो जो भी आँदोलन हाथ में लिए जाएँगे, वे सफलता के चरम शिखर तक पहुँचाकर रहेंगे।
साधना विज्ञान के गूढ़तम सूत्रों को गुरुसता द्वारा कराए गए ध्यान द्वारा सीख कर जाते हैं। सभी के लिए पूर्वानुमति लेना आवश्यक है।
साधना संयम-साधना, तो सबके लिए एक जैसी ही हैं। फिर उन पर विवाद कैसा? सद्बुद्धि की प्रार्थना तो सभी के लिए की जा सकती है। उसे किसी धर्म विशेष से जोड़कर किसी को क्या मिलेगा? वस्तुतः साधना आँदोलन मानवी व्यक्तित्व के परिष्कार का, तनाव मुक्ति का, जीवन जीने की कला के शिक्षण का आँदोलन है।
साधना मानकर साहस और जिन्दादिली के साथ जीना चाहिए। ये विपत्ति भरे क्षण प्रायः अगले आने वाले क्षणों पर हमारी पकड़ मजबूत करते हैं। हमारे अन्दर सुषुप्तावस्था में वर्षों से निष्क्रिय पड़े आत्मबल को जाग्रत् कर हमें जीवन्त बनाते हैं। साथ ही निराशा के अंधेरे क्षणों को चीर कर आशा की चमकदार किरणों की भरी-पूरी भीड़ सामने ला खड़ी करते हैं। परन्तु ये लाभ मात्र उन्हें ही प्राप्य है, जो इस कठिन एवं विपन्न स्थिति का सामना उतनी ही साहसिकता व उत्साह के साथ करते हैं, जितना कि ऐसे क्षणों में उनसे अपेक्ष्य है।
साधना का अहसास था, पर आज उन्होंने अनिरुद्ध के सामने अपनी साधना का रहस्य सविधि समझा दिया। सूर्यमंडल में स्थिति गायत्री महाशक्ति का ध्यान चौबीस अक्षरों वाले गायत्री महामंत्र की जप विधि उन्होंने अनिरुद्ध को कह सुनायी। साथ ही उन्होंने बताया कि बेटा अनिरुद्ध-तप के बिना जप कुछ ऐसा है जैसे गर्मी से रहित अग्नि। जप के साथ जब तक तप की प्रक्रिया का योग नहीं होता, तब तक जप का प्रभाव नहीं होता।
साधना और सिद्धि के क्षेत्र में दिनोदिन प्रगति की है। उसकी यह नियति पहले ही लिखी जा चुकी थी। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 के अपने प्रसिद्ध भाषण में जिसे नियति से साक्षात्कार का उद्घोष किया था, वह नियति भी वर्षों पहले अंकित हो गई थी, लेकिन उसके अक्षर जिस समय उभरते दिखाई देने लगे थे, वह सन् 1911 का वर्ष था, जिससे आचार्य श्रीराम शर्मा जी का जन्म हुआ था। क्रमश:
साधना ने मानव जाति को एक नूतन उपलब्धि दी।
साधना करते हैं, तो उनका शारीरिक -मानसिक परीक्षण भी यहाँ की प्रयोगशाला में नियमित रूप से चलता है। इससे साधना -आहार -जप आदि का प्रभाव देखा जा सकता है।
साधना की धुरी पर चलने वाले अपने राष्ट्रव्यापी-विश्वव्यापी संगठन को सशक्त बनाया जा सका तो जो भी आँदोलन हाथ में लिए जाएँगे, वे सफलता के चरम शिखर तक पहुँचाकर रहेंगे।
साधना है, जिनमें इंद्रियों को इतना स्तब्ध कर दिया जाता है कि अंतरात्मा अपने विशुद्ध शाँत रूप में मन से बाहर निकलकर स्वतः प्रकट हो जाती है।
साधना का दमखम रखने वालों के लिए ही इनका प्रावधान है। इनमें अनुमति सभी को नहीं मिलती । पहले विस्तृत विवरण भेजना पड़ता है। व मार्गदर्शिका का अध्ययन कर लेना होता है। जनवरी 22 के अंत तक तो ये सत्र 1 से 4, 6 से 10, 11 से 14, 16 से 20, 21, से 24, व 26 से 30 की तारीखों में चलेंगे, पर फरवरी में वसंत पर्व ( 17/2/2002) होने के कारण 16 से 2 वाला सत्र स्थगित रहेगा।
साधना की राह पर चल दिया। मास्टर जी ने उसकी पढ़ाई का पहिया तो चला दिया था, लेकिन घर का पहिया अभी तक दलदल में फँसा था। इस कारण अनिरुद्ध को चने बेचने का काम लगातार करना पड़ता था। अपनी चतुः सूत्री साधना के साथ प्रति मास सवा लक्ष गायत्री महामंत्र के अनुष्ठान के साथ वह पढ़ाई की लालटेन को जलाए रखता। उसे मास्टर जी के द्वारा कहा गया महर्षि अरविन्द का वचन-यदि प्रभु का संस्पर्शबद्ध हो तो सब कुछ संभव है, हमेशा याद रहता।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-April
साधनारत दिव्य-कर्मी विधाता द्वारा दी गई ‘कर्म की स्वतंत्रता’ का ठीक-ठीक उपयोग करने में समर्थ होता है। वह स्वयं की अभिरुचियों, आदतों एवं प्रवृत्तियों को नए सिरे से गढ़ता है। उसके अंतराल में नए संस्कार जन्म रकने की लालसा, अहंकार का झंडा ऊँचा करने की चाहत नहीं रह जाती। प्रत्येक काम लोक के प्रति करुणा, आत्मविकास के सोपानों पर चढ़ने के उद्देश्य से होता है। यही कर्म पुण्य बन जाते हैं।
साधना करने पर प्रत्येक शिष्य का जीवन सत्य बन सकता है।
साधना का अर्थ है कठोर संयम, शरीर ही नहीं मन पर भी नियंत्रण रखना। उन सभी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों को वर्जित समझना जो हमारी जीवनी शक्ति को नष्ट करती हैं, हमारी चिन्तन शक्ति को विकृत एवं बर्बाद करती हैं। यदि व्यावहारिक रूप से कतिपय साधना सूत्रों को अपनाना हो तो तप के विशेष समय में शारीरिक तल पर 1. ब्रह्मचर्य, 2. अस्वाद, 3. किसी से सेवा न लेना, 4. कठोर बिछौने पर शयन करना एवं 5. दिनचर्या को पूर्णतया नियमित एवं अनुशासित रखना जैसे सूत्रों को अपनाया जा सकता है।
साधना के द्वारा अहं के उन्मूलन के स्थान पर उसका पोषण एवं संवर्द्धन करते हैं।
साधना एवं आराधना के ये सभी सूत्र मिलकर तप की उच्चस्तरीय प्रयोग भूमि विनिर्मित करते हैं। इसके परिणाम कैसे और कितने प्रभावकारी है, यह कहने-सुनने की बात नहीं है। नवरात्रि के दिनों में इन्हें अपनाने वाले की अनुभूति अपने आप ही इसकी सत्यता बखान कर देगी। प्रयोग के अन्तिम दिन साधक को पूर्णाहुति के रूप में हवन का विशेष उपक्रम करना चाहिए। हवन की प्रत्येक आहुति के साथ यह भाव रखा जाना चाहिए।
साधना सत्य है। जो साधना करने पर प्रत्येक शिष्य का जीवन सत्य बन सकता है।
साधना रूपी कल्पतरु को छिन्न-भिन्न करने वाला ‘अहंकार-कुठार’ दीर्घ साधना के बाद भी आप में छिपा रहा। यही आपके लिए घोर शत्रु बन गया और इसी कारण आपको आकाशवाणी सुनाई पड़ी। अब आप ही बताइए कि मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य करूं? जिससे आपका कल्याण हो सके।
साधना की धुरी पर संभाल ली गई तो संगठन सभी शक्तिपीठों के ट्रस्टीगणों-प्रज्ञामंडलों, महिला मंडलों के समन्वय से द्रुतगति से जिला स्तर पर चल पड़ेगा एवं एक वर्ष में वह परिणाम देने लगेगा जो वह विगत तीस वर्ष में नहीं दे पाया।
साधना इन्हें बड़ी ही भावपूर्ण रीति से छुएगी।
साधना विज्ञान के मर्मज्ञ महर्षियों द्वारा अनुभूत सत्य है कि चैत्र नवरात्रि की साधना के प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना की रीति-नीति एवं अनुशासनों का ढंग से पालन किया गया हो। इन दिनों ग्रहों की गति, सौर मण्डल में सूर्य के चारों ओर भ्रमण कर रही पृथ्वी की स्थिति कुछ अलग ही होती है। इन दिनों समूची प्रकृति कुछ ऐसे सरंजाम जुटाती है, जो चर्म चक्षुओं से भली प्रकार नजर न आने के बावजूद साधकों की साधना के लिए विलक्षण होते हैं।
साधना के लिए प्रेरित करना, 3. विचार क्रान्ति के सत्साहित्य को औरों को पढ़ाना, 4. छोटे स्तर पर ही सही किसी सुपात्र की सहायता करना एवं 5. सृष्टि के सभी प्राणी जगन्माता गायत्री की सन्तानें हैं, सबमें माँ ही समायी है, ऐसी भावानुभूति में जीना।
साधना सफल कर ली। इसमें उनके शब्द हैं-
साधना ही सार है, यही सम्भावनाओं की द्वार है। नव सम्वत्सर का यही तत्त्वोपदेश है।
साधनामय जीवन का निष्कर्ष बताते हुए उन्होंने लिखा- अध्यात्म एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। इसके प्रयोगों के लिए हमें एक सच्चे वैज्ञानिक की भाँति सत्यान्वेषी बनना होगा। अध्यात्म की भाषा में शिष्यत्व ही इसका पर्याय और कसौटी है।
साधना की अन्तर्यात्रा शुरू होती है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में इसी के बारे में गूढ़ संकेत दिए हैं। इस प्रथम सूत्र में उन्होंने योग साधना की पूर्व तैयारियों, साधना में प्रवेश के लिए आवश्यक आवश्यकताओं एवं अनिवार्यताओं का ब्योरा सूत्रबद्ध किया है। समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद एवं कैवल्यपाद तथा 195 सूत्रों वाले योगदर्शन की आधारशिला यही पहला सूत्र है।
साधना की अन्तिम रात्रि में तुम विघ्न न डालो। माँ की महिमा का गायन करके मैं मन्दिर में ही हवन करूंगा और फिर घर न जाकर तुम्हारे ही पास आहार बनने आ जाऊँगा।’
साधनाओं को अपने सामने बिठाकर सिखा देते।
साधना की बराबरी कर सके, ऐसा भला त्रिभुवन में कौन होगा? अतः अब मैं यहाँ से जाकर मनुष्य-समाज में पहुँचूँगा उन्हें इस अध्यात्म-रहस्य और अपने तप-तेज से परिचित करवाऊँगा। और उन सभी को बताऊँगा कि समूचे जगत् में ऐसी महान् साधना करने वाला दूसरा कोई भी नहीं है? आत्मश्लाघा और अहंकार से उनका मन-प्राण ओतप्रोत था, तभी उन्हें आकाशवाणी से ये वचन सुनने को मिले-
साधना से उपजी संवेदना इस विराट् ज्ञान को छूने, जानने एवं पहचानने की सार्थक रीति है। इस रीति से जो जाना जाता है, उसे जानकर सब कुछ जान लिया जाता है। तभी तो उपनिषद् कहते हैं- ‘तस्मिन् विज्ञाते सर्वं विजानात्’ अर्थात् उसको जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है। महर्षि अरविन्द ने ‘ द ह्युमन साइकिल’ में भी इसी सत्य को दुहराया है। उन्होंने कहा है कि अतिभौतिक प्रकृति के नियम और सम्भावनाओं को जाने बिना न तो भौतिक प्रकृति और न सम्भावनाएँ ही जानी जाती हैं।
साधना के एक दिन और एक रात का पुण्य नहीं देना चाहते तो कोई बात नहीं। रात्रि के अन्तिम प्रहर में माँ गायत्री की महिमा में जो अन्तिम गीत तुमने गाया है केवल उसी का पुण्य देकर, मुझे पाप से बचाओ। ब्रह्मराक्षस पुनः गिड़गिड़ाते स्वर में बोला।
साधना, यथार्थ तप का मूल उद्देश्य अहं का उन्मूलन और उच्छेदन है। लेकिन इस सत्य से अनभिज्ञ अज्ञानी जन अपने जप-तप-व्रत इसलिए करते हैं, संसार उन्हें तपस्वी के रूप में जाने-माने एवं पहचाने। उनके तप से उन्हें कोई ऐसी सिद्धि मिले, जिससे वह लोक विख्यात हो सके। इस तरह उनके सारे प्रयास उलटी दिशा में चलते रहते हैं। वे अपनी साधना के द्वारा अहं के उन्मूलन के स्थान पर उसका पोषण एवं संवर्द्धन करते हैं।
साधना के व्यावहारिक बिन्दु निम्न है- 1. इस समझ को- आत्मसात करना ही योग सत्य की प्राप्ति है, सिद्धि की प्राप्ति नहीं। 2. ‘अथ का पुण्य क्षण’ लाने के लिए गुरुदेव को पुकारना, उनकी कृपा का आह्वान करना। 3. योग के प्राथमिक अनुशासन के रूप में किसी सुखप्रद आसन (सुखासन, पद्मासन आदि) पर देर तक बैठकर गायत्री महामंत्र को जपने का अभ्यास, 4. इस विवेक पथ का अनुशीलन करके भी यदि अभी तक हमें योग की अनुभूति नहीं हो सकी है, तो इसका एक मात्र कारण यह है कि अपनी पात्रता अभी परिपक्व नहीं है, इसे परिपक्व करने के प्रयास में प्राणपण से जुटना।
साधना कोई शॉर्टकट नहीं
साधना प्रखर एवं प्रचण्ड तभी बनती है, जब उसमें सम्यक् उपासना के साथ साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़ें हों। उपासना के क्रम में साधकों को पूरी भक्ति एवं श्रद्धा के साथ 24,000 का जप पूर्ण करना होता है। नवरात्रि के दिनों के हिसाब से प्रतिदिन की जप संख्या का निर्धारण होता है। 30 माला जप करने से जप संख्या का विधान भली-भाँति पूरा हो जाता है। परन्तु जैसे-तैसे जप पूरा कर लेना उपासना नहीं है।
साधना, उपासना व राष्ट्र आराधना का अद्भुत समन्वय होता था। पृथक से प्रकाशित पुस्तकों रहित विभिन्न कवियों को हमारे गुरुवर ने लिखना सिखाया, छंदबद्ध करना सिखाया एवं प्रायः दो से तीन हजार कविताएँ इनसे लिखवा लीं। इन्हीं का समन्वित रूप काव्य के वाङ्मय के खंडों के रूप में शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा हैं। देखने योग्य बात है- कविता लेखन पर सुव्यवस्थित मार्गदर्शन। कवि अपनी भाव संवेदनाओं को पिरोते हुए कैसे लिखें, यह स्टीक बिंदुवार चिंतन वे सतत देते रहते थे।
साधना और आराधना के कठोर अनुशासन जुड़ें हों। उपासना के क्रम में साधकों को पूरी भक्ति एवं श्रद्धा के साथ 24,000 का जप पूर्ण करना होता है। नवरात्रि के दिनों के हिसाब से प्रतिदिन की जप संख्या का निर्धारण होता है। 30 माला जप करने से जप संख्या का विधान भली-भाँति पूरा हो जाता है। परन्तु जैसे-तैसे जप पूरा कर लेना उपासना नहीं है।
साधना की रीति-नीति एवं अनुशासनों का ढंग से पालन किया गया हो। इन दिनों ग्रहों की गति, सौर मण्डल में सूर्य के चारों ओर भ्रमण कर रही पृथ्वी की स्थिति कुछ अलग ही होती है। इन दिनों समूची प्रकृति कुछ ऐसे सरंजाम जुटाती है, जो चर्म चक्षुओं से भली प्रकार नजर न आने के बावजूद साधकों की साधना के लिए विलक्षण होते हैं।
साधना में प्रवेश के लिए आवश्यक आवश्यकताओं एवं अनिवार्यताओं का ब्योरा सूत्रबद्ध किया है। समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद एवं कैवल्यपाद तथा 195 सूत्रों वाले योगदर्शन की आधारशिला यही पहला सूत्र है।
साधना के सत्य को पूरी तरह जिया था। अपने जीवन को इसकी अनुभूतियों के रस में डूबोया था। फिर भी उन्हें इस बार भी अपनी पात्रता को सिद्ध करना पड़ा। जो उन्हीं की भाषा में ‘पिसे को पीसा जाना था।’ उनकी जाग्रत् चेतना की पुकार इतनी तीव्र हो उठी कि उनके सद्गुरु हिमालय के गुह्यक्षेत्र से भागे चले आए।
साधना क्रिया में नहीं विचारों एवं भावनाओं में निहित है। विचार और भावनाओं की दिशा बदल जाय तो सामान्य क्रिया भी अध्यात्म प्रदायिनी हो जाती है। मेरे गुरुदेव कहा करते थे- बेटा जीवन का शीर्षासन ही अध्यात्म है। इसे वे अपनी खास शैली में- उल्टे को उलटकर सीधा करना भी कहते थे। उनके आदेशानुसार- मैंने यही किया है।
साधनाएँ छपा करती थीं। ये साधनाएँ छपती तो अभी भी हैं, पर तब खास बात यह थी कि जिज्ञासा करने पर पत्र लिखने पर उन दिनों गुरुदेव अपने पास बुला लिया करते थे। और जिज्ञासु को इन साधनाओं को अपने सामने बिठाकर सिखा देते।
साधना की धुरी पर सुव्यवस्थित-संगठित बना देना है। एक प्रकार से यह पुनर्गठन की महापूर्णाहुति एवं सारे प्रचार-दिग्विजयी पुरुषार्थ से उपजी ऊर्जा के आगामी आठ वर्षों में सुनियोजन का एक प्रकार से श्वेत पत्र होगा।
साधना सत्र एवं क्षेत्रीय कार्यकर्त्ताओं के सम्मेलनों के आयोजन हों। प्रतिवर्ष एक-एक यह आयोजन निश्चित रूप से हो।
साधना का निचोड़ नवयुग की आचार संहिता के रूप में क्राँतिधर्मी साहित्य लिखकर प्रस्तुत कर दिया, साथ ही बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण एवं दीपयज्ञों के माध्यम से उसकी महापूर्णाहुति की घोषणा भी वे कर गए। 2 जून गायत्री जयंती को महाप्रयाण के साथ ही उनका अंतिम संदेश एक आश्वासन दे गया कि संगठन का कार्य और बढ़ेगा एवं परमवंदनीया माता उसे दिशा देंगी।
साधना के समय को वे प्रपंच मानते रहे, वही अनेकों को सुविधा पहुँचाने और ऋण चुकाने के कारण परमार्थ गिना गया।
साधना में कोई रुचि न थी। पर अपनी जाति के अहं में मैं दूसरे गायत्री साधकों की निन्दा करता फिरता था। मेरे ही गाँव में एक अन्य तपस्वी रहते थे, जो जाति और कर्म दोनों से ही ब्राह्मण थे। उनमें न तो अपने कुलीन होने का अहं था और न ही जाति-भेद की पक्षपात पूर्ण भावना। वह बराबर कहा करते थे कि माँ गायत्री तो आदि जननी है, समस्त सृष्टि उनकी सन्तान है।
साधना व कार्यकर्ता प्रशिक्षण की योग्यता रखते हों, ज्ञानरथ, झोला पुस्तकालय द्वारा ज्ञानयज्ञ में सक्रिय भागीदारी करते हों तथा मीडिया आदि कार्यों से जुड़े हों। इस जिला समन्वय समिति को उस जिले (या जिलों के समुच्चय) की शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, सक्रिय प्रज्ञामंडलों, महिला मंडलों, स्वाध्याय मंडलों से जाड़ा जाएगा। इस समिति के सदस्यों का निर्धारण क्षेत्रीय स्तर पर सर्वसम्मति से होकर केंद्र द्वारा उसका अनुमोदन होगा। तदुपराँत सभी एक ही बैनर तले विभिन्न प्रकोष्ठों में कार्य करेंगे। चाहे वह उस जिले के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हो, प्रज्ञा संस्थान/संस्थानों के वार्षिकोत्सव हों, प्रज्ञापुराण या महिला जागरण सम्मेलनों के आयोजन हों अथवा प्रबुद्ध वर्ग के सम्मेलन, वर्कशॉप या भारतीय संस्कृति ज्ञानपरीक्षा संबंधी गोष्ठियाँ-सभी एक ही मंच तले संपन्न होगी।
साधनाओं से उपजी संवेदनाओं का भी सुयोग जुटाना होगा। तभी तत्त्व को भी जाना जा सकेगा और तरंग को भी। शाश्वत की अनुभूति और सामयिक का सदुपयोग- यह वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का ही सुफल हो सकता है। इसे तथ्य के रूप में स्वीकारते हुए पश्चिम के मेधा सम्पन्न दार्शनिक बट्रेण्ड रसेल का कहना है कि वैज्ञानिक ज्ञान के साथ विवेक का समीचीन प्रयोग होना चाहिए। वैज्ञानिक आध्यात्मवाद की इस रीति से ही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तम् ब्रह्म’ की अनगिन चेतन धाराओं की अनुभूति पायी जा सकती है।
साधना का समुचित पात्र चाहिए। साधना का अर्थ है कठोर संयम, शरीर ही नहीं मन पर भी नियंत्रण रखना। उन सभी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों को वर्जित समझना जो हमारी जीवनी शक्ति को नष्ट करती हैं, हमारी चिन्तन शक्ति को विकृत एवं बर्बाद करती हैं। यदि व्यावहारिक रूप से कतिपय साधना सूत्रों को अपनाना हो तो तप के विशेष समय में शारीरिक तल पर 1. ब्रह्मचर्य, 2. अस्वाद, 3. किसी से सेवा न लेना, 4. कठोर बिछौने पर शयन करना एवं 5. दिनचर्या को पूर्णतया नियमित एवं अनुशासित रखना जैसे सूत्रों को अपनाया जा सकता है।
साधना उत्कृष्ट है। लेकिन अभी तुमने अध्यात्म ज्ञान के रहस्य को नहीं जाना है। अध्यात्म ज्ञान का यह रहस्य गुरुभक्त अनिमेष के पास है। उसकी दृष्टि क्रान्तिदर्शी एवं अन्तर्चेतना निर्दोष व निर्मल है। गुरुभक्ति के प्रभाव ने उसे सर्वथा अहंशून्य बना दिया है।
साधना जीने का मंत्र सिखाता है। जब जीवन साधना निखरने लगती है, तो पापकर्म स्वतः नहीं बन पड़ते। रोजमर्रा के कषाय-कल्मषों एवं पापकर्मों के बीजों को भूनकर राख कर देने के लिए उनका स्वरूप बदलने के लिए इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री की ज्ञानगंगा बहाई। कभी जो प्रतिबंधों से घिरी थी, उस साधना को जन-जन के लिए उपलब्ध करा दिया। गायत्री मंत्र का भर्गतश्रव पापनाशक सविता देव का तेज धारण करने की प्रेरणा देता है।
साधना के परिणाम बहुत व्यापक और असरकारक होते हैं। ऐसे तप से कठिन प्रारब्ध के दुर्धर्ष दुर्योग कटते हैं और उज्ज्वल जीवन की प्रकाश किरणें अवतरित होती हैं। यह पूरी तरह से शास्त्र सम्मत एवं साधना विज्ञान के मर्मज्ञ महर्षियों द्वारा अनुभूत सत्य है कि चैत्र नवरात्रि की साधना के प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना की रीति-नीति एवं अनुशासनों का ढंग से पालन किया गया हो। इन दिनों ग्रहों की गति, सौर मण्डल में सूर्य के चारों ओर भ्रमण कर रही पृथ्वी की स्थिति कुछ अलग ही होती है।
साधना से वंचित रहा हो। यदि किसी के जीवन में कभी ऐसे अवसर आए भी हैं, तो अवश्य उसकी कोई मजबूरी रही होगी। अन्यथा तपोमूर्ति गुरुदेव की सन्तानें तप साधना से कब पीछे हटने वाली हैं। और वह भी तब, जब श्रेष्ठतम मुहूर्त ने द्वार पर दस्तक दी हो। साधना के अभ्यासी अपने तपस्वी परिजनों से इस विशेष नवरात्रि में कुछ विशेष ही उम्मीदें रखी गयी हैं।
साधना, दिन-रात, धूप-वर्षा, भीषण शीत, उग्रतपन किसी की भी चिन्ता किए बिना अविचलित भाव से बियावान, भीषण, भयानक जंगल में निराहार जीवन बिताया और काशी के साधारण से व्यक्ति अनिमेष के सामने उसकी सारी तपस्या निष्फल हो गयी। अन्तर्द्वन्द्व से उनका मन हाहाकार कर उठा। तप की स्थिरता क्षण भर में ही जल के फेन की भाँति विलीन हो गयी।
साधना के प्रवेश द्वार की पहचान जरूरी है। क्योंकि यही वह महत्त्वपूर्ण स्थल है, जहाँ से योग साधना की अन्तर्यात्रा शुरू होती है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में इसी के बारे में गूढ़ संकेत दिए हैं। इस प्रथम सूत्र में उन्होंने योग साधना की पूर्व तैयारियों, साधना में प्रवेश के लिए आवश्यक आवश्यकताओं एवं अनिवार्यताओं का ब्योरा सूत्रबद्ध किया है। समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद एवं कैवल्यपाद तथा 195 सूत्रों वाले योगदर्शन की आधारशिला यही पहला सूत्र है।
साधना का श्रेष्ठतम मुहूर्त है। यूँ तो साधना हरपल-हरक्षण शुभ होती है। किन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में उचित रीति-नीति एवं विशेष विधान से की जाने वाली तप-साधना के परिणाम बहुत व्यापक और असरकारक होते हैं। ऐसे तप से कठिन प्रारब्ध के दुर्धर्ष दुर्योग कटते हैं और उज्ज्वल जीवन की प्रकाश किरणें अवतरित होती हैं। यह पूरी तरह से शास्त्र सम्मत एवं साधना विज्ञान के मर्मज्ञ महर्षियों द्वारा अनुभूत सत्य है कि चैत्र नवरात्रि की साधना के प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं।
साधना एक। साधना सफल है, सही है या गलत है, इससे व्यक्तित्व का विकास जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व के विकास के बाद में वो करना, जिसको हम ऋद्धियाँ कहते है, सिद्धियाँ कहते है, सफलता कहते हैं। नहीं साहब! भजन करने से सिद्धियाँ मिलनी चाहिए। नहीं बेटे, आप गलत बात कहते हैं।
साधना सत्रों में भागीदारी करके अपनी जिज्ञासा का समाधान पाया जा सकता है। इस लेखमाला के भावी पृष्ठ भी जिज्ञासु साधकों के लिए समाधान सामग्री प्रस्तुत करते रहेंगे। योग अपने आप में क्या है, इसे अच्छी तरह से जान लेने पर इसकी सच्ची साधना सहज सम्भव है। महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र में योग का सत्य बताते हैं और परम पूज्य गुरुदेव इसे अपने जीवन के प्रयोग से सिद्ध करते हैं। योग क्या है?
साधना के रहस्यों का अद्भुत रीति से उद्घाटन किया है।
साधना के प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना की रीति-नीति एवं अनुशासनों का ढंग से पालन किया गया हो। इन दिनों ग्रहों की गति, सौर मण्डल में सूर्य के चारों ओर भ्रमण कर रही पृथ्वी की स्थिति कुछ अलग ही होती है। इन दिनों समूची प्रकृति कुछ ऐसे सरंजाम जुटाती है, जो चर्म चक्षुओं से भली प्रकार नजर न आने के बावजूद साधकों की साधना के लिए विलक्षण होते हैं।
साधना कही जाती है। छलनी में अमृत की धार भी गिरे तो भी वह टिकेगी नहीं। उपासना में प्राप्त तप शक्ति का अमृतत्त्व टिक सके इसके लिए साधना का समुचित पात्र चाहिए। साधना का अर्थ है कठोर संयम, शरीर ही नहीं मन पर भी नियंत्रण रखना। उन सभी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों को वर्जित समझना जो हमारी जीवनी शक्ति को नष्ट करती हैं, हमारी चिन्तन शक्ति को विकृत एवं बर्बाद करती हैं।
साधना कैसे पूरी करोगे? पथ में मिले उस व्यक्ति ने उससे फिर कहा।
साधना तो हो
साधना है। यही मेरी सिद्धि और यही मेरा अध्यात्म तत्त्व है। यही वह रहस्य है, जिसे पाने के लिए आपको दैवी-निर्देश प्राप्त हुआ है।
साधना का एक नया द्वार खुला।
साधना के द्वारा स्वयं सुरक्षित हो। हे महाभाग, यदि तुम अपनी साधना के एक दिन और एक रात का पुण्य नहीं देना चाहते तो कोई बात नहीं। रात्रि के अन्तिम प्रहर में माँ गायत्री की महिमा में जो अन्तिम गीत तुमने गाया है केवल उसी का पुण्य देकर, मुझे पाप से बचाओ। ब्रह्मराक्षस पुनः गिड़गिड़ाते स्वर में बोला।
साधना करने वाले, अपनी चिंतन क्षमता, कल्पनाशक्ति, भाव संपदा खपाने वाले तपस्वी युगद्रष्टा आचार्य श्री को पत्रकारिता के क्षेत्र में भी एक पथप्रदर्शक के रूप में याद रखा जाना चाहिए। उन्होंने दार्शनिक, साहित्यकार एवं मार्गदर्शक तीनों की भूमिका निभाई। जीवनभर वे अपनी लेखनी से, पुस्तकों-पत्रिकाओं, पत्रों व प्रत्यक्ष चर्चा से औरों को भी प्रोत्साहित करते रहे, ताकि सकारात्मक लेखन चलता रहे, जिस किसी के भी अंदर पात्रता हो, वह युगसाहित्य के निर्माण में भागीदारी करे। कार्य बड़ा था, वे स्वयं भी सामर्थ्य रखते थे एवं अस्सी वर्ष की आयु पूरी होने तक उन्होंने जो लिखा, वह अपने आप में एक कीर्तिमान है। फिर भी वैज्ञानिक अध्यात्मवाद हो, चाहें काव्यलेखन, विभिन्न स्तर की साहित्यिक प्रतिभाओं को सतत प्रेरित कर उनका पथ प्रदर्शन जीवन भर किया।
साधना दो। यों है बेटे इसका चक्र। आप समझ गए, यह एक चक्र है। कौन-सा? इसमें तीन चीजें शामिल है, साधना एक।
साधना में कोई रहस्यपूर्ण चमत्कार है। अपने मन में ऐसा विचार करते हुए उसने उस गायत्री भक्त से कहा- कल्याणमय! तुम अपनी नवरात्रि साधना के मात्र एक दिन और रात्रि का पुण्य मुझे दे दो, तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा, अन्यथा मैं तुम्हारा भक्षण करके ही चैन लूँगा।
साधना की दात्री भी वही है। हम असंख्य इच्छाओं की पूर्ति की अछोर कल्प वल्ली हैं। लेकिन हमारी ये सभी इच्छाएँ माँ से जुड़कर ही पूर्ण होती है। जब हम अपने अन्तर का सब कुछ माँ के चरणों में न्यौछावर कर देते हैं और एक आन्तरिक शून्यता की अनुभूति पाते हैं, तो माँ बरबस ही इस शून्यता में पूर्णता भर देती है। क्योंकि शून्यता में ही पूर्णता भरती है।
साधना वर्ष की शुरुआत के साथ ही इस विराट संगठन को सशक्त बनाने की प्रक्रिया आरंभ हो गई थी, किंतु अब हीरक जयंती महोत्सव मनाने एवं उसकी पूर्णाहुति के प्रसाद रूप में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के विधिवत् बन जाने के बाद उसकी क्रियापद्धति शुरू करने के साथ इस बसंत से संगठन-सशक्तीकरण वर्ष की शुरुआत की गई है। पुनर्गठन से सशक्तीकरण की इस महायात्रा का यह विवरण इसीलिए परिजनों के समक्ष प्रस्तुत किया गया कि वे उस भूमिका को समझ सकें, जो अब उन्हें संगठन को सशक्त बनाने के लिए निभानी है।
साधना के लिए सच्ची चाहत अपने चरम को छूने लगी। उसकी अभीप्सा की ज्वालाओं का तेज तीव्रतम हो गया। उसकी पात्रता की परिपक्वता हर कसौटी पर खरी साबित हो चुकी। उसका शिष्यत्व पूरी तरह से जाग उठा। उसकी पुकार में वह तीव्रता और त्वरा आ गयी कि सद्गुरु उससे मिलने के लिए विकल-बेचैन हो उठे।
साधना आरंभ हुई, जिसकी पूर्णाहुति के उपलक्ष्य में 1986-87 में सारे भारत में 108 कुँडी यज्ञों सहित राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की एक वृहत शृंखला चली। बीच-बीच में शक्तिपीठों, प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों की स्थापनाएँ, प्राण प्रतिष्ठाएँ होती रही। 1989-90 की अवधि इस मिशन की अति महत्वपूर्ण अवधि है, जिसमें पूज्यवर ने अपने सारे जीवन भर की साधना का निचोड़ नवयुग की आचार संहिता के रूप में क्राँतिधर्मी साहित्य लिखकर प्रस्तुत कर दिया, साथ ही बारह वर्षीय युगसंधि महापुरश्चरण एवं दीपयज्ञों के माध्यम से उसकी महापूर्णाहुति की घोषणा भी वे कर गए। 2 जून गायत्री जयंती को महाप्रयाण के साथ ही उनका अंतिम संदेश एक आश्वासन दे गया कि संगठन का कार्य और बढ़ेगा एवं परमवंदनीया माता उसे दिशा देंगी।
साधना सूत्रों को अपनाना हो तो तप के विशेष समय में शारीरिक तल पर 1. ब्रह्मचर्य, 2. अस्वाद, 3. किसी से सेवा न लेना, 4. कठोर बिछौने पर शयन करना एवं 5. दिनचर्या को पूर्णतया नियमित एवं अनुशासित रखना जैसे सूत्रों को अपनाया जा सकता है।
साधना में प्रवेश करना है, उन्हें अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि अथ को समझकर साधक का जीवन अर्थवान् बनता है। बिना अथ को समझे वह पूरी तरह से अर्थहीन रह जाता है।
साधना का प्रारम्भ होता है। अन्तर्यात्रा का विज्ञान जन्म लेता है। अस्तित्त्व में अनूठे प्रयोग शुरू होते हैं। महर्षि पतंजलि के इस प्रथम सूत्र को जो नहीं समझ पाते, योग साधना का प्रवेश द्वार उनके लिए कभी भी नहीं खुलता। परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में भी यह द्वार इसी रीति से खुला था।
साधना सत्य है, समाधिगम्य है। वह अलौकिक स्पर्श, स्पर्श भर न रहा, स्पर्शयोग बन गया। उस दिन साधना का एक नया द्वार खुला।
साधनाएँ छपती तो अभी भी हैं, पर तब खास बात यह थी कि जिज्ञासा करने पर पत्र लिखने पर उन दिनों गुरुदेव अपने पास बुला लिया करते थे। और जिज्ञासु को इन साधनाओं को अपने सामने बिठाकर सिखा देते।
साधना के द्वारा अध्यात्म ज्ञान को पा सकते हैं।
साधना के मात्र एक दिन और रात्रि का पुण्य मुझे दे दो, तो मैं तुम्हें छोड़ दूँगा, अन्यथा मैं तुम्हारा भक्षण करके ही चैन लूँगा।
साधना एवं सच्ची सिद्धि के रहस्य को जान लिया।
साधना की सफलता का सुख अनुभव किया। इसमें एक समय ऐसा भी आया कि बच्चों सहित सभी पक्षी दूर कहीं उड़ गए और फिर नहीं लौटे।
साधना है। इसी से मुझे गुरु कृपा का प्रसाद मिला है। मैं तो गुरुगत प्राण हूँ देव। अपने सद्गुरु की कृपा से मुझे इस सत्य की स्पष्ट अनुभूति होती है - कि देह सिर्फ मेरी है, इसमें प्राण गुरुदेव के विराजते हैं। केवल मन मेरा है- परन्तु इसके माध्यम से जो विचार प्रवाह उमड़ता है, वह गुरुदेव का है।
साधना के अभ्यासी अपने तपस्वी परिजनों से इस विशेष नवरात्रि में कुछ विशेष ही उम्मीदें रखी गयी हैं। उनके सम्मिलित तप के महास्त्र का उपयोग युगान्तरीय चेतना अपने उच्चस्तरीय प्रयोजन हेतु करने वाली है।
साधना की चरम परिणति है ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की प्रबल भावानुभूति है। तपस्वी यदि सच्चा है तो वह आराध्य के बगैर नहीं रह सकता। वह अपने तप के सुपरिणामों, सत्परिणामों का वितरण करता चला जाता है। आराधना तप की सुगन्ध है, तप का ज्योतिर्मय प्रकाश है, तप की ऊर्जा का अनुभूतिपूर्ण विस्तार है। यह स्वयं की आत्म चेतना का व्यापक विस्तार है।
साधना का ऐसा सुयोग कुछ वर्षों तक नियमित रूप से रह सके तो फिर उसके संकल्प मिथ्या नहीं होते। उसके द्वारा सोचे गए कार्य अनायास ही होने लगते हैं। दुर्धर्ष दुर्योगों के चक्रव्यूह अपने आप ही ध्वस्त होते हैं। साधक पर माँ आदिशक्ति की कृपा कुछ ऐसी होती है कि कुटिल काल भी अपनी चाल बदलने पर मजबूर होता है।
साधना की महिमा पूरी दुनिया में प्रसारित होना चाहिए। मैंने कठिन से कठिन एवं विपरीत क्षणों में उग्र तप करके विजय पायी है।
साधना के व्यावहारिक तल पर 1. किसी भी तरह के ईर्ष्या, द्वेष से बचना, 2. पर चर्चा, पर निन्दा से हर तरह से बचना, 3. विपरीत परिस्थितियों में भी क्रोध न करना, शान्त रहना, 4. परेशानी आने पर भी आदि शक्ति जगज्जननी माँ गायत्री एवं परम कृपालु गुरुदेव की कृपा पर विश्वास करके प्रसन्न रहना, एवं 5. नियमित स्वाध्याय करना जैसे सूत्रों को अपनाया जाना चाहिए। शारीरिक और मानसिक तल पर इन सभी अनुशासन सूत्रों को अपनाने वाला अपने आप ही सुपात्र, सत्पात्र बन जाता है। उसमें उपासना द्वारा प्राप्त शक्ति केबल पर ब्रह्मतेज चमकने, छलकने लगता है। यदि उपासना और साधना का ऐसा सुयोग कुछ वर्षों तक नियमित रूप से रह सके तो फिर उसके संकल्प मिथ्या नहीं होते। उसके द्वारा सोचे गए कार्य अनायास ही होने लगते हैं।
साधनाओं का सार है। उनके कथन की समाप्ति के बाद सभी एक-एक करके उठे, सबको अब चरण स्पर्श का सौभाग्य मिला था।
साधना का सार ही नहीं, हमारी संस्कृति का निष्कर्ष भी है। वेदों की घोषा, अपाला, लोपामुद्रा आदि मंत्रदृष्टाओं में अभ्भृण ऋषि की कन्या ‘वाक्’ का स्थान महिमामय है। उसके द्वारा रचित देवीसूक्त में भावी युगों की शक्ति उपासना का अंकुरण मिलता है। ‘अहं राष्ट्रीय संगमनी वसूनाँ’ एवं ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि’ आदि मंत्रों में वह कहती है कि ‘मैं राष्ट्र को बाँधने वाली शक्ति हूँ। मैं ही उसे ऐश्वर्यों से सम्पन्न करती हूँ।
साधनामय जीवन ही नहीं उनकी देह भी दिव्य होती है। वह तपोमूर्ति की तपस्या के तेज के प्रकट होने का माध्यम है। इस अलौकिक देह में सबसे अनुपम है प्रभु के चरण, शिष्यों के आश्रय स्थल। इन चरणों से जो गुरुकृपा की गंगा बहती है, उसके स्पर्श मात्र से त्रयताप छूट जाते हैं। इस स्पर्श की अनुभूति जीवन में बनी रहे, तो फिर और बाकी क्या रहा?
साधना करने वाला दूसरा कोई भी नहीं है? आत्मश्लाघा और अहंकार से उनका मन-प्राण ओतप्रोत था, तभी उन्हें आकाशवाणी से ये वचन सुनने को मिले-
साधना का तीसरा महत्त्वपूर्ण आयाम है आराधना। यह दरअसल तप से उत्पन्न ज्ञान है। तप साधना की चरम परिणति है ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की प्रबल भावानुभूति है। तपस्वी यदि सच्चा है तो वह आराध्य के बगैर नहीं रह सकता। वह अपने तप के सुपरिणामों, सत्परिणामों का वितरण करता चला जाता है।
साधना के लिए विलक्षण होते हैं।
साधना से कब पीछे हटने वाली हैं। और वह भी तब, जब श्रेष्ठतम मुहूर्त ने द्वार पर दस्तक दी हो। साधना के अभ्यासी अपने तपस्वी परिजनों से इस विशेष नवरात्रि में कुछ विशेष ही उम्मीदें रखी गयी हैं। उनके सम्मिलित तप के महास्त्र का उपयोग युगान्तरीय चेतना अपने उच्चस्तरीय प्रयोजन हेतु करने वाली है।
साधना में नियोजित कर दिए गए। इसका लाभ उन्हें भी मिला एवं मिशन को भी।
साधनात्मक शिक्षण के अलावा उन्होंने मुझे सूर्य चिकित्सा एवं प्राण चिकित्सा की विद्याएँ भी सिखायीं। मेरी ही तरह बहुतों ने उनसे इन सब चीजों को सीखा। लौकिक काम मुकदमा, बीमारी और घर-परिवार की ढेरों समस्याएँ तो गुरुदेव चुटकियों में हल कर दिया करते थे। सारी समस्याओं को सुनकर वह कहते तुम लोग चिन्ता क्यों करते हो, समस्याएँ हैं तो क्या हुआ, हम हैं, अखण्ड ज्योति है। जिज्ञासुओं की जिज्ञासा होती- गुरुदेव आप हैं यह तो समझ में आता है।
साधना हरपल-हरक्षण शुभ होती है। किन्तु श्रेष्ठतम मुहूर्त में उचित रीति-नीति एवं विशेष विधान से की जाने वाली तप-साधना के परिणाम बहुत व्यापक और असरकारक होते हैं। ऐसे तप से कठिन प्रारब्ध के दुर्धर्ष दुर्योग कटते हैं और उज्ज्वल जीवन की प्रकाश किरणें अवतरित होती हैं। यह पूरी तरह से शास्त्र सम्मत एवं साधना विज्ञान के मर्मज्ञ महर्षियों द्वारा अनुभूत सत्य है कि चैत्र नवरात्रि की साधना के प्रभाव तीव्र एवं त्वरित होते हैं। बशर्ते कि साधना की रीति-नीति एवं अनुशासनों का ढंग से पालन किया गया हो।
साधना एवं लेखनी व वाणी से गुरुज्ञान का प्रकाश, यही उनका जीवन मंत्र था। जो लोग उनके सान्निध्य में आते उन सबसे वह यही कहते- मैं तो अपने सद्गुरु का यंत्र हूँ। मेरे कार्य-विचार और जीवन में जो प्रकाश और सद्गुण है, वे सब के सब मेरे गुरुदेव के हैं। जो कमियाँ है, वे सिर्फ मेरी हैं। सामान्य रहन-सहन, सामान्य जीवन क्रम में हर कहीं उनकी गुरुभक्ति की सजलता छलकती थी।
साधना सफल है, सही है या गलत है, इससे व्यक्तित्व का विकास जुड़ा हुआ है। व्यक्तित्व के विकास के बाद में वो करना, जिसको हम ऋद्धियाँ कहते है, सिद्धियाँ कहते है, सफलता कहते हैं। नहीं साहब! भजन करने से सिद्धियाँ मिलनी चाहिए। नहीं बेटे, आप गलत बात कहते हैं। भजन करने से सिद्धियाँ नहीं मिल जाती।
साधना सत्र के रूप में ढाई दिवसीय वार्षिकोत्सव हो, जिसमें केंद्र का एक प्रतिनिधि भी सम्मिलित हो।
साधना की पूर्व तैयारियों, साधना में प्रवेश के लिए आवश्यक आवश्यकताओं एवं अनिवार्यताओं का ब्योरा सूत्रबद्ध किया है। समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद एवं कैवल्यपाद तथा 195 सूत्रों वाले योगदर्शन की आधारशिला यही पहला सूत्र है।
साधना का सार है। इसी में निहित है मातृत्व की सम्यक् पहचान। जिसे हम अपनी मानसिक एवं सामाजिक बुराइयों को दूर करके ही पा सकते हैं। नवरात्रि के दिनों में गायत्री महामंत्र के 24 हजार अक्षरों वाले मंत्र के 24,000 जप का अनुष्ठान तो करें ही, पर साथ ही अपने संवेदनशून्य मन को माँ के प्रेम से भी संवेदित करें। अपनी माँ को सच्ची और सम्यक् प्रतिष्ठ प्रदान करने के अधिकारी बनने का अनुष्ठान भी करें।
साधना के प्रताप से वह संगीत कुशल था। पं. गायत्री शरण ने आस-पास के गाँवों में रहने वाले रूढ़िवादी ब्राह्मणों के विरोध के बावजूद उसे गायत्री महामंत्र की दीक्षा दी थी। तब से नियमित गायत्री जप, नवरात्रि के नौ दिनों में 24,000 गायत्री महामंत्र के जप का लघु अनुष्ठान उसका नियम बन गया था। वर्ष की दोनों नवरात्रि के दिन उसके विशेष तप के दिन होते थे। वह एक समय आस्वाद भोजन करके दिन में अपना जप करता और रात्रि में माँ की महिमा का गायन करता।
साधना निखरने लगती है, तो पापकर्म स्वतः नहीं बन पड़ते। रोजमर्रा के कषाय-कल्मषों एवं पापकर्मों के बीजों को भूनकर राख कर देने के लिए उनका स्वरूप बदलने के लिए इसीलिए परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री की ज्ञानगंगा बहाई। कभी जो प्रतिबंधों से घिरी थी, उस साधना को जन-जन के लिए उपलब्ध करा दिया। गायत्री मंत्र का भर्गतश्रव पापनाशक सविता देव का तेज धारण करने की प्रेरणा देता है। यह ज्ञान यदि जीवन का अंग बन जाए तो व्यक्ति भवबंधन में फँसेगा ही क्यों?
साधना कोई शॉर्टकट नहीं है। किसी भी क्षेत्र में कोई शॉर्टकट रास्ता नहीं है। आप एम.ए. पास होने का शॉर्टकट बताइए। बेटे, हमें तो मालूम नहीं है। हमने तो जिनको देखा है, वे पढ़ते है और नंबर बाई नंबर, कक्षा दर कक्षा फीस देते हैं।
साधना में निमग्न सब ऐसे होते हैं, जैसे वे एक ही वृक्ष के पत्ते हों, फूल हों, फल हों, फल में निहित बीज हों। वे सिर्फ पहचान पाना चाहते हैं, अपने अस्तित्व के मूल की पहचान। अपनी सबकी माँ की पहचान, जो सब कुछ देती है, सतत् अविराम। जीवन भी उससे मिलता है, जीवन यापन के साधना की दात्री भी वही है। हम असंख्य इच्छाओं की पूर्ति की अछोर कल्प वल्ली हैं।
साधना के प्रवेश द्वार के पश्चात् साधक को पहली अनुभूति क्या होती है? इन सवालों का सटीक समाधान अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में मिलेगा। इसे पढ़कर ‘योग का स्वरूप’ बोध होना निश्चित है।
साधना के बाद भी आप में छिपा रहा। यही आपके लिए घोर शत्रु बन गया और इसी कारण आपको आकाशवाणी सुनाई पड़ी। अब आप ही बताइए कि मैं आपका कौन सा प्रिय कार्य करूं? जिससे आपका कल्याण हो सके।
साधना से अभी हाल में ही निवृत्त हुए थे। शान्तिकुञ्ज के नवागन्तुक कार्यकर्त्ताओं में से कुछ को प्रतिदिन बारी-बारी से बुलाकर अपना सहज प्यार बाँट रहे थे। उस सुबह भी यही क्रम था। लगभग आठ-दस को बुलाया था। वह भी इन्हीं आठ-दस में एक था।
साधना को जन-जन के लिए उपलब्ध करा दिया। गायत्री मंत्र का भर्गतश्रव पापनाशक सविता देव का तेज धारण करने की प्रेरणा देता है। यह ज्ञान यदि जीवन का अंग बन जाए तो व्यक्ति भवबंधन में फँसेगा ही क्यों? ज्ञान की और अधिक व्याख्या अगले अंक में क्रमशः
साधना एक निष्ठ और अडिग बनी रही। अपनी इसी भावना से अभिभूत हो वह गर्व से भर उठे और आत्मालाप करते हुए अपने अंतर्मन की बातें कहने लगे- कि मैंने इस धरती पर अध्यात्म का रहस्य जान लिया है। सूर्य की प्रखरता एवं तेजस्विता से भी कहीं बढ़कर मेरी तपस्या का तेज है। मेरी यह तप साधना की महिमा पूरी दुनिया में प्रसारित होना चाहिए। मैंने कठिन से कठिन एवं विपरीत क्षणों में उग्र तप करके विजय पायी है।
साधना का प्रवेश द्वार उनके लिए कभी भी नहीं खुलता। परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में भी यह द्वार इसी रीति से खुला था। ‘अथ’ शब्द की समझ ने, और योग अनुशासन की स्वीकार्यता ने ही उन्हें महायोगी बनाया। अपने सुदीर्घ साधनामय जीवन का निष्कर्ष बताते हुए उन्होंने लिखा- अध्यात्म एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। इसके प्रयोगों के लिए हमें एक सच्चे वैज्ञानिक की भाँति सत्यान्वेषी बनना होगा।
साधना करते हुए अपने स्वभाव में नमनीयता लाएँ। विकसित होती हुई मानवता के साथ अपने चिन्तन एवं दर्शन का भी विकास करें। शास्त्रों के मौलिक सत्य को अपरिवर्तित रखते हुए, उसके व्यावहारिक पक्ष में यथोचित हेर-फेर करें, नए क्षितिजों का प्रवेश सम्भव बनाएँ। जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण अपनाएँ, जो कि जीवन के त्याग में नहीं, उसे आध्यात्मिक स्तर पर उठाने में सच्ची सफलता मानता है। मानव मात्र का चेतना स्तर नए आलोक में सजाने-संवारने में पुरुषार्थ की सार्थकता समझता है।
साधना अनुष्ठान के लिए संकल्पित होते हैं। अपने देव परिवार के सदस्यों की गणना ऐसे ही समझदारों में होती है। गुरुदेव को समर्पित शायद ही ऐसा कोई शिष्य-साधक हो, जो नवरात्रि साधना से वंचित रहा हो। यदि किसी के जीवन में कभी ऐसे अवसर आए भी हैं, तो अवश्य उसकी कोई मजबूरी रही होगी। अन्यथा तपोमूर्ति गुरुदेव की सन्तानें तप साधना से कब पीछे हटने वाली हैं।
साधना सहज सम्भव है। महर्षि पतंजलि अपने अगले सूत्र में योग का सत्य बताते हैं और परम पूज्य गुरुदेव इसे अपने जीवन के प्रयोग से सिद्ध करते हैं। योग क्या है? इसे अपने जीवन में गुरुदेव ने कैसे अनुभव किया? साधना के प्रवेश द्वार के पश्चात् साधक को पहली अनुभूति क्या होती है?
साधना प्रारम्भ करने वाले साधकों के लिए इस सूत्र की साधना के व्यावहारिक बिन्दु निम्न है- 1. इस समझ को- आत्मसात करना ही योग सत्य की प्राप्ति है, सिद्धि की प्राप्ति नहीं। 2. ‘अथ का पुण्य क्षण’ लाने के लिए गुरुदेव को पुकारना, उनकी कृपा का आह्वान करना। 3. योग के प्राथमिक अनुशासन के रूप में किसी सुखप्रद आसन (सुखासन, पद्मासन आदि) पर देर तक बैठकर गायत्री महामंत्र को जपने का अभ्यास, 4. इस विवेक पथ का अनुशीलन करके भी यदि अभी तक हमें योग की अनुभूति नहीं हो सकी है, तो इसका एक मात्र कारण यह है कि अपनी पात्रता अभी परिपक्व नहीं है, इसे परिपक्व करने के प्रयास में प्राणपण से जुटना।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-July
साधना फलित नहीं होती है। जो जगत्माता आदि जननी की भाँति स्वयं को अपने गुरु के चरणों में अर्पित कर देते हैं। गुरु कृपा उन्हीं का वरण करती है। करुणा सागर कृपालु गुरुदेव उन्हीं को अपनी कृपा का वरदान देते हैं। इस गुरु पूर्णिमा पर हम सब अपने शिष्यत्व में कुछ ऐसा ही निखार लाएँ।
साधना विधि भी है। अनुभवी साधकों का कहना है कि गुरुवार का व्रत रखते हुए विनियोग और ध्यान के साथ सम्यक् विधि से इसका पाठ किया जाय, तो शिष्य को अवश्य ही अपने गुरुदेव का दिव्य सन्देश मिलता है। स्वप्न में, ध्यान में या फिर साक्षात् उसे सद्गुरु कृपा की अनुभूति होती है। शिष्य के अनुराग व प्रगाढ़ भक्ति से प्रसन्न होकर गुरुदेव उसकी आध्यात्मिक व लौकिक इच्छाओं को पूरा करते हैं। यह कथन केवल काल्पनिक विचार नहीं, बल्कि अनेकों साधकों की साधनानुभूति है।
साधनापरायण रहता है तथा चारों संयमों का (इंद्रिय, अर्थ, समय, विचार) पालन करता है, अपने ऊपर अपना नियंत्रण रखता है, उसे निश्चित ही परमात्मसत्ता का, सत्य से साक्षात्कार का अवसर मिलता है, जो मानव जीवन को सार्थक बना देता है।
साधना का निष्कर्ष है। इसे जब भी कोई जहाँ भी चाहे अपने प्रायोगिक जीवन की कसौटी पर सत्यापित कर सकता है। सात्विक जीवन का विस्तार जितना होगा, इसके अमृत फल भी उतने ही व्यापक होंगे। व्यक्ति गत, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में इसके प्रयोगों के अनुरूप व्यक्ति , परिवार एवं समाज इसके सत्परिणामों से धन्य होते हैं। उत्तरप्रदेश में सहारनपुर जनपद के देवबंद कस्बे के उत्तर−पूर्व में बसे मिरगपुर गाँव के लोग सामूहिक रूप से पिछले साढ़े चार सौ वर्षों से इस सचाई को अनुभव कर रहे हैं।
साधना करते रहना ही ‘अध्यात्म’ नहीं हैं। सच्चा अध्यात्म है− अपने सारे गुणों, सारी उपलब्धियों और सारी संपदा को समाज−हित पर निछावर कर देना।
साधना की प्रत्येक उपलब्धि सहज रूप में अवतरित हो जाती है। गुरु चरणों की कृपा से तत्वज्ञान, ब्रह्मतादात्म्य, ईश्वर कृपा सभी कुछ सुलभ हो जाती है। हममें से हर एक के लिए यह गुरुपूर्णिमा- गुरु चरणों की इसी कृपा की अनुभूति का पर्व है।
साधना का सुफल मिल जाय। अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाय। लेकिन सवाल है कि यह सब हो तो कैसे हो?
साधना अन्तर्चेतना में कुछ इस तरह से स्वरित होती है-
साधना से भेद पाते हैं। इनके अनुसार यही शारीरिक एवं मानसिक रोगों के मूल कारण हैं। उपवास के माध्यम से इनका परिष्कार, परिमार्जन एवं सुसंतुलन बनाया जा सकता है। हालाँकि यह विद्या गहन, गंभीर एवं गुप्त है। विरले ही सही, पर अभी भी ऐसे योगी एवं तपस्वी ऋषि हैं, जिनको इस गूढ़ विज्ञान का साँगोपाँग ज्ञान है।
साधना से उसका चित्त निष्कल्मष हो गया था। यदि कभी भी उससे कोई उसके भविष्य के बारे में पूछता तो वह हंस देती। इस हंसी में बहुत कुछ होता था। एक रहस्य, आत्मा से उपजी प्रसन्नता का उजलापन, आध्यात्मिक जीवन की जगमग ज्योति सभी कुछ इसमें घुले-मिले थे। उसकी रहस्यमयी हंसी के बारे में सबको तब पता चला, जब वह एक दिन देर तक अपने घर से बाहर नहीं आयी।
साधना के बीज उसके अन्तःकरण की उर्वर भूमि में अंकुरित होने की तैयारी करने लगते हैं। गुरुकृपा आध्यात्मिक जीवन के प्रत्येक रहस्य को खोलने वाली दिव्य शक्ति है। गुरुदेव की कृपा से सारे असम्भव सम्भव हो जाते हैं। शास्त्र यही कहते हैं, ऋषि वचनों से यही प्रमाणित होता है। अनुभवी साधक, सन्त, सिद्धगण, आध्यात्मिक विभूतियों से सम्पन्न महापुरुष सभी का यही मत है।
साधना है। हम अभी किसके सम्मुख हैं? इसका विचार करें। हम किसे देख रहे हैं? इसे अनुभव हैं।
साधना करने वाले अनुभव करते हैं कि निश्चल प्रकृति में सृष्टि निमित्त जो क्षोभ की ध्वनि है, वही प्रणव नाद है। आचार्य शंकर एवं उनके दादा गुरुदेव गौड़पादाचार्य ने अपनी इन्हीं साधनात्मक अनुभूतियों को आधार बनाकर ओंकार पर विशद् भाष्य लिखा है। ध्यान बिन्दु उपनिषद् में कहा गया है- ‘यही आदि शब्द है, जो नाद अथवा ध्यान में निहित है। यह सभी वेदों का सार तत्व व सृष्टि के विकास का सूत्र है।’ सभी विरोधों का इससे समाहार व शमन होता है।
साधना की कोई उपयुक्त विधि निर्देशित की जाती है। इस प्रयोग विधि से होने वाले परिणामों की जाँच परख ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के वैज्ञानिक उपकरणों के साथ स्टैंडर्ड मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के द्वारा की जाती है। इससे मिलने वाले आँकड़ों की साम्यकीय गणना से वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के प्रायोगिक निष्कर्ष उजागर होते हैं। इस तकनीक में जीवन शैली पर विशेष ध्यान दिया गया है। क्योंकि व्यक्तित्व को व्याधिग्रस्त करने का यथार्थ कारण इसी का कोई न कोई बिन्दु है।
साधना वर्ष, महापूर्णाहुति वर्ष एवं हीरक जयंती वर्ष जैसी तीन अनुष्ठान विगत तीन वर्षों में किए है। अब सारे भारत व विश्व का संगठनात्मक एकीकरण इस वर्ष करने जा रहे हैं, जो दो वर्ष की अवधि में पूरा हो जाएगा। इस प्रक्रिया के अंतर्गत विकसित,अर्द्ध विकसित एवं अविकसित क्षेत्र को मिलाकर पूरे भारत को छह जानों में बाँटा गया है, ताकि एक विराट् मंथन इन छह क्षेत्रों में केंद्र के मार्गदर्शन तंत्र द्वारा समयदानियों की फौज के माध्यम से संभव हो सके। यह छह जोन इस आधार पर बाँटे गए हैं कि प्रत्येक में कुछ विकसित-समर्थ समयदानियों से भरे क्षेत्र हों, शक्तिपीठें हों या केंद्र के तंत्र हों। विकसित क्षेत्र से समयदानियों की आपूर्ति होती रहे एवं उनके केंद्र-शक्तिपीठें प्रशिक्षण शिविरों की, छावनियों की भूमिका निभाती रहें।
साधना-स्वावलंबन केंद्र
साधना करने वाले शियात्सान राम्पा नाम के एक लामा का उल्लेख है। यह लामा आश्चर्यजनक आध्यात्मिक शक्तियों व विभूतियों का स्वामी था। मैडम नील का कहना है कि शियात्सान राम्पा नाम का यह लामा साधु अपने मठ में समाधिस्थ रहते हुए भी कई स्थानों पर एक साथ प्रकट हो सकता था। मैडम नील ने विभिन्न तरीकों के इसके प्रमाण भी जुटाए। जहाँ-जहाँ पर वह प्रकट हुआ, वहाँ एक साथ, एक ही समय किन्तु अनेक स्थानों पर उसके स्पर्श व आशीष की अनुभूति पायी।
साधना प्रारम्भ करने से पहले इन सभी छात्रों की चिन्ता व तनाव का परीक्षण स्टैंडर्ड मनोवैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा किया गया। इस पहले परीक्षण के बाद कन्ट्रोल ग्रुप के लोग अपनी सामान्य दिनचर्या शान्तिकुञ्ज परिसर में रहकर बिताते रहे। जबकि प्रयोगात्मक समूह के लोगों ने अपनी ओम् जप की 20 दिवसीय साधना प्रारम्भ की। साधना कराने के लिए मार्गदर्शन का दायित्व योगविभाग के आचार्यगणों ने वहन किया। इसके लिए सारे प्रयोग परीक्षण ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की प्रयोगशाला में यहाँ के शोध कर्मियों के द्वारा सम्पन्न किए गए।
साधनात्मक अनुभूतियों को आधार बनाकर ओंकार पर विशद् भाष्य लिखा है। ध्यान बिन्दु उपनिषद् में कहा गया है- ‘यही आदि शब्द है, जो नाद अथवा ध्यान में निहित है। यह सभी वेदों का सार तत्व व सृष्टि के विकास का सूत्र है।’ सभी विरोधों का इससे समाहार व शमन होता है। आचार्यगण कहते हैं- ‘तत् प्रत्यक्चेतना अधिगमः अपि अन्तराय अभावश्च’ अर्थात् ओम् से सभी अन्तराय यानि कि चित्त के विक्षेप दूर होते हैं।
साधना का लक्ष्य है। महर्षि पतंजलि विश्व भर के मानव इतिहास में सर्वाधिक अनूठे व्यक्तित्व हैं। उन्हें मानव चेतना का सम्यक् ज्ञान है। उनको मनुष्य की कमियों, कमजोरियों, अच्छाइयों व विशेषताओं के बारे में भली प्रकार पता है। उन्हें मानव चेतना की सीमाएँ मालूम हैं, तो सम्भावनाएँ भी ज्ञात हैं।
साधना करते रहे। इस जप साधना के अतिरिक्त उनके सभी बाकी क्रियाकलाप कन्ट्रोल ग्रुप के व्यक्तियों की ही भाँति रहे। महीने की 25 तारीख को यानि की साधना के बीस दिन हो जाने पर चिन्ता एवं तनाव का दूसरा मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया गया। इस दूसरे परीक्षण से प्राप्त आँकड़ों का वैज्ञानिक विधि से साँख्यकीय आँकलन किया गया। इसके निष्कर्षों से यह पता चला कि ओम् जप साधना से प्रत्येक व्यक्ति की चिन्ता व तनाव के स्तर में भारी कमी आती है।
साधना से 100 में से 99 लोगों को या 100 में से 99 बार चिन्ता में फायदा होता है।
साधना कराने के लिए मार्गदर्शन का दायित्व योगविभाग के आचार्यगणों ने वहन किया। इसके लिए सारे प्रयोग परीक्षण ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की प्रयोगशाला में यहाँ के शोध कर्मियों के द्वारा सम्पन्न किए गए।
साधना विधि के रूप में बताया था। इस गुरुगीता का उपदेश कैलाश शिखर पर भगवान सदाशिव ने माता पार्वती को दिया था। बाद में यह गुरुगीता नैमिषारण्य के तीर्थ स्थल में सूत जी ने ऋषिगणों को सुनायी। भगवान व्यास ने स्कन्द पुराण के उत्तरखण्ड में इस प्रसंग का बड़ी भावपूर्ण रीति से वर्णन किया है।
साधना की धुरी पर चलते हुए एक लंबी 75 वर्ष की यात्रा पूरी करने के बाद की जा रही है। निश्चित ही इस पुरुषार्थ में साधना प्रधान हैं, इसीलिए इसके सशक्त होने की संभावनाएँ सुनिश्चित दिखाई देती है।
साधना को सतत करते रहें। विश्वगुरु भगवान महेश्वर ने विश्वमाता से क्या कहा, यह अगले अंक में।
साधना में उन्हें यह अनुभव होने लगा है कि प्रकृति हो या पदार्थ सभी में परम पूर्ण की पूर्णता समायी है। खण्ड में भी अखण्ड ही झिलमिल झलकता है।
साधनाएँ कीं। इसके बाद सभी तरह के संस्मरणों को लिपिबद्ध किया। ये संस्मरण उनकी कई कृतियों में प्रकाशित हुए। ऐसी ही एक कृति का नाम है- ‘माई जर्नी टु तिब्बत’। यह पुस्तक चेतना की आश्चर्यजनक सम्भावनाओं का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।
साधना के गंभीर रहस्यवेत्ता एवं मर्मज्ञों ने उपवास की इस विशेषता एवं महत्ता को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। उनके अनुसार यह अन्नमय कोश के परिष्कार के लिए सर्वोत्तम साधन है। शरीर में अत्यंत सूक्ष्म एवं पतली−पतली डोरियाँ आपस में लिपटी हुई होती हैं। शरीरशास्त्री इन्हें नाड़ी गुच्छक कहते हैं। योग विज्ञान में इन्हें उपत्यिकाओं के रूप में माना जाता है।
साधनाओं के बाद वह इसमें पारंगत व प्रवीण हुए। अनेकानेक विद्याओं व साधनाओं में आचार्य होने के साथ वह तंत्र विज्ञान के भी सुप्रतिष्ठित आचार्य बने। आनन्द प्रतिष्ठान में उनकी तंत्र विद्या का यही साधना सत्य प्रकट हुआ।
साधना से प्रत्येक व्यक्ति की चिन्ता व तनाव के स्तर में भारी कमी आती है। इस साँख्यकीय गणना व निष्कर्षों का प्रारूप कुछ इस तरह रहा-
साधना से उपजे बोधि के दिव्यास्त्र से एक-एक करके सबको मारा। और अन्त में उन्होंने स्वयं को भी मारने में सफलता प्राप्त की। अब वह निर्वाण को उपलब्ध हो चुके हैं।
साधनाओं में आचार्य होने के साथ वह तंत्र विज्ञान के भी सुप्रतिष्ठित आचार्य बने। आनन्द प्रतिष्ठान में उनकी तंत्र विद्या का यही साधना सत्य प्रकट हुआ।
साधना विज्ञान है। इसका गुरु भक्ति में लीन साधकों के लिए विशेष महत्व है।
साधना प्रधान हैं, इसीलिए इसके सशक्त होने की संभावनाएँ सुनिश्चित दिखाई देती है।
साधना प्रारम्भ की। साधना कराने के लिए मार्गदर्शन का दायित्व योगविभाग के आचार्यगणों ने वहन किया। इसके लिए सारे प्रयोग परीक्षण ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की प्रयोगशाला में यहाँ के शोध कर्मियों के द्वारा सम्पन्न किए गए।
साधना जगत् के महासत्य का बड़े ही सहज ढंग से साक्षात्कार हो जाता है। इससे हृदय में जो दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है, उससे साधक के जीवन में एक अपूर्व रूपांतरण होता है। जीवन का सारा अन्धकार प्रकाश में परिवर्तित-रूपांतरित हो जाता है। बड़े भाग्यशाली होते हैं वे जो इस रूपांतरण की अनुभूति प्राप्त करते हैं। सद्गुरु के चरणों का ध्यान जब हृदय में प्रगाढ़ होता है, तो हृदय के निर्मल नेत्र खुल जाते हैं।
साधना विधि को पाना-अपनाना चाहता है, जिससे उसे अपने सद्गुरु की चेतना का संस्पर्श मिले। गुरुतत्त्व का बोध हो। जीवन के सभी लौकिक दायित्वों का पालन-निर्वहन करते हुए उसे गुरुदेव की कृपानुभूतियों का लाभ मिल पाए। शिष्यों-गुरुभक्तों की इन सभी चाहतों को पूरा करने के लिए प्राचीन ऋषियों ने गुरुगीता के पाठ, अर्थ चिन्तन, मनन व निदिध्यासन को समर्थ साधना विधि के रूप में बताया था। इस गुरुगीता का उपदेश कैलाश शिखर पर भगवान सदाशिव ने माता पार्वती को दिया था।
साधना यंत्र, कवच, रक्षा विधान आदि सब चीजें बिल्कुल मुफ्त भेजी जाती थी। बस लाभार्थी को केवल डाक खर्च वहन करना पड़ता था। इस अद्भुत केन्द्र के द्वारा गुरुदेव ने वर्षों तक जन सेवा की। तंत्र विज्ञान की वैज्ञानिकता को खरा व प्रामाणिक साबित किया। असंख्य लोगों ने यहाँ से लाभ उठाया।
साधनाएँ कालान्तर में लुप्त हो गयीं। गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता ने तंत्र विद्या का यह रहस्यमय विज्ञान ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की कारण सत्ता से प्राप्त किया। बाद में समय आने पर इसे अपने सुयोग्य शिष्य हम सबके गुरुदेव को सौंपा। अनेकों वर्षों की कठिन व कठोर साधनाओं के बाद वह इसमें पारंगत व प्रवीण हुए। अनेकानेक विद्याओं व साधनाओं में आचार्य होने के साथ वह तंत्र विज्ञान के भी सुप्रतिष्ठित आचार्य बने।
साधना से गुरुभक्त साधक के जीवन में तप-साधना की प्रत्येक उपलब्धि सहज रूप में अवतरित हो जाती है। गुरु चरणों की कृपा से तत्वज्ञान, ब्रह्मतादात्म्य, ईश्वर कृपा सभी कुछ सुलभ हो जाती है। हममें से हर एक के लिए यह गुरुपूर्णिमा- गुरु चरणों की इसी कृपा की अनुभूति का पर्व है।
साधना के बहुत काल बाद वेदपुरी परमात्मा के मन्दिरों का नगर बन गया। बाद में किसी प्राकृतिक कारण वश इस नगर का अधिकाँश भाग महासागर में डूब गया। कथा के आगे के अंश की कल्पना अतिविचित्र है। कथाकार का कहना है कि उस सागर में डूबे उन मंदिरों की घंटियाँ आज भी बजती रहती हैं। केवल सन्नाटी रातों में उन्हें सुना जा सकता है।
साधनानुभूति है। हम सब भी इसके पाठ, अर्थ चिन्तन, मनन व निदिध्यासन से गुरुतत्त्व का बोध पा सकें, परम पूज्य गुरुदेव की कृपा से लाभान्वित हो सके, इसलिए इस ज्ञान को धारावाहिक रीति से क्रमिक ढंग से प्रकट किया जा रहा है। अब से प्रत्येक महीने की अखण्ड ज्योति में मंत्र क्षमता वाले गुरुगीता के श्लोकों की भावपूर्ण व्याख्या की जाएगी।
साधना एवं ऋषियों के आध्यात्मिक प्रयोगों के बीच एक सुदृढ़ सेतु हो सकती है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में इसके प्रायोगिक स्वरूप को विकसित करने की कोशिश इन दिनों की जा रही है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के आचार्यगण भी इसमें महत्वपूर्ण सहयोग कर रहे हैं। मानवीय व्यक्तित्व को व्याधिमुक्त करने के लिए ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी एवं अध्यात्म विज्ञान की तकनीकों की समन्वित प्रयोग विधियाँ विकसित की गयी हैं।
साधनाओं के नाना पथ इसी एक लक्ष्य की ओर जाते हैं। योगिवर स्वामी विवेकानन्द ने इसी गन्तव्य पर पहुँचकर गाया था-
साधना से वह परिचित होते, तो वे अपने प्रयोगों को और भी अधिक सराहनीय एवं समग्र बना सकते हैं। लेकिन फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी पश्चिम की विज्ञान साधना एवं ऋषियों के आध्यात्मिक प्रयोगों के बीच एक सुदृढ़ सेतु हो सकती है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में इसके प्रायोगिक स्वरूप को विकसित करने की कोशिश इन दिनों की जा रही है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय के आचार्यगण भी इसमें महत्वपूर्ण सहयोग कर रहे हैं। मानवीय व्यक्तित्व को व्याधिमुक्त करने के लिए ट्राँसपर्सनल साइकोलॉजी एवं अध्यात्म विज्ञान की तकनीकों की समन्वित प्रयोग विधियाँ विकसित की गयी हैं।
साधना के द्वारा अपने स्वरूप को जानने, पाने एवं अवस्थित होने में मन अनेकों विघ्न खड़े करता हैं। चित्तवृत्तियों द्वारा खड़े किए गए इन विघ्नों की चर्चा अगली कड़ी में होगी।
साधनाओं के फलस्वरूप मिली जीवन दृष्टि होलोग्राफ प्रयोगों के निष्कर्षों की भाँति है। क्योंकि इस दृष्टि से जीवन व पदार्थ के कण-कण में चेतना की सम्पूर्णता, अविभाज्यता व अखण्डता बड़ी साफ-साफ दिखती है। इस दृष्टि से यह सच्चाई बड़े ही साफ तौर पर उजागर होती है कि बंटवारा पदार्थ का हो सकता है, चेतना का कदापि नहीं। गीता के महोपदेशक भगवान श्रीकृष्ण के शब्दों में- जो नष्ट हुआ, जिसका रूप बदला वह तो पदार्थ है। चेतना तो ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ देह कलेवर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती।
साधना द्वारा प्राप्त शक्ति को पीड़ितों की सेवा में लगाया जाय। और इसके बदले किसी भी गरीब-अमीर से कुछ भी न लिया जाय। अर्थात् लोगों के कष्टों को दूर करने का उपचार बिल्कुल मुफ्त में किया जाय। हाँ लाभ होने पर यदि कोई बिना माँगे अपने मन से थोड़ा-बहुत कुछ दे दे, तो उसे सन्तोषपूर्वक साधकों के जीवन निर्वाह के लिए ले लिया जाय। यहाँ तंत्र विद्या द्वारा कठिन से कठिन शारीरिक रोग, मानसिक रोग, बुरी आदतों, सन्तान सम्बन्धी चिन्ता, गृहकलह, बुरे दिन, अनिष्ट की आशंका, भूत बाधा, अशान्ति आदि का बड़ी आसानी से उपचार कर दिया जाता था।
साधना से 100 में से 99 लोगों को या 100 में से 99 बार तनाव में फायदा होता है।
साधनाओं की वैज्ञानिकता प्रकट हो रही है। अध्यात्म विद्या के वैज्ञानिक निष्कर्ष स्पष्ट हो रहे हैं। अभी पिछले दिनों एक प्रयोग अध्यात्म विद्या के सारतत्व ‘ओम्’ पर किया गया। इस प्रयोग परियोजना का विषय था- An investigation to study the effect of Pranav (Om) jap on anxiety and stress levels of individuals.. अर्थात् प्रणव या ओम् के जप का व्यक्तियों के चिंता एवं तनाव के स्तर पर प्रभाव की जाँच। शोध कार्य की इस लघु परियोजना से ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की प्रयोगशाला के शोधकर्मियों की उद्देश्यनिष्ठ एवं उनके कार्य की सार्थकता एक बार फिर प्रकाश पुञ्ज बन कर प्रकट हुई।
साधना के बाद परीक्षण में कन्ट्रोल ग्रुप की चिन्ता का औसत 11.2 था। वही प्रयोगात्मक समूह के लोगों की चिन्ता का मध्यमान या औसत 3.5 रहा। इसी आधार पर इनका मानक विचलन क्रमशः 3.55 एवं 2.94 रहा। इसमें N नम्बर या संख्या का द्योतक है। जो दोनों में बराबर 6 व 6 थी।
साधना ही पर्याप्त है।
साधना सत्य प्रकट हुआ।
साधना की पूर्णता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी काव्य व्यञ्जना में इसे तात्विक अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने रामचरित का गान करने से पहले सद्गुरु चरणों का चरित बखान किया है। उनकी कालजयी दैवी कृति श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड के प्रारम्भ में यह प्रकरण है- मंगलाचरण के सात श्लोकों व वन्दना के चार दोहों के बाद गुरु चरणों की महिमा का गान है। कलेवर की दृष्टि से अत्यन्त लघु होते हुए भी भक्ति संवेदना की दृष्टि से यह प्रकरण महाविराट् है।
साधना अत्यन्त गहन थी। मितभाषी, सेवाभावी, ध्यान परायण लवकुँठक सभी की प्रीति का केन्द्र था। महाकाश्यप एवं रेवत आदि सिद्धजन उस पर अपना हृदय उड़ेलते थे। भिक्षुसंघ के नए सदस्य उस पर अपनापन लुटाते थे।
साधनाएँ सिद्धान्त, प्रयोग व उनके निष्कर्षों में गहरी वैज्ञानिकता है। जो भविष्य में दिनों-दिन स्पष्ट होती जाएगी।
साधना के अतिरिक्त उनके सभी बाकी क्रियाकलाप कन्ट्रोल ग्रुप के व्यक्तियों की ही भाँति रहे। महीने की 25 तारीख को यानि की साधना के बीस दिन हो जाने पर चिन्ता एवं तनाव का दूसरा मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया गया। इस दूसरे परीक्षण से प्राप्त आँकड़ों का वैज्ञानिक विधि से साँख्यकीय आँकलन किया गया। इसके निष्कर्षों से यह पता चला कि ओम् जप साधना से प्रत्येक व्यक्ति की चिन्ता व तनाव के स्तर में भारी कमी आती है। इस साँख्यकीय गणना व निष्कर्षों का प्रारूप कुछ इस तरह रहा-
साधनाओं व प्रक्रियाओं की सूक्ष्मता बहुत अधिक थी। तदानुसार उनका प्रभाव भी बहुत व्यापक व दीर्घकालिक होता था। इसकी गूढ़ क्रियाओं द्वारा उत्पन्न किए गए सूक्ष्म कम्पन इतने शक्तिशाली होते थे कि हजारों मील दूर बैठे हुए आदमी पर भी उतना ही असर पड़ता, जितना कि पास बैठे हुए आदमी पर होता। इसका प्रभाव क्षण भर खेल दिखाकर ही समाप्त नहीं होता, बल्कि जिसके ऊपर उपचार किया जाता, उसके गुप्त मन में इतना गहरा उतर जाता कि उसके शरीर व मन में आश्चर्यजनक व चमत्कारी परिवर्तन हो जाते थे।
साधना संबंधी मार्गदर्शन भी पुरुष-महिला शिष्याओं को समान रूप में भेजते थे। उन मार्गदर्शन के साथ जो शब्दों को गुँथन रहा करता था, वह इतना विलक्षण होता था कि पढ़कर ऐसा लगता था मानो आसमान छू लें।
साधना स्थिति के बारे में सभी जानते थे, इसलिए किसी ने अविश्वास नहीं किया। न ही उसे हँसी में उड़ाया। पूछा, उस खजाने को निकालने के लिए क्या करना होगा? श्रीराम ने कहा, लेकिन आप उस खजाने का क्या करेंगे? आपकी तो उमर निकल गई है, थोड़ी बहुत बची है, वह भी कट जाएगी।
साधना की सच्चाई को जानना होगा। उसके सत्य और तत्त्व की अनुभूति करनी होगी। इस अनुभूति की प्रगाढ़ता में ही उन्हें अपने प्रश्नों के हल मिलेंगे।
साधना का प्रकाश है। सन् 1940 ई. की अप्रैल और जून माह की अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर ऐसा ही एक रहस्यमय प्रसंग अंकित है। उन दिनों गुरुदेव ने ‘आनन्द प्रतिष्ठान’ नाम की एक संस्था की स्थापना की थी। यह संस्था तंत्र विज्ञान की साधना-शिक्षण एवं इसकी विभूतियों व उपलब्धियों से लोक सेवा हेतु संकल्पित थी। महायोगी परम पूज्य गुरुदेव तंत्र विद्या के महान् आचार्य भी थे।
साधना की दिशा है। योग साधक का प्राप्तव्य एवं गन्तव्य है। पहले मंजिल का पता, फिर राह की बातें महर्षि की यही नीति है। इसी कारण वह पहले समाधिपाद के सूत्रों का बयान करते हैं, बाद में साधन पाद के सूत्र बताते हैं। अन्य दोनों पादों का क्रम इनके बाद आता है।
साधना-शिक्षण एवं इसकी विभूतियों व उपलब्धियों से लोक सेवा हेतु संकल्पित थी। महायोगी परम पूज्य गुरुदेव तंत्र विद्या के महान् आचार्य भी थे। अखण्ड ज्योति जून 1940 के ये कुछ पृष्ठ उनके इसी आचार्यत्व का प्रामाणिक दस्तावेज हैं।
साधना का सुफल है। किसी भी योग साधक की साधना का लक्ष्य है। महर्षि पतंजलि विश्व भर के मानव इतिहास में सर्वाधिक अनूठे व्यक्तित्व हैं। उन्हें मानव चेतना का सम्यक् ज्ञान है। उनको मनुष्य की कमियों, कमजोरियों, अच्छाइयों व विशेषताओं के बारे में भली प्रकार पता है।
साधना के बीस दिन हो जाने पर चिन्ता एवं तनाव का दूसरा मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया गया। इस दूसरे परीक्षण से प्राप्त आँकड़ों का वैज्ञानिक विधि से साँख्यकीय आँकलन किया गया। इसके निष्कर्षों से यह पता चला कि ओम् जप साधना से प्रत्येक व्यक्ति की चिन्ता व तनाव के स्तर में भारी कमी आती है। इस साँख्यकीय गणना व निष्कर्षों का प्रारूप कुछ इस तरह रहा-
साधना की परेशानी बन कर सामने आता है। इस परेशानी से उलझे साधक बार-बार यह सवाल करते हैं- मेरा ध्यान नहीं लगता? क्यों नहीं लगता? किस तरह लगेगा? इन सभी सवालों का एक ही जवाब है कि साधकों को ध्यान साधना की सच्चाई को जानना होगा।
साधना की प्रेरणा के लिए जिम्मेदार था। पुत्र ने माँ को समझाने की कोशिश की, कहा कि साधु-महात्माओं को मत कोसिए। अपने द्वारिकाधीश को मत कोसिए। आपका जी मेरे कारण दुखी हुआ है। आप मुझे कोसिए।
साधना की थी। कुछ ग्रन्थों में इस पुण्य क्षेत्र के बारे में कई किंवदंतियों का उल्लेख है। इन्हीं किंवदंतियों में एक बड़ी मधुर कथा है। ऋषि अगस्त्य की तप साधना के बहुत काल बाद वेदपुरी परमात्मा के मन्दिरों का नगर बन गया। बाद में किसी प्राकृतिक कारण वश इस नगर का अधिकाँश भाग महासागर में डूब गया।
साधना का अविभाज्य अंग मानें।
साधना से सिद्ध थे। महात्मा कबीर, समर्थ रामदास, श्री रामकृष्ण परमहंस के रूप में उन्होंने योग के सभी तत्वों का सम्यक् बोध प्राप्त किया था। इस बार तो उन्हीं की भाषा में- ‘सिर्फ पिसे को पीसना था, कुटे को कूटना था, बने को बनाना था। यानि कि किए हुए का पुनरावलोकन करना था। सद्गुरु की कृपा की किरण उतरी बस एक पल में हो गया।
साधनाओं में पूर्ण, वेद की साकार मूर्ति, तपोनिष्ठ व तेजस्वी हैं। शिष्य और भक्तों से सेवित गुरुदेव करुणा के अमृत सागर हैं। उन आचार्य श्रेष्ठ श्रीराम का, अपने गुरुदेव का साधक ध्यान करें।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-June
साधनात्मक प्रयोगों का व्यावहारिक शिक्षण। ये चार बिन्दु मूलतः सैद्धान्तिक है। इनसे पाठ्यक्रमों की थ्योरी भर पता चल पाती है। जिसके कुछ अंश अन्य विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिल जाते हैं।
साधना के अनुरागी आचार्य एवं 4. संकल्पवान एवं आध्यात्मिक अनुशासनों के लिए समर्पित विद्यार्थी। उपर्युक्त चार में से तीन अनिवार्यताओं को जुटाने की विधि व्यवस्था विश्वविद्यालय के संचालकों ने पूरी कर ली है। चौथे क्रम के अनुरूप विद्यार्थियों की बड़ी आतुर प्रतीक्षा है।
साधना से विकसित संवेदना उनमें एक अनूठी आत्म जागृति को जन्म देगी। जिससे उनमें सामाजिक कर्त्तव्यों के बोध के साथ देश व धरती से गहरे भावनात्मक लगाव, जुड़ाव की अनुभूति होगी। राष्ट्रीय भावनाएँ विकसित होगी। और यहाँ अध्ययन करने वाले सभी विद्यार्थी मिल-जुलकर विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय धर्म को अपना सकेंगे।
साधना संकाय की स्थापना की गई है। यह पीड़ा ही इसमें पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों के निर्माण की प्रेरणा बनी है। देश की धरती में, विश्व वसुधा में फिर से ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, महातेजस्वी महर्षि अगस्त्य के नवीन संस्करण अपनी तप शक्ति से, साधना सामर्थ्य से मानव हृदयों को आलोकित करे, यही इन पाठ्यक्रमों को पढ़ाने का मकसद है। इन पाठ्यक्रमों को पढ़ने वाले श्री रामकृष्ण परमहंस द्वारा बताए गए ‘जतो मत-ताते पथ’ का अर्थ समझ सकेंगे। वे जान सकेंगे कि सब धर्मों का सार एक है।
साधना की शिक्षा पायी थी। इस संकाय में शताधिक विषयों एवं विभागों की गतिविधियाँ संचालित होती थी। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में- 1.साधना संकाय, 2. स्वास्थ्य संकाय, 3. शिक्षा संकाय, 4. स्वावलम्बन संकाय की स्थापना भी साँस्कृतिक चेतना एवं विद्या के बहुआयामी विस्तार के लिए की गयी है। अपने उद्देश्यों के अनुरूप सतत् सृजन, संवर्द्धन, शिक्षण एवं शोध में ही प्रत्येक संकाय की गुणवत्ता एवं अर्थवत्ता समायी है। इनमें से प्रथम स्थान साधना संकाय का है।
साधना के अंकुर पलते हैं, पर जीवन पाने के पहले ही इनका मरण हो जाता है। समुचित मार्गदर्शन के अभाव में साधना और साधक दोनों ही मुरझा जाते हैं। मानव जीवन की उच्चतर अभीप्साएँ या तो असमय ही कुम्हला जाती हैं, या फिर भौतिकता की भूल-भुलैया में भटक जाती है। मनुष्य में देवत्व के अंकुर तो फूटते हैं, पर उसके विकास के लिए सही खाद-पानी नहीं मिल पाता। दिव्य जीवन जीने की प्यास तो जगती है, पर उसे प्यासे ही दम तोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है।
साधना का केन्द्र विश्वविद्यालय का पुस्तकालय होगा। यही पर शोध सत्यों को प्रकट करने वाली उर्वर विचार भूमि एवं संवेदनशील भावभूमि तैयार होगी।
साधना का सार है। यह देश की धरती का मौलिक सच है। इसमें अनेकों दैवी विभूतियों के तप की ऊष्मा है, ऊर्जा है, आभा है, प्रकाश है। वैदिक काल से लेकर हर युग में इसकी अभिव्यक्ति अपनी अनूठी रीति से होती रही है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, वामदेव, वाल्मीकि, व्यास सभी ने इस सत्य की अनुभूति की।
साधना केन्द्र में प्रवेश के लिए उनके समग्र व्यक्तित्व का इसके अनुरूप होना जरूरी है।
साधना केन्द्र अवस्थित है। प्रकृति की सुरम्यता चारों ओर से इस देव संस्कृति विश्वविद्यालय की भूमि एवं भवन को घेरे है। हिमालय की शिवालिक पर्वतमालाएँ इस पर अपनी सुषमा की अविराम वृष्टि करती हैं। गंगा की लहरों को छूकर आती बयार यहाँ पावनता का संचार करती है। यहाँ के प्राकृतिक परिवेश एवं पर्यावरण को छूकर मन के सारे सन्ताप स्वयं शान्त हो जाते हैं।
साधना का सुफल है। यहाँ आकर अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं की गुरु दक्षिणा है। यही उनसे अपेक्षा है। विद्यार्थीगण इस ऋषिभूमि में विद्याभ्यास करके यदि स्वयं को देव संस्कृति के देवदूत के रूप में गढ़ सकें, तो समझा जाएगा कि उनका विद्याध्ययन सफल हुआ। उन्होंने आचार्य कुल को, विश्वविद्यालय को अपनी भावभरी श्रद्धा अर्पित कर दी।
साधना संकाय के सदस्य हो सकेंगे।
साधना संकाय का है। यही विद्या विस्तार की आधारभूमि है। साधना की नींव पर ही यहाँ विद्या विस्तार का भव्य भवन खड़ा होना है।
साधनाओं एवं आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का गन्तव्य एक है। युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव की अपरिमित तप ऊर्जा, उनके द्वारा अर्जित की गई विद्याएँ साधना संकाय के पाठ्यक्रमों के माध्यम से ही अभिव्यक्त होंगी। इनसे उपजी प्राण ऊर्जा से स्वास्थ्य संकाय के पाठ्यक्रम जन्म लेंगे। और रुग्ण होते जा रहे मानव समाज को समग्र स्वास्थ्य का बोध कराएँगे।
साधना से देवमानवों की शृंखला में कुछ नए निष्कर्ष जोड़े। उन्होंने इस युग में देव संस्कृति की आध्यात्मिक चेतना एवं वैज्ञानिक सत्य को एक नयी अभिव्यक्ति दी।
साधना के इस मन्दिर के मुख्य परिसर में ही अभी निर्माण कार्य हो रहा है। एक लाख वर्गमीटर से कहीं अधिक क्षेत्रफल में इस मुख्य परिसर का प्रसार है। विश्व विद्यालय भवन के अन्य परिसरों के लिए आस-पास की भूमि क्रय करने की बात चल रही है। पर जहाँ तक निर्माण की बात है, वह अभी इस मुख्य परिसर या मेन कैम्पस में ही केन्द्रित है। इसके कुछ अंश बन चुके हैं, कुछ अभी निर्माणाधीन है।
साधना के सत्य को जानकर ही जाना और सीखा जा सकता है। मनुष्य में देवता के अवतरण की प्रयोगात्मक विधि यही है। मनुष्य मात्र के लिए इसकी वैज्ञानिक उपयोगिता को सिद्ध करने के लिए ही देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साधना संकाय की स्थापना की गयी है।
साधना है। शोध कार्य करने का अर्थ अपने जीवन में ऋषित्व को सिद्ध करना है। इस क्रम में शोध छात्र एवं छात्राओं के सम्मुख एक ही सत्य रखा जाएगा कि जिसने भी अपने शोध-अनुसंधान में ऋषित्व की जितनी प्रेरक एवं प्रगाढ़ अनुभूति की, उसी की उतनी शोध साधना सफल हुई। इस शोध साधना का केन्द्र विश्वविद्यालय का पुस्तकालय होगा। यही पर शोध सत्यों को प्रकट करने वाली उर्वर विचार भूमि एवं संवेदनशील भावभूमि तैयार होगी।
साधना के लिए भावभरा समर्पण होना चाहिए। यह सब होने पर ही यहाँ प्रवेश सम्भव है। उत्कृष्ट बीज ही यहाँ की ऋषि भूमि में बोए जाएँगे। उन्हें खाद-पानी जुटाने का हर आवश्यक जतन किया जाएगा। और फिर महान् व्यक्तित्व के पौधों की कतारें यहाँ पनपेगी।
साधना से उपजे वे मूल्य और प्रक्रियाएँ हैं, जो मनुष्य को देव बनाने, सुसंस्कृत करने में समर्थ हैं। ‘विश्व’ इसलिए कि इसका लक्ष्य कोई सीमित वर्ग या क्षेत्र नहीं, वरन् समस्त विश्व वसुधा है। ‘विद्यालय’ इसलिए की शिक्षा की स्वल्प उपलब्धि केवल भौतिक प्रगति का द्वार खोलती है, व्यक्तित्व का परिष्कार तो विद्या साधना पर टिका है। यह केन्द्र विद्या की गरिमा को समझाने और जनमानस में उसकी प्राण प्रतिष्ठ करने में निरत रहेगा। इन प्रयत्नों के इस केन्द्र को सच्चे अर्थों में ‘आलय’ कहा जा सकेगा।
साधना और साधक दोनों ही मुरझा जाते हैं। मानव जीवन की उच्चतर अभीप्साएँ या तो असमय ही कुम्हला जाती हैं, या फिर भौतिकता की भूल-भुलैया में भटक जाती है। मनुष्य में देवत्व के अंकुर तो फूटते हैं, पर उसके विकास के लिए सही खाद-पानी नहीं मिल पाता। दिव्य जीवन जीने की प्यास तो जगती है, पर उसे प्यासे ही दम तोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है।
साधना से प्रकट हुई भारत माता ने ऋग्वेद के ऋषि को उसकी गहन समाधि में अपने दिव्य स्वरूप का परिचय देते हुए कहा, वत्स जान लो,
साधना की। यही उनके तपोनिष्ठ होने का रहस्य था। श्रीराम की ही भाँति वे मर्यादा पुरुषोत्तम थे। देव संस्कृति की सभी मर्यादाओं की स्थापना के लिए ही उन्होंने अवतार लिया था। ऐसे युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य हम सबके परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी साधना से देवमानवों की शृंखला में कुछ नए निष्कर्ष जोड़े।
साधना देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रत्येक आचार्य एवं छात्र-छात्रा के लिए अनिवार्य कर्त्तव्य है। इसका लक्ष्य सच्चा आत्म स्वामित्व है। जीवन की सामान्य रीति-नीति बड़ी अनगढ़ होती है। अवाँछनीय आदतों और कुसंस्कारों की अनेकों विवशताएँ इसे घेरे रहती हैं। इन मजबूरी में चाहे-अनचाहे ऐसा हो जाता है, जो जीवन के सोचे गए लक्ष्य एवं चुनी हुई दिशा से पूरी तरह से उल्टा है।
साधना है। इसमें पदार्थ और चेतना, विज्ञान और अध्यात्म दोनों का समुचित समावेश है। उदाहरण के लिए एक बीज को हम बोते हैं, अंकुर बीज से निकलता है, लेकिन पास में पड़ी बूँदें, गिरा पानी, सूरज की किरणें मौका बनती हैं। वे मौका बनती हैं कि अंकुर निकल सके, हालाँकि अंकुर उनसे नहीं निकलता, अंकुर तो बीज से ही निकलता है। यदि बीज की जगह कंकड़ डाला गया हो, तो अच्छी से अच्छी जमीन, अच्छे से अच्छा पानी, अच्छी चमकदार सूरज की किरणें और कुशल से कुशल माली भी उनमें अंकुर नहीं ला सकेंगे।
साधना मनुष्य को इसी ओर तीव्रगामी वेग से बढ़ चलने के लिए प्रेरित करती है। इन संस्कृति सूत्रों के अनुसार देवता वे हैं जो दिव्य हैं, दैवी गुणों से सम्पन्न हैं और वरदान देने में समर्थ हैं। मनुष्य में ये सभी क्षमताएँ बीज रूप में हैं। जो अभी सुप्त एवं अविकसित दशा में हैं। यदि इनका विकास हो सके तो मानव की आकृति तो वही रहेगी, परन्तु प्रकृति से वह देवता हो जाएगा।
साधना के लिए किस-किस भाँति अनुकूलताएँ थी। इतिहास गवाही देता है कि यहाँ साधना के साधन जुटाए गए थे, लेकिन सुख के साधनों से परहेज बरती गयी थी।
साधना संकाय में पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों का ही साधक होना अनिवार्य है। इस संकाय में उन्हीं का स्थान सुनिश्चित होगा जो अध्यात्म विद्या के अनुरागी हैं। जो मानव धर्म व विश्व धर्म की स्थापना करने, सब धर्मों के अनिवार्य तत्त्वों में समायी एकता को समझने के लिए समर्पित हैं। जिनमें तपस्वी जीवन जीने का संकल्प है। जो साधना के कठोर प्रयोगों को अपनाने में सक्षम हैं।
साधना से उत्पन्न ऊर्जा उन्हें निरन्तर गतिशील बनाए रखती है। राह में आने वाले पहाड़ जैसे अवरोध इसके प्रभाव से बरबस अपने आप ही हटते और मिटते हैं।
साधनाओं का भी मूल्याँकन किया जाएगा। यह प्रक्रिया प्रत्येक सेमेस्टर में अपनायी जाएगी। कक्षा के अन्तिम सेमेस्टर में सभी नियमित परीक्षाओं के साथ एक ग्राण्ड वाइवा या महामौखिकी का आयोजन होगा। इसमें छात्र या छात्रा से वर्तमान सेमेस्टर की पाठ्यवस्तु के साथ पिछले सभी सेमेस्टरों की पाठ्यवस्तु से सम्बन्धित सवाल पूछे जाएँगे। इस प्रश्नकाल में सम्पूर्ण कक्षा अवधि में अपनाए गए आदर्शों एवं व्रतों का भी मूल्याँकन होगा।
साधना से उन्होंने देव संस्कृति के निहितार्थ को प्रकट किया है। उन सबने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ यह बात कही है कि जब एक के बाद एक और इस तरह से अनेक जनों के जीवन में देवत्व अवतरित हो सकता है, आनन्द घटित हो सकता है तो फिर सबके जीवन में क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर जीवन को समझने में हुई भूल के निवारण-निराकरण में है। देव संस्कृति के सूत्रों से मनुष्य की प्रकृति को परिष्कृत करना, संस्कारित करना ही एक मात्र उपाय है। इस उपाय को जब कभी, जिसने भी अपनाया, उसी के जीवन में आनन्द के फूल खिले, खुशियों की सुरभि बिखरी।
साधना के चार अनुबन्ध भी कहा जा सकता है। कथन का सार संक्षेप इतना है कि देव संस्कृति विश्वविद्यालय के चारों संकाय साँस्कृतिक चेतना के क्रियाशील कीर्तिस्तम्भ के रूप में स्थापित किए गए हैं। इनकी क्रियाशीलता में ही देव संस्कृति का भावी विस्तार निहित है। इन्हीं के द्वारा साँस्कृतिक मूल्यों की प्रयोग-प्रक्रियाएँ पनपेगी। जीवन मूल्यों का विस्तार होगा।
साधना संकाय की स्थापना की गयी है।
साधना में अपनी भागीदारी निभाने वाले आचार्यगण एवं छात्र-छात्राएँ यहाँ के वातावरण की दिव्यता को अपने मन, प्राण एवं अन्तःकरण में अनिवार्य रूप से अनुभव करेंगे। वातावरण के अदृश्य किन्तु समर्थ सहयोग से उनकी प्रज्ञा, मेधा एवं आत्मिक क्षमताओं का आश्चर्यजनक विकास होगा। यह कोई काल्पनिक बात नहीं, बल्कि देखा परखा और अनुभव किया जाने वाला सच है। बस इस अनुभूति के लिए अनुशासन की तप साधना चाहिए। जिसे करना विद्यार्थियों के लिए ही नहीं आचार्यों के लिए भी अनिवार्य है।
साधना सफल हुई। इस शोध साधना का केन्द्र विश्वविद्यालय का पुस्तकालय होगा। यही पर शोध सत्यों को प्रकट करने वाली उर्वर विचार भूमि एवं संवेदनशील भावभूमि तैयार होगी।
साधनात्मक साहस की परख होगी। दरअसल यह मानव चेतना में जन्म लेने वाला, आन्दोलित होने वाला रोमाँचक अभियान है। इसलिए महर्षि अरविन्द ने इस अनुशासन निष्ठ को Real Adventure in Human Consciousness (मानव चेतना में किया जाने वाला सच्चा साहस) कहा है। अपने विकसित रूप में यह अभियान अवाँछनीय आदतों एवं कुसंस्कारों के विरुद्ध होता है। संकल्प के धनी अनुशासन निष्ठ, अनेक निम्नगामी आकर्षण से मुक्त होने में सफल होते हैं।
साधना संकाय, 2. स्वास्थ्य संकाय, 3. शिक्षा संकाय, 4. स्वावलम्बन संकाय की स्थापना भी साँस्कृतिक चेतना एवं विद्या के बहुआयामी विस्तार के लिए की गयी है। अपने उद्देश्यों के अनुरूप सतत् सृजन, संवर्द्धन, शिक्षण एवं शोध में ही प्रत्येक संकाय की गुणवत्ता एवं अर्थवत्ता समायी है। इनमें से प्रथम स्थान साधना संकाय का है। यही विद्या विस्तार की आधारभूमि है। साधना की नींव पर ही यहाँ विद्या विस्तार का भव्य भवन खड़ा होना है।
साधना अद्भुत थी। इस तप ने ही उनके विश्वविद्यालय के वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर किया था।
साधना को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। और उसी अनुरूप इसे बनाया जा रहा है। यहाँ रहने वाले विद्यार्थी सब तरह की अनुकूलता में अपना विद्या अध्ययन एवं तप साधना सम्पन्न कर सकेंगे निर्माणाधीन परिसरों में आवासीय परिसर भी है। इस परिसर का विस्तार 8507 वर्गमीटर में है। तीन मंजिल वाले इन भवनों में 129 फ्लैट बनाए जा रहे हैं।
साधना मन्दिर है। तपस्वी साधकों के लिए तप-साधना की प्रक्रिया एवं प्रणाली के साथ साधना स्थल का भी महत्त्व होता है। इस महत्त्व को ध्यान में रखते हुए ही विश्वविद्यालय भवन का निर्माण व विकास किया जा रहा है। इतिहास के पृष्ठ प्राचीन भारत के तक्षशिला, नालन्दा एवं विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालयों की गौरव गाथा सुनाते हैं। इस गौरव गान में इन विश्वविद्यालयों के भवनों के मधुर गीत भी हैं।
साधना के गुह्य एवं गहन प्रयोगों से यहाँ प्रज्ञा एवं मेधा के असंख्य दीप जलाये जाएँगे। पुस्तकों के बोझ को लगातार बढ़ाते रहने के बजाय यहाँ विद्यार्थियों के जीवन को तराशा, निखारा एवं गढ़ा जाएगा। इस विश्वविद्यालय की कोख से अनेकों कपिल, कणाद, भारद्वाज और बृहस्पति जन्म लेंगे। अनेकों गार्गी, घोषा, अपाला यहाँ अपने व्यक्तित्व को प्रकाशित करेंगी।
साधना के कठोर प्रयोगों को अपनाने में सक्षम हैं। ऐसे संकल्पवान, तप-परायण जीवन जीने के अभ्यासी व्यक्तियों के लिए ही आध्यात्मिक अनुशासनों की विधि व्यवस्था में स्वयं को खपा पाना सम्भव है। इस सत्य से परिचित जन ही साधना संकाय के सदस्य हो सकेंगे।
साधना पर टिका है। यह केन्द्र विद्या की गरिमा को समझाने और जनमानस में उसकी प्राण प्रतिष्ठ करने में निरत रहेगा। इन प्रयत्नों के इस केन्द्र को सच्चे अर्थों में ‘आलय’ कहा जा सकेगा। विश्वविद्यालय के नाम से कितने ही परीक्षा संस्थान और कॉलेजों का समन्वय सम्बन्धित किया जाता है, पर शब्द के अर्थ को सार्थक करने वाले विद्यापीठ कहीं भी दिखाई नहीं देते।
साधना संकाय की स्थापना इस संकल्प का उद्घोष है- कि अब अध्यात्म विद्या के जिज्ञासुओं को प्रभावकारी मार्गदर्शन का अभाव न रहेगा। कठोर साधना के अभिलाषियों के लिए आध्यात्मिक साधनाएँ फिर से प्रकाशित की जाएँगी। तप के गुह्य व गहन प्रयोगों में तत्पर होने वालों की अभीप्सा को अब निराश न होना पड़ेगा। साधना संकाय के पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन ऐसे ही संकल्पित अध्यात्म अभिलाषियों के लिए है। इसका उद्देश्य देश व धरती के वातावरण को तप की ऊर्जा से ऊर्जावान बनाना है।
साधना संकाय के विद्यार्थियों के संकल्प बल का असाधारण विकास, 2. जीवन की अवाँछनीय आदतों, कुसंस्कारों, कुप्रवृत्तियों की जटिलताओं से छुटकारा, 3. मानव चेतना में समायी सम्भावनाओं का ज्ञान, 4. अतीन्द्रिय सत्य एवं शक्ति का व्यावहारिक प्रशिक्षण। ये चारों बिन्दु महत्त्वपूर्ण हैं। इन्हीं से साधना के अर्थ एवं महत्त्व को समझने की शुरुआत होती है। इसी से वह नींव मजबूत होती है, जिसके ऊपर अध्यात्म विद्या का भव्य मन्दिर गढ़ा जा सकता है, ऋषि प्रणीत उद्देश्य साकार किए जा सकते हैं।
साधना के साथ सेवा साधना भी करेंगे। इन सेवा कार्यों का निर्धारण प्रत्येक संकाय के अनुरूप किया जाएगा। चिकित्सा सेवा एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता के अलावा अन्य कई सामाजिक सेवा की योजनाएँ विश्वविद्यालय के द्वारा चलाई जाएगी। इन सभी में आचार्यों एवं छात्रगणों की भागीदारी अनिवार्य रूप से होगी। सभी सेवा योजनाओं का क्रियान्वयन व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के आदर्शों एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाएगा।
साधना की ऊर्जा से ओत-प्रोत था। महाकवि विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस में इस विश्वविद्यालय के वातावरण को चित्रित किया है। इस चित्रण में कुलपति आचार्य चाणक्य के तप और सादगी का प्रकाश है। ‘शरणभविसमिद्िभिः शुष्यमाणाभिराभिर्विनिमित पटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड़यम’ अर्थात् छात्रों द्वारा वन से लायी हुई समिधाएँ छत पर सूखने के लिए डाली गयी हैं। छत का किनारा कुछ झुका हुआ है।
साधना की लगन एवं प्यास होती है। जो अध्यात्म विद्या को पढ़ना और सीखना चाहते हैं। आध्यात्मिक प्रयोगों में लीन होने के लिए जिनके मन में विकलता जगती है। आज भी भारत जननी की कोख में तप, त्याग और साधना के अंकुर पलते हैं, पर जीवन पाने के पहले ही इनका मरण हो जाता है। समुचित मार्गदर्शन के अभाव में साधना और साधक दोनों ही मुरझा जाते हैं।
साधना का महिमामय आयाम है। यह देव संस्कृति के प्रणेता ऋषियों की विरासत है। जिसे यहाँ पर युगानुकूल रीति से अपनाया गया है। इस रीति से ज्ञान में समग्रता आती है। उसकी एकाँगिता का विलोप होता है।
साधना संकाय के पाठ्यक्रमों की संरचना व सरंजाम के उद्देश्यों को कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं में परिभाषित किया जा सकता है- 1. भारत देश के ऋषियों, सन्तों एवं महापुरुषों द्वारा प्रवर्तित एवं अनुभूत साधना-सिद्धान्तों का ज्ञान, 2. विश्व वसुधा के विभिन्न धर्मों व उनके संस्थापकों, व विश्व भर के अध्यात्मवेत्ताओं के द्वारा बताए गए धार्मिक तत्त्वों व साधना-विधियों का समुचित ज्ञान, 3. प्रायः समस्त साधना विधियों का आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन-अनुसन्धान, 4.कतिपय साधनात्मक प्रयोगों का व्यावहारिक शिक्षण। ये चार बिन्दु मूलतः सैद्धान्तिक है। इनसे पाठ्यक्रमों की थ्योरी भर पता चल पाती है। जिसके कुछ अंश अन्य विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिल जाते हैं।
साधना संकाय के पाठ्यक्रम संचालित होते थे। यहाँ ब्रह्मविद्या के अध्ययन के लिए छात्र दूर-दूर से आते थे। इतिहासवेत्ता एवं पुराविद् ए. ब्लूमफील्ड और के. रघुनाथ अपने संयुक्त अध्ययन में इस विद्याकेन्द्र की पहचान नासिक से पन्द्रह मील दूर अकोला ग्राम में की है।
साधना की प्रमाणिकता का सुफल थीं। ये सभी सामान्य समय में किए जाने वाले सेवा कार्यों के अतिरिक्त किसी भी राष्ट्रीय या प्राकृतिक आपदा के समय अपनी जान-जोखिम में डालकर भी सेवा योजनाओं को संचालित करते थे। उनकी इन भावनाओं के कारण जन-जन में उनका भारी सम्मान था।
साधना से स्पन्दित है। शान्तिकुञ्ज से आधा किलोमीटर दूर हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर यह विद्या साधना केन्द्र अवस्थित है। प्रकृति की सुरम्यता चारों ओर से इस देव संस्कृति विश्वविद्यालय की भूमि एवं भवन को घेरे है। हिमालय की शिवालिक पर्वतमालाएँ इस पर अपनी सुषमा की अविराम वृष्टि करती हैं। गंगा की लहरों को छूकर आती बयार यहाँ पावनता का संचार करती है।
साधना और अविद्या से मुक्ति के द्वार खुल रहे हैं। देव संस्कृति की अनगिन सम्भावनाएँ अब यहाँ जन्म एवं जीवन पाने की तैयारी में जुटी हैं। प्रखर साधक अपनी साधना की निर्मल दृष्टि से यहाँ बहुत कुछ अद्भुत होता हुआ देख रहे हैं।
साधना संकाय के पाठ्यक्रमों में देव संस्कृति के प्रणेता ऋषियों के जीवन का प्रकाश है। इनमें उन प्रयोगों, प्रक्रियाओं, सिद्धान्तों एवं व्यावहारिक सूत्रों का समन्वय-सामञ्जस्य है, जो उनकी उपलब्धियों का आधार बने। साधना की विधियाँ प्राचीन भारत के महर्षियों का सर्वोत्कृष्ट अनुसन्धान है। उन्होंने साधना-विज्ञान के द्वारा ही मनुष्य की प्रकृति का परिष्कार एवं विकृति का निवारण-निराकरण करके संस्कृति को जन्म दिया। संस्कृति के सूत्रों को, साधना के सत्य को जानकर ही जाना और सीखा जा सकता है।
साधना संकाय के संकायाध्यक्ष भी थे। वे स्वयं योगशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार चीनी यात्री ह्वनत्साँग ने उन्हीं से योग साधना की शिक्षा पायी थी। इस संकाय में शताधिक विषयों एवं विभागों की गतिविधियाँ संचालित होती थी। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में- 1.साधना संकाय, 2. स्वास्थ्य संकाय, 3. शिक्षा संकाय, 4. स्वावलम्बन संकाय की स्थापना भी साँस्कृतिक चेतना एवं विद्या के बहुआयामी विस्तार के लिए की गयी है।
साधना संकाय के पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन ऐसे ही संकल्पित अध्यात्म अभिलाषियों के लिए है। इसका उद्देश्य देश व धरती के वातावरण को तप की ऊर्जा से ऊर्जावान बनाना है। हिमालय की गहन कन्दराओं में जो वैभव खोया हुआ है, उसे फिर से प्रकट व प्रकाशित करना है। हिमालय के ऋषियों के सन्देश से धरा को ध्वनित करना है। विश्व भर के विविध धर्मों के मूल तत्त्वों व सत्यों को उजागर करना है।
साधना संकाय के किसी भी पाठ्यक्रम की सीमा कतिपय सिद्धान्तों को रटने और रटाने से कहीं बहुत अधिक है। साधना संकाय में पढ़ने वाले और पढ़ाने वाले दोनों का ही साधक होना अनिवार्य है। इस संकाय में उन्हीं का स्थान सुनिश्चित होगा जो अध्यात्म विद्या के अनुरागी हैं। जो मानव धर्म व विश्व धर्म की स्थापना करने, सब धर्मों के अनिवार्य तत्त्वों में समायी एकता को समझने के लिए समर्पित हैं। जिनमें तपस्वी जीवन जीने का संकल्प है।
साधनाओं का पूरा ध्यान है और ज्ञान है। वे अपने कार्य के व्यापक उद्देश्यों से उत्साहित हैं, भाव विभोर हैं। यंत्री होने के बावजूद उनमें याँत्रिकता जरा भी नहीं है। उनमें तो साँस्कृतिक संवेदना छलकती है। वे सभी अपने द्वारा किए जाने वाले कठोर श्रम को तप साधना ही मान रहे हैं।
साधना विधियों का आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन-अनुसन्धान, 4.कतिपय साधनात्मक प्रयोगों का व्यावहारिक शिक्षण। ये चार बिन्दु मूलतः सैद्धान्तिक है। इनसे पाठ्यक्रमों की थ्योरी भर पता चल पाती है। जिसके कुछ अंश अन्य विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिल जाते हैं।
साधना संकाय की थी। वहाँ के कुलपति आचार्य शीलभद्र, साधना संकाय के संकायाध्यक्ष भी थे। वे स्वयं योगशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार चीनी यात्री ह्वनत्साँग ने उन्हीं से योग साधना की शिक्षा पायी थी। इस संकाय में शताधिक विषयों एवं विभागों की गतिविधियाँ संचालित होती थी।
साधना के लिए एक और विश्वविद्यालय हिमालय की तलहटी में स्थापित किया था। हालाँकि उनके द्वारा स्थापित एक विश्वविद्यालय पहले से ही अयोध्या में था। उनके हिमालय स्थित विश्वविद्यालय के वातावरण के सौंदर्य का वर्णन करती, महाकाव्य रघुवंश की पंक्तियाँ हैं- गंगप्रपातान्तविरुढ़शष्पं गौरीगुरोर्गह्वरभाविवेश। यहाँ चारों ओर घना मनोरम वन था। इस वन में विविध वनस्पतियाँ थीं और पशु-पक्षी विचरण करते थे।
साधना एवं संयम के चारित्रिक आदर्शों का पालन करेंगे। 3. आचार्य एवं विद्यार्थी सभी सामाजिक मर्यादाओं एवं वर्जनाओं का पालन करेंगे।
साधना करते हुए देव संस्कृति के विस्तार में अपना सहयोग दे सकें।
साधना से यहाँ उन्हें विचारों के साथ उत्तम संस्कार भी मिलेंगे। इसे पाकर वर्तमान संवरेगा, भविष्य निखरेगा। विद्यार्थियों के साथ उनके कुटुम्ब एवं पीढ़ियाँ, राष्ट्र और विश्व इस विश्वविद्यालय के अनुदानों से अनुगृहीत हुए बिना न रहेंगे।
साधना विज्ञान के वैज्ञानिक प्रयोगों की समुचित विधि व्यवस्था, 3. अध्यात्म साधना के अनुरागी आचार्य एवं 4. संकल्पवान एवं आध्यात्मिक अनुशासनों के लिए समर्पित विद्यार्थी। उपर्युक्त चार में से तीन अनिवार्यताओं को जुटाने की विधि व्यवस्था विश्वविद्यालय के संचालकों ने पूरी कर ली है। चौथे क्रम के अनुरूप विद्यार्थियों की बड़ी आतुर प्रतीक्षा है।
साधना के यथार्थ स्वरूप से बहुसंख्यक जन अपरिचित हैं। जिन्हें इससे परिचित होने का विश्वास है, वे भी प्रायः भ्रमित हैं। ऐसे लोग अनुशासन को पराधीनता, परवशता या जबर्दस्ती लादी गयी बेबसी-मजबूरी मानते हैं। लेकिन ये मान्यताएँ वास्तव में भ्रमित चित्त की देन है। दरअसल ऐसा अनुशासन को शासन का पर्याय मानने से होता है, जबकि ऐसा है नहीं।
साधना ही मान रहे हैं। इन सभी की सम्मिलित संवेदना की सजलता एवं सघनता के कारण विश्वविद्यालय भवन कुछ लाख-करोड़ ईंटों के जोड़ से कहीं बहुत अधिक हो गया है।
साधना सामर्थ्य से मानव हृदयों को आलोकित करे, यही इन पाठ्यक्रमों को पढ़ाने का मकसद है। इन पाठ्यक्रमों को पढ़ने वाले श्री रामकृष्ण परमहंस द्वारा बताए गए ‘जतो मत-ताते पथ’ का अर्थ समझ सकेंगे। वे जान सकेंगे कि सब धर्मों का सार एक है। सभी धर्म साधनाओं एवं आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का गन्तव्य एक है। युग ऋषि परम पूज्य गुरुदेव की अपरिमित तप ऊर्जा, उनके द्वारा अर्जित की गई विद्याएँ साधना संकाय के पाठ्यक्रमों के माध्यम से ही अभिव्यक्त होंगी।
साधना करने का भार विश्वविद्यालय के छात्रों-छात्राओं व आचार्यों-आचार्याओं का है। उनकी विद्या साधना ही इसे प्राणवान व ऊर्जावान बनाएगी। इस पुस्तकालय में अन्य विविध ग्रन्थों के साथ देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अपने निजी प्रकाशित ग्रन्थ भी होंगे। जिनका प्रकाशन विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग द्वारा होगा। इस विभाग से देव संस्कृति के बहुआयामी स्वरूप के सम सामयिक रूप नियमित व निरन्तर प्रकाशित होते रहेंगे।
साधना मन्दिर में होने वाली भविष्यत् विद्या साधनाओं का पूरा ध्यान है और ज्ञान है। वे अपने कार्य के व्यापक उद्देश्यों से उत्साहित हैं, भाव विभोर हैं। यंत्री होने के बावजूद उनमें याँत्रिकता जरा भी नहीं है। उनमें तो साँस्कृतिक संवेदना छलकती है। वे सभी अपने द्वारा किए जाने वाले कठोर श्रम को तप साधना ही मान रहे हैं।
साधना-विज्ञान के द्वारा ही मनुष्य की प्रकृति का परिष्कार एवं विकृति का निवारण-निराकरण करके संस्कृति को जन्म दिया। संस्कृति के सूत्रों को, साधना के सत्य को जानकर ही जाना और सीखा जा सकता है। मनुष्य में देवता के अवतरण की प्रयोगात्मक विधि यही है। मनुष्य मात्र के लिए इसकी वैज्ञानिक उपयोगिता को सिद्ध करने के लिए ही देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साधना संकाय की स्थापना की गयी है।
साधना की प्रक्रिया एवं प्रणाली के साथ साधना स्थल का भी महत्त्व होता है। इस महत्त्व को ध्यान में रखते हुए ही विश्वविद्यालय भवन का निर्माण व विकास किया जा रहा है। इतिहास के पृष्ठ प्राचीन भारत के तक्षशिला, नालन्दा एवं विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालयों की गौरव गाथा सुनाते हैं। इस गौरव गान में इन विश्वविद्यालयों के भवनों के मधुर गीत भी हैं। इस बात का भी उल्लेख है कि प्राचीन विश्वविद्यालयों के भवनों में आचार्यों एवं अन्तेवासी विद्यार्थियों के लिए विद्या-साधना के लिए किस-किस भाँति अनुकूलताएँ थी।
साधना के साधन जुटाए गए थे, लेकिन सुख के साधनों से परहेज बरती गयी थी।
साधना की नींव पर ही यहाँ विद्या विस्तार का भव्य भवन खड़ा होना है।
साधना के अमिट संस्कार हैं। इसे प्रमाणित करने वाले कतिपय महत्त्वपूर्ण चिह्न भवन निर्माण के दौरान मिले हैं। इन संस्कारों को जाग्रत् करने के लिए फिर से तप की प्रक्रिया अपनायी जा रही है। इस तप साधना में विश्वविद्यालय के आचार्यगणों के साथ सभी छात्र एवं छात्राओं को मिलकर भागीदारी निभानी है। गायत्री महामंत्र का जप एवं नियमित यज्ञ से यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा शतगुणित एवं सहस्रगुणित होगी।
साधना ही इसे प्राणवान व ऊर्जावान बनाएगी। इस पुस्तकालय में अन्य विविध ग्रन्थों के साथ देव संस्कृति विश्वविद्यालय के अपने निजी प्रकाशित ग्रन्थ भी होंगे। जिनका प्रकाशन विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग द्वारा होगा। इस विभाग से देव संस्कृति के बहुआयामी स्वरूप के सम सामयिक रूप नियमित व निरन्तर प्रकाशित होते रहेंगे। विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित इन कृतियों का पुस्तकालय में विशेष स्थान होगा।
साधना को पहले और साधनों को बाद में स्थान दिया जाय। जीवन को आनन्द से भरपूर करने के लिए मनुष्य को पहले अपनी प्रकृति में बदलाव लाना होगा। बाद में इससे मिली नवीन जीवन दृष्टि के आधार पर परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं।
साधना सम्पन्न विश्वविद्यालय यह एक ही होगा। जिनके पास अनेक जन्मों के पुण्यों की संचित निधि है, ऐसे पुण्यवान यहाँ आएँगे और विद्यावान् बनेंगे। गंगा की गोद और हिमालय की छाया में अनुशासन की कठोर तप-साधना से यहाँ उन्हें विचारों के साथ उत्तम संस्कार भी मिलेंगे। इसे पाकर वर्तमान संवरेगा, भविष्य निखरेगा। विद्यार्थियों के साथ उनके कुटुम्ब एवं पीढ़ियाँ, राष्ट्र और विश्व इस विश्वविद्यालय के अनुदानों से अनुगृहीत हुए बिना न रहेंगे।
साधना की विधियाँ प्राचीन भारत के महर्षियों का सर्वोत्कृष्ट अनुसन्धान है। उन्होंने साधना-विज्ञान के द्वारा ही मनुष्य की प्रकृति का परिष्कार एवं विकृति का निवारण-निराकरण करके संस्कृति को जन्म दिया। संस्कृति के सूत्रों को, साधना के सत्य को जानकर ही जाना और सीखा जा सकता है। मनुष्य में देवता के अवतरण की प्रयोगात्मक विधि यही है। मनुष्य मात्र के लिए इसकी वैज्ञानिक उपयोगिता को सिद्ध करने के लिए ही देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साधना संकाय की स्थापना की गयी है।
साधना करते हैं। यहाँ सुन्दर वाटिकाएँ हैं। इन पर आने-जाने का मार्ग बनाया गया है।’ यज्ञों की परम्परा तो सदा ही देव संस्कृति का प्राणभूत रही है। महाकवि कालिदास महर्षि कण्व के विद्या केन्द्र में यज्ञ दर्शन कराते हुए कहते हैं- ‘भिन्नो रागः किसलयरुचा-भाज्यधूमोद्गमेन।
साधना तो सधेगी ही साथ ही उन्हें अपने सामाजिक दायित्व का भी बोध होगा। वे अनुभव करेंगे कि जिस समाज के वे अंग-अवयव हैं, उसके प्रति उनका महत्त्वपूर्ण दायित्व भी है। सेवा-साधना से विकसित संवेदना उनमें एक अनूठी आत्म जागृति को जन्म देगी। जिससे उनमें सामाजिक कर्त्तव्यों के बोध के साथ देश व धरती से गहरे भावनात्मक लगाव, जुड़ाव की अनुभूति होगी। राष्ट्रीय भावनाएँ विकसित होगी।
साधना के लिए उपयुक्त वातावरण, 2. साधना विज्ञान के वैज्ञानिक प्रयोगों की समुचित विधि व्यवस्था, 3. अध्यात्म साधना के अनुरागी आचार्य एवं 4. संकल्पवान एवं आध्यात्मिक अनुशासनों के लिए समर्पित विद्यार्थी। उपर्युक्त चार में से तीन अनिवार्यताओं को जुटाने की विधि व्यवस्था विश्वविद्यालय के संचालकों ने पूरी कर ली है। चौथे क्रम के अनुरूप विद्यार्थियों की बड़ी आतुर प्रतीक्षा है।
साधना संकाय के पाठ्यक्रमों के माध्यम से ही अभिव्यक्त होंगी। इनसे उपजी प्राण ऊर्जा से स्वास्थ्य संकाय के पाठ्यक्रम जन्म लेंगे। और रुग्ण होते जा रहे मानव समाज को समग्र स्वास्थ्य का बोध कराएँगे।
साधनात्मक अनुबन्ध है। इन अनुबन्धों एवं व्रतबन्धों की अनुशासन मर्यादाओं को स्वीकार करने वाले आचार्य एवं छात्र-छात्राएँ यहाँ की शिक्षण प्रक्रिया की मौलिकता का सृजन करेंगे।
साधना संकाय के पाठ्यक्रम विवशता के इसी चक्रव्यूह को ध्वस्त करने के लिए है। देव संस्कृति विश्वविद्यालय में साधना संकाय की स्थापना इस संकल्प का उद्घोष है- कि अब अध्यात्म विद्या के जिज्ञासुओं को प्रभावकारी मार्गदर्शन का अभाव न रहेगा। कठोर साधना के अभिलाषियों के लिए आध्यात्मिक साधनाएँ फिर से प्रकाशित की जाएँगी। तप के गुह्य व गहन प्रयोगों में तत्पर होने वालों की अभीप्सा को अब निराश न होना पड़ेगा। साधना संकाय के पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन ऐसे ही संकल्पित अध्यात्म अभिलाषियों के लिए है।
साधना के अभिलाषियों के लिए आध्यात्मिक साधनाएँ फिर से प्रकाशित की जाएँगी। तप के गुह्य व गहन प्रयोगों में तत्पर होने वालों की अभीप्सा को अब निराश न होना पड़ेगा। साधना संकाय के पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन ऐसे ही संकल्पित अध्यात्म अभिलाषियों के लिए है। इसका उद्देश्य देश व धरती के वातावरण को तप की ऊर्जा से ऊर्जावान बनाना है। हिमालय की गहन कन्दराओं में जो वैभव खोया हुआ है, उसे फिर से प्रकट व प्रकाशित करना है।
साधना।
साधना की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। वातावरण उपयुक्त और ऊर्जावान हो तो मनुष्य का मानसिक विकास बड़े ही सहज ढंग से हो जाता है। वातावरण और मानव मन के जुड़ाव को आधुनिक विज्ञानवेत्ता भी स्वीकारने लगे हैं। मानव मन के मर्मज्ञ एडवर्ड ब्यूरिन ने ‘इन्वायरन्मेण्टल इफेक्ट्स ऑन ह्युमेन माइन्ड’ में इस सम्बन्ध में काफी कुछ विचार किया है। वह कहते हैं मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर वातावरण के असर पड़े बिना रह नहीं सकते।
साधना और तप परायण जीवन से यहाँ के वातावरण के सौंदर्य में अभिवृद्धि करते थे।
साधना संकाय से संपर्क करना चाहिए।
साधना चाहिए। जिसे करना विद्यार्थियों के लिए ही नहीं आचार्यों के लिए भी अनिवार्य है।
साधना स्थल का भी महत्त्व होता है। इस महत्त्व को ध्यान में रखते हुए ही विश्वविद्यालय भवन का निर्माण व विकास किया जा रहा है। इतिहास के पृष्ठ प्राचीन भारत के तक्षशिला, नालन्दा एवं विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालयों की गौरव गाथा सुनाते हैं। इस गौरव गान में इन विश्वविद्यालयों के भवनों के मधुर गीत भी हैं। इस बात का भी उल्लेख है कि प्राचीन विश्वविद्यालयों के भवनों में आचार्यों एवं अन्तेवासी विद्यार्थियों के लिए विद्या-साधना के लिए किस-किस भाँति अनुकूलताएँ थी।
साधना के लिए तो अनिवार्य थी ही, इसका सामाजिक महत्त्व भी था। समस्याएँ ज्ञान अर्जन के क्षेत्र की हो या फिर समाज की उलझनों को सुलझाने के सवाल हो? इनके समाधान संगोष्ठियों में ढूंढ़े जाने की रीति रही है। वैदिक काल की सभा, समिति, विदथ इसी सत्य को तथ्य के रूप में स्पष्ट करती है। इन सभी का उद्देश्य एक ही था कि सभी मननशील मुनि एवं विचारशील ऋषि मिलकर उपलब्ध ज्ञान की त्रुटियों का निवारण-निराकरण करें।
साधना सम्पन्न कर सकेंगे निर्माणाधीन परिसरों में आवासीय परिसर भी है। इस परिसर का विस्तार 8507 वर्गमीटर में है। तीन मंजिल वाले इन भवनों में 129 फ्लैट बनाए जा रहे हैं। इनमें से एक कमरे वाले फ्लैट 48 और दो कमरों वाले फ्लैट 54 है। तीन कमरों वाले फ्लैट की संख्या 18 और चार कमरों वाले फ्लैट 9 हैं।
साधना केन्द्र मालिनी नदी के तट पर स्थित था। ‘एष खलु कण्वस्य कुलपतेरनुमालिनीतीर विश्वविद्यालयों दृश्यते।’ इस स्थान का वर्णन करते हुए महाकवि कालिदास कहते हैं- ‘अपने गुरुजनों के साथ छात्र और छात्राएँ यहाँ सदा से तप परायण होकर विद्या साधना करते हैं। यहाँ सुन्दर वाटिकाएँ हैं। इन पर आने-जाने का मार्ग बनाया गया है।
साधनाएँ फिर से प्रकाशित की जाएँगी। तप के गुह्य व गहन प्रयोगों में तत्पर होने वालों की अभीप्सा को अब निराश न होना पड़ेगा। साधना संकाय के पाठ्यक्रमों का निर्माण एवं संचालन ऐसे ही संकल्पित अध्यात्म अभिलाषियों के लिए है। इसका उद्देश्य देश व धरती के वातावरण को तप की ऊर्जा से ऊर्जावान बनाना है। हिमालय की गहन कन्दराओं में जो वैभव खोया हुआ है, उसे फिर से प्रकट व प्रकाशित करना है।
साधना के प्रति प्रबल अनुराग चाहिए। यहाँ प्रवेश के लिए जरूरी है, स्वयं के व्यक्तित्व को विकसित करने की तीव्रतम चाहत। जो यहाँ प्रवेश चाहते हैं उनमें संस्कृति-साधना के लिए भावभरा समर्पण होना चाहिए। यह सब होने पर ही यहाँ प्रवेश सम्भव है। उत्कृष्ट बीज ही यहाँ की ऋषि भूमि में बोए जाएँगे।
साधना के अर्थ एवं महत्त्व को समझने की शुरुआत होती है। इसी से वह नींव मजबूत होती है, जिसके ऊपर अध्यात्म विद्या का भव्य मन्दिर गढ़ा जा सकता है, ऋषि प्रणीत उद्देश्य साकार किए जा सकते हैं।
साधना के प्रकाश में विद्यार्थी एवं आचार्यगण सम्मिलित रूप से यहाँ विद्या वैभव के साथ आत्म वैभव का भी अर्जन करेंगे। इस भूमि का सुरम्य परिवेश प्रकृति ने बनाया है, और यहाँ के आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण पुरातन ऋषियों ने किया है। इस बात की गवाही वेद-पुराण और इतिहास सभी मिलकर देते हैं। अब तो कई पुरातात्त्विक प्रमाण भी इस भूमि के तपोभूमि होने के प्रमाण देने लगे हैं। विदेशी पुराविद् ए. रिचर्ड सहित कई देशी पुराविशेषज्ञों ने शिवालिक के सर्वेक्षण में इसके तपोभूमि एवं यज्ञभूमि होने के प्रमाण पाए हैं।
साधनात्मक प्रशिक्षण, इसके निष्कर्षों का विश्ववसुधा में वितरण परम पूज्य गुरुदेव का दिव्य स्वप्न था।
साधना से अनुभूत सत्य के द्वारा राष्ट्रीय जीवन में नव प्राण भरे। विश्वमानवता को अपने ज्ञान से कृतकार्य किया। प्राक् ऐतिहासिक काल के ऋषियों एवं उनके विश्वविद्यालयों तथा ऐतिहासिक काल के विश्वविद्यालयों ने जिस जीवन दृष्टि की खोज की, उसके द्वारा आज भी शिक्षा जगत् में नयी क्राँति सम्भव है। शान्तिकुञ्ज द्वारा ऋषियों की उज्ज्वल परम्परा में स्थापित देव संस्कृति विश्वविद्यालय शिक्षा जगत् में इसी नयी क्रान्ति के लिए कृत संकल्पित है।
साधना-विधियों का समुचित ज्ञान, 3. प्रायः समस्त साधना विधियों का आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन-अनुसन्धान, 4.कतिपय साधनात्मक प्रयोगों का व्यावहारिक शिक्षण। ये चार बिन्दु मूलतः सैद्धान्तिक है। इनसे पाठ्यक्रमों की थ्योरी भर पता चल पाती है। जिसके कुछ अंश अन्य विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिल जाते हैं।
साधना की निर्मल दृष्टि से यहाँ बहुत कुछ अद्भुत होता हुआ देख रहे हैं।
साधना करने का सुयोग सुअवसर मिल पाएगा।
साधना में विश्वविद्यालय के आचार्यगणों के साथ सभी छात्र एवं छात्राओं को मिलकर भागीदारी निभानी है। गायत्री महामंत्र का जप एवं नियमित यज्ञ से यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा शतगुणित एवं सहस्रगुणित होगी।
साधना-सिद्धान्तों का ज्ञान, 2. विश्व वसुधा के विभिन्न धर्मों व उनके संस्थापकों, व विश्व भर के अध्यात्मवेत्ताओं के द्वारा बताए गए धार्मिक तत्त्वों व साधना-विधियों का समुचित ज्ञान, 3. प्रायः समस्त साधना विधियों का आधुनिक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन-अनुसन्धान, 4.कतिपय साधनात्मक प्रयोगों का व्यावहारिक शिक्षण। ये चार बिन्दु मूलतः सैद्धान्तिक है। इनसे पाठ्यक्रमों की थ्योरी भर पता चल पाती है। जिसके कुछ अंश अन्य विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिल जाते हैं।
साधना करनी पड़ेगी। विषय वस्तु के अध्ययन के साथ उन्हें अनेक व्रतों का अभ्यास करना पड़ेगा। मूल्याँकन की इस मौलिक रीति-नीति से उनके समग्र व्यक्तित्व का मूल्याँकन होगा। विद्यार्थीगण अपनी विषय वस्तु के ज्ञान के साथ देव संस्कृति के आदर्शों को अपने जीवन में कितना उतार पाए? यह परखा जाएगा।
साधना भी करेंगे। इन सेवा कार्यों का निर्धारण प्रत्येक संकाय के अनुरूप किया जाएगा। चिकित्सा सेवा एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता के अलावा अन्य कई सामाजिक सेवा की योजनाएँ विश्वविद्यालय के द्वारा चलाई जाएगी। इन सभी में आचार्यों एवं छात्रगणों की भागीदारी अनिवार्य रूप से होगी। सभी सेवा योजनाओं का क्रियान्वयन व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के आदर्शों एवं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किया जाएगा।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-May
साधना, स्वाध्याय, सेवा का मूल यही है कि स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करे तथा उसके दिव्य स्वरूप का अनुभव प्राप्त करें।
साधना हो जाती है। यह न समझना कि बैठे रहकर नाक दबाने का नाम साधना है।
साधना के लिए हर रात्रि ऐसे सोएँ जैसे सारा अतीत छोड़कर सो रहे हैं। सोने से पहले अतीत को भगवत्स्मरण में विसर्जन कर दें। हर रात मरने की अनूठी कला सीखें- मरना अतीत के प्रति। और हर सुबह- नया जन्म लें। सुबह एक नयी सुबह में- एक नए मनुष्य की भाँति उठें।
साधना है। बेटा, मथुरा के अखण्ड ज्योति संस्थान में जो 9&9 की कोठरी है, वहीं पर मैंने सब कुछ देख समझ लिया था। वहीं पर उसी कोठरी में साधना करते हुए मैंने मिशन का आज का वर्तमान और आगे का भविष्य देखा था। अपने साधनाकाल में ध्यान करते हुए मैंने शान्तिकुञ्ज देखा था, तुम सबको देखा था। आगे जो लोग आएँगे, शान्तिकुञ्ज का जो भावी विस्तार होना है, वह भी मैंने उसी छोटी सी कोठरी में ध्यान करते हुए देख लिया था।
साधना में श्रद्धा सिद्धि के मार्ग पर ले जाती है।
साधना का खोल है। इसका प्राण तो पवित्रता और प्रामाणिकता है। अपनी जीवात्मा को धोने से साधना होती है। अपने गुरु की नजर में, अपनी आत्मा के सामने और भगवान के सामने एकदम सौ फीसदी खरा साबित होने का नाम साधना है। तुम लोग यह कर सको, तो करो।
साधना करते हुए मैंने मिशन का आज का वर्तमान और आगे का भविष्य देखा था। अपने साधनाकाल में ध्यान करते हुए मैंने शान्तिकुञ्ज देखा था, तुम सबको देखा था। आगे जो लोग आएँगे, शान्तिकुञ्ज का जो भावी विस्तार होना है, वह भी मैंने उसी छोटी सी कोठरी में ध्यान करते हुए देख लिया था।
साधना काल में जो सन्देश मिला, जो संकेत प्रकट हुए उन्हीं के आधार पर अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की योजना बनी। यह दैवी संकल्प का दिव्य प्राकट्य था। उन दिनों न तो मिशन था और न साधन। सहयोगियों एवं समर्पित कार्यकर्त्ताओं की आज की सी लम्बी कतारें न थी। प्रत्यक्ष में कुछ भी न होते हुए अप्रत्यक्ष में हिमालयवासी ऋषियों का आशीष और आश्वासन था।
साधना में श्रद्धा-विश्वास का समावेश है। जो किया जा रहा है, जो समझाया गया है, उसमें प्रत्यक्ष की तरह विश्वास कहा गया है कि गायत्री कामधेनु है, तो उसी रूप में मान लिया। यक संदेह नहीं उठा कि यह सिर्फ महत्व बताने के लिए ही है। सच्चाई शायद कुछ और हो। शास्त्र गुरु और साधना में श्रद्धा सिद्धि के मार्ग पर ले जाती है।
साधना, इतिहास, पुराण आदि भागवत् में ही समाहित हैं। पिताश्री की मुख-मुद्रा देखकर बालक श्रीराम भी आश्वस्त हो जाता। उठकर वह खेलने-कूदने लगता।
साधना होती है। अपने गुरु की नजर में, अपनी आत्मा के सामने और भगवान के सामने एकदम सौ फीसदी खरा साबित होने का नाम साधना है। तुम लोग यह कर सको, तो करो। रोज अपनी चीर-फाड़ करो, अपनी कमियों-कमजोरियों को ढूंढ़ो और और उन्हें निकाल बाहर करो। जो अपने प्रति जितना कठोर होता है, वह उतना ही अच्छा साधक बन पाता है।
साधना बताएँगे। गुरुजी ! साधना बताने में तो बहुत टाइम लग जाएगा? नहीं बेटा ये तो मिनटों की बात है। आपरेशन में क्या देर लगती है! दवा खिलाने में क्या देर लगती है! इंजेक्शन तो एक मिनट में लगा देंगे। और क्या करेंगे?
साधनाशील बने तथा अपने ऊपर अपना नियंत्रण स्थापित करें। इससे हम आदर्शों के,सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय परमपिता परमात्मा के ज्ञान से ओत प्रोत हो सकेंगे एवं यही ज्ञान मिलने पर अविलंब हमें भगवत्प्राप्ति होगी, जो परम शाँति की ओर हमें ले जाएगी।
साधना का अर्थ है- अपने को इससे अलग करना। मन की क्रिया से अपने जुड़ाव-लगाव को खत्म करना। यदि मन के साथ, उसकी क्रियाशीलता के साथ अपनी आसक्ति समाप्त हो जाए, तो मन को ऊर्जा मिलना बन्द हो जाती है। फिर तो मन बस थोड़ी देर बहेगा, ऊर्जा के अभाव में स्वयं ही थम जाएगा। जब पिछला संवेग चुक जाएगा, जब पिछली ऊर्जा समाप्त हो जायगी, तब मन अपने आप ही रुक जाएगा।
साधना करनी है, उन्हें स्वयं में इतनी जागृति तो लानी ही होगी कि वे अपने आप को अतीत की स्मृति एवं भविष्य के कल्पनापाश से मुक्त रख सकें। जो जाग्रत् हैं वे ही ऐसा कर सकेंगे। और जो ऐसे करेंगे, वे स्वतः ही जाग्रत् हो जाएँगे।
साधना, नारी जागरण, लेखन, रामायण शिक्षण, वानप्रस्थ प्रशिक्षण आदि सूत्रों का संचालन कर वे धीरे-धीरे उस प्रक्रिया को स्थापित करने लगे। जिसे शाँतिकुँज में स्थापित होने वाले देव संस्कृति विश्वविद्यालय का आधार बनाना था।
साधना का सार यही है कि भीड़ भरे जीवन में, सम्बन्धों की रेल-पेल में हम उसे भूल गए हैं, जो कि हम स्वयं हैं। हम या तो किसी के मित्र हैं, या तो शत्रु हैं। पिता हैं या फिर पुत्र, पति हैं अथवा पत्नी। इन सम्बन्धों से हम इतना घिरे हुए हैं कि हमारी निजता ही खो गयी है। क्या हमने कभी कल्पना की है कि इन सारे सम्बन्धों से भिन्न हम कौन हैं?
साधना में समाधिस्थ गुरुदेव को हिमालय के ऋषियों का यह सन्देश मिला कि “आध्यात्मिक जगत् में भारत माता की बेड़ियाँ टूट चुकी हैं। राष्ट्र की स्वतंत्रता की घोषणा की जा चुकी है। कुछ ही वर्षों में यह सत्य प्रत्यक्ष जगत् में प्रकट हो जाएगा। इसलिए अब तुम्हें नए दायित्व सम्भालने हैं। राजनैतिक क्रान्ति को सही अर्थ तब तक न मिलेगा, जब तक इसमें सामाजिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति एवं बौद्धिक क्रान्ति के स्वर न मुखर होंगे।
साधना के एकान्त से समाज के महासमर में आ खड़े हुए हैं। 2. यहाँ केवल उनकी उपस्थिति ही नहीं है, अब उन्होंने कालचक्र की गति को अपने हाथों से नियंत्रित करने का संकल्प कर लिया है।
साधना है। यही साधना हमने की है, यही तुमको बता रहे हैं।
साधना करने के लिए हमें अपने मिथ्या चेहरों को उतार कर रखना होगा। क्योंकि अध्यात्म साधना का अर्थ ही स्वयं को जानना और स्वयं को देखना है। अपने अस्तित्व में जो मौलिक है और सहज है, उसे प्रकट होने दें, उसमें जिएँ। जीवन यदि सहज और सरल बनें, तो साधना अपने आप ही विकसित होती है।
साधना-साधन’ खेल में रस आने लगा था, वे ढूँढ़ते रहे। तीसरे पहर उनके खेल का लीडर प्रकट हुआ तो पूछा कहाँ गए थे। श्रीराम ने उत्तर दिया, एक गुफा मिल गई थी। वहाँ काई नहीं आता। आराम से बैठकर ध्यान किया जा सकता है।
साधना इतनी प्रखर थी कि कागामारु जहाज द्वारा जापान से पाण्डिचेरी आते समय श्री माँ ने 50 मील की दूरी पर ही इसका अनुभव कर लिया था। इसी के प्रभाव से तपस्वी की तपस्थली एवं साधक का साधना स्थान पुण्य तीर्थ बन जाता है जहाँ पर इन दिव्य शक्तियों का प्रचण्ड प्रवाह बना रहता है। और इसके आसपास आने वाले हर व्यक्ति को उसकी पात्रता के अनुरूप उस अनुदान-वरदान की वृष्टि होती रहती है।
साधनाशाली होना अनिवार्य है। हो सकता है श्रद्धा एवं भक्तिभाव से ध्यान-साधना के क्षेत्र में अधिकतम आँतरिक जागरुकता मिल भी जाए, पर यदि इंद्रियाँ भलीभाँति नियंत्रित नहीं है, तो न केवल एकाग्रता छिन्न-भिन्न हो जाती है, हम उस शाँति को प्राप्त नहीं कर पाते जो आत्मज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धि है। देखा जाए तो इंद्रियों का स्वभाव ही बहिर्मुख होना है। वे बार-बार विषयों की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं। इसीलिए जब तक हम इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करते, तब तक शाँति प्रदान नहीं कर सकती।
साधना करने की चाहत है, उन्हें कुछ विशेष ढंग से जीना होता है। आध्यात्मिक जीवन के लिए कोरी चाहत काफी नहीं है। जो अकेली चाहत को रखते हैं, वे केवल अपने कल्पना जाल में उलझे रहते हैं। बाद में उन्हें पछतावा और निराशा के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता। क्योंकि साधना के लिए तीव्र अभीप्सा के साथ संकल्प एवं श्रम भी आवश्यक है।
साधना अपने आप ही विकसित होती है।
साधना से तुमको हमारा प्यार मिलेगा, भगवान का प्यार मिलेगा। और उन सब ऋषियों-मुनियों, हिमालय वासी देवात्माओं का आशीर्वाद मिलेगा, जिनके तप से यह मिशन चल रहा है। इन शब्दों के साथ गुरुदेव ने उस दिन अपनी वाणी को विराम दे दिया। गोष्ठी के पल बीत गए। पर कुछ ऐसा भी था, जो नहीं बीता न उस दिन और न आज के दिन।
साधना से सिद्धि का मूलभूत आधार श्रद्धा है।मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का (आदतों का) गहरा पुट रहता है, वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।” आगे वे कहते हैं-” साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि उन लौह श्रृंखलाओं में जड़कर श्रद्धा-विश्वासरूपी महोदैत्य को उपयोगी प्रयोजन उत्पन्न कर सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। श्रद्धा से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है। आत्मा का सबसे विश्वस्त और घनिष्ठ सचिव श्रद्धा ही है।
साधना के लिए साधक को चित्त की भूमि वैसे ही तैयार करनी होती है, जैसे फूलों को बोने के लिए पहले भूमि को तैयार किया जाता है। इसके लिए कुछ अनिवार्य सूत्र हैं।
साधना का अर्थ जीवन के हर पक्ष में आदर्शवादिता और प्रामाणिकता समावेश है। जो भी इस कसौटी पर खरा उतरता है, उसको स्वर्णकार की तरह सम्मानपूर्वक उचित मूल्य मिलता है, पर पीतल को सोना बनाकर बेचने की फिराक में फिरने वाले को हर कहीं दुत्कारा जाता है।
साधना के मर्म को स्पष्टतः उद्घाटित करता है। यहाँ इतना ही कि यज्ञोपवीत के बाद बालक श्रीराम ने संध्या गायत्री जप आरंभ कर दिया।यह बात मन अच्छी तरह बैठ गई थी कि संध्या-गायत्री नहीं करने से यज्ञोपवीत भंग हो जाता है। व्यक्ति को व्रात्यसंज्ञक अर्थात् पतित कहा जाने लगता है और यज्ञोपवीत संस्कार के समय हुआ उसका दूसरा जन्म या मनुष्य जीवन स्थगित हो जाता है। वह अपने आपको द्विज कहने का अधिकार खो देता है।
साधना के लिए तीव्र अभीप्सा के साथ संकल्प एवं श्रम भी आवश्यक है। सत्य की साधना के लिए साधक को चित्त की भूमि वैसे ही तैयार करनी होती है, जैसे फूलों को बोने के लिए पहले भूमि को तैयार किया जाता है। इसके लिए कुछ अनिवार्य सूत्र हैं।
साधना के क्षेत्र में अधिकतम आँतरिक जागरुकता मिल भी जाए, पर यदि इंद्रियाँ भलीभाँति नियंत्रित नहीं है, तो न केवल एकाग्रता छिन्न-भिन्न हो जाती है, हम उस शाँति को प्राप्त नहीं कर पाते जो आत्मज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धि है। देखा जाए तो इंद्रियों का स्वभाव ही बहिर्मुख होना है। वे बार-बार विषयों की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं। इसीलिए जब तक हम इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करते, तब तक शाँति प्रदान नहीं कर सकती।
साधना का तीसरा सूत्र है- अकेले जीना। साधना का जीवन अत्यन्त अकेलेपन में, एकाकीपन में जन्म पाता है। पर मनुष्य साधारणतया कभी अकेला नहीं होता है। प्रायः वह हमेशा ही दूसरों से घिरा होता है। भीड़ सदा उसे घेरे रहती है।
साधना के ये सूत्र अद्भुत है, इनकी अनुभूति अद्भुत है। बस बात इन्हें अपनाने, आत्मसात करने और अनुभव करने की है। ज्यों-ज्यों इन्हें अपनाया जाएगा, त्यों-त्यों प्रकृति एवं परमात्मा से संवाद के अवसर मिलने लगेगा। हाँ पहले प्रकृति संवाद करेगी। आकाश में टके चाँद-सितारे, वृक्ष, नदी, पर्वत, झरने, पक्षियों का कलरव- इन सभी में से कुछ मीठे बोल उपजेंगे।
साधना करनी है, उन्हें उपाधि को व्याधि समझकर इससे छुटकारा पाना ही होगा।
साधना तभी होगी, जब यह जान लिया जाय, कि असलियत में न कोई अपना पद है, न प्रतिष्ठ और न ही कोई वैशिष्ट्य। ये तो सारी नकाबें हैं, केवल मुखौटे हैं। इन्हें जैसे भी बने जल्दी से हटा देने में ही भला है। हम निपट हम हैं और अतिसाधारण इन्सान हैं। जिसका न कोई नाम है, न कोई प्रतिष्ठ है, न कुल है, न वर्ग है, न जाति है।
साधना के इस सत्य को समझाते हुए कहा करते थे- ‘साधक का मन मिटे तो उसे योग की सच्चाई समझ में आए।’ महर्षि पतंजलि एवं गुरुदेव दोनों ही खरे वैज्ञानिक हैं, एकदम गणितज्ञ। वे इधर-उधर की बातें करके न अपना समय खराब करते हैं और न ही साधकों का।
साधना का खेल
साधना जैसे अस्त्र-शस्त्रों एवं साधनों के द्वारा भी अपने अन्तर प्रदेश को परिष्कृत एवं परिमार्जित किया जाता है।
साधना का कर्त्तव्य, जो उन्होंने उस दिन बताया था। इसे पूरा करके ही हम उनके अपने हो सकते हैं।
साधना का बल चाहिए। तुम लोग अपने अन्दर यही बल पैदा करो। एक बात मैं और बताए देता हूँ, तुममें से कोई यह न समझ ले कि उल्टी-सीधी माला टरकाने से साधना हो जाती है। यह न समझना कि बैठे रहकर नाक दबाने का नाम साधना है।
साधना का पत्राचार पाठ्यक्रम ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका से एवं कुछ साधकों की धुरी पर क्राँतिकारी परिवर्तन कैसे आएगा। इस पर ‘महाकाल और उसकी युगप्रत्यावर्तन प्रक्रिया’ नामक लेखमाला उन्होंने जून - अक्टूबर 1967 में लिखी। फिर पुस्तक रूप में उसकी प्रस्तुति 1968 में की। यह एक प्रकार से नवजागरण का शंखनाद था। भारत को राजनैतिक आजादी तो मिल गई थी, पर साँस्कृतिक नवजागरण ने, जिसके लिए विगत ढाई सौ वर्षों से महामानव इसी धरती पर जन्म ले रहे थे।
साधनाकाल में ध्यान करते हुए मैंने शान्तिकुञ्ज देखा था, तुम सबको देखा था। आगे जो लोग आएँगे, शान्तिकुञ्ज का जो भावी विस्तार होना है, वह भी मैंने उसी छोटी सी कोठरी में ध्यान करते हुए देख लिया था।
साधना के शिखर पर आरुढ़ होकर एकता के सत्य को जाना, बल्कि बाह्य जीवन में भी राष्ट्र को एकता का महत्त्व बताया। राष्ट्रीय एकता की स्थापना की।
साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि उन लौह श्रृंखलाओं में जड़कर श्रद्धा-विश्वासरूपी महोदैत्य को उपयोगी प्रयोजन उत्पन्न कर सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। श्रद्धा से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है। आत्मा का सबसे विश्वस्त और घनिष्ठ सचिव श्रद्धा ही है।” (पं. श्रीराम आचार्य वाङ्मय, उपासना-समर्पण योग- खंड 3, पृष्ठ 3.32,33)। कितनी सुँदर व्याख्या श्रद्धा की हुई है और हमें बड़ा स्पष्ट मार्ग भी देती है कि श्रद्धावान कैसे बनें?
साधना स्थान पुण्य तीर्थ बन जाता है जहाँ पर इन दिव्य शक्तियों का प्रचण्ड प्रवाह बना रहता है। और इसके आसपास आने वाले हर व्यक्ति को उसकी पात्रता के अनुरूप उस अनुदान-वरदान की वृष्टि होती रहती है।
साधना की धुरी पर खड़ा कर उसे व्यवस्थित, विशिष्ट एवं सशक्त बनाने के संकल्प के साथ इस वर्ष का मिशन का वार्षिक पर्व वसंत पंचमी हर्षोल्लास संपन्न हुआ। ‘भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा’ की वार्षिक सेमीनार भी 15, 13 फरवरी में आयोजित होने से सभी क्षेत्रों के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता भी इसमें उपस्थित थे। इस वसंत को जो कि परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्मदिवस (17.2.22) भी था, हीरक जयंती की महापूर्णाहुति एवं संगठन-सशक्तीकरण वर्ष के शुभारंभ के रूप में मनाया गया । जनपद व जोन स्तर पर पूरा मिशन अब व्यवस्थित ढंग से सक्रिय हो जाए, इसी धुरी पर पर्व उद्बोधन भी दिया गया एवं परिपत्र भी सभी को दिया गया । प्रातः ध्वजारोहण के साथ गुरुसत्ता को समर्पित दो प्रस्तुतियों ने वासंती उल्लास का परिचय दिया।
साधना है। तुम लोग यह कर सको, तो करो। रोज अपनी चीर-फाड़ करो, अपनी कमियों-कमजोरियों को ढूंढ़ो और और उन्हें निकाल बाहर करो। जो अपने प्रति जितना कठोर होता है, वह उतना ही अच्छा साधक बन पाता है। अपनी बुराइयों, अपने अहंकार के प्रति घोर निर्ममता का नाम साधना है।
साधना के लिए तैयार हैं तो अतीत के ख्यालों एवं भविष्य के ख्वाबों से बाहर आना होगा। जो बीत गया सो बीत गया, जो भविष्य में होना है वह समय पर अपने आप ही हो जाएगा। अतीत और भविष्य की याँत्रिक चिन्तन धारा में बहने वाले अपने वर्तमान को खो देते हैं। वर्तमान का जीवित क्षण उनके हाथों से निकल जाता है। जबकि केवल वही वास्तविक है।
साधना आयी। ये सब जो कुछ भी दिख रहा है, वे फूल-पत्ते हैं। सबकी जड़ तो साधना है। बेटा, मथुरा के अखण्ड ज्योति संस्थान में जो 9&9 की कोठरी है, वहीं पर मैंने सब कुछ देख समझ लिया था। वहीं पर उसी कोठरी में साधना करते हुए मैंने मिशन का आज का वर्तमान और आगे का भविष्य देखा था।
साधना का प्रथम चरण ‘धारणा’ कहलाता है। धारणा अर्थात् निर्धारित ध्येय में चित्त को एकाग्र करना। यह एकाग्रता अनायास ही नहीं सध जाती। मन के चंचल होने के कारण वह बार-बार विषय-वासनाओं की ओर प्रवृत्त हो जाता है। उसकी इस वृति को निरुद्ध कर मन को ध्येय वस्तु में टिका देना ही ‘धारणा’ है।
साधनाओं द्वारा जगाया-उभारा जाता है ओर अनेक प्रकार के लाभ उठाए जा सकते हैं। तिब्बत में ध्यान-समाधि आदि योग पद्धतियों द्वारा शरीर के इन विशिष्ट ऊर्जा केन्द्रों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इससे शरीर तप्त लोहे के समान तप जाता है। ऐसे साधक बर्फीले जल में भिगाया गया वस्त्र ओढ़कर सुखा लेते हैं। ये साधक 40-40 दिन तक निर्वस्त्र होकर बर्फ के गड्ढ में रह जाते हैं।
साधना की होती, अध्यात्म के लिए अपना सर्वस्व न लुटाया होता, हम साधक न बने होते, तो फिर आज तुम लोग यह सब जो कुछ भी देख रहे हो, वैसा कुछ भी न होता। न तुम लोग हमें गुरुजी कहते और हम तुम लोगों की नौकरियाँ छुड़ाकर, तुम्हारे घरों से दूर यहाँ तक ला पाए होते। तुम्हारे जीवन में, हमारे जीवन में जो कुछ अचरज घटा है, वह सब अध्यात्म के कारण है। हमारे साधक होने की वजह से है।
साधना का रहस्य समझा रहे गुरुदेव के मुख मण्डल पर तपस्या की प्रखरता एवं प्रभा झलक रही थी। उनके मस्तक पर सदा विद्यमान रहने वाले चन्द्रकार निशान इस समय और अधिक स्पष्ट हो आया था। उनकी वाणी से शब्द नहीं उनका प्राण बरस रहा था। सभी सुनने वाले मौन थे। शायद यह मौन उन्हें अन्दर ही अन्दर कुरेद रहा था।
साधना में निरत नहुष अनायास ही इस परम दुर्लभ पद का प्रस्ताव पाकर प्रसन्न हो उठे। वे सोचने लगे कि अभी तक केवल सुना था कि तप से सभी कामनाओं की प्राप्ति होती है, लेकिन यह तो सचमुच ही सच हो गया। बिना माँगे ही इन्द्र का पद अपने आप ही चलकर मेरे पास आ गया। सचमुच ही तप की महिमा अपार है। मन ही मन अपनी कल्पनाओं का ताना-बाना बुनते हुए नहुष ने प्रकट में देवर्षि के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
साधनाओं को बताने वाले अनेकों स्त्रोतों की रचना की।
साधना के नये आयाम को विकसित करने वाले श्री अरविन्द की साधना इतनी प्रखर थी कि कागामारु जहाज द्वारा जापान से पाण्डिचेरी आते समय श्री माँ ने 50 मील की दूरी पर ही इसका अनुभव कर लिया था। इसी के प्रभाव से तपस्वी की तपस्थली एवं साधक का साधना स्थान पुण्य तीर्थ बन जाता है जहाँ पर इन दिव्य शक्तियों का प्रचण्ड प्रवाह बना रहता है। और इसके आसपास आने वाले हर व्यक्ति को उसकी पात्रता के अनुरूप उस अनुदान-वरदान की वृष्टि होती रहती है।
साधना करते थे। श्री अरविन्द की प्रचण्ड प्राण शक्ति उस सेल के कण-कण में व्याप्त थी जो कैदी के मनःस्थिति से भारी पड़ने के कारण उसे विक्षिप्त करने लगी। यही कारण है कि आज वैज्ञानिक आभामण्डल से व्यक्ति की पहचान की बात सोचने लगे हैं।
साधना से मिला है। इस कुछ और से विराट् से संवाद की स्थिति बनती है। इस कुछ और के स्पर्श से सद्गुरु के शब्द फिर शब्द नहीं रहते- मंत्र बन जाते हैं। फिर जो कुछ पढ़ा जाता है, सुना जाता है, उसमें छपे हुए कागज का बासीपन नहीं, आत्मा की मोहक सुगन्ध छलकती है।
साधना का जीवन अत्यन्त अकेलेपन में, एकाकीपन में जन्म पाता है। पर मनुष्य साधारणतया कभी अकेला नहीं होता है। प्रायः वह हमेशा ही दूसरों से घिरा होता है। भीड़ सदा उसे घेरे रहती है। कोई जरूरी नहीं है कि यह भीड़ बाहर हो, भीड़ तो भीतर भी हो सकती है, प्रायः होती भी भीतर ही है।
साधना के बाद से गुरुदेव के काम करने में प्रतिपल एक तेजी दिखाई देती थी। शायद वे मिशन के वर्तमान को बड़ी तेजी से भविष्य के लिए गढ़ रहे थे। उनके द्वारा ली जाने वाली ये गोष्ठियाँ उनकी इस प्रक्रिया का एक माध्यम भर थी।
साधना के सूत्र, साधक के जीवन का स्वर बनेंगे।
साधना करना चाहते हैं, उन्हें यह बात भली प्रकार समझ लेनी है।
साधना है।
साधना का यह आवश्यक तत्त्व ही महर्षि के इस दूसरे सूत्र के विचार का विषय है।
साधना कर सकते हैं। ठीक वैसे ही साधना करने के लिए हमें अपने मिथ्या चेहरों को उतार कर रखना होगा। क्योंकि अध्यात्म साधना का अर्थ ही स्वयं को जानना और स्वयं को देखना है। अपने अस्तित्व में जो मौलिक है और सहज है, उसे प्रकट होने दें, उसमें जिएँ। जीवन यदि सहज और सरल बनें, तो साधना अपने आप ही विकसित होती है।
साधना के पर्याय हैं। उन्होंने न केवल अध्यात्म साधना के शिखर पर आरुढ़ होकर एकता के सत्य को जाना, बल्कि बाह्य जीवन में भी राष्ट्र को एकता का महत्त्व बताया। राष्ट्रीय एकता की स्थापना की।
साधना का पुण्य परमात्मा को ही समर्पित कर बालक श्रीराम वापस लौट आते। सात बजे पंडित रूपराम की पाठशाला में पहुँच जाते। वहाँ शिक्षा के साथ आचार आदि के अभ्यास होता। शाम के समय भी सूर्यास्त होने के ठीक पहले सायंकालीन संध्या शुरू हो जाती। तारे दिखाई देने तक वह संध्या कर्म भी परब्रह्म को समर्पित हो जाता।
साधना बताने में तो बहुत टाइम लग जाएगा? नहीं बेटा ये तो मिनटों की बात है। आपरेशन में क्या देर लगती है! दवा खिलाने में क्या देर लगती है! इंजेक्शन तो एक मिनट में लगा देंगे। और क्या करेंगे? खान-पान का परहेज रखते हुए मरीज ठीक हो जाएगा।
साधनामय जीवन का अनुभव है जो सृष्टि के कण-कण में, पौधों एवं प्राणियों में लहराता-उफनता दृष्टिगोचर होता है। आवश्यकता है उस दृष्टि की जो जगत् में इसकी लीला को देख सके तथा अपने अन्तर में विद्यमान उस परम पुरुष परमात्मा को झाँक सके। समस्त जप, तप, साधना, स्वाध्याय, सेवा का मूल यही है कि स्वयं को परिष्कृत एवं परिमार्जित करे तथा उसके दिव्य स्वरूप का अनुभव प्राप्त करें।
साधना हमने की है, यही तुमको बता रहे हैं।
साधना का अर्थ ही स्वयं को जानना और स्वयं को देखना है। अपने अस्तित्व में जो मौलिक है और सहज है, उसे प्रकट होने दें, उसमें जिएँ। जीवन यदि सहज और सरल बनें, तो साधना अपने आप ही विकसित होती है।
साधना में गति होने, इंद्रिय संयम अर्थ संयम-समय संयम एवं विचार संयम साध लेने पर सर्वोच्च स्तर की उपलब्धि हमें मिलती है-वह है शाँति (पराँ शाँतिम्)। सारी विकलताओं से मुक्ति, तनाव से मुक्ति, दुःखों से छुटकारा हमें मिल जाता है। संक्षोभ ही हमें विकल-रोगी बनाते हैं। यदि संत्रास मन से समाप्त हो जाएँ तो हम सभी आधि-व्याधियों से मुक्ति पा सकते हैं। आज सारा संसार इसी की तलाश में तो है।
साधना सिखाने का ही हमारा उद्देश्य है। उसके लिए ही आपको बुलाना पड़ता है। आप न सीखें, न समझें तो फिर हम क्या कर सकते हैं! आप पर तो गलतफहमियाँ हावी होती जा रही हैं। इन गलतफहमियों को जब तक न निकालूँ, तब तक वास्तविकता आपको कैसे बताऊँ। आप पर तो यही गलतफहमियां हावी हो रही हैं कि मंत्र जपो, धन आएगा।
साधना के प्रवेश द्वार के रूप में योग दर्शन के प्रथम पाद के प्रथम सूत्र पर मनन किया। जो अपनी सम्यक् दृष्टि से इस पहले सूत्र का रहस्य जान चुके हैं, उनके लिए महर्षि पतंजलि समाधिपाद के दूसरे सूत्र में योग के सत्य को समझाते हैं। योग के स्वरूप को परिभाषित करते हैं। इसकी व्याख्या करते हैं। क्योंकि जिनकी अन्तर्चेतना में शिष्यत्व जन्म ले चुका है, जो अपने सद्गुरु द्वारा दिए गए अनुशासन को स्वीकारने के लिए कृतसंकल्प हैं।
साधनात्मक दृष्टि और इस आधुनिक विज्ञान की व्याख्या पद्धति का संयोग हो सके तो सुपर नेचुरल का वैज्ञानिक सत्य, विज्ञान की एक नवीन शाखा के रूप में जन्म और जीवन ग्रहण कर सकता है। अध्यात्म एवं विज्ञान के इस समन्वय से मानवीय शक्तियों से परे एवं प्रकृति से पार के सच का अनुभव एवं व्याख्या की जा सकती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-December
साधना के तीन चरणों का उल्लेख किया था, मातृवत् परदारेषु-परद्रव्येषु लोष्ठवत् एवं तीसरा आत्मवत् सर्वभूतेषु। अपने समान सबको देखना। वे लिखते है कि कहने-सुनने में ये शब्द मामूली से लगते है और सामान्यतः नागरिक कर्तव्यों का पालन, शिष्टाचार-सद्व्यवहार की सीमा तक पहुँचकर बात पूरी हो गई दीखती है, पर वस्तुतः इस तत्वज्ञान की सीमा अति विस्तृत है। उसकी परिधि वहाँ पहुँचती है, जहाँ परमात्मा के साथ घुल जाने की स्थिति आ पहुँचती है। साधना के लिए दूसरे के अंतरंग के साथ अपना अंतरंग जोड़ना पड़ता है और उसकी संवेदनाओं को अपनी संवेदना समझना पड़ता है।
साधना करने वालों को शीघ्र, अद्भुत एवं चमत्कारी परिणाम मिलें, इसके लिए मैंने और माताजी ने अपने जीवन भर की तपस्या लगा दी है। यही नहीं हिमालय में रहने वाले ऋषि, मुनि एवं महायोगी भी यहाँ अपनी छाया रखते हैं। शाँतिकुँज समूची धरती पर ऐसा विरल दिव्य धाम है, जो बसा तो इसी धरती पर है, पर जिसकी चेतना पूरी तरह अलौकिक हैं।
साधना में लग गए। उनकी माता ने भी बौद्ध भिक्षुणी के रूप में पति का अनुकरण किया।
साधना कराकर आए थे।
साधना बड़े भारी परिणाम देगी। करके तो देखो, मन को मथने वाली गुरुदेव की इन बातों ने अंतःकरण में हलचल मचा दी। इतने वर्षों के बाद भी उस हलचल के स्पंदन अभी भी महसूस हो रहे हैं। यदि ऐसा ही कुछ आपको भी महसूस हो रहा है, तो परमपूज्य गुरुदेव की आज्ञा को शिरोधार्य करके सत शिष्य के कर्तव्य निर्वहन में जुट जाइए। महासिद्ध के शिष्यों को साधक तो होना ही चाहिए।
साधना को प्रखर बनाने की प्रक्रिया को गति दी गई। साथ ही साथ शाँतिकुँज हरिद्वार स्थित मुख्य केंद्र से सात जोनों के निर्माण का संगठनात्मक पुरुषार्थ भी चलता रहा, सभी वरिष्ठ कार्यकर्ता भाइयों ने सघन मंथन प्रधान दौरे किए एवं संगठन का एक सशक्त सुव्यवस्थित स्वरूप अब क्रमशः उभर कर आ रहा है। शाँतिकुँज गायत्री तीर्थ एवं गायत्री तपोभूमि, मथुरा दोनों ने ही अब साधना की धुरी पर संगठन को गति देने हेतु मिलकर प्रचंड पुरुषार्थ करने की ठानी है, ताकि इस वर्ष हम अधिकाधिक प्राणवान संकल्पित समर्थ समयदानी तैयार कर सकें। इसके लिए चर्चाओं के कई दौर हुए एवं फिर इस समारोह में पधारे क्षेत्र के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भी गहन चिंतन, परामर्श होता रहा। निष्कर्ष जो निकलकर आए हैं, वे समुद्र मंथन के चौदह रत्नों की तरह हैं एवं इतने मूल्यवान हैं कि इस राष्ट्र एवं जगती की काया पलट करके रख देंगे, ऐसा लगता है।
साधना करने वाला मनुष्य अपने तक सीमित नहीं रह सकता, स्वार्थों की परिधि में आबद्ध रहना उसके लिए कठिन हो जाता है। दूसरों का दुःख मिटाने और सुख बढ़ाने के प्रयास उसे बिलकुल ऐसे लगते है मानों यह सब वह निताँत व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए कर रहा हो। जैसे ही अपनी आत्मवत् सर्वभूतेषु की संवेदना प्रखर हुई, अंदर की निष्ठुरता उसी क्षण गल-जल कर नष्ट हो गई। जी में केवल करुणा शेष रही। वही अब तक के जीवन के इस अंतिम अध्याय तक यथावत बनी हुई है।
साधना का परम प्राप्य अनायास ही सुलभ हो जाता है। गुरु चरण सेवा से जीव ‘अयमात्माब्रह्म’ के दुर्लभ बोध को सुगमता से पा लेता है।
साधना किए उस स्तर को बनाए रखना संभव नहीं, जो गुरुसत्ता ने स्थापित किया था। अभी भी प्रेरणा के अनंत ज्ञान के स्त्रोत वे ही हमारे गुरुवर हैं, जिनकी सूक्ष्म व कारण सत्ता की उपस्थिति प्रत्यक्ष अहर्निश होती रहती है।
साधना की थी। कंस का वध करने के लिए जाते हुए श्रीकृष्ण और बलराम ने यहाँ संध्या वंदन किया था। समय समय पर हुए या अनुष्ठानों के बारे में भी बताया और अपने साथ चलने के लिए कहा। श्री राम उनके साथ चल दिए। बगीची से करीब तीन किलोमीटर दूर एक टीले के पास जाकर वे रुक गए।
साधना विहीन गाँव में आ रहे हैं। इस समाचार ने जैसे अचानक गाँव वालों को भाग्यवान बना दिया। गाँव के मुखिया सहित बूढ़े-बच्चे, युवक-युवतियाँ सभी भगवान् के स्वागत की तैयारियों में जुट गए।
साधना का रहस्य ज्ञात होगा।
साधनासंपन्न ऋषि और महायोगी भी हैं, जिन्होंने हिमालय के वातावरण में अपने को पूरी तरह से डुबा दिया है।
साधना और निष्ठा से बूटी सिद्ध बाबा अभिभूत हो उठे। दोनों हाथ उठाकर आशीष दिया और फिर गले से भी लगा लिया। काठिया बाबा इसके बाद अपनी राह चले गए और श्रीराम वापस बगीची में आ गए। इस भेंट के कुछ दिन बाद बूटी सिद्ध बाबा ने अपना शरीर छोड़ दिया।
साधना और अब तक की यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। उन्हीं बाबा से यह समाधान हुआ कि देवी प्रतिमा गायत्री की है। यहाँ कभी एक आश्रम हुआ करता था। तीन-चार सौ साल पहले एक संन्यासी के सान्निध्य में बीस-पच्चीस साधक हमेशा रहते थे। वे गायत्री जप करते और वेद-शास्त्रों के अध्ययन में निरत रहते।
साधना के द्वारा उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति भी पाई जा सकती है।
साधना का खाद-पानी दे।
साधनामय जीवन के कुछ रहस्यमय सूत्र बता रहे थे।
साधना की धुरी पर ही संगठन सशक्त बन सकता है। साधक बनेंगे, तो अहंकार गलेगा, संयम विकसित होगा। बची ऊर्जा स्वाध्यायशील साधक द्वारा जनसेवा में लगेगी। तीनों पत्रिकाएँ हर परिजन पढ़ें, इस पर उनने विशेष जोर दिया।
साधना में उसका मन एकाग्र नहीं होता। किसी भी तरह से उसका ध्यान नहीं जमता। रुमी ने मुस्कराते हुए उसे अपने एक मित्र साधु के पास यह कहकर भेजा- जाओ और उनकी समग्र दिनचर्या को बड़े ध्यान से देखो। वहीं तुम्हें साधना का रहस्य ज्ञात होगा।
साधना शुरू हुई।
साधना करने वालों के लिए यह भी कहा जा सकता है कि अपने सद्गुरु के वचनों पर परिपूर्ण श्रद्धा-सम्यक् ज्ञान का स्त्रोत है। सद्गुरु के वचन कभी-कभी बड़े अटपटे होते है, परंतु वे प्रेम लपेटे होते है। उन्हें ठीक-ठीक समझ न पाने पर भी यदि कोई साधक उन पर समग्र श्रद्धा के साथ आचरण करने लगता है, तो उसे अपने आप ही सम्यक् ज्ञान हो जाता है।
साधना का, युगऋषि के चिंतन का नवनीत है। इसे पढ़ना पढ़ाना एक प्रकार का पावन पुण्य माना जाना चाहिए।
साधना अपने सद्गुरु के चरणों का चिन्तन और ध्यान है।
साधना को जीवन में उतारने वाले भारतीय संस्कृति को हर श्वास में जीने वाले अनुदान पाए एवं उनके ज्ञान के विराट् पिटारे से थोड़ा कुछ आत्मसात किया है। वस्तुतः बिना साधना किए उस स्तर को बनाए रखना संभव नहीं, जो गुरुसत्ता ने स्थापित किया था। अभी भी प्रेरणा के अनंत ज्ञान के स्त्रोत वे ही हमारे गुरुवर हैं, जिनकी सूक्ष्म व कारण सत्ता की उपस्थिति प्रत्यक्ष अहर्निश होती रहती है।
साधना के वर्षों में प्रायः सभी से मिलना बन्द था। वन्दनीया माताजी के अलावा एक-आध निकटस्थ जन ही ऐसे थे, जो इन दिनों भी उनसे मिलते रहे थे। इसका कारण उनकी कई महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य कार्यों में सहभागिता थी। अन्यथा समदर्शी एवं शिष्य वत्सल गुरुदेव की भावनाएँ तो सभी के प्रति समान थी।
साधना पथ से भटक जाते हैं।
साधना के लिए सबसे अच्छा वातावरण हिमालय का माना जाता है, पर हिमालय जाने वाले, वहाँ रहने वाले सभी उसका लाभ कहाँ उठा पाते हैं? मैं जब हिमालय गया तो वहाँ देखा, दो साधु वेशधारी थोड़ी सी जमीन के लिए झगड़ा कर रहे हैं। यहाँ तक कि नौबत सिर फुटब्बल की आ गई। एक तरफ हिमालय में ऐसे लोभी लालची, द्वेष दुर्भाव से ग्रस्त लोग, दूसरी ओर उच्च साधनासंपन्न ऋषि और महायोगी भी हैं, जिन्होंने हिमालय के वातावरण में अपने को पूरी तरह से डुबा दिया है।
साधना का यह नया प्रसंग जोड़ते हुए बोले, पहली बात तो तुम लोग यह जान लो कि साधना कुछ धार्मिक पुस्तकों के पढ़ने का नाम नहीं है। यह करने का नाम है। किताबों में तरह तरह की मिठाइयों के लिखे हुए नाम और उनके भाँति भाँति के चित्र पढ़ने देखने से किसी भी मिठाई का कोई स्वाद नहीं मिलता। उसके लिए हलवाई की दुकान पर जाना पड़ता है, जेब के पैसे खरच करने पड़ते हैं, तब कही मिठाई मिलती है और उसे खाकर स्वाद का आनंद मिलता है। ठीक यही बात साधना के बारे में हैं।
साधना कुछ धार्मिक पुस्तकों के पढ़ने का नाम नहीं है। यह करने का नाम है। किताबों में तरह तरह की मिठाइयों के लिखे हुए नाम और उनके भाँति भाँति के चित्र पढ़ने देखने से किसी भी मिठाई का कोई स्वाद नहीं मिलता। उसके लिए हलवाई की दुकान पर जाना पड़ता है, जेब के पैसे खरच करने पड़ते हैं, तब कही मिठाई मिलती है और उसे खाकर स्वाद का आनंद मिलता है। ठीक यही बात साधना के बारे में हैं।
साधना से बाहर आए थे। भक्तों और शिष्यों के आतुर उत्कंठित प्राण उन महाप्राण से मिलकर एक अनोखी-आध्यात्मिक संतृप्ति का अनुभव कर रहे थे। सूक्ष्मीकरण साधना के वर्षों में प्रायः सभी से मिलना बन्द था। वन्दनीया माताजी के अलावा एक-आध निकटस्थ जन ही ऐसे थे, जो इन दिनों भी उनसे मिलते रहे थे। इसका कारण उनकी कई महत्त्वपूर्ण एवं अनिवार्य कार्यों में सहभागिता थी।
साधना-उपासना के बाद थोड़ा-बहुत समय बचता है, वह जनसंपर्क में लगाते है। उन सब के बारे में और लोगों से तरह-तरह की बातें सुनी। उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती। कभी किसी ने कुछ आहार लेते नहीं देखा। उन्हें शौच आदि के लिए भी नहीं जाना पड़ता।
साधना की उच्चतम स्थिति में पहुँच जाना है। अहंभाव से रहित होते ही हैं सही अर्थों में दिव्यकर्मी बन जाते है एवं समाज के एक कर्मठ सेवा बनकर पूरे उत्साह के साथ लग जाते है। बंधन मुक्ति का तत्वदर्शन-अहंभाव से मुक्ति का यह चिंतन गीता का अमृत है। जिसने इसे समझ लिया, उसने मानो ब्रह्म को पा लिया।
साधना का रहस्य है। क्योंकि इस स्वच्छता पर ही साधना की सभी विधियों की सफलता निर्भर है। जो इसे विस्मरण कर देते हैं, वे साधना पथ से भटक जाते हैं।
साधना की सुगम, सरल, सहज विधियाँ सुझाते हैं। साधकों को इस गुह्यतत्त्व का बोध कराते हैं कि तुम क्यों इधर-उधर भटक रहे हो, क्यों व्यर्थ में परेशान हो? परम कृपालु सद्गुरु के होते हुए तुम्हें किसी भी तरह से भटकने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। सद्गुरु के प्रति भाव भरा समर्पण सभी भव रोगों की अचूक दवा है। समस्याएँ भौतिक हों या आध्यात्मिक, लौकिक हों या अलौकिक गुरुचरणों में सभी के सारे समाधान समाए हैं।
साधना की सभी विधियों की सफलता निर्भर है। जो इसे विस्मरण कर देते हैं, वे साधना पथ से भटक जाते हैं।
साधना के बारे में हैं। केवल गायत्री महाविज्ञान पढ़ने से, अखण्ड ज्योति के पन्ने उलट लेने से कुछ खास होने वाला नहीं है। गायत्री महाविज्ञान में जो लिखा है, उसे भावभरी श्रद्धा एवं दृढं संकल्प के साथ लंबे समय तक करके देखो, तुम्हारी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। यह कहते हुए वह धीरे से बोले, गायत्री महाविज्ञान में ऐसा एक अक्षर भी नहीं है, जो मेरी अनुभूतियों से न गुजरा हो। उसमें लिखी हुई कोई बात हो, चाहे चौबीस हजार के लघु अनुष्ठान के बारे में हो, उसमें लिखे हुए सारे अनुशासनों को मानते हुए ये अनुष्ठान लंबे समय तक करते जाओ, फिर देखो कैसे बदलाव नहीं आता है।
साधना करेगा, वही इस रहस्य को जान पाएगा। यहाँ छोटी सी भी तप साधना बड़े भारी परिणाम देगी। करके तो देखो, मन को मथने वाली गुरुदेव की इन बातों ने अंतःकरण में हलचल मचा दी। इतने वर्षों के बाद भी उस हलचल के स्पंदन अभी भी महसूस हो रहे हैं। यदि ऐसा ही कुछ आपको भी महसूस हो रहा है, तो परमपूज्य गुरुदेव की आज्ञा को शिरोधार्य करके सत शिष्य के कर्तव्य निर्वहन में जुट जाइए।
साधना करने की लगन ही है। घर से यह कहकर आए थे कि गुरुजी का काम करेंगे और साधना करेंगे। माँ-बाप को रुलाया, रिश्ते नातेदारों को दुखी किया, पर यहाँ आकर इंचार्ज बनने के फेर में पड़ गए। जो कुँवारे हैं, वह शादी के लिए परेशान हैं। जिनकी शादी हो गई, उन्हें बच्चा चाहिए।
साधना का दूसरा वाला चरण बताता हूँ, जिसका नाम है, ‘देव-पूजन’। देव-पूजन किसे कहते है? बेटे, इस बारे में तो हम बताते रहते है कि गायत्री माता का एक फोटो रख लेना। हाँ, वह तो मैंने रख लिया है। और बेटे, धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत चढ़ा दिया करना, चंदन लगा दिया करना।
साधना के लिए दूसरे के अंतरंग के साथ अपना अंतरंग जोड़ना पड़ता है और उसकी संवेदनाओं को अपनी संवेदना समझना पड़ता है। (सुनसान के सहचर, पुस्तक पृष्ठ 13 से)
साधना, स्वाध्याय, अंशदान की नियमितता एवं गौसेवा के लिए किए जाने वाले प्रयासों की चर्चा की। संकल्पों की भावभरी पृष्ठभूमि इन चार गोष्ठियों ने बना दी थी, इसीलिए शाम का दीपमहायज्ञ अलौकिक वातावरण में शपथ के साथ सम्पन्न हुआ।
साधना करेंगे। माँ-बाप को रुलाया, रिश्ते नातेदारों को दुखी किया, पर यहाँ आकर इंचार्ज बनने के फेर में पड़ गए। जो कुँवारे हैं, वह शादी के लिए परेशान हैं। जिनकी शादी हो गई, उन्हें बच्चा चाहिए। जिनके एक बच्चा है, तो उन्हें एक की बजाय दो चाहिए।
साधना है जो कर्मयोगी के रूप में अर्जुन को करना चाहिए-ऐसा श्रीकृष्ण का मानना है। वे कहते है कि अहंभाव-कर्त्ताभाव का समावेश करता है। यह यहाँ तक तो ठीक है कि कर्म का गौरव हम अनुभव करे, किंतु यदि यह अनावश्यक रूप से निरर्थक जिम्मेदारियों का बोझ आप पर लाद दे व सारी दुनिया के आप ठेकेदार स्वयं को महसूस करने लगे तो फिर मानसिक तनाव-अशाँति का ही कारण बनेगा।
साधना की धुरी पर संगठन को गति देने हेतु मिलकर प्रचंड पुरुषार्थ करने की ठानी है, ताकि इस वर्ष हम अधिकाधिक प्राणवान संकल्पित समर्थ समयदानी तैयार कर सकें। इसके लिए चर्चाओं के कई दौर हुए एवं फिर इस समारोह में पधारे क्षेत्र के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने भी गहन चिंतन, परामर्श होता रहा। निष्कर्ष जो निकलकर आए हैं, वे समुद्र मंथन के चौदह रत्नों की तरह हैं एवं इतने मूल्यवान हैं कि इस राष्ट्र एवं जगती की काया पलट करके रख देंगे, ऐसा लगता है।
साधनामय जीवन का का रहस्य बताते हुए कहा कि श्रेष्ठ सुगम किन्तु सर्वाधिक फलदायी एवं प्रभावोत्पादक साधना अपने सद्गुरु के चरणों का चिन्तन और ध्यान है।
साधना का वातावरण प्रदान करने के लिए शाँतिकुँज बनाया है। यह अद्भुत, संस्कारवान स्थान है। यहाँ हिमालय का स्थूल रूप तो नहीं है, पर तुम लोग साधना की गहराई में उतर सको तो देख पाओगे कि मैंने यहाँ हिमालय की समूची चेतना को उतार दिया है। यहाँ पर साधना करने वालों को शीघ्र, अद्भुत एवं चमत्कारी परिणाम मिलें, इसके लिए मैंने और माताजी ने अपने जीवन भर की तपस्या लगा दी है। यही नहीं हिमालय में रहने वाले ऋषि, मुनि एवं महायोगी भी यहाँ अपनी छाया रखते हैं।
साधना की गहराई में उतर सको तो देख पाओगे कि मैंने यहाँ हिमालय की समूची चेतना को उतार दिया है। यहाँ पर साधना करने वालों को शीघ्र, अद्भुत एवं चमत्कारी परिणाम मिलें, इसके लिए मैंने और माताजी ने अपने जीवन भर की तपस्या लगा दी है। यही नहीं हिमालय में रहने वाले ऋषि, मुनि एवं महायोगी भी यहाँ अपनी छाया रखते हैं। शाँतिकुँज समूची धरती पर ऐसा विरल दिव्य धाम है, जो बसा तो इसी धरती पर है, पर जिसकी चेतना पूरी तरह अलौकिक हैं।
साधना की पाठशाला है। यह परिकर-परिवार और पड़ोसी भी हो सकते हैं। इसमें उनकी प्रसन्नता और विकास की बात सोची जाती है। इसमें उठाए गए कष्ट में सन्तोष की अनुभूति होती है। यह आरम्भिक प्रशिक्षण है।
साधना में निरत हो जाता है।
साधना में वातावरण का बहुत महत्व बताया जाता है? इस सवाल को सुनकर गुरुदेव किंचित गंभीर हो गए। वातावरण में कुछ मिनटों तक एक रहस्यमय चुप्पी छाई रही। प्रखर आध्यात्मिक तेज से परिपूर्ण गुरुदेव के नेत्रों का प्रकाश वहाँ उपस्थित जनों पर समान रूप से बिखरता रहा। मनों में समवेत ऊहापोह थी कि अब वे क्या कहेंगे?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-August
साधना बन जाएगी। फिर किसी भी प्रकार के जप-अनुष्ठान, ध्यान-धारण अथवा योगाभ्यास की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, पर आदमी अध्यात्म में भी सर्वथा सच्चा कहाँ बन पाता है। वह यहाँ भी उन्हीं तरीकों और तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहता है, जो अपने पूर्ववर्ती जीवन में लोक प्रवंचना हेतु करता रहा था। इससे उसका आध्यात्मिक जागरण और विलंबित होता है, जिससे उबार पाना गुरु के बूते की बात नहीं होती है।
साधना-कक्ष का निर्माण धरातल के नीचे किया जा रहा है, जिसमें एक हजार व्यक्ति एक साथ बैठकर ध्यान कर सकेंगे। इसके ठीक ऊपर केंद्र में एक शिवालय बनाया जा रहा है, जहाँ महाकाल के प्रतीक की स्थापना होगी। नासिक रोड के श्री के.सी. पाँडे जी के ‘गारगोटी अंतर्राष्ट्रीय मिनरल म्यूजियम’ द्वारा नवरात्रि के दौरान साढ़े सात सौ किलोग्राम के एक बड़े शिवलिंग एवं छह छोटे शिवलिंगों के पूजन हेतु शाँतिकुँज प्रतिनिधि को आमंत्रण गया। इन्हें इसी शिवालय में स्थापित किया जाना है। 18 अप्रैल को केंद्रीय दल गया एवं नासिक के अपने सभी परिजनों तथा कैलाश मठ ट्रस्ट के महंत आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी संविदानंद जी की उपस्थिति में इसका विधिवत् पूजन-अर्चन किया गया।
साधना’ माने-अपने जीवन को ऊँचा उठाना, अपने को साधक बनाना ताकि वह जनसेवा कर सके। जनसेवा हमारा मुख्य ध्येय है। इसीलिए तो गुरुजी आए। सारी जिंदगी उन्होंने यही तो किया था। बेटे, जितनी उन्होंने उपासना की, उससे कम उपासना कलम की नहीं की, और उससे कम उपासना उन्होंने समाज की नहीं की।
साधना एवं संवेदना का जागरण उतना ही समयानुकूल है, जितना तब था। सचमुच सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे हमारे गुरुदेव, जो द्रष्टा भी थे एवं एक अभिभावक भी, संवेदनाशील पिताश्री।
साधना है।
साधना सभी दिव्य थे। उनकी जीवन-साधना का सुफल रामचरित मानस तो दिव्यतम है ही। इस सत्य के तत्व से अपरिचित जन यदा-कदा उनके ऋषि जीवन और ऋषि कर्म में कमियाँ ढूंढ़ने की कोशिश करते रहते हैं, ऐसे लोगों के लिए महाकवि ने कहा है- ‘वचन वज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥’ इन्हें कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्यारा लगता है। और ये हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं।
साधना में सुगम होने से अधिक श्रेष्ठ है।”
साधना के लक्ष्य को पहचाना। चित्तवृत्ति निरोध के सुफल को आत्मसात किया। इस सत्य पर निदिध्यासन किया कि यदि चित्तवृत्तियों का निरोध हो सके तो साक्षी होने का भाव उपलब्ध होता है। साक्षी की स्वयं के स्वरूप में अवस्थिति होती है। लेकिन यदि ऐसा न हो पाए तब?
साधना करनी है, तो इन्द्रिय सुखों से मुँह मोड़ना होगा। एकदम रूखी-सूखी जिन्दगी जीनी होगी। ये बातें बताकर वह थोड़ा रुके फिर कहने लगे- यह तो बाद में पता चला कि इस रूखे-सूखे पन में आनन्द की अनन्तता समायी है। बस यही बात महर्षि पतंजलि के बारे में है। वह बहुत ही रूखी-सूखी धरती पर ले चलेंगे, मरुस्थल जैसी भूमि पर।
साधना की आकृति फलती-फूलती रहती है, पर उसकी प्रकृति के प्राण प्रपंच चूसता रहता है। इन साधकों की ऐसी स्थिति के बारे में सन्त कवियों ने कहा है- ‘ब्रह्मज्ञान बिनु बात न करहीं। परनिन्दा करि विष रस भरही॥’ ब्रह्मज्ञान के बिना कोई बात नहीं करते, लेकिन अन्तःकरण को परनिन्दा के विष रस से भरते रहते हैं। इनका उद्धार वेदान्त वचनों को पढ़ने, सुनने और प्रवचन करने से नहीं, प्रपंच के मायापाश से छूटने में है। सन्त कवि तुलसी के वचनों में सभी के लिए सीख है- ‘परचर्चा, परनिन्दा तजि, भजुहरि’ अर्थात् परचर्चा और परनिन्दा को छोड़कर हरि को भजो।
साधना है
दर्द नियति के आँगन में पड़ी निहाई है
दर्द भगवान् के हाथों का हथौड़ा है
भगवान् हम पर चोटें देकर
हमें संवारता और गढ़ता है
यह बात सुनिश्चित है कि
आदमी दर्द में विकसित होता
खूबसूरत बनता और बढ़ता है।
साधना की। देश-विदेश के अनेक स्थानों का भ्रमण किया। विभिन्न शास्त्र और विद्याएँ पढ़ी। परन्तु चित को शान्ति न मिली। सालों-साल के विद्याभ्यास के बावजूद अविद्या की भटकन एवं भ्रान्ति यथावत बनी रही।
साधना के महासाधक ऋषि अरविन्द के विचारों के परिप्रेक्ष्य में आत्मलोचन एवं आत्ममंथन भी करें। समस्याओं को परखें और उनके निवारण के उपाय ढूंढ़ें।
साधना बातों और कर्मकाण्ड तक सिमट जाती है। साधना की आकृति फलती-फूलती रहती है, पर उसकी प्रकृति के प्राण प्रपंच चूसता रहता है। इन साधकों की ऐसी स्थिति के बारे में सन्त कवियों ने कहा है- ‘ब्रह्मज्ञान बिनु बात न करहीं। परनिन्दा करि विष रस भरही॥’ ब्रह्मज्ञान के बिना कोई बात नहीं करते, लेकिन अन्तःकरण को परनिन्दा के विष रस से भरते रहते हैं। इनका उद्धार वेदान्त वचनों को पढ़ने, सुनने और प्रवचन करने से नहीं, प्रपंच के मायापाश से छूटने में है।
साधना बन जाएगी। फिर यह कर्तव्यनिष्ठा ही हमारी सर्वोत्तम साधना बन जाएगी। फिर किसी भी प्रकार के जप-अनुष्ठान, ध्यान-धारण अथवा योगाभ्यास की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, पर आदमी अध्यात्म में भी सर्वथा सच्चा कहाँ बन पाता है। वह यहाँ भी उन्हीं तरीकों और तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहता है, जो अपने पूर्ववर्ती जीवन में लोक प्रवंचना हेतु करता रहा था। इससे उसका आध्यात्मिक जागरण और विलंबित होता है, जिससे उबार पाना गुरु के बूते की बात नहीं होती है।
साधना की डगर पर चल कर ही राष्ट्र की अखण्डता एवं एकता अक्षुण्ण रह सकती है।
साधना करने वाले महर्षि अरविन्द के पूर्ण योग के सत्यों की व्याख्या की है। अपने इस प्रस्तुतीकरण में श्री दलाल का कहना है कि- सामान्यतया मानसिक स्वास्थ्य संकट को तनाव, उदासी, चिन्ता, असुरक्षा का भाव, क्रोध, ईर्ष्या, सन्देह आदि की उपस्थिति से परिभाषित किया जाता है। इन मनोविकारों की अनुपस्थिति को मानसिक स्वास्थ्य समझा जाता है। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। क्योंकि मनुष्य के आन्तरिक एवं विधेयात्मक भावों जैसे शान्ति, अन्तः सुरक्षा का भाव, विश्वास, इन्द्रिय निग्रह आदि का इसमें अभाव है।
साधनात्मक प्रक्रियाएँ ही एक मात्र सार्थक एवं समर्थ समाधान है। इसी से मनुष्य की बिखरी और बंटी हुई चेतना फिर से अपनी एकात्मकता व सम्पूर्णता प्राप्त करती है। फिर से उसे अपना खोया हुआ स्वास्थ्य व सौंदर्य मिलता है।
साधना से इतने समर्थ बना चुके होते हैं कि स्थूल देह के न रहने पर भी शिष्यों को सहयोग-संरक्षण मिलता रह सके। जो निष्ठावान शिष्य है, जिनके लिए गुरु कार्य ही सर्वोपरि है, ऐसे शिष्यों के प्रति गुरु भी अहैतुकी कृपा करते हैं। उन्हें अपना संरक्षण-मार्गदर्शन ही नहीं देते, अपितु आत्मोत्थान की सुनिश्चित गारंटी भी प्रदान करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे इस संसार में अब हैं या नहीं, कारण कि आत्मज्ञान प्राप्त गुरु कभी मरते नहीं, उनका सिर्फ परमात्मा में विलय होता है, लेकिन अभिन्न हृदय शिष्यों की आत्मिक प्रगति तक वे प्रतीक्षा करते रहते हैं।
साधना भी करने लगते हैं। गाढ़ी बेहोशी को और गाढ़ा करने के लिए जप-तप-व्रत का सिलसिला शुरू करते हैं। इसकी सफलताओं पर खुशियों की अठखेलियों से खेलते हैं। और असफल होने पर गम के आंसुओं से अपने-आपको भिगोते हैं। वृत्तियों का यह बहुरंगी तमाशा हमारे जीवन का सामान्य परिचय है।
साधना और धर्मोपदेश करना है। यह कार्य हम लोग बिना नेत्रों के भी कर सकते हैं। इससे इन दिनों जो निरर्थक समय बीतता है, उसकी सार्थकता बन पड़ेगी।
साधनापूर्वक) गाते हैं, वही इस सरोवर की चतुराई से रक्षा करने वाले हैं। और जो श्रोता है, वही इस सुन्दर सरोवर में आने वाले श्रेष्ठ देवता हैं। ऐसे देव तुल्य मनुष्य ही इसमें स्नान करके इस सरोवर की शोभा बढ़ाते हैं। कुसंग में पड़े, साधन पथ से भटके हुए तो यहाँ पहुँच ही नहीं पाते। ऐसे बगुले और कौओं का यहाँ कोई काम ही नहीं है।
साधना कराने में विश्वास करते हैं। उनका इधर-उधर की कहानियाँ-किस्से सुनाने में कतई विश्वास नहीं है। बहलाने-फुसलाने में उनका कोई यकीन नहीं है। एक प्रसंग में गुरुदेव के सामने जब इस सूत्र की चर्चा चली तो उन्होंने कहा- ‘अब यहीं देखो कैसी दो टूक बात कह दी उन्होंने। साधकों के सामने बिलकुल बात साफ कर दी कि या तो साक्षी भाव को उपलब्ध कर अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाओ या फिर वृत्तियों के साथ तादात्म्य करके भटकते रहो।
साधना एवं काव्य सौंदर्य का रसपान किया जा सकता है। इसकी कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा है-
साधनाएँ कोष भंडार। इस चाभी के बिना भक्ति, ज्ञान और योग का भंडार सुलभ नहीं होता। सप्ताह परायण की अवधि में पिताश्री गायत्री महिमा के साथ भागवत शास्त्र और धर्म की बातें बताते रहे। उन बातों में श्रीराम का मन अच्छी तरह लग रहा था। कथा पूरी होने के दिन पिता-पुत्र दोनों वापस चलने की तैयारी करने लगे।
साधना के वैज्ञानिक एवं प्रायोगिक जीवन के सर्वथा नए क्षितिज पर जीवन साधना करने वाले महर्षि अरविन्द के पूर्ण योग के सत्यों की व्याख्या की है। अपने इस प्रस्तुतीकरण में श्री दलाल का कहना है कि- सामान्यतया मानसिक स्वास्थ्य संकट को तनाव, उदासी, चिन्ता, असुरक्षा का भाव, क्रोध, ईर्ष्या, सन्देह आदि की उपस्थिति से परिभाषित किया जाता है। इन मनोविकारों की अनुपस्थिति को मानसिक स्वास्थ्य समझा जाता है। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। क्योंकि मनुष्य के आन्तरिक एवं विधेयात्मक भावों जैसे शान्ति, अन्तः सुरक्षा का भाव, विश्वास, इन्द्रिय निग्रह आदि का इसमें अभाव है।
साधना की धुरी पर जीवनकला को निखारने की बात भी समझाता है। संन्यास वेशधारी तो लाखों की संख्या में समाज में हैं, पर क्या वे अपना ‘अहं’ छोड़ पाए हैं? वास्तविक संन्यास क्या होता है व कर्मयोग व संन्यास का परस्पर समन्वय कैसे स्थापित किया जाए, इसकी विशिष्ट व्याख्या इस अध्याय में श्रीकृष्ण करते है। अहंकार के नाश की विधि इसमें वर्णित की गई है, इसीलिए इस अध्याय का नाम ‘कर्मसंन्यासयोग‘ है।
साधना से अपने जीवन की सफलता और सार्थकता सिद्ध करते रहते हैं।
साधना, उसके स्वाध्याय, चिन्तन-मनन व निदिध्यासन की झलक मिलती है। माता पार्वती की जिज्ञासा भी हम सब गुरुभक्तों की कल्याण कामना के उद्देश्य से उपजी थी। सर्वज्ञानमय माँ ने अपनी सन्तानों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए देवेश्वर शिव से प्रश्न किया था।
साधना और आराधना तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।
साधना का सुफल रामचरित मानस तो दिव्यतम है ही। इस सत्य के तत्व से अपरिचित जन यदा-कदा उनके ऋषि जीवन और ऋषि कर्म में कमियाँ ढूंढ़ने की कोशिश करते रहते हैं, ऐसे लोगों के लिए महाकवि ने कहा है- ‘वचन वज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥’ इन्हें कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्यारा लगता है। और ये हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं। लेकिन यथार्थ में ये कमियाँ उनकी अपनी कमियाँ होती हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-October
साधना है, जिससे सिद्धि और समाधि जन्मती है। यह घटित तभी होती है जब हमारा चिन्तन उत्कृष्ट हो, भावना परिष्कृत हो। तभी कर्म भी श्रेष्ठ व निष्काम हो सकेंगे। जीवन की सार्थकता, समग्रता भी इसी में है। हम सभी को अपने विचारों, भावों एवं कर्मों से सतत् इसी श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते रहना चाहिए।
साधना है, सारा योग है।
साधना है,
नवरात्रि−साधना के साधक सभी बने हम,
पल भर नहीं प्रगति में बाधक कभी बनें हम
साधना से, सद्गुरु के बताए कार्यों में लगने से स्वयं होते चले जाते हैं। युगधर्म यही है कि भ्राँतियों और विकृतियों के दलदल में फंसे लोकमानस को उबारा जाए। इसी निमित्त युगनिर्माण योजना मथुरा द्वारा सप्तक्राँतियाँ एवं शाँतिकुँज हरिद्वार द्वारा सप्त आँदोलन जन−जन को दिए गए।
साधना का उपयोग प्रारंभ कर दिया। राजघराने की परंपरा के विपरीत होने से उनके पति महाराणा ने उनको आभूषणों में सर्प रखकर भेजे, पेय में घातक विष मिलाकर भेजा, पर मीरा पर उनका कोई प्रभाव नहीं हुआ। यह उनकी लोक आराधना का ही प्रभाव था।
साधना से होता है जबकि चरित्र निर्माण समाजिक आराधना में ही सम्भव है। इन दोनों तत्त्वों के समुचित विकास से ही व्यक्तित्व निखरता है। गुणवान एवं चरित्रवान व्यक्ति भले ही नाम, रूप, जाति, कुल से श्रेष्ठ न हो पर वह इन विशेषताओं के कारण लोकमान्य बनता है, प्रतिष्ठित होता है तथा श्रेय-सम्मान का अधिकारी बनता है। निम्न कुल-जाति की माने जाने वाले मत्स्यगंधा पुत्र व्यास जी ने अपनी प्रचण्ड तपस्या एवं गहन साधना के द्वारा गुण एवं चरित्र का विकास कर अपने व्यक्तित्व को समुज्ज्वल बनाया था। इनका व्यक्तित्व इतना महान् था कि उन्हें कोई उनके जाति-कुल-गोत्र आदि के बारे में नहीं पूछता, बल्कि प्रखर व्यक्तित्व के सामने माथा नवाता है।
साधना के सूत्रों को अपनाकर ऐसा करने से रूखा, नीरस, शुष्क व्यक्तित्व भी उस सरिता के समान प्रवाहित हो उठता है जिसमें अत्यन्त प्रभावकारी तीव्र जीवनधारा के साथ किनारों को चूमती-छूती लहरों की अटखेलियाँ भी होती हैं।
साधना में नियोजित हो। सुसंगठित हो समाज की सेवा में लगना हम सबकी नियति भी है, समय की आवश्यकता भी। मात्र भावनाओं के दुर्भिक्ष में जी रहे संकीर्ण स्वार्थी ही इस सेवा−साधना से दूर रह सकते हैं। परमपूज्य गुरुदेव इस संबंध में लिखते हैं, भजन का अर्थ है सेवा। सेवा किस की?
साधना की भावलीनता में अपने सद्गुरु के प्राणों की छुअन का अहसास कर रहे थे। साधना की इस अनूठी भावभूमि में सद्गुरु कृपा की अनोखी अमृत वृष्टि हो रही थी। समस्त शिष्यों की अन्तर्चेतना का कण-कण इस कृपा-वर्षा से भीग रहा था, रूपांतरित हो रहा था। समवेत प्राणों की पुकार पर महाप्राण के भावघन सघन हो बरस रहे थे।
साधनात्मक धरोहर को अपनी अगली पीढ़ी के सदस्यों को वसीयत और विरासत के रूप में सौंपा है। यही वह तथ्य है, जिसके कारण गायत्री परिवार का विशालकाय संगठन देश और विश्व के अन्य सभी संगठनों व आन्दोलनों से पूरी तरह भिन्न हैं। जहाँ अन्य संगठन अपनी पूँजी के रूप में धन-बल को अपना सब कुछ मानते हैं, वही गायत्री परिवार के लिए उसकी सम्पूर्ण पूँजी तप-बल है।
साधना करो। इसी से तुम अध्यात्म के सभी शिखरों पर भ्रमण कर सकोगे। सोच-विचार नहीं साधना करो। दुविधा में मत पड़ो, यात्रा करो।
साधना, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वावलंबन, पर्यावरण, महिला जागरण, व्यसनमुक्ति, कुरीति संवर्द्धन, कुरीति उन्मूलन, व्यसन मुक्ति का उत्तरार्द्ध है। आस्तिकता संवर्द्धन प्रकाराँतर से शाँतिकुँज का साधना आँदोलन है।
साधना करो। दुविधा में मत पड़ो, यात्रा करो।
साधना वाले सत्र साधकों को प्रायश्चित, क्षतिपूर्ति तथा आँतरिक परिशोधन द्वारा परिपूर्ण कायाकल्प का अवसर दें। इसीलिए वे अपने लंबे प्रवास पर समुचित मार्गदर्शन क्षेत्र से बैठकर कर रहे थे। प्रत्येक पत्र पर नंबर अंकित रहता था। उस प्रवास का यह कौन क्रमाँक है, यह भी उसमें होता था, ताकि सभी को स्मृति रहे कि कौन−कौन से पत्रों पर कितना अमल हो गया। उपर्युक्त दोनों पत्र क्रमशः 2 व 3 नंबर के थे।
साधना कराई, पर समाधि तक ले जाकर रोक लिया, कहा, तुम्हें लोकसेवा का कार्य करना है।
साधना से हाथोंहाथ प्राप्त हो सकते हैं। इसमें महिलाएँ भी पीछे न रहें। शिक्षित महिलाएँ तो अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं। कमला हास्पेट, शिवदेवी शास्त्री जैसी समाजसेवी देवियाँ अपने प्रज्ञा परिवार के बीच से निकलें और अनपढ़ महिलाओं को साक्षर बनाने के लिए थोड़ा−सा समय निकालें, तो यह अपने तरीके की एक महान सेवा होगी। जन समर्थन जन सहयोगी की कमी उन्हें नहीं पड़ेगी
साधना की धुरी पर बनकर खड़ा हो गया।
साधना की ओर उन्मुख हो। इसके लिए उपलब्ध है, सबके लिए सुलभ उपासना−साधना पुस्तिका। इसका संशोधित−संवर्द्धित संस्करण शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सभी तीस साहित्य विस्तार पटलों पर उपलब्ध हैं।
साधना है,
उत्कृष्टता−नियंत्रित व्यवहार साधना है,
नवरात्रि−साधना के साधक सभी बने हम,
पल भर नहीं प्रगति में बाधक कभी बनें हम
साधनाओं द्वारा मंत्रों का साक्षात्कार किया। वेद के कई मंत्र ‘ऋषिकाओं’ द्वारा खोजे गए हैं।
साधना पथ के पथिक को लौकिक जीवन की वासनाओं का क्षय करने में मदद करता है। जैसे−जैसे वासनाएँ मिटती चली जाती हैं, मन शाँत होता चला जाता है। मन की शाँति किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जरूरी है। ऐसी मनःस्थिति में स्थित व्यक्ति अपने ध्यान द्वारा चैतन्य की आत्मानुभूति कर लेता है। जब अपने आप की कर्त्ताभाव मिट जाता है, तो संन्यास की स्थिति में जाकर मनुष्य परम आनंद को प्राप्त होता है।
साधना को अनुष्ठान का स्वरूप प्रदान करते हैं। यह सत्य अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए। तप के क्रम में 1. भूमि या तख्त पर शयन, 2.ब्रह्मचर्य पालन, 3. एक समय का आस्वाद भोजन, 4. वाणी पर अनिवार्य नियंत्रण, सम्भव हो सके तो मौन पालन, 5. किसी से भी अपनी सेवा न लेना सामान्य नियम है। इस विधान को कुछ विशेष ऊर्जावान बनाना हो तो गायत्री महाविज्ञान के प्रथम भाग में बताए गए बारह तप प्रयोगों में भी कुछ को अपनाया जा सकता है। शारदीय नवरात्रि में गायत्री अनुष्ठान का पालन अध्यात्म विद्या का महाप्रयोग है।
साधना जंग छुड़ाने में लग जाएगी, तब वह ठीक प्रकार से प्रयुक्त हो सकेगा।
साधना की रोशनी परमात्मा तक पहुँचने के लिए पर्याप्त है।
साधना प्रारम्भ की थी। आज उनके बच्चे अथवा बच्चों के बच्चे बड़ी ही श्रद्धापूर्वक नवरात्रि के दिनों में अपने अनुष्ठान को पूरा करते हैं। परिजनों ने परम पूज्य गुरुदेव से पायी गयी इस अमूल्य साधनात्मक धरोहर को अपनी अगली पीढ़ी के सदस्यों को वसीयत और विरासत के रूप में सौंपा है। यही वह तथ्य है, जिसके कारण गायत्री परिवार का विशालकाय संगठन देश और विश्व के अन्य सभी संगठनों व आन्दोलनों से पूरी तरह भिन्न हैं। जहाँ अन्य संगठन अपनी पूँजी के रूप में धन-बल को अपना सब कुछ मानते हैं, वही गायत्री परिवार के लिए उसकी सम्पूर्ण पूँजी तप-बल है।
साधना में लीन किया गया है तो मन की यही पाँचों वृत्तियों अक्लेश का स्रोत सिद्ध होती है। मन की पञ्चवृत्तियाँ जिन्दगी में क्लेश की बाढ़ किस तरह लाती है, इसका अनुभव हममें से प्रायः सभी को है। परन्तु इनका अक्लेश के स्रोत के रूप में सिद्ध होना परम पूज्य गुरुदेव द्वारा बताए गए जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्रों से ही सम्भव है।
साधना के लिए पुकार है। अपने गायत्री परिवार के परिजनों को इस महापर्व का महत्त्व सदा से सुविदित रहा है। ऐसे असंख्य लोग अपने देव परिवार में हैं, जिन्होंने वर्षों पहले अपनी किशोरावस्था या युवावस्था में गायत्री महामंत्र की साधना प्रारम्भ की थी। आज उनके बच्चे अथवा बच्चों के बच्चे बड़ी ही श्रद्धापूर्वक नवरात्रि के दिनों में अपने अनुष्ठान को पूरा करते हैं। परिजनों ने परम पूज्य गुरुदेव से पायी गयी इस अमूल्य साधनात्मक धरोहर को अपनी अगली पीढ़ी के सदस्यों को वसीयत और विरासत के रूप में सौंपा है।
साधना के बिना लोकसाधना नहीं, जो बना नहीं वह बनाएगा क्या? और जो नया नहीं बनाया तो स्वयं बनने का क्या लाभ।
साधना की इस अनूठी भावभूमि में सद्गुरु कृपा की अनोखी अमृत वृष्टि हो रही थी। समस्त शिष्यों की अन्तर्चेतना का कण-कण इस कृपा-वर्षा से भीग रहा था, रूपांतरित हो रहा था। समवेत प्राणों की पुकार पर महाप्राण के भावघन सघन हो बरस रहे थे।
साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन, कुरीति−उन्मूलन, नशा निवारण, पर्यावरण संवर्द्धन तथा नारी जागरण में से किन्हीं दो को पूर्ण गति दे सकें। सुनियोजित कार्यपद्धति अपनाकर उसे ऐसी गति दें कि उस क्षेत्र में वह एक ख्यातिप्राप्त आँदोलन बन जाए।
साधना नहीं, जो बना नहीं वह बनाएगा क्या? और जो नया नहीं बनाया तो स्वयं बनने का क्या लाभ।
साधना स्वर्ण जयंती वर्ष संपन्न कर चुके इस मिशन के सूत्रधार के रूप में प्रवास पर निकली हो, वहाँ तो भीड़ का उमड़ना स्वाभाविक ही था।
साधना या संन्यास से नहीं, गुफा में बैठकर नहीं, समवेत मनों की शक्ति के जागरण से ही हो पाएगा। ऐसा समय निश्चित ही आएगा, तत्पश्चात् गोरक्षनाथ ने नाथ योगियों की एक सेना खड़ी की एवं उन्हें एक विशिष्ट कार्य सौंपा। जहाँ भी भवनों का आक्रमण होने की संभावना रहती थी, वहाँ यह सेना पहले से ही पहुँच जाती थी एवं बाकायदा मोर्चा लेती थी। वे जाकर सभी को एकत्र करते एवं बताते थे कि युगधर्म क्या है? इस समय तलवार हाथ में लेकर लड़ना एवं विधर्मियों को मार गिराना ही युगधर्म है।
साधना सम्बन्धी सामग्री प्रकाशित होती रही है, वहाँ से भी यह जानकारी पायी जा सकती है।
साधना सत्रों के विषय में भी सोचा था। परमपूज्य गुरुदेव इसी विषय पर अपने गुजरात प्रवास में महुआ से 5-11-81 को एक पत्र में परमवंदनीया माताजी को लिखते हैं−
साधना द्वारा समूह मन के जागरण की प्रक्रिया को जीवनभर गति दी। उनने कहा कि जो इसमें जुटेगा, वह भारत को महानायक होते देखेगा। गोरखनाथ से भी फेरुकवज्र ने यह बात इसी तरह कही, भारतवर्ष का उद्धार तंत्र साधना या संन्यास से नहीं, गुफा में बैठकर नहीं, समवेत मनों की शक्ति के जागरण से ही हो पाएगा। ऐसा समय निश्चित ही आएगा, तत्पश्चात् गोरक्षनाथ ने नाथ योगियों की एक सेना खड़ी की एवं उन्हें एक विशिष्ट कार्य सौंपा। जहाँ भी भवनों का आक्रमण होने की संभावना रहती थी, वहाँ यह सेना पहले से ही पहुँच जाती थी एवं बाकायदा मोर्चा लेती थी।
साधना स्थली का चयन इसी स्थान के रूप में गीता जयंती पर किया। 1953 की गायत्री जयंती पर गायत्री तपोभूमि के छोटे से परिसर में गायत्री जयंती पर गायत्री तपोभूमि के छोटे से परिसर में गायत्री महाशक्ति के विग्रह को स्थापना हुई। इसके साथ ही यहाँ एक 108 कुँडीय यज्ञ भी संपन्न हुआ, जिसमें परमपूज्य गुरुदेव ने अपने साधना गुरु श्री सर्वेश्वरानंद जी महाराज के निर्देशानुसार चौबीस महापुरश्चरणों (प्रत्येक चौबीस लक्ष के) की पूर्णाहुति भी संपन्न की। तीन वर्ष बाद यहीं पर नरमेध यज्ञ संपन्न हुआ तथा 1958 में 1008 कुँडी वाजपेय स्तर के गायत्री महायज्ञ के संपन्न होने के साथ गायत्री परिवार का एक विराट संगठन साधना की धुरी पर बनकर खड़ा हो गया।
साधना में क्यों लगवा दिया? उत्तर मिला, आत्मसाधना के बिना लोकसाधना नहीं, जो बना नहीं वह बनाएगा क्या? और जो नया नहीं बनाया तो स्वयं बनने का क्या लाभ।
साधना ताकि सबके उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना की जा सके। उपासना की गहराई बढ़ एवं हमारी प्रार्थना−उपासना जीवन−साधना की ओर उन्मुख हो। इसके लिए उपलब्ध है, सबके लिए सुलभ उपासना−साधना पुस्तिका। इसका संशोधित−संवर्द्धित संस्करण शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सभी तीस साहित्य विस्तार पटलों पर उपलब्ध हैं।
साधना की नियमितता में ध्यान लगाया। कुछ काल के बाद दोनों ही अपने-अपने ढंग से अपने अनुभव के बल पर सबको समझाने लगे- मित्रों! बैठे क्या हो? उठो और चलो। जो सोचता है, वह नहीं; जो चलता है, बस केवल वही पहुँचता है। स्मरण रहे कि इतना विवेक, इतना प्रकाश प्रत्येक के पास है कि उससे कम से कम दस कदम का फासला दिखाई पड़ सके और उतना ही पर्याप्त भी है।
साधना की पूर्णाहुति भी की एवं आगामी वर्ष की साधना के लिए नए संकल्प लिए। दोनों ही पर्व मिशन के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ गए हैं।
साधना महापूर्णाहुति एवं फिर हीरक जयंती वर्ष मनाने के बाद साधना की धुरी पर संगठन को सशक्त बनाने के लिए इस वर्ष ही नहीं, 2004 की जनवरी तक हम संकल्पित हैं। गुरुसत्ता की इच्छा है कि इस अवधि में सारा गायत्री परिवार विधिवत संगठित हो जाए, प्रत्येक की अपनी कार्यविधि निर्धारित हो एवं हमारी अधिकाधिक शक्ति समूह साधना में नियोजित हो। सुसंगठित हो समाज की सेवा में लगना हम सबकी नियति भी है, समय की आवश्यकता भी। मात्र भावनाओं के दुर्भिक्ष में जी रहे संकीर्ण स्वार्थी ही इस सेवा−साधना से दूर रह सकते हैं। परमपूज्य गुरुदेव इस संबंध में लिखते हैं, भजन का अर्थ है सेवा।
साधना के बिना इसका अलग अस्तित्त्व अनुभव नहीं हो पाता। हालाँकि योग साधना करने वाले इस सच्चाई को बड़ी आसानी से जान लेते हैं। कि दृश्य शरीर यदि स्थूल शरीर है, तो अपनी शक्तियों एवं सम्भावनाओं के साथ मन सूक्ष्म शरीर है। इसका विकास इस तथ्य पर निर्भर करता है कि मन और उसकी वृत्तियों का किस तरह से उपयोग किया गया?
साधना की धुरी पर ही संगठन के सशक्त होने की बात कह रहे हैं। ऐसी स्थिति में आगे के पत्र भी हमारा इसी इसी प्रकार मार्गदर्शन करते दिखाई देते हैं। ये बताते हैं कि सूक्ष्म से जानने की सामर्थ्य होते हुए भी हमारी गुरुसत्ता प्रत्यक्ष में मात्र शिक्षण हेतु किस तरह अपनी भावनाएँ प्रेषित करती थी। अमरेली से लिखे 6-11-81 के (पिछले पत्र के मात्र एक दिन बाद) पत्र में वे लिखते हैं−
साधना के स्वर्णिम सूत्रों से ही सम्भव है।
साधना से ही जाना जाता है। सत्य से साक्षात्कार करने का और कोई मार्ग नहीं है। जागो और जियो! जागो और चलो। आध्यात्मिक सत्य कोई मृत वस्तु नहीं है कि उसे बैठे-बिठाए ही पाया जा सके। वह तो अत्यन्त जीवन्त प्रवाह है।
साधना-साध्य है। दैवी गुणों से सम्पन्न असंख्य तपस्वियों के सम्मिलित तप तेज को ही अपना ब्रह्मत्र बनाकर जगन्माता इस कार्य को पूर्ण करेंगी। परिजनों का तप तेज जिस तीव्रता से बढ़ेगा, विश्व-वसुधा में दैवी सम्भावनाएँ उसी तेजी से साकार होंगी। जो परिजन परम पूज्य गुरुदेव के संग-साथ में रहे हैं, जिन्होंने पूज्यवर का सान्निध्य पाया है, उन्हें यह सत्य भली-भाँति अवगत है कि नवरात्रि के दिनों का तप-साधना के लिए विशेष महत्त्व है।
साधना आँदोलन−आस्तिकता संवर्द्धन
साधना की विशिष्टता सभी बड़े महत्वपूर्ण पक्ष थे। उन्हीं दिनों गुरुसत्ता के निर्देश पर एक पुस्तक भी लिखी गई थी, आँतरिक कायाकल्प का सुनिश्चित विधान। परमपूज्य गुरुदेव चाहते थे कि ये चाँद्रायण तप−साधना वाले सत्र साधकों को प्रायश्चित, क्षतिपूर्ति तथा आँतरिक परिशोधन द्वारा परिपूर्ण कायाकल्प का अवसर दें। इसीलिए वे अपने लंबे प्रवास पर समुचित मार्गदर्शन क्षेत्र से बैठकर कर रहे थे। प्रत्येक पत्र पर नंबर अंकित रहता था।
साधना की दृष्टि से वे बड़े ही अद्भुत और असाधारण होते हैं। बंगाल के महान् सन्त लोकनाथ ब्रह्मचारी तो इसके बारे में यहाँ तक कहते थे कि वर्ष भर किए जाने वाले गायत्री के चौबीस लक्ष के महापुरश्चरण का सुफल शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मात्र 24 हजार के लघु अनुष्ठान से ही मिल जाता है। इन विशेष दिनों में किए जाने वाले इस लघु अनुष्ठान से बड़े ही दुष्कर-दुर्योग अनायास ही कट जाते हैं। और अनेकों शुभ-सुफलों की प्राप्ति होती है। यह सच अनेकों साधकों द्वारा बार-बार आजमाया हुआ है।
साधना और भी निखरे, यही मंगलकामनाएँ हमारी हैं।
साधना गुरु श्री सर्वेश्वरानंद जी महाराज के निर्देशानुसार चौबीस महापुरश्चरणों (प्रत्येक चौबीस लक्ष के) की पूर्णाहुति भी संपन्न की। तीन वर्ष बाद यहीं पर नरमेध यज्ञ संपन्न हुआ तथा 1958 में 1008 कुँडी वाजपेय स्तर के गायत्री महायज्ञ के संपन्न होने के साथ गायत्री परिवार का एक विराट संगठन साधना की धुरी पर बनकर खड़ा हो गया।
साधना की नियमितता में जो सब भाँति मुक्त और निर्बन्ध हो बहता है, वही उसे पाता है।
साधना के लिए नए संकल्प लिए। दोनों ही पर्व मिशन के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ गए हैं।
साधना रावण, कुम्भकर्ण, हिरण्यकश्यपु एवं हिरण्याक्ष ने भी कम नहीं की थी। इनकी घोर तपस्या के किस्सों से पुराणों के पन्ने भरे पड़े हैं। पुराण कथाएँ कहती हैं कि इनकी तपस्या से मजबूर होकर स्वयं विधाता इन्हें वरदान देने के लिए विवश हुए। परन्तु वृत्तियों के शोधन के अभाव में समस्त तप की परिणति अन्ततः क्लेश का ही स्रोत साबित हुई। अपनी तमाम उम्र ये वासनाओं की अतृप्ति की आग में जलते-झुलसते रहे।
साधना करने के लिए यहाँ आए हजारों साधक-साधिकाएँ साधना की भावलीनता में अपने सद्गुरु के प्राणों की छुअन का अहसास कर रहे थे। साधना की इस अनूठी भावभूमि में सद्गुरु कृपा की अनोखी अमृत वृष्टि हो रही थी। समस्त शिष्यों की अन्तर्चेतना का कण-कण इस कृपा-वर्षा से भीग रहा था, रूपांतरित हो रहा था। समवेत प्राणों की पुकार पर महाप्राण के भावघन सघन हो बरस रहे थे।
साधनाएँ संपन्न की। तभी वे मंत्रद्रष्टा ऋषि हो पाई। रामवंश के यथार्थ इतिहास को बाल्मीकि ने अपनी रामायण में लिखा है। जब सीताजी का अपहरण हो गया, और भगवान राम उन्हें खोजने चले तो उन्होंने लक्ष्मण से कहा, सायंकाल हो रहा है। सीताजी को जलाशय के किनारे संध्यावंदन बहुत प्रिया है।
साधना तक वे कोई भी क्षेत्र उनके विशिष्ट व्यक्तित्व, प्रतिभा एवं कौशल की छाप से अछूते नहीं थे। अपनी बहुआयामी उपलब्धियों के आधार पर वे अपनी जाति के अन्दर संजीवनी शक्ति का संचार करती थी और अपने समाज व राष्ट्र को सशक्त एवं ऊँचा उठाने में अपना अमूल्य योगदान देती थी। वैदिक वाङ्मय में कहीं पुत्री तो कहीं भगिनी, कहीं पत्नी व कहीं माता के रूप में उसकी भूमिका एवं योगदान का उल्लेख आता है। और कहीं-कहीं वह मंत्रद्रष्ट ऋषिका के रूप में अपना वर्चस्व प्रकट करती है।
साधना में निमग्न हैं। इधर उनके नीति-निर्देशन के अभाव में कौशाम्बी श्रीहीन हो रही है और महाराज विलास में डूबे हैं। महामंत्री त्रिवृष्ण ने अपनी स्मृति कथा का उपसंहार किया।
साधना के नाम पर दौड़ते रहते हैं। गिरते−पड़ते,
साधना सत्रों के नए निर्धारण लागू कर दिए जाएँ। सभी जिम्मेदारी से अपना−अपना कार्य (शिक्षण−व्यवस्था संबंधी) करते रहें तो वह उद्देश्य पूरा हो जाएगा जिसके लिए साधकों को बुलाया गया है। मिनी चाँद्रायण के छोटे सत्रों के साथ−साथ ये चाँद्रायण सत्र पूरे एक माह (28 दिन) के थे। इनमें दिनचर्या, आहार नियोजन से लेकर साधना की विशिष्टता सभी बड़े महत्वपूर्ण पक्ष थे। उन्हीं दिनों गुरुसत्ता के निर्देश पर एक पुस्तक भी लिखी गई थी, आँतरिक कायाकल्प का सुनिश्चित विधान।
साधना के लिए विशेष महत्त्व है।
साधना से दूर रह सकते हैं। परमपूज्य गुरुदेव इस संबंध में लिखते हैं, भजन का अर्थ है सेवा। सेवा किस की? इसका उत्तर एक ही हो सकता है−आदर्शों की आदर्शों का समुच्चय की भगवान है। दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए ही भगवान समय−समय पर अवतार लेते हैं ईश्वर की अनुकंपा किस पर कितनी हो रही है, इसकी परख प्रक्रिया एक ही है कि उसे उन्मूलन से सात आँदोलन आज से चार वर्ष पूर्व दिए गए।
साधना है
साधना से जुड़े परिजनों के लिए एक सशक्त मार्गदर्शन है।
साधना की धुरी पर संगठन को सशक्त बनाने के लिए इस वर्ष ही नहीं, 2004 की जनवरी तक हम संकल्पित हैं। गुरुसत्ता की इच्छा है कि इस अवधि में सारा गायत्री परिवार विधिवत संगठित हो जाए, प्रत्येक की अपनी कार्यविधि निर्धारित हो एवं हमारी अधिकाधिक शक्ति समूह साधना में नियोजित हो। सुसंगठित हो समाज की सेवा में लगना हम सबकी नियति भी है, समय की आवश्यकता भी। मात्र भावनाओं के दुर्भिक्ष में जी रहे संकीर्ण स्वार्थी ही इस सेवा−साधना से दूर रह सकते हैं। परमपूज्य गुरुदेव इस संबंध में लिखते हैं, भजन का अर्थ है सेवा।
साधना सत्र (अनुष्ठान सहित) भी नियमित पूरे वर्ष चलते हैं। ये 9 से 9, 99, से 96, 29 से 29 तारीखों में चलते हैं। पाँच दिवसीय मौन अंतःऊर्जा जागरण सत्र इस माह नवरात्रि (7 से 15 अक्टूबर) की अवधि छोड़कर 16 अक्टूबर से पुनः उसी क्रम से आरंभ हो जाएँगे एवं वसंत पर्व ( 6 फरवरी 2003) का अवकाश छोड़कर 30 मार्च तक चलते रहेंगे। रचनात्मक प्रशिक्षणों को प्रतिमाह दो सत्रों का सिलसिला यथावत चलता रहेगा। इस वर्ष उत्तराँचल राज्य के एन. जी. ओंज का प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य का विशेष शिविर प्रतिमाह केंद्र में चल रहा है।
साधना के साधक सभी बने हम,
पल भर नहीं प्रगति में बाधक कभी बनें हम
साधना परायण व्यक्ति होते हैं। इनका विश्वास जीवन की याँत्रिक गतिविधियों में फँसकर सब कुछ गवाँ देने में नहीं होता। इनकी अन्तर्चेतना रोजी-रोटी कमाने तक सिमटी नहीं रहती। ये अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों के साथ जीवन के सार तत्त्व के बारे में सतत मनन करते रहते हैं।
साधना है।
साधना की ओर अपने पाँव बढ़ाए और युवराज को अपना अभीप्सित मिल गया। उन्हें तो इस अवसर की प्रतीक्षा थी ही। यह कथा सुनाते हुए वृद्ध मंत्री त्रिवृष्ण थोड़ा ठहरे। युवा वयस् के मंत्री संकेत की ओर इंगित करके बोले- पुत्र तुम शायद नहीं जानते होगे- कि महाराज बृहस्पतिमित्र एवं महर्षि प्रचेतस् दोनों ही बालसखा हैं। उन्होंने एक ही गुरुकुल में शिक्षा पायी थी।
साधना करने वाले इस सच्चाई को बड़ी आसानी से जान लेते हैं। कि दृश्य शरीर यदि स्थूल शरीर है, तो अपनी शक्तियों एवं सम्भावनाओं के साथ मन सूक्ष्म शरीर है। इसका विकास इस तथ्य पर निर्भर करता है कि मन और उसकी वृत्तियों का किस तरह से उपयोग किया गया?
साधना एवं यज्ञ कर रही हैं। अश्वमेध जैसे विराट् यज्ञ में वे ब्रह्मवादिनी की भूमिका निभा चुकी है। धीरे-धीरे वे समाज और जीवन के हर क्षेत्र में पदार्पण कर रही हैं। नारी जागृति की यह लहर वर्तमान 21 वीं सदी में नारी सदी के आदर्श को सार्थक साकार करके ही दम लेगी। ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए।
साधना आँदोलन है।
साधना सत्रों के क्रियान्वयन संबंधी व्यग्रता को बताता है। वे वहाँ भी यही चिंतन कर रहे थे कि कैसे इनका स्तर ऊँचा हो, कैसे अधिकाधिक व्यक्ति गुणात्मक दृष्टि से अच्छे इसमें भागीदारी करें। वे कहते हैं कि यह सत्र दूरगामी परिणामों को जन्म देंगे। इनसे साधक स्तर के लोकसेवी कार्यकर्त्ता निकलेंगे। अगर अन्यमनस्कता के साथ वरिष्ठ कार्यकर्त्ताओं ने इस शिक्षण को लिया तो वह परिणाम नहीं मिलेंगे
साधना की जाती है। ये यथार्थतः पाँच दिवसीय प्राण प्रत्यावर्तन साधना के ही संशोधित संस्करणों के रूप में हैं। फर्क इतना ही है, उस समय परमपूज्य गुरुदेव परमवंदनीय माताजी का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन साधकों को उपलब्ध था, अब सूक्ष्म संरक्षण एवं दिशा निर्देश उपलब्ध होते हैं। जितनी गहराई से चिंतन करके पूज्यवर ने इन सत्रों का प्रावधान बनाया था, लगभग उसी स्तर पर 1980−81 में आरंभ किए गए चाँद्रायण साधना सत्रों के विषय में भी सोचा था। परमपूज्य गुरुदेव इसी विषय पर अपने गुजरात प्रवास में महुआ से 5-11-81 को एक पत्र में परमवंदनीया माताजी को लिखते हैं−
साधना के ही संशोधित संस्करणों के रूप में हैं। फर्क इतना ही है, उस समय परमपूज्य गुरुदेव परमवंदनीय माताजी का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन साधकों को उपलब्ध था, अब सूक्ष्म संरक्षण एवं दिशा निर्देश उपलब्ध होते हैं। जितनी गहराई से चिंतन करके पूज्यवर ने इन सत्रों का प्रावधान बनाया था, लगभग उसी स्तर पर 1980−81 में आरंभ किए गए चाँद्रायण साधना सत्रों के विषय में भी सोचा था। परमपूज्य गुरुदेव इसी विषय पर अपने गुजरात प्रवास में महुआ से 5-11-81 को एक पत्र में परमवंदनीया माताजी को लिखते हैं−
साधना के द्वारा गुण एवं चरित्र का विकास कर अपने व्यक्तित्व को समुज्ज्वल बनाया था। इनका व्यक्तित्व इतना महान् था कि उन्हें कोई उनके जाति-कुल-गोत्र आदि के बारे में नहीं पूछता, बल्कि प्रखर व्यक्तित्व के सामने माथा नवाता है।
साधना पुस्तिका। इसका संशोधित−संवर्द्धित संस्करण शांतिकुंज, गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं सभी तीस साहित्य विस्तार पटलों पर उपलब्ध हैं।
साधना उनका आदर्श होगी। मर्यादा की इस अमिट रेख को वे कभी भी पार नहीं करेंगे। महासेनानी ने इस आदर्श को पूरी उम्र भर निभाया। तभी तो उनके तप और शौर्य के तेज से यवनों की आँखें भी चौंधिया गयीं। कौशाम्बी के प्रताप ने उसके श्री और बल का हरण कर लिया।
साधना के बहुआयामी पक्षों पर चिंतन करने को विवश करता है। आज भी हम साधना की धुरी पर ही संगठन के सशक्त होने की बात कह रहे हैं। ऐसी स्थिति में आगे के पत्र भी हमारा इसी इसी प्रकार मार्गदर्शन करते दिखाई देते हैं। ये बताते हैं कि सूक्ष्म से जानने की सामर्थ्य होते हुए भी हमारी गुरुसत्ता प्रत्यक्ष में मात्र शिक्षण हेतु किस तरह अपनी भावनाएँ प्रेषित करती थी। अमरेली से लिखे 6-11-81 के (पिछले पत्र के मात्र एक दिन बाद) पत्र में वे लिखते हैं−
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-March
साधना के लिए यहाँ आए हुए थे। जब उन्होंने इन सबको वहाँ खड़े हुए, परेशान देखा, तो बोले- तुम लोग अपनी बुद्धि का उपयोग क्यों नहीं करते।
साधना यही दो आत्मिक प्रगति के आधार है। साधना का प्रकरण ज्ञानयज्ञ से संबंधित है। यह स्वाध्याय से आरंभ होकर सद्ज्ञान प्रसार के लिए किए जाने वाले प्रबल प्रयत्नों तक फैलता है..... ज्ञान ही है जो पशु को मनुष्य, मनुष्य को देवता और देवता को भगवान बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अंधकार में भटकने से उबारकर कल्याणकारी प्रकाश की और उन्मुख करता है।” (पृष्ठ 59)।
साधना।
लोकसेवी समर्पित होकर करें॥
साधना।
साधना भंग न हुई। दुर्वासा ने उन्हें कभी विकारमय न पाया। निर्मल अन्तःकरण वाले महर्षि बड़े ही विनम्र भाव से दुर्वासा का अतिथि सत्कार करते रहे। उनके कटु-तिरस्कार पूर्ण वचनों को भी उन्होंने अतिथि द्वारा लाई गयी भेंट के रूप में ही उत्साहपूर्वक स्वीकार किया।
साधना पर विश्वास था। और शिष्य को अपने सद्गुरु की कृपा पर भरोसा था। साधना तीव्र, कठोर एवं एकनिष्ठ हो तो कृपा अवतरित हुए बिना नहीं रहती। इसी तरह सद्गुरु की कृपा हो तो साधना विकसित हुए बिना नहीं रहती। यहाँ पर साधना और कृपा दोनों ही एक दूसरे के सहयोगी थे।
साधना से ही सम्भव है।
साधना का एक महत्त्वपूर्ण आयाम रहा है, पत्रों से मार्गदर्शन। जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, उसे स्पर्श करते हुए व्यक्ति को आत्मबोध करना कि उस व्यक्ति का, शिष्य का कर्त्तव्य क्या है। 27/7/6161 को पं. बैजनाथ जी सौनकिया को लिखा एक पत्र यहाँ दे रहे हैं--
साधना विकसित हुए बिना नहीं रहती। यहाँ पर साधना और कृपा दोनों ही एक दूसरे के सहयोगी थे। और फिर अध्यात्म तो है ही असम्भव को सम्भव करने का विज्ञान। सचमुच ही असम्भव, सम्भव हुआ और अखण्ड ज्योति प्रकाशित होने लगी।
साधना जैसे तुच्छ उद्देश्यों में न कर महानता प्रदर्शित करने वाले कार्यों में करना चाहिए। मानव जीवन की सफलता इसी में है कि हम व्यक्तिगत लाभ का विचार छोड़कर अपनी शक्तियों का उपयोग परोपकार के लिए ही करें।
साधनाओं के गर्भ से यह जन्मी है। और उन्हीं के तप का अमृतपान कर इसका विकास हुआ है। वर्ष 1926 ई. की बसन्त पंचमी को हिमालय वासी परमगुरु के दिव्य सान्निध्य में जो अखण्ड दीप जला, उसकी ज्योति दो स्थानों पर एक साथ प्रकट हुई और अखण्ड बनी। अखण्ड दीप की अखण्ड ज्योति का एक प्राकट्य गुरुदेव की पूजा स्थली पर हुआ। जिसके सान्निध्य में 24 लक्ष के 24 गायत्री महामंत्र के महापुरश्चरणों की शृंखलाएँ चलीं।
साधना की प्रखरता है। शबरी ही है, रात-रात भर जागकर आश्रम से लेकर सरोवर तक कँटीला रास्ता साफ करती रही और सज्जनों का पथ-प्रशस्त करने के लिए अपना अविज्ञात, निरहंकारी भावभरा योगदान प्रस्तुत करती रही।”
साधना यथावत बनी रही। वह सच्चा साधक था। उसके हृदय में सत्य की सच्ची लगन थी। वह अपनी अनुभूति को शब्द देते हुए कहता- धर्म ईसाई हो अथवा इस्लाम या फिर कोई और, वह वस्तुतः प्रेम, त्याग और सेवा के तीन शब्दों में सिमटा है। इन तीन के अलावा जहाँ कोई अन्य विरोधी भाव हैं, वहाँ न तो धर्म रह सकता है और नहीं धार्मिकता पनप सकती है।
साधना ही रही है। वैज्ञानिकों, आविष्कारों ने अपना मानस और समय प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केंद्रित किया होता तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती? लोकसेवियों ने अपना समयदान के सहारे एक-से-एक बड़े कार्य संपन्न कर दिखाए हैं।” इस समय का उपयोग ज्ञान के विस्तार में लगें, यहीं उनका जीवनभर लक्ष्य रहा। वे सितंबर 1969 की अखण्ड ज्योति में लिखते हैं, “जपात्मक और होमात्मक यज्ञ के स्तर का ही हम दूसरा धर्मानुष्ठान “ज्ञानयज्ञ’ चलाते रहे हैं।
साधना और शौर्य की सात धाराओं वाली गंगा जैसे वहाँ प्रवाहित हो उठी थी। महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीयता की भावनाओं से ओत-प्रोत भाषण वहीं दिया था, जिसमें प्रतिभाओं को ललकारा गया था। उन्हें अपने कर्त्तव्य से विमुख बताते हुए गाँधी जी ने राजा-महाराजाओं और श्रीमंतों की कड़ी आलोचना कर दी थी।
साधना भी उनने की, जिसमें पाँच वीरभद्रों के उत्पादन का पुरुषार्थ संपन्न हुआ। सन् 6 के दशक में उनका हिमालय-प्रवास एक और विशिष्ट उद्देश्य के लिए था, आर्षग्रंथों का अनुवाद-सरलीकरण, साथ-साथ कठोर तप एवं ‘युगनिर्माण योजना’ व उसके आधारभूत ढांचे को खड़ा करने के लिए एकाँत में चिंतन। एक पत्र जो सप्तर्षि आश्रम हरिद्वार से 31/5/61 को लिखा गया, इसी प्रवास की साक्षी देता हैं वे बशेशरनाथ जी (दिल्ली) को लिखते हैं-
साधना की, अनुशासन की नींव बनाते हैं। यह नींव सबके लिए है। यदि कोई उस नींव पर चल पड़े तो उस शिखर पर निश्चित रूप से पहुँच जाएगा, जो अभी दिखता नहीं, सबसे परे है। उनके द्वारा कहा गया एक भी शब्द व्यर्थ नहीं है। अपनी अन्तर्यात्रा पर चलने के लिए उनके एक-एक शब्द को समझने की कोशिश करनी होगी।
साधना अनुष्ठान के तुरंत बाद एक साधारण गृहस्थ कार्यकर्त्ता को यह बताने की क्या आवश्यकता?
साधना से कम न था। अनेकों तप अनुबन्ध इससे जुड़े थे। पहला अनुबन्ध यही कम कठोर न था कि उन दिनों की आर्थिक विपन्नता की स्थिति में बिना किसी धनपति के सहयोग के इसे प्रकाशित करना था। दूसरे अनुबन्ध की कठोरता भी अद्भुत थी। चौबीस महापुरश्चरणों की शृंखला जारी रखते हुए इसका लेखन, संकलन, सम्पादन स्वयं करना था।
साधना का निष्कर्ष एक ही सूत्र में प्रतिपादित किया है- ‘न ऋते ज्ञानन्मुक्तिः’ यानि कि आत्म ज्ञान एवं सत्य के बोध के बिना मनुष्य बन्धनों से नहीं छूट सकता। बन्धन ही तो जीवन में दुःख के कारण हैं। और ये सभी बन्धन अज्ञान एवं आत्म चिन्तन से आते हैं। जब तक आत्मा कल्याणकारी शिवतत्त्व की ओर प्रवृत्त नहीं होती, तब तक जीवन दुःख, चिन्ता, पीड़ा और अशान्ति से छुटकारा नहीं पा सकता। वेद भी इसी विचार की पुष्टि करता है- ‘नान्यः पन्थाविद्यते अनयाय’ अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
साधना के आधार हैं। कला और विद्या के विविध रूप उन्हीं से उपजते हैं। पौराणिक गाथाएँ इस सत्य की बड़ी मोहक प्रस्तुति करती हैं। शिव कल्याण प्रदाता आशुतोष हैं तो महासंहार के अधिष्ठाता महारुद्र भी। वह काल के भी काल महाकाल हैं।
साधना, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन के अंतर्गत प्रारंभिक दौर में भारतीय संस्कृति प्रधान विद्याएं जो ली जा रही है वे हैं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद, सर्वधर्म समभाव, देवालय प्रबंधन, नैतिक एवं मूल्यपरक शिक्षा, शिक्षालय प्रबंधन एवं शिक्षकों का प्रशिक्षण, आयुर्वेद, योगविज्ञान, मंत्रविज्ञान, यज्ञविज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान, औषधालय प्रबंधन, स्वास्यि संरक्षण प्रशिक्षण, ग्राम प्रबंधन, स्वदेशी स्वावलंबन पर आधारित अर्थप्रबंधन तथा गोविज्ञान।
साधना में बीता हो, वह यही तो परामर्श सभी को देगा। वह स्वयं भी अपने जीवन में ऐसे क्षण लाता है जब तप की पूँजी को बटोरा जा सके। परमपूज्य गुरुदेव ने ऐसा चार बार किया, जब वे एक से डेढ़ वर्ष की अवधि के लिए अपने गुरु का मार्गदर्शन पाकर तप हेतु, उनसे साक्षात्कार हेतु हिमालय गए। इसके अतिरिक्त सूक्ष्मीकरण की साधना भी उनने की, जिसमें पाँच वीरभद्रों के उत्पादन का पुरुषार्थ संपन्न हुआ। सन् 6 के दशक में उनका हिमालय-प्रवास एक और विशिष्ट उद्देश्य के लिए था, आर्षग्रंथों का अनुवाद-सरलीकरण, साथ-साथ कठोर तप एवं ‘युगनिर्माण योजना’ व उसके आधारभूत ढांचे को खड़ा करने के लिए एकाँत में चिंतन।
साधना, आत्मनिर्माण, लोकनिर्माण, समय का लोकसेवा में नियोजन जरूरी है। साधनदान अंशदान भी जरूरी है, पर सबसे बड़ा है समयदान, जो आज का युगधर्म भी है। ज्ञानयज्ञ पतन निवारण की सेवा है एवं उसके लिए चाहिए लोकहितार्थाय, समयदान-परिव्रज्या धर्म का पालन, ताकि जनमानस का परिष्कार हो सके।
साधना का प्रकरण ज्ञानयज्ञ से संबंधित है। यह स्वाध्याय से आरंभ होकर सद्ज्ञान प्रसार के लिए किए जाने वाले प्रबल प्रयत्नों तक फैलता है..... ज्ञान ही है जो पशु को मनुष्य, मनुष्य को देवता और देवता को भगवान बनाने में समर्थ होता है। ज्ञान से ही प्रसुप्त मनुष्यता जागती है और वही आत्मा को अज्ञान के अंधकार में भटकने से उबारकर कल्याणकारी प्रकाश की और उन्मुख करता है।” (पृष्ठ 59)।
साधना में रत हैं। व्याकरण की दृष्टि से देखें तो आत्मानि-इति विग्रह के द्वारा अव्ययीभाव समास करके ‘अध्यात्मम्’ शब्द की निष्पत्ति होती है। जिसका अर्थ हुआ- आत्मा में स्थित। आत्मन् शब्द की सप्तमी विभक्ति के एक वचन में ‘आत्मनि’ बनता है और अव्यय का ‘इति’ शब्द- ‘अधि’ शब्द के रूप में सामासिक सूत्र में परिवर्तित होता है। इसका स्पष्ट अर्थ होता है- ‘आत्मा में स्थित’।
साधना बन जाता है और इससे चित्त निर्मल हो जाता है। इस कर्म का संदेश है कि वर्तमान कार्य को अपनी समस्त क्षमता के साथ करना। कर्मयोगी अपने कर्म को गहन विचार और पुण्य भावना के साथ तन्मयतापूर्वक करता है।
साधना का आनंद भी आएगा एवं प्रभावोत्पादक सामर्थ्य- व्यक्तित्व में आभा व तेज बढ़ने लगेगा। इससे दूसरे प्रभावित होंगे एवं इस मार्ग पर अग्रसर होने की इच्छा उन्हें भी होने लगेगी। यही तो मानव मात्र का जीवनोद्देश्य है। हर गुरु यही चाहेगा कि उसका शिष्य-मानसपुत्र अपने अंदर सोई आत्मा को पहचाने व अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने तक रुके नहीं।
साधना।
लोकमंगल-साध्य की आराधना।
लोकमंगल के लिए शिव-साधना।
लोकसेवी समर्पित होकर करें॥
साधना प्रयोगों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।
साधना के इस सच्चे साधक की मृत्यु भी बड़े ही धार्मिक ढंग से हुई। वह आराम कुर्सी पर निश्चिन्त लेटा हुआ प्रभु से प्रार्थना करने में लीन था। उसकी आँखें दीवार पर लटके ईसा के क्रास पर लगी थी। प्रार्थना में इस तरह लीन सोवस्की की चेतना सदा के लिए अपने प्रभु में लीन हो गयी। आरामकुर्सी पर बस उसका शरीर पड़ा रहा।
साधनाओं के साथ लेखन कार्य करते थे। और जब वह नहीं हैं तो सम्पादक की लेखनी उनके दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही चलती है। आज भी लिखने वाला केवल यंत्र की भूमिका निभाता है। इस लेखक कहे जाने वाले, सम्पादक कहे जाने वाले यंत्र के नियंत्रक एवं नियामक आज भी वही होते हैं। अखण्ड ज्योति के सुदीर्घ भविष्य के लिए नीति वह स्वयं ही तैयार करके गए हैं।
साधना में डूबा हुआ था। हालाँकि इन दिनों भी उसके युद्धाभ्यास का सिलसिला यथावत था। और इसी कारण उसे लोग ग्रैंड मार्शल भी कहते थे। ऐसी स्थिति बनने पर सबकी निगाह अपने ग्रैंड मार्शल पर जा टिकी। नगरवासी-ग्रामवासी सभी झुण्ड के झुण्ड उसके पास पहुँचने लगे।
साधनात्मक पुरुषार्थ की है। यदि वह निरंतर चलता रहे तो कार्य सफल होंगे ही।
साधना उसके जीवन का अभिन्न एवं अविभाज्य अंग बन गयी थी। जीवन के सत्य को जानने के लिए वह घण्टों एकान्त में बिताया करता। इस क्रम में उसने अपनी समूची जीवनचर्या को तपश्चर्या बना डाला था। उससे जो भी मिलता, उसके जीवन से प्रभावित हुए बिना न रहता। उसके जीवन में एक ओर सदाशयता, दयालुता एवं करुणा छलकती थी, तो दूसरी ओर उसकी वीरता के प्रचण्ड तेज के सामने दृष्टि ठहर नहीं पाती थी।
साधना तीव्र, कठोर एवं एकनिष्ठ हो तो कृपा अवतरित हुए बिना नहीं रहती। इसी तरह सद्गुरु की कृपा हो तो साधना विकसित हुए बिना नहीं रहती। यहाँ पर साधना और कृपा दोनों ही एक दूसरे के सहयोगी थे। और फिर अध्यात्म तो है ही असम्भव को सम्भव करने का विज्ञान। सचमुच ही असम्भव, सम्भव हुआ और अखण्ड ज्योति प्रकाशित होने लगी।
साधना और कृपा दोनों ही एक दूसरे के सहयोगी थे। और फिर अध्यात्म तो है ही असम्भव को सम्भव करने का विज्ञान। सचमुच ही असम्भव, सम्भव हुआ और अखण्ड ज्योति प्रकाशित होने लगी।
साधना प्रशिक्षण केंद्रों तक यही ज्ञानयज्ञ संपन्न होता दिखाई देता है। स्वामी विवेकानंद पत्रावली में से एक पत्र जो उनके द्वारा उनके एक शिष्य को लिखा गया, स्पष्ट होता है कि ज्ञानयज्ञ क्या है? वे अपने एक शिष्य को जिन्हें वह अध्यापक महोदय संबोधन देते है, लिखते हैं, “मैं विचारचक्र का प्रवर्तन कर रहा हूँ, ताकि अच्छे-अच्छे विचार घर-घर पहुँचें। मेरे जीवन की यही महत्त्वाकांक्षा हैं।” यही ज्ञान यज्ञ है, जो स्वामी जी ने जीवन भर किया।
साधना द्वारा गढ़े गए थे। ये सभी विद्याएं जीवन जीने की पर्याय-अध्यात्म विद्या की विभिन्न धाराएं थी। आज ये सभी विद्याएं लुप्तप्राय हैं शरीर रुग्ण, मन अशाँत, परिवार विखंडित, समाज विक्षुब्ध, विज्ञान घातक, राजनीति भ्रष्ट, देश आतंकित, धर्म जंजाल और शिक्षा आज अनुपयुक्त भार बनकर रह गए है। जीवन विद्याओं की उपेक्षा से ही यह स्थिति पैदा हुई है।
साधनारत। यह साधना ही प्रतीक्षा होगी। और प्रतीक्षा ही पात्रता बनेगी।
साधनाओं में निमग्न होना भी अनिवार्य है।
साधना के प्रधान अंग परमार्थ को अपनाना पड़ेगा। परम स्वार्थ का स्वरूप आत्मनिर्माण है, जिसमें लोकमंगल के लिए सेवाधर्म अपनाना, अपनी परोपकार परायण सेवा प्रवृत्ति का परिचय देना निताँत आवश्यक है।
साधनारत गुरुदेव की आत्मा में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति में अवतरित हुआ। यह अद्भुत निर्देश था- अखण्ड ज्योति के दृश्य एवं अदृश्य इन दोनों रूपों से भिन्न एक तीसरे स्वरूप को प्रकाशित करना था। ऐसा स्वरूप जिसमें पहले के दोनों रूपों की आभा, ऊर्जा एवं प्रकाश समाया हो।
साधना के इसी काल में एक दैवी निर्देश का अवतरण हुआ। यह दिव्य निर्देश अखण्ड दीप की अखण्ड ज्योति के सान्निध्य में ध्यानस्थ, साधनारत गुरुदेव की आत्मा में प्रकाशित हो रही अखण्ड ज्योति में अवतरित हुआ। यह अद्भुत निर्देश था- अखण्ड ज्योति के दृश्य एवं अदृश्य इन दोनों रूपों से भिन्न एक तीसरे स्वरूप को प्रकाशित करना था। ऐसा स्वरूप जिसमें पहले के दोनों रूपों की आभा, ऊर्जा एवं प्रकाश समाया हो।
साधना में पायी। इसको स्वयं पढ़ने और अधिकाधिक लोगों को पढ़ाने से बड़ी न तो कोई जनसेवा है और न ही आध्यात्मिक साधना।
साधना में विघ्न डालने की आकाँक्षा से सब कुछ छोड़-छाड़ क्रोध में फुंफकारते दुर्वासा अवधूत वेश में चल पड़े थे। और उन्होंने महर्षि मुद्गल की कुटिया के द्वार पर क्रोधित स्वर में भोजन देने का आग्रह किया। उनकी सोच थी, कि अब तो सारे अतिथि जा चुके हैं और इसके पास अन्न होगा नहीं। ऐसे में यह मुझे कहाँ से भोजन करा पाएँगे। एक पल में धराशायी हो जाएगा दानी होने का ढोंग।
साधना ‘समय’ की तपशिला पर बैठकर ही संभव हुई है। उन्होंने जो सोचा, जो सृजा है उसके पीछे उनकी तन्मयता भरी साधना ही रही है। वैज्ञानिकों, आविष्कारों ने अपना मानस और समय प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केंद्रित किया होता तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती? लोकसेवियों ने अपना समयदान के सहारे एक-से-एक बड़े कार्य संपन्न कर दिखाए हैं।” इस समय का उपयोग ज्ञान के विस्तार में लगें, यहीं उनका जीवनभर लक्ष्य रहा।
साधना-विधान से अपरिचित रहने पर भी उसे इतना श्रेय क्यों मिला? हम लोग उस श्रेय-सम्मान से वंचित क्यों रहे?
साधना द्वारा संस्कारित उत्तराँचल की इस देवभूमि की अपनी विशिष्ट साँस्कृतिक पृष्ठभूमि रही है। गंगा की गोद व हिमालय की छाया में स्थित गायत्रीतीर्थ रूपी तपोभूमि समूचे विश्व के लिए दिव्य आलोक एवं प्रेरणा का केंद्र रही है। न केवल उत्तराँचल रूपी पर्वतीय प्राँत के ग्रामीण अंचल की सभी समस्याओं को वरन् सारे भारत व विश्व की आज की नैतिक मूल्यों के संकट से पैदा हुई परिस्थितियों को स्पर्श करते हुए इसके विविध कार्यक्रम राष्ट्र के साँस्कृतिक उत्थान, सामाजिक नवोन्मेष एवं आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
साधना प्रयोगों में अग्रसर करने के लिए। आप सब-हम सब रहें इसके लिए प्रतिमास साधनारत। यह साधना ही प्रतीक्षा होगी। और प्रतीक्षा ही पात्रता बनेगी।
साधना के अनुरूप होगी। उनके अनुभवों एवं संस्मरणों के प्रकाश में होगी। यह होगा दोनों महर्षियों का मिलन अपने शिष्यों के साथ, साधकों के साथ। अखण्ड ज्योति के पृष्ठो पर साथ-साथ प्रतिमास प्रकट होते रहेंगे, अपने अनुभवों को बाँटने और जिज्ञासाओं का समाधान करने। और साधकों को उनके साधना प्रयोगों में अग्रसर करने के लिए।
साधना ही प्रतीक्षा होगी। और प्रतीक्षा ही पात्रता बनेगी।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-November
साधना के शिखर पर आरुढ़ हो गया है। एक सन्त कवि ने इस तथ्य को एक पंक्ति में कहने की कोशिश की है- ‘श्री गुरुचरणों में नेह। साधन और सिद्धि है येह।’ अर्थात् गुरुचरणों में अनुराग साधना भी है और सिद्धि भी। साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो इसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होते हैं।
साधना मेरी जीवनचर्या का अनिवार्य और अविभाज्य अंग बन गयी।
साधना भी सिखाई थी। गुरुजी! हम स्वर्ण जयंती साधना वर्ष की साधना करते हैं और भजन भी पैंतालीस मिनट करते हैं। भजन तो करता है बेटा, पर तू एक बात तो बता तो बता कि उस कर्मकाँड के साथ-साथ जो विचार हैं, उनको भी करता है कि नहीं।
साधना कहिए, उसे तप कहिए, उसे भजन कहिए- इन सबका उद्देश्य भगवान का रिझाना नहीं है, भगवान की खुशामद करना नहीं है, भगवान को फुसलाना नहीं है, भगवान को बहकाना नहीं है। भगवान के आगे तरह-तरह के जाल बिछाना नहीं है। भगवान की उपासना का उद्देश्य एक तो यह है कि हम अपने आपको परिशोधित करते चले जाएँ। अपने आपका परिशोधन करते हुए चले जाएँगे, तो फिर देखेंगे कि क्या कमाल होता है। देखें क्या मजा आता है।
साधना है। संगठन भी इसी तरह खड़े खोते है। उनमें भी सब तरह की सतर्कता रखनी होती है एवं एक-एक पक्ष पर गहराई से चिंतन कर उसकी देखभाल करने वालों का एक तंत्र खड़ा किया जाता है। गायत्री परिवार ऐसा ही एक वटवृक्ष है, जो परमपूज्य गुरुदेव के तप एवं वंदनीया माताजी के सजल स्नेह भरे सिंचन से खड़ा हो आज करोड़ों के लिए मार्गदर्शन बना हुआ है।
साधना से मन की यह शक्ति अपने आप ही कुछ वर्षों में जाग जाती है। साथ ही इस शक्ति के जागरण में अवरोध उत्पन्न करने वाली शक्ति समूल नष्ट हो जाती है।
साधना जीवन में खरा प्रमाणित किया है। महान साधकों ने दुर्लभतम ब्रह्मतत्त्व का बोध इस महामन्त्र की साधना से पाया है। ऐसी सैकड़ों, हजारों और लाखों घटनाओं में हम यहाँ केवल एक घटना की चर्चा कर रहे हैं। इसकी चर्चा विश्वविख्यात महान् योगी स्वामी योगानन्द ने योगी कथामृत में भी की है।
साधना का संगी-साथी और सच्चा सहचर बन चुका है। साधक-समुदाय में अनेकों ऐसे हैं, जो प्रत्येक महीने प्रकाशित होने वाली इसकी हर कड़ी को दिन में कम से कम एक बार जरूर पढ़ते हैं। उस पर गहराई से चिन्तन, मनन एवं निदिध्यासन करते हैं। साथ ही भाव भरी प्रतीक्षा करते हैं अगले महीने प्रकाशित होने वाली कड़ी की। जिससे कि योग साधना एवं तत्त्वदर्शन के एक नए आयाम में प्रवेश हो सके।
साधना वर्ष से चलने लगा एवं गायत्री तीर्थ एक सिद्धपीठ एक कल्पवृक्ष बन गया। हिमालय की प्रतिमा बनी, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान बना एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय विनिर्मित होने लगा। यह तप आगे क्या खेल दिखाएगा, यह तो विधाता ही ज्ञान पर इसका महिमा अपरंपार है।
साधना निर्देशिका का ठीक से अध्ययन एवं सभी साधनाओं का एक बार अच्छी तरह अभ्यास भी कर लें। अन्यथा साक्षात्कार में अयोग्य पाए जाने पर सत्र लाभ से वंचित रहना पड़ सकता है।
साधना करते है, तो जो कर्म हम करते है- उनमें पूरी ईमानदारी बरतें। कर्मयोग का आदर्श किसी भी सार्वजनिक-राष्ट्रोत्थान को समर्पित संस्था का क्या होना चाहिए? इस पर पूज्यवर कहते थे, हमारा आदर्श लोकमान्य तिलक होना चाहिए, शहीद भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस होना चाहिए। जो इस तरह युगधर्म का पालन करता है, तो वह व्यापारी हो अथवा अधिकारी पूरी तरह साँख्या में प्रतिष्ठित हो अपने लक्ष्य की सिद्धि तक पहुँच जाता है। स्वार्थ और अहं को त्यागकर अपना सर्वस्व राष्ट्र व समाज के लिए निछावर करने वाला व्यक्ति महामानव पद पाता है।
साधना की किसी वास्तविक दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।
साधना से सिद्धि का यह दो नामों वाला एक ही मार्ग है। कोई भी किसी भी एक का अनुसरण कर ले, तो वह परम लक्ष्य का पा लेगा। वह द्रष्टा (यः पश्यति स पश्यति) बन जाएगा।
साधना एवं तत्त्वदर्शन के एक नए आयाम में प्रवेश हो सके। जीवन की अनूठी अन्तर्यात्रा में एक कदम और आगे बढ़ा जा सके। साधकों की इन भावनाओं से हम सुपरिचित हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से उनसे यह भाव-भरा अनुरोध है कि आप सब आगे भी अपने पत्रों के माध्यम से इसी तरह अपनी साधनात्मक प्रगति से हमें अवगत कराते रहें। पिछली कड़ी में आप सबने समाधिपाद के पाँचवे सूत्र पर निदिध्यासन किया था।
साधना कितनी बढ़ाई। तप से अर्थ है- ब्राह्मणोचित जीवन एवं बचत का सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में नियोजन। परमपूज्य गुरुदेव का सूत्र है- सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपना समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे। विभूतियों में समय व धन के अलावा प्रभाव-ज्ञान-पुरुषार्थ भी है। हमें इनके सुनियोजन का एक तंत्र खड़ा करना है।
साधना को सफल बनाया है।
साधनामय जीवन की सृष्टि की जा सकती है।
साधना में प्रवीण-पारगत होकर यहाँ से गए है। तप यहाँ के कण-कण में संव्याप्त है। प्रतिदिन चौबीस लख का गायत्री जप यहाँ संपन्न होता है, साथ ही यज्ञाग्नि से निकलते धूम्र से सारा वातावरण सुवासित रहता है। युगऋषि की जीवन यात्रा के अंतिम बीस वर्ष (क्क्स्त्रक् से क्क्क्) यहीं बीते है। हमारी मातृसत्ता-शक्तिस्वरूपा माता भगवती देवी शर्मा ने क्क्स्त्रक् से क्क्क्ब् तक के चौबीस वर्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण समय यही तप में नियोजित किया एवं इस अवधि में यहाँ की सभी गतिविधियाँ का संचालन भी किया।
साधना को स्पष्ट किया जाएगा। तब तक साधकगण इन पाँचों वृत्तियों के सामान्य परिचय के सत्य को अपनी अंतर्चेतना में आत्मसात करें।
साधना का साक्षी रहा वह केंद्र है, जो आज भी मथुरा जाने वालों को दर्शन करने पर सतत उस सूक्ष्मसत्ता से साक्षात्कार कराता रहता है गुरुसत्ता के ज्ञानशरीर के रूप में सत्तर खंडों में प्रकाशित वाङ्मय है, जो उनके द्वारा लिखा गया जीवनभर का पुरुषार्थ है। हर समस्या का समाधान है एक संजीवनी है। गायत्री तपोभूमि 1951 से 11971 तक बीस वर्ष की अवधि, में गुरुसत्ता द्वारा जिए गए तपस्वी जीवन की साक्षी है। जो संघर्ष आचार्य श्री ने गायत्री महाशक्ति को स्थापित करने के लिए किया, वह उन दिनों की परिस्थितियों को देखते हुए एक मानवीय स्तर पर असंभव है, माने ज्ञाने योग्य कहा जाएगा, परंतु उनने किया एवं वह भी तप की शक्ति के बलबूते किया। आहार का संयम, इंद्रियों का संयम विचारों का संयम और समय का संयम।
साधना करते हैं और भजन भी पैंतालीस मिनट करते हैं। भजन तो करता है बेटा, पर तू एक बात तो बता तो बता कि उस कर्मकाँड के साथ-साथ जो विचार हैं, उनको भी करता है कि नहीं।
साधना-संगठन-सशक्तीकरण वर्ष में विशिष्टों को उभारने की वेला आई है। अपनी जीवन-साधना को और प्रभावी बनाकर नवसृजन के लिए उपयुक्त व्यक्तियों के निर्माण की अवधि है यह। साधना तंत्र के विस्तार के लिए गायत्री महामंत्र लेखन अभियान को गति दी गई है, तो साथ ही गायत्री साधना को सभी भाषा-भाषियों में पहुँचाने व साधना की गहराई बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना है।
साधना तंत्र के विस्तार के लिए गायत्री महामंत्र लेखन अभियान को गति दी गई है, तो साथ ही गायत्री साधना को सभी भाषा-भाषियों में पहुँचाने व साधना की गहराई बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना है।
साधना करके साधक का अध्यात्म राज्य में प्रवेश सुनिश्चित है। पर ध्यान रहे गुरुगीता के इन महामन्त्रों की साधना करने का मतलब कतिपय क्रियाओं अथवा कर्मकाण्डों को कर लेना भर नहीं है। इनकी साधना करने का अर्थ है उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछली कड़ी में गुरुभक्त साधकों ने गुरुतत्त्व के बारे में पढ़ा था। परम गुरु भगवान् सदाशिव के उन वचनों को आत्मसात् किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुरुतत्त्व ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है।
साधना की बात मुक्त कण्ठ से स्वीकारते हैं। पौराणिक कथाओं के अनेकानेक प्रसंग भी इस सत्य की साक्षी देते हैं। तपश्चेतना एवं धर्म भावना की अदृश्य तरंगों से किस तरह यहाँ का दृश्य जीवन हिलोरे लेता रहता है, इसे केवल अनुभूति से जाना जा सकता है। इस सुयोग, सौभाग्य से लाभान्वित होने वाले लोकसेवी एवं धर्मप्राण विद्यार्थी भी स्वाभाविक रूप से आ जुटे हैं। इन सभी विद्यार्थियों की एक ही आशा और एक ही अरमान है कि वे अपने जीवन में धर्म के मर्म को साकार कर लें और दूसरों को उसका सुगम बोध करा सकें।
साधनाओं का एक बार अच्छी तरह अभ्यास भी कर लें। अन्यथा साक्षात्कार में अयोग्य पाए जाने पर सत्र लाभ से वंचित रहना पड़ सकता है।
साधना से सिद्धि की जो बात बताई गई है, वह करना हो तो आपको पहला काम क्या करना पड़ेगा? आपको सबसे पहले अपने काम में मन लगाना पड़ेगा। कोई भी काम हो, जिसमें भजन भी शामिल है, मन लगाकर करना पड़ेगा। भजन के साथ में मन लगाना चाहिए। मन लगाने से क्या मतलब है?
साधना को जीवन में उतार सकते है। सभी साधकों का अपनी-अपनी टोली के साथ संस्था प्रमुख के साथ फोटोसेशन भी होता है। अंतिम दिन एक सुँदर प्रमाण पत्र दिया जाता है। पूर्व अनुमति लेकर आने वाले स्वस्थ साधकों के लिए ये सत्र वर्षभर खुले है।
साधना संबंधी गुह्य विवेचनाओं में एवं सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘एक योगी की आत्मकथा’ (एन ऑटोबायोग्राफी ऑफ योगी- स्वा. योगानंद परमहंस) में पढ़ने को मिलते है। रानीखेत (उत्तराँचल) के आगे दुर्गम हिमालय के ऊपरी क्षेत्र में वे मात्र संकल्प से सूक्ष्मशरीर से पहुँच जाते थे एवं ढेरों व्यक्तियों को उनने योग के मार्ग पर प्रशस्त किया था। उनने कर्म को कौशलपूर्वक संपन्न कर अपने अंदर वह शक्ति जाग्रत् कर ली, जो किसी को सब कुछ छोड़कर मिलती है। परमपूज्य गुरुदेव लिखते है कि मनः स्थिति योगी की होनी चाहिए, बहिरंग कैसा भी हो, अंतरंग परिष्कृत होना चाहिए।
साधना ऐसे जीवंत होगी
साधना व नैतिक अनुशासनों के विधेयात्मक प्रगतिशील पक्षों का प्रतिपादन किया जा सकेगा। इसमें भागीदार होने वाले शोधछात्र अपने में शोध के अनुरूप प्रायोगिक प्रतिफल उत्पन्न करने का विश्वास और कौशल भी विकसित करने में समर्थ हो सकेंगे। धर्म विज्ञान केन्द्र में इन दिनों तैयार की जा रही शोध योजनाओं में धर्म के अत्यन्त गूढ़ तत्त्वों की रहस्यमयता की वैज्ञानिकता को प्रकट करने का प्रयास किया जा रहा है।
साधना से अपने अतीत को अपने विगत जन्मों को जानकर एक नए साधनामय जीवन की सृष्टि की जा सकती है।
साधना करने का अर्थ है उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछली कड़ी में गुरुभक्त साधकों ने गुरुतत्त्व के बारे में पढ़ा था। परम गुरु भगवान् सदाशिव के उन वचनों को आत्मसात् किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुरुतत्त्व ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है। इसके अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ अपना अर्थ खो देते हैं। यही नहीं अपनी प्रबुद्ध आत्मा और सद्गुरु भिन्न नहीं है।
साधनाएँ अतिफलदायिनी है, पर साधक की मनःस्थिति-स्वास्थ्य-पूर्व के सत्रों का विवरण जानकर ही उन्हें अनुमति दी जाती है। ये सभी आम व्यक्तियों के लिए नहीं है। अंतिम दिन निर्देशों के अनुसार लिए संकल्पों को संस्था प्रमुख के सम्मुख प्रस्तुत कर गायत्री मंत्र उच्चारण के साथ मौन तोड़ा जाता है व 11 बजे से पूर्व अपना कक्ष खाली कर देना होता है।
साधना संकाय के अंतर्गत ‘धर्म विज्ञान केन्द्र’ की विधिवत स्थापना हो गयी। इस धर्म विज्ञान केन्द्र या सेण्टर ऑफ थियोलॉजी का उद्देश्य धर्म के मर्म को बताने वाले विभिन्न तत्त्वों, सत्यों, सूत्रों एवं व्यावहारिक क्रियाओं की गहन शोध एवं व्यापक शिक्षण व प्रसार है। आज के दौर में यह विचित्र एवं आश्चर्यपूर्ण विडम्बना है कि भ्रान्तियों से मुक्ति दिलाने वाला धर्म स्वयं ही भ्रान्तियों के महाघटाटोप से बुरी तरह से घिर गया है। धार्मिक संवेदना साम्प्रदायिक कट्टरता के विष दंशों से छटपटाती हुई मूर्छित प्राय है। धर्म के नाम पर केवल कुछ रीति रिवाजों, रूढ़ियों, मान्यताओं एवं परम्पराओं को निभाने का प्रचलन है।
साधना सद्ज्ञान विस्तार रही ऐसे वेदमूर्ति हमारे गुरुदेव हैं। उनके द्वारा लिखा ज्ञान तीन हजार से भी अधिक पुस्तक पुस्तिकाओं द्वारा जन जन तक पहुँचा व चूँकि वह उनके आचरण में उतरकर करोड़ों को प्रभावित करता चला गया इसलिए वे आचार्य कहलाए। गीताकार ने ज्ञान को पवित्रतम बनाया है वे कहा है कि मनुष्य के लिए यही सबसे दुर्लभ विभूति है ज्ञान श्रद्धावान, संयमी और कर्मठ हर क्षण लोकसेवा हेतु तत्पर साधक को ही मिलता है, इसलिए वेदमूर्ति उपाधि हर दृष्टि से हमारे इष्ट आराध्य के लिए उपयुक्त बैठती है व हम सबको उसी मार्ग पर चलकर उनका अंग अवयव बनने हेतु प्रेरित करती है।
साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो इसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होते हैं। हममें से अनेक गुरुपद अनुरागी यह जानना चाहेंगे की इस साधना की शुरुआत कैसे करें? तो इसका सरल उत्तर है कि गुरुचरणों के भाव भरे ध्यान से। भाव भरे ध्यान का मतलब इस अटल विश्वास से है कि सद्गुरु का स्थूल रूप ही और कुछ नहीं परब्रह्म का ही घनीभूत प्राकट्य है।
साधना सत्रों में बताई गई है। प्रतिदिन प्रज्ञायोग प्रातःकाल संपन्न कराया जाता है, जो युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव द्वारा प्रणीत सूर्य नमस्कार एवं विभिन्न आसनों का सम्मिश्रण है। एक बार सीख लेने पर यह पंद्रह मिनट की प्रक्रिया शरीर को सतत स्वस्थ एवं मन को प्रसन्न बनाए रखती है। ढपली वादन की सामूहिक संगीत की कक्षाएँ भी इनमें ली जाती है। बौद्धिक उद्बोधन प्रतिदिन चलते है।
साधनाएँ करनी पड़ी, उसे इसने कर्मयोग करते-करते धोती-कुरता पहने ही प्राप्त कर लिया है। इसने कर्मयोग से ही उस कौशल की, सर्वोच्च पद की सिद्धि हासिल कर ली, जिसके लिए संन्यासी वर्षों तप करते रहते है। कठोर तप-तितिक्षा के मार्ग से गुजरते है।” यह उदाहरण बताता है कि साधना से सिद्धि का यह दो नामों वाला एक ही मार्ग है। कोई भी किसी भी एक का अनुसरण कर ले, तो वह परम लक्ष्य का पा लेगा।
साधना का चमत्कार आपको देखने का मन हो और साधना से सिद्धि की जो बात बताई गई है, वह करना हो तो आपको पहला काम क्या करना पड़ेगा? आपको सबसे पहले अपने काम में मन लगाना पड़ेगा। कोई भी काम हो, जिसमें भजन भी शामिल है, मन लगाकर करना पड़ेगा। भजन के साथ में मन लगाना चाहिए। मन लगाने से क्या मतलब है?
साधनात्मक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अनुसंधान।
साधना के महातपस्वी थे। जो राष्ट्रीय सवालों पर अपने-अपने नजरिए से गम्भीरतापूर्ण विचार करते थे। संसद को वे गहन राष्ट्रीय चर्चा का मंच समझते थे। संसद उनके लिए राष्ट्र देवता का मन्दिर था। साथ ही वे अपनी विधायी भूमिका के लिए सम्पूर्ण रूप से सचेत थे।
साधना का रूप दिया जा सकता है। भगवान् बुद्ध ने इसीलिए ध्यान को ‘सम्यक् स्मृति’ भी कहा है। इस साधना से अपने अतीत को अपने विगत जन्मों को जानकर एक नए साधनामय जीवन की सृष्टि की जा सकती है।
साधना कर रही होगी। संकल्प पत्र इस अवसर पर अपने नाम, उम्र, पद, पते, मिशन की पृष्ठभूमि के साथ क्षेत्रीय स्तर पर एवं केंद्रीय स्तर पर अपनी शक्ति के नियोजन का भरा जाना है। भरकर इनकी दो प्रतियाँ बनाई जाएँ। एक गायत्री तपोभूमि मथुरा एवं एक शाँतिकुँज हरिद्वार भेजे। शपथ का अनुयाज ही, जो शरद पूर्णिमा से गायत्री जयंती 23 तक चलेगा, नैष्ठिक रूप से संपन्न होकर वेदमूर्ति की स्थापना की स्वर्णजयंती की सार्थकता प्रमाणित करेगा।
साधना की धुरी पर संगठन बनाने का शिक्षण’ शीर्षक से इस धारावाहिक शृंखला की पिछली कड़ी (अक्टूबर-2002) में परमपूज्य गुरुदेव के परमवंदनीया माताजी को लिखे पत्रों के माध्यम से कई ऐसे तथ्य प्रस्तुत किए गए थे, जो अभी तक आम कार्यकर्त्ताओं, परिजनों-पाठकों की जानकारी में नहीं रहे है। उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए गुरुसत्ता की प्रव्रज्या अवधि में लिखे पत्रों से कुछ और सीखने का प्रयास करते है। ये पत्र वस्तुतः हम सभी के लिए वे मार्गदर्शक सूत्र प्रदान करते है, जिनसे किसी संगठन को सुव्यवस्थित ढंग से खड़ा किया जाता है। बीज बोने के बाद पानी दिया जाता है, अंकुरित होने की प्रतीक्षा की जाती है, निराई-गुड़ाई से खरपतवार निकाले जाते है एवं फिर उस पौधे की चारों ओर से सुरक्षा कर दी जाती है। निरंतर पानी देने, खाद की व्यवस्था का तंत्र बना दिया जाता है।
साधना ही वह उपाय है, जिससे कि स्मृति को योग साधना का रूप दिया जा सकता है। भगवान् बुद्ध ने इसीलिए ध्यान को ‘सम्यक् स्मृति’ भी कहा है। इस साधना से अपने अतीत को अपने विगत जन्मों को जानकर एक नए साधनामय जीवन की सृष्टि की जा सकती है।
साधना को लोगों ने जादू मान लिया। अध्यात्म को मनोकामना पूरा करने का जादू मान लिया। यह जादू नहीं है, यह जीवन जीने की कला है। जीवन का संशोधित करने की विधि है। आपका जीवन इतना बड़ा जीवन है कि इस पर हम देवताओं को निछावर करते है, भगवान को हम इस पर निछावर कर सकते है।
साधना सत्र-
साधना से पाया है। ऐसी सैकड़ों, हजारों और लाखों घटनाओं में हम यहाँ केवल एक घटना की चर्चा कर रहे हैं। इसकी चर्चा विश्वविख्यात महान् योगी स्वामी योगानन्द ने योगी कथामृत में भी की है।
साधना को अपने में समेट लेने वाले धर्मविज्ञान केन्द्र के उद्देश्यों का बिन्दुवार स्पष्टीकरण कुछ इस तरह से किया जा सकता है-
साधना वर्ष की साधना करते हैं और भजन भी पैंतालीस मिनट करते हैं। भजन तो करता है बेटा, पर तू एक बात तो बता तो बता कि उस कर्मकाँड के साथ-साथ जो विचार हैं, उनको भी करता है कि नहीं।
साधनामय जीवन के लिए मन की ये पाँचों वृत्तियाँ महत्त्वपूर्ण है। महर्षि पतंजलि ने अपने इस छठे सूत्र में केवल इनके नाम भर बताए हैं। इसमें प्रत्येक का समग्र परिचय उन्होंने समाधिपाद के अगले सूत्रों में दिया है। इस क्रम में उन्होंने प्रत्येक वृत्ति के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए एक-एक सूत्र की रचना की है। इन सूत्रों की व्याख्या से ही उन रहस्यों का उद्घाटन हो सकेगा, जो साधकों की अन्तर्यात्रा के लिए अनिवार्य है।
साधना प्रणालियों एवं नैतिक अनुशासनों की उपयोगिता पर किया जाएगा। इस क्रम में मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से साधना व नैतिक अनुशासनों के विधेयात्मक प्रगतिशील पक्षों का प्रतिपादन किया जा सकेगा। इसमें भागीदार होने वाले शोधछात्र अपने में शोध के अनुरूप प्रायोगिक प्रतिफल उत्पन्न करने का विश्वास और कौशल भी विकसित करने में समर्थ हो सकेंगे। धर्म विज्ञान केन्द्र में इन दिनों तैयार की जा रही शोध योजनाओं में धर्म के अत्यन्त गूढ़ तत्त्वों की रहस्यमयता की वैज्ञानिकता को प्रकट करने का प्रयास किया जा रहा है।
साधना बनकर समूह में सक्रिय हो जाती है, तो संगठन का सशक्त आधार खड़ा होने लगता है। अब एक देव परिवार के सृजनशील संगठन के रूप में खड़े होने की वेला में और अधिक पुरुषार्थ की आवश्यकता है, ताकि न केवल जड़े मजबूत हो, पूरा तंत्र सशक्त व प्रामाणिक बने। इसीलिए व्यक्तित्वों की पहचान, उन विभूतियों का सार्थक सुनियोजन, इस पर अधिक जोर इस शपथ समारोह में दिया जाना चाहिए।
साधना संकाय में एक विशिष्ट प्रशिक्षण देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में आरंभ हो चुका है। अब यहाँ धर्मशास्त्र की सभी विधाओं का, पौरोहित्य-ज्योतिर्विज्ञान का भी शिक्षणक्रम चलेगा। इसके साथ ही बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट, अर्थ समिति एवं बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग भी सितंबर माह में सम्पन्न हो गई। प्रगति संतोषजनक है। छात्र-छात्राएँ, शिक्षक व सारे सदस्य कार्य करने में एक विलक्षण आनंद की अनुभूति करते है।
साधना द्वारा देवमानवों के निर्माण संबंधी गुरुवर की व्यग्रता उनके क्षेत्र से भेजे पात्रों द्वारा हम पिछली कड़ी में जान चुके है। यहाँ अहमदाबाद से 25-11-71 का लिखा एक पत्र प्रस्तुत है, जिसमें पूज्यवर ने ‘ध्यान-धारणा’ के विषय में लिखा है। क्षेत्र में परिभ्रमण करते हुए भी उनका ध्यान सतत अपनी आगे की रणनीति को बनाने व शिविरों की क्वालिटी सुधारने की ओर रहता था। पत्र पढ़े।
साधनात्मक वातावरण बनाने व पूरे क्षेत्र को अनुप्राणित करने, सहयोग जुटाने व सामान्य प्रशिक्षण चलाने में सक्षम होंगे। इस डिप्लोमा पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु योग्यता स्नातक स्तर है। पी.जी. डिप्लोमा के अलावा पोस्ट ग्रेजुएट स्तर का एक और पाठ्यक्रम धर्म विज्ञान केन्द्र के अगले सत्र में शुरू किए जाने की सम्भावना है। इस पाठ्यक्रम के द्वारा छात्र-छात्राएँ धर्म विज्ञान में विशेषज्ञ स्तर की निपुणता अर्जित कर सकेंगे। इसके माध्यम से उन्हें भारतीय संस्कृति के अंतर्गत आने वाली विभिन्न परम्परागत साधना विधियों का सम्यक् बोध कराया जाएगा।
साधना के प्रति आस्थावान बनाने की क्षमता विकसित की जा सकेगी। वे स्वयं भी उपासना, साधना व आराधना के क्षेत्र में अच्छी प्रगति कर सकेंगे। और उनमें साधकों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं के समाधान की सम्यक् सामर्थ्य का विकास हो सकेगा।
साधनाएँ ऑडियो सिस्टम से निर्देशानुसार कराई जाती है। निताँत मौन रहकर की जाने वाले ये साधनाएँ अतिफलदायिनी है, पर साधक की मनःस्थिति-स्वास्थ्य-पूर्व के सत्रों का विवरण जानकर ही उन्हें अनुमति दी जाती है। ये सभी आम व्यक्तियों के लिए नहीं है। अंतिम दिन निर्देशों के अनुसार लिए संकल्पों को संस्था प्रमुख के सम्मुख प्रस्तुत कर गायत्री मंत्र उच्चारण के साथ मौन तोड़ा जाता है व 11 बजे से पूर्व अपना कक्ष खाली कर देना होता है।
साधना में रुचि रखकर पूर्व अनुमति लेकर आने वाले हर साधक के लिए खुले है। न्यूनतम दो से तीन माह पूर्व शिविर विभाग, शाँतिकुँज हरिद्वार को अपना प्रतिवेदन भेज देना चाहिए। अनुमति आने पर ही आरक्षण कराना चाहिए।
साधना करने का मतलब कतिपय क्रियाओं अथवा कर्मकाण्डों को कर लेना भर नहीं है। इनकी साधना करने का अर्थ है उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछली कड़ी में गुरुभक्त साधकों ने गुरुतत्त्व के बारे में पढ़ा था। परम गुरु भगवान् सदाशिव के उन वचनों को आत्मसात् किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुरुतत्त्व ही साधक के जीवन का सार सर्वस्व है। इसके अभाव में यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ अपना अर्थ खो देते हैं।
साधना की शुरुआत कैसे करें? तो इसका सरल उत्तर है कि गुरुचरणों के भाव भरे ध्यान से। भाव भरे ध्यान का मतलब इस अटल विश्वास से है कि सद्गुरु का स्थूल रूप ही और कुछ नहीं परब्रह्म का ही घनीभूत प्राकट्य है।
साधनात्मक प्रगति से हमें अवगत कराते रहें। पिछली कड़ी में आप सबने समाधिपाद के पाँचवे सूत्र पर निदिध्यासन किया था। यह जाना था कि मन की पाँचों वृत्तियाँ किस तरह से क्लेश और अक्लेश का स्रोत बन जाती हैं।
साधना? नहीं बेटे, कुछ नहीं हुआ। यह तो केवल शारीरिक क्रिया हुई है। शरीर की क्रियाओं का जो फल मिलना चाहिए बस वही मिलता है। इससे ज्यादा कुछ और फल नहीं मिल सकता।
साधना भी है और सिद्धि भी। साधना के रूप में इसका प्रारम्भ होता है, तो इसके तात्त्विक स्वरूप के दर्शन में इसकी सिद्धि की चरम परिणति होते हैं। हममें से अनेक गुरुपद अनुरागी यह जानना चाहेंगे की इस साधना की शुरुआत कैसे करें? तो इसका सरल उत्तर है कि गुरुचरणों के भाव भरे ध्यान से। भाव भरे ध्यान का मतलब इस अटल विश्वास से है कि सद्गुरु का स्थूल रूप ही और कुछ नहीं परब्रह्म का ही घनीभूत प्राकट्य है।
साधना करने के बावजूद भी मैं ब्रह्मतत्त्व से एकाकार नहीं हो सका। इस बारे में किए गए मेरे सारे प्रयास पुरुषार्थ, निष्फल गए। तभी मुझे ध्यान आया कि साधक के लिए सद्गुरु चरणों की कृपा ही परमपूर्णता का परिचय पर्याय बनती है। यही सोचकर एक दिन सायंकाल मैंने लाहिड़ी महाशय के चरणों का आश्रय ग्रहण किया। उनके आशीष की आकाँक्षा के साथ मेरी प्रार्थना चलती रही, ‘गुरुदेव, मेरी ईश्वर में समा जाने की आकाँक्षा इतनी तीव्र वेदना का रूप धारण कर चुकी है कि उस परम प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन किए बिना मैं अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकता।
साधना विधियों का सम्यक् बोध कराया जाएगा। साथ ही उनमें विश्व के किसी भी क्षेत्र या धर्म, सम्प्रदाय के प्रति निष्ठ रखने वाले प्रबुद्ध जनों को जीवन साधना के प्रति आस्थावान बनाने की क्षमता विकसित की जा सकेगी। वे स्वयं भी उपासना, साधना व आराधना के क्षेत्र में अच्छी प्रगति कर सकेंगे। और उनमें साधकों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं के समाधान की सम्यक् सामर्थ्य का विकास हो सकेगा।
साधना के बाद एक माह और सघन प्रशिक्षण दिया जाता है। ये दो मास के होते है, जो प्रतिमास की एक तारीख को आरंभ होकर दूसरे माह की 21 तारीख का समाप्त होते है। प्रशिक्षित साधक समयदानियों को विशेष जिम्मेदारी देकर प्रज्ञापीठों-शक्तिपीठों एवं जाग्रत् केंद्रों में कार्य करने हेतु तीन से छह माह के लिए भेजा जाता है। अब इन्हीं सत्रों का और भी वरिष्ठ स्तर का प्रशिक्षण धर्म विज्ञान केंद्र देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में आरंभ हो गया है, जिसमें त्रैमासिक डिप्लोमा का शिक्षण भी दिया जाएगा व विश्वविद्यालय का प्रमाणपत्र भी उन्हें मिलेगा। सभी धर्मों की मूल विधाओं में प्रवीण-पारंगत होकर ये साधक कहीं भी देवालय प्रबंधक की भूमिका निभा सकेंगे।
साधना व आराधना के क्षेत्र में अच्छी प्रगति कर सकेंगे। और उनमें साधकों की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं के समाधान की सम्यक् सामर्थ्य का विकास हो सकेगा।
साधना जीवन के महासूत्र हैं। इन्हें अपनाकर, इनकी साधना करके साधक का अध्यात्म राज्य में प्रवेश सुनिश्चित है। पर ध्यान रहे गुरुगीता के इन महामन्त्रों की साधना करने का मतलब कतिपय क्रियाओं अथवा कर्मकाण्डों को कर लेना भर नहीं है। इनकी साधना करने का अर्थ है उस भावदशा में अपनी सम्पूर्णता एवं समग्रता से जीना, जिसका कि ये महामन्त्र बोध कराते हैं। पिछली कड़ी में गुरुभक्त साधकों ने गुरुतत्त्व के बारे में पढ़ा था।
साधना करने वालों के लिए निर्धारित किए गए है। कुछ आवश्यकता हो तो घंटी बजा देने पर सहायक आ जाते हैं व स्लिप में लिखे निर्देशानुसार व्यवस्था कर देते है। दिनभर में दस प्रकार की साधनाएँ ऑडियो सिस्टम से निर्देशानुसार कराई जाती है। निताँत मौन रहकर की जाने वाले ये साधनाएँ अतिफलदायिनी है, पर साधक की मनःस्थिति-स्वास्थ्य-पूर्व के सत्रों का विवरण जानकर ही उन्हें अनुमति दी जाती है। ये सभी आम व्यक्तियों के लिए नहीं है।
साधना के परिणामों का विश्लेषण किया जाता है। परामर्श के आधार पर परिजन स्वास्थ्य संवर्द्धन हेतु वनौषधि सेवन व बताई साधना को जीवन में उतार सकते है। सभी साधकों का अपनी-अपनी टोली के साथ संस्था प्रमुख के साथ फोटोसेशन भी होता है। अंतिम दिन एक सुँदर प्रमाण पत्र दिया जाता है। पूर्व अनुमति लेकर आने वाले स्वस्थ साधकों के लिए ये सत्र वर्षभर खुले है।
साधना जन्म लेती है। पर हममें से प्रायः किसी के जीवन में ऐसा हो नहीं पाता। हमारा अपना जीवन तो बस स्मृतियों का एक बड़ा गोदाम भर है। जिसमें अगणित स्मृतियाँ यूँ ही बेतरतीब पड़ी हुई हैं। कौन स्मृति कहाँ किस स्मृति में जा मिली है।
साधना की गहराई बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना है।
साधना एवं आराधना जैसे जीवन सूत्रों पर आस्था। उन्हें जीवन में अपनाते हुए सीखने, सिखाने की प्रारम्भिक दक्षता।
साधना जब जीवनसाधना बनकर समूह में सक्रिय हो जाती है, तो संगठन का सशक्त आधार खड़ा होने लगता है। अब एक देव परिवार के सृजनशील संगठन के रूप में खड़े होने की वेला में और अधिक पुरुषार्थ की आवश्यकता है, ताकि न केवल जड़े मजबूत हो, पूरा तंत्र सशक्त व प्रामाणिक बने। इसीलिए व्यक्तित्वों की पहचान, उन विभूतियों का सार्थक सुनियोजन, इस पर अधिक जोर इस शपथ समारोह में दिया जाना चाहिए।
साधना को और प्रभावी बनाकर नवसृजन के लिए उपयुक्त व्यक्तियों के निर्माण की अवधि है यह। साधना तंत्र के विस्तार के लिए गायत्री महामंत्र लेखन अभियान को गति दी गई है, तो साथ ही गायत्री साधना को सभी भाषा-भाषियों में पहुँचाने व साधना की गहराई बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना है।
साधना को सभी भाषा-भाषियों में पहुँचाने व साधना की गहराई बढ़ाने पर भी जोर दिया जाना है।
साधनात्मक अनुभूति संजोयी है। सद्गुरु के चरणों का प्रभाव एवं प्रताप ही ऐसा है। इसकी महिमा कथा का और अधिक विस्तार गुरुगीता की अगली कड़ी की विषयवस्तु बनेगी। इसकी प्रतीक्षा करते हुए साधकगण गुरुचरणों का ध्यान करें।
साधना जीवंत हो जाएगी। प्रत्येक क्रिया के साथ हम पाँच उपासनाएँ बताते है। पाँच उपासनाओं का मोटा-मोटा स्वरूप हमने पत्रिकाओं में भी छापा दिया था और पिछले साल भी हमने स्वर्ण जयंती साधना भी सिखाई थी। गुरुजी! हम स्वर्ण जयंती साधना वर्ष की साधना करते हैं और भजन भी पैंतालीस मिनट करते हैं। भजन तो करता है बेटा, पर तू एक बात तो बता तो बता कि उस कर्मकाँड के साथ-साथ जो विचार हैं, उनको भी करता है कि नहीं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 2002-September
साधना के क्षणों में अपने मार्गदर्शक का कुछ ऐसा ही सन्देश मिला है। इस सन्देश के अनुरूप हमें ऐसा केन्द्र स्थापित करना है, जहाँ देश के विभिन्न भागों से अनेकों साधक आकर सच्ची अध्यात्म साधना कर सकें। उन्हें आध्यात्मिक तत्त्वदर्शन की वास्तविक अनुभूति हो सके। साथ ही उस महत् कार्य का प्रारम्भ हो सके, जिसके लिए हम लोगों को भगवान् ने धरती पर भेजा है।
साधना के लिए अभी भी बैठती थीं। परन्तु प्रायः किसी विशेष साधना के लिए नहीं, बल्कि उनके साधनात्मक कार्यों में सहभागी बनने के लिए। ऐसे कार्यों में शिष्यों-भक्तों की पीड़ा और उन पर आए संकटों का निवारण प्रमुख था। इसके लिए वे दोनों ही शिष्यों के पास पहुँच कर उन्हें आश्वासन देते, उनको ढाढ़स बंधाते और अपनी योगशक्ति से उनके कष्टों का पल में निवारण कर देते। सन्तानों की छटपटाती अन्तर्चेतना अपनी महायोगिनी माँ की कृपा को पाकर अपूर्व शान्ति अनुभव करती।
साधना को और अधिक तीव्र करने का निश्चय किया।
साधना बस यही उनकी दिनचर्या के अनिवार्य तत्त्व थे। घर में सबसे छोटी होते हुए भी वह परिवार के अन्य सभी सदस्यों की देख-भाल किया करती थी। किसको, कब, क्या और कितनी जरूरत है, इस बात का उन्हें हमेशा ध्यान रहता।
साधना की किसी किताब में नहीं है। लेकिन इस तरह से किए जाने वाले शक्ति अर्जन की सार्थकता तभी है, जब उसके अवतरण के लिए उचित आधारभूमि हो। इस आधारभूमि का निर्माण इन लड़कियों द्वारा मेरी देख-रेख में किए जाते गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला से हो रहा है, तुझे समझ में ये सब बातें कितनी आएँगी, पता नहीं। पर इतना जान ले कि यहाँ इन दिनों अद्भुत हो रहा है। इस पवित्र भूमि की पात्रता का विस्तार करके इसे आध्यात्मिक ऊर्जा का भण्डारगृह बनाया जा रहा है।
साधना के अलावा अपने परिजनों के पत्रों के उत्तर देना, अखण्ड ज्योति पत्रिका के सम्पादन की व्यवस्था करना, सभी के भोजन का समुचित रूप से इन्तजाम करना शामिल था। इन सभी कामों के साथ वे अपने साथ रहने वाली बालिकाओं के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था भी जुटाती थी, जिससे कि उनको अपने घर का अथवा माता-पिता का अभाव न खले। इस व्यवस्था में उन्हें कुछ-कुछ नयी विशेष चीजें अपने हाथों से बनाकर खिलाना आदि शामिल था। इन सब दैनिक कार्यों में माताजी पर्याप्त व्यस्त रहती थीं। उनकी इस व्यस्तता को देखकर आस-पास रहने वाले यह समझ ही न पाते थे कि वे साधना कब करती हैं?
साधना दीप प्रज्वलित किया था। हालाँकि यहाँ उनका साधना काल बहुत ही थोड़े समय के लिए रहा। अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की वजह से परम पूज्य गुरुदेव का मथुरा रहना अनिवार्य था। पहले कुछ अंकों के आगरा से प्रकाशित होने के बाद अब अखण्ड ज्योति मथुरा से प्रकाशित होने लगी थी। साधकों जिज्ञासुओं और आगन्तुकों का आवागमन भी बढ़ने लगा था।
साधना की इस अवधि में प्रत्येक साधक को गुरुदेव के संग-सुपास व चर्चा-परामर्श का भरपूर मौका मिलता था। इस साधना में साधकों को भोजन व औषधि कल्क के माध्यम से माताजी की प्राण-सुधा पीने को मिलती थी। वे अपने बच्चों को इन्हीं माध्यमों से अपने तप का महत्त्वपूर्ण अंश देकर अनुग्रहीत करती थीं।
साधना सत्र थे। इनमें देश भर के परिजनों ने भाग लिया। और अपने प्राणों के प्रत्यावर्तन की अनुभूति प्राप्त की। इन परिजनों में से अनेक आज शान्तिकुञ्ज और ब्रह्मवर्चस में वरिष्ठ कार्यकर्त्ता हैं। जो शान्तिकुञ्ज आकर नहीं भी रह सके, वे भी अपने-अपने क्षेत्र में जी-जान से मिशन की गतिविधियों में जुटे हैं।
साधना ही जीवन को संस्कारित एवं परिष्कृत करती है। इसी से जीवन समर्थ एवं शक्तिवान बनता है। इस सम्बन्ध में उन्होंने समय-समय पर कुछ विशेष बातें भी बतायी। उन्होंने कहा कि काल प्रवाह में सामान्य एवं असामान्य क्षण प्रवाहित होते रहते हैं। सामान्य क्षणों में मानव मातृतत्त्व की अभीप्सा करता है।
साधनाओं का उद्देश्य साधकों के प्राणों को उच्चस्तरीय आध्यात्मिक तत्त्वों के लिए ग्रहणशील बनाना था, ताकि वे गुरुदेव के महाप्राणों के किसी लघु अंश को ग्रहण व धारण करने में समर्थ हो सकें। साधना की इस अवधि में प्रत्येक साधक को गुरुदेव के संग-सुपास व चर्चा-परामर्श का भरपूर मौका मिलता था। इस साधना में साधकों को भोजन व औषधि कल्क के माध्यम से माताजी की प्राण-सुधा पीने को मिलती थी। वे अपने बच्चों को इन्हीं माध्यमों से अपने तप का महत्त्वपूर्ण अंश देकर अनुग्रहीत करती थीं।
साधना कर सकें। उन्हें आध्यात्मिक तत्त्वदर्शन की वास्तविक अनुभूति हो सके। साथ ही उस महत् कार्य का प्रारम्भ हो सके, जिसके लिए हम लोगों को भगवान् ने धरती पर भेजा है।
साधना लीन थीं। धन्य हैं वे लोग जिन्होंने उन दिनों कुछ क्षणों के लिए ही सही, शान्तिकुञ्ज में आकर अथवा रहकर माताजी को निहारा, उनके साथ कुछ पल अथवा दिन बिताए। बड़भागी वे भी हैं जो अपनी भावनाओं की गहराइयों में इन पलों में उस अलौकिकता का साक्षात्कार कर रहे हैं।
साधना से सिद्ध अखण्ड दीपक को सम्हाले हुए दो-तीन कार्यकर्त्ता थे। यह यात्रा भी समाप्त हुई। शान्तिकुञ्ज में गुरुदेव कुछ दिन रहे भी। पर आखिर में माताजी को उन्हें तप के लिए हिमालय की ओर विदा करना ही था। घर-परिवार के सदस्य, स्वजन-परिजन, एक-एक करके नहीं एक साथ सब छूटे।
साधना का क्रम बनाए रखती।
साधना के लिए नहीं, बल्कि उनके साधनात्मक कार्यों में सहभागी बनने के लिए। ऐसे कार्यों में शिष्यों-भक्तों की पीड़ा और उन पर आए संकटों का निवारण प्रमुख था। इसके लिए वे दोनों ही शिष्यों के पास पहुँच कर उन्हें आश्वासन देते, उनको ढाढ़स बंधाते और अपनी योगशक्ति से उनके कष्टों का पल में निवारण कर देते। सन्तानों की छटपटाती अन्तर्चेतना अपनी महायोगिनी माँ की कृपा को पाकर अपूर्व शान्ति अनुभव करती।
साधना शक्ति से गुरुदेव के स्थूल शरीर की आसुरी प्रकोपों से रक्षा की। इस हिमालय यात्रा में गुरुदेव को उनके द्वारा की जाने वाली अलौकिक साधना का विधि-विधान बताया गया। विश्वहित में इसके अत्यन्त प्रभावकारी परिणाम बताने के साथ साधना के लिए आवश्यक सावधानियाँ भी गिनायी गयीं। यह भी कहा गया कि साधना काल में आसुरी शक्तियाँ तरह-तरह से उपद्रव मचाने में, हर तरह के विघ्न पहुँचाने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगी। इन विघ्नों और उपद्रवों के अलावा स्वयं की सूक्ष्म चेतना को पाँच समर्थ स्वरूप प्रदान करने की इस प्रक्रिया में अस्तित्व में इतने तरह के शक्ति विस्फोट होंगे कि कभी भी स्थूल देह छूटने का खतरा बना रहेगा।
साधना करती हैं। इन लड़कियों की साधना स्थूल है और मेरी सूक्ष्म। मैं जो कुछ भी करती हूँ वह सूक्ष्म शरीर से, सूक्ष्मलोक में करती हूँ। साधारण लोगों को दिखाई न देने और समझ में न आने पर भी इस तरह से ब्रह्मांड में बिखरे-फैले शक्ति प्रवाहों में से अनन्त शक्ति का अर्जन होता है। यह सूक्ष्म शरीर की ऐसी साधना है जिसकी चर्चा साधना की किसी किताब में नहीं है।
साधना ही यहाँ की समस्त गतिविधियों का केन्द्र थी। उनकी इस साधना से ही समूचे गायत्री परिवार को प्राण व प्रकाश मिलता था।
साधना के उपरान्त बाहर निकलने पर गुरुदेव ने इस विशिष्ट समय की चर्चा करते हुए एक बात-चीत में कहा था- “तुम्हीं लोगों को माताजी के आशीष नहीं मिलते, उनके आशीष हमें भी मिले हैं।” फिर वह हँसते हुए बोले- “माताजी, माँ के पेट से, माताजी होकर ही पैदा हुई हैं।” वह एक साथ सभी की माँ हैं। कुछ देर ठहर कर अपने शरीर की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा- यह शरीर अब तक उन्हीं की देख-भाल के बल पर टिका हुआ है। मेरे जीवन के सारे जटिल प्रयोग उनके मातृत्व के संरक्षण के बल पर ही सम्भव हुए हैं।
साधना काल में वे अगर अपनी दिव्य शक्तियों से सतत मेरी रखवाली न कर रही होती, तो कौन जाने यह शरीर रहता भी या नहीं।’ गुरुदेव की इस सूक्ष्मीकरण साधना के बाद बीतते वर्षों के साथ अनेकों घटनाचक्र तेजी से बदले। और वह समय भी आया जब शिव-महाशक्ति में समाने की तैयारी करने लगे।
साधना शास्त्र में नहीं मिलती। यथार्थ साधना शास्त्र गम्य होती भी नहीं है। यह तो सर्वथा गुरुगम्य है। इस पर सदा गुरुगत प्राण शिष्यों का ही अधिकार होता आया है। माताजी के अगाध समर्पण एवं परिपूर्ण निवेदन ने ही उन्हें इन सर्वथा गोपनीय योग साधनाओं का अधिकारी बनाया था।
साधना करने की आवश्यकता क्या है?” इस सवाल के बाद थोड़ा डरते-डरते उन्होंने यह भी पूछा- कि “आप अपनी साधना कब करती हैं, कुछ पता ही नहीं चलता।” अन्तर्यामी माताजी उसकी इन बातों पर पहले तो मुस्कराई, फिर हल्की से हंस दीं। फिर थोड़ा सा रुककर बोलीं- क्या करेगा यह सब जानकर। पर उसे बड़ा मायूस और उदास देखकर वह समझाने लगीं- देख बेटा! तू इन चीजों को अभी ठीक से समझ नहीं सकता।
साधना में एक दिन उनका मन गहरे ध्यान में लीन हो गया। प्रगाढ़ ध्यान की इसी भावदशा में उन्होंने देखा कि सूर्यमण्डलस्थ माता गायत्री ने माताजी का रूप ले लिया है। निरभ्र अनन्त आकाश में केवल माताजी की तेजोमयी मूर्ति विराजमान है। अखिल ब्रह्मांड के सारे ग्रह-नक्षत्र उन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहे हैं। धीरे-धीरे सब कुछ उनमें विलीन हो जाता है, यहाँ तक परम पूज्य गुरुदेव की दिव्य मूर्ति भी उन्हीं में समा जाती है।
साधना की प्रगाढ़ दशा में अनुभव किया था। यद्यपि जमीन की दृष्टि से यह जगह ठीक नहीं थी। यह भूमि काफी दलदली थी। एक छोटा पहाड़ी झरना भी इसके बीच में बह रहा था। जब उन्होंने इस जमीन को पसन्द किया, तो जमीन बिकवाने वाला एजेण्ट उनका मुँह देखता रह गया।
साधना है जिसकी चर्चा साधना की किसी किताब में नहीं है। लेकिन इस तरह से किए जाने वाले शक्ति अर्जन की सार्थकता तभी है, जब उसके अवतरण के लिए उचित आधारभूमि हो। इस आधारभूमि का निर्माण इन लड़कियों द्वारा मेरी देख-रेख में किए जाते गायत्री पुरश्चरणों की शृंखला से हो रहा है, तुझे समझ में ये सब बातें कितनी आएँगी, पता नहीं। पर इतना जान ले कि यहाँ इन दिनों अद्भुत हो रहा है। इस पवित्र भूमि की पात्रता का विस्तार करके इसे आध्यात्मिक ऊर्जा का भण्डारगृह बनाया जा रहा है।
साधना में साधकों को भोजन व औषधि कल्क के माध्यम से माताजी की प्राण-सुधा पीने को मिलती थी। वे अपने बच्चों को इन्हीं माध्यमों से अपने तप का महत्त्वपूर्ण अंश देकर अनुग्रहीत करती थीं।
साधना का बल घटता है। ऐसा कहते हुए वह कहती- “अब मेरी ही ले लो। मैंने क्या-क्या किया कोई कुछ जानता है क्या? अखण्ड ज्योति संस्थान में आधी रात से पहले उठ जाती थी। प्रायः सारी रात गुरुजी के साथ साधना में बिता देती।
साधना की अनुभूतियों में ही जाना जा सकता है। और यह सच्चाई ऐसी है कि कोई जानने वाला इसे कहे भी तो ऐसा लगेगा जैसे किसी रहस्यपूर्ण उपन्यास की कथा सुनायी जा रही है। इसलिए समझदार लोग इन बातों को कहीं कहते नहीं। बहुत हुआ तो इसके तत्त्वदर्शन को बता देते हैं। सार बात भी वही है।
साधनालीन माताजी एक दूसरे की परिस्थिति एवं भावदशा को अपने हृदय की गहराइयों में सतत अनुभव करते थे। दोनों के कर्त्तव्य कठोर थे, दोनों की साधना दुर्धर्ष थी। माताजी, गायत्री परिवार के अपने बच्चों को प्यार-दुलार देने, उनकी कष्ट-कठिनाइयों में भागीदार होने के साथ शान्तिकुञ्ज के भविष्यत् के लिए आध्यात्मिक-ऊर्जा का अक्षय कोष जुटाने में जुटी थीं। गुरुदेव इन दिनों उन आसुरी शक्तियों को प्रचण्ड टक्कर देने में जुटे थे, जो पड़ोसी देश की कुटिल गतिविधियों का बाना पहनकर अपने देश पर चढ़ आयीं थीं।
साधना स्थल के रूप में चुनेंगी, वही स्थान भविष्य में सम्पूर्ण विश्व के लिए ऊर्जा अनुदान का केन्द्र बनेगा। अपने इस निर्धारण में ऋषितन्त्र ने यह भी स्पष्ट किया- इस युग के लिए विधि ने जो युग प्रत्यावर्तन का विधान रचा है, उसमें केन्द्रीय भूमिका महाशक्ति स्वयं निभाएँगी। ऋषिगण एवं दिव्य लोकों की देव शक्तियाँ उनका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में सहयोग करेंगे।
साधना और अध्यात्म उपार्जित आत्मशक्ति की आवश्यकता है। अपनी भावी रीति-नीति के अनुरूप माता भगवती इन दिनों यही करने में जुट गयीं। अपने आराध्य के संसर्ग में अनेकों गुह्यमंत्रों, बीजाक्षरों, योग की गहन प्रक्रियाओं का ज्ञान उन्हें इसी समय हुआ। उनकी अपनी विशिष्ट साधना की शुरुआत ठीक उसी स्थान से हुई, जहाँ कभी तपस्वी प्रवर, श्रीराम ने अखण्ड साधना दीप प्रज्वलित किया था। हालाँकि यहाँ उनका साधना काल बहुत ही थोड़े समय के लिए रहा।
साधना सफल हो सकती है।
साधना में चले जाने के बाद अतिशय सघन हो गयी थी। सन् 1984 की रामनवमी से गुरुदेव का सर्वसामान्य से मिलना बन्द हो गया था। इस विशिष्ट साधना काल में उन्होंने प्रायः दो ही लोगों को अपने आस-पास रहने व निरन्तर मिलने-जुलने की अनुमति दी थी। इनमें से प्रथम स्वयं वन्दनीया माताजी थी, जो उनसे सर्वथा अभिन्न थीं, जिनके प्राण गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में घुल रहे थे, जो साधना करते समय गुरुदेव के स्थूल शरीर को अपनी दिव्य शक्तियों से सुरक्षित व संरक्षित करती थीं। दूसरे व्यक्ति के रूप में डॉ. प्रणव पण्ड्या थे।
साधना व सिद्धि की आधारभूमि यही है। यही योगियों की कुण्डलिनी शक्ति है। जिसके जागरण मात्र से योग साधकों में महाशक्ति की अभिव्यक्ति के अनेकों स्रोत खुल जाते हैं। मातृतत्त्व की कृपा से ही योग साधक सक्षम व समर्थ बनता है। अनेकानेक सिद्धियाँ एवं विभूतियाँ उसका अनुगमन व अनुसरण करती हैं।
साधना करने में इतनी खुशी मिलती थी कि सारे कष्ट उनको नगण्य लगते थे।
साधना के बाद से ही परम पूज्य गुरुदेव शान्तिकुञ्ज सहित सम्पूर्ण युग निर्माण मिशन को सर्वथा नए आयाम में पहुँचाने में जुटे थे। इसके लिए उन्होंने अपने लेखन, साधना आदि नियमित कार्यों के साथ कार्यकर्त्ताओं को तरह-तरह से प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया था। सारे दिन एक के बाद एक गोष्ठियाँ चलती रहती। इन गोष्ठियों में वह भविष्य में होने वाले कार्यों का खुलासा करते, नयी योजनाएँ बनाते व समझाते। यह भी बताते कि उनके न रहने पर मिशन का किस तरह से विस्तार होगा और यह कैसे व किस ढंग से चलेगा।
साधना के बाद बीतते वर्षों के साथ अनेकों घटनाचक्र तेजी से बदले। और वह समय भी आया जब शिव-महाशक्ति में समाने की तैयारी करने लगे।
साधना की तीव्रता के कारण उनके सूक्ष्म शरीर की क्रियाशीलता उत्तरोत्तर बढ़ती गयी। कारण शरीर भी प्रभावान और प्रखर होने लगा। उनकी साधना का घनत्व इस कदर बढ़ गया था कि वह प्रत्येक दृष्टि से परम समर्थ हो गयीं थी।
साधना का मकसद विश्व-वसुधा पर छाते जा रहे आसुरी आतंक को निरस्त करना था। साथ ही तीसरे विश्वयुद्ध की उन भयावह सम्भावनाओं को समाप्त करना था जिसकी भविष्यवाणी एक अरसे से दुनिया भर के सभी भविष्यवक्ता करते चले आ रहे थे। सन् 1984 की रामनवमी को इस तरह योजनाबद्ध रीति से गुरुदेव के एकान्त में चले जाने के बाद मिशन के सूत्र संचालन का सारा दायित्व माताजी पर आ गया। इस दायित्व के साथ एक अन्य गुरुतर दायित्व भी उन पर था। वह गुरुदेव द्वारा की जाने वाली अत्यन्त दुष्कर एवं दुरूह सूक्ष्मीकरण साधना में वह उनकी समर्थ सहयोगिनी भी थीं।
साधना में समर्पण का क्या महत्त्व है? सर्वेश्वरी माँ के अतिरिक्त भला और कौन अपने बच्चों के लिए ऐसा त्यागमय, कष्टमय एवं आदर्शपूर्ण जीवन जिएगा। अध्यात्म-साधकों के लिए माताजी की यह जीवन शैली कितनी ही आदर्शनिष्ठ क्यों न हो, पर मिशन को उनके कुशल नेतृत्व की आवश्यकता थी। गुरुदेव की हिमालय से वापसी इसी शर्त पर हुई थी कि वे पूर्ण एकान्त में सतत उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगों में संलग्न रहेंगे।
साधना काल बहुत ही थोड़े समय के लिए रहा। अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की वजह से परम पूज्य गुरुदेव का मथुरा रहना अनिवार्य था। पहले कुछ अंकों के आगरा से प्रकाशित होने के बाद अब अखण्ड ज्योति मथुरा से प्रकाशित होने लगी थी। साधकों जिज्ञासुओं और आगन्तुकों का आवागमन भी बढ़ने लगा था। मथुरा में पहले लिया गया किराये का मकान भी छोटा पड़ने लगा था।
साधना स्थल के रूप में शान्तिकुञ्ज की पृष्ठभूमि बनने लगी।
साधना काल में उन्होंने प्रायः दो ही लोगों को अपने आस-पास रहने व निरन्तर मिलने-जुलने की अनुमति दी थी। इनमें से प्रथम स्वयं वन्दनीया माताजी थी, जो उनसे सर्वथा अभिन्न थीं, जिनके प्राण गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना में घुल रहे थे, जो साधना करते समय गुरुदेव के स्थूल शरीर को अपनी दिव्य शक्तियों से सुरक्षित व संरक्षित करती थीं। दूसरे व्यक्ति के रूप में डॉ. प्रणव पण्ड्या थे। जो उन दिनों गुरुदेव के प्रधान सेवक, निजी सचिव व उनके लेखन कार्य में एकमात्र सहयोगी का धर्म निभाते थे। इस गुरुतर सेवा धर्म में प्रतिपल उनके मन-प्राण तल्लीन रहते थे।
साधना किया करती थी। वे बड़े अद्भुत दिन थे। शरीर इस लोक में रहते हुए भी चेतना कहीं और ही रहती थी। मेरा सब कुछ गुरुजी में घुलता मिलता चला जा रहा था।” उनकी इन बातों को सुनते हुए सुनने वालों की भावानुभूतियों में शिव और शक्ति के अन्तर्मिलन का सत्य उजागर होने लगता।
साधना में अपने विगत जन्मों की कथा स्पष्ट हो जाने के बाद उनमें एक भाव परिवर्तन हो गया था। वह पहले भी शान्त रहा करती थीं। अब यह शान्ति और भी सघन हो गयी थी। इन दिनों वह सर्वथा शान्त-अचंचल रहकर अपने दैनिक क्रिया-कलापों में संलग्न रहती। बड़ी भाभी के घर-गृहस्थी के कामों में सहयोग, रामायण, महाभारत आदि धर्मग्रन्थों का स्वाध्याय, अपनी नियमित ध्यान साधना बस यही उनकी दिनचर्या के अनिवार्य तत्त्व थे।
साधना से जाग्रत् एवं चैतन्य गायत्री महामंत्र के प्रत्येक बीजाक्षर का स्फोट उनके अस्तित्त्व के विभिन्न गुह्य केन्द्रों में होता रहता। यह उनके द्वारा किए जाने वाले गायत्री जप की अद्भुत प्रणाली थी। जप के अनन्तर वह ध्यानस्थ हो जातीं। ध्यान की भावदशा में वह अपने महाशक्ति के स्वरूप में परिपूर्णता से निमग्न होतीं। साधना का यह क्रम प्रायः सूर्योदय तक चलता रहता।
साधना स्थली-शान्तिकुञ्ज में एकान्त तप कर रही होंगी।
साधना करेंगे, अनायास उनके प्राण प्रत्यावर्तित हो जाएँगे। आगे के दिनों में यहाँ आने वाले श्रद्धावान साधक अपने प्रत्यावर्तित प्राणों को अनुभव करेंगे। अपनी साधना की रहस्य कथा के इन कुछ अंशों को उजागर करती हुए माताजी अचानक उठ खड़ी हुई। शायद उन्हें अपने भविष्यत् कार्यों को गति देनी थी।
साधनाओं को करते थे। इन साधनाओं का उद्देश्य साधकों के प्राणों को उच्चस्तरीय आध्यात्मिक तत्त्वों के लिए ग्रहणशील बनाना था, ताकि वे गुरुदेव के महाप्राणों के किसी लघु अंश को ग्रहण व धारण करने में समर्थ हो सकें। साधना की इस अवधि में प्रत्येक साधक को गुरुदेव के संग-सुपास व चर्चा-परामर्श का भरपूर मौका मिलता था। इस साधना में साधकों को भोजन व औषधि कल्क के माध्यम से माताजी की प्राण-सुधा पीने को मिलती थी। वे अपने बच्चों को इन्हीं माध्यमों से अपने तप का महत्त्वपूर्ण अंश देकर अनुग्रहीत करती थीं।
साधना के लिए विदा दे रहे थे। सभी को मालूम था कि वे हरिद्वार में रहेंगी। बहुत जरूरत पड़ने पर उनसे संपर्क हो सकता है। परन्तु उस समय हरिद्वार में मथुरा जैसी सुगमता तो न थी।
साधनात्मक कार्यों में सहभागी बनने के लिए। ऐसे कार्यों में शिष्यों-भक्तों की पीड़ा और उन पर आए संकटों का निवारण प्रमुख था। इसके लिए वे दोनों ही शिष्यों के पास पहुँच कर उन्हें आश्वासन देते, उनको ढाढ़स बंधाते और अपनी योगशक्ति से उनके कष्टों का पल में निवारण कर देते। सन्तानों की छटपटाती अन्तर्चेतना अपनी महायोगिनी माँ की कृपा को पाकर अपूर्व शान्ति अनुभव करती।
साधना संगिनी होकर प्राप्त करती थीं।
साधना की जरूरत नहीं रही। सूक्ष्म शरीर से स्वमेव सारी योग विभूतियों का अर्जन होने लगा। यह विलक्षण स्थिति किन्हीं विरले महायोगियों को ही सुलभ होती है।
साधना का रूप ले लेते हैं।
साधनाएँ की थीं। उनकी सहनशक्ति इतनी आगाध और असीम थी कि गुरुदेव उन्हें ‘सर्वसहा’ कहने लगे थे। वह कहा करते थे- कि माताजी सर्व कष्ट सहिष्णु हैं। वे सब कष्टों-संकटों को बड़ी आसानी से हँसते-हँसते सह जाती हैं। उन सर्वसहा को भी बाह्य वियोग का यह महातप असह्य लग रहा था।
साधना में समर्थ सहयोग करते हुए, पूरे दिन उन्हें मिशन के सभी काम-काज की देखभाल करनी थी, सभी तरह की व्यवस्था के लिए मार्गदर्शन देना था। छोटे-बड़े सभी लोगों की प्रत्येक बात को ध्यान से सुनकर निर्णय देना था। क्षेत्र में कार्यरत कार्यकर्त्ताओं की समस्याओं के हल निकालने थे। इन सारे कामों के साथ कष्ट और पीड़ा में पड़े अपने उन बच्चों का भी ध्यान रखना था- जो अपनी प्यारी माँ के अलावा और कुछ जानते ही नहीं। जब-तब किसी भी छोटी-मोटी आफत-मुसीबत आने पर माँ-माँ चिल्लाने लगते हैं।
साधना कब करती हैं, कुछ पता ही नहीं चलता।” अन्तर्यामी माताजी उसकी इन बातों पर पहले तो मुस्कराई, फिर हल्की से हंस दीं। फिर थोड़ा सा रुककर बोलीं- क्या करेगा यह सब जानकर। पर उसे बड़ा मायूस और उदास देखकर वह समझाने लगीं- देख बेटा! तू इन चीजों को अभी ठीक से समझ नहीं सकता। तेरी आँखें अभी बड़ी कमजोर हैं, वे हमारी साधना को देख नहीं सकती।
साधना केन्द्रों की यात्रा करतीं। ऐसे प्रसंगों को उन्होंने सम्पूर्ण रूप से प्रायः कभी उजागर नहीं किया। फिर भी यदा-कदा गुरुदेव की महिमा बताने के लिए इसके कुछ अंशों को वह प्रकट कर देती थीं। ऐसे ही एक प्रसंग में उन्होंने बताया- “बेटा! तुम लोग जानते नहीं, गुरुदेव कौन हैं? उन्हें कभी सामान्य तपस्वी, सिद्ध और योगी समझने की भूल मत करना।
साधना मेरे लिए आवश्यकता नहीं, मेरा स्वभाव है। इसकी आवश्यकता मुझे नहीं तुम सब बच्चों को है। अब बच्चे तो बच्चे ठहरे, जाने-अनजाने उनसे न जाने कितने पाप-ताप हो जाते हैं। और जब उनके परिणाम सामने आते हैं तो कहते हैं- माताजी बचाओ। अब बच्चे कैसे भी हों, धूल-मिट्टी, मल-मूत्र से सने हो या साफ-सुथरे हों, मेरे लिए तो बच्चे ही हैं।
साधना, पढ़ाई-लिखाई सब में अव्वल है। पहले कुछ दिन उसने यहीं आगरा में रहकर सैनिक अखबार में काम किया। आजकल मथुरा में रहकर खुद की पत्रिका निकालते हैं। बस काल देवता ने उनकी पहली पत्नी को उठा लिया। उसके तीन बच्चे हैं- ओमप्रकाश, दयावती और श्रद्धा।
साधना का स्वर संगीत गूँजने लगा था।
साधना स्थूल है और मेरी सूक्ष्म। मैं जो कुछ भी करती हूँ वह सूक्ष्म शरीर से, सूक्ष्मलोक में करती हूँ। साधारण लोगों को दिखाई न देने और समझ में न आने पर भी इस तरह से ब्रह्मांड में बिखरे-फैले शक्ति प्रवाहों में से अनन्त शक्ति का अर्जन होता है। यह सूक्ष्म शरीर की ऐसी साधना है जिसकी चर्चा साधना की किसी किताब में नहीं है। लेकिन इस तरह से किए जाने वाले शक्ति अर्जन की सार्थकता तभी है, जब उसके अवतरण के लिए उचित आधारभूमि हो।
साधना बना लिया था। इस साधना को करते हुए उनके प्राण अपने आराध्य में महामिलन के लिए महाप्रयाण करने की तैयारी में लगे थे।
साधना की परम प्रगाढ़ता में शिव ओर शक्ति परस्पर अन्तर्लीन हो गए थे। शिव और शक्ति का यह अन्तर्मिलन दो रूपों में प्रकट हुआ था। अपने पहले रूप में महायोगिनी माताजी की अन्तस्थ कुण्डलिनी महाशक्ति परिपूर्ण जागरण के पश्चात् विभिन्न चक्रों का भेदन और प्रस्फुटन करती हुई सहस्रार में स्थित महाशिव से जा मिली थी। योग साधकों के लिए इस अद्भुत एवं दुर्लभ सत्य के घटित होने से माताजी का समूचा अस्तित्त्व योगैश्वर्य का भण्डार बन गया था। योग की उच्चस्तरीय विभूतियाँ एवं सिद्धियाँ उनके व्यक्तित्व के विविध आयामों से अनायास प्रकट होने लगी थीं।
साधना से थोड़ी देर में उठीं।
साधना के लिए आवश्यक सावधानियाँ भी गिनायी गयीं। यह भी कहा गया कि साधना काल में आसुरी शक्तियाँ तरह-तरह से उपद्रव मचाने में, हर तरह के विघ्न पहुँचाने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगी। इन विघ्नों और उपद्रवों के अलावा स्वयं की सूक्ष्म चेतना को पाँच समर्थ स्वरूप प्रदान करने की इस प्रक्रिया में अस्तित्व में इतने तरह के शक्ति विस्फोट होंगे कि कभी भी स्थूल देह छूटने का खतरा बना रहेगा। ऐसी स्थिति में स्थूल देह की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किसी समर्थ शक्ति का स्थूल रूप से दिव्य संरक्षण जरूरी है। यह कार्य केवल और केवल माताजी कर सकती हैं।
साधना के लिए सुनिश्चित किया था। दिनभर के क्रिया-कलापों को देखते हुए यही सबसे उपयुक्त समय था। हालाँकि उन्हें सोने के लिए मुश्किल से तीन-चार घण्टे मिल पाते थे। परन्तु माताजी को अर्धरात्रि से कुछ पहले जगकर गुरुदेव के साथ बैठकर साधना करने में इतनी खुशी मिलती थी कि सारे कष्ट उनको नगण्य लगते थे।
साधना करता रह- धीरे-धीरे तुझे सारी बातें समझ में आ जाएँगी। जो गुरुजी हैं- वही मैं हूँ। जो मैं हूँ वहीं गायत्री है। माताजी का यह कथन सुनकर सुनने वाला भाव विह्वल हो गया। काफी देर तो उसे सूझा ही नहीं, कि वह और क्या कहे?
साधना के लिए तैयार करती थीं। आगन्तुकों के आवागमन, पत्रिका व अन्य साहित्य का प्रकाशन और गायत्री तपोभूमि के अनेकों क्रिया-कलापों की वजह से परम पूज्य गुरुदेव की व्यस्तताएँ बहुत ज्यादा बढ़ गयी थीं। माताजी की भी इसमें बराबर की सहभागिता थी। इसलिए प्रातः सूर्योदय से लेकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक कोई भी समय ऐसा नहीं था, जिसमें साधना की जा सके। इसलिए गुरुदेव ने मध्य रात्रि से लेकर प्रातः तक के समय को साधना के लिए सुनिश्चित किया था।
साधना के समय वह प्रायः दिन के सारे समय गुरुदेव के पास ही रहा करते थे।
साधना में निरत रहता है। ध्यान व ज्ञान की साधना करके आदिमाता से अपने जीवन की पूर्णता का वरदान पाने की प्रार्थना करता है।
साधना करती रहनी पड़ती है।
साधना का घनत्व इस कदर बढ़ गया था कि वह प्रत्येक दृष्टि से परम समर्थ हो गयीं थी।
साधना सत्र चल रहे थे। शिविर में भागीदार होने आए सभी परिजन अपने साधनात्मक कार्यक्रमों में व्यस्त थे। उन दिनों गुरुदेव सभी के लिए प्रायः सभी समय सर्वसुलभ भी हुआ करते थे। इसी का लाभ उठाकर वह दुष्ट व्यक्ति ऊपर गया और उसने उन पर प्राणघातक हमला किया। हालाँकि गुरुदेव के समर्थ प्रतिरोध के कारण उसे बहुत ज्यादा सफलता न मिली और वह डर कर भाग निकला।
साधना की सफलता प्रमाणित होती है। वे कहती थी- बेटा! मैं तुम सब की जननी तो नहीं, पर तुमसे से हर एक को अच्छे संस्कार देने वाली तुम्हारी सच्ची माँ हूँ।’
साधना स्थली- शान्तिकुञ्ज में साधनालीन माताजी एक दूसरे की परिस्थिति एवं भावदशा को अपने हृदय की गहराइयों में सतत अनुभव करते थे। दोनों के कर्त्तव्य कठोर थे, दोनों की साधना दुर्धर्ष थी। माताजी, गायत्री परिवार के अपने बच्चों को प्यार-दुलार देने, उनकी कष्ट-कठिनाइयों में भागीदार होने के साथ शान्तिकुञ्ज के भविष्यत् के लिए आध्यात्मिक-ऊर्जा का अक्षय कोष जुटाने में जुटी थीं। गुरुदेव इन दिनों उन आसुरी शक्तियों को प्रचण्ड टक्कर देने में जुटे थे, जो पड़ोसी देश की कुटिल गतिविधियों का बाना पहनकर अपने देश पर चढ़ आयीं थीं।
साधना काल में आसुरी शक्तियाँ तरह-तरह से उपद्रव मचाने में, हर तरह के विघ्न पहुँचाने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगी। इन विघ्नों और उपद्रवों के अलावा स्वयं की सूक्ष्म चेतना को पाँच समर्थ स्वरूप प्रदान करने की इस प्रक्रिया में अस्तित्व में इतने तरह के शक्ति विस्फोट होंगे कि कभी भी स्थूल देह छूटने का खतरा बना रहेगा। ऐसी स्थिति में स्थूल देह की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किसी समर्थ शक्ति का स्थूल रूप से दिव्य संरक्षण जरूरी है। यह कार्य केवल और केवल माताजी कर सकती हैं। शक्ति स्वरूपा माताजी परम समर्थ और सभी के लिए, यहाँ तक कि हम सब हिमालयवासी ऋषिगणों के लिए भी परम वन्दनीया हैं।
साधना करेगी तो सबके-सब परेशान हो जाएँगे। और वह अपने परिवार के किसी भी सदस्य को परेशान नहीं करना चाहती थी। इसीलिए उन्होंने यह अनूठा तरीका निकाला था। वह दिन-प्रतिदिन ध्यान साधना की गहरी भावदशा में खोती जा रही थी। अनेकों दिव्य अनुभूतियाँ प्रतिक्षण उन्हें घेरे रहती थी।
साधना, तपस्या की बात करते हुए उन्होंने कहा था- “यह सब जितना गोपनीय रहे उतना ही अच्छा। संसार को दिखाकर-जताकर भला क्या लाभ होगा? गुरुजी को लोक शिक्षण करना था, तुम सब को बताना था, सिखाना था इसलिए उन्होंने अपने बारे में कुछ छोटी-मोटी बातें बता दी। उनकी विशेष तपस्या के बारे में अभी भी किसी को कुछ नहीं पता। मेरे बारे में तो खैर कोई कुछ जानता ही नहीं है।
साधना काल में और ज्योतिष विद्या का गहन अवलोकन करते समय उन्हें बार-बार इस तथ्य की अनुभूति होती थी कि सन् 1926 ई. महान् आध्यात्मिक शक्ति के अवतरण का वर्ष है। परन्तु कैसे और किस तरह? इन प्रश्नों के हल वे नहीं खोज पाते थे।
साधना का विधि-विधान बताया गया। विश्वहित में इसके अत्यन्त प्रभावकारी परिणाम बताने के साथ साधना के लिए आवश्यक सावधानियाँ भी गिनायी गयीं। यह भी कहा गया कि साधना काल में आसुरी शक्तियाँ तरह-तरह से उपद्रव मचाने में, हर तरह के विघ्न पहुँचाने में कोई कसर नहीं उठा रखेंगी। इन विघ्नों और उपद्रवों के अलावा स्वयं की सूक्ष्म चेतना को पाँच समर्थ स्वरूप प्रदान करने की इस प्रक्रिया में अस्तित्व में इतने तरह के शक्ति विस्फोट होंगे कि कभी भी स्थूल देह छूटने का खतरा बना रहेगा। ऐसी स्थिति में स्थूल देह की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किसी समर्थ शक्ति का स्थूल रूप से दिव्य संरक्षण जरूरी है।
साधना चाहिए। तू साधना करता रह- धीरे-धीरे तुझे सारी बातें समझ में आ जाएँगी। जो गुरुजी हैं- वही मैं हूँ। जो मैं हूँ वहीं गायत्री है। माताजी का यह कथन सुनकर सुनने वाला भाव विह्वल हो गया।
साधनारत युवक का उन्होंने अब नामकरण भी कर दिया। ‘महायोगी शिव’ यही नाम दिया उन्होंने अपनी भाव समाधि में साक्षात्कार होने वाले सत्य का। हालाँकि यह ‘महायोगी शिव’ रोज ही उनकी अन्तर्भावनाओं में प्रत्यक्ष होते, परन्तु अभी तक वह यह नहीं जान पायी थी कि ये कौन हैं? कहाँ हैं और क्या करते हैं? लेकिन जब कभी वह ध्यानरत होती अथवा अपनी शिव-पूजा में भावमग्न होती, तब उनके हृदय में यह तीव्र स्फुरण होता था कि ये ‘महायोगी शिव’ जो कोई भी हों, पर ये हैं भगवान् शिव ही।
साधना की रहस्य कथा के इन कुछ अंशों को उजागर करती हुए माताजी अचानक उठ खड़ी हुई। शायद उन्हें अपने भविष्यत् कार्यों को गति देनी थी।
साधना शास्त्र गम्य होती भी नहीं है। यह तो सर्वथा गुरुगम्य है। इस पर सदा गुरुगत प्राण शिष्यों का ही अधिकार होता आया है। माताजी के अगाध समर्पण एवं परिपूर्ण निवेदन ने ही उन्हें इन सर्वथा गोपनीय योग साधनाओं का अधिकारी बनाया था।
साधनात्मक कार्यक्रमों में व्यस्त थे। उन दिनों गुरुदेव सभी के लिए प्रायः सभी समय सर्वसुलभ भी हुआ करते थे। इसी का लाभ उठाकर वह दुष्ट व्यक्ति ऊपर गया और उसने उन पर प्राणघातक हमला किया। हालाँकि गुरुदेव के समर्थ प्रतिरोध के कारण उसे बहुत ज्यादा सफलता न मिली और वह डर कर भाग निकला। एक तरह से करुणामूर्ति गुरुदेव ने स्वयं ही उस कायर और डरपोक को भाग जाने का अवसर दिया।
साधनाओं की चरम परिणति है। योग के विभिन्न तत्त्व व प्रकार, विधि और अनुशासन इसी परम पूर्णता को जानने व पाने के लिए है। चित्तवृत्ति निरोध से मातृतत्त्व की चित् शक्ति ही प्रकाशित एवं प्रकट होती है। इसी में साधक को अपने स्वरूप का बोध होने के साथ अनेकानेक यौगिक विभूतियों की प्राप्ति होती है। साधकों की साधना व सिद्धि की आधारभूमि यही है।
साधना करके आदिमाता से अपने जीवन की पूर्णता का वरदान पाने की प्रार्थना करता है।
साधना दीप प्रज्वलित किया था। उनकी चौबीस वर्षीय चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला इसी वर्ष प्रारम्भ हुई थी। इसके अतिरिक्त श्री अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी में महायोगी अरविन्द पूर्णयोग की विशेष सिद्धि को अवतरण करने की सफलता प्राप्त कर रहे थे। इस वर्ष के अन्तिम महीनों में ही अतिमानसिक चेतना धरती पर अवतरित हुई थी। और महायोगी अरविन्द अतिमानसिक चेतना के अवतरण के लिए परिपूर्ण एकान्त में चले गए थे।
साधना में घुल रहे थे, जो साधना करते समय गुरुदेव के स्थूल शरीर को अपनी दिव्य शक्तियों से सुरक्षित व संरक्षित करती थीं। दूसरे व्यक्ति के रूप में डॉ. प्रणव पण्ड्या थे। जो उन दिनों गुरुदेव के प्रधान सेवक, निजी सचिव व उनके लेखन कार्य में एकमात्र सहयोगी का धर्म निभाते थे। इस गुरुतर सेवा धर्म में प्रतिपल उनके मन-प्राण तल्लीन रहते थे। ‘सब ते सेवक धरम कठोरा’- कहे जाने वाले सेवाधर्म को उनके हृदय में छलकने वाली भक्ति संवेदना ने एकदम आसान कर दिया था।
साधना की जा सके। इसलिए गुरुदेव ने मध्य रात्रि से लेकर प्रातः तक के समय को साधना के लिए सुनिश्चित किया था। दिनभर के क्रिया-कलापों को देखते हुए यही सबसे उपयुक्त समय था। हालाँकि उन्हें सोने के लिए मुश्किल से तीन-चार घण्टे मिल पाते थे। परन्तु माताजी को अर्धरात्रि से कुछ पहले जगकर गुरुदेव के साथ बैठकर साधना करने में इतनी खुशी मिलती थी कि सारे कष्ट उनको नगण्य लगते थे।
साधना के प्रति इनके समर्पित भाव को देखकर ऐसा लगता था जैसे माताजी ने स्वयं अपनी प्राणशक्ति को विभाजित कर ये कौमारी स्वरूप बना रखे हैं। इन बालिकाओं के पठन-पाठन, खान-पान, सार-संभाल आदि की सारी व्यवस्था वे स्वयं करती थीं। ये बालिकाएँ उनके निर्देशन में अपने दैनिक काम-काज के अलावा अखण्ड दीप की सिद्ध ज्योति के सान्निध्य में साधना करती थीं।
साधना के जो तत्त्व खेल-खेल में अंकुरित हुए थे, वह अब पल्लवित होने लगे थे। उनके हृदय में साधनामय जीवन के लिए अभीप्सा बढ़ने लगी थी। अपने आराध्य से मिलन के लिए पुकार तीव्र होने लगी थी। इस पुकार में भक्ति की सघनता, प्रेम की तरलता एवं अनुराग की सजलता सभी कुछ था। बालिका भगवती एक प्रखर योग साधिका के रूप में रूपांतरित होने लगी थी।
साधना परायण थी। ब्रह्म मुहूर्त से लेकर प्रातः तीन घण्टे नियमित साधना करने का उनका बड़ा पक्का नियम था। गायत्री महामंत्र के प्रत्येक अक्षर को वह बड़ी भावपूर्ण रीति से जपती थी। उनके आचार-व्यवहार में भी बड़ी असाधारण पवित्रता थी। जप काल के अलावा दिन के अन्य समय गृहकार्यों को करते हुए भी वह गायत्री मंत्र का मानसिक जप और सूर्यमण्डलस्थ माता गायत्री का ध्यान किया करती थी।
साधना सत्रों के साथ अनेकों तरह की योजनाएँ यहाँ से संचालित होने लगी। दूर-दूर से लोगों के आने का सिलसिला चल पड़ा। जो भी यहाँ आते थे, उन सबका एक साथ सामूहिक परिचय एक ही था, वे सभी माताजी के बच्चे थे। उन सबके मन अपनी माँ के लिए हुलसते थे। उन सभी के प्राणों में अपनी माँ के लिए पुकार थी।
साधना के लिए जगने और बैठने का बाहरी क्रम यथावत बना रहा। परन्तु सभी आन्तरिक सत्य बदल गए। वह गुरुदेव के साथ साधना के लिए अभी भी बैठती थीं। परन्तु प्रायः किसी विशेष साधना के लिए नहीं, बल्कि उनके साधनात्मक कार्यों में सहभागी बनने के लिए। ऐसे कार्यों में शिष्यों-भक्तों की पीड़ा और उन पर आए संकटों का निवारण प्रमुख था।
साधना में बिता देती। लेकिन घर के दूसरे लोगों के जागने से पहले उठ जाती और बाद में उनके उठने पर फिर से स्नान करती। इस स्नान से रात भर की गयी साधना के कारण बढ़ा हुआ ताप शान्त हो जाता। और सभी यही सोचते कि ये तो अभी जगी है और अब इतनी देर से नहा रही है। ज्यादा कुछ पूछने पर मैं भी उनकी हाँ में हाँ मिला देती थी।
साधना में वह उनकी समर्थ सहयोगिनी भी थीं। गुरुदेव इन दिनों जिस सूक्ष्मीकरण साधना को कर रहे थे वह योग और तंत्र का मिला−जुला अत्यन्त उच्चस्तरीय और गोपनीय प्रयोग था।
साधना का यह क्रम प्रायः सूर्योदय तक चलता रहता।
साधना की प्रगाढ़ता और सघनता से उनका सूक्ष्म शरीर अति तेजस्वी एवं प्रचण्ड ऊर्जावान हो गया था। गुरुदेव द्वारा बतायी गयी योग की गुह्य विधियों से वे इसे बड़ी ही आसानी से स्थूल शरीर से पृथक् कर लेती थी। ऐसी दशा में गुरुदेव उनके स्थूल शरीर की रक्षा करते थे। और वह लोक-लोकान्तर में जाकर वहाँ से आवश्यक तत्त्वों का अर्जन कर लेती। शिष्यों-सन्तानों की पुकार का भी प्रत्युत्तर देती।
साधना के रूप में कर सकते हैं। हाँ बेटा! क्यों नहीं? फिर कुछ सोचते हुए वह बोलीं- “समय आने पर यह गाथा अपने आप प्रकट हो जाएगी। इसे पढ़ने वाले, इसके माध्यम से मेरा स्वरूप का चिन्तन करने वाले अपनी मानसिक चेतना को मेरी पराचेतना से बड़ी आसानी से जोड़ पाएँगे। मुझे पुकारने के लिए यह भी एक तरीका है।
साधना में इतना डूबी रहती कि उन्हें अपने उठने, नहाने, खाने की सुध-बुध ही न रहती। घर के सदस्य उनके इस आन्तरिक परिवर्तन से अनजान थे। बड़ी भाभी जो माँ की तरह उनकी सार-संभाल किया करती थी, उन्हें समझाती रहती। बार-बार कहती, “लाली! तू तो ऐसी न थी। आजकल तुझे क्या हो गया है?
साधनामय अतीत की झलकियाँ देखीं। गंगा की लहरों एवं मन्दिर की घण्टियों की गूँज के साथ जो दृश्य उभरे, पहले वे अस्पष्ट थे। बाद में धीरे-धीरे उन्होंने अपने को दक्षिणेश्वर मन्दिर में रामकृष्ण परमहंस के साथ पाया। उन्हें ऐसा लगा, जैसे कि वे परमहंस देव के साथ उनके भक्तों व शिष्यों के साथ घिरी हैं। सभी उन्हें माँ-माँ कहते हुए भक्तिपूर्वक प्रणाम-प्रणिपात कर रहे हैं।
साधना के लिए बैठ जातीं। उनकी पूजावेदी पर सदा परम पूज्य गुरुदेव एवं गायत्री माता का चित्र प्रतिष्ठित रहता था। वही उनके जीवन सर्वस्व और आराध्य थे। अपने आराध्य में ही वे जगन्माता गायत्री की अनुभूति करती थीं। इस चित्र का पंचोपचार पूजन करके प्राणायाम की कुछ विशिष्ट प्रक्रियाएँ सम्पन्न करतीं।
साधना करते हैं।
साधना से ही समूचे गायत्री परिवार को प्राण व प्रकाश मिलता था।
साधना स्थल के रूप में शान्तिकुञ्ज के निर्माण की परिकल्पना परम पूज्य गुरुदेव की दूसरी हिमालय यात्रा के समय ही तैयार हो गयी थी। उनकी मार्गदर्शक सत्ता ने इसकी आवश्यकता एवं इस तरह के निर्माण की स्पष्ट रूपरेखा से उन्हें इस विशिष्ट अवधि में अवगत करा दिया था। हिमालय की गहनताओं में युगों से तप कर रहे दिव्य देहधारी ऋषियों की सम्मति भी यही थी। गुरुदेव की यह दूसरी हिमालय यात्रा (1960-61) पहली बार की तुलना में कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण थी। इस बार उन्हें अपने मार्गदर्शक के साथ हिमालय की दिव्य ऋषि सत्ताओं के न केवल दर्शन मिले, बल्कि उनसे चिन्तन परामर्श का विशेष अवसर मिला।
साधनामय जीवन के लिए अभीप्सा बढ़ने लगी थी। अपने आराध्य से मिलन के लिए पुकार तीव्र होने लगी थी। इस पुकार में भक्ति की सघनता, प्रेम की तरलता एवं अनुराग की सजलता सभी कुछ था। बालिका भगवती एक प्रखर योग साधिका के रूप में रूपांतरित होने लगी थी। अपने प्रभु के प्रति भावभरी पुकार में उनकी योग साधना का स्वर संगीत गूँजने लगा था।
साधनाओं में पारंगत थे। अब माताजी भी योग के उच्चतम रहस्यों से अवगत हो गयी। यह स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी कि स्थूल देह से किसी भी साधना की जरूरत नहीं रही। सूक्ष्म शरीर से स्वमेव सारी योग विभूतियों का अर्जन होने लगा। यह विलक्षण स्थिति किन्हीं विरले महायोगियों को ही सुलभ होती है।
साधना की शुरुआत ठीक उसी स्थान से हुई, जहाँ कभी तपस्वी प्रवर, श्रीराम ने अखण्ड साधना दीप प्रज्वलित किया था। हालाँकि यहाँ उनका साधना काल बहुत ही थोड़े समय के लिए रहा। अखण्ड ज्योति के प्रकाशन की वजह से परम पूज्य गुरुदेव का मथुरा रहना अनिवार्य था। पहले कुछ अंकों के आगरा से प्रकाशित होने के बाद अब अखण्ड ज्योति मथुरा से प्रकाशित होने लगी थी। साधकों जिज्ञासुओं और आगन्तुकों का आवागमन भी बढ़ने लगा था।
साधना दुर्धर्ष थी। माताजी, गायत्री परिवार के अपने बच्चों को प्यार-दुलार देने, उनकी कष्ट-कठिनाइयों में भागीदार होने के साथ शान्तिकुञ्ज के भविष्यत् के लिए आध्यात्मिक-ऊर्जा का अक्षय कोष जुटाने में जुटी थीं। गुरुदेव इन दिनों उन आसुरी शक्तियों को प्रचण्ड टक्कर देने में जुटे थे, जो पड़ोसी देश की कुटिल गतिविधियों का बाना पहनकर अपने देश पर चढ़ आयीं थीं।
साधना ग्यारह-बारह साल की उम्र में शुरू हो गयी थी। इसमें कहीं कोई दिखावा न था। बस सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते सब समय ध्यान किया करती थी। देह का तो जैसे कोई होश ही नहीं रह गया था। बड़ी विचित्र स्थिति थी उन दिनों।
साधना की गहरी भावदशा में खोती जा रही थी। अनेकों दिव्य अनुभूतियाँ प्रतिक्षण उन्हें घेरे रहती थी। बाहरी तौर पर सब कुछ सामान्य होते हुए भी उनके आन्तरिक जीवन में सभी कुछ असामान्य और अलौकिक हो गया था।
साधना करनी थी। उनकी भावनाएँ कितनी भी छटपटाई हों, पर मर्यादा प्रभु श्रीराम एवं माता भगवती के साथ चलने की इजाजत नहीं दे रही थी। प्रभु का अनुशासन शिरोधार्य करके वे सब वहीं कर्म निरत हो गए।
साधना के कारण बढ़ा हुआ ताप शान्त हो जाता। और सभी यही सोचते कि ये तो अभी जगी है और अब इतनी देर से नहा रही है। ज्यादा कुछ पूछने पर मैं भी उनकी हाँ में हाँ मिला देती थी। पर असली बात दूसरी थी। उन दिनों गुरुदेव के साथ मैं पूरी प्रगाढ़ता, तन्मयता एवं तत्परता के साथ साधना किया करती थी।
साधना को कर रहे थे वह योग और तंत्र का मिला−जुला अत्यन्त उच्चस्तरीय और गोपनीय प्रयोग था।
साधना में संलग्न रही। इस शुभ घड़ी में 24 तीर्थों की रज, 24 पवित्र स्थानों का जल यहाँ लाया गया। इसके अतिरिक्त और भी कुछ ऐसी दिव्य क्रियाएँ गोपनीय स्तर पर सम्पन्न की गयी, ताकि माता की चेतना इस महामन्दिर में सद्य जाग्रत् रहे। और इस स्थान का अमोघ प्रभाव सभी को दीर्घकाल तक अनुभव होता रहे।
साधना संगिनी थी। परम पूज्य गुरुदेव उनके लिए गुरु, मार्गदर्शक, ईष्ट, आराध्य सभी कुछ थे। उनका जीवन अपने आराध्य के श्री चरणों में समर्पित सुरभित पुष्प की भाँति था। रोज-मर्रा किए जाने वाले छोटे-बड़े हर क्रिया-कलाप के माध्यम से उनके प्राण अपने आराध्य के महाप्राणों में समाहित होते रहते थे। बाहरी रूप से घर-परिवार, सगे-सम्बन्धियों, अखण्ड ज्योति संस्थान व गायत्री तपोभूमि के अनेकों लौकिक दायित्व निभाते हुए भी उनका आन्तरिक जीवन इस लौकिकता से पूरी तरह से अछूता, एकदम अलौकिक था।
साधना से कम नहीं मानती थीं। वह कहा करती थीं कि काम चाहे छोटा हो या बड़ा, यदि सच्चे भाव से भगवान् को अर्पित करके किया जाय तो वह योग साधना बन जाता है। उससे ध्यान और समाधि की ही तरह योग-विभूतियाँ प्रकट होती हैं। माताजी की इन बातों में कोरा शब्द विस्तार नहीं अनुभूति का सत्य समाया था। अपने कामों के द्वारा वह हर पल-हर क्षण साधना किया करती थीं।
साधना माना जाता है। लाखों लोग प्रतिदिन इसका पाठ कर अपना मनोवाँछित पाते हैं। इसी तरह क्या आपके बच्चे आपकी जीवनकथा के पाठ को साधना के रूप में कर सकते हैं। हाँ बेटा! क्यों नहीं? फिर कुछ सोचते हुए वह बोलीं- “समय आने पर यह गाथा अपने आप प्रकट हो जाएगी।
साधना और समाधि में गुजरता था। बस पत्र लिखने का ही समय ऐसा था, जब मुझे उनका संग-साथ मिल पाता था। इन्हीं क्षणों में कभी-कदार एक-आध घर-परिवार की बातें हो जातीं।
साधना को करते हुए उनके प्राण अपने आराध्य में महामिलन के लिए महाप्रयाण करने की तैयारी में लगे थे।
साधना करते समय गुरुदेव के स्थूल शरीर को अपनी दिव्य शक्तियों से सुरक्षित व संरक्षित करती थीं। दूसरे व्यक्ति के रूप में डॉ. प्रणव पण्ड्या थे। जो उन दिनों गुरुदेव के प्रधान सेवक, निजी सचिव व उनके लेखन कार्य में एकमात्र सहयोगी का धर्म निभाते थे। इस गुरुतर सेवा धर्म में प्रतिपल उनके मन-प्राण तल्लीन रहते थे। ‘सब ते सेवक धरम कठोरा’- कहे जाने वाले सेवाधर्म को उनके हृदय में छलकने वाली भक्ति संवेदना ने एकदम आसान कर दिया था।
साधना में हैं और इस समय उनकी एकाग्रता में व्यवधान डालना किसी भी तरह से ठीक नहीं है।
साधना, गृहकार्य, पत्र लेखन, अखण्ड ज्योति पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि के कार्यों की देखभाल करनी थी। यह ठीक है कि इन सभी कार्यों में सहयोग के लिए कार्यकर्त्ता थे। परन्तु वे सब के सब सहयोगी नहीं थे। माताजी के दैवी स्वरूप के प्रति अनभिज्ञता एवं श्रद्धा-भक्ति के अभाव में इनमें से कुछ की मनःस्थिति बड़ी विपन्न हो गयी थी। अपनी मानसिक विपन्नता के वश हो, ये कभी-कभी उल्टे-सीधे काम भी कर बैठते थे।
साधना करने का उनका बड़ा पक्का नियम था। गायत्री महामंत्र के प्रत्येक अक्षर को वह बड़ी भावपूर्ण रीति से जपती थी। उनके आचार-व्यवहार में भी बड़ी असाधारण पवित्रता थी। जप काल के अलावा दिन के अन्य समय गृहकार्यों को करते हुए भी वह गायत्री मंत्र का मानसिक जप और सूर्यमण्डलस्थ माता गायत्री का ध्यान किया करती थी।
साधना के क्षणों में ही वह जब-तब गुरुदेव के साथ सूक्ष्म शरीर से दिव्य लोकों, दिव्य भूमियों एवं सामान्य मानवदृष्टि से ओझल दिव्य साधना केन्द्रों की यात्रा करतीं। ऐसे प्रसंगों को उन्होंने सम्पूर्ण रूप से प्रायः कभी उजागर नहीं किया। फिर भी यदा-कदा गुरुदेव की महिमा बताने के लिए इसके कुछ अंशों को वह प्रकट कर देती थीं। ऐसे ही एक प्रसंग में उन्होंने बताया- “बेटा! तुम लोग जानते नहीं, गुरुदेव कौन हैं? उन्हें कभी सामान्य तपस्वी, सिद्ध और योगी समझने की भूल मत करना।
साधना की गयी थी, वह सब अपने प्रभु के आदेश व उन्हीं के सान्निध्य में हुई थी। बीच में जो वियोग के पल आए थे, वे सीमित थे। विश्वास था कि प्रभु गए हैं तो आएँगे भी। उनके आने की अवधि प्रायः निश्चित थी। अपने आराध्य के सान्निध्य में अथवा उनके लौट आने की आशा में सहा गया महाकष्ट भी वन्दनीया माताजी के लिए आनन्ददायी था।
साधना से सिद्ध ज्योति दृश्य और अदृश्य को प्रकाशित करती थी। शान्तिकुञ्ज का समूचा वातावरण पुराणों में वर्णित प्राचीन तपस्वी ऋषियों के आश्रम की भाँति था। तब यहाँ किसी का आना-जाना प्रायः नहीं ही होता था। बस माँ की साधना ही यहाँ की समस्त गतिविधियों का केन्द्र थी। उनकी इस साधना से ही समूचे गायत्री परिवार को प्राण व प्रकाश मिलता था।
साधना, प्रातः हवन, उनके जीवन के अनिवार्य अंग बन गए थे। माताजी द्वारा दिए गए दिव्य संस्कारों ने उन्हें सम्पूर्ण रूप से बदल दिया था। अपनी अनुभूतियों को सुनाते हुए कहा करते थे- श्रेष्ठ साधकों के लिए मार्गदर्शक परम पूज्य गुरुदेव हैं। वे अवतारी सत्ता हैं। परन्तु हम जैसे निकृष्ट जनों के लिए, अनेक तरह की गन्दगी से लिपटी हुई सन्तानों के लिए तो माताजी ही सब कुछ हैं।
साधना के बाद उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर मिल गए। उनकी जीवनचर्या का बाह्य रूप फिर से पूर्ववत सुव्यवस्थित हो गया। घर के सभी सदस्यों को आश्वस्ति मिली। बस उन्हें पहले और अब में सिर्फ एक परिवर्तन नजर आया। अब उनकी लाली प्रातः जल्दी स्नान करके शिव-पूजा के साथ नियमित ध्यान करने लगी है।
साधना से उठने पर अपने नित्य-नियम के अनुरूप उन्होंने घर और अखण्ड ज्योति के कार्यालय के जरूरी काम निबटाए। इसके बाद परिजनों के आए हुए पत्रों को पढ़ने और उनके उत्तर लिखने का क्रम आया। यह काम परम पूज्य गुरुदेव एवं माताजी मिलकर किया करते थे। इसी बीच कुछ बातें भी हो जातीं। उस दिन पत्रों को खोलते हुए माताजी ने अपनी अन्तरानुभूति भी गुरुदेव के सामने खोली।
साधना सत्रों का आयोजन-संचालन हुआ। इनमें भागीदारी करने वाले देश भर के हजारों साधकों ने परम पूज्य गुरुदेव के साथ माताजी की तपशक्ति और योग विभूतियों का साक्षात्कार किया। ये सभी सर्वसिद्धिदात्री माँ द्वारा दिए गए विविध विधि अनुदानों से लाभान्वित हुए। यह अवधि शान्तिकुञ्ज के स्वर्णिम कालों में से एक थी। इसी अवधि में 1978 में माताजी को सहयोग देने के लिए शैल दीदी एवं डॉ. प्रणव पण्ड्या का आगमन हुआ।
साधना का कार्यक्रम बनाया। परम वन्दनीया माताजी पर दोहरी जिम्मेदारी आ पड़ी। रात्रि में गुरुदेव की साधना में समर्थ सहयोग करते हुए, पूरे दिन उन्हें मिशन के सभी काम-काज की देखभाल करनी थी, सभी तरह की व्यवस्था के लिए मार्गदर्शन देना था। छोटे-बड़े सभी लोगों की प्रत्येक बात को ध्यान से सुनकर निर्णय देना था। क्षेत्र में कार्यरत कार्यकर्त्ताओं की समस्याओं के हल निकालने थे।
साधना करती थीं।
साधनात्मक एवं ज्योतिषीय अनुभूतियों का इतिहास साक्षी बन रहा था। इस वर्ष की बसन्त पंचमी को विश्व की महानतम आध्यात्मिक घटना घट चुकी थी। परम पूज्य गुरुदेव (पन्द्रह वर्षीय श्रीराम) ने अपने हिमालयवासी महागुरुदेव के मार्गदर्शन में अखण्ड साधना दीप प्रज्वलित किया था। उनकी चौबीस वर्षीय चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला इसी वर्ष प्रारम्भ हुई थी। इसके अतिरिक्त श्री अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी में महायोगी अरविन्द पूर्णयोग की विशेष सिद्धि को अवतरण करने की सफलता प्राप्त कर रहे थे।
साधना को देख नहीं सकती। फिर भी तू जिद करता है, तो चल थोड़ा बहुत बताए देती हूँ।
साधना में चले गए। परिपूर्ण एकान्त में चलने वाली इस साधना का मकसद विश्व-वसुधा पर छाते जा रहे आसुरी आतंक को निरस्त करना था। साथ ही तीसरे विश्वयुद्ध की उन भयावह सम्भावनाओं को समाप्त करना था जिसकी भविष्यवाणी एक अरसे से दुनिया भर के सभी भविष्यवक्ता करते चले आ रहे थे। सन् 1984 की रामनवमी को इस तरह योजनाबद्ध रीति से गुरुदेव के एकान्त में चले जाने के बाद मिशन के सूत्र संचालन का सारा दायित्व माताजी पर आ गया। इस दायित्व के साथ एक अन्य गुरुतर दायित्व भी उन पर था।
साधना के प्रसंग जितने गोपनीय रखे जाय उतना ही अच्छा है। चर्चा करने पर साधना का बल घटता है। ऐसा कहते हुए वह कहती- “अब मेरी ही ले लो। मैंने क्या-क्या किया कोई कुछ जानता है क्या? अखण्ड ज्योति संस्थान में आधी रात से पहले उठ जाती थी।
साधना बन जाता है। उससे ध्यान और समाधि की ही तरह योग-विभूतियाँ प्रकट होती हैं। माताजी की इन बातों में कोरा शब्द विस्तार नहीं अनुभूति का सत्य समाया था। अपने कामों के द्वारा वह हर पल-हर क्षण साधना किया करती थीं। उनका कहना था कि स्वार्थ और अहंकार के तत्त्वों की विषाक्तता से प्रायः सभी कर्म कलुषित होते रहते हैं।
साधना आदि नियमित कार्यों के साथ कार्यकर्त्ताओं को तरह-तरह से प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया था। सारे दिन एक के बाद एक गोष्ठियाँ चलती रहती। इन गोष्ठियों में वह भविष्य में होने वाले कार्यों का खुलासा करते, नयी योजनाएँ बनाते व समझाते। यह भी बताते कि उनके न रहने पर मिशन का किस तरह से विस्तार होगा और यह कैसे व किस ढंग से चलेगा। सारे कामों को करते हुए वह इन दिनों नयी-नयी पुस्तकों के रूप में क्रान्तिधर्मी साहित्य का भी सृजन कर रहे थे।
साधनाओं का अधिकारी बनाया था।
साधना का काल था। गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला अपने अन्तिम चरण में थी। अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका का प्रकाशन विधिवत प्रारम्भ हो चुका था। आज का विशालकाय गायत्री परिवार तब अखण्ड ज्योति परिवार के रूप में अंकुरित होने लगा था। इसकी उपयुक्त सार-संभार के लिए, सही पालन-पोषण के लिए माँ की आवश्यकता थी।
साधना स्थली गायत्री तीर्थ को अवतरित होना था। जमीन खरीदने के थोड़े समय बाद यहाँ पर प्रारम्भिक निर्माण कार्य शुरू हो गया। गुरुदेव बीच-बीच में आकर यहाँ की व्यवस्था देख जाते थे। साथ ही वे माताजी के साथ मथुरा की व्यवस्थाओं को भी अन्तिम रूप दे रहे थे। घर-परिवार की सभी जिम्मेदारियाँ भी इसी समय निबटायी जानी थी।
साधना दीप के सामने ध्यानस्थ नजर आता। उसके मुख मण्डल पर उन्हें अपूर्व तेजस्विता दिखाई देती। यह दृश्य उनके अंतर्मन में बार-बार उभरता।
साधना की आवश्यकता क्या है? तो बेटा! साधना मेरे लिए आवश्यकता नहीं, मेरा स्वभाव है। इसकी आवश्यकता मुझे नहीं तुम सब बच्चों को है। अब बच्चे तो बच्चे ठहरे, जाने-अनजाने उनसे न जाने कितने पाप-ताप हो जाते हैं। और जब उनके परिणाम सामने आते हैं तो कहते हैं- माताजी बचाओ।
साधना के ये पल अति विशिष्ट थे। इन पलों में उन्हें उन सब सत्यों का साक्षात्कार होता था, जिसके बारे में शास्त्र केवल संकेत मात्र करते हैं। जिसकी विस्तृत चर्चा विश्व के किसी भी साधना शास्त्र में नहीं मिलती। यथार्थ साधना शास्त्र गम्य होती भी नहीं है। यह तो सर्वथा गुरुगम्य है।
साधना कब करती हैं? करती हैं भी कि नहीं? और यदि करती हैं तो क्या करती हैं? हालाँकि अन्तःकरण को कुरेदने वाले इन सवालों की भ्रान्ति में पड़ने वाले लोग भी उनकी आध्यात्मिक शक्ति व सिद्धियों से अवगत थे। फिर भी अपनी ऊहापोह भरी भ्रान्ति में वे सत्य को समझने में असमर्थ थे।
साधना के क्षणों में उपयुक्त भूमि को तलाशने के प्रयत्न शुरू किए। एक-दो दिन के प्रयास में उन्हें एक भूमि पर प्रकाश पुञ्ज सा उठता दिखा। इसके आध्यात्मिक स्पन्दनों को उन्होंने अपनी अन्तर्चेतना में अनुभव किया। एक दिन गुरुदेव के साथ घूमने जाते समय उन्होंने यह भूमि प्रत्यक्ष में देखी। यह स्थान मथुरा से लगभग 1 किलोमीटर दूर मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर था।
साधना किया करती थीं। उनका कहना था कि स्वार्थ और अहंकार के तत्त्वों की विषाक्तता से प्रायः सभी कर्म कलुषित होते रहते हैं। इनके रहते हुए किसी भी कर्म का योग बनना सम्भव नहीं हो पाता। इनकी जगह यदि अपने आराध्य के प्रति निष्ठ और समर्पण की भावनाएँ कर्म में समाविष्ट हो जाय तो सब-कुछ बदल जाता है। कोई माने या न माने, फिर बर्तन माँजना, झाड़ू-पोछा करने जैसे हीन समझे जाने वाले काम भी ध्यान साधना का रूप ले लेते हैं।
साधना के भावपूर्ण स्वरों का उत्तर देने के लिए ही तो भावमयी माता भगवती अवतार लेती है। इसीलिए तो मातृतत्त्व की विशुद्ध चेतना घनीभूत होकर स्थूल रूप में प्रकट होती है। मानव की जन्म-जन्मान्तर की आध्यात्मिक अभीप्साओं का उत्तर देने के लिए ही मातृतत्त्व की दिव्य-ज्योति जन्म लेती है। उसके प्रकाश से लोकों के बाह्य आवरण ही नहीं जीवों के अन्तःकरण भी प्रकाशित होते हैं। युगशक्ति के अवतरण से हवाओं में अलौकिक सुगन्ध फैलने लगती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-July
साधना से ही अधिकाँश समस्याएँ सुलझ गयी होतीं। यदि स्वादेन्द्रिय पर काबू रखा जाता, तो अनावश्यक-अभक्ष्य खाने की ललक न उठती और पेट के संतुलित बने रहने पर पाचन-तंत्र में कोई व्यतिक्रम न खड़ा होता। कामुकता, मानसिक विकार है। लोग उसे शारीरिक माँग या आवश्यकता मानते हैं, जो कि सही नहीं है। यदि इस मोटे सिद्धाँत को समझ लिया जाय, तो फिर कामुकताजन्य जो अनेक अनाचार दीख पड़ते हैं, उनमें से एक भी कहीं दीख न पड़ता।
साधना में स्वयं के उत्कर्ष के साथ समूचे संसार का कल्याण सन्निहित है।
साधना पर ध्यान केन्द्रित करके हमें ऐसे क्षेत्रों में रहने के लिए आकर्षित नहीं होना चाहिए जहाँ की जलवायु उपयुक्त नहीं है। कारण कि जलवायु का प्रभाव स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही है, स्वभाव से भी उसका गहरा संबंध रहता है। शीतलता गर्मी की अपेक्षा अधिक उपयोगी है। यदि अवसर मिले तो अपने निवास के लिए ऐसे क्षेत्र का चयन करना चाहिए जिसमें हरियाली, शान्ति एवं शीतलता हो। ठंडे क्षेत्र प्राकृतिक न हों तो छोटे देहातों में प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति पैदा की जा सकती है।
साधना के रूप में मनुष्य का सर्वतोमुखी प्रगति के लिए-उत्कर्ष के लिए किया है। युगान्तरकारी महापरिवर्तन की प्रस्तुत संधिवेला में भी उसी की दिव्य शक्तियों का आवाहन किया गया है।
साधना हेतु विशेषतया इन्हें इसी रूप में प्रयुक्त करना चाहिए।
साधना आरण्यक तो यह है ही जिसमें सुसंस्कारित बीजों को अंकुरित होने के निर्मित प्रचुर परिमाण में ऊर्जा विद्यमान है। परिजन अगले दिनों बड़ी संख्या में गुरुदेव के कर्त्तृत्व रूपी विराट रूप को देखने यहाँ आयेंगे तथा प्रज्ञा आलोक के विस्तार का संदेश लेकर यहां से जायेंगे। निःशुल्क छात्रावास, प्रशिक्षण तथा अतिथि सत्कार का क्रम यहाँ पहले की तरह ही चलता रहेगा।
साधना करो। सन्त की आँखें किसी अदृष्ट को निहार रही थी। साधना की प्रक्रिया समझायी, युवक भी तन्मय होकर साधना करने लगा। एक दिन सन्त ने कहा - “ पुत्र तुम्हारे अन्दर योगी के लक्षण दीखने लगे हैं। तुम किसी भी अवस्था में क्यों न हो, इच्छा होते ही मुझे अपने पास अनुभव कर सकोगे।
साधना में इन्हीं शक्तियों का अवगाहन अवधारण किया और ओजस् तेजस् एवं वर्चस् की बहुमूल्य विभूतियों-सम्पदाओं से लाभान्वित हुआ जाता है।
साधना के तुरन्त बाद उनने अपनी गतिविधियों में तीव्रता लाकर भारत भर में राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों तथा दीपयज्ञों का ताना-बाना बुना था, शाँतिकुँज परिवार में विस्तार-क्रम आरंभ किया था और फिर क्रमशः अपने सारे उत्तरदायित्व वंदनीय माताजी को सौंपते हुए इस वर्ष वसंत पंचमी से मिलने-जुलने का क्रम बन्द कर दिया था, उससे भली-भाँति पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस वर्ष की जनवरी एवं मार्च की अखण्ड-ज्योति जिनने पढ़ी हो तथा अप्रैल की इक्कीसवीं सदी लेखमाला का अवलोकन किया जो, उन्हें अनुमान हो गया होगा कि वसंत पर्व पर महाकाल के संदेश में दिये गये निराकरणों का ही उनमें निर्वाह हुआ था। सभी में स्पष्ट संकेत था कि वे अब सूक्ष्म शरीर की सत्ता से ही सक्रिय रह परिजनों के और निकट आ जायेंगे एवं इस वर्ष कभी भी अपनी पार्थिव देह छोड़ सकते हैं।
साधना द्वारा ऐसा आत्म परिष्कार करना होता है, जिसके आधार पर विश्व-उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा-सुषमा का वातावरण विनिर्मित कर सके। जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ अपनाते हैं, तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आ पड़ी है, जिसके कारण उसे अनावश्यक संग्रह और उच्छृंखल उपभोग के लिए आकुल-व्याकुल होकर पग-पग पर अनर्थ सम्पादित करते फिरना पड़।
साधना का परिचय देने का साहस जुटा पाया।
साधना करने लगा। एक दिन सन्त ने कहा - “ पुत्र तुम्हारे अन्दर योगी के लक्षण दीखने लगे हैं। तुम किसी भी अवस्था में क्यों न हो, इच्छा होते ही मुझे अपने पास अनुभव कर सकोगे।
साधना मनोयोगपूर्वक करनी पड़ी थी। हर सफलता प्राप्त करने के आकाँक्षी को चाहे वह किसी भी क्षेत्र की ही हो, ऐसी ही एकाग्रता भरा मनोयोग जुटाना पड़ता है।
साधना एक ही तथ्य के स्थूल और सूक्ष्म रूप हैं। सूर्य विज्ञान से भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का सुयोग मिलता है तो सविता साधना से आध्यात्मिक उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं वैदिक युग में सूर्योपासना सर्वोपरि थी। वेद एवं उपनिषदों में सूर्य को जगत की आत्मा के रूप में उल्लेख किया गया है और कहा गया है कि सारा जगत उसी से प्रकाशित होता और प्राणवान बनता है। वह जीवनी शक्ति और चेतना शक्ति का घनीभूत रूप है। सबको वर्चस् और ज्योति उसी से मिलती है।
साधनात्मक प्रयत्न से इस परम स्थिति तक पहुँच सकता है। जैन धर्म ग्रन्थों में ईश्वर के अस्तित्व का वर्णन इस प्रकार भी देखने को मिलता है “मैं उस निरंजन को नमस्कार करता हूँ, जो अनेक में एक है और एक में अनेक है और जो न एक है और न अनेक में है
साधना उपक्रमों के आधार पर विकसित होती हुई चेतना अपनी अन्तिम स्थिति को पहुँच जाती है, जिसे ही पूर्णता की निर्वाण की प्राप्ति कहा जाता है। नर का नारायण में मनुष्य का देवत्व में परिवर्तन भी।
साधनारत युवक के प्राणों ने शरीर छोड़ दिया। शरीर छोड़ने के बाद भी उसके प्राण सचेतन थे। उसने देखा कि वह एक अन्धेरी, संकीर्ण, दुर्गन्ध भरी गुफा में प्रवेश कर रहा है। दुःख और क्रोध से तमतमा कर उसने गुरु को पुकारते हुए कहा यही है आपका सत्य? आपने कहा था मैं सम्राट बनूँगा, अपने कहा था मैं योगी बनूँगा और मैं यह नारकीय यातना भुगत रहा हूँ।
साधना से आध्यात्मिक उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं वैदिक युग में सूर्योपासना सर्वोपरि थी। वेद एवं उपनिषदों में सूर्य को जगत की आत्मा के रूप में उल्लेख किया गया है और कहा गया है कि सारा जगत उसी से प्रकाशित होता और प्राणवान बनता है। वह जीवनी शक्ति और चेतना शक्ति का घनीभूत रूप है। सबको वर्चस् और ज्योति उसी से मिलती है। प्राणियों की उत्पत्ति, पोषण आदि का तथा संसार की सृष्टि, स्थिति और संहार का निमित्त कारण भी सूर्य है, वरन् वह आरोग्यकारक, अनिष्ट निवारक एवं पीड़ा पतन का बिगाड़ का परिहार करने वाला भी है।
साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शूद्र ऐतरेय भी ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल और कौण्डिलायन शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ है। ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेकों को सुपथ पर चलना सिखाए।
साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल और कौण्डिलायन शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ है। ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेकों को सुपथ पर चलना सिखाए। इस कसौटी पर कसे जाने.....।
साधनाओं में से प्रत्येक का यही स्वरूप एवं यही प्रतिफल है। जो मात्र कर्मकाण्डों को ही साधना मान बैठते हैं, वे भूल करते हैं। शारीरिक अथवा पदार्थपरक क्रिया-कृत्यों का मूल्य नगण्य ही होता है। श्रमिक दिन भर काम करके थोड़ा-सा पारिश्रमिक पाते हैं, फिर कुछ समय तक किये जाने वाले जप-ध्यान आदि का कोई बड़ा माहात्म्य या मूल्य कैसे हो सकता है? इतने पर भी जिनका यही आग्रह है कि अमुक जप या पूजन की असाधारण महत्व होना चाहिए, उतने भर से बढ़ी-चढ़ी सिद्धियाँ मिलनी चाहिए, उनकी मान्यता फलीभूत नहीं होती।
साधना की प्रक्रिया समझायी, युवक भी तन्मय होकर साधना करने लगा। एक दिन सन्त ने कहा - “ पुत्र तुम्हारे अन्दर योगी के लक्षण दीखने लगे हैं। तुम किसी भी अवस्था में क्यों न हो, इच्छा होते ही मुझे अपने पास अनुभव कर सकोगे।
साधना मान बैठते हैं, वे भूल करते हैं। शारीरिक अथवा पदार्थपरक क्रिया-कृत्यों का मूल्य नगण्य ही होता है। श्रमिक दिन भर काम करके थोड़ा-सा पारिश्रमिक पाते हैं, फिर कुछ समय तक किये जाने वाले जप-ध्यान आदि का कोई बड़ा माहात्म्य या मूल्य कैसे हो सकता है? इतने पर भी जिनका यही आग्रह है कि अमुक जप या पूजन की असाधारण महत्व होना चाहिए, उतने भर से बढ़ी-चढ़ी सिद्धियाँ मिलनी चाहिए, उनकी मान्यता फलीभूत नहीं होती। उन्हें निराश ही रहना पड़ता है।
साधना द्वारा अपनी चेतना का जो व्यक्ति जिस सीमा तक विकास कर लेता है, उसी अनुपात से वह आत्मिक प्रगति के उच्च सोपानों पर आगे बढ़ता और दिव्य क्षमताएँ अर्जित करता जाता है। योग एवं तप के द्विविध साधना उपक्रमों के आधार पर विकसित होती हुई चेतना अपनी अन्तिम स्थिति को पहुँच जाती है, जिसे ही पूर्णता की निर्वाण की प्राप्ति कहा जाता है। नर का नारायण में मनुष्य का देवत्व में परिवर्तन भी।
साधना जैसे आध्यात्मिक उपाय-उपचार मानवी चेतना की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही विनिर्मित किये गये हैं।
साधना है। इन्हीं माध्यमों से मन एकाग्र होता है, बिखरी शक्तियों के केन्द्रीकरण का चमत्कार दृष्टिगोचर होता है।
साधना है। मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान है। इसकी साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शूद्र ऐतरेय भी ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल और कौण्डिलायन शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ है।
साधना के शीर्ष तक स्वयं को पहुँचाया, अगणित व्यक्तियों को जाति, वंश, लिंग, वर्ण का भेद किए गायत्री उपासक बना दिया उसके लिए महानिर्वाण के लिए इससे श्रेष्ठ दिन और हो भी क्या सकता था।
साधना विधानों की सहायता से उसी की दिव्य शक्तियों को आकर्षित किया जाता है और साधन को भौतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से सर्व समर्थ बनने का अवसर मिलता है। प्राचीन काल के दिव्यदर्शी ऋषि-मनीषी इस तथ्य से भलीभाँति परिचित थे। उनने भूतकाल से ही सूर्य का उपयोग सविता-साधना के रूप में मनुष्य का सर्वतोमुखी प्रगति के लिए-उत्कर्ष के लिए किया है। युगान्तरकारी महापरिवर्तन की प्रस्तुत संधिवेला में भी उसी की दिव्य शक्तियों का आवाहन किया गया है।
साधनाओं के संबन्ध में यही बात है यम-नियम जीवन के चिन्तन-चरित्र एवं आचरण में उतारने पड़ते हैं। आसन व्यायाम नहीं, वरन् आसन जमा कर बैठना है। रसोई भी आसन पर बैठकर की जाती है। बाल-चाल की भाषा में किसी कार्य के लिए दृढ़तापूर्वक आरूढ़ होना भी आसन लगाना या आसन जमाना है। प्राणायाम प्राणवान बनने के लिए किया जाता है।
साधना माना गया होता और उसके सदुपयोग-दुरुपयोग का आरंभ से ही ध्यान रखा गया होता, तो सदा-सर्वदा हर किसी को हँसती-हँसाती जिन्दगी जीने का अवसर मिलता। जिन विग्रहों और अनाचारों का आये दिन सामना करना पड़ता है, उनमें से एक भी हैरान करने के लिए सामने न आते। इस संसार में ऐसी एक भी कठिनाई नहीं है, जिसका बुद्धिमत्ता अपनाने पर समाधान न खोजा और निवारण निराकरण का मार्ग न निकाला जा सके यह संसार भगवान का सुरम्य उद्यान है। उसमें हर दिशा में, हर प्रकार की सुविधाएँ ही भरी पड़ी हैं, जहाँ-कहीं प्रतिकूलताएँ दीख पड़ती हैं, वहाँ समझना चाहिए कि चिन्तन में कहीं कोई गड़बड़ी पड़ गई है। यदि ऐसी खोट को ढूँढ़ लिया जाय, तो वह कारण सहज ही समझ में आ सकता है।
साधना से जिस चमत्कारी शक्ति-सम्पदा की उपलब्धि होती है, उसका उद्गम केन्द्र ‘सविता’ है गायत्री का अधिपति सविता देवता है। विशिष्ट साधना विधानों की सहायता से उसी की दिव्य शक्तियों को आकर्षित किया जाता है और साधन को भौतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से सर्व समर्थ बनने का अवसर मिलता है। प्राचीन काल के दिव्यदर्शी ऋषि-मनीषी इस तथ्य से भलीभाँति परिचित थे। उनने भूतकाल से ही सूर्य का उपयोग सविता-साधना के रूप में मनुष्य का सर्वतोमुखी प्रगति के लिए-उत्कर्ष के लिए किया है। युगान्तरकारी महापरिवर्तन की प्रस्तुत संधिवेला में भी उसी की दिव्य शक्तियों का आवाहन किया गया है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-September
साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया।
साधना के समग्र रूप का प्रस्तुतीकरण गायत्री महाविज्ञान के तीन खण्ड रचकर किया जो कि एक प्रकार से विश्वकोष माने जा सकते है। उस में उनने लिखा है कि मंत्राराधना के अतिरिक्त एक निष्ठावान साधक को अपनी जीवनचर्या में उपासना, साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिए।
साधना सत्र चलते रहे। आयुर्वेद के राष्ट्रीय बोर्ड से वे मान्यता प्राप्त वैद्य थे।
साधना करते थे। इन दोनों ही तत्वों को वे अपने आत्मदेवता में समाविष्ट मानते थे। उनका मन था कि जिसने अन्तःकरण को तपोवन बना लिया व वहाँ एकनिष्ठ होकर ब्रह्म चेतना से तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास किया, वही सच्चा साधक है।
साधना करता रहा है।
कह उठ जग क्रान्ति करने, फिर मसीहा आ रहा है॥3॥
साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे। योगीराज अरविन्द ने भी वेद पुरी को ही अपनी तपःस्थली बनाया जो महर्षि अगस्त की तपोभूमि थी। रावण महाबली था पर तप शक्ति से डरता था। उसके निर्देश थे कि उसके असुर उत्तर में कहीं भी जाएँ पर वेदपुरी जहाँ आज पांडिचेरी स्थित है से कोसों दूर रहें क्योंकि उस स्थान के प्रभामण्डल का प्रभाव असुरत्व के लिए विनाशकारी था। गोविन्द पाद जो आद्य शंकराचार्य के गुरु थे, ने अमरकण्टक को अपनी साधना स्थली बनाया, वहीं पर आचार्य शंकर को चारों धामों की यात्रा करने का उपदेश दिया व शक्ति प्रदान की।
साधना का क्रियापक्ष था व पूज्य गुरुदेव का” इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य “ उद्घोष यही से प्रकट हुआ। उज्ज्वल भविष्य का मूल आधार उनने अपना संकल्पबल बताया जो उच्चसत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया। इसी अंक में उनने लिखा कि इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमने स्थूल शरीर से काम लेना प्रायः बंद कर दिया है। उसके साथ एक हल्का तंतु ही जुड़ा रखा है। जब उसकी भी आवश्यकता न रहेगी तो एक झटके से इसे भी तोड़कर अलग कर देंगे।
साधना कहा, जिसमें वे पाँच शरीरों से भिन्न भिन्न कार्य सूक्ष्मजगत में करना चाहते थे। वंदनीया माताजी ने इस सम्पादकीय में लिखा कि “ हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गये है और न पलायन ही कर रहे है, वरन् वे सूक्ष्मीकरण की जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़त कर रहे है।” यह आश्वासन उन के लिए था जिन्हें अचानक परामर्श-वार्तालाप विचार विनिमय का क्रम समाप्त होने पर खिन्नता अनुभव हो रही थी।
साधना अब तक चली थी, व अगले दिनों और प्रचंड रूप में चलनी थी, वही इस पत्रिका का नाम बनकर आया व सभी परिजनों को इसका इतिहास बताते हुए उनने दो हजार पते जो छाँटे थे, उन्हें नमूने की एक-एक प्रति भेज दी कि यदि आपको पसंद आये तो आप अन्य पाँच व्यक्तियों को भी इसे पढ़ायें। वे भी ग्राहक बनना चाहें तो जब सुविधा हो तब चन्दा भेज दें। मूल्य था प्रत्येक पत्रिका का नौ पैसा, वार्षिक डेढ़ रुपया।
साधना पूज्य गुरुदेव के जीवनकाल एवं मिशन के इतिहास का एक अतिमहत्त्वपूर्ण मोड़ है। इस अवधि में उनकी तप साधना सूक्ष्म रूप से पाँच वीरभद्रों को क्रियाशील बनाने में लगी रही व लेखनी” अखण्ड-ज्योति” एवं” युगशक्ति-गायत्री” के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के मन को सतत् मथती रही। इसी दौरान सन 1985 का वर्ष उनकी आयुष्य का पचहत्तरवां वर्ष होने के कारण ही रजत जयन्ती वर्ष मनाया गया एवं इसी वर्ष अप्रैल 1985 में उनने अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर पहली बार प्रकाश डाला। इन्हीं लेखों व सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ।
साधना उस क्रिया कलाप तक ही सीमित नहीं थी।
साधना जुड़ी है, वह भी स्वयं की, वह कर पाना हरेक के लिए शक्य नहीं है, तो उस अखण्ड दीप व अखण्ड-ज्योति से लाभ उठायें जो क्रमशः प्रत्यक्ष अग्नि व लेखनी रूपी संजीवनी के रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत है। तीर्थों का जो महत्व होता है, उससे कहीं अधिक महत्व ऐसी सिद्ध ज्योति का है जिसमें तिल-तिल कर एक साधक ने अपना जीवन होम किया व न केवल अपनी कुण्डलिनी जाग्रत की विश्वात्मा की कुण्डलिनी जगाने हेतु सूक्ष्मीकृत-घनीभूत हो जो अभी भी परोक्ष जगत में सक्रिय है।
साधना कराके उनकी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर प्रमाणित कर दिया। अन्यान्य देवताओं की अनुकम्पा पाने हेतु भटकने वालों के लिए उनका एक ही संदेश था कि एक ही मंत्र ऐसा है जो संसार भर के सभी मंत्रों की बराबरी करता है, वह है गायत्री मंत्र। सभी अवतारों ने इसकी उपासना की तथा महामानवों, ऋषिसत्ताओं ने भी। फिर जगह जगह कुआँ खोदते रहने की विडंबना क्यों रची जाय? आज के बुद्धिवादी युग में महाप्रज्ञा के तत्वदर्शन के विस्तार की और अधिक आवश्यकता है।
साधना की।
स्वर्ग से कम की, नहीं कुछ कल्पना की॥
साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
साधना और लोक सेवा की एक लम्बी मंजिल पार कर चुके हैं। इस जन्मे में प्रचण्ड तप आरंभ करना था उसका स्वरूप उनने बता दिया। वह था चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न करना और उन दिनों जौ की रोटी तथा छाछ (मट्ठा) अथवा उस न्यूनतम पर निर्वाह करना जो तप तितिक्षा की श्रेणी में आता है। समर्थता सम्पादन के लिए यह प्रचण्ड तपोबल अर्जित करना जरूरी था यह उन तीन कार्यों में से एक था जो सूक्ष्म ऋषि सत्ताओं से साक्षात्कार के बाद प्रथम हिमालय यात्रा के अवसर पर पूज्य गुरुदेव को बताये गये थे। अन्य दो कार्य थे अपना अध्ययन जारी रख लेखनी की साधना द्वारा युग संजीवनी जन जन तक पहुँचाना, विचारक्राँति का सरंजाम जुटाना तथा तीसरा कार्यक्रम था स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहना।
साधना करवा ली, ऐसे श्री राम के पिता ने सच्चे मार्गदर्शक की वह भरी भूमिका निभाई जो गुरु के साक्षात्कार से पहले संपन्न होनी ही थी।
साधना को करने के लिए हम उन्हें अनुरोधपूर्वक प्रेरित करेंगे कि वह दिन-रात में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय निकालें और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचें कि वे क्या हैं? वे सोचें कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं जो मनुष्य होने के नाते उन्हें सौंपा गया था। मन से कहिए कि वह निर्भीक सत्यवक्ता की तरह आपके अवगुण साफ साफ बताए।” यह शैली ऐसी लगती है जैसे किसी को व्यक्तिगत पत्र लिखा जा रहा हो। हर पाठक इन्हें पढ़ने के बाद ऐसा अकुलाता था कि उनके संपर्क में आने के बाद निरन्तर संपर्क बनाये रखने को उत्सुक रहता था।
साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिए।
साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ।
साधना द्वारा इस प्रचण्ड गति प्रदान की अब वे सूक्ष्म व कारण शरीर से सक्रिय है व सुरक्षा कवच पूरी मानव जाति के लिए विनिर्मित कर रहे है। यदि उनके बताए निर्देशों को हम जीवन में उतारते चलें तो यह परिवर्तन भावी पाँच वर्षों में ही बड़ी तेजी से भारत से आरंभ होकर विश्वभर में संव्याप्त होता दृष्टिगोचर होगा। जागृतात्माओं को यही तो उस सत्ता का अन्तिम संदेश भी था।
साधना में नियोजित कर दी। इस अवधि में कितनी ही बार में नियोजित कर दी। इस अवधि में कितनी ही बार निराहार रहना पड़ा, मात्र मट्ठे पर ही जीकर अपनी काया का अनिवार्य किन्तु सीमित पोषण वे करते रहे। वस्तुतः यह तो उनकी स्थूल व दृश्य साधना थी। मोटे तौर से जितना देखा जा सके, उतना ही तो समझा जा सकता है।
साधना का दर्शन तत्वज्ञान सिखा रहा है।
साधना नाम दिया गया। प्रकारान्तर से इस अंक में पूज्य गुरुदेव द्वारा सम्पन्न सूक्ष्मीकरण साधना एवं अगले दिनों सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्पन्न होने वाली साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना तथा अपनी उपासना सम्पन्न की। प्रस्तुत पंक्तियाँ भी उसी अखण्ड दीपक के प्रकाश में परोक्ष प्रेरणा से लिखी जा रही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ नहीं है, दिव्य धना का तपोबल जो पूज्य गुरुदेव रूपी ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महामानव के रूप में सिद्ध हुआ ही इसके मूल में कार्य कर रहा है वह आगे भी करता रहेगा।
साधना का पोषण सुपात्र साधन द्वारा किया जा रही हो। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं है कि किसी और से करा लिया जाय। जप-अनुष्ठान भी स्वयं करना पड़ता है, तप-तितीक्षा भी स्वयं करनी पड़ती है तथा आत्मशोधन को अनिवार्य अंग मानते हुए उसे सतत् निभाना पड़ता है। यही कार्य पूज्य गुरुदेव व वंदनीया माता जी ने किया तथा आज भी वह अखण्ड दीपक जो 64 वर्षों से जल रहा है, शांतिकुंज में स्थापित है। समस्त प्रेरणाओं व सिद्धियों का वह स्रोत है।
साधना नहीं ब्राह्मणत्व का चमत्कार कहिए। तप साधना तो अभी तिजोरी में बन्द है। “ब्राह्मणत्व? ब्राह्मण तो अनेकों है” शायद यह मन्तव्य समझ नहीं पाये थे। उनका जवाब था “ब्राह्मण वह है जो समाज से न्यूनतम लेकर समाज को अधिकतम दे।
साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना से जोड़ने का उनका तरीका स्वयं में निराला था एवं अध्यात्म को सही प्रगतिशील दिशा देने वाला भी। लाखों व्यक्तियों को इस प्रकार उनने अपनी ही मुक्ति, वैराग्य, समाधि वाले चिन्तन से विरत कर लोकसेवी बना दिया। यह एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कर सकता था। धर्म के संबंध में जो भ्राँतियाँ संव्याप्त हैं एवं जनोपदेशक जो भी कुछ कहकर उन्हें पोषण देते रहे है, उनसे जूझना व योद्धा की तरह संघर्षरत रह बिना विचलित हुए लक्ष्य सिद्धि तक पहुंच जाना उनके व्यक्तित्व के एक अनूठे पक्ष को प्रस्तुत करता है।
साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना में लगा सकें। आज की परिस्थितियों में यह भले ही अव्यावहारिक प्रतीत होता हो किन्तु मिशन का सूत्र संचालक जिन आदर्शों पर जीवन भर चला था, उनके माध्यम से ही अपनी रीति नीति का निर्धारण कर रहा था। यदि इसे एक आदर्श शुरुआत कहें तो उचित होगा क्योंकि वे आने वाले दिनों में प्रज्ञा परिजनों प्रवासियों तथा विश्वभर के नागरिकों में घूम घूम कर प्रचार करने वाले विवेकानन्दों, रामतीर्थों, कुमारजीवों, महेन्द्रों व संघमित्राओं के लिए एक उदाहरण सामने रखना चाहते थे। यह यात्रा एक बीजारोपण मात्र थी इसलिए सूत्र संचालक ने 80 वर्ष के जीवन के अढ़ाई माह इस कार्य के लिए निर्धारित कर दिए किन्तु यह कार्य बाद में भी सतत् चलना ही था।
साधना करा के अपने कार्य को उनके माध्यम से आगे बढ़ाने का संकल्प दिलाते हैं। वे एक विशाल परिवार की, जो मात्र सत्प्रवृत्तियों की स्थापना को कृतसंकल्प है, संरचना कर अपना कार्यभार अपनी धर्मपत्नी को सौंपकर स्वयं सूक्ष्म शरीर से गतिशील व सर्वव्यापी बनने महाप्रयाण कर जाते हैं।
साधना सीखकर स्वयं को गढ़ सके। विद्या विस्तार का उनका यह क्रम स्वयं के लिए भी, औरों को वितरित करने के रूप में भी आजीवन चलता रहा।
साधना पर विशेष ध्यान देने की चर्चा अपने विशेष स्तम्भ में करना आरंभ कर दी थी। अब तक उनकी स्वयं की कोई प्रशिक्षण स्थली भी मथुरा में नहीं थी, जिसमें वे आगन्तुक जिज्ञासुओं को ठहराते एवं संगठन की महत्ता समझाते, उनकी शंकाओं का समाधान करते अथवा परामर्श द्वारा प्रेरणा देते। जो भी परिजन आते वे घीयामण्डी मथुरा वाले घर में ही मिलने आते थे। स्थान छोटा था पर हर व्यक्ति उनका आतिथ्य पाकर जाता। न्यूनतम में अपना निर्वाह कर वे औरों का आतिथ्य कैसे कर पाते होंगे एवं साथ ही अपनी साधना का क्रम भी निर्बाध गति से चला कर पत्र परामर्श एवं सम्पादन कार्य भी करते रहे यह एक रहस्यमय प्रसंग है।
साधना से सिद्धि’ का सिद्धान्त सही है या गलत। इसका परीक्षण उनने स्वयं पर किया। सारे सुयोग वैसे ही बनते चले गये एवं संकल्प को प्रयास रूप में परिणत होने का योग भी मिल गया।
साधनास्थली है। हव ऐसा पारस है जिसका स्पर्श मात्र कर व्यक्ति तपे कुन्दन की तरह निखर जाता है।
साधना के प्राथमिक पाठों में आत्मशुद्धि व पात्रता संवर्धन की महत्ता समझाने के बाद उनने भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रतीकों का मर्म समझाना आरम्भ किया। इस क्रम में शिखा और सूत्र की उपयोगिता, उन्हें धारण करने का विनम्र अनुरोध, उनका वैज्ञानिक आधार, गंगा-गौ गायत्री-गुरु गीता का महत्व स्वास्तिक, तुलसी, प्रतिमा, देवालय, तीर्थ, पर्व-संस्कार आदि सभी पक्षों पर महत्वपूर्ण विवेचन करते हुए शिक्षण संस्कार की प्रक्रिया चलाई।
साधना हेतु बैठे थे वह बोली-”साधक! क्या तुझे आत्मा में रस नहीं आता जो सिद्धि व मुक्ति की बात सोचता है। भगवान के दर्शन से क्या भक्ति भावना में कम रस है? मिलन से क्या विरह कम गुदगुदा है। मैं। तिल तिल अपने को घिस रही हूँ।
साधना के दिनों को छोड़कर नित्य वे मिलते ही रहे, उनमें प्राण फूँकते रहे, उनका मनोबल बढ़ाते रहे वह दैनन्दिन जीवन संबंधी मार्गदर्शन, साधना संबंधी मार्गदर्शन तथा परिस्थितियों के अनुकूल कैसे मनःस्थिति बदली जाय यह वह बड़े ममत्व व लगन के साथ बताते थे। कार्यकर्ताओं के हृदय के सम्राट उन्हें कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।
साधना संबंधी मार्गदर्शन देकर उनने कहीं से कहीं पहुँचा दिया तथा जिन्हें अपने तप का एक अंश देकर विभूति संपन्न बना दिया अथवा कष्ट निवारण में उनकी मदद की, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि वे एक ऐसे सिद्ध स्तर के साधक थे जो सतत् कमाने व पूँजी को दिल खोल कर सुपात्रों में बाँटने में ही विश्वास रखते थे। स्वयं के लिए अथवा आत्मीयों के लिए अपने निज के तपोबल का, अर्जित सम्पदा का उनने कभी उपयोग नहीं किया। वे लिखते हैं कि हमने अपने लिए व आत्मीय निकटस्थ परिजनों के लिए दवा दारु का ही प्रयोग किया हैं। वस्तुतः किसी दुखी की वेदना बाँटनी पड़ी तो सबने मिलकर बाँटी है। इतना जरूर किया कि किसी के कष्ट को मृत्यु स्तर से कम कर छोटी-मोटी दुर्घटना के रूप में टाल दिया गया।
साधना के चमत्कारी प्रसंगों का प्राकट्य अन्यान्य महापुरुषों की तरह शैशवकाल से ही होने लगा था। ऐसे महापुरुष की जीवनी को, विभिन्न संस्करणों को लिपिबद्ध करना कितना पुष्कर कार्य हो सकता है, इसकी कल्पना सामान्य पाठक नहीं कर सकते। संभव है कुछ अविज्ञात घटनाक्रम ऐसे उनके शैशवकाल से संबंधित इस स्मारक अंक से छूट जाएँ जिनकी फलश्रुतियाँ आगे चल कर देखने को मिली तो इसे संकलनकर्ताओं का-संपादकों का प्रमाद माना जाए।
साधना है, हम ममता है, गरिमा हैं। आँचल में जीवनधारा है, कर में आतुर राखी है। मस्तक पर सिन्दूर बिन्दू, अनुराग त्याग की सीमा है। गृहिणी, सहधर्मचारिणी, कुल दीपक की बाती हैं।
साधना के दौरान वे आने वाले भविष्य का ताना बाना बुन रहे थे। अपने स्थूल शरीर के क्रिया–कलापों को सीमित कर सूक्ष्म से और अधिक व व्यापक क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए स्वयं पीछे हट रहे थे व वंदनीया माताजी को इस भूमिका के लिए तैयार कर रहे थे, जो उन्हें उनके महाप्रयाण के बाद निभानी थी। यह सारा सुनियोजित उद्देश्यों के लिए धरती पर आयी हो, समर्पित जीवन जी चुकी हो, काया की क्षमता से सौ गुनी अधिक काम कर चुकी हो एवं निरन्तर उनके बताए सूत्रों पर चलने वालों को मार्गदर्शन देते रहने का आश्वासन देकर नवसृजन की आधारशिला रख रही हो। अवतार रूप पूज्य गुरुदेव का विभिन्न कर्तव्यों में तो प्रकट होता ही है, विविध रूपों में समय समय पर व्यक्त उनके उद्गारों में भी। झलकता है।
साधना की सफलता का मूल तो साधक की अटूट निष्ठा एवं आत्मशोधन है किन्तु ऐ अक्ष जो बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह है सुसंस्कारिता साधना स्थली में साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना। जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्धि कर लेते है। वातावरण की अपनी महत्ता है। देवात्मा हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के मध्य गंगा किनारे की गई उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे।
साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया। यही साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधना द्वारा युग निर्माण आँदोलन का परोक्ष सूत्र संचालन, प्राण प्रत्यावर्तन के सघन अनुदान, नारी जागरण का अभिनव सूत्रपात, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की स्थापना का भागीरथी प्रयास तथा प्रवासी भारतीयों में देव संस्कृति का विस्तार में से चार की चर्चा तो हो चुकी। पाँचवाँ प्रसंग विदेश में बसे प्रवासियों व नागरिकों को देव संस्कृति के महत्वपूर्ण निर्धारणों से अनुप्राणित कर उन्हें उस केन्द्रीय धुरी से जोड़ना था जो प्राण संचार करती रह सके। इस के लिए दिसम्बर 1972 से स्वयं पूज्य गुरुदेव ने अढ़ाई माह की अफ्रीका के पूर्वी भाग की यात्रा की। यह यात्रा कई उद्देश्यों से जरूरी थी।
साधना का यह चमत्कार था कि एक स्वर से सारे भारत के महात्मागण उन्हें गायत्री विद्या व उसकी साधना पद्धति का एक अनुभवी निष्णात विद्वान मानते थे। ब्रह्मलीन श्री देवरहा बाबा से विगत महाकुँभ पर्व पर इलाहाबाद में मिशन से जुड़े एक उच्चाधिकारी ने पूज्य गुरुदेव के विषय में पूछा कि आपकी उनके संबंध में क्या मान्यता है? तो देवरहा बाबा ने पूर्व की ओर मुख करके कहा कि “साक्षात् सविता का जो रूप है, ब्रह्मतेज सम्पन्न उस अवतारी सत्ता को मेरा नमन है। वे माँ गायत्री के सिद्ध साधक है व युगपरिवर्तन उन्हीं के बताये पद चिह्नों पर चल कर होगा।” युग निर्माण योजना से प्रत्यक्ष उनके क्या संबंध है, यह पूछने पर दीर्घ-जीवी उस महापुरुष ने कहा कि “सभी देवसत्ताएं धरती पर सतयुग लाने को जन्मी है।
साधना पद्धति को जितना समीप से, गहराई से वंदनीया माता जी ने देखा व समझा था उतना अवसर शायद ही किसी को मिला हो। वंदनीया माता जी कहा करती हैं कि गुरुदेव ने जितना कड़ा तप किया है, उतने ही दिव्य अनुदान उन्हें मिले हैं। वस्तुतः उनका सारा जीवन तपोमय रहा हैं सब कुछ साधन व कमा सकने की असीम संभावनाएं होते हुए भी जो अपनी भौतिक महत्त्वाकांक्षाओं पर कड़ा नियंत्रण लगा ले, वह सही अर्थों में जीवन संग्राम में प्रतिकूलताओं से लड़ रहा, एक जुझारू योद्धा है जिसे मात्र औरों के हित की समाज के उत्थान की ही एक मात्र आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षा है।
साधना, हमें सातना, कैसा खेल विधाता का।
किस दर्पण में कहाँ निहारें, प्रियदर्शी मुख त्राता का॥
साधना, साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना काल रूपी पूर्वार्द्ध की पूर्णाहुति के लिए एवं भावी गतिविधियों को क्रिया रूप देने के लिए जिस स्थान का चयन किया, वह महर्षि दुर्वासा की तपःस्थली था। यह स्थान यमुना किनारे मथुरा से वृन्दावन जाने वाले मार्ग पर स्थित था। वे अखण्ड ज्योति के जनवरी 1942 अंक में लिखते है कि “मथुरा में गायत्री तीर्थ बनने की योजना किसी व्यक्ति के संकल्प से नहीं वरन् माता की प्रेरणा से बनी है। ब्रह्मविद्या के गंभीर अन्वेषण एवं विशद विस्तार के लिए एक केन्द्रीय स्थान जरूरी था। कितने ही सूक्ष्म एवं रहस्यमय कारणों से वह स्थान मथुरा चुना गया व अब वहाँ गायत्री माता का मन्दिर व तपोभूमि बननी है।
साधना जिसने एक वर्ष बाद ही सूक्ष्मीकरण साधना का रूप ले लिया। प्रारंभ में जो उलाहना दिया गया वह भी ऋषि चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है।
साधना के अनुदान बाँटता चला गया। उसके गुरु ने उनसे कहा, “सौ हाथों से कमाना, हजार हाथों से लुटाना। जितना तुम समाज रूपी खेत में बोओगे कई गुना तुम्हें वापस मिलेगा, उसे काटना व वितरित कर देना।” ऐसे औघड़दानी को साक्षात् रुद्र न कहा जाय तो क्या कहें? नवनीत और हिमखण्ड जब गलते और पिघलते रहते हैं तथा अपने तप अनुदान सहज वितरित करते रहते हैं।
साधना को साथ जारी रखते हुए परिजनों से सीमित रूप में मिलते रहने का क्रम पुनः बना लिया, जो निर्बाध गति से बसंत पर्व 1990 तक चलता रहा। इन चार वर्षों की अवधि में जो कार्य उनके मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ, वह विगत चालीस वर्षों के बराबर हुआ माना जा सकता है। इसी अवधि में उनने कार्यक्षेत्र से जुड़े कार्यक्रमों को नई गति दी। सात लाख गाँवों व एक लाख कस्बों तक पहुँचने के लिए एक नई कार्यशैली निर्धारित हुई। पूर्णाहुति वर्ष होने के कारण एक हजार 108 कुंडीय गायत्री यज्ञों व इतने ही छोटे 24 कुण्डीय यज्ञों को मनाने का निर्णय 1986 में ही लिया गया।
साधना, कोई न छूटी॥
साधना के कठिन मार्ग पर चलते हुए तप साधना और लोक सेवा की एक लम्बी मंजिल पार कर चुके हैं। इस जन्मे में प्रचण्ड तप आरंभ करना था उसका स्वरूप उनने बता दिया। वह था चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न करना और उन दिनों जौ की रोटी तथा छाछ (मट्ठा) अथवा उस न्यूनतम पर निर्वाह करना जो तप तितिक्षा की श्रेणी में आता है। समर्थता सम्पादन के लिए यह प्रचण्ड तपोबल अर्जित करना जरूरी था यह उन तीन कार्यों में से एक था जो सूक्ष्म ऋषि सत्ताओं से साक्षात्कार के बाद प्रथम हिमालय यात्रा के अवसर पर पूज्य गुरुदेव को बताये गये थे। अन्य दो कार्य थे अपना अध्ययन जारी रख लेखनी की साधना द्वारा युग संजीवनी जन जन तक पहुँचाना, विचारक्राँति का सरंजाम जुटाना तथा तीसरा कार्यक्रम था स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहना।
साधना, स्वाध्याय,
साधनाकारी।
‘बंधन से निर्वाण’ सिखाती, वाणी वीर तुम्हारी॥
साधना करना ऐसे जीवन्त उदाहरण दिए है। पूज्य गुरुदेव की संभाषण व व्याख्यान की शैली भी यही थी। जीवन से जुड़े छोटे छोटे उदाहरणों के द्वारा कैसे व्यक्ति साधारण से असाधारण बनता है, यह उनने अनेकों तरह से समझाया है। कोयले से हीरा बनने से लेकर अनगढ़ पत्थर की मूर्ति की तरह तराशा जाना एवं बेल के वृक्ष से लिपट कर ऊँचा उठ जाने की तरह समर्पित का उत्कृष्टता की ऊँचाई को पा लेना यही उनकी मर्मस्पर्शी उद्बोधन शैली थी। आश्चर्य इस बात का है कि बोलते समय ऐसी सुबोध शैली जो सीधी अंदर तक उतरती चली जाए व लिखते समय ऐसी संस्कृतनिष्ठ व उक्तियों-मुहावरों से भरी हुई कि हिन्दी के विद्वान भी उससे शिक्षण लें।
साधना अनुष्ठान की महत्ता एवं ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूपी गायत्री महापुरश्चरण की आवश्यकता को पत्रिका में प्रतिपादित किया जाने लगा था। इसके बाद सहस्रकुंडीय महायज्ञ 1958 में संपन्न हुआ। व सभी परिजनों को एक सूत्र में आबद्ध कर गायत्री परिवार रूपी संगठन बनाया। इस संगठन के माध्यम से अष्टग्रही योग, भारत-चीन युद्ध (968) भारत-पाक युद्ध (1965) बंगला मुक्ति संघर्ष (1971) आपातकाल (1976) तक गायत्री की उच्चस्तरीय, पंचकोशी तथा, स्वर्ण जयन्ती साधना द्वारा अभयदान देते हुए वे अपनी भूमिका को स्पष्ट करते चले जा रहे थे। उनकी तप साधना भी इसी क्रम से प्रचंड होती होती गयी व उसकी स्थूल परिणति सूक्ष्मीकरण साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना थी। मोटे तौर से जितना देखा जा सके, उतना ही तो समझा जा सकता है। पर वस्तुतः साधना उस क्रिया कलाप तक ही सीमित नहीं थी।
साधना के स्वरूपों को गोपनीय ही रहने देते हैं किन्तु गुरुदेव का जीवन तो एक खुली किताब है। उनने जो भी किया उसे लेखनी के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा दिया। जिसे उचित समझा वाणी से समझाया व जिसे और अधिक पात्र समझा उसके रोम में वह ज्ञान समाविष्ट कर दिया। 1950 से 1961 के बीच की उनकी अखण्ड ज्योति पत्रिका गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्रीतंत्र एवं गायत्री योग नामक पाँच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा गायत्री महाविज्ञान इसकी साक्षी देते हैं। बाद में विज्ञान समस्त प्रतिपादनों के साथ जोड़ कर अपनी सुबोध शैली में उनने 1977 में चार विशेषाँक अखण्ड ज्योति के प्रकाशित किये (मार्च से जून 1977) जिसमें उनने साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया।
साधना टिक नहीं सकती। जो अनेकानेक साधनाओं का पथ-प्रदर्शक हो उसके पास तो ईश्वर अपनी चरम और परम स्थिति में होना चाहिए। था भी ऐसा। मथुरा के दिनों का प्रसंग है, तब विख्यात उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला अक्सर आया करते थे। एक दिन आने पर उन्होंने कहा “आचार्य जी!मैं आपकी कुछ आर्थिक सहायता करना चाहता हूँ।
साधना में वे क्रमशः आगे के पाठ, नया परामर्श पहले बताई गई दिशा धारा से आगे का निर्देशन ऐसे करते चले गए जैसे वे स्वयं सामने बैठ कर समझा रहे हों। पत्रकारिता की इस पत्राचार विद्या को अनूठा, अभूतपूर्व ही कहा जाएगा क्योंकि यह साधना जैसे गूढ़ तत्व पर आधारित थी।
साधना सत्र थे। विभिन्न मुद्राओं, त्राटक योग, सोऽहम्, नादयोग, आत्मब्रह्म की दर्पण साधना तथा तत्व बोध की साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे।
साधना पराक्रम का सचित्र, शास्त्रोक्त एवं विज्ञान सम्मत प्रतिपादन था। एक गूढ़ विषय पर एक सरल सुबोध व्याख्या परिजनों के समक्ष आयी। विश्व वातावरण में संव्याप्त अवाँछनीयताओं के परिशोधन हेतु की गयी इस साधना नाम दिया गया। प्रकारान्तर से इस अंक में पूज्य गुरुदेव द्वारा सम्पन्न सूक्ष्मीकरण साधना एवं अगले दिनों सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्पन्न होने वाली साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना की आवश्यकता उन्हें अनुभव हो रही थी जो वातावरण में प्रचण्ड चक्रवात उत्पन्न कर सके, सोयों का जगा व जाग्रतों को क्रियाशील बना आदर्शोन्मुख कर सके। यहीं से आरंभ होती है पूज्य गुरुदेव की एकाकी तप साधना जिसने एक वर्ष बाद ही सूक्ष्मीकरण साधना का रूप ले लिया। प्रारंभ में जो उलाहना दिया गया वह भी ऋषि चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है।
साधना को ही सब कुछ मानने वाले पूज्य गुरुदेव ने प्रेरणापुँज के रूप में मील के पत्थर को भी एक मान्यता प्रदान कर अपनी कल्पना को ऐसा रूप दिया कि पढ़ने वालों को सहज ही लगने लगे कि क्या वास्तव में हम कहीं उपयोगी नहीं हो सकते?
साधना सुनसान का सहचर अपनी झोंपड़ी से कुछ दूर गंगा की जलधारा के पास बैठकर कह रहा था। वे लिखते हैं-”अगणित चन्द्रबिम्ब मुझ से कहने लगे-तुम तो यहाँ साधना करने आए हो न। इस प्रियतम के प्रेम में तल्लीन गंगा की धारा को नहीं देखते! गंगा तट पर निवास करना है तो गंगा की प्रेम साधना भी सीखो”।
साधना सूक्ष्म रूप से पाँच वीरभद्रों को क्रियाशील बनाने में लगी रही व लेखनी” अखण्ड-ज्योति” एवं” युगशक्ति-गायत्री” के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के मन को सतत् मथती रही। इसी दौरान सन 1985 का वर्ष उनकी आयुष्य का पचहत्तरवां वर्ष होने के कारण ही रजत जयन्ती वर्ष मनाया गया एवं इसी वर्ष अप्रैल 1985 में उनने अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर पहली बार प्रकाश डाला। इन्हीं लेखों व सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ।
साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधनाक्रम के विषय में यह जिज्ञासाएं उठना स्वाभाविक हैं। इस संबंध में स्वयं पूज्य गुरुदेव अपनी पुस्तक “सुनसान के सहचर” में लिखते हैं कि “हमारी 24 लक्ष महापुरश्चरण की साधना गायत्री उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय।
साधना के समापन तक के समय को एक पूर्वाभ्यास मानना चाहिए उस महायात्रा का जो उन्हें 1990 में करनी थी व उनने सशरीर बखूबी उसे दो वर्ष में सम्पन्न भी कर लिया।
साधना से, पाने वाली क्षमताएँ हो॥
साधना में प्रवेश करने की निर्णय ले ही लिया।
साधना से प्राप्त दिव्य शक्तियों का चमत्कार है। अन्यथा मनुष्य कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो इतना सब नहीं कर सकता।”
साधना के वैज्ञानिक पक्ष को उद्घाटित करते हुए 64 पृष्ठ की एक किताब सन 1946 में ही प्रकाशित कर चुके थे। आज तो परिजन उसका बड़ा परिवर्धित स्वरूप पढ़ते व पाते हैं किन्तु उस जमाने के हिसाब से वह प्रस्तुतीकरण अनूठा था।
साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे। योगीराज अरविन्द ने भी वेद पुरी को ही अपनी तपःस्थली बनाया जो महर्षि अगस्त की तपोभूमि थी। रावण महाबली था पर तप शक्ति से डरता था। उसके निर्देश थे कि उसके असुर उत्तर में कहीं भी जाएँ पर वेदपुरी जहाँ आज पांडिचेरी स्थित है से कोसों दूर रहें क्योंकि उस स्थान के प्रभामण्डल का प्रभाव असुरत्व के लिए विनाशकारी था।
साधना का क्रम भी निर्बाध गति से चला कर पत्र परामर्श एवं सम्पादन कार्य भी करते रहे यह एक रहस्यमय प्रसंग है। जो भी उनके पास आया, वह उनके पास आया वह उनके एवं वन्दनीय माताजी के भाव भरे सत्कार एवं सत्परामर्श में निहाल हो कर उनका हो कर गया। अब वे आगन्तुकों की बढ़ती संख्या देखकर एक ऐसा सुसंस्कारित स्थान ढूँढ़ रहे थे जहाँ वे अपने लम्बे महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कर सकें, साथ ही सुनियोजित सामूहिक साधना व शिक्षण क्रम भी चला सकें। यहीं से गायत्री तपोभूमि का शुभारम्भ माना जाना चाहिए। यह एक सहज संयोग नहीं है कि जिस वर्ष गायत्री महाविज्ञान खण्डों में प्रकाशित हुआ, उस वर्ष देश को स्वतंत्रता मिली एवं जब गणतंत्र बनने के बाद प्रथम अखिल भारतीय चुनाव प्रक्रिया की ओर बढ़ा तपोभूमि की स्थापना हुई।
साधना तुमने, अपने जीवन में साधी।
असुरों की दुर्धर्ष शाहियाँ, अपनी मुट्ठी में बाँधी॥
साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना। जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्धि कर लेते है। वातावरण की अपनी महत्ता है। देवात्मा हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के मध्य गंगा किनारे की गई उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे।
साधना का विस्तार करने की जो योजना है उससे राष्ट्र में एक तपोमयी भूमिका का सूक्ष्म वायुमण्डल बनेगा और उस वातावरण में अनेक मनोरम पुष्प प्रस्फुटित होंगे।” (पृष्ठ 21 अगस्त 1953 अखण्ड ज्योति) पहली बार वे इसी अंक में लिखते है कि “अब सभी गायत्री उपासकों को जो हमसे जुड़े हैं अपना दैनिक उपासना क्रम चालू रख रविवार के दिन साप्ताहिक कार्यक्रम रखना व सामूहिक हवन करना चाहिए।”
साधना” करने तुले, तो की अनूठी।
फिर अछूती साधना, कोई न छूटी॥
साधना है। हिमालय जैसी उदार हृदय और मानसरोवर जैसी निर्मल इन आत्माओं में वह विष बीज निश्चित रूप से नहीं है जो इतने बड़े अनुष्ठानों के संयोजकों को झुका सके। आचार्य जी असंख्यों को पार कराने वाले अनुभवी मल्लाह हैं। वे महान पैदा हुए हैं, महानता के साथ जी रहे हैं और उनका अन्त भी महान ही होगा”।
साधना, सूत शौनिक परम्परा में रामचरित मानव की प्रगतिशील प्रेरणा व गीता कथा तथा प्रज्ञापुराण कथा द्वारा समागमों का आयोजन व लोक शिक्षण ये कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ ऐसी थी जिनसे गायत्री तीर्थ को संस्कारित किया गया।
साधना तथा तत्व बोध की साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया।
साधनाओं का पथ-प्रदर्शक हो उसके पास तो ईश्वर अपनी चरम और परम स्थिति में होना चाहिए। था भी ऐसा। मथुरा के दिनों का प्रसंग है, तब विख्यात उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला अक्सर आया करते थे। एक दिन आने पर उन्होंने कहा “आचार्य जी!मैं आपकी कुछ आर्थिक सहायता करना चाहता हूँ। “मिशन तब अपनी शैशव अवस्था से गुजर रहा था, अर्थ की आवश्यकता तो थी ही।
साधना किस निमित्त की जा रही है। उनने लिखा कि “ साधक स्तर का एक स्थूल शरीरधारी विशेष स्थिति में पाँच सूक्ष्म शरीरों द्वारा पाँच गुने काम हाथ में ले सकता है। इनमें से एक शरीर को विशेष रूप से इसीलिए सुरक्षित रखा व नियुक्त किया गया है कि वह हमारे पास आने वाले असमर्थों दुखी जनों, पीड़ितों के आँसू पोंछता, सिर दबाता व मलहम लगाकर दुलार पुचकार सहित गोदी में बिठाता रहे।” शेष शरीर नवनिर्माण का जागृतात्माओं का जगाने का, विभीषिकाओं निरस्त करने का कार्य पूरा करते रहेंगे।’
साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधना का स्वरूप व उसका महात्म्य बताया था। गायत्री जयन्ती (8 जून) तक यह अंक सबके पास पहुँच गया एवं उन सभी को जो सूत्र संचालक के एकाएक दृश्य पटल से चले जाने से क्षुब्ध व व्यथित थे। जुलाई का अंक भी इसी सामग्री का उत्तरार्ध था। इस में स्पष्टीकरण था कि प्रस्तुत सूक्ष्मीकरण साधना किस निमित्त की जा रही है। उनने लिखा कि “ साधक स्तर का एक स्थूल शरीरधारी विशेष स्थिति में पाँच सूक्ष्म शरीरों द्वारा पाँच गुने काम हाथ में ले सकता है।
साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया। इन सबके बावजूद भी जो स्थूल में सब कुछ खोज रहा हो इसे क्या कहा जाय?
साधना से कहीं अधिक बताते हुए वे गायत्री मात के निमित्त श्रम व समय सब से माँगते है वे सेवा के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का आह्वान भी पहली बार इसी के माध्यम से करते है। क्रमशः इन्हीं प्रसंगों को आगे बढ़ाते हुए 1954 की जून में पहला, पंद्रह दिन का जीवन विद्या सत्र आयोजित हुआ जिसमें संजीवनी विद्या पर, जीवन जीने की कला पर व्याख्यानों का क्रम चला। संभवतः यह बौद्धिक स्तर का पहला समागम था।
साधना करायी गयी थी व आत्मशोधन की महत्ता प्रतिपादित की गयी थी। मिशन को सात संसदों में ( शोध, अध्यापक, संपर्क, कला, महिला, युवा तथा धर्म संसद ) इसी वर्ष बाँटकर भिन्न-भिन्न विधाओं से जुड़े सक्रिय व्यक्तियों को प्रज्ञा अभियान से संबद्ध होने का आह्वान किया गया।
साधना को अगले चरण पर पहुँचाया तो उनका लक्ष्य था आत्मशक्ति का संवर्धन तथा तप से उद्भूत लेखनी द्वारा तत्कालीन समाज का बहुमुखी मार्गदर्शन। लेखनी दो तरह से चली एक प्यार व ममत्व भरा व्यक्तिगत परामर्श, प्रत्येक व्यक्ति को पत्र द्वारा स्वयं की लेखनी से। दूसरे लेखों के रूप में-जिनमें व्यक्ति, परिवार समाज से जुड़ी समस्याओं का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में समाधान समाहित रहता था। 1953 की गायत्री जयन्ती पर जब उनने गायत्री तपोभूमि की स्थापना कर अपनी पहली गुरुदीक्षा दी तो एक अध्याय का पटाक्षेप हो गया था-वह था चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की साधना जिसकी पूर्णाहुति उस दिन की गयी तथा दूसरा अध्याय आरंभ हो गया था वह था गायत्री परिवार के रूप में एक सुव्यवस्थित संगठन की स्थापना। मणिमुक्तकों को ढूंढ़कर एकत्र कर उनमें प्राणशक्ति भरने का सुनियोजित कार्य यदि गायत्री जयन्ती सन 1953 से आरंभ हुआ माने तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।
साधना की अनुभूतियों पर आधारित अंक था। इस तथा आगे के अंकों की “गायत्री चर्चा” प्रसंग में उनने स्थान स्थान पर गायत्री उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति। 124 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 124 लाख आहुतियों का हवन, 124 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने को आ रहे थे वे सभी गायत्री जयन्ती तक पूरे हो जाने की संभावना उनने व्यक्त की थी। दूसरा था सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति।
साधना द्वारा ऊर्ध्वरेता बन अपनी कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत किया। यह पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जिस व्यक्ति के मातृवत् श्रद्धा के साथ सिद्ध कर लीं, उसके पास कोई कमी रह कैसे सकती है? पंचदेवों को भी उनने इन्द्रियों की तरह संभाला। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व प्राण सभी देवों की आराधना कर उन्हें परिष्कृत की ओर ही नियोजित किया।
साधना की चर्चा करते।
साधना के लिए अपने साथ हिमालय ले जाते हैं। समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कर वे शिवजी की भस्म रूपी ज्ञान गंगा तथा परशु (विचारों की तीक्ष्णता रूपी अस्त्र) लेकर संसार के उद्धार के लिए चल देते हैं।
साधना के अनुशासनों को न समझा जाता है, न निर्वाह किया जाता है, फिर वे फलित हों कैसे?
साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
साधना भी सीखो”।
साधना तो अभी तिजोरी में बन्द है। “ब्राह्मणत्व? ब्राह्मण तो अनेकों है” शायद यह मन्तव्य समझ नहीं पाये थे। उनका जवाब था “ब्राह्मण वह है जो समाज से न्यूनतम लेकर समाज को अधिकतम दे। इसके बिना भी कभी कोई ब्राह्मण हुआ है।
साधना व शिक्षण क्रम भी चला सकें। यहीं से गायत्री तपोभूमि का शुभारम्भ माना जाना चाहिए। यह एक सहज संयोग नहीं है कि जिस वर्ष गायत्री महाविज्ञान खण्डों में प्रकाशित हुआ, उस वर्ष देश को स्वतंत्रता मिली एवं जब गणतंत्र बनने के बाद प्रथम अखिल भारतीय चुनाव प्रक्रिया की ओर बढ़ा तपोभूमि की स्थापना हुई।
साधना, प्रज्ञायोग तथा दिव्य अनुदान की धारणा के महत्वपूर्ण निर्धारण किए। इस वर्ष जो साधना सत्र चले वे विशिष्ट थे। इन में कायाकल्प, आध्यात्मिक भाव कल्प स्तर की साधना करायी गयी थी व आत्मशोधन की महत्ता प्रतिपादित की गयी थी। मिशन को सात संसदों में ( शोध, अध्यापक, संपर्क, कला, महिला, युवा तथा धर्म संसद ) इसी वर्ष बाँटकर भिन्न-भिन्न विधाओं से जुड़े सक्रिय व्यक्तियों को प्रज्ञा अभियान से संबद्ध होने का आह्वान किया गया।
साधना उपक्रम को जीवन में अपनाएगा, वह सुनिश्चित ही प्रतिफल पाएगा। अखण्ड ज्योति जूना 1966 में “अखण्ड ज्योति के परिजन इतना तो करें ही” प्रसंग में वे लिखते है कि “हमने गायत्री उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
साधना, तीन शरीरों के परिष्कार-उन्नयन की साधना, सावित्री तथा कुण्डलिनी साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना सम्पादन में आ सकता था। उसका पूर्वानुमान कर उनने लक्ष्य निर्धारित कर दिया व यह भी बता दिया कि बिना इस तप शक्ति की पूँजी के वे वह कार्य नहीं कर पाएंगे जिसकी कि उनके गुरु ने उनसे आकांक्षा रखी है। बड़े काम उपयुक्त समर्थता के बल पर ही पूरे होते हैं। पूज्य गुरुदेव की लिपि में आदिकाल वह निर्देश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
साधना की महापूर्णाहुति थी। लाखों व्यक्ति इस माध्यम से मिशन से जुड़ गये। अगले ही वर्ष समय की आवश्यकता को देखते हुए इन यज्ञों को विस्तार देने के लिए न्यूनतम सामग्री में संपन्न करने के लिए दीपयज्ञों का निर्धारण हुआ जो जन्मदिवसोत्सवों से लेकर एक लक्ष वेदीय दीपयज्ञों का स्वरूप लेता हुआ विस्तार लेता चला गया।
साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना, सावित्री तथा कुण्डलिनी साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना या समाज देवता की आराधना जो करता चले वह आत्मकल्याण का पथ तो प्रशस्त करेगा, औरों की मुक्ति का निमित्त भी बन सहज ही श्रेय पाता चलेगा।
साधना का समर्थ ब्रह्मास्त्र” जैसे लेखों द्वारा जहाँ उनने महाकाल द्वारा नवसृजन की सुनिश्चितता का तथ्य प्रतिपादित किया, वहीं “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” (दो खण्डों) तथा सतयुग की वापसी “प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया” जैसी पुस्तकों द्वारा सबकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब अन्तराल बदलेगा, भाव संवेदनाएं जागेंगी तो सद्बुद्धि का उदय होगा। यही प्रज्ञावतार की व्यष्टि तंत्र में अवतरित सूक्ष्म प्रेरणा हैं यही सद्बुद्धि व्यक्ति के क्रियाकृत्यों में आमूलचूल परिवर्तन कर उदार सहकारिता पर आधारित समाज बनाएगी।
साधनाओं का अवलम्बन घाटे का सौदा नहीं व जो लाभ होता है वह पूर्णतः वान सम्मत है, प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर प्रमाणित किया जा सकता है। देवसंस्कृति के निर्धारण मात्र कपोल कल्पना नहीं है वरन् तथ्यों पर आधारित है, यह देखकर नयी पीढ़ी, बुद्धिवादी समुदाय को भी आश्वासन मिलेगा कि एक ऐसा संस्थान है जो मात्र इसी कार्य को समर्पित है।
साधनात्मक उपचार कर लें। गायत्री का लघु अनुष्ठान, चौबीस हजार मंत्रों का जाप नौ दिन तक संयम नियम से रहना। यदि लघु अनुष्ठान संभव न हो तो गायत्री चालीसा का चौबीस सौ पाठ। इतना भी न हो सके तो मंत्र लेखन ही पर्याप्त है। पंचाक्षरी ॐ भूर्भुवः स्वः का जप भी जो कर ले उसे भी वे यज्ञ की पात्रता दे देते थे।
साधना का रूप ले लिया। प्रारंभ में जो उलाहना दिया गया वह भी ऋषि चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है।
साधना की आत्म प्रेरणा असत् नहीं हो सकती, जो शक्ति इस मार्ग पर खींच कर लाई है, वह गलत मार्गदर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा-जीव अकेला आता है, अकेला जाता है। सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है।
साधना में प्रवीण पारंगत बनेगा, यह बात भी कही गयी है। उपनयन संस्कार के बाद, ब्रह्म संस्कार, गायत्री उपासना व वेदाध्ययन करने का प्रसंग भी आया है। पुराण के पैंतीसवें श्लोक से चालीसवें श्लोक तक कल्कि द्वारा पिता से वेद, सावित्री ब्राह्मणत्व, यज्ञोपवीत, गायत्री ब्रह्म विद्या आदि की व्याख्या पूछी गयी है। सच्चा ब्राह्मणत्व क्या होता है व उसकी उपासना कैसे की जाती है? यह समझाया
साधना द्वारा अभयदान देते हुए वे अपनी भूमिका को स्पष्ट करते चले जा रहे थे। उनकी तप साधना भी इसी क्रम से प्रचंड होती होती गयी व उसकी स्थूल परिणति सूक्ष्मीकरण साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना की सर्वोपरि सिद्धि है।
साधना के समापन पर जो पूर्णाहुति का प्रसाद माँ गायत्री ने उन्हें प्रदान निश्छल प्यार, निष्काम समर्पण।
साधना स्थली में साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना। जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्धि कर लेते है। वातावरण की अपनी महत्ता है। देवात्मा हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के मध्य गंगा किनारे की गई उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे।
साधना संबंधी मार्गदर्शन तथा परिस्थितियों के अनुकूल कैसे मनःस्थिति बदली जाय यह वह बड़े ममत्व व लगन के साथ बताते थे। कार्यकर्ताओं के हृदय के सम्राट उन्हें कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।
साधना का निवास स्थान है-ईश्वर विश्वास। इसके अभाव में साधना टिक नहीं सकती। जो अनेकानेक साधनाओं का पथ-प्रदर्शक हो उसके पास तो ईश्वर अपनी चरम और परम स्थिति में होना चाहिए। था भी ऐसा। मथुरा के दिनों का प्रसंग है, तब विख्यात उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला अक्सर आया करते थे।
साधना को उनने छाया पुरुष की साधना कहा, जिसमें वे पाँच शरीरों से भिन्न भिन्न कार्य सूक्ष्मजगत में करना चाहते थे। वंदनीया माताजी ने इस सम्पादकीय में लिखा कि “ हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गये है और न पलायन ही कर रहे है, वरन् वे सूक्ष्मीकरण की जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़त कर रहे है।” यह आश्वासन उन के लिए था जिन्हें अचानक परामर्श-वार्तालाप विचार विनिमय का क्रम समाप्त होने पर खिन्नता अनुभव हो रही थी।
साधना चिन्तन से-सूक्ष्म शरीर से और आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
साधना करने आए हो न। इस प्रियतम के प्रेम में तल्लीन गंगा की धारा को नहीं देखते! गंगा तट पर निवास करना है तो गंगा की प्रेम साधना भी सीखो”।
साधना सत्र चले वे विशिष्ट थे। इन में कायाकल्प, आध्यात्मिक भाव कल्प स्तर की साधना करायी गयी थी व आत्मशोधन की महत्ता प्रतिपादित की गयी थी। मिशन को सात संसदों में ( शोध, अध्यापक, संपर्क, कला, महिला, युवा तथा धर्म संसद ) इसी वर्ष बाँटकर भिन्न-भिन्न विधाओं से जुड़े सक्रिय व्यक्तियों को प्रज्ञा अभियान से संबद्ध होने का आह्वान किया गया।
साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीनकाल की तरह तभी भी बना हुआ है और संभवतः सदा बना ही रहेगा।
साधना, संयम जैसे विषयों को वैज्ञानिक ढंग से समझाते, हुए उनने उपासना विधियों की उपयोगिता को सुबोध शैली में समझाया। पहली बार जनसाधारण के सम्मुख ऐसा प्रतिपादन आया, जिससे वे प्रेरणा ले सकें कि अध्यात्म मात्र शास्त्र वचन ही नहीं हैं, पूर्णतः उसका पूरा आधार विज्ञान सम्मत भी है। बाद की अखण्ड ज्योति के अंकों में वे शब्द शक्ति की महत्ता, गायत्री के चौबीस अक्षरों का वैज्ञानिक विवेचन, यज्ञ विज्ञान के महत्वपूर्ण पक्षों तथा कुण्डलिनी महाशक्ति के विज्ञान सम्मत आधार पर लिखते रहे। यह क्रम 1967-68 तक चला।
साधना-उपासना का क्रम शक्ति पीठों में चलाना, युग संगीत के माध्यम से जन चेतना को झकझोरना का विस्तार करना, रामायण गीता प्रज्ञापुराण की कथा द्वारा प्रगतिशील अध्यात्म का प्रतिपादन करना, अपने मण्डल की तीर्थ यात्रा-धर्म प्रचार की पदयात्रा-साइकिल यात्रा सतत् चलाना, जन-जन को युग साहित्य के संजीवनी से परिचित कराना, इस के लिए चल पुस्तकालयों की व्यवस्था करना, स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे।
साधना का पोषक आहार उपलब्ध हो जाय तथा सुसंस्कारिता के बीज पूर्व से ही विद्यमान हों, उसका भावी जीवन क्रम कैसा होगा, इसकी पूर्व कल्पना की जा सकती है। पूज्य गुरुदेव की बहुमुखी जीवन साधना के चमत्कारी प्रसंगों का प्राकट्य अन्यान्य महापुरुषों की तरह शैशवकाल से ही होने लगा था। ऐसे महापुरुष की जीवनी को, विभिन्न संस्करणों को लिपिबद्ध करना कितना पुष्कर कार्य हो सकता है, इसकी कल्पना सामान्य पाठक नहीं कर सकते। संभव है कुछ अविज्ञात घटनाक्रम ऐसे उनके शैशवकाल से संबंधित इस स्मारक अंक से छूट जाएँ जिनकी फलश्रुतियाँ आगे चल कर देखने को मिली तो इसे संकलनकर्ताओं का-संपादकों का प्रमाद माना जाए।
साधना का महत्वपूर्ण अंग था “आत्मवत् सर्वभूतेषु, मातृवत् परदारेषु” एवं “परद्रव्येषु लोष्ठवत्” तो काया की परिधि तो वे कभी की लाँघ चुके थे पर अपने समान सबको देखना समानुभूति करना एवं दूसरों के अंतःकरण से अपने को इस गहराई जोड़ लेना कि लाखों परिजन उसे अपना परमप्रिय सखा, पिता, अभिभावक मानने लगे साधना की सर्वोपरि सिद्धि है।
साधनाएँ पूर्णतः विज्ञान सम्मत है; यह उनने अपने जीवन के माध्यम से प्रमाणित किया। ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न आचार्य श्री के अनेकानेक कर्तव्यों में, उनकी 80 वर्ष की जिन्दगी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों से जड़े हीरक मालाओं के हार में एक हीरा और जुड़ता है- वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिकल्पना, उस दिशा में आवश्यक दार्शनिक शोध कर युग साहित्य का प्रस्तुतीकरण तथा एक अत्याधुनिक प्रयोगशाला एवं दुर्लभ ग्रन्थों से सज्जित “ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान” की स्थापना।
साधनाएँ, धर्म-धारणा, कर्मकाण्ड, प्रतीक उपासना आदि नामों से ही कतराता रहा है अथवा मन में उनके संबंध में भ्रान्तियाँ पाले हुए है, भी उनकी बात समझकर इस आलोक का विस्तार कर सकेगा।
साधना द्वार योगदर्शन को व्यावहारिक रूप प्रदान करना, विश्वामित्र परम्परा में सिद्धपीठ की स्थापना कर संजीवनी विद्या का शिक्षण व नवयुग के पृष्ठ भूमि का निर्माण, पिप्पलाद परम्परा में संस्कारी आहार के माध्यम से कल्प साधना, सूत शौनिक परम्परा में रामचरित मानव की प्रगतिशील प्रेरणा व गीता कथा तथा प्रज्ञापुराण कथा द्वारा समागमों का आयोजन व लोक शिक्षण ये कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ ऐसी थी जिनसे गायत्री तीर्थ को संस्कारित किया गया।
साधना स्थली बनाया, वहीं पर आचार्य शंकर को चारों धामों की यात्रा करने का उपदेश दिया व शक्ति प्रदान की। यह महत्ता भूमि के संस्कारों की है।
साधना।
साधना का आदर्श ही नहीं, अटूट विश्वास और प्रचण्ड साहस, पर्याप्त मनोबल देकर चले गए। दिव्य सत्ताओं का प्यार अनुदान भी विचित्र होता है। संभवतः यही शक्तिपात प्रक्रिया भी है।
साधना की सिद्धि के अलौकिक घटनाक्रमों से भी बढ़कर किसी की क्या कोई और प्रमाण चाहिए?
साधनात्मक पुरुषार्थ से तीर्थ, महातीर्थ और अब युगान्तर चेतना के गोमुख के रूप में परिवर्तित हो गई। शांतिकुंज नाम से जाना जाने वाला यह दिव्य क्षेत्र सहस्राधिक वर्षों तक मानवता को नवीन प्राण देता रहेगा।
साधना साथ कर सकें, इसलिए उन्हें परमार्थ कार्य में नियोजित होने को आमंत्रित किया गया।
साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।” (पृष्ठ 135 प्रथम संस्करण, सन् 1965)
साधना के नाम पर संव्याप्त आस्था वाली मानसिकता का दोहन करने अधिकाँश समय वहीं बने रहते हैं। चोगा भले ही उनने बाबा जी का पहन रखा हो, किन्तु आचरण में पाश्चात्य भोग विलास की ही प्रधानता रहती है। पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ब्राह्मण की जिन्दगी जी है वह सफेद खादी की धोती व एक कुर्ते से ही जीवन भर काम चलाया है। विमान यात्रा का खर्च सुनकर उनने समुद्र से यात्रा कर अधिक दिन प्रवास व बिताना पसंद किया ताकि अनावश्यक भार परिजनों पर न पड़े वह जहाज पर व्यतीत समय को वे स्वाध्याय, साधना में लगा सकें। आज की परिस्थितियों में यह भले ही अव्यावहारिक प्रतीत होता हो किन्तु मिशन का सूत्र संचालक जिन आदर्शों पर जीवन भर चला था, उनके माध्यम से ही अपनी रीति नीति का निर्धारण कर रहा था।
साधना, पूजा उपासना का नियमित क्रम 1937 से आरंभ कर 1951 तक यथावत चलाया एवं पूर्णाहुति तक उनने सारे व्रत अनुशासन उसी प्रकार निबाहे जैसा कि उनके गुरु ने उन्हें बताया था। इस बीच 1951 में वे एक बार हिमालय यात्रा पर गए जो कुछ माह की थी व पुनः बाद में 1961 में एक वर्ष के लिए दुर्गम हिमालय उनने प्रवास किया। सब कुछ अपने मार्गदर्शक के बताये निर्देशों के अनुरूप।
साधना स्वाध्याय प्रेस का काम तो था ही। इन सबके बावजूद न कोई उनकी शिकवा शिकायत थी और न असुविधाओं का रोना। उनकी इस अद्भुत जीवन शैली-अपूर्व कर्मठता ने केसकर जी को दंग कर दिया। सहस्र कुण्डीय महायज्ञ में वही केसकर जी जब तीस वर्ष बाद आए तो उन्होंने सभी के सामने उनके चरण स्पर्श किए।
साधना गायत्री उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है।
साधना कृत्य पूरा कर लिया जाय”।
साधना, आराधना से लेकर लोक सेवा संबंधी विशद मार्गदर्शन भी है।
साधना का वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत कर पूज्य गुरुदेव ने अनेकों बुद्धिजीवियों को प्राण प्रत्यावर्तन जीवन साधना, साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना शक्ति द्वारा बीसवीं व इक्कीसवीं शताब्दी में सारे महत्वपूर्ण परिवर्तन का सरंजाम जुटा कर, धरित्री का कायाकल्प करने का आश्वासन दिया। उनकी सारी आध्यात्मिक मनोकामनाएँ पूरी कीं तथा जो कुछ भी गुरुदेव ने “मास्टर” से माँगा वह कल्पवृक्ष के माध्यम से मिलता चला गया। उपरोक्त तीनों दिव्य सत्ताओं का त्रिवेणी संगम उनके जीवन के प्रारंभिक कुछ वर्षों में ही फलीभूत होता दिखाई पड़ता है।
साधना जैसे गूढ़ तत्व पर आधारित थी।
साधना में अपने अहं को पूर्णतया गला डालना जो अनिवार्य है। इस अनिवार्यता को उन जैसे कोई विरले ही निभा पाते हैं। आगरा में काँग्रेसी कार्यकर्ताओं का बृहद् सम्मेलन था। स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आए हुए थे। सम्मेलन में कार्यक्रम की समाप्ति पर श्री कृष्णदत्त पालीवाल जी ने ‘नवीन’ जी को सभी का परिचय देना शुरू किया।
साधना क्षेत्र में बाह्योपचारों की नकल होती देखी जाती है एवं जो भी बहिरंग उपचार कोई साधक करता दिखता है, एक समुदाय उसके पीछे चल पड़ता है। उन प्रतीकों के पीछे छिपी भावनाओं को, आत्मशोधन व जीवनसाधना के अनुशासनों को न समझा जाता है, न निर्वाह किया जाता है, फिर वे फलित हों कैसे?
साधना पद्धति का एक अनुभवी निष्णात विद्वान मानते थे। ब्रह्मलीन श्री देवरहा बाबा से विगत महाकुँभ पर्व पर इलाहाबाद में मिशन से जुड़े एक उच्चाधिकारी ने पूज्य गुरुदेव के विषय में पूछा कि आपकी उनके संबंध में क्या मान्यता है? तो देवरहा बाबा ने पूर्व की ओर मुख करके कहा कि “साक्षात् सविता का जो रूप है, ब्रह्मतेज सम्पन्न उस अवतारी सत्ता को मेरा नमन है। वे माँ गायत्री के सिद्ध साधक है व युगपरिवर्तन उन्हीं के बताये पद चिह्नों पर चल कर होगा।” युग निर्माण योजना से प्रत्यक्ष उनके क्या संबंध है, यह पूछने पर दीर्घ-जीवी उस महापुरुष ने कहा कि “सभी देवसत्ताएं धरती पर सतयुग लाने को जन्मी है।
साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
साधना एवं अगले दिनों सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्पन्न होने वाली साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना के प्रति न केवल रुचि जगा दी अपितु गायत्री का मर्म समझाते हुए यज्ञोपवीत संस्कार की सार्थकता को उनके रोम-रोम में पिरो दिया। गायत्री ही जिनका आगे चल कर इष्ट बनी एवं करोड़ों व्यक्तियों से जिनने गायत्री साधना करवा ली, ऐसे श्री राम के पिता ने सच्चे मार्गदर्शक की वह भरी भूमिका निभाई जो गुरु के साक्षात्कार से पहले संपन्न होनी ही थी।
साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना तथा उसके बाद के महाप्रयाण तक के वर्ष एकाकी बिताने की प्रेरणा एवं शक्ति दी होगी। सन् 1974 से 1990 तक वे एक ही कोठरी में रहे, उसी में तप में लीन रहे व वहीं से प्रचण्ड शक्ति में चक्रवात सारे विश्व में उत्पन्न कर सके। एकान्त सेवन को किस सीमा तक रचनात्मक बनाया जा सकता है व इसके लिए किस श्रेणी का चिन्तन होना चाहिए यह मार्गदर्शन पूज्य गुरुदेव लेखनी से ही नहीं, अपना जीवन जीकर सब को दे गए हैं।
साधना कर साक्षात भगवान को अपने घर जन्म लेने के लिए विवश कर दिया था। तप की अवधि में एक ही प्रार्थना रही होगी कि वे एक ऐसी सुसन्तति को जन्म दें जो अपने सत्कार्यों से विश्व वसुधा को धन्य कर दे। यही हुआ भी।
साधना सत्र में बदल दिया गया। यही साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधनाखण्ड एवं ब्रह्मविद्या खण्डों में कुल 108 उपनिषद् थे जिनकी हिन्दी में सरल टीका पहली बार जनसमुदाय के समक्ष प्रस्तुत की गयी थी। इसकी भूमिका में पूज्य गुरुदेव लिखते है कि “उपनिषदों को जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन ही कहना चाहिए। उनमें जीवन को शान्ति और आनन्द के साथ जीने तथा प्रगतिपथ पर निरन्तर आगे बढ़ते जाने की विद्या का भली भाँति विवेचन हुआ है। लौकिक और पारलौकिक, बाह्य और आन्तरिक, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के दोनों ही पक्ष जिसके आधार पर समुन्नत हों, वह महत्वपूर्ण ज्ञान उनमें भरा हुआ है। इनकी एक एक पंक्ति में अमृत भरा प्रतीत होता है।
साधना में लीन थे। वे इस बीच स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने के बाद बापू से यह निर्देश ले आए थे कि उन्हें योगीराज अरविंद एवं रमण महर्षि की तरह आध्यात्मिक शक्ति के सहारे परतंत्रता से मुक्ति पा रहे भारत व युद्ध की पीड़ा से भुगत रहे विश्व को प्रचण्ड सामर्थ्य परोक्ष जगत से प्रदान करनी है। यह उनकी मार्गदर्शक सत्ता का निर्देशन भी था। उन दिनों जिनने पूज्य गुरुदेव को लेखनी द्वारा संघर्ष कर एक मासिक आध्यात्मिक पत्रिका निकालने की स्थिति में देखा था, वे एक सामान्य व्यक्ति का संघर्ष मात्र ही समझ पाए थे। वस्तुतः पूज्य गुरुदेव युग परिवर्तन के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए अपनी लेखनी द्वारा लोकशिक्षण का,जन-जन का आत्मबल बढ़ाने का, उन्हें तपोनिष्ठ बनाने का शिक्षण आरम्भ करना चाहते थे।
साधनाक्रम चल रहा होगा। सब स्वजनों को हमारा आशीर्वाद और माताजी का स्नेह कहें।
साधनाएं भी करायी। बाद में शान्तिकुँज में आरण्यक के बन जाने पर चान्द्रायण व्रत एवं कल्पसाधना सत्र चलते रहे। आयुर्वेद के राष्ट्रीय बोर्ड से वे मान्यता प्राप्त वैद्य थे।
साधना की शुरुआत थी। उन्हें किसी का परामर्श क्या प्रभावित करता। वे तो महाकाल की आकाँक्षा का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ लोक संग्रह के लिए भी कर्म कर रहे थे। उनका हर कार्य दिव्य सत्ता की स्फुरणा के साथ था। कर्तृत्व के माध्यम से जो शिक्षण करना था, उसे उन्हें अपने जीवन में भी तो उतारना था।
साधनाएं भी स्थूल शरीर वालों की अपेक्षा भिन्न हैं।
साधना उनने किस प्रकार कब संपन्न की होगी? अलौकिक पुरुषों के अविज्ञात साधनाक्रम के विषय में यह जिज्ञासाएं उठना स्वाभाविक हैं। इस संबंध में स्वयं पूज्य गुरुदेव अपनी पुस्तक “सुनसान के सहचर” में लिखते हैं कि “हमारी 24 लक्ष महापुरश्चरण की साधना गायत्री उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय।
साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना भी इसी क्रम से प्रचंड होती होती गयी व उसकी स्थूल परिणति सूक्ष्मीकरण साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
साधना अनुदान के वितरण, ममत्व भरे मार्गदर्शन एवं कौशल प्रशिक्षण का क्रम चलता रहेगा।”
साधना, अनुष्ठान करते होंगे। वे जैसा भी कुछ अपने विश्वास के कारण करते हों करें। परंतु एक साधना को करने के लिए हम उन्हें अनुरोधपूर्वक प्रेरित करेंगे कि वह दिन-रात में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय निकालें और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचें कि वे क्या हैं? वे सोचें कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं जो मनुष्य होने के नाते उन्हें सौंपा गया था। मन से कहिए कि वह निर्भीक सत्यवक्ता की तरह आपके अवगुण साफ साफ बताए।
साधना उपचार, कुण्डलिनी अष्टचक्र, अंतरंग में विद्यमान विराट संभावनाएं मंदिर-मूर्ति-शिखा सूत्र-तिलक-संख्या-पूजा अग्निहोत्र जन-व्रत आदि का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण हजारों ऐसे व्यक्तियों को खींचकर प्रज्ञापरिवार में सम्मिलित कर रहा था जो पहले इन नामों से बिदकते थे।
साधना द्वारा युग संजीवनी जन जन तक पहुँचाना, विचारक्राँति का सरंजाम जुटाना तथा तीसरा कार्यक्रम था स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहना। प्रस्तुत पंक्तियों में उनके जीवन के प्रबलतम पुरुषार्थ गायत्री उपासना की चर्चा की जा रही है जिससे उनने पर्याप्त तप पूँजी कमाई और जी भर कर लुटाई।
साधनामय बनने पर दूषित विचारों की भी वैसी ही कटाई, किसान की तरह खरपतवार अपने जीवन में से निकाल बाहर कर अनगढ़ता से सुगढ़ता की साधना करना ऐसे जीवन्त उदाहरण दिए है। पूज्य गुरुदेव की संभाषण व व्याख्यान की शैली भी यही थी। जीवन से जुड़े छोटे छोटे उदाहरणों के द्वारा कैसे व्यक्ति साधारण से असाधारण बनता है, यह उनने अनेकों तरह से समझाया है। कोयले से हीरा बनने से लेकर अनगढ़ पत्थर की मूर्ति की तरह तराशा जाना एवं बेल के वृक्ष से लिपट कर ऊँचा उठ जाने की तरह समर्पित का उत्कृष्टता की ऊँचाई को पा लेना यही उनकी मर्मस्पर्शी उद्बोधन शैली थी। आश्चर्य इस बात का है कि बोलते समय ऐसी सुबोध शैली जो सीधी अंदर तक उतरती चली जाए व लिखते समय ऐसी संस्कृतनिष्ठ व उक्तियों-मुहावरों से भरी हुई कि हिन्दी के विद्वान भी उससे शिक्षण लें।
साधना जिसकी पूर्णाहुति उस दिन की गयी तथा दूसरा अध्याय आरंभ हो गया था वह था गायत्री परिवार के रूप में एक सुव्यवस्थित संगठन की स्थापना। मणिमुक्तकों को ढूंढ़कर एकत्र कर उनमें प्राणशक्ति भरने का सुनियोजित कार्य यदि गायत्री जयन्ती सन 1953 से आरंभ हुआ माने तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। क्योंकि इसके पूर्व तो वे पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे, वातावरण गर्म कर रहे थे तथा हर परिजन को आने वाले समय के लिए अपनी तैयारी कैसे की जाय, यह मार्गदर्शन दे रहे थे। “गायत्री चर्चा” स्तम्भ द्वारा उनने गायत्री के तत्वज्ञान को व्यावहारिक जामा पहनाकर उसे इतना जन सुलभ बना दिया कि हर व्यक्ति जो उनके संपर्क में आया, वह गायत्री साधना न्यूनाधिक किसी ने किसी रूप में करने लगा।
साधना एवं तत्वज्ञान का समन्वित रूप कही देखने को नहीं मिला था।
साधना स्वर्ण जयन्ती समारोह तक महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई थी, उन्हीं को प्रकारान्तर से इन्हें स्थापित करने का श्रेय मिला। कुछ ऐसे नये प्राणवान व्यक्ति भी उभर कर आए जिन्हें आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी।
साधना न्यूनाधिक किसी ने किसी रूप में करने लगा।
साधना के उन्नायक, वेद पुराणों के ज्ञाता।
सदाचार समता के पोषक, राष्ट्र धर्म के निर्माता॥
साधना करते तथा उन निष्कर्षों के आधार पर उन ग्रन्थों का निर्माण करते थे, जिनसे जनसामान्य का मार्गदर्शन होता था। इस क्षेत्र के निवासी मूर्धन्य स्तर के थे। तत्वदर्शन उनका प्रिय विषय था। यदि कहीं इसी कारण इस क्षेत्र को स्वर्ग और निवासियों को देवता कहा गया हो तो वह अत्युक्तिपूर्ण है भी नहीं। दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्मांड की सघन अध्यात्मचेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इस क्षेत्र की भू चुम्बकीय व आध्यात्मिक विशेषताओं के कारण इसी क्षेत्र में होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-April
साधना की इसका पता उसकी परिणति को देखकर ही जाना समझा जाता है।
साधना का कोई सर्वसाधारण की प्रवृत्ति को मोड़ना अतिशय कठिन हो रहा है।
साधना की पूँजी बटोरने में जुटें हैं। इन्हें कुछ भी कहो भैया पर इनमें से कोई साधु नहीं हैं। साधु भला बिलखती मानवता को देख कर निष्क्रिय कैसे रह सकता है। गीता में भगवान भी कहते हैं “न निरग्निचाक्रिय” आग छोड़ने से कर्मठता को त्यागने से भला कोई साधु होता है। युवक कुछ क्षण रुका बराबर चल रहे अपने भाई की ओर देखा।
साधना से सिद्धि का रहस्य और मार्ग सदा से यही समझा-समझाया जाता रहा है।
साधना या सामयिक तपश्चर्या कहा जा सकता हैं। नित्य गायत्री जप उदित होते सत्ता का स्वर्णिम ध्यान, नित्य यज्ञ अखण्ड-द्वीप का सान्निध्य, दिव्य नाद की अवधारणा, आत्मदेव की साधना सहगान कीर्तन जैसे अनेक प्रयोग ऐसे है जो सम्मिलित रूप से युग साधना की आवश्यकता पूरी करते हैं। तपाकर खरा सोना बनाने में बहुत हद तक सफल होते हैं। सूर्यतापी गंगाजल से बना हुआ हविष्यान्न यहाँ का भोजन रूपी प्रसाद है। आश्रम की परिधि में पाँच दिनों तक उसी प्रकार बिना दौड़-धूप के एकनिष्ठ रहना पड़ता है जैसा कि माता के गर्भ में नियत अवधि तक भ्रूण पकता है।
साधना, उपासना, सृजनात्मक संरचना के साथ साथ वह संकल्प भी क्रियान्वित किये जाने का ताना-बाना बुना जा रहा है जिसमें एक लाख संगठन, समारोह तथा एक करोड़ सृजन शिल्पी सम्मिलित किये जाने की योजना भी समग्र तत्परता के साथ चल रही हैं।
साधना की जो महत्ता बताई, महिमा गाई जाती रही है, वह अत्युक्ति या अलंकारिक है। अथवा जो आत्मसाधना के करने के दावेदार हैं, वे भ्रमग्रस्त हैं। छल-प्रपंच का आश्रय लेते है अथवा वास्तविकता को न समझ पाने के कारण अंड-जडं करते, अस्त-व्यस्त रहते और दिग्भ्रान्त होने पर भी बड़े लक्ष्य प्राप्त करने की आशा करते हैं।
साधना के आधार पर पूरा कर लेते हैं, जिनके लिए यदि कर्मचारी रखने पड़ते तो उनका व्यय भार असंभव हो जाता। यहाँ की गरिमा तो गिरती ही।
साधना को जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाया जाय। भिखारी बनकर नहीं, उदारचेता दानवीर बनकर भगवान के दरवाजे पर पहुँचा जाय और अनुदान का प्रतिदान असंख्यों गुनी मात्रा में वापस लौटाया जाय।
साधना का अवलम्बन ही एक मात्र सर्वोत्तम मार्ग हैं। शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक ऊर्जा के उन्नयन में इसका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता हैं। इसकी परिणति सदैव विधेयात्मक दिशा में देखने को मिलती हैं। आरोग्य की प्राप्ति उत्साह की अभिवृद्धि तथा सफलता का मार्ग तो इससे प्रशस्त होता ही है, आन्तरिक विकास का मार्ग भी खुलता है। उनकी मान्यता हैं कि अनभिज्ञता के कारण जीवन के महत्वपूर्ण अवसर यों ही व्यर्थ निकल जाते हैं और मानव विशिष्ट उपलब्धियों से वंचित रह जाता है।
साधना के करने के दावेदार हैं, वे भ्रमग्रस्त हैं। छल-प्रपंच का आश्रय लेते है अथवा वास्तविकता को न समझ पाने के कारण अंड-जडं करते, अस्त-व्यस्त रहते और दिग्भ्रान्त होने पर भी बड़े लक्ष्य प्राप्त करने की आशा करते हैं।
साधना को चिन्हपूजा भर नहीं कहा जा सकता। वह मानव चेतना से निस्सृत होने वाली वह जीवन्त ऊर्जा है जो हर व्यक्ति में समान रूप से विद्यमान रहती हैं और उच्च उद्देश्यों आदर्शों के साथ जुड़ जाने पर प्रभावकारी सत्परिणाम प्रस्तुत करती हैं। इसके प्रतिफल शारीरिक दृढ़ता, मनोगत उत्साह तथा नैतिक बल के रूप में सामने आते हैं, अध्यात्मवेत्ताओं ने इस शारीरिक ओजस, मानसिक तेजस् और आत्मिक वर्चस्व के नाम से पुकारा है और कहा है कि प्राणऊर्जा के सुविकसित एवं सशक्त होने पर ही यह उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। रेडियम की भाँति प्रकाशन इस ऊर्जा को जिधर भी नियोजित किया जाता है वहीं सफलता प्रकट हो कर रहती हैं। परमचेतना से गुँथने पर मनुष्य उसके जैसा ही समर्थ बन जाता हैं।
साधना सहगान कीर्तन जैसे अनेक प्रयोग ऐसे है जो सम्मिलित रूप से युग साधना की आवश्यकता पूरी करते हैं। तपाकर खरा सोना बनाने में बहुत हद तक सफल होते हैं। सूर्यतापी गंगाजल से बना हुआ हविष्यान्न यहाँ का भोजन रूपी प्रसाद है। आश्रम की परिधि में पाँच दिनों तक उसी प्रकार बिना दौड़-धूप के एकनिष्ठ रहना पड़ता है जैसा कि माता के गर्भ में नियत अवधि तक भ्रूण पकता है। संचित कुसंस्कारों के प्रायश्चित परिमार्जन के रूप में जो कुछ करना पड़ता है उसे सामर्थ्य अनुसार नवसृजन की लोक सेवा में निरत रहने के रूप में जाना जा सकता है।
साधना चलती रही है उसका प्रभाव स्थल जगत तक पदार्थ जगत तक मार्ग दर्शन और सीमित अनुदान दे सकने जितनी क्षमता अर्जित कर सकता है। पर अगले समय असाधारण रूप से विकट हैं उसके लिए इतनी सीमित क्षमता पर्याप्त न होगी। विशिष्ट स्तर की प्रचंडता उत्पन्न करने के लिए उच्चस्तरीय तपश्चर्या से कम में काम नहीं चलता। भगीरथ, दधीचि, ध्रुव, सप्तऋषि स्तर की उस तपश्चर्या की आवश्यकता पड़ती है जो प्रत्यक्ष शरीर में अधिक बढ़ी-चढ़ी क्षमता उत्पन्न करने तक सीमित न रहे, वरन् सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर की गहराई में प्रवेश करके उच्चस्तरीय प्राणचेतना का ऐसा भंडार संचय कर सके जो विषय परिस्थितियों से लोहा ले सके और-असाधारण दिव्य उत्पादन में अपनी सामर्थ्य का परिचय दे सके। सूक्ष्म जगत में संव्याप्त विकृतियों को भी बुहार सके।
साधना समझा जा सकता है। अवांछनीयताओं, अनाचारों, आपदाओं, मूढ़ मान्यताओं, कुरीतियों, अनीतियों और विडम्बनाओं से जूझने के लिये भी कारगर हथियार चाहिए। सीधे साधे तरीके से तो नशेबाजी, दहेज वाली बरबादी भरी शादियों तक से छुटकारा नहीं पाया जा सका तो और भी अनौचित्य की जो विषम विडम्बनाएँ घटाटोप की तरह गहरा रही हैं, उनको लेख-लेक्चर जैसे दुर्बल साधनों से कैसे निरस्त किया जा सकेगा?
साधना उपक्रम की तीनों व्यवस्था जुटाते हुए ऐसा प्रबंध किया गया है कि प्राचीन विश्वविद्यालयों की तरह सभी शिक्षार्थियों को बिना अमीर-गरीब के अन्तर के शिक्षा देने में सभी अनिवार्य सुविधाओं को प्राप्त करने का अवसर मिल सके। सभी छात्र निवास, भोजन प्रशिक्षण आदि की निःशुल्क सुविधाएँ प्राप्त करते हैं। अन्यथा मूल्य चुकाने की शर्त रहने पर मात्र अमीरों को ही उपयुक्त विद्या लाभ मिल पाता और निर्धनों को आत्म परिष्कार एवं परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकने से सर्वथा वंचित ही रहना पड़ता। उपयुक्त साधनों के अभाव में ऐसे समर्थ विद्यालय हर कहीं स्थापित भी तो नहीं हो सकते थे। एक प्रकार से इसे बहुमुखी एवं समग्र विधारण्यक या मल्टीवर्सिटी कहा जा सकता है।
साधना की आवश्यकता पूरी करते हैं। तपाकर खरा सोना बनाने में बहुत हद तक सफल होते हैं। सूर्यतापी गंगाजल से बना हुआ हविष्यान्न यहाँ का भोजन रूपी प्रसाद है। आश्रम की परिधि में पाँच दिनों तक उसी प्रकार बिना दौड़-धूप के एकनिष्ठ रहना पड़ता है जैसा कि माता के गर्भ में नियत अवधि तक भ्रूण पकता है। संचित कुसंस्कारों के प्रायश्चित परिमार्जन के रूप में जो कुछ करना पड़ता है उसे सामर्थ्य अनुसार नवसृजन की लोक सेवा में निरत रहने के रूप में जाना जा सकता है।
साधना, आराधना के समन्वय पर अवलम्बित है। इन तीनों को जीवनचर्या की हर क्रिया प्रक्रिया के साथ जोड़ना पड़ता है और ध्यान रखना पड़ता है कि इसके विपरीत तो कुछ नहीं बन पड़ रहा है।
साधना में अपने को संलग्न करने वालों के लिए क्या कहा जाए जो न तो अपना निजी व्यक्तित्व परिष्कृत कर सके जो न सामयिक विपत्तियों के समाधान में कोई योगदान दे सके। जिनमें दूसरों को प्रभावित, परिवर्तित करने की सामर्थ्य, कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त कर सकने की क्षमता न हो। जिनमें समय की माँग, प्रवाह के परिवर्तन और पतन को अभ्युदय में परिवर्तित कर सकने की क्षमता न हो। इन अभावों को देखते हुए सन्देह होता है कि या तो आत्मबल की, आत्मसाधना की जो महत्ता बताई, महिमा गाई जाती रही है, वह अत्युक्ति या अलंकारिक है। अथवा जो आत्मसाधना के करने के दावेदार हैं, वे भ्रमग्रस्त हैं।
साधनाशक्ति की अपेक्षा होगी उसे सफल सम्पन्न कर सकता है। इससे शक्ति संचय हेतु किये गये पुरुषार्थ और तद्नुरूप दैवी अनुकम्पा के सहयोग की सम्भावना का रहस्य आसानी से समझा जा सकता हैं।
साधना का निर्वाह भी आराधना और सेवा साधना का निर्वाह भी आराधना के अंतर्गत आता है। देवत्व की प्रवृत्ति एवं रीति-नीति भी यही हैं।
साधना के लिए अभीष्ट तपश्चर्या के लिए साहस जुटाते रहना पड़ा है। योगी-तपस्वी अपने कार्यक्रम इसी आधार पर विनिर्मित करते हैं। बदले में उन्हें जो कुछ मिलता है वह भी उत्कृष्टता की दिशाधारा का अवलम्बन के कारण हस्तगत भी ऐसा ही होता है। असाधारण अद्भुत, अलौकिक कहा जा सके। इस बल के धनी होते ही इस स्तर के हैं कि वे अपने को महामानव, धरती के देवता कह सकें।
साधना में चले जाने, अन्तः चेतना के विशेष प्रयोजन के लिए नियोजित कर देने पर एक असमंजस यह खड़ा होता है कि इतने बड़े और इतने समर्थ समुदाय के साथ जो घनिष्ठता पनपती और प्रगति की प्रक्रिया चलती रही है उसमें विक्षेप, गतिरोध लगेगा, व्यवधान पड़ेगा। पारस्परिक जोड़ने वाला स्नेह, बन्धन टूट जाने पर वह उपक्रम कैसे बनेगा, जिससे पतंगे की तरह उज्ज्वल भविष्य के आकाश पर छाया और अपनी सक्रियता का परिचय देते रहा जा सके?
साधना से सिद्धि” प्राप्त होने के रहस्य का उद्घाटन करने के इच्छुकों में से प्रत्येक को यही जताया और बताया गया है कि सत्प्रवृत्तियों के धन हेतु अपने को प्रखर, प्रामाणिक और साहसी, उदारचेता बनाया जाय तो उतने भर से अनेकानेक कर्मकाण्डों की आवश्यकता पूरी हो जाती हैं और बदले में वह मिल जाता हैं जो सच्चे भगवद् भक्तों को मिलना चाहिए। साधना अपने आपको संयमी और सुसंस्कृत बनाने की की जाती हैं। इसके लिए स्रष्टा की एकमात्र इच्छा को पूरा करना पड़ता हैं कि संयमशील उदारचेता स्तर का परमार्थ परायण जीवन जिया जाय। साधु ब्राह्मण, सन्त, सुधारक और शहीद इसी स्तर के होते रहे हैं। उनकी साधारण सी पूजा उपासना भी तिल से ताड़ और राई से पर्वत बनती देखी जा सकती हैं, ईश्वर समर्पित मनुष्य ही देव-मानव कहलाते हैं और उन्हीं में वे सिद्धियाँ विभूतियाँ प्रकट होती हैं जिनके बारे में एक व्यक्ति के माध्यम से बन पड़े अनेकानेक महान कार्यों की चर्चा एवं पूछताछ की जाती हैं।
साधना। सध हुआ संयमी जीवन। मानवी गरिमा के अनुरूप क्रियाएँ, मर्यादाओं का अवलम्बन और वर्जनाओं का निरस्तीकरण, सभ्यता एवं सुसंस्कारिता की अवधारणा। उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अनुशासन का अवधारण। संचित कुसंस्कारों का गुण, कर्म स्वभाव से निष्कासन।
साधना ही सन्निहित है।
साधना करते रहने के लिए कहा गया है, वह तो चलेगी ही। साथ ही एक अनुबन्ध यह भी जोड़ा गया है यदि संभव हो तो वर्ष में कभी भी पाँच दिन के लिए शान्तिकुञ्ज आकर एक सत्र सम्पन्न कर लें और लगभग वही लाभ प्राप्त कर लें तो बैटरी को बिजली के साथ जुड़कर नये सिरे से चार्ज होने एवं धीमी पड़ी शक्ति को नये सिरे से फिर अर्जित करने के रूप में मिलता हैं।
साधना और आराधना के त्रिविध प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता होती है। इसी आधार पर आत्मिक स्वस्थता बन पड़ती है। पूजन, अर्जन, उपहार, आदि क्रिया-कृत्यों को भी आत्म साधना का अंग माना जाता है पर वह ऐसा ही है जैसा कि स्वस्थ शरीर पर धुले वस्त्र और श्रृंगार साधनों की सुसज्जा। आवश्यकता उसकी भी है पर उसे महत्व इतना ही देना चाहिए जितना कि अपेक्षित है। पूजा कृत्यों को कलेवर और आत्म साधना को यदि प्राण समझा जाय तो भी ठीक है।
साधना से निर्वाह की उचित आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं। सात घण्टे सोने में, आठ घण्टे कमाने में, पाँच घण्टे इधर उधर के कामों में खर्च कर लेने पर भी बीस घण्टे से अधिक रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने वाले को भी खर्चने नहीं चाहिए। चौबीस घण्टे समय में से चार घण्टे हर किसी के पास इसलिए बच जाते हैं कि उन्हें ईश्वर द्वारा निर्धारित प्रयोजनों के लिए लोकमंगल के लिए, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिए लगाया जा सके। पर जो इस अनुशासन को पूरी तरह भूल जाते हैं। सारा समय विलास, संग्रह, मनोरंजन एवं अवांछनीय प्रयोजनों के लिए खर्च है कि वे आत्मा और परमात्मा के साथ विश्वासघात कर रहे हैं।
साधना से ही ईश्वर भक्ति का प्रयोजन बहुत अंशों में पूरा हो जाता है तो एकान्त तपश्चर्या की अति-आपका जनसंपर्क, कार्यक्रमों का नियोजन, मार्गदर्शन एवं सेवा-सहयोग की अन्यान्य क्रिया-प्रक्रियाएँ जो इन दिनों चलती हैं, वे भी न बन पड़ेंगी? आपको कष्टसाध्य उपक्रम अपनाकर अनेक असुविधाओं से भरी जीवनचर्या बितानी पड़ेगी और संपर्क में आने वाले जो निरन्तर लाभ उठाते रहते हैं, उनसे उन्हें वंचित रहना पड़ेगा?”
साधना का अवलम्बन करने का दावा असंख्यों को करते देखा जाता है। पर उनमें वे विभूतियाँ नहीं देखी जातीं जो इस दिशा में सफल पुरुषार्थियों में देखी जानी चाहिए। असफलता के लक्षण न दीख पड़ने पर विडम्बना का ही आरोप लगेगा। वह धनाध्यक्ष कैसा?, जो रोटी कपड़े जैसी सामान्य आवश्यकता न जुटा सके।
साधना से तुलना इसी कारण की जाती हैं।
साधना करें एवं प्रेरणा ग्रहण करें।
साधना करने पर बलिष्ठता सुन्दरता आदि विभूतियों की प्राप्ति होती है। उसी के सहारे अभीष्ट उपलब्धियों के लिए पुरुषार्थ करते बन पड़ता है। आक्रमण किया या उसे निरस्त किया जा सकता हैं। रुपये पास में हों तो बाज़ार में मिलने वाली हर वस्तु उससे खरीदी जा सकती है। सुविधा साधनों का अभीष्ट मात्रा में संचय करते बन पड़ता है।
साधना के क्षेत्र में ही उनकी क्यों व्यापक उपयोगिता-आवश्यकता रह जायेगी। धर्म-धारणा और सेवा-साधना वस्तुतः योगाभ्यास और तपश्चर्या का ही एक बुद्धिसंगत उपचार है।
साधना का निर्वाह भी आराधना के अंतर्गत आता है। देवत्व की प्रवृत्ति एवं रीति-नीति भी यही हैं।
साधना है। तपश्चर्या की संयम साधना से तुलना इसी कारण की जाती हैं।
साधना का अंग माना जाता है पर वह ऐसा ही है जैसा कि स्वस्थ शरीर पर धुले वस्त्र और श्रृंगार साधनों की सुसज्जा। आवश्यकता उसकी भी है पर उसे महत्व इतना ही देना चाहिए जितना कि अपेक्षित है। पूजा कृत्यों को कलेवर और आत्म साधना को यदि प्राण समझा जाय तो भी ठीक है। दोनों के बीच अविच्छिन्न संबंध है। पूर्णता तक पहुँचने के लिए जीवन शोधन की वह तत्व है जिसे शक्ति भावना की जड़ों के सहारे सींचा और आगे बढ़ाया जाता हैं।
साधना को यदि प्राण समझा जाय तो भी ठीक है। दोनों के बीच अविच्छिन्न संबंध है। पूर्णता तक पहुँचने के लिए जीवन शोधन की वह तत्व है जिसे शक्ति भावना की जड़ों के सहारे सींचा और आगे बढ़ाया जाता हैं।
साधना करने वाले, साहित्यकार, कवि, संगीतज्ञ, चित्रकार, मूर्तिकार, अभिनेता आदि बनते हैं। इसी प्रकार संसार में अनेकानेक शक्तियों के अपने-अपने चमत्कार देखे जा सकते हैं। अशक्तों को अभाव तिरस्कार, दौर्बल्य पराजय आदि का ही भाजन बनना पड़ता है। वे जैसे तैसे काम चलाते और परावलम्बन पर आश्रित रहते हैं। इसलिए बहुमुखी शक्तियों में से किसी न किसी की साधना के लिए मनुष्य को प्रयत्नशील होना पड़ता है।
साधना जड़ जाने के कारण सस्ता भी पड़ता है और प्रचार प्रयोजन में सहायक भी सिद्ध होता हैं।
साधना द्वारा सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में लग सकता था उसे भजन परक विडम्बनाओं में इस हद तक क्यों सहन किया जाता है कि प्रायः साठ लाख पूरे समय के पेशेवर और न्यूनाधिक मात्रा में उसी के लिए ढेरों समय लगाने वाले कोटि-कोटि व्यक्ति नाम रटन को ही ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्ति का एक मात्र साधन मान लें। बहाना मिल जाने पर प्रायः पूरा ही समय उसी प्रयोजन में गुजारते रहें?
साधना को ही उन प्रयोगों में अपनाया है जिन्हें अध्यात्म का प्राण कहा जा सकता है।
साधना अपने आपको संयमी और सुसंस्कृत बनाने की की जाती हैं। इसके लिए स्रष्टा की एकमात्र इच्छा को पूरा करना पड़ता हैं कि संयमशील उदारचेता स्तर का परमार्थ परायण जीवन जिया जाय। साधु ब्राह्मण, सन्त, सुधारक और शहीद इसी स्तर के होते रहे हैं। उनकी साधारण सी पूजा उपासना भी तिल से ताड़ और राई से पर्वत बनती देखी जा सकती हैं, ईश्वर समर्पित मनुष्य ही देव-मानव कहलाते हैं और उन्हीं में वे सिद्धियाँ विभूतियाँ प्रकट होती हैं जिनके बारे में एक व्यक्ति के माध्यम से बन पड़े अनेकानेक महान कार्यों की चर्चा एवं पूछताछ की जाती हैं।
साधना के लिए नियोजित किये जाने वाले सत्रों में सम्मिलित होना (४) सामूहिक समारोह, दीपयज्ञ, तीर्थयात्रा, जुलूस, प्रदर्शन आदि प्रयोजनों द्वारा अलख जगाने जनसंपर्क साधने की क्रिया प्रक्रिया को अपनाया जाना। युग परिवर्तन के लिए इन चारों ही माध्यमों को समुचित प्रश्रय मिलना चाहिए।
साधना भी यही है।
साधना के लिए मनुष्य को प्रयत्नशील होना पड़ता है। जो इसकी उपेक्षा करते हैं उन्हें आलसी-प्रमादी कहा, गया-गुजरा माना और अभागेपन का आरोपण किया जाता है।
साधना (३) आराधना। तीनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती हैं।
साधना में निर्वाह के आवश्यक साधन जुटा लेता है तो फिर कुछ लोग इस प्रकार का दावा क्यों करते रहे कि उन्हें भजन समर्थक होने के कारण यह छूट मिल गई है कि वे जनता को इसी एक कारण को सब कुछ बतायें और अपने लिए मुफ्त में खर्चीले साधन जुटाये? यदि इस प्रवाह की दिशा बदली जा सकी होती तो लाखों करोड़ों परमार्थ प्रेमी सृजन प्रयोजनों में लग सकते थे और अपने खाली समय का ऐसा सुनियोजित उपक्रम अपना सकते थे कि उतने भर से दोष दुर्गुणों में, अभाव, अनाचार में भारी कटौती हो सकी होती और ऐसे आधार खड़े हो सकते थे कि संव्याप्त अवांछनीयता के स्थान पर नवजीवन संचार के लिए बहुत कुछ बन पड़ा होता।
साधना की ऐसी प्रक्रिया थी जुड़ी हुई है जिसे युग साधना या सामयिक तपश्चर्या कहा जा सकता हैं। नित्य गायत्री जप उदित होते सत्ता का स्वर्णिम ध्यान, नित्य यज्ञ अखण्ड-द्वीप का सान्निध्य, दिव्य नाद की अवधारणा, आत्मदेव की साधना सहगान कीर्तन जैसे अनेक प्रयोग ऐसे है जो सम्मिलित रूप से युग साधना की आवश्यकता पूरी करते हैं। तपाकर खरा सोना बनाने में बहुत हद तक सफल होते हैं। सूर्यतापी गंगाजल से बना हुआ हविष्यान्न यहाँ का भोजन रूपी प्रसाद है। आश्रम की परिधि में पाँच दिनों तक उसी प्रकार बिना दौड़-धूप के एकनिष्ठ रहना पड़ता है जैसा कि माता के गर्भ में नियत अवधि तक भ्रूण पकता है।
साधना वस्तुतः योगाभ्यास और तपश्चर्या का ही एक बुद्धिसंगत उपचार है।
साधना चाहता है। उस प्रपंची पाखण्डी को सदैव भगवान को उलाहना देने और निरंकुश कहते रहने की शिकायत रहती है। जिसने अपना सब कुछ पति के सामने सौंप दिया उस पत्नी को अपने पति की समूची सम्पत्ति सहायता और सद्भावना मिलकर रहती है।
साधना के पथ पर अग्रसर होने का प्रमाण मिलना चाहिए। धर्म-धारणा का एक ही प्रमाण-परिचय है कि मनुष्य स्वयं को अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार बनाये, अपने को तपाये गलाए और देव मानवों के अनुरूप दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप का उपक्रम बनाए। यदि वैसा कुछ न बन पड़े, तो समझना चाहिए कि लोभ मोह के भवबंधनों की हथकड़ी-बेड़ी जानबूझकर पहन ली गई हैं।
साधना करेंगे और कठोर तपश्चर्या में रित् रहने का संकल्प साधेंगे। ऐसा क्यों? जब धर्म धारण और सेवा साधना से ही ईश्वर भक्ति का प्रयोजन बहुत अंशों में पूरा हो जाता है तो एकान्त तपश्चर्या की अति-आपका जनसंपर्क, कार्यक्रमों का नियोजन, मार्गदर्शन एवं सेवा-सहयोग की अन्यान्य क्रिया-प्रक्रियाएँ जो इन दिनों चलती हैं, वे भी न बन पड़ेंगी? आपको कष्टसाध्य उपक्रम अपनाकर अनेक असुविधाओं से भरी जीवनचर्या बितानी पड़ेगी और संपर्क में आने वाले जो निरन्तर लाभ उठाते रहते हैं, उनसे उन्हें वंचित रहना पड़ेगा?”
साधना एवं प्रेरणा के उभयपक्षीय प्रयत्नों से सामान्यों को असामान्य बना देने का प्रयत्न किया जाता है, टकसाल के सिक्कों और सीप के मोतियों की तरह।
साधना सम्पादन के लिए किन तथ्यों को अविस्मरणीय मानते हुए अपनाने की तैयारी करनी चाहिए।
साधना में निरत रहते थे। पर अब वे अपने छोटे कलेवर में दिन भर प्रवचन और गायन करते रहने पर भी न थकने वाला माध्यम सँजोये रहने लगे हैं। इसलिए उसकी उपयोगिता अनेक गुनी अधिक बढ़ गई हैं। पुराने ज्ञानरथों को चलाने वाले राह में मिलने वालों को अपने प्रयास का वाणी द्वारा परिचय भी देते थे। पर अब उन्हें बिना पढ़ें, गूँगे-बहरे शिक्षित-अशिक्षित लिये-लिये फिरते हैं और दिन भर एक अतिप्रभावोत्पादक चलते-फिरते प्रचार समारोह को गतिशील रखे रहते हैं।
साधना आरंभ की जा सकती हैं।
साधना शक्ति की की जाती हैं। शक्ति, समृद्धि या शक्ति के रूप में प्रकट होती है। सम्पत्ति, सिद्धि और सफलता का चिन्ह परस्पर पर्यायवाचक है। किसने किस स्तर की साधना की इसका पता उसकी परिणति को देखकर ही जाना समझा जाता है।
साधना-अर्थात् जीवन साधना। सध हुआ संयमी जीवन। मानवी गरिमा के अनुरूप क्रियाएँ, मर्यादाओं का अवलम्बन और वर्जनाओं का निरस्तीकरण, सभ्यता एवं सुसंस्कारिता की अवधारणा। उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अनुशासन का अवधारण। संचित कुसंस्कारों का गुण, कर्म स्वभाव से निष्कासन।
साधना से, मूकदर्शक बने रहने से लोगों की यह सहज मान्यता बनती हैं कि ‘मौन को अर्धस्वीकृति’ क्यों न मान लिया जाय, और ईश्वर को क्यों न उसका समर्थन मान लिया जाय? बड़ों की बड़ी बातें छोटों की समझ में नहीं आतीं, कहकर उत्कट जिज्ञासा बालों को भी चुप तो किया जा सकता हैं, पर इस भ्रम-संदेह की आग को भीतर-ही-भीतर सुलगने से नहीं रोका जा सकता है कि जो समय, श्रम-साधना द्वारा सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में लग सकता था उसे भजन परक विडम्बनाओं में इस हद तक क्यों सहन किया जाता है कि प्रायः साठ लाख पूरे समय के पेशेवर और न्यूनाधिक मात्रा में उसी के लिए ढेरों समय लगाने वाले कोटि-कोटि व्यक्ति नाम रटन को ही ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्ति का एक मात्र साधन मान लें। बहाना मिल जाने पर प्रायः पूरा ही समय उसी प्रयोजन में गुजारते रहें?
साधना को सम्पन्न करने वाले स्वयं लाभान्वित होंगे और अपने संपर्क क्षेत्र को भी लाभान्वित करेंगे। इसलिए नवयुग के आगमन की पुण्य बेला में तीर्थयात्रा के रूप में युगचेतना का अभिनव संचार किया जा रहा है।
साधना के लिए एक नया वातावरण विनिर्मित हो सकता है।
साधना द्वारा व्यक्तित्व के देवोपम बनने की मान्यता पर विश्वास कराता रहा हैं।
साधना का यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इसे चूका नहीं जाना चाहिए। जो उपयुक्त अक्सर पर मुँह मोड़ते और पीठ दिखाते हैं, वे परीक्षा भवन में गायब हो जाने वालों की तरह सदा-सर्वदा पछताते ही रहते हैं। इस भूल को अनेक बार दुहराया जाता रहा है पर जब भगवान ने सुदामा से उसकी तंदुल पोटली माँग कर बदले में टूटे छप्पर वाली सुदामापुरी को सर्वसम्पन्न सृजित द्वारिकापुरी के रूप में बदलने का आमंत्रण भेजा हैं, तब उस स्वर्ण सौभाग्य को स्वीकार करने में आना कानी नहीं ही की जानी चाहिए। पेट और प्रजनन की छोटी-सी परिधि में तो कीड़े-मकोड़े भी अपना समय गुजार लेते हैं, पर जब कल्पवृक्ष के नीचे विश्राम मंच किसी ने बिछाया तो उस पर बैठने भर का निर्वाह करने में आनाकानी क्यों करनी चाहिए?
साधना (३) आराधना का समन्वय ही आत्मशक्ति के उपार्जन को सुनिश्चित करता है। इन्हें समान रूप से अपनाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि जिन चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों को अध्यात्म की परिणति माना जाता है, वे अक्षरशः सही सिद्ध न हों। तीनों की संक्षिप्त विवेचना यहाँ प्रस्तुत हैं।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-November
साधना मानकर चलना चाहिए जो ईश्वर उपासना के ही समतुल्य है।
साधना उपक्रमों का आविष्कार किया और बताया है कि सतत् अभ्यास और विवेक वैराग्य द्वारा मन को वशवर्ती बनाना जाता है। अर्जुन को सम्बोधित करते हुए गीता के छठे अध्याय के 35 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है-” मनोदर्निग्रहंचलम अभ्यासेन त कौन्तेय वैराग्येण च गृहृयते।” आद्यशंकराचार्य ने इसकी विशद व्याख्या की है। यहाँ अभ्यास का अर्थ है कि वे योग साधनायें जो मन को रोकती हैं। वैराग्य का अर्थ व्यावहारिक जीवन को संयमशील और व्यवस्थित बनाना।
साधना के प्रति निष्ठा पनपी, वह ने केवल अपने व्यक्तित्व विकास की पूर्णता को पाएगा, बल्कि नवसृजन में जुटी दिव्य शक्तियाँ उसी के नवयुग का श्रृंगार करेंगी।
साधना क्या है? संस्कारों, आदतों- चिन्तन का नए सिरे से गठन। बेतरतीब उछल-कूद करने वाले मन का प्रशिक्षण। इसे किये बिना उच्चतर जीवन के लिए कदम बढ़ाना कहाँ सम्भव है? विद्यार्थी जीवन में यही तो किया था - उनने।
साधना है।
साधना, मौन साधना जैसे प्रयोग इसीलिए किए जाते हैं कि आत्म शक्ति का चमत्कारी उपयोग बन पड़े। इसी आधार पर सिद्ध पुरुष, अनेकों दिव्य विभूतियों के अधिष्ठाता बनते हैं और वह कर दिखाते हैं जो सामान्यजनों की कल्पना से भी बाहर होता है। नर पशु के समतुल्य विचरण करने वाले भी यदि ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता बन सकें तो समझना चाहिए कि उनने देव पुरुष की स्थिति प्राप्त कर ली।
साधनाओं, तपश्चर्याओं द्वारा आत्मशक्ति को उभारना, एकत्रीकरण करना और वरिष्ठता का परिचय देना संभव होता है। एकाग्रता, एकान्त साधना, मौन साधना जैसे प्रयोग इसीलिए किए जाते हैं कि आत्म शक्ति का चमत्कारी उपयोग बन पड़े। इसी आधार पर सिद्ध पुरुष, अनेकों दिव्य विभूतियों के अधिष्ठाता बनते हैं और वह कर दिखाते हैं जो सामान्यजनों की कल्पना से भी बाहर होता है। नर पशु के समतुल्य विचरण करने वाले भी यदि ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता बन सकें तो समझना चाहिए कि उनने देव पुरुष की स्थिति प्राप्त कर ली।
साधना संस्कारों के बीजारोपण के निमित्त अखण्ड गायत्री जप की व्यवस्था की गयी थी। चारों दिन यह सतत् चलती रही। इसी के साथ प्रबंधन सभागार में वंदनीया माताजी द्वारा दीक्षा दी गयी। इस कार्यक्रम में प्रतिदिन पचास हजार से अधिक परिजन उपस्थित थे। सभी ने वंदनीया माता जी के साथ गायत्री मंत्र का उच्चारण कर ऋषि परम्परा से अपना सम्बन्ध जोड़ा।
साधना, व्यक्तित्व के परिष्कार परिमार्जन एवं विकास की पूर्णता को पाने के साधना है।
साधना के विविध विधि विशाल कर्मकाण्डों का सृजन इसी लिए हुआ है कि चित्तवृत्तियाँ एक बिन्दु पर केन्द्रित होने लगें तथा आत्मा के आदेशानुसार उसकी गतिविधियाँ हों। महर्षि पातंजलि ने योग की परिभाषा करते हुए कहा है कि “योगश्चितवृति निरोध” अर्थात् चित की वृत्तियों का निरोध करना, रोककर एकाग्र करना ही योग है। इस दिशा में सफलता मिलते ही अन्तरात्मा का परमात्मा से सायुज्य हो जाता है और वह उनमें सन्निहित समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। वशवर्ती मन के प्रयोग से संसार के किसी कार्य में प्रतिभा, यश, विद्या, स्वास्थ्य, भोग, अन्वेषण आदि जो भी वस्तु अभीष्ट होगी, वह निश्चित ही प्राप्त होकर रहेगी। उसकी प्राप्ति में संसार की कोई शक्ति बाधक नहीं हो सकती।
साधना जैसे प्रयोग इसीलिए किए जाते हैं कि आत्म शक्ति का चमत्कारी उपयोग बन पड़े। इसी आधार पर सिद्ध पुरुष, अनेकों दिव्य विभूतियों के अधिष्ठाता बनते हैं और वह कर दिखाते हैं जो सामान्यजनों की कल्पना से भी बाहर होता है। नर पशु के समतुल्य विचरण करने वाले भी यदि ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता बन सकें तो समझना चाहिए कि उनने देव पुरुष की स्थिति प्राप्त कर ली।
साधना की कसौटी बन गई। पुराणों ने तो यहाँ तक कह दिया जिनके घर में तीन दिन से अधिक का अनाज हो वह ब्राह्मण नहीं। आज यह तथ्य भले अनोखा लगे पर तत्कालीन समय के समाज ओर ब्राह्मणों के पारस्परिक विश्वास को दर्शाने वाला तो है ही।
साधना है। उसकी जानकारी प्राचीन काल में विद्याध्ययन के साथ ही करा दी जाती थी। पाठशाला में प्रवेश करते समय पुरातन काल में गुरुमंत्र के रूप में गायत्री को रटाया जाता था और उसकी प्रतिमा सदा साथ रखने के लिए जनेऊ पहनाया जाता था। इसमें वर्णभेद की कोई बात नहीं थी। वंशभेद या लिंगभेद के कारण किसी को भी इससे वंचित नहीं किया जाता था।
साधना उपचार, इन्हीं दिनों
साधना पूरी हुई इसे कैसे पहचानें? इस पहेली को गीता ने अपने अठारहवें अध्याय के बयालीस श्लोक में सुलझाया है। इसके अनुसार अन्तःकरण का निग्रह, आवरण और व्यवहार की परिष्कृत स्थिति, सरल आस्तिक बुद्धि, अपरिग्रह आदि ऐसे लक्षण हैं जिनसे इन्हें पहचाना जा सकता है। अपरिग्रह तो जैसे इस साधना की कसौटी बन गई। पुराणों ने तो यहाँ तक कह दिया जिनके घर में तीन दिन से अधिक का अनाज हो वह ब्राह्मण नहीं।
साधना थी, वह सतत् अभ्यास था - जिसके द्वारा मन को प्रशिक्षित किया था। साधना क्या है? संस्कारों, आदतों- चिन्तन का नए सिरे से गठन। बेतरतीब उछल-कूद करने वाले मन का प्रशिक्षण। इसे किये बिना उच्चतर जीवन के लिए कदम बढ़ाना कहाँ सम्भव है?
साधना अनुष्ठान के रूप में सूक्ष्म जगत के परिशोधन एवं सद्बुद्धि के विस्तार हेतु इन दिनों किया जाना चाहिए। वह है प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में 6 से 6.30 के बीच जो परिजन जहाँ भी हों पंद्रह मिनट पूर्व की और मुख करके बैठें व मौन गायत्री जप करें। सामयिक परिस्थितियों से उत्पन्न विषाक्तता के निवारण हेतु वे सन्मति के जन-जन तक पहुँचने व सौहार्द्र की भावना बढ़ने की प्रार्थना करें। उज्ज्वल भविष्य अवश्यम्भावी है। यह विश्वास रखते हुए इस प्रार्थना में अधिक से अधिक लोगों को सम्मिलित कर अनुकूल वातावरण तैयार करने में केन्द्रीय तंत्र को योगदान दें।
साधनायें जो मन को रोकती हैं। वैराग्य का अर्थ व्यावहारिक जीवन को संयमशील और व्यवस्थित बनाना। प्रलोभन को जीतना ही वैराग्य है। आद्यशंकराचार्य के अनुसार मन का सीधा सम्बन्ध श्वास-प्रश्वास से है। इस प्रक्रिया को नियंत्रित नियमित करने से मनःसंस्थान को वशवर्ती बनाया जा सकता है।
साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
साधना के चरम शिखर पर पहुँचने वाला कैसा होगा? यही पर उसकी एक झलक देखने को मिलती है।
साधना फिर से एक बार पूरे वेग से चल पड़ी है। इसमें शामिल होने के लिए आवाहन के स्वर मुखरित हुए हैं। जो शामिल हुआ, जिससे इस साधना के प्रति निष्ठा पनपी, वह ने केवल अपने व्यक्तित्व विकास की पूर्णता को पाएगा, बल्कि नवसृजन में जुटी दिव्य शक्तियाँ उसी के नवयुग का श्रृंगार करेंगी।
साधना के सत्परिणामों की परम्परा अभी भी यथावत है। यह दूसरी बात है कि उन उपलब्धियों को कोई क्षुद्र प्रयोजनों में बाजीगरी जैसे कौतुक-कौतूहल दिखाये जायें अथवा उसके साथ जन समस्या के हितार्थ लोक कल्याण के महान प्रयोजन पूरा कर सकें। युग परिवर्तन की इस बेला में ऐसी ही संग्रहित, परिष्कृत और प्रखर आत्मशक्ति के प्रयोग की आवश्यकता समझी गई है।
साधना के बाद 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ आरंभ हुआ जो 11.30 तक अनवरत चलता रहा। इसमें प्रायः अढ़ाई लाख परिजनों ने पर्यावरण संशोधन एवं सूक्ष्मजगत के परिशोधन हेतु वनौषधियों की गायत्री मंत्र के साथ आहुतियाँ दीं। साथ-साथ शाँतिकुँज के साथ नई खरीदी गई भूमि, जहाँ देवात्मा हिमालय एवं स्मृति उपवन विनिर्मित होना है, में अखण्ड गायत्री जप एवं संस्कारों का क्रम नियमित चलता रहा। पुंसवन, जन्मदिवस, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ, नामकरण, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाहदिवस तथा श्राद्ध-तर्पण संस्कार नित्य संपन्न होते रहे एवं इस निःशुल्क व्यवस्था से पचास हजार से अधिक परिजन लाभान्वित हुए। उस भूमि को जो पूर्व संस्कारित है, प्रचण्ड प्राण ऊर्जा से अनुप्राणित करने हेतु साधना संस्कारों के बीजारोपण के निमित्त अखण्ड गायत्री जप की व्यवस्था की गयी थी।
साधना में भागीदारी, चिन्तन-मनन स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपयज्ञों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना, यही त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था जो तीनों दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वंदनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत जी शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। अपनी ओजस्वी शैली में पं. लीलापत शर्मा ने पूज्य गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के विस्तार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी क्षेत्रों तक पहुँचाने की प्रेरणा दी, जहाँ अभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया हैं। वंदनीया माता जी के उपासना, साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
साधना परम श्रेयस्कर है।
साधनाओं में रुचि लेने के लिए परामर्श दिया जाता है किन्तु पुरातन तत्त्वज्ञान को हृदयंगम कराये बिना उस दिशा में न तो विश्वास जमता है और न मन टिकता है। बदली हुई परिस्थितियों में हम कर्मयोग को ईश्वर प्राप्ति का आधार मान सकते हैं। कर्तव्य को, संयम को, पुण्य परमार्थ को ईश्वर का निराकार रूप मान सकते हैं। कामों के साथ आदर्शवादिता का समावेश रखा जा सके तो वह सम्मिश्रण इतना मधुर एवं सरस बन जाता है कि उस पर मन टिक सके। बया अपने घोंसले को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर तन्मयतापूर्वक बनाती है।
साधना द्वारा ब्राह्मणत्व उपलब्ध किया। विदेशों में यह नाम भले न प्रचलित हो पर इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ ब्राह्मण नहीं हुए। सुकरात, थोरो, इमर्सन, आइन्स्टीन सौ टंच ब्राह्मण थे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-October
साधना वस्तुतः एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें साधक अपने भीतर के काले मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश अणुओं को दिव्य तेजस्वी, सदाचरण शान्ति और प्रसन्नता देने वाले प्रकाश अणुओं में परिवर्तित करता है। विकास की इस प्रक्रिया में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि करते हुए वहाँ तक जा पहुँचना होता है जहाँ व्यष्टिगत आत्मचेतना को ब्रह्माण्डव्यापी समष्टिगत परमात्म चेतना का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है और अंततः वह उसी में तिरोहित हो जाती है। सविता साधना से इसी उद्देश्य की पूर्ति होती है। गायत्री के देवता सविता की आराधना भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं पाप-तापों एवं कषाय-कल्मषों को धो देती है और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश भर देती है जिससे समूचा जीवन ही ज्योतिर्मय हो उठता है। इस उपक्रम को अपनाकर हर कोई अपनी जीवन ज्योति को प्रकाशित-प्रज्ज्वलित कर सकता है।
साधना, कल्प साधना जैसे शिविरों में अपनी बीती बातों को उन्हें लिखकर देना, साधनात्मक उपचार, औषधि कल्प जैसी विधाओं से व्यक्तियों के जीवन में अकल्पनीय परिवर्तन घटित हुआ।
साधना से औरों को लाभान्वित करना ही सदैव पूज्य गुरुदेव का लक्ष्य रहा। वे 21 जनवरी 1955 को लिखे गए एक पत्र में एक घनिष्ठ आत्मीय को लिखते हैं-”हम अधिक शक्ति प्राप्त करने जा रहे हैं और उसका परिपूर्ण लाभ आपको मिलने वाला है। आपके साथ हमारी आत्मा अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है और वह तब तक जुड़ी रहेगी जब तक हम दोनों पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते।”
साधना से जुड़ा हुआ था तथा अन्तरंग की गहन पत्तों को उखाड़ कर अंतःकरण की चिकित्सा करता चलता था, इन पंक्तियों के रूप में हमारे पास अभी भी है। पत्र लेखन की यह शैली संभवतः आने वाले वर्षों में अनगिनत छात्रों के लिए शोध का विषय बन। फिर भी जो इस पक्ष से अभी तक अनभिज्ञ हैं, संभवतः उन दिनों नहीं बाद में इस महामानव व ऋषि युग्म के तंत्र से जुड़े हों, उनको लाभान्वित करने के लिए ऐसे कुछ पत्रों के महत्वपूर्ण अंश यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं।
साधना के समय सविता के ध्यान से हमारे मस्तिष्क का चुम्बकत्व सूर्य के प्रकाश कणों के चुम्बकत्व को आकर्षित करता और ग्रहण करता हुआ हमारी प्राणचेतना में दिव्यता का अभिवर्धन करता रहता है। प्रकाश ऊर्जा या प्राण शक्ति का आकर्षण मस्तिष्क के मध्यभाग से करने का विधान है, जिसे ‘ब्रह्मरंध्र ‘ कहा जाता है। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता और विश्व में जो कुछ भी मानवकृत विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है, उनका सम्पादन करता है। इसी मध्यभाग से प्रकाशकणों का एक फव्वारा सा फूटता रहता है। उसकी उछलती हुई तरंगें एकवृत्त बनाती हैं और फिर अपने मूल उद्गम में लौट जाती हैं।
साधना द्वारा आत्म परिष्कार की विधि व्यवस्था को कार्यान्वित करना पड़ता है।
साधना का निर्धारण इसी निमित्त किया था। सविता की दिव्य प्रकाश ऊर्जा को जो मनुष्य जितनी अधिक मात्रा में आकर्षित कर लेता है, वह उतना ही श्रेष्ठ, सद्गुणी एवं ओजस् तेजस् वाला बन जाता है। यदि इस विज्ञान को समझा जा सके और श्रद्धा भावनापूर्वक ध्यान उपक्रम को अपनाया जा सके, तो न केवल अपना जीवन शुद्ध, सात्विक दिव्य एवं सफल बनाया जा सकता है, वरन् औरों को भी लाभान्वित किया जा सकता है। परलोक और सद्गति का आधार यह दिव्य प्रकाश चेतना ही है।
साधना के अतिरिक्त और कुछ सोचते बन ही नहीं पड़ता। तब उन उलझनों में से एक भी बच नहीं सकेगी, जो आज किसी को उद्विग्न-आतंकित किये हुए है।
साधना का उद्देश्य भी यही है।
साधना आपकी होगी व पुण्य आपको हस्तान्तरित होगा।”
साधना अरुणोदय काल में सम्पन्न की जाती है, जब पूर्व दिशा की ओर अरुणिमा युक्त स्वर्णिम आभा के साथ भगवान सविता अपने समस्त वरेण्य, दिव्य भर्ग, ऐश्वर्य के साथ उदय होते हैं। यों तो सामान्य जप के साथ सूर्य मंडल मध्यस्थ भगवती गायत्री का ध्यान करने का विधान है, किन्तु इस साधना में गायत्री माता की छवि का स्थान सविता का दिव्य तेजोवलय ले लेता है। ध्यान मुद्रा में बैठकर भावना करनी पड़ती है कि हमारी प्राणचेतना अन्तरिक्ष की यह विशाल दूरी पार करने के लिए निकल पड़ी है। भावना की प्रगाढ़ता के लिए पृथ्वी और आकाश के विविध काल्पनिक दृश्यों को मानस पटल पर उभारना पड़ता है। धीरे-धीरे प्राणों को सविता के प्रकाश में डुबो देते हैं।
साधनाओं के द्वारा मेरे अन्तराल में उतरा है। वह रहस्य!!! जिसे हिमालय की ऋषि सत्ताओं ने मेरे सामने उद्घाटित किया है।”
साधना के पथ पर सुगमतापूर्वक चलता रह सके।
साधना में गायत्री माता की छवि का स्थान सविता का दिव्य तेजोवलय ले लेता है। ध्यान मुद्रा में बैठकर भावना करनी पड़ती है कि हमारी प्राणचेतना अन्तरिक्ष की यह विशाल दूरी पार करने के लिए निकल पड़ी है। भावना की प्रगाढ़ता के लिए पृथ्वी और आकाश के विविध काल्पनिक दृश्यों को मानस पटल पर उभारना पड़ता है। धीरे-धीरे प्राणों को सविता के प्रकाश में डुबो देते हैं। मन हठात् भागना चाहे तो अनन्त सितारों की जगमग के मनोहारी दृश्य दिखा कर उसे फिर उसी सूर्य के प्रकाश में उतारा जाता है और दृढ़ भावना की जाती है कि अपनी प्रकाश चेतन में सम्मिलित कालिमायुक्त दूषित अणु पाप-ताप और अहंताएँ नष्ट होती जा रही हैं।
साधना जो इस जीवन में नहीं कर लेता उसके लिए इस सुर दुर्लभ अवसर का कुछ भी उपयोग नहीं। श्रीमद्भागवत् 11-6-74 में कहा गया है:-
साधनात्मक उपचार, औषधि कल्प जैसी विधाओं से व्यक्तियों के जीवन में अकल्पनीय परिवर्तन घटित हुआ।
साधना के लिए निरन्तर आकुल-व्याकुल रहती।
साधनाओं की जटिलताओं में उलझकर उनसे मार्गदर्शन लेते थे। कोई कुण्डलिनी, चक्रवेधन तथा कोई हठयोग अथवा विरक्ति प्रधान साधना का विधान जानने व मार्गदर्शन प्राप्त करने का हठ करता तो उनका उत्तर यों होता था- “शबरी, निषाद, रैदास, आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के ही उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हो पर आप गृहस्थ योग की भूमिका का ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति प्राप्त कर लेंगे।
साधना में सिद्धि प्राप्त कर लेने जैसी उपलब्धि है।
साधना से इसी उद्देश्य की पूर्ति होती है। गायत्री के देवता सविता की आराधना भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं पाप-तापों एवं कषाय-कल्मषों को धो देती है और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश भर देती है जिससे समूचा जीवन ही ज्योतिर्मय हो उठता है। इस उपक्रम को अपनाकर हर कोई अपनी जीवन ज्योति को प्रकाशित-प्रज्ज्वलित कर सकता है। ज्योति साधना का उद्देश्य भी यही है।
साधना का विशेष महत्व है। अध्यात्मशास्त्रों में स्थान-स्थान पर इसकी चर्चा की गई है। यह प्रकाश सूर्य, चन्द्र आदि से निकलने वाला भौतिक प्रकाश नहीं, वरन् वह परम् ज्योति है जो इस विश्व चेतना का आलोक बन कर जगमगा रही है। गायत्री का उपस्थ सविता देवता इसी परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतंभरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण-कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने में भी देख सकता है।
साधना से परिष्कृत अंतःचेतना को अपनी सघन आत्मीयता एवं सहृदयता का परिचय पग-पग पर देना होता है। इससे प्रेमी तो धन्य होता ही है, प्रेम पात्र को भी अति महत्वपूर्ण लाभ होता है। गंगा तो स्वयं पवित्र होती है उसमें स्नान करने वाले भी पवित्र बनने लगते हैं।
साधना को हानि पहुँच सकती है।” कितना बेबाक स्पष्टवादी मार्गदर्शन है। यहाँ यह बताना उचित होगा कि उस समय वे “मैं क्या हूँ?” जैसी गूढ़ उपनिषद् स्तर की पुस्तक लिख चुके थे। तथापि सभी को सत्साहित्य पढ़ते रहने व सत्यधर्म की दीक्षा लेने का ही आग्रह करते थे।
साधना प्रक्रिया द्वारा विकसित किया और दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सेवा, सज्जनता, सहृदयता, आदि अन्तःकरण की दिव्य विशेषताओं के साथ विस्तृत एवं परिपुष्ट किया जाता है। यह जहाँ से अद्भुत होता है, वहाँ ऐसी उल्लासभरी किसी पदार्थ से नहीं की जा सकती। प्रेम को अलौकिक रस के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। इस निर्झर का जल जो भी पीता है, असीम तृप्ति अनुभव करता है। प्रेमी अन्तःकरण अपने से सम्बद्ध व्यक्तियों को अतिशय बल प्रदान करता है।
साधनाओं के ही उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हो पर आप गृहस्थ योग की भूमिका का ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति प्राप्त कर लेंगे। आप इस संबंध में पूर्ण निश्चिन्त रहें और सब सोचना विचारना हमारे ऊपर छोड़ दें।
साधना प्रक्रिया को अपना कर हर कोई ओजस तेजस वर्चस सम्पन्न बन सकता है।
साधना का विधान जानने व मार्गदर्शन प्राप्त करने का हठ करता तो उनका उत्तर यों होता था- “शबरी, निषाद, रैदास, आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के ही उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हो पर आप गृहस्थ योग की भूमिका का ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति प्राप्त कर लेंगे। आप इस संबंध में पूर्ण निश्चिन्त रहें और सब सोचना विचारना हमारे ऊपर छोड़ दें।
साधना करनी पड़ी है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय “ की प्रार्थना में इसी दिव्य प्रकाश की याचना का भाव सन्निहित है। इसकी विधि अत्यंत सरल, किन्तु महान प्रतिफल प्रदान करने वाली है।
साधना अतीव लाभकारी सिद्ध होती है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
साधना से जगाएँ जीवन की सार्थकता का यही एक मात्र मार्ग है।
साधना जैसे शिविरों में अपनी बीती बातों को उन्हें लिखकर देना, साधनात्मक उपचार, औषधि कल्प जैसी विधाओं से व्यक्तियों के जीवन में अकल्पनीय परिवर्तन घटित हुआ।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-December
साधना एक वैज्ञानिक अन्वेषण एवं अभ्यास प्रकरण है। उसमें अन्तर्मुखी होकर सूक्ष्म अतिसूक्ष्म सत्ता के गहरे समुद्र में डुबकी लगाने और वहाँ से बहुमूल्य रत्न-राशि ढूँढ़ लाने के लिए कुशल पनडुब्बी का सा-दुस्साहस भरा महत्वपूर्ण कदम उठाया जाता है और वही भी बन तब पड़ता है जब पहल मन को भली प्रकार निग्रहित कर लिया जाय।
साधना की और कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। यहूदी धर्म के यहोवा और पारसी धर्म के देवदूत जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।
साधना पराक्रम के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। पुरातन काल में तो वैसा वातावरण चहुँ ओर था एवं बहिरंग से हटकर अन्तर्मुखी हो आत्मचिन्तन की साधना करने का हर किसी के पास अवसर था। कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, निदिध्यासन-धारण ध्यान समाधि स्तर के उपक्रम अब भले ही उस सीमा तक संभव न हों, पूज्य गुरुदेव स्थूल, सूक्ष्म कारण शरीर के जागरण संबंधी ऐसे विशिष्ट साधन निर्धारित कर गए हैं कि उनका आश्रम लेकर निश्चित ही लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अखण्ड जप, नियमित यज्ञ, युगसन्धि महापुरश्चरण एवं करोड़ों गायत्री जप की ऊर्जा से अभिपूरित वातावरण इसमें सहायक भूमिका है। मनःस्थिति यदि बदलने को एवं नये प्रचलन को अपनाने को समुद्यत है तो आन्तरिक कायाकल्प सुनिश्चित हो जाता है।
साधना आरण्यक का स्वरूप ब्रह्मवर्चस् के रूप में बनाया गया है, न कि किसी चिकित्सालय सेनेटोरियम जैसा।
साधना भी उन लोगों के लिए हानिकर सिद्ध होता है, जो सात्विकता बनाये रहना चाहते और साधनारत होकर आत्मकल्याण का प्रयोजन साधने के इच्छुक हैं।
साधना में लगाए। योगी अरविन्द घोष, महर्षि रमण, स्वामी रामतीर्थ की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। वैष्णव आचार्यों में से रामानुज मध्व, निम्बार्क आदि ने जितना ज्ञान संचय किया उतनी ही तप साधना की।
साधना विधान की विशेषता है कि इसमें दोनों ही प्रतिफलों की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति ओजस्, तेजस, वर्चस् को समुच्चय बनता है। अथर्व वेद के मंत्र “स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताम्.......” में जिस सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि की बात कही गयी है, वह ब्रह्मवर्चस् ही है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यही ब्रह्मलोक ले जाने वाला, बंधनों से मुक्ति दिलाने वाला एक मात्र मार्ग है। हम सब गायत्री के ब्रह्मवर्चस् की साधना कर आत्मबल संपन्न बनें।
साधना की सफलता निश्चय रहती है।
साधना प्रधान पर उनका स्तर तीनों में भिन्न-भिन्न हैं।
साधना उपक्रमों का निर्धारण किया गया है।
साधना के दिनों में उपासना परक जो नियम-उपनियम बनाये बताये गये हैं, वे तो श्रद्धापूर्वक समग्र अनुशासन के साथ पूरे करने ही चाहिए, पर साथ ही एक बात यह भी भूलनी नहीं चाहिए कि उन दिनों आहार-विहार की सात्विकता का अनुबंध भी ठीक तरह पालन करना चाहिए। अस्त-व्यस्त जीवनचर्या अपनाते हुए पूजा-उपासना के कुछ नियम पालन कर लेने भर से साधना समग्र रूप से सफल नहीं हो सकती। जिस प्रकार पूजा काल में शरीर को शुद्ध करना आवश्यक है, धुले कपड़े ही पहनने चाहिए, उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि आहार-विहार की पवित्रता में, व्यतिरेक न होने दिया जाय।
साधना विज्ञान की भाषा में इसे योग और तप का समन्वय कहा जाता है। योग से आत्मा के देवात्मा, परमात्मा स्तर तक विकसित होने का अवसर प्राप्त होता हैं तप से शक्ति उत्पन्न होती है। सशक्तता ही प्रगति, समृद्धि और विभूति के विविध सत्परिणाम उत्पन्न करती है। साधना से मिलने वाली सिद्धियाँ शक्ति -सम्पादन का ही परिणाम हैं। योग एवं तप दोनों की समन्वित साधना, प्रक्रिया ब्रह्मवर्चस् का आधार है।
साधना का परामर्श भी इसी आधार पर दिए जाने की व्यवस्था बनाई गई है। नौ दिन तक गंगाजल ही पीने एक समय आहार लेने तथा ऊर्जा पूरित स्थान छोड़कर कहीं और न जाने का विधान रखा गया है ताकि संचित प्राणशक्ति का क्षरण न हो। आत्म देव की साधना तथा नादयोग की साधना भी विशिष्ट
रूप किये जाने तथा युगसन्धि पुरश्चरण में भागीदारी हेतु सामूहिक मौन जप आधा घण्टे एक साथ एक ही समय किए जाने का प्रावधान भी रखा गया है। परीक्षण के उपकरण नये बढ़ाये गये हैं, जिनसे साधक यह स्वतः जान सकेंगे कि उनमें आने से पूर्व की स्थिति में क्या परिवर्तन हुआ है। विभिन्न वर्णों तथा शब्द शक्ति का प्रभाव अन्तश्चेतना पर क्या पड़ता है, यह ब्रह्मवर्चस् के उपकरणों द्वारा परिजन जान सकेंगे।
साधनाओं में निष्णात् और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र गुरुपत्नी से बदला लेने वाले हैं। विपुल ने सूक्ष्म शरीर से गुरुपत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचाया।
साधना द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, इसकी रूप-रेखा बनाने में दिशाधारा विनिर्मित करने में ध्यान योग का उपयोग कर सकें तो वह प्रयास अधिक सार्थक और अधिक प्रत्यक्ष हो सकता है।
साधनाओं द्वारा स्वयं के जीवन को उत्कृष्टतम बनाने वाली आत्माएँ ही लोक जीवन को सच्चा नेतृत्व दे सकने में समर्थ हो सकती हैं। नए समाज में ओछे हल्के वाचाल व्यक्तियों का कोई स्थान न होगा। फिर नेतृत्व जैसे महान कार्य के लिए इन जैसों के बारे में सोचना ही ठीक नहीं। यह महान कार्य महान आत्माएँ ही कर सकेंगी और महान आत्माओं के अनेक गुणों में प्रमुख एक तपश्चर्या भी है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। महाकाल आज ऐसे ही तपस्वियों की प्रतीक्षा कर रहा है।
साधना समग्र रूप से सफल नहीं हो सकती। जिस प्रकार पूजा काल में शरीर को शुद्ध करना आवश्यक है, धुले कपड़े ही पहनने चाहिए, उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि आहार-विहार की पवित्रता में, व्यतिरेक न होने दिया जाय।
साधना-प्रक्रिया का पथ है।
साधनाकाल में विशेष रूप से निषेध है। सात्विक जीवन जीना हो और आत्मबल बढ़ाना हो, तो आहार ही नहीं, विहार में भी सात्विकता का अधिकाधिक समावेश करना चाहिए।
साधना सम्पन्न करें।
साधना स्तर की तपश्चर्याएँ बढ़ा दी गयी हैं व शीत ऋतु, बसंत को इसके लिए उपयुक्त समझकर इन्हें सर्वोच्च वरीयता देकर 1990 के अंतिम दो माह व 1991 के पूर्वार्ध में चलाते रहने का निश्चय किया गया है।
साधना तथा नादयोग की साधना भी विशिष्ट
रूप किये जाने तथा युगसन्धि पुरश्चरण में भागीदारी हेतु सामूहिक मौन जप आधा घण्टे एक साथ एक ही समय किए जाने का प्रावधान भी रखा गया है। परीक्षण के उपकरण नये बढ़ाये गये हैं, जिनसे साधक यह स्वतः जान सकेंगे कि उनमें आने से पूर्व की स्थिति में क्या परिवर्तन हुआ है। विभिन्न वर्णों तथा शब्द शक्ति का प्रभाव अन्तश्चेतना पर क्या पड़ता है, यह ब्रह्मवर्चस् के उपकरणों द्वारा परिजन जान सकेंगे। ध्यान यही रखना है कि यह परीक्षण सुविधा रोगियों के लिए नहीं मात्र साधना का अवलम्बन ले रहे लोक सेवियों के लिए उपलब्ध है। साधना आरण्यक का स्वरूप ब्रह्मवर्चस् के रूप में बनाया गया है, न कि किसी चिकित्सालय सेनेटोरियम जैसा।
साधना है। उच्चस्तरीय सत्परिणाम इसी से मिलते हैं। ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मतेज दोनों के समन्वय द्वारा ही सर्वांगपूर्ण साधना संभव हो पाती अभीष्ट दोनों हैं-तत्त्वज्ञान भी तथा तेजस्विता भी। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। यह गायत्री साधना विधान की विशेषता है कि इसमें दोनों ही प्रतिफलों की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति ओजस्, तेजस, वर्चस् को समुच्चय बनता है।
साधनारत होकर आत्मकल्याण का प्रयोजन साधने के इच्छुक हैं।
साधना करने का हर किसी के पास अवसर था। कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, निदिध्यासन-धारण ध्यान समाधि स्तर के उपक्रम अब भले ही उस सीमा तक संभव न हों, पूज्य गुरुदेव स्थूल, सूक्ष्म कारण शरीर के जागरण संबंधी ऐसे विशिष्ट साधन निर्धारित कर गए हैं कि उनका आश्रम लेकर निश्चित ही लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अखण्ड जप, नियमित यज्ञ, युगसन्धि महापुरश्चरण एवं करोड़ों गायत्री जप की ऊर्जा से अभिपूरित वातावरण इसमें सहायक भूमिका है। मनःस्थिति यदि बदलने को एवं नये प्रचलन को अपनाने को समुद्यत है तो आन्तरिक कायाकल्प सुनिश्चित हो जाता है। इन नौ दिवसीय अनुदान सत्रों में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही विशिष्ट साधना उपक्रमों का निर्धारण किया गया है।
साधना अनुदान शिक्षण अनिवार्य रूप से जुड़ा होगा। इस उनतीस दिन की अवधि में प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञामंडलों, शक्तिपीठों का संचालन व युगनेतृत्व की विधा का शिक्षण दिया जाएगा। अगले दिनों नेतृत्व धर्मतंत्र से लोक शिक्षण करने वाले लोकसेवियों को ही करना हैं। कैसे स्वयं को मुखर बनाया जाय, अपनी झिझक को मिटाकर अपनी बात कैसे सामने वालों के गले उतारी जाय निज की प्रतिभा का संवर्धन परिष्कार कर किस प्रकार अपनी व्यवस्था बुद्धि का उपयोग करते हुए कार्यरत रहा जाय, यह समग्र शिक्षण लोकसेवियों के इन युगशिल्पी सत्रों में दिया जा रहा है।
साधना का खाद-पानी नहीं मिलता, वह अंकुरित पल्लवित नहीं होती। बड़े काम साधना पराक्रम के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। पुरातन काल में तो वैसा वातावरण चहुँ ओर था एवं बहिरंग से हटकर अन्तर्मुखी हो आत्मचिन्तन की साधना करने का हर किसी के पास अवसर था। कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, निदिध्यासन-धारण ध्यान समाधि स्तर के उपक्रम अब भले ही उस सीमा तक संभव न हों, पूज्य गुरुदेव स्थूल, सूक्ष्म कारण शरीर के जागरण संबंधी ऐसे विशिष्ट साधन निर्धारित कर गए हैं कि उनका आश्रम लेकर निश्चित ही लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अखण्ड जप, नियमित यज्ञ, युगसन्धि महापुरश्चरण एवं करोड़ों गायत्री जप की ऊर्जा से अभिपूरित वातावरण इसमें सहायक भूमिका है।
साधना ही गायत्री की समग्र साधना है। उच्चस्तरीय सत्परिणाम इसी से मिलते हैं। ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मतेज दोनों के समन्वय द्वारा ही सर्वांगपूर्ण साधना संभव हो पाती अभीष्ट दोनों हैं-तत्त्वज्ञान भी तथा तेजस्विता भी। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। यह गायत्री साधना विधान की विशेषता है कि इसमें दोनों ही प्रतिफलों की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति ओजस्, तेजस, वर्चस् को समुच्चय बनता है।
साधना सम्पन्न होती है। महान ऋषियों द्वारा प्रतिपादित समग्र अध्यात्म यही है। प्रज्ञा और पराक्रम का यही युग्म ब्रह्मवर्चस् की लक्ष्य-प्राप्ति में समर्थ बनाता है। अध्यात्म परम्परा में इन्हें ही ब्रह्मविद्या एवं तपश्चर्या कहा गया है। पौराणिक कथाओं में ब्रह्मा जी की दो पत्नियाँ बताई गई हैं एक गायत्री, दूसरी सावित्री।
साधना का अवलम्बन ले रहे लोक सेवियों के लिए उपलब्ध है। साधना आरण्यक का स्वरूप ब्रह्मवर्चस् के रूप में बनाया गया है, न कि किसी चिकित्सालय सेनेटोरियम जैसा।
साधना के माध्यम से भौतिक सफलताएँ एवं अध्यात्म जगत की विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है।
साधना सत्र प्रतिमाह 1 से 9, 11 से 19 तथा 21 से 29 तारीखों में चलते रहेंगे। आवेदन के पश्चात् जिन्हें उपयुक्त समझा जाएगा, उन्हीं को स्वीकृति स्वरूप सत्र प्रवेश की एक विशिष्ट पुस्तिका नियमोपनियम संबंधी भेजी जायगी। इस प्रकार परिपक्व मनः स्थिति के साधक ही इसमें आ सकेंगे।
साधना-अनुसंधान सत्र, एक मास के युग शिल्पी शिक्षण सत्र तथा तीसरे तीन-तीन के अतिथि सत्र। हैं सभी साधना प्रधान पर उनका स्तर तीनों में भिन्न-भिन्न हैं।
साधना और राष्ट्र भक्ति है। उसमें हर भावनाशील को सम्पूर्ण हृदय और अन्तः करण से जुट जाने का ठीक यही समय है।
साधना भी करता है, पर लोक-आराधना के अभाव में वह अंकुरित बीज पौधा बनने से पूर्व ही सूख जाता है।
साधना के दिनों में उपवास का नियम है। फलाहार दूध, छाछ पर रहकर साधक अपना साधनाक्रम पूरा करते हैं। इतना न बन पड़े, तो रोटी-पूड़ी आदि न खाकर दलिया खिचड़ी जैसे अमृताशय आधे समय खाकर काम चलाना पड़ता है। कम से कम भोजन किया जाय और दूसरे समय उपवास रखा जाय। इससे पेट को विश्राम मिलने से स्वास्थ्य लाभ भी होता है और मनःक्षेत्र में सात्विकता बनी रहने से साधना की सफलता निश्चय रहती है।
साधनाक्रम पूरा करते हैं। इतना न बन पड़े, तो रोटी-पूड़ी आदि न खाकर दलिया खिचड़ी जैसे अमृताशय आधे समय खाकर काम चलाना पड़ता है। कम से कम भोजन किया जाय और दूसरे समय उपवास रखा जाय। इससे पेट को विश्राम मिलने से स्वास्थ्य लाभ भी होता है और मनःक्षेत्र में सात्विकता बनी रहने से साधना की सफलता निश्चय रहती है।
साधना कर आत्मबल संपन्न बनें।
साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।
साधना भी विशिष्ट
रूप किये जाने तथा युगसन्धि पुरश्चरण में भागीदारी हेतु सामूहिक मौन जप आधा घण्टे एक साथ एक ही समय किए जाने का प्रावधान भी रखा गया है। परीक्षण के उपकरण नये बढ़ाये गये हैं, जिनसे साधक यह स्वतः जान सकेंगे कि उनमें आने से पूर्व की स्थिति में क्या परिवर्तन हुआ है। विभिन्न वर्णों तथा शब्द शक्ति का प्रभाव अन्तश्चेतना पर क्या पड़ता है, यह ब्रह्मवर्चस् के उपकरणों द्वारा परिजन जान सकेंगे। ध्यान यही रखना है कि यह परीक्षण सुविधा रोगियों के लिए नहीं मात्र साधना का अवलम्बन ले रहे लोक सेवियों के लिए उपलब्ध है। साधना आरण्यक का स्वरूप ब्रह्मवर्चस् के रूप में बनाया गया है, न कि किसी चिकित्सालय सेनेटोरियम जैसा।
साधना के बाद पाँच कुण्डीय यज्ञशाला में अविवाहित कुमारी कन्याओं द्वारा गायत्री यज्ञ के साथ विभिन्न संस्कार तथा “महाकाल के साथ साझेदारी का विशिष्ट संकल्प सभी उपस्थित परिजनों को कराया जाएगा।
साधना है। चिन्तन की उत्कृष्टता ब्रह्मविद्या या अध्यात्म-तत्त्वज्ञान का ज्ञान पक्ष है। ज्ञान एवं कर्म का समन्वय ही ब्रह्मवर्चस् है परिपोषण तथा उन्मूलन दोनों ही तथ्य इसमें समाविष्ट हैं।
साधना में समर्थ हो सके। औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में संतोष करने के उपरान्त ही ऐसा कुछ बन पड़ता है जिसे युग देवता के चरणों में समर्पित किया जा सके और वातावरण को नन्दन वन जैसा सुरभित बनाया जा सके।
साधना की।
साधना हेतु बने कक्ष को चारों ओर से ढँक कर ऐसा बनाया गया है कि ध्यान बँटे नहीं, निर्देशों के अनुरूप उन्मीलित नेत्रों से उस प्रकाश व दृश्य पर केन्द्रित रहे जो मंच पर दिखाई दे रहा है। प्रातःकाल प्राणायाम, बंध के विशिष्ट प्रयोग जोड़े गए हैं तथा त्रिकाल संध्या की तरह प्रातः के अलावा मध्याह्न व संध्या के भी, इस प्रकार तीन ध्यान प्रयोग जोड़े गए हैं। सभी उपक्रम बंध मुद्रा को छोड़कर सामूहिक रूप से सम्पन्न होंगे। स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीर के परिष्कार के लिए जड़ी बूटी कल्क अखण्ड दीपक को प्रणाम करते समय दिए जाने की व्यवस्था की गयी है। नौ दिन में यह प्रति तीन दिन में भिन्न-भिन्न प्रकार का साधक के परीक्षण के उपरान्त पाई गई स्थिति के अनुरूप होगा।
साधना से मिलने वाली सिद्धियाँ शक्ति -सम्पादन का ही परिणाम हैं। योग एवं तप दोनों की समन्वित साधना, प्रक्रिया ब्रह्मवर्चस् का आधार है।
साधना भी चलती रहे।
साधना बनाया।
साधना संभव हो पाती अभीष्ट दोनों हैं-तत्त्वज्ञान भी तथा तेजस्विता भी। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। यह गायत्री साधना विधान की विशेषता है कि इसमें दोनों ही प्रतिफलों की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति ओजस्, तेजस, वर्चस् को समुच्चय बनता है। अथर्व वेद के मंत्र “स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताम्.......” में जिस सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि की बात कही गयी है, वह ब्रह्मवर्चस् ही है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यही ब्रह्मलोक ले जाने वाला, बंधनों से मुक्ति दिलाने वाला एक मात्र मार्ग है।
साधना, प्रक्रिया ब्रह्मवर्चस् का आधार है।
साधना काल में ब्रह्मचर्य पालन का प्रचलन है। शारीरिक काम सेवन की तरह ही कामुक चिन्तन का भी मानसिक पवित्रता पर बुरा असर पड़ता है। उन दिनों नर-नारी के बीच माता, भगिनी, पुत्री जैसे पवित्र संबंधों की ही कल्पना करनी चाहिए। ऐसा साहित्य नहीं पढ़ना चाहिए, ऐसे खेल तमाशे नहीं देखने चाहिए, जो मन में कामुकता के विचार भड़काते हों।
साधना की। पैंतालीस वर्ष की आयु में उनका व्यक्तित्व लोक नायक के रूप में उभरा। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग तप में और एक चौथाई जन नेतृत्व में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेशों की बौछार उतनी नहीं की जितने आज के सामान्य उपदेशक कर लेते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई जनता उनके मार्गदर्शन पर आस्था रखती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-May
साधना जो भावों के प्रगाढ़ परिपक्व होने पर जीवन बोध करा दे। अलाउद्दीन खाँ, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कला का विकास इसी तरह तक किया था। यह कथन सिर्फ संगीत के क्षेत्र में ही नहीं अपितु साहित्य यहाँ तक कि विज्ञान के क्षेत्र में भी सात्य है। इमर्सन ने साहित्य तथा रमन -आइन्स्टीन के विज्ञान के माध्यमों से विद्या के इसी स्वरूप के बाद भी आवश्यक नहीं कि प्रत्येक शिक्षा कला बने और प्रत्येक कला विद्या के स्तर तक विकसित हो सके।
साधना विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि मात्र विचार परिवर्तन से उनके आकारों में परिवर्तन आता हो, ऐसी बात नहीं है, वरन् भाव परिवर्तन से भी आकृतियों में बदलाव आता है। उनके अनुसार स्नेहसिक्त भाव आकर्षक फूलों की भाँति होते हैं और अनायास ही हर किसी को अपनी ओर खींच लेते हैं। इसी तरह भगवद् भक्तियुक्त भावना प्रवाह के आकार गुम्बदनुमा होते हैं तो ईर्ष्या, द्वेष और हिंसायुक्त विचार आयुध की आकृति लिए होते हैं। शाप और वरदान इसी आधार पर कार्य करते एवं भले-बुरे परिणाम प्रस्तुत करते हैं। शाप में चूँकि अहितकर भावों का समावेश होता है, अतः वह जिस व्यक्ति को लक्ष्य कर दिये जाते हैं, उस तक पहुँच कर विचारों के यही अस्त्र अमंगलकारी प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
साधना का पुरुषार्थ चाहिए। स्वयं बुद्ध बन कर ही औरों की बोधि में सहायक हुआ जा सकता है”। तब मैं जानना चाहता हूँ।”
साधना के सातत्य के बल पर सर्वात्मबोध प्राप्त कर लिया था। तभी तो वह बाल गंगाधर से लोकमान्य हुए। उनके कृतित्व की प्रेरणास्पद दीप शिखा को बीतते बदलते समय की आँधियाँ बुझा नहीं पाई। इन दिनों महाकाल को पुकार हृदय के हर स्पन्दन के माध्यम से पुकार रही है हम सबको सामान्य से लोकमान्य बनाने हेतु।
साधना है। साधना के दौरान जब इस दृढ़ संकल्प को आरोपित किया जाता है तो धीरे-धीरे यह जीवन्त, जाग्रत और सशक्त बनने लगती है और अन्ततः एक पृथक् सत्ता का रूप धारण कर लेती है। अस्थिर एवं कमजोर संकल्प वालों का छाया पुरुष भी निर्बल होता है और यदा-यदा अपनी हलकी झलक-झाँकी दिखाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पाता। संकल्प की दृढ़ता न केवल व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान बनाती है, वरन् इसके साधक अपने छाया पुरुष को भी बलिष्ठ बनाकर उससे कोई भी दुरूह कार्य सम्पन्न करा लेते हैं।
साधना पूर्ण हुई अब प्रव्रज्या व्रत में दीक्षित हो’। जो आज्ञा।
साधना का लक्ष्य है भी।
साधना हर बीज को अंकुरित कर देने तक की सफलता उपलब्ध कराती है। यह प्रयत्न स्वयं का साहस और वातावरण जुटाने पर निर्भर है कि बीज में उगे हुए अंकुर किस गति से ऊँचे उठ सके और किस स्तर की द्रुतगामिता अपनाकर अपने को देव मानवों की, युग पुरुषों की पंक्ति में खड़े करने में सफल हो सके?
साधना में निमग्न था। जल का उद्वेलन लहरों की बेचैनी उसकी स्थिरता का संस्पर्श पा सुशान्त हो उठी थी। बाह्य हलचलों से अछूते चेतना के अन्तरतम् में कुछ घट रहा था। मन तदाकार हो रहा था मंत्र से। हृदय गुहा से झर रहा था अलौकिक दिव्य नाद।
साधना द्वारा इन्हें परिपुष्ट बनाया जा सकता है। रक्ताभवर्ण कामुकताजन्य विचारों की अभिव्यक्ति करता है। सात्विक लोगों के विचार पीत रंग वर्ण के बताये जाते हैं, जबकि स्वार्थ परायण व्यक्ति हरे रंग के विचार उत्पन्न करते हैं। भावनाओं में क्रोध का समावेश हो तो रंग लाल मिश्रित काला होता है। इस तरह विचारों में जो जो भाव समाविष्ट होते जाते हैं, तद्नुरूप उनकी आकृतियाँ भी उन वर्णों का सम्मिलित स्वरूप प्रकट करती हैं।
साधना डडडड। जिसमें स्वार्थ वासना क्रोध लालसा डडडड एक करके भस्मीभूत होने लगीं। डडडड करुणा के बादल बरस पड़े। डडडड भी बह गई। अब शेष थी करुणा।
साधना के लिए उस क्षेत्र का चयन करने में प्रसन्नता होती है। उच्चस्तरीय विचारधारा अनायास ही उठती और अन्ततः उस क्षेत्र को प्रभावित करती रहती है। वे वहाँ रहकर प्रसन्नता और सफलता अनुभव करते हैं। बिना किसी उद्वेग के वहाँ अपने सहचरों और शिष्यों समेत निवास भी करते रहते हैं। यह लाभ किसी प्रत्यक्ष कारण से नहीं होता वरन् वहाँ का वातावरण ही ऐसा होता है जो प्रोत्साहित एवं प्रसन्न करने में अनायास ही सहायक होता है।
साधना विज्ञान में आसमानी बताया गया है और कहा गया है कि इस रंग की ध्यान साधना द्वारा इन्हें परिपुष्ट बनाया जा सकता है। रक्ताभवर्ण कामुकताजन्य विचारों की अभिव्यक्ति करता है। सात्विक लोगों के विचार पीत रंग वर्ण के बताये जाते हैं, जबकि स्वार्थ परायण व्यक्ति हरे रंग के विचार उत्पन्न करते हैं। भावनाओं में क्रोध का समावेश हो तो रंग लाल मिश्रित काला होता है। इस तरह विचारों में जो जो भाव समाविष्ट होते जाते हैं, तद्नुरूप उनकी आकृतियाँ भी उन वर्णों का सम्मिलित स्वरूप प्रकट करती हैं।
साधना में निरत साधक को लोकजीवन की सेवा किए बगैर चैन नहीं मिलता”। फिर कुछ रुककर कुमार की आँखों में झाँकते हुए बोला-स्वल्पकालिक होते हुए जाना बहुमूल्य है। यह अनन्त यात्रा के पथ का पड़ाव है। जिसमें कुछ विशेष करना है। पर कितना भ्रम से ग्रसित है- जन जो इसे न समझ कर उन्मादी की तरह, सन्निपात के रोगी की तरह निरुद्देश्य ही जीता है।
साधना मार्ग सुझाया। भगवान से सन्मार्ग प्रदर्शन की गुहार लगाने का मंत्र सुझाया था तो फिर इनमें इतना अन्तर क्यों है? जरूर वह ठोस कारण तत्व है जिसके कारण मनुष्य निर्मम हो उठता है न स्वयं जीता है न औरों को जीवित रहने देता है।
साधना की हवा में कहाँ उड़ गई कुछ पता नहीं। अब तो एक सुवास थी। प्रसारित थी एक अनोखी सुरभि जिसका स्रोत थी स्वयं की सत्ता का मूल केन्द्र आत्मा।
साधना के फल ऐसे भी हो सकते हैं यह किसने सोचा था? क्या उपाय किए जाय? जिससे सामाजिक अशान्ति दूर हो? सारे मंत्री सभासद सभी चिन्तित थे। किसी को सूझ नहीं रहा था किया क्या जाय?
साधना का क्रम नित्य रखना। इसे आत्मदेव की उपासना समझो’।
साधना के दौरान जब इस दृढ़ संकल्प को आरोपित किया जाता है तो धीरे-धीरे यह जीवन्त, जाग्रत और सशक्त बनने लगती है और अन्ततः एक पृथक् सत्ता का रूप धारण कर लेती है। अस्थिर एवं कमजोर संकल्प वालों का छाया पुरुष भी निर्बल होता है और यदा-यदा अपनी हलकी झलक-झाँकी दिखाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पाता। संकल्प की दृढ़ता न केवल व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान बनाती है, वरन् इसके साधक अपने छाया पुरुष को भी बलिष्ठ बनाकर उससे कोई भी दुरूह कार्य सम्पन्न करा लेते हैं।
साधना द्वारा चक्रों के बेधन से प्राण ऊर्जा का ऊर्ध्वीकरण होता और साधक पशु-प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर पेट प्रजनन से आगे की बात सोचता और प्रगति की दिशा में अग्रगमन करता है। परन्तु आत्मोन्नति का मार्ग इतने से ही प्रशस्त नहीं हो जाता। इससे आगे का मुख्य सोपान है गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना एवं हृदय की अन्तः मलिनता को धोना। उसकी जटिल गाँठों को खोलना, और उलझी गुत्थियों को सुलझाना पड़ता है। हृदय ग्रंथि यदि परिष्कृत हो सुलझ जाय तो फिर मनुष्य-मनुष्य नहीं रह जाता, वह देव मानव, महामानव बन जाता है।
साधना विज्ञान में इसी सिद्धान्त का उपयोग कर छाया पुरुष की सिद्धि की जाती है। यह और कुछ नहीं संकल्पों द्वारा गढ़ी अपनी ही काया की छाया की साधना है। साधना के दौरान जब इस दृढ़ संकल्प को आरोपित किया जाता है तो धीरे-धीरे यह जीवन्त, जाग्रत और सशक्त बनने लगती है और अन्ततः एक पृथक् सत्ता का रूप धारण कर लेती है। अस्थिर एवं कमजोर संकल्प वालों का छाया पुरुष भी निर्बल होता है और यदा-यदा अपनी हलकी झलक-झाँकी दिखाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पाता। संकल्प की दृढ़ता न केवल व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान बनाती है, वरन् इसके साधक अपने छाया पुरुष को भी बलिष्ठ बनाकर उससे कोई भी दुरूह कार्य सम्पन्न करा लेते हैं।
साधना बन जाती है। ऐसी साधना जो भावों के प्रगाढ़ परिपक्व होने पर जीवन बोध करा दे। अलाउद्दीन खाँ, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कला का विकास इसी तरह तक किया था। यह कथन सिर्फ संगीत के क्षेत्र में ही नहीं अपितु साहित्य यहाँ तक कि विज्ञान के क्षेत्र में भी सात्य है। इमर्सन ने साहित्य तथा रमन -आइन्स्टीन के विज्ञान के माध्यमों से विद्या के इसी स्वरूप के बाद भी आवश्यक नहीं कि प्रत्येक शिक्षा कला बने और प्रत्येक कला विद्या के स्तर तक विकसित हो सके।
साधना द्वारा प्राप्त समाधि अवस्था से की है।
साधना कर पाते हैं। यह प्रत्यक्ष प्रतिफल की बात हुई परोक्ष रूप में अनुसंधान करने पर पाया गया है कि ऐसी वनौषधियों को उपजाने वाले क्षेत्र में कुछ समय निवास करने पर भी उन गुणों का लाभ उठाया जा सकता है। वहाँ की वायु में रहने वाली आरोग्यवर्द्धक विशेषता शरीर और मन को ऐसे लाभ पहुँचाती है जो उत्पन्न हुई औषधियों के सेवन से बहुत श्रम और समय के उपरान्त प्राप्त होती है।
साधना का तेजस। पता नहीं क्यों आज उसे अपना अतीत याद आ रहा था। वह तुलना करने लगा सबसे आज की। तब बही नदी के किनारे गंगापुर था आज गंगा नदी के किनारे कनखल तब पंजाब का करतारपुर था आज हिमालय का चरण प्रान्त। पाँच वर्ष की आयु में चेचक के प्रकोप से दृष्टिहीन को जाना।
साधना से अर्जित अमृत का अभिसिंचन करने हेतु।
साधना की सफलता सुगम बन जाती है। मंत्र-शास्त्रों में इसी हेतु विभिन्न प्रयोजनों के लिए इष्टदेव के भिन्न-भिन्न रूप रंग, छंद, ऋषि आदि निश्चित किये गये हैं। मंत्र सिद्धि के लिए इस संदर्भ में ऋषियों द्वारा निर्देशित नियमों-विधानों का पालन करना आवश्यक होता है। पर प्रायः लोग अनभिज्ञता या अज्ञानतावश इन निर्धारणाओं को मात्र मस्तिष्क की कोरी कल्पना मान लेते हैं और लकीर पीटते रहने भर से खाली हाथ रह जाते हैं। इसी तरह तामसिक पूजा विधान तथा हेय विचार भी सत्परिणाम के स्थान पर उलटे दुखदायी संकट ही खड़े करते हैं।
साधनात्मक पुरुषार्थ से पूरी होती है।
साधना एवं शिक्षण की अवधि में छात्रों को अधिकांश समय इसी परिधि में रहने का अनुबंध है। समुचित लाभ के लिए यह आवश्यक भी था। अनावश्यक लोगों को, अशिक्षितों, वयोवृद्धों, बीमारों, बच्चों को साथ लेकर चलने की मनाही इसीलिए की है कि सैर-सपाटे के उत्सुकों और अति गंभीर अध्यात्मप्रसंगों पर दत्तचित्त होने वालों के बीच किसी प्रकार का तालमेल बन नहीं पाता, साथ ही आश्रम का अनुशासन भी भंग होता है। जिस प्रकार इन दिनों पिता का नाम भी सरकारी कागजों में दर्ज किया जाता है, उसी प्रकार पुरातन काल में उस गुरुकुल का भी उल्लेख रहता था, जिससे ज्ञात होता था कि प्रशिक्षण का अविच्छिन्न अंग समझी जाने वाली महत्ता एवं गरिमा कहाँ से प्राप्त की? जिस प्रकार राजा की संतानें राजकुमार कहीं जाती और अपेक्षाकृत ऊँचे स्तर पर सम्मानित होती थीं, उसी प्रकार अगले दिनों शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षण के साथ अपने को जुड़ा हुआ होने के रूप में अपना परिचय देने वाले भी निश्चित रूप से गौरवान्वित होंगे।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-June
साधना-उपासना की विभिन्न विधियों क्रिया पद्धतियों का आधार परिष्कृत अन्तराल ही है।
साधना।
साधनात्मक प्रयासों की प्रायोगिकता सिद्ध करे। प्रणाली के साथ तुममें से प्रत्येक की समीक्षा हो सकेगी साथ ही श्रेष्ठता का आकलन भी संभव बन पड़ेगा”। किसी को भला क्या आपत्ति होती सब सहज तत्पर थे। जैसी आज्ञा समवेत का स्वर उभरा। आचार्य के भृकुटि संकेत के साथ ही एक प्रौढ़ योगी आगे आए।
साधना के कचुँक से निरंतर संकुचित होते रहकर स्वयं के मुक्ति लाभ की आशा करना और क्या है? समाज की रक्षा का अर्थ है-स्वार्थी का बलिदान। धरती पर स्वर्ग वही लाएगा, जिसके पास सहज जीवन का कवच होगा, सत्य को तलवार होगी, धैर्य का रथ होगा, साहस की ढाल होगी, मैत्री का पाश होगा, धर्म का नेतृत्व होगा, उठो, रौंदो इन स्वार्थों को तुम्हारे बलिदानों का प्रत्येक कण भावी पीड़ियों को साहस और निर्भीकता का संदेश देगा, प्रचण्ड सुधा की तरह बरसो, कायरों और निकम्मों के गढ़ पर धक्का मारो। उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ने वाले प्रत्येक निःस्वार्थ कदम के साथ मैं स्वयं हूँ।
साधना सफल हुई।
साधना का आश्रय लेना चाहिए।
साधना के एक बड़े काल खण्ड के पश्चात् शिष्यों को वैसा ही सतेज प्रखर और सत्कर्म में तत्पर पा उनकी पुलकन का उमंगना स्वाभाविक था। प्रणाम के क्रम के अनन्तर आचार्य की दृष्टि सभी शिष्यों के मुखों से गुजरती हुई एक पर जा टिकी जिसके चेहरे पर जिज्ञासा के भाव घनीभूत हो रहे थे। “कहो कुछ पूछना है?” उनके प्रत्येक अक्षर से वात्सल्य टपक रहा था। “एक जिज्ञासा थी” सुनकर लगा जैसे नम्रता साकार हो उठी हो।
साधना मार्ग में मिलने वाली सफलताओं के स्वरूप भी अनेक हैं जिन्हें सिद्धि कहते हैं इनमें से परम सिद्धि क्या है?
साधना तप तितीक्षा सब व्यर्थ है।
साधना कहा जा सकता है। उसे लघु से विभु बनाने में मत्स्यावतार जैसी भूमिका भी तो निबाहनी है। इसलिए देव मानवों को एक छत्र-छाया में एकत्रित करना अनिवार्य हों गया है। इस संदर्भ में सन् 1958 में एक सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का
साधना विज्ञानियों ने निर्धारण किया है।
साधना प्रणालियाँ बताई हैं। प्रायः हरेक ने पर्याप्त अभ्यास भी किया है कहने वाले ने बैठे हुए गुरु भाइयों पर दृष्टि घुमाई। हरेक के मुख पर समर्थन के भाव पा वह आश्वस्त हो एक क्षण रुक कर बोला यों प्रत्येक प्रणाली का लक्ष्य भी एक है। किन्तु मैं जानना चाहता हूँ इनमें से सर्व श्रेष्ठ योग कौन सा है? साथ ही..।
साधना करें। कर्त्तव्यनिष्ठ रहे, भगवान को संतोष दें। राजा की समझ में यह सीधा तत्वज्ञान भली प्रकार आ गया और वे घर लौट कर परमार्थ प्रयोजनों में लग गये।
साधना भली प्रकार से पूरी होती रहेगी।
साधना का प्रयोजन उस महाकाली को अवतीर्ण करना है जो समस्त आसुरी शक्तियों को परास्त करके लोक जीवन का खोया गौरव वापस दिला सके। परन्तु हम लोग, दोनों ने आपस में एक-दूसरे की ओर देखा। मुख्यतः यही तो कहना चाहते थे वे। अरे! तुम सब बिछुड़ने के लिए थोड़ा ही जुड़े हो। हम लोगों के आपसी संबंध चिरस्थायी हैं।
साधना की पूर्णाहुतियाँ 1995 तथा 2000 में होंगी, जिनमें न्यूनतम एक-एक करोड़ व्यक्ति सम्मिलित होंगे। इन सबको, इस प्रथम चरण की पूर्णाहुतियाँ करके अगले नये सोपान में और भी अधिक श्रद्धा-संवेदना के, उत्साह एवं साहस के साथ प्रवेश करना होगा। इसलिए दो पूर्णाहुतियों के आयोजन की योजना बनी है, यदि इतने लोगों का एकत्रीकरण एक जगह न बन सका, तो उसे मिशन द्वारा संचालित 24 सौ प्रज्ञा केन्द्रों में विभाजित भी किया जा सकता है। पूर्णाहुति की इस विशालता का लक्ष्य यथावत रहेगा, पर उसे एक या अनेक स्थानों पर संपन्न करने की बात अवसर आने पर परिस्थितियों के अनुरूप ही निश्चित होगी।
साधना में तनिक सा विघ्न उपस्थिति करने वाले को पत्थर मार कर भगा देते हैं।”
साधना करने। उसे ऐसा करते बीस साल बीत गये। अकेला रहता। अहंकार और क्रोध का मौका भी न मिलता। उसने सोचा चलो अहंकार से छुटकारा मिला।
साधना है, यह जिनसे जितनी श्रद्धा और तत्परता के साथ बन पड़े, वे इसे नित्य कर्म के एक अविच्छिन्न अंग के रूप में करते रहें। यह युग संधि की बेला है। इक्कीसवीं सदी के आगमन से पूर्व तक बीसवीं सदी चलेगी। यह अन्तिम चरण कितनी ही उथल-पुथल से भरा हुआ होगा। इसमें प्रसव पीड़ा जैसी अनुभूति भी हो सकती है और नवजात शिशु के आगमन का उत्साहवर्धक समाचार भी मिल सकता है।
साधना का लक्ष्य है जगत का कोलाहल में रहते हुए अविकंप शान्त बने रहना स्वधर्म में निरत रहना। “ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म ॐ।” अन्य साधक आ बैठे थे उस प्रयोगशिला पर। नेत्रकोणों के संवेदन स्नायु सूत्र का उन्होंने तनिक स्पर्श किया और स्थिर हो गए। डड अद्भुत अपूर्व रंगों की छटा जब अंतर से उमड़ संपूर्ण हिम प्रदेश पाटलपीत, हरित रक्तनील रंगों से रंजित होने लगा।
साधना के मेरे प्रयल! उपास्य के निर्देश ने उसके अंग-अंग में स्फूर्ति, उल्लास और प्रसन्नता भर दी थी।
साधना ने मानवीय चेतना में नयी फेर बदल की।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-February
साधना की अपनी महती शक्ति ऐसे ही महान प्रयोजनों के लिए संपन्न की जाती रही है।
साधना के पहले लक्ष्मण देव था।” छोटे प्रश्न का छोटा उत्तर। ऐसा, जैसे अंतर्मुख तपस्वी कुछ अधिक बताने के लिए उत्सुक न हो। गुरु ने कुरेदा— "अपने बारे में कुछ अधिक बताने की कृपा करेंगे?"
साधना अविराम चलती रहे। पाँचवीं सिद्धि है— 'दान' अर्थात अपने समय का कुछ भाग स्वयं के अनुभवों को दूसरों को बताने व उन्हें सन्मार्ग की ओर मोड़ने में लगाना। अपने प्रयत्नों से स्वाध्याय और सत्संग की प्रक्रिया को वह तेजी देना, जिससे दूर अनेकों व्यक्ति जीवन-साधना को अपना सकें; स्वयं के व्यक्तित्व को परिपक्व बना सकें।
साधना का लक्ष्य क्या है? युवक!” "मान-अपमान में समान रहना, उद्वेगों को शांत करना" और... कहते-कहते वह रुक गया।
साधना चलती है तो उसके बिखराव वाली अस्त-व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है। देवताओं की बिखरी शक्तियों को एक केंद्र पर केंद्रित करके, कभी प्रजापति ने ऐसी समर्थ महाकाली का सृजन किया था, जो देखते-देखते उद्दंड असुरता को धराशाई बनाने और देवसत्ता को उनकी गरिमा यथावत लौटाने में समर्थ हुई थी। प्रस्तुत युगसंधि पुरश्चरण को उसी स्तर का एक सामयिक प्रयोग समझा जा सकता है। यह साधना शान्तिकुञ्ज की इमारत तक सीमित नहीं है, वरन उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारों द्वारा संपन्न हो रहा है, जो अपने-अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ संपन्न कर रहे हैं। अदृश्य वातावरण में, सूक्ष्मजगत में छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की संभावना है।
साधना में सक्रियता और तन्मयता अधिक हो जाती है।
साधना सही क्रम में और ठीक दिशा में गतिमान है। यदि इन्हें साधना की प्रामाणिकता का मानदंड माना गया हो तो आश्चर्य क्या? जीवन-साधना के मानदंडों के रूप में हमने चित्र-विचित्र ख्याल बना रखें हैं। ख्यालों के अनुरूप ख्वाब देखे जाते हैं, सपने संजोए जाते हैं। सिद्धियाँ क्या हैं?
साधना में अगले ही दिनों करोड़ों सम्मिलित होंगे। एक ही प्रयोजन के लिए— एक ही सूत्र में संबद्ध होकर, एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है तो उसके बिखराव वाली अस्त-व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है। देवताओं की बिखरी शक्तियों को एक केंद्र पर केंद्रित करके, कभी प्रजापति ने ऐसी समर्थ महाकाली का सृजन किया था, जो देखते-देखते उद्दंड असुरता को धराशाई बनाने और देवसत्ता को उनकी गरिमा यथावत लौटाने में समर्थ हुई थी। प्रस्तुत युगसंधि पुरश्चरण को उसी स्तर का एक सामयिक प्रयोग समझा जा सकता है। यह साधना शान्तिकुञ्ज की इमारत तक सीमित नहीं है, वरन उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारों द्वारा संपन्न हो रहा है, जो अपने-अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ संपन्न कर रहे हैं।
साधना भी इसका अपवाद नहीं है। सिद्धियाँ यह बताती हैं कि साधना सही क्रम में और ठीक दिशा में गतिमान है। यदि इन्हें साधना की प्रामाणिकता का मानदंड माना गया हो तो आश्चर्य क्या? जीवन-साधना के मानदंडों के रूप में हमने चित्र-विचित्र ख्याल बना रखें हैं। ख्यालों के अनुरूप ख्वाब देखे जाते हैं, सपने संजोए जाते हैं।
साधना-सत्चिंतन के माध्यम से आत्मसत्ता को व्यवहारव्यापी बनाने का क्रम शुरू किया।"
साधना शान्तिकुञ्ज की इमारत तक सीमित नहीं है, वरन उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारों द्वारा संपन्न हो रहा है, जो अपने-अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ संपन्न कर रहे हैं। अदृश्य वातावरण में, सूक्ष्मजगत में छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की संभावना है। जहाँ भौतिक पुरुषार्थ अपर्याप्त पड़ता है, वहाँ दैवी सहायता का अवतरण ऐसे ही प्रयोगों द्वारा संपन्न होता है। तप-साधना की अपनी महती शक्ति ऐसे ही महान प्रयोजनों के लिए संपन्न की जाती रही है।
साधना उभारती, संयम अपनाने के लिए बाधित करती और क्षमताओं को पुण्य-परमार्थ के साथ नियोजित करती है। वह न केवल निरुत्साहित करती है, वरन प्रत्यक्ष घाटा पड़ने की बात कहकर उसके विपरीत विद्रोह भी खड़ा करती है। इसी मानसिकता को दूसरे शब्दों में कुटिलता, नास्तिकता, शालीनता को पूरी तरह समाप्त कर देने में समर्थ उपल वृद्धि के समतुल्य भी समझा जा सकता है। स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उस बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। लोक-मंगल के लिए, आत्मपरिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण-कण समर्पित करना पड़ा है।
साधनाक्रम देखा। आस-पास के लोगों से पता लगाया। जिज्ञासा और बढ़ी। रात्रि के ध्यान से उठकर जब वह प्रातः नदी स्नान की ओर जा रहे थे, गुरु साथ हो लिए।
साधना करते आ रहे थे; हाँ न कर सके और विवेकानंद को लौटने से न रोक सके; किंतु विवेकानंद जब रामकृष्ण के पास गए और यही प्रश्न उनसे किया। उन्होंने आँखें खोलीं तो विवेकानंद की कँप-कँपी बँध गई। रामकृष्ण बोले— “ईश्वर है या नहीं, यह छोड़ो तुम्हें जानना है तो बोलो और अभी जानना है तो हाँ करो या ना करो; है या नहीं, ये सवाल बेकार है। विवेकानंद लिखते हैं कि उनकी हिम्मत ही न पड़ी कि फिर उलटकर उनसे पूछा जाए; क्योंकि वे वेद, उपनिषद्, शास्त्र, बुद्ध, कृष्ण की किसी की भी गवाही बीच में लाए ही नहीं। वे तो इस बात पर तुल गए कि जैसा मैंने अनुभव किया है वैसा तू भी कर, अभी कर, इसी क्षण कर।
साधना को अपना सकें; स्वयं के व्यक्तित्व को परिपक्व बना सकें।
साधना की प्रामाणिकता का मानदंड माना गया हो तो आश्चर्य क्या? जीवन-साधना के मानदंडों के रूप में हमने चित्र-विचित्र ख्याल बना रखें हैं। ख्यालों के अनुरूप ख्वाब देखे जाते हैं, सपने संजोए जाते हैं। सिद्धियाँ क्या हैं? इस प्रश्न के बारे में अधिकांश के जवाब होंगे— पानी पर चलना, आग पर दौड़ना, आकाश में उड़ना और न जाने कितनी ऐसी अनेकों विलक्षण बातें सुनने को मिलेंगी।
साधना के मानदंडों के रूप में हमने चित्र-विचित्र ख्याल बना रखें हैं। ख्यालों के अनुरूप ख्वाब देखे जाते हैं, सपने संजोए जाते हैं। सिद्धियाँ क्या हैं? इस प्रश्न के बारे में अधिकांश के जवाब होंगे— पानी पर चलना, आग पर दौड़ना, आकाश में उड़ना और न जाने कितनी ऐसी अनेकों विलक्षण बातें सुनने को मिलेंगी।
साधना में निरत शान्तिकुञ्ज की एक तीसरी प्रतिज्ञा और है कि निर्धारित अवधि में वह एक लाख वरिष्ठों के एक करोड़ तक के सहयोगी बनाकर रहेगी। दस वर्ष में इतनी प्रगति हो चुकना असंभव नहीं है। पचास लाख का वर्तमान परिवार यदि वर्तमान जनसंख्या अभिवृद्धि की गति अपना सके तो उसका चार गुना हो जाना किसी भी प्रकार असंभव नहीं माना जा सकता। खरगोश-चूहे तो इतनी अवधि में सौ गुने से भी अधिक हो सकते हैं। हमें यह आशा करनी चाहिए कि एक से पाँच, पाँच से पच्चीस बनने के जिस सिद्धांत का इन दिनों परिवार के हर क्षेत्र में कार्यान्वयन किया जा रहा है, उसकी गति यह पूरा वेग न पकड़ सके तो भी प्रज्ञा परिजनों को सन् 2000 तक एक करोड़ तो हो ही जाना चाहिए।
साधना में प्रवृत्त हों, आठों सिद्धियाँ अर्जित करें। भावी समय व्यक्तित्ववानों का होगा। वही अपनी सार्थकता साबित कर सकेंगे जो प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे सिद्ध हुए हैं। बीतते और आते युगों की ब्रह्मबेला के क्षण यों ही बर्बाद करने के लिए नहीं हैं। स्वयं को गढ़ें, अंतराल की भावश्रद्धा को जाग्रत— विकसित करें।
साधना का मार्ग अपनाया। दोनों तपस्वीगण लोक-मानस के कल्मषों को धोने में निरत हो गए। उन्होंने पहला काम किया व्यक्तियों को ढालने का; भटके परिव्राजकों में कर्त्तव्यबोध जगाने का। श्रद्धास्पद होकर भी श्रद्धातत्त्व के मूल कारणों की उपेक्षा भर्त्सना के योग्य है। यह कहकर उन्होंने परिव्राजकों को उनका समाज के प्रति दायित्व समझाया।
साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की संभावना है। जहाँ भौतिक पुरुषार्थ अपर्याप्त पड़ता है, वहाँ दैवी सहायता का अवतरण ऐसे ही प्रयोगों द्वारा संपन्न होता है। तप-साधना की अपनी महती शक्ति ऐसे ही महान प्रयोजनों के लिए संपन्न की जाती रही है।
साधना का एक ही परिणाम है— सिद्धि। जीवन-साधना भी इसका अपवाद नहीं है। सिद्धियाँ यह बताती हैं कि साधना सही क्रम में और ठीक दिशा में गतिमान है। यदि इन्हें साधना की प्रामाणिकता का मानदंड माना गया हो तो आश्चर्य क्या? जीवन-साधना के मानदंडों के रूप में हमने चित्र-विचित्र ख्याल बना रखें हैं।
साधना की श्रेणी में गिना है। उन्होंने सपनों को झूठा न ठहराकर प्रतिभासित सत्य की श्रेणी में रखा है। स्वप्नों में गहरे आत्मनिरीक्षण और जागरण में आत्मसुधार का क्रम चल पड़े तो व्यक्तित्व का काया पलट होते देर नहीं लगेगी।
साधना?” गुरु ने उसकी ओर इस तरह से देखा, मानो वह कोई बहुत छोटी चीज के लिए यत्न कर रहा हो। अभी तक उसे प्रशंसा करने वाले मिले थे; पर गुरु की आँखों में प्रशंसा का कोई भाव न था, उल्टे उनमें उद्धारक की करुणा थी।
साधना का काल माना गया है। घटती-मिटती-हटती तमिस्रा और तेजी से दौड़ते आ रहे नवप्रभात के क्षणों में अर्जित की गई ओजस्विता और प्रखरता की सिद्धियाँ, नए दिन के नए प्रभात का आनंद सौ गुना बढ़ा देती है। जब ब्रह्मवेला की व्यापकता युगों के दायरे में फैल गई हों। उस समय, जबकि बुद्धिवाद की घटती निशा और भाव-संवेदनाओं का प्रभात अपने मिलन बिंदु पर आ पहुँचे हों, जीवन-साधना में सक्रियता और तन्मयता अधिक हो जाती है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-August
साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया।
साधना के समग्र रूप का प्रस्तुतीकरण गायत्री महाविज्ञान के तीन खण्ड रचकर किया जो कि एक प्रकार से विश्वकोष माने जा सकते है। उस में उनने लिखा है कि मंत्राराधना के अतिरिक्त एक निष्ठावान साधक को अपनी जीवनचर्या में उपासना, साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिए।
साधना सत्र चलते रहे। आयुर्वेद के राष्ट्रीय बोर्ड से वे मान्यता प्राप्त वैद्य थे।
साधना करते थे। इन दोनों ही तत्वों को वे अपने आत्मदेवता में समाविष्ट मानते थे। उनका मन था कि जिसने अन्तःकरण को तपोवन बना लिया व वहाँ एकनिष्ठ होकर ब्रह्म चेतना से तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास किया, वही सच्चा साधक है।
साधना करता रहा है।
कह उठ जग क्रान्ति करने, फिर मसीहा आ रहा है॥3॥
साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे। योगीराज अरविन्द ने भी वेद पुरी को ही अपनी तपःस्थली बनाया जो महर्षि अगस्त की तपोभूमि थी। रावण महाबली था पर तप शक्ति से डरता था। उसके निर्देश थे कि उसके असुर उत्तर में कहीं भी जाएँ पर वेदपुरी जहाँ आज पांडिचेरी स्थित है से कोसों दूर रहें क्योंकि उस स्थान के प्रभामण्डल का प्रभाव असुरत्व के लिए विनाशकारी था। गोविन्द पाद जो आद्य शंकराचार्य के गुरु थे, ने अमरकण्टक को अपनी साधना स्थली बनाया, वहीं पर आचार्य शंकर को चारों धामों की यात्रा करने का उपदेश दिया व शक्ति प्रदान की।
साधना का क्रियापक्ष था व पूज्य गुरुदेव का” इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य “ उद्घोष यही से प्रकट हुआ। उज्ज्वल भविष्य का मूल आधार उनने अपना संकल्पबल बताया जो उच्चसत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया। इसी अंक में उनने लिखा कि इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमने स्थूल शरीर से काम लेना प्रायः बंद कर दिया है। उसके साथ एक हल्का तंतु ही जुड़ा रखा है। जब उसकी भी आवश्यकता न रहेगी तो एक झटके से इसे भी तोड़कर अलग कर देंगे।
साधना कहा, जिसमें वे पाँच शरीरों से भिन्न भिन्न कार्य सूक्ष्मजगत में करना चाहते थे। वंदनीया माताजी ने इस सम्पादकीय में लिखा कि “ हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गये है और न पलायन ही कर रहे है, वरन् वे सूक्ष्मीकरण की जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़त कर रहे है।” यह आश्वासन उन के लिए था जिन्हें अचानक परामर्श-वार्तालाप विचार विनिमय का क्रम समाप्त होने पर खिन्नता अनुभव हो रही थी।
साधना अब तक चली थी, व अगले दिनों और प्रचंड रूप में चलनी थी, वही इस पत्रिका का नाम बनकर आया व सभी परिजनों को इसका इतिहास बताते हुए उनने दो हजार पते जो छाँटे थे, उन्हें नमूने की एक-एक प्रति भेज दी कि यदि आपको पसंद आये तो आप अन्य पाँच व्यक्तियों को भी इसे पढ़ायें। वे भी ग्राहक बनना चाहें तो जब सुविधा हो तब चन्दा भेज दें। मूल्य था प्रत्येक पत्रिका का नौ पैसा, वार्षिक डेढ़ रुपया।
साधना पूज्य गुरुदेव के जीवनकाल एवं मिशन के इतिहास का एक अतिमहत्त्वपूर्ण मोड़ है। इस अवधि में उनकी तप साधना सूक्ष्म रूप से पाँच वीरभद्रों को क्रियाशील बनाने में लगी रही व लेखनी” अखण्ड-ज्योति” एवं” युगशक्ति-गायत्री” के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के मन को सतत् मथती रही। इसी दौरान सन 1985 का वर्ष उनकी आयुष्य का पचहत्तरवां वर्ष होने के कारण ही रजत जयन्ती वर्ष मनाया गया एवं इसी वर्ष अप्रैल 1985 में उनने अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर पहली बार प्रकाश डाला। इन्हीं लेखों व सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ।
साधना उस क्रिया कलाप तक ही सीमित नहीं थी।
साधना जुड़ी है, वह भी स्वयं की, वह कर पाना हरेक के लिए शक्य नहीं है, तो उस अखण्ड दीप व अखण्ड-ज्योति से लाभ उठायें जो क्रमशः प्रत्यक्ष अग्नि व लेखनी रूपी संजीवनी के रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत है। तीर्थों का जो महत्व होता है, उससे कहीं अधिक महत्व ऐसी सिद्ध ज्योति का है जिसमें तिल-तिल कर एक साधक ने अपना जीवन होम किया व न केवल अपनी कुण्डलिनी जाग्रत की विश्वात्मा की कुण्डलिनी जगाने हेतु सूक्ष्मीकृत-घनीभूत हो जो अभी भी परोक्ष जगत में सक्रिय है।
साधना कराके उनकी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर प्रमाणित कर दिया। अन्यान्य देवताओं की अनुकम्पा पाने हेतु भटकने वालों के लिए उनका एक ही संदेश था कि एक ही मंत्र ऐसा है जो संसार भर के सभी मंत्रों की बराबरी करता है, वह है गायत्री मंत्र। सभी अवतारों ने इसकी उपासना की तथा महामानवों, ऋषिसत्ताओं ने भी। फिर जगह जगह कुआँ खोदते रहने की विडंबना क्यों रची जाय? आज के बुद्धिवादी युग में महाप्रज्ञा के तत्वदर्शन के विस्तार की और अधिक आवश्यकता है।
साधना की।
स्वर्ग से कम की, नहीं कुछ कल्पना की॥
साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
साधना और लोक सेवा की एक लम्बी मंजिल पार कर चुके हैं। इस जन्मे में प्रचण्ड तप आरंभ करना था उसका स्वरूप उनने बता दिया। वह था चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न करना और उन दिनों जौ की रोटी तथा छाछ (मट्ठा) अथवा उस न्यूनतम पर निर्वाह करना जो तप तितिक्षा की श्रेणी में आता है। समर्थता सम्पादन के लिए यह प्रचण्ड तपोबल अर्जित करना जरूरी था यह उन तीन कार्यों में से एक था जो सूक्ष्म ऋषि सत्ताओं से साक्षात्कार के बाद प्रथम हिमालय यात्रा के अवसर पर पूज्य गुरुदेव को बताये गये थे। अन्य दो कार्य थे अपना अध्ययन जारी रख लेखनी की साधना द्वारा युग संजीवनी जन जन तक पहुँचाना, विचारक्राँति का सरंजाम जुटाना तथा तीसरा कार्यक्रम था स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहना।
साधना करवा ली, ऐसे श्री राम के पिता ने सच्चे मार्गदर्शक की वह भरी भूमिका निभाई जो गुरु के साक्षात्कार से पहले संपन्न होनी ही थी।
साधना को करने के लिए हम उन्हें अनुरोधपूर्वक प्रेरित करेंगे कि वह दिन-रात में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय निकालें और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचें कि वे क्या हैं? वे सोचें कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं जो मनुष्य होने के नाते उन्हें सौंपा गया था। मन से कहिए कि वह निर्भीक सत्यवक्ता की तरह आपके अवगुण साफ साफ बताए।” यह शैली ऐसी लगती है जैसे किसी को व्यक्तिगत पत्र लिखा जा रहा हो। हर पाठक इन्हें पढ़ने के बाद ऐसा अकुलाता था कि उनके संपर्क में आने के बाद निरन्तर संपर्क बनाये रखने को उत्सुक रहता था।
साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिए।
साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ।
साधना द्वारा इस प्रचण्ड गति प्रदान की अब वे सूक्ष्म व कारण शरीर से सक्रिय है व सुरक्षा कवच पूरी मानव जाति के लिए विनिर्मित कर रहे है। यदि उनके बताए निर्देशों को हम जीवन में उतारते चलें तो यह परिवर्तन भावी पाँच वर्षों में ही बड़ी तेजी से भारत से आरंभ होकर विश्वभर में संव्याप्त होता दृष्टिगोचर होगा। जागृतात्माओं को यही तो उस सत्ता का अन्तिम संदेश भी था।
साधना में नियोजित कर दी। इस अवधि में कितनी ही बार में नियोजित कर दी। इस अवधि में कितनी ही बार निराहार रहना पड़ा, मात्र मट्ठे पर ही जीकर अपनी काया का अनिवार्य किन्तु सीमित पोषण वे करते रहे। वस्तुतः यह तो उनकी स्थूल व दृश्य साधना थी। मोटे तौर से जितना देखा जा सके, उतना ही तो समझा जा सकता है।
साधना का दर्शन तत्वज्ञान सिखा रहा है।
साधना नाम दिया गया। प्रकारान्तर से इस अंक में पूज्य गुरुदेव द्वारा सम्पन्न सूक्ष्मीकरण साधना एवं अगले दिनों सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्पन्न होने वाली साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना तथा अपनी उपासना सम्पन्न की। प्रस्तुत पंक्तियाँ भी उसी अखण्ड दीपक के प्रकाश में परोक्ष प्रेरणा से लिखी जा रही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ नहीं है, दिव्य धना का तपोबल जो पूज्य गुरुदेव रूपी ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महामानव के रूप में सिद्ध हुआ ही इसके मूल में कार्य कर रहा है वह आगे भी करता रहेगा।
साधना का पोषण सुपात्र साधन द्वारा किया जा रही हो। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं है कि किसी और से करा लिया जाय। जप-अनुष्ठान भी स्वयं करना पड़ता है, तप-तितीक्षा भी स्वयं करनी पड़ती है तथा आत्मशोधन को अनिवार्य अंग मानते हुए उसे सतत् निभाना पड़ता है। यही कार्य पूज्य गुरुदेव व वंदनीया माता जी ने किया तथा आज भी वह अखण्ड दीपक जो 64 वर्षों से जल रहा है, शांतिकुंज में स्थापित है। समस्त प्रेरणाओं व सिद्धियों का वह स्रोत है।
साधना नहीं ब्राह्मणत्व का चमत्कार कहिए। तप साधना तो अभी तिजोरी में बन्द है। “ब्राह्मणत्व? ब्राह्मण तो अनेकों है” शायद यह मन्तव्य समझ नहीं पाये थे। उनका जवाब था “ब्राह्मण वह है जो समाज से न्यूनतम लेकर समाज को अधिकतम दे।
साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना से जोड़ने का उनका तरीका स्वयं में निराला था एवं अध्यात्म को सही प्रगतिशील दिशा देने वाला भी। लाखों व्यक्तियों को इस प्रकार उनने अपनी ही मुक्ति, वैराग्य, समाधि वाले चिन्तन से विरत कर लोकसेवी बना दिया। यह एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कर सकता था। धर्म के संबंध में जो भ्राँतियाँ संव्याप्त हैं एवं जनोपदेशक जो भी कुछ कहकर उन्हें पोषण देते रहे है, उनसे जूझना व योद्धा की तरह संघर्षरत रह बिना विचलित हुए लक्ष्य सिद्धि तक पहुंच जाना उनके व्यक्तित्व के एक अनूठे पक्ष को प्रस्तुत करता है।
साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना में लगा सकें। आज की परिस्थितियों में यह भले ही अव्यावहारिक प्रतीत होता हो किन्तु मिशन का सूत्र संचालक जिन आदर्शों पर जीवन भर चला था, उनके माध्यम से ही अपनी रीति नीति का निर्धारण कर रहा था। यदि इसे एक आदर्श शुरुआत कहें तो उचित होगा क्योंकि वे आने वाले दिनों में प्रज्ञा परिजनों प्रवासियों तथा विश्वभर के नागरिकों में घूम घूम कर प्रचार करने वाले विवेकानन्दों, रामतीर्थों, कुमारजीवों, महेन्द्रों व संघमित्राओं के लिए एक उदाहरण सामने रखना चाहते थे। यह यात्रा एक बीजारोपण मात्र थी इसलिए सूत्र संचालक ने 80 वर्ष के जीवन के अढ़ाई माह इस कार्य के लिए निर्धारित कर दिए किन्तु यह कार्य बाद में भी सतत् चलना ही था।
साधना करा के अपने कार्य को उनके माध्यम से आगे बढ़ाने का संकल्प दिलाते हैं। वे एक विशाल परिवार की, जो मात्र सत्प्रवृत्तियों की स्थापना को कृतसंकल्प है, संरचना कर अपना कार्यभार अपनी धर्मपत्नी को सौंपकर स्वयं सूक्ष्म शरीर से गतिशील व सर्वव्यापी बनने महाप्रयाण कर जाते हैं।
साधना सीखकर स्वयं को गढ़ सके। विद्या विस्तार का उनका यह क्रम स्वयं के लिए भी, औरों को वितरित करने के रूप में भी आजीवन चलता रहा।
साधना पर विशेष ध्यान देने की चर्चा अपने विशेष स्तम्भ में करना आरंभ कर दी थी। अब तक उनकी स्वयं की कोई प्रशिक्षण स्थली भी मथुरा में नहीं थी, जिसमें वे आगन्तुक जिज्ञासुओं को ठहराते एवं संगठन की महत्ता समझाते, उनकी शंकाओं का समाधान करते अथवा परामर्श द्वारा प्रेरणा देते। जो भी परिजन आते वे घीयामण्डी मथुरा वाले घर में ही मिलने आते थे। स्थान छोटा था पर हर व्यक्ति उनका आतिथ्य पाकर जाता। न्यूनतम में अपना निर्वाह कर वे औरों का आतिथ्य कैसे कर पाते होंगे एवं साथ ही अपनी साधना का क्रम भी निर्बाध गति से चला कर पत्र परामर्श एवं सम्पादन कार्य भी करते रहे यह एक रहस्यमय प्रसंग है।
साधना से सिद्धि’ का सिद्धान्त सही है या गलत। इसका परीक्षण उनने स्वयं पर किया। सारे सुयोग वैसे ही बनते चले गये एवं संकल्प को प्रयास रूप में परिणत होने का योग भी मिल गया।
साधनास्थली है। हव ऐसा पारस है जिसका स्पर्श मात्र कर व्यक्ति तपे कुन्दन की तरह निखर जाता है।
साधना के प्राथमिक पाठों में आत्मशुद्धि व पात्रता संवर्धन की महत्ता समझाने के बाद उनने भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रतीकों का मर्म समझाना आरम्भ किया। इस क्रम में शिखा और सूत्र की उपयोगिता, उन्हें धारण करने का विनम्र अनुरोध, उनका वैज्ञानिक आधार, गंगा-गौ गायत्री-गुरु गीता का महत्व स्वास्तिक, तुलसी, प्रतिमा, देवालय, तीर्थ, पर्व-संस्कार आदि सभी पक्षों पर महत्वपूर्ण विवेचन करते हुए शिक्षण संस्कार की प्रक्रिया चलाई।
साधना हेतु बैठे थे वह बोली-”साधक! क्या तुझे आत्मा में रस नहीं आता जो सिद्धि व मुक्ति की बात सोचता है। भगवान के दर्शन से क्या भक्ति भावना में कम रस है? मिलन से क्या विरह कम गुदगुदा है। मैं। तिल तिल अपने को घिस रही हूँ।
साधना के दिनों को छोड़कर नित्य वे मिलते ही रहे, उनमें प्राण फूँकते रहे, उनका मनोबल बढ़ाते रहे वह दैनन्दिन जीवन संबंधी मार्गदर्शन, साधना संबंधी मार्गदर्शन तथा परिस्थितियों के अनुकूल कैसे मनःस्थिति बदली जाय यह वह बड़े ममत्व व लगन के साथ बताते थे। कार्यकर्ताओं के हृदय के सम्राट उन्हें कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।
साधना संबंधी मार्गदर्शन देकर उनने कहीं से कहीं पहुँचा दिया तथा जिन्हें अपने तप का एक अंश देकर विभूति संपन्न बना दिया अथवा कष्ट निवारण में उनकी मदद की, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि वे एक ऐसे सिद्ध स्तर के साधक थे जो सतत् कमाने व पूँजी को दिल खोल कर सुपात्रों में बाँटने में ही विश्वास रखते थे। स्वयं के लिए अथवा आत्मीयों के लिए अपने निज के तपोबल का, अर्जित सम्पदा का उनने कभी उपयोग नहीं किया। वे लिखते हैं कि हमने अपने लिए व आत्मीय निकटस्थ परिजनों के लिए दवा दारु का ही प्रयोग किया हैं। वस्तुतः किसी दुखी की वेदना बाँटनी पड़ी तो सबने मिलकर बाँटी है। इतना जरूर किया कि किसी के कष्ट को मृत्यु स्तर से कम कर छोटी-मोटी दुर्घटना के रूप में टाल दिया गया।
साधना के चमत्कारी प्रसंगों का प्राकट्य अन्यान्य महापुरुषों की तरह शैशवकाल से ही होने लगा था। ऐसे महापुरुष की जीवनी को, विभिन्न संस्करणों को लिपिबद्ध करना कितना पुष्कर कार्य हो सकता है, इसकी कल्पना सामान्य पाठक नहीं कर सकते। संभव है कुछ अविज्ञात घटनाक्रम ऐसे उनके शैशवकाल से संबंधित इस स्मारक अंक से छूट जाएँ जिनकी फलश्रुतियाँ आगे चल कर देखने को मिली तो इसे संकलनकर्ताओं का-संपादकों का प्रमाद माना जाए।
साधना है, हम ममता है, गरिमा हैं। आँचल में जीवनधारा है, कर में आतुर राखी है। मस्तक पर सिन्दूर बिन्दू, अनुराग त्याग की सीमा है। गृहिणी, सहधर्मचारिणी, कुल दीपक की बाती हैं।
साधना के दौरान वे आने वाले भविष्य का ताना बाना बुन रहे थे। अपने स्थूल शरीर के क्रिया–कलापों को सीमित कर सूक्ष्म से और अधिक व व्यापक क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए स्वयं पीछे हट रहे थे व वंदनीया माताजी को इस भूमिका के लिए तैयार कर रहे थे, जो उन्हें उनके महाप्रयाण के बाद निभानी थी। यह सारा सुनियोजित उद्देश्यों के लिए धरती पर आयी हो, समर्पित जीवन जी चुकी हो, काया की क्षमता से सौ गुनी अधिक काम कर चुकी हो एवं निरन्तर उनके बताए सूत्रों पर चलने वालों को मार्गदर्शन देते रहने का आश्वासन देकर नवसृजन की आधारशिला रख रही हो। अवतार रूप पूज्य गुरुदेव का विभिन्न कर्तव्यों में तो प्रकट होता ही है, विविध रूपों में समय समय पर व्यक्त उनके उद्गारों में भी। झलकता है।
साधना की सफलता का मूल तो साधक की अटूट निष्ठा एवं आत्मशोधन है किन्तु ऐ अक्ष जो बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह है सुसंस्कारिता साधना स्थली में साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना। जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्धि कर लेते है। वातावरण की अपनी महत्ता है। देवात्मा हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के मध्य गंगा किनारे की गई उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे।
साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया। यही साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधना द्वारा युग निर्माण आँदोलन का परोक्ष सूत्र संचालन, प्राण प्रत्यावर्तन के सघन अनुदान, नारी जागरण का अभिनव सूत्रपात, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की स्थापना का भागीरथी प्रयास तथा प्रवासी भारतीयों में देव संस्कृति का विस्तार में से चार की चर्चा तो हो चुकी। पाँचवाँ प्रसंग विदेश में बसे प्रवासियों व नागरिकों को देव संस्कृति के महत्वपूर्ण निर्धारणों से अनुप्राणित कर उन्हें उस केन्द्रीय धुरी से जोड़ना था जो प्राण संचार करती रह सके। इस के लिए दिसम्बर 1972 से स्वयं पूज्य गुरुदेव ने अढ़ाई माह की अफ्रीका के पूर्वी भाग की यात्रा की। यह यात्रा कई उद्देश्यों से जरूरी थी।
साधना का यह चमत्कार था कि एक स्वर से सारे भारत के महात्मागण उन्हें गायत्री विद्या व उसकी साधना पद्धति का एक अनुभवी निष्णात विद्वान मानते थे। ब्रह्मलीन श्री देवरहा बाबा से विगत महाकुँभ पर्व पर इलाहाबाद में मिशन से जुड़े एक उच्चाधिकारी ने पूज्य गुरुदेव के विषय में पूछा कि आपकी उनके संबंध में क्या मान्यता है? तो देवरहा बाबा ने पूर्व की ओर मुख करके कहा कि “साक्षात् सविता का जो रूप है, ब्रह्मतेज सम्पन्न उस अवतारी सत्ता को मेरा नमन है। वे माँ गायत्री के सिद्ध साधक है व युगपरिवर्तन उन्हीं के बताये पद चिह्नों पर चल कर होगा।” युग निर्माण योजना से प्रत्यक्ष उनके क्या संबंध है, यह पूछने पर दीर्घ-जीवी उस महापुरुष ने कहा कि “सभी देवसत्ताएं धरती पर सतयुग लाने को जन्मी है।
साधना पद्धति को जितना समीप से, गहराई से वंदनीया माता जी ने देखा व समझा था उतना अवसर शायद ही किसी को मिला हो। वंदनीया माता जी कहा करती हैं कि गुरुदेव ने जितना कड़ा तप किया है, उतने ही दिव्य अनुदान उन्हें मिले हैं। वस्तुतः उनका सारा जीवन तपोमय रहा हैं सब कुछ साधन व कमा सकने की असीम संभावनाएं होते हुए भी जो अपनी भौतिक महत्त्वाकांक्षाओं पर कड़ा नियंत्रण लगा ले, वह सही अर्थों में जीवन संग्राम में प्रतिकूलताओं से लड़ रहा, एक जुझारू योद्धा है जिसे मात्र औरों के हित की समाज के उत्थान की ही एक मात्र आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षा है।
साधना, हमें सातना, कैसा खेल विधाता का।
किस दर्पण में कहाँ निहारें, प्रियदर्शी मुख त्राता का॥
साधना, साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना काल रूपी पूर्वार्द्ध की पूर्णाहुति के लिए एवं भावी गतिविधियों को क्रिया रूप देने के लिए जिस स्थान का चयन किया, वह महर्षि दुर्वासा की तपःस्थली था। यह स्थान यमुना किनारे मथुरा से वृन्दावन जाने वाले मार्ग पर स्थित था। वे अखण्ड ज्योति के जनवरी 1942 अंक में लिखते है कि “मथुरा में गायत्री तीर्थ बनने की योजना किसी व्यक्ति के संकल्प से नहीं वरन् माता की प्रेरणा से बनी है। ब्रह्मविद्या के गंभीर अन्वेषण एवं विशद विस्तार के लिए एक केन्द्रीय स्थान जरूरी था। कितने ही सूक्ष्म एवं रहस्यमय कारणों से वह स्थान मथुरा चुना गया व अब वहाँ गायत्री माता का मन्दिर व तपोभूमि बननी है।
साधना जिसने एक वर्ष बाद ही सूक्ष्मीकरण साधना का रूप ले लिया। प्रारंभ में जो उलाहना दिया गया वह भी ऋषि चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है।
साधना के अनुदान बाँटता चला गया। उसके गुरु ने उनसे कहा, “सौ हाथों से कमाना, हजार हाथों से लुटाना। जितना तुम समाज रूपी खेत में बोओगे कई गुना तुम्हें वापस मिलेगा, उसे काटना व वितरित कर देना।” ऐसे औघड़दानी को साक्षात् रुद्र न कहा जाय तो क्या कहें? नवनीत और हिमखण्ड जब गलते और पिघलते रहते हैं तथा अपने तप अनुदान सहज वितरित करते रहते हैं।
साधना को साथ जारी रखते हुए परिजनों से सीमित रूप में मिलते रहने का क्रम पुनः बना लिया, जो निर्बाध गति से बसंत पर्व 1990 तक चलता रहा। इन चार वर्षों की अवधि में जो कार्य उनके मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ, वह विगत चालीस वर्षों के बराबर हुआ माना जा सकता है। इसी अवधि में उनने कार्यक्षेत्र से जुड़े कार्यक्रमों को नई गति दी। सात लाख गाँवों व एक लाख कस्बों तक पहुँचने के लिए एक नई कार्यशैली निर्धारित हुई। पूर्णाहुति वर्ष होने के कारण एक हजार 108 कुंडीय गायत्री यज्ञों व इतने ही छोटे 24 कुण्डीय यज्ञों को मनाने का निर्णय 1986 में ही लिया गया।
साधना, कोई न छूटी॥
साधना के कठिन मार्ग पर चलते हुए तप साधना और लोक सेवा की एक लम्बी मंजिल पार कर चुके हैं। इस जन्मे में प्रचण्ड तप आरंभ करना था उसका स्वरूप उनने बता दिया। वह था चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न करना और उन दिनों जौ की रोटी तथा छाछ (मट्ठा) अथवा उस न्यूनतम पर निर्वाह करना जो तप तितिक्षा की श्रेणी में आता है। समर्थता सम्पादन के लिए यह प्रचण्ड तपोबल अर्जित करना जरूरी था यह उन तीन कार्यों में से एक था जो सूक्ष्म ऋषि सत्ताओं से साक्षात्कार के बाद प्रथम हिमालय यात्रा के अवसर पर पूज्य गुरुदेव को बताये गये थे। अन्य दो कार्य थे अपना अध्ययन जारी रख लेखनी की साधना द्वारा युग संजीवनी जन जन तक पहुँचाना, विचारक्राँति का सरंजाम जुटाना तथा तीसरा कार्यक्रम था स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहना।
साधना, स्वाध्याय,
साधनाकारी।
‘बंधन से निर्वाण’ सिखाती, वाणी वीर तुम्हारी॥
साधना करना ऐसे जीवन्त उदाहरण दिए है। पूज्य गुरुदेव की संभाषण व व्याख्यान की शैली भी यही थी। जीवन से जुड़े छोटे छोटे उदाहरणों के द्वारा कैसे व्यक्ति साधारण से असाधारण बनता है, यह उनने अनेकों तरह से समझाया है। कोयले से हीरा बनने से लेकर अनगढ़ पत्थर की मूर्ति की तरह तराशा जाना एवं बेल के वृक्ष से लिपट कर ऊँचा उठ जाने की तरह समर्पित का उत्कृष्टता की ऊँचाई को पा लेना यही उनकी मर्मस्पर्शी उद्बोधन शैली थी। आश्चर्य इस बात का है कि बोलते समय ऐसी सुबोध शैली जो सीधी अंदर तक उतरती चली जाए व लिखते समय ऐसी संस्कृतनिष्ठ व उक्तियों-मुहावरों से भरी हुई कि हिन्दी के विद्वान भी उससे शिक्षण लें।
साधना अनुष्ठान की महत्ता एवं ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूपी गायत्री महापुरश्चरण की आवश्यकता को पत्रिका में प्रतिपादित किया जाने लगा था। इसके बाद सहस्रकुंडीय महायज्ञ 1958 में संपन्न हुआ। व सभी परिजनों को एक सूत्र में आबद्ध कर गायत्री परिवार रूपी संगठन बनाया। इस संगठन के माध्यम से अष्टग्रही योग, भारत-चीन युद्ध (968) भारत-पाक युद्ध (1965) बंगला मुक्ति संघर्ष (1971) आपातकाल (1976) तक गायत्री की उच्चस्तरीय, पंचकोशी तथा, स्वर्ण जयन्ती साधना द्वारा अभयदान देते हुए वे अपनी भूमिका को स्पष्ट करते चले जा रहे थे। उनकी तप साधना भी इसी क्रम से प्रचंड होती होती गयी व उसकी स्थूल परिणति सूक्ष्मीकरण साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना थी। मोटे तौर से जितना देखा जा सके, उतना ही तो समझा जा सकता है। पर वस्तुतः साधना उस क्रिया कलाप तक ही सीमित नहीं थी।
साधना के स्वरूपों को गोपनीय ही रहने देते हैं किन्तु गुरुदेव का जीवन तो एक खुली किताब है। उनने जो भी किया उसे लेखनी के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा दिया। जिसे उचित समझा वाणी से समझाया व जिसे और अधिक पात्र समझा उसके रोम में वह ज्ञान समाविष्ट कर दिया। 1950 से 1961 के बीच की उनकी अखण्ड ज्योति पत्रिका गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्रीतंत्र एवं गायत्री योग नामक पाँच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा गायत्री महाविज्ञान इसकी साक्षी देते हैं। बाद में विज्ञान समस्त प्रतिपादनों के साथ जोड़ कर अपनी सुबोध शैली में उनने 1977 में चार विशेषाँक अखण्ड ज्योति के प्रकाशित किये (मार्च से जून 1977) जिसमें उनने साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया।
साधना टिक नहीं सकती। जो अनेकानेक साधनाओं का पथ-प्रदर्शक हो उसके पास तो ईश्वर अपनी चरम और परम स्थिति में होना चाहिए। था भी ऐसा। मथुरा के दिनों का प्रसंग है, तब विख्यात उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला अक्सर आया करते थे। एक दिन आने पर उन्होंने कहा “आचार्य जी!मैं आपकी कुछ आर्थिक सहायता करना चाहता हूँ।
साधना में वे क्रमशः आगे के पाठ, नया परामर्श पहले बताई गई दिशा धारा से आगे का निर्देशन ऐसे करते चले गए जैसे वे स्वयं सामने बैठ कर समझा रहे हों। पत्रकारिता की इस पत्राचार विद्या को अनूठा, अभूतपूर्व ही कहा जाएगा क्योंकि यह साधना जैसे गूढ़ तत्व पर आधारित थी।
साधना सत्र थे। विभिन्न मुद्राओं, त्राटक योग, सोऽहम्, नादयोग, आत्मब्रह्म की दर्पण साधना तथा तत्व बोध की साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे।
साधना पराक्रम का सचित्र, शास्त्रोक्त एवं विज्ञान सम्मत प्रतिपादन था। एक गूढ़ विषय पर एक सरल सुबोध व्याख्या परिजनों के समक्ष आयी। विश्व वातावरण में संव्याप्त अवाँछनीयताओं के परिशोधन हेतु की गयी इस साधना नाम दिया गया। प्रकारान्तर से इस अंक में पूज्य गुरुदेव द्वारा सम्पन्न सूक्ष्मीकरण साधना एवं अगले दिनों सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्पन्न होने वाली साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना की आवश्यकता उन्हें अनुभव हो रही थी जो वातावरण में प्रचण्ड चक्रवात उत्पन्न कर सके, सोयों का जगा व जाग्रतों को क्रियाशील बना आदर्शोन्मुख कर सके। यहीं से आरंभ होती है पूज्य गुरुदेव की एकाकी तप साधना जिसने एक वर्ष बाद ही सूक्ष्मीकरण साधना का रूप ले लिया। प्रारंभ में जो उलाहना दिया गया वह भी ऋषि चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है।
साधना को ही सब कुछ मानने वाले पूज्य गुरुदेव ने प्रेरणापुँज के रूप में मील के पत्थर को भी एक मान्यता प्रदान कर अपनी कल्पना को ऐसा रूप दिया कि पढ़ने वालों को सहज ही लगने लगे कि क्या वास्तव में हम कहीं उपयोगी नहीं हो सकते?
साधना सुनसान का सहचर अपनी झोंपड़ी से कुछ दूर गंगा की जलधारा के पास बैठकर कह रहा था। वे लिखते हैं-”अगणित चन्द्रबिम्ब मुझ से कहने लगे-तुम तो यहाँ साधना करने आए हो न। इस प्रियतम के प्रेम में तल्लीन गंगा की धारा को नहीं देखते! गंगा तट पर निवास करना है तो गंगा की प्रेम साधना भी सीखो”।
साधना सूक्ष्म रूप से पाँच वीरभद्रों को क्रियाशील बनाने में लगी रही व लेखनी” अखण्ड-ज्योति” एवं” युगशक्ति-गायत्री” के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के मन को सतत् मथती रही। इसी दौरान सन 1985 का वर्ष उनकी आयुष्य का पचहत्तरवां वर्ष होने के कारण ही रजत जयन्ती वर्ष मनाया गया एवं इसी वर्ष अप्रैल 1985 में उनने अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर पहली बार प्रकाश डाला। इन्हीं लेखों व सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ।
साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधनाक्रम के विषय में यह जिज्ञासाएं उठना स्वाभाविक हैं। इस संबंध में स्वयं पूज्य गुरुदेव अपनी पुस्तक “सुनसान के सहचर” में लिखते हैं कि “हमारी 24 लक्ष महापुरश्चरण की साधना गायत्री उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय।
साधना के समापन तक के समय को एक पूर्वाभ्यास मानना चाहिए उस महायात्रा का जो उन्हें 1990 में करनी थी व उनने सशरीर बखूबी उसे दो वर्ष में सम्पन्न भी कर लिया।
साधना से, पाने वाली क्षमताएँ हो॥
साधना में प्रवेश करने की निर्णय ले ही लिया।
साधना से प्राप्त दिव्य शक्तियों का चमत्कार है। अन्यथा मनुष्य कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो इतना सब नहीं कर सकता।”
साधना के वैज्ञानिक पक्ष को उद्घाटित करते हुए 64 पृष्ठ की एक किताब सन 1946 में ही प्रकाशित कर चुके थे। आज तो परिजन उसका बड़ा परिवर्धित स्वरूप पढ़ते व पाते हैं किन्तु उस जमाने के हिसाब से वह प्रस्तुतीकरण अनूठा था।
साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे। योगीराज अरविन्द ने भी वेद पुरी को ही अपनी तपःस्थली बनाया जो महर्षि अगस्त की तपोभूमि थी। रावण महाबली था पर तप शक्ति से डरता था। उसके निर्देश थे कि उसके असुर उत्तर में कहीं भी जाएँ पर वेदपुरी जहाँ आज पांडिचेरी स्थित है से कोसों दूर रहें क्योंकि उस स्थान के प्रभामण्डल का प्रभाव असुरत्व के लिए विनाशकारी था।
साधना का क्रम भी निर्बाध गति से चला कर पत्र परामर्श एवं सम्पादन कार्य भी करते रहे यह एक रहस्यमय प्रसंग है। जो भी उनके पास आया, वह उनके पास आया वह उनके एवं वन्दनीय माताजी के भाव भरे सत्कार एवं सत्परामर्श में निहाल हो कर उनका हो कर गया। अब वे आगन्तुकों की बढ़ती संख्या देखकर एक ऐसा सुसंस्कारित स्थान ढूँढ़ रहे थे जहाँ वे अपने लम्बे महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कर सकें, साथ ही सुनियोजित सामूहिक साधना व शिक्षण क्रम भी चला सकें। यहीं से गायत्री तपोभूमि का शुभारम्भ माना जाना चाहिए। यह एक सहज संयोग नहीं है कि जिस वर्ष गायत्री महाविज्ञान खण्डों में प्रकाशित हुआ, उस वर्ष देश को स्वतंत्रता मिली एवं जब गणतंत्र बनने के बाद प्रथम अखिल भारतीय चुनाव प्रक्रिया की ओर बढ़ा तपोभूमि की स्थापना हुई।
साधना तुमने, अपने जीवन में साधी।
असुरों की दुर्धर्ष शाहियाँ, अपनी मुट्ठी में बाँधी॥
साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना। जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्धि कर लेते है। वातावरण की अपनी महत्ता है। देवात्मा हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के मध्य गंगा किनारे की गई उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे।
साधना का विस्तार करने की जो योजना है उससे राष्ट्र में एक तपोमयी भूमिका का सूक्ष्म वायुमण्डल बनेगा और उस वातावरण में अनेक मनोरम पुष्प प्रस्फुटित होंगे।” (पृष्ठ 21 अगस्त 1953 अखण्ड ज्योति) पहली बार वे इसी अंक में लिखते है कि “अब सभी गायत्री उपासकों को जो हमसे जुड़े हैं अपना दैनिक उपासना क्रम चालू रख रविवार के दिन साप्ताहिक कार्यक्रम रखना व सामूहिक हवन करना चाहिए।”
साधना” करने तुले, तो की अनूठी।
फिर अछूती साधना, कोई न छूटी॥
साधना है। हिमालय जैसी उदार हृदय और मानसरोवर जैसी निर्मल इन आत्माओं में वह विष बीज निश्चित रूप से नहीं है जो इतने बड़े अनुष्ठानों के संयोजकों को झुका सके। आचार्य जी असंख्यों को पार कराने वाले अनुभवी मल्लाह हैं। वे महान पैदा हुए हैं, महानता के साथ जी रहे हैं और उनका अन्त भी महान ही होगा”।
साधना, सूत शौनिक परम्परा में रामचरित मानव की प्रगतिशील प्रेरणा व गीता कथा तथा प्रज्ञापुराण कथा द्वारा समागमों का आयोजन व लोक शिक्षण ये कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ ऐसी थी जिनसे गायत्री तीर्थ को संस्कारित किया गया।
साधना तथा तत्व बोध की साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया।
साधनाओं का पथ-प्रदर्शक हो उसके पास तो ईश्वर अपनी चरम और परम स्थिति में होना चाहिए। था भी ऐसा। मथुरा के दिनों का प्रसंग है, तब विख्यात उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला अक्सर आया करते थे। एक दिन आने पर उन्होंने कहा “आचार्य जी!मैं आपकी कुछ आर्थिक सहायता करना चाहता हूँ। “मिशन तब अपनी शैशव अवस्था से गुजर रहा था, अर्थ की आवश्यकता तो थी ही।
साधना किस निमित्त की जा रही है। उनने लिखा कि “ साधक स्तर का एक स्थूल शरीरधारी विशेष स्थिति में पाँच सूक्ष्म शरीरों द्वारा पाँच गुने काम हाथ में ले सकता है। इनमें से एक शरीर को विशेष रूप से इसीलिए सुरक्षित रखा व नियुक्त किया गया है कि वह हमारे पास आने वाले असमर्थों दुखी जनों, पीड़ितों के आँसू पोंछता, सिर दबाता व मलहम लगाकर दुलार पुचकार सहित गोदी में बिठाता रहे।” शेष शरीर नवनिर्माण का जागृतात्माओं का जगाने का, विभीषिकाओं निरस्त करने का कार्य पूरा करते रहेंगे।’
साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधना का स्वरूप व उसका महात्म्य बताया था। गायत्री जयन्ती (8 जून) तक यह अंक सबके पास पहुँच गया एवं उन सभी को जो सूत्र संचालक के एकाएक दृश्य पटल से चले जाने से क्षुब्ध व व्यथित थे। जुलाई का अंक भी इसी सामग्री का उत्तरार्ध था। इस में स्पष्टीकरण था कि प्रस्तुत सूक्ष्मीकरण साधना किस निमित्त की जा रही है। उनने लिखा कि “ साधक स्तर का एक स्थूल शरीरधारी विशेष स्थिति में पाँच सूक्ष्म शरीरों द्वारा पाँच गुने काम हाथ में ले सकता है।
साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया। इन सबके बावजूद भी जो स्थूल में सब कुछ खोज रहा हो इसे क्या कहा जाय?
साधना से कहीं अधिक बताते हुए वे गायत्री मात के निमित्त श्रम व समय सब से माँगते है वे सेवा के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का आह्वान भी पहली बार इसी के माध्यम से करते है। क्रमशः इन्हीं प्रसंगों को आगे बढ़ाते हुए 1954 की जून में पहला, पंद्रह दिन का जीवन विद्या सत्र आयोजित हुआ जिसमें संजीवनी विद्या पर, जीवन जीने की कला पर व्याख्यानों का क्रम चला। संभवतः यह बौद्धिक स्तर का पहला समागम था।
साधना करायी गयी थी व आत्मशोधन की महत्ता प्रतिपादित की गयी थी। मिशन को सात संसदों में ( शोध, अध्यापक, संपर्क, कला, महिला, युवा तथा धर्म संसद ) इसी वर्ष बाँटकर भिन्न-भिन्न विधाओं से जुड़े सक्रिय व्यक्तियों को प्रज्ञा अभियान से संबद्ध होने का आह्वान किया गया।
साधना को अगले चरण पर पहुँचाया तो उनका लक्ष्य था आत्मशक्ति का संवर्धन तथा तप से उद्भूत लेखनी द्वारा तत्कालीन समाज का बहुमुखी मार्गदर्शन। लेखनी दो तरह से चली एक प्यार व ममत्व भरा व्यक्तिगत परामर्श, प्रत्येक व्यक्ति को पत्र द्वारा स्वयं की लेखनी से। दूसरे लेखों के रूप में-जिनमें व्यक्ति, परिवार समाज से जुड़ी समस्याओं का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में समाधान समाहित रहता था। 1953 की गायत्री जयन्ती पर जब उनने गायत्री तपोभूमि की स्थापना कर अपनी पहली गुरुदीक्षा दी तो एक अध्याय का पटाक्षेप हो गया था-वह था चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की साधना जिसकी पूर्णाहुति उस दिन की गयी तथा दूसरा अध्याय आरंभ हो गया था वह था गायत्री परिवार के रूप में एक सुव्यवस्थित संगठन की स्थापना। मणिमुक्तकों को ढूंढ़कर एकत्र कर उनमें प्राणशक्ति भरने का सुनियोजित कार्य यदि गायत्री जयन्ती सन 1953 से आरंभ हुआ माने तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।
साधना की अनुभूतियों पर आधारित अंक था। इस तथा आगे के अंकों की “गायत्री चर्चा” प्रसंग में उनने स्थान स्थान पर गायत्री उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति। 124 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 124 लाख आहुतियों का हवन, 124 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने को आ रहे थे वे सभी गायत्री जयन्ती तक पूरे हो जाने की संभावना उनने व्यक्त की थी। दूसरा था सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति।
साधना द्वारा ऊर्ध्वरेता बन अपनी कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत किया। यह पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जिस व्यक्ति के मातृवत् श्रद्धा के साथ सिद्ध कर लीं, उसके पास कोई कमी रह कैसे सकती है? पंचदेवों को भी उनने इन्द्रियों की तरह संभाला। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व प्राण सभी देवों की आराधना कर उन्हें परिष्कृत की ओर ही नियोजित किया।
साधना की चर्चा करते।
साधना के लिए अपने साथ हिमालय ले जाते हैं। समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कर वे शिवजी की भस्म रूपी ज्ञान गंगा तथा परशु (विचारों की तीक्ष्णता रूपी अस्त्र) लेकर संसार के उद्धार के लिए चल देते हैं।
साधना के अनुशासनों को न समझा जाता है, न निर्वाह किया जाता है, फिर वे फलित हों कैसे?
साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
साधना भी सीखो”।
साधना तो अभी तिजोरी में बन्द है। “ब्राह्मणत्व? ब्राह्मण तो अनेकों है” शायद यह मन्तव्य समझ नहीं पाये थे। उनका जवाब था “ब्राह्मण वह है जो समाज से न्यूनतम लेकर समाज को अधिकतम दे। इसके बिना भी कभी कोई ब्राह्मण हुआ है।
साधना व शिक्षण क्रम भी चला सकें। यहीं से गायत्री तपोभूमि का शुभारम्भ माना जाना चाहिए। यह एक सहज संयोग नहीं है कि जिस वर्ष गायत्री महाविज्ञान खण्डों में प्रकाशित हुआ, उस वर्ष देश को स्वतंत्रता मिली एवं जब गणतंत्र बनने के बाद प्रथम अखिल भारतीय चुनाव प्रक्रिया की ओर बढ़ा तपोभूमि की स्थापना हुई।
साधना, प्रज्ञायोग तथा दिव्य अनुदान की धारणा के महत्वपूर्ण निर्धारण किए। इस वर्ष जो साधना सत्र चले वे विशिष्ट थे। इन में कायाकल्प, आध्यात्मिक भाव कल्प स्तर की साधना करायी गयी थी व आत्मशोधन की महत्ता प्रतिपादित की गयी थी। मिशन को सात संसदों में ( शोध, अध्यापक, संपर्क, कला, महिला, युवा तथा धर्म संसद ) इसी वर्ष बाँटकर भिन्न-भिन्न विधाओं से जुड़े सक्रिय व्यक्तियों को प्रज्ञा अभियान से संबद्ध होने का आह्वान किया गया।
साधना उपक्रम को जीवन में अपनाएगा, वह सुनिश्चित ही प्रतिफल पाएगा। अखण्ड ज्योति जूना 1966 में “अखण्ड ज्योति के परिजन इतना तो करें ही” प्रसंग में वे लिखते है कि “हमने गायत्री उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
साधना, तीन शरीरों के परिष्कार-उन्नयन की साधना, सावित्री तथा कुण्डलिनी साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना सम्पादन में आ सकता था। उसका पूर्वानुमान कर उनने लक्ष्य निर्धारित कर दिया व यह भी बता दिया कि बिना इस तप शक्ति की पूँजी के वे वह कार्य नहीं कर पाएंगे जिसकी कि उनके गुरु ने उनसे आकांक्षा रखी है। बड़े काम उपयुक्त समर्थता के बल पर ही पूरे होते हैं। पूज्य गुरुदेव की लिपि में आदिकाल वह निर्देश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
साधना की महापूर्णाहुति थी। लाखों व्यक्ति इस माध्यम से मिशन से जुड़ गये। अगले ही वर्ष समय की आवश्यकता को देखते हुए इन यज्ञों को विस्तार देने के लिए न्यूनतम सामग्री में संपन्न करने के लिए दीपयज्ञों का निर्धारण हुआ जो जन्मदिवसोत्सवों से लेकर एक लक्ष वेदीय दीपयज्ञों का स्वरूप लेता हुआ विस्तार लेता चला गया।
साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना, सावित्री तथा कुण्डलिनी साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
साधना या समाज देवता की आराधना जो करता चले वह आत्मकल्याण का पथ तो प्रशस्त करेगा, औरों की मुक्ति का निमित्त भी बन सहज ही श्रेय पाता चलेगा।
साधना का समर्थ ब्रह्मास्त्र” जैसे लेखों द्वारा जहाँ उनने महाकाल द्वारा नवसृजन की सुनिश्चितता का तथ्य प्रतिपादित किया, वहीं “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” (दो खण्डों) तथा सतयुग की वापसी “प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया” जैसी पुस्तकों द्वारा सबकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब अन्तराल बदलेगा, भाव संवेदनाएं जागेंगी तो सद्बुद्धि का उदय होगा। यही प्रज्ञावतार की व्यष्टि तंत्र में अवतरित सूक्ष्म प्रेरणा हैं यही सद्बुद्धि व्यक्ति के क्रियाकृत्यों में आमूलचूल परिवर्तन कर उदार सहकारिता पर आधारित समाज बनाएगी।
साधनाओं का अवलम्बन घाटे का सौदा नहीं व जो लाभ होता है वह पूर्णतः वान सम्मत है, प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर प्रमाणित किया जा सकता है। देवसंस्कृति के निर्धारण मात्र कपोल कल्पना नहीं है वरन् तथ्यों पर आधारित है, यह देखकर नयी पीढ़ी, बुद्धिवादी समुदाय को भी आश्वासन मिलेगा कि एक ऐसा संस्थान है जो मात्र इसी कार्य को समर्पित है।
साधनात्मक उपचार कर लें। गायत्री का लघु अनुष्ठान, चौबीस हजार मंत्रों का जाप नौ दिन तक संयम नियम से रहना। यदि लघु अनुष्ठान संभव न हो तो गायत्री चालीसा का चौबीस सौ पाठ। इतना भी न हो सके तो मंत्र लेखन ही पर्याप्त है। पंचाक्षरी ॐ भूर्भुवः स्वः का जप भी जो कर ले उसे भी वे यज्ञ की पात्रता दे देते थे।
साधना का रूप ले लिया। प्रारंभ में जो उलाहना दिया गया वह भी ऋषि चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है।
साधना की आत्म प्रेरणा असत् नहीं हो सकती, जो शक्ति इस मार्ग पर खींच कर लाई है, वह गलत मार्गदर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा-जीव अकेला आता है, अकेला जाता है। सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है।
साधना में प्रवीण पारंगत बनेगा, यह बात भी कही गयी है। उपनयन संस्कार के बाद, ब्रह्म संस्कार, गायत्री उपासना व वेदाध्ययन करने का प्रसंग भी आया है। पुराण के पैंतीसवें श्लोक से चालीसवें श्लोक तक कल्कि द्वारा पिता से वेद, सावित्री ब्राह्मणत्व, यज्ञोपवीत, गायत्री ब्रह्म विद्या आदि की व्याख्या पूछी गयी है। सच्चा ब्राह्मणत्व क्या होता है व उसकी उपासना कैसे की जाती है? यह समझाया
साधना द्वारा अभयदान देते हुए वे अपनी भूमिका को स्पष्ट करते चले जा रहे थे। उनकी तप साधना भी इसी क्रम से प्रचंड होती होती गयी व उसकी स्थूल परिणति सूक्ष्मीकरण साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना की सर्वोपरि सिद्धि है।
साधना के समापन पर जो पूर्णाहुति का प्रसाद माँ गायत्री ने उन्हें प्रदान निश्छल प्यार, निष्काम समर्पण।
साधना स्थली में साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना। जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्धि कर लेते है। वातावरण की अपनी महत्ता है। देवात्मा हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के मध्य गंगा किनारे की गई उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे।
साधना संबंधी मार्गदर्शन तथा परिस्थितियों के अनुकूल कैसे मनःस्थिति बदली जाय यह वह बड़े ममत्व व लगन के साथ बताते थे। कार्यकर्ताओं के हृदय के सम्राट उन्हें कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।
साधना का निवास स्थान है-ईश्वर विश्वास। इसके अभाव में साधना टिक नहीं सकती। जो अनेकानेक साधनाओं का पथ-प्रदर्शक हो उसके पास तो ईश्वर अपनी चरम और परम स्थिति में होना चाहिए। था भी ऐसा। मथुरा के दिनों का प्रसंग है, तब विख्यात उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला अक्सर आया करते थे।
साधना को उनने छाया पुरुष की साधना कहा, जिसमें वे पाँच शरीरों से भिन्न भिन्न कार्य सूक्ष्मजगत में करना चाहते थे। वंदनीया माताजी ने इस सम्पादकीय में लिखा कि “ हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गये है और न पलायन ही कर रहे है, वरन् वे सूक्ष्मीकरण की जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़त कर रहे है।” यह आश्वासन उन के लिए था जिन्हें अचानक परामर्श-वार्तालाप विचार विनिमय का क्रम समाप्त होने पर खिन्नता अनुभव हो रही थी।
साधना चिन्तन से-सूक्ष्म शरीर से और आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
साधना करने आए हो न। इस प्रियतम के प्रेम में तल्लीन गंगा की धारा को नहीं देखते! गंगा तट पर निवास करना है तो गंगा की प्रेम साधना भी सीखो”।
साधना सत्र चले वे विशिष्ट थे। इन में कायाकल्प, आध्यात्मिक भाव कल्प स्तर की साधना करायी गयी थी व आत्मशोधन की महत्ता प्रतिपादित की गयी थी। मिशन को सात संसदों में ( शोध, अध्यापक, संपर्क, कला, महिला, युवा तथा धर्म संसद ) इसी वर्ष बाँटकर भिन्न-भिन्न विधाओं से जुड़े सक्रिय व्यक्तियों को प्रज्ञा अभियान से संबद्ध होने का आह्वान किया गया।
साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीनकाल की तरह तभी भी बना हुआ है और संभवतः सदा बना ही रहेगा।
साधना, संयम जैसे विषयों को वैज्ञानिक ढंग से समझाते, हुए उनने उपासना विधियों की उपयोगिता को सुबोध शैली में समझाया। पहली बार जनसाधारण के सम्मुख ऐसा प्रतिपादन आया, जिससे वे प्रेरणा ले सकें कि अध्यात्म मात्र शास्त्र वचन ही नहीं हैं, पूर्णतः उसका पूरा आधार विज्ञान सम्मत भी है। बाद की अखण्ड ज्योति के अंकों में वे शब्द शक्ति की महत्ता, गायत्री के चौबीस अक्षरों का वैज्ञानिक विवेचन, यज्ञ विज्ञान के महत्वपूर्ण पक्षों तथा कुण्डलिनी महाशक्ति के विज्ञान सम्मत आधार पर लिखते रहे। यह क्रम 1967-68 तक चला।
साधना-उपासना का क्रम शक्ति पीठों में चलाना, युग संगीत के माध्यम से जन चेतना को झकझोरना का विस्तार करना, रामायण गीता प्रज्ञापुराण की कथा द्वारा प्रगतिशील अध्यात्म का प्रतिपादन करना, अपने मण्डल की तीर्थ यात्रा-धर्म प्रचार की पदयात्रा-साइकिल यात्रा सतत् चलाना, जन-जन को युग साहित्य के संजीवनी से परिचित कराना, इस के लिए चल पुस्तकालयों की व्यवस्था करना, स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे।
साधना का पोषक आहार उपलब्ध हो जाय तथा सुसंस्कारिता के बीज पूर्व से ही विद्यमान हों, उसका भावी जीवन क्रम कैसा होगा, इसकी पूर्व कल्पना की जा सकती है। पूज्य गुरुदेव की बहुमुखी जीवन साधना के चमत्कारी प्रसंगों का प्राकट्य अन्यान्य महापुरुषों की तरह शैशवकाल से ही होने लगा था। ऐसे महापुरुष की जीवनी को, विभिन्न संस्करणों को लिपिबद्ध करना कितना पुष्कर कार्य हो सकता है, इसकी कल्पना सामान्य पाठक नहीं कर सकते। संभव है कुछ अविज्ञात घटनाक्रम ऐसे उनके शैशवकाल से संबंधित इस स्मारक अंक से छूट जाएँ जिनकी फलश्रुतियाँ आगे चल कर देखने को मिली तो इसे संकलनकर्ताओं का-संपादकों का प्रमाद माना जाए।
साधना का महत्वपूर्ण अंग था “आत्मवत् सर्वभूतेषु, मातृवत् परदारेषु” एवं “परद्रव्येषु लोष्ठवत्” तो काया की परिधि तो वे कभी की लाँघ चुके थे पर अपने समान सबको देखना समानुभूति करना एवं दूसरों के अंतःकरण से अपने को इस गहराई जोड़ लेना कि लाखों परिजन उसे अपना परमप्रिय सखा, पिता, अभिभावक मानने लगे साधना की सर्वोपरि सिद्धि है।
साधनाएँ पूर्णतः विज्ञान सम्मत है; यह उनने अपने जीवन के माध्यम से प्रमाणित किया। ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न आचार्य श्री के अनेकानेक कर्तव्यों में, उनकी 80 वर्ष की जिन्दगी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों से जड़े हीरक मालाओं के हार में एक हीरा और जुड़ता है- वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिकल्पना, उस दिशा में आवश्यक दार्शनिक शोध कर युग साहित्य का प्रस्तुतीकरण तथा एक अत्याधुनिक प्रयोगशाला एवं दुर्लभ ग्रन्थों से सज्जित “ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान” की स्थापना।
साधनाएँ, धर्म-धारणा, कर्मकाण्ड, प्रतीक उपासना आदि नामों से ही कतराता रहा है अथवा मन में उनके संबंध में भ्रान्तियाँ पाले हुए है, भी उनकी बात समझकर इस आलोक का विस्तार कर सकेगा।
साधना द्वार योगदर्शन को व्यावहारिक रूप प्रदान करना, विश्वामित्र परम्परा में सिद्धपीठ की स्थापना कर संजीवनी विद्या का शिक्षण व नवयुग के पृष्ठ भूमि का निर्माण, पिप्पलाद परम्परा में संस्कारी आहार के माध्यम से कल्प साधना, सूत शौनिक परम्परा में रामचरित मानव की प्रगतिशील प्रेरणा व गीता कथा तथा प्रज्ञापुराण कथा द्वारा समागमों का आयोजन व लोक शिक्षण ये कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ ऐसी थी जिनसे गायत्री तीर्थ को संस्कारित किया गया।
साधना स्थली बनाया, वहीं पर आचार्य शंकर को चारों धामों की यात्रा करने का उपदेश दिया व शक्ति प्रदान की। यह महत्ता भूमि के संस्कारों की है।
साधना।
साधना का आदर्श ही नहीं, अटूट विश्वास और प्रचण्ड साहस, पर्याप्त मनोबल देकर चले गए। दिव्य सत्ताओं का प्यार अनुदान भी विचित्र होता है। संभवतः यही शक्तिपात प्रक्रिया भी है।
साधना की सिद्धि के अलौकिक घटनाक्रमों से भी बढ़कर किसी की क्या कोई और प्रमाण चाहिए?
साधनात्मक पुरुषार्थ से तीर्थ, महातीर्थ और अब युगान्तर चेतना के गोमुख के रूप में परिवर्तित हो गई। शांतिकुंज नाम से जाना जाने वाला यह दिव्य क्षेत्र सहस्राधिक वर्षों तक मानवता को नवीन प्राण देता रहेगा।
साधना साथ कर सकें, इसलिए उन्हें परमार्थ कार्य में नियोजित होने को आमंत्रित किया गया।
साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।” (पृष्ठ 135 प्रथम संस्करण, सन् 1965)
साधना के नाम पर संव्याप्त आस्था वाली मानसिकता का दोहन करने अधिकाँश समय वहीं बने रहते हैं। चोगा भले ही उनने बाबा जी का पहन रखा हो, किन्तु आचरण में पाश्चात्य भोग विलास की ही प्रधानता रहती है। पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ब्राह्मण की जिन्दगी जी है वह सफेद खादी की धोती व एक कुर्ते से ही जीवन भर काम चलाया है। विमान यात्रा का खर्च सुनकर उनने समुद्र से यात्रा कर अधिक दिन प्रवास व बिताना पसंद किया ताकि अनावश्यक भार परिजनों पर न पड़े वह जहाज पर व्यतीत समय को वे स्वाध्याय, साधना में लगा सकें। आज की परिस्थितियों में यह भले ही अव्यावहारिक प्रतीत होता हो किन्तु मिशन का सूत्र संचालक जिन आदर्शों पर जीवन भर चला था, उनके माध्यम से ही अपनी रीति नीति का निर्धारण कर रहा था।
साधना, पूजा उपासना का नियमित क्रम 1937 से आरंभ कर 1951 तक यथावत चलाया एवं पूर्णाहुति तक उनने सारे व्रत अनुशासन उसी प्रकार निबाहे जैसा कि उनके गुरु ने उन्हें बताया था। इस बीच 1951 में वे एक बार हिमालय यात्रा पर गए जो कुछ माह की थी व पुनः बाद में 1961 में एक वर्ष के लिए दुर्गम हिमालय उनने प्रवास किया। सब कुछ अपने मार्गदर्शक के बताये निर्देशों के अनुरूप।
साधना स्वाध्याय प्रेस का काम तो था ही। इन सबके बावजूद न कोई उनकी शिकवा शिकायत थी और न असुविधाओं का रोना। उनकी इस अद्भुत जीवन शैली-अपूर्व कर्मठता ने केसकर जी को दंग कर दिया। सहस्र कुण्डीय महायज्ञ में वही केसकर जी जब तीस वर्ष बाद आए तो उन्होंने सभी के सामने उनके चरण स्पर्श किए।
साधना गायत्री उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है।
साधना कृत्य पूरा कर लिया जाय”।
साधना, आराधना से लेकर लोक सेवा संबंधी विशद मार्गदर्शन भी है।
साधना का वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत कर पूज्य गुरुदेव ने अनेकों बुद्धिजीवियों को प्राण प्रत्यावर्तन जीवन साधना, साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना शक्ति द्वारा बीसवीं व इक्कीसवीं शताब्दी में सारे महत्वपूर्ण परिवर्तन का सरंजाम जुटा कर, धरित्री का कायाकल्प करने का आश्वासन दिया। उनकी सारी आध्यात्मिक मनोकामनाएँ पूरी कीं तथा जो कुछ भी गुरुदेव ने “मास्टर” से माँगा वह कल्पवृक्ष के माध्यम से मिलता चला गया। उपरोक्त तीनों दिव्य सत्ताओं का त्रिवेणी संगम उनके जीवन के प्रारंभिक कुछ वर्षों में ही फलीभूत होता दिखाई पड़ता है।
साधना जैसे गूढ़ तत्व पर आधारित थी।
साधना में अपने अहं को पूर्णतया गला डालना जो अनिवार्य है। इस अनिवार्यता को उन जैसे कोई विरले ही निभा पाते हैं। आगरा में काँग्रेसी कार्यकर्ताओं का बृहद् सम्मेलन था। स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आए हुए थे। सम्मेलन में कार्यक्रम की समाप्ति पर श्री कृष्णदत्त पालीवाल जी ने ‘नवीन’ जी को सभी का परिचय देना शुरू किया।
साधना क्षेत्र में बाह्योपचारों की नकल होती देखी जाती है एवं जो भी बहिरंग उपचार कोई साधक करता दिखता है, एक समुदाय उसके पीछे चल पड़ता है। उन प्रतीकों के पीछे छिपी भावनाओं को, आत्मशोधन व जीवनसाधना के अनुशासनों को न समझा जाता है, न निर्वाह किया जाता है, फिर वे फलित हों कैसे?
साधना पद्धति का एक अनुभवी निष्णात विद्वान मानते थे। ब्रह्मलीन श्री देवरहा बाबा से विगत महाकुँभ पर्व पर इलाहाबाद में मिशन से जुड़े एक उच्चाधिकारी ने पूज्य गुरुदेव के विषय में पूछा कि आपकी उनके संबंध में क्या मान्यता है? तो देवरहा बाबा ने पूर्व की ओर मुख करके कहा कि “साक्षात् सविता का जो रूप है, ब्रह्मतेज सम्पन्न उस अवतारी सत्ता को मेरा नमन है। वे माँ गायत्री के सिद्ध साधक है व युगपरिवर्तन उन्हीं के बताये पद चिह्नों पर चल कर होगा।” युग निर्माण योजना से प्रत्यक्ष उनके क्या संबंध है, यह पूछने पर दीर्घ-जीवी उस महापुरुष ने कहा कि “सभी देवसत्ताएं धरती पर सतयुग लाने को जन्मी है।
साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
साधना एवं अगले दिनों सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्पन्न होने वाली साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना के प्रति न केवल रुचि जगा दी अपितु गायत्री का मर्म समझाते हुए यज्ञोपवीत संस्कार की सार्थकता को उनके रोम-रोम में पिरो दिया। गायत्री ही जिनका आगे चल कर इष्ट बनी एवं करोड़ों व्यक्तियों से जिनने गायत्री साधना करवा ली, ऐसे श्री राम के पिता ने सच्चे मार्गदर्शक की वह भरी भूमिका निभाई जो गुरु के साक्षात्कार से पहले संपन्न होनी ही थी।
साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
साधना तथा उसके बाद के महाप्रयाण तक के वर्ष एकाकी बिताने की प्रेरणा एवं शक्ति दी होगी। सन् 1974 से 1990 तक वे एक ही कोठरी में रहे, उसी में तप में लीन रहे व वहीं से प्रचण्ड शक्ति में चक्रवात सारे विश्व में उत्पन्न कर सके। एकान्त सेवन को किस सीमा तक रचनात्मक बनाया जा सकता है व इसके लिए किस श्रेणी का चिन्तन होना चाहिए यह मार्गदर्शन पूज्य गुरुदेव लेखनी से ही नहीं, अपना जीवन जीकर सब को दे गए हैं।
साधना कर साक्षात भगवान को अपने घर जन्म लेने के लिए विवश कर दिया था। तप की अवधि में एक ही प्रार्थना रही होगी कि वे एक ऐसी सुसन्तति को जन्म दें जो अपने सत्कार्यों से विश्व वसुधा को धन्य कर दे। यही हुआ भी।
साधना सत्र में बदल दिया गया। यही साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
साधनाखण्ड एवं ब्रह्मविद्या खण्डों में कुल 108 उपनिषद् थे जिनकी हिन्दी में सरल टीका पहली बार जनसमुदाय के समक्ष प्रस्तुत की गयी थी। इसकी भूमिका में पूज्य गुरुदेव लिखते है कि “उपनिषदों को जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन ही कहना चाहिए। उनमें जीवन को शान्ति और आनन्द के साथ जीने तथा प्रगतिपथ पर निरन्तर आगे बढ़ते जाने की विद्या का भली भाँति विवेचन हुआ है। लौकिक और पारलौकिक, बाह्य और आन्तरिक, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के दोनों ही पक्ष जिसके आधार पर समुन्नत हों, वह महत्वपूर्ण ज्ञान उनमें भरा हुआ है। इनकी एक एक पंक्ति में अमृत भरा प्रतीत होता है।
साधना में लीन थे। वे इस बीच स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने के बाद बापू से यह निर्देश ले आए थे कि उन्हें योगीराज अरविंद एवं रमण महर्षि की तरह आध्यात्मिक शक्ति के सहारे परतंत्रता से मुक्ति पा रहे भारत व युद्ध की पीड़ा से भुगत रहे विश्व को प्रचण्ड सामर्थ्य परोक्ष जगत से प्रदान करनी है। यह उनकी मार्गदर्शक सत्ता का निर्देशन भी था। उन दिनों जिनने पूज्य गुरुदेव को लेखनी द्वारा संघर्ष कर एक मासिक आध्यात्मिक पत्रिका निकालने की स्थिति में देखा था, वे एक सामान्य व्यक्ति का संघर्ष मात्र ही समझ पाए थे। वस्तुतः पूज्य गुरुदेव युग परिवर्तन के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए अपनी लेखनी द्वारा लोकशिक्षण का,जन-जन का आत्मबल बढ़ाने का, उन्हें तपोनिष्ठ बनाने का शिक्षण आरम्भ करना चाहते थे।
साधनाक्रम चल रहा होगा। सब स्वजनों को हमारा आशीर्वाद और माताजी का स्नेह कहें।
साधनाएं भी करायी। बाद में शान्तिकुँज में आरण्यक के बन जाने पर चान्द्रायण व्रत एवं कल्पसाधना सत्र चलते रहे। आयुर्वेद के राष्ट्रीय बोर्ड से वे मान्यता प्राप्त वैद्य थे।
साधना की शुरुआत थी। उन्हें किसी का परामर्श क्या प्रभावित करता। वे तो महाकाल की आकाँक्षा का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ लोक संग्रह के लिए भी कर्म कर रहे थे। उनका हर कार्य दिव्य सत्ता की स्फुरणा के साथ था। कर्तृत्व के माध्यम से जो शिक्षण करना था, उसे उन्हें अपने जीवन में भी तो उतारना था।
साधनाएं भी स्थूल शरीर वालों की अपेक्षा भिन्न हैं।
साधना उनने किस प्रकार कब संपन्न की होगी? अलौकिक पुरुषों के अविज्ञात साधनाक्रम के विषय में यह जिज्ञासाएं उठना स्वाभाविक हैं। इस संबंध में स्वयं पूज्य गुरुदेव अपनी पुस्तक “सुनसान के सहचर” में लिखते हैं कि “हमारी 24 लक्ष महापुरश्चरण की साधना गायत्री उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय।
साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना भी इसी क्रम से प्रचंड होती होती गयी व उसकी स्थूल परिणति सूक्ष्मीकरण साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
साधना अनुदान के वितरण, ममत्व भरे मार्गदर्शन एवं कौशल प्रशिक्षण का क्रम चलता रहेगा।”
साधना, अनुष्ठान करते होंगे। वे जैसा भी कुछ अपने विश्वास के कारण करते हों करें। परंतु एक साधना को करने के लिए हम उन्हें अनुरोधपूर्वक प्रेरित करेंगे कि वह दिन-रात में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय निकालें और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचें कि वे क्या हैं? वे सोचें कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं जो मनुष्य होने के नाते उन्हें सौंपा गया था। मन से कहिए कि वह निर्भीक सत्यवक्ता की तरह आपके अवगुण साफ साफ बताए।
साधना उपचार, कुण्डलिनी अष्टचक्र, अंतरंग में विद्यमान विराट संभावनाएं मंदिर-मूर्ति-शिखा सूत्र-तिलक-संख्या-पूजा अग्निहोत्र जन-व्रत आदि का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण हजारों ऐसे व्यक्तियों को खींचकर प्रज्ञापरिवार में सम्मिलित कर रहा था जो पहले इन नामों से बिदकते थे।
साधना द्वारा युग संजीवनी जन जन तक पहुँचाना, विचारक्राँति का सरंजाम जुटाना तथा तीसरा कार्यक्रम था स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहना। प्रस्तुत पंक्तियों में उनके जीवन के प्रबलतम पुरुषार्थ गायत्री उपासना की चर्चा की जा रही है जिससे उनने पर्याप्त तप पूँजी कमाई और जी भर कर लुटाई।
साधनामय बनने पर दूषित विचारों की भी वैसी ही कटाई, किसान की तरह खरपतवार अपने जीवन में से निकाल बाहर कर अनगढ़ता से सुगढ़ता की साधना करना ऐसे जीवन्त उदाहरण दिए है। पूज्य गुरुदेव की संभाषण व व्याख्यान की शैली भी यही थी। जीवन से जुड़े छोटे छोटे उदाहरणों के द्वारा कैसे व्यक्ति साधारण से असाधारण बनता है, यह उनने अनेकों तरह से समझाया है। कोयले से हीरा बनने से लेकर अनगढ़ पत्थर की मूर्ति की तरह तराशा जाना एवं बेल के वृक्ष से लिपट कर ऊँचा उठ जाने की तरह समर्पित का उत्कृष्टता की ऊँचाई को पा लेना यही उनकी मर्मस्पर्शी उद्बोधन शैली थी। आश्चर्य इस बात का है कि बोलते समय ऐसी सुबोध शैली जो सीधी अंदर तक उतरती चली जाए व लिखते समय ऐसी संस्कृतनिष्ठ व उक्तियों-मुहावरों से भरी हुई कि हिन्दी के विद्वान भी उससे शिक्षण लें।
साधना जिसकी पूर्णाहुति उस दिन की गयी तथा दूसरा अध्याय आरंभ हो गया था वह था गायत्री परिवार के रूप में एक सुव्यवस्थित संगठन की स्थापना। मणिमुक्तकों को ढूंढ़कर एकत्र कर उनमें प्राणशक्ति भरने का सुनियोजित कार्य यदि गायत्री जयन्ती सन 1953 से आरंभ हुआ माने तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। क्योंकि इसके पूर्व तो वे पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे, वातावरण गर्म कर रहे थे तथा हर परिजन को आने वाले समय के लिए अपनी तैयारी कैसे की जाय, यह मार्गदर्शन दे रहे थे। “गायत्री चर्चा” स्तम्भ द्वारा उनने गायत्री के तत्वज्ञान को व्यावहारिक जामा पहनाकर उसे इतना जन सुलभ बना दिया कि हर व्यक्ति जो उनके संपर्क में आया, वह गायत्री साधना न्यूनाधिक किसी ने किसी रूप में करने लगा।
साधना एवं तत्वज्ञान का समन्वित रूप कही देखने को नहीं मिला था।
साधना स्वर्ण जयन्ती समारोह तक महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई थी, उन्हीं को प्रकारान्तर से इन्हें स्थापित करने का श्रेय मिला। कुछ ऐसे नये प्राणवान व्यक्ति भी उभर कर आए जिन्हें आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी।
साधना न्यूनाधिक किसी ने किसी रूप में करने लगा।
साधना के उन्नायक, वेद पुराणों के ज्ञाता।
सदाचार समता के पोषक, राष्ट्र धर्म के निर्माता॥
साधना करते तथा उन निष्कर्षों के आधार पर उन ग्रन्थों का निर्माण करते थे, जिनसे जनसामान्य का मार्गदर्शन होता था। इस क्षेत्र के निवासी मूर्धन्य स्तर के थे। तत्वदर्शन उनका प्रिय विषय था। यदि कहीं इसी कारण इस क्षेत्र को स्वर्ग और निवासियों को देवता कहा गया हो तो वह अत्युक्तिपूर्ण है भी नहीं। दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्मांड की सघन अध्यात्मचेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इस क्षेत्र की भू चुम्बकीय व आध्यात्मिक विशेषताओं के कारण इसी क्षेत्र में होता है।
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-March
साधना से ही सिद्धि का सिद्धांत जब तक व्यक्ति आत्मसात नहीं कर लेता, तब तक उसे सही अध्यात्म की कड़ुई, किंतु प्रामाणिक कुनैन खिलाते ही रहना पड़ेगा। यदि नया ईश्वर भी रचना पड़े तो इसके लिए तैयार होना पड़ेगा।"
साधना, धर्म-धारणा और परमार्थपरायणता को अनिवार्य रूप से आवश्यक माना जाता रहा है। अब उस पर्वत शिखर पर नंगे पैरों चढ़ने की झंझट से सहज निवृत्ति सुझा दी गई है कि अमुक कर्मकांड संपन्न करने से वह स्वर्ग, अंधे के हाथ बटेर लगने से भी अधिक सरल हो गया है। जब स्वर्ग इतना सस्ता है; मोक्ष इतना सुगम है, तो फिर उपासना, साधना, आराधना जैसे पुण्य प्रयोजनों में अपने को नियोजित करने के लिए कोई क्यों तैयार हो?
साधना में भागीदारी करने का जिनका मन हो, वे न्यूनतम कार्यक्रम के रूप में इस बसंत पर्व से निम्न संकल्प तो कर रही ही ले। इन संकल्पों की पूर्ति जा कर सकेगा। वह सहज ही युग अवतरण का श्रेय भी प्राप्त करेगा तथा बड़भागी कहलायेगा।ये संकल्प इस प्रकार है
साधना द्वारा नियंत्रण करने की विद्या सिखाई जा सके तो इसे चिकित्सा विज्ञान का मानव जगत को अद्भुत अनुदान कहा जाएगा।
साधना में निष्ठापूर्वक लगे रहने वाले कम-से-कम एक लाख लोकसेवी तैयार करने का संकल्प है।
साधना में भागीदारी से किसी को मिल सकता है। प्रस्तुत पाँच दिवसीय सत्रों में, परिजनों द्वारा उठाए जा रहे उत्तरदायित्वों के अनुरूप प्राण अनुदान देकर, उन्हें समर्थ अग्रदूत के रूप में विकसित करने का सशक्त प्रयास किया जा रहा है।
साधना, आराधना जैसे पुण्य प्रयोजनों में अपने को नियोजित करने के लिए कोई क्यों तैयार हो?
अखण्ड ज्योति वर्ष-महीना 1990-January
साधना के परिणामों और सफलताओं को चुराया, पर वह खिन्न न हुए और न ही उद्विग्नता ने उन्हें सताया। उसी शांतभाव से वह अपने आगे के कार्य में लगे रहें। अभी एक वर्ष पूर्व जब उन्होंने अपनी पैंतीसवीं वर्षगाँठ मनाई थी, तब अपना सारा जीवन विज्ञान की शोध और मानव जाति की सेवा में लगाने का निश्चय किया था। इस निश्चय की पूर्ति में यह पहली सफलता मिली थी, वह भी हाथ से फिसल गई।
साधना जारी रखी। अपने कार्यों के द्वारा समूचे इतिहास में अमर यह समर्थ पुरुष था- 'वाल्टेयर'।
साधना भी कम चमत्कारी परिणाम उत्पन्न नहीं करती। फरहाद शीरी को पाने के लिए पहाड़ खोदकर लंबी नहर निकाल सकने में एकाकी प्रयत्नों के बलबूते ही सफल हो गया था। गंगा को स्वर्ग से घसीटकर जमीन पर बहने के लिए बाधित करने में भगीरथ अकेले ही सफल हो गए थे। व्यापक अंधकार पर छोटा दीखने वाला सूरज ही विजय प्राप्त कर लेता है, फिर यह आशा भी की जा सकती है कि मनुष्य में उत्कृष्टता का उदय होगा तो यह वातावरण भी बदल जाएगा, जो हर दृष्टि से भयंकर ही भयंकर दीख पड़ रहा है। यह आशावाद ही उज्ज्वल भविष्य का प्राण है।
साधना भी पवित्र होनी चाहिए।
साधना के माध्यम से दैवी चेतना का वर्चस्व प्राप्त करने को प्रमुखता दी गई है। शिक्षण की दृष्टि से एक घंटे का प्रवचन ही पर्याप्त माना गया है। शेष समय में तो आत्मचिंतन और अंतराल का समुद्र-मंथन ही प्रधान कार्यक्रम है। तदनुसार ही नियमोपनियम भी बनाए गए है। संभवतः यहाँ पाँच दिन शान्तिकुञ्ज की परिधि में रहकर उसी प्रकार काटने होंगे, जिस प्रकार कि गर्भस्थ भ्रूण माँ के पेट में ही निर्वाह करता है और जिस प्रकार भी भरण-पोषण अनुशासन निर्धारित रहता है, उसी के परिपालन में एकाग्र रहता है।
साधना विज्ञान में इस प्रयोजन के लिए त्राटक-साधना का विधान है। त्राटक की मोटी रीति-नीति यह है कि आँखें खोलकर किसी वस्तु को देखा जाए। इसके बाद नेत्र बंद करके उसका कल्पना-चित्र मस्तिष्क में अंकित किया जाए। जब तक वह चित्र धुँधला न पड़े, स्मृति झीनी न पड़े, तब तक आँखें बंद रखी जाएँ और फिर आँख खोलकर उसी वस्तु को एकाग्रतापूर्वक देखने के उपरांत पहले की तरह फिर आँखें बंद कर ली जाएँ। इसी प्रकार देखने, स्मृति के आधार पर आँखें मूँदकर ध्यान करने और कल्पना धुँधली पड़ने पर फिर उसे आँख खोलकर देखने लगने की क्रिया बार-बार दुहरानी चाहिए।
साधना- पथ में व्यवधान उपस्थित हो जाएगा और यह भी कि इस कारण वह एक साधक की भाँति विज्ञान के क्षेत्र में अपना अस्तित्व खाे देंगे।
साधना का लक्ष्य भी यही है कि किसी प्रकार संवेदनाशून्य निष्ठुरता के महादैत्य से बच निकलना संभव हो सके और उस देवत्व का साक्षात्कार हो सके, जो जरूरतमंदों को दिए बिना रह ही नहीं सकता। देना ही जिनकी प्रकृति और नियति है। उन्हीं को इस धरती का देवता कहा जाता है। देवमानव के रूप में उन्हीं का अनुकरण और अभिनंदन करते विवेकवान भक्तजन देखे जाते हैं।
साधना की सिद्धि करनी है, उन्हें लंबे समय तक इस प्रयोग का अभ्यास करना चाहिए और जब प्रयोग करने, परिणाम देखने की इच्छा हो तो यह देख-भाल कर लेना चाहिए कि शक्तिसंचय का उपयोग सत्प्रयोजनों के लिए हो रहा है या नहीं ?
साधना सत्र हैं। इनमें देने व लेने की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया संपन्न होने जा रही है। वर्त्तमान समय की महत्ता को समझते हुए, उस अंतिम वर्ष के सत्र-आमंत्रण को सक्रिय परिजन अनदेखा न करेंगे, यही आशा एवं विश्वास है।
साधना भी कह सकता है।
साधना का विधान है। त्राटक की मोटी रीति-नीति यह है कि आँखें खोलकर किसी वस्तु को देखा जाए। इसके बाद नेत्र बंद करके उसका कल्पना-चित्र मस्तिष्क में अंकित किया जाए। जब तक वह चित्र धुँधला न पड़े, स्मृति झीनी न पड़े, तब तक आँखें बंद रखी जाएँ और फिर आँख खोलकर उसी वस्तु को एकाग्रतापूर्वक देखने के उपरांत पहले की तरह फिर आँखें बंद कर ली जाएँ। इसी प्रकार देखने, स्मृति के आधार पर आँखें मूँदकर ध्यान करने और कल्पना धुँधली पड़ने पर फिर उसे आँख खोलकर देखने लगने की क्रिया बार-बार दुहरानी चाहिए।
साधना बन पड़ती है। धर्म-धारणा का निर्वाह भी इससे कम में नहीं होता। तपश्चर्या और योग-साधना का लक्ष्य भी यही है कि किसी प्रकार संवेदनाशून्य निष्ठुरता के महादैत्य से बच निकलना संभव हो सके और उस देवत्व का साक्षात्कार हो सके, जो जरूरतमंदों को दिए बिना रह ही नहीं सकता। देना ही जिनकी प्रकृति और नियति है। उन्हीं को इस धरती का देवता कहा जाता है।
साधना और उपलब्धियों का उपयोग पैसा कमाने के लिए करें, न ही उन्हें श्रेय की कभी चिंता होती थी।
साधनासंपन्न और समर्थ बन सका है कि उसे सर्वसमर्थ कहा जाने लगा है। विश्वास किया जाना चाहिए कि यह प्रगतिक्रम दिन-दिन आगे ही चलेगा। जो लाभदायक पक्ष हाथ लगा है, उसे छोड़ते नहीं बनता। धरती से खाद्य उत्पादन और पशुपालन के लाभ जब तक विदित न रहे होंगे, तब तक आदिमकाल के मनुष्य का काम किसी अन्य प्रकारों के सहारे भी चल जाता होगा, पर अब जबकि वे विधाएँ उपलब्ध हो गई हैं, यह संभव नहीं रहा कि उनका परित्याग कर दिया जाए । आग से लेकर बिजली तक का प्रयोग जब से व्यवहार में आने लगा है, तब से यह निश्चित हो गया है कि भविष्य में कभी भी इनसे विमुख नहीं हुआ जा सकेगा।
साधना हेतु अपनी कुटी में, कायाकल्प-प्रक्रिया संपन्न करने वालों को एक छोटी कुटिया में रहना पड़ता है। लगभग वैसी ही स्थिति साधकों की रहेगी। इसीलिए उन्हें वैसी ही मनोभूमि बनाकर आने के लिए कहा गया है।
साधना कर रहा हूँ और उससे जो उपलब्धियाँ मिल रही हैं, उन्हें यदि इन लोगों के हाथ बेच दिया तो साधना- पथ में व्यवधान उपस्थित हो जाएगा और यह भी कि इस कारण वह एक साधक की भाँति विज्ञान के क्षेत्र में अपना अस्तित्व खाे देंगे।